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अजरारमरणः सकलार्तिहरः कमलापतिरीड्यतमोवतु नः ॥1॥ (2) ·
अथ खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपासीत सर्वदा समस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ १ ॥ (1) ·
अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपासीत हिङ्कार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ १ ॥ (1) ·
अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ६ ॥ (1) ·
अथ यदवोचं भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ५ ॥ (1) ·
अथ यदवोचं स्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येतदवोचं तदवोचम् ॥ ७ ॥ १५ ॥ (1) ·
अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूंष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥ (1) ·
अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥ (1) ·
अथावृत्तेषु द्यौर्हिङ्कार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम् ॥ २ ॥ (1) ·
अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥ ३ ॥ (1) ·
आदिरिति द्व्यक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत इहैकं तत्समम् ॥ २ ॥ (1) ·
इति देववरस्य हरेः स्तवनं कृतवान् मुनिरुत्तममादरतः । (2) ·
उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान् वृष्टौ पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ३ ॥ (1) ·
एकविंशत्याऽऽदित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥ (1) ·
ओं समस्तस्य खलु साम्न उपासनं साधु यत् खलु साधु तत् सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥ १ ॥ (1) ·
ओम् असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवंशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥ (1) ·
कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान् भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ५ ॥ (1) ·
कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वांल्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ३ ॥ २ ॥ (1) ·
क्वचिदद्यतनोपि न पूर्णसदागणितेड्यगुणानुभवैकतनोः ॥7॥ (2) ·
न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ४ ॥ (1) ·
निजपूर्णसुखामितबोधतनुः परशक्तिरनन्तगुणः परमः । (2) ·
निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥ (1) ·
परमोपि रमेशितुरस्य समो न हि कश्चिदभून्न भविष्यति च । (2) ·
बलिनं निजवैरिणमात्मतमोभिदमीशमनन्तमुपास्व हरिम् ॥5॥ (2) ·
बहुचित्रजगद्बहुधाकरणात् परशक्तिरनन्तगुणः परमः । (2) ·
यदसुप्तिगतोपि हरिः सुखवान् सुखरूपिणमाहुरतो निगमाः । (2) ·
विमलं हि पदं परमं स्वरतं तरुणार्कसवर्णमजस्य हरेः ॥4॥ (2) ·
विमलैः श्रुतिशाणनिशाततमैः सुमनोसिभिराशु निहत्य दृढम् । (2) ·
स य एतदेवंविद्वान् साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥ ४ ॥ १ ॥ (1) ·
स हि विश्वसृजो विभुशम्भुपुरन्दरसूर्यमुखानपरानमरान् । (2) ·
सुखतीर्थापदाभिहितः पठतस्तदिदं भवति ध्रुवमुच्चसुखम् ॥8॥ (2) ·
सुखरूपममुष्य पदं परमं स्मरतस्तु भविष्यति तत्सततम् ॥3॥ (2) ·
सृजतीड्यतमोवति हन्ति निजं पदमापयति प्रणतान्सुधिया ॥6॥ (2) ·
स्मरणे हि परेशितुरस्य विभोर्मलिनानि मनांसि कुतः करणम् । (2) ·
स्वमतिप्रभवं जगदस्य यतः परबोधतनुं च ततः खपतिम् ॥2॥ (2)
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