Chandogya/Moola: Difference between revisions
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<span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमाध्यायः प्रथमखण्डः"></span> | <span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमाध्यायः प्रथमखण्डः"></span> | ||
== प्रथमाध्यायः प्रथमखण्डः == | == प्रथमाध्यायः प्रथमखण्डः == | ||
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| verse_text = हरिःओम्॥ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुःश्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्मनिराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥ | |||
| verse_lines = हरिःओम्॥ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुःश्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्मनिराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥;ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः | |||
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| verse_text = एषां भूतानां पृथिवी रसः। पृथिव्या आपो रसः। अपामोषधयो रसः। ओषधीनां पुरुषो रसः। पुरुषस्य वाग्रसो। वाच (ऋक् रसः)ऋग्रसः। ऋचः साम रसः। साम्न उद्गीथो रसः। स एष रसानां रसतमः परमः परार्ध्योऽष्टमो य उद्गीथः ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = एषां भूतानां पृथिवी रसः। पृथिव्या आपो रसः। अपामोषधयो रसः। ओषधीनां पुरुषो रसः। पुरुषस्य वाग्रसो। वाच (ऋक् रसः)ऋग्रसः। ऋचः साम रसः। साम्न उद्गीथो रसः। स एष रसानां रसतमः परमः परार्ध्योऽष्टमो य उद्गीथः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = कतमा कतमर्क् कतमत् कतमत् साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति । वागेवर्क, प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = कतमा कतमर्क् कतमत् कतमत् साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति । वागेवर्क, प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्च ऋक् च साम च तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य काममापयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य काममापयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = तद्वा एतदनुज्ञाक्षरम् । यद्धि किञ्चानुजानात्योमित्येव तदा हैष उ एव समृद्धिर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = तद्वा एतदनुज्ञाक्षरम् । यद्धि किञ्चानुजानात्योमित्येव तदा हैष उ एव समृद्धिर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते ओमित्याश्रावयत्योमिति शंसत्योमित्युद्गायत्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै महिम्ना रसेन तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते ओमित्याश्रावयत्योमिति शंसत्योमित्युद्गायत्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै महिम्ना रसेन तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति अथ ह य एवायं (मुख्यप्राणः) मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीत तस्येतरैः प्राणैरुपव्याख्यानं भवति ॥ ८॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति अथ ह य एवायं (मुख्यप्राणः) मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीत तस्येतरैः प्राणैरुपव्याख्यानं भवति ॥ ८॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = देवासुरा ह वै यत्र संयेतिर उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम इति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = देवासुरा ह वै यत्र संयेतिर उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम इति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = अथ ह वाचमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तां हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तयोभयं(तेनोभयं) वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = अथ ह वाचमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तां हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तयोभयं(तेनोभयं) वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद् विद्धम् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद् विद्धम् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतद् विद्धम् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = अथ ह मन उद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं सङ्कल्पयते सङ्कल्पनीयं चासङ्कल्पनीयं च पाप्मना ह्येतत् विद्धम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ ह य एवायं (मुख्यः प्राणः)मुख्यप्राणस्तमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः ऋत्वा विदध्वसुर्यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेतैवम् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = स यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसते एवं हैव स विध्वंसते य एवं विदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माऽऽखणः ॥ ८ ॥ | |||
| verse_lines = स यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसते एवं हैव स विध्वंसते य एवं विदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माऽऽखणः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_text = नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येषः तेन यदश्नाति यत् पिबति तेनेतरान् प्राणानवत्येतमु एवान्ततो वित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्तत इति ॥ ९ ॥ | |||
| verse_lines = नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येषः तेन यदश्नाति यत् पिबति तेनेतरान् प्राणानवत्येतमु एवान्ततो वित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्तत इति ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_text = तं हाङ्गिरा उद्गीथमुपासाञ्चक्रे एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसस्तेन॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = तं ह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते वाग्घि बृहती तस्या एष पतिस्तेन ॥ ११ ॥ | |||
| verse_lines = तं ह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते वाग्घि बृहती तस्या एष पतिस्तेन ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = तं हायास्य उद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद् यदयते तेन ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = तं ह बको दाल्भ्यो विदाञ्चकार स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः कामानागायति ॥ १३ ॥ | |||
| verse_lines = तं ह बको दाल्भ्यो विदाञ्चकार स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः कामानागायति ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_text = आगता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥ १४ ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीतोद्यन् वा एष प्रजाभ्य उद्गायत्युद्यंस्तमोभयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयमुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयमुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानोऽथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः सा वाक् तस्मादप्राणन्ननपानन् वाचमभिव्याहरति या वाक् सर्क्(सा ऋक्) तस्मात् अप्राणन्ननपानन् ऋचमभिव्याहरति या ऋक् तत् साम तस्मादप्राणन्ननपानन् साम गायति यत् साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्ननपानन् उद्गायति (अतः) ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाऽग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपानन् तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमोवोद्गीथमुपासीत ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीत उद्-गी-थ इति प्राण एवोत् प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग् गीर्वाचो हि गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदं सर्वं स्थितं द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्थं सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गीर्ऋग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्-गी-थ इति ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = यदा वा ऋचमाप्नोति अोमित्येव अति(भि)स्वरति। एेवं साम। एवं यजुः। एष उ स्वरो यदेतदक्षरमम्। एतदमृतमभयम्। तत् प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन्। स य एतदेवं विद्वान् अक्षरं प्रणौति एतदेवाक्षरं स्वरममृतमभयं प्रविशति। तत् प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ २ ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = यदा वा ऋचमाप्नोति अोमित्येव अति(भि)स्वरति। एेवं साम। एवं यजुः। एष उ स्वरो यदेतदक्षरमम्। एतदमृतमभयम्। तत् प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन्। स य एतदेवं विद्वान् अक्षरं प्रणौति एतदेवाक्षरं स्वरममृतमभयं प्रविशति। तत् प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ २ ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = अथ खलु ‘य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः’ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथः, एष प्रणवः। ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = अथ खलु ‘य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः’ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथः, एष प्रणवः। ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = एतमु एव अहमभ्यागासिषम्। तस्मात् मम त्वमेकोऽसि। इति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच। रश्मीन् त्वं पर्यावर्तयताद् बहवो वै ते भविष्यन्ति। इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = एतमु एव अहमभ्यागासिषम्। तस्मात् मम त्वमेकोऽसि। इति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच। रश्मीन् त्वं पर्यावर्तयताद् बहवो वै ते भविष्यन्ति। इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = अथाध्यात्मम्। य एवायं मुख्यप्राणसः तमुद्गीथमुपासीत। ओमिति ह्येष स्वरन् एति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = एतमु एवाहमभ्यागासिषं। तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच। प्राणान् त्वं भूमानमभिगायतात् बहवो वै ते भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनुसमाहरतीति ॥ ५ ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = इयमेव ऋक्। अग्निः साम। (तदेतदस्याम् .हृ)तदेतत् एतस्यामृचि अयध्यूढं साम। तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते। इयमेव सा अग्निरमः। तत् साम ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्तरिक्षमेव ऋक्। वायुः साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। अन्तरिक्षमेव सा। वायुरमः। तत् साम ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = द्यौरेव ऋक्। आदित्यः साम तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। द्यौरेव सा। आदित्योऽमः। तत् साम ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव ऋक्। अथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव सा। अथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमः। तत् साम ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुः हिरण्यकेशः आ प्रणखात् सर्व एव सुवर्णः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुः हिरण्यकेशः आ प्रणखात् सर्व एव सुवर्णः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी । तस्य उदिति नाम। स एषः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो उदितः। उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी । तस्य उदिति नाम। स एषः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो उदितः। उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्य ऋक् च साम च गेष्णौ। तस्मादुद्गीथः। तस्मात् त्वेवोद्गाता एतस्य हि गाता। स एष ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकाः तेषां चेष्टे देवकामानां च, इत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = अथाध्यात्मं वागेवर्क् प्राणः साम तदेतदेस्यामृच्यध्यूढं साम तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते वागेव सा प्राणोऽमस्तत् साम ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते चक्षुरेव (साऽत्माऽत्मः .हृ .प्रभ)सा प्राणोऽमस्तत् साम ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रोत्रमेवर्ङ्(ऋक्) मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत् साम ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयतेऽथ यदेवैतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैव साऽथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत् साम ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते सैवर्क् तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावदमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां चेति तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात् ते धनसनयः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ यदेतदेवं(य एतदेवं) विद्वान् साम गायत्युभौ साम गायति(उभौ स गायति) सोऽमुनैव स एष ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति देवकामांश्च ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ॥ ८ ॥ | |||
| verse_lines = अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_text = कं ते काममागायानीत्येष ह्येष कामगानस्येष्टे य एवं विद्वान् साम गायति साम गायति ॥ ९ ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः। शिलकः शालावत्यः, चैकितायनो दाल्भ्यः, प्रवाहणो जैबिलिरिति। ते होचुरुद्गीथे ये कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = तथेति ते ह(ह ते) समुपविविशुः। स ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाच- भगवन्तावग्रे वदताम्। ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामीति। स ह शिलकः शालावत्यः चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति। पृच्छेति होवाच- का साम्नो गतिरिति ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = तथेति ते ह(ह ते) समुपविविशुः। स ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाच- भगवन्तावग्रे वदताम्। ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामीति। स ह शिलकः शालावत्यः चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति। पृच्छेति होवाच- का साम्नो गतिरिति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = स्वर इति होवाच। स्वरस्य का गतिरिति। प्राण इति होवाच। प्राणस्य का गतिरिति। अन्नमिति होवाच। अन्नस्य का गतिरिति। आप इति होवाच। अपां का गतिरिति। असौ लोक इति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = स्वर इति होवाच। स्वरस्य का गतिरिति। प्राण इति होवाच। प्राणस्य का गतिरिति। अन्नमिति होवाच। अन्नस्य का गतिरिति। आप इति होवाच। अपां का गतिरिति। असौ लोक इति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच। स्वर्गं वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। स्वर्गसंस्तावं हि सामेति । तं ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यं (चैकितायनं दाल्भ्यं इति .हृपाठे नास्ति) उवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम। यस्त्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥४॥ | |||
| verse_lines = न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच। स्वर्गं वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। स्वर्गसंस्तावं हि सामेति । तं ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यं (चैकितायनं दाल्भ्यं इति .हृपाठे नास्ति) उवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम। यस्त्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥४॥ | |||
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| verse_lines = हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति। अयं लोक इति होवाच। अस्य लोकस्य का गतिरिति। न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच। प्रतिष्ठां वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति ।;तं ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाच। अन्तवद्वै किल ते शालावत्य साम। यत्स्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति । हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच ॥ ५ ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणं स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकान् जयति य एतमेवं(एतदेवं) विद्वान् परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते तं (हैन)हैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रयाजमुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिंल्लोके जीवनं भविष्यति तथामुष्मिंल्लोक इति स य एतमेवं(एतदेवं) विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिंल्लोके जीवनं भविष्यति तथामुष्मिंल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ २ ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_text = तं होवाच नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता(ये मे उपनिहिताः) इत्येतेषां मे देहीति होवाच। तानस्मै प्रददौ। हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतं स्यादिति होवाच। न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = तं होवाच नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता(ये मे उपनिहिताः) इत्येतेषां मे देहीति होवाच। तानस्मै प्रददौ। हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतं स्यादिति होवाच। न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = न वा अजीविष्यमिमान् अखादन्निति होवाच। कामो म उदपानमिति। स ह खादित्वाऽतिशेषान् जायाय आजहार। साऽग्र एव सुभिक्षा बभूव। तान् प्रतिगृह्य निदधौ स ह प्रातः सञ्जिहान उवाच यद् बतान्नस्य लभेमहि। लभेमहि धनमात्रां राजासौ यक्ष्यते। स मा सर्वैरार्त्विज्यैर्वृणीतेति ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = न वा अजीविष्यमिमान् अखादन्निति होवाच। कामो म उदपानमिति। स ह खादित्वाऽतिशेषान् जायाय आजहार। साऽग्र एव सुभिक्षा बभूव। तान् प्रतिगृह्य निदधौ स ह प्रातः सञ्जिहान उवाच यद् बतान्नस्य लभेमहि। लभेमहि धनमात्रां राजासौ यक्ष्यते। स मा सर्वैरार्त्विज्यैर्वृणीतेति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति। तान् खादित्वाऽमुं यज्ञं विततमेयाय। तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोप विवेश। स ह प्रस्तोतारमुवाच। प्रस्तोतर्या(तः या) देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या(तः या) देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या(तः या) देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासाञ्चक्रिरे ॥ ४ ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति। तान् खादित्वाऽमुं यज्ञं विततमेयाय। तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोप विवेश। स ह प्रस्तोतारमुवाच। प्रस्तोतर्या(तः या) देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या(तः या) देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या(तः या) देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासाञ्चक्रिरे ॥ ४ ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = अथ हैनं यजमान उवाच- भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरार्त्विज्यैः पर्यैशिषं भगवतो वा अहमवित्त्याऽन्यानवृषि भगवांस्त्वेव मे सर्वैरार्त्विज्यैरिति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = अथ हैनं यजमान उवाच- भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरार्त्विज्यैः पर्यैशिषं भगवतो वा अहमवित्त्याऽन्यानवृषि भगवांस्त्वेव मे सर्वैरार्त्विज्यैरिति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = तथेत्यथ तर्ह्येत एव समतिसृष्टास्तुवन्तां (मदतिसृष्टास्तुवन्तां) यावत्तेभ्यो(यावत्त्वेभ्यो) धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = तथेत्यथ तर्ह्येत एव समतिसृष्टास्तुवन्तां (मदतिसृष्टास्तुवन्तां) यावत्तेभ्यो(यावत्त्वेभ्यो) धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् उद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेत्यादित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति॥ ५॥ | |||
| verse_lines = अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् उद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेत्यादित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति॥ ५॥ | |||
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| verse_text = सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुदगास्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति अथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेत्यन्नमिति होवाच । सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ६ ॥ ११ ॥ | |||
| verse_lines = सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुदगास्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति अथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेत्यन्नमिति होवाच । सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ६ ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वव्राज तस्मै (ह) श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वव्राज तस्मै (ह) श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = तान् होवाच- इहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाञ्चकार ते ह यथैवेदं बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः संरब्धाः सर्पन्तीत्येवमाससृपुस्ते ह समुपविश्य हिञ्चक्रुरो३मदा३मोम्पिबा३मों देवो वरुणः प्रजापतिः सविता३न्नमिहा३हरदन्नपते३न्नमिहा३हराऽहरोमिति ॥ २ ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = तान् होवाच- इहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाञ्चकार ते ह यथैवेदं बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः संरब्धाः सर्पन्तीत्येवमाससृपुस्ते ह समुपविश्य हिञ्चक्रुरो३मदा३मोम्पिबा३मों देवो वरुणः प्रजापतिः सविता३न्नमिहा३हरदन्नपते३न्नमिहा३हराऽहरोमिति ॥ २ ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = अयं वाव लोको हावुकारो वायुर्हायिकारश्चन्द्रमा अथकार आत्मेहकारोऽग्निरीकार आदित्य ऊकारो निहव एकारो विश्वेदेवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिङ्कारः प्राणः स्वरोऽन्नं याया वाग्विराडनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः सञ्चरो हुप्कारो दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवं साम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद इति ॥ १ ॥ १३ ॥ | |||
| verse_lines = अयं वाव लोको हावुकारो वायुर्हायिकारश्चन्द्रमा अथकार आत्मेहकारोऽग्निरीकार आदित्य ऊकारो निहव एकारो विश्वेदेवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिङ्कारः प्राणः स्वरोऽन्नं याया वाग्विराडनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः सञ्चरो हुप्कारो दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवं साम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद इति ॥ १ ॥ १३ ॥ | |||
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<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयोऽध्यायः"></span> | ||
== द्वितीयोऽध्यायः == | == द्वितीयोऽध्यायः == | ||
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| verse_text = ओं समस्तस्य खलु साम्न उपासनं साधु यत् खलु साधु तत् सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = ओं समस्तस्य खलु साम्न उपासनं साधु यत् खलु साधु तत् सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = स य एतदेवंविद्वान् साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥ ४ ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = स य एतदेवंविद्वान् साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥ ४ ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = अथावृत्तेषु द्यौर्हिङ्कार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम् ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = अथावृत्तेषु द्यौर्हिङ्कार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वांल्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ३ ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वांल्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ३ ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = वृष्टौ पञ्चविधं सामोपासीत । पुरोवातो हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान् वृष्टौ पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपासीत । मेघो यत् सम्प्लवते स हिङ्कारो यद् वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपासीत । मेघो यत् सम्प्लवते स हिङ्कारो यद् वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = ऋतुषु पञ्चविधं सामोपासीत । वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनम् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात् तस्य यत्पुरोदयात् स हिङ्कारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात् ते हिङ्कुर्वन्ति हिङ्कारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात् तस्य यत्पुरोदयात् स हिङ्कारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात् ते हिङ्कुर्वन्ति हिङ्कारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात् ते प्रस्तुतिकामाः प्रशंसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥३॥ | |||
| verse_lines = अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात् ते प्रस्तुतिकामाः प्रशंसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥३॥ | |||
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| verse_text = अथ यत्सङ्गववेलायां स आदिस्तदस्य वयांस्यन्वायत्तानि तस्मात् तान्यन्तरिक्षेऽनारम्भणान्यादायात्मानं परिपतन्त्यादिभाजीनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = अथ यत्सङ्गववेलायां स आदिस्तदस्य वयांस्यन्वायत्तानि तस्मात् तान्यन्तरिक्षेऽनारम्भणान्यादायात्मानं परिपतन्त्यादिभाजीनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात् ते सत्तमाः प्राजापत्यानामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात् ते सत्तमाः प्राजापत्यानामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात् प्रागपराह्णात् स प्रतिहारस्तदस्य गर्भा अन्वायत्तास्तस्मात् ते प्रतिहृता नावपद्यन्ते प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = अथ यदूर्ध्वमपराह्णात् प्रागस्तमयात् स उपद्रवस्तदस्यारण्या अन्वायत्तास्तस्मात् ते पुरुषं दृष्ट्वा कक्षंश्वभ्रमित्युपद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = अथ यदूर्ध्वमपराह्णात् प्रागस्तमयात् स उपद्रवस्तदस्यारण्या अन्वायत्तास्तस्मात् ते पुरुषं दृष्ट्वा कक्षंश्वभ्रमित्युपद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात् तान्निदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न एवं खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ ९ ॥ | |||
| verse_lines = अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात् तान्निदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न एवं खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_text = अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपासीत हिङ्कार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपासीत हिङ्कार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = आदिरिति द्व्यक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत इहैकं तत्समम् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यते(अवशिष्यते) त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यते(अवशिष्यते) त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = एकविंशत्याऽऽदित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = एकविंशत्याऽऽदित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = आप्नोतीहादित्यस्य जयं परो हास्याऽदित्यजयाज्जयो भवति (स) य एतदेवं विद्वानात्मसम्मितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = आप्नोतीहादित्यस्य जयं परो हास्याऽदित्यजयाज्जयो भवति (स) य एतदेवं विद्वानात्मसम्मितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = मनो हिङ्कारो वाक् प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद् गायत्रं प्राणेषु प्रोतं स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या महामनाः स्यात् तद् व्रतम् ॥ १॥ ११ ॥ | |||
| verse_lines = मनो हिङ्कारो वाक् प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद् गायत्रं प्राणेषु प्रोतं स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या महामनाः स्यात् तद् व्रतम् ॥ १॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = अभिमन्थति स हिङ्कारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनं संशाम्यति तन्निधनमेतद् रथन्तमग्नौ प्रोतम् ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = अभिमन्थति स हिङ्कारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनं संशाम्यति तन्निधनमेतद् रथन्तमग्नौ प्रोतम् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स य एवमेतद् रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न प्रत्यङ्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = उपमन्त्रयते स हिङ्कारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रतिस्त्री(प्रति स्त्रिया) सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद् वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = उपमन्त्रयते स हिङ्कारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रतिस्त्री(प्रति स्त्रिया) सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद् वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनीभवति मिथुनान्मिथुनात् प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥१३॥ | |||
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| verse_lines = उद्यन् हिङ्कारः उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गीथोऽपराह्णः प्रतिहारोऽस्तं यन्निधनमेतद् बृहदादित्ये प्रोतं स य एवमेतद् बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या तपन्तं न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = अभ्राणि सम्प्लवन्ते स हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपांश्च सुरूपांश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतत् वैराजमृतुषु प्रोतं स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ऋतून् न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_lines = पृथिवी हिङ्कारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकीभवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या लोकान्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = अजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या पशून्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_text = सर्वे स्वरा इन्द्रस्याऽत्मानः सर्व ऊष्मणः प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं यदि स्वरेषूपालभेतेन्द्रं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = सर्वे स्वरा इन्द्रस्याऽत्मानः सर्व ऊष्मणः प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं यदि स्वरेषूपालभेतेन्द्रं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापतिं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिपेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येनं स्पर्शेषूपालभेत मृत्युं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापतिं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिपेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येनं स्पर्शेषूपालभेत मृत्युं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्वे ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशेनानभिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥ २२ ॥ | |||
| verse_lines = सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्वे ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशेनानभिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_text = त्रयो धर्मस्कन्धाः यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमः, तप एव द्वितीयो, ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयो, अत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = त्रयो धर्मस्कन्धाः यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमः, तप एव द्वितीयो, ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयो, अत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत् तामभ्यतपत् तस्या अभितप्ताया(तप्यमानाया) एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त । भूर्भुवः स्वरिति । तान्यभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् । तद् यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि सन्तृण्णान्येवमेतेनोङ्कारेण सर्वा वाक्सन्तृण्णोङ्कार एवेदं सर्वमोङ्कार एवेदं सर्वम् ॥ २ ॥ २३ ॥ | |||
| verse_lines = प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत् तामभ्यतपत् तस्या अभितप्ताया(तप्यमानाया) एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त । भूर्भुवः स्वरिति । तान्यभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् । तद् यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि सन्तृण्णान्येवमेतेनोङ्कारेण सर्वा वाक्सन्तृण्णोङ्कार एवेदं सर्वमोङ्कार एवेदं सर्वम् ॥ २ ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_text = ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद् वसूनां प्रातःसवनं रुद्राणां माध्यन्दिनं सवनमादित्यानां विश्वेषां देवानां च तृतीयसवनं(तृतीयं सवनं) क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात् कथं कुर्यादथ विद्वान् कुर्यात् ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद् वसूनां प्रातःसवनं रुद्राणां माध्यन्दिनं सवनमादित्यानां विश्वेषां देवानां च तृतीयसवनं(तृतीयं सवनं) क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात् कथं कुर्यादथ विद्वान् कुर्यात् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = पुरा प्रातरनुवाकस्योपकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्योदङ्मुख उपविश्य स वासवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं रा ३३३३३ हु३म् आ३३ ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानास्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै वसवः प्रातःसवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ २ ॥ २४ ॥ | |||
| verse_lines = पुरा प्रातरनुवाकस्योपकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्योदङ्मुख उपविश्य स वासवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं रा ३३३३३ हु३म् आ३३ ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानास्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै वसवः प्रातःसवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ २ ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योददङ्मुख उपविश्य स रौद्रं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं विरा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्मत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यन्दिनं सवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यं स वैश्वदेवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं ं स्वारा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यादित्यमथ वैश्वदेवं लो३कद्वारमपा३वा३वार्णू३३ पश्येम त्वा वयं साम्ना ३३३३ हू आ ३म् ३३ ज्या ३यो ३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दतैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनं(तृतीयं सवनं) सम्प्रयच्छन्ति एष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ ४॥ २४ ॥ | |||
| verse_lines = पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यं स वैश्वदेवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं ं स्वारा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यादित्यमथ वैश्वदेवं लो३कद्वारमपा३वा३वार्णू३३ पश्येम त्वा वयं साम्ना ३३३३ हू आ ३म् ३३ ज्या ३यो ३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दतैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनं(तृतीयं सवनं) सम्प्रयच्छन्ति एष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ ४॥ २४ ॥ | |||
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<span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयोऽध्यायः"></span> | ||
== तृतीयोऽध्यायः == | == तृतीयोऽध्यायः == | ||
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| verse_text = ओम् असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवंशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्य ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्य ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो मधुनाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमृता आपः॥१॥ | |||
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| verse_lines = ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीयमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयस्ता एवास्योर्ध्वा मधुनाड्यो गुह्या एवाऽदेशा मधुकृतो ब्रह्मैव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = तद् यत् प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स य एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवैको भूत्वेन्द्रेणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥३॥ | |||
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| verse_lines = स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्विस्तावद् दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = त एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स यावदादित्यः पश्चादुतेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥४॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = अथ यत्पञ्चमममृतं तत् साध्याः उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स यावदादित्यः उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्वं उदेताऽर्वाङस्तमेता साध्यानामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = न वै तत्र न निम्लोचो नोदियाय कदाचन । | |||
| verse_lines = न वै तत्र न निम्लोचो नोदियाय कदाचन ।;देवास्तेनाहं सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति च एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति च एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = तद्धैतद् ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्धैतदुद्दालकायाऽरुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = इदं वा व तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात् प्रणाय्याय वाऽन्तेवासिने ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = इदं वा व तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात् प्रणाय्याय वाऽन्तेवासिने ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥ ६ ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च वाग् वै गायत्री वाग् वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च वाग् वै गायत्री वाग् वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यस्यां हीदं सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयन्ते ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे हृदयमस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः ।;पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = अयं वाव स योयमन्तः पुरुष आकाशो यो वै सोन्तः पुरुष आकाशः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशो यो वै सोऽन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत् पूर्णमप्रवर्ति पूर्णामप्रवर्तिनीं श्रियं लभेत य एवं वेद ॥ ९ ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ्सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेतत् तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रं स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत श्रीमान् यशस्वी भवति य एवं वेद ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ योऽस्य प्रत्यङ्सुषिः सोऽपानः सा वाक् सोऽग्निस्तदेतद् ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥३॥ | |||
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| verse_lines = अथ योऽस्योदङ् सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेत् कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान् व्युष्टिमान् भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महस्वान् भवति य एवं वेद ॥५॥ | |||
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| verse_text = ते वा एते पञ्चब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = ते वा एते पञ्चब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = अस्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद । अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद् यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिस्तस्यैषा दृष्टिः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = अस्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद । अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद् यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिस्तस्यैषा दृष्टिः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसङ्कल्पः आकाश आत्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसङ्कल्पः आकाश आत्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद् वा श्यामाकाद् वा श्यामकतण्डुलाद् वा एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥३॥ | |||
| verse_lines = एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद् वा श्यामाकाद् वा श्यामकतण्डुलाद् वा एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥३॥ | |||
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| verse_text = अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलं स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन् सर्वमिदं (विश्वमिदं) श्रितम् ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलं स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन् सर्वमिदं (विश्वमिदं) श्रितम् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = तस्य प्राची दिक् जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदं रुदम् ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = तस्य प्राची दिक् जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदं रुदम् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = अथ(स) यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च तमेव तत् प्रापत्सि ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिनं सवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनं सवनं चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप् त्रैष्टुभं मान्धन्दिनं सवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीदं सर्वं रोदयन्ति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ यान्यष्टा(अष्ट .हृ)चत्वारिंशद्वर्षाणि तत् तृतीयसवनमष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वाव आदित्या एते हीदं सर्वमाददते ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत् स ह(प्राह) षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७ ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_text = अथ यत् तपो दानमार्जवमहिंसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = आदित्प्रत्नस्य रेतसो ज्योतिष्पश्यन्ति वासरम् । परो यदिध्यते दिवा । उद् वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरम् । स्वः पश्यन्त उत्तरम् देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥ इत्यगन्म ज्योतिरुत्तममिति ॥ ७ ॥ १७ ॥ | |||
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<span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थाध्यायः"></span> | <span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थाध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = जानश्रुतिर्हि पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य (बहुवाक्य) आस। स ह सर्वत आवसथान् मापयाञ्चक्रे सर्वत एव मेऽत्स्यन्तीति ॥१॥ | |||
| verse_lines = जानश्रुतिर्हि पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य (बहुवाक्य) आस। स ह सर्वत आवसथान् मापयाञ्चक्रे सर्वत एव मेऽत्स्यन्तीति ॥१॥ | |||
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| verse_text = अथ ह हंसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवं हंसो हंसमभ्युवाद होहोयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत् त्वा मा प्रधाक्षीरिति ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = अथ ह हंसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवं हंसो हंसमभ्युवाद होहोयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत् त्वा मा प्रधाक्षीरिति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = तमु ह परः प्रत्युवाच कम्वर एनमेतत्सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = तमु ह परः प्रत्युवाच कम्वर एनमेतत्सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद् वेद यत् स वेद स(वेद सर्वं स) मयैतदुक्त इति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव स ह संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्गारे ह सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत् स वेद स सर्वं मयैतदुक्त इति ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = स ह क्षत्ताऽन्विष्य नाविदमिति प्रत्येया तं स होवाच यत्रारे ब्राह्मणस्यान्वेषणा तदेनमृच्छेति ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तं हाभ्युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यहं ह्यरा३ इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताऽन्विष्याविदमिति प्रत्येयाय ॥ ८ ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = रैक्वेमानि षट् शतानि गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथोऽनु म एतां भगवो देवतां शाधि यां देवतामुपास्स इति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति तदुह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = तं हाभ्युवाद रैक्वेदं सहस्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायाऽयं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाऽजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनाऽलापयिष्यथा इति ते हैते रैक्वपर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास तस्मै स होवाच ॥ ५ ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = वायुर्वाव संवर्गो यदा वा महाप्रलये अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = वायुर्वाव संवर्गो यदा वा महाप्रलये अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = यदाऽऽप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्ह्येवैतान् सर्वान् संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = यदाऽऽप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्ह्येवैतान् सर्वान् संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान् सर्वान् संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी बिभिक्षे तस्मा उ ह न ददतुः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः सो जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय नाभिपश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन् बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः सो जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय नाभिपश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन् बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायाऽत्मा देवानां जनिता प्रजानां हिरण्यदंष्ट्रो बभसोऽनसूरिः। महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्निदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायाऽत्मा देवानां जनिता प्रजानां हिरण्यदंष्ट्रो बभसोऽनसूरिः। महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्निदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतं तस्मात् सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दश कृतं सैषा विराडन्नादी तयेदं सर्वं दृष्टं सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतं तस्मात् सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दश कृतं सैषा विराडन्नादी तयेदं सर्वं दृष्टं सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयाञ्चक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किङ्गोत्रो न्वहमस्मीति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयाञ्चक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किङ्गोत्रो न्वहमस्मीति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साऽहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि(त्वमसीति स त्वं जाबालः .हृ) स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = स ह हारिद्रुमन्तं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्यं भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = हंसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ् उपोपविवेश ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = हंसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ् उपोपविवेश ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = तं हंस उपनिपत्याभ्युवाद सत्यकामा३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत् कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत् कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिंल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकान् जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिंल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकान् जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = मद्गुष्टे(मद्गुः ते) पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ् उपोपविवेश ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद सत्यकामा३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राणः कला चक्षुः कला श्रोत्रं कला मनः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते आयतनवानस्मिंल्लोके भवत्यातनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः आयतनवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वाऽनुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवांस्त्वेव मे कामे ब्रूयात् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्य आचार्यद्ध्येव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयतीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किञ्चन वीयायेति वीयायेति ॥ ३ ॥ ९ ॥ | |||
| verse_lines = श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्य आचार्यद्ध्येव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयतीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किञ्चन वीयायेति वीयायेति ॥ ३ ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_text = उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास तस्य ह द्वादश वर्षाण्यग्नीन् परिचचार स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयंस्तं ह स्मैव न समावर्तयति ॥१॥ | |||
| verse_lines = उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास तस्य ह द्वादश वर्षाण्यग्नीन् परिचचार स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयंस्तं ह स्मैव न समावर्तयति ॥१॥ | |||
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| verse_text = तं जायोवाच तप्तो ब्रह्मचारी कुशलमग्नीन् परिचचारीन् मा त्वाऽग्नयः परिप्रवोचन् प्रब्रूह्यस्मा इति तस्मै हाप्रोच्यैव प्रवासाञ्चक्रे ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = तं जायोवाच तप्तो ब्रह्मचारी कुशलमग्नीन् परिचचारीन् मा त्वाऽग्नयः परिप्रवोचन् प्रब्रूह्यस्मा इति तस्मै हाप्रोच्यैव प्रवासाञ्चक्रे ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = स ह व्याधिनाऽनशितुं दध्रे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिन्नशान किं नु नाश्नासीति स होवाच बहव इमेऽस्मिन्(बहवो ह्यस्मिन् .हृ) पुरुषे कामा नानात्यया व्याधिभिः परिपूर्णोऽस्मि(प्रतिपूर्णोऽस्मि) नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = स ह व्याधिनाऽनशितुं दध्रे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिन्नशान किं नु नाश्नासीति स होवाच बहव इमेऽस्मिन्(बहवो ह्यस्मिन् .हृ) पुरुषे कामा नानात्यया व्याधिभिः परिपूर्णोऽस्मि(प्रतिपूर्णोऽस्मि) नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ हाग्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं नः (परि चचारीत्)पर्यचचारीद्धन्तास्मै प्रब्रवामेति तस्मै होचुः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इति य एष आदित्ये पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मैतस्मिन्न किञ्चन श्लिष्यति तद् यदस्मिन् सर्पिवोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्यतरामेव वर्तनीं संस्कुर्वन्ति हीयतेऽन्यतरा स यथैकपाद् व्रजन् रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यत्येवमस्य यज्ञो रिष्यति यज्ञं रिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति स इष्ट्वा पापीयान् भवति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यवदत्युभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यवदत्युभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = स यथोभयपाद् व्रजन् रथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान् भवति ॥ ५ ॥ १६ ॥ | |||
| verse_lines = स यथोभयपाद् व्रजन् रथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान् भवति ॥ ५ ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_text = प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेषां तप्यमानानां रसान् (प्रावहद्)प्राबृहद् अग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षादादित्यं दिवः ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेषां तप्यमानानां रसान् (प्रावहद्)प्राबृहद् अग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षादादित्यं दिवः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत् तासां तप्यमानानां रसान् प्राबृहद्(प्रावृहद्)अग्नेर्ऋचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत् तस्यास्तप्यमानाया रसान् प्राबृहद्(प्रावृहद्) भूरित्यृग्भ्यो भुव इति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = तद् यद्यृक्तो रिष्येद् भूः स्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयाद् ऋचामेव तद्रसेनर्चां वीर्येणर्चां यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ यदि यजुष्टो रिष्येद् भुवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयाद् यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ यदि सामतो रिष्येत् स्वः स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात् साम्नामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = तद् यथा लवणेन सुवर्णं सन्दध्यात् सुवर्णेन रजतं रजतेन त्रपु त्रपुणा सीसं सीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविद् ब्रह्मा भवति ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद् ब्रह्मा भवत्येवंविदं ह वा एषा ब्रह्माणमनुगाथा यतो यत आवर्तते तत्तद् गच्छति ॥;मानवो ब्रह्मैवैकर्त्विक् कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥ ९ ॥ १७ ॥ | |||
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<span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमोऽध्यायः"></span> | ||
== पञ्चमोऽध्यायः == | == पञ्चमोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग् वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = यो ह वै सम्पदं वेद सं हास्मै कामाः सम्पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव सम्पत् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = अथ ह प्राणा अहं श्रेयसि व्यूदिरेऽहं श्रेयानस्म्यहं श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन् को नः श्रेष्ठ इति तान् होवाच यस्मिन् व उत्क्रान्ते इदं शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन् को नः श्रेष्ठ इति तान् होवाच यस्मिन् व उत्क्रान्ते इदं शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = सा ह(च) वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथाऽकला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चचक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथाऽन्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रोत्रं होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिराः अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ ह प्राणः उच्चिक्रमिषन् स यथा सुहयः पट्वीशशङ्कून् सङ्खिदेदेवमितरान् प्राणान् समाखिदत् तं हाभिसमेत्योेचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठाऽस्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसीति ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ हैनं श्रोत्रमुवाच यदहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीत्यथ हैनं मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_text = न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किञ्चिदिदमाश्वभ्य आशकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किञ्चनानन्नं भवतीति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = तद्धैतत् सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये (वैय्याघ्र .हृ)वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = श्वेतकेतुर्हाऽरुणेयः पञ्चालानां समितिमेयाय तं ह प्रवाहणो जैबलिरुवाच कुमारानु(कुमार .हृ) त्वाऽशिषत्(अनुशिषत् .हृ) पितेत्यनु हि भगव इति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति न भगव इति वेत्थ यथा पुनरावर्तन्ता३ इति न भगव इति वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति न भगव इति ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति न भगव इति वेत्थ यथा पुनरावर्तन्ता३ इति न भगव इति वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति न भगव इति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = वेत्थ यथाऽसौ लोको न सम्पूर्यता३ इति न भगव इति वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति इति नैव भगव इति ॥३॥ | |||
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| verse_text = अथ नु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात् कथं सोऽनुशिष्टो ब्रवीतेति स हाऽयस्तः पितुरर्धमेयाय तं होवाचाननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाऽशिषमिति ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = अथ नु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात् कथं सोऽनुशिष्टो ब्रवीतेति स हाऽयस्तः पितुरर्धमेयाय तं होवाचाननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाऽशिषमिति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत् तेषां नैकं च नाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं (तत .रा)तातैतानवदो यथाऽहमेषां नैकं च न वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत् तेषां नैकं च नाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं (तत .रा)तातैतानवदो यथाऽहमेषां नैकं च न वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हाञ्चकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तं होवाच मानुषस्य भगवान् गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति स होवाच तवैव राजन् मानुषं वित्तं यामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तामेव मे ब्रूहीति स ह कृच्छ्री बभूव॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हाञ्चकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तं होवाच मानुषस्य भगवान् गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति स होवाच तवैव राजन् मानुषं वित्तं यामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तामेव मे ब्रूहीति स ह कृच्छ्री बभूव॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = तं ह चिरं वसेत्याज्ञापयाञ्चकार तं होवाच यथा मा त्वं गौतमावदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान् गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ॥ ७ ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्याऽदित्य एव समिद् रश्मयो धूमोऽहरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = पर्जन्यो वा गौतमाग्निः तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादुनयो विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = पृथिवी वाव गौतमाग्निः तस्य संवत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रिरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = पृथिवी वाव गौतमाग्निः तस्य संवत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रिरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव समित् प्राणो धूमो जिह्वाऽर्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = योषा वाव गौतमाग्निः तस्या उपस्थ एव समिद् यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा मासानन्तः शयित्वा यावद्वाऽथ जायते ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा मासानन्तः शयित्वा यावद्वाऽथ जायते ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = स जातो यावदायुषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः सम्भूतो भवति ॥ २ ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = तद्य इत्थं विदुर्ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युुपासते तेऽर्चिषमभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षडुुदङ् एति मासांस्तान् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो मानवः स एतान् ब्रह्म गमयत्येष देवयानः पन्था इति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद् रात्रिं रात्रेरपरपक्षमपरपक्षाद् यान् षड् दक्षिणैति मासांस्तान्नैते(मासांस्तानेति .हृ) संवत्सरमभिप्राप्नुवन्ति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमसमेष सोमो राजा तद्देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिला माषा इति जायन्ते ततो वै खलु दुर्निष्प्रपतनं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिला माषा इति जायन्ते ततो वै खलु दुर्निष्प्रपतनं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाऽथ य इह कपूरचरणाः अभ्याशो ह (एते)यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = अथैतयोः पथोर्नैकतरेण(पथोर्न कतरेण .हृ) च न तानीमानि क्षुद्रमिश्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत् तृतीयं स्थानं तेनासौ लोको न सम्पूर्यते तस्माज्जुगुप्सेत तदेषश्लोकः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_text = तान् होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्ताऽस्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्ने प्रतिचक्रमिरे तान् हानुपनीयैवैतदुवाच ॥ ७ ॥ ११ ॥ | |||
| verse_lines = तान् होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्ताऽस्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्ने प्रतिचक्रमिरे तान् हानुपनीयैवैतदुवाच ॥ ७ ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुषिं प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्ट्वेतदात्मन इति होवाचान्धोऽभविष्यो (यद्) यन्मां नाऽगमिष्य(तः) इति ॥ २ ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_text = अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै पृथग्वर्त्माऽऽत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वां पृथग्वलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम कं त्वमात्मानमुपास्स इति पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै प्रतिष्ठाऽऽत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्य ह वा एतस्याऽत्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मा सन्दोहो बहुलो वस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥ २ ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_lines = तद्यद् भक्तं प्रथममागच्छेत् तद्धोमीयं स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात् तां जुहुयात् प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृप्यति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = अपाने तृप्यति वाक् तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किञ्च पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = तद् यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मनः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते ।;एवं सर्वाणि भूतान्याग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत ॥ इति ॥ ५ ॥ ११२४ ॥ | |||
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<span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठोऽध्यायः"></span> | ||
== षष्ठोऽध्यायः == | == षष्ठोऽध्यायः == | ||
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| verse_text = स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तं ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तं ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति । कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद् वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद् वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्याद् वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं लोहमणिरित्येव सत्यम् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्याद् वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं लोहमणिरित्येव सत्यम् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्याद् वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं कार्ष्णायसमित्येव सत्यमेवं सोम्य स आदेशो भवतीति ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = न वै नूनं भगवन्तस्य(भगवंस्तस्य) एतदवेदिषुर्यद्येतद्(यद्ध्येतत्) अवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवांस्त्वेव मे तद् ब्रवीत्विति यथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = न वै नूनं भगवन्तस्य(भगवंस्तस्य) एतदवेदिषुर्यद्येतद्(यद्ध्येतत्) अवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवांस्त्वेव मे तद् ब्रवीत्विति यथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत इति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत इति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति सत् त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय इति तत् तेजोऽसृजत तत्तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत तस्माद्यत्र क्व च शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तद्ध्यापो जायन्ते ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भवन्त्यण्डजं(भवन्त्याण्डजं) जीवजमुद्भिज्जमिति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद् यथा तु(नु) खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ३ ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं, यच्छुक्लं तदपां, यत् कृष्णं तदन्नस्यापगादग्नेरग्नित्वं वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं, यच्छुक्लं तदपां, यत् कृष्णं तदन्नस्यापगादग्नेरग्नित्वं वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ते ह्येभ्यो विदञ्चक्रुः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद् विदाञ्चक्रुर्यदु शुक्लमिवाभूदित्यपां रूपमिति तद् विदाञ्चक्रुर्यदु कृष्णमिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद् विदाञ्चक्रुः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्वविज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवानां समास इति तद्विदाञ्चक्रुर्यथा तु(नु) खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ७ ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥४॥५॥ | |||
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| verse_text = तेजसः सोम्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग् भवति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_text = उद्दालको हाऽरुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः(यत्रायं पुरुषः .शाखान्तरपाठः) स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = उद्दालको हाऽरुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः(यत्रायं पुरुषः .शाखान्तरपाठः) स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धः दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयत(उपश्रयते .श) एवमेव खलु सोम्यैतन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्राऽयतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते(उपाश्रयते .श) प्राणबन्धनं हि सोम्य मन इति ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धः दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयत(उपश्रयते .श) एवमेव खलु सोम्यैतन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्राऽयतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते(उपाश्रयते .श) प्राणबन्धनं हि सोम्य मन इति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = अशनापिपासे(अशनायापिपासे) मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = अशनापिपासे(अशनायापिपासे) मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यान्नेन शुङ्गेनापोमूलमन्विच्छद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यान्नेन शुङ्गेनापोमूलमन्विच्छद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भ्यः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ ८ ॥ | |||
| verse_lines = स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_text = यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणां रसानां(रसान् .पा) समवहारमेकतांं गमयन्ति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणां रसानां(रसान् .पा) समवहारमेकतांं गमयन्ति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यत् भवन्ति तत्तदा भवन्ति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = स एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ(ऽ)तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_text = इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात् प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात् प्रतीच्यस्ताः समुद्रात् समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात् प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात् प्रतीच्यस्ताः समुद्रात् समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामहे इति त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यद् भवन्ति तत् तदा भवन्ति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियत इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ ११ ॥ | |||
| verse_lines = जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियत इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = न्यग्रोधफलमत आहरेति इदं भगव इति भिन्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = न्यग्रोधफलमत आहरेति इदं भगव इति भिन्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = तं होवाच यं वै सौम्य एतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्नः एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धस्व सोम्येति ॥२॥ | |||
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| verse_lines = लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह(तद्ध) तथा चकार तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = अथ स यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येनाऽत्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = अथ स यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येनाऽत्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = स यथा तत्र (नादाह्येत)न दाह्येत एतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति तद्धास्य विजज्ञाविति । (इत आरभ्य खण्डान्तं वेदेशियटीकानुसारेण उपनिषदि दृश्यमानोऽधिकः पाठः। अयं श्रीराघवेन्द्रतीर्थीयटीकानुसारी न इत्यवगन्तव्यम्। हृषीकेशतीर्थीयेऽपि पाठोऽयं न दृश्यते) (सर्वेषां खलु भुतानामात्मा सत्ये प्रतिष्ठितः। तेनाऽत्मानमन्तर्धाय न किञ्चित् पापमृच्छति। आत्मा सत्य आत्मा साक्षी सतां धर्मः प्रतापवान् । न स पापानि कुरुते यस्याऽत्मा भवति प्रियः।जायत्येको म्रियत्येकोऽश्नात्येकः शुभाशुभम्॥ इति॥ | |||
| verse_lines = स यथा तत्र (नादाह्येत)न दाह्येत एतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति तद्धास्य विजज्ञाविति । (इत आरभ्य खण्डान्तं वेदेशियटीकानुसारेण उपनिषदि दृश्यमानोऽधिकः पाठः। अयं श्रीराघवेन्द्रतीर्थीयटीकानुसारी न इत्यवगन्तव्यम्। हृषीकेशतीर्थीयेऽपि पाठोऽयं न दृश्यते) (सर्वेषां खलु भुतानामात्मा सत्ये प्रतिष्ठितः। तेनाऽत्मानमन्तर्धाय न किञ्चित् पापमृच्छति। आत्मा सत्य आत्मा साक्षी सतां धर्मः प्रतापवान् । न स पापानि कुरुते यस्याऽत्मा भवति प्रियः।जायत्येको म्रियत्येकोऽश्नात्येकः शुभाशुभम्॥ इति॥;तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति। तदेश श्लोकः-;सर्वभूतात्मभूतेभ्यः सम्यग् भूतानि पश्यतो देवा अपि मार्गे मुह्यन्ति पदज्ञानात् पदैषिणः इति। पदज्ञानात् पदैषिण इति)॥ ३ ॥ १६ ॥ | |||
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<span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमोऽध्यायः"></span> | ||
== सप्तमोऽध्यायः == | == सप्तमोऽध्यायः == | ||
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| verse_text = ओम् अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदस्तं होवाच यद् वेत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति स होवाच ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = ओम् अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदस्तं होवाच यद् वेत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति स होवाच ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यामेतद् भगवोऽध्येमि ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यामेतद् भगवोऽध्येमि ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तन्मा भगवांञ्च्छोकस्य पारं तारयत्विति तं होवाच यद्वै किञ्चैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तन्मा भगवांञ्च्छोकस्य पारं तारयत्विति तं होवाच यद्वै किञ्चैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = नाम वा ऋग्वेदः यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमः वेदानां वेदः पित्र्यो राशिर्दैवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्मविद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्या नामैवैतन्नामोपास्वेति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो नाम ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो (वाग्वा)वावा भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ५ ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो नाम ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो (वाग्वा)वावा भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ५ ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = वाग्वाव नाम्नो भूयसी वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयति यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाऽकाशं चाऽपश्च तेजश्च देवांश्च मनुष्यांश्च पशूंश्च वयांसि च तृणवनस्पतीञ्च्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं च यद्वै वाङ् नाभविष्यन्न धर्मो नाधर्मो व्यज्ञापयिष्यन्न सत्यं नानृतं न साधु नासाधु न हृदयज्ञो वागेवैतत् सर्वं विज्ञापयति वाचमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = वाग्वाव नाम्नो भूयसी वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयति यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाऽकाशं चाऽपश्च तेजश्च देवांश्च मनुष्यांश्च पशूंश्च वयांसि च तृणवनस्पतीञ्च्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं च यद्वै वाङ् नाभविष्यन्न धर्मो नाधर्मो व्यज्ञापयिष्यन्न सत्यं नानृतं न साधु नासाधु न हृदयज्ञो वागेवैतत् सर्वं विज्ञापयति वाचमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो वाचो भूय इति वाचो भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वाऽऽमलके द्वे वा कोले द्वौ वाऽक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम च मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि कुर्वीयेत्यथ कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वाऽऽमलके द्वे वा कोले द्वौ वाऽक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम च मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि कुर्वीयेत्यथ कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते स यावन्मनसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो मनो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो मनसो भूय इति मनसो भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = सङ्कल्पो वाव मनसो भूयान् यदा वै सङ्कल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = विज्ञानं वाव ध्यानाद् भूयो विज्ञानेन वा ऋग्वेदं विजानाति यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाकाशं चापश्च तेजश्च देवांश्च मनुष्यांश्च पशूंश्च वयांसि च तृणवनस्पतीञ्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं चान्नं च रसं चेमं च लोकममुं च विज्ञानेनैव विजानाति विज्ञानमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = बलं वाव विज्ञानाद् भूयोऽपीह शतं विज्ञानवतामेको बलवानाकम्पयते स यदा बली भवत्यथोत्थाता भवत्युत्तिष्ठन् परिचरिता भवति परिचरन्नुपसत्ता भवत्युपसीदन् द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवति बलेन वै पृथिवी तिष्ठति बलेनान्तरिक्षं बलेन द्यौर्बलेनापो बलेन पर्वता बलेन देवमनुष्या बलेन पशवश्च वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं बलेन वै लोकस्तिष्ठति बलमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद् बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद् भूय इति बलाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ८ ॥ | |||
| verse_lines = बलं वाव विज्ञानाद् भूयोऽपीह शतं विज्ञानवतामेको बलवानाकम्पयते स यदा बली भवत्यथोत्थाता भवत्युत्तिष्ठन् परिचरिता भवति परिचरन्नुपसत्ता भवत्युपसीदन् द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवति बलेन वै पृथिवी तिष्ठति बलेनान्तरिक्षं बलेन द्यौर्बलेनापो बलेन पर्वता बलेन देवमनुष्या बलेन पशवश्च वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं बलेन वै लोकस्तिष्ठति बलमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद् बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद् भूय इति बलाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_text = स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद् बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद् भूय इति बलाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ८ ॥ | |||
| verse_lines = स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद् बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद् भूय इति बलाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_text = अन्नं वाव बलाद् भूयस्तस्माद् यद्यपि दशरात्रीर्नाश्नीयाद् यदु ह जीवेऽदथवाऽद्रष्टाऽश्रोताऽमन्ताऽबोद्धाऽकर्ताऽविज्ञाता भवत्यथान्नस्याशी द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवत्यन्नमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = अन्नं वाव बलाद् भूयस्तस्माद् यद्यपि दशरात्रीर्नाश्नीयाद् यदु ह जीवेऽदथवाऽद्रष्टाऽश्रोताऽमन्ताऽबोद्धाऽकर्ताऽविज्ञाता भवत्यथान्नस्याशी द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवत्यन्नमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽन्नवतो वै स लोकान् पानवतोऽभिसिद्ध्यति यावत् अन्नस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽन्नात् भूय इत्यन्नाद् वाव भूयोस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_text = आपो वावान्नाद् भूयस्यस्तस्माद् यदा सुवृष्टिर्न भवति व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो भविष्यतीत्यथ यदा सुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहु भविष्यतीत्याप एवेमा मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्षं यद् द्यौर्यत् पर्वता यद् देवमनुष्या यत् पशवश्च वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकमाप एवेमा मूर्ता अप उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = आपो वावान्नाद् भूयस्यस्तस्माद् यदा सुवृष्टिर्न भवति व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो भविष्यतीत्यथ यदा सुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहु भविष्यतीत्याप एवेमा मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्षं यद् द्यौर्यत् पर्वता यद् देवमनुष्या यत् पशवश्च वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकमाप एवेमा मूर्ता अप उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्ते आप्नोति सर्वान् कामांस्तृप्तिमान् भवति यावदपां गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽपो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो अद्भ्य भूय इति अद्भ्यो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्ते आप्नोति सर्वान् कामांस्तृप्तिमान् भवति यावदपां गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽपो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो अद्भ्य भूय इति अद्भ्यो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = तेजो वावाद्भ्यो भूयस्तद्वा एतद् वायुमागृह्याकाशमभितपति तदाऽऽहुर्निशोचति नितपति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तदेतदूर्ध्वाभिश्च तिरश्चीभिश्च विद्युदि्भराह्रादाश्चरन्ति तस्मादाहुर्विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = तेजो वावाद्भ्यो भूयस्तद्वा एतद् वायुमागृह्याकाशमभितपति तदाऽऽहुर्निशोचति नितपति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तदेतदूर्ध्वाभिश्च तिरश्चीभिश्च विद्युदि्भराह्रादाश्चरन्ति तस्मादाहुर्विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वै स तेजस्वतो लोकान् भास्वतोऽपहततमस्कानभिसिद्ध्यति यावत्तेजसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो तेजसो भूय इति तेजसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निराकाशेन आह्वयत्याकाशेन शृृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निराकाशेन आह्वयत्याकाशेन शृृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = स्मरो वा आकाशाद् भूयांस्तस्माद् यद्यपि बहव आसीरन्नस्मरन्तो नैव ते कञ्चन शृणुयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन् यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन् स्मरेण वै पुत्रान् विजानाति स्मरेण पशूं स्मरमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = प्राणो वा आशाया भूयान् यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्वं समर्पितं प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्च्छूलेन समासं व्यतिषं दहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहाऽसीति न मातृहाऽसीति न भ्रातृहाऽसीति न स्वसृहाऽसीति नाचार्यहाऽसीति न ब्राह्मणहाऽसीति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेव ब्रवीमीति होवाचान्यो ह्यन्यस्मिन् प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥ २४ ॥ | |||
| verse_lines = गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेव ब्रवीमीति होवाचान्यो ह्यन्यस्मिन् प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_text = स एवाधस्तात् स उपरिष्टात् स पश्चात् स पुरस्तात् स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेदं सर्वमिति। | |||
| verse_lines = स एवाधस्तात् स उपरिष्टात् स पश्चात् स पुरस्तात् स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेदं सर्वमिति।;अथातोऽहङ्कारादेशो एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेदं सर्वमिति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = अथात आत्मादेश एवाऽत्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदं सर्वमिति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराड् भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवत्यथ येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥ २५ ॥ | |||
| verse_lines = अथात आत्मादेश एवाऽत्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदं सर्वमिति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराड् भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवत्यथ येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥ २५ ॥ | |||
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| verse_text = तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आशाऽऽत्मतः स्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्मत आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमात्मतो विज्ञानमात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतः सङ्कल्पः आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामाऽत्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेदं सर्वमिति ॥१॥ | |||
| verse_lines = तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आशाऽऽत्मतः स्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्मत आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमात्मतो विज्ञानमात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतः सङ्कल्पः आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामाऽत्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेदं सर्वमिति ॥१॥ | |||
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| verse_text = तदेष श्लोकः- | |||
| verse_lines = तदेष श्लोकः-;न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताम् । सर्वं ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति ॥;स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः । शतं च दश चैकं च सहस्राणि च विंशतिः ॥;आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः । स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारं दर्शयति देवर्षये नारदाय भगवान् सनत्कुमारस्तं स्कन्द इत्याचक्षते तं स्कन्द इत्याचक्षते ॥ २ ॥ २६ ॥ | |||
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<span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमोऽध्यायः"></span> | ||
== अष्टमोऽध्यायः == | == अष्टमोऽध्यायः == | ||
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| verse_text = ओम् अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = ओम् अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = तं चेद् ब्रूयुर्यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद् वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = तं चेद् ब्रूयुर्यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद् वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = यावान् वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन् समाहितमिति ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = यावान् वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन् समाहितमिति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = तं चेद् ब्रूयुरस्मिंश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितं सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदैनं जराऽ(यदैतज्जरा .प्र)वाप्नोति प्रध्वंसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = तं चेद् ब्रूयुरस्मिंश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितं सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदैनं जराऽ(यदैतज्जरा .प्र)वाप्नोति प्रध्वंसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत् सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत् सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य इहाऽत्मानमननुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान् कामां स्तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवत्यथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान् कामां स्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ६ ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ यदि मातृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन मातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ यदि भ्रातृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य भ्रातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन भ्रातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन् न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानास्तद्यथापि हिरण्यनिधिं निहतमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वा प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन् न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानास्तद्यथापि हिरण्यनिधिं निहतमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वा प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तं हृद्ययमिति तस्माद्धृदयमहरहर्वा एवंवित् स्वर्गं लोकमेति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसम्भेदाय नैतंसेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुष्कृतं सर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ यदनाशकायनमित्यचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते । | |||
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| verse_text = तद् य एवैतावरं च वै ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ४ ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = तद् य एवैतावरं च वै ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ४ ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष पीत एष लोहितः ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष पीत एष लोहितः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छतीमं चामुं चैवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते त आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छतीमं चामुं चैवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते त आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्यासु तदा नाडीषु सृप्तो भवति तं न कश्चन पाप्मा स्पृशति तेजसा हि तदा सम्पन्नो भवति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ यत्रैतदबलिमानं नीतो भवति तमभित आसीना आहुर्जानासि मां जानासि मामिति स यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति तावज्जानाति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = अथ यत्रैतस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वं आक्रमते स ओमितिवाहोद्वामीयते स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = अथ यत्रैतस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वं आक्रमते स ओमितिवाहोद्वामीयते स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = तदेष श्लोकः;शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।;तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ् अन्या उत्क्रमणे भवन्ति उत्क्रमणे भवन्ति ॥ ६ ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति स सर्वांश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति स सर्वांश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामानितीन्द्रो ह वै देवानामभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणां तौ हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापतिसकाशमाजग्मतुः ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामानितीन्द्रो ह वै देवानामभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणां तौ हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापतिसकाशमाजग्मतुः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = तौ ह द्वात्रिंशतं वर्षाणि प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्ताववास्तामिति तौ होचतुर्य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह भगवतो वचो हरन्तो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = तौ ह द्वात्रिंशतं वर्षाणि प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्ताववास्तामिति तौ होचतुर्य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह भगवतो वचो हरन्तो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽन्तरक्षणि(अन्तरक्षिणि) पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेत्यथ योऽयं भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादर्शे कतम एष इत्येष(व) उ एवैषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायत इति होवाच ॥ ४ ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानीथस्तन्मे प्रब्रूतमिति तौ होदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानीथस्तन्मे प्रब्रूतमिति तौ होदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामिति तौ ह साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = तौ होचतुर्यथैवेदमावां भगवः साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ स्व एवमेवेमौ भगवः साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृताविति एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति तौ ह शान्तहृदयौ प्रवव्रजतुः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = तौ होचतुर्यथैवेदमावां भगवः साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ स्व एवमेवेमौ भगवः साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृताविति एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति तौ ह शान्तहृदयौ प्रवव्रजतुः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचानुपलभ्याऽत्मानमननुविद्य व्रजतो यतर एतदुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वाऽसुरा वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्तहृदय एव विरोचनोऽसुरान् जगाम तेभ्यो हैतामुपनिषदं प्रोवाचात्मैवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महय्यन्नात्मानं परिचरन्नुभौ लोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचानुपलभ्याऽत्मानमननुविद्य व्रजतो यतर एतदुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वाऽसुरा वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्तहृदय एव विरोचनोऽसुरान् जगाम तेभ्यो हैतामुपनिषदं प्रोवाचात्मैवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महय्यन्नात्मानं परिचरन्नुभौ लोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादप्यद्येहाददानमश्रद्दधानमयजमानमाहुरासुरो बतेत्यसुराणां ह्येषोपनिषत् प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसनेनालङ्कारेणेति संस्कुवर्न्त्येतेन ह्यमुं लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥ ५ ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_text = अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद् भयं ददर्श यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद् भयं ददर्श यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = नाहमत्र भोज्यं पश्यामीति स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन् यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः सार्धं विरोचनेन किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोज्यं पश्यमीति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = न वधेनास्य हन्यते नास्य स्रामेण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोज्यं पश्यामीति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = मघवन् मर्त्यं वाव इदं शरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्याऽत्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = मघवन् मर्त्यं वाव इदं शरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्याऽत्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत् स्तनयित्नुरशरीराण्येतानि तद् यथैतान्यमुष्मादकाशात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत् स्तनयित्नुरशरीराण्येतानि तद् यथैतान्यमुष्मादकाशात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः स यत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वाऽज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरं स यथा प्रायोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्छरीरे प्राणो युक्तः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः स यत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वाऽज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरं स यथा प्रायोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्छरीरे प्राणो युक्तः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = अथ यत्रैतदाकाशमनुविषण्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माऽभिव्याहाराय वागथ यो वेदेदं शृणवानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = अथ यत्रैतदाकाशमनुविषण्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माऽभिव्याहाराय वागथ यो वेदेदं शृणवानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा(मननाय) मनोऽस्य दैवं चक्षुः स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा(मननाय) मनोऽस्य दैवं चक्षुः स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = य एते ब्रह्मलोके तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात् तेषां सर्वे च लोकाः आत्ताः सर्वे च कामाः सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच ॥ ६ ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = य एते ब्रह्मलोके तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात् तेषां सर्वे च लोकाः आत्ताः सर्वे च कामाः सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच ॥ ६ ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छयामं प्रपद्येऽश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात् प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसम्भवामीत्यभिसम्भवामीति ॥ १॥ १३ ॥ | |||
| verse_lines = श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छयामं प्रपद्येऽश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात् प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसम्भवामीत्यभिसम्भवामीति ॥ १॥ १३ ॥ | |||
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| verse_text = आकाशो वै नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद् ब्रह्म तदमृतं स आत्मा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवानि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशो विशां यशोऽहमनुप्रापत्सि स हाहं यशसां यशः श्वेतमदत्कमदत्कं श्वेतं लिन्दुमाऽभिगां लिन्दुमाऽभिगाम् ॥ १॥ १४ ॥ | |||
| verse_lines = आकाशो वै नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद् ब्रह्म तदमृतं स आत्मा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवानि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशो विशां यशोऽहमनुप्रापत्सि स हाहं यशसां यशः श्वेतमदत्कमदत्कं श्वेतं लिन्दुमाऽभिगां लिन्दुमाऽभिगाम् ॥ १॥ १४ ॥ | |||
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| verse_text = तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यः आचार्यकुलाद् वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषणाभिसमावृत्य कुटुम्बी(कुटुम्बे .हृ) शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिंसन् सर्वाणि भूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन् यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते ॥ १॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यः आचार्यकुलाद् वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषणाभिसमावृत्य कुटुम्बी(कुटुम्बे .हृ) शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिंसन् सर्वाणि भूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन् यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते ॥ १॥ १५ ॥ | |||
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Latest revision as of 07:14, 8 June 2026
छान्दोग्योपनिषत् — मूलम्
प्रथमाध्यायः प्रथमखण्डः
हरिःओम्॥ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुःश्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्मनिराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥
एषां भूतानां पृथिवी रसः। पृथिव्या आपो रसः। अपामोषधयो रसः। ओषधीनां पुरुषो रसः। पुरुषस्य वाग्रसो। वाच (ऋक् रसः)ऋग्रसः। ऋचः साम रसः। साम्न उद्गीथो रसः। स एष रसानां रसतमः परमः परार्ध्योऽष्टमो य उद्गीथः ॥ २ ॥
कतमा कतमर्क् कतमत् कतमत् साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति । वागेवर्क, प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथः ॥ ३ ॥
तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्च ऋक् च साम च तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते ॥ ४ ॥
यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य काममापयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ५ ॥
तद्वा एतदनुज्ञाक्षरम् । यद्धि किञ्चानुजानात्योमित्येव तदा हैष उ एव समृद्धिर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ६ ॥
तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते ओमित्याश्रावयत्योमिति शंसत्योमित्युद्गायत्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै महिम्ना रसेन तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद ॥ ७ ॥
नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति अथ ह य एवायं (मुख्यप्राणः) मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीत तस्येतरैः प्राणैरुपव्याख्यानं भवति ॥ ८॥ १ ॥
देवासुरा ह वै यत्र संयेतिर उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम इति ॥ १ ॥
ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥
अथ ह वाचमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तां हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तयोभयं(तेनोभयं) वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ ३ ॥
अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद् विद्धम् ॥ ४ ॥
अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतद् विद्धम् ॥ ५ ॥
अथ ह मन उद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं सङ्कल्पयते सङ्कल्पनीयं चासङ्कल्पनीयं च पाप्मना ह्येतत् विद्धम् ॥ ६ ॥
अथ ह य एवायं (मुख्यः प्राणः)मुख्यप्राणस्तमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः ऋत्वा विदध्वसुर्यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेतैवम् ॥ ७ ॥
स यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसते एवं हैव स विध्वंसते य एवं विदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माऽऽखणः ॥ ८ ॥
नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येषः तेन यदश्नाति यत् पिबति तेनेतरान् प्राणानवत्येतमु एवान्ततो वित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्तत इति ॥ ९ ॥
तं हाङ्गिरा उद्गीथमुपासाञ्चक्रे एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसस्तेन॥ १० ॥
तं ह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते वाग्घि बृहती तस्या एष पतिस्तेन ॥ ११ ॥
तं हायास्य उद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद् यदयते तेन ॥ १२ ॥
तं ह बको दाल्भ्यो विदाञ्चकार स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः कामानागायति ॥ १३ ॥
आगता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥ १४ ॥ २ ॥
अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीतोद्यन् वा एष प्रजाभ्य उद्गायत्युद्यंस्तमोभयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥
समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयमुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥
अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानोऽथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः सा वाक् तस्मादप्राणन्ननपानन् वाचमभिव्याहरति या वाक् सर्क्(सा ऋक्) तस्मात् अप्राणन्ननपानन् ऋचमभिव्याहरति या ऋक् तत् साम तस्मादप्राणन्ननपानन् साम गायति यत् साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्ननपानन् उद्गायति (अतः) ॥ ३ ॥
अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाऽग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपानन् तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमोवोद्गीथमुपासीत ॥ ४ ॥
अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीत उद्-गी-थ इति प्राण एवोत् प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग् गीर्वाचो हि गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदं सर्वं स्थितं द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्थं सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गीर्ऋग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्-गी-थ इति ॥ ५ ॥
अथ खल्वाशीःसमृद्धिरुपसरणानीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन् स्यात् तत्सामोपधावेद् यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतामभिष्टोष्यन् स्यात् तां देवतामुपधावेद् येन च्छन्दसा स्तोष्यन् स्यात् तच्छन्द उपधावेद् येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात् तं स्तोममुपधावेद् यां दिशमभिष्टोष्यन् स्यात् तां दिशमुपधावेदात्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्रमत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृध्येत यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥६॥३॥
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत। ओमिति ह्युद्गायति। तस्योपव्याख्यानम् । देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशन्। ते छन्दोभिराच्छादयन्। यदेभिराच्छादयन् तत् छन्दसां छन्दस्त्वम्। तान् उ तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येद् एवं पर्यपश्यद् ऋचि साम्नि यजुषि ते अनु वित्त्वा ऊर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ॥ १ ॥
यदा वा ऋचमाप्नोति अोमित्येव अति(भि)स्वरति। एेवं साम। एवं यजुः। एष उ स्वरो यदेतदक्षरमम्। एतदमृतमभयम्। तत् प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन्। स य एतदेवं विद्वान् अक्षरं प्रणौति एतदेवाक्षरं स्वरममृतमभयं प्रविशति। तत् प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ २ ॥ ४ ॥
अथ खलु ‘य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः’ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथः, एष प्रणवः। ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥
एतमु एव अहमभ्यागासिषम्। तस्मात् मम त्वमेकोऽसि। इति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच। रश्मीन् त्वं पर्यावर्तयताद् बहवो वै ते भविष्यन्ति। इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥
अथाध्यात्मम्। य एवायं मुख्यप्राणसः तमुद्गीथमुपासीत। ओमिति ह्येष स्वरन् एति ॥ ३ ॥
एतमु एवाहमभ्यागासिषं। तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच। प्राणान् त्वं भूमानमभिगायतात् बहवो वै ते भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥
अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनुसमाहरतीति ॥ ५ ॥ ५ ॥
इयमेव ऋक्। अग्निः साम। (तदेतदस्याम् .हृ)तदेतत् एतस्यामृचि अयध्यूढं साम। तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते। इयमेव सा अग्निरमः। तत् साम ॥ १ ॥
अन्तरिक्षमेव ऋक्। वायुः साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। अन्तरिक्षमेव सा। वायुरमः। तत् साम ॥ २ ॥
द्यौरेव ऋक्। आदित्यः साम तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। द्यौरेव सा। आदित्योऽमः। तत् साम ॥ ३ ॥
नक्षत्राण्येव ऋक्। चन्द्रमाः साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। नक्षत्राण्येव सा। चन्द्रमा अमः। तत् साम ॥४॥
अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव ऋक्। अथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव सा। अथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमः। तत् साम ॥ ५ ॥
अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुः हिरण्यकेशः आ प्रणखात् सर्व एव सुवर्णः ॥ ६ ॥
तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी । तस्य उदिति नाम। स एषः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो उदितः। उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७ ॥
तस्य ऋक् च साम च गेष्णौ। तस्मादुद्गीथः। तस्मात् त्वेवोद्गाता एतस्य हि गाता। स एष ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकाः तेषां चेष्टे देवकामानां च, इत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥ ६ ॥
अथाध्यात्मं वागेवर्क् प्राणः साम तदेतदेस्यामृच्यध्यूढं साम तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते वागेव सा प्राणोऽमस्तत् साम ॥ १ ॥
चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते चक्षुरेव (साऽत्माऽत्मः .हृ .प्रभ)सा प्राणोऽमस्तत् साम ॥ २ ॥
श्रोत्रमेवर्ङ्(ऋक्) मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत् साम ॥ ३ ॥
अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयतेऽथ यदेवैतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैव साऽथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत् साम ॥ ४ ॥
अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते सैवर्क् तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावदमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम ॥ ५ ॥
स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां चेति तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात् ते धनसनयः ॥ ६ ॥
अथ यदेतदेवं(य एतदेवं) विद्वान् साम गायत्युभौ साम गायति(उभौ स गायति) सोऽमुनैव स एष ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति देवकामांश्च ॥ ७ ॥
अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ॥ ८ ॥
कं ते काममागायानीत्येष ह्येष कामगानस्येष्टे य एवं विद्वान् साम गायति साम गायति ॥ ९ ॥ ७ ॥
त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः। शिलकः शालावत्यः, चैकितायनो दाल्भ्यः, प्रवाहणो जैबिलिरिति। ते होचुरुद्गीथे ये कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ॥ १ ॥
तथेति ते ह(ह ते) समुपविविशुः। स ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाच- भगवन्तावग्रे वदताम्। ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामीति। स ह शिलकः शालावत्यः चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति। पृच्छेति होवाच- का साम्नो गतिरिति ॥ २ ॥
स्वर इति होवाच। स्वरस्य का गतिरिति। प्राण इति होवाच। प्राणस्य का गतिरिति। अन्नमिति होवाच। अन्नस्य का गतिरिति। आप इति होवाच। अपां का गतिरिति। असौ लोक इति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति॥ ३ ॥
न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच। स्वर्गं वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। स्वर्गसंस्तावं हि सामेति । तं ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यं (चैकितायनं दाल्भ्यं इति .हृपाठे नास्ति) उवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम। यस्त्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥४॥
हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति। अयं लोक इति होवाच। अस्य लोकस्य का गतिरिति। न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच। प्रतिष्ठां वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति ।
अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणं स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः ॥ १ ॥
परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकान् जयति य एतमेवं(एतदेवं) विद्वान् परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते तं (हैन)हैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रयाजमुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिंल्लोके जीवनं भविष्यति तथामुष्मिंल्लोक इति स य एतमेवं(एतदेवं) विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिंल्लोके जीवनं भविष्यति तथामुष्मिंल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ २ ॥ ९ ॥
मटचीहतेषु कुरुष्वाटक्या(आटिक्य) सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास। स हेभ्यं कुल्माषान् खादन्तं बिभिक्षे ॥ १ ॥
तं होवाच नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता(ये मे उपनिहिताः) इत्येतेषां मे देहीति होवाच। तानस्मै प्रददौ। हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतं स्यादिति होवाच। न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति ॥ २ ॥
न वा अजीविष्यमिमान् अखादन्निति होवाच। कामो म उदपानमिति। स ह खादित्वाऽतिशेषान् जायाय आजहार। साऽग्र एव सुभिक्षा बभूव। तान् प्रतिगृह्य निदधौ स ह प्रातः सञ्जिहान उवाच यद् बतान्नस्य लभेमहि। लभेमहि धनमात्रां राजासौ यक्ष्यते। स मा सर्वैरार्त्विज्यैर्वृणीतेति ॥ ३ ॥
तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति। तान् खादित्वाऽमुं यज्ञं विततमेयाय। तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोप विवेश। स ह प्रस्तोतारमुवाच। प्रस्तोतर्या(तः या) देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या(तः या) देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या(तः या) देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासाञ्चक्रिरे ॥ ४ ॥ १० ॥
अथ हैनं यजमान उवाच- भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरार्त्विज्यैः पर्यैशिषं भगवतो वा अहमवित्त्याऽन्यानवृषि भगवांस्त्वेव मे सर्वैरार्त्विज्यैरिति ॥ १ ॥
तथेत्यथ तर्ह्येत एव समतिसृष्टास्तुवन्तां (मदतिसृष्टास्तुवन्तां) यावत्तेभ्यो(यावत्त्वेभ्यो) धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ २ ॥
अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेति ॥ ३ ॥
प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति ॥ ४ ॥
अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् उद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेत्यादित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति॥ ५॥
सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुदगास्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति अथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेत्यन्नमिति होवाच । सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ६ ॥ ११ ॥
अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वव्राज तस्मै (ह) श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ॥ १ ॥
तान् होवाच- इहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाञ्चकार ते ह यथैवेदं बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः संरब्धाः सर्पन्तीत्येवमाससृपुस्ते ह समुपविश्य हिञ्चक्रुरो३मदा३मोम्पिबा३मों देवो वरुणः प्रजापतिः सविता३न्नमिहा३हरदन्नपते३न्नमिहा३हराऽहरोमिति ॥ २ ॥ १२ ॥
अयं वाव लोको हावुकारो वायुर्हायिकारश्चन्द्रमा अथकार आत्मेहकारोऽग्निरीकार आदित्य ऊकारो निहव एकारो विश्वेदेवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिङ्कारः प्राणः स्वरोऽन्नं याया वाग्विराडनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः सञ्चरो हुप्कारो दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवं साम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद इति ॥ १ ॥ १३ ॥
द्वितीयोऽध्यायः
ओं समस्तस्य खलु साम्न उपासनं साधु यत् खलु साधु तत् सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥ १ ॥
तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥
अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥ ३ ॥
स य एतदेवंविद्वान् साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥ ४ ॥ १ ॥
लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत पृथिवी हिङ्कारोऽग्निः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथ आदित्यः प्रतिहारो द्यौर्निधनमित्यूर्ध्वेषु ॥ १ ॥
अथावृत्तेषु द्यौर्हिङ्कार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम् ॥ २ ॥
कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वांल्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ३ ॥ २ ॥
वृष्टौ पञ्चविधं सामोपासीत । पुरोवातो हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः ॥ १ ॥
उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान् वृष्टौ पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ३ ॥
सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपासीत । मेघो यत् सम्प्लवते स हिङ्कारो यद् वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥ १ ॥
न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ४ ॥
ऋतुषु पञ्चविधं सामोपासीत । वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनम् ॥ १ ॥
कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान् भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ५ ॥
पशुषु पञ्चविधं सामोपासीताजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनं भवन्ति हास्य पशवः पशुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् पशुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ६ ॥
प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिङ्कारः वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयांसि वा एतानि परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकान् जयति य एतदेवं विद्वान् प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ ७ ॥
अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधं सामोपासीत यत्किञ्च वाचो हुमिति स हिङ्कारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिर्यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतदेवं विद्वान् वाचि सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ १ ॥
अथ खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपासीत सर्वदा समस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ १ ॥
तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात् तस्य यत्पुरोदयात् स हिङ्कारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात् ते हिङ्कुर्वन्ति हिङ्कारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ २ ॥
अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात् ते प्रस्तुतिकामाः प्रशंसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥३॥
अथ यत्सङ्गववेलायां स आदिस्तदस्य वयांस्यन्वायत्तानि तस्मात् तान्यन्तरिक्षेऽनारम्भणान्यादायात्मानं परिपतन्त्यादिभाजीनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥
अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात् ते सत्तमाः प्राजापत्यानामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ५ ॥
अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात् प्रागपराह्णात् स प्रतिहारस्तदस्य गर्भा अन्वायत्तास्तस्मात् ते प्रतिहृता नावपद्यन्ते प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ६ ॥
अथ यदूर्ध्वमपराह्णात् प्रागस्तमयात् स उपद्रवस्तदस्यारण्या अन्वायत्तास्तस्मात् ते पुरुषं दृष्ट्वा कक्षंश्वभ्रमित्युपद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ७ ॥
अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात् तान्निदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न एवं खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ ९ ॥
अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपासीत हिङ्कार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ १ ॥
आदिरिति द्व्यक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत इहैकं तत्समम् ॥ २ ॥
उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यते(अवशिष्यते) त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३ ॥
निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥
एकविंशत्याऽऽदित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥
आप्नोतीहादित्यस्य जयं परो हास्याऽदित्यजयाज्जयो भवति (स) य एतदेवं विद्वानात्मसम्मितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥ १० ॥
मनो हिङ्कारो वाक् प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद् गायत्रं प्राणेषु प्रोतं स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या महामनाः स्यात् तद् व्रतम् ॥ १॥ ११ ॥
अभिमन्थति स हिङ्कारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनं संशाम्यति तन्निधनमेतद् रथन्तमग्नौ प्रोतम् ॥ १ ॥
स य एवमेतद् रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न प्रत्यङ्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥ १२ ॥
उपमन्त्रयते स हिङ्कारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रतिस्त्री(प्रति स्त्रिया) सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद् वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥ १ ॥
स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनीभवति मिथुनान्मिथुनात् प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥१३॥
उद्यन् हिङ्कारः उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गीथोऽपराह्णः प्रतिहारोऽस्तं यन्निधनमेतद् बृहदादित्ये प्रोतं स य एवमेतद् बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या तपन्तं न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १४ ॥
अभ्राणि सम्प्लवन्ते स हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपांश्च सुरूपांश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १५ ॥
वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतत् वैराजमृतुषु प्रोतं स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ऋतून् न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १६ ॥
पृथिवी हिङ्कारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकीभवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या लोकान्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १७ ॥
अजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या पशून्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १८ ॥
लोम हिङ्कारस्त्वक् प्रस्तावो मांसमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनमेतद् यज्ञायज्ञीयेषु प्रोतं स य एवमेतद् यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गीभवति नाङ्गेन(नाङ्गेषु) विहूर्च्छति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात् तद् व्रतं मज्ज्ञु नाश्नीयादिति वा ॥ १९ ॥
अग्निर्हिङ्कारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानां सलोकतां सार्ष्टितां सायुज्यं गच्छति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ब्राह्मणान् न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ २० ॥
त्रयी विद्या हिङ्कारस्त्रय इमे लोकाः स प्रस्तावोऽग्निर्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयांसि मरीचयः स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत् साम सर्वस्मिन् प्रोतं स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन् प्रोतं वेद सर्वं ह भवति ॥ १ ॥
तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति । यस्तद् वेद स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति । सर्वमस्मीत्युपासीत तद् व्रतं तद् व्रतम् ॥ २ ॥ २१ ॥
विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान् सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥
अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत् स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २ ॥
सर्वे स्वरा इन्द्रस्याऽत्मानः सर्व ऊष्मणः प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं यदि स्वरेषूपालभेतेन्द्रं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥
अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापतिं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिपेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येनं स्पर्शेषूपालभेत मृत्युं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥
सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्वे ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशेनानभिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥ २२ ॥
त्रयो धर्मस्कन्धाः यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमः, तप एव द्वितीयो, ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयो, अत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥
प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत् तामभ्यतपत् तस्या अभितप्ताया(तप्यमानाया) एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त । भूर्भुवः स्वरिति । तान्यभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् । तद् यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि सन्तृण्णान्येवमेतेनोङ्कारेण सर्वा वाक्सन्तृण्णोङ्कार एवेदं सर्वमोङ्कार एवेदं सर्वम् ॥ २ ॥ २३ ॥
ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद् वसूनां प्रातःसवनं रुद्राणां माध्यन्दिनं सवनमादित्यानां विश्वेषां देवानां च तृतीयसवनं(तृतीयं सवनं) क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात् कथं कुर्यादथ विद्वान् कुर्यात् ॥ १ ॥
पुरा प्रातरनुवाकस्योपकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्योदङ्मुख उपविश्य स वासवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं रा ३३३३३ हु३म् आ३३ ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानास्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै वसवः प्रातःसवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ २ ॥ २४ ॥
पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योददङ्मुख उपविश्य स रौद्रं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं विरा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्मत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यन्दिनं सवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ ३ ॥
पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यं स वैश्वदेवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं ं स्वारा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यादित्यमथ वैश्वदेवं लो३कद्वारमपा३वा३वार्णू३३ पश्येम त्वा वयं साम्ना ३३३३ हू आ ३म् ३३ ज्या ३यो ३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दतैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनं(तृतीयं सवनं) सम्प्रयच्छन्ति एष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ ४॥ २४ ॥
तृतीयोऽध्यायः
ओम् असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवंशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥
तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्य ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः ॥ २ ॥
एतमृग्वेदमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ ३ ॥
तद् व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद् यदेतदादित्यस्य रोहितं रूपम् ॥ ४ ॥ १ ॥
अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूंष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
तानि वा एतानि यजूंष्येतं यजुर्वेदमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ २ ॥
तद् व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तदा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्लं रूपम् ॥ ३ ॥ २ ॥
अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
तानि वा एतानि सामान्येतं सामवेदमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ २ ॥
तद् व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद् यदेतदादित्यस्य परं कृष्णं रूपम् ॥ ३ ॥ ३ ॥
अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो मधुनाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमृता आपः॥१॥
ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीयमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ २ ॥
तद् व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद् यदेतदादित्यस्य परं कृष्णं रूपम् ॥ ३ ॥ ४ ॥
अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयस्ता एवास्योर्ध्वा मधुनाड्यो गुह्या एवाऽदेशा मधुकृतो ब्रह्मैव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥
ते वा एते गुह्या आदेशा एतद् ब्रह्माभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ २ ॥
तद् व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद् यदेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥ ३ ॥
ते वा एते रसानांरसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ४ ॥५॥
तद् यत् प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाऽग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुदेति ॥३॥
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता वसूनामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ६ ॥
अथ यद्वितीयममृतं तद् रुद्राः उपजीवन्तीन्द्रेण मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवैको भूत्वेन्द्रेणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥३॥
स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्विस्तावद् दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ७ ॥
अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामेवैको भूत्वा वरुणेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुदेति ॥ ३ ॥
स यावदादित्यो दक्षिणतः उदेतात्तरतोऽस्तमेता द्विस्तावत् पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेताऽऽदित्यानामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ८ ॥
अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेद मरुतामेवैको भूत्वा सोमेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुदेति ॥३॥
स यावदादित्यः पश्चादुतेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥४॥ ९॥
अथ यत्पञ्चमममृतं तत् साध्याः उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥
त एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥
स य एतदेवममृतं वेद साध्यानामेवैको भूत्वा ब्रह्मणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुदेति ॥ ३ ॥
स यावदादित्यः उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्वं उदेताऽर्वाङस्तमेता साध्यानामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ १० ॥
अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः ॥ १ ॥
न वै तत्र न निम्लोचो नोदियाय कदाचन ।
न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति च एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥
तद्धैतद् ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्धैतदुद्दालकायाऽरुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ४ ॥
इदं वा व तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात् प्रणाय्याय वाऽन्तेवासिने ॥ ५ ॥
नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥ ६ ॥ ११ ॥
गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च वाग् वै गायत्री वाग् वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ १ ॥
या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यस्यां हीदं सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयन्ते ॥ २ ॥
या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन् पुरुषे शरीरमस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीर्यन्ते ॥ ३ ॥
यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे हृदयमस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥ ४ ॥
सैषा चतुष्पदा षडि्वधा गायत्री ।
......तदेतदृचाऽभ्यनूक्तम्(ऋचाऽभ्युक्तम्) ॥ ५॥
तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः ।
यद्वै तद् ब्रह्मेतीदं वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशो यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाशः ॥ ७ ॥
अयं वाव स योयमन्तः पुरुष आकाशो यो वै सोन्तः पुरुष आकाशः ॥ ८ ॥
अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशो यो वै सोऽन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत् पूर्णमप्रवर्ति पूर्णामप्रवर्तिनीं श्रियं लभेत य एवं वेद ॥ ९ ॥ १२ ॥
तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ्सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेतत् तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥
अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रं स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत श्रीमान् यशस्वी भवति य एवं वेद ॥ २ ॥
अथ योऽस्य प्रत्यङ्सुषिः सोऽपानः सा वाक् सोऽग्निस्तदेतद् ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥३॥
अथ योऽस्योदङ् सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेत् कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान् व्युष्टिमान् भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥
अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महस्वान् भवति य एवं वेद ॥५॥
ते वा एते पञ्चब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद ॥ ६ ॥
अस्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद । अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद् यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिस्तस्यैषा दृष्टिः ॥ ७ ॥
यत्रैतदस्मिंच्छरीरे संस्पर्शेनोष्णिमानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनदमिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत(प्रज्वलतः) उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ १३ ॥
सर्वं खल्विदं ब्रह्म । तज्जलानिति शान्त उपासीत अथ खलु क्रतुमयः पुुरुषो यथा क्रतुरस्मन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ॥ १ ॥
मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसङ्कल्पः आकाश आत्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥ २ ॥
एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद् वा श्यामाकाद् वा श्यामकतण्डुलाद् वा एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥३॥
सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः एष म आत्मान्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसम्भविताऽस्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्साऽस्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥ ४ ॥ १४ ॥
अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलं स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन् सर्वमिदं (विश्वमिदं) श्रितम् ॥ १ ॥
तस्य प्राची दिक् जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदं रुदम् ॥ २ ॥
अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना प्राणं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भूः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भुवः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना स्वः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना ॥ ३ ॥
अथ(स) यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च तमेव तत् प्रापत्सि ॥ ४ ॥
अथ यदवोचं भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ५ ॥
अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ६ ॥
अथ यदवोचं स्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येतदवोचं तदवोचम् ॥ ७ ॥ १५ ॥
पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विंशतिवर्षाणि तत् प्रातःसवनं चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदं सर्वं वासयन्ति ॥ १ ॥
तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिनं सवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ २ ॥
अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनं सवनं चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप् त्रैष्टुभं मान्धन्दिनं सवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीदं सर्वं रोदयन्ति ॥ ३ ॥
तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिनं सवनं तृतीयं सवनमनुसन्तनुतेति माऽहं प्राणानां रुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥४॥
अथ यान्यष्टा(अष्ट .हृ)चत्वारिंशद्वर्षाणि तत् तृतीयसवनमष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वाव आदित्या एते हीदं सर्वमाददते ॥ ५ ॥
तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवनमायुरनुसन्तनुतेति माऽहं प्राणानां आदित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ ६ ॥
एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत् स ह(प्राह) षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७ ॥ १६ ॥
स यदशिशिषति यत्पिपासति यन्न रमते ता अस्य दीक्षाः ॥ १ ॥
अथ यदश्नाति यत् पिबति यद् रमते तदुपसदैरेति ॥ २ ॥
अथ यद्धसति यज्जक्षति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव तदेति ॥३॥
अथ यत् तपो दानमार्जवमहिंसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः ॥ ४ ॥
तस्मादाहुः सोष्यत्यसोष्टेति पुनरुत्पादनमेवास्य तन्मरणमेवास्यावभृथः ॥ ५ ॥
तद्धैतद्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणसंशितमसीति ।...
...तत्रैते द्वे ऋचौ भवतः ॥ ६ ॥
आदित्प्रत्नस्य रेतसो ज्योतिष्पश्यन्ति वासरम् । परो यदिध्यते दिवा । उद् वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरम् । स्वः पश्यन्त उत्तरम् देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥ इत्यगन्म ज्योतिरुत्तममिति ॥ ७ ॥ १७ ॥
मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथाधिदैवतमाकाशो ब्रह्मेत्युभयमादिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च ॥ १ ॥
तदेतच्चतुष्पाद् ब्रह्म वाक्पादः प्राणः पादश्चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद इत्यध्यात्ममथाधिदैवतमग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पाद इत्युभयमेवाऽदिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च ॥ २ ॥
वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ३ ॥
प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ४ ॥
चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स आदित्येन ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ५ ॥
श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स दिग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद य एवं वेद ॥ ६ ॥ १८ ॥
आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत् तत् सदासीत् तत् समभवत् तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम् ॥ १ ॥
तद्यद्रजतं सेयं पृथिवी यत्सुवर्णं सा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बं स मेधो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकं स समुद्रः ॥ २॥
अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानं घोषा उलूलवोऽनूदतिष्ठन् सर्वाणि च भूतानि च सर्वे च कामास्तस्मात् तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रति घोषा उलूलवोऽनूत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सर्वे चैव कामाः ॥ ३ ॥
स य एतदेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेरन् ॥ ४ ॥ १९ ॥
चतुर्थाध्यायः
जानश्रुतिर्हि पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य (बहुवाक्य) आस। स ह सर्वत आवसथान् मापयाञ्चक्रे सर्वत एव मेऽत्स्यन्तीति ॥१॥
अथ ह हंसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवं हंसो हंसमभ्युवाद होहोयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत् त्वा मा प्रधाक्षीरिति ॥ २ ॥
तमु ह परः प्रत्युवाच कम्वर एनमेतत्सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति ॥ ३ ॥
यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद् वेद यत् स वेद स(वेद सर्वं स) मयैतदुक्त इति ॥ ४ ॥
तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव स ह संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्गारे ह सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति ॥ ५ ॥
यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत् स वेद स सर्वं मयैतदुक्त इति ॥ ६ ॥
स ह क्षत्ताऽन्विष्य नाविदमिति प्रत्येया तं स होवाच यत्रारे ब्राह्मणस्यान्वेषणा तदेनमृच्छेति ॥ ८ ॥
सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तं हाभ्युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यहं ह्यरा३ इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताऽन्विष्याविदमिति प्रत्येयाय ॥ ८ ॥ १ ॥
तदु ह(अथ ह .हृ) जानश्रुतिः पौत्रायणः षट् शतानि गवां निष्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमे तं हाभ्युवाद ॥ १ ॥
रैक्वेमानि षट् शतानि गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथोऽनु म एतां भगवो देवतां शाधि यां देवतामुपास्स इति ॥ २ ॥
तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति तदुह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥ ३ ॥
तं हाभ्युवाद रैक्वेदं सहस्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायाऽयं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति ॥ ४ ॥
तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाऽजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनाऽलापयिष्यथा इति ते हैते रैक्वपर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास तस्मै स होवाच ॥ ५ ॥ २ ॥
वायुर्वाव संवर्गो यदा वा महाप्रलये अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥ १ ॥
यदाऽऽप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्ह्येवैतान् सर्वान् संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥
अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान् सर्वान् संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥
तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ॥ ४ ॥
अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी बिभिक्षे तस्मा उ ह न ददतुः ॥ ५ ॥
स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः सो जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय नाभिपश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन् बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥ ६ ॥
तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायाऽत्मा देवानां जनिता प्रजानां हिरण्यदंष्ट्रो बभसोऽनसूरिः। महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्निदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥ ७ ॥
तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतं तस्मात् सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दश कृतं सैषा विराडन्नादी तयेदं सर्वं दृष्टं सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ ३ ॥
सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयाञ्चक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किङ्गोत्रो न्वहमस्मीति ॥ १ ॥
सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साऽहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि(त्वमसीति स त्वं जाबालः .हृ) स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति ॥ २ ॥
स ह हारिद्रुमन्तं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्यं भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति ॥ ३ ॥
तं होवाच किं गोत्रो नु सोम्यासीति स होवाच नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्म्यपृच्छं मातरं सा मा प्रत्यब्रवीद् बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साऽहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति सोहं सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥ ४ ॥
तं होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सोम्याऽऽहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशतं गा निराकृत्योवाचेमाः सोम्यानु संव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणाऽवर्तेयम्(आवर्तय) इति। स ह वर्षगणं प्रोवाच ता यदा सहस्रं सम्पेदुः ॥ ५ ॥ ४ ॥
अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद सत्यकामा ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्राप्ताः सोम्य सहस्रं स्मः प्रापय न आचार्यकुलम् ॥ १ ॥
ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राची दिक् कला प्रतीची दिक् कला दक्षिणा दिक् कलोदीची दिक् कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ॥ २ ॥
स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते प्रकाशवानस्मिंल्लोके भवति प्रकाशवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते ॥ ३ ॥५॥
अग्निष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ् उपोपविवेश ॥ १ ॥
तमग्निरभ्युवाद सत्यकामा३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥
ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच पृथिवी कलाऽन्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥ ३ ॥
स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्ते अनन्तवानस्मिंल्लोके भवति अनन्तवतो ह लोकान् जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ ६ ॥
हंसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ् उपोपविवेश ॥ १ ॥
तं हंस उपनिपत्याभ्युवाद सत्यकामा३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥
ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत् कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥ ३ ॥
स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिंल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकान् जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ ७ ॥
मद्गुष्टे(मद्गुः ते) पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ् उपोपविवेश ॥ १ ॥
तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद सत्यकामा३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥
ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राणः कला चक्षुः कला श्रोत्रं कला मनः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम ॥ ३ ॥
स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते आयतनवानस्मिंल्लोके भवत्यातनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः आयतनवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ ८ ॥
प्राप हाऽचार्यकुलं तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकामा३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ १ ॥
ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वाऽनुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवांस्त्वेव मे कामे ब्रूयात् ॥ २ ॥
श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्य आचार्यद्ध्येव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयतीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किञ्चन वीयायेति वीयायेति ॥ ३ ॥ ९ ॥
उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास तस्य ह द्वादश वर्षाण्यग्नीन् परिचचार स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयंस्तं ह स्मैव न समावर्तयति ॥१॥
तं जायोवाच तप्तो ब्रह्मचारी कुशलमग्नीन् परिचचारीन् मा त्वाऽग्नयः परिप्रवोचन् प्रब्रूह्यस्मा इति तस्मै हाप्रोच्यैव प्रवासाञ्चक्रे ॥ २ ॥
स ह व्याधिनाऽनशितुं दध्रे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिन्नशान किं नु नाश्नासीति स होवाच बहव इमेऽस्मिन्(बहवो ह्यस्मिन् .हृ) पुरुषे कामा नानात्यया व्याधिभिः परिपूर्णोऽस्मि(प्रतिपूर्णोऽस्मि) नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥
अथ हाग्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं नः (परि चचारीत्)पर्यचचारीद्धन्तास्मै प्रब्रवामेति तस्मै होचुः ॥ ४ ॥
प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामीति ते होचुर्यद्वाव कं तदेव खं यदेवं खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः ॥ ५ ॥ १० ॥
अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इति य एष आदित्ये पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥
स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥ ११ ॥
अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशासाऽपो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥
स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥१२॥
अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति य एष विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥
स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥१३॥
ते होचुरुपकोसलैषा सोम्य तेऽस्मद्विद्याऽऽत्मविद्या चाऽचार्यस्तु ते गतिं वक्तेत्याजगाम हास्याचाऽर्यस्तमाचार्योऽभ्युवादोपकोसला ३ इति ॥ १ ॥
भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वाऽनुशशासेति को नु माऽनुशिष्याद् भो इतीहावेव निह्नुत इमे नूनमीदृशा अन्यादृशा इतीहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किल तेऽवोचन्निति ॥ २ ॥
इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान् वाव किल सोम्य तेऽवोचन्नहं तु ते तद् वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवं विदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच ॥ ३ ॥ १४ ॥
य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मैतस्मिन्न किञ्चन श्लिष्यति तद् यदस्मिन् सर्पिवोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति ॥ १ ॥
एतं संयद्वाम इत्याचक्षत एतं हि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति सर्वाण्येनं वामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद ॥ २ ॥
एष उ एव वामनिरेष हि सर्वाणि वामानि नयति सर्वाणि वामानि नयति य एवं वेद ॥ ३ ॥
एष उ एव भामनिरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद ॥ ४ ॥
अथ यदु चैवास्मिञ्च्छव्यं कुर्वन्ति यदु(यदि .हृ) च नार्चिषमेवाभिसम्भवन्ति(अभिसंविशन्ति) अर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षडुदंङ्ङेति मासांस्तान् मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो मानवः स एनान् ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन खलु प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नाऽवर्तन्ते नाऽवर्तन्ते ॥ ५ ॥ १५ ॥
एष ह वै यज्ञो योऽयं पवत एष यन्निदं सर्वं पुनाति यदेष यन्निदं सर्वं पुनाति तस्मादेष एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक् च वर्तनी ॥ १ ॥
तयोरन्यतरां मनसा संस्करोति(संस्कारः) ब्रह्मा वाचा होताऽध्वर्युरुद्गाताऽन्यतरांस यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यपवदति ॥ २ ॥
अन्यतरामेव वर्तनीं संस्कुर्वन्ति हीयतेऽन्यतरा स यथैकपाद् व्रजन् रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यत्येवमस्य यज्ञो रिष्यति यज्ञं रिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति स इष्ट्वा पापीयान् भवति ॥ ३ ॥
अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यवदत्युभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा ॥ ४ ॥
स यथोभयपाद् व्रजन् रथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान् भवति ॥ ५ ॥ १६ ॥
प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेषां तप्यमानानां रसान् (प्रावहद्)प्राबृहद् अग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षादादित्यं दिवः ॥ १ ॥
स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत् तासां तप्यमानानां रसान् प्राबृहद्(प्रावृहद्)अग्नेर्ऋचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् ॥ २ ॥
स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत् तस्यास्तप्यमानाया रसान् प्राबृहद्(प्रावृहद्) भूरित्यृग्भ्यो भुव इति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ॥ ३ ॥
तद् यद्यृक्तो रिष्येद् भूः स्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयाद् ऋचामेव तद्रसेनर्चां वीर्येणर्चां यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति ॥ ४ ॥
अथ यदि यजुष्टो रिष्येद् भुवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयाद् यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति ॥ ५ ॥
अथ यदि सामतो रिष्येत् स्वः स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात् साम्नामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति ॥ ६ ॥
तद् यथा लवणेन सुवर्णं सन्दध्यात् सुवर्णेन रजतं रजतेन त्रपु त्रपुणा सीसं सीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा ॥ ७ ॥
एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविद् ब्रह्मा भवति ॥ ८ ॥
एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद् ब्रह्मा भवत्येवंविदं ह वा एषा ब्रह्माणमनुगाथा यतो यत आवर्तते तत्तद् गच्छति ॥
पञ्चमोऽध्यायः
यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥
यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग् वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥
यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥
यो ह वै सम्पदं वेद सं हास्मै कामाः सम्पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव सम्पत् ॥ ४ ॥
यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥
अथ ह प्राणा अहं श्रेयसि व्यूदिरेऽहं श्रेयानस्म्यहं श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥
ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन् को नः श्रेष्ठ इति तान् होवाच यस्मिन् व उत्क्रान्ते इदं शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥
सा ह(च) वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथाऽकला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चचक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥
चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथाऽन्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥
श्रोत्रं होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिराः अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥
मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥
अथ ह प्राणः उच्चिक्रमिषन् स यथा सुहयः पट्वीशशङ्कून् सङ्खिदेदेवमितरान् प्राणान् समाखिदत् तं हाभिसमेत्योेचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥
अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठाऽस्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसीति ॥ १३ ॥
अथ हैनं श्रोत्रमुवाच यदहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीत्यथ हैनं मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥
न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ १ ॥
स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किञ्चिदिदमाश्वभ्य आशकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किञ्चनानन्नं भवतीति ॥ १ ॥
स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥
तद्धैतत् सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये (वैय्याघ्र .हृ)वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥
अथ यदि महज्जिगमिषेदमावास्यायां दीक्षित्वा पौर्णमास्यां रात्रौ सर्वौषधस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ॥ ४ ॥
वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् सम्पदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यास्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ॥ ५ ॥
अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ मन्थमाधाय जपत्यमो नामास्यमा हि ते सर्वमिदं स हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाधिपतिः स मा ज्यैष्ठ्यं श्रैष्ठ्यं राज्यमाधिपत्यं गमयत्यहमेवेदं सर्वमसानीति ॥ ६ ॥
अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति तत्सवितुर्वृणीमह इत्याचामति वयं देवस्य भोजनमित्याचामति श्रेष्ठं सर्वधातममित्याचामति तुरं भगस्य धीमहीति सर्वं पिबति निर्णिज्य कंसं चमसं वा पश्चादग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः स यदि स्त्रियं पश्येत् समृद्धं कर्मेति विद्यात् ॥ ७ ॥
तदेष श्लोकः–
श्वेतकेतुर्हाऽरुणेयः पञ्चालानां समितिमेयाय तं ह प्रवाहणो जैबलिरुवाच कुमारानु(कुमार .हृ) त्वाऽशिषत्(अनुशिषत् .हृ) पितेत्यनु हि भगव इति ॥ १ ॥
वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति न भगव इति वेत्थ यथा पुनरावर्तन्ता३ इति न भगव इति वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति न भगव इति ॥ २ ॥
वेत्थ यथाऽसौ लोको न सम्पूर्यता३ इति न भगव इति वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति इति नैव भगव इति ॥३॥
अथ नु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात् कथं सोऽनुशिष्टो ब्रवीतेति स हाऽयस्तः पितुरर्धमेयाय तं होवाचाननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाऽशिषमिति ॥ ४ ॥
पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत् तेषां नैकं च नाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं (तत .रा)तातैतानवदो यथाऽहमेषां नैकं च न वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५ ॥
स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हाञ्चकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तं होवाच मानुषस्य भगवान् गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति स होवाच तवैव राजन् मानुषं वित्तं यामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तामेव मे ब्रूहीति स ह कृच्छ्री बभूव॥ ६ ॥
तं ह चिरं वसेत्याज्ञापयाञ्चकार तं होवाच यथा मा त्वं गौतमावदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान् गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ॥ ७ ॥ ३ ॥
असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्याऽदित्य एव समिद् रश्मयो धूमोऽहरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा सम्भवति ॥ २ ॥ ४ ॥
पर्जन्यो वा गौतमाग्निः तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादुनयो विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुतेः वर्षः सम्भवति ॥ २ ॥ ५ ॥
पृथिवी वाव गौतमाग्निः तस्य संवत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रिरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्षं जुह्वति तस्या आहुतेरन्नं सम्भवति ॥ २ ॥ ६ ॥
पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव समित् प्राणो धूमो जिह्वाऽर्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुते रेतः सम्भवति ॥ २ ॥ ७ ॥
योषा वाव गौतमाग्निः तस्या उपस्थ एव समिद् यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुतेर्गर्भः सम्भवति ॥ २ ॥ ८ ॥
इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा मासानन्तः शयित्वा यावद्वाऽथ जायते ॥ १ ॥
स जातो यावदायुषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः सम्भूतो भवति ॥ २ ॥ ९ ॥
तद्य इत्थं विदुर्ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युुपासते तेऽर्चिषमभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षडुुदङ् एति मासांस्तान् ॥ १ ॥
मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो मानवः स एतान् ब्रह्म गमयत्येष देवयानः पन्था इति ॥ २ ॥
अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद् रात्रिं रात्रेरपरपक्षमपरपक्षाद् यान् षड् दक्षिणैति मासांस्तान्नैते(मासांस्तानेति .हृ) संवत्सरमभिप्राप्नुवन्ति ॥ ३ ॥
मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमसमेष सोमो राजा तद्देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति ॥ ४ ॥
तस्मिन् यावत्सम्पातमुषित्वाऽथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतमाकाशमाकाशाद् वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति ॥ ५ ॥
अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिला माषा इति जायन्ते ततो वै खलु दुर्निष्प्रपतनं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥
तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाऽथ य इह कपूरचरणाः अभ्याशो ह (एते)यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ ७ ॥
अथैतयोः पथोर्नैकतरेण(पथोर्न कतरेण .हृ) च न तानीमानि क्षुद्रमिश्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत् तृतीयं स्थानं तेनासौ लोको न सम्पूर्यते तस्माज्जुगुप्सेत तदेषश्लोकः ॥ ८ ॥
स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन् ब्रह्महा च । एते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरंस्तु तैरिति ॥ ९ ॥
अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन् वेद न स ह तैरप्याचरन् पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यश्लोको भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ १० ॥ ३१० ॥
प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसाञ्चक्रुः को न आत्मा किं तद्ब्रह्मेति ॥ १ ॥
ते ह सम्पादयाञ्चक्रुरुद्दालको वै भगवन्तोऽयमारुणिः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तं हन्ताभ्यागच्छामेति तं हाभ्याजग्मुः ॥ २ ॥
स ह सम्पादयाञ्चकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो न सर्वमिव प्रतिपत्स्ये हन्ताहमन्यमभ्यनुशासानीति ॥ ३ ॥
तान् होवाचाश्वपतिर्वै भगवन्तोऽयं कैकेयः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तं हन्ताभ्यागच्छामेति तं हाभ्याजग्मुः ॥ ४ ॥
तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयाञ्चकार स ह प्रातः सञ्जिहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपो नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतो यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद् भगवद्भ्यो दास्यामि वसन्तु भगवन्त इति ॥ ५ ॥
ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत् तंहैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानरं सम्प्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहीति ॥ ६ ॥
तान् होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्ताऽस्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्ने प्रतिचक्रमिरे तान् हानुपनीयैवैतदुवाच ॥ ७ ॥ ११ ॥
औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥ १ ॥
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १२ ॥
अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुषिं प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥ १ ॥
प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्ट्वेतदात्मन इति होवाचान्धोऽभविष्यो (यद्) यन्मां नाऽगमिष्य(तः) इति ॥ २ ॥ १३ ॥
अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै पृथग्वर्त्माऽऽत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वां पृथग्वलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १४ ॥
अथ होवाच जनं शार्कराक्ष्यं शार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते सन्दोहस्त्वेष आत्मन इति होवाच सन्दोहस्त व्यशीर्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १५ ॥
अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं रयिमान् पुष्टिमानसि ॥ १ ॥
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेव(न)मात्मानं वैश्वानरमुपास्ते वस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच वस्तिस्ते व्यभेत्स्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १६ ॥
अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम कं त्वमात्मानमुपास्स इति पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै प्रतिष्ठाऽऽत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ॥ १ ॥
अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १७ ॥
तान् होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वांसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥ १ ॥
तस्य ह वा एतस्याऽत्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मा सन्दोहो बहुलो वस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥ २ ॥ १८ ॥
तद्यद् भक्तं प्रथममागच्छेत् तद्धोमीयं स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात् तां जुहुयात् प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृप्यति ॥ १ ॥
प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यत्यादित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किञ्च द्यौश्चाऽदित्यश्चाधितिष्ठतस्तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ १९ ॥
अथ यां द्वितीयां जुहुयात् तां जुहुयाद् व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥
व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किञ्च दिशश्चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २० ॥
अथ यां तृतीयां जुहुयात् तां जुहुयादपानाय स्वाहेति अपानस्तृप्यति ॥ १ ॥
अपाने तृप्यति वाक् तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किञ्च पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २१ ॥
अथ यां चतुर्थीं जुहुयात् तां जुहुयात् समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति ॥ १ ॥
समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत् तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किञ्च विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २२ ॥
अथ यां पञ्चमीं जुहुयात् तां जुहुयादुदानाय स्वाहेत्युदानस्तृप्यति ॥ १ ॥
उदाने तृप्यति वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृप्यत्याकाशे तृप्यति यत्किञ्च वायुश्चाऽकाशश्चाधितिष्ठतस्तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २३ ॥
स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति यथाऽङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात् तादृक् तत् स्यात् ॥ १ ॥
अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ २ ॥
तद् यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मनः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति ॥ ३ ॥
तस्मादु हैवंविद् यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद् वैश्वानरे हुतं स्यादिति तदेष श्लोकः ॥ ४ ॥
यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते ।
षष्ठोऽध्यायः
अों श्वेतकेतुर्हाऽरुणेय आस तं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यं न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥
स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तं ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ २ ॥
येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति । कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥
यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद् वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥
यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्याद् वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं लोहमणिरित्येव सत्यम् ॥ ५ ॥
यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्याद् वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं कार्ष्णायसमित्येव सत्यमेवं सोम्य स आदेशो भवतीति ॥ ६ ॥
न वै नूनं भगवन्तस्य(भगवंस्तस्य) एतदवेदिषुर्यद्येतद्(यद्ध्येतत्) अवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवांस्त्वेव मे तद् ब्रवीत्विति यथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ १ ॥
सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत इति ॥ १ ॥
कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति सत् त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥ २ ॥
तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय इति तत् तेजोऽसृजत तत्तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत तस्माद्यत्र क्व च शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तद्ध्यापो जायन्ते ॥ ३ ॥
ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥ २ ॥
तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भवन्त्यण्डजं(भवन्त्याण्डजं) जीवजमुद्भिज्जमिति ॥ १ ॥
सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिममास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥ २ ॥
तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद् यथा तु(नु) खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ३ ॥ ३ ॥
यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं, यच्छुक्लं तदपां, यत् कृष्णं तदन्नस्यापगादग्नेरग्नित्वं वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १ ॥
यदादित्यस्य रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत् कृष्णं तदन्नस्यापागादादित्यस्याऽदादित्यत्वं(तदन्नस्यापागादादित्यादादित्यत्वं) वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ २ ॥
यच्चन्द्रमसो रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाच्चन्द्रात् चन्द्रत्वं वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ३ ॥
यद् विद्युतो रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत् कृष्णं तदन्नस्यापागाद् विद्युतो विद्युत्त्वं वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥
एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ते ह्येभ्यो विदञ्चक्रुः ॥ ५ ॥
यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद् विदाञ्चक्रुर्यदु शुक्लमिवाभूदित्यपां रूपमिति तद् विदाञ्चक्रुर्यदु कृष्णमिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद् विदाञ्चक्रुः ॥ ६ ॥
यद्वविज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवानां समास इति तद्विदाञ्चक्रुर्यथा तु(नु) खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ७ ॥ ४ ॥
अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥ १ ॥
आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ २ ॥
तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक् ॥ ३ ॥
अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥४॥५॥
दध्नः सोम्यः मथ्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तत्सर्पिर्भवति ॥ १ ॥
एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तन्मनो भवति ॥ २ ॥
अपां सोम्य पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स प्राणो भवति ॥ ३ ॥
तेजसः सोम्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग् भवति ॥ ४ ॥
अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति (यथा)तथा सोम्येति होवाच ॥ ५ ॥६॥
षोडशकलः सोम्य पुरुषः पञ्चदशाहानि माऽशीः काममपः पिबाऽपोमयः प्राणो न पिबतो विच्छेत्स्यत इति ॥ १ ॥
स ह पञ्चदशाहानि नाऽशाथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य यजूंषि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥ २ ॥
तं होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात् तेन ततोऽपि न बहु दहेदेवं सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टा स्यात् तयैतर्हि वेदान् नानुभवस्याशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥ ३ ॥
स हाशाथ हैनमुपससाद तं ह यत्किञ्च पप्रच्छ सर्वं ह प्रतिपेदे ॥ ४ ॥ तं ह होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय प्रज्वलयेत् तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥५॥
तं ह होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय प्रज्वलयेत् तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥५॥
एवं सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टाऽभूत् साऽन्नेनोपसमाहिता प्राज्वालीत् तयैतर्हि वेदाननुभवस्यन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयो वागिति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ६ ॥ ७ ॥
(तदेष श्लोकः-
उद्दालको हाऽरुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः(यत्रायं पुरुषः .शाखान्तरपाठः) स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति ॥ १ ॥
स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धः दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयत(उपश्रयते .श) एवमेव खलु सोम्यैतन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्राऽयतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते(उपाश्रयते .श) प्राणबन्धनं हि सोम्य मन इति ॥ २ ॥
अशनापिपासे(अशनायापिपासे) मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ३ ॥
तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यान्नेन शुङ्गेनापोमूलमन्विच्छद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥
अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ५ ॥
तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भ्यः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ६ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ ८ ॥
यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणां रसानां(रसान् .पा) समवहारमेकतांं गमयन्ति ॥ १ ॥
ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति ॥ २ ॥
त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यत् भवन्ति तत्तदा भवन्ति ॥ ३ ॥
स एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ(ऽ)तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥ ९ ॥
इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात् प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात् प्रतीच्यस्ताः समुद्रात् समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति ॥ १ ॥
एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामहे इति त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यद् भवन्ति तत् तदा भवन्ति ॥ २ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १० ॥
अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद् यो मध्येऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद् योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेत् स एष जीवेनात्मनाऽनुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति ॥ १ ॥
अस्य यदैकां शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां जहात्यथ सा शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यत्येवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच ॥ २ ॥
जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियत इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ ११ ॥
न्यग्रोधफलमत आहरेति इदं भगव इति भिन्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति ॥ १ ॥
तं होवाच यं वै सौम्य एतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्नः एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धस्व सोम्येति ॥२॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १२ ॥
लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह(तद्ध) तथा चकार तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ॥ १ ॥
यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्त्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यभिप्रास्यैतदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत् संवर्तते तं होवाचात्र वाव किल स सोम्यैतमणिमानं न निभालयसेऽत्रैव किलेति ॥ २ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १३ ॥
यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षमानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत् स यथा तत्र प्राङ्वोदङ्वाऽधराङ्वा प्राध्मायीताऽभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः ॥ १ ॥
तस्य यथाऽभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद् ग्रामं पृच्छन् पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पद्येतैवमेवेहाऽचार्यवान् पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्यत इति ॥ २ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १४ ॥
पुरुषं सोम्योपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ॥ १ ॥
अथ यदाऽस्य वाङ् मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ॥ २ ॥
स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १५ ॥
पुरुषं सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत् स्तेयमकार्षीत् परशुमस्मै तपतेति स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसन्धोऽनृतेनाऽत्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते ॥ १ ॥
अथ स यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येनाऽत्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥ २ ॥
स यथा तत्र (नादाह्येत)न दाह्येत एतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति तद्धास्य विजज्ञाविति । (इत आरभ्य खण्डान्तं वेदेशियटीकानुसारेण उपनिषदि दृश्यमानोऽधिकः पाठः। अयं श्रीराघवेन्द्रतीर्थीयटीकानुसारी न इत्यवगन्तव्यम्। हृषीकेशतीर्थीयेऽपि पाठोऽयं न दृश्यते) (सर्वेषां खलु भुतानामात्मा सत्ये प्रतिष्ठितः। तेनाऽत्मानमन्तर्धाय न किञ्चित् पापमृच्छति। आत्मा सत्य आत्मा साक्षी सतां धर्मः प्रतापवान् । न स पापानि कुरुते यस्याऽत्मा भवति प्रियः।जायत्येको म्रियत्येकोऽश्नात्येकः शुभाशुभम्॥ इति॥
सप्तमोऽध्यायः
ओम् अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदस्तं होवाच यद् वेत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति स होवाच ॥ १ ॥
ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यामेतद् भगवोऽध्येमि ॥ २ ॥
सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तन्मा भगवांञ्च्छोकस्य पारं तारयत्विति तं होवाच यद्वै किञ्चैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत् ॥ ३ ॥
नाम वा ऋग्वेदः यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमः वेदानां वेदः पित्र्यो राशिर्दैवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्मविद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्या नामैवैतन्नामोपास्वेति ॥ ४ ॥
स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो नाम ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो (वाग्वा)वावा भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ५ ॥ १ ॥
वाग्वाव नाम्नो भूयसी वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयति यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाऽकाशं चाऽपश्च तेजश्च देवांश्च मनुष्यांश्च पशूंश्च वयांसि च तृणवनस्पतीञ्च्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं च यद्वै वाङ् नाभविष्यन्न धर्मो नाधर्मो व्यज्ञापयिष्यन्न सत्यं नानृतं न साधु नासाधु न हृदयज्ञो वागेवैतत् सर्वं विज्ञापयति वाचमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
स यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो वाचो भूय इति वाचो भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ २ ॥
मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वाऽऽमलके द्वे वा कोले द्वौ वाऽक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम च मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि कुर्वीयेत्यथ कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्स्वेति ॥ १ ॥
स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते स यावन्मनसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो मनो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो मनसो भूय इति मनसो भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ३ ॥
सङ्कल्पो वाव मनसो भूयान् यदा वै सङ्कल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥
तानि ह वा एतानि सङ्कल्पैकायनानि सङ्कल्पात्मकानि सङ्कल्पे प्रतिष्ठितानि समक्लृपतां द्यावापृथिवी समकल्पेतां वायुश्चाऽकाशश्च समकल्पन्ताऽ(मा)पश्च तेजश्च तेषां सङ्क्लृप्त्यै वर्षं सङ्कल्पते वर्षस्य सङ्क्लृप्त्या अन्नं सङ्कल्पतेऽन्नस्य सङ्ग्क्लृप्त्यै प्राणाः सङ्कल्पन्ते प्राणानां सङ्क्लृप्त्यै मन्त्राः सङ्कल्पन्ते मन्त्राणां सङ्क्लृप्त्यै कर्माणि सङ्कल्पन्ते कर्मणां सङ्क्लृप्त्यै लोकाः सङ्कल्पन्ते लोकानां सङ्क्लृप्त्यै सर्वं सङ्कल्पते स एष सङ्कल्पः सङ्कल्पमुपास्स्वेति ॥ २ ॥
स यः सङ्कल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते क्लृप्तान् वै स लोकान् ध्रुवान् ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिद्ध्यति यावत् सङ्कल्पस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः सङ्कल्पं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति (भगवो वाचो) भगवः सङ्कल्पाद् भूय इति सङ्कल्पात् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥ ४ ॥
चित्तं वाव सङ्कल्पाद् भूयो यदा चेतयतेऽथ सङ्कल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥
तानि ह वा एतानि चित्तैकायनानि चित्तात्मकानि चित्ते प्रतिष्ठितानि तस्माद् यद्यपि बहुविदचित्तो भवति नायमस्तीत्येवैनमाहुर्यदयं वेद यद्वा अयं विद्वान् नेत्थमचित्तः स्यादित्यथ यद्यल्पविच्चित्तवान् भवति तस्मा एवोत शुश्रूषन्ते चित्तं ह्येवैषामेकायनं चित्तमात्मा चित्तं प्रतिष्ठा चित्तमुपास्स्वेति ॥ २ ॥
स यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्ते चित्तान् वै स लोकान् ध्रुवान् ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिद्ध्यति यावच्चित्तस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवश्चित्ताद् भूय इति चित्ताद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥ ५ ॥
ध्यानं वाव चित्ताद्भूयो ध्यायतीव पृथिवी ध्यायतीव द्यौर्ध्यायतीवान्तरिक्षं ध्यायन्तीवाऽपो ध्यायन्तीव पर्वता ध्यायन्तीव देवमनुष्यास्तस्माद् य इह मनुष्याणां महत्तां प्राप्नुवन्ति ध्यानापादांशा इवैव ते भवन्त्यथ येऽल्पाः कलहिनः पिशुना उपवादिनस्तेऽथ ये प्रभवो ध्यानापादांशा इवैव ते भवन्ति ध्यानमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
स यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत् ध्यानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो ध्यानाद् भूय इति ध्यानाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥६॥
विज्ञानं वाव ध्यानाद् भूयो विज्ञानेन वा ऋग्वेदं विजानाति यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाकाशं चापश्च तेजश्च देवांश्च मनुष्यांश्च पशूंश्च वयांसि च तृणवनस्पतीञ्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं चान्नं च रसं चेमं च लोकममुं च विज्ञानेनैव विजानाति विज्ञानमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
स यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते विज्ञानवतो वै स लोकान् ज्ञानवतोऽभिसिद्ध्यति यावद् विज्ञानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो विज्ञानाद् भूय इति विज्ञानाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥७॥
बलं वाव विज्ञानाद् भूयोऽपीह शतं विज्ञानवतामेको बलवानाकम्पयते स यदा बली भवत्यथोत्थाता भवत्युत्तिष्ठन् परिचरिता भवति परिचरन्नुपसत्ता भवत्युपसीदन् द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवति बलेन वै पृथिवी तिष्ठति बलेनान्तरिक्षं बलेन द्यौर्बलेनापो बलेन पर्वता बलेन देवमनुष्या बलेन पशवश्च वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं बलेन वै लोकस्तिष्ठति बलमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद् बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद् भूय इति बलाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ८ ॥
स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद् बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद् भूय इति बलाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ८ ॥
अन्नं वाव बलाद् भूयस्तस्माद् यद्यपि दशरात्रीर्नाश्नीयाद् यदु ह जीवेऽदथवाऽद्रष्टाऽश्रोताऽमन्ताऽबोद्धाऽकर्ताऽविज्ञाता भवत्यथान्नस्याशी द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवत्यन्नमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
स योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽन्नवतो वै स लोकान् पानवतोऽभिसिद्ध्यति यावत् अन्नस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽन्नात् भूय इत्यन्नाद् वाव भूयोस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ९ ॥
आपो वावान्नाद् भूयस्यस्तस्माद् यदा सुवृष्टिर्न भवति व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो भविष्यतीत्यथ यदा सुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहु भविष्यतीत्याप एवेमा मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्षं यद् द्यौर्यत् पर्वता यद् देवमनुष्या यत् पशवश्च वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकमाप एवेमा मूर्ता अप उपास्स्वेति ॥ १ ॥
स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्ते आप्नोति सर्वान् कामांस्तृप्तिमान् भवति यावदपां गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽपो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो अद्भ्य भूय इति अद्भ्यो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ १० ॥
तेजो वावाद्भ्यो भूयस्तद्वा एतद् वायुमागृह्याकाशमभितपति तदाऽऽहुर्निशोचति नितपति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तदेतदूर्ध्वाभिश्च तिरश्चीभिश्च विद्युदि्भराह्रादाश्चरन्ति तस्मादाहुर्विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥
स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वै स तेजस्वतो लोकान् भास्वतोऽपहततमस्कानभिसिद्ध्यति यावत्तेजसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो तेजसो भूय इति तेजसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ११ ॥
आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निराकाशेन आह्वयत्याकाशेन शृृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्ते आकाशवतो ह वै स लोकान् प्रकाशवतोऽसम्बाधानुरुगायवतोऽभिसिद्ध्यति यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो आकाशाद् भूय इति आकाशाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ १२ ॥
स्मरो वा आकाशाद् भूयांस्तस्माद् यद्यपि बहव आसीरन्नस्मरन्तो नैव ते कञ्चन शृणुयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन् यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन् स्मरेण वै पुत्रान् विजानाति स्मरेण पशूं स्मरमुपास्स्वेति ॥ १ ॥
स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत् स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो स्मराद् भूय इति स्मराद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥१३॥
आशा वाव स्मराद् भूयस्याशेद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते कर्माणि कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति ॥ १ ॥
स य आशां ब्रह्मेत्युपास्ते आशायाऽस्य सर्वे कामाः समृध्यन्त्यमोघा हास्याऽशिषो भवन्ति यावदाशाया गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आशां ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आशाया भूय इत्याशाया वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ १४ ॥
प्राणो वा आशाया भूयान् यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्वं समर्पितं प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥ १ ॥
स यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा स्वसारं वाऽऽचार्यं वा ब्राह्मणं वा किञ्चिद्भृशमिव प्रत्याह धिक्त्वाऽस्त्वित्येवैनमाहुः पितृहा वै त्वमसि मातृहा वै त्वमसि भ्रातृहा वै त्वमसि स्वसृहा वै त्वमस्याचार्यहा वै त्वमसि ब्राह्मणहा वै त्वमसीति ॥ २ ॥
अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्च्छूलेन समासं व्यतिषं दहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहाऽसीति न मातृहाऽसीति न भ्रातृहाऽसीति न स्वसृहाऽसीति नाचार्यहाऽसीति न ब्राह्मणहाऽसीति ॥ ३ ॥
प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीत्येव ब्रूयान्नापह्नुवीत ॥ ४ ॥ १५ ॥
एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानीति सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ १६ ॥
यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन् सत्यं वदति विजानन्नैव सत्यं वदति विज्ञानं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ १७ ॥
यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ १८॥
यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते नाश्रद्दधन्मनुते श्रद्दधदेव मनुते श्रद्धा त्वेव विजिज्ञासितव्येति श्रद्धां भगवो विजिज्ञास इति॥ १॥१९ ॥
यदा वै निस्तिष्ठत्यथ श्रद्धधाति नानिस्तिष्ठन् श्रद्दधाति निस्तिष्ठन्नेव श्रद्दधाति निष्ठा त्वेव विजिज्ञासितव्येति निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ २० ॥
यदा वै करोत्यथ निस्तिष्ठति नाकृत्वा निस्तिष्ठति कृत्वैव निस्तिष्ठति कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति कृतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १॥ २१ ॥
यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं लब्ध्वा करोति सुखमेव लब्ध्वा करोति सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सुखं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १॥ २२ ॥
यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १॥ २३ ॥
यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ यत्रान्यत् पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद् विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यं स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नीति ॥ १ ॥
गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेव ब्रवीमीति होवाचान्यो ह्यन्यस्मिन् प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥ २४ ॥
स एवाधस्तात् स उपरिष्टात् स पश्चात् स पुरस्तात् स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेदं सर्वमिति।
अथात आत्मादेश एवाऽत्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदं सर्वमिति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराड् भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवत्यथ येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥ २५ ॥
तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आशाऽऽत्मतः स्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्मत आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमात्मतो विज्ञानमात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतः सङ्कल्पः आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामाऽत्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेदं सर्वमिति ॥१॥
तदेष श्लोकः-
अष्टमोऽध्यायः
ओम् अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १ ॥
तं चेद् ब्रूयुर्यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद् वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥ २ ॥
यावान् वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन् समाहितमिति ॥ ३ ॥
तं चेद् ब्रूयुरस्मिंश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितं सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदैनं जराऽ(यदैतज्जरा .प्र)वाप्नोति प्रध्वंसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥
स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत् सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥ ५ ॥
तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य इहाऽत्मानमननुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान् कामां स्तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवत्यथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान् कामां स्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ६ ॥ १ ॥
स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति तेन पितृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ १ ॥
अथ यदि मातृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन मातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ २ ॥
अथ यदि भ्रातृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य भ्रातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन भ्रातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ३ ॥
अथ यदि स्वसृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य स्वसारः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्वसृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ४ ॥
अथ यदि सखिलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य सखायः समुत्तिष्ठन्ति तेन सखिलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ५ ॥
अथ यदि गन्धमाल्यलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतस्तेन गन्धमाल्यलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ६ ॥
अथ यद्यन्नपालोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य अन्नपाने समुत्तिष्ठतः तेनान्नपानलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ७ ॥
अथ यदि गीतवादित्रलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य गीतवादित्रे समुत्तिष्ठतः तेन गीतवादित्रलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ८ ॥
अथ यदि स्त्रीलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्त्रीलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ९ ॥
यं यमन्तमभिकामो भवति यं कामं कामयते सोऽस्य सङ्कल्पादेवास्य समुत्तिष्ठति तेन सम्पन्नो महीयते ॥ १० ॥ २ ॥
त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषां सत्यानां सतामनृतमपिधानं यो यो ह्यस्येतः प्रैति न तमिह दर्शनाय लभते ॥ १ ॥
अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन् न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानास्तद्यथापि हिरण्यनिधिं निहतमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वा प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥ २ ॥
स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तं हृद्ययमिति तस्माद्धृदयमहरहर्वा एवंवित् स्वर्गं लोकमेति ॥ ३ ॥
अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति ॥४॥
तानि ह वा एतानि त्रीण्यक्षराणि सत् ति यमिति तद् यत् सत् तदमृतमथ यत् ति तन्मर्त्यमथ यद्यं तेनोभे यच्छति यदनेनोभे यच्छति तस्माद् यमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमेति ॥ ५ ॥ ३ ॥
अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसम्भेदाय नैतंसेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुष्कृतं सर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः ॥ १ ॥
तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वाऽन्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो भवत्युपतापी सन्ननुपतापी भवति तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वाऽपि नक्तमहरेवाभिनिष्पद्यतेऽसकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः ॥२॥
तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ३ ॥ ४ ॥
अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दतेऽथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्वाऽऽत्मानमनुविन्दते ॥ १ ॥
अथ यत् सत्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येव सत आत्मनस्त्राणं विन्दतेऽथ यन्मौनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्येमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येवाऽत्मानमनुविद्य मनुते ॥ २ ॥
अथ यदनाशकायनमित्यचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते ।
तद् य एवैतावरं च वै ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ४ ॥ ५ ॥
अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष पीत एष लोहितः ॥ १ ॥
तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छतीमं चामुं चैवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते त आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥ २ ॥
तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्यासु तदा नाडीषु सृप्तो भवति तं न कश्चन पाप्मा स्पृशति तेजसा हि तदा सम्पन्नो भवति ॥ ३ ॥
अथ यत्रैतदबलिमानं नीतो भवति तमभित आसीना आहुर्जानासि मां जानासि मामिति स यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति तावज्जानाति ॥ ४ ॥
अथ यत्रैतस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वं आक्रमते स ओमितिवाहोद्वामीयते स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम् ॥ ५ ॥
तदेष श्लोकः
य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति स सर्वांश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ॥ १ ॥
तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामानितीन्द्रो ह वै देवानामभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणां तौ हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापतिसकाशमाजग्मतुः ॥ २ ॥
तौ ह द्वात्रिंशतं वर्षाणि प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्ताववास्तामिति तौ होचतुर्य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह भगवतो वचो हरन्तो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ॥ ३ ॥
तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽन्तरक्षणि(अन्तरक्षिणि) पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेत्यथ योऽयं भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादर्शे कतम एष इत्येष(व) उ एवैषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायत इति होवाच ॥ ४ ॥ ७ ॥
उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानीथस्तन्मे प्रब्रूतमिति तौ होदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ १ ॥
तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामिति तौ ह साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति ॥ २ ॥
तौ होचतुर्यथैवेदमावां भगवः साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ स्व एवमेवेमौ भगवः साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृताविति एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति तौ ह शान्तहृदयौ प्रवव्रजतुः ॥ ३ ॥
तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचानुपलभ्याऽत्मानमननुविद्य व्रजतो यतर एतदुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वाऽसुरा वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्तहृदय एव विरोचनोऽसुरान् जगाम तेभ्यो हैतामुपनिषदं प्रोवाचात्मैवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महय्यन्नात्मानं परिचरन्नुभौ लोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ॥ ४ ॥
तस्मादप्यद्येहाददानमश्रद्दधानमयजमानमाहुरासुरो बतेत्यसुराणां ह्येषोपनिषत् प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसनेनालङ्कारेणेति संस्कुवर्न्त्येतेन ह्यमुं लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥ ५ ॥ ८ ॥
अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद् भयं ददर्श यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति ॥ १ ॥
नाहमत्र भोज्यं पश्यामीति स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन् यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः सार्धं विरोचनेन किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोज्यं पश्यमीति ॥ २ ॥
एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै स होवाच ॥ ३ ॥ ९ ॥
य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद् भयं ददर्श तद्यदपीदं शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ १ ॥
न वधेनास्य हन्यते नास्य स्रामेण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोज्यं पश्यामीति ॥ २ ॥
स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन् यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच तद्यदपीदं शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ ३ ॥
न वधेनास्य हन्यते नास्य स्रामेण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं(ज्यं) पश्यामीत्येवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै स होवाच ॥ ४ ॥ १० ॥
तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्तः सन् प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श नाहं खल्वयमेवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यमीति ॥ १ ॥
स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन् यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमेवेच्छन् पुनरागम इति स होवाच नाहं खल्वयं भगव एवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यमीति ॥ २ ॥
एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्माद् वसापराणि पञ्च वर्षाणीति स हापराणि पञ्च वर्षाण्युवास तान्येकशतं सम्पेदुरेतत् तद् यदाहुरेकशतं ह वै वर्षाणि मघवान् प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास तस्मै स होवाच ॥ ३ ॥ ११ ॥
मघवन् मर्त्यं वाव इदं शरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्याऽत्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥ १ ॥
अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत् स्तनयित्नुरशरीराण्येतानि तद् यथैतान्यमुष्मादकाशात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥ २ ॥
एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः स यत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वाऽज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरं स यथा प्रायोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्छरीरे प्राणो युक्तः ॥ ३ ॥
अथ यत्रैतदाकाशमनुविषण्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माऽभिव्याहाराय वागथ यो वेदेदं शृणवानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥
अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा(मननाय) मनोऽस्य दैवं चक्षुः स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते ॥ ५ ॥
य एते ब्रह्मलोके तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात् तेषां सर्वे च लोकाः आत्ताः सर्वे च कामाः सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच ॥ ६ ॥ १२ ॥
श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छयामं प्रपद्येऽश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात् प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसम्भवामीत्यभिसम्भवामीति ॥ १॥ १३ ॥
आकाशो वै नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद् ब्रह्म तदमृतं स आत्मा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवानि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशो विशां यशोऽहमनुप्रापत्सि स हाहं यशसां यशः श्वेतमदत्कमदत्कं श्वेतं लिन्दुमाऽभिगां लिन्दुमाऽभिगाम् ॥ १॥ १४ ॥
तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यः आचार्यकुलाद् वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषणाभिसमावृत्य कुटुम्बी(कुटुम्बे .हृ) शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिंसन् सर्वाणि भूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन् यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते ॥ १॥ १५ ॥