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| verse_text | Text | उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः सूर्यश्चक्षुर्वातः प्राणो व्यात्तमग्निर्वैश्वानरः संवत्सर आत्माऽश्वस्य मेध्यस्य द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरं पृथिवी पाजस्यं दिशः पार्श्वे अवान्तरदिशः पर्शव ऋतवोऽङ्गानि मासाश्चार्धमासाश्च पर्वाण्यहोरात्राणि प्रतिष्ठा नक्षत्राण्यस्थीनि नभो माꣳसानि ऊवध्यꣳ सिकताः सिन्धवो गुदा यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता ओषधयश्च वनस्पतयश्च लोमान्युद्यन् पूर्वार्धो निम्लोचन् जघनार्धो यद् विजृम्भते तद् विद्योतते यद् विधूनुते तत्स्तनयति यन्मेहति तद्वर्षति वागेवास्य वाक् ॥ १ ॥ |
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| verse_text | Text | अहर्वा अश्वं पुरस्ताद् महिमाऽन्वजायत तस्य पूर्वे समुद्रे योनी रात्रिरेनं पश्चान्महिमाऽन्वजायत तस्यापरे समुद्रे योनिरेतौ वा अश्वं महिमानावभितः सम्बभूवतुः । हयो भूत्वा देवानवहद् वाजी गन्धर्वानर्वाऽसुरानश्वो मनुष्यान् । समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनिः ॥ २ ॥ |
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| verse_text | Text | नैवेह किञ्चनाग्र आसीत् मृत्युनैवेदमावृतमासीद् अशनाया हि मृत्युस्तन्मनोऽकुरुतात्मन्वी स्यामिति । सोऽर्चन्नचरत् तस्यार्चत आपोऽजायन्तार्चतो ह वै मे कमभूदिति तदेवार्कस्यार्कत्वं कꣳह वा अस्मै भवति य एवमेतदर्कस्यार्कत्वं वेद ॥ १ ॥ |
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| verse_text | Text | आपो वा अर्कस्तद् यदपाꣳशर आसीत् तत्समहन्यत सा पृथिव्यभवत्तस्यामश्राम्यत् तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य तेजो रसो निरवर्तताग्निः ॥ २ ॥ |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | स त्रेधाऽऽत्मानं व्यकुरुताऽदित्यं तृतीयं वायुं तृतीयं स एष प्राणस्त्रेधा विहितः । तस्य प्राची दिक् शिरोऽसौ चासौ चेर्मौ । अथास्य प्रतीची दिक् पुच्छमसौ चासौ च सक्थ्यौ दक्षिणा चोदीची च पार्श्वे द्यौः पृष्ठमन्तरिक्षमुदरमियमुरस्स एषोऽप्सु प्रतिष्ठितो यत्र क्व चैति तदेव प्रतितिष्ठत्येवं विद्वान् ॥३॥ |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | सोऽकामयत द्वितीयो म आत्मा जायेतेति स मनसा वाचं मिथुनꣳ समभवदशनायां मृत्युस्तद् यद् रेत आसीत् स संवत्सरोऽभवत् । न ह पुरा ततः संवत्सर आस तमेतावन्तं कालमबिभर्यावान् संवत्सरस्तमेतावतः कालस्य परस्तादसृजत तं जातमभिव्याददात् स भाणमकरोत् सैव वागभवत् ॥ ४ ॥ |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | स ऐक्षत यदि ह वा इममभिमंस्ये कनीयोऽन्नं करिष्य इति स तया वाचा तेनाऽत्मनेदꣳ सर्वमसृजत यदिदं किञ्चर्चो यजूꣳषि सामानि च्छन्दाꣳसि यज्ञान् प्रजाः पशून् । स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत सर्वं वा अत्तीति तददितेरदितित्वꣳ सर्वस्यैतस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवमेतददितेरदितित्वं वेद ॥ ५ ॥ |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | सोऽकामयत भूयसा यज्ञेन भूमो यजेयेति । सोऽश्राम्यत् स तपोऽतप्यत तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य यशो वीर्यमुदक्रामत् । प्राणा वै यशो वीर्यं तत्प्राणेषूत्क्रान्तेषु शरीरꣳश्वयितुमध्रियत तस्य शरीर एव मन आसीत् ॥ ६ ॥ |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | सोऽकामयत मेध्यं म इदꣳ स्यादात्मान्व्यनेन स्यामिति । ततोऽश्वः समभवत् यदश्वत् तन्मेध्यमभूदिति तदेवाश्वमेधस्याश्वमेधत्वम् । एष ह वा अश्वमेधं वेद य एनमेवं वेद ॥ ७ ॥ |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | तमनवरुध्यैवामन्यत । तꣳ संवत्सरस्य परस्तादात्मन आलभत पशून् देवताभ्यः प्रत्यौहत् । तस्मात् सर्वदैवत्यं प्रोक्षितं प्राजात्पत्यमालभन्त । एष ह वा अश्वमेधो य एष तपति तस्य संवत्सर आत्माऽयमग्निरर्कस्तस्येमे लोका आत्मानः तावेतावर्काश्वमेधौ । सो पुनरेकैव देवता भवति मृत्युरेव अप पुनर्मृत्युं जयति नैनं मृत्युराप्नोति मृत्युरस्याऽत्मा भवत्येतासां देवतानामेको भवति ॥ ८ ॥ |
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| verse_text | Text | द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च । ततः कानीयसा एव देवा जायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त ते ह देवा ऊचुर्हन्तासुरान् यज्ञ उद्गीथेनात्ययामेति ॥ १ ॥ |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | ते ह वाचमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो वागुदगायद् । यो वाचि भोगस्तं देवेभ्य आ गायद् यत्कल्याणं वदति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् स यः पाप्मा। यदेवेदमप्रतिरूपं वदति स एव स पाप्मा ॥ २ ॥ |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | अथ ह प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो घ्राण उदगायद् यो घ्राणे भोगस्तं देवेभ्य आगायद् यत्कल्याणं जिघ्रति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् स यः पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं जिघ्रति स एव स पाप्मा ॥ ३ ॥ |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | अथ ह चक्षुरूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यश्चक्षुरुदगायत् । यश्चक्षुषि भोगस्तं देवेभ्य आगायद् यत्कल्याणं पश्यति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् स यः पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपं पश्यति स एव स पाप्मा ॥ ४ ॥ |
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| chapter_id | String | BR_C01 |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | अथ ह श्रोत्रमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो श्रोत्रमुदगायद् यो श्रोत्रे भोगस्तं देवेभ्य आगायद् यत्कल्याणꣳ शृणोति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपꣳ शृणोति स एव स पाप्मा ॥ ५ ॥ |
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| chapter_id | String | BR_C01 |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | अथ ह मन ऊचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्यो मन उदगायद् यो मनसि भोगस्तं देवेभ्य आगायद् यत्कल्याणं सङ्कल्पयति तदात्मने । ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति तमभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् स यः स पाप्मा यदेवेदमप्रतिरूपꣳ सङ्कल्पयति स एव स पाप्मैवमु खल्वेता देवताः पाप्मभिरुपासृजन्नेवमेनाः पाप्मनाऽविध्यन् ॥ ६ ॥ |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | अथ हेममासन्यं प्राणमूचुस्त्वं न उद्गायेति तथेति तेभ्य एष प्राण उदगायत् ते विदुरनेन वै न उद्गात्राऽत्येष्यन्तीति तदभिद्रुत्य पाप्मनाऽविध्यन् स यथाऽश्मानमृत्वा लोष्टो विध्वꣳसेतैवꣳ हैव विध्वꣳसमाना विश्वञ्चो विनेशुस्ततो देवा अभवन् परासुरा भवत्यात्मना परास्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥७॥ |
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| verse_text | Text | ते होचुः क्व नु सोऽभूद् यो न इत्थमसक्तेत्ययमास्येऽन्तरिति सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानाꣳ हि रसः ॥ ८ ॥ |
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| verse_text | Text | सा वा एषा देवता दूर्नाम दूरꣳ ह्यस्या मृत्युर्दूरꣳ ह वा अस्मान्मृत्युर्भवति य एवं वेद ॥ ९ ॥ |
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| verse_text | Text | सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्य यत्तासां दिशामन्तस्तद्गमयाञ्चकार तदासां पाप्मनो विन्यदधात् तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्नेत्पाप्मानं मृत्युमन्ववायानीति ॥ १० ॥ |
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| verse_text | Text | सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्युमपहत्याथैना मृत्युमत्यवहत् ॥ ११ ॥ |
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| verse_text | Text | स वै वाचमेव प्रथमामत्यवहत्सा यदा मृत्युमत्यमुच्यत सोऽग्निरभवत् सोऽयमग्निः परेण मृत्युमतिक्रान्तो दीप्यते ॥ १२ ॥ |
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| verse_text | Text | अथ घ्राणमत्यवहत्स यदा मृत्युमत्यमुच्यत स वायुरभवत् सोऽयं वायुः परेण मृत्युमतिक्रान्तः पवते ॥ १३ ॥ |
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| verse_text | Text | अथ चक्षुरत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत। स आदित्योऽभवत्सोऽसावादित्यः परेण मृत्युमतिक्रान्तस्तपति ॥ १४ ॥ |
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| verse_text | Text | अथ श्रोत्रमत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत ता दिशोऽभवꣳस्ता इमा दिशः परेण मृत्युमतिक्रान्ताः ॥ १५ ॥ |
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| verse_text | Text | अथ मनोऽत्यवहत्तद्यदा मृत्युमत्यमुच्यत स चन्द्रमा अभवत्सोऽसौ चन्द्रः परेण मृत्युमतिक्रान्तो भात्येवꣳ ह वा एनमेषा देवता मृत्युमतिवहति य एवं वेद ॥ १६ ॥ |
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| verse_text | Text | अथ आत्मनेऽन्नाद् यमागायद् यद्धि किञ्चान्नमद्यतेऽनेनैव तदद्यत इह प्रतितिष्ठति ॥ १७ ॥ |
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| verse_text | Text | ते देवा अब्रुवन् एतावद् वा इदꣳ सर्वं यदन्नं तदाऽत्मन आगासीरनु नोऽस्मिन् अन्न आभजस्वेति ते वै माऽभिसंविशतेति तथेति तꣳ समन्तं परिण्यविशन्त । तस्माद् यदनेनान्नमत्ति तेनैतास्तृप्यन्त्येवꣳ ह वा एनꣳ स्वा अभिसंविशन्ति भर्ता स्वानाꣳ श्रेष्ठः पुर एता भवत्यन्नादोऽधिपतिर्य एवं वेद य उ हैवं विदꣳ स्वेषु प्रति प्रति बुभूषति न हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८ ॥¦अथ य एवैतमनु-भवति यो वै तमनु भार्यान् बुभूषति स हैवालं भार्येभ्यो भवति ॥ १८ ॥ |
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| verse_text | Text | सोऽयास्य आङ्गिरसोऽङ्गानाꣳ हि रसः प्राणो वा अङ्गानाꣳ रसः प्राणो हि वा अङ्गानाꣳ रसस्तस्माद् यस्मात् कस्माच्चाङ्गात् प्राण उत्क्रामति तदेव तच्छुष्यत्येष ह वा अङ्गानाꣳ रसः ॥ १९ ॥ |
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| verse_text | Text | एष उ एव बृहस्पतिर्वाग्वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥ |
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| verse_text | Text | एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः ॥ २१ ॥ |
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| verse_text | Text | एष उ एव साम वाग्वै सा अम एष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वम् । यद्वैव समः प्लुषिणा, समो मशकेन, समो नागेन, सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः, समोऽनेन सर्वेण, तस्मादेव साम अश्नुते साम्नः सायुज्यꣳ सलोकतां जयति य एवमेतत् साम वेद ॥ २२ ॥ |
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| verse_text | Text | एष उ वा उद्गीथः प्राणो वा उत् प्राणेन हीदꣳसर्वमुत्तब्धम् वागेव गीथा उच्च गीथा चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥ |
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| verse_text | Text | तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्वस्य राजा मूर्धानं विपातयताद्यदीतोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोदगायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोदगायदिति ॥ २४ ॥ |
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| verse_text | Text | तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं तस्य वै स्वर एव स्वं तस्मादार्त्विज्यं करिष्यन् वाचि स्वरमिच्छेत तया वाचा स्वरसम्पन्नया आर्त्विज्यं कुर्यात्तस्माद् यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त एव । अथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥ २५ ॥ |
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| verse_text | Text | तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद भवति हास्य सुवर्णं तस्य वै स्वर एव सुवर्णं भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥ |
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| verse_text | Text | तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्युहैक आहुः ॥ २७ ॥ |
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| verse_text | Text | अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र प्रस्तूयात् तदेतानि जपेत् ‘असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योऽर्मामृतं गमय’ इति स यदाहासतो मा सद्गमयेति मृत्युर्वा असत्सदमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युर्वै तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्माऽमृतं गमयामृतं मां कुर्वित्येवैतदाह ॥ |
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| verse_text | Text | मृत्योर्माऽमृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्ति । अथ यानीतराणि स्तोत्राणि तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत् तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तꣳ स एष एवं विदुद्गाताऽऽत्मने वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २९ ॥ |
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| verse_text | Text | आत्मैवेदमग्र आसीत् पुरुषविधः सोऽनुवीक्ष्य नान्यदात्मनोऽपश्यत् सोऽहमस्मीत्यग्रे व्याहरत् ततोऽहं नामाऽभवत् तस्मादप्येतर्ह्यामन्त्रितोऽहमयमित्येेवाग्र उक्त्वाऽथान्यन्नाम प्रब्रूते यदस्य भवति स यत्पूर्वोऽस्मात् सर्वस्मात् सर्वान् पाप्मन औषत् तस्मात् पुरुष ओषति ह वै स तं योऽस्मात् पूर्वो बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥ |
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| verse_text | Text | सोऽबिभेत् तस्मादेकाकी बिभेति सहायमीक्षाञ्चक्रे यन्मदन्यन्नास्ति कस्मान्नु बिभेमीति तत एवास्य भयं वीयाय कस्माद्ध्यभैष्यद् द्वितीयाद्वै भयं भवति ॥ २ ॥ |
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| verse_text | Text | स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत् स हैतावानास यथा स्त्रीपुमाꣳसौ सम्परिष्वक्तौ स इममेवाऽत्मानं द्वेधाऽपातयत् ततः पतिश्च पत्नी चाभवतां तस्मादिदमर्धबृगलमिव स्व इति ह स्माह याज्ञवल्क्यस्तस्मादयमाकाशः स्त्रिया पूर्यत एव ताꣳ समभवत् ततो मनुष्या अजायन्त ॥ ३ ॥ |
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| verse_text | Text | सोहेयमीक्षाञ्चक्रे कथं नु माऽऽत्मन एव जनयित्वा सम्भवति हन्त तिरोऽसानीति सा गौरभवत् वृषभ इतरस्ताꣳ समेवाभवत् ततो गावो अजायन्त बडबेतराऽभवदश्ववृष इतरो गर्दभीतरा गर्दभ इतरस्ताꣳ समेवाभवत् तत एकशफमजायताजेतराऽभवद् वस्त इतरोऽविरितरा मेष इतरस्ताꣳ समेवाभवत् ततोऽजावयोऽजायन्तैवमेव यदिदं किञ्च मिथुनमा पिपीलिकाभ्यस्तत्सर्वमसृजत ॥ ४ ॥ |
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| verse_text | Text | सोऽवेदहं वाव सृष्टिरस्म्यहꣳ हीदꣳ सर्वमसृक्षीति ततः सृष्टिरभवत् सृष्ट्याꣳ हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥ |
| verse_lines | List of String, delimiter: ¦ | सोऽवेदहं वाव सृष्टिरस्म्यहꣳ हीदꣳ सर्वमसृक्षीति ततः सृष्टिरभवत् सृष्ट्याꣳ हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥ |
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| verse_text | Text | अथेत्यभ्यमन्थत् स मुखाच्च योनेर्हस्ताभ्यां चाग्निमसृजत । तस्मादेतदुभयमलोमकमन्तरतो अलोमका हि योनिरन्तरतस्तद्यदिदमाहुरमुं यजामुं यजेत्येकैकं देवमेतस्यैव सा विसृष्टिरेष उ ह्येव सर्वे देवा अथ यत्किञ्चेदमार्द्रं तद्रेतसोऽसृजत तदु सोम एतावद्वा इदमन्नं चैवान्नादश्च सोम एवान्नमग्निरन्नादः सैषा ब्रह्मणोऽतिसृष्टिर्यच्छ्रेयसो देवानसृजताथ यन्मर्त्यः सन्नमृतानसृजत तस्मादतिसृष्टिरतिसृष्ट्यां हास्यैतस्यां भवति य एवं वेद ॥ ६ ॥ |
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| verse_text | Text | तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतासौ नामायमिदꣳ रूप इति तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतेऽसौ नामायमिदꣳ रूप इति स एष इह प्रविष्ट । आनखाग्रेभ्यो यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्यात् विश्वम्भरो वा विश्वम्भरकुलाये तं न पश्यन्ति । अकृत्स्नो हि स प्राणन्नेव प्राणनामा भवति । वदन् वाक्पश्यंश्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेदात्कृत्स्नो ह्येवैषोऽत एकैकेन भवत्यात्मेत्येवोपासीतात्र ह्येते सर्व एकं भवन्ति । तदेतत्पदनीयमस्य सर्वस्य यदयमात्माऽनेन ह्येतत्सर्वं वेद यथा ह वै पदेनानुविन्देदेवं कीर्तिꣳ श्लोकं विन्दते य एवं वेद ॥ १ ॥ |
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| verse_text | Text | तदेतत् प्रेयः पुत्रात् प्रेयो वित्तात् प्रेयोऽन्यस्मात् सर्वस्मादन्तरतरं यदयमात्मा स योऽन्यमात्मनः प्रियं ब्रुवाणं ब्रूयात् प्रियꣳ रोत्स्यतीतीश्वरो ह तथैव स्यादात्मानमेव प्रियमुपासीत स य आत्मानमेव प्रियमुपास्ते न हास्य प्रियं प्रमायुतं(प्रमायुक्तं. शाङ्करभाष्यम्) भवति ॥ २ ॥ |
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| verse_text | Text | तदाहुर्- यद् ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्तो मनुष्या मन्यन्ते । किमु तद् ब्रह्मावेद् यस्मात् तत् सर्वमभवदिति ॥ ३ ॥ |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेत् । अहं ब्रह्मास्मीति तस्मात् तत्सर्वमभवत् तद् यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तद्धैतत् पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदेऽहं मनुरभवꣳ सूर्यश्चेति । तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदꣳ सर्वं भवति तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशत । आत्मा ह्येषाꣳ समभवत्यथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवꣳ स देवानाम् । यथा ह वै बहवः पशवो मनुष्यं भुञ्ज्युरेवमेकैकः पुरुषो देवान् भुनक्त्येकस्मिन्नेव पशावादीयमाने प्रियं भवति किमु बहुषु तस्मादेषां तन्न प्रियं यदेतन्मनुष्या विद्युः ॥ ४ ॥ |
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| verse_text | Text | ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव तदेकꣳ सन्न व्यभवत् तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत क्षत्रं यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणीन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्यो यमो मृत्युरीशान इति तस्मात् क्षत्रात् परं नास्ति तस्मात् ब्रह्मणः क्षत्रियमधस्तादुपास्ते राजसूये क्षत्र एव तद्यशो दधाति सैषा क्षत्रस्य योनिर्यद् ब्रह्म तस्माद् यद्यपि राजा परमतां गच्छति ब्रह्मैवान्तत उप निःश्रयति स्वां योनिं य उ एनꣳ हिनस्ति स्वाꣳ स योनिमृच्छति स पापीयान् भवति यथा श्रेयाꣳ सꣳ हिꣳसित्वा ॥ ५ ॥ |
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| verse_text | Text | स नैव व्यभवत् स विशमसृजत यान्येतानि देवजातानि गणश आख्यायन्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति ॥ ६ ॥ |
| verse_lines | List of String, delimiter: ¦ | स नैव व्यभवत् स विशमसृजत यान्येतानि देवजातानि गणश आख्यायन्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति ॥ ६ ॥ |
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| verse_text | Text | स नैव व्यभवत् स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणमिषं वै पूषेयꣳ हीदꣳ सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च ॥ ७ ॥ |
| verse_lines | List of String, delimiter: ¦ | स नैव व्यभवत् स शौद्रं वर्णमसृजत पूषणमिषं वै पूषेयꣳ हीदꣳ सर्वं पुष्यति यदिदं किञ्च ॥ ७ ॥ |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | स नैव व्यभवत् तच्छ्रेयोरूपमत्यसृजत धर्मं तदेतत् क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मस्तस्माद्धर्मात् परं नास्त्यथो अबलीयन् बलीयाꣳ समाशꣳसते धर्मेण यथा राज्ञैवं यो वै स धर्मः सत्यं वै तत्तस्मात् सत्यं वदन्तमाहुर्धर्मं वदतीति धर्मं वा वदन्तꣳ सत्यं वदतीत्येतद्ध्येवैतदुभयं भवति ॥ ८ ॥ |
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| verse_text | Text | तदेतद् ब्रह्म क्षत्रं विट् शूद्रस्तदग्निनैव देवेषु ब्रह्माभवद् ब्राह्मणो मनुष्येषु क्षत्रियेण क्षत्रियो वैश्येन वैश्यश्शूद्रेण शूद्रस्तस्मादग्नावेव देवेषु लोकमिच्छन्ते ब्राह्मणे मनुष्येष्वेताभ्याꣳ रूपाभ्यां ब्रह्माभवदथ यो ह वा अस्माल्लोकात् स्वं लोकमदृष्ट्वा प्रैति स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाऽनूक्तोऽन्यद्वा कर्माकृतं यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्ततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयते । अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते ॥ ९ ॥ |
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| verse_type | String | mantra |
| verse_text | Text | अथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद् यजते तेन देवानां लोकोऽथ यदनुब्रूते तेनर्षिणामथ यत्पितृभ्यो निमृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितॄणामथ यन्मनुष्यान् वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा वयाꣳस्या पिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोको यथा ह वै स्वाय लोकायारिष्टिमिच्छेदेवꣳ हैवंविदे सर्वाणि भूतान्यरिष्टिमिच्छन्ति तद्वा एतद्विदितं मीमाꣳसितम् ॥ १० ॥ |
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| verse_text | Text | आत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेत्येतावान् वै कामो नेच्छꣳश्च नातो भूयो विन्देत् तस्मादप्येतर्ह्येकाकी कामयते जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति स यावदप्येतेषामेकैकं न प्राप्नोत्यकृत्स्न एव तावन्मन्यते तस्योकृत्स्नता मन एवास्याऽत्मा वाग्जाया प्राणः प्रजा चक्षुर्मानुषं वित्तं चक्षुषा हि तद्विन्दते श्रोत्रं दैवं श्रोत्रेण हि तच्छ्रुणोत्यात्मैवास्य कर्माऽत्मना हि कर्म करोति स एष पाङ्क्तो यज्ञः पाङ्क्तः पशुः पाङ्क्तः पुरुषः पाङ्क्तमिदꣳ सर्वं यदिदं किञ्च तदिदꣳ सर्वमाप्नोति य एवं वेद ॥११॥ |
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| verse_text | Text | श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यप्रणीतं बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्यम्¦प्राणादेरीशितारं परमसुखनिधिं सर्वदोषव्यपेतं सर्वान्तस्थं सुपूर्णं प्रकृतिपतिमजं सर्वबाह्यं सुनित्यम् ।¦सर्वज्ञं सर्वशक्तिं सुरमुनिमनुजाद्यैः सदा सेव्यमानं विष्णुं वन्दे सदाऽहं सकलजगदनाद्यन्तमानन्ददं तम् ॥ १ ॥ |
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| verse_text | Text | अश्वपूर्वापरौ होम्यौ महिमानौ ग्रहौ स्मृतौ ।¦अहोरात्राभिमन्तारौ तयोरप्यभिमानिनौ ॥¦कामश्चाथ रतिश्चैव विष्णुब्रह्मशरीरजौ ।¦समुद्रेकात् समुद्रस्तु विष्णुः पूर्वमुदाहृतः ॥¦उपचारेण तूद्रेकादपरश्च चतुर्मुखः ।¦स विष्णुर्हयनामा सन् देववाहेेषु संस्थितः ॥¦वाजिनामा तु गन्धर्वेष्वर्वनामाऽसुरेषु च ।¦मनुष्येष्वश्वनामाऽसौ तद्बन्धुः स्वयमेव सः ॥¦तस्मादेवोत्थितिस्तस्य रूपभेदो न तस्य च ।¦ऐश्वर्यात् स तथाऽपीशो व्यक्तिभावं गमिष्यति ॥¦हत्वा याति यतः शत्रून् हरिस्तस्मात् हयः स्मृतः ।¦सर्वदा युद्धकर्तृत्वाद् वाजी चापि प्रकीर्तितः ॥¦अर्वाऽभिगमनादुक्त आशुत्वादश्व उच्यते ॥ इति वैहायसे । |
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| verse_text | Text | सर्वसंहारकं विष्णुं देवीं जीवांस्तथैव च ।¦कालं त्रिगुणसाम्यं च कर्माणि प्राणमिन्द्रियम् ॥¦संस्कारं चैव वेदांश्च नर्ते किञ्चिल्लये त्वभूत् ॥ इति ब्रह्मतर्के । |
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| verse_text | Text | अर्कशब्दस्यादित्ये प्रसिद्धत्वादप्शब्दोऽपि तत्रेत्याशङ्कां निवर्तयितुमापो वा अर्क इति पुनर्वचनम् । नाऽदित्येऽप् शब्दः । किन्त्वप्स्वेवार्कशब्द इत्यर्थः । शरो मण्डः । |
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| verse_text | Text | वायुरग्निरिति प्रोक्तो ह्यग्रणीत्वादथाङ्गिनाम् ।¦नेतृत्वाददनाच्चापि तस्य स्रष्टा जनार्दनः ॥¦स वायुर्वायुरूपेण जगत्पाति शरीरगः ।¦आदित्यस्थेन रूपेण जगद् याति प्रकाशयन् ॥¦अग्निस्थेन तु रूपेण हूयते सर्वयष्टृभिः ।¦आदाय यात्यायुरिति स एवादित्य उच्यते ॥॥¦तत्सम्बन्धात्तु तन्नाम सूर्यस्याग्नेस्तथैव च ।¦स एष कूर्मरूपेण वायुरण्डोदके स्थितः ॥¦विष्णुना कूर्मरूपेण धारितोऽनन्तधारकः ।¦अस्य पादा हि चत्वारो ह्यण्डोदे कोणसंस्थिताः ॥¦उरस्तु भूमिसंश्लिष्टमतिरिच्य भुवं पुनः ।¦पार्श्वतः पृष्ठतश्चैव शिरश्चोदकसंस्थितम् ॥¦आकाशमुदरे तस्य द्यौः पृष्ठे संस्थिता विभोः ।¦एव ंविद्वांस्तु यत्रैति तत्रैव प्रतितिष्ठति ॥ इति प्रभञ्जने । |
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| verse_text | Text | आत्मा ब्रह्मा मे द्वितीयो जायेतेत्यकामयत । वायुरेव ब्रह्मा भवतीति दर्शयितुं वायोः सृष्टिः प्रथममुक्ता । |
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| verse_text | Text | अभिमंस्ये लीनं करिष्ये चेत् । |
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| verse_text | Text | इच्छतो विष्णुयजनं ब्रह्मणः साधनास्मृतेः ।¦श्रमात् तापाच्च देहं तं त्यक्तुमिच्छा बभूव ह ॥¦इच्छया चाप्युदक्रामत् प्राणैः सह पितामहः ।¦यशोवीर्यनिमित्तत्वात् प्राणास्तन्नामकाः स्मृताः ॥¦अत्यल्पे चापि सञ्जाते श्रमेऽपि न तदिच्छया ।¦तापे प्राणा निःसरन्ति सा च क्रीडा विभोः स्मृता ॥¦बृंहमाणशरीरं तु पुनर्दृष्ट्वा पितामहः ।¦प्रवेष्टुं तच्छरीरं च कामयामास स प्रभुः ॥ |
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| verse_text | Text | पुनस्तस्मिन् प्रवेशाय शवरूपस्य मेध्यताम् ।¦ऐच्छत् तेनैव देही स्यामिति तस्मिन् विवेश च ॥¦तस्मिन् प्रविश्य स ब्रह्मा द्वितीयं वपुरग्रहीत् ।¦दृष्ट्वोपायं महायज्ञेऽथाश्वाकारं पितामहः ॥¦श्वैतीभावात् परं यस्मात् तज्जज्ञेऽतोऽश्वनामकम् ।¦यदर्थं श्वैततामाप तद्देहो मेध्यतामपि ॥¦अश्वमेधः स यज्ञोऽभून्नाम्ना तेन तदा कृतः ।¦श्वैतीभावं गते देहे पुनर्मेध्ये यतः स्थितः ॥¦अतोऽश्वमेधनामाऽसौ ब्रह्मा शुभचतुर्मुखः ।¦अश्वो भूत्वा यतो मेध्यः सोऽभवत् तेन वा स्मृतः ॥¦मेधो यज्ञः समुद्दिष्टो याज्ञीयं मेध्यमुच्यते ।¦शुद्धं मेध्यमथापि स्यादेवंविद् योऽश्वमेधवित् ॥ |
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| verse_text | Text | तमश्वरूपमात्मानमनिवारितवद् विभुः ।¦चारयामास रूपेण तदन्येन पुमात्मना ॥¦सर्वस्मिन् भुवने चाब्दं तदन्ते परमात्मने ।¦स्वस्मिन् स्थिताय सङ्कल्प्य यज्ञ आलभताऽत्मवान् ॥¦अजादिकान् पशूनन्यदेवस्थपरमात्मने ।¦कर्तृत्वेन पशुत्वेन यत्फलं तदशेषतः ॥¦मम स्यादिति मन्वानः सोऽश्वरूपमधारयत् ।¦अबुद्धिपूर्वमरणात् स्वर्गश्चापि पशोर्भवेत् ॥¦ज्ञानपूर्वमृतेः पुंसः किमु वक्तव्यमित्यजः ।¦एवं सूर्योऽप्यश्वमेधनामा संवत्सराभिधः ॥¦सूर्ये स्थितो यतो ब्रह्मा ह्यश्वमेधाभिधः स्वयम् ।¦सूर्ये ततत्वात् सूर्यात्मा ब्रह्माऽसौ परिकीर्तितः ॥¦अग्नौ स्थितो यतः सोऽर्कस्तस्मादग्निरितीर्यते ।¦ब्रह्मातता यतो लोकास्तदात्मानस्ततो मताः ॥¦ब्रह्मसूर्याग्निलोकेषु व्याप्तैका देवता हरिः ।¦तादृशं नृहरिं ज्ञात्वा पुनर्मृत्युं जयन्नसौ ॥¦सदैव वर्तते ब्रह्मा पुनर्मृत्युर्मृतिः स्मृता ।¦नैनं मृत्व्यात्मको मृत्युः प्राप्नोति हरिसेवनात् ॥¦यस्मान्नृसिंहो मृत्योश्च मृत्युरात्माऽस्य वै भवेत् ।¦आततत्वात् तथात्तृत्वादात्माऽसौ ब्रह्मणः स्मृतः ॥¦आदानादात्तनिर्माणादात्तज्ञानात् तथैव च ।¦एतासां देवतानां च ब्रह्मेशत्वेन वर्तते ॥¦नृसिंहस्य सदा ज्ञानाद् ध्यानाच्च तदनुग्रहात् ॥ इति महासंहितायाम् । |
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| verse_text | Text | द्वया ब्रह्मसुतास्तत्र दैतेया बहवः स्मृताः ।¦तमोरूपाः, सत्वरूपाः अल्पसङ्ख्याः सुराः स्मृताः ॥¦बहुत्वात् तैर्जिता देवाः शङ्करस्य वरेण च ।¦यज्ञेन विष्णुमभ्यर्च्य तत्रोद्गातृबलेन च ॥¦जयामैनानिति स्मृत्वा वह्न्यादीनप्यचूचुदन् । |
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| verse_text | Text | औद्गात्रेऽग्निमुखाः सर्वे इन्द्ररुद्रौ च वेधितौ ॥¦असुरैः पापपूगेन मुख्यवायुं ततोऽब्रुवन् ।¦दैत्यास्तं वेद्धुमीप्सन्तो ध्वस्ता नेशुश्च सर्वशः ॥¦पांसुपिण्डो यथा वज्रशिलां प्राप्यैव नश्यति ।¦तस्मादखण्डशक्तिः स मुख्यवायुरुदाहृतः ॥¦शापैरथ वरैर्वाऽपि नास्य प्रतिहतिर्भवेत् ।¦स्वेच्छयैवानुसारेण विना कुत्रापि पुत्रक ॥¦एवंविदपि पापेभ्यः शत्रुभ्योऽपि प्रमुच्यते । |
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| verse_text | Text | स वायू रुद्रशक्रादेर्वासुदेवबलाश्रयः ॥¦विमोच्य पापसङ्घातान् दिशामन्तेष्वथाक्षिपत् ।¦उन्मुच्य मृत्योस्तांश्चैवाथोर्ध्वलोकेषु चावहत् ॥¦अग्निर्नासिक्यवायुश्च दिक्पा इन्द्रादयोऽखिलाः ।¦सूर्यः सोमश्च रुद्रश्च तेनैव स्वपदे स्थिताः ॥ |
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| verse_text | Text | स्त्रीगुणैः सर्वपूर्णत्वाद् बृहती तु सरस्वती ।¦अनन्तवेदरूपत्वाद् सैव ब्रह्मेति कीर्तिता ॥¦विष्णुना बृंहितत्वाद्वा तत्पतिर्वायुरीश्वरः । |
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| verse_text | Text | सारत्वात् स्त्रीषु सा देवी सेत्युक्ता सामरूपतः ॥¦गीथेत्युक्ता तदुद्गीथः सामाख्योऽर्धतनुस्तथा ।¦अर्धनारीनरवपुर्वायुः कुत्रचिदीरितः ॥ |
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| verse_text | Text | अयास्यो विश्वसृग्यज्ञे तेनाविष्टोऽन्वगायत । |
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| verse_text | Text | गृहकोशादिकं यत्स्वं तद्रूप्यस्य स्वरेस्थितः ॥¦भूषणस्वर्णरूपी च स एवापि स्वरस्थितः । |
| verse_lines | List of String, delimiter: ¦ | गृहकोशादिकं यत्स्वं तद्रूप्यस्य स्वरेस्थितः ॥ • भूषणस्वर्णरूपी च स एवापि स्वरस्थितः । |
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| verse_text | Text | वागिन्द्रियं पीठरूपं तस्य देवस्य संस्थितम् ॥¦गानकालेऽन्यदा त्वन्नं प्राणपीठमिति स्मृतम् । |
| verse_lines | List of String, delimiter: ¦ | वागिन्द्रियं पीठरूपं तस्य देवस्य संस्थितम् ॥ • गानकालेऽन्यदा त्वन्नं प्राणपीठमिति स्मृतम् । |
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| verse_text | Text | पवमाना इति प्रोक्ता मुख्यवायुत्वयोगिनः ॥¦अनादिकालसम्बद्धा योग्यता सा प्रकीर्तिता ।¦सर्वाधिक्यारोहणं तु तेषामेव विमुक्तिगम् ॥¦प्रस्तावकाले प्रस्तोतुं योग्यो वायुपदस्य यः ।¦जपेद् यजूंषि त्वेतानि त्रीणि विष्णुं सदा स्मरन् ॥¦असतो मा सदित्यादि विष्णुप्रार्थनभाञ्जि च ।¦द्वात्रिंशल्लक्षणैः सम्यग्युक्ता वायुत्वयोग्यकाः ॥¦नियमेनैव विष्णोस्तु प्रादुर्भावा विशेषतः ।¦सहस्रारेण चक्रेण चिह्निता दक्षिणे करे ॥¦गदयाऽष्टाश्रया चैव शतावर्तेन कम्बुना ।¦वामे करे तथाऽब्जेन सहस्रदलशोभिना ॥¦अष्टाविंशल्लक्षणाश्च गिरीशपदयोगिनः ।¦चतुर्विंशतिमारभ्य षोडशादासुराः स्मृताः ॥¦अष्टकादृषयश्चोक्तास्तदूनाश्चक्रवर्तिनः ।¦असद्दुःखात्मको मृत्युः सदानन्दोऽमृतं स्मृतम् ॥¦तमोऽज्ञानात्मको मृत्युर्ज्योतिर्ज्ञानामृतं स्मृतम् ।¦मृत्योर्माऽमृतमित्यत्र मृत्युर्मरणमेव च ॥¦एवंविद् वायुपदयोग्या उद्गातार एव तु ।¦यदा भवेयुस्तेषु तदा याजी तु वृणुयाद् वरम् ॥¦आत्मने याजिने वाऽपि ह्युद्गातैवंविधो यदि ।¦आगायेत्तद्भवेन्नात्र कार्याऽभीष्टे विचारणा ॥¦एवं तं सामनामानं वायुं यो वेद सादरम् ।¦तस्येष्टलोकराहित्ये नाऽशा कार्याऽरिणा क्वचित् ॥¦तस्माद् वायुत्वयोग्यैर्हि येषां लोकाः प्रकीर्तिताः ।¦तेषामलोकाशङ्का च नैव कार्या कदाचन ॥¦यस्मान्नारायणस्यातिप्रियाः प्राणत्वयोगिनः ॥ इत्यादि महासंहितायाम् । |
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| verse_text | Text | इदमग्रे एतस्याग्रे परमात्मैवाऽसीत् । ततः पुरुषविधो ब्रह्माऽऽसीत् । पुरुषो विष्णुस्तद्विधत्वात् पुरुषविधः । |
| verse_lines | List of String, delimiter: ¦ | इदमग्रे एतस्याग्रे परमात्मैवाऽसीत् । ततः पुरुषविधो ब्रह्माऽऽसीत् । पुरुषो विष्णुस्तद्विधत्वात् पुरुषविधः । |
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| verse_text | Text | तस्य त्वेकस्य सहसा यतो भीः समजायत ।¦तस्मादद्यापि चैकस्य निर्विवेकं भयं भवेत् ॥¦विममर्श ततो ब्रह्मा यस्मान्मद्बाधको न हि ।¦मया सृज्या यतः सर्वे इतः पश्चात्तनो हरः ॥¦अतः कस्माद्बिभेमीति तस्य भीतिरपोहिता ।¦विष्णोरतिप्रियत्वात्तु तदन्येषां पितृत्वतः ॥¦कस्माद्भयं भवेत् तस्य समानाद्धि भयं भवेत् ।¦विरोधिनोऽधिकाद्वाऽपि हीनाद्वा पारवश्यतः ॥¦हीनमेव यतस्तस्य सर्वमेव जगद्वशे ।¦न च जातं तदा सर्वं हरिरेव यतः परः ॥ २ ॥ |
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| verse_text | Text | न रेमे स ततो ब्रह्मा तस्मादेकस्य नो रतिः ।¦अथापि(अद्यापि) पत्नीमैच्छच्च स स्थूलत्वमुपागतः ॥¦दम्पती सहितौ यावद् ब्रह्मा चैव सरस्वती ।¦तावद्देहोऽभवद् ब्रह्मा तदा देहं द्विधाऽकरोत् ॥¦पातनात् पतिपत्नीत्वशब्द एनोरजायत ।¦तस्मात् तयोरेकसुखं भवत्येवार्धपात्रवत् ॥¦ततस्तस्यामुमेशादीन् देवान् सर्वान् मनूनपि ।¦जनयामास बोधस्य प्राधान्यं हि मनुष्यता ॥ ३ ॥ |
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| verse_text | Text | सर्वज्ञाऽपि तु सा देवी विरिञ्चे भक्तिमत्यपि ।¦तद्भार्यतामात्मनश्च नितरां धर्ममीक्षती ॥¦अनाद्यनन्तसम्बन्धमुभयोरपि जानती ।¦स्त्रीस्वभावं दर्शयन्ती साऽधर्ममिव चैक्षत ॥¦नानासृष्टिप्रसिद्ध्यर्थं सा गोत्वादिकमाव्रजत् ।¦ऋषभादिरूपतां सोऽपि प्राप्य सृष्ट्वेदमञ्जसा ॥¦सर्जनात् सृष्टिनामाऽभूत् तद्वित्तत्पुत्रतां व्रजेत् ।¦पिपीलिकान्तरुद्रादौ यथायोग्यत्वमात्मनः ॥ |
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| verse_text | Text | अथान्नादमथाप्यन्नं स्रक्ष्यामीति विचिन्तयन् ।¦ओष्ठद्वयं ममन्थान्तर्हस्तौ चैव परस्परम् ॥¦तन्मुखाच्चैव हस्ताभ्यामन्तरग्निरजायत ।¦एवं सर्वस्य हेतुत्वात् सर्वस्यापि पतित्वतः ॥¦सर्वे देवा एष एवेत्याहुर्वेदविदो जनाः ।¦स्वतन्त्रेषु यतः शब्दा वर्तेयुः सर्व एव च ॥¦स रेतसः पुनः सोममसृजद्ब्रह्मविद्वरः ।¦सर्वाधिकोऽपि योग्यत्वान्मर्त्यधर्मतया पुरा ॥¦अवमो योग्यताहीनानप्यायुर्मात्रतोऽधिकान् ।¦यतोऽस्रागतिसृष्टिस्तं देवं यो वेद पूरुषः ॥¦विष्णोः प्रसादतः सृष्टिं देवलोके स जायते ।¦आत्मयोग्यानुसारेण सुखज्ञानादियुक्तता ॥ इति ब्रह्मतर्के ।¦भगवदुपासनामाहात्म्यमेतदिति दर्शयितुं तद्यदिदमाहुरित्याद्यारम्भः ॥ |
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| verse_text | Text | विश्वम्भरो वायुः ।¦‘अकृत्स्नो हि स’¦इत्यस्याभिप्रायः¦‘स योऽत एकैकमुपास्ते न स वेद’¦इत्यादि । प्राण इत्यादिनामानि परमेश्वरस्य न सर्वगुणसम्पूर्णतां वदन्ति । किन्तु प्राणनादिकर्मकर्तृत्वमेव वदन्ति । आत्मशब्द एव सर्वगुणपरिपूर्णत्वं वदति । अस्य सर्वस्य गुणजातस्यायमाऽत्मैव पदनीय आश्रयो यस्मादतस्तं सर्वगुणवाचकेनाऽत्मशब्देनैवोपासीत । अनेन ह्येतत्सर्वं वेद यस्मात् सर्वज्ञानप्रदस्तस्मात् सर्वगुणसम्पूर्णः इत्येवोपासनं तस्य युक्तम् । तदुपासनादेव सर्वज्ञत्वादयो भवन्ति किमु तस्येति । पद्यते अनेनेति पदं साधनम् । यथा तत्तत्साधनेन तत्तत्फलं प्राप्नुयादेवं सर्वगुणयुक्तत्वेन भगवदुपासनात् कीर्तिं श्लोकं च विन्दते । शं लोकः श्लोकः परमानन्दं परमं ज्ञानं चेत्यर्थः । लुक् प्रकाश इति धातोः । |
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| verse_text | Text | स एष विष्णुर्भगवान् पुत्राद् वित्तात् तथाऽऽत्मनः ।¦अन्यस्मादपि सर्वस्मात् प्रेष्ठ एव स्वभावतः ॥¦आत्मनोऽपि प्रियत्वं तु तेनैव कृतमञ्जसा ।¦आत्मनो निरयायैव कुर्यात् कर्माणि नित्यशः ॥¦यतोऽतः स्वात्मनश्चापि स्वाप्रियत्वमुदाहृतम् ।¦स चेदप्रियकृद् विष्णुर्नाऽत्माऽपि प्रियतां व्रजेत् ॥¦अस्मिन् प्रिये प्रियं सर्वं तस्मादेकः प्रियो हरिः ।¦स चात्मशब्देनोद्दिष्टो यस्मादाप्तगुणः प्रभुः ॥¦अतो विष्णोः प्रियं ब्रूयाद् यः स्वात्माद्यं दुरात्मवान् ।¦प्रियरोधं करोषीति तं ब्रूयाद् वैष्णवो महान् ॥¦एवं वदन् वैष्णवस्तु समर्थः प्रियरोधने ।¦तस्य स्याच्च विशेषेण तदुक्त्यैवापि दुःखिनः ॥¦तस्मात् सर्वप्रियो विष्णुरित्युपास्ते सदा प्रियः(सदाऽपि यः) ।¦नास्य प्रियमनित्यं स्यादस्य प्रीतिः सदा भवेत् ॥¦तस्मात् सर्वप्रियं विष्णुमुपासीतैव नित्यशः ।¦नित्यप्रियकरो विष्णुर्भवेत् तस्याप्यजः स्वयम् ॥इत्यध्यात्मे ॥ २ ॥ |
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| verse_text | Text | ब्रह्मविद्यया सर्वं भविष्यन्त आत्मयोग्यतापूर्तिमाप्नुवन्तो महान्तो यदाहुः ब्रह्मविद्यया स्वयोग्यं सर्वं प्राप्यत इति । नित्यनिर्दुःखानन्दानुभवरूपो हि स्वत उत्तमो जीवः । तादृशं रूपमज्ञानात् तिरोहितं ब्रह्मविद्ययाऽभिव्यज्यते एव । न चान्यथाऽभिव्यज्यत इति सन्तो यदाहुः । तत्तत्र केचिन्मनुष्या इति मन्यन्ते । स्वरूपमपि ब्रह्मविद्ययाऽभिव्यज्यते चेत् तद् ब्रह्मापि यस्मात् सर्वमभवत् परिपूर्णमभवत् तस्मात् स्वरूपं ज्ञात्वैवाभवत् किमिति ॥ ३ |
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| verse_text | Text | सत्यम् । तदपि स्वरूपं नित्यापरोक्षज्ञानेन सर्वदा जानात्येव । अत एव सर्वदा परिपूर्णमिति तेषां परिहारः । तदात्मानमेवावेत् तस्मात् तत्सर्वमभवदिति । ‘आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्’ ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’ इत्यादिवत् सदातनज्ञानं पूर्णभावं चाऽह । |
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| verse_text | Text | विष्णोर्ब्राह्मणजातिः सन् ब्रह्मा जज्ञे चतुर्मुखः ।¦इतोऽग्रे जगतस्तस्मात् क्षत्रजातिरजायत ॥¦वायुः सदाशिवोऽनन्तो गरुडः शक्र एव च ।¦कामश्च वरुणश्चैव सोमसूर्यौ यमस्तथा ॥¦एवमाद्याः क्षत्रियास्तु देवानां ब्रह्मनिर्मिताः ॥¦श्रेयसी सर्वजातिभ्यः क्षत्रजातिरिति श्रुतिः ।¦नैव क्षत्रात् परा जातिर्ब्रह्मजातिं विना क्वचित् ॥¦ब्राह्मणाच्च परो राजा राजसूयाश्वमेधयोः । |
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| verse_text | Text | उपास्ते राजसूयेऽतो ब्राह्मणो राजसूयिनम् ॥¦आसीन आसनाधस्तात् तथाऽपि ब्राह्मणो गुरुः ।¦तस्मात् स राजसूयान्ते ब्राह्मणान् वन्दयीत च ॥¦यः क्षत्रियो ब्राह्मणहा पितृहा स प्रकीर्तितः ।¦पापीयानेव भवति हत्वा स्वपितरं यथा ॥ इति वामने ।¦स्वतोऽधिकगुणं हत्वा साक्षाच्च पितरं पुनः ।¦क्षत्रस्य ब्राह्मणं हत्वा तावान् दोषो भवेद् ध्रुवम् ॥ इत्याग्नेये ।¦ईशानो मारुतः प्राणो वायुर्जिष्णुस्तथैव च ।¦धृष्णुश्च पवमानश्च पवनश्चेति कथ्यते ॥ इति शब्दतत्त्वे ।¦मृत्युः सङ्कर्षणः शेषः शेताऽनन्तस्तथैव च ।¦बलिर्महाविषश्चेति भूधरश्चेति कथ्यते ॥ इति च ।¦इन्द्रः सुपर्णो गरुडो महाभारो धुरन्धरः ।¦विश्वजिच्चाप्यवध्यश्च वैनतेयश्च कथ्यते ॥ इति च ।¦पर्जन्यो मघवांश्चैव पुरुहूतः पुरन्दरः ।¦प्राचीनबर्हिर्हर्यश्वः सोमपो मेषभुक्तथा ॥ इति च ।¦‘यशोनिधिर्ब्राह्मणस्तु तद्दातुं क्षत्रिये स्वयम् ।¦अधो ब्राह्मण आसीनो राजसूये हि सेवते ॥’ इति प्रत्यये ।¦ऋच्छति विनाशयति । रीङ् क्षये इति धातोः ॥ ५ ॥ |
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| verse_text | Text | विवस्वदिन्द्रवरुणविष्णुभ्योऽन्येऽदितेः सुताः ।¦रुद्रादन्ये तथा रुद्रा वायोरन्ये च वायवः ॥॥¦अग्नेरन्ये च वसवो वैश्या इत्येव कीर्तिताः ।¦एक एव हरेर्जातः परिवारविवर्जितः ॥¦वाय्वादीन् क्षत्रियान् सृष्ट्वा पुनरल्पपरिग्रहः ।¦इच्छन् बहुपरीवारं वैश्यान् देवान् ससर्ज ह ॥॥¦ततो बहुतरानिच्छन् शूद्रान् देवान् ससर्ज ह ।¦अश्विनौ पृथिवी चैव काला मृत्यव एव च ॥ ॥¦शूद्रदेवाः समुद्दिष्टा देववर्णा इति स्मृताः । |
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| verse_text | Text | स्रष्टा स्वयं समुद्दिष्टः पालका देवता इमाः ॥¦धारणं कथमस्य स्याद् गतिश्चास्य कथं परा ।¦इति मत्वा हरेर्भक्तिर्धर्मरूपं पुनर्विभुः ॥¦प्राणिनां धैर्यरूपं च वायो रूपान्तरं पुनः ।¦ससर्ज मतिमान् ब्रह्मा विष्णोराज्ञापुरःसरः ॥¦तस्माद् वायोः परो नास्ति ऋते विष्णुं सनातनम् ।¦शेषादीनां क्षत्रियाणां वायुरेवाधिपः स्मृतः ॥¦धारणाद्धर्म इत्याहुर्वायुर्धारयति प्रजाः ।¦अबलोऽपि ततो वायोर्विष्णुभक्त्यादिरूपिणः ॥¦प्राप्तुमिच्छति युक्तः सन् विष्णुं सुबलवत्तरम् ।¦यथैव युवराजेन महाराजमभीप्सति ॥॥¦प्राप्तुं धर्माभिमानी स वायुः सत्याभिमानवान् ।¦तस्मादाहुर्धर्मविदं सत्यं वेत्तेति वेदिनः ॥¦सत्यज्ञमथ धर्मज्ञं वायुर्देवो यतस्तयोः ॥ इति नारदीये । |
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| verse_text | Text | स(सः) नैव व्यभवदिति परिवारबहुत्वेन यद्विशिष्टत्वं तन्नाभवदित्यर्थः । |
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| verse_text | Text | सर्वजात्युत्तमो ब्रह्मा यतो विप्राग्निसंस्थितः ॥¦तस्माद् विप्रांस्तथैवाग्निं तर्पयेद् ब्रह्मतुष्टिकृत् ।¦तुष्टे ब्रह्मणि विष्णुश्च तुष्टो लोकान् प्रदास्यति ॥¦अग्निविप्रार्चकोऽप्येवं यो न वेद हरिं परम् ।¦आश्रयं सर्वजीवानां हरिस्तं नैव भोजयेत् ॥¦यथाऽनधीतो वेदस्तु यथा कर्माकृतं तथा ।¦न सम्यक् फलदो विष्णुरज्ञातो जगदीश्वरः ॥¦यद्यवेत्ता महदपि हयमेधादिकं हरेः ।¦कुर्यात् क्षयिष्णुफलवान् स भवेन्नात्र संशयः ॥¦आप्तकामतयाऽऽत्मेति यो विष्णुः समुदीरितः ।¦सर्वाश्रयमुपासीत तमेव पुरुषं सुधीः ॥¦विष्णुं सर्वाश्रय इति सदोपास्ते य आत्मवान् ।¦क्षीयन्ते नास्य कर्माणि शुभान्येव कदाचन ॥¦उपासनाबलान्मुक्तो भोगान् कर्मफलान् सदा ।¦भुङ्क्ते विष्णोः समीपस्थः सर्वदोषविवर्जितः ॥ इति ब्रह्माण्डे ।¦एताभ्यां रूपाभ्यां सहितं हि ब्रह्माऽभवत् । स्वं लोकं स्वाश्रयम् ॥९॥ |
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| verse_text | Text | योऽयं सर्वेषु जीवेषु नियामकतया स्थितः ।¦स विष्णुराप्तकामत्वादात्मेत्येवोच्यते बुधैः ॥¦स लोकः सर्वभूतानां सर्वजीवेषु संस्थितः ।¦वैश्वदेवादिकान् होमान् यज्ञांश्च कुरुते विभुः ॥¦कारुण्यात् सर्वदेवेषु तेन देवाश्रयो हरिः ।¦ऋषीणामाश्रयश्चापि स्वाध्यायेष्वृषिसंस्मृतेः ॥¦स हि जीवेषु सन्दिष्टः पिण्डं पुत्रजनिं तथा ।¦यत्करोति पितॄणां च संश्रयस्तत एव सः ॥¦तृणोदकादिदानेन पशूनामन्नतो नृणाम् ।¦उपकाराच्च सर्वेषां प्राणिनामाश्रयो हरिः ॥¦यज्ञादीन् देवतादीनामन्नत्वेन पुरैव यत् ।¦ब्रह्माद्यैरर्थितः प्रादात् क्षीराब्धेस्तट उत्तरे ॥¦अतश्च सर्वलोकानामाश्रयो विष्णुरेव सः ।¦एवं यो वेत्ति विष्णोस्तु सर्वाधारत्वमुत्तमम् ॥¦सर्वाण्यपि हि भूतानि तस्येच्छन्त्यविनाशिताम् ।¦स्वाश्रयस्य यथा नित्यमनाशं प्रार्थयन्ति हि ॥¦राजादेरपि तान्येवमुत्तमाश्रयवेदिनः ।¦तदेतद् वासुदेवस्य सर्वाधारत्वमुत्तमम् ॥¦विदितं सर्ववेदैश्च मीमांसाभिश्च निश्चितम् ॥ इति भविष्यत्पर्वणि । |
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| verse_text | Text | एको नारायणः पूर्वमासीज्जायां स ऐच्छत ।¦विद्यमानामपि सदा भोगार्थं पुरुषोत्तमः ॥¦नित्यत्वेऽप्युभयोर्देवोऽवियुक्तस्तु तया यदा ।¦एक इत्युच्यते देव्या रममाणः सुतं विभुः ॥¦ऐच्छद्ब्रह्मा ततो जज्ञे ततो देवांश्च सर्वशः ।¦जाते पुत्रे वित्तमैच्छद्भूतान्यण्डं ततोऽभवत् ॥¦अण्डस्यान्तस्त्विमे लोकाः कुर्यां कर्मेति चैच्छत ।¦ततस्तु कृतवान् यज्ञं स्वस्मै स पुरुषोत्तमः ॥¦आहुरात्मेति तं देवं पूर्णत्वाद् विष्णुमव्ययम् ।¦तस्मादद्यापि यः कामी स ह्येतावन्तमिच्छति ॥¦दैवं वित्तं सुखाद्यं हि मित्राद्यं मानुषं तु यत् ।¦इदानीमपि तस्माद्धि कामयेदेवमेव तु ॥¦यः कश्चित् पुरुषो वाऽपि तद्वैकल्यादकृत्स्नवान् । |
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| verse_text | Text | एकाकिनोऽप्यवैकल्यं यथैव स्यात् तथा शृणु ॥¦स्वात्मनस्त्वपृथग् यत्तज्ज्ञानरूपं मनः परम् ।¦मुक्तावपि न हेयं यत् तत् स्वात्मेत्येव चिन्तयेत् ॥¦जायां तु तादृशीं वाचं बलं तादृक् स्वमात्मजम् ।¦श्रोत्रं चक्षुश्च तादृग् यद् वित्तं दैवं च मानुषम् ॥¦एवम्भूतं चिन्तनं यत्तत्कर्मेत्येव चिन्तयेत् ।¦एतत्षट्कं च हरये सर्वेशाय समर्पयेत् ॥¦एवमात्मा प्रिया पुत्रो वित्तं द्विविधमित्यपि ।¦पञ्चभिः क्रियते यज्ञः पुरुषः पशुरेव च ॥¦मातापितृभ्यामन्नेन तयोः पूर्वेण कर्मणा ।¦जन्यस्य कर्मणा चैव साध्यः पञ्चभिरेव तु ॥¦एवं हि प्राणिनोऽन्येऽपि जायन्ते नात्र संशयः ।¦एतामुपासनां कुर्याद् यो ब्राह्मं पदमाप्य च ॥¦सर्वस्यास्य पतिर्भूयाद् विष्णोरेव प्रसादतः ।¦ब्राह्मे पदे त्वयोग्या ये ते देवपदमाप्नुयुः ॥¦तस्याप्ययोग्या लोकस्य भवेयुरधिकं(क) प्रियाः ।¦क्रमान्मुक्तिं व्रजेयुश्च केशवस्य प्रसादतः ॥ इति माहात्म्ये । |
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| verse_text | Text | अश्वब्राह्मणम् |
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| verse_text | Text | अथ प्रजापतिब्राह्मणम् |
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