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| lines | | "नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं सर्वज्ञमच्युतमपेतसमस्तदोषम् ।" |
| "प्राणस्य सर्वचिदचित्परमेश्वरस्य साक्षादधीश्वरमियां शरणं रमेशम् ॥" |
|
|---|
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| lines | | "प्रादुबर्भूव भगवांस्तपसेतराया नारायणोऽब्जजसुतस्य विशालनाम्नः ।" |
| "तस्मिन् गतेऽध्वरमभूत् सुरविप्रसङ्घो निश्चेतनस्तदनु पद्मभवोऽमुमस्तौत् ॥" |
| "तेन स्तुतः(तैः संस्तुतः .हृ) स भगवान् गिरिशेन्द्रमुख्यान् सर्वानबोधयदजेन सहैव तेऽथ ।" |
| "दासत्वमापुरत एव महत्सुराणां दासत्वतः स महिदास इति प्रसिद्धः ॥" |
| "शृण्वत्सु तेषु भगवानवदद्रमायै दिव्यां श्रुतिं स परमोऽतिमुदैतरेयीम् ।" |
| "सा बह्वृचैः प्रपठिता चतुराननास्याद् यस्यां रहस्यमुदितं परमं हि विष्णोः ॥" |
| "महाभूतिः श्रुतिः सैषा महाभूतिर्यतो हरिः ।" |
| "विशेषेणात्र कथितः सर्वज्ञः शाश्वतः प्रभुः ॥ इति ऋक्संहितायाम् ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "एष पन्था एतत्कर्म एतद्ब्रह्मैतत्सत्यम् । तस्मान्न प्रमाद्येत् तन्नातीयान्न ह्यत्यायन् पूर्वे । येऽत्यायंस्ते ह पराबभूवुः ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "एष एव सदा पन्था भगवान् पुरुषोत्तमः ।" |
| "नित्यं स्वप्राप्तिहेतुत्वात्, कर्तृत्वात् कर्म मातृतः ॥" |
| "ब्रह्मैव गुणपूर्णत्वात्, सत्यं साधुस्वरूपतः ।" |
| "क्वापि तं विस्मरेन्नैव त्यक्त्वा तं नेतरं व्रजेत् ॥" |
| "पूर्वे नैनं तत्यजुर्हि ब्रह्माद्यास्तेन संसृतेः ।" |
| "मुक्ताः श्रीश्च तदत्यागान्नित्यमुक्ता गुणाधिका ॥" |
|
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदुक्तमृषिणा-" |
| "‘प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुर्न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे ।" |
| "बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः पवमानो हरित आ विवेशेति ।’(ऋ.सं.८.१०१.१४)इति ।" |
|
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "‘प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुः’इति या वै ता इमाः प्रजास्तिस्रो अत्यायमायंस्तानीमानि वयांसि वङ्गावगधाश्चेरपादाः। ‘न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे’ इति ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| lines | | "विहायस्ययनात् प्रोक्ता वयांसीति पिशाचकाः ।" |
| "वर्तितज्ञानतो वङ्गा नरास्तैरवनं सदा ।" |
| "अन्नरूपैर्गृध्नवो हि वङ्गावगधनामकाः ॥" |
| "राक्षसा असुरा ईरपादा इति समीरिताः ।" |
| "धर्मो ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं चतुरात्मकः ॥" |
| "वायुर्देवोऽत्रासुराणामैश्वर्य गुण एव हि ।" |
| "ईरपादास्ततः प्रोक्तास्ते त्रयो विष्णुमत्यजन् ॥" |
| "पराभूतास्ततस्ते तु तमस्यन्धे निपातिताः ।" |
| "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयप्रघट्टके प्रथमोऽध्यायः ॥" |
|
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ता इमाः प्रजा अर्कमभितो निविष्टा इममेवाग्निम् । बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तरित्यद उ एव बृहद्भुवनेष्वन्तरसावादित्यः । पवमानो हरित आ विविशेति । वायुरेव पवमानो दिशो हरित आविष्टः ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "देवाश्च ऋषयो मर्त्यसत्तमा इति च त्रयः ॥" |
| "आश्रिता विष्णुमेवैकं त्रिस्थानस्थितमच्युतम् ।" |
| "अग्निस्थमाश्रिता मर्त्या विष्णुमर्काभिधं परम् ॥" |
| "आ जनैरर्चितत्वात् स ह्यर्क इत्युच्यते हरिः ।" |
| "अग्नौ कर्माणि कृत्वैव मानुषा मुक्तिभागिनः ॥" |
| "कर्मभिः शुद्धसत्त्वानां कर्मत्यागोऽपि नान्यथा ।" |
| "आश्रिताः सूर्यगं विष्णुम् ऋषयो बृहदित्यसौ ॥" |
| "तेजसा बृंहणादुक्तो, विष्णुरादित्य इत्यपि ।" |
| "आदानात् सर्ववस्तूनाम्, स्वाध्यायेनामुमाश्रिताः ॥" |
| "मुच्यन्ते ऋषयो नित्यं नान्यथा तु कथञ्चन ।" |
| "वायुस्थमाश्रिता देवाः पवमानाभिधं हरिम् ।" |
| "संसारात् पावयित्वा यन्महानन्दे मिनोत्ययम् ॥" |
| "पवमानस्ततो विष्णुः व्याप्तः सर्वासु दिक्षु च ।" |
| "आश्रितो भगवान् सर्वैः सर्वत्रापि, विशेषतः ॥" |
| "आश्रयात् पृथगुक्तोऽयं नित्यानन्दो रमापतिः ॥ १ ॥" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-11" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "उक्थमुक्थमिति वै प्रजा वदन्ति, तदिदमेवोक्थमियमेव पृथिवी । इतो हीदं सर्वमुत्तिष्ठति यदिदं किञ्च । तस्याग्निरर्कः। अन्नमशीतयः, अन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । अन्तरिक्षमेवोक्थम् । अन्तरिक्षं वा अनु पतन्त्यन्तरिक्षमनु धावयन्ति॥" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-12" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तस्य वायुरर्कः। अन्नमशीतयः। अन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । असावेव द्यौरुक्थम् । अमुतः प्रदानाद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठति यदिदं किञ्च । तस्यासावादित्योऽर्कः। अन्नमशीतयः, अन्नेन हीदं सर्वमश्नुते- इत्यधिदैवतम् ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-13" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अथाध्यात्मम्" |
| "- पुरुष एवोक्थम्। अयमेव महान् प्रजापतिरहमुक्थमस्मीति विद्यात् ।" |
| "तस्य मुखमेवोक्थम्। यथा पृथिवी तथा । तस्य वागर्कः। अन्नमशीतयः, अन्नेन हीदं सर्वमश्नुते। नासिके एवोक्थं यथाऽन्तरिक्षं तथा । तस्य प्राणोऽर्कः। अन्नमशीतयः, अन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । तदेतद् ब्रध्नस्य विष्टपं यदेतन्नासिकायै विनतमिव । ललाटमेवोक्थम्॥" |
| "यथा द्यौस्तथा तस्य चक्षुरर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते ॥" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-14" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "समानमशीतयोऽध्यात्मं चैवाधिदैवतं चान्नमेव । अन्नेन हीमानि सर्वाणि भूतानि समनन्ती३ । अन्नेनेमं लोकं जयत्यन्नेनामुम् । तस्मात् समानमशीतयोऽध्यात्मं चाधिदैवतं चान्नमेव।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-15" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदिदम् अन्नम् अन्नादम् इयमेव पृथिवी । ततो हीदं सर्वमुत्तिष्ठति यदिदं किञ्च । यद्ध किञ्चेदं प्रेर्ता३(प्रेता३ इ) इ तदसौ सर्वमत्ति । यदु किञ्चातः प्रैती३ तदियं सर्वमत्ति । सेयमित्याद्याऽत्त्री । अत्ता ह वा आद्यो भवति । न तस्येशेऽयं नाद्याद् यद्वैनं नाद्युः ॥२ ॥" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-16" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "उत्थापनादुक्थनामा स एव पृथिवीस्थितः ।" |
| "प्रथितः पृथिवीनामा, सोऽन्तरिक्षाभिधोऽत्रगः ॥" |
| "अन्तरीक्ष्यो यतो, द्युस्थो द्युनामाऽऽतिप्रकाशनात् ।" |
| "अध्यात्मे च निविष्टोऽसौ पुरुषाख्यो जनार्दनः ॥" |
| "पूर्षु स्थितत्वात्, स महान् प्रजानां पतिरेव च ।" |
| "अहमुक्थमिति ह्येतां विद्यामनुभवत्यसौ ॥" |
| "पृथक्पृथक्च तस्याङ्गान्युक्थानि जगदीशितुः ।" |
| "अग्निवातदिनेशानाम् उत्थानानि पृथक् पृथक् ॥" |
| "वदनं नासिका नेत्रमित्येतानि परात्मनः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-17" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "तृचाशीतिविभिन्नस्य शस्त्रस्यान्नत्वहेतुतः ॥" |
| "विष्णोस्तृचाशीतिवत् स्यात् प्रसिद्धान्नमिति स्फुटम् ।" |
| "अन्नाभिमानिदेवश्च तृचाशीत्याश्च देवता ॥" |
| "सोम एव ततश्चान्नमशीतय इतरितम् ।" |
| "अदनाऽऽघ्राणदृष्ट्याख्यभोगत्रयविभागतः ॥" |
| "मुखनासाचक्षुषां तद्भोग्यमन्नं हरेः श्रुतम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-18" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V03_B03" |
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "अरणं गमनं यस्माद् अर्कः शीघ्रगतित्वतः ॥" |
| "श्येन एव, तदाकारा चितिरर्कपदोदिता ।" |
| "सुपर्णप्रतिमा सा, यत् तदारूढो जनार्दनः ॥" |
| "तस्मात् तस्यार्क इति सा प्रोच्यते वैदिकैः पदैः ।" |
| "योऽसौ चितिगतो वीन्द्रः सोऽग्निवातरविष्वपि ॥" |
| "तथा वाक्प्राणचक्षुष्षु तस्मात् तेऽर्काः प्रकीर्तिताः।" |
| "तेषु स्थिते सुपर्णे च रूपभेदैः पृथक् पृथक् ॥" |
| "स्थितो विष्णुस्तदर्कास्ते तस्मादेव प्रकीर्तिताः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-19" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V03_B04" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "व्याप्तत्वाज्जीवदेहेषु मुखे विष्णोर्मुखं स्मृतम् ॥" |
| "नासयोर्नासिका विष्णोरक्ष्णोरेव तदक्षिणी ।" |
| "जीववाक्प्राणचक्षुष्षु तद्वागाद्यास्ततः स्थिताः ॥" |
| "विष्णोर्वाग्भार्गवो रामो प्राणोऽस्य नरकेसरी ।" |
| "चक्षुस्तु कपिलो विष्णुरग्न्यादीनां च कारणम् ॥" |
| "जीववागादिसंस्थं च सुपर्णमधिसंस्थिताः ।" |
| "अविशेषोऽपि भगवान् पूर्णैश्वर्यस्वरूपतः ॥" |
| "अङ्गाङ्गित्वेनैक एव स्वानन्दानुभवे स्थितः ।" |
| "स एव व्यूह्य चात्मानं पृथग्रूप इव स्थितः ॥" |
| "सुपर्णनामा भगवान् सुपर्णे च व्यवस्थितः ।" |
| "अग्न्यादिषु च तन्नामा वासुदेवः स संस्थितः ॥" |
| "अन्ननामा स एवान्ने चेष्टयन् सर्वमास्थितः ।" |
| "अन्ने स्थितः स एवेशो ह्यन्नदातृगतिप्रदः ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-20" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V03_B05" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "तस्यान्तरिक्षगस्यैव नियमादनुपक्षिणः ।" |
| "पतन्ति धावयन्त्यश्वान् नरादींश्च नरादयः ॥" |
| "परस्य विष्णोर्धामत्वात् सूर्यो ब्रध्न इतीरितः ।" |
| "निहितश्चैव तल्लोको नासिकायां नतस्थले ॥" |
| "पृथिव्यां संस्थितो विष्णुः स्त्रीरूपेण द्युलोकतः ।" |
| "पतितं सर्वमेवात्ति तथा दिवि च संस्थितः ॥" |
| "इतो गतं सर्वमत्ति द्युनामा भगवान् परः ।" |
| "भोग्यत्वादाद्य इत्युक्तः एवमाद्यात्तृरूपवान् ॥" |
| "एक एव परो विष्णुरत्ताऽन्यैरुपजीव्यतः ।" |
| "आद्यो भवति चान्येषाम्, नोपजीव्यो भवेद् यथा ॥" |
| "हरिः स सर्वजीवानाम्, न भुज्यन्ते यथाऽमुना ।" |
| "सर्वे लोकास्तथा कर्तुं नैवेष्टे कश्चन क्वचित् ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-21" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V04" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथातो रेतसः सृष्टिः । प्रजापते रेतो देवाः, देवानां रेतो वर्षम्, वर्षस्य रेत ओषधयः, ओषधीनां रेतोऽन्नं अन्नस्य रेतो रेतः, रेतसो रेतः प्रजाः, प्रजानां रेतो हृदयम्, हृदयस्य रेतो मनः, मनसो रेतो वाक्, वाचो रेतः कर्म । तदिदं कर्म कृतम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-22" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V04_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "स एष भगवान् विष्णुः प्रजापतिरितीरितः ।" |
| "तस्माज्जाताः सर्वदेवा ब्रह्माद्यास्तेभ्य एव च ॥" |
| "वृष्टिः सञ्जायते, तस्याः सर्वा ओषधयोऽभवन् ।" |
| "ओषधीभ्योऽन्नमन्नाच्च रेतो, रेतस एव च ।" |
| "सर्वाः प्रजाः प्रजायन्ते, सङ्कल्पो हृदयाभिधः ॥" |
| "प्रजाभ्यो जायते, तस्माद् विकल्पाख्यं मनस्तथा ।" |
| "विकल्पाद् वाक्प्रचारश्च वाचा नामादिवेदनात् ॥" |
| "कर्म सञ्जायते, तस्मात् कर्मणश्च जगत्पुनः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-23" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अयं पुरुषो ब्रह्मणो लोकः । स इरामयः। यद्धीरामयास्तस्मात् हिरण्मयः। हिरण्मयो ह वा अमुष्मिंल्लोके सम्भवति, हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे, य एवं वेद ॥३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-24" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V04_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "कर्माभिमान्ययं जीवः परस्य ब्रह्मणो हरेः ॥" |
| "आवासस्थानमुद्दिष्टो विशेषात्, स इरामयः ।" |
| "इच्छानुरूपं तु सुखम् इरेत्येव प्रकीर्तितम् ॥" |
| "इच्छानन्दप्रभूतत्वात्, स एव च हिरण्मयः ।" |
| "हिरुक् सुखं हिरण्यं स्याद् बाह्यानन्दात् पृथग् यतः ॥" |
| "आधिक्यार्थे मयड् यस्माद् अधिकानन्दरूपकः ।" |
| "उत्सृज्य कर्मजं रूपं निजानन्दैकरूपकः ॥" |
| "एवं नारायणं जानन् सर्वलोकैककारणम् ।" |
| "तल्लोके दृश्यते भूतैर्मुक्तैरानन्दरूपकः ॥ ३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-25" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V05" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S01" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तं प्रपदाभ्यां प्रापद्यत ब्रह्मेमं पुरुषम् । यत्प्रपदाभ्यां प्रापद्यत ब्रह्मेमं पुरुषं तस्मात् प्रपदे तस्मात् प्रपदे इत्याचक्षते ।" |
| "शफाः खुरा इत्यन्येषां पशूनाम् । तद् ऊर्ध्वमुदसर्पत् तावूरू अभवताम् । उरु गृणीहीत्यब्रवीत् । तदुदरमभवद् । उर्वेव मे कुर्वित्यब्रवीत् । तदुरोऽभवत् । उदरं ब्रह्मेति शार्कराक्ष्या उपासते, हृदयं ब्रह्मेत्यारुणयो ब्रह्मा हैव ता३ ई ।" |
| "ऊर्ध्वं त्वेवोदसर्पत् । तच्छिरोऽश्रयत । यच्छिरोऽश्रयत तच्छिरोऽभवत् । तच्छिरसः शिरस्त्वम् ।" |
| "ता एताः शीर्षच्छ्रियः श्रिताः, चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक्प्राणः, श्रयन्तेऽस्मिञ्च्छ्रियो य एवमेतच्छिरसः शिरस्त्वं वेद ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-26" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V05_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "तमिमं प्रथमज्ञानिपुरुषं चतुराननम् ।" |
| "वासुदेवाभिधं ब्रह्म प्राप प्रपदयोः पुरा ॥" |
| "यस्मात् प्रपेदे भगवान् प्रपदाच्चतुराननम् ।" |
| "तस्मात् प्रपदनादेव प्रपदं नाम कीर्तितम् ॥" |
| "चतुर्मुखाकारवतां नृणां पादतलोपरि ।" |
| "प्रपदाख्या वर्ततेऽतो, न तु पश्वादिनां क्वचित्॥" |
| "अयादूर्ध्वं ततो विष्णुः प्रपदाद् ऊरुमत्र च ।" |
| "स्थित ऊरू च तावास्ताम् ऊरूर्ध्वगमनाद्धरेः ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-27" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S01_V05_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| lines | | "ककिञ्चिदूर्ध्वं ततो गत्वा वायुना सह केशवः ।" |
| "वायुमाहोरुगरणं कुर्वत्र स्थित इत्यपि ॥" |
| "उर्वेव गरणं चक्रे वायुर्यत्र स्थितः सदा ।" |
| "तत्स्थानमुदरं नाम, पुनराह जनार्दनः ॥" |
| "उरु स्थानं निवासं मे कुरु विस्तारसंयुतम् ।" |
| "तथाऽकरोत् स वायुश्च तदुरोऽभूद् उरुत्वतः ॥" |
| "उरोमध्ये च हृदयम्, तत्रवासो (तत्राऽवासो) हरेः सदा ।" |
| "सूक्ष्मदृष्टियुता ये तु मुनयः शार्कराक्ष्यकाः ॥" |
| "उदरे ते परं ब्रह्म वासुदेवमुपासते ।" |
| "हृत्स्थमेव परं विष्णुं ध्यायन्त्यारुणयः सदा ॥" |
| "उदरस्थं च हृद्गं च ते उभे ब्रह्म तत्परम् ।" |
| "एकमेव यतस्तस्माद उभये ह्यपि तद्विदः ॥" |
|
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| lines | | "तत ऊर्ध्वं गतो विष्णुर्वायुना सह दैवतैः ।" |
| "स्थितो मूर्धनि देवेशः श्रितोऽसाविति तच्छिरः ॥" |
| "तत्र प्राणात्मना वायुर्मनोरूपेण शङ्करः ।" |
| "शेषः सुपर्ण इन्द्रश्च मनांस्येव पृथक् पृथक् ॥" |
| "अहम्भावमनो रुद्रः, शेषोऽसौ पाञ्चरात्रकम् ।" |
| "वैदिकं गरुडश्चेन्द्रो यज्ञादिविषयं मनः ॥" |
| "श्रोत्रं चन्द्रो, रविश्चक्षुर्वागग्निः परिकीर्तितः ।" |
| "एते देवास्तदन्ये च सर्वप्राणिषु संस्थितः ॥" |
| "उपासते महाविष्णुं परमात्मानमच्युतम् ।" |
|
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| lines | | "ता अहिंसन्ताहमुक्थमस्म्यहमुक्थमस्मीति । ता अब्रुवन् । हन्तास्माच्छरीरादुत्क्रामाम तद् यस्मिन् न उत्क्रान्त इदं शरीरं पत्स्यति तदुक्थं भविष्यतीति ॥" |
| "वागुदक्रामद् अवदन्नन् अश्नन् पिबन्नास्तैव चक्षुरुदक्रामद् अपश्यन्नश्नन् पिबन्नास्तैव श्रोत्रमुदक्रामदशृण्वन् अश्नन् पिबन्नास्तैव ।" |
| "मन उदक्रामन्मीलित इवाश्नन् पिबन्नास्तैव ।" |
| "प्राण उदक्रामत् प्राण उत्क्रान्तेऽपद्यत तदशीर्यताशारीती३ ।" |
| "तच्छरीरमभवत् । तच्छरीरस्य शरीरत्वम् शीर्यते ह वा अस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यः पराऽस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ।" |
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| lines | | "वाचा हिंसामकुर्वंस्ते विनिन्दन्तः परस्परम् ॥" |
| "ते विष्णोराज्ञयाऽवोचन् ‘उत्क्रमाम पृथक् पृथक् ।" |
| "देहाद् अब्जभवस्यास्माद्, यस्मिन्नुत्क्रान्त एव हि ॥" |
| "शरीरं पद्यते श्रेयान् स न इत्यवधार्यताम् ’।" |
| "ततः क्रमेण चाग्न्याद्या निष्क्रान्तास्तेषु सर्वशः ॥" |
| "निष्क्रान्तेषु न वै पातः शरीरस्याभवत् क्वचित् ।" |
| "वायावुत्क्रान्त एवैतच्छरीरमपतत् क्षितौ ।" |
| "उदासीनवदास्तां तौ केशवश्चाब्जसम्भवः॥" |
| "तेषां बलपरीक्षार्थं वाय्वादीनां च सर्वशः ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "ता अहिंसन्तैव-‘अहमुक्थमस्महमुक्थमस्मि’ इति । ता अब्रुवन्- ‘हन्तेदं पुनः शरीरं प्रविशाम, तद् यस्मिन्नः प्रपन्न इदं शरीरमुत्थास्यति तदुक्थं भविष्यति ’ इति ।" |
| "वाक्प्राविशद्, अशयदेव । चक्षुः प्राविशद्, अशयदेव । श्रोत्रं प्राविशद्, अशयदेव । मनः प्राविशद्, अशयदेव ॥" |
| "प्राणः प्राविशत्, तत् प्राणे प्रपन्न उदतिष्ठत् । तदुक्थमभवत् । तदेतदुक्थं प्राण एव। प्राण उक्थमित्येव विद्यात्।" |
| "तं देवा अब्रुवन्- ‘त्वमुक्थमसि, त्वमिदं सर्वमसि, तव वयं स्मः, त्वमस्माकमसि’ इति ।" |
| "तदप्येतदृषिणोक्तम्- ‘त्वमस्माकं तव स्मसि’ इति ॥४ ॥" |
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|---|
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| lines | | "पुनस्ते प्राविशन् सर्वे वह्निसूर्यौ शशी शिवः ॥" |
| "नोत्थानमभवत् तेषु प्रविष्टेष्वपि सर्वशः ।" |
| "वायौ प्रविष्टे तूत्थानं कायस्यासीत् तदैव च ॥" |
| "उच्चैः स्थितत्वादुक्थोऽभूद् वायुरेव ततः प्रभुः ।" |
| "उच्चत्वं च गुणाधिक्यम्, त्वमुच्चोऽसीति तेऽब्रुवन् ॥" |
| "भृत्या वयं तवैव स्मः त्वमस्माकं पतिः सदा ।" |
| "स्पर्धामहे त्वद्बलेन त्वया, नान्येन केनचित्॥" |
| "इत्यूचुर्वीन्द्रशेषेशशक्रचन्द्रादिकाः पृथक् ।" |
| "वायुः स संस्तुतस्तैश्च प्रसन्नोभूद् दिवौकसाम् ॥ ४ ॥" |
|
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तं देवाः प्राणयन्त । स प्रणीतः प्रातायत । प्रातायीती३ तत्प्रातरभवत् । समागादिती३ तत्सायमभवत् । अहरेव प्राणो, रात्रिरपानः ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "तस्माच्छ्रुत्वा परं ब्रह्म देवा नारायणाभिधम् ॥" |
| "शिष्यप्रशिष्यादिषु च तेऽनयन् वायुनोदितम् ।" |
| "वायुमप्यनयन् सर्वे यशसा तद्गुणोक्तितः ॥" |
| "ये ये गुणान् विजानन्ति वायोस्तान् आविशन् मरुत् ।" |
| "तत्र तत्र प्रविष्टत्वात् प्रततोऽसौ बभूव ह ॥" |
| "प्रततत्वात् प्रातरिति तस्य नामाऽभवद्विभोः ।" |
| "सङ्गतश्चाभवज्जीवचिता रूपान्तरेण सः ।" |
| "सङ्गतत्वात् सायमिति तद् रूपं नामतोऽभवत् ॥" |
| "वायोस्तत्पुनरध्यात्मं प्राणापानाभिधं द्वयम् ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "वागग्निश्चक्षुरसावादित्यश्चन्द्रमा मनः, दिशः श्रोत्रं स एष प्रहितां संयोगोऽध्यात्मम्। इमा देवताः। अद उ आविरधिदैवतम् । इत्येतत् तदुक्तं भवति ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "अध्यात्ममग्निर्वागाख्यश्चक्षुः सूर्यः प्रकीर्तितः ॥" |
| "यज्ञादिसाधने यत्तु मनश्चन्द्रः प्रकीर्तितः ।" |
| "मित्रो(मनो) यमश्च वरुणः कुबेरश्च दिगीश्वराः ॥" |
| "श्रोत्राभिमानिनः सर्वे, वैदिकश्रवणोचितम् ।" |
| "श्रोत्रं चन्द्रस्तथा स्मार्ततान्त्रिकश्रवणोचितम् ॥" |
| "यम एव, षडङ्गानां विषयश्रवणोचितम् ।" |
| "श्रोत्रं तु वरुणः, काम्यशास्त्रार्थं (मन)मित्र एव च ॥" |
| "श्रोत्रं यन्नीतिशास्त्रार्थं कुबेरस्तत्(श्च) प्रकीर्तितः ।" |
| "विष्णुना प्रहितानां हि संयोगोऽध्यात्ममेष हि ॥" |
| "शिवादीनां च सर्वेषां मनस्त्वं कथितं पुरः(रा) ।" |
| "एताः सर्वा देवता हि ब्रह्मवायुसुपर्णकाः ॥" |
| "शेषशङ्करशक्राश्च चन्द्रसूर्ययमा अपि ।" |
| "अग्निश्च मित्रावरुणौ कुबेराद्याश्च सर्वशः ॥" |
| "अधिदैवं स एवैक आधिक्यात् पुरुषोत्तमः ।" |
| "देवमात्रास्तदन्ये तु स आविः पुरुषोत्तमः ॥" |
| "पूर्णज्ञानस्वरूपत्वाद्, एतावत् कथितं भवेत् ।" |
| "तात्पर्यात् सर्ववेदैश्च ..." |
|
|---|
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| id | "Aitareya-37" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "एतद्ध स्म वै तद् । विद्वानाह हिरण्यदन् (वै)बैदः, न तस्येशेऽयं मह्यं न दद्युरिति ॥" |
| "प्रहितां वा अहमध्यात्मं संयोगं निविष्टं वेदैतद्ध । तदनीशानानि ह वा अस्मै भूतानि बलिं हरन्ति य एवं वेद ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "-... तज्जानन्नवदन् मुनिः ॥" |
| "हिरण्यदन्नाम (वै)बैदो, ‘भूतेषु हि सुरानृते ।" |
| "मदभीष्टं ममादातुं नैवेष्टे कश्चनाञ्जसा ॥" |
| "विष्णुना प्रहितानां हि देवानाम् अहमुत्तमम् ।" |
| "वेद संयोगमाध्यात्मम्, ततो मुक्तो यथेष्टभुक् ॥" |
| "स्यान्नैवात्रास्ति सन्देहः, स्वेच्छाविहृतिरेव च ।" |
| "मन्निषेधे न शक्तोऽस्ति प्रीता देवा हि मे सदा ॥" |
| "अधिदैवेन सहिता विष्णुना प्रभविष्णुना’ ।" |
| "एतद्धि तेन कथितं मुनिना तत्त्ववेदिना ॥" |
| "विष्णुप्रहितदेवानां योगमध्यात्ममञ्जसा ।" |
| "वेद तं च नियोक्तारम् उपास्ते विष्णुमव्ययम् ॥" |
| "एतादृशोपासनाया योग्यः सन् सततं सुधीः ।" |
| "स्वस्वाम्यन्यानि भूतानि हरेयुर्बलिमस्य हि ॥" |
| "मुक्तस्य वैष्णवे लोके मुक्तानि च न संशयः ।" |
| "इत्येतद्ध्यानयोगाश्च मुनयो देवतास्तथा ॥" |
| "मानुषा ज्ञानमात्रेण स्वावरैः पूज्यतामियुः ।" |
| "मुक्तामुक्तैर्मुक्तियोग्या इति शास्त्रस्य निर्णयः ॥" |
|
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तत्सत्यम्। सदिति प्राणस्तीत्यन्नं यमित्यसावादित्यः। तदेतत् त्रिवृत्। त्रिवृदिव वै चक्षुः, शुक्लं कृष्णं कनीनिकेति स यदि ह वा अपि मृषा वदति सत्यं हैवास्योदितं भवति, य एवमेतत् सत्यस्य सत्यत्वं वेद ॥ ५ ॥" |
|
|---|
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "स एष भगवान् विष्णुः सत्यमित्यभिधीयते ।" |
| "सर्वोत्तमत्वात् पूर्णत्वात् सर्वज्ञत्वात् तथैव च ॥" |
| "देवतात्रयमन्यच्च पृथक् सत्यमितीर्यते ।" |
| "शेषवीन्द्रशिवादिभ्य उत्तमत्वात् सदैव हि ॥" |
| "वायुः सदिति सम्प्रोक्तः, जीवेषु तु सुपूर्णतः ।" |
| "तीति ब्रह्मा समुद्धिष्टः स एवान्नाभिमानवान् ॥" |
| "अन्नं प्रजापतिरिति श्रुतिरन्या ह्यभाषत ।" |
| "अतिनादात् सदा वेदैरप्यन्नं स चतुर्मुखः ॥" |
| "यमयेत्यदिति य उद्दिष्टो यमयेद् यत्प्रकाशयन्(नात्) ।" |
| "देवतात्त्रयमेतत्तु सहितं सत्यमुच्यते ॥" |
| "शुक्लकृष्णकनीनासु चक्षुषोऽप्येत आस्थिताः ।" |
| "एवं सत्यपदार्थं यो(हि) विज्ञायोपास्त आदरात् ॥" |
| "योग्यस्तस्या उपासाया नैवासत्येन दुष्यति ।" |
| "देवता मुनयश्चैव योग्या अस्या अपि स्फुटम् ।" |
| "मानुषाणां(मनुष्याणां) ज्ञानमात्राद् दोषो नातितरां भवेत् ॥ ५ ॥" |
|
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तस्य वाक् तन्तिः। नामानि दामानि । तदस्येदं वाचा तन्त्या नामभिर्दामभिः सर्वं सितम् । सर्वं हीदं नामानी३ । सर्वं वाचाऽभिवदति । वहन्ति ह वा एनं तन्तिसम्बद्धा य एवं वेद ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-42" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "तस्य नारायणस्यैव सर्ववेदात्मिका हि वाक् ।" |
| "तन्तिरूपा जगद्बन्धे, नाम ब्रह्मादिकं च यत् ।" |
| "विप्रक्षत्रियवैश्यादिरूपं चाखिलमेव तु ॥" |
| "दाम, तेनैव बध्नाति सकलं जगदच्युतः ।" |
| "सर्वे हि नामवन्तोऽत्र सर्वे वेदोदिता अपि ॥" |
| "वेदात्मिक्या यतो वाचा विष्णुर्वदति सोऽखिलम् ।" |
| "य एतद्विष्णुवाचैव बद्धं नामाख्यदामभिः ॥" |
| "ज्ञात्वा जगदुपास्ते तु योग्यः संस्तदुपासने ।" |
| "तं प्रत्येवाखिलान्येव भूतानि सह दैवतैः ॥" |
| "बलिं हरन्ति, पञ्चाथ भूतान्येनं वहन्ति च ।" |
| "योग्यश्चास्या उपासाया योग्यो ब्रह्मपदस्य यः ॥" |
| "भूतयुक्ते रथे तस्मात् स तिष्ठति सुरार्चितः ।" |
| "मुक्तः संश्च तदन्येषां ज्ञानमात्राद् विमुक्तिगैः ॥" |
| "स्वावरैः सेव्यतैव स्यात् कैश्चिदेव क्वचित्क्वचित्।" |
| "तथैव वायुना बद्धं जगदेतत् ततोऽवरम् ॥" |
| "सुपर्णशेषगिरिशशक्रसूर्याद्यमञ्जसा ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तस्योष्णिग् लोमानि, त्वग् गायत्री, त्रिष्टुप् मांसम्, अनुष्टुप् स्नावानि, अस्थि जगती, पङ्क्तिर्मज्जा, प्राणो बृहती । स च्छन्दोभिश्छन्नः, यच्छन्दोभिश्छन्नस्तस्माच्छन्दांसीत्याचक्षते । छादयन्ति ह वा एनं छन्दांसि पापात् कर्मणः, यस्यां कस्याञ्चिद् दिशि कामयते, य एवमेतच्छन्दसां छन्दस्त्वं वेद ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-44" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "विष्णोर्वायोश्च लोमादौ छन्दांस्येवाऽश्रितानि च ।" |
| "विष्णोर्विमुक्तवायोश्च लोमाद्यं तु चिदात्मकम् ॥" |
| "लोमप्राणादिभेदश्च नैव कश्चिच्चिदात्मनि ।" |
| "न्नश्छन्दोभिरेवं स केशवस्तेन चाभिधा ॥" |
| "छन्दांसीत्येव तेषां हि, य एवंविदुपासकः ।" |
| "निवारयन्ति पापेभ्यश्छन्दांसि किमु केशवः ॥" |
| "योग्या अस्याश्च विद्यायाः भृग्वाद्या देवतास्तथा ।" |
| "छन्दस्सु संस्थितो विष्णुर्गोपायत्येव तद्विदम् ॥" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-45" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तदुक्तमृषिणा- ‘अपश्यं गोपाम्’(ऋ.सं.१.१६४.३१) इत्येष वै गोपा, एष हीदं सर्वं गोपायति । ‘अनिपद्यमानम्’ इति न ह्येष कदाचन संविशति । ‘आ च परा च पथिभिश्चरन्तम्’ इत्या च ह्येष परा च पथिभिश्चरति । ‘स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान’ इति सध्रीचीश्च ह्येष विषूचीश्च वस्ते, इमा एव दिशः । ‘आवरीवर्ति भुवनेष्वन्तः’ इत्येष ह्यन्तर्भुवनेष्वावरीवर्ति ॥" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-46" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "मन्त्रोऽप्यर्थमिमं प्राहापश्यं गोपामिति स्म ह ।" |
| "एष गोप्ता हि सर्वस्य वायुस्थः पुरुषोत्तमः ॥" |
| "छन्दस्सु संस्थितो वायुर्वायौ च स जनार्दनः ।" |
| "वायुश्च वायुसंस्थश्च कदाचिन्न हि (नैव) तिष्ठतः ॥" |
| "वायुर्हि नित्यसञ्चारी सदा सर्वप्रवृत्तिमान् ।" |
| "चोदितः केशवेनैव तत्स्थेनामितशक्तिना ॥" |
| "आसमन्तात् पराक्चापि पञ्चभूतेभ्य ईश्वरः ।" |
| "वायुस्तत्स्थो हरिश्चैव चरत्यमितपौरुषः ॥" |
| "सध्रीचीनासु पूर्वादिदिक्ष्वेतौ चतसृष्वपि ।" |
| "नित्यदा वसतः कोणदिक्ष्वथाऽसु विषूचिषु ॥" |
| "अन्तश्च सर्वलोकेषु चरतो लोकसाक्षिणौ ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-47" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथो ‘आवृतासोऽवतासो न कर्तृभिः’ इति, सर्वं हीदं प्राणेनाऽवृतम् । सोऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धः । तद्यथाऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्ध एवं सर्वाणि भूतान्यापिपीलिकाभ्यः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धानीत्येवं विद्यात् ॥६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-48" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "हस्तयोरेतयोरेव नित्याक्षीणं वसु स्थितम् ॥" |
| "तद्ध्यसह्यं बलं वायोरनन्तं, किमु तद्धरेः ।" |
| "वायोराधारभूतस्य, ताभ्यां हि क्रतुनामकाः ॥" |
| "आवृताः सर्वजीवा हि यथैव कनकावटाः ।" |
| "आच्छाद्यन्ते वित्तवद्भिस्ताभ्यामेवं च चेतनाः ॥" |
| "आवृता महदाद्यै(द्या)स्तु देहे तिष्ठन्ति चैतयोः ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-49" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "विष्टब्धाश्चैव सर्वेऽपि जीवा आकाश एव च ॥" |
| "स वायुः प्रकृतिश्चैव विष्टब्धौ केशवेन हि ।" |
| "बृहत्वाद् बृहतीत्येव तयोर्नाम प्रकीर्तितम् ॥" |
| "वायुकेशवयोः प्राणनाम सर्वप्रणायनात् ।" |
| "विशेषतो(विशेषेण) बृहत्प्राणो भगवांस्तत्र केशवः ॥" |
| "इति विद्यात् ... ॥ ६ ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अथाऽतो विभूतयोऽस्य पुरुषस्य । तस्य वाचा सृष्टौ पृथिवी चाग्निश्च । अस्यामोषधयो जायन्ते । अग्निरेनाः स्वदयतीदमाहरतेदमाहरतेति । एवमेतौ वाचं पितरं परिचरतः पृथिवी चाग्निश्च ।" |
| "यावदनु पृथिवी यावदन्वग्निस्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतयोर्न जीर्यते पृथिव्याश्चाग्नेश्च य एवमेतां वाचो विभूतिं वेद ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "... तस्य विष्णोरङ्गानामथ वैभवम् ।" |
| "उच्यते तस्य वाचा हि सृष्टावग्निः क्षितिस्तथा ॥" |
| "शुश्रूषार्थं(षार्थे) तस्य पृथ्वी जनयत्योषधीः प्रभोः ।" |
| "ताः पचत्यग्निरुद्युक्त आहृता आहृताः पुनः ॥" |
| "आहरेति वचोऽस्यापि शृण्वन्त्येव महर्षयः ।" |
| "मुखजत्वात् तयोर्विष्णोर्मुखं जनकमिष्यते ॥" |
| "आस्यभोग्यं ततो विष्णोरन्नं तौ कुरुतः सदा ।" |
| "सर्वैर्यद्भुज्यते चान्नं तत्र तत्र स्थितो हरिः ॥" |
| "तद्भुङ्क्तेऽतस्तदर्थं हि तावन्नं कुरुतस्सदा ।" |
| "विष्णोर्वाग्विभवं वेद य उपास्ते च सर्वदा ॥" |
| "योग्यः संस्तदुपासायाः स भूम्यग्निसमन्वितः ।" |
| "समं तयोर्व्याप्तिमांश्च तद्वन्मुक्तश्च नित्यदा ॥" |
| "अनष्टलोको वसति समीपे केशवस्य च ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "योग्या अस्या उपासायाः पृथिव्यग्निपदस्य ये ॥" |
| "योग्यास्ते वै मुख्यतया, तदन्ये तत्र तौ स्थितौ ।" |
| "तत्र चर्तुं समर्था स्युर्मुक्तिं प्राप्य यथेच्छया(यदृचछया .प्र.पा) ॥" |
| "कादाचित्कोपासने तु, तावत् तेषां च योग्यता ।" |
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| lines | | "वेदनं ह्यापरोक्ष्येण मुख्यं भवति नान्यथा ॥" |
| "एकदेशविदो यस्मात् परोक्षज्ञानिनोऽखिलाः ।" |
| "आपरोक्ष्यं भवेद् यस्मान्नैवोपासामृते क्वचित्॥" |
| "तस्मादुपासापूर्वं तु योऽपरोक्षं प्रपश्यति ।" |
| "स एव वेद, नान्यस्तु, योग्यस्यैवापरोक्षदृक् ॥" |
| "तस्माद्योग्यस्योक्तफलम् अन्येषां किञ्चिदेव हि ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "प्राणेन सृष्टावन्तरिक्षं च वायुश्च । अन्तरिक्षं वा अनु चरन्त्यन्तरिक्षमनु शृण्वन्ति । वायुरस्मै पुण्यं गन्धमावहति । एवमेतौ प्राणं पितरं परिचरतोऽन्तरिक्षं च वायुश्च । यावदन्वन्तरिक्षं यावदनु वायुस्तावानस्य लोको भवति, नास्य तावल्लोको जीर्यते, यावदेतयोर्न जीर्यतेऽन्तरिक्षस्य च वायोश्च य एवमेतां प्राणस्य विभूतिं वेद ।" |
| "चक्षुषा सृष्टौ द्यौश्चाऽदित्यश्च । द्यौर्हास्मै वृष्टिमन्नाद्यं सम्प्रयच्छति। आदित्योऽस्य ज्योतिः प्रकाशं करोत्येवमेतौ चक्षुः पितरं परिचरतो द्यौश्चाऽदित्यश्च । यावदनु द्यौर्यावदन्वादित्यस्तावानस्य लोको भवति, नास्य तावल्लोको जीर्यते, यावदेतयोर्न जीर्यते दिवश्चाऽदित्यस्य च, य एवमेतां चक्षुषो विभूतिं वेद ।" |
| "श्रोत्रेण सृष्टा दिशश्च चन्द्रमाश्च । दिग्भ्यो हैनमायान्ती३, दिग्भ्यो विशृणोति । चन्द्रमा अस्मै पूर्वपक्षापरपक्षान् विचिनोति पुण्याय कर्मणे । एवमेते श्रोत्रं पितरं परिचरन्ति दिशश्च चन्द्रमाश्च । यावदनु दिशो यावदनु चन्द्रमास्तावानस्य लोको भवति, नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतेषां न जीर्यते दिशां च चन्द्रमसश्च य एवमेतां श्रोत्रस्य विभूतिं वेद ।" |
| "मनसा सृष्टा आपश्च वरुणश्च । आपो हास्मै श्रद्धां सन्नमन्ते पुण्याय कर्मणे । वरुणोऽस्य प्रजां धर्मेण दाधार । एवमेते मनः पितरं परिचरन्त्यापश्च वरुणश्च । यावदन्वापो यावदनु वरुणस्तावानस्य लोको भवति, नास्य तावल्लोको जीर्यते, यावदेतेषां न जीर्यतेऽपां च वरुणस्य च य एवमेतां मनसो विभूतिं वेद ॥ ७ ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "प्राणादिभ्यश्च वाय्वाद्या एवं विष्णोः प्रजज्ञिरे ॥" |
| "ब्रह्मशेषसुपर्णेन्द्रशिवाद्या आप ईरिताः ।" |
| "ते विष्णोर्मनसा जाताः सर्वे चाबभिमानिनः ॥" |
| "वैश्वदेव्यस्ततो ह्यापो, वरुणश्च मनोभवः ।" |
| "प्राणिनां पूर्तपुण्येषु श्रद्धारूपमनोऽधिपः ॥" |
| "एवं (हि) सर्वा देवता हि विष्ण्वङ्गेभ्यः प्रजज्ञिरे ।" |
| "स्वोत्पत्त्यङ्गं च ते विष्णोः शुश्रूषन्ते पृथक् पृथक् ॥" |
| "विष्णोः विषयधर्मेषु ज्ञानादिषु चतुर्मुखः ।" |
| "श्रद्धां ददाति भूतानाम्, वैदिकश्रवणे विपः ॥" |
| "तान्त्रिके शेषरुद्रौ च शक्रो यज्ञादिकर्मणि ।" |
| "वायुर्गन्धवहश्चास्य भक्तिज्ञानप्रदस्तथा ॥" |
| "भूतानां तस्य विषये, त्वन्तरिक्षं च कर्मणः ।" |
| "तदीयस्यैव भोगार्थं जीवानाम्, श्रुतिचारदम् ॥" |
| "अन्तरिक्षं च विघ्नेशः, सूर्यस्तत्कर्मसिद्धये ।" |
| "भूतानां ज्योतिषो दाता द्यौरप्यन्नाद्यदायिनी ॥७ ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "आपा३ इति। आप इति । तदिदमाप एव । इदं वै मूलम्, अदस्तूलम्। अयं पिता, एते पुत्राः। यत्र ह क्वच पुत्रस्य तत्पितुः। यत्र वा पितुस्तत्पुत्रस्य। इत्येतत् तदुक्तं भवति।" |
| "एतद्ध स्म वै तद् विद्वानाह महिदास ऐतरेयः। आऽहं मां देवेभ्यो वेदा, ओ मद् देवान् वेद। इतः प्रदाना ह्येते। इतः सम्भृता इति ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "आप इत्येव देवानां ब्रह्मादीनां कथं भवेत् ।" |
| "नामेत्यपृच्छल्लक्ष्मीस्तं महिदासं जनार्दनम् ॥" |
| "आप इत्येव नामैषां भवतीत्याह स प्रभुः ।" |
| "इदं मदाख्यं यद् ब्रह्म ह्याप इत्यभिधीयते ॥" |
| "आ पूर्णत्वाद् गुणैः सर्वैस्तन्मूलमखिलस्य च ।" |
| "तूलभूतं तदन्यत् तु, पिता ह्येष जनार्दनः ॥" |
| "पुत्रा ब्रह्मादयः सर्वे, नैवायं वृक्षमूलवत् ।" |
| "स्वतन्त्रत्वाज्जगन्नाथः, पितृत्वात् परमेशितुः ॥" |
| "तन्नामाऽप इति ह्येतद् ब्रह्मरुद्रादिनां भवेत् ।" |
| "यथा यदव इत्येव रघवः कुरवस्तथा ॥" |
| "पुत्रनाम पितुश्च स्यात् तत्तन्त्रत्वात् सुतस्य हि ।" |
| "यथा पितामहाद्याश्च पितरो नाम कीर्तिताः ॥" |
| "तथापि मुख्यया वृत्त्या व्यवहारव्यवस्थितिः ।" |
| "आप इत्येव देवानां सर्वेषां प्रददौ हरिः ॥" |
| "स्वकीयमेवमन्यानि पृथक् पृथगदात् प्रभुः ।" |
| "नारायणादिनामानि ददौ नान्यस्य केशवः ॥" |
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| lines | | "एवं स भगवान् विष्णुर्महिदासाभिधः प्रभुः ।" |
| "जानन्नित्योदितज्ञानादाह देवीमिदं वचः ॥" |
| "देवपर्यन्तम् आ व्याप्तिं वेदाहं मम सर्वदा ।" |
| "मत्पर्यन्तं (य)तथा व्याप्तिं देवानामपि सर्वशः ॥" |
| "मयि देवास्तेषु चाहमिति विद्धिवरानने ।" |
| "मयैतानि प्रदत्तानि पदानि ब्रह्मपूर्वकाः ॥" |
| "अधितिष्ठन्ति, सत्ताद्या अप्येतेषां मदाज्ञया ।" |
| "ज्ञानकर्मबलेहाद्या मद्दत्ता इति किं वदे ॥" |
| "सम्भृता मत्त एवैते,......।" |
|
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| lines | | "स एष गिरिश्चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् प्राणः । तं ब्रह्मगिरिरित्याचक्षते । गिरति ह वै द्विषन्तं पाप्मानं भ्रातृव्यम्, पराऽस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | ". ... स एष भगवान् गिरिः ।" |
| "(गि)गरणात् सर्वभूतानाम्, चक्षुर्नामास्य दर्शनात् ॥" |
| "सर्वश्रोतृत्वतः श्रोत्रम्, मनो मन्तृत्वहेतुतः ।" |
| "प्राणनामा प्रणेतृत्वात्, तमेनं गुणपूर्तितः ॥" |
| "गिरणाच्चाखिलस्यास्य प्राहुर्ब्रह्मगिरिं प्रभुम् ।" |
| "य एवं वेद तं विष्णुम् आपरोक्ष्येण शाश्वतम् ॥" |
| "गिरत्येवाखिलं पापं भ्रातृवत् सह संस्थितम्म् ।" |
| "पराभवति पाप्माऽस्य द्वेष्टा निरयगः सदा ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "स एषोऽसुः । स एष प्राणः । स एष भूतिश्चाभूतिश्च। तं भूतिरिति देवा उपासाञ्चक्रिरे । ते बभूवुः । तस्माद्धाप्येतर्हि सुप्तो भूर्भूररित्येव प्रश्वसिति । अभूतिरित्यसुराः । ते ह पराबभूवुः। भवत्यात्मना, पराऽस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति, य एवं वेद ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "असनाद्भगवान् सोऽसुः सर्वस्यापि जनार्दनः ।" |
| "प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते ॥" |
| "स एष भूतिनामाऽपि ज्ञानैश्वर्यादिभूतिदः ।" |
| "अज्ञानादिप्रदातृत्वात् स एवाभूतिनामकः ॥" |
| "सुखज्ञानादिगुणदं पूर्णं सर्वगुणैः प्रभुम् ।" |
| "उपासते तं वाय्वाद्या देवास्तस्माच्च तेऽखिलाः ॥" |
| "बभूवुः सुखसज्ज्ञानपूर्वैः सर्वैर्गुणैर्युताः ।" |
| "देवानामपि सर्वेषां प्रधानोऽद्यापि मारुतः ॥" |
| "स्थित्वा सुप्तेषु विष्णुं तं भूर्भूरित्येव शंसति ।" |
| "भूःशब्दार्थो भूतिरिति, वैपरीत्येन चासुराः ॥" |
| "अभूतिकारको(अभूतिकारणः .हृ)ऽस्माकमैश्वर्यादिगुणोज्झितिः ।" |
| "इत्येवोपासते, तस्मात् पराभूताश्च सर्वशः ॥" |
| "ज्ञानैश्वर्यादिभिर्हीनाः पेतुरन्धे तमस्यथ ।" |
| "य एवं वेद तं विष्णुं भूतिदं भूतिरूपिणम् ॥" |
| "भावाभावं च देवानां दैत्यानां चैवमेव तु ।" |
| "ज्ञानैश्वर्यादिभिः सोऽपि भवेत् तस्य परात्मनः ॥" |
| "प्रसादात् तस्य पाप्मा च पराभवति सर्वशः ।" |
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|---|
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| id | "Aitareya-63" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "स एष मृत्युश्चैवामृतं च । तदुक्तमृषिणा– ‘अपाङ् प्राङेति स्वधया गृभीतः’ इति । अपानेन ह्ययं यतः प्राणो न पराङ् भवति । ‘अमर्त्यो मर्त्येना स योनिः’इति, एतेन हीदं सर्वं सयोनि, मर्त्यानि हीमानि शरीराणी३, अमृतैषा देवता । ‘ता शश्वन्ता विषूचीना वियन्ता न्य१न्यं चिक्युर्न निचिक्युरन्यम्’ इति, निचिन्वन्ति हैवेमानि शरीराणी३, अमृतैवैषा देवता । अमृतो ह वा अमुष्मिन् लोके सम्भवति, अमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे, य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "स एष भगवान् विष्णुर्मृत्युदो मोक्षदस्तथा ॥" |
| "स एव जीवनकरो यदाऽपानेन संयुतम् ।" |
| "प्राणं नियमयत्यस्मिञ्च्छरीरे पुरुषोत्तमः ॥" |
| "शरीराद् बहिरेतौ तु यदा निःसारयत्यजः ।" |
| "तदा मृत्युप्रदश्चायम्, मुक्तानामपि जीवनम् ॥" |
| "प्राणादेव हि, तत्रापि प्राणाधारो जनार्दनः ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-65" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "अर्वाक् प्राक् च सदा गच्छेद् वायुरानन्दरूपिणा ॥" |
| "अनेनैव गृहीतो हि प्राणोऽपानेन संयुतः ।" |
| "अनेन हरिणा यस्मान्नियतो न पराङ् भवेत् ॥" |
| "अमर्त्यस्तत्प्रसादेन वायुर्देहैः सह स्थितः ।" |
| "अनित्या अपि देहास्ते शश्वत् सन्त्याविमोक्षतः ॥" |
| "स्थूलसूक्ष्मविभागेन, किमु वायुर्जगत्प्रभुः ।" |
| "नानागती (तु)च तावेतौ, वायुः प्राप्नोति केशवम् ॥" |
| "शरीरं तु विनष्टं स्यात् पञ्चत्वमुपगच्छति ।" |
| "जडं तज्जडतामेति, चेतना वायुदेवता ॥" |
| "चेतनेशं हरिं याति, विरुद्धगमनौ च तौ ।" |
| "ऊर्ध्वं गच्छति देवः सः, देहोऽधः पतति क्षितौ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "दृश्यते तच्छरीरं चाप्यदृश्या वायुदेवता ।" |
| "य एवं वेद तं वायुम् अमृतं सर्वनायकम् ॥" |
| "पूर्णानन्देन हरिणा गृहीतं तद्वशं सदा ।" |
| "स मुक्तो लोकमाप्नोति विष्णोर्मुक्तैश्च दृश्यते ॥ इति च ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-67" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "‘ब्रह्म’ ‘पन्थाः’ ‘सत्यं’ ‘कर्म’ इति तस्य नारायणस्य वासुदेवाद्याः क्रमेण चतस्रो मूर्तयः । नासिकायां यन्नेत्रयोर्मध्ये विनतमिव किञ्चिन्नतस्थानं तत् सूर्यलोकस्थानीयं विद्यात् ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-68" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "तथा इति निर्णयः। ‘इरामया’(पृ.सं) इति दैर्घ्यमवधारणार्थम् ।‘दैर्घ्यं प्लुतं च हिङ्कारो बिन्दुरप्यवधारणे’ इति शब्दनिर्णये । ब्रह्मा हैव ता इ ते ।" |
| "देशतः कालतोऽर्थाच्च बलतो गुणतस्तथा ।" |
| "स्वरूपतोऽपि नैव स्याद् भेदोऽत्यल्पोऽपि यत्र हि ॥" |
| "केवलैश्वर्ययोगेन यत्र सङ्ख्या दिवद् भवेत् ।" |
| "स्वरस्पर्शविभागेन तत्रोक्तिः स्याद् विभक्तिषु ॥" |
| "अचिन्त्यादेव (तु) (तथै)चैश्वर्याद् एकोऽपि बहुरूपवान् ।" |
| "प्रकाशयेद्यतो विष्णुः सर्वत्राप्यविशेषवान् ॥" |
| "न विशेषो हि रूपाणां मत्स्यादीनां कथञ्चन ।" |
| "नैश्वर्ये न बले चैव नाऽनन्दादिगुणेष्वपि ॥" |
| "इत्यादिशब्दनिर्णयवचनाद् द्विवचनम् अत्र व्यवहारमात्रम् इति दर्शयितुं ता इत्युक्तम् ।" |
| "संहितायां यत्र दैर्घ्यं पदे यत्र न विद्यते ।" |
| "उक्तार्थस्य महाधिक्यं श्रुतेस्तत्र विवक्षितम् ॥" |
| "इति, अतो ब्रह्मा ह इति दैर्घ्यमपि परब्रह्मत्वविवक्षया ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-69" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "अद उ एव नारायणाख्यमधिदैवतम्, अन्यानि दैवतमात्राणि । स्थानान्तरेऽन्येषामपि अधिदैवत्वकथनम् कर्मजदेवाद्यपेक्षया। मुख्याधिदैवतं नारायण एव ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "स्योष्णिग् लोमानि इत्यादि ‘लोमसूष्णिग्’ इत्याद्यर्थे । ‘सप्तसु प्रथमा’ इति सूत्रात् । सच्छन्दोऽभिश्छन्न इति वाक्यशेषात् । ‘ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्’(ऋ.सं.१०.९०.१२) इत्यादिवच्च ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "<span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">‘अङ्गेषु यस्य छन्दांसि देवा लोका मखा अपि ।" |
| "तद्वशा नियता नित्यं नमस्तस्मै परात्मने ॥’</span> इति स्कान्दे ।" |
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| lines | | "अस्मै.... पुण्याय कर्मण इति। एतमुद्दिश्य जीवानां पुण्यकर्म कर्तुम् । तैर्हि स्तुत्यादिकर्माणि कृतानि श्रोत्रेण शृणोति भगवान् । दिग्भ्योऽप्यन्य एव विशृणोति जीवः । अन्येषां जीवानां श्रवणजं भोगं स्वश्रोत्रेण दिग्भिरननुगृहीतेनैव भगवान् भुङ्क्ते।" |
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| lines | | "न च जीववागादिना पृथिव्यग्नादिकं सृष्टमित्यत्र किञ्चिन्मानमस्ति । ‘मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च’(ऋ.सं.१०.९०.१३) इत्यादिना भगवतः सकाशाद्धि सर्वेषां सृष्टिः प्रसिद्धा । सृष्टिभेदाद् अन्यथावचनम् । न च मुख्यकारणाङ्गीकारेऽविरोध औपचारिककारणमङ्गीकर्तुं युक्तम् , अतिप्रसङ्गात् । न हि यत्ककिञ्चित् कारणत्वमस्तीत्येतावता ब्राह्मणस्य चण्डालः पितेत्युच्यते । पितृत्वं चात्रोक्तं ‘वाचं पितरम्’ इत्यादिना ।" |
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| lines | | "मनुष्याणां तु यत्कर्म न देवोत्पत्तिकारणम् ।" |
| "दैवतैरुपकारस्तु क्रियते नरकर्मणाम् ॥" |
| "देवानां कर्मणैवैते जायन्ते सर्वमानुषाः ।" |
| "प्रधानत्वान्न देवानां नृकर्मोत्पत्तिकारणम् ॥ इति च ब्रह्माण्डे ।" |
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| lines | | "आह महिदास ऐतरेय इति तु सर्वस्य वचनस्य तदीयत्वप्रकाशनार्थम्(ज्ञापनार्थम्), न तु सन्निहितस्यैव । यथा ‘इन्द्रं कुत्स’ इत्यादि । यथा च ‘पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात्’(ब्र.सू.३.२.४२) इत्यादि(इति० ॥ ८ ॥" |
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| lines | | "एष इमं लोकमभ्यार्चत् पुरुषरूपेण, य एष तपति प्राणो वाव तदभ्यार्चत् प्राणो ह्येष य एष तपति ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "एष नारायणो देवो वायुना सहेैवेमं लोकमभ्यार्चत् । ब्रह्मादिशरीरेषु प्रविवेश । पुरुष इत्यन्तर्यामिरूपस्याख्या । ‘पुरि शेते’ इति । प्रसिद्धत्वाच्च पञ्चरात्रेषु ।" |
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| lines | | "य एष सूर्यमण्डले स्थित्वा तपति भगवान् स नारायणः । ‘य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद’(बृ.भा.५.७.९) इत्यादिश्रुतिभ्यः । ‘य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते’(छां.उ.१.६.६) इत्युक्त्वा ‘तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी’(छां.उ.१.७.६) इत्युक्तत्वान्न शिवादयः । शिवो हि विरूपाक्षः । प्रसिद्धश्च पुण्डरीकाक्ष इति भगवान्नारायणः ।" |
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| lines | | "‘यमादित्यो न वेद’ इत्युक्तत्वान्नादित्यः। ‘ओं भेदव्यपदेशाच्चान्यः’(ब्र.सू.१.१.२१) इति भगवद्वचनम् ।" |
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| lines | | "‘वृत्रं यदिन्द्र शवसाऽवधीरहिमादित् सूर्यं दिव्यारोहयो दृशे ।" |
| "यत्सूर्यस्य हरितः पतन्तीः पुरस्सतीरुपरा एतसे कः ॥" |
| "सीदन्निन्द्रस्य जठरे कनिक्रदन्नृभिर्यतस्सूर्यमारोहयो दिवि’।(ऋ.सं.१०.९०.१३)" |
| "‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोस्सूर्यो अजायत ।’ (ऋ.सं.८.४.२९)" |
| "‘यस्सूर्यं य उषसं जजान यो अपां नेता स जनास इन्द्रः ।" |
| "उद्वेति प्रसविता जनानां महान् केतुरर्णवः सूर्यस्य’।(ऋ.सं.२.१२.७)" |
| "‘येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्यस्तपति तेजसा भ्राजसा च ।" |
| "यमन्तः समुद्रे कवयो वयन्ति यदक्षरे परमे प्रजाः’।(म.ना.उ.१.३)" |
| "‘तमेताः पञ्चदेवताः परिम्रियन्ते विद्युद्वृष्टिश्चन्द्रमा आदित्योऽग्निः’ इत्यादौ सूर्यस्य सर्वत्र पराधीनत्वावगतेश्च ।" |
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| lines | | "‘ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्तीनारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः ।" |
| "केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः ॥’(तं.सासं. उ.प्र.व.अ.६२.श्लो.१७) इति नारसिंहपुराणे ।" |
| "‘तापनी पाचिका चैव शोषणी च प्रकाशनी ।" |
| "नैव राजन् रवेः शक्तिः शक्तिर्नारायणस्य सा ॥ इति पाद्मे ।" |
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| lines | | "‘यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।" |
| "यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥’(भ.गी.१५.१२) इति च ।" |
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| lines | | "न च विष्णोरन्याधीनत्वं श्रुतिषूक्तं कुत्रचित् । उत्पत्तिस्तु प्रादुर्भावापेक्षया । ‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’(महोपनिषत्.१) इति महाप्रलये तस्यैवावस्थानश्रुतेः । ‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्’(ऋ.सं.१०.१२५.५) इत्यादि ब्रह्मशिवादीनां देव्यधीनपद-प्राप्तिमुक्त्वा तस्या अपि भगवदधीनत्वं ‘मम योनिरप्स्वं१तः समुद्रे । ततो वितिष्ठे भुवना नु विश्वा। परो दिवा पर एना पृथिव्या’(ऋ.सं.१०.१२५.७) इत्याह । ‘अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ । अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्’(ऋ.सं.१०.१२५.६-७) इति ब्रह्मरुद्रयोर्देव्याः सकाशात् सृष्टिसंहारौ चोक्तौ ।" |
| "‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।" |
| "विदेहि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत् ॥’(ऋ.सं.७.४०.५)" |
| "इत्यादिना विष्णोः प्रसादादेव शिवादीनां पदप्राप्तिकथनाच्च ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते। तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्त’(बृ.२.२.२) इत्यादिना शिवादिसर्वदेवोपास्यस्य वायोः ‘अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः’(बृ.२.२.१) इति मध्यमप्राण-शब्दोक्तस्य ‘प्राणः स्थूणा’(बृ.२.२.१) इति प्राणशब्दोदितो नारायण आश्रय उक्तः । तस्मात् सर्वोत्तमो भगवान् नारायणः प्राणशब्दोदित आदित्य-मण्डलस्थस्तपतीत्यादि सिद्धम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तं शतं वर्षाण्यभ्यार्चत् तस्माच्छतं वर्षाणि पुरुषायुषो भवन्ति । तं यच्छतं वर्षाण्यर्भ्याचत्, तस्माच्छतर्चिनस्तस्माच्छतर्चिन इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "‘क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः ।" |
| "आजानजाः कर्मदेवास्तात्त्विका दक्ष एव च ॥" |
| "शक्रश्चोमा च रुद्रश्च भारती वायुरेव च ।" |
| "मुक्ता उक्ताः शतगुणा बलज्ञानसुखादिभिः ॥" |
| "विष्णुभक्त्यादिभिश्चैव गुणैः सर्वैः क्रमाधिकाः ।" |
| "तस्माद्रमा ततो विष्णुरनन्तगुणतोऽधिकः ॥" |
| "नित्यमुक्तः स्वतन्त्रश्च न चान्यस्तादृशः क्वचित् ।" |
| "कुत एवाधिकोऽन्यः स्याद् यन्मुक्ता अपि तद्वशाः ॥" |
| "रमाऽपि तद्वशा नित्यं स नान्यस्य वशे प्रभुः ।" |
| "न भेदः शेषशिवयोः सुपर्णः शेषसंमितः ॥" |
| "कामः शक्रसमो नित्यं प्रतिबिम्बाश्च ते क्रमात् ॥’" |
| "इति च महासंहितायाम् ॥" |
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|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "स इदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च, तस्मात् मध्यमास्तस्मात् मध्यमा इत्याचक्षते। एतमेव सन्तम् ।" |
| "प्राणो वै गृत्सोऽपानो मदः । स यत्प्राणो गृत्सोऽपानो मदस्तस्मात् गृत्समदः। तस्माद् गृत्समद इत्याचक्षते । एतमेव सन्तम् ।" |
| "तस्येदं विश्वं मित्रमासीद् । यदिदं किञ्च तद्यदस्येदं विश्वं मित्रमासीद् । यदिदं किञ्च तस्मात् विश्वामित्रस्तस्माद्विश्वामित्र इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।" |
| "तं देवा अब्रुवन् - अयं वै नः सर्वेषां वाम इति तं यद्देवा अब्रुवन्नयं वै नः सर्वेषां वाम इति तस्माद्वामदेवस्तस्माद् वामदेव इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।" |
| "स इदं सर्वं पाप्मनोऽत्रायत यदिदं किञ्च स यदिदं सर्वं पाप्मनोऽत्रायत यदिदं किञ्च तस्माद् अत्रयस्तस्मादत्रय इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ॥ १ ॥" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "स पुरुषेषु शतवर्षं गत इति शतर्चिनामा । बहुरूपत्वाद् बहुवचनम् । एतमेव तथासन्तं मुख्यत आचक्षते, ऋषींस्तूपचारतः । आत्मन उदरे धृतवान् मध्ये स्थित्वा धृतवांश्च ।" |
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|---|
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| id | "Aitareya-90" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S02" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "प्राणस्थः प्राणनामासावपानेऽपाननामकः ।" |
| "नेतृत्वाच्चापनेतृत्वाद् भगवान् पुरुषोत्तमः ॥इति च ।" |
| "वामो भद्रः ॥ १ ॥" |
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|---|
|
| id | "Aitareya-91" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "एष उ एव बिभ्रद्वाजः । प्रजा वै वाजस्ता एष बिभर्ति यद् बिभर्ति तस्मात् भारद्वाजस्तस्मात् भारद्वाज इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।" |
| "तं देवा अब्रुवन् ‘अयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ’ इति तं यद्देवा अब्रुवन्नयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ इति तस्माद्वसिष्ठः। तस्माद्वसिष्ठ इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।" |
| "स इदं सर्वम् अभिप्रागाद् यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वमभिप्रागाद्यदिदं किञ्च, तस्मात् प्रगाथाः । तस्मात् प्रगाथा इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।" |
| "स इदं सर्वमभ्यपवयत यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वमभ्यपवयत यदिदं किञ्च, तस्मात् पावमान्यः। तस्मात् पावमान्य इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।" |
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|---|
|
| id | "Aitareya-92" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "वसिष्ठः वसतामुत्तमः । अभ्यपवयत पावयामास संसारात् ।" |
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|---|
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| id | "Aitareya-93" |
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| oldKey | "AIT_C02_S02_V05" |
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| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "सोऽब्रवीत् ‘अहमिदं सर्वमसानि, यच्च क्षुद्रं यच्च महद्’ इति । ते क्षुद्रसूक्ताश्चाभवन् महासूक्ताश्च । तस्मात् क्षुद्रसूक्ताः। तस्मात् क्षुद्रसूक्ता इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।" |
| "सूक्तं बतावोचतेति, तत्सूक्तमभवत् । तस्मात् सूक्तम्। तस्मात् सूक्तमित्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-94" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S02" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "तद्विष्ण्वाख्यं ब्रह्म सूक्तान्यवोचतेति सूक्तनामकम् अभवत् । बत इत्यास्वादने । स्वात्मनैव स्वयं सुष्ठूक्तमिति वा । इदं सर्वं परिपूर्णं सन् अहम् अल्पप्राणिषु प्रविश्य सूक्ष्मरूपः, महाप्राणिषु महारूपश्चासानीति(भवानीति) स भगवानब्रवीत् । तस्मात् क्षुद्रोऽसानीत्युक्तत्वात् क्षुद्रसूक्तास्ते क्षुद्रप्राणिषु स्थिता भगवद्रूपसङ्घाः । महानसानीत्युक्तत्वात् महासूक्ता महाप्राणिषु स्थिताः । सूक्ष्मरूपत्वादेव क्षुद्रनाम भगवतः । न तु सामर्थ्याऽल्पत्वात् । न हि सामर्थ्यादिगुणेषु कश्चिद्विशेषो भगवद्रूपेषु ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-95" |
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| oldKey | "AIT_C02_S02_V06" |
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| type | "verse" |
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "एष वा ऋग् । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत । स यद् एभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत, तस्माद् ऋक् । तस्माद् ऋगित्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।" |
| "एष वा अर्धर्चः । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्योऽर्द्धेभ्योऽर्चत । स यद् एभ्यः सर्वेभ्योऽर्धेभ्योऽर्चत, तस्माद् अर्धर्चः । तस्मादर्धर्च इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।" |
| "एष वै पदम्। एष हीमानि सर्वाणि भूतानि पादि। स यद् इमानि सर्वाणि भूतानि पादि, तस्मात् पदम्। तस्मात् पदमित्यचक्षत एतमेव सन्तम् ।" |
| "एष वा अक्षरम्। एष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः क्षरति । न चैनमतिक्षरन्ति । स यद् एभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः क्षरति, न चैनम् अतिक्षरन्ति, तस्मात् अक्षरम्। तस्मादक्षरमित्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।" |
| "ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव । प्राण ऋच इत्येव विद्यात् ॥ २ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-96" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "एभ्यः प्राणिभ्यो गतवानित्यृक् । गच्छति हि मरणकाले ।" |
| "‘ब्रह्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते बुधैः’ इति हि भारते ।" |
| "‘म्रियमाणमिमं जीवं वासुदेवादिदेवताः ।" |
| "त्यक्त्वा भागेन गच्छन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ॥" |
| "गतैर्भागैरपि पुनर्विशेयुर्भोगसिद्धये ।" |
| "भोग्यलोकमनुप्राप्तं तस्मात् स्वप्नवदन्तरा ॥’इति च ॥" |
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|---|
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| id | "Aitareya-97" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "‘अर्च= गतिपूजनयोः’, ‘ऋ=गतौ’ इति धातोः । सर्वेभ्योऽर्धेभ्यः स्थानेभ्यः शरीरेभ्यो गतवानित्यर्धर्चः । सर्वाणि भूतान्यपादि । ‘पद=गतौ’ तस्मात् पदं नाम । अधिकं क्षरतीत्यक्षरम् । क्षरणं नाम सन्ततदानम् । ‘क्षर= विनाशसन्ततदानयोः’ इति धातोः ।
(समुद्र-मेघ-वृक्षपतन-भेरीताडनादिसर्वघोषा अपि तस्यैव नामानि)" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "एवमृषिषु शब्देषु च व्यवह्रियमाणानि सर्वाणि नामानि विष्णोरेव मुख्यतः । किमु देवतानामानि !" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "‘यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या’(ऋ.सं.१०.८८.१००) ।" |
| "‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहु रथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्’ ।(ऋ.सं.१.१६४.४६)" |
| "‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।’(तै.ब्रा.३.७.९.३)" |
| "‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ ॥(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१)" |
| "इत्यादिश्रुतिभ्यः । न केवलमृष्यादीनां नाम भगवतः, सर्वे वेदा अपि तस्यैव नामानि, किमु च वेदाः समुद्र-मेघ-वृक्षपतन-भेरीताडनादिसर्वघोषा अपि तस्यैव नामानि यथायोग्यं योजनीयानि ! एकमेव व्याहरणम्= एकप्रकारमेव नाम । निर्दोषगुणपूर्तिवाचकत्वादेकप्रकारता । प्राणे नारायण एव= नारायणविषय एव व्याहारः । ऋचस्तु विशेषत इन्द्रादिनामवतो विष्णोर्गुणान् अल्पज्ञानाम् अपि प्रकाशयन्तीति प्राणे नारायणे एवेति विद्यात् ।" |
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| lines | | "उक्तं च बृहत्संहितायाम्–" |
| "‘हुङ्कारेण सहैवाब्धिः सर्वाभिभवशक्तिताम् ।" |
| "विष्णोर्वक्ति यतो हुं च पराभिभववाचकः ।" |
| "ओमिति स्वरते नित्यं वायुर्मेघेषु संस्थितः ।" |
| "बलवन्नादसंयुक्तो ह्यधिकोच्चत्वमस्य तु ।" |
| "ओङ्कारस्यार्थ उद्दिष्ट उक्तार्थाधिक्यमेव च ।" |
| "नादो बली प्रवदति तथा भेरीध्वनिः प्रभोः ।" |
| "अनुदात्तस्वरूपत्वाद् औदार्यं वदतीशितुः ॥" |
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| lines | | "तदपेक्षयाऽन्यनीचत्वं घण्टाद्याः स्वरितात्मकाः ॥" |
| "उच्चस्थितिमुदात्तस्तु स्वर्णचञ्च्वादिकः स्वरः ।" |
| "विष्णोर्वक्ति, तथा मन्द्रः श्वासादिः प्रचयात्मकः ।" |
| "एकप्रकारतां विष्णोः सदाऽचाल्यां वदत्यपि ॥" |
| "इत्यादयः सर्वघोषा विष्णोरेव गुणोन्नतिम् ।" |
| "वदन्ति, किमु वेदाद्या, मार्जाराद्यभिधास्तथा ॥" |
| "मारयित्वा प्रभक्ष्यैव जरयत्यखिलं जगत् ।" |
| "तेन मार्जार उद्दिष्टो, मोषणान्मूषको हरिः ॥" |
| "वर्षणाद् वृष उद्दिष्टो, बलनाद् बलिनामकः ।" |
| "तारणात् तृणनामाऽसावित्याद्येकोऽभिधीयते ॥" |
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| lines | | "सर्वनामाऽपि भगवान् सर्वशक्तिश्च सर्ववित् ।" |
| "ब्रह्मरुद्रादिजीवेभ्यो जडेभ्यः श्रिय एव तु ।" |
| "व्यतिरिक्तः सदाऽनन्तसान्द्रानन्दैकरूपकः ।" |
| "तस्यैव मुख्यनामानि समाकृष्येतरेष्वपि ।" |
| "उपचारात् प्रवर्तन्ते व्यवहारप्रसिद्धये ।" |
| "तथैव सर्वनामानि प्रवर्तन्ते च मारुते ।" |
| "न तावन्मुख्यवृत्त्यैव, मुख्यतोऽन्यव्यपेक्षया ।" |
| "मुख्यतः सर्वनामा तु विष्णुरेको न चापरः ।" |
| "तस्मात् प्राणादिशब्दाश्च विष्णावेव हि मुख्यतः ।" |
| "अन्यव्यपेक्षया वायौ मुख्यवृत्तिर्विधीयते ।" |
| "वायुश्च सूर्यसंस्थः संस्तपत्येतज्जगत्त्रयम् ।" |
| "आज्ञयैव हरेर्वायोः शक्त्या सूर्यस्तपत्ययम् ॥’ इत्यादि च ।" |
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| lines | | "न प्रसिद्धसूर्यस्येयं तापनशक्तिरिति ज्ञापयितुं ‘प्राणो ह्येष य एष तपति’ इत्युक्तम् । ‘प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति’(बृ.उ.३.६.२३,सप्तान्नब्राह्मणम्) इति च श्रुतिः । प्राणशब्दश्च मुख्यतो विष्णौ प्रवर्तमानोऽपि वायावपि वर्तते । अतः सर्ववेदाद्यभिधेयत्वं वायोरप्यस्ति । ‘प्राणस्य प्राणः’(केन.१.३) इति श्रुतेरुभयोरपि प्राणशब्दः प्रसिद्ध एव ।‘अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः’(बृ.४.२.१) इति वायोर्विशेषणादुत्तमप्राणो विष्णुरिति च सिद्धम् ।" |
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| lines | | "द्वावात्मानौ हि वेदेषु द्वौ प्राणौ द्वौ च चेतनौ ।" |
| "अज्ञानाभिभवास्पृष्टौ वायुर्नारायणश्च तौ ।" |
| "तदन्ये चेतनास्सर्वे प्राणाश्चात्मान एव च ।" |
| "अज्ञानाभिभवस्पृष्टास्तस्मात् ते ह्यधमाः श्रुताः ।" |
| "मध्यमो वायुरेवैक, उत्तमः केवलो हरिः ।" |
| "सर्वशब्दोदितौ तस्माद् एतौ द्वावेव नापरः ।" |
| "अन्ये चैव मितैः शब्दैरुच्यन्ते नामितैः क्वचित्।" |
| "श्रीरप्यखिलशब्दोक्ता विष्णुवन्न तु मुख्यतः ॥" |
| "तस्मादमितनामानावपि तौ मितनामवत् ।" |
| "श्रीश्च वायुश्च विष्णुस्तु मुख्योक्तेरमिताभिधः ॥" |
| "अनन्तनामकत्वाच्च सोऽनन्तगुण ईरितः ।" |
| "पृथङ्नामानि यस्मात् तद्गुणानेव प्रचक्षते ॥’इत्यादि ब्रह्माण्डे ॥ २ ॥" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमिन्द्र उपनिषससाद । स ह ‘अन्नम्’ इत्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः स वा ऋषे द्वितीयं शंस’ इति । स ह ‘अन्नम्’ इत्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय ।
तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः स वा ऋषे तृतीयं शंस’ इति । स ह ‘अन्नम्’ इत्येव अभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय ।
तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागा, वरं ते ददामि’ इति । स होवाच- ‘त्वामेव जानीयाम्’इति ।
तमिन्द्र उवाच- ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे प्राणस्त्वं प्राणः सर्वाणि भूतानि । प्राणो ह्येष य एष तपति । स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि । तस्य मेऽन्नं मित्रं दक्षिणम् । तद् वैश्वामित्रम् एष तपन्नेवास्मि’ इति होवाच ॥ ३ ॥
(बृहतीसहस्रं सर्वं नारायणस्यान्नम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya-collection"><span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः, तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम्, तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेते इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तम् इत्यादिना ॥</span>
(इन्द्रकर्तृकं महाव्रतम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये ।
महाव्रतं कर्म चक्रे, हौत्रं चक्रेऽत्र कौशिकः ।
भृगुरध्वर्युरभवद्, ब्रह्मा ब्रह्माऽभवत् स्वयम् ।
उद्गाता वायुरभवत्, स्वयं नारायणः प्रभुः ।
सादस्यमकरोत् तत्र, तदन्येऽन्येऽपि चर्त्विजः ।</span>
(विश्वामित्रेण बृहतीसहस्रफठनम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">बृहतीसहस्रं शंसिष्यन् यदा सस्मार केशवम् ।
वायुना सह देवेशस्तदा वासवमाविशत् ।
आविष्टो, विष्णुनाऽथेन्द्रो वायुना सह कौशिकम् ।
शंसेत्युक्त्वा निषण्णोऽभूद्, इदमन्नं तवेति सः ।
ऋक्सहस्रं शशंसाथ(शशंसात्र .हृ) यज्ञाङ्गत्वेन भक्तितः ।
तच्छ्रुत्वा तुष्टिमगमत् केशवो वायुसंयुतः ।
द्वितीयवारं शंसेति प्राह तं च जनार्दनः ।
प्रीत्यैव शक्रमाविष्टो, विश्वामित्रः शशंस तत् ।
अतिप्रियत्वाद् भगवान् पुनरप्याह कौशिकम् ।
तृतीयं च शशंसासौ(सास्मै) विष्णोरन्नं प्रकल्प्य तत् ।
ततोऽतितुष्टो भगवान् ददामि वरमित्यमुम् ।
ऊचे, स प्रथमे त्वेव निजसालोक्यमीश्वरः ।
प्रादाद् द्वितीये सामीप्यम्, तृतीये पुनरेव च ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">वरं ददानीत्युक्तः स मुनिः प्राह जनार्दनम् ।
सम्यक्त्वामेव जानीयाम् इति मोक्षे सुखोच्चताम् ।
इच्छंस्तं प्राह भगवान् इन्द्रस्थो वायुसंयुतः ।
सर्वनामाऽहमस्म्येक इति ज्ञानं ममोत्तमम् ।
यस्मात् सर्वगुणत्वं स्यात् सर्वनामत्व एव तु ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न हि दोषाभिधायीनि विष्णोर्नामानि कर्हिचित्(कानिचित् .हृ)।
अदोषत्वान्महाविष्णोर्न सामान्यवचांस्यपि ।
सर्वोत्तमगुणात्मत्वात् सदा नारायणस्य हि ।
सर्वोत्तमगुणानेव नामान्याचक्षते हरेः ।</span>
(विष्णौ सर्वशब्दसमन्वयक्रमप्रदर्शनम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">यावज्ज्ञानेन मोक्षः स्यात् तावज्ज्ञात्वापि कौशिकः ।
अधिकज्ञानलब्ध्यर्थं मोक्षेऽधिकसुखाप्तये ।
जानीयां त्वामिति प्राह तस्मा आह स केशवः ।
इन्द्राविष्टः प्राणनाम तथाऽन्याश्चाभिधाः प्रभुः ।
प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते ।
ओयत्वाद् अहंनामाऽस्म्यसनान्मनुतेरपि ।
ततो वेत्तीति च त्वं स, पूर्णत्वात् सर्वनामकः ।
सर्वाणि बहुरूपत्वात् सर्वरूपेषु पूर्तितः ।
प्रभूतत्वाद् भूतनामा सर्वरूपप्रभूततः ।
बहुरूपः स भूतानीत्युक्तो विष्णुस्सनातनः ।
सर्वैश्वर्यस्वरूपत्वादेष इत्यभिधीयते ।
स एव सूर्यसंस्थः सन् लोकं तपति केशवः ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">सर्वनामवतस्तस्य ममान्नं मित्रमुच्यते ।
अन्नाभिमानिनी साक्षाच्छ्रीरेव प्रमदोत्तमा ।
साऽन्नमित्युच्यते विष्णोर्भोग्यत्वान्मित्रमेव च ।
दक्षभागस्थितेनत्वाद् दक्षिणं नाम सोच्यते ।
तस्या इनो हि विष्णुः स दक्षभागे स्थितः सदा ।
यस्याभिमानिन्यन्नस्य लक्ष्मीः सा देवतोत्तमा।
वैश्वामित्रं तदन्नं तु ऋक्सहस्रात्मकं मतम्।
विश्वामित्रेण दृष्टत्वाद् वैश्वामित्रं तदीर्यते।</span>
(शक्राविष्टो विष्णुः; न चापरः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कां परिहरन् हरिः।
आदित्यसंस्थितो विष्णुः तपन्नस्मीति चोचिवान्।
त्वं जानीयामिति प्रश्नं विश्वामित्रस्य कुर्वतः।
अभिप्रायद्वयं ह्यस्ति ‘शक्राविष्टो न चापरः।
हरेरिति तु मे तर्कस्तजोबाहुल्यतोऽजनि।
तस्य तर्कस्य सत्यत्वं ज्ञातव्यं प्रथमं मया।
द्वितीयं यदि विष्णुः स्याज्ज्ञातव्यो मे विशेषतः’।
इत्याभिप्रायमस्यैव ज्ञात्वा विष्णुः सनातनः ।
अभिप्रायद्वयस्यापि परिहारं हरिर्ददौ।
प्राणो वा अहमित्यादि नामसन्दर्भमुक्तवान्।
विशेषज्ञानसिद्ध्यर्थं नाम्नामुक्तिः परात्मनः।
इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कानुत्त्यर्थमेव च ।
तपन्नेवास्मीत्यावदत्, तपन्तं वेद सोऽपि हि।
नारायणं सर्वगतम्, गायत्र्योपासको हि सः॥ इति ब्रह्मण्डे।</span>
(‘प्राणो वा अहम्’ इत्युपदेशः भगवतैव कृतः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उपनिषण्णमिन्द्रं दृष्ट्वाऽपि त्वामेव जानीयाम् इति वरस्वीकाराद् इन्द्रादेव च, इन्द्राविष्टो भगवान् अत्रोक्त इति ज्ञायते । इन्द्रं तु जानात्येव हि विश्वामित्रः । भगवन्तमपि स्वरूपत आगतं जानात्येव । विशेषज्ञानप्रार्थने प्राणो वा अहमस्म्यृष इत्यादिकमेव पूर्यते ; एष तपन्नेवास्मि इति व्यर्थम् । प्राणो ह्येष य एष तपति इत्युक्तत्वात् ।</span>
(भगवतस्तदीयरूपाणां च नास्ति भेदः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि इत्यादिनाऽपि आविष्टस्य विष्णुत्वं किञ्चिज्ज्ञायते । तथाऽपि एतेन इति तृतीयात्वात् करणत्वाशङ्का भवति । तस्य मे इति वैयधिकरण्यमिति च । अतो भगवन्नामानि पृथगुक्त्वा ‘अहं विष्णुरित्येष तपन्नेवास्मि’ इत्युवाच । इन्द्रशरीरमेव पश्यतो विश्वामित्रस्य तर्कमात्रतो भगवानिति किञ्चिज्जानत इति ज्ञायते ।</span>
(न शचीपतिः सर्वशब्दवाच्यः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न चेन्द्रस्य प्राणशब्दः(प्राणशब्दाभिधेयत्वम्. हृ) सर्वशब्दाभिधेयत्वं च विद्यते । ‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितम्’(ऋ.सं.१०.८२.६) इत्युक्तस्य पद्मनाभस्य हि ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८.२३) इति सर्वदेवाभिधानत्वमुक्तम् । इन्द्रे हीन्द्रशब्दोऽपि न मुख्यतो वर्तते, परमैश्वर्याभावात्, इन्द्रशब्दोऽपि विष्णावेव वर्तते । स हि परमेश्वरः ।</span>
‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।’(तै.ब्रा.३.७.९.३)
‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्’(ऋ.सं.१.१६४.४६) । इत्यादिश्रुतेश्च । ‘सप्तार्द्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोऽस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’(ऋ.सं.१.१६४.३६) इत्यादिना विष्णुरेव हि तत्र प्रस्तुतः ।</span>
(नारायणादिनामानि नान्यस्य)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘नामानि विश्वाभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् ।<br/>नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१) ॥’ इति श्रुतिः ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यो देवानां नामधा एक एव’ इत्यवधारणान्नान्यस्य सर्वनामत्वम् । स च विष्णोर्नान्यः । पद्मनाभत्वादेव ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">श्रियो वायोरपि न नारायणादिनामवत्वम् । ‘एको वासुदेवस्तत्सदृशपरौ न स्तः’ इति श्रुतिः । ‘एको नारायण आसीत् तत्समो वा, अधिको वा नास्ति’ इति च ।
‘येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्स्तपति तेजसा भ्राजसा च’(म.ना.उ.१.३) ।
‘यमन्तःसमुद्रे कवयोऽवयन्ति यदक्षरे परमे प्रजा’(तै.आ.१०.१.१) ।
इत्युक्तस्य समुद्रशायिन एव नारायणस्य
‘तद् एवर्तं तद् सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’(म.ना.उ.४.३) । इति परब्रह्मत्वावधारणाच्च विष्णोः परं सदृशं वा नास्त्येव । अतस्तदत्रोच्यत इत्यपि न वक्तव्यम् ।</span>
(विष्णुः सर्वेश्वरः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।<br/>न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.सं.७.९९.१) ॥इत्यादेश्च ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायान् अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम्’(ऋ.सं.४.३०.१) । इत्याद्यपि सर्वनामकत्वात् तस्यैव ।<br/> ‘किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्’ इत्यादिप्रश्नस्यापि<br/>‘परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।<br/>परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥</span>
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।<br/>दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।<br/>यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।<br/>विष्णोर्नामसहस्रम्... ॥’(म.भा.अनु.अ.१४९)
इत्येव भारते परिहाराच्च ।
(मित्रं मे दक्षिणा रमा)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">मेऽन्नं दक्षिणमित्युक्तत्वाच्च विष्णुरेवेति ज्ञायते । स हि विष्णुर्दक्षिणामित्र उक्तो हरिवंशेषु धन्याश्चर्याध्यायि ।
‘दक्षिणाभिः सहैवैतन्मदधस्ताज्जगत्सदा ।<br/>धन्याश्चर्योऽहमेवैको मित्रं मे दक्षिणा रमा ।<br/>इत्यवादीद्धरिर्भूपा धन्योऽसीत्युदितो मया ॥’ इति नारदवचनम् ।
न च बृहतीसहस्राभिमानिनीं देवीं विना अचेतनमात्रस्य मुख्यमित्रत्वं युज्यते ।
‘मिनोति त्रायते चेति मित्रमित्यभिधीयते ।<br/>तस्माद्योऽयं विजानाति स मित्रं तस्य नान्यथा ॥’इति भारते</span>
(विष्णुरेव बृहतीसहस्रप्रतिपाद्यः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उक्थायुत्वाच्च विष्णुरेवात्रोक्त इत्यवगम्यते । बृहतीसहस्रं ह्युक्थनामकं मुख्यतः ।
‘महाव्रतनियुक्तं यदृक्सहस्रं हरेः प्रियम् ।<br/>तदुक्थमिति सम्प्रोक्तं तेने यो विष्णुरेव हि ॥
तस्मादुक्थायुरित्युक्त ऐश्वर्यादिन्द्र उच्यते ।<br/>तस्मादुक्थायुरिन्द्रेति विष्णुर्यज्ञेषु पूज्यते ॥’इति गारुडे
विष्णुर्ह्युक्थायुरिन्द्र इत्युच्यते । यज्ञेष्वन्य इन्द्रः पृथक्चोच्यते । ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः’(तै.ब्रा.३.७.९.३) । इत्युक्त्वा ‘तस्मै त्वा तेभ्यस्त्वा’ इति भेदवचनाच्च । सत्य इति वायुः । ‘सदिति प्राण’ इति श्रुतेः ।
‘सदेव सत्यमित्युक्तं सत्यो वायुरुदाहृतः ।<br/>साधुत्वं सत्यता प्रोक्ता साधुर्वायुर्हि सर्वतः ॥’ इति शब्दनिर्णये ।</span>
(बृहतीसहस्रपठनफलम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">प्रियधाम्न उप= समीपे गमनं नाम तद्धामप्राप्तिकारणभगवत्प्रसादप्राप्तिः । अन्यथोपशब्दो व्यर्थः स्यात् । न च तदैव भगवतः प्रियं धाम विश्वामित्रेण प्राप्तम् ।
बृहतीसहस्रे प्रथमे सालोक्यं प्रददौ हरिः ।<br/>द्वितीये स्वपुरप्राप्तिं तृतीयेऽन्तःपुरस्य च ।<br/>तथा स्वविषयं ज्ञानं विश्वामित्रे ददौ प्रभुः ॥ इति च गारुडे ।</span>
(इन्द्रे विशेषावेशस्तात्कालिकः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न चेन्द्रादिभिरैक्यमत्रोच्यते । ‘प्राणस्तथाऽनुगमाद्’(ब्र.सू.१.१.२८) इति च विष्णोरेव प्राणशब्दाभिधेयत्वमुक्त्वा ‘न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन्’(ब्र.सू.१.१.२९) इति वक्तुः= बृहतीसहस्रं शंसितुर्विश्वामित्रस्य इन्द्रेण स्वात्मोपदेशः क्रियत इति पक्षो निराकृतो हि भगवता सूत्रेषु । ‘अध्यात्मसम्बन्ध’ शब्देनावेशो विष्णोरिन्द्रे विवक्षितो भगवता । अन्येष्वन्तर्यामिरूपेण सम्बन्धोऽस्त्येव । अस्मिन्निन्द्रे तु विशेषावेशस्तात्कालिकः । अधिकात्मनः= परमात्मनः सम्बन्धोऽध्यात्मसम्बन्धः । न हि स्वात्मना स्वस्य सम्बन्धो भवति । यद्यध्यात्ममात्रमत्रोच्यत इति विवक्षितं तर्हि ‘अध्यात्मभूमा’ इत्येव स्यात्; सम्बन्धशब्दो व्यर्थः । तस्मादिन्द्रादिजीवेभ्यो विष्णोर्भेद एवात्र भगवतो विवक्षितः ।</span>
(अन्तर्यामिदृष्ट्याऽभेदव्यवहारः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्’(ब्र.सू.१.१.३०) इति शास्तुरन्तर्यामिणो विष्णोः सर्वशरीरस्थितत्वात् सर्वनामाभिधेयत्वं चोक्तम् । ‘अहं मनुरभवं सूर्यश्च’ (ऋ.सं.४.२६.१) इत्यादिवत् । न हि मनुसूर्यादिर्भवति वामदेवस्तेषां पक्षेऽपि । सर्वप्रवृत्तिहीनतां हि ते मोक्षं वदन्ति । अत्र च ‘अहं भूमिमददामार्याय’(ऋ.सं.४.२६.२) इत्यादिना प्रवृत्तिरेवोच्यते ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च वामदेवेन मन्वादिकर्म क्रियते कदाऽपि । अतीतार्थश्चायं दृश्यते ‘भूमिम् अददाम्’ इत्यादिना । नहि पूर्वं वामदेवेन तानि कर्माणि कृतानि । भगवान् विष्णुर्हीन्द्राय भूमिमददात्(विष्णुर्हि आर्याय इन्द्राय भूमिमदात्(ताम्रपर्णि) । स एव च सर्वेष्वन्तर्यामित्वेन स्थित्वा नामप्रवृत्तिनिमित्तानि सर्वकर्माणि कुर्वन्नवबोध-सूरिनियमनादिभिर्मनुसूर्यादिसर्वनामा भवति । यदि भेदस्य पूर्वमपि मिथ्यात्वमङ्गीक्रियते तर्हि भूमिदानादिसर्वकर्मणां मन्वादित्वस्यापि मिथ्यात्वाद् ‘अहं मनुरभवम्’ इत्यादिकं सर्वमनर्थकमेव भवति ।</span>
(मुक्तावपि पञ्चभेदाः सुनित्याः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘जीवेश्वरभिदा चैव जीवभेदः परस्परम् ।<br/>जडेश्वरभिदा चैव जडभेदस्तथैव च ॥
जडजीवभिदा चैव सत्योऽयं भेदपञ्चकः ।<br/>न कदाचिन्निवर्त्योऽयं मुक्तौ संसार एव च (वा) ॥
य एतदन्यथा ब्रूयुस्ते हि यान्त्यधरं तमः ॥’ इति भविष्यत्पर्वणि ।
‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।’(भ.गी.१६.८)
‘ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ।’(भ.गी.१६.१४)
‘एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।’(भ.गी.१६.९)
‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।<br/>मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्’(भ.गी.१६.२०) ॥ इत्यादि च ।</span>
(सर्वान्तर्यामित्वादिना विष्णोः सर्वशब्दवाच्यत्वम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे’ इत्यादौ अहमस्म्यादिशब्दोऽस्मच्छब्दार्थः(अस्मच्छब्दस्थः/अस्मच्छब्दाद्यर्थः) । एष तपन्नेवास्मीत्युपरितनस्य वैयर्थ्यात् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । अतोऽहमस्मीत्यादि च भगवन्नामैव । न च जीवैक्यवचनमत्र प्रस्तुतम् । ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव’ इति सर्वनामाभिधेयत्वं भगवत उक्त्वा, तत्रैव प्रमाणत्वेन विश्वामित्रं ह्येतदहरित्याद्याख्यायिकोक्ता । तस्मात् सर्वान्तर्यामित्वात्, सर्वगुणत्वात्, सर्वशक्तित्वाच्च सर्वनामवत्वमेव विष्णोरुच्यते; न तु सर्वस्वरूपत्वम् ।
उक्तं च भारते ।
‘स्रष्टृत्वाच्चैव पातृत्वान्नियमाच्च प्रकाशनात् ।<br/>सर्वत्वमुक्तं विष्णोस्तु न तु सर्वस्वरूपतः ॥’ इति ।</span>
(श्रुतिवचनानि नाभेदपराणि)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘‘ ‘पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्’(ऋ.सं.८.४.१७) इति पुरुषेणैव ‘इदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।’, ‘आ तृणाद् आकरीषात् सर्वं भगवान् इति मिथ्यादृष्टिरेव’ (एषा.हृ)’’ इति च श्रुतिः ।
‘हिरण्मयो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’,
‘अमृतो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’,
‘स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् आप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’ इत्यादिना मुक्तानामपि भेदस्यैवोक्तेश्च ।
न हि भेदाभावे ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे’ इति युज्यते । न चामुक्तैः सर्वभूतैर्मुक्तो दृश्यते ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">एकत्वे तु ‘ददृशे’ इत्येतावता पूर्यते; ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यः’ इति व्यर्थम् । न च तेषां पक्षे स्वयमपि स्वात्मानं पश्यति । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति । अतः सर्वश्रुतिविरोध एव जीवेश्वरैक्याङ्गीकारे । नच ‘कर्तृकर्मविरोधो नामास्ति’ इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । श्रुत्यनुभवसिद्धत्वाच्च स्वदर्शनादेः ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च तेषां पक्षे प्रज्ञेन सर्वज्ञेन परमात्मना सर्वकामावाप्तिर्नामाङ्गीक्रियते शरीरादुत्क्रान्तस्य ज्ञानिनः । तस्माद् वेदविरुद्धवादिन एव तेऽपि ।
(न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो मायावादिनः)
न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो दृश्यते । न हि सर्वावाच्यं सर्वाज्ञेयं शून्यं चेति कश्चिद्विशेषः । केनापि शब्देनावाच्यस्य लक्षणायामपि प्रमाणं नास्ति । क्षीरमाधुर्यादयोऽपि तैरेव शब्दैरुच्यन्ते ।
‘विशदं क्षीरमाधुर्यं स्थिरमाज्यस्य तीक्ष्णकम् ।<br/>सितस्य (गुडस्य) पनसादीनां निर्हारीत्यभिधीयते ॥’ इति शब्दनिर्णये ।
न च सर्वगुणदोषक्रियाविनिर्मुक्तस्यास्तित्वमपि कुत्रचित् दृष्टम् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि ।</span>
(मुक्तावपि तारतम्यम् अप्रतिहतम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति’(क.ठ.२.३.१३) इत्यादिना प्रसादादिगुणाश्च भगवतो दृश्यन्ते । ‘यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः’(क.ठ.६.११) इत्यादि कर्माणि च । ‘यस्मिन् देवाः श्रिताः सर्वे’ इत्यादिगुणाश्च तत्रैवोक्ताः(काठके न दृश्यते) ।</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः ।
अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥आदध्ना(घ्ना)स उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे’(ऋ.सं.१०.७१.७) ॥
इति मुक्तानामपि तारतम्यं चोक्तम् ।
‘श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः ।<br/>अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥</span>
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">तारतम्यं च तेषां हि श्रुतावुदितमञ्जसा ।<br/>क्षीरसागरदध्नास्तु केचित् तिष्ठन्ति मुक्तिगाः ॥
उपस्थिता ब्रह्मवनं केचिदश्वत्थमण्डलम् ।<br/>ऐरे ह्रदे केचिदपि देवा एव परं(सदा.हृ) हरिम् ॥
नागभोगशयं मुक्ता ददृश्रेऽधिकमोदिनः ।<br/>सागरादिस्थिता विष्णुं पश्यन्ति क्वचिदेव हि ॥’
इति ब्रह्मसारे ।</span>
(वेदमन्त्रेषु मुक्तलोकवर्णनम्)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यत्र ब्रह्मा पवमान च्छन्दस्यां वाचं वदन् ।<br/>ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिल्ँलोके स्वर्हितम् ।<br/>तस्मिन् मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः ।<br/>यत्राभूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः ।<br/>लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्र तत्परमं पदं विष्णोर्लोके महीयते ।<br/>देवैस्सुकृतकर्माभिस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ।<br/>कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव’(ऋ.सं.९.११३.६-११) ॥</span>
(श्रुतिसूत्राणि मुक्तभेदावेदकानि)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">इत्यादिना ब्रह्मसूर्ययमादीनां सर्वदेवानाम्, दिवो देव्या अवरोधभूतानां सर्वदेवानाम्, गङ्गाद्यब्देवतानां च वेदव्याख्यानम्, सोमयागादिकम्, कामचरणं च मुक्तानां भेदेनावस्थितानामुच्यते । मुक्ताश्चात्रोच्यन्त इति प्रतीयते; ‘अमृतं कृधि’ इति वचनात् । अमुक्तानां स्वे स्वे लोकेऽवस्थानं हि तेषाम् । मुक्तानां हि विष्णुलोकेऽवस्थानं देवानाम् । ‘मुक्तः प्रतिज्ञानात्’(ब्र.सू.४.४.२) । ‘सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः’(ब्र.सू.४.४.८) । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’(ब्र.सू.४.४.१७) । ‘भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च’(ब्र.सू.४.४.२२) । ‘अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्’(ब्र.सू.४.४.२३) इत्यादि मुक्तसूत्रेभ्यश्च मुक्तानां विष्णोर्भेदो भोगादिकं च सर्वं प्रतीयते । ‘ग्राव्णा सोमे महीयते’(ऋ.सं.९.११३.६) इति ब्रह्मणोऽन्यमुक्तैः पूज्यत्वं च प्रतीयते ।</span>
(सूत्राणुसारेण श्रुतेरर्थ उपवर्णनीयः)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">नच सूत्रेषु निश्चितार्थस्यौपचारिकत्वं वक्तुं युज्यते । निर्णयात्मकत्वात् तेषाम् । अतिप्रसङ्गश्चोपचारादिकल्पने । ‘ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः’(भ.गी.१३.५) इति (हि) विनिश्चितानि ब्रह्मसूत्राणि ।
‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।<br/>योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रस्य निर्णयः ॥’इति आदित्यपुराणे ।</span>
(न मुक्तिर्भोगरहिता)
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च निर्णयकानि(निर्णयात्मकानि. हृ) भगवद्वाक्यान्यपहाय मानुषवाक्यैरेव तेषामुपचारत्वादि कल्प्यम् । न च भोगरहिता मुक्तिर्नामान्याऽस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् ।
‘भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः(ग्रहत्वमाप. हृ ) ।<br/>तथा मुक्तावुत्तमायां विष्णुमाविश्य भुञ्जते ॥
विष्णोर्वशाश्च ते सर्वे सर्वदा दुःखवर्जिताः ।<br/>न तु विष्णुगुणान् सर्वे भुञ्जते ते कदाचन ॥
बाह्यभोगान् भुञ्जते च तारतम्येन कांश्चन ।<br/>विष्णोर्देहाद् बहिश्चापि निर्गच्छन्ति यथेष्टतः ॥’ इति स्कान्दे ।
‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।<br/>सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’(भ.गी.१४.२) इति भगवद्वचनम् ।
तस्मात् मुक्तैरपीज्यमानः सर्वस्माद् भिन्नः सर्वोत्तमः सर्वनामा सर्वशक्तिः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायणः सर्ववेदादिषूच्यते इति सिद्धम् ॥ ३ ॥</span> ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥" |
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| lines | | "अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः, तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम्, तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेते इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तम् इत्यादिना ॥" |
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| lines | | "वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये ।" |
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| lines | | "बृहतीसहस्रं शंसिष्यन् यदा सस्मार केशवम् ।" |
| "वायुना सह देवेशस्तदा वासवमाविशत् ।" |
| "आविष्टो, विष्णुनाऽथेन्द्रो वायुना सह कौशिकम् ।" |
| "शंसेत्युक्त्वा निषण्णोऽभूद्, इदमन्नं तवेति सः ।" |
| "ऋक्सहस्रं शशंसाथ(शशंसात्र .हृ) यज्ञाङ्गत्वेन भक्तितः ।" |
| "तच्छ्रुत्वा तुष्टिमगमत् केशवो वायुसंयुतः ।" |
| "द्वितीयवारं शंसेति प्राह तं च जनार्दनः ।" |
| "प्रीत्यैव शक्रमाविष्टो, विश्वामित्रः शशंस तत् ।" |
| "अतिप्रियत्वाद् भगवान् पुनरप्याह कौशिकम् ।" |
| "तृतीयं च शशंसासौ(सास्मै) विष्णोरन्नं प्रकल्प्य तत् ।" |
| "ततोऽतितुष्टो भगवान् ददामि वरमित्यमुम् ।" |
| "ऊचे, स प्रथमे त्वेव निजसालोक्यमीश्वरः ।" |
| "प्रादाद् द्वितीये सामीप्यम्, तृतीये पुनरेव च ।" |
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| lines | | "वरं ददानीत्युक्तः स मुनिः प्राह जनार्दनम् ।" |
| "सम्यक्त्वामेव जानीयाम् इति मोक्षे सुखोच्चताम् ।" |
| "इच्छंस्तं प्राह भगवान् इन्द्रस्थो वायुसंयुतः ।" |
| "सर्वनामाऽहमस्म्येक इति ज्ञानं ममोत्तमम् ।" |
| "यस्मात् सर्वगुणत्वं स्यात् सर्वनामत्व एव तु ।" |
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| lines | | "न हि दोषाभिधायीनि विष्णोर्नामानि कर्हिचित्(कानिचित् .हृ)।" |
| "अदोषत्वान्महाविष्णोर्न सामान्यवचांस्यपि ।" |
| "सर्वोत्तमगुणात्मत्वात् सदा नारायणस्य हि ।" |
| "सर्वोत्तमगुणानेव नामान्याचक्षते हरेः ।" |
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| lines | | "यावज्ज्ञानेन मोक्षः स्यात् तावज्ज्ञात्वापि कौशिकः ।" |
| "अधिकज्ञानलब्ध्यर्थं मोक्षेऽधिकसुखाप्तये ।" |
| "जानीयां त्वामिति प्राह तस्मा आह स केशवः ।" |
| "इन्द्राविष्टः प्राणनाम तथाऽन्याश्चाभिधाः प्रभुः ।" |
| "प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते ।" |
| "ओयत्वाद् अहंनामाऽस्म्यसनान्मनुतेरपि ।" |
| "ततो वेत्तीति च त्वं स, पूर्णत्वात् सर्वनामकः ।" |
| "सर्वाणि बहुरूपत्वात् सर्वरूपेषु पूर्तितः ।" |
| "प्रभूतत्वाद् भूतनामा सर्वरूपप्रभूततः ।" |
| "बहुरूपः स भूतानीत्युक्तो विष्णुस्सनातनः ।" |
| "सर्वैश्वर्यस्वरूपत्वादेष इत्यभिधीयते ।" |
| "स एव सूर्यसंस्थः सन् लोकं तपति केशवः ।" |
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| lines | | "सर्वनामवतस्तस्य ममान्नं मित्रमुच्यते ।" |
| "अन्नाभिमानिनी साक्षाच्छ्रीरेव प्रमदोत्तमा ।" |
| "साऽन्नमित्युच्यते विष्णोर्भोग्यत्वान्मित्रमेव च ।" |
| "दक्षभागस्थितेनत्वाद् दक्षिणं नाम सोच्यते ।" |
| "तस्या इनो हि विष्णुः स दक्षभागे स्थितः सदा ।" |
| "यस्याभिमानिन्यन्नस्य लक्ष्मीः सा देवतोत्तमा।" |
| "वैश्वामित्रं तदन्नं तु ऋक्सहस्रात्मकं मतम्।" |
| "विश्वामित्रेण दृष्टत्वाद् वैश्वामित्रं तदीर्यते।" |
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| lines | | "इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कां परिहरन् हरिः।" |
| "आदित्यसंस्थितो विष्णुः तपन्नस्मीति चोचिवान्।" |
| "त्वं जानीयामिति प्रश्नं विश्वामित्रस्य कुर्वतः।" |
| "अभिप्रायद्वयं ह्यस्ति ‘शक्राविष्टो न चापरः।" |
| "हरेरिति तु मे तर्कस्तजोबाहुल्यतोऽजनि।" |
| "तस्य तर्कस्य सत्यत्वं ज्ञातव्यं प्रथमं मया।" |
| "द्वितीयं यदि विष्णुः स्याज्ज्ञातव्यो मे विशेषतः’।" |
| "इत्याभिप्रायमस्यैव ज्ञात्वा विष्णुः सनातनः ।" |
| "अभिप्रायद्वयस्यापि परिहारं हरिर्ददौ।" |
| "प्राणो वा अहमित्यादि नामसन्दर्भमुक्तवान्।" |
| "विशेषज्ञानसिद्ध्यर्थं नाम्नामुक्तिः परात्मनः।" |
| "इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कानुत्त्यर्थमेव च ।" |
| "तपन्नेवास्मीत्यावदत्, तपन्तं वेद सोऽपि हि।" |
| "नारायणं सर्वगतम्, गायत्र्योपासको हि सः॥ इति ब्रह्मण्डे।" |
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| lines | | "उपनिषण्णमिन्द्रं दृष्ट्वाऽपि त्वामेव जानीयाम् इति वरस्वीकाराद् इन्द्रादेव च, इन्द्राविष्टो भगवान् अत्रोक्त इति ज्ञायते । इन्द्रं तु जानात्येव हि विश्वामित्रः । भगवन्तमपि स्वरूपत आगतं जानात्येव । विशेषज्ञानप्रार्थने प्राणो वा अहमस्म्यृष इत्यादिकमेव पूर्यते ; एष तपन्नेवास्मि इति व्यर्थम् । प्राणो ह्येष य एष तपति इत्युक्तत्वात् ।" |
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| lines | | "स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि इत्यादिनाऽपि आविष्टस्य विष्णुत्वं किञ्चिज्ज्ञायते । तथाऽपि एतेन इति तृतीयात्वात् करणत्वाशङ्का भवति । तस्य मे इति वैयधिकरण्यमिति च । अतो भगवन्नामानि पृथगुक्त्वा ‘अहं विष्णुरित्येष तपन्नेवास्मि’ इत्युवाच । इन्द्रशरीरमेव पश्यतो विश्वामित्रस्य तर्कमात्रतो भगवानिति किञ्चिज्जानत इति ज्ञायते ।" |
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| lines | | "न चेन्द्रस्य प्राणशब्दः(प्राणशब्दाभिधेयत्वम्. हृ) सर्वशब्दाभिधेयत्वं च विद्यते । ‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितम्’(ऋ.सं.१०.८२.६) इत्युक्तस्य पद्मनाभस्य हि ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८.२३) इति सर्वदेवाभिधानत्वमुक्तम् । इन्द्रे हीन्द्रशब्दोऽपि न मुख्यतो वर्तते, परमैश्वर्याभावात्, इन्द्रशब्दोऽपि विष्णावेव वर्तते । स हि परमेश्वरः ।" |
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| lines | | "‘नामानि विश्वाभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् ।" |
| "नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१) ॥’ इति श्रुतिः ।" |
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| lines | | "‘यो देवानां नामधा एक एव’() इत्यवधारणान्नान्यस्य सर्वनामत्वम् । स च विष्णोर्नान्यः । पद्मनाभत्वादेव ।" |
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| lines | | "श्रियो वायोरपि न नारायणादिनामवत्वम् । ‘एको वासुदेवस्तत्सदृशपरौ न स्तः’ इति श्रुतिः । ‘एको नारायण आसीत् तत्समो वा, अधिको वा नास्ति’ इति च ।" |
| "‘येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्स्तपति तेजसा भ्राजसा च’(म.ना.उ.१.३) ।" |
| "‘यमन्तःसमुद्रे कवयोऽवयन्ति यदक्षरे परमे प्रजा’(तै.आ.१०.१.१) ।" |
| "इत्युक्तस्य समुद्रशायिन एव नारायणस्य" |
| "‘तद् एवर्तं तद् सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’(म.ना.उ.४.३) । इति परब्रह्मत्वावधारणाच्च विष्णोः परं सदृशं वा नास्त्येव । अतस्तदत्रोच्यत इत्यपि न वक्तव्यम् ।" |
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| lines | | "‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।" |
| "न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.सं.७.९९.१) ॥इत्यादेश्च ।" |
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| lines | | "‘नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायान् अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम्’(ऋ.सं.४.३०.१) । इत्याद्यपि सर्वनामकत्वात् तस्यैव ।" |
| "‘किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्’() इत्यादिप्रश्नस्यापि" |
| "‘परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।" |
| "परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥" |
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| lines | | "मेऽन्नं दक्षिणमित्युक्तत्वाच्च विष्णुरेवेति ज्ञायते । स हि विष्णुर्दक्षिणामित्र उक्तो हरिवंशेषु धन्याश्चर्याध्यायि ।" |
| "‘दक्षिणाभिः सहैवैतन्मदधस्ताज्जगत्सदा ।" |
| "धन्याश्चर्योऽहमेवैको मित्रं मे दक्षिणा रमा ।" |
| "इत्यवादीद्धरिर्भूपा धन्योऽसीत्युदितो मया ॥’ इति नारदवचनम् ।" |
| "न च बृहतीसहस्राभिमानिनीं देवीं विना अचेतनमात्रस्य मुख्यमित्रत्वं युज्यते ।" |
| "‘मिनोति त्रायते चेति मित्रमित्यभिधीयते ।" |
| "तस्माद्योऽयं विजानाति स मित्रं तस्य नान्यथा ॥’इति भारते" |
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| lines | | "उक्थायुत्वाच्च विष्णुरेवात्रोक्त इत्यवगम्यते । बृहतीसहस्रं ह्युक्थनामकं मुख्यतः ।" |
| "‘महाव्रतनियुक्तं यदृक्सहस्रं हरेः प्रियम् ।" |
| "तदुक्थमिति सम्प्रोक्तं तेने यो विष्णुरेव हि ॥" |
| "तस्मादुक्थायुरित्युक्त ऐश्वर्यादिन्द्र उच्यते ।" |
| "तस्मादुक्थायुरिन्द्रेति विष्णुर्यज्ञेषु पूज्यते ॥’इति गारुडे" |
| "विष्णुर्ह्युक्थायुरिन्द्र इत्युच्यते । यज्ञेष्वन्य इन्द्रः पृथक्चोच्यते । ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः’(तै.ब्रा.३.७.९.३) । इत्युक्त्वा ‘तस्मै त्वा तेभ्यस्त्वा’ इति भेदवचनाच्च । सत्य इति वायुः । ‘सदिति प्राण’ इति श्रुतेः ।" |
| "‘सदेव सत्यमित्युक्तं सत्यो वायुरुदाहृतः ।" |
| "साधुत्वं सत्यता प्रोक्ता साधुर्वायुर्हि सर्वतः ॥’ इति शब्दनिर्णये ।" |
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| lines | | "प्रियधाम्न उप= समीपे गमनं नाम तद्धामप्राप्तिकारणभगवत्प्रसादप्राप्तिः । अन्यथोपशब्दो व्यर्थः स्यात् । न च तदैव भगवतः प्रियं धाम विश्वामित्रेण प्राप्तम् ।" |
| "बृहतीसहस्रे प्रथमे सालोक्यं प्रददौ हरिः ।" |
| "द्वितीये स्वपुरप्राप्तिं तृतीयेऽन्तःपुरस्य च ।" |
| "तथा स्वविषयं ज्ञानं विश्वामित्रे ददौ प्रभुः ॥ इति च गारुडे ।" |
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| lines | | "न चेन्द्रादिभिरैक्यमत्रोच्यते । ‘प्राणस्तथाऽनुगमाद्’(ब्र.सू.१.१.२८) इति च विष्णोरेव प्राणशब्दाभिधेयत्वमुक्त्वा ‘न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन्’(ब्र.सू.१.१.२९) इति वक्तुः= बृहतीसहस्रं शंसितुर्विश्वामित्रस्य इन्द्रेण स्वात्मोपदेशः क्रियत इति पक्षो निराकृतो हि भगवता सूत्रेषु । ‘अध्यात्मसम्बन्ध’ शब्देनावेशो विष्णोरिन्द्रे विवक्षितो भगवता । अन्येष्वन्तर्यामिरूपेण सम्बन्धोऽस्त्येव । अस्मिन्निन्द्रे तु विशेषावेशस्तात्कालिकः । अधिकात्मनः= परमात्मनः सम्बन्धोऽध्यात्मसम्बन्धः । न हि स्वात्मना स्वस्य सम्बन्धो भवति । यद्यध्यात्ममात्रमत्रोच्यत इति विवक्षितं तर्हि ‘अध्यात्मभूमा’ इत्येव स्यात्; सम्बन्धशब्दो व्यर्थः । तस्मादिन्द्रादिजीवेभ्यो विष्णोर्भेद एवात्र भगवतो विवक्षितः ।" |
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| lines | | "‘शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्’(ब्र.सू.१.१.३०) इति शास्तुरन्तर्यामिणो विष्णोः सर्वशरीरस्थितत्वात् सर्वनामाभिधेयत्वं चोक्तम् । ‘अहं मनुरभवं सूर्यश्च’ (ऋ.सं.४.२६.१) इत्यादिवत् । न हि मनुसूर्यादिर्भवति वामदेवस्तेषां पक्षेऽपि । सर्वप्रवृत्तिहीनतां हि ते मोक्षं वदन्ति । अत्र च ‘अहं भूमिमददामार्याय’(ऋ.सं.४.२६.२) इत्यादिना प्रवृत्तिरेवोच्यते ।" |
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| lines | | "न च वामदेवेन मन्वादिकर्म क्रियते कदाऽपि । अतीतार्थश्चायं दृश्यते ‘भूमिम् अददाम्’ इत्यादिना । नहि पूर्वं वामदेवेन तानि कर्माणि कृतानि । भगवान् विष्णुर्हीन्द्राय भूमिमददात्(विष्णुर्हि आर्याय इन्द्राय भूमिमदात्(ताम्रपर्णि) । स एव च सर्वेष्वन्तर्यामित्वेन स्थित्वा नामप्रवृत्तिनिमित्तानि सर्वकर्माणि कुर्वन्नवबोध-सूरिनियमनादिभिर्मनुसूर्यादिसर्वनामा भवति । यदि भेदस्य पूर्वमपि मिथ्यात्वमङ्गीक्रियते तर्हि भूमिदानादिसर्वकर्मणां मन्वादित्वस्यापि मिथ्यात्वाद् ‘अहं मनुरभवम्’ इत्यादिकं सर्वमनर्थकमेव भवति ।" |
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| lines | | "‘जीवेश्वरभिदा चैव जीवभेदः परस्परम् ।" |
| "जडेश्वरभिदा चैव जडभेदस्तथैव च ॥" |
| "जडजीवभिदा चैव सत्योऽयं भेदपञ्चकः ।" |
| "न कदाचिन्निवर्त्योऽयं मुक्तौ संसार एव च (वा) ॥" |
| "य एतदन्यथा ब्रूयुस्ते हि यान्त्यधरं तमः ॥’ इति भविष्यत्पर्वणि ।" |
| "‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।’(भ.गी.१६.८)" |
| "‘ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ।’(भ.गी.१६.१४)" |
| "‘एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।’(भ.गी.१६.९)" |
| "‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।" |
| "मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्’(भ.गी.१६.२०) ॥ इत्यादि च ।" |
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| lines | | "न च ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे’ इत्यादौ अहमस्म्यादिशब्दोऽस्मच्छब्दार्थः(अस्मच्छब्दस्थः/अस्मच्छब्दाद्यर्थः) । एष तपन्नेवास्मीत्युपरितनस्य वैयर्थ्यात् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । अतोऽहमस्मीत्यादि च भगवन्नामैव । न च जीवैक्यवचनमत्र प्रस्तुतम् । ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव’ इति सर्वनामाभिधेयत्वं भगवत उक्त्वा, तत्रैव प्रमाणत्वेन विश्वामित्रं ह्येतदहरित्याद्याख्यायिकोक्ता । तस्मात् सर्वान्तर्यामित्वात्, सर्वगुणत्वात्, सर्वशक्तित्वाच्च सर्वनामवत्वमेव विष्णोरुच्यते; न तु सर्वस्वरूपत्वम् ।" |
| "उक्तं च भारते ।" |
| "‘स्रष्टृत्वाच्चैव पातृत्वान्नियमाच्च प्रकाशनात् ।" |
| "सर्वत्वमुक्तं विष्णोस्तु न तु सर्वस्वरूपतः ॥’ इति ।" |
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| lines | | "‘‘ ‘पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्’(ऋ.सं.८.४.१७) इति पुरुषेणैव ‘इदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।’, ‘आ तृणाद् आकरीषात् सर्वं भगवान् इति मिथ्यादृष्टिरेव’ (एषा.हृ)’’ इति च श्रुतिः ।" |
| "‘हिरण्मयो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’," |
| "‘अमृतो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’," |
| "‘स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् आप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’ इत्यादिना मुक्तानामपि भेदस्यैवोक्तेश्च ।" |
| "न हि भेदाभावे ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे’ इति युज्यते । न चामुक्तैः सर्वभूतैर्मुक्तो दृश्यते ।" |
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| lines | | "एकत्वे तु ‘ददृशे’ इत्येतावता पूर्यते; ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यः’ इति व्यर्थम् । न च तेषां पक्षे स्वयमपि स्वात्मानं पश्यति । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति । अतः सर्वश्रुतिविरोध एव जीवेश्वरैक्याङ्गीकारे । नच ‘कर्तृकर्मविरोधो नामास्ति’ इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । श्रुत्यनुभवसिद्धत्वाच्च स्वदर्शनादेः ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "न च तेषां पक्षे प्रज्ञेन सर्वज्ञेन परमात्मना सर्वकामावाप्तिर्नामाङ्गीक्रियते शरीरादुत्क्रान्तस्य ज्ञानिनः । तस्माद् वेदविरुद्धवादिन एव तेऽपि ।" |
| "(न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो मायावादिनः)" |
| "न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो दृश्यते । न हि सर्वावाच्यं सर्वाज्ञेयं शून्यं चेति कश्चिद्विशेषः । केनापि शब्देनावाच्यस्य लक्षणायामपि प्रमाणं नास्ति । क्षीरमाधुर्यादयोऽपि तैरेव शब्दैरुच्यन्ते ।" |
| "‘विशदं क्षीरमाधुर्यं स्थिरमाज्यस्य तीक्ष्णकम् ।" |
| "सितस्य (गुडस्य) पनसादीनां निर्हारीत्यभिधीयते ॥’ इति शब्दनिर्णये ।" |
| "न च सर्वगुणदोषक्रियाविनिर्मुक्तस्यास्तित्वमपि कुत्रचित् दृष्टम् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "‘अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति’(क.ठ.२.३.१३) इत्यादिना प्रसादादिगुणाश्च भगवतो दृश्यन्ते । ‘यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः’(क.ठ.६.११) इत्यादि कर्माणि च । ‘यस्मिन् देवाः श्रिताः सर्वे’ इत्यादिगुणाश्च तत्रैवोक्ताः(काठके न दृश्यते) ।" |
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| lines | | "‘अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः ।
अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥आदध्ना(घ्ना)स उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे’(ऋ.सं.१०.७१.७) ॥" |
| "इति मुक्तानामपि तारतम्यं चोक्तम् ।" |
| "‘श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः ।" |
| "अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "तारतम्यं च तेषां हि श्रुतावुदितमञ्जसा ।" |
| "क्षीरसागरदध्नास्तु केचित् तिष्ठन्ति मुक्तिगाः ॥" |
| "उपस्थिता ब्रह्मवनं केचिदश्वत्थमण्डलम् ।" |
| "ऐरे ह्रदे केचिदपि देवा एव परं(सदा.हृ) हरिम् ॥" |
| "नागभोगशयं मुक्ता ददृश्रेऽधिकमोदिनः ।" |
| "सागरादिस्थिता विष्णुं पश्यन्ति क्वचिदेव हि ॥’" |
| "इति ब्रह्मसारे ।" |
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| lines | | "‘यत्र ब्रह्मा पवमान च्छन्दस्यां वाचं वदन् ।" |
| "ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥" |
| "यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिल्ँलोके स्वर्हितम् ।" |
| "तस्मिन् मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥" |
| "यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः ।" |
| "यत्राभूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥" |
| "यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः ।" |
| "लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥" |
| "यत्र तत्परमं पदं विष्णोर्लोके महीयते ।" |
| "देवैस्सुकृतकर्माभिस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥" |
| "यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ।" |
| "कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव’(ऋ.सं.९.११३.६-११) ॥" |
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| lines | | "इत्यादिना ब्रह्मसूर्ययमादीनां सर्वदेवानाम्, दिवो देव्या अवरोधभूतानां सर्वदेवानाम्, गङ्गाद्यब्देवतानां च वेदव्याख्यानम्, सोमयागादिकम्, कामचरणं च मुक्तानां भेदेनावस्थितानामुच्यते । मुक्ताश्चात्रोच्यन्त इति प्रतीयते; ‘अमृतं कृधि’ इति वचनात् । अमुक्तानां स्वे स्वे लोकेऽवस्थानं हि तेषाम् । मुक्तानां हि विष्णुलोकेऽवस्थानं देवानाम् । ‘मुक्तः प्रतिज्ञानात्’(ब्र.सू.४.४.२) । ‘सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः’(ब्र.सू.४.४.८) । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’(ब्र.सू.४.४.१७) । ‘भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च’(ब्र.सू.४.४.२२) । ‘अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्’(ब्र.सू.४.४.२३) इत्यादि मुक्तसूत्रेभ्यश्च मुक्तानां विष्णोर्भेदो भोगादिकं च सर्वं प्रतीयते । ‘ग्राव्णा सोमे महीयते’(ऋ.सं.९.११३.६) इति ब्रह्मणोऽन्यमुक्तैः पूज्यत्वं च प्रतीयते ।" |
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| lines | | "नच सूत्रेषु निश्चितार्थस्यौपचारिकत्वं वक्तुं युज्यते । निर्णयात्मकत्वात् तेषाम् । अतिप्रसङ्गश्चोपचारादिकल्पने । ‘ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः’(भ.गी.१३.५) इति (हि) विनिश्चितानि ब्रह्मसूत्राणि ।" |
| "‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।" |
| "योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रस्य निर्णयः ॥’इति आदित्यपुराणे ।" |
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| lines | | "न च निर्णयकानि(निर्णयात्मकानि. हृ) भगवद्वाक्यान्यपहाय मानुषवाक्यैरेव तेषामुपचारत्वादि कल्प्यम् । न च भोगरहिता मुक्तिर्नामान्याऽस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् ।" |
| "‘भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः(ग्रहत्वमाप. हृ ) ।" |
| "तथा मुक्तावुत्तमायां विष्णुमाविश्य भुञ्जते ॥" |
| "विष्णोर्वशाश्च ते सर्वे सर्वदा दुःखवर्जिताः ।" |
| "न तु विष्णुगुणान् सर्वे भुञ्जते ते कदाचन ॥" |
| "बाह्यभोगान् भुञ्जते च तारतम्येन कांश्चन ।" |
| "विष्णोर्देहाद् बहिश्चापि निर्गच्छन्ति यथेष्टतः ॥’ इति स्कान्दे ।" |
| "‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।" |
| "सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’(भ.गी.१४.२) इति भगवद्वचनम् ।" |
| "तस्मात् मुक्तैरपीज्यमानः सर्वस्माद् भिन्नः सर्वोत्तमः सर्वनामा सर्वशक्तिः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायणः सर्ववेदादिषूच्यते इति सिद्धम् ॥ ३ ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य यानि व्यञ्जनानि तच्छरीरम् । यो घोषः स आत्मा । य ऊष्माणः स प्राणः । एतद्ध स्म वै तद्विद्वान् वसिष्ठो वसिष्ठो बभूव । तत एतन्नामधेयं लेभे । एतदु हैवेन्द्रो विश्वामित्राय प्रोवाच। एतदु हैवेन्द्रो भरद्वाजाय प्रोवाच । तस्मात् स तेन बन्धुना यज्ञेषु हूयते ।" |
| "तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य षट् त्रिंशतमक्षराणां सहस्राणि भवन्ति । तावन्ति शतसंवत्सरस्याह्नां सहस्राणि भवन्ति । व्यञ्जनैरेव रात्रीराप्नुवन्ति । स्वरैरहानि । तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् ।" |
| "तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य परस्तात् प्रज्ञामयो देवतामयो ब्रह्ममयोऽमृतमयः सम्भूय देवता अप्येति । य एवं वेद । तद्योऽहं सोऽसौ, योऽसौ सोऽहं । तदुक्तमृषिणा - सूर्य आत्मा 'जगतस्थस्थुषश्च' इति । एतदु हैवोपेक्षेतोपेक्षेत ॥४ ॥" |
| "इति श्रीमन्महैतरेयोपनिषत्सु द्वितीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥" |
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| lines | | "यावतीभिर्ऋग्भिः शंसिताभिः षट् त्रिंशत्सहस्राण्यक्षराणि भवन्ति । यस्मात् कस्मादपि च्छन्दसस्तावत्यः शंसनीयास्तदा सम्पादितं बृहतीसहस्रं भवति । तत्र या व्यञ्जनाभि(मानि)देवता सैव सर्वप्राणिनां शरीराभिमानिदेवता स्वायम्भुवो मनुः । घोषाभिमानिदेवता सर्वजीवाभिमानी ब्रह्मा । ऊष्माभिमानी वायुः ।" |
| "व्यञ्जनानां शरीरस्य चाभिमानी मनुः स्मृतः ।" |
| "घोषाणां सर्वजीवानामभिमानी चतुर्मुखः ॥" |
| "ऊष्माभिमानी वायुश्च प्रतिपाद्यो जनार्दनः ।" |
| "एतेषामधिपं विष्णुं बृहत्युक्थस्य देवताम् ॥" |
| "उपास्यैव वसिष्ठोऽभूद् वसिष्ठः शक्र एव च ।" |
| "एतां विद्यां कौशिकाय भरद्वाजाय चादरात्(चाददात्. हृ) ॥" |
| "एतद्विद्याबलेनैव विद्याधीशेन बन्धुना ।" |
| "यज्ञेष्वाहूयते नित्यमिन्द्रो विष्णुप्रसादतः ॥" |
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| lines | | "तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य षट् त्रिंशतमक्षराणां सहस्राणि भवन्ति । तावन्ति शतसंवत्सरस्याह्नां सहस्राणि भवन्ति । व्यञ्जनैरेव रात्रीराप्नोति (राप्नुवन्ति) । स्वरैरहानि । तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "षट् त्रिंशद्रूपवान् विष्णुर्व्यञ्जनेषु च संस्थितः ।" |
| "तान्येव विष्णुरूपाणि रात्रीणामपि देवताः ॥" |
| "एकैकं च सहस्रं तद्व्यञ्जनेषु च रात्रिषु ।" |
| "रूपं विष्णोः स्थितं व्यूह्य षट् त्रिंशतिसहस्रधा ॥" |
| "षट् त्रिंशतिसहस्राणि स्वरगाणि हरेरपि ।" |
| "तान्येवाह्नां दैवतानि रूपाणि परमात्मनः ॥" |
| "द्वासप्ततिसहस्राणि रूपाण्येवं रमापतेः ।" |
| "शताब्दानामहोरात्रदैवतान्युत्तमानि च ॥" |
| "बृहतीसहस्रवर्णानामपि ध्यात्वाऽखिलान्यपि ।" |
| "शतवर्षहरिध्यानफलमाप्नोति पूरूषः ॥" |
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| lines | | "तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य परस्तात् प्रज्ञामयो देवतामयो ब्रह्ममयोऽमृतमयः सम्भूय देवता अप्येति, य एवं वेद । तद्योऽहं सोऽसौ । योऽसौ सोऽहं । तदुक्तमृषिणा - सूर्य आत्मा ‘जगतस्थस्थुषश्च’(ऋ.सं.१०.११४.१) इति । एतदु हैवोपेक्षेतोपेक्षेत ॥४ ॥" |
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| lines | | "एवं ज्ञात्वाऽपि(त्वैव) सम्पाद्य बृहतीनां सहस्रकम् ।" |
| "ज्ञानान्नारायणस्यैव प्रकृष्टज्ञानसन्ततेः ॥" |
| "स एव मे मयो विष्णुः प्रकृष्टज्ञानरूपकः ।" |
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| lines | | "प्राधान्यं मयशब्दोऽयं वक्ति विष्णोः सदैव हि ॥" |
| "प्रधानोऽस्य हरिर्यस्मात् प्रज्ञारूपोऽधिदेवता ।" |
| "ब्रह्मामृतं(च) तेनायं ब्रह्मादिमय उच्यते ॥" |
| "सर्वोत्तमस्वरूपत्वाद्विष्णुरुक्तः स देवता ।" |
| "ब्रह्म पूर्णगुणत्वाच्च, नित्यत्वाद् अमृतं तथा ॥" |
| "एतादृशं च (तु) यो विष्णुं प्रधानं वेत्ति सर्वदा ।" |
| "प्रज्ञादिभिर्गुणैः स्वस्मात् परेभ्यश्च सदाऽधिकम् ॥" |
| "प्रज्ञादेवब्रह्मामृतमयः स परिकीर्तितः ।" |
| "प्रज्ञादिमय एवं स भूत्वा देवान् क्रमेण च ॥" |
| "एति मारुतपर्यन्तान्, मारुतेन च केशवम् ।" |
| "सम्पादनाच्च विद्याया अस्याः परत एव च ॥" |
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| lines | | "द्वासप्ततिसहस्राणि रूपाणि हि रमापतेः ।" |
| "बृहतीसहस्रसंस्थानि स्वरव्यञ्जनभेदतः ॥" |
| "तान्येव पुरुषस्थानि यस्मात् पुरुषसंस्थितम् ।" |
| "बृहतीसहस्रं तच्छंस्यं व्यज्यते न ह्यृते नरम् ॥" |
| "द्वासप्ततिसहस्राणि तान्येवाहर्निशासु च ।" |
| "विष्णुरूपाणि सूर्येऽपि त्वहोरात्रं हि सूर्यगम् ॥" |
| "तस्माद्योऽयमहं नामा सदाऽहेयत्वहेतुतः ।" |
| "स एवासौ सूर्यसंस्थः साक्षान्नारायणः प्रभुः ॥" |
| "योऽसौ सूर्यगतो विष्णुः सोऽहेयो भास्करादिभिः ।" |
| "एवं मनुष्यजीवेषु सूर्यादिषु च संस्थितः ॥" |
| "एक एव परो विष्णुरिति जीवसमीपगम् ।" |
| "ईक्षेन्नारायणं देवं सर्वजीवेश्वरेश्वरम् ॥ इत्यैतरेयसंहितायाम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "सम्पन्नस्य परस्तादेवानन्तरमेव; न पुनः कर्मान्तरेण शरीरारम्भ एवंविदो भवति । प्रज्ञामयो देवतामय इत्यादि पृथक् पृथङ् ‘मय’शब्दोऽनिरुद्धादिचतुर्मूर्तीनामपि परस्परसाम्येन सर्वजीवेभ्य आधिक्यं ज्ञातव्यमिति दर्शयितुम् ।" |
| "‘अन्तर्यामिस्वरूपेण ज्ञापयन्ननिरुद्धकः ।" |
| "प्रज्ञेत्युक्तो द्योतनाच्च प्रद्युम्नो देवतोदितः ॥" |
| "अमं करोति यच्छास्त्रमृतं स्वस्मिन् पुनः पुनः ।" |
| "सङ्कर्षणोऽमृतं तस्माद्, वासुदेवस्तु बृंहणात् ॥" |
| "जीवानां मुक्तिदानेन ब्रह्मेति कथितः प्रभुः ।" |
| "एवमेकोऽपि भगवांश्चतुर्धा समुदीरितः ॥’ इत्यादि चातुरात्म्ये ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "सम्भूयेत्यत्र ‘सम्’ इत्युपसर्गाद् बृहतीसहस्रसम्पादनानन्तरं भगवदाधिक्यं पुनराधिक्येन ज्ञायत इत्युक्तं भवति । भगवदाधिक्यमधिकं ज्ञात्वा देवता अपि एति= क्रमेण प्राप्नोति ।" |
| "‘द्वासप्ततिसहस्राणां रूपाणां पर्युपासनात् ।" |
| "आधिक्यं ज्ञायते विष्णोर्नितरां हि पुनः पुनः ॥" |
| "प्राप्नोति देवताश्चैव केशवान्ताः क्रमेण तु ।" |
| "योग्या अस्याश्च विद्यायाः देवा ऋषय एव च ॥’ इत्यादि सत्तत्त्वे ।" |
| "(अहंनामा विष्णुः)" |
| "बृहतीसहस्रस्थितानि विष्णुरूपाणि पुरुषे स्थितानि पुरुषैरहेयत्वाद् अहंनामकानि तान्येव सूर्ये स्थितानि, यान्येव सूर्ये स्थितानि तान्यपि सूर्यादिभिरहेयत्वादहंनामकानि । एतदेवोक्तं नारायणाख्यं परं ब्रह्मैव सर्वदा उप= समीपे ईक्षेत ।" |
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| lines | | "नात्र जीवेश्वराभेदो विवक्षितः । ‘उप= समीपे ईक्षेत’ इति समीपे दर्शनवचनात् । न च निरर्थकत्वम् उपसर्गस्याङ्गीकर्तुं युक्तम् । न ह्यार्षेषु वेदादिषु व्याकरण-निरुक्तादिषु चोपसर्गाणां वैयर्थ्यमङ्गीकृतं कुत्रचित् ।" |
| "उक्तं च भगवता व्यासेन–" |
| "‘नानर्थकः स्वरो वाऽपि वर्णो वा कुत्रचिद् भवेत् ।" |
| "पदं वाक्यं कुतश्च स्यान्नाल्पार्थमपि कुत्रचित् ॥" |
| "उच्चाराद्यर्थमपि वा नास्ति किञ्चित् स्वरादिकम् ।" |
| "महार्थमेव सर्वं हि वेदे वा वैदिकेऽपि वा ॥’ इति ।" |
| "सुकरं च सर्वपदानाम् अनर्थकत्वकल्पनम् । यैश्च वाक्यैरर्थवत्वं प्रतीयते तेषामप्यनर्थकत्वमेव स्याद्, विशेषाभावात् । न च मानुषवाक्येन वेदपदानाम् आनर्थक्यं कल्प्यम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "जीवेश्वरैक्यङ्गीकारे ‘योऽहं सोऽसौ’ इत्येव पूर्यते; पुनः ‘योऽसौ सोऽहम्’ इति व्यर्थम् ? न ह्यस्य तेनैक्ये तस्यानेन भेदशङ्का भवति । ‘अस्य तस्य’ इति भेदाङ्गीकारे नाभेदो मुख्यः ; किन्तु ? तदधीनत्वमेवान्यस्य भवति, स्नेहविशेषो वा । ‘चैत्रो मैत्रः, मैत्रश्चैत्रः’ इतिवत् । तत्र ह्युभयस्नेहापेक्षया पुनर्वचनं युज्यते । अभ्यासत्वे ह्येकप्रकारेण प्रयोगो दृष्टः । अत्र हि प्रयोगद्वैविध्यं दृश्यते ।" |
| "‘एकप्रकारा बहुशो वागभ्यास इतीरितः ।" |
| "अर्थान्तरार्था द्विविधा प्रयुक्तेति हि निर्णयः ॥’ इति गारुडे ।" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "अहंशब्दस्याहेयत्वाङ्गीकारे नराहेयत्वं सुराहेयत्वं चोच्यते इति न वैयर्थ्यम् । ‘अः इति ब्रह्म तत्रागतमहमिति’, ‘न वा अहमिमं विजानाति’, ‘तस्योपनिषदहम्’(बृ.उ.७.५.४) इत्यादौ विष्णोरेवाहेयत्वेनाहंनामकत्वप्रसिद्धेः । अहंशब्दस्यास्मच्छब्दार्थकत्वे ‘अहमिमं न जानाति’ इति न युज्यते । तस्य ‘भूरिति शिरः, भुव इति बाहू’(बृ.उ.७, ब्रा.५) इत्यादिनाऽक्षिसंस्थो भगवानेव ह्यहंशब्दोदितः । न हि जीवस्याक्षिणि पृथक् शिरोबाह्वादिकं विद्यते । हृदि स्थितमेव हि तस्य स्वरूपम्(रूपम्. हृ) । जागरितेऽप्यक्ष्यादिषु विशेषसन्निहितं भवति दीपप्रकाशवत् । ‘अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद् हृदि हि’(ब्र.सू.२.३.२५) ‘गुणाद्वाऽऽलोकवत्’(ब्र.सू.२.२.२६) इति च सूत्रात् ।" |
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|---|
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| id | "Aitareya-153" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "‘आदित्ये हिरण्मयः पुरुषः’, ‘तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी’(छां.उ.१.६.७) इत्यादि सूर्ये स्थितस्य विष्णो रूपमुक्त्वाऽक्षिस्थितस्यापि ‘तस्यैतस्य तदेव रूपम्’(छां.उ.१.७.५) इत्यादि कथनाच्च । ‘स एष एवैतस्माद् अर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे’(छां.उ.१.७.६) इत्यादि लोकाधिपत्यकथनाच्च । न हि ‘कश्चिद् भिक्षुकः पातालाद्यधिपतिः’ इत्यत्र ककिञ्चिन्मानम् । तस्माद् भगवानेवाहेयत्वाद् अहं नामा । ‘चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः’(ऋ.सं.१.११४.१), ‘जगतस्तस्थुषश्चात्मा’(ऋ.सं.१.११४.१) इत्यादि जीवेभ्यो भेददर्शनाच्च ।" |
| "‘यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह ।" |
| "यच्चास्य सन्ततो भावस्तस्मादात्मेति भण्यते (कथ्यते) ॥’ इति भारते ।" |
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| id | "Aitareya-154" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| lines | | "देवता अप्येति प्राप्नोतीत्येव चार्थः । लयश्चेद् ‘देवतास्वप्येति’ इति स्यात् । न च विनाशः पुरुषार्थः । मयट्शब्दस्य भगवत्प्राधान्यार्थत्वानङ्गीकारे ‘सम्भूय देवता अप्येति’ इति ल्यब् न युज्यते । उपासनायास्तु सम्पन्नस्य परस्तादित्युक्तत्वात् पूर्वमेव सिद्धिः ।" |
| "‘सर्वस्माद्भिन्नमीशेशं जीवाभेदेन यः स्मरेत् ।" |
| "स यात्यन्धन्तमो घोरं नित्यातिशयदुःखदम् ॥" |
| "सर्वोत्तमं तु यो विष्णुं भिन्नं जानाति सर्वतः ।" |
| "नित्यानन्दमसौ याति वासुदेवप्रसादतः ॥’ इति चैतरेयसंहितायाम् ।" |
| "अतः सर्वव्यतिरिक्तः सर्वोत्तमः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायण इति सिद्धम् ।" |
| "सर्वप्रमाणसिद्धत्वं वक्तुम् आऽध्यायमूलतः ।" |
| "अध्यायान्ते द्विरुक्तिः स्यात् पूर्वोक्तस्यावधारणे ॥ इति शब्दनिर्णये ॥" |
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|---|
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| id | "Aitareya-155" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03" |
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| type | "section" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "paada" |
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| lines | | "स एष पुरुषः समुद्रः सर्वं लोकमति यद्ध किञ्चाश्नुतेऽत्येनं मन्यते । यद्यन्तरिक्षलोकमश्नुतेऽत्येनं मन्यते । यद्यमुं लोकमश्नुवीत, अत्येवैनं मन्येत ।" |
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|---|
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| id | "Aitareya-156" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V01" |
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| type | "verse" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ॐ यो ह वा आत्मानं पञ्चविधमुक्थं वेद, यस्माद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठति स सम्प्रतिवित् ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-157" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V01_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "योऽसौ नारायणो देवः परमात्मा सनातनः ।" |
| "नित्याततगुणत्वात् स आत्मेत्युक्तः सदा श्रुतौ ॥" |
| "नारायणादिरूपेण पञ्चधाऽवस्थितः सदा ।" |
| "सर्वस्योत्थापकत्वात् स उक्थमित्यभिधीयते ॥" |
| "बृहतीसहस्ररूपे च स उक्थे पञ्चधा स्थितः ।" |
| "पञ्चभेदं हि तच्छस्त्रं तृचाशीतित्रयं च यत् ॥" |
| "पूर्वापरं तृचाशीत्या इति पञ्चात्मकं हि तत् ।" |
| "प्रथमे पञ्चकाद् भागे स्थितो नारायणः स्वयम् ।" |
| "ऋक्त्रयाशीतिके पूर्वे गायत्रीच्छन्दआत्मके ॥" |
| "वासुदेवः स्थितो नित्यम् ऋगशीतित्रये तथा ।" |
| "द्वितीये बृहतीच्छन्दस्यसौ सङ्कर्षणः स्थितः ॥" |
| "यस्याऽवेशबलेनैव जीवः सङ्कर्षणोऽपरः ।" |
| "पृथिवीं बिभर्ति सततं तत्प्रसादात्तवैभवः ॥" |
| "तृतीयायां तृचाशीत्यामुष्णिक्छन्दसि केशवः ।" |
| "प्रद्युम्नरूपी सततं स्थितो यस्यैव सन्निधेः ॥" |
| "कामः प्रद्युम्ननामाऽभूत् तत्प्रसादात्तवैभवः ।" |
| "उक्थस्यैवान्त्यभागे तु सोऽनिरुद्धो हरिः स्थितः ॥" |
| "कामपुत्रोऽनिरुद्धाख्यं यदावेशेन लब्धवान् ।" |
| "एवं पञ्चात्मकं विष्णुं बृहत्युक्थस्य देवताम् ॥" |
| "यो वेद सम्यग् वेत्ता सः .......।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-158" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V02" |
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| type | "verse" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येव वा आत्मोक्थं पञ्चविधम् । एतस्माद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठति । एतमेवाप्येति । अयनं ह वै समानानां भवति य एवं वेद ।" |
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|---|
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| id | "Aitareya-159" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V02_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | ".... तानि रूपाणि वै हरेः ।" |
| "स्थितानि पञ्चभूतेषु पृथिव्याद्यभिधानि च ।" |
| "तदावेशात् पृथिव्यादिनाम भूतेषु पञ्चसु ॥" |
| "पृथुत्वात् पृथिवीनामा भूमौ नारायणः स्थितः ।" |
| "बलज्ञानस्वरूपत्वाद् वायुनामा स एव च ॥" |
| "वायौ सङ्कर्षणो नित्यं स्थित आकाशनामकः ।" |
| "व्याप्तत्वाद् वासुदेवस्तु सदाऽऽकाशे स्थितः प्रभुः ॥" |
| "अनिरुद्धस्तथैवाप्सु बहुरूपो व्यवस्थितः ।" |
| "अम्नामा पालनान्नित्यं प्रद्युम्नो ज्योतिषि स्थितः ॥" |
| "ज्योतिर्नामा द्योतनाच्च बहुरूपः पृथक् पृथक् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-160" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V02_B02" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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|---|
| lines | | "यद्यप्यस्य हरेः सर्वरूपाण्यप्यखिलैर्गुणैः ॥" |
| "पूर्णान्यथापि चैकै(वै)करूपेषु स पृथग्गुणैः ।" |
| "व्यवहारान् पृथग् देवः करोतीव हि लीलया ॥" |
| "तस्मात् पृथगिवास्येति नाम विष्णोः परात्मनः ।" |
| "सर्वत्र सर्वनाम्नोऽपि व्यवहारार्थमीर्यते ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "एतस्माद्धि हरेर्नित्यं जगदुत्तिष्ठति प्रभोः ॥" |
| "मुक्तौ लये च तं याति स च सर्वाश्रयः प्रभुः ।" |
| "य एवं वेत्ति तं विष्णुमुपास्ते चाऽपरोक्षतः ॥" |
| "स मुक्तः समजातीनाम् आश्रयश्च भविष्यति ।" |
| "स्वजातीनामुत्तमत्वपदयोग्या हि ये सुराः ॥" |
| "ब्रह्मेन्द्राद्यास्ते हि योग्याः साक्षादस्मिन्नुपासने ।" |
| "अन्येषां ज्ञानमात्रेण योग्यमाधिक्यमाप्यते ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तस्मिन् योऽन्नं चान्नादं च वेदाहास्मिन्नन्नादो जायते । भवत्यस्यान्नम् । आपश्च पृथिवी चान्नम् । एतन्मयानि ह्यन्नानि भवन्ति ॥" |
| "ज्योतिश्च वायुश्चान्नादम् । एताभ्यां हीदं सर्वमन्नमत्ति । अवपनमाकाशः । आकाशे हीदं सर्वं समोप्यत । आवपनं ह वै समानानां भवति । य एवं वेद ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तत्र भोक्तृषु संस्थितौ ।" |
| "भोक्तृशक्तिप्रदौ नित्यं भोक्तारौ च विशेषतः ॥" |
| "नारायणानिरुद्धौ तौ भोग्यवस्तुषु संस्थितौ ।" |
| "तर्पकौ सर्वलोकानां तस्माद्भोग्यौ न चर्व्यतः ।" |
| "अवकाशप्रदो नित्यं वासुदेवो नभःस्थितः ।" |
| "एवं पञ्चात्मकं विष्णुं य उपास्ते सदैव तु (च) ॥" |
| "अवकाशप्रदः सोऽपि स्वजातीनां भविष्यति ।" |
| "भोक्ता चाप्यायकश्चैव तस्य विष्णोः प्रसादतः ॥" |
| "ब्रह्मेन्द्राद्याः स्वजातीयपदयोग्या अमुष्य च ।" |
| "योग्या उपासनस्य स्युस्तदन्ये ज्ञानमात्रके ॥" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तस्मिन् योऽन्नं चान्नादं च वेदा हास्मिन्नन्नादो जायते । भवत्यस्यान्नम् । ओषधिवनस्पतयोऽन्नम् ।" |
| "प्राणभृतोऽन्नादम् । ओषधिवनस्पतीन् हि प्राणभृतोऽदन्ति । तेषां य उभयतोऽदन्ताः पुरुषस्यानुविधां विहितास्तेऽन्नादाः । अन्नमितरे पशवः । तस्मात् त इतरान् पशूनधीव चरन्ति । अधीव ह्यन्नेऽन्नादो भवति । अधीव ह समानानां जायते य एवं वेद ॥१ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नो जङ्गमेषु व्यवस्थितौ ।" |
| "नारायणानिरुद्धौ तु स्थावरान्तर्गतौ प्रभू ॥" |
| "तत्राप्याकाशगो नित्यं वासुदेवो निरञ्जनः ।" |
| "प्राणानां भरणान्नित्यं प्राणभृन्नाम तद्धरेः ॥" |
| "न ह्यन्यः प्राणभर्ताऽस्ति तमृते पुरुषोत्तमम् ।" |
| "ओषणाच्च निधानाच्च स एवौषधिनामकः ॥" |
| "वननीयपतित्वाच्च स एव हि वनस्पतिः ।" |
| "अन्ने स्थित्वा तृप्तिदत्वं तस्याऽद्यत्वमपीष्यते ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "पुरुषस्य हरेर्ये तु सदाऽऽकारेण संस्थिताः ।" |
| "देवगन्धर्वमर्त्याद्यास्तेषु सङ्कर्षणो हरिः ॥" |
| "प्रद्युम्नश्च स्थितो नित्यं पुरुषाकृतिरेव तु ।" |
| "तौ भोक्तारौ च भोग्यानां भोजकावखिलस्य च ॥" |
| "नारायणानिरुद्धौ तु तथाऽन्यपशुषु स्थितौ ।" |
| "वृषभाश्वादिरूपेण तृप्तिदावखिलस्य च ॥" |
| "वाहनोपानहादीनामारोढारो नरादयः ।" |
| "यतः सङ्कर्षणश्चैव प्रद्युम्नस्तेषु संस्थितौ ॥" |
| "ततस्तयोर्हि सञ्चार उपरीव भविष्यति ।" |
| "आकाशगो वासुदेवः पञ्चमोऽत्राप्युपास्यते ।" |
| "वाहनादियुतो मुक्तौ भवेदेतदुपासकः ॥" |
| "इत्यै(त्याद्यै)तरेयसंहितायाम् ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "आत्मशब्दाच्च न भूतमात्रमत्रोच्यते । न च मुख्यार्थं परित्यज्य उपचारार्थोऽङ्गीकर्तव्यो विरोधाभावे । सर्वनामवत्वं च भगवतः श्रुत्यैवोपपादितं पूर्वत्र । ‘वप=नीरोमकरण-अवकाशप्रदान-बीजवर्धनेषु’ इति च धातुः ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "तस्मिन् पञ्चके चोऽन्नमन्नादं च वेद सोऽस्मिन् स्वजातियूथे विशेषेणान्नाद आजायते ह । ‘तस्मिन् वेद’, ‘अस्मिन् आजायते’ इति पृथक् पृथक् पुनः पुनर्विशेषणाद्, उपासकस्य स्वजातिसन्निधानाच्च ‘स्वजातौ’ इति ज्ञायते ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "क्षीराब्धिशयनं विष्णो रूपं यत्पुरुषाभिधम् ।" |
| "सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तदाकारौ नृषु स्थितौ ।" |
| "नारायणानिरुद्धौ तु पश्वाकारौ पशुस्थितौ ॥ इति सत्तत्त्वे ।" |
| "गुणवैशेष्याभावाद् वाहनादिषु चरणमात्राद् ‘अधीव चरन्ति’ इत्यादौ इवशब्दः ॥ १ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "तस्य य आत्मानम् आविस्तरां वेद, अश्नुते हाऽविर्भूय ओषधिवनस्पतयो यच्च किञ्च प्राणभृत् । स आत्मानमाविस्तरां वेदौषधिवनस्पतिषु हि रसो दृश्यते ।" |
| "चित्तं प्राणभृत्सु । प्राणभृत्सु त्वेवाऽविस्तरामात्मा । तेषु हि रसोऽपि दृश्यते । न चित्तमितरेषु ।" |
| "पुरुषे त्वेवाऽविस्तरामात्मा । स हि प्रज्ञानेन सम्पन्नतमः । विज्ञातं वदति, विज्ञातं पश्यति, वेद श्वस्तनम् । वेद लोकालोकौ । मर्त्येनामृतमीप्सति । एवं सम्पन्नः ।" |
| "अथेतरेषां पशूनामशनापिपासे एवाभिविज्ञानम् । न विज्ञातं वदन्ति, न विज्ञातं पश्यन्ति, न विदुः श्वस्तनम्, न लोकालोकौ । त एतावन्तो भवन्ति । यथाप्रज्ञं हि सम्भवाः ॥ २ ॥" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-171" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "आविर्भावं तारतम्याद्यो वेद परमात्मनः ।" |
| "स तस्यैव विशेषेण प्रीतियोगाद् भविष्यति ॥" |
| "स्थावरं जङ्गमं चैव भूयस्त्वेनाश्नुते हरिः ।" |
| "आविर्भूतस्तेषु सदा सम्यक्स्वात्मानमेव च ॥" |
| "तारतम्यात् सन्निहितं सर्वभूतेषु केशवः ।" |
| "वेत्त्येक एव, विष्णोर्यद्विशेषावेशनं सदा ॥" |
| "जङ्गमेषु च वृक्षेषु नैव तादृक्शिलादिषु ।" |
| "तस्माद् वृक्षादिषु रसश्चित्तं चलनवत्सु च ॥" |
| "दृश्यते न शिलाद्येषु सन्निधिर्न हि तादृशी ।" |
| "शिलाद्येषु स्थितो विष्णुर्भारदार्ढ्यादिकारणम् ॥" |
|
|---|
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "नैव चित्तादिकस्यातो वृक्षाद्या उत्तमास्ततः ।" |
| "विशेषोऽयं पदार्थानाम्, न तु विष्णोः कथञ्चन(कदाचन) ॥" |
| "यत्र विष्णुर्गुणाधिक्यं दर्शयेद् वस्तु तद्वरम् ।" |
| "गुणपूर्णो हि सर्वत्र स्वयं विष्णुः सनातनः ॥" |
| "वृक्षेभ्योऽप्यधिकं विष्णुर्जङ्गमेषु प्रकाशितः ।" |
| "तेभ्योऽपि पुरुषे विष्णुर्गुणाधिक्यप्रकाशकः ॥ इत्यादि च ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-173" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
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| lines | | "य आत्मानं परमात्मानम् आविस्तरां आविर्भावतारतम्येन वेद स तस्य विष्णोरेव । सर्वेषां तदीयत्वेऽपि प्रियत्वात् तदीयत्वविशेषणम् । ओषधिवनस्पतयो यच्च किञ्च प्राणभृत् तत्सर्वं शिलादिभ्यो भूयस्त्वेन तेष्वाविर्भूतोऽश्नुते भगवान् । स एव च नारायणः सम्यक् स्वात्मानमाविस्तरां वेद । ‘अन= चेष्टायाम्’ इति धातोश्चेष्टावत्त्वमेव प्राणभृत्त्वं पश्वादीनां ज्ञानानुसारेण ह्युत्पत्तयः सम्भवाः ॥" |
|
|---|
|
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
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|---|
| lines | | "योऽस्मिन् पुरुषे पश्वादिभ्य आधिक्येन सन्निहितो भगवान् स एष पुरुषः समुद्रः, समुद्रिक्तोऽन्येभ्यः । स जीवो यद्यपि भगवत्प्रसादात् सर्वलोकाधिपो भवति, सर्वलोकानतीत्य यत्ककिञ्चिद् अलौकिकं मोक्षाख्यमप्यश्नुते । तथाऽपि तम् एनम् आत्मशब्देन प्रस्तुतं विष्णुम् अत्येव मन्यतेऽधिकमेव मन्यते स्वात्मनः सर्वस्माच्च । मुक्तोऽपि न तेन साम्यम्, तद्भावं वा मन्यते ‘कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः’(म.भा.ता.नि.२.५८) ‘मुक्तानां परमा गतिः’(वि.स), ‘अमृतस्यैष सेतुः’(मुण्डक.उ.२.५) इत्यादिवाक्याच्च ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-175" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
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|---|
| lines | | "यद्यपि देवलोकाधिपत्यं तद्योग्यस्य विष्णुर्ददाति तदप्यश्नुवीतैव । ‘बहुगणिकादिपरिवाररूपम् अशुचीदं पदम्’ इत्यादिबुद्ध्या नापह्नुवीत । एनं भगवन्तमतिमन्येतैव च सर्वथा स्वतः सर्वस्माच्चाधिकमेव मन्येत । यद्यमुं लोकमश्नुते प्राप्नोति अश्नुवीत भुञ्जीत ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-176" |
|---|
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|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
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|---|
| lines | | "पृथिवीलोकाधिपत्ये(लोके) विष्णोराधिक्यं सत्पुरुषो मन्यत इति प्रत्यक्षसिद्धत्वान्न पृथगुक्तम् । अतिशब्दाद् ‘यद्ध किञ्च’ इति प्रथमोक्तो मोक्ष इति सिद्धम् । अन्तरिक्षप्राप्तेरल्पत्वाद्, मोक्षे स्वतः सिद्धत्वाच्च अतिमन्यते इति सिद्धवचनमेव कृतम् । स्वर्गादिप्राप्तेरधिकैश्वर्याद् ‘भगवत्समोऽहम्’, ‘भगवत्स्वरूपः’ इति वा मन्तुं प्राप्तिरस्तीति ‘अत्येवैनं मन्येत’ इति सावधारणविधिः ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-177" |
|---|
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|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "न च ‘मन्यते’ इति काममात्रम् । ‘मनु= अवबोधने’ इति धातोः । न ह्यवबोध एव कामः । अन्यथा राज्यं जानन्नपि ‘राज्यकामः’ इति स्यात् । न च ‘मन्यते’ ‘मन्येत’ इति द्विविधः प्रयोगस्तस्मिन् पक्षे युज्यते । न च सर्वलोकमतीत्याश्नतो मुक्तस्य मुक्तेरन्यत्र कामो विद्यते । सर्वलोकाधिकं च मुक्तिं विना नान्यत् । तस्मान्मुक्तैरमुक्तैरपि भगवान् सर्वोत्तमत्वेन चिन्त्य इति सिद्धम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-178" |
|---|
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|---|
| type | "verse" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "स एष पुरुषः पञ्चविधः । तस्य यदुष्णं तज्ज्योतिः। यानि खानि स आकाशः। अथ यल्लोहितं श्लेष्मा रेतस्ता आपः । यच्छरीरं सा पृथिवी । यः प्राणः स वायुः । स एष वायुः पञ्चविधः। प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानः । ता एता देवताः प्राणापानयोरेव निविष्टाः, चक्षुः श्रोत्रं मनो वागिति । प्राणस्य ह्यन्वपायमेता अपियन्ति ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-179" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "पुरुषस्थपञ्चभूतेषु पञ्चरूपो हरिः स्थितः ।" |
| "प्रद्युम्नादिस्वरूपेण ज्योतिरादौ पृथक् पृथक् ॥" |
| "स एव तु(च) पुनर्वायौ पञ्चधाऽवस्थितः प्रभुः ।" |
| "प्राणादिरूपे वसति ह्यनिरुद्धादिरूपवान् ॥" |
| "अनिरुद्धश्च(द्धः स) प्रद्युम्नस्तथा सङ्कर्षणः प्रभुः ।" |
| "वासुदेवो नारायणः पञ्चरूप इति क्रमात् ॥" |
| "पञ्चरूपोऽपि भगवान् यस्माद् वायौ विशेषतः ।" |
| "स्थितस्तेन च खादिभ्यो वायुरेव विशिष्यते ॥" |
| "अत एव पृथिव्यादिस्वरूपा मनआदयः ।" |
| "देवाः प्राणाश्रिता नित्यं गच्छन्ति प्राणमन्वपि ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-180" |
|---|
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|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "पृथिवीमयं मनस्तत्र शेषवीन्द्रशिवेन्द्रकाः ।" |
| "कामानिरुद्धौ देवगुरुर्मनोदेवाः सचन्द्रकाः ॥" |
| "श्रोत्रमाकाशरूपं च मित्रधर्मजलाधिपाः ।" |
| "कुबेरश्च दिशां देवाः श्रोत्रदेवा इति श्रुताः ॥" |
| "ज्योतीरूपं तथा चक्षुश्चक्षुर्देवो रविः स्मृतः ।" |
| "किञ्चित् तेजोयुता वाक् च विशेषेण त्वबात्मिका ॥" |
| "उपचीयते ततः साऽद्भिस्तदभावे च शुष्यति ।" |
| "तृषितस्य हि वागेव पूर्वं मन्दा प्रवर्तते ॥" |
| "वाग् देवते ततो वह्निरुमा चापि प्रकीर्तिते ।" |
| "चक्षुष्ट्वमग्नेः श्रोत्रत्वं चन्द्रस्यापि सहोच्यते ॥" |
| "स्वाहाया अपि वाक्त्वं च पर्जन्यस्य मनःस्थितिः ।" |
| "द्वितीयमेतदास्थानं श्रुतिवाक्यप्रमाणतः ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-181" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V08" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "स एष वाचश्चित्तस्योत्तरत्तरिक्रमो यद् यज्ञः । स एष यज्ञः पञ्चविधः- अग्निहोत्रम्, दर्शपूर्णमासौ, चातुर्मास्यानि, पशुः, सोमः । स एव यज्ञानां सम्पन्नतमो यत् सोमः। एतस्मिन् ह्येताः पञ्चविधा अधिगम्यन्ते, यत् प्राक् सवनेभ्यः सैका विधा, त्रीणि सवनानि, यदूर्ध्वं सा पञ्चमी ॥३ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-182" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V08_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "शेषवीन्द्रशिवादीनां मनआदिस्वरूपिणाम् ।" |
| "आश्रयो वायुरेवैकस्तस्य नारायणः स्वयम् ॥" |
| "तस्माद् वायुवशानां हि वाक्चित्तादिस्वरूपिणाम् ।" |
| "देवानां क्रमवृत्तिभ्यो जाते यज्ञेऽपि केशवः ॥" |
| "अग्निहोत्रादिके नित्यम् अनिरुद्धादिरूपकः ।" |
| "पञ्चधाऽवस्थितः सोमे पञ्चरूपो व्यवस्थितः ॥" |
| "सवनत्रयात् पूर्वके च सवनत्रितये परे ।" |
| "अनिरुद्धादिरूपेण क्रमेणैव व्यवस्थितः ॥" |
| "तमेतं परमं विष्णुं मुक्तोऽप्यत्येव मन्यते ।" |
| "अधिकं ह्येव तस्मात् तं मन्येतान्योऽपि सर्वदा ॥ इत्यादि च ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-183" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V08_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "पञ्चरूपभगवद्ध्यानार्थमेव चैतत् पञ्चविधत्वं सर्वत्रोक्तम् ॥ ३ ॥" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-184" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V09" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "यो ह वै यज्ञे यज्ञं वेद, अहन्यहर्देवेषु देवमध्यूळ्हं स सम्प्रतिविद् । एष वै यज्ञे यज्ञोऽहन्यहर्देवेषु देवोऽध्यूळ्हः, यदेतन्महदुक्थम् । तदेतत् पञ्चविधम्- त्रिवृत्पञ्चदशं सप्तदशमेकविंशं पञ्चविंशमिति स्तोमतः । गायत्रं रथन्तरं बृहद् भद्रं राजनमिति सामतः । गायत्र्युष्णिग् बृहतीत्रिष्टुब् द्विपदेति छन्दस्तः । शिरो दक्षिणः पक्ष उत्तरः पक्षः पुच्छम् आत्मेत्याख्यानम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-185" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V09_B01" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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|---|
| lines | | "यज्ञेषु यज्ञनामानं याज्यत्वात् पुरुषोत्तमम् ।" |
| "अधिरूढम्, तथाऽहस्सु चाहर्नामानमेव तु ॥" |
| "अहार्यत्वाद्धि, देवेषु देवं सर्वोत्तमत्वतः ।" |
| "एवं च सर्वनामानं सर्वेषु स्थितमच्युतम् ॥" |
| "स्तोमादिषु च यो वेद स सम्यग्विदिति श्रुतः ।" |
| "य एष उक्थनामाऽसौ सर्वोत्थापनको हरिः ॥" |
| "महांश्च परिपूर्णत्वात् सहस्रबृहतीस्थितः ।" |
| "अहरह्नां स, यज्ञानां यज्ञो, देवाधिकोऽपि सः ॥" |
| "अनिरुद्धादिरूपेण स विष्णुः पञ्चधा स्थितः।" |
| "स्तोमसामचितिच्छन्दश्शस्त्रेष्वपि पृथक् पृथक् ।" |
| "एकैकमेव तद्रूपमनिरुद्धादिपञ्चकम् ॥" |
|
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "पञ्चकृत्वः प्रस्तौति, पञ्चकृत्व उद्गायति, पञ्चकृत्वः प्रतिहरति, पञ्चकृत्व उपद्रवति, पञ्चकृत्वो निधनमुपयन्ति ।" |
| "तत् स्तोभसहस्रं भवति । एवं ह्येताः पञ्चविधा अनुशस्यन्ते, यत्प्राक् तृचाशीतिभ्यः सैका विधा, तिस्रस्तृचाशीतयः, यदूर्ध्वं सा पञ्चमी ।" |
|
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| lines | | "प्रस्तावादिष्वपि विभुः पञ्चधैव व्यवस्थितः ।" |
| "प्रस्तावादीन् पञ्चकृत्वस्तस्मादेव प्रकुर्वते ॥" |
| "पञ्चरूपं तमेवैकं स्तोतुमेव पृथक् पृथक् ।" |
| "तत्र ये स्तोमशब्दाश्च संस्थिता बहुकोटयः ॥" |
| "पृथक् पृथक्तेऽपि विष्णोः प्रादुर्भावान् प्रचक्षते ।" |
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| lines | | "तदेतत् सहस्रं तत् सर्वम् ।" |
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| lines | | "अनन्तरूपो हि हरिः शब्दोऽप्येष ह्यनन्तधा ॥" |
| "विष्णोः सहस्रनामस्तु यत्तद्रूपसहस्रकम् ।" |
| "बृहतीसहस्रमेतच्च तद्वक्ति हि पृथक् पृथक् ॥" |
| "सहस्रशब्दोऽप्यमितं यतो वक्त्यमितान्यतः ।" |
| "नामानि विष्णोरुच्यन्ते सहस्रमिति चाऽख्यया ॥" |
| "अनन्तनामवचने त्वशक्तत्वात् सहस्रकम् ।" |
| "नाम्नां पृथगिदं प्रोक्तमनन्ततनुवाचकम् ॥" |
| "विष्णोरनन्तरूपाणाम् उक्त्या(उक्ता) पञ्चशतद्वये ।" |
| "आसीत् सहस्रमित्याख्या सहस्रं मुख्यतोऽमितम् ॥" |
| "‘ब्रह्म यावत् तावती वाग्’ इति वेदप्रमाणतः ।" |
| "सहैवानन्तरूपैस्तु सरणेन सहस्रकम् ॥" |
| "नाम्ना सह सृतेरेव रूपाणां वा सहस्रता ।" |
| "बृहतीसहस्रं चैतस्माद्रूपानन्ताभिधायकम् ॥" |
| "पृथक् पृथग्घि नामार्था ऋच एताः प्रकीर्तिताः ।" |
| "सर्वनामात्मकं तस्माद ऋक्सहस्रमिदं हरेः ॥" |
| "सर्वरूपाण्यतो विष्णोस्संस्तुतान्यमुनैव हि । ॥ ४० ॥" |
|
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| lines | | "मत्स्यकूर्मक्रोडसिंहवटुभार्गवराघवाः ॥" |
| "कृष्णबुद्धौ च कल्कीति रूपाणां दशकं हरेः ।" |
| "पञ्चभेदविभिन्नेन ह्यृक्सहस्रेण शस्यते ॥" |
| "रूपाणां पञ्चकं पूर्वमपरं पञ्चकं हरेः ।" |
| "प्रस्तावाद्यैरानिधनैः स्तूयते सामभक्तिभिः ॥" |
| "तानि रूपाण्यस्य दश सर्वरूपात्मकानि च ।" |
| "दशनामानि चास्यैव सर्वरूपाभिधान्यपि ॥" |
| "पञ्चकं सामभक्तीनामृक्सहस्रं च तद्द्वयम् ।" |
| "स्तावकं सर्वरूपाणामत एव रमापतेः ॥" |
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| lines | | "तानि दश दशेति वै सर्वम् ।" |
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| lines | | "दशेति सर्वनामैतत्प्रथितं मुख्यतः श्रुतौ ।" |
| "शं रूपं भगवन्तं यद्दद्याद् व्यक्त्या समस्तशः ॥" |
| "दशेत्यमितनाम्नां तदाख्या रूपेषु शं ददेः ।" |
| "सर्वनामार्थवचनात् पञ्चकद्वितयस्य च ॥" |
| "अभूद्दशेति वै नाम तस्मादेतद्दशाखिलम् ।" |
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| lines | | "एतावती हि सङ्ख्या । दशदशतस्तच्छतम् । दश शतानि तत् सहस्रम् । तत् सर्वम् ।" |
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| lines | | "दशैव मूलसङ्ख्या च तद्विभेदाः शतादयः ॥" |
| "ऋक्सहस्रमिदं तस्मादनन्तगुणमच्युतम् ।" |
| "अनन्तशक्तिममितरूपनामानमेव च ॥" |
| "वक्ति ..." |
|
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| lines | | "तानि त्रीणि च्छन्दांसि भवन्ति । त्रेधा विहितं वा इदमन्नम् अशनं पानं खादस्तदेतैराप्नोति ॥४ ॥" |
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| lines | | ".... च्छन्दस्त्रयं चात्र तृचाशीतित्रयात्मकम् ।" |
| "अशनादित्रिकं तच्च भूत्वा विष्णुमुपैति च ।" |
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| lines | | "सर्वच्छन्दोऽभिधश्चैव सर्वदेवाभिधस्तथा ॥" |
| "सर्वमुन्यभिधश्चैव सर्ववस्त्वभिधो हरिः।" |
| "अनन्तपूर्णगुणकस्तस्माज्ज्ञेयो रमापतिः ॥" |
| "मुख्यतोऽस्यां च विद्यायां योग्य एकश्चतुर्मुखः ।" |
| "एकदेशपरिज्ञाने त्वन्ये योग्याः शिवादयः ॥ इत्यादि च ।" |
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| lines | | "त्रिविधो ह्यनिरुद्धोऽसावध्यात्मादिविभेदतः ।" |
| "अतस्त्रिवृदिति प्रोक्तस्तथा पञ्चदशात्मकः ॥" |
| "प्रद्युम्नः पञ्चभूतेषु ह्यध्यात्मादिविभेदतः ।" |
| "लिङ्गसप्तदशस्थत्वात् तावान् सङ्कर्षणः श्रुतः ॥" |
| "सप्तधातुषु संस्थः सन्नध्यात्मादिविभेदतः ।" |
| "एकविंशो वासुदेवो मन आदिचतुष्टये ॥" |
| "गुणत्रये च प्रकृतावध्यात्मादिविभेदतः ।" |
| "मूलरूपेण च सह पञ्चविंशात्मकः प्रभुः ॥" |
| "नारायणस्त्वचिन्त्यात्मा स एकोऽपि ह्यनन्तधा ।" |
|
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| lines | | "गायकानां त्राणतोऽसौ गायत्रमनिरुद्धकः ॥" |
| "प्रद्युम्नो हि रथारूढस्तेन चोक्तो रथन्तरम् ।" |
| "बृहद्रूपो बृहन्नामा तथा सङ्कर्षणः प्रभुः ॥" |
| "भद्रं तु वासुदेवोऽसौ भद्रमोक्षप्रदो यतः ।" |
| "नारायणो राजनं स्याद् राजयत्येष मोक्षिणः ॥" |
|
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| lines | | "गायत्री त्वनिरुद्धोऽसौ त्रिकाले गीयते यतः ।" |
| "उष्णिगुष्णस्वरूपत्वात् प्रद्युम्नोऽग्न्यादिसंस्थितः ॥" |
| "स्त्रीरूपो बृहतीनामा बृहत्सङ्कर्षणः प्रभुः ।" |
| "वासुदेवस्तथा त्रिष्टुप् त्रिवेदैः स्तूयते यतः ॥" |
| "नारायणस्तु स्त्रीरूपो द्विधैवासौ व्यवस्थितः ।" |
| "द्विपदेति ततो नाम सर्वच्छन्दोभिधा इमे ॥" |
| "वनितातनवः प्रोक्ताः......" |
|
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| lines | | "......मध्यं नारायणः प्रभुः ।" |
| "वासुदेवोऽस्य पुच्छं च वामदक्षौ च पक्षकौ ॥" |
| "सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नः क्रमादेव प्रकीर्तितौ ।" |
| "अनिरुद्धः शिरश्चैव तथैकोऽपि हि पञ्चधा ॥" |
| "प्रस्तावनामाऽनिरुद्धो रक्षन् संस्तूयते यतः ।" |
|
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| lines | | "सृजन् जगच्च रमया प्रद्युम्नस्तत्र गीयते ॥" |
| "उद्गीथनामा तेनासौ जगदुद्गमनेन वा ।" |
| "संहारात् प्रतिहाराख्यस्तथा सङ्कर्षणः प्रभुः ॥" |
| "मोचयित्वा समीपं हि द्रावयेद् वासुदेवकः ।" |
| "तेनोपद्रवनामाऽसौ निधीयन्ते यतोऽखिलाः ॥" |
| "मुक्ता नारायणे देवे तेनासौ निधनाभिधः ॥इत्यादि च ।" |
| "स्तूयमानत्वात् स्तोमः । समत्वात् साम । छन्द्यत्वाच्छन्दः ॥ ४ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "तद् वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तद्धैतदेके नानाच्छन्दसां सहस्रं प्रतिजानते । किमन्यत् सत् । अन्यद् ब्रूयामेति त्रिष्टुप्सहस्रमेके, जगतीसहस्रमेके, अनुष्टुप्सहस्रमेके ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "तदिदमुक्तप्रकारेणैव बृहतीसहस्रं सम्पन्नं भवति । तदेके ‘नानाच्छन्दसां सहस्रं शंसितव्यमेव, बृहतीसहस्रसम्पादनमविवक्षितम्’ इति प्रतिजानते । केचित् त्रिष्टुप्सहस्रमेव शंसितव्यमिति ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तदुक्तमृषिणा- ‘अनुष्टुभमनु चर्चूर्यमाणमिन्द्रं निचिक्युः कवयो मनीषा’(ऋ.सं. १०.१२४.९) इति । वाचि वै तदैन्द्रं प्राणं न्यचायन्नित्येतत् तदुक्तं भवति ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "अनुष्टुप्सहस्रमेवेति वदन्तोऽनुष्टुप्प्रशंसात्मिकाम् ऋचं दर्शयन्ति । बीभत्सूनां जगद् भर्तुमिच्छूनाम् । अपां सयुजं सहैव चरन्तं चाऽहुः । विष्णुं हंसस्वरूपिणम्, अनुष्टुभं चर्चूर्यमाणं पुनः पुनर्वदन्तं परमेश्वरं ददृशुश्च ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "मेघसंस्थं हंसरूपं तं विष्णुं परमेश्वरम् ।" |
| "विरिञ्चशिवपूर्वेभ्यो नृसिंहानुष्टुभं पराम् ॥" |
| "उच्चारयन्तमर्थांश्च व्याचक्षाणं समन्ततः ।" |
| "ददृशुर्मुनयो दिव्या आचार्यं ब्रह्मशर्वयोः ॥" |
| "एवं वायुं च ददृशुस्तत्र हंसस्वरूपिणम् ।" |
| "शिवादिभ्यो व्याहरन्तं तामेवानुष्टुभं पराम् ॥ इत्यादि च ।" |
| "वागाख्यायाम् अनुष्टुभ्युच्चार्यमाणायां हि मुनयो विष्णुं ददृशुः । अतो ब्रह्मादयोऽपि विष्णोः सकाशादनुष्टुभर्थं सदा (सर्वदा) शृण्वन्तीति ज्ञायते, अतोऽनुष्टुबेव छन्दसां वरेति चोक्तं भवति ।" |
|
|---|
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| lines | | "स हेश्वरो यशस्वी कल्याणकीर्तिर्भवितोरीश्वरो ह तु पुराऽऽयुषः प्रैतोः । इति ह स्माऽह ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "अनुष्टुभां सहस्रं तु यः शंसीतात एव तु ।" |
| "भवितुं चेश्वरः स स्याद् भावो मुक्तिर्न चान्यथा ॥" |
| "यशस्वी स प्रसिद्धः स्याच्छुभकीर्तिश्च सर्वदा ।" |
| "स्वच्छन्दमृत्युता च स्यात् तस्येत्याहैतरेयकः ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अकृत्स्नो ह्येष आत्मा यद् वाग् । अभि हि प्राणेन मनसेस्यमानो वाचा नानुभवति । बृहतीमभि सम्पादयेत् । एष वै कृत्स्न आत्मा यद् बृहती ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-212" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "महैतरेयो भगवान् तन्नेत्याह रमापतिः ।" |
| "नानाच्छन्दःप्रशंसादिप्रमाणरहितत्वतः ॥" |
| "परिहाराय चापूर्णमैतरेयमुने शृणु ।" |
| "त्वं तु मन्त्रमुदाहृत्य यस्मादेतदवोचथाः ॥" |
| "तस्माद् वक्ष्याम्युत्तरं ते प्रियः शिष्योऽसि मे यतः ।" |
| "उमैव वागिति प्रोक्ता साऽनुष्टुबभिमानिनी ॥" |
| "अकृत्स्ना सा ततो नैव ब्रह्मेत्युक्ता कथञ्चन।" |
| "वागिन्द्रियाभिमानिन्यां न हि ब्रह्मवचः क्वचित् ॥" |
| "वायुना प्राणरूपेण मनोरूपशिवेन च ।" |
| "अभ्यस्यमानोऽनुभवेत् पुमान् वाचा तु न क्वचित् ॥" |
| "अभिमानी बृहत्यास्तु वायुरेव यतः प्रभुः ।" |
| "तस्मादेषा च्छन्दसां हि वरिष्टा बृहती स्मृता ॥" |
| "पूर्णो हि वायुर्देवानां तस्माद् ब्रह्मेति चोच्यते ।" |
| "माहात्म्याधिक्यतश्चैव बृहतीत्येव नाम तत् ॥" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-213" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "सोऽयमात्मा सर्वतः शरीरैः परिवृतः। तद् यथाऽयमात्मा सर्वतः शरीरैः परिवृत एवमेव बृहती सर्वतश्छन्दोभिः परिवृता । मध्यं ह्येषाम् अङ्गानामात्मा । मध्यं छन्दसां बृहती । स हेश्वरो यशस्वी कल्याणकीर्तिर्भवितोरीश्वरो ह तु पुराऽऽयुषः प्रैतोरिति ह स्माऽह । कृत्स्नो ह्येष आत्मा यद् बृहती तस्माद् बृहतीमेवाभिसम्पादयेत् ॥ ५ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "अङ्गेभ्य एव सम्भूतान्यन्यच्छन्दांसि चाब्जजात् ।" |
| "मध्यात् तु बृहती जाता तस्मात् सा मध्यमुच्यते ॥" |
| "पठ्यते तेन मध्ये सा छन्दसां प्रवरा सती ।" |
| "छन्दांस्यन्यान्यङ्गवत् स्युर्मध्यवद् बृहती परा ॥" |
| "सप्तछन्दांसि चैवं हि प्रतिमा वैष्णवी मता ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-215" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "गायत्रीदेवतात्वं च लक्ष्म्या यत्राभिधीयते ॥" |
| "बृहती देवता तत्र भगवान् पुरुषोत्तमः ।" |
| "आधिक्यं छन्दसां यत्र गायत्र्यास्तु विवक्षितम् ॥" |
| "तत्र तत्पुत्रको वायुर्बृहतीदेवता मता ।" |
| "ऋचामाधिक्ययोगार्थं नाङ्गीकर्तव्यमत्र तत् ॥" |
| "प्रधानत्वाद् बृहत्यास्तु जगत्याद्यं न युज्यते ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "सम्पादनाद् बृहत्यास्तन्मुक्तो भवितुमीश्वरः ॥" |
| "स्यात् प्रसिद्धः सुकीर्तिश्च च्छन्दोमृत्युर्गुणाधिकः ।" |
| "इति प्राह स्वयं विष्णुर्महिदासाभिधः प्रभुः ॥ इत्यादि च ।" |
|
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| lines | | "‘इतोऽन्यत् सत् किमित्याहुर्नानाच्छन्दस्त्ववादिनः ।" |
| "अन्यत् सद्रूपमित्याहुस्त्रिष्टुब्वादिन एव ते ॥’" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "ऐन्द्रं प्राणं परमेश्वरसहितं वायुम् । प्राणेन मनसा च अभि इस्यमानः अभ्यस्यमानः । ‘तृतीयोऽतिशये’ इति सूत्रादकारस्येकारः । ‘मथनान्मिथिलो जातः सहनात् सिंह उच्यते, हत्वी दस्यून्’(भाग.ता.नि.३.२२.१८) इत्यादिवच्च । अभ्यस्यमानः अभितः क्षिप्यमाणो विषयेषु बहुशः । कृत्स्न आत्मा कृत्स्नप्रतिमा विष्णोः ।" |
| "एकाऽपि प्रतिमा विष्णोर्बृहती च्छन्दसां वरा ।" |
| "अन्यच्छन्दोऽभिधा यत् स्यात् प्रतिमा मध्यमैव तत् ॥ इति च ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "एवं ब्रह्मादिभिः श्रूयमाणानुष्टुबपि बृहत्या अङ्गमिति बृहत्या एवाऽधिक्यमुक्तं भवति ॥ ५ ॥" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तद् वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्यैकादशानुष्टुभां शतानि भवन्ति, पञ्चविंशतिश्चानुष्टुभः । आत्तं वै भूयसा कनीयः ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "बृहतीसम्पादनेऽनुष्टुप्च्छंसनमात्रात् पञ्चविंशोत्तरशतानुष्टुबाधिक्यं च भवति । अत आधिक्याद् बृहतीसम्पादनमेव वरम् । तस्यात्रैवान्तर्भावात् । जगत्यादिकं त्वधिकत्वेऽपि बृहतीवन्माहात्म्याभावादेवोपेक्ष्यते ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तदुक्तमृषिणा-" |
| "‘वाचमष्टापदीमहम्’(ऋ.सं. ८.७६.१२) इति, अष्टौ हि चतुरक्षराणि भवित । ‘नवस्रक्तिम्’ इति, बृहती सम्पद्यमाना नवस्रक्ति । ‘ऋतस्पृशम्’ इति, सत्यं वै वागृचा स्पृष्टा । ‘इन्द्रात् परि तन्वं ममे’ इति, तद् यदेवैतद् बृहतीसहस्रमनुष्टुप् सम्पन्नं भवति । तस्मात् तदैन्द्रात् प्राणाद् बृहत्यै वाचमनुष्टुभं तन्वं सन्निर्मिमीते ॥" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "वाचमष्टापदीमहम् इत्यनुष्टुभो बृहतीसम्पादनवचनाच्च । अष्टचतुरक्षराण्यनुष्टुप् । तस्या एव बृहतीसम्पादने नव स्रक्तयो भवन्ति । ऋचा वाक् ऋग्रूपेण वाक् ऋतं स्पृष्टा सत्यरूपं विष्णुं स्पृष्टा भवति । इन्द्रस्य परमेश्वरस्य विष्णोः सम्बन्धी नितरां प्रियत्वाद् यः प्राणदेवता वायुः तस्य प्रतिमारूपमिदं बृहतीसहस्रम् । स च वायुर्विष्णोर्मुख्यप्रतिमा । तस्माद् विष्णोरेव प्रतिमा बृहतीसहस्रम् ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "तस्मात् तस्यैव बृहतीसहस्रत्वेन सम्पन्नस्य पञ्चविंशोत्तरैकादशशतानुष्टुप्त्वेन सम्पादने बृहतीदैवतप्राणरूपाद् वायोरनुष्टुब्देवताया वाग्रूपाया उमाया उत्पत्तिः संस्मृता भवत्येवं जानतः । ततश्चोमाया अपि भगवत्प्रतिमात्वाद् विष्णुप्रतिमास्थापक एव भवत्येतत् सर्वं सम्यग् ध्यायन् ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "विष्णुरेव बृहत्याः प्राणस्याधिष्ठातृदेवता, प्रतिमाधिष्ठितदेवतावत् । तस्माद् बृहत्याः सकाशाद् अनुष्टुप्सम्पादने तस्यैव विष्णोः प्रतिमान्तरं तस्मादेव निर्मितं भवति । अत एव ‘इन्द्रात् परि तन्वं ममे’ इत्युक्तम् । बृहतीस्थविष्णोर्बलादेव तत् सम्पद्यते । स हि तस्याः षट् त्रिंशदक्षरादित्वमपि नियमयति तत्प्रसादाद् वायुश्च । वायुरेव यद्भगवन्नियतो नियमयति तस्माद् ‘इन्द्रात् परि’ इत्यस्य ऐन्द्रात् प्राणाद् इति व्याख्या कृता ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "यावत्सहस्रं बृहती तावच्छंसेद् अनुष्टुभाम् ।" |
| "छन्दसां वा तदन्येषां बृहतीत्वं स्मरेत् ततः ॥" |
| "तेन सर्वगतो विष्णुः सर्वस्माद् अधिकोऽर्चितः ।" |
| "भवेदेवं जानतस्तु कृता च प्रतिमा भवेत् ॥" |
| "तथा वायोरपि कृता वायुर्हि प्रतिमा हरेः ।" |
| "तस्माद् वायुकृतं सर्वं क्रियते विष्णुनैव हि ॥" |
| "बृहतीसहस्रं सम्पन्नमेकादशशतं पुनः ।" |
| "अनुष्टुभां स्मरेत् पञ्चविंशोत्तरमुदारधीः ॥" |
| "तेन वायोरुमोत्पत्तिः सम्यग्ज्ञानात् स्मृता भवेत् ।" |
| "ततो द्वितीयप्रतिमा विष्णोरेव कृता भवेत् ।" |
| "विष्णुनाऽनुप्रविष्टौ यदुमा वायुश्च तद्वशौ ॥ इत्यादि च ।" |
| "स्रक्तयः= विभागाः । ‘स्रक्तिरंशो विभागश्च विदळं चेति कथ्यते ।’ इति शब्दनिर्णये ।" |
|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "स वा एव वाचः परमो विकारो यदेतन्महदुक्थम् ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "स वा एष वाचः परमो विकारः, अकाराख्यवाग्विकारेषूत्तमो बृहतीसहस्राख्यः ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "अकारः प्रथमं नाम विष्णोः सर्वगुणान् ब्रुवन् ।" |
| "सर्वदोषविरुद्धत्वाद् गुणनाम्, अन्यतामपि ॥" |
| "विष्णोर्वदति जीवेभ्यो जडेभ्यश्चैव सर्वदा ।" |
| "अभावं चैव दोषाणां सर्वेषां केशवे वदेत् ॥" |
| "सम्यग्वक्तृत्वतस्तस्मादकारो मुख्यनाम हि ।" |
| "तदर्थानेकदेशेन शब्दाः सर्वेऽपि चोचिरे ॥" |
| "व्याख्याव्याख्येयरूपत्वं विकारत्वमिहोदितम् ।" |
| "विकारत्वं च नान्यत् स्यान्नित्या वेदा यतोऽखिलाः ॥" |
| "वाचकेषु तथा विष्णोः सहस्रबृहतीमयम् ।" |
| "उक्थमुत्तममुद्दिष्टं व्याख्याऽकारस्य सा परा ॥" |
| "अन्येऽपि शब्दाः सर्वेऽपि ह्यकारार्थाभिधायिनः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-230" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदेतत्पञ्चविधम् । मितम् अमितं स्वरः सत्यानृते इति । ऋग् गाथा कुम्ब्या तन्मितम् । यजुर्निगदो वृथावाक् तदमितम् । साम, अथो यः कश्च गेष्णः स स्वरः । ओमिति सत्यम् । नेत्यनृतम् ।" |
| "तदेतत् पुष्पं फलं वाचो यत् सत्यम् । सहेश्वरो यशस्वी कल्याणकीर्तिर्भवितोः पुष्पं हि फलं वाचः सत्यं वदति ॥" |
| "अथैतन्मूलं वाचो यदनृतम् । तद् यथा वृक्ष आविर्मूलः शुष्यति, स उद्वर्तते, एवमेवानृतं वदन्नाविर्मूलमात्मानं करोति, स शुष्यति, स उद्वर्तते, तस्मादनृतं न वदेद् । दयेत त्वेनेन ॥" |
| "पराग् वा एतद् रिक्तमक्षरं यदेतद् ओम् इति । तद् यत् किञ्च ओमित्याह अत्रैवास्मै तद् रिच्यते । स यत् सर्वम् ओङ्कुर्याद् रिच्याद् आत्मानम् । स कामेभ्यो नालं स्यात् ॥ अथैतत्पूर्णमभ्यात्मं यन्नेति ।" |
| "स यत् सर्वं नेति ब्रूयात् पापिकाऽस्य कीर्तिर्जायेत । सैनं तत्रैव हन्यात् । तस्मात् काल एव दद्यात्, काले न दद्यात् । तत् सत्यानृते मिथुनीकरोति । तयोर्मिथुनात् प्र जायते ।" |
| "भूयान् भवति, यो वै तां वाचं वेद यस्या एषः विकारः स सम्प्रतिवित् ।" |
| "अकारो ह वै सर्वा वाक् । सैषा स्पर्शोष्मभिर्व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति ।" |
| "तस्यै यदुपांशु स प्राणोऽथ यदुच्चैस्तच्छरीरम् । तस्मात् तत् तिर इव । तिर इव ह्यशरीरम् । अशरीरो हि प्राणः । अथ यदुच्चैस्तच्छरीरम्, तस्मात् तदाविः । आविर्हि शरीरम् ॥ ६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-231" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
|---|
| lines | | "येषां परममुक्थं तत् तदेतत्पञ्चधा स्थितम् ॥" |
| "व्याख्यानमेवाकारस्य सहैवोक्थेन सर्वशः ।" |
| "मितामिते स्वरस्सत्यमनृतं चेति पञ्चधा ॥" |
| "तस्मादकार एवायं सर्ववागात्मकः श्रुतः ।" |
| "तस्यैव व्यक्तिरूपोऽयं सर्ववेदादिविस्तरः ॥" |
| "तस्मात् सर्वगुणान् विष्णोरकारो वक्ति यत्प्रभोः ।" |
| "तद्व्यक्तयोऽपि शब्दा ये सर्वे विष्णुगुणब्रुवाः ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-232" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "अकारस्य तथोपांशोरभिमानी तु मारुतः।" |
| "देहेन्द्रियान्तःकरणनाम्नोऽस्य द्विविधस्य च ॥" |
| "स्थूलसूक्ष्मशरीरस्य सर्वेषामभिमानिनी ।" |
| "भारत्युच्चोदितस्यापि ह्यकारस्याभिमानिनी ॥" |
| "तस्मादुच्चादुपांशुर्हि जपादिषु फलाधिकः ।" |
| "वायुः पतिर्हि भारत्या उपांशोर्देवताः....." |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-233" |
|---|
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | ".....ततः ॥" |
| "अकारस्य विकारोऽयम् ओङ्कार इति कथ्यते ।" |
| "अधिकोच्चत्वमानं हि तस्यार्थः समुदीरितः ॥" |
| "अकारेणैव तत्सर्वमुक्तमाधिक्यवक्तृतः ।" |
| "अधिकोच्चस्वरूपोऽसौ माता चाधिक एव हि ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-234" |
|---|
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|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "एकार्थत्वाद् अकारोऽसौ नकारत्वमुपागतः ।" |
| "दीर्घीभूतः पुनस्तेनैवाकारेण सह स्थितः ॥" |
| "अभाववाच्यकारस्य ह्यर्थो रेफः क्षयं वदन् ।" |
| "सोऽप्यकारेण सहितो दीर्घत्वं समुपागतः ॥" |
| "अभाववाच्यकारः स एकार्थाद्गत्यभावयोः ।" |
| "यकारत्वं गतस्तस्मान्नो रेफस्योत्तरत्वतः ॥" |
| "णत्वं गतो ह्यकारोऽसौ नो विरुद्धार्थवाचकः ।" |
| "अन्यत्वात् सर्वजीवेभ्यो जडेभ्यश्च सदैव हि ॥" |
| "सर्वदोषोज्झितत्वाच्च सर्वतोऽप्यधिकत्वतः ।" |
| "निरासनाच्च दोषाणां स्वभक्तेभ्यः समन्ततः ॥" |
| "सर्वदोषविरुद्धोरुगुणपूर्णस्वरूपतः ।" |
| "नारायण इति प्रोक्तो ह्यकारार्थोऽयमेव हि ॥" |
| "तस्मादकारबीजेयं विष्णोर्नारायणाभिधा ।" |
| "प्रणवश्च....." |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-235" |
|---|
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| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | ".....ततोऽकारः प्रधानं नाम चक्रिणः ॥" |
| "अकारनामा नान्योऽस्ति तमृते पुरुषोत्तमम् ।" |
| "ब्रह्मरुद्रादिनामानि ब्रह्मादिष्वप्यमुख्यतः ॥" |
| "वर्तन्ते न त्वकारोऽयं वर्तते केशवं विना ।" |
| "नारायणादिनामानि नृणां नामक्रियास्वपि ॥" |
| "विहितान्यकारो नैवायं विहितस्तमृते प्रभुम् ।" |
| "वायुर्ब्रह्माऽपि चाऽकारदेवते न तु नामिनौ ॥" |
| "यथा वेदाभिधेयोऽन्यो वेदाख्या देवताऽपरा ।" |
| "एवं नामाभिमानी तु वायुर्वाच्यो जनार्दनः ॥" |
| "तस्माद इति नामैतद् विष्णोः केवलमेव हि ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-236" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
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| lines | | "विशेषतोऽस्य व्याख्यानं बृहतीनां सहस्रकम् ॥" |
| "तस्मात् प्रीतो भवेद् विष्णुः शंसनादस्य सर्वदा ।" |
| "तस्माद्यज्ञेऽपि वा शंसेद् अयज्ञेऽपि रहः पुमान् ।" |
| "ध्यात्वा नारायणं देवं विष्णोरन्नं हि तत्परम् ॥ इत्यादि ब्रह्मसारे ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-237" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V24_B01" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "परमविकारेण सह विकारमात्रस्यापि प्रस्तुतत्वात् तदेतत्पञ्चविधमिति परामर्शः ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-238" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V24_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "अकारार्थत्वाद् नकारस्य ककिञ्चिन्मूलमिव । तस्मान्मूलत्वाद्, अकारार्थोऽपि ज्ञेय एव । नायोग्यानां सम्यग् वाच्यमिति स्वल्प एव प्रकाशितोऽस्माभिः । वाच उद्वर्तनाशक्तेः स्वयमेवोद्वर्तते । यद्धि देवतासु करोति तद् आत्मन्यापतति । तस्माद् द्रव्यदानं ज्ञानदानं वा काले पात्राद्यनुसारेणैव कुर्यात् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-239" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "अकारस्योङ्कारता तु अकारलोपेनैव जातेति सत्यमोङ्कारः । अकारस्याऽदौ स्थितत्वेन च यथार्थरूपत्वात् । उकारादिविकारसहितत्वात् पुष्पफलात्मकश्च । अकारस्यार्थरूपः सन्नेव च भगवांस्तमेवोङ्कारो वक्ति । अतश्च सत्यमेवोङ्कारः । यम् अर्थम् अकारो वक्ति तमेव वक्तीति । नकारस्तु ‘अत्’शिरस्कत्वात् मूलभूतस्याकारस्यान्ते स्थितिरूपत्वाद् अयथास्थितेरसत्यरूपः । तथाऽप्यकारस्य नकारस्य चैकार्थत्वात् मूलभूतश्च । तस्माद् अकारस्यैतद् वृथा वागादिकमपि व्याख्यानम् । तस्माद् विजानतः सर्वमपि भगवन्नामैव ॥ ६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-240" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V25" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तद् वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नं तद् यशः । स इन्द्रः स भूतानामधिपतिः । स य एवमेतमिन्द्रं भूतानामधिपतिं वेद विस्रसा हैवास्माल्लोकात् प्रैतीति ह स्माऽह महिदास ऐतरेयः ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-241" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "विद्यान्तरोपदेशार्थं तद् वा इदं बृहतीसहस्रम् इति पुनः पुनः परामर्शः । तदिदं बृहतीसहस्रं तद्यशः तस्य= नारायणस्य यशः । यस्य नारायणस्यैतद् यशः स भगवानेवेन्द्रनामा । स हि यत् प्रथमत इन्द्रो बभूव स्वेच्छया यज्ञनामा । तस्मात् तमेव वेदा इन्द्रशब्देन वदन्ति मुख्यतः । ‘इदि= परमैश्वर्ये’ इति धातोश्च तस्यैव हि परमैश्वर्यम् । अन्येषां तु द्वादशानां तेन दत्तमेवेन्द्रत्वम्; न तु मुख्यतः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-242" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V25_B02" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "अतो विष्णावेवेन्द्रशब्दं प्रयुङ्क्ते श्रुतिः- ‘मत्सि सोम वरुणं मत्सि मित्रं मत्सीन्द्रिमिन्दो पवमान विष्णुम्’(ऋ.सं.९.९०.५) इति ।" |
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| lines | | "न च ‘इन्द्रं विष्णुं च’ इति पृथगन्वयः क्रियते । तदा वरुणादिषु पृथक् पृथक् मत्सिशब्ददर्शनाद् अत्रापि पृथङ् मत्सिशब्दो दृश्येत । न हि सर्वेषां पृथङ् मत्सिशब्ददर्शने एकस्यैवान्यथात्वं युज्यते । न चात्र द्वित्वगमकं चकारादिकं विद्यते । तस्मात् ‘प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिम्’(ऋ.सं.७.४१.१) इत्याद्यप्येकस्यैव विष्णोर्विशेषणम् ।" |
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| lines | | "यत्र चैवं भूतेषु एकत्वे विरोधो दृश्यते तत्र तेनैव विरोधेन द्वित्वं भवति ; अन्यथैकत्वमेव । ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८२.३) इति चोक्तम् । बहुरूपत्वाद् बहुवचनं च विष्णोरेव युज्यते । तस्मान्मुख्यतो विष्णावेवेन्द्रादिशब्दाः; अन्येषामुपचारतः । ‘मत्सि महामिन्द्रमिन्दो मदाय’ इति अन्येन्द्रस्य पृथगुक्तेश्च ‘मत्सीन्द्रमिन्दो पवमान विष्णुम्’ इति पूर्वोक्त इन्द्रो विष्णुरेवेति सिद्धम् ।" |
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| lines | | "महत्त्वं च तस्यादितिपुत्रत्वेऽग्रजत्वमात्रम् , न तु सामर्थ्यतः । ‘मह= पूजायामिति धातोः पूज्यो ह्यग्रजो भवति ।" |
| "‘आ यो विवाय सचथाय दैव्य इन्द्राय विष्णुः सुकृते सुकृत्तरः ।" |
| "वेधा अजिन्वत् त्रिषधःस्थ आर्यम् ऋतस्य भागे यजमानमभजत्’(ऋ.सं.१.५६.५) ॥" |
| "इतीन्द्रस्य परमदैवं जनको यज्ञभागादियुक् पददाता विष्णुरेव हि श्रूयते । इन्द्रश्च यजमानः । तस्मात् तत्प्रसादाद् अवताराग्रजत्वमेव तस्य महत्वम् ।" |
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| lines | | "अन्येन्द्रो हि- ‘अहं प्रथमः पिबेयमहं प्रथमः पिबेयम्’(ऐ.ब्रा.द्वितीयपञ्चके, नवमाध्याये प्रथमखण्डे) इति वायुना विवदमान आजौ पराजितो वायुं प्रसादयित्वा चतुर्थे वायुना सह ग्रहमाप ।" |
| "विष्णुस्तु ‘क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधसः’(ऋ.सं.१.५६.४) इति वायोरपि विधाता श्रूयते । ‘डुधाञ्= धारणपोषणयोः’ इति धातोर्विशेषेण धारणपोषणकर्ता हि वेधाः । तस्माद् भगवत एवैतद् यशो बृहदुक्थादिकम् ।" |
| "(इन्द्रो महेन्द्राभिध इत्यत्र निमित्तम्)" |
| "ऋक्सहस्रात्मकं विष्णोर्यश इन्द्राभिधस्य हि ।" |
| "इन्द्रो हि प्रथमो विष्णुर्यज्ञनामा जगत्पतिः ॥" |
| "तत्प्रसादाद् अथेन्द्रत्वं द्वादशान्ये प्रपेदिरे ।" |
| "पुरन्दरस्त्वेक एव वासुदेवप्रसादतः ।" |
| "द्विवारमिन्द्रतामाप तस्मात् द्वादश ते परे ॥" |
| "अग्रजत्वाद् अदित्यां तु महेन्द्रो नाम चाभवत् ।" |
| "महाव्रतं कर्म कृत्वा चैव नाम्ना महेन्द्रकः ॥" |
| "महत्त्वं मुख्यतो विष्णोर्न ह्यन्यस्य कदाचन ।" |
| "एवं यो वेद तं विष्णुं विस्रस्तो बन्धतोऽखिलात् ।" |
| "अस्माल्लोकाद्धरेर्लोकम् एति नास्त्यत्र संशयः ॥" |
| "इत्याह भगवान् विष्णुर्महिदासस्वरूपकः ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "(महीदास ऐतरेयः)प्रेत्येन्द्रो भूत्वैषु लोकेषु राजति । तदाहुः- ‘यदनेन रूपेणामुं लोकमभिसम्भवन्ती३ , अथ केन रूपेणेमं लोकमा भवती३’ ।" |
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| lines | | "श्वेतद्वीपादिकान् प्राप्य स इन्द्राख्यो हरिः स्वयम् ॥" |
| "महिदासाभिधो भूत्वा लोकेष्वेषु विराजति ।" |
| "तत्र पृच्छन्ति केचित्तु यद्येष भगवान् हरिः ।" |
| "महिदासादिरूपेण भूमिष्ठो रमते प्रभुः ॥" |
| "तदा यदा स्त्रिया विष्णू रमते नित्यसत्सुखः ॥" |
| "कया स्त्रिया रतिं कुर्यान्नह्यन्यरतिरच्युतः ।" |
| "स्त्रीरूपे तत्स्वयं स्वस्मिन् रमतेऽसावितीदृशम् ।" |
| "वाच्यम्, तत्र तु भूमिष्ठरूपेण तु दिवि स्थितम् ।" |
| "स्त्रीरूपं किमसौ गच्छेद् ? अथ यद्येवमत्र च ।" |
| "स्त्रीरूपं पृथिवीसंस्थं केन रूपेण संव्रजेत् ?" |
| "न ह्यन्यगम्यो भगवान् स्त्रीरूपोऽपि जनार्दनः ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तद् यदेतत् स्त्रियां लोहितं भवति, अग्नेस्तद् रूपम् । तस्मात् तस्मान्न बीभत्सेत । अथ यदेतत् पुरुषे रेतो भवति, आदित्यस्य तद्रूपम् । तस्मात् तस्मान्न बीभत्सेत । सोऽयमात्मा इममात्मानममुष्मा आत्मने सम्प्रयच्छति । असावात्माऽमुमात्मानमिममस्मा आत्मने सम्प्रयच्छति । तावन्योन्यमभिसम्भवतः । अनेन ह रूपेणामुं लोकमभिसम्भवति, अमुना रूपेणेमं लोकमा भवति ॥" |
| "७ ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "इति पृष्ठः स्वशिष्यैः स महिदासोऽवदद्धरिः ।" |
| "स्त्रीषु यल्लोहितं लोके तत्राग्निस्थो जनार्दनः ।" |
| "स्त्रीरूपः सोऽग्निनामैव ज्वलज्ज्वालासमप्रभः ।" |
| "तस्माद्विष्णोः सन्निधानाद्भर्ता भार्याशरीरगात् ॥" |
| "न बीभत्सेतैव रक्तात् तथा पुं रेतसि स्थितः ।" |
| "आदित्ये संस्थितो विष्णुरादेरादित्यनामकः ।" |
| "तस्मान्न रेतसो भार्या बीभत्सेत पतिस्थितात् ।" |
| "पुंरूपो भगवान् विष्णू रेतसिस्थो द्युमत्प्रभः ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "तस्माद् यद् भूमिगं विष्णोः स्त्रीरूपं तत्स्वयं हरिः ।" |
| "प्रादुर्भावगतो दद्याद् दिवि स्थितपुमात्मनः ।" |
| "सूर्यगस्य तथा पुंसो रेतसिस्थस्य चाऽत्मनः ।" |
| "देवीषु यल्लोहितगं स्त्रीरूपं परमात्मनः ।" |
| "तत्स सूर्यगतो विष्णुः पुंरेतःस्थस्य चाऽत्मनः ।" |
| "दद्याद् भूमिगतस्यैव, रूपद्वयमिदं ततः ।" |
| "परस्परं सम्भवति विष्णोर्नित्यसुखात्मकम् ।" |
| "प्रादुर्भावस्थितं रूपं यच्च भूमौ पुमात्मकम् ॥" |
| "विष्णोस्तदपि देवीषु स्थितस्स्त्रीरूपकात्मना ।" |
| "एवमन्योन्यतो विष्णू रतः स्वस्मिन् न चान्यतः ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "रमया रममाणोऽपि तत्स्थेनैव स्त्रियाऽत्मना ।" |
| "रमते, नान्यतः क्वापि रतिर्विष्णोः सुखात्मनः ॥" |
| "रमया रमणं तस्माद् रमाया रतिपात्रता ।" |
| "नैवास्या रतिदातृत्वं विष्णोर्न ह्यन्यतो रतिः ॥ इत्यादि च ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "स एव महिदास इन्द्रनामा प्राप्येमं लोकमत्र भूत्वा प्रादुर्भूय मनुष्यदृष्टिगोचरतां प्राप्येषु लोकेषु राजति । नात्र ‘प्रेत्य’शब्दो मरणवाची ; किन्तु ? ‘प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवा’(ऋ.सं.२.४१.१९) इत्यादिवत् प्राप्तिवाच्येव । न हि मृतः पुनरेषु लोकेष्वेव राजति । न च यशोमात्रराजनेन स्वस्य राजनं भवति । भिन्नपदार्थत्वात् । यद्वा- ‘एति च प्रेति च’ इत्यादौ प्राप्त्यर्थेऽपि वेदेषु प्रसिद्धत्वाच्च । ‘लक्ष्मणः प्रेत्य सुग्रीवं बभाषे रामचोदितः’ इति च स्कान्दे ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "‘यदनेन रूपेणामुं लोकमभिसम्भवति’ अनेन= महिदासादिरूपेणामुं लोकं= दिविष्ठं स्वरूपम् । ‘लोक्यते’ इति स्वरूपवाची लोकशब्दः । ‘आत्मानमेव लोकमुपासीत’(बृ.उ.१.४.१५) इतिवत् । यच्छब्दः किंशब्दार्थे । अनेन रूपेण तद्रूपमभिसम्भवति किम्? उभयोरपि परिहारदर्शनादस्यापि प्रश्नत्वमवगम्यते । ‘यतश्चोदेति सूर्यः’(कठ.उ.२.१.९) इत्यादिवत् । रङ्गस्तु प्रश्नविषयस्य दुरवगमत्वं प्रकाशयति । ‘दुर्गमे प्रश्नविषये प्रश्नो रङ्गयुतो भवेद्’(३ꣳ अयं रङ्गस्वरः) इति शब्दनिर्णये ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "केन रूपेणेमं लोकमाभवति, केन स्वरूपेण भूमिष्ठेनात्मन एव स्त्रीरूपेण विष्णुः सम्बध्यते ? सोऽयं महिदासादिप्रादुर्भावरूप इमं भूमिष्ठस्त्रीरूपम्, लोहितगतं च स्वकीयमेव रूपममुष्यै दिविष्ठाय स्वपुरुषरूपाय प्रयच्छति । देवरेतःस्थिताय च देवीलोहितस्थितमात्मनः स्त्रीरूपं महिदासादिरूपेभ्यो मानुषरेतःस्थितरूपेभ्यश्च दिविष्ठैश्च विष्ण्वादिस्वरूपैः प्रयच्छति च ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "तानि भूमिष्ठत्वेन दिविष्ठत्वेन च द्विविधत्वात् ‘तौ’ इत्युच्यन्ते । अग्नेस्तद् रूपम् अग्निनाम्नो विष्णोः प्रतिमा, तत्सन्निधानात् । एवमादित्यनाम्नो विष्णोः । न ह्यग्न्यादिस्वरूपमेव लोहितादि । न च लौकिकस्त्रीपुरुषसम्बन्धमात्रमत्रोच्यते , अप्रस्तुतत्वात् तस्य । भगवानेव ह्यत्र प्रस्तुतः ।" |
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|---|
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| id | "Aitareya-257" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "असावात्मेत्यात्मशब्दाच्च भगवानेवेति ज्ञायते ।" |
| "आत्मशब्दः परे विष्णौ नान्यत्र क्वचिदिष्यते ।" |
| "गुणपूर्त्यभिधायी स, नान्यस्य गुणपूर्णता ॥" |
| "अमुख्यात्मान एवातो ब्रह्माद्याः सर्व एव हि ॥ इत्यादि च ब्रह्माण्डे ।" |
| "यदक्षरं पञ्चविधं समेति , सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते इत्यादिनोक्तार्थविषयोदाहृतैः श्लोकैरपि भगवत एव स्वरूपाणां परस्परयोगस्योक्तत्वात् । गायत्र्युष्णिग् बृहतीत्यादिना भगवत एव पञ्चविधस्य स्त्रीरूपस्य महिदासादिपञ्चपुंरूपाणां च प्रस्तुतत्वाच्च ॥ ७ ॥" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तत्रैते श्लोकाः–" |
| "यदक्षरं पञ्चविधं समेति युजो युक्ता अभियत् संवहन्ति ।" |
| "सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति ॥" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "यद् नारायणादिरूपेण पञ्चविधमक्षरं परं ब्रह्म तत् स्वस्मिन्नेव स्त्रीपुंरूपेण समेति । स्त्रीपुंरूपेण युजो देवा अश्वरूपेण रथे युक्ताः सन्तो यद् नारायणाख्यं परं ब्रह्माभिसंवहन्ति । तदेतत्सत्यस्य सत्यं नारायणाख्यं ब्रह्म यत्रानुयुज्यते यस्मिन् स्वरूप एव स्त्रीपुंरूपेण युज्यते , तत्र तस्मिन् एव परे ब्रह्मणि नारायणाख्ये सर्वेदेवा एकीभवन्ति मुक्ताः सन्तो मिलिता भवन्ति ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-260" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "नायमेकीभावो नाम स्वरूपैक्यम् ; किन्तु ? एकस्थाने वासः, अत्यनुकूलचित्तता च ।" |
| "‘एकीभूय नृपाः सर्वे ववृषुः पाण्डवं शरैः ।’(म.भा.उद्योगपर्वणि)" |
| "‘एकीभूता तु सा सेना पाण्डवानभ्यवर्तत ॥’(न्या.वि,ब्र.सू.२.१.५) इत्यादिवत् ।" |
| "न चैकीभावशब्दः स्वरूपैकत्वविषये प्रयुज्यमानः कुत्रचिद् दृष्टः । एकः पुरुषोऽपि यदा द्विधा भूत्वा एकीभवतीत्युच्यते तदाऽपि स्थानैक्यमेव । स्वरूपैक्यस्य पूर्वमेव सिद्धत्वात् । न चाज्ञात एकत्वे पुनर्ज्ञाते ‘ऐक्यं प्राप्तः’ इति प्रयोगो दृश्यते ; किन्तु ? ‘ज्ञातः’ इत्येव प्रयुज्यते । तस्माद् भावसहित एकशब्दो न स्वरूपवाची । न हि पूर्वं भिन्नस्य पश्चात् स्वरूपैक्यं भवति; किन्तु ? संसर्ग एव भवति । तस्माद् अत्रापि संसर्ग एव विवक्षितः ।" |
| "(‘समेति’,‘युज्यते’ इति पदयोर्न पुनरुक्तिः)" |
| "यदक्षरं पञ्चविधं समेतीत्युक्तस्य सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते इति परामर्शं कृत्वा तत्र देवाः सर्व एकं भवन्तीत्युच्यते । तस्मान्न पुनरुक्तिः ।" |
|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "यदक्षरादक्षरमेति युक्तं युजो युक्ता अभियत् सं वहन्ति ।" |
| "सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति ॥" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-262" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "यस्माद् अक्षराद् नारायणाख्यात् स स्वयमेव भगवान् प्रादुर्भावरूपी स्त्रीपुंरूपेण युक्त आगच्छति । तात्पर्यार्थं तस्यैवार्थस्य पुनरभ्यासः ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-263" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "यद् वाच ओमिति यच्च नेति यच्चास्याः क्रूरं यदु चोल्बणिष्णु ।" |
| "तद् वियूया कवयोऽन्वविन्दन् नामायत्ता समतृप्यञ्च्छृतेऽधि ॥" |
| "यस्मिन् नामा समतृप्यञ्च्छृतेऽधि तत्र देवाः सर्वयुजो भवन्ति ।" |
| "तेन पाप्मानमपहत्य ब्रह्मणा स्वर्गं लोकमप्येति विद्वान् ।" |
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|---|
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| id | "Aitareya-264" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "वियूय= विचार्य नामायत्तान्येव= नामार्थभूतान्येव विष्णोर्माहात्म्यादीनि अन्वविन्दन् । ततश्चाधिकं समतृप्यन्, शृते परिपक्वे सति ज्ञाने । यस्मिन् विष्णौ(विष्णोः हृ) नामानि ज्ञात्वा तस्मिन् ज्ञाने परिपक्वे समतृप्यन्, तस्मिन्नेव देवाः सर्वयुजो भवन्तीत्यवधारणार्थं पुनर्वचनम् । सर्वयुजो भवन्ति मनोवाक्कर्मभिस्तत्रैव युक्ता भवन्ति । ‘अर्थतः कठिनं क्रूरम्, उल्बणं श्रवणाप्रियम्’ इति शब्दनिर्णये ।" |
|
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| id | "Aitareya-265" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "नैनं वाचा स्त्रियं ब्रुवन्नैनमस्त्रीपुमान् ब्रुवन् ।" |
| "पुमांसं न ब्रुवन्नेनं वदन् वदति कश्चन ॥" |
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| id | "Aitareya-266" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "अस्त्रीपुमान् ब्रुवन् ‘‘अस्त्री पुमांसं ब्रुवन् ‘सप्तसु प्रथमा’ इति सूत्रात्, ‘स्वातन्त्र्ये विभक्तिव्यत्ययः’ ’’ इति च । स्वतन्त्रो हि भगवान्, तत्प्रेरित एव तं वदतीत्यभिप्रायः । वदन् वदति वदन्नेव न वदति । वदन्नेव न वदति । भवत्येव हि भगवान् स्त्रीरूपः पुंरूपश्च । तस्माद् वदत्येव । अप्रसिद्धत्वान्न वदति च ।" |
|
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| id | "Aitareya-267" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "अ स्त्रीरूपश्चैव पुंरूपो यस्मान्नारायणः स्थितः ।" |
| "पुमांस्त्री चेति वाच्योऽतो वैलक्ष्ण्यान्न चोच्यते ।" |
| "विष्णोर्नपुंसकाकारो नैवास्ति क्वचन प्रभोः ।" |
| "तथापि अरागाकृष्टत्वात् तच्छब्दैरपि कथ्यते ॥इति गारुडे ।" |
|
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| id | "Aitareya-268" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "नारायणादिरूपेण पञ्चधैष हरिः स्थितः ।" |
| "तन्नामभिश्च स्त्रीरूपैः समेति स्वैः स केशवः ।" |
| "यत्स्यन्दनं वहन्त्येते देवा भार्यासमन्विताः ।" |
| "अधिदैवे तथाऽध्यात्मे जीवदेहात्मकं रथम् ।" |
| "स सूर्यः सूर्यभार्या च चक्षुर्द्वयसमाश्रितौ ।" |
| "वहतोऽश्वात्मकौ, देहं नारायणरथात्मकम् ।" |
| "सोमश्च रोहिणी चैव दक्षवामश्रुतिस्थितौ ।" |
| "उभयोः पक्षयोः स्थित्वा वहतोऽश्वात्मकौ तयोः ।" |
| "उद्धारणार्थमेतेषामुमा वाचि समास्थिता ।" |
| "नागाकारैव रश्मित्वमगमद्वैष्णवे रथे ।" |
| "मनःस्थितः शिवश्चात्र मनोनामा महाबलः ।" |
| "अभवत् सारथिर्विष्णोर्विष्णुर्वायुश्च तं रथम् ।" |
| "प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राणाख्यावधितिष्ठतः ।" |
| "तावेव चाश्विनामानौ हयास्यौ जगदीश्वरौ । इत्यादि गारुडे ।" |
|
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| lines | | "‘तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति, प्राणा वै सत्यम् तेषामेष सत्यम्’(बृ.उ.४.१.२०) इति च श्रुतिः ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "सर्वसाधुगुणत्वात् तु वायुः सत्य इतीर्यते ।" |
| "तस्यापि सत्यतादाता साधुपूर्णगुणो हरिः ॥" |
| "सत्यस्य सत्य एतस्मात्....." |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | ".....स्त्रीपुंरूप स केशवः ।" |
| "यस्मिन् स्वात्मनि युक्तः स रमते स्त्रीपुमात्मना ॥" |
| "मुनिर्गन्धर्वपित्राद्यैर्न तत्प्राप्यं कथञ्चन ।" |
| "आप्नुवन्ति सुराः सर्वे, तद्रूपं जाज्वलत् सदा ॥" |
| "अर्धनारीपुमाकारम्, तस्य वामस्थितानि च ।" |
| "स्त्रीरूपाणि तु सर्वाणि विष्णोरत्यद्भुतानि च ॥" |
| "विष्णोर्यानि तु पुंरूपाण्यास्थितान्यस्य दक्षिणे ।" |
| "तान्यस्यैव तु रूपाणि युज्यन्तेऽत्र परस्परम् ॥" |
|
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| lines | | "एष नारायणो देवो ह्यर्धनारीपुमात्मकः ।" |
| "सर्वे देवास्सभार्याश्च तं प्राप्य पुरुषोत्तमम् ॥" |
| "एकीभावं स्वभार्याभिरर्धनारीपुमात्मना ।" |
| "प्राप्यैवोपासते विष्णुं मुक्ताः संसारसागरात् ॥" |
| "मोदन्ते च रमन्ते च विभागं चेच्छयाऽऽप्नुयुः ।" |
| "बहुधा च भवन्त्येते स्त्रीपुमात्मपृथक्त्वतः ॥" |
| "प्रसादाद् वासुदेवस्य भागैः स्त्रीपुंस्वरूपिणः ।" |
| "तेनैव नियता नित्यं तद्वशास्तत्परायणाः ॥" |
| "रमन्ते, नान्यगम्योऽसौ देशो विष्णोः परात्मनः ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "स्त्रीपुंरूपेण युक्तं तद् विष्ण्वाख्यं परमक्षरम्(यद्विष्ण्वाख्यं पराक्षरम्.हृ) ॥" |
| "अक्षरादेव परमात् पुंसो नारायणाभिधात् ।" |
| "आगच्छन्ति तदैते च देवा भार्यासमन्विताः ॥" |
| "वहन्त्यश्वादिरूपेण रथस्थं परमं वपुः ।" |
| "तत्सर्वदेवैः प्राप्यं च नान्यैः कथमपि क्वचित्॥" |
| "मितादिपञ्चरूपं यद्वाक्यं लोकेऽथवा श्रुतौ ।" |
| "नारायणस्य नामैतदिति जानन्ति देवताः ॥" |
| "मनोवाक्कर्मभिस्तस्माद् योगमाप्स्यन्ति तत्र ते ।" |
| "सर्वशब्दान् हरौ नेतुं कस्य देवानृते बलम् ॥" |
| "वाय्वन्तास्तारतम्येन विष्णुनामार्थवेदिनः ।" |
| "सम्यग्वेत्ता मारुतोऽत्र तस्मान्मुक्तेभ्य एव च ॥" |
| "सुरेभ्योऽधिकमानन्दं नित्यं भुङ्क्ते हरेरनु ॥ इत्याद्यर्धनारीनारायणतन्त्रे ।" |
|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अः इति ब्रह्म तत्राऽगतमहमिति ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "एवं सर्वे शब्दा भगवद्वाचका इत्युक्त्वा, अकारो विशेषतो नारायणवाचक इत्याह– अः इति ब्रह्मेति ॥" |
| "‘इतिशब्दोऽभिधानान्ते यत्र, वैशेषिकं हि तत् ।" |
| "नाम स्यादिति मे साक्षान्निर्णयः समुदाहृतः ॥ इति शब्दनिर्णये ।" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "तत्राऽगतमहम् अति यस्माद् अ इति अयं शब्दः प्रस्तुतस्याभावम्, विरोधिनम् अन्यं च वदति तस्मात् प्रत्यक्षत्वाज्जीवजडात्मकस्य जगत एवानुक्तावपि प्रस्तुतरूपत्वात् तदन्यः, तद् विरोधी, तत्र दृश्यमानदोषवर्जितश्चाकारशब्दार्थ इति सिद्ध्यति। मनसि प्रस्तुतत्वाद् अवचनेऽपि प्रस्तुतमेवेदं सर्वम् । दृष्टसम्बन्धित्वाद् अदृष्टं सर्वमपि प्रस्तुतं भवति । भगवांस्तु ‘अ’इति पृथग् विवक्षितत्वादेव न प्रस्तुतसमुदाये ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "(न च शून्यम् अकारार्थः)" |
| "न च शून्यस्य ‘अ’शब्दार्थता । शून्याङ्गीकारे हि अकारस्याभावताख्य एक एवार्थ इति सिद्ध्यति । विष्णोरङ्गीकारे त्वभावता, अन्यता, विरोधिता इति त्रयोऽप्यर्थाः सम्यगेव सिद्ध्यन्ति । तस्माद् अकारस्य भगवानेव मुख्यार्थः, न शून्यम् । एकदेशार्थत्वात् । तस्माद् अमुख्यार्थत्वाद् अन्ययुक्तेनैव अकारेण ‘अभावः’ इत्येव तदुच्यते, न तु ‘अ’ इत्येव केनचित् क्वचित्। न च तथा प्रयोगोऽस्ति ।
तस्मात् पारतन्त्र्य- अल्पगुणत्वादिसर्ववस्तुस्वभावविरुद्धस्वभावं स्वतन्त्रं पूर्णगुणं सर्वजीवजडेभ्योऽन्यद् अज्ञान-दुःख-अल्पत्व-पारतन्त्र्य-उत्पत्ति-नाशादिसर्वदोषविवर्जितं ब्रह्मैव ‘अ’शब्दार्थः । पूर्णं हि ‘ब्रह्म’शब्दस्यार्थः । न च दोषयुक्तस्य पूर्णता । न च जीवजडाद्यपूर्णवस्त्वभिन्नस्य पूर्णत्वं भवति । तस्माद् अकारशब्दार्थ एव ब्रह्मशब्दार्थः । तदेतदुक्तं ‘अः इति ब्रह्म’इति ।" |
| "(सन्ध्यकरणस्योद्देशः)" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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|---|
| lines | | "(सन्ध्यकरणस्योद्देशः)" |
| "‘अः’ इति पृथक्त्वेन वचनं ‘तत्समम् अधिकं वा किमपि नास्ति’ इति दर्शयितुम् ।" |
| "‘विवृतावपि सर्गः स्यात् संहितायां च यत्र हि ।" |
| "समानोत्तमहीनत्वम् उच्यते वस्तुनोऽञ्जसा ॥’ इति शब्दनिर्णये ।" |
| "‘अः इति ब्रह्म’ पूर्णं वस्तूच्यते । तत्राऽगतमहमिति । तत्राकारस्य पूर्णवाचित्वेऽहमेव सोऽकारवाच्य इत्याह महिदासरूपो भगवान्नारायणः । अहमेक एव परिपूर्णः । अन्येषां सर्वेषां मदधीनत्वादल्पत्वादिति ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-279" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "मुक्तेभ्यः प्रळये लीनेभ्यश्च सर्ववस्तुभ्यश्च(वस्तुभ्यः सर्वदा .हृ) सदा विभिन्न एव भगवानिति दर्शयितुं च ‘अः’ इति पृथग्वचनम् ।" |
| "तच्चोक्तं वाक्यनिर्णये–" |
| "‘मुक्ता अपि न विष्णुत्वं यान्ति तत्समतामपि ।" |
| "आधिक्यं कुत एव स्यान्मुक्तानां मुक्तिदातृतः ।" |
| "कुत एव प्रलीनानां प्रळये तु तदात्मता ।" |
| "ब्रह्मशर्वेन्द्रपूर्वाणां मुक्तावपि न विष्णुता ।" |
| "यदा तदा तु संसारे क्व तद्रूपत्वमिष्यते ।" |
| "अन्योऽसौ सर्वतो विष्णुः स्वातन्त्र्याद् गुणपूर्तितः ।" |
| "सर्ववस्तुस्वभावस्य विरुद्धोरुस्वभावकः ।" |
| "पारतन्त्र्याल्पताऽज्ञानजनिनाशादिवर्जितः ।" |
| "अकारेण ततो विष्णुः संहितायां पदात्मना ।" |
| "बह्वृचोपनिषत्प्रोक्तस्तेनैव परमात्मना ।" |
| "महिदासावतारेण सोऽहमेवंविधस्त्विति ।" |
| "मत्तोऽन्यो न हि पूर्णोऽस्ति यतोऽकारश्च पूर्णताम् ।" |
| "वक्ति तस्मादकारोऽयं मामेव वदति स्फुटम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-280" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
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|---|
| lines | | "नाभाववाच्यकारः स्याद् अर्थत्रययुतो यतः ।" |
| "एकार्थात्मा ह्यभावः स्यान्निषेधैकस्वरूपतः ।" |
| "अन्यता च निषेधश्च विरुद्धत्वमिति त्रयः ।" |
| "अकारार्था ह्यभावस्तु निषेधैकस्वरूपतः।" |
| "एकदेशस्वरूपत्वान्नाकारेणैव भण्यते ।" |
| "किन्त्वभाव इति त्वेव तेनाकारोदितो हरिः ॥ इति च ।" |
| "न च निषेधस्वरूपेऽपि विरुद्धता चान्यता चास्तीत्येतावता पूर्णार्थता भवति । तदाऽर्थत्रयकल्पनस्य(कथनस्य) वैयर्थ्यात् ।" |
| "उक्तं हि शब्दनिर्णये-" |
| "‘विरुद्धतानिषेधान्यभावयुक्ते हि केवलः ।" |
| "अकारो वर्तते तेषाम् एकार्थात्मन्यभावके ।" |
| "वर्ततेऽभाव इत्येव, न त्व इत्येव केवलः ॥’ इति ।" |
| "तस्मान्नारायण एवाकारवाच्य इति सिद्धम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-281" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V32_B08" |
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| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘यतोऽकारः सदा विष्णोर्वाचकत्वेन संस्थितः ।" |
| "तस्माद् वर्णत्रयात्माऽयं प्रणवोऽपि त्रयात्मकम् ॥" |
| "हरिमेव सदा वक्ति नैवान्यं कञ्चन क्वचित्।" |
| "सृष्टिकर्ता ब्रह्मनामा योऽसृजच्चतुराननम् ।" |
| "अन्तर्यामी विरिञ्चस्य सोऽकारार्थो जनार्दनः ।" |
| "वैकुण्ठलोक आस्ते स द्वितीयवपुषा हरिः ।" |
| "उकारवाच्यः स विभुर्नृसिंहो रुद्रनामकः ।" |
| "रौद्रत्वात् स शिवस्यापि स्रष्टा संहारकारकः ॥" |
| "अन्तर्यामी शिवस्यापि मकारार्थः प्रकीर्तितः ।" |
| "एवं त्रयात्मकं विष्णुं प्रणवोऽयं त्रियात्मकः ।" |
| "एवं पृथगिवाऽचष्टे बिन्दुर्वक्त्यनिरुद्धकम् ।" |
| "प्रद्युम्नाद्यान् नादपूर्वाः सर्वान् नारायणात्मकान् ।" |
| "पद्मनाभादिका एव मूर्तीर्नारायणोत्तराः ।" |
| "प्रणवोऽयं वदत्यष्टौ तस्मान्नान्याभिधायकः ॥’ इति तत्त्वसारे ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-282" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V33" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य षट् त्रिंशतम् अक्षराणां सहस्राणि भवन्ति । तावन्ति पुरुषायुषोऽह्नां सहस्राणि भवन्ति । जीवाक्षरेणैव जीवाहराप्नोति, जीवाह्ना जीवाक्षरमिति अनकाममारः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-283" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V33_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘षट्त्रिंशतिसहस्राणि बृहत्युक्थार्णगानि तु ।" |
| "स्त्रीरूपाणि हरेस्तावद् अह्नामप्यभिमानिषु ॥" |
| "सूर्यरूपेषु रूपाणि पुमाकाराणि सर्वशः ।" |
| "एतैः पुरुषगैः (रूपैर्बृहदुक्थ....)रूपैर्बृहत्युक्थव्यवस्थितैः ॥" |
| "कदाचिद् भगवान् विष्णुः पुमाकाराणि तानि च ।" |
| "कृत्वा सूर्यगतान्येव स्त्रीरूपाणि विधाय च ॥" |
| "तान्याप्नोति च पुंरूपैस्तैरेवाक्षरगानि च ।" |
| "स्त्रीरूपाणि जगन्नाथः प्राप्नोत्यात्मेच्छया प्रभुः ॥" |
| "पुंरूप-प्रमदारूपस्वरूपै रमते स्वयम् ।" |
| "एकीकृत्य च तान्येव द्विरूपो रमते तथा ॥" |
| "स एव रमते मायां स्थितात्मस्त्रीतनौ हरिः ।" |
| "प्राणस्योत्पत्तिकामः सन् अनेच्छामारनामकः ॥’ इत्यर्धनारीनारायणतन्त्रे ।" |
| "वायोरुत्पत्तिकामो मायां= रमायां(मायायां=रमायाम्) रमत इति अनकाममारः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-284" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V33_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "जीवस्थितेन(जीवे स्थितेन. हृ) अक्षरगेण अक्षरनाम्ना स्वरूपेण जीवाख्यसूर्यस्थितम् अहराख्यं स्वरूपमाप्नोति, तेन चाक्षराख्यं स्वरूपमाप्नोति । यदक्षरादक्षरमेति युक्तम् इत्यस्य व्याख्यानरूपत्वाच्चैतदवसीयते ।" |
| "‘पुमांसं स्त्रियं च वदन्नेव न वदति’ इत्युक्तत्वाद् उभयात्मकं रूपं प्रतीयते । अस्त्रीपुमानिति ब्रुवन्नपि न वदति इत्युक्तत्वाच्च स्त्रीत्वं पुंस्त्वं च प्रतीयते विष्णोः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-285" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V33_B03" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "न च नपुंसकरूपं भगवतः कुत्रचिदुक्तम् । प्रसिद्धमेव च रूपद्वयम् । अतो नपुंसके वदन्नपि न वदतीति न तद्वदनुषज्यते । नपुंसकरूपे प्रमाणाभावादेव लौकिकस्त्रीपुंविलक्षणत्वाद् ‘अस्त्रीपुमान्’ इत्यपि वदन्निति भवति ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-286" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V34" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथ देवरथः- तस्य वाग् उद्धिः, श्रोत्रे पक्षसी, चक्षुषी युक्ते, मनः सङ्ग्रहीता । तदयं प्राणोऽधितिष्ठति । तदुक्तमृषिणा- ‘आ तेन यातं मनसो जवीयसा(ऋ.सं.१०.३९.१२) ।’ ‘निमिषश्चिज्जवीयसा(ऋ.सं.८.७३.२) ।’ इति जवीयसेति ॥" |
| "८ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-287" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V34_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘ऋष ज्ञान इति ह्यस्माद्(ह्यद्धा. हृ) धातोः सर्वज्ञ एकराट् ।" |
| "वेदद्रष्टा परमर्षिर्हयास्यः पुरुषोत्तमः ।" |
| "मन्त्राणां प्रथमो द्रष्टा सर्वेषां यत(योऽतः. हृ) एव तु ।" |
| "ऋषिणोक्तमिति प्राहुर्मन्त्रोक्तं ब्राह्मणान्यतः ।" |
| "तत्प्रसादाद्धि तपसा पश्चान्मन्त्रान् प्रपेदिरे ।" |
| "ब्रह्माद्या ब्राह्मणं पश्चात् तैर्दृष्टमृषिभिः पृथक् ।" |
| "मन्त्राश्चोपनिषच्चैव नाकृत्वा सुमहत् तपः ।" |
| "प्रथमं तद्धयास्येन दृष्टं केनचिदीक्ष्यते ।" |
| "विना पृथक् तपो दृश्येत् ब्राह्मणं मुनिभिर्यतः ।" |
| "मन्त्राश्चोपनिषच्चैव ब्राह्मणाद् उत्तमास्ततः ॥" |
| "तत्राप्युपनिषच्छ्रेष्ठा युक्तावस्थाधिगम्यतः ॥’ इत्यादि प्रमाणविवेके ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-288" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V34_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
|---|
| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "तेन रथेन अध्यात्मं शरीराख्येन, अधिदैवं(अधिदैवतम्. हृ) रथरूपेण । ऋभव इत्यत्र देवानां साधारणं नाम(साधारणनाम) ।" |
| "‘आदित्या वसवो रुद्रा विश्वे ऋभव इत्यपि ।" |
| "सर्वदेवसमाख्या च द्वादशाष्टादिकेष्वपि ॥ इति शब्दनिर्णये ।" |
| "निर्मितो दैवतैः सर्वैर्विष्णुना वायुना सह ।" |
| "अधिष्ठितो रथो दिव्यः सोऽध्यात्मं देहनामकः ॥" |
| "सम्यग् योगो यदा तस्य मनोवाक्कर्मभिर्भवेत् ।" |
| "देहाख्यस्य रथस्यैव तदा नारायणात् प्रभोः ॥" |
| "विविधं वासवत्वात्तु विवस्वन्नामकाच्छुभम् ।" |
| "संसारवारकं ज्ञानं दिवो दुहितृनामकम् ॥" |
| "विष्णुतत्त्वापरोक्षाख्यम् अहनी द्वे च शोभने ।" |
| "ज्ञानावस्था मुक्त्यवस्थेत्युभे एवाहनी परे ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-289" |
|---|
| oldKey | "AIT_C02_S03_V34_B03" |
|---|
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|---|
| parent | "AIT_C02_S03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "जायन्ते देवतास्त्वेषां भारती वायुरेव च ।" |
| "जीवन्मुक्तेश्च मुक्तेश्च दाता रूपद्वयी प्रभुः(विभुः हृ) ॥" |
| "सर्वस्त्रीणाम् उत्तमत्वाद् द्यौर्नामा श्रीरुदाहृता ।" |
| "(अहराख्या, हृ)दुहिताऽस्या भारती तु नित्याहेयस्वरूपतः ॥" |
| "अहरित्युच्यते वायुर्ज्ञानात्मत्वात् तथैव च ।" |
| "अधिदैवे(अधिदैवरथे. हृ) रथेऽप्येते विष्णोर्लक्ष्म्यां प्रजज्ञिरे ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-290" |
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| oldKey | "AIT_C02_S03_V34_B03" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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|---|
| lines | | "रथेन तेन देवेशौ विष्णुवायू जगत्पती ।" |
| "आयातमिति हैवैतौ प्रार्थयेद् यज्ञकर्मणि ॥" |
| "(अन्यदा. हृ)अन्यथाप्यर्थयेदेतौ ज्ञानेच्छुः पुरुषः सदा ।" |
| "जपेन्मन्त्रद्वयं(वायुदेवस्थं) नित्यम् आ तेन निमिषस्तथा ॥" |
| "रक्षणं वां समीपे स्यान्ममेत्यध्यात्ममेव च ।" |
| "हयास्यत्वाच्चाश्विनौ तावित्याह परमा श्रुतिः ॥" |
| "ऐन्द्राग्नेयादिकाश्चैवं सर्वे मन्त्रा हरिं परम् ।" |
| "वदन्ति मुख्यतो नान्यं सर्वनामानमच्युतम् ॥" |
| "अथवा वायुदेवस्थं पृथक्संस्थं च केशवम् ।" |
| "मन्त्रो द्विवचनो वक्ति तथा बहुवचस्स्वपि ॥ इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "सुखं ददत इति सुदिने । विवस्वतो विष्णोः सकाशाद् दिवो दुहिता अहनी च जायन्ते । अहनी इति द्विवचनेन द्वित्वे सिद्धेऽप्युभे इति वचनमध्यात्माधिदैवतयोः(...धिदैवतयोः. हृ) उभयोरपि वचनार्थम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "न च सूर्यरथोऽत्र वर्ण्यते । न चाहोरात्रे ‘अहनी’ इत्युच्येते । सूर्यस्याश्विनामाभावात् । सप्ताश्वत्वाच्च तद्रथस्य । चतुरश्वत्वं चात्रोच्यते । श्रोत्रे पक्षसी चक्षुषी युक्ते इत्यध्यात्मसम्बन्धाच्च । न च रात्रौ ‘सुदिनम्’ इति प्रयोगो दृष्टः । असुदिनस्यापि तत एव जातत्वाद् व्यर्थविशेषणता च ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "अस्मिन् पक्षे तु लौकिकाहर्व्यावृत्त्यर्थं ‘सुदिने’ इति युज्यते । जीवन्मुक्तिर्मुक्तिश्च हि मुख्ये सुदिने । ‘स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवाऽत्मनो यद्यत्कामयते तत्तत् सृजते’(बृ.उ.३.५.९अव्याकृतब्राह्मणम्) इति ज्ञानावस्थायां(ज्ञान्यवस्थायां. हृ) मुक्तौ भोगबाहुल्यकारणत्वात् साऽपि मुक्तिवत् सुदिनम् । न हि मुक्तावधिक्यार्जनमस्ति । ‘न हीयते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते’(मोक्षधर्मे, ब्र.सू.भा.४.४.२१) इति वचनात् । अतो ज्ञानोत्पत्तिसमनन्तरमेव मुक्तौ न पुनरार्जनमस्तीति किञ्चित्कालं ज्ञानित्वेनावस्थानमपि सुदिनमेव । ज्ञानात् पूर्वं तु पतनसंशयादेव न सुदिनम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "न चाश्विरथो वर्ण्यते । न ह्यश्विरथयोगाद् अहनी जायेते । एकरासभयुक्तो हि तद्रथः । ‘तद्रासभो नासत्या सहस्रम्’(ऋ.सं.१.११५.२) इत्यादि वचनात् । न च विवस्वच्छब्दोऽश्विनोर्विद्यते । ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८२.३) इति विष्णोः सर्वनामानि प्रसिद्धानि च । ‘युजो युक्ता अभियत् संवहन्ति’ इत्यादिना तस्यैव प्रस्तावाच्च । अतो विष्णुरेव मुख्यतः सर्वनामोक्त इति सिद्धम् ॥ ८ ॥" |
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| lines | | "आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीद्, नान्यत् किञ्चन मिषत् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "एको नारायणस्त्वासीत् प्रलये रमया सह ।" |
| "नित्याततगुणत्वात् स आत्मेति श्रुतिषूदितः ।" |
| "इदं सर्वमपेक्ष्यासौ कालतो गुणतस्तथा ।" |
| "अग्र्य एव समस्तेभ्यस्तद्वशत्वाद् रमाऽपि सा ।" |
| "विद्यमानाऽपि नाग्रस्था गुणैरूना ततो यतः ।" |
| "न ब्रह्मा न शिवश्चाऽसीन्नैवान्यच्च मिषत् क्वचित्।" |
| "सुप्तास्तत्र यतो जीवाः सर्वे ब्रह्मशिवादिकाः ।" |
| "असुप्ता श्रीश्च मुक्ताश्च स्वतन्त्रोन्मेषवर्जनात् ।" |
| "अनुन्मेषा एव तेऽपि स्वतन्त्रोन्मेष एकराट् ।" |
| "नारायणो न चान्योऽस्ति पूर्णोन्मीलद्गुणात्मकः ।" |
| "पराधीनेन वित्तेन भुञ्जन्नपि हि भिक्षुकः ।" |
| "वित्तवानिति नैवोक्तस्तथा श्रीर्मुक्तिगा अपि ।" |
| "मिषन्तोऽप्यन्यतन्त्रत्वान्न मिषन्तः कथञ्चन ।" |
| "सर्वदाऽप्येक एवायं स्वतन्त्रो नापरः क्वचित्।" |
| "कालाग्र्यत्वं वक्तुमस्य प्रलये स्थितिरुच्यते ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "स ईक्षत-‘इमान् लोकान्नु सृजा’ इति स इमान् लोकान् असृजत, अम्भो मरीचीर्मरम् आपः । अदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः, प्रतिष्ठा । अन्तरिक्षं मरीचयः । पृथिवी मरः । या अधस्तात् ता आपः । स ईक्षत ‘इमे नु लोकाः, लोकपालान्नु सृजा’ इति । सोऽद्भ्यः एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "स ऐच्छद्भगवान् विष्णुः स्रष्टुं लोकाभिमानिनः ॥" |
| "लोकाभिधानवद्देवाञ्जडलोकांश्च शाश्वतः ।" |
| "स लोकेभ्यः पूर्वतनान् अबाख्यान् महदादिकान् ॥" |
| "ब्रह्मशर्वादिकान् सृष्ट्वा जडैस्सह जनार्दनः ।" |
| "दिवमाकाशमुर्वीं च ससृजेऽथ द्विसप्तकान् ॥" |
| "इति सृष्ट्वा स लोकांस्तु पुनस्तानेव लोकपान् ।" |
| "अण्डान्तः स्रष्टुमैच्छच्च तेषां पूज्यत्वसिद्धये ॥" |
| "अम्नामकेभ्यस्तेभ्यः स पूर्वसृष्टेभ्य एव तु ।" |
| "सर्वजीवाधिकत्वात् तु ब्रह्माणं पुरुषाभिधम् ॥" |
| "अंशेनोद्धृत्य रुद्राद्यैः सह चैनमयोजयत् ।" |
| "तथैव चेतनानाञ्च भागानुद्धृत्य पिण्डवत् ॥" |
| "चेतनाचेतनं राशिमेकस्थं विदधे प्रभुः ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तमभ्यतपत् । तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाऽण्डम् । मुखाद् वाग्, वाचोऽग्निः ।" |
| "नासिके निरभिद्येताम् । नासिकाभ्यां प्राणः , प्राणाद्वायुः ।" |
| "अक्षिणी निरभिद्येताम् । अक्षिभ्यां चक्षुः , चक्षुषः आदित्यः ।" |
| "कर्णौ निरभिद्येताम् । कर्णाभ्यां श्रोत्रम् , श्रोत्राद् दिशः ।" |
| "त्वङ् निरभिद्यत । त्वचो लोमानि, लोमभ्य ओषधिवनस्पतयः ।" |
| "हृदयं निरभिद्यत । हृदयान्मनः, मनसश्चन्द्रमाः ।" |
| "नाभिर्निरभिद्यतः । नाभ्या अपानः, अपानान्मृत्युः ।" |
| "शिश्नं निरभिद्यत । शिश्नाद् रेतः, रेतस आपः ॥" |
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| lines | | "पुनरैच्छञ्जगन्नाथस्तस्याङ्गोत्पत्तिम् अच्युतः ॥" |
| "अण्डवन्मुखमस्यासीत् प्रथमं तु शिरोऽभिधम् ।" |
| "भिन्नमास्यं पुनस्तस्य विष्णोरेवेच्छया प्रभुः ॥" |
| "तत्र वाङ्नामकं रूपं वह्नेरासीत् पुरातनम् ।" |
| "तस्यैवाथ द्वितीयं च यदग्निरिति गीयते ।" |
| "तथैव नासिकातोऽभून् मुख्यवायोः सुतो मरुत् ।" |
| "प्राणो वायुरिति द्वेधा, चक्षुषोऽभूत् तथा रविः ।" |
| "द्विरूप एव, कर्णाभ्यां मित्र-धर्म-अप्प-वित्तपाः ।" |
| "दिग्देवता द्विरूपेण बभूवुः सर्व एव च ।" |
| "हृदयाद् गरुडानन्तशिवचन्द्राः पृथक् पृथक् ।" |
| "मनो बुद्ध्यभिमानाश्च तन्नामानश्च जज्ञिरे ।" |
| "त्वचश्च रोमनामानो वृक्षनामान एव च ।" |
| "द्विविधाः पारिजाताद्या बभूवुर्ब्रह्मदेहतः ।" |
| "हस्ताभ्यां द्विविधः शक्रः, पद्भ्यां तत्सूनुरेव च ।" |
| "यज्ञस्त्वजनि, पायोश्च यमो निर्ऋतिरेव च ।" |
| "रेतोऽम्नामा द्विरूपस्तु शिव एव च गुह्यतः ।" |
| "अपानो मृत्युरिति च मुख्यो नाभेश्च(स्तु) मारुतः ॥ १ ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतन् । तम् अशनापिपासाभ्याम् अन्ववार्जत् । ता एनमब्रुवन्- ‘आयतनं नः प्रजानीहि , यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदाम’ इति । ताभ्यो गामानयत्, ता अब्रुवन्- ‘न वै नोऽयमलम्’ इति । ताभ्यः अश्वमानयत्, ता अब्रुवन्- ‘न वै नोऽयमलम्’ इति । ताभ्यः पुरुषमानयत्, ता अब्रुवन्- ‘सुकृतं बत’ इति । पुरुषो वाव सुकृतम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "एवं रूपद्वयेनापि स्तुवन्तो विष्णुमव्ययम् ।" |
| "दिव्याम्बराः कुण्डलिनः प्राविशन्नुदकार्णवम् ।" |
| "तदाऽशनापिपासाख्यं द्विरूपं मारुतं पुनः ।" |
| "तस्मिन् देवसमूहे तु विष्णुः प्रावेशयत् प्रभुः ।" |
| "तेऽब्रुवन् देहि नो वासं यत्र चान्नमदामहे ।" |
| "गोरूपमेभ्यो ब्रह्माणं ददौ नारायणः प्रभुः ।" |
| "तत्र प्रविश्य ते देवा नालमित्यब्रुवन् पुनः ।" |
| "अश्वरूपं विरिञ्चश्च पुनरेवाददत् प्रभुः ।" |
| "तद्रूपेऽपि प्रविश्यैव नालमित्यब्रुवन् पुनः ।" |
| "पूर्वसृष्टं पुमाकारं ब्रह्मणोऽदात् पुनर्हरिः ।" |
| "तद् दृष्ट्वैवालमित्यूचुः....." |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "ता अब्रवीद्- ‘यथाऽऽयतनं प्रविशत’ इति । अग्निः वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत् । वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् । आदित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशत् । दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन् । ओषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशन् । चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशत् । मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशत् । आपो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | null |
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| lines | | "... विशतेति स चाब्रवीत् ।" |
| "विविशुश्च यथोत्पन्नाः सर्वे देवाश्चतुर्मुखम् ॥" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तमशनापिपासे अब्रूताम्- ‘आवाभ्याम् अभिप्रजानीहि’ इति । ते अब्रवीद्- ‘एतास्वेव वां देवतास्वाभजामि, एतासु भागिन्यौ करोमि’ इति ।" |
| "तस्माद्यस्मै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते, भागिन्यावेवास्याम् अशनापिपासे भवतः ॥ २ ॥" |
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| id | "Aitareya-307" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "अशनापिपासामानी तु द्विरूपो मारुतोऽवदत् ।" |
| "‘कुर्वाज्ञामावयोश्चैव यथा त्वच्छासनानुगौ ॥" |
| "नित्यं भवाव’ इति, हरिः ‘सर्वत्र प्रविश’ इत्यमुम् ।" |
| "आह, तस्माद् देवतानां सर्वासां भागभुङ् मरुत् ॥" |
| "एक एव प्राणनामा, नाभिस्थोऽपि स एव हि । अशनापिपासापानश्च मृत्युश्चेति चतुर्विधः ॥" |
| "एक एव महान् वायुः सर्वदेवेषु संस्थितः ॥ २ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "स ईक्षेत- ‘इमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा’ इति । सोऽपोऽभ्यतपत् । ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत । या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् । तदेतत् पराङ् अत्यजिघांसत् ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-309" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "पुनरैच्छत् केशवोऽसावन्नमेभ्यः सृजा इति ।" |
| "अबाख्याः देवताः पूर्वसृष्टा ब्रह्मादिकाः पुनः ।" |
| "ददर्श(ददर्शाऽशु .हृ) सुविशालाभ्यां नेत्राभ्यां पुष्करेक्षणः ।" |
| "तद्दर्शनात् तदिच्छातस्तासां देहोऽभवत् पृथक् ।" |
| "सर्वासामपि देहैकदेशेभ्यो मिळितं शुभम् ।" |
| "सर्वैरधिष्ठितं चैव विरिञ्चेन विशेषतः ।" |
| "दिव्यावयवसम्पन्नमेकमेव सुलोचनम् ।" |
| "भोग्यभोक्त्रात्मना नास्ति तस्य दुःखं कथञ्चन ।" |
| "ते हि देवाः स्वयं भोग्याः स्वयं भोक्तार एव च ।" |
| "क्रीडन्ते मोदिनो नित्यम्, तथाऽप्यन्नात्मकस्त्वसौ ।" |
| "क्रीडयाऽपाक्रमत् किञ्चित्...।" |
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|---|
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| id | "Aitareya-310" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "तद् वाचाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोद् वाचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनद् वाचाऽग्रहैष्यद् अभिव्याहृत्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।" |
| "तत् प्राणेनाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् प्राणेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनत् प्राणेनाग्रहैष्यद् अभिप्राण्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।" |
| "तच्चक्षुषाऽजिघृक्षत् , तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्चक्षुषाऽग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।" |
| "तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यत् श्रुत्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।" |
| "तत् त्वचाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् त्वचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनत् त्वचाऽग्रहैष्यत् स्पृष्ट्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।" |
| "तन्मनसाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् मनसा ग्रहीतुम् । स यद्धैतन्मनसाऽग्रहैष्यद् ध्यात्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।" |
| "तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद् विसृज्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।" |
| "तदपानेनाजिघृक्षत् , तदावयत् । सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद् वायुः । अन्नायुर्वा एष यद् वायुः ।" |
|
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| id | "Aitareya-311" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "... तं तदाऽसौ चतुर्मुखः ।" |
| "अत्तुं वागादिभिः सर्वैरैच्छन्नाप्यशकत् तदा ।" |
| "जानन्नपि क्रीडयैव तारतम्यं प्रकाशयन् ।" |
| "एवं चकार ब्रह्मा स क्वाज्ञानं लोककर्तरि ।" |
| "क्षुत्पिपासदयश्चैव देवानां भोगसाधकाः ।" |
| "न तु पीडाकरास्तेषामैश्वर्यादिगुणोन्नतेः ।" |
| "अन्नमूर्तिं ततो ब्रह्मा प्रधानेनैव वायुना ।" |
| "अपानाख्येनात्तुमैच्छत् तदैवाशकदाशु सः ।" |
| "तस्माद् भोक्तैक एवासौ सर्वस्यान्नस्य मारुतः ।" |
| "तत्प्रसादात् परेऽश्नन्ति किञ्चित् किञ्चिन्न चाखिलम् ।" |
| "आयूरूपोऽखिलानां च देवानां वायुरेव हि ।" |
| "अन्नदेवस्य चाऽयुः स तस्माद्देवोत्तमो मरुत् ॥" |
| "आयुःशब्दो ज्ञानवाची गतिवाची च यत्ततः ।" |
| "चेष्टामोक्षज्ञानदाता सुराणां मारुतस्ततः ॥" |
| "अन्योन्यगुणदातृत्वात् समानौ ब्रह्ममारुतौ ।" |
| "तस्मान्मोक्षे सुखे ज्ञाने विष्णुभक्त्यादिकेष्वपि(भक्त्यादिकेषु च .हृ) ॥" |
| "सर्वेभ्यश्चाधिकौ तौ हि तयोर्विष्णुः परस्सदा ।" |
|
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| id | "Aitareya-312" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "स ईक्षत- ‘कथं न्विदं मदृते स्याद्’ इति । स ईक्षत- ‘कतरेण प्रपद्या’ इति । स ईक्षत- ‘यदि वाचाऽभिव्याहृतम्, यदि प्राणेनाभिप्राणितम्, यदि चक्षुषा दृष्टम्, यदि श्रोत्रेण श्रुतम्, यदि त्वचा स्पृष्टम्, यदि मनसा ध्यातम्, यद्यपानेनाभ्यपानितम्, यदि शिश्नेन विसृष्टम्, अथ कोऽहम्’इति ।" |
|
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| id | "Aitareya-313" |
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| lines | | "देवतानां प्रवेशात् तु पूर्वमेव जनार्दनः ।" |
| "इत्थमैक्षत देवेशो ‘ब्रह्माद्या यदि मां विना ।" |
| "क्रियादिषु समर्थाः स्युर्न मे विष्ण्वभिधा भवेत् ।’" |
| "सर्वचेष्टयितृत्वाच्च विशिष्टबलतस्तथा ।" |
| "विष्णुरित्यभिधा मह्यम्, सा न युक्ता दिवौकसाम् ।" |
| "स्वतन्त्रत्वे, ततः सर्वे मद्वशा एव नान्यथा ।" |
| "तस्मादेषां प्रवृत्त्यर्थं प्रवेक्ष्ये सह वायुना ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विदृतिर्नाम द्वाः । तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथाः । त्रयः स्वप्नाः । अयमावसथोऽयमावसथ इति ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "इति मत्वा विरिञ्चस्य शरीरं प्रविवेश सः ।" |
| "मूर्धन्यनाड्या प्रथमं ब्रह्मवायुसमन्वितः ।" |
| "अग्न्यादयस्ततः पश्चात् प्रविष्टास्तन्नियोजिताः ।" |
| "प्रपदाभ्यां तथाऽन्येन रूपेण प्रविवेश सः ।" |
| "बिभर्ति देहं तेनैव मूर्धाविष्टेन(मूर्ध्नाविष्टेन) चेष्टयन् ।" |
| "नारायणो वासुदेव इति द्वेधा व्यवस्थितः ।" |
| "मूर्धाविष्टो(मूर्ध्नाविष्टो) वासुदेवस्तस्य चावसथास्त्रयः ।" |
| "अक्षि कण्ठो हृदित्येवं त एव स्वप्ननामकाः ।" |
| "आप्नोत्यत्र स्वयं विष्णुरतः स्वप्नाः प्रकीर्तिताः ।" |
| "अनिरुद्धादिरूपेण त्रिधा तेषु व्यवस्थितः ।" |
| "दाताऽवस्थात्रयस्यास्य जीवस्य क्रमशो विभुः ।" |
| "सुषुम्नायां वासुदेवो मूर्धन्येव व्यवस्थितः ।" |
| "तस्यामेव ब्रह्मनाड्यां स्थितो नारायणः प्रभुः ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् । किमिहान्यं वावदिषदिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्मततममपश्यत् । इदमदर्शमिती३ँ (अयं रङ्गस्वरः)। तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते। परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ ३ ॥" |
|
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| lines | | "स एव भगवान् विष्णुः प्रादुर्भावात्मना पुनः ।" |
| "जातो मत्स्यादिरूपेण सर्वभूतेषु चाऽविशत् ।" |
| "‘असुराणां निहन्तारं ज्ञानादिगुणदं तथा ।" |
| "चेष्टाप्रदं च भूतेषु(देहेषु) न मदन्यं वदत्यपि’ ।" |
| "इति मत्वा जगन्नाथो दैत्यनिग्रहणेच्छया ।" |
| "ज्ञानदानार्थमपि तु प्रादुर्भूतो भुवि प्रभुः ।" |
| "तथा जीवेषु सर्वेषु प्रविष्टः प्रेरणेच्छया ।" |
| "को ह्यन्यस्तमृते विष्णुम् एतत्कर्म करिष्यति ।" |
| "स सर्वगुणसम्पूर्णं सर्वगं नित्यमव्ययम् ।" |
| "एतदेवस्वरूपं स त्वपश्यदवतारगम् ।" |
| "तस्मात् सर्वावताराश्च सर्वजीवेषु संस्थिताः(च स्थिताः .हृ) ।" |
| "प्रादुर्भावाः सर्वगुणैः पूर्णा एव सदा स्थिताः ।" |
| "पश्यन्ति च तथा नित्यं निर्दोषोरुस्वसंविदा ।" |
|
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| lines | | "गुणपूर्णस्वरूपस्य त्वापरोक्ष्येण दर्शनात् ।" |
| "सर्वदैव ह्यसौ विष्णुरिदन्द्रो नामतो मतः ।" |
| "ब्रह्मादीनां हि सर्वेषां तत्प्रसादेन जायते ।" |
| "जानन्ति न स्वतस्तेन नेदन्द्रास्ते प्रकीर्तिताः ।" |
| "रमाऽपि तत्प्रसादेन जानाति किमुतापरे ।" |
| "अल्पज्ञाना अल्पगुणा अल्पानन्दाश्च तेऽखिलाः ।" |
| "रमाऽजशङ्करेन्द्राद्यास्तेनानिन्द्राः क्रमेण ते ।" |
| "पापैरज्ञाततां देवा मानयन्ति सदाऽऽत्मनः ।" |
| "हर्षेण, तेन विष्णुः स इन्द्र इत्यभिशब्द्यते ।" |
| "नेदन्द्रताऽसुरादीनां ज्ञायेतेति श्रुतिर्हरिम् ।" |
| "इन्द्र इत्येव वदति पारोक्ष्येणोरुसद्गुणम् ।" |
| "इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ।" |
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| lines | | "आततगुणत्वाद् आत्मा नारायणः । ‘ब्रह्म’, ‘पन्थाः’, ‘सत्यम्’ ‘कर्म’इति तस्यैव पञ्चरात्रप्रसिद्धैरेव नामभिरारब्धत्वाच्च ।" |
| "‘मुख्यतः कर्मनामा तु प्रादुर्भावात्मको हरिः ।" |
| "अनिरुद्धतनुश्चैव तत्र ह्यमितचेष्टितः(ह्यमितचेष्टता .हृ) ।" |
| "कर्माभासा जीवसङ्घाः, सत्यं प्रद्युम्ननामकः ।" |
| "सङ्कर्षणो हरिः पन्थाः, ब्रह्मोक्तो वासुदेवकः’ ॥ इत्यादि च (हि) नामनिर्णये ।" |
|
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| lines | | "‘मत्सीन्द्रमिन्दो पवमान विष्णुम्’ इत्यादिश्रुतौ तस्मिन्नेव प्रसिद्धस्येन्द्रशब्दस्यात्र बहुशोऽभ्यासाच्च । अकारस्य च विष्णावेव प्रसिद्धस्यात्राप्यभ्यासात् ।" |
| "‘तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी’(छां.१.६.७) इति सूर्यमण्डले पुण्डरीकाक्षत्वेन निर्दिष्टस्यात्रापि ‘य एष तपति’ इत्यादिना बहुशोऽनुसन्धानाच्च(अभ्यासाच्च) । सूर्यो हि ‘हिरण्याक्षः सविता देव आगात्’(ऋ.सं.१.३५.८) इति पिङ्गलाक्षः(पिङ्गाक्षः .हृ) प्रसिद्धः ।" |
| "‘विरूपाक्षः शिवः सूर्यः सुराचार्यो विनायकः ।" |
| "पुण्डरीकेक्षणो विष्णुः सहस्राक्षः सुराधिपः ॥ इति च स्कान्दे ।" |
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| lines | | "‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८२.३),‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१) , ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुः ’(ब्रह्माण्डे,आथर्वाण.अ-१,ख-२.१)," |
| "‘चन्द्रसूर्यादयः शब्दा विष्णावेव हि मुख्यतः ।" |
| "उपचारात् तदन्येषां विष्णुनैव कृताः पुरा’ ॥" |
| "इत्यादिना तस्यैव सर्वनामवत्वाच्च । ‘ णकारो बलं षकारः प्राण आत्मा’ इत्यादिनाऽन्ते विष्णुशब्दव्याख्यानेनोपसंहाराच्च ।" |
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| lines | | "‘आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् ।" |
| "न वर्तन्ते तदन्यत्र शृङ्गिबेरेऽग्निशब्दवत् ॥’ इति च पाद्मे ।" |
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| lines | | "‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’(ब्राह्मसंहिता), ‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः’(चतुर्वेदोपनिषत्,गीता.नि.१.१.१) , ‘वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’(गोपालतापिन्युपनिषत्,गीता.नि.१.१.१) ॥ इत्यादि श्रुतिभ्यश्च ।" |
|
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| lines | | "अग्रशब्दो गुणाधिक्यवाची । इदं रमाब्रह्माशिवादिकं सर्वं जगदपेक्ष्यात्मैवाग्रे ‘विष्णुरेवाग्र्यः सर्वगुणैः’इत्यर्थः । तत्र हेतुः तदन्यत् किञ्चिन्न मिषदासीत् । सर्वस्याप्युन्मेषणं नासीद् इत्यर्थः । स्वत उन्मेषणं कस्यापि नास्ति । अस्तिशब्दवद् आसीच्छब्दोऽपि सर्वकालसाधारणः । भगवत्प्रसादादेव सर्वदा सर्वं किञ्चिदुन्मिषति । स्वातन्त्र्येण पूर्णोन्मेषो विष्णुरेव ।" |
|
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| lines | | "‘उन्मेषो गुणसम्पूर्तेरुद्रिक्तानुभवः स्मृतः ।" |
| "तदेव मिषणं नाम, सद्रूपं मिनुते यतः ॥" |
| "मिषच्च नान्यद् विष्णोर्हि किमुतोन्मिषदिष्यते ।" |
| "उच्चैर्मिषन् हि भगवान् सर्वदैव जनार्दनः ॥’इति च सत्तत्त्वे ।" |
|
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| lines | | "‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति॥’(भा.१.२३) इति च भारते ।" |
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| lines | | "सर्वजीवानां रमायाश्च प्रलये विद्यमानत्वादेव न अग्र इति कालापेक्षया । तदधीनमिषत्त्वादन्येषाम्, अग्र्यः स एवेत्याशयः । तदधीनत्वमेव तेषां सृष्ट्यादिना दर्शयति । स्थूलशरीरस्य पूर्वाभावस्तत एवार्थतः सिद्ध्यति ।" |
| "‘प्रलयेऽप्यखिलं देवी रमा विष्णुप्रसादतः ।" |
| "जानाति नित्यज्ञानेन, मुक्ता ध्यानस्थिता लये ॥’ इति च सत्तत्त्वे ।" |
| "ब्रह्मादीनां शरीरान्तरस्यापि प्रलयेऽनुक्तेरेवाभावः सिद्ध्यति ।" |
| "‘आत्मा ब्रह्माग्र इत्यादि गुणाग्र्यत्वं हरेर्वदेत् ।" |
| "कालज्यैष्ठ्यं न, यस्मात् तत् सृष्ट्युक्तेरेव सिध्यति ॥’इति वाक्यनिर्णये ।" |
| "गुणाग्र्यतायामेव कालज्यैष्ठ्यस्याप्यन्तर्भावाच्च ।" |
|
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| lines | | "‘अं= विष्णुं बिभर्तीत्यम्भः= विष्णुलोकः’, दिवः परे महदादयश्च । दिव्यपि भगवान् प्रतितिष्ठतीति प्रतिष्ठा । तेषु सर्वेषु प्रत्यक्षतश्चरति विष्णुस्तस्मादम्भ इत्युच्यते । दिवः परे द्यौश्चाम्भोनामका इत्यर्थः । सूर्यमरीचीनां तत्र विशेषेण वितत्वाद् अन्तरिक्षं मरीचयः, मरीचीनामयनात् । पृथिव्यां क्षिप्रं मरन्तीति पृथिवीमरः ।" |
| "‘भूतेभ्योऽनन्तरं त्वण्डं सृष्ट्वा विष्णुः पुरा प्रभुः ।" |
| "लोकभेदांश्च चक्रेऽत्र, पश्चाद् ब्रह्मा विशेषतः ।" |
| "सम्यक् चकार लोकांस्तान् लोककर्ता ततः स च ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते ।" |
|
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| lines | | "या अधस्तात् पूर्वमेव सृष्टा देवताः ता आप इत्युच्यन्ते । आपा इत्याप इति इति पूर्वं भगवदङ्गसृष्टानामेवाप्छब्देनोक्तेः । ‘अयं पितैते पुत्राः’ इति च । ‘आहं मां देवेभ्यो वेदा ओ मद् देवान् वेद’ इति च ।" |
| "‘ब्रह्मवायू च तद्भार्ये वीन्द्रशेषौ च तत्स्त्रियौ ।" |
| "शिवस्तद्दयिता शक्रकामौ तद्दयितादयः ।" |
| "सर्वे सुराः क्रमेणैव विष्णोर्जाता अबाख्यकाः ।" |
|
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| lines | | "ज्ञानानन्दबलाद्येषु विष्णुभक्तौ च सर्वशः ।" |
| "हीनाः शतगुणेनैव क्रमेणानेन ते मताः ।" |
| "तेभ्यश्च ऋषयो मर्त्या हीना एव क्रमेण च ।" |
| "विशेषतस्तु मुक्तानां सर्वसंसारबन्धनात् ।" |
| "क्रमोऽयं सम्यगुद्दिष्टो नित्यानन्दैकभोगिनाम् ।" |
| "न विशेषो ब्रह्मवाय्वोरधिकाराविभेदतः ।" |
| "न शेषशिवयोश्चैव तत्पत्नीनां च सर्वशः ।" |
| "सुपर्णशेषयोश्चैव साम्यं सर्वगुणेष्वपि ।" |
| "साम्यमेवैतयोः पत्न्योः साम्यं शक्रमनोजयोः ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "एते तु महादादीनां सर्वेऽपि ह्यभिमानिनः ।" |
| "पूर्वस्य प्रतिबिम्बश्च चरमस्तत्सुतस्तथा ।" |
| "तद्वशाश्चाखिला विष्णोर्न विष्णुः कस्यचिद् वशे ।" |
| "महदादिमानिनश्चैते जातास्तैः सह सर्वशः ।" |
| "एते लोका इति प्रोक्ता लोकानाम् अभिमानिनः(लोकानामभिमानिनः) ।" |
| "त एव लोकपालाश्च यदा पश्चाद् प्रजज्ञिरे ।" |
| "पश्चाज्जातैर्हि रूपैस्तैर्लोकस्थान् पालयन्त्यलम् ॥’ इत्यादि तत्त्वसारे ।" |
|
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| lines | | "अमूर्च्छयद् मूर्तमकरोत् । अग्निर्वाग् भूत्वा इत्यादिना पश्चादैक्यप्रतीतेरेकस्यैव रूपद्वयं तदिति प्रतीयते । प्रजानीहि प्रकर्षेणानुजानीहि । अन्नदेवता च सर्वदेवतायुक्तो विरिञ्च एव । ग्रसनं चैतस्मिन् प्रवेश एव, न तु पीडा तस्य । एक एव हि ब्रह्मा भोक्तृभोज्यत्वेन स्थितः, भोज्यरूपेणैकीभूयातितरां मुमोदेत्यर्थः । देवानाम् उपद्रवाभावाद् भोक्तृत्वशक्तियोजनमेवाशनापिपासाभ्याम् अन्ववार्जनम् । वायुरेव च भोक्तृत्वशक्तिरूपः ।" |
|
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| lines | | "यदि वागादीनामेवाभिव्याहरणादिशक्तिः स्यान्मां विना, तर्हि विष्णुत्वं न मम स्यात् । तस्मात् कोऽहं भवानि इत्याक्षेपः । विशेषेण प्राणयति सर्वान्, सर्वेभ्यो विशिष्टश्चेति हि विष्णुः । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मा इति व्याख्यानात् । तस्मान्मत्प्रेरिता एवैते ऽभिव्याहारादिशक्ता इत्यभिप्रायः ।" |
|
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| lines | | "पूर्णानन्दस्वरूपत्वान्नन्दनो भगवान् । प्रादुर्भावरूपेण जातोऽपि भगवान् सर्वभूतान्यभितः= सर्वकालेषु विशेषेण पश्यत्येव । इह भूतेषु मत्तोः अन्यं प्रवर्तकं वदेत् किम् इत्याक्षेपः । अहमेव स्वतन्त्रः परिपूर्णगुण इति कृष्णराघवादिसर्वावताररूपोऽपि सर्वदानुभवत्येव ।" |
| "‘नायं दशरथाज्जातो न चापि वसुदेवतः ।" |
| "क्वास्याज्ञानं कुतो दुःखं प्रादुर्भावेष्वपि प्रभोः ॥" |
| "प्रादुर्भूतश्चिदानन्दशरीरो राघवः स्वयम् ।" |
| "स्तम्भाद् वा नरदेहाद् वा नैवास्य प्राकृती तनुः ॥" |
| "दैत्यानां मोहनार्थाय सोऽज्ञानाद्यं प्रकाशयेत् ।" |
| "पूर्णचित्सुखरूपोऽपि सदा सर्वावतारगः ॥’इत्यादि स्कान्दे ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "एतमेव पुरुषं व्यास-कृष्ण-कपिल-राघवादिरूपं ततममपश्यत् । ततमं=(तततमम्. हृ) परिपूर्णतमं ब्रह्माऽपश्यत् । इदं मे स्वरूपम् अदर्शमेव अहमिति । रङ्गस्त्ववधारणे- ‘रङ्गोऽवधारणे चैव संवादे च प्रयुज्यते’ इति पदविवेके । अपश्यद् इत्यत्र नातीतकालत्वं विवक्षितम्, अभिव्यैख्यद् इति ‘अभि’शब्दस्यानुषङ्गात् । अपश्यत् पश्यतीति चैककालसम्बन्धं विना वक्तुमशक्यत्वात् तथा प्रयोगः ।" |
| "‘प्रयोग एककालीनः सर्वकालेऽनुषज्यते ।" |
| "ददर्श विष्णुरित्यादौ नित्यचिद्रूपतो हरेः ॥’ इत्यादि सत्तत्त्वे ।" |
| "परोक्षप्रिया इव इत्यसुराणां सम्यगदर्शनेन पतनं देवानां प्रियम्, तथाऽप्यपरोक्षदर्शिन्येव प्रीतिं कुर्वन्तीति इवशब्दः ॥ ३ ॥" |
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| lines | | "(अपक्रामन्तु गर्भिण्यः) पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद् रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतम् । आत्मन्येवात्मानं बिभर्ति । तद् यदा स्त्रियां सिञ्चति, अथैनज्जनयति । तदस्य प्रथमं जन्म । तत् स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति यथा स्वमङ्गं तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । साऽस्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति । सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति । स यत् कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति, आत्मानमेव तद् भावयति, एषां लोकानां सन्तत्यै । एवं सन्तता हीमे लोकाः ।" |
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| lines | | "अयं नारायणो देवः पुरुषे प्रथमं विशेत् ।" |
| "अन्नस्थोऽन्नेन सहितस्तस्मिन् रेतस्त्वमागते ।" |
| "तस्मिन् स्थितं स्वरूपं(स्थितस्वरूपम्. हृ) स पुरुषस्थो बिभर्त्यजः ।" |
| "तद्रूपं रेतसा साकं स्वयं पुंसि स्थितो हरिः ।" |
| "स्त्रियां सिञ्चति, तस्यैव स्थानान्तरगतेः प्रभोः ।" |
| "प्रथमं जन्म विष्णोस्तु,(विष्णोस्तत्) स तस्या अङ्गवत् प्रभुः ।" |
| "नैनां हिनस्त्यानुकूल्यात्, सा पुत्रं भावयत्यथ ।" |
| "पुत्रस्य भावना सैव तद्गत्वाद् हरिभावना ।" |
| "सम्भावितव्या सा चैव भर्त्रा पुत्रश्च सादरम् ।" |
| "सम्भावनं कुमारस्य जानतः केशवे भवेत् ।" |
| "तस्येत्यर्पणमात्रेण पूजितो हि भवेद्धरिः ।" |
| "पुत्रस्थस्य हरेः पूजां कुर्वतः पृथिवीस्थितिः ।" |
| "स्वर्गस्थस्यापि भवति पुत्रपुण्यं यतोऽखिलम् ।" |
| "अत्यल्पपुण्यभाक् स स्यान्नार्चयेत् केशवं यदि ॥" |
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| lines | | "तदस्य द्वितीयं जन्म । सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते । अथाऽस्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति । स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म । तदुक्तमृषिणा–" |
| "‘गर्भे नु सन्नन्वेषाममवेदम् अहं देवानां जनिमानि विश्वा ।" |
| "शतं मा पुर आयसीररक्षन् अधः श्येनो जवसा निरदीयमिति(ऋ.सं.४.२७.१) ॥’" |
| "गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच । स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् (यथास्थानं गर्भिण्यः) ॥ १ ॥" |
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| lines | | "पृथिव्यां जन्म पुत्रस्य द्वितीयं विष्णुजन्म हि ।" |
| "एतद्रूपं निधायैव जीवार्थे धर्मकर्तवे ।" |
| "पितृस्थेन तु रूपेण गच्छत्यन्यत्र केशवः ।" |
| "पितुरन्यत्र जननं तृतीयं जन्म तद्धरेः ।" |
| "अन्तर्यामितयैवं हि सर्वजीवेषु संस्थितम् ।" |
| "सर्वदोषोज्झितं विष्णुं कर्तारं सर्वकर्मणाम् ।" |
| "नित्यानन्दं स्वतन्त्रं च सर्वज्ञं सर्वतोऽधिकम् ।" |
| "यो वेद देहबन्धात् स विमुक्तो नित्यमुत्तमान् ॥" |
| "भोगान् भुङ्क्ते यथायोग्यम् इति वेदानुशासनम् ॥ इत्यैतरेयसंहितायाम् ।" |
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| lines | | "नात्र जीवोत्पत्तिमात्रमुच्यते । न हि जीवोत्पत्तिमात्रपरिज्ञानादमृतत्वं भवति । ज्ञातमेव सर्वैः पितापुत्रसम्बन्धमात्रं पश्वादिभिरपि(श्वादिभिरपि. हृ) । ‘गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा’ इत्युक्तार्थ उदाहृते मन्त्रे देवजन्मकथनाच्च । विष्णुर्हि परमो देवः । तेनैव सह सर्वेऽपि देवा जीवदेहजनने जायन्त इव । शरीरप्राप्तिरेव हि जन्मान्येषामपि । अयमेव विशेषो देवानां दुःखाभोगः । स्वातन्त्र्यं च विष्णोः ।" |
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| lines | | "‘आत्मन्येवाऽत्मानं बिभर्ति’, ‘आत्मानमेव तद्भावयति’ इत्याद्यात्मशब्दश्च मुख्यतो विष्णावेव युज्यते । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मा इति विष्णुशब्दार्थैकदेशवाचित्वाच्चात्मशब्दस्य । ‘एतया द्वारा प्रापद्यत’ इति तस्यैव शरीरप्रवेशस्य प्रस्तुतत्वाच्च । जीवशरीरं परित्यज्यान्यत्र गमनमात्रं विष्णोरप्यस्तीति प्रैतीत्युक्तेऽप्यविरोधः । कृष्णराघवादिस्वरूपमेव ह्यसौ न परित्यजति ।" |
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| lines | | "‘कृष्णो ह्यत्यक्तदेहोऽपि त्यक्तदेहवदेव च ।" |
| "लोकानां दर्शयामास स्वरूपसदृशाकृतिम् ।" |
| "येन रूपेण कंसादीन् जघ्ने तद्रूपमेव(तद्रूप एव हि. हृ) हि ।" |
| "पूज्यतेऽद्यापि शर्वाद्यैर्निर्मिताऽन्या शवाकृतिः ।" |
| "स्वर्गारोहणकाले तु जनास्तेनैव मोहिताः ।" |
| "यत्तद् रूपं निजं विष्णोर्दृष्टं सर्वजनैर्भुवि ।" |
| "अद्यापि तद् देवलोके पूज्यते सर्वदैवतैः ॥’ इत्यादि स्कान्दे ।" |
| "‘प्रदर्श्यातप्ततपसाम् अवितृप्तदृशां नृणाम् ।" |
| "आदायान्तरधाद् यस्तु स्वबिम्बं लोकलोचनम्(भाग. ३.२.११) ॥’ इति च भागवते ।" |
| "‘प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवा’(ऋ.सं.२.४१.१९) इत्यादिवत् प्रकृष्टगतिवाच्येवायं शब्दः । प्रकृष्टगतित्वादेव च मरणेऽपि प्रयुज्यते ।" |
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| lines | | "एषामवेदमहम् इत्यपि जीवभेद एवोक्तः । अन्यथा ‘मम जनिमानि’ इत्येवोच्येत । व्यर्थता च एषाम् इत्यादिविशेषणानाम् । अवेदम् इत्यनेनैव स्वस्य सिद्धत्वात् । अहम् इत्यप्यहेयत्वेनेति क्रियाविशेषणम् । जन्म जानन्नपि देवानां दुःखादिहेयरहितत्वेन व्यजानामीत्यर्थः । तस्माद् ‘अहं मनुरभवम्’(ऋ.सं.४.२६.१) इत्यादावपि अहेयगुणं भगवन्तमेवाहंशब्दो वक्ति । सर्वान्तरत्वात् तस्मिन्नेव ‘अभवम्’ इत्युत्तमपुरुषशब्दोऽपि सर्वो वर्तते ।" |
| "‘अहेयत्वादहं विष्णुः स तु सर्वान्तरत्वतः ।" |
| "अस्यस्मीत्यादिभिः शब्दैरुच्यतेऽन्योऽपि जीवतः ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते ।" |
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| lines | | "न च मूढव्यवहार एव वेदनिर्णयाय भवति ; किन्तु ? सर्वेषामनुभवो युक्तयश्च वाक्यान्तरं च निर्णयकारणम् । तस्मात् सर्वजीवादिभ्योऽन्यः सर्वोत्तमो विष्णुरेवात्रोक्तः ।" |
| "‘न वेदेषु पदं ककिञ्चिद् वर्णो वा व्यर्थ इष्यते ।" |
| "यथायोग्यं चार्थभेद ऊह्यः सर्वत्र वेदिभिः(ईशावास्य.१६) ॥’ इति शब्दनिर्णये ॥" |
| "‘शब्दा रेतोऽन्नमित्याद्या अपि तत्र गतं हरिम् ।" |
| "वदन्त्यविष्णुवाची हि न शब्दः क्वचिदिष्यते ॥’ इति च ।" |
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| lines | | "भावयति सम्भावयति । सोऽग्र एव अग्र्यो विष्णुरेव । पुत्रसम्भावनमपि तत्रस्थं विष्णुं सम्भावयामीति तत् तस्यैव भवति । एवं भावयतामेव एष पन्था उरुगायः इत्याद्यपि । तं पश्यन्ति पशवः इत्याद्यपि दिव्यपश्वादीनामेव । अन्येषां स्वभावप्रवृत्तिः ।" |
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| lines | | "ता एव देवताः शतं पुर आयसीः ज्ञानिन्यो विशेषतः । ‘अय पय= गतौ’ इति धातोः । मानुषान् अपेक्ष्य पूर्णत्वात् पुरः । विष्णुर्मुख्यत एव पूर्णः । न च शरीरैर्जीवो रक्षितः । मुख्ये युज्यमाने च नामुख्यार्थः कल्प्यः । ‘शम् अस्य विद्यत इति शी’ विष्णुः । पूर्णानन्दत्वात् । स एव ज्ञानत्वाद् ‘यश्चेति श्यः’ । सोऽस्य जीवस्येन इति ‘श्येनः’ । विष्णुं स्वामिनं ज्ञात्वेत्यर्थः । ‘निरदीयम्’, निष्क्रम्यातीतोऽस्मि गर्भवासम् ।" |
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| lines | | "‘स्वर्’ आनन्दो विष्णुः । अत्र ‘गः’ इति स्वर्गलोको विष्णुलोकः । अमृतः सन् सर्वान् कामानाप्त्वा तानेव सर्वान् कामान् समभवद् अनुभवति । अपेक्षितवस्तुस्वीकार आप्तिः । सम्भवो भोगः । ‘ताँ समभवत् ततो मनुष्या आजायन्त’(बृ.उ.३.४.३ प्राजापत्यब्राह्मणम्) इत्यादिवत् । मुक्त्यनन्तरमेव ह्यनुपचरितसर्वकामावाप्तिः । मुख्य एव चार्थः स्वीकार्यः । अमुक्तानां विष्णुलोकगानामपि न सर्वकामावाप्तिः । जय-विजयादीनामप्रियदर्शनात् । अतोऽमृतः सन् सर्वान् कामानाप्त्वेत्यर्थः(सर्वकामानाप्त्वा) ।" |
| "मुक्तः कामानवाप्नोति भुङ्क्ते चैव यथेष्टतः ।" |
| "सर्वानपि निरातङ्कः सर्वदा च हरेर्वशः ॥ इति सत्तत्त्वे ॥" |
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| lines | | "कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा । येन वा पश्यति , येन वा शृणोति , येन वा गन्धान् आजिघ्रति , येन वा वाचं व्याकरोति , येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ।" |
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| lines | | "‘अयं विष्णुर्हि किंरूप उपास्योऽस्माभिरच्युतः ।" |
| "इत्यपृच्छद् रमा देवी महिदासं जनार्दनम् ।" |
| "आह तां महिदासोऽथ पूर्णानन्दतमस्त्विति ।" |
| "उपास्यस्तादृशो ह्यस्य स्वभावः परमात्मनः ।" |
| "येन जीवो दर्शनादीन् प्रेरितः कुरुते सदा ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "‘यद्, एतद्, हृदयम्, मनः, च, आ, इतत्, संज्ञानम्, आज्ञानम्, विज्ञानम्, प्रज्ञानम्, मेधा, दृष्टिः, धृतिः, मतिः, मनीषा, जूतिः, स्मृतिः, सङ्कल्पः, क्रतुः, असुः, कामः, अवशः’ इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ।" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "यो विष्णुर्हृदयमिति हृद्गतत्वात् प्रकीर्तितः ।" |
| "मन्तृत्वान्मन इत्येव यच्च ज्ञान(तृ)स्वरूपतः ।" |
| "एतत् सन्निहितत्वाच्च पूर्णत्वादेति कीर्तितः ।" |
| "इतत्वाच्च ततत्वाच्च स इतन्नाम केशवः ।" |
| "गुणानामुच्चयो यस्मात् स च इत्येव शब्दितः ।" |
| "सम्यग् ज्ञानस्वरूपत्वात् संज्ञानमिति कीर्तितः ।" |
| "आततज्ञानरूपत्वाद् आज्ञानं भगवान् हरिः ।" |
| "विविधज्ञानरूपत्वाद् विज्ञानमिति कीर्तितः ।" |
| "प्रकृष्टात्मगुणज्ञानरूपः प्रज्ञानमुच्यते ।" |
|
|---|
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| lines | | "अविस्मृतित्वान्मेधा स दृष्टिर्दर्शनरूपतः ।" |
| "धृतिर्धारणरूपत्वान्मतिर्मासु ततत्वतः ।" |
| "मनुनाम्नाम् अजादीनां मनीषेशो यतो हरिः ।" |
| "सर्वप्रेरकरूपत्वाज्जूतिरित्यभिधीयते ।" |
| "सर्वदेशेषु कालेषु स्वरूपेषु च सर्वशः ।" |
| "समं रमत इत्येव स्मृतिर्नाम जनार्दनः ।" |
| "सर्वस्य क्लृप्तिकर्तृत्वात् सङ्कल्प इति गीयते ।" |
| "क्रतुः स सर्वकर्तृत्वाद् असुरप्यसनाद्धरिः ।" |
| "अमेयानन्दरूपत्वात् काम इत्यभिधीयते ।" |
| "अवशः स स्वतन्त्रत्वात् त्रयोविंशतिनामकम् ॥" |
| "यो वेदैवं हरिं सम्यङ् मुच्यतेऽखिलसंमृतेः ।" |
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| lines | | "एष ब्रह्मा, एष इन्द्रः, एष प्रजापतिः, एते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि, पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानि, इमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि च, इतराणि चाण्डजानि च, जरायुजानि च, स्वेदजानि च, उद्भिजानि च, अश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत् किञ्चेदं प्राणि, जङ्गमं च, पतत्त्रि च, यच्च स्थावरं सर्वं तत् प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम् , प्रज्ञानेत्रोऽलोकः । प्रज्ञा प्रतिष्ठा । प्रज्ञानं ब्रह्म ।" |
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| lines | | "ब्रह्मा शिवश्च शक्रश्च देवाश्चान्ये समस्तशः ।" |
| "तथैव पञ्चभूतानि पुण्यपापविमिश्रिताः ।" |
| "क्षुद्रात्मानस्तु ये मर्त्या इतरे असुरा अपि ।" |
| "सर्वं जगदिदं विष्णोर्वशे तिष्ठति सर्वदा ।" |
| "तेनैव नीयते नित्यं तस्मिन्नेव प्रतिष्ठितम् ।" |
| "मुक्ता येऽलोकनामानो नीयन्ते तेऽपि विष्णुना ।" |
| "स्वयं चानन्यनिष्ठत्वात् प्रतिष्ठेत्यभिधीयते ।" |
| "देशतः कालतश्चैव गुणतश्चातिपूर्तितः ।" |
| "विष्णोर्ब्रह्मेति नामैतन्मुख्यतोऽन्यत्र न क्वचित्।" |
|
|---|
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| lines | | "स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् ॥" |
|
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "‘सोऽलोकनामा मुक्तास्तु चितिमात्रस्वरूपतः ।" |
| "प्रकृष्टज्ञानरूपस्य प्रसादात् परमात्मनः ।" |
| "अस्माद् देहात् समुत्क्रम्य गत्वोर्ध्वं लोकमुत्तमम् ।" |
| "अमृतः सन् विष्णुलोके भोगान् सम्प्राप्य पुष्कलान् ।" |
| "भुङ्क्ते यथेष्टतो नित्यमिति वेदानुशासनम् ॥’ इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ।" |
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|---|
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| lines | | "जानन्त्यापि देव्या लोकानुग्रहार्थं विशेषज्ञानार्थं च कोऽयमात्मा इति पृष्टः स(सन्) भगवानाह- कतरः स आत्मेति ॥ कतरः आनन्दतमः । ‘यत्रोभयोः प्रयोगो न तत्रैकार्थो तरप्-तमौ’ इति शब्दनिर्णये ।" |
|
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| lines | | "यत्प्रेरणाद् अयं जीवो दर्शनादीन् करोति । रमाब्रह्मादीनामपि तत्प्रेरितत्वात् सर्वेषाम्, दर्शनादिकारणत्वम् एकैकमपि तस्य लक्षणं भवतीति वाशब्दः सर्वत्रानुषज्यते ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-361" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "प्रजापतिः शिवः । लिङ्गाभिमानित्वात् ।" |
| "‘प्रजापतिः शिवः शेषो(शेपो. हृ) लिङ्गमित्यभिधीयते ।" |
| "लिङ्गाभिमानी लोकस्य स्रष्टा गिरिश एव हि ॥’ इति शैवपुराणे ।" |
| "‘सममस्त्वनयोर्युद्धमिति प्राह प्रजापतिः ।" |
| "वाक्यं शिवस्य तत् श्रुत्वा शक्रो नेत्याह सत्वरः ॥’ इति भारते ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "क्षुद्रमिश्राणीव बीजानि शाल्यादिबीजवत् भिन्नस्वभावा ब्रह्मादयः सर्वजीवाः ।" |
| "‘ब्रह्माद्याः सर्व एवैते जीवा भिन्नस्वभावकाः ।" |
| "यथा शाल्यादिबीजानि भिन्नवीर्याणि सर्वशः ॥’ इति सत्तत्त्वे ।" |
| "प्रथम-इतराणि इतिशब्दो मानुषाणाम्, द्वितीयोऽसुरादीनाम् ।" |
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| chapter | "AIT_C02" |
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| lines | | "प्रज्ञानेत्रोऽलोक इति । अलोकशब्देन मुक्तसमुदाय उच्यते । ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य लोकस्य सर्वं तत् प्रज्ञाननेत्रम् इति विष्ण्वधीनत्वस्य पूर्वमेवोक्तत्वात्, पुनः प्रज्ञाननोत्रोऽलोक इति मुक्तविषयमेव । मुक्तो ह्यलोक्यत्वाद् अलोकः ।" |
| "अण्डजानि च इत्याद्युक्त्वा पुनः अश्वा गाव इत्यादि देवादीनां मन आदेरेव जातानामपि स्वीकारार्थम् । अण्डजत्वाद्युत्पत्तिप्रकारोऽपि विष्ण्वधीन इति ज्ञापयितुं तत्कथनम् ।" |
| "‘तथाऽश्मानस्तृणकाष्ठाश्च सर्वे दिदृक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते’ इति भारतवचनाद् अश्मादीनामपि प्राणित्वात् तत्स्वीकारार्थं प्राणि इति । गमन-पतन-स्थिरत्वादयोऽपि भावा विष्ण्वधीना इति ज्ञापयितुं जङ्गमम् इत्यादिवचनम् ।" |
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| lines | | "स एतेन(अ.व्या.३.२.२१५) इत्यलोकशब्दोक्तो मुक्तः परामृश्यते । सकलकर्मबन्धमुक्त्यनन्तरं हि शरीराद् उत्क्रामति । प्रकृष्टज्ञानरूपेण विष्णुना प्रेरितः, प्राज्ञेन आत्मनैव उत्क्रम्य तेनैव सर्वान् कामानाप्त्वा तेनैव सर्वान् कामान् सम्भुङ्क्त इति सर्वत्रानुषज्यते । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इत्युक्ते कथं प्रज्ञानेत्रो मुक्तः? इत्याकाङ्क्षायां तस्यैव व्याख्यानं स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मना इत्यादि । अनुक्तविशेषाणानामपि भगवदधीनत्वज्ञापनार्थं प्रज्ञानेत्रोऽलोक इति सामान्यवचनम् ।" |
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| lines | | "‘अनारब्धफलानां च प्रारब्धानां च सर्वशः ।" |
| "कर्मणां दाह एवायं मुक्तिरित्यभिधीयते ॥" |
| "स तु मुक्तस्ततो देहाद् उद्गच्छति परात्मना ।" |
| "प्रेरितो, विष्णुलोकं च प्राप्य भोगान् अवाप्य च ॥" |
| "भुङ्क्ते विष्णुप्रसादेन, न विष्णोरवशः क्वचित्।" |
| "विष्णुतन्त्रा इमे सर्वे मुक्ता अपि यतोऽखिलाः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।" |
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| lines | | "ब्रह्मेन्द्रादिशब्दा विष्णावेव मुख्यत इति तद्व्यावृत्त्या जीवानां स्वीकारार्थम् एष इत्यादिशब्दः । स हि भगवान् स्वनेतृकोऽपि नानुग्राह्यः । अनुग्राह्यत्वं हि ब्रह्मादीनाम् अत्र विवक्षितम् । ‘नेयताऽनुग्राह्यतापि न सा विष्णोः स्वतोऽपि तु’ इति शब्दतत्त्वे ॥" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता । मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् । आविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थ, श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । ऋतं वदिष्यामि , सत्यं वदिष्यामि , तन्मामवतु , तद् वक्तारमवतु , अवतु माम् , अवतु वक्तारम् ॥" |
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| lines | | "वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता , अवबोधरूपे विष्णौ प्रतिष्ठिता । स च विष्णुर्मे वाचि स्थितः । यदेतद् हृदयं मनश्च इति विष्णुनामधेयेषूक्तत्वात् । आविराविर्म एधि, हे विष्णो ! ममाऽविराविर्भव । आणीस्थित आण्यां स्थित विष्णो ! इति सम्बोधनम् ।" |
| "‘आधारः सर्ववेदानां वेदाणी प्राण उच्यते ।" |
| "तस्मिन् स्थितो हरिर्नित्यम् आणीस्थ इति गीयते ॥’ इति शब्दतत्त्वे ।" |
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| lines | | "आविरावीः इति दैर्घ्यमतिशयार्थे, ‘आधिक्येऽधिकम्’ इति सूत्रात् । अणशब्दस्य गतिवाचित्वाच्चलम् आणम् उच्यते । तस्य धारणेन तद्वान् आणी, स्थापक इत्यर्थः । मे श्रुतं मा प्रहासीः मम विद्यागोचर एव सर्वदा भव, विस्मृतो मा भव ।" |
| "हे विष्णो ! अनेन त्वद्विषयेणैव अधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि सर्वाहोरात्रेष्वपि त्वद्विषयाध्ययनमेव करोमीत्यर्थः । ऋतं यथावत् अवगतं त्वां वदिष्यामि । सत्यं साधुगुणैस्ततं सर्वनियन्तारं च । तद् विष्ण्वाख्यं ब्रह्म मामवतु इति तस्यैव विष्णोः परोक्षत्वेनैव प्रार्थनम् ।" |
| "‘वाङ् म इत्यादिकं खण्डं विष्णुप्रार्थनरूपकम् ।" |
| "अविघ्नत्वमभीप्सूनां शिष्याणां दृष्टवान् हरिः ॥’ इति च ॥" |
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| lines | | "अथाऽतः संहितायाः उपनिषत् ।" |
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| lines | | "‘विष्णुनाम्नि षकारस्य णकारस्य च संहिताम् ।" |
| "विष्णोस्तु बहुरूपाणां वाचिकाम्(वाचकाम् .हृ) ऋषयो विदुः ।" |
| "तौ च वर्णौ हरेः सम्यक्स्वरूपप्रतिपादकौ ।" |
| "बहुधैव स्थितस्यास्य सदैवैकस्वरूपिणः ।" |
| "विष्णुनामार्थरूपत्वाद् वेदानामपि सर्वशः ।" |
| "अन्येषामपि शब्दानां संहिता विष्णुवाचिकाः(वाचकाः .हृ) ।" |
| "तद्वाचकास्तथा वर्णाः सर्वे लौकिकवैदिकाः ।" |
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| lines | | "पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । वायुस्संहितेति माण्डूकेयः ।" |
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| lines | | "पृथिवीनामकं रूपं पृथुत्वात् पृथिवीस्थितम् ।" |
| "देवता पूर्ववर्णस्य पूर्वरूपं तदुच्यते ।" |
| "देवतोत्तरवर्णस्य क्रीडनाच्च द्युनामकम् ।" |
| "दिवि स्थितं हरे रूपमुत्तरं रूपमुच्यते ।" |
| "वेदकत्वाच्चायनत्वाद् रूपं यद्वायुनामकम् ।" |
| "विष्णोस्तद्वर्णयोर्मध्यदेवतेति प्रकीर्तितम् ।" |
| "संहितानामकं तच्च रूपद्वयसहस्थितेः ॥" |
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| lines | | "वर्णद्वयं विकारं च षकारं केचिदब्रुवन् ।" |
| "षकारं मध्यमत्रैव णकारं केचिदुत्तरम् ।" |
| "पृथक्करणमेवैषां वर्णयोर्मध्यमुच्यते ।" |
| "उपसर्गमात्रं वीत्याहुः केचिन्नाम ष्णुमात्रकम् ।" |
| "षकारं च णकारं च वर्णौ पूर्वोत्तरावपि ।" |
| "व्यक्तिरेवोष्मणस्तत्र मध्यमित्यभिधीयते ।" |
| "सर्वेप्येत उपादेयाः पक्षा निर्दोषका यतः ।’इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ॥" |
|
|---|
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| lines | | "आकाशः संहितेत्यस्य माक्षव्यो वेदयाञ्चक्रे ।" |
| "स हाविपरिहृतो मेने ,न मेऽस्य पुत्रेण समगादिति समाने वै तत् । परिहृतो मेन इत्यागस्त्यः ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "आकाशस्थ आकाशनामा भगवान् वर्णयोर्मध्यदेवतेति माक्षव्यः। उभयरूपसंहितत्वात्(उभयरूपसहितत्वात् .हृ) संहितानामकः । स माण्डूकेयः, तेन माक्षव्येण अपरिहृतः स्वपक्षः इति मेने । मे मदीयेन= मदुपासितेन अस्य आकाशस्य पुत्रेण वायुना न समागादसौ माक्षव्यः । वायुस्थविष्ण्वनुपासनात् ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "यद्यप्याकाशस्थो भगवान् संहितानामको भवति । तथाऽपि न वायुस्थस्यासंहितात्वं भवतीत्यपरिहृतत्वम् । परिहृतो माण्डूकेयपक्ष इत्यहं मेन इत्यागस्त्यः । आकाशे विष्णूपासनस्याधिकफलत्वात् । पिता ह्याकाशो वायोः ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "समानं ह्येतद् भवति वायुश्चाऽकाशश्चेत्यधिदैवतम् ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "भगवतस्तु पक्षः(‘भगवतः स्वपक्षः’इति ताम्रपर्णियरीत्या भाष्यपाठः) समत्वमेव वाय्वाकाशयोरिति । आकाशस्य पितृत्वाद् वायोर्बलाधिकत्वाच्च उभयोरुपासनास्थानत्वे साम्यम् । तस्मादुभावपि ग्राह्यौ ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-382" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "त्वगिन्द्रियदेवतात्वेनाऽकाशात् पूर्वमेव वायोः सात्विकाहङ्कारजत्वाद्, वायोराकाशाद् गुणाधिकत्वम् । तथाऽप्यत्राऽकाशस्य पितृत्वम्, व्याप्तिश्चाधिका इत्युपासनायां साम्यम् ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-383" |
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथाध्यात्मम् । वाक्पूर्वरूपम्, मन उत्तररूपम्, प्राणस्संहितेति शूरवीरो माण्डूकेयः । अथ हास्य पुत्र आह ज्येष्ठः। मनः पूर्वरूपम्, वागुत्तररूपम्, मनसा वा अग्रे सङ्कल्पयति । अथ वाचा व्याहरति । तस्मान्मन एव पूर्वरूपम्, वागुत्तररूपम्, प्राणस्त्वेव संहितेति । समानमेनयोरत्र पितुश्च पुत्रस्य च ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-384" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "अत्र प्राणाख्यस्य प्राणे स्थितस्य विष्णोः संहितानामत्वे पितापुत्रयोः साम्यमेव । अन्यत्र तु पुत्रपक्ष एव बलीयान्, युक्तिमत्वात् ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-385" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "स एषोऽश्वरथः प्रष्टिवाहनो मनोवाक्प्राणसंह(हि)तः । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन । सर्वमायुरेतीति नु माण्डूकेयानाम् ॥ १ ॥" |
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|---|
|
| id | "Aitareya-386" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "‘मनोवाक्प्राणनामाऽसौ मन आदिषु संस्थितः ।" |
| "विष्णुस्तस्य रथो देह इन्द्रियाश्वः प्रकीर्तितः ॥’ इति च ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-387" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "‘प्रष्टिः स पृच्छनीयत्वात् परमात्मा जनार्दनः ।" |
| "वक्तृत्वाच्चैव वाङ्नामा मनो मन्तृत्वहेतुतः ॥’इति च ।" |
| "‘प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति, वदन् वाक्, पश्यंश्चक्षुः, शृण्वन् श्रोत्रं, मन्वानो मनः तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव’(बृ.उ.५.१. अव्याकृतब्राह्मणम्) इति च श्रुतिः ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-388" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "मुक्तिरेव स्वर्गलोकः अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वा इति प्रस्तुतत्वात् ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-389" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01_V07" |
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| type | "verse" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथ शाकल्यस्य पृथिवी पूर्वरूपम्, द्यौरुत्तररूपम् , वृष्टिः सन्धिः. पर्जन्यः सन्धाता । तदुतापि यत्रैतद् बलवद् अनूद्गृह्णन् सन्दधद् अहोरात्रे वर्षति, द्यावापृथिव्यौ समधाताम् इत्युताप्याहुः, इती नु अधिदैवतम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-390" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V07_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘वराहो वामनः सिंह इति रूपत्रयं हरेः ।" |
| "पूर्वोत्तरार्णमध्येषु स्थितमुक्तं सनातनम् ।" |
| "माण्डूकेयैर्हि, शाकल्यो वासुदेवादिरूपिणम् ।" |
| "तेषु चोच्चारके चैव स्थितमाह चतुर्विधम् ।" |
| "भूमिद्युवृष्टिपर्जन्यनाम्नोर्व्यादिषु संस्थितम् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-391" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S01_V08" |
|---|
| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथाध्यात्मम् । पुरुषो ह वा अयं सर्व आनन्दं द्वे विदले भवत इत्याहुः । तस्येदमेव पृथिव्या रूपम्, इदं दिवः । तत्रायमन्तरेणाऽकाशो यथाऽसौ द्यावापृथिव्यावन्तरेणाऽकाशः । तस्मिन् हास्मिन्नाकाशे प्राण आयत्तः, यथाऽमुष्मिन्नाकाशे वायुरायत्तः , यथाऽमूनि त्रीणि ज्योतींषि, इत्येवम् इमानि पुरुषे त्रीणि ज्योतींषि ।" |
| "यथाऽसौ दिव्यादित्य एवमिदं शिरसि चक्षुः, यथाऽसावन्तरिक्षे विद्युदेवमिदमात्मनि हृदयम्, यथाऽयमग्निः पृथिव्याम् एवम् इदमुपस्थे रेतः। एवमु ह स्म सर्वलोकमात्मानमनुविधायाऽह इदमेव पृथिव्या रूपम् इदं दिवः । स य एवमेतां संहितां वेद, सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन, सर्वमायुरेति ॥२॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-392" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01_V08_B01" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
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| lines | | "उर्व्यादीनां चतुर्णां च देह एव स्थितिं पुनः ।" |
| "अधरार्धस्य चोर्व्याश्च साम्यमन्यस्य वै दिवा ।" |
| "वाचो वृष्ट्यैव साम्यं च पर्जन्येनैव चाऽत्मनः ।" |
| "तेषां तेषु स्थितिं चैव विष्णोश्च चतुरात्मनः ।" |
| "आकाशस्यान्तराकाशे नृसिंहस्यात्र संस्थितिम् ।" |
| "वायोः प्राणात्मतां चैव तत्र दाशरथेः स्थितिम् ।" |
| "सूर्यविद्युद्धुताशानां दृग्धृद्रेतःसु च स्थितिम् ।" |
| "कपिलस्य च हंसस्य जामदग्न्यस्य तेषु च ।" |
| "स्थितिं वदति विद्येयमपि मोक्षप्रदायिनी ॥’ इत्यादि च ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-393" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01_V08_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| lines | | "वर्षणाद् वृष्टिः । परं जनयतीति पर्जन्यनामा विष्णुः । सन्धिनोतीति सन्धिः, ‘धिनु= पृष्टौ’ इति धातुः । सम्यग्धारणात् सन्धाता । वर्षणमेव द्यावापृथिव्योः सन्धानम् । पर्जन्यस्थो भगवांस्तत्कर्ता ॥२॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-394" |
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| oldKey | "AIT_C03_S01_V09" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथातो निर्भुजप्रवादाः । पृथिव्यायतनं निर्भुजम् । दिव्यायतनं प्रतृण्णम् । अन्तरिक्षायतनम् उभयम् अन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तमुपवदेद्, अच्योष्ठा अवराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयाद् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तमुपवदेद् । अच्योष्ठा उत्तराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयाद् । यस्त्वेवोभयमन्तरेणाऽह तस्य नास्त्युपवादः ।" |
|
|---|
|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| lines | | "‘पृथिवीस्थो वराहस्तु संहितादेवतोदिता ।" |
| "दिविष्ठो वामनश्चैव सम्प्रोक्तः पददेवता ।" |
| "नृसिंहस्त्वन्तरिक्षस्थो भगवान् क्रमदेवता ।" |
| "स्वाध्यायमेवं ध्यात्वा यः करोत्यपवदेन्न तम् ।" |
| "तस्यापवदिता याति त्रैलोक्याद् अध एव हि ।" |
| "नाशमाप्नोति निरये तस्माद् अपवदेन्न तम् ।" |
| "गच्छस्यध इति ब्रूयाद् अन्यं ब्राह्मणतस्तथा ।" |
| "ब्रह्मप्राप्तेर्हि योग्यो यो ब्राह्मणः स, न चेतरः ॥’ इति च ॥" |
|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| lines | | "भञ्जनवर्जितत्वाद् निर्भुजं संहिता । ‘तृण(तृणु. हृ)= च्छेदने’ इति धातोः प्रतृण्णं पदम् । उभयमन्तरेण क्रमः । निर्भुजमूलत्वात् पदादीनां तद्विषयप्रवादा अपि निर्भुजप्रवादा इत्येवोच्यन्ते ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "पृथिवीस्थितपृथिवीनामकविष्ण्वायतनं पृथिव्यायतनम् इत्यादि ।" |
| "अवराभ्यां पृथिव्यन्तरिक्षाभ्यां च्युतोऽसीति । उत्तराभ्याम् अन्तरिक्षद्युभ्याम् ।" |
| "‘क्रमस्वाध्यायकृद् यस्तं विशेषेण न निन्दयेत् ।" |
| "लोकत्रयादपि भ्रष्टो यस्मात् तन्निन्दको भवेत् ॥’ इति च ।" |
| "तस्माद् अतिदुष्टत्वात् तन्निन्दको नास्त्येवेत्युक्तम्- तस्य नास्त्युपवादः इति । ‘तं कृष्णं पुण्डरीकाक्षं को नु युध्येत बुद्धिमान्’(भाग.५.६३.८) इत्यादिवत् ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "यद्धि सन्धिं विवर्तयति तन्निर्भुजस्य रूपम् । अथ यच्छुद्धे अक्षरे अभिव्याहरति तत् प्रतृण्णस्य । अग्र उ एवोभयमन्तरेणोभयं व्याप्तं भवति । अन्नाद्यकामो निर्भुजं ब्रूयात् । स्वर्गकामः प्रतृण्णम् । उभयकाम उभयमन्तरेण ।" |
| "अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तं पर उपवदेत्, ‘पृथिवीं देवतामारः पृथिवी त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।" |
| "अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तं पर उपवदेद्, ‘दिवं देवतामारः, द्यौस्त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।" |
| "अथ यद्येनमुभयमन्तरेण ब्रुवन्तं पर उपवदेद्, ‘अन्तरिक्षं देवतामारः, अन्तरिक्षं त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।" |
| "यथा तु कथा च ब्रुवन् वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयाद् अभ्याशमेव यत् तथा स्यात् ।" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "उपवदेद् इत्युक्तो मनुष्यमात्रः । पर उपवदेद् इत्यसुरः । सर्वशत्रुत्वात् ।" |
| "‘अमुक्तियोग्यैस्तु नरैर्विदुषां निन्दने कृते ।" |
| "ब्रूयाल्लोकच्युतोऽसीति निन्दितोऽसुरसर्गगैः ।" |
| "नाशयिष्यति विष्णुस्त्वाम् अन्धे तमसि पातयेत् ।" |
| "इति ब्रूयान्न तु ब्रूयाद् देवसर्गात्मकं क्वचित्॥’ इति च ।" |
| "‘षणयोः सन्धिकरणात् संहिताध्ययनं भवेत् ।" |
| "विषणुस्त्विति यो ब्रूयात् पदाध्यायी भवेत सः ।" |
| "सन्ध्युक्तिश्च विभागश्च द्वयं व्याप्तं क्रमेण तु ।" |
| "तस्माद् द्विधाऽपि वचनात् क्रमाध्यायी भवेत सः ॥" |
| "भोगवृद्धिं च यो मोक्ष इच्छेद् विष्णव इत्यसौ ।" |
| "मोक्षकामो विष्णवे द्वयकामो द्वयं वदेत् ॥" |
| "विष्णुनामात्मकत्वाच्चाथ संहितपदक्रमाः ।" |
| "सर्ववेदस्थिता मोक्षतद्भोगद्वयसाधकाः ॥" |
| "तज्ज्ञानामेव नान्येषाम् इति वेदानुशासनम् ।" |
| "संहिताद्या ब्रुवन् वाऽपि य एवंविन्नवा ब्रुवन् ॥" |
| "परिवादं ब्रुवन्तं वा न ब्रुवन्तम् अथापि वा ।" |
| "यद् वदेत् तत् तथैव स्यात् क्षिप्रमेव न संशयः ॥’ इति च ।" |
| "अग्र एव ‘अग्र्यमेव’ उभयमन्तरेण ।" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयाद् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयाद् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयाद् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माऽऽह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ ३ ॥" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "द्युम्नो द्युतिस्वरूपत्वाद् विष्णुरेव प्रकीर्तितः ।" |
| "योऽतिक्रमति तस्याज्ञाम् अतिद्युम्नः प्रकीर्तितः(स कीर्तितः .हृ) ॥" |
| "मोक्षयोग्योऽपि(मोक्षायोग्योऽपि . हृ) यस्त्वेवम् अतिद्युम्नो भवेत् पुमान् ।" |
| "लोकच्युतोऽसीत्येवं तं ब्रूयान्नाज्ञास्थितं क्वचित्॥" |
| "लोकच्युतो भवेत्येनम् अपि नैव वदेत् क्वचित्।" |
| "च्युतोऽसीति तु शिक्षार्थं ब्रूयान्नैवान्यथा क्वचित्॥’ इति च ॥३ ॥" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "अथातोऽनुव्याहाराः । प्राणो वंश इति विद्यात् । स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत्, शक्नुवन्तं चेन्मन्येत ‘प्राणं वंशं समधां३ँ । प्राणं मां वंशं सन्दधतं न शक्नोषीत्याह । प्राणस्त्वा वंशो हास्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् । अथ चेद् अशक्नुवन्तं मन्येत ‘प्राणं वंशं समधित्सिषन्तं नाशकः सन्धातुं प्राणस्त्वा वंशो हास्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।" |
| "यथा तु कथा च ब्रुवन् वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयाद् अभ्याशमेव यत् तथा स्यात् । न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥" |
| "४ ॥" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "भगवदुपासकस्य यस्मिन् कस्मिंश्चिद् दोष उक्ते तं प्रत्युक्तिप्रकारः पूर्वं दर्शितः । अनुव्याहारशब्देन भगवदुपासनाविषय एवास्याशक्त्यादिदोषं वदतः प्रत्युक्तिरुच्यते । निर्भुजं वदन्तम् इत्यादि त्ववस्थामात्रदर्शनम् । आत्मनो ज्ञानसामर्थ्यानुसारेण वक्तव्यत्वादनुव्याहारः ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "‘सर्वाधारत्वतो वंश इत्युपासीत यो हरिम् ।" |
| "वायुं च, मुक्तिमाप्नोति, य एवं तदुपासकम् ।" |
| "निन्देत विष्णुविज्ञानविषये, तं वदेत सः ।" |
| "विष्णुना वंशभूतेन वायुना सहितं तथा ।" |
| "न शक्नोषीति मामात्थ हास्यतस्त्वाम् अतो हि तौ ।" |
| "ज्ञानसामर्थ्यवान् इत्थं ब्रूयाद् देवादिरुत्तमः ।" |
| "अन्यो गन्धर्वपित्रादिरल्पज्ञानबलो, हि यः ।" |
| "स ब्रूयाद् विष्णुवायुभ्यां सन्धिमिच्छन्तमेव माम्(मा. हृ) ॥" |
| "सन्धातुं नाशको यस्माद् हास्यतस्त्वाम् अतो हि तौ ॥’ इति च ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत्, प्राणं प्रत्येनमुपासकमुपवदेत्- ‘प्राणस्य विष्णोः प्रियत्वं तव न प्राप्स्यति’ इति । नाशकः सन्धातुम्, मया सह सन्धानं कर्तुं नाशकः । मम प्रीतिं कर्तुं नाशकः ।" |
| "‘तद्भक्तभक्तेष्वपि यो न कुर्यात् प्रीतिमञ्जसा ।" |
| "विष्णुर्जहाति तं पापम् इह चामुत्र च प्रभुः ॥’ इति च भारते ॥४ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथ खल्वाहुर्निर्भुजवक्त्राः- ‘पूर्वमक्षरं पूर्वरूपम्, उत्तरम् उत्तररूपम्, योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सा संहिता’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।" |
| "अथ वयं ब्रूमो निर्भुजवक्त्रा इति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः- ‘पूर्वमेवाक्षरं पूर्वरूपम्, उत्तरमुत्तररूपम्, योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण, येन सन्धिं विवर्तयति, येन स्वरास्वरं विजानाति, येन मात्रामात्रां विभजते सा संहिता’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद, सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।" |
| "अथ हास्य पुत्र आह मध्यमः प्रातीबोधीपुत्रः- ‘अक्षरे खल्विमे अविकर्षन् अनेकीकुर्वन् यथावर्णमाह । तद् याऽसौ मात्रा पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सन्धिविज्ञपनी साम तद् भवति । सामैवाहं संहितां मन्ये’ इति ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-407" |
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| type | "bhashya" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘पूर्ववर्णस्थितं यत्तद् रूपं पूर्वाक्षराभिधम् ।" |
| "वराहाख्यं हरेरन्यवर्णगं वामनाभिधम् ।" |
| "उत्तराक्षरसंज्ञं च, वर्णयोरन्तरस्थितम् ।" |
| "अवनात् काशनाच्चैतद् अवकाशाभिधं हरेः ।" |
| "नृसिंहरूपमित्याहुर्निर्भुजास्यास्तथाऽवदन्(त्) ।" |
| "ह्रस्वो येनाक्षरोच्चारो मात्रासन्धिस्वरात्मकः ।" |
| "व्यासरूपो हरिः साक्षात् संहितानामकस्त्विति ।" |
| "तत्पुत्रो मध्यमः प्राह समोच्चारणकारणः ।" |
| "सामनामा वासुदेवः संहितानामवानिति ॥’इति च ।" |
| "मापयति त्रायति चेति मात्रा भगवान् । यथोच्चारितवर्णयोर्मध्यस्थितश्च ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-408" |
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| type | "verse" |
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तदप्येतदृषिणोक्तम्– ‘बृहस्पते न परः साम्नो विदुः’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ ५ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-409" |
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|---|
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|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
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|---|
| lines | | "‘मा नः तेनेभ्यो ये अभिद्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः ।’(ऋ.सं.२.२३.१६)" |
| "‘येषां नैतन्नापरं किञ्चनैकं ब्रह्मणस्पते ब्रूहि तेभ्यः कदाचित्।’" |
| "‘अथो शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः ।’" |
| "‘आ देवानामोहते वि व्रयो(वि ब्रयो. हृ) हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः ।’(ऋ.सं.२.२३.१६)" |
| "अभिद्रुहस्पदे अभितो द्रोहस्य= नित्यनिरतिशयदुःखस्य अन्धतमसो(अन्धतमसस्य इति ताम्रपर्णीयपाठः) योग्याः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-410" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः ।" |
| "शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथावादबला जनाः ।" |
| "कामक्रोधाभिभूतत्वाद् अहङ्कारवशं गताः ।" |
| "याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः ।" |
| "ब्रह्मस्तेना निरानन्दा अपक्वमनसोऽशिवाः ।" |
| "वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ।" |
| "तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ॥’" |
| "इति मोक्षधर्मे भगवद्वचनाद् एवंविधा एव ‘स्तेनाः’ ‘अभिद्रुहस्पदस्थाः’ च ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-411" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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|---|
| lines | | "‘निरामिणः’ रामस्य रमणरूपस्य पूर्णानन्दस्वरूपस्य विष्णोर्जीवस्वरूपताज्ञानेन(स्वरूपतादिज्ञानेन- हृ) नीचताविदः । त एव(तत एव)) रिपवश्च तस्य ।" |
| "‘अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।" |
| "परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ।" |
| "मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।" |
| "राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥’(भ.गी.९.११-१२)" |
| "इत्यादिवचनाद् असुरादयः । अन्नेषु जागृधुः भोगमात्रगृध्नवः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-412" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| lines | | "येषामेतत् सर्वोत्तमं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म नास्तीति पक्षः । ईशितव्ये विद्यमाने हीश्वरो भवतीति । न चापरं किञ्चित् । परमापेक्षया ह्यपरमिति । किं तर्हि ? किञ्चनैकम् । किमप्येकमेव वस्त्वस्ति न परमपरं चेति तेषां पक्षः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-413" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।" |
| "अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥" |
| "एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।" |
| "प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥" |
| "ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥’(भ.गी.१६.८-९) इत्यादि वचनात् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-414" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| lines | | "ब्रह्मणस्पते ! ब्रह्मणः= वेदस्य पते वायो ! ‘अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः’(बृ.उ.३.३.७), ‘एष उ एव ब्रह्मणस्पतिः । वाग्वै ब्रह्म । तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः । वाग्धि बृहती’(बृ.उ.३.३.२१)इत्यादि श्रुतेः । एतादृशेभ्यो मा ब्रूहि ।" |
| "शमेन= विष्णुनिष्ठया उप= समीपे तस्मिन्नेव रताः साम्नः= विष्णोः परं किमपि न विदुः । तदेव देवानां व्रयः । सर्वदेवानां परतमं विष्ण्वाख्यं ब्रह्म हृदा व्योहते । वासुदेवादिरूपेण वरं नियामकं चेति व्रयः । तेभ्यो ब्रूहि ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-415" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "‘वायुं विद्याः समासाद्य सर्वासां पतिमूचिरे ।" |
| "स्तेनेभ्यो मैव नो ब्रूहि ब्रूह्यथो वैष्णवेषु च ॥’ इति च ।" |
| "‘सामनाम्ना श्रुतिर्यस्माद् विष्णुमाह ततः प्रियम् ।" |
| "तन्नाम विष्णोरिह तु संहितार्थं वदेद् यतः ॥’ इति वचनात् सामनाम्नः संहिताशब्दार्थत्वाद्, विष्णोस्तस्य नाम्नः श्रुतिसिद्धत्वाच्च सामनाम्नोः वासुदेवरूपसमाख्यासु पञ्चरात्रे पठितत्वाच्च तद् रूपं संहितानामकमिति युक्तमित्यभिप्रायः ॥५ ॥" |
|
|---|
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "बृहद्-रथन्तरयो रूपेण संहिता सन्धीयत इति तार्क्ष्यः । वाग्वै रथन्तरस्य रूपम् । प्राणो बृहतः । उभाभ्यामु खलु संहिता सन्धीयते वाचा च प्राणेन च । एतस्यां ह स्मोपनिषदि संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । एतस्यां ह स्म मात्रायां संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । तदप्येतदृषिणोक्तं– ‘रथन्तरमाजभारा वसिष्ठः’(ऋ.सं.१०.१८१.१), ‘भरद्वाजो बृहदा चक्रे अग्नेः’(ऋ.सं.१०.१८१.२) इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।" |
|
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| id | "Aitareya-417" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "‘देवता पूर्ववर्णस्य लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता ।" |
| "नारायणस्तूत्तरस्य तौ वाक्प्राणाभिधौ मतौ ।" |
| "मध्यस्थः संहितानामा सोऽर्धनारीपुमात्मकः ।" |
| "वेदात्मकत्वाद् वाङ्नाम्नी लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता ।" |
| "प्राणनामा प्रणेतृत्वात् साक्षान्नारायणः स्वयम् ।" |
| "रमित्यानन्द उद्दिष्टः सम्भोग्यं थमुदाहृतम् ।" |
| "विष्णुभोग्या रतितरा लक्ष्मीरेव रथन्तरम् ।" |
| "नारायणो बृहत्वात्तु बृहन्नामा प्रकीर्तितः ।" |
| "रथन्तरस्य बृहतो देवते चैव तावुभौ ।" |
| "वाक् प्राणसंस्थितौ चैव ताभ्यामेव हि सन्धितम् ।" |
| "लक्ष्मीनारायणं रूपं संहितानामकं शुभम् ।" |
| "एतां विद्यामवाप्तुं हि वत्सरं गा अरक्षत ।" |
| "तार्क्ष्य एतावन्मात्रं(तार्क्ष्य एतन्मात्रं च- हृ) च समुद्दिश्य न चापरम् ।" |
|
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "‘वाक् प्राणेन संहिता’ इति कौण्ठरव्यः । प्राणः पवमानेन, पवमानो विश्वैर्देवैः, विश्वेदेवाः स्वर्गेण लोकेन, स्वर्गो लोको ब्रह्मणा । सैषाऽवरपरा संहिता ।" |
| "स यो हैतामवरपरां संहितां वेद, एवं हैव स प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सन्धीयते । यथैषा संहिता ।" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "संहितादेवता बह्व्य इति कुण्ठरवात्मजः ।" |
| "द्वयं द्वयं देवतानां मिलितं हरिशर्ववत् ।" |
| "संहितानामकं तत्र वर्णमध्यस्य देवता ।" |
| "तयोरेकं देवतयोः परमन्यत् तथाऽवरम् ।" |
| "अवरस्य परस्यापि संयोगात् संहिता तु सा ।" |
| "प्रोक्ताऽवरपरेत्येव, वाक् प्राणाख्यौ रमाऽच्युतौ ।" |
| "संहितैका, तथैवान्या केशवो वायुसंयुतः ।" |
| "वायुः स पवमानाख्यो देवताश्चाखिला अपि ।" |
| "तृतीया संहिता प्रोक्ता, देवतास्ताः सशङ्कराः ।" |
| "चतुर्थी संहिता प्रोक्ता, शङ्करो ब्रह्मणा सह ।" |
| "पञ्चमी संहिता चैव संहिता मोक्षदा इमाः ।" |
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| lines | | "प्रथमायां द्वितीयायां विष्णुरेव परो मतः ।" |
| "तृतीयायां वायुरेव, चतुर्थ्यां सर्वदेवताः ।" |
| "विरिञ्च एव पञ्चम्याम्, अवरा इतरे ततः ।" |
| "प्रथमायां संहितायाम् अवरो वामभागगः ।" |
| "द्वितीयायां तु परमस्तृतीयायां तथाऽवरः ।" |
| "चतुर्थ्यां परमश्चैव पञ्चम्यां वामगोऽवरः ।" |
| "अवराद्याः परान्ता यद् एताः सर्वाश्च संहिताः ।" |
| "ततोऽवरपराः प्रोक्ता नैवोक्तास्ताः परावराः ।" |
| "अभिमानी द्युलोकस्य शिवः सर्वस्य लोकनात् ।" |
| "द्योतनाच्च ...." |
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| lines | | "स यदि परेण वोपसृतः स्वेन वाऽर्थेनाभिव्याहरेद्, अभिव्याहार्षन्नेव विद्यात् । ‘दिवं संहिताऽगमद् विदुषां देवानामेवं भविष्यति’ इति । शश्वत् तथा स्यात् । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।" |
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| lines | | ".... यदि ब्रूयान्मन्त्रमेतमथापि वा ।" |
| "आत्मार्थेऽथ परार्थे वा चिन्तयेदेवमञ्जसा ।" |
| "‘विद्वांसो देवता यस्मात् सम्यक् तेन महत् फलम् ॥" |
| "तेषामेव, हरिश्चैव संहितारूपकः प्रभुः ।" |
| "अगमद् देवलोकं हि कर्तुं देवेष्वनुग्रहम् ॥’" |
| "इति चिन्तयतस्तेषां प्रसादात् फलमञ्जसा ।" |
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| lines | | "वाक् संहितेति पञ्चालचण्डः। वाचा वै वेदा सन्धीयन्ते । वाचा च्छन्दांसि । वाचा मित्राणि सन्दधति । वाचा सर्वाणि भूतानि । अथो वागेवेदं सर्वमिति ।" |
| "तद् यत्रैतदधीयते वा भाषते वा वाचि तदा प्राणो भवति । वाक् तदा प्राणं रेळ्हि । अथ यत्र तूष्णीं वा भवति, स्वपिति वा, प्राणे तदा वाग् भवति । प्राणस्तदा वाचं रेळ्हि । तावन्योन्यं रीळ्हः । वाग् वै माता । प्राणः पुत्रः ।" |
| "तदप्येतदृषिणोक्तम्–" |
| "‘एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश।" |
| "स इदं विश्वं भुवनं विचष्टे ।" |
| "तं पाकेन मनसाऽपश्यमन्तितः।" |
| "तं माता रेळ्हि स उ रेळ्हि मातरम् ॥’(ऋ.सं.१०.११४.४) इति ।" |
| "स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥" |
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| lines | | "पञ्चालचण्डो वाचं तु ब्रह्माणीं हि सरस्वतीम् ।" |
| "मन्यतेऽस्याः पुत्रवच्च देवं नारायणं प्रभुम् ।" |
| "वेदैर्हि व्यज्यते विष्णुः सा च वेदाभिमानिनी ।" |
| "प्राणस्थो भगवान् विष्णुः प्राणनामा प्रणेतृतः ।" |
| "ब्रह्मणोऽपि पिता नित्यं भगवान् पुरुषोत्तमः ।" |
| "उपचर्यते पुत्र इति वेदैर्यद् व्यज्यते हरिः ।" |
| "सा देवी संहितानाम्नी वाच्योऽस्या विष्णुरेव हि ॥" |
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| lines | | "अथातः प्रजापतिसंहिता । जाया पूर्वरूपम्, पतिरुत्तररूपम्, पुत्रः सन्धिः, प्रजननं सन्धानम्। सैषाऽदितिः संहिता । अदितिर्हीदं सर्वं यदिदं किञ्च, पिता च माता च पुत्रश्च प्रजननं च। तदप्येतदृषिणोक्तम्– ‘अदितिर्माता स पिता स पुत्रः’(ऋ.सं.१.८९.१०) इति ।" |
| "स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति सर्वमायुरेति ॥ ६ ॥" |
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| lines | | "प्रजापत्याख्यशर्वेण प्रोक्ताऽन्या संहिताऽपि हि ।" |
| "विष्णुरेवादितिर्नाम सर्वस्यात्ता यतः प्रभुः ।" |
| "स एव पितृसंस्थस्तु पातृत्वात् पितृनामकः ।" |
| "देवतोत्तरवर्णस्य मातृस्थो मातृनामकः ।" |
| "माननात्, पूर्ववर्णस्य देवतेति प्रकीर्तितः ।" |
| "पोषकत्वात् सन्धिनामा वर्णयोरन्तरस्थितः ।" |
| "स एव पुत्रसंस्थश्च पुत्रनामा जनार्दनः ।" |
| "त्राणात् पू्तित एवासौ, वर्णसन्धानकर्मणि ।" |
| "सन्धाननामा सन्धानकर्तृत्वात् पुरुषोत्तमः ।" |
| "प्रजातिकर्मसंस्थश्च स एव प्रजनाभिधः ।" |
| "जनकत्वात् परो विष्णुरेवं विष्णुर्हि संहिता ।" |
| "वासुदेवादिरूपेण चतुर्धैवं व्यवस्थितः ।" |
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| lines | | "स एव दिवि संस्थश्च द्युनामा क्रीडनात् प्रभुः ।" |
| "अन्तरेवेक्षणाच्चैव सोऽन्तरिक्षोऽन्तरिक्षगः ।" |
| "पृथिवी पृथिवीस्थश्च प्रथितत्वाज्जनार्दनः ।" |
| "मुख्यार्थत्वात् सर्वनाम्नां सर्वदेवाभिधो हरिः" |
| "विश्वे देवा इति प्रोक्तो बहुधा तेषु संस्थितः ।" |
| "ज्ञानद्युतेर्देवनामा स्थितो देवेषु केशवः ।" |
| "गां धारयंश्च गन्धर्वो गन्धर्वेषु व्यवस्थितः ।" |
| "माननान्मानुषो नाम मानुषेषु स्थितो हरिः(प्रभुः) ।" |
| "पालनात् पितृनामाऽसौ पितृष्वेव व्यवस्थितः ।" |
| "रतेः प्राणेऽसुराख्यश्च सोऽसुरेषु व्यवस्थितः ।" |
| "एवं पञ्चजनेषुस्थो हरिः पञ्चजनाभिधः ।" |
| "जातनामा जातसंस्थः प्रादुर्भूतगुणत्वतः ।" |
| "जनिक्रियास्थितश्चासौ जनित्वमिति गीयते ।" |
| "जनिं यस्मात् तवयति, तवनं हि प्रकाशनम् ॥इति च ॥" |
|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "प्रथश्च सप्रथश्चैव राजानौ मत्स्यदेशजौ ।" |
| "यापयामासतुर्विष्णोर्हविर्नाम्नो हविर्मुखे ।" |
| "अनुष्टुब्देवता यस्तु नृसिंहो जगतोऽस्य च ।" |
| "स्वमुखे हवनादेव हविरित्यभिधीयते ।" |
| "तस्मिन् यज्ञे वसिष्ठस्तु चतूरूपाज्जनार्दनात् ।" |
| "आजहार श्रियं देवीं रथन्तरवराभिधाम् ।" |
| "चतुर्मूतिः स्तुतस्तेन प्रेषयामास तां श्रियम् ।" |
| "सा चास्मै प्रददौ विद्यां प्रययौ च पुनर्हरिम् ।" |
| "धातेत्युक्तोऽनिरुद्धस्तु प्रद्युम्नस्तु द्युनामकः(द्युतानकः हृ.) ।" |
| "वासुदेवः प्रसविता सर्वस्य प्रसवाद् विभुः(प्रभवाद् प्रभुः) ।" |
| "सङ्कर्षणो विष्णुनामा प्रणेतृत्वाद् बलादपि ।" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "चतूरूपं परं विष्णुं राजानौ प्रथसप्रथौ ।" |
| "भरद्वाजो वसिष्ठश्च ध्यात्वाऽविन्दन् परात् परम् ।" |
| "यजनीयो यजुर्नामा विष्णुः सङ्कर्षणाभिधः ।" |
| "जीवानां स्कन्दनादेव स्कन्नः प्रद्युम्न उच्यते ।" |
| "प्रथमो वासुदेवस्तु देवयानोऽनिरुद्धकः ।" |
| "प्राप्यो देवैर्यतो नित्यम् अनिरुद्धाभिधो हरिः ।" |
| "तस्मादेवं चतुर्मूर्तेः स्तुतिसन्तोषिताद्धरेः ।" |
| "आजहार भरद्वाजो रूपं नारायणाभिधम् ।" |
| "तद् बृहन्नामकं विष्णोश्चातुरात्म्यात् समुद्गतम् ।" |
| "भरद्वाजमुपागम्य प्रादान्मोक्षवरं परम् ।" |
| "चतुर्मूर्तिः स भगवानग्निरित्यभिधीयते ।" |
| "अग्र्यत्वात् सर्वभूतानाम् ........" |
|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | ".......... एवं चत्वार एव ते ।" |
| "अविन्दंस्तं चतुर्मूर्तिं साक्षान्नारायणं प्रभुम् ।" |
| "गुहायां संस्थितमपि ह्यतीव हितमस्य च ।" |
| "सर्वज्ञत्वाद् यज्ञनाम्नो विष्णोस्तेजः परं हि तत् ।" |
| "तस्मादेव चतुर्मूर्तेः सूरिप्राप्यत्वहेतुतः ।" |
| "सूर्यनाम्नोऽहरन् घर्मनामानं तं नृसिंहकम् ।" |
| "घर्षणात् सर्वलोकस्य नृसिंहो घर्म उच्यते ।" |
| "निर्गत्य स चतुर्मूर्तेर्विप्रक्षत्राभिसंस्तुतात् ।" |
| "प्रथादीनां चतुर्णां च पुरुषार्थचतुष्टयम् ।" |
| "दत्वा जगाम भगवान् स्वकीयां तनुमेव च ।" |
| "वसिष्ठाच्च भरद्वाजाद् होत्रध्वर्य्वोर्नृपौ तु तौ ।" |
| "यथेष्टसिद्धिं सम्प्राप्तौ सम्यगिष्टाज्जनार्दनात् ॥ इत्याद्यृग्वेदसंहितायाम् ।" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "यस्य प्रथ इति नाम स च हविर्नाम्नो विष्णोर्हविर्यत्= अयत् । अटो लोपेनान्तर्णीतणिच्त्वेन अयापयद् इत्यर्थः । एवं सप्रथ इति यस्य नामासौ हविर्यदिति पृथक् सम्बन्धः ।" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "आचक्रे= आकारयामास । ‘अविन्दन् ते’, ‘तेऽविन्दन्’ इत्यध्यात्म-अधिदैवतयोरुभयत्रापि भगवन्तम् अविन्दन्नित्यर्थः । ‘देवयानम्’, ‘गुहायद्’ इति वचनात् ।" |
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| lines | | "‘चतुःशिखण्डां तु रमां द्विरूपो भगवान् हरिः ।" |
| "परमानन्दरूपत्वात् सुपर्ण इतिनामकः ।" |
| "रमयामास तस्यां च निषण्णः सर्वदैव सः ।" |
| "एक एव च विष्णुः स प्रविष्टः क्षीरसागरम् ।" |
| "सर्वं पश्यत्यसौ देवः पूर्णाकुण्ठेन चेतसा ।" |
| "परिपक्वेन मनसाऽपश्यमित्याह तं त्वजः ।" |
| "मातेव व्यञ्जकत्वात् तं प्राणस्थं वाक् सरस्वती ।" |
| "लिहते लिह्यत इव प्राणस्थेन तु सा सदा ।" |
| "स्वयं तु भगवान् विष्णुर्वाक्पतेर्ब्रह्मणोऽपि हि ।" |
| "नित्यः पिता स्वतन्त्रश्च नास्य माता पिताऽपि वा(च) ॥’ इत्यादि च ॥ ६ ॥" |
|
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| lines | |
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| lines | | "प्राणो वंश इति स्थविरः शाकल्यः । तद् यथा शालावंशे सर्वेऽन्ये वंशाः समाहिताः स्युः, एवमस्मिन् प्राणे चक्षुः श्रोत्रं मनो वाग् इन्द्रियाणि शरीरं सर्व आत्मा समाहितस्तस्यैतस्याऽत्मनः प्राण ऊष्मरूपम् । अस्थीनि स्पर्शरूपं मज्जानः स्वररूपम् । मांसं लोहितम् इत्येतद् अन्यच्चतुर्थम् अन्तःस्थरूपम् ।(ह स्माऽह)" |
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| lines | | "गृहस्याऽच्छादनादीनां मध्यवंशो यथाऽऽश्रयः ।" |
| "तथेन्द्रियाभिमान्यादिदेवानां वायुराश्रयः ।" |
| "तेषु सर्वेषु भगवान् बहुरूपो हरिः स्थितः ।" |
| "विष्णुनामाऽक्षरेष्वेवम् अन्येष्वपि तदर्थतः ।" |
| "प्राणनामा तु(अपि) भगवान् प्राणस्थश्चोष्मसु स्थितः ।" |
| "ऊष्मनामा समर्थत्वात् स एव भगवान् हरिः ।" |
| "पूर्णत्वाद् आत्मनामाऽसौ, प्रतिमात्वाद् अमुष्य तु ।" |
| "सङ्घात आत्मशब्दोक्तो, ह्यस्थिरश्चास्थिनामकः ।" |
| "अस्थिस्थितो हरिः स्पर्शसंस्थितः स्पर्शनामकः ।" |
| "स्पर्शहेतुत्वतः स्पर्शनामा स भगवान् हरिः ।" |
| "मज्जासुस्थः स मज्जाख्यो मदं जनयतीति ह ।" |
| "स एव स्वरसंस्थश्च स्वराख्यः स्वरतेः प्रभुः ।" |
| "प्रमाणं सारयेद् यस्मान्मांसाख्यो मांससंस्थितः ।" |
| "लोहिताख्यो रक्तवर्णो लोहितस्थो जनार्दनः ।" |
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| lines | | "इति ह स्माऽह ह्रस्वो माण्डूकेयः- त्रयं त्वेव न एतत् प्रोक्तम् । तस्यैतस्य त्रयस्यास्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति, त्रीणीतः षष्टिशतानि, त्रीणीतस्तानि सप्तविंशतिशतानि भवन्ति ।" |
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| lines | | "अस्थिस्थान्येव रूपाणि पर्वस्वपि हरेर्यतः ।" |
| "तत एव विभक्तानि सङ्ख्या तेषां पृथङ् न तत् ।" |
| "तस्मात् सप्तशतान्येव देहे विंशच्च तस्य हि ।" |
| "रूपाणि विष्णोर्भागे तु षष्ठ्युत्तरशतत्रयम् ।" |
|
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| lines | | "सप्त च वै शतानि विंशतिश्च संवत्सरस्याहोरात्राः स एषोऽहःसम्मानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा ।" |
| "स य एवमेतमहःसम्मानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेद, अह्नां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति, सर्वमायुरेति ॥" |
| "१ ॥" |
|
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| lines | | "तान्येव विष्णो रूपाणि वत्सराहस्सु सर्वशः ।" |
| "अहर्नामा च भगवान् अहार्यत्वात् प्रकीर्तितः ।" |
| "अहोभिः समसङ्ख्यानि यस्माद् अध्यात्मगानि तु ।" |
| "रूपाणि विष्णोस्तेनायम् अहस्सम्मान उच्यते ।" |
| "पूर्णदर्शनशक्तित्वाच्चक्षुर्मय इतीरितः (उदीरितः) ।" |
| "तादृक् श्रवणशक्तित्वाद् तथा श्रोत्रमयः स्मृतः ।" |
| "छन्दोमयः सत्यकामो मन्तृवक्तृबलात्मकः ।" |
| "एवं विद्वांस्तस्य रूपाण्याप्नोति ज्ञानपुत्रवान् ॥" |
| "पीयमानं शमाप्नोति प्राप्याहर्नामकं हरिम् ॥ १ ॥" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अथ कौण्ठरव्यः- त्रीणि षष्टिशतान्यक्षराणाम्, त्रीणि षष्टिशतान्यूष्मणाम्, त्रीणि षष्टिशतानि सन्धीनाम् ।" |
| "यान्यक्षराण्यवोचामाहानि तानि, यानूष्मणोऽवोचाम रात्रयस्ताः, यान् सन्धीन् अवोचामाहोरात्राणां ते सन्धय इत्यधिदैवतम् ।" |
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| lines | | "अथाध्यात्मम्- यान्यक्षराण्यधिदैवतमवोचाम, अस्थीनि तान्यध्यात्मम् । यानूष्मणोऽधिदैवतमवोचाम, मज्जानस्तेऽध्यात्मम् । एष ह वै सम्प्रति प्राणो यन्मज्जा । एतद्रेतेः । न ह वा ऋते प्राणाद् रेतः सिच्यते । यद् वा ऋते प्राणाद् रेतः सिच्येत, पूयेद् न सम्भवेत् । यान् सन्धीन् अधिदैवतमवोचाम पर्वाणि तान्यध्यात्मम् । तस्यैतस्य त्रयस्य, अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति । पञ्चेतश्चत्वारिंशच्छतानि, पञ्चेतः । तदशीतिसहस्रं भवति, अशीतिसहस्रं वा अर्कलिनो बृहतीरहरभिसम्पादयन्ति ।" |
| "स एषोऽक्षरसंमानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा ।" |
| "स य एवम् एतम् अक्षरसम्मानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेद, अक्षराणां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ॥२ ॥" |
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| lines | | "‘एवमुक्तप्रकारेण तस्य ह्यक्षरनामकम् ।" |
| "अशीत्युत्तरसाहस्ररूपं वर्णेषु संस्थितम् ।" |
| "विष्णुनाम्नोऽथवाऽन्येषु पञ्चाशत्सङ्ख्यकेष्वपि ।" |
| "तावत् सङ्ख्यानि, देहेषु पृथङ् मज्जास्थिपर्वसु ।" |
| "रूपाणि विष्णोस्तावन्ति चेष्टकानि(चेष्टकासु) पृथक् पृथक् ।" |
| "अर्कस्थितबृहत्याख्यरूपाण्यह्नां च सर्वशः ।" |
| "सम्पादकानि तान्येव, तान्यक्षरमितानि च ।" |
| "अस्थ्यादिस्थितरूपाणि तान्युपास्य विमुच्यते ॥’ इति च ।" |
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| lines | | "तस्यैतस्याऽत्मनः तस्य शरीराख्यस्याऽत्मनो य आत्मा आदानादिकर्ता तस्य परमात्मन एतस्य । अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणां च मिलितानामपि विंशोत्तरसप्तशतत्वोक्तेरपि तत्रस्थविष्णुरूपाण्येवोच्यन्त इति सिद्धम् । अस्थ्यादीन्येव चेदशीत्युत्तरसहस्राणि सन्ति हि ।" |
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| lines | | "‘ष्(विष्)’ ‘ण्’ ‘ष्णुः’ इत्येतानि विष्णुनामगतान्यूष्माक्षरसन्धिनामकानि तद्गतभगवद्रूपाणि मुख्यतस्तन्नामकानि ।" |
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| lines | | "अहार्यत्वादहर्नामा रात्रिनामा रतिप्रदः ।" |
| "सन्धानात् सन्धिनामाऽसौ स्वयं नारायणः प्रभुः ।" |
| "सन्ध्यूष्माक्षरगाण्यस्य विष्णो रूपाणि सर्वशः ।" |
| "सन्ध्यारात्रिदिवास्थानि साशीतिकसहस्रकम् ।" |
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| lines | | "तान्येवास्थिषु मज्जासु पर्वस्वपि च सर्वशः ।" |
| "परज्ञानात् तु पर्वाणि विष्णो रूपाणि तानि हि ।" |
| "अस्थानान्मदनाच्चैव ह्यस्थिमज्जाभिधानि च ।" |
| "व्यक्तिर्मज्जासु तस्यैव प्राणो मज्जासु संस्थितः ।" |
| "मज्जैव रेतो भवति रेतसिस्थो विशेषतः ।" |
| "प्राणस्तेन हि तद्रेतोयुक्तं प्राणेन सर्वदा ।" |
| "यदि प्राणो न तद्रेतो न गर्भत्वं व्रजेत् क्वचित्।" |
| "विशेषप्राणसम्बन्धवर्जितान्यत एव हि ।" |
| "न मांसादीनि गर्भत्वं यान्त्यतः स हि रेतसि ।" |
| "विशेषेण स्थितः प्राणः प्राणे चैव विशेषतः ।" |
| "स्थितो नारायणो देवस्तस्मान्मज्जासु च स्थितः ॥इति च ।" |
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| lines | | "मज्जास्वधिकसन्निधानज्ञापनार्थम् इदं वचनम् । अशीत्युत्तरसहस्रवर्णानाम् अभावाच्च तत्स्थविष्णुरूपाण्येव तत्सङ्ख्यानीति सिद्धम् । अर्के निलीनत्वेनादृश्यत्वेन स्थिता भगवत्प्रादुर्भावा अर्कलिनः । त एव शरीरे स्थित्वा सहस्रं बृहतीः सम्पादयन्ति । वाक् प्रेरकत्वाद् । विष्णुनामार्थवत्वादेव च बृहतीसहस्रस्य तद्देवताश्चैतान्येवाशीत्युत्तरसहस्ररूपाणि । एतान्येव अहःप्रवर्तकानि च । अहःशब्देन यज्ञो दिवसश्चोभावप्यभिप्रेतौ ।" |
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| lines | | "‘यज्ञानां दिवसानां च साशीतिकसहस्रकैः ।" |
| "विष्णुः प्रवर्तको रूपैर्बृहत्युक्थस्य चाञ्जसा ॥" |
| "बृहत्युक्थेन वाच्यानि रूपाण्येतान्यधीशितुः ॥’ इति च ॥ २ ॥" |
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| lines | | "चत्वारः पुरुषा इति बाध्वः- ‘शरीरपुरुषश्छन्दःपुरुषो वेदपुरुषो महापुरुषः’ इति ।" |
| "शरीरपुरुष इति यमवोचाम, स य एवायं दैहिक आत्मा । तस्य योऽयमशरीरः प्रज्ञात्मा स रसः ।" |
| "छन्दःपुरुष इति यमवोचाम, अक्षरसमाम्नाय एव । तस्यैतस्याकारो रसः ।" |
| "वेदपुरुष इति यमवोचाम, येन वेदान् वेद, ऋग्वेदं यजुर्वेदं सामवेदम् । तस्यैतस्य ब्रह्मा रसः । तस्माद् ब्रह्माणं ब्रह्मिष्ठं कुर्वीत, यो यज्ञस्योल्बणं पश्येत् ।" |
| "महापुरुष इति यमवोचाम, संवत्सर एव प्रध्वंसयन् अन्यानि भूतानि, ऐक्याभावयन्नन्यानि तस्यैतस्यासावादित्यो रसः ।" |
|
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| lines | | "संसारबाधितैः प्राप्यो बाध्वो वायुरुदाहृतः ।" |
| "स हि मोक्षप्रदो विष्णोराज्ञया स उवाच ह ।" |
| "सर्वदेहाभिमानी तु शरीरपुरुषः शिवः ।" |
| "सर्ववर्णाभिमानी च शेषोऽसौ छान्दसः पुमान् ।" |
| "सर्ववेदाभिमान्येव गरुडो वेदपूरुषः ।" |
| "संवत्सराभिमानी तु ब्रह्मैव हि महापुमान् ।" |
| "सारः शिवस्यानिरुद्धनामा देहस्थितो हरिः ।" |
| "अ इत्याक्रियते यस्माद् वासुदेवो ह्यकारकः ।" |
| "शेषस्य सारः स विभुर्ब्रह्माख्यो ज्ञानबृंहणात् ।" |
| "सङ्कर्षणाख्यस्तु हरिः सारः स गरुडस्य च ।" |
| "ब्रह्मर्त्विक्संस्थितश्चासौ तस्माद् ब्रह्मिष्ठमेव हि ।" |
| "कुर्याद् ब्रह्मर्त्विजं तस्मिन् विशेषेण स्थितो हरिः ।" |
| "ब्रह्मणः सारभूतस्तु प्रद्युम्नो भगवान् हरिः ।" |
| "स एवाऽदित्यसंस्थश्च स ह्यादिर्जगतो विभुः ।" |
| "ततश्च सर्वभूतेषु जीवानां विनियामकः ।" |
|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्य एकमेतदिति विद्यात् तस्मात् पुरुषं पुरुषं प्रत्यादित्यो भवति ।" |
| "तदप्येतदृषिणोक्तं–" |
| "‘चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः ।" |
| "आ प्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥’(ऋ.सं.१.११५.१) इति ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "स एवाऽदित्यगो विष्णुर्यः प्रद्युम्नाभिधो हरिः ।" |
| "स एव सर्वदेहेषु चानिरुद्धतनुः स्थितः ।" |
| "सङ्कर्षणो वासुदेव इत्येकः स चतुर्विधः ।" |
| "प्रतिपूरुषमेतस्मात् स्थितो विष्णुर्नियामकः ।" |
| "आदित्यादिषु च स्थित्वा द्योतकोऽसौ प्रति प्रति ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "स चेतनतमत्वाद्धि चित्रमित्यभिधीयते ।" |
| "मुख्यत्वात् सर्वदेवानामननादीशितृत्वतः ।" |
| "कर्तृत्वादप्यनीकं स उदैत् सूर्यस्थितो हरिः ।" |
| "ज्ञानदत्वाच्च देवानां चक्षुरेतेन दर्शनात् ।" |
| "आपूरयन् सर्वलोकान् प्रकाशेन जनार्दनः ।" |
| "आदानात् सर्वजीवानाम् अत्तृत्वात् प्रलयेऽपि च ।" |
| "आत्मेत्युक्तः स भगवान् जगतः स्थावरस्य च ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "एताम् अनुविधं संहितां सन्धीयमानां मन्य इति ह स्माऽह बाध्वः । एतां ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्ते । एतमग्नावध्वर्यवः । एतं महाव्रते छन्दोगाः । एतमस्याम्, एतं दिवि, एतं वायौ, एतमाकाशे, एतमप्सु, एतमोषधीषु, एतं वनस्पतिषु, एतं चन्द्रमसि, एतं नक्षत्रेषु, एतं सर्वेषु भूतेषु एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते ।" |
| "स एष संवत्सरसंमानश्चक्षुर्मयः, श्रोत्रमयः, छन्दोमयः, मनोमयः, वाङ्मय आत्मा ।" |
| "स य एवमेतं संवत्सरसंमानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयम् आत्मानं परस्मै शंसति," |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| lines | | "एवं चतुर्विधो विष्णुः संहितादेवता यदा ।" |
| "ज्ञायते पूर्ववर्णस्य रूपं नारायणाभिधम् ।" |
| "प्रादुर्भावाः समस्ताश्च चरमार्णस्य देवताः ।" |
| "तदा तु संहितां सम्यङ् मन्येऽहं सन्धितामिति ।" |
| "आह वायुरिमं विष्णुं बृहत्युक्थस्य(बृहदुक्थस्य- हृ) देवताम् ।" |
| "महाव्रताख्यस्तोत्रस्य चेष्टकानां च देवताम् ।" |
| "एतमेवाखिलजगद् व्याप्तं पूर्णगुणात्मकम् ।" |
| "संवसद्रतिदातृत्वाद् ब्रह्मा संवत्सराभिधः ।" |
| "नियामकः स जीवानां सर्वेषां प्रभुरीश्वरः ।" |
| "अनन्तमूर्तिर्ब्रह्माऽसावनन्तजगदास्थितः ।" |
| "नियामकस्तस्य विष्णुस्तावद्रूपेषु संस्थितः ।" |
| "तत् संवत्सरसम्मानः स विष्णुः परमेश्वरः ॥ ३ ॥" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-457" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "दुग्धदोहा अस्य वेदा भवन्ति । न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति । न वेद सुकृतस्य पन्थानम् इति ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-458" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| lines | | "य एनं वक्त्ययोग्येभ्यो योऽथवैनं महाव्रते ।" |
| "कर्मण्याचार्यतोऽन्यस्य शंसेत पितृतोऽथवा ।" |
| "महाव्रतेन स्तोत्रेण स्तुवीतैनमथापि वा ।" |
| "महाव्रते चितिं वाऽपि कुर्यान्नास्य फलं श्रुतेः ।" |
| "सुकृतस्य फलं चैव नासौ सम्यगवाप्स्यति ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-459" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "प्रत्यक्षज्ञानिनोऽप्येतद् आनन्दह्रासकृद् भवेत् ।" |
| "प्रत्यक्षज्ञानिनो मोक्षो न कथञ्चिद्धि हीयते ।" |
| "आचार्यमेव तं विद्याद् गुणैर्यः स्वात्मनोऽधिकः ।" |
| "गुणाधिकस्य तेनैव शंसनादि न दुष्यति ।" |
| "अयोग्यस्योपदेशे तु कृते हौत्रादिकेऽपि वा ।" |
| "प्रायश्चित्तार्थमेतत्तु शंसीत शतवारकम् ।" |
| "अन्यथा मानुषेष्वेव जायते न दिवं व्रजेत् ।" |
| "योग्या अस्यास्तु विद्याया देवा ऋषय एव च ।" |
| "एकदेशज्ञानयोग्या मानुषा उत्तमा यदि ॥" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-460" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "तदप्येतदृषिणोक्तम्–" |
| "यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति ।" |
| "यदीं शृणोत्यलकं शृणोति न हि प्र वेद सुकृतस्य पन्थाम्(ऋ.सं.१०.७१.६) ॥ इति ।" |
| "‘न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति, न वेद सुकृतस्य पन्थानम्’ इत्येतत् तदुक्तं भवति तस्मादेवं विद्वान् न परस्मा अग्निं चिनुयाद् । न परस्मै महाव्रतेन स्तुवीत । न परस्मा एतदहः शंसेत् । कामं पित्रे वाऽऽचार्याय वा शंसेद् । आत्मन एवास्य तत् कृतं भवति ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-461" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "कर्मसञ्चयवेत्तारं त्यजेन्नारायणं हि यः ।" |
| "प्रीत्यैकदेशसंस्थत्वात् सखायमिति चोदितम् ।" |
| "न विद्यायाः फलं तस्य श्रुतं च नरकावहम् ।" |
| "नैव प्राप्नोति सुकृतं सन्त्यागात् परमात्मनः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-462" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "मुख्यत्यागो हरेरेष यन्नास्तीति वदेदमुम् ।" |
| "तत्समं वाऽधिकं वाऽपि ब्रूयादैक्यमथापि वा ।" |
| "ऐश्वर्यादिगुणानां वा ह्रासं नास्तित्वमेव वा ।" |
| "तत्प्रसादं विना मोक्षं ब्रूयाद् वा कस्यचित् क्वचित्।" |
| "ऐक्यं वा ब्रह्मशर्वादेर्मुक्तावैक्यम् अथापि वा ।" |
| "व्यत्यासं चावताराणां जीवाभेदम् अमुष्य वा ।" |
| "भेदज्ञानं तद्गुणानां तेन वाऽथ मिथोऽपि वा ।" |
| "तथैव तत्क्रियाणां च तद्रूपाणामथापि वा ।" |
| "असाम्यदर्शनं वाऽपि तद्रूपाणां (तद्गुणानां) परस्परम् ।" |
| "देहदेहिविभेदं च तस्मिन्नवयवेषु वा ।" |
| "परस्परं भेददृष्टिं तेन वा कुत्रचित् क्वचित्।" |
| "दोषसंसर्गमस्यापि स्वतः परत एव वा ।" |
| "अज्ञानतो ज्ञानतो वा, निर्देहत्वममुष्य च ।" |
| "तद्देहस्य प्राकृतत्वम् अचिदानन्ददेहताम् ।" |
| "प्रादुर्भावेष्वपि विभोर्देहत्यागोद्भवादिकम् ।" |
| "अज्ञानदुःखासामर्थ्यपारवश्यादिकं तथा ।" |
| "अतद्वशत्वं कस्यापि कदाचित् क्वचिदप्युत ।" |
| "परिमाणं बलादेर्वा तस्य विष्णोर्महात्मनः ।" |
| "भेदाभेददृशिर्वाऽस्य जीवैर्वा स्वगुणादिभिः ।" |
| "तर्कैस्तस्यापलापो वा तत्र रक्तेन चेतसा ।" |
| "त्यागानामेवमुक्तानां तर्काद्यैः साधनं तथा ।" |
| "अचिन्त्यविभवेऽप्यस्मिन्नसम्भवनिरूपणम् ।" |
| "स एष मुख्यतस्त्यागो वासुदेवस्य कीर्तितः ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-463" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
|---|
| lines | | "रमाब्रह्मादिकानां च तारतम्यानभिज्ञता ।" |
| "संशयश्चोक्ततत्त्वेषु जगन्मिथ्यात्वदर्शनम् ।" |
| "अस्मृतिर्वासुदेवस्य तद्भक्तानां च निन्दनम् ।" |
| "द्वितीय एष त्यागस्तु विष्णोरेव प्रकीर्तितः ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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|---|
| lines | | "निषिद्धकर्मकरणं विहितस्य च वर्जनम् ।" |
| "त्यागस्तृतीयो हि हरेः, चतुर्थोऽयोग्यपूरुषे ।" |
| "उपदेशः केशवस्य यथाशास्त्रोदितक्रमात् ।" |
| "आचार्यपित्रोरन्यत्र तथैव च महाव्रते ।" |
| "हौत्रौद्गात्राध्वर्यवाणि, त्याग एव चतुर्विधः ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "त्यागद्वयात् तु प्रथमात् प्राप्यतेऽन्धन्तमः क्रमात् ।" |
| "तृतीयान्निरयप्राप्तिश्चतुर्थान्न दिवं व्रजेत् ।" |
| "उपदिष्टेऽपि यस्तत्त्वे संशयं कुरुते पुमान् ।" |
| "सोऽन्धन्तमो व्रजेदन्यो निरयायैव गच्छति ।" |
| "स एव भगवान् विष्णुरेतैदोषैर्विना यदि ।" |
| "ज्ञायते मुक्तिदः साक्षान्नात्र कार्या विचारणा ।" |
| "यदि ज्ञानं नातिपक्वं सरागं च मनो भवेत् ।" |
| "तदा स्वर्गादिलोकाप्तिः संशयश्चेत् क्वचित् क्वचित्।" |
| "आवृत्तिरेव संसारे यावन्निःसशंयो भवेत् ।" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "पुनरावृत्तिहीनं तु तमोऽन्धं मुक्तिरेव च ।" |
| "पूर्वं तु निःसुखं तत्र, निर्दुःखं चापरं मतम् ।" |
| "निश्शेषगुणहीनं च पूर्वम्, निर्दोषकं परम् ।" |
| "विमिश्रगतयस्त्वन्याः पुनरावृत्तिसंयुताः ।" |
| "असुरा देवता मर्त्या योग्या एतेषु च क्रमात् ।" |
| "न च तेषां सङ्करोऽस्ति यथायोग्या हि तद्गतिः ।" |
| "मानुषेषूत्तमा मुक्तिम् अधमा निरयं तथा ।" |
| "आप्नुवन्ति मनुष्येषु मध्यमाः सृतिभागिनः ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "नियमोऽयं नान्यथा स्याद्, अच्छिद्रत्वं यथा भवेत् ।" |
| "दोषेऽथवा गुणे वाऽपि तदा दैत्याः सुरा अपि ।" |
| "स्वां स्वां गतिं समायान्ति तावत् संसारभागिनः ।" |
| "अच्छिद्रत्वं नैव सर्वैः कदाचित् प्राप्यते यतः ।" |
| "सृष्टिस्थितिलयादीनां नोच्छेदस्तेन कुत्रचित् ।" |
| "तस्माद् दोषान् प्रहायैव विष्णुं सर्वोत्तमोत्तमम् ।" |
| "जानीयात् तेन मुक्तिः स्याद् अपरोक्षदृशेरनु ।" |
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| type | "verse" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्ये, एकमेतदित्यवोचाम । तौ यत्र विहीयेते । चन्द्रमा इवाऽदित्यो दृश्यते, न रश्मयः प्रादुर्भवन्ति । लोहिनी द्यौर्भवति यथा मञ्जिष्ठाः । व्यस्तः पायुः । काककुलायगन्धिकमस्य शिरो वायति । सम्परेतोऽस्याऽत्मा न चिरमिव जीविष्यतीति विद्यात् । स यत्करणीयं मन्येत, तत्कुर्वीत । ‘यदन्ति यच्च दूरके’(ऋ.सं.९.६७.२१) इति सप्त जपेत् । ‘आदित् प्रत्नस्य रेतस’ इत्येका । ‘यत्र ब्रह्मा पवमान’ इति षट् । ‘उद्वयं तमसस्परि’ इत्येका ।" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "सूर्यमण्डलगो विष्णुर्देहे चक्षुषि संस्थितः ।" |
| "अनिरुद्धश्च हृदये न च भेदोऽनयोः क्वचित्।" |
| "अन्येषामपि रूपाणाम् इति विद्याद् विचक्षणः ।" |
| "द्विरूपः स यदा विष्णुरपगच्छति देहतः ।" |
| "तदैव दुर्निमित्तानि जायन्ते नान्यदा क्वचित्।" |
| "तस्मात् तेषां दर्शने तु कर्तव्यं पारलौकिकम् ।" |
| "सर्वमेव, जपेच्चैव यदन्तीत्यादिका ऋचः ।" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "ऋग्भिः षडि्भर्वायुरेव पवमानादिनामकः ।" |
| "स्तूयते सोऽङ्गनेतृत्वाद् अग्निरित्यभिधीयते ।" |
| "परस्य ब्रह्मणो विष्णोर्ज्ञापनाख्यप्रसूतिभिः ।" |
| "वायुः पुनाति यल्लोकान् सविता तेन कथ्यते ।" |
| "पवित्रं नाम साक्षात् तत् परं ब्रह्म जनार्दनः ।" |
| "प्रसादयित्वा तं विष्णुं तेन लोकान् पुनात्यसुः ।" |
| "ज्ञानाख्यप्रसवेनापि स्वयं वायुः पुनात्ययम् ।" |
| "प्राणाग्नेरर्चिषो देहे विततास्तेषु केशवः ।" |
| "अर्चिष्मान् विततो नित्यं वायुस्तेन पुनात्ययम्(पुनात्यलम्- हृ) ।" |
| "यत्र ब्रह्मेति षडि्भश्च प्रार्थनीयः स मारुतः ।" |
| "मोचयित्वैव संसारद् विष्णोर्लोके कृधीति च ।" |
| "आदित्प्रत्नस्येति विष्णुः स्तुत्यो वैकुण्ठलोकगः ।" |
| "आदित्यमण्डलस्थश्च साक्षान्नारायणः प्रभुः ।" |
| "उद्वयं त्वितिमन्त्रेण स्तुत्यो वायोरपीश्वरः ।" |
| "अपमृत्युभयं तस्य यदन्तीत्यृग्जपाद् व्रजेत् ।" |
| "कालमृत्युर्यदि भवेत् तथा जन्मादिकं भयम् ।" |
| "अन्याभिः कर्मतः पूतो यत्र ब्रह्मेति वैष्णवम् ।" |
| "लोकं व्रजेत् तथाऽन्याभ्यां विष्णुर्मोक्षसुखप्रदः ।" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "इष्टप्रदानशीलत्वाद् इन्दुर्वायुः स एव च ।" |
| "सोमः सौम्यस्वरूपत्वात्, पवमानश्च पावनात् ।" |
| "विष्णुः पुरातनत्वात् तु प्रत्नो, रेतो महारतिः ।" |
| "देवत्रा देव एवासौ सर्वदेवेश्वरो यतः ।" |
| "सूर्यश्च सूरिभिः प्राप्यो नित्यानन्दो रमापतिः ।" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अथापि यत्र च्छिद्र इवाऽदित्यो दृश्यते, रथनाभिरिवाभिख्यायेत, च्छिद्रां वा छायां पश्येत्, तदप्येवमेव विद्यात् । अथाप्यादर्शे वोदके वा जिह्मशिरसं वाऽशिरसं वाऽऽत्मानं पश्येद्, विपर्यस्ते वा कन्याके जिह्मेन वा दृश्येयाताम्, तदप्येवमेव विद्यात् ।" |
| "अथाप्यपिधायाक्षिणी उपेक्षेत, तद् यथा बटरकाणि सम्पतन्तीव दृश्यन्ते, तानि यदा न पश्येत्, तदप्येवमेव विद्यात् ।" |
| "अथाप्यपिधाय कर्णावुपशृणुयात्, स एषोऽग्निरिव प्रज्वलतो, रथस्येवोपब्दिस्तं यदा न शृणुयात्, तदप्येवमेव विद्यात् । अथापि यत्र नील इवाग्निर्दृश्यते यथा मयूरग्रीवा, मेघे वा विद्युतं पश्येत्, मेघे वा विद्युतं न पश्येत्, महामेघे वा मरिचीरिव पश्येत, तदप्येवमेव विद्यात् । अथापि यत्र भूमिं ज्वलन्तीमिव पश्येत तदप्येवमेव विद्याद् इति प्रत्यक्षदर्शनानि ।" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
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| lines | | "अथ स्वप्नाः- पुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति, स एनं हन्ति, वराह एनं हन्ति, मर्कट एनमास्कन्दयति, आशु वायुरेनं प्रवहति, सुवर्णं खादित्वाऽपगिरति, मध्वश्नाति, बिसानि भक्षयति, पुण्डरीकं धारयति, खरैर्वराहैर्युक्तैर्याति, कृष्णां धेनुं कृष्णवत्सां नलदमाली दक्षिणामुखो व्राजयति ।" |
| "स यद्येतेषां ककिञ्चित् पश्येद्, उपोष्य पायसं स्थालीपाकं श्रपयित्वा, रात्रिसूक्तेन प्रत्यृचं हुत्वा, अन्येनान्नेन ब्राह्मणान् भोजयित्वा चरुं स्वयं प्रश्नीयात् ।" |
| "स योऽतोऽश्रुतोऽगतोऽमतोऽनतोऽदृष्टोऽविज्ञातोऽनादिष्टः । श्रोता मन्ता द्रष्टाऽदेष्टा घोष्टा विज्ञाता प्रज्ञाता सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः सम आत्मेति विद्यात् ॥ ४ ॥" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| lines | | "देशतः कालतश्चैव गुणतश्चापि पूर्तितः ।" |
| "अत इत्युच्यते विष्णुः सन्ततो ह्यत उच्यते ।" |
| "तृतीयवर्णोऽतिशये यतस्तेनातिरेव वा ।" |
| "अत इत्युच्यते विष्णुः सम्यक् श्रुत्याद्यशक्यतः ।" |
| "पूर्णत्वाद् भगवान् विष्णुरश्रुतत्वादिनोदितः ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "अन्तस्थः सर्वजीवानां पूर्णत्वात् पुरुषाभिधः ।" |
| "समः स सर्वरूपेषु सर्वजीवनियामकः ।" |
| "इति विद्यात् परं विष्णुं मुच्यते तेन संसृतेः ॥’ इत्यादि च ।" |
| "शरीरपुरुषादीनां प्राप्यत्वात्, तदुपास्यत्वात्, तेषां नियामकत्वेन तेभ्योऽप्यत्युत्तमत्वेन तेषु स्थितत्वाच्च तेषां सार इत्युच्यते भगवान् । यद् ईम् एव । अलकं अरकम् । यत्ककिञ्चिच्छृणोति तत् सर्वम् अरतिरूपान्धतमःप्राप्तिकारणमेव तस्य भवति । तत्र हि सर्वरत्यभावः, रतिविरुद्धदुःखं च पूर्णम् ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-476" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| lines | | "परस्मै शंसनमात्राद् अरतिरेव ! इत्यतः प्रस्तुते चतुर्थत्यागेन न तस्य वाच्यपि भागोऽस्ति, न हि प्र वेद सुकृतस्य पन्थाम् इति दोषद्वयमेवेत्यव-धारयति- न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति, न वेद सुकृतस्य पन्थानम् इत्येतत् तदुक्तं भवति इति । अलकं शृणोति इति त्यागद्वयस्य मुख्यतः, तृतीयस्यापि नरकं शृणोतीति किञ्चिद् भवति ।" |
| "तौ यदैवास्माच्छरीराद् विहीयेते तदैव तानि निमित्तानि पश्यन्तीति नियमः । न च तदा पश्यत्येवेति ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | null |
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| lines | | "वासेन रमयतीति वासरं विष्णुर्ज्योतिः ।" |
| "‘यत्र ब्रह्मा वेदवाक्यं व्याचक्षाणो मखैर्यजन् ।" |
| "सोमेन च सुतेनेशमास्ते लोके हरेर्हि सः ॥’ इति स्कान्दे ।" |
| "ग्राव्णा सोमविषये सोमेनेष्ट्वा महीयते, तेनैव विष्णुप्रीत्या स्वस्याऽनन्दं जनयन् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-478" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "स्वर् आनन्दरूपो विष्णुः । दिवो देव्या अवरोधनं तस्याः परिवारभूताः सर्वदेव्यः । द्यौर्नाम वायुपत्नी । ‘अजनयो मरुतो वक्षणाभ्यो दिव आ वक्षणाभ्यः’(ऋ.सं.१.१३४.४) इत्यादेः । यह्वतीः स्यन्दमानाः ।" |
| "‘सर्वेष्टद जगत्प्राण मामादाय परिस्रव ।" |
| "यत्रासौ भगवान् विष्णुस्त्वं हि मोक्षप्रदः सदा ॥’ इति च ।" |
| "‘इन्दुरिष्टप्रदत्वाद् यो वायुरादाय गच्छति ।" |
| "इन्द्रनाम्नः केशवस्य समीपं मुक्तमञ्जसा ॥’ इति च ।" |
| "(आनन्द-मोद-प्रमोद-मुत् शब्देषु अर्थभेदः)" |
| "‘अनन्यहेतुकं साक्षाद् भगवद्भक्तिरूपकम् ।" |
| "सुखमानन्द इत्युक्तो मोदो भोगनिमित्तकः ।" |
| "प्रमोदस्तद्विशेषोत्थो मुन्नामात्यल्पभोगतः ॥’ इत्यृग्वेदसंहितायाम् ।" |
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|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "तमसः सकाशाद् उद्गता वयम् उत्तरं सर्वोत्तमं विष्ण्वाख्यं ज्योतिः परिपश्यन्तः तमेव देवत्रा देवं देवविषयेऽपि देवम् अगन्म । तदेव ज्योतिष्ट्वेनोत्तरत्वेन च पश्यन्त इति दर्शने इत्थम्भावविधानार्थं पूर्वम् । तथैवासौ भगवानुत्तमं ज्योतिः, न राजादिष्विवाविद्यमानभक्तिमात्रम् इदम् इति ज्ञापयितुम् ‘अगन्म ज्योतिरुत्तमम्’ इति पुनर्वचनम् ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-480" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "‘अर्चिषोंऽशा वर्तुलास्तु नाम्ना वटरकाः स्मृताः’ इति शब्दनिर्णये ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-481" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "‘बृहत्तमं मधु यदि सहापूपं प्रभक्षयेत् ।" |
| "स्वप्ने तस्याचिरान्मृत्यू रक्ताब्जे वा शिरोधृते ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-482" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V10_B09" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "‘रात्र्यास्तु देवता दुर्गा दुःस्वप्ने सा प्रपूजिता ।" |
| "पायसेन हरेन्मृत्युं रात्रिसूक्तादकालिकम् ।" |
| "यदि कालिकमृत्युः स्यात् पदं सा परमं नयेत् ।" |
| "सहैव विष्णुना भक्तं विष्णोस्तद्वेदिनं तथा ।" |
| "रतिदत्वात् परो विष्णुर्मुख्यतो रात्रिरुच्यते ।" |
| "तदाश्रयत्वाद् दुर्गाऽपि रात्रीरित्यभिधीयते ।" |
| "स्त्रीरूपः स परो विष्णुः पायसेष्टो हि मोक्षदः ।" |
| "तस्मादुभौ सहैवेज्यौ भक्त्या दुःस्वप्नदर्शने ।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-483" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "बहुभिर्नयनैर्विष्णुर्बहुधेदं ददर्श ह ।" |
| "आयन् सर्वेषु लोकेषु धृतास्तेनैव हि श्रियः ॥" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-484" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "नीचान् उच्चांश्च जीवान् स ब्रह्मादीन् उर्वपूरयत् ।" |
| "ज्ञानेन बाधतेऽज्ञानं........." |
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|---|
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| id | "Aitareya-485" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "...............स्वसारं स्वं तथाऽकरोत् ।" |
| "उषआख्यं शुक्लवर्णं प्रमदारूपमेव च ।" |
| "तमश्चापाकरोत्येव तदा(सदा) सूर्यादिषु स्थितः ।" |
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|---|
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| id | "Aitareya-486" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "स नः स्वामी यदुदरे यमनाद् यामनामके ।" |
| "आविक्ष्महि वयं सर्वे वृक्षे यद्वत् पतत्रिणः ।" |
|
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| id | "Aitareya-487" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "शेनाख्यास्तु सुखीनत्वाद् आ समन्तात् सुरोत्तमाः ।" |
| "पद्वन्तो मानुषाश्चैव पादमात्रप्रयायिनः ।" |
| "ग्रामाख्या बहुलत्वात्तु दैत्या एव प्रकीर्तिताः ।" |
| "अर्थिनस्तु कृतार्थत्वान्मुक्ता एव श्रुताः श्रुतौ ।" |
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|---|
|
| id | "Aitareya-488" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "ऊरीकृतप्रमाणत्वाद् ऊर्म्यः स भगवान् हरिः ।" |
| "वृकास्तेनैव निर्याप्याः वृकाः क्रूरत्वतोऽसुराः ।" |
| "तत्स्वभावाश्च वृक्याः स्युः स्तेनास्तत्र महासुराः ।" |
| "ब्रह्मस्तेना यतस्ते हि नित्यमैकात्म्यवेदिनः ।" |
| "विष्णुः सुखतरश्चैव भक्तानां भवति प्रभुः ।" |
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|---|
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| id | "Aitareya-489" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "कृष्णं व्यक्तं तमोऽज्ञानम् अज्ञानां पेशलं हि तत् ।" |
| "तद् यातयत्यृणमिव भगवान् पुरुषोत्तमः ।" |
| "स एव चोषाः कथितः प्रकाशत्वाज्जनार्दनः ।" |
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|---|
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| id | "Aitareya-490" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "जयिनः स्तोममिव च ब्राह्मणाय यथा च गाः ।" |
| "उपाकरं तथा स्तोमं तवाहं तद् (वृ)गृणीष्व च ।" |
| "द्यौरिति ज्ञानमुद्दिष्टं तद्व्यङ्गत्वाज्जनार्दनः ।" |
| "दुहिता दिव इत्युक्तः.........।" |
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|---|
|
| id | "Aitareya-491" |
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "......... एवमर्थेन पूज्यते ॥" |
| "रात्रीसूक्तेन भगवान् साक्षान्नारायणः प्रभुः ।" |
| "तत्सन्निधानाद् दुर्गाया एषोऽर्थ उपचारतः ।" |
| "एवं स्तुतस्तथैवेष्टो भगवान् मोक्षदो भवेत् ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "यदन्तीत्याद्यृचः सर्वा अपि दुःस्वप्नदर्शने ।" |
| "जप्या एव, विशेषोऽयं होमो दुःस्वप्नदर्शने ।" |
| "परोक्षज्ञानिनो विष्णुरापरोक्ष्यं व्रजेत् त्वरन् ।" |
| "अपरोक्षदृशः प्रीतः सुखाधिक्यं करोत्यतः ।" |
| "मुक्तस्य, द्विविधैस्तस्माज्जपो योगश्च सर्वथा ।" |
| "कर्तव्यो, न्यासिभी रात्रिसूक्तं जप्यं त्रिशोऽञ्जसा ॥ इत्यैतरेयसंहितायाम् ॥ ४ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथ खल्वियं सर्वस्यै वाच उपनिषत् । सर्वा ह्येवेमाः सर्वस्यै वाच उपनिषदः । इमां त्वेवाऽचक्षते । पृथिव्या रूपं स्पर्शाः, अन्तरिक्षस्योष्माणः, दिवः स्वराः । अग्ने रूपं स्पर्शाः, वायोरुष्माणः, आदित्यस्य स्वराः । ऋग्वेदस्य रूपं स्पर्शाः, यजुर्वेदस्योष्माणः, सामवेदस्य स्वराः । चक्षुषो रूपं स्पर्शाः, श्रोत्रस्योष्माणः, मनसः स्वराः । प्राणस्य रूपं स्पर्शाः, अपानस्योष्माणः, व्यानस्य स्वराः ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "अथ सर्ववाग्विषया विद्योच्यते । विष्णुनामा(शब्दा)र्थत्वात् सर्ववाचाम् । पूर्वोक्ता अपि सर्ववाग् उपनिषद एव । तथापि मुख्यत(मुखत) एव सर्ववाग्विषयत्वाद् वक्ष्यमाणामेव सर्वस्यै वाच उपनिषदिति सर्वेऽप्याचक्षते ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "‘पृथिव्यादिस्थितो विष्णुः पृथिव्याद्यभिधानवान् ।" |
| "स्पर्शादीनां देवताऽसौ क्रमेणैव प्रकीर्तितः ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथ खल्वियं दैवी वीणा भवति । तदनुकृतिरसौ मानुषी वीणा भवति । यथाऽस्याः शिरः, एवममुष्याः शिरः । यथाऽस्याः उदरम्, एवममुष्या अम्भणम् । यथाऽस्यै जिह्वा, एवममुष्यै वादनम् । यथाऽस्यास्तन्त्रयः, एवममुष्या अङ्गुलयः । यथाऽस्याः स्वराः, एवममुष्याः स्वराः । यथाऽस्याः स्पर्शाः, एवममुष्याः स्पर्शाः ।" |
| "यथा ह्येवेयं शब्दवती तर्द्मवति, एवमसौ शब्दवती तर्द्मवती । यथा ह्येवेयं लोमशेन चर्मणा पिहिता भवति, एवमसौ लोमशेन चर्मणा पिहिता । लोमशेन ह स्म वै चर्मणा पुरा वीणा अपिदधति । स यो हैतां दैवीं वीणां वेद, श्रुतवदनो भवति, भूमिप्राऽस्य कीर्तिर्भवति, यत्र क्व चाऽर्या वाचो भाषन्ते विदुरेनं तत्र ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "तस्य विष्णोरयं देहो वीणा साक्षात् प्रकीर्तिता ।" |
| "दैवी वीणा ततः सेयं लोकसिद्धा तु मानुषी ।" |
| "ब्रह्मादिदेहान् यो वेद विष्णोर्वीणेति भक्तितः ।" |
| "विद्यापूर्णसुखः स स्याद् भूमिपूरितकीर्तिमान् ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथातो वाग्रसः । यस्यां संसद्यधीयानो वा भाषमाणो वा न विरुरुचुषेत । तत्रैतामृचं जपेत् -" |
| "‘ओष्ठा पिधाना न कुली दन्तैः परि वृता पविः ।" |
| "सर्वस्यै वाच ईशाना चारु मामिह वादयेत्’(सा.मं.ब्रा.१.७.१५) ।" |
| "इति वाग्रसः ॥५ ॥" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "विद्याधिक्यार्थमेवैतां वाक्साराम् अप्यृचं जपेत् ।" |
| "ध्यात्वा नारायणं देवं स्त्रीरूपं वाचि संस्थितम् ।" |
| "ओष्ठा पिधानेत्येषा ह्यृक् सारो वाचः प्रकीर्तितः ।" |
| "विष्णोर्हि वाचि संस्थस्यैवोष्ठावेतौ पिधानवत् ।" |
| "कुलीति चोक्तो भगवान् प्रलीनाशेषकुत्सितः ।" |
| "पाति सर्वं विशिष्टश्च सर्वस्मादित्यतः पविः ।" |
| "सर्ववागीश्वरो विष्णुः स्त्रीरूपो मां सुवादयेत्’ ॥ इति च ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "(नेत्युपमार्थे)न इत्युपमानार्थम् । ओष्ठावपिधानवत् अस्येति । न च विष्णोरन्या सर्वस्या वाच ईशाना । स हि मुख्यतः सर्वेश्वरः । तस्यैव प्रस्तुतत्वाद्, वक्ष्यमाणत्वाच्च ।" |
|
|---|
|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "‘श्रियःपतिर्यज्ञपतिर्जगत्पतिर्गिराम्पतिर्लोकपतिर्धरापतिः’(भाग.२.४.२०) इति भागवते । ‘यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ् न वेद’(बृह.३.७.२७) इत्यादिश्रुतिश्च । स्त्रीलिङ्गत्वं देवतेत्यादिवदपि युज्यते । स्त्रीरूपत्वाच्च ॥ ५ ॥" |
|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "अथ हास्मा एतत् कृष्णहारीतो वाग्ब्राह्मणमिवोपोदाहरति । प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा व्यस्रंसत संवत्सरः । स च्छन्दोभिरात्मानं समदधात् । यच्छन्दोभिरात्मानं समदधात् तस्मात् संहिता ।" |
|
|---|
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "संवत्सर इति विशेषणाद् विरिञ्च एवात्र प्रजापतिः । ‘ब्रह्मा विश्वः कतमः स्वयम्भूः प्रजापतिः संवत्सरः’(महाना.उ.१७.१२) इत्यादि श्रुतेः ।" |
| "‘श्रान्तो ब्रह्मा सर्ववेदैः स्तुत्वा नारायणं प्रभुम् ।" |
| "तेनैव सम्यक् सन्धाय दार्ढ्यं देहस्य सोऽकरोत् ।" |
| "सन्धानात् संहितेत्युक्तो विष्णुरेव सनातनः।" |
|
|---|
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| id | "Aitareya-504" |
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| type | "verse" |
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "तस्यै वा एतस्यै संहितायै णकारो बलम् , षकारः प्राण आत्मा । स यो हैतो णकार-षकारावनुसंहितम् ऋचो वेद, सबलां सप्राणां संहितां वेद । आयुष्यमित विद्यात् ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-505" |
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| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "विष्णुनाम्नि णशब्देन विष्णोर्बलमुदीर्यते ।" |
| "ण इत्याक्रियमाणत्वाण्णकारोऽस्य बलं मतम् ।" |
| "विष्णुनाम्नि षकारेण रमाब्रह्मेशपूर्विणः ।" |
| "प्रणेतृताऽखिलस्यैव विष्णोरुक्ता तथाऽऽत्मता ।" |
| "आततत्वं सर्वगुणैर्देशतः कालतस्तथा ।" |
| "आत्मशब्दोदितं तच्च षशब्देनाभिधीयते ।" |
| "ष इत्याक्रियमाणत्वं प्रणेतृत्वं च पूर्णता ।" |
| "विष्णोः षकार इत्युक्ता वीत्युक्तस्य विशिष्टता ।" |
| "अन्त्यस्थित उकारस्तु ताच्छील्यादि हरेर्वदेत् ।" |
| "एवं विशिष्टप्राणत्वम् आततत्वं च सर्वतः ।" |
| "विशिष्टं च बलं विष्णोः सर्वस्माच्छीलमित्यपि ।" |
| "उदितं विष्णुशब्देन, तस्माद् ऋक्संहितामनु ।" |
| "वर्णद्वयसमायोगे ष्णुशब्दस्यार्थमेव तु ।" |
| "विष्णोः प्राणत्वमात्मत्वं बलं चैवात्र वेत्ति यः ।" |
| "स एव विष्णोर्बलवित् तथा प्राणत्वविद् भवेत् ।" |
| "स एव मुक्तः संसारान्नित्यायुष्मान् भविष्यति ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-506" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V16" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "स यदि विचिकित्सेत्, सणकारं ब्रवाणीं३ँ, अणकारा३ँ इति, सणकारमेव ब्रूयात् । सषकारं ब्रवाणी३ँ, अषकारा३ँ इति, सषकारमेव ब्रूयात् ।" |
| "ते यद् वयम् अनुसंहितम् ऋचोऽधीमहे, यच्च माण्डूकेयीयम् अध्यायं प्रब्रूमः, तेन नो णकार-षकारावुपाप्ताविति ह स्माऽह ह्रस्वो माण्डूकेयः ।" |
| "अथ यद् वयम् अनुसंहितम् ऋचोऽधीमहे, यच्च माण्डूकेयीयम् अध्यायं प्रब्रूमः, तेन नो णकार-षकारावुपाप्तावन्ति ह स्माऽह स्थविरः शाकल्यः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-507" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V16_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "संहितासहितत्वेन यदृचोऽधीमहे वयम् ।" |
| "वेदान् अन्यान् पुराणं वा तेन विष्णुपदोदितः ।" |
| "अवाप्तो भगवान् स्यान्नस्तन्नामार्था यतोऽखिलाः ।" |
| "इत्याहुर्ऋषयः सर्वे ... ...।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-508" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V17" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "एतद्ध स्म वै तद् विद्वांस आहुर्ऋषयः कावषेयाः किमर्था वयमध्येष्यामहे । किमर्था वयं यक्ष्यामहे । वाचि हि प्राणं जुहुमः प्राणे वा वाचम् । यो ह्येव प्रभवः स एवाप्ययः ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-509" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V17_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | ".... किमन्याध्ययनाद् भवेत् ।" |
| "यज्ञैर्वेत्यृषयोऽप्यन्ये कावषेया वदन्ति हि ।" |
| "मौनेन विष्णुशब्दार्थं ध्यायन्तो वाचमेव वा ।" |
| "जुहुमो विष्णुनामाख्यां जपन्तो मन्त्रमेव वा ।" |
| "नमस्कारसमायुक्तं जुहुमः प्राणमत्र हि ।" |
| "किमन्यैर्बहुभिः कार्यैरेतस्यैवाधिकत्वतः ।" |
| "एतदर्थानुसन्धानपूर्वं वेदान् अथापि वा ।" |
| "अधीमहे यजामो वा नान्यथा तु कथञ्चन ।" |
| "एष एव हि सर्वेषां वेदानामर्थ ईरितः ।" |
| "विष्णुनामोदितो योऽर्थस्तद्व्याख्याऽन्यद् वचोऽखिलम् ॥" |
| "एवं विशिष्टप्राणात्मबलाद्यखिलसद्गुणैः ।" |
| "पूर्णस्वभावः सर्वेषां वचसामर्थ ईरितः ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-510" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V18" |
|---|
| type | "verse" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | "mantra" |
|---|
| lines | | "ता एताः संहिता नानन्तेवासिने प्रब्रूयात् , नासंवत्सवासिने, नाप्रवक्त्रे इत्याचार्या आचार्याः ॥ ६ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-511" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V18_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘संहिताख्यानि विष्णोस्तु रूपाण्येतानि सर्वशः ।" |
| "अन्यविद्यास्वशिष्यस्य न ब्रूयात् प्रथमं क्वचित्।" |
| "व्याख्यानशक्तिहीनाय नैव ब्रूयात् कथञ्चन ।" |
| "वैष्णवाय सुवृत्ताय (सुव्रताय सुशिक्षिणे ।" |
| "शान्ताय सुविशुद्धाय) मेधाश्रद्धायुताय च ।" |
| "गुरोः शुश्रूषकायैव ब्रूयादित्यनुशासनम् ॥’ इत्यादि च ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-512" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V18_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "य एतेन ‘ण’ इति शब्देनाक्रियमाणं विष्णोः पूर्णबलम्, ‘ष’शब्देनाक्रियमाणं देशतः कालतो गुणतश्चाऽततत्वं च सर्वां संहिताम् अनु तदर्थत्वेन वेद, अक्षरद्वयसंयोगरूपया संहितयैतदेव सर्वत्रोच्यत इति, स सम्पूर्णबलं सर्वप्रणेतृत्वशक्त्यादियुक्तं विष्णुं वेद । अथ इत्यादिका अपि संहितारूपा एव । पदवर्णयोः पृथगनभिव्याहारात् । तस्मात् सर्वशब्दा विष्णुनाम-व्याख्यानरूपा एव ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-513" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V18_B02" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "यद् वयं संहितायुक्तत्वेनर्चोऽधीमहे तेनास्माकं ‘ण’शब्द-‘ष’शब्दार्थरूपो विष्णुरुपात्तः । तद्व्याख्यानत्वात् सर्ववाचाम् । ‘वि’इत्युपसर्गत्वाद् उकारस्य च ताच्छील्यार्थत्वाद् उक्तार्थविशेषणरूपत्वेन प्रसिद्धत्वान्न पृथक् तयोर्व्याख्यानमत्र कृतम् । ऋच इति सर्ववाचामुपलक्षणम् । अतः सर्ववेदादिशब्दोदितः सर्वगुणपरिपूर्णो भगवान्नारायण इति सिद्धम् ॥ ६॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-514" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V18_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "सर्वैश्च वैदिकपदैरपि लोकशब्दैः मेघाग्निवारिधितळादि(रवैश्च)भवैश्च सर्वैः ।" |
| "एकोऽभिधेयपरिपूर्णगुणः प्रियोऽलं नारायणो मम सदैव सुतुष्टिमेतु ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-515" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V18_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
| parent | "AIT_C03_S02" |
|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं" |
| "बट् तद्दर्शनमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।" |
| "वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः" |
| "मध्वो यत्तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हि तेन प्रभौ ॥" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-516" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V18_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "हन(नु)शब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः ।" |
| "रामस्य स्वृतरूपस्य वाचस्तेनानयन्त हि ।" |
| "भृतमो भीम इत्युक्तो वाचो मा मातरः स्मृतः ।" |
| "ऋगाद्या इतिहासश्च पुराणं पञ्चरात्रकम् ।" |
| "प्रोक्ताः सप्तशिवास्तत्र शयो भीमस्ततः स्मृतः ।" |
| "मध्वित्यानन्द उद्दिष्टो वेति तीर्थमुदाहृतम् ।" |
| "मध्व आनन्दतीर्थः स्यात् तृतीया मारुतीतनुः ।" |
| "इति सूक्तगतं रूपत्रयमेतन्महात्मनः ।" |
| "यो वेद वेदवित् स स्यात् तत्त्ववित् तत्प्रसादतः ॥ इति च ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-517" |
|---|
| oldKey | "AIT_C03_S02_V18_B01" |
|---|
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|---|
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|---|
| chapter | "AIT_C03" |
|---|
| verseType | null |
|---|
| lines | | "‘साधको रामवाक्यानां तत्समीपगतः सदा ।" |
| "हनुमान् प्रथमो ज्ञेयो भीमस्तु बहुभुक् पितोः ।" |
| "पृतनाक्षयकारी च द्वितीयस्तु तृतीयकः ।" |
| "पूर्णप्रज्ञस्तथाऽऽनन्दतीर्थनामा प्रकीर्तितः ।" |
| "दशेति सर्वमुद्दिष्टं सर्वं पूर्णमिहोच्यते ।" |
| "प्रज्ञा प्रमतिरुद्दिष्टा पूर्णप्रज्ञस्ततः स्मृतः ।" |
| "आ समन्तात् पतित्वे तु गूढं कलियुगे हरिम् ।" |
| "असत्यमप्रतिष्ठं तु जगदेतदनीश्वरम् ।" |
| "वदद्भिर्गूहितं सन्तं तृतीयोऽसुर्मथायति ।" |
| "येन विष्णोर्हि वर्पाख्यान् गुणान् अज्ञासिषुः परान् ।" |
| "ईशानासः सूरयश्च निगूढान् निर्गुणोक्तिभिः(निगूढाभिर्गुणोक्तिभिः) ।" |
| "त्रेतायां द्वापरे चैव कलौ चैते क्रमात् त्रयः ।" |
| "एतेषां(येषां हि) परमो विष्णुर्नेता सर्वेश्वरेश्वरः ।" |
| "स्वयम्भुब्रह्मसंज्ञोऽसौ परस्मै ब्रह्मणे नमः ॥’ इति च ।" |
|
|---|
|
| id | "Aitareya-518" |
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| oldKey | "AIT_C03_S02_V18_B01" |
|---|
| type | "bhashya" |
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| parent | "AIT_C03_S02" |
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| chapter | "AIT_C03" |
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| lines | | "पूर्णानन्दगुणोदारधाम्ने नित्याय वेधसे ।" |
| "अमन्दानन्दसान्द्राय प्रेयसे विष्णवे नमः ॥" |
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|---|
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