Page values for "Kathalakshana/Vyakhya/Kathalakshanapanchika"
"Commentaries" values
25 rows are stored for this page| Field | Field type | Value |
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| commentary_id | String | KL_C01_V01_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | नृसिंहमखिलाज्ञानतिमिराशिशिरद्युतिम् । सम्प्रणम्य प्रवक्ष्यामि कथालक्षणमञ्जसा ॥ १ ॥ श्रियः कमितुरानम्य चरणाम्बुरुहद्वयम् ।यथाबोधं विधास्यामः कथालक्षणपञ्चिकाम् ॥
अथ कथां लिलक्षयिषुराचार्यवर्यः प्रारिप्सितप्रकरणपरिसमाप्त्यादि प्रयोजनेष्टदेवताप्रणतिनुतिपुरस्सरं विवक्षितमर्थं दर्शयति ॥ |
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| commentary_id | String | KL_C01_V02_Kathalakshanapanchika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | वादो जल्पो वितण्डेति त्रिविधा विदुषां कथा । तत्वनिर्णयमुद्दिश्य केवलं गुरुशिष्ययोः ॥ २ ॥ कथाऽन्येषामपि सतां वादः..... । अथ कथां विभागेनोद्दिशति |
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| commentary_id | String | KL_C01_V03_Kathalakshanapanchika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | वा समितेश्शुभा । ख्यात्याद्यर्थं स्पर्धया वा सतां जल्प इतीर्यते ॥ ननु यदा विदिततत्वौ अदुष्टमनसौ परप्रार्थितौ कथां कुरुतः स वादो न वा ? आद्ये अव्यापकमाद्यं लक्षणं, द्वयोरपि तत्वज्ञानितया तदुद्देशिताभावात् । द्वितीयमतिव्यापकम् । सेयमुभयतः पाशा रज्जुः इत्यत आह– |
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| commentary_id | String | KL_C01_V04_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | वितण्डा तु सतामन्यैः ... । ....तत्वमेषु निगूहितम् । स्वयं वा प्राश्निकैर्वादे चिन्तयेत् ... ॥ .... तत्वनिर्णयम् ॥ वितण्डालक्षणं दर्शयति |
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| verse_id | String | KL_C01_V05 |
| commentary_id | String | KL_C01_V05_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | रागद्वेषविहीनास्तु सर्वविद्याविशारदाः । प्राश्निका इति विज्ञेयाः ..... ........ विषमा एक एव वा ॥ प्राश्निकानां लक्षणं वक्ति |
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| commentary_id | String | KL_C01_V06_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | अशेषसंशयच्छेत्ता निस्संशय उदारधीः । एकश्चेत्प्राश्निको ज्ञेयस्सर्वदोषविवर्जितः ॥ ६ ॥ नन्वेवं चेत् एक एव इत्यनुज्ञानं कथम् ? संवादाभावेन तत्कृतकथानिर्णये अनाश्वासादित्यत आह |
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| commentary_id | String | KL_C01_V07_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | एको वा बहवो वा स्युर्विष्णुभक्तिपरास्सदा । विष्णुभक्तिर्हि सर्वेषां सद्गुणानां स्वलक्षणम् ॥ विशेषणान्तरमाह |
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| commentary_id | String | KL_C01_V08_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | पृष्टेनाऽगम एवादौ वक्तव्यः ........ साध्यसिद्धये ॥ नैषा तर्केणापनेया मतिरित्याह हि श्रुतिः ॥ अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः प्रतिवादिना ॥ वादे, प्रतिवादिना वादिनं प्रति विचार्ये प्रमेये प्रमाणं प्रष्टव्यम् । पृष्टेन च वादिना तावदागम एव वक्तव्यः न तु छलादिना प्रश्नखण्डनं कर्तव्यम् । नाप्यनुमानं दुरागमो वा वक्तव्यः । |
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| verse_id | String | KL_C01_V09 |
| commentary_id | String | KL_C01_V09_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | ऋग्यजुस्सामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम् ॥ मूलरामायणं चैव सम्प्रोच्यन्ते सदागमाः ।
अनुकूला य एतेषां ते च प्रोक्तास्सदागमाः ॥
तत्र श्रुतीनामपौरुषेयत्वेन अप्रामाण्यकारणशून्यानामप्रामाण्यं वक्तुं तावन्न शक्यम् । स्मृत्यादीनामप्याप्तप्रणीततया श्रुत्यानुकूल्येन च दोषाभावनिश्चयान्नाप्रामाण्यं वक्तुं शक्यते । अतो विषयान्तरोपदर्शनेन वाद्यभिमतार्थप्रच्यावनमेव न्याय्यमित्याशयवानाह |
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| commentary_id | String | KL_C01_V10_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | अन्ये दुरागमा नाम तैर्न साध्यं हि साध्यते । ननु यदा वादी परिगणितं वेदादिकं वदेत् तदा प्रतिवादिनाऽन्योऽर्थोऽभिधीयताम् । यदा तु उपरिगणितं पाशुपतादिकम भिदधीत, तदा तु अप्रामाण्यं वक्तुं शक्यत एव । अतः कथं अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः इति नियमः ? इत्यत आह |
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| verse_id | String | KL_C01_V11 |
| commentary_id | String | KL_C01_V11_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | स्वपक्ष आगमश्चैव वक्तव्यः प्रतिवादिना ॥ तस्याप्यन्यार्थता साध्या वादिना ..... । ...... स्वार्थसिद्धये । वादिप्रयुक्तागमस्यार्थान्तरकथनेन किं प्रतिवादी चरितार्थः ? नेत्याह |
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| commentary_id | String | KL_C01_V12_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | अन्यार्थता निराकार्या स्वागमस्य ...... । ......... विनिश्चयात् ॥ उपपत्त्यवकाशोऽत्र ह्यागमार्थविनिर्णये । किमेतावता जितं वादिना ? नेत्याह |
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| verse_id | String | KL_C01_V13 |
| commentary_id | String | KL_C01_V13_Kathalakshanapanchika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | वाद्यागमार्थे निर्णीत आगमार्थः परस्य तु ॥ निर्णेयः सहितैः पश्चात् ........................ । ..... ततो निश्शेषनिर्णयः । एवं वादिना स्वागमस्योपपत्तिवशेन स्वाभिमतार्थेप्रामाण्यं साधितवता स्वपक्षे साधिते, परोपन्यस्तागमस्य च अर्थान्तरमुक्तवता परपक्षे दूषिते निवृत्तो वाद इति न मन्तव्यं; किं नाम ? इत्यत आह |
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| verse_id | String | KL_C01_V14 |
| commentary_id | String | KL_C01_V14_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | प्रत्यक्षसिद्धेष्वर्थेषु प्रश्ने मामक्षजं वदेत् ॥ ज्ञानं वा ज्ञानसिद्धेषु .................... । .......... नानुमां प्रथमं वदेत् । ननु यदि परश्चक्षुराद्येकप्रमाणके साक्ष्येकविषये वा अर्थे प्रमाणं पृच्छेत् तदा परेण किं तूष्णीमासितव्यम् ? प्रत्यक्षादिकं वा वक्तव्यम् ? आद्ये साध्यासिद्धिः । द्वितीये तु आगम एव वक्तव्यः इति नियमभङ्गः । न च प्रत्यक्षसिद्धेऽर्थे विप्रतिपत्तिरेव न सम्भवति तत्प्रामाण्यासम्प्रतिपत्त्यभिप्रायेण तदुपपत्तेरिति । तत्राह |
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| verse_id | String | KL_C01_V15 |
| commentary_id | String | KL_C01_V15_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | परतुष्टिकरं वाक्यं वदेतां यदि वादिनौ ॥ स एवात्रागमो ज्ञेयः .................... । ....... परतुष्टिर्हि तत्फलम् । ननु तत् उक्तेषु अपरिगणितत्वात् न आगम इत्युक्तं इत्यत आह |
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| verse_id | String | KL_C01_V16 |
| commentary_id | String | KL_C01_V16_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | एवं निर्णयपर्यन्तं वादे सुबहवोऽपि हि ॥ घटेयुः ....... ......चिरकालं च ... । जल्पे यावत् परो जितः ॥ नन्वेवंविधस्य वादस्य किं अवसानम् ? तत्राह |
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| commentary_id | String | KL_C01_V17_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | तत्वनिर्णयवैलोम्यं वादे साक्षात् पराजयः । संवादे श्लाघ्यतैव स्यात् गुरुत्वमितरस्य च ॥ एवं असङ्करेण कथामार्गत्रयं प्रतिपादितवता कथैक्यादिमतानि अपहस्तितानि विज्ञातव्यानि । अधिकार्यङ्गप्रवृत्तिप्रकारफलभेदे सति किन्निबन्धनं कथैक्यं स्यात् । |
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| commentary_id | String | KL_C01_18_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | तत्वनिर्णयवैलोम्ये निन्द्यो दण्ड्योऽथ वा भवेत् । विरोधाऽसङ्गतिन्यूनतूष्णीम्भावादिकैर्जितः ॥ भवेज्जल्पे ... तत्वनिर्णयवैलोम्यंप्राप्तोऽपि यदि मतिमान्द्यादिना तत्र न संवादं करोति तस्य कर्तव्यम् आह |
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| commentary_id | String | KL_C01_V19_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | ...... वितण्डायां न्यायो जल्पवदीरितः । प्रसङ्गात् वितण्डायां निग्रहादिकमतिदिशति |
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| verse_id | String | KL_C01_V20 |
| commentary_id | String | KL_C01_V20_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | संवादे दण्ड्यता न स्यात् वितण्डाजल्पयोरपि ॥ पराजितत्वमात्रं स्यात् ............ अनुवादादिराहित्यं नैव जल्पेऽपि दूषणम् ॥ विरोधादिप्राप्तवतो जल्पवितण्डयोः कि कार्यं ? इत्यपेक्षायामाह |
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| commentary_id | String | KL_C01_V21_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | विद्याहीनत्वलिङ्गेऽपि वादिनोः स्यात् पराजयः । वादिप्रतिवादिनोः जल्पारम्भोत्तरकालीनं निग्रहस्थानं उक्तम् । कथातः प्रागपि सम्भवात् आह |
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| commentary_id | String | KL_C01_V22_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | तदभावात् नैव षट्कात् अन्यो निग्रह इष्यते ॥ अन्तर्भावातदिहान्येषां निग्रहाणाम् ............ । ...... इति स्म ह । विद्यापरीक्षापूर्वैव वृत्तिर्जल्पवितण्डयोः ॥ ननु विरोधादिव्यतिरिक्तानि हेत्वाभासादीनि निग्रहस्थानानि सन्ति । विजयमात्रप्रयोजनयोश्च जल्पवितण्डयोः पराजयनिमित्तानि सम्भावितानि च । अतः कथं विरोधादिषट्केनैव जल्पादौ पराजयः ? इत्यत आह |
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| commentary_id | String | KL_C01_V23_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | स्खलितत्वादिमात्रेण न तत्रापि पराजयः । वादजल्पवितण्डानां इति शुद्धं स्वलक्षणम् ॥ विरोधादीनि निग्रहस्थानानि इत्युक्तं । तत्र विशेषं आह– |
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| verse_id | String | KL_C01_V24 |
| commentary_id | String | KL_C01_V24_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | आनन्दतीर्थमुनिना ब्रह्मतर्कानुसारतः । कथालक्षणमित्युक्तं प्रीत्यर्थं शार्ङ्गधन्वनः ॥ न केवलं एतत् कथालक्षणं उपपत्त्या साधु प्रतिपत्तव्यम् । किं नाम ? परमाप्तोक्तत्वात् आगमान्तरसिद्धत्वाच्च इति दर्शयन् उक्तस्य विनियोगं आह– |
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| verse_id | String | KL_C01_V025 |
| commentary_id | String | KL_C01_V025_Kathalakshanapanchika |
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| text | Wikitext | सदोदितामितज्ञानपूरवारितहृत्तमाः । नरसिंहः प्रियतमः प्रीयतां पुरुषोत्तमः ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितेषु दशप्रकरणेषु कथालक्षणं सम्पूर्णम् ॥ श्रीमदानन्दतीर्थार्यहृदयामलमन्दिरा ।इन्दिरार्चितपादाब्जा देवता पातु नः सदा ॥
भक्त्यतिशयवशात् भगवान् आचार्यः प्रकरणनिर्माणफलत्वेन परमेश्वरप्रशंसापुरस्सरं तत्प्रसादं आशास्ते |