Page values for "Bhagavadgitabhashya"
"Commentaries" values
433 rows are stored for this page| Field | Field type | Value |
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| text | Wikitext | प्रज्ञावादान् स्वमनीषोत्थवचनानि । कथमशोच्याः? गतासून् ॥११ ॥ |
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| text | Wikitext | किमिति? न त्वेवाहम् ॥ ईश्वरनित्यत्वस्याप्रस्तुतत्वाद् दृष्टान्तत्वेनाह – न त्वेति ॥ यथाऽहं नित्यः सर्ववेदान्तेषु प्रसिद्धः; एवं त्वमेते जनाधिपाश्च नित्याः ॥ १२ ॥ |
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| text | Wikitext | देहिनो भाव एतद्भवति; तदेवासिद्धमिति चेद्, न- देहिनोऽस्मिन् ॥ यथा कौमारादिशरीरभेदेऽपि देही तदीक्षिता सिद्धः; एवं देहान्तरप्राप्तावपि, ईक्षितृत्वात् । |
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| text | Wikitext | न हि जडस्य शरीरस्य कौमाराद्यनुभवः सम्भवति, मृतस्यादर्शनात् । मृतस्य वाय्वाद्यपगमाद् अनुभवाभावः, ‘अहं मनुष्यः’ इत्याद्यनुभवाच्चैतत् सिद्धमिति चेद्, न । सत्येवाविशेषे देहे सुप्त्यादौ ज्ञानादिविशेषादर्शनात् । |
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| text | Wikitext | समश्चाभिमानो मनसि । काष्ठादिवच्च । |
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| text | Wikitext | श्रुतेश्च । प्रामाण्यं च प्रत्यक्षादिवत् । न च बौद्धादिवत् । अपौरुषेयत्वात्। न ह्यपौरुषेये पौरुषेयाज्ञानादयः कल्पयितुं शक्याः । विना च कस्यचिद् वाक्यस्यापौरुषेयत्वं सर्वसमयाभिमतधर्माद्यसिद्धिः । यश्च तौ नाङ्गीकुरुते नासौ समयी, अप्रयोजकत्वात् । |
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| text | Wikitext | माऽस्तु धर्मोऽनिरूप्यत्वाद् इति चेद्, न । सर्वाभिमतस्य प्रमाणं विना निषेद्धुमशक्यत्वात् । न च सिद्धिरप्रामाणिकस्येति चेत् - न । सर्वाभिमतेरेव प्रमाणत्वात् । |
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| text | Wikitext | अन्यथा सर्ववाचिकव्यवहारासिद्धेश्च । न च ‘मया श्रुतम्’ इति तव ज्ञातुं शक्यम् । अन्यथा वा प्रत्युत्तरं स्यात् । भ्रान्तिर्वा तव स्यात् । |
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| text | Wikitext | सर्वदुःखकारणत्वं वा स्यात् । एको वाऽन्यथा स्यात् । |
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| text | Wikitext | रचितत्वे च धर्मप्रमाणस्य कर्तुरज्ञानादिदोषशङ्का स्यात् । न चादोषत्वं स्ववाक्येनैव सिध्यति । |
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| text | Wikitext | न च येन केनचिद् अपौरुषेयम् इत्युक्तमआ उक्तवाक्यसमम् । अनादिकालपरिग्रहसिद्धत्वात् । अतः प्रामाण्यं श्रुतेः । अतः कुतर्कैः धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ |
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| text | Wikitext | अथवा- जीवनाशं देहनाशं वाऽपेक्ष्य शोकः? न तावज्जीवनाशम् , नित्यत्वाद् इत्याह – न त्वेवेति ॥ |
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| text | Wikitext | नापि देहनाशमित्याह – देहिन इति ॥ यथा कौमारादिदेहहानेन जरादिप्राप्तावशोकः, एवं जीर्णादिदेहहानेन देहान्तरप्राप्तावपि ॥ १३ ॥ |
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| text | Wikitext | तथाऽपि तद्दर्शनाभावादिना शोक इति चेद्? नेत्याह – मात्रास्पर्शा इति ॥ मीयन्त इति मात्राः = विषयाः, तेषां स्पर्शाः = सम्बन्धाः । त एव शीतोष्णसुखदुःखदाः । देहे शीतोष्णादिसम्बन्धाद्धि शीतोष्णाद्यनुभव आत्मनः। ततश्च सुखदुःखे । नह्यात्मनः स्वतो दुःखादिः सम्भवति । कुतः? आगमापायित्वात् । यद्यात्मनः स्वतः स्युः सुप्तावपि स्युः । अतो ‘यतो मात्रास्पर्शा जाग्रदादावेव ते सन्ति; नान्यदा’ इति तदन्वयव्यतिरेकित्वात् तन्निमित्ता एव, नात्मनः स्वतः । |
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| text | Wikitext | आत्मनश्च तैर्विषयविषयिभावसम्बन्धाद् अन्यः सम्बन्धो नास्ति । न चाऽगमापायित्वेऽपि प्रवाहरूपेणापि नित्यत्वमस्ति । सुप्तिप्रलयादावभावाद् इत्याह – अनित्या इति ॥ |
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| text | Wikitext | अत आत्मनो देहाद्यात्मभ्रम एव सुखदुःखकारणम् । अतस्तद्विमुक्तस्य बन्धुमरणादिदुःखं न संभवति । अतोऽभिमानं परित्यज्य तान् शीतोष्णादीन् तितिक्षस्व ॥ १४ ॥ |
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| text | Wikitext | अतः प्रयोजनमाह – यं हीति ॥ यम् एते मात्रास्पर्शा न व्यथयन्ति । पुरि शयमेव सन्तम् । शरीरसम्बन्धाभावे सर्वेषामपि व्यथाभावात् पुरुषम् इति विशेषणम् । कथं न व्यथयन्ति? समदुःखसुखत्वात् । तत् कथम् ? धैर्येण ॥ १५ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘नित्य आत्मा’ इत्युक्तम् । किम् आत्मैव नित्यः, आहोस्विद् अन्यदपि ? अन्यदपि । तत् किम् इति ? आह – नासत इति ॥ असतः कारणस्य सतः ब्रह्मणश्च अभावो न विद्यते । |
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| text | Wikitext | ‘प्रकृतिः पुरुषश्चैव नित्यौ कालश्च सत्तम।’ इति वचनात् श्रीविष्णुपुराणे । पृथग् ‘विद्यते’ इत्यादरार्थः ॥ |
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| text | Wikitext | असतः कारणत्वं च – ‘सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः’ (भाग.१.२.३१) इति भागवते । ‘असतः सदजायत’ (ऋ.१०.७२.२) इति च । अव्यक्तेश्च । सम्प्रदायतश्चैतत् सिद्धम् इत्याह – उभयोरपीति ॥ अन्तो निर्णयः॥१६ ॥ |
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| text | Wikitext | किं बहुना ! यद् देशतोऽनन्तं तन्नित्यमेव, वेदाद्यन्यदपीत्याह – अविनाशीति ॥ नापि शापादिना विनाश इत्याह – विनाशमिति ॥ अव्ययं च तद् ॥ १७ ॥ |
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| text | Wikitext | भवतु देहस्यापि कस्यचिन्नित्यत्वम् इति । नेत्याह – अन्तवन्त इति ॥ अस्तु तर्हि दर्पणनाशात् प्रतिबिम्बनाशवत् आत्मनाशः ? इत्यत आह – नित्यस्येति ॥ ‘शरीरिणः’ इति ईश्वरव्यावृत्तये । न च नैमित्तिकनाश इत्याह – अनाशिन इति ॥ कुतः ? अप्रमेयेश्वरसरूपत्वात् । न ह्युपाधिबिम्बसन्निध्यनाशे प्रतिबिम्बनाशः, सति च प्रदर्शके । स्वयमेवात्र प्रदर्शकः, चित्त्वात् । नित्यश्चोपाधिः कश्चिदस्ति ॥ |
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| text | Wikitext | ‘प्रतिपत्तौ विमोक्षस्य नित्योपाध्या स्वरूपया । चिद्रूपया युतो जीवः केशवप्रतिबिम्बकः ॥’ इति भगवद्वचनात् ॥१८ ॥ |
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| text | Wikitext | व्यवहारस्तु भ्रान्त इत्याह – य एनमिति ॥ कुतः? उक्तहेतुभ्यो नायं हन्ति, न हन्यते । |
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| text | Wikitext | न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया । स हि बिम्बक्रिययैव क्रियावान् । ‘ध्यायतीव’ (बृ.उ.६.३.७) इति श्रुतेश्च ॥ १९ ॥ |
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| text | Wikitext | अत्र मन्त्रवर्णोऽप्यस्तीत्याह – न जायत इति ॥ न चेश्वरज्ञानवत् भूत्वा भविता । तद्धि – ‘तदैक्षत’ (छां.उ.६.२.३) । ‘देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः । अविलुप्तावबोधात्मा.........’॥ (भाग.३.७.५) इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धम् । |
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| text | Wikitext | कुतः? अजादिलक्षणेश्वरसरूपत्वात् । शाश्वतः सदैकरूपः । पुरं = देहम् अणतीति पुराणः । तथाऽपि न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे ॥२० ॥ |
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| text | Wikitext | अतो य एवं वेद स कथं कं घातयति, हन्ति वा ? अविनाशिनं नैमित्तिकनाशरहितम् । नित्यं स्वाभाविकनाशरहितम् । अथवा- अविनाशिनं दोषयोगरहितम्, नित्यं सदा भाविनम् इति सर्वत्र विवेकः । दोषयुक्तपुरुषादिषु नष्टशब्दप्रयोगात् ॥ २१ ॥ |
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| text | Wikitext | देहात्मविवेकानुभवार्थं दृष्टान्तमाह – वासांसीति ॥ २२ ॥ |
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| text | Wikitext | स्वतः प्रायो निमित्तैश्चाविनाशिनोऽपि केनचिद् निमित्तविशेषेण स्यात् ककच्छेदवत्, इत्यतो विशेषनिमित्तानि निषेधति – नैनमिति ॥२३ ॥ |
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| text | Wikitext | वर्तमाननिषेधात् स्याद् उत्तरत्र? इत्यत आह – अच्छेद्य इति ॥ वर्तमानादर्शनाद् युक्तम् अयोग्यत्वम् इति सूचयति वर्तमानापदेशेन । कुतोऽयोग्यता? नित्यसर्वगतादिविशेषणेश्वरसरूपत्वात् । ‘शाश्वतः’ इत्येकरूपत्वमात्रम् उक्तम् । ‘स्थाणु’शब्देन नैमित्तिकम् अन्यथात्वं निवारयति । नित्यत्वं सर्वगतत्वविशेषणम् । अन्यथा पुनरुक्तेः । ऐक्योक्तावपि अनुक्तविशेषणोपादानाद् नेश्वरैक्ये पुनरुक्तिः । युक्ताश्च बिम्बधर्माः प्रतिबिम्बेऽविरोधे । |
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| text | Wikitext | तत्ता च - ‘रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव’(ऋ.६.४७.१८) , ‘आभास एव च’ ( ब्र.सू.२.३.५०) इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धा । न चांशत्वविरोधः । तस्यैवांशत्वात् । न चैकरूपैवांशता । प्रमाणं चोभयविधवचनमेव । न चांशस्य प्रतिबिम्बत्वं कल्प्यम्, गाध्यादिष्वपि अंशबाहुरूप्यदृष्टेः, इतरत्रादृष्टेः । स्थाणुत्वेऽपि ‘ऐक्षत’(छां.उ.६.२.३) इत्याद्यविरुद्धम् ईश्वरस्य । उभयविधवाक्याद् , अचिन्त्यशक्तेश्च । न च माययैकम् । ‘त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते’ (भाग.१०.४.१९) , ‘न योगित्वाद् ईश्वरत्वाद्’ (बृ.उ.भा.५.८.१२.उ. वाराहवचनम् ) , ‘चित्रं न चैतत् त्वयि कार्यकारणे’ (भाग. ५.१८.५.) इत्याद्यैश्वर्येणैव विरुद्धधर्माविरोधोक्तेः । |
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| commentary_id | String | BGB_C02_V24_B03 |
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| text | Wikitext | महातात्पर्याच्च । मोक्षो हि महापुरुषार्थः। ‘तत्रापि मोक्ष एवार्थः’ । ‘अन्तेषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे । अन्तप्राप्तिं सुखं प्राहुर्दुःखमन्तरमन्तयोः ॥’(म.भा.१२.३१७.३४) ‘पुण्यचितो लोकः क्षीयते’"(छा.उ. ८.१.६) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । स च विष्णुप्रसादादेव सिध्यति । ‘वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं समवाप्नुयात्।’(विष्णु.१.४.१८) , ‘तुष्टे तु तत्र किमलभ्यमनन्त ईशे’ (भाग.७.६.२५) , ‘तत्प्रसादाद् अवाप्नोति परां सिद्धिं न संशयः।’ , ‘येषां स एव भगवान् दययेद् अनन्तः सर्वात्मना श्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् । ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां नैषां ममाहमिति धीः श्वसृगालभक्ष्ये ॥’ (भाग.२. ७ .४२) , ‘तस्मिन् प्रसन्ने किमिहास्त्यलभ्यं धर्मार्थकामैरलमल्पकास्ते’ ‘ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवाः तापत्रयेणोपहता न शर्म । आत्मन् लभन्ते भगवन् तवाङ्घ्रिच्छायांशविद्यामत आश्रयेम॥’ (भाग.३.६.१८) , ‘ऋते भवत्प्रसादाद्धि कस्य मोक्षो भवेदिह ।’ ‘तमेवं विद्वान्.....’ इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । स चोत्कर्षज्ञानादेव भवति । लोकप्रसिद्धेः । लोकसिद्धमविरुद्धम् अत्राप्यङ्गीकार्यम् ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C02_V24 |
| commentary_id | String | BGB_C02_V24_B04 |
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| text | Wikitext | ‘अहल्याजारत्वाद्यपि दोषकृतोऽपि ते बहुतरो लेपो नासीद्’ इत्युत्कर्षमेव वक्ति । बहुनरकफलो ह्यसौ । ‘तस्य न लोम च न क्षीयते(मीयते)’(कौ.उ.३.२) इति श्रुत्यन्तराच्च । ‘यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्’ (१५.१९) इति तदुक्तेश्च । |
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| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | ‘सत्यं सत्यं पुनस्सत्यं शपथैश्चापि कोटिभिः । विष्णुमाहात्म्यलेशस्य विभक्तस्य च कोटिधा ॥ पुनश्चानन्तधा तस्य पुनश्चापि ह्यनन्तधा । नैकांशसममाहात्म्याः श्रीशेषब्रह्मशङ्कराः ॥’ इति नारदीये । अन्योत्कर्ष ऐक्यं च - ‘तथैव सर्वशास्त्रेषु महाभारतमुत्तमम् । को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत् ॥’(वि.पु.३.४.५) इत्यादिग्रन्थान्तरसिद्धोत्कर्षमहाभारतविरुद्धम् । तत्र हि - ‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान् साधयाम्यहम् ॥’(म.भा.१.१.१८) , ‘यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रश्च क्रोधसम्भवः ।’ (म.भा.१२.३४१.१२) , ‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः’ (११.४३) इत्यादिषु साधारणप्रश्नावसर एव महान्तम् उत्कर्षं विष्णोर्वक्ति । अन्यत्र यत्किञ्चिदुक्तावप्यसाधारण एवावसरे । तद्धि अग्न्यादेरपि वेदादावस्ति- ‘त्वमग्न इन्द्रो वृषभः सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्यः’ (ऋ.२.१.३) , ‘विश्वस्माद् इन्द्र उत्तरः’(ऋ.१०.८६.१) इत्यादिषु । |
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| verse_id | String | BGB_C02_V24 |
| commentary_id | String | BGB_C02_V24_B06 |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | तद्ग्रन्थविरोधाच्च । तथा हि स्कान्दे शैवे - ‘यदन्तरं व्याघ्रहरीन्द्रयोर्वने यदन्तरं मेरुगिरीन्द्रविन्ध्ययोः । यदन्तरं सूर्यसुरेड्यबिम्बयोस्तदन्तरं रुद्रमहेन्द्रयोरपि ॥ यदन्तरं सिंहगजेन्द्रयोर्वने यदन्तरं सूर्यशशाङ्कयोर्दिवि । यदन्तरं जाह्नविसूर्यकन्ययोः तदन्तरं ब्रह्मगिरीशयोरपि ॥ यदन्तरं प्रलयजवारिविप्लुषोः यदन्तरं स्तम्बहिरण्यगर्भयोः । स्फुलिङ्गसंवर्तकयोर्यदन्तरं तदन्तरं विष्णुहिरण्यगर्भयोः ॥ अनन्तत्वान्महाविष्णोस्तदन्तरमनन्तकम् । माहात्म्यसूचनार्थाय ह्युदारणमीरितम् ॥ तत्समो ह्यधिको वाऽपि नास्ति कश्चित् कदाचन । एतेन सत्यवाक्येन तमेव प्रविशाम्यहम् ॥’ इत्याद्याह । तत्रैव शिवं प्रति मार्कण्डेयवचनम् - ‘संसारार्णवनिर्मग्न इदानीं मुक्तिमेष्यसि।’ इत्यादि । पाद्मे शैवे मार्कण्डेयकथाप्रबन्धे शिवान्निषिध्य विष्णोरेव मुक्तिमाह - ‘अहं भोगप्रदो वत्स मोक्षदस्तु जनार्दनः’ इत्यादि । समब्राह्मविरोधाच्च । वेदश्च इतिहासाद्यविरोधेन योज्यः । ‘यदि विद्याद्’ इति वचनात् । अनिर्णयाच्चेन्द्रादिशङ्कयाऽन्यथा । तत्रापीष्टसिद्धिः । नामवैशेष्यात् । अतो भगवदुत्कर्ष एव सर्वागमानां महातात्पर्यम् । |
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| verse_id | String | BGB_C02_V24 |
| commentary_id | String | BGB_C02_V24_B07 |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | तथाऽपि स्वतः प्रामाण्यात् सन्नेवोच्यते । अविरोधात् । न च प्रमाणसिद्ध(दृष्ट)स्यान्यत्रादृष्ट्याऽपह्नवो युक्तः । धर्मवैचित्र्याद् अर्थानाम् । स्वतः प्रामाण्यानङ्गीकारे मानोक्तावप्यदोषत्वं च साधयेद् इत्यतिप्रसङ्गः । अनन्यापेक्षया च तत्परत्वं सिद्धमागमानाम् । ‘नारायणपरा वेदाः’ (भाग.२.५.१५) , ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ (कठ.२.१५) , ‘वासुदेवपरा वेदाः’ (भाग.१.२.२९) इति । न चैतद् विरुद्धम् । ईश्वरनियमात् । अनादौ च तत् सिद्धं ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च’ ( भाग.२.१०.१२) इत्यादौ । प्रयोजकत्वं तु पूर्वोक्तन्यायेन । अतः सिद्धमेतत् । तच्चानन्यापेक्षा अचिन्त्यशक्तित्व एव युक्तम् । अतो न मायामयमेकम् । |
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| verse_id | String | BGB_C02_V24 |
| commentary_id | String | BGB_C02_V24_B08 |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | अचलत्वं तु ‘अप्रहर्षमनानन्दम्’(म.भा.१२.१९१.८) , ‘अदुःखमसुखम्’(म.भा.१२.२५६.२१) , ‘(न)अप्रज्ञम्’ (माण्डूक-२.१) , ‘असद्वा’ (तै.उ.२.७) इत्यादिवत् । क्रियादृष्टेः । ‘तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः’ (भाग.६.४.४६) इत्याद्युक्तेः । अतश्च न मायामयं सर्वम् । ऐश्वर्यादिवाचिभगशब्देनैव सम्बोधनाच्च ‘तं त्वा भग’( तै. उ.१.४) इत्यादौ । स्वरूपत्वान्न मायामयत्वं युक्तम् । ‘विज्ञानशक्तिरहमासम् अनन्तशक्तेः’ ( भाग.३.१०.२४) , ‘मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे’ (भाग.६.४.४८) , ‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च’ ( श्वे.उ.६.८) इत्यादिवचनात् ॥२४ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C02_V25 |
| commentary_id | String | BGB_C02_V25_B01 |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | अत एवाव्यक्तादिरूपः ॥ २५ ॥ |
| Field | Field type | Value |
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| verse_id | String | BGB_C02_V26 |
| commentary_id | String | BGB_C02_V26_B01 |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | अस्त्वेवम् आत्मनो नित्यत्वम्; तथाऽपि देहसंयोगवियोगात्मक-जनिमृती स्त एव? इत्यत आह – अथ चेति ॥ २६ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C02_V27 |
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| text | Wikitext | कुतोऽशोकः ? नियतत्वादित्याह – जातस्येति ॥ २७ ॥ |
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| text | Wikitext | तदेव स्पष्टयति – अव्यक्तादीनीति ॥ २८ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘देहयोगवियोगस्य नियतत्वाद्, आत्मनश्चेश्वरसरूपत्वात्, सर्वथाऽनाशाद् न शोकः कार्यः’ इत्युपसंहर्तुम् ऐश्वरं सामर्थ्यं पुनर्दर्शयति – आश्चर्यवदिति ॥ दुर्लभत्वेनेत्यर्थः । तद्धि आश्चर्यं लोके । दुर्लभोऽपीश्वरसरूपत्वात् सूक्ष्मत्वाच्चाऽऽत्मनस्तद्द्रष्टा॥२९-३० ॥ |
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| text | Wikitext | साङ्ख्यम् ज्ञानम् । ‘शुद्धात्मतत्त्वविज्ञानं साङ्ख्यमित्यभिधीयते॥’ इति भगवद्वचनाद् व्यासस्मृतौ । योग उपायः । ‘दृष्टा योगाः प्रयुक्ताश्च पुंसां श्रेयःप्रसिद्धये’ (भाग.४.१८.३) इति प्रयोगाद् भागवते । नेतरौ साङ्ख्ययोगौ उपादेयत्वेन विवक्षितौ कुत्रचित् सामस्त्येन, ‘कर्मयोग’ इत्यादिप्रयोगाच्च । निन्दितत्वाच्च इतरयोः मोक्षधर्मेषु भिन्नमतत्वमुक्त्वा पञ्चरात्रस्तुत्या । वेदानां त्वेकार्थत्वान्न विरोधः । पार्थक्यं तु साङ्ख्याद्यपेक्षया युक्तम् । तत्रैव चित्रशिखण्डिशास्त्रे पञ्चरात्रमूले वेदैक्योक्तेश्च । एवमेव सर्वत्र साङ्ख्ययोगशब्दार्थ उपादेयो वर्णनीयः । युक्तेश्च । ज्ञानं हि जैवमुक्तम् । उपायश्च वक्ष्यते । ‘बुध्यतेऽनया’ इति बुद्धिः । साङ्ख्यविषयो यया वाचा बुध्यते सा वाग् अभिहिता इत्यर्थः ॥ ३९-४० ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C02_V41 |
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| text | Wikitext | ‘योग इमां बुद्धिं शृणु’ इत्युक्तम्; बह्व्यो हि बुद्धयो मतभेदात्; तत् कथम् एकत्र निष्ठां करोमि ? इत्यत आह – व्यवसायात्मिकेति ॥ सम्यग् युक्तिनिर्णीतानां मतानाम् ऐक्यमेव इत्यर्थः ॥ ४१ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C02_V44 |
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| text | Wikitext | स्युरवैदिकानि मतानि अव्यवसायात्मकानि; न तु वैदिकानि । तेऽपि हि केचित् कर्माणि स्वर्गादिफलान्येवाऽऽहुः इत्यत आह – यामिमामिति ॥ ‘यामाहुस्तया’ इत्यन्वयः । मोक्षफलम् अपेक्ष्य स्वर्गादिपुष्पयुक्तां वाचं प्रवदन्ति । वेदवादरताः कर्मादिवाचकवेदवादरताः; वेदैर्यन्मुखत उच्यते तत्रैव रताः । नान्यदस्तीति वादिनः । >, ‘परोक्षविषया वेदाः’ , ‘परोक्षप्रिया इव हि देवाः’(ऐ.उ.३.१४) , ‘मां विधत्तेऽभिधत्ते’(भाग.११.२१.४३) इत्यादिभिः पारोक्ष्येण हि प्रायो भगवन्तं वदन्ति । भोगैश्वर्यगतिं प्रति तत्प्राप्तिं प्रति । तत्प्राप्तिफला एव वेदा इति वदन्तीत्यर्थः । तेषां सम्यग् युक्तिनिर्णयात्मिका बुद्धिः समाधौ समाध्यर्थे न विधीयते । सम्यङ् निर्णीतार्थानां हीश्वरे मनःसमाधानं सम्यग् भवति । तद्धि मोक्षसाधनम् । उक्तं चैतदन्यत्र– >, ‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचः समासन् । स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥’(भाग.५.११.३) इति ॥ ४२-४४ ॥ |
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| text | Wikitext | तां योगबुद्धिमाह - त्रैगुण्यविषया इत्यादिना इतरद् अपोद्य । वेदानां परोक्षार्थत्वात् त्रिगुणसम्बन्धि स्वर्गादि प्रतीतितोऽर्थ इव भाति (भवति) । ‘परोक्षवादी वेदोऽयम्’ इति ह्युक्तम् । अतः प्रातीतिकेऽर्थे भ्रान्तिं मा कुरु इत्यर्थः । ‘वादो विषयकत्वं (विषयकृत्त्वं) च मुखतो वचनं स्मृतम् ।’ इत्यभिधानम् । न तु वेदपक्षो निषिध्यते । ‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा । आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते॥’(कल्कि.३५.३२), ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति.......।’(कठ.१.२.१५), ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम् । आचारश्चैव साधूनाम् आत्मनस्तुष्टिरेव च ॥’(मनु.२.६) , ‘वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।(भाग.६.१.४०) ’ इति वेदानां सर्वात्मना विष्णुपरत्वोक्तेः । तद्विहितस्य तद्विरुद्धस्य च धर्माधर्मत्वोक्तेः ॥ ४५ ॥ |
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| text | Wikitext | तथाऽपि काम्यकर्मिणां फलं ज्ञानिनां न भवतीति साम्यमेव? इत्यत आह – यावानर्थ इति ॥ यथा यावान् अर्थः प्रयोजनम् उदपाने कूपे भवति, तावान् सर्वतः सम्प्लुतोदके अन्तर्भवत्येव, एवं सर्वेषु वेदेषु यत् फलं तद् विजानतो ऽपि ज्ञानिनो ब्राह्मणस्य फलेऽन्तर्भवति । ‘ब्रह्म अणति’ इति ब्राह्मणः =अपरोक्षज्ञानी । स हि ब्रह्म गच्छति । ‘विजानतः’ इति ज्ञानफलत्वं तस्य दर्शयति ॥ ४६ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C02_V47 |
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| text | Wikitext | कामात्मनां निन्दा कृता कथमेषाम् ? ‘स्वर्गकामो यजेत’ इत्यादौ कामस्यापि विहितत्वाद् इत्यत आह - कर्मण्येवेति ॥ ‘ते’ इत्युपलक्षणार्थम् । तव ज्ञानिनोऽपि न फलकामकर्तव्यता; किम्वन्येषाम् ! न ‘त्वस्ति केषाञ्चिद्, न तेऽस्ति’ इति । स हि ज्ञानी नरांश इन्द्रश्च । मोहादिस्त्वभिभवादेः । यदि तेषां शुद्धसत्त्वानां न स्याज्ज्ञानम्, क्व अन्येषाम् ? उपदेशादेश्च सिद्धं ज्ञानं तेषाम् । ‘....पार्थार्ष्टिषेण....।’(भाग.२.७.४५) इत्यादिज्ञानिगणनाच्च । कामनिषेध एवात्र । फलानि ह्यस्वातन्त्र्येण भवन्ति । न हि कर्मफलानि कर्माभावे यत्नतोऽपि भवन्ति । भवन्ति च काम्यकर्मिणो विपर्ययप्रयत्नेऽपि अविरोधे । |
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| verse_id | String | BGB_C02_V47 |
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| text | Wikitext | अतः कर्माकरणे एव प्रत्यवायः, न तु ज्ञानादिनाऽकामनया वा फलाप्राप्तौ । अतः कर्मण्येवाधिकारः । अतस्तदेव कार्यम्; न तु कामेन ज्ञानादिनिषेधेन वा फलप्राप्तिः । कामवचनानां तु तात्पर्यं भगवतैवोक्तम्- ‘रोचनार्थं फलश्रुतिः’(भाग.११.३.४७) , ‘यथा भैषज्यरोचनम्’(भाग.११.२१.२३) इत्यादौ भागवते । अत एव ‘कामी यजेत’ इत्यर्थः; न तु ‘कामी भूत्वा’ इत्यर्थः । ‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं च’(मनु.१२.८९) इति वचनात्, वक्ष्यमाणेभ्यश्च । ‘वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत’ इत्यादिभ्यश्च । अतो मा कर्मफलहेतुर्भूः । कर्मफलं तत्कृतौ हेतुर्यस्य स कर्मफलहेतुः, स मा भूः । तर्हि न करोमि? इत्यत आह– मा त इति ॥ कर्माकरणे च स्नेहो माऽस्त्वित्यर्थः । अन्य(था)फलाभावेऽपि मत्प्रसादाख्यफलभावात् । इच्छा च तस्य युक्ता ‘वृणीमहे ते परितोषणाय’(भाग.४.३०.४०) इत्यादिमहदाचारात् । अनिन्दनात्, विशेषत इतरनिन्दनाच्च। सामान्यं विशेषो बाधत इति च प्रसिद्धम्– ‘सर्वान् आनय, नैकं मैत्रम्’ इत्यादौ । अतः - ‘नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचिद्.....’(भाग.३.२६.३४) , ‘भक्तिमन्विच्छन्तः’ , ‘ब्रह्मजिज्ञासा’(ब्र,सू.१.१.१) , ‘विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत.....’,(बृ.उ.६.४.२१) , ‘द्रष्टव्यः.....’ इत्यादिवचनेभ्यः, स्वार्थसेवकं प्रति न तथा स्नेहः, ‘किं ददामि’ इत्युक्ते सेवादियाचकं प्रति बहुतरः स्नेह इति लौकिकन्यायाच्च भक्तिज्ञानादिप्रार्थना कार्येति सिद्धम् ॥४७ ॥ |
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| text | Wikitext | पूर्वश्लोकोक्तं स्पष्टयति – योगस्थ इति ॥ योगस्थः उपायस्थः । सङ्गं फलस्नेहं त्यक्त्वा । तत एव सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा । स एव च मयोक्तो योगः ॥ ४८ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C02_V49 |
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| text | Wikitext | इतश्च योगाय युज्यस्व इत्याह – दूरेणेति ॥ बुद्धियोगाद् ज्ञानलक्षणाद् उपायाद् । दूरेण अतीव । अतो बुद्धौ शरणं ज्ञाने स्थितिम् । फलं कर्मकृतौ हेतुर्येषां ते फलहेतवः ॥ ४९ ॥ |
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| text | Wikitext | ज्ञानफलमाह – बुद्धियुक्त इति ॥ सुकृतमप्यप्रियं मानुष्यादिफलं जहाति, न बृहत्फलमपि उपासनादिनिमित्तम् । ‘न हास्य (न तस्य)कर्म क्षीयते’(बृ.१.४.१५) , ‘अविदित्वाऽस्मिन् लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राणि अन्तवदेवास्य तद् भवति’(बृ.३.८.१०) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः । अतः कर्मक्षयश्रुतिरज्ञानिविषया सर्वत्र । उभयक्षयश्रुतिरप्यनिष्टविषया । नहीष्टपुण्यक्षये किञ्चित् प्रयोजनम् । न चेष्टनाशो ज्ञानिनो युक्तः । इष्टाश्च केचिद्विषयाः - ‘स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति’(छां.उ.८.२.१) , ‘प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानाम्’(छां.उ.८.४.१) , ‘स्त्रीभिर्वा यानैर्वा’(छां.उ.८.१२.३) , ‘अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते’(बृह. १.४.१५) , ‘कामान्नी कामरूप्यनुसञ्जरन्’(तै.उ. ३.१०.५) , ‘स एकधा भवति’(छां.उ.७.२६.२) इत्यादिश्रुतिभ्यः । बहुत्वेऽप्यात्मसुखस्य पुनरिष्टत्वात् कर्मसुखे न विरोधः । अनुभवशक्तिश्चेश्वरप्रसादात् । श्रुतेश्च । न च शरीरपातात् पूर्वमेतत् - ‘स तत्र पर्येति’(छां.८.१२.३) , ‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य’(तै.उ. ३.१०.५) इत्याद्युत्तरत्र श्रवणात् । |
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| verse_id | String | BGB_C02_V50 |
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| text | Wikitext | न चैकीभूत एव ब्रह्मणा सः । ‘मग्नस्य हि परेऽज्ञाने (परे ज्ञाने) किं नु दुःखतरं भवेत्’(म.भा.१२.२९०.७९) इत्यादिनिन्दनाद् मोक्षधर्मे । परिहारे पृथग् भोगाभिधानाच्च । शुकादीनां पृथग्दृष्टेश्च । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’(ब्र.सू.४.४.१७) इत्यैश्वर्यमर्यादोक्तेश्च । ‘इदं ज्ञानमु(म)पाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः’(१४.२) इति च । उपाधिनाशे नाशाच्च प्रतिबिम्बस्य । न चैकीभूतस्य पृथग्ज्ञाने मानं पश्यामः । ‘आसं दुःखी, नाऽसम्’ इति ज्ञानविरोधाच्चेश्वरस्य । अनेन रूपेणेति च । भेदाभावात् । |
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| verse_id | String | BGB_C02_V50 |
| commentary_id | String | BGB_C02_V50_B03 |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | न च प्रतिबिम्बस्य बिम्बैक्यं लोके पश्यामः । उपाधिनाशे मानं वा । ‘मग्नस्य हि परेऽज्ञाने’ इति दुःखात्मकत्वोक्तेश्च । ‘यावदात्मभावित्वाद्’ इत्युपाधिनित्यताभिधानाच्च। अतोऽन्यवचनं प्रतीयमानमप्यौपचारिकम् । |
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| verse_id | String | BGB_C02_V50 |
| commentary_id | String | BGB_C02_V50_B04 |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | दृष्टाश्च ते भगवतो भिन्ना नारदेन । प्रतिशाखं च ‘स एकधा’(छा.उ.७.२६.८) इत्यादिषु भेदेन प्रतीयन्ते । विरोधे तु युक्तिमतामेव बलवत्त्वम् । युक्तयश्चात्रोक्ताः - ‘मग्नस्य हि’ इत्यादयः। अतो जले जलैकीभाववत् एकीभावः । उक्तं च - ‘यथोदकं शुद्धे शुद्धम्’(कठ.उ.२.१.१५) , ‘यथा नद्यः’(आथ.उ.३.२.८) इत्यादौ । तत्राऽप्यन्योन्यात्मकत्वे वृद्ध्यसम्भवः । अस्ति चेषत् समुद्रेऽपि द्वारि । महत्त्वाद् अन्यत्रादृष्टिः । ‘ता एवापो ददौ तस्य स ऋषिः शंसितव्रतः’ इति महाकौर्मे समर्थानां भेदज्ञानाच्च । ‘नैव तत् प्राप्नुवन्त्येते ब्रह्मेशानादयः सुराः । यत् ते पदं हि कैवल्यम्’ इति निषेधाच्च, नारदीये । सविचारश्च निर्णयः कृतो मोक्षधर्मेषु । बलवांश्च सविचारो निर्णयो वाक्यमात्रात् । अतो ‘यत्र नान्यत् पश्यति’(छां.७.२४.१) इत्याद्यपि तदधीनसत्तादिवाचि । अन्यथा कथम् ऐश्वर्यादि स्यात्? न च तन्मायामयम् इत्युक्तम् । अन्यथा कथं तत्रैव ‘स एकधा’(छां.७.२६.२) इत्यादि ब्रूयात् । |
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| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | न च – ‘न वै सशरीरस्य....’(छां.८.१२.१) इत्यादिविरोधः । वैलक्षण्यात् तच्छरीराणाम् । अभौतिकानि हि तानि नित्योपाधिविनिर्मितानीश्वरशक्त्या । तथाचोक्तम्– ‘शरीरं जायते तेषां षोडश्या कलयैव तु’ इत्यादि नारायणाष्टाक्षरकल्पे । वदन्ति च लौकिकवैलक्षण्येऽभावशब्दम्- ‘अप्रहर्षमनानन्दम्’, ‘सुखदुःखबाह्यः’ इत्यादिषु । निरुक्त्यभावाच्च न तानि शरीराणि । तथा हि श्रुतिः - ‘अशारीतीँ.... तच्छरीरमभवद्’ इति । न हि तानि शीर्णानि भवन्ति । ‘सर्गेऽपि नोपजायन्ते’(१४.२) इत्यादिवचनात् । साम्यात् प्रयोगः । प्रयोगाच्च - ‘अनिन्द्रिया अनाहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः’(कुम्भ-म.भा.१२.३३६.२९) , ‘देहेन्द्रियासुहीनानां वैकुण्ठपुरवासिनाम्’(भाग.७.१.३४) इत्यादि दृष्टदेहेष्वेव । |
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| verse_id | String | BGB_C02_V50 |
| commentary_id | String | BGB_C02_V50_B06 |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | न चैषाऽन्या गौणी मुक्तिः । ‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति । योगी तावन्न मुक्तः स्याद् एष शास्त्रस्य निर्णयः ॥’ इत्यादित्यपुराणे तदन्यमुक्तिनिषेधात् । ये त्वत्रैव भगवन्तं प्रविशन्ति तेऽपि पश्चात् तत्रैव यान्ति । योग्यत्वं चात्र विवक्षितम् । युधिष्ठिरप्रश्न इतरनिन्दनाच्च । सायुज्यं च ग्रहवत् । तदुक्तेश्च - ‘भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः । तथा मुक्तावुत्तमायां बाह्यान् भोगांस्तु भुञ्जते ॥’ इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतोऽनिष्टस्यैव वियोगः । |
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| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | सोऽस्त्येव सर्वात्मना– ‘अदुःखम्’ , ‘सर्वदुःखविवर्जिताः’ , ‘अशोकमहिमम्’ , ‘यत्र गत्वा न शोचति’(ब्राह्म.२३७.११) इत्यादिभ्यः । विशेषवचनाभावाच्च । येषां त्वीषद् दृश्यते ते न सायुज्यं प्राप्ताः । सामीप्याद्येव तेषाम् । अतः प्रारब्धकर्मशेषभावात् तद् भुक्त्वा सायुज्यं गच्छन्ति । तच्चोक्तम्- ‘सङ्कर्षणादयः सर्वे स्वाधिकाराद् अनन्तरम् । प्रविशन्ति परं देवं विष्णुं नास्त्यत्र संशयः ॥’ इति व्यासयोगे । अतोऽनिष्टस्य सर्वात्मना वियोगः । ‘परब्रह्मत्वमिच्छामि परमात्मन् (परब्रह्मन्)जनार्दन’ । इत्यादिना ब्रह्मादिभिरपि प्रार्थितत्वात् । ‘न मोक्षसदृशं किञ्चिद् अधिकं वा सुखं क्वचित् । ऋते वैष्णवमानन्दं वाङ्मनोगोचरं महत् ॥’ इत्यादेश्च ब्रह्मादिपदादपि अधिकतमं सुखं च मोक्ष इति सिद्धम् । अतो योगाय युज्यस्व । ज्ञानोपायाय । तद्धि कर्मकौशलम् ॥ ५० ॥ |
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| commentary_id | String | BGB_C02_V51_B01 |
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| text | Wikitext | तदुपायमाह - कर्मजमिति ॥ कर्मजं फलं त्यक्त्वा , अकामनया ईश्वराय समर्प्य, बुद्धियुक्ताः सम्यग्ज्ञानिनो भूत्वा पदं गच्छन्ति । सयोगकर्म ज्ञानसाधनम् ; तन्मोक्षसाधनमिति भावः ॥ ५१ ॥ |
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| commentary_id | String | BGB_C02_V52_B01 |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | कियत्पर्यन्तम् अवश्यं कर्तव्यानि मुमुक्षुणैवं कर्माणीति ? आह- यदेति ॥ निर्वेदं नितरां लाभम् । प्रयोगात् - ‘तस्माद् ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बाल्येन तिष्ठासेत् ।’(बृह.उ.३.५.१) इत्यादि । न हि तत्र वैराग्यमुपपद्यते । तथा सति ‘पाण्डित्याद्’ इति स्यात् । न च ज्ञानिनां भगवन्महिमादिश्रवणे विरक्तिर्भवति । ‘आत्मारामा हि मुनयो निर्ग्राह्या अप्युरुक्रमे । कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिम् इत्थम्भूतगुणो हरिः ॥’ इति वचनात् । अनुष्ठानाच्च शुकादीनाम् । न च तेषां (फलं) सुखं नास्ति । तस्यैव महत्सुखत्वात् तेषाम्- ‘या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्मध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् । सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किम्वन्तकासिलुलितात् पततां विमानात् ॥’(भाग.४.९.१०) इत्यादिवचनात् । तेषामप्युपासनादिफलस्य साधितत्वात् । |
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| commentary_id | String | BGB_C02_V52_B02 |
| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | तारतम्याधिगतेश्च । तथा हि- यदि तारतम्यं न स्यात्, ‘नाऽत्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादम्’(भाग.३.१६.४८) , ‘नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचित्’(भाग.३.२६.३४) , ‘एकत्व(मित्युत)मप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति’(भाग.३.३०.१३) इति मुक्तिमप्यनिच्छतामपि मोक्ष एव फलम्, तमिच्छतामपि स (एव) भवति सुप्रतीकादीनामिति कथम् अनिच्छतां स्तुतिरुपपन्ना स्यात् ? वचनाच्च ‘यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृश्यते पुरुषोत्तमे । तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने ॥ योगिनां भिन्नलिङ्गानाम् आविर्भूतस्वरूपिणाम् । प्राप्तानां परमानन्दं तारतम्यं सदैव हि ॥’ इति (इत्याद्युक्तेः )। ‘न त्वाम् अतिशयिष्यन्ति मुक्तावपि कथञ्चन । मद्भक्तियोगाज्ज्ञानाच्च सर्वान् अतिशयिष्यसि ॥’ इति च । साम्यवचनं तु प्राचुर्यविषयम्, दुःखाभावविषयं च । तच्चोक्तम्- ‘दुःखाभावः परानन्दो लिङ्गभेदः समा(मो) मताः(तः) । तथाऽपि परमानन्दो ज्ञानभेदात्तु भिद्यते ॥’ इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतो न वैराग्यं श्रुतादौ अत्र विवक्षितम् । न च सङ्कोचे मानं किञ्चिद् विद्यमान इतरत्र प्रयोगे । महद्भिः श्रवणीयस्य श्रुतस्य च वेदादेः फलं प्राप्स्यसीत्यर्थः ॥५२ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C02_V53 |
| commentary_id | String | BGB_C02_V53_B01 |
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| text | Wikitext | तदेव स्पष्टयति - श्रुतिविप्रतिपन्नेति ॥ पूर्वं श्रुतिभिः= वेदैर्विप्रतिपन्ना= विरुद्धा सती यदा वेदार्थानुकूलेन तत्त्वनिश्चयेन विपरीतवाग्भिरपि निश्चला भवति; ततश्च समाधावचला , ब्रह्मप्रत्यक्षदर्शनेन भेरीताडनादावपि परमानन्दमग्नत्वात्; तदा योगमवाप्स्यसि उपायसिद्धो भवसीत्यर्थः ॥ ५३ ॥ |
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| commentary_id | String | BGB_C02_V54_B01 |
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| text | Wikitext | स्थिता प्रज्ञा= ज्ञानं यस्य स स्थितप्रज्ञः । भाष्यतेऽनयेति भाषा , लक्षणमित्यर्थः । उक्तं लक्षणम् अनुवदति लक्षणान्तरं पृच्छामीति ज्ञापयितुम् - समाधिस्थस्येति ॥ कम्= ब्रह्माणम्, ईशम्= रुद्रं च वर्तयतीति केशवः । तथाहि निरुक्तिः कृता हरिवंशेषु रुद्रेण कैलासयात्रायाम् । ‘हिरण्यगर्भः कः प्रोक्त ईशः शङ्कर एव च । सृष्ट्यादिना वर्तयति तौ यतः केशवो भवान् ॥’ इति वचनान्तराच्च । किमासीत ? किं प्रत्यासीत ? न चार्जुनो न जानाति तल्लक्षणादिकम् - ‘जानन्ति पूर्वराजानो देवर्षयस्तथैव हि । तथाऽपि धर्मान् पृच्छन्ति वार्तायै गुह्यवित्तये । न ते गुह्याः प्रतीयन्ते पुराणेष्वल्पबुद्धिनाम् ॥’ इति वचनात् ॥५४ ॥ |
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| text | Wikitext | गमनादिप्रवृत्तिर्नात्यभिसन्धिपूर्विका मत्तादिप्रवृत्तिवत् इति ‘या निशा’ इत्यादिना दर्शयिष्यन्, तल्लक्षणं प्रथमत आह - प्रजहातीति ॥ एवं परमानन्दतृप्तः किमर्थं प्रवृत्तिं करोति? इति प्रश्नाभिप्रायः । ‘प्रारब्धकर्मणा ईषत्तिरोहितब्रह्मणो वासनया प्रायोऽल्पाभिसन्धिप्रवृत्तयः सम्भवन्ति’ इत्याशयवान् परिहरति । प्रायः सर्वान् कामान् प्रजहाति । शुकादीनामपि ईषद्दर्शनात् । ‘त्वत्पादभक्तिमिच्छन्ति ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः’ इत्युक्तेः ताम् इच्छन्ति । यदा तु इन्द्रादीनाम् अग्रहो दृश्यते तदाऽभिभूतं तेषां ज्ञानम् । तच्चोक्तम्- ‘आधिकारिकपुंसां तु बृहत्कर्मत्वकारणात् । उद्भवाभिभवौ ज्ञाने ततोऽन्येभ्यो विलक्षणाः ॥’ इति । अत एव वैलक्षण्याद् अनधिकारिणाम् आग्रहादि चेद् अस्ति न ते ज्ञानिन इत्यवगन्तव्यम् । |
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| text | Wikitext | न चात्र समाधिं कुर्वतो लक्षणमुच्यते । ‘यः सर्वत्रानभिस्नेहः’(२.५७) इति स्नेहनिषेधात् । न हि समाधिं कुर्वतस्तस्य शुभाशुभप्राप्तिरस्ति । असम्प्रज्ञातसमाधेः । सम्प्रज्ञाते त्वविरोधः । तथाऽपि न तत्रैवेति नियमः । ‘कामादयो न जायन्ते ह्यपि विक्षिप्तचेतसाम् । ज्ञानिनां ज्ञाननिर्धूतमलानां देवसंश्रयात् ॥’ इति स्मृतेः । मनोगता हि कामाः । अतस्तत्रैव तद्विरुद्धज्ञानोत्पत्तौ युक्तं हानं तेषामिति दर्शयति - मनोगतानिति ॥ विरोधश्चोच्यते - ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’ (भ.गी.२.५९) इति । न चैतददृष्ट्याऽपलपनीयम् । पुरुषवैशेष्यात् । आत्मना परमात्मना । परमात्मन्येव स्थितः सन् । आत्माख्ये तस्मिन् स्थितस्य तत्प्रसादादेव तुष्टिर्भवति । ‘विषयांस्तु परित्यज्य रामे स्थितिमतस्ततः । देवाद् भवति वै तुष्टिर्नान्यथा तु कदाचन ॥’ इत्युक्तं हि नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अतो नाऽत्मा जीवः ॥५५ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C02_V56 |
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| text | Wikitext | तदेव स्पष्टयत्युत्तरैस्त्रिभिः श्लोकैः । एतान्येव ज्ञानोपायानि च । तच्चोक्तम् - ‘तद्वै जिज्ञासुभिः साध्यं ज्ञानिनां यत्तु लक्षणम् ।’ इति । शोभनाध्यासो रागः । ‘रसो रागस्तथा रक्तिः शोभनाध्यास उच्यते ।’ इत्यभिधानम् ॥५६ ॥ |
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| text | Wikitext | सर्वत्रानभिस्नेहत्वात् शुभाशुभं प्राप्य नाभिनन्दति न द्वेष्टि ॥५७, ५८॥ |
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| verse_id | String | BGB_C02_V59 |
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| text | Wikitext | न चैतल्लक्षणं ज्ञानम् अयत्नतोऽपि भवतीत्याहोत्तर(त्तरैः)श्लोकैः । निराहारत्वेन विषयभोगसामर्थ्याभाव एव भवति । इतरविषयाकाङ्क्षाभावो वा । रसाकाङ्क्षादिर्न निवर्तते । स त्वपरोक्षज्ञानादेव निवर्तत इत्याह - विषया इति ॥ ‘इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः । वर्जयित्वा तु रसनाम् असौ रस्ये च वर्धते’॥(भाग.११.८.१९) इति वचनाद् भागवते । रसशब्दस्य रागवाचकत्वाच्च ॥५९ ॥ |
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| text | Wikitext | अपरोक्षज्ञानरहितज्ञानिनोऽपि साधारणयत्नवतोऽपि मनो हरन्ति इन्द्रियाणि । पुरुषस्य शरीराभिमानिनः । को दोषस्ततः ? प्रमाथीनि प्रमथनशीलानि पुरुषस्य ॥ ६० ॥ |
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| text | Wikitext | तर्ह्यशक्यान्येवेत्यत आह - तानीति ॥ बहुयत्नवतः शक्यानि । अतो यत्नं कुर्यादित्याशयः । युक्तो मयि मनोयुक्तः । अहमेव परः= सर्वस्माद् उत्कृष्टो यस्य स मत्परः । फलमाह - वशे हीति ॥६१॥ |
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| text | Wikitext | सम्मोहः अकार्येच्छा । तथाहि मोहशब्दार्थ उक्त उपगीतासु - ‘मोहसंज्ञितम् । अधर्मलक्षणं चैव नियतं पापकर्मसु’ इति । तथा चान्यत्र - ‘सम्मोहोऽधर्मकामिता’ इति । स्मृतिविभ्रमः प्रतिषेधादिबुद्धि(स्मृति)नाशः । बुद्धिनाशः सर्वात्मना दोषबुद्धिनाशः । विनश्यति नरकाद्यनर्थं प्राप्नोति । तथा ह्युक्तम् - ‘अधर्मकामिनः शास्त्रे विस्मृतिर्जायते यदा । दोषादृष्टेस्तत्कृतेश्च नरकं प्रतिपद्यते ॥’ इति ॥ ६२, ६३ ॥ |
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| text | Wikitext | विषयान् अनुभवन्नपि विधेय आत्मा= मनो यस्य सः, जितात्मेत्यर्थः । प्रसादं मनःप्रसादम् ॥ ६४ ॥ |
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| text | Wikitext | कथं प्रसादमात्रेण सर्वदुःखहानिः ? प्रसन्नचेतसो हि बुद्धिः पर्यवतिष्ठति । ब्रह्मापरोक्ष्येण सम्यक् स्थितिं करोति । प्रसादो नाम स्वतोऽपि प्रायो विषय-अगतिः ॥ ६५ ॥ |
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| text | Wikitext | न हि प्रसादाभावे युक्तिः = चित्तनिरोधः । अयुक्तस्य च बुद्धिः सम्यग्ज्ञानं नास्ति । तदेवोपपादयति - न चायुक्तस्येति ॥ शान्तिः मुक्तिः । ‘शान्तिर्मोक्षोऽथ निर्वाणम्’ इत्यभिधानात् ॥ ६६ ॥ |
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| text | Wikitext | कथम् अयुक्तस्य भावना न भवति ? आह - इन्द्रियाणामिति ॥ अनुविधीयते क्रियते ननु ; ईश्वरेण इन्द्रियाणाम् अनु ! ‘बुद्धिर्ज्ञानम्’ इत्यादि वक्ष्यमाणत्वात् । प्रज्ञां प्रज्ञानम् । उत्पत्स्यदपि निवारयतीत्यर्थः । उत्पन्नस्याऽप्यभिभवो भवति ॥ ६७ ॥ |
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| text | Wikitext | तस्मात् सर्वात्मना निगृहीतेन्द्रिय एव ज्ञानीति निगमयति - तस्मादिति ॥ ६८ ॥ |
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| text | Wikitext | उक्तलक्षणं पिण्डीकृत्याऽह - या निशेति ॥ या सर्वभूतानां निशा परमेश्वरस्वरूपलक्षणा, यस्यां सुप्तानीव न किञ्चिज्जानन्ति, तस्याम् इन्द्रियसंयमयुक्तो ज्ञानी जागर्ति । सम्यग्= आपरोक्ष्येण पश्यति परमात्मानमित्यर्थः । यस्यां विषयलक्षणायां भूतानि जाग्रति तस्यां निशायामिव सुप्तः प्रायो न जानाति । मत्तादिवत् गमनादिप्रवृत्तिः । तदुक्तम् - ‘देहं तु तं न चरमम्’ , ‘देहोऽपि दैववशगः’(भाग.३.२९.३७) इति श्लोकाभ्याम् । मननयुक्तो मुनिः । ‘पश्यत’ इति अस्य साधनमाह ॥ ६९ ॥ |
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| text | Wikitext | तेन विषयानुभवप्रकारमाह - आपूर्यमाणमिति ॥ यो विषयैरापूर्यमाणोऽपि अचलप्रतिष्ठो भवति= नोत्सेकं प्राप्नोति, न च प्रयत्नं करोति, न चाभावे शुष्यति । न हि समुद्रः सरित्प्रवेश-अप्रवेशनिमित्तवृद्धि-शोषौ बहुतरौ प्राप्नोति, प्रयत्नं वा करोति, स मुक्तिम् आप्नोति इत्यर्थः ॥ ७० ॥ |
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| text | Wikitext | एतदेव प्रपञ्चयति - विहायेति ॥ कामान् विषयान् निःस्पृहतया विहाय यश्चरति भक्षयति । ‘भक्षयामि’इत्य(त्याद्य)हङ्कारममकारवर्जितश्च । स हि पुमान् । स एव च मुक्तिम् अधिगच्छति इत्यर्थः ॥ ७१ ॥ |
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| text | Wikitext | उपसंहरति - एषेति ॥ ब्राह्मी स्थितिः ब्रह्मविषया स्थितिः = लक्षणम् । अन्तकालेऽपि अस्यां स्थित्वा एव ब्रह्म गच्छति । अन्यथा जन्मान्तरं प्राप्नोति । ‘यं यं वाऽपि’(भ.गी.८.६) इति वक्ष्यमाणत्वात् । ज्ञानिनामपि सति प्रारब्धकर्मणि शरीरान्तरं युक्तम् । ‘भोगेन त्वितरे’(ब्र.सू.४.१.१९) इति ह्युक्तम् । सन्ति हि बहुशरीरफलानि कर्माणि कानिचित् । ‘सप्तजन्मनि विप्रः स्याद्’ इत्यादेः । दृष्टेश्च ज्ञानिनामपि बहुशरीरप्राप्तेः । तथा ह्युक्तम् - ‘स्थितप्रज्ञोऽपि यस्तूर्ध्वः प्राप्य रुद्रपदं ततः । साङ्कर्षणं ततो मुक्तिम् अगाद् विष्णुप्रसादतः॥’ इति गारुडे । ‘महादेव परे जन्मंस्तव मुक्तिर्निरूप्यते’। इति नारदीये । निश्चितफलं च ज्ञानम् - ‘तस्य तावदेव चिरम्’(छां.उ.६.१४.२) , ‘यदु(दि) च नार्चिषमेवाभिसम्भवति’(छां.उ.४.१५.५) इत्यादिश्रुतिभ्यः । |
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| text | Wikitext | न च कायव्यूहापेक्षा । ‘तद्यथैषीकातूलम्’(छां.उ.५.२४.३) , ‘तद्यथा(तद्वक्ष्यामि यथा) पुष्करपलाशे’(छां.उ.४.१४.३) , ‘ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि’(४.३७) इत्यादिवचनेभ्यः । प्रारब्धे त्वविरोधः । प्रमाणाभावाच्च । न च तत् शास्त्रं प्रमाणम्- ‘अक्षपादकणादानां साङ्ख्ययोगजटाभृताम् । मतमालम्ब्य ये वेदं दूषयन्त्यल्पचेतसः ॥’ इति निन्दनात् । यत्र तु स्तुतिस्तत्र शिवभक्तानां स्तुतिपरत्वमेव ; न सत्यत्वम् । न हि तेषामपि इतरग्रन्थविरुद्धार्थे प्रामाण्यम् । तथा ह्युक्तम्- ‘एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति । त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय । अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्व महाभुज । प्रकाशं कुरु चात्मानम् अप्रकाशं च मां कुरु ॥’ इति वाराहे । ‘कुत्सितानि च मिश्राणि रुद्रो विष्णुप्रचोदितः । चकार शास्त्राणि विभुर्ऋषयस्तत्प्रचोदिताः । दधीच्याद्याः पुराणानि तच्छास्त्रसमयेन तु । चक्रुर्वेदैस्तु ब्राह्माणि वैष्णवान् विष्णुवेदतः । पञ्चरात्रं भारतं च मूलरामायणं तथा । तथा पुराणं भागवतं विष्णुवेद इतीरितः । अतः शैवपुराणानि योग्यान्यन्याविरोधतः॥’ इति च नारदीये । अतो ज्ञानिनां भवत्येव मुक्तिः । भीष्मादीनां तु तस्मिन् क्षणे मुक्त्यभावः । ‘स्मरंस्त्यजति’ इति वर्तमानापदेशो हि कृतः ।तच्चोक्तम्- ‘ज्ञानिनां कर्मयुक्तानां कायत्यागक्षणो यदा । विष्णुमाया तदा तेषां मनो बाह्यं करोति हि ॥’ इति गारुडे । नचान्येषां तदा स्मृतिर्भवति - ‘बहुजन्मविपाकेन भक्तिज्ञानेन ये हरिम् । भजन्ति तत्स्मृतिं त्वन्ते देवो याति न चान्यथा ॥’ इत्युक्तेर्ब्रह्मवैवर्ते । |
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| verse_id | String | BGB_C02_V72 |
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| text | Wikitext | निर्बाणम् अशरीरम् । ‘कायो बाणं शरीरं च’ इत्यभिधानात् । ‘एतद्बाणमवष्टभ्य’ इति प्रयोगाच्च । निर्बाणशब्दप्रतिपादनम्- ‘अनिन्द्रियाः’ इत्यादिवत् । कथम् अन्यथा सर्वपुराणादिप्रसिद्धाकृतिर्भगवत उपपद्येत ? न चान्यद् भगवत उत्तमं ब्रह्म - ‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते’(भाग.१.२.११) इति भागवते । ‘भगवन्तं परं ब्रह्म’(भाग.३.२५.१०) , ‘परं ब्रह्म जनार्दनः’ , ‘परमं यो महद् ब्रह्म’(म.भा.१३..९) , ‘यस्मात् क्षरमतीतोऽहम् अक्षरादपि चोत्तमः’(१५.१८), ‘योऽसावतीन्द्रियग्राह्यः’(म.स्मृ.१.१) , ‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति’(गरुड.३,१.१८) , ‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः’(११.४३) इत्यादिभ्यः । न च तस्य ब्रह्मणोऽशरीरत्वाद् एतत् कल्प्यम् । तस्यापि शरीरश्रवणात्- ‘आनन्दरूपममृतम्’(आथ.४.१०,मु.उ.२.२.८) , ‘सुवर्णज्योतीः’(भृगुवल्लि.१५,तै.उ.३.१०.६) , ‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशः’(छां.उ.८.१.२) इत्यादिषु । यदि रूपं न स्यात्, ‘आनन्दम्’ इत्येव स्यात् ; न तु ‘आनन्दरूपम्’ इति । कथं च सुवर्णरूपत्वं स्याद् अरूपस्य ? कथं च दहरत्वम्? दहरस्थश्च- ‘केचित् स्वदेहे’ इत्यादौ रूपवान् उच्यते । ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः’(ऋ.सं,मं.१०.सू.९०.मं.१) , ‘रुग्मवर्णं कर्तारम्’(मु.उ.३.१.३) , ‘आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्’(श्वे.उ.३.८) , ‘सर्वतः पाणिपादं तत्’(श्वे.उ.३.१६) , ‘विश्वतश्चक्षुरुत’(श्वे.उ.३.३) इत्यादिवचनाद्, विश्वरूपाध्यायादेश्च रूपवान् अवसीयते। |
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| text | Wikitext | अतिपरिपूर्णतम-ज्ञान-ऐश्वर्य-वीर्य-आनन्द-श्री-शक्त्यादिमांश्च भगवान् । ‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च।’(श्वे.उ.६.८) , ‘यः सर्वज्ञः...’(आथ.१.९,मु.उ.१.१.९) , ‘आनन्दं ब्रह्मणः’(तै.उ.ब्रह्मवल्लि.९) , ‘एतस्यैवाऽनन्दस्य अन्यानि भूतानि मात्राम् उपजीवन्ति’ (बृह. ४,३.३२) , ‘अनादिमध्यान्तम् अनन्तवीर्यम्’ , ‘सहस्रलक्षामितकान्तिकान्तम्’ , ‘मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे’(भाग.६.५,४८) , ‘विज्ञानशक्तिरहमासम् अनन्तशक्तेः’(भाग.०३.१०.२४) , ‘तुर्यं (तु) तत् सर्वदृक् सदा’(माण्डूक्य.उ.२.४) , ‘आत्मानम् अन्यं च स वेद विद्वान्’(भाग.११.११.७) , ‘अन्यतमो मुकुन्दात् को नाम लोके भगवत्पदार्थः’(भाग.१.१८.२१) , ‘ऐश्वर्यस्य समग्रस्य’(बृहन्नारदीय.१,४६.१७) । ‘अतीव परिपूर्णं ते सुखं ज्ञानं च सौभगम् । यच्चात्ययुक्तं स्मर्तुं वा शक्तः कर्तुमतः परः ॥’ इत्यादिभ्यः । |
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| text | Wikitext | तानि च सर्वाण्यन्योन्यस्वरूपाणि - ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’(बृह. ३,९.३५) , ‘आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्’(तै.उ.३.६.१,भृगुवल्लि.२) , ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’(तै.उ.२.१,ब्रह्मवल्लि.२) , ‘यस्य ज्ञानमयं तपः’(आथ.१.९) , ‘समा भग प्रविश स्वाहा’(तै.उ.१.४.२,शिक्षावल्लि.११) । ‘न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोऽस्थिसम्भवा । न योगित्वादीश्वरत्वात् सत्यरूपाच्युतो विभुः ॥’, ‘सद्देहः सुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः । ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोऽक्षरः ॥’ इति पैङ्गिखिलेषु । ‘देहोऽयं मे सदानन्दो नायं प्रकृतिनिर्मितः । परिपूर्णश्च सर्वत्र तेन नारायणोऽस्म्यहम्॥’ इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते । तदेव लीलया चासौ परिच्छिन्नादिरूपेण दर्शयति मायया । ‘न च गर्भेऽवसद् देव्या न चापि वसुदेवतः । न चापि राघवाज्जातो न चापि जमदग्नितः । नित्यानन्दोऽव्ययोऽप्येवं क्रीडतेऽमोघदर्शनः ॥’ इति पाद्मे । ‘न वै स आत्माऽऽत्मवताम् अधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः’ । ‘सर्गादेरीशिताऽजः परमसुखनिधिर्बोधरूपोऽप्यबोधम् । लोकानां दर्शयन् यो मुनिसुतहृतात्मप्रियार्थे जगाम॥’ ‘स ब्रह्मवन्द्यचरणो जनमोहनाय (नरवत् प्रलापी) स्त्रीसङ्गिनाम् इति रतिं प्रथयंश्चचार।’ ‘पूर्तेरचिन्त्यवीर्यो यो यश्च दाशरथिः स्वयम् । रुद्रवाक्यम् ऋतं कर्तुम् अजितो जितवत् स्थितः ॥ योऽजितो विजितो भक्त्या गाङ्गेयं न जघान ह । न चाम्बा ग्राहयामास करुणः कोऽपरस्ततः ॥’ इत्यादिभ्यश्च स्कान्दे । न तत्र संसारसमानधर्मा निरूप्याः । यत्र च परावरभेदोऽवगम्यते तत्र अज्ञबुद्धिम् अपेक्ष्य अवरत्वं विश्वरूपमपेक्ष्यान्यत्र । तच्चोक्तम् - ‘परिपूर्णानि रूपाणि समान्यखिलरूपतः । तथाऽप्यपेक्ष्य मन्दानां दृष्टिं त्वाम् ऋषयोऽपि हि । परावरं वदन्त्येव ह्यभक्तानां विमोहनम् (ने) ॥’ इति गारुडे । न चात्र किञ्चिदुपचारादिति(चरितादि) वाच्यम् । अचिन्त्यशक्तेः, पदार्थवैचित्र्याच्चेत्युक्तम् । ‘कृष्णरामादिरूपाणि परिपूर्णानि सर्वदा । न चाणुमात्रं भिन्नानि तथाऽप्यस्मान् विमोहसि ॥’ इत्यादेश्च नारदीये । तस्मात् सर्वदा सर्वरूपेषु अपरिगणितानन्तगुणगणं नित्यनिरस्ताशेषदोषं च नारायणाख्यं परं ब्रह्म अपरोक्षज्ञानी ऋच्छति इति सिद्धम् ॥७२ ॥ |
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| text | Wikitext | कर्मणो ज्ञानम् अत्युत्तमम् इत्यभिहितं भगवता- ‘दूरेण ह्यवरं कर्म’ (२.४९.) इत्यादौ । एवं चेत् किमिति कर्मणि घोरे युद्धाख्ये नियोजयसि निवृत्तधर्मान् विनेत्याह- ज्यायसीति ॥ कर्मणः सकाशाद् बुद्धिर्ज्यायसी चेत् ते तव मता तत् तर्हि ॥ १-२ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C03_V03 |
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| name | String | bhashyam |
| text | Wikitext | ‘ज्यायस्त्वेऽपि बुद्धेः, आधिकारिकत्वात् त्वं कर्मण्यप्यधिकृत इति तत्र नियोक्ष्यामि’ इत्याशयवान् भगवानाह- लोक इति ॥ |
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| text | Wikitext | द्विविधा अपि जनाः सन्ति- गृहस्थादिकर्मत्यागेन ज्ञाननिष्ठाः सनकादिवत्, तत्स्था एव ज्ञाननिष्ठाश्च जनकादिवत् । मद्धर्मस्था एवेत्यर्थः । सांख्यानां ज्ञानिनां सनकादीनाम् । योगिनाम् उपायिनां जनकादीनाम् । ज्ञाननिष्ठा अप्याधिकारिकत्वाद् ईश्वरेच्छया लोकसंग्रहार्थत्वाच्च ये कर्मयोग्या भवन्ति तेऽपि योगिनः । निष्ठा स्थितिः । त्वं तु जनकादिवत् सकर्मैव ज्ञानयोग्यः, न तु सनकादिवत् तत्त्यागेनेत्यर्थः। सन्ति हीश्वरेच्छयैव कर्मकृतः प्रियव्रतादयोऽपि ज्ञानिन एव । तथा ह्युक्तम् ‘ईश्वरेच्छया विनिवेशितकर्माधिकारः’ इति ॥ ३ ॥ |
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| text | Wikitext | इतश्च नियोक्ष्यामीत्याह- न कर्मणामिति ॥ कर्मणां युद्धादीनाम् अनारम्भेण नैष्कर्म्यं निष्कर्मतया काम्यकर्मपरित्यागेन प्राप्यत इति मोक्षं, नाश्नुते । ज्ञानमेव तत्साधनं, न तु कर्माकरणमित्यर्थः । कुतः ? पुरुषत्वात् । सर्वदा स्थूलेन सूक्ष्मेण वा पुरेण युक्तो ननु जीवः ! यदि कर्माकरणेन मुक्तिः स्यात् स्थावराणां च । |
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| text | Wikitext | न चाकरणे कर्माभावान्मुक्तिर्भवति । प्रतिजन्म कृतानाम् अनन्तानां कर्मणां भावात् । न च सर्वाणि कर्माणि भुक्तानि । एकस्मिन् शरीरे बहूनि हि कर्माणि करोति । तानि चैकैकानि बहुजन्मफलानि कानिचित् । तत्र चैकैकानि कर्माणि भुञ्जन् प्राप्नोत्येव शेषेण मानुष्यम् । ततश्च बहुशरीरफलानि कर्माणी-त्यसमाप्तिः । तच्चोक्तम्- ‘जीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु । स्त्री वाऽप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जते ॥ चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः। अतोऽवित्त्वा परं देवं मोक्षाशा का महामुने ॥’ इति ब्राह्मे । यदि सादिः स्यात् संसारः पूर्वकर्माभावाद् अतत्प्राप्तिः। अबन्धकत्वं त्वकामेनैव भवति । तच्च वक्ष्यते ‘अनिष्टमिष्टम्’ (१८.१२) इति । |
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| text | Wikitext | ननु निष्कामकर्मणः फलाभावान्मोक्षः स्मृतः - ‘निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिति चोच्यते । निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥’ इति मानवे । अतस्तत्साम्याद् अकरणेऽपि भवति इत्यत आह- न चेति ॥ सन्न्यासः काम्यकर्मपरित्यागः । ‘काम्यानां कर्मणां न्यासम्’ (१८.२) इति वक्ष्यमाणत्वात् । अकामकर्मणाम् अन्तःकरणशुध्या ज्ञानान्मोक्षो भवति । तच्चोक्तम्- ‘कर्मभिश्शुद्धसत्त्वस्य वैराग्यं जायते हृदि ।’ इति भागवते । विरक्तानामेव च ज्ञानमित्युक्तम् । - ‘न तस्य तत्वग्रहणाय साक्षाद् वरीयसीरपि वाचस्समासन् । स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेध(धि)सौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥’ (भाग. ५-११-३) इति । न तु फलाभावात् । कर्माभावात् । अतो न कर्मत्याग एव मोक्षसाधनम् । |
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| text | Wikitext | यत्याश्रमस्तु प्रायत्यार्थो भगवत्तोषार्थश्च । अप्रयतत्वमेव हि प्रायो गृहस्थादीनाम् , इतरकर्मोद्योगात् । अप्रयतानां च न ज्ञानम् । तथाहि श्रुतिः - ‘नाशान्तो नासमाहितः’(कठ.1.3.10) इति । महांश्च यत्याश्रमे तोषो भगवतः । तथा ह्याह - ‘यत्याश्रमं तुरीयं तु दीक्षां मम सुतोषणीम्’ इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । आधिकारिकास्तु तत्स्था एव प्रायत्ये समर्थाः । स एव च महान् भगवत्तोषः । तच्चोक्तम् - ‘देवादीनामादिराज्ञां महोद्योगेऽपि नो मनः । विष्णोश्चलति तद्भोगोऽप्यतीव हरितोष(णम्)णः॥’ इति पाद्मे ॥४ ॥ |
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| text | Wikitext | न तु कर्माणि सर्वात्मना त्यक्तुं शक्यानीत्याह- न हीति ॥५॥ |
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| text | Wikitext | तथाऽपि शक्तितस्त्यागः कार्य इत्याह- कर्मेन्द्रियाणीति ॥ मन एव प्रयोजकमिति दर्शयितुमन्वयव्यतिरेकावाह- मनसा स्मरन् मनसा नियम्येति ॥ कर्मयोगं स्ववर्णाश्रमोचितम्, न तु गृहस्थकर्मैवेति नियमः । सन्न्यासादिविधानात्, सामान्यवचनाच्च ॥ ६-७ ॥ |
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| text | Wikitext | अतो नियतं स्ववर्णाश्रमोचितं कर्म कुरु ॥ ८ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘कर्मणा बध्यते जन्तुः’ इति कर्म बन्धकं स्मृतम् ? इत्यत आह- यज्ञार्थादिति ॥ कर्म बन्धनं यस्य लोकस्य स कर्मबन्धनः । यज्ञो विष्णुः । यज्ञार्थं सङ्गरहितं कर्म न बन्धकमित्यर्थः । ‘मुक्तसङ्गः’ इति विशेषणात् । ‘कामान् यः कामयते’ (मुं. ४. १-२) इति श्रुतेश्च । ‘अनिष्टमिष्टम्’ (१८.१२) इति वक्ष्यमाणत्वाच्च । ‘एतान्यपि तु कर्माणि’ (१८.६) इति च । ‘तस्मान्नेष्टि-याजुकः स्यात्’ (बृ.१.५.२) इति च । विशेषवचनत्वे समेऽपि विशेषणं परिशिष्यते ॥ ९ ॥ |
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| text | Wikitext | अत्रार्थवादमाह- सहयज्ञा इति ॥ १०-१३ ॥ |
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| text | Wikitext | हेत्वन्तरमाह- अन्नादिति ॥ यज्ञः पर्जन्यान्नत्वात् तत्कारणमुच्यते । पूर्वयज्ञविवक्षायां तस्य चक्रप्रवेशो न भवति । तद्धि आपाद्यं कर्मविधये । न तु साम्यमात्रेणेदानीं कार्यम् । |
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| text | Wikitext | मेघचक्राभिमानी च पर्जन्यः । तच्च यज्ञाद् भवति । ‘अग्नौ प्रास्ताऽऽहुतिः सम्यग् आदित्यमुपतिष्ठति । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥’ (म.स्मृ. ३.७६)इति स्मृतेः(तेश्च) । उभयवचनाद् आदित्यात् समुद्राच्चाविरोधः । अतश्च यज्ञात् पर्जन्योद्भवः सम्भवति । यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः, कर्म इतरक्रिया ॥ १४ ॥ |
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| text | Wikitext | कर्म ब्रह्मणो जायते । ‘एष ह्येव साधु कर्म कारयति’(कौ.3.9), ‘बुद्धिर्ज्ञानम्’(गी.10.4) इत्यादिभ्यः । न च मुख्ये सम्भाव्यमाने पारम्पर्येणौपचारिकं कल्प्यम् । न च जडानां स्वतः प्रवृत्तिः सम्भवति । ‘एतस्य वा अक्षरस्य’ इत्यादिसर्वनियमनश्रुतेश्च । ‘द्रव्यं कर्म च’ इत्यादेश्च अचिन्त्यशक्तिश्चोक्ता । जीवस्य च प्रतिबिम्बस्य बिम्बपूर्वैव चेष्टा । ‘न कर्तृत्वम्’ इत्यादिनिषेधाच्च । |
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| text | Wikitext | अक्षराणि प्रसिद्धानि । तेभ्यो ह्यभिव्यज्यते परं ब्रह्म । अन्यथानादिनिधनमचिन्त्यं परिपूर्णमपि ब्रह्म को जानाति? न च रूढिं विना योगाङ्गीकारो युक्तः । |
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| text | Wikitext | परामर्शाच्च ‘तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म’ (३.१५) इति । न ह्येकशब्देन द्विरुक्तेन भेदश्रुतिं विना वस्तुद्वयं कुत्रचिदुच्यते । |
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| text | Wikitext | तानि चाक्षराणि नित्यानि । ‘वाचा विरूप नित्यया’(ऋ. ८.६४.६) , ‘अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा’, ‘अत एव च नित्यत्वम्’ (ब्र.सू. १-३-२९) इत्यादिश्रुतिस्मृति-भगवद्वचनेभ्यः । दोषाश्चोक्ताः सकर्तृकत्वे । |
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| text | Wikitext | न चाबुद्धिपूर्वमुत्पन्नानि । तत्प्रमाणाभावात् । निःश्वसित-शब्दस्त्वक्लेशाभिप्रायः, नाबुद्धिपूर्वाभिप्रायः । ‘सोऽकामयत’ (तै. २.११) इत्यादेश्च । ‘इष्टं हुतम्’ (बृ. ६.१.२) इत्यादिरूपप्रपञ्चेन सहाभिधानाच्च । महातात्पर्यविरोधाच्च । तच्चोक्तं पुरस्तात् (गी.भा. २.२४)। न ह्यस्वातन्त्र्येणोत्पत्तिकर्तुः प्राधान्यम् । अस्वातन्त्र्यं च तदमतिपूर्वकत्वेन भवति । यथा रोगादीनां पुरुषस्य तज्जत्वेऽपि उत्पत्तिवचनान्यभिव्यक्त्यर्थानि , अभिमानिदेवताविषयाणि च । ‘नित्या’ इत्युक्त्वा ‘उत्सृष्टा’ इति वचनात् । अभिव्यञ्जके कर्तृवचनं चास्ति । ‘कृत्स्नं शतपथं चक्रे’ (मोक्षधर्मे) इति । कथमादित्यस्था वेदाः तेनैव क्रियन्ते ? वचनमात्राच्च निर्णयात्मक-शारीरकोक्तं बलवत् । |
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| text | Wikitext | शास्त्रं योनिः प्रमाणमस्येति तु शास्त्रयोनित्वम् । ‘जन्माद्यस्य यतः’ इत्युक्ते प्रमाणं हि तत्रापेक्षितं, न तु तस्य जातत्वं वेदकारणत्वं वा । न हि वेदकारणत्वं जगत्कारणत्वे हेतुः । न हि विचित्रजगत्सृष्टेर्वेदसृष्टिरशक्या सृज्यत्वे । न च सर्वज्ञत्वे । यदि वेदस्रष्टा सर्वज्ञः किमिति न जगत्स्रष्टा ? तस्माद् वेदप्रमाणकत्वमेवात्र विवक्षितम् । अतो नित्यान्यक्षराणि । यत एवं परम्परया यज्ञाभिव्यङ्ग्यं ब्रह्म तस्मात् तद् नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ |
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| text | Wikitext | तानि चाक्षराणि भूताभिव्यङ्ग्यानीति चक्रम् । तदेतत् जगच्चक्रं यो नानुवर्तयति, स तद्विनाशकत्वाद् अघायुः । पापनिमित्तमेव यस्याऽयुः सोऽघायुः ॥ १६ ॥ |
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| text | Wikitext | तर्ह्यतीव मनःसमाधानमपि न कार्यमित्यत आह - यस्त्विति ॥ रमणं परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । तृप्तिरन्यत्रालम्बुद्धिः । सन्तोषस्तज्जनकं सुखम् । ‘सन्तोषस्तृप्तिकारणम्’ इत्यभिधानात् । परमात्मदर्शनादिनिमित्तं सुखं प्राप्तः । अन्यत्र सर्वात्मनालम्बुद्धिं च । |
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| text | Wikitext | महच्च तत् सुखम् । तेनैवान्यत्रालम्बुद्धिरिति दर्शयति । आत्मन्येव च सन्तुष्टः, इति तत्स्थ एव सन् सन्तुष्ट इत्यर्थः । नान्यत् किमपि सन्तोषकारणम् इत्यवधारणम् । आत्मना तृप्तः । न ह्यात्मन्यलम्बुद्धिर्युक्ता । तद्वाचित्वं च ‘वयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमैः’ (भाग. १.१.१९) इति प्रयोगात् सिद्धम् । अध्याहारस्त्वगतिका गतिः । |
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| text | Wikitext | ‘आत्मरतिरेव’ इत्यवधारणाद् असम्प्रज्ञातसमाधिस्थस्यैव कार्यं न विद्यते । ‘स्थितप्रज्ञस्यापि कार्यो देहादिर्दृश्यते यदा ।स्वधर्मो मम तुष्ट्यर्थः सा हि सर्वैरपेक्षिता ॥’ इति वचनाच्च पञ्चरात्रे । अन्यदाऽन्यरतिरपीषत् सर्वस्य भवति । न च तत्रालम्बुद्धिमात्रमुक्तम् । ‘आत्मतृप्तः’ इति पृथगभिधानात् । कर्तृशब्दः कालावच्छेदेऽपि चायं प्रसिद्धो ‘यो भुङ्क्ते स तु न ब्रूयात्’ इत्यादौ । |
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| commentary_id | String | BGB C03 V17 B04 |
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| text | Wikitext | अतोऽसम्प्रज्ञातसमाधावेवैतत् । ‘मानवः’ इति ज्ञानिन एवासम्प्रज्ञातसमाधिर्भवतीति दर्शयति ‘मनु अवबोधने’ इति धातोः । परमात्मरतिश्चात्र विवक्षिता । ‘विष्णावेव रतिर्यस्य क्रिया तस्यैव नास्ति हि ।’इति वचनात् ॥ १७ ॥ |
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| text | Wikitext | तस्य ‘कर्मकाले वक्तव्योऽहम्’ इति कञ्चित् प्रत्युक्त्वा तत्कृतावात्मरत्यधिकः समो वाऽर्थो नास्ति । न च सन्ध्याद्यकृतौ कश्चिद्दोषोऽस्ति । |
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| text | Wikitext | न चैतदपहाय सर्वभूतेषु कश्चित् प्रयोजनाश्रयः । अर्थो येन दर्शनादिना भवति सोऽर्थ व्यपाश्रयः । |
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| text | Wikitext | ज्ञानमात्रेण प्रत्यवायो यद्यपि न भवति । तद् अर्जुनस्यापि समम् इति न तस्य कर्मोपदेशोपयोग्येतद् भवति । ईषत् प्रारब्धानर्थसूचकं च तद् भवति महच्चेद् वृत्रहत्यादिवत् ॥ १८ ॥ |
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| text | Wikitext | यतोऽसम्प्रज्ञातसमाधेरेव कार्याभावः, तस्मात् कर्म समाचर ॥१९॥ |
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| text | Wikitext | आचारोऽप्यस्तीत्याह- कर्मणैवेति ॥ कर्मणा सह कर्म कुवन्त एवेत्यर्थः । कर्म कृत्वैव ततो ज्ञानं प्राप्य वा । |
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| text | Wikitext | न तु ज्ञानं विना । प्रसिद्धं हि तेषां ज्ञानित्वं भारतादिषु । ‘तमेवं विद्वान्’ (तै.आ. ३.१२) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । अत्रापि कर्मणां ज्ञानसाधनत्वोक्तेश्च ‘बुद्धियुक्ताः’ (२.५१) इति । |
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| text | Wikitext | गत्यन्तरं च ‘नान्यः पन्थाः’ (तै.आ.३.१२) इत्यस्य नास्ति । इतरेषां ज्ञानद्वाराऽप्यविरोधः । यत्र च तीर्थाद्येव मुक्तिसाधनमुच्यते- ‘ब्रह्मज्ञानेन वा मुक्तिः प्रयागमरणेन वा । अथवा स्नानमात्रेण गोमत्यां कृष्णसन्निधौ ॥’ इत्यादौ, तत्र पापादिमुक्तिः, स्तुतिपरता च । |
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| text | Wikitext | तत्रापि हि कुत्रचिद् ब्रह्मज्ञानसाधनत्वमेवोच्यतेऽन्यथा मुक्तिं निषिध्य - ‘ब्रह्मज्ञानं विना मुक्तिर्न कथञ्चिदपीष्यते । प्रयागादेस्तु या मुक्तिर्ज्ञानोपायत्वमेव हि ॥’ इत्यादौ । न च तीर्थस्तुतिवाक्यानि तत्प्रस्तावेऽप्युक्तं ज्ञाननियमं घ्नन्ति । यथा कञ्चिद् दक्षं भृत्यं प्रति उक्तानि ‘अयमेव हि राजा किं राज्ञा’ इत्यादीनि । यथाऽऽह भगवान् - ‘यानि तीर्थादिवाक्यानि कर्मादिविषयाणि च । स्तावकान्येव तानि स्युरज्ञानां मोहकानि वा । भवेन्मोक्षस्तु मद्दृष्टेर्नान्यतस्तु कथञ्चन ॥’ इति नारदीये । अतोऽपरोक्षज्ञानादेव मोक्षः । कर्म तु तत्साधनमेव ॥ २० ॥ |
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| text | Wikitext | स यद् वाक्यादिकं प्रमाणं कुरुते , यदुक्तप्रकारेण तिष्ठतीत्यर्थः ॥ २१ ॥ |
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| text | Wikitext | विद्वदविदुषोः कर्मभेदमाह- प्रकृतेरिति॥ प्रकृतेर्गुणैः इन्द्रियादिभिः । प्रकृतिमपेक्ष्य गुणभूतानि हि तानि । तत्सम्बन्धीनि च । न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया ॥ २७ ॥ |
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| text | Wikitext | कर्मभेदस्य गुणभेदस्य च तत्त्ववित् । गुणा इन्द्रियादीनि । गुणेषु विषयेषु ॥ २८ ॥ |
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| text | Wikitext | प्रकृतेर्गुणेषु इन्द्रियादिषु सम्मूढाः । इन्द्रियाद्यभिमानाद्धि विषयादिसङ्गः । गुणकर्मसु विषयेषु कर्मसु च । ‘शब्दाद्या इन्द्रियाद्याश्च सत्त्वाद्याश्च शुभानि च । अप्रधानानि च गुणा निगद्यन्ते निरुक्तिगैः ॥’ इत्यभिधानात् । सत्त्वाद्यङ्गीकारे- ‘गुणा गुणेषु’ इत्ययुक्तं स्यात् ॥ २९ ॥ |
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| text | Wikitext | अतः सर्वाणि कर्माणि मय्येव सन्न्यस्य भ्रान्त्या जीवेऽध्यारोपितानि मय्येव विसृज्य ‘भगवानेव सर्वाणि कर्माणि करोति’ इति, मत्पूजेति च । आत्मानं मामधिकृत्य यच्चेतः तद् अध्यात्मचेतः । सन्न्यासस्तु भगवान् करोतीति । निर्ममत्वं नाहं करोमीति ॥ ३० ॥ |
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| text | Wikitext | फलमाह- ये म इति ॥ ये त्वेवं निवृत्तकमिणस्तेऽपि मुच्यन्ते ज्ञानद्वारा । किमु अपरोक्षज्ञानिनः ? न तु साधनान्तरमुच्यते । ‘निवृत्तादीनि कर्माणि ह्यपरोक्षेशदृष्टये । अपरोक्षेशदृष्टिस्तु मुक्तौ किञ्चिन्न मार्गते । सर्वं तदन्तराधाय मुक्तये साधनं भवेत् । न किञ्चिदन्तराधाय निर्वाणायापरोक्षदृक् ॥’ इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे । अत एव समुच्चयनियमोऽपि निराकृतः ॥ ३१-३२ ॥ |
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| text | Wikitext | एवं चेत् किमिति ते मतं नानुतिष्ठन्ति लोकाः इत्यत आह - सदृशमिति । प्रकृतिः पूर्वसंस्कारः ॥ ३३ ॥ |
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| text | Wikitext | तथाऽपि शक्तितो निग्रहः कार्यः । निग्रहात् सद्यः प्रयोजना-भावेऽपि भवत्येवातिप्रयत्नत इत्याशयवानाह- इन्द्रियस्येति ॥ तथा ह्युक्तम् - ‘संस्कारो बलवानेव ब्रह्माद्या अपि तद्वशाः । तथाऽपि सोऽन्यथाकर्तुं शक्यतेऽतिप्रयत्नतः ॥’ इति ॥ ३४ ॥ |
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| text | Wikitext | तथाऽप्युग्रं युद्धकर्म ? इत्यत आह- श्रेयानिति ॥ ३५ ॥ |
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| text | Wikitext | बहवः कर्मकारणाः सन्ति, क्रोधादयः कामश्च । तत्र को बलवान् ? इति पृच्छति- अथेति ॥ अथेत्यर्थान्तरं ‘तयोर्न वशमागच्छेत्’ इति प्रश्नप्रापकम् ॥ ३६ ॥ |
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| text | Wikitext | यस्तु बलवान् प्रवर्तकः स एष कामः । क्रोधो ऽप्येष एव तज्जन्यत्वात् । ‘कामात् क्रोधोऽभिजायते’ (२.६२) इति ह्युक्तम् । यत्रापि गुरुनिन्दादिनिमित्तः क्रोधस्तत्रापि भक्तिनिमित्त-अनिन्दा-कामनिमित्त एव । ये त्वन्यथा वदन्ति ते शङ्करान्न सूक्ष्मं जानन्ति । उक्तं च ‘ऋते कामं न कोपाद्या जायन्ते हि कथञ्चन’ इति । महाशनः । महद्धि कामभोग्यम् । महाब्रह्महत्यादिकारणत्वान् महापाप्मा । सर्वपुरुषार्थविरोधित्वाद् वैरी ॥ ३७ ॥ |
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| text | Wikitext | कथं विरोधी सः ? इदमनेनावृतम् । यथा धूमेनाग्निरावृतः प्रकाश-रूपोऽप्यन्येषां न सम्यग्दर्शनाय तथा परमात्मा । यथाऽऽदर्शो मलेनावृतोऽन्याभिव्यक्तिहेतुर्न भवति, तथाऽन्तःकरणं परमात्मा-देर्व्यक्तिहेतुर्न भवति कामेनावृतम् । यथोल्बेनावृत्य बद्धो भवति गर्भस्तथा कामेन जीवः ॥ ३८ ॥ |
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| text | Wikitext | शास्त्रतो जातमपि ज्ञानं परमात्माऽपरोक्ष्याय न प्रकाशते ; कामेनावृतं ज्ञानिनोऽपि, किमु अल्पज्ञानिनः ! कामरूपेण कामाख्येन नित्यवैरिणा । दुष्पूरेण दुःखेन हि कामः पूर्यते । न हीन्द्रादिपदं सुखेन लभ्यते । यद्यपीन्द्रादिपदं प्राप्तम्, पुनर्ब्रह्मादिपदमिच्छतीत्यलम्बुद्धिर्नास्तीती अनलः । उक्तं च- ‘ज्ञानस्य ब्रह्मणश्चाग्नेर्धूमो बुद्धेर्मलं तथा । आदर्शस्याथ जीवस्य गर्भोल्बोपि हि कामकः ॥’ इति ॥३९ ॥ |
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| text | Wikitext | वधार्थं शत्रोरधिष्ठानमाह- इन्द्रियाणीति ॥ एतैर्ज्ञानमावृत्य बुध्यादिभिर्हि विषयैः ज्ञानमावृतं भवति ॥ ४० ॥ |
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| text | Wikitext | हृताधिष्ठानो हि शत्रुर्नश्यति ॥ ४१ ॥ |
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| text | Wikitext | शत्रुहनन आयुधरूपं ज्ञानं वक्तुं ज्ञेयमाह- इन्द्रियाणीति ॥ ‘असङ्गज्ञानासिमादाय तराति पारम्’ इति ह्युक्तम् । शरीराद् इन्द्रियाणि पराणि उत्कृष्टानि । न केवलं बुद्धेः परः । श्रुत्युक्त-प्रकारेणाव्यक्तादपि । ‘अव्यक्तात् पुरुषः परः’ इति हि श्रुतिः । न च तत्रतत्रोक्तैकदेशज्ञानमात्रेण भवति मुक्तिः । सार्वत्रिक-गुणोपसंहारो हि भगवता गुणोपसंहारपादेऽभिहितः । ‘आनन्दादयः प्रधानस्य’ (ब्र.सू. ३-३-१२) इत्यादिना । तथा चान्यत्र- ‘अपौरुषेयवेदेषु विष्णुवेदेषु चैव हि । सर्वत्र ये गुणाः प्रोक्ताः सम्प्रदायागताश्च ये ॥ सर्वैस्तैः सह विज्ञाय ये पश्यन्ति परं हरिम् । तेषामेव भवेन्मुक्तिर्नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति गारुडे । तस्मादव्यक्तादपि परत्वेन ज्ञेयः । न चात्र जीव उच्यते । ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते’(२.५९) इत्युक्तत्वात् । ‘अविहाय परं मत्तो जयः कामस्य वै कुतः’ इति च । अतः परमात्मज्ञानमेवात्र विवक्षितम् । आत्मानं मनः । आत्मना बुध्या ॥ ४२-४३ ॥ |
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| text | Wikitext | पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह - इममिति ॥ १-३ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘मयि सर्वाणि’(३.३०) इत्युक्तं तन्माहात्म्यमादितो ज्ञातुं पृच्छति - अपरमिति ॥ ४-५ ॥ |
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| text | Wikitext | न तर्ह्यनादिर्भवान् ? इत्यत आह - अजोऽपीति ॥ अव्यय आत्मा= देहोऽपीति अव्ययात्मा । ‘अनन्तं विश्वतो मुखम्’(११.११) इति हि रूपविशेषणमुत्तरत्र । ‘एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्’ (भाग.१.३.५) इति च । ‘जगृहे.....’(भाग.१.३.१) इति तु व्यक्तिः । युक्तयस्तूक्ताः । आत्मानादित्वं तु सर्वसमम् । |
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| text | Wikitext | कथमनादिनित्यस्य जनिः? प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय । प्रकृत्या जातेषु वसुदेवादिषु । तथैव (तयैव) तेषां जात इव प्रतीयत इत्यर्थः । न तु स्वतन्त्रामधिष्ठायेत्याह - स्वामिति ॥ ‘द्रव्यं कर्म च...’ (भाग.२.५.१४) इति ह्युक्तम् । सा हि तत्रोक्ता । ततः सर्वसृष्टेः । आत्ममायया आत्मज्ञानेन । प्रकृतेः पृथगभिधानात् । ‘केतुः केतश्चितिश्चित्तं मतिः क्रतुर्मनीषा माया’ इति ह्यभिधानम् । सृष्टिकारणया तेषां शरीरादि सृष्ट्वा विमोहिकयाऽजात एव जात इव प्रतीयते वा । उक्तं च– ‘महदादेस्तु माता या श्रीर्भूमिरिति कल्पिता । विमोहिका च दुर्गाख्या ताभिर्विष्णुरजोऽपि हि । जातवत् प्रथते ह्यात्मचिद्बलान्मूढचेतसाम् ॥’ इति । ईश्वरः ईशेभ्योऽपि वरः । तच्चोक्तम्- ‘ईशेभ्यो ब्रह्मरुद्रश्रीशेषादिभ्यो यतो भवान् । वरोऽत ईश्वराख्या ते मुख्या नान्यस्य कस्यचित् ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते । ‘समर्थ ईश इत्युक्तस्तद्वरत्वात्त्वमीश्वरः’ इति च ॥ ६,७ ॥ |
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| text | Wikitext | न जन्मनैव परित्राणादिकं कार्यमिति नियमः । तथाऽपि लीलया स्वभावेन च यथेष्टचारी । तथाह्युक्तम्– ‘देवस्यैष स्वभावोऽयम्’। ‘लोकवत् तु लीलाकैवल्यम्’ । ‘क्रीडतो बालकस्येव चेष्टां तस्य निशामय’ ।(विष्णुपुराण.१.२.१८) ‘.....अरिभयादिव स्वयं पुराद् व्यवात्सीद् यदनन्तवीर्यः’ (भाग.३.२.१६)। ‘पूर्णोऽयमस्यात्र न किञ्चिदाप्यं तथाऽपि सर्वाः कुरुते प्रवृत्तीः । अतो विरुद्धेषुमिमं वदन्ति परावरज्ञा मुनयः प्रशान्ताः ॥’ इत्याद्यृग्वेदखिलेषु॥ ८ ॥ |
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| text | Wikitext | पृथङ् मुक्त्युक्तिः सर्वज्ञाननियमदर्शनार्थम् ; न तु तावन्मात्रेण मुक्तिरित्युक्तम् । ‘वेदाद्युक्तं तु सर्वं यो ज्ञात्वोपास्ते सदा हि माम् । तस्यैव दर्शनपथं यामि नान्यस्य कस्यचित् ॥’ इत्युक्तेश्च महाकौर्मे । अत्रोक्तस्यैतज्ज्ञात्वैव जन्म नैतीति गतिः । इतरवाक्यानां नान्या गतिः । ‘नान्यस्य कस्यचित्’ इति विशेषणात् । ‘तत्त्वतः’ इति विशेषणाच्च सर्वज्ञानमापतति । यत्रैवं भवति यत्र तत्त्वत इति विशेषणे न विरोधः । उक्तं च– ‘एकं च तत्त्वतो ज्ञातुं विना सर्वज्ञतां नरः । न समर्थो महेन्द्रोऽपि तस्मात् सर्वत्र जिज्ञसेत्’ ॥ इति स्कान्दे ॥९ ॥ |
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| text | Wikitext | सन्ति च तथा मुक्ता इत्याह– वीतरागेति ॥ मन्मयाः मत्प्रचुराः । सर्वत्र मां विना न किञ्चित् पश्यन्तीत्यर्थः ॥ १० ॥ |
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| text | Wikitext | न च मद्भजनमात्रेण मुक्तिर्भवत्यन्यदेवतादिरूपेण । तथाऽपि सर्वेषामानुरूप्येण फलं ददामीत्याह - ये यथेति ॥ भजामि सेवयामि फलदानेन; न तु गुणभावेन । कथमयं विशेषः? इत्यत आह - मम वर्त्मेति ॥ अन्यदेवता यजन्तोऽपि मम वर्त्मैवानुवर्तन्ते । सर्वकर्मकर्तृत्वाद् भोक्तृत्वाच्च मम । |
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| text | Wikitext | ‘योऽप्यन्यदेवताभक्ताः’(९.२३) इति हि वक्ष्यति । ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१७ व,६ अनु) इति हि श्रुतिः । स भगवानेव च तत्राभिधीयते । ‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितम्’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१७ व) इत्यादि तल्लिङ्गात् ॥ ११ ॥ |
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| text | Wikitext | कुतो मम वर्त्मानुवर्तन्ते ? क्षिप्रं हि ॥ अत एव हि फलप्राप्तिः । ‘तस्मात्ते धनसनयः’(छा.१.३.९) इति हि श्रुतिः ॥ १२ ॥ |
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| text | Wikitext | अहमेव हि कर्तेत्याह - चातुर्वर्ण्यमिति ॥ चतुर्वर्णसमुदायः । सात्त्विको हि ब्राह्मणः । सात्त्विकराजसः क्षत्रियः । राजसतामसो वैश्यः । तामसः शूद्रः इति गुणविभागः । कर्मविभागस्तु ‘शमो दमः’(१८.४२) इत्यादिना वक्ष्यते । क्रियाया वैलक्षण्यात् कर्ताऽप्यकर्ता । तथाहि श्रुतिः– ‘विश्वकर्मा विमनाः...’(ऋ.सं.८ अ.३ अ.१५ व,८२ सू) इत्यादि । ‘.....तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः।’(भाग.६.४.४६) इत्यादि च । साधितं चैतत् पुरस्तात् ॥ १३ ॥ |
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| text | Wikitext | अत एव न मां कर्माणि लिम्पन्ति । इतश्च न लिम्पन्तीत्याह - न मे कर्मफले स्पृहा ॥ इच्छामात्रं त्वस्ति; न तु तत्राभिनिवेशः । तच्चोक्तम्– ‘आकाङ्क्षन्नपि देवोऽसौ नेच्छते लोकवत् परः । नह्याग्रहस्तस्य विष्णोर्ज्ञानं कामो हि तस्य तु ॥’ इति । न च केचिन्मुक्ता भवन्तीति क्रमेण सर्वमुक्तिः । तथाहि श्रुतिः- ‘ज्ञात्वा तमेवं मनसा हृदा च भूयो न मृत्युमुपयाति विद्वान्’ इति, ‘कथं वा इति, अनन्ता वा इत्यनन्तवत् इति होवाच’ इति ॥ १४ ॥ |
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| text | Wikitext | एवं ज्ञात्वा कर्मकरण आचारोऽप्यस्तीत्याह - एवमिति ॥ पूर्वतरं कर्म पूर्वभावीत्यर्थः ॥ १५ ॥ |
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| text | Wikitext | कर्म कुर्वित्युक्तम् । तस्य कर्मणो दुर्ज्ञेयत्वमाह सम्यग् वक्तुम् - किं कर्मेति ॥ १६ ॥ |
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| text | Wikitext | न केवलं तज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसे, ज्ञात्वैवेत्याशयवानाह - कर्मण इति ॥ तच्चोक्तम्– ‘अज्ञात्वा भगवान् कस्य कर्माकर्मविकर्मकम् । दर्शनं याति हि मुने कुतो मुक्तिश्च तद् विना ॥’ इति । अकर्म कर्माकरणम् । कर्माकर्मान्यद् विकर्म । निषिद्धम् । बन्धकत्वात् । ततो विविच्य कर्मादि बोद्धव्यमित्यादि । न च शापादिना । कवयोऽप्यत्र मोहिताः । अशक्यं चैतज्ज्ञातुमित्याह - गहनेति ॥ १७ ॥ |
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| text | Wikitext | कर्मादिस्वरूपमाह - कर्मणीति ॥ कर्मणि क्रियमाणे सति अकर्म यः पश्येत् - विष्णोरेव कर्म, नाहं चित्प्रतिबिम्बः किञ्चित् करोमि इति । अकर्मणि सुप्त्यादावकरणावस्थायां परमेश्वरस्य यः कर्म पश्यति- ‘अयमेव परमेश्वरः सर्वदा सर्वसृष्ट्यादि करोति’ इति । स बुद्धिमान् ज्ञानी । स एव च युक्तो योगयुक्तः । सर्वाकरणात् स एव च कृत्स्नकर्मकृत् कृत्स्नफलत्वात् ॥ १८ ॥ |
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| text | Wikitext | एतदेव प्रपञ्चयति - यस्य इत्यादिना श्लोकपञ्चकेन । उक्तप्रकारेण ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम् ॥ १९ ॥ |
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| text | Wikitext | न च कामसङ्कल्पाभावेनालम् । आसङ्गं स्नेहं च त्यक्त्वा । ज्ञानस्वरूपमाह पुनः - नित्यतृप्त इति ॥ नित्यतृप्तनिराश्रयेश्वरसरूपोऽस्मीति तथाविधः ॥ २० ॥ |
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| text | Wikitext | कामादित्यागोपायमाह - निराशीरिति ॥ यतचित्तात्मा भूत्वा निराशीः इत्यर्थः । आत्मा मनः । परिग्रहत्यागः अनभिमानम् । ‘नैव किञ्चित् करोति’(४.२०) इत्यस्याभिप्रायमाह - नाऽप्नोति किल्बिषमिति ॥ २१॥ |
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| text | Wikitext | यतचित्तात्मनो लक्षणमाह - यदृच्छालाभेति ॥ कथं द्वन्द्वातीतत्वमित्यत आह - समः सिद्धाविति ॥ २२ ॥ |
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| text | Wikitext | उपसंहरति- गतसङ्गस्येति ॥ गतसङ्गस्य फलस्नेहरहितस्य । मुक्तस्य शरीराद्यनभिमानिनः । ज्ञानावस्थितचेतसः परमेश्वरज्ञानिनः ॥ २३ ॥ |
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| text | Wikitext | ज्ञानावस्थितचेतस्त्वं स्पष्टयति - ब्रह्मार्पणमिति ॥ सर्वमेतद् ब्रह्मेत्युच्यते । तदधीनसत्ताप्रतीतित्वात् । न तु तत्स्वरूपत्वात् । उक्तं हि- ‘त्वदधीनं यतः सर्वमतः सर्वो भवानिति । वदन्ति मुनयः सर्वे न तु सर्वस्वरूपतः ॥’ इति पाद्मे । ‘सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम्’ (ऐत.२.५.३) इति च । ‘एतं ह्येव बह्वृचाः..’(ऐत.२.७.३.७) इत्यादि च । समाधिना सह ब्रह्मैव कर्म ॥२४ ॥ |
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| text | Wikitext | यज्ञभेदानाह - दैवमित्यादिना ॥ दैवं भगवन्तम् । स एव तेषां यज्ञः । भगवदुपासनं यज्ञमिति क्रियाविशेषणम् । नान्यत् तेषामस्ति यतीनां केषाञ्चित् । यज्ञं भगवन्तम् । ‘यज्ञेन यज्ञम्.....’(ऋ.८अ.४अ.१९व. ९०सू.१६मं) , ‘यज्ञो विष्णुर्देवता..’ इत्यादिश्रुतिभ्यः । यज्ञेन प्रसिद्धेनैव । यज्ञं प्रति यज्ञेन जुह्वतीति सर्वत्र समम्- ‘तं यज्ञम्....’(ऋ.८अ.४अ.१८व.) इत्यादौ । उक्तं च- ‘विष्णुं रुद्रेण पशुना ब्रह्मा ज्येष्ठेन सूनुना । अयजन्मानसे यज्ञे पितरं प्रपितामहः ॥’ इति ॥ २५,२६ ॥ |
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| text | Wikitext | आत्मसंयमाख्योपायाग्नौ ॥ २७ ॥ |
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| text | Wikitext | द्रव्यं जुह्वतीति द्रव्ययज्ञाः । तपः परमेश्वरार्पणबुध्या तत्र जुह्वतीति तपोयज्ञा इत्यादि । ‘इदं तपो हविः तद् ब्रह्माग्नौ जुहोमि तत्पूजार्थम्’ इति होमः । तदर्पण एव च होमबुद्धिः ॥ २८ ॥ |
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| text | Wikitext | अपरे प्राणायामपरायणाः प्राणम् अपाने जुह्वति, अपानं च प्राणे । कुम्भकस्था एव भवन्तीत्यर्थः ॥ २९ ॥ |
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| text | Wikitext | नियताहारत्वेनैव प्राणशोषात् प्राणान् प्राणेषु जुह्वति । ‘यच्छेद् वाङ्मनसी प्राज्ञः’(काठ.१.७.१३) इत्यादिश्रुत्युक्तप्रकारेण वा । अन्यदपि ग्रन्थान्तरे सिद्धम्- ‘यदस्याल्पाशनं तेन प्राणाः प्राणेषु वै हुताः’ इति ॥ ३०, ३१ ॥ |
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| text | Wikitext | ब्रह्मणः परमात्मनो मुखे । ‘अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च’(९.२४) इति हि वक्ष्यति । मानसवाचिककायिककर्मजा एव हि ते सर्वे । एवं ज्ञात्वा तानि कर्माणि कृत्वा विमोक्ष्यसे । युद्धं परित्यज्य यद् मोक्षार्थं करिष्यसि तदपि कर्म । अतो विहितं न त्याज्यमिति भावः ॥ ३२ ॥ |
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| text | Wikitext | अखिलम् उपासनाद्यङ्गयुक्तम् । ज्ञानफलमेवेत्यर्थः ॥ ३३ ॥ |
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| text | Wikitext | इदानीमपि ज्ञान्येव । तथाऽप्यभिभवान्मोहः । मा तूक्ता ॥ ३४॥ |
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| text | Wikitext | येन ज्ञानेन मय्यात्मभूते सर्वभूतानि अथो तस्मादेव मोहनाशात् पश्यसि॥ ३५ ॥ |
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| text | Wikitext | करणभूतं ज्ञानं स्तौति पुनः श्लोकत्रयेण ॥ ३६॥ |
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| text | Wikitext | तत्साधनं विरोधिफलं च तदुत्तरैरुक्त्वोपसंहरति- |
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| text | Wikitext | नियमनादिना सकललोककर्षणात् कृष्णः ।तच्चोक्तम्- ‘यतः कर्षसि देवेश नियम्य सकलं जगत् । अतो वदन्ति मुनयः कृष्णं त्वां ब्रह्मवादिनः ॥’ इति महाकौर्मे । संन्यासशब्दार्थं भगवानेव वक्ष्यति । अयं प्रश्नाभिप्रायः(शयः) - ‘यदि संन्यासः श्रेयः अधिकः स्यात्, तर्हि संन्यासस्येेषद्(स्यैतद्)विरोधि युद्धम्’ इति ॥१ ॥ |
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| text | Wikitext | नायं संन्यासो यत्याश्रमः । ‘द्वन्द्वत्यागात्तु संन्यासान्मत्पूजैव गरीयसी ॥’ इति वचनात् । ‘तानि वा एतान्यवराणि तपांसि न्यास एवात्यरेचयत्’(म.ना.उ.१६.१२) । इति च । ‘संन्यासस्तु तुरीयो यो निष्क्रियाख्यः सधर्मकः । न तस्मादुत्तमो धर्मो लोके कश्चन विद्यते ॥ तद्भक्तोऽपि हि यद् गच्छेत् तद्गृहस्थो न धार्मिकः । मद्भक्तिश्च विरक्तिस्तदधिकारो निगद्यते । यदाऽधिकारो भवति ब्रह्मचार्यपि प्रव्रजेत् ॥’ इति नारदीये । ‘ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्’ । ‘यदहरेव विरजेत्’(जा.उ.४.१) इति च । ‘संन्यासे तु तुरीये वै प्रीतिर्मम गरीयसी (महीयसी) । येषामत्राधिकारो न, तेषां कर्मेति निश्चयः ॥’ इत्यादेश्च ब्राह्मे । अतो नात्राऽश्रमः संन्यास उक्तः ॥२ ॥ |
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| text | Wikitext | संन्यासशब्दार्थमाह - ज्ञेय इति ॥ संन्यासस्य निःश्रेयसकरत्वं ज्ञापयितुं तच्छब्दार्थं स्मारयति - ज्ञेय इति ॥ ३ ॥ |
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| text | Wikitext | संन्यासो हि ज्ञानान्तरङ्गत्वेनोक्तः- ‘न तस्य तत्त्वग्रहणाय’(भाग.५.११.३) इत्यादौ । अतः कथं सोऽवमः? इत्यत आह - साङ्ख्ययोगाविति ॥ उभयोरप्यन्तरङ्गत्वेनाविरोधः । ‘अग्निमुग्धो हवै धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रतिजानाति’(तै.) , ‘मा वः पदव्यः पितरस्मदाश्रिता या यज्ञशालासनधूमवर्त्मनाम्’(भाग.४.४.२१) इत्यादि काम्यकर्मविषयमिति भावः । ये त्वन्यथा वदन्ति ते बालाः ॥ ४ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘एकमपि’(५.४) इत्यस्याभिप्रायमाह - यत् साङ्ख्यैरिति ॥ योगिभिरपि ज्ञानद्वारा ज्ञानफलं प्राप्यत इत्यर्थः ॥ ५ ॥ |
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| text | Wikitext | इतश्च संन्यासाद् योगो वर इत्याह - संन्यासस्त्विति ॥ योगाभावे मोक्षादिफलं न भवति । अतः कामजयादिदुःखमेव तस्य । मोक्षाद्येव हि फलम् । अन्यत् फलम् अल्पत्वाद् अफलमेवेत्याशयः । तच्चोक्तम्- ‘विना मोक्षफलं यत्तु न तत्फलमुदीर्यते’ । इति पाद्मे । यत्तु महत्फलयोग्यं तस्याल्पं फलमेव न भवति । यथा पद्मरागस्य तण्डुलमुष्टिः । महाफलश्च योगयुक्तश्चेत् संन्यास इत्याह - योगयुक्त इति ॥ मुनिः संन्यासी । तथाचोक्तम्- ‘स हि लोके मुनिर्नाम यः कामक्रोधवर्जितः।’ इति ॥ ६ ॥ |
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| text | Wikitext | एतदेव प्रपञ्चयति - योगयुक्त इति ॥ सर्वभूतात्मभूतः परमेश्वरः । ‘यच्चाऽप्नोति’(म.भा) इत्यादेः । स आत्मभूतः स्वसमीपं प्रति आदानादिकर्ता यस्य सः सर्वभूतात्मभूतात्मा ॥ ७ ॥ |
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| text | Wikitext | संन्यासं स्पष्टयति पुनः श्लोकद्वयेन ॥ ८, ९ ॥ |
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| text | Wikitext | संन्यासयोगयुक्त एव च कर्मणा न लिप्यत इत्याह- ब्रह्मणीति ॥ साधननियमोपचारत्वनिवृत्त्यर्थं पुनःपुनः फलकथनम् ॥ १० ॥ |
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| text | Wikitext | एवं चाऽचार इत्याह - कायेनेति ॥ ११ ॥ |
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| text | Wikitext | पुनर्युक्त्यादिनियमनार्थं युक्तायुक्तफलमाह - युक्त इति ॥ युक्तो योगयुक्तः॥ १२ ॥ |
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| text | Wikitext | पुनः संन्यासशब्दार्थं स्पष्टयति - सर्वकर्माणीति ॥ ‘मनसा’ इति विशेषणाद् अभिमानत्यागः ॥ १३ ॥ |
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| text | Wikitext | न च करोति वस्तुत इत्याह - न कर्तृत्वमिति ॥ प्रभुर्हि जीवो जडमपेक्ष्य ॥ १४, १५ ॥ |
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| text | Wikitext | ज्ञानमेवाज्ञाननाशकमित्याह - ज्ञानेनेति ॥ प्रथमज्ञानं परोक्षम् ॥ १६ ॥ |
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| text | Wikitext | अपरोक्षज्ञानाव्यवहितसाधनमाह - तद्बुद्धय इति ॥ १७ ॥ |
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| text | Wikitext | परमेश्वरस्वरूपाणां सर्वत्र साम्यदर्शनं चापरोक्षज्ञानसाधनमित्याशयवानाह - विद्येति ॥ १८ ॥ |
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| text | Wikitext | तदेव स्तौति - इहैवेति ॥ १९ ॥ |
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| text | Wikitext | संन्यासयोगज्ञानानि मिलित्वा प्रपञ्चयत्यध्यायशेषेण- ॥ २० ॥ |
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| text | Wikitext | पुनर्योगस्याऽधिक्यं स्पष्टयति - बाह्यस्पर्शेष्विति ॥ कामरहित आत्मनि यत् सुखं विन्दति स एव ब्रह्मयोगयुक्तात्मा चेत् तदेव अक्षयं सुखं विन्दति । ब्रह्मविषयो योगो= ब्रह्मयोगः । ध्यानादियुक्तस्यैव आत्मसुखमक्षयम् । अन्यथा नेत्यर्थः ॥ २१ ॥ |
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| text | Wikitext | संन्यासार्थं कामभोगं निन्दयति - ये हीति ॥ २२ ॥ |
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| text | Wikitext | तत्परित्यागं प्रशंसयति - शक्नोतीति ॥ कामक्रोधोद्भवं वेगं सोढुं शक्नोति, शरीरविमोक्षणात् प्राक्, यथा मनुष्यशरीरे सोढुं सुकरं तथा नान्यत्रेति भावः । ब्रह्मलोकादिस्तु जितकामानामेव भवति ॥ २३ ॥ |
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| text | Wikitext | ज्ञानिलक्षणं प्रपञ्चयत्युत्तरश्लोकैः- |
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| text | Wikitext | आरामः परदर्शनादिनिमित्तं सुखम् । अत्र तु परमात्मदर्शनादिनिमित्तं तत् । सुखं तूपद्रवक्षये व्यक्तम् । अत्र तु कामादिक्षये व्यक्तमात्मनः सुखम् । स्वयञ्ज्योतिष्ट्वाद् भगवतः। तद्व्यक्तेरन्तर्ज्योतिः । सर्वेषामन्तर्ज्योतिष्ट्वेऽपि व्यक्तेर्विशेषः । असम्प्रज्ञातसमाधीनां बाह्यादर्शनात् । दर्शनेऽप्यकिञ्चित्करादेवशब्दः । उक्तं चैतत्- ‘दर्शनस्पर्शसम्भाषाद् यत् सुखं जायते नृणाम् । आरामः स तु विज्ञेयः सुखं कामक्षयोदितम् ॥’ इति नारदीये । ‘स्वज्योतिष्ट्वान्महाविष्णोरन्तर्ज्योतिस्तु तत्स्थितः’ । इति च । अन्तःसुखत्वादेः कारणमाह - ब्रह्मणि भूत इति ॥ २४ ॥ |
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| text | Wikitext | पापक्षयाच्चैतद् भवतीत्याह - लभन्त इति ॥ क्षीणकल्मषा भूत्वा छिन्नद्वैधाऽऽयतात्मानः । द्वेधा भावो = द्वैधम् । संशयो विपर्ययो वा तच्चोक्तम्- ‘विपर्ययः संशयो वा यद् द्वैधं त्वकृतात्मनाम् । ज्ञानासिना तु तच्छित्त्वा मुक्तसङ्गः परं व्रजेत् ॥’ इति च। छिन्नद्वैधास्त एवायतात्मानः = दीर्घमनसः सर्वज्ञा इत्यर्थः । तत एव छिन्नद्वैधाः । तच्चोक्तम्- ‘क्षीणपापा माहाज्ञाना (महद् ज्ञात्वा) जायन्ते गतसंशयाः’ । इति । छिन्नद्वैधाः, यतात्मान इति वा ॥२५ ॥ |
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| text | Wikitext | सुलभं च तेषां ब्रह्मेत्याह - कामक्रोधेति ॥ अभितः सर्वतः ॥ २६ ॥ |
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| text | Wikitext | ध्यानप्रकारमाह - स्पर्शानित्यादिना ॥ बाह्यान् स्पर्शान् बहिः कृत्वा = श्रोत्रादीनि योगेन नियम्येत्यर्थः । चक्षुः भ्रुवोरन्तरे कृत्वा = भ्रुवोर्मध्यमवलोकयन् इत्यर्थः । उक्तं च - ‘नासाग्रे वा भ्रुवोर्मध्ये DfyanI (ज्ञानी) चक्षुर्निधापयेत्’ । इति । प्राणापानौ समौ कृत्वा कुम्भके स्थित्वेत्यर्थः ॥ २७, २८ ॥ |
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| text | Wikitext | ध्येयमाह - भोक्तारमिति ॥ २९ ॥ |
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| text | Wikitext | विवक्षितं संन्यासमाह योगेन सह - अनाश्रित इति ॥ चतुर्थाश्रमिणोऽप्यग्निः क्रिया चोक्ता ‘दैवमेव’(४.२५) इत्यादौ । ‘अग्निर्ब्रह्म च तत्पूजा क्रिया न्यासाश्रमे स्मृता’ । इति च । तस्माद् निरग्निरक्रियः संन्यासी योगी च न भवत्येव ॥१ ॥ |
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| text | Wikitext | संन्यासोऽपि योगान्तर्भूत इत्याह - यं संन्यासमिति ॥ कामसङ्कल्पाद्यपरित्यागे कथमुपायवान् स्यादित्याशयः ॥ २ ॥ |
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| text | Wikitext | कियत्कालं कर्म कर्तव्यम् ? इत्यत आह - आरुरुक्षोर्मुनेरिति ॥ योगमारुरुक्षोः उपायसम्पूर्तिमिच्छोः । योगारूढस्य सम्पूर्णोपायस्य । अपरोक्षज्ञानिन इत्यर्थः । कारणं परमसुखकारणम् । अपरोक्षज्ञानिनोऽपि समाध्यादिफलमुक्तम् । तस्य सर्वोपशमेन समाधिरेव कारणं प्राधान्येनेत्यर्थः । तथाऽपि यदा भोक्तव्योपरमः तदैव सम्यगसम्प्रज्ञातसमाधिर्जायते । अन्यदा तु भगवच्चरितादौ स्थितिः । तच्चोक्तम्- ‘ये त्वां पश्यन्ति भगवंस्त एव सुखिनः परम् । तेषामेव तु(च) सम्यक् च(तु) समाधिर्जायते नृणाम् । भोक्तव्यकर्मण्यक्षीणे जपेन कथयाऽपि वा । वर्तयन्ति महात्मानसः त्वद्भक्ताः तत्परायणाः ॥’ इति ॥३ ॥ |
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| text | Wikitext | योगारूढस्य लक्षणमाह - यदेति ॥ सम्यगननुषङ्गः तस्यैव भवति । उक्तं च - ‘स्वतो दोषलयो दृष्ट्या त्वितरेषां प्रयत्नतः’ । इति ॥ ४ ॥ |
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| text | Wikitext | स च योगारोहः प्रयत्नेन कर्तव्य इत्याह - उद्धरेदित्यादिना ॥ ५ ॥ |
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| text | Wikitext | कस्य बन्धुरात्मा इत्यत आह- बन्धुरात्मेति ॥ आत्मा मनः । आत्मनः जीवस्य । आत्मना मनसा । आत्मानं जीवम् । आत्मैव मनः । आत्मना बुद्ध्या, जीवेनैव वा । स हि बुद्ध्या विजयति । उक्तं च- ‘मनः परं कारणमामनन्ति’(भाग.११.२३.४३) , ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।’(वि.पु.६.७.२८) ‘उद्धरेन्मनसा जीवं न जीवमवसादयेत् । जीवस्य बन्धुः शत्रुश्च मन एव न संशयः ॥’ ‘जीवेन बुध्या हि यदा मनो जितं तदा बन्धुः शत्रुरन्यत्र चास्य । ततो जयेद् बुद्धिबलो नरस्तद् देवे च भक्त्या मधुकैटभारौ ॥’ इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते । अनात्मनः अजितात्मनः पुरुषस्य, अजितमनस्कस्य । सदपि मनोऽनुपकारि इत्यनात्मा । सन्नपि भृत्यो यस्य न भृत्यपदे वर्तते स ह्यभृत्यः । तस्यात्मा= मन एव शत्रुवत् शत्रुत्वे वर्तते ॥ ६ ॥ |
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| text | Wikitext | जितात्मनः फलमाह - जितात्मन इति ॥ जितात्मा हि प्रशान्तो भवति । न तस्य मनः प्रायो विषयेषु गच्छति । तदा च परमात्मा सम्यग् हृदि आहितः सन्निहितो भवति, अपरोक्षज्ञानी स भवतीत्यर्थः । अपरोक्षज्ञानिनो लक्षणं स्पष्टयति - शीतोष्णेत्यादिना ॥ शीतोष्णादिषु कूटस्थः । ‘ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा’, ‘विजितेन्द्रियः’ इति कूटस्थत्वे हेतुः । विज्ञानं विशेषज्ञानम् । अपरोक्षज्ञानं वा । तच्चोक्तम्- ‘सामान्यैर्ये त्वविज्ञेया विशेषा मम गोचराः । देवादीनां तु तज्ज्ञानं विज्ञानमिति कीर्तितम् ॥’ ‘श्रवणान्मननाच्चैव यज्ज्ञानमुपजायते । तज्ज्ञानं, दर्शनं विष्णोर्विज्ञानं शम्भुरब्रवीत् । विज्ञानं ज्ञानमङ्गादेर्विशिष्टं दर्शनं तथा ॥’ इत्यादि । कूटस्थः निर्विकारः । कूटवत् स्थित इति व्युत्पत्तेः । कूटम् = आकाशः । ‘कूटं खं विदलं व्योम सन्धिराकाश उच्यते’ । इत्यभिधानात् । योगी योगं कुर्वन् । युक्तः योगसम्पूर्णः । एवम्भूतो योगानुष्ठाता योगसम्पूर्ण उच्यत इत्यर्थः ॥ ७-८ ॥ |
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| text | Wikitext | स एव च सर्वस्माद् विशिष्यते, साधुपापादिषु समबुद्धिः । जीवचितः परमात्मनः सर्वस्य तन्निमित्तकत्वस्य च सर्वत्रैकरूप्येण । चिद्रूपा एव हि जीवाः । विशेषस्त्वन्तःकरणकृतः । सर्वेषां च साधुत्वादिकं सर्वमीश्वरकृतमेव, स्वतो न किञ्चिदपि । उक्तं चैतत् सर्वम्- ‘स्वतः सर्वेऽपि चिद्रूपाः सर्वदोषविवर्जिताः । जीवास्तेषां तु ये दोषास्त उपाधिकृता मताः ॥ सर्वं चेश्वरतस्तेषां न किञ्चित् स्वत एव तु । समा एव ह्यतः सर्वे वैषम्यं भ्रान्तिसम्भवम् ॥ एवं समा नृजीवास्तु विशेषो देवतादिषु । स्वाभाविकस्तु नियमादत एव सनातनः (नियमाद्धरेरेव सदा(ना)तनः) ॥ असुरादेस्तथा दोषा नित्याः स्वाभाविका अपि । गुणदोषौ मनुष्याणां (मानुषाणां) नित्यौ स्वाभाविकौ मतौ । गुणैकमात्ररूपास्तु देवा एव सदा मताः ॥’ इति ब्राह्मे । |
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| text | Wikitext | न तु साधुपापादीनां पूजासाम्यम् । तत्र दोषस्मृतेः । ‘समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा । क्रियते येन देवोऽपि स पदाद् भ्रश्यते पुमान् ॥’ इति ब्राह्मे (पाद्मे) । ‘वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु पञ्चमी । एतानि मान्यस्थानानि गरीयो (यद्यदुत्तरम्) ह्युत्तरोत्तरम् ॥(म.स्मृ.२.१३६) इति मानवे(वामने) । ‘गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः । सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति । वैषम्यमुत्तमत्वं तु ददाति नरसञ्चयात् । पूजा या विषमा दृष्टिः समा साम्यं विदुःखजम् ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते । सुहृदादिषु शास्त्रोक्तपूजादिकृतिः अन्यूनाधिका या साऽपि समा। तदप्याह- ‘यथा सुहृत्सु कर्तव्यं पितृशत्रुसुतेषु च । तथा करोति पूजादि समबुद्धिः स उच्यते ॥’ इति गारुडे । |
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| text | Wikitext | प्रत्युपकारनिरपेक्षयोपकारकृत् सुहृत् । क्लेशस्थानं निरूप्य यो रक्षां करोति स मित्रम् । अरिः वधादिकर्ता(कृत्) । कर्तव्ये उपकारे अपकारे च य उदास्ते स उदासीनः । कर्तव्यमुभयमपि यः करोति स मध्यमः(स्थः) । अवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) द्वेष्यः । आह चैतत्- ‘द्वेष्योऽवासितकृत्(अवाञ्चितकृत्) कार्यमात्रकारी तु मध्यमः । प्रियकृत् प्रियो निरूप्यापि क्लेशं यः परिरक्षति । स मित्रमुपकारं तु अनपेक्ष्योपकारकृत् । यस्ततः स सुहृत् प्रोक्तः शत्रुश्चापि वधादिति(कृत्) ॥’ इति ॥९ ॥ |
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| text | Wikitext | समाधियोगप्रकारमाह - योगी युञ्जीत इत्यादिना ॥ युञ्जीत समाधियोगयुक्तं कुर्यात् । आत्मानं मनः ॥ १०-११ ॥ |
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| text | Wikitext | योगं समाधियोगं युञ्ज्यात् ॥ १२-१४ ॥ |
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| text | Wikitext | निर्वाणपरमां शरीरत्यागोत्तरकालीनाम् ॥ १५ ॥ |
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| text | Wikitext | अनशनादिनिषेधोऽशक्तस्य । उक्तं हि- ‘निद्राशनभयश्वासचेष्टातन्द्रा(न्द्र्या)दिवर्जनम् । कृत्वाऽऽनिमीलिताक्षस्तु शक्तो ध्यायन् (प्रसिध्यति) प्रसीदति॥’ इति नारदीये ॥ १६ ॥ |
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| text | Wikitext | युक्ताहारविहारस्य सोपायाहारादेः । यावता श्रमाद्यभावो भवति तावदाहारादेः इत्यर्थः ॥ १७ ॥ |
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| text | Wikitext | आत्मनि भगवति ॥ १८ ॥ |
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| text | Wikitext | आत्मनो योगं भगवद्विषयं योगम् ॥ १९ ॥ |
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| text | Wikitext | आत्मना मनसा । आत्मनि देहे । आत्मानं भगवन्तं पश्यन् ॥२०॥ |
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| text | Wikitext | तत्त्वतो भगवद्रूपात् ॥ २१ ॥ |
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| text | Wikitext | दुःखसंयोगो येन वियुज्यते स दुःखसंयोगवियोगः । न केवलमुत्पन्नं दुःखं नाशयति, उत्पत्तिमेव निवारयतीति दर्शयति संयोगशब्देन । निश्चयेन योक्तव्यः योक्तव्य एव (तद्) बुभूषुणेत्यर्थः ॥ २३ ॥ |
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| text | Wikitext | सर्वान् सर्वविषयान् । अशेषतः, एकविषयोऽपि कामः स्वल्पः कादाचित्कोऽपि न कर्तव्य इत्यर्थः । मनसैव नियन्तुं शक्यते न अन्येन इति ‘एव’शब्दः ॥ २४ ॥ |
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| text | Wikitext | बुद्धेः (क)कारणत्वं मनोनिग्रहे आत्मरमणे च ॥ २५ ॥ |
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| text | Wikitext | यतो यतः यत्र यत्र । ‘यतो यतो धावति’(भाग.१०.१.४२) इत्यादिप्रयोगात् । आत्मन्येव वशं नयेत् आत्मविषय एव वशीकुर्यादित्यर्थः ॥ २६ ॥ |
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| text | Wikitext | पूर्वश्लोकोक्तं प्रपञ्चयति - एवं युञ्जन्निति ॥ २८ ॥ |
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| text | Wikitext | ध्येयमाह - सर्वभूतस्थमिति ॥ सर्वभूतस्थमात्मानं परमेश्वरम् । सर्वभूतानि चाऽत्मनि परमेश्वरे । तं च परमेश्वरं ब्रह्म तृणादौ ऐश्वर्यादिना साम्येन पश्यति । तच्चोक्तम्- ‘आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् । अपश्यत् सर्वभूतानि भगवत्यपि चाऽत्मनि ॥’(भाग.३.२५.४७) इति । ‘समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।’(१३.२८) इति च ॥२९ ॥ |
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| text | Wikitext | फलमाह - यो मामिति॥ तस्याहं न प्रणश्यामीति॥ सर्वदा योगक्षेमवहः स्यामित्यर्थः । स च मे न प्रणश्यति सर्वदा मद्भक्तो भवति । सत्यपि स्वामिनि अरक्षति अनाथः, एवं भृत्येऽप्यभजति अभृत्य इति हि प्रसिद्धिः । उक्तं च- ‘सर्वदा सर्वभूतेषु समं मां यः प्रपश्यति । अचला तस्य भक्तिस्स्याद् योगक्षेमवहोप्यहम्’ । इति गारुडे ॥३० ॥ |
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| text | Wikitext | एतदेव स्पष्टयति - सर्वभूतस्थितमिति ॥ एकत्वमास्थितः सर्वत्रैक एवेश्वर इति स्थितः । सर्वप्रकारेण वर्तमानोऽपि मय्येव वर्तते । एवमपरोक्षं पश्यतो ज्ञानफलं नियतमित्यर्थः । तथाऽपि प्रायो नाधर्मं करोति । कुर्वतस्तु महच्चेद् दुःखसूचकं भवतीत्युक्तं पुरस्तात्(गी.भा.३.१८) । आह च- ‘कदाचिदपि नाधर्मे बुद्धिर्विष्णुदृशां भवेत् । प्रमादात्तु कृतं पापं स्वल्पं भस्मीभविष्यति । आदिराजैः तथा देवैर्ऋषिभिः क्रियते कियत् । बाहुल्यात् कर्मणस्तेषां दुःखसूचकमेव तत् ॥’ इति ॥३१ ॥ |
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| text | Wikitext | साम्यं प्रकारान्तरेण व्याचष्टे - आत्मौपम्येनेति ॥ ३२ ॥ |
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| text | Wikitext | एतस्य योगस्य स्थिरां स्थितिं न पश्यामि । मनसः चञ्चलत्वात् । उक्तं च - ‘मनसश्चञ्चलत्वाद्धि स्थितिर्योगस्य वै स्थिरा । विनाऽभ्यासं न शक्या स्याद् वैराग्याद्वा न संशयः ॥’ इति व्यासयोगे ॥ ३३, ३५ ॥ |
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| text | Wikitext | न च कदाचित् स्वयमेव मनो नियम्यते । ‘शुभेच्छारहितानां च द्वेषिणां च रमापतौ । नास्तिकानां च वै पुंसां सदा मुक्तिर्न जायते ॥’ इति निषेधाद् ब्राह्मे॥३६ ॥ |
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| text | Wikitext | अयतिः अप्रयत्नः ॥ ३७ ॥ |
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| text | Wikitext | योगस्य जिज्ञासुरपि, ज्ञातव्यो मया योग इति यस्यातीवेच्छा सोऽपि । शब्दब्रह्मातिवर्तते परं ब्रह्म प्राप्नोतीत्यर्थः ॥ ४४ ॥ |
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| text | Wikitext | नैकजन्मनीत्याह - प्रयत्नादिति ॥ जिज्ञासुर्ज्ञात्वा प्रयत्नं करोति । एवमनेकजन्मभिः संसिद्धोऽपरोक्षज्ञानी भूत्वा परां गतिं याति । आह च- ‘अतीव श्रद्धया युक्तो जिज्ञासुर्विष्णुतत्परः । ज्ञात्वा ध्यात्वा तथा दृष्ट्वा जन्मभिर्बहुभिः पुमान् । विशेन्नारायणं देवं नान्यथा तु कथञ्चन॥’ इति नारदीये ॥४५ ॥ |
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| text | Wikitext | ज्ञानिभ्यः योगज्ञानिभ्यः । तपस्विभ्यः कृच्छ्रादिचारिभ्यः ।उक्तं च- ‘कृच्छ्रादेरपि यज्ञादेर्ध्यानयोगो विशिष्यते । तत्रापि शेषश्रीब्रह्मशिवादिध्यानतो हरेः । ध्यानं कोटिगुणं प्रोक्तमधिकं वा मुमुक्षुणाम् ॥’ इति गारुडे । ‘अज्ञात्वा ध्यायिनो ध्यानात् ज्ञानमेव विशिष्यते । ज्ञात्वा ध्यानं ज्ञानमात्राद् ध्यानादपि तु दर्शनम् । दर्शनाच्चैव भक्तेश्च न किञ्चित् साधनाधिकम् ॥’ इति नारदीये ॥ ४६, ४७ ॥ |
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| text | Wikitext | आसक्तमनाः अतीव स्नेहयुक्तमनाः । मदाश्रयः ‘भगवानेव मया सर्वं कारयति, स एव च मे शरणम्, तस्मिन्नेव चाहं स्थितः’ इति स्थितः । ‘असंशयम्’, ‘समग्रम्’ इति क्रियाविशेषणम् ॥ १ ॥ |
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| text | Wikitext | इदं मद्विषयं ज्ञानम् । विज्ञानं विशेषज्ञानम् ॥ २ ॥ |
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| text | Wikitext | दौर्लभ्यं ज्ञानस्याह - मनुष्याणामिति ॥ ३ ॥ |
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| text | Wikitext | प्रतिज्ञातं ज्ञानमाह - भूमिरित्यदिना ॥ महतो हङ्कार एवान्तर्भावः । ॥४ ॥ |
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| text | Wikitext | अपरा अनुत्तमा। वक्ष्यमाणामपेक्ष्य । जीवभूता श्रीः । जीवानां प्राणधारिणी । चिद्रूपभूता सर्वदा सती । ‘एतन्महद्भूतम्’ इति श्रुतेः । जगाद च- ‘प्रकृती द्वे तु देवस्य जडा चैवाजडा तथा । अव्यक्ताख्या जडा सा च सृष्ट्या भिन्नाऽष्टधा पुनः । महान् बुद्धिर्मनश्चैव पञ्चभूतानि चेति हि । अव(प)रा सा जडा श्रीश्च परेयं धार्यते तया । चिद्रूपा सा त्वनन्ता च अनादिनिधना परा । यत्समं तु प्रियं किञ्चिन्नास्ति विष्णोर्महात्मनः । नारायणस्य महिषी माता सा ब्रह्मणोऽपि हि । ता(आ)भ्यामिदं जगत् सर्वं हरिः सृजति भूतरा ॥’ इति नारदीये ॥५॥ |
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| text | Wikitext | न केवलं ते जगत् प्रकृती मद्वशे इत्येतावन्मदैश्वर्यमित्याह - अहमिति ॥ प्रभवादेः सत्ताप्रतीत्यादिकारणत्वात्, तद्भोक्तृत्वाच्च प्रभव इत्यादि । तथा च श्रुतिः- ‘सर्वमकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः’(छा.३.२.९) इति । आह च - ‘स्रष्टा पाता च संहर्ता नियन्ता च प्रकाशिता । यतः सर्वस्य तेनाहं सर्वोऽसीत्यृषिभिः स्तुतः । सुखरूपस्य भोक्तृत्वान्न तु सर्वस्वरूपतः । आगमिष्यत् सुखं चापि तस्यास्त्येव सदाऽपि तु । तथाऽप्यचिन्त्यशक्तित्वाज्जातं सुखमि(म)तीव च’ ॥ इति नारदीये ॥६॥ |
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| text | Wikitext | अहमेव परतरः । मत्तोऽन्यत् परतरं न किञ्चिद् अपि । ( इदं ज्ञानम्) ॥ ७ ॥ |
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| text | Wikitext | इदं ज्ञानम्। ‘रसोऽहम्’ इति (इत्यादि)विज्ञानम् । अबादयोऽपि तत एव । तथाऽपि रसादिस्वभावानां साराणां (रसानां) च स्वभावत्वे सारत्वे च विशेषतोऽपि स एव नियामकः । न त्वबादिनियमानुबद्धो रसादिः तत्सारत्वादिश्चेति दर्शयति ‘अप्सु रसः’ इत्यादिविशेषशब्दैः । भोगश्च विशेषतो रसादेरिति, उपासनार्थं च । उक्तं गीताकल्पे- ‘रसादीनां रसादित्वे स्वभावत्वे तथैव च । सारत्वे सर्वधर्मेषु विशेषेणापि कारणम् । सारभोक्ता च सर्वत्र यतोऽतो जगदीश्वरः । रसादिमानिनां देहे स सर्वत्र व्यवस्थितः । अबादयः पार्षदा एव ध्येयः स ज्ञानिनां हरिः । रसादिसम्पत्त्या अन्येषां वासुदेवो जगत्पतिः ॥’ इति । ‘स्वभावो जीव एव च’(भाग.१.१०.१२), ‘सर्वस्वभावो नियतस्तेनैव किमुतापरम्(किमतः परम्)।’ , ‘न तदस्ति विना यत् स्यान्मया भूतं चराचरम्’(१०.३९) । इति च । ‘धर्माविरुद्धः’, ‘कामरागविवर्जितम्’ इत्याद्युपासनार्थम् । उक्तं च गीताकल्पे- ‘धर्माविरुद्धकामेऽसावुपास्यः काममिच्छता । विहीने कामरागादेर्बले च बलमिच्छता । ध्यातस्तत्र त्वनिच्छद्भिर्ज्ञानमेव ददाति सः ॥’ इत्यादि । |
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| text | Wikitext | ‘पुण्यो गन्धः’ इति भोगापेक्षया च । तथाहि श्रुतिः - ‘पुण्यमेवामुं गच्छति न ह वै देवान् पापं गच्छति’(बृ.३.६.२७) , ‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके’(कठ.१.७.१) इत्यादिका । ऋतं च पुण्यम्- ‘ऋतं सत्यं तथा धर्मः सुकृतं चाभिधीयते’ इत्यभिधानात् । ‘ऋतं तु मानसो धर्मः सत्यं स्यात् सम्प्रयोगगः’ इति च । न च ‘अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति’(आथ.३.१.१) , ‘अन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान्’(भाग.११.११.६) इत्यादिविरोधः । स्थूलानशनोक्तेः । आह च सूक्ष्माशनम्- ‘प्रविविक्ताऽहारतर इवैष भवत्यस्माच्छारीरादात्मनः’(बृ.६.२.३) इति । न चात्र जीव उच्यते । ‘शारीरादात्मनः’ इति भेदाभिधानात् । स्वप्नादिश्च शारीर एव - ‘शारीरस्तु त्रिधा भिन्नो जाग्रदादिष्ववस्थितेः’ इति वचनाद् गारुडे । ‘अस्मात्’ इतीश्वरव्यावृत्त्यर्थम्- ‘शारीरौ तावुभौ ज्ञेयौ जीवश्चेश्वरसंज्ञितः । अनादिबन्धनस्त्वेको नित्यमुक्तस्तथाऽपरः ॥’ इति वचनान्नारदीये । भेदश्रुतेश्च । सति गत्यन्तरे पुरुषभेद एव कल्प्यः, न त्ववस्थाभेदः । आह च - ‘प्रविविक्तभुग् यतो ह्यस्माच्छारीरात् पुरुषोत्तमः । अतोऽभोक्ता च भोक्ता च स्थूलाभोगात् स एव तु ॥’ इति गीताकल्पे ॥ ८-१० ॥ |
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| text | Wikitext | ‘न त्वहं तेषु’ इति तदनाधारत्वमुच्यते । उक्तं च- ‘तदाश्रितं जगत् सर्वं नासौ कुत्रचिदाश्रितः’ । इति गीताकल्पे ॥ १२ ॥ |
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| text | Wikitext | तर्हि कथमेवं न ज्ञायसे ? इत्यत आह - त्रिभिरिति ॥ तादात्म्यार्थे मयट् । तच्चोक्तम्- ‘तादात्म्यार्थे विकारार्थे प्राचुर्यार्थे मयट् त्रिधा’। इति । नहि गुणकार्यभूता माया । ‘गुणमयी’ इति च वक्ष्यति । सिद्धं च कार्यस्यापि तादात्म्यम्- ‘तादात्म्यं कार्यधर्मादेः संयोगो भिन्नवस्तुनोः’ । इति व्यासयोगे । भावैः पदार्थैः । सर्वे भावा दृश्यमाना गुणमया एत इति दर्शयति- एभिरिति |
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| text | Wikitext | कथमनादिकाले मोहानत्ययो बहूनाम्? इत्यत आह- दैवीति ॥ अयमाशयः - माया हि एषा मोहिका । सा च सृष्ट्यादिक्रीडादि- मद्देवसम्बन्धित्वाद् अतिशक्तेर्दुरत्यया । तथाहि देवशब्दार्थं पठन्ति- ‘दिवु=क्रीडा-विजिगीषा-व्यवहार-द्युति-स्तुति-मद-मोद-स्वप्न-कान्ति-गतिषु’ इति । कथं दैवी ? मदीयत्वात् । अहं हि देव इति । अब्रवीच्च- ‘श्रीर्भूर्दुर्गेति या भिन्ना महामाया तु वैष्णवी । तच्छक्त्यनन्तांशहीनाऽथापि तस्याश्रयात् प्रभोः । अनन्तब्रह्मरुद्रादेर्नास्याः शक्तिकलाऽपि हि । तेषां दुरत्ययाऽप्येषा विना विष्णुप्रसादतः ॥’ इति व्यासयोगे । तर्हि न कथञ्चिदत्येतुं शक्यते? इत्यत आह- मामेवेति ॥ अन्यत् सर्वं परित्यज्य मामेव ये प्रपद्यन्ते , गुर्वादिवन्दनं च मय्येव समर्पयन्ति । स एव च तत्र स्थित्वा गुर्वादिर्भवतीत्यादि पश्यन्ति । आह च नारदीये- ‘मत्सम्पत्त्या तु गुर्वादीन् भजन्ते मध्यमा नराः । मदुपाधितया तांश्च सर्वभूतानि चोत्तमाः ॥’ इति । ‘आचार्यचैत्यवपुषा स्वग(तं)तिं व्यनङ्क्षि’(भाग.११.२९.६) । इति च ॥१४ ॥ |
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| text | Wikitext | तर्हि किमिति सर्वेऽपि नात्यायन्? इत्यत आह - न मामिति ॥ दुष्कृतित्वात् मूढाः । अत एव नराधमाः । अपहृतज्ञानत्वाच्च मूढाः । अत एव आसुरं भावमाश्रिताः । स च वक्ष्यते- ‘प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च’(१६.७) इत्यादिना । अपहारः= अभिभवः । उक्तं चैतद् व्यासयोगे- ‘ज्ञानं स्वभावो जीवानां मायया ह्यभिभूयते’। इति । असुषु रता असुराः । तच्चोक्तं नारदीये- ‘ज्ञानप्रधाना देवास्तु असुरास्तु रता असौ’ । । इति ॥ १५, १६ ॥ |
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| text | Wikitext | एकस्मिन्नेव भक्तिरित्येकभक्तिः । तच्चोक्तं गारुडे- ‘मय्येव भक्तिर्नान्यत्र एकभक्तिः स उच्यते।’ इति ॥ १७, १८ ॥ |
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| text | Wikitext | बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् भवति । तच्चोक्तं ब्राह्मे- ‘जन्मभिर्बहुभिः ज्ञात्वा ततो मां प्रतिपद्यते’। इति ॥ १९ ॥ |
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| text | Wikitext | प्रकृत्या स्वभावेन,- ‘स्वभावः प्रकृतिश्चैव संस्कारो वासनेति च’। इत्यभिधानात् ॥ २० ॥ |
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| text | Wikitext | यां यां ब्रह्मादिरूपां तनुम् । उक्तं च नारदीये- ‘अन्तो ब्रह्मादिभक्तानां मद्भक्तानामनन्तता’। इति । ‘मुक्तश्च कां गतिं गच्छेन्मोक्षश्चैव किमात्मकः’।(म.भा.शां.प.३४२.३) इत्यादेः परिहारसन्दर्भाच्च मोक्षधर्मेषु । ‘अवतारे महाविष्णोर्भक्तः कुत्र च मुच्यते’ । इत्यादेश्च ब्रह्मवैवर्ते ॥॥ २१-२३ ॥ |
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| text | Wikitext | को विशेषस्तवान्येभ्यः ? इत्यत आह - अव्यक्तमिति ॥ कार्यदेहादिवर्जितः(तम्) । तद्वानिव प्रतीयस इत्यत आह - व्यक्तिमापन्नमिति ॥ कार्यदेहाद्यापन्नम् । तच्चोक्तम्- ‘सदसतः परम्’ , ‘न तस्य कार्यम्(श्वे.उ.६,८)’ , ‘अपाणिपादः’(श्वे.उ.३,१९) , ‘आनन्ददेहं पुरुषं मन्यन्ते गौणदेहिकम्’ इत्यादौ । भावं याथार्थ्यम् । (तच्चा)तथाऽब्रवीत्- ‘याथातथ्यमजानन्तः परं तस्य विमोहिताः’ । इति ॥ २४ ॥ |
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| text | Wikitext | अज्ञानं च मदिच्छयेत्याह - नाहमिति ॥ योगेन= सामर्थ्योपायेन, मायया च । मयैव मूढो नाभिजानाति । तथाऽऽह पाद्मे- ‘आत्मनः प्रावृतिं चैव लोकचित्तस्य बन्धनम् । स्वसामर्थ्येन देव्या च कुरुते स महेश्वरः ॥’ इति ॥२५ ॥ |
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| text | Wikitext | न च मां माया बध्नातीत्याह - वेदेति ॥ न कश्चन अतिसमर्थोऽपि स्वसामर्थ्यात् ॥ २६ ॥ |
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| text | Wikitext | द्वन्द्वमोहेन सुखदुःखादिविषयमोहेन । इच्छाद्वेषयोः प्रवृद्धयोर्न हि किञ्चिज्ज्ञातुं शक्यम् । कारणान्तरमेतत् । सर्गे सर्गकालं आरभ्यैव । शरीरे हि सति (सन्ति) इच्छादयः । पूर्वं त्वज्ञानमात्रम् ॥ २७ ॥ |
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| text | Wikitext | विपरीताश्च केचित् सन्तीत्याह - येषामिति ॥ २८ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘जरामरणमोक्षाय’ इत्यन्यकामनिवृत्त्यर्थम् । मोक्षे सक्तिस्तुत्यर्थं वा । न विधिः । ‘मुमुक्षोरमुमुक्षुस्तु वरो ह्येकान्तभक्तिभाक्’ । इतीतरस्तुतेः नारदीये । ‘नात्यन्तिकम्’(भाग.३.१६.४८) इति च । ‘देवानां गुणलिङ्गानाम् आनुश्राविककर्मणाम् । सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या । अनिमित्ता भगवति भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी । जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥’(भाग.३.२६.३२-३३) इति भागवते लक्षणाच्च । आह च- ‘सर्वे वेदास्तु देवार्था देवा नारायणार्थकाः । नारायणस्तु मोक्षार्थे मोक्षो नान्यार्थ इष्यते । एवं मध्यमभक्तानाम् एकान्तानां न कस्यचित् । अर्थे नारायणो देवस्त्वन्यत् सर्वं तदर्थकम् ॥’ इति गीताकल्पे । त एव च विदुः । ‘यमेवैष वृणुते’(आथ.४.१.३) इति श्रुतेः ॥ २९, ३० ॥ |
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| text | Wikitext | परमक्षरं (परं) ब्रह्म । वेदादिशङ्कानि(व्या)वृत्त्यर्थम् एतत् । आत्मन्यधि यत् तद् अध्यात्मम् । आत्माऽधिकारे यत् तदिति वा । तथा हि- जैवस्वभावः । स्वाख्यो भाव इति व्युत्पत्त्या जीवो वा स्वभावः । सर्वदा अस्त्येवैकप्रकारेणेति भावः । अन्तःकरणादिव्यावृत्त्यर्थो ‘भाव’शब्दः । न ह्येकप्रकारेण स्थितिरन्तःकरणादेः, विकारित्वात् । स्वशब्दः ईश्वरव्यावृत्त्यर्थः । भूतानाम्= जीवानाम्, भावानाम्= जडपदार्थानां चोद्भवकरेश्वरक्रिया विसर्गः । विशेषेण सर्जनम् = विसर्ग इत्यर्थः ॥ १-३ ॥ |
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| text | Wikitext | भूतानि = सशरीरान् जीवान् अधिकृत्य यत् तद् अधिभूतम् । क्षरो भावः विनाशी कार्यः पदार्थः । अव्यक्तान्तर्भावेऽपि तस्याप्यन्यथाभावाख्यो विनाशोऽस्त्येव । तच्चोक्तम्- ‘अव्यक्तं परमे व्योम्नि (व्योमन्) निष्क्रिये सम्प्रलीयते।’ इति । ‘तस्मादव्यक्तमुत्पन्नं त्रिगुणं द्विजसत्तम।’ इति च । ‘विकारोऽव्यक्तजन्म हि’ इति च स्कान्दे । पुरि शयनात् पुरुषो जीवः । स च सङ्कर्षणो ब्रह्मा वा । स सर्वदेवानधिकृत्य वर्तते पतिरिति अधिदैवतम् । देवाधिकारस्थ इति वा । देवान् इन्द्रियाण्यपेक्ष्य(भावरत्नकोशे स्वीकृतं भाष्यवाक्यम्)। |
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| commentary_id | String | BGB_C08_V04_B02 |
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| text | Wikitext | सर्वयज्ञभोक्तृत्वादेः अधियज्ञः । अन्योऽधियज्ञोऽग्न्यादिः प्रसिद्धः इति ‘देहे’ इति विशेषणम् । ‘भोक्तारं यज्ञतपसाम्’(५.२९), ‘त्रैविद्या माम्’(९.२०), ‘येऽप्यन्यदेवताभक्ताः’(९.२३), ‘एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि ददतो मनुष्याः प्रशंसन्ति यजमानं देवाः।’(बृ.५.८.९) इत्यादेः । ‘कुतो ह्यस्य ध्रुवः(वं) स्वर्गः कुतो नैःश्रेयसं परम्।’(म.भा.शां.प.३४२.२) इत्यादिपरिहाराच्च मोक्षधर्मे ॥ भगवान् चेत्, तद्भोक्तृत्वादेरधियज्ञत्वं सिद्धमिति ‘कथम्’ इत्यस्य परिहारः पृथङ् नोक्तः । सर्वप्राणिदेहस्थरूपेण अधियज्ञः । |
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| text | Wikitext | ‘अत्र’ इति स्वदेहनिवृत्त्यर्थम् । न हि तत्रेश्वरस्य नियन्तृत्वं पृथगस्ति । नात्रोक्तं ब्रह्म भगवतोऽन्यत् । ‘ते ब्रह्म’(७.२९) इत्युक्त्वा ‘साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः’(७.३०) इति परामर्शात् । तस्यैव च प्रश्नात् । ‘साधियज्ञम्’ इति भेदप्रतीतेः तन्निवृत्त्यर्थम् ‘अधियज्ञोऽहम्’ इत्युक्तम् । ‘माम्’ इत्यभेदप्रतीतेः ‘अक्षरम्’ इत्येवोक्तम् । आह च गीताकल्पे- ‘देहस्थविष्णुरूपाणि अधियज्ञ इतीरितः । कर्मेश्वरस्य सृष्ट्याख्यं तच्चापीच्छाद्यमुच्यते । अधिभूतं जडं प्रोक्तमध्यात्मं जीव उच्यते । हिरण्यगर्भोऽधिदैवं देवः सङ्कर्षणोऽपि वा । ब्रह्म नारायणो देवः सर्वदेवेश्वरेश्वरः ॥’ इति । ‘यथाप्रतीतं वा सर्वमत्र वै न विरुध्यते ॥’ इति च । स्कान्दे च - ‘आत्माभिमानाधिकारस्थितमध्यात्ममुच्यते । देहाद् बाह्यं विनाऽतीव बाह्यत्वादधिदैवतम् । देवाधिकारगं सर्वं महाभूताधिकारगम् । तत्कारणं तथा कार्यमधिभूतं तदन्तिकात्’॥ इति । महाकौर्मे च - ‘अध्यात्मं देहपर्यन्तं केवलात्मोपकारकम् । ‘सदेहजीवभूतानि यत् तेषामुपकारकृत् । अधिभूतं तु मायान्तं देवानामधिदैवतम् ॥’ इति ॥४ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C08_V05 |
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| text | Wikitext | मद्भावं मयि सत्ताम् । निर्दुःखनिरतिशयानन्दात्मिकाम् । तच्चोक्तम्- ‘मुक्तानां च गतिर्ब्रह्मन् क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः।’(म.भा.शां.प.३४२.४२) इति मोक्षधर्मे ॥ ५ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C08_V07 |
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| text | Wikitext | स्मरन् त्यजतीति भिन्नकालीनत्वेऽप्यविरोध इति मन्दमतेः शङ्का मा भूदिति ‘अन्ते’ इति विशेषणम् । सुमतेर्नैव शङ्काऽवकाशः । ‘स्मरन् त्यजति’ इत्येककालीनत्वप्रतीतेः । दुर्मतेः दुःखान्न स्मरन् त्यजतीति भविष्यति शङ्का । ‘त्यजन् देहं न कश्चित्तु मोहमाप्नोत्यसंशयम्’ । इति स्कान्दे । ‘तस्य हैतस्य हृदयस्याग्रं प्रद्योतते । तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्रामति॥’(बृ.६.४.२) इति हि श्रुतिः । ‘सदा तद्भावभावितः’ इति अन्तकालस्मरणोपायमाह । भावः= अन्तर्गतं मनः । तथाऽभिधानात् । भावितत्वम्= तिवासितत्वम् । ‘भावना त्वतिवासना’ इत्यभिधानात् ॥ ६, ७ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C08_V08 |
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| text | Wikitext | सदा तद्भावभावितत्वं स्पष्टयति - अभ्यासेति ॥ अभ्यास एव योगो अभ्यासयोगः । दिव्यं पुरुषं पुरिशयं पूर्णं च । ‘स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो। नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥’(बृ.४.५.१८) इति श्रुतेः । दिव्यं सृष्ट्यादिक्रीडादियुक्तम् । ‘दिवु = क्रीडा-.......’ इति धातोः ॥८ ॥ |
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| text | Wikitext | ध्येयमाह- कविमिति ॥ कविं सर्वज्ञम् , ‘यः सर्वज्ञः...’(आथ.१.१०) इति श्रुतिः । ‘त्वं कविः सर्ववेदनात्’ इति च ब्राह्मे । धातारं धारणपोषणकर्तारम् । ‘डुधाञ्= धारणपोषणयोः’ इति धातोः । ‘धाता विधाता परमोत सन्दृक्’(कृ.य.का.५.प्र.७.अनु.४) इति च श्रुतिः । ‘ब्रह्मा स्थाणुः’ इत्यारभ्य ‘तस्य प्रसादादिच्छन्ति तदादिष्टफलं गतिम्।’(म.भा.शां.प.३३४.३४-३९) इति च मोक्षधर्मे । तमसः अव्यक्तात् परतः स्थितम्- तमसः परस्तादिति ॥ अव्यक्तं वै तमः, परस्ताद्धि स ततः’ इति पिप्पलादशाखायाम् । ‘मृत्युर्वा व तमः’ , मृत्युर्वै ज्योतिरमृतम्’(बृ.३.३.२९) इति श्रुतेः ॥९ ॥ |
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| text | Wikitext | वायुजयादियोगयुक्तानां मृतिकालकर्तव्यमाह विशेषतः - प्रयाणकाल इति ॥ वायुजयादिरहितानामपि ज्ञानभक्तिवैराग्यसम्पूर्णानां भवत्येव मुक्तिः । तद्वतां तु ईषज्ज्ञानाद्यसम्पूर्णानामपि निपुणानां तद्बलात् कथञ्चिद् भवतीति विशेषः । उक्तं च भागवते- ‘पानेन ते देवकथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये । वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाऽञ्जसा त्वाऽऽपुरकुण्ठधिष्ण्यम् ॥ तथाऽपरे (परे) त्वात्मसमाधियोगबलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् । त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्नतु सेवया ते।’(भाग.३.६.२४-२५) इति ॥ ‘ये तु तद्भाविता लोके ह्येकान्तित्वं समास्थिताः । एतदभ्यधिकं तेषां यत्ते तं (तत् तेजः) प्रविशन्त्युत ॥’(म.भा.शां.प.३४२.४५) इति च मोक्षधर्मे । ‘सम्पूर्णानां भवेन्मोक्षो विरक्तिज्ञानभक्तिभिः । नियमेन तथाऽपीरजयादियुतयोगिनाम् । वश्यत्वान्मनसस्त्वीषत् पूर्वमप्याप्यते ध्रुवम् ॥’ इति च व्यासयोगे ।॥१० ॥ |
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| text | Wikitext | तदेव सध्येयं प्रपञ्चयति - यदक्षरमित्यादिना ॥ प्राप्यते मुमुक्षुभिरिति पदं स्वरूपम् । ‘पद= गतौ’ इति धातोः । ‘तद् विष्णोः परमं पदम्’(ऋ.मं.१.सू.२२.मं.७) इति श्रुतेश्च । ‘गीयसे पदमित्येव मुनिभिः पद्यसे यतः।’ इति वचनान्नारदीये ॥११ ॥ |
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| text | Wikitext | ब्रह्मनाडीं विना यद्यन्यत्र गच्छति तर्हि विना मोक्षं स्थानान्तरं प्राप्नोतीति सर्वद्वाराणि संयम्य । ‘निर्गच्छन् चक्षुषा सूर्यं दिशः श्रोत्रेण चैव हि’ इत्यादिवचनात् व्यासयोगे, मोक्षधर्मे च । हृदि नारायणे । ‘ह्रियते त्वया जगद् यस्माद्धृदित्येव प्रभाष्यसे’ इति हि पाद्मे । न हि मूर्ध्नि प्राणे (प्राणस्थितेः) हृदि मनसः स्थितिः सम्भवति । ‘यत्र प्राणो मनस्तत्र तत्र जीवः परस्तथा।’ इति व्यासयोगे । योगधारणामास्थितः योगभरण एवाभियुक्त इत्यर्थः ॥ १२, १३ ॥ |
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| text | Wikitext | नित्ययुक्तस्य नित्योपायवतः । योगिनः परिपूर्णयोगस्य ॥ १४ ॥ |
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| text | Wikitext | तत्प्राप्तिं स्तौति - माम् इति ॥ ‘परमां (सं)सिद्धिं गता हि ते’ इति तत्र हेतुः ॥ १५ ॥ |
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| text | Wikitext | महामेरुस्थब्रह्मसदनमारभ्य न पुनरावृत्तिः । तच्चोक्तं नारायणगोपालकल्पे- ‘आ मेरुब्रह्मसदनाद् आजनान्न जनिर्भुवि । तथाऽप्यभावः सर्वत्र प्राप्यैव वसुदेवजम् ॥’ इति ॥१६ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘मां प्राप्य न पुनरावृत्तिः’ इति स्थापयितुम् अव्यक्ताख्यात्मसामर्थ्यं दर्शयितुं प्रलयादि दर्शयति - सहस्रयुगेत्यादिना ॥ सहस्रशब्दोऽत्रानेकवाची । ब्रह्म परम् । ‘सा विश्वरूपस्य रजनी’ इति हि श्रुतिः । द्विपरार्धप्रलय एवात्र विवक्षितः । ‘अव्यक्ताद् व्यक्तयः सर्वाः’(८.१८) इत्युक्तेः । उक्तं च महाकौर्मे- ‘अनेकयुगपर्यन्तम् अहर्विष्णोस्तथा निशा । रात्र्यादौ लीयते सर्वमहरादौ च जायते ॥’ इति । ‘यः स सर्वेषु भूतेषु’ इति वाक्यशेषाच्च ॥ १७-२० ॥ |
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| text | Wikitext | अव्यक्तः भगवान् । ‘यं प्राप्य न निवर्तन्ते’ इति ‘मामुपेत्य’(८.१६) इत्युक्तस्य परामर्शात् । ‘अव्यक्तं परमं विष्णुः’ इति प्रयोगाच्च गारुडे । धाम स्वरूपम् । ‘तेजः स्वरूपं च गृहं प्राज्ञैर्धामेति गीयते’ इत्यभिधानात्॥ २१ ॥ |
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| text | Wikitext | परमसाधनमाह- पुरुष इति ॥ २२ ॥ |
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| text | Wikitext | यत्कालाद्यभिमानिदेवतागता आवृत्त्यनावृत्ती गच्छन्ति ता आह - यत्रेत्यादिना ॥ ‘काले’ इत्युपलक्षणम् । अग्न्यादेरपि वक्ष्यमाणत्वात् ॥२३ ॥ |
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| text | Wikitext | ज्योतिः अर्चिः । ‘ते अर्चिषमभिसम्भवन्ति’(छा.५.४.१) इति हि श्रुतिः । तथा च नारदीये- ‘अग्निं प्राप्य ततश्चार्चिः ततश्चाप्यहरादिकम्।’ इति । अभिमानिदेवताश्च अग्न्यादयः । कथमन्यथा ‘अह्न आपूर्यमाणपक्षम्’ इति युज्येत । ‘दिवादिदेवताभिस्तु पूजितो ब्रह्म याति हि।’ इति च ब्राह्मे । मासाभिमानिभ्यो अयनाभिमानिनी च पृथक् । तच्चोक्तं गारुडे- ‘पूजितस्त्वयनेनासौ मासैः परिवृतेन हि’ इति । तच्चोक्तं ब्रह्मवैवर्ते- ‘साह्ना मध्यन्दिनेनाथ शुक्लेन च स पूर्णिमा । सविष्वा चायनेनासौ पूजितः केशवं व्रजेत् ॥’ इति ॥ २४-२६ ॥ |
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| text | Wikitext | एते सृती सोपाये ज्ञात्वाऽनुष्ठाय न मुह्यति । तच्चाह स्कान्दे- ‘सृती ज्ञात्वा तु सोपाये अनुष्ठाय च साधनम् । न कश्चित् मोहमाप्नोति न चान्या तत्र वै गतिः ॥’ इति ॥ २७-२८ ॥ |
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| text | Wikitext | राजविद्या प्रधानविद्या । प्रत्यक्षं ब्रह्म अवगम्यते येन तत् प्रत्यक्षावगमम् । अक्षेषु = इन्द्रियेषु प्रति प्रति स्थित इति प्रत्यक्षः । तथा च श्रुतिः- ‘यः प्राणे तिष्ठन् प्राणादन्तरो यं प्राणो न वेद यस्य प्राणः शरीरम्, यः प्राणमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’(बृ.५.७.१६) । ‘यो वाचि (विज्ञाने) तिष्ठन्’(बृ.५.७.१७), ‘यः चक्षुषि तिष्ठन्’(बृ.५.७.१८) इत्यादेः । ‘य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते’(छा.४.१५.१) इति च । ‘अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषः अङ्गुष्ठं च समाश्रितः’(म.ना.१६(१५).५) इति च । ‘त्वं मनस्त्वं चन्द्रमास्त्वं चक्षुरादित्यः(त्यम्)’(गी.प्रे. म.भा.शां.प.३३८.४) इत्यादेश्च मोक्षधर्मे । ‘स प्रत्यक्षः, प्रति प्रति हि सोऽक्षेष्वक्षवान् स भवति हि, य एवं विद्वान् प्रत्यक्षं वेद’ इति सामवेदे (वारुणशाखायाम्) बाभ्रव्यशाखायाम् । धर्मो=भगवान्, तद्विषयं धर्म्यम् । सर्वं जगद् धत्त इति धर्मः । ‘पृथिवी (धरणी) धर्ममूर्धनि’(कुम्भ-म.भा.१२.३६०.१२) इति प्रयोगान्मोक्षधर्मे । ‘भारभृत् कथितो योगी’ इति च । ‘भर्ता सन् भ्रियमाणो बिभर्ति’(तै.आ.३.१४) इति च श्रुतिः । ‘धर्मो वा इदमग्र आसीन्न पृथिवी न वायुर्नाकाशो न ब्रह्मा न रुद्रो (नेन्द्रो) न देवा न ऋषयः सोऽध्यायत्’ इति च सामवेदे बाभ्रव्यशाखायाम् । ‘प्रत्यक्षावगम’शब्देन अपरोक्षज्ञानसाधनत्वमुक्तम् ॥ १-३ ॥ |
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| text | Wikitext | तज्ज्ञानाद्याह- मयेति ॥ तर्हि किमिति न दृश्यत इत्यत आह- अव्यक्तमूर्तिनेति ॥ ४ ॥ |
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| text | Wikitext | मत्स्थत्वेऽपि यथा पृथिव्यां स्पृष्ट्वा स्थितानि, न तथा मयीत्याह- न चेति ॥ ‘न दृश्यश्चक्षुषा चासौ न स्पृश्यः स्पर्शनेन च।’(कुम्भ-म.भा.१२.३४७.२१) इति मोक्षधर्मे । ‘सञ्ज्ञासञ्ज्ञ’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४) इति च । ममाऽत्मा देह एव भूतभावनः । ‘महाविभूते माहात्म्यशरीर’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४) इति हि मोक्षधर्मे ॥५ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘मत्स्थानि’(९.४), ‘न च मत्स्थानि’(९.५) इत्यस्य दृष्टान्तमाह- यथाऽऽकाशस्थित इति ॥ न हि आकाशस्थितो(ऽपि) वायुः स्पर्शाद्याप्नोति ॥ ६ ॥ |
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| text | Wikitext | ज्ञानप्रदर्शनार्थं प्रलयादि प्रपञ्चयति- सर्वभूतानीत्यादिना ॥ ७॥ |
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| text | Wikitext | प्रकृत्यवष्टम्भस्तु यथा कश्चित् समर्थोऽपि पादेन गन्तुम्, लीलया दण्डमवष्टभ्य गच्छति । ‘सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं त्वं ज्ञातुमर्हसि।’(कुम्भ-म.भा.शां.प.३४७.४५) इति च मोक्षधर्मे । ‘सर्वभूतगुणैर्युक्तं दैवं मां (त्वं) ज्ञातुमर्हसि।’(मोक्षधर्मे) इति च । ‘विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम्(त्वां च मूर्तितः) । प्रधानविनियोगस्थः परं ब्रह्माधिगच्छति(त्वामेव विशते बुधः) ॥’(कुम्भ-म.भा.१३.४५.४११) इति च । ‘न कुत्रचिच्छक्तिरनन्तरूपा विहन्यते तस्य महेश्वरस्य । तथाऽपि मायामधिरुह्य देवः प्रवर्तते सृष्टिविलापनेषु ॥’ इति ऋग्वेदखिलेषु । ‘मय्यनन्तगुणेनन्ते गुणतोनन्तविग्रहे।’ इति भागवते । ‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म इति, (बृ)बृंहति (बृ)बृंहयति ।’ इति च आथर्वणे । ‘पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते।’ इति च । ‘विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि’(ऋ.मं.१.अनु.१५४.मं.१) , ‘न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.मं.७.अनु.९९.मं.२) इत्यादेश्च । प्रकृतेर्वशादवशम् । ‘त्वमेवैतत्सर्जने सर्वकर्मण्यनन्तशक्तोऽपि स्वमाययैव । मायावशं चावशं लोकमेतत् तस्मात् स्रक्ष्यस्यत्सि पासीश विष्णो ॥’ इति गौतमखिलेषु ॥ ८ ॥ |
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| text | Wikitext | उदासीनवत्, न तु उदासीनः । तदर्थमाह- असक्तमिति ॥ ‘अवाक्यनादरः’(छा.३.३४.२) इति (हि) श्रुतिः । ‘द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च । यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया॥’(भाग.२.१०.११) इति भागवते । यस्य असक्त्यैव सर्वकर्मशक्तिः कुतस्तस्य सर्वकर्मबन्ध इति भावः । ‘न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्’ इति श्रुतिः। यः कर्माणि(पि) निया(य)मयति कथं च (तत्) तं कर्म बध्नाति ॥९ ॥ |
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| text | Wikitext | उदासीनवदिति चेत् स्वयमेव प्रकृतिः सूयते? इत्यत आह- मयेति ॥ प्रकृतिसूतिद्रष्टा कर्ता (च) अहमेवेत्यर्थः । तथा च श्रुतिः- ‘यतः प्रसूता जगतः प्रसूती तोयेन जीवान् व्यससर्ज भूम्याम्।’(म.ना.१.४) इति ॥१० ॥ |
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| text | Wikitext | तर्हि कथं केचित् त्वामवजानन्ति ? का च तेषां गतिः ? इत्यत आह - अवजानन्तीत्यादिना ॥ मानुषीं तनुं मूढानां मानुषवत् प्रतीताम् तनुं, न तु मनुष्यरूपाम् । उक्तं च मोक्षधर्मे- ‘यत्किञ्चिदिह लोकेऽस्मिन् देहबद्धं विशाम्पते । सर्वं पञ्चभिराविष्टं भूतैरीश्वरबुद्धिजैः ॥ ईश्वरो हि जगत्स्रष्टा प्रभुर्नारायणो विराट् । भूतान्तरात्मा विज्ञेयः सगुणो निर्गुणोऽपि च । भूतप्रलयमव्यक्तं शुश्रूषुर्नृपसत्तम’।(कुम्भ-म.भा.१२.३५७.११-१३) इति । अवतारप्रसङ्गे चैतदुक्तम् । अतो नावताराः (च) पृथक् शङ्क्याः । ‘रूपाण्यनेकान्यसृजत् प्रादुर्भावभवाय सः । वाराहं नारसिंहं च वामनं मानुषं तथा ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५९.३६-३७) इति तत्रैव प्रथमसर्गकाल एवावताररूपविभक्त्युक्तेश्च । अतो न तेषां मानुषत्वादिर्विना भ्रान्तिम् । ‘भूतं महद् ईश्वरं च’ इति भूतमहेश्वरम् । तथा हि (सामवेदे)बाभ्रव्यशाखायाम्- ‘अनाद्यनन्तं परिपूर्णरूपम् ईशं वराणामपि देववीर्यम्।’ इति । ‘अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितम्।’(बृ.४.४.१०) इति च । ‘ब्रह्म पुरोहित ब्रह्म कायिक महाराजिक।’(गी.प्रे-म.भा.१२.३३८.४) इति च मोक्षधर्मे ॥११ ॥ |
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| text | Wikitext | तेषां फलमाह - मोघाशा इति ॥ वृथाशाः । भगवद्द्वेषिभिः आशासितं(आमुष्मिकम्) न किञ्चिदाप्यते । यज्ञादिकर्माणि च वृथैव तेषां, ज्ञानं च । केनापि ब्रह्मरुद्रादिभक्त्याद्युपायेन न कश्चित् पुरुषार्थ आमुष्मिकः तैराप्यत इत्यर्थः । वक्ष्यति च - ‘तानहं द्विषतः क्रूरान्’(१६.१९) इत्यादि । मोक्षधर्मे च - ‘कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद् विष्णुमव्ययम् । मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीस्समाः । यो द्विष्याद् विबुधश्रेष्ठं देवं नारायणं हरिम् (प्रभुम्) । कथं स न भवेद् द्वेष्य आलोकान्तस्य कस्यचित् ॥(कथं नाम भवेद् द्वेष्य आात्मा लोकस्य कस्यचित्)’(गी.प्रे-म.भा.१२.३४६.६-७) इति । ‘सर्वोत्कृष्टो(ष्टे) ज्ञानभक्ती ह(हि) यस्य नारायणे पुष्करविष्टराद्ये । सर्वावमो(मे) द्वेषयुतश्च तस्मिन् भ्रूणानन्तघ्नोऽ(प्य)स्य समो न चैव ॥’ इति च सामवेदे शाण्डिल्यशाखायाम् । |
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| commentary_id | String | BGB_C09_V12_B02 |
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| text | Wikitext | ‘द्वेषाच्चेद्यादयो नृपाः’(भाग.७.१.३२) , ‘वैरेण यन्नृपतयः शिशुपालपौण्ड्रसाल्वादयो गतिविलासविलोकनाद्यैः । ध्यायन्त आकृतधियः शयनासनादौ तत्साम्यमीयु(मापु)रनुरक्तधियः पुनः किम्॥’(भाग.११.५.४९) इत्यादि तु भगवतो भक्तप्रियत्वज्ञापनार्थम्, (नित्यध्यानस्तुत्यर्थं च ।) स्वभक्तस्य कदाचिच्छापबलाद् द्वेषिणोऽपि भक्तिफलमेव भगवान् ददातीति । |
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| text | Wikitext | भक्ता एव हि ते पूर्वं शिशुपालादयः । शापबलादेव च द्वेषिणः । तत्प्रश्नपूर्वं पार्षदत्वादिकथनाच्च(तत्प्रश्ने पूर्वपार्षदत्वशापादिकथनाच्च) एतज्ज्ञायते । अन्यथा किमिति तदप्रस्तुतमुच्यते । भगवतः साम्यकथनं तु द्वेषिणामपि द्वेषमनिरूप्य पूर्वतनभक्तिफलमेव ददातीति ज्ञापयितुम् । ‘न मे भक्तः प्रणश्यति’(९.३१) इति च वक्ष्यति । न च ‘भावो (हि) भव(भाव)कारणम्’ (भाग.१०.८४.४७) इत्यादिविरोधः । द्वेषभाविनां द्वेष एव भवतीति हि युक्तम् । अन्यथा गुरुद्वेषिणामपि गुरुत्वं भवतीत्याद्यनिष्टम् आपद्येत । न च आकृतधीत्वेऽविशेषः । तेषामेव हिरण्यकशिप्वादीनां पापप्रतीतेः- ‘हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः । विविक्षुरत्यगात् सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः ॥’(भाग.४.२१.४६) इति । ‘यदनिन्दत् पिता मह्यम्’(भाग.७.१०.१६) इत्यारभ्य ‘तस्मात् पिता मे पूयेत दुरन्ताद् दुस्तरादघात्’ (भाग.७.१०.१८) इति प्रह्लादेन भगवतो वरयाचनाच्च । बहुषु ग्रन्थेषु च निषेधः, कुत्रचिदेव तदुक्तिरिति विशेषः । यस्मिन् तदुच्यते तत्रैव निषेध उक्तः । महातात्पर्यविरोधश्चोक्तः पुरस्तात् । अयुक्तिमद्भ्यो युक्त्तिमन्त्येव बलवन्ति वाक्यानि । युक्तयश्चोक्ता अन्येषाम् । न चैषां काचिद् गतिः । साम्येऽपि वाक्ययोर्लोकानुकूलाननुकूलयोर्लोकानुकूलमेव बलवत् । लोकानुकूलं च भक्तप्रियत्वम्, नेतरत् । उक्तं च तेषां पूर्वभक्तत्वम्- ‘मन्येसुरान् भागवतान् त्र्यधीशे संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् ।’(भाग.३.२.२४) इत्यादि । अतो न भगवद्द्वेषिणां काचिद् गतिरिति सिद्धम् । द्वेषकारणमाह- राक्षसीमिति ॥ १२ ॥ |
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| text | Wikitext | नेतरे द्विषन्तीति दर्शयितुं देवानाह - महात्मान इति ॥ १३, १४ ॥ |
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| text | Wikitext | सर्वत्रैक एव नारायणः स्थित इति एकत्वेन । पृथक्त्वेन सर्वतो वैलक्षण्येन । बहुधा तस्य रूपम् । ‘आभाति शुक्लमिव लोहितमिवाथो नीलमथार्जुनम्’(आभाति शुक्लमिव लोहितमिव अथो कृष्णमायसमर्कवर्णम् इति कुम्भ-म.भा.५.४४.२६) इति हि सनत्सुजा(तीये)ते । ‘दैवमेवापरे’(४.२५) इत्युक्तप्रकारेण बहवो वा बहुधा ॥१५ ॥ |
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| text | Wikitext | प्रतिज्ञातं विज्ञानमाह - अहं क्रतुरित्यादिना ॥ क्रतवोऽग्निष्टोमादयः । यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः । ‘उद्दिश्य देवान् द्रव्याणां त्यागो यज्ञ इतीरितः’ इत्यभिधानात् ॥ १६ ॥ |
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| text | Wikitext | गम्यते मुमुक्षुभिरिति गतिः । तथाहि सामवेदेषु वसिष्ठशाखायाम्- ‘अथ कस्मादुच्यते गतिरिति । ब्रह्मैव गतिः, तद्धि गम्यते पापविमुक्तैः’ इति । साक्षादीक्षत इति साक्षी । तथाहि बाष्कलशाखायाम्- ‘स साक्षादिदमद्राक्षीद् यदद्राक्षीत् तत् साक्षिणः साक्षित्वम्’ इति । शरणम् आश्रयः संसारभीतस्य । ‘परमं यः परायणम्’ इति ह्युक्तम् । ‘नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम्’ इति च । संहारकाले प्रकृत्या जगदत्र निधीयत इति निधानम् । तथाहि ऋग्वेदखिलेषु- ‘अपश्यमप्यये मायया विश्वकर्मण्यदो जगन्निहितं शुभ्रचक्षुः’ इति ॥१८ ॥ |
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| text | Wikitext | सत् कार्यम् । असत् कारणम् । ‘सदभिव्यक्तरूपत्वात् कार्यमित्युच्यते बुधैः । असदव्यक्तरूपत्वात् कारणं चापि शब्दितम्॥’ ॥ इति ह्यभिधानम् । ‘असच्च सच्चैव यद् विश्वं सदसतः परम्’(गी.प्रे.म.भा.१.१.२३) इति च भारते ॥१९ ॥ |
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| text | Wikitext | तथाऽपि मद्भजनमेवान्यदेवताभजनाद् वरमिति दर्शयति- त्रैविद्या इत्यादिना ॥ २०-२१ ॥ |
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| text | Wikitext | अनन्याः अन्यदचिन्तयित्वा । तथाहि गौतमखिलेषु- ‘सर्वं परित्यज्य मनोगतं यद् विना देवं केवलं शुद्धमाद्यम् । ये चिन्तयन्तीह तमेव धीरा अनन्यास्ते देवमेवाविशन्ति ॥’ इति । ‘कामं कालेन महता एकान्तित्वात् समाहितैः । शक्यो द्रष्टुं स भगवान् प्रभासन्दृश्यमण्डलः॥’ ॥ इति मोक्षधर्मे । नित्यमभितः= सर्वतो युक्तानाम् ॥२२ ॥ |
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| text | Wikitext | तर्हि ‘अहं क्रतुः’(९.१६) इत्याद्यसत्यमित्यत आह - येऽपीति ॥ २३ ॥ |
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| text | Wikitext | कारणमाहाविधिपूर्वकत्वे - अहं हीति ॥ २४ ॥ |
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| text | Wikitext | फलं विविच्याह - यान्तीति ॥ २५ ॥ |
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| text | Wikitext | दुर्बलैस्त्वं पूजयितुमशक्यः ? महत्त्वाद्, इत्याशङ्क्याह - पत्रमिति ॥ न त्वविहितपत्रादि । तस्यापराधत्वोक्तेर्वाराहादौ । भक्त्यैवाहं (तुष्ट) तृप्य इति भावः । ‘भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च’(म.भा.१११) इति च भारते ‘एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसः स्वार्थः परः स्मृतः । एकान्तभक्तिर्गोविन्दे यत् सर्वत्रात्मदर्शनम्॥’(एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां धर्मः परः स्मृतः। भक्तियोगो भगवति तन्नामग्रहणादिभिः ॥भाग.६.३.२२ ) (इति भागवते) ॥२६ ॥ |
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| text | Wikitext | अतो यत् करोषि ॥ २७, २८ ॥ |
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| text | Wikitext | तर्हि स्नेहादिमत्त्वाद् अल्पभक्तस्यापि कस्यचित् बहु फलं ददासि । विपरीतस्यापि कस्यचित् विपरीतम् ? इत्यत आह - समोऽहमिति ॥ तर्हि न भक्तिप्रयोजनम् ? इत्यत आह - ये भजन्तीति ॥ मयि ते तेषु चाप्यहम् इति । मम ते वशाः, तेषामहं वश इति । उक्तं च पैङ्गिखिलेषु- ‘ये वै भजन्ते परमं पुमांसं तेषां वशः स तु ते तद्वशाश्च ।’ इति । तद्वशा एव ते सर्वदा । तथाऽपि बुद्धिपूर्वकत्वाबुद्धिपूर्वकत्वेन भेदः । उद्धवादिवत्, शिशुपालादिवच्च । तच्चोक्तं तत्रैव- ‘अबुद्धिपूर्वाद् यो वशस्तस्य ध्यानात् पुनर्वशो भवते बुद्धिपूर्वम्’ इति ॥ २९ ॥ |
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| text | Wikitext | न भवत्येव प्रायशस्तद्भक्तो सुदुराचारः । तथाऽपि बहुपुण्येन यदि कथञ्चित् भवति तर्हि साधुरेव स मन्तव्यः ॥ ३० ॥ |
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| text | Wikitext | कुतः ? क्षिप्रं भवति धर्मात्मा । देवदेवांशादिष्वेव च (ए)तद् भवति । उक्तं च (सामवेदे)शाण्डिल्यशाखायाम्- ‘नाविरतो दुश्चरितान्नाभक्तो नासमाहितः । सम्यग् भक्तो भवेत् कश्चिद् वासुदेवेऽमलाशयः । देवर्षयस्तदंशाश्च भवन्ति क्व च ज्ञानतः ॥’ इति । अतोन्यः कश्चिद् भवति चेत्, डाम्भिकत्वेन सोऽनुमेयः । साधारणपापानां तु सत्सङ्गात् महत्यपि कथञ्चिद् भक्तिर्भवति । साधारणभक्तिर्वेतरेषाम् । ‘शठमतिरुपयाति योऽर्थतृष्णां तमधमचेष्टमवैहि नास्य(भक्तम्)भक्तिः’। इति हि श्रीविष्णुपुराणे । ‘सा श्रद्दधानस्य विवर्धमाना विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसाम्’ इति च । ‘वेदाः स्वधीता मम लोकनाथ तप्तं तपो नानृतमुक्तपूर्वम् । पूजां गुरूणां सततं करोमि परस्य गुह्यं न च भिन्नपूर्वम् । गुप्तानि चत्वारि यथागमं मे शत्रौ च मित्रे च समोऽस्मि नित्यम् । तं चापि देवं शरणं प्रपन्नः एकान्तभावेन भजाम्यजस्रम् । एतैरुपायैः परिशुद्धसत्त्वः कस्मान्न पश्येयमनन्तमेनम् ॥’ इति मोक्षधर्मे। आचारस्य ज्ञानसाधनत्वोक्तेश्च । ज्ञानाभावे च सम्यग्भक्त्यभावात् । तथाहि गौतमखिलेषु- ‘विना ज्ञानं कुतो भक्तिः कुतो भक्तिं विना च तत्।’ इति । ‘भक्तिः परे स्वेऽनुभवो विरक्तिरन्यत्र चैतत् त्रिक एककालम्’(भाग.११.२.४२) इति च भागवते ॥ ३१-३४ ॥ |
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| text | Wikitext | प्रीयमाणाय श्रुत्वा सन्तोषं प्राप्नुवते ॥ १ ॥ |
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| text | Wikitext | प्रभवं प्रभावम् । मदीयां जगदुत्पत्तिं वा । तद्वशत्वात् तस्येत्युच्यते । यद्यस्ति तर्हि देवादयोऽपि जानन्ति सर्वज्ञत्वात्, अतो नास्तीति भावः । ‘अहमादिर्हि’ इति तु उत्पत्तिरपि यस्य वशा, कुतस्तस्य जनिरिति ज्ञापनार्थम् । ‘अहं सर्वस्य जगतः प्रभवः प्रलयः’(७.३) इति चोक्तम् । उक्तं चैतत् सर्वमन्यत्रापि- ‘को अद्धा वेद क इह प्रवोचत् कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः । अर्वाग् देवा अस्य विसर्जनेन अथा को वेद यत आ बभूव ॥’(तै.ब्रा.२.८९.५,ऋ.म.१०.सू.१२९.मं.६) इति । ‘न तत्प्रभावमृषयश्च देवा विदुः कुतोऽन्येऽल्पधृतिप्रमाणाः।’ इति ऋग्वेदखिलेषु । अन्यस्तु अर्थो ‘यो मामजम्’(१०.०३) इति वाक्यादेव ज्ञायते ॥२ ॥ |
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| text | Wikitext | अनः= चेष्टयिता आदिश्च सर्वस्य इति अनादिः । अजत्वेन सिद्धेः इतरस्य । ॥३ ॥ |
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| text | Wikitext | तत् प्रथयति- बुद्धिरित्यादिना॥ कार्याकार्यविनिश्चयो बुद्धिः । ज्ञानं प्रतीतिः । ‘ज्ञानं प्रतीतिर्बुद्धिस्तु कार्याकार्यविनिश्चयः(विनिर्णयः)।’ इत्यभिधानम् । दमः इन्द्रियनिग्रहः । शमः परमात्मनि निष्ठा- ‘शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रियनिग्रहः ।’(भाग.११.१९.३५) इति हि भागवते । तुष्टिः अलम्बुद्धिः- ‘अलम्बुद्धिस्तथा तुष्टिः’ इत्यभिधानात् ॥ ४-५ ॥ |
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| text | Wikitext | पूर्वे सप्तर्षयः - ‘मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । वसिष्ठश्च महातेजाः’(कुम्भ-म.भा.१२.३४३.३०) इति मोक्षधर्मोक्ताः । ते हि (सर्वे)सर्वपुराणेषूच्यन्ते । चत्वारः प्रथमाः स्वायम्भुवाद्याः । तेषां हि इमाः प्रजाः । न हि भविष्यताम् ‘इमाः प्रजाः’ इति युक्तम् । विभागः प्राधान्यं च प्राथमिकत्वादेव भवति । तच्चोक्तं गौतमखिलेषु- ‘स्वायम्भुवं स्वारोचिषं रैवतं च तथोत्तमम् । वेद यः स प्रजावान्’ इति । पूर्वेभ्यो ह्युत्तरा जायन्त इत्येषां (तेषां) प्राधान्यम् । अजातेषु (च) ज्यैष्ठ्यम् । |
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| text | Wikitext | तापसस्य भगवदवतारत्वाद् अनुक्तिः । तच्च भागवते प्रसिद्धम् । मानसत्वं च सर्वेषां मनूनामुक्तं भागवते- ‘ततो मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान्।(भाग.३.२१.४९)’ इति । अन्यपुत्रत्वं तु अपरित्यज्यापि शरीरं तद् भवति । प्रमाणं चोभयविधवाक्यान्यथाऽनुपपत्तिरेव । ‘पूर्वे’ इति विशेणाच्च एतत्सिद्धिः । मत्तो भावो येषां ते मद्भावाः । ये ते ‘ब्रह्मणो मनसा जाताः’ ते मत्त एव जाताः इति भावः ॥६ ॥ |
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| text | Wikitext | सन्ति च भजन्तः केचिदित्याह- अहमित्यादिना ॥ ८-११ ॥ |
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| text | Wikitext | ब्रह्म परिपूर्णम्- ‘अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म । बृहति(बृंहति) बृंहयति च’ इति च श्रुतिः । ‘बृह (बृंह) बृहि = वृद्धौ’ इति च पठन्ति । ‘परमं यो महद् ब्रह्म’(कुम्भ-म.भा.१३.२५४.९) इति च । विविधमासीदिति विभुः । तथाहि वारुणशाखायाम्- ‘विभु प्रभु प्रथमं मेहनावत इति । स ह्येव प्राभवद् विविधोऽभवत्’ इति । ‘सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय’(तै.उ.२.६.) इत्यादेश्च ॥ १२-१५ ॥ |
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| text | Wikitext | विभूतयः विविधभूतयः ॥ १६ ॥ |
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| text | Wikitext | न जायते, अर्दयति च संसारम् इति जनार्दनः । तथा च बाभ्रव्यशाखायाम्- ‘स भूतः स जनार्दन इति स ह्यासीत् स नासीत् सोऽर्दयति’ इति ॥१८ ॥ |
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| text | Wikitext | विष्णुः सर्वव्यापित्व-प्रवेशित्वादेः । ‘विष्लृ= व्याप्तौ’, ‘विश= प्रवेशने’ इति हि पठन्ति । ‘गतिश्च सर्वभूतानां प्रजानां चापि भारत । व्याप्तौ मे रोदसी पार्थ कान्तिश्चाभ्यधिका मम । अधिभूतनिविष्टश्च तदिच्छुश्चास्मि(पि) भारत । क्रमणाच्चाप्यहं पार्थ विष्णुरित्यभिसञ्ज्ञितः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.४२-४३) इति मोक्षधर्मे ॥२१ ॥ |
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| text | Wikitext | सुखरूपः पाल्यते लीयते च जगद् अनेन इति कपिलः । ‘प्रीतिः सुखं कम् आनन्दः’ इत्याद्यभिधानात् । ‘प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म’(छा.४.१०.५) इति च । ‘ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् । सुखादनन्तात् पालना(ल्लीयनाच्च)ल्लापनाच्च यं वै देवं कपिलमुदाहरन्ति॥’ इति च (सामवेदे)बाभ्रव्यशाखायाम् ॥२६ ॥ |
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| text | Wikitext | आनन्दरूपत्वात् पूर्णत्वात् लोकरमणत्वाच्च रामः । ‘आनन्दरूपो निष्परीमाण एष लोकश्चैतस्माद् रमते तेन रामः ।’ इति शाण्डिल्यशाखायाम् । रश्च अमश्चेति व्युत्पत्तिः ॥३१ ॥ |
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| text | Wikitext | आच्छादयति सर्वम्, वासयति, वसति च सर्वत्र इति वासुः । देवशब्दार्थ उक्तः पुरस्तात् (गी.भा.७.१४)। ‘छादयामि जगत् सर्वं भूत्वा सूर्य इवांशुभिः । सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततो ह्यहम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.४१) इति मोक्षधर्मे । विशिष्टः सर्वस्मात्, आ= समन्तात् स एव इति व्यासः । तथा च- (अग्निवेश्य)अग्नेयीशाखायाम्- ‘स व्यासो वीति तमप् वै विः, सोऽधस्तात् स उत्तरतः स पश्चात् स पूर्वस्मात् स दक्षिणतः स उत्तरत इति।’ इति । ‘यच्च किञ्चित् जगत् सर्वं दृश्यते श्रूयतेपि वा । अन्तर्बहिश्च तत् सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ॥’ इति च ॥३७ ॥ |
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| text | Wikitext | मया विना यद् भूतं स्यात् तन्नास्ति । ‘विश्वरूपः अनन्तगतेः अनन्तभागः अनन्तगः अनन्तः’(कुम्भ-म.भा.१२.३४६.४) इत्यादि हि मोक्षधर्मे ॥ ३९,४० ॥ |
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| text | Wikitext | ‘यद्यद् विभूतिमत्’इति विस्तरः । विष्ण्वादीनि तु स्वरूपाण्येव । अन्यानि तु तेजोयुक्तानि(तेजोंऽश) । तथा च पैङ्गिखिलेषु- ‘विशेषका रुद्रवैन्येन्द्रदेवराजन्याद्या अंशयुतान्यजीवाः । कृष्णव्यासौ रामकृष्णौ च रामः कपिलयज्ञप्रमुखाः स्वयं सः ॥’ इति । ‘स एवैको भार्गवदाशरथिकृष्णाद्यास्तु अवंशयुता अन्यजीवाः’ इति च गौतमखिलेषु । ‘ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजसः । कलाः सर्वे हरेरेव सप्रजापतयः स्मृताः। एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ॥’(भाग.१.३.२७-२८) इति च भागवते । ऋष्यादीन् अंशयुतत्वेनोक्त्वा वराहादीन् स्वरूपत्वेनाह । तु शब्द एवार्थे । अन्यस्तु विशेषो न कुत्राप्यवगतः । अंशत्वं च तत्राप्यवगतम्- ‘उद्बबर्हात्मनः केशौ’ इति । ‘मृडयन्ति’(भाग१.३.२९) इति बहुवचनं चायुक्तम् । न हि अन्तराऽन्यदुक्त्वा पूर्वम् अपरामृश्य तत्क्रिया उच्यमाना दृष्टा कुत्रचित् ॥ ४१ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘किम्’ इति वक्ष्यमाणप्राधान्यज्ञापनार्थम् । न तूक्तनिष्फलत्वज्ञापनाय । तथा सति नोच्येत । ‘अज्ञात्वैनं सर्वविशेषयुक्तं देवं वरं को हि मुच्येत बन्धात्।’ इति च ऋर्ग्वेदखिलेषु । त्वं तु बहुफलप्राप्तियोग्य इति ‘तव’ इति विशेषणम् । अन्यस्तुत्यर्थत्वेन प्रसिद्धश्च एकत्र किंशब्दः - ‘रागद्वेषौ यदि स्यातां तपसा किं प्रयोजनम् । तावुभौ यदि न (रागद्वेषौ न चेत्) स्यातां तपसा किं प्रयोजनम् ॥’ इत्यादौ । प्राधान्यं च सिद्धमेकत्र दर्शनात् सर्वत्र भगवद्दर्शनस्य ‘यो मां पश्यति सर्वत्र’(६.३०) इत्यादौ ॥४२ ॥ |
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| text | Wikitext | प्रभुः समर्थः । ‘नास्ति तस्मात् परं भूतं पुरुषाद्वै सनातनात्।’(कुम्भ.म.भा.१२.३४७.३१) इति हि मोक्षधर्मे । ‘प्रभुरीशः समर्थश्च’ इत्यादि चाभिधानम् ॥ १-४ ॥ |
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| text | Wikitext | हरिः सर्वयज्ञभागहारित्वात्- ‘इडोपहूतं गेहेषु हरे भागं क्रतुष्वहम् । वर्णो मे हरितः श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरिति स्मृतः’॥ इति हि मोक्षधर्मे ।॥९ ॥ |
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| text | Wikitext | सर्वाश्चर्यमयं सर्वाश्चर्यात्मकम् ॥ १०, ११ ॥ |
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| text | Wikitext | सहस्रशब्दोऽनन्तवाची । तदपि ‘पाकशासनविक्रमः’ इत्यादिवत् प्रत्यायनार्थमेव । तथाहि ऋग्वेदखिलेषु- ‘अनन्तशक्तिः परमोऽनन्तवीर्यः सोऽनन्ततेजाश्च ततस्ततोऽपि ।’ इति । महातात्पर्याच्च बाहुल्यम् । न च परिमाणोक्त्या किञ्चित् प्रयोजनम् ॥१२ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘अनेक’शब्दोऽनन्तवाची । ‘अनन्तबाहुम्’(११.१९) इति वक्ष्यति । ‘सर्वतः पाणिपादं तत्’(१३.१४) इत्यादि च । ‘विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः ॥’ इति ऋग्वेदे । ‘विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोहस्त उत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां नमति सं पतत्रैर्द्यावापृथिवी जनयन् देव एकः ॥’ इति यजुर्वेदे च । विश्वशब्दश्चानन्तवाची- ‘सर्वं समस्तं विश्वं च अनन्तं पूर्णमेव च।’ इत्यभिधानात् । ‘अनन्तबाहुमनन्तपादम् अनन्तरूपं पुरुवक्त्रमेकम् ॥’ इति च बाभ्रव्यशाखायाम् । महत्त्वाद्युक्तिस्तु तदात्मकत्वेनापि भवति । अन्यथा ‘अनादिमत् परं ब्रह्म’(१३.१३) इत्याद्ययुक्तं स्यात् । |
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| text | Wikitext | एकत्र त्वनन्तान्यस्य रूपाणि इत्यनन्तरूपः । अन्यत्र त्वपरिमाण इति । उक्तं ह्युभयमपि ‘परात् परं यन्महतो महान्तम्’, ‘यदेकमव्यक्तमनन्तरूपम्’(तै.आ.१०.१.१) इति यजुर्वेदे अव्यक्तस्यानन्तत्वादेव महतो महत्त्वेऽपरिमेयत्वं सिध्यति । ‘महान्तं च समावृत्य प्रधानं समवस्थितम् । अनन्तस्य न तस्यान्तः सङ्ख्यानं चापि विद्यते ॥’ इत्यादित्यपुराणे । तानि चैकैकानि रूपाण्यनन्तानीति चैकत्र भवन्ति(भवति) । ‘असङ्ख्याता ज्ञानकास्तस्य देहाः सर्वे परीमाणविवर्जिताश्च’ । इति हि ऋग्वेदखिलेषु । ‘यावान् वाऽयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाशः । उभेऽस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते । उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ ॥’(छा.८.१.३) इति च । ‘कृष्णस्य गर्भजगतोऽतिभरावसन्नपार्ष्णिप्रहारपरिरुग्णफणातपत्रम् ।’(भाग.१०.१४.३१) इति च भागवते । |
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| text | Wikitext | न चैतदयुक्तम् । अचिन्त्यशक्तित्वादीश्वरस्य । ‘अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत्’ । इति श्रीविष्णुपुराणे । ‘नैषा तर्केण मतिरापनेया’(कठ.१.२.९) इति च श्रुतिः । अतिप्रसङ्गस्तु महातात्पर्यवशाद् वाक्यबलाच्चापनेयः । न हि घटवत् कश्चिदपि पदार्थो न दृष्ट इत्येतावता प्रमाणदृष्टः सन् निराक्रियते । केषुचित् पदार्थेषु वाक्यव्यवस्थाऽचिन्त्यशक्तित्वाभावाद् अङ्गीक्रियते । ‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का । चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ॥ एवं परे, अन्यत्र श्रुताश्रुतानां गुणागुणानां च क्रमाद् व्यवस्था ॥’ इति जाबालखिलश्रुतेश्च । उपचारत्वपरिहाराय ‘न मध्यम्’ इति । अन्यथा आद्यन्ताभावेनैव तत्सिद्धेः । विश्वरूपः पूर्णरूपः- ‘स विश्वरूपोऽनूनरूपोऽतोऽयं सोऽनन्तरूपो न हि नाशोऽस्ति तस्य’ इति शाण्डिल्यशाखायाम् ॥ १६ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘अनलार्कद्युतिम्’ इत्युक्ते मितत्वशङ्कामपाकरोति - अप्रमेयमिति ॥ १७ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C11_V19 |
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| text | Wikitext | ‘शशिसूर्यनेत्रम्’ इत्यपि ‘अहं क्रतुः’(९.१६) इत्यादिवत् । ‘तदङ्गजाः सर्वसुरादयोऽपि तस्मात् तदङ्गेति ऋषिभिः स्तुतास्ते’ । इत्यृग्वेदखिलेषु । ‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्योऽजायत’ ।(ऋ.मं.१०.सू.९०.मं.१६) इति च । बहुरूपत्वाद् बह्वङ्गत्वं च तेषां युक्तम् ॥ १८, १९ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘मातापित्रोरन्तरगः स एकरूपेण चान्यैः सर्वगतः स एकः’ । इति वारुणश्रुतेरेकेन रूपेण द्यावापृथिव्योरन्तरं (प्राप्तो) व्याप्तो भवति । ‘पश्य मे पार्थ रूपाणि’(११.५) इति बहूनि रूपाणि प्रतिज्ञातानि । मातापितरौ च पृथिवीद्यावौ- ‘मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात्’,(ऋ.मं.५.सू.४२.मं.१६) ‘मधु द्यौरस्तु नः पिता’(ऋ.मं.१.सू.९०.मं.७) इत्यादिप्रयोगात् । न तु नियमतो भयप्रदं तत्स्वरूपम् । नारदस्य तदभावात् । केषाञ्चित् तथा दर्शयति भगवान् । ‘प्रीयन्ति केचित् तस्य रूपस्य दृष्टौ बिभेति कश्चिदभ्यसे सर्वतृप्तिः’ । इति हि वरुणशाखायाम् । न तु तं सर्वे पश्यन्ति अदृष्ट्वाऽपि तन्निरूप्य भये द्रष्टुस्तथा प्रतिभाति । तथा च गौतमखिलेषु- ‘दृष्ट्वा देवं मोदमाना अदृष्ट्वाऽप्येतद्भयाद् बिभ्यतो दृष्टवत् ते । पश्यन्ति ते न्यस्तचक्षुर्मुखांस्तु तस्मिन्नेवैते मनसो गतत्वात्’॥ इति ।॥२० ॥ |
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| text | Wikitext | धर्मान्तरज्ञानार्थमेव ‘को भवान्’ इति पृच्छति । यथा कश्चित् किञ्चित् नामादिकं जानन्नपि जातिज्ञानार्थं पृच्छति ‘कस्त्वम्’ इति । यदि तमेव न जानाति तर्हि ‘विष्णो’(११.३०) इत्येव सम्बोधनं न स्यात् । ‘त्वमक्षरम्’(११.१८) इत्यादि च ॥ २१-३१ ॥ |
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| text | Wikitext | कालशब्दो जगद्बन्धन-च्छेदन-ज्ञानादिसर्वभगवद्धर्मवाची । ‘कल बन्धने’, ‘कल च्छेदने’, ‘कल ज्ञाने’, ‘कल कामधेनुः’ इति (हि) पठन्ति । प्रसिद्धश्च स शब्दो भगवति । ‘नियतं कालपाशेन बद्धं शक्र विकत्थसे । अयं स पुरुषः श्यामो लोकस्य हरति प्रजाः । बद्ध्वा तिष्ठति मां रौद्रः पशुं(पशून्) रशनया यथा ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३४.८१-८२) इति हि मोक्षधर्मे विष्णुना बद्धो बलिर्वक्ति । ‘विष्णौ चाधीश्वरे चित्तं धारयन् कालविग्रहे’(भाग.११.१५.१५) इति हि भागवते । |
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| text | Wikitext | प्रवृद्धः परिपूर्णोऽनादिर्वा । ‘ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्’(ऋ.मं.१०.सू.१९०.मं.१) इति हि श्रुतिः । ‘एतन्महद्भूतमनन्तम्’ इति च । ‘प्र विष्णुरस्तु तवसस्तवीयान् त्वेषं ह्यस्य स्थविरस्य नाम’(ऋ.मं.७.सू.१००.मं.३) इति च । न तु वर्धनम् । ‘नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ।’(भाग.११.३.३९) इति हि भागवते । ‘यस्य दिव्यं हि तद्रूपं हीयते वर्धते न च’ इति मोक्षधर्मे । ‘न कर्मणा’(बृ.३.४.२३) इति तु, कर्मणाऽपि न, किमु स्वयमिति । लोकान् समाहर्तुमिह विशेषेण प्रवृत्तः । भ्रात्रादींश्च ऋते इति ‘अपि’शब्दः । प्रत्यनीकत्वं तु परस्परतया । सर्वेऽपि (हि) न भविष्यन्ति । अक्षोहिण्यादिभेदेन बहुवचनं च युक्तम् ॥३२ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C11_V35 |
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| text | Wikitext | ‘योऽस्य शिरश्छिन्नं भूमौ पातयति, तच्छिरो भेत्स्यति’ तत्पितुर्वरात् जयद्रथोऽपि विशेषेणोक्तः । सवरा वासवी शक्तिरिति कर्णः ॥३४-३५ ॥ |
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| text | Wikitext | यदेतद् वक्ष्यमाणं तत् स्थाने युक्तमेवेत्यर्थः । अग्नीषोमाद्यन्तर्यामितया जगद्धर्षणादेः(त्) हृषीकेशः । केशत्वं त्वंशूनां तन्नियत(न्तृ)त्वादेः । प्रमाणं तु ‘शशिसूर्यनेत्रम्’(११.१९) इत्यत्रोक्तम् । हृषीकाणामिन्द्रियाणामीशत्वाच्च (हृषीकेशः) । तेषां विशेषतः ईशत्वं च ‘यः प्राणे तिष्ठन्’(बृ.५.७.१६) इत्यादौ सिद्धम् । ‘न मे हृषीकाणि पतन्त्यसत्पथे’(भाग.२.६.३३) इत्यादिप्रयोगाच्च । इतरोऽर्थो मोक्षधर्मे सिद्धः । ‘सूर्याचन्द्रमसौ शश्वत् केशैर्मे अंशुसञ्ज्ञितैः । बोधयन् स्थापयंश्चैव जगदुत्पद्यते पृथक् । बोधनात् स्थापनाच्चैव जगतो हर्षसम्भवात् । अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन । हृषीकेशो महेशानो वरदो लोकभावनः॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२४२.६६-६८) इति ॥ ३६ ॥ |
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| text | Wikitext | कथं ‘स्थाने’ इति ? तदाह - कस्मादित्यादिना ॥ पूर्णश्चासौ आत्मा च इति महात्मा । आत्मशब्दश्चोक्तो भारते- ‘यच्चाऽप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह । यच्चास्य सन्ततो भावः तस्मादात्मेति भण्यते ॥’ इति । तत्परं सदसतः परम् । ‘असच्च सच्चैव च यद्विश्वं सदसतः परम्’(म.भा.१.१.२३) इति च भागवते ।॥३७ ॥ |
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| text | Wikitext | एकस्त्वमेव कारयिता नान्योऽस्त्यथापि ॥ ४२ ॥ |
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| text | Wikitext | स्वकं रूपं तु भ्रान्ति(न्त)प्रतीत्या । अन्यथा तदपि स्वकमेव । प्रमाणानि तूक्तानि पुरस्तात् ॥ ५० ॥ |
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| text | Wikitext | तदुपासनमपि हि मोक्षसाधनं प्रतीयते- ‘श्रियं वसाना अमृतत्वमायन् भवन्ति सत्या समिथा मितद्रौ’ इति । ‘अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते’ इति च । अव्यक्तं च महतः परम्- ‘महतः परमव्यक्तम्’ इत्युक्तपरामर्शोपपत्तेः । ‘उपास्य तां श्रियमव्यक्तसञ्ज्ञां भक्त्या मर्त्यो मुच्यते सर्वबन्धैः’ । इति सामवेदे आग्निवेश्यशाखायाम् । |
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| verse_id | String | BGB_C12_V02 |
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| text | Wikitext | महच्च माहात्म्यं तस्याः वेदेषूच्यते । ‘चतुष्कपर्दा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते । तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतुः यत्र देवा दधिरे भागधेयम् ’(ऋ.मं.१०.सू.११४.मं.३) इति । ‘चतुःशिखण्डा युवतिः सुपेशा घृतप्रतीका वयुनानि वस्ते । (तस्यां सुपर्णा वृषणा निषेदतुर्यत्र देवा दधिरे भागधेयम्)’(काठकसंहिता.३१.१४,तै.ब्रा.१.२.१.२७) इति च । ‘अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः’ इत्यारभ्य ‘अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् । तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम् । मया सो अन्नमत्ति यो वि पश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत्युक्तम् । अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि। यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् । अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्त वाउ। अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् मम योनिरप्स्वान्तः समुद्रे । परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना सं बभूव’(ऋ.मं.१०.सू.१२४.मं.१-८) इत्यादि च । ‘त्वया जुष्ट ऋषिर्भवति देवि त्वया ब्रह्मागतश्रीरुत(ब्रह्मा गतश्रीः) त्वया’(म.ना.१३.२) इति च । इति शङ्का कस्यचिद् भवति । अतो जानन्नपि सूक्ष्मयुक्तिज्ञानार्थं पृच्छति- एवमिति ॥ एवं शब्देन दृष्टश्रुतरूपं ‘मत्कर्मकृत्’(११.५५) इत्यादिप्रकारश्च परामृश्यते । |
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| verse_id | String | BGB_C12_V02 |
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| text | Wikitext | अव्यक्तं प्रकृतिः ‘महतः परमव्यक्तम्’(कठ.१.३.१२) इति प्रयोगात् । ‘यत् तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । प्रधानं प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत् ॥’(भाग.३.२७.११) इति च भागवते । अक्षरं च तत् । ‘अक्षरात् परतः परः’(आथ.२.१.२) इति श्रुतेः । |
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| verse_id | String | BGB_C12_V02 |
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| text | Wikitext | परं तु ब्रह्म न हि भगवतोऽन्यत् । ‘आनन्दमानन्दमयोऽवसाने सर्वात्मके ब्रह्मणि वासुदेवे’(भाग.२.२.३४) इति भागवते । रूपं चेदृशं साधितं पुरस्तात्(गी.भा.२.७२) । उपासनं च तथैव कार्यम् । ‘सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्’(तै.आ.३.१२.१,श्वे.उ.३.१४,ऋ.सं.मं.१०.सू.९०.मं.१) इत्यारभ्य ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै.आ.३.१२.७,चित्त्युपनिषत्) इति (हि) साभ्यासा । आदित्यवर्णत्वादिश्च न वृथोपचारत्वेनाङ्गीकार्यः । तथा च सामवेदे सौकरायणश्रुतिः- ‘‘स्थाणुर्ह वै प्राजापत्यः स प्रजापतिं पितरमेत्य उवाच- ‘(मुमुक्षुभी राधुभिः) मुमुक्षुभिः साधुभिः पूतपापैः किमु ह वै तारकं तारवाच्यम् । ध्यानं च तस्याप्तरुचेः कथं स्याद् ध्येयश्च कः पुरुषोऽलोमपादः॥’ इति । तं होवाच- ‘एष वै विष्णुस्तारकोऽलोमपादो ध्यानं च तस्याप्तरुचेर्वदामि । सोऽनन्तशीर्षो बहुवर्णः सुवर्णो ध्येयः स वै लोहितादित्यवर्णः ॥ श्यामोऽथ वा हृदये सोऽष्टबाहुः अनन्तवीर्योऽनन्तबलः पुराणः।’ ’’ इति (इत्यादि)। अरूपत्वादेस्तु गतिरुक्ता (पुरस्तात्) । पुरुषभेदश्च प्रश्नादौ प्रतीयते ‘त्वां पर्युपासते, ये चाप्यक्षरमव्यक्तम्’ इत्यादौ ॥१-२ ॥ |
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| verse_id | String | BGB_C12_V04 |
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| text | Wikitext | भवन्तु त्वदुपासका एवोत्तमाः । इतरेषां तु किं फलम् ? इत्यत आह- ये त्वित्यादिना ॥ अनिर्देश्यत्वं चोक्तं भागवते मायायाः- ‘अप्रतर्क्याद् अनिर्देश्याद्(अनिर्वाच्यात्) इति केष्वपि निश्चयः’(भाग.१.१७.१९) इति । ईश्वरस्तु (दे)दैवशब्देनोक्तः ‘दैवमन्येपरे’(भाग.१.१७.१८) इत्यत्र । उक्तं च सामवेदे काषायणश्रुतौ ‘नासदासीन्नो सदासीत् तदानीम्’ (ऋ.मं.१०.सू.१२९. मं.१,शत.ब्रा.१०.५.३.२, तै.ब्रा.२.८९.३) इति । ‘न महाभूतं नोपभूतं तदासीत्’ इत्यारभ्य ‘तम आसीत् तमसा गूहमग्रे’ इति । ‘तमो ह्यव्यक्तमजरम- निर्देश्यमेषा ह्येव प्रकृतिः’ इति । सर्वगाचिन्त्यादिलक्षणा च सा ।तथाहि मोक्षधर्मे- ‘नारायणगुणाश्रयाद् अजराद् अतीन्द्रियाद् अग्राह्याद् असम्भवतः(असम्भवात्)। असत्याद् अहिंस्रात् ललामाद् द्वितीयप्रवृत्तिविशेषाद् अवैराद् अक्षयाद् अमराद् अक्षराद् अमूर्तितः सर्वस्याः सर्वकर्तुः शाश्वततमसः।’(नारायणगुणाश्रयाद् अजराद् अमराद् अतीन्द्रियाद् अग्राह्याद् असम्भवात्। सत्याद् अहिंस्यात् लवादिभिरद्वितीयाद् अप्रवृत्तिविशेषाद् अवैराद् अक्षयाद् अमराद् अजराद् अमूर्तितः सर्वव्यापिनः सर्वकर्तुः शाश्वतात् तमसः। कुम्भ-म.भा.१२.३५१.६) । इति । ‘आसीदिदं तमोऽभूतम् अप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥’(म.स्मृ.१.५) इति (च) मानवे । ‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’(१५.१६) इति च वक्ष्यति । कूटे= आकाशे स्थिता कूटस्था । ‘(आकाशसंस्थिता) आकाशे संस्थिता त्वेषा ततः कूटस्थिता मता’ इति हि ऋग्वेदखिलेषु । ‘सा सर्वगा निश्चला लोकयोनिः सा चाक्षरा विश्वगा (वी)विरजस्का’ इति च सामवेदे (गौतम)गौपवनशाखायाम् ॥ ३-४ ॥ |
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| text | Wikitext | कथं तर्हि त्वदुपासकानामुत्तमत्वम् ? इत्यत आह - क्लेश इति ॥ अव्यक्ता गतिर्दुःखं ह्यवाप्यते । गतिः मार्गः । अव्यक्तोपासनद्वारको मत्प्राप्तिमार्गो दुःखमाप्यत इत्यर्थः । अतिशयोपासन-सर्वेन्द्रियातिनियमन-सर्वसमबुद्धि- सर्वभूतहितेरतत्व-अतिसुष्ठ्वाचार-सम्यग्विष्णुभक्त्यादिसाधनसन्दर्भम् ऋते नाव्यक्तापरोक्ष्यम् । तदृते च न विष्णुप्रसादः । सत्यपि तस्मिन् न सम्यग् भगवदुपासनम् ऋते । नर्ते च तं मोक्षः । विनाऽप्यव्यक्तोपासनं भवत्येव भगवदुपासकानां मोक्ष इति क्लेशिष्ठोऽयं मार्ग इति भावः । तथाऽप्यपरोक्षीकृताव्यक्तानां सुकरं भगवदुपासनम् इत्येव(तावत्) प्रयोजनम् । तत्रापि योऽव्यक्तापरोक्ष्ये प्रयाससः तावता प्रयासेन यदि भगवन्तमुपास्ते ऊनेन वा तदा भगवदपरोक्षमेव (भगदापरोक्ष्यमेव) भवतीति द्वितीयमधिकम् । इन्द्रियसंयमनाद्यूनभावेऽत्युपासकस्यापि देवी नातिप्रसादमेति । देवस्तु तानि साधनानि भक्तिमतः स्वयमेवाप्रयत्नेन ददातीति (चाति) सौकर्यमिति भक्तानां भगवदुपासने । इतरत्र च क्लेशोऽधिकतरः । तदेतत् सर्वं ‘पर्युपासते’(१२.३) ‘सन्नियम्य’(१२.४) ‘अधिकतरः’(१२.४) इति परि सन् तरप्शब्दैः प्रतीयते । |
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| text | Wikitext | सामवेदे माधुच्छन्दसशाखायां चोक्तम्- ‘भक्ताश्च येऽतीव विष्णावतीव जितेन्द्रियाः सम्यगाचारयुक्ताः । उपासते तां समबुद्धयश्च तेषां देवी दृश्यते नेतरेषाम् । दृष्टा च सा भक्तिमतीव विष्णौ दत्वोपास्तौ सर्वविघ्नान् छिनत्ति । उपास्य तं वासुदेवं विदित्वा ततस्ततः शान्तिमत्यन्तमेति ॥’ इति । उक्तं च सामवेदे आयास्यशाखायाम्- ‘प्रसन्नो भविता देवः सोऽव्यक्तेन सहैव तु । यावता तत्प्रसादो हि तावतैव न संशयः । न तत्प्रसादमात्रेण प्रीयते स महेश्वरः । तस्मिन् प्रीते तु सर्वस्य प्रीतिस्तु भवति ध्रुवम् । यद्यप्युपासनाधिक्यं तथाऽपि गुणदो हि सः । मुक्तिदश्च स एवैको नाव्यक्तादि(दे)स्तु कश्चन ॥’ इति । ‘ममात्मभावमिच्छन्तो यतन्ते परमात्मने(ना) ।’(कुम्भ-म.भा.१२.२३५.२७) इति च मोक्षधर्मे श्रीवचनम् । ‘धर्मनित्ये महाबुद्धौ ब्रह्मण्ये सत्यवादिनि । प्रश्रिते दानशीले च सदैव निवसाम्यहम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३५.३३) इति च । महतः परं तु ब्रह्मैव । तथाहि भगवता सयुक्तिकमभिहितम् । ‘वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि’(ब्र.सू.१.४.५) ‘त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च’(ब्र.सू.१.४.७) इत्यादि । ‘तम्’ इति पुल्लिङ्गाच्चैतत्सिद्धिः । महतः(त्) परत्वं त्वव्यक्तपरस्य भवत्येव । तथा चाग्निवेश्यशाखायाम्- ‘अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवम्’(काठकेऽपि.१.३.१५) इति । ‘परो हि देवः पुरुहूतो महत्तः’ इति । |
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| text | Wikitext | न चाव्यक्त(स्य)रूपं भगवता निषिद्धम् । भारतादौ साधितत्वात् । ‘शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः’(ब्र.सू.१.४.१) इत्यादौ तु साङ्ख्यप्रसिद्धं प्रधानं निषिध्य, वैदिकमव्यक्तमेवोक्तम् । तथा च सौकरायणश्रुतिः - ‘शरीररूपिका साऽशरीरस्य विष्णोः यतः प्रिया सा जगतः प्रसूतिः’ इति । सुव्रतानां क्षिप्रं महदैश्वर्यं ददाति देवी; न देव इति (च) विशेषः । ‘सुवर्णवर्णां पद्मकरां च देवीं सर्वेश्वरीं व्याप्तजडां च बुद्ध्वा । सैवेति वै सुव्रतानां तु मासान्महाभूतिं श्रीस्तु दद्यान्न देवः॥’ इति ऋग्वेदखिलेषु ।॥५ ॥ |
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| text | Wikitext | मदुपासकानां भक्तानां न कश्चित् क्लेश इति दर्शयति- ये त्वित्यादिना ॥ उक्तं च सौकरायणश्रुतौ- ‘उपासते ये पुरुषं वासुदेवम् अव्यक्तादेरीप्सितं किं नु तेषाम् ।’ इति । ‘तेषामेकान्तिनः श्रेष्ठाः ते(ये) चैवानन्यदेवताः । अहमेव गतिस्तेषां निराशीःकर्मकारिणाम्’॥(कुम्भ-म.भा.१२.३५०.३४) इति च मोक्षधर्मे ।॥ ६-११ ॥ |
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| text | Wikitext | अज्ञानपूर्वादभ्यासाद् ज्ञान(मात्र)मेव विशिष्यते । ज्ञानमात्रात् सज्ञानं ध्यानम् । तथा च सामवेदेऽनभिम्लान(त)शाखायाम्- ‘अधिकं केवलाभ्यासाद् ज्ञानं तत्सहितं ततः । ध्यानं ततश्चापरोक्ष्यं(क्षं) ततः शान्तिर्भविष्यति ॥’ इति । ध्यानात् कर्मफलत्यागः इति तु स्तुतिः । अन्यथा कथम् ‘असमर्थोऽसि’(१२.१०) इत्युच्यते । ‘तयोस्तु कर्मसन्न्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते’(५.२) इति चोक्तम् । ‘सर्वाधिकं (ज्ञानं)ध्यानमुदाहरन्ति ध्यानाधिके ज्ञानभक्ती परात्मन् । कर्माफलाकाङ्क्षमथो विरागः त्यागश्च न ध्यानकलाफलार्हः ॥’ इति च काषायणशाखायाम् । वाक्यसाम्येऽप्यसमर्थविषयत्वोक्तेः तात्पर्याभाव इतरत्र प्रतीयते । ध्यानादिप्राप्तिकारणत्वाच्च(कारणेन) त्यागस्तुतिर्युक्ता । (केवलाद्) केवलध्यानात् फलत्यागयुक्तं ध्यानमधिकम् । ध्यानयुक्तत्याग एव चात्रोक्तः । अन्यथा कथम्- ‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ इत्युच्येत ? कथं च ध्यानादाधिक्यम् ? तथा च गौपवनशाखायाम्- ‘ध्यानात्तु केवलात् त्यागयुक्तं तदधिकं भवेत्॥’ इति । न हि त्यागमात्रानन्तरमेव मुक्तिर्भवति । भवति च ध्यानयुक्तात् । केवलत्यागस्तुतिरेवमपि भवति । यथा ‘अनेन युक्तो जेता, नान्यथा’ इत्युक्ते ॥१२ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘सर्वारम्भपरित्यागी’ (‘शुभाशुभपरित्यागी’) इत्यादेः सामान्यविशेष-व्याख्यानव्याख्येयभावेन अपुनरुक्तिः । ‘हर्षादिभिर्मुक्तः’ इत्युक्ते कादाचित्कमपि भवतीति ‘यो न हृष्यति’इत्युक्तम् (इत्याद्युक्तम्) । उपचारपरिहारार्थं पूर्वम् । आधिक्यज्ञापनाय भक्त्यभ्यासः । ‘ये तु सर्वाणि कर्माणि’(१२.६) इत्यादेः प्रपञ्च एषः ॥ १६-१९ ॥ |
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| text | Wikitext | पिण्डीकृत्योपसंहरति- ये तु धर्म्यामृतमिति ॥ धर्मः= विष्णुः, तद्विषयं च धर्म्यम् । ‘धर्म्यम् अमृतम्= मृत्यादिसंसारनाशकं च’ इति धर्म्यामृतम् । श्रत्= आस्तिक्यम् । ‘श्रन्नामास्तिक्यमुच्यते’ इति ह्यभिधानम् । तद् दधानाः श्रद्दधानाः ॥२० ॥ |
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| text | Wikitext | ‘यद्विकारि’ येन विकारेण युक्तम् । यतश्च यत् यतो याति = प्रवर्तते । स च प्रवर्तकः । यतश्च यत् इति अस्मात् प्रवर्तते क्षेत्रमिति वचनम् । स च य इति स्वरूपमात्रम् ॥ १-४ ॥ |
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| text | Wikitext | ब्रह्मसूत्राणि =शारीरकम् ॥ ५ ॥ |
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| text | Wikitext | इच्छादयो विकाराः ॥ ६-७ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘स च यो यत्प्रभावश्च’ इति वक्तुं तज्ज्ञानसाधनान्याह- अमानित्वमित्यादिना ॥ आत्माल्पत्वं ज्ञात्वापि महत्त्वप्रदर्शनं दम्भः । ‘ज्ञात्वापि स्वात्मनोल्पत्वं डम्भो माहात्म्य(भावनम्)दर्शनम्’ इति ह्यभिधानम् । आर्जवं मनोवाक्कायकर्म\ाम् अवैपरीत्यम् ॥ ८ ॥ |
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| text | Wikitext | सक्तिः = स्नेहः । स एवातिपक्वः= अभिष्वङ्गः । ‘स्नेहः सक्तिः स एवातिपक्वो(क्तो)भिष्वङ्ग उच्यते।’ इति ह्यभिधानम् ॥ १०॥ |
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| text | Wikitext | तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् अपरोक्षज्ञानार्थं शास्त्र(ज्ञानम्)दर्शनम् ॥ ११-१२ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘परं ब्रह्म’ इति च ‘स च यः’(१३.४) इति प्रतिज्ञातमुच्यते - अन्यद् ‘यत्प्रभावः’(१३.४) इति । आदिमद्देहादिवर्जितम् अनादिमत् । अन्यथा ‘अनादि’ इत्येव स्यात् । ॥ १३ ॥ |
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| text | Wikitext | सर्वेन्द्रियाणि गुणांश्चाभासयतीति सर्वेन्द्रियगुणाभासम् । इन्द्रियवर्जितत्वाद्यर्थ उक्तः पुरस्तात् । |
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| text | Wikitext | विकारान्तर्भावाज्ज्ञानसाधनं प्रथमत उक्तम् । बहुत्वात् साधनात्युपयोगात् प्रभावः ॥ १९ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘यतश्च यत्’ इति वक्तुं प्रकृति-विकार-पुरुषान् सङ्क्षिप्याह- प्रकृतिमिति ॥ गुणाः सत्त्वादयः । तेषामत्यल्पो(ऽपि) विशेषो लयात् सर्गे इति विकाराः पृथगुक्ताः । ‘कार्याकार्यगुणास्तिस्रः यतः स्वल्पोद्भवो जनौ’ । इति (हि) माधुच्छन्दसशाखायाम् ॥२० ॥ |
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| text | Wikitext | कार्यं शरीरम् । ‘शरीरं कार्यमुच्यते’ इति ह्यभिधानम् । करणानि इन्द्रियाणि । भोगः अनुभवः । स हि चिद्रूपत्वाद् अनुभवति । प्रकृतिश्च जडत्वात् परिणामिनी । ‘कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः । भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषं प्रकृतेः परम् ॥’(भाग.३.२७.९) इति (हि) भागवते ॥२१ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘यतश्च यत्’(१३.४) इत्याह - उपद्रष्टेति ॥ अनुमन्ता अन्वनु विशेषतो निरूपकः ॥२३ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘पुरुषः सुखदुःखानाम्’(१३.२१) इति जीव उक्तः । ‘पुरुषं प्रकृतिं च’ इति जीवेश्वरौ सहैवोच्येते । अन्यत्र महातात्पर्यविरोधः । उत्कर्षे हि महातात्पर्यम् । । तथाहि सौकरायणश्रुतिः- ‘अवाच्योत्कर्षे महत्त्वात् सर्ववाचां सर्वन्यायानां च महत्तत्परत्वम् । विष्णोरनन्तस्य परात्परस्य तच्चापि ह्यस्त्येव न चात्र शङ्का । अतो विरुद्धं तु यदत्र मानं तदक्षजादावथवाऽपि युक्तिः । न तत् प्रमाणं कवयो वदन्ति न चापि युक्तिर्ह्यूनमतिर्हि दृष्टेः ॥’ इति । अतो युक्तिभिरप्येतदपलापो न युक्तः । अतो यया युक्त्याऽविद्यमानत्वादि कल्पयति साऽप्याभासरूपेति सदेव माहात्म्यं वेदैरुच्यत इति सिध्यति । |
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| text | Wikitext | अवान्तरं च तात्पर्यं तत्रास्ति । उक्तं च तत्रैव- ‘अवान्तरं तत्परत्वं च सत्त्वे, महद्वाऽप्येकत्वात् (तु) तयोरनन्ते’ । इति । श्यामत्वाद्यभिधानाच्च । युक्तं च पुरुषमतिकल्पितयुक्त्यादेराभासत्वम् । अज्ञानसम्भवात् । न तु स्वतः प्रमाणस्य वेदस्याऽभासत्वम् । अदर्शनं च सम्भवत्येव । पुंसां बहूनामप्यज्ञानात् । तर्ह्यस्मदनधीतश्रुत्यादौ विपर्ययोऽपि स्यादिति च न वाच्यम् । यतस्तत्रैवाह- ‘नैतद्विरुद्धा वाचो नैतद्विरुद्धा युक्तयः इति ह प्रजापतिरुवाच (प्रजापतिरुवाच)’ इति । तद्विरुद्धं च जीवसाम्यम् । |
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| text | Wikitext | ‘आभास एव च’(ब्र.सू.२.३.५०) इति चोक्तम् । ‘बहवः पुरुषा ब्रह्मन् उताहो एक एव तु । को ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति । श्रीवैशंपायन उवाच- नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्भव । बहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ॥ तथा त्वं पुरुषं विश्वं आख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३६०.१-३) इति च मोक्षधर्मे । न च तत् सर्वं स्वप्नेन्द्रजाल(लादि)वत् । ‘वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत्’(ब्र.सू.२.२.२९) इति हि भगवद्वचनम् । न च स्वप्नवत् एकजीवकल्पितत्वे मानं पश्यामः । विपर्यये माश्चोक्ता द्वितीये । उक्तं चायास्यशाखायाम्- ‘स्वप्नो ह वा अयं चञ्चलत्वान्न च स्वप्नो न हि विच्छेद एतदिति।’ इति । |
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| text | Wikitext | नायं दोषः । न हीश्वरस्य जीवैक्यमुच्यते । जीवस्य हीश्वरैक्यं ध्येयम् । तदपि न निरुपाधिकम् । अतो न प्रतिबिम्बत्वविरोधि ऐक्यम् । तथा च माधुच्छन्दसश्रुतिः- ‘ऐक्यं चापि प्रातिबिम्ब्येन विष्णोः जीवस्यैतद्ध्यृषयो वदन्ति’ इति । अहङ्ग्रहोपासने च फलाधिक्यम् अ(आ)ग्निवेश्यश्रुतिसिद्धम्- ‘अहङ्ग्रहोपासकस्तस्य साम्यम् अभ्याशो ह वा अश्नुते नात्र शङ्का ।’ इति । ‘तदीयोऽहमिति ज्ञानम् अहङ्ग्रह इतीरितः ।’ इति वामने । ‘तद्वशत्वात्तु सोऽस्मीति भृत्यैरेव न तु स्वतः’ इति च । ‘प्रातिबिम्ब्येन सोऽस्मि भृत्यश्च’ इति भावना । तथा हि आयास्यशाखायाम्- ‘भृत्यश्चाहं प्रातिबिम्ब्येन सोऽस्मीत्येवं ह्युपास्यः परमः पुमान् सः ।’ इति । प्रातिबिम्ब्यं च तत्साम्य(सादृश्य)मेव ॥ २४ ॥ |
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| text | Wikitext | साङ्ख्येन वेदोक्तभगवत्स्वरूपज्ञानेन । कर्मिणामपि श्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वा दृष्टिः । श्रावकाणां च ज्ञात्वा ध्यात्वा । साङ्ख्यानां च ध्यात्वा । तथा च गौपवनश्रुतिः- ‘कर्मकृच्चापि तच्छ्रुत्वा ज्ञात्वा ध्यात्वाऽनुपश्यति । श्रावकोऽपि तथा ज्ञात्वा ध्यात्वा ज्ञान्यपि पश्यति । अन्यथा तस्य दृष्टिर्हि कथञ्चिन्नोपजायते ॥’ इति । ‘अन्ये’ इत्यशक्तानामप्युपायदर्शनार्थम् ॥ २५, २६ ॥ |
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| text | Wikitext | पुनश्च प्रकृति-पुरुष-ईश्वरस्वरूपं साम्यादिधर्मयुतमाह- यावदित्यादिना ॥ २७-२९ ॥ |
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| text | Wikitext | आत्मानं चाकर्तारं पश्यति स पश्यति ॥ ३० ॥ |
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| text | Wikitext | एकस्थम् एकस्मिन्नेव विष्णौ स्थितम् । तत एव च विष्णोः विस्तारम् ॥३१ ॥ |
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| text | Wikitext | न च व्ययादिस्तस्येत्याह - अनादित्वादिति ॥ सादि हि प्रायो व्ययि, गुणात्मकं च । ‘न करोति’ इत्यादेरर्थ उक्तः पुरस्तात् । न लौकिकक्रियादिस्तस्य । अतो ‘न प्रज्ञम्’(मां.२.१) इत्यादिवदिति ॥ ३२ ॥ |
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| text | Wikitext | भूतेभ्यः प्रकृतेश्च मोक्षसाधनम् अमानित्वादिकम् ॥ ३५ ॥ |
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| text | Wikitext | महद् ब्रह्म प्रकृतिः । सा च ‘श्रीः-भूः-दुर्गा’ इति भिन्ना । उमासरस्वत्याद्यास्तु तदंशयुता अन्यजीवाः । तथा च काषायणश्रुतिः- ‘श्रीर्भूमिर्दुर्गा महती तु माया सा लोकसूतिर्जगतो बन्धिक च । उमावागाद्या अन्यजीवास्तदंशास्तदात्मना सर्ववेदेषु गीताः ॥’ इति । ‘मम योनिः’ इति गर्भाधानार्था योनिः । नतु माता । वाक्यशेषात् । तथाहि सामवेदे शार्कराक्ष्यश्रुतौ- ‘विष्णोर्योनिर्गर्भसन्धारणार्था महामाया सर्वदुःखैर्विहीना । तथाऽप्यात्मानं दुःखिवन्मोहनार्थं (प्रदर्शयन्ती) प्रकाशयन्ती सह विष्णुना सा ॥’ इति । |
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| text | Wikitext | अतः सीतादुःखादिकं (सर्वं) मृषाप्रदर्शनमेव । तथा कूर्मपुराणे । न चेयं भूः । तथा च सौकरायणश्रुतिः- ‘अन्या भूमिर्भूरियं तस्य छाया भूतावमा सा हि भूतैकयोनिः।’ इति । ‘अवाप स्वेच्छया दास्यं जगतां प्रपितामही’ इत्यनभिम्लात(न)श्रुतिः। मत्स्यपुराणोक्तमपि स्वेच्छयैव । महद्ब्रह्मशब्दवाच्याऽपि प्रकृतिरेव- ‘महती ब्रह्मणी द्वे तु प्रकृतिश्च महेश्वरः।’ इति तत्रैव ॥३ ॥ |
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| text | Wikitext | बन्धप्रकारं दर्शयति साधनानुष्ठानाय - सत्त्वमित्यादिना ॥ ४,५, ६ ॥ |
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| text | Wikitext | (रज इति) तृष्णासङ्गयोः समुद्भवम् = तयोः कारणम् ॥ ७ ॥ |
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| text | Wikitext | अज्ञानं जायते यतः तद् अज्ञानजम् । ‘प्रमादमोहौ तमसः’(१४.१७) इति वाक्यशेषात् ॥८ ॥ |
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| text | Wikitext | रजसस्तु फलं दुःखमिति ॥ अल्पसुखं दुःखम् । तथाहि शार्कराक्षशाखायाम्- ‘रजसो ह्येव जायते मात्रया सुखं दुःखम्, तस्मात् तान् सुखिनो दुःखिन इत्याचक्षते ।’ इति । अन्यथा दुःखस्यातिकष्टत्वात् तमोऽधिकत्वं रजसो न स्यात् ॥ ९-१६ ॥ |
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| text | Wikitext | परिणामिकर्तारं गुणेभ्योऽन्यं न पश्यति । अन्यथा ‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्।’ इति श्रुतिविरोधः । ‘नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः’(कुम्भ-म.भा.१२.२३४.८४) इति मोक्षधर्मे ।॥ १९-२१ ॥ |
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| text | Wikitext | प्रायो न द्वेष्टि न काङ्क्षति । तथाहि सामवेदे भाल्लवेयशाखायाम्- ‘रजस्तमःसत्त्वगुणान् प्रवृत्तान् प्रायो न च द्वेष्टि न चापि काङ्क्षते । तथाऽपि सूक्ष्मं सत्त्वगुणं च काङ्क्षेद् यदि प्रविष्टं सुतमश्च जह्यात् ॥’ इति। ‘न हि देवा ऋषयश्च सत्त्वस्था नृपसत्तम । हीनास्सत्त्वेन सूक्ष्मेण ततो वैकारिकाः स्मृताः । कथं वैकारिको गच्छेत् पुरुषः पुरुषोत्तमम् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.७८-७९) इति हि मोक्षधर्मे । ‘सात्त्विकः पुरुषव्याघ्र भवेन्मोक्षार्थनिश्चितः’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.६९) । इति च ॥ २०-२२ ॥ |
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| text | Wikitext | तुल्यत्वार्थ उक्तः पुरस्तात् ॥ २४, २५ ॥ |
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| text | Wikitext | ब्रह्मवत् = प्रकृतिवत् भगवत्प्रियत्वं ब्रह्मभूयम् । नतु तावत् प्रियत्वम् । किन्तु प्रियत्वमात्रम् । ‘बद्धा वाऽपि तु मुक्ता वा न रमावत् प्रिया हरेः’ । इति पाद्मे । भूयाय भावाय ॥२६ ॥ |
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| text | Wikitext | ब्रह्मणः मायायाः ॥ २७ ॥ |
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| text | Wikitext | ऊर्ध्वो विष्णुः । ‘ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीवस्वमृतमस्मि द्रविणसवर्चसम्’ । इति हि श्रुतिः । ऊर्ध्वः उत्तमः सर्वतः । अधो निकृष्टम् । शाखा भूतानि । श्वोप्येकप्रकारेण न तिष्ठतीत्यश्वत्थः । तथाऽपि न प्रवाहव्ययः । पूर्वब्रह्मकाले यथा स्थितिस्तथा सर्वत्रापीत्यव्ययता । फलकारणत्वा- च्छन्दसां पर्णत्वम् । न हि कदाचिदप्यजाते पर्णे फलोत्पत्तिः ॥१ ॥ |
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| text | Wikitext | अव्यक्तेऽपि सूक्ष्मरूपेण सन्ति शरीरादौ च भूतानि इति अधश्चोर्ध्वं च प्रसृताः । गुणैः सत्त्वादिभिः । प्रतीतिमात्रसुखत्वात् प्रवाला विषयाः । मूलानि भगवद्रूपादीनि । भगवानपि कर्मानुबन्धेन हि फलं ददाति । तथाहि भाल्लवेयशाखायाम्- ‘ब्रह्म वा अस्य पृथङ् मूलम्, प्रकृतिः समूलम्, सत्त्वादयो अर्वाचीनमूलम् । भूतानि शाखाः, छन्दांसि पर्णा(त्रा)णि, देवनृतिर्यञ्चश्च शाखाः । पत्रेभ्यो हि फलं जायते । मात्राः शिफाः । मुक्तिः फलम्, अमुक्तिः फलम् । मोक्षो रसः, अमोक्षो रसः । अव्यक्ते च शाखाः, व्यक्ते च शाखा । अव्यक्ते च मूलम्, व्यक्ते च मूलम् । एषोऽश्वत्थो गुणालोलपत्रो न स्थीयते न न स्थीयते ; न ह्येष कदाचनान्यथा जायते, नान्यथा जायते ’ इति ॥ २ ॥ |
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| text | Wikitext | यथा स्थितिः तथा नोपलभ्यते । अन्तादिर्विष्णुः । ‘त्वमादिरन्तो जगतोऽस्य मध्यम्’(भा.ग.८.३.१०) इति भागवते । ‘अनाद्यनन्तं परं ब्रह्म न देवा ऋषयो विदुः’(कुम्भ-म.भा.१२.४३.१९) इति च मोक्षधर्मे । असङ्गशस्त्रेण सङ्गराहित्यसहितेन ज्ञानेन । ‘ज्ञानासिनोपासनया शितेन’(भाग.११.२८.१८) इति हि भागवते । छेदश्च विमर्श एव । ततश्च तस्यैवाबन्धकं भवति । तथा हि मूलस्थं ब्रह्म प्रतीयते । तच्चोक्तं तच्छ्रुतावेव- ‘विमर्शो ह्यस्य च्छेदः । स तं न बध्नाति, बध्नाति चान्यान्’ इति । |
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| text | Wikitext | तदर्थं च तमेव प्रपद्ये प्रपद्येत । तच्चोक्तं तत्रैव- ‘तं वै प्रपद्येत यं वै प्रपद्य न शोचति न हृष्यति न जायते न म्रियते तद् ब्रह्म मूलम्, तत् छित्सुः’ इति । ‘नारायणेन दृष्टश्च प्रतिबुद्धो(प्रतिबद्धः) भवेत् पुमान्’(कुम्भ-म.भा.१२.३५८.७५) । इति च मोक्षधर्मे । छेदनोपायो ह्यत्राकाङ्क्षितः । न च भगवतोऽन्यः शरण्योऽस्ति ॥ ३, ४ ॥ |
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| text | Wikitext | साधनान्तरमाह - निर्मानेति ॥ ५ ॥ |
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| text | Wikitext | स्वरूपं कथयति- न तदित्यादिना ॥ ६॥ |
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| text | Wikitext | ‘कर्षति’इत्युक्ते जीवस्य स्वातन्त्र्यं प्रतीतम् । तन्निवारयति- शरीरमित्यादिना ॥ यद् यदा शरीरमवाप्नोति उत्क्रामति च जीवः तदा ईश्वरः एव एतानि गृहीत्वा संयाति । ‘यत्रयत्र च संयुक्त्तो धाता गर्भं पुनः पुनः । तत्रतत्रैव वसति न यत्र स्वयमिच्छति’(कुम्भ-म.भा.१२.२३३.१२) इति हि मोक्षधर्मे । ‘भावाभावावपि जानन् गरीयो जानामि श्रेयो न तु तत् करोमि । आशासु हर्म्यासु ह्रदासु कुर्वन् यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३३.१०) इति च । ‘हत्वा जित्वाऽपि मघवन् यः कश्चित् पुरुषायते । अकर्ता त्वेव भवति कर्ता त्वेव करोति तत् ॥’(कुम्भ-म.भा.१२.२३१.१७) इति च । ‘तद्यथाऽनः सुसमाहितम् उत्सर्जद्यायात् । एवमेवायं (श)शारीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जद्याति’(बृ.४.३.३५) इति च श्रुतिः । ‘वाङ् मनसि सम्पद्यते, मनः प्राणे, प्राणस्तेजसि, तेजः परस्यां देवतायाम् ’(छां.६.८.६) इति च । गन्धानिव सूक्ष्माणि ॥८ ॥ |
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| text | Wikitext | भोगो अस्यापि साधितः पुरस्तात् । इन्द्रियद्वाराऽपि सोऽपि भुङ्क्ते । ‘(यद्य) तद्य इमे वीणायां गायन्ति एतं ते गायन्ति’(छां.१.३.९) इति च श्रुतिः । गुणान्वितमेव भुङ्क्ते । ‘न ह वै देवान् पापं गच्छति’(बृ.३.६.२७) इति श्रुतेः ॥ ९ ॥ |
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| text | Wikitext | तर्हि किमिति न दृश्यते ? इत्यत आह - उत्क्रामन्तमित्यादि ॥ १० ॥ |
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| text | Wikitext | यतन्तः ज्ञानं प्राप्य । अकृतात्मानः अशुद्धबुद्धयः ॥ ११ ॥ |
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| text | Wikitext | पूर्वोक्तमेव ज्ञानं प्रपञ्चयति - यदादित्यगतमित्यादिना ॥ १२ ॥ |
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| text | Wikitext | गां भूमिम् ॥ १३ ॥ |
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| text | Wikitext | वेदनिर्णयात्मिका मीमांसा= वेदान्तः । तथाहि सामवेदे प्राचीनशाल(ला)श्रुतिः- ‘स वेदान्तकृत् स कालक इति । स ह्येव युक्तिसूत्रकृत् स कालक इति’ इति ॥१५ ॥ |
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| text | Wikitext | क्षरभूतानि ब्रह्मादीनि । कूटस्थः प्रकृतिः । तथा च शार्कराक्ष्यश्रुतिः- ‘प्रजापतिप्रमुखाः सर्वजीवाः क्षरोऽक्षरः पुरुषो वै प्रधानम् । तदुत्तमं चान्यमुदाहरन्ति जालाजालं मातरिश्वानमेकम् ॥’ इति॥ १६-२० ॥ |
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| text | Wikitext | तपः ब्रह्मचर्यादि । ‘ब्रह्मचर्यादिकं तपः’ इति ह्यभिधानम् ॥ १ ॥ |
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| text | Wikitext | पैशुनं परोपद्रवनिमित्तदोषाणां राजादेः कथनम् । ‘परोपद्रवहेतूनां दोषाणां पैशुनं वचः । राजादेस्तु मदाद्भीतेरदृष्टिर्दर्प उच्यते ॥’ इति ह्यभिधानम् । लौल्यं= रागः । ‘रागो लौल्यं तथा रक्तिः’ इत्यभिधानात् । अचापलं स्थैर्यम् । ‘चपलश्चञ्चलोऽस्थिरः’ इत्यभिधानात् ॥२ ॥ |
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| text | Wikitext | क्षमा तु क्रोधाभावेन सहापकर्तुरनपकृतिः । ‘अक्रोधोदोषकृच्छत्रोः क्षमावान् स निगद्यते’ इत्यभिधानात् । दैवीं सम्पदम् अभि जातः प्रति जातः॥३-७॥ |
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| text | Wikitext | जगतः सत्यं प्रतिष्ठा ईश्वरश्च विष्णुः । तद्वैपरीत्येनाऽहुः । ‘तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यम्, तेषामेष सत्यम्’(बृ.८.१.२०) । इति हि श्रुतिः । ‘द्वे वा व ब्रह्मणो रूपे चामूर्तं चैवामूर्तं च स्थितं च यच्च सच्च त्यच्च’(बृ.२.३.१) इति च । ‘तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यम् इति, एष ह्येवैतत् सादयति यामयति चेति’ इति च प्राचीनशालाश्रुतिः । परस्परसम्भवो ह्युक्तः- ‘अन्नाद्भवन्ति भूतानि’(३.१४) इत्यादिना ॥९ ॥ |
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| text | Wikitext | दुष्पूरो हि कामः । ‘पाताल इव दुष्पूरो मां हि क्लेशयते सदा।’(कुम्भ-म.भा.१२.१७६.३९) इति हि मोक्षधर्मे ॥१० ॥ |
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| text | Wikitext | मामात्मपरदेहेष्विति ॥ ‘न कस्यचिद् विष्णुः कारयिता । यदि स्यान्मामपी(न्ममापी)दानीं कारयतु’ इत्यादि । ‘ईश्वरो यदि सर्वस्य कारकः कारयीत माम् । अद्येति वादिनं ब्रूयात् सदाऽधो यास्यसीति तु ॥’ इति हि सामवेदे यास्कश्रुतिः ॥ १८ ॥ |
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| text | Wikitext | शास्त्रविधिमुत्सृज्य= अज्ञात्वा एव । ‘वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना।’(म.स्मृ.२.२३५) इति विधिरुत्सृष्टो हि तैः । ‘ये वै वेदं न पठन्ते न चार्थं वेदोज्झितांस्तान् विद्धि सानूनबुद्धीन्’ । इति च माधुच्छन्दसश्रुतिः । अन्यथा तु ‘तामसाः’ इत्येवोच्येत, नतु विभज्य । यदि सात्त्विकाः तर्हि नोत्सृष्टशास्त्राः । नहि वेदविरुद्धो धर्मः । ‘वेदोऽखिलो धर्ममूलम्, स्मृतिशीले च तद्विदाम्’(म.स्मृ.२.६) । इति हि स्मृतिः । ‘वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः’(भाग.६.१.४०) इति भागवते ॥१ ॥ |
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| text | Wikitext | अतो विभज्याह- त्रिविधेत्यादिना ॥ २ ॥ |
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| text | Wikitext | सत्त्वानुरूपा चित्तानुरूपा । यो यच्छ्रद्धः स एव स सात्त्विकश्रद्धः सात्त्विक इत्यादि ॥ ३ ॥ |
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| text | Wikitext | कः सात्त्विकश्रद्धः ? इत्यादि विभज्याह - यजन्त इत्यादिना ॥ ४॥ |
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| text | Wikitext | भगवत्कर्शनं नाम अल्पत्वदृष्टिरेव । ‘यो वै महान्तं परमं पुमांसं नैवं द्रष्टा कर्शकः सोऽतिपापी’ । इत्यनभिम्लान(त)श्रुतिः । आसुरो निश्चयो येषां त आसुरनिश्चयाः । ‘देवास्तु सात्त्विकाः प्रोक्ताः दैत्या राजसतामसाः।’ इति ह्याग्निवेश्यश्रुतिः ॥ ६॥ |
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| text | Wikitext | प्रीतिः आनन्तरिका । हृद्यत्वं दर्शने । स्थिराश्च न तदैव पक्वा भवन्ति । तथा ह्याज्यादयः ॥ ८ ॥ |
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| text | Wikitext | सौम्यत्वम् अक्रौर्यम् । ‘अक्रूरः सौम्य उच्यते’ इति ह्यभिधानम् । मौनं मननशीलत्वम् । ‘बाल्यं च पाण्डित्यं च निर्विद्याथ मुनिः’(बृ.अ.५,ब्रा.५.१) इति हि श्रुतिः । ‘एतेन हीदं सर्वम् अनन्तं मतम् । यदनेनेदं सर्वं मतं तस्मान्मुनिस्तस्मान्मुनिरित्याचक्षते’ । इति हि भाल्लवेयश्रुतिः । कथं चान्यथा मानसं तपः स्यात् ? ॥१६ ॥ |
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| text | Wikitext | पुनश्च कर्मादीतिकर्तव्यताविधानार्थमर्थवादमाह- ओं तत् सत् इत्यादिना ॥ परस्य ब्रह्मणो ह्येतानि नामानि- ‘ओतं जगद् यत्र स्वयं च पूर्णो वेदोक्तरूपोऽनुपचारतश्च । सर्वैः शुभैश्चाभियुतो नचान्यैः ओम् तत् सत् इत्येनमतो वदन्ति ॥’ इति हि ऋग्वेदखिलेषु । द्वितीयपादस्तच्छब्दार्थः । |
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| text | Wikitext | ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’(छा.६.२.१) इति च । ‘ओम् इति ब्रह्म’(तै.उ.१.८.१) इति च । तेन ब्रह्मणा । आत्मपूजार्थम् । वेदविधिः व्यञ्जनम् । मा तूक्ता पुरस्तात् ॥ २४ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘तत् फलं मे स्यात्’ इत्यनभिसन्धाय ॥ २५ ॥ |
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| text | Wikitext | सद्भावशब्देन प्रजननं सूचितम् । ‘ओम्’ इत्युक्त्वा, अनभिसन्धाय फलम्, यज्ञदानतपआदिकृताम् अतिप्रीतेः नामसाम्याद् ब्रह्मैव निष्पादितं भवतीत्याशयः । तथा च ऋग्वेदखिलेषु- ‘ओं यज्ञाद्या निष्फलं कर्म तत् स्यात् सद् वै तदर्थं कर्म वदन्ति वेदाः । तच्छब्दानां सन्निधेर्ब्रह्मप्रीतेः तद्रूपत्वाज्जनितं ब्रह्म तस्य ॥’ इति ॥ २६-२८ ॥ |
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| text | Wikitext | फलानिच्छया अकरणेन वा काम्यकर्मणो न्यासः सन्न्यासः । त्यागस्तु फलत्याग एव । तथाहि प्राचीनशालश्रुतिः- ‘अनिच्छयाकर्मणा वापि काम्यकर्मन्यासो न्यासः, फलत्यागस्तु त्यागः।’ इति ॥ १, २ ॥ |
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| text | Wikitext | ‘मनीषिणः’ इति (उक्तत्वात्) विशेषणात् पूर्वपक्षोऽपि ग्राह्य एव । फलत्यागेन त्यागो विवक्षितो यज्ञादेस्तत्पक्षे । ‘यस्तु कर्मफलत्यागी’(१८.११) इति च वक्ष्यति । अत एक एवायं पक्षः ॥ ३ ॥ |
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| text | Wikitext | तत्प्रकारं चाह - निश्चयमित्यादिना ॥ ४ ॥ |
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| text | Wikitext | यज्ञभेद उक्तो ‘द्रव्ययज्ञाः’(४.२८) इत्यादिना । दाने तु अभयदानमन्तर्भवति । एतेषां मध्ये यत्किञ्चिद् यज्ञादिकं कर्तव्यमेवेत्यर्थः । अन्यथा ‘ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा । यदीच्छेत् मोक्षमास्थातुम् उत्तमाश्रममाश्रयेत् ॥’ इत्यादिव्यासस्मृतिविरोधः । ज्ञानयज्ञविद्याऽभयदानब्रह्मचर्यादितपसो हि ते । अतो यद्वचोऽन्यथा प्रतीयते अधिकारभेदेन तद् योज्यम् । अन्यथेतरेषां गत्यभावात् ॥ १० ॥ |
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| text | Wikitext | अन्यः त्यागार्थो न युक्त इत्याह- न हीति ॥ ११ ॥ |
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| text | Wikitext | त्यागं स्तौति- अनिष्टमिति ॥ १२ ॥ |
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| text | Wikitext | पुनः संन्यासं प्रपञ्चयितुं कर्मकारणान्याह - पञ्चेत्यादिना ॥ साङ्ख्यकृतान्ते ज्ञानसिद्धान्ते ॥ १३ ॥ |
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| text | Wikitext | अधिष्ठानं देहादिः । कर्ता विष्णुः । स हि ‘सर्वस्य कर्ता’ इत्युक्तम् । जीवस्य चाकर्तृत्वे प्रमाणमुक्तम् । करणम् इन्द्रियादि च । चेष्टाः क्रियाः । हस्तादिक्रियाभिः होमादिकर्माणि जायन्ते । ध्यानादेरपि मानसी चेष्टा कारणम् । पूर्वतनचेष्टाऽपि संस्कारकारणत्वेन भवति । दैवम् अदृष्टम् । तथाचायास्यश्रुतिः- ‘देहो ब्रह्माथेन्द्रियाद्याः क्रियाश्च तथाऽदृष्टं पञ्चमं कर्महेतुः’ । इति ॥ १४, १५ ॥ |
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| text | Wikitext | केवलं निष्क्रियम् । ‘एनं केवलमात्मानं निष्क्रियत्वाद् वदन्ति हि।’ इति तत्रैव ॥१६ ॥ |
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| text | Wikitext | तज्ज्ञानं स्तौति- यस्येति ॥ यस्त्वीषद् बध्यते स ईषदहङ्कारी च ॥१७ ॥ |
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| text | Wikitext | एवं तर्हि न पुरुषमपेक्ष्य विधिः ? अकर्तृत्वात् , इत्यत आह- ज्ञानमिति ॥ त्रिविधा कर्मचोदना । एतत् त्रिविधमपेक्ष्य कर्मविधिरिति त्रिविधा इत्युच्यते । कारणानि सङ्क्षिप्याऽह- करणमिति ॥ कर्मसङ्ग्रहः कर्मकारणसङ्क्षेपः । अधिष्ठानादि करण एवान्तर्भूतम् । |
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| text | Wikitext | तथाह्यृग्वेदखिलेषु- ‘ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानिनं चाप्यपेक्ष्य विधिरुत्थितः । करणं चैव कर्ता च कर्मकारणसङ्ग्रहः ॥’ इति । अकर्तृत्वेऽपि विधिद्वारा इश्वरप्रसादाद् इच्छोत्पत्त्या उक्तकारणैः कर्मद्वारा पुरुषार्थो भवतीति । ईश्वराधीनत्वेऽपि विधिद्वारा नियत तेनैव । यदि चेच्छादिर्जायते तर्हि कारितमेवेश्वरेण । फलं च नियतम् । |
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| text | Wikitext | वस्तुतोऽकर्तृत्वेऽप्याभिमानिकं कर्तृत्वं तस्यैव । स्वातन्त्र्यं च जडम् अपेक्ष्येति न प्रवृत्तिविधिवैयर्थ्यम् । सर्वं चैतद् अनुभवोक्तप्रमाणसिद्धमिति न पृथक् प्रमाणमुच्यते ॥१८ ॥ |
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| text | Wikitext | पुनः साधनप्रथनाय गुणभेदानाह- ज्ञानमित्यादिना ॥ गुणसङ्ख्याने गुणगणनप्रकरणे ॥ १९ ॥ |
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| text | Wikitext | एकं भावं विष्णुम् ॥ २० ॥ |
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| text | Wikitext | परकृतं दोषं दीर्घकालकृतमपपि अनुचितं यः सूचयति स दीर्घसूत्री । परेण यः कृतो दोषो दीर्घकालकृतोऽपि वा । यस्तस्य सूचको दोषाद् दीर्घसूत्री स उच्यते ॥’ इत्यभिधानात् ॥२८ ॥ |
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| text | Wikitext | यथार्थत्वनियमाभावे राजस्याः । अन्यथा तामस्याः, भेदाभावात् ॥३१ ॥ |
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| text | Wikitext | नैष्कर्म्यसिद्धिं नैष्कर्म्यफलां योगसिद्धिम् ॥ ४९ ॥ |
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| text | Wikitext | यथा येनोपायेन सिद्धिं प्राप्तो ब्रह्म प्राप्नोति तथा निबोध । या सिद्धिः ज्ञानस्य परा निष्ठा ॥ ५० ॥ |
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| text | Wikitext | ब्रह्मभूयाय कल्पते । ब्रह्मणि भावो ब्रह्मभूयम् । ब्रह्मणि स्थितिः सर्वदा तन्मनस्कतेत्यर्थः ॥ ५३ ॥ |
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| text | Wikitext | पुनरन्तरङ्गसाधनान्युक्त्वोपसंहरति- सर्वकर्माणीत्यादिना ॥ ५६ ॥ |
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| text | Wikitext | परोक्षवचनं तु द्रोणं प्रति भीमवचनवत् ॥ ६२ ॥ |
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| text | Wikitext | धर्मत्यागः फलत्यागः । कथमन्यथा युद्धविधिः ? ‘यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते’(१८.११) इति चोक्तम् ॥ ६६ ॥ |
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| text | Wikitext | पूर्णादोषमहाविष्णोः गीतामाश्रित्य लेशतः । निरूपणं कृतं तेन प्रीयतां मे सदा विभुः ॥ |