Page values for "Tattvasankhyana/Vyakhya/TattvasankhyanamTika"
"Commentaries" values
11 rows are stored for this page| Field | Field type | Value |
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| verse_id | String | TSK_C01_V01 |
| commentary_id | String | TSK_C01_V01_TattvasankhyanamTika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | स्वतन्त्रमस्वतन्त्रं च द्विविधं तत्वमिष्यते ।
स्वतन्त्रो भगवान् विष्णुः...
......भावाभावौ द्विधेतरत् ॥ १ ॥
लक्ष्मीपतेः पदाम्भोजयुगं नत्वा गुरोरपि । करिष्ये तत्त्वसङ्ख्यानव्याख्यानं नातिविस्तरम् ॥ १ ॥ |
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| verse_id | String | TSK_C01_V02 |
| commentary_id | String | TSK_C01_V02_TattvasankhyanamTika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | प्राक्प्रध्वंससदात्वेन त्रिविधोऽभाव इष्यते ।
चेतनाचेतनत्वेन भावोऽपि द्विविधो मतः ॥ २ ॥
प्राक्त्वेन, प्रध्वंसत्वेन, सदात्वेन च उपलक्षितोऽभावः त्रिविधइष्यते । ‘प्रामाणिकै’रिति शेषः। |
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|---|---|---|
| verse_id | String | TSK_C01_V03 |
| commentary_id | String | TSK_C01_V03_TattvasankhyanamTika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | दुःखस्पृष्टं तदस्पृष्टमिति द्वेधैव चेतनम् ।
नित्यादुःखा रमाऽन्ये तु स्पृष्टदुःखास्समस्तशः ॥ ३ ॥
कदाचिद्दुःखसंबद्धम् एव दुःखस्पृष्टम् । कदाऽपि दुःखासंबद्धं तदस्पृष्टम् ॥ |
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| verse_id | String | TSK_C01_V04 |
| commentary_id | String | TSK_C01_V04_TattvasankhyanamTika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | स्पृष्टदुःखा विमुक्ताश्च दुःखसंस्था इति द्विधा ।
दुःखसंस्था मुक्तियोग्या अयोग्या इति च द्विधा ॥ ४ ॥
विमुक्ताःदुःखात्। दुःखसंस्थाःवर्तमानदुःखाः । चशब्दः दुःखसंस्थाःइत्यतःपरं योज्यः । अत्र प्राधान्यक्रमेण उद्देशः । |
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| verse_id | String | TSK_C01_V05 |
| commentary_id | String | TSK_C01_V05_TattvasankhyanamTika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | देवर्षिपितृपनरा इति मुक्तास्तु पञ्चधा ॥
एवं विमुक्तयोग्याश्च ..
....................तमोगाः सृतिसंस्थिताः ॥ ५ ॥ इति द्विधा मुक्त्ययोग्याः
पान्तीति पाःचक्रवर्तिनः । नराःमनुष्योत्तमाः । तुशब्दोऽवधारणे । तेन ये मोक्षे तारतम्यं न मन्यन्ते तन्मतं निराचष्टे । गन्धर्वादीनां, केषाञ्चित् एषु एव अन्तर्भावात्, केषाञ्चित् अविवक्षितत्वात् न ग्रन्थान्तरविरोधः । |
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|---|---|---|
| verse_id | String | TSK_C01_V06 |
| commentary_id | String | TSK_C01_V06_TattvasankhyanamTika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | .... दैत्यरक्षः पिशाचकाः ।मर्त्याधमाश्चतुर्धैव तमोयोग्याः प्रकार्तिताः ॥ ६ ॥
मर्त्याधमाः इत्यतःपरम् इतिशब्दोऽध्याहार्यः । |
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| verse_id | String | TSK_C01_V07 |
| commentary_id | String | TSK_C01_V07_TattvasankhyanamTika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | ते च प्राप्तान्धतमसः सृतिसंस्था इति द्विधा ॥
नित्यानित्यविभागेन त्रिधैवाचेतनं मतम् ॥ ७ ॥
ते च चतुर्विधा अपि। सृतिसंस्थिताःसंसारे वर्तमानाः, न अधुनाऽपि तमःप्राप्ताः । योग्यतायाः चैतन्यस्वभावत्वेन, तमोयोग्यानाम् अयं विभागः न अनुपपन्नः । |
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| verse_id | String | TSK_C01_V08 |
| commentary_id | String | TSK_C01_V08_TattvasankhyanamTika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | नित्या वेदाः.. ।
... पुराणाद्याः कालः प्रकृतिरेव च ।नित्यानित्यं त्रिधा प्रोक्तं.. ।
........................अनित्यं द्विविधं मतम् ॥ ८ ॥असंसृष्टं च संसृष्टम्.......................... ।
अत्र नित्यत्वं नाम कूटस्थतया आद्यन्तशून्यत्वम् । तच्च वेदानां ‘‘नित्या वेदाः समस्ताश्च’’ इत्यादि प्रमाणसिद्धम् । अत्र वेदाइत्युपलक्षणम् । पञ्चाशद्वर्णानां अव्याकृताकाशस्य च तथाभावात् । |
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| verse_id | String | TSK_C01_V09 |
| commentary_id | String | TSK_C01_V09_TattvasankhyanamTika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | असंसृष्टं महानहम् ।बुद्धिर्मनः खानि दशमात्रा भूतानि पञ्च च ॥ ९ ॥ |
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| verse_id | String | TSK_C01_V10 |
| commentary_id | String | TSK_C01_V10_TattvasankhyanamTika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | संसृष्टमण्डं तद्गं च समस्तं सम्प्रकीर्तितम् ।
सृष्टिः स्थितिः संहृतिश्च नियमोऽज्ञानबोधने॥ १० ॥
ननु एषां चतुर्विंशतितत्वानामसंसृष्टत्त्वं नाम यदि एकदेशेन उत्पत्तिः तर्हि अनुत्पन्नस्य असत्वात् उत्पन्नमेव तत्त्वम् । तच्च संसृष्टमेव, इति न द्वैविध्यम् । न च प्रकारान्तरम् अस्ति इति । मैवम् । सूक्ष्मरूपेण नित्यानां महदादीनां प्राकृताद्यंशैः उपचयमात्रं क्रियते इति तानि असंसृष्टानि । |
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| verse_id | String | TSK_C01_V11 |
| commentary_id | String | TSK_C01_V11_TattvasankhyanamTika |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | बन्धो मोक्षः सुखं दुःखमावृतिर्ज्योतिरेव च ।विष्णुनाऽस्य समस्तस्य................... ।
.......................समासव्यासयोगतः ॥ ११ ॥
बन्धः प्रकृतेः। मोक्षः बन्धात् । आवृतिज्योतिषीबाह्यतमःप्रकाशौ । एवकारः विष्णुनाइत्यनेन सम्बध्यते । अस्य समस्तस्यअस्वतन्त्रस्य भवन्ति इति शेषः । |