Mahabharatatatparyanirnaya/Moola: Difference between revisions
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<span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमोऽध्यायः"></span> | ||
== प्रथमोऽध्यायः == | == प्रथमोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = नारायणाय परिपूर्णगुणार्णवाय विश्वोदयस्थितिलयोन्नियति प्रदाय।;ज्ञानप्रदाय विबुधासुरसौख्यदुःखसत्कारणाय वितताय नमो नमस्ते ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = आसीदुदारगुणवारिधिरप्रमेयो नारायणः परतमः परमात् स एकः।;संशान्तसंविदखिलं जठरे निधाय लक्ष्मीभुजान्तरगतः स्वरतोऽपि चाग्रे ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = तस्योदरस्थजगतः सदमन्दसान्द्रस्वानन्दतुष्टवपुषोऽपि रमारमस्य।;भूत्यै निजाश्रितजनस्य हि सृज्यसृष्टावीक्षा बभूव परनामनिमेषकान्ते ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा स चेतनगणान् जठरे शयानान् आनन्दमात्रवपुषः सृतिविप्रमुक्तान्।;ध्यानं गतान् सृतिगतांश्च सुषुप्तिसंस्थान् ब्रह्मादिकान् कलिपरान् मनुजांस्तथैक्षत् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = स्रक्ष्ये हि चेतनगणान् सुखदुःखमध्यसम्प्राप्तये तनुभृतां विहृतिं ममेच्छन्।;सोऽयं विहार इह मे तनुभृत् स्वभावसम्भूतये भवति भूतिकृदेव भूत्याः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं विचिन्त्य परमः स तु वासुदेवनामा बभूव निजमुक्तिपदप्रदाता।;तस्याज्ञयैव नियताऽथ रमाऽपि रूपं बभ्रे द्वितीयमपि यत् प्रवदन्ति मायाम् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = सङ्कर्षणश्च स बभूव पुनः सुनित्यः संहारकारणवपुस्तदनुज्ञयैव।;देवी जयेत्यनु बभूव स सृष्टिहेतोः प्रद्युम्नतामुपगतः कृतितां च देवी ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = स्थित्यै पुनः स भगवाननिरुद्धनामा देवी च शान्तिरभवच्छरदां सहस्रम्।;स्थित्वा स्वमूर्तिभिरमूभिरचिन्त्यशक्तिः प्रद्युम्नरूपक इमांश्चरमात्मनेऽदात् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = निर्देहकान् स भगवाननिरुद्धनामा जीवान् स्वकर्मसहितान् उदरे निवेश्य ।;चक्रेऽथ देहसहितान् क्रमशः स्वयम्भुप्राणात्मशेषगरुडेशमुखान् समग्रान् ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = पञ्चात्मकः स भगवान् द्विषडात्मकोऽभूत् पञ्चद्वयी शतसहस्रपरोऽमितश्च।;एकः समोऽप्यखिलदोषसमुज्झितोऽपि सर्वत्र पूर्णगुणकोऽपि बहूपमोऽभूत् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आत्मतन्त्रो निश्चेतनात्मकशरीरगुणैश्च हीनः।;आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादिः सर्वत्र च स्वगतभेदविवर्जितात्मा ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = कालाच्च देशगुणतोऽस्य न चाऽदिरन्तो वृद्धिक्षयौ न तु परस्य सदातनस्य।;नैतादृशः क्व च बभूव न चैव भाव्यो नास्त्युत्तरः किमु परात् परमस्य विष्णोः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = सर्वज्ञ ईश्वरतमः स च सर्वशक्तिः पूर्णाव्ययात्मबलचित्-सुखवीर्यसारः।;यस्याऽज्ञया रहितमिन्दिरया समेतं ब्रह्मेशपूर्वकमिदं न तु कस्य चेशम् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = आभासकोऽस्य पवनः पवनस्य रुद्रः शेषात्मको गरुड एव च शक्रकामौ।;वीन्द्रेशयोस्तदपरे त्वनयोश्च तेषां ऋष्यादयः क्रमश ऊनगुणाः शतांशाः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = आभासका त्वथ रमाऽस्य मरुत्स्वरूपाच्छ्रेष्ठाऽप्यजात् तदनु गीः शिवतो वरिष्ठा।;तस्या उमा विपतिनी च गिरस्तयोऽस्तु शच्यादिकाः क्रमश एव यथा पुमांसः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = ताभ्यश्च ते शतगुणैर्दशतो वरिष्ठाः पञ्चोत्तरैरपि यथाक्रमतः श्रुतिस्थाः।;शब्दो बहुत्ववचनः शतमित्यतश्च श्रुत्यन्तरेषु बहुधोक्तिविरुद्धता न ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = तेषां स्वरूपमिदमेव यतोऽथ मुक्तावप्येवमेव सततोच्चविनीचरूपाः।;शब्दः शतं दशसहस्रमिति स्म यस्मात् तस्मान्न हीनवचनोऽथ ततोऽग्र्यरूपाः ॥ १७॥ | |||
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<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयोऽध्यायः"></span> | ||
== द्वितीयोऽध्यायः == | == द्वितीयोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ जयति हरिरचिन्त्यः सर्वदेवैकवन्द्यः परमगुरुरभीष्टावाप्तिदः सज्जनानाम् ।;निखिलगुणगणार्णो नित्यनिर्मुक्तदोषः सरसिजनयनोऽसौ श्रीपतिर्मानदो नः ॥१॥ | |||
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| verse_lines = उक्तः पूर्वेऽध्याये शास्त्राणां निर्णयः परो दिव्यः ।;श्रीमद्भारतवाक्यान्येतैरेवाध्यवस्यन्ते ॥२॥ | |||
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| verse_lines = क्वचिद् ग्रन्थान् प्रक्षिपन्ति क्वचिदन्तरितानपि ।;कुर्युः क्वचिच्च व्यत्यासं प्रमादात् क्वचिदन्यथा ॥३॥ | |||
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| verse_lines = अनुत्सन्ना अपि ग्रन्था व्याकुला इति सर्वशः ।;उत्सन्नाः प्रायशः सर्वे कोट्यंशोऽपि न वर्तते ॥४॥ | |||
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| verse_lines = ग्रन्थोऽप्येवं विलुळितः किम्वर्थो देवदुर्गमः ।;कलावेवं व्याकुलिते निर्णयाय प्रचोदितः ॥५॥ | |||
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| verse_lines = हरिणा निर्णयान् वच्मि विजानंस्तत्प्रसादतः ।;शास्त्रान्तराणि सञ्जानन् वेदांश्चास्य प्रसादतः ॥६॥ | |||
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| verse_lines = देशे देशे तथा ग्रन्थान् दृष्ट्वा चैव पृथग्विधान् ।;यथा स भगवान् व्यासः साक्षान्नारायणः प्रभुः ॥७॥ | |||
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| verse_lines = जगाद भारताद्येषु तथा वक्ष्ये तदीक्षया ।;सङ्क्षेपात् सर्वशास्त्रार्थं भारतार्थानुसारतः ॥८॥ | |||
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| verse_lines = ‘भारतं सर्ववेदाश्च तुलामारोपिताः पुरा ।;देवैर्ब्रह्मादिभिः सर्वैरृषिभिश्च समन्वितैः ।;व्यासस्यैवाऽज्ञया तत्र त्वत्यरिच्यत भारतम्’ ॥१०॥ | |||
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| verse_lines = ‘महत्वाद् भारवत्वाच्च महाभारतमुच्यते ।;निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते’(महा. १.१.२०९) ॥११॥ | |||
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| verse_lines = यतः कृष्णवशे सर्वे भीमाद्याः सम्यगीरिताः ।;सर्वेषां ज्ञानदो विष्णुर्यशोदातेति चोदितः ॥१३॥ | |||
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| verse_lines = यो य एव बलज्येष्ठः क्षत्रियेषु स उत्तमः ।;अङ्गं चेद्विष्णुकार्येषु तद्भक्त्यैव न चान्यथा ॥१७॥ | |||
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| verse_lines = देवेषु बलिनामेव भक्तिज्ञाने न चान्यथा ।;स एव च प्रियो विष्णोर्नान्यथा तु कथञ्चन ॥१९॥ | |||
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| verse_lines = देवेष्वेव न चान्येषु वासुदेवप्रतीपतः ।;क्षत्रादन्येष्वपि बलं प्रमाणं यत्र केशवः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = प्रवृत्तो दुष्टनिधने ज्ञानकार्ये तथैव च ।;अन्यत्र ब्राह्मणानां तु प्रमाणं ज्ञानमेव हि ।;क्षत्रियाणां बलं चैव सर्वेषां विष्णुकार्यता ॥२३॥ | |||
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| verse_lines = औं ॥ जयत्यजोऽखण्डगुणोरुमण्डलः सदोदितो ज्ञानमरीचिमाली ।;स्वभक्तहार्दोच्चतमोनिहन्ता व्यासावतारो हरिरात्मभास्करः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = जयत्यजोऽक्षीणसुखात्मबिम्बः स्वैश्वर्यकान्तिप्रततः सदोदितः ।;स्वभक्तसन्तापदुरिष्टहन्ता रामावतारो हरिरीशचन्द्रमाः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = जयत्यसङ्ख्योरुबलाम्बुपूरो गुणोच्चरत्नाकर आत्मवैभवः ।;सदा सदात्मज्ञनदीभिराप्यः कृष्णावतारो हरिरेकसागरः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = ‘नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।;देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरये’ ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = जयो नामेतिहासोऽयं कृष्णद्वैपायनेरितः ।;वायुर्नरोत्तमो नाम देवीति श्रीरुदीरिता ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = नारायणो व्यास इति वाच्यवक्तृस्वरूपकः ।;एकः स भगवानुक्तः साधकेशो नरोत्तमः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = उपसाधको नरश्चोक्तो देवी भाग्यात्मिका नृणाम् ।;सरस्वती वाक्यरूपा तस्मान्नम्या हि तेऽखिलाः ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = सर्वस्य निर्णयसुवाक्यसमुद्धृती तु स्वाध्याययोर्हरिपदस्मरणेन कृत्वा ।;आनन्दतीर्थवरनामवती तृतीया (भौ) भैमी तनुर्मरुत आह कथाः परस्य ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = व्यूढश्चतुर्धा भगवान् स एको मायां श्रियं सृष्टिविधित्सयाऽऽर ।;रूपेण पूर्वेण स वासुदेवनाम्ना विरिञ्चं सुषुवे च साऽतः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = सङ्कर्षणाच्चापि जयातनूजो बभूव साक्षाद्बलसंविदात्मा ।;वायुर्य एवाथ विरिञ्चनामा भविष्य आद्यो न परस्ततो हि ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = सूत्रं स वायुः पुरुषो विरिञ्चः प्रद्युम्नतश्चाथ कृतौ स्त्रियौ द्वे ।;प्रजज्ञतुर्यमळे तत्र पूर्वा प्रधानसञ्ज्ञा प्रकृतिर्जनित्री ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = श्रद्धा द्वितीयाऽथ तयोश्च योगो बभूव पुंसैव च सूत्रनाम्ना ।;हरेर्नियोगादथ सम्प्रसूतौ शेषः सुपर्णश्च तयोः सहैव ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = शेषस्तयोरेव हि जीवनामा कालात्मकः सोऽथ सुपर्ण आसीत् ।;तौ वाहनं शयनं चैव विष्णोः काला जयाद्याश्च तत प्रसूताः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = काला जयाद्या अपि विष्णुपार्षदा यस्मादण्डात् परतः सम्प्रसूताः ।;नीचाः सुरेभ्यस्तत एव तेऽखिला विष्वक्सेनो वायुजः खेन तुल्यः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = व्यूहात्तृतीयात्पुनरेव विष्णोर्देवांश्चतुर्वर्णगतान् समस्तान् ।;सङ्गृह्य बीजात्मतयाऽनिरुद्धो न्यधत्त शान्त्यां त्रिगुणात्मिकायाम् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = ततो महत्तत्त्वतनुर्विरिञ्चः स्थूलात्मनैवाजनि वाक् च देवी ।;तस्यामहङ्कारतनुं स रुद्रं ससर्ज बुद्धिं च तदर्द्धदेहाम् ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = बुद्ध्यामुमायां स शिवस्त्रिरूपो मनश्च वैकारिकदेवसङ्घान् ।;दशेन्द्रियाण्येव च तैजसानि क्रमेण खादीन् विषयैश्च सार्द्धम् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = पुंसः प्रकृत्यां च पुनर्विरिञ्चाच्छिवोऽथ तस्मादखिलाः सुरेशाः ।;जाताः सशक्राः पुनरेव सूत्राच्छ्रद्धा सुतानाप सुरप्रवीरान् ।;शेषं शिवं चेन्द्रमथेन्द्रतश्च सर्वे सुरा यज्ञगणाश्च जाताः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च माया त्रिविधा बभूव सत्त्वादिरूपैरथ वासुदेवात् ।;सत्त्वात्मिकायां स बभूव तस्मात् स विष्णुनामैव निरन्तरोऽपि ।;रजस्तनौ चैव विरिञ्च आसीत् तमस्तनौ शर्व इति त्रयोऽस्मात् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = एते हि देवाः पुनरण्डसृष्टावशक्नुवन्तो हरिमेत्य तुष्टुवुः ।;त्वन्नो जगच्चित्रविचित्रसर्गनिस्सीमशक्तिः कुरु सन्निकेतम् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = इति स्तुतस्तैः पुरुषोत्तमोऽसौ स विष्णुनामा श्रियमाप सृष्टये ।;सुषाव सैवाण्डमधोक्षजस्य शुष्मं हिरण्यात्मकमम्बुमध्ये ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् प्रविष्टा हरिणैव सार्द्धं सर्वे सुरास्तस्य बभूव नाभेः ।;लोकात्मकं पद्मममुष्य मध्ये पुनर्विरिञ्चोऽजनि सद्गुणात्मा ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् पुनः सर्वसुराः प्रसूतास्ते जायमाना अपि निर्णयाय ।;निस्सृत्य कायादुत पद्मयोनेः सम्प्राविशन् क्रमशो मारुतान्ताः ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = पपात वायोर्गमनाच्छरीरं तस्यैव चावेशत उत्थितं पुनः ।;तस्मात् स एको विबुधप्रधान इत्याश्रिता देवगणास्तमेव । ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = हरेर्विरिञ्चस्य च मध्यसंस्थितेस्तदन्यदेवाधिपतिः स मारुतः ।;ततो विरिञ्चो भुवनानि सप्त ससप्तकान्याशु चकार सोऽब्जात् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = अग्रे शिवोऽहं भव एव बुद्धेरुमा मनोजौ सह शक्रकामौ ।;गुरुर्मनुर्दक्ष उतानिरुद्धः सहैव (पश्चान्) शच्या मनसः प्रसूताः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = चक्षुःश्रुतिभ्यां स्पर्शात्सहैव रविः शशी धर्म इमे प्रसूताः ।;जिह्वाभवो वारिपतिर्नसोश्च नासत्यदस्रौ क्रमशः प्रसूताः ।;ततः सनाद्याश्च मरीचिमुख्या देवाश्च सर्वे क्रमशः प्रसूताः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = उक्तक्रमात् पूर्वभवस्तु यो यः श्रेष्ठः स स ह्यासुरकानृते च ।;पूर्वश्च (पूर्वस्तु) पश्चात् पुनरेव जातो नाश्रेष्ठतामेति कथञ्चिदस्य ।;गुणास्तु कालात् पितृमातृदोषात् स्वकर्मतो वाऽभिभवं प्रयान्ति ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = लयो भवेद् व्युत्क्रमतो हि तेषां ततो हरिः प्रलये श्रीसहायः ।;शेते निजानन्दममन्दसान्द्रसन्दोहमेकोऽनुभवन्ननन्तः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तशीर्षास्यकरोरुपादः सोऽनन्तमूर्तिः स्वगुणाननन्तान् ।;अनन्तशक्तिः परिपूर्णभोगो भुञ्जन्नजस्रं निजरूप आस्ते ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = एवं पुनः सृजते सर्वमेतदनाद्यनन्तो हि जगत्प्रवाहः ।;नित्या हि (श्च) जीवाः प्रकृतिश्च नित्या कालश्च नित्यः किमु देवदेवः ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = यथा समुद्रात् सरितः प्रजाताः पुनस्तमेव प्रविशन्ति शश्वत् ।;एवं हरेर्नित्यजगत्प्रवाहस्तमेव चासौ प्रविशत्यजस्रम् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = एवं विदुर्ये परमामनन्तामजस्य शक्तिं पुरुषोत्तमस्य ।;तस्य प्रसादादथ दग्धदोषास्तमाप्नुवन्त्याशु परं सुरेशम् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = देवानिमान् मुक्तसमस्तदोषान् स्वसन्निधाने विनिवेश्य देवः ।;पुनस्तदन्यानधिकारयोग्यांस्तत्तद्गणानेव पदे नियुङ्क्ते ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च मारीचत एव देवाः जाता आदित्यामसुराश्च दित्याम् ।;गावो मृगाः पक्ष्युरगादिसत्त्वा दाक्षायणीष्वेव समस्तशोऽपि ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = ततः स मग्नामलयो लयोदधौ महीं विलोक्याशु हरिर्वराहः ।;भूत्वा विरिञ्चार्थमिमां सशैलामुद्धृत्य वारामुपरि न्यधात् स्थिरम् ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = (हतो) ततो हिरण्याक्ष उदारविक्रमो दितेः सुतो योऽवरजः सुरार्थे ।;धात्रार्थितेनैव वराहरूपिणा धरोद्धृतौ पूर्वहतोऽब्जजोद्भवः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = अभिष्टुतस्तैर्हरिरुग्रवीर्यो नृसिंहरूपेण स आविरासीत् ।;हत्वा हिरण्यं च सुताय तस्य दत्वाऽभयं देवगणानतोषयत् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = सुरासुराणामुदधिं विमथ्नतां दधार पृष्ठेन गिरिं स मन्दरम् ।;वरप्रदानादपरैरधार्यं हरस्य कूर्मो बृहदण्डवोढा ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = वरादजेयत्वमवाप दैत्यराट् चतुर्मुखस्यैव बलिर्यदा तदा ।;अजायतेन्द्रावरजोऽदितेः सुतो महानजोऽप्यब्जभवादिसंस्तुतः ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = ‘स वामनात्माऽसुरभूभृतोऽध्वरं जगाम गां सन्नमयन् पदे पदे ।;जहार चास्माच्छलतस्त्रिविष्टपं त्रिभिः क्रमैस्तच्च ददौ निजाग्रजे’ ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = पितामहेनास्य पुरा हि (भि) याचितो बलेः कृते केशव आह यद्वचः ।;नायाञ्चयाऽहं प्रतिहन्मि तं बलिं शुभाननेत्येव ततोऽभ्ययाचत ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = बभूविरे चन्द्रललामतो वरात् पुरा ह्यजेया असुरा धरातले ।;तैरर्दिता वासवनायकाः सुराः पुरो निधायाब्जजमस्तुवन् हरिम् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = विरिञ्चसृष्टैर्नितरामवध्यौ वराद् विधातुर्दितिजौ हिरण्यकौ ।;तथा हयग्रीव उदारविक्रमस्त्वया हता ब्रह्मपुरातनेन ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = स चासुरान् रुद्रवरादवध्यानिमान् समस्तैरपि देवदेव ।;निःसीमशक्त्यैव निहत्य सर्वान् हृदम्बुजे नो निवसाथ शश्वत् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादरोक्तस्त्रिदशैरजेयः स शार्ङ्गधन्वाऽथ भृगूद्वहोऽभूत् ।;रामो निहत्यासुरपूगमुग्रं (न) ह्रदाननादिर्विदधेऽसृजैव ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = ततः पुलस्त्यस्य कुले प्रसूतौ तावादिदैत्यौ जगदेकशत्रू ।;परैरवध्यौ वरतः पुरा हरेः सुरैरजेयौ च वराद्विधातुः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = सर्वैरजेयः स च कुम्भकर्णः पुरातने जन्मनि धातुरेव ।;वरान्नरादीनृत एव रावणस्तदातनात्तौ त्रिदशानबाधताम् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = तदाऽब्जजं शूलिनमेव चाग्रतो निधाय देवाः पुरुहूतपूर्वकाः ।;पयोम्बुधौ भोगिपभोगशायिनं समेत्य योग्यां स्तुतिमभ्ययोजयन् ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = त्वमेक ईशः परमः स्वतन्त्रस्त्वमादिरन्तो जगतो नियोक्ता ।;त्वदाज्ञयैवाखिलमम्बुजोद्भवा वितेनिरेऽग्र्याश्चरमाश्च येऽन्ये ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = मनुष्यमानात् त्रिशतं सषष्टिकं दिवौकसामेकमुशन्ति वत्सरम् ।;द्विषट्सहस्रैरपि तैश्चतुर्युगं त्रेतादिभिः पादश एव हीनैः ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = सहस्त्रवृत्तं तदहः स्वयम्भुवो निशा च तन्मानमितं शरच्छतम् ।;त्वदाज्ञया स्वाननुभूय भोगानुपैति सोऽपि त्वरितस्त्वदन्तिकम् ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = त्वया पुरा कर्णपुटाद्विनिर्मितौ महासुरौ तौ मधुकैटभाख्यौ ।;प्रभञ्जनावेशवशात् (तवाऽज्ञया) त्वदाज्ञया बलोद्धतावाशु जलेऽभ्यवर्धताम् (व्यवर्धताम्)॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = त्वदाज्ञया ब्रह्मवरादवध्यौ चिक्रीडिषासम्भवया (मुखोद्गतान्) मुखोद्गतौ ।;स्वयम्भुवो वेदगणानहार्षतां तदाऽभवस्त्वं हयशीर्ष ईश्वरः ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = आहृत्य वेदानखिलान् प्रदाय स्वयम्भुवे तौ च जघन्थ दस्यू ।;निष्पीड्य तावूरुतळे कराभ्यां तन्मेदसैवाऽशु चकर्थ मेदिनीम् ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = एवं सुराणां च निसर्गजं बलं तथाऽसुराणां वरदानसम्भवम् ।;वशे तवैतद्द्वयमप्यतो वयं निवेदयामः पितुरेव तेऽखिलम् ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = इमौ च रक्षोऽधिपती विरोद्धतौ जहि स्ववीर्येण नृषु प्रभूतः ।;इतीरिते तैरखिलैः सुरेश्वरैर्बभूव रामो जगतीपतिः प्रभुः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = स कश्यपस्यादितिगर्भजन्मनो विवस्वतस्तन्तुभवस्य भूभृतः ।;गृहे दशस्यन्दननामिनोऽभूत् कौसल्यकानाम्नि तदर्थिनेष्टः ॥ ६५ ॥ | |||
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| verse_lines = तदाज्ञया देवगणा बभूविरे पुरैव पश्चादपि तस्य भूम्नः ।;निषेवणायोरुगुणस्य वानरेष्वथो नरेष्वेव च पश्चिमोद्भवाः ॥ ६६ ॥ | |||
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| verse_lines = स देवतानां प्रथमो गुणाधिको बभूव नाम्ना हनुमान् प्रभञ्जनः ।;स्वसम्भवः केसरिणो गृहे प्रभुर्बभूव वाली स्वत एव वासवः ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = सुग्रीव आसीत् परमेष्ठितेजसा युतो रविः स्वात्मत एव जाम्बवान् ।;य एव पूर्वं परमेष्ठिवक्षसस्त्वगुद्भवो धर्म इहाऽस्यतोऽभवत् ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = य एव सूर्यात् पुनरेव संज्ञया नाम्ना यमो दक्षिणदिक्प आसीत् ।;स जाम्बवान् दैवतकार्यदर्शिना पुरैव सृष्टो मुखतः स्वयम्भुवा ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मोद्भवः सोम उतास्य सूनोरत्रेरभूत् सोऽङ्गद एव जातः ।;बृहस्पतिस्तार उतो शची च शक्रस्य भार्यैव बभूव तारा ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = बृहस्पतिर्ब्रह्मसुतोऽपि पूर्वं सहैव शच्या मनसोऽभिजातः ।;ब्रह्मोद्भवस्याङ्गिरसः सुतोऽभून्मारीचजस्यैव शची पुलोम्नः ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = स एव शच्या सह वानरोऽभूत् स्वयम्भुवो देवगुरुर्बृहस्पतिः ।;अभूत् सुषेणो वरुणोऽश्विनौ च बभूवतुस्तौ विविदश्च मैन्दः ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मोद्भवौ तौ पुनरेव सूर्याद् बभूवतुस्तत्र कनीयसस्तु ।;आवेश ऐन्द्रो वरदानतोऽभूत् ततो बलीयान् विविदो हि मैन्दात् ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = नीलोऽग्निरासीत् कमलोद्भवोत्थः कामः पुनः श्रीरमणाद् रमायाम् ।;प्रद्युम्ननामाऽभवदेवमीशात् स स्कन्दतामाप स चक्रतां च ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं हरेश्चक्रमभूद्धि दुर्गा तमःस्थिता श्रीरिति यां वदन्ति ।;सत्त्वात्मिका शङ्खमथो रजस्था भूर्नामिका पद्ममभूद्धरेर्हि ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा शार्ङ्गं च विद्येति रमैव खड्गः ।;दुर्गात्मिका सैव च चर्मनाम्नी पञ्चात्मको मारुत एव बाणाः ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = एवं स्थितेष्वेव पुरातनेषु वराद् रथाङ्गत्वमवाप कामः ।;तत्सूनुतामाप च सोऽनिरुद्धो ब्रह्मोद्भवः शङ्खतनुः पुमात्मा ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = तावेव जातौ भरतश्च नाम्ना शत्रुघ्न इत्येष च रामतोऽनु ।;पूर्वं सुमित्रातनयश्च शेषः स लक्ष्मणो नाम रघूत्तमादनु ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = कौसल्यकापुत्र उरुक्रमोऽसावेकस्तथैको भरतस्य मातुः ।;उभौ सुमित्रातनयौ नृपस्य चत्वार एते ह्यमरोत्तमाः सुताः ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = सङ्कर्षणाद्यैस्त्रिभिरेव रूपैराविष्ट आसीत् त्रिषु तेषु विष्णुः ।;इन्द्रोऽङ्गदे चैव ततोऽङ्गदो हि बली नितान्तं स बभूव शश्वत् ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = येऽन्ये च भूपाः कृतवीर्यजाद्याः बलाधिकाः सन्ति सहस्रशोऽपि ।;सर्वे हरेः सन्निधिभावयुक्ताः धर्मप्रधानाश्च गुणप्रधानाः ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = स्वयं रमा सीरत एव जाता सीतेति रामार्थमनूपमा या ।;विदेहराजस्य हि यज्ञभूमौ सुतेति तस्यैव ततस्तु साऽभूत् ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादिकल्पोत्थित एष सर्गो मया समस्तागमनिर्णयात्मकः ।;सहानुसर्गः कथितोऽत्र पूर्वो यो यो गुणैर्नित्यमसौ वरो हि ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = पाश्चात्त्यकल्पेष्वपि सर्गभेदाः श्रुतौ पुराणेष्वपि चान्यथोक्ताः ।;नोत्कर्षहेतुः प्रथमत्वमेषु विशेषवाक्यैरवगम्यमेतत् ॥ ८४॥ | |||
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== चतुर्थोऽध्यायः == | == चतुर्थोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ अथाभ्यवर्धंश्चतुराः कुमारा नृपस्य गेहे पुरुषोत्तमाद्याः ।;नित्यप्रवृद्धस्य च तस्य वृद्धिरपेक्ष्य लोकस्य हि मन्ददृष्टिम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = निरीक्ष्य नित्यं चतुरः कुमारान् पिता मुदं सन्ततमाप चोच्चम् ।;विशेषतो राममुखेन्दुबिम्बमवेक्ष्य राजा कृतकृत्य आसीत् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = तन्मातरः पौरजना अमात्या अन्तःपुरा वैषयिकाश्च सर्वे ।;अवेक्षमाणाः परमं पुमांसं स्वानन्दतृप्ता इव सम्बभूवुः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = ततः सुवंशे शशिनः प्रसूतो गाधीति शक्रस्तनुजोऽस्य चाऽसीत् ।;वरेण विप्रत्वमवाप योऽसौ विश्वस्य मित्रं स इहाऽजगाम ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = तेनार्थितो यज्ञरिरक्षयैव कृच्छ्रेण पित्राऽस्य भयाद्विसृष्टः ।;जगाम रामः सह लक्ष्मणेन सिद्धाश्रमं सिद्धजनाभिवन्द्यः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = अनुग्रहार्थं स ऋषेरवाप सलक्ष्मणोऽस्त्रं मुनितो हि केवलम् ।;ववन्दिरे ब्रह्ममुखाः सुरेशास्तमस्त्ररूपाः प्रकटाः समेत्य ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = अथो जघानाऽऽशु शरेण ताटकां वराद् विधातुस्तदनन्यवध्याम् ।;ररक्ष यज्ञं च मुनेर्निहत्य सुबाहुमीशानगिरा विमृत्युम् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = शरेण मारीचमथार्णवेऽक्षिपद् वचो विरिञ्चस्य तु मानयानः ।;अवध्यता तेन हि तस्य दत्ता जघान चान्यान् रजनीचरानथ ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = तदा विदेहेन सुतास्वयंवरो विघोषितो दिक्षु विदिक्षु सर्वशः ।;निधार्य तद् गाधिसुतानुयायी ययौ विदेहाननुजानुयातः ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = अथो अहल्यां पतिनाऽभिशप्तां प्रधर्षणादिन्द्रकृताच्छिलीकृताम् ।;स्वदर्शनान्मानुषतामुपेतां सुयोजयामास स गौतमेन ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = बलं स्वभक्तेरधिकं प्रकाशयन्ननुग्रहं च त्रिदशेष्वतुल्यम् ।;अनन्यभक्तां च सुरेशकाङ्क्षया विधाय नारीं प्रययौ तयाऽर्चितः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = श्यामावदाते जगदेकसारे स्वनन्तचन्द्राधिककान्तिकान्ते ।;सहानुजे कार्मुकबाणपाणौ पुरीं प्रविष्टे तुतुषुर्विदेहजाः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = पपुर्नितान्तं सरसाक्षिभृङ्गैर्वराननाब्जं पुरुषोत्तमस्य ।;विदेहनारीनरवर्यसङ्घा यथा महापौरुषिकास्तदङ्घ्रिम् (महापूरुषिकास्तदङ्घ्रिम्) ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = तथा विदेहः प्रतिलभ्य रामं सहस्रनेत्रावरजं गविष्ठम् ।;समर्चयामास सहानुजं तमृषिं च साक्षाज्ज्वलनप्रकाशम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = मेने च जामातरमात्मकन्यागुणोचितं रूपनवावतारम् ।;उवाच चास्मै ऋषिरुग्रतेजाः कुरुष्व जामातरमेनमाश्विति ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = स आह चैनं परमं वचस्ते करोमि नात्रास्ति विचारणा मे ।;शृणुष्व मेऽथापि यथा प्रतिज्ञा सुताप्रदानाय कृता पुरस्तात् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = तपो मया चीर्णमुमापतेः पुरा वरायुधावाप्तिधृतेन चेतसा ।;स मे ददौ दिव्यमिदं धनुस्तदा कथञ्चनाचाल्यमृते पिनाकिनम् ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = न देवदैत्योरगदेवगायका अलं धनुश्चालयितुं सवासवाः ।;कुतो नरास्तद्वरतो हि किङ्कराः सहानसैवात्र कृषन्ति कृच्छ्रतः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = अधार्यमेतद्धनुराप्य शङ्करादहं नृणां वीर्यपरीक्षणे धृतः ।;सुतार्थमेतां चकर प्रतिज्ञां ददामि कन्यां य इदं हि पूरयेत् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितां मे गिरमभ्यवेत्य दितेः सुता दानवयक्षराक्षसाः ।;समेत्य भूपाश्च समीपमाशु प्रगृह्य तच्चालयितुं न शेकुः ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = संस्विन्नगात्राः परिवृत्तनेत्राः दशाननाद्याः पतिता विमूर्छिताः ।;तथाऽपि मां धर्षयितुं न शेकुः सुताकृते ते वचनात्स्वयम्भुवः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = पुरा हि मेऽदात् प्रभुरब्जजो वरं प्रसादितो मे तपसा कथञ्चन ।;बलान्न ते कश्चिदुपैति कन्यकां तदिच्छुभिस्ते न च धर्षणेति ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु ते नष्टमदा इतो गताः समस्तशो ह्यस्तन एव पार्थिवाः ।;ततो ममायं प्रतिपूर्य मानसं वृणोतु कन्यामयमेव मेऽर्थितः ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = तथेति चोक्ते मुनिना स किङ्करैरनन्तभोगोपममाश्वथाऽनयत् ।;समीक्ष्य तद्वामकरेण राघवः सलीलमुद्धृत्य हसन्नपूरयत् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = विकृष्यमाणं तदनन्तराधसा परेण निःसीमबलेन लीलया ।;अभज्यतासह्यममुष्य तद्बलं प्रसोढुमीशं कुत एव तद्भवेत् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = स मध्यतस्तत् प्रविभज्य लीलया यथेक्षुदण्डं शतमन्युकुञ्जरः ।;विलोकयन् वक्त्रमृषेरवस्थितः सलक्ष्मणः पूर्णतनुर्यथा शशी ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = तमब्जनेत्रं पृथुतुङ्गवक्षसं श्यामावदातं चलकुण्डलोज्ज्वलम् ।;शशक्षतोत्थोपमचन्दनोक्षितं ददर्श विद्युद्वसनं नृपात्मजा ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = अथो कराभ्यां प्रतिगृह्य मालामम्लानपद्मां जलजायताक्षी ।;उपेत्य मन्दं ललितैः पदैस्तां तदंस आसज्य च पार्श्वतोऽभवत्(पार्श्वतोऽभूत्) ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = ततः प्रमोदो नितरां जनानां विदेहपुर्यामभवत् समन्तात् ।;रामं समालोक्य नरेन्द्रपुत्र्या समेतमानन्दनिधिं परेशम् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = लक्ष्म्या समेते प्रकटं रमेशे सम्प्रेषयामास तदाऽऽशु पित्रे ।;‘विदेहराजो दशदिग्रथाय स तन्निशम्याऽशु तुतोष भूमिपः’ ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽत्मजाभ्यां सहितः सभार्यो ययौ गजस्यन्दनपत्तियुक्तया ।;स्वसेनयाऽग्रे प्रणिधाय धातृजं वसिष्ठमाश्वेव स यत्र मैथिलः ॥ ३१॥(भा\.पु\. ७\.८\.३६) | |||
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| verse_lines = स मैथिलेनातितरां समर्चितो विवाहयामास सुतं मुदम्भरः ।;पुरोहितो गाधिसुतानुमोदितो जुहाव वह्निं विधिना वसिष्ठः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = तदा विमानावलिभिर्नभस्तलं दिदृक्षतां सङ्कुलमास नाकिनाम् ।;सुरानका दुन्दभयो विनेदिरे जगुश्व गन्धर्ववराः सहस्रशः ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = विजानमाना जगतां हि मातरं पुराऽर्थितुं नाऽययुरत्र देवताः ।;तदा तु रामं रमया युतं प्रभुं दिदृक्षवश्चक्रुरलं नभस्तलम् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = यथा पुरा सागरजास्वयंवरे सुमानसानामभवत्समागमः ।;तथा ह्यभूत्सर्वदिवौकसां तदा तथा मुनीनां सहभूभृतां भुवि ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = प्रगृह्य पाणिं च नृपात्मजाया रराज राजीवसमाननेत्रः ।;यथा पुरा सागरजासमेतः सुरासुराणाममृताब्धिमन्थने ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = स्वलङ्कृतास्तत्र विचेरुरङ्गना विदेहराजस्य च या हि योषितः ।;मुदा समेतं रमया रमापतिं विलोक्य रामाय ददौ धनं नृपः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = प्रियाणि वस्त्राणि रथान् सकुञ्जरान् परार्द्ध्यरत्नान्यखिलस्य चेशितुः ।;ददौ च कन्यात्रयमुत्तमं मुदा तदा स रामावरजेभ्य एव च ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = महोत्सवं तं त्वनुभूय देवता नराश्च सर्वे प्रययुर्यथाऽऽगतम् ।;पिता च रामस्य सुतैः समन्वितो ययावयोध्यां स्वपुरीं मुदा ततः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = तदन्तरे सोऽथ ददर्श भार्गवं सहस्रलक्षामितभानुदीधितिम् ।;विभासमानं निजरश्मिमण्डले धनुर्धरं दीप्तपरश्वधायुधम् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = अजानतां राघवमादिपूरुषं समागतं ज्ञापयितुं निदर्शनैः ।;समाह्वयन्तं रघुपं स्पृधेव नृपो ययाचे प्रणिपत्य भीतः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = न मे सुतं हन्तुमिहार्हसि प्रभो वयोगतस्येत्युदितः स भार्गवः ।;सुतत्रयं ते प्रददामि राघवं रणे स्थितं द्रष्टुमिहाऽऽगतोऽस्म्यहम् ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = स इत्थमुक्त्वा नृपतिं रघूत्तमं भृगूत्तमः प्राह निजां तनुं हरिः ।;अभेदमज्ञेष्वपि दर्शयन् परं पुरातनोऽहं हरिरेष इत्यपि ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = तदा तु लोकस्य निदर्शनार्थिभिः समर्थितौ तौ हरिशङ्करौ सुरैः ।;रणस्थितौ वां प्रसमीक्षितुं वयं समर्थयामोऽत्र निदर्शनार्थिनः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = ततो हि युद्धाय रमेशशङ्करौ व्यवस्थितौ तौ धनुषी प्रगृह्य ।;यतोऽन्तरस्यैष नियामको हरिस्ततो हरोऽग्रेऽस्य शिलोपमोऽभूत् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = शशाक नैवाथ यदाऽभिवीक्षितुं प्रस्पन्दितुं वा कुत एव योद्धुम् ।;शिवस्तदा देवगणास्समस्ताः शशंसुरुच्चैर्जगतो हरेर्बलम् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = यदीरणेनैव विनैष शङ्करः शशाक न प्रश्वसितुं च केवलम् ।;किमत्र वक्तव्यमतो हरेर्बलं हरात् परं सर्वत एव चेति ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = ततः प्रणम्याऽऽशु जनार्दनं हरः प्रसन्नदृष्ट्या हरिणाऽभिवीक्षितः ।;जगाम कैलासममुष्य तद्धनुस्त्वया प्रभग्नं किल लोकसन्निधौ ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = धनुर्यदन्यद्धरिहस्तयोग्यं तत्कार्मुकात् कोटिगुणं पुनश्च ।;वरं हि हस्ते तदिदं गृहीतं मया गृहाणैतदतो हि वैष्णवम् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = यदीदमागृह्य विकर्षसि त्वं तदा हरिर्नात्र विचार्यमस्ति ।;इति ब्रुवाणः प्रददौ धनुर्वरं प्रदर्शयत् विष्णुबलं हराद्वरम् ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = प्रगृह्य तच्चापवरं स राघवश्चकार सज्यं निमिषेण लीलया ।;चकर्ष सन्धाय शरं च पश्यतः समस्तलोकस्य च संशयं नुदन् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = प्रदर्शिते विष्णुबले समस्ततो हराच्च निःसङ्ख्यतया महाधिके ।;जगाद मेघौघगभीरया गिरा स राघवं भार्गव आदिपूरुषः ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = अलं बलं ते जगतोऽखिलाद्वरं परोऽसि नारायण एव नान्यथा ।;विसर्जयस्वेह शरं तपोमये महासुरे लोकमये वराद्विभोः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = पुरोऽतुलो नाम महासुरोऽभवद् वरात् स तु ब्रह्मण आप लोकताम् ।;पुनश्च तं प्राह जगद्गुरुर्यदा हरिर्जितः स्याद्धि तदैव वध्यसे ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = अतो वधार्थं जगदन्तकस्य सर्वाजितोऽहं जितवद् व्यवस्थितः ।;इतीरिते लोकमये स राघवो मुमोच बाणं जगदन्तकेऽसुरे ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = पुरा वरोऽनेन शिवोपलम्भितो मुमुक्षया विष्णुतनुप्रवेशनम् ।;स तेन रामोदरगो बहिर्गतस्तदाज्ञयैवाऽऽशु बभूव भस्मसात् ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = इतीव रामाय स राघवः शरं विकर्षमाणो विनिहत्य चासुरम् ।;तपस्तदीयं प्रवदन् मुमोद तदीयमेव ह्यभवत् समस्तम् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = निरन्तरानन्तविबोधसारः स जानमानोऽखिलमादिपूरुषः ।;वदञ्छृणोतीव विनोदतो हरिः स एक एव द्वितनुर्मुमोद ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = स चेष्टितं चैव निजाश्रयस्य जनस्य सत्तत्त्वविबोधकारणम् ।;विमोहकं चान्यतमस्य कुर्वन् चिक्रीड एकोऽपि नरान्तरे यथा ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = ततः स कारुण्यनिधिर्निजे जने नितान्तमैक्यं स्वगतं प्रकाशयन् ।;द्विधेव भूत्वा भृगुवर्य आत्मना रघूत्तमेनैक्यमगात् समक्षम् ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = समेत्य चैक्यं जगतोऽभिपश्यतः प्रणुद्य शङ्कामखिलां जनस्य ।;प्रदाय रामाय धनुर्वरं तदा जगाम रामानुमतो रमापतिः ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = ततो नृपोऽत्यर्थमुदाऽभिपूरितः सुतैः समस्तैः स्वपुरीमवाप ह ।;रेमेऽथ रामोऽपि रमास्वरूपया तयैव राजात्मजया हि सीतया ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = यथा पुरा श्रीरमणः श्रिया तया रतो नितान्तं हि पयोब्धिमध्ये ।;तथा त्वयोध्यापुरिगो रघूत्तमोऽप्युवास कालं सुचिरं रतस्तया ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = इमानि कर्माणि रघूत्तमस्य हरेर्विचित्राण्यपि नाद्भुतानि ।;दुरन्तशक्तेरथ चास्य वैभवं स्वकीयकर्तव्यतयाऽनुवर्ण्यते ॥ ६५॥ | |||
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<span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमोऽध्यायः"></span> | ||
== पञ्चमोऽध्यायः == | == पञ्चमोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ इत्थं विश्वेश्वरेऽस्मिन्नखिलजगदवस्थाप्य सीतासहाये भूमिष्ठे सर्वलोकास्तुतुषुरनुदिनं वृद्धभक्त्यानितान्तम् ।;राजा राज्याभिषेके प्रकृतिजनवचो मानयन्नात्मनोऽर्थ्यं दध्रे तन्मन्थरायाः श्रुतिपथमगमद् भूमिगाया अलक्ष्म्याः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं क्षीराब्धिजाता कथमपि तपसैवाप्सरस्त्वं प्रयाता तां नेतुं तत्तमोऽन्धं कमलजनिरुवाचाऽऽशु रामाभिषेकम् ।;भूत्वा दासी विलुम्प स्वगतिमपि ततः कर्मणा प्राप्स्यसे त्वं सेत्युक्ता मन्थराऽऽसीत् तदनु कृतवत्येव चैतत् कुकर्म ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = तद्वाक्यात् कैकयी सा पतिगवरबलादाजहारैव राज्यं रामस्तद्गौरवेण त्रिदशमुनिकृतेऽरण्यमेवाऽविवेश ।;सीतायुक्तोऽनुजेन प्रतिदिनसुविवृद्धोरुभक्त्या समेतः संस्थाप्याशेषजन्तून् स्वविरहजशुचा त्यक्तसर्वेषणार्थान् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = वृक्षान् पक्षीभकीटान् पितरमथ सखीन् मातृपूर्वान् विसृज्य प्रोत्थां गङ्गांस्वपादाद्धर इव गुहेनार्चितः सोऽथ तीर्त्वा ।;देवार्च्यस्यापि पुत्रादृषिगणसहितात् प्राप्य पूजां प्रयातः शैलेशं चित्रकूटं कतिपयदिवसान्यत्र मोदन्नुवास ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = एतस्मिन्नेव काले दशरथनृपतिः स्वर्गतोऽभूद्वियोगाद् रामस्यैवाथ पुत्रौ विधिसुतसहितैर्मन्त्रिभिः केकयेभ्यः ।;आनीतौ तस्य कृत्वा श्रुतिगणविहितप्रेतकार्याणि सद्यः शोचन्तौ राममार्गं पुरजनसहितौ जग्मतुर्मातृभिश्च ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = धिक्कुर्वन्तौ नितान्तं सकलदुरितगां मन्थरां कैकयीं च प्राप्तौ रामस्य पादौ मुनिगणसहितौ तत्र चोवाच नत्वा ।;रामं राजीवनेत्रं भरत इह पुनः प्रीतयेऽस्माकमीश प्राप्याऽऽशु स्वामयोध्यामवरजसहितः पालयेमां धरित्रीम् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तः कर्तुमीशः सकलसुरगणाप्यायनं रामदेवः सत्यां कर्तुं च वाणीमवददतितरां नेति सद्भक्तिनम्रम् ।;भूयोभूयोऽर्थयन्तं द्विगुणितशरदां सप्तके त्वभ्यतीते कर्तैतत्ते वचोऽहं सुदृढमृतमिदं मे वचो नात्र शङ्का ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वैतद्रामवाक्यं हुतभुजि पतने स प्रतिज्ञां च कृत्वा रामोक्तस्यान्यथात्वे न तु परमभिवेक्ष्येऽहमित्येव तावत् ।;कृत्वाऽन्यां स प्रतिज्ञामवसदथ बहिर्ग्रामके नन्दिनाम्नि श्रीशस्यैवास्य कृत्वा शिरसि परमकं पौरटं पादपीठम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = समस्तपौरानुगतेऽनुजे गते स चित्रकूटे भगवानुवास ह ।;अथाऽजगामेन्द्रसुतोऽपि वायसो महासुरेणाऽत्मगतेन चोदितः ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = स चासुरावेशवशाद्रमास्तने यदा व्यधात्तुण्डमथाभिवीक्षितः ।;जनार्दनेनाऽऽशु तृणे प्रयोजिते चचार तेन ज्वलताऽनुयातः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = स्वयम्भुशर्वेन्द्रमुखान्सुरेश्वरान् जिजीविषुस्ताञ्छरणं गतोऽपि ।;बहिष्कृतस्तैर्हरिभक्तिभावतो ह्यलङ्घ्यशक्त्या परमस्य चाक्षमैः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = पुनः प्रयातः शरणं रघूत्तमं विसर्जितस्तेन निहत्य चासुरम् ।;तदक्षिगं साक्षिकमप्यवध्यं प्रसादतश्चन्द्रविभूषणस्य ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = स वायसानामसुरोऽखिलानां वरादुमेशस्य बभूव चाक्षिगः ।;निपातितोऽसौ सह वायसाक्षिभिस्तृणेन रामस्य बभूव भस्मसात् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = ददुर्हि तस्मै विवरं बलार्थिनो यद्वायसास्तेन तदक्षिपातनम् ।;कृतं रमेशेन तदेकनेत्रा बभूवुरन्येऽपि तु वायसास्तदा ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = रामोऽथ दण्डकवनं मुनिवर्यनीतो लोकाननेकश उदारबलैर्निरस्तान् ।;श्रुत्वा खरप्रभृतिभिर्वरतो हरस्य सर्वैरवध्यतनुभिः प्रययौ सभार्यः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = आसीच्च तत्र शरभङ्ग इति स्म जीर्णो लोकं हरेर्जिगमिषुर्मुनिरुग्रतेजाः ।;तेनाऽदरोपहृतसार्ध्यसपर्यया स प्रीतो ददौ निजपदं परमं रमेशः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = धर्मो यतोऽस्य वनगस्य नितान्तशक्तिह्रासे स्वधर्मकरणस्य हुताशनादौ ।;देहात्ययः स तत एव तनुं निजाग्नौ सन्त्यज्य रामपुरतः प्रययौ परेशम् ॥ १९॥ | |||
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| verse_text = रामोऽपि तत्र ददृशे धनदस्य शापाद् गन्धर्वमुर्वशिरतेरथ यातुधानीम् । | |||
| verse_lines = रामोऽपि तत्र ददृशे धनदस्य शापाद् गन्धर्वमुर्वशिरतेरथ यातुधानीम् ।;प्राप्तं दशां सपदि तुम्बुरुनामधेयं नाम्ना विराधमपि शर्ववरादवध्यम् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = भङ्क्त्वाऽस्य बाहुयुगलं बिलगं चकार सम्मानयन् वचनमम्बुजजन्मनोऽसौ ।;प्रादाच्च तस्य सुगतिं निजगायकस्य भक्षार्थमंसकमितोऽपि सहानुजेन ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = प्रीतिं विधित्सुरगमद्भवनं निजस्य कुम्भोद्भवस्य परमादरतोऽमुना च ।;सम्पूजितो धनुरनेन गृहीतमिन्द्राच्छार्ङ्गं तदादिपुरुषो निजमाजहार ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = आत्मार्थमेव हि पुरा हरिणा प्रदत्तमिन्द्रे तदिन्द्र उत रामकरार्थमेव ।;प्रादादगस्त्यमुनये तदवाप्य रामो रक्षन् ऋषीनवसदेव स दण्डकेषु ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = काले तदैव खरदूषणयोर्बलेन रक्षःस्वसा पतिनिमार्गणतत्पराऽऽसीत् ।;व्यापादिते निजपतौ हि दशाननेन प्रामादिकेन विधिनाऽभिससार रामम् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = साऽनुज्ञयैव रजनीचरभर्तुरुग्रा भ्रातृद्वयेन सहिता वनमावसन्ती ।;रामं समेत्य भव मे पतिरित्यवोचद्भानुं यथा तम उपेत्य सुयोगकामम् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = तां तत्र हास्यकथया जनकासुताग्रे गच्छानुजं म इह मेति वचः स उक्त्वा ।;तेनैव दुष्टचरितां हि विकर्णनासां चक्रे समस्तरजनीचरनाशहेतोः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = तत्प्रेरितान् सपदि भीमबलान् प्रयातांस्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् ।;जघ्ने चतुर्दशसहस्रमवारणीयकोदण्डपाणिरखिलस्य सुखं विधातुम् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = दत्तेऽभये रघुवरेण महामुनीनां दत्ते भये च रजनीचरमण्डलस्य ।;रक्षःपतिः स्वसृमुखादविकम्पनाच्च श्रुत्वा बलं रघुपतेः परमाप चिन्ताम् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽऽशु कार्यमवमृश्य जगाम तीरे क्षेत्रं नदीनदपतेः श्रवणं धरित्र्याः ।;मारीचमत्र तपसि प्रतिवर्तमानं भीतं शराद्रघुपतेर्नितरां ददर्श ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = तेनार्थितः सपदि राघववञ्चनार्थे मारीच आह शरवेगममुष्य जानन् ।;शक्यो न ते रघुवरेण हि विग्रहोऽत्र जानामि संस्पर्शमस्य शरस्य पूर्वम् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवन्तमथ रावण आह खड्गं निष्कृष्य हन्मि यदि मे न करोषि वाक्यम् ।;तच्छुश्रुवान् भययुतोऽथ निसर्गतश्च पापो जगाम रघुवर्यसकाशमाशु ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = सम्प्राप्य हैममृगतां बहुरत्नचित्रः सीतासमीप उरुधा विचचार शीघ्रम् ।;निर्दोषनित्यवरसंविदपि स्म देवी रक्षोवधाय जनमोहकृते तथाऽऽह ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = देवेममाशु परिगृह्य च देहि मे त्वं क्रीडामृगं त्विति तयोदित एव रामः ।;अन्वक् ससार ह शरासनबाणपाणिर्मायामृगं निशिचरं निजघान जानन् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = तेनाऽहतः शरवरेण भृशं ममार विक्रुश्य लक्ष्मणमुरुव्यथया स पापः ।;श्रुत्वैव लक्ष्मणमचूचुददुग्रवाक्यैः सोऽप्याप रामपथमेव सचापबाणः ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = यां यां परेश उरुधैव करोति लीलां तां तां करोत्यनु तथैव रमापि देवी ।;नैतावताऽस्य परमस्य तथा रमाया दोषोऽणुरप्यनुविचिन्त्य उरुप्रभू यत् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = क्वाज्ञानमापदपि मन्दकटाक्षमात्रात् सर्गस्थितिप्रलयसंसृतिमोक्षहेतोः ।;देव्या हरेः किमु विडम्बनमात्रमेतद् विक्रीडतोः सुरनरादिदेव तस्मात् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = देव्याः समीपमथ रावण आससाद साऽदृश्यतामगमदप्यविषह्यशक्तिः ।;सृष्ट्वाऽऽत्मनः प्रतिकृतिं प्रययौ च शीघ्रं कैलासमर्चितपदा न्यवसच्छिवाभ्याम् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = तस्यास्तु तां प्रतिकृतिं प्रविवेश शक्रो देव्याश्च सन्निधियुतां व्यवहारसिद्ध्यै ।;आदाय तामथ ययौ रजनीचरेन्द्रो हत्वा जटायुषमुरुश्रमतो निरुद्धः ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = मार्गे व्रजन्तमभियाय ततो हनूमान् संवारितो रविसुतेन च जानमानः ।;दैवं तु कार्यमथ कीर्तिमभीप्समानो रामस्य नैनमहनद्वचनाद्धरेश्व ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = प्राप्यैव राक्षस उताऽऽत्मपुरीं स तत्र सीताकृतिं प्रतिनिधाय ररक्ष चाथ ।;रामोऽपि तत्तु विनिहत्य सुदुष्टरक्षः प्राप्याऽश्रमं स्वदयितां नहि पश्यतीव ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = अन्वेषमाण इव तं च ददर्श गृध्रं सीतां रिरक्षिषुमथो रिपुणा विशस्तम् ।;मन्दात्मचेष्टममुनोक्तमरेश्च कर्म श्रुत्वा मृतं तमदहत् स्वगतिं तथाऽदात् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = अन्यत्र चैव विचरन् सहितोऽनुजेन प्राप्तः करौ स सहसाऽथ कबन्धनाम्नः ।;धातुर्वरादखिलजायिन उज्झितस्य मृत्योश्च वज्रपतनादतिकुञ्चितस्य ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = छित्वाऽस्य बाहुयुगलं सहितोऽनुजेन तं पूर्ववत् प्रतिविधाय सुरेन्द्रभृत्यम् ।;नाम्ना दनुं त्रिजटयैव पुराऽभिजातं गन्धर्वमाशु च ततोऽपि तदर्चितोऽगात् ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा तमेव शबरी परमं हरिं च ज्ञात्वा विवेश दहनं पुरतोऽस्य तस्यै ।;प्रादात् स्वलोकमिममेव हि सा प्रतीक्ष्य पूर्वं मतङ्गवचनेन वनेऽत्र साऽभूत् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = शापाद् वराप्सरसमेव हि तां विमुच्य शच्या कृतात् पतिपुरस्त्वतिदर्पहेतोः ।;गत्वा ददर्श पवनात्मजमृश्यमूके स ह्येक एनमवगच्छति सम्यगीशम् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = देहेऽपि यत्र पवनोऽत्र हरिर्यतोऽसौ तत्रैव वायुरिति वेदवचः प्रसिद्धम् ।;‘कस्मिन् न्वहं’ त्विति तथैव हि सोऽवतारे तस्मात् स मारुतिकृते रविजं ररक्ष ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = एवं स कृष्णतनुरर्जुनमप्यरक्षद् भीमार्थमेव तदरिं रविजं निहत्य ।;पूर्वं हि मारुतिमवाप रवेः सुतोऽयं तेनास्य वालिनमहन् रघुपः प्रतीपम् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = एवं सुराश्च पवनस्य वशे यतोऽतः सुग्रीवमत्र तु परत्र च शक्रसूनुम् ।;सर्वे श्रिता हनुमतस्तदनुग्रहाय तत्रागमद् रघुपतिः सह लक्ष्मणेन ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = ‘यत्पादपङ्कजरजः शिरसा विभर्ति श्रीरब्जजश्च गिरिशः सह लोकपालैः’ ।;सर्वेश्वरस्य परमस्य हि सर्वशक्तेः किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = समागते तु राघवे प्लवङ्गमाः ससूर्यजाः ।;विपुप्लुवुर्भयार्दिता न्यवारयच्च मारुतिः (भा\.पु\. १०\.५८\.३८)॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = संस्थाप्याऽशु हरीन्द्रान् जानन् विष्णोर्गुणाननन्तान् सः ।;साक्षाद् ब्रह्मपिताऽसावित्येतेनास्य पादयोः पेते ॥ ५१॥ | |||
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<span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठोऽध्यायः"></span> | ||
== षष्ठोऽध्यायः == | == षष्ठोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ उत्थाप्य चैनमरविन्ददलायताक्षश्चक्राङ्कितेन वरदेन कराम्बुजेन ।;कृत्वा च संविदमनेन नुतोऽस्य चांसं प्रीत्याऽऽरुरोह स हसन् सह लक्ष्मणेन ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = आरोप्य चांसयुगळं भगवन्तमेनं तस्यानुजं च हनुमान् प्रययौ कपीन्द्रम् ।;सख्यं चकार हुतभुक्प्रमुखे च तस्य रामेण शाश्वतनिजार्तिहरेण शीघ्रम् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽस्य दुःखमथ देववरः प्रतिज्ञां चक्रे स वालिनिधनाय हरीश्वरोऽपि ।;सीतानुमार्गणकृतेऽथ स वालिनैव क्षिप्तां हि दुन्दुभितनुं समदर्शयच्च ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = वीक्ष्यैव तां निपतितामथ रामदेवः सोऽङ्गुष्ठमात्रचलनादतिलीलयैव ।;सम्प्रास्य योजनशतेऽथ तयैव चोर्वीं सर्वान् विदार्य दितिजानहनद्रसास्थान् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = शर्वप्रसादजबलाद्दितिजानवध्यान् सर्वान् निहत्य कुणपेन पुनश्च सख्या ।;भीतेन वालिबलतः कथितः स्म सप्तसालान् प्रदर्श्य दितिजान् सुदृढांश्च वज्रात् ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = एकैकमेषु स विकम्पयितुं समर्थः पत्राणि लोप्तुमपि तूत्सहते न शक्तः ।;विष्वक्स्थितान् यदि भवान् प्रतिभेत्स्यतीमानेकेषुणा तर्हि वालिवधे समर्थः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = जेतुं चतुर्गुणबलो हि पुमान् प्रभुः स्याद्धन्तुं शताधिकबलोऽतिबलं सुशक्तः ।;तस्मादिमान् हरिहयात्मजबाह्वलोप्यपत्रान् विभिद्य मम संशयमाशु भिन्धि ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽस्य वाक्यमवमृश्य दितेः सुतांस्तान् धातुर्वरादखिलपुम्भिरभेद्यरूपान् ।;ब्रह्मत्वमाप्तुमचलं तपसि प्रवृत्तानेकेषुणा सपदि तान् प्रबिभेद रामः ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = सन्धाय कार्मुकवरे निशिते तु बाणेऽथाऽकृष्य दक्षिणभुजेन तदा प्रमुक्ते ।;रामेण सत्वरमनन्तबलेन सर्वे चूर्णीकृताः सपदि ते तरवो रवेण ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = भित्त्वा च तान् सगिरिकुं भगवत्प्रमुक्तः पातालसप्तकमथात्र च ये त्ववध्याः ।;नाम्नाऽसुराः कुमुदिनोऽब्जजवाक्यरक्षाः सर्वांश्च तानदहदाशु शरः स एकः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = नैतद्विचित्रममितोरुबलस्य विष्णोर्यत्प्रेरणात् सपवनस्य भवेत् प्रवृत्तिः ।;लोकस्य सप्रकृतिकस्य सरुद्रकालकर्मादिकस्य तदपीदमनन्यसाध्यम् ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा बलं भगवतोऽथ हरीश्वरोऽसावग्रे निधाय तमयात् पुरमग्रजस्य ।;आश्रुत्य रावमनुजस्य बिलात् स चाऽगादभ्येनमाशु दयिताप्रतिवारितोऽपि ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = तन्मुष्टिभिः प्रतिहतः प्रययावशक्तः सुग्रीव आशु रघुपोऽपि हि धर्ममीक्षन् ।;नैनं जघान विदिताखिललोकचेष्टोऽप्येनं स आह युधि वां न मया विविक्तौ ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = सौभ्रात्रमेष यदि वाञ्छति वालिनैव नाहं निरागसमथाग्रजनिं हनिष्ये ।;दीर्घः सहोदरगतो न भवेद्धि कोपो दीर्घोऽपि कारणमृते विनिवर्तते च ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = कोपः सहोदरजने पुनरन्तकाले प्रायो निवृत्तिमुपगच्छति तापकश्च ।;एकस्य भङ्ग इति नैव झटित्यपास्तदोषो निहन्तुमिह योग्य इति स्म मेने ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = तस्मान्न बन्धुजनगे जनिते विरोधे कार्यो वधस्तदनुबन्धिभिराश्वितीह ।;धर्मं प्रदर्शयितुमेव रवेः सुतस्य भावी न ताप इति विच्च न तं जघान ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = यः प्रेरकः सकलशेमुषिसन्ततेश्च तस्याज्ञता कुत इहेशवरस्य विष्णोः ।;तेनोदितोऽथ सुदृढं पुनरागतेन वज्रोपमं शरममूमुचदिन्द्रसूनौ ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = रामाज्ञयैव लतया रविजे विभक्ते वायोः सुतेन रघुपेण शरे च मुक्ते ।;श्रुत्वाऽस्य शब्दमतुलं हृदि तेन विद्ध इन्द्रात्मजो गिरिरिवापतदाशु सन्नः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = भक्तो ममैष यदि मामभिपश्यतीह पादौ ध्रुवं मम समेष्यति निर्विचारः ।;योग्यो वधो नहि जनस्य पदानतस्य राज्यार्थिना रविसुतेन वधोऽर्थितश्च ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = कार्यं ह्यभीष्टमपि तत् प्रणतस्य पूर्वं शस्तो वधो न पदयोः प्रणतस्य चैव ।;तस्माददृश्यतनुरेव निहन्मि शक्रपुत्रं त्वितिस्म तमदृष्टतया जघान ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = यः प्रेरकः सकललोकबलस्य नित्यं पूर्णाव्ययोच्चबलवीर्यतनुः स्वतन्त्रः ।;किं तस्य दृष्टिपथगस्य च वानरोऽयं कर्तैशचापमपि येन पुरा प्रभग्नम् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = सन्नेऽथ वालिनि जगाम च तस्य पार्श्वं प्राहैनमार्द्रवचसा यदि वाञ्छसि त्वम् ।;उज्जीवयिष्य इति नैच्छदसौ त्वदग्रे को नाम नेच्छति मृतिं पुरुषोत्तमेति ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = कार्याणि तस्य चरमाणि विधाय पुत्रं त्वग्रे निधाय रविजः कपिराज्य आसीत् ।;रामोऽपि तद्गिरिवरे चतुरोऽथ मासान् दृष्ट्वा घनागममुवास सलक्ष्मणोऽसौ ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = अथातिसक्ते क्षितिपे कपीनां प्रविस्मृते रामकृतोपकारे ।;प्रसह्य तं बुद्धिमतां वरिष्ठो रामाङ्घ्रिभक्तो हनुमानुवाच ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = न विस्मृतिस्ते रघुवर्यकार्ये कार्या कथञ्चित् स हि नोऽभिपूज्यः ।;न चेत् स्वयं कर्तुमभीष्टमद्य ते ध्रुवं बलेनापि हि कारयामि ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = स एवमुक्त्वा हरिराजसन्निधौ द्वीपेषु सप्तस्वपि वानरान् प्रति ।;सम्मेलनायाऽशुगतीन् स्म वानरान् प्रस्थापयामास समस्तशः प्रभुः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = हरीश्वराज्ञाप्रणिधानपूर्वकं हनूमता ते प्रहिता हि वानराः ।;समस्तशैलद्रुमषण्डसंस्थितान् हरीन् समादाय तदाऽभिजग्मुः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = तदैव रामोऽपि हि भोगसक्तं प्रमत्तमालक्ष्य कपीश्वरं प्रभुः ।;जगाद सौमित्रिमिदं वचो मे प्लवङ्गमेशाय वदाऽशु याहि ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = यदि प्रमत्तोऽसि मदीयकार्ये नयाम्यहं त्वेन्द्रसुतस्य मार्गम् ।;प्रायः स्वकार्ये प्रतिपादिते हि मदोद्धता न प्रतिकर्तुमीशते ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = इतीड्यरामेण समीरिते तदा ययौ सबाणः सधनुः स लक्ष्मणः ।;दृष्ट्वैव तं तेन सहैव तापनिर्भयाद्ययौ रामपदान्तिकं त्वरन् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = हनूमतः साधुवचोभिराशु प्रसन्नचेतस्यधिपे कपीनाम् ।;समागते सर्वहरिप्रवीरैः सहैव तं वीक्ष्य ननन्द राघवः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = ससम्भ्रमं तं पतितं पदाब्जयोस्त्वरन् समुत्थाप्य समाश्लिषत् प्रभुः ।;स चोपविष्टो जगदीशसन्निधौ तदाज्ञयैवाऽऽदिशदाशु वानरान् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = समस्तदिक्षु प्रहितेषु तेन प्रभुर्हनूमन्तमिदं बभाषे ।;न कश्चिदीशस्त्वदृतेऽस्ति साधने समस्तकार्यप्रवरस्य मेऽस्य ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = अतस्त्वमेव प्रतियाहि दक्षिणां दिशं समादाय मदङ्गुलीयकम् ।;इतीरितोऽसौ पुरुषोत्तमेन ययौ दिशं तां युवराजयुक्तः ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = समस्तदिक्षु प्रतियापिता हि ते हरीश्वराज्ञामुपधार्य मासतः ।;समाययुस्तेऽङ्गदजाम्बवन्मुखाः सुतेन वायोः सहिता न चाययुः ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = समस्तदुर्गप्रवरं दुरासदं विमार्गतां विन्ध्यगिरिं महात्मनाम् ।;गतः स कालो हरिराडुदीरितः समासदंश्चाथ बिलं महाद्भुतम् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = कृतं मयेनातिविचित्रमुत्तमं समीक्ष्य तत्तार उवाच चाङ्गदम् ।;वयं न यामो हरिराजसन्निधिं विलङ्घितो नः समयो यतोऽस्य ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = दुरासदोऽसावतिचण्डशासनो हनिष्यति त्वामपि किं मदादिकान् ।;अगम्यमेतद् बिलमाप्य तत् सुखं वसाम सर्वे किमसाविहाऽऽचरेत् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = न चैव रामेण सलक्ष्मणेन प्रयोजनं नो वनचारिणां सदा ।;न चेह नः पीडयितुं स च क्षमस्ततो ममेयं सुविनिश्चिता मतिः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितं मातुलवाक्यमाशु स आददे वालिसुतोऽपि सादरम् ।;उवाच वाक्यं च न नो हरीश्वरः क्षमी भवेल्लङ्घितशासनानाम् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = राज्यार्थिना येन हि घातितोऽग्रजो हृताश्च दाराः सुनृशंसकेन ।;स नः कथं रक्षति शासनातिगान् निराश्रयान् दुर्बलकान् बले स्थितः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते शक्रसुतात्मजेन तथेति होचुः सह जाम्बवन्मुखाः ।;सर्वेऽपि तेषामथ चैकमत्यं दृष्ट्वा हनूमानिदमाबभाषे ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञातमेतद्धि मयाऽङ्गदस्य राज्याय ताराभिहितं हि वाक्यम् ।;साध्यं न चैतन्नहि वायुसूनू रामप्रतीपं वचनं सहेत ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = न चाहमाक्रष्टुमुपायतोऽपि शक्यः कथञ्चित् सकलैः समेतैः ।;सन्मार्गतो नैव च राघवस्य दुरन्तशक्तेर्बिलमप्रधृष्यम् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = वचो ममैतद्यदि चाऽऽदरेण ग्राह्यं भवेद्वस्तदतिप्रियं मे ।;न चेद् बलादप्यनये प्रवृत्तान् प्रशास्य सन्मार्गगतान् करोमि ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = निरीक्ष्य ते सागरमप्रधृष्यमपारमेयं सहसा विषण्णाः ।;दृढं निराशाश्च मतिं हि दध्रुः प्रायोपवेशाय तथा च चक्रुः ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = प्रायोपविष्टाश्च कथा वदन्तो रामस्य संसारविमुक्तिदातुः ।;जटायुषः पातनमूचिरे तत्सम्पातिनाम्नः श्रवणं जगाम ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = तस्याग्रजोऽसावरुणस्य सूनुः सूर्यस्य बिम्बं सह तेन यातः ।;जवं परीक्षन्नथ तं सुतप्तं गुप्त्वा पतत्रक्षयमाप्य चापतत् ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = स दग्धपक्षः सवितृप्रतापाच्छ्रुत्वैव रामस्य कथां सपक्षः ।;भूत्वा पुनश्चापि मृतिं जटायुषः शुश्राव पृष्ट्वा पुनरेव सम्यक् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = स रावणस्याथ गतिं सुतोक्तां निवेद्य दृष्ट्वा जनकात्मजाकृतिम् ।;स्वयं तथाऽशोकवने निषण्णामवोचदेभ्यो हरिपुङ्गवेभ्यः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु ते ब्रह्मसुतेन पृष्टा न्यवेदयन्नात्मबलं पृथक् पृथक् ।;दशैव चाऽरभ्य दशोत्तरस्य क्रमात् पथो योजनतोऽभियाने ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = सनीलमैन्दद्विविदाः सताराः सर्वेऽप्यशीत्याः परतो न शक्ताः ।;गन्तुं यदाऽऽथाऽत्मबलं स जाम्बवान् जगाद तस्मात् पुनरष्टमांशम् ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = बलेर्यदा विष्णुरवाप लोकांस्त्रिभिः क्रमैर्नन्दिरवं प्रकुर्वता ।;तदा मया भ्रान्तमिदं जगत्त्रयं सवेदनं जानु ममाऽऽस मेरुतः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = अतो जवो मे न हि पूर्वसम्मितः पुरा त्वहं षण्णवतिप्लवोऽस्मि ।;ततः कुमारोऽङ्गद आह चास्माच्छतं प्लवेयं न ततोऽभिजाने ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = अपूरिते तैः सकलैः शतस्य गमागमे शत्रुबलं च वीक्ष्य ।;सुदुर्गमत्वं च निशाचरेशपुर्याः स धातुः सुत आबभाषे ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = अयं हि गृध्रः शतयोजनं गिरिं त्रिकूटमाहेत उतात्र विघ्नाः ।;भवेयुरन्येऽपि ततो हनूमानेकः समर्थो न परोऽस्ति कश्चित् ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = उक्त्वा स इत्थं पुनराह सूनुं प्राणस्य निःसीमबलं प्रशंसयन् ।;त्वमेक एवात्र परं समर्थः कुरुष्व चैतत् परिपाहि वानरान् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितोऽसौ हनुमान् निजेप्सितं तेषामशक्तिं प्रकटां विधाय ।;अवर्धताऽऽशु प्रविचिन्त्य रामं सुपूर्णशक्तिं चरितोस्तदाज्ञाम् ॥ ५९॥ | |||
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<span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमोऽध्यायः"></span> | ||
== सप्तमोऽध्यायः == | == सप्तमोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ रामाय शाश्वतसुविस्तृतषड्गुणाय सर्वेश्वराय सुखसारमहार्णवाय।;नत्वा लिलङ्घयिषुरर्णवमुत्पपात निष्पीड्य तं गिरिवरं पवनस्य सूनुः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = चुक्षोभ वारिधिरनुप्रययौ च शीघ्रं यादोगणैः सह तदीयबलाभिकृष्टः ।;वृक्षाश्च पर्वतगताः पवनेन पूर्वं क्षिप्तोऽर्णवे गिरिरुदागमदस्य हेतोः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = श्यालो हरस्य गिरिपक्षविनाशकाले क्षिप्तोऽर्णवे स मरुतोर्वरितात्मपक्षः ।;हैमो गिरिः पवनजस्य तु विश्रमार्थमुद्भिद्य वारिधिमवर्द्धदनेकसानुः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = नैवात्र विश्रमणमैच्छत निःश्रमोऽसौ निःसीमपौरुषगुणस्य कुतः श्रमोऽस्य ।;आश्लिष्य पर्वतवरं स ददर्श गच्छन् देवैस्तु नागजननीं प्रहितां वरेण ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = जिज्ञासुभिर्निजबलं तव भक्षमेतु यद्यत् त्वमिच्छसि तदित्यमरोदितायाः ।;आस्यं प्रविश्य सपदि प्रविनिस्सृतोऽस्माद् देवाननन्दयदुत स्वृतमेषु रक्षन् ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा सुरप्रणयितां बलमस्य चोग्रं देवाः प्रतुष्टुवुरमुं सुमनोभिवृष्ट्या ।;तैरादृतः पुनरसौ वियतैव गच्छन् छायाग्रहं प्रतिददर्श च सिंहिकाख्यम् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = लङ्कावनाय सकलस्य च निग्रहेऽस्याः सामर्थ्यमप्रतिहतं प्रददौ विधाता ।;छायामवाक्षिपदसौ पवनात्मजस्य सोऽस्याः शरीरमनुविश्य बिभेद चाऽशु ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = निस्सीममात्मबलमित्यनुदर्शयानो हत्वैव तामपि विधातृवराभिगुप्ताम् ।;लम्बे स लम्बशिखरे निपपात लङ्काप्राकाररूपकगिरावथ सञ्चुकोच ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = भूत्वा बिडालसमितो निशि तां पुरीं च प्राप्स्यन् ददर्श निजरूपवतीं स लङ्काम् ।;रुद्धोऽनयाऽऽश्वथ विजित्य च तां स्वमुष्टिपिष्टां तयाऽनुमत एव विवेश लङ्काम् ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = मार्गमाणो बहिश्चान्तः सोऽशोकवनिकातले ।;ददर्श शिंशपावृक्षमूलस्थितरमाकृतिम् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = नरलोकविडम्बस्य जानन् रामस्य हृद्गतम् ।;तस्य चेष्टानुसारेण कृत्वा चेष्टाश्च संविदः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = तादृक्चेष्टासमेताया अङ्गुलीयमदात् ततः ।;सीताया यानि चैवाऽऽसन्नाकृतेस्तानि सर्वशः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = भूषणानि द्विधा भूत्वा तान्येवाऽसन् तथैव च ।;अथ चूडामणिं दिव्यं दातुं रामाय सा ददौ ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = यद्यप्येतन्न पश्यन्ति निशाचरगणास्तु ते ।;द्युलोकचारिणः सर्वं पश्यन्त्यृषय एव च ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = तेषां विडम्बनायैव दैत्यानां वञ्चनाय च ।;पश्यतां कलिमुख्यानां विडम्बोऽयं कृतो भवेत् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = कृत्वा कार्यमिदं सर्वं विशङ्कः पवनात्मजः ।;आत्माविष्करणे चित्तं चक्रे मतिमतां वरः ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = अथ वनमखिलं तद् रावणस्यावलुम्प्य क्षितिरुहमिममेकं वर्जयित्वाऽऽशु वीरः ।;रजनिचरविनाशं काङ्क्षमाणोऽतिवेलं मुहुरतिरवनादी तोरणं चाऽऽरुरोह ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = अथाशृणोद्दशाननः कपीन्द्रचेष्टितं परम् ।;दिदेश किङ्करान् बहून् कपिर्निगृह्यतामिति ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = अशीतिकोटियूथपं पुरस्सराष्टकायुतम् ।;अनेकहेतिसङ्कुलं कपीन्द्रमावृणोद् बलम् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च मन्त्रिपुत्रकान् स रावणप्रचोदितान् ।;ममर्द सप्तपर्वतप्रभान् वराभिरक्षितान् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = बलाग्रगामिनस्तथा स शर्ववाक्सुगर्वितान् ।;निहत्य सर्वरक्षसां तृतीयभागमक्षिणोत् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = स मण्डमध्यकासुतं समीक्ष्य रावणोपमम् ।;तृतीय एष चांशको बलस्य हीत्यचिन्तयत् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = निधार्य एव रावणः स राघवस्य नान्यथा ।;यदीन्द्रजिन्मया हतो न चास्य शक्तिरीक्ष्यते ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = मया वरा विलङ्घिता ह्यनेकशः स्वयम्भुवः ।;स माननीय एव मे ततोऽत्र मानयाम्यहम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = इमे च कुर्युरत्र किं प्रहृष्टरक्षसां गणाः ।;इतीह लक्ष्यमेव मे स रावणश्च दृश्यते ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = इदं समीक्ष्य बद्धवत् स्थितं कपीन्द्रमाशु ते ।;बबन्धुरन्यपाशकैर्जगाम चास्त्रमस्य तत् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = अथ प्रगृह्य तं कपिं समीपमानयंश्च ते ।;निशाचरेश्वरस्य तं स पृष्टवांश्च रावणः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = कपे कुतोऽसि कस्य वा किमर्थमीदृशं कृतम् ।;इतीरितः स चावदत् प्रणम्य राममीश्वरम् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = अवैहि दूतमागतं दुरन्तविक्रमस्य माम् ।;रघूत्तमस्य मारुतिं कुलक्षये तवेश्वरम् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = न चेत् प्रदास्यसि त्वरन् रघूत्तमप्रियां तदा ।;सपुत्रमित्रबान्धवो विनाशमाशु यास्यसि ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = न रामबाणधारणे क्षमाः सुरेश्वरा अपि ।;विरिञ्चिशर्वपूर्वकाः किमु त्वमल्पसारकः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = प्रकोपितस्य तस्य कः पुरस्थितौ क्षमो भवेत् ।;सुरासुरोरगादिके जगत्यचिन्त्यकर्मणः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते वधोद्यतं न्यवारयद् विभीषणः ।;स पुच्छदाहकर्मणि न्ययोजयन्निशाचरान् ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = अथास्य वस्त्रसञ्चयैः पिधाय पुच्छमग्नये ।;दुदुर्ददाह नास्य तन्मरुत्सखो हुताशनः ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = ममर्ष सर्वचेष्टितं स रक्षसां निरामयः ।;बलोद्धतश्च कौतुकात् प्रदग्धुमेव तां पुरीम् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = ददाह चाखिलं पुरं स्वपुच्छगेन वह्निना ।;कृतस्तु विश्वकर्मणोऽप्यदह्यतास्य तेजसा ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = सुवर्णरत्नकारितां स राक्षसोत्तमैः सह ।;प्रदह्य सर्वशः पुरीं मुदाऽन्वितो जगर्ज च ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = स रावणं सपुत्रकं तृणोपमं विधाय च ।;तयोः प्रपश्यतोः पुरं विधाय भस्मसाद्ययौ ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = विलङ्घ्य चार्णवं पुनः स्वजातिभिः प्रपूजितः ।;प्रभक्ष्य वानरेशितुर्मधु प्रभुं समेयिवान् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = रामं सुरेश्वरमगण्यगुणाभिरामं सम्प्राप्य सर्वकपिवीरवरैः समेतः ।;चूडामणिं पवनजः पदयोर्निधाय सर्वाङ्गकैः प्रणतिमस्य चकार भक्त्या ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = रामोऽपि नान्यदनुदातुममुष्य योग्यमत्यन्तभक्तिभरितस्य विलक्ष्य किञ्चित् ।;स्वात्मप्रदानमधिकं पवनात्मजस्य कुर्वन् समाश्लिषदमुं परमाभितुष्टः ॥ ५०॥ | |||
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<span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमोऽध्यायः"></span> | ||
== अष्टमोऽध्यायः == | == अष्टमोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ श्रुत्वा हनूमदुदितं कृतमस्य सर्वं प्रीतः प्रयाणमभिरोचयते स रामः ।;आरुह्य वायुसुतमङ्गदगेन युक्तः सौमित्रिणा सरविजः सह सेनयाऽगात् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = सम्प्राप्य दक्षिणमपान्निधिमत्र देवः शिश्ये जगद्गुरुतमोऽप्यविषह्यशक्तिः (विचिन्त्यशक्तिः) ।;अग्रे हि मार्दवमनुप्रथयन् स धर्मं पन्थानमर्थितुमपाम्पतितः प्रतीतः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = तत्राऽऽजगाम स विभीषणनामधेयो रक्षःपतेरवरजोऽप्यथ रावणेन ।;भक्तोऽधिकं रघुपताविति धर्मनिष्ठस्त्यक्तो जगाम शरणं च रघूत्तमं तम् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मात्मजेन रविजेन बलप्रणेत्रा नीलेन मैन्दविविदाङ्गदतारपूर्वैः ।;सर्वैश्च शत्रुसदनादुपयात एष भ्राताऽस्य न ग्रहणयोग्य इति स्थिरोक्तः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = अत्राऽह रूपमपरं बलदेवताया ग्राह्यः स एष नितरां शरणं प्रपन्नः ।;भक्तश्च रामपदयोर्विनशिष्णु रक्षो विज्ञाय राज्यमुपभोक्तुमिहाभियातः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवत्यथ हनूमति देवदेवः सङ्गृह्य तद्वचनमाह यथैव पूर्वम् ।;सुग्रीवहेतुत इमं स्थिरमाग्रहीष्ये पादप्रपन्नमिदमेव सदा व्रतं मे ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = सब्रह्मकाः सुरगणाः सहदैत्यमर्त्याः सर्वे समेत्य च मदङ्गुलिचालनेऽपि ।;नेशा भयं न मम रात्रिचरादमुष्माच्छुद्धस्वभाव इति चैनमहं विजाने ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवाक्य उत तं स्वजनं विधाय राज्येऽभ्यषेचयदपारसुसत्त्वराशिः ।;मत्वा तृणोपममशेषसदन्तकं तं रक्षःपतेस्त्ववरजस्य ददौ स लङ्काम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = ‘कल्पान्तमस्य निशिचारिपतित्वपूर्वमायुः प्रदाय निजलोकगतिं तदन्ते ।;रात्रित्रयेऽप्यनुपगामिनमीक्ष्य सोऽब्धिं चुक्रोध रक्तनयनान्तमयुञ्जदब्धौ ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = स क्रोधदीप्तनयनान्तहतः परस्य शोषं क्षणादुपगतो दनुजादिसत्त्वैः ।;सिन्धुः शिरस्यर्हणं परिगृह्य रूपी पादारविन्दमुपगम्य बभाष एतत् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = तं त्वा वयं जडधियो न विदाम भूमन् कूटस्थमादिपुरुषं जगतामधीशम् ।;त्वं सत्वतः सुरगणान् रजसो मनुष्यांस्तार्तीयतोऽसुरगणानभितस्तथाऽस्राः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = ‘कामं प्रयाहि जहि विश्रवसोऽवमेहं त्रैलोक्यरावणमवाप्नुहि वीर पत्नीम् ।;बध्नीहि सेतुमिह ते यशसो वितत्यै गायन्ति दिग्विजयिनो यमुपेत्य भूपाः’ ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवन्तममुमाश्वनुगृह्य बाणं तस्मै धृतं दितिसुतात्मसु चान्त्यजेषु ।(भा\.पु\. ९\.१०\.१३\-१५);शार्वाद्वराद्विगतमृत्युषु दुर्जयेषु निःसङ्ख्यकेष्वमुचदाशु ददाह सर्वान् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = कृत्वेरिणं तदथ मूलफलानि चात्र सम्यग्विधाय भवशत्रुरमोघचेष्टः ।;बद्धुं दिदेश सुरवर्धकिणोऽवतारं तज्जं नलं हरिवरानपरांश्च सेतुम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = बध्वोदधौ रघुपतिर्विविधाद्रिकूटैः सेतुं कपीन्द्रकरकम्पितभूरुहाङ्गैः ।;सुग्रीवनीलहनुमत्प्रमुखैरनेकैर्लङ्कां विभीषणदृशाऽविशदाशु दग्धाम् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = प्राप्तं निशम्य परमं भुवनैकसारं निःसीमपौरुषमनन्तमसौ दशास्यः ।;त्रासाद्विषण्णहृदयो नितरां बभूव कर्तव्यकर्मविषये च विमूढचेताः ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = प्रस्थाप्य वालिसुतमेव च राजनीत्यै रामस्तदुक्तवचनेऽप्यमुनाऽगृहीते ।;द्वारो रुरोध स च तत्र उदीर्णसैन्यो रक्षःपतेः पुर उदारगुणः परेशः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = द्वारां निरोधसमये स दिदेश पुत्रं वाराम्पतेर्दिशि सुरेश्वरशत्रुमुग्रम् ।;प्राच्यां प्रहस्तमदिशद्दिशि वज्रदंष्ट्रं प्रेताधिपस्य शशिनः स्वयमेव चागात् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञाय तत् स भगवान् हनुमन्तमेव देवेन्द्रशत्रुविजयाय दिदेश चाऽऽशु ।;नीलं प्रहस्तनिधनाय च वज्रदंष्ट्रं हन्तुं सुरेन्द्रसुतसूनुमथाऽऽदिदेश ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = मध्ये हरीश्वरमधिज्य धनुर्नियुज्य यस्यां स राक्षसपतिस्स्वयमेव तां हि ।;उद्दिश्य संस्थित उपात्तशरः सखड्गो देदीप्यमानवपुरुत्तमपूरुषोऽसौ ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = विद्रावितो हनुमतेन्द्रजिदाशु हस्तं तस्य प्रपन्न इव वीर्यममुष्य जानन् ।;नीलो विभीषण उभौ शिलया च शक्त्या सञ्चक्रतुर्यमवशं गमितं प्रहस्तम् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = नीलस्य नैव वशमेति स इत्यमोघशक्त्या विभीषण इमं प्रजहार साकम् ।;तस्मिन् हतेऽङ्गद उपेत्य जघान वज्रदंष्ट्रं निपात्य भुवि शीर्षममुष्य (मृत्नन्) मृद्गन् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेषु तेषु निहतेषु दिदेश धूम्रनेत्रं स राक्षसपतिः स च पश्चिमेन ।;द्वारेण मारुतसुतं समुपेत्य दग्धो गुप्तोऽपि शूलिवचनेन दुरन्तशक्तिम् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = अथास्त्रसम्प्रदीपितैः समस्तशो महोल्मुकैः ।;रघुप्रवीरचोदिताः पुरं निशि स्वदाहयन् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तौ निकुम्भोऽथ कुम्भश्च कोपात् प्रदिष्टौ दशास्येन कुम्भश्रुतेर्हि ।;सुतौ सुप्रहृष्टौ रणायाभियातौ कपींस्तान् बहिः सर्वशो यातयित्वा ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = स कुम्भो विधातुः सुतं तारनीलौ नलं चाश्विपुत्रौ जिगायाङ्गदं च ।;सुयुद्धं च कृत्वा दिनेशात्मजेन प्रणीतो यमस्याऽशु लोकं सुपापः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = ततो निकुम्भोऽद्रिवरप्रदारणं महान्तमुग्रं परिघं प्रगृह्य ।;ससार सूर्यात्मजमाशु भीतः स पुप्लुवे पश्चिमतो धनुःशतम् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = तं भ्रामयत्याशु भुजेन वीरे भ्रान्ता दिशो द्यौश्च (सचन्द्रसूर्या) सचन्द्रसूर्याः ।;सुराश्च तस्योरुबलं वरं च शर्वोद्भवं वीक्ष्य विषेदुरीषत् ॥ २९॥ | |||
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<span id="gr-C9" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="नवमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C9" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="नवमोऽध्यायः"></span> | ||
== नवमोऽध्यायः == | == नवमोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ अथाऽप्तराज्यो भगवान् स लक्ष्मणं जगाद राजा तरुणो भवाऽशु ।;इतीरितस्त्वाह स लक्ष्मणो गुरुं भवत्पदाब्जान्न परं वृणोम्यहम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = न मां भवत्पादनिषेवणैकस्पृहं तदन्यत्र नियोक्तुमर्हति ।;नहीदृशः कश्चिदनुग्रहः क्वचित् तदेव मे देहि ततः सदैव ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितस्तस्य तदेव दत्त्वा दृढं समाश्लिष्य च राघवः प्रभुः ।;स यौवराज्यं भरते निधाय जुगोप लोकानखिलान् सधर्मकान् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = प्रशासतीशे पृथिवी बभूव विरिञ्चलोकस्य समा गुणोन्नतौ ।;जनोऽखिलो विष्णुपरो बभूव न धर्महानिश्च बभूव कस्यचित् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = गुणैश्च सर्वैरुदिताश्च सर्वे यथायथा योग्यतयोच्चनीचाः ।;समस्तरोगादिभिरुज्झिताश्च सर्वे सहस्रायुष ऊर्जिता धनैः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेऽजरा नित्यबलोपपन्ना यथेष्टसिद्ध्या च सदोपपन्नाः ।;समस्तदोषैश्च सदा विहीनाः सर्वे सुरूपाश्च सदा महोत्सवाः ॥ ६॥ | |||
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| verse_text = सर्वे मनोवाक्तनुभिः सदैव विष्णुं यजन्ते नतु कञ्चिदन्यम् । | |||
| verse_lines = सर्वे मनोवाक्तनुभिः सदैव विष्णुं यजन्ते नतु कञ्चिदन्यम् ।;समस्तरत्नोद्भरिता च पृथ्वी यथेष्टधान्या बहुदुग्धगोमती ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = समस्तगन्धाश्च सदाऽतिहृद्या रसा मनोहारिण एव तत्र ।;शब्दाश्च सर्वे श्रवणातिहारिणः स्पर्शाश्च सर्वे स्पर्शेन्द्रियप्रियाः ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = न कस्यचिद् दुःखमभूत् कथञ्चिन्न वित्तहीनश्च बभूव कस्यचित् (कश्चन) ।;नाधर्मशीलो न च कश्चनाप्रजो न दुष्प्रजो नैव कुभार्यकश्च ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रियो नचाऽसन् विधवाः कथञ्चिन्न वै पुमांसो विधुरा बभूवुः ।;नानिष्टयोगश्च बभूव कस्यचिन्नचेष्टहानिर्नच पूर्वमृत्युः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = यथेष्टमाल्याभरणानुलेपना यथेष्टपानाशनवाससोऽखिलाः ।;बभूवुरीशे जगतां प्रशासति प्रकृष्टधर्मेण जनार्दने नृपे ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = स ब्रह्मरुद्रमरुदश्विदिवाकरादिमूर्द्धन्यरत्नपरिघट्टितपादपीठः ।;नित्यं सुरैः सह नरैरथ वानरैश्च सम्पूज्यमानचरणो रमते रमेशः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = तस्याखिलेशितुरनाद्यनुगैव लक्ष्मीः सीताभिधा त्वरमयत् स्वरतं सुरेशम् ।;नित्यावियोगिपरमोच्चनिजस्वभावा सौन्दर्यविभ्रमसुलक्षणपूर्वभावा ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = रेमे तया स परमः स्वरतोऽपि नित्यं नित्योन्नतप्रमदभारभृतस्वभावः ।;पूर्णोडुराजसुविराजितसन्निशासु दीप्यन्नशोकवनिकासु सुपुष्पितासु ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = गायन्ति चैनमनुरक्तधियः सुकण्ठा गन्धर्वचारणगणाः सह चाप्सरोभिः ।;तं तुष्टुवुर्मुनिगणाः सहिताः सुरेशै राजान एनमनुयान्ति सदाऽप्रमत्ताः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = एवं त्रयोदशसहस्रमसौ समास्तु पृथ्वीं ररक्ष विजितारिरमोघवीर्यः ।;आनन्दमिन्दुरिव सन्दधदिन्दिरेशो लोकस्य सान्द्रसुखवारिधिरप्रमेयः ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = देव्यां स चाजनयदिन्द्रहुताशनौ द्वौ पुत्रौ यमौ कुशलवौ बलिनौ गुणाढ्यौ ।;शत्रुघ्नतो लवणमुद्बणबाणदग्धं कृत्वा चकार मधुरां पुरमुग्रवीर्यः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = कोटित्रयं स निजघान तथाऽसुराणां गन्धर्वजन्म भरतेन सतां च धर्मम् ।;संशिक्षयन्नयजदुत्तमकल्पकैः स्वं यज्ञैर्भवाजमुखसत्सचिवाश्च यत्र ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = अथ शूद्रतपश्चर्यानिहतं विप्रपुत्रकम् ।;उज्जीवयामास विभुर्हत्वा तं शूद्रतापसम् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = जङ्घनामाऽसुरः पूर्वं गिरिजावरदानतः ।;बभूव शूद्रः कल्पायुः स लोकक्षयकाम्यया ।;तपश्चचार दुर्बुद्धिरिच्छन् माहेश्वरं पदम् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = अनन्यवध्यं तं तस्माज्जघान पुरुषोत्तमः ।;श्वेतदत्तां तथा मालामगस्त्यादाप राघवः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = अनन्नयज्ञकृच्छ्वेतो राजा क्षुद्विनिवर्तनम् ।;कुर्वन् स्वमांसैर्धात्रोक्तो मालां रामार्थमर्पयत् ।;अगस्त्याय न साक्षात्तु रामे दद्यादयं नृपः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = क्षुदभावमात्रफलदं न साक्षाद् राघवेऽर्पितम् ।;क्षुदभावमात्रमाकाङ्क्षन् मामसौ परिपृच्छति ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = व्यवधानतस्ततो रामे दद्याच्छ्वेत इति प्रभुः ।;मत्वा ब्रह्माऽदिशन्मालां प्रदातुं कुम्भयोनये ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = तामगस्त्यकरपल्लवार्पितां भक्त एष मम कुम्भसम्भवः ।;इत्यवेत्य जगृहे जनार्दनस्तेन संस्तुत उपागमत् पुरम् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = अथ केचिदासुरसुराः सुराणका इत्युरुप्रथितपौरुषाः पुरा ।;ते तपः सुमहदास्थिता विभुं पद्मसम्भवमवेत्य (अवेक्ष्य) चोचिरे ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = भूरिपापकृतिनोऽपि निश्चयान्मुक्तिमाप्नुम उदारसद्गुण ।;इत्युदीरितमजोऽवधार्य तत् प्राह च प्रहसिताननः प्रभुः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = यावदेव रमया रमेश्वरं नो वियोजयथ सद्गुणार्णवम् ।;तावदुच्चमपि दुष्कृतं भवन्मोक्षमार्गपरिपन्थि नो भवेत् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = इत्युदीरितमवेत्य तेऽसुराः क्षिप्रमोक्षगमनोत्सुकाः क्षितौ ।;साधनोपचयकाङ्क्षिणो हरौ शासति क्षितिमशेषतोऽभवन् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = ताननादिकृतदोषसञ्चयैर्मोक्षमार्गगतियोग्यतोज्झितान् ।;मैथिलस्य तनया व्यचालयन्मायया स्वतनुवा स्वमार्गतः ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = आज्ञयैव हि हरेस्तु मायया मोहितास्तु दितिजा व्यनिन्दयन् ।;राघवो निशिचराहृतां पुनर्जानकीं जगृह इत्यनेकशः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मवाक्यमृतमेव कारयन् पातयंस्तमसि चान्ध आसुरान् ।;नित्यमेव सहितोऽपि सीतया सोऽज्ञसाक्षिकमभूद् वियुक्तवत् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = नान्यः कश्चित् तद्वराणां शापानामप्यतिक्रमी ।;अयोग्येषु तु रुद्रादिवाक्यं तौ कुरुतो मृषा ।;एकदेशेन सत्यं तु योग्येष्वपि कदाचन ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = न विष्णोर्वचनं क्वापि मृषा भवति कस्यचित् ।;एतदर्थोऽवतारश्च विष्णोर्भवति सर्वदा ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = प्रविश्य भूमौ सा देवी लोकदृष्ट्यनुसारतः ।;रेमे रामेणावियुक्ता भास्करेण प्रभा यथा ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = एवं रमालाळितपादपल्लवः पुनः स यज्ञैरयजत्स्वमेव ।;वराश्वमेधादिभिराप्तकामो रेमेऽभिरामो नृपतीन् विशिक्षयन् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = रामस्य दृश्या त्वन्येषामदृश्या जनकात्मजा ।;भूमिप्रवेशादूर्ध्वं सा रेमे सप्तशतं समाः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = एवं विधान्यगणितानि जनार्दनस्य रामावतारचरितानि तदन्यपुम्भिः ।;शक्यानि नैव मनसाऽपि हि तानि कर्तुं ब्रह्मेशशेषपुरुहूतमुखैः सुरैश्च ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = तस्यैवमब्जभवलोकसमामिमां क्ष्मां कृत्वाऽनुशासत उदीक्ष्य गुणान् धरायाः ।;वैशेष्यमात्मसदनस्य हि काङ्क्षमाणा वृन्दारकाः कमलजं प्रति तच्छशंसुः ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = आमन्त्र्य तैः सह विभुर्भगवत्प्रयाणं स्वीयाय सद्मन इयेष दिदेश चाशु ।;रुद्रं स्वलोकगमनाय रघूत्तमस्य सम्प्रार्थने स च समेत्य विभुं ययाचे ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = एकान्तमेत्य रघुपेण समस्तकालो रुद्रो जगाद वचनं जगतो विधातुः ।;वैशेष्यमात्मभवनस्य हि काङ्क्षमाणास्त्वामर्थयन्ति विबुधाः सहिता विधात्रा ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = पुत्रस्तवेश कमलप्रभवस्तथाऽहं पौत्रस्तु पौत्रकवचो यदपि ह्ययोग्यम् ।;सम्भावयन्ति गुणिनस्तदहं ययाचे गन्तुं स्वसद्म नतिपूर्वमितो भवन्तम् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = यत्कार्यसाधनकृते विबुधार्थितस्त्वं प्रादुश्चकर्थ निजरूपमशेषमेव ।;तत् साधितं हि भवता तदितः स्वधाम क्षिप्रं प्रयाहि हर्षं विबुधेषु कुर्वन् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = ओम् इत्युवाच भगवांस्तदशेषमेव श्रुत्वा रहस्यथ तनुस्त्वपरा हरस्य ।;दुर्वासनामयुगिहाऽगमदाशु राम मां भोजय क्षुधितमित्यसकृद् ब्रुवाणः ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = सिद्धं न देयमथ साध्यमपीति वाचं श्रुत्वाऽस्य वाक्समयजातमुरु स्वहस्तात् ।;अन्नं चतुर्गुणमदादमृतोपमानं रामस्तदाप्य बुभुजेऽथ मुनिः सुतुष्टः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = तृप्तो ययौ च सकलान् प्रति कोपयानः कश्चिन्न मेऽर्थितवरं प्रतिदातुमीशः ।;एवम्प्रतिज्ञक ऋषिः स हि तत्प्रतिज्ञां मोघां चकार भगवान् नतु कश्चिदन्यः ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = कुन्ती तु तस्य हि मुनेर्वरतोऽजयत् तु रामः स कृष्णतनुवा स्वबलाज्जिगाय ।;तस्मिञ्छिवे प्रतिगते मुनिरूपके च याहीति लक्ष्मणमुवाच रमापतिः सः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = एकान्ते तु यदा रामश्चक्रे रुद्रेण संविदम् ।;द्वारपालं स कृतवांस्तदा लक्ष्मणमेव सः ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = यद्यत्र प्रविशेत् कश्चिद्धन्मि त्वेति वचो ब्रुवन् ।;तदन्तराऽऽगतमृषिं दृष्ट्वाऽमन्यत लक्ष्मणः ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = दुर्वाससः प्रतिज्ञा तु रामं प्राप्यैव भज्यताम् ।;अन्यथा त्वयशो रामे करोत्येष मुनिर्ध्रुवम् ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = राघवो घ्नन्नपि तु मां करोत्येव दयां मयि ।;इति मत्वा ददौ मार्गं स तु दुर्वाससे तदा ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = स्वलोकगमनाकाङ्क्षी स्वयमेव तु राघवः ।;इयं प्रतिज्ञा हेतुः स्यादिति हन्मीति सोऽकरोत् ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = अत्यन्तबन्धुनिधनं त्याग एवेति चिन्तयन् ।;याहि स्वलोकमचिरादित्युवाच स लक्ष्मणम् ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तः स ययौ जगद्भवभयध्वान्तच्छिदं राघवं ध्यायन्नाप च तत्पदं दशशतैर्युक्तो मुखाम्भोरुहैः ।;आसिच्छेषमहाफणी मुसलभृद् दिव्याकृतिर्लाङ्गली पर्यङ्कत्वमवाप यो जलनिधौ विष्णोः शयानस्य च ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = अथ राघवः स्वभवनोपगतौ विदधे मतिं सह जनैरखिलैः ।;समघोषयच्च य इहेच्छति तत् पदमक्षयं सपदि मैत्वितिसः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा तु तद् य इह मोक्षपदेच्छवस्ते सर्वे समाययुरथाऽतृणमापिपीलम् ।;रामाज्ञया गमनशक्तिरभूत् तृणादेर्ये तत्र दीर्घभविनो नहि ते तदैच्छन् ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = संस्थापयामास कुशं स्वराज्ये तैः साकमेव च लवं युवराजमीशः ।;संस्थाप्य वालितनयं कपिराज्य आशु सूर्यात्मजोऽपि रघुवीरसमीपमायात् ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह वायुनन्दनं स राघवः समाश्लिषन् ।;तवाहमक्षगोचरः सदा भवामि नान्यथा ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = त्वया सदा महत् तपः सुकार्यमुत्तमोत्तमम् ।;तदेव मे महत् प्रियं चिरं तपस्त्वया कृतम् ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = दशास्यकुम्भकर्णकौ यथा सुशक्तिमानपि ।;जघन्थ न प्रियाय मे तथैव जीव कल्पकम् ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = पयोब्धिमध्यगं च मे सुसद्म चान्यदेव वा ।;यथेष्टतो गमिष्यसि स्वदेहसंयुतोऽपि सन् ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = यथेष्टभोगसंयुतः सुरेशगायकादिभिः ।;समीड्यमानसद्यशा रमस्व मत्पुरः सदा ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = तवेप्सितं न किञ्चन क्वचित् कदाचिदेव (कुतश्चिदेव) वा ।;मृषा भवेत् प्रियश्च मे पुनःपुनर्भविष्यसि ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = सदा प्रवर्द्धमानया तया रमेऽहमञ्जसा ।;समस्तजीवसञ्चयात् सदाऽधिका हि मेऽस्तु सा ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = नमो नमो नमो नमो नतोऽस्मि ते सदा पदम् ।;समस्तसद्गुणोच्छ्रितं नमामि ते पदं पुनः ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = स भूतिवत्सभूषणस्तनूदरे वलित्रयी ।;उदारमध्यभूषणोल्लसत्तडित्प्रभाम्बरः ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = करीन्द्रसत्करोरुयुक् सुवृत्तजानुमण्डलः ।;क्रमाल्पवृत्तजङ्घकः सुरक्तपादपल्लवः ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = लसद्धरिन्मणिद्युती रराज राघवोऽधिकम् ।;असङ्ख्यसत्सुखार्णवः समस्तशक्तिसत्तनुः ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं नेत्राब्जयुग्मान्मुखवरकमलात् सर्ववेदार्थसारान्स्तन्वा ब्रह्माण्डबाह्यान्तरमधिकरुचा भासयन् भासुरास्यः ।;सर्वाभीष्टाभये च स्वकरवरयुगेनार्थिनामादधानः प्रायाद् देवाधिदेवः स्वपदमभिमुखश्चोत्तराशां विशोकाम् ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = दघ्रे च्छत्रं हनूमान् स्रवदमृतमयं पूर्णचन्द्रायुताभं सीता सैवाखिलाक्ष्णां विषयमुपगता श्रीरिति ह्रीरथैका ।;द्वेधा भूत्वा दधार व्यजनमुभयतः पूर्णचन्द्रांशुगौरं प्रोद्यद्भास्वत्प्रभाभा सकलगुणतनुर्भूषिता भूषणैः स्वैः ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = साक्षाच्चक्रतनुस्तथैव भरतश्चक्रं दधद् दक्षिणेनाऽयात् सव्यत एव शङ्खवरभृच्छङ्खात्मकः शत्रुहा ।;अग्रे ब्रह्मपुरोगमाः सुरगणा वेदाश्च सोङ्कारकाः पश्चात् सर्वजगज्जगाम रघुपं यान्तं निजं धाम तम् ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = तस्य सूर्यसुतपूर्ववानरा दक्षिणेन मनुजास्तु सव्यतः ।;रामजन्मचरितानि तस्य ते कीर्तयन्त उचथैर्द्रुतं ययुः ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्वैर्गीयमानो विबुधमुनिगणैरब्जसम्भूतिपूर्वैर्वेदोदारार्थवाग्भिः प्रणिहितसुमनः सर्वदा स्तूयमानः ।;सर्वैर्भूतैश्च भक्त्या स्वनिमिषनयनैः कौतुकाद् वीक्ष्यमाणः प्रायाच्छेषगरुत्मदादिकनिजैः संसेवितः स्वं पदम् ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मरुद्रगरुडैः सशेषकैः प्रोच्यमानसुगुणोरुविस्तरः ।;आरुरोह विभुरम्बरं शनैस्ते च दिव्यवपुषोऽभवंस्तदा ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = अथ ब्रह्मा हरिं स्तुत्वा जगादेदं वचो विभुम् ।;त्वदाज्ञया मया दत्तं स्थानं दशरथस्य हि ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = मातॄणां चापि तल्लोकस्त्वयुताब्दादितोऽग्रतः ।;अनर्हायास्त्वयाऽऽज्ञप्ता कैकेय्या अपि सद्गतिः ।;सूत्वा तु भरतं नैषा गच्छेत निरयानिति ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽपि सा यदावेशाच्चकार त्वय्यशोभनम् ।;निकृतिर्नाम सा क्षिप्ता मया तमसि शाश्वते ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = कैकयी तु चलान् लोकान् प्राप्ता नैवाचलान् क्वचित् ।;पश्चाद् भक्तिमती यस्मात् त्वयि सा युक्तमेव तत् ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = मन्थरा तु तमस्यन्धे पातिता दुष्टचारिणी ।;सीतार्थं येऽप्यनिन्दंस्त्वां तेऽपि याता महत् तमः ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = प्रायशो राक्षसाश्चैव त्वयि कृष्णत्वमागते ।;शेषा यास्यन्ति तच्छेषा अष्टाविंशे कलौ युगे ।;गते चतुस्सहस्राब्दे तमोगास्त्रिशतोत्तरे ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = अथ ये त्वत्पदाम्भोजमकरन्दैकलिप्सवः ।;त्वया सहाऽगतास्तेषां विधेहि स्थानमुत्तमम् ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = अहं भवः सुरेशाद्याः किङ्कराः स्म तवेश्वर ।;यच्च कार्यमिहास्माभिस्तदप्याज्ञापयाऽशु नः ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = इत्युदीरितमाकर्ण्य शतानन्देन राघवः ।;जगाद भावगम्भीरं सुस्मिताधरपल्लवः ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = जगद्गुरुत्वमादिष्टं मया ते कमलोद्भव ।;गुर्वादेशानुसारेण मयाऽऽदिष्टा च सद्गतिः ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = अतस्त्वया प्रदेया हि लोका एषां मदाज्ञया ।;हृदि स्थितं च जानासि त्वमेवैकः सदा मम ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितो हरेर्भावविज्ञानी कञ्जसम्भवः ।;पिपीलिकातृणान्तानां ददौ लोकाननुत्तमान् ।;वैष्णवान् सन्ततत्वाच्च नाम्ना सान्तानिकान् विभुः ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = ते जरामृतिहीनाश्च सर्वदुःखविवर्जिताः ।;संसारमुक्ता न्यवसंस्तत्र नित्यसुखाधिकाः ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = ये तु देवा इहोद्भूता नृवानरशरीरिणः ।;ते सर्वे स्वांशितामापुस्तन्मैन्दविविदावृते ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = असुरावेशतस्तौ तु न राममनुजग्मतुः ।;पीतामृतौ पुरा यस्मान्मम्रतुर्नच तौ तदा ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = तयोश्च तपसा तुष्टश्चक्रे तावजरामरौ ।;पुरा स्वयम्भूस्तेनोभौ दर्पादमृतमन्थने ।;प्रसह्यापिबतां देवैर्देवांशत्वादुपेक्षितौ ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = पीतामृतेषु देवेषु युद्ध्यमानेषु दानवैः ।;तैर्दत्तमात्महस्ते ते रक्षायै पीतमाशु तत् ।;तस्माद् दोषादापतुस्तावासुरं भावमूर्जितम् ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = अङ्गदः कालतस्त्यक्त्वा देहमाप निजां तनुम् ।;रामाज्ञयैव कुर्वाणो राज्यं कुशसमन्वितः ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = विभीषणश्च धर्मात्मा राघवाज्ञापुरस्कृतः ।;सेनापतिर्धनेशस्य कल्पमावीत् स राक्षसान् ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = रामाज्ञया जाम्बवांश्च न्यवसत् पृथिवीतले(ळे) ।;उत्पत्त्यर्थं जाम्बवत्यास्तदर्थं सुतपश्चरन् ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = अथो रघूणां प्रवरः सुरार्चितः स्वयैकतन्वा न्यवसत् सुरालये ।;द्वितीयया ब्रह्मसदस्यधीश्वरस्तेनार्चितोऽथापरया निजालये ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = तृतीयरूपेण निजं पदं प्रभुं व्रजन्तमुच्चैरनुगम्य देवताः ।;अगम्यमर्यादमुपेत्य च क्रमाद् विलोकयन्तोऽतिविदूरतोऽस्तुवन् ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मा मरुन्मारुतसूनुरीशः शेषो गरुत्मान् हरिजः शक्रकाद्याः ।;क्रमादनुव्रज्य तु राघवस्य शिरस्यथाऽज्ञां प्रणिधाय निर्ययुः ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = स्वं स्वं च सर्वे सदनं सुरा ययुः पुरन्दराद्याश्च विरिञ्चपूर्वकाः ।;मरुत्सुतोऽथो बदरीमवाप्य नारायणस्यैव पदं सिषेवे ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = समस्तशास्त्रोद्भरितं हरेर्वचो मुदा तदा श्रोत्रपुटेन सम्भरन् ।;वदंश्च तत्त्वं विबुधर्षभाणां सदा मुनीनां च सुखं ह्युवास ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = रामाज्ञया किम्पुरुषेषु राज्यं चकार रूपेण तथाऽपरेण ।;रूपैस्तथाऽन्यैश्च समस्तसद्मन्युवास विष्णोः सततं यथेष्टम् ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं स गायञ्छतकोटिविस्तरं रामायणं भारतपञ्चरात्रम् ।;वेदांश्च सर्वान् सहितब्रह्मसूत्रान् व्याचक्षाणो नित्यसुखोद्भरोऽभूत् ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = रामोऽपि सार्द्धं पवमानात्मजेन ससीतया लक्ष्मणपूर्वकैश्च ।;तथा गरुत्मत्प्रमुखैश्च पार्षदैः संसेव्यमानो न्यवसत् पयोब्धौ ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = कदाचिदीशः सकलावतारानेकं विधायाहिपतौ च शेते ।;पृथक् च संव्यूह्य कदाचिदिच्छया रेमे रमेशोऽमितसद्गुणार्णवः ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = भीमसेनहतास्ते हि ज्ञायन्ते बहुवाक्यतः ।;विस्तारे भीमनिहताः सङ्क्षेपेऽर्जुनपातिताः ।;उच्यन्ते बहवश्चान्ये पुंव्यत्याससमाश्रयात् ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = विस्तारे कृष्णनिहता बलभद्रहता इति ।;उच्यन्ते च क्वचित् कालव्यत्यासोऽपि क्वचिद् भवेत् ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = यथा सुयोधनं भीमः प्राहसत् कृष्णसन्निधौ ।;इति वाक्येषु बहुषु ज्ञायते(ज्ञायन्ते) निर्णयादपि ।;अनिर्णये तु कृष्णस्य पूर्वमुक्ता गतिस्ततः ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = व्यत्यासास्त्वेवमाद्याश्च प्रातिलोम्यादयस्तथा ।;दृश्यन्ते भारताद्येषु लक्षणग्रन्थतश्च ते ।;ज्ञायन्ते बहुभिर्वाक्यैर्निर्णयग्रन्थतस्तथा ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् विनिर्णयग्रन्थानाश्रित्यैव च लक्षणम् ।;बहुवाक्यानुसारेण निर्णयोऽयं मया कृतः ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = उक्तं लक्षणशास्त्रे च कृष्णद्वैपायनोदिते ।;त्रिभाषा यो न जानाति रीतीनां शतमेव च ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = व्यत्यासादीन् सप्तभेदान् वेदाद्यर्थं तथा वदेत् ।;स याति निरयं घोरमन्यथाज्ञानसम्भवम् ।;इत्यन्येषु च शास्त्रेषु तत्र तत्रोदितं बहु ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = ‘व्यत्यासः प्रातिलोम्यं च गोमूत्री प्रघसस्तथा ।;उक्षणः सुधुरः साधु सप्त भेदाः प्रकीर्तिताः’ ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादिलक्षणान्यत्र नोच्यन्तेऽन्यप्रसङ्गतः ।;अनुसारेण तेषां तु निर्णयः क्रियते मया ।;तस्मान्निर्णयशास्त्रत्वाद् ग्राह्यमेतद् बुभूषुभिः ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिता रामकथा परा मया समस्तशास्त्रानुसृतेर्भवापहा ।;पठेदिमां यः शृणुयादथापि वा विमुक्तबन्धश्चरणं हरेर्व्रजेत् ॥ १३७॥ | |||
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<span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमोऽध्यायः"></span> | ||
== दशमोऽध्यायः == | == दशमोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = ओं ॥ द्वापरेऽथ युगे प्राप्ते त्वष्टाविंशतिमे पुनः ।;स्वयम्भुशर्वशक्राद्या दुग्धाब्धेस्तीरमाययुः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = पयोब्धेरुत्तरं तीरमासाद्य विबुधर्षभाः ।;तुष्टुवुः पुण्डरीकाक्षमक्षयं पुरुषोत्तमम् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = नमोनमोऽगण्यगुणैकधाम्ने समस्तविज्ञानमरीचिमालिने ।;अनाद्यविज्ञानतमोनिहन्त्रे परामृतानन्दपदप्रदायिने ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = स्वदत्तमालाभुविपातकोपतो दुर्वाससः शापत आशु हि श्रिया ।;शक्रे विहीने दितिजैः पराजिते पुरा वयं त्वां शरणं गता स्म ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = त्वदाज्ञया बलिना सन्दधाना वराद् गिरीशस्य परैरचाल्यम् ।;वृन्दारका मन्दरमेत्य बाहुभिर्न शेकुरुद्धर्तुमिमे समेताः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = तदा त्वया नित्यबलत्वहेतुतो योऽनन्तनामा गरुडस्तदंसके ।;उत्पाट्य चैकेन करेण मन्दरो निधापितस्तं स सह त्वयाऽवहत् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = पुनः परीक्षद्भिरसौ गिरिः सुरैः सहासुरैरुन्नमितस्तदंसतः ।;व्यचूर्णयत् तानखिलान् पुनश्च ते त्वदीक्षया पूर्ववदुत्थिताः प्रभो ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च वामेन करेण वीश्वरे निधाय तं स्कन्धगतस्त्वमस्य ।;अगाः पयोब्धिं सहितः सुरासुरैर्मथ्ना च तेनाब्धिमथाप्यमथ्नाः ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = कृतश्च कद्रो(द्र्वा)स्तनयोऽत्र वासुकिर्नेत्रं त्वया कश्यपजः स नागराट् ।;ममन्थुरब्धिं सहितास्त्वया सुराः सहासुरा दिव्यपयो घृताधिकम् ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = नैच्छन्त पुच्छं दितिजा अमङ्गलं(ळं) तदित्यथाग्रं जगृहुर्विषोल्बणम् ।;श्रान्ताश्च तेऽतो विबुधास्तु पुच्छं त्वया समेता जगृहुस्त्वदाश्रयाः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = अथातिभारादविशत् सुकाञ्चनो गिरिः स पाताल(ळ)मथ त्वमेव ।;तं कच्छपात्मा त्वभरः स्वपृष्ठे ह्यनन्यधार्यं पुरुलीलयैव ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = उपर्यधश्चाऽत्मनि नेत्रगोत्रयोस्त्वया परेणाऽविशता समेधिताः ।;ममन्थुरब्धिं तरसा मदोत्कटाः सुरासुराः क्षोभितनक्रचक्रम्(भाग. ८.७.१३) ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = श्रान्तेषु तेष्वेक उरुक्रम त्वं सुधारसाप्त्यै मुदितो ह्यमथ्नाः ।;तदा जगद्ग्रासि विषं समुत्थितं त्वदाज्ञया वायुरधात् करे निजे ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = कलेः स्वरूपं तदतीव दुष्षहं वराद् विधातुः सकलैश्च दुःस्पृशम् ।;करे विमथ्यास्तबलं विधाय ददौ स किञ्चिद् गिरिशाय वायुः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = स तत् पिबत्(पिबन्) कण्ठगतेन तेन निपातितो मूर्च्छित आशु रुद्रः ।;हरेः करस्पर्शबलात् स सञ्ज्ञामवाप नीलोऽस्य गल(ळ)स्तदाऽऽसीत् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = अथ त्वदाज्ञां पुरतो निधाय निधाय पात्रे तपनीयरूपे ।;स्वयं च निर्मथ्य बलोपपन्नं पपौ स वायुस्तदु चास्य जीर्णम् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = अत्यल्पपानाच्च बभूव शूला शिवस्य शीर्ष्ण्यस्य करावशिष्टम् ।;अभूत् कलिः सर्वजगत्सु पूर्णं पीत्वा विकारो न बभूव वायोः ।;कलेः शरीरादभवन् कुनागाः सवृश्चिकाः श्वापदयातुधानाः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = अथ त्वयाऽब्धौ तु विमथ्यमाने सुराऽभवत् तामसुरा अवापुः ।;उच्चैःश्रवा नाम तुरङ्गमोऽथ करी तथैरावतनामधेयः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = अन्ये च दिक्पालगजा बभूवुर्वरं तथैवाप्सरसां सहस्रम् ।;तथाऽऽयुधान्याभरणानि चैव दिवौकसां पारिजातस्तरुश्च ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = तथैव साक्षात् सुरभिर्निशेशो बभूव तत् कौस्तुभं लोकसारम् ।;अथेन्दिरा यद्यपि नित्यदेहा बभूव तत्रापरया स्वतन्वा ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = ततो भवान् दक्षिणबाहुना सुधाकमण्डलुं कलशं चापरेण ।;प्रगृह्य तस्मान्निरगात् समुद्राद् धन्वन्तरिर्नाम हरिन्मणिद्युतिः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = ततो भवद्धस्तगतं दितेः सुताः सुधाभरं कलशं चापजह्रुः ।;मुक्तं त्वया शक्तिमताऽपि दैत्यान् सत्यच्युतान् कारयितुं वधाय ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = ततो भवाननुपममुत्तमं वपुर्बभूव दिव्यप्रमदात्मकं त्वरन् ।;श्यामं नितम्बार्पितरत्नमेखलं जाम्बूनदाभाम्बरभृत् सुमध्यमम् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = बृहन्नितम्बं कलशोपमस्तनं सत्पुण्डरीकायतनेत्रमुज्ज्वलम् ।;समस्तसारं परिपूर्णसद्गुणं दृष्ट्वैव तत् सम्मुमुहुः सुरारयः ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = परस्परं तेऽमृतहेतुतोऽखिला विरुद्ध्यमानाः प्रददुः स्म ते करे ।;समं सुधायाः कलशं विभज्य निपाययास्मानिति वञ्चितास्त्वया ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = धर्मच्छलं पापजनेषु धर्म इति त्वया ज्ञापयितुं तदोक्तम् ।;यद्यत् कृतं मे भवतां यदीह संवाद एवोद्विभजे सुधामिमाम् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = यथेष्टतोऽहं विभजामि सर्वथा न विश्वसध्वं(अविश्वसध्वं) मयि केनचित् क्वचित् ।;इति प्रहस्याभिहितं निशम्य स्त्रीभावमुग्धास्तु तथेति तेऽवदन् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = ततश्च संस्थाप्य पृथक् सुरासुरांस्तवातिरूपोच्चलितान् सुरेतरान् ।;सर्वान् भवद्दर्शिन ईक्ष्य लज्जिताऽस्म्यहं दृशो मीलयतेत्यवोचः ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = निमीलिताक्षेष्वसुरेषु देवता न्यपाययः साध्वमृतं ततः पुमान् ।;क्षणेन भूत्वा पिबतः सुधां शिरो राहोर्न्यकृन्तश्च सुदर्शनेन ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = तेनामृतार्थं हि सहस्रजन्मसु प्रतप्य भूयस्तप आरितो वरः ।;स्वयम्भुवस्तेन भवान् करेऽस्य बिन्दुं सुधां प्रास्य शिरो जहार ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = शिरस्तु तस्य ग्रहतामवाप सुरैः समाविष्टमथो सबाहुः ।;क्षिप्तः कबन्धोऽस्य शुभोदसागरे त्वया स्थितोऽद्यापि हि तत्र सामृतः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = अथासुराः प्रत्यपतन्नुदायुधाः समस्तशस्ते च हतास्त्वया रणे ।;कलिस्तु स ब्रह्मवरादजेयो ऋते भवन्तं पुरुषेषु संस्थितः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_text = तस्यार्द्धदेहात् समभूदलक्ष्मीस्तत्पुत्रका दोषगणाश्च सर्वशः । | |||
| verse_lines = तस्यार्द्धदेहात् समभूदलक्ष्मीस्तत्पुत्रका दोषगणाश्च सर्वशः ।;अथेन्दिरा वक्षसि ते समास्थिता त्वत्कण्ठगं कौस्तुभमास धाता ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = यथाविभागं च सुरेषु दत्तास्त्वया तथाऽन्येऽपि हि तत्र जाताः ।;इत्थं त्वया साध्वमृतं सुरेषु दत्तं हि मोक्षस्य निदर्शनाय ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = भवेद्धि मोक्षो नियतं सुराणां नैवासुराणां स कथञ्चन स्यात् ।;उत्साहयुक्तस्य च तत् प्रतीपं भवेद्धि राहोरिव दुःखरूपम् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = कलिस्त्वयं ब्रह्मवरादिदानीं विबाधतेऽस्मान् सकलान् प्रजाश्च ।;अज्ञानमिथ्यामतिरूपतोऽसौ प्रविश्य सज्ज्ञानविरुद्धरूपः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = त्वदाज्ञया तस्य वरोऽब्जजेन दत्तः स आविश्य शिवं चकार ।;कदागमांस्तस्य कुयुक्तिबाधाम् नहि त्वदन्यश्चरितुं(चलितुं) समर्थः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = वेदाश्च सर्वे सहशास्त्रसङ्घा उत्सादितास्तेन न सन्ति तेऽद्य ।;तत् साधु भूमाववतीर्य वेदानुद्धृत्य शास्त्राणि कुरुष्व सम्यक् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = अदृश्यमज्ञेयमतर्क्यरूपं कलिं निलीनं हृदयेऽखिलस्य ।;सच्छास्त्रशस्त्रेण निहत्य शीघ्रं पदं निजं देहि महाजनस्य ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = ऋते भवन्तं नहि तं निहन्ता(तन्निहन्ता) त्वमेक एवाखिलशक्तिपूर्णः ।;ततो भवन्तं शरणं गता वयं तमोनिहत्यै निजबोधविग्रहम् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितस्तैरभयं प्रदाय सुरेश्वराणां परमोऽप्रमेयः ।;प्रादुर्बभूवामृतभूरिला(ळा)यां विशुद्धविज्ञानघनस्वरूपः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = वसिष्ठनामा कमलोद्भवात्मजः सुतोऽस्य शक्तिस्तनयः पराशरः ।;तस्योत्तमं सोऽपि तपोऽचरद्धरिः सुतो मम स्यादिति तद्धरिर्ददौ ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = उवाच चैनं भगवान् सुतोषितो वसोर्मदीयस्य सुताऽस्ति शोभना ।;वने मृगार्थं चरतोऽस्य वीर्यं पपात भार्यां मनसा गतस्य ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = तच्छ्येनहस्ते प्रददौ स तस्यै दातुं तदन्येन तु युद्ध्यतोऽपतत् ।;जग्रास तन्मत्स्यवधूर्यमस्वसुर्जलस्थमेनां जगृहुस्म (श्च) दाशाः ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = तद्गर्भतोऽभून्मिथुनं स्वराज्ञे न्यवेदयन् सोऽपि वसोः समर्पयत् ।;पुत्रं समादाय सुतां स तस्मै ददौ सुतोऽभूदथ मत्स्यराजः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = कन्या तु सा दाशराजस्य सद्मन्यवर्द्धतातीव सुरूपयुक्ता ।;नाम्ना च सा सत्यवतीति तस्यां तवाऽत्मजोऽहं भविताऽस्म्यजोऽपि ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितश्चक्रधरेण तां मुनिर्जगाम मार्ताण्डसुतां समुद्रगाम् ।;उत्तारयन्तीमथ तत्र विष्णुः प्रादुर्बभूवाऽशु विशुद्धचिद्घनः ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = विदोषविज्ञानसुखैकरूपोऽप्यजो जनान् मोहयितुं मृषैव ।;योषित्सु पुंसो ह्यजनीव दृश्यते न जायते क्वापि बलादिविग्रहः ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = यथा नृसिंहाकृतिराविरासीत् स्तम्भात् तथा नित्यतनुत्वतो विभुः ।;आविर्भवेद् योषिति नो मलोत्थस्तथाऽपि मोहाय निदर्शयेत् तथा ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रीपुम्प्रसङ्गात् परतो यतो हरिः प्रादुर्भवत्येष विमोहयन् जनम् ।;अतो मलोत्थोऽयमिति स्म मन्यते जनोऽशुभः पूर्णगुणैकविग्रहम् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = द्वीपे भगिन्याः स(तु/च) यमस्य विश्वकृत् प्रकाशते ज्ञानमरीचिमण्डलः ।;प्रभासयन्नण्डबहिस्तथाऽन्तः सहस्रलक्षामितसूर्य(भानु)दीधितिः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = अगण्यदिव्योरुगुणार्णवः प्रभुः समस्तविद्याधिपतिर्जगद्गुरुः ।;अनन्तशक्तिर्जगदीश्वरः समस्तदोषातिविदूरविग्रहः ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = शुभमरतकवर्णो रक्तपादाब्जनेत्राधरकरनखरसनाग्रश्चक्रशङ्खाब्जरेखः ।;रविकरवरगौरं चर्म चैणं वसानस्तटिदमलजटासन्दीप्तजूटं दधानः ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = विस्तीर्णवक्षाः कमलायताक्षो बृहद्भुजः कम्बुसमानकण्ठः ।;समस्तवेदान् मुखतः समुद्गिरन्ननन्तचन्द्राधिककान्तसन्मुखः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = प्रबोधमुद्राभयदोर्द्वयान्वि(ङ्कि)तो यज्ञोपवीताजिनमेखलोल्लसन् ।;दृशा महाज्ञानभुजङ्गदष्टमुज्जीवयानो जगदत्यरोचत ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = स लोकधर्माभिरिरक्षया पितुर्द्विजत्वमाप्याऽशु पितुर्ददौ निजम् ।;ज्ञानं तयोः संस्मृतिमात्रतः सदा प्रत्यक्षभावं परमात्मनो ददौ ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = द्वैपायनः सोऽथ जगाम मेरुं चतुर्मुखाद्यैरनुगम्यमानः ।;उद्धृत्य वेदानखिलान् सुरेभ्यो ददौ मुनिभ्यश्च यथाऽऽदिसृष्टौ ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = सर्वाणि शास्त्राणि तथैव कृत्वा विनिर्णयं ब्रह्मसूत्रं चकार ।;तच्छुश्रुवुर्ब्रह्मगिरीशमुख्याः सुरा मुनीनां प्रवराश्च तस्मात् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = समस्तशास्त्रार्थनिदर्शनात्मकं चक्रे महाभारतनामधेयम् ।;वेदोत्तमं तच्च विधातृशङ्करप्रधानकैस्तन्मुखतः सुरैः श्रुतम् ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = अथो गिरीशादिमनोनुशायी कलिर्ममाराऽशु सुवाङ्मयैः शरैः ।;निकृत्तशीर्षो भगवन्मुखेरितैः सुराश्च सज्ज्ञानसुधारसं पपुः ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = अथो मनुष्येषु तथाऽसुरेषु रूपान्तरैः कलिरेवावशिष्टः ।;ततो मनुष्येषु च सत्सु संस्थितो विनाश्य इत्येव(ष) हरिर्व्यचिन्तयत् ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = ततो नृणां कालबलात् सुमन्दमायुर्मतिं कर्म च वीक्ष्य कृष्णः ।;विव्यास वेदान् स विभुश्चतुर्धा चक्रे तथा भागवतं पुराणम् ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = येये च सन्तस्तमसाऽनुविष्टास्तांस्तान् सुवाक्यैस्तमसो विमुञ्चन् ।;चचार लोकान् स पथि प्रयान्तं कीटं व्यपश्यत् तमुवाच कृष्णः ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = भवस्व राजा कुशरीरमेतत् त्यक्त्वेति नैच्छत् तदसौ ततस्तम् ।;अत्यक्तदेहं नृपतिं चकार पुरा स्वभक्तं वृषलं सुलुब्धम् ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = लोभात् स कीटत्वमुपेत्य कृष्णप्रसादतश्चाऽशु बभूव राजा ।;तदैव तं सर्वनृपाः प्रणेमुर्ददुः करं चास्य यथैव वैश्याः ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = उवाच तं भगवान् मुक्तिमस्मिंस्तव क्षणे दातुमहं समर्थः ।;तथाऽपि सीमार्थमवाप्य विप्रतनुं विमुक्तो भव मत्प्रसादात् ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं च तस्मै विमलं ददौ स महीं च सर्वां बुभुजे तदन्ते ।;त्यक्त्वा तनुं विप्रवरत्वमेत्य पदं हरेश्चाप सुतत्त्ववेदी ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = एवं बहून् संसृतिबन्धतः स व्यमोचयद् व्यासतनुर्जनार्दनः ।;बहून्यचिन्त्यानि च तस्य कर्माण्यशेषदेवेशसदोदितानि ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = अथास्य पुत्रत्वमवाप्तुमिच्छंश्चचार रुद्रः सुतपस्तदीयम् ।;ददौ च तस्मै भगवान् वरं तं स्वयं च तप्त्वेव तपो विमोहयन् ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = विमोहनायासुरसर्गिणां प्रभुः स्वयं करोतीव तपः प्रदर्शयेत् ।;कामादिदोषांश्च मृषैव दर्शयेन्न(दर्शयन्) तावता तस्य हि सन्ति कुत्रचित् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = ततस्त्वरण्योस्स बभूव पुत्रकः शिवोऽस्य सोऽभूच्छुकनामधेयः ।;शुकी हि भूत्वाऽह्यगमद् घृताची व्यासं विमथ्नन्तमुतारणीं तम् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = अकामयन् कामुकवत् स भूत्वा तयाऽर्थितस्तं शुकनामधेयम् ।;चक्रे ह्यरण्योस्तनयं च सृष्ट्वा विमोहयंस्तत्त्वमार्गेष्वयोग्यान् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = शेषोऽथ पैलं मुनिमाविशत् तदा वीशः सुमन्तुमपि वारुणिं(वारुणं) मुनिम् ।;ब्रह्माऽविशत् तमुत वैशम्पायनं शक्रश्च जैमिनिमथाऽविशद् विभुः ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णस्य पादपरिसेवनोत्सुकाः सुरेश्वरा विविशुराशु तान् मुनीन् ।;समस्तविद्याः प्रतिपाद्य तेष्वसौ प्रवर्तकांस्तान् विदधे हरिः पुनः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = ऋचां प्रवर्तकं पैलं यजुषां च प्रवर्तकम् ।;वैशम्पायनमेवैकं द्वितीयं सूर्यमेव च ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = चक्रेऽथ जैमिनिं साम्नामथर्वाङ्गिरसामपि ।;सुमन्तुं भारतस्यापि वैशम्पायनमादिशत् ।;प्रवर्तने मानुषेषु गन्धर्वादिषु चाऽत्मजम् ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = नारदं पाठयित्वा च देवलोकप्रवृत्तये ।;आदिशत् ससृजे सोऽथ रोमाञ्चाद् रोमहर्षणम् ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = तं भारतपुराणानां महारामायणस्य च ।;पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य प्रवृत्त्यर्थमथाऽदिशत् ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = तमाविशत् कामदेवः कृष्णसेवासमुत्सुकः ।;स तस्मै ज्ञानमखिलं ददौ द्वैपायनः प्रभुः ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = सनत्कुमारप्रमुखांश्चक्रे योगप्रवर्तकान् ।;भृग्वादीन् कर्मयोगस्य ज्ञानं दत्वाऽमलं शुभम् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = जैमिनिं कर्ममीमांसाकर्तारमकरोत् प्रभुः ।;देवमीमांसि(स)काद्यन्तं कृत्वा पैलमथाऽदिशत् ।;शेषं च मध्यकरणे पुराणान्यथ चाकरोत् ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = शैवान् (पाशुपतान्) पाशुपताच्चक्रे संशयार्थं सुरद्विषाम् ।;वैष्णवान् पञ्चरात्राच्च यथार्थज्ञानसिद्धये ।;ब्राह्मांश्च वेदतश्चक्रे पुराणग्रन्थसङ्ग्रहान् ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = एवं ज्ञानं पुनः प्रापुर्देवाश्च ऋषयस्तथा ।;सनत्कुमारप्रमुखा योगिनो मानुषास्तथा ।;कृष्णद्वैपायनात् प्राप्य ज्ञानं ते मुमुदुः सदा ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = समस्तविज्ञानगभस्तिचक्रं विताय विज्ञानमहादिवाकरः ।;निरस्य(निपीय) चाज्ञानतमो जगत्ततं प्रभासते भानुरिवावभासयन् ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = चतुर्मुखेशानसुरेन्द्रपूर्वकैः सदा सुरैः सेवितपादपल्लवः ।;प्रकाशयंस्तेषु सदाऽऽत्मगुह्यं मुमोद मेरौ च तथा बदर्याम् ॥ ८६॥ | |||
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<span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशोऽध्यायः"></span> | ||
== एकादशोऽध्यायः == | == एकादशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ शशाङ्कपुत्रादभवत् पुरूरवास्तस्याऽयुरायोर्नहुषो ययातिः ।;तस्याऽस पत्नीयुगलं सुताश्च पञ्चाऽभवन् विष्णुपदैकभक्ताः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।;द्रुह्यं चाऽनुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥।;२॥ | |||
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| verse_lines = यदोर्वंशे चक्रवर्ती कार्तवीर्यार्जुनोऽभवत् ।;विष्णोर्दत्तात्रेयनाम्नः प्रसादाद् योगवीर्यवान् ।;तस्यान्ववाये यदवो बभूवुर्विष्णुसंश्रयाः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = पूरोर्वंशे तु भरतश्चक्रवर्ती हरिप्रियः ।;तद्वंशजः कुरुर्नाम प्रतीपोऽभूत् तदन्वये ॥।;४॥ | |||
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| verse_lines = प्रतीपस्याभवन् पुत्रास्त्रयस्त्रेताग्निवर्चसः ।;देवापिरथ बाह्लीको गुणज्येष्ठश्च शन्तनुः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = त्वग्दोषयुक्तो देवापिर्जगाम तपसे वनम् ।;‘विष्णोः प्रसादात् स कृते युगे राजा भविष्यति’ ॥ ६॥ (भा\.पु\. १२\.२\.३७) | |||
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| verse_lines = पुत्रिकापुत्रतां यातो बाह्लीको राजसत्तमः ।;हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लादो भगवत्प्रियः (भगवत्परः) ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = वायुना च समाविष्टो महाबलसमन्वितः ।;येनैव जायमानेन तरसा भूर्विदारिता ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = भूभारक्षपणे विष्णोरङ्गतामाप्तुमेव सः ।;प्रतीपपुत्रतामाप्य बाह्लीकेष्वभवत् पतिः ।;रुद्रेषु पत्रतापाख्यः सोमदत्तोऽस्य चाऽत्मजः ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = अजैकपादहिर्बुध्निर्विरूपाक्ष इति त्रयः ।;रुद्राणां सोमदत्तस्य बभूवुः प्रथिताः सुताः ।;विष्णोरेवाङ्गतामाप्तुं भूरिभूरिश्रवाः (भूरिर्भूरिश्रवाः) शलः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = शिवादिसर्वरुद्राणामावेशाद् वरतस्तथा ।;भूरिश्रवा अतिबलस्तत्राऽसीत् परमास्त्रवित् ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = तदर्थं हि तपश्चीर्णं सोमदत्तेन शम्भवे ।;दत्तो वरश्च तेनास्य त्वत्प्रतीपाभिभूतिकृत् ।;बलवीर्यगुणोपेतो नाम्ना भूरिश्रवाः सुतः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = भविष्यति मयाऽऽविष्टो यज्ञशील इति स्म ह ।;तेन भूरिश्रवा जातः सोमदत्तसुतो बली ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वोदधेस्तीरगतेऽब्जसम्भवे गङ्गायुतः पर्वणि घूर्णितोऽब्धिः ।;अवाक्षिपत् तस्य तनौ निजोदबिन्दुं शशापैनमथाब्जयोनिः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = महाभिषङ् नाम नरेश्वरस्त्वं भूत्वा पुनः शन्तनुनामधेयः ।;जनिष्यसे विष्णुपदी तथैषा तत्रापि भार्या भवतो भविष्यति ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = शान्तो भवत्येव मयोदितस्त्वं तनुत्वमाप्तोऽसि(आप्नोषि) ततश्च शन्तनुः ।;इतीरितः सोऽथ नृपो बभूव महाभिषङ् नाम हरेःपदाश्रयः ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = स तत्र भुक्त्वा चिरकालमुर्वीं तनुं विहायाऽप सदो विधातुः ।;तत्रापि तिष्ठन् सुरवृन्दसन्निधौ ददर्श गङ्गां श्लथिताम्बरां स्वकाम् ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = अवाङ्मुखेषु द्युसदस्सु रागान्निरीक्षमाणं पुनरात्मसम्भवः ।;उवाच भूमौ नृपतिर्भवाऽशु शप्तो यथा त्वं हि पुरा मयैव ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितस्तत्क्षणतः प्रतीपाद् बभूव नाम्ना नृपतिश्च (नृपतिः) स शन्तनुः ।;अवाप्य गङ्गां दयितां स्वकीयां तया मुमोदाब्दगणान् बहूंश्च ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = अथाष्टमो वसुरासीद् द्युनामा वराङ्गिनाम्न्यस्य बभूव भार्या ।;बभूव तस्याश्च सखी नृपस्य सुविन्दनाम्नो दयिता सनाम्नी ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = तस्या जरामृतिविध्वंसहेतोर्वसिष्ठधेनुं स्वमृतं क्षरन्तीम् ।;जरापहां नन्दिनिनामधेयां बद्धुं पतिं चोदयामास देवी ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = तया द्युनामा स वसुः प्रचोदितो भ्रातृस्नेहात् सप्तभिरन्वितोऽपरैः ।;बबन्ध तां गामथ ताञ्छशाप वसिष्ठसंस्थः कमलोद्भवः प्रभुः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = अधर्मवृत्ताः प्रतियात मानुषीं योनिं द्रुतं यत्कृते सर्व एव ।;धर्माच्च्युताः स तथाऽष्टायुराप्यतामन्ये पुनः क्षिप्रमतो विमोक्ष्यथ ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = प्रचोदयामास च या कुमार्गे पतिं हि साऽम्बेति नरेषु जाता ।;अभर्तृका पुंस्त्वसमाश्रयेण पत्युर्मृतौ कारणत्वं व्रजेत ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = भवत्वसौ ब्रह्मचर्यैकनिष्ठो महान् विरोधश्च तयोर्भवेत ।;स गर्भवासाष्टकदुःखमेव समाप्नुतां शरतल्पे शयानः ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = मृत्यष्टकोत्थामपि वेदनां सः प्राप्नोतु शस्त्रैर्बहुधा निकृत्तः ।;इतीरितास्ते कमलोद्भवं तं ज्ञात्वा समुत्सृज्य च गां प्रणेमुः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = न मानुषं (मानुषीं) गर्भमवाप्नुमो वयं भवत्वयं सर्ववित् कीर्तिमांश्च ।;महास्त्रवेत्ता भवदंशयुक्तस्तथा बलं नोऽखिलानामुपैतु ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितेऽस्त्वित्युदिताः स्वयम्भुवा वसिष्ठसंस्थेन सुरापगां ययुः ।;ऊचुस्तथैनामुदरे वयं ते जायेमहि क्षिप्रमस्मान् हन त्वम् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिता सा वरमाशु वव्रे तेभ्योऽप्यपापत्वमथ प्रयत्वम् ।;तेषां सदैवाऽत्मन एकमेषां दीर्घायुषं | |||
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== द्वादशोऽध्यायः == | == द्वादशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ बभूव गन्धर्वमुनिस्तु देवकः स आस सेवार्थमथाऽहुकाद्धरेः ।;स उग्रसेनावरजस्तथैव नामास्य तस्मादजनि स्म देवकी ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = अन्याश्च याः काश्यपस्यैव भार्या ज्येष्ठां तु तामाहुक आत्मपुत्रीम् ।;चकार तस्माद्धि पितृष्वसा सा स्वसा च कंसस्य बभूव देवकी ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = सैवादितिर्वसुदेवस्य दत्ता तस्या रथं माङ्गलं (मङ्गलं) कंस एव ।;संयापयामास तदा हि वायुर्जगाद वाक्यं गगनस्थितोऽमुम् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = (विनाऽपराधं न) विनापराधाद्धि ततो गरीयसो न मातुलो वध्यतामेति विष्णोः ।;लोकस्य धर्माननुवर्ततोऽतः पित्रोर्विरोधार्थमुवाच वायुः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = मृत्युस्तवास्या भविताऽष्टमः सुतो मूढेति चोक्तो जगृहे कृपाणाम् ।;पुत्रान् समर्प्यास्य च शूरसूनुर्विमोच्य तां तत्सहितो गृहं ययौ ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = षट् कन्यकाश्चावरजा गृहीतास्तेनैव ताभिश्च मुमोद शूरजः ।;बाह्लीकपुत्री च पुरा गृहीता पुराऽस्य भार्या सुरभिस्तु रोहिणी ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = राज्ञश्च काशिप्रभवस्य कन्यां स पुत्रिकापुत्रकधर्मतोऽवहत् ।;कन्यां तथा करवीरेश्वरस्य धर्मेण तेनैव दितिं दनुं पुरा ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = यो मन्यते विष्णुरेवाहमित्यसौ पापो वेनः पौण्ड्रको वासुदेवः ।;जातः पुनः शूरजात् काशिजायां नान्यो मत्तो विष्णुरस्तीति वादी ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = धुन्धुर्हतो यो हरिणा मधोः सुत आसीत् सुतायां करवीरेश्वरस्य ।;सृगालनामा वासुदेवोऽथ देवकीमुदूह्य शौरिर्न ययावुभे ते ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु तौ वृष्णिशत्रू बभूवतुर्ज्येष्ठौ सुतौ शूरसुतस्य नित्यम् ।;अन्यासु च प्राप सुतानुदारान् देवावतारान् वसुदेवोऽखिलज्ञः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = येये हि देवाः पृथिवीं गतास्ते सर्वे शिष्याः सत्यवतीसुतस्य ।;विष्णुज्ञानं (विष्णोः ज्ञानम्) प्राप्य सर्वेऽखिलज्ञास्तस्माद् यथायोग्यतया बभूवुः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = मरीचिजाः षण् मुनयो बभूवुस्ते देवलं प्राहसन् कार्श्यहेतोः ।;तच्छापतः कालनेमिप्रसूता अवध्यतार्थं तप एव चक्रुः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = धाता प्रादाद् वरमेषां तथैव शशाप तान् क्ष्मातले सम्भवध्वम् ।;तत्र स्वतातो भवतां निहन्तेत्यात्मान्यतो वरलिप्सून् हिरण्यः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = दुर्गा तदा तान् भगवत्प्रचोदिता प्रस्वापयित्वा प्रचकर्ष कायात् ।;क्रमात् समावेशयदाशु देवकीगर्भाशये तान् न्यहनच्च कंसः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = तदा मुनीन्द्रसंयुतः सदो विधातुरुत्तमम् ।;स पाण्डुराप्तुमैच्छत न्यवारयंश्च ते तदा ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = यधर्थमेव जायते पुमान् हि तस्य सोऽकृतेः ।;शुभां गतिं नतु व्रजेद् ध्रुवम् ततो न्यवारयन् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = प्रधानदेवताजनौ (प्रधानदेवताजने) नियोक्तुमात्मनः प्रियाम् ।;बभूव पाण्डुरेष तद् विना न तस्य सद्गतिः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = अतोऽन्यथा सुतानृते व्रजन्ति सद्गतिं नराः ।;यथैव धर्मभूषणो जगाम सन्ध्यकासुतः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = तदा कलिश्च राक्षसा बभूवुरिन्द्रजिन्मुखाः ।;विचित्रवीर्यनन्दनप्रियोदरे हि गर्भगाः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = तदस्य(तदास्य) सोऽनुजोऽशृणोन्मुनीन्द्रदूषितं च तत् ।;विचार्य तु प्रियामिदं जगाद वासुदेवधीः ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = य एव मद्गुणाधिकस्ततः सुतं समाप्नुहि ।;सुतं विना न नो गतिं शुभां वदन्ति साधवः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = तदस्य कृच्छ्रतो वचः पृथाऽग्रहीज्जगाद च ।;ममास्ति देववश्यदो मनूत्तमः सुताप्तिदः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = न ते सुरानृते समः सुरेषु केचिदेव च ।;अतस्तवाधिकं सुरं कमाह्वये त्वदाज्ञया ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = वरं समाश्रिता पतिं व्रजेत या ततोऽधमम् ।;न काचिदस्ति निष्कृतिर्न भर्तृलोकमृच्छति ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = कृते पुरा सुरास्तथा सुराङ्गनाश्च केवलम् ।;निमित्ततोऽपि ताः क्वचिन्न तान् विहाय रेमिरे ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = मनोवचःशरीरतो यतो हि ताः पतिव्रताः ।;अनादिकालतोऽभवंस्ततः सभर्तृकाः सदा ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = स्वभर्तृभिर्विमुक्तिगाः सहैव ता भवन्ति हि ।;कृतान्तमाप्य चाप्सरःस्त्रियो बभूवुरूर्जिताः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = अनावृताश्च तास्तथा यथेष्टभर्तृकाः सदा ।;अतस्तु ता न भर्तृभिर्विमुक्तिमापुरुत्तमाम् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = सुरस्त्रियोऽतिकारणैर्यदऽन्यथा स्थितास्तदा ।;दुरन्वयात् सुदुःसहा विपत् ततो भविष्यति ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = अयुक्तमुक्तवांस्ततो भवांस्तथाऽपि ते वचः ।;अलङ्घ्यमेव मे (मतो) ततो वदस्व पुत्रदं सुरम् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितोऽब्रवीन्नृपो न धर्मतो विना भुवः ।;नृपोऽभिरक्षिता भवेत् तदाह्वयाऽशु तं विभुम् ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = स धर्मजः सुधार्मिको भवेद्धि सूनुरुत्तमः ।;इतीरिते तया यमः समाहुतोऽगमद् द्रुतम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = ततश्च सद्य एव सा सुषाव पुत्रमुत्तमम् ।;युधिष्ठिरं यमो हि स प्रपेद आत्मपुत्रताम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = यमे सुते तु कुन्तितः प्रजात एव सौबली ।;अदह्यतेर्ष्यया चिरं बभञ्ज गर्भमेव च ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = स्वगर्भपातने कृते तया जगाम केशवः ।;पराशरात्मजो न्यधाद् घटेषु तान् विभागशः ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = शतात्मना विभेदिताः शतं सुयोधनादयः ।;बभूवुरन्वहं ततः शतोत्तरा च दुःशला ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = स देवकार्यसिद्धये ररक्ष गर्भमीश्वरः ।;पराशरात्मजो विभु (प्रभु)र्विचित्रवीर्यजोद्भवम् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरे जात उवाच पाण्डुर्बाह्वोर्बलाज्ज्ञानबलाच्च धर्मः ।;रक्ष्योऽन्यथा नाशमुपैति तस्माद् बलद्वयाढ्यं (जनय)प्रसुवाऽशु पुत्रम् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = यज्ञाधिको ह्यश्वमेधो मनुष्यदृश्येषु तेजस्स्वधिको हि भास्करः ।;वर्णेषु विप्रः सकलैर्गुणैर्वरो देवेषु वायुः पुरुषोत्तमादृते ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = विशेषतोऽप्येष पितैव मे प्रभुर्व्यासात्मना विष्णुरनन्तपौरुषः ।;अतश्च ते श्वशुरो नैव योग्यो दातुं पुत्रं वायुमुपैहि तं प्रभुम् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते पृथयाऽऽहूतवायुसंस्पर्शमात्रादभवद् बलद्वये ।;समो जगत्यस्ति न यस्य कश्चिद् भक्तौ च विष्णोर्भगवद्वशः सुतः ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = स वायुरेवाभवदत्र भीमनामा भृता माः सकला हि यस्मिन् ।;स विष्णुनेशेन युतः सदैव नाम्ना सेनो भीमसेनस्ततोऽसौ ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = तज्जन्ममात्रेण धरा विदारिता शार्दूलभीताज्जननीकराद् यदा ।;पपात सञ्चूर्णित एव पर्वतस्तेनाखिलोऽसौ शतशृङ्गनामा ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् प्रजाते रुधिरं प्रसुस्रुवुर्महासुरा वाहनसैन्यसंयुताः ।;नृपाश्च तत्पक्षभवाः समस्तास्तदा भीता असुरा राक्षसाश्च ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = अवर्द्धतात्रैव वृकोदरो वने मुदं सुराणामभितः प्रवर्द्धयन् ।;तदैव शेषो हरिणोदितोऽविशद् गर्भं सुताया अपि देवकस्य ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = स तत्र मासत्रयमुष्य दुर्गयाऽपवाहितो रोहिणीगर्भमाशु ।;नियुक्तया केशवेनाथ तत्र स्थित्वा मासान् सप्त जातः पृथिव्याम् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = स नामतो बलदेवो बलाढ्यो बभूव तस्यानु जनार्दनः प्रभुः ।;आविर्बभूवाखिलसद्गुणैकपूर्णः(जातः) सुतायामिह देवकस्य ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = यः सत्सुखज्ञानबलैकदेहः समस्तदोषस्पर्शोज्झितः सदा ।;अव्यक्ततत्कार्यमयो न यस्य देहः कुतश्चित् क्वच स ह्यजो हरिः ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = न शुक्लरक्तप्रभवोऽस्य कायस्तथाऽपि तत्पुत्रतयोच्यते मृषा ।;जनस्य मोहाय शरीरतोऽस्या यदाविरासीदमलस्वरूपः ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = आविश्य पूर्वं वसुदेवमेव विवेश तस्मादृतुकाल एव ।;देवीमुवासात्र च सप्त मासान् सार्धांस्ततश्चाऽविरभूदजोऽपि ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = यथा पुरा स्तम्भत आविरासीदशुक्लरक्तोऽपि नृसिंहरूपः ।;तथैव कृष्णोऽपि तथाऽपि मातापितृक्रमादेव विमोहयत्यजः ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = पितृक्रमं मोहनार्थं समेति न तावता शुक्लतो रक्ततश्च ।;जातोऽस्य देहस्त्विति दर्शनाय सशङ्खचक्राब्जगदः स दृष्टः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = अनेकसूर्याभकिरीटयुक्तो विद्युत्प्रभे कुण्डले धारयंश्च ।;पीताम्बरो वनमाली स्वनन्तसूर्योरुदीप्तिर्ददृशे गुणार्णवः ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = स कञ्जयोनिप्रमुखैः सुरैः स्तुतः पित्रा च मात्रा च जगाद शूरजम् ।;नयस्व मां नन्दगृहानिति स्म ततो बभूव द्विभुजो जनार्दनः ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = तदैव जाता च हरेरनुज्ञया दुर्गाभिधा श्रीरनु नन्दपत्न्याम् ।;ततस्तमादाय हरिं ययौ स शूरात्मजो नन्दगृहान् निशीथे ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = संस्थाप्य तं तत्र तथैव कन्यकामादाय तस्मात् स्वगृहं पुनर्ययौ ।;हत्वा स्वसुर्गर्भषट्कं क्रमेण मत्वाऽष्टमं तत्र जगाम कंसः ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = गर्भं देवक्यां सप्तमं मेनिरे हि लोकाः सुतं त्वष्टमं तां ततः सः ।;मत्वा हन्तुं पादयोः सम्प्रगृह्य सम्पोथयामास शिलातले च ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = सा तद्धस्तात् क्षिप्रमुत्पत्य देवी खेऽदृश्यतैवाष्टभुजा समग्रा ।;ब्रह्मादिभिः पूज्यमाना समग्रैरत्यद्भुताकारवती हरिप्रिया ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = उवाच चार्या तव मृत्युरत्र क्वचित् प्रजातो हि वृथैव पाप ।;अनागसीं मां विनिहन्तुमिच्छस्यशक्यकार्ये तव चोद्यमोऽयम् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = उक्त्वेति कंसं पुनरेव देवकीतल्पेऽशयद् बालरूपैव दुर्गा ।;नाज्ञासिषुस्तामथ केचनात्र ऋते हि मातापितरौ गुणाढ्याम् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा तयोक्तं तु तदैव कंसः पश्चात्तापाद् वसुदेवं सभार्यम् ।;प्रसादयामास पुनःपुनश्च विहाय कोपं च तमूचतुस्तौ ।;सुखस्य दुःखस्य च राजसिंह नान्यः कर्ता वासुदेवादिति स्म ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = आनीय कंसोऽथ गृहे स्वमन्त्रिणः प्रोवाच कन्यावचनं समस्तम् ।;श्रुत्वा च ते प्रोचुरत्यन्तपापाः कार्यं बालानां निधनं सर्वशोऽपि ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = तथेति तांस्तत्र नियुज्य कंसो गृहं स्वकीयं प्रविवेश पापः ।;चेरुश्च ते बालवधे सदोद्यता हिंसाविहाराः सततं स्वभावतः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = अथ प्रभाते शयने शयानमपश्यतामब्जदलायताक्षम् ।;कृष्णं यशोदा च तथैव नन्द आनन्दसान्द्राकृतिमप्रमेयम् ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = मेनात एतौ निजपुत्रमेनं स्रष्टारमब्जप्रभवस्य चेशम् ।;महोत्सवात् पूर्णमनाश्च नन्दो विप्रेभ्योऽदाल्लक्षमितास्तदा(तथा) गाः ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = सुवर्णरत्नाम्बरभूषणानां बहूनि गोजीविगणाधिनाथः ।;प्रादादथोपायनपाणयस्तं गोपा यशोदां च मुदा स्त्रियोऽगमन् ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = गतेषु तत्रैव दिनेषु केषुचिज्जगाम कंसस्य गृहं स नन्दः ।;पूर्वं हि नन्दः स करं हि दातुं बृहद्वनान्निस्सृतः प्राप कृष्णाम् ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = सहाऽगता तेन तदा यशोदा सुषाव दुर्गामथ तत्र शौरिः ।;निधाय कृष्णं प्रतिगृह्य कन्यकां गृहं ययौ नन्द उवास तत्र ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = निरुष्य तस्मिन् यमुनातटे स मासं ययौ द्रष्टुकामो नरेन्द्रम् ।;राज्ञेऽथ तं दत्तकरं ददर्श शूरात्मजो वाक्यमुवाच चैनम् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = याह्युत्पाताः सन्ति तत्रेत्युदीरितो जगाम शीघ्रं यमुनां स नन्दः ।;रात्रावेवाऽगच्छमाने तु नन्दे कंसस्य धात्री तु जगाम गोष्ठम् ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = सा पूतना नाम निजस्वरूपमाच्छाद्य रात्रौ शुभरूपवच्च ।;विवेश नन्दस्य गृहं बृहद्वनप्रान्ते हि मार्गे रचितं प्रयाणे ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = तीरे भगिन्यास्तु यमस्य वस्त्रगृहे शयानं पुरुषोत्तमं तम् ।;जग्राह मात्रा तु यशोदया तया निद्रायुजा प्रेक्ष्यमाणा शुभेव ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = तन्मायया धर्षिता निद्रया च न्यवारयन्नैव हि नन्दजाया ।;तया प्रदत्तं स्तनमीशिताऽसुभिः पपौ सहैवाऽशु जनार्दनः प्रभुः ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = मृता स्वरूपेण सुभीषणेन पपात सा व्याप्य वनं समस्तम् ।;तदाऽऽगमन्नन्दगोपोऽपि तत्र दृष्ट्वा च सर्वेऽप्यभवन् सुविस्मिताः ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = सा ताटका चोर्वशिसम्प्रविष्टा कृष्णावध्यानान्निरयं जगाम ।;सा तूर्वशी कृष्णभुक्तस्तनेन पूता स्वर्गं प्रययौ तत्क्षणेन ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = सा तुम्बुरोः सङ्गत आविवेश रक्षस्तनुं शापतो वित्तपस्य ।;कृष्णस्पर्शाच्छुद्धरूपा पुनर्दिवं ययौ तुष्टे किमलभ्यं रमेशे ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = यदाऽऽप देवश्चतुरः स मासांस्तदोपनिष्क्रामणमस्य चाऽसीत् ।;जन्मर्क्षमस्मिन् दिन एव चाऽसीत् प्रातः किञ्चित् तत्र महोत्सवोऽभूत् ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = तदा शयानः शकटस्य सोऽधः पदाऽक्षिपत् तं दितिजं निहन्तुम् ।;अनः समाविश्य दितेः सुतोऽसौ स्थितः प्रतीपाय हरेः सुपापः ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = क्षिप्तोऽनसिस्थः शकटाक्षनामा स विष्णुनेत्वा सहितः पपात ।;ममार चाऽशु प्रतिभग्नगात्रो व्यत्यस्तचक्राक्षमभूदनश्च ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = ससम्भ्रमात् तं प्रतिगृह्य शङ्क्या कृष्णं यशोदा द्विजवर्यसूक्तिभिः ।;सा स्नापयामास नदीतटात् तदा समागता नन्दवचोऽभितर्जिता ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = हत्वा तु तं कंसभृत्यं स कृष्णः शिश्ये पुनः शिशुवत् सर्वशास्ता ।;एवं गोपान् प्रीणयन् बालकेलीविनोदतो न्यवसत् तत्र देवः ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = विवर्द्धमाने लोकदृष्ट्यैव कृष्णे पाण्डुः पुनः प्राह पृथामिदं वचः ।;धर्मिष्ठो नौ सूनुरग्रे बभूव बलद्वयज्येष्ठ उतापरश्च ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = यदैक एवातिबलोपपन्नो भवेत् तदा तेन परावमर्दे ।;प्रवर्त्यमाने स्वपुरं हरेयुश्चौर्यात् परे तद् द्वयमत्र योग्यम् ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = शस्त्रास्त्रविद् वीर्यवान् नौ सुतोऽन्यो भवेद् देवं तादृशमाह्वयातः ।;शेषस्तव भ्रातृसुतोऽभिजातस्तस्मान्नासौ सुतदानाय योग्यः ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = नवै सुपर्णः सुतदो नरेषु प्रजायते वाऽस्य यतस्तथाऽऽज्ञा ।;कृता पुरा हरिणा शङ्करस्तु क्रोधात्मकः पालने नैव योग्यः ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = अतो महेन्द्रो बलवाननन्तरस्तेषां समाह्वानमिहार्हति स्वराट् ।;इतीरिता साऽऽह्वयदाशु वासवं ततः प्रजज्ञे स्वयमेव शक्रः ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = स चार्जुनो नाम नरांशयुक्तो विष्ण्वावेशी बलवानस्त्रवेत्ता ।;रूप्यन्यः स्यात् सूनुरित्युच्यमाना भर्त्रा कुन्ती नेति तं प्राह धर्मात् ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = बृहस्पतिः पूर्वमभूद्धरेः पदं संसेवितुं पवनावेशयुक्तः ।;स उद्धवो नाम यदुप्रवीराज्जातो विद्वानुपगवनामधेयात् ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणात्मकं नातितरां स्वसेवकं कुर्याद्धरिर्मामिति भूय एव ।;स उद्धवात्माऽवततार यादवेष्वासेवनार्थं पुरुषोत्तमस्य ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = बृहस्पतेरेव स सर्वविद्या अवाप मन्त्री निपुणः सर्ववेत्ता ।;वर्षत्रये तत्परतः स सात्यकिर्जज्ञे दिने चेकितानश्च तस्मिन् ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = मरुत्सु नाम प्रतिभो यदुष्वभूत् स चेकितानो हरिसेवनार्थम् ।;तदैव जातो हृदिकात्मजोऽपि वर्षत्रये तत्परतो युधिष्ठिरः ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽब्दतो भूभरसंहृतौ हरेरङ्गत्वमाप्तुं गिरिशोऽजनिष्ट ।;अश्वत्थामा नामतोऽश्वध्वनिं स यस्माच्चक्रे जायमानो महात्मा ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = स सर्वविद् बलवानस्त्रवेत्ता कृपस्वसायां द्रोणवीर्योद्भवोऽभूत् ।;दुर्योधनस्तच्चतुर्थेऽह्नि जातस्तस्यापरेद्युर्भीमसेनः सुधीरः ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = यदा स मासद्वितयी बभूव तदा रोहिण्यां बलदेवोऽभिजातः ।;बली गुणाढ्यः सर्ववेदी य एव सेवाखिन्नो लक्ष्मणोऽग्रे हरेर्भूत् ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = यदा हि पुत्रान् विनिहन्तुमेतौ सहैव बद्धौ गतिशृङ्खलायाम् ।;कंसेनापापौ देवकीशूरपुत्रौ वियोजिताः शौरिभार्याः पराश्च ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = विनिश्चयार्थं देवकीगर्भजानामन्या भार्या धृतगर्भाः स कंसः ।;स्थानान्तरे प्रसवो यावदासां संस्थापयामास सुपापबुद्धिः ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = हेतोरेतस्माद् रोहिणी नन्दगेहे प्रसूत्यर्थं स्थापिता तेन देवी ।;लेभे पुत्रं गोकुले पूर्णचन्द्रकान्ताननं बलभद्रं सुशुभ्रम् ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = यदा त्रिमासः स बभूव देवस्तदाऽऽविरासीत् पुरुषोत्तमोऽजः ।;तौ कृष्णशेषावाप्तुकामौ सुतौ हि तपश्चक्राते देवकीशूरपुत्रौ ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = विष्ण्वावेशी बलवान् यो गुणाधिकः स मे सुतः स्यादिति रोहिणी च ।;तेपे तपोऽतो हरिशुक्लकेशयुतः शेषो देवकीरोहिणीजः ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = अवर्द्धतासौ हरिशुक्लकेशसमावेशी गोकुले रौहिणेयः ।;कृष्णोऽपि लीला ललिताः प्रदर्शयन् बलद्वितीयो रमयामास गोष्ठम् ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = स प्राकृतं शिशुमात्मनमुच्चैर्विजानन्त्या मातुरादर्शनाय ।;विजृम्भमाणोऽखिलमात्मसंस्थं प्रदर्शयामास कदाचिदीशः ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = साऽण्डं महाभूतमनोऽभिमानमहत्प्रकृत्यावृतमब्जजादिभिः ।;सुरैः शिवेतैर्नरदैत्यसङ्घैर्युतं ददर्शास्य तनौ यशोदा ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = न्यमीलयच्चाक्षिणी भीतभीता जुगूह चाऽत्मानमथो रमेशः ।;वपुः स्वकीयं सुखचित्स्वरूपं पूर्णं सत्सु ज्ञापयंस्तद्ध्यदर्शयत् ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = कदाचित् तं लालयन्ती यशोदा वोढुं नाशक्नोद् भूरिभाराधिकार्ता ।;निधाय तं भूमितले स्वकर्म यदा चक्रे दैत्य आगात् सुघोरः ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = तृणावर्तो नामतः कंसभृत्यः सृष्ट्वाऽत्युग्रं चक्रवातं शिशुं तम् ।;आदायाऽगा(या)दन्तरिक्षं स तेन शस्तः कण्ठग्राहसंरुद्धवायुः ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = पपात कृष्णेन हतः शिलातळे तृणावर्तः पर्वतोदग्रदेहः ।;सुविस्मयं चाऽपुरथो जनास्ते तृणावर्तं वीक्ष्य सञ्चूर्णिताङ्गम् ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = अक्रुद्ध्यतां केशवोऽनुग्रहाय शुभं स्वयोग्यादधिकं निहन्तुम् ।;स क्रुद्ध्यतां नवनीतादि मृष्णंश्चचार देवो निजसत्सुखाम्बुधिः ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन्नब्दे भाद्रपदे स मासे सिंहस्थयोर्गुरुरव्योः परेशः ।;उदैत् ततः फाल्गुने फल्गुनोऽभूद् गते ततो माद्रवती बभाषे ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = जाताः सुतास्ते प्रवराः पृथायामेकाऽनपत्याऽहमतः प्रसादात् ।;तवैव भूयासमहं सुतेता विधत्स्व कुन्तीं मम मन्त्रदात्रीम् ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः प्राह पृथां स माद्र्यै दिशस्व मन्त्रं सुतदं वरिष्ठम् ।;इत्यूचिवांसं पतिमाह यादवी दद्यां त्वदर्थे तु सकृत्फलाय ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = उवाच माद्र्यै सुतदं मनुं च पुनः फलं ते न भविष्यतीति ।;मन्त्रं समादाय च मद्रपुत्री व्यचिन्तयत् स्यां नु कथं द्विपुत्रा ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = सदाऽवियोगो दिविजेषु दस्रौ नचैतयोर्नामभेदः क्वचिद्धि।;एका भार्या सैतयोरप्युषा हि तदाऽऽयातः सकृदावर्तनाद् द्वौ ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = इतीक्षन्त्याऽऽकारितावश्विनौ तौ शीघ्रं प्राप्तौ पुत्रकौ तत्प्रसूतौ ।;तावेव देवौ नकुलः पूर्वजातः सहदेवोऽभूत् पश्चिमस्तौ यमौ हि (च) ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = पुनर्मनोः फलवत्त्वाय माद्री सम्प्रार्थयामास पतिं तदुक्ता ।;पृथाऽवादीत् कुटिलैषा मदाज्ञामृते देवावाह्वयामास दस्रौ ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = अतो विरोधं च मदात्मजानां कुर्यादेषेत्येव भीतां न मां त्वम् ।;नियोक्तुमर्हः पुनरेव राजन्नितीरितोऽसौ विरराम क्षितीशः ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = विशेषनाम्नैव समाहुताः सुरा (सुतान्) दद्युः सुरा इत्यविशेषितं ययोः ।;विशेषनामापि समाह्वयत् तौ मन्त्रावृत्तिर्नामभेदेऽस्य चोक्ता ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = शृङ्गाररूपं केवलं दर्शयानो विवेश वायुर्यमजौ प्रधानः ।;शृङ्गारकैवल्यमभीप्समानः पाण्डुर्हि पुत्रं चकमे चतुर्थम् ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = सुपुल्लवाकारतनुर्हि कोमळः प्रायो जनैः प्रोच्यते रूपशाली ।;ततः सुजातं वरवज्रकायौ भीमार्जुनावप्यृते पाण्डुरैच्छत् ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = अतीतेन्द्रा एव ते विष्णुषष्ठाः पूर्वेन्द्रोऽसौ यज्ञनामा रमेशः ।;स वै कृष्णो वायुरथ द्वितीयः स भीमसेनो धर्म आसीत् तृतीयः ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरोऽसावथ नासत्यदस्रौ क्रमात् तावेतौ माद्रवतीसुतौ च ।;पुरन्दरः षष्ठ उतात्र सप्तमः स एवैकः फल्गुनो ह्येत इन्द्राः ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = क्रमात् संस्कारान् क्षत्रियाणामवाप्य तेऽवर्द्धन्त स्वतवसो महित्वना ।;सर्वे सर्वज्ञाः सर्वधर्मोपपन्नाः सर्वे भक्ताः केशवेऽत्यन्तयुक्ताः ॥ १३६॥ | |||
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<span id="gr-C13" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रयोदशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C13" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रयोदशोऽध्यायः"></span> | ||
== त्रयोदशोऽध्यायः == | == त्रयोदशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ गर्गः शूरसुतोक्त्या व्रजमायात् सात्त्वतां पुरोधास्सः ।;चक्रे क्षत्रिययोग्यान् संस्कारान् कृष्णरोहिणीसून्वोः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = ऊचे नन्द सुतोऽयं तव विष्णोर्नावमो गुणैः सर्वैः ।;सर्वे चैतत्त्राताः सुखमाप्स्यन्त्युन्नतं भवत्पूर्वाः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तः स मुमोद प्रययौ गर्गोऽपि केशवोऽथाद्यः ।;स्वपदैरग्रजयुक्तश्चक्रे पुण्यं व्रजन् व्रजोद्देशम् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = स कदाचिच्छिशुभावं कुर्वन्त्या मातुरात्मनो भूयः ।;अपनेतुं परमेशो मृदं जघासेक्षतां वयस्यानाम् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = मात्रोपालब्ध ईशो मुखविवृतिमकर्नाम्ब मृद्भक्षिताऽहं ।;पश्येत्यास्यान्तरे तु प्रकृतिविकृतियुक् सा जगत् पर्यपश्यत् ।;इत्थं देवोऽत्यचिन्त्यामपरदुरधिगां शक्तिमुच्चां प्रदर्श्य प्रायो ज्ञातात्मतत्त्वां पुनरपि भगवानावृणोदात्मशक्त्या ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = इति प्रभुः स लीलया हरिर्जगद् विडम्बयन् ।;चचार गोष्ठमण्डलेऽप्यनन्तसौख्यचिद्धनः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = कदाचिदीश्वरः स्तनं पिबन् यशोदया पयः ।;सृतं (शृतं) निधातुमुज्झितो बभञ्ज दध्यमत्रकम् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = (स) प्रमथ्यमानदध्युरुप्रजातमिन्दुसन्निभम् ।;नवं हि नीतमाददे रहो जघास चेशिता ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = प्रजायते हि यत्कुले यथा युगं यथा वयः ।;तथा प्रवर्तनं भवेद् दिवौकसां समुद्भवे ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = इति स्वधर्ममुत्तमं दिवौकसां प्रदर्शयन् ।;अधर्मपावकोऽपि सन् विडम्बते जनार्दनः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = नृतिर्यगादिरूपकः स बाल्ययौवनादि यत् ।;क्रियाश्च तत्तदुद्भवाः करोति शाश्वतोऽपि सन् ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = स विप्रराजगोपकस्वरूपकस्तदुद्भवाः ।;तदा तदा विचेष्टते क्रियाः सुरान् विशिक्षयन् ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽप्यनन्यदेवतासमं निजं बलं प्रभुः ।;प्रकाशयन् पुनः पुनः प्रदर्शयत्यजो गुणान् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽत्तयष्टिमीक्ष्य तां स्वमातरं जगद्गुरुः ।;प्रपुप्लुवे तमन्वयान्मनोविदूरमङ्गना ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = पुनः समीक्ष्य तच्छ्रमं जगाम तत्करग्रहम् ।;प्रभुः स्वभक्तवश्यतां प्रकाशयन्नुरुक्रमः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = सदा विमुक्तमीश्वरं निबद्धुमञ्जसाऽऽददे ।;यदैव दाम गोपिका न तत् पुपूर तं प्रति ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = समस्तदामसञ्चयः सुसन्धितोऽप्यपूर्णताम् ।;ययावनन्तविग्रहे शिशुत्वसम्प्रदर्शके ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = अबन्धयोग्यतां प्रभुः प्रदर्श्य लीलया पुनः ।;स एकवत्सपाशकान्तरं गतोऽखिलम्भरः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = सुतस्य मातृवश्यतां प्रदर्श्य धर्ममीश्वरः ।;बभञ्ज तौ दिविस्पृशौ यमार्जुनौ सुरात्मजौ ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = पुरा धुनिश्चमुस्तथाऽपि पूतनासमन्वितौ ।;अनोक्षसंयुतौ तपः प्रचक्रतुः शिवां प्रति ।;तया वरोऽप्यवध्यता चतुर्षु च प्रयोजितः ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तरं तृणोद्भृमिस्तपोऽचरद् वरं च तम् ।;अवाप ते त्रयो हताः शिशुस्वरूपविष्णुना ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = धुनिश्चमुश्च तौ तरू समाश्रितौ निषूदितौ ।;तरुप्रभङ्गतोऽमुना तरू च शापसम्भवौ ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = पुरा हि नारदान्तिके दिगम्बरौ शशाप सः ।;धनेशपुत्रकौ द्रुतं तरुत्वमाप्नुतं त्विति ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = ततो हि तौ निजां तनुं हरेः प्रसादतः शुभौ ।;अवापतुः स्तुतिं प्रभोर्विधाय जग्मतुर्गृहम् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = नलकूबरमणिग्रीवौ मोचयित्वा तु शापतः ।;वासुदेवोऽथ गोपालैर्विस्मितैरभिवीक्षितः ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = वृन्दावनयियासुः स नन्दसूनुर्बृहद्वने ।;ससर्ज रोमकूपेभ्यो वृकान् व्याघ्रसमान् बले ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = अनेककोटिसङ्घैस्तैः पीड्यमाना व्रजालयाः ।;युयुर्वृन्दावनं नित्यानन्दमादाय नन्दजम् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = इन्दिरापतिरानन्दपूर्णो वृन्दावने प्रभुः ।;नन्दयामास नन्दादीनुद्दामतरचेष्टितैः ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = स चन्द्रतो हसत्कान्तवदनेनेन्दुवर्चसा ।;संयुतो रौहिणेयेन वत्सपालो बभूव ह ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = दैत्यं स वत्सतनुमप्रमयः प्रगृह्य कंसानुगं हरवरादपरैरवध्यम् ।;प्रक्षिप्य वृक्षशिरसि न्यहनद् बकोऽपि कंसानुगोऽथ विभुमच्युतमाससाद ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = स्कन्दप्रसादकवचः स मुखे चकार गोविन्दमग्निवदमुं प्रदहन्तमुच्चैः ।;चच्छर्द तुण्डशिरसैव निहन्तुमेतमायान्तमीक्ष्य जगृहेऽस्य स तुण्डमीशः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = तुण्डद्वयं यदुपतिः करपल्लवाभ्यां सङ्गृह्य चाऽशु विददार ह पक्षिदैत्यम् ।;ब्रह्मादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः सायं ययौ व्रजभुवं सहितोऽग्रजेन ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = एवं स देववरवन्दितपादपद्मो गोपालकेषु विहरन् भुवि षष्ठमब्दम् ।;प्राप्तो गवामखिलपोऽपि स पालकोऽभूद् वृन्दावनान्तरगसान्द्रलताविताने ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = ज्येष्ठं विहाय स कदाचिदचिन्त्यशक्तिर्गोगोपगोगणयुतो यमुनातटेषु (जलेषु) ।;रेमे भविष्यदनुवीक्ष्य हि गोपदुःखं तद्बोधनाय निजमग्रजमेषु सोऽधात् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = (स) तं ब्रह्मणो वरबलादुरगं त्ववध्यं सर्वैरवार्यविषवीर्यमृते सुपर्णात् ।;विज्ञाय तद्विषविदूषितवारिपानसन्नान् पशूनपि वयस्यजनान् स आवीत् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = तद्दृष्टिदिव्यसुधया सहसाऽभिवृष्टाः सर्वेऽपि जीवितमवापुरथोच्छशाखम् ।;कृष्णः कदम्बमधिरुह्य ततोऽतितुङ्गादास्फोट्य गाढरशनो न्यपतद् विषोदे ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = ‘सार्पह्रदः पुरुषसारनिपातवेगसङ्क्षोभितोरगविषोचच्छ्वसिताम्बुराशिः ।;पर्यक्प्लुतो विषकषायविभीषणोर्मिभीमो धनुःशतमनन्तबलस्य किं तत्’ ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = तं यामुनह्रदविलोलकमाप्य नागः काल्यो निजैः समदशत् सह वासुदेवम्(भा\.पु\. १०\.१६\.६\-७) ।;भोगैर्बबन्ध च निजेश्वरमेनमज्ञः सेहे तमीश उत भक्तिमतोऽपराधम् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = उत्पातमीक्ष्य तु तदाऽखिलगोपसङ्घस्तत्राऽजगाम हलिना प्रतिबोधितोऽपि ।;दृष्ट्वा निजाश्रयजनस्य बहोः सुदुःखं कृष्णः स्वभक्तमपि नागममुं ममर्द ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = तस्योन्नतेषु स फणेषु ननर्त कृष्णो ब्रह्मादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः ।;आर्तो मुखैरुरु वमन् रुधिरं स नागो नारायणं तमरणं मनसा जगाम ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = तच्चित्रताण्डवविरुग्णफणातपत्रं रक्तं वमन्तमुरु सन्नधियं नितान्तम् ।;दृष्ट्वाऽहिराजमुपसेदुरमुष्य पत्न्यो नेमुश्च सर्वजगदादिगुरुं भुवीशम् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = ताभिः स्तुतः स भगवानमुना च तस्मै दत्त्वाऽभयं यमसहोदरवारितोऽमुम् ।;उत्सृज्य निर्विषजलां यमुनां चकार संस्तूयमानचरितः सुरसिद्धसाध्यैः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = गोपैर्बलादिभिरुदीर्णतरप्रमोदैः सार्द्धं समेत्य भगवानरविन्दनेत्रः ।;तां रात्रिमत्र निवसन् यमुनातटे स दावाग्निमुद्धतबलं च पपौ व्रजार्थे ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं सुरासुरगणैरविचिन्त्यदिव्यकर्माणि गोकुलगतेऽगणितोरुशक्तौ ।;कुर्वत्यजे व्रजभुवामभवद् विनाश उग्राभिधादसुरतस्तरुरूपतोऽलम् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = तद्गन्धतो नृपशुमुख्यसमस्तभूतान्यापुर्मृतिं बहुलरोगनिपीडितानि ।;धातुर्वराज्जगदभावकृतैकबुद्धिर्वद्ध्यो न केनचिदसौ तरुरूपदैत्यः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = सङ्कर्षणेऽपि तदुदारविषानुविष्टे कृष्णो निजस्पर्शतस्तमपेतरोगम् ।;कृत्वा बभञ्ज विषवृक्षममुं बलेन तस्यानुगैः सह तदाकृतिभिः समस्तैः ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = दैत्यांश्च गोवपुष आत्तवरान् विरिञ्चान्मृत्यूज्झितानपि निपात्य ददाह वृक्षान् ।;विक्रीड्य रामसहितो यमुनाजले स नीरोगमाशु कृतवान् व्रजमब्जनाभः ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = सप्तोक्षणोऽतिबलवीर्ययुतानदम्यान् सर्वैर्गिरीशवरतो दितिजप्रधानान् ।;हत्वा सुतामलभदाशु विभुर्यशोदाभ्रातुः स कुम्भकसमाह्वयिनोऽपि नीलाम् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = या पूर्वजन्मनि तपः प्रथमैव भार्या भूयासमित्यचरदस्य हि सङ्गमो मे ।;स्यात् कृष्णजन्मनि समस्तवराङ्गनाभ्यः पूर्वं त्विति स्म तदिमां प्रथमं स आप ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = अग्रे द्विजत्वत उपावहदेष नीलां गोपाङ्गना अपि पुरा वरमापिरे यत् ।;संस्कारतः प्रथममेव सुसङ्गमो नो भूयात् तवेति परमाप्सरसः पुरा याः ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = तत्राथ कृष्णमवदन् सबलं वयस्याः पक्वानि तालसुफलान्यनुभोजयेति ।;इत्यर्थितः सबल आप स तालवृन्दं गोपैर्दुरासदमतीव हि धेनुकेन ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = विघ्नेशतो वरमवाप्य (स) सुदुष्टदैत्यो दीर्घायुरुत्तमबलः कदनप्रियोऽभूत् ।;नित्योद्धतः स उत राममवेक्ष्य तालवृन्तात् फलानि गलयन्तमथाभ्यधावत् ।;तस्य प्रहारमभिकाङ्क्षत आशु पृष्ठपादौ प्रगृह्य तृणराजशिरोऽहरत् सः ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् हते खरतरे खररूपदैत्ये सर्वे खराश्च खरतालवनान्तरस्थाः ।;प्रापुः खरस्वरतराः खरराक्षसारिं कृष्णं बलेन सहितं निहताश्च तेन ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = सर्वान् निहत्य खररूपधरान् स दैत्यान् विघ्नेश्वरस्य वरतोऽन्यजनैरवध्यान् ।;पक्वानि तालसुफलानि निजेषु चादाद् दुर्वारपौरुषगुणोद्भरितो रमेशः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = पक्षद्वयेन विहरत्स्वथ गोपकेषु दैत्यः प्रलम्ब इति कंसविसृष्ट आगात् ।;कृष्णस्य पक्षिषु जयत्स्वथ राममेत्य पापः पराजित उवाह तमुग्ररूपः ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = भीतेन रोहिणिसुतेन हरिः स्तुतोऽसौ स्वाविष्टतामुपदिदेश बलाभिपूर्त्यै ।;तेनैव पूरितबलोऽम्बरचारिणं तं पापं प्रलम्बमुरुमुष्टिहतं चकार ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् हते सुरगणा बलदेवनाम रामस्य चक्रुरतितृप्तियुता हरिश्च ।;वह्निं पपौ पुनरपि प्रदहन्तमुच्चैर्गोपांश्च गोगणमगण्यगुणार्णवोऽपात् ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णं कदाचिदतिदूरगतं वयस्या ऊचुः क्षुधाऽर्दिततरा वयमित्युदारम् ।;सोऽप्याह सत्रमिह विप्रगणाश्चरन्ति तान् याचतेति परिपूर्णसमस्तकामः ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = तान् प्राप्य काममनवाप्य पुनश्च गोपाः कृष्णं समापुरथ तानवदत् स देवः ।;पत्नीः समर्थयत मद्वचनादिति स्म चक्रुश्च ते तदपि ता भगवन्तमापुः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = ताः षड्विधान्नपरिपूर्णकराः समेताः प्राप्ता विसृज्य पतिपुत्रसमस्तबन्धून् ।;आत्मार्चनैकपरमा विससर्ज देहं एका पतिप्रविधुता पदमाप विष्णोः ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = भुक्त्वाऽथ गोपसहितो भगवांस्तदन्नं रेमे च गोकुलमवाप्य समस्तनाथः ।;आज्ञातिलङ्घनकृतेः स्वकृतापराधात् पश्चात् सुतप्तमनसोऽप्यभवन् स्म विप्राः ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽथ वीक्ष्य पुरुहूतमहप्रयत्नं गोपान् न्यवारयदविस्मरणाय तस्य ।;मा मानुषोऽयमिति मामवगच्छतात्स इत्यव्ययोऽस्य विदधे महभङ्गमीशः ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = गोपांश्च तान् गिरिमहोऽस्मदुरुस्वधर्म इत्युक्तिसच्छलत आत्ममहेऽवतार्य ।;भूत्वाऽतिविस्तृततनुर्बुभुजे बलिं स नानाविधान्नरसपानगुणैः सहैव ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रोऽथ विस्मृतरथाङ्गधरावतारो मेघान् समादिशदुरूदकपूगवृष्ट्यै ।;ते प्रेरिताः सकलगोकुलनाशनाय धारा वितेरुरुनागकरप्रकाराः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = ताभिर्निपीडितमुदीक्ष्य स कञ्जनाभः सर्वं व्रजं गिरिवरं प्रसभं दधार ।;वामेन कञ्जदलकोमलपाणिनैव तत्राखिलाः प्रविविशुः पशुषाः स्वगोभिः ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = वृष्ट्वोरुवार्यथ निरन्तरसप्तरात्रं त्रातं समीक्ष्य हरिणा व्रजमश्रमेण ।;शक्रोऽनुसंस्मृतसुरप्रवरावतारः पादाम्बुजं यदुपतेः शरणं जगाम ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = तुष्टाव चैनमुरुवेदशिरोगताभिर्गीर्भिः सदाऽगणितपूर्णगुणार्णवं तम् ।;गोभृद् गुरुं हरगुरोरपि गोगणेन युक्तः सहस्रगुरगाधगुमग्र्यमग्र्यात् ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = त्वत्तो जगत् सकलमाविरभूदगण्यधाम्नस्त्वमेव परिपासि समस्तमन्ते ।;अत्सि त्वयैव जगतोऽस्य हि बन्धमोक्षौ न त्वत्समोऽस्ति (कुतश्चित्) कुहचित् परिपूर्णशक्ते ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = क्षन्तव्यमेव भवता मम बाल्यमीश त्वत्संश्रयोऽस्मि हि सदेत्यभिवन्दितोऽजः ।;क्षान्तं सदैव भवतस्तव शिक्षणाय पूजापहारविधिरित्यवदद् रमेशः ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = गोविन्दमेनमभिषिच्य स गोगणेशो गोभिर्जगाम गुणपूर्णममुं प्रणम्य ।;गोपैर्गिराम्पतिरपि प्रणतोऽभिगम्य गोवर्द्धनोद्धरणसङ्गतसंशयैः सः ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णं ततः प्रभृति गोपगणा व्यजानन् नारायणोऽयमिति गर्गवचश्च नन्दात् ।;नारायणस्य सम इत्युदितं निशम्य पूजां च चक्रुरधिकामरविन्दनेत्रे ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = स्कन्दादुपात्तवरतो मरणादपेतं दृष्ट्वा च रामनिहतं बलिनं प्रलम्बम् ।;चक्रुर्विनिश्चयममुष्य सुराधिकत्वे गोपा अथास्य विदधुः परमां च पूजाम् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = कात्यायनीव्रतपराः स्वपतित्वहेतोः कन्या उवाह भगवानपराश्च गोपीः ।;अन्यैर्धृता अयुगबाणशराभिनुन्नाः प्राप्ता निशास्वरमयच्छशिराजितासु ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = तास्वत्र तेन जनिता दशलक्षपुत्रा नारायणाह्वययुता बलिनश्च गोपाः ।;सर्वेऽपि दैवतगणा भगवत्सुतत्वमाप्तुं धरातलगता हरिभक्तिहेतोः ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = तास्तत्र पूर्ववरदानकृते रमेशो रामाद्(रामा) द्विजत्वगमनादपि पूर्वमेव ।;सर्वा निशास्वरमयत् समभीष्टसिद्धिचिन्तामणिर्हि भगवानशुभैरलिप्तः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = सम्पूर्णचन्द्रकरराजितसद्रजन्यां वृन्दावने कुमुदकुन्दसुगन्धवाते ।;श्रुत्वा मुकुन्दमुखनिस्सृतगीतसारं गोपाङ्गना मुमुहुरत्र ससार यक्षः ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = रुद्रप्रसादकृतरक्ष उतास्य सख्युर्भृत्यो बली खलतरोऽपिच शङ्खचूडः ।;ताः कालयन् भगवतस्तलताडनेन मृत्युं जगाम मणिमस्य जहार कृष्णः ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = सोऽप्याससाद हरिमुग्रविषाणकोटिमग्रे निधाय जगृहेऽस्य विषाणमीशः ।;भूमौ निपात्य च वृषासुरमुग्रवीर्यं यज्ञे यथा पशुममारयदग्र्यशक्तिः ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = केशी (च) तु कंसविहितस्तुरगस्वरूपो गिर्यात्मजावरमवाप्य सदा विमृत्युः ।;पापः स केशवमवाप मुखेऽस्य बाहुं प्रावेशयत् स भगवान् ववृधेऽथ देहे ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = तत्खादनाय कुमतिः स कृतप्रयासः शीर्णास्यदन्तदशनच्छदरुद्धवायुः ।;(दीर्णः) शीर्णः पपात च मृतो हरिरप्यशेषैर्ब्रह्मेशशक्रदिनकृत्प्रमुखैः स्तुतोऽभूत् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = व्योमश्च नाम मयसूनुरजप्रसादाल्लब्धायुतायुरखिलान् विदधे बिले सः ।;तं श्रीपतिः सुरपतिः पशुवद् विशस्य निःसारितान् बिलमुखादखिलांश्चकार ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = कुर्वत्यनन्यविषयाणि दुरन्तशक्तौ कर्माणि गोकुलगतेऽखिललोकनाथे ।;कंसाय सर्वमवदत् सुरकार्यहेतोर्ब्रह्माङ्कजो मुनिरकारि यदीशपित्रा ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽतिकोपरभसोच्चलितः स कंसो बद्ध्वा सभार्यमथ शूरजमुग्रकर्मा ।;अक्रूरमाश्वदिशदानयनाय विष्णो रामान्वितस्य सह गोपगणै रथेन ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = संसेवनाय स हरेरभवत् पुरैव नाम्ना किशोर इति यः सुरगायकोऽभूत् ।;स्वायम्भुवस्य च मनोः परमांशयुक्त आवेशयुक् कमलजस्य बभूव विद्वान् ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = सोऽक्रूर इत्यभवदुत्तमपूज्यकर्मा वृष्णिष्वथाऽस स हि भोजपतेश्च मन्त्री ।;आदिष्ट एव जगदीश्वरदृष्टिहेतोरानन्दपूर्णसुमना अभवत् कृतार्थः ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = आरुह्य तद्रथवरं भगवत्पदाब्जमब्जोद्भवप्रणतमन्तरमन्तरेण ।;सञ्चिन्तयन् पथि जगाम स गोष्ठमाराद् दृष्ट्वा पदाङ्कितभुवं मुमुदे परस्य ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = सोऽचेष्टतात्र जगदीशितुरङ्गसङ्गलब्धोच्चयेन निखिलाघविदारणेषु ।;पांसुष्वजेशपुरुहूतमुखोच्चविद्युद्भ्राजत्किरीटमणिलोचनगोचरेषु ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = सोऽपश्यताथ जगदेकगुरुं समेतमग्रोद्भवेन भुवि गा अपि दोहयन्तम् ।;आनन्दसान्द्रतनुमक्षयमेनमीक्ष्य हृष्टः पपात पदयोः पुरुषोत्तमस्य ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = उत्थाप्य तं यदुपतिः सबलो गृहं स्वं नीत्वोपचारमखिलं प्रविधाय तस्मिन् ।;नित्योदिताक्षयचिदप्यखिलं स तस्माच्छुश्राव लोकचरितानुविडम्बनेन ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा स कंसहृदि संस्थितमब्जनाभः प्रातस्तु गोपसहितो रथमारुरोह ।;रामश्वफल्कतनयाभियुतो जगाम यानेन तेन यमुनातटमव्ययात्मा ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = संस्थाप्य तौ रथवरे जगताऽभिवन्द्यौ श्वाफल्किराश्ववततार यमस्वसारम् ।;स्नात्वा स तत्र विधिनैव कृताघमर्षः शेषासनं परमपूरुषमत्र चैक्षत् ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = नित्यं हि शेषमभिपश्यति सिद्धमन्त्रो दानेश्वरः स तु तदा ददृशे हरिं च ।;अग्रे हि बालतनुमत्र समीक्ष्य कृष्णं किं नास्ति यान इति यानमुखो बभूव ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = तत्रापि कृष्णमभिवीक्ष्य पुनर्निमज्य शेषोरुभोगशयनं परमं ददर्श ।;ब्रह्मेशशक्रमुखदेवमुनीन्द्रवृन्दसंवन्दिताङ्घ्रियुगमिन्दिरया समेतम् ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = स्तुत्वा वरस्तुतिभिरव्ययमब्जनाभं सोऽन्तर्हिते भगवति स्वकमारुरोह ।;यानं च तेन सहितो भगवान् जगाम सायं पुरीं सहबलो मधुरामनन्तः ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = अग्रेऽथ दानपतिमक्षयपौरुषोऽसावीशो विसृज्य सबलः सहितो वयस्यैः ।;द्रष्टुं पुरीमभिजगाम नरेन्द्रमार्गे पौरैः कुतूहलयुतैरभिपूज्यमानः ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = आसाद्य कुञ्जरगतं रजकं ययाचे वस्त्राणि कंसदयितं गिरिजावरेण ।;मृत्यूज्झितं सपदि तेन दुरुक्तिविद्धः पापं कराग्रमृदितं व्यनयद् यमाय ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = हत्वा तमक्षतबलो भगवान् प्रगृह्य वस्त्राणि चाऽत्मसमितानि बलस्य चादात् ।;दत्वाऽपराणि सखिगोपजनस्य शिष्टान्यास्तीर्य तत्र च पदं प्रणिधाय चागात् ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = ग्राह्याऽपहेयरहितैकचिदात्मसान्द्रस्वानन्दपूर्णवपुरप्ययशोषहीनः ।;लोकान् विडम्ब्य नरवत् समलक्तकाद्यैर्वप्त्रा विभूषित इवाभवदप्रमेयः ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = मालामवाप्य च सुदामत आत्मतन्त्रस्तावक्षयोऽनुजगृहे निजपार्षदौ हि ।;पूर्वं विकुण्ठसदनाद्धरिसेवनाय प्राप्तौ भुवं मृजनपुष्पकरौ पुराऽपि ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेष्टपुष्टिमिह तत्र सरूपतां च कृष्णस्तयोर्वरमदादथ राजमार्गे ।;गच्छन् ददर्श वनितां नरदेवयोग्यमादाय गन्धमधिकं कुटिलां व्रजन्तीम् ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = तेनार्थिता सपदि गन्धमदात् त्रिवक्रा तेनाग्रजेन सहितो भगवान् लिलिम्पे ।;तां चाऽश्वृजुत्वमनयत् स तयाऽर्थितोऽलमायामि कालत इति प्रहसन्नमुञ्चत् ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = पूर्णेन्दुवृन्दनिवहाधिककान्तिकान्तसूर्यामितोरुपरमद्युतिसौख्यदेहः ।;पीताम्बरः कनकभासुरगन्धमाल्यः शृङ्गारवारिधिरगण्यगुणार्णवोऽगात् ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = प्राप्याथ चाऽयुधगृहं धनुरीशदत्तं कृष्णः प्रसह्य जगृहे सकलैरभेद्यम् ।;कांसं स नित्यपरिपूर्णसमस्तशक्तिरारोप्य चैनमनुकृष्य बभञ्ज मध्ये ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् सुरासुरगणैरखिलैरभेद्ये भग्ने बभूव जगदण्डविभेदभीमः ।;शब्दः स येन निपपात भुवि प्रभग्नसारोऽसुरो धृतियुतोऽपि तदैव कंसः ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = आदिष्टमप्युरुबलं भगवान् स तेन सर्वं निहत्य सबलः प्रययौ पुनश्च ।;नन्दादिगोपसमितिं हरिरत्र रात्रौ भुक्त्वा पयोऽन्वितशुभान्नमुवास कामम् ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = कंसोऽप्यतीव भयकम्पितहृत्सरोजः प्रातर्नरेन्द्रगणमध्यगतोऽधिकोच्चम् ।;मञ्चं विवेश सह जानपदैश्च पौरैर्नानाऽनुमञ्चकगतैर्युवतीसमेतैः ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = संस्थाप्य नागमुरुरङ्गमुखे कुवल्यापीडं गिरीन्द्रसदृशं करिसादियुक्तम् ।;चाणूरमुष्टिकमुखानपि मल्लवीरान् रङ्गे निधाय हरिसंयमनं किलैच्छत् ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = अक्षोहिणी गणितमस्य बलं च विंशदासीदसह्यमुरुवीर्यमनन्यवध्यम् ।;शम्भोर्वरादपि च तस्य सुनीथनामा यः पूर्वमास वृक इत्यसुरोऽनुजोऽभूत् ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = सप्तानुजा अपि हि तस्य पुरातना ये सर्वेऽपि कंसपृतनासहिताः स्म रङ्गे ।;तस्थुः सराममभियान्तमुदीक्ष्य कृष्णमात्तायुधा युधि विजेतुमजं सुपापाः ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽपि सूर उदिते सबलो वयस्यैः सार्द्धं जगाम वररङ्गमुखं सुरेशैः ।;संस्तूयमान उरुविक्रम आसुराणां निर्मूलनाय सकळाचलितोरुशक्तिः ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = आयन् जगद्गुरुतमो बलिनं गजेन्द्रं रुद्रप्रसादपरिरक्षितमाश्वपश्यत् ।;(दुष्टोरुरङ्ग) दृष्ट्वोरुरङ्गमुखसंस्थितमीक्ष्य चैभ्यं पापापयाहि नचिरादिति वाचमूचे ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = क्षिप्तः स ईश्वरतमेन गिरीशलब्धाद् दृप्तो वराज्जगति सर्वजनैरवध्यः ।;नागं त्ववध्यमभियापयते ततोऽग्रे पापो दुरन्तमहिमं प्रति वासुदेवम् ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = विक्रीड्य तेन करिणा भगवान् स किञ्चिद्धस्ते प्रगृह्य विनिकृष्य निपात्य भूमौ ।;कुम्भे पदं प्रतिनिधाय विषाणयुग्ममुत्कृष्य हस्तिपमहन् निपपात सोऽपि ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = नागं ससादिनमवध्यमसौ निहत्य स्कन्धे विषाणमवसज्य सहाग्रजेन ।;नागेन्द्रसान्द्रमदबिन्दुभिरञ्चिताङ्गः पूर्णात्मशक्तिरमलः प्रविवेश रङ्गम् ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = विष्टे जगद्गुरुतमे बलवीर्यमूर्तौ रङ्गं मुमोद च शुशोष जनोऽखिलोऽत्र ।;कञ्जं तथाऽपि कुमुदं च यथैव सूर्य उद्यत्यजेऽनुभविनो विपरीतकाश्च ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आह भगवान् (अपहासपूर्वं) परिहासपूर्वमेवं भवत्विति स तेन तदाऽभियातः ।;सन्दर्श्य दैवतपतिर्युधि मल्ललीलां मौहूर्तिकीमथ पदोर्जगृहे स्वशत्रुम् ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = उत्क्षिप्य तं गगनगं गिरिसन्निकाशमुद्भ्राम्य चाथ शतशः कुलिशक्षताङ्गम् (कुलिशाक्षताङ्गम्) ।;आविद्ध्य दुर्धरबलो भुवि निष्पिपेष चूर्णीकृतः स निपपात यथा गिरीन्द्रः ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णं च तुष्टुवुरथो दिवि देवसङ्घा मर्त्या भुवि प्रवरमुत्तमपूरुषाणाम् ।;तद्वद् बलस्य दृढमुष्टिनिपिष्टमूर्धा भ्रष्टस्तदैव निपपात स मुष्टिकोऽपि ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = कूटश्च कोसल उत च्छलनामधेयो द्वौ तत्र कृष्णनिहतावपरो बलेन ।;कंसस्य ये त्ववरजाश्च सुनीथमुख्याः सर्वे बलेन निहताः परिघेण वीराः ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = ताभ्यां हतानभिसमीक्ष्य निजान् समस्तान् कंसो दिदेश बलमक्षयमुग्रवीर्यम् ।;रुद्रप्रसादकृतरक्षमवध्यमेतौ निस्सार्य दण्डमधिकं कुरुतेति पापः ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वैव राजवचनं बलमक्षयं तदक्षोहिणीदशकयुग्ममनन्तवीर्यम् ।;कृष्णं चकार विविधास्त्रधरं स्वकोष्ठे सिंहं यथा किल सृगालबलं समेतम् ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = जानन्नपीश्वरमनन्तबलं महेन्द्रः कृष्णं रथं निजमयापयदायुधाढ्यम् ।;शुश्रूषणाय परमस्य यथा समुद्रमर्घ्येण पूरयति पूर्णजलं जनोऽयम् ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = स्वस्यन्दनं तु भगवान् स महेन्द्रदत्तमारुह्य सूतवरमातलिसङ्गृहीतम् ।;नानायुधोग्रकिरणस्तरणिर्यथैव ध्वान्तं व्यनाशयदशेषत आशु सैन्यम् ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = निःशेषतो विनिहते स्वबले स कंसश्चर्मासिपाणिरभियातुमियेष कृष्णम् ।;तावत् तमेव भगवन्तमभिप्रयान्तमुत्तुङ्गमञ्चशिरसि प्रददर्श वीरम् ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = तं श्येनवेगमभितः प्रतिसञ्चरन्तं निश्छिद्रमाशु जगृहे भगवान् प्रसह्य ।;केशेषु चैनमभिभृश्य करेण वामेनोद्धृत्य दक्षिणकरेण जघान केऽस्य ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = सञ्चालितेन मुकुटेन विकुण्डलेन कर्णद्वयेन विगताभरणोरसा च ।;स्रस्ताम्बरेण जघनेन सुशोच्यरूपः कंसो बभूव नरसिंहकराग्रसंस्थः ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = उत्कृष्य तं सुरपतिः परमोच्चमञ्चादन्यैरजेयमतिवीर्यबलोपपन्नम् ।;अब्जोद्भवेशवरगुप्तमनन्तशक्तिर्भूमौ निपात्य स ददौ पदयोः प्रहारम् ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = देहे तु योऽभवदमुष्य रमेशबन्धुर्वायुः स कृष्णतनुमाश्रयदन्यपापम् ।;दैत्यं चकर्ष हरिरत्र शरीरसंस्थं पश्यत्सु कञ्जजमुखेषु सुरेष्वनन्तः ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = द्वेषात् स सर्वजगदेकगुरोः स्वकीयैः पूर्वप्रमापितजनैः सहितः समस्तैः ।;धात्र्यादिभिः प्रतिययौ कुमतिस्तमोऽन्धमन्येऽपि चैवमुपयान्ति हरावभक्ताः ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = नित्यातिदुःखमनिवृत्ति सुखव्यपेतमन्धं तमो नियतमेति हरावभक्तः ।;भक्तोऽपि कञ्जजगिरीशमुखेषु सर्वधर्मार्णवोऽपि निखिलागमनिर्णयेन ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = यो वेत्ति निश्चितमतिर्हरिमब्जजेशपूर्वाखिलस्य जगतः सकलेऽपि काले ।;सृष्टिस्थितिप्रळयमोक्षदमात्मतन्त्रं लक्ष्म्या अपीशमतिभक्तियुतः स मुच्येत् ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादनन्तगुणपूर्णममुं रमेशं निश्चित्य दोषरहितं परयैव भक्त्या ।;विज्ञाय दैवतगणांश्च यथाक्रमेण भक्ता हरेरिति सदैव भजेत धीरः ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = निहत्य कंसमोजसा विधातृशम्भुपूर्वकैः ।;स्तुतः प्रसूनवर्षिभिर्मुमोद केशवोऽधिकम् ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = सदैव मोदरूपिणो मुदोक्तिरस्य लौकिकी ।;यथोदयो रवेर्भवेत् सदोदितस्य लोकतः ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तचित्सुखार्णवः सदोदितैकरूपकः ।;समस्तदोषवर्जितो हरिर्गुणात्मकः सदा ॥ १३८॥ | |||
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== चतुर्दशोऽध्यायः == | == चतुर्दशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ कृष्णो विमोच्य पितरावभिवन्द्य सर्ववन्द्योऽपि रामसहितः प्रतिपालनाय ।;धर्मस्य राज्यपदवीं प्रणिधाय चोग्रसेने द्विजत्वमुपगम्य मुमोच नन्दम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = नन्दोऽपि सान्त्ववचनैरनुनीय मुक्तः कृष्णेन तच्चरणपङ्कजमात्मसंस्थम् ।;कृत्वा जगाम सह गोपगणेन कृच्छ्राद् ध्यायन् जनार्दनमुवास वने सभार्यः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽप्यवन्तिपुरवासिनमेत्य विप्रं सान्दीपनिं सह बलेन ततोऽध्यगीष्ट ।;वेदान् सकृन्निगदितान् निखिलाश्च विद्याः सम्पूर्णसंविदपि दैवतशिक्षणाय ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = धर्मो हि सर्वविदुषामपि दैवतानां प्राप्ते नरेषु जनने नरवत् प्रवृत्तिः ।;ज्ञानादिगूहनमुताध्ययनादिरत्र तज्ज्ञापनार्थमवसद् भगवान् गुरौ च ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = गुर्वर्थमेष मृतपुत्रमदात् पुनश्च रामेण सार्द्धमगमन्मधुरां रमेशः ।;पौरैः सजानपदमबन्धुजनैरजस्रमभ्यर्चितो न्यवसदिष्टकृदात्मपित्रोः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेऽपि ते पतिमवाप्य हरिं पुराऽभितप्ता हि भोजपतिना मुमुदुर्नितान्तम् ।;किं वाच्यमत्र सुतमाप्य हरिं स्वपित्रोर्यत्राखिलस्य सुजनस्य बभूव मोदः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णाश्रयो वसति यत्र जनोऽपि तत्र वृद्धिर्भवेत् किमु रमाधिपतेर्निवासे ।;वृन्दावनं यदधिवासत आस सध्र्यङ् माहेन्द्रसद्मसदृशं किमु तत्र पुर्याम् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = येनाधिवासमृषभो जगतां विधत्ते विष्णुस्ततो हि वरता सदने विधातुः ।;तस्मात् प्रभोर्निवसनान्मधुरा पुरी सा शश्वत् समृद्धजनसङ्कुलिता बभूव ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = रक्षत्यजे त्रिजगतां परिरक्षकेऽस्मिन् सर्वान् यदून् मगधराजसुते स्वभर्तुः ।;कृष्णान्मृतिं पितुरवाप्य समीपमस्तिप्रास्ती शशंसतुरतीव च दूःखितेऽस्मै ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वैव तन्मगधराज उरुप्ररूढबाह्वोर्बलेन नजितो युधि सर्वलोकैः ।;ब्रह्मेशचण्डमुनिदत्तवरैरजेयो मृत्यूज्झितश्च विजयी जगतश्चुकोप ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = क्षुब्धोऽतिकोपवशतः स्वगदाममोघां दत्तां शिवेन जगृहे शिवभक्तवन्द्यः ।;शैवागमाखिलविदत्र च सुस्थिरोऽसौ चिक्षेप योजनशतं स तु तां परस्मै ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = अर्वाक् पपात च गदा मधुराप्रदेशात् सा योजनेन यदिमं प्रजगाद पृष्टः ।;एकोत्तरामपि शताच्छतयोजनेति देवर्षिरत्र मधुरां भगवत्प्रियार्थे ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = शक्तस्य चापि हि गदाप्रविघातने तु शुश्रूषणं मदुचितं त्विति चिन्तयानः ।;विष्णोर्मुनिः स निजगाद ह योजनोनं मार्गं पुरो भगवतो मगधेशपृष्टः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = क्षिप्ता तु सा भगवतोऽथ गदा जराख्यां तत्सन्धिनीमसुभिराशु वियोज्य पापाम् ।;मर्त्याशनीं भगवतः पुनराज्ञयैव याता गिरीशसदनं मगधं विसृज्य ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = राजा स्वमातृत उतो गदया च हीनः क्रोधात् समस्तनृपतीनभिसन्निपात्य ।;अक्षोहिणीत्र्यधिकविंशयुतोऽतिवेलं दर्पोद्धतः सपदि कृष्णपुरीं जगाम ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = लोकेऽप्रतीतबलपौरुषसाररूपस्त्वं ह्येक एष्यभवतो बलवीर्यसारम् ।;ज्ञात्वा सुते नतु मया प्रतिपादिते हि कंसस्य वीर्यरहितेन हतस्त्वया सः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = द्वारेषु सात्यकिपुरस्सरमात्मसैन्यं त्रिष्वभ्युदीर्य भगवान् स्वयमुत्तरेण ।;रामद्वितीय उदगान्मगधाधिराजं योद्धुं नृपेन्द्रकटकेन युतं परेशः ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = तस्येच्छयैव पृथिवीमवतेरुराशु तस्याऽयुधानि सबलस्य सुभास्वराणि ।;शार्ङ्गासिचक्रदरतूणगदाः स्वकीया जग्राह दारुकगृहीतरथे स्थितः सः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = आरुह्य भूमयरथं प्रतियुक्तमश्वैर्वेदात्मकैर्धनुरधिज्यमथ प्रगृह्य ।;शार्ङ्गं शरांश्च निशितान् मगधाधिराजमुग्रं नृपेन्द्रसहितं प्रययौ जवेन ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = रामः प्रगृह्य मुसलं स हलं च यानमास्थाय सायकशरासनतूणयुक्तः ।;सैन्यं जरासुतसुरक्षितमभ्यधावद्धर्षान्नदन्नुरुबलोऽरिबलैरधृष्यः ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = उद्वीक्ष्य कृष्णमभियान्तमनन्तशक्तिं राजेन्द्रवृन्दसहितो मगधाधिराजः ।;उद्वेलसागरवदाश्वभियाय कोपान्नानाविधायुधवरैरभिवर्षमाणः ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = तं वै चुकोपयिषुरग्रत उग्रसेनं कृष्णो निधाय समगात् स्वयमस्य पश्चात् ।;दृष्ट्वाऽग्रतो मगधराट् स्थितमुग्रसेनं कोपाच्चलत्तनुरिदं वचनं बभाषे ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = पापापयाहि पुरतो मम राज्यकाम निर्लज्ज पुत्रवधकारण शत्रुपक्ष ।;त्वं जीर्णबस्तसदृशो न मयेह वध्यः सिंहो हि सिंहमभियाति न वै सृगालम् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = आक्षिप्त इत्थममुनाऽथ स भोजराजस्तूणात् प्रगृह्य निशितं शरमाशु तेन ।;छित्वा जरासुतधनुर्बलवन्ननाद विव्याध सायकगणैश्च पुनस्तमुग्रैः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = अन्यच्छरासनवरं प्रतिगृह्य कोपसंरक्तनेत्रमभियान्तमुदीक्ष्य कृष्णः ।;भोजाधिराजवधकाङ्क्षिणमुग्रवेगं बार्हद्रथं प्रतिययौ परमो रथेन ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = आयान्तमीक्ष्य भगवन्तमनन्तवीर्यं चेदीशपौण्ड्रमुखराजगणैः समेतः ।;नानाविधास्त्रवरशस्त्रगणैर्ववर्ष मेरुं यथा घन उदीर्णरवो जलौघैः ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = शस्त्रास्त्रवृष्टिमभितो भगवान् विवृश्च्य शार्ङ्गोत्थसायकगणैर्विरथाश्वसूतम् ।;चक्रे निरायुधमसौ मगधेन्द्रमाशु च्छिन्नातपत्रवरकेतुमचिन्त्यशक्तिः ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = नैनं जघान भगवान् सुशकं च भीमे भक्तिं निजां प्रथयितुं यश उच्चधर्मम् ।;चेदीशपौण्ड्रकसकीचकमद्रराजसाल्वैकलव्यकमुखान् विरथांश्चकार ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = ये चापि हंसडिभकद्रुमरुग्मिमुख्या बाह्लीकभौमसुतमैन्दपुरस्सराश्च ।;सर्वे प्रदुद्रुवुरजस्य शरैर्विभिन्ना अन्ये च भूमिपतयो य इहाऽसुरुर्व्याम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = छिन्नायुधध्वजपताकरथाश्वसूतवर्माण उग्रशरताडितभिन्नगात्राः ।;स्रस्ताम्बराभरणमूर्धजमाल्यहीना रक्तं वमन्त उरु दुद्रुवुराशु भीताः ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = शोच्यां दशामुपगतेषु नृपेषु (सर्वेष्वस्तायुधेषु) सर्वेष्वात्तायुधेषु हरिणा युधि विद्रवत्सु ।;नानायुधाढ्यमपरं रथमुग्रवीर्यम् आस्थाय मागधपतिः प्रससार रामम् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = आधावतोऽस्य मुसलेन रथं बभञ्ज रामो गदामुरुतरोरसि सोऽपि तस्य ।;चिक्षेप तं च मुसलेन तताड रामस्तावुत्तमौ बलवतां युयुधात उग्रम् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = तौ चक्रतुः पुरु नियुद्धमपि स्म तत्र सञ्चूर्ण्य सर्वगिरिवृक्षशिलासमूहान् ।;दीर्घं नियुद्धमभवत् सममेतयोस्तद् वज्राद् दृढाङ्गतमयोर्बलिनोर्नितान्तम् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽथ शङ्खरवमम्बुजलोचनस्य विद्रावितानपि नृपानभिवीक्ष्य रामः ।;युद्ध्यन्तमीक्ष्य च रिपुं ववृधे बलेन त्यक्त्वा रिपुं मुसलमादद आश्वमोघम् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = तेनाऽहतः शिरसि सम्मुमुहेऽतिवेलं बार्हद्रथो जगृह एनमथो हली सः ।;तत्रैकलव्य उत कृष्णशरैः पलायन्नस्त्राणि रामशिरसि प्रमुमोच शीघ्रम् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = भीतेन तेन समरं भगवाननिच्छन् प्रद्युम्नमाश्वसृजदात्मसुतं मनोजम् ।;प्रद्युम्न एनमभियाय महास्त्रजालै रामस्तु मागधमथाऽत्मरथं निनाय ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = युद्ध्वा चिरं रणमुखे भगवत्सुतोऽसौ चक्रे निरायुधममुं स्थिरमेकलव्यम् ।;अंशेन यो भुवमगान्मणिमानिति स्म स क्रोधतन्त्रकगणेष्वधिपो निषादः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = प्रद्युम्नमात्मनि निधाय पुनः स कृष्णः संहृत्य मागधबलं निखिलं शरौघैः ।;भूयश्चमूमभिविनेतुमुदारकर्मा बार्हद्रथं त्वमुचदक्षयपौरुषाऽजः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = व्रीडानताच्छविमुखः सहितो नृपैस्तैर्बार्हद्रथः प्रतिययौ स्वपुरीं स पापः ।;आत्माभिषिक्तमपि भोजवराधिपत्ये दौहित्रमग्रत उत प्रणिधाय मन्दः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = जित्वा तमूर्जितबलं भगवानजेशशक्रादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः ।;रामादिभिः सहित आशु पुरं(पुरीं) प्रविश्य रेमेऽभिवन्दितपदो महतां समूहैः ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = वर्द्धत्सु पाण्डुतनयेषु चतुर्दशं तु जन्मर्क्षमास तनयस्य सहस्रदृष्टेः ।;प्रत्याब्दिकं मुनिगणान् परिवेषयन्ती कुन्ती तदाऽऽस बहुकार्यपरा नयज्ञा ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = तत्काल एव नृपतिः सह माद्रवत्या पुंस्कोकिलाकुलितफुल्लवनं ददर्श ।;तस्मिन् वसन्तपवनस्पर्शेधितः स कन्दर्पमार्गणवशं सहसा जगाम ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = जग्राह तामथ तया रममाण एव यातो यमस्य सदनं हरिपादसङ्गी ।;पूर्वं शचीरमणमिच्छत एव विघ्नं शक्रस्य तद्दर्शनोपगतो हि चक्रे ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = तेनैव मानुषमवाप्य रतिस्थ एव पञ्चत्वमाप रतिविघ्नमपुत्रतां च(हि) ।;स्वात्मोत्तमेष्वथ सुरेषु विशेषतश्च स्वल्पोऽपि दोष उरुतामभियाति(उपयाति) यस्मात् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = माद्री पतिं मृतमवेक्ष्य रुराव दूरात् तच्छुश्रुवुश्च पृथया सह पाण्डुपुत्राः ।;तेष्वागतेषु वचनादपि माद्रवत्याः पुत्रान् निवार्य तु पृथा स्वयमत्र चाऽगात् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = पत्युः कलेवरमवेक्ष्य निशम्य माद्र्याः कुन्ती भृशं व्यथितहृत्कमलैव माद्रीम् ।;धिक्कृत्य चानुमरणाय मतिं चकार तस्याः स्वनो रुदितजः श्रुत आशु पार्थैः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = तेष्वागतेष्वधिक आस विराव एतं सर्वेऽपि शुश्रुवुर्ऋषिप्रवरा अथात्र ।;आजग्मुरुत्तमकृपा ऋषिलोकमध्ये पत्नी नृपानुगमनाय च पस्पृधाते ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = ते सन्निवार्य तु पृथामथ माद्रवत्या भर्तुः सहानुगमनं बहु चार्थयन्त्याः ।;संवादमेव निजदोषमवेक्ष्य तस्याश्चक्रुः सदाऽवगतभागवतोच्चधर्माः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = भर्तुर्गुणैरनधिकौ तनयार्थमेव माद्र्या कृतौ (आकृतौ) सुरवरावधिकौ स्वतोऽपि ।;तेनैव भर्तृमृतिहेतुरभूत् समस्तलोकैश्च नातिमहिता सुगुणाऽपि माद्री ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = पाण्डोः सुता मुनिगणैः पितृमेधमत्र चक्रुर्यथावदथ तेन सहैव माद्री ।;हुत्वाऽऽत्मदेहमुरु पापमदः कृतं च सम्मार्ज्य लोकमगमन्निजभर्तुरेव ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = पाण्डुश्च पुत्रकगुणैः स्वगुणैश्च साक्षात् कृष्णात्मजः सततमस्य पदैकभक्तः ।;लोकानवाप विमलान् महितान् महद्भिः किं चित्रमत्र हरिपादविनम्रचित्ते ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = तूष्णीं स्थिते तु नृपतौ तनुजे द्युनद्याः क्षत्तर्युतात्त उरुमोदमतीव पापाः ।;ऊचुः सुयोधनमुखाः सह सौबलेन पाण्डोर्मृतिः किल पुरा तनयाः क्व तस्य ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = वायोरदृश्यवचनं परिशङ्कमानेष्वाविर्बभूव भगवान् स्वयमब्जनाभः ।;व्यासस्वरूप उरुसर्वगुणैकदेह आदाय तानगमदाशु च पाण्डुगेहम् ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = तत्स्वीकृतेषु सकला अपि भीष्ममुख्या वैचित्रवीर्यसहिताः परिपूज्य सर्वान् ।;कुन्त्या सहैव जगृहुः सुभृशं तदाऽऽर्ता वैचित्रवीर्यतनयाः सह सौबलेन ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = वैचित्रवीर्यतनयाः कृपतो महास्त्राण्यापुश्च पाण्डुतनयैः सह सर्वराज्ञाम् ।;पुत्राश्च तत्र विविधा अपि बालचेष्टाः कुर्वत्सु वायुतनयेन जिताः समस्ताः ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = पक्वोरुभोज्यफलसन्नयनाय वृक्षेष्वारूढराजतनयानभिवीक्ष्य भीमः ।;पादप्रहारमुरुवृक्षतले प्रदाय साकं फलैर्विनिपतत्सु फलान्यभुङ्क्त ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = युद्धे नियुद्ध उत धावन उत्प्लवे च वारिप्लवे च सहितान् निखिलान् कुमारान् ।;एको जिगाय तरसा परमार्यकर्मा विष्णोः सुपूर्णसदनुग्रहतः सुनित्यात् ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = सर्वान् प्रगृह्य विनिमज्जति वारिमध्ये श्रान्तान् विसृज्य हसति स्म स विष्णुपद्याम् ।;सर्वानुदूह्य च कदाचिदुरुप्रवाहां गङ्गां सुतारयति सारसुपूर्णपौंस्यः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = द्वेषं ह्यृते नहि हरौ तमसि प्रवेशः प्राणे च तेन जगतीमनु तौ प्रपन्नौ ।;तत्कारणान्यकुरुतां परमौ करांसि देवद्विषां सततविस्तृतसाधुपौंस्यौ ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वाऽमितान्यथ करांसि मरुत्सुतेन नित्यं कृतानि तनया निखिलाश्च राज्ञाम् ।;तस्यामितं बलमुदीक्ष्य सदोरुवृद्धद्वेषा बभूवुरथ मन्त्रममन्त्रयंश्च ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = येये हि तत्र नरदेवसुताः सुरांशाः प्रीतिं परां पवनजे निखिला अकुर्वन् ।;तांस्तान् विहाय दितिजा नरदेववंशजाता विचार्य वधनिश्चयमस्य चक्रुः ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = अस्मिन् हते विनिहता अखिलाश्च पार्थाः शक्यो बलाच्च न निहन्तुमयं बलाढ्यः ।;छद्मप्रयोगत इमं विनिहत्य वीर्यात् पार्थं निहत्य निगडे च विदध्महेऽन्यान् ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = एवं कृते निहतकण्टकमस्य राज्यं दुर्योधनस्य हि भवेन्न ततोऽन्यथा स्यात् ।;अस्मिन् हते निपतिते च सुरेन्द्रसूनौ शेषा भवेयुरपि सौबलिपुत्रदासाः ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = एवं विचार्य विषमुल्बणमन्तकाभं क्षीरोदधेर्मथनजं तपसा गिरीशात् ।;शुक्रेण लब्धममुतः सुबलात्मजेन प्राप्तं प्रतोष्य मरुतस्तनयाय चादुः ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = सम्मन्त्र्य राजतनयैर्धृतराष्ट्रजैस्तद् दत्तं स्वसूदमुखतोऽखिलभक्ष्यभोज्ये ।;ज्ञात्वा युयुत्सुगदितं बलवान् स भीमो विष्णोरनुग्रहबलाज्जरयाञ्चकार ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = जीर्णे विषे कुमतयः परमाभितप्ताः प्रासादमाशु विदधुर्हरिपादतोये ।;ज्ञात्वा युयुत्सुमुखतः स्वयमत्र चान्ते सुष्वाप मारुतिरमा धृतराष्ट्रपुत्रैः ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = दोषान् प्रकाशयितुमेव विचित्रवीर्यपुत्रात्मजेषु नृवरं प्रतिसुप्तमीक्ष्य ।;बद्ध्वाऽभिमन्त्रणदृढैरयसा कृतैस्तं पाशैर्विचिक्षिपुरुदे हरिपादजायाः ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = तत् कोटियोजनगभीरमुदं विगाह्य भीमो विजृम्भणत एव विवृश्च्य पाशान् ।;उत्तीर्य सज्जनगणस्य विधाय हर्षं तस्थावनन्तगुणविष्णुसदातिहार्दः ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = तं वीक्ष्य दुष्टमनसोऽतिविपन्नचित्ताः सम्मन्त्र्य भूय उरुनागगणानथाष्टौ ।;शुक्रोक्तमन्त्रबलतः पुर आह्वयित्वा पश्चात् सुपञ्जरगतान् प्रददुः स्वसूते ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनेन पृथुमन्त्रबलोपहूतांस्तत्सारथिः फणिगणान् पवनात्मजस्य ।;सुप्तस्य विस्तृत उरस्यमुचद् विशीर्णदन्ता बभूवुरमुमाशु विदश्य नागाः ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = क्षिप्त्वा सुदूरमुरुनागगणानथाष्टौ तद्वंशजान् स विनिहत्य पिपीलिकावत् ।;जघ्ने च सूतमपहस्तत एव भीमः सुष्वाप पूर्ववदनुत्थित एव तल्पात् ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = तत् तस्य (नैजबलमप्रमेयं) नैजबलमप्रतिमं निरीक्ष्य सर्वे क्षितीशतनया अधिकं विषेदुः ।;निश्वासतोऽथ दर्शनादपि भस्म येषां भूयासुरेव भुवनानि च ते मृषाऽऽसन् ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = दद्भिर्विदश्य न विकारममुष्य कर्तुं शेकुर्भुजङ्गमवरा अपि सुप्रयत्नाः ।;कस्यापि नेदृशबलं श्रुतपूर्वमासीद् दृष्टं किमु स्म तनयेऽपि हिरण्यकस्य ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = स्वात्मावनार्थमधिकां स्तुतिमेव कृत्वा विष्णोः स दैत्यतनयो हरिणाऽवितोऽभूत् ।;नत्वौरसं बलममुष्य स कृष्यते हि भृत्यैर्बलात् स पितुरौरसमस्य वीर्यम् ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = नैसर्गिकं प्रियमिमं प्रवदन्ति विप्रा विष्णोर्नितान्तमपि सत्यमिदं ध्रुवं हि ।;नैवान्यथौरसबलं भवतीदृशं तदुत्साद्य एष हरिणैव सहैष नोऽर्थः ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णः किलैष च हरिर्यदुषु प्रजातः सोऽस्याऽश्रयः कुरुत तस्य बहु प्रतीपम् ।;सम्मन्त्र्य चैवमतिपापतमा नरेन्द्रपुत्रा हरेश्च बहु चक्रुरथ प्रतीपम् ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = तैः प्रेरिता नृपतयः पितरश्च तेषां साकं बृहद्रथसुतेन हरेः सकाशम् ।;युद्धाय जग्मुरमुनाऽष्टदशेषु युद्धेष्वत्यन्तभग्नबलदर्पमदा निवृत्ताः ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = तेनाऽगृहीतगजवाजिगजा नितान्तं शस्त्रैः परिक्षततनूभिरलं वमन्तः ।;रक्तं विशस्त्रकवचध्वजवाजिसूताः स्रस्ताम्बराः श्लथितमूर्द्धजिनो निवृत्ताः ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = एवं बृहद्रथसुतोऽपि सुशोच्यरूप आर्तो ययौ बहुश एव पुरं स्वकीयम् ।;कृष्णेन पूर्णबलवीर्यगुणेन मुक्तो जीवेत्यतीव विजितः श्वसितावशेषः ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = एवं गतेषु बहुशो नतकन्धरेषु राजस्वजोऽपि मधुरां स्वपुरीं प्रविश्य ।;रामेण सार्धमखिलैर्यदुभिः समेतो रेमे रमापतिरचिन्त्यबलो जयश्रीः ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = व्यर्थोद्यमाः पुनरपि स्म सधार्तराष्ट्रा भीमं निहन्तुमुरुयत्नमकुर्वताज्ञाः ।;राज्ञां सुतास्तमखिलं स मृषैव कृत्वा चक्रे जयाय च दिशां बलवान् प्रयत्नम् ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = प्राचीं दिशं प्रथममेव जिगाय पश्चाद् याम्यां जलेशपरिपालितया सहान्याम् ।;यौ तौ पुरातनदशाननकुम्भकर्णौ मातृष्वसातनयतां च गतौ जिगाय ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वस्तयोर्हि दमघोषसुतः प्रजातः प्राहुश्च यं नृपतयः शिशुपालनाम्ना ।;अन्यं वदन्ति च करूशनृपं तथाऽन्यमातृष्वसातनयमेव च दन्तवक्रम् ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = जित्वैव तावपि जिगाय च पौण्ड्रकाख्यं शौरैः सुतं सुतमजैदथ भीष्मकस्य ।;यः पूर्वमास दितिजो नरहेल्वलाख्यो रुग्मीति नाम च बभूव स कुण्डिनेशः ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = भागेत एव तनयस्य स एव वह्नेर्नाम्ना शुचेः स तु पिताऽस्य हि मित्रभागः ।;राह्वंशयुक् तदनुजौ क्रथकैशिकाख्यौ भागौ तथाऽग्निसुतयोः पवमानशुन्ध्योः ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = बन्धोर्निजस्य तु बलं सुपरीक्षमाणः शल्योऽपि तेन युयुधे विजितस्तथैव ।;भीमो जिगाय युधि वीरमथैकलव्यं सर्वे नृपाश्च विजिता अमुनैवमेव ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = तद्बाहुवीर्यपरिपालित इन्द्रसूनुः शेषान् नृपांश्च समजैद् बलवानयत्नात् ।;साल्वं च हंसडिभकौ च विजित्य भीमो नागाह्वयं पुरमगात् सहितोऽर्जुनेन ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = तद्बाहुवीर्यमथ वीक्ष्य मुमोद धर्मसूनुः समातृयमजो विदुरः सभीष्मः ।;अन्ये च सज्जनगणाः सहपौरराष्ट्राः श्रुत्वैव सर्वयदवो जहृषुर्नितान्तम् ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = सोऽयाद् गजाह्वयममुत्र विचित्रवीर्यपुत्रेण भीष्मसहितैः कुरुभिः समस्तैः ।;सम्पूजितः कतिपयानवसच्च मासान् ज्ञातुं हि पाण्डुषु मनःप्रसृतिं कुरूणाम् ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञात्वा स कुन्तिविदुरोक्तित आत्मना च मित्रारिमध्यमजनांस्तनयेषु पाण्डोः ।;विज्ञाय पुत्रवशगं धृतराष्ट्रमञ्जः साम्नैव भेदसहितेन जगाद विद्वान् ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = पुत्रेषु पाण्डुतनयेषु च साम्यवृत्तिः कीर्तिं च धर्ममुरुमेषि तथाऽर्थकामौ ।;प्रीतिं परां त्वयि करिष्यति वासुदेवः साकं समस्तयदुभिः सहितः सुराद्यैः ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = धर्मार्थकामसहितां च विमुक्तिमेषि तत्प्रीतितः सुनियतं विपरीतवृत्तिः ।;यास्येव राजवर तत्फलवैपरीत्यमित्थं वचो निगदितं तव कार्ष्णमद्य ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं समस्तकुरुमध्य उपात्तवाक्यो राजाऽपि पुत्रवशगो वचनं जगाद ।;सर्वं वशे भगवतो न वयं स्वतन्त्रा भूभारसंहृतिकृते स इहावतीर्णः ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = एतन्निशम्य वचनं स तु यादवोऽस्य ज्ञात्वा मनोऽस्य कलुषं तव नैव पुत्राः ।;इत्यूचिवान् सह मरुत्तनयार्जुनाभ्यां प्रायात् पुरीं च सहदेवयुतः स्वकीयाम् ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं तु भागवतमुत्तममात्मयोग्यं भीमार्जुनौ भगवतः समवाप्य कृष्णात् ।;तत्रोषतुर्भगवता सह युक्तचेष्टौ सम्पूजितौ यदुभिरुत्तमकर्मसारौ ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्युद्यमो भगवताऽपि भवेद् गदायाः शिक्षा यदा भगवता क्रियते नचेमम् ।;कुर्यादिति स्म भगवत्समनुज्ञयैव रामादशिक्षदुरुगायपुरः स भीमः ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = रामोऽपि शिक्षितमरीन्द्रधरात् पुरोऽस्य भीमे ददावथ वराणि हरेरवाप ।;अस्त्राणि शक्रतनयः सहदेव आर नीतिं तथोद्धवमुखात् सकलामुदाराम् ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽथ चौपगविमुत्तमनीतियुक्तं सम्प्रेषयन्निदमुवाच ह गोकुलाय ।;दुःखं विनाशय वचोभिररे मदीयैर्नन्दादिनां विरहजं मम चाऽशु याहि ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = मत्तो वियोग इह कस्यचिदस्ति नैव यस्मादहं तनुभृतां निहतोऽन्तरेव ।;नाहं मनुष्य इति कुत्रच वोऽस्तु बुद्धिर्ब्रह्मैव निर्मलतमं प्रवदन्ति मां हि ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं यदा ह्यजगरो निजगार नन्दं सर्वे न शेकुरथ तत्प्रविमोक्षणाय(तत्प्रतिमोक्षणाय) ।;मत्पादसंस्पर्शतः स तदाऽतिदिव्यो विद्याधरस्तदुदितं निखिलं स्मरन्तु ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं स रूपमदतः प्रजहास विप्रान् नित्यं तपःकृशतराङ्गिरसो विरूपान् ।;तैः प्रापितः सपदि सोऽजगरत्वमेव मत्तो निजां तनुमवाप्य जगाद नन्दम् ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = नायं नरो हरिरयं परमः परेभ्यो विश्वेश्वरः सकलकारण आत्मतन्त्रः ।;विज्ञाय चैनमुरुसंसृतितो विमुक्ता यान्त्यस्य पादयुगलं मुनयो विरागाः ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = नन्दं यदा च जगृहे वरुणस्य दूतस्तत्रापि मां जलपतेर्गृहमाशु यान्तम् ।;सम्पूज्य वारिपतिराह विमुच्य नन्दं नायं सुतस्तव पुमान् परमः स एषः ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = सन्दर्शितो ननु मयैव विकुण्ठलोको गोजीविनां स्थितिरपि प्रवरा मदीया ।;मानुष्यबुद्धिमपनेतुमजे मयि स्म तस्मान्मयि स्थितिमवाप्य शमं प्रयान्तु ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वोद्धवो निगदितं परमस्य पुंसो वृन्दावनं प्रति ययौ वचनैश्च तस्य ।;दुःखं व्यपोह्य निखिलं पशुजीवनानामायात् पुनश्चरणसन्निधिमेव विष्णोः ॥ ११२॥ | |||
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<span id="gr-C15" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चदशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C15" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चदशोऽध्यायः"></span> | ||
== पञ्चदशोऽध्यायः == | == पञ्चदशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ एवं प्रशासति जगत् पुरुषोत्तमेऽस्मिन् भीमार्जुनौ तु सहदेवयुतावनुज्ञाम् ।;कृष्णादवाप्य वर्षत्रितयात् पुरं स्वमाजग्मतुर्हरिसुतेन विशोकनाम्ना ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = सैरन्ध्रिकोदरभवः स तु नारदस्य शिष्यो वृकोदररथस्य बभूव यन्ता ।;या पिङ्गलाऽन्यभव आत्मनि संस्थितं तं संस्मृत्य कान्तमुरुगायमभूत् त्रिवक्रा ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = तं पञ्चरात्रविदमाप्य सुसारथिं स भीमो मुमोद पुनराप परात्मविद्याम् ।;व्यासात् परात्मत उवाच च फल्गुनादिदैवेषु(फल्गुणादिदैवेषु) सर्वविजयी परविद्ययैषः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = सर्वानभागवतशास्त्रपथान् विधूय मार्गं चकार स तु वैष्णवमेव शुभ्रम् ।;क्रीडार्थमेव विजिगाय तथोभयात्मयुद्धे बलं च करवाक्प्रभवेऽमितात्मा ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = नित्यप्रभूतसुशुभप्रतिभोऽपि विष्णोः श्रुत्वा परां पुनरपि प्रतिभामवाप ।;को नाम विष्ण्वनुपजीवक आस यस्य नित्याश्रयादभिहिताऽपि रमा सदा श्रीः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = व्यासादवाप परमात्मसतत्त्वविद्यां धर्मात्मजोऽपि सततं भगवत्प्रपन्नाः ।;ते पञ्च पाण्डुतनया मुमुदुर्नितान्तं सद्धर्मचारिण उरुक्रमशिक्षितार्थाः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = यदा भरद्वाजसुतस्त्वसञ्चयी प्रतिग्रहोज्झो निजधर्मवर्ती ।;द्रौणिस्तदा धार्तराष्ट्रैः समेत्य क्रीडन् पयः पातुमुपैति सद्म ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = तस्मै माता पिष्टमालोड्य पातुं ददाति पीत्वैति तदेष नित्यम् ।;पीतक्षीरान् धार्तराष्ट्रान् समेत्य मया पीतं क्षीरमित्याह नित्यम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = नृत्यन्तमेनं पाययामासुरेते पयः कदाचिद् रसमस्य सोऽवैत् ।;पुनः कदाचित् स तु मातृदत्ते पिष्टे नेदं क्षीरमित्यारुराव ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा रुवन्तं(रुदन्तं) सुतमात्मजस्य स्नेहान्नियत्यैव जनार्दनस्य ।;सम्प्रेरितः कृपया चाऽर्तरूपो द्रोणो ययावार्जयितुं तदा गाम् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तः स रामं ययौ न विष्णोर्हि भवेत् प्रतिग्रहः ।;दोषाय यस्मात् स पिताऽखिलस्य स्वामी गुरुः परमं दैवतं च ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैवैनं जामदग्न्योऽप्यचिन्तयद् द्रोणं कर्तुं क्षितिभारापनोदे ।;हेतुं सुराणां नरयोनिजानां हन्ता चायं स्यात् सह पुत्रेण चेति ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = तेषां वृद्धिः स्यात् पाण्डवार्थे हतानां मोक्षेऽपि सौख्यस्य न सन्ततिश्च ।;योग्या सुराणां कलिजा सुपापाः प्रायो यस्मात् कलिजाः सम्भवन्ति ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = न देवानामाशतं पूरुषा हि सन्तानजाः प्रायशः पापयोग्याः ।;नाकारणात् सन्ततेरप्यभावो योग्यः सुराणां सदमोघरेतसाम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = अव्युच्छिन्ने सकलानां सुराणां तन्तौ कलिर्नो भविता कथञ्चित् ।;तस्मादुत्साद्याः सर्व एते सुरांशा एतेन साकं तनयेन वीराः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = एवं विचिन्त्याप्रतिमः स भार्गवो बभाष ईषत्स्मितशोचिषा गिरा ।;अनन्तशक्तिः सकलेश्वरोऽपि त्यक्तं सर्वं नाद्य वित्तं ममास्ति ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = आत्मा विद्या शस्त्रमेतावदस्ति तेषां मध्ये रुचितं त्वं गृहाण ।;उक्तः स इत्थं प्रविचिन्त्य विप्रो जगाद कस्त्वद्ग्रहणे समर्थः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेशिता सर्वपरः स्वतन्त्रस्त्वमेव कोऽन्यः सदृशस्तवेश ।;स्वाम्यं तवेच्छन् प्रतियात्यधो हि यस्मान्न चोत्थातुमलं कदाचित् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = सर्वोत्तमस्येश तवोच्चशस्त्रैः कार्यं किमस्माकमनुद्बलानाम् (अतद्बलानाम्)।;विद्यैव देया भवता ततोऽज सर्वप्रकाशिन्यचला सुसूक्ष्मा ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितस्तत्त्वविद्यादिकाः स विद्याः सर्वाः प्रददौ सास्त्रशस्त्राः ।;अब्दद्विषट्केन समाप्य ताः स ययौ सखायं द्रुपदं महात्मा ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = दानेऽर्द्धराज्यस्य हि तत्प्रतिज्ञां संस्मृत्य पूर्वामुपयातं सखायम् ।;सखा तवास्मीति तदोदितोऽपि जगाद वाक्यं द्रुपदोऽतिदर्पात् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = न निर्धनो राजसखो भवेत यथेष्टतो गच्छ विप्रेति दैवात् ।;इतीरितस्याऽशु बभूव कोपो जितेन्द्रियस्यापि मुनेर्हरीच्छया ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तेन सोऽयं मया प्राप्तो मत्पितुः शिष्यकत्वात् ।;पितुः शिष्यो ह्यात्मशिष्यो भवेत शिष्यस्यार्थः स्वीय एवेति मत्वा ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = सोऽयं पापो मामवज्ञाय मूढो दुष्टं वचोऽश्रावयदस्य दर्पम् ।;हनिष्य इत्येव मतिं निधाय ययौ कुरूञ्छिष्यतां नेतुमेतान् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिग्रहाद् विनिवृत्तस्य चार्थः स्याच्छिष्येभ्यः कौरवेभ्यो ममात्र ।;एवं मन्वानः क्रीडतः पाण्डवेयान् सधार्तराष्ट्रान् पुरबाह्यतोऽख्यत् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = विक्रीडतो धर्मसूनोस्तदैव सहाङ्गुलीयेन च कन्दुकोऽपतत् ।;कूपे न शेकुः सहिताः कुमारा उद्धर्तुमेतं पवनात्मजोऽवदत् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = निष्पत्य चोद्धृत्य समुत्पतिष्ये कूपादमुष्माद् भृशनीचादपि स्म ।;सकन्दुकां मुद्रिकां पश्यताद्य सर्वे कुमारा इति वीर्यसंश्रयात् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = तदा कुमारानवदत् स विप्रो धिगस्त्रबाह्यां भवतां प्रवृत्तिम् ।;जाताः कुले भरतानां न वित्थ दिव्यानि चास्त्राणि सुरार्चितानि ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिता अस्त्रविदं कुमारा विज्ञाय विप्रं सुरपूज्यपौत्रम्(सुरपूज्यपौत्रात्) ।;सम्प्रार्थयामासुरथोद्धृतिं प्रति प्रधानमुद्रायुतकन्दुकस्य ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = स चाऽश्विषीकाभिरथोत्तरोत्तरं सम्प्रास्य दिव्यास्त्रबलेन कन्दुकम् ।;उद्धृत्य मुद्रोद्धरणार्थिनः पुनर्जगाद भुक्तिर्मम कल्प्यतामिति ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = यथेष्टवित्ताशनपानमस्य धर्मात्मजः प्रतिजज्ञे सुशीघ्रम् ।;तथैव तेनोद्धृतमङ्गुलीयं त्रिवर्गमुख्यात्मजवाक्यतोऽनु ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = पप्रच्छुरेनं सहिताः कुमाराः कोऽसीति सोऽप्याह पितामहो वः ।;वक्तेति ते दुद्रुवुराशु भीष्मं द्रोणोऽयमित्येव स तांस्तदोचे ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = न राजगेहं स कदाचिदेति तेनादृष्टः स कुमारैः पुराऽतः ।;भीष्मो विद्यास्तेन सहैव चिन्तयन्नस्त्रप्राप्तिं तस्य शुश्राव रामात् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा वृद्धं कृष्णवर्णं द्विजं तं महास्त्रविद्यामपि तां महामतिः ।;द्रोणं ज्ञात्वा तस्य शिष्यत्व एतान् ददौ कुमारांस्तत्र गत्वा स्वयं च ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणोऽथ तानवदद् यो मदिष्टं कर्तुं प्रतिज्ञां प्रथमं करोति ।;तं धन्विनां प्रवरं साधयिष्य इत्यर्जुनस्तामकरोत् प्रतिज्ञाम् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = उन्मादनादीनि स वेद कृष्णादस्त्राण्यनापत्सु न तानि मुञ्चेत् ।;इत्याज्ञया केशवस्यापराणि प्रयोगयोग्यानि सदेच्छति स्म ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मादिभिर्भविता सङ्गरो नस्तदा नाहं गुरुभिर्नित्ययोद्धा ।;भवेयमेकः फल्गुनोऽस्त्रज्ञ एषां निवारकश्चेन्मम धर्मलाभः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = न बुद्धिपूर्वं वर इन्दिरापतेरन्यत्र मे ग्राह्य इतश्च जिष्णुः ।;करोतु गुर्वर्थमिति स्म चिन्तयन् भीमः प्रतिज्ञां न चकार तत्र ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = तत्प्रेरितेनार्जुनेन प्रतिज्ञा कृता यदा विप्रवरस्ततः परम् ।;स्नेहं नितान्तं सुरराजसूनौ कृत्वा महास्त्राणि ददौ स तस्य ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = स पक्षपातं च चकार तस्मिन् करोति चास्योरुतरां प्रशंसाम् ।;रहस्यविद्याश्च ददाति तस्य नान्यस्य कस्यापि तथा कथञ्चित् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = भीमः समस्तं प्रतिभाबलेन जानन् स्नेहं त्वद्वितीयं कनिष्ठे ।;द्रोणस्य कृत्वा सकलास्त्रवेदिनं कर्तुं पार्थं नार्जुनवच्चकार ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = नैवातियत्नेन ददर्श लक्षं शुश्रूषायां पार्थमग्रे करोति ।;स्वबाहुवीर्याद् भगवत्प्रसादान्निहन्मि शत्रून् किमनेन चेति ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = तदा समीयुः सकलाः क्षितीशपुत्रा द्रोणात् सकलास्त्राण्यवाप्तुम् ।;ददौ स तेषां परमास्त्राणि विप्रो रामादवाप्तान्यगतानि चान्यैः ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्राणि चित्राणि महान्ति दिव्यान्यन्यैर्नृपैर्मनसाऽप्यस्मृतानि ।;अवाप्य सर्वे तनया नृपाणां शक्ता बभूवुर्न यथैव पूर्वे ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = नैतादृशाः पूर्वमासन् नरेन्द्रा अस्त्रे बले सर्वविद्यासु चैव ।;दौष्यन्तिमान्धातृमरुत्तपूर्वाश्चैतत्समानाः नासुरदारवीर्याः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = तदा कर्णोऽथैकलव्यश्च दिव्यान्यस्त्राण्याप्तुं द्रोणसमीपमीयतुः ।;सूतो निषाद इति नैतयोरदादस्त्राणि विप्रः स तु रामशिष्यः ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = कर्णोऽनवाप्य निजमीप्सितमुच्चमानो यस्मादवाप पुरुषोत्तमतोऽस्त्रवृन्दम् ।;विप्रोऽप्ययं तमजमेमि भृगोः कुलोत्थमित्थं विचिन्त्य स ययौ भृगुपाश्रमाय ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = स सर्ववेत्तुश्च विभोर्भयेन विप्रोऽहमित्यवददस्त्रवरातिलोभात् ।;जानन्नपि प्रददावस्य रामो दिव्यान्यस्त्राण्यखिलान्यव्ययात्मा(अव्यथात्मा) ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रज्ञचूळामणिमिन्द्रसूनुं विश्वस्य हन्तुं धृतराष्ट्रपुत्रः ।;एनं समाश्रित्य दृढो भवेतेत्यदाज्ज्ञात्वैवास्त्रमस्मै रमेशः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं च भागवतमप्यपराश्च विद्या रामादवाप्य विजयं धनुरग्र्ययानम् ।;अब्दैश्चतुर्भिरथ च न्यवसत् तदन्ते हातुं न शक्त उरुगायमिमं स कर्णः ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = अङ्के निधाय स कदाचिदमुष्य रामः शिश्ये शिरो विगतनिद्र उदारबोधः ।;संसुप्तवत् सुरवरः सुरकार्यहेतोर्दातुं च वालिनिधनस्य फलं तदस्य ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = तत्राऽस राक्षसवरः स तु हेतिनामा काले महेन्द्रमनुपास्य हि शापतोऽस्य ।;कीटस्तमिन्द्र उत तत्र समाविवेश कर्णस्य शापमुपपादयितुं सुतार्थे ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = कर्णः स कीटतनुगेन किरीटिनैव ह्यूरोरधस्तनत (ओपरिगात्वचः)औपरिगात्वचश्च ।;विद्धः शरेण स यथा रुधिरस्य धारां सुस्राव तं विगतनिद्र इवाऽह रामः ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = किं त्वं न चालयसि मां रुधिरप्रसेके प्राप्तेऽपि पावनविरोधिनि कोऽसि चेति ।;तं प्राह कर्ण इह नैव मया विधेयो निद्राविरोध इति कीट उपेक्षितो मे ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = जात्याऽस्मि सूत उत ते तनयोऽस्मि सत्यं तेनास्मि विप्र इति भार्गववंशजोऽहम् ।;अग्रेऽब्रुवं भवत ईश नहि त्वदन्यो माता पिता गुरुतरो जगतोऽपि मुख्यः ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तमात्रवचने स तु कीटकोऽस्य रामस्य दृष्टिविषयत्वत एव रूपम् ।;सम्प्राप्य नैजमतिपूर्णगुणस्य तस्य विष्णोरनुग्रहत आप विमानगः स्वः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह रामस्तमसत्यवाचो न ते सकाशे मम वासयोग्यता ।;तथाऽपि ते नैव वृथा मदीया भक्तिर्भवेज्जेष्यसि सर्वशत्रून् ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = अस्पर्धमानं न कथञ्चन त्वां जेता कश्चित् स्पर्धमानस्तु यासि ।;पराभूतिं नात्र विचार्यमस्ति प्रमादी त्वं भविता चास्त्रसङ्घे (अस्त्रसङ्ख्ये)॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = याहीति तेनोक्त उदारकर्मणा कर्णो ययौ तं प्रणम्येशितारम् ।;तथैकलव्योऽपि निराकृतोऽमुना द्रोणेन तस्य प्रतिमां वनेऽर्चयत् ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = ततः कदाचिद् धृतराष्ट्रपुत्रैः पाण्डोः सुता मृगयां सम्प्रयाताः ।;अग्रे गच्छन् सारमेयो रुराव धर्मात्मजस्यात्र वने मृगार्थी ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा रावं सारमेयस्य दूराच्छरैर्मुखं शब्दवेधी पुपूरे ।;स एकलव्यो व्रणमस्य नाकरोच्छ्वा पूरितास्यः पाण्डवानभ्ययात् सः ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा चित्रं कुरवः पाण्डवाश्च द्रष्टुं कर्तारं मार्गयामासुरत्र ।;द्रोणाकृतिं मार्त्तिकीं पूजयन्तं ददृशुश्चैनं धनुरेवाभ्यसन्तम् ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = पुनः कृपालू रैवतपर्वते तं द्रोणः प्राप्याऽदादस्त्रवराणि तस्मै ।;एकान्त एवास्य भक्त्या सुतुष्टो धन्विश्रेष्ठं कृतवानर्जुनं च ॥ ६६॥ | |||
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<span id="gr-C16" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षोडशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C16" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षोडशोऽध्यायः"></span> | ||
== षोडशोऽध्यायः == | == षोडशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ काले त्वेतस्मिन् भूय एवाखिलैश्च नृपैर्युक्तो मागधो योद्धुकामः ।;प्रायाद् यदूंस्तत्र नित्याव्ययातिबलैश्वर्योऽपीच्छयाऽगात् स कृष्णः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = सन्दर्शयन् बलिनामल्पसेनाद्युपस्कराणां बहलोपस्करैश्च ।;प्राप्ते विरोधे बलिभिर्नीतिमग्र्यां ययौ सरामो दक्षिणाशां रमेशः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = सोऽनन्तवीर्यः परमोऽभयोऽपि नीत्यै गच्छन् जामदग्न्यं ददर्श ।;क्रीडार्थमेकोऽपि ततोऽतिदुर्गं श्रुत्वा गोमन्तं तत्र ययौ सहाग्रजः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = तदा दुग्धाब्धौ संसृतिस्थैः सुराद्यैः पूजां प्राप्तुं स्थानमेषां च योग्यम् ।;मुक्तस्थानादाप नारायणोऽजो बलिश्चाऽगात् तत्र सन्द्रष्टुमीशम् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = तत्रासुरावेशममुष्य विष्णुः सन्दर्शयन् सुप्तिहीनोऽपि नित्यम् ।;संसुप्तविच्छश्य उदारकर्मा सञ्ज्ञायै देवानां मुखमीक्ष्याप्रमेयः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = देवाश्च तद्भावविदोऽखिलाश्च निमीलिताक्षाः शयनेषु शिश्यरे ।;तदा बलिस्तस्य विष्णोः किरीटमादायागाज्जहसुः सर्वदेवाः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = नारायणे सर्वदेवैः समेते ब्रह्मादिभिर्हासमाने सुपर्णः ।;गत्वा पातालं युधि जित्वा बलिं च किरीटमादायाभ्ययाद् यत्र कृष्णः ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = तत् तस्य शीर्ष्णि प्रतिमुच्य नत्वा खगः स्तुत्वा देवदेवं रमेशम् ।;स्मृत आगच्छेत्येव विसर्जितोऽमुना ययौ दुग्धाब्धिं यत्र नारायणोऽसौ ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = किरीटं तत् कृष्णमूर्ध्नि प्रविष्टं तत्तुल्यमासीत् तस्य रूपेष्वभेदात् ।;तदिच्छया चैव नारायणस्य शीर्ष्ण्यप्यासीद् युगपद् दुग्धवार्धौ ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं प्राप्तान्येव दिव्यायुधानि पुनर्वैकुण्ठं लोकमितानि भूयः ।;तदाऽवतेरू रौहिणेयस्य चैवं भार्याऽप्यायाद् वारुणी नाम पूर्वा ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = सैवापरं रूपमास्थाय चाऽगाच्छ्रीरित्याख्यं सेन्दिरावेशमग्र्यम् ।;कान्तिश्चाऽगात् तस्य सोमस्य चान्या भार्या द्वयोः पूर्वतना सुरूपा ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = ताभी रामो मुमुदे तत्र तिष्ठञ्छशाङ्कपूगोद्रिक्तकान्तिः सुधामा ।;तस्या वारुण्याः प्रतिमा पेयरूपा कादम्बरी वारुणी(वारुणीं) तां पपौ सः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = एवं तयोः क्रीडतोः स्वैरमत्र राजन्यवृन्दानुगतो जरासुतः ।;गिरिं गोमन्तं परिवार्यादहत् तं दृष्ट्वा देवौ पुप्लुवतुर्बलाढ्यौ ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = गिरिस्ताभ्यां पीडितः सन् निमग्नो भूमौ पद्भ्यां योजनैकादशं सः ।;निष्पीडिताज्जलधारोद्गताऽस्माद् वह्निं व्याप्तं शमयामास सर्वम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = सेनां प्रविष्टौ सर्वराजन्यवृन्दं व्यमथ्नतां देववरौ स्वशस्त्रैः ।;तत्र हंसो डिभिकश्चैकलव्यः (स कीचक)सकीचकस्तौ शिशुपालपौण्ड्रकौ ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = भौमात्मजो दन्तवक्रश्च रुग्मी सौभाधिपो मैन्दमैन्दानुजौ च ।;अन्ये च ये पार्थिवाः सर्व एव क्रोधात् कृष्णं परिवार्याभ्यवर्षन् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = शस्त्रैरस्त्रैर्द्रुमपूगैः शिलाभिर्भक्ताश्च ये शल्यबाह्लीकमुख्याः ।;ससोमदत्ताः सौमदत्तिर्विराटः पाञ्चालराजश्च जरासुतस्य ।;भयात् कृष्णं शस्त्रवर्षैरवर्षन् कारागृहे वासिता मागधेन ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = सर्वानेताञ्छरवर्षेण कृष्णो विसूतवाजिध्वजशस्त्रवर्मणः ।;कृत्वा वमच्छोणितानार्तरूपान् विद्रावयामास हरिर्यथा मृगान् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = हत्वा सेनां विंशदक्षोहिणीं तां त्रिभिर्युक्तां रुग्मिणं नैव कृष्णः ।;रुग्मिण्यर्थे पीडयामास शस्त्राण्यस्य च्छित्वा विरथं द्रावयानः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = जरासुतो रौहिणेयेन युद्धं चिरं कृत्वा तन्मुसलेन पोथितः ।;विमोहितः प्राप्तसञ्ज्ञश्चिरेण क्रुद्धो गदां तदुरस्यभ्यपातयत् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = तेनाऽहतः सुभृशं रौहिणेयः पपात मूर्च्छाभिगतः क्षणेन ।;अजेयत्वं तस्य दत्तं हि धात्रा पूर्वं गृहीतं (गृहीतो) विष्णुना रामगेन ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = तथाकृते बलभद्रे तु कृष्णो गदामादाय स्वामगान्मागधेशम् ।;तताड जत्रौ स तयाऽभिताडितो जगाम गां मूर्च्छयाऽभिप्लुताङ्गः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = अथोत्तस्थौ रौहिणेयः सहैव समुत्तस्थौ मागधोऽप्यग्र्यवीर्यः ।;क्रुद्धो गृहीत्वा मौलिमस्याऽशु रामो वधायोद्यच्छन्मुसलं बाहुषाली ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = अथाब्रवीद् वायुरेनं न राम त्वया हन्तुं शक्यते मागधोऽयम् ।;वृथा न ते बाहुबलं प्रयोज्यममोघं ते यद् बलं तद्वदस्त्रम् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = अन्यो हन्ता बलवानस्य चेति श्रुत्वा ययौ बलभद्रो विमुच्य ।;जरासुतं पुनरुद्यच्छमानं जघान कृष्णो गदया स्वयैव ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = तेनाऽहतः स्रस्तसमस्तगात्रः पपात मूर्च्छाभिगतः स राजा ।;चिरात् सञ्ज्ञां प्राप्य चान्तर्हितोऽसौ सम्प्राद्रवद् भीतभीतः सलज्जः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = ययौ शिष्टै राजभिः संयुतश्च पुरं जीवेत्येव कृष्णेन मुक्तः ।;पुनर्युद्धं बहुशः केशवेन कृत्वा जितो राजगणैः समेतः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णो जित्वा मागधं रौहिणेययुक्तो ययौ दमघोषेण सार्द्धम् ।;पितृष्वसायाः पतिना तेन चोक्तः पूर्वं जितेनापि युधि स्म बान्धवात् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = यामः पुरं करिवीराख्यमेव महालक्ष्म्याः क्षेत्रसन्दर्शनाय ।;श्रुत्वा वाक्यं तस्य युद्धे जितस्य भीत्या(प्रीत्या) युक्तस्याऽत्मना तद्युतोऽगात् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्वोऽसौ दनुनामा नरोऽभूत् तस्मात् कृष्णे भक्तिमांश्चाऽस राजा ।;पुरप्राप्तांस्तान् स विज्ञाय पापः सृगालाख्यो वासुदेवः क्रुधाऽऽगात् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = सूर्यप्रदत्तं रथमारुह्य दिव्यं वरादवध्यस्तिग्मरुचेः स कृष्णम् ।;योद्धुं ययावमुचच्चास्त्रसङ्घाञ्छिरस्तस्याथाऽशु जहार कृष्णः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = द्विधा कृत्वा देहमस्यारिणा च पुत्रं भक्तं तस्य राज्येऽभिषिच्य ।;स शक्रदेवं माणिभद्रः पुरा यो ययौ पुरीं स्वां सहितोऽग्रजेन ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = नीतिं बलिष्ठस्य विहाय सेनां दूराद् युद्धं युद्धं दर्शयित्वैव गुप्त्यै ।;स्वसेनायाः सर्वपूर्णात्मशक्तिः पुनः पुरीं प्राप्य स पूजितोऽवसत् ॥ ३३॥ | |||
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<span id="gr-C17" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तदशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C17" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तदशोऽध्यायः"></span> | ||
== सप्तदशोऽध्यायः == | == सप्तदशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ गतेऽथ चेदिपे स्वकं पुरं जनार्दनोऽशृणोत् ।;रमैव रुग्मिणीति योद्यतां स्वयम्बराय ताम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = जिता वयं च सर्वशोऽमुनैकलेन संयुगे ।;अनेकशो न सङ्गतैर्जितः कदाचिदेष हि ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = अमुष्य चाग्रजः पुरा निहन्तुमुद्यतो हि माम् ।;अदृश्यवाक्यतोऽत्यजत् प्रताडनात् सुपीडितम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = किमस्य (चोच्यते)तूच्यते बलं वयं तृणोपमाः कृताः ।;समस्तशो मृधेमृधे हि येन चाक्षतेन हा ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = किमत्र कुर्वतां सुखं भवेदुदीर्णसङ्कटे ।;इति ब्रुवन्नवाङ्मुखं नृपश्चकार विच्छविः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह चेदिभूपतिः सदन्तवक्रको वचः ।;पुरा हरेर्हि पार्षदः प्रसन्नबुद्धिरेकदा ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = शृणुष्व राजसत्तम प्रभुं शिवस्वयम्भुवोः ।;हरिं वदन्ति केचिदप्यदो भवेन्न वै मृषा ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽऽवयोश्च दर्शने भवेत् कदाचिदूर्जिता ।;अमुष्य भक्तिरन्यथा पुनश्च जायते क्रुधा ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = न कारणं च विद्महे न संशयः परो हरिः ।;व्रजाम तं सुखार्थिनो वयं विहाय शत्रुताम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = इदं हि नः शुभप्रदं नचान्यथा शुभं क्वचित् ।;इतीरितो जरासुतो ददर्श तौ दहन्निव ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = अथ प्रहस्य सौभराड् वचो जगाद मागधम् ।;विनिन्द्य तौ क्रुधा स्फुरन् क्रुधा स्फुरन्तमीक्ष्य च ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = न तन्मृषा हरिः स्वयं जनार्दनो वधाय नः ।;प्रजात एष यादवो वयं च दानवेश्वराः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = स्वधर्म एष नः सदा दृढप्रतीपता हरौ ।;स्वधर्मिणो हता अपि प्रयाम सद्गतिं ध्रुवम् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = शिवश्च नः परा गतिर्गुरुर्भवानरिर्हरेः ।;इतीरितः स मागधो जगाद साधु साध्विति ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = तथैव रुक्मिपूर्वकाः करूशचेदिपौ च तौ ।;विनिश्चयं कुबुद्धयो युधे च चक्रुरूर्जितम् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = सदा प्रतीपकारिणौ भवाव कृष्ण इत्यपि ।;गुरोः प्रसादमाप्नुतां करूशचेदिभूभृतौ ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च ते त्वमन्त्रयन् सहैव पापबुद्धयः ।;ध्रुवं समागतो हरिर्लभेत रुक्मिणीमिमाम् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = अयं त्रिलोकसुन्दरोऽनुरूपिणी च रुक्मिणी ।;मुखेन बाहुनाऽप्ययं समस्तलोकजिद् वशी ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = समस्तवेदिनां वरं जितारिमग्र्यरूपिणम् ।;समस्तयोषितां वरा व्रजेत रुक्मिणी ध्रुवम् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = वयं च मानसङ्क्षयं नितान्तमाप्नुमस्तदा ।;न शक्नुमो निवारितुं शरैरमुं कथञ्चन ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = अतः स्वयंवरे यथा न सङ्गमो हरेर्भवेत् ।;तथा विधानमेव नः सुनीतिरूर्जिता ध्रुवम् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = अतो न देयमस्य नः सुभूभुजां समागमे ।;क्वचित् कदाचिदासनं नचार्घ्यपूर्वको विधिः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = नचाऽस्यति क्षितौ क्वचिद् विमानितः पुरो हि नः ।;वरासनस्थभूभुजां स मानितो हि दैवतैः ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = स दर्पमानसंयुतः क्रुधा प्रयास्यति ध्रुवम् ।;पुरीं स्वकां ततौ वयं विधेम च स्वयंवरम् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = इति स्म सर्वभूभृतां विनिश्चयं सकैशिकः ।;क्रथोऽवगम्य भीष्मकानुजोऽभ्ययाद्धरिं द्रुतम् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽगमच्छतक्रतोर्वचः प्रगृह्य भूभुजः ।;जरासुतादिकान् पुमानुवाच चार्थवद् वचः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = अहं प्रियः शचीपतेः सदाऽस्य चाक्षिगोचरः ।;सुरेन्द्र आज्ञयाऽवदन्नृपान् व ईश्वरो हि सः ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = समस्तराजसत्पतिर्हरिर्न चान्य इत्यपि ।;वराभिषेकमीशितुः कुरुध्वमाश्वसंशयम् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = अतोऽन्यथा शिरस्यहं निपातयामि वोऽशनिम् ।;इतीदमिन्द्रशासनं कुरुध्वमित्यसौ ययौ ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = तदीरितं निशम्य ते पुनः सुतप्तचेतसः ।;बभूवुरूचिरे वचः सुगर्वितो हि वासवः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = पुरा बिभेति नः सदा प्रतिप्रति स्म वासवः ।;उताद्य कृष्णसंश्रयाद् दृढं विभीषयत्यसौ ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = अदृश्य एव देवराड् यदि स्म वज्रमुत्सृजेत् ।;भवेम पीडिता वयं वरादमृत्यवोऽपि हि ॥ ३८॥ | |||
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== अष्टादशोऽध्यायः == | == अष्टादशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ यदा रामादवाप्तानि दिव्यास्त्राणि प्रपेदिरे ।;द्रोणात् कुमारास्तेष्वासीत् सर्वेष्वप्यधिकोऽर्जुनः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = निजप्रतिभया जानन् सर्वास्त्राणि ततोऽधिकम् ।;नास्त्रयुद्धं क्वचिद् भीमो मन्यते धर्ममञ्जसा ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = न हि भागवतो धर्मो देवताभ्युपयाचनम् ।;ज्ञानभक्ती हरेस्तृप्तिं विना विष्णोरपि क्वचित् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = नाऽकाङ्क्ष्यं किमुतान्येभ्यो ह्यस्त्रं काम्यफलप्रदम् ।;शुद्धे भागवते धर्मे निरतो यद् वृकोदरः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = न काम्यकर्मकृत् तस्मान्नायाचद् देवमानुषान्(दैवमानुषान्) ।;न हरिश्चार्थितस्तेन कदाचित् कामलिप्सया(काम्यलिप्सया) ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = भिक्षामटंश्च हुङ्कारात् करवद् वैश्यतोऽग्रहीत् ।;नान्यदेवा नतास्तेन वासुदेवान्न पूजिताः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = न प्रतीपं हरेः क्वापि स करोति कथञ्चन ।;अनुपस्करिणो युद्धे नाभियाति ह्युपस्करी ।;नापयाति युधः क्वापि न क्वचिच्छद्म चाऽचरेत् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = (न चौर्ध्वदैहिकानुज्ञां) नैवोर्ध्वदैहिकानुज्ञामवैष्णवकृतेऽकरोत् ।;न करोति स्वयं नैषां प्रियमप्याचरेत् क्वचित् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = सख्यं नावैष्णवैश्चक्रे प्रतीपं वैष्णवेन च(तु) ।;परोक्षेऽपि हरेर्निन्दाकृतो जिह्वां छिनत्ति च ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = प्रतीपकारिणो हन्ति विष्णोर्वैतानजीघनत्(विष्णोर्वै तान्) ।;न संशयं कदाऽप्येष धर्मे ज्ञानेऽपि वाऽकरोत् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = आज्ञयैव हरेर्द्रौणेरस्त्राण्यस्त्रैरशामयत् ।;अदृश्योऽलम्बुसो भग्नो नान्यत्र तु कथञ्चन ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = नह्यस्त्रयुद्धे सदृशो द्रौणेरस्त्यर्जुनादृते ।;सर्ववित्त्वं ततो भीमे प्रदर्शयितुमीश्वरः ।;अदादाज्ञामस्त्रयुद्धे तथैवालम्बुसं प्रति ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = अन्वेनमेव तद्धर्मे कृष्णैका संस्थिता सदा ।;धृतराष्ट्रादपि वरं ततो नाऽत्मार्थमग्रहीत् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = नाशपद् धार्तराष्ट्रांश्च महापद्यपि सा ततः ।;न वाचा मनसा वाऽपि प्रतीपं केशवेऽचरत् ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = अन्ये भागवतत्वेऽपि छिन्नधर्माः क्वचित्क्वचित् ।;स्यमन्तकार्थे रामोऽपि कृष्णस्य विमनाऽभवत् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = अवमेनेऽर्जुनः कृष्णं विप्रस्य शिशुरक्षणे ।;प्रद्युम्न उद्धवः साम्बोऽनिरुद्धाद्याश्च सर्वशः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = हरेरिष्टं सुभद्रायाः फल्गुने दानमञ्जसा ।;ज्ञात्वाऽपि रुरुधुः सम्यक् सात्यकिः कृष्णसम्मितम् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = कदाचिन्मन्यते पार्थं धर्मजोऽपि नरं हरिम् ।;मत्वाऽबिभेज्जरासन्धवधे कृष्णमुदीरितुम् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = बन्धनं शङ्कमानो हि कृष्णस्य विदुरोऽपितु ।;कौरवेयसभामध्ये नावतारमरोचयत् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = नकुलः करदानाय प्रेषयामास केशवे ।;अवमेने हरेर्बुद्धिं सहदेवः कुलक्षयात् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = देवकीवसुदेवाद्या मेनिरे मानुषं हरिम् ।;भीष्मस्तु भार्गवं राममवमेने युयोध च ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणकर्णद्रौणिकृपाः कृष्णाभावे मनो दधुः ।;देवाः शिवाद्या अपितु विरोधं चक्रिरे क्वचित् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = ऋषिमानुषगन्धर्वा वक्तव्याः किमतः परम् (परे)।;जन्मजन्मान्तरेऽज्ञानादवजानन्ति यत् सदा ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादेको वायुरेव धर्मे भागवते स्थिरः ।;लक्ष्मीः सरस्वती चेति परशुक्लत्रयं श्रुतम् (स्मृतम्) ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = सर्वमेतच्च कथितं तत्रतत्रामितात्मना ।;व्यासेनैव पुराणेषु भारते च स्वसंविदा ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = यदा ते सर्वशस्त्रास्त्रवेदिनो राजपुत्रकाः ।;बभूवू रङ्गमध्ये तान् भारद्वाजोऽप्यदर्शयत् (व्यदर्शयत्)॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = रक्तचन्दनसत्पुष्पवस्त्रशस्त्रगुडोदनैः ।;सम्पूज्य भार्गवं राममनुजज्ञे कुमारकान् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = ते भीष्मद्रोणविदुरगान्धारीधृतराष्ट्रकान् ।;सराजमण्डलान् नत्वा कुन्तीं चादर्शयञ्छ्रमम् ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = सर्वैः प्रदर्शितेऽस्त्रे तु द्रोणादात्तमहास्त्रवित् ।;द्रौणिरस्त्राण्यमेयानि दर्शयामास चाधिकम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽप्यतितरां पार्थो दिव्यास्त्राणि व्यदर्शयत् (दिव्यास्त्राण्यप्यदर्शयत्)।;अविध्यन्माशके पादे पक्षिणः पक्ष्म एव च(पक्ष्ममेव च) ।;एवमादीनि चित्राणि बहून्येष व्यदर्शयत् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = तदैव कर्ण आगत्य रामोपात्तास्त्रसम्पदम् ।;दर्शयन्नधिकः पार्थादभूद् राजन्यसंसदि ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = कुन्ती निजं सुतं(निजसुतं) ज्ञात्वा लज्जया नावदच्च तम् ।;पार्थोऽसहंस्तं युद्धायैवाऽह्वयामास संसदि ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = रणायाक्षत्रियाह्वानं जानन् धर्मप्रतीपकम् ।;भीमो निवार्य बीभत्सुं कर्णायादात् प्रतोदकम् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = अक्षत्रसंस्कारयुतो जातोऽपि क्षत्रिये कुले ।;न क्षत्रियो हि भवति यथा व्रात्यो द्विजोत्तमः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = निरुत्तरे कृते कर्णे भीमेनैव सुयोधनः ।;अभ्यषेचयदङ्गेषु राजानं पित्रनुज्ञया ।;धृतराष्ट्रः पक्षपातात् पुत्रस्यानुवशोऽभवत् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = अभिषिक्ते तदा कर्णे प्रायादधिरथः पिता ।;सर्वराजसदोमध्ये(सभामध्ये) ववन्दे तं वृषा तदा ।;तुतुषुः कर्मणा तस्य सन्तः सर्वे समागताः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = भीमदुर्योधनौ तत्र शिक्षासन्दर्शनच्छलात् ।;समादाय गदे गुर्वी संरम्भादभ्युदीयतुः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = देवासुरमनुष्यादि जगदेतच्चराचरम् ।;सर्वं तदा द्विधा भूतं भीमदुर्योधनाश्रयात् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = देवा देवानुकूलाश्च भीममेव समाश्रिताः ।;असुरा आसुराश्चैव दुर्योधनसमाश्रयाः ।;द्विधाभूता मानुषाश्च(मनुष्याश्च) देवासुरविभेदतः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = जय भीम महाबाहो जय दुर्योधनेति च ।;हुङ्कारांश्चैव फट्कारांश्चक्रुर्देवासुरा अपि ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा जगत् सुसंरब्धं द्रोणोऽथ द्विजसत्तमः ।;नेदं जगद् विनश्येत भीमदुर्योधनाश्रयात् ।;इति पुत्रेण तौ वीरौ न्यवारयदरिन्दमौ ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = स्वकीयायां स्वकीयायां योग्यतायां नतु क्वचित् ।;युवयोः सम इत्युक्त्वा द्रौणिरेतौ न्यवारयत् ।;द्रोणाज्ञया वारितौ तौ ययतुः स्वं स्वमालयम् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = सुरासुरान् सुसंरब्धान् कालेन द्रक्ष्यथेति च ।;ब्रह्मा निवार्य ससुरो ययौ सेशः स्वमालयम् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = कर्णं हस्ते प्रगृह्यैव धार्तराष्ट्रो गृहं ययौ ।;पार्थं हस्ते प्रगृह्यैव भीमः प्रायात् स्वमालयम् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = पार्थेन कर्णो हन्तव्य इत्यासीद् भीमनिश्चयः ।;वैपरीत्येन तस्याऽसीद् दुर्योधनविनिश्चयः ।;तदर्थं नीतिमतुलां चक्रतुस्तावुभावपि ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = तथोत्कर्षे फल्गुनस्य यशसो निजयस्य च ।;उद्योग आसीद् भीमस्य धार्तराष्ट्रस्य चान्यथा ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = भीमार्थं केशवोऽन्ये च देवाः फल्गुनपक्षिणः ।;आसन् यथैव रामाद्याः सङ्ग्रहेण हनूमतः ।;सुराः सुग्रीवपक्षस्थाः पूर्वमासंस्तथैव हि ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = तदर्थमेव भीमस्य ह्यनुजत्वं सुरेश्वरः ।;आप पूर्वानुतापेन तेन भीमस्तथाऽकरोत् ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनार्थं कर्णस्य पक्षिणो दैत्यदानवाः ।;आसुः सर्वे ग्लहावेतावासतुः कर्णफल्गुनौ ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = अथ पृष्टो दक्षिणार्थं(दक्षिणायां) द्रोण आह कुमारकान् ।;बद्ध्वा पाञ्चालराजानं दत्तेत्यूचुस्तथेति ते ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = ते धार्तराष्ट्राः कर्णेन सहिताः पाण्डवा अपि ।;ययुर्द्रोणेन सहिताः पाञ्चालनगरं प्रति ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह भीमः सामर्थ्यविवेकाभीप्सया गुरुम् ।;गर्व एष कुमाराणामनिवार्यो द्विजोत्तम ।;गच्छन्त्वेतेऽग्रतो नैषां वशगो द्रुपदो भवेत् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रीबालवृद्धसहितैः पाञ्चालैरप्यनुद्रुताः ।;भीमार्जुनेति वाशन्तो ययुर्यत्र स्म पाण्डवाः ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = तान् प्रभग्नान् समालोक्य भीमः प्रहरतां वरः ।;आरुरोह रथं वीरः पुर आत्तशरासनः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = तमन्वयादिन्द्रसूनुः यमौ तस्यैव चक्रयोः ।;युधिष्ठिरस्तु द्रोणेन सह तस्थौ निरीक्षकः ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = आयान्तमग्रतो दृष्ट्वा भीममात्तशरासनम् ।;दुद्रुवुः सर्वपाञ्चालाः विविशुः पुरमेव च ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = द्रुपदस्त्वभ्ययाद् भीमं सपुत्रः सारसेनया ।;चक्ररक्षौ तु तस्याऽस्तां युधामन्यूत्तमौजसौ ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = धात्रर्यमावेशयुतौ विश्वावसुपरावसू ।;सुतौ तस्य महावीर्यौ सत्यजित् पृष्ठतोऽभवत् ।;स मित्रांशयुतो वीरश्चित्रसेनो महारथः ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = अग्रतस्तु शिखण्ड्यागाद् रथोदारः शरान् क्षिपन् ।;जनमेजयस्तमन्वेव पूर्वं चित्ररथो हि यः ।;त्वष्टुरावेशसंयुक्तः स शरानभ्यवर्षत ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = तावुभौ विरथौ कृत्वा विचापौ च विवर्मकौ ।;भीमो जघान तां सेनां सवाजिरथकुञ्जराम् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = अथैनं शरवर्षेण युधामन्यूत्तमौजसौ ।;अभीयतुस्तौ विरथौ चक्रे भीमो निरायुधौ ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = हस्तप्राप्तं च पाञ्चालं नाग्रहीत् स वृकोदरः ।;गुर्वर्थामर्जुनस्योर्वीं प्रतिज्ञां कर्तुमप्यृताम् ।;मानभङ्गाय कर्णस्य पार्थमेव न्ययोजयत् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = स शरान् क्षिपतस्तस्य पाञ्चालस्यार्जुनो द्रुतम् ।;पुप्लुवे स्यन्दने चापं छित्वा तं चाग्रहीत् क्षणात् ।;सिंहो मृगमिवाऽदाय स्वरथं नाभिपेदिवान् (स्वरथे चाभिपेतिवान्) ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = अथ प्रकुपितं सैन्यं फल्गुनं पर्यवारयत् ।;जघान भीमस्तरसा तत् सैन्यं शरवृष्टिभिः ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = अथ सत्यजिदभ्यागात् पार्थं मुञ्चञ्छरान् बहून् ।;तमर्जुनः क्षणेनैव चक्रे विरथकार्मुकम् ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = घ्नन्तं भीमं पुनः सैन्यमर्जुनः प्राह मा भवान् ।;सेनामर्हति राज्ञोऽस्य वीर हन्तुमशेषतः ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = सम्बन्धयोग्यस्तातस्य सखाऽयं न सुधार्मिकः ।;नेष्याम एनमेवातो गुरोर्वचनगौरवात् ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = स्नेहपाशं ततश्चक्रे बीभत्सौ द्रुपदोऽधिकम् ।;ततः सेनां विहायैव भीमो बीभत्सुमन्वयात् ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = मुक्ता कथञ्चिद् भीमास्यात् सा सेना दुद्रुवे भयात् ।;द्रुपदं स्थापयामासाथार्जुनो द्रोणसन्निधौ ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = पप्रच्छैनं तदा द्रोणसख्यमस्त्युत नेति वा ।;अस्तीदानीमिति प्राह द्रुपदोऽङ्गिरसां वरम् ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह द्रुपदं द्रोणः सख्यमिच्छेऽक्षयं तव ।;नह्यराज्ञो भवेत् सख्यं तवेतीदं कृतं मया ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = न विप्रधर्मो यद् युद्धमतस्त्वं न मया धृतः ।;शिष्यैरेतत् कारितं मे तव सख्यमभीप्सता ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = अतः सख्यार्थमेवाद्य त्वद्राज्यार्धो हृतो मया ।;गङ्गाया दक्षिणे कूले त्वं राजैवोत्तरे त्वहम् ।;न ह्यराजत्व एकस्य सख्यं स्यादावयोः सखे ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त्वोन्मुच्य तं द्रोणो राज्यार्धं गृह्य चामुतः ।;ययौ शिष्यैर्नागपुरं न्यवसत् सुखमत्र च ।;ब्राह्मण्यत्यागभीरुः स नागृह्णन् धनुरप्यसौ ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = धार्तराष्ट्रैस्तु भीमस्य भयात् पादौ प्रणम्य च ।;शरणार्थं याचितत्वात् सपुत्रो युयुधे परैः ।;एवं हरीच्छयैवासौ क्षात्रं(क्षत्रधर्मम्) धर्ममुपेयिवान् ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = द्रुपदस्तु दिवारात्रं तप्यमानः पराभवात् ।;भीमार्जुनबलं दृष्ट्वा चेच्छन्(चैच्छत्) पाण्डवसंश्रयम् ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = सम्बन्धीत्यर्जुनवचश्चिकीर्षुः सत्यमेव च ।;मार्दवं चार्जुने दृष्ट्वा सुतामैच्छत् तदर्थतः ।;पुत्रं च द्रोणहन्तारमिच्छन् विप्रवरौ ययौ ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = याजोपयाजावानीयाथार्बुदेन गवां नृपः ।;चकारेष्टिं तु तद्भार्या द्विजाभ्यामत्र चाऽहुता ।;द्रुपदात् सुतलब्ध्यर्थं साऽहङ्काराद्(सालङ्कारात्) व्यलम्बयत् ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = किमेतयेत्यवज्ञाय तावुभौ विप्रसत्तमौ ।;अजुह्वतां तत् पुत्रार्थं पत्न्या प्राश्यं हविस्तदा ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = हुते हविषि मन्त्राभ्यां वैष्णवाभ्यां तदैव हि ।;दीप्ताङ्गारनिभो वह्निः कुण्डमद्ध्यात् समुत्थितः ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = किरीटी कुण्डली दीप्तौ हेममाली वरासिमान् ।;रथेनाऽदित्यवर्णेन नदन् द्रुपदमभ्ययात्(द्रुपदमाद्रवत्) ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टत्वाद् द्योतनत्वाच्च धृष्टद्युम्न इतीरितः ।;मुनिभिर्द्रुपदेनापि सर्ववेदार्थतत्त्ववित् ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = अन्वेनं भारती साक्षाद् वेदिमद्ध्यात् समुत्थिता ।;प्राणो हि भरतो नाम सर्वस्य भरणाच्छ्रुतः ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = तद्भार्या भारती नाम वेदरूपा सरस्वती ।;शंरूपमाश्रिता वायुं श्रीरित्येव च कीर्तिता ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = आवेशयुक्ता शच्याश्च श्यामलायास्तथोषसः ।;ताश्चेन्द्रधर्मनासत्यसंश्रयाच्छ्रिय ईरिताः ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = सा कृष्णा नामतश्चाऽसीदुत्कृष्टत्वाद्धि योषिताम् ।;कृष्णा सा वर्णतश्चाऽसीदुत्कृष्टानन्दिनी च सा ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = उत्पत्तितश्च सर्वज्ञा सर्वाभरणभूषिता ।;सम्प्राप्तयौवनैवाऽसीदजरा लोकसुन्दरी ।;उमांशयुक्ताऽतितरां सर्वलक्षणसंयुता ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं ह्युमा च देव्यस्ताः कदाचिद् भर्तृभिर्युताः ।;विलासं दर्शयामासुर्ब्रह्मणः पश्यतोऽधिकम् ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = देवि नो मानुषं प्राप्यमन्यगात्वं च सर्वथा ।;तथाऽपि(तत्रापि) मारुतादन्यं न स्पृशेम कथञ्चन ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = अतस्त्वयैकदेहत्वमिच्छामो देवि जन्मसु ।;चतुर्ष्वपि यतोऽस्माकं शापद्वयनिमित्ततः ।;॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = चतुर्जन्म भवेद् भूमौ त्वां नान्यो मारुताद् व्रजेत् ।;नियमोऽयं हरेर्यस्मादनादिर्नित्य एव च ।;अतस्त्वयैकदेहान्नो नान्य आप्नोति मारुतात् ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेष्वपीति चान्यासां ददौ शङ्कर एव च ।;वरं स्वभर्तृसंयोगं मानुषेष्वपि जन्मसु ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तदैव देहं ता विसृज्य नलनन्दिनी ।;बभूवुरिन्द्रसेनेति देहैक्येन सुसङ्गताः ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = तदाऽऽसीन्मुद्गलो नाम मुनिस्तपसि संस्थितः ।;चकमे पुत्रिकां ब्रह्मेत्यशृणोत् स कथान्तरे ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = अपाहसत् सोऽब्जयोनिं शशापैनं चतुर्मुखः ।;भारत्याद्याः पञ्च देवीर्गच्छ मानिन्नभूतये(मानिन् न भूतये) ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितस्तं तपसा तोषयामास मुद्गलः ।;शापानुग्रहमस्याथ चक्रे कञ्जसमुद्भवः ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = न त्वं यास्यसि ता देवी मारुतस्त्वच्छरीरगः ।;यास्यति त्वं सदा मूर्छां गतो नैव विबुद्ध्यसे ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = नच पापं ततस्ते स्यादित्युक्ते चैनमाविशत् ।;मारुतोऽथेन्द्रसेनां च गृहीत्वाऽथाभवद् गृही ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = रेमे च स तया सार्द्धं दीर्घकालं जगत्प्रभुः ।;ततो मुद्गलमुद्बोध्य ययौ च स्वं निकेतनम् ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = ततो देशान्तरं गत्वा तपश्चक्रे स मुद्गलः ।;सेन्द्रसेना वियुक्ताथ भर्त्रा चक्रे महत् तपः ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = तद्देहगा भारती तु केशवं शङ्करे स्थितम् ।;तोषयामास तपसा कर्मैक्यार्थं हि पूर्ववत् ।;उमाद्या रौद्रमेवात्र तपश्चक्रुर्यथा पुरा ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्यक्षे च शिवे जाते तद्देहस्थे च केशवे ।;पृथक्पृथक् स्वभर्त्राप्त्यै ताः पञ्चाप्येकदेहगाः ।;प्रार्थयामासुरभवत् पञ्चकृत्वो वचो हि तत् ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = शिवदेहस्थितो विष्णुर्भारत्यै तु ददौ पतिम् ।;अन्यासां शिव एवाथ प्रददौ चतुरः पतीन् ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = देव्यश्चतस्रस्तु तदा दत्तमात्रे वरेऽमुना ।;देवानामवतारार्थं पञ्च देव्यः स्म इत्यथ ।;नाजानन्नेकदेहत्वाच्चिद्योगात् क्षीरनीरवत् ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = ताः श्रुत्वा स्वपतिं देवि नचिरात् प्राप्स्यसीति च ।;विष्णूक्तं शङ्करोक्तं च चत्वारः पतयः पृथक् ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = भविष्यन्तीत्यथैकस्या मेनिरे पञ्चभर्तृताम् ।;रुरुदुश्चैकदेहस्था एकैवाहमिति स्थिताः ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = अथाभ्यागान्महेन्द्रोऽत्र सोऽब्रवीत् तां वरस्त्रियम् ।;किमर्थं रोदिषीत्येव साऽब्रवीद् वटुरूपिणम् ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = शङ्करं दर्शयित्वैव पञ्चभर्तृत्वमेष मे ।;वरार्थमर्थितः प्रादादिति तं शिव इत्यथ ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = अजानन् शक्र आहोच्चैः किमेतद् भुवनत्रये ।;मत्पालिते योषितं त्वं वृथा शपसि दुर्मते ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते शिवः प्राह पत मानुष्यमाप्नुहि ।;अस्याश्च भर्ता भवसि त्वामेवैषा वरिष्यति ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = पश्यात्र मदवज्ञानात् पतितांस्त्वादृशान् सुरान् ।;गिरेरधस्तादस्यैवेत्युक्तोऽसौ पाकशासनः ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = उद्बबर्ह गिरिं तं तु ददर्शात्र च तान् सुरान् ।;पूर्वेन्द्रान् मारुतवृषनासत्यांश्चतुरः स्थितान् ।;मानुषेष्ववताराय मन्त्रं रहसि कुर्वतः ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = ततो वरेण्यं वरदं विष्णुं प्राप्य स वासवः ।;तत्प्रसादान्नरांशेन युक्तो भूमावजायत ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = मदवज्ञानिमित्तेन पतिता इति तान् सुरान् ।;मारुतादीन् मृषाऽवादीरिति ब्रह्मा शिवं तदा ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = शशाप मानुषेषु त्वं क्षिप्रं जातः पराभवम् ।;शक्रान्नरतनोर्यासि यस्मै त्वं तु मृषाऽवदः ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = मच्छप्तानां च देवीनामविचार्य मया यतः ।;पतियोगवरं प्रादा नावाप्स्यसि ततः प्रियाम् ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = मानुषेषु ततः पश्चाद् भारतीदेहनिर्गताम् ।;स्वलोके प्राप्स्यसि स्वार्थे वरोऽयं ते मृषा भवेत् ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = एषा सा द्रौपदी नाम पञ्चदेवीतनुर्भवेत् ।;मृषा वाग् येषु ते प्रोक्ता मारुताद्यास्तु तेऽखिलाः ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = तासां पतित्वमाप्स्यन्ति भारत्यैव तु पार्वती ।;संयुक्ता व्यवहारेषु प्रवर्तेत नचान्यथा ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = एते हि मारुताद्यास्ते देवकार्यार्थगौरवात् ।;जाता इति श्रुतिस्तत्र नावज्ञा तेऽत्र कारणम् ।;दीर्घकालं मनुष्येषु ततस्त्वं स्थितिमाप्स्यसि ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = वेदेषु सपुराणेषु भारते चावगम्यते ।;उक्तोऽर्थः सर्व एवायं तथा पूर्वोदिताश्च ये ॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = मुमुदुः सर्वपाञ्चाला जातयोः सुतयोस्तयोः ।;मानुषान्नोपभोगेन संसर्गान्मानुषेषु च ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = मनुष्यपुत्रतायाश्च भावो मानुष एतयोः ।;अभून्नातितरामासीत् तदयोनित्वहेतुतः ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = जातमात्मनिहन्तारं भारद्वाजो निशम्य तम् ।;यशोर्थमस्त्राणि ददावग्रहीत् सोऽपि लोभतः ।;रामास्त्राणां दुर्लभत्वात् त्रिदशेष्वपि वीर्यवान् ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = भीमार्जुनाभ्यां बद्धं तं श्रुत्वा पाञ्चालभूपतिम् ।;प्राहिणोत् कृतवर्माणं पाण्डवानां जनार्दनः ।;पाण्डवेष्वतुलां प्रीतिं लोके ख्यापयितुं प्रभुः ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = सन्मान्य(सम्मान्य) पाण्डवान् सोऽपि शूरानुजसुतासुतः ।;तैर्मानितः कृष्णभक्त्या भ्रातृत्वाच्च हरिं ययौ ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = ततः प्रभृति सन्त्यज्य देवपक्षा जरासुतम् ।;पाण्डवानाश्रिता भूपा ज्ञात्वा भैमार्जुनं बलम् ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = प्रतापाद्ध्येव ते पूर्वं जरासन्धवशं गताः ।;न स्नेहात् तद् बलं ज्ञात्वा पार्थानां केशवस्य च ॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = धृतराष्ट्रो बलं दृष्ट्वा (ज्ञात्वा) बहुशो भीमपार्थयोः ।;दैवत्वाच्च स्वभावेन ज्येष्ठत्वाद् धर्मजस्य च ।;सुप्रीत एव तं चक्रे यौवराज्याभिषेकिणम्(यौवराज्येऽभिषेकिणम्) ॥ १५२॥ | |||
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| verse_lines = औं ॥ एवं शुभोच्चगुणवत्सु जनार्दनेन;युक्तेषु पाण्डुषु चरत्स्वधिकं शुभानि ।;नास्तिक्यनीतिमखिलां(नास्तिक्यनीतिमतुलां) गुरुदेवतादि;सत्स्वञ्जसैव जगृहुर्धृतराष्ट्रपुत्राः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = नाम्ना कणिङ्क इति चासुरको द्विजोऽभूत्;शिष्यः सुरेतरगुरोः शकुनेर्गुरुः सः ।;नीतिं स कुत्सिततमां(सुकुत्सिततमाम्) धृतराष्ट्रपुत्रेषु;अधाद् रहो वचनतः शकुनेः समस्ताम् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = छद्मैव यत्र परमं न सुराश्च पूज्याः;स्वार्थेन वञ्चनकृते जगतोऽखिलं च ।;धर्मादिकार्यमपि यस्य महोपाधिः स्याचत्;श्रेष्ठः स एव निखिलासुरदैत्यसङ्घात्(निखिलात् सुरदैत्यसङ्घात्) ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादि कुत्सिततमां(कल्पिततमाम्) जगृहुः स्म विद्याम्;अज्ञात एव धृतराष्ट्रमुखैः समस्तैः ।;तेषां स्वभावबलतो रुचिता च सैव;विस्तारिता च निजबुद्धिबलादतोऽपि ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = सम्पूर्णदुर्मतिरथो धृतराष्ट्रसूनुः;तातप्यमानहृदयो निखिलान्यहानि ।;दृष्ट्वा श्रियं परमिकां विजयं च पार्थेषु;आहेदमेत्य पितरं सह सौबलेन ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = ज्येष्ठस्य तेऽपि हि वयं हृदयप्रजाता;नार्हत्वमेव गमिता भवतैव राज्ये ।;भ्रातुः कनीयस उतापि हि दारजाता;अन्यैश्च राज्यपदवीं भवतैव नीताः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = राज्यं महच्च समवाप्स्यति धर्मसूनुः;त्वत्तोऽथवाऽनुजबलात्(अथ चानुजबलात्) प्रसभं वयं तु ।;दासा भवेम निजतन्तुभिरेव साकं;कुन्तीसुतस्य परतोऽपि तदन्वयस्य ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = नाऽत्मार्थमस्ति मम दुःखमथातिशुद्ध;लोकप्रसिद्धयशसस्तव कीर्तिनाशः ।;अस्मन्निमित्त इति दुःखमतो हि सर्वेऽपि;इच्छाम मर्तुमथ नः कुरु चाप्यनुज्ञाम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = एवं स्वपुत्रवचनं स निशम्य राजा;प्रोवाच नानुगुणमेतदहो मनस्ते ।;को नाम पाण्डुतनयेषु गुणोत्तमेषु;प्रीतिं न याति निजवीर्यभवोच्चयेषु(निजवीर्यभवोच्छ्रयेषु) ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = ते हि स्वबाहुबलतोऽखिलभूपभूतिं;मय्याकृषन्ति नच वः प्रतिषेधकास्ते ।;तस्माच्छमं व्रज शुभाय कुलस्य तात;क्षेमाय नो भवति वो बलवद्विरोधः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = एवं ब्रुवत्यपि नृपे पुनराह पाप;आश्रित्य सौबलमतं यदि नैव पार्थान् ।;अन्यत्र यापयसि(प्रापयसि) नागपुरात् परेतान्;दृष्ट्वाऽखिलानपि हि नो मुदमेहि पार्थैः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = एवं निशम्य गदितं सुतहार्दपाशैः आकृष्यताऽशु स नृपोऽरिधरेच्छयैव ।;प्रोवाच पुत्रमपि ते बलिनो न पार्थाः;शक्याः पुरात् तनय यापयितुं कथञ्चित् ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आह पितरं(नृपतिम्) शकुनिं निरीक्ष्य;सृष्टो मया विधिरिहाद्य शृणुष्व तं च ।;आसंस्त्रयोदश समा नगरं प्रविष्टे-;ष्वेतेषु तावदयमेव विधिर्मयेष्टः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = द्रौणेर्हि नास्ति सदृशो बलवान् प्रतापी;सोऽयं मया बहुविधैः परमैरुपायैः ।;नीतो वशं वशगतोऽस्य च मातुलेन;साकं पिता तमनु चैष नदीप्रसूतः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = एवं हि सैनिकगणा अपि दानमानैः;प्रायो वशं मम गता अपि चैष कर्णः ।;अस्त्रे बलेऽप्यधिक एव सुरेन्द्रसूनोः;जेष्ये च मन्त्रबलतस्त्वहमेव भीमम् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = त्रिंशच्छतं परमकाः सुरदुर्लभाश्च;दुर्वाससो हि मनवोऽद्य मया गृहीताः ।;अन्यत्र ते प्रविहिता नहि वीर्यवन्तः;स्युर्भीम इत्यहममून् न नियोजयामि ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = ते वीर्यदा विजयदा अपि वारिवह्नि;स्तम्भादिदाः सकलदेवनिकायरोधाः ।;वृष्ट्याद्यभीप्सितसमस्तकरा अमूभिः;जेष्यामि भीमममुमेकमयातयामैः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = सौहार्दमेषु यदिवाऽतितरां(यदि वा नितराम्) करोषि;तत्रापि नैव हि मया क्रियते विरोधः ।;वत्स्यन्तु वारणवते भवतु स्म राष्ट्रं;तेषां तदेव मम नागपुरं त्वदर्थे ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = एवं स्वपुत्रपरिपालनतो यशस्ते;भूयाद् विनश्यति परप्रसवातिपुष्टौ ।;जाते बले तव विरोधकृतश्च ते स्युः;स्वार्थं हि तावदनुयान्त्यपि केवलं त्वाम् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = क्षत्तैक एव सततं परिपोषकोऽलं;तेषां मम द्विडथ मन्त्रबलादमुष्य ।;पौराश्च जानपदकाः(जानपदिकाः) सततं द्विषन्ति;मां तेष्वतीव दृढसौहृदचेतसश्च ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = ते तेषु(एतेषु) दूरगमितेषु निराश्रयत्वात्;मामेव दुर्बलतया परितः श्रयन्ते ।;भीष्मादयश्च नहि तन्निकटे विरोधं;कुर्युर्विनश्यति गतेषु हि सौहृदं तत् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = भेदः कुलस्य भविता कुलनाशहेतु;अस्माभिरेषु सहितेषु पुरे वसत्सु ।;तस्मादुपायबलतः प्रतियापनीयाः;ते वारणावतमितो विहितोऽप्युपायः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = विष्णुर्जयन्त इति शम्भुसहाय आस्ते;देवोत्सवश्च सुमहान् भविताऽत्र सुष्ठु ।;भक्ताश्च ते हि नितरामरिशङ्खपाणौ;त्वच्चोदिताः समुपयान्ति तमुत्सवं द्राक् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = अज्ञाप्य मत्पुरुषतां पुरुषैर्मदीयैः;मध्यस्थवद् बहुगुणा उदिताश्च तत्र ।;तेषां पुरोऽत्र गमनाभिरुचिश्च जाता;द्रष्टुं पुरं बहुगुणं ननु पाण्डवानाम् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवत्यथ सुते स तथेत्युवाच;प्राप्तेषु पाण्डुतनयेषु तथैव चोचे ।;ज्ञात्वैव तेऽपि नृपतेर्हृदयं समस्तं;जग्मुः पितेति पृथया सह नीतिहेतोः ॥ २५॥ | |||
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<span id="gr-C20" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="विंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C20" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="विंशोऽध्यायः"></span> | ||
== विंशोऽध्यायः == | == विंशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ यज्ञोरुदाननरदेववन्द्यताप्रश्नर्षिपूजासु युधिष्ठिरोऽभूत् ।;धर्मानुशास्तिहरितत्त्वशंसनस्वराष्ट्ररक्षादिषु भीम आसीत् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रीधर्मसंशासनभृत्यकोशरक्षाव्ययादौ गुणदोषचिन्तने ।;अन्तःपुरस्थस्य जनस्य कृष्णा त्वासीद्धरेर्धर्मनिदर्शनी च ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = बीभत्सुरासीत् परराष्ट्रमर्दने तेनानियम्यांस्तु जरासुतादीन् ।;स कीचकादींश्च ममर्द भीमस्तस्यैव ते बलतो नित्यभीताः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = राष्ट्रेषु भीमेन विमर्दितेषु जिताश्च युद्धेषु निरुद्यमास्ते ।;बभूवुरासीद्धरिधर्मनिष्ठः प्रायेण लोकश्च(लोकाश्च) तदीयशासनात् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = आजीविनां वेतनदस्तदाऽऽसीन्माद्रीसुतः प्रथमोऽथ द्वितीयः ।;सन्धानभेदादिषु धर्मराजपश्चाच्च खड्गी स बभूव रक्षन् ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नस्तत्र सेनाप्रणेता शक्रप्रस्थे नित्यमास्तेऽतिहार्दात् ।;विशेषतो भीमसखा स आसीद् राष्ट्रं चैषां सर्वकामैः सुपूर्णम् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = नावैष्णवो न दरिद्रो बभूव न धर्महानिश्च बभूव कस्यचित् ।;तेषां राष्ट्रे शासति भीमसेने न व्याधितो नापि विपर्ययान्मृतिः ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरं यान्ति हि दर्शनोत्सुकाः प्रतिग्रहायाप्यथ याजनाय ।;कार्यार्थिनो(कार्यार्थतो) नैव वृकोदरेण कार्याणि सिद्ध्यन्ति(सिद्धानि) यतोऽखिलानि ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्वविद्याधरचारणाश्च सेवन्त एतान्त्सततं समस्ताः ।;यथा सुरेन्द्रं मुनयश्च सर्व आयान्ति देवा अपि कृष्णमर्चितुम् ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = तेषां राष्ट्रे कार्तयुगा हि धर्माः प्रवर्तिता एव ततोऽधिकाश्च ।;वृद्धिश्च तस्मादधिका सुवर्णरत्नाम्बरादेरपि सस्यसम्पदाम् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = अथोपयेमे शिशुपालपुत्रीं युधिष्ठिरो देवकीं नाम पूर्वम्(पूर्वाम्) ।;स्वीयां भार्यां यत्सहजो धृष्टकेतुरनुह्लादः सवितुश्चांशयुक्तः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = तस्यां सुहोत्रो नामतः पुत्र आसीद् यश्चित्रगुप्तो नाम पूर्वं सुलेखः ।;कृष्णा सैवाऽप्यन्यरूपेण जाता काशीशपुत्री यां प्रवदन्ति कालीम् ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = सा केवला भारती नान्यदेव्यस्तत्राऽविष्टास्तत्कृते(तत्राविष्टा यत्कृते) काशिराजः ।;स्वयम्बरार्थं नृपतीनाजुहाव सर्वांस्तेऽपि ह्यत्र हर्षात् समेताः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = तेषां मध्ये भीमसेनांस एषा मालामधात् तत्र जरासुताद्याः ।;क्रुद्धा विष्णोराश्रितानाक्षिपन्त आसेदुरुच्चैः शिवमास्तुवन्तः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = वेदाधिक्यं शैवशास्त्राणि चाऽहुर्वेदोज्झितानां बहुलां च निन्दाम् ।;तथा शाक्तेयस्कान्दसौरादिकानां तत्रैवोक्तं छन्दसां वैष्णवत्वम् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = विष्णोराधिक्यं तानि शास्त्राणि चाऽहुः शिवादिभ्यः कुत्रचिन्नैव वेदे ।;विष्णूत्कृष्टः(विष्णूत्कर्षः) कथितो बौद्धपूर्वाश्चाऽहुर्विष्णुं परमं सर्वतोऽपि ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = लोकायताश्च क्वचिदाहुरग्र्यं विष्णुं गुरुं सर्ववरं बृहस्पतेः ।;सर्वागमेषु प्रथितोऽत एव विष्णुः समस्ताधिक एव मुक्तिदः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = तेष्वागमेष्वेव परस्परं च विरुद्धता ह्यन्यपक्षेषु भूपाः ।;प्रत्यक्षतश्चात्र पश्यध्वमाशु बलं बाह्वोर्मे विष्णुपदाश्रयस्य ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं हि गङ्गा मम विष्णुपूजाविघ्नार्थमायाद् वामकरेण सा मे ।;नुन्ना परस्ताद् बहुयोजनं गता पुरे कुरूणां शिव आगतस्तदा ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = स व्याघ्ररूपी कपिलात्मिकामुमां(कपिलात्मकामुमां) परीक्षयन् मां हन्तुमिवाऽद्रवद् द्रुतम् ।;स मे युद्धे विजितो मूर्च्छितश्च गदाप्रहारादास लिङ्गान्तरस्थः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = व्याघ्रेश्वरं नाम लिङ्गं पृथिव्यां ख्यातं तदास्ते तद्वदन्यत्र युद्धे ।;तीरे गोमत्या हैमवते गिरौ हि जितस्तत्राप्यास शार्दूललिङ्गम् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = एवं प्रत्यक्षे विष्णुपदाश्रयस्य बलाधिक्ये किमु वक्तव्यमत्र ।;विष्णोराधिक्ये क्षत्रियाणां प्रमाणं बलं विप्रे ज्ञानमेवेति चाऽहुः ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = मया केदारे विप्ररूपी जितश्च रुद्रोऽविशल्लिङ्गमेवाऽशु भीतः ।;ततः परं वेदविदामगम्यताशापं प्रादाच्छङ्करो व्रीडितोऽत्र ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = एवं प्रत्यक्षे विष्णुबले प्रतीपं मनो यस्य ह्युत्तरं स ब्रवीतु ।;क्रोधोऽधिकश्चेत् क्षिप्रमायातु योद्धुमित्युक्तास्तेऽभ्याययुरात्तशस्त्राः ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = विद्राप्य(विद्राव्य) तान् बाणसङ्घैः समस्तान् जरासुतं गदया योधयित्वा(पोथयित्वा) ।;बाहुभ्यां चैनं परिगृह्याऽशु विष्णोः पादोत्थायां(पादोत्थायां) प्राक्षिपद् देवनद्याम् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = स व्रीडितः प्रययौ मागधांश्च भूपैः समेतो भीमसेनो रथं स्वम् ।;आरुह्य काशीश्वरपूजितश्च ययौ काल्या शक्रसनामकं पुरम् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = तस्यां त्रिलोकाधिकरूपसद्गुणैरासम्मितायां (आसम्मतायां) रममाणः सुतं च ।;शर्वत्रातं(शर्वत्रातः) नामाजनयत्(नाम्नाऽजनयत्) पुरा यः समानवायुर्बलवीर्ययुक्तः ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽपि गत्वा द्वारवतीं सरामः सत्यापितुर्वधकर्तारमेव ।;शतधन्वानं हन्तुमैच्छत् स चैव (याचे)ययाचेऽक्रूरं कृतवर्मानुयुक्तम् ॥ २९॥ | |||
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== एकविंशोऽध्यायः == | == एकविंशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ जनार्दनाज्ञया मयः समस्तकौतुकोत्तराम्(समस्तकौतुकोत्तमाम्) ।;सभां विधाय भूभृते ददौ गदां वृकोदरे ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = स वायुधारितां गदां हि यौवनाश्वभूभृता ।;प्रसादतोऽस्य लम्भितामवाप्य मोदमाप ह ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च वत्सरद्वयं समुष्य केशवो ययौ ।;समर्चितस्य पाण्डवैर्वियोजनेऽस्य चाक्षमैः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = ततो वसन् स्वपुर्यजः क्वचिद् रविग्रहे हरिः ।;सदारपुत्रबान्धवः समन्तपञ्चकं ययौ ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = पृथासुताश्च सर्वशः सदारपुत्रमातृकाः ।;क्षितीश्वराश्च सर्वशः प्रियाप्रिया(प्रियाः प्रियाः) हरेश्च ये ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = तथैव नन्दगोपकः सदारगोपगोपिकः ।;मुनीश्वराश्च सर्वतः समीयुरत्र च प्रजाः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = प्रियाश्च ये रमेशितुर्हरिं त्रिरूपमेत्य ते ।;वसिष्ठवृष्णिनन्दनौ भृगूत्तमं(भृगूद्वहं) तथाऽऽर्चयन्(आर्चयन्) ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = कृतार्थतां च ते ययू रमेशपाददर्शनात् ।;रविग्रहे समाप्लुता भृगूद्वहोत्थतीर्थके ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = अनुग्रहं विधाय स स्वकेषु केशवस्त्रिवृत् ।;अयाजयच्च शूरजं मखैः समाप्तदक्षिणैः ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = समस्तलोकसंस्थितात्मभक्तिमज्जनस्य सः ।;सुकालदर्शनात् परं(वरं व्यधात्) व्यधादनुग्रहं हरिः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = ततो ययौ स्वकां पुरीं पृथासुतैः सहाच्युतः ।;चकार तत्र चाऽह्निकं क्रतुं महाश्वमेधिकम् ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = हयं सभीमफल्गुना हरे रथं समास्थिताः ।;व्यचारयन् हरेः सुता दिनस्य पादमात्रतः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = जिताः समस्तभूभृतो जरासुतादयः क्षणात् ।;वृकोदरादिभिस्तु(वृकोदरादिभिः सुतैः) तैर्हयश्च दिव्य आययौ ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = हयः स कृष्णनिर्मितो दिनेन लक्षयोजनम् ।;क्षमो हि गन्तुमञ्जसा दिनाश्वमेधसिद्धये ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = पराशरात्मजो हरिर्हरिं यदा त्वदीक्षयत् ।;तदाऽऽससाद ह द्विजस्तृणावहो रुराव च ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = व्रजन्ति जन्मनोऽनु मे सदा सुता अदृश्यताम् ।;इतीरितेऽर्जुनोऽब्रवीदहं हि पामि ते सुतान् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = सकृष्णरामकार्ष्णिभिः (न कृष्णरामकार्ष्णिभिः) सुता नु मेऽत्र पालिताः ।;क्व तेऽत्र शक्तिरित्यमुं जगाद सोऽर्जुनं द्विजः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = तदा जगाद फल्गुनोऽसुरैर्विदूषितात्मना ।;न विप्र तादृशोऽस्म्यहं यथैव केशवादयः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = मया जिता हि खाण्डवे सुरास्तथाऽसुरानहम् ।;निवातवर्मनमकान् विजेष्य उत्तरत्र हि ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = उदीर्य चेति केशवं स ऊचिवान् व्रजाम्यहम् ।;इतीरितोऽवदद्धरिस्तवात्र शक्यते नु किम् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = वह्निं प्रवेक्ष्येऽशक्तश्चेदित्युक्त्वा सर्वयादवैः ।;ययौ न रामप्रद्युम्नावनिरुद्धं च केशवः ।;न्ययोजयत् तत्साहाय्ये (तत्सहाये) यशस्तेष्वभिरक्षितुम् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = प्रियो हि नितरां रामः कृष्णस्यानु च तं सुतः ।;अनिरुद्धः कार्ष्णिमनु प्रद्युम्नाद् योऽजनिष्ट हि ।;रुक्मिपुत्र्यां रुक्मवत्यामाहृतायां स्वयम्बरे ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = रतिरेव हि या तस्यां जातोऽसौ कामनन्दनः ।;पूर्वमप्यनिरुद्धाख्यो विष्णोस्तन्नाम्न एव च ।;आवेशयुक्तो बलवान् रूपवान् सर्वशास्त्रवित् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रैश्चकार दिग्बन्धं कुमारोऽथापि तत्क्षणात् ।;अदर्शनं ययौ पार्थो विषण्णः सह यादवैः ।;अधिक्षिप्तो(अदिक्षिप्तः) ब्राह्मणेन ययौ यत्र श्रियःपतिः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = वह्निं(अग्निं) विविक्षन्तममुं निवार्य ययौ सविप्रः सहफल्गुनो हरिः ।;आशामुदीचीं बृहता रथेन क्षणेन तीर्त्वैव च सप्तवारिधीन् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = सहस्रमूर्धन्युरुशेषभोग आसीनरूपेऽमितसूर्यदीधितौ ।;रमासहाये तटिदुज्ज्वलाम्बरे मुक्तैर्विरिञ्चादिभिरर्चिते सदा ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = स्थित्वैकरूपेण मुहूर्तमीश्वरो विनिर्ययौ विप्रसुतान् प्रगृह्य ।;सुनन्दनन्दादय एव पार्षदास्ते वैष्णवा भूमितले प्रजाताः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = दर्पं निहन्तुं हरिरर्जुनस्य समानयद् विप्रसुतान् परेशः ।;प्रीतिर्महत्येव यतोऽर्जुने हरेः संशिक्षयामास ततः स एनम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = अप्राकृतात् सदनाद् वासुदेवो निस्सृत्य सूर्याधिकलक्षदीधितेः ।;रथं समारुह्य सपार्थविप्र आगात् सुतांश्चैव ददौ द्विजाय ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = लोकशिक्षार्थमेवासौ प्रायश्चित्तं च चालने ।;चक्रे सार्द्धमुहूर्तेन समागम्य पुनर्मखम् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मादीनागतांश्चैव सदा स्वपरिचारकान् ।;पूजयित्वाऽभ्यनुज्ञाय ब्राह्मणानप्यपूजयत्(अभ्यपूजयत्) ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = सस्नाववभृथं कृष्णः सदारः ससुहृज्जनः ।;आयान्तं द्वारकां कृष्णं दन्तवक्रो रुरोध ह ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = जघान गदया कृष्णस्तं क्षणात् सविडूरथम् ।;विडूरथस्तमोऽगच्छद् दन्तवक्रे च योऽसुरः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = हरेः पार्षदः क्षिप्रं हरिमेव समाश्रितः ।;कृष्णे प्राप्ते स्वलोकं च निस्सृत्यास्मात् स्वरूपतः ।;एकीभावं स्वरूपेण द्वारपेण गमिष्यति ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = ततः कृष्णः पुरीमेत्य बोधयामास फल्गुनम् ।;किमेतद् दृष्टमित्येव तेन पृष्टो रमापतिः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = अयं द्वीपः सागरश्च लक्षयोजनविस्तृतौ ।;तदन्ये तु क्रमेणैव द्विगुणेनोत्तरोत्तराः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = अन्त्याध्यर्द्धस्थलं हैमं बाह्यतो वाज्रलेपिकम्(वज्रलेपितम्,वज्रलेपकम्)) ।;एतत् सर्वं लोकनाम ह्येतस्माद् द्विगुणं तमः ।;अन्धं यत्र पतन्त्युग्रा मिथ्याज्ञानपरायणाः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = घनोदकं तद्द्विगुणं तदन्ते धाम मामकम् ।;यत्तद् दृष्टं त्वया पार्थ तत्र मुक्तैरजादिभिः ।;सेव्यमानः स्थितो नित्यं सर्वैः परमपूरुषः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = लोकालोकप्रदेशस्तु पञ्चाशल्लक्षविस्तृतः ।;सपञ्चाशत्सहस्रश्च तस्यापि गणनं तथा ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = योजनानां पञ्चविंशत्कोटयो मेरुपर्वतात् ।;चतसृष्वपि दिक्षूर्ध्वमधश्चाण्डं प्रकीर्तितम् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = अबग्नीरनभोहङ्कृन्महत्तत्त्वगुणत्त्रयैः ।;क्रमाद् दशोत्तरैरेतदावृतं(क्रमाद् दशोत्तरैरैतैरावृतं) परतस्ततः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = व्याप्तोऽहं (सर्वतः)सर्वगोऽनन्तोऽनन्तरूपो निरन्तरः ।;अनन्तशीर्षोऽनन्ताक्षोऽनन्तपादकरोरुकः ।;अनन्तगुणमाहात्म्यश्चिदानन्दशरीरकः ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = मद्वशा एव सर्वेऽपि त्वं चान्ये च धनञ्जय ।;मत्प्रसादाद् बलं चैव विजयश्चाखिला गुणाः ।;तस्मान्न विस्मयः कार्यो न दर्पश्च त्वयाऽनघ ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = ‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।;मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे’ ।(भ.गी.१८-६५);इत्युक्तः प्रणिपत्यैनं क्षमस्वेत्याह फल्गुनः ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = उषित्वा कतिचिन्मासान् ययुः सर्वेऽपि पाण्डवाः ।;अनुज्ञाताः केशवेन भक्तिनम्रधियोऽच्युते ।;सम्भाविताः केशवेन सौहार्देनाधिकेन च ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = ततः कदाचित् प्रवरे सभातले धर्मात्मजो राजभिर्भ्रातृभिश्च ।;वृतो निशम्यैव(निशाम्यैव) सभाः सुराणां यथा स्थिता नारदमन्वपृच्छत् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = अन्तरिक्षं | |||
<span id="gr-C22" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वाविंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C22" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वाविंशोऽध्यायः"></span> | ||
== द्वाविंशोऽध्यायः == | == द्वाविंशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ आगन्तुकामान् पुरवासिनस्ते संस्थाप्य कृच्छ्रेण कुरुप्रवीराः ।;रात्रौ प्रविष्टा गहनं वनं च किर्मीरमासेदुरथो नराशम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = बकानुजोऽसौ निखिलैरजेयो वराद् गिरीशस्य निहन्तुकामः ।;सदारसोदर्यमभिप्रसस्रे भीमं महावृक्षगिरीन् प्रमुञ्चन् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = स सम्प्रहारं सह तेन कृत्वा भीमो निपात्याऽशु(निहत्याऽशु) धरातले तम् ।;चक्रे मखे सङ्गरनामेधेये प्रसह्य नारायणदैवते पशुम् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = निहत्य रक्षो वनमध्यसंस्थास्तदा यतीनामयुतैः समेताः ।;अशीतिसाहस्रमुनिप्रवीरैर्दशांशयुक्तैः सहिता व्यचिन्तयन् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = विचिन्त्य तेषां भरणाय धर्मजः सम्पूज्य सूर्यस्थितमच्युतं प्रभुम् ।;दिनेऽक्षयान्नं पिठरं तदाप रत्नादिदं कामवरान्नदं च ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = बभार तेनैव युधिष्ठिरस्तान् प्रत्येकशस्त्रिंशतदासदासिकान्(त्रिंशतिदासदासिकान्) ।;सुवर्णपात्रेषु हि भुञ्जते ये गृहे तदीये बहुकोटिदासिके ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = सत्सङ्गमाकाङ्क्षिण एव तेऽवसन् पार्थैः सहान्ये च मुनीन्द्रवृन्दाः ।;शृण्वन्त एभ्यः परमार्थसाराः कथा वदन्तश्च पुरातनास्तथा ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = एवं गजानां बहुकोटिवृन्दांस्तथा रथानां च हयांश्च वृन्दशः ।;विसृज्य रत्नानि नरांश्च वृन्दशो वने विजह्रुर्दिवि देववत् सुखम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = गवां च लक्षं प्रददाति नित्यशः सुवर्णभारांश्च शतं युधिष्ठिरः ।;सभ्रातृकोऽसौ वनमाप्य शक्रवन्मुमोद विप्रैः सहितो यथासुखम् ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = पार्थेषु यातेषु किमत्र कार्यमिति स्म पृष्टो विदुरोऽग्रजेन ।;आहूय राज्यं प्रतिपादयेति प्राहैनमाहाथ रुषाऽऽम्बिकेयः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं प्रतीपोऽसि ममाऽत्मजानां न मे त्वया कार्यमिहास्ति किञ्चित् ।;यथेष्टतस्तिष्ठ वा गच्छ वेति प्रोक्तो ययौ विदुरः पाण्डुपुत्रान् ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् गते भ्रातृवियोगकर्शितः पपात भूमौ सहसैव राजा ।;सञ्ज्ञामवाप्याऽदिशदाशु सञ्जयं जीवामि चेदाशु ममाऽनयानुजम् ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः सञ्जयः पाण्डवेयान् प्राप्याऽनयद् विदुरं शीघ्रमेव ।;सोऽप्यागतः क्षिप्रमपास्तदोषो ज्येष्ठं ववन्देऽथ स चैनमाश्लिषत् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = अङ्कं समारोप्य स मूर्ध्नि चैनमाघ्राय लेभे परमां मुदं तदा ।;क्षत्तारमायान्तमुदीक्ष्य सर्वे ससौबला धार्तराष्ट्रा अमर्षात् ।;सम्मन्त्र्य हन्तुं पाण्डवानामुतैकं छन्नोपधेनैव ससूतजा ययुः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञाय तेषां गमनं समस्तलोकान्तरात्मा परमेश्वरेश्वरः ।;व्यासोऽभिगम्यावददाम्बिकेयं निवारयाऽश्वेव सुतं तवेति ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = अवाप्य पार्थानयमद्य मृत्युं सहानुबन्धो गमिता ह्यसंशयम् ।;इतीरिते तेन निवारयेति प्रोक्तो हरिः प्राह न संवदे तैः ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = मैत्रेय आयास्यति सोऽपि वाचं शिक्षार्थमेतेष्वभिधास्यतीह ।;तां चेत् करोत्येष सुतस्तवास्य भद्रं तदा स्याच्छप्स्यति त्वन्यथा सः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = मैत्रेय आगादथ(आयात्) भूपतिश्च पुत्रान् समाहूय सकर्णसौबलान् ।;सम्पूजयामास मुनिं स चाऽह दातुं राज्यं पाण्डवान् सम्प्रशंसन् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = शशाप चैनं मुनिरुग्रतेजास्तवोरुभेदाय भवेत् सुयुद्धम् ।;इत्यूचिवान् धृतराष्ट्रानतोऽपि ययौ न चेद् राज्यदस्त्वं तथेति ।;श्रुत्वा तु किर्मीरवधं स्वपित्रा पृष्टं क्षत्रोक्तं (पृष्टक्षत्रोक्तं) सोऽत्रसद् धार्तराष्ट्रः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = वने वसन्तोऽथ पृथासुतास्ते वार्तां स्वकीयां(स्वकीयां वार्तां) प्रापयामासुराशु ।;कृष्णे सोऽपि द्रुतमायात् ससत्यः सम्बन्धिनो ये च पाञ्चालमुख्याः ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = क्रुद्धं कृष्णं धार्तराष्ट्राय पार्थाः क्षमापयामासुरुच्चैर्गृणन्तः ।;गुणांस्तदीयानमितान् प्रणम्य तदा रुदन्ती द्रौपदी चाऽप पादौ ।;सा पादयोः पतिता वासुदेवमस्तौत् समस्तप्रभुमात्मतन्त्रम् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = अचिन्त्यनित्याव्ययपूर्णसद्गुणार्णवैकदेहाखिलदोषदूर ।;रमाब्जजेरेशसुरेन्द्रपूर्ववृन्दारकाणां सतताभिवन्द्य ।;समस्तचेष्टाप्रद सर्वजीव प्रभो (सर्वजीवप्रभो) विमुक्ताश्रय सर्वसार ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = इति ब्रुवन्ती सकलानुभूतं जगाद सर्वेशितुरच्युतस्य ।;यस्याधिकानुग्रहपात्रभूता स्वयं हि शेषेशविपादिकेभ्यः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा समस्तं भगवान् प्रतिज्ञां चकार तेषामखिलाश्च योषाः ।;पतीन् समालिङ्ग्य विमुक्तकेशा भीमाहतान् दर्शये नान्यथेति ।;तां सान्त्वयित्वा मधुरैः सुवाक्यैर्नारायणो वाचमिमां जगाद ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = यदीहाहं स्थितो नैवं भविताऽहं त्वयोधयम् ।;साल्वराजं दुरात्मानं हतश्चासौ सुपापकृत् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = सन्निधानेऽथ वा दूरे कालव्यवहितेऽपि वा ।;स्वभावाद् वा व्यवहिते वस्तुव्यवहितेऽपि वा ।;नाशक्तिर्विद्यते विष्णोर्नित्याव्यवहितत्वतः ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽपि नरलोकस्य करोत्यनुकृतिं प्रभुः ।;दुष्टानां दोषवृद्ध्यर्थं भीमादीनां गुणोन्नतेः ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरेऽतिवृद्धं तु राजसूयादिसम्भवम् ।;धर्मं च सङ्क्रामयितुं कृष्णायामनुजेषु च ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = योग्यताक्रमतो(योग्यताक्रमशो) विष्णुरिच्छयेत्थमचीक्लृपत् ।;एधमानद्विडित्येव विष्णोर्नाम हि वैदिकम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = स्वयोग्यताया अधिकधर्मज्ञानादिजं फलम् ।;भीष्मद्रोणाम्बिकेयादेः पार्थेष्वेव निधापितुम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च पापवृद्ध्यर्थमजो दुर्योधनादिषु ।;व्यासोऽम्बिकासुतं प्राह पार्था मेऽभ्यधिकं(मे ह्यधिकं) प्रियाः ।;तेषां प्रवासनं चैव प्रियं न मम सर्वथा ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = इति दुर्योधनादीनां पापवृद्ध्यर्थमेव सः ।;प्रिया इत्येव कथनात् पाण्डवानां शुभोन्नतेः(गुणोन्नतेः) ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = गुरुत्वाद् भीमसेनस्य क्षमा द्यूतेऽर्जुनादिनाम् ।;नातिधर्मस्वरूपोऽत्र(नातिधर्मस्वरूपोऽक्षे) धर्मो भीमे निरौपधः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = द्रौपद्या अप्यतिक्लेशात् क्षमा धर्मो महानभूत् ।;सा हि भीममनो वेद न कार्यः शाप इत्यलम् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् यथायोग्यतया हरिणा धर्मवर्धनम् ।;कृतं तत्रासन्निधानकारणं केशवोऽब्रवीत् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = साल्वं श्रुत्वा समायान्तं (समायातं) रौक्मिणेयादयो मया ।;प्रस्थापिता हि भवतां सकाशे ते ययुः पुरीम् ।;तदा साल्वोऽपि सौभेन द्वारकामर्दयद् भृशम् ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = प्रद्युम्न आशु निरगादथ सर्वसैन्यै-;रन्यैश्च यादवगणैः सहितोऽनुजैश्च ।;साल्वोऽवगम्य तनयं मम तद्विमानात्;पापोऽवरुह्य रथमारुहदत्र योद्धुम् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = कृत्वा सुयुद्धममुना मम पुत्रकोऽसौ;अस्त्राणि तस्य विनिवार्य महास्त्रजालैः ।;दत्तं मया शरममोघमथाऽददे तं;हन्तुं नृपं कृतमतिस्त्वशृणोद् वचः खे ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = नारायणेन हि पुरा मनसाऽभिक्लृप्तं;कृष्णावतारमुपगम्य निहन्मि साल्वम् ।;इत्येव तेन हरिणाऽपि स भार्गवेण;विद्रावितो न निहतः स्वमनोनुसारात् ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = वध्यस्त्वया नहि ततोऽयमयं च बाणः;चक्रायुधस्य दयितो नितराममोघः ।;मा मुञ्च तेन तमिमं विनिवर्तयेऽहं;साल्वं हृदि स्थित इतीरितमीरणेन ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा वचः स पवनस्य शरं त्वमोघं;सञ्जह्र आशु स च साल्वपतिः स्वसौभम् ।;आरुह्य बालकलहेन किमत्र कार्यं;कृष्णेन सङ्गर इति प्रययौ स्वदेशम् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = प्रद्युम्नसाम्बगदसारणचारुदेष्णाः;सेनां निहत्य सह मन्त्रिगणैस्तदीयाम् ।;आह्लादिनः स्वपुरमाययुरप्यहं च;तत्रागमं सपदि तैः श्रुतवानशेषम् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिञ्छरे करगते विजयो ध्रुवः स्यात्;मत्तेजसा तदनुसङ्ग्रहणात् सुतान्मे ।;यातं निशम्य रिपुमात्मपुरीं च भग्नां;दृष्ट्वैव तेन तदनुव्रजनं कृतं मे ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = तं सागरोपरिगसौभगतं निशाम्य;मुक्ते च तेन मयि शस्त्रमहास्त्रवर्षे ।;तं सन्निवार्य(तत्सन्निवार्य) तु मया शरपूगविद्धो;माया युयोज मयि पापतमः स साल्वः ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = ताः क्रीडया क्षणमहं समरे निशाम्य;ज्ञानास्त्रतः प्रतिविधूय बहूंश्च दैत्यान् ।;हत्वाऽऽशु तं च गिरिवर्षिणमाशु सौभं;वार्धौ न्यपातयमरीन्द्रविभिन्नबन्धम् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = तं स्यन्दनस्थितमथो विभुजं विधाय;बाणेन तद्रथवरं गदया विभिद्य ।;चक्रेण तस्य च शिरो विनिकृत्य धातृ-;शर्वादिभिः प्रतिनुतः स्वपुरीमगां च ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादिदं व्यसनमास हि विप्रकर्षात्;मे कार्यतस्त्विति निगद्य पुनश्च पार्थान् ।;कृष्णां च सान्त्वयितुमत्र दिनान्युवास;सत्या च सोमकसुतामनुसान्त्वयन्ती ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = पाण्डवानां च या भार्याः पुत्रा अपि हि(च) सर्वशः ।;अन्वेव पाण्डवान् याता वनमत्रैव स्थिताः(वनमत्रैव च संस्थिताः) ॥ ५१॥ | |||
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== त्रयोविंशोऽध्यायः == | == त्रयोविंशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ नारायणानुग्रहतो यथावन्निस्तीर्य तान् द्वादशाब्दान् वने ते ।;विसृज्य च ब्राह्मणादीन् सधौम्यानज्ञातवासाय ततो मनो दधुः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = गत्वा विराटस्य पुरीं निधाय हेतीः शम्यां छन्नरूपा बभूवुः ।;यतिः सूदः षण्ढवेषोऽथ सूतवेषो गोपो गन्धकर्त्री च जाताः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = सर्वे विराटं ययुरत्र देववत् सम्भावितास्तेन शुभोरुलक्षणाः ।;युधिष्ठिरस्यैव(युधिष्ठिरस्येव) शुश्रूषणं ते चक्रुर्हृदा वासुदेवस्य नान्यत् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = परपाको गृहस्थस्य क्षत्रियस्य विशेषतः ।;न योग्य इति सूदस्य बभ्रे वेषं वृकोदरः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = वैदिकव्यवहारेषु ज्ञानाधिक्यप्रसिद्धितः ।;जानीयुर्भीम इत्येव सूदवेषस्ततोऽभवत् (शूद्रवेषस्ततोऽभवत्) ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = स्वीयं वेदविदां सर्वं देवेशानां च किं पुनः ।;अतस्तेऽन्याश्रयं नैव चक्रुः स्वबलसंश्रयात् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = ततो गोपालतामाप यतिः पूज्योऽखिलैर्यतः;यतिरासीद् धर्मजोऽतः सोऽभ्यासार्थं सदैव च ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = य एष सूद आशु तं निहत्य मल्लमोजसा ।;यशस्तवाभिवर्द्धयेत् समाह्वयाद्य तं नृप ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते समाहुतो जगाद मारुतिर्वचः ।;प्रसादतो हरेरहं निषूदयेऽद्य (निसूदयेऽद्य) मल्लकम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = समस्तदेववृन्दतो महान् य एव केशवः ।;(समस्तदेवनामधा) समस्तदेवनामवांस्तदीयभक्तितो बलम् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = य एव देवनामधा इति श्रुतिर्जगाद हि ।;महांश्च देव एष तत् स मे जयं विधास्यति ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिराभिधश्च यो युधिष्ठिरे स्थितः सदा ।;त्वयि स्थितस्त्वमित्यसौ सदाऽभिधीयते हरिः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = इति ब्रुवाणो मल्लं तमभियातो वृकोदरः ।;अनयन्मृत्युलोकाय बलाढ्यैरपि दुर्जयम् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = एवं निवसतां तत्र पाण्डवानां महात्मनाम् ।;संवत्सरे द्विमासोने विजित्य दिश आगतः ।;कीचको मत्स्यनृपतेः स्यालो बलवतां वरः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = स द्रौपदीं वीक्ष्य मनोभवार्तः(मनोमदार्तः) सम्प्रार्थयामास तया निरस्तः ।;मासे गते भगिनीं स्वां सुदेष्णां सम्प्रार्थयामास तदर्थमेव ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = तया निषिद्धोऽपि पुनःपुनस्तां यदा ययाचेऽथ सा चाह (ययाचेऽथच साऽऽह) कृष्णाम् ।;समानयाऽश्वेव सुरां मदर्थमितीरिता नेति भीताऽवदत् सा ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = बलात् तया प्रेषिता तद्गृहाय यदाऽगमत् तेन हस्ते गृहीता ।;विधूय तं प्राद्रवत् सा सभायै स्मृत्वाऽऽदित्यस्थं वासुदेवं परेशम् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = अनुद्रुत्यैतां पातयित्वा पदा स सन्ताडयामास तदा रविस्थितः ।;नारायणो हेतिनामैव रक्षो न्ययोजयत् तददृश्यं समागात् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = वायुस्तमाविश्य(वायुस्तदाविश्य) तु कीचकं तं न्यपातयत् तां समीक्ष्यैव भीमः ।;चुकोप वृक्षं च समीक्षमाणं तं वारयामास युधिष्ठिरोऽग्रजः ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णा रात्रौ भीमसकाशमेत्य हन्तुं पापं कीचकं प्रैरयत् तम् ।;भीमस्य बुद्ध्या निशि सा कीचकं च जगाद गन्तुं शून्यगृहं स चागात् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = तत्रैनमासाद्य तु भीमसेनो विजित्य तं बाहुयुद्धे निहत्य(निपात्य) ।;शिरो गुदे पाणिपादौ च तस्य प्रवेशयामास विमृद्य वीरः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = अवध्यं तं निहतं वीक्ष्य तस्य पञ्चोत्तरं शतमेवानुजानाम् ।;सर्वं वराच्छङ्करस्य ह्यवध्यं सहैव कृष्णां तेन दग्धुं बबन्ध ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = सा नीयमाना कीचकैः संरुराव श्रुत्वैव तं भीमसेनो महान्तम् ।;उद्धृत्य वृक्षं तेन जघान सर्वानादाय कृष्णां पुनरागात् पुरं स्वम्(गृहं स्वम्, पुरञ्च) ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = एवं यत्नात् तपसा तैरवाप्तो वरः शिवादजयत्वं(शिवादक्षयत्वं) रणेषु ।;अवध्यता चैव षडुत्तरास्ते शतं हता भीमसेनेन सङ्ख्ये ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्व इत्येव निहत्य सर्वान् मुमोद भीमो द्रौपदी चाथ कृष्णाम् ।;याहीत्यूचे तां सुदेष्णा भयेन त्रयोदशाहं पालयेत्याह तां सा ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्वित्येनामाह भयात् सुदेष्णा तथाऽवसन् पूर्णमब्दं च तेऽत्र;तदा(ततः) पार्थान् प्रविचिन्त्याखिलायां(प्रविचित्य) पृथ्व्यां छन्नान् धार्तराष्ट्रस्य दूताः ।;अविज्ञाय प्रययुर्धार्तराष्ट्रमूचुर्हतं कीचकं योषिदर्थे ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = तेनावदद् द्रौपदीकारणेन दुर्योधनो निहतं कीचकं तम् ।;भीमेनागुस्तत्र दुर्योधनाद्या भीष्मादिभिः सह कर्णेन चैव ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = अग्रे ययौ तत्र योद्धुं सुशर्मा स गा विराटस्य समाजहार ।;श्रुत्वा विराटोऽनुययौ ससेनस्तं पाण्डवाश्चानुययुर्विनाऽर्जुनम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = विजित्य सङ्ख्ये जगृहे विराटं तदा सुशर्मा तमयाद् वृकोदरः ।;स तस्य सेनां विनिहत्य(विनिपात्य) मात्स्यं विमोच्य जग्राह सुशर्मराजम् ।;युधिष्ठिरो मोचयामास तं च ततो रात्रौ न्यवसन् बाह्यतस्ते ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽपरदिने सर्वे भीष्मद्रोणपुरस्सराः ।;रहितं कीचकैर्मात्स्यं शक्यं मत्वाऽभिनिर्ययुः ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = कीचकस्य हिडिम्बस्य बककिर्मीरयोरपि ।;जरासन्धस्य नृपतेः कंसादीनां च सर्वशः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = न बाधनाय भीष्माद्या अपि शेकुः कथञ्चन ।;तस्मात् ते कीचकं शान्तं श्रुत्वा मात्स्यं ययुर्युधे ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = यतिष्ये रक्षितुं भीमाद् धार्तराष्ट्रानिति स्वकाम् ।;सत्यां कर्तुं प्रतिज्ञां तु ययौ द्रोणः सपुत्रकः ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = यदि युद्धाय निर्यान्ति ज्ञाताः स्युः पाण्डवास्तदा ।;न चेद् विराटमनतं नमयिष्यामहे वयम् ।;इति मत्वा विराटस्य जगृहुर्गाः समन्ततः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = तदोत्तरः सारथित्वे प्रकल्प्य पार्थं ययौ तान् निशाम्यैव भीतः ।;ततोऽर्जुनः सारथिं तं विधाय कृच्छ्रेण संस्थाप्य च तं(तान्) ययौ कुरून् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = आदाय गाण्डीवमथ ध्वजं च हनूमदङ्कं सदरोऽग्रतो गाः ।;निवर्त्य युद्धाय ययौ कुरूंस्तान् जिग्ये सर्वान् द्वैरथेनैव सक्तान् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = एकीभूतान् पुनरेवानुयातान् सम्मोहनास्त्रेण विमोहयित्वा ।;जग्राह तेषामुत्तरीयाण्यृते तु भीष्मस्य वेदास्त्रघातं स एव ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = विधाय भीष्मं विरथं जगाम तदा श्रुत्वा मत्स्यपतिर्जितान् कुरून् ।;मुमोद पुत्रेण जिता इति स्म तदाऽऽह षण्ढेन जितान् युधिष्ठिरः ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = तदा क्रुद्धः प्राहरत् तं विराटः सोऽक्षेण तद् भीमधनञ्जयाभ्याम् ।;श्रुतं तदा कुपितौ तौ निशाम्य न्यवारयत् तावपि धर्मसूनुः ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = निजस्वरूपेण समास्थितान् नो यदि स्म नासौ प्रणिपातपूर्वकम्(पूर्वम्) ।;क्षमापयेद् वध्य इत्यात्मरूपं समास्थितास्तस्थुरथापरे(अथा परे) दिने ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = तदा विराटासनमास्थितं नृपं युधिष्ठिरं वीक्ष्य विराट आह ।;किमेतदित्यूचिवानुत्तरोऽस्मै तान् पाण्डवान् गोग्रहणे च वृत्तम् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = ततो विराटो भयकम्पिताङ्गः प्रणम्य पार्थाञ्छरणं जगाम ।;ददौ च कन्यामुत्तरां फल्गुनाय पुत्रार्थमेव प्रतिजग्राह सोऽपि ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = एवं विराटं मोचयित्वैव गाश्च तमस्यन्धे कीचकान् पातयित्वा ।;प्राप्तो धर्मः सुमहान् वायुजेन तस्यानु पार्थेन च गोविमोक्षणात् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = अयातयन् केशवायाथ दूतान् सहाभिमन्युः सोऽपि रामेण सार्द्धम् ।;आगादनन्तानन्दचिद् वासुदेवो विवाहयामासुरथाभिमन्युम् ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = आसीन्महानुत्सवस्तत्र तेषां दाशार्हवीरैः सह पाण्डवानाम् ।;स पाञ्चालानां वासुदेवेन सार्द्धमज्ञातवासं समतीत्य मोदताम् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनाद्याः सूतपुत्रेण सार्द्धं ससौबलेया युधि पार्थपीडिताः ।;भीष्मादिभिः सार्द्धमुपेत्य नागपुरं मन्त्रं मन्त्रयामासुरत्र ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = अज्ञातवासे फल्गुनो नोऽद्य दृष्टस्तस्मात् पुनर्यान्तु पार्था वनाय ।;इति ब्रुवाणानाह भीष्मोऽभ्यतीतमज्ञातवासं द्रोण आहैवमेव ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = दिनानामधिपः सूर्यः पक्षमासाधिपः शशी ।;तस्मात् सौम्याब्दमेवात्र मुख्यमाहुर्मनीषिणः ।;सौम्यं कालं ततो यज्ञे गृह्णन्ति नतु सूर्यजम् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = तदेतदविचार्यैव लोभाच्च धृतराष्ट्रजैः ।;राज्यं न दत्तं पार्थेभ्यः पार्थाः कालस्य पूर्णताम् ।;ख्यापयन्तो विप्रवरैरुपप्लाव्यमुपाययुः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = सुवासुदेवा अखिलैश्च यादवैः पाञ्चालमत्स्यैश्च युताः सभार्याः ।;उपप्लाव्ये ते कतिचिद् दिनानि वासं चक्रुः कृष्णसंशिक्षितार्थाः ॥ ५७॥ | |||
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<span id="gr-C24" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्विंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C24" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्विंशोऽध्यायः"></span> | ||
== चतुर्विंशोऽध्यायः == | == चतुर्विंशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ ततः सम्मन्त्र्यानुमते(अनुमतेः) कृष्णस्य स्वपुरोहितम् ।;द्रुपदः प्रेषयामास धृतराष्ट्राय शान्तये ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = स गत्वा धृतराष्ट्रं तं भीष्मद्रोणादिभिर्युतम् ।;उवाच न विरोधस्त उत्पाद्यो धर्मसूनुना ।;यस्य भीमार्जुनौ यौधौ नेता यस्य जनार्दनः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = श्रुतास्ते भीमनिहता जरासन्धादयोऽखिलाः ।;यथा च रुद्रवचनादवध्या राक्षसाधिपाः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = तीर्थविघ्नकराः सर्वतीर्थान्याच्छाद्य संस्थिताः ।;तिस्रः कोट्यो महावीर्या भीमेनैव निषूदिताः (निसूदिताः) ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = भ्रातॄणां ब्राह्मणानां च लोकानां च हितैषिणा ।;ततो हि सर्वतीर्थानि गम्यान्यासन् नृणां क्षितौ ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = यथा जटासुरः पापः शर्वाणीवरसंश्रयात् ।;अवध्यो विप्ररूपेण वञ्चयन्नेव पाण्डवान् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञात्वाऽपि भीमसेनेन विप्ररूपस्य नो वधः ।;योग्य इत्यहतो भीमे मृगयार्थं गते क्वचित् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = यमौ युधिष्ठिरं कृष्णां चाऽदायैव पराद्रवत् ।;दृष्टो भीमेन तांस्त्यक्त्वा संसक्तस्तेन सङ्गरे ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = निपात्य भूमौ पादेन सञ्चूर्णितशिरास्तमः ।;जगाम किमु ते पुत्राः शक्या हन्तुमिति स्म ह ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = निवातकवचाश्चैव हताः पार्थेन ते श्रुताः ।;जानासि च हरेर्वीर्यं यस्येदमखिलं वशे ।;सब्रह्मरुद्रशक्राद्यं चेतनाचेतनात्मकम् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादेतैः पालितस्य धर्मजस्य स्वकं वसु ।;दीयतामिति तेनोक्तो धृतराष्ट्रो नचाकरोत् ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = ततः सहैव यदुभिः कृष्णं द्वारवतीं गतम् ।;युद्धसाहाय्यमिच्छन्तौ धार्तराष्ट्रधनञ्जयौ ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = युगपद् ययतुस्तत्र वेगेनाजयदर्जुनम् ।;दुर्योधनः शिरस्थान आसीनोऽभूद्धरेस्तदा ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = दर्पान्नाहं राजराज उपास्ये पादयोरिति ।;तयोरागमनं पूर्वं ज्ञात्वैव हि हरिः प्रभुः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = असुप्तः सुप्तवच्छिश्ये तत्रातिष्ठद् धनञ्जयः ।;प्रणम्य पादयोः प्रह्वो भक्त्युद्रेकात् कृताञ्जलिः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = तमैक्षत् प्रथमं देवो जानन्नपि सुयोधनम् ।;स्वागतं फल्गुनेत्युक्ते पूर्वमागामहं त्विति ।;आह दुर्योधनस्तं च स्वागतेनाभ्यपूजयत् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = तयोरागमने हेतुं श्रुत्वा प्राह जनार्दनः ।;एकः पूर्वागतोऽत्रान्यः पूर्वदृष्टो मया यतः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = समं करिष्ये युवयोरेकत्राहं निरायुधः ।;अन्यत्र दशलक्षं मे पुत्राः शूराः पदातयः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्ते फल्गुनः कृष्णं वव्रे तद्भक्तिमान् यतः ।;अन्यस्तत्राभक्तिमत्त्वाद् वव्रे गोपान् प्रयुद्ध्यतः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = पार्थानामेव साहाय्यं करिष्यन्नपि केशवः ।;तस्याभक्तिं दर्शयितुं चक्रे समवदीश्वरः ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = ततः पार्थेन सहितः पाण्डवान् केशवो ययौ ।;दुर्योधनो ययौ रामं स भयात् केशवस्य च ।;न साहाय्यं करोमीति प्राह तत्स्नेहवानपि ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = उपप्लाव्ये सभायां हि तत्पक्षीयं वचो ब्रुवन् ।;निराकृतः सात्यकिना समक्षं केशवस्य च ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = ततो दुर्योधनं नायात् स च हार्दिक्यसंयुतः ।;जगाम हस्तिनपुरमक्षोहिण्यो दशाभवन् ।;एका च धार्तराष्ट्रस्य नानादेश्यैर्नृपैर्युताः ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = सप्त पाण्डुसुतानां च मत्स्यद्रुपदकेकयैः ।;धृष्टकेतुजरासन्धसुतकाशीनृपैर्युताः ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = पुरुजित् कुन्तिभोजश्च चेकितानश्च सात्यकिः ।;पाण्डवान् सेनया युक्ताः समीयुर्देवपक्षिणः ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = विन्दानुविन्दावावन्त्यौ जयत्सेनोऽन्यकैकयाः(अन्यकेकयाः) ।;क्षेमधूर्तिर्दण्डधारः कलिङ्गोऽम्बष्ठ एव च ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = श्रुतायुरच्युतायुश्च बृहद्बलसुदक्षिणौ ।;श्रुतायुधः सैन्धवश्च राक्षसोऽलम्बुसस्तथा ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = अलायुधोऽलम्बलश्च दैत्या दुर्योधनं ययुः ।;गत्वा दुर्योधनाहूतो भगदत्तोऽपि तं ययौ ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = सपुत्रपौत्रो बाह्लीको भीष्मद्रोणकृपा अपि ।;प्रीत्यर्थं धृतराष्ट्रस्य बभूवुस्तत्सुतानुगाः ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = पाण्ड्यश्च वीरसेनाख्यः पाण्डवानेव संश्रितः ।;शल्यं च पाण्डवानेव यान्तं ज्ञात्वा सुयोधनः ।;सुसभाः कारयामास सर्वभोगसमन्विताः ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = ता युधिष्ठिरक्लृप्ताः स मत्वा शल्योऽब्रवीदिदम् ।;य एताः(य एतत्) कारयामास तदभीष्टं करोम्यहम् ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = लीनः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रः सत्यं कुर्वित्यभाषत ।;देहि मे युद्धसाहाय्यमिति सोऽपि यशोऽर्थयन् ।;रक्षार्थमात्मवाक्यस्य तथेत्येवाभ्यभाषत ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = स पाण्डवांस्ततो गत्वा तैरनुज्ञात एव च ।;तेजोवधार्थं कर्णस्य धनञ्जयकृतेऽर्थितः ।;तथेत्युक्त्वा ययौ धर्मनन्दनं कौरवान् प्रति ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = सञ्जयं प्रेषयामास धृतराष्ट्रोऽथ शान्तये ।;पाण्डवान् प्रत्यधर्मं च युद्धं स प्रत्यपादयत् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = हठवादेऽवदद् भीमो यं धर्मं द्रौपदी तथा ।;तमेवोक्त्वा धर्मजस्तु चकार च निरुत्तरम् ।;कृष्णोऽपि तस्य धर्मस्य प्रामाण्यं प्रत्यपादयत् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = ततो निरुत्तरः कृष्णं पाण्डवांश्च प्रणम्य सः ।;धृतराष्ट्रं ययौ तं च विनिन्द्य प्रययौ गृहम् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्ते वैरमात्मोत्थं लोकमध्ये प्रहापयन् ।;लोकसङ्ग्रहणार्थाय भीमसेनोऽब्रवीद् वचः ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = नास्मन्निमित्तनाशः स्यात् कुलस्यापि वयं कुलम् ।;रक्षितुं धार्तराष्ट्रस्य भवेमाधश्चरा इति ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = इच्छताऽप्यखिलान् हन्तुं धार्तराष्ट्रान् दृढात्मना ।;भीमेनोक्तो वासुदेवो लोकसङ्ग्रहणेच्छया ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = वधं तेषां धर्ममेव लोके ख्यापयितुं हरिः ।;आक्षिपन्निव भीमं तं युद्धाय प्रेरयद्(प्रैरयत्,प्रेरयद्) दृढम् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = अभिप्रायं केशवस्य जानन् भीमो निजं बलम् ।;राज्ञां मध्येऽवदत् तच्च कृष्णोऽभ्यधिकमेव हि ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = शशंस सत्यैः सद्वाक्यै राज्ञां मध्ये प्रकाशयन् ।;वधं कुरूणां सद्धर्मं गुणान् भीमस्य चामितान् ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = नित्यमेकमनस्कौ तावपि केशवमारुती ।;एवं लोकस्य संवादहेतोः संवादमक्रताम् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = ततः कृष्णोऽर्जुनं चैव कृपालुं सन्धिकामुकम् ।;हेतुमद्भिः शुभैर्वाक्यैरनुनीय जगत्पतिः ।;उक्तो मानुषया बुद्ध्या नकुलेन सुनीतिवत्(सुनीतवत्) ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = शौर्यप्रकाशनायैव युद्धं योजयतां भवान् ।;इत्युक्तः सहदेवेन युयुधानेन चाच्युतः ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = दस्यूनां निग्रहो धर्मः क्षत्रियाणां यतः परः ।;अतो न धार्तराष्ट्रैर्नः सन्धिः स्यादिति पार्षती ।;जगाद कृष्णं सोऽप्येनां ओमित्युक्त्वा विनिर्ययौ ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = ससात्यकिः स्यन्दनवर्यसंस्थितः पृथातनूजैरखिलैः स भूमिपैः ।;अन्वागतो दूरतरं गिरा तान् संस्थाप्य विप्रप्रवरैः कुरून् ययौ ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = एकोऽपि विष्णुः स तु(च) भार्गवात्मा व्यासात्मकश्चानुगतो मुनीन्द्रैः (व्यासः सशिष्यस्तदनन्यदृश्यः) ।;ययौ तदुक्तेर्हि गुणान् प्रवेत्तुं नान्यो हि शक्तस्तमृते यतः प्रभुम् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = स वन्द्यमानोऽखिलराष्ट्रवासिभिः प्रसूनवर्षैरभिवर्षितः सुरैः ।;संस्तूयमानः प्रणतोऽब्जजादिभिर्गजाह्वयं प्राप परोऽप्रमेयः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = स भीष्ममुख्यैः सरसाभियातः सहैव तै प्रययौ राजमार्गे ।;दिदृक्षवस्तं जगदेकसुन्दरं गुणार्णवं प्राययुरत्र सर्वे ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = सभाजितस्तैः(सम्भावितस्तैः) परमादरेण विवेश गेहं नृपतेरनन्तः ।;स भीष्ममुख्यान् पुरतो निधाय वैचित्रवीर्येण समर्चितोऽजः ।;रौग्मे(रौक्मे) निषण्णः परमासने प्रभुर्बभौ स्वभासा ककुभोऽवभासयन् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = यथोचितं तेषु विधाय केशवो दौर्योधनं प्राप्य गृहं च पूजितः ।;पूजां तदीयां गुणवद्द्विडित्यसौ जग्राह नो विदुरं चाऽजगाम ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = स भीष्मपूर्वैरभियाचितोऽपि जगाम नैषां गृहमादिदेवः ।;उपेक्षिता द्रौपदीत्यप्रमेयो जगाम गेहं विदुरस्य शीघ्रम् ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = स तेन भक्त्याऽभिगतः प्रसन्नः प्रविश्य चान्तर्गृहमीश्वरोऽजः ।;भक्त्याऽभिपूर्णेन ससम्भ्रमेण सम्पूजितः सर्वसमर्पणेन ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = परे दिनेऽसौ धृतराष्ट्रसूनुना समानीतः संसदि कौरवाणाम् ।;विवेश दिव्ये मणिकाञ्चनासने सार्द्धं मुनीन्द्रैः परमार्थवेदिभिः ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = सम्पूजितो भीष्ममुख्यैः समस्तै रराज राजीवसमाननेत्रः ।;यथोचितास्तत्र विधाय वार्ता जगाद काले कलिकल्मषापहः ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = वैचित्रवीर्य स्वकुलस्य वृद्ध्यै प्रदेहि राज्यं तव सत्सुताय ।;यशश्च धर्मं परमं प्रसादं मम त्वमाप्नोषि तदैव राजन् ।;अतोऽन्यथा यशसो धर्मतश्च हीनः प्रतीपत्वमुपैषि मेऽतः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः प्राह ममातिवर्तिनं सुतं स्वयं मे प्रतिबोधयेति ।;स वासुदेवेन विबोधितोऽपि पापाभिसन्धिर्धृतराष्ट्रसूनुः ।;उत्थाय तस्मादनुजैरमात्यैर्नियन्तुमीशं कुमतिर्व्यधान्मतिम् ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = येये तदा केशवसंयमाय न्यमन्त्रयंस्ते विबुधप्रतीपाः ।;अतो विकर्णप्रमुखा अपि स्म वध्यत्वमायन्नशुभां गतिं च ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = कर्णः सुराग्र्योऽपि(सुरांशोऽपि) सुयोधनार्थे(सुयोधनार्थं) न्यमन्त्रयद् भावतो नैव दुष्टः ।;अतो गतिश्चास्य सुशोभनाऽभूद् येऽत्रानुकूलाः परमस्य ते शुभाः ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = ऋषिभिर्जामदग्न्येन व्यासेनाप्यमितौजसा ।;वासुदेवात्मकेनैव चैव त्रिरूपेणैव विष्णुना ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = मातापितृभ्यां भीष्माद्यैरनुशिष्टोऽपि दुर्मतिः ।;सुयोधनो मन्त्रयते मुकुन्दस्यानुबन्धनम् ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = सात्यकिः कृतवर्मा च तच्छुश्रुवतुरञ्जसा ।;संस्थाप्य कृतवर्माणं रहः सात्यकिरत्र च ।;अभ्येत्य केशवं प्राह दुर्योधनविनिश्चयम् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = जानन्नप्यखिलं कृष्णस्तच्छ्रुत्वा सात्यकेर्मुखात् ।;वैचित्रवीर्यमवदत् पश्य मामिति(मामपि) सर्वगम् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = अथ तेनाऽहुते पुत्रे सामात्ये पुरुषोत्तमः ।;(स्वं रूपं) स्वरूपं दर्शयामास सर्वगं पूर्णसद्गुणम् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = तत् कालसूर्यामितदीप्ति सर्वजगद्भरं शाश्वतमप्रमेयम् ।;दृष्ट्वैव चक्षूंषि सुयोधनाद्या न्यमीलयन् दीधितिवारितानि ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = पिधाय रूपं पुनरेव तद्धरिर्वैचित्रवीर्येण समर्थितः पुनः ।;कृत्वाऽन्धमेव प्रययौ सुयोधनं सहानुगं(सहानुजं) पापतमं प्रकाश्य ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तशक्तिः पुरुषोत्तमोऽसौ शक्तोऽपि दुर्योधनचित्तनिग्रहे ।;नैव व्यधादेनमथोक्तकारिणं निपातयन्नन्धतमस्यनन्तः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च कुन्तीगृहमेत्य कृष्णस्तयोद्योगं धर्मसुतस्य शिष्टम् ।;श्रुत्वा ययौ सूर्यजमात्मयाने निधाय तस्यावददात्मजन्म ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = आयाहि पार्थानिति (पाण्डूनिति) तद्वचः स नैवाकरोन्मानितो धार्तराष्ट्रैः ।;संस्थाप्य तं भगवान् द्रौणये च रहोऽवदन्मित्रभावं पृथाजैः ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = यावत् पितुर्मरणं सोऽपि मैत्रीं वव्रे पार्थैस्तं च विसृज्य कृष्णः ।;ययौ कुरून् पूर्वमेवोद्विसृज्य पृथासुतानां स सकाशमीशः ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = सम्प्रार्थितः पृथया चैव कर्णः पार्थैर्योगं याहि सूनुर्ममासि ।;तेनाप्युक्ता वासविना विनाऽहं हन्यां सुतांस्ते न कथञ्चनेति ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = ततो ययुः कौरवाः पाण्डवाश्च कुरुक्षेत्रं योद्धुकामाः सकृष्णाः ।;चक्रुश्च ते शिबिराण्यत्र सर्वे शुभे देशे पाण्डवाः कृष्णबुद्ध्या ॥ ८०॥ | |||
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<span id="gr-C25" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चविंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C25" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चविंशोऽध्यायः"></span> | ||
== पञ्चविंशोऽध्यायः == | == पञ्चविंशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ ते सेने समरारम्भे समेते सागरोपमे ।;भीमभीष्ममुखे वीक्ष्य प्राह वासविरच्युतम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = ‘सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत’(भ.गी.१.२१) ।;इत्युक्तः स तथा चक्रे पार्थोऽपश्यच्च बान्धवान्(पार्थोऽपश्यत् स्वबान्धवान्) ।;विससर्ज धनुः पापाशङ्की तत्राऽह माधवः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = स्वधर्मो दुष्टदमनं धर्मज्ञानानुपालनम् ।;क्षत्रियस्य तमुत्सृज्य निन्दितो यात्यधो ध्रुवम् ॥ ३॥ | |||
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| verse_text = सृष्टिस्थित्यप्ययाज्ञानबन्धमोक्षप्रवृत्तयः । | |||
| verse_lines = सृष्टिस्थित्यप्ययाज्ञानबन्धमोक्षप्रवृत्तयः ।;प्रकाशनियमौ चैव ब्रह्मेशादिक्षरस्य च ।;अक्षरप्रकृतेश्चैव मत्त एव नचान्यतः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = न मे कुतश्चित् सर्गाद्याः स्वातन्त्र्याद् गुणपूर्तितः ।;अतः समाधिकाभावान्मम मद्वशमेव च ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञात्वैषां निधनाद्यं च जीवादेरस्वतन्त्रताम् ।;अस्वातन्त्र्यान्निवृत्तौ च मामनुस्मर युद्ध्य च ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।;अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।;भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ १०॥ (भ.गी.१२.६-७) | |||
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| verse_lines = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।;मत्स्थानि सर्वभूतानि नचाहं तेष्ववस्थितः ॥ ११॥ (भ.गी.९.४) | |||
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| verse_lines = (सम्पूर्णसत्सर्व)सुपूर्णसत्सर्वगुणदेहोऽहं सर्वदा प्रभुः ।;अस्पृष्टाखिलदोषैकनित्यसत्तनुरव्ययः ।;इत्युक्तो वासविः प्राह व्याप्तं ते दर्शयेश मे(व्याप्तिं मे दर्शयस्व मे) ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = अथ दिव्यदृशं तस्य दत्वा व्याप्तं निजं वपुः ।;देशतः कालतश्चैव पूर्णं सर्वगुणैः सदा ।;दर्शयामास भगवान् यावत्यर्जुनयोग्यता ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = तत्प्रार्थितः पुनः कृष्णस्तद्रूपं लोकमानतः ।;पूर्ववद् दर्शयामास पुनश्चैनमशिक्षयत् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं ज्ञेयं प्रकृत्यादि(ज्ञानज्ञेयप्रकृत्यादि) ज्ञापयन् पुरुषोत्तमः ।;तेनानुशिष्टः पार्थस्तु सशरं धनुराददे ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = अथ व्यूढेष्वनीकेषु नदन् वायुसुतोऽभ्ययात् ।;समितिं धार्तराष्ट्राणां ते तं सर्वे न्यवारयन् ।;ससृजुः शरवृष्टिं च भीमसेनस्य मूर्धनि ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = क्षिप्रं नैव प्रहर्तव्यं ज्ञातिषु प्रहरत्स्वपि ।;इत्येवाप्रहरत्यस्मिन् शत्रुभिः शरविक्षते ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = अमुचन् धार्तराष्ट्रेषु शस्त्रवृष्टिं दुरासदाम् ।;सौभद्रप्रमुखा वीराः सर्वे पाण्डुसुतात्मजाः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = अपीडयंस्ताञ्छस्त्रौघैर्धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।;ररक्ष तान् वायुसुतो विसृजञ्छरसञ्चयान् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = तत्र भीमशरैर्नुन्ना धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।;भग्नास्तानथ गाङ्गेयो दिव्यास्त्रविदधारयत्(दिव्यास्त्रं व्यदधारयत्, दिव्यास्त्रविदधारयत्)) ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = अथ द्वन्द्वानि युद्धानि बभूवुर्विजिगीषताम् ।;द्रोणपार्षतयोश्चैव शैनेयकृतवर्मणोः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = दुःशासनेन वीरस्य माद्रेयस्य यवीयसः ।;नकुलस्य विकर्णस्य कार्ष्णेयैर्दुर्मुखादिनाम् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = वृत्ते द्वन्द्वमहायुद्धे तत्र धर्मजपक्षगाः ।;जिता विनैव शैनेयं सोऽजयद्धृदिकात्मजम् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = अथ भीष्मद्रोणमुखैर्भगदत्तादिभिस्तथा ।;विद्राप्यमाणं स्वबलं स्थापयामास मारुतिः ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणं च भगदत्तं च कृपं दुर्योधनं तथा ।;केवलं बाहुवीर्येण व्यजयद् भीमविक्रमः ।;हत्वोत्तरं मद्रराजो व्यद्रावयदनीकिनीम् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = अथ भीष्ममुदीर्णास्त्रं द्रावयन्तं वरूथिनीम् ।;ससौमदत्तिं सौभद्रसहायोऽर्जुन आसदत् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = सौभद्रं तत्र विक्रान्तमतीत्य द्युसरित्सुतः ।;द्रावयामास पाञ्चालान् पश्यतः सव्यसाचिनः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = तस्य विक्रममालक्ष्य पार्थं तद्गौरवानुगम् ।;दृष्ट्वा युधिष्ठिरो राजा क्रुद्धः सेनामपाहरत् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = रात्रौ युधिष्ठिरश्चिन्तामाप्य पार्थं व्यगर्हयत् ।;स कृष्णाद्यैः सान्त्वितश्च पुनर्युद्धाय निर्ययौ ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = एवं भीष्मो दशाहानि सेनापत्यं चकार ह ।;कृत्वाऽपि पाण्डवैर्युद्धं तत् कर्तुमकृतोपमम् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = कर्णोऽर्द्धरथ इत्युक्त्वा तावद् युद्धात् प्रयापितः(प्रहापितः) ।;यावत् त्वं योत्स्यसे तावन्न योत्स्यामीति निर्गते ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = कर्णेऽयुतरथानां(कर्णोऽयुतरथानां च) स नित्यशो वधमाहवे ।;प्रतिजज्ञेऽकरोत् तच्च पुनश्चास्त्रविदां वरः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = सुसमर्थावपि वधे तस्य भीमधनञ्जयौ ।;स्नेहेन यन्त्रितौ तस्य गौरवाच्चान्ववर्तताम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = बभूवुस्तत्र युद्धानि चित्राणि सुबहूनि च ।;तान्यम्बरे विमानस्था ब्रह्मरुद्रपुरस्सराः ।;अपश्यन् देवताः सर्वा गन्धर्वाप्सरसोऽसुराः ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नो महेष्वासः प्रतिव्यूह्याऽपगासुतम् ।;चक्रे युद्धानि सुबहून्यजेयः शत्रुभी रणे ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = तत्रोद्दधार कृष्णोऽपि फल्गुनं मृदुयोधिनम् ।;दृष्ट्वा चक्रं तथोद्यम्य बाहुं भीष्माय जग्मिवान् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = तेन स्तुतो गृहीतश्च फल्गुनेन प्रणम्य च ।;प्रार्थितो रथमारूढः पुनः शङ्खमपूरयत् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = ततो भीष्मोऽर्जुनश्चैव शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् ।;अयत्नेन जितश्चैव फल्गुनेनाऽपगासुतः ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = अयुतानि बहून्याजौ रथानां निजघान च ।;जिताः सेनापहारं च चक्रुर्भीष्ममुखास्ततः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = कदाचिदग्रगो भीमो भीष्मद्रोणौ विसारथी ।;कृत्वा विद्राप्य तानश्वान् भित्वा व्यूहं विवेश ह ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = पुनः संस्थापितरथौ विजित्यायत्नतो बली ।;यतमानौ महेष्वासौ धार्तराष्ट्रान् जघान ह ।;पञ्चविंशद्धतास्तत्र धार्तराष्ट्रा महाबलाः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = भगदत्तद्रौणिकृपशल्यदुर्योधनादयः ।;सर्वे जिता द्राविताश्च सेना च बहुला हता ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = विरथो व्यायुधश्चैव दृढवेधविमूर्च्छितः ।;कृतो दुर्योधनः सर्वराज्ञां भीमेन पश्यताम् ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽपहारं सैन्यस्य जिताश्चक्रुश्च कौरवाः ।;दुर्योधनो निशायां च ययौ यत्र नदीसुतः ।;पीडितो भीमबाणैश्च क्षरद्गात्रो ननाम तम् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = अयं नारायणो देवः पुर्णानन्तगुणार्णवः ।;आज्ञापयति वः सर्वान् प्रादुर्भावाय भूतले ।;स्वयं च देवकीपुत्रो भविष्यति जगत्पतिः(जगत्प्रभुः) ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = स च नारायणो देवो देवकीनन्दनोऽभवत् ।;तेनैते पालिताः पार्था अजेया देवसर्गिणः ।;तस्मात् तैः सन्धिमन्विच्छ यदीच्छस्यपराभवम् ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो डम्भबुद्ध्यैव नत्वा विष्णुं ततो ययौ ।;प्रातर्निर्यातयामास सेनां युद्धाय दुर्मतिः ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = दिव्यौषधेन भीष्मस्य भूत्वा च निरुजस्ततः ।;भीष्ममग्रे निधायैव ययौ युद्धाय दंशितः (दंसितः) ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = तत्राऽसीद् युद्धमतुलं भीमभीष्मानुयायिनाम् ।;पाण्डवानां कुरूणां च शूराणामनिवर्तिनाम् ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नस्तत्र भीमानुयायी दुर्योधनस्यावरजैः प्रयुद्ध्यन् ।;सम्मोहनास्त्रेण विमोहयित्वा विकर्णपूर्वानहनच्च सेनाम् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = ततो द्रोणस्तान् समुत्थाप्य सर्वान् विज्ञानास्त्रेणाऽसदत् पार्षतं च ।;तं भीमसेनः सूतहीनं विधाय व्यद्रावयच्छत्रुगणाञ्छरौघैः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽसदत् कृतवर्मा रथेन धृष्टद्युम्नं सोऽभ्ययात् तावुभौ च ।;ववर्षतुः शरवर्षैरथोग्रैस्तत्राकरोद् विरथं द्रौपदिस्तम् ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् जिते रथवीरे स्वयं तं दुर्योधनः पार्षतमाससाद ।;तं भीमसेनो विरथायुधं च कृत्वा बाणेनाहनज्जत्रुदेशे ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = विमूर्च्छितं तं रुधिरौघमुच्चैर्वमन्तमाशु स्वरथे निधाय ।;कृपो ययौ मारुतिर्धार्तराष्ट्रीं व्यद्रावयत् पृतनां बाणपूगैः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = अथेन्द्रसूनुः केशवप्रेरितेन रथेन शत्रून् विधमञ्छरौघैः ।;रथान् रणे पञ्चविंशत्सहस्रान् निनाय वैवस्वतसादनाय ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = तमन्वगाद् (तमन्वयात्) युयुधानः सुधन्वा विद्रावयन् धार्तराष्ट्रस्य सेनाम् ।;तमभ्ययात् सौमदत्तिस्तयोश्च सुयुद्धमासीदतिभैरवास्त्रम् ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = पुत्रान् दशास्याऽशु निहत्य वीरः स सात्यकेः सौमदत्तिः सकाशे ।;समर्पयामास शरीरदारणैः शरैरुभौ तौ विरथौ च चक्रतुः ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = अथासिपाणिं युयुधानमाशु महासिहस्तेन च सौमदत्तिना ।;आसादितं वीक्ष्य रथं स्वकीयमारोपयामास सुतोऽनिलस्य ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = सुयोधनः सौमदत्तिं स्वकीयरथे व्यवस्थाप्य च भीमसेनात् ।;अपाद्रवद् वासविर्भीष्ममाजौ समाससादाऽशु महेन्द्रकल्पः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = उभौ च तावस्त्रविदां प्रबर्हौ शरैर्महाशीविषसन्निकाशैः ।;ततक्षतुर्नाकसदां समक्षं महाबलौ संयति जातदर्पौ ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = स्वबाहुवीर्येण जितः स भीष्मः किरीटिना लोकमहारथेन ।;सेनामपाहृत्य ययौ निशायामासादितायामथ पाण्डवाश्च ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = ततः परेद्युः पुनरेव भीमभीष्मौ पुरस्कृत्य समीयतुस्ते ।;सेने तदा सारथिहीनमाशु भीष्मं कृत्वा मारुतिरभ्ययात् परान् ।;निपातितास्तेन रथेभवाजिनः प्रदुद्रुवुश्चावशिष्टाः समस्ताः ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनाद्येषु पराजितेषु भीष्मद्रोणद्रौणिपुरस्सरेषु ।;महागजस्थो भगदत्त आगादायन् बाणं भीमसेनेऽमुचच्च(भीमसेने मुमोच) ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = तेनातिविद्धे भीमसेनेऽस्य पुत्र उद्यच्छमानं पितरं निवार्य ।;घटोत्कचोऽभ्यद्रवदाशु वीरः स्वमायया हस्तिचतुष्टयस्थः ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = स वैष्णवास्त्रं भगदत्तसंस्थं विज्ञाय विष्णोर्वरतो विशेषतः ।;अमोघमन्यत्र हरेर्मरुत्सुतः पुत्रे याते न स्वयमभ्यधावत् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = अनुग्रहादभ्यधिकादवध्यं जानन्नपि स्वं वासुदेवस्य नित्यम् ।;तद्भक्तिवैशेष्यत एव तस्य सत्यं वाक्यं कर्तुमरिं नचायात् ।;यदा स्वपुत्रेण जितो भवेत् स किम्वात्मनेत्येव तदा प्रवेत्तुम् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = स विस्मृतास्त्रस्तु यदा भवेत तदा भीमो भगदत्तं प्रयाति ।;ऋते भीमं वाऽर्जुनं नास्त्रमेष प्रमुञ्चतीत्येव हि वेद भीमः ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = चतुर्गजात्मोपरिगात्मकश्च घटोत्कचः सुप्रतीकं च तं च ।;नानाप्रहारैर्वितुदंश्चकार सन्दिग्धजीवौ जगतां समक्षम् ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = गजार्तनादं तु निशम्य भीष्ममुखाः समापेतुरमुं च दृष्ट्वा ।;महाकायं भीमममुष्य पृष्ठगोपं च वाय्वात्मजमत्रसन् भृशम् ।;ते भीतभीताः पृतनापहारं कृत्वाऽपजग्मुः शिबिराय शीघ्रम् ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = दिने परे चैव पुनः समेताः परस्परं पाण्डवाः कौरवास्ते ।;तत्राऽसदन्नागसुतासमुद्भवः पार्थात्मजः शाकुनेयान् षडेकः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = तैः प्रासहस्तैः क्षतकायोऽतिरूढकोपः स खड्गेन चकर्त तेषाम् ।;शिरांसि वीरो बलवानिरावान् भयं दधद् धार्तराष्ट्रेषु चोग्रम् ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा तमुग्रं धृतराष्ट्रपुत्रो दिदेश रक्षोऽलम्बुसनामधेयम् ।;जह्यार्जुनिं क्षिप्रमिति स्म तच्च समासदन्नागसुतातनूजम्(नागसुतासमुद्भवम्) ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = तयोरभूद् युद्धमतीव दारुणं मायायुजोर्वीर्यवतोर्महाद्भुतम् ।;ससादिनोऽश्वान् स तु राक्षसोऽसृजत् ते पार्थपुत्रस्य च सादिनोऽहनन्(अहनत्) ।;ततस्त्वनन्ताकृतिमाप्तमार्जुनिं सुपर्णरूपोऽहनदाशु राक्षसः ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = हतं निशम्याऽर्जुनिमुग्रपौरुषो ननाद कोपेन वृकोदरात्मजः ।;चचाल भूर्नानदतोऽस्य रावतः ससागरागेन्द्रनगा भृशं तदा ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = अलम्बुसस्तं प्रसमीक्ष्य मारुतेः सुतं बलाढ्यं भयतः पराद्रवत् ।;पराद्रवन् धार्तराष्ट्रस्य सेनाः सर्वास्तमाराथ सुयोधनो नृपः ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = स भीमपुत्रस्य जघान मन्त्रिणो महाबलांश्चतुरोऽन्यांस्तथैव ।;हतावशेषेषु च विद्रवत्सु घटोत्कचोऽभ्याहनदाशु तं नृपम् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = स पीड्यमानो युधि तेन रक्षसा प्रवेशयामास शरं घटोत्कचे ।;दृढाहतस्तेन तदा बलीयसा घटोत्कचः प्रव्यथितेन्द्रियो भृशम् ।;तस्थौ कथञ्चिद् भुवि पात्यमानः पुनः शरानप्यसृजत् सुयोधने ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = चिरं प्रयुद्धौ नृपराक्षसाधिपौ परस्पराजेयतमौ रणाजिरे ।;द्रोणादयो वीक्ष्य रिरक्षिषन्तः सुयोधनं प्रापुरमित्रसाहाः ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = स द्रोणशल्यौ गुरुपुत्रगौतमौ भूरिश्रवःकृतवर्मादिकांश्च ।;ववर्ष बाणैर्गगनं समाश्रितो घटोत्कचः स्थूलतमै सुवेगैः ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = तमेकग्र्यै रथिभिः परिष्कृतं निरीक्ष्य भीमोऽभ्यगमत् समस्तान् ।;द्रोणोऽत्र भीमप्रहितैः शरोत्तमैः सुपीडितः प्राप्तमूर्च्छः पपात ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = द्रौणिं कृपाद्यान् ससुयोधनांश्च चकार भीमो विरथान् क्षणेन ।;निवार्यमाणांस्तु वृकोदरेण घटोत्कचस्तान् प्रववर्ष सायकैः ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = तेनाम्बरस्थेन तरुप्रमाणैरभ्यर्दिताः कुरवः सायकौघैः ।;भूमौ च भीमेन शरौघपीडिताः पेतुर्नेदुः प्राद्रवंश्चातिभीताः ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = सर्वांश्च ताञ्छिबिरं प्रापयित्वा विना भीष्मं कौरवान् भीमसेनः ।;घटोत्कचश्चानदतां महास्वनौ नादेन लोकानभिपूरयन्तौ ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनोऽथ स्वजनैः समेतः पुनः प्रायाद् रणभूमिं स भीष्मम् ।;जयोपायं भैमसेनेरपृच्छत् स्वस्यैव स प्राह न तं व्रजेति ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = प्राग्ज्योतिषं चैव घटोत्कचाय सम्प्रेषयामास सुरापगासुतः ।;स प्राप्य हैडिम्बमयोधयद् बली स चार्दयामास सकुञ्जरं तम् ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = तेनाहतः (तेनार्दितः) प्राहिणोच्छूलमस्मै वियत्यवप्लुत्य तदा घटोत्कचः ।;प्रगृह्य शूलं प्रबभञ्ज जानुमारोप्य देवा जहृषुस्तदीक्ष्य ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = तदा स तस्यैव पदानुगान् नृपो जघान तं मारुतिरभ्ययाद् रणे ।;स प्राहिणोद् भीमसेनाय वीरो गजं तमस्तम्भयदाशु सायकैः ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = संस्तम्भिते बाणवरैस्तु नागे भीमस्याश्वान् सायकैरर्दयत्(आर्दयत्) सः ।;सोऽभ्यर्दिताश्वोऽथ गदां प्रगृह्य हन्तुं नृपं तं सगजं समासदत् ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = स हन्तुकामेन रुषाऽभिपन्नो भीमेन राजा पुरतः पृष्ठतश्च ।;कृष्णेनास्त्रं वैष्णवं तद् गृहीतुं(ग्रहीतुं) सहार्जुनेनापययौ स भीतः ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् गते भीमसेनार्जुनाभ्यां विद्राविते राजसङ्घे समस्ते ।;भीष्मः सेनामपहृत्यापयातो दुर्योधनस्तं निशि चोपजग्मिवान् ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = संश्रावितः क्रूरवचः स तेन चक्रे सत्यं मृत्युभयं विहाय ।;शक्त्या हनिष्यामि परानिति स्म चक्रे च तत् कर्म तथा परेद्युः ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = तं शक्तितो जुगुपुर्धार्तराष्ट्रास्तेनार्दिताश्चेदिपाञ्चालमुख्याः ।;पराद्रवन् भीष्मबाणोरुभीताः सिंहार्दिताः क्षुद्रमृगा इवाऽर्ताः ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = संस्थाप्य तान् भीष्ममभिप्रयान्तमलम्बुसोऽवारयत् पार्थसूनुम् ।;विजित्य तं केशवभागिनेयो ययौ भीष्मं धार्तराष्ट्रोऽमुमार ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = तद् युद्धमासीन्नृपपार्थपुत्रयोर्विचित्रमत्यद्भुतमुग्ररूपम् ।;समं चिरं तत्र धनुश्चकर्त ध्वजं च राजा सहसाऽभिमन्योः ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = अथैनमुग्रैश्च शरैर्ववर्ष सूतं च तस्याऽशु जघान वीरः ।;तदाऽऽसदद् भीमसेनो नृपं तं जघान चाश्वान् धृतराष्ट्रजस्य ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणो द्रौणिर्भगदत्तः कृपश्च सचित्रसेना अभ्ययुर्भीमसेनम् ।;सर्वांश्च तान् विमुखीकृत्य भीमः स चित्रसेनाय गदां समाददे ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = तामुद्यतां वीक्ष्य(तामुद्यतामीक्ष्य) पराद्रवंस्ते स चित्रसेनश्च रथादवप्लुतः ।;सञ्चूर्णितो गदया तद्रथश्च तज्जीवनेनोद्धृषिताश्च कौरवाः ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मस्तु पाञ्चालकरूशचेदिष्वहन् सहस्राणि चतुर्दशोग्रः ।;रथप्रबर्हानतितिग्मतेजा विद्रावयामास परानवीनिव ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = विद्राप्य सर्वामपि पाण्डुसेनां विश्राव्य लोकेषु च कीर्तिमात्मनः ।;सेनामपाहृत्य ययौ निशागमे संस्तूयमानो धृतराष्ट्रपुत्रैः ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणो विराटस्य पुरो निहत्य शङ्खं सुतं तस्य विजित्य तं च ।;विद्राव्य सेनामपि पाण्डवानां ययौ नदीजेन सहैव हृष्टः ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = भीमार्जुनावपि शत्रून् निहत्य विद्राप्य सर्वांश्च युधि प्रवीरान् ।;युधिष्ठिरेणापहृते(युधिष्ठिरेणापि हृते) स्वसैन्ये भीतेन भीष्माच्छिबिरं प्रजग्मतुः ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरो भीष्मपराक्रमेण भीतो भीष्मं स्ववधोपायमेव ।;प्रष्टुं ययौ निशि कृष्णोऽनुजाश्च तस्यान्वयुस्तं स पितामहो यत् ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = भीमार्जुनौ शक्नुवन्तावपि स्म नर्तेऽनुज्ञां हन्तुमिमं समैच्छताम् ।;पूज्यो यतो भीष्म उदारकर्मा कृष्णोऽप्ययात्(कृष्णोऽप्यायात्) तेन हि पाण्डवार्थे ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = प्राप्यानुज्ञां भीष्मतस्ते वधाय शिखण्डिनं तद्वचसाऽग्रयायिनम् ।;कृत्वा परेद्युर्युधये विनिर्गता भीष्मं पुरस्कृत्य तथा परेऽपि(तथाऽपरेऽपि) ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = शिखण्डिनो रक्षकः फल्गुनोऽभूद् भीष्मस्य दुःशासन आस चाग्रे ।;अन्ये च सर्वे जुगुपुर्भीष्ममेव न्यवारयन् भीमसेनादयस्तान् ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = भीष्माय यान्तं युयुधानमाजौ न्यवारयद् राक्षसोऽलम्बुसोऽथ ।;तं वज्रकल्पैरतुदद् वृष्णिवीरः शरैः स मायामसृजत् तदोग्राम् ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रेण मायामपनुद्य वीरो व्यद्रावयद् राक्षसं सात्यकिस्तम् ।;तस्मिन् गते युयुधानो रथेन ययौ भीष्मं पार्थमन्वेव धन्वी ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणो द्रौणिर्धार्तराष्ट्रश्च राजा भूरिश्रवा भगदत्तः कृपश्च ।;शल्यो बाह्लीकः कृतवर्मा सुशर्मा सर्वाश्च सेना वारिता वायुजेन ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = स तान् मुहुर्विरथीकृत्य वीरः प्राग्ज्योतिषं सगजं द्रावयित्वा ।;न्यवारयत् फल्गुनं योद्धुकामं पार्थश्च देवव्रतमाससाद ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरं भीष्ममभिप्रयान्तं माद्रीसुताभ्यां सहितं नृवीरम् ।;न्यवारयच्छकुनिः सादिनां च युतोऽयुतेनैव वराश्वगेन ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = तान् सादिनोऽश्वांश्च निहत्य सर्वान् विजित्य तं शकुनिं पाण्डवास्ते ।;प्रापुर्भीष्मं द्रौपदेयाश्च सर्वे तथा विराटद्रुपदौ कुन्तिभोजः ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नं भीष्ममभिप्रयान्तं न्यवारयत् सैन्धवस्तं स बाणैः ।;हत्वाश्वसूतं (हताश्वसूतं) सगणं द्रावयित्वा समासदद् भीष्ममेवाऽशु वीरः ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = गुप्तोऽथ पार्थेन रणे शिखण्डी भीष्मं समासाद्य शरैरताडयत् ।;भीष्मः स्त्रीत्वं तस्य जानन् न तस्मै मुमोच बाणान् स तु तं तुतोद ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = शिखण्डिनं वारयामास बाणैर्दुर्मर्षणोऽमर्षणविह्वलेक्षणः ।;नात्येतुमेनमशकच्छिखण्डी दुःशासनः पार्थमवारयत् तदा ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = स लोकवीरोऽपि दुरात्मनाऽमुना रुद्धोऽशकन्नैनमतीत्य यातुम् ।;भीष्मं पार्थः सायकाश्चास्य तस्मिन् ससज्जिरे पर्वतेष्वप्यसक्ताः(पर्वतेष्वप्यमुक्ताः) ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = अमर्षयुक्तौ चिरमेव वीरावयुद्ध्यतामर्जुनधार्तराष्ट्रौ ।;समं तदासीन्महदद्भुतं च दिवौकसां पश्यतां भूभृतां च ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = तदा विराटद्रुपदौ कुन्तिभोजं कृष्णासुतान् केकयांश्चेकितानम् ।;भूरिश्रवाः (भूरिः शलः) सोमदत्तो विकर्णः सकैकया (सकेकया) वारयामासुरुच्चैः ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = जित्वैव तांस्तेऽभिययुश्च भीष्मं (तदा)ततोऽर्जुनोऽतीत्य दुःशासनं च ।;भीष्मं शरैरार्च्छदरिप्रमाथिभिः शिखण्डिनं धार्तराष्ट्राद् विमुच्य ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = स तैः समस्तैर्बहुभिश्शस्त्रपूगैर्भृशं मर्मस्वर्दितश्चापमुक्तैः ।;शरैः समस्तान् विरथांश्चकार शैनैयपाञ्चालयुधिष्ठिराद्यान् ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = स चेदिपाञ्चालकरूशमुख्यान् रथोदारान् पञ्चविंशत्सहस्रान् ।;सम्प्रेषयामास यमाय बाणैर्युगान्तकालेऽग्निरिव प्रवृद्धः ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = निरीक्ष्य तं सूर्यमिवाऽतपन्तं सञ्चोदितो वासुदेवेन पार्थः ।;चिच्छेद तत्कार्मुकं लोकवीरो रणेऽर्द्धचन्द्रेण स चान्यदाददे ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = चिच्छेद तच्चैवमष्टौ धनूंषि शक्तिं च चर्मासिवरं पराणि ।;धनूंषि दत्तानि नृभिर्नृपस्य सर्वाणि चिच्छेद स पाकशासनिः ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = ततः शरैः सूर्यकरप्रकाशैर्विव्याध सर्वे च युधिष्ठिराद्याः ।;तैरर्दितो न्यपतद् भूतले स प्राणान् दधारापि तथोत्तरायणात् ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = निपापितेऽस्मिन् मारुतिर्द्रोणमुख्यान् विद्राप्य तत्राऽगमदाशु तेऽपि ।;तदायुधानि प्रणिधाय वीराः पार्थाः परे चैनमुपासदन् स्म ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = प्रणम्य तं तद्वचनात् समीयुस्तस्मिन् दिने शिबिराण्येव सर्वे ।;परे दिने सर्व एवोपतस्थुर्भीष्मं यदूनाम्पतिना सहैव ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = स पूर्वदिवसे पार्थदत्तबाणोपबर्हणः ।;तदाऽपि तृट्परीतात्मा योग्यं(योग्य) पेयमयाचत ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = धार्तराष्ट्रैरविज्ञातं तदभिज्ञाय(तदाभिज्ञाय) वासविः ।;वारुणास्त्रेण भित्त्वा स भूमिं वारि सुगन्धि च ।;ऊर्ध्वधारमदादास्ये(ऊर्ध्वधारामदादास्ये) तर्पितोऽनेन सोऽवदत् ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = यादृशं चैव माहात्म्यमनन्तमजरं हरेः ।;विज्ञातं सर्वलोकस्य सभायां दृष्टमेव च ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = उपारमत तद् युद्धं सुखिनः सन्तु भूमिपाः ।;यथोचितं विभक्तां च भुङ्ग्ध्वं भूपाः सदा भुवम् ।;इत्युक्तः प्रययौ तूष्णीं धार्तराष्ट्रः स्वकं गृहम् ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = व्यासदत्तोरुविज्ञानात् सञ्जयादखिलं पिता ।;श्रुत्वा तदा पर्यतप्यत् पाण्डवाः कृष्णदेवताः ।;मुमुदुः शिबिरं प्राप्य सर्वे कृष्णानुमोदिताः ॥ १३६॥ | |||
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<span id="gr-C26" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षड्विंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C26" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षड्विंशोऽध्यायः"></span> | ||
== षड्विंशोऽध्यायः == | == षड्विंशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = औं ॥ अथाखिलानां पृथिवीपतीनामाचार्यमग्र्यं रथिनां सुविद्यम् ।;रामस्य विश्वाधिपतेः सुशिष्यं चक्रे चमूपं धृतराष्ट्रपुत्रः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = कर्णोऽपि भीष्मानुमतो धनुष्मान् युद्धोद्यतोऽभूत् तदसत्कृतः पुरा ।;तस्मिन् स्थितेऽनात्तधनुस्तदैव(अनात्तधनुस्तथैव) रथं समास्थाय गुरुं समन्वयात् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणो वृतो धार्तराष्ट्रेण धर्मसुतग्रहे तेन कृते प्रतिश्रवे ।;ज्ञात्वा यत्ताः पाण्डवास्तं समीयुर्युद्धाय तत्राभवदुग्रयुद्धम् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = पतत्रिभिस्तत्र दुधाव शात्रवान् द्रोणो धनुर्मण्डलमन्त्रनिस्सृतैः ।;तमाससादाऽशु वृकोदरो नदंस्तमासदन्(नदन् समासदन्) द्रौणिकृपौ च मद्रराट् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = स तान् विधूयाभ्यपतद् रणेऽग्रणीर्द्रोणं तमन्वार्जुनिरभ्ययात् परान् ।;ववार तं मद्रपतिस्तयोरभूद् रणो महांस्तत्र गदां समाददे ।;शल्योऽथ भीमोऽभिययौ गदाधरस्तमेतयोरत्र(गदाधरः समेतयोः) बभूव सङ्गरः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = उभावजेयौ गदिनामनुत्तमावतुल्यवीर्यौ प्रवरौ बलीयसाम् ।;विचेरतुश्चित्रतमं प्रपश्यतां मनोहरं तावभिनर्दमानौ ।;गदाप्रपाताङ्कितवज्रगात्रौ ददर्श लोकोऽखिल एव तौ रणे ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = गदाभिघातेन वृकोदरस्य विचेतनः प्रापतदत्र मद्रराट् ।;भीमोऽपि कोपात् प्रचलत्पदः क्षितौ निधाय जानुं सहसोत्थितः क्षणात् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = विचेतनं पतितं मद्रराजं विलोक्य भीमं च तमाह्वयन्तम् ।;रथं समारोप्य जनस्य पश्यतः पुरश्च भीमस्य कृपोऽपजग्मिवान् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = विजित्य मद्राधिपमोजसाऽरिहा नदन् रथं प्राप्य निजं स मारुतिः ।;व्यद्रावयद् बाणगणैः परेषामनीकिनीं द्रोणसमक्षमेव ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = विद्रावयत्याशु कुरून् वृकोदरे विधूय सौभद्रमुखान् ससात्यकीन् ।;द्रोणोऽभिपेदे नृपतिं गृहीतुं तमाससादाऽशु धनञ्जयो रथी ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = स वासुदेवप्रयते रथे स्थितः शरैः शरीरान्तकरैः समन्ततः ।;निहत्य नागाश्वरथान् प्रवर्तयन्नदृश्यताऽश्वेव च शोणितापगाः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = निहन्यमानासु किरीटिना चमूष्वारक्षिते धर्मसुते तथाऽपदः ।;चमूं च भीमार्जुनबाणभग्नां द्रोणोऽपहृत्यापययौ निशागमे ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = स धार्तराष्ट्रेण युधिष्ठिराग्रहात् संश्रावितः क्रूरवचो निशायाम् ।;जगाद दूरं समराद् विनीयतां पार्थस्ततो धर्मसुतं ग्रहीष्ये ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = ततः सुशर्मा सहितो महारथैः संशप्तकैर्दूरतरं प्रणेतुम् ।;युद्धाय भीमानुजमाशु क्लृप्तो दुर्योधनेनोमिति सोऽप्यवादीत् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = समाह्वयामासुरथार्जुनं ते प्रातर्हुताशस्य दिशं रणाय ।;अयोधयत् तान् स च तत्र गत्वा भीमो गजानीकमथात्र चावधीत् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = निहन्यमानेषु गजेषु (सङ्घशो)सर्वशो विद्राप्यमाणेष्वखिलेषु राजसु ।;प्राग्ज्योतिषो धार्तराष्ट्रार्थितस्तं समासदत् सुप्रतीकेन धन्वी ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = विभीषिताः सुप्रतीकेन भीमहया न तस्थुस्तदनु स्म सात्यकिः ।;सौभद्रमुख्याश्च गजं तमभ्ययुश्चिक्षेप तेषां स रथानथाम्बरे ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = शैनेयपूर्वेषु रथोज्झितेषु भूमाववप्लुत्य कथञ्चिदेव ।;स्थितेषु भीमे च विभीषिताश्वान् संयम्य युद्ध्यत्यपि कृष्ण ऐक्षत् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = सङ्क्लेशितो वैष्णवास्त्रं (विमुञ्चेत्) प्रमुञ्चेत् प्राग्ज्योतिषो भीमसेने ततोऽहम् ।;याम्यार्जुनेनैव तदस्त्रमात्मनः स्वीकर्तुमन्येन वरादधार्यम् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = इति स्म सञ्चिन्त्य सहार्जुनेन तत्राऽययावथ पार्थं त्रिगर्ताः ।;न्यवारयंस्त्वाष्ट्रमस्त्रं स तेषु व्यवासृजन्मोहनायाऽशु वीरः ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = तदस्त्रवीर्येण विमोहितास्ते परस्परं कृष्णपार्थाविति स्म ।;जघ्नुस्तदा वासविस्तान् विसृज्य प्राग्ज्योतिषं हन्तुमिहाभ्यगाद् द्रुतम् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = विसृज्यं भीमं स च पार्थमेव ययौ गजस्कन्धगतो गजं तम् ।;सञ्चोदयामास (सम्बोधयामास, प्रचोदयामास) रथाय तस्य चक्रेऽपसव्यं हरिरेनमाशु ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = मनोजवेनैव रथे परेण(वरेण) सम्भ्राम्यमाणे नतु तं गजः सः ।;प्राप्तुं शशाकाथ शरैः सुतीक्ष्णैरभ्यर्दयामास नृपं स वासविः ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रैश्च शस्त्रैः सुचिरं नृवीरावयुद्ध्यतां तौ बलिनां प्रबर्हौ ।;अथो चकर्तास्य धनुः स पार्थः स वैष्णवास्त्रं च तदाऽङ्कुशेऽकरोत् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन्नस्त्रे तेन तदा प्रमुक्ते(प्रयुक्ते, प्रदत्ते) दधार तद् वासुदेवोऽमितौजाः ।;तदंसदेशस्य तु वैजयन्ती बभूव मालाऽखिललोकभर्तुः ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव तद् धारितमच्युतेन पार्थः किमर्थं विधृतं त्वयेति ।;ऊचे तमाहाऽशु जगन्निवासो मयाऽखिलं धार्यते सर्वदैव ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = न मादृशोऽन्योऽस्ति कुतः परो मत् सोऽहं चतुर्धा जगतो हिताय ।;स्थितोऽस्मि मोक्षप्रलयस्थितीनां सृष्टेश्च कर्ता क्रमशः स्वमूर्तिभिः ।;स वासुदेवादिचतुःस्वरूपः स्थितोऽनिरुद्धो हृदि चाखिलस्य ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = स एव च क्रोडतनुः पुराऽहं भूमिप्रियार्थं नरकाय चादाम् ।;अस्त्रं मदीयं वरमस्य चादामवध्यतां यावदस्त्रं ससूनोः(स्वसूनोः, अस्त्रं च सूनोः) ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रस्य चान्यो नतु कश्चिदस्ति योऽवध्य एतस्य कुतश्च मत्तः ।;इति स्म तेनैव मया धृतं तदस्त्रं तदेनं जहि चास्त्रहीनम् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तमाकर्ण्य स केशवेन सम्मन्त्र्य बाणं हृदये मुमोच ।;प्राग्ज्योतिषस्यापरमुत्तमं शरं गजेन्द्रकुम्भस्थल आश्वमज्जयत् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = उभौ च तौ पेततुरद्रिसन्निभौ महेन्द्रवज्राभिहताविवाऽशु ।;निहत्य तौ वासविरुग्रपौरुषो मुमोद साधु स्वजनाभिपूजितः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = अथाचलं वृषकं चैव हत्वा कनीयसौ शकुनेस्तं च बाणैः ।;विव्याध मायामसृजत् स तां च विज्ञानास्त्रेणाऽशु नाशाय चक्रे ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = स नष्टमायः प्राद्रवत् पापकर्मा ततः पार्थः शरपूगैश्चमूं ताम् ।;विद्रावयामास तदा गुरोः सुतो माहिष्मतीपतिमाजौ जघान ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = तदा भीमस्तस्य निहत्य वाहान् व्यद्रावयद् धार्तराष्ट्रीं चमूं च ।;भीमार्जुनाभ्यां हन्यमानां चमूं तां दृष्ट्वा द्रोणः क्षिप्रमपाजहार ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = प्राग्ज्योतिषे निहतेऽथाग्रहाच्च युधिष्ठिरस्यातिविषण्णरूपः ।;दुर्योधनोऽश्रावयद् दीनवाक्यान्यत्र द्रोणं सोऽपि नृपं जगाद ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = पार्थे गते श्वो नृपतिं ग्रहीष्ये निहन्मि वा तत्सदृशं तदीयम् ।;इति प्रतिज्ञां स विधाय भूयः प्रातर्ययौ युद्धमाकाङ्क्षमाणः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = ओं ॥ अथानुज्ञामुपादाय द्रौणेर्दुर्योधनो नृपः ।;कर्णं सेनापतिं चक्रे सोऽगाद् युद्धाय दंशितः (दंसितः) ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = तत्राभवद् युद्धमतीव दारुणं पाण्डोः सुतानां धृतराष्ट्रजैर्गजे ।;तत्रोदयाद्रिप्रतिमे प्रदृश्यते भीमो यथोद्यन् सविताऽतिनिर्मलः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = तं कालयन्तं नृपतीन् क्षेमधूर्तिरभ्यागमत् तस्य गजं जघान च ।;तं वीर्यमत्तं प्रतिलभ्य भीमो निनाय मृत्योः सदनाय शीघ्रम् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = निहत्य तं मारुतिरभ्यकृन्तच्छिरांसि यूनां परपक्षपातिनाम् ।;विक्षोभयामास च शत्रुसैन्यं सिंहो यथैव श्वसृगालयूथम् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = सङ्क्षोभ्यमाणं तदनीकमीक्ष्य द्रौणी रथेन प्रतिजग्मिवांस्तम् ।;तद् युद्धमासीदतिरौद्रमद्भुतं (अतिघोरमद्भुतं) पुरा यथा नाऽस च कस्यचित् क्वचित् ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव तद् देवगन्धर्वविप्रा ऊचुर्नेदृग् दृष्टपूर्वं सुयुद्धम् ।;न चोत्तरं वाऽपि भविष्यतीदृक् कलां च सर्वाणि न षोडशीमियुः(षोडशीमयुः) ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = नैतादृशी ज्ञानसम्पद् बलं वा द्वयं कुतो वायुमृते शिवं तथा ।;द्वयोः समाहार इह द्वयोरपि ज्ञानस्य बाह्वोश्च बलस्य सूर्जितः ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = इतीर्यमाणे विबुधैर्नरोत्तमौ दिशः समस्ता गगनं च पत्रिभिः ।;निरन्तरं चक्रतुरुत्तमोजसौ दृष्ट्वैव तद् (प्रीतिमगुः)भीतिमगुर्महारथाः ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = शरासने मारुतिना निराकृतो द्रौणिर्महास्त्राणि मुमोच तस्मिन् ।;(तान्यस्त्रवर्षैः)तान्यस्त्रवर्यैर्बलवानविस्मयः संशामयामास सुतोऽनिलस्य ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = पुनः शरैरेव परस्परं तावयुद्ध्यतां चित्रमलं च सुष्ठु ।;तदा तु भीमस्य शरैर्भृशार्दितो द्रौणिः पपाताऽशु दृढं विचेतनः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = भीमश्च विह्वलतनुः स तु किञ्चिदेव पूर्वं गते गुरुसुते प्रययौ क्षणेन ।;निर्धूतयुद्धश्रम आत्तधन्वा योद्धुं गजौघं प्रति नादिताशः(प्रतिनादिताशः) ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् गजान् मर्दयति धार्तराष्ट्रो युधिष्ठिरम् ।;अगाद् युद्धाय तौ युद्धं राजानौ चक्रतुश्चिरम् ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = तत्र तं विरथं चक्रे सहसैव युधिष्ठिरः ।;स गदामाददे गुर्वीं तं भीमोऽभ्यपतद् गदी ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा कृपस्तं स्वरथमारोप्यापययौ ततः ।;तदैव कर्णनकुलौ भृशं बाणैरयुद्ध्यताम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = नकुलं विरथं कृत्वा कर्णोऽथ प्रपलायिनम्(प्रपलायितम्) ।;अनुद्रुत्य च वेगेन कण्ठे धनुरवासृजत् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = उक्त्वा च पुरुषा(उवाच परुषा) वाचः कुन्त्या वचनगौरवात् ।;जघान नैव नकुलं विसृज्य च ययौ परान् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = विन्दानुविन्दावथ कैकयौ रणे समासदत् सात्यकिरुग्रविक्रमः ।;तयोरमुष्याभवदुग्रवैशसं प्रवर्षतोरुत्तमसायकान् बहून् ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = ताभ्यां निरुद्धः सहसा जहार तत्रानुविन्दस्य शिरोऽथ विन्दः ।;युयोध शैनेयमथारथावुभौ परस्परं चक्रतुरुत्तमाहवे ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = ततश्च चर्मासिधरौ प्रचेरतुः श्येनौ यथाऽकाशतले कृतश्रमौ ।;निकृत्य चान्योन्यमुभौ च चर्मणी वरासिपाणी युगपत् समीयतुः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = तत्रापहस्तेन शिरः सकुण्डलं जहार विन्दस्य मृधे स सात्यकिः ।;निहत्य तौ बन्धुजनैः सुपूजितो जगाम शत्रूनपरान् प्रकम्पयन् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = कृपमायान्तमीक्ष्यैव तपसां मां प्रपीडयेत् ।;इति मत्वा पार्षतस्तु भीमं शरणमेयिवान् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = कर्णं समन्तात् प्रतिकालयन्तं वरूथिनीमिन्द्रसुतः समभ्ययात् ।;क्षणात् तमाजौ विरथं च चक्रे ततोऽपहारं स चकार चम्वाः ॥ २२॥ | |||
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== अष्टाविंशोऽध्यायः == | == अष्टाविंशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = ओं ॥ प्रभातायां तु शर्वर्यां गुरुपुत्रानुमोदितः ।;शल्यं सेनापतिं कृत्वा योद्धुं दुर्योधनोऽभ्ययात् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = तमभ्ययुः पाण्डवाश्च हृष्टा युद्धाय दंशिताः (दंसिताः) ।;तत्राऽसीत् सुमहद् युद्धं पाण्डवानां परैः सह ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = अग्रे भीमः पाण्डवानां मध्ये राजा युधिष्ठिरः ।;पृष्ठे गाण्डीवधन्वाऽऽसीद् वासुदेवाभिरक्षितः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = चक्ररक्षौ यमौ राज्ञो धृष्टद्युम्नश्च सात्यकिः ।;नृपस्य पार्श्वयोरास्तामग्रेऽन्येषां गुरोः सुतः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = मध्ये शल्यः पृष्ठतोऽभूद् भ्रातृभिश्च सुयोधनः ।;चक्ररक्षौ तु शल्यस्य(तस्यास्तां) शकुनिस्तत्सुतस्तथा ।;कृपश्च कृतवर्मा च पार्श्वयोः समवस्थितौ(समुपस्थितौ) ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = तत्रभवन्महद् युद्धं भीमस्य द्रौणिना सह ।;राज्ञः शल्येन च तथा घोररूपं भयानकम् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = तत्र नातिप्रयत्नेन द्रौणिर्भीमेन सायकैः ।;विरथीकृतस्तथा धर्मसूनुः शल्येन तत्क्षणात् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = आससाद तदा शल्यं कपिप्रवरकेतनः ।;तयोरासीन्महद् युद्धमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = सहदेवस्तु शकुनिमुलूकं नकुलस्तदा(तथा) ।;धृष्टद्युम्नश्च हार्दिक्यं सात्यकिः कृपमेव च ।;तेषां तदभवद्(तदाऽभवत्) युद्धं चित्रं(चिरं) लघु च सुष्ठु च ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = शल्यस्तु शरसङ्घातैः पार्थस्यावारयद् दिशः ।;सोऽपि विव्याध विशिखैः शल्यमाहवशोभिनम् ।;तयोः सुसममेवाऽसीच्चिरं देवासुरोपमम् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = ततः शरं वज्रनिभं मद्रराजः समाददे ।;तेन विव्याध बीभत्सुं हृदये स मुमोह च ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = पुनर्न्यकृन्तत् तच्चापमिन्द्रसूनुरमर्षितः ।;शल्यो गदां समाधाय चिक्षेपार्जुनवक्षसि ।;तदा मुमोह बीभत्सुस्तत उच्चुक्रुशुः परे ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = शल्योऽन्यं रथमास्थाय सर्वांस्ताञ्छरवृष्टिभिः ।;छादयामास राजानं विरथं च चकार ह ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = निहत्याश्वान् सात्यकेश्च धृष्टद्युम्नस्य चाभिभूः ।;चापे च्छित्त्वा च यमयोर्दध्मौ शङ्खं महास्वनम् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु शल्यं समुदीर्यमाणं दृष्ट्वा रणे भीमसेनस्तरस्वी(भीमसेनस्तपस्वी) ।;न्यवारयद् बाणवरैरनेकैश्चकार चैनं विरथं क्षणेन ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = आस्थाय चान्यं रथमापतन्तं पुनश्च शल्यं भृशमेव मर्मसु ।;निर्भिद्य बाणैर्विरथं चकार पुनस्तृतीयं रथमारुरोज(आरुरोह) ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = आत्तान्यात्तान्यायुधान्यस्य भीमः सर्वाणि चिच्छेद बिभेद चास्य ।;मर्माणि बाणैर्नितरां पुनश्च स मुष्टिमुद्यम्य जगाम धर्मजम् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = तं भीमभिन्नमर्माणं विवर्माणं निरायुधम् ।;श्वासमात्रावशिष्टं च मरणायैव केवलम् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = आत्मानमभिगच्छन्तं दृष्ट्वाऽन्यं रथमास्थितः ।;हन्तुकामो रणे वीरममोघां शक्तिमाददे ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = दिव्यास्त्रैरपि संयोज्य तां तदा धर्मनन्दनः ।;सत्यधर्मफलैश्चैव चिक्षेपास्य हृदि त्वरन् ॥ | |||
<span id="gr-C29" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकोनत्रिंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C29" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकोनत्रिंशोऽध्यायः"></span> | ||
== एकोनत्रिंशोऽध्यायः == | == एकोनत्रिंशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = ओं ॥ यदैव कृष्णौ सकलाधिराज्ये युधिष्ठिरं यौवराज्ये च भीमम् ।;विप्रैर्युतावभिषिच्याऽशिषश्च युक्ता दत्वा हर्षयामासतुस्तौ ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = तदैव चार्वाक इति प्रसिद्धं रक्षस्त्रिदण्डी यतिरेव भूत्वा ।;युधिष्ठिरं गर्हयामास विप्रास्त्वां गर्हयन्तीति सुपापशीलः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वैव तद् दुःखितमाशु धर्मजं दृष्ट्वा विप्राः शेपुरमुं भृशार्ताः ।;अगर्हितं नित्यमस्माभिरेनं यतोऽवोचो गर्हितमद्य पाप ।;भस्मीभवाऽश्वेव ततस्त्वितीरिते क्षणादभूत् पापतमः स भस्मसात् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = भस्मीकृतेऽस्मिन् यतिवेषधारिणि युधिष्ठिरं दुःखितं वृष्णिसिंहः ।;प्रोवाच नायं यतिरुग्रकर्मा सुयोधनस्यैव सखा सुपापः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = रक्षोऽधमोऽयं निहतोऽद्य विप्रैस्तमा शुचः कृतकार्योऽसि राजन् ।;इतीरितः शान्तमनाः स विप्रान् सन्तर्पयामास धनैश्च भक्त्या ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = असान्त्वयच्च बान्धवान् स्वपौरसंश्रयादिकान् ।;ददौ यथेष्टतो धनं ररक्ष चानु पुर्ववत्(पुत्रवत्,चानुपूर्ववत्)) ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = स भीष्मद्रोणकर्णानां वधाद् दुर्योधनस्य च ।;पापाशङ्की तप्यमानो राज्यत्यागे मनो दधे ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = सोऽनुजैः कृष्णया विप्रैरप्युक्तो धर्मशासनम्(धर्मसाधनम्) ।;भीमं सम्प्रार्थयित्वैव(सम्प्रार्थयित्वैनं) न वेत्सीत्याह फल्गुनम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् क्रुद्धे नृपं प्राहुर्विप्रास्त्वत्तोऽपि तत्त्ववित् ।;शक्रोऽर्जुन इति श्रुत्वाऽप्येतद्धर्मे स संशयम्(ससंशयम्) ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = मत्स्नेहादेव सर्वेऽपि धर्मोऽयमिति वादिनः ।;इत्येवं शङ्कमानं तमूचतुर्विप्रयादवौ ।;कृष्णौ धर्मोऽयमित्येव शास्त्रयुक्त्या पुनः पुनः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = नातिनिश्चितबुद्धिं तं तदाऽपि पुरुषोत्तमौ ।;हतपक्षगतत्वेन त्वच्छङ्काया अगोचरः ।;यतो भीष्मस्ततो याहि तमित्यूचतुरव्ययौ ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = स ताभ्यां भ्रातृभिश्चैव मुनिभिश्च समन्वितः ।;भीष्मं ययौ लज्जितेऽस्मिंस्तं भीष्मायाऽह केशवः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = पृच्छेत्युक्तः स भीष्मेण पप्रच्छाखिलमञ्जसा ।;तत्रोवाचाखिलान् धर्मान् कृष्णो भीष्मशरीरगः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मो ह्याह हरिं पार्था बोधनीयास्त्वयैव हि ।;का शक्तिर्मम देवेशपार्थान्(देवेश पार्थान्) बोधयितुं प्रभो ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो भगवानाह त्वत्कीर्त्यै त्वयि संस्थितः ।;प्रवक्ष्याम्यखिलान् धर्मान् सूक्ष्मं तत्त्वमपीति ह ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = राज्ञः प्रथमतो धर्मो भगवद्धर्मपालनम् ।;तदर्थं कण्टकोद्धारो धर्मा भागवता अपि ।;मनोवाक्कर्मभिर्विष्णोरच्छिद्रत्वेन(विष्णोरच्छिन्नत्वेन) चार्चनम् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = पूर्णाशेषगुणो विष्णुः स्वतन्त्रश्चैक एव तु ।;तद्वशं सर्वमन्यच्च सर्वदेति विनिश्चयः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = देवताक्रमविज्ञानमपूजाऽन्यस्य वै हरेः ।;पूजा भागवतत्वेन देवादीनां च सर्वशः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = वृथा कर्माकृतिः क्वापि निराशीस्त्वं सदैव च(सदैव तु) ।;विष्णोर्भागवतानां च प्रतीपस्याकृतिः सदा ।;परस्परविरोधे तु विशिष्टस्यानुकूलता ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = प्रियं विष्णोस्तदीयानामपि सर्वं समाचरेत् ।;धर्ममप्यप्रियं तेषां नैव किञ्चित् समाचरेत् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = साम्ये विरोधे च बहूननुवर्तेत वैष्णवान् ।;एते साधारणा धर्मा ज्ञेया भागवता इति ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = तत्त्वविज्ञापनं धर्मो विप्रस्य तु विशेषतः ।;शारीरदण्डसन्त्यागः पुत्रभार्यादिकानृते ।;तत्रापि नाङ्गहानिः स्याद् वेदना वा चिरं न तु ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = न चार्थदण्डः कर्तव्यो विप्रवैश्यादिभिः क्वचित् ।;शारीरदण्डविषये वैश्यादीनां च विप्रवत् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = यथालब्धेन वर्तेत भिक्षया वा द्विजोत्तमः ।;शिष्ययाज्योपलब्धैर्वा क्षत्रधर्मेण वाऽऽपदि ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = महापदि विशां धर्मैः क्षत्रियः सुरविप्रयोः ।;अन्यत्र सर्ववित्तेन वर्तेतैतांश्च पालयन् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = विरोधिनः क्षत्रियाच्च प्रसह्यैव हरेद् धनम् ।;सामादिक्रमतो धर्मान् वर्तयेद् दण्डतोऽन्ततः ।;अपलायी सदा युद्धेऽसतां कार्यमृते भवेत् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = कृषिवाणिज्यगोरक्षाकुसीदं वैश्यजीवनम् ।;परिचर्यैव शूद्रस्य वृत्तिरन्ये स्वपूर्ववत् ।;वर्तेयुर्ब्राह्मणाद्याश्च क्रमात् पूज्या हरिप्रियाः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = हरिभक्तावनुच्चस्तु वर्णोच्चो नातिपूज्यते ।;विना प्रणामं पूज्यस्तु वर्णहीनो हरिप्रियः ।;आदरस्तत्र कर्तव्यो यत्र भक्तिर्हरेर्वरा ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञापनं क्षत्रियाणां च धर्मो विप्राभ्यनुज्ञया ।;तदभावे तु वैश्यानां शूद्रस्य परमापदि ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = धर्मो गुणोत्तमानां तु स्मृत्यैवान्धं तमो व्रजेत् ।;गुणसर्वस्वहानिः स्यादुत्तरोत्तरतोऽत्र च;अधोऽधोऽधिकदोषः स्यात् स्त्रीणामन्यत्र मध्यतः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = प्राकृतं देहमथवा(देहमथ वा) दुःखाज्ञानश्रमादिकम् ।;मन्यते तारतम्यं वा तद्भक्तेष्वन्यथैव यः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = मनोवाक्तनुभिर्यो वा तस्मिन्स्तद्भक्त एव वा ।;विरोधकृद् विष्ण्वधीनादन्यत् किञ्चिदपि स्मरन् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = अन्याधीनत्वविच्चास्य सर्वपूर्त्यविदेव च ।;भक्तिहीनश्च ते सर्वे तमोऽन्धं यान्त्यसंशयम् ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = तत्त्वे संशययुक्ता ये सर्वे ते निरयोपगाः ।;दोषेभ्यस्ते गुणाधिक्ये नैव यान्त्यधमां गतिम् ।;गुणदोषसाम्ये मानुष्यं सर्वदैव पुनःपुनः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = यावद् दोषक्षयश्चोर्ध्वा गतिः(दोषक्षयश्चोर्ध्वगतिः) क्रमश एव तु ।;सर्वदोषक्षये मुक्तिरात्मयोग्यानुसारतः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = भक्तिज्ञानोन्नतावेव स्वर्गश्च शुभकर्मणः ।;विष्णुवैष्णववाक्येन हानिः पापस्य कर्मणः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादि धर्मसर्वस्वं भीष्मस्थेनैव विष्णुना ।;पार्थानां गदितं तच्च श्रुत्वा धर्मसुतोऽनुजान् ।;पप्रच्छ विदुरं चैव सारं धर्मादिषु त्रिषु ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = आह क्षत्ता धर्ममेव सारमर्थं च मध्यमम् ।;नीचं कामं निष्फलत्वादर्थमेवार्जुनोऽब्रवीत् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = सारं स द्विविधो ज्ञेयो दैवो मानुष एव च ।;दैवो विद्या हिरण्यादिर्मानुषः परिकीर्तितः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = मध्यमो धर्म एवात्र साध्यं साधनमेव च ।;विद्याह्वयोऽर्थो धर्मस्य विद्ययैव च मुच्यते ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = मानुषोऽर्थोऽपि विद्यायाः कारणं सुप्रयोजितः ।;तुष्टोऽर्थेन गुरुर्यस्मात् कैवल्यं दातुमप्यलम् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = धर्मार्थतां विनाऽप्यर्थैस्तुष्येयुर्गुरुदेवताः ।;यद्यनुद्देशितो धर्मोऽप्यर्थमेवानुसंव्रजेत् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = गुरुताऽर्थगतैव स्यात् कामोऽधस्ताद्धि निष्फलः ।;यमावत्र विदां श्रेष्ठावर्जुनोक्तमनूचतुः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह भीमः प्रवरः सुतत्त्वदृशां समस्तानभिभाष्य हर्षात् ।;स्मयन् न कामादतिरिक्तमस्ति किञ्चिच्छुभं क्कावरतां स यायात् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = काम्यं हि कामाभिधमाहुरार्याः काम्याः पुमर्थाः सह साधनैर्यत् ।;अकाम्यतां यात्यपुमर्थ एव पुमर्थितत्वाद्धि पुमर्थ उक्तः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञानभक्त्यादिकमप्यतीव सत्साधनं कामबहिष्कृतं चेत् ।;न साधनं स्यात् परमोऽपि मोक्षो न साध्यतां याति विना हि कामात् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = परात्परोऽप्यादिपुमान् हरिश्च स्वस्येतरेषामपि काम्य एव ।;अकामितोऽवाग्गतिमेव दद्यात् कामः पुमर्थोऽखिल एव तेन ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = इच्छैव कामोऽस्तु तथाऽपि नैतामृते हि चित्त्वं घटकुड्यवत् स्यात् ।;सारस्ततः सैव चिदात्मकाऽपि सा चेतना गूढतनुः सदैव ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = न प्रश्नयोग्यः पृथगेव कामस्तेनैष राजन् यदि तारतम्यम् ।;इच्छस्ययं ते त्रिविधो हि वेद्यो धर्मार्थयुक्तः परमो मतोऽत्र ।;एकाविरोधी यदि मध्यमोऽसौ द्वयोर्विरोधी तु स एव नीचः ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् स्वबुद्धिप्रमदाभिरेव(सुबुद्धिप्रमदाभिरेव) कामं रमेथा अनुरूपकामः ।;राजन् न कामादपरं शुभं हि परो हि कामो हरिरेव येन(तेन) ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = प्राज्ञः सुहृच्चन्दनसारलिप्तो विचित्रमाल्याभरणैरुपेतः ।;इदं वचो व्याससमासयुक्तं सम्प्रोच्य भीमो वरराम वीरः ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = प्रशस्य भीममन्यांश्च राजा मोक्षमथास्तुवत् ।;स्वयुक्तेरप्रतीपत्वान्निराचक्रे न मारुतिः ॥ ५८॥ | |||
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<span id="gr-C30" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रिंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C30" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रिंशोऽध्यायः"></span> | ||
== त्रिंशोऽध्यायः == | == त्रिंशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = ओं ॥ अथ कृष्णमनुस्मृत्य भीष्मे स्वां वसुतां गते ।;कृत्वा कार्याणि सर्वाणि गङ्गामाश्वास्य दुःखिताम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = आश्वासितश्च कृष्णाभ्यां धर्मजो दुःखितः पुनः ।;पराशरसुतेनोक्तः कृष्णेनानन्तराधसा ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = अपापे पापशङ्कित्वादश्वमेधैर्यजाच्युतम् ।;कुरु राज्यं च धर्मेण पालयापालकाः प्रजाः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तः स तथा चक्रे त्यक्त्वा भोगांश्च कृत्स्नशः ।;गोव्रतादिव्रतैर्युक्तः पालयामास मेदिनीम् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = ददौ देयानि मुख्यानि यथाकाममखण्डितम् ।;नैवार्थी विमुखः कश्चिदभूद् योग्यः कदाचन(कथञ्चन) ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = प्रष्टा च दाताऽखिलराजनम्यो यष्टा च धर्मात्मज एव तत्र ।;बभूव पाण्डोर्गृहमावसंश्च राजाधिराजो वनितानिवृत्तः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = भीमस्तु दौर्योधनमेव सद्म प्रपेदिवानूर्जितवीर्यलब्धम् ।;कृष्णासहायः सुरराजयोग्यान् अभुङ्क्त भोगान् युवराज एव ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णा च पार्थांश्चतुरो विहाय सुव्यक्तसारस्वतशुद्धभावा ।;रराज राजावरजेन नित्यमनन्ययोगेन शिखेव वह्नेः ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = प्रीत्यैव विज्ञानयुजाऽन्यपार्थैः संवादतः परिहृता गतभाविकाले ।;अपि स्वकीयं पतिमेव भीममवाप्य सा पर्यचरन्मुदैव ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = रराज राजावरजस्तया स द्विरूपया सोमककाशिजातया ।;श्रिया भुवा चैव यथाऽब्जनाभो निहत्य सर्वान् दितिजान् पयोब्धौ ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = सर्वोत्तुङ्गो नामतः प्राणवायोरंशो निशायां गुरुपुत्रसूदितः ।;माताऽस्य देवीति च रौहिणेयी भीमप्रियाऽऽसीद् या पुराऽस्यैव राका ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = अन्याश्चाऽसुर्वासुदेव्यो दिशो या आपश्च पूर्वं विंशतिरग्र्यरूपाः ।;ताभिर्युतो(युक्तो) दैवतैरप्यलभ्यानभुङ्क्त भोगान् विबुधानुगार्चितः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = ररक्ष धर्मानखिलान् हरेः स निधाय विप्राननुशास्य युक्तान् ।;सद्वैष्णवान् विदुषः पञ्चपञ्च सवेतनान् ग्राममनु स्वकीयान् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = दधार दण्डं तदवर्तिषु स्वयं जग्राह चान्वेव मुदाऽथ तद्गतान् ।;तद्वृत्तमन्यैरपि विप्रवर्यैः संशोधयन् सर्वमसौ यथा व्यधात् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = नावैष्णवः कश्चिदभूत् कुतश्चिन्नैवान्यनिष्ठो नच धर्महन्ता ।;न विध्यवर्ती नच दुःखितोऽभून्नापूर्णवित्तश्च तदीयराष्ट्रे ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = वासिष्ठवृष्णिप्रवरौ प्रपश्यतां ताभ्यां च भीमेन मुनीश्वरैश्च ।;संशिक्षितानां प्रथमाद् युगाच्च गुणाधिकः कलिरासीत् प्रजानाम् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = शुभं महत् स्वल्पफलं कृते हि विपर्ययेणाशुभमेषु दोषः ।;तद्धीनमप्युच्चशुभं कृताद् युगाच्चक्रे कलिं मारुतिरच्युताश्रयात् ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = धनञ्जयः प्रोद्यतदण्ड आसीत् सदाऽन्यचक्रेषु निजाग्रजेरितः ।;विभीषयित्वा नृपतीन् सरत्नान् पदोर्नृपस्याग्रभुवो न्यपातयत् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = सदैव कृष्णस्य मुखारविन्दाद् विनिस्सृतं तत्त्वविनिर्णयामृतम् ।;पिबन् सुताद्याधिमसौ क्रमेण त्यजंश्च रेमेऽविरतातिभोगः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = दुःशासनस्याऽवसथं(अवसथे) सुभद्राचित्राङ्गदासहितोऽध्यावसंश्च ।;(स)सचन्द्रिकाकान्तिरनूनबिम्बो नभस्थितश्चन्द्र इवात्यरोचत ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = समस्तभृत्याश्रितवेतनानां माद्रेय आसीत् प्रथमः प्रदाता ।;स दुर्मुखस्याऽवसथेऽवसच्च स मद्रराजात्मजयाऽग्र्यवर्ती ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = सेनापतिः कृप आसीद् युयुत्सुः ससञ्जयो विदुरश्चाऽम्बिकेयम् ।;पार्थेरिताः पर्यचरन् स्वयं च सर्वे यथा दैवतमादरेण ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = द्विरूपकृष्णप्रहितेषु पाण्डुषु क्षितिं प्रशासत्सु न कश्चनाऽतुरः ।;नचाक्रमान्मृत्युरभून्न नार्यो विभर्तृका नो विधुरा नराश्च ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = शब्दादयश्चाऽसुरतीव हृद्या निकामवर्षी च सुरेश्वरोऽभूत् ।;प्रजा अनास्पृष्टसमस्ततापा अनन्यभक्त्याऽच्युतमर्चयन्ति ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = पृथ्वी च गावः ससरस्वतीका निकामदोहा अभवन् सदैव ।;अब्दाब्धिनद्यो गिरिवृक्षजङ्गमाः सर्वेऽपि रत्नप्रभवा(रत्नप्रसवा) बभूवुः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णाश्रयात् सर्वमिदं वशे ते विधाय सम्यक् परिपालयन्तः ।;दिवीव देवा मुमुदुः सदैव मुनीन्द्रगन्धर्वनृपादिभिर्वृताः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = समुज्ज्वला पाण्डवकीर्तिनारी पदं (विधाय)विधायासुरपक्षमूर्धसु(मूर्धनि) ।;वराभये चैव सतां कराभ्यां कृष्णप्रसूता जगदण्डमावृणोत् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = पातालपादां पृथिवीनितम्बामाकाशमध्यां करसन्तताशाम् ।;ग्रहर्क्षताराभरनद्युवक्षसं विरिञ्चलोकस्थलसन्मुखाम्बुजाम् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = विकुण्ठनाथाभयहस्तमादरान् मूर्ध्ना वहन्तीं(मूर्ध्नाऽऽवहन्तीं) वरभारताख्याम् ।;निशम्य तामीक्ष्य समस्तलोकाः पवित्रिता वेदिभवामिवान्याम् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = प्रपालयत्स्वेव धरां सकृष्णेष्वद्धैव पार्थेषु कलिर्बलिश्च ।;सुपापदैत्यौ क्वच राष्ट्रविप्लवं सञ्चक्रतुस्तच्छ्रुतमाशु पार्थैः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = नृपेण कृष्णेन च साधु चोदितो भीमस्तदा तौ सगणौ विजित्य ।;बलिं प्रविद्राव्य कलिं निबद्ध्य समानयत् कृष्णनृपेन्द्रयोः(कृष्णनरेन्द्रयोः) पुरः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = पप्रच्छ तं कृष्णपुरो युधिष्ठिर उदारधीः ।;कले किमिति मे राष्ट्रं विप्लावयसि दुर्मते ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आह कालोऽयं दुर्योधननिपातनम् ।;आरभ्य मम तत्र त्वं बलादाक्रम्य तिष्ठसि ।;ततो मया कृतो राष्ट्रविप्लवस्ते नराधिप ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = तमाह राजा राज्ञां हि बलाद् राज्यं प्रवर्तते ।;अपि कालभवं राष्ट्रं त्वदीयं मादृशैर्नृपैः ।;ह्रियते बलवद्भिर्हि राज्याशा ते कुतस्तदा ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् ।;इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम् ॥ ३६॥ (महा.१२.७०.६) | |||
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| verse_lines = तमुवाच कलिः काले मदीये त्वादृशः कुतः ।;राजानं पूर्वमाविश्य विप्रांश्च स्यामहं नृप ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = वासुदेवसहायेषु तेजो युष्मासु मे नहि ।;क्व राजाऽसावृते युष्मान् यो मया नाभिभूयते ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = मदीयकाले भूपाल विप्रदेव(वेद)विरोधिनि ।;मद्दृष्टिपाते(याते) क्व गुणाः क्व वेदाः क्व सुयुक्तयः(क्व च सूक्तयः) ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = जगाद नृपतिः सत्यं कले वक्ष्यनृतोऽपि सन् ।;मोचये त्वार्तवचनाद् यदाऽस्मत्सन्ततेः परम् ।;विलुम्पस्यखिलान् धर्मान् करं तत्रापि नोऽर्पय ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = सीमाधिर्बहुवाक्यं च तुलामाने च मे करः ।;नैवातिक्रममेतेषां कुरु सर्वात्मना क्वचित् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = तमाह भगवान् कृष्णो यावत् पाण्डवसन्ततिः ।;तावन्न ते भवेच्छक्तिः प्रवृत्तस्यापि भूतले ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = पाण्डवेभ्यः परं यावत् क्षेमकः क्रमवर्द्धिता ।;क्षेमकात् परतः पूर्तिं शक्तिस्ते यास्यति ध्रुवम् ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = न द्रष्टव्यं भूतलं ते कुत एव स्पृशेर्भुवम् ।;यावत् पार्था अहं चात्र ततो भुवि पदं कुरु ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो वासुदेवेन मोचितो धर्मजेन च ।;तान् प्रणम्य ययौ पारे समुद्रस्याऽश्रयद् गुहाम् ।;पार्थाश्च कृष्णसहिता रक्षन्तः क्ष्मां मुदं ययुः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = एवं पार्थान् प्रतिष्ठाप्य शक्रप्रस्थे तु सार्जुनः ।;क्रीडन् दिव्याः कथाः प्राह पुत्रशोकापनुत्तये ।;गीतोक्तं विस्मृतं चास्मै पुनर्विस्तरतोऽवदत् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = वाणी प्राणो वासुदेव इत्येतैरखिलं ततम् ।;सर्वोत्तमत्वमेतेषां सर्वमेतद्वशे जगत् ।;उत्तरोत्तरमेतेऽपि गुणोच्चास्तद्वशेऽपरे ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं हरेर्वशे सर्वं गुणपूर्णश्च(सर्वगुणपूर्णश्च) स प्रभुः ।;एक एव नचान्योऽस्ति प्राणोच्चा तदधो रमा ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = स हुताश इति प्रोक्तो(हुताशन इति प्रोक्तो) हुतमत्त्यखिलं यतः ।;वाक्प्राणमध्यगो नित्यं धारयत्यखिलं जगत् ।;स ईशो ब्रह्मरुद्राद्या जीवा एव प्रकीर्तिताः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = एतस्यानादिसद्भक्ता मुक्तियोग्या हि ते स्मृताः ।;अनादिद्वेषिणो येऽस्मिन्स्तमोयोग्याः सुपापिनः ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = मिश्रा मध्या इति ज्ञेयाः संसारपरिवर्तिनः ।;एवं जीवास्त्रिधा प्रोक्ता भवन्त्येते नचान्यथा ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = तारतम्यं च विज्ञेयं लिङ्गैर्दैहिकमानसैः ।;विष्णोर्लिङ्गानुसारित्वत् तारतम्यात् तदीक्षणम् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = विष्णोस्तदनुगानां च प्रीतिकृद् धर्म ईरितः ।;अधर्मोऽन्य इयं निष्ठा प्रलापः किं करिष्यति ।;एवमाद्यनुशास्याजः पार्थं पार्थैः सुसत्कृतः॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = कथञ्चित् तानवस्थाप्य सुदूरानुगतान् प्रभुः ।;सुभद्रासहितः प्रायाद् यानेन द्वारकां पुरीम् ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = समाधिविरतोदङ्कपरिपृष्टः पथि प्रभुः ।;हतं दुर्योधनं प्राह सभ्रातृसुतसैनिकम् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = मद्भक्तो नितरामेष मदाराधनतत्परः ।;मामवज्ञाय निरयं माऽनुत्थानं व्रजेदिति ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = कृपया वासुदेवेन बोधितः शान्तमानसः ।;पश्चात्तापाभितप्तात्मा तमेव शरणं ययौ ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = मूत्रस्रोतसि सौधञ्च निधाय कलशं वशी ।;मूत्रयन्निव तं प्राह वासुदेवः सुधामिमाम् ।;महर्षे प्रेषयामास तवार्थे तत् पिबेति च ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = ततः सुदुःखिताः शूरपुत्राद्या अभिमन्यवे ।;श्राद्धदानानि बहुशश्चक्रुः केशवसंयुताः ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = निवसत्यत्र विश्वेशे धर्मपुत्रः क्रतूत्तमम् ।;अश्वमेधमनुष्ठातुं नाविन्दद् वित्तमञ्जसा ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = हतशेषात् क्षत्रसङ्घात् करं नैच्छद् दयापरः ।;नच मध्यमकल्पेन यष्टुं तस्य मनो गतम् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञाय नित्यविज्ञातनिखिलो बादरायणः ।;आविर्भूतो हिमवतः शृङ्गं यत्राभिसङ्गतम् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = मेरुशृङ्गेण यत्रैव विष्णुः स्वात्मानमव्ययम् ।;लोकस्य सङ्ग्रहायेजे कर्मबन्धोज्झितोऽपि सन् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = शङ्कराद्याः सुरा यत्र मरुत्तश्चेजिरे हरिम् ।;दानवो वृषपर्वा च तत्रास्ति धनमक्षयम् ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = तच्छङ्करशरीरस्थं जामदग्न्यं हरिं परम् ।;इष्ट्वैवानुज्ञया तस्य स्वीकृत्य यज तेन च ।;इत्याह व्यासवाक्यानु भीमोऽप्याह नृपोत्तमम् ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = धनस्य देवता विष्णुर्जामदग्न्योऽखिलेश्वरः ।;स शङ्करशरीरस्थो यज्ञोच्छिष्टधनाधिपः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = तेनैव विष्णुना दत्तमर्जुनायास्त्रमुत्तमम् ।;कार्याण्यन्यानि चास्माकं कृतान्येतेन विष्णुना ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = स ब्रह्मरुद्रशक्रादिपददाताऽखिलप्रदः ।;स्वतन्त्रः परतन्त्रांस्तानावर्तयति चेच्छया ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = प्रियोऽस्माकं प्रियास्तस्य सर्वदैव वयं नृप ।;अतस्तदभ्यनुज्ञातधनेनैव यजामहे ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = सोऽयं पितामहोऽस्माकं व्यासस्तन्नः प्रदास्यति ।;इत्युक्त्वा तं पुरस्कृत्य कृष्णद्वैपायनं ययुः ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = धनं कृष्णः समादाय(स आदाय) समन्ताच्छतयोजनम् ।;ददौ तेषां तेऽपि चोहुर्हस्त्यश्वोष्ट्रनरादिभिः ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरमृते सर्वे भीमसेनपुरोगमाः ।;यज्ञार्थमूहिरे भूरि स्वर्णमुद्यद्रविप्रभम् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = तदैव वासुदेवोऽपि सभार्यः स सुभद्रया ।;आगच्छन् हस्तिनपुरं पथ्युदङ्केन पूजितः ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = तत्कामवर्षिणो मेघांस्तस्य दत्वोदकार्थिनः ।;सफलं स्ववरं कृत्वा जगाम गजसाह्वयम् ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = आसन्नेष्वेव पार्थेषु व्यासे च पुरुषोत्तमे ।;प्रविवेश पुरं कृष्णस्तदाऽसूतोत्तरा मृतम् ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = द्रौण्यस्त्रसूदितं बालं दृष्ट्वा कुन्त्यादिकाः स्त्रियः ।;शरण्यं शरणं जग्मुर्वासुदेवं जगत्पतिम् ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्यक्षमात्मना गर्भे रक्षितं प्रसवे हतम् ।;पुनरुज्जीवयामास केशवः पार्थतन्तवे ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = तदैव विविशुः पार्था सकृष्णाः सधनोच्चयाः(सधनोच्छ्रयाः) ।;सर्वे मुमुदिरे दृष्ट्वा पौत्रं केशवरक्षितम् ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = ददौ दानानि बहुशो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।;पौत्रजन्मनि हृष्टात्मा वासुदेवं ननाम च ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = कुन्तीकृष्णासुभद्राभिर्वैराट्याऽन्याभिरेव च ।;पाण्डवैः पुरुषैश्चान्यैः संस्तुतः प्रणतो हरिः ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = ततः कृष्णाभ्यनुज्ञाता पाराशर्यसदस्यकाः ।;आरेभिरेऽश्वमेधं ते मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = सर्वयज्ञात्मकं तेषामश्वमेधं जगत्पतिः ।;कारयामास भगवान् कृष्णद्वैपायनः स्वयम् ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = साधनानि तु सर्वाणि शालां चैव हिरण्मयीम् ।;पवमानसुतश्चक्रे कृष्णद्वैपायनेरितः ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = अथानुमन्त्रितोत्सृष्टं पुरोहितपुरस्कृतम् ।;तुरङ्गं (तुरगं) कृष्णसारङ्गमनुवव्राज वासविः ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = स जित्वा रुन्धतः सर्वान् नृपतीञ्छस्त्रतेजसा ।;चारयामास सर्वेषु राष्ट्रेष्वविजितोऽरिभिः ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिराज्ञया तेन न कश्चिन्निहतस्तदा ।;आहूताश्च नृपास्तेन यज्ञार्थं प्रीयताऽखिलाः ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = मळलूरं (मणलूरं) क्रमात् प्राप्तस्तत्रैनं बभ्रुवाहनः ।;अभ्ययादर्घ्यपाद्याद्यैस्तमाह विजयः सुतम् ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = योद्धुकामोऽर्घ्यमादाय त्वयाऽद्याभिगतो ह्यहम् ।;न प्रीये पौरुषं धिक् ते यन्मेध्याश्वो न वारितः ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = तदाऽपि(तथाऽपि) पितृभक्त्यैनमयुद्ध्यन्तमुलूपिका ।;प्राह युद्ध्यस्व यत् प्रीत्यै(तत् प्रीत्यै) गुरोः कार्यमसंशयम् ।;प्रीणनायैव युद्ध्यस्व पित्रे सन्धर्शयन् बलम् ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो युयुधे पित्रा बलं सर्वं प्रदर्शयन् ।;अर्जुनस्तु सुतस्नेहान्मन्दं योधयति स्मयन् ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = स तु सर्वायुधक्षेपेऽप्यविकारं धनञ्जयम् ।;दृष्ट्वा बाल्यात् परीक्षायै मन्त्रपूतं महाशरम् ।;चिक्षेप पित्रे दैवेन तेनैनं मोह आविशत् ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = मूर्च्छितं तं गुरुं दृष्ट्वा तद्भक्त्या भृशदुःखितः ।;प्रायोपविष्टस्तन्माता विललापातिदुःखिता ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त्वा मरणायैव तां विनिश्चितमानसाम् ।;धरायां विलुठन्तीं च दृष्ट्वा भुजगनन्दिनी ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = नागलोकात् समादाय विशल्यकरणीं क्षणात् ।;उत्थापयामास पतिं त्रिलोकातिरथं तया ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = यद्धतास्तेन दोषेण पार्थस्तेनातिवेदनाम् ।;रणे व्रजेदिति न तत् परतः स्यादिति ह्यहम् ।;वचनादेव देवानां युद्ध्येत्यात्मजमब्रवम् ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = सकृष्णः सहसोदर्यः श्रुत्वाऽसौ प्राप्तमर्जुनम् ।;प्रीतो बाष्पाभिपूर्णाक्षो(बाष्पातिपूर्णाक्षो) भ्रातृस्नेहादभाषत ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = वासुदेव न पश्यामि दुर्लक्षणमथार्जुने ।;केन दुर्लक्षणेनायं बहुदुःखी प्रवासगः ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = पृष्टस्तं केशवः प्राह भ्राता ते दीर्घपिण्डकः(पिण्डिकः) ।;तेनायं दुःखबहुल इत्युक्त्वा पुनरेव च ।;वदन्तमेव पाञ्चाली कटाक्षेण न्यवारयत् ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = समस्तलक्षणाभिज्ञाः कृष्णः सत्या वृकोदरः ।;कृष्णा च पञ्चमो नास्ति विद्या शुद्धेयमञ्जसा ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = प्रसङ्गात् प्राप्तुमिच्छेत् तां विद्याशीलो युधिष्ठिरः ।;इति लोभात् तु पाञ्चाली वासुदेवं न्यवारयत् ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = तद्गौरवाद् वासुदेवो नोत्तरं प्रत्यभाषत ।;विस्मारयामास च तं पब्रुवाणः कथान्तरम् ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = उदरस्य किञ्चिदाधिक्यं वृषणाधिक्यमेव च ।;सव्यबाहोस्तथाऽऽधिक्यं दुर्लक्षणमथार्जुने(अतोऽर्जुने,अथोऽर्जुने) ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = नैवोक्तं वासुदेवेन दृश्यमानमपि स्फुटम् ।;ज्ञानानन्दह्रासकरा ह्येते दोषाः सनातनाः (सदातनाः) ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = समस्तजीवराशौ यद् दुर्लक्षणविवर्जितौ ।;पूर्णचित्सुखशक्त्यादेर्योग्यौ कृष्णा च मारुतिः ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = अनादिदुःखहीनत्वे सुखाधिक्ये च लक्षणम् ।;रुग्मिणीसत्यभामादिरूपायाः श्रिय एव तु ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = मुख्यं ततोऽपि(ततोऽति) मुख्यं तु स्वान्तन्त्र्यादेरशेषतः ।;गुणराशेः परं लिङ्गं नित्यं व्यासादिरूपिणः ।;विष्णोरेव नचान्यस्य स ह्येकः पूर्णसद्गुणः ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = साश्वेऽर्जुने यज्ञवाटं प्रविष्टेऽस्य सहोदराः ।;पूजिताः पूजयामासुर्मुदिताः सहकेशवाः ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = ततः स यज्ञो यदुवीररक्षितो व्यासोपदिष्टो मुनिभिः प्रवर्तितः ।;अशोभतालं सकलैर्नृपैश्च समागतैर्विप्रवरैश्च जुष्टः ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = स कृष्णयुग्मेन च भार्गवेण त्रिधा विभक्तेन परेण पुंसा ।;अधिष्ठितोऽशोभत विश्वमेतद् विश्वादिरूपेण यथैव तेन ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = यथा विरिञ्चस्य पुराऽऽस यज्ञो यथैव शक्रस्य शतक्रतुत्वे ।;तथैव सोऽभूद् विधिशर्वशक्रपूर्वैः सुरैराविरलङ्कृतोऽधिकम् ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = न देवगन्धर्वमुनिस्वधर्ममर्त्यादिकेष्वास स योऽत्र नाऽस(सम्भ्रमः) ।;स्वलङ्कृतैर्नाकिजनैः सकान्तैररूरुचन्नाकवदेतदोकः(दोघः) ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = तत्रैव तत्त्वानि ससंशयानि निस्संशयान्यासुरलं विवादे ।;परस्परोत्थे हरिणा त्रिरूपिणा संस्थापितान्यग्र्यवचोभिरुच्चैः ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = प्रगीतगन्धर्ववरः प्रनृत्तसदप्सराः सन्ततवादिविप्रः ।;विवेचयद्देवनृपौघ एको रराज राजाऽखिलसत्क्रतूनाम् ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = समस्तदेव्यः सहवासुदेव्यः स्वलङ्कृताः फुल्लमुखारविन्दाः ।;विचेरुरत्रैव(विरेजुरत्रैव) सहाप्सरोभिर्निषेदुरप्यच्युतसत्कथारमाः ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = न वै मुमुक्षुर्न बभूषुरत्र न वै विवित्सुश्च कुतो बुभुक्षुः ।;असत्यकामा अभवन् कुतश्चित् प्रदातरि प्राज्ञवरेऽनिलात्मजे ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = दिनेदिने तत्र महान्नपर्वताः सभक्षसारा रसवन्त ऊर्जिताः ।;नद्यः पयः सर्पिरजस्रपूर्णाः समाक्षिकाद्या अपि पायसह्रदाः ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = ह्रदा महान्तस्त्रिदशादियोग्याः सुयोगयुक्ता हरिचन्दनादेः ।;तथाऽञ्जनालक्तकमुख्यमण्डनद्रव्याग्र्यवाप्यो मणिकाञ्चनोद्भवाः ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = यथेष्टपानाशनभोगशिष्टाः सहस्रशो मारुतिना तु कारिताः ।;गन्धा रसाद्याश्च समस्तभोगा दिवीव तत्राऽसुरतीव हृद्याः ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = नैतादृशः कश्चन भूतपूर्वो मखो विना रामविरिञ्चवज्रिणाम् ।;मखानिति प्रोचुरशेषलोका दृष्ट्वा मखं तं पुरुषोत्तमेरितम् ॥ १३८॥ | |||
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| verse_lines = स एवमद्धा हरिदैवतः क्रतुः पञ्चाश्वमेधात्मक उच्चकल्पः ।;दिनेदिने स्वृद्धगुणो बभूव मुदावहो वत्सरपञ्चकत्रयम् ॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = यज्ञावसाने निखिलाश्च पाण्डवाः कृष्णा च पृथ्वीमखिलां सवित्ताम् ।;माङ्गल्यमात्रं दयिताशरीरे निधाय सर्वाभरणानि चैव ।;समर्पयामासुरजे वरेण्ये व्यासे विभागाय यथोक्तमृत्विजाम् ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = प्रियो विभागो यदमुष्य विष्णोरतो विभागार्थमिवाऽर्पयंस्ते ।;हृदा समस्तं हरयेऽर्पितं तैः स हि द्विजस्थोऽपि समस्तकर्ता ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = देहेन्द्रियप्राणमनांसि चेतनैः सहैव तस्मा अतिसृज्य नेमुः ।;त्वदीयमेतन्निखिलं वयं च नास्त्यस्मदीयं(न त्वस्मदीयं) क्वच किञ्चनेश ।;स्वन्त्र एकोऽसि न कश्चिदन्यः सर्वत्र पूर्णोऽसि सदेति हृष्टाः ॥ १४२॥ | |||
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| verse_lines = ततो विभक्ते मुनयोऽवदंस्ते प्रत्यर्पयामो वयमेषु राज्यम् ।;पूर्णा हिरण्येन वयं धरायाः प्रपालने योग्यतमा इमे हि ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = पार्थाः सभार्या द्विजवाक्यमेतन्निशम्य कृष्णाय पुनः प्रणम्य ।;ऊचुस्तपो नोऽस्तु वनेऽर्पयित्वा राज्यं मखान्ते त्वयि धर्मलब्धम् ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः प्राह स बादरायणो मुनीश्वरैरप्यभियाचितः प्रभुः ।;हिरण्यमेव स्वमिदं मुनीनां मदाज्ञया भूङ्ग्ध्वमशेषराज्यम् ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = समर्पितं मे फलवच्च तत् स्यात् पुनर्ग्रहो नैव च दोषकारी ।;पितामहोऽहं भवतां विशेषतो गुरुः पतिश्चैव ततो मदर्हथ ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितास्ते प्रतिपद्य राज्यं ददुर्हिरण्यं निखिलं च तस्मै ।;विभज्य विप्रान् स निजं तु भागमदात् पृथायै निखिलम् प्रसन्नः ॥ १४७॥ | |||
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| verse_lines = सभार्यकाणां वररत्नभूषणान्यशेषतः पुत्रभुवां प्रदाय ।;पृथक्पृथग् योग्यवरांस्तथैभ्यः प्रादात् प्रभुस्ते मुदिताः प्रणेमुः ॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = तद् यज्ञपञ्चकमजस्त्रिगुणां स एभ्यः सद्दक्षिणां क्रतुपतिर्निखिलामवाप्य ।;चक्रेऽश्वमेधत्रयमेकमेकं तेषां हरिर्बहुसुवर्णकनामधेयम् ॥ १४९॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णेन च तमोऽन्धं तं प्रापयद्भिः स्मिते कृते ।;अदर्शनं जगामाऽशु तमः प्राप च कालतः ।;तदर्थमेव हैरण्यः पार्श्वस्तस्याभवत् पुरा ॥ १५६॥ | |||
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| verse_lines = श्राद्धार्थं हि पयः पूर्वं (जामदग्नेः)जमदग्नेरदूषयत् ।;नाकुलेनैव रूपेण क्रोधस्तं पितरोऽशपन् ॥ १५८॥ | |||
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| verse_lines = भव त्वं नकुलस्तावद् यावद् धर्मादिकान् सुरान् ।;क्षेप्स्यसीति तमो घोरं भूयः पापेन यात्वयम् ।;इत्यभिप्रेत्यः तैः शप्तस्तथा कृत्वा तमोऽभ्ययात् ॥ १५९॥ | |||
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| verse_lines = यद्यप्यल्पधनत्यक्तं वित्तं बहुफलं भवेत् ।;तथाऽप्यनन्तफलदाः कर्तुरेव महागुणाः ॥ १६०॥ | |||
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| verse_lines = सतां प्रीतिश्च तत्रापि सद्वरो हरिरेव हि ।;पार्थेभ्योऽभ्यधिकः कर्ता समो वा को गुणैर्भवेत् ॥ १६१॥ | |||
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| verse_lines = सतां च प्रवरो विष्णुः सद्भिर्मुनिवरैर्युतः ।;प्रत्यक्षतः कारयति पार्थैः प्रियतमैश्च तैः ।;यं मखप्रवरं तस्य समं किं शुभसाधनम्(शुभसाधनैः) ॥ १६२॥ | |||
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| verse_lines = पठन्ति पैङ्गिनश्चैतान् मन्त्रानन्वर्थकानिह ।;अवैष्णवकृतं कर्म सर्वमन्तवदुच्यते ।;अनन्तं वैष्णवकृतं तत्र वर्णक्रमात् परम् ॥ १६३॥ | |||
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| verse_lines = वैष्णवेष्वपि मर्त्यैर्यत् कृतं शतगुणं ततः ।;गान्धर्वं कर्म तस्माच्च मुनिभिः पितृभिस्ततः ॥ १६४॥ | |||
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| verse_lines = देवशक्रशिवब्रह्मकृतं तस्मात् क्रमेण च ।;शतोत्तरमिति ज्ञेयं नान्यद् ब्रह्मकृतोपमम् ॥ १६५॥ | |||
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| verse_lines = वैष्णवत्वं क्रमात् वृद्धं (क्रमोद्वृद्धं) ब्रह्मान्तं जीवराशिषु ।;फलाधिक्यं कर्मणां हि विष्णोः प्रीत्यैव नान्यथा ॥ १६६॥ | |||
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| verse_lines = इति तेन न पार्थानां कर्मणाऽन्यत् समं क्वचित् ।;गुणैर्ज्ञानादिभिर्वाऽपि तस्मात् क्रोधः स तामसः ।;विनिन्द्य तान् सुसत्त्वस्थांस्तमोऽन्धमुपजग्मिवान् ॥ १६७॥ | |||
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| verse_lines = अथ पृष्टो वासुदेवः सुरविप्रादिसंसदि ।;युधिष्ठिरेण संहृष्टो जगादाशेषतः प्रभुः ॥ १६८॥ | |||
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| verse_lines = ते च श्रुत्वाऽखिलान् धर्मान् भक्त्या परमया युताः ।;पूजयन्तो जगन्नाथमापुश्च परमां मुदम् ॥ १६९॥ | |||
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<span id="gr-C31" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकत्रिंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C31" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकत्रिंशोऽध्यायः"></span> | ||
== एकत्रिंशोऽध्यायः == | == एकत्रिंशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = ओं ॥ यज्ञेश्वरेणाभियुतेषु भक्त्या महीं प्रशासत्सु पृथासुतेषु ।;यियक्षुरागान्निशि विप्रवर्यो युधिष्ठिरं वित्तमभीप्समानः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = प्रातर्ददानीति नृपस्य वाक्यं निशम्य विप्रस्त्वरितो मखार्थे ।;भीमं ययाचे स नृपोक्तमाशु निशम्य चादान्निजहस्तभूषणम् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = अनर्घमग्निप्रतिमं(अनर्घ्यमग्निप्रतिमं) विचित्ररत्नान्वितं(रत्नाञ्चितं) विप्रवरस्तदाप्य ।;ययौ कृतार्थोऽथ च (नन्दिरावं)नन्दिघोषमकारयद् वायुसूनुस्तदैव ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = अकालजं तं तु निशम्य राजा पप्रच्छ दूतैस्तमुवाच भीमः ।;यन्मर्त्यदेहोऽपि विनिश्चितायुरभून्नृपस्तेन ममाऽस हर्षः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितोऽसौ नृपतिस्त्वरेत धर्मार्थमित्यस्य मतं प्रपूजयन् ।;जगाद साध्वित्यथ भूय एव धर्मे त्वरावानपि सम्बभूव ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = अथाम्बिकेयं विषयेषु सक्तं दुस्सङ्गदुष्टं कृतभूरिदोषम् ।;समस्तराजाप्ययहेतुभूतं विचार्य (निचाय्य) तं मारुतिरन्वकम्पत ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = अकुर्वतस्तीक्ष्णतपः कुतश्चिन्नैवास्य(कुतश्चिन्नैव स्वलोकाप्ति)लोकाप्तिरमुष्य भूयात् ।;रागाधिकोऽयं न तपश्च कुर्यादित्यस्य वैराग्यकराणि चक्रे ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = आज्ञां परैरस्य निहन्ति सोदरैर्वधूजनैरप्यतिपूजितेऽस्मिन् ।;स निष्टनत्येवमपीतरैः स्वैः सुपूजितो(सम्पूजितो) नाऽस तदा विरागः ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = सर्वे हि पार्थास्तमृते सभार्या वैचित्रवीर्यं परमादरेण ।;पर्येव चक्रुः सततं सभार्यं कृष्णा च न स्यात् तनयार्तिमानिति ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = स प्रीयमाणो नितरां च तेषु नैवाधिकं प्रीयते भीमसेने ।;स्मरन् सुतांस्तेन हतान् समस्तानपि प्रभावं परमस्य जानन् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = तस्यापनेतुं विषयेषु सक्तिं द्वेषं तथैवाऽत्मनि भीमसेनः ।;जगाद माद्रीसुतयोः समक्षमास्फोट्य संशृण्वत एव तस्य ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = ताविमौ मे भुजौ वृत्तौ पीनौ चन्दनरूषितौ ।;ययोरन्तरमासाद्य जरढस्य सुता हताः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = यमौ तदन्वमोदेतां तत्स्नेहाद् गौरवादपि ।;नैव तत् कृष्णया ज्ञातं पृथया च सपुत्रया ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = तच्छ्रुत्वोत्पन्ननिर्वेदं क्षत्ता ज्येष्ठस्य वर्द्धयन् ।;उवाच जीविताशा ते ननु राजन् गरीयसी (महीयसी) ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = अहो महीयसी(गरीयसी) जन्तोर्जीविताशा यथा(यया) भवान्।;भीमापवर्जितं पिण्डमादत्से गृहपालवत् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = नचापराधो भीमस्य ब्रुवतस्त्वामिदं वचः ।;अग्निर्निसृष्टो दत्तश्च गरो दाराश्च दूषिताः ।;हृतं क्षेत्रं धनं यस्य किं भीमेन कृतं त्वयि ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = अलमासज्जतस्तेऽद्य निर्वेदकरमीरितम् ।;उपकाराय भीमेन तव द्वेषं त्यजात्र तत् ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = विमुच्य द्वेषकामौ त्वं वने तीर्थनिषेवकः ।;तपसाऽऽराधय हरिं ततः पूतो भविष्यसि ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो द्वेषमुत्सृज्य भीमे निर्वेदमागतः ।;अनुज्ञां तपसे प्राप्तुमुपवासपरोऽभवत् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = अनुज्ञां वनवासाय त्वत्तः प्राप्यैव सर्वथा ।;भोक्ष्येऽन्यथा नेति वदन् धृतराष्ट्रः श्रमान्वितः ।;उपवासकृशो भार्यां शिश्रिये मूर्च्छितः क्षणात् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = शन्तमेन(श्रान्तमेनं) करेणाथ धर्मजस्तं मृदु स्पृशन् ।;शनैः सञ्ज्ञामगमयदब्रवीच्च सुदुःखितः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = पुरस्कृत्य युयुत्सुं त्वं कुरु राज्यमकण्टकम् ।;वयमेव त्वदर्थाय कुर्मः सर्वे तपो वने ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = काले निर्वेदमापन्नस्तपसा दग्धकिल्बिषः ।;शुभ्रां गतिमयं यायादन्यथा न कथञ्चन ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो धर्मराजस्तमनुजज्ञे स चाशितः ।;शिक्षयामास सद्धर्मान् नीतिं च विदुषेऽप्यलम् ।;केवलस्नेहतो(केवलं स्नेहतो) राज्ञे शुश्राव विनयात् स च ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मादीनां वयं श्राद्धकर्तारस्तेन किं ततः ।;कानीनत्वात्तु कर्णस्य सहास्माभिः पृथैव हि ।;श्राद्धकर्मण्यधिकृता किं तस्मै दीयते धनम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवन्तं नृपतिरर्जुनश्चोचतुः पुनः ।;यियासोर्याचमानाय निजबाहुबलार्जितम् ।;देहि वित्तं परमतः किं त्वामेषोऽभियाचते ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तमपि नेत्येव ब्रुवाणं शुद्धधार्मिकम् ।;अप्रीत्या जोषमास्वेति प्रोच्योवाच युधिष्ठिरः ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = कोशतो यद् बहिर्वित्तं दानभोगादिकारणम् ।;मम सन्निहितं सर्वं तत् पित्रे चार्पितं (पित्रेऽद्यार्पितं) मया ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = एवमेवार्जुनोऽप्याह विदुरं पुनरूचतुः ।;मुख्यधर्मरते भीमे न पिता क्रोद्धुमर्हति ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो वित्तमादाय गत्वा क्षत्ताऽग्रजेऽब्रवीत्।;युधिष्ठिरार्जुनौ भक्तिं नितरां त्वयि चक्रतुः ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = नातिहृष्टस्त्वदाज्ञायां भीमस्तन्मा क्रुधोऽत्र च।;शुद्धे क्षत्रियधर्मे हि(शुद्धक्षत्रियधर्मेषु) नितरोऽयं वृकोदरः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = नृपार्जुनौ धर्मरतावपि लोककृपापरौ।;अजातकोपस्तच्छ्रुत्वा धृतराष्ट्रः प्रशान्तधीः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = कृत्वा श्राद्धानि सर्वेषां महादानान्यनारतम् ।;दशरात्रं ददौ शुद्धमनसा निर्ऋणत्वधीः ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वं समर्प्य गोविन्दे पार्थेभ्योऽन्येभ्य एव च ।;स्वजनेभ्यः समादाय स्रवन्नेत्रेभ्य उच्चधीः ।;अनुज्ञां निर्गतः प्राह पौरजानपदान् नृपः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = धर्मतो रक्षिता यूयमस्मत्पूर्वैर्महात्मभिः ।;नचाहं परमस्नेहाद् युष्माभिः सुकृपालुभिः ।;अरक्षितेति कथितः प्रमादादपि सज्जनाः ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = इष्टं च यज्ञैः पूर्तैश्च चरितं युष्मदाश्रयात् ।;पुत्रस्तु मम पापात्मा सर्वक्षत्रविनाशकः ।;सर्वातिशङ्की मूढश्च वृद्धानां शासनातिगः ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = सौभ्रात्रं येन सन्त्यज्य पाण्डवेषु महात्मसु ।;कृतं विरूपं सुमहत् कुर्याद् यन्नापरः क्वचित् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = अप्रियाणि च कृष्णस्य सुबहून्याचरत् कुधीः ।;प्रायस्तेनापि मन्देन न युष्मास्वप्यप्रियं(युष्मास्वप्यशिवं,न युष्मास्वशिवं,न युष्मासु शिवं) कृतम् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = भ्रातरोऽस्य च सर्वेऽपि तच्छीलमनुवर्तिनः ।;हताश्च स्वेन पापेन ससुतामात्यबान्धवाः ॥ ४7॥ | |||
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| verse_lines = सोऽहं वयोगतश्चैव पुत्राधिभिरभिप्लुतः(पुत्रादिभिरभिप्लुतः) ।;तत्सम्बन्धकृतं(तत्सम्बन्धात्कृतं) पापं स्वकृतं चाप्यपेशलम्(चात्यपेशलम्) ।;पाण्डवेषु सकृष्णेषु तपसा मार्ष्टुमुद्यतः ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = तत्र मामनुजानीध्वं कृपया मित्रवत्सलाः ।;मत्प्रियार्थमपि स्नेहः पाण्डवेषु महात्मसु ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = क्रियमाणोऽपि कर्तव्यो भूय एव सदाऽचलः ।;ते हि मे पुत्रकाः सन्त इहामुत्र च सौख्यदाः ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तैः स्वगुणानुच्चैः कीर्तयद्भिः सुदुःखितैः ।;पर्यश्रुनयनैः कृच्छ्रात् पौरजानपदैश्चिरात् ।;अनुज्ञातो ययौ पार्थैरनुयातः सुदूरतः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = सञ्जयो विदुरश्चैनं सभार्यमनुजग्मतुः ।;अनुवव्राज तं कुन्ती वनाय कृतनिश्चया ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = वार्यमाणाऽपि तनयैः सभार्यैर्भृशदुःखितैः ।;संस्थाप्य तान् सुकृच्छ्रेण ययौ साऽन्वेव तं नृपम् ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = संन्दर्शितपथो राजा कुन्तीविदुरसञ्जयैः ।;गान्धारीसहितः प्राप कुरुक्षेत्रं जगद्गुरोः ।;क्रमेणैवाऽश्रमं व्यासदेवस्य सुरपूजितम् ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = त्रिवत्सरेणास्य (त्रिवत्सरादस्य) निजस्य लोकस्याऽप्तिं सभार्यस्य जगाद तत्र ।;ब्रह्माङ्कजस्तेन भृशं प्रतीतो व्यासोपदिष्टं व्यचरत् तपोऽग्र्यम् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = सक्षत्तृगान्धारिपृथे ससञ्जये तपोभिराराधयति प्रभुं हरिम् ।;वैचित्रवीर्येऽत्र सदारबन्धुभृत्यास्तु पार्था दृशये समाययुः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = क्षत्तैकतामत्र युधिष्ठिरेण प्राप्तोऽथ भार्यासहितं ससञ्जयम् ।;उपासमानेषु विचित्रवीर्यपुत्रं पृथां चैव पृथासुतेषु ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = प्रादुर्बभूवामितशक्ति(प्रादुर्बभूवामृतशक्ति)तेजोज्ञानाद्भुतैश्वर्यसुखादिरूपः ।;व्यासो हरिस्तत्र समीक्ष्य सर्वे सम्पूजयामासुरुदग्र्यभक्त्या(सम्पूजयामासुरुदग्रभक्त्या) ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = तैः पूजितस्तत्र निषण्ण आह यद्यद् यदिष्टं प्रवदन्तु तत्तत् ।;दास्यामि तस्याद्य तदित्यमुष्मिन् भक्त्युच्छ्रयः पाण्डुसुतैः सदारैः ।;वृतोऽत्र कुन्ती रविसूनुजन्ममृत्यूत्थदोषापगमं ययाचे ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = तेषां प्रदत्तेष्वभिवाञ्छितेषु वैचित्रवीर्यः सह भार्ययैव ।;सम्मन्त्र्य निःशेषरणेहतानां सन्दर्शनं प्रार्थितवांस्तमीशम् ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु ते सत्यवतीसुतस्य सर्वेश्वरस्याऽज्ञया सर्व एव ।;समागताः स्वर्गलोकात् क्षणेन दत्ता च दिव्या दृगमुष्य राज्ञः ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = ऊषुश्च रात्रिं परमाज्ञयैव सर्वे स्वभार्यासहिता(सर्वेऽपि भार्यासहिता) यथा पुरा ।;तृप्तः(तृप्ताः) सदारो नृपतिश्च तत्र सर्वेऽपि दृष्ट्वा महदद्भुतं(परमाद्भुतं) तत् ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽज्ञयैवास्य परस्य सर्वाः स्त्रियो निजेशैः सहिता ययुः स्वः (स्वम्) ।;विनोत्तरां तां तु कथां निशम्य पारीक्षितोऽयाचत तातदृष्टिम् ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = तं चाऽनयामास तदैव कृष्णो ह्यचिन्त्यशक्तिः स विकुण्ठलोकात् ।;दृष्ट्वा स पारीक्षित आप तुष्टिं स्वतातमीशेन समाहृतं पुनः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = सम्पूज्य तं कृष्णमपीशवन्द्यं क्षमापयामास परीक्षिदात्मजः ।;चक्रे च विस्रम्भमतीव भारते पुनश्च तत्रस्थजनैः(तत्रत्यजनैः) समेतः ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = पार्थाः पुनः प्राप्य पुरं स्वकीयं धर्मेण पृथ्वीं परिपालयन्तः ।;भोगानरागा अजुषन्त(भोगानारागादषुजन्त) योग्यान् युक्ता जगद्धातरि वासुदेवे ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = वर्षत्रयान्ते त्मसमाहिताग्निं (त्यक्त्वाऽग्निभिः)त्यक्ताग्निभिस्तैर्वनमालिहद्भिः ।;ते शुश्रुवुर्धृतराष्ट्रं सभार्यं सहैव कुन्त्या परिदग्धदेहम् ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = वीटामुखं(व्रीळामुखा,व्रीडामुखं, व्रीडामुखान्) ध्यानपरा निशम्य स्वर्यातमात्मीयपितृव्यमाशु ।;समेत्य भर्त्रा प्रतिपूज्यमानां कुन्तीं च तप्ता विदधुः क्रियाश्च ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = ते विष्णुभक्त्या परिपूतकर्मभिर्ज्ञानेन चान्ते तमनुस्मरन्तः ।;पार्थैः सुपुत्रैः (कुकृतौर्ध्वकर्मभिः)सुकृतोर्ध्वकर्मभिर्वृद्धिं सुखस्याऽपुरनप्ययां(अनव्ययाम्) शुभाः(शुभाम्) ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = (गावल्गणिः)गावद्गणिर्व्याससकाशमेत्य शुश्रूषया तस्य पुनर्निजां गतिम् ।;प्रपेदिवान् पाण्डुसुताश्च कृष्णं प्रतीक्षमाणाः पृथिवीमशासन् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = अष्टादशाब्दाः पृथिवीं समस्तां प्रशासतामेवमगुर्महात्मनाम् ।;अरिक्तधर्मार्थसुखोत्तमानामनुज्झितानन्तपदस्मृतीनाम् ॥ ७१॥ | |||
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<span id="gr-C32" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वात्रिंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C32" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वात्रिंशोऽध्यायः"></span> | ||
== द्वात्रिंशोऽध्यायः == | == द्वात्रिंशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = OM ॥ ततः कुरुक्षेत्रमवाप्य कृष्णो दीक्षां प्रपेदे द्विषडब्दसत्रे ।;स एव च व्यासभृगूद्वहात्मा चक्रेऽत्र सादस्यमजोऽप्रमेयः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = तत्रर्त्विजो दक्षभृगुप्रधानाः पार्था यदूनां प्रवरैः समेताः ।;ब्रह्मेशशक्रप्रमुखाः सुराश्च चक्रुः सुसाचिव्यमनन्तदासाः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = सुनिर्णयस्तत्त्वविनिर्णयार्थिनां तत्त्वस्य चाभूदिह वादशीलिनाम् ।;मिथो विवादात् सुरभूसुराणां वाक्याद्धरेर्व्यासभृगूद्वहात्मनः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = धर्मार्थकामानखिलानवापुस्तदर्थिनो मुक्तिमपीह कृष्णात् ।;यथेष्टपानाशनवाससो जना विचेरुरत्रा(विरेजुरत्रा)मरमानवादयः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = क्षेत्रं तदासीद्धरिलोकसम्मितं(तदाऽसीद्धरिलोकसम्मितं) यदीयुरत्राखिलसज्जना युतिम् ।;नानाप्तकामाश्च ततो बभूवुर्निर्यत्नदृश्यश्च यतोऽत्र केशवः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = द्वादशाब्दं महासत्रमेवमेतादृशं हरिः ।;समाप्यावभृथस्नातः पूजयित्वाऽखिलान् जनान् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = अनुजज्ञे क्रमेणैव वत्सरेण समागतान् ।;स्वकुलं सञ्जिहीर्षुः(सञ्जहीर्षुः) स विप्रशापमजीजनत् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = उपदिश्य परं ज्ञानमुद्धवायामुमाश्रमम् ।;बदर्याख्यं प्रापयित्वा सप्तमाब्दं शतोत्तरम् ।;प्रतीक्षन् पालयामास पार्थैः सह भुवं प्रभुः ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = समारब्धं कलियुगं यदा दुर्योधनोऽपतत् ।;षट्त्रिंशाब्दं पुनः कृष्णः कृतमेवान्ववर्तयत् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = कृतादपि विशेषोऽयं यत् पुण्यस्याधिकं फलम् ।;अल्पमेव च पापस्य कालात् कृष्णाज्ञया तथा ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = एवं सुधार्मिके लोके हरिभक्तिपरायणे ।;नष्टेषु कलिलिङ्गेषु युगवृत्तिमभीप्सवः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मरुद्रादयो देवाः स्तुत्वा केशवमव्ययम् ।;व्यज्ञापयन् स्वलोकाप्तिमोमित्याह स चाच्युतः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = प्राचुर्ये सज्जनस्य स्यान्न कलेर्वृद्धिरञ्जसा ।;इति स्वकुलसंहृत्यै प्रभासमनयत् प्रभुः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = पुण्यक्षेत्रेऽपि न मृतिः स्वगृहे त्वतिधर्मदा(स्वगृहेऽप्यतिधर्मदा) ।;गत्यैवाल्पमपि क्षेत्रं स्यान्महत्फलमित्यजः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = प्रकाशयितुमेवैनान् प्रभासाय कुशस्थलात् ।;नीत्वा दानादि(दानादिसद्धर्मान्)सद्धर्मांस्तैरकारयदच्युतः ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = ते ततः शापदोषेण कृष्णेनैव विमोहिताः ।;मैरेयमत्ता अन्योन्यं निपात्य स्वां तनुं गताः ।;तद् दृष्ट्वा बलदेवोऽपि योगेन स्वतनुं जहौ ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = ततः परेशोऽगणितानुभावः स्वसारथिं पाण्डवानां सकाशम् ।;स्वलोकयानप्रतिबोधनाय(स्वलोकयानप्रतिवेदनाय) स्वस्यानु चैषां त्वरयाऽभ्ययातयत् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽसतः पिप्पलमूल ईशितुरूरुस्थितं पादतलं सुताम्रम् ।;दृष्ट्वा जरा नाम ससर्ज शल्यं भक्तोऽप्यलं रोहितं शङ्कमानः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = अच्छेद्याभेद्यदेहस्य शल्ये पादमुपस्थिते ।;समीपमागतो व्याधो दृष्ट्वा भीतोऽपतद् भुवि ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = विप्रवाक्यं मानयानः कारयित्वाऽमुना हरिः ।;पापं मां जहि देवेति याचन्तमनयद् दिवम् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = पादप्रहारदोषेण तं भृगुं व्याधतां गतम् ।;पश्चात्तापेन भक्त्या च सुप्रीतस्तच्छरीरिणम् ।;स्वाज्ञाप्राप्तविमानेन दिवं निन्ये जनार्दनः ॥ २२॥ | |||
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Latest revision as of 07:07, 8 June 2026
श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णयः — मूलम्
प्रथमोऽध्यायः
नारायणाय परिपूर्णगुणार्णवाय विश्वोदयस्थितिलयोन्नियति प्रदाय।
आसीदुदारगुणवारिधिरप्रमेयो नारायणः परतमः परमात् स एकः।
तस्योदरस्थजगतः सदमन्दसान्द्रस्वानन्दतुष्टवपुषोऽपि रमारमस्य।
दृष्ट्वा स चेतनगणान् जठरे शयानान् आनन्दमात्रवपुषः सृतिविप्रमुक्तान्।
स्रक्ष्ये हि चेतनगणान् सुखदुःखमध्यसम्प्राप्तये तनुभृतां विहृतिं ममेच्छन्।
इत्थं विचिन्त्य परमः स तु वासुदेवनामा बभूव निजमुक्तिपदप्रदाता।
सङ्कर्षणश्च स बभूव पुनः सुनित्यः संहारकारणवपुस्तदनुज्ञयैव।
स्थित्यै पुनः स भगवाननिरुद्धनामा देवी च शान्तिरभवच्छरदां सहस्रम्।
निर्देहकान् स भगवाननिरुद्धनामा जीवान् स्वकर्मसहितान् उदरे निवेश्य ।
पञ्चात्मकः स भगवान् द्विषडात्मकोऽभूत् पञ्चद्वयी शतसहस्रपरोऽमितश्च।
निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आत्मतन्त्रो निश्चेतनात्मकशरीरगुणैश्च हीनः।
कालाच्च देशगुणतोऽस्य न चाऽदिरन्तो वृद्धिक्षयौ न तु परस्य सदातनस्य।
सर्वज्ञ ईश्वरतमः स च सर्वशक्तिः पूर्णाव्ययात्मबलचित्-सुखवीर्यसारः।
आभासकोऽस्य पवनः पवनस्य रुद्रः शेषात्मको गरुड एव च शक्रकामौ।
आभासका त्वथ रमाऽस्य मरुत्स्वरूपाच्छ्रेष्ठाऽप्यजात् तदनु गीः शिवतो वरिष्ठा।
ताभ्यश्च ते शतगुणैर्दशतो वरिष्ठाः पञ्चोत्तरैरपि यथाक्रमतः श्रुतिस्थाः।
तेषां स्वरूपमिदमेव यतोऽथ मुक्तावप्येवमेव सततोच्चविनीचरूपाः।
एवं नरोत्तमपरास्तु विमुक्तियोग्या अन्ये च संसृतिपरा असुरास्तमोगाः।
पूर्तिश्च नैव नियमाद् भविता हि यस्मात् तस्मात् समाप्तिमपि यान्ति न जीवसङ्घाः।
एतैः सुरादिभिरतिप्रतिभादियुक्तैर्युक्तैः सहैव सततं प्रविचिन्तयद्भिः।
साम्यं न चास्य परमस्य च केन चाऽप्यं मुक्तेन च क्वचिदतस्त्वभिदा कुतोऽस्य।
अर्थोऽयमेव निखिलैरपि वेदवाक्यै रामायणैः सहितभारतपञ्चरात्रैः।
नारायणस्य न समः पुरुषोत्तमोऽहं
‘आभास एव’ (ब्र.सू. २.३.५०) पृथगीशत एष जीवो
‘माहात्म्यदेह’ ‘सृतिमुक्तिगते’ ‘शिवश्च
‘आभासकाभासपरावभासरूपाण्यजस्राणि च चेतनानाम् ।
‘यस्मिन् परेऽन्येऽप्यजजीवकोशा’
‘नैवैक एव पुरुषः पुरुषोत्तमोऽसौ
‘सर्वोत्तमो हरिरिदं तु तदाज्ञयैव
‘ऋगादयश्च चत्वारः पञ्चरात्रं च भारतम्।
अविरुद्धं च यत्त्वस्य प्रमाणं तच्च नान्यथा।
वैष्णवानि पुराणानि पञ्चरात्रात्मकत्वतः।
एतेषु विष्णोराधिक्यमुच्यतेऽन्यस्य न क्वचित्।
मोहार्थान्यन्यशास्त्राणि कृतान्येवाऽज्ञया हरेः।
यस्मात् कृतानि तानीह विष्णुनोक्तैः शिवादिभिः।
विष्ण्वाधिक्यविरोधीनि यानि वेदवचांस्यपि।
अवतारेषु यत् किञ्चिद् दर्शयेन्नरवद्धरिः।
अज्ञत्वं पारवश्यं वा (छे)वेधभेदादिकं तथा।
अनीशत्वं च दुःखित्वं साम्यमन्यैश्च हीनताम्।
न तस्य कश्चिद् दोषोऽस्ति पूर्णाखिलगुणो ह्यसौ।
ब्रह्माद्यभेदः साम्यं वा कुतस्तस्य महात्मनः।
निर्णयायैव यत् प्रोक्तं ब्रह्मसूत्रं तु विष्णुना।
यथार्थवचनानां च मोहार्थानां च संशयम्।
तस्मात् सूत्रार्थमागृह्य कर्तव्यः सर्वनिर्णयः।
अभेदः सर्वरूपेषु जीवभेदः सदैव च।
तारतम्यं च मुक्तानां विमुक्तिर्विद्यया तथा।
तस्माद् ‘ये ये गुणा विष्णोर्ग्राह्यास्ते सर्व एव तु’।
‘एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति।
अतत्थ्यानि वितत्थ्यानि दर्शयस्व महाभुज।
इति वाराहवचनं ब्रह्माण्डोक्तं तथाऽपरम् ।
निर्दोषत्वं तारतम्यं मुक्तानामपि चोच्यते ।
स्कान्देऽप्युक्तं शिवेनैव षण्मुखायैव सादरम् ।
‘परमो विष्णुरेवैकस्तज्ज्ञानं मोक्षसाधनम् ।
ज्ञानं विना तु या मुक्तिः साम्यं च मम विष्णुना ।
अभेदश्चास्मदादीनां मुक्तानां हरिणा तथा ।
उक्तं (पा)पद्मपुराणे च शैव एव शिवेन तु ।
‘त्वामाराध्य तथा शम्भो ग्रहीष्यामि वरं सदा ।
स्वाऽगमैः कल्पितैस्त्वं च जनान् मद्विमुखान् कुरु ।
न च वैष्णवशास्त्रेषु वेदेष्वपि हरेः परः ।
निर्दोषत्वाच्च वेदानां वेदोक्तं ग्राह्यमेव हि ।
‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।
‘स्तुहि श्रुतं गर्तसदं युवानं मृगं न भीममुपहत्नुमुग्रम्’ ।
‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’ ।
‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।
‘यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।
‘प्र घा न्वस्य महतो महानि सत्या सत्यस्य करणानि वोचम्’ ।
‘यच्चिकेत सत्यमिइत् तन्न मोघं वसु स्पार्हम् उत जेतोत दाता’ ।
‘सत्या विष्णोर्गुणाः सर्वे सत्या जीवेशयोर्भिदा ।
असत्यः स्वगतो भेदो विष्णोर्नान्यदसत्यकम् ।
जीवेशयोर्भिदा चैव जीवभेदः परस्परम् ।
पञ्चभेदा इमे नित्याः सर्वावस्थासु सर्वशः ।
क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा दैवाश्च पितरश्चिराः ।
रुद्रः सरस्वती वायुर्मुक्ताः शतगुणोत्तराः ।
मुक्तेषु श्रीस्तथा वायोः सहस्रगुणिता गुणैः ।
इत्यादि वेदवाक्यं विष्णोरुत्कर्षमेव वक्त्युच्चैः ।
‘भूम्नो ज्यायस्त्वम्’(‘भूम्नःक्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति’ ब्र.सू.३.३.५९) इति ह्युक्तं सूत्रेषु निर्णयात् तेन ।
‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
‘विष्णुर्हि दाता मोक्षस्य वायुश्च तदनुज्ञया ।
उत्तरेषां प्रसादेन नीचानां नान्यथा भवेत् ।
तारतम्यं ततो ज्ञेयं सर्वोच्चत्वं हरेस्तथा ।
पञ्चभेदांश्च विज्ञाय विष्णोः स्वाभेदमेव च ।
अवतारान् हरेर्ज्ञात्वा नावतारा हरेश्च ये ।
सृष्टिरक्षाऽहृतिज्ञाननियत्यज्ञानबन्धनान् ।
वेदांश्च पञ्चरात्राणि सेतिहासपुराणकान् ।
माहात्म्यज्ञानपूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोऽधिकः ।
त्रिविधा जीवसङ्घास्तु देवमानुषदानवाः ।
मध्यमा मानुषा ये तु सृतियोग्याः सदैव हि ।
मुक्तिर्नित्या तमश्चैव नाऽवृत्तिः पुनरेतयोः ।
नासुराणां तथा मुक्तिः कदाचित् केनचित् क्वचित् ।
असुराणां तमःप्राप्तिस्तदा नियमतो भवेत् ।
तदा मुक्तिश्च देवानां यदा प्रत्यक्षगो हरिः ।
सर्वैर्गुणैर्ब्रह्मणा तु समुपास्यो हरिः सदा ।
यथाक्रमं गुणोद्रेकात् तदन्यैराविरिञ्चतः ।
तैरेवाप्यं पदं तत्तु नैवान्यैः साधनैरपि ।
तस्मादनाद्यनन्तं हि तारतम्यं चिदात्मनाम् ।
अयोग्यमिच्छन् पुरुषः पतत्येव न संशयः ।
अच्छिद्रसेवनाच्चैव निष्कामत्वाच्च योग्यतः ।
नियमोऽयं हरेर्यस्मान्नोल्लङ्घ्यः सर्वचेतनैः ।
दानतीर्थतपोयज्ञपूर्वाः सर्वेऽपि सर्वदा ।
‘शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमायन् अन्यमन्यमतिनेनीयमानः ।
परा पूर्वेषां सख्या वृणक्ति वितर्तुराणो अपरेभिरेति ।
‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै. आ. ३.१२.१७, श्वे. उ. ३.८) ।
‘यस्य देवे परा भक्तिर्यथादेवे तथा गुरौ ।
‘भक्त्यर्थान्यखिलान्येव भक्तिर्मोक्षाय केवला ।
ज्ञानपूर्वः परः स्नेहो नित्यो भक्तिरितीर्यते’।
‘निश्शेषधर्मकर्ताऽप्यभक्तस्ते नरके हरे।
‘धर्मो भवत्यधर्मोऽपि कृतो भक्तैस्तवाऽच्युत ।
‘भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
‘अनादिद्वेषिणो दैत्या विष्णौ द्वेषो विवर्धितः ।
पूर्णदुःखात्मको द्वेषः सोऽनन्तो ह्यवतिष्ठते ।
जीवाभेदो निर्गुणत्वं अपूर्णगुणता तथा ।
प्रादुर्भावविपर्यासस्तद्भक्तद्वेष एव च ।
एतैर्विहीना या भक्तिः सा भक्तिरिति निश्चिता ।
अपरोक्षदृशेर्हेतुर्मुक्तिहेतुश्च सा पुनः ।
यथा शौक्ल्यादिकं रूपं गोर्भवत्येव सर्वदा ।
भक्त्यैव तुष्टिमभ्येति विष्णुर्नान्येन केनचित् ।
ब्रह्मादीनां च मुक्तानां तारतम्ये तु कारणम् ।
मानुषेष्वधमाः किञ्चिद् द्वेषयुक्ताः सदा हरौ ।
मध्यमा मिश्रभूतत्वान्नित्यं मिश्रफलाः स्मृताः ।
ब्रह्मणः परमा भक्तिः सर्वेभ्यः परमस्ततः’ ।
‘षण्णवत्यङ्गुलो यस्तु न्यग्रोधपरिमण्डलः ।
तस्माद् ब्रह्मा गुरुर्मुख्यः सर्वेषामेव सर्वदा ।
क्रमाल्लक्षणहीनाश्च लक्षणालक्षणैः समाः ।
सम्यग्लक्षणसम्पन्नो यद् दद्यात् सुप्रसन्नधीः ।
अगम्यत्वाद्धरिस्तस्मिन्नाविष्टो मुक्तिदो भवेत् ।
स्वावराणां गुरुत्वं तु भवेत् कारणतः क्वचित् ।
‘यदा मुक्तिप्रदानाय स्वयोग्यं पश्यति ध्रुवम् ।
यान्ति पूर्वाण्युत्तराणि न श्लेषं यान्ति कानिचित् ।
भविष्यत्पर्ववचनमित्येतत् सूत्रगं तथा ।
‘मुक्तास्तु मानुषा देवान् देवा इन्द्रं स शङ्करम् ।
उत्तरोत्तरवश्याश्च मुक्ता रुद्रपुरस्सराः ।
असुराः कलिपर्यन्ता एवं दुःखोत्तरोत्तराः ।
तथाऽन्येऽप्यसुराः सर्वे गणा योग्यतया सदा ।
मुक्तोऽपि सर्वमुक्तानां आधिपत्ये स्थितः सदा ।
इत्यृग्यजुःसामाथर्वपञ्चरात्रेतिहासतः ।
विष्ण्वाज्ञयैव विदुषा तत्प्रसादबलोन्नतेः ।
तात्पर्यं शास्त्राणां सर्वेषामुत्तमं मया प्रोक्तम् ।
द्वितीयोऽध्यायः
औं ॥ जयति हरिरचिन्त्यः सर्वदेवैकवन्द्यः परमगुरुरभीष्टावाप्तिदः सज्जनानाम् ।
उक्तः पूर्वेऽध्याये शास्त्राणां निर्णयः परो दिव्यः ।
क्वचिद् ग्रन्थान् प्रक्षिपन्ति क्वचिदन्तरितानपि ।
अनुत्सन्ना अपि ग्रन्था व्याकुला इति सर्वशः ।
ग्रन्थोऽप्येवं विलुळितः किम्वर्थो देवदुर्गमः ।
हरिणा निर्णयान् वच्मि विजानंस्तत्प्रसादतः ।
देशे देशे तथा ग्रन्थान् दृष्ट्वा चैव पृथग्विधान् ।
जगाद भारताद्येषु तथा वक्ष्ये तदीक्षया ।
निर्णयः सर्वशास्त्राणां भारतं परिकीर्तितम् ॥९॥
‘भारतं सर्ववेदाश्च तुलामारोपिताः पुरा ।
‘महत्वाद् भारवत्वाच्च महाभारतमुच्यते ।
‘निर्णयः सर्वशास्त्राणां सदृष्टान्तो हि भारते ।
यतः कृष्णवशे सर्वे भीमाद्याः सम्यगीरिताः ।
यस्माद्व्यासात्मना तेषां भारते यश ऊचिवान् ।
ब्रह्माधिकश्च देवेभ्यः शेषाद्रुद्रादपीरितः ।
भूभारहारिणो विष्णोः प्रधानाङ्गं हि मारुतिः ।
यो य एव बलज्येष्ठः क्षत्रियेषु स उत्तमः ।
बलं नैसर्गिकं तच्चेद्वरास्त्रादेस्तदन्यथा ।
देवेषु बलिनामेव भक्तिज्ञाने न चान्यथा ।
तस्माद्यो यो बलज्येष्ठः स गुणज्येष्ठ एव च ।
ज्ञानादयो गुणा यस्माज्ज्ञायन्ते सूक्ष्मदृष्टिभिः ।
देवेष्वेव न चान्येषु वासुदेवप्रतीपतः ।
प्रवृत्तो दुष्टनिधने ज्ञानकार्ये तथैव च ।
कृष्णरामादिरूपेषु बलकार्यो जनार्दनः ।
मत्स्यकूर्मवराहाश्च सिंहवामनभार्गवाः ।
कपिलो दत्त ऋषभौ शिंशुमारो रुचेः सुतः ।
महिदासस्तथा हंसः स्त्रीरूपो हयशीर्षवान् ।
इत्याद्याः केवलो विष्णुर्नैषां भेदः कथञ्चन ।
श्रीब्रह्मरुद्रशेषाश्च वीन्द्रेन्द्रौ काम एव च ।
धर्म एषां तथा भार्या दक्षाद्या मनवस्तथा ।
कश्यपः सनकाद्याश्च वह्न्याद्याश्चैव देवताः ।
गयश्च लक्ष्मणाद्याश्च त्रयो रोहिणिनन्दनः ।
नरः फल्गुन इत्याद्या विशेषावेशिनो हरेः ।
तस्माद्बलप्रवृत्तस्य रामकृष्णात्मनो हरेः ।
ब्रह्मात्मको यतो वायुः पदं ब्राह्ममगात् पुरा ।
यत्र रूपं तत्र गुणाः भक्त्याद्यास्त्रीषु नित्यशः ।
प्रायो वेत्तुं न शक्यन्ते भक्त्याद्यास्त्रीषु यत् ततः ।
तच्च नैसर्गिकं रूपं द्वात्रिंशल्लक्षणैर्युतम् ।
आसुरीणां वरादेस्तु वपुर्मात्रं भविष्यति ।
तस्माद् रूपगुणोदारा जानकी रुग्मिणी तथा ।
ततः पश्चाद् द्रौपदी च सर्वाभ्यो रूपतो वरा ।
हन्ता च वैरहेतुश्च भीमः पापजनस्य तु ।
बलदेवस्ततः पश्चात् ततः पश्चाच्च फल्गुनः ।
रामवज्जाम्बवत्याद्याः षट् ततो रेवती तथा ।
रामकार्यं तु यैः सम्यक् स्वयोग्यं न कृतं पुरा ।
अधिकं यैः कृतं तत्र तैरूनं कृतमत्र तत् ।
प्रादुर्भावद्वये ह्यस्मिन् सर्वेषां निर्णयः कृतः ।
पश्चात्तनत्वात् कृष्णस्य वैशेष्यात् तत्र निर्णयः ।
उक्ता रामकथाऽप्यस्मिन् मार्कण्डेयसमाख्य(स्य)या ।
अत्रोक्तं सर्वशास्त्रेषु नहि सम्यगुदाहृतम्'।
मार्कण्डेयेऽपि कथितं भारतस्य प्रशंसनम् ।
आयुधानां यथा वज्रमोषधीनां यथा यवाः ।
वायुप्रोक्तेऽपि तत् प्रोक्तं भारतस्य प्रशंसनम् ।
एवं हि सर्वशास्त्रेषु पृथक् पृथगुदीरितम् ।
भारतेऽपि यथा प्रोक्तो निर्णयोऽयं क्रमेण तु ।
‘नारायणं सुरगुरुं जगदेकनाथं भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च ।
ज्ञानप्रदः स भगवान् कमलाविरिञ्चशर्वादिपूर्वजगतो निखिलाद्वरिष्ठः ।
निर्दोषकः सृतिविहीन उदारपूर्णसंविद्गुणः प्रथमकृत् सकलात्मशक्तिः ।
नम्यत्वमुक्तमुभयत्र यतस्ततोऽस्य मुक्तैरमुक्तिगगणैश्च विनम्यतोक्ता ।
‘कृष्णो यज्ञैरिज्यते सोमपूतैः कृष्णो वीरैरिज्यते विक्रमद्भिः ।
सृष्टा ब्रह्मादयो देवा निहता येन दानवाः ।
स्रष्टृत्वं देवानां मुक्तिस्रष्टृत्वमुच्यते नान्यत् ।
अथ च दैत्यहतिस्तमसि स्थिरा नियतसंस्थितिरेव न चान्यथा ।
तमिममेव सुरासुरसञ्चये हरिकृतं प्रविशेषमुदीक्षितुम् ।
‘नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे ।
वासुदेवस्तु भगवान् कीर्तितोऽत्र सनातनः ।
नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति ।
आद्यन्तयोरित्यवदत् स यस्माद् व्यासात्मको विष्णुरुदारशक्तिः ।
‘सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते ।
‘आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।
‘स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित् ।
‘को हि तं वेदितुं शक्तो यो न स्यात् तद्विधोऽपरः(तद्वधः परः) ।
को हि तं वेदितुं शक्तो नारायणमनामयम् ।
अप्रमेयोऽनियोज्यश्च स्वयं कामगमो वशी ।
न प्रमातुं महाबाहुः शक्योऽयं मधुसूदनः ।
वसुदेवसुतो नायं नायं गर्भेऽवसत् प्रभुः ।
जायते नैव कुत्रापि म्रियते कुत एव तु ।
ईशन्नपि हि देवेशः सर्वस्य जगतो हरिः ।
नाऽत्मानं वेद मुग्धोऽयं दुःखी सीतां च मार्गते ।
मुह्यते शस्त्रपातेन भिन्नत्वग्रुधिरस्रवः ।
इत्याद्यसुरमोहाय दर्शयामास नाट्यवत् ।
प्रादुर्भावा हरेः सर्वे नैव प्रकृतिदेहिनः ।
दुष्टानां मोहनार्थाय सतामपि तु(च) कुत्रचित् ।
‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
‘अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रळयस्तथा ।
‘अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्’(भ. गी. ९.११) ।
‘मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
‘महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
‘पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
‘परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
‘ममयोनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।
‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
(इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
‘द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च । दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु’(भ. गी. १६.६) ॥९७॥
‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्’ ।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।
‘ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ।आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया’(भ. गी. १६.१४-१५) ॥१००॥
‘मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः’(भ. गी. १६.१८)।
‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
‘सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
‘सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
‘पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता नारायणः स्वयम् ।
‘ज्ञानेष्वेतेषु राजेन्द्र साङ्ख्यपाशुपतादिषु ।
‘पञ्चरात्रविदो मुख्या यथाक्रमपरा नृप ।
\ (जनमेजय उवाच)
(वैशम्पायन उवाच)‘ नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ।
‘आह ब्रह्मैतमेवार्थं महादेवाय पृच्छते ।
‘अहं ब्रह्मा चाऽद्य ईशः प्रजानां तस्माज्जातस्त्वं च मत्तः प्रसूतः ।
तथैव भीमवचनं धर्मजं प्रत्युदीरितम् ।
स एष भगवान् कृष्णो नैव केवलमानुषः ।
वचनं चैव कृष्णस्य ज्येष्ठं कुन्तीसुतं प्रति ।
यथाऽऽश्रितानि ज्योतींषि ज्योतिःश्रेष्ठं दिवाकरम् ।
भविष्यत्पर्वगं चापि वचो व्यासस्य सादरम् ।
तदर्थास्तु कथाः सर्वा नान्यार्थं वैष्णवं यशः ।
भाषास्तु त्रिविधास्तत्र मया वै सम्प्रदर्शिताः ।
शैवदर्शनमालम्ब्य क्वचिच्छैवी कथोदिता ।
अविरुद्धं समाधेस्तु दर्शनोक्तं च गृह्यते ।
दर्शनान्तरसिद्धं च गुह्यभाषाऽन्यथा भवेत् ।
तस्याङ्गं प्रथमं वायुः प्रादुर्भावत्रयान्वितः ।
त्रेताद्येषु युगेष्वेष सम्भूतः केशवाज्ञया ।
शंरूपे तु रतेर्वायौ श्रीरित्येव च कीर्त्यते ।
तृतीयाङ्गं हरेः शेषः प्रादुर्भावसमन्वितः ।
रुद्रात्मकत्वाच्छेषस्य शुको द्रौणिश्च तत्तनू ।
प्रद्युम्नाद्यास्ततो विष्णोरङ्गभूताः क्रमेण तु ।
तथा भागवतेऽप्युक्तं हनूमद्वचनं परम् ।
न वै स आत्माऽऽत्मवतामधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः ।
यत्पादपङ्कजपरागनिषेवकाणां दुःखानि सर्वाणि लयं प्रयान्ति ।
‘क्वचिच्छिवं क्वचिदृषीन् क्वचिद् देवान् क्वचिन्नरान् ।
लिङ्गं प्रतिष्ठापयति वृणोत्यसुरतो वरान् ।
तस्माद् यो महिमा विष्णोः सर्वशास्त्रोदितः स हि ।
भारतार्थस्त्रिधा प्रोक्तः स्वयं भगवतैव हि ।
‘सकृष्णान् पाण्डवान् गृह्य योऽयमर्थः प्रवर्तते ।
धर्मो भक्त्यादिदशकः श्रुतादिः शीलवैनयौ ।
नारायणस्य नामानि सर्वाणि वचनानि तु ।
भक्तिर्ज्ञानं सवैराग्यं प्रज्ञा मेधा धृतिः स्थितिः ।
एतद्दशात्मको वायुस्तस्माद् भीमस्तदात्मकः ।
अज्ञानादिस्वरूपस्तु कलिर्दुर्योधनः स्मृतः ।
नास्तिक्यं शकुनिर्नाम सर्वदोषात्मकाः परे ।
द्रोणाद्या इन्द्रियाण्येव पापान्यन्ये तु सैनिकाः ।
एवमध्यात्मनिष्ठं हि भारतं सर्वमुच्यते ।
स्वयं व्यासो हि तद् वेद ब्रह्मा वा तत्प्रसादतः ।
इत्यादिव्यासवाक्यैस्तु विष्णूत्कर्षोऽवगम्यते ।
‘वायुर्हि ब्रह्मतामेति तस्माद् ब्रह्मैव स स्मृतः ।
‘ज्ञाने विरागे हरिभक्तिभावे धृतिस्थितिप्राणबलेषु योगे ।
‘बळित्था तद् वपुषे धायि दर्शतं देवस्य भर्गः सहसो यतो जनि ।
पृक्षो वपुः पितुमान् नित्य आ शये द्वितीयमा सप्तशिवासु मातृषु ।
निर्यदीं बुध्नान्महिषस्य वर्पस ईशानासः शवसा क्रन्त सूरयः ।
प्र यत्पितुः परमान्नीयते पर्या पृक्षुधो वीरुधो दंसु रोहति ।
आदिन् मात्रॄराविशद्यास्वा शुचिरहिंस्यमान उर्विया वि वावृधे ।
‘अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिःश्रेष्ठो दिवाकरः ।
‘बलमिन्द्रस्य गिरिशो गिरिशस्य बलं मरुत् ।
‘वायुर्भीमो भीमनादो महौजाः सर्वेषां च प्राणिनां प्राणभूतः ।
‘तत्त्वज्ञाने विष्णुभक्तौ धैर्ये स्थैर्ये पराक्रमे ।
भीमसेनसमो नास्ति सेनयोरुभयोरपि ।
तथा युधिष्ठिरेणापि भीमं प्रति समीरितम् ।
विराटपर्वगं चापि वचो दुर्योधनस्य हि ।
साम्प्रतं मानुषे लोके सदैत्यनरराक्षसे ।
भीमश्च बलभद्रश्च मद्रराजश्च वीर्यवान् ।
वचनं वासुदेवस्य तथोद्योगगतं परम् ।
यादृशे च कुले जातः सर्वराजाभिपूजिते ।
‘अस्मिन् युद्धे भीमसेन त्वयि भारः समाहितः ।
उक्तं पुराणे ब्रह्माण्डे ब्रह्मणा नारदाय च ।
या मारुताद् गर्भमधत्त पूर्वं शेषं सुपर्णं गिरीशं सुरेन्द्रम् ।
‘यस्याधिको बले नास्ति भीमसेनमृते(भीममेकमृते) क्वचित् ।
‘यस्य न प्रतियोद्धाऽस्ति भीमेमेकमृते क्वचित् ।
तथा युधिष्ठिरेणैव भीमाय समुदीरितम् ।
अन्वेष रौहिणेयं च त्वां च भीमापराजितम् ।
तथैव द्रौपदीवाक्यं वासुदेवं प्रतीरितम् ।
तथैवान्यत्र वचनं कृष्णद्वैपायनेरितम् ।
अक्षयाविषुधी दिव्ये ध्वजो वानरलक्षणः ।
इत्याद्यनन्तवाक्यानि सन्त्येवार्थे विवक्षिते ।
तस्मादुक्तक्रमेणैव पुरुषोत्तमता हरेः ।
पूर्णप्रज्ञकृतेयं सङ्क्षेपादुद्धृतिः सुवाक्यानाम् । श्रीमद्भारतगानां विष्णोः पूर्णत्वनिर्णयायैव ॥१७७॥
स प्रीयतां परतमः परमादनन्तः सन्तारकः सततसंसृतिदुस्तरार्णात् । यत्पादपद्ममकरन्दजुषो हि पार्थाः स्वाराज्यमापुरुभयत्र सदा विनोदात् ॥१७८॥
तृतीयोऽध्यायः
औं ॥ जयत्यजोऽखण्डगुणोरुमण्डलः सदोदितो ज्ञानमरीचिमाली ।
जयत्यजोऽक्षीणसुखात्मबिम्बः स्वैश्वर्यकान्तिप्रततः सदोदितः ।
जयत्यसङ्ख्योरुबलाम्बुपूरो गुणोच्चरत्नाकर आत्मवैभवः ।
‘नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
जयो नामेतिहासोऽयं कृष्णद्वैपायनेरितः ।
नारायणो व्यास इति वाच्यवक्तृस्वरूपकः ।
उपसाधको नरश्चोक्तो देवी भाग्यात्मिका नृणाम् ।
कृष्णौ सत्या भीमपार्थौ कृष्णेत्युक्ता हि भारते ॥ ८॥
सर्वस्य निर्णयसुवाक्यसमुद्धृती तु स्वाध्याययोर्हरिपदस्मरणेन कृत्वा ।
व्यूढश्चतुर्धा भगवान् स एको मायां श्रियं सृष्टिविधित्सयाऽऽर ।
सङ्कर्षणाच्चापि जयातनूजो बभूव साक्षाद्बलसंविदात्मा ।
सूत्रं स वायुः पुरुषो विरिञ्चः प्रद्युम्नतश्चाथ कृतौ स्त्रियौ द्वे ।
श्रद्धा द्वितीयाऽथ तयोश्च योगो बभूव पुंसैव च सूत्रनाम्ना ।
शेषस्तयोरेव हि जीवनामा कालात्मकः सोऽथ सुपर्ण आसीत् ।
काला जयाद्या अपि विष्णुपार्षदा यस्मादण्डात् परतः सम्प्रसूताः ।
व्यूहात्तृतीयात्पुनरेव विष्णोर्देवांश्चतुर्वर्णगतान् समस्तान् ।
ततो महत्तत्त्वतनुर्विरिञ्चः स्थूलात्मनैवाजनि वाक् च देवी ।
बुद्ध्यामुमायां स शिवस्त्रिरूपो मनश्च वैकारिकदेवसङ्घान् ।
पुंसः प्रकृत्यां च पुनर्विरिञ्चाच्छिवोऽथ तस्मादखिलाः सुरेशाः ।
पुनश्च माया त्रिविधा बभूव सत्त्वादिरूपैरथ वासुदेवात् ।
एते हि देवाः पुनरण्डसृष्टावशक्नुवन्तो हरिमेत्य तुष्टुवुः ।
इति स्तुतस्तैः पुरुषोत्तमोऽसौ स विष्णुनामा श्रियमाप सृष्टये ।
तस्मिन् प्रविष्टा हरिणैव सार्द्धं सर्वे सुरास्तस्य बभूव नाभेः ।
तस्मात् पुनः सर्वसुराः प्रसूतास्ते जायमाना अपि निर्णयाय ।
पपात वायोर्गमनाच्छरीरं तस्यैव चावेशत उत्थितं पुनः ।
हरेर्विरिञ्चस्य च मध्यसंस्थितेस्तदन्यदेवाधिपतिः स मारुतः ।
तस्माच्च देवा ऋषयः पुनश्च वैकारिकाद्याः सशिवा बभूवुः ॥ २७ ॥
अग्रे शिवोऽहं भव एव बुद्धेरुमा मनोजौ सह शक्रकामौ ।
चक्षुःश्रुतिभ्यां स्पर्शात्सहैव रविः शशी धर्म इमे प्रसूताः ।
ततोऽसुराद्या ऋषयो मनुष्या जगद्विचित्रं च विरिञ्चतोऽभूत् ॥ ३०॥
उक्तक्रमात् पूर्वभवस्तु यो यः श्रेष्ठः स स ह्यासुरकानृते च ।
लयो भवेद् व्युत्क्रमतो हि तेषां ततो हरिः प्रलये श्रीसहायः ।
अनन्तशीर्षास्यकरोरुपादः सोऽनन्तमूर्तिः स्वगुणाननन्तान् ।
एवं पुनः सृजते सर्वमेतदनाद्यनन्तो हि जगत्प्रवाहः ।
यथा समुद्रात् सरितः प्रजाताः पुनस्तमेव प्रविशन्ति शश्वत् ।
एवं विदुर्ये परमामनन्तामजस्य शक्तिं पुरुषोत्तमस्य ।
देवानिमान् मुक्तसमस्तदोषान् स्वसन्निधाने विनिवेश्य देवः ।
पुनश्च मारीचत एव देवाः जाता आदित्यामसुराश्च दित्याम् ।
ततः स मग्नामलयो लयोदधौ महीं विलोक्याशु हरिर्वराहः ।
अथाब्जनाभप्रतिहारपालौ शापात् त्रिशो भूमितले प्रजातौ ।
(हतो) ततो हिरण्याक्ष उदारविक्रमो दितेः सुतो योऽवरजः सुरार्थे ।
अथो विधातुर्मुखतो विनिःसृतान् वेदान् हयास्यो जगृहेऽसुरेन्द्रः ।
मन्वन्तरप्रलये मत्स्यरूपो विद्यामदान्मनवे देवदेवः ।
अथो दितेर्ज्येष्ठसुतेन शश्वत् प्रपीडिता ब्रह्मवरात् सुरेशाः ।
अभिष्टुतस्तैर्हरिरुग्रवीर्यो नृसिंहरूपेण स आविरासीत् ।
सुरासुराणामुदधिं विमथ्नतां दधार पृष्ठेन गिरिं स मन्दरम् ।
वरादजेयत्वमवाप दैत्यराट् चतुर्मुखस्यैव बलिर्यदा तदा ।
‘स वामनात्माऽसुरभूभृतोऽध्वरं जगाम गां सन्नमयन् पदे पदे ।
पितामहेनास्य पुरा हि (भि) याचितो बलेः कृते केशव आह यद्वचः ।
बभूविरे चन्द्रललामतो वरात् पुरा ह्यजेया असुरा धरातले ।
विरिञ्चसृष्टैर्नितरामवध्यौ वराद् विधातुर्दितिजौ हिरण्यकौ ।
स चासुरान् रुद्रवरादवध्यानिमान् समस्तैरपि देवदेव ।
इत्यादरोक्तस्त्रिदशैरजेयः स शार्ङ्गधन्वाऽथ भृगूद्वहोऽभूत् ।
ततः पुलस्त्यस्य कुले प्रसूतौ तावादिदैत्यौ जगदेकशत्रू ।
सर्वैरजेयः स च कुम्भकर्णः पुरातने जन्मनि धातुरेव ।
तदाऽब्जजं शूलिनमेव चाग्रतो निधाय देवाः पुरुहूतपूर्वकाः ।
त्वमेक ईशः परमः स्वतन्त्रस्त्वमादिरन्तो जगतो नियोक्ता ।
मनुष्यमानात् त्रिशतं सषष्टिकं दिवौकसामेकमुशन्ति वत्सरम् ।
सहस्त्रवृत्तं तदहः स्वयम्भुवो निशा च तन्मानमितं शरच्छतम् ।
त्वया पुरा कर्णपुटाद्विनिर्मितौ महासुरौ तौ मधुकैटभाख्यौ ।
त्वदाज्ञया ब्रह्मवरादवध्यौ चिक्रीडिषासम्भवया (मुखोद्गतान्) मुखोद्गतौ ।
आहृत्य वेदानखिलान् प्रदाय स्वयम्भुवे तौ च जघन्थ दस्यू ।
एवं सुराणां च निसर्गजं बलं तथाऽसुराणां वरदानसम्भवम् ।
इमौ च रक्षोऽधिपती विरोद्धतौ जहि स्ववीर्येण नृषु प्रभूतः ।
स कश्यपस्यादितिगर्भजन्मनो विवस्वतस्तन्तुभवस्य भूभृतः ।
तदाज्ञया देवगणा बभूविरे पुरैव पश्चादपि तस्य भूम्नः ।
स देवतानां प्रथमो गुणाधिको बभूव नाम्ना हनुमान् प्रभञ्जनः ।
सुग्रीव आसीत् परमेष्ठितेजसा युतो रविः स्वात्मत एव जाम्बवान् ।
य एव सूर्यात् पुनरेव संज्ञया नाम्ना यमो दक्षिणदिक्प आसीत् ।
ब्रह्मोद्भवः सोम उतास्य सूनोरत्रेरभूत् सोऽङ्गद एव जातः ।
बृहस्पतिर्ब्रह्मसुतोऽपि पूर्वं सहैव शच्या मनसोऽभिजातः ।
स एव शच्या सह वानरोऽभूत् स्वयम्भुवो देवगुरुर्बृहस्पतिः ।
ब्रह्मोद्भवौ तौ पुनरेव सूर्याद् बभूवतुस्तत्र कनीयसस्तु ।
नीलोऽग्निरासीत् कमलोद्भवोत्थः कामः पुनः श्रीरमणाद् रमायाम् ।
पूर्वं हरेश्चक्रमभूद्धि दुर्गा तमःस्थिता श्रीरिति यां वदन्ति ।
गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा शार्ङ्गं च विद्येति रमैव खड्गः ।
एवं स्थितेष्वेव पुरातनेषु वराद् रथाङ्गत्वमवाप कामः ।
तावेव जातौ भरतश्च नाम्ना शत्रुघ्न इत्येष च रामतोऽनु ।
कौसल्यकापुत्र उरुक्रमोऽसावेकस्तथैको भरतस्य मातुः ।
सङ्कर्षणाद्यैस्त्रिभिरेव रूपैराविष्ट आसीत् त्रिषु तेषु विष्णुः ।
येऽन्ये च भूपाः कृतवीर्यजाद्याः बलाधिकाः सन्ति सहस्रशोऽपि ।
स्वयं रमा सीरत एव जाता सीतेति रामार्थमनूपमा या ।
इत्यादिकल्पोत्थित एष सर्गो मया समस्तागमनिर्णयात्मकः ।
पाश्चात्त्यकल्पेष्वपि सर्गभेदाः श्रुतौ पुराणेष्वपि चान्यथोक्ताः ।
चतुर्थोऽध्यायः
औं ॥ अथाभ्यवर्धंश्चतुराः कुमारा नृपस्य गेहे पुरुषोत्तमाद्याः ।
निरीक्ष्य नित्यं चतुरः कुमारान् पिता मुदं सन्ततमाप चोच्चम् ।
तन्मातरः पौरजना अमात्या अन्तःपुरा वैषयिकाश्च सर्वे ।
ततः सुवंशे शशिनः प्रसूतो गाधीति शक्रस्तनुजोऽस्य चाऽसीत् ।
तेनार्थितो यज्ञरिरक्षयैव कृच्छ्रेण पित्राऽस्य भयाद्विसृष्टः ।
अनुग्रहार्थं स ऋषेरवाप सलक्ष्मणोऽस्त्रं मुनितो हि केवलम् ।
अथो जघानाऽऽशु शरेण ताटकां वराद् विधातुस्तदनन्यवध्याम् ।
शरेण मारीचमथार्णवेऽक्षिपद् वचो विरिञ्चस्य तु मानयानः ।
तदा विदेहेन सुतास्वयंवरो विघोषितो दिक्षु विदिक्षु सर्वशः ।
अथो अहल्यां पतिनाऽभिशप्तां प्रधर्षणादिन्द्रकृताच्छिलीकृताम् ।
बलं स्वभक्तेरधिकं प्रकाशयन्ननुग्रहं च त्रिदशेष्वतुल्यम् ।
श्यामावदाते जगदेकसारे स्वनन्तचन्द्राधिककान्तिकान्ते ।
पपुर्नितान्तं सरसाक्षिभृङ्गैर्वराननाब्जं पुरुषोत्तमस्य ।
तथा विदेहः प्रतिलभ्य रामं सहस्रनेत्रावरजं गविष्ठम् ।
मेने च जामातरमात्मकन्यागुणोचितं रूपनवावतारम् ।
स आह चैनं परमं वचस्ते करोमि नात्रास्ति विचारणा मे ।
तपो मया चीर्णमुमापतेः पुरा वरायुधावाप्तिधृतेन चेतसा ।
न देवदैत्योरगदेवगायका अलं धनुश्चालयितुं सवासवाः ।
अधार्यमेतद्धनुराप्य शङ्करादहं नृणां वीर्यपरीक्षणे धृतः ।
इतीरितां मे गिरमभ्यवेत्य दितेः सुता दानवयक्षराक्षसाः ।
संस्विन्नगात्राः परिवृत्तनेत्राः दशाननाद्याः पतिता विमूर्छिताः ।
पुरा हि मेऽदात् प्रभुरब्जजो वरं प्रसादितो मे तपसा कथञ्चन ।
ततस्तु ते नष्टमदा इतो गताः समस्तशो ह्यस्तन एव पार्थिवाः ।
तथेति चोक्ते मुनिना स किङ्करैरनन्तभोगोपममाश्वथाऽनयत् ।
विकृष्यमाणं तदनन्तराधसा परेण निःसीमबलेन लीलया ।
स मध्यतस्तत् प्रविभज्य लीलया यथेक्षुदण्डं शतमन्युकुञ्जरः ।
तमब्जनेत्रं पृथुतुङ्गवक्षसं श्यामावदातं चलकुण्डलोज्ज्वलम् ।
अथो कराभ्यां प्रतिगृह्य मालामम्लानपद्मां जलजायताक्षी ।
ततः प्रमोदो नितरां जनानां विदेहपुर्यामभवत् समन्तात् ।
लक्ष्म्या समेते प्रकटं रमेशे सम्प्रेषयामास तदाऽऽशु पित्रे ।
अथाऽत्मजाभ्यां सहितः सभार्यो ययौ गजस्यन्दनपत्तियुक्तया ।
स मैथिलेनातितरां समर्चितो विवाहयामास सुतं मुदम्भरः ।
तदा विमानावलिभिर्नभस्तलं दिदृक्षतां सङ्कुलमास नाकिनाम् ।
विजानमाना जगतां हि मातरं पुराऽर्थितुं नाऽययुरत्र देवताः ।
यथा पुरा सागरजास्वयंवरे सुमानसानामभवत्समागमः ।
प्रगृह्य पाणिं च नृपात्मजाया रराज राजीवसमाननेत्रः ।
स्वलङ्कृतास्तत्र विचेरुरङ्गना विदेहराजस्य च या हि योषितः ।
प्रियाणि वस्त्राणि रथान् सकुञ्जरान् परार्द्ध्यरत्नान्यखिलस्य चेशितुः ।
महोत्सवं तं त्वनुभूय देवता नराश्च सर्वे प्रययुर्यथाऽऽगतम् ।
तदन्तरे सोऽथ ददर्श भार्गवं सहस्रलक्षामितभानुदीधितिम् ।
अजानतां राघवमादिपूरुषं समागतं ज्ञापयितुं निदर्शनैः ।
न मे सुतं हन्तुमिहार्हसि प्रभो वयोगतस्येत्युदितः स भार्गवः ।
स इत्थमुक्त्वा नृपतिं रघूत्तमं भृगूत्तमः प्राह निजां तनुं हरिः ।
शृणुष्व राम त्वमिहोदितं मया धनुर्द्वयं पूर्वमभून्महाद्भुतम् ।
तदा तु लोकस्य निदर्शनार्थिभिः समर्थितौ तौ हरिशङ्करौ सुरैः ।
ततो हि युद्धाय रमेशशङ्करौ व्यवस्थितौ तौ धनुषी प्रगृह्य ।
शशाक नैवाथ यदाऽभिवीक्षितुं प्रस्पन्दितुं वा कुत एव योद्धुम् ।
यदीरणेनैव विनैष शङ्करः शशाक न प्रश्वसितुं च केवलम् ।
ततः प्रणम्याऽऽशु जनार्दनं हरः प्रसन्नदृष्ट्या हरिणाऽभिवीक्षितः ।
धनुर्यदन्यद्धरिहस्तयोग्यं तत्कार्मुकात् कोटिगुणं पुनश्च ।
यदीदमागृह्य विकर्षसि त्वं तदा हरिर्नात्र विचार्यमस्ति ।
प्रगृह्य तच्चापवरं स राघवश्चकार सज्यं निमिषेण लीलया ।
प्रदर्शिते विष्णुबले समस्ततो हराच्च निःसङ्ख्यतया महाधिके ।
अलं बलं ते जगतोऽखिलाद्वरं परोऽसि नारायण एव नान्यथा ।
पुरोऽतुलो नाम महासुरोऽभवद् वरात् स तु ब्रह्मण आप लोकताम् ।
अतो वधार्थं जगदन्तकस्य सर्वाजितोऽहं जितवद् व्यवस्थितः ।
पुरा वरोऽनेन शिवोपलम्भितो मुमुक्षया विष्णुतनुप्रवेशनम् ।
इतीव रामाय स राघवः शरं विकर्षमाणो विनिहत्य चासुरम् ।
निरन्तरानन्तविबोधसारः स जानमानोऽखिलमादिपूरुषः ।
स चेष्टितं चैव निजाश्रयस्य जनस्य सत्तत्त्वविबोधकारणम् ।
ततः स कारुण्यनिधिर्निजे जने नितान्तमैक्यं स्वगतं प्रकाशयन् ।
समेत्य चैक्यं जगतोऽभिपश्यतः प्रणुद्य शङ्कामखिलां जनस्य ।
ततो नृपोऽत्यर्थमुदाऽभिपूरितः सुतैः समस्तैः स्वपुरीमवाप ह ।
यथा पुरा श्रीरमणः श्रिया तया रतो नितान्तं हि पयोब्धिमध्ये ।
इमानि कर्माणि रघूत्तमस्य हरेर्विचित्राण्यपि नाद्भुतानि ।
पञ्चमोऽध्यायः
औं ॥ इत्थं विश्वेश्वरेऽस्मिन्नखिलजगदवस्थाप्य सीतासहाये भूमिष्ठे सर्वलोकास्तुतुषुरनुदिनं वृद्धभक्त्यानितान्तम् ।
पूर्वं क्षीराब्धिजाता कथमपि तपसैवाप्सरस्त्वं प्रयाता तां नेतुं तत्तमोऽन्धं कमलजनिरुवाचाऽऽशु रामाभिषेकम् ।
तद्वाक्यात् कैकयी सा पतिगवरबलादाजहारैव राज्यं रामस्तद्गौरवेण त्रिदशमुनिकृतेऽरण्यमेवाऽविवेश ।
वृक्षान् पक्षीभकीटान् पितरमथ सखीन् मातृपूर्वान् विसृज्य प्रोत्थां गङ्गांस्वपादाद्धर इव गुहेनार्चितः सोऽथ तीर्त्वा ।
एतस्मिन्नेव काले दशरथनृपतिः स्वर्गतोऽभूद्वियोगाद् रामस्यैवाथ पुत्रौ विधिसुतसहितैर्मन्त्रिभिः केकयेभ्यः ।
धिक्कुर्वन्तौ नितान्तं सकलदुरितगां मन्थरां कैकयीं च प्राप्तौ रामस्य पादौ मुनिगणसहितौ तत्र चोवाच नत्वा ।
इत्युक्तः कर्तुमीशः सकलसुरगणाप्यायनं रामदेवः सत्यां कर्तुं च वाणीमवददतितरां नेति सद्भक्तिनम्रम् ।
श्रुत्वैतद्रामवाक्यं हुतभुजि पतने स प्रतिज्ञां च कृत्वा रामोक्तस्यान्यथात्वे न तु परमभिवेक्ष्येऽहमित्येव तावत् ।
समस्तपौरानुगतेऽनुजे गते स चित्रकूटे भगवानुवास ह ।
स चासुरावेशवशाद्रमास्तने यदा व्यधात्तुण्डमथाभिवीक्षितः ।
स्वयम्भुशर्वेन्द्रमुखान्सुरेश्वरान् जिजीविषुस्ताञ्छरणं गतोऽपि ।
पुनः प्रयातः शरणं रघूत्तमं विसर्जितस्तेन निहत्य चासुरम् ।
स वायसानामसुरोऽखिलानां वरादुमेशस्य बभूव चाक्षिगः ।
ददुर्हि तस्मै विवरं बलार्थिनो यद्वायसास्तेन तदक्षिपातनम् ।
भविष्यतामप्यथ यावदेव द्विनेत्रता काककुलोद्भवानाम् ।
अतः पुनर्भावममुष्य हिन्वन् भविष्यतश्चैकदृशश्चकार ।
रामोऽथ दण्डकवनं मुनिवर्यनीतो लोकाननेकश उदारबलैर्निरस्तान् ।
आसीच्च तत्र शरभङ्ग इति स्म जीर्णो लोकं हरेर्जिगमिषुर्मुनिरुग्रतेजाः ।
धर्मो यतोऽस्य वनगस्य नितान्तशक्तिह्रासे स्वधर्मकरणस्य हुताशनादौ ।
रामोऽपि तत्र ददृशे धनदस्य शापाद् गन्धर्वमुर्वशिरतेरथ यातुधानीम् ।
भङ्क्त्वाऽस्य बाहुयुगलं बिलगं चकार सम्मानयन् वचनमम्बुजजन्मनोऽसौ ।
प्रीतिं विधित्सुरगमद्भवनं निजस्य कुम्भोद्भवस्य परमादरतोऽमुना च ।
आत्मार्थमेव हि पुरा हरिणा प्रदत्तमिन्द्रे तदिन्द्र उत रामकरार्थमेव ।
काले तदैव खरदूषणयोर्बलेन रक्षःस्वसा पतिनिमार्गणतत्पराऽऽसीत् ।
साऽनुज्ञयैव रजनीचरभर्तुरुग्रा भ्रातृद्वयेन सहिता वनमावसन्ती ।
तां तत्र हास्यकथया जनकासुताग्रे गच्छानुजं म इह मेति वचः स उक्त्वा ।
तत्प्रेरितान् सपदि भीमबलान् प्रयातांस्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् ।
दत्तेऽभये रघुवरेण महामुनीनां दत्ते भये च रजनीचरमण्डलस्य ।
श्रुत्वाऽऽशु कार्यमवमृश्य जगाम तीरे क्षेत्रं नदीनदपतेः श्रवणं धरित्र्याः ।
तेनार्थितः सपदि राघववञ्चनार्थे मारीच आह शरवेगममुष्य जानन् ।
इत्युक्तवन्तमथ रावण आह खड्गं निष्कृष्य हन्मि यदि मे न करोषि वाक्यम् ।
सम्प्राप्य हैममृगतां बहुरत्नचित्रः सीतासमीप उरुधा विचचार शीघ्रम् ।
देवेममाशु परिगृह्य च देहि मे त्वं क्रीडामृगं त्विति तयोदित एव रामः ।
तेनाऽहतः शरवरेण भृशं ममार विक्रुश्य लक्ष्मणमुरुव्यथया स पापः ।
यां यां परेश उरुधैव करोति लीलां तां तां करोत्यनु तथैव रमापि देवी ।
क्वाज्ञानमापदपि मन्दकटाक्षमात्रात् सर्गस्थितिप्रलयसंसृतिमोक्षहेतोः ।
देव्याः समीपमथ रावण आससाद साऽदृश्यतामगमदप्यविषह्यशक्तिः ।
तस्यास्तु तां प्रतिकृतिं प्रविवेश शक्रो देव्याश्च सन्निधियुतां व्यवहारसिद्ध्यै ।
मार्गे व्रजन्तमभियाय ततो हनूमान् संवारितो रविसुतेन च जानमानः ।
प्राप्यैव राक्षस उताऽऽत्मपुरीं स तत्र सीताकृतिं प्रतिनिधाय ररक्ष चाथ ।
अन्वेषमाण इव तं च ददर्श गृध्रं सीतां रिरक्षिषुमथो रिपुणा विशस्तम् ।
अन्यत्र चैव विचरन् सहितोऽनुजेन प्राप्तः करौ स सहसाऽथ कबन्धनाम्नः ।
छित्वाऽस्य बाहुयुगलं सहितोऽनुजेन तं पूर्ववत् प्रतिविधाय सुरेन्द्रभृत्यम् ।
दृष्ट्वा तमेव शबरी परमं हरिं च ज्ञात्वा विवेश दहनं पुरतोऽस्य तस्यै ।
शापाद् वराप्सरसमेव हि तां विमुच्य शच्या कृतात् पतिपुरस्त्वतिदर्पहेतोः ।
देहेऽपि यत्र पवनोऽत्र हरिर्यतोऽसौ तत्रैव वायुरिति वेदवचः प्रसिद्धम् ।
एवं स कृष्णतनुरर्जुनमप्यरक्षद् भीमार्थमेव तदरिं रविजं निहत्य ।
एवं सुराश्च पवनस्य वशे यतोऽतः सुग्रीवमत्र तु परत्र च शक्रसूनुम् ।
‘यत्पादपङ्कजरजः शिरसा विभर्ति श्रीरब्जजश्च गिरिशः सह लोकपालैः’ ।
समागते तु राघवे प्लवङ्गमाः ससूर्यजाः ।
संस्थाप्याऽशु हरीन्द्रान् जानन् विष्णोर्गुणाननन्तान् सः ।
षष्ठोऽध्यायः
औं ॥ उत्थाप्य चैनमरविन्ददलायताक्षश्चक्राङ्कितेन वरदेन कराम्बुजेन ।
आरोप्य चांसयुगळं भगवन्तमेनं तस्यानुजं च हनुमान् प्रययौ कपीन्द्रम् ।
श्रुत्वाऽस्य दुःखमथ देववरः प्रतिज्ञां चक्रे स वालिनिधनाय हरीश्वरोऽपि ।
वीक्ष्यैव तां निपतितामथ रामदेवः सोऽङ्गुष्ठमात्रचलनादतिलीलयैव ।
शर्वप्रसादजबलाद्दितिजानवध्यान् सर्वान् निहत्य कुणपेन पुनश्च सख्या ।
एकैकमेषु स विकम्पयितुं समर्थः पत्राणि लोप्तुमपि तूत्सहते न शक्तः ।
जेतुं चतुर्गुणबलो हि पुमान् प्रभुः स्याद्धन्तुं शताधिकबलोऽतिबलं सुशक्तः ।
श्रुत्वाऽस्य वाक्यमवमृश्य दितेः सुतांस्तान् धातुर्वरादखिलपुम्भिरभेद्यरूपान् ।
सन्धाय कार्मुकवरे निशिते तु बाणेऽथाऽकृष्य दक्षिणभुजेन तदा प्रमुक्ते ।
भित्त्वा च तान् सगिरिकुं भगवत्प्रमुक्तः पातालसप्तकमथात्र च ये त्ववध्याः ।
नैतद्विचित्रममितोरुबलस्य विष्णोर्यत्प्रेरणात् सपवनस्य भवेत् प्रवृत्तिः ।
दृष्ट्वा बलं भगवतोऽथ हरीश्वरोऽसावग्रे निधाय तमयात् पुरमग्रजस्य ।
तन्मुष्टिभिः प्रतिहतः प्रययावशक्तः सुग्रीव आशु रघुपोऽपि हि धर्ममीक्षन् ।
सौभ्रात्रमेष यदि वाञ्छति वालिनैव नाहं निरागसमथाग्रजनिं हनिष्ये ।
कोपः सहोदरजने पुनरन्तकाले प्रायो निवृत्तिमुपगच्छति तापकश्च ।
तस्मान्न बन्धुजनगे जनिते विरोधे कार्यो वधस्तदनुबन्धिभिराश्वितीह ।
यः प्रेरकः सकलशेमुषिसन्ततेश्च तस्याज्ञता कुत इहेशवरस्य विष्णोः ।
रामाज्ञयैव लतया रविजे विभक्ते वायोः सुतेन रघुपेण शरे च मुक्ते ।
भक्तो ममैष यदि मामभिपश्यतीह पादौ ध्रुवं मम समेष्यति निर्विचारः ।
कार्यं ह्यभीष्टमपि तत् प्रणतस्य पूर्वं शस्तो वधो न पदयोः प्रणतस्य चैव ।
यः प्रेरकः सकललोकबलस्य नित्यं पूर्णाव्ययोच्चबलवीर्यतनुः स्वतन्त्रः ।
सन्नेऽथ वालिनि जगाम च तस्य पार्श्वं प्राहैनमार्द्रवचसा यदि वाञ्छसि त्वम् ।
कार्याणि तस्य चरमाणि विधाय पुत्रं त्वग्रे निधाय रविजः कपिराज्य आसीत् ।
अथातिसक्ते क्षितिपे कपीनां प्रविस्मृते रामकृतोपकारे ।
न विस्मृतिस्ते रघुवर्यकार्ये कार्या कथञ्चित् स हि नोऽभिपूज्यः ।
स एवमुक्त्वा हरिराजसन्निधौ द्वीपेषु सप्तस्वपि वानरान् प्रति ।
हरीश्वराज्ञाप्रणिधानपूर्वकं हनूमता ते प्रहिता हि वानराः ।
तदैव रामोऽपि हि भोगसक्तं प्रमत्तमालक्ष्य कपीश्वरं प्रभुः ।
यदि प्रमत्तोऽसि मदीयकार्ये नयाम्यहं त्वेन्द्रसुतस्य मार्गम् ।
इतीड्यरामेण समीरिते तदा ययौ सबाणः सधनुः स लक्ष्मणः ।
हनूमतः साधुवचोभिराशु प्रसन्नचेतस्यधिपे कपीनाम् ।
ससम्भ्रमं तं पतितं पदाब्जयोस्त्वरन् समुत्थाप्य समाश्लिषत् प्रभुः ।
समस्तदिक्षु प्रहितेषु तेन प्रभुर्हनूमन्तमिदं बभाषे ।
अतस्त्वमेव प्रतियाहि दक्षिणां दिशं समादाय मदङ्गुलीयकम् ।
समस्तदिक्षु प्रतियापिता हि ते हरीश्वराज्ञामुपधार्य मासतः ।
समस्तदुर्गप्रवरं दुरासदं विमार्गतां विन्ध्यगिरिं महात्मनाम् ।
कृतं मयेनातिविचित्रमुत्तमं समीक्ष्य तत्तार उवाच चाङ्गदम् ।
दुरासदोऽसावतिचण्डशासनो हनिष्यति त्वामपि किं मदादिकान् ।
न चैव रामेण सलक्ष्मणेन प्रयोजनं नो वनचारिणां सदा ।
इतीरितं मातुलवाक्यमाशु स आददे वालिसुतोऽपि सादरम् ।
राज्यार्थिना येन हि घातितोऽग्रजो हृताश्च दाराः सुनृशंसकेन ।
इतीरिते शक्रसुतात्मजेन तथेति होचुः सह जाम्बवन्मुखाः ।
विज्ञातमेतद्धि मयाऽङ्गदस्य राज्याय ताराभिहितं हि वाक्यम् ।
न चाहमाक्रष्टुमुपायतोऽपि शक्यः कथञ्चित् सकलैः समेतैः ।
वचो ममैतद्यदि चाऽऽदरेण ग्राह्यं भवेद्वस्तदतिप्रियं मे ।
इतीरितं तत् पवनात्मजस्य श्रुत्वाऽतिभीता धृतमूकभावाः ।
निरीक्ष्य ते सागरमप्रधृष्यमपारमेयं सहसा विषण्णाः ।
प्रायोपविष्टाश्च कथा वदन्तो रामस्य संसारविमुक्तिदातुः ।
तस्याग्रजोऽसावरुणस्य सूनुः सूर्यस्य बिम्बं सह तेन यातः ।
स दग्धपक्षः सवितृप्रतापाच्छ्रुत्वैव रामस्य कथां सपक्षः ।
स रावणस्याथ गतिं सुतोक्तां निवेद्य दृष्ट्वा जनकात्मजाकृतिम् ।
ततस्तु ते ब्रह्मसुतेन पृष्टा न्यवेदयन्नात्मबलं पृथक् पृथक् ।
सनीलमैन्दद्विविदाः सताराः सर्वेऽप्यशीत्याः परतो न शक्ताः ।
बलेर्यदा विष्णुरवाप लोकांस्त्रिभिः क्रमैर्नन्दिरवं प्रकुर्वता ।
अतो जवो मे न हि पूर्वसम्मितः पुरा त्वहं षण्णवतिप्लवोऽस्मि ।
अपूरिते तैः सकलैः शतस्य गमागमे शत्रुबलं च वीक्ष्य ।
अयं हि गृध्रः शतयोजनं गिरिं त्रिकूटमाहेत उतात्र विघ्नाः ।
उक्त्वा स इत्थं पुनराह सूनुं प्राणस्य निःसीमबलं प्रशंसयन् ।
इतीरितोऽसौ हनुमान् निजेप्सितं तेषामशक्तिं प्रकटां विधाय ।
सप्तमोऽध्यायः
औं ॥ रामाय शाश्वतसुविस्तृतषड्गुणाय सर्वेश्वराय सुखसारमहार्णवाय।
चुक्षोभ वारिधिरनुप्रययौ च शीघ्रं यादोगणैः सह तदीयबलाभिकृष्टः ।
श्यालो हरस्य गिरिपक्षविनाशकाले क्षिप्तोऽर्णवे स मरुतोर्वरितात्मपक्षः ।
नैवात्र विश्रमणमैच्छत निःश्रमोऽसौ निःसीमपौरुषगुणस्य कुतः श्रमोऽस्य ।
जिज्ञासुभिर्निजबलं तव भक्षमेतु यद्यत् त्वमिच्छसि तदित्यमरोदितायाः ।
दृष्ट्वा सुरप्रणयितां बलमस्य चोग्रं देवाः प्रतुष्टुवुरमुं सुमनोभिवृष्ट्या ।
लङ्कावनाय सकलस्य च निग्रहेऽस्याः सामर्थ्यमप्रतिहतं प्रददौ विधाता ।
निस्सीममात्मबलमित्यनुदर्शयानो हत्वैव तामपि विधातृवराभिगुप्ताम् ।
भूत्वा बिडालसमितो निशि तां पुरीं च प्राप्स्यन् ददर्श निजरूपवतीं स लङ्काम् ।
मार्गमाणो बहिश्चान्तः सोऽशोकवनिकातले ।
नरलोकविडम्बस्य जानन् रामस्य हृद्गतम् ।
तादृक्चेष्टासमेताया अङ्गुलीयमदात् ततः ।
भूषणानि द्विधा भूत्वा तान्येवाऽसन् तथैव च ।
यद्यप्येतन्न पश्यन्ति निशाचरगणास्तु ते ।
तेषां विडम्बनायैव दैत्यानां वञ्चनाय च ।
कृत्वा कार्यमिदं सर्वं विशङ्कः पवनात्मजः ।
अथ वनमखिलं तद् रावणस्यावलुम्प्य क्षितिरुहमिममेकं वर्जयित्वाऽऽशु वीरः ।
अथाशृणोद्दशाननः कपीन्द्रचेष्टितं परम् ।
समस्तशो विमृत्यवो वराद्धरस्य किङ्कराः ।
अशीतिकोटियूथपं पुरस्सराष्टकायुतम् ।
समावृतस्तथाऽऽयुधैः स ताडितश्च तैर्भृशम् ।
पुनश्च मन्त्रिपुत्रकान् स रावणप्रचोदितान् ।
बलाग्रगामिनस्तथा स शर्ववाक्सुगर्वितान् ।
अनौपमं हरेर्बलं निशम्य राक्षसाधिपः ।
स सर्वलोकसाक्षिणः सुतं शरैर्ववर्ष ह ।
स मण्डमध्यकासुतं समीक्ष्य रावणोपमम् ।
निधार्य एव रावणः स राघवस्य नान्यथा ।
अतस्तयोः समो मया तृतीय एष हन्यते ।
स चक्रवद् भ्रमातुरं विधाय रावणात्मजम् ।
विचूर्णिते धरातले निजे सुते स रावणः ।
अथेन्द्रजिन्महाशरैर्वरास्त्रसम्प्रयोजितैः ।
अथास्त्रमुत्तमं विधेर्युयोज सर्वदुस्सहम् ।
मया वरा विलङ्घिता ह्यनेकशः स्वयम्भुवः ।
इमे च कुर्युरत्र किं प्रहृष्टरक्षसां गणाः ।
इदं समीक्ष्य बद्धवत् स्थितं कपीन्द्रमाशु ते ।
अथ प्रगृह्य तं कपिं समीपमानयंश्च ते ।
कपे कुतोऽसि कस्य वा किमर्थमीदृशं कृतम् ।
अवैहि दूतमागतं दुरन्तविक्रमस्य माम् ।
न चेत् प्रदास्यसि त्वरन् रघूत्तमप्रियां तदा ।
न रामबाणधारणे क्षमाः सुरेश्वरा अपि ।
प्रकोपितस्य तस्य कः पुरस्थितौ क्षमो भवेत् ।
इतीरिते वधोद्यतं न्यवारयद् विभीषणः ।
अथास्य वस्त्रसञ्चयैः पिधाय पुच्छमग्नये ।
ममर्ष सर्वचेष्टितं स रक्षसां निरामयः ।
ददाह चाखिलं पुरं स्वपुच्छगेन वह्निना ।
सुवर्णरत्नकारितां स राक्षसोत्तमैः सह ।
स रावणं सपुत्रकं तृणोपमं विधाय च ।
विलङ्घ्य चार्णवं पुनः स्वजातिभिः प्रपूजितः ।
रामं सुरेश्वरमगण्यगुणाभिरामं सम्प्राप्य सर्वकपिवीरवरैः समेतः ।
रामोऽपि नान्यदनुदातुममुष्य योग्यमत्यन्तभक्तिभरितस्य विलक्ष्य किञ्चित् ।
अष्टमोऽध्यायः
औं ॥ श्रुत्वा हनूमदुदितं कृतमस्य सर्वं प्रीतः प्रयाणमभिरोचयते स रामः ।
सम्प्राप्य दक्षिणमपान्निधिमत्र देवः शिश्ये जगद्गुरुतमोऽप्यविषह्यशक्तिः (विचिन्त्यशक्तिः) ।
तत्राऽऽजगाम स विभीषणनामधेयो रक्षःपतेरवरजोऽप्यथ रावणेन ।
ब्रह्मात्मजेन रविजेन बलप्रणेत्रा नीलेन मैन्दविविदाङ्गदतारपूर्वैः ।
अत्राऽह रूपमपरं बलदेवताया ग्राह्यः स एष नितरां शरणं प्रपन्नः ।
इत्युक्तवत्यथ हनूमति देवदेवः सङ्गृह्य तद्वचनमाह यथैव पूर्वम् ।
सब्रह्मकाः सुरगणाः सहदैत्यमर्त्याः सर्वे समेत्य च मदङ्गुलिचालनेऽपि ।
इत्युक्तवाक्य उत तं स्वजनं विधाय राज्येऽभ्यषेचयदपारसुसत्त्वराशिः ।
‘कल्पान्तमस्य निशिचारिपतित्वपूर्वमायुः प्रदाय निजलोकगतिं तदन्ते ।
स क्रोधदीप्तनयनान्तहतः परस्य शोषं क्षणादुपगतो दनुजादिसत्त्वैः ।
तं त्वा वयं जडधियो न विदाम भूमन् कूटस्थमादिपुरुषं जगतामधीशम् ।
‘कामं प्रयाहि जहि विश्रवसोऽवमेहं त्रैलोक्यरावणमवाप्नुहि वीर पत्नीम् ।
इत्युक्तवन्तममुमाश्वनुगृह्य बाणं तस्मै धृतं दितिसुतात्मसु चान्त्यजेषु ।(भा\.पु\. ९\.१०\.१३\-१५)
कृत्वेरिणं तदथ मूलफलानि चात्र सम्यग्विधाय भवशत्रुरमोघचेष्टः ।
बध्वोदधौ रघुपतिर्विविधाद्रिकूटैः सेतुं कपीन्द्रकरकम्पितभूरुहाङ्गैः ।
प्राप्तं निशम्य परमं भुवनैकसारं निःसीमपौरुषमनन्तमसौ दशास्यः ।
प्रस्थाप्य वालिसुतमेव च राजनीत्यै रामस्तदुक्तवचनेऽप्यमुनाऽगृहीते ।
द्वारां निरोधसमये स दिदेश पुत्रं वाराम्पतेर्दिशि सुरेश्वरशत्रुमुग्रम् ।
विज्ञाय तत् स भगवान् हनुमन्तमेव देवेन्द्रशत्रुविजयाय दिदेश चाऽऽशु ।
मध्ये हरीश्वरमधिज्य धनुर्नियुज्य यस्यां स राक्षसपतिस्स्वयमेव तां हि ।
विद्रावितो हनुमतेन्द्रजिदाशु हस्तं तस्य प्रपन्न इव वीर्यममुष्य जानन् ।
नीलस्य नैव वशमेति स इत्यमोघशक्त्या विभीषण इमं प्रजहार साकम् ।
सर्वेषु तेषु निहतेषु दिदेश धूम्रनेत्रं स राक्षसपतिः स च पश्चिमेन ।
अकम्पनोऽपि राक्षसो निशाचरेशचोदितः ।
अथास्त्रसम्प्रदीपितैः समस्तशो महोल्मुकैः ।
ततस्तौ निकुम्भोऽथ कुम्भश्च कोपात् प्रदिष्टौ दशास्येन कुम्भश्रुतेर्हि ।
स कुम्भो विधातुः सुतं तारनीलौ नलं चाश्विपुत्रौ जिगायाङ्गदं च ।
ततो निकुम्भोऽद्रिवरप्रदारणं महान्तमुग्रं परिघं प्रगृह्य ।
तं भ्रामयत्याशु भुजेन वीरे भ्रान्ता दिशो द्यौश्च (सचन्द्रसूर्या) सचन्द्रसूर्याः ।
अनन्यसाध्यं तमथो निरीक्ष्य समुत्पपाताऽशु पुरोऽस्य मारुतिः ।
इतीरितस्तेन स राक्षसोत्तमो वरादमोघं प्रजहार वक्षसि ।
विचूर्णिते निजायुधे निकुम्भ एत्य मारुतिम् ।
प्रगृह्य कण्ठमस्य स प्रधानमारुतात्मजः ।
चकार तं रणात्मके मखे रमेशदैवते ।
सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च शकुनिर्देवतापनः ।
रावणप्रेरिताः सर्वान् मथ्नन्तः कपिकुञ्जरान् ।
युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च देवान्तकनरान्तकौ ।
नरान्तको रावणजो हयवर्योपरि स्थितः ।
तं दहन्तमनीकानि युवराजोऽङ्गदो बली ।
तस्योरसि प्रासवरं प्रजहार स राक्षसः ।
अथास्य हयमाश्वेव निजघान मुखे कपिः ।
स खड्गवरमादाय प्रससार रणे कपिम् ।
गन्धर्वकन्यकासूते निहते रावणात्मजे ।
तस्याऽपतत एवाऽशु शरवर्षप्रतापिताः ।
स शरं तरसाऽऽदाय रविपुत्रायुधोपमम् ।
अथ तिग्मांशुतनयः शैलं प्रचलपादपम् ।
तमापतन्तमालक्ष्य दूराच्छरविदारितम् ।
स तमाकर्णमाकृष्य यमदण्डोपमं शरम् ।
बलमप्रतिमं वीक्ष्य सुरशत्रोस्तु मारुतिः ।
तमापतन्तमालोक्य रथं सहयसारथिम् ।
अथ खड्गं समादाय पुर आपततो रिपोः ।
वरदानादवध्यं तं निहत्य पवनात्मजः ।
विद्राविताखिलकपिं वरात् त्रिशिरसं विभोः ।
युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च पार्वतीवरदर्पितौ ।
ततोऽतिकायोऽतिरथो रथेन स्वयम्भुदत्तेन हरीन् (प्रमृद्गन्) प्रमृत्नन्।
बृहत्तनुः कुम्भवदेव कर्णावस्येत्यतो नाम च कुम्भकर्णः ।
तमापतन्तं शरवर्षधारं महाघनाभं स्तनयित्नुघोषम् ।
ववर्षतुस्तावतिमात्रवीर्यौ शरान् सुरेशाशनितुल्यवेगान् ।
शरैः शरानस्य निवार्य वीरः सौमित्रिरस्त्राणि महास्त्रजालैः ।
छिन्नेषु तेषु द्विगुणास्यबाहुः पुनःपुनः सोऽथ बभूव वीरः ।
ब्रह्मास्त्रतोऽन्येन न वध्य एष वराद् विधातुः सुमुखेत्यदृश्यः ।
अथानुजो देवतमस्य सोऽस्त्रं ब्राह्मं तनूजे दशकन्धरस्य ।
हतेषु पुत्रेषु स राक्षसेशः स्वयं प्रयाणं समरार्थमैच्छत् ।
नियुङ्क्ष्व मां मे पितुरन्तकस्य वधाय राजन् सहलक्ष्मणं तम् ।
इतीरिते तेन नियोजितः स जगाम वीरो मकराक्षनामा ।
अचिन्तयन् लक्ष्मणबाणसङ्घानवज्ञया राममथाऽह्वयद् रणे ।
केनाप्युपायेन धनुर्धराणां वरः फलं तस्य ददामि तेऽद्य ।
प्रहस्य रामोऽस्य निवार्य चास्त्रैरस्त्राण्यमेयोऽशनिसन्निभेन ।
विदुद्रुवुस्तस्य तु येऽनुयायिनः कपिप्रवीरैर्निहतावशेषिताः ।
ततः स सज्जीकृतमात्तधन्वा रथं समास्थाय निशाचरेश्वरः ।
बलैस्तु तस्याथ बलं कपीनां नैकप्रकारायुधपूगभग्नम् ।
गजो गवाक्षो गवयो वृषश्च सगन्धमादा धनदेन जाताः ।
शरैस्तु तान् षड्भिरमोघवेगैर्निपातयामास दशाननो द्राक् ।
गिरीन् विदार्याऽशु शरैरथान्याञ्छरान् दशास्योऽमुचदाशु तेषु ।
शिलां समादाय तमापतन्तं विभेद रक्षो हृदये शरेण ।
तद्धस्तगं भूरुहमाशु बाणैर्दशाननः खण्डश एव कृत्वा ।
अथो हनूमानुरगेन्द्रभोगसमं स्वबाहुं भृशमुन्नमय्य ।
स लब्धसञ्ज्ञः प्रशशंस मारुतिं त्वया समो नास्ति पुमान् हि कश्चित् ।
अत्यल्पमेतद् यदुपात्तजीवितः पुनस्त्वमित्युक्त उवाच रावणः ।
किञ्चित् प्रहारेण तु विह्वलाङ्गवत् स्थिते हि तस्मिन्निदमन्तरं मम ।
तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य नीलो धनुर्ध्वजाग्राश्वरथेषु तस्य ।
स क्षिप्रमादाय हुताशनास्त्रं मुमोच नीले रजनीचरेशः ।
ततो ययौ राघवमेव रावणो निवारयामास तमाशु लक्ष्मणः ।
निवारितस्तेन स रावणो (दशाननो) भृशं रुषाऽन्वितो बाणममोघमुग्रम् ।
भृशाहतस्तेन मुमोह लक्ष्मणो रथादवप्लुत्य दशाननोऽपि ।
सम्प्राप्य सञ्ज्ञां स सुविह्वलोऽपि सस्मार रूपं निजमेव लक्ष्मणः ।
बलात् स्वदोर्भिः प्रतिगृह्य चाखिलैर्यदा स वीरं प्रचकर्ष रावणः ।
सहस्रमूर्ध्नोऽस्य बतैकमूर्ध्नि ससप्तपाता(ल)ळगिरीन्द्रसागरा ।
प्रकर्षति त्वेव निशाचरेश्वरे तथैव रामावरजं त्वरान्वितः ।
स मुष्टिमावृत्य (आवर्त्य) च वज्रकल्पं जघान तेनैव च रावणं रुषा ।
निपात्य रक्षोधिपतिं स मारुतिः प्रगृह्य सौमित्रिमुरङ्गशायिनः ।
स रामसंस्पर्शनिवारितक्लमः समुत्थितस्तेन समुद्धृते शरे ।
स शेषभोगाभमथो जनार्दनः प्रगृह्य चापं सशरं पुनश्च ।
रथं समारुह्य पुनः सकार्मुकः समार्गणो रावण आशु रामम् ।
रथस्थितेऽस्मिन् रजनीचरेशे न मे पतिर्भूमितळे(ले) स्थितः स्यात् ।
प्रहस्य रामोऽस्य हयान् निहत्य सूतं च कृत्वा तिलशो ध्वजं रथम् ।
कर्तव्यमूढं तमवेक्ष्य रामः पुनर्जगादाऽशु गृहं प्रयाहि ।
इतीरितोऽवाग्वदनो ययौ गृहं विचार्य कार्यं सह मन्त्रिभिः स्वकैः ।
सशैलशृङ्गासिपरश्वधायुधैर्निशाचराणामयुतैरनेकैः ।
शैलोपमानस्य च मांसराशीन् विधाय (भक्षान्) भक्ष्यानपि शोणितह्रदान् ।
उवाच चैनं रजनीचरेन्द्रः पराजितोऽस्म्यद्य हि जीवति त्वयि ।
इतीरितः कारणमप्यशेषं श्रुत्वा जगर्हाग्रजमेव वीरः ।
प्रशस्यते नो बलिभिर्विरोधः कथञ्चिदेषोऽतिबलो मतो मम ।
चरन्ति राजान उताक्रमं क्वचित् त्वयोपमान् बन्धुजनान् बलाधिकान् ।
प्राकारमुल्लङ्घ्य(मालङ्घ्य) स पञ्चयोजनं यदा ययौ शूलवरायुधो रणम् ।
शतवलिपनसाख्यौ तत्र वस्वंशभूतौ पवनगणवरांशौ श्वेतसम्पातिनौ च ।
रजनिचरवरोऽसौ कुम्भकर्णः प्रतापी कुमुदमपि जयन्तं पाणिना सम्पिपेष ।
अथाङ्गदश्च जाम्बवानिनात्मजश्च वानरैः ।
विचूर्णिताश्च पर्वतास्तनौ निशाचरस्य ते ।
अथापरं महाचलं प्रगृह्य भास्करात्मजः ।
तदा पपात सूर्यजस्तताड चाङ्गदं रुषा ।
अथ प्रगृह्य भास्करिं ययौ स राक्षसो बली ।
यदैनमेष बाधते तदा विमोचयाम्यहम् ।
इति व्रजत्यनु स्म तं मरुत्सुते निशाचरः ।
तुहिनसलिलमाल्यैः सर्वतोऽभिप्रवृष्टे रजनिचरवरेऽस्मिंस्तेन सिक्तः कपीशः ।
कराभ्यामस्य कर्णौ च नासिकां दशनैरपि ।
तळेन चैनं निजघान राक्षसः पिपेष भूमौ पतितं ततोऽपि ।
अमोघशूलं प्रपतन् (प्रपतत्)तमीक्ष्य(तदीक्ष्य) रवेः सुतस्योपरि मारुतात्मजः ।
अथैनमावृत्य जघान मुष्टिना स राक्षसो वायुसुतं स्तनान्तरे ।
तले(ळे)न वक्षस्यभिताडितो रुषा हनूमता मोहमवाप राक्षसः ।
विचिन्तयामास ततो हनूमान् मयैव हन्तुं समरे हि शक्यः ।
अनन्यवध्यं तमिमं निहत्य स्वयं स रामो यश आहरेत ।
मयैव वध्यौ भवतं त्रिजन्मसु प्रवृद्धवीर्याविति केशवेन ।
इति स्म सञ्चिन्त्य कपीशयुक्तो जगाम यत्रैव कपिप्रवीराः ।
ते भक्षितास्तेन कपिप्रवीराः सर्वे विनिर्जग्मुरमुष्य देहात् ।
स तान् विधूयाऽशु यथा महागजो जगाम रामं समरार्थमेकः ।
न्यवारयत् तं शरवर्षधारया स लक्ष्मणो नैनमचिन्तयत् सः ।
अथो समादाय धनुः सुघोरं शरान्सुरेशाशनितुल्यवेगान् ।
यावद्बलेन न्यहनत् खरादिकान् न तावतैव न्यपतत् स राक्षसः ।
द्वाभ्यां स बाहू निचकर्त तस्य पदद्वयं चैव तथा शराभ्याम् ।
अवर्धताब्धिः पतितेऽस्य काये महाचलाभे क्षणदाचरस्य ।
योजनानां त्रिलक्षं हि कुम्भकर्णोऽभ्यवर्धत ।
स तु स्वभावमापन्नो म्रियमाणोऽभ्यवर्धत ।
अथापरे ये रजनीचरास्तदा कपिप्रवीरैर्निहताश्च सर्वशः ।
स दुःखतप्तो निपपात मूर्छितो निराशकश्चाभवदात्मजीविते ।
मया गृहीतस्त्रिदशेश्वरः पुरा विषीदसे किं नरराजपुत्रतः ।
स आत्तधन्वा सशरो रथेन वियत्समारुह्य ययावदर्शनम् ।
पुराऽवताराय यदा स विष्णुर्दिदेश सर्वांस्त्रिदशांस्तदैव ।
तमाह विष्णुर्न भुवि प्रजातिमुपैहि सेवां तव चान्यथाऽहम् ।
वरेण शर्वस्य हि रावणात्मजो यदा निबध्नाति कपीन् सलक्ष्मणान् ।
अहं समर्थोऽपि स लक्ष्मणश्च तथा हनूमान् न विमोचयामः ।
तदेतदुक्तं हि पुराऽऽत्मना यत् ततो हि रामो न मुमोच कञ्चन ।
अथो निबद्ध्याऽशु हरीन् सलक्ष्मणान् जगाम रक्षः स्वपितुः सकाशम् ।
स पक्षिराजोऽथ हरेर्निदेशं स्मरंस्त्वरावानिह चाऽजगाम ।
स राममानम्य परात्मदैवतं ययौ सुमाल्याभरणानुलेपनः ।
श्रुत्वा निनादं प्लवगेश्वराणां पुनः सपुत्रोऽत्रसदत्र रावणः ।
पुनश्च हुत्वा स हुताशमेव रथं समारुह्य ययावदर्शनम् ।
पुनश्च तस्यास्त्रनिपीडितास्ते निपेतुरुर्व्यां कपयः सलक्ष्मणाः ।
विज्ञातुकामः पुरि सम्प्रवृत्तिं विभीषणः पूर्वगतस्तदाऽऽगात् ।
स तं समादाय ययौ विधातृजं विमूर्च्छितं चोदकसेकतस्तम् ।
ऊचे पुनर्जीवति किं हनूमान् जीवाम सर्वेऽपि हि जीवमाने ।
इत्युक्तो जाम्बवानाह हनूमन्तमनन्तरम् ।
मृतसञ्जीवनी मुख्या सन्धानकरणी परा ।
इत्युक्तः स क्षणेनैव प्रापतद् गन्धमादनम् ।
अन्तर्हिताश्चौषधीस्तु तदा विज्ञाय मारुतिः ।
स तं समुत्पाट्य गिरिं करेण प्रतोल(ळ)यित्वा बलदेवसूनुः ।
अवाप चाक्ष्णोः स निमेषमात्रतो निपातिता यत्र कपिप्रवीराः ।
अपूजयन् मारुतिमुग्रपौरुषं रघूत्तमोऽस्यानुजनिस्तथाऽपरे ।
स देवगन्धर्वमहर्षिसत्तमैरभिष्टुतो रामकरोप(करेण)गूहितः ।
स पूर्ववन्मारुतिवेगचोदितो निरन्तरं श्लिष्टतरोऽत्र चाभवत् ।
पुनश्च तान् प्रेक्ष्य समुत्थितान् कपीन् भयं महच्छक्रजितं विवेश ।
वराश्रयेणाजगिरीशयोस्तथा पुनर्महास्त्रैः स बबन्ध तान् कपीन् ।
पितामहास्त्रेण निहन्मि दुर्मतिं तवाऽज्ञया शक्रजितं सबान्धवम् ।
न सोढुमीशोऽसि यदि त्वमेतदस्त्रं तदाऽहं शरमात्रकेण ।
इति स्म वीन्द्रस्य हनूमतश्च बलप्रकाशाय पुरा प्रभुः स्वयम् ।
अनेन दृष्टोऽहमिति स्म दुष्टो विज्ञाय बाह्वोर्बलमस्य चोग्रम् ।
हाहाकृते प्रद्रुत इन्द्रशत्रौ रघूत्तमः शत्रुविभीषणत्वात् ।
निशाचरास्त्रं ह्यगमत् क्षणेन रामास्त्रवीर्याद्धरयो नदन्तः ।
सुरैश्च पुष्पं वर्षद्भिरीडितस्तस्थौ धनुष्पाणिरनन्तवीर्यः ।
विभीषणोऽथाऽह रघूत्तमं प्रभुं नियोजयाद्यैव वधाय दुर्मतेः ।
न वै वधं राम इयेष तस्य पलायितस्याऽत्मसमीक्षणात् पुनः ।
स आदिदेशावरजं जनार्दनो हनूमता चैव विभीषणेन ।
स जुह्वतस्तस्य चकार विघ्नं प्लवङ्गमैः सोऽथ युयुत्सया रथम् ।
उभौ च तावस्त्रविदां वरिष्ठौ शरैः शरीरान्तकरैस्ततक्षतुः ।
अस्त्राणि तस्यास्त्रवरैः स लक्ष्मणो निवार्य शत्रोश्चलकुण्डलोज्ज्वलम् ।
निपातितेऽस्मिन् नितरां निशाचरान् प्लवङ्गमा जघ्नुरनेककोटिशः ।
स तन्निशम्याप्रियमुग्ररूपं भृशं विनिश्वस्य विलप्य दुःखात् ।
मरणाभिमुखः शीघ्रं रावणो रणकर्मणे ।
त्रिंशत् सहस्राणि महौघकानामक्षोहिणीनां (अपि) सह षट्सहस्रम् ।
तदप्रधृष्यं वरतः स्वयम्भुवो युगान्तकालार्णवघूर्णितोपमम् ।
आगच्छमानं तदपारमेयं बलं सुघोरं प्रल(ळ)यार्णवोपमम् ।
वरो हि दत्तोऽस्य पुरा स्वयम्भुवा धरातले(ळे)ऽल्पेऽपि निवासशक्तिः ।
प्रगृह्य रामोऽथ धनुः शरांश्च समन्ततस्तानवधीच्छरौघैः ।
क्षणेन सर्वांश्च निहत्य राघवः प्लवङ्गमानामृषभैः स पूजितः ।
अथाऽययौ सर्वनिशाचरेश्वरो हतावशिष्टेन बलेन संवृतः ।
विरूपनेत्रोऽथच यूपनेत्रस्तथा महापार्श्वमहोदरौ च ।
अथास्य सैन्यानि निजघ्नुरोजसा समन्ततः शैलशिलाभिवृष्टिभिः ।
वीक्ष्यातिकायं तमभिद्रवन्तं स कुम्भकर्णोऽयमिति ब्रुवन्तः ।
वदन् स तिष्ठध्वमिति स्म वीरो विभीषिकामात्रमिदं न यात ।
अथो शरानाशु विमुञ्चमानं शिरः परामृश्य निपात्य भूतळे ।
अथो महापार्श्व उपाजगाम प्रवर्षमाणोऽस्य शराम्बुधाराः ।
निगृह्य केशेषु निपात्य भूतले(ळे) चकर्त वामांसत औदरं परम् ।
अथैनमाजग्मतुरुद्यतायुधौ विरूपनेत्रोऽप्यथ यूपनेत्रः ।
ताभ्यां स बद्धः शरपञ्जरेण विचेष्टितुं नाशकदत्र वीरः ।
उभौ च तौ तेन विचूर्णितौ रणे रवेः सुतस्योरुबलेरितेन ।
ततस्तु सर्वांश्च हरिप्रवीरान् विधूय बाणैर्बलवान् दशाननः ।
तदा दशास्योऽन्तकदण्डकल्पां मयाय दत्तां कमलोद्भवेन ।
तया स वीरः सुविदारितोराः पपात भूमौ सुभृशं विमूर्च्छितः ।
तेनातिगाढं व्यथितो दशाननो मुखैर्वमञ्छोणितपूरमाशु ।
समुद्बबर्हाथ च तां स राघवो दिदेश च प्राणवरात्मजं पुनः ।
तद्गन्धमात्रेण समुत्थितोऽसौ सौमित्रिरात्तोरुबलश्च पूर्ववत् ।
प्राक्षिपत् तं गिरिवरं लङ्कास्थः सन् स मारुतिः ।
तद्बाहुवेगात् संश्लेषं प्राप पूर्ववदेव सः ।
रामाज्ञयैव रक्षांसि हरयोऽब्धाववाक्षिपन् ।
छिन्नप्ररोहिणश्चैव विशल्याः पूर्ववर्णिनः ।
अथाऽससादोत्तमपूरुषं प्रभुं विमानगो रावण आयुधौघान् ।
सम्मानयन् राघवमादिपूरुषं निर्यातयामास रथं पुरन्दरः ।
आरुह्य तं रथवरं जगदेकनाथो लोकाभयाय रजनीचरनाथमाशु ।
आयान्तमीक्ष्य रजनीचरलोकनाथः शस्त्राण्यथास्त्रसहितानि मुमोच रामे ।
कृत्तानि तानि पुनरेव समुत्थितानि दृष्ट्वा वराच्छतधृतेर्हृदयं विभेद ।
तस्मिन् हते त्रिजगतां परमप्रतीपे ब्रह्मा शिवेन सहितः सह लोकपालैः ।
अथैनमस्तौत् पितरं कृताञ्जलिर्गुणाभिरामं जगतः पितामहः ।
त्वमेक ईशोऽस्य नचाऽदिरन्तस्तवेड्य कालेन तथैव देशतः ।
नचोद्भवो नैव तिरस्कृतिस्ते क्वचिद् गुणानां परतः स्वतो वा ।
यथाऽर्चिषोऽग्नेः पवनस्य वेगा मरीचयोऽर्कस्य नदीषु चाऽपः ।
ये ये च मुक्तास्त्वथ ये च बद्धाः सर्वे तवेशेश वशे सदैव ।
किमेष ईदृग्गुणकस्य ते प्रभो रक्षोवधोऽशेषसुरप्रपालनम् ।
इतीरिते त्वब्जभवेन शूली समाह्वयद् राघवमाहवाय ।
इतीरितेऽस्त्वित्यभिधाय राघवो धनुः प्रगृह्याऽशु शरं च सन्दधे ।
अथोत्थितश्चाऽसुरभाववर्जितः क्षमस्व देवेति ननाम पादयोः ।
अथेन्द्रमुख्याश्च तमूचिरे सुरास्त्वयाऽविताः स्मोऽद्य निशाचराद् वयम् ।
सीताकृतिं तामथ तत्र चाऽगतां दिव्यच्छलेन प्रणिधाय पावके ।
जानन् गिरीशालयगां स सीतां समग्रहीत् पावकसम्प्रदत्ताम् ।
अथो गिरेरानयनात् परस्ताद् ये वानरा रावणबाणपीडिताः ।
तदा मृतान् राघव आनिनाय यमक्षयाद् देवगणांश्च सर्वशः ।
विभीषणेनार्पितमारुरोह स पुष्पकं तत्सहितः सवानरः ।
ददर्श चासौ भरतं हुताशनं प्रवेष्टुकामं जगदीश्वरस्य ।
श्रुत्वा प्रमोदोरुभरः स तेन सहैव पौरैः सहितः समातृकः ।
उत्थाप्य तं रघुपतिः सस्वजे प्रणयान्वितः ।
पुरीं प्रविश्य मुनिभिः साम्राज्ये चाभिषेचितः ।
सर्वैर्भवद्भिः सुकृतं विधाय देहं मनोवाक्सहितं मदीयम् ।
मुक्तिप्रदानात् प्रतिकर्तृता मे सर्वस्य चाथो भवतां भवेत (त्)।
मद्भक्तौ ज्ञानपूर्तावनुपधिकबलप्रोन्नतिस्थैर्यधैर्यस्वाभाव्याधिक्यतेजःसुमतिदमशमेष्वस्य तुल्यो न कश्चित् ।
पूर्वं जिगाय भुवनं दशकन्धरोऽसावब्जोद्भवस्य वरतो नतु तं कदाचित् ।
दत्तो वरो न मनुजान् प्रति वानरांश्च धात्राऽस्य तेन विजितो युधि वालिनैषः ।
बलेर्द्वारस्थोऽहं वरमस्मै सम्प्रदाय पूर्वं तु ।
पुनश्च युद्धाय समाह्वयन्तं न्यपातयं रावणमेकमुष्टिना ।
आवां स्वशक्त्या जयिनाविति स्म शिवो वरान्मेऽजयदेनमेवम् ।
अतः स्वभावाज्जयिनावहं च वायुश्च वायुर्हनुमान् स एषः ।
अतो हनूमान् पदमेतु धातुर्मदाज्ञया सृष्ट्यवनादि कर्म ।
भोगाश्च ये यानि च कर्मजातान्यनाद्यनन्तानि ममेह सन्ति ।
एतादृशं मे सहभोजनं ते मया प्रदत्तं हनुमन् सदैव ।
को न्वीश ते पादसरोजभाजां सुदुर्लभोऽर्थेषु चतुर्ष्वपीह ।
त्वमेव साक्षात् परमस्वतन्त्रस्त्वमेव साक्षादखिलोरुशक्तिः ।
समेत्य सर्वेऽपि सदा वदन्तोऽप्यनन्तकालाच्च नवै समाप्नुयुः ।
यस्ते कथासेवक एव सर्वदा सदारतिस्त्वय्यचलैकभक्तिः ।
प्रवर्द्धतां भक्तिरलं क्षणेक्षणे त्वयीश मे ह्रासविवर्जिता सदा ।
इतीरितस्तस्य ददौ स तद्द्वयं पदं विधातुं सकलैश्च शोभनम् ।
नवमोऽध्यायः
औं ॥ अथाऽप्तराज्यो भगवान् स लक्ष्मणं जगाद राजा तरुणो भवाऽशु ।
न मां भवत्पादनिषेवणैकस्पृहं तदन्यत्र नियोक्तुमर्हति ।
इतीरितस्तस्य तदेव दत्त्वा दृढं समाश्लिष्य च राघवः प्रभुः ।
प्रशासतीशे पृथिवी बभूव विरिञ्चलोकस्य समा गुणोन्नतौ ।
गुणैश्च सर्वैरुदिताश्च सर्वे यथायथा योग्यतयोच्चनीचाः ।
सर्वेऽजरा नित्यबलोपपन्ना यथेष्टसिद्ध्या च सदोपपन्नाः ।
सर्वे मनोवाक्तनुभिः सदैव विष्णुं यजन्ते नतु कञ्चिदन्यम् ।
समस्तगन्धाश्च सदाऽतिहृद्या रसा मनोहारिण एव तत्र ।
न कस्यचिद् दुःखमभूत् कथञ्चिन्न वित्तहीनश्च बभूव कस्यचित् (कश्चन) ।
स्त्रियो नचाऽसन् विधवाः कथञ्चिन्न वै पुमांसो विधुरा बभूवुः ।
यथेष्टमाल्याभरणानुलेपना यथेष्टपानाशनवाससोऽखिलाः ।
स ब्रह्मरुद्रमरुदश्विदिवाकरादिमूर्द्धन्यरत्नपरिघट्टितपादपीठः ।
तस्याखिलेशितुरनाद्यनुगैव लक्ष्मीः सीताभिधा त्वरमयत् स्वरतं सुरेशम् ।
रेमे तया स परमः स्वरतोऽपि नित्यं नित्योन्नतप्रमदभारभृतस्वभावः ।
गायन्ति चैनमनुरक्तधियः सुकण्ठा गन्धर्वचारणगणाः सह चाप्सरोभिः ।
एवं त्रयोदशसहस्रमसौ समास्तु पृथ्वीं ररक्ष विजितारिरमोघवीर्यः ।
देव्यां स चाजनयदिन्द्रहुताशनौ द्वौ पुत्रौ यमौ कुशलवौ बलिनौ गुणाढ्यौ ।
कोटित्रयं स निजघान तथाऽसुराणां गन्धर्वजन्म भरतेन सतां च धर्मम् ।
अथ शूद्रतपश्चर्यानिहतं विप्रपुत्रकम् ।
जङ्घनामाऽसुरः पूर्वं गिरिजावरदानतः ।
अनन्यवध्यं तं तस्माज्जघान पुरुषोत्तमः ।
अनन्नयज्ञकृच्छ्वेतो राजा क्षुद्विनिवर्तनम् ।
क्षुदभावमात्रफलदं न साक्षाद् राघवेऽर्पितम् ।
व्यवधानतस्ततो रामे दद्याच्छ्वेत इति प्रभुः ।
तामगस्त्यकरपल्लवार्पितां भक्त एष मम कुम्भसम्भवः ।
अथ केचिदासुरसुराः सुराणका इत्युरुप्रथितपौरुषाः पुरा ।
भूरिपापकृतिनोऽपि निश्चयान्मुक्तिमाप्नुम उदारसद्गुण ।
यावदेव रमया रमेश्वरं नो वियोजयथ सद्गुणार्णवम् ।
इत्युदीरितमवेत्य तेऽसुराः क्षिप्रमोक्षगमनोत्सुकाः क्षितौ ।
ताननादिकृतदोषसञ्चयैर्मोक्षमार्गगतियोग्यतोज्झितान् ।
आज्ञयैव हि हरेस्तु मायया मोहितास्तु दितिजा व्यनिन्दयन् ।
ब्रह्मवाक्यमृतमेव कारयन् पातयंस्तमसि चान्ध आसुरान् ।
तेन चान्धतम ईयुरासुरा यज्ञमाह्वयदसौ च मैथिलीम् ।
गुरुं हि जगतो विष्णुर्ब्रह्माणमसृजत् स्वयम् ।
नासत्स्वप्यनृतं कुर्याद् वचनं पारलौकिकम् ।
निजाधिक्यस्य विज्ञप्त्यै क्वचिद् वायुस्तदाज्ञया ।
नान्यः कश्चित् तद्वराणां शापानामप्यतिक्रमी ।
न विष्णोर्वचनं क्वापि मृषा भवति कस्यचित् ।
प्रविश्य भूमौ सा देवी लोकदृष्ट्यनुसारतः ।
एवं रमालाळितपादपल्लवः पुनः स यज्ञैरयजत्स्वमेव ।
रामस्य दृश्या त्वन्येषामदृश्या जनकात्मजा ।
एवं विधान्यगणितानि जनार्दनस्य रामावतारचरितानि तदन्यपुम्भिः ।
तस्यैवमब्जभवलोकसमामिमां क्ष्मां कृत्वाऽनुशासत उदीक्ष्य गुणान् धरायाः ।
आमन्त्र्य तैः सह विभुर्भगवत्प्रयाणं स्वीयाय सद्मन इयेष दिदेश चाशु ।
एकान्तमेत्य रघुपेण समस्तकालो रुद्रो जगाद वचनं जगतो विधातुः ।
पुत्रस्तवेश कमलप्रभवस्तथाऽहं पौत्रस्तु पौत्रकवचो यदपि ह्ययोग्यम् ।
यत्कार्यसाधनकृते विबुधार्थितस्त्वं प्रादुश्चकर्थ निजरूपमशेषमेव ।
ओम् इत्युवाच भगवांस्तदशेषमेव श्रुत्वा रहस्यथ तनुस्त्वपरा हरस्य ।
सिद्धं न देयमथ साध्यमपीति वाचं श्रुत्वाऽस्य वाक्समयजातमुरु स्वहस्तात् ।
तृप्तो ययौ च सकलान् प्रति कोपयानः कश्चिन्न मेऽर्थितवरं प्रतिदातुमीशः ।
कुन्ती तु तस्य हि मुनेर्वरतोऽजयत् तु रामः स कृष्णतनुवा स्वबलाज्जिगाय ।
एकान्ते तु यदा रामश्चक्रे रुद्रेण संविदम् ।
यद्यत्र प्रविशेत् कश्चिद्धन्मि त्वेति वचो ब्रुवन् ।
दुर्वाससः प्रतिज्ञा तु रामं प्राप्यैव भज्यताम् ।
राघवो घ्नन्नपि तु मां करोत्येव दयां मयि ।
स्वलोकगमनाकाङ्क्षी स्वयमेव तु राघवः ।
अत्यन्तबन्धुनिधनं त्याग एवेति चिन्तयन् ।
इत्युक्तः स ययौ जगद्भवभयध्वान्तच्छिदं राघवं ध्यायन्नाप च तत्पदं दशशतैर्युक्तो मुखाम्भोरुहैः ।
अथ राघवः स्वभवनोपगतौ विदधे मतिं सह जनैरखिलैः ।
श्रुत्वा तु तद् य इह मोक्षपदेच्छवस्ते सर्वे समाययुरथाऽतृणमापिपीलम् ।
संस्थापयामास कुशं स्वराज्ये तैः साकमेव च लवं युवराजमीशः ।
अथाऽह वायुनन्दनं स राघवः समाश्लिषन् ।
त्वया सदा महत् तपः सुकार्यमुत्तमोत्तमम् ।
दशास्यकुम्भकर्णकौ यथा सुशक्तिमानपि ।
पयोब्धिमध्यगं च मे सुसद्म चान्यदेव वा ।
यथेष्टभोगसंयुतः सुरेशगायकादिभिः ।
तवेप्सितं न किञ्चन क्वचित् कदाचिदेव (कुतश्चिदेव) वा ।
इतीरितो मरुत्सुतो जगाद विश्वनायकम् ।
सदा प्रवर्द्धमानया तया रमेऽहमञ्जसा ।
नमो नमो नमो नमो नतोऽस्मि ते सदा पदम् ।
इतीरिते तथेति तं जगाद पुष्करेक्षणः ।
खगा मृगास्तृणादयः पिपीलिकाश्च गर्दभाः ।
सदैव रामभावनात् (रामभावनाः) सदा सुतत्त्ववेदिनः ।
‘स तैः समावृतो विभुर्ययौ दिशं तदोत्तराम् ।
सहस्रसूर्यमण्डलज्वलत्किरीटमूर्द्धजः ।
सुरक्तपद्मलोचनः सुविद्युदाभकुण्डलः ।
दिवाकरौघकौस्तुभप्रभासकोरुकन्धरः ।
सुवृत्तदीर्घपीवरोल्लसद्भुजद्वयाङ्कितः ।
स्वयं स तेन निर्मितो हतौ मधुश्च कैटभः ।
स शत्रुसूदनोऽवधीन्मधोः सुतं रसाह्वयम् ।
समस्तसारसम्भवं शरं दधार तं करे ।
उदारबाहुभूषणः शुभाङ्गदः सकङ्कणः ।
अनर्घ्यरत्नमालया वनाख्यया च मालया ।
स भूतिवत्सभूषणस्तनूदरे वलित्रयी ।
करीन्द्रसत्करोरुयुक् सुवृत्तजानुमण्डलः ।
लसद्धरिन्मणिद्युती रराज राघवोऽधिकम् ।
ज्ञानं नेत्राब्जयुग्मान्मुखवरकमलात् सर्ववेदार्थसारान्स्तन्वा ब्रह्माण्डबाह्यान्तरमधिकरुचा भासयन् भासुरास्यः ।
दघ्रे च्छत्रं हनूमान् स्रवदमृतमयं पूर्णचन्द्रायुताभं सीता सैवाखिलाक्ष्णां विषयमुपगता श्रीरिति ह्रीरथैका ।
साक्षाच्चक्रतनुस्तथैव भरतश्चक्रं दधद् दक्षिणेनाऽयात् सव्यत एव शङ्खवरभृच्छङ्खात्मकः शत्रुहा ।
तस्य सूर्यसुतपूर्ववानरा दक्षिणेन मनुजास्तु सव्यतः ।
गन्धर्वैर्गीयमानो विबुधमुनिगणैरब्जसम्भूतिपूर्वैर्वेदोदारार्थवाग्भिः प्रणिहितसुमनः सर्वदा स्तूयमानः ।
ब्रह्मरुद्रगरुडैः सशेषकैः प्रोच्यमानसुगुणोरुविस्तरः ।
अथ ब्रह्मा हरिं स्तुत्वा जगादेदं वचो विभुम् ।
मातॄणां चापि तल्लोकस्त्वयुताब्दादितोऽग्रतः ।
तथाऽपि सा यदावेशाच्चकार त्वय्यशोभनम् ।
कैकयी तु चलान् लोकान् प्राप्ता नैवाचलान् क्वचित् ।
मन्थरा तु तमस्यन्धे पातिता दुष्टचारिणी ।
प्रायशो राक्षसाश्चैव त्वयि कृष्णत्वमागते ।
अथ ये त्वत्पदाम्भोजमकरन्दैकलिप्सवः ।
अहं भवः सुरेशाद्याः किङ्कराः स्म तवेश्वर ।
इत्युदीरितमाकर्ण्य शतानन्देन राघवः ।
जगद्गुरुत्वमादिष्टं मया ते कमलोद्भव ।
अतस्त्वया प्रदेया हि लोका एषां मदाज्ञया ।
इतीरितो हरेर्भावविज्ञानी कञ्जसम्भवः ।
ते जरामृतिहीनाश्च सर्वदुःखविवर्जिताः ।
ये तु देवा इहोद्भूता नृवानरशरीरिणः ।
असुरावेशतस्तौ तु न राममनुजग्मतुः ।
तयोश्च तपसा तुष्टश्चक्रे तावजरामरौ ।
पीतामृतेषु देवेषु युद्ध्यमानेषु दानवैः ।
अङ्गदः कालतस्त्यक्त्वा देहमाप निजां तनुम् ।
विभीषणश्च धर्मात्मा राघवाज्ञापुरस्कृतः ।
रामाज्ञया जाम्बवांश्च न्यवसत् पृथिवीतले(ळे) ।
अथो रघूणां प्रवरः सुरार्चितः स्वयैकतन्वा न्यवसत् सुरालये ।
तृतीयरूपेण निजं पदं प्रभुं व्रजन्तमुच्चैरनुगम्य देवताः ।
ब्रह्मा मरुन्मारुतसूनुरीशः शेषो गरुत्मान् हरिजः शक्रकाद्याः ।
स्वं स्वं च सर्वे सदनं सुरा ययुः पुरन्दराद्याश्च विरिञ्चपूर्वकाः ।
समस्तशास्त्रोद्भरितं हरेर्वचो मुदा तदा श्रोत्रपुटेन सम्भरन् ।
रामाज्ञया किम्पुरुषेषु राज्यं चकार रूपेण तथाऽपरेण ।
इत्थं स गायञ्छतकोटिविस्तरं रामायणं भारतपञ्चरात्रम् ।
रामोऽपि सार्द्धं पवमानात्मजेन ससीतया लक्ष्मणपूर्वकैश्च ।
कदाचिदीशः सकलावतारानेकं विधायाहिपतौ च शेते ।
इत्यशेषपुराणेभ्यः पञ्चरात्रेभ्य एव च ।
परस्परविरोधस्य हानान्निर्णीय तत्त्वतः ।
बहुकल्पानुसारेण मयेयं सत्कथोदिता ।
क्वचिन्मोहायासुराणां व्यत्यासः प्रतिलोमता ।
एवं च वक्ष्यमाणेषु नैवाऽशङ्क्या विरुद्धता ।
पुंव्यत्यासेन चोक्तिः स्यात् पुराणादिषु कुत्रचित् ।
भीमसेनहतास्ते हि ज्ञायन्ते बहुवाक्यतः ।
विस्तारे कृष्णनिहता बलभद्रहता इति ।
यथा सुयोधनं भीमः प्राहसत् कृष्णसन्निधौ ।
व्यत्यासास्त्वेवमाद्याश्च प्रातिलोम्यादयस्तथा ।
तस्माद् विनिर्णयग्रन्थानाश्रित्यैव च लक्षणम् ।
उक्तं लक्षणशास्त्रे च कृष्णद्वैपायनोदिते ।
व्यत्यासादीन् सप्तभेदान् वेदाद्यर्थं तथा वदेत् ।
‘व्यत्यासः प्रातिलोम्यं च गोमूत्री प्रघसस्तथा ।
इत्यादिलक्षणान्यत्र नोच्यन्तेऽन्यप्रसङ्गतः ।
इतीरिता रामकथा परा मया समस्तशास्त्रानुसृतेर्भवापहा ।
दशमोऽध्यायः
ओं ॥ द्वापरेऽथ युगे प्राप्ते त्वष्टाविंशतिमे पुनः ।
पयोब्धेरुत्तरं तीरमासाद्य विबुधर्षभाः ।
नमोनमोऽगण्यगुणैकधाम्ने समस्तविज्ञानमरीचिमालिने ।
स्वदत्तमालाभुविपातकोपतो दुर्वाससः शापत आशु हि श्रिया ।
त्वदाज्ञया बलिना सन्दधाना वराद् गिरीशस्य परैरचाल्यम् ।
तदा त्वया नित्यबलत्वहेतुतो योऽनन्तनामा गरुडस्तदंसके ।
पुनः परीक्षद्भिरसौ गिरिः सुरैः सहासुरैरुन्नमितस्तदंसतः ।
पुनश्च वामेन करेण वीश्वरे निधाय तं स्कन्धगतस्त्वमस्य ।
कृतश्च कद्रो(द्र्वा)स्तनयोऽत्र वासुकिर्नेत्रं त्वया कश्यपजः स नागराट् ।
नैच्छन्त पुच्छं दितिजा अमङ्गलं(ळं) तदित्यथाग्रं जगृहुर्विषोल्बणम् ।
अथातिभारादविशत् सुकाञ्चनो गिरिः स पाताल(ळ)मथ त्वमेव ।
उपर्यधश्चाऽत्मनि नेत्रगोत्रयोस्त्वया परेणाऽविशता समेधिताः ।
श्रान्तेषु तेष्वेक उरुक्रम त्वं सुधारसाप्त्यै मुदितो ह्यमथ्नाः ।
कलेः स्वरूपं तदतीव दुष्षहं वराद् विधातुः सकलैश्च दुःस्पृशम् ।
स तत् पिबत्(पिबन्) कण्ठगतेन तेन निपातितो मूर्च्छित आशु रुद्रः ।
अथ त्वदाज्ञां पुरतो निधाय निधाय पात्रे तपनीयरूपे ।
अत्यल्पपानाच्च बभूव शूला शिवस्य शीर्ष्ण्यस्य करावशिष्टम् ।
अथ त्वयाऽब्धौ तु विमथ्यमाने सुराऽभवत् तामसुरा अवापुः ।
अन्ये च दिक्पालगजा बभूवुर्वरं तथैवाप्सरसां सहस्रम् ।
तथैव साक्षात् सुरभिर्निशेशो बभूव तत् कौस्तुभं लोकसारम् ।
ततो भवान् दक्षिणबाहुना सुधाकमण्डलुं कलशं चापरेण ।
ततो भवद्धस्तगतं दितेः सुताः सुधाभरं कलशं चापजह्रुः ।
ततो भवाननुपममुत्तमं वपुर्बभूव दिव्यप्रमदात्मकं त्वरन् ।
बृहन्नितम्बं कलशोपमस्तनं सत्पुण्डरीकायतनेत्रमुज्ज्वलम् ।
परस्परं तेऽमृतहेतुतोऽखिला विरुद्ध्यमानाः प्रददुः स्म ते करे ।
धर्मच्छलं पापजनेषु धर्म इति त्वया ज्ञापयितुं तदोक्तम् ।
यथेष्टतोऽहं विभजामि सर्वथा न विश्वसध्वं(अविश्वसध्वं) मयि केनचित् क्वचित् ।
ततश्च संस्थाप्य पृथक् सुरासुरांस्तवातिरूपोच्चलितान् सुरेतरान् ।
निमीलिताक्षेष्वसुरेषु देवता न्यपाययः साध्वमृतं ततः पुमान् ।
तेनामृतार्थं हि सहस्रजन्मसु प्रतप्य भूयस्तप आरितो वरः ।
शिरस्तु तस्य ग्रहतामवाप सुरैः समाविष्टमथो सबाहुः ।
अथासुराः प्रत्यपतन्नुदायुधाः समस्तशस्ते च हतास्त्वया रणे ।
तस्यार्द्धदेहात् समभूदलक्ष्मीस्तत्पुत्रका दोषगणाश्च सर्वशः ।
यथाविभागं च सुरेषु दत्तास्त्वया तथाऽन्येऽपि हि तत्र जाताः ।
भवेद्धि मोक्षो नियतं सुराणां नैवासुराणां स कथञ्चन स्यात् ।
कलिस्त्वयं ब्रह्मवरादिदानीं विबाधतेऽस्मान् सकलान् प्रजाश्च ।
त्वदाज्ञया तस्य वरोऽब्जजेन दत्तः स आविश्य शिवं चकार ।
वेदाश्च सर्वे सहशास्त्रसङ्घा उत्सादितास्तेन न सन्ति तेऽद्य ।
अदृश्यमज्ञेयमतर्क्यरूपं कलिं निलीनं हृदयेऽखिलस्य ।
ऋते भवन्तं नहि तं निहन्ता(तन्निहन्ता) त्वमेक एवाखिलशक्तिपूर्णः ।
इतीरितस्तैरभयं प्रदाय सुरेश्वराणां परमोऽप्रमेयः ।
वसिष्ठनामा कमलोद्भवात्मजः सुतोऽस्य शक्तिस्तनयः पराशरः ।
उवाच चैनं भगवान् सुतोषितो वसोर्मदीयस्य सुताऽस्ति शोभना ।
तच्छ्येनहस्ते प्रददौ स तस्यै दातुं तदन्येन तु युद्ध्यतोऽपतत् ।
तद्गर्भतोऽभून्मिथुनं स्वराज्ञे न्यवेदयन् सोऽपि वसोः समर्पयत् ।
कन्या तु सा दाशराजस्य सद्मन्यवर्द्धतातीव सुरूपयुक्ता ।
इतीरितश्चक्रधरेण तां मुनिर्जगाम मार्ताण्डसुतां समुद्रगाम् ।
विदोषविज्ञानसुखैकरूपोऽप्यजो जनान् मोहयितुं मृषैव ।
यथा नृसिंहाकृतिराविरासीत् स्तम्भात् तथा नित्यतनुत्वतो विभुः ।
स्त्रीपुम्प्रसङ्गात् परतो यतो हरिः प्रादुर्भवत्येष विमोहयन् जनम् ।
द्वीपे भगिन्याः स(तु/च) यमस्य विश्वकृत् प्रकाशते ज्ञानमरीचिमण्डलः ।
अगण्यदिव्योरुगुणार्णवः प्रभुः समस्तविद्याधिपतिर्जगद्गुरुः ।
शुभमरतकवर्णो रक्तपादाब्जनेत्राधरकरनखरसनाग्रश्चक्रशङ्खाब्जरेखः ।
विस्तीर्णवक्षाः कमलायताक्षो बृहद्भुजः कम्बुसमानकण्ठः ।
प्रबोधमुद्राभयदोर्द्वयान्वि(ङ्कि)तो यज्ञोपवीताजिनमेखलोल्लसन् ।
स लोकधर्माभिरिरक्षया पितुर्द्विजत्वमाप्याऽशु पितुर्ददौ निजम् ।
द्वैपायनः सोऽथ जगाम मेरुं चतुर्मुखाद्यैरनुगम्यमानः ।
सर्वाणि शास्त्राणि तथैव कृत्वा विनिर्णयं ब्रह्मसूत्रं चकार ।
समस्तशास्त्रार्थनिदर्शनात्मकं चक्रे महाभारतनामधेयम् ।
अथो गिरीशादिमनोनुशायी कलिर्ममाराऽशु सुवाङ्मयैः शरैः ।
अथो मनुष्येषु तथाऽसुरेषु रूपान्तरैः कलिरेवावशिष्टः ।
ततो नृणां कालबलात् सुमन्दमायुर्मतिं कर्म च वीक्ष्य कृष्णः ।
येये च सन्तस्तमसाऽनुविष्टास्तांस्तान् सुवाक्यैस्तमसो विमुञ्चन् ।
भवस्व राजा कुशरीरमेतत् त्यक्त्वेति नैच्छत् तदसौ ततस्तम् ।
लोभात् स कीटत्वमुपेत्य कृष्णप्रसादतश्चाऽशु बभूव राजा ।
उवाच तं भगवान् मुक्तिमस्मिंस्तव क्षणे दातुमहं समर्थः ।
ज्ञानं च तस्मै विमलं ददौ स महीं च सर्वां बुभुजे तदन्ते ।
एवं बहून् संसृतिबन्धतः स व्यमोचयद् व्यासतनुर्जनार्दनः ।
अथास्य पुत्रत्वमवाप्तुमिच्छंश्चचार रुद्रः सुतपस्तदीयम् ।
विमोहनायासुरसर्गिणां प्रभुः स्वयं करोतीव तपः प्रदर्शयेत् ।
ततस्त्वरण्योस्स बभूव पुत्रकः शिवोऽस्य सोऽभूच्छुकनामधेयः ।
अकामयन् कामुकवत् स भूत्वा तयाऽर्थितस्तं शुकनामधेयम् ।
शुकं तमाशु प्रविवेश वायुर्व्यासस्य सेवार्थमथास्य सर्वम् ।
शेषोऽथ पैलं मुनिमाविशत् तदा वीशः सुमन्तुमपि वारुणिं(वारुणं) मुनिम् ।
कृष्णस्य पादपरिसेवनोत्सुकाः सुरेश्वरा विविशुराशु तान् मुनीन् ।
ऋचां प्रवर्तकं पैलं यजुषां च प्रवर्तकम् ।
चक्रेऽथ जैमिनिं साम्नामथर्वाङ्गिरसामपि ।
नारदं पाठयित्वा च देवलोकप्रवृत्तये ।
तं भारतपुराणानां महारामायणस्य च ।
तमाविशत् कामदेवः कृष्णसेवासमुत्सुकः ।
सनत्कुमारप्रमुखांश्चक्रे योगप्रवर्तकान् ।
जैमिनिं कर्ममीमांसाकर्तारमकरोत् प्रभुः ।
शैवान् (पाशुपतान्) पाशुपताच्चक्रे संशयार्थं सुरद्विषाम् ।
एवं ज्ञानं पुनः प्रापुर्देवाश्च ऋषयस्तथा ।
समस्तविज्ञानगभस्तिचक्रं विताय विज्ञानमहादिवाकरः ।
चतुर्मुखेशानसुरेन्द्रपूर्वकैः सदा सुरैः सेवितपादपल्लवः ।
एकादशोऽध्यायः
औं ॥ शशाङ्कपुत्रादभवत् पुरूरवास्तस्याऽयुरायोर्नहुषो ययातिः ।
यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।
यदोर्वंशे चक्रवर्ती कार्तवीर्यार्जुनोऽभवत् ।
पूरोर्वंशे तु भरतश्चक्रवर्ती हरिप्रियः ।
प्रतीपस्याभवन् पुत्रास्त्रयस्त्रेताग्निवर्चसः ।
त्वग्दोषयुक्तो देवापिर्जगाम तपसे वनम् ।
पुत्रिकापुत्रतां यातो बाह्लीको राजसत्तमः ।
वायुना च समाविष्टो महाबलसमन्वितः ।
भूभारक्षपणे विष्णोरङ्गतामाप्तुमेव सः ।
अजैकपादहिर्बुध्निर्विरूपाक्ष इति त्रयः ।
शिवादिसर्वरुद्राणामावेशाद् वरतस्तथा ।
तदर्थं हि तपश्चीर्णं सोमदत्तेन शम्भवे ।
भविष्यति मयाऽऽविष्टो यज्ञशील इति स्म ह ।
पूर्वोदधेस्तीरगतेऽब्जसम्भवे गङ्गायुतः पर्वणि घूर्णितोऽब्धिः ।
महाभिषङ् नाम नरेश्वरस्त्वं भूत्वा पुनः शन्तनुनामधेयः ।
शान्तो भवत्येव मयोदितस्त्वं तनुत्वमाप्तोऽसि(आप्नोषि) ततश्च शन्तनुः ।
स तत्र भुक्त्वा चिरकालमुर्वीं तनुं विहायाऽप सदो विधातुः ।
अवाङ्मुखेषु द्युसदस्सु रागान्निरीक्षमाणं पुनरात्मसम्भवः ।
इतीरितस्तत्क्षणतः प्रतीपाद् बभूव नाम्ना नृपतिश्च (नृपतिः) स शन्तनुः ।
अथाष्टमो वसुरासीद् द्युनामा वराङ्गिनाम्न्यस्य बभूव भार्या ।
तस्या जरामृतिविध्वंसहेतोर्वसिष्ठधेनुं स्वमृतं क्षरन्तीम् ।
तया द्युनामा स वसुः प्रचोदितो भ्रातृस्नेहात् सप्तभिरन्वितोऽपरैः ।
अधर्मवृत्ताः प्रतियात मानुषीं योनिं द्रुतं यत्कृते सर्व एव ।
प्रचोदयामास च या कुमार्गे पतिं हि साऽम्बेति नरेषु जाता ।
भवत्वसौ ब्रह्मचर्यैकनिष्ठो महान् विरोधश्च तयोर्भवेत ।
मृत्यष्टकोत्थामपि वेदनां सः प्राप्नोतु शस्त्रैर्बहुधा निकृत्तः ।
न मानुषं (मानुषीं) गर्भमवाप्नुमो वयं भवत्वयं सर्ववित् कीर्तिमांश्च ।
इतीरितेऽस्त्वित्युदिताः स्वयम्भुवा वसिष्ठसंस्थेन सुरापगां ययुः ।
इतीरिता सा वरमाशु वव्रे तेभ्योऽप्यपापत्वमथ प्रयत्वम् ।
अविघ्नतस्तान् विनिहन्तुमेव पुरा प्रतीपस्य हि दक्षिणोरुम् ।
तेनैव चोक्ता भव मे सुतस्य भार्या यतो दक्षिणोरुस्थिताऽसि ।
उवाच सा तं नतु मां सुतस्ते काऽसीति पृच्छेन्न तु मां निवारयेत् ।
यदा त्रयाणामपि चैकमेष करोति गच्छेयमहं विसृज्य ।
तथैव पुत्राय च तेन तद्वचो वधूक्तमुक्तं वचनाद् द्युनद्याः ।
ततस्तु सा शन्तनुतोऽष्टपुत्रानवाप्य सप्त न्यहनत् तथाऽष्टमम् ।
अवस्थितिर्नातिसुखाय मानुषे यतः सुराणामत एव गन्तुम् ।
तां पुत्रनिधनोद्युक्तां न्यवारयत शन्तनुः ।
रूपं सुरवरस्त्रीणां तव तेन न पापकम् (पातकम्)।
तत् कारणं वद शुभे यदि मच्छ्रोत्रमर्हति ।
न धर्मो देवतानां हि ज्ञातवासश्चिरं नृषु ।
अदृश्यत्वमसंस्पर्शो ह्यसम्भाषणमेव च ।
अतः सा वरुणं देवं पूर्वभर्तारमप्यमुम् ।
सुतमष्टममादाय भर्तुरेवाप्यनुज्ञया ।
देवव्रतोऽसावनुशासनाय मात्रा दत्तो देवगुरौ शतार्द्धम् ।
ततश्च मात्रा जगतां गरीयस्यनन्तपारेऽखिलसद्गुणार्णवे ।
स पञ्चविंशत् पुनरब्दकानामस्त्राणि चाऽभ्यस्य पतेर्भृगूणाम् ।
स तत्र बद्ध्वा शरपञ्जरेण गङ्गां विजह्रेऽस्य पिता तदैव ।
स मार्गयामास ततोऽस्य हेतुं ज्ञप्त्यै तदा स्वं च ददर्श सूनुम् ।
मीमांसमानं तमवाप गङ्गा सुतं समादाय पतिं जगाद च ।
अस्याग्रजाः स्वां स्थितिमेव याता हरेः पदाम्भोजसुपाविते जले ।
इति प्रदायामुमदृश्यतामगाद् गङ्गा तमादाय ययौ स्वकं गृहम् ।
पुनः स पित्राऽनुमतो बृहस्पतेरवाप वेदान् पुरुषायुषोऽर्द्धतः ।
स सर्ववित्त्वं समवाप्य रामात् समस्तविद्याधिपतेर्गुणार्णवात् ।
यदैव गङ्गा सुषुवेऽष्टमं सुतं तदैव यातो मृगयां स शन्तनुः ।
शरद्वांस्तु तपः कुर्वन् ददर्श सहसोर्वशीम् ।
विष्कम्भो नाम रुद्राणां भूभारहरणेऽङ्गताम् ।
तावुभौ शन्तनुर्दृष्ट्वा कृपाविष्टः स्वकं गृहम् ।
तस्य प्रीतस्तदा विष्णुः सर्वलोकेश्वरेश्वरः ।
पुत्रवच्छन्तनोश्चाऽसीत् स च पुत्रवदेव तत् ।
सर्ववेदानधिजगौ सर्वशास्त्राणि कौशिकात् ।
यदा हि जातः स कृपस्तदैव बृहस्पतेः सूनुरगाच्च गङ्गाम् ।
तद्दर्शनात् स्कन्नमथेन्द्रियं स द्रोणे दधाराऽशु ततोऽभवत् स्वयम् ।
द्रोणेतिनामास्य चकार तातो मुनिर्भरद्वाज उतास्य वेदान् ।
काले च तस्मिन् पृषतोऽनपत्यो वने तु पाञ्चालपतिश्चचार ।
स तद् विलज्जावशतः पदेन समाक्रमत् तस्य बभूव सूनुः ।
स द्रोणतातात् समवाप वेदानस्त्राणि विद्याश्च तथा समस्ताः ।
पदे द्रुतत्वाद् द्रुपदाभिधेयः स राज्यमापाथ निजां कृपीं सः ।
सिलोञ्छवृत्त्यैव हि वर्तयन् स धर्मं महान्तं विरजं जुषाणः ।
तेषां समानो वयसा विराटस्त्वभूद्धहा नाम विधातृगायकः ।
ततः कदाचिन्मृगयां गतः स ददर्श कन्याप्रवरां तु शन्तनुः ।
यस्यै वरं विष्णुरदात् पुराऽहं सुतस्तव स्यामिति या वसोः सुता ।
तद्दर्शनान्नृपतिर्जातहृच्छ्रयो(च्छयः) वव्रे प्रदानाय च दाशराजम् ।
तच्चिन्तया म्लानमुखं(ग्लानमुखं) जनित्रं दृष्ट्वैव देवव्रत आश्वपृच्छत् ।
स तस्य विश्वासकृते प्रतिज्ञां चकार नाहं करवाणि राज्यम् ।
भीमव्रतत्वाद्धि तदाऽस्य नाम कृत्वा देवा भीष्म इति ह्यचीक्लृपन् ।
ज्ञात्वा तु तां राजपुत्रीं गुणाढ्यां सत्यस्य विष्णोर्मातरं नामतस्तत् ।
प्रायः सतां न मनः पापमार्गे गच्छेदिति ह्यात्ममनश्च सक्तम् ।
स्वच्छन्दमृत्युत्ववरं प्रदाय तथाऽप्यजेयत्वमधृष्यतां च ।
लेभे स चित्राङ्गदमत्र पुत्रं तथा द्वितीयं च विचित्रवीर्यम् ।
स्वेच्छया वरुणत्वं स प्राप नानिच्छया तनुः ।
अतिसक्तास्तपोहीनाः कथञ्चिन्मृतिमाप्नुयुः ।
अथौर्ध्वदैहिकं कृत्वा पितुर्भीष्मोऽभ्यषेचयत् ।
चित्राङ्गदेन निहतो नाम स्वं त्वपरित्यजन् ।
अथ काशिसुतास्तिस्रस्तदर्थं भीष्म आहरत् ।
पाणिग्रहणकाले तु ब्रह्मदत्तस्य वीर्यवान् ।
अम्बिकाम्बालिके तत्र संवादं चक्रतुः शुभे ।
शापाद्धिरण्यगर्भस्य साल्वकामाऽहमित्यपि ।
तेनापि सम्परित्यक्ता परामृष्टेति सा पुनः ।
भ्रातुर्विवाहयामास सोऽम्बिकाम्बालिके ततः ।
अनन्तशक्तिरपि स न भीष्मं निजघान ह ।
अनन्तशक्तिः सकलान्तरात्मा यः सर्ववित् सर्ववशी च सर्वजित् ।
भीष्मं स्वभक्तं यशसाऽभिपूरयन् विमोहयन्नासुरांश्चैव रामः ।
‘विद्धवन्मुग्धवच्चैव केशवो वेदनार्तवत् ।
यशो भीष्मस्य दत्वा तु सोऽम्बां च शरणागताम् ।
अनन्तरं शिखण्डित्वात् तदा सा शाङ्करं तपः ।
भीष्मो यथा त्वां गृह्णीयात् तथा कुर्यामितीरितम् ।
रुद्रस्तु तस्यास्तपसा तुष्टः प्रादाद् वरं तदा ।
मालां च य इमां मालां गृह्णीयात् स हनिष्यति ।
तां न भीष्मभयात् केऽपि जगृहुस्तां हि सा ततः ।
एतस्मिन्नेव काले तु सुतार्थं द्रुपदस्तपः ।
भूत्वा भविष्यति पुमानिति साम्बा ततोऽजनि ।
तस्यै पाञ्चालराजः स दशार्णाधिपतेः सुताम् ।
धात्र्यै न्यवेदयत् साऽथ तत्पित्रे सा न्यवेदयत् ।
विश्वस्य वाक्यं रुद्रस्य पुमानेवेति पार्षतः ।
अथ भार्यासमेतं तं पितरं चिन्तयाऽऽकुलम् ।
इति मत्वा वनायैव ययौ तत्र च तुम्बुरुः ।
स तस्या अखिलं श्रुत्वा कृपां चक्रे महामनाः ।
पुंसां स्त्रीत्वं भवेत् क्वापि तथाऽप्यन्ते पुमान् भवेत् ।
अतः शिववरेऽप्येषां जज्ञे योषैव नान्यथा ।
नास्या देहः पुंस्त्वमाप नच पुंसाऽनधिष्ठिते ।
तस्यास्तद्देहसादृश्यं गन्धर्वस्य प्रसादतः ।
श्वो देहि मम देहं मे स्वं च देहं समाविश ।
अप्रत्युत्थायिनं तन्तुलीयमानं विलज्जया ।
यदा युद्धे मृतिं याति सा कन्या पुन्तनुस्थिता ।
तथाऽवसत् स गन्धर्वः कन्या पित्रोरशेषतः ।
परीक्ष्य तामुपायैश्च श्वशुरो लज्जितो ययौ ।
ययौ तेनैव देहेन पुंस्त्वमेव समाश्रिता ।
विचित्रवीर्यः प्रमदाद्वयं तत् सम्प्राप्य रेमेऽब्दगणान् सुसक्तः ।
आविर्बभूवाऽशु जगज्जनित्रो जनार्दनो जन्मजराभयापहः ।
तं भीष्मपूर्वैः परमादरार्चितं स्वभिष्टुतं चावददस्य माता ।
क्षेत्रे ततो भ्रातुरपत्यमुत्तममुत्पादयास्मत्परमादरार्थितः ।
ऋते रमां जातु (ममाङ्गयोगयोग्या)ममाङ्गसङ्गयोग्याऽङ्गना नैव सुरालयेऽपि ।
सा पूतदेहाऽथ च वैष्णवव्रतान्मत्तः समाप्नोतु सुतं वरिष्ठम् ।
सौम्यस्वरूपोऽप्यतिभीषणं मृषा तच्चक्षुषो रूपमहं प्रदर्शये ।
इतीरितेऽस्त्वित्युदितस्तयाऽगमत् कृष्णोऽम्बिकां सा तु भिया न्यमीलयत् ।
स मारुतावेशबलाद् बलाधिको बभूव राजा धृतराष्ट्रनामा ।
ज्ञात्वा तमन्धं पुनरेव कृष्णं माताऽब्रवीज्जनयान्यं गुणाढ्यम् ।
परावहो नाम मरुत् ततोऽभवद् वर्णेन पाण्डुः स हि नामतश्च ।
तस्मै तथा बलवीर्याधिकत्ववरं प्रादात् कृष्ण एवाथ पाण्डुम् ।
उक्त्वेति कृष्णं पुनरेव च स्नुषामाह त्वयाऽक्ष्णोर्हि निमीलनं पुरा ।
इतीरिताऽप्यस्य हि मायया सा भीता भुजिष्यां कुमतिर्न्ययोजयत् ।
तस्यां स देवोऽजनि धर्मराजो माण्डव्यशापाद् य उवाह शूद्रताम् ।
अयोग्यसम्प्राप्तिकृतप्रयत्नदोषात् समारोपितमेव शूले ।
नासत्यता तस्य च तत्र हेतुतः शापं गृहीतुं स तथैव चोक्त्वा ।
विद्यारतेर्विदुरो नाम चायं भविष्यति ज्ञानबलोपपन्नः ।
ज्ञात्वाऽस्य शूद्रत्वमथास्य माता पुनश्च कृष्णं प्रणता ययाचे ।
योग्यानि कर्माणि ततस्तु तेषां चकार भीष्मो मुनिभिर्यथावत् ।
ते सर्वविद्याप्रवरा बभूवुर्विशेषतो विदुरः सर्ववेत्ता ।
गवद्गणादास तथैव सूतात् समस्तगन्धर्वपतिः स तुम्बुरुः ।
विचित्रवीर्यस्य स सूतपुत्रः सखा च तेषामभवत् प्रियश्च ।
गान्धारराजस्य सुतामुवाह गान्धारिनाम्नीं सुबलस्य राजा ।
शूरस्य पुत्री गुणशीलरूपयुक्ता दत्ता सख्युरेव स्वपित्रा ।
कूर्मश्च नाम्ना मरुदेव कुन्तिभोजोऽथैनां वर्द्धयामास सम्यक् ।
तमाह राजा यदि कन्यकायाः क्षमिष्यसे शक्तितः कर्म कर्त्र्याः ।
चकार कर्म सा पृथा मुनेः सुकोपनस्य हि ।
स वत्सरत्रयोदशं तया यथावदर्चितः ।
ऋतौ तु सा समाप्लुता परीक्षणाय तन्मनोः ।
ततो न सा विसर्जितुं शशाक तं विना रतिम् ।
स तत्र जज्ञिवान् स्वयं द्वितीयरूपको विभुः ।
पुरा स वालिमारणप्रभूतदोषकारणात् ।
यथा ग्रहैर्विदूष्यते मतिर्नृणां तथैव हि ।
तथाऽपि रामसेवनाद्धरेश्च सन्निधानयुक् ।
स रत्नपूर्णमञ्जुषागतो विसर्जितो जले ।
नदीप्रवाहतो गतं ददर्श सूतनन्दनः ।
सूतेनाधिरथेन लालिततनुस्तद्भार्यया राधया ।
अथ कुन्ती दत्ता सा पाण्डोः सोऽप्येतया चिरं रेमे ।
अथ चर्तायननामा मद्रेशः शक्रतुल्यपुत्रार्थी ।
प्रह्लादावरजो यः सह्लादो नामतो हरेर्भक्तः ।
स मारुतावेशवशात् पृथिव्यां बलाधिकोऽभूद् वरतश्च धातुः ।
सा पाण्डुभार्यैव च पूर्वजन्मन्यभूत् पुनश्च प्रतिपादिताऽस्मै ।
अथाङ्गनारत्नमवाप्य तद् द्वयं पाण्डुस्तु भोगान् बुभुजे यथेष्टतः ।
भीष्मो हि राष्ट्रे धृतराष्ट्रमेव संस्थाप्य पाण्डुं युवराजमेव ।
भीष्माम्बिकेयोक्तिपरः सदैव पाण्डुः शशासावनिमेकवीरः ।
नैषा विरोधे कुरुपाण्डवानां तिष्ठेदिति व्यास उदीर्णसद्गुणः ।
सुतोक्तमार्गेण विचिन्त्य तं हरिं सुतात्मना ब्रह्मतया च सा ययौ ।
माता च सा विदुरस्याऽप लोकं वैरिञ्चमन्वेव गताऽम्बिकां सती ।
अम्बालिकाऽपि क्रमयोगतोऽगात् परां गतिं नैव तथाऽम्बिका ययौ ।
पाण्डुस्ततो राज्यभरं निधाय ज्येष्ठेऽनुजे चैव वनं जगाम ।
गृहाश्रमेणैव वने निवासं कुर्वन् स भोगान् बभुजे तपश्च ।
स कामतो हरिणत्वं प्रपन्नं दैवादृषिं ग्राम्यकर्मानुषक्तम् ।
न्यसिष्णुरुक्तः पृथया स नेति प्रणामपूर्वं न्यवसत् तथैव ।
तपो नितान्तं स चचार ताभ्यां समन्वितः कृष्णपदाम्बुजाश्रयः ।
एतस्मिन्नेव काले कमलभवशिवाग्रेसराः शक्रपूर्वा ।
ऊचुः परं पुरुषमेनमनन्तशक्तिं सूक्तेन तेऽब्जजमुखा अपि पौरुषेण ।
दुस्सङ्गतिर्भवति भारवदेव देव नित्यं सतामपि हि नः शृणु वाक्यमीश ।
आसीत् पुरा दितिसुतैरमरोत्तमानां सङ्ग्राम उत्तमगजाश्वरथद्विपद्भिः ।
तेषां रथाश्च बहुनल्वपरिप्रमाणा देवासुरप्रवरकार्मुकबाणपूर्णाः ।
जघ्नुर्गिरीन्द्रतलमुष्टिमहास्त्रशस्त्रैश्चक्रुर्नदीश्च रुधिरौघवहा महौघम् ।
अथाऽत्मसेनामवमृद्यमानां वीक्ष्यासुरः शम्बरनामधेयः ।
मायासहस्रेण सुराः समर्दिता(विमर्दिताः) रणे विषेदुः शशिसूर्यमुख्याः ।
समस्तमायापहया तयैव वराद् रमेशस्य सदाऽप्यसह्यया ।
यमेन्दुसूर्यादिसुरास्ततोऽसुरान् निजघ्नुराप्यायितविक्रमास्तदा ।
तस्मिन् हते दानवलोकपाले दितेः सुता दुद्रुवुरिन्द्रभीषिताः ।
वरादजेयेन विधातुरेव सुरोत्तमांस्तेन शरैर्निपातितान् ।
अस्त्राणि तस्यास्त्रवरैर्निवार्य चिक्षेप तस्योरसि काञ्चनीं गदाम् ।
अथाऽससादाऽशु स कालनेमिस्त्वदाज्ञया यस्य वरं ददौ पुरा ।
तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य मारुतस्त्वदाज्ञया दत्तवरस्त्वयैव ।
तमस्त्रशस्त्राणि बहूनि बाहुभिः प्रवर्षमाणं भुवनाप्तदेहम् ।
ततोऽसुरास्ते निहता अशेषास्त्वया त्रिभागा निहताश्चतुर्थम् ।
राज्ञां महावंशसुजन्मनां तु तेषामभूद् धर्ममतिर्विपापा ।
त्वद्भक्तिलेशाभियुतः सुकर्मा व्रजेन्न पापां तु गतिं कथञ्चित् ।
धर्मस्य मिथ्यात्वभयाद् वयं त्वामथापिवा दैत्यशुभाप्तिभीषा ।
य उग्रसेनः सुरगायकः स जातो यदुष्वेष तथाऽभिधेयः ।
यस्त्वत्प्रियार्थं न हतो हि वायुना भवत्प्रसादात् परमीशिताऽपि ।
स औग्रसेने जनितोऽसुरेण क्षेत्रे हि तद्रूपधरेण मायया ।
जित्वा जलेशं च हृतानि येन रत्नानि यक्षाश्च जिताः शिवस्य ।
स विप्रचित्तिश्च जरासुतोऽभूद् वराद् विधातुर्गिरिशस्य चैव ।
निवारयामास न कंसमुद्धतं शक्तोऽपि यो यस्य बले न कश्चित् ।
हतौ पुरा यौ मधुकैटभाख्यौ त्वयैव हंसो डिभकश्च जातौ ।
अन्येऽपि भूमावसुराः प्रजातास्त्वया हता ये सुरदैत्यसङ्गरे ।
व्यासावतारे निहतस्त्वयायः कलिः सुशास्त्रोक्तिभिरेव चाद्य ।
रामात्मना(रामावतारे) ये निहताश्च राक्षसा दृष्ट्वा बलं तेऽपि तदा तवाद्य ।
ये केशव त्वद्बहुमानयुक्तास्तथैव वायौ नहि ते तमोऽन्धम् ।
नितान्तमुत्पाद्य भवद्विरोधं तथाच (तथैव) वायौ बहुभिः प्रकारैः ।
हतौ च यौ रावणकुम्भकर्णौ त्वया त्वदीयौ प्रतिहारपालौ ।
यौ तौ तवारी ह तयोः प्रविष्टौ दैत्यौ तु तावन्धतमः प्रवेश्यौ ।
आविश्य यो बलिमञ्जश्चकार प्रतीपमस्मासु तथा त्वयीश ।
मायामयं तेन विमानमग्र्यमभेद्यमाप्तं सकलैर्गिरीशात् ।
नासौ हतः शक्तिमताऽपि तत्र कृष्णावतारे स मयैव वध्यः ।
यदीयमारुह्य विमानमस्य पिताऽभवत् सौभपतिश्च नाम्ना ।
स चाद्य तस्मात् तपसो निवृत्तो जरासुतस्यानुमते स्थितो हि ।
यो बाणमाविश्य महासुरोऽभूत् स्थितः स नाम्ना(सनाम्ना) प्रथितोऽपि बाणः ।
अतस्त्वया भुव्यवतीर्य देवकार्याणि कार्याण्यखिलानि देव ।
त्वमेव नित्योदितपूर्णशक्तिस्त्वमेव नित्योदितपूर्णचिद्धनः ।
इतीरितो देववरैरुदारगुणार्णवोऽक्षोभ्यतमामृताकृतिः ।
स मेरुमाप्याऽह चतुर्मुखं प्रभुर्यत्र त्वयोक्तोऽस्मि हि तत्र सर्वथा ।
ब्रह्मा प्रणम्याऽह तमात्मकारणं प्रादां पुराऽहं वरुणाय गाः शुभाः ।
मात्रा त्वदित्या च तथा सुरभ्या प्रचोदितेनैव हृतासु तासु ।
शूरात् स जातो बहुगोधनाढ्यो भूमौ यमाहुर्वसुदेव इत्यपि ।
तत् त्वं भवस्वाऽशु च देवकीसुतस्तथैव यो द्रोणनामा वसुः सः ।
तस्मै वरः स मया सन्निसृष्टः स चाऽस नन्दाख्य उतास्य भार्या ।
तौ देवकीवसुदेवौ च तेपतुस्तपस्त्वदीयं सुतमिच्छमानौ ।
इतीरिते सोऽब्जभवेन केशवस्तथेति चोक्त्वा पुनराह देवताः ।
अथावतीर्णाः सकलाश्च देवता यथायथैवाऽह हरिस्तथातथा ।
पापेन तेनापहृतो हि हस्ती शिवप्रदत्तः सुप्रतीकाभिधानः ।
महासुरस्यांशयुतः स एव रुद्रावेशाद् बलवानस्त्रवांश्च ।
अभूच्छिनिर्नाम यदुप्रवीरस्तस्याऽत्मजः सत्यक आस तस्मात् ।
यः संवहो नाम मरुत् तदंशश्चक्रस्य विष्णोश्च बभूव तस्मिन् ।
स पाञ्चजन्यांशयुतो मरुत्सु तथाऽंशयुक्तः प्रवहस्य वीरः ।
ये पाण्डवानामभवन् सहाया देवाश्च देवानुचराः समस्ताः ।
लिङ्गं सुराणां हि परैव भक्तिर्विष्णौ तदन्येषु च तत्प्रतीपता ।
द्वादशोऽध्यायः
औं ॥ बभूव गन्धर्वमुनिस्तु देवकः स आस सेवार्थमथाऽहुकाद्धरेः ।
अन्याश्च याः काश्यपस्यैव भार्या ज्येष्ठां तु तामाहुक आत्मपुत्रीम् ।
सैवादितिर्वसुदेवस्य दत्ता तस्या रथं माङ्गलं (मङ्गलं) कंस एव ।
(विनाऽपराधं न) विनापराधाद्धि ततो गरीयसो न मातुलो वध्यतामेति विष्णोः ।
मृत्युस्तवास्या भविताऽष्टमः सुतो मूढेति चोक्तो जगृहे कृपाणाम् ।
षट् कन्यकाश्चावरजा गृहीतास्तेनैव ताभिश्च मुमोद शूरजः ।
राज्ञश्च काशिप्रभवस्य कन्यां स पुत्रिकापुत्रकधर्मतोऽवहत् ।
यो मन्यते विष्णुरेवाहमित्यसौ पापो वेनः पौण्ड्रको वासुदेवः ।
धुन्धुर्हतो यो हरिणा मधोः सुत आसीत् सुतायां करवीरेश्वरस्य ।
ततस्तु तौ वृष्णिशत्रू बभूवतुर्ज्येष्ठौ सुतौ शूरसुतस्य नित्यम् ।
येये हि देवाः पृथिवीं गतास्ते सर्वे शिष्याः सत्यवतीसुतस्य ।
मरीचिजाः षण् मुनयो बभूवुस्ते देवलं प्राहसन् कार्श्यहेतोः ।
धाता प्रादाद् वरमेषां तथैव शशाप तान् क्ष्मातले सम्भवध्वम् ।
दुर्गा तदा तान् भगवत्प्रचोदिता प्रस्वापयित्वा प्रचकर्ष कायात् ।
तदा मुनीन्द्रसंयुतः सदो विधातुरुत्तमम् ।
यधर्थमेव जायते पुमान् हि तस्य सोऽकृतेः ।
प्रधानदेवताजनौ (प्रधानदेवताजने) नियोक्तुमात्मनः प्रियाम् ।
अतोऽन्यथा सुतानृते व्रजन्ति सद्गतिं नराः ।
तदा कलिश्च राक्षसा बभूवुरिन्द्रजिन्मुखाः ।
तदस्य(तदास्य) सोऽनुजोऽशृणोन्मुनीन्द्रदूषितं च तत् ।
य एव मद्गुणाधिकस्ततः सुतं समाप्नुहि ।
तदस्य कृच्छ्रतो वचः पृथाऽग्रहीज्जगाद च ।
न ते सुरानृते समः सुरेषु केचिदेव च ।
वरं समाश्रिता पतिं व्रजेत या ततोऽधमम् ।
कृते पुरा सुरास्तथा सुराङ्गनाश्च केवलम् ।
मनोवचःशरीरतो यतो हि ताः पतिव्रताः ।
स्वभर्तृभिर्विमुक्तिगाः सहैव ता भवन्ति हि ।
अनावृताश्च तास्तथा यथेष्टभर्तृकाः सदा ।
सुरस्त्रियोऽतिकारणैर्यदऽन्यथा स्थितास्तदा ।
अयुक्तमुक्तवांस्ततो भवांस्तथाऽपि ते वचः ।
इतीरितोऽब्रवीन्नृपो न धर्मतो विना भुवः ।
स धर्मजः सुधार्मिको भवेद्धि सूनुरुत्तमः ।
ततश्च सद्य एव सा सुषाव पुत्रमुत्तमम् ।
यमे सुते तु कुन्तितः प्रजात एव सौबली ।
स्वगर्भपातने कृते तया जगाम केशवः ।
शतात्मना विभेदिताः शतं सुयोधनादयः ।
स देवकार्यसिद्धये ररक्ष गर्भमीश्वरः ।
कलिः सुयोधनोऽजनि प्रभूतबाहुवीर्ययुक् ।
पुरा हि मेरुमूर्धनि त्रिविष्टपौकसां वचः ।
ततस्तु ते त्रिलोचनं तपोबलादतोषयन् ।
वरादुमापतेस्ततः कलिः स देवकण्टकः ।
अवध्य एव सर्वतः सुयोधने समुत्थिते ।
स दुःखशासनोऽभवत् ततोऽतिकायसम्भवः ।
स चित्रसेननामकस्तथाऽपरे च राक्षसाः ।
समस्तदोषरूपिणः शरीरिणो हि तेऽभवन् ।
कुहूप्रवेशसंयुता ययाऽऽर्जुनेर्वधाय हि ।
तयोदितो हि सैन्धवो बभूव कारणं वधे ।
तथाऽऽस निर्ऋथाभिधोऽनुजः स निर्ऋतेरभूत् ।
स चाऽम्बिकेयवीर्यजः सुयोधनादनन्तरः ।
युधिष्ठिरे जात उवाच पाण्डुर्बाह्वोर्बलाज्ज्ञानबलाच्च धर्मः ।
यज्ञाधिको ह्यश्वमेधो मनुष्यदृश्येषु तेजस्स्वधिको हि भास्करः ।
विशेषतोऽप्येष पितैव मे प्रभुर्व्यासात्मना विष्णुरनन्तपौरुषः ।
इतीरिते पृथयाऽऽहूतवायुसंस्पर्शमात्रादभवद् बलद्वये ।
स वायुरेवाभवदत्र भीमनामा भृता माः सकला हि यस्मिन् ।
तज्जन्ममात्रेण धरा विदारिता शार्दूलभीताज्जननीकराद् यदा ।
तस्मिन् प्रजाते रुधिरं प्रसुस्रुवुर्महासुरा वाहनसैन्यसंयुताः ।
अवर्द्धतात्रैव वृकोदरो वने मुदं सुराणामभितः प्रवर्द्धयन् ।
स तत्र मासत्रयमुष्य दुर्गयाऽपवाहितो रोहिणीगर्भमाशु ।
स नामतो बलदेवो बलाढ्यो बभूव तस्यानु जनार्दनः प्रभुः ।
यः सत्सुखज्ञानबलैकदेहः समस्तदोषस्पर्शोज्झितः सदा ।
न शुक्लरक्तप्रभवोऽस्य कायस्तथाऽपि तत्पुत्रतयोच्यते मृषा ।
आविश्य पूर्वं वसुदेवमेव विवेश तस्मादृतुकाल एव ।
यथा पुरा स्तम्भत आविरासीदशुक्लरक्तोऽपि नृसिंहरूपः ।
पितृक्रमं मोहनार्थं समेति न तावता शुक्लतो रक्ततश्च ।
अनेकसूर्याभकिरीटयुक्तो विद्युत्प्रभे कुण्डले धारयंश्च ।
स कञ्जयोनिप्रमुखैः सुरैः स्तुतः पित्रा च मात्रा च जगाद शूरजम् ।
तदैव जाता च हरेरनुज्ञया दुर्गाभिधा श्रीरनु नन्दपत्न्याम् ।
संस्थाप्य तं तत्र तथैव कन्यकामादाय तस्मात् स्वगृहं पुनर्ययौ ।
गर्भं देवक्यां सप्तमं मेनिरे हि लोकाः सुतं त्वष्टमं तां ततः सः ।
सा तद्धस्तात् क्षिप्रमुत्पत्य देवी खेऽदृश्यतैवाष्टभुजा समग्रा ।
उवाच चार्या तव मृत्युरत्र क्वचित् प्रजातो हि वृथैव पाप ।
उक्त्वेति कंसं पुनरेव देवकीतल्पेऽशयद् बालरूपैव दुर्गा ।
श्रुत्वा तयोक्तं तु तदैव कंसः पश्चात्तापाद् वसुदेवं सभार्यम् ।
आनीय कंसोऽथ गृहे स्वमन्त्रिणः प्रोवाच कन्यावचनं समस्तम् ।
तथेति तांस्तत्र नियुज्य कंसो गृहं स्वकीयं प्रविवेश पापः ।
अथ प्रभाते शयने शयानमपश्यतामब्जदलायताक्षम् ।
मेनात एतौ निजपुत्रमेनं स्रष्टारमब्जप्रभवस्य चेशम् ।
सुवर्णरत्नाम्बरभूषणानां बहूनि गोजीविगणाधिनाथः ।
गतेषु तत्रैव दिनेषु केषुचिज्जगाम कंसस्य गृहं स नन्दः ।
सहाऽगता तेन तदा यशोदा सुषाव दुर्गामथ तत्र शौरिः ।
निरुष्य तस्मिन् यमुनातटे स मासं ययौ द्रष्टुकामो नरेन्द्रम् ।
याह्युत्पाताः सन्ति तत्रेत्युदीरितो जगाम शीघ्रं यमुनां स नन्दः ।
सा पूतना नाम निजस्वरूपमाच्छाद्य रात्रौ शुभरूपवच्च ।
तीरे भगिन्यास्तु यमस्य वस्त्रगृहे शयानं पुरुषोत्तमं तम् ।
तन्मायया धर्षिता निद्रया च न्यवारयन्नैव हि नन्दजाया ।
मृता स्वरूपेण सुभीषणेन पपात सा व्याप्य वनं समस्तम् ।
सा ताटका चोर्वशिसम्प्रविष्टा कृष्णावध्यानान्निरयं जगाम ।
सा तुम्बुरोः सङ्गत आविवेश रक्षस्तनुं शापतो वित्तपस्य ।
यदाऽऽप देवश्चतुरः स मासांस्तदोपनिष्क्रामणमस्य चाऽसीत् ।
तदा शयानः शकटस्य सोऽधः पदाऽक्षिपत् तं दितिजं निहन्तुम् ।
क्षिप्तोऽनसिस्थः शकटाक्षनामा स विष्णुनेत्वा सहितः पपात ।
ससम्भ्रमात् तं प्रतिगृह्य शङ्क्या कृष्णं यशोदा द्विजवर्यसूक्तिभिः ।
हत्वा तु तं कंसभृत्यं स कृष्णः शिश्ये पुनः शिशुवत् सर्वशास्ता ।
विवर्द्धमाने लोकदृष्ट्यैव कृष्णे पाण्डुः पुनः प्राह पृथामिदं वचः ।
यदैक एवातिबलोपपन्नो भवेत् तदा तेन परावमर्दे ।
शस्त्रास्त्रविद् वीर्यवान् नौ सुतोऽन्यो भवेद् देवं तादृशमाह्वयातः ।
नवै सुपर्णः सुतदो नरेषु प्रजायते वाऽस्य यतस्तथाऽऽज्ञा ।
अतो महेन्द्रो बलवाननन्तरस्तेषां समाह्वानमिहार्हति स्वराट् ।
स चार्जुनो नाम नरांशयुक्तो विष्ण्वावेशी बलवानस्त्रवेत्ता ।
बृहस्पतिः पूर्वमभूद्धरेः पदं संसेवितुं पवनावेशयुक्तः ।
द्रोणात्मकं नातितरां स्वसेवकं कुर्याद्धरिर्मामिति भूय एव ।
बृहस्पतेरेव स सर्वविद्या अवाप मन्त्री निपुणः सर्ववेत्ता ।
मरुत्सु नाम प्रतिभो यदुष्वभूत् स चेकितानो हरिसेवनार्थम् ।
ततोऽब्दतो भूभरसंहृतौ हरेरङ्गत्वमाप्तुं गिरिशोऽजनिष्ट ।
स सर्वविद् बलवानस्त्रवेत्ता कृपस्वसायां द्रोणवीर्योद्भवोऽभूत् ।
यदा स मासद्वितयी बभूव तदा रोहिण्यां बलदेवोऽभिजातः ।
यदा हि पुत्रान् विनिहन्तुमेतौ सहैव बद्धौ गतिशृङ्खलायाम् ।
विनिश्चयार्थं देवकीगर्भजानामन्या भार्या धृतगर्भाः स कंसः ।
हेतोरेतस्माद् रोहिणी नन्दगेहे प्रसूत्यर्थं स्थापिता तेन देवी ।
यदा त्रिमासः स बभूव देवस्तदाऽऽविरासीत् पुरुषोत्तमोऽजः ।
विष्ण्वावेशी बलवान् यो गुणाधिकः स मे सुतः स्यादिति रोहिणी च ।
अवर्द्धतासौ हरिशुक्लकेशसमावेशी गोकुले रौहिणेयः ।
स प्राकृतं शिशुमात्मनमुच्चैर्विजानन्त्या मातुरादर्शनाय ।
साऽण्डं महाभूतमनोऽभिमानमहत्प्रकृत्यावृतमब्जजादिभिः ।
न्यमीलयच्चाक्षिणी भीतभीता जुगूह चाऽत्मानमथो रमेशः ।
कदाचित् तं लालयन्ती यशोदा वोढुं नाशक्नोद् भूरिभाराधिकार्ता ।
तृणावर्तो नामतः कंसभृत्यः सृष्ट्वाऽत्युग्रं चक्रवातं शिशुं तम् ।
पपात कृष्णेन हतः शिलातळे तृणावर्तः पर्वतोदग्रदेहः ।
अक्रुद्ध्यतां केशवोऽनुग्रहाय शुभं स्वयोग्यादधिकं निहन्तुम् ।
यस्मिन्नब्दे भाद्रपदे स मासे सिंहस्थयोर्गुरुरव्योः परेशः ।
जाताः सुतास्ते प्रवराः पृथायामेकाऽनपत्याऽहमतः प्रसादात् ।
इतीरितः प्राह पृथां स माद्र्यै दिशस्व मन्त्रं सुतदं वरिष्ठम् ।
उवाच माद्र्यै सुतदं मनुं च पुनः फलं ते न भविष्यतीति ।
सदाऽवियोगो दिविजेषु दस्रौ नचैतयोर्नामभेदः क्वचिद्धि।
इतीक्षन्त्याऽऽकारितावश्विनौ तौ शीघ्रं प्राप्तौ पुत्रकौ तत्प्रसूतौ ।
पुनर्मनोः फलवत्त्वाय माद्री सम्प्रार्थयामास पतिं तदुक्ता ।
अतो विरोधं च मदात्मजानां कुर्यादेषेत्येव भीतां न मां त्वम् ।
विशेषनाम्नैव समाहुताः सुरा (सुतान्) दद्युः सुरा इत्यविशेषितं ययोः ।
युधिष्ठिराद्येषु चतुर्षु वायुः समाविष्टः फल्गुनेऽथो विशेषात् ।
शृङ्गाररूपं केवलं दर्शयानो विवेश वायुर्यमजौ प्रधानः ।
शृङ्गाररूपो नकुले विशेषात् सुनीतिरूपः सहदेवं विवेश ।
सुपुल्लवाकारतनुर्हि कोमळः प्रायो जनैः प्रोच्यते रूपशाली ।
अप्राकृतानां तु मनोहरं यद् रूपं द्वात्रिंशल्लक्षणोपेतमग्र्यम् ।
अतीतेन्द्रा एव ते विष्णुषष्ठाः पूर्वेन्द्रोऽसौ यज्ञनामा रमेशः ।
युधिष्ठिरोऽसावथ नासत्यदस्रौ क्रमात् तावेतौ माद्रवतीसुतौ च ।
क्रमात् संस्कारान् क्षत्रियाणामवाप्य तेऽवर्द्धन्त स्वतवसो महित्वना ।
त्रयोदशोऽध्यायः
औं ॥ गर्गः शूरसुतोक्त्या व्रजमायात् सात्त्वतां पुरोधास्सः ।
ऊचे नन्द सुतोऽयं तव विष्णोर्नावमो गुणैः सर्वैः ।
इत्युक्तः स मुमोद प्रययौ गर्गोऽपि केशवोऽथाद्यः ।
स कदाचिच्छिशुभावं कुर्वन्त्या मातुरात्मनो भूयः ।
मात्रोपालब्ध ईशो मुखविवृतिमकर्नाम्ब मृद्भक्षिताऽहं ।
इति प्रभुः स लीलया हरिर्जगद् विडम्बयन् ।
कदाचिदीश्वरः स्तनं पिबन् यशोदया पयः ।
(स) प्रमथ्यमानदध्युरुप्रजातमिन्दुसन्निभम् ।
प्रजायते हि यत्कुले यथा युगं यथा वयः ।
इति स्वधर्ममुत्तमं दिवौकसां प्रदर्शयन् ।
नृतिर्यगादिरूपकः स बाल्ययौवनादि यत् ।
स विप्रराजगोपकस्वरूपकस्तदुद्भवाः ।
तथाऽप्यनन्यदेवतासमं निजं बलं प्रभुः ।
अथाऽत्तयष्टिमीक्ष्य तां स्वमातरं जगद्गुरुः ।
पुनः समीक्ष्य तच्छ्रमं जगाम तत्करग्रहम् ।
सदा विमुक्तमीश्वरं निबद्धुमञ्जसाऽऽददे ।
समस्तदामसञ्चयः सुसन्धितोऽप्यपूर्णताम् ।
अबन्धयोग्यतां प्रभुः प्रदर्श्य लीलया पुनः ।
सुतस्य मातृवश्यतां प्रदर्श्य धर्ममीश्वरः ।
पुरा धुनिश्चमुस्तथाऽपि पूतनासमन्वितौ ।
अनन्तरं तृणोद्भृमिस्तपोऽचरद् वरं च तम् ।
धुनिश्चमुश्च तौ तरू समाश्रितौ निषूदितौ ।
पुरा हि नारदान्तिके दिगम्बरौ शशाप सः ।
ततो हि तौ निजां तनुं हरेः प्रसादतः शुभौ ।
नलकूबरमणिग्रीवौ मोचयित्वा तु शापतः ।
वृन्दावनयियासुः स नन्दसूनुर्बृहद्वने ।
अनेककोटिसङ्घैस्तैः पीड्यमाना व्रजालयाः ।
इन्दिरापतिरानन्दपूर्णो वृन्दावने प्रभुः ।
स चन्द्रतो हसत्कान्तवदनेनेन्दुवर्चसा ।
दैत्यं स वत्सतनुमप्रमयः प्रगृह्य कंसानुगं हरवरादपरैरवध्यम् ।
स्कन्दप्रसादकवचः स मुखे चकार गोविन्दमग्निवदमुं प्रदहन्तमुच्चैः ।
तुण्डद्वयं यदुपतिः करपल्लवाभ्यां सङ्गृह्य चाऽशु विददार ह पक्षिदैत्यम् ।
एवं स देववरवन्दितपादपद्मो गोपालकेषु विहरन् भुवि षष्ठमब्दम् ।
ज्येष्ठं विहाय स कदाचिदचिन्त्यशक्तिर्गोगोपगोगणयुतो यमुनातटेषु (जलेषु) ।
(स) तं ब्रह्मणो वरबलादुरगं त्ववध्यं सर्वैरवार्यविषवीर्यमृते सुपर्णात् ।
तद्दृष्टिदिव्यसुधया सहसाऽभिवृष्टाः सर्वेऽपि जीवितमवापुरथोच्छशाखम् ।
‘सार्पह्रदः पुरुषसारनिपातवेगसङ्क्षोभितोरगविषोचच्छ्वसिताम्बुराशिः ।
तं यामुनह्रदविलोलकमाप्य नागः काल्यो निजैः समदशत् सह वासुदेवम्(भा\.पु\. १०\.१६\.६\-७) ।
उत्पातमीक्ष्य तु तदाऽखिलगोपसङ्घस्तत्राऽजगाम हलिना प्रतिबोधितोऽपि ।
तस्योन्नतेषु स फणेषु ननर्त कृष्णो ब्रह्मादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः ।
तच्चित्रताण्डवविरुग्णफणातपत्रं रक्तं वमन्तमुरु सन्नधियं नितान्तम् ।
ताभिः स्तुतः स भगवानमुना च तस्मै दत्त्वाऽभयं यमसहोदरवारितोऽमुम् ।
गोपैर्बलादिभिरुदीर्णतरप्रमोदैः सार्द्धं समेत्य भगवानरविन्दनेत्रः ।
इत्थं सुरासुरगणैरविचिन्त्यदिव्यकर्माणि गोकुलगतेऽगणितोरुशक्तौ ।
तद्गन्धतो नृपशुमुख्यसमस्तभूतान्यापुर्मृतिं बहुलरोगनिपीडितानि ।
सङ्कर्षणेऽपि तदुदारविषानुविष्टे कृष्णो निजस्पर्शतस्तमपेतरोगम् ।
दैत्यांश्च गोवपुष आत्तवरान् विरिञ्चान्मृत्यूज्झितानपि निपात्य ददाह वृक्षान् ।
सप्तोक्षणोऽतिबलवीर्ययुतानदम्यान् सर्वैर्गिरीशवरतो दितिजप्रधानान् ।
या पूर्वजन्मनि तपः प्रथमैव भार्या भूयासमित्यचरदस्य हि सङ्गमो मे ।
अग्रे द्विजत्वत उपावहदेष नीलां गोपाङ्गना अपि पुरा वरमापिरे यत् ।
तत्राथ कृष्णमवदन् सबलं वयस्याः पक्वानि तालसुफलान्यनुभोजयेति ।
विघ्नेशतो वरमवाप्य (स) सुदुष्टदैत्यो दीर्घायुरुत्तमबलः कदनप्रियोऽभूत् ।
तस्मिन् हते खरतरे खररूपदैत्ये सर्वे खराश्च खरतालवनान्तरस्थाः ।
सर्वान् निहत्य खररूपधरान् स दैत्यान् विघ्नेश्वरस्य वरतोऽन्यजनैरवध्यान् ।
पक्षद्वयेन विहरत्स्वथ गोपकेषु दैत्यः प्रलम्ब इति कंसविसृष्ट आगात् ।
भीतेन रोहिणिसुतेन हरिः स्तुतोऽसौ स्वाविष्टतामुपदिदेश बलाभिपूर्त्यै ।
तस्मिन् हते सुरगणा बलदेवनाम रामस्य चक्रुरतितृप्तियुता हरिश्च ।
कृष्णं कदाचिदतिदूरगतं वयस्या ऊचुः क्षुधाऽर्दिततरा वयमित्युदारम् ।
तान् प्राप्य काममनवाप्य पुनश्च गोपाः कृष्णं समापुरथ तानवदत् स देवः ।
ताः षड्विधान्नपरिपूर्णकराः समेताः प्राप्ता विसृज्य पतिपुत्रसमस्तबन्धून् ।
भुक्त्वाऽथ गोपसहितो भगवांस्तदन्नं रेमे च गोकुलमवाप्य समस्तनाथः ।
कृष्णोऽथ वीक्ष्य पुरुहूतमहप्रयत्नं गोपान् न्यवारयदविस्मरणाय तस्य ।
गोपांश्च तान् गिरिमहोऽस्मदुरुस्वधर्म इत्युक्तिसच्छलत आत्ममहेऽवतार्य ।
इन्द्रोऽथ विस्मृतरथाङ्गधरावतारो मेघान् समादिशदुरूदकपूगवृष्ट्यै ।
ताभिर्निपीडितमुदीक्ष्य स कञ्जनाभः सर्वं व्रजं गिरिवरं प्रसभं दधार ।
वृष्ट्वोरुवार्यथ निरन्तरसप्तरात्रं त्रातं समीक्ष्य हरिणा व्रजमश्रमेण ।
तुष्टाव चैनमुरुवेदशिरोगताभिर्गीर्भिः सदाऽगणितपूर्णगुणार्णवं तम् ।
त्वत्तो जगत् सकलमाविरभूदगण्यधाम्नस्त्वमेव परिपासि समस्तमन्ते ।
क्षन्तव्यमेव भवता मम बाल्यमीश त्वत्संश्रयोऽस्मि हि सदेत्यभिवन्दितोऽजः ।
गोविन्दमेनमभिषिच्य स गोगणेशो गोभिर्जगाम गुणपूर्णममुं प्रणम्य ।
कृष्णं ततः प्रभृति गोपगणा व्यजानन् नारायणोऽयमिति गर्गवचश्च नन्दात् ।
स्कन्दादुपात्तवरतो मरणादपेतं दृष्ट्वा च रामनिहतं बलिनं प्रलम्बम् ।
कात्यायनीव्रतपराः स्वपतित्वहेतोः कन्या उवाह भगवानपराश्च गोपीः ।
तास्वत्र तेन जनिता दशलक्षपुत्रा नारायणाह्वययुता बलिनश्च गोपाः ।
तास्तत्र पूर्ववरदानकृते रमेशो रामाद्(रामा) द्विजत्वगमनादपि पूर्वमेव ।
सम्पूर्णचन्द्रकरराजितसद्रजन्यां वृन्दावने कुमुदकुन्दसुगन्धवाते ।
रुद्रप्रसादकृतरक्ष उतास्य सख्युर्भृत्यो बली खलतरोऽपिच शङ्खचूडः ।
नाम्नाऽप्यरिष्ट उरुगायविलोमचेष्टो गोष्ठं जगाम वृषभाकृतिरप्यवध्यः ।
सोऽप्याससाद हरिमुग्रविषाणकोटिमग्रे निधाय जगृहेऽस्य विषाणमीशः ।
केशी (च) तु कंसविहितस्तुरगस्वरूपो गिर्यात्मजावरमवाप्य सदा विमृत्युः ।
तत्खादनाय कुमतिः स कृतप्रयासः शीर्णास्यदन्तदशनच्छदरुद्धवायुः ।
व्योमश्च नाम मयसूनुरजप्रसादाल्लब्धायुतायुरखिलान् विदधे बिले सः ।
कुर्वत्यनन्यविषयाणि दुरन्तशक्तौ कर्माणि गोकुलगतेऽखिललोकनाथे ।
श्रुत्वाऽतिकोपरभसोच्चलितः स कंसो बद्ध्वा सभार्यमथ शूरजमुग्रकर्मा ।
संसेवनाय स हरेरभवत् पुरैव नाम्ना किशोर इति यः सुरगायकोऽभूत् ।
सोऽक्रूर इत्यभवदुत्तमपूज्यकर्मा वृष्णिष्वथाऽस स हि भोजपतेश्च मन्त्री ।
आरुह्य तद्रथवरं भगवत्पदाब्जमब्जोद्भवप्रणतमन्तरमन्तरेण ।
सोऽचेष्टतात्र जगदीशितुरङ्गसङ्गलब्धोच्चयेन निखिलाघविदारणेषु ।
सोऽपश्यताथ जगदेकगुरुं समेतमग्रोद्भवेन भुवि गा अपि दोहयन्तम् ।
उत्थाप्य तं यदुपतिः सबलो गृहं स्वं नीत्वोपचारमखिलं प्रविधाय तस्मिन् ।
श्रुत्वा स कंसहृदि संस्थितमब्जनाभः प्रातस्तु गोपसहितो रथमारुरोह ।
संस्थाप्य तौ रथवरे जगताऽभिवन्द्यौ श्वाफल्किराश्ववततार यमस्वसारम् ।
नित्यं हि शेषमभिपश्यति सिद्धमन्त्रो दानेश्वरः स तु तदा ददृशे हरिं च ।
तत्रापि कृष्णमभिवीक्ष्य पुनर्निमज्य शेषोरुभोगशयनं परमं ददर्श ।
स्तुत्वा वरस्तुतिभिरव्ययमब्जनाभं सोऽन्तर्हिते भगवति स्वकमारुरोह ।
अग्रेऽथ दानपतिमक्षयपौरुषोऽसावीशो विसृज्य सबलः सहितो वयस्यैः ।
आसाद्य कुञ्जरगतं रजकं ययाचे वस्त्राणि कंसदयितं गिरिजावरेण ।
हत्वा तमक्षतबलो भगवान् प्रगृह्य वस्त्राणि चाऽत्मसमितानि बलस्य चादात् ।
ग्राह्याऽपहेयरहितैकचिदात्मसान्द्रस्वानन्दपूर्णवपुरप्ययशोषहीनः ।
मालामवाप्य च सुदामत आत्मतन्त्रस्तावक्षयोऽनुजगृहे निजपार्षदौ हि ।
सर्वेष्टपुष्टिमिह तत्र सरूपतां च कृष्णस्तयोर्वरमदादथ राजमार्गे ।
तेनार्थिता सपदि गन्धमदात् त्रिवक्रा तेनाग्रजेन सहितो भगवान् लिलिम्पे ।
पूर्णेन्दुवृन्दनिवहाधिककान्तिकान्तसूर्यामितोरुपरमद्युतिसौख्यदेहः ।
प्राप्याथ चाऽयुधगृहं धनुरीशदत्तं कृष्णः प्रसह्य जगृहे सकलैरभेद्यम् ।
तस्मिन् सुरासुरगणैरखिलैरभेद्ये भग्ने बभूव जगदण्डविभेदभीमः ।
आदिष्टमप्युरुबलं भगवान् स तेन सर्वं निहत्य सबलः प्रययौ पुनश्च ।
कंसोऽप्यतीव भयकम्पितहृत्सरोजः प्रातर्नरेन्द्रगणमध्यगतोऽधिकोच्चम् ।
संस्थाप्य नागमुरुरङ्गमुखे कुवल्यापीडं गिरीन्द्रसदृशं करिसादियुक्तम् ।
अक्षोहिणी गणितमस्य बलं च विंशदासीदसह्यमुरुवीर्यमनन्यवध्यम् ।
सप्तानुजा अपि हि तस्य पुरातना ये सर्वेऽपि कंसपृतनासहिताः स्म रङ्गे ।
कृष्णोऽपि सूर उदिते सबलो वयस्यैः सार्द्धं जगाम वररङ्गमुखं सुरेशैः ।
आयन् जगद्गुरुतमो बलिनं गजेन्द्रं रुद्रप्रसादपरिरक्षितमाश्वपश्यत् ।
क्षिप्तः स ईश्वरतमेन गिरीशलब्धाद् दृप्तो वराज्जगति सर्वजनैरवध्यः ।
विक्रीड्य तेन करिणा भगवान् स किञ्चिद्धस्ते प्रगृह्य विनिकृष्य निपात्य भूमौ ।
नागं ससादिनमवध्यमसौ निहत्य स्कन्धे विषाणमवसज्य सहाग्रजेन ।
विष्टे जगद्गुरुतमे बलवीर्यमूर्तौ रङ्गं मुमोद च शुशोष जनोऽखिलोऽत्र ।
रङ्गप्रविष्टमभिवीक्ष्य जगाद मल्लः कंसप्रियार्थमभिभाष्य जगन्निवासम् ।
राजैव दैवतमिति प्रवदन्ति विप्रा राज्ञः प्रियं कृतवतः परमा हि सिद्धिः ।
इत्युक्त आह भगवान् (अपहासपूर्वं) परिहासपूर्वमेवं भवत्विति स तेन तदाऽभियातः ।
उत्क्षिप्य तं गगनगं गिरिसन्निकाशमुद्भ्राम्य चाथ शतशः कुलिशक्षताङ्गम् (कुलिशाक्षताङ्गम्) ।
कृष्णं च तुष्टुवुरथो दिवि देवसङ्घा मर्त्या भुवि प्रवरमुत्तमपूरुषाणाम् ।
कूटश्च कोसल उत च्छलनामधेयो द्वौ तत्र कृष्णनिहतावपरो बलेन ।
ताभ्यां हतानभिसमीक्ष्य निजान् समस्तान् कंसो दिदेश बलमक्षयमुग्रवीर्यम् ।
श्रुत्वैव राजवचनं बलमक्षयं तदक्षोहिणीदशकयुग्ममनन्तवीर्यम् ।
जानन्नपीश्वरमनन्तबलं महेन्द्रः कृष्णं रथं निजमयापयदायुधाढ्यम् ।
स्वस्यन्दनं तु भगवान् स महेन्द्रदत्तमारुह्य सूतवरमातलिसङ्गृहीतम् ।
निःशेषतो विनिहते स्वबले स कंसश्चर्मासिपाणिरभियातुमियेष कृष्णम् ।
तं श्येनवेगमभितः प्रतिसञ्चरन्तं निश्छिद्रमाशु जगृहे भगवान् प्रसह्य ।
सञ्चालितेन मुकुटेन विकुण्डलेन कर्णद्वयेन विगताभरणोरसा च ।
उत्कृष्य तं सुरपतिः परमोच्चमञ्चादन्यैरजेयमतिवीर्यबलोपपन्नम् ।
देहे तु योऽभवदमुष्य रमेशबन्धुर्वायुः स कृष्णतनुमाश्रयदन्यपापम् ।
द्वेषात् स सर्वजगदेकगुरोः स्वकीयैः पूर्वप्रमापितजनैः सहितः समस्तैः ।
नित्यातिदुःखमनिवृत्ति सुखव्यपेतमन्धं तमो नियतमेति हरावभक्तः ।
यो वेत्ति निश्चितमतिर्हरिमब्जजेशपूर्वाखिलस्य जगतः सकलेऽपि काले ।
तस्मादनन्तगुणपूर्णममुं रमेशं निश्चित्य दोषरहितं परयैव भक्त्या ।
निहत्य कंसमोजसा विधातृशम्भुपूर्वकैः ।
सदैव मोदरूपिणो मुदोक्तिरस्य लौकिकी ।
अनन्तचित्सुखार्णवः सदोदितैकरूपकः ।
चतुर्दशोऽध्यायः
औं ॥ कृष्णो विमोच्य पितरावभिवन्द्य सर्ववन्द्योऽपि रामसहितः प्रतिपालनाय ।
नन्दोऽपि सान्त्ववचनैरनुनीय मुक्तः कृष्णेन तच्चरणपङ्कजमात्मसंस्थम् ।
कृष्णोऽप्यवन्तिपुरवासिनमेत्य विप्रं सान्दीपनिं सह बलेन ततोऽध्यगीष्ट ।
धर्मो हि सर्वविदुषामपि दैवतानां प्राप्ते नरेषु जनने नरवत् प्रवृत्तिः ।
गुर्वर्थमेष मृतपुत्रमदात् पुनश्च रामेण सार्द्धमगमन्मधुरां रमेशः ।
सर्वेऽपि ते पतिमवाप्य हरिं पुराऽभितप्ता हि भोजपतिना मुमुदुर्नितान्तम् ।
कृष्णाश्रयो वसति यत्र जनोऽपि तत्र वृद्धिर्भवेत् किमु रमाधिपतेर्निवासे ।
येनाधिवासमृषभो जगतां विधत्ते विष्णुस्ततो हि वरता सदने विधातुः ।
रक्षत्यजे त्रिजगतां परिरक्षकेऽस्मिन् सर्वान् यदून् मगधराजसुते स्वभर्तुः ।
श्रुत्वैव तन्मगधराज उरुप्ररूढबाह्वोर्बलेन नजितो युधि सर्वलोकैः ।
क्षुब्धोऽतिकोपवशतः स्वगदाममोघां दत्तां शिवेन जगृहे शिवभक्तवन्द्यः ।
अर्वाक् पपात च गदा मधुराप्रदेशात् सा योजनेन यदिमं प्रजगाद पृष्टः ।
शक्तस्य चापि हि गदाप्रविघातने तु शुश्रूषणं मदुचितं त्विति चिन्तयानः ।
क्षिप्ता तु सा भगवतोऽथ गदा जराख्यां तत्सन्धिनीमसुभिराशु वियोज्य पापाम् ।
राजा स्वमातृत उतो गदया च हीनः क्रोधात् समस्तनृपतीनभिसन्निपात्य ।
सर्वां पुरीं प्रतिनिरुद्ध्य दिदेश विन्दविन्दानुजौ भगवतः कुमतिः स दूतौ ।
लोकेऽप्रतीतबलपौरुषसाररूपस्त्वं ह्येक एष्यभवतो बलवीर्यसारम् ।
सोऽहं हि दुर्बलतमो बलिनां वरिष्ठं कृत्वैव दृष्टिविषयं विगतप्रतापः ।
साक्षेपमीरितमिदं बलदर्पपूर्णमात्मापहाससहितं भगवान् निशम्य ।
द्वारेषु सात्यकिपुरस्सरमात्मसैन्यं त्रिष्वभ्युदीर्य भगवान् स्वयमुत्तरेण ।
तस्येच्छयैव पृथिवीमवतेरुराशु तस्याऽयुधानि सबलस्य सुभास्वराणि ।
आरुह्य भूमयरथं प्रतियुक्तमश्वैर्वेदात्मकैर्धनुरधिज्यमथ प्रगृह्य ।
रामः प्रगृह्य मुसलं स हलं च यानमास्थाय सायकशरासनतूणयुक्तः ।
उद्वीक्ष्य कृष्णमभियान्तमनन्तशक्तिं राजेन्द्रवृन्दसहितो मगधाधिराजः ।
तं वै चुकोपयिषुरग्रत उग्रसेनं कृष्णो निधाय समगात् स्वयमस्य पश्चात् ।
पापापयाहि पुरतो मम राज्यकाम निर्लज्ज पुत्रवधकारण शत्रुपक्ष ।
आक्षिप्त इत्थममुनाऽथ स भोजराजस्तूणात् प्रगृह्य निशितं शरमाशु तेन ।
अन्यच्छरासनवरं प्रतिगृह्य कोपसंरक्तनेत्रमभियान्तमुदीक्ष्य कृष्णः ।
आयान्तमीक्ष्य भगवन्तमनन्तवीर्यं चेदीशपौण्ड्रमुखराजगणैः समेतः ।
शस्त्रास्त्रवृष्टिमभितो भगवान् विवृश्च्य शार्ङ्गोत्थसायकगणैर्विरथाश्वसूतम् ।
नैनं जघान भगवान् सुशकं च भीमे भक्तिं निजां प्रथयितुं यश उच्चधर्मम् ।
ये चापि हंसडिभकद्रुमरुग्मिमुख्या बाह्लीकभौमसुतमैन्दपुरस्सराश्च ।
छिन्नायुधध्वजपताकरथाश्वसूतवर्माण उग्रशरताडितभिन्नगात्राः ।
शोच्यां दशामुपगतेषु नृपेषु (सर्वेष्वस्तायुधेषु) सर्वेष्वात्तायुधेषु हरिणा युधि विद्रवत्सु ।
आधावतोऽस्य मुसलेन रथं बभञ्ज रामो गदामुरुतरोरसि सोऽपि तस्य ।
तौ चक्रतुः पुरु नियुद्धमपि स्म तत्र सञ्चूर्ण्य सर्वगिरिवृक्षशिलासमूहान् ।
श्रुत्वाऽथ शङ्खरवमम्बुजलोचनस्य विद्रावितानपि नृपानभिवीक्ष्य रामः ।
तेनाऽहतः शिरसि सम्मुमुहेऽतिवेलं बार्हद्रथो जगृह एनमथो हली सः ।
भीतेन तेन समरं भगवाननिच्छन् प्रद्युम्नमाश्वसृजदात्मसुतं मनोजम् ।
युद्ध्वा चिरं रणमुखे भगवत्सुतोऽसौ चक्रे निरायुधममुं स्थिरमेकलव्यम् ।
प्रद्युम्नमात्मनि निधाय पुनः स कृष्णः संहृत्य मागधबलं निखिलं शरौघैः ।
व्रीडानताच्छविमुखः सहितो नृपैस्तैर्बार्हद्रथः प्रतिययौ स्वपुरीं स पापः ।
जित्वा तमूर्जितबलं भगवानजेशशक्रादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः ।
वर्द्धत्सु पाण्डुतनयेषु चतुर्दशं तु जन्मर्क्षमास तनयस्य सहस्रदृष्टेः ।
तत्काल एव नृपतिः सह माद्रवत्या पुंस्कोकिलाकुलितफुल्लवनं ददर्श ।
जग्राह तामथ तया रममाण एव यातो यमस्य सदनं हरिपादसङ्गी ।
तेनैव मानुषमवाप्य रतिस्थ एव पञ्चत्वमाप रतिविघ्नमपुत्रतां च(हि) ।
माद्री पतिं मृतमवेक्ष्य रुराव दूरात् तच्छुश्रुवुश्च पृथया सह पाण्डुपुत्राः ।
पत्युः कलेवरमवेक्ष्य निशम्य माद्र्याः कुन्ती भृशं व्यथितहृत्कमलैव माद्रीम् ।
तेष्वागतेष्वधिक आस विराव एतं सर्वेऽपि शुश्रुवुर्ऋषिप्रवरा अथात्र ।
ते सन्निवार्य तु पृथामथ माद्रवत्या भर्तुः सहानुगमनं बहु चार्थयन्त्याः ।
भर्तुर्गुणैरनधिकौ तनयार्थमेव माद्र्या कृतौ (आकृतौ) सुरवरावधिकौ स्वतोऽपि ।
पाण्डोः सुता मुनिगणैः पितृमेधमत्र चक्रुर्यथावदथ तेन सहैव माद्री ।
पाण्डुश्च पुत्रकगुणैः स्वगुणैश्च साक्षात् कृष्णात्मजः सततमस्य पदैकभक्तः ।
पाण्डोः सुताश्च पृथया सहिता मुनीन्द्रैर्नारायणाश्रमत आशु पुरं स्वकीयम् ।
तूष्णीं स्थिते तु नृपतौ तनुजे द्युनद्याः क्षत्तर्युतात्त उरुमोदमतीव पापाः ।
न क्षेत्रजा अपि मृते पितरि स्वकीयैः सम्यङ् नियोगमनवाप्य भवाय योग्याः ।
एते हि धर्ममरुदिन्द्रभिषग्वरेभ्यो जाताः प्रजीवति पितर्युरुधामसाराः ।
वायोरदृश्यवचनं परिशङ्कमानेष्वाविर्बभूव भगवान् स्वयमब्जनाभः ।
तत्स्वीकृतेषु सकला अपि भीष्ममुख्या वैचित्रवीर्यसहिताः परिपूज्य सर्वान् ।
वैचित्रवीर्यतनयाः कृपतो महास्त्राण्यापुश्च पाण्डुतनयैः सह सर्वराज्ञाम् ।
पक्वोरुभोज्यफलसन्नयनाय वृक्षेष्वारूढराजतनयानभिवीक्ष्य भीमः ।
युद्धे नियुद्ध उत धावन उत्प्लवे च वारिप्लवे च सहितान् निखिलान् कुमारान् ।
सर्वान् प्रगृह्य विनिमज्जति वारिमध्ये श्रान्तान् विसृज्य हसति स्म स विष्णुपद्याम् ।
द्वेषं ह्यृते नहि हरौ तमसि प्रवेशः प्राणे च तेन जगतीमनु तौ प्रपन्नौ ।
दृष्ट्वाऽमितान्यथ करांसि मरुत्सुतेन नित्यं कृतानि तनया निखिलाश्च राज्ञाम् ।
येये हि तत्र नरदेवसुताः सुरांशाः प्रीतिं परां पवनजे निखिला अकुर्वन् ।
अस्मिन् हते विनिहता अखिलाश्च पार्थाः शक्यो बलाच्च न निहन्तुमयं बलाढ्यः ।
एवं कृते निहतकण्टकमस्य राज्यं दुर्योधनस्य हि भवेन्न ततोऽन्यथा स्यात् ।
एवं विचार्य विषमुल्बणमन्तकाभं क्षीरोदधेर्मथनजं तपसा गिरीशात् ।
सम्मन्त्र्य राजतनयैर्धृतराष्ट्रजैस्तद् दत्तं स्वसूदमुखतोऽखिलभक्ष्यभोज्ये ।
जीर्णे विषे कुमतयः परमाभितप्ताः प्रासादमाशु विदधुर्हरिपादतोये ।
दोषान् प्रकाशयितुमेव विचित्रवीर्यपुत्रात्मजेषु नृवरं प्रतिसुप्तमीक्ष्य ।
तत् कोटियोजनगभीरमुदं विगाह्य भीमो विजृम्भणत एव विवृश्च्य पाशान् ।
तं वीक्ष्य दुष्टमनसोऽतिविपन्नचित्ताः सम्मन्त्र्य भूय उरुनागगणानथाष्टौ ।
दुर्योधनेन पृथुमन्त्रबलोपहूतांस्तत्सारथिः फणिगणान् पवनात्मजस्य ।
क्षिप्त्वा सुदूरमुरुनागगणानथाष्टौ तद्वंशजान् स विनिहत्य पिपीलिकावत् ।
तत् तस्य (नैजबलमप्रमेयं) नैजबलमप्रतिमं निरीक्ष्य सर्वे क्षितीशतनया अधिकं विषेदुः ।
दद्भिर्विदश्य न विकारममुष्य कर्तुं शेकुर्भुजङ्गमवरा अपि सुप्रयत्नाः ।
स्वात्मावनार्थमधिकां स्तुतिमेव कृत्वा विष्णोः स दैत्यतनयो हरिणाऽवितोऽभूत् ।
नैसर्गिकं प्रियमिमं प्रवदन्ति विप्रा विष्णोर्नितान्तमपि सत्यमिदं ध्रुवं हि ।
कृष्णः किलैष च हरिर्यदुषु प्रजातः सोऽस्याऽश्रयः कुरुत तस्य बहु प्रतीपम् ।
तैः प्रेरिता नृपतयः पितरश्च तेषां साकं बृहद्रथसुतेन हरेः सकाशम् ।
तेनाऽगृहीतगजवाजिगजा नितान्तं शस्त्रैः परिक्षततनूभिरलं वमन्तः ।
एवं बृहद्रथसुतोऽपि सुशोच्यरूप आर्तो ययौ बहुश एव पुरं स्वकीयम् ।
एवं गतेषु बहुशो नतकन्धरेषु राजस्वजोऽपि मधुरां स्वपुरीं प्रविश्य ।
व्यर्थोद्यमाः पुनरपि स्म सधार्तराष्ट्रा भीमं निहन्तुमुरुयत्नमकुर्वताज्ञाः ।
प्राचीं दिशं प्रथममेव जिगाय पश्चाद् याम्यां जलेशपरिपालितया सहान्याम् ।
पूर्वस्तयोर्हि दमघोषसुतः प्रजातः प्राहुश्च यं नृपतयः शिशुपालनाम्ना ।
जित्वैव तावपि जिगाय च पौण्ड्रकाख्यं शौरैः सुतं सुतमजैदथ भीष्मकस्य ।
भागेत एव तनयस्य स एव वह्नेर्नाम्ना शुचेः स तु पिताऽस्य हि मित्रभागः ।
बन्धोर्निजस्य तु बलं सुपरीक्षमाणः शल्योऽपि तेन युयुधे विजितस्तथैव ।
तद्बाहुवीर्यपरिपालित इन्द्रसूनुः शेषान् नृपांश्च समजैद् बलवानयत्नात् ।
तद्बाहुवीर्यमथ वीक्ष्य मुमोद धर्मसूनुः समातृयमजो विदुरः सभीष्मः ।
कृष्णः सुयोधनमुखाक्रममाम्बिकेयं जानन् स्वपुत्रवशवर्तिनमेव गत्वा ।
सोऽयाद् गजाह्वयममुत्र विचित्रवीर्यपुत्रेण भीष्मसहितैः कुरुभिः समस्तैः ।
ज्ञात्वा स कुन्तिविदुरोक्तित आत्मना च मित्रारिमध्यमजनांस्तनयेषु पाण्डोः ।
पुत्रेषु पाण्डुतनयेषु च साम्यवृत्तिः कीर्तिं च धर्ममुरुमेषि तथाऽर्थकामौ ।
धर्मार्थकामसहितां च विमुक्तिमेषि तत्प्रीतितः सुनियतं विपरीतवृत्तिः ।
इत्थं समस्तकुरुमध्य उपात्तवाक्यो राजाऽपि पुत्रवशगो वचनं जगाद ।
एतन्निशम्य वचनं स तु यादवोऽस्य ज्ञात्वा मनोऽस्य कलुषं तव नैव पुत्राः ।
ज्ञानं तु भागवतमुत्तममात्मयोग्यं भीमार्जुनौ भगवतः समवाप्य कृष्णात् ।
प्रत्युद्यमो भगवताऽपि भवेद् गदायाः शिक्षा यदा भगवता क्रियते नचेमम् ।
रामोऽपि शिक्षितमरीन्द्रधरात् पुरोऽस्य भीमे ददावथ वराणि हरेरवाप ।
कृष्णोऽथ चौपगविमुत्तमनीतियुक्तं सम्प्रेषयन्निदमुवाच ह गोकुलाय ।
मत्तो वियोग इह कस्यचिदस्ति नैव यस्मादहं तनुभृतां निहतोऽन्तरेव ।
पूर्वं यदा ह्यजगरो निजगार नन्दं सर्वे न शेकुरथ तत्प्रविमोक्षणाय(तत्प्रतिमोक्षणाय) ।
पूर्वं स रूपमदतः प्रजहास विप्रान् नित्यं तपःकृशतराङ्गिरसो विरूपान् ।
नायं नरो हरिरयं परमः परेभ्यो विश्वेश्वरः सकलकारण आत्मतन्त्रः ।
नन्दं यदा च जगृहे वरुणस्य दूतस्तत्रापि मां जलपतेर्गृहमाशु यान्तम् ।
सन्दर्शितो ननु मयैव विकुण्ठलोको गोजीविनां स्थितिरपि प्रवरा मदीया ।
श्रुत्वोद्धवो निगदितं परमस्य पुंसो वृन्दावनं प्रति ययौ वचनैश्च तस्य ।
पञ्चदशोऽध्यायः
औं ॥ एवं प्रशासति जगत् पुरुषोत्तमेऽस्मिन् भीमार्जुनौ तु सहदेवयुतावनुज्ञाम् ।
सैरन्ध्रिकोदरभवः स तु नारदस्य शिष्यो वृकोदररथस्य बभूव यन्ता ।
तं पञ्चरात्रविदमाप्य सुसारथिं स भीमो मुमोद पुनराप परात्मविद्याम् ।
सर्वानभागवतशास्त्रपथान् विधूय मार्गं चकार स तु वैष्णवमेव शुभ्रम् ।
नित्यप्रभूतसुशुभप्रतिभोऽपि विष्णोः श्रुत्वा परां पुनरपि प्रतिभामवाप ।
व्यासादवाप परमात्मसतत्त्वविद्यां धर्मात्मजोऽपि सततं भगवत्प्रपन्नाः ।
यदा भरद्वाजसुतस्त्वसञ्चयी प्रतिग्रहोज्झो निजधर्मवर्ती ।
तस्मै माता पिष्टमालोड्य पातुं ददाति पीत्वैति तदेष नित्यम् ।
नृत्यन्तमेनं पाययामासुरेते पयः कदाचिद् रसमस्य सोऽवैत् ।
दृष्ट्वा रुवन्तं(रुदन्तं) सुतमात्मजस्य स्नेहान्नियत्यैव जनार्दनस्य ।
प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तः स रामं ययौ न विष्णोर्हि भवेत् प्रतिग्रहः ।
दृष्ट्वैवैनं जामदग्न्योऽप्यचिन्तयद् द्रोणं कर्तुं क्षितिभारापनोदे ।
तेषां वृद्धिः स्यात् पाण्डवार्थे हतानां मोक्षेऽपि सौख्यस्य न सन्ततिश्च ।
न देवानामाशतं पूरुषा हि सन्तानजाः प्रायशः पापयोग्याः ।
अव्युच्छिन्ने सकलानां सुराणां तन्तौ कलिर्नो भविता कथञ्चित् ।
एवं विचिन्त्याप्रतिमः स भार्गवो बभाष ईषत्स्मितशोचिषा गिरा ।
आत्मा विद्या शस्त्रमेतावदस्ति तेषां मध्ये रुचितं त्वं गृहाण ।
सर्वेशिता सर्वपरः स्वतन्त्रस्त्वमेव कोऽन्यः सदृशस्तवेश ।
सर्वोत्तमस्येश तवोच्चशस्त्रैः कार्यं किमस्माकमनुद्बलानाम् (अतद्बलानाम्)।
इतीरितस्तत्त्वविद्यादिकाः स विद्याः सर्वाः प्रददौ सास्त्रशस्त्राः ।
दानेऽर्द्धराज्यस्य हि तत्प्रतिज्ञां संस्मृत्य पूर्वामुपयातं सखायम् ।
न निर्धनो राजसखो भवेत यथेष्टतो गच्छ विप्रेति दैवात् ।
प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तेन सोऽयं मया प्राप्तो मत्पितुः शिष्यकत्वात् ।
सोऽयं पापो मामवज्ञाय मूढो दुष्टं वचोऽश्रावयदस्य दर्पम् ।
प्रतिग्रहाद् विनिवृत्तस्य चार्थः स्याच्छिष्येभ्यः कौरवेभ्यो ममात्र ।
विक्रीडतो धर्मसूनोस्तदैव सहाङ्गुलीयेन च कन्दुकोऽपतत् ।
निष्पत्य चोद्धृत्य समुत्पतिष्ये कूपादमुष्माद् भृशनीचादपि स्म ।
तदा कुमारानवदत् स विप्रो धिगस्त्रबाह्यां भवतां प्रवृत्तिम् ।
इतीरिता अस्त्रविदं कुमारा विज्ञाय विप्रं सुरपूज्यपौत्रम्(सुरपूज्यपौत्रात्) ।
स चाऽश्विषीकाभिरथोत्तरोत्तरं सम्प्रास्य दिव्यास्त्रबलेन कन्दुकम् ।
यथेष्टवित्ताशनपानमस्य धर्मात्मजः प्रतिजज्ञे सुशीघ्रम् ।
पप्रच्छुरेनं सहिताः कुमाराः कोऽसीति सोऽप्याह पितामहो वः ।
न राजगेहं स कदाचिदेति तेनादृष्टः स कुमारैः पुराऽतः ।
श्रुत्वा वृद्धं कृष्णवर्णं द्विजं तं महास्त्रविद्यामपि तां महामतिः ।
द्रोणोऽथ तानवदद् यो मदिष्टं कर्तुं प्रतिज्ञां प्रथमं करोति ।
उन्मादनादीनि स वेद कृष्णादस्त्राण्यनापत्सु न तानि मुञ्चेत् ।
भीष्मादिभिर्भविता सङ्गरो नस्तदा नाहं गुरुभिर्नित्ययोद्धा ।
न बुद्धिपूर्वं वर इन्दिरापतेरन्यत्र मे ग्राह्य इतश्च जिष्णुः ।
तत्प्रेरितेनार्जुनेन प्रतिज्ञा कृता यदा विप्रवरस्ततः परम् ।
स पक्षपातं च चकार तस्मिन् करोति चास्योरुतरां प्रशंसाम् ।
भीमः समस्तं प्रतिभाबलेन जानन् स्नेहं त्वद्वितीयं कनिष्ठे ।
नैवातियत्नेन ददर्श लक्षं शुश्रूषायां पार्थमग्रे करोति ।
तदा समीयुः सकलाः क्षितीशपुत्रा द्रोणात् सकलास्त्राण्यवाप्तुम् ।
अस्त्राणि चित्राणि महान्ति दिव्यान्यन्यैर्नृपैर्मनसाऽप्यस्मृतानि ।
नैतादृशाः पूर्वमासन् नरेन्द्रा अस्त्रे बले सर्वविद्यासु चैव ।
तदा कर्णोऽथैकलव्यश्च दिव्यान्यस्त्राण्याप्तुं द्रोणसमीपमीयतुः ।
कर्णोऽनवाप्य निजमीप्सितमुच्चमानो यस्मादवाप पुरुषोत्तमतोऽस्त्रवृन्दम् ।
स सर्ववेत्तुश्च विभोर्भयेन विप्रोऽहमित्यवददस्त्रवरातिलोभात् ।
अस्त्रज्ञचूळामणिमिन्द्रसूनुं विश्वस्य हन्तुं धृतराष्ट्रपुत्रः ।
ज्ञानं च भागवतमप्यपराश्च विद्या रामादवाप्य विजयं धनुरग्र्ययानम् ।
अङ्के निधाय स कदाचिदमुष्य रामः शिश्ये शिरो विगतनिद्र उदारबोधः ।
तत्राऽस राक्षसवरः स तु हेतिनामा काले महेन्द्रमनुपास्य हि शापतोऽस्य ।
कर्णः स कीटतनुगेन किरीटिनैव ह्यूरोरधस्तनत (ओपरिगात्वचः)औपरिगात्वचश्च ।
किं त्वं न चालयसि मां रुधिरप्रसेके प्राप्तेऽपि पावनविरोधिनि कोऽसि चेति ।
जात्याऽस्मि सूत उत ते तनयोऽस्मि सत्यं तेनास्मि विप्र इति भार्गववंशजोऽहम् ।
इत्युक्तमात्रवचने स तु कीटकोऽस्य रामस्य दृष्टिविषयत्वत एव रूपम् ।
अथाऽह रामस्तमसत्यवाचो न ते सकाशे मम वासयोग्यता ।
अस्पर्धमानं न कथञ्चन त्वां जेता कश्चित् स्पर्धमानस्तु यासि ।
याहीति तेनोक्त उदारकर्मणा कर्णो ययौ तं प्रणम्येशितारम् ।
ततः कदाचिद् धृतराष्ट्रपुत्रैः पाण्डोः सुता मृगयां सम्प्रयाताः ।
श्रुत्वा रावं सारमेयस्य दूराच्छरैर्मुखं शब्दवेधी पुपूरे ।
दृष्ट्वा चित्रं कुरवः पाण्डवाश्च द्रष्टुं कर्तारं मार्गयामासुरत्र ।
पैशाचमेवैष पिशाचकेभ्यः पूर्वं विवेदास्त्रवृन्दं निषादः ।
दृष्ट्वा विशेषं तममुष्य पार्थो द्रोणायोचे त्वद्वरो मे मृषाऽऽसीत् ।
तस्य प्रसादोपचितोरुशिक्षो निषादोऽदाद् दक्षिणाङ्गुष्ठमस्मै ।
पुनः कृपालू रैवतपर्वते तं द्रोणः प्राप्याऽदादस्त्रवराणि तस्मै ।
षोडशोऽध्यायः
औं ॥ काले त्वेतस्मिन् भूय एवाखिलैश्च नृपैर्युक्तो मागधो योद्धुकामः ।
सन्दर्शयन् बलिनामल्पसेनाद्युपस्कराणां बहलोपस्करैश्च ।
सोऽनन्तवीर्यः परमोऽभयोऽपि नीत्यै गच्छन् जामदग्न्यं ददर्श ।
तदा दुग्धाब्धौ संसृतिस्थैः सुराद्यैः पूजां प्राप्तुं स्थानमेषां च योग्यम् ।
तत्रासुरावेशममुष्य विष्णुः सन्दर्शयन् सुप्तिहीनोऽपि नित्यम् ।
देवाश्च तद्भावविदोऽखिलाश्च निमीलिताक्षाः शयनेषु शिश्यरे ।
नारायणे सर्वदेवैः समेते ब्रह्मादिभिर्हासमाने सुपर्णः ।
तत् तस्य शीर्ष्णि प्रतिमुच्य नत्वा खगः स्तुत्वा देवदेवं रमेशम् ।
किरीटं तत् कृष्णमूर्ध्नि प्रविष्टं तत्तुल्यमासीत् तस्य रूपेष्वभेदात् ।
पूर्वं प्राप्तान्येव दिव्यायुधानि पुनर्वैकुण्ठं लोकमितानि भूयः ।
सैवापरं रूपमास्थाय चाऽगाच्छ्रीरित्याख्यं सेन्दिरावेशमग्र्यम् ।
ताभी रामो मुमुदे तत्र तिष्ठञ्छशाङ्कपूगोद्रिक्तकान्तिः सुधामा ।
एवं तयोः क्रीडतोः स्वैरमत्र राजन्यवृन्दानुगतो जरासुतः ।
गिरिस्ताभ्यां पीडितः सन् निमग्नो भूमौ पद्भ्यां योजनैकादशं सः ।
सेनां प्रविष्टौ सर्वराजन्यवृन्दं व्यमथ्नतां देववरौ स्वशस्त्रैः ।
भौमात्मजो दन्तवक्रश्च रुग्मी सौभाधिपो मैन्दमैन्दानुजौ च ।
शस्त्रैरस्त्रैर्द्रुमपूगैः शिलाभिर्भक्ताश्च ये शल्यबाह्लीकमुख्याः ।
सर्वानेताञ्छरवर्षेण कृष्णो विसूतवाजिध्वजशस्त्रवर्मणः ।
हत्वा सेनां विंशदक्षोहिणीं तां त्रिभिर्युक्तां रुग्मिणं नैव कृष्णः ।
जरासुतो रौहिणेयेन युद्धं चिरं कृत्वा तन्मुसलेन पोथितः ।
तेनाऽहतः सुभृशं रौहिणेयः पपात मूर्च्छाभिगतः क्षणेन ।
तथाकृते बलभद्रे तु कृष्णो गदामादाय स्वामगान्मागधेशम् ।
अथोत्तस्थौ रौहिणेयः सहैव समुत्तस्थौ मागधोऽप्यग्र्यवीर्यः ।
अथाब्रवीद् वायुरेनं न राम त्वया हन्तुं शक्यते मागधोऽयम् ।
अन्यो हन्ता बलवानस्य चेति श्रुत्वा ययौ बलभद्रो विमुच्य ।
तेनाऽहतः स्रस्तसमस्तगात्रः पपात मूर्च्छाभिगतः स राजा ।
ययौ शिष्टै राजभिः संयुतश्च पुरं जीवेत्येव कृष्णेन मुक्तः ।
कृष्णो जित्वा मागधं रौहिणेययुक्तो ययौ दमघोषेण सार्द्धम् ।
यामः पुरं करिवीराख्यमेव महालक्ष्म्याः क्षेत्रसन्दर्शनाय ।
गन्धर्वोऽसौ दनुनामा नरोऽभूत् तस्मात् कृष्णे भक्तिमांश्चाऽस राजा ।
सूर्यप्रदत्तं रथमारुह्य दिव्यं वरादवध्यस्तिग्मरुचेः स कृष्णम् ।
द्विधा कृत्वा देहमस्यारिणा च पुत्रं भक्तं तस्य राज्येऽभिषिच्य ।
नीतिं बलिष्ठस्य विहाय सेनां दूराद् युद्धं युद्धं दर्शयित्वैव गुप्त्यै ।
सप्तदशोऽध्यायः
औं ॥ गतेऽथ चेदिपे स्वकं पुरं जनार्दनोऽशृणोत् ।
स रुक्मिनामकोऽग्रजः श्रियो(श्रिया) द्विषन् रमापतिम् ।
प्रघोषिते स्वयंवरेऽथ तेन मागधादयः ।
तदा जगाम केशवो जवेन कुण्डिनं पुरम् ।
पतत्रवायुनाऽस्य ते नरेश्वराः प्रपातिताः ।
किमत्र नः कृतं भवेत् सुखाय हीति तेऽब्रुवन् ।
जिता वयं च सर्वशोऽमुनैकलेन संयुगे ।
अमुष्य चाग्रजः पुरा निहन्तुमुद्यतो हि माम् ।
किमस्य (चोच्यते)तूच्यते बलं वयं तृणोपमाः कृताः ।
किमत्र कुर्वतां सुखं भवेदुदीर्णसङ्कटे ।
अथाऽह चेदिभूपतिः सदन्तवक्रको वचः ।
शृणुष्व राजसत्तम प्रभुं शिवस्वयम्भुवोः ।
तथाऽऽवयोश्च दर्शने भवेत् कदाचिदूर्जिता ।
न कारणं च विद्महे न संशयः परो हरिः ।
इदं हि नः शुभप्रदं नचान्यथा शुभं क्वचित् ।
अथ प्रहस्य सौभराड् वचो जगाद मागधम् ।
न तन्मृषा हरिः स्वयं जनार्दनो वधाय नः ।
स्वधर्म एष नः सदा दृढप्रतीपता हरौ ।
शिवश्च नः परा गतिर्गुरुर्भवानरिर्हरेः ।
तथैव रुक्मिपूर्वकाः करूशचेदिपौ च तौ ।
सदा प्रतीपकारिणौ भवाव कृष्ण इत्यपि ।
पुनश्च ते त्वमन्त्रयन् सहैव पापबुद्धयः ।
अयं त्रिलोकसुन्दरोऽनुरूपिणी च रुक्मिणी ।
समस्तवेदिनां वरं जितारिमग्र्यरूपिणम् ।
वयं च मानसङ्क्षयं नितान्तमाप्नुमस्तदा ।
अतः स्वयंवरे यथा न सङ्गमो हरेर्भवेत् ।
अतो न देयमस्य नः सुभूभुजां समागमे ।
नचाऽस्यति क्षितौ क्वचिद् विमानितः पुरो हि नः ।
स दर्पमानसंयुतः क्रुधा प्रयास्यति ध्रुवम् ।
इति स्म सर्वभूभृतां विनिश्चयं सकैशिकः ।
प्रणम्य पादपद्मयोर्निजं गृहं प्रवेश्य च ।
अथाऽगमच्छतक्रतोर्वचः प्रगृह्य भूभुजः ।
अहं प्रियः शचीपतेः सदाऽस्य चाक्षिगोचरः ।
समस्तराजसत्पतिर्हरिर्न चान्य इत्यपि ।
अतोऽन्यथा शिरस्यहं निपातयामि वोऽशनिम् ।
तदीरितं निशम्य ते पुनः सुतप्तचेतसः ।
पुरा बिभेति नः सदा प्रतिप्रति स्म वासवः ।
अदृश्य एव देवराड् यदि स्म वज्रमुत्सृजेत् ।
पुरा दिविस्थितस्य च प्रमर्दने वयं क्षमाः ।
अतोऽभिषेचनाद् यदीह शार्ङ्गिणः शचीपतिः ।
अतोऽन्यथा दनुर्यथा वरादमृत्युकोऽपि सन् ।
तथैव कृष्णसंश्रयात् स नः शचीपतिर्नयेत् ।
समस्तशो जरासुतादिभिः कृतेऽभिषेचने ।
समाश्रयं च केशवं तदैव जीवनार्थिनः ।
इतीक्ष्य (उदीक्ष्य) पाकशासनोऽवदज्जरासुतादिकान् ।
ततस्तु तान् विनाऽपरेऽधिराजराज इत्यमुम् ।
अतः शचीपतिर्निजं वरासनं हरेरदात् ।
करे प्रगृह्य केशवो न्यवेशयत् सहाऽसने ।
अथाखिला नरेश्वरा मुनीन्द्रसंयुता हरिम् ।
विरिञ्चशर्वपूर्वकैरभिष्टुतः सुरादिभिः ।
अथाऽह भीष्मकं प्रभुः स्वयंवरः किल त्वया ।
इयं रमा तवाऽत्मजा बभूव तां (हरेर्नच) हरेर्न चेत् ।
हिताय चैतदीरितं तवान्यथा न चिन्तय ।
उदीर्य चैवमीश्वरश्चकार हाऽविरात्मनः ।
अनन्ततेज(अनेकतेज) आततं विसङ्ख्यरूपसंयुतम् ।
ज्वलत्सुकौस्तुभप्रभाऽभिभासकं शुभाम्बरम् ।
अनन्तरूपिणीं परां मनुष्यदृष्टितोऽधिकाम् ।
तदद्भुतं समीक्ष्य तु प्रभीत आशु भीष्मकः ।
पुनश्च विश्वरूपतां पिधाय पद्मलोचनः ।
अपाम्पतिश्च मैथिलः स्वयंवरं कृतावपि ।
स्वयंवरः क्षितेर्भुजां स्वधर्म इत्यतो द्वयोः ।
अतो हरौ प्रबोध्य तं गते कृपालुसत्तमे ।
यशश्च धर्ममुत्तमं विधित्सता वृकोदरे ।
वराच्छिवस्य मामयं न हन्तुमीष्ट उत्तमात् ।
मृधे मृधे जितोऽपि सन् दृढाशया पुनः पुनः ।
अतः पुनश्च भूमिपानुवाच बार्हद्रथः ।
अभूपतेर्न चाऽसनं प्रदेयमित्युदाहृतम् ।
अयं नृपोत्तमाङ्कणे महेन्द्रपीठमारुहत् ।
अतः पुनः कथं हरिं वयं जयेम चिन्त्यताम् ।
अयं हि दत्तपुत्रको म औरसाद् विशिष्यते ।
शिवागमेषु शिष्यकाः सरुक्मिसाल्वपौण्ड्रकाः ।
इतीरिते तु सौभराड् जगाद रुक्मिसंविदा ।
नचातिवर्तितुं क्षमः पिताऽस्य चेदिपाय ताम् ।
स्वयं तु कृष्ण एत्य नो विजित्य कन्यकां हरेत् ।
उपाय एष चिन्तितो मयाऽत्र मागधेश्वर ।
यदाऽस्य षण्ढतोदिता मुनेः पुरो हि तस्य च ।
चकार हि प्रतिश्रवं समार्जये सुतं द्रुतम् ।
यतो हि कृष्णसंश्रयाद् बतापहासिता वयम् ।
स चूर्णमायसं त्वदन् ददर्श चाब्दतः शिवम् ।
स विष्णुदैवतोऽपि सन् प्रविष्ट उल्बणासुरैः ।
तमार चाऽसुराप्सरा बलिष्ठपुत्रकाम्यया ।
स यावनेन भूभृता हि गोपिकाभिरर्चितः ।
स चाप्सरस्तनौ सुतं निषिच्य यावनाय च ।
स आश्रमाच्च नैष्ठिकाद् विदूषितः प्रतीपकृत् ।
जगाम चारणं हरिं प्रपाहि मां सुपापिनम् ।
कुतो हि भाग्यमापतेन्मुनेः शिवार्चने सदा ।
सुतोऽस्य कालनामको बभूव कृष्णमर्दितुम् ।
तवैव शिष्य एष चातिभक्तिमान् हि शङ्करे ।
तमेष यामि शासनात् तवोपनीय सत्वरम् ।
ततश्च रुक्मिणीं वयं प्रदापयाम चेदिपे ।
इतीरितो जरासुतो बभूव दुर्मना भृशम् ।
करं करेण पीडयन् निशाम्य चाऽत्मनो भुजौ ।
सुदुर्गकार्यसन्ततिं ह्यगुः स्म मद्भुजाश्रयाः ।
कदाऽप्यचीर्णमद्य तत् कथं करोमि केवलम् ।
इतीरितः स सौभराड् जगाद वाक्यमुत्तमम् ।
स्वशिष्यकैः कृतं तु यत् किमन्यसाधितं भवेत् ।
अपि स्म ते बलाश्रयप्रवृत्तयोऽस्मदादयः ।
कुठारसम्मितो ह्यसौ तवैव यावनेश्वरः ।
वरो हि कृष्णमर्दने वृतोऽस्य केवलः शिवात् ।
तवाखिलैरजेयता शिवप्रसादतोऽस्ति हि ।
इतीरितेऽप्यतृप्तवत् स्थिते तु बार्हद्रथे ।
स कालयावनोऽथ तं जरासुतान्तिकागतम् ।
जरासुतो हि दैवतं समस्तकेशवद्विषाम् ।
तदीरितं निशम्य च द्रुतं त्रिकोटिसङ्ख्यया ।
तदश्वमूत्रविष्ठया बभूव नामतः शकृत् ।
पुनःपुनर्नदीभवं निशाम्य देशसङ्क्षयम् ।
हरिश्च वैनतेययुग् विचार्य रामसंयुतः ।
युयुत्सुरेष यावनः समीपमागतोऽद्य नः ।
स यादवान् हनिष्यति प्रभङ्गतस्तु कोपतः (कोपितः) ।
निराशकोऽद्य यादवानपि स्म पीडयिष्यति ।
उदीर्य चैवमीश्वरोऽस्मरत् सुरेशवर्धकिम् ।
निरम्बुके तु सागरे जनार्दनाज्ञया कृते ।
चकार लावणोदकं जनार्दनोऽमृतोपमम् ।
शतक्रतोः सभां तु तां प्रदाय केशवाय सः ।
समस्तदेवतागणाः स्वकीयमर्पयन् हरौ ।
सम्स्तमाधुरान् प्रभुः कुशस्थलीस्थितान् क्षणात् ।
अनन्तशक्तिरप्यजः सुनीतिदृष्टये नृणाम् ।
अनाद्यनन्तकालकं समस्तलोकमण्डलम् ।
निरायुधं च मामयं वराच्छिवस्य न क्षमः ।
स कृष्णपन्नगं घटे निधाय केशवोऽर्पयत् ।
घटं पिपीलिकागणैः प्रपूर्य यावनोऽस्य च ।
किमत्र सत्यमित्यहं प्रदर्शयिष्य इत्यजः ।
स बाहुनैव केशवो विजित्य यावनं प्रभुः ।
सहास्त्रशस्त्रसञ्चयान् सृजन्तमाशु यावनम् ।
विवाहनं निरायुधं विधाय बाहुना क्षणात् ।
पुरा हि यौवनाश्वजे वरप्रदाः सुरेश्वराः ।
अनर्थको वरोऽमुना वृतोऽपि सार्थको भवेत् ।
तथाऽस्त्विति प्रभाषितं स्ववाक्यमेव केशवः ।
ससञ्ज्ञकोऽथ यावनो धरातलात् समुत्थितः ।
हरिर्गुहां नृपस्य तु प्रविश्य संव्यवस्थितः ।
स तस्य दृष्टिमात्रतो बभूव भस्मसात् क्षणात् ।
वराच्छिवस्य दैवतैरवध्यदानवान् पुरा ।
सुदीर्घसुप्तिमात्मनः प्रसुप्तिभङ्गकृत्क्षयम् ।
अतश्च पुण्यमाप्तवान् सुरप्रसादतोऽक्षयम् ।
ततो हरिं निरीक्ष्य स स्तुतिं विधाय चोत्तमाम् ।
ततो गुहामुखाद्धरिर्विनिस्सृतो जरासुतम् ।
तलेन मुष्टिभिस्तथा महीरुहैश्च चूर्णिताः ।
ससाल्वपौण्ड्रचेदिपान् निपात्य सर्वभूभुजः ।
ससञ्ज्ञकाः समुत्थितास्ततो नृपाः पुनर्ययुः ।
समस्तराजमण्डले विनिश्चयादुपागते ।
समस्तलोकयोषितां वरा विदर्भनन्दना ।
निशम्य तद्वचो हरिः क्षणाद् विदर्भकानगात् ।
समस्तराजमण्डलं प्रयान्तमीक्ष्य केशवम् ।
पुरा प्रदानतः सुरेक्षणच्छलाद् बहिर्गताम् ।
जरासुतादयो रुषा तमभ्ययुः शरोत्तमैः ।
पुनर्गृहीतकार्मुकान् हरिं प्रयातुमुद्यतान् ।
तदा सितः शिरोरुहो हरेर्हलायुधस्थितः ।
स तस्य मागधो रणे गदानिपातचूर्णितः ।
वरोरुवेषसंवृतोऽथ चेदिराट् समभ्ययात् ।
चिरं प्रयुद्ध्य तावुभौ वरास्त्रशस्त्रवर्षिणौ ।
समानभावमक्षमी शिनेः सुतात्मजः शरम् ।
स तेन ताडितोऽपतद् विसञ्ज्ञको नृपात्मजः ।
अथापरे च यादवा विजित्य तद्बलं ययुः ।
सहैकलव्यपूर्वकैः समेत्य भीष्मकात्मजः ।
अक्षोहिणीत्रयं हरिस्तदा निहत्य सायकैः ।
शरं शरीरनाशकं समाददानमीश्वरम् ।
धनुर्भृतां वरे गते रणं विहाय भूभृतः ।
अथाऽससाद केशवं रुषा स भीष्मकात्मजः ।
चकर्त कार्मुकं पुनः स खड्गचर्मभृद्धरेः ।
शरैर्वितस्तिमात्रकैर्विधाय तं निरायुधम् ।
निबद्ध्य पञ्चचूडिनं विधाय तं व्यसर्जयत् ।
सदैकमानसावपि स्वधर्मशासकौ नृणाम् ।
अथाऽससाद सौभराड् हरिं शराम्बुवर्षणः ।
शरेण तेन पीडितः पपात मन्दचेष्टितः ।
समस्तराजसन्निधावयादवीं महीमहम् ।
अथो विवेश केशवः पुरीं कुशस्थलीं विभुः ।
पुरा ततो हलायुधः प्रियां निजां पुराऽपि हि ।
पतिं यथाऽनुरूपिणं तदीयमेव पूर्वकम् ।
स तत्सदो गतो वरात् तदीयतः प्रगीतिकाम् ।
नरानयोग्यगीतिका विमोहयेत् ततो नृपः ।
स मूर्च्छितः प्रबोधितोऽब्जजेन तं त्वपृच्छत ।
स रैवतो बलाय तां प्रदाय गन्धमादनम् ।
बलोऽपि तां पुरातनप्रमाणसम्मितां विभुः ।
तया रतः सुतावुभौ शठोल्मुकाभिधावधात् ।
जनार्दनश्च रुग्मिणीकरं शुभे दिनेऽग्रहीत् ।
चतुर्मुखेशपूर्वकाः सुरा वियत्यवस्थिताः ।
मुनीन्द्रदेवगायनादयोऽपि यादवैः सह ।
सुरांशकाश्च ये नृपाः समाहुता महोत्सवे ।
समस्तलोकसुन्दरौ युतौ रमारमेश्वरौ ।
तया रमन् जनार्दनो वियोगशून्यया सदा ।
चतुस्तनोर्हरेः प्रभोस्तृतीयरूपसंयुतः ।
पुरैव मृत्यवेऽवदत् तमेव शम्बरस्य ह ।
स मायया हरेः सुतं प्रगृह्य सूतिकागृहात् ।
तमग्रसज्जलेचरः स दाशहस्तमागतः ।
विपाट्य मत्स्यकोदरं स शम्बरः कुमारकम् ।
अनङ्गतामुपागते पुरा हरेण साऽङ्गजे ।
पुरा हि पञ्चभर्तृकां निशम्य कञ्जजोदिताम् ।
भवासुरेण दूषितेति सा ततो हि मायया ।
गृहेऽपि साऽऽसुरे स्थिता निजस्वरूपतोऽसुरम् ।
रसायनैः कुमारकं व्यवर्द्धयद् रतिः पतिम् ।
पतिं सुपूर्णयौवनं निरीक्ष्य तां विषज्जतीम् ।
जगाद साऽखिलं पतौ तदस्य(तदास्य) जन्म चाऽगतिम् ।
ददौ च मन्त्रमुत्तमं समस्तमायिनाशकम् ।
ततः स्वदारधर्षकं समाह्वयद् युधेऽङ्गजः ।
स चर्मखड्गधारिणं वरास्त्रशस्त्रपादपैः ।
सहस्रमायमुल्बणं त्वदृश्यमम्बराद् गिरीन् ।
स विद्यया विनाशितोरुमाय आशु शम्बरः ।
निहत्य तं हरेः सुतस्तयैव विद्ययाऽम्बरम् ।
समस्तवेदिनोर्मुनिर्नरान् विडम्बमानयोः ।
स रुग्मिणीजनार्दनादिभिः सरामयादवैः ।
ततः पुरा स्यमन्तकं ह्यवाप सूर्यमण्डले ।
सदाऽस्य विष्णुभाविनोऽप्यतीव लोभमान्तरम् ।
स तं न दत्तवांस्ततोऽनुजो निबद्ध्य तं मणिम् ।
तदा स सत्रजिद्धरिं शशंस सोदरान्तकम् ।
वने स सिंहसूदितं पदैः प्रदर्श्य वृष्णिनाम् ।
ततो निधाय तान् बिलं स जाम्बवत्परिग्रहम् ।
युयोध मन्दमेव स प्रभुः स्वभक्त इत्यजः ।
स मुष्टिपिष्टविग्रहो नितान्तमापदं गतः ।
स्मृतिं गते तु राघवे तदाकृतिं यदूत्तमे ।
ततः क्षमापयन् सुतां प्रदाय रोहिणीं शुभाम् ।
विधाय चक्रदारितं सुजीर्णदेहमस्य सः ।
विधाय भक्तवाञ्छितं प्रियासहाय ईश्वरः ।
गुहाप्रविष्टमीश्वरं बहून्यहान्यनिर्गतम् ।
समस्तवृष्णिसन्निधौ यदूत्तमः स्यमन्तकम् ।
स दुर्यशो रमापतावनूच्य मिथ्यया तपन् ।
मणिं च तं प्रदाय तं ननाम ह क्षमापयन् ।
रमैव सा हि भूरिति द्वितीयमूर्तिरुत्तमा ।
ततो हि सा च रुगक्मिणी प्रिये प्रियासु तेऽधिकम् ।
अथाऽप साम्बनामकं सुतं च रोहिणी हरेः ।
इति प्रशासति प्रभौ जगज्जनार्दनेऽखिलम् ।
जनार्दनः स नामतो रमेशपादसंश्रयः ।
क्षमस्व मे वचः प्रभो ब्रवीम्यतीव (पातकम्)पापकम् ।
न तेऽस्त्यगोचरं क्वचित् तथाऽपि चाऽज्ञया वदे ।
सुतौ हि साल्वभूपतेर्बभूवतुः शिवाश्रयौ ।
अजेयतामवध्यतां (अजेयवध्यतां) च तौ शिवाद् वरं समापतुः ।
महोदरं च कुण्डधारिणं च भूतकावुभौ ।
तयोः सहाय एव तौ वराच्छिवस्य भूतकौ ।
अजेयतामवध्यतामवाप्य तावुभौ शिवात् ।
जरासुतो गुरुत्वतो विरोद्धुमत्र नेच्छति ।
स्वयं हि राजसूयितां जरासुतो न मन्यते ।
इमौ पितुर्यशोऽर्थिनौ पराभवाय ते तथा ।
समुद्रसंश्रयो भवान् बहून् प्रगृह्य लावणान् ।
इतीर्य तं ननाम स प्र चाहसन् स्म यादवाः ।
प्रयाहि सात्यके वचो ब्रवीहि मे नृपाधमौ ।
उपैतमाशु संयुगार्थिनौ च पुष्करं प्रति ।
उपेत्य तौ हरेर्वचो जगाद सात्यकिर्बली ।
ततः पुरैव तावुभौ द्विजं हरस्वरूपिणम् ।
दशत्रिकैः शतैर्वृतो यतीश्वरैः स सर्ववित् ।
वरात् स्वसम्भवादसौ न शापशक्तिमानभूत् ।
स तान् समर्च्य माधवः प्रदाय चोरुमात्रकाः ।
तमत्रिजं हरात्मकं यतो हि वेद मागधः ।
हरौ तु पुष्करं गते मुनीश्वरैः समर्चिते ।
स ब्रह्मदत्तनामकोऽत्र तत्पिताऽप्युपाययौ ।
विचक्रनामकोऽसुरः पुरा विरिञ्चतो वरम् ।
स चाभवत् तयोः सखा सहायकाम्ययाऽगमत् ।
न जीयसे न वध्यसे कुतश्चनेति तोषितात् (तोषणात्)।
अक्षोहिणीदशात्मकं बलं तयोर्बभूव ह ।
द्विरष्टसेनया युतौ सहैकयैव तौ नृपौ ।
अथ द्वयोर्द्वयोरभूद् रणो भयानको महान् ।
तदाऽस्य चानुजं ययौ शिनिप्रवीर आयुधी ।
पुरा स चण्डको गणो हरेर्निवेदिताशनः ।
अक्षोहिणीत्रयान्विताः समस्तयादवास्तदा ।
हरिर्विचक्रमोजसा महास्त्रशस्त्रवर्षिणम् ।
पुनश्च पादपान् गिरीन् प्रमुञ्चतोऽरिणाऽरिहा ।
प्रसूनवर्षिभिः स्तुतश्चतुर्मुखादिभिः प्रभुः ।
समस्तयादवान् रणे विधूय तौ जनार्दनम् ।
स तौ भुजप्रवेगतो विधूय शङ्करालये ।
प्रभक्षयन्तमोजसा हिडिम्बमुद्धतं बलम् ।
तयो रथौ सहायुधौ प्रभक्ष्य राक्षसो बली ।
तदा गदावरायुधः सहैव हंसभूभृता ।
तमागतं समीक्ष्य तौ विहाय राक्षसाधिपः ।
उभौ हि बाहुषालिनावयुद्ध्यतां च मुष्टिभिः ।
अथैनमुद्धृतं बलाद् बलः स दूरमाक्षिपत् ।
विहाय सैनिकांश्च तौ नृपौ ययौ वनाय सः ।
गदस्तु साल्वभूभृता वयोगतेन योधयन् ।
सुतेन तस्य कन्यसा युयोध सात्यकी रथी ।
चिरं प्रयुद्ध्य सात्यकिः स हंसकन्यसा बली ।
स खड्गचर्मभृद् रणेऽभ्ययात् सुतात्मजं शिनेः ।
द्विषोडशप्रभेदकं वरासियुद्धमश्रमौ ।
परस्परान्तरैषिणौ(अन्तरेषिणौ) नचान्तरं व्यपश्यताम् ।
ततः स हंससंयुतो जगाम योद्धुमच्युतम् ।
हतं च सैन्यमेतयोश्चतुर्थभागशेषितम् ।
स पुष्करेक्षणस्तदा सुरैर्नुतोऽथ पुष्करे ।
परे दिने जनार्दनो नृपात्मजौ प्रविद्रुतौ ।
स रौहिणेयसंयुतः समन्वितश्च सेनया ।
निवृत्य तौ स्वसेनया शरोत्तमैर्ववर्षतुः ।
अथाऽससाद हंसको हलायुधं महाधनुः ।
स सात्यकिं निरायुधं विवाहनं विवर्मकम् ।
विधूय सैनिकांश्च स प्रगृह्य चापमाततम् ।
तमाशु केशवोऽरिहा समस्तसाधनोज्झितम् ।
हलायुधो निरायुधं विधाय हंसमोजसा ।
स हंस आशु कार्मुकं पुनः प्रगृह्य तं बलम् ।
शिनेः सुतात्मजोऽप्यसौ विहाय हंसकानुजम् ।
वयोगतः पिता तयोर्युयोध तेन वृष्णिना ।
स सात्यकिर्दृढाहतो जगाम मोहमाशु च ।
स तेन तच्छिरो बली चकर्त शुक्लमूर्द्धजम् ।
नदंश्च सात्यकिर्हरेर्जगाम पार्श्वमुद्धतः ।
हरिस्तु हंसमुल्बणैः शरैः समर्दयन् बलम् ।
स एक एव केशवं महास्त्रमुक् ससार ह ।
स वैष्णवास्त्रमुद्यतं निरीक्ष्य यानतो महीम् ।
वरास्त्रपाणिरीश्वरः पदाऽहनिच्छरस्यमुम् ।
स धार्तराष्ट्रकोदरे यथा तमोऽन्धमेयिवान् ।
ततोऽन्धमेव तत् तमो हरेर्द्विडेति निश्चयात् ।
विहाय रोहिणीसुतं जले निमज्ज्य मार्गयन् ।
विहाय देहमुल्बणं तमोऽवतीर्य चाग्रजम् ।
ततो हरिर्बलैर्युतो बलान्वितो मुनीश्वरैः ।
स्वकीयपादपल्लवाश्रयं जनं प्रहर्षयन् ।
अष्टादशोऽध्यायः
औं ॥ यदा रामादवाप्तानि दिव्यास्त्राणि प्रपेदिरे ।
निजप्रतिभया जानन् सर्वास्त्राणि ततोऽधिकम् ।
न हि भागवतो धर्मो देवताभ्युपयाचनम् ।
नाऽकाङ्क्ष्यं किमुतान्येभ्यो ह्यस्त्रं काम्यफलप्रदम् ।
न काम्यकर्मकृत् तस्मान्नायाचद् देवमानुषान्(दैवमानुषान्) ।
भिक्षामटंश्च हुङ्कारात् करवद् वैश्यतोऽग्रहीत् ।
न प्रतीपं हरेः क्वापि स करोति कथञ्चन ।
(न चौर्ध्वदैहिकानुज्ञां) नैवोर्ध्वदैहिकानुज्ञामवैष्णवकृतेऽकरोत् ।
सख्यं नावैष्णवैश्चक्रे प्रतीपं वैष्णवेन च(तु) ।
प्रतीपकारिणो हन्ति विष्णोर्वैतानजीघनत्(विष्णोर्वै तान्) ।
विद्योपजीवनं नैष चकाराऽपद्यपि क्वचित् ।
आज्ञयैव हरेर्द्रौणेरस्त्राण्यस्त्रैरशामयत् ।
नह्यस्त्रयुद्धे सदृशो द्रौणेरस्त्यर्जुनादृते ।
प्रत्यक्षीभूतदेवेषु बन्धुज्येष्ठेषु वा नतिम् ।
तत्रापि विष्णुमेवासौ नमेन्नान्यं कथञ्चन ।
अन्वेनमेव तद्धर्मे कृष्णैका संस्थिता सदा ।
नाशपद् धार्तराष्ट्रांश्च महापद्यपि सा ततः ।
अन्ये भागवतत्वेऽपि छिन्नधर्माः क्वचित्क्वचित् ।
अवमेनेऽर्जुनः कृष्णं विप्रस्य शिशुरक्षणे ।
हरेरिष्टं सुभद्रायाः फल्गुने दानमञ्जसा ।
कदाचिन्मन्यते पार्थं धर्मजोऽपि नरं हरिम् ।
बन्धनं शङ्कमानो हि कृष्णस्य विदुरोऽपितु ।
नकुलः करदानाय प्रेषयामास केशवे ।
देवकीवसुदेवाद्या मेनिरे मानुषं हरिम् ।
द्रोणकर्णद्रौणिकृपाः कृष्णाभावे मनो दधुः ।
ऋषिमानुषगन्धर्वा वक्तव्याः किमतः परम् (परे)।
तस्मादेको वायुरेव धर्मे भागवते स्थिरः ।
सर्वमेतच्च कथितं तत्रतत्रामितात्मना ।
यदा ते सर्वशस्त्रास्त्रवेदिनो राजपुत्रकाः ।
रक्तचन्दनसत्पुष्पवस्त्रशस्त्रगुडोदनैः ।
ते भीष्मद्रोणविदुरगान्धारीधृतराष्ट्रकान् ।
सर्वैः प्रदर्शितेऽस्त्रे तु द्रोणादात्तमहास्त्रवित् ।
ततोऽप्यतितरां पार्थो दिव्यास्त्राणि व्यदर्शयत् (दिव्यास्त्राण्यप्यदर्शयत्)।
तदैव कर्ण आगत्य रामोपात्तास्त्रसम्पदम् ।
कुन्ती निजं सुतं(निजसुतं) ज्ञात्वा लज्जया नावदच्च तम् ।
रणायाक्षत्रियाह्वानं जानन् धर्मप्रतीपकम् ।
अक्षत्रसंस्कारयुतो जातोऽपि क्षत्रिये कुले ।
निरुत्तरे कृते कर्णे भीमेनैव सुयोधनः ।
अभिषिक्ते तदा कर्णे प्रायादधिरथः पिता ।
भीमदुर्योधनौ तत्र शिक्षासन्दर्शनच्छलात् ।
देवासुरमनुष्यादि जगदेतच्चराचरम् ।
देवा देवानुकूलाश्च भीममेव समाश्रिताः ।
जय भीम महाबाहो जय दुर्योधनेति च ।
दृष्ट्वा जगत् सुसंरब्धं द्रोणोऽथ द्विजसत्तमः ।
स्वकीयायां स्वकीयायां योग्यतायां नतु क्वचित् ।
सुरासुरान् सुसंरब्धान् कालेन द्रक्ष्यथेति च ।
कर्णं हस्ते प्रगृह्यैव धार्तराष्ट्रो गृहं ययौ ।
पार्थेन कर्णो हन्तव्य इत्यासीद् भीमनिश्चयः ।
तथोत्कर्षे फल्गुनस्य यशसो निजयस्य च ।
भीमार्थं केशवोऽन्ये च देवाः फल्गुनपक्षिणः ।
तदर्थमेव भीमस्य ह्यनुजत्वं सुरेश्वरः ।
दुर्योधनार्थं कर्णस्य पक्षिणो दैत्यदानवाः ।
अथ पृष्टो दक्षिणार्थं(दक्षिणायां) द्रोण आह कुमारकान् ।
ते धार्तराष्ट्राः कर्णेन सहिताः पाण्डवा अपि ।
अथाऽह भीमः सामर्थ्यविवेकाभीप्सया गुरुम् ।
निवृत्तेष्वकृतार्थेषु वयं बद्ध्वा रिपुं तव ।
सद्रोणकेषु पार्थेषु स्थितेष्वन्ये ससूतजाः ।
कुमारान् ग्रहणेप्सूंस्तानुपयातानुदीक्ष्य सः ।
ते शरैरभिवर्षन्तः परिवार्य कुमारकान् ।
हर्म्यसंस्थाः स्त्रियो बाला ग्रावभिर्मुसलैरपि ।
द्रुपदस्य वरो ह्यस्ति सूर्यदत्तस्तपोबलात् ।
इति तेन वरेणैव सुखसंवर्द्धिताश्च ते ।
स्त्रीबालवृद्धसहितैः पाञ्चालैरप्यनुद्रुताः ।
तान् प्रभग्नान् समालोक्य भीमः प्रहरतां वरः ।
तमन्वयादिन्द्रसूनुः यमौ तस्यैव चक्रयोः ।
आयान्तमग्रतो दृष्ट्वा भीममात्तशरासनम् ।
द्रुपदस्त्वभ्ययाद् भीमं सपुत्रः सारसेनया ।
धात्रर्यमावेशयुतौ विश्वावसुपरावसू ।
अग्रतस्तु शिखण्ड्यागाद् रथोदारः शरान् क्षिपन् ।
तावुभौ विरथौ कृत्वा विचापौ च विवर्मकौ ।
अथैनं शरवर्षेण युधामन्यूत्तमौजसौ ।
हस्तप्राप्तं च पाञ्चालं नाग्रहीत् स वृकोदरः ।
स शरान् क्षिपतस्तस्य पाञ्चालस्यार्जुनो द्रुतम् ।
अथ प्रकुपितं सैन्यं फल्गुनं पर्यवारयत् ।
अथ सत्यजिदभ्यागात् पार्थं मुञ्चञ्छरान् बहून् ।
घ्नन्तं भीमं पुनः सैन्यमर्जुनः प्राह मा भवान् ।
सम्बन्धयोग्यस्तातस्य सखाऽयं न सुधार्मिकः ।
स्नेहपाशं ततश्चक्रे बीभत्सौ द्रुपदोऽधिकम् ।
मुक्ता कथञ्चिद् भीमास्यात् सा सेना दुद्रुवे भयात् ।
पप्रच्छैनं तदा द्रोणसख्यमस्त्युत नेति वा ।
अथाऽह द्रुपदं द्रोणः सख्यमिच्छेऽक्षयं तव ।
न विप्रधर्मो यद् युद्धमतस्त्वं न मया धृतः ।
अतः सख्यार्थमेवाद्य त्वद्राज्यार्धो हृतो मया ।
इत्युक्त्वोन्मुच्य तं द्रोणो राज्यार्धं गृह्य चामुतः ।
धार्तराष्ट्रैस्तु भीमस्य भयात् पादौ प्रणम्य च ।
द्रुपदस्तु दिवारात्रं तप्यमानः पराभवात् ।
सम्बन्धीत्यर्जुनवचश्चिकीर्षुः सत्यमेव च ।
याजोपयाजावानीयाथार्बुदेन गवां नृपः ।
किमेतयेत्यवज्ञाय तावुभौ विप्रसत्तमौ ।
हुते हविषि मन्त्राभ्यां वैष्णवाभ्यां तदैव हि ।
किरीटी कुण्डली दीप्तौ हेममाली वरासिमान् ।
धृष्टत्वाद् द्योतनत्वाच्च धृष्टद्युम्न इतीरितः ।
अन्वेनं भारती साक्षाद् वेदिमद्ध्यात् समुत्थिता ।
तद्भार्या भारती नाम वेदरूपा सरस्वती ।
आवेशयुक्ता शच्याश्च श्यामलायास्तथोषसः ।
सा कृष्णा नामतश्चाऽसीदुत्कृष्टत्वाद्धि योषिताम् ।
उत्पत्तितश्च सर्वज्ञा सर्वाभरणभूषिता ।
पूर्वं ह्युमा च देव्यस्ताः कदाचिद् भर्तृभिर्युताः ।
शशाप तास्तदा ब्रह्मा मानुषीं योनिमाप्स्यथ ।
विचार्य भारतीमेत्य सर्वमस्यै निवेद्य च ।
देवि नो मानुषं प्राप्यमन्यगात्वं च सर्वथा ।
ब्रह्मणैव च(हि) शप्ताः स्म पूर्वं चान्यत्र लीलया ।
एकदेहा मानुषत्वमाप्स्यथ त्रिश उद्धताः ।
अतस्त्वयैकदेहत्वमिच्छामो देवि जन्मसु ।
चतुर्जन्म भवेद् भूमौ त्वां नान्यो मारुताद् व्रजेत् ।
इतीरिते तथेत्युक्त्वा पार्वत्यादियुतैव सा ।
तद्देहस्था भारती तु रुद्रदेहस्थितं हरिम् ।
तस्यै स रुद्रदेहस्थो हरिः प्रादाद् वरं प्रभुः ।
सर्वेष्वपीति चान्यासां ददौ शङ्कर एव च ।
ततस्तदैव देहं ता विसृज्य नलनन्दिनी ।
तदाऽऽसीन्मुद्गलो नाम मुनिस्तपसि संस्थितः ।
अपाहसत् सोऽब्जयोनिं शशापैनं चतुर्मुखः ।
इतीरितस्तं तपसा तोषयामास मुद्गलः ।
न त्वं यास्यसि ता देवी मारुतस्त्वच्छरीरगः ।
नच पापं ततस्ते स्यादित्युक्ते चैनमाविशत् ।
रेमे च स तया सार्द्धं दीर्घकालं जगत्प्रभुः ।
ततो देशान्तरं गत्वा तपश्चक्रे स मुद्गलः ।
तद्देहगा भारती तु केशवं शङ्करे स्थितम् ।
प्रत्यक्षे च शिवे जाते तद्देहस्थे च केशवे ।
शिवदेहस्थितो विष्णुर्भारत्यै तु ददौ पतिम् ।
देव्यश्चतस्रस्तु तदा दत्तमात्रे वरेऽमुना ।
ताः श्रुत्वा स्वपतिं देवि नचिरात् प्राप्स्यसीति च ।
भविष्यन्तीत्यथैकस्या मेनिरे पञ्चभर्तृताम् ।
अथाभ्यागान्महेन्द्रोऽत्र सोऽब्रवीत् तां वरस्त्रियम् ।
शङ्करं दर्शयित्वैव पञ्चभर्तृत्वमेष मे ।
अजानन् शक्र आहोच्चैः किमेतद् भुवनत्रये ।
इतीरिते शिवः प्राह पत मानुष्यमाप्नुहि ।
पश्यात्र मदवज्ञानात् पतितांस्त्वादृशान् सुरान् ।
उद्बबर्ह गिरिं तं तु ददर्शात्र च तान् सुरान् ।
ततो वरेण्यं वरदं विष्णुं प्राप्य स वासवः ।
मदवज्ञानिमित्तेन पतिता इति तान् सुरान् ।
शशाप मानुषेषु त्वं क्षिप्रं जातः पराभवम् ।
मच्छप्तानां च देवीनामविचार्य मया यतः ।
मानुषेषु ततः पश्चाद् भारतीदेहनिर्गताम् ।
एषा सा द्रौपदी नाम पञ्चदेवीतनुर्भवेत् ।
तासां पतित्वमाप्स्यन्ति भारत्यैव तु पार्वती ।
एते हि मारुताद्यास्ते देवकार्यार्थगौरवात् ।
इत्युक्त्वा प्रययौ ब्रह्मा सोऽश्वत्थामा शिवोऽभवत् ।
वेदेषु सपुराणेषु भारते चावगम्यते ।
मुमुदुः सर्वपाञ्चाला जातयोः सुतयोस्तयोः ।
मनुष्यपुत्रतायाश्च भावो मानुष एतयोः ।
याजोपयाजौ तावेव दयिता द्रुपदस्य सा ।
जातमात्मनिहन्तारं भारद्वाजो निशम्य तम् ।
भीमार्जुनाभ्यां बद्धं तं श्रुत्वा पाञ्चालभूपतिम् ।
सन्मान्य(सम्मान्य) पाण्डवान् सोऽपि शूरानुजसुतासुतः ।
ततः प्रभृति सन्त्यज्य देवपक्षा जरासुतम् ।
विशेषतश्च कृष्णस्य विज्ञाय स्नेहमेषु हि ।
प्रतापाद्ध्येव ते पूर्वं जरासन्धवशं गताः ।
जन्मान्तराभ्यासवशात् स्निग्धाः कृष्णे च पाण्डुषु ।
अपि तं बहुशः कृष्णविजितं नैव तत्यजुः ।
देवा हि कारणादन्यानाश्रयन्तोऽपि नाऽन्तरम् ।
धृतराष्ट्रो बलं दृष्ट्वा (ज्ञात्वा) बहुशो भीमपार्थयोः ।
भीमार्जुनावथो जित्वा सर्वदिक्षु च भूपतीन् ।
तयोः प्रीतोऽभवत् सोऽपि पौरजानपदास्तथा ।
एकोनविंशोऽध्यायः
औं ॥ एवं शुभोच्चगुणवत्सु जनार्दनेन
नाम्ना कणिङ्क इति चासुरको द्विजोऽभूत्
छद्मैव यत्र परमं न सुराश्च पूज्याः
इत्यादि कुत्सिततमां(कल्पिततमाम्) जगृहुः स्म विद्याम्
सम्पूर्णदुर्मतिरथो धृतराष्ट्रसूनुः
ज्येष्ठस्य तेऽपि हि वयं हृदयप्रजाता
राज्यं महच्च समवाप्स्यति धर्मसूनुः
नाऽत्मार्थमस्ति मम दुःखमथातिशुद्ध
एवं स्वपुत्रवचनं स निशम्य राजा
ते हि स्वबाहुबलतोऽखिलभूपभूतिं
एवं ब्रुवत्यपि नृपे पुनराह पाप
एवं निशम्य गदितं सुतहार्दपाशैः आकृष्यताऽशु स नृपोऽरिधरेच्छयैव ।
इत्युक्त आह पितरं(नृपतिम्) शकुनिं निरीक्ष्य
द्रौणेर्हि नास्ति सदृशो बलवान् प्रतापी
एवं हि सैनिकगणा अपि दानमानैः
त्रिंशच्छतं परमकाः सुरदुर्लभाश्च
ते वीर्यदा विजयदा अपि वारिवह्नि
सौहार्दमेषु यदिवाऽतितरां(यदि वा नितराम्) करोषि
एवं स्वपुत्रपरिपालनतो यशस्ते
क्षत्तैक एव सततं परिपोषकोऽलं
ते तेषु(एतेषु) दूरगमितेषु निराश्रयत्वात्
भेदः कुलस्य भविता कुलनाशहेतु
विष्णुर्जयन्त इति शम्भुसहाय आस्ते
अज्ञाप्य मत्पुरुषतां पुरुषैर्मदीयैः
इत्युक्तवत्यथ सुते स तथेत्युवाच
भीमस्तदा ह(तदाऽऽह/तदैव) भविताऽत्र हि भैक्षचार
निष्कालयन्ति यदि नो निजधर्मसंस्थान्
इत्युक्तवाक्यममुमग्रजमन्वगात् स
कीर्त्यर्थमेव निजधर्मपरिप्रहाणे
हन्तव्यतामुपगतेषु सुयोधनादि-
क्षत्ताऽथ चाऽह सुवचोऽन्त्यजभाषयैव
तान् हन्तुमेव च तदा धृतराष्ट्रसूनुः
पूर्वं प्रहस्त इति यस्त्वभवत् सुपापः
दिव्यं गृहं च भवतां हि मयोपनीतं
दृष्ट्वैव जातुषगृहं वसया समेतं
क्षत्ताऽथ नीतिबलतोऽखिललोकवृत्तं
चक्रे स चैवमथ वर्त्म वृतिच्छलेन
तस्याग्रजा च सहिता सुतपञ्चकेन
तं भागिनेयसहितं भगिनीं च तस्य
तप्तं तया ससुतया च तपो नितान्तं
जानन्निदं सकलमेव स(च) भीमसेनो
ज्ञात्वा पुरोचनवधं यदि भीष्ममुख्यैः
भीमोऽभयोऽपि गुरुभिः स्वमुखेन युद्धम्
विश्वासिता विदुरपूर्ववचोभिरेव
हा पाण्डवानदहदेष हि धार्तराष्ट्रो
पौरेभ्य एव निखिलेन च भीष्ममुख्या
भीमोऽप्युदूह्य वनमाप हिडिम्बकस्य
रक्षार्थमेव परिजाग्रति भीमसेने
सा राक्षसीतनुमवाप सुरेन्द्रलोक
तां भीम आह कमनीयतनुं न पूर्वं
सा भारती वरमिमं प्रददावमुष्यै
ज्ञानं च नैजमभिदर्शयितुं पुनश्च
काले तदैव कुपितः प्रययौ हिडिम्बो
सा भीममेव शरणं प्रजगाम तां च
तौ मुष्टिभिस्तरुभिरश्मभिरद्रिभिश्च
तद् भीमबाहुबलताडितमीशवाक्यात्
हत्वैव शर्ववररक्षितराक्षसं तं
ताभ्यामनूक्तमपि यन्न करोति भीमः
दृष्ट्वैव तं परममोदिन आशु पार्था
तान् भक्तिनम्रशिरसः समुदीक्ष्य कृष्णो
एवं ब्रुवत्यगणितोरुगुणे रमेश
सा नन्दनादिषु वनेषु विहृत्य तेन
देवोऽपि राक्षसतनुर्निर्हृतिः पुरा य
जाते सुते समयतो भगवत्कृतात् स
व्यासोऽपि पाण्डुतनयैः सहितो बकस्य
तान् ब्राह्मणस्य च गृहे प्रणिधाय कृष्णः
भिक्षामटत्सु सततं प्रतिहुङ्कृतेन
स्थूलं हि सद्म पृथिवीसहितं त्वरक्ष
धर्मस्य ते सुनियतेर्बलश्च बोधो
इत्युक्त आशु स चकार तथैव भीमः
तत्काल एव रुदितं निजवासहेतोः
जानीहि विप्ररुदितं कुत इत्यतश्च
दातव्य एव हि करोऽद्य च रक्षसस्य
अन्यत्र याम इति पूर्वमुदाहृतं मे
अर्थे तवाद्य तनुसन्त्यजनादहं स्यां
कन्योदिता बत कुलद्वयतारिणीति
एवं रुदत्सु सहितेषु कुमारकोऽस्य
पृष्टस्तयाऽऽह स तु विप्रवरो बकस्य
श्रुत्वा तमुग्रबलमत्युरुवीर्यमेव
एवं बलाढ्यममुमाशु निहत्य भीमः
सन्ति स्म विप्रवर पञ्च सुता ममाद्य
उक्तैवमाह च पृथा तनये मदीये
उक्त्वैवमेत्य निखिलं च जगाद भीम
मातः किमेष मुदितोऽतितरामिति स्म(मुदितो नितराम्)
यद्बाहुवीर्यपरमाश्रयतो हि राज्यम्
इत्युक्तवन्तममुमाह सुधीरबुद्धिः
एष स्वयं हि मरुदेव नरात्मकोऽभूत्
गत्वा त्वरन् बकवनाय सकाशमाशु
तेनैव चान्नसमितौ परिभुज्यमान
पीत्वा पयो त्वरित एनमवेक्षमाण(अवेक्ष्यमाण)
आक्रम्य पादमपि पादतलेन तस्य
हत्वा तमक्षतबलो जगदन्तकं स
द्वार्येव तत् प्रतिनिधाय पुनः स भीमः
दृष्ट्वैव राक्षसशरीरमुरु प्रभीता
अन्नात्मकं करममुष्य च सम्प्रचक्रुः
उत्पत्तिपूर्वककथां द्रुपदात्मजाया
पूर्वं हि पार्षत इमान् जतुगेहदग्धान्
यत्रक्वचित् प्रतिवसन्ति निलीनरूपाः
तत्काल एव वसुदेवसुतोऽपि कृष्णः
स प्राप्य(सम्प्राप्य) हस्तिनपुरं धृतराष्ट्रपुत्रान्
तस्यान्तरे हृदिकसूनुरनन्तरं स्वं
सर्वांश्च नः पुनरसाववमत्य कृष्णा-
इत्युक्त आशु कुमतिः स तु(स हि) पूर्वदेहे
श्रुत्वा तदीयवचनं भगवान् पुरीं स्वाम्
भीमोऽपि रुद्रवररक्षितराक्षसं तं
मङ्गल्यमेतदतुलं प्रतियात शीघ्रं
षण्णां च मध्यगमुदीर्णभुजं विशाल-
रात्रौ दिवा च सततं पथि गच्छमानाः
प्राप्ते तदोल्मुकधरेऽर्जुन एव गङ्गां
हन्ताऽस्मि वो ह्युपगतानुदकान्तमस्या
सर्वं हि फेनवदिदं बहुलं बलं ते
आग्नेयमस्त्रमभिमन्त्र्य तदोल्मुके स
पार्थेन सन्धर्षितः शरणं जगाम
गन्धर्व उल्बणसुरक्ततनुः स भूत्वा
विद्या सुशिक्षिततमा हि सुरेशसूनौ
आधिक्यतः स्वगतसंविद एव साम्ये
पार्थेन सोऽपि बहुलाश्च कथाः कथित्वा
ते धौम्यमाप्य च पुरोधसमुत्तमज्ञं
राजन्यमण्डलमुदीक्ष्य सुपूर्णमत्र
तांश्च प्रदर्श्य सकलान्(निखिलान्) स हुताशनांशः
एतेन कार्मुकवरेण तरूपरिस्थं
इत्यस्य वाक्यमनु सर्वनरेन्द्रपुत्रा
केचिन्निरीक्ष्य धनुरेत्य न मे सुशक्यम्
माषान्तराय स चकर्ष यदैव कोट्या
मद्रेश एत्य चकृषे स्थविरोऽपि वीर्यात्
सन्नेषु भूपतिषु मागध आससाद
जानुन्यमुष्य धरणीं ययतुस्तदैव
प्रायो गतास्तमनु(गतास्तदनु) भूपतयोऽथ कर्णो
तस्मिंश्च तेन विहते(निहते) प्रतिसन्निवृत्ते
विप्राश्च केचिदतियुक्तमिमौ हि वीरौ
तत्रार्जुनः पवनजात् प्रियतोऽप्यनुज्ञाम्(अभ्यनुज्ञाम्)
कृष्णा तदाऽस्य विदधे नवकञ्जमालां
द्रष्टुं हि केवलगतिर्नतु कन्यकाया
भीमस्तु राजसमितिं प्रतिसम्प्रयातां
भीमोऽयमेष पुरुहूतसुतोऽन्य एते
प्रीतेषु सर्वयदुषु प्रपलायितेषु
विप्रेषु दण्डपटदर्भमहाजिनानि
वृक्षं त्वसौ प्रतिनिधाय च मद्रराजं
पार्थोऽपि तेन धनुषा युयुधे स्म कर्णं
त्वं फल्गुनो हरिहयो द्विजसत्तमो(सत्तपो) वा
कार्यं न मे द्विजवरैः प्रतियोधनेने-
अग्रेऽश्विपुत्रसहितः स तु धर्मसूनुः
प्रामादिकं च वचनं न मृषा तयोक्तं
सम्भाष्य तैः स भगवानमितात्मशक्तिः
भिक्षान्नभोजिन उतो भगिनीं निजां च(इमां भगिनीं)
प्रातस्तु तस्य जनितुर्वचसा पुरोधाः
तानागतान् समभिपूज्य निजात्मजां च
चेष्टास्वराकृतिविवक्षितवीर्यशौर्य-
स प्राह मन्दहसितः किमिहाद्य राजन्
एवं ब्रुवाणमथ तं पृथया सहैव
पार्थार्थमेव हि मयैष कृतः प्रयत्नः
नात्र प्रमा मम हृदि प्रतिभात्यथापि
व्यासं तमीक्ष्य (भगवन्तमगम्यपूर्ण)भगवन्तमगण्यपूर्ण-
कृष्णस्तदाऽह नृपतिं प्रति देहि कन्यां
एषां श्रियश्च निखिला अपिचैकदेहाः
दिव्यं हि दर्शनमिदं तव दत्तमद्य
इत्युक्तवाक्यमनु तान् स ददर्श राजा
दत्वाऽभयं स भगवान् द्रुपदस्य कार्ये
पाञ्चालकेषु च महोत्सव आस राजा
उद्बाह्य तत्र निवसत्सु च पाण्डवेषु
दृष्ट्वैव तं मुमुदुराशु कुरुप्रवीरा
देवाङ्गयोग्यशुभकुण्डलहारमौलि-
रत्नानि गोगजतुरङ्गरथान् सुवर्ण-
दासीश्च दाससहिताः शुभरूपवेषाः
मासान् बहूनिह विहृत्य सहैव पार्थैः
वैचित्रवीर्यतनयाः सह सौबलेन
तैरर्दिते स्वपुर आशु स सोमकानां
चित्रे हते समर आशु सचित्रकेतौ
तैस्तेषु पञ्चसु समं प्रतियोधयत्सु
आयान्तमीक्ष्य तरुहस्तमिमं समीर-
ज्ञात्वा समस्तमपि तद् विदुरोऽग्रजं स्वं
पार्था इति स्म विदुरोऽवददाशु सोऽपि
इत्युक्त आह विदुरः स हिडिम्बवध्या-
श्रुत्वाऽथ कृष्णमुपयातमुरु प्रदाय
युद्धाय तेषु पुनरेव रथैः प्रयाते-
भीमार्जुनौ विषहितुं नहि कश्चनास्ति
आनीतये च विनियुज्य सुसान्त्वपूर्वम्
इत्युक्तवत्यनु तथेत्यवदन्नदीजो
तत्काल एव वसुदेवसुतश्च कृष्णो
तेष्वागतेषु सुमहानभवत् प्रहर्षः
कृष्णामपूजयदतीव च सौबली सा
कुन्ति प्रयाहि सहिता स्नुषया गृहं स्वं
ऊषुस्तथैव परिवत्सरपञ्चकं ते
कन्यैव साऽभवदतः प्रतिवासरं च
धर्मात्मजादिषु मरुत् प्रतिविष्ट एषां
नो सुप्तिवत्(सुप्तवत्) त्विदमतोऽन्यवशत्वतो हि
एवं स वायुरनुविष्टयुधिष्ठिरादि-
वासिष्ठयादववृषावपि केशवौ तौ
पूर्वं हि तेषु वनगेषु बभूव काशि-
पूर्वं हि राजगणने मगधाधिराजः
भग्नेषु तेषु पुनरात्तशरासनेषु
एकान्ततो जयमवीक्ष्य च नानुयाति
एकोऽहमेव नृपतीन् प्रतियोधयिष्य
भीष्मादयोऽपि नहि योधयितुं समर्था
इत्युक्त आशु स विमृश्य ययौ पुरं स्वं
सर्वेषु तेषु विजितेष्वभिजग्मिवान् स
सन्धौ यदैव जरया प्रतिसन्धितस्य
एवंविधं सुकुशलं बहुयुद्धशौण्डं
इत्युक्त आशु स तथैव चकार कर्णः
अङ्गाधिराज्यमुपलभ्य जरासुतस्य
उद्वाह्य काशितनयां गिरिजाधिविष्टां(गिरिजाभिविष्टां)
पुत्रो बभूव स तु लक्षणनामधेयः
पूर्वं सुरान्तक इति प्रथितः सुतोऽभूद्
आसीत् स्वयंवर उतात्र कलिङ्गराज-
तत्राथ रुद्रवरतः स जरासुतेन
दुर्योधनेऽनुजजनैः सह तैर्गृहीते
तेऽपि स्म कर्णसहिता मृतकप्रतीका
तत्रार्द्धराज्यमनुभुङ्क्ष्व सहानुजैस्त्वं
त्वं वीर शक्रसम एव ततस्तवैव
तस्याभिषेकमकरोत् प्रथमं हि कृष्णो
इत्येव पार्षतसुतासहितेऽभिषिक्ते
भीमे च पार्षतसुतासहितेऽभिषिक्ते
तस्मिन् महोत्सववरे दिनसप्तकानु-
कोशस्य चार्द्धसहितास्तु यदैव पार्था
भीमप्रतापमवलम्ब्य कलिङ्गबन्धान्
आज्ञापयत्यपि स भेरिरवेण पार्थान्
सद्भिर्हि सङ्गतिरिहैव सुखस्य हेतुः(सुखैकहेतुः)
प्रीतिर्यदि स्म भवतां मयि सानुजेऽस्ति
इत्येव तैः पुरजना निखिलैर्निषिद्धाः
वासिष्ठपेन यदुपेन च पाण्डवानां
देशं च नातिजनसंवृतमन्यदेश-
प्रस्थाप्य दूरमनुजस्य सुतान् स राजा
पार्थाश्च ते मुमुदुरत्र वसिष्ठवृष्णि-
विंशोऽध्यायः
औं ॥ यज्ञोरुदाननरदेववन्द्यताप्रश्नर्षिपूजासु युधिष्ठिरोऽभूत् ।
स्त्रीधर्मसंशासनभृत्यकोशरक्षाव्ययादौ गुणदोषचिन्तने ।
बीभत्सुरासीत् परराष्ट्रमर्दने तेनानियम्यांस्तु जरासुतादीन् ।
राष्ट्रेषु भीमेन विमर्दितेषु जिताश्च युद्धेषु निरुद्यमास्ते ।
आजीविनां वेतनदस्तदाऽऽसीन्माद्रीसुतः प्रथमोऽथ द्वितीयः ।
धृष्टद्युम्नस्तत्र सेनाप्रणेता शक्रप्रस्थे नित्यमास्तेऽतिहार्दात् ।
नावैष्णवो न दरिद्रो बभूव न धर्महानिश्च बभूव कस्यचित् ।
युधिष्ठिरं यान्ति हि दर्शनोत्सुकाः प्रतिग्रहायाप्यथ याजनाय ।
गन्धर्वविद्याधरचारणाश्च सेवन्त एतान्त्सततं समस्ताः ।
तेषां राष्ट्रे कार्तयुगा हि धर्माः प्रवर्तिता एव ततोऽधिकाश्च ।
अथोपयेमे शिशुपालपुत्रीं युधिष्ठिरो देवकीं नाम पूर्वम्(पूर्वाम्) ।
तस्यां सुहोत्रो नामतः पुत्र आसीद् यश्चित्रगुप्तो नाम पूर्वं सुलेखः ।
सा केवला भारती नान्यदेव्यस्तत्राऽविष्टास्तत्कृते(तत्राविष्टा यत्कृते) काशिराजः ।
तेषां मध्ये भीमसेनांस एषा मालामधात् तत्र जरासुताद्याः ।
पूर्वं वाक्यैर्वैदिकैस्तान्स भीमो जिग्ये तर्कैः साधुभिः सम्प्रयुक्तैः ।
वेदाधिक्यं शैवशास्त्राणि चाऽहुर्वेदोज्झितानां बहुलां च निन्दाम् ।
विष्णोराधिक्यं तानि शास्त्राणि चाऽहुः शिवादिभ्यः कुत्रचिन्नैव वेदे ।
लोकायताश्च क्वचिदाहुरग्र्यं विष्णुं गुरुं सर्ववरं बृहस्पतेः ।
तेष्वागमेष्वेव परस्परं च विरुद्धता ह्यन्यपक्षेषु भूपाः ।
पूर्वं हि गङ्गा मम विष्णुपूजाविघ्नार्थमायाद् वामकरेण सा मे ।
स व्याघ्ररूपी कपिलात्मिकामुमां(कपिलात्मकामुमां) परीक्षयन् मां हन्तुमिवाऽद्रवद् द्रुतम् ।
व्याघ्रेश्वरं नाम लिङ्गं पृथिव्यां ख्यातं तदास्ते तद्वदन्यत्र युद्धे ।
एवं प्रत्यक्षे विष्णुपदाश्रयस्य बलाधिक्ये किमु वक्तव्यमत्र ।
मया केदारे विप्ररूपी जितश्च रुद्रोऽविशल्लिङ्गमेवाऽशु भीतः ।
एवं प्रत्यक्षे विष्णुबले प्रतीपं मनो यस्य ह्युत्तरं स ब्रवीतु ।
विद्राप्य(विद्राव्य) तान् बाणसङ्घैः समस्तान् जरासुतं गदया योधयित्वा(पोथयित्वा) ।
स व्रीडितः प्रययौ मागधांश्च भूपैः समेतो भीमसेनो रथं स्वम् ।
तस्यां त्रिलोकाधिकरूपसद्गुणैरासम्मितायां (आसम्मतायां) रममाणः सुतं च ।
कृष्णोऽपि गत्वा द्वारवतीं सरामः सत्यापितुर्वधकर्तारमेव ।
तावब्रूतां (सर्वलोकैकभर्तुः)सर्वलोकैककर्तुर्नाऽवां विरोधं मनसाऽपि कुर्वः ।
अन्वेव तं कृष्णरामौ रथेन यातौ शतं योजनानां दिनेन ।
छित्वा शिरस्तस्य चक्रेण कृष्णो जानन्नक्रूरे मणिमेनेन दत्तम् ।
अविश्वासात् सतु सक्रोध एव ययौ विदेहानवसत् पञ्च चाब्दान् ।
बभूव शिष्योऽस्य तथा गदायामसन्निधानं केशवस्य प्रतीक्षन् ।
ज्येष्ठं ह्येनं केशवो नातिवर्तेदित्येव मेने धार्तराष्ट्रः स तस्मात् ।
रूपेण तस्या मोहितो धार्तराष्ट्रो विशेषतः कृष्णरामौ भगिन्याः ।
जाता देवक्यां सा सुभद्रेति नाम्ना भद्रा रूपेणाऽनकदुन्दुभेस्ताम् ।
सीतायाः प्राङ् नित्यशुश्रूषणात् सा बभूव विष्णोर्भगिनी प्रिया च ।
एतत् कृत्वा धृतराष्ट्रात्मजः स ययौ कुरून् निवसत्यत्र रामे ।
आनीय रामं च समस्तसात्त्वतां यदाऽवादीत् केशवः सन्निधाने ।
अव्याजतामात्मनो दर्शयित्वा हलायुधे केशवस्तस्य जानन् ।
आस्तामक्रूरे मणीरन्यैरधार्यः सदा यज्ञाद् दानपतेः स धार्यः ।
लब्ध्वा रत्नं दानपतिः सदैव सन्दीक्षितोऽभूद् यज्ञकर्मण्यतन्द्रः ।
वसन्नजस्तत्र बहूंश्च मासान् सफल्गुनोऽयान्मृगयां कदाचित् ।
सा सूर्यपुत्री यमुनानुजाता तपश्चरन्ती कृष्णपत्नीत्वकामा ।
ततो गत्वा नग्नजितो गृहं च स्वयंवरे सप्त वृषान्गृह्णात्(अगृह्णत्) ।
ततो नीलां तस्य सुतां च लेभे पूर्वं नीला गोपकन्याऽपि याऽसीत् ।
पितृष्वसुर्मित्रविन्दा सुता च कृष्णे मालामासजद् राजमध्ये ।
जित्वाऽऽवन्त्यौ तौ नृपतींश्चैव सर्वानादाय तां प्रययौ वासुदेवः ।
विश्वेषां देवानामवतारा हि पञ्च ते कैकेया(कैकया) भ्रातरोऽस्या हरेश्च ।
स्वयंवरो लक्षणायास्तथाऽऽसीद् यथा द्रौपद्या लक्ष्यवेधात्मकः(लक्षवेधात्मकः) सः ।
लक्षं च तत् सर्वतश्छन्नमेव द्वारं शरस्याप्युपरि स्म लक्षात् ।
तत्राऽजग्मुर्मागधाद्याश्च सर्वे पार्था अपि द्रष्टुमिहाभ्युपाययुः ।
केचिन्निपेतुर्धनुषैव ताडिता नवै केचिच्चालयितुं च शेकुः ।
धनञ्जयः स्वात्मबलं(धनञ्जयः सु आत्मबलं) प्रकाशयन् सज्जं कृत्वा धनुरैक्षच्च लक्ष्यम् ।
भीमश्चापं लक्षमप्येतदत्र द्रष्टुं च नैवैच्छदरीन्द्रधारिणः ।
कृष्णस्ततश्चापमधिज्यमाशु कृत्वाऽचिन्त्यश्छिन्नबाणेन लक्ष्यम्(लक्षम्) ।
कृष्णे ब्रह्माद्यैः स्तूयमाने नरेन्द्रकन्या मालां केशवांसे निधाय ।
विद्राप्य(विद्राव्य) तान् मागधादीन् स कृष्णो भीमार्जुनाभ्यां सहितः पुरीं स्वाम् ।
भैष्मी सत्या चैकतनुर्द्विधैव जाता भूमौ प्रकृतिर्मूलभूता ।
रामेण तुल्या जाम्बवती प्रियत्वे कृष्णस्यान्याः किञ्चिदूनाश्च तस्याः ।
यदाऽऽवेशो ह्रासमुपैति तत्र प्रद्युम्नतो विंशगुणाधिकाः स्युः ।
एवं कृष्णे द्वारकामध्यसंस्थे गिरिं भूपा रैवतकं समाययुः ।
आत्मानं तान् द्रष्टुमभ्यागतान् स कृष्णो गिरौ रैवतके ददर्श ।
एत्याऽकाशान्नारदः कृष्णमाह सर्वोत्तमस्त्वं त्वादृशो नास्ति कश्चित् ।
दक्षिणाभिः साकमित्येव कृष्णं पप्रच्छुरेतत् किमिति स्म भूपाः ।
कूर्मो दृष्टो विष्णुपद्यां मयोक्तस्त्वमुत्तमो नास्ति समस्तवेति(नास्त्यधिकस्तवेति) ।
या मादृशा देवताः सर्वशस्ता धृतास्तया प्रथितत्वात् पृथिव्या ।
तैरेवाहं मत्समाश्चैव देव्यो ध्रियन्त इत्येव त ऊचिरेऽथ ।
सैका देवी बहुरूपा बभाषे युक्ता यदाऽहं ज्ञेन नारायणेन ।
विष्ण्वाविष्टा यज्ञनाम्नी तदङ्कस्थिता सोचे केशवो ह्युत्तमोऽलम् ।
तयोक्तोऽहं नावतारेषु कश्चिद् विशेष इत्येव यदुप्रवीरम् ।
सदोत्तमः किन्तु यदा तु सा मे वामार्द्धरूपा दक्षिणानामधेया ।
सा दक्षिणामानिनी देवता च सा च स्थिता(साऽवस्थिता) बहुरूपा मदर्द्धा ।
तदाऽप्यस्या उत्तमोऽहं सुपूर्णो न मादृशः कश्चिदस्त्युत्तमो वा ।
ताभिश्चैताभिर्दक्षिणाभिः समेताद् वरिष्ठोऽहं जगतः सर्वदैव ।
उक्तं कृष्णेनाप्रतिमेन भूपा अन्योत्तमत्वं दक्षिणानां च शश्वत् ।
प्रत्यक्षं वो वीर्यमस्यापि कुन्त्या युद्धेऽर्थितः केशवो वीर्यमस्यै ।
व्रतं भीमस्यास्ति नैवाभि कृष्णमियामिति स्माऽज्ञया तस्य विष्णोः ।
एवं क्रीडन्तोऽप्यात्मशक्त्या प्रयत्नं कुर्वन्तस्ते विजिताः केशवेन ।
एवं विधान्यद्भुतानीह कृष्णे दृष्टानि वः शतसाहस्रशश्च ।
वाय्वाज्ञया वायुशिष्यः स सत्यमित्याद्युक्त्वा नारदो रुक्मिणीं च ।
साक्षात् सत्या रुक्मिणीत्येकसंविद् द्विधाभूता नात्र भेदोऽस्ति कश्चित् ।
साकं रुक्मिण्या राजमध्ये प्रवेशात् स्तवादृषेः पुष्पदानाच्च देवीम् ।
दातास्म्यहं पारिजातं तरुं त इत्येव तत्राथाऽगमद् वासवोऽपि ।
तदैवाऽगुर्मुनयस्तेन नुन्ना(तुन्नाः) बदर्यास्ते सर्व एवाऽशु कृष्णम् ।
इन्द्रेण देवैः सहितेन याचितो विप्रैश्च सस्मार विहङ्गराजम् ।
नित्यैव या प्रकृतिः स्वेच्छयैव जगच्छिक्षार्थं द्वादशीं भीमसञ्ज्ञाम् ।
तया युक्तो गरुडस्कन्धसंस्थो दूरानुयातो वज्रभृताऽप्यनुज्ञाम् ।
भौमो ह्यासीद् ब्रह्मवरादवध्यो न शस्त्रभृज्जीयस इत्यमुष्मै ।
भौमेन जेयत्वमपि(जय्यत्वमपि) ह्यमीषां दत्तं भौमाय ब्रह्मणा क्रोडरूपात् ।
आसीद् बाह्ये गिरिदुर्गं तदन्तः पानीयदुर्गं मौरवं पाशदुर्गम् ।
तस्यामात्याः पीठमुरौ निसुम्भहयग्रीवौ पञ्चजनश्च शूराः ।
हन्तुम् कृष्णो नरकं तत्र गत्वा गिरिदुर्गं(गिरिं दुर्गं) गदया निर्बिभेद ।
अथाभिपेतुर्मुरपीठौ निसुम्भहयग्रीवौ पञ्चजनश्च दैत्याः ।
तेषां सुताः सप्तसप्तोरुवीर्या वरादवध्या गिरिशस्याभिपेतुः ।
हत्वा पञ्चत्रिंशतो मन्त्रिपुत्रान् जगाम भौमस्य सकाशमाशु ।
जघ्ने सेनां गरुडः पक्षपातैः पादं शेषां केशवः सायकौघैः ।
अच्छेद्योऽभेद्यो नित्यसंवित्सुखात्मा नित्याव्ययः पूर्णशक्तिः स कृष्णः ।
बहून् वरान् ब्रह्मणोऽन्येष्वमोघान् मोघीकृतान् वीक्ष्य परात्परेशः ।
तदा दृप्तं नरकं वीक्ष्य देवी सत्याऽऽददे कार्मुकं शार्ङ्गसञ्ज्ञम् ।
आलिङ्ग्य कृष्णः सत्यभामां पुनश्च रथान्तरे संस्थितं भौममुग्रम् ।
स मन्त्रिभिर्मन्त्रिपुत्रैः समेतो जगाम कृष्णावज्ञयाऽन्धंतमश्च ।
तदा भूमिः पञ्चभूतावरा या यस्यां जज्ञे नरकः श्रीवराहात् ।
साऽदित्यास्ते कुण्डले पादयोश्च निधाय पौत्रं भगदत्तसञ्ज्ञम् ।
संस्थाप्य तं सर्वकिरातराज्ये भौमाहृतं वैश्रवणाद् बलेन ।
करीन्द्रमेकं तं निधायैव तस्मिन् कृत्वा प्रसादं च वसुन्धरायाः ।
नराधिपान् देवगन्धर्वनागान् जित्वाऽऽनीतं हेमरत्नोच्चराशिम् ।
महावीर्यैर्नैर्ऋतै राक्षसेन्द्रैर्भौमानीतैर्निर्ऋतिं योधयित्वा ।
तत्रापश्यत् कन्यका भूमिपानां भौमानीताः समरे तान् विजित्य ।
काश्चित् तत्राऽसन् देवगन्धर्वकन्यास्तासां प्रधाना त्वष्टृपुत्री कशेरुः ।
भार्यात्वार्थे वासुदेवस्य योषित्तनुं तासामिच्छतीनां समीरः ।
नारायणं तत्र शुश्रूषमाणाः प्राप्याप्सरस्त्वं राजकुलेषु जाताः ।
आजानदेवैः सर्वगुणैः समास्ताः स्वभावतोऽथेन्दिरावेशतोऽतः ।
समन्ततो योजनानां शते द्वे प्रवृद्धमिन्द्रस्य स रत्नपर्वतम् ।
स्वयं च सत्यासहितः समारुहत् स चाश्रमेणैव ययौ त्रिविष्टपम् ।
सम्पूजितः सत्यभामासहायः शक्रेण शच्या सहितेन सादरम् ।
तमासुरावेशवशादजानती सत्यां च सर्वप्रभवौ जगत्प्रभू(जगत्गुरू) ।
अथो सदानन्दचिदात्मदेहः न नन्दनोद्यानमजोऽनुरूपया ।
तयाऽच्युतोऽसौ कनकावदातया सुकुङ्कुमादिग्धपिशङ्गवाससा ।
सर्वर्तुनित्योदितसर्ववैभवे सुरत्नचामीकरवृक्षसद्वने ।
विदोषसंवित्तनुरत्र सत्तरुं ददर्श सत्याऽमृतमन्थनोद्भवम् ।
दृष्ट्वैव तं सुस्मितचन्द्रिकास्फुरन्मुखारविन्दाऽसितलोललोचना ।
तरुर्जगज्जीवद मे गृहाङ्गणे संस्थापनीयोऽयमचिन्त्यपौरुष ।
स तेन वृक्षेण सहैव केशवस्तया च देव्याऽऽरुहदग्र्यपौरुषम् ।
तानासुरावेशयुतान् हरेश्च बलप्रकाशाय समुद्यतान् सुरान् ।
निरायुधं वैश्रवणं चकार चिक्षेप चाब्धौ गरुडो जलेश्वरम्(जलेशम्) ।
विबोध्य शार्ङ्गोत्थरवैः स्वकां तनुमावेशितानामसुरैरगाद्धरिः ।
शिवं च शक्रार्थमुपागतं हरिर्व्यद्रावयच्छार्ङ्गविनिःसृतैः शरैः ।
विद्राविते बाणगणैश्च शौरिणा हरे हरौ वज्रमवासृजद् द्रुतम् ।
अपाहसत् तं जगदेकसुन्दरी हरिप्रियाऽथो जगदेकमातरम् ।
जगाम चाथो शरणं जनार्दनं सुरैर्वृतो देवपतिः क्षमापयन् ।
ययाच एनं परिरक्षणाय शचीपतिः केशवमर्जुनस्य ।
तमर्जुनार्थं वरमाप्य वासवः पुनःपुनश्चक्रधरं प्रणम्य ।
कृष्णोऽप्यनुज्ञाप्य पुरन्दरं पुरीं निजां व्रजन्नभ्यधिकं व्यरोचत ।
विरोचमानस्य सदा जगत्प्रभोर्नवै विशेषः क्वचिदच्युतस्य ।
प्रविश्य चेशः स्वपुरीं स यादवैः सुपूजितोऽन्तःपुरमेत्य चाङ्गणे ।
प्रदाय रत्नानि च सर्वसात्त्वतां यथेष्टतस्ता अपि कन्यकाः प्रभुः ।
पृथक्पृथक् तासु दशैव पुत्रकानधत्त(पुत्रकान् न्यधत्त) कन्यामपि सर्वशः प्रभुः ।
विवस्वतो योऽवरजोऽदितेः सुतः ख्यातश्च नाम्ना सवितेति कृष्णात् ।
स चारुदेष्णोऽपि हि विघ्नराजो येऽन्ये च कृष्णस्य सुताः समस्ताः ।
तस्यां समस्तैरभिपूज्यमाने देवे स्वपुर्यां निवसत्यनन्ते ।
अज्ञानतस्तैरभियोधितः स जिगाय सर्वानपि वासुकिं च ।
तैः पूजितः साम्बसहाय आशु मयं च मायाविनमस्त्रवर्षैः ।
तत्रैव कृष्णेन तु पारिजाते हृते जयन्तं प्रजिगाय चाऽजौ ।
अस्त्राणि तावस्त्रवरैर्निहत्य(तावस्त्रवर्षैर्निहत्य) तयोश्च ताभ्यां प्रतिदग्धयानौ ।
स विद्यया साम्बमुदूह्य रत्या प्रदत्तया रुगक्मि(ग्मि)णिनन्दनः पुरीम् ।
तं द्व्यष्टसाहस्रगृहेषु दृष्ट्वा तावत्स्वरूपैर्विहरन्तमेकम् ।
स आज्ञया ब्रह्मण आह कृष्णां क्रमात् कर्तुं भीम एवैकसंस्थाम् ।
सुन्दोपसुन्दौ भ्रातरौ ब्रह्मवाक्यात् परस्परादन्यतो नैव वध्यौ ।
अतः पृथग् वत्सरतो भवत्सु क्रमात् कृष्णा तिष्ठतां योऽन्ययुक्ताम् ।
ततः कदाचिद् धर्मराजेन युक्तां शस्त्रागारे विप्रगोरक्षणार्थम् ।
युधिष्ठिराद्यैः सौहृदाद् वारितोऽपि ययौ सत्यार्थं स कदाचिद् द्युनद्याम् ।
तस्याः पिता गरुडेनाऽत्तपत्युः पुत्राकाङ्क्षी चोदयामास पार्थम् ।
पुनःपुनर्याच्यमानः स पार्थः पुत्रार्थमस्या भुजगेन तस्याम् ।
गुणाः पितुर्मातृजातिः सुतानां यस्मात् सतां प्रायशस्तेन नागः ।
ततो ययावर्जुनस्तीर्थयात्राक्रमेण पाण्ड्यांस्तनयोऽस्य मात्रा ।
सत्यात्ययान्नैव दोषोऽर्जुनस्य तेजीयसश्चिन्तनीयः कथञ्चित् ।
अतिस्नेहाच्चाग्रजाभ्यां तदस्य क्षान्तं सुता पाण्ड्यराजेन दत्ता ।
स वीरसेनस्त्वष्टुरंशो यमस्याप्यावेशयुक् सा च कन्या शची हि ।
तेनैव हेतोर्नातिसामीप्यमासीत् तस्याः पार्थे पुत्रिकापुत्रधर्मा ।
पुत्रं वीरं जनयित्वाऽर्जुनोऽतो गच्छन् प्रभासं शापतो ग्राहदेहाः ।
एवं हि तासां शापमोक्षः प्रदत्तो यदाऽखिला वो युगपत् सम्प्रकर्षेत् ।
विप्रापहासात् कुत्सितयोनितस्ताः कन्यातीर्थे पाण्डवः सम्प्रमुच्य ।
विचिन्त्य कार्यं यतिरूपं गृहीत्वा कुशस्थलीं प्रययौ तं समीपे ।
सर्वज्ञा(सर्वज्ञाना) सा लीलया हासहेतुमपृच्छत् तं सोऽपि तस्यै बभाषे ।
आक्रीडोऽसौ वृष्णिभोजान्धकानां तत्रापश्यत् केशवः फल्गुनं तम् ।
दृष्ट्वा गिरौ रौहिणेयो यतीन्द्रवेषं पार्थं ज्ञातियुक्तः प्रणम्य ।
सर्वज्ञं तं वाग्मिनं वीक्ष्य रामः कन्यागारे वर्षकाले निवासम् ।
युवा बली दर्शनीयोऽतिवाग्मी नायं योग्यः कन्यकागारवासम् ।
नास्मन्मते रोचते त्वन्मतं तु सर्वेषां नः पूज्यमेवास्तु तेन ।
नित्याप्रमत्ता साधु सन्तोषयेति प्रोक्ता तथा साऽकरोत् सोऽपि तत्र ।
संयाचितः फल्गुनेनाऽह वाक्यं यद् वासुदेवस्तन्न जानाति कश्चित् ।
अस्त्रे शस्त्रे तत्त्वविद्यासु चैव शिष्यः शैनेयो वासुदेवेन्द्रसून्वोः ।
अन्ये सर्वे(अन्येऽपि सर्वे) वासुदेवस्य पार्थान् प्रियान् नित्यं जानमाना अपि स्म ।
दुर्योधने दातुमिच्छन्ति सर्वे रामप्रियार्थं जानमाना हरेस्तत् ।
प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाश्च वञ्चिता ययुस्तीर्थार्थं रामयुक्ताः समग्राः ।
यते तीर्थानाचरन् बान्धवांस्त्वमद्राक्षीर्नः कच्चिदिष्टान् स्म पार्थान् ।
भूयः साऽवादीद् भगवन्निन्द्रसूनुर्गतस्तीर्थार्थं ब्राह्मणेभ्यः श्रुतो मे ।
अत्रैवेति स्मयमानं च पार्थं पुनःपुनः पर्यपृच्छच्छुभाङ्गी ।
ततो हर्षाल्लज्जया चोत्पलाक्षी किञ्चिन्नोचे पार्थ एनामुवाच ।
नातिक्रमो वासुदेवस्य युक्तस्तस्मात् तेन स्वपितृभ्यां च दत्ताम् ।
मातापितृभ्यां सहितोऽथ कृष्णस्तत्रैवाऽयाद् वासवश्चाथ शच्या ।
कृष्णस्ततः पुरुहूतेन साकं तयोर्विवाहं कारायामास सम्यक् ।
ततः कृष्णः स्यन्दनं फल्गुनार्थे निधाय स्वं प्रययौ तद्रजन्याम् ।
सर्वायुधैर्युक्तरथं समास्थिते गृहीतचापे फल्गुने द्वारवत्याम् ।
ततस्तु तं सतनुत्रं महेन्द्रदत्ते दिव्ये कुण्डले वाससी च ।
ततः स आबद्धतलाङ्गुलित्रः सतूणीरश्चापमायम्य(आनम्य) बाणैः ।
चक्रे सारथ्यं केशवेनैतदर्थे(केशवेनैतदर्थं) सुशिक्षिता तस्य सम्यक् सुभद्रा ।
स शिक्षया(स्वशिक्षया, सुशिक्षयाऽत्यद्भुतया) त्वद्भुतया शरौघैर्विद्राप्य तान् भीषयित्वैव सर्वान् ।
प्रियं कुर्वन्निव रामस्य सोऽपि व्याजेन पार्थं सेनयैवाऽवृणोत् तम् ।
एको ह्यसौ मरुतां सौम्यनामा शुश्रूषार्थं वासुदेवस्य जातः ।
निरायुधं विरथं(निरायुधां विरथां) चैव चक्रे पार्थः सेनां तस्य नैवाहनच्च ।
शिक्षां पार्थस्याधिकां मानयान उपेत्य पार्थं च शशंस सर्वाम् (सर्वम्) ।
ततः पराजितवच्छीघ्रमेत्य शशंस सर्वं हलिनेऽथ सोऽपि ।
कृष्णोऽपि सर्वं विपृथोर्निशम्य प्राप्तः सुधर्मां विमना इवाऽसीत् ।
मायाव्रतं तं विनिहत्य शीघ्रं वयं सुभद्रामानयामः क्षणेन ।
ज्ञातव्यमेतस्य मतं पुरस्ताद्धरेर्विरोधे न जयो भवेद् वः ।
अथाब्रवीद् वासुदेवोऽमितौजाः शृण्वन्तु सर्वे वचनं मदीयम् ।
तां मे वाचं नाग्रहीदग्रजोऽयं बहून् दोषान् व्याहरतोऽप्यतो मया ।
अतीतश्चायं कार्ययोगोऽसमक्षं हृता कन्याऽतो नोऽत्र का मानहानिः ।
देया च कन्या नास्ति पार्थेन तुल्यो वरोऽस्माकं कौरवेयश्च पार्थः ।
अर्थ्योऽस्माभिः स्वयमेवाहरत् स शक्रात्मजो नात्र नः कार्यहानिः ।
जित्वा यद्येनं कन्यका चाऽहृता चेत् परामृष्टां नैव कश्चिद्धि लिप्सेत्(कश्चिद् विलिप्सेत्) ।
श्रुत्वा हली कृष्णवाक्यं बभाषे मा यात चित्तं विदितं मयाऽस्य ।
ततोऽर्जुनो यत्र तिष्ठन्(तिष्ठेत्) न कश्चित् पराजयं याति कृष्णाज्ञयैव ।
सम्भावितो भ्रातृभिश्चातितुष्टैरूचेऽथ सर्वं तेषु यच्चाऽत्मवृत्तम्(आत्मवृत्तिम्) ।
सार्द्धं ययौ शकटै रत्नपूर्णैः शक्रप्रस्थं पूजितस्तत्र पार्थैः ।
मासानुषित्वा कतिचिद् रौहिणेयो ययौ पुरीं स्वां केशवोऽत्रावसच्च ।
आसन् कृष्णायाः पञ्च सुता गुणाढ्या विश्वेदेवाः पञ्चगन्धर्वमुख्यैः ।
प्रतिविन्ध्यः सुतसोमः(श्रुतसोमः) श्रुताख्यकीर्तिः शतानीक उत श्रुतक्रियः ।
चन्द्रांशयुक्तोऽतितरां(चन्द्रांशयुक्तो नितरां) बुधोऽसौ जातः सुभद्राजठरेऽर्जुनेन ।
सर्वेऽपि ते वीर्यवन्तः सुरूपा भक्ता विष्णोः सर्वशास्त्रेष्वभिज्ञाः ।
ततः कदाचित् खाण्डवं कृष्णपार्थौ चिक्रीडिषू सत्यभामासुभद्रे ।
स्वैरं तयोस्तत्र विक्रीडतोश्च स्त्रीरत्नाभ्यां मन्दवातानुजुष्टे ।
भूत्वा विप्रस्तौ ययाचेऽन्नमेत्य कुशानुरूचेऽनुमते (कुशानुरूचे च मते) रमेशितुः ।
प्रयाजान् देवाननुयाजांश्च शुल्कं हविर्दाने देवतानामयाचिषम् ।
पुनः पूर्तिः केन मे स्याद् बलस्येत्यब्जोद्भवं पृष्टवानस्मि नत्वा ।
शक्रस्येदं खाण्डवं तेन विघ्नं करोत्यसौ तेन वां प्रार्थयामि ।
नरावेशादन्नदानप्रतिश्रवात् स्वस्यापि शक्रस्य विरोधमैच्छत् ।
नहि स्वदत्तस्य पुनः स वैरं शक्रः कुर्यात् स्वयमिन्द्रो हि पार्थः ।
नचायुक्तः केशवेनैष शक्त इति कृष्णादाप भूयोऽप्यनुज्ञाम् ।
चक्रं गोमन्ते कृष्णमापापि(कृष्णमायाद्धि) पूर्वं भक्त्या वह्निः केशवेऽदात् पुनस्तत् ।
धनुश्च गाण्डीवमथाब्जजस्य करोति येनाखिलसंहृतिं सः ।
तेनैव ते जिग्युरथो जगत्त्रयं प्रसादतस्ते(प्रसादतस्तु) क्रमशोऽब्जयोनेः ।
रथं च शुभ्राश्वयुतं जयावहं तूणौ तथाचाक्षयसायकौ शुभौ ।
विशेषतो ध्वजसंस्थे हनूमत्यजेयता स्याज्जयरूपो यतोऽसौ ।
गाण्डीवमप्यास कृष्णप्रसादाच्छक्यं धर्तुं पाण्डवस्याप्यधार्यम् ।
इन्द्रस्य दत्तश्च वरः स्वयम्भुवा तेनापि पार्थस्य बभूव धार्यम् ।
स योजनद्वादशकाभिविस्तृतं पुरं चकाराऽशु पुरन्दरात्मजः ।
प्रभक्षमाणं(प्रभक्ष्यमाणं) निजकक्षमीक्ष्य सन्धुक्षयामास तदाऽऽशुशुक्षणिम् ।
अस्त्रैस्तु वृष्टिं विनिवार्य कृष्णः पार्थश्च शक्रं सुरपूगयुक्तम् ।
स्नेहं च कृष्णस्य तदर्जुने धृतं विलोक्य पार्थस्य बलं च तादृशम् ।
विष्णुश्च शक्रेण सहेत्य केशवं समाश्लिषन्निर्विशेषोऽप्यनन्तः ।
ब्रह्मा च शर्वश्च समेत्य कृष्णं प्रणम्य पार्थस्य च कृष्णनाम ।
अनुज्ञातास्ते प्रययुः केशवेन क्रीडार्थमिन्द्रो युयुधे हि तत्र ।
दैत्याश्च नागाश्च पिशाचयक्षा हताः सर्वे तद्वनस्था हि ताभ्याम् ।
अयमग्ने जरितेत्यादिमन्त्रैः स्तुत्वा वह्निं पक्षिणो नैव दग्धाः ।
छिन्नेऽर्जुनेनान्तरिक्षे पतन्त्यास्तस्याः शक्रेणावितश्छिन्नपुच्छः ।
मयः कृष्णेनाऽत्तचक्रेण दृष्टो ययौ पार्थं शरणं जीवनार्थी ।
देवारिरित्येव मयि प्रकोपः कृष्णस्य तेनाहमिमं(तेनाहममुं) पुरन्दरम् ।
प्राणोपकृत् प्रत्युपकारमाशु किं ते करोमीति स पार्थमाह ।
कृष्णोऽपि (राज्ञे)राज्ञोऽतिविचित्ररूपसभाकृतावादिशत्(सभाकृतावदिशत्) तां स चक्रे ।
दृष्ट्वा च तौ पाण्डवाः सर्व एव महामुदं प्रापुरेतन्निशम्य ।
एकविंशोऽध्यायः
औं ॥ जनार्दनाज्ञया मयः समस्तकौतुकोत्तराम्(समस्तकौतुकोत्तमाम्) ।
स वायुधारितां गदां हि यौवनाश्वभूभृता ।
पुनश्च वत्सरद्वयं समुष्य केशवो ययौ ।
ततो वसन् स्वपुर्यजः क्वचिद् रविग्रहे हरिः ।
पृथासुताश्च सर्वशः सदारपुत्रमातृकाः ।
तथैव नन्दगोपकः सदारगोपगोपिकः ।
प्रियाश्च ये रमेशितुर्हरिं त्रिरूपमेत्य ते ।
कृतार्थतां च ते ययू रमेशपाददर्शनात् ।
अनुग्रहं विधाय स स्वकेषु केशवस्त्रिवृत् ।
समस्तलोकसंस्थितात्मभक्तिमज्जनस्य सः ।
ततो ययौ स्वकां पुरीं पृथासुतैः सहाच्युतः ।
हयं सभीमफल्गुना हरे रथं समास्थिताः ।
जिताः समस्तभूभृतो जरासुतादयः क्षणात् ।
हयः स कृष्णनिर्मितो दिनेन लक्षयोजनम् ।
पराशरात्मजो हरिर्हरिं यदा त्वदीक्षयत् ।
व्रजन्ति जन्मनोऽनु मे सदा सुता अदृश्यताम् ।
सकृष्णरामकार्ष्णिभिः (न कृष्णरामकार्ष्णिभिः) सुता नु मेऽत्र पालिताः ।
तदा जगाद फल्गुनोऽसुरैर्विदूषितात्मना ।
मया जिता हि खाण्डवे सुरास्तथाऽसुरानहम् ।
उदीर्य चेति केशवं स ऊचिवान् व्रजाम्यहम् ।
विलज्जमानमीक्ष्य तं जगाद केशवोऽरिहा ।
वह्निं प्रवेक्ष्येऽशक्तश्चेदित्युक्त्वा सर्वयादवैः ।
प्रियो हि नितरां रामः कृष्णस्यानु च तं सुतः ।
रतिरेव हि या तस्यां जातोऽसौ कामनन्दनः ।
तस्मात् तांस्त्रीनृते कृष्णः पार्थसाहाय्यकारणात् ।
अस्त्रैश्चकार दिग्बन्धं कुमारोऽथापि तत्क्षणात् ।
वह्निं(अग्निं) विविक्षन्तममुं निवार्य ययौ सविप्रः सहफल्गुनो हरिः ।
ददुश्च मार्गं गिरयोऽब्धयस्तथा विदार्य चक्रेण तमोऽन्धमीशः ।
संस्थाप्य दूरे सरथं सविप्रं पार्थं स्वरूपे द्विचतुष्कबाहौ ।
सहस्रमूर्धन्युरुशेषभोग आसीनरूपेऽमितसूर्यदीधितौ ।
स्थित्वैकरूपेण मुहूर्तमीश्वरो विनिर्ययौ विप्रसुतान् प्रगृह्य ।
दर्पं निहन्तुं हरिरर्जुनस्य समानयद् विप्रसुतान् परेशः ।
अप्राकृतात् सदनाद् वासुदेवो निस्सृत्य सूर्याधिकलक्षदीधितेः ।
लोकशिक्षार्थमेवासौ प्रायश्चित्तं च चालने ।
ब्रह्मादीनागतांश्चैव सदा स्वपरिचारकान् ।
सस्नाववभृथं कृष्णः सदारः ससुहृज्जनः ।
जघान गदया कृष्णस्तं क्षणात् सविडूरथम् ।
हरेः पार्षदः क्षिप्रं हरिमेव समाश्रितः ।
ततः कृष्णः पुरीमेत्य बोधयामास फल्गुनम् ।
अयं द्वीपः सागरश्च लक्षयोजनविस्तृतौ ।
अन्त्याध्यर्द्धस्थलं हैमं बाह्यतो वाज्रलेपिकम्(वज्रलेपितम्,वज्रलेपकम्)) ।
घनोदकं तद्द्विगुणं तदन्ते धाम मामकम् ।
लोकालोकप्रदेशस्तु पञ्चाशल्लक्षविस्तृतः ।
योजनानां पञ्चविंशत्कोटयो मेरुपर्वतात् ।
अबग्नीरनभोहङ्कृन्महत्तत्त्वगुणत्त्रयैः ।
व्याप्तोऽहं (सर्वतः)सर्वगोऽनन्तोऽनन्तरूपो निरन्तरः ।
मद्वशा एव सर्वेऽपि त्वं चान्ये च धनञ्जय ।
‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
उषित्वा कतिचिन्मासान् ययुः सर्वेऽपि पाण्डवाः ।
ततः कदाचित् प्रवरे सभातले धर्मात्मजो राजभिर्भ्रातृभिश्च ।
अन्तरिक्षं त्वया प्रोक्तं लक्षयोजनमुच्छ्रितम् ।
भुवः स्वर्गश्च कोट्यैव योजनानां प्रविस्तृतौ(प्रविस्तृते) ।
यावन्त एते मिलितास्तत्प्रमाण उदीरितः ।
ततश्च द्विगुणः प्रोक्तो विष्णुलोकः सनातनः ।
अनन्तजनसम्पूर्णा(अनन्तजनसङ्कीर्णाः) अपि ते हीच्छया हरेः ।
दिव्यरत्नसमाकीर्णं तथा पातालसप्तकम् ।
कामभोगसमायुक्ता बहुवर्षसहस्रिणः ।
एषां च सर्वलोकानां धाता नारायणः परः ।
सेवका ब्रह्मणश्चैव देवा वेदाश्च सर्वशः ।
अखिला अपि राजानः पाण्डुश्चास्मत्पिता मुने ।
उपास्यमानो भगवान् रामो यमसभातले ।
प्रादुर्भावाश्च निखिला ब्रह्मणोपासिताः सदा ।
रुद्रस्योग्राणि भूतानि नृसिंहात्मा शिवेन च ।
तत्र मे संशयो भूयान् हरिश्चन्द्रः कथं नृपः ।
इत्युक्तो नारदः प्राह राजसूयकृतोन्नतिम् ।
करोतु राजसूयं मे पुत्रोऽजेयानुजार्चितः ।
एतच्छ्रुत्वा धर्मसुतो भ्रातृभिः सहितो वशी ।
सुकार्यमेतदित्यलं निशम्य सोदरोदितम् ।
तदैव केशवस्य याः स्त्रियस्तदीयतातकैः ।
प्रणम्य केशवं वचः स आह मागधेन ते ।
नृपायुतद्वयेन सोऽष्टविंशकैः शतैरपि ।
विमोचयस्व तान् प्रभो निहत्य मागधेश्वरम् ।
इतीरितोऽथ सारथिं निशाम्य धर्मजस्य च ।
स पाण्डवैः समर्चितो मखाय धर्मजेन च ।
क्रतुर्यथाविधानतः कृतो हि पारमेष्ठ्यकम् ।
(अयोग्यकम्)अयोग्यकान्महापदे विधातुरेष हि क्रतुः ।
पुरा तु मुक्तितोऽधिकं स्वजातितः करोति च ।
सुरांशकोऽपि ते पिता विना हि राजसूयतः ।
तपश्चरन् समागते शचीपतौ पिता तव ।
व्रजस्व मानुषीं तनुं ततो मृतः पुनर्दिवम् ।
तदाऽधिकस्त्रिशङ्कुजो भविष्यतु त्वदित्यथ ।
अतः सुकार्य एव ते युधिष्ठिर क्रतूत्तमः ।
उदीर्य चैवमीश्वरः क्रतोरमुष्य योग्यता ।
ततः सुपूर्णमस्य तत् फलं विधातुमञ्जसा ।
क्व राजसूयमद्य ते जरासुते तु जीवति ।
विरिञ्चशर्ववाक्यतः समस्तलोकजायिनि ।
इतीरिते(इतिरितो) रथाङ्गिना जगाद धर्मनन्दनः ।
बभूवुरेव(बभूविरे च) भूभृतो नचाऽधिराज्यमापिरे ।
इतीरितेऽमुनाऽवदत् प्रधानमारुतात्मजः ।
निजानुभाववर्जिता हरेरनुग्रहोज्झिताः ।
स्थिरोऽनुभाव एव मे महाननुग्रहो हरेः ।
इतीरितेऽमुना हरिः समुद्यमात् प्रधानतः ।
स एक एव पूरुषो जरासुतोऽद्य वर्तते ।
तथा सतां समाश्रयो यदुद्भवाः सतां गुणाः ।
यदि स्म तेन मागधो निहन्यते सतां जयः ।
स पारमेष्ठ्यसत्पदं प्रयात्यसंशयं युधि ।
निहन्ति मागधेश्वरं य एष वैष्णवं जगत् ।
निहन्ति शैवनायकं य एष(स एव) वैष्णवाग्रणीः ।
युधिष्ठिरे ब्रुवत्यजं मखेन मे त्वलं त्विति ।
इतीरितेऽवदद्धरिर्व्रजामहे वयं त्रयः ।
वृकोदरेण हन्यते यदि स्म मागधाधिपः ।
इतीरिते तु शौरिणा जगाद धर्मनन्दनः ।
भयाद्धि यस्य माधुरं विहाय मण्डलं गताः ।
इमौ हि(इमौ च) भीमफल्गुनौ ममाक्षिणी सदा प्रभो ।
अतो न जीवितात् प्रियानहं रिपोर्बलीयसः ।
इतीरितेऽवदत् पुनर्वृकोदरोऽरिकक्षभुक् ।
वशे च यस्य तद् बलं सुरासुरोरगादिनाम् ।
अधृष्यमस्ति मे बलं हरिः प्रणायकोऽस्य च ।
अजेयता तथाऽर्जुने हरेर्वरोद्भवाऽस्ति हि ।
हनिष्य एव मागधं हरेः पुरो न संशयः ।
वयं त्रयः समेत्य तं प्रयातयाम मृत्यवे ।
भयं न कार्यमेव ते मया हतः स नेति ह ।
स शर्वसंश्रयाग्रणीर्मदाश्रयोत्तमेन तु ।
अतो न शङ्कितं मनः कुरुष्व भूपते(भूपतिं) क्वचित् ।
इतीरितः स विष्णुना विचार्य तद्गुणान् परान् ।
समेत्य मागधांस्तु ते शिवोरुलिङ्गमित्यलम् ।
स्वशीर्षतोऽपि चाऽदृतं जरासुतेन ते गिरिम् ।
अद्वारतस्ते नगरं प्रविश्य माषस्य नालेन कृतास्त्रिभेरीः ।
तथाऽऽपणेभ्यो बहुमाल्यगन्धान् प्रसह्य सङ्गृह्य शुभांश्च दध्रुः ।
तान् विप्रवेषान् स निशाम्य राजा महाभुजान् स्नातकवेषयुक्तान् ।
के ष्ठाथ(स्थात) किंहेतुत आगताश्च कृतश्च मे पर्वतलिङ्गभेदनम् ।
इति ब्रुवाणं भगवानुवाच कार्यं हि शत्रोरखिलं प्रतीपम् ।
इत्युक्तवाक्यं नृपतिं जगाद जनार्दनो नैव हि तादृशा द्विजाः ।
यद् बान्धवान् नः पिशिताशिधर्मतो रौद्रे मखे कल्पयितुं पशुत्वे ।
विमोक्षयामः स्वजनान् यदि त्वं न मोचयस्यद्य निगृह्य च त्वाम् ।
इतीरितोऽसौ मगधाधिपो रुषा जगाद नाहं शिव यागयुक्तान् ।
निरायुधः सायुधो वा युष्मदिष्टायुधेन वा ।
इत्युक्तवन्तमवददजितोरुबलो हरिः ।
येन कामयसे योद्धुं तं न आसादय द्रुतम् ।
घातयित्वा स्वशत्रुं च भीमसेनानुग्रहं परम् ।
तृणीकर्तुं रिपुं चैव निरायुधतयाऽगमन् ।
निरायुधः क्षत्रवेषो नैव योग्यः कथञ्चन ।
मागधस्य ससैन्यस्य स्वगृहे संस्थितस्य च ।
तृतीयमर्जुनं चैव समादाय ययौ रिपुम् ।
वृण्वेकमस्मास्विति स प्रोक्त आह जरासुतः ।
पञ्चपञ्चाशदब्दोऽद्य ह्ययमेवं च बालवत् ।
इत्युक्तोऽप्यर्जुनो नाऽह कुरु तर्हि परीक्षणम् ।
अतो भीमे बलाधिक्यं सुप्रसिद्धमभून्महत् ।
जानन् कृष्णे बलं घोरमविषह्यं स मागधः ।
आह्वयामास भीमं तु स्याद् वा मे जीवनं त्विति ।
अर्जुने तु जिते कृष्णभीमौ मां निहनिष्यतः ।
इति मत्वाऽऽह्वयामास भीमसेनं स मागधः ।
इति स्म(इतीक्ष्य) भीमं प्रतियोधनाय सङ्गृह्य राजा स जरासुतो बली ।
बलं भीमे मन्यमानोऽधिकं तु गदाशिक्षामात्मनि चाधिकां नृपः ।
तदर्थमेवाऽशु गदां प्रगृह्य भीमो ययौ मागधसंयुतो बहिः ।
वाचाऽजयत् तं प्रथमं वृकोदरः शिवाश्रयं विष्णुगुणप्रकाशया ।
तयोर्गदे तेऽशनिसन्निकाशे चूर्णिकृते देहमहादृढिम्ना ।
सञ्चूर्णितगदौ वीरौ जघ्नुतुर्मुष्टिभिर्मिथः ।
चचाल पृथ्वी गिरयश्च चूर्णिताः कुलाचलाश्चेलुरलं विचक्षुभुः ।
सुरास्तु भीमस्य जयाभिकाङ्क्षिणस्तथाऽसुराद्या मगधाधिपस्य ।
मानयित्वा वरं धातुर्दिवसान् दश पञ्च च ।
स प्रणम्य हृषीकेशं हर्षादाश्लिष्य फल्गुनम् ।
पृष्ठेऽस्य जानुमाधाय कूर्मदेशं बभञ्ज ह ।
मर्मण्येव न हन्तव्यो मयाऽयमिति मारुतिः ।
भज्यमाने शरीरेऽस्य ब्रह्माण्डस्फोटसन्निभः ।
निहत्य कृष्णस्य रिपुं स भीमः समर्पयामास तदर्चनं हरेः ।
स्वीकृत्य पूजां च वृकोदरस्य दृढं समाश्लिष्य च तं जनार्दनः ।
जग्मुः सुराश्चातितरां प्रहृष्टा ब्रह्मादयो दीनतराश्च दैत्याः ।
सुतो ययौ शरणं तान् रमेशभीमार्जुनान् सहदेवोऽस्य धीमान् ।
रथो ह्यसौ वसुना वासुदेवाच्छक्रान्तराऽऽप्तो वसुवंशजत्वात् ।
कृष्णोऽस्मरद् गरुडं स ध्वजेऽभूद् रथं कृष्णोऽथाऽरुहत् पाण्डवाभ्याम् ।
नकुलस्याऽदान्मद्रराजो हि पूर्वं स्वीयां कन्यां सा तथैषाऽप्युषा हि ।
जरासुतस्याऽत्मजः केशवादीन् रत्नैः समभ्यर्च्य ययावनुज्ञया ।
सम्भावितास्ते सहदेवेन सम्यक् प्रशस्य(प्रणम्य) कृष्णं भीमसेनं च सर्वे ।
कृष्णश्च पार्थौ च तथैकयानं समास्थिता धर्मजमभ्यगच्छन् ।
द्वैपायनोऽथ भगवानभिगम्य पार्थानाज्ञापयत् सकलसम्भृतिसाधनाय ।
कर्ता हि तस्य परमेष्ठिपदं प्रयाति यद्यन्यसद्गुणवरैः परमेष्ठितुल्यः ।
असाधारणहेतुर्यः कर्मणो यस्य चेतनः ।
हेतवोऽपि हि पापस्य न प्रायः फलभागिनः(फलभोगिनः) ।
असाधारणहेतुश्च भीम एव प्रकीर्तितः ।
जयाच्च कीचाकादीनामन्यैर्जेतुमशक्यतः ।
तस्माद् ब्रह्मपदावाप्त्यै व्यासो भीमस्य तं क्रतुम् ।
अथाब्रवीद् धनञ्जयो धनुर्ध्वजो रथो वरः ।
इतीरितोऽखिलप्रभुर्जगाद सत्यमस्ति ते ।
तथाऽपि कीचकादयो वृकोदरादृते वशम् ।
बलाधिकोऽसि कर्णतस्तथाऽपि नामृतः करम् ।
सवर्मकुण्डलत्वतो न वध्य एष यत् त्वया ।
जीवग्राहभयात् कर्णो ददाति करमञ्जसा ।
अजेयौ शर्ववचनाद् रणे कीचकपौण्ड्रकौ ।
जीवग्राहभयं ह्येषां भीमान्मागधपातनात् ।
प्रयाहि च त्वं धनदप्रपालितां दिशं द्वीपान् सप्त चाशेषदिक्षु ।
रथो हि दिव्योऽम्बरगस्तवास्ति दिव्यानि चास्त्राणि धनुश्च दिव्यम् ।
तथा सुराश्चापि(तथाऽसुराः) समस्तशोऽस्य बलिं प्रयच्छन्ति मदज्ञयेतरे ।
यशश्च धर्मश्च तयोरपि स्यादिति स्यदिति स्म कृष्णेन सुतेन काल्याः ।
वृकोदरोऽजयन्नृपान् विराटमाससाद ह ।
ततः क्रमान्नृपान् जित्वा चेदीनां विषयं गतः ।
मातृष्वसुर्गृहे चोष्य दिवसान् कतिचित् सुखम् ।
क्रमेण सर्वान् निर्जित्य पौण्ड्रकं च महाबलम् ।
हिमवच्छिखरे देवान् जित्वा शक्रपुरोगमान् ।
बाहुयुद्धेन शेषं च गरुडं च महाबलम् ।
पोप्लूयमानः स ततोऽम्बुधौ बली जगाम बाणस्य पुरं हरं च ।
पृष्टश्च गिरिशेनासौ विस्तरं दिग्जयस्य च ।
निशम्य शङ्करोऽखिलं मखस्य च प्रसाधकम् ।
स बाणदैत्यतो महच्छिवेन दत्तमुत्तमम्।
स विप्रयादवेश्वरं द्विधास्थितं जनार्दनम् ।
सोऽभिवाद्याग्रजं(सोऽभिवन्द्याग्रजं) चैव यथावृत्तं न्यवेदयत् ।
यथा जिताः कीचकाद्या एकलव्यसहायवान् ।
यथा सिंहादितनवः शेषवीन्द्रेन्द्रपूर्वकाः ।
सम्भावितश्च कृष्णाभ्यां राज्ञा च सुमहाबलः ।
ऊचे तं भगवान् व्यासो जितं सर्वं त्वयाऽरिहन् ।
विरिञ्चः सर्वजित् पूर्वं द्वितीयस्त्वमिहाभवः ।
तदैवान्ये दिशो जित्वा समीयुस्तस्य येऽनुजाः ।
तत्र रुग्मी(रुक्मी) न युयुधे सहदेवेन वीर्यवान् ।
तपसा तोषितात् कृष्णादन्यानेवामुनाऽखिलान् ।
स्वसुः स्नेहाच्च कृष्णस्य यज्ञकारयितृत्वतः ।
तथा स्मृतं समागतं घटोत्कचं विभीषणे ।
पुरा हि राघवोदितं तदस्य(यदस्य) सोऽखिलं तदा ।
महौघरत्नसञ्चयं स आप्य भीमसेनजः ।
नकुलः पश्चिमाशायां विजिग्येऽखिलभूभृतः ।
अर्जुनः कपिवरोच्छ्रितध्वजं स्यन्दनं समधिरुह्य गाण्डिवी।
त्रैगर्ताः पार्वतेयाश्च सहिताः पाण्डुनन्दनम् ।
तान् विजित्य युगपत् स पाण्डवः सञ्जयन् क्रमश एव तां दिशम् ।
सोऽभियुद्ध्य सगजो दिनाष्टकं श्रान्त आह पुरुहूतनन्दनम् ।
सोऽप्यदात् करममुष्य वासवो मद्गुरुस्तव पितेति सादरम् ।
स्नेहपूर्वं प्रदत्ते तु करे नैवाऽह चोत्तरम् ।
पार्थो जित्वाऽष्टवर्षाणि षड् द्वीपानपरानपि ।
पाताळसप्तकं गत्वा जित्वा दैतेयदानवान् ।
जित्वा च वासुकिं भूरि रत्नमादाय सत्वरः ।
सुवर्णरत्नगिरयश्चतुर्भिस्तैः समार्जिताः ।
चतुःशतं च क्रमश उच्छ्रिता दिग्जयार्जिताः ।
विश्वकर्मकृतत्वात्तु पुरस्याल्पेऽपि च स्थले ।
ततो यज्ञः प्रववृते कृष्णद्वैपायनेरितः ।
ज्येष्ठत्वाद् याजमानं तु प्रणिधाय युधिष्ठिरे ।
ब्रह्माणीपदयोग्यत्वात् कृष्णैका यज्ञपत्न्यभूत् ।
आज्ञयैव जगद्धातुर्व्यासस्यानन्ततेजसः ।
आहूतं दिग्जये पार्थैस्तदा लोकद्विसप्तकम् ।
भीष्मो द्रोणश्च विदुरो धृतराष्ट्रः सहात्मजः ।
तथैव यादवाः सर्वे बलभद्रपुरोगमाः ।
तत्र सर्वजगदेकसङ्गमे तत्त्वनिर्णयकथा बभूविरे ।
तत्त्वनिर्णयकथासु निर्णयो वासुदेवगुणविस्तरोऽभवत् ।
बादरायणभृगूत्थरामयोः शृण्वतोः परमनिर्णये कृते ।
जानमानोऽपि नृपतिः सर्वपूज्यतमं हरिम् ।
नास्ति नारायणसममिति वादेन निर्णये ।
नृपास्तस्मादयं कृष्णो नारायण इति स्म ह ।
ब्रह्मादयः सुरा यस्माद् दृश्यन्ते मर्त्यवन्नृभिः ।
सर्वशास्त्रविदं भीष्मं जानन्त्येते नृपा अपि ।
पितामहाग्र्यपूजार्हः कोऽत्र लोकसमागमे ।
यद्यप्येकस्त्रिधा विष्णुर्वसिष्ठभृगुवृष्णिषु ।
विप्रत्वान्न विरुद्ध्यन्ते तत एव च युक्तताम् ।
अविवादे प्रसिद्धिश्च नैवास्य भविता क्वचित् ।
कृष्णाय दत्ते राजानो विवादं कुर्युरञ्जसा ।
व्यासभार्गवयोः साक्षात् तदैक्यात् तदनन्तरम् ।
अग्र्योपहारमुपयापित एव कृष्णे कोपादनिन्ददमुमाशु च चेदिराजः ।
दूरेऽपि केशवविनिन्दनकारिजिह्वामुच्छेत्स्य इत्युरुतराऽस्य सदा प्रतिज्ञा ।
मयैव वध्याविति तावाह यत् केशवः पुरा ।
जानन्नपि हरेरिष्टं स्वकर्तव्यतयोत्थितः ।
देवसङ्घभविनां महानभूदीक्ष्य(महानभूद् वीक्ष्य) तोष इह केशवेऽधिकाम् ।
आसुरा इह सुयोधनादयस्तत्र ते विमनसो बभूविरे ।
समाह्वयच्च केशवं युधे तमाशु केशवः ।
निकृत्यमानकन्धरः स भक्तिमानभूद्धरौ ।
जयः प्रविश्य केशवं पुनश्च पार्षदोऽभवत् ।
सुवर्णरत्नभारकान् बहून् नृपा उपानयन् ।
अभोजयंस्तथा द्विजान् यथेष्टभक्ष्यभोज्यकैः ।
यदिष्टमास यस्य च प्रदत्तमेव पाण्डवैः ।
नदत्सुरोरुदुन्दुभिप्रगीतदेवगायकाः ।
समस्तराजसंयुता विगाह्य जाह्नवीजले ।
गतेषु सर्वराजसु स्वकां(स्वकं) पुरं स्वकेषु च ।
विचित्ररत्ननिर्मिते रविप्रभे सभातले ।
तथैव (रुग्मिणी)रुक्मिणीमुखाः परिग्रहा रमेशितुः ।
सहैव वायुसूनुना तथैव पार्षतात्मजा ।
यमौ च पार्षतादयो धनञ्जयान्तिकेऽविशन् ।
समासतां तु सा सभा व्यरोचताधिकं तदा ।
विचित्रहेममालिनः शुभाम्बराश्च तेऽधिकम् ।
विशेषतो जनार्दनः सभार्यको जगत्प्रभुः ।
उपासिरे च तान् नृपाः समस्तशः सुहृद्गुणाः ।
द्वारं सभाया हरिनीलरश्मिव्यूढं न जानन् स विहाय भित्तम् ।
प्रवेशयेतां च यमौ तमाशु सभां भुजौ गृह्य नृपोपदिष्टौ ।
तत्रेन्द्रनीलभुवि रत्नमयानि दृष्ट्वा पद्मानि नीरमनसा जगृहे स्ववस्त्रम् ।
तं प्राहसद् भगवता क्षितिभारनाशहेतोः सुसूचित उरुस्वरतोऽत्र भीमः ।
मन्दस्मितेन विलसद्वदनेन्दुबिम्बो नारायणस्तु मुखमीक्ष्य मरुत्सुतस्य ।
कृष्णावृकोदरगतं बहुलं निधाय क्रोधं ययौ सशकुनिर्धृतराष्ट्रपुत्रः ।
यौ मामहसतां कृष्णभीमौ कृष्णस्य सन्निधौ ।
यदि मे शक्तिरत्र स्याद् घातयेयं वृकोदरम् ।
ईदृशं पाण्डवैश्वर्यं दृष्ट्वा को नाम जीवितम् ।
इत्युक्तः शकुनिर्वैरं दृढीकर्तुं वचोऽब्रवीत् ।
अनुजीवस्व तान् वीरान् गुणज्येष्ठान् बलाधिकान् ।
यदि तेषां तदैश्वर्यं न मां गच्छेदशेषतः ।
नच बाहुबलाच्छक्ष्य आदातुं तां श्रियं क्वचित् ।
इतीरितः पापतम आह गान्धारको नृपः ।
यां यां श्रियं प्रदीप्तां त्वं पाण्डवेषु प्रपश्यसि ।
इतीरितः प्रसन्नधीः सुयोधनो बभूव ह ।
धृतराष्ट्रमथोवाच द्वापरांशोऽतिपापकृत् ।
दुर्योधनं तु तच्छ्रुत्वा कुत इत्याह दुर्मनाः ।
श्रुत्वैव तन्नेत्यवदत् स भूपतिर्विरोधि धर्मस्य विनाशकारणम् ।
त्वयाऽपि निर्जित्य दिशो मखाग्र्याः कार्याः स्पृधो मा गुणवत्तमैस्तैः ।
यदि श्रियं पाण्डवानां नाक्षैराहर्तुमिच्छसि(नाक्षैराच्छेत्तुमिच्छसि) ।
यदि मज्जीवितार्थी त्वमानयाऽश्विह पाण्डवान् ।
वेदानुजीविनो विप्राः क्षत्रियाः शस्त्रजीविनः ।
अतः स्वधर्म एवायं तवापि स्यात् फलं महत् ।
एवं ब्रुवन्नपि नृप आविष्टः कलिना स्वयम् ।
आविवेश कलिस्तं हि यदा पुत्रत्वसिद्धये ।
यावत् पुरं परित्यज्य वनमेव विवेश ह ।
न्यवारयत् तं विदुरो महत् ते पापं कुलस्यापि विनाशकोऽयम् ।
इति ब्रुवाणं कलहोऽत्र न स्यान्निवारयामो वयमेव यस्मात् ।
अतः क्षिप्रमुपानेयाः पार्था इति बलोदितः ।
गते हि पार्थसन्निधेः सुयोधने तु नारदः ।
क उद्यमी नृपेष्विति प्रपृष्ट आह नारदः ।
पांसुमुष्टिं सकृद्ग्रासी बहूनब्दांस्तपश्चरन् ।
स श्रुत्वा मागधवधं दिशां विजयमेव च ।
यदून् प्रत्युद्यमं तूर्णं करोतीति निशम्य तत् ।
अस्त्वित्युक्त्वा स गोविन्दः प्रेषयामास यादवान् ।
विदुरस्तु ततो गत्वा धर्मराजमथाऽह्वयत् ।
ज्येष्ठाज्ञयैव विदुर आह्वायन्नपि धर्मजम् ।
इतीह दोषसञ्चयस्तथापि ते पितुर्वचः ।
इतीरितोऽपि पाण्डवो ययौ कलिप्रवेशितः ।
कल्याविशान्नृपतिः प्रतिजज्ञे पूर्वमेव धर्मात्मा ।
तेनाऽयात् (स सुहृद्भिः)स्वसुहृद्भिर्निवार्यमाणोऽपि नागपुरमाशु ।
वैचित्रवीर्यतनयेन तु पाण्डुपुत्राः सम्भावितास्तमुप च न्यवसन् निशायाम् ।
वैचित्रवीर्यनृपतिर्विदुरान्वितोऽस्य गान्धारराजसहितास्तनयाः सकर्णाः ।
सर्वांश्च तत्र कलिराविशदेव भीमपूर्वान् विनैव चतुरः सपृथां च कृष्णाम् ।
भीमादिभिः स विदुरेण च वार्यमाणो द्यूते निधाय पणमप्यखिलं स्ववित्तम् ।
तस्मिन् जितेऽथ सहदेवमथार्जुनं च भीमं च सोमकसुतां स्वमपि क्रमेण ।
सूतो गत्वा तदन्तं समकथयदिमां द्यूतमध्ये जिताऽसि
स पापपूरुषोत्तमः प्रगृह्य केशपक्षके ।
समाहृता रजस्वला जगाद भीष्मपूर्वकान् ।
कथं छलात्मके द्यूते जिते धर्मजयो भवेत् ।
येऽधर्मं(ये धर्मं) न वदन्तीह न ते वृद्धा इतीरिताः ।
कथं द्यूते जिता चाहमजिते स्वपतौ स्थिते ।
सहैव कर्म कर्तव्यं पतौ दासे हि भार्यया ।
इत्युक्ता अपि भीष्माद्याः कल्यावेशेन मोहिताः ।
दुर्योधनप्रतीपं हि न कश्चिदशकत् तदा ।
न तस्य वाचं जग्राह धृतराष्ट्रः सहात्मजः ।
स्वाशक्तिं द्रौपदीं चाऽह जिता नैवासि धर्मतः ।
एवं तु विदुरेणोक्ते विकर्णः पापकोऽपि सन् ।
दृष्ट्वा भीमः क्लिश्यमानां तु कृष्णां धर्मात्ययं धर्मराजे च दृष्ट्वा ।
इमां न्यस्तवतो द्यूते धक्षणीयौ हि ते भुजौ ।
वक्तव्यं नतु कर्तव्यं तस्मान्नहि मया कृतम् ।
अथ कर्णोऽब्रवीत् कृष्णामपतिर्ह्यसि शोभने ।
युधिष्ठिरो दुःखहेतुस्तवैको यद्येनमन्ये न गुरुर्न एषः ।
इत्युक्त ऊचे पवमानसूनुः पूज्योऽस्माकं धर्मजोऽसंशयेन ।
बलज्यैष्ठ्ये यदि वः संशयः स्यादुत्तिष्ठध्वं सर्व एवाद्य वीराः ।
इति ब्रुवन् समुत्थितो नदन् वृकोदरो यदा ।
भीष्मो द्रोणो विदुराद्याः क्षमस्व सर्वं त्वयोक्तं सत्यमित्येव हस्तौ ।
निवारितो धर्मजेन गुरुभिश्चापरैस्तदा ।
न चात्यवर्तत(न चातिवर्तते) ज्येष्ठं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
अथ दुर्योधनः पापो भीमसेनस्य पश्यतः ।
तवोरुमेनं गदयोरुवेगया बिभेत्स्य इत्येव पुनः सुयोधनः ।
अथाब्रवीद् वृकोदरः कृतेऽवमानने हरेः ।
स वध्य एव मे सदा परोक्षतोऽपि यो हरिम् ।
पुनश्च पापवृद्धये तदैव नो जघान तम् ।
प्रयाहि भूभृतो हि नो गृहं न सन्ति पाण्डवाः ।
उभौ च तौ युधिष्ठिरो न्यवारयत् तथाऽपरे ।
दुःशासनैषां वासांसि दासानां नो व्यपाकुरु ।
ते चर्मवसना(अचर्मवसना) भूत्वा तानशिष्टान् प्रकाश्य च ।
पुनर्दुर्योधनेनोक्तः पार्थानामथ पश्यताम् ।
पापेषु पूर्वस्य तथाऽधमस्य वंशे कुरूणामुरुधर्मशीलिनाम् ।
विकृष्यमाणे वसने तु कृष्णा सस्मार कृष्णं सुविशेषतोऽपि ।
पुनःपुनश्चैव विकर्षमाणे दुःशासनेऽन्यानि च तादृशानि ।
वस्त्रोच्चये शैलनिभे प्रजाते दुर्योधनः प्राह सञ्जातकोपः ।
तच्छ्रुत्वा वचनं कृष्णा प्रतिज्ञामकरोत् तदा ।
इत्युक्ते तत् तथेत्याह भीमसेनः सभातले ।
ततः सुयोधनानुजश्चकर्ष पार्षतात्मजाम् ।
अर्जुनार्जुन नैवात्र क्षमा मे तात रोचते ।
इति वेदोदितं वाक्यं न सुतो दारधर्षणे ।
अतोऽद्य सानुबन्धकान् निहन्मि धार्तराष्ट्रकान् ।
ददर्श च महाघोरमादातुं परिघं रुषा ।
तदा शिवा ववाशिरे सुयोधनाग्निगेहतः ।
निमित्तान्यतिघोराणि कुपिते मारुतात्मजे ।
आह तं विदुरो ज्येष्ठं क्षणेऽस्मिंस्तव पुत्रकाः ।
क्रीडसेऽर्भकवत् त्वं हि किं जितं किं जितं त्विति ।
स्त्रीषु द्यूतेषु वा दत्तं मदान्धेन नरेण वा ।
आहार्यं पुनराहुश्च तथाऽपि नतु पाण्डवैः ।
इत्युक्त आहाऽम्बिकेयो निमित्तानां फलं कथम् ।
तोषयस्व वरैश्चैनामन्यथा ते सुतान् मृतान् ।
कृष्णा च पाण्डवाश्चैव तपोवृद्धिमभीप्सवः ।
तथाऽपि यदि कृष्णां त्वं न मोचयसि ते सुतान् ।
इतीरितो विनिर्भर्त्स्य(विनिर्भत्स्य) पुत्रं दुःशासनं नृपः ।
छन्दिता सा वरैस्तेन धर्मे भागवते स्थिता ।
युधिष्ठिरस्य सभ्रातुः सराष्ट्रस्य विमोक्षणम् ।
भर्तुर्विष्णोश्च नान्यस्माद् वरस्वीकार इष्यते ।
अधर्मतो हृतत्वात्तु तद् दानं न वरो भवेत् ।
श्वशुरादैहिकवराः क्षत्रियायास्त्रयो यतः ।
ततो विमुक्ताः प्रययुश्च पार्था गुरून् प्रणम्य स्वपुरं सकृष्णाः ।
समस्तपाण्डवश्रियं समागतामहो पुनः ।
अतः पुनश्च पाण्डवान् समाह्वयस्व(समानयस्व) नः कृते ।
तेनोक्तः स तदा राजा पाण्डवान् पुनराह्वयत् ।
द्वादशाब्दं वने वासमज्ञातत्वेन वत्सरम् ।
कृष्णायाः पाण्डवानां वा दर्शनेऽज्ञातवासिनाम् ।
वत्सराज्ञातवासं च त्यागेऽप्युक्तविधेस्तथा ।
गान्धारेण पुनश्चाक्षहृदयज्ञेन धर्मजः ।
तदा ननर्त पापकृत् सुयोधनानुजो हसन् ।
उवाच च(स) पुनः कृष्णां नृत्यन्नेव सभातले ।
एतेऽखिलाः षण्ढ(ड)तिलास्तमोऽन्धमं प्राप्ता नचैषां पुनरुत्थितिः स्यात् ।
तदाऽकरोद् भीमसेनः प्रतिज्ञां हन्ताऽस्मि वो ह्यखिलान् सङ्गरेऽहम् ।
यत्र द्रोणस्तत्र पुत्रस्तत्र भीष्मः कृपस्तथा ।
अब्रवीद् धार्तराष्ट्रांश्च द्रोणो विप्रोऽपि सन्नहम् ।
रक्षणे भवतां चैव कुर्यां यत्नं स्वशक्तितः ।
ततो ययुः पाण्डवास्ते सभाया वनाय कृष्णासहिताः सुशूराः ।
दृष्ट्वा सभाया अर्द्धनिष्क्रान्तदेहो व्यावृत्य भीमः प्राह संरक्तनेत्रः ।
प्रयाताननु तान् कुन्ती प्रययौ पुत्रगृद्धिनी ।
युधिष्ठिरोऽवाग्वदनो ययौ न क्रोधचक्षुषा ।
उद्धृत्य बाहू प्रययौ बाहुषाली वृकोदरः ।
अबद्धकेशा प्रययौ द्रौपदी सा सभातलात् ।
वर्षन् पांसून् ययौ पार्थ इत्थं शत्रुषु सायकान् ।
यमाववाङ्मुखौ यातौ नावयोः शत्रवो मुखम् ।
प्रेतसंस्कारसूक्तानि पठन् धौम्योऽग्रतो ययौ ।
तानथानुययुः सूता रथैः परिचतुर्दशैः ।
ततस्ते जाह्नवीतीरे वने वटमुपाश्रिताः ।
ततस्तु ते सर्वजगन्निवासं नारायणं नित्यसमस्तसद्गुणम् ।
द्वाविंशोऽध्यायः
औं ॥ आगन्तुकामान् पुरवासिनस्ते संस्थाप्य कृच्छ्रेण कुरुप्रवीराः ।
बकानुजोऽसौ निखिलैरजेयो वराद् गिरीशस्य निहन्तुकामः ।
स सम्प्रहारं सह तेन कृत्वा भीमो निपात्याऽशु(निहत्याऽशु) धरातले तम् ।
निहत्य रक्षो वनमध्यसंस्थास्तदा यतीनामयुतैः समेताः ।
विचिन्त्य तेषां भरणाय धर्मजः सम्पूज्य सूर्यस्थितमच्युतं प्रभुम् ।
बभार तेनैव युधिष्ठिरस्तान् प्रत्येकशस्त्रिंशतदासदासिकान्(त्रिंशतिदासदासिकान्) ।
सत्सङ्गमाकाङ्क्षिण एव तेऽवसन् पार्थैः सहान्ये च मुनीन्द्रवृन्दाः ।
एवं गजानां बहुकोटिवृन्दांस्तथा रथानां च हयांश्च वृन्दशः ।
गवां च लक्षं प्रददाति नित्यशः सुवर्णभारांश्च शतं युधिष्ठिरः ।
पार्थेषु यातेषु किमत्र कार्यमिति स्म पृष्टो विदुरोऽग्रजेन ।
ज्ञानं प्रतीपोऽसि ममाऽत्मजानां न मे त्वया कार्यमिहास्ति किञ्चित् ।
तस्मिन् गते भ्रातृवियोगकर्शितः पपात भूमौ सहसैव राजा ।
इतीरितः सञ्जयः पाण्डवेयान् प्राप्याऽनयद् विदुरं शीघ्रमेव ।
अङ्कं समारोप्य स मूर्ध्नि चैनमाघ्राय लेभे परमां मुदं तदा ।
विज्ञाय तेषां गमनं समस्तलोकान्तरात्मा परमेश्वरेश्वरः ।
अवाप्य पार्थानयमद्य मृत्युं सहानुबन्धो गमिता ह्यसंशयम् ।
मैत्रेय आयास्यति सोऽपि वाचं शिक्षार्थमेतेष्वभिधास्यतीह ।
उक्त्वेति राजानमनन्तशक्तिर्व्यासो ययौ तत्र गतेषु तेषु ।
सर्वाश्च चेष्टा भगवन्नियुक्ताः सदा समस्तस्य चितोऽचितश्च ।
मैत्रेय आगादथ(आयात्) भूपतिश्च पुत्रान् समाहूय सकर्णसौबलान् ।
विशेषतो भीमबलं शशंस किर्मीरनाशादि वदन् मुनीन्द्रः ।
शशाप चैनं मुनिरुग्रतेजास्तवोरुभेदाय भवेत् सुयुद्धम् ।
वने वसन्तोऽथ पृथासुतास्ते वार्तां स्वकीयां(स्वकीयां वार्तां) प्रापयामासुराशु ।
क्रुद्धं कृष्णं धार्तराष्ट्राय पार्थाः क्षमापयामासुरुच्चैर्गृणन्तः ।
अचिन्त्यनित्याव्ययपूर्णसद्गुणार्णवैकदेहाखिलदोषदूर ।
इति ब्रुवन्ती सकलानुभूतं जगाद सर्वेशितुरच्युतस्य ।
श्रुत्वा समस्तं भगवान् प्रतिज्ञां चकार तेषामखिलाश्च योषाः ।
यदीहाहं स्थितो नैवं भविताऽहं त्वयोधयम् ।
सन्निधानेऽथ वा दूरे कालव्यवहितेऽपि वा ।
तथाऽपि नरलोकस्य करोत्यनुकृतिं प्रभुः ।
युधिष्ठिरेऽतिवृद्धं तु राजसूयादिसम्भवम् ।
योग्यताक्रमतो(योग्यताक्रमशो) विष्णुरिच्छयेत्थमचीक्लृपत् ।
स्वयोग्यताया अधिकधर्मज्ञानादिजं फलम् ।
पुनश्च पापवृद्ध्यर्थमजो दुर्योधनादिषु ।
इति दुर्योधनादीनां पापवृद्ध्यर्थमेव सः ।
गुरुत्वाद् भीमसेनस्य क्षमा द्यूतेऽर्जुनादिनाम् ।
द्रौपद्या अप्यतिक्लेशात् क्षमा धर्मो महानभूत् ।
तस्माद् यथायोग्यतया हरिणा धर्मवर्धनम् ।
साल्वं श्रुत्वा समायान्तं (समायातं) रौक्मिणेयादयो मया ।
प्रद्युम्न आशु निरगादथ सर्वसैन्यै-
कृत्वा सुयुद्धममुना मम पुत्रकोऽसौ
नारायणेन हि पुरा मनसाऽभिक्लृप्तं
वध्यस्त्वया नहि ततोऽयमयं च बाणः
श्रुत्वा वचः स पवनस्य शरं त्वमोघं
प्रद्युम्नसाम्बगदसारणचारुदेष्णाः
यस्मिञ्छरे करगते विजयो ध्रुवः स्यात्
तं सागरोपरिगसौभगतं निशाम्य
ताः क्रीडया क्षणमहं समरे निशाम्य
तं स्यन्दनस्थितमथो विभुजं विधाय
तस्मादिदं व्यसनमास हि विप्रकर्षात्
पाण्डवानां च या भार्याः पुत्रा अपि हि(च) सर्वशः ।
धृष्टद्युम्नस्ततः कृष्णां सान्त्वयित्वैव केशवम् ।
धृष्टकेतुश्च भगिनीं काशिराजः सुतामपि ।
पार्वती नकुलस्याऽसीद् भार्या पूर्वं तिलोत्तमा ।
सुभद्रामभिमन्युं च रथमारोप्य केशवः(काञ्चनम्) ।
कञ्चित् कालं द्रौपदेया उष्य पाञ्चालके पुरे ।
ततः परं धर्मराजो निर्विण्णः स्वकृतेन ह ।
ऊषुर्वने च ते पार्था मुनिशेषान्नभोजिनः ।
अलङ्घ्यत्वात् तदाज्ञाया अनुजाः पूर्वभोजिनः ।
एवं सदा विष्णुपरायणानां तत्प्रार्पणान्नैकभुजां(तत्प्रापणान्नैकभुजां) प्रयातः ।
अतिमार्दवयुक्तत्वाद् धर्मराजश्चतुर्दशे ।
क्षमा सर्वत्र धर्मो न पापहेतुश्च दुर्जने ।
हत्वा चतुर्दशे वर्षे धार्तराष्ट्रानराज्यदान् ।
कारयन् सत्यशपथं विवादस्य क्रमेच्छया ।
नैव क्षमा कुजनतासु नृपस्य धर्मः
कर्ता च सर्वजगतः सुखदुःखयोर्हि
इत्युक्तवन्तं नृपमाह पार्षती यदि क्षमा सर्वनरेषु धर्मः ।
सत्यं च विष्णुः सकलप्रवर्तको रमाविरिञ्चेशपुरस्सराश्च ।
तदाज्ञया पुरुषश्चेष्टमानश्चेष्टानुसारेण शुभाशुभस्य ।
वृथा यदि स्यात् पौरुषं कस्य हेतोर्विधिर्निषेधश्च समस्तवेदगः ।
तेनैव लेपश्च भवेदमुष्य पुण्येन पापेन च नैव चासौ ।
इतीरितो धर्मजः कृष्णयैव निरुत्तरत्वं गमितस्त्वभर्त्सयत् ।
छलेन तेन प्रतिभर्त्सिता सा क्षमापयामास नृपं यतः स्त्री ।
राजन् विष्णुः सर्वकर्ता न चान्यस्तत्तन्त्रमेवान्यदसौ स्वतन्त्रः ।
प्रत्यक्षमेतत् पुरुषस्य कर्म तेनानुमेया प्रेरणा केशवस्य ।
तेनैति सम्यग्गतिमस्य विष्णोर्जनोऽशुभो दैवमित्येव मत्वा ।
ज्ञातव्यं चैवास्य विष्णोर्वशत्वं कर्तव्यं चैवाऽत्मनः कार्यकर्म ।
विष्णोर्वशे तन्न हेयं द्वयं च जानन् विद्वान् कुरुते कार्यकर्म ।
पूर्णं प्रमाणं तत्त्रयं चाविरोधेनैकत्रस्थं तत्त्रयं चाविरोधि ।
अज्ञः प्रत्यक्षं त्वपहायैव दैवं मत्वा कर्तृ स्वात्मकर्म प्रजह्यात् ।
स्वभावाख्या योग्यता या हठाख्या याऽनादिसिद्धा सर्वजीवेषु नित्या ।
स कस्यचिन्न वशे वासुदेवः परात् परः परमोऽसौ स्वतन्त्रः ।
विना यत्नं न हठो नापि कर्म फलप्रदौ वासुदेवोऽखिलस्य ।
एतानपेक्ष्यैव फलं ददानीत्यस्यैव सङ्कल्प इति स्वतन्त्रता ।
तस्मात् कार्यं तेन क्लृप्तं स्वकर्म तत्पूजार्थं तेन तत्प्राप्तिरेव ।
बाह्वोर्जातः क्षत्रियस्तेन बाह्वोः कर्मास्य पापप्रतिवारणं हि ।
वैश्यो यस्मादूरुजस्तेन तस्य प्रजावृद्धिस्तज्जकर्मैव धर्मः ।
गतिप्रधानं कर्म शुश्रूषणाख्यं सादृश्यतो हस्तपदोस्तथैव ।
भुजावुरो हृदयं यद् बलस्य ज्ञानस्य च स्थानमतो नृपाणाम् ।
प्राधान्यतो धर्मविशेष एष सामान्यतः सर्व एवाखिलानाम् (सर्वमेवाखिलानाम्) ।
एतैर्धर्मैर्विष्णुना पूर्वक्लृप्तैः सर्वैर्वर्णैर्विष्णुरेवाभिपूज्यः ।
पिता गुरुः परमं दैवतं च विष्णुः सर्वेषां तेन पूज्यः स एव ।
सम्पूजितो वासुदेवः स मुक्तिं दद्यादेवापूजितो दुःखमेव ।
स्वतन्त्रत्वात् सुखसज्ज्ञानशक्तिपूर्वैर्गुणैः पूर्ण एषोऽखिलैश्च ।
दोषास्पृष्टौ गुणपूर्तौ च शक्तिर्निस्सीमत्वाद् विद्यते तस्य यस्मात् ।
हन्याद् दुष्टान् यः क्षत्रियः क्षत्रियांश्च विशेषतो युद्धगतान् स्मरन् हरिम् ।
पापाधिकांश्चैव बलाधिकांश्च हत्वा मुक्तावधिकानन्दवृद्धिः ।
ये त्वक्षधूर्ता ग्रहणं गता वा पापास्तेऽन्यैर्घातनीयाः स्वदोर्भ्याम् ।
राज्ञः पुत्रोऽप्यकृतोद्वाहको यः स घातनीयो न स्वयं वध्य एव ।
अक्षद्यूतं निकृतिः पापमेव कृतं त्वया गर्हितं सौबलेन ।
भीतेन दत्तं द्यूतदत्तं तथैव दत्तं कामिन्यै पुनराहार्यमेव ।
यद्येषां वै भोग्यमल्पं(यद्येतेषां भोग्यमल्पं) तदीयं भोगेन तद्बन्धुभिस्तच्च हार्यम् ।
त्वं धर्मनित्य(धर्मनिष्ठः)श्चाग्रजश्चेति राजन् ऋतेऽनुज्ञां न मया तत् कृतं च ।
सत्यं पापेष्वपि कर्तुं यदीच्छा तथाऽपि मासा द्वादशः नः प्रयाताः ।
मा मित्राणां तापकस्त्वं भवेथास्तथाऽमित्राणां नन्दकश्चैव राजन् ।
स्वतन्त्रत्वं वासुदेवस्य सम्यक् प्रत्यक्षतो दृश्यते ह्यद्य राजन् ।
ब्रह्मादीनां प्रकृतेस्तद्वशत्वं दृष्टं हि नो बहुशो व्यासदेहे ।
तस्माद् राजन्नभिनिर्याहि शत्रून् हन्तुं सर्वान् भोक्तुमेवाधिराज्यम् ।
एवमुक्तोऽब्रवीद् भीमं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
सत्यमेतन्न सन्देहः सत्येनाऽत्मानमालभे ।
तुदसे चातिवाचा मां यद्येवं भीम मां वदेः(भीम मा वद) ।
भीष्मद्रोणादयोऽस्त्रज्ञा निवार्याश्च कथं युधि ।
अस्त्राणि जानन्नपि हि न प्रयोजयसि क्वचित्(प्रयोजसि न क्वचित्) ।
इत्युक्तो भीमसेनस्तु स्नेहभङ्गभयात् ततः ।
अभिप्रायो हि भीमस्य निश्चयेन त्रयोदशे ।
कृतकृत्ये तथा भीमे स्थिते धर्मात्मजो हि सः ।
निवारणं गुरूणां हि भीम इच्छति न क्वचित् ।
आपद्येव हि भीमस्तान् निवारयति नान्यथा ।
सर्वज्ञः सर्वशक्तिश्च कृष्णद्वैपायनोऽगमत् ।
इमं मन्त्रं वदिष्यामि येन जेष्यति फल्गुनः ।
इत्युक्त्वैवावदन्मन्त्रं सर्वदैवतदृष्टिदम् ।
भीष्मद्रोणादिविजय एतावद् वीर्यमेव हि ।
गते व्यासे भगवति सर्वज्ञे सर्वकर्तरि ।
तमाप्य फल्गुनो मन्त्रं ययौ ज्येष्ठौ प्रणम्य च ।
षण्मासेऽतिगतेऽपश्यन्मूकं नामासुरं गिरौ ।
तं ज्ञात्वा फल्गुनो वीरः सज्यं कृत्वा तु गाण्डिवम् ।
किरातरूपस्तमनु सभार्यश्च त्रियम्बकः ।
तेनोक्तोऽसौ मयैवायं वराहोऽनुगतोऽद्य हि ।
इत्युक्तः फल्गुनः प्राह तिष्ठ तिष्ठ न मोक्ष्यसे ।
तत्राखिलानि चास्त्राणि फल्गुनस्याग्रसच्छिवः ।
तदप्यग्रसदेवासौ प्रहसन् गिरिशस्तदा ।
पिण्डीकृत्य ततो रुद्रश्चिक्षेपाथ(ध) धनञ्जयम् ।
पूर्वं सम्प्रार्थयामास शङ्करो गरुडध्वजम् ।
इत्युक्तः प्रददौ विष्णुरुमाधीशाय तं वरम् ।
केवलान् वैष्णवान् मन्त्रान् व्यासः पार्थाय नो ददौ ।
केवलैर्वैष्णवैर्मन्त्रैः स्वदत्तैर्विजयावहैः ।
पार्थः सञ्ज्ञामवाप्याथ जयार्थ्याराधयच्छिवम् ।
आरुहन् स तु तं ज्ञात्वा रुद्र इत्येव फल्गुनः ।
अस्त्रं तद् विष्णुदैवत्यं साधितं शङ्करेण यत् ।
इन्द्रोऽर्जुनं समागम्य प्राह प्रीतोऽस्मि तेऽनघ ।
इत्युक्त्वा प्रययाविन्द्रस्तद्रथेन च मातलिः ।
पूजितो दैवतैः सर्वैरिन्द्रेणैव निवेशितः ।
प्रीत्या समाश्लिष्य कुरुप्रवीरं शक्रो द्वितीयां तनुमात्मनः सः ।
अस्त्राणि तस्मा अदिशत् स वासवो महान्ति दिव्यानि तदोर्वशी तम् ।
षण्ढो भवेत्येव तयाऽभिशप्ते पार्थे शक्रोऽनुग्रहं तस्य चादात् ।
ततोऽवसत् पाण्डवेयो गान्धर्वं वेदमभ्यसन् ।
सुभद्रयाऽभिमन्युना सह स्वकां पुरं गतः ।
मया वरो हि शम्भवे प्रदत्त आस पूर्वतः ।
‘त्वामाराध्य तथा शम्भो ग्रहीष्यामि वरं सदा ।
स्वागमैः कल्पितैस्त्वञ्च जनान् मद्विमुखान् कुरु ।
इति वाक्यमृतं कर्तुमभिप्रायं विजज्ञुषी ।
पुत्रो मे बलवान् देव स्यात् सर्वास्त्रविदुत्तमः।
एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति ।
अतत्थ्यानि वितत्थ्यानि दर्शयस्व महाभुज ।
अहं त्वां पूजयिष्यामि लोकसम्मोहनोत्सुकः ।
इत्युक्तवचनं पूर्वं केशवेन शिवाय यत् ।
रात्रौ कृष्णे मुनिमध्ये प्रविष्टे घण्टाकर्णः कर्णनामा पिशाचौ ।
तौ दृष्ट्वा मुनिमध्यस्थं केशवं तदबोधतः ।
दृष्ट्वा हृदि स्थितं तं तु कौतूहलसमन्वितौ ।
तयोः प्रसन्नो भगवान् स्पृष्ट्वा गन्धर्वसत्तमौ ।
ताभ्यां पुनर्नृत्तगीतसंस्तवैः पूजितः प्रभुः ।
स्वीयानेव गुणान् विष्णुर्भुञ्जन् (युञ्जन्) नित्येन शोचिषा ।
पूर्वं तेनोदितं यत्तल्लोकान् मोहयताऽञ्जसा ।
तपोऽसुराणां मोहाय सुराः सन्तु गतज्वराः ।
आज्ञया(स्वाज्ञया) चारयामास क्षिप्रं द्वादशराशिषु ।
एकस्मिन्नह्नि भगवान् राशिंराशिं च वत्सरम् ।
मासब्रतं सार्द्धशतश्वासकालैरकल्पयत् ।
तत्रास्य गरुडाद्याश्च परिचर्यां स्वपार्षदाः ।
एवं स्थितं तमरविन्ददलायताक्षं ब्रह्मेन्द्रपूर्वसुरयोगिवरप्रजेशाः ।
शर्वोऽपि सर्वसुरदैवतमात्मदैवम्
अभ्येत्य पादयुगलं जगदेकभर्तुः
कृष्णोऽप्ययोग्यजनमोहनमेव वाञ्छन्
विष्णुः समस्तसुजनैः परमो ह्युपेयः
अव्यक्ततः सकलजीवगणाच्च नित्यम्
उक्तैरन्यैश्च गिरिशवाक्यैस्तत्त्वविनिर्णयैः ।
सर्वदेवोत्तमं तं हि जानन्त्येव सुराः सदा ।
ततः कृष्णः सुतवरं त्वत्त आदास्य इत्यजः ।
पुत्रं देहीति सोऽप्याह पूर्वमेव सुतस्तव ।
पुरा दग्धो मया कामस्तदाऽयाचत मां रतिः ।
उत्पत्स्यते वासुदेवाद् यदा तं(त्वं) पतिमाप्स्यसि ।
दासोऽस्मि तव देवेश पाहि मां शरणागतम् ।
यदर्थमेष आयातः केशवः शृणुतामराः ।
तं हन्तुमेव पुत्रं स्वं प्रद्युम्नमुदरेऽर्प्य च ।
ज्वालामालाकरालेन स्वतेजोवर्द्धितेन च ।
सद्योगर्भं पुनस्तं च रुक्मिण्यां जनयिष्यति ।
दृष्टमेतन्नारदाद्यैर्मुनिभिः सर्वमेव च ।
ततो हरिर्ब्रह्मसुरेन्द्रमुख्यैः सुरैः स्तुतो गरुडस्कन्धसंस्थः ।
कृष्णे प्रयाते निलयं पुरद्विषो रात्रौ पौण्ड्रौ वासुदेवः समागात् ।
पुरीं प्रभञ्जन्तममुं विदित्वा सरामशैनेययदुप्रवीराः ।
तदस्त्रशस्त्रैः सहसा विषण्णा यदुप्रवीरा विहतप्रदीपाः(विगतप्रदीपाः) ।
पुनः समादाय तथोरुदीपिका अग्रे समाधाय च रौहिणेयम् ।
अथाऽससादैकलव्यं रथेन रामः शैनेयः पौण्ड्रकं वासुदेवम् ।
ततो गदायुद्धमभूत् तयोर्द्वयोस्तथा रामश्चैकलव्यश्च वीरौ(हरिवंशे भविष्यत्पर्वणि अ.१०२) ।
तस्मिन् काले केशवो वैनतेयमारुह्याऽयाद् यत्र ते युद्दसंस्थाः ।
उद्यम्य दोर्भ्यां स गदां जवेनैवाभ्यापतद् रौहिणेयो निषादम् ।
विद्रावयन् रौहिणेयोऽन्वयात् तं भीतोऽपतच्चैकलव्योऽम्बुधौ सः ।
सुपापोऽसावेकलव्यः सुभीतो रामं मत्वैवानुयान्तं पुनश्च ।
रामो विजित्यातिबलं रणे रिपुं मुदैव दामोदरमाससाद ।
तं केशवो विरथं व्यायुधं च क्षणेन चक्रे स ययौ निजां पुरीम् ।
मदीयलिङ्गानि विसृज्य चाऽशु समागच्छेथाः शरणं मामनन्तम् ।
कृष्णः प्रहस्याऽह तवाऽयुधानि दास्याम्यहं लिङ्गभूतानि चाऽजौ ।
तं शातकौम्भे गरुडे रथस्थे स्थितं चक्रादीन् कृत्रिमान् सन्दधानम् ।
ततोऽस्त्रशस्त्राण्यभिवर्षमाणं विजित्य तं वासुदेवोऽरिणैव ।
अपातयच्चाऽशु(न्यापातयच्चाशु) शिरः स तेन
साहाय्यकृच्चास्य च काशिराजो यथैव किर्मीरहिडिम्बसाल्वाः ।
निहत्य तौ केशवो रौग्मिणेयं पुनर्वैदर्भ्यां जनयामास सद्यः ।
स शर्वदत्तेन वरेण दृप्तः पुनर्योद्धुं कृष्णमेवाऽससाद ।
एवं यदूनामृषभेण सूदिते पौण्ड्रे तथा काशिनृपे च पापे ।
प्रत्यक्षगं तं शिवं पापबुद्धिः कृष्णाभावं याचते दुष्टचेताः ।
स दक्षिणाग्निश्चासुरावेशयुक्तः सम्पूजितः काशिराजात्मजेन ।
कृष्णस्तस्य प्रतिघातार्थमुग्रं समादिशच्चक्रमनन्तवीर्यः ।
कृत्यात्मको वह्निरसौ प्रधानवह्नेः पुत्रश्चक्रविद्रावितोऽथ ।
दग्ध्वा पुरीं वारणसीं सुदर्शनः पुनः पार्श्वं वासुदेवस्य चाऽगात् ।
कृष्णः क्रीडन् द्वारवत्यां सुपूर्णनित्यानन्दः(सुपूर्णो नित्यानन्दः) क्वचिदाह स्म भैष्मीम् ।
त्वया न कार्यं मम किञ्च भद्रे मयाऽरीणां मानभङ्गार्थमेव ।
स्त्रिया भेतव्यं भर्तुरित्येव धर्मं विज्ञापयन्ती दुःखितेवाऽस देवी ।
एवं क्रीडत्यब्जनाभे रमायां कृष्णादिष्टो गोकुलं रौहिणेयः ।
मासौ तत्र न्यवसद् गोपिकाभी रेमे क्षीबो यमुनामाह्वयच्च ।
पुनस्तया प्रणतः संस्तुतश्च व्यसर्जयत् तामथ नन्दगोपम्(भा.पु.१०.६५.१७) ।
तदैव मैन्दो विविदश्च भौमे हते सखाये (सखायौ) दानवावेशयुक्तौ ।
रामाय सोऽदाद् वरमब्जनाभो वध्यावेतौ भवतां तेऽप्यवध्यौ ।
गत्वा स मैन्दं प्रथमं जघान क्रोधात् युद्धायाऽगतं रैवताग्रे ।
दुर्योधनस्याऽस पुत्री रतिर्या पूर्वं नाम्ना लक्षणा कान्तरूपा ।
बलाद् गृहीतां वीक्ष्य तां कर्णमुख्या दुर्योधनाद्या युयुधुः क्रोधदीप्ताः ।
श्रुत्वैव तद् वृष्णयः सर्व एव समुद्यमं चक्रिरे कौरवेषु ।
पुरस्य बाह्योपवने स्थितः स प्रस्थापयच्चोद्धवं कौरवार्थे ।
आज्ञापयद् वो नृपतिः स्म यन्नः कुमारकः प्रगृहीतो भवद्भिः ।
आज्ञापयामास व उग्रसेन
स लाङ्गलेन तत् पुरं विकृष्य जाह्नवीजले ।
सभार्यमाशु पुत्रकं सुयोधनाभिपूजितम् ।
इत्यादिकर्माणि महान्ति रामस्याऽसञ्छेषस्याच्युतावेशिनोऽलम् ।
क्रीडायुद्धे बहुशो रौहिणेये व्यक्तिं विष्णोर्भीमसेनो विदित्वा ।
तदा जयी प्रभवत्येष रामो नातिव्यक्तस्तत्र(नाभिव्यक्तस्तत्र) यदा जनार्दनः ।
एतादृशेनैव रामेण युक्ते कृष्णे द्वार्वत्यां निवसत्यब्जनाभे ।
तमानयेत्यथ सा चित्रवस्त्रे प्रदर्श्य लोकान् समदर्शयत् तम् ।
अनिरुद्धं गुणोदारमानीतं चित्रलेखया ।
गूढं कन्यागृहे तं तु ज्ञात्वा कन्याभिरक्षिणः ।
आगताननिरुद्धस्तान् परिघेण महाबलः ।
अथ कृष्णः समारुह्य गरुडं रामसंयुतः ।
युद्ध्वैवाङ्गिरसा चैव क्षणाद् विद्राप्य तान् हरिः ।
तेन भस्मप्रहारेण ज्वरितं रोहिणीसुतम् ।
स्वयं विक्रीड्य तेनाथ कञ्चित् कालं जनार्दनः ।
स्वयं जित्वाऽपि गिरिशभृत्यं नालमिति प्रभुः ।
ज्वरेण वैष्णवेनासौ सुभृशं पीडितस्तदा ।
क्रीडार्थमत्यल्पजनेष्वपि प्रभुः कथञ्चिदेव व्यजयद् व्यथां विना ।
यदा ज्वराद्या अखिलाः प्रविद्रुतास्तदा स्वयं प्राप हरिं गिरीशः ।
विजृम्भिते शङ्करे निष्प्रयत्ने स्थाणूपमे संस्थिते कञ्जजातः ।
प्रगृह्य शर्वं च विवेश विष्णोः स तूदरं दर्शयामास तत्र ।
अपेतमोहोऽथ वृषध्वजो हरिं तुष्टाव बाणोऽभिससार केशवम् ।
तदा शिवेन प्रणतो बाणरक्षणकाम्यया ।
एवमग्नीनङ्गिरसं ज्वरं स्कन्दमुमापतिम् ।
येनायत्नेन विजितः सर्वलोकहरो हरः ।
ईदृशानन्तसङ्ख्यानां शिवानां ब्रह्मणामपि ।
नच ज्ञानादयो भावा नचास्तित्वमपि क्वचित् ।
चित्रलेखासमेतोषान्वितपौत्रसमन्वितः ।
एवंविधान्यगणितानि यदूत्तमस्य
एवं वसत्यमितपौरुषवीर्यसारे
पृथ्वीं प्रदक्षिणत एत्य समस्ततीर्थस्नानं यथाक्रमत एव विधाय पार्थाः ।
पार्थैः सम्पूजितस्तत्र कृष्णो यदुगणैः सह ।
तत्र भीमं तपोवेषं दृष्ट्वाऽतिस्नेहकारणात् ।
सर्वे वयं निहत्याद्य सकर्णान् धृतराष्ट्रजान् ।
संवत्सरं समाप्यैव पुरं यास्यन्ति पाण्डवाः ।
एवं वदत्येव शिनिप्रवीरे जनार्दनः पार्थमुखान्युदीक्ष्य ।
स्वबाहुवीर्येण निहत्य शत्रूनाप्स्यन्ति राज्यं त इतीरितेऽमुना ।
क्रमेण पार्था अपि शैशिरं गिरिं समासदंस्तत्र कृष्णां सुदुर्गे ।
उवाह कृष्णां स तु तस्य भृत्या ऊहुः पार्थांस्ते बदर्याश्रमं च ।
अतीत्य शर्वश्वशुरं गिरिं ते सुवर्णकूटं निषधं गिरिं च ।
तस्मिन् मुनीन्द्रैरभिपूज्यमाना नारायणं पूजयन्तः सदैव ।
एवं बदर्यां विहरत्सु तेषु क्वचिद् रहः कृष्णया वायुसूनौ ।
(तत्पक्षपातेन) तत्पक्षवातेन विचालिते तु तस्मिन् गिरौ कमलं हैममग्र्यम् ।
दृष्ट्वाऽतिगन्धं वरहेमकञ्जं कुतूहलाद् द्रौपदी भीमसेनम् ।
तयाऽर्थितः सगदस्तुङ्गमेनं गिरिं वेगादारुहद् वायुसूनुः ।
आसेदिवांस्तत्र हनूमदाख्यं निजं रूपं प्रोद्यदादित्यभासम् ।
धर्मो देवानां परमो मानुषत्वे स्वीये रूपेऽप्यन्यवदेव वृत्तिः ।
सर्वे गुणा आवृता मानुषत्वे युगानुसारान्मूलरूपानुसारात् ।
नैवाव्यक्तिः काचिदस्तीह विष्णोः प्रादुर्भावेष्वतिसुव्यक्तशक्तेः ।
तस्माद् भीमो धर्मवृद्ध्यर्थमेव स्वीये रूपेऽप्यन्यवद् वृत्तिमेव ।
तद्रूपवृद्धिं भीमसेनोऽथ दृष्ट्वा श्रुत्वा हनूमन्मुखतः कथाश्च ।
ध्वजाद् बीभत्सोर्गर्जनेनैव शत्रुपराभवे तेन दत्तेऽर्जुनस्य ।
नरागम्यां नलिनीमेत्य तत्र दृष्ट्वा पद्मान्यद्भुताकारवन्ति ।
ते भीममात्तायुधमुग्ररूपं महाबलं रूपनवावतारम् ।
वराच्छिवस्यैव परैरजेयाः शस्त्रास्त्रवृष्टिं मुमुचुः सुभीमाम्(सुभीमाः) ।
तान् वैष्णवैरेव शास्त्रैः स भीमो विजित्य पूर्वं वाङ्मये सङ्गरे तु ।
वातेन कुन्त्यां बलवान् स जातः शूरस्तपस्वी द्विषतां निहन्ता ।
तत्रापरांश्चैव बहूनसत्यं निरीश्वरं चाप्रतिष्ठं च लोकम् ।
भिन्नं विष्णुमधिकं सर्वतश्च ब्रुवन् प्रवीरान् लक्षमेषां निजघ्ने ।
विक्रम्य तान् गदयाऽसौ निहत्य विद्राप्य सर्वान् नलिनीं प्रविश्य ।
अथो कलहशंसीनि निमित्तानि युधिष्ठिरः ।
सौगन्धिकार्थं यातं तं श्रुत्वा कृष्णामुखान्नृपः ।
ययौ वृकोदरो यत्र दृष्ट्वा चैनमवस्थितम् ।
देवेभ्यो मरणाद् भीता राक्षसा वित्तपाज्ञया ।
वसत्सु तत्र पार्थेषु पुनः कतिपयैर्दिनैः ।
पञ्चवर्णानि पुष्पानि कृष्णा वीक्ष्याऽहृतानि तु ।
अगम्योऽयं गिरिः सर्वैः कुबेरेणाभिपालितः ।
इत्युक्त आशु सगदः सधनुः सबाणो भीमो गिरीन्द्रमजितोरुबलो विगाहे ।
अग्रे निधाय मणिमन्तमजेयमुग्रं शम्भोर्वराद् विविधशस्त्रमहास्त्रवृष्ट्या (महाभिवृष्ट्या) ।
अवध्यांस्तान् क्षणेनैव हत्वा भीमो महाबलः ।
ते हता भीमसेनेन प्रापुरन्धन्धन्तमोऽखिलाः ।
ततो वैश्रवणो राजा महापद्मत्रये हते ।
असुरावेशतस्तस्य भीमे क्रोधो महानभूत् ।
तस्मिन् काले भीमसेनस्य घोषं श्रुत्वा राजाऽपृच्छदाशु स्म कृष्णाम् ।
सभ्रातृके मुनिभिः कृष्णया च गते राजन्यत्र भीमं कुबेरः ।
धृतायुधं भीममीक्ष्यापि किञ्चिद् दैत्यावेशाद् बहु मेने न भीमम् ।
दैत्यावेशादुज्झितः शान्तभावो ददौ निजं स्थानमेषां सुतुष्टः ।
तत्रैव तेषां वसतां महात्मनामानन्दिनामब्दचतुष्टये गते ।
वधं वव्रे स्वशत्रूणामिन्द्रः पार्थात् स्वरूपतः ।
पुनरिन्द्रेणार्थितोऽदाज्जहीमान् नरदेहवान् ।
ऐन्द्रं स्यन्दनमारुह्य पार्थो मातलिसंयुतः ।
शङ्खं ददुस्तस्य देवा देवदत्तः स शङ्खराट् ।
दधानः कुण्डले दिव्ये शक्रदत्ते सुभास्वरे ।
तस्य शङ्खध्वनिं श्रुत्वा गाण्डीवस्य च निस्स्वनम् ।
तिस्रः कोट्यो दानवानां स्वयम्भुवरगर्विताः ।
तेषां स शस्त्राणि किरीटमाली(किरीटमौली) निवार्य गाण्डीवधनुःप्रमुक्तैः(गाण्डीवधनुःप्रयुक्तैः) ।
सर्वे हतास्तेन महारथेन ते दानवाः सोऽपि ययौ तथाऽन्यान् ।
तानस्त्रशस्त्राण्यभिवर्षमाणान् धनञ्जयः पाशुपतास्त्रतो द्राक् ।
ययुरन्धं(प्रापुरन्धं)तमस्तेऽपि सर्वदेवद्विषोऽसुराः ।
आयान्तमीक्ष्य बीभत्सुं मुमुदुर्भ्रातरोऽधिकम् ।
कथाभिर्वासुदेवस्य ध्यानेनाभ्यर्चनेन च ।
नैव शत्रूननुत्साद्य नानादाय महद्यशः ।
तदन्येषां तु वर्णानां क्षमा बाह्येषु शत्रुषु ।
इति भीमवचः श्रुत्वा ससोदर्यो युधिष्ठिरः ।
पादेषु तेषु निवसत्सु हिमाचलस्य
पूर्वं हि वृत्रवधतोऽम्बुजनालतन्तु-
स सर्वसुरविप्रेन्द्रतपश्च बलमक्षयम् ।
स (सुरेन्द्रवचनात्)इन्द्रवचनाच्छच्या महर्षिगणवाहने ।
स शचीप्रतिषेधार्थमगस्त्येन महात्मना ।
तदा भृगुं तस्य जटासु लीनं कदाऽपि तस्याक्षिपथं न यातम्(न यान्तम्) ।
षष्ठे काले यस्त्वयाऽसादितः स्यात्
सर्वदेवमुनीन्द्राणां (सर्वदेवमुनीनां) यत् तपस्त्वामुपाश्रितम् (समुपाश्रितम्) ।
यदा प्रश्नांस्त्वदीयांश्च कश्चित् परिहरिष्यति ।
भृगुदेहगतेनैवं शप्तः कमलयोनिना ।
इन्द्रोऽप्यवाप स्वं स्थानमिष्ट्वा विष्णुं विपापकः ।
नहि लोकावनं पापं त्रैलोक्येशस्य वज्रिणः ।
क्वचित् पापं च पुण्यानां वृद्धये भवति स्फुटम् ।
देवानां वा मुनीनां वा भवेदेवं नवै नृणाम् ।
नान्यस्य पदमाप्स्यन्ति तद् देवानां व्रतं परम् ।
तस्मिन्नेवं निपतिते ब्रह्मणः शापकारणात् ।
यत्तत् सुराणां सर्वेषां मुनीनां च तपः स्थितम् ।
देवानां हि नृजातानामल्पं व्यक्तं भवेद् बलम् ।
नित्यं व्यक्ता गुणा विष्णोरिति शास्त्रस्य निर्णयः ।
देवानां मानुषादौ तु शक्येऽप्यव्यक्तताकृतेः ।
तन्मानुषे बले तस्य वराद् वारितवत्(वरादावृतवत्) स्थिते ।
आत्ममोक्षाय न प्रश्नान् व्याजहार स चाभिभूः ।
किमुत क्षत्रियस्येति जानन्नपि वृकोदरः ।
अयतन्तमपि ह्येनं(ह्येषो) चालनायापि नाशकत् ।
भ्रातृमात्रादिषु(भ्रातृमात्रादिभिः) स्नेहात् क्षिप्रमात्मविमोक्षणम् ।
भ्रात्रादिषु स्नेहवशान्न स्थातव्यमिहेत्यपि ।
स्रस्ताङ्गे पतिते सर्पे यास्यामीति विचिन्तयन् ।
तदैव ब्रह्मवचनात् पूर्वोक्तात् केशवाज्ञया ।
पूरिते नहुषस्थेन तपसा च बलेन च ।
गते भीमे निमित्तानि दृष्ट्वा राजा युधिष्ठिरः ।
यातं मृगार्थं स निशम्य तस्यास्तदूरुवेगात् पतितान् नगेन्द्रान् ।
स कारणं नहुषात् सर्वमेव शुश्राव तत्प्रश्नमशेषतश्च ।
दिव्याम्बरे कुण्डलिनि स्वपूर्वे गते विमानेन स धर्मराजः ।
श्रुत्वा कृष्णा भ्रातरश्चास्य सर्वे सर्वे मुनीन्द्रा भीमसेनेऽतिभक्ताः ।
नैतादृशं साहसं तेऽनुरूपं शक्तोऽपि यत् स्वात्मनो मोक्षणाय(स्वात्मविमोक्षणाय) ।
मैवं पुनः कार्यमिति ब्रुवन्तः समाश्लिषन् सर्व एवैत्य भीमम् ।
ततोऽमितौजा भगवानुपागमन्नारायणः सत्यभामासहायः ।
कृष्णा च सत्या च परस्परं मुदा सम्भाषणं चक्रतुर्योषिदग्र्ये ।
स्त्रीधर्मानखिलांस्तत्र सत्यां निर्दोषसंविदम् ।
क्रीडार्थमेव वचनं ज्ञात्वा सत्यासमीरितम् ।
ततः कतिपयाहानि निरुष्यात्र जनार्दनः ।
ततः कदाचिन्मृगयां गतेषु पार्थेषु राजा सैन्धव आससाद ।
ब्रजन् विवाहार्थमसौ निशाम्य कृष्णां कोटिं प्रेषयित्वैव काश्यम् ।
तया धूतो(धुतो) निपपाताऽशु भूमौ पुनस्ससञ्ज्ञोऽभ्यगमद् विलज्जः(अभ्यपतद्विलज्जः) ।
तदा निमित्तानि निशाम्य पार्थाः समाययुस्त्वरयैवाऽश्रमाय ।
आक्रोशमानं भीमसेनेति धौम्यं दृष्ट्वा तस्याग्रे सैन्धवं चातिपापम् ।
अग्रे कृष्णां योऽवदत् सिन्धुराजं याहीति तं कोटिकाश्यं सुपापम् ।
हत्वा सेनामखिलां सैन्धवस्य भीमार्जुनौ सयमं धर्मराजम् ।
पद्भ्यां धावन्तं भीमसेनो निगृह्य दत्वा प्रहारांश्च भृशं तमार्तम् ।
दासो द्रौपद्या अहमित्येव वाक्ये तेनैवोक्ते भीमसेनोऽप्यमुञ्चत्(भीमसेनो व्यमुञ्चत्) ।
मार्कण्डेयस्तदाऽऽगत्य तेषामकथयत् कथाः ।
लोकदर्शनमाश्रित्य देवाश्च मुनयस्तथा ।
अर्थः समाधिभाषासु ग्राह्यः सर्वोऽप्यसंशयम् ।
ग्राह्यो नार्थो वैदिकं तु दर्शनं ग्राह्यमेव हि ।
जयद्रथस्तु भीमेन तदा(यदा) पञ्चशिखीकृतः ।
वने वसत्स्वेव च पाण्डवेषु चक्रे यज्ञं पौण्डरीकाख्यमेव ।
दुर्योधनस्याऽज्ञया पाण्डवानां दुःशासनः प्रेषयामास तत्र(दूतम्) ।
ततो दिनैः कैश्चन धार्तराष्ट्राः सकर्णगान्धारनृपाः कुमन्त्रतः ।
ते स्यन्दनैः काञ्चनरत्नचित्रैर्महागजैस्तुरगैः पत्तिभिश्च ।
गवां दृष्टिच्छद्मना निर्गतांस्तान् ज्ञात्वा शक्रस्तेजसो भङ्गकामः ।
स षष्टिसाहस्रककोटियूथपैर्गन्धर्वमुख्यैः संवृतोऽगात् सरस्तत् ।
स्नातुं समायास्यति धार्तराष्ट्रो राजेश्वरो निस्सरध्वं तदस्मात् ।
ऊचुर्वयं मानयामस्तदाज्ञां त्रिलोकानां यः पतिः शक्रदेवः ।
इतीरिते कुपितो धार्तराष्ट्रो जघान गन्धर्ववराञ्छरौघैः ।
मुहूर्तमासीत् सममेव युद्धं तेषां तदा धार्तराष्ट्रस्य चैव ।
तेजोभङ्गं तत्र सुयोधनस्य पार्थार्थमत्र प्रविधातुमेव च ।
स चित्रसेनः प्रथमं कर्णमेव युयोध पार्थस्पर्धया तेन युद्ध्यन् ।
स भग्नयानश्च(स भग्नयानोऽथ) विकर्णयानमास्थाय तस्यैव नियम्य वाजिनः ।
मुहूर्तमेनेन समं स युद्ध्यन्नन्यैर्गन्धर्वैर्बहुभिर्माययैव ।
महाबलो धार्तराष्ट्रोऽपि शक्रवराद् विष्णोराज्ञया चाभिवृद्धे ।
तस्यानुजाः शकुनी राजभार्याः सर्वे बद्धाः शक्रदूतैः (शक्रभृत्यैः) प्रणीताः ।
समीपमागत्य पृथासुतानां परिभूतं वः कुलं शक्रभृत्यैः ।
इत्युक्त ऊचे भीमसेनोऽग्रजं स्वं जाने राजन् यादृशोऽयं विमर्दः ।
विज्ञाय तेषां मन्त्रितं वज्रबाहुरेतच्चक्रे नात्र नः कार्यहानिः ।
एकाहयज्ञे दीक्षितेनैव राज्ञा सम्प्रेषितो भीमसेनोऽर्जुनश्च ।
स चित्रसेनो वासवोक्तं च सर्वं कुमन्त्रितं धार्तराष्ट्रस्य चाऽह ।
समाप्य यज्ञं च ततोऽभियान्तं सर्वे प्रापुर्धर्मराजं स चाऽशु ।
स पाण्डवैर्मोचितः सानुजश्च सभार्यकः किञ्चिदतोऽपगम्य ।
स चाऽह दिष्ट्या जयसि राजन्निति सुयोधनम् ।
कर्णदुःशासनाभ्यां च सौबलेन च देविना ।
ततो निशायां प्राप्तायां स्वपक्षे प्रविषीदति ।
शुक्रेणोत्पादिता कृत्या सा प्रसुप्तेषु मन्त्रिषु ।
त्वं दिव्यः पुरुषो वीरः सृष्टोऽस्माभिः प्रतोषितात् ।
इदानीं सर्वदेवानां(इन्द्रादिसर्वदेवानां) वरात् त्वं विजितो रणे ।
कृष्णेन निहतश्चैव नरकः कर्ण आस्थितः ।
भीष्मादींश्च वयं सर्वानाविशाम(प्रविशाम) जयाय ते ।
तस्माद् गत्वा पालयस्व राज्यं राजन्नपेतभीः ।
इत्युक्त्वा कृत्यया भूयः स्वस्थाने स्थापितो नृपः ।
नोवाच कस्यचित् तेषु स्वानुभूतं सुयोधनः ।
भृत्यैस्तवैव पार्थैर्यन्मोचितोऽसि परन्तप ।
या च तेऽर्जुनमाहात्म्ये शङ्का सा व्येतु मे शृणु ।
इत्युक्तोऽवरजैश्चैव सर्वैः शकुनिना तथा ।
सकुण्डलं सकवचमवध्यं सूर्यनन्दनम् ।
तद् विज्ञाय रविः कर्णं स्वप्न उक्त्वा न्यवारयत् ।
ददौ चोत्कृत्य कवचं कुण्डले च शचीपतेः ।
ऋतेऽर्जुनादेकमेव वधिष्यस्यनयेति सः ।
पार्था(पार्थो) विमुच्यैव सुयोधनं तं वने वसन्तो मुदिताः सदैव ।
तस्मिन्नदृश्ये तृषिता एकैकमुदकार्थिनः ।
क्षत्रधर्मस्य रक्षार्थं न तत्प्रश्नान् विदां वराः ।
न विप्राणां च धर्मोऽयं विद्याया उपजीवनम् ।
देवा अपि मनुष्येषु जाताः सुबलिनोऽपि हि ।
अतो भीमार्जुनौ धर्मादत्युत्तमबलावपि ।
मुहूर्तमेव सा माया तयोराच्छादने क्षमा ।
उक्तं पाद्मपुराणे च तदेतत् सर्वमञ्जसा ।
धर्मात्मजोऽथाऽजगामोदकान्तं दृष्ट्वा भ्रातॄंस्तत्र दुःखाभितप्तः ।
अर्थे भ्रातॄणामैच्छदसौ तदीयप्रश्नप्रतिव्याहरणं दयालुः ।
ततस्तुष्टो वरमस्मै ददौ स एकोत्थानं भ्रातृमध्ये स वव्रे ।
इत्युक्त ऊचे माद्रिपुत्रं विहाय कुन्तीपुत्रो न मयोत्थापनीयः ।
यथेष्टरूपप्राप्तिमेषां पुनश्च स्वकामतो निजरूपाप्तिमादात् ।
युधिष्ठिरात्मनस्तस्य यशोधर्मविवृद्धये(युधिष्ठिरात्मनः स्वस्य यशोधर्माभिवृद्धये) ।
ततो राजा भीमसेनार्जुनौ च सार्द्धं यमाभ्यामरणीं प्रदाय ।
त्रयोविंशोऽध्यायः
औं ॥ नारायणानुग्रहतो यथावन्निस्तीर्य तान् द्वादशाब्दान् वने ते ।
गत्वा विराटस्य पुरीं निधाय हेतीः शम्यां छन्नरूपा बभूवुः ।
सर्वे विराटं ययुरत्र देववत् सम्भावितास्तेन शुभोरुलक्षणाः ।
परपाको गृहस्थस्य क्षत्रियस्य विशेषतः ।
वैदिकव्यवहारेषु ज्ञानाधिक्यप्रसिद्धितः ।
स्वीयं वेदविदां सर्वं देवेशानां च किं पुनः ।
शापादेवार्जुनः षण्ढवेषोऽभून्नकुलस्तथा ।
सूतस्यानन्तरत्वात्तु वैश्यजातेस्तथाऽभवत् ।
ततो गोपालतामाप यतिः पूज्योऽखिलैर्यतः
अक्षासक्तोऽभवत् पश्चाद् दर्शयिष्यन् स्वशिष्टताम्
अथाऽजगाम मल्लकः समस्तभूमिमण्डले ।
तमीक्ष्य सर्वमल्लका विराटराजसंश्रयाः ।
य एष सूद आशु तं निहत्य मल्लमोजसा ।
इतीरिते समाहुतो जगाद मारुतिर्वचः ।
समस्तदेववृन्दतो महान् य एव केशवः ।
य एव देवनामधा इति श्रुतिर्जगाद हि ।
युधिष्ठिराभिधश्च यो युधिष्ठिरे स्थितः सदा ।
इति ब्रुवाणो मल्लं तमभियातो वृकोदरः ।
एवं निवसतां तत्र पाण्डवानां महात्मनाम् ।
स द्रौपदीं वीक्ष्य मनोभवार्तः(मनोमदार्तः) सम्प्रार्थयामास तया निरस्तः ।
तया निषिद्धोऽपि पुनःपुनस्तां यदा ययाचेऽथ सा चाह (ययाचेऽथच साऽऽह) कृष्णाम् ।
बलात् तया प्रेषिता तद्गृहाय यदाऽगमत् तेन हस्ते गृहीता ।
अनुद्रुत्यैतां पातयित्वा पदा स सन्ताडयामास तदा रविस्थितः ।
वायुस्तमाविश्य(वायुस्तदाविश्य) तु कीचकं तं न्यपातयत् तां समीक्ष्यैव भीमः ।
कृष्णा रात्रौ भीमसकाशमेत्य हन्तुं पापं कीचकं प्रैरयत् तम् ।
तत्रैनमासाद्य तु भीमसेनो विजित्य तं बाहुयुद्धे निहत्य(निपात्य) ।
अवध्यं तं निहतं वीक्ष्य तस्य पञ्चोत्तरं शतमेवानुजानाम् ।
सा नीयमाना कीचकैः संरुराव श्रुत्वैव तं भीमसेनो महान्तम् ।
एवं यत्नात् तपसा तैरवाप्तो वरः शिवादजयत्वं(शिवादक्षयत्वं) रणेषु ।
गन्धर्व इत्येव निहत्य सर्वान् मुमोद भीमो द्रौपदी चाथ कृष्णाम् ।
अस्त्वित्येनामाह भयात् सुदेष्णा तथाऽवसन् पूर्णमब्दं च तेऽत्र
तेनावदद् द्रौपदीकारणेन दुर्योधनो निहतं कीचकं तम् ।
अग्रे ययौ तत्र योद्धुं सुशर्मा स गा विराटस्य समाजहार ।
विजित्य सङ्ख्ये जगृहे विराटं तदा सुशर्मा तमयाद् वृकोदरः ।
ततोऽपरदिने सर्वे भीष्मद्रोणपुरस्सराः ।
कीचकस्य हिडिम्बस्य बककिर्मीरयोरपि ।
न बाधनाय भीष्माद्या अपि शेकुः कथञ्चन ।
यतिष्ये रक्षितुं भीमाद् धार्तराष्ट्रानिति स्वकाम् ।
यदि युद्धाय निर्यान्ति ज्ञाताः स्युः पाण्डवास्तदा ।
तदोत्तरः सारथित्वे प्रकल्प्य पार्थं ययौ तान् निशाम्यैव भीतः ।
आदाय गाण्डीवमथ ध्वजं च हनूमदङ्कं सदरोऽग्रतो गाः ।
एकीभूतान् पुनरेवानुयातान् सम्मोहनास्त्रेण विमोहयित्वा ।
विधाय भीष्मं विरथं जगाम तदा श्रुत्वा मत्स्यपतिर्जितान् कुरून् ।
तदा क्रुद्धः प्राहरत् तं विराटः सोऽक्षेण तद् भीमधनञ्जयाभ्याम् ।
निजस्वरूपेण समास्थितान् नो यदि स्म नासौ प्रणिपातपूर्वकम्(पूर्वम्) ।
तदा विराटासनमास्थितं नृपं युधिष्ठिरं वीक्ष्य विराट आह ।
ततो विराटो भयकम्पिताङ्गः प्रणम्य पार्थाञ्छरणं जगाम ।
एवं विराटं मोचयित्वैव गाश्च तमस्यन्धे कीचकान् पातयित्वा ।
अयातयन् केशवायाथ दूतान् सहाभिमन्युः सोऽपि रामेण सार्द्धम् ।
आसीन्महानुत्सवस्तत्र तेषां दाशार्हवीरैः सह पाण्डवानाम् ।
दुर्योधनाद्याः सूतपुत्रेण सार्द्धं ससौबलेया युधि पार्थपीडिताः ।
अज्ञातवासे फल्गुनो नोऽद्य दृष्टस्तस्मात् पुनर्यान्तु पार्था वनाय ।
तयोर्वाक्यं ते त्वनादृत्य पापा वनं पार्थाः पुनरेव प्रयान्तु ।
सौरमासानुसारेण धार्तराष्ट्रा अपूर्णताम् ।
दिनानामधिपः सूर्यः पक्षमासाधिपः शशी ।
तदेतदविचार्यैव लोभाच्च धृतराष्ट्रजैः ।
सुवासुदेवा अखिलैश्च यादवैः पाञ्चालमत्स्यैश्च युताः सभार्याः ।
चतुर्विंशोऽध्यायः
औं ॥ ततः सम्मन्त्र्यानुमते(अनुमतेः) कृष्णस्य स्वपुरोहितम् ।
स गत्वा धृतराष्ट्रं तं भीष्मद्रोणादिभिर्युतम् ।
श्रुतास्ते भीमनिहता जरासन्धादयोऽखिलाः ।
तीर्थविघ्नकराः सर्वतीर्थान्याच्छाद्य संस्थिताः ।
भ्रातॄणां ब्राह्मणानां च लोकानां च हितैषिणा ।
यथा जटासुरः पापः शर्वाणीवरसंश्रयात् ।
ज्ञात्वाऽपि भीमसेनेन विप्ररूपस्य नो वधः ।
यमौ युधिष्ठिरं कृष्णां चाऽदायैव पराद्रवत् ।
निपात्य भूमौ पादेन सञ्चूर्णितशिरास्तमः ।
निवातकवचाश्चैव हताः पार्थेन ते श्रुताः ।
तस्मादेतैः पालितस्य धर्मजस्य स्वकं वसु ।
ततः सहैव यदुभिः कृष्णं द्वारवतीं गतम् ।
युगपद् ययतुस्तत्र वेगेनाजयदर्जुनम् ।
दर्पान्नाहं राजराज उपास्ये पादयोरिति ।
असुप्तः सुप्तवच्छिश्ये तत्रातिष्ठद् धनञ्जयः ।
तमैक्षत् प्रथमं देवो जानन्नपि सुयोधनम् ।
तयोरागमने हेतुं श्रुत्वा प्राह जनार्दनः ।
समं करिष्ये युवयोरेकत्राहं निरायुधः ।
इत्युक्ते फल्गुनः कृष्णं वव्रे तद्भक्तिमान् यतः ।
पार्थानामेव साहाय्यं करिष्यन्नपि केशवः ।
ततः पार्थेन सहितः पाण्डवान् केशवो ययौ ।
उपप्लाव्ये सभायां हि तत्पक्षीयं वचो ब्रुवन् ।
ततो दुर्योधनं नायात् स च हार्दिक्यसंयुतः ।
सप्त पाण्डुसुतानां च मत्स्यद्रुपदकेकयैः ।
पुरुजित् कुन्तिभोजश्च चेकितानश्च सात्यकिः ।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ जयत्सेनोऽन्यकैकयाः(अन्यकेकयाः) ।
श्रुतायुरच्युतायुश्च बृहद्बलसुदक्षिणौ ।
अलायुधोऽलम्बलश्च दैत्या दुर्योधनं ययुः ।
सपुत्रपौत्रो बाह्लीको भीष्मद्रोणकृपा अपि ।
पाण्ड्यश्च वीरसेनाख्यः पाण्डवानेव संश्रितः ।
ता युधिष्ठिरक्लृप्ताः स मत्वा शल्योऽब्रवीदिदम् ।
लीनः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रः सत्यं कुर्वित्यभाषत ।
स पाण्डवांस्ततो गत्वा तैरनुज्ञात एव च ।
सञ्जयं प्रेषयामास धृतराष्ट्रोऽथ शान्तये ।
हठवादेऽवदद् भीमो यं धर्मं द्रौपदी तथा ।
ततो निरुत्तरः कृष्णं पाण्डवांश्च प्रणम्य सः ।
निन्दितः सञ्जयेनासावाहूय विदुरं निशि ।
ऐहिकस्य सुखस्यापि कारणं तदनिन्दितम् ।
तत्र भावमकृत्वा स ज्ञानादिच्छन्नघक्षयम् ।
स आगत्यावदत् तत्त्वं विष्णोर्मायाविनः शुभा ।
तच्छ्रुत्वा स तु भीतोऽपि पुत्रस्नेहानुगो नृपः ।
यदुक्तवान् सञ्जयाय यदि दित्सतिः नः पिता ।
सोऽप्याहाहं गमिष्यामि सभायामृषिसन्निधौ ।
इत्युक्ते वैरमात्मोत्थं लोकमध्ये प्रहापयन् ।
नास्मन्निमित्तनाशः स्यात् कुलस्यापि वयं कुलम् ।
इच्छताऽप्यखिलान् हन्तुं धार्तराष्ट्रान् दृढात्मना ।
वधं तेषां धर्ममेव लोके ख्यापयितुं हरिः ।
अभिप्रायं केशवस्य जानन् भीमो निजं बलम् ।
शशंस सत्यैः सद्वाक्यै राज्ञां मध्ये प्रकाशयन् ।
नित्यमेकमनस्कौ तावपि केशवमारुती ।
ततः कृष्णोऽर्जुनं चैव कृपालुं सन्धिकामुकम् ।
शौर्यप्रकाशनायैव युद्धं योजयतां भवान् ।
दस्यूनां निग्रहो धर्मः क्षत्रियाणां यतः परः ।
ससात्यकिः स्यन्दनवर्यसंस्थितः पृथातनूजैरखिलैः स भूमिपैः ।
एकोऽपि विष्णुः स तु(च) भार्गवात्मा व्यासात्मकश्चानुगतो मुनीन्द्रैः (व्यासः सशिष्यस्तदनन्यदृश्यः) ।
स वन्द्यमानोऽखिलराष्ट्रवासिभिः प्रसूनवर्षैरभिवर्षितः सुरैः ।
स भीष्ममुख्यैः सरसाभियातः सहैव तै प्रययौ राजमार्गे ।
सभाजितस्तैः(सम्भावितस्तैः) परमादरेण विवेश गेहं नृपतेरनन्तः ।
यथोचितं तेषु विधाय केशवो दौर्योधनं प्राप्य गृहं च पूजितः ।
स भीष्मपूर्वैरभियाचितोऽपि जगाम नैषां गृहमादिदेवः ।
स तेन भक्त्याऽभिगतः प्रसन्नः प्रविश्य चान्तर्गृहमीश्वरोऽजः ।
परे दिनेऽसौ धृतराष्ट्रसूनुना समानीतः संसदि कौरवाणाम् ।
सम्पूजितो भीष्ममुख्यैः समस्तै रराज राजीवसमाननेत्रः ।
वैचित्रवीर्य स्वकुलस्य वृद्ध्यै प्रदेहि राज्यं तव सत्सुताय ।
इतीरितः प्राह ममातिवर्तिनं सुतं स्वयं मे प्रतिबोधयेति ।
येये तदा केशवसंयमाय न्यमन्त्रयंस्ते विबुधप्रतीपाः ।
कर्णः सुराग्र्योऽपि(सुरांशोऽपि) सुयोधनार्थे(सुयोधनार्थं) न्यमन्त्रयद् भावतो नैव दुष्टः ।
ऋषिभिर्जामदग्न्येन व्यासेनाप्यमितौजसा ।
मातापितृभ्यां भीष्माद्यैरनुशिष्टोऽपि दुर्मतिः ।
सात्यकिः कृतवर्मा च तच्छुश्रुवतुरञ्जसा ।
जानन्नप्यखिलं कृष्णस्तच्छ्रुत्वा सात्यकेर्मुखात् ।
अथ तेनाऽहुते पुत्रे सामात्ये पुरुषोत्तमः ।
तत् कालसूर्यामितदीप्ति सर्वजगद्भरं शाश्वतमप्रमेयम् ।
पिधाय रूपं पुनरेव तद्धरिर्वैचित्रवीर्येण समर्थितः पुनः ।
अनन्तशक्तिः पुरुषोत्तमोऽसौ शक्तोऽपि दुर्योधनचित्तनिग्रहे ।
पुनश्च कुन्तीगृहमेत्य कृष्णस्तयोद्योगं धर्मसुतस्य शिष्टम् ।
आयाहि पार्थानिति (पाण्डूनिति) तद्वचः स नैवाकरोन्मानितो धार्तराष्ट्रैः ।
यावत् पितुर्मरणं सोऽपि मैत्रीं वव्रे पार्थैस्तं च विसृज्य कृष्णः ।
सम्प्रार्थितः पृथया चैव कर्णः पार्थैर्योगं याहि सूनुर्ममासि ।
ततो ययुः कौरवाः पाण्डवाश्च कुरुक्षेत्रं योद्धुकामाः सकृष्णाः ।
पञ्चविंशोऽध्यायः
औं ॥ ते सेने समरारम्भे समेते सागरोपमे ।
‘सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत’(भ.गी.१.२१) ।
स्वधर्मो दुष्टदमनं धर्मज्ञानानुपालनम् ।
‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
नच शोकस्त्वया कार्यो बन्धूनां निधनेच्छया (निधनेक्षया) ।
सृष्टिस्थित्यप्ययाज्ञानबन्धमोक्षप्रवृत्तयः ।
न मे कुतश्चित् सर्गाद्याः स्वातन्त्र्याद् गुणपूर्तितः ।
ज्ञात्वैषां निधनाद्यं च जीवादेरस्वतन्त्रताम् ।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
(सम्पूर्णसत्सर्व)सुपूर्णसत्सर्वगुणदेहोऽहं सर्वदा प्रभुः ।
अथ दिव्यदृशं तस्य दत्वा व्याप्तं निजं वपुः ।
तत्प्रार्थितः पुनः कृष्णस्तद्रूपं लोकमानतः ।
ज्ञानं ज्ञेयं प्रकृत्यादि(ज्ञानज्ञेयप्रकृत्यादि) ज्ञापयन् पुरुषोत्तमः ।
अथ व्यूढेष्वनीकेषु नदन् वायुसुतोऽभ्ययात् ।
क्षिप्रं नैव प्रहर्तव्यं ज्ञातिषु प्रहरत्स्वपि ।
अमुचन् धार्तराष्ट्रेषु शस्त्रवृष्टिं दुरासदाम् ।
अपीडयंस्ताञ्छस्त्रौघैर्धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।
तत्र भीमशरैर्नुन्ना धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।
अथ द्वन्द्वानि युद्धानि बभूवुर्विजिगीषताम् ।
दुःशासनेन वीरस्य माद्रेयस्य यवीयसः ।
वृत्ते द्वन्द्वमहायुद्धे तत्र धर्मजपक्षगाः ।
अथ भीष्मद्रोणमुखैर्भगदत्तादिभिस्तथा ।
द्रोणं च भगदत्तं च कृपं दुर्योधनं तथा ।
अथ भीष्ममुदीर्णास्त्रं द्रावयन्तं वरूथिनीम् ।
सौभद्रं तत्र विक्रान्तमतीत्य द्युसरित्सुतः ।
तस्य विक्रममालक्ष्य पार्थं तद्गौरवानुगम् ।
रात्रौ युधिष्ठिरश्चिन्तामाप्य पार्थं व्यगर्हयत् ।
एवं भीष्मो दशाहानि सेनापत्यं चकार ह ।
कर्णोऽर्द्धरथ इत्युक्त्वा तावद् युद्धात् प्रयापितः(प्रहापितः) ।
कर्णेऽयुतरथानां(कर्णोऽयुतरथानां च) स नित्यशो वधमाहवे ।
सुसमर्थावपि वधे तस्य भीमधनञ्जयौ ।
बभूवुस्तत्र युद्धानि चित्राणि सुबहूनि च ।
धृष्टद्युम्नो महेष्वासः प्रतिव्यूह्याऽपगासुतम् ।
तत्रोद्दधार कृष्णोऽपि फल्गुनं मृदुयोधिनम् ।
तेन स्तुतो गृहीतश्च फल्गुनेन प्रणम्य च ।
ततो भीष्मोऽर्जुनश्चैव शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् ।
अयुतानि बहून्याजौ रथानां निजघान च ।
कदाचिदग्रगो भीमो भीष्मद्रोणौ विसारथी ।
पुनः संस्थापितरथौ विजित्यायत्नतो बली ।
भगदत्तद्रौणिकृपशल्यदुर्योधनादयः ।
विरथो व्यायुधश्चैव दृढवेधविमूर्च्छितः ।
ततोऽपहारं सैन्यस्य जिताश्चक्रुश्च कौरवाः ।
उवाच हेतुना केन वयं जीवाम (क्षीयाम, जीयाम) सर्वदा ।
तमाह भीष्मस्तेऽजेया देवास्ते धरणीं गताः ।
मानसोत्तरशैले हि पुरा ब्रह्मपुरस्सराः ।
स्तुत्वा सम्पूज्य भूमेः स भारावतरणाय तम् ।
अयं नारायणो देवः पुर्णानन्तगुणार्णवः ।
एवं तेन समादिष्टा धर्मवाय्वादयोऽखिलाः ।
स च नारायणो देवो देवकीनन्दनोऽभवत् ।
इत्युक्तो डम्भबुद्ध्यैव नत्वा विष्णुं ततो ययौ ।
दिव्यौषधेन भीष्मस्य भूत्वा च निरुजस्ततः ।
तत्राऽसीद् युद्धमतुलं भीमभीष्मानुयायिनाम् ।
धृष्टद्युम्नस्तत्र भीमानुयायी दुर्योधनस्यावरजैः प्रयुद्ध्यन् ।
ततो द्रोणस्तान् समुत्थाप्य सर्वान् विज्ञानास्त्रेणाऽसदत् पार्षतं च ।
अथाऽसदत् कृतवर्मा रथेन धृष्टद्युम्नं सोऽभ्ययात् तावुभौ च ।
तस्मिन् जिते रथवीरे स्वयं तं दुर्योधनः पार्षतमाससाद ।
विमूर्च्छितं तं रुधिरौघमुच्चैर्वमन्तमाशु स्वरथे निधाय ।
अथेन्द्रसूनुः केशवप्रेरितेन रथेन शत्रून् विधमञ्छरौघैः ।
तमन्वगाद् (तमन्वयात्) युयुधानः सुधन्वा विद्रावयन् धार्तराष्ट्रस्य सेनाम् ।
पुत्रान् दशास्याऽशु निहत्य वीरः स सात्यकेः सौमदत्तिः सकाशे ।
अथासिपाणिं युयुधानमाशु महासिहस्तेन च सौमदत्तिना ।
सुयोधनः सौमदत्तिं स्वकीयरथे व्यवस्थाप्य च भीमसेनात् ।
उभौ च तावस्त्रविदां प्रबर्हौ शरैर्महाशीविषसन्निकाशैः ।
स्वबाहुवीर्येण जितः स भीष्मः किरीटिना लोकमहारथेन ।
ततः परेद्युः पुनरेव भीमभीष्मौ पुरस्कृत्य समीयतुस्ते ।
दुर्योधनाद्येषु पराजितेषु भीष्मद्रोणद्रौणिपुरस्सरेषु ।
तेनातिविद्धे भीमसेनेऽस्य पुत्र उद्यच्छमानं पितरं निवार्य ।
स वैष्णवास्त्रं भगदत्तसंस्थं विज्ञाय विष्णोर्वरतो विशेषतः ।
अनुग्रहादभ्यधिकादवध्यं जानन्नपि स्वं वासुदेवस्य नित्यम् ।
स विस्मृतास्त्रस्तु यदा भवेत तदा भीमो भगदत्तं प्रयाति ।
चतुर्गजात्मोपरिगात्मकश्च घटोत्कचः सुप्रतीकं च तं च ।
गजार्तनादं तु निशम्य भीष्ममुखाः समापेतुरमुं च दृष्ट्वा ।
दिने परे चैव पुनः समेताः परस्परं पाण्डवाः कौरवास्ते ।
तैः प्रासहस्तैः क्षतकायोऽतिरूढकोपः स खड्गेन चकर्त तेषाम् ।
दृष्ट्वा तमुग्रं धृतराष्ट्रपुत्रो दिदेश रक्षोऽलम्बुसनामधेयम् ।
तयोरभूद् युद्धमतीव दारुणं मायायुजोर्वीर्यवतोर्महाद्भुतम् ।
हतं निशम्याऽर्जुनिमुग्रपौरुषो ननाद कोपेन वृकोदरात्मजः ।
अलम्बुसस्तं प्रसमीक्ष्य मारुतेः सुतं बलाढ्यं भयतः पराद्रवत् ।
स भीमपुत्रस्य जघान मन्त्रिणो महाबलांश्चतुरोऽन्यांस्तथैव ।
स पीड्यमानो युधि तेन रक्षसा प्रवेशयामास शरं घटोत्कचे ।
चिरं प्रयुद्धौ नृपराक्षसाधिपौ परस्पराजेयतमौ रणाजिरे ।
स द्रोणशल्यौ गुरुपुत्रगौतमौ भूरिश्रवःकृतवर्मादिकांश्च ।
तमेकग्र्यै रथिभिः परिष्कृतं निरीक्ष्य भीमोऽभ्यगमत् समस्तान् ।
द्रौणिं कृपाद्यान् ससुयोधनांश्च चकार भीमो विरथान् क्षणेन ।
तेनाम्बरस्थेन तरुप्रमाणैरभ्यर्दिताः कुरवः सायकौघैः ।
सर्वांश्च ताञ्छिबिरं प्रापयित्वा विना भीष्मं कौरवान् भीमसेनः ।
दुर्योधनोऽथ स्वजनैः समेतः पुनः प्रायाद् रणभूमिं स भीष्मम् ।
प्राग्ज्योतिषं चैव घटोत्कचाय सम्प्रेषयामास सुरापगासुतः ।
तेनाहतः (तेनार्दितः) प्राहिणोच्छूलमस्मै वियत्यवप्लुत्य तदा घटोत्कचः ।
तदा स तस्यैव पदानुगान् नृपो जघान तं मारुतिरभ्ययाद् रणे ।
संस्तम्भिते बाणवरैस्तु नागे भीमस्याश्वान् सायकैरर्दयत्(आर्दयत्) सः ।
स हन्तुकामेन रुषाऽभिपन्नो भीमेन राजा पुरतः पृष्ठतश्च ।
तस्मिन् गते भीमसेनार्जुनाभ्यां विद्राविते राजसङ्घे समस्ते ।
संश्रावितः क्रूरवचः स तेन चक्रे सत्यं मृत्युभयं विहाय ।
तं शक्तितो जुगुपुर्धार्तराष्ट्रास्तेनार्दिताश्चेदिपाञ्चालमुख्याः ।
संस्थाप्य तान् भीष्ममभिप्रयान्तमलम्बुसोऽवारयत् पार्थसूनुम् ।
तद् युद्धमासीन्नृपपार्थपुत्रयोर्विचित्रमत्यद्भुतमुग्ररूपम् ।
अथैनमुग्रैश्च शरैर्ववर्ष सूतं च तस्याऽशु जघान वीरः ।
द्रोणो द्रौणिर्भगदत्तः कृपश्च सचित्रसेना अभ्ययुर्भीमसेनम् ।
तामुद्यतां वीक्ष्य(तामुद्यतामीक्ष्य) पराद्रवंस्ते स चित्रसेनश्च रथादवप्लुतः ।
भीष्मस्तु पाञ्चालकरूशचेदिष्वहन् सहस्राणि चतुर्दशोग्रः ।
विद्राप्य सर्वामपि पाण्डुसेनां विश्राव्य लोकेषु च कीर्तिमात्मनः ।
द्रोणो विराटस्य पुरो निहत्य शङ्खं सुतं तस्य विजित्य तं च ।
भीमार्जुनावपि शत्रून् निहत्य विद्राप्य सर्वांश्च युधि प्रवीरान् ।
युधिष्ठिरो भीष्मपराक्रमेण भीतो भीष्मं स्ववधोपायमेव ।
भीमार्जुनौ शक्नुवन्तावपि स्म नर्तेऽनुज्ञां हन्तुमिमं समैच्छताम् ।
प्राप्यानुज्ञां भीष्मतस्ते वधाय शिखण्डिनं तद्वचसाऽग्रयायिनम् ।
शिखण्डिनो रक्षकः फल्गुनोऽभूद् भीष्मस्य दुःशासन आस चाग्रे ।
भीष्माय यान्तं युयुधानमाजौ न्यवारयद् राक्षसोऽलम्बुसोऽथ ।
अस्त्रेण मायामपनुद्य वीरो व्यद्रावयद् राक्षसं सात्यकिस्तम् ।
द्रोणो द्रौणिर्धार्तराष्ट्रश्च राजा भूरिश्रवा भगदत्तः कृपश्च ।
स तान् मुहुर्विरथीकृत्य वीरः प्राग्ज्योतिषं सगजं द्रावयित्वा ।
युधिष्ठिरं भीष्ममभिप्रयान्तं माद्रीसुताभ्यां सहितं नृवीरम् ।
तान् सादिनोऽश्वांश्च निहत्य सर्वान् विजित्य तं शकुनिं पाण्डवास्ते ।
धृष्टद्युम्नं भीष्ममभिप्रयान्तं न्यवारयत् सैन्धवस्तं स बाणैः ।
गुप्तोऽथ पार्थेन रणे शिखण्डी भीष्मं समासाद्य शरैरताडयत् ।
शिखण्डिनं वारयामास बाणैर्दुर्मर्षणोऽमर्षणविह्वलेक्षणः ।
स लोकवीरोऽपि दुरात्मनाऽमुना रुद्धोऽशकन्नैनमतीत्य यातुम् ।
अमर्षयुक्तौ चिरमेव वीरावयुद्ध्यतामर्जुनधार्तराष्ट्रौ ।
तदा विराटद्रुपदौ कुन्तिभोजं कृष्णासुतान् केकयांश्चेकितानम् ।
जित्वैव तांस्तेऽभिययुश्च भीष्मं (तदा)ततोऽर्जुनोऽतीत्य दुःशासनं च ।
स तैः समस्तैर्बहुभिश्शस्त्रपूगैर्भृशं मर्मस्वर्दितश्चापमुक्तैः ।
स चेदिपाञ्चालकरूशमुख्यान् रथोदारान् पञ्चविंशत्सहस्रान् ।
निरीक्ष्य तं सूर्यमिवाऽतपन्तं सञ्चोदितो वासुदेवेन पार्थः ।
चिच्छेद तच्चैवमष्टौ धनूंषि शक्तिं च चर्मासिवरं पराणि ।
ततः शरैः सूर्यकरप्रकाशैर्विव्याध सर्वे च युधिष्ठिराद्याः ।
निपापितेऽस्मिन् मारुतिर्द्रोणमुख्यान् विद्राप्य तत्राऽगमदाशु तेऽपि ।
प्रणम्य तं तद्वचनात् समीयुस्तस्मिन् दिने शिबिराण्येव सर्वे ।
स पूर्वदिवसे पार्थदत्तबाणोपबर्हणः ।
धार्तराष्ट्रैरविज्ञातं तदभिज्ञाय(तदाभिज्ञाय) वासविः ।
यादृश्यस्त्रज्ञता पार्थे दृष्टाऽत्र कुरुनन्दनाः ।
यादृशं चैव माहात्म्यमनन्तमजरं हरेः ।
उपारमत तद् युद्धं सुखिनः सन्तु भूमिपाः ।
व्यासदत्तोरुविज्ञानात् सञ्जयादखिलं पिता ।
षड्विंशोऽध्यायः
औं ॥ अथाखिलानां पृथिवीपतीनामाचार्यमग्र्यं रथिनां सुविद्यम् ।
कर्णोऽपि भीष्मानुमतो धनुष्मान् युद्धोद्यतोऽभूत् तदसत्कृतः पुरा ।
द्रोणो वृतो धार्तराष्ट्रेण धर्मसुतग्रहे तेन कृते प्रतिश्रवे ।
पतत्रिभिस्तत्र दुधाव शात्रवान् द्रोणो धनुर्मण्डलमन्त्रनिस्सृतैः ।
स तान् विधूयाभ्यपतद् रणेऽग्रणीर्द्रोणं तमन्वार्जुनिरभ्ययात् परान् ।
उभावजेयौ गदिनामनुत्तमावतुल्यवीर्यौ प्रवरौ बलीयसाम् ।
गदाभिघातेन वृकोदरस्य विचेतनः प्रापतदत्र मद्रराट् ।
विचेतनं पतितं मद्रराजं विलोक्य भीमं च तमाह्वयन्तम् ।
विजित्य मद्राधिपमोजसाऽरिहा नदन् रथं प्राप्य निजं स मारुतिः ।
विद्रावयत्याशु कुरून् वृकोदरे विधूय सौभद्रमुखान् ससात्यकीन् ।
स वासुदेवप्रयते रथे स्थितः शरैः शरीरान्तकरैः समन्ततः ।
निहन्यमानासु किरीटिना चमूष्वारक्षिते धर्मसुते तथाऽपदः ।
स धार्तराष्ट्रेण युधिष्ठिराग्रहात् संश्रावितः क्रूरवचो निशायाम् ।
ततः सुशर्मा सहितो महारथैः संशप्तकैर्दूरतरं प्रणेतुम् ।
समाह्वयामासुरथार्जुनं ते प्रातर्हुताशस्य दिशं रणाय ।
निहन्यमानेषु गजेषु (सङ्घशो)सर्वशो विद्राप्यमाणेष्वखिलेषु राजसु ।
विभीषिताः सुप्रतीकेन भीमहया न तस्थुस्तदनु स्म सात्यकिः ।
शैनेयपूर्वेषु रथोज्झितेषु भूमाववप्लुत्य कथञ्चिदेव ।
सङ्क्लेशितो वैष्णवास्त्रं (विमुञ्चेत्) प्रमुञ्चेत् प्राग्ज्योतिषो भीमसेने ततोऽहम् ।
इति स्म सञ्चिन्त्य सहार्जुनेन तत्राऽययावथ पार्थं त्रिगर्ताः ।
तदस्त्रवीर्येण विमोहितास्ते परस्परं कृष्णपार्थाविति स्म ।
विसृज्यं भीमं स च पार्थमेव ययौ गजस्कन्धगतो गजं तम् ।
मनोजवेनैव रथे परेण(वरेण) सम्भ्राम्यमाणे नतु तं गजः सः ।
अस्त्रैश्च शस्त्रैः सुचिरं नृवीरावयुद्ध्यतां तौ बलिनां प्रबर्हौ ।
तस्मिन्नस्त्रे तेन तदा प्रमुक्ते(प्रयुक्ते, प्रदत्ते) दधार तद् वासुदेवोऽमितौजाः ।
दृष्ट्वैव तद् धारितमच्युतेन पार्थः किमर्थं विधृतं त्वयेति ।
न मादृशोऽन्योऽस्ति कुतः परो मत् सोऽहं चतुर्धा जगतो हिताय ।
स एव च क्रोडतनुः पुराऽहं भूमिप्रियार्थं नरकाय चादाम् ।
अस्त्रस्य चान्यो नतु कश्चिदस्ति योऽवध्य एतस्य कुतश्च मत्तः ।
इत्युक्तमाकर्ण्य स केशवेन सम्मन्त्र्य बाणं हृदये मुमोच ।
उभौ च तौ पेततुरद्रिसन्निभौ महेन्द्रवज्राभिहताविवाऽशु ।
अथाचलं वृषकं चैव हत्वा कनीयसौ शकुनेस्तं च बाणैः ।
स नष्टमायः प्राद्रवत् पापकर्मा ततः पार्थः शरपूगैश्चमूं ताम् ।
तदा भीमस्तस्य निहत्य वाहान् व्यद्रावयद् धार्तराष्ट्रीं चमूं च ।
प्राग्ज्योतिषे निहतेऽथाग्रहाच्च युधिष्ठिरस्यातिविषण्णरूपः ।
पार्थे गते श्वो नृपतिं ग्रहीष्ये निहन्मि वा तत्सदृशं तदीयम् ।
पद्मव्यूहं व्यूह्य परैरभेद्यं वराद् विष्णोस्तस्य मन्त्रं ह्यजप्त्वा(जपित्वा) ।
पार्था व्यूहं तु तं प्राप्य नाशकन् भेत्तुमुद्यताः ।
भीमो युधिष्ठिरस्तत्र तज्ज्ञं सौभद्रमब्रवीत् ।
स एवमुक्तो रथिनां प्रबर्हो विवेश भित्त्वा द्विषतां चमूं ताम् ।
वरेण रुद्रस्य निरुद्ध्यमानो जयद्रथेनात्र वृकोदरस्तु ।
जयद्रथस्थेन वृषध्वजेन प्रयुद्ध्यमानेषु वृकोदरादिषु ।
स द्रोणदुर्योधनकर्णशल्यैर्द्रोण्यग्रणीभिः कृतवर्मयुक्तैः ।
स लक्षणं राजसुतं प्रसह्य(प्रगृह्य) पितुः समीपेऽनयदाशु मृत्यवे ।
द्रोणादयस्तं हरिकोपभीताः प्रत्यक्षतो हन्तुमशक्नुवन्तः ।
कर्णो धनुस्तस्य कृपश्च सारथिं द्रोणो हयानाशु विधूय सायकैः ।
भीतेषु कृष्णादथ तद्वधाय तेष्वाससादाऽशु गदायुधं गदी ।
तस्मिन् हते शत्रुरवं निशम्य हर्षोद्भवं मारुतिरुग्रविक्रमः ।
व्यासस्तदा तानमितात्मवैभवो युधिष्ठिरादीन् ग्लपितानबोधयत् ।
निशम्य पुत्रस्य वधं भृशार्तः प्रतिश्रवं सोऽथ चकार वीरः ।
स्वयमेवाखिलजगद्रक्षाद्यमितशक्तिमान् ।
ज्ञापयन् फल्गुनस्यास्त्रगुरुं गिरिशमञ्जसा ।
सान्त्वयित्वा सुभद्रां च गत्वोपप्लाव्यमच्युतः ।
श्रुत्वा प्रतिज्ञां पुरुहूतसूनोर्दुर्योधनेनार्थितः सिन्धुराजम् ।
स दिव्यमग्र्यं शकटाब्जचक्रं कृत्वा स्वयं व्यूहमुखे व्यवस्थितः ।
अथार्जुनो दिव्यरथोपरिस्थितः सुरक्षितः(संरक्षितः) केशवेनाव्ययेन ।
प्रदक्षिणीकृत्य तमाश्वगात् ततः कालात्ययं त्वेव विशङ्कमानः ।
विजित्य हार्दिक्यमथाप्रयत्नः स इन्द्रसूनुः प्रविवेश तद् बलम् ।
स उच्चकाशेऽतिरथो रथोत्तमे सवासुदेवो हरिणा यथेन्द्रः ।
दृढायुमच्युतायुं च हत्वा विन्दानुविन्दकौ ।
सुदक्षिणं च काम्बोजं(काम्भोजं) निहत्याम्बष्ठमेव च ।
स तु तेन शरैस्तीक्ष्णैरर्पितो विरथं क्षणात् ।
गदां चिक्षेप सा तस्य वारुणेः शिर एव तु ।
अयुद्ध्यन्तं स्वगदया यदि ताडयसि स्वयम् ।
इत्यब्रवीत् तं वरुणः पुरा तेन स केशवे ।
हतेषु वीरेषु निजेषु सङ्घशो विद्रावितेष्वालुलिते च सैन्ये ।
इतीरितेऽभेद्यममुष्य वर्म बद्ध्वा महामन्त्रबलात् स विप्रः ।
इतीरितो धार्तराष्ट्रः स चापमादाय सौवर्णरथोपरिस्थः ।
विव्याध पार्थोऽपि तमुग्रवेगैः शरैर्न ते तस्य च वर्मभेदम् (वर्मभेदनम्)।
सन्धीयमानं तु गुरोः सुतस्तच्चिच्छेद पार्थोऽथ सुयोधनाश्वान् ।
स द्रौणिकर्णप्रमुखैर्धनञ्जयो युयोध ते चैनमवारयञ्छरैः ।
पार्थे प्रविष्टे कुरुसैन्यमध्यं द्रोणोऽविशत् पाण्डवसैन्यमाशु ।
स वीरवर्यः स्थविरोऽपि यूनां युवेव मध्ये प्रचचार धन्विनाम् ।
नृपग्रहेच्छुं तमवेत्य सत्यजिन्न्यवारयद् द्रौपदिराशु वीर्यवान् ।
निहत्य तं वीरतमं रणोत्कटं युधिष्ठिरं बाणगणैः समर्दयत् ।
स ऊर्ध्वबाहुर्भुवि संस्थितोऽपि गृहीतुमाजौ गुरुणाऽभिपन्नः ।
द्रोणं ततः शैशुपालिः सपुत्रो जारासन्धिः काशिराजः सशैव्यः ।
स तान् क्रमेणैव निकृत्तकन्धराञ्छरोत्तमैस्तत्र विधाय विप्रः ।
विधूयमाने गुरुणोरुसैन्ये पृथासुतानां पृतनाः परेषाम् ।
अलम्बुसो नाम तदैव राक्षसः समासदन्मारुतिमुग्रपौरुषम् ।
सोऽदृश्यरूपोऽनुचरानपीडयद् भीमस्य तद् वीक्ष्य चुकोप मारुतिः ।
त्वाष्ट्रास्त्रमादत्त स काम्यकर्महीनोऽपि भीमस्तत उत्थिताः शराः ।
तद्धन्यमानं प्रविहाय भीममपाद्रवद् दूरतरं सुभीतम् ।
तदैव कृष्णातनयाः समेता जघ्नुः शलं संयति सौमदत्तिम् ।
घटोत्कचस्तं विरथं विधाय खस्थं ख एवाभियुयोध संस्थितः ।
पदा शिरस्येव स पिष्टमस्तको ममार मध्ये पृथिवीपतीनाम् ।
तदाऽऽसदत् कृतवर्मा रथेन सेनां पाण्डूनां शरवर्षं प्रमुञ्चन् ।
स तेन पाञ्चालगणान् विजिग्ये यमौ च भीमस्य पुरोऽथ तं च ।
विनैव वृष्णीन् विजये वरो यदमुष्य तेनास्य हयान् स सात्यकिः ।
तदा हरिः पाञ्चजन्यं सुघोषमापूरयामास जयेऽभियुद्ध्यति ।
स पाञ्चजन्योऽच्युतवक्त्रवायुना भृशं सुपूर्णोदरनिस्सृतध्वनिः ।
गाण्डीवघोषे च तदाऽभिभूते युधिष्ठिरो भीतभीतस्तदैत्य ।
न श्रूयते गाण्डीवस्याद्य घोषः संश्रूयते पाञ्चजन्यस्य घोषः ।
इतीरितः सात्यकिरत्र विप्रान् सम्पूज्य वित्तैः परमाशिषश्च ।
भीमस्तु सेनामुखमाशु भित्त्वा प्रावेशयद् युयुधानं चमूं ताम् ।
बलं विवृद्धं च तदाऽस्य सात्यकेर्विप्राशीर्भिः कृष्णवरादपि स्म ।
तदा (ततो) विवृद्धोरुबलात् स सात्यकिः संस्थाप्य भीमं प्रययौ रथेन ।
तयोरभूद् युद्धमतीव दारुणं तत्राकरोत् तं विरथं स सात्यकिः ।
निवारयन्तं तमसह्यविक्रमं निहत्य बाणैः समरे स सात्यकिः ।
स पार्वतेयांश्च(स पार्वतीयांश्च) शिलाभिवर्षिणो निहत्य विद्राव्य च सर्वसैनिकान् ।
तयोरभूद् युद्धमतीव घोरं चिरं विचित्रं च महद् विभीषणम् ।
स सौमदत्तिर्भुवि सात्यकिं रणे निपात्य केशेषु च सम्प्रगृह्य ।
तद् वासुदेवस्तु निरीक्ष्य विश्वतश्चक्षुर्जगादाऽशु धनञ्जयं रणे ।
स तेन चोत्कृत्तसखड्गबाहुर्विनिन्द्य पार्थं निषसाद भूमौ ।
गतेऽसुरावेश उतातिभक्त्या ध्यायत्यमुष्मिन् गरुडध्वजं तम् ।
तदा स्वकीयं रथमेतदर्थं क्लृप्तं ददौ सात्यकये ससूतम् ।
तेनैव तीर्थं परमं चकार तथाऽश्वशालामपि बाणरूपाम् ।
युयोज कृष्णस्तुरगान् रथे पुनर्गतश्रमानुद्धृतसायकान् प्रभुः ।
शिनिप्रवीरे तु गते युधिष्ठिरः पुनश्च चिन्ताकुलितो बभूव ह ।
मया नियुक्तश्च गतः स सात्यकिर्भारं च तस्याधिकमेव मन्ये ।
इतीरितः प्राह वृकोदरस्तं न रक्षितं वासुदेवेन पार्थम् ।
अतो भयं नास्ति धनञ्जयस्य न सात्यकेश्चैव हरेः प्रसादात् ।
इतीरितः प्राह युधिष्ठिरस्तं न जीवमाने युधि मां घटोत्कचे ।
यदि प्रियं कर्तुमिहेच्छसि त्वं मम प्रयाह्याशु च पार्थसात्यकी ।
तथा हते चैव जयद्रथे मे कुरुष्व सञ्ज्ञामिति तेन भीमः ।
स चाऽह सेनापतिरत्र भीमं प्रयाहि तौ यत्र च केशवार्जुनौ ।
इति ब्रुवाणं (ब्रुवाणे) प्रणिधाय भीमः पुनः पुनस्तं नृपतिं गदाधरः ।
न्यवारयत् तं शरवर्षधारो द्रोणो वचश्चेदमुवाच भीमम् ।
स्वीया प्रतिज्ञाऽपि हि सैन्धवस्य गुप्तौ मया पार्थकृते विसृष्टा ।
इत्युक्तवाक्यः स गदां समाददे चिक्षेप तां द्रोणरथाय भीमः ।
अमार्दवे पश्य च यादृशं बलं ममेति तस्याऽशु विचूर्णितो रथः ।
द्रोणो गदामापततीं निरीक्ष्य त्ववप्लुतो लाघवतो धरातले ।
शरैस्तदीयैः परमास्त्रमन्त्रितैः प्रवृष्यमाणो जगदीरणात्मजः ।
मनोजवादेव तमाप्य भीमो रथं गृहीत्वाऽम्बर आक्षिपत् क्षणात् ।
सवाजिसूतः स रथः क्षितौ (पतद्विचूर्णितः)पतन् विचूर्णितोऽस्माद् गुरुरप्यवप्लुतः ।
द्रोणोऽपि दुर्योधनदत्तमन्यद् रथं समास्थाय युधिष्ठिरं ययौ ।
विदारितां द्रोणशरैः स्वसेनां संस्थाप्य(संस्थाप्य भीमो) भूयो द्रुपदात्मजः शरैः ।
तयोरभूद् युद्धमतीव रौद्रं जयैषिणोः पाण्डवधार्तराष्ट्रयोः ।
ततः प्रायाद् भीमसेनोऽमितौजा मृत्नञ्छरैः कौरवराजसेनाम् ।
हतेषु तेषु प्रवरेषु धन्विनां सत्यव्रतः पुरमित्रो जयश्च ।
स तैः पृषत्कैरवकीर्यमाणः शितान् विपाठान्(सितान् विपाटान्) युगपत् समाददे ।
स सिंहवत् क्षुद्रमृगान् समन्ततो विद्राप्य शत्रून् हृदिकात्मजं रणे ।
विजित्य हार्दिक्यमथाऽशु भीमो विद्रावयामास वरूथिनीं ताम् ।
दृष्ट्वैव कृष्णविजयौ परमप्रहृष्टस्ताभ्यां निरीक्षित उत प्रतिभाषितश्च ।
भीमस्य नानदत एव महास्वनेन विण्मूत्रशोणितमथो मृतिमापुरेके ।
हत्वा विकर्णमुत तत्र च चित्रसेनं सञ्चूर्णितं प्रविदधे (सञ्चूर्णितं च विदधे) रथमर्कसूनोः ।
आश्वास्य चैव सुचिरं पुनरेव भीमं युद्धाय याति धृतराष्ट्रसुतैस्तथाऽन्यैः ।
विकर्णचित्रसेनाद्या एवं वीरतमाः सुताः ।
निपेतुर्धृतराष्ट्रस्य रथेभ्यः पृथिवीतले ।
एकविंशतिवारं च व्यश्वसूतरथध्वजः ।
प्राणसंशयमापन्नः सर्वलोकस्य पश्यतः ।
द्वाविंशतिमयुद्धे तु रामदत्तं सुभास्वरम् ।
तद्दत्तमेव सङ्गृह्य तूणौ (तूणी) चाक्षयसायकौ ।
सुघोर आसीत् स तयोर्विमर्दो भीमस्य कर्णस्य च दीर्घकालम् ।
ततो भीमो महाबाहुः सहजाभ्यां च संयुतम् ।
इति ज्ञापयितुं तस्य कुण्डले कवचं तथा ।
एवं तान्यपकृष्याहं हन्यां त्वामिति वेदयन् ।
ततस्तु भीमस्य बभूव बुद्धिरस्पर्धिनः सर्वजयो हि दत्तः ।
तथाऽपि मे भगवानत्यनुग्रहाज्जयं ददात्यात्मवचो विहाय (वचोऽपहाय) ।
एवं स्मृत्वा तेन रन्ध्रे प्रदत्ते कर्णोऽस्त्रवीर्येण धनुर्न्यकृन्तत् ।
न मे रथाद्यैर्धनुषाऽपि कार्यमित्येव सञ्ज्ञापयितुं (स ख्यापयितुं) वृकोदरः ।
भीतस्तु(भीमस्तु) कर्णो रथकूबरे तदा व्यलीयताधः (व्यलीयतातः) स वृकोदरो रथात् ।
नैच्छद् गृहीतुं(ग्रहीतुं) विनिहन्तुमेव वा रथं धनुर्वाऽस्य रणेऽपहर्तुम् ।
सत्यां कर्तुं वासवेश्च प्रतिज्ञां सम्मानयन् वैष्णवत्वाच्च कर्णम् ।
ततः कर्णो दूरगतं वृकोदरं सम्मानयन्तं रामवाक्यं विजानन् ।
व्यसून् गजान् प्रक्षिपन्तं समेत्य संस्पृश्य चापेन वचश्च दुष्टम् ।
संश्रावयन्तं वचनानि रूक्षाण्यपाहनद् बाणवरैस्तदाऽर्जुनः(बाणगणैस्तदा) ।
कर्णो भीमे वासवीं नैव शक्तिं विमोक्तुमैच्छन्नैव बीभत्सुतोऽन्यान् ।
नारायणास्त्रं शिरसि प्रपातितं न यस्य लोमाप्यदहच्चिरस्थितम्(लोमाप्यदहरच्छिरःस्थितम्) ।
भीमः कर्णरथं प्राप्तः शक्तिं नाऽदातुमैच्छत ।
दिव्यं रथं धनुश्चैव कृष्णबुद्ध्योऽर्जुनो हरेत् ।
एकं हृतं चेदन्यत् स्यादिति मत्वा भयाकुलः ।
निश्चितो मरणायैव मृतिकाले तु तं रथम् ।
शक्तिं तु तद्रथगतां प्रसमीक्ष्य कृष्णः संस्थाप्य पार्थमपि सात्यकिमेव योद्धुम् ।
शिष्यं त्वशक्तमिह मे प्रतियोधनाय पार्थो ह्यदादिति स सात्यकिमीक्षमाणः ।
न केशवरथे कश्चित् स्थितो याति पराजयम् ।
शस्त्रसङ्ग्रहकाले तु कुमाराणां व्रतं भवेत् ।
तच्छत्रुवधरूपं च पूर्वासिद्धं च गूहितम् ।
अनुपद्रवाय (अनुपद्रवं च) लोकस्येत्यतो भीमो व्रतं त्विदम् ।
अनुपद्रवाय लोकस्य सुव्यञ्जच्श्मश्रुमण्डलः(सुव्यक्तश्मश्रुमण्डलः) ।
अर्जुनस्यापि गाण्डीवं देहीत्युक्तो(देहीत्युक्ते) निहन्म्यहम्(निहन्मितम्) ।
प्रतिज्ञां भीमसेनस्य ब्रुवतः फल्गुने(फाल्गुने) रहः ।
अतूबरोऽपि तेनासौ तस्मात् तूबर इत्यलम् ।
जानासि मत्प्रतिज्ञां त्वं त्वत्प्रतिज्ञामहं तथा ।
प्रतिज्ञातो वधश्चास्य त्वयाऽपि मदनुज्ञया ।
इत्युक्तो वासविः प्राह हन्तव्योऽयं मयैव हि ।
न त्वत्कृतं मत्कृतं स्याद् गुरुर्मम यतो भवान् ।
रूक्षा वाचः श्रावितोऽयं भीमः कृष्णस्य शृण्वतः ।
अतस्त्वां निहनिष्यामि त्वत्पुत्रं च तवाग्रतः ।
द्रौणिकर्णाभिगुप्तं तं नाशकद्धन्तुमर्जुनः ।
नचैनमशकत् तर्तुं यत्नवानपि फल्गुनः ।
तद् दृष्ट्वा भगवान् कृष्णो लोहितायति भास्करे ।
तमोव्याप्ते गगने सूर्यमस्तं गतं मत्वा द्रौणिपूर्वाः समस्ताः ।
तदा हरेराज्ञया शक्रसूनुश्चकर्त बाणेन जयद्रथस्य ।
नैतच्छिरः पातय भूतले त्वमितीरितः पाशुपतास्त्रतेजसा ।
इदं पितुस्तस्य करे निपात्यतां वरोऽस्य दत्तो हि पुराऽमुनाऽयम्(यत्) ।
इति स्म वध्यः स पिताऽपि(वध्योऽस्य पिताऽपि) तेनेत्युदीरिते तस्य सन्ध्याक्रियस्य ।
ततोऽभवत् तस्य शिरः सहस्रधा हरिश्च चक्रे तमसो लयं पुनः ।
भीमस्तदा शल्यसुयोधनादीन् कृपं च जित्वा व्यनदत् सुभैरवम् ।
अपूरयत् पाञ्चजन्यं च कृष्णो मुदा तदा देवदत्तं च पार्थः ।
ततो द्रौणिमुखां(द्रौणिमुखान्) सेनां सर्वां भीमोऽभ्यवर्तत।
शीर्णां सेनां प्रविविशुर्धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।
तत एकीकृताः सर्वे पाण्डवाः सहसोमकाः ।
विद्राप्यमाणं सैन्यं तं दृष्ट्वा दुर्योधनो नृपः ।
स भीमसेनं च धनञ्जयं च युधिष्ठिरं माद्रवतीसुतौ च ।
ते विव्यधुस्तं बहुभिः शिलीमुखैः(शिलीमुखान्) स ताननादृत्य चकर्त बाणैः ।
आदाय चापानि पराणि तेऽपि दुर्योधनं ववृषुः सायकौघैः ।
तं गाहमानं द्विषतां बहूनां मध्ये द्रोणद्रौणिकृपप्रधानाः ।
सुयोधनः कर्णमाह जहि भीममिमं युधि ।
दैवाज्जीवाम्यहं राजन् युध्यंस्तेनातिपीडितः ।
दुर्योधनो द्रोणमाह सैन्धवस्त्वदुपेक्षया ।
प्रतिज्ञा च परित्यक्ता पाण्डवस्नेहतस्त्वया ।
इतः परं नैव रणाद् रात्रावहनि वा क्वचित् ।
मत्पुत्रश्च त्वया वाच्यः पाञ्चालान् नैव शेषय (शेषयेत्, शेषयेः) ।
चमूं परेषामभ्यागाद् धृष्टद्युम्नस्तमाशु च ।
अक्षोहिण्यस्तु सप्तैव सेनयोरुभयोरपि ।
सौभद्रसात्यकिमुखैस्तन्मध्ये षोडशांशकः(षोडशांसकैः) ।
भीष्मद्रोणद्रौणिभिश्च द्वे समं निहते तदा ।
ततो रात्रौ पञ्चभिश्च पार्थाः षड्भिश्च कौरवाः ।
स कर्णपुरतो भीमो दुष्कर्णं कर्णमेव च ।
निरायुधोऽहमिति मां त्वमात्थ पुरुषं वचः ।
इति कर्णस्य तौ भीमः सञ्ज्ञया ज्ञापयन् भुवि ।
मुष्टिना त्वद्वधायाहं समर्थ इति किं वदे ।
केतुमांश्च पिता तस्य शक्रदेवः श्रुतायुधः ।
कर्णानुजान् ध्रुवाद्यांश्च बहून् जघ्ने स वै निशि ।
इति ज्ञापयितुं तां तु ज्ञात्वा भीमः क्षणात् तदा ।
यदि त्वया तदा मुक्ता शक्तिस्त्वां सा हनिष्यति ।
मुक्ता दक्षभुजे सा च(सोऽथ) विदार्य धरणीं तथा(तदा) ।
ततो भीमः पुनः स्वं तु रथमास्थाय चापभृत् ।
तं कर्णो वारयामास शरैः सन्नतपर्वभिः ।
स तद्गदाविघाताय स्थूणाकर्णास्त्रमासृजत् ।
भीमो गदां समादाय कर्णस्य रथमारुहत् ।
एवं त्वच्चूर्णने शक्तो मत्कामात् त्वं हि जीवसि ।
पुनः कर्णपुरः सेनां जघान बहुशो रणे ।
स तु तं विरथीकृत्य धनुः कण्ठेऽवसज्य च ।
न हन्तुमैच्छत् तं कर्णः पृथायै स्वं वचः स्मरन् ।
ततो द्रौणिर्विविधैर्बाणसङ्घैर्जघान पार्थस्य चमूं समन्ततः ।
दृष्ट्वा सेनां द्रौणिबलाभिभूतां तमाह्वयामास घटोत्कचो युधे(युधि) ।
इत्युक्त ऊचे न पिता मम त्वं सखा पितुर्यद्यपि शत्रुसंश्रयात् ।
इत्यूचिवाञ्छक्रधनुःप्रकाशं विष्फार्य चापं प्रकिरञ्छरौघान् ।
स रक्षसां लक्षसमावृतो बली नृभिश्च वीरैर्बहुभिः सुशिक्षितैः ।
स तेन बाणैर्बहुभिः सुपीडितो विभिन्नगात्रः क्षतजाप्लुताङ्गः(क्षतजाभिप्लुताङ्गः) ।
सोऽक्षौहिणीं तां(अक्षौहिणीं तां) क्षणमात्रतः क्षरन् महाशरांस्तानपि राक्षसान् क्षयम् ।
निरीक्ष्य सेनां स्वसुतं च पातितं घटोत्कचो द्रोणसुतं शरेण ।
उत्थाय बाणं यमदण्डकल्पं सन्धाय चापे प्रविकृष्य राक्षसे ।
विमूर्च्छितं सारथिरस्य दूरं निनाय युद्धाज्जगतो विपश्यतः ।
सञ्ज्ञामवाप्याथ घटोत्कचोऽपि क्रुद्धोऽविशत् कौरवसैन्यमाशु ।
तदैव पार्थं प्रति योद्धुमागतं वैकर्तनं वीक्ष्य जगत्पतिर्हरिः ।
स कर्णमाहूय युयोध तेन तस्यानु दुर्योधनपूर्वकाश्च ये ।
ते बाध्यमाना बहुशो बलीयसा कर्णं पुरोधाय तमभ्ययोधयन् ।
निवारयामास गुरोः सुतं तदा भीमस्त्रिगर्ताञ्छतमन्युनन्दनः ।
युद्ध्वा प्रगृह्यैनमथो निपात्य घटोत्कचो भूमितलेऽसिनाऽस्य ।
अलायुधोऽथाऽगमदुग्रवीर्यो नराशनस्तं स घटोत्कचोऽभ्ययात् ।
अथास्य शिर उद्धृत्य क्रोधाद् दुर्योधनोरसि ।
घटोत्कचबलख्यात्यै समर्थेनापि यो रणे ।
सर्वे सञ्चोदयामासुः(सम्बोधयामासुः) कर्णं शक्तिविमोक्षणे ।
एवं सञ्चोद्यमानः(सम्बोध्यमानः) स धार्तराष्ट्रैः पुनः पुनः ।
तामम्बरस्थाय घटोत्कचाय शैलोपमायातुलविक्रमाय ।
निर्भिण्णवक्षाः(निर्भिन्नवक्षाः) स तया पपात व्यचूर्णयञ्छत्रुबलं हतोऽपि ।
तदा ननर्त केशवः समाश्लिषच्च फल्गुनम् ।
तमपृच्छद् गुडाकेशः किमेतदिति दुर्मनाः ।
तमाह भगवान् कृष्णो दिष्ट्या जीवसि फल्गुन ।
ततो युधिष्ठिरो दुःखादमर्षाच्चाभ्यवर्तत ।
ययाऽर्जुनो निहन्तव्यस्तयाऽसौ राक्षसो हतः ।
भीमार्जुनाभ्यामिह हन्यमाने बले कुरूणामितरैश्च पाण्डवैः ।
दृष्ट्वैव तानाह धनञ्जयस्तदा स्वप्स्यन्तु यावच्छशिनः प्रकाशः ।
पुनश्च चन्द्रेऽभ्युदिते युधे ते समाययुः शस्त्रमहास्त्रवर्षाः ।
हतौ च तौ पेततुस्तेन भूमौ बाह्लीक एनं समरे त्वयोधयत् ।
चिच्छेद तं भीमसेनस्त्रिधैव तस्मै(तस्मिञ्छतघ्नीं) शतघ्नीं प्रजहार बाह्लिकः ।
बाह्लीकः प्रार्थयामास पूर्वं स्नेहपुरस्सरम् ।
इत्युक्त आह तं भीमो नितरां व्यथितस्तदा ।
हते बाह्लीके कौरवा भीमसेनमभ्याजग्मुः कर्णदुर्योधनाद्याः(कर्णसुयोधनाद्याः) ।
संशप्तकैरेव पार्थो युयोध तद् युद्धमासीदतिरौद्रमद्भुतम् ।
ततः सूर्यश्चाभ्युदितस्तदाऽतिघोरं द्रोणः कर्म युद्धे चकार ।
विद्रावितास्तेन महारथाश्च नैवाविन्दञ्छर्म बाणान्धकारे ।
रथार्बुदं तेन हतं च तत्र ततः सहस्रं(तथा सहस्रं) गुणितं नराणाम् ।
तथा विराटद्रुपदौ शराभ्यां निनाय लोकं परमाजिमध्ये ।
धृष्टद्युम्नो भीमसेनाभिगुप्तो द्रोणं हन्तुं यत्नमुच्चैश्चकार ।
धृष्टद्युम्नः सत्वरं खड्गचर्मणी आदाय तस्याऽरुरुहे रथोत्तमम् ।
स तैरतिव्यथितस्तद्रथाच्च परावृत्तः स्वं रथं चारुरोह ।
निवार्य शत्रुं स शरैर्ब्रह्मास्त्रमसृजद् द्विजः ।
भीमोऽर्जुनः सात्यकिश्च पर्यायेण गुरोः सुतम् ।
कर्णदुर्योधनादींश्च शल्यं भोजं कृपं तथा ।
तत्र भीमो गजानीकं जयत्सेनं च मागधम् ।
अथ मालवराजस्य त्वश्वत्थामाभिधं गजम् ।
अश्वत्थामवधं श्रुत्वा नाहं योत्स्य इति स्वयम् ।
ब्रूहि सत्यमिति प्राह सत्यमित्येव सोऽब्रवीत् ।
तस्य भीमो रथेषां(रथेषुं) च गृहीत्वा न तवेदृशम् ।
इत्याह खस्था मुनयश्चालमेहीति तं तदा ।
सन्यस्य कर्माणि तदाऽखिलानि योगारूढः परमं वासुदेवम् ।
धृष्टद्युम्नः पाण्डवैर्वार्यमाणोऽप्यगात् खड्गं चर्म चाऽदाय तत्र ।
सञ्छिन्ने द्रोणशिरसि गर्हयामास वासविः ।
धृष्टद्युम्नस्तु तावाह कथं भूरिश्रवा हतः ।
तदा जग्राह शैनेयं भीमः कृष्णप्रचोदितः ।
ते वासुदेवेन तदा सुशिक्षिताः (तदाऽनुशिक्षिताः) स्नेहं पुनः पूर्ववदापुरुत्तमम् ।
आश्रुत्य तातं निहतं प्रतिज्ञां चकार निःशेषरिपुप्रमाथने ।
युधिष्ठिरः प्राह विषण्णचेतनः शैनेयपूर्वाः प्रतियान्तु सर्वे ।
नमध्वमस्त्रस्य ततो विमोक्ष्यथेत्यथ प्रणेमुश्च धनञ्जयादिकाः ।
अदह्यमाने भीमेऽपि वह्नौ वह्निरिव स्थिते ।
न देहे पतितास्त्रस्य बहिर्वेष्टनतः फलम् ।
अमोघत्वं निजास्त्रस्य भीमस्यावध्यतामपि ।
वेष्टितं वारुणास्त्रेण प्रविष्टं बाह्यतस्तदा ।
तदस्त्रं नादहत् ताभ्यां स्वरथादवरोपिते ।
शुद्धक्षत्रियधर्मेषु निरतो यद् वृकोदरः ।
स्वधर्महानौ मित्राणां कर्तव्यं यन्निषेधनम् ।
नमस्कार्यमपि ह्यस्त्रं न नम्यं जीवनेच्छया ।
अस्त्राभिमानी वायुर्हि देवताऽस्य हरिः स्वयम् ।
मनसैवाऽदरं चक्रे भीमोऽस्त्रे च हरौ तदा ।
वासुदेवः स्वकीयास्त्रं भीमं चामोघमेव तु ।
पुनः प्रयोक्तुमस्त्रं तत् (प्रयोक्तमस्त्रं तं) धार्तराष्ट्रोऽभ्यचोदयत्(अभ्ययाचत) ।
आयान्तमीक्ष्यैव गुरोः सुतं तं धृष्टद्युम्नं सात्यकिरन्वयाद् रणे ।
भीमस्याभ्यागतस्याश्वान् द्रौणिर्व्यद्रावयद् रणे ।
ततोऽर्जुनस्तं प्रतियोद्धुमागमद् रुक्षा वाचः श्रावयन् क्रुद्धरूपः ।
अक्षोहिणी निहता चात्र सेना पार्थं सयानं हरिरुज्जहार ।
मा याहि साक्षाद् गिरिशः सुराणां कार्याय भूमौ बलवानजायथाः ।
तथोदितः प्रातरिति ब्रुवाणो ययौ प्रणम्याखिलवेदयोनिम् ।
पार्थाश्च सर्वे मुदिता जनार्दनं परं स्तुवन्तः शिबिराय जग्मुः ।
सप्तविंशोऽध्यायः
ओं ॥ अथानुज्ञामुपादाय द्रौणेर्दुर्योधनो नृपः ।
तत्राभवद् युद्धमतीव दारुणं पाण्डोः सुतानां धृतराष्ट्रजैर्गजे ।
तं कालयन्तं नृपतीन् क्षेमधूर्तिरभ्यागमत् तस्य गजं जघान च ।
निहत्य तं मारुतिरभ्यकृन्तच्छिरांसि यूनां परपक्षपातिनाम् ।
सङ्क्षोभ्यमाणं तदनीकमीक्ष्य द्रौणी रथेन प्रतिजग्मिवांस्तम् ।
दृष्ट्वैव तद् देवगन्धर्वविप्रा ऊचुर्नेदृग् दृष्टपूर्वं सुयुद्धम् ।
नैतादृशी ज्ञानसम्पद् बलं वा द्वयं कुतो वायुमृते शिवं तथा ।
इतीर्यमाणे विबुधैर्नरोत्तमौ दिशः समस्ता गगनं च पत्रिभिः ।
शरासने मारुतिना निराकृतो द्रौणिर्महास्त्राणि मुमोच तस्मिन् ।
पुनः शरैरेव परस्परं तावयुद्ध्यतां चित्रमलं च सुष्ठु ।
भीमश्च विह्वलतनुः स तु किञ्चिदेव पूर्वं गते गुरुसुते प्रययौ क्षणेन ।
तस्मिन् गजान् मर्दयति धार्तराष्ट्रो युधिष्ठिरम् ।
तत्र तं विरथं चक्रे सहसैव युधिष्ठिरः ।
दृष्ट्वा कृपस्तं स्वरथमारोप्यापययौ ततः ।
नकुलं विरथं कृत्वा कर्णोऽथ प्रपलायिनम्(प्रपलायितम्) ।
उक्त्वा च पुरुषा(उवाच परुषा) वाचः कुन्त्या वचनगौरवात् ।
विन्दानुविन्दावथ कैकयौ रणे समासदत् सात्यकिरुग्रविक्रमः ।
ताभ्यां निरुद्धः सहसा जहार तत्रानुविन्दस्य शिरोऽथ विन्दः ।
ततश्च चर्मासिधरौ प्रचेरतुः श्येनौ यथाऽकाशतले कृतश्रमौ ।
तत्रापहस्तेन शिरः सकुण्डलं जहार विन्दस्य मृधे स सात्यकिः ।
कृपमायान्तमीक्ष्यैव तपसां मां प्रपीडयेत् ।
कर्णं समन्तात् प्रतिकालयन्तं वरूथिनीमिन्द्रसुतः समभ्ययात् ।
पराजितः संयति सूर्यसूनुः सुतेन शक्रस्य स धार्तराष्ट्रम् ।
कामं रथो मे धनुरप्यभेद्यं दत्तं भृगूणामधिपेन दिव्यम् ।
इतीरिते सौत्यकृते स शल्यं प्रोवाच स क्रुद्ध इवाभवत् तदा ।
बुद्ध्या बलेन ज्ञानेन धैर्याद्यैरपि योऽधिकः ।
इत्यादिवाक्यैः संशान्त इव शल्योऽस्य सारथिः ।
गच्छन् युद्धाय दर्पेण प्राह यो मेऽर्जुनं पुमान् ।
इति ब्रुवन्तं बहुशः प्राह शल्यः प्रहस्य च ।
काकगोमायुधर्मा त्वं हंससिंहोपमं रणे ।
इत्युक्ते रविजो मद्रान् नितरां पर्यकुत्सयत् ।
कर्णोऽथ शल्यनियतेन रथेन पार्थसेनामवाप्य विदुधाव शरैः समन्तात् ।
तं भीमपार्षतशिनिप्रवराभिगुप्ता सा पाण्डवेयपृतनाऽभिववर्ष बाणैः ।
कृत्वा तमाशु विरथं धनुरस्य कण्ठे सज्यं निधाय परुषा गिर आह चोच्चैः ।
तं प्राणसंशयगतं नृपतिं निरीक्ष्य कर्णं जगाद युधि मद्रपतिः प्रदर्श्य ।
श्रुत्वाऽस्य वाक्यमतिहाय(वाक्यमपहाय) युधिष्ठिरं तं कर्णो ययौ नृपतिरक्षणतत्परोऽलम् ।
राजावनाय शिनिपुङ्गवपार्षतौ च सन्दिश्य कर्णमभिगच्छत आस रूपम् ।
वैकर्तनेन शरसञ्चयताडितः स बाणं च वज्रसदृशं प्रमुमोच तस्मिन् ।
निन्दां हरेस्तु(हरेश्च) विदधाति परोक्षगोऽपि(परोक्षतोऽपि) यस्तं प्रगृह्य करवाणि विजिह्वमेव ।
आयान्तमन्तिकममुं प्रसमीक्ष्य शल्यो नेत्याह हेतुभिरहो न मृषा प्रतिज्ञा ।
इत्युक्त्वा प्रमुखात्(इत्युक्त्वाऽभिमुखात्) तस्य रथेनैव तु मद्रराट् ।
जित्वा सूर्यसुतं भीमः कौरवाणामनीकिनीम् ।
अक्षोहिणीत्रयं तेन तदा विलुलितं क्षणात् ।
विमृद्य सकलां सेनां कृत्वा च विरथं नृपम् ।
तान् भग्नदर्पान् रणतोऽपयातानन्वेव बाणावृतमन्तरिक्षम् ।
क्षत्रियान् परधर्मस्थो मा हिंसीरिति चोदितः ।
संशप्तकैस्तत्र संयुद्ध्यमानं समाह्वयामास सुरेशसूनुम् ।
पार्थः संशप्तकगणैः संसृष्टः समरार्थिभिः ।
उभौ च तावस्त्रविदां प्रधानौ महाबलौ संयति जातदर्पौ ।
द्रौणिस्तदा स्यन्दनवाजिरोमस्वरोमकूपध्वजकार्मुकेभ्यः ।
तस्मिन् निबद्धे हरिरप्रमेयो विबोधयामास सुरेन्द्रसूनुम् ।
निवार्य तान्यस्त्रवरैर्गुरोः सुतश्चिच्छेद च ज्यां युधि गाण्डिवस्य ।
ततः शरेण कुपितः शितेन द्रौणिसारथेः ।
शरान् विसृजता तेन सारथ्यमपि कुर्वता ।
पुनरालिङ्ग्य कृष्णस्तमधाच्छत्रुविघातकम् ।
पुनस्तस्य तुतोद(नुनोद) ज्यां द्रौणिः सन्धाय तां पुनः ।
विरश्मयो हया द्रौणेः पुनः पार्थशराहताः ।
सारथित्वात् केशवस्य ध्वजस्थत्वाद्धनूमतः ।
अवध्यत्वात् तथाऽश्वानामभेद्यत्वाद् रथस्य च ।
एवं स मत्वा प्रविवेश सेनां पाण्डोः सुतानामथ तं समभ्ययात् ।
अष्टावष्टशतान्यूहुः(अष्टावष्टगवान्यूहुः) शकटानि यदायुधम् ।
अथ तं विरथं कृत्वा छित्वा कार्मुकमाहवे ।
अथ विद्रावयामास पृतनां पाण्डवीं शरैः ।
विद्राप्यमाणां पृतनां निरीक्ष्य गुरोः सुतेनाभ्यगमत् त्वरावान् ।
इत्युक्तो दर्शयामास पार्षतः खड्गमुत्तमम् ।
इत्युक्त्वा धनुरादाय ववर्ष च शरान् बहून् ।
स तत्र पार्षतं द्रौणिः क्षणेन विरथायुधम् ।
खड्गेन सोऽस्त्रैशस्त्रैरप्यनिर्भिन्नत्वचं तदा ।
आकृष्यमाणं पार्षतं दृष्ट्वा कृष्णप्रचोदितः ।
स ताभ्यां वज्रसमितैः(वज्रसन्निभैः) शरैरभिहतो भृशम् ।
जगाम च ततोऽन्यत्र पाञ्चाल्योऽपि रथं पुनः ।
तयोरासीत् सुतुमुलं युद्धमद्भुतदर्शनम् ।
अथ दुर्योधनो राजा माद्रेयावभ्ययाद् रथी ।
स्वयं युधिष्ठिरो राजा तदा तं समवारयत् ।
अथाऽगतं सूर्यसुतं पुनश्च जगाम भीमो रभसो(रभसा) रथेन ।
निवार्य कर्णं च शरैरमुष्य सूनोः सुषेणस्य शिरश्चकर्त ।
हतं तमीक्ष्यैव विकर्तनात्मजः क्रोधान्वितो भीमसेनं विहाय ।
न्यवारयेतां शिनिपौत्रपार्षतौ कृष्णासुताः सोमकसङ्घयुक्ताः ।
निहत्य सोऽश्वान् युधि धर्मसूनोर्निरायुधौ तौ च यमौ चकार ।
तदैव मोक्षाय नृपस्य भीमो दुर्योधनं विरथं संविधाय ।
शल्यस्तदा धर्मसुतं विहाय कर्णो ययौ तत्र युधिष्ठिरोऽपि ।
द्रौणिः कृपश्चात्र तदैव जग्मतुस्तदा भीमो द्रौणिकर्णौ जगाम ।
नृपं समादाय कृपेऽपयाते भीमार्दितौ द्रौणिकर्णौ शरौघैः ।
अथात्र राजानमचक्षमाणो धनञ्जयो वासुदेवप्रणुन्नः ।
न्यवारयत् समायान्तं कपिप्रवरकेतनम् ।
उभावतिरथौ तौ तु शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् ।
तत्र दुःशासनेनाऽजौ स्तम्भितो द्रुपदात्मजः ।
तदाऽभवद् युद्धमतीव दारुणं द्रौणेस्तनूजेन तु वज्रपाणेः ।
पार्थोऽथ कृष्णेधितबाहुवीर्यो(कृष्णैधितबाहुवीर्यो) निहत्य सूतं गुरुपुत्रकस्य ।
अतीत्य पुत्रं तु गुरोः समागते पार्थे कर्णो द्रावयामास सेनाम् ।
कर्णमायान्तमालोक्य द्रावयन्तं निजां चमूम् ।
तयोरासीन्महद् युद्धं चिरं सममविश्रमम् ।
निवारितः सात्यकिना रणे दुर्योधनो नृपः ।
तदन्तरैव कर्णोऽपि पार्षताश्वानपातयत्(अश्वानघातयत्) ।
बलं स्वकीयं बहुधा विभिन्नं(विभग्नं) समीक्ष्य भीमो मृगराजकेतुः ।
नादेन बाणैश्च वृकोदरेण भग्नं तदा कौरवसैन्यमाशु ।
दृष्ट्वैव तत् पाण्डवानां च सेना समावृत्ता क्षिप्रमवार्यविक्रमा (समागता क्षिप्रमवार्यवेगा) ।
हन्यमानं दिशो यातं (पाञ्चाल्यैः)पाञ्चालैर्भीमसंश्रयात् ।
सोऽमोघं रामदेवत्यमस्त्रं भार्गवसञ्ज्ञितम् ।
तदस्त्रं वर्जयामास भीमं रामप्रसादतः ।
न ह्यस्त्रं द्रवमाणांस्तद्धन्ति तेन सपार्षताः ।
पलायनेनोर्वरिता अर्जुनोऽप्यस्त्रमुद्यतम् ।
वासुदेवमिदं प्राह वर्जयित्वैव सूतजम् ।
इत्यूचिवांसं पार्थं तं कृष्णोऽप्राप्यैव सूतजम् ।
तत्रार्जुनोऽवदद् भीमं याहि द्रष्टुं युधिष्ठिरम् ।
इत्यूचिवांसं तमुवाच भीमो जानन् स्वबाह्वोर्बलमप्रमेयम् ।
त्यक्त्वा रणं नाहमितो व्रजेयं न मां वदेत् कश्चन युद्धभीतम् ।
ययौ युधिष्ठिरं द्रष्टुं शिबिरं सार्जुनो हरिः ।
अभिवाद्य हनिष्यामीत्युक्तः पार्थेन सा क्रुधा ।
अथवा भीम एवैनं निवृत्ते त्वयि पातयेत् ।
अहं हि सूतपुत्रेण क्लिष्टो मारुतितेजसा ।
तमाह गाण्डिवं दातुं यो वदेत् तद्वधो मया ।
सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् ।
धर्मस्य चरणं(धर्मस्याचरणं) श्रेयो धर्मज्ञानं तु दुष्करम्(सुदुष्करम्) ।
कौशिकाख्यो ब्राह्मणो हि लीनं ग्रामजनं क्वचित् ।
कश्चिद् व्याधो मृगं हत्वा मातापितृनिमित्ततः ।
तस्मात् सद्धारको धर्म इति कृत्वा विनिश्चयम् ।
त्वं नृशंसोऽकृतघ्नश्च निर्वीर्यः पुरुषंवदः ।
भीमो मां गर्हितुं योग्यो यो ह्यस्माकं सदा गतिः ।
इत्याद्युक्त्वाऽऽत्मनाशाय विकोशं चकृवानसिम् ।
मतिपूर्वं देहहानात्(देहनाशात्) पापं महदवाप्यते ।
अतो मा त्यज देहं तु कुरु चाऽत्मप्रशंसनम्(कुरुष्वात्मप्रशंसनम्) ।
गुरुनिन्दाऽऽत्मपूजा च न धर्माय भवेत् क्वचित् ।
तस्य लज्जां समुत्पाद्य नाशयित्वा च तं मदम् ।
इति भावं समुत्पाद्य दोषान् नाशयितुं हरिः ।
तत एवदविज्ञानात् कुपितो नृपतिर्भृशम् ।
तं वासुदेवः प्रतिगृह्य हेतुमुक्त्वा सर्वं शमयामास नेता ।
तौ भ्रातरौ वासुदेवप्रसादान्महापदो मुक्तिमाप्यातिहृष्टौ ।
ततः प्रणम्य बीभत्सुरग्रजं परिरम्भितः ।
तं शङ्कितं कर्णजये स्विन्नगात्रं हरिस्तदा ।
भीमस्तदा शत्रुबलं समस्तं विद्रावयामास जघान चाऽजौ ।
तदाऽऽसदत् तं शकुनिः ससैन्यो दुर्योधनस्यावरजैरुपेतः ।
न जघ्निवांस्तं सहदेवभागं प्रकल्पितं स्वेन तदाऽक्षगोष्ठ्या(तदाऽक्षगोष्ठ्याम्) ।
दुर्योधनस्यावरजा दशात्र प्रदुद्रुवुर्भीमसेनं विहाय ।
पुनश्च निघ्नन्तमरिप्रवीरान् विद्रावयन्तं च निजां वरूथिनीम् ।
तं रूक्षवाचो मुहुरर्पयन्तं विधाय भीमो विरथं क्षणेन ।
आक्रम्य कण्ठं च पदोदरेऽस्य निविश्य पश्यन् मुखमात्तरोषः(मुखमाप्तरोषः) ।
कृत्वाऽस्य वक्षस्युरुसत्तटाकं पपौ निकामं तृषितोऽमृतोपमम् ।
वाक्सायकांश्चास्य पुरा समर्पितान् संस्मारयामास पुनः पुनर्भृशम् ।
तथाऽपि शत्रुप्रतिभीषणाय पपाविवाऽस्वाद्य पुनःपुनर्भृशम् ।
‘यस्ते मन्यो'’ (ऋ.१०.८३.१) इत्यतो नारसिंहं सोमं तस्मै चाऽर्पयच्छोणिताख्यम्(प्रार्पयच्छोणिताख्यम्)।
उवाच वाचं पुरुषप्रवीरः सत्यां प्रतिज्ञां लोकमध्ये विधाय ।
पश्यन्तु चित्रां परमस्य शक्तिं ये वै तिलाः षण्ढतिला बभूवुः ।
इति ब्रुवाणः पुनरेव रक्तं पपौ सुधां देववरो यथा दिवि ।
प्रत्यनृत्यन् येऽस्मान् पुनर्गौरिति गौरिति ।
इति ब्रुवन् नृत्यमानोऽरिमध्य आस्फोटयञ्छत्रुगणानजोहवीत् ।
भयाच्च कर्णस्य पपात कार्मुकं निमीलयामास तदाऽक्षिणी च ।
द्रौणिर्विहायैनमपाजगाम(विहायैतमपाजगाम) दूरं तदा भीमसेनो जगाद ।
इति ब्रुवन् मृतमुत्सृज्य शत्रुं दुर्योधनं चाऽशु रुषाऽभिदुद्रुवे ।
बलद्वयं चापययौ विहाय भयाद् भीमं कृष्णपार्थौ विनैव ।
सङ्कल्प्य शत्रून् गोवदेवाऽजिमध्ये शार्दूलवत् तच्चरितं निशाम्य ।
यदा स रङ्गः पवमानसूनुना शून्यः कृतस्तत्र महूर्तमात्रात् ।
तान् मारुतिर्बाणवरैर्निकृत्तशीर्षान् यमायानयदाशु वीरः ।
कर्माण्यनन्यौपयिकानि(कर्माण्यनन्यौपधिकानि) भीमे कुर्वत्येवं (भीमभीते)भीतभीतेऽरिसङ्घे ।
माद्रीसुतो वृषसेनं शरौघैरवारयत् तं विरथं चकार ।
कर्णात्मजस्तस्य सञ्छिद्य चर्म भीमार्जुनादीनपि बाणसङ्घैः ।
एकेन बाणेन सुते हते स्वे वैकर्तनो वासविमभ्यधावत् ।
पक्षग्रहास्तत्र सुरासुरास्तयोरन्ये च जीवा गगनं समाश्रिताः ।
सुरासुराणां भीमदुर्योधनौ द्वौ समाश्रयौ तत्प्रियौ कर्णपार्थौ ।
इतीरिते वासवः पद्मयोनिं जगाद कृष्णो यत्र जयश्च तत्र ।
इत्यूचिवान् वासवः फल्गुनस्य जयोऽस्तु कर्णस्य वधस्तथेति ।
न कर्णार्जुनयोरर्थे विरोधं कुरुत क्वचित् ।
ववर्षतुस्तौ च महास्त्रशस्त्रैर्भीमो रथस्थोऽवरजं जुगोप ।
दुर्योधनो द्रौणिमुखाश्च कर्णं ररक्षुरावार्य तदाऽऽस युद्धम् ।
तदा नदन् भीमसेनो जगाद गदां समादाय समात्तरोषः ।
समृद्धवीर्यः स तदा धनञ्जयः सुयोधनद्रौणिकृपान् सभोजान् ।
ते किञ्चिद् दूरतस्थुः पश्यन्तो युद्धमुत्तमम् ।
दृष्टं हि भीमस्य बलं त्वयाऽद्य तथैव पार्थस्य यथा जिता वयम् ।
धनञ्जयस्तिष्ठति वारितो मया जनार्दनो नैव विरोधमिच्छति ।
हितार्थमेतत् तव वाक्यमीरितं गृहाण मे नैव भयादुदीरितम् ।
इतीरितः प्राह सुयोधनस्तं दुःशासनस्याद्य पपौ हि शोणितम् ।
इत्युक्तो द्रौणिरासीत् स तूष्णीं कर्णधनञ्जयौ ।
आग्नेयवारुणैन्द्रादीन्येतान्यन्योन्यमृत्यवे ।
क्रमेण वृद्धोरुबलेन तत्र सुरेन्द्रपुत्रेण विरोचनात्मजः ।
तं वासुदेवो रथमानमय्य मोघं चकारार्जुनतः किरीटम् ।
नमिते(नमितं) वासुदेवेन रथे पञ्चाङ्गुलं भुवि ।
भङ्क्त्वा किरीटं वियति गच्छति प्रभुणोदितः ।
ब्रह्मास्त्रस्यातिवेगित्वं प्राप्तं कर्णेन भार्गवात् ॥ १७८॥
पुनश्च पार्थेन महास्त्रयुद्धं प्रकुर्वतः सूर्यसुतस्य चक्रम् ।
उद्धर्तुकामो रथचक्रमेव पार्थं ययाचेऽवसरं प्रदातुम् ।
सत्येन धर्मेण च सन्नियोज्य मुमोच कर्णस्य वधाय बाणम् ।
अपराह्णेऽपराह्णस्य सूतजस्येन्द्रसूनुना ।
तस्मिन् हते दीनमुखः सुयोधनो ययौ समाहृत्य(समागत्य) बलं सशल्यः ।
शशंस कृष्णं च धनञ्जयं च भीमं च येऽन्येऽपि युधि प्रवीराः ।
अष्टाविंशोऽध्यायः
ओं ॥ प्रभातायां तु शर्वर्यां गुरुपुत्रानुमोदितः ।
तमभ्ययुः पाण्डवाश्च हृष्टा युद्धाय दंशिताः (दंसिताः) ।
अग्रे भीमः पाण्डवानां मध्ये राजा युधिष्ठिरः ।
चक्ररक्षौ यमौ राज्ञो धृष्टद्युम्नश्च सात्यकिः ।
मध्ये शल्यः पृष्ठतोऽभूद् भ्रातृभिश्च सुयोधनः ।
तत्रभवन्महद् युद्धं भीमस्य द्रौणिना सह ।
तत्र नातिप्रयत्नेन द्रौणिर्भीमेन सायकैः ।
आससाद तदा शल्यं कपिप्रवरकेतनः ।
रथमन्यं समास्थाय द्रौणिर्भीमं समभ्ययात् ।
तावुभौ शरवर्षेण वारयामास मारुतिः ।
दुर्योधनस्यावरजान् द्रौपदेया युयुत्सुना ।
सहदेवस्तु शकुनिमुलूकं नकुलस्तदा(तथा) ।
शल्यस्तु शरसङ्घातैः पार्थस्यावारयद् दिशः ।
ततः शरं वज्रनिभं मद्रराजः समाददे ।
उपलभ्य पुनः सञ्ज्ञां वासविः शत्रुतापनः ।
सोऽन्यत् कार्मुकमादाय मुमोचास्त्राणि फल्गुने ।
पुनर्न्यकृन्तत् तच्चापमिन्द्रसूनुरमर्षितः ।
प्राप्य सञ्ज्ञां पुनः पार्थः शल्यं विव्याध वक्षसि ।
समाश्वस्तः पुनर्बाणं यमदण्डनिभं(यमदण्डोपमं) रणे ।
तेन विह्वलितः पार्थो ध्वजयष्टिं समाश्रितः ।
तदाऽन्यं रथमास्थाय धर्मराजः शरोत्तमैः ।
शल्योऽन्यं रथमास्थाय सर्वांस्ताञ्छरवृष्टिभिः ।
निहत्याश्वान् सात्यकेश्च धृष्टद्युम्नस्य चाभिभूः ।
ततस्तु शल्यं समुदीर्यमाणं दृष्ट्वा रणे भीमसेनस्तरस्वी(भीमसेनस्तपस्वी) ।
आस्थाय चान्यं रथमापतन्तं पुनश्च शल्यं भृशमेव मर्मसु ।
आत्तान्यात्तान्यायुधान्यस्य भीमः सर्वाणि चिच्छेद बिभेद चास्य ।
तं भीमभिन्नमर्माणं विवर्माणं निरायुधम् ।
आत्मानमभिगच्छन्तं दृष्ट्वाऽन्यं रथमास्थितः ।
दिव्यास्त्रैरपि संयोज्य तां तदा धर्मनन्दनः ।
स भिन्नहृदयो भूमौ पपाताभिमुखो नृपम् ।
मद्रराजे हते वीरे सुशर्माऽर्जुनमभ्ययात् ।
दुर्योधनस्यावरजानवशिष्टान् वृकोदरः ।
उलूकं सहदेवोऽथ शकुनिं चातिपापिनम् ।
बहुशो विरथीकृत्य पीडयित्वा पुनःपुनः ।
शैनेयेन गृहीतोऽथ सञ्जयोऽनन्तशक्तिना ।
तेषामभूत् तस्य च घोररूपं युद्धं स बाणैर्बहुशोऽर्जुनं च ।
तं भीमसेनो विरथं चकार गजं समारुह्य पुनः समभ्ययात् ।
गजे च भीमेन शरैर्निपातिते समारुहद् वाजिवरं सुनिर्भयः ।
मुमोह तेनाभिहतः स सात्यकिर्यमावपि प्रासनिपीडितौ रथे ।
प्रासे निकृत्ते च वृकोदरेण विवाहनः सोऽपि(सोऽप ययौ) ययौ सुयोधनः ।
एवमक्षोहिणीषट्कं भीमेन निहतं रणे ।
अक्षौहिणीचतुष्कं च पार्थानां द्रौणिना हतम् ।
जयं लब्ध्वा तदत्सूच्चैः पाण्डवेषु महात्मसु ।
मन्त्रा दुर्वाससा दत्ता मृतसञ्जीवनप्रदाः ।
इति विद्याबलं तस्य ज्ञात्वा पाण्डुसुतास्ततः ।
तदा जलात् समुन्मज्ज्य त्रिभिर्द्रौणिपुरस्सरैः ।
दुर्योधनोऽविशत् तोयं दृष्ट्वा तं केशवाज्ञया ।
अमर्षितोऽसौ धृतराष्ट्रपुत्रः श्वसंस्तदा दण्डहतो यथाऽहिः ।
तमाह धर्मजो राजा यस्त्वं कृष्णे समागते ।
घातयित्वा सर्वपृथ्वीं भीष्मद्रोणमुखानपि ।
अहत्वा प्रतिगृह्णामि एहि युद्धे स्थिरो भव ।
इत्यादि रूक्षवचनं श्रुत्वा दुर्योधनो रुषा ।
उवाच एक एवाहमकिरीटो विवर्मकः ।
यद्येवमपि मे युद्धं भवद्भिर्मन्यसे समम् ।
इत्युक्त आह धर्मात्मा वर्माद्यं च ददामि ते ।
हत्वैकं त्वं भुङ्क्ष्व राज्यमन्ये याम वयं वनम् ।
इत्युक्त ऊचे नहि दुर्बलैरहं योत्स्ये चतुर्भिर्भवदर्जुनादिभिः ।
श्रुत्वाऽस्य वाक्यं रभसो(रभसा) वृकोदरो गदां तदाऽध्यर्द्धभराधिकां(तदध्यर्धभराधिकां) मुदा ।
अथाऽह नारायण आदिदेवो युधिष्ठिरं कष्टमिदं कृतं त्वया ।
स निश्चयाद् वश्चतुरो निहन्यात् सहार्जुनान् भीमसेनः कथञ्चित् ।
ऊरू भीमेन भेत्तव्यौ प्रतिज्ञां रक्षता रिपोः ।
अधर्म इति तत् कृष्णो लोकनिन्दानिवृत्तये ।
भीमो हन्याद् धार्तराष्ट्रमित्यूचे यद्यपि स्फुटम् ।
आह शिक्षामप्यनूनां यत्नं दुर्योधनेऽधिकम् ।
प्रतिज्ञापालनं धर्मो दुष्टेषु तु विशेषतः ।
नान्यस्ततो लोकनिन्दां व्यपनेतुमुभावपि ।
ततो भीमः सर्वलोकस्य धर्मं प्रकाशयन् वाक्यमिदं जगाद ।
इत्युक्तवन्तं(इति ब्रुवन्तं) प्रससार चाऽजौ दुर्योधनस्तत्र बभूव युद्धम् ।
दर्शयन्तौ गदामार्गं चित्रं तौ प्रविचेरतुः (चित्रं परिविचेरतुः)।
वारितावपि तेनोभौ नैव युद्धं प्रमुञ्चताम्(व्यमुञ्चताम्) ।
ततो(तत्र) भीमं वञ्चयितुं धार्तराष्ट्रः शिरः क्षितौ ।
प्रतिज्ञापालनार्थाय नाभेर्नोपर्यधस्तदा ।
नाधस्तान्मध्य एवासौ निजघ्ने तं वृकोदरः ।
कृष्णं द्यूते निधेहीति यदवादीत्(यदवादि) सुयोधनः ।
तेषां पुण्यानि विद्याश्च समादायैव सर्वशः ।
स्मारयामास कर्माणि यानि तस्य कृतानि च ।
पुनःपुनश्च तद् वीक्ष्य चुक्रोध मुसलायुधः ।
पुनः क्रोधाभिताम्राक्ष(क्रोधातिताम्राक्षः) आदाय मुसलं हलम् ।
अभये संस्थिते भीमे रामं जग्राह केशवः ।
न मण्डलेऽभिसारे वा नापसारे च नाभितः ।
कृता प्रतिज्ञा च वृकोदरेण भेत्स्ये तवोरू इति युक्तिपूर्वम्(पूर्वकम्) ।
वासुदेववचः श्रुत्वा धर्मच्छलमिति ब्रुवन् ।
तस्मिन् गते वासुदेवं समपृच्छद् युधिष्ठिरः ।
न साक्षाद् धर्मतो वध्या ये तु पापतमा नराः ।
भीष्मद्रोणौ च कर्णश्च यदैवोपधिना(यथैवोपाधिना) हताः ।
प्रतिज्ञापालनायापि विभेदोरू वृकोदरः ।
लोकतोऽपि न धर्मस्य हानिरत्र कथञ्चन ।
अवध्यत्वे शिववराद् गदाशिक्षाबलादपि ।
तस्मात् सद्धर्म एवायं भीमचीर्ण इति ब्रुवन् ।
भूभारक्षतिजो धर्मो मच्छुश्रूषात्मकश्च यः ।
स्वेनैव बलभद्राय जनाय च पुनःपुनः ।
मुख्यं धर्मं(मुख्यधर्मं) हि भगवान् बलायाऽह जनाय च ।
पुनःपुनर्धर्मत एव भीमो जघान राजानमिति ब्रुवन्तम् ।
इत्यूचिवांसं प्रजगाद कृष्णो न त्वत्समः पापतमः कदाचित् ।
न पाण्डवेष्वस्ति ततो हि किञ्चित् पापं प्रयत्नाच्च निसर्गतोऽपि ।
निसर्गतः पापतमस्त्वमन्यान् धर्मस्थितान् पापपथे निधाय ।
इति ब्रुवन्तं पुनराह कृष्णं दुर्योधनः पापकृतां प्रधानः ।
इष्टं च यज्ञैश्चरितं च पूर्तैः पदं रिपूणां निहितं च मूर्ध्नि(मूर्धनि) ।
इष्टा भोगा मया भुक्ताः प्राप्ता च परमा गतिः ।
चन्द्रसूर्यनिभैः(चन्द्रार्कसन्निभैः) शूरैर्धार्मिकैः सद्भिरुज्झिता ।
इत्युक्तवत्येव नृपे सुरेशैः प्रसूनवृष्टिर्विहिता पपात ।
सम्भावयत आत्मानं वासुदेवं विनिन्दतः ।
यदैकैकमलं तत्र दुःखाधिक्यं समुच्चयात् ।
नृशंसस्य कृतघ्नस्य गुणवद्द्वेषिणः सदा ।
वदन् पुनःपुनरिदं धर्मतो हत इत्यपि ।
प्रख्यापिते वासुदेवेन धर्मे सतां सर्वेषां हृद्यमासीत् समस्तम् ।
युधिष्ठिरोऽपापदर्शी (अपायदर्शी) सदैव ससंशयोऽभूत् सुमनोऽभिवृष्ट्या ।
ततः कृष्णः पाण्डुपाञ्चालकैस्तैर्भृशं नदद्भिर्हृषितैः समेतः ।
ततः श्रुत्वा सञ्जयाद् दुःखतप्तं सम्बोधयिष्यन् पितरं युयुत्सुः ।
धर्मयुक्तैश्च तत्त्वार्थैर्लोकवृत्तानुदर्शकैः ।
कालानुसारतो दैवांश्चोपसंहर्तुमच्युतः ।
तदैव हार्दिक्यकृपान्वितोऽयात् सुयोधनं द्रौणिरमुं शयानम् ।
स दुःखशोकाभिहतो विनिन्द्य पार्थान् मया भूप किमत्र कार्यम् ।
उच्छिद्य सन्ततिं पाण्डोः कृत्वा स्वक्षेत्रसन्ततिम् ।
स कृष्णभीमपार्थानां भयादेव पुनर्वनम् ।
तस्य चिन्तयतो द्रोणवधं दुर्योधनस्य च ।
हतान् सुबहुसाहस्रानेकेनातिबलेन तु ।
निदर्शनेन ह्येतेन(ह्येनेन) प्रेरितः परमात्मना ।
निवारितोऽपि ताभ्यां स प्राद्रवच्छिबिरं प्रति ।
उग्ररूपधरं रुद्रं स्वकीयां तनुमेव सः ।
दृष्ट्वैव वासुदेवं तमत्रसद् गौतमीसुतः ।
अयुद्ध्यदग्रसच्चाऽशु द्रौणेः सर्वायुधान्यपि ।
अतस्तया प्रेरितेन स्वात्मनैवाखिलेष्वपि ।
यज्ञतुष्टेन(यज्ञे तुष्टेन) हरिणा प्रेरितः शङ्करः स्वयम् ।
उवाच चाहमादिष्टो विष्णुना प्रभविष्णुना ।
तदिच्छयैव निर्दिष्टो दास्ये मार्गं तवाद्य च ।
इत्युदीर्य प्रदायाऽशु सर्वा हेतीर्वृषध्वजः ।
ये निर्यास्यन्ति शिबिराज्जहितं तांस्तु सर्वशः ।
पारावताश्वं स तदा शयानमुपेत्य पद्भ्यां समताडयच्च ।
समुत्थितं मां जहि शस्त्रपाणिं शस्त्रेण वीरोऽसि स वीरधर्मः ।
न सन्ति हि ब्रह्महणां सुलोका विशेषतश्चैव गुरुद्रुहां पुनः ।
अवश्यं भाविनं(अवश्यभाविनं) मृत्युं धृष्टद्युम्नो विचिन्त्य तम् ।
द्रौणिं च कालरात्रिं च द्रोणपातादनन्तरम् ।
समाक्षिपद् द्रोणसुतोऽस्य कण्ठे निबद्ध्य मौर्वीं धनुषोप्युरस्थः ।
ततः शिखण्डिनं हत्वा युधामन्यूत्तमोजसौ ।
तैरुत्थितैरस्यमानः शरैः खड्गेन जघ्निवान् ।
तं तदाऽन्तर्हितः(अन्तर्हितं) शर्वः कैलासमनयत् क्षणात् ।
पुराऽर्थितः स्वदौहित्रस्यामरत्वाय शङ्करः ।
वासुदेवमतं ज्ञात्वा साम्राज्याय परीक्षितः ।
सामान्यतोऽपाण्डवाय द्रौणिनाऽप्यभिसन्धितम् ।
अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैनं न जघानैक्यतस्तयोः ।
स चेदिपाञ्चालकरूशकाशीनन्यांश्च सर्वान् विनिहत्य वीरः ।
जीजीविषूंस्तत्र पलायमानान् द्वारि स्थितौ गौतमः सात्वतश्च ।
खड्गेन प्रहृतं दृष्ट्वा हार्दिक्येन पपात ह ।
तस्या अकथयत् सर्वं सा भीमायाऽह दुःखिता ।
तदन्तरे द्रौणिरपि प्रयातः कृष्णासुतानां मुदितः शिरांसि ।
दृष्ट्वा तदुक्तं च निशम्य पापस्तुष्टोऽत्यजत् साध्विति देहमाशु ।
तत्रैकलं द्रोणसुतं रथेन यान्तं रथी मारुतिरन्वधावत् ।
आद्रवन्तं पुनर्दृष्ट्वा भीमं द्रोणात्मजो रुषा ।
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो धर्मजेनार्जुनेन च ।
विष्णुनैवोभयं यस्मात् कृतं (क्लृप्तं) भीमोऽस्त्रमेव तत् ।
ऊचे च पार्थयोः कृष्णो यत् कृतं द्रौणिना पुरा ।
पृष्टेनोक्तं त्वया हीनां कृत्वा दुर्योधनाय गाम् ।
तदस्त्रं प्रज्वलद् दृष्ट्वाऽपाण्डवत्वविधित्सया ।
स्वस्त्यस्तु द्रोणपुत्राय भूतेभ्यो मह्यमेव च ।
अनस्त्रज्ञेषु मुक्तं तद्धन्यादस्त्रमुचं यतः ।
तदाऽस्त्रयोस्तु संयोगे भूतानां संहृतिर्भवेत् ।
तथाऽप्यस्त्रद्वयं युक्तं भूतानां नाशकृद् ध्रुवम् ।
संस्थाप्यास्त्रद्वयं दूरे तावाह पुरुषोत्तमः ।
इत्युक्ते फल्गुनः प्राह मया मुक्तं महापदि ।
द्रौणिरप्येवमेवाऽह तौ वेदपतिरब्रवीत् ।
क्षत्रतेजा ब्रह्मचारी कौमारादपि पाण्डवः ।
निवर्तनासमर्थस्त्वं देहि नैसर्गिकं मणिम् ।
इत्युक्तो मूर्धजं रत्नं जरामरणनाशनम् ।
उत्कृत्य भीमाय ददौ मुक्ताः पञ्चैव पाण्डवाः ।
तात मुक्तं द्रौणिनाऽपि त्वमेवास्त्रं निवर्तय ।
यादवेशोऽथ गौतम्याः सुतमाहैकसन्ततेः ।
पक्षपातादिच्छसि त्वं भागिनेयस्य सन्ततिम् ।
वासुदेवः पुनः प्राह यदि हन्तव्य एव ते ।
अभिमन्योर्मृतस्यैव देहे पातय मानद ।
पातये गर्भ एवाहमित्यूचे गौतमीसुतः ।
दुर्मते पश्य मे वीर्यं यत् ते शक्यं कुरुष्व तत् ।
सन्ततिर्वर्षसाहस्रं पाण्डवानां भवेद् भुवि ।
जानामि ते मतिं दुष्टां जिघांसोः पार्थसन्ततिम् ।
मदाज्ञया सा विफला भवित्री वाञ्छा मुमुक्षा विमुखस्य(मुमुक्षोर्विमुखस्य) विष्णोः ।
दुर्गन्धयुक्तो व्रणसञ्चिताङ्गः सदा चरः स्या विपिनेषु मन्दः ।
रूपद्वयेनापि हरेस्तथोक्तो जगाद कालीतनयं स कृष्णम् ।
इत्युक्त ओमिति प्राह भगवान् बादरायणः ।
स्वप्ने हि द्रौपदेयानां वधो दृष्टोऽत्मना निशि ।
निबध्याऽनयनं चैव तेनैव शिबिरं प्रति ।
इत्यादि स्वप्नदृष्टं यत् प्रायः सत्यमभूदिति ।
स कृष्णोक्तमपि प्राप्य बादरायणशिष्यताम् ।
ततः सप्तर्षिर्भूत्वा पाराशर्यप्रसादतः ।
कृपोऽथ पाण्डवान् प्राप्य गौरवात् पूजितश्च तैः ।
बादरायणशिष्यत्वं पुनः प्राप्य भजन्नमुम् ।
कृष्णायै तं मणिं(तन्मणिं) दत्वा भीमस्तां पर्यसान्त्वयत् ।
राजार्हे हि मणौ दत्ते मह्यं भीमेन लौकिकाः ।
मणिं राज्ञे ददौ कृष्णा भर्तृप्रियहिते रता ।
वेदेश्वरेणापि यदूत्तमेन कृष्णेन युक्तास्तत आशु पार्थाः ।
युधिष्ठिरस्यानु विचित्रवीर्यसुतस्य पादावभिवन्दमानम् ।
भीमाकृतिं तां स सुयोधनेन कारापितामभ्यसने गदायाः ।
तमाह कृष्णो न हतोऽद्य भीमो नच त्वयाऽन्यैरपि शक्यतेऽसौ ।
स्वबुद्धिदोषादतिपापशीलपुत्राख्यपापानि विवर्द्धयित्वा ।
इत्युक्ते शान्तबुद्ध्यैव राज्ञाऽऽहूतो वृकोदरः ।
वज्राच्च दृढदेहत्वादविकारे वृकोदरे ।
कुलनाशकरः पापः शापयोग्यस्तव ह्यहम् ।
ददर्श धर्मराजस्य पटान्तेन(पट्टान्तेन) प्रकोपिता ।
वन्दमानं पुनर्भीममाह सा क्रोधविह्वला ।
इत्युक्तेऽस्याः (इत्युक्तोऽस्याः) शमयितुं क्रोधमग्रे वृकोदरः ।
इत्युक्त्वा तां पुनः प्राह प्रतिज्ञाहानिमन्तरा ।
यथाप्रतिज्ञं भ्रातृव्यान् रणे मम निजघ्नुषः ।
‘पापा न शुद्धधर्मेण हन्तव्या’ इति च श्रुतिः ।
निकृत्या निकृतिं हन्यान्निकृत्या नैव धार्मिकान्(धार्मिकम्) ।
इत्युक्ता तं पुनः प्राह कथं ते नरशोणितम् ।
दन्तान्तरं न मे प्राप शोणितं तत् सुतस्य ते ।
भीषणाय च शत्रूणां पीतवच्च प्रदर्शितम् ।
इत्युक्तोवाच नैवान्धद्वयस्यास्य वृकोदर ।
तामाह भीमः पापिष्ठा वधयोग्यापराधिनः ।
सर्वैः समेतैः कृष्णस्य बन्धनाय विनिश्चितम्(विनिश्चतः) ।
वासुदेवं सभासंस्थं ब्रुवाणं धर्मसंहितम्(धर्मसंहिताम्) ।
नैकोऽप्यनपराधी मे स्वयं ताननुशिक्षितुम् ।
इत्युक्ता साऽभवत् तूष्णीं क्रमात् सर्वैश्च पाण्डवैः ।
तस्या याश्च स्नुषाः सर्वास्ताभिः सह पुरस्कृताम् ।
पाण्डवाः प्रधनस्थानं सभार्याः पृथया सह ।
जानन् पाण्डवरक्षार्थं चिकीर्षुस्तत्तपोव्ययम् ।
तेन दृष्ट्वा प्रेतदेहान् सर्वांस्तत्र समाकुला(समाकुलान्) ।
इत्युक्तो भगवान् कृष्णः स्वचिकीर्षितमेव तत् ।
तेन तस्यास्तपो नष्टं हीना साऽतो हि भर्तृतः ।
तत आश्लिष्य भर्तॄणां देहान् प्ररुदतीः स्त्रियः ।
ततो देहान् प्रसिद्धानां पार्थाः समदहन् सताम् ।
स्नेहान्नृपो यमौ च स्वान् नाऽजौ तस्मिन् न्ययोजयन् (ह्ययोजयन्) ।
ततो ददत्सु पानीयं गङ्गायां स्वजनस्य तु ।
ततो हाहेति विलपन् राजा परमदुःखितः ।
हा मातस्तव धृत्यैव वयं सर्वे भृशं हताः ।
एवं वदन्तं कौन्तेयं वासुदेवः सनारदः ।
ततस्ते प्रेतकार्याणि चक्रुः सर्वेऽपि सर्वशः ।
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
ओं ॥ यदैव कृष्णौ सकलाधिराज्ये युधिष्ठिरं यौवराज्ये च भीमम् ।
तदैव चार्वाक इति प्रसिद्धं रक्षस्त्रिदण्डी यतिरेव भूत्वा ।
श्रुत्वैव तद् दुःखितमाशु धर्मजं दृष्ट्वा विप्राः शेपुरमुं भृशार्ताः ।
भस्मीकृतेऽस्मिन् यतिवेषधारिणि युधिष्ठिरं दुःखितं वृष्णिसिंहः ।
रक्षोऽधमोऽयं निहतोऽद्य विप्रैस्तमा शुचः कृतकार्योऽसि राजन् ।
असान्त्वयच्च बान्धवान् स्वपौरसंश्रयादिकान् ।
स भीष्मद्रोणकर्णानां वधाद् दुर्योधनस्य च ।
सोऽनुजैः कृष्णया विप्रैरप्युक्तो धर्मशासनम्(धर्मसाधनम्) ।
तस्मिन् क्रुद्धे नृपं प्राहुर्विप्रास्त्वत्तोऽपि तत्त्ववित् ।
मत्स्नेहादेव सर्वेऽपि धर्मोऽयमिति वादिनः ।
नातिनिश्चितबुद्धिं तं तदाऽपि पुरुषोत्तमौ ।
स ताभ्यां भ्रातृभिश्चैव मुनिभिश्च समन्वितः ।
पृच्छेत्युक्तः स भीष्मेण पप्रच्छाखिलमञ्जसा ।
भीष्मो ह्याह हरिं पार्था बोधनीयास्त्वयैव हि ।
इत्युक्तो भगवानाह त्वत्कीर्त्यै त्वयि संस्थितः ।
राज्ञः प्रथमतो धर्मो भगवद्धर्मपालनम् ।
पूर्णाशेषगुणो विष्णुः स्वतन्त्रश्चैक एव तु ।
देवताक्रमविज्ञानमपूजाऽन्यस्य वै हरेः ।
वृथा कर्माकृतिः क्वापि निराशीस्त्वं सदैव च(सदैव तु) ।
प्रियं विष्णोस्तदीयानामपि सर्वं समाचरेत् ।
साम्ये विरोधे च बहूननुवर्तेत वैष्णवान् ।
तत्त्वविज्ञापनं धर्मो विप्रस्य तु विशेषतः ।
न चार्थदण्डः कर्तव्यो विप्रवैश्यादिभिः क्वचित् ।
यथालब्धेन वर्तेत भिक्षया वा द्विजोत्तमः ।
महापदि विशां धर्मैः क्षत्रियः सुरविप्रयोः ।
विरोधिनः क्षत्रियाच्च प्रसह्यैव हरेद् धनम् ।
कृषिवाणिज्यगोरक्षाकुसीदं वैश्यजीवनम् ।
हरिभक्तावनुच्चस्तु वर्णोच्चो नातिपूज्यते ।
ज्ञापनं क्षत्रियाणां च धर्मो विप्राभ्यनुज्ञया ।
वर्णेष्वज्ञेष्ववर्णस्तु न ज्ञानी स्यात् कथञ्चन ।
ज्ञेयं सर्वं त्रिवर्णस्थः स्त्रीभिर्वेदान् विनाऽखिलम् ।
धर्मो गुणोत्तमानां तु स्मृत्यैवान्धं तमो व्रजेत् ।
वेदा अप्युत्तमस्त्रीभिः कृष्णाद्याभिरिवाखिलाः
उत्तमा इति विज्ञेयास्तच्छूद्रैरप्यवैदिकम् ।
सर्वथाऽन्धं तमो याति वरं सदृशमेव वा(सदृशमेव च) ।
ब्रह्मेशानादिकमपि भेदं यो वा न मन्यते ।
प्राकृतं देहमथवा(देहमथ वा) दुःखाज्ञानश्रमादिकम् ।
मनोवाक्तनुभिर्यो वा तस्मिन्स्तद्भक्त एव वा ।
अन्याधीनत्वविच्चास्य सर्वपूर्त्यविदेव च ।
तत्त्वे संशययुक्ता ये सर्वे ते निरयोपगाः ।
यावद् दोषक्षयश्चोर्ध्वा गतिः(दोषक्षयश्चोर्ध्वगतिः) क्रमश एव तु ।
भक्तिज्ञानोन्नतावेव स्वर्गश्च शुभकर्मणः ।
इत्यादि धर्मसर्वस्वं भीष्मस्थेनैव विष्णुना ।
आह क्षत्ता धर्ममेव सारमर्थं च मध्यमम् ।
सारं स द्विविधो ज्ञेयो दैवो मानुष एव च ।
मध्यमो धर्म एवात्र साध्यं साधनमेव च ।
मानुषोऽर्थोऽपि विद्यायाः कारणं सुप्रयोजितः ।
धर्मार्थतां विनाऽप्यर्थैस्तुष्येयुर्गुरुदेवताः ।
गुरुताऽर्थगतैव स्यात् कामोऽधस्ताद्धि निष्फलः ।
अथाऽह भीमः प्रवरः सुतत्त्वदृशां समस्तानभिभाष्य हर्षात् ।
काम्यं हि कामाभिधमाहुरार्याः काम्याः पुमर्थाः सह साधनैर्यत् ।
विज्ञानभक्त्यादिकमप्यतीव सत्साधनं कामबहिष्कृतं चेत् ।
परात्परोऽप्यादिपुमान् हरिश्च स्वस्येतरेषामपि काम्य एव ।
इच्छैव कामोऽस्तु तथाऽपि नैतामृते हि चित्त्वं घटकुड्यवत् स्यात् ।
न प्रश्नयोग्यः पृथगेव कामस्तेनैष राजन् यदि तारतम्यम् ।
तस्मात् स्वबुद्धिप्रमदाभिरेव(सुबुद्धिप्रमदाभिरेव) कामं रमेथा अनुरूपकामः ।
प्राज्ञः सुहृच्चन्दनसारलिप्तो विचित्रमाल्याभरणैरुपेतः ।
प्रशस्य भीममन्यांश्च राजा मोक्षमथास्तुवत् ।
त्रिंशोऽध्यायः
ओं ॥ अथ कृष्णमनुस्मृत्य भीष्मे स्वां वसुतां गते ।
आश्वासितश्च कृष्णाभ्यां धर्मजो दुःखितः पुनः ।
अपापे पापशङ्कित्वादश्वमेधैर्यजाच्युतम् ।
इत्युक्तः स तथा चक्रे त्यक्त्वा भोगांश्च कृत्स्नशः ।
ददौ देयानि मुख्यानि यथाकाममखण्डितम् ।
प्रष्टा च दाताऽखिलराजनम्यो यष्टा च धर्मात्मज एव तत्र ।
भीमस्तु दौर्योधनमेव सद्म प्रपेदिवानूर्जितवीर्यलब्धम् ।
कृष्णा च पार्थांश्चतुरो विहाय सुव्यक्तसारस्वतशुद्धभावा ।
प्रीत्यैव विज्ञानयुजाऽन्यपार्थैः संवादतः परिहृता गतभाविकाले ।
रराज राजावरजस्तया स द्विरूपया सोमककाशिजातया ।
सर्वोत्तुङ्गो नामतः प्राणवायोरंशो निशायां गुरुपुत्रसूदितः ।
अन्याश्चाऽसुर्वासुदेव्यो दिशो या आपश्च पूर्वं विंशतिरग्र्यरूपाः ।
ररक्ष धर्मानखिलान् हरेः स निधाय विप्राननुशास्य युक्तान् ।
दधार दण्डं तदवर्तिषु स्वयं जग्राह चान्वेव मुदाऽथ तद्गतान् ।
नावैष्णवः कश्चिदभूत् कुतश्चिन्नैवान्यनिष्ठो नच धर्महन्ता ।
वासिष्ठवृष्णिप्रवरौ प्रपश्यतां ताभ्यां च भीमेन मुनीश्वरैश्च ।
शुभं महत् स्वल्पफलं कृते हि विपर्ययेणाशुभमेषु दोषः ।
धनञ्जयः प्रोद्यतदण्ड आसीत् सदाऽन्यचक्रेषु निजाग्रजेरितः ।
सदैव कृष्णस्य मुखारविन्दाद् विनिस्सृतं तत्त्वविनिर्णयामृतम् ।
दुःशासनस्याऽवसथं(अवसथे) सुभद्राचित्राङ्गदासहितोऽध्यावसंश्च ।
समस्तभृत्याश्रितवेतनानां माद्रेय आसीत् प्रथमः प्रदाता ।
सन्धानभेदानुगतप्रवृत्तिस्तिष्ठंश्च दुर्मर्षणशुभ्रसद्मनि ।
सेनापतिः कृप आसीद् युयुत्सुः ससञ्जयो विदुरश्चाऽम्बिकेयम् ।
द्विरूपकृष्णप्रहितेषु पाण्डुषु क्षितिं प्रशासत्सु न कश्चनाऽतुरः ।
शब्दादयश्चाऽसुरतीव हृद्या निकामवर्षी च सुरेश्वरोऽभूत् ।
पृथ्वी च गावः ससरस्वतीका निकामदोहा अभवन् सदैव ।
कृष्णाश्रयात् सर्वमिदं वशे ते विधाय सम्यक् परिपालयन्तः ।
समुज्ज्वला पाण्डवकीर्तिनारी पदं (विधाय)विधायासुरपक्षमूर्धसु(मूर्धनि) ।
पातालपादां पृथिवीनितम्बामाकाशमध्यां करसन्तताशाम् ।
विकुण्ठनाथाभयहस्तमादरान् मूर्ध्ना वहन्तीं(मूर्ध्नाऽऽवहन्तीं) वरभारताख्याम् ।
प्रपालयत्स्वेव धरां सकृष्णेष्वद्धैव पार्थेषु कलिर्बलिश्च ।
नृपेण कृष्णेन च साधु चोदितो भीमस्तदा तौ सगणौ विजित्य ।
पप्रच्छ तं कृष्णपुरो युधिष्ठिर उदारधीः ।
इत्युक्त आह कालोऽयं दुर्योधननिपातनम् ।
तमाह राजा राज्ञां हि बलाद् राज्यं प्रवर्तते ।
कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् ।
तमुवाच कलिः काले मदीये त्वादृशः कुतः ।
वासुदेवसहायेषु तेजो युष्मासु मे नहि ।
मदीयकाले भूपाल विप्रदेव(वेद)विरोधिनि ।
जगाद नृपतिः सत्यं कले वक्ष्यनृतोऽपि सन् ।
सीमाधिर्बहुवाक्यं च तुलामाने च मे करः ।
तमाह भगवान् कृष्णो यावत् पाण्डवसन्ततिः ।
पाण्डवेभ्यः परं यावत् क्षेमकः क्रमवर्द्धिता ।
न द्रष्टव्यं भूतलं ते कुत एव स्पृशेर्भुवम् ।
इत्युक्तो वासुदेवेन मोचितो धर्मजेन च ।
एवं पार्थान् प्रतिष्ठाप्य शक्रप्रस्थे तु सार्जुनः ।
वाणी प्राणो वासुदेव इत्येतैरखिलं ततम् ।
इत्थं हरेर्वशे सर्वं गुणपूर्णश्च(सर्वगुणपूर्णश्च) स प्रभुः ।
स हुताश इति प्रोक्तो(हुताशन इति प्रोक्तो) हुतमत्त्यखिलं यतः ।
एतस्यानादिसद्भक्ता मुक्तियोग्या हि ते स्मृताः ।
मिश्रा मध्या इति ज्ञेयाः संसारपरिवर्तिनः ।
तारतम्यं च विज्ञेयं लिङ्गैर्दैहिकमानसैः ।
विष्णोस्तदनुगानां च प्रीतिकृद् धर्म ईरितः ।
कथञ्चित् तानवस्थाप्य सुदूरानुगतान् प्रभुः ।
समाधिविरतोदङ्कपरिपृष्टः पथि प्रभुः ।
तं शिष्यवधकोपेन शप्तुमात्मानमुद्यतम् ।
मद्भक्तो नितरामेष मदाराधनतत्परः ।
कृपया वासुदेवेन बोधितः शान्तमानसः ।
तस्मै देवोऽभयं दत्त्वा प्रेषयिष्येऽमृतं तव ।
अथाऽदिदेश देवेशं वासुदेवोऽमृतं मुनेः ।
ओमित्युक्तो भगवता तत्स्नेहात् स शचीपतिः ।
मूत्रस्रोतसि सौधञ्च निधाय कलशं वशी ।
स मूत्रमिति मत्वा तं याहीत्येवाऽह भत्सयन् ।
असाधारणमन्नं हि देवानाममृतं सदा ।
आत्मदत्तप्रसादाच्च स्वापराधात् प्रचालिते ।
स्वपुरीं प्राप्य यदुभिः पूजितः शूरसूनवे ।
वधमन्तरितं सूनोः सात्वतेशेन सात्वती ।
ततः सुदुःखिताः शूरपुत्राद्या अभिमन्यवे ।
निवसत्यत्र विश्वेशे धर्मपुत्रः क्रतूत्तमम् ।
हतशेषात् क्षत्रसङ्घात् करं नैच्छद् दयापरः ।
विज्ञाय नित्यविज्ञातनिखिलो बादरायणः ।
मेरुशृङ्गेण यत्रैव विष्णुः स्वात्मानमव्ययम् ।
शङ्कराद्याः सुरा यत्र मरुत्तश्चेजिरे हरिम् ।
तच्छङ्करशरीरस्थं जामदग्न्यं हरिं परम् ।
धनस्य देवता विष्णुर्जामदग्न्योऽखिलेश्वरः ।
तेनैव विष्णुना दत्तमर्जुनायास्त्रमुत्तमम् ।
स ब्रह्मरुद्रशक्रादिपददाताऽखिलप्रदः ।
प्रियोऽस्माकं प्रियास्तस्य सर्वदैव वयं नृप ।
सोऽयं पितामहोऽस्माकं व्यासस्तन्नः प्रदास्यति ।
धनं कृष्णः समादाय(स आदाय) समन्ताच्छतयोजनम् ।
युधिष्ठिरमृते सर्वे भीमसेनपुरोगमाः ।
तदैव वासुदेवोऽपि सभार्यः स सुभद्रया ।
तत्कामवर्षिणो मेघांस्तस्य दत्वोदकार्थिनः ।
आसन्नेष्वेव पार्थेषु व्यासे च पुरुषोत्तमे ।
द्रौण्यस्त्रसूदितं बालं दृष्ट्वा कुन्त्यादिकाः स्त्रियः ।
प्रत्यक्षमात्मना गर्भे रक्षितं प्रसवे हतम् ।
तदैव विविशुः पार्था सकृष्णाः सधनोच्चयाः(सधनोच्छ्रयाः) ।
ददौ दानानि बहुशो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
कुन्तीकृष्णासुभद्राभिर्वैराट्याऽन्याभिरेव च ।
ततः कृष्णाभ्यनुज्ञाता पाराशर्यसदस्यकाः ।
सर्वयज्ञात्मकं तेषामश्वमेधं जगत्पतिः ।
साधनानि तु सर्वाणि शालां चैव हिरण्मयीम् ।
अथानुमन्त्रितोत्सृष्टं पुरोहितपुरस्कृतम् ।
स जित्वा रुन्धतः सर्वान् नृपतीञ्छस्त्रतेजसा ।
युधिष्ठिराज्ञया तेन न कश्चिन्निहतस्तदा ।
मळलूरं (मणलूरं) क्रमात् प्राप्तस्तत्रैनं बभ्रुवाहनः ।
योद्धुकामोऽर्घ्यमादाय त्वयाऽद्याभिगतो ह्यहम् ।
तदाऽपि(तथाऽपि) पितृभक्त्यैनमयुद्ध्यन्तमुलूपिका ।
इत्युक्तो युयुधे पित्रा बलं सर्वं प्रदर्शयन् ।
स तु सर्वायुधक्षेपेऽप्यविकारं धनञ्जयम् ।
मूर्च्छितं तं गुरुं दृष्ट्वा तद्भक्त्या भृशदुःखितः ।
विजगर्ह तदोलूपीं धिग् जगत्त्रयपूजितम् ।
लोकवीरं पतिं हित्वा(हत्वा) न मे कार्यं सुतेन च ।
इत्युक्त्वा मरणायैव तां विनिश्चितमानसाम् ।
नागलोकात् समादाय विशल्यकरणीं क्षणात् ।
प्रहस्योवाच च तदा श्रुतं वाक्यं पुरा मया ।
यद्धतास्तेन दोषेण पार्थस्तेनातिवेदनाम् ।
देवानामेव सङ्कल्पान्मूर्च्छितश्चार्जुनोऽभवत् ।
अन्येन पातितस्त्यास्य यशो नश्येत् त्रिलोकगम् ।
इत्युक्तः प्रीतिमापेदे पुत्रभार्यायुतोऽर्जुनः ।
द्वारकायाः समीपस्थं प्रद्युम्नाद्याः सुता हरेः ।
सुभद्राहरणं मार्ष्टुं नीतेऽश्वे तैर्धनञ्जयः ।
मातुलायाब्रवीदश्वं हृतं पौत्रैरबन्धुवत् ।
मातुलं स प्रणम्याथ यज्ञार्थं तान् निमन्त्र्य च ।
सकृष्णः सहसोदर्यः श्रुत्वाऽसौ प्राप्तमर्जुनम् ।
वासुदेव न पश्यामि दुर्लक्षणमथार्जुने ।
पृष्टस्तं केशवः प्राह भ्राता ते दीर्घपिण्डकः(पिण्डिकः) ।
समस्तलक्षणाभिज्ञाः कृष्णः सत्या वृकोदरः ।
प्रसङ्गात् प्राप्तुमिच्छेत् तां विद्याशीलो युधिष्ठिरः ।
तद्गौरवाद् वासुदेवो नोत्तरं प्रत्यभाषत ।
उदरस्य किञ्चिदाधिक्यं वृषणाधिक्यमेव च ।
नैवोक्तं वासुदेवेन दृश्यमानमपि स्फुटम् ।
समस्तजीवराशौ यद् दुर्लक्षणविवर्जितौ ।
अनादिदुःखहीनत्वे सुखाधिक्ये च लक्षणम् ।
मुख्यं ततोऽपि(ततोऽति) मुख्यं तु स्वान्तन्त्र्यादेरशेषतः ।
साश्वेऽर्जुने यज्ञवाटं प्रविष्टेऽस्य सहोदराः ।
ततः स यज्ञो यदुवीररक्षितो व्यासोपदिष्टो मुनिभिः प्रवर्तितः ।
स कृष्णयुग्मेन च भार्गवेण त्रिधा विभक्तेन परेण पुंसा ।
यथा विरिञ्चस्य पुराऽऽस यज्ञो यथैव शक्रस्य शतक्रतुत्वे ।
न देवगन्धर्वमुनिस्वधर्ममर्त्यादिकेष्वास स योऽत्र नाऽस(सम्भ्रमः) ।
तत्रैव तत्त्वानि ससंशयानि निस्संशयान्यासुरलं विवादे ।
प्रगीतगन्धर्ववरः प्रनृत्तसदप्सराः सन्ततवादिविप्रः ।
समस्तदेव्यः सहवासुदेव्यः स्वलङ्कृताः फुल्लमुखारविन्दाः ।
न वै मुमुक्षुर्न बभूषुरत्र न वै विवित्सुश्च कुतो बुभुक्षुः ।
दिनेदिने तत्र महान्नपर्वताः सभक्षसारा रसवन्त ऊर्जिताः ।
ह्रदा महान्तस्त्रिदशादियोग्याः सुयोगयुक्ता हरिचन्दनादेः ।
यथेष्टपानाशनभोगशिष्टाः सहस्रशो मारुतिना तु कारिताः ।
नैतादृशः कश्चन भूतपूर्वो मखो विना रामविरिञ्चवज्रिणाम् ।
स एवमद्धा हरिदैवतः क्रतुः पञ्चाश्वमेधात्मक उच्चकल्पः ।
यज्ञावसाने निखिलाश्च पाण्डवाः कृष्णा च पृथ्वीमखिलां सवित्ताम् ।
प्रियो विभागो यदमुष्य विष्णोरतो विभागार्थमिवाऽर्पयंस्ते ।
देहेन्द्रियप्राणमनांसि चेतनैः सहैव तस्मा अतिसृज्य नेमुः ।
ततो विभक्ते मुनयोऽवदंस्ते प्रत्यर्पयामो वयमेषु राज्यम् ।
पार्थाः सभार्या द्विजवाक्यमेतन्निशम्य कृष्णाय पुनः प्रणम्य ।
इतीरितः प्राह स बादरायणो मुनीश्वरैरप्यभियाचितः प्रभुः ।
समर्पितं मे फलवच्च तत् स्यात् पुनर्ग्रहो नैव च दोषकारी ।
इतीरितास्ते प्रतिपद्य राज्यं ददुर्हिरण्यं निखिलं च तस्मै ।
सभार्यकाणां वररत्नभूषणान्यशेषतः पुत्रभुवां प्रदाय ।
तद् यज्ञपञ्चकमजस्त्रिगुणां स एभ्यः सद्दक्षिणां क्रतुपतिर्निखिलामवाप्य ।
सकृष्णेष्वथ पार्थेषु सुस्नातावभृथेष्वलम् ।
स्तूयमाने च तद्यज्ञे क्रोधो नकुलतां गतः ।
गर्हयन्नूचिवानित्थं भार्यापुत्रस्नुषायुतः ।
धर्मायातिथये तस्य कलां नार्हति षोडशीम् ।
अतिथेस्तस्य पादोदक्लिन्नः पार्श्वो हिरण्मयः ।
मज्जतोऽवभृथेष्वद्धा यज्ञानामत्र चाऽदरात् ।
कृष्णेन च तमोऽन्धं तं प्रापयद्भिः स्मिते कृते ।
कृष्णस्य पाण्डवानां च मखादेश्च गुणान् बहून् ।
श्राद्धार्थं हि पयः पूर्वं (जामदग्नेः)जमदग्नेरदूषयत् ।
भव त्वं नकुलस्तावद् यावद् धर्मादिकान् सुरान् ।
यद्यप्यल्पधनत्यक्तं वित्तं बहुफलं भवेत् ।
सतां प्रीतिश्च तत्रापि सद्वरो हरिरेव हि ।
सतां च प्रवरो विष्णुः सद्भिर्मुनिवरैर्युतः ।
पठन्ति पैङ्गिनश्चैतान् मन्त्रानन्वर्थकानिह ।
वैष्णवेष्वपि मर्त्यैर्यत् कृतं शतगुणं ततः ।
देवशक्रशिवब्रह्मकृतं तस्मात् क्रमेण च ।
वैष्णवत्वं क्रमात् वृद्धं (क्रमोद्वृद्धं) ब्रह्मान्तं जीवराशिषु ।
इति तेन न पार्थानां कर्मणाऽन्यत् समं क्वचित् ।
अथ पृष्टो वासुदेवः सुरविप्रादिसंसदि ।
ते च श्रुत्वाऽखिलान् धर्मान् भक्त्या परमया युताः ।
एकत्रिंशोऽध्यायः
ओं ॥ यज्ञेश्वरेणाभियुतेषु भक्त्या महीं प्रशासत्सु पृथासुतेषु ।
प्रातर्ददानीति नृपस्य वाक्यं निशम्य विप्रस्त्वरितो मखार्थे ।
अनर्घमग्निप्रतिमं(अनर्घ्यमग्निप्रतिमं) विचित्ररत्नान्वितं(रत्नाञ्चितं) विप्रवरस्तदाप्य ।
अकालजं तं तु निशम्य राजा पप्रच्छ दूतैस्तमुवाच भीमः ।
इतीरितोऽसौ नृपतिस्त्वरेत धर्मार्थमित्यस्य मतं प्रपूजयन् ।
अथाम्बिकेयं विषयेषु सक्तं दुस्सङ्गदुष्टं कृतभूरिदोषम् ।
अकुर्वतस्तीक्ष्णतपः कुतश्चिन्नैवास्य(कुतश्चिन्नैव स्वलोकाप्ति)लोकाप्तिरमुष्य भूयात् ।
आज्ञां परैरस्य निहन्ति सोदरैर्वधूजनैरप्यतिपूजितेऽस्मिन् ।
सर्वे हि पार्थास्तमृते सभार्या वैचित्रवीर्यं परमादरेण ।
स प्रीयमाणो नितरां च तेषु नैवाधिकं प्रीयते भीमसेने ।
तस्यापनेतुं विषयेषु सक्तिं द्वेषं तथैवाऽत्मनि भीमसेनः ।
ताविमौ मे भुजौ वृत्तौ पीनौ चन्दनरूषितौ ।
यमौ तदन्वमोदेतां तत्स्नेहाद् गौरवादपि ।
तच्छ्रुत्वोत्पन्ननिर्वेदं क्षत्ता ज्येष्ठस्य वर्द्धयन् ।
अहो महीयसी(गरीयसी) जन्तोर्जीविताशा यथा(यया) भवान्।
नचापराधो भीमस्य ब्रुवतस्त्वामिदं वचः ।
अलमासज्जतस्तेऽद्य निर्वेदकरमीरितम् ।
विमुच्य द्वेषकामौ त्वं वने तीर्थनिषेवकः ।
इत्युक्तो द्वेषमुत्सृज्य भीमे निर्वेदमागतः ।
अनश्नन्तं चतुर्थेऽह्नि धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः ।
अनुज्ञां वनवासाय त्वत्तः प्राप्यैव सर्वथा ।
शन्तमेन(श्रान्तमेनं) करेणाथ धर्मजस्तं मृदु स्पृशन् ।
पुरस्कृत्य युयुत्सुं त्वं कुरु राज्यमकण्टकम् ।
नेत्याह धृतराष्ट्रस्तं कुलधर्मो हि नो वने ।
तयोर्विवदतोरेवं कृष्णद्वैपायनः प्रभुः ।
तपसाऽशेषदोषाणां क्षयकाममिमं नृपम् ।
काले निर्वेदमापन्नस्तपसा दग्धकिल्बिषः ।
इत्युक्तो धर्मराजस्तमनुजज्ञे स चाशितः ।
अनुज्ञाय गृहं प्राप्ते धर्मजे विदुरं पुनः ।
श्रुत्वा युधिष्ठिरो भीममाह दातव्यमद्य नः ।
तमाह भीमः पापानां विमुखानां मधुद्विषः ।
तज्ज्ञात्वा ददतां दोषो भवेदिति विचिन्तयन् ।
भीष्मादीनां वयं श्राद्धकर्तारस्तेन किं ततः ।
इत्युक्तवन्तं नृपतिरर्जुनश्चोचतुः पुनः ।
इत्युक्तमपि नेत्येव ब्रुवाणं शुद्धधार्मिकम् ।
कोशतो यद् बहिर्वित्तं दानभोगादिकारणम् ।
एवमेवार्जुनोऽप्याह विदुरं पुनरूचतुः ।
इत्युक्तो वित्तमादाय गत्वा क्षत्ताऽग्रजेऽब्रवीत्।
नातिहृष्टस्त्वदाज्ञायां भीमस्तन्मा क्रुधोऽत्र च।
नृपार्जुनौ धर्मरतावपि लोककृपापरौ।
कृत्वा श्राद्धानि सर्वेषां महादानान्यनारतम् ।
सर्वं समर्प्य गोविन्दे पार्थेभ्योऽन्येभ्य एव च ।
धर्मतो रक्षिता यूयमस्मत्पूर्वैर्महात्मभिः ।
इष्टं च यज्ञैः पूर्तैश्च चरितं युष्मदाश्रयात् ।
सौभ्रात्रं येन सन्त्यज्य पाण्डवेषु महात्मसु ।
अप्रियाणि च कृष्णस्य सुबहून्याचरत् कुधीः ।
भ्रातरोऽस्य च सर्वेऽपि तच्छीलमनुवर्तिनः ।
सोऽहं वयोगतश्चैव पुत्राधिभिरभिप्लुतः(पुत्रादिभिरभिप्लुतः) ।
तत्र मामनुजानीध्वं कृपया मित्रवत्सलाः ।
क्रियमाणोऽपि कर्तव्यो भूय एव सदाऽचलः ।
इत्युक्तैः स्वगुणानुच्चैः कीर्तयद्भिः सुदुःखितैः ।
सञ्जयो विदुरश्चैनं सभार्यमनुजग्मतुः ।
वार्यमाणाऽपि तनयैः सभार्यैर्भृशदुःखितैः ।
संन्दर्शितपथो राजा कुन्तीविदुरसञ्जयैः ।
त्रिवत्सरेणास्य (त्रिवत्सरादस्य) निजस्य लोकस्याऽप्तिं सभार्यस्य जगाद तत्र ।
सक्षत्तृगान्धारिपृथे ससञ्जये तपोभिराराधयति प्रभुं हरिम् ।
क्षत्तैकतामत्र युधिष्ठिरेण प्राप्तोऽथ भार्यासहितं ससञ्जयम् ।
प्रादुर्बभूवामितशक्ति(प्रादुर्बभूवामृतशक्ति)तेजोज्ञानाद्भुतैश्वर्यसुखादिरूपः ।
तैः पूजितस्तत्र निषण्ण आह यद्यद् यदिष्टं प्रवदन्तु तत्तत् ।
तेषां प्रदत्तेष्वभिवाञ्छितेषु वैचित्रवीर्यः सह भार्ययैव ।
ततस्तु ते सत्यवतीसुतस्य सर्वेश्वरस्याऽज्ञया सर्व एव ।
ऊषुश्च रात्रिं परमाज्ञयैव सर्वे स्वभार्यासहिता(सर्वेऽपि भार्यासहिता) यथा पुरा ।
अथाऽज्ञयैवास्य परस्य सर्वाः स्त्रियो निजेशैः सहिता ययुः स्वः (स्वम्) ।
तं चाऽनयामास तदैव कृष्णो ह्यचिन्त्यशक्तिः स विकुण्ठलोकात् ।
सम्पूज्य तं कृष्णमपीशवन्द्यं क्षमापयामास परीक्षिदात्मजः ।
पार्थाः पुनः प्राप्य पुरं स्वकीयं धर्मेण पृथ्वीं परिपालयन्तः ।
वर्षत्रयान्ते त्मसमाहिताग्निं (त्यक्त्वाऽग्निभिः)त्यक्ताग्निभिस्तैर्वनमालिहद्भिः ।
वीटामुखं(व्रीळामुखा,व्रीडामुखं, व्रीडामुखान्) ध्यानपरा निशम्य स्वर्यातमात्मीयपितृव्यमाशु ।
ते विष्णुभक्त्या परिपूतकर्मभिर्ज्ञानेन चान्ते तमनुस्मरन्तः ।
(गावल्गणिः)गावद्गणिर्व्याससकाशमेत्य शुश्रूषया तस्य पुनर्निजां गतिम् ।
अष्टादशाब्दाः पृथिवीं समस्तां प्रशासतामेवमगुर्महात्मनाम् ।
द्वात्रिंशोऽध्यायः
OM ॥ ततः कुरुक्षेत्रमवाप्य कृष्णो दीक्षां प्रपेदे द्विषडब्दसत्रे ।
तत्रर्त्विजो दक्षभृगुप्रधानाः पार्था यदूनां प्रवरैः समेताः ।
सर्वे च जीवा वसुधातलस्था येऽन्येऽन्तरिक्षद्युमुखोत्तरेषु ।
सुनिर्णयस्तत्त्वविनिर्णयार्थिनां तत्त्वस्य चाभूदिह वादशीलिनाम् ।
धर्मार्थकामानखिलानवापुस्तदर्थिनो मुक्तिमपीह कृष्णात् ।
क्षेत्रं तदासीद्धरिलोकसम्मितं(तदाऽसीद्धरिलोकसम्मितं) यदीयुरत्राखिलसज्जना युतिम् ।
द्वादशाब्दं महासत्रमेवमेतादृशं हरिः ।
अनुजज्ञे क्रमेणैव वत्सरेण समागतान् ।
उपदिश्य परं ज्ञानमुद्धवायामुमाश्रमम् ।
समारब्धं कलियुगं यदा दुर्योधनोऽपतत् ।
कृतादपि विशेषोऽयं यत् पुण्यस्याधिकं फलम् ।
एवं सुधार्मिके लोके हरिभक्तिपरायणे ।
ब्रह्मरुद्रादयो देवाः स्तुत्वा केशवमव्ययम् ।
प्राचुर्ये सज्जनस्य स्यान्न कलेर्वृद्धिरञ्जसा ।
पुण्यक्षेत्रेऽपि न मृतिः स्वगृहे त्वतिधर्मदा(स्वगृहेऽप्यतिधर्मदा) ।
प्रकाशयितुमेवैनान् प्रभासाय कुशस्थलात् ।
ते ततः शापदोषेण कृष्णेनैव विमोहिताः ।
ततः परेशोऽगणितानुभावः स्वसारथिं पाण्डवानां सकाशम् ।
अथाऽसतः पिप्पलमूल ईशितुरूरुस्थितं पादतलं सुताम्रम् ।
अच्छेद्याभेद्यदेहस्य शल्ये पादमुपस्थिते ।
विप्रवाक्यं मानयानः कारयित्वाऽमुना हरिः ।
पादप्रहारदोषेण तं भृगुं व्याधतां गतम् ।
नीचा योनिर्नीचनीच(नीचां योनिं नीचनीचकर्मा) कर्माऽप्तं नीचकर्मतः ।
ततो विरिञ्चेशपुरन्दराद्याः पुनः स्तुवन्तोऽभिययुः प्रणम्य ।
गोपालमन्त्रं भजतां फलप्रदस्त्वेकेन रूपेण स भुव्यदृश्यः ।
सम्पूजितं ब्रह्मलोके चतुर्थं कञ्जोद्भवेनाथ परं स्वधाम ।
तत्तेजसा ते प्रतिमुष्टदृष्टयः पुरुष्टुताद्या अमितोरुदीधितेः ।
वीन्द्रेशशेषानुगतः स्वयम्भूर्धाम प्रविष्टं तमजं प्रणम्य ।
स पूर्वरूपेण समाप्य चैक्यं विभज्य चेच्छानुसृतोऽथ रेमे ।
ब्रह्माऽपि शर्वादियुतः स्वलोकं प्राप्तः पुनस्तत्र गतं च कृष्णम् ।
यतो न दर्शिता भ्रान्तिः प्रादुर्भावेष्वपि क्वचित् ।
मोहयित्वाऽसुरानन्धं तमः प्रापयितुं प्रभुः ।
दारुकोक्त्या समायातः पार्थस्तमदहत् तदा ।
तथैव जनमोहाय प्राप्य वह्नावदृश्यताम् ।
चिदानन्दैकदेहे हि(चिदानन्दैकदेहेऽपि) द्विरूपे इव ते यतः ।
अन्या महामहिष्यस्तु त्यक्त्वा देहं हुताशने ।
रौहिणेयादिकानां च भार्या वह्निमुखे तनुम् ।
वसुदेवः पार्थमुखाच्छ्रुत्वा तद्योगमास्थितः ।
तस्यार्जुनोऽश्वमेधाग्नावन्त्यकर्माकरोत् तदा ।
स्त्रियो बालांस्तथाऽऽदाय धनं चैव धनञ्जयः ।
स्त्रीबालसहिते पार्थ एकस्मिन् पथि गच्छति ।
यास्ताः षोडशसाहस्रवनिताः शतसंयुताः ।
ह्रियमाणे धने चैव वनितासु च वासविः ।
क्षीणास्तस्य शरा दैवान्नास्त्राणि स्मृतिमाययुः ।
तदा कुरुक्षेत्रगतं जगद्गुरुं सुपूर्णविज्ञानबलाब्धिसत्सुखम्(बलर्द्धिसत्सुखम्) ।
स तेन पुंसां प्रवरेण हेतुभिः सम्बोधितोऽज्ञानतमोंऽशुमालिना ।
स्त्रियो म्लेच्छहृताः कृष्णप्रेषिताद्(कृष्णप्रेरिताद्) दाल्भ्यतः पुनः ।
अर्जुनस्तु कुरुक्षेत्रे हार्दिक्ययुयुधानयोः ।
अनिरुद्धसुतं वज्रं प्रियं कृष्णस्य सद्गुणम् ।
स्त्रीबालांश्च धनं चैव तस्मिन् संस्थाप्य फल्गुनः ।
ते चावियोगसमयं स्मरन्तो मुरवैरिणः(मुरवैरिणा) ।
स्त्रीहारिणां च म्लेच्छानां वधायैनमयोजयन् ।
वासुदेवपदा स्पृष्टभूकण्टकसमुद्धृतिः(समुद्धतिः) ।
अनुव्रजद्भिर्विश्वेशं नास्माभिर्भूस्तदुज्झिता ।
तत्र काली भीमभार्या वैष्णवं योगमास्थिता ।
सुभद्राद्यास्तु या भार्याः पार्थानां तु तदाज्ञया ।
सन्त्यज्य राजचिह्नानि (राज्यचिह्नानि) वैष्णवं योगमास्थिताः ।
प्रागुदीचीं दिशं पूर्वं ययुस्तत्रार्जुनो धनुः ।
प्रातिभाव्यं तु वरुणे निस्तीर्याग्निरदृश्यताम् ।
अहोभिः सप्तभिर्योगं समारूढाः प्रदक्षिणम् ।
द्रौपदीसहदेवादिपञ्चानां तत्र मारुतिः ।
तेषामिहेति याथार्थ्यं जानन् पप्रच्छ धर्मजम् ।
मृतिकाले हि यो यस्य दोषं वक्त्यृणमोचनम् ।
सोऽपीच्छापतितान् देहानजानञ्छुद्धकर्मणाम् ।
स्वच्छन्दमृत्यवो योगाद् देहानुत्सृज्य पाण्डवाः ।
ऋणान्युन्मुच्य(ऋणात् प्रमुच्य) दोषोक्त्या स्वानां भीमः स्वकां तनुम् ।
भीमादृते हि चतुर्षु पक्षपातस्तु वासवौ ।
नीतिरूपे वीर्यबले महान्त्येषां यतः क्रमात् ।
यथास्वरूपविज्ञानमात्मन्यपि न दोषकृत् ।
कदाचिदतिमानोऽपि त्रयाणामेषु जायते ।
प्रारब्धकर्मनाशे (आरब्धकर्मनाशे) हि पतेद् देहोऽप्यपापिनः ।
अतिमानादयो दोषाः कुत एव हि मारुतेः ।
सर्वजीवगणेभ्यो ये ते हि(समस्तजीवराशिभ्यस्ते हि) वायुत्वमाप्नुयुः ।
अभावं ह्यतिमानादेर्भीमस्याऽह च केशवः ।
इति तस्माद् यथा युद्धे धर्महानिममन्यत ।
पूज्येभ्यः(पूर्वेभ्यः) पूर्वमेवैषां देहपातमभीप्सताम् ।
न हि पापफलं मुक्तौ(पापफलान्मुक्तौ देहपातः कथञ्चन ।
तेषु स्वलोकान् प्राप्तेषु धर्मजः श्वाऽत्मना सह(स्वात्मना सह) ।
रथमारुहेति कथितो रथिना पुरतः शुनः ।
नाऽरुहेयं विना श्वानमिति तेन स्थिरोदिते ।
आनृशंस्यपरत्वेन कीर्तिमेवाऽत्मनो वृषः ।
ततः(यतः) स रथमारुह्य लोकानामुत्तरोत्तरम् ।
सर्वेषामुत्तरं लोकमैन्द्रं प्राप्येदमेव ते ।
सभ्रातृकं ज्वलन्तं च सर्वेषामुपरि स्थितम् ।
भ्रातरो मे क्व कृष्णा च सकर्णाः(कर्णाद्याः) क्व च बान्धवाः ।
यादवश्चेति पप्रच्छ देवांस्ते च तमब्रुवन् ।
इत्युक्त आह पापोऽयं पृथिवीक्षयकारकः ।
नास्तिकोऽतिशठः क्रूरो द्वेष्टा विष्णोश्च तद्भुवाम् ।
कथं च सर्वधर्मज्ञा नारायणपरायणाः ।
यत्र सन्तस्तु ते सन्ति तत्र स्थातव्यमेव मे ।
अस्य वीरतमस्येदं धार्तराष्ट्रस्य युज्यते ।
दुर्गन्धेन सुकृच्छ्रेण तमसा प्रावृतेन च ।
क्षणं तिष्ठ महाराज सन्निधानबलात् तव ।
के यूयमिति पप्रच्छ दीनध्वनिविशङ्कितः ।
श्रुत्वा तत् कृपयाऽऽविष्टः शोकामर्षसमन्वितः ।
नच स्वर्गेण मे कार्यं त्यक्त्वा स्वजनमीदृशम् ।
ततोऽत्र देवाः पुरुहूतपूर्वकाः समाययुः स्नेहवशाद् युधिष्ठिरे ।
आहात्र धर्मः पुनरात्मसद्यशः(परमात्मसद्यशः) प्रकाशयन् पाण्डुसुताभिधं स्वम् ।
शक्रोऽप्युवाचैनमिदं मृषा ते प्रदर्शितं द्रोणकृते मृषागिरः ।
ब्रह्मापरोक्ष्येऽपि विकर्म सूचकं प्रारब्धपापस्य विषाशनं यथा ।
कुतः परब्रह्मदृशां सुशुद्धसत्कर्मणां कृष्णपरायणानाम् ।
एते हि देवप्रवराः पृथिव्यां जाता भुवो भारजिहीर्षुमीशम् ।
न ते नृपाद्यापि हि मानुषो गतो भावस्ततो द्वेष्टि सुयोधनादीन् ।
सुयोधनाद्या(दुर्योधनाद्या) यदिमे सुपापा आरब्धकर्मक्षयमाप्य नित्ये ।
देवांशजा ये तु समस्तशस्ते स्वमूलरूपं समवाप्य काले ।
इत्युक्त आश्वेव निमज्ज्य गङ्गां धर्मात्मजस्तत्र विसृज्य(धर्मात्मजस्तं प्रविसृज्य) देहम् ।
स तु प्रपश्यन् स्वजनं समस्तं स्वमूलरूपातिसमीपसंस्थम् ।
ददर्श कृष्णामपि तत्समीपे श्रिया ज्वलन्तीं समतीत्य चान्याः ।
एषा हि साक्षाज्जगतां प्रियस्य प्राणात्मनो जीववरेश्वरस्य ।
युष्मच्चतुर्देहगतस्य वायोर्वायुप्रिया भीमतनोस्तथैव ।
प्रीतिस्ततो ह्यभ्यधिका(ह्यत्यधिका) बभूव भीमस्य चास्यास्तदनु स्म पार्थे ।
इयं(इदा,एषा) हि सा शुद्धतनुः प्रजाता शच्यादियोगापगताग्र्यदेहा ।
स्पर्शेऽपि नास्याः पवमानपत्न्याः सुपूतताऽलं भवतामिदानीम् ।
इतीरितं तं प्रतिसन्निवृत्तं विनाशयन् मानुषवासनां स्वयम् ।
ततस्तु पार्था अखिलाः स्वमूलरूपैः सहैवाऽविविशुर्मुदाऽन्विताः ।
तत्रापि कृष्णेन समागमोऽभूत् पुरेव तेषामतितत्पराणाम् ।
अन्ये च(तु) देवांशभवाः समस्ताः स्वमूलरूपैक्यमवापुराशु ।
चतुःसहस्रं त्रिशतोत्तरं ते(त्रिशतोत्तरं गते) संवत्सराणामनुभूय दिव्यान् ।
दुःखेऽपि तेषामिह तारतम्यं कलेः परं दुःखमिहाखिलाच्च ।
केचित् पिशाचासुरराक्षसत्वमवाप्य विष्णोरपि तत्पराणाम् ।
चतुःसहस्रे त्रिशतोत्तरे गते संवत्सराणां तु कलौ पृथिव्याम् ।
तदैव कृष्णाऽपि भुवि प्रजाता प्रीत्यै हरेरन्धतमस्यपातयत् ।
वायुत्वमाप्तः स हनूमदंशो ब्राह्मं पदं प्राप्य वृकोदरश्च ।
भुवि द्युलोके च विरिञ्चतायां मुक्तौ च ताभ्यामधिकं समस्तात् ।
‘भूषन् न योऽधि बभ्रूषु नम्नते’(ऋग्वेद १.१४०.६)(भुषन्न योऽधि बभ्रूषु नम्नते) ‘बळित्था तद्वपुषे धायि दर्शतं’(१.१४१.१) ।
अन्यानि वाक्यानि च वैदिकानि सपञ्चरात्रोक्तिपुराणकानि ।
एवं प्रयातेषु सकेशवेषु स्वानेव लोकान् यदुपाण्डवेषु ।
तैः क्षेमकान्तैरिह भारतादिशास्त्राणि शृण्वद्भिरशेषविद्भिः ।
संवत्सराणां तु सहस्रके गते प्राप्तेषु विद्यामखिलेषु सत्सु ।
अदर्शनं सर्वमुनीन्द्रवृन्दैः सहैव सज्ज्ञानमहानिधाने (निदाने) ।
उत्सादितत्वात्तु दुरागमानां तत्सम्प्रदायस्य च नाशितत्वात् ।
शुना पुरोडाशमिवावलीढं वेदश्रुतिं चा(वा)ऽन्त्यजनैरवाप्ताम् ।
नावाग्गतिः क्वापि सुवेदिनां भवेत् प्राप्यं सुखं नित्यमवश्यमेभिः ।
ज्ञानप्रदानाय सतां तदन्यज्ञानप्रणाशाय च विष्णुनैते ।
क्षीरोदधेरुत्तरतीरनिष्ठितै(विष्ठितै)रभिष्टुतः सुष्टुतिभिः पुरुष्टुतः ।
यस्त्रैपुराणां प्रथमोऽत्र जातः शुद्धोदनेत्येव जिनेति चोक्तः ।
तेषां तदा वैदिककर्म वीक्ष्य सम्प्राहसत् तद्वपुषैव केशवः ।
तथाऽप्यविश्वासमवेक्ष्य तेषां सस्मार देवानखिलान् जनार्दनः ।
स जातमात्रः शिवपूर्वकाणां शूलादिहेतीरखिला निगीर्य ।
तदासनत्वेन विधाय तस्मिन् समास्थितं देवगणाः प्रणम्य ।
ते ज्ञानधर्मावपहाय पापा विमोहिता देववरेण(दैववरेण) सर्वे ।
नारायणोऽप्याप्य(नारायणः प्राप्य) सुरेन्द्रवृन्दं वृत्तं च तेषामखिलं(तेषां निखिलं) निगद्य ।
क्षणादयं क्षणिकास्तद्विशेषा यतः प्रयान्त्येव निसर्गतोऽखिलाः ।
तद्वान् विशेषश्च यतो न भिन्नो सदा स्वनिर्वाहकशक्तियुक्तौ ।
ज्ञोऽहं सदैकः परमो मयैतत् सदाऽननीयं हि यतोऽस्वतन्त्रम् ।
शंशीलकोऽहं यत एव चोच्चः शूनामकस्तद्धि मया निधेयम्(विधेयम्) ।
इत्यादि बोद्धव्यमिदं समस्तं मयोदितं क्वापि न हेयमस्ति ।
ततस्तु बुद्धोदितपक्षसंस्थो जिनोऽपि चक्रे मतमन्यदेव ।
प्रशान्तविद्येत्यभिधं तथाऽन्यद् बुद्धोक्तशास्त्रं त्रिदशा अवाप्य ।
अन्ये मनुष्या अपि भारताद्यं सत्सम्प्रदायं परिगृह्य विष्णुम् ।
शैवं तपस्ते विपुलं विधाय जगद्विमोहोर्जितशक्तिमस्मात् ।
तेषां प्रपाताय सतां च मुक्त्यै(विमुक्त्यै) जन्माऽस भीमस्य यदुक्तमत्र ।
ततः कलेरन्तमवाप्य धर्मज्ञानादिकल्याणगुणप्रहीने ।
नारायणस्तैः स्तुतिपूर्वमर्थितो भवाय लोकस्य स शम्भलाख्ये ।
कलेस्तु कात्कारत(काल्कारत) एव कल्की ज्ञानं कलं कं सुखमेव तद्वान् ।
अधर्मवृत्तं विमुखं हरेश्च निहत्य निःशेषजनं तुरङ्गी ।
इत्याद्यनन्तानि हरेरुदारकर्माणि रूपाणि च सद्गुणाश्च ।
आनन्दतीर्थाख्यमुनिः सुपूर्णप्रज्ञाभिधो ग्रन्थमिमं चकार ।
यस्तत्प्रसादादखिलांश्च वेदान् सपञ्चरात्रान् सरहस्यसङ्ग्रहान् ।
समस्तशास्त्रार्थविनिर्णयोऽयं विशेषतो भारतवर्त्मचारी(भारतमार्गवर्ती) ।
विनिर्णयो नास्त्यमुना विना यद् विप्रस्थितानामिव सर्ववाचाम् ।
निगूहितं यत् पुरुषोत्तमत्वं सूत्रोक्तमप्यत्र महासुरेन्द्रैः ।
व्यासाज्ञया भाष्यवरं विधाय पृथक्पृथक् चोपनिषत्सुभाष्यम् ।
तनुस्तृतीया पवनस्य सेयं सद्भारतार्थप्रतिदीपनाय ।
तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः ।
इत्यादिवाक्योक्तमिदं समस्तं तथा पुराणेषु च पञ्चरात्रे ।
तस्मादयं ग्रन्थवरोऽखिलोरुधर्मादिमोक्षान्तपुमर्थहेतुः ।
यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं
यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः ।