Mandu/Moola: Difference between revisions
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| verse_lines = सर्वमोङ्कार एव । यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव । सर्वं ह्येतद् ब्रह्म । अयमात्मा ब्रह्म ॥ २ ॥ सोयमात्मा चतुष्पात् ॥ | |||
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| verse_text = यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत् सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत् सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञः एषोऽन्तर्यामी ।;एष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = अत्रैते श्लोका भवन्ति ।;बहिःप्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तःप्रज्ञस्तु तैजसः ।;घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = दक्षिणाक्षिमुखे विश्वो मनस्यन्तस्तु तैजसः ।;आकाशे च हृदि प्राज्ञस्त्रिधा देहे व्यवस्थितः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = विश्वो हि स्थूलभुङ् नित्यं तैजसः प्रविविक्तभुक् ।;आनन्दभुक् तथा प्राज्ञस्त्रिधा भोगं निबोधत ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = स्थूलं तर्पयते विश्वं प्रविविक्तं तु तैजसम् ।;आनन्दं च तथा प्राज्ञं त्रिधा तृप्तिं विजानथ ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = त्रिषु धामसु यद् भोज्यं भोक्ता यश्च प्रकीर्तितः ।;वेदैतदुभयं यस्तु स भुञ्जानो न लिप्यते ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रभवः सर्वभावानां सतामिति विनिश्चयः ।;सर्वं जनयति प्राणश्चेतोंऽशून् पुरुषः पृथक् ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_lines = विभूतिं प्रसवं त्वन्ये मन्यन्ते सृष्टिचिन्तकाः ।;स्वप्नमायासरूपेति सृष्टिरन्यैर्विकल्पिता ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_lines = इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिरिति सृष्टौ विनिश्चिताः ।;कालात् प्रसूतिं भूतानां मन्यन्ते कालचिन्तकाः ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये क्रीडार्थमिति चापरे ।;देवस्यैषः स्वभावोऽयमाप्तकामस्य का स्पृहेति ॥ १५ ॥ | |||
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<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयखण्डः"></span> | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयखण्डः"></span> | ||
== द्वितीयखण्डः == | == द्वितीयखण्डः == | ||
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| verse_text = नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं नप्रज्ञं नाप्रज्ञमदृष्टं अव्यवहार्यं अलक्षणं अचिन्त्यं अव्यपदेश्यं ऐकात्म्यप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते । स आत्मा स विज्ञेयः ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं नप्रज्ञं नाप्रज्ञमदृष्टं अव्यवहार्यं अलक्षणं अचिन्त्यं अव्यपदेश्यं ऐकात्म्यप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते । स आत्मा स विज्ञेयः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = अत्रैते श्लोकाः भवन्ति ।;निवृत्तेः सर्वदुःखानामीशानः प्रभुरव्ययः ।;अद्वैतः सर्वभावानां देवस्तुर्यो विभुः स्मृतः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतैजसौ ।;प्राज्ञः कारणबद्धस्तु द्वौ तु तुर्ये न सिद्ध्यतः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = नाऽऽत्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम् ।;प्राज्ञः किञ्चन संवेत्ति तुर्यं तत् सर्वदृक् सदा ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = द्वैतस्याग्रहणं तुल्यमुभयोः प्राज्ञतुर्ययोः ।;बीजनिद्रायुतः प्राज्ञः सा च तुर्ये न विद्यते ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वप्ननिद्रायुतावाद्यौ प्राज्ञस्त्वस्वप्ननिद्रया ।;न निद्रां नैव च स्वप्नं तुर्ये पश्यन्ति निश्चिताः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्यथागृह्णतः स्वप्नो निद्रा तत्त्वमजानतः ।;विपर्यासे तयोः क्षीणे तुरीयं पदमश्नुते ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुद्ध्यते ।;अजमनिद्रमस्वप्नमद्वैतं बुद्ध्यते तदा ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।;मायामात्रमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।;उपदेशादयं वादो ज्ञाते द्वैतं न विद्यत इति ॥ १० ॥ | |||
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== तृतीयः खण्डः == | == तृतीयः खण्डः == | ||
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| verse_lines = सोऽयमात्माऽध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा अकार उकारो मकार इति ॥ १ ॥;जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्रा । आप्तेरादिमत्त्वाद् वा ।;आप्नोति ह वै सर्वान् कामानादिश्च भवति । य एवं वेद ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रा । उत्कर्षादुभयत्वाद् वा । उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित् कुले भवति । य एवं वेद ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा । मितेरपीतेर्वा । मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति । य एवं वेद ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अत्रैते श्लोकाः भवन्ति-;विश्वस्यात्वविवक्षायामादिसामान्यमुत्कटम् ।;मात्रासम्प्रतिपत्तौ स्यादाप्तिसामान्यमेव च ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = तैजसस्योत्वविज्ञान उत्कर्षो दृश्यते स्फुटम् ।;मात्रासम्प्रतिपत्तौ स्यादुभयत्वं तथाविधम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_lines = मकारभावे प्राज्ञस्य मानसामान्यमुत्कटम् ।;मात्रासम्प्रतिपत्तौ तु लयसामान्यमेव च ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = त्रिषु धामसु यत् तुल्यं सामान्यं वेत्ति निश्चितम् ।;स पूज्यस्सर्वभूतानां वन्द्यश्चैव महामुनिः ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = अकारो नयते विश्वमुकारश्चापि तैजसम् ।;मकारश्च पुनः प्राज्ञं नामात्रे विद्यतेऽगतिरिति ॥ ९ ॥ | |||
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== चतुर्थः खण्डः == | == चतुर्थः खण्डः == | ||
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| verse_lines = अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत ओङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद ॥ १ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वस्य प्रणवो ह्यादिर्मध्यमन्तस्तथैव च ।;एवं हि प्रणवं ज्ञात्वा व्यश्नुते तदनन्तरम् ॥ ५ ॥ | |||
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Latest revision as of 07:14, 8 June 2026
माण्डूकोपनिषद्भाष्यम् — मूलम्
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प्रथमः खण्डः
ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम् । तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति ॥ १ ॥
सर्वमोङ्कार एव । यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव । सर्वं ह्येतद् ब्रह्म । अयमात्मा ब्रह्म ॥ २ ॥ सोयमात्मा चतुष्पात् ॥
जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः । सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग् वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥ ३ ॥
स्वप्नस्थानोऽन्तप्रज्ञः । सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक् तैजसो द्वितीयः पादः ॥ ४ ॥
यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत् सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५ ॥
एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञः एषोऽन्तर्यामी ।
अत्रैते श्लोका भवन्ति ।
दक्षिणाक्षिमुखे विश्वो मनस्यन्तस्तु तैजसः ।
विश्वो हि स्थूलभुङ् नित्यं तैजसः प्रविविक्तभुक् ।
स्थूलं तर्पयते विश्वं प्रविविक्तं तु तैजसम् ।
त्रिषु धामसु यद् भोज्यं भोक्ता यश्च प्रकीर्तितः ।
प्रभवः सर्वभावानां सतामिति विनिश्चयः ।
विभूतिं प्रसवं त्वन्ये मन्यन्ते सृष्टिचिन्तकाः ।
इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिरिति सृष्टौ विनिश्चिताः ।
भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये क्रीडार्थमिति चापरे ।
द्वितीयखण्डः
नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं नप्रज्ञं नाप्रज्ञमदृष्टं अव्यवहार्यं अलक्षणं अचिन्त्यं अव्यपदेश्यं ऐकात्म्यप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते । स आत्मा स विज्ञेयः ॥ १ ॥
अत्रैते श्लोकाः भवन्ति ।
कार्यकारणबद्धौ ताविष्येते विश्वतैजसौ ।
नाऽऽत्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम् ।
द्वैतस्याग्रहणं तुल्यमुभयोः प्राज्ञतुर्ययोः ।
स्वप्ननिद्रायुतावाद्यौ प्राज्ञस्त्वस्वप्ननिद्रया ।
अन्यथागृह्णतः स्वप्नो निद्रा तत्त्वमजानतः ।
अनादिमायया सुप्तो यदा जीवः प्रबुद्ध्यते ।
प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।
विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।
तृतीयः खण्डः
सोऽयमात्माऽध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा अकार उकारो मकार इति ॥ १ ॥
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रा । उत्कर्षादुभयत्वाद् वा । उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित् कुले भवति । य एवं वेद ॥ ३ ॥
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा । मितेरपीतेर्वा । मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति । य एवं वेद ॥ ४ ॥
अत्रैते श्लोकाः भवन्ति-
तैजसस्योत्वविज्ञान उत्कर्षो दृश्यते स्फुटम् ।
मकारभावे प्राज्ञस्य मानसामान्यमुत्कटम् ।
त्रिषु धामसु यत् तुल्यं सामान्यं वेत्ति निश्चितम् ।
अकारो नयते विश्वमुकारश्चापि तैजसम् ।
चतुर्थः खण्डः
अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत ओङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद ॥ १ ॥
युञ्जीत प्रणवे चेतः प्रणवो ब्रह्म निर्भयम् ।
प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म प्रणवस्य परं स्मृतः ।
सर्वस्य प्रणवो ह्यादिर्मध्यमन्तस्तथैव च ।
प्रणवं हीश्वरं विद्यात् सर्वस्य हृदये स्थितम् ।
अमात्रोऽनन्तमात्रश्च द्वैतस्योपशमः शिवः ।