Satprashna: Difference between revisions
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<div class="gr-doc-title">षट्प्रश्नोपनिषद्भाष्यम्</div> | <div class="gr-doc-title" data-has-moola="1">षट्प्रश्नोपनिषद्भाष्यम्</div> | ||
__TOC__ | __TOC__ | ||
<span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमप्रश्नः"></span> | |||
== प्रथमप्रश्नः == | == प्रथमप्रश्नः == | ||
<div class="introduction" id="SPB_C01_I01" data-block-id="SPB_C01_I01" data-verse="SPB_C01"> | |||
<div class="introduction-line">नमो भगवते तस्मै प्राणादिप्रभविष्णवे ।<</div> | |||
<div class="introduction-line">अमन्दानन्दसान्द्राय वासुदेवाय वेधसे ।<</div> | |||
</div> | |||
नमो भगवते तस्मै प्राणादिप्रभविष्णवे । | |||
अमन्दानन्दसान्द्राय वासुदेवाय वेधसे । | |||
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| verse_line1 = सुकेशा च भारद्वाजः शैब्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः | | verse_line1 = ओ३म् ॥ सुकेशा च भारद्वाजः, शैब्यश्च सत्यकामः, सौर्यायणी च गार्ग्यः, कौसल्यश्चाऽश्वलायनो, भार्गवो वैदर्भिः, कबन्धी कात्यायनः ते हैते ब्रह्मपराः ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणाः एष ह वै तत् सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = ओ३म् ॥ सुकेशा च भारद्वाजः, शैब्यश्च सत्यकामः, सौर्यायणी च गार्ग्यः, कौसल्यश्चाऽश्वलायनो, भार्गवो वैदर्भिः, कबन्धी कात्यायनः ते हैते ब्रह्मपराः ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणाः एष ह वै तत् सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = तान् ह स ऋषिरुवाच । भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ । यथाकामं प्रश्नान् पृच्छत । यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = तान् ह स ऋषिरुवाच । भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ । यथाकामं प्रश्नान् पृच्छत । यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥ | ||
| verse_lines = तान् ह स ऋषिरुवाच । भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ । यथाकामं प्रश्नान् पृच्छत । यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ कबन्धी | | verse_line1 = अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ- ‘भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त’ इति, तस्मै स होवाच प्रजाकामो ह वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत ॥ ३ ॥ | ||
| | | verse_lines = अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ- ‘भगवन् कुतो ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त’ इति, तस्मै स होवाच प्रजाकामो ह वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = स मिथुनमुत्पादयते | | verse_line1 = स मिथुनमुत्पादयते रयिं च प्राणं चेति। एतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमाः ॥ | ||
| commentary1 = satprashna | | verse_lines = स मिथुनमुत्पादयते रयिं च प्राणं चेति। एतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमाः ॥ | ||
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| text = | | text = प्रजानां पालनाद् विष्णुः प्रजापतिरितीरितः । | ||
स वायुं सूर्यनामानं चन्द्रनाम्नीं सरस्वतीम् ॥ | स वायुं सूर्यनामानं चन्द्रनाम्नीं सरस्वतीम् ॥ | ||
सूर्याचन्द्रगतौ देवः ससर्ज पुरुषोत्तमः । | सूर्याचन्द्रगतौ देवः ससर्ज पुरुषोत्तमः । | ||
तावाविश्य स्वयं विष्णुः सर्वसृष्टीः करोत्यजः ॥ | तावाविश्य स्वयं विष्णुः सर्वसृष्टीः(सर्वसृष्टिं .हृ) करोत्यजः ॥ | ||
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| verse_line1 = रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः, अथाऽदित्य उदयन् यत् प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु सन्निधत्ते, यद् दक्षिणां यत् प्रतीचीं यदुदीची यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत् सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु सन्निधत्ते ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = रयिर्वा एतत्सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः, अथाऽदित्य उदयन् यत् प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु सन्निधत्ते, यद् दक्षिणां यत् प्रतीचीं यदुदीची यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत् सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु सन्निधत्ते ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते । तदेतदृचाऽभ्युक्तम्- | ||
| commentary1 = satprashna | | verse_lines = स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते । तदेतदृचाऽभ्युक्तम्-;विश्वरूपं करिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् ।;सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ६ ॥ | ||
| verse_line2 = विश्वरूपं करिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । | |||
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| text = | | text = अमूर्तस्थः स वायुस्तु(वायुस्थः .हृ) मूर्तसंस्था सरस्वती । | ||
आदित्यस्थः स वायुस्तु प्राणान् आत्मनि सन्नयेत् ॥ | |||
अमूर्तस्थः स वायुस्तु मूर्तसंस्था सरस्वती । | |||
आदित्यस्थः स वायुस्तु | |||
प्राच्याः प्राणास्तथेन्द्राद्या दक्षिणाश्च यमादयः । | प्राच्याः प्राणास्तथेन्द्राद्या दक्षिणाश्च यमादयः । | ||
प्रतीच्या वरुणाद्यास्तु सोमाद्या उत्तराः स्मृताः । | प्रतीच्या वरुणाद्यास्तु सोमाद्या उत्तराः स्मृताः । | ||
शेषमित्राववाचीनौ वीन्द्रकामावुदक्तनौ । | शेषमित्राववाचीनौ वीन्द्रकामावुदक्तनौ । | ||
सभार्याः कोणपैः सार्धं चत्वारो | सभार्याः कोणपैः सार्धं चत्वारो दिशिदिश्यपि ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च । तद् ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते। तस्मादेते ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ७ ॥ | ||
| | | verse_lines = संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च । तद् ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते। तस्मादेते ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद् वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत् परायणम् । एतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः । | ||
| verse_lines = अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद् वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत् परायणम् । एतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधः ।;तदेष श्लोकः -;पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् ।;अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षळर आहुरर्पितमिति ॥ ८ ॥ | |||
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| | | text = संवत्सरस्थो भगवान् वागीरावयनस्थितौ । | ||
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| verse_line1 = मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः । शुक्लः प्राणः । तस्मादेते ऋषयः शुक्ल इष्टिं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् । अहोरात्रे वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः । प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते । ब्रह्मचर्यमेव तद् यद् रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ ९ ॥ | |||
| verse_lines = मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः । शुक्लः प्राणः । तस्मादेते ऋषयः शुक्ल इष्टिं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् । अहोरात्रे वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः । प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते । ब्रह्मचर्यमेव तद् यद् रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = अन्नं वै प्रजापतिस्ततो हैतद् रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति । तद् ये हैतत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति तेे मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् । तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = satprashna | | verse_lines = अन्नं वै प्रजापतिस्ततो हैतद् रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति । तद् ये हैतत्प्रजापतिव्रतं चरन्ति तेे मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् । तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = satprashna | |||
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| text = | | text = मासस्थितः स भगवान् पक्षयोर्वाक् च मारुतः । | ||
अहोरात्रे तु भगवान् प्राणो(प्राणोऽह्न्यथ च .हृ) ह्यहनि वाङ् निशि ॥ | |||
मासस्थितः स भगवान् पक्षयोर्वाक् च मारुतः | |||
अहोरात्रे तु भगवान् प्राणो ह्यहनि वाङ् निशि | |||
दम्पत्योर्भगवान् विष्णुर्भार्यास्था तु सरस्वती । | दम्पत्योर्भगवान् विष्णुर्भार्यास्था तु सरस्वती । | ||
भर्तृस्थः स स्वयं वायुरेवं जानन् विमुच्यते ॥ | भर्तृस्थः स स्वयं वायुरेवं जानन् विमुच्यते ॥ इति प्रजापतिसंहितायाम् | ||
इति प्रजापतिसंहितायाम् | |||
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</div> | |||
<div class="gr-author-note">॥ इति प्रथमप्रश्प्रतिवचनम्॥</div> | |||
<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयः प्रश्नः"></span> | |||
== द्वितीयः प्रश्नः == | == द्वितीयः प्रश्नः == | ||
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| verse_lines = अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । भगवन् कत्येव देवाः प्रजा विधारयन्ते । कतर एतत् प्रकाशयन्ते । कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । भगवन् कत्येव देवाः प्रजा विधारयन्ते । कतर एतत् प्रकाशयन्ते । कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मै स होवाच । आकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्राकाश्या अभिवदन्ति । वयमेतद् बाणमवष्टभ्य विधारयाम इति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = तस्मै स होवाच । आकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्राकाश्या अभिवदन्ति । वयमेतद् बाणमवष्टभ्य विधारयाम इति ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = satprashna | | verse_lines = तस्मै स होवाच । आकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्राकाश्या अभिवदन्ति । वयमेतद् बाणमवष्टभ्य विधारयाम इति ॥ २ ॥ | ||
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| commentary1 = satprashna | | verse_lines = तान् वरिष्ठः प्राण उवाच । मा मोहमापद्यथ। अहमेवैतत् पञ्चधाऽत्मानं प्रविभज्यैतद् बाणमवष्टभ्य विधारयामीति । तेऽश्रद्दधाना बभूवुः । सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव । तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रमन्ते । तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रतिष्ठन्ते ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = satprashna | |||
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| verse_line2 = एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ४ ॥ | | verse_lines = तद्यथा मधुमक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रमन्ते । तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रतिष्ठन्ते । एवं वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रं च। ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ।;एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः। एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ४ ॥ | ||
| verse_line2 = एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः। एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ४ ॥ | |||
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| | | verse_lines = अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ।;ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं च ब्रह्म च ॥;प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे ।;तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा यत् प्राणैः प्रतितिष्ठसि ॥;देवानामसि वह्नितमः पितॄणां प्रथमा स्वधा ।;ऋषीणां चरितं सत्यम् अथर्वाऽङ्गिरसामपि ॥ ५ ॥ | ||
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| | | verse_lines = इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता ।;त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥;यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः ।;आनन्दरूपाः तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥;व्रात्यस्त्वं प्राणैकऋषिरत्ता विश्वस्य सत्पतिः ।;वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥ ६ ॥ | ||
| verse_line2 = त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = याते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि । | ||
| | | verse_lines = याते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि ।;या मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥;प्राणस्यैतद्वशे सर्वं त्रिदिवे यत् प्रतिष्ठितम् ।;मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ ७ ॥ | ||
| verse_line2 = या मनसि सन्तता शिवां तां कुरु मोत्क्रमीः ॥ | |||
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<div class="gr-author-note">इति द्वितीयप्रश्नः ।</div> | |||
<span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयः प्रश्नः"></span> | |||
== तृतीयः प्रश्नः == | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ओम्॥ अथ हैनं कौसल्यश्चाऽश्वलायनः पप्रच्छ । भगवन् कुत एष प्राणो जायते। कथमायात्यस्मिन् शरीरे। आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रतिष्ठते। केनोत्क्रमते। कथं बाह्यमभिधत्ते । कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = ओम्॥ अथ हैनं कौसल्यश्चाऽश्वलायनः पप्रच्छ । भगवन् कुत एष प्राणो जायते। कथमायात्यस्मिन् शरीरे। आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रतिष्ठते। केनोत्क्रमते। कथं बाह्यमभिधत्ते । कथमध्यात्ममिति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मै स होवाच। अतिप्रश्नान् पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति। तस्मात् तेऽहं ब्रवीमि। आत्मत एष प्राणो जायते। यथैषा पुरुषे च्छाया एतस्मिन्नेतदाततम्॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = तस्मै स होवाच। अतिप्रश्नान् पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति। तस्मात् तेऽहं ब्रवीमि। आत्मत एष प्राणो जायते। यथैषा पुरुषे च्छाया एतस्मिन्नेतदाततम्॥ २ ॥ | |||
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आत्मतः परमात्मतः॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = मनोकृतेनाऽयात्यस्मिञ्छरीरे । यथा सम्राडेवाधिकृतान् विनियुङ्क्त एतान् ग्रामान् अधितिष्ठस्वैतान् ग्रामान् अधितिष्ठस्वेति, एवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथक् पृथगेव सन्निधत्ते ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = satprashna | | verse_lines = मनोकृतेनाऽयात्यस्मिञ्छरीरे । यथा सम्राडेवाधिकृतान् विनियुङ्क्त एतान् ग्रामान् अधितिष्ठस्वैतान् ग्रामान् अधितिष्ठस्वेति, एवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथक् पृथगेव सन्निधत्ते ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = satprashna | |||
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| text = | | text = ‘विष्णोर्वायुः समुत्पन्नो वायोः सर्वाश्च देवताः । | ||
प्राणाद्यास्तान्नयन् प्राण आज्ञापयति राजवत् ॥ | प्राणाद्यास्तान्नयन् प्राण आज्ञापयति राजवत् ॥ | ||
स्वयं च पञ्चरूपस्सन् दद्यान्मोक्षादिकं प्रभुः | स्वयं च पञ्चरूपस्सन् दद्यान्मोक्षादिकं प्रभुः ॥’ इति प्रभञ्जने | ||
इति प्रभञ्जने | |||
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| verse_lines = पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रतिष्ठते । मध्ये तु समानः । एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति। तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति । हृदि ह्येष आत्मा ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अत्रैतद् एकशतं नाडीनाम् । तासां शतंशतम् एकैकस्यां द्वासप्ततिं प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्चरति । अथैकयोर्ध्वम् उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम्॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं | | verse_line1 = आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः। पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः। तेजो ह वा उदानः। तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥ ६ ॥ | ||
| verse_lines = आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः। पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्यापानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः। तेजो ह वा उदानः। तस्मादुपशान्ततेजाः पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानैः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_line1 = यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति । प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासङ्कल्पितं लोकं | | verse_line1 = यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति । प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासङ्कल्पितं लोकं नयति। य एवं विद्वान् प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति । तदेष श्लोकः - | ||
| | | verse_lines = यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति । प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथासङ्कल्पितं लोकं नयति। य एवं विद्वान् प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति । तदेष श्लोकः -;उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा ।;अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥ ७ ॥ | ||
| verse_line2 = उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा । | |||
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<div class="gr-author-note">॥ इति तृतीयप्रश्नप्रतिवचनम् ॥</div> | |||
<span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थः प्रश्नः"></span> | |||
== चतुर्थः प्रश्नः == | == चतुर्थः प्रश्नः == | ||
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| verse_line1 = ओम्॥ अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ । भगवन्नेतस्मिन् पुरुषे कानि स्वपन्ति । कान्यस्मिन् जाग्रति । कतर एष देवः स्वप्नान् पश्यति । कस्यैतत् सुखं भवति । कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = ओम्॥ अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ । भगवन्नेतस्मिन् पुरुषे कानि स्वपन्ति । कान्यस्मिन् जाग्रति । कतर एष देवः स्वप्नान् पश्यति । कस्यैतत् सुखं भवति । कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ हैनं सौर्यायणी गार्ग्यः पप्रच्छ । भगवन्नेतस्मिन् पुरुषे कानि स्वपन्ति । कान्यस्मिन् जाग्रति । कतर एष देवः स्वप्नान् पश्यति । कस्यैतत् सुखं भवति । कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मै स होवाच । यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा | | verse_line1 = तस्मै स होवाच । यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति। ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं (ह वै) पुनः हैतत् सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति । तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नाऽदत्ते नाऽनन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = satprashna | | verse_lines = तस्मै स होवाच । यथा गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति। ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं (ह वै) पुनः हैतत् सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति । तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नाऽदत्ते नाऽनन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २ ॥ | ||
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सूर्यस्य मण्डलं यान्तीत्युच्यन्ते तददर्शनात् ॥ | सूर्यस्य मण्डलं यान्तीत्युच्यन्ते तददर्शनात् ॥ | ||
एवं विष्णोस्तु | एवं विष्णोस्तु सामीप्याद् देवानां सुप्तिगस्य तु । | ||
व्यवहाराकरत्वाच्च एकीभाव इतीर्यते | व्यवहाराकरत्वाच्च एकीभाव इतीर्यते (इवेर्यते .हृ)॥’ इति च | ||
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| verse_lines = प्राणाग्नय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद् गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणो यदुच्छ्वासनिःश्वासवेतावाहुती समं नयति स समानो मनो ह वाव यजमान इष्टफलमेवोदानः। स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ३ ॥ | |||
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| | | verse_lines = अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद् दृष्टन्दृष्टमनुपश्यति श्रुतंश्रुतमेवार्थमनुशृणोति देशदिगन्तरे च प्रत्यनुभूतं पुनःपुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति ॥;स यदा तेजसाऽभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान् न पश्यति । अथ यद् एतस्मिन् शरीरे सुखं भवति ॥ ४ ॥ | ||
| verse_line2 = स यदा तेजसाऽभिभूतो भवत्यत्रैष देवः स्वप्नान् न पश्यति । अथ यद् एतस्मिन् शरीरे सुखं भवति ॥ ४ ॥ | |||
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सादृश्याद् देहवज्जीवो विष्णोस्तस्य सुखं भवेत् । | |||
सुप्तौ तस्य सुखार्थं हि भगवान् सुप्तिमानयेत्॥’ इति च | |||
सुप्तौ तस्य सुखार्थं हि भगवान् | |||
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| verse_line1 = स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते । | | verse_line1 = स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते । एवं हैैतत् सर्वं पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते। पृथिवी च पृथिवीमात्रा चाऽपश्चाऽपोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाऽकाशश्चाऽकाशमात्रा च । चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसनं च रसयितव्यं च त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाक् च वक्तव्यं च हस्तौ च दातव्यं च पादौ च गन्तव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च उपस्थश्चाऽनन्दयितव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥ ५ ॥ | ||
| verse_lines = स यथा सोम्य वयांसि वासोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते । एवं हैैतत् सर्वं पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते। पृथिवी च पृथिवीमात्रा चाऽपश्चाऽपोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाऽकाशश्चाऽकाशमात्रा च । चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च घ्राणं च घ्रातव्यं च रसनं च रसयितव्यं च त्वक् च स्पर्शयितव्यं च वाक् च वक्तव्यं च हस्तौ च दातव्यं च पादौ च गन्तव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च उपस्थश्चाऽनन्दयितव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विधारयितव्यं च ॥ ५ ॥ | |||
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| | | verse_lines = एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः । स यो (ह वैतद)हैतमच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वं भवति । तदेष श्लोकः -;विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र ।;तदेतदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाऽविवेशेति ॥ ६ ॥ | ||
| verse_line2 = विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र । | |||
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<div class="gr-author-note">॥ इति चतुर्थप्रश्नप्रतिवचनम् ॥</div> | |||
<span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमप्रश्नः"></span> | |||
== पञ्चमप्रश्नः == | == पञ्चमप्रश्नः == | ||
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| verse_lines = अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ । स यो ह वै तद्भगवन् मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति। तस्मै स होवाच । एतद् वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारस्तस्माद् विद्वानेतेनैवायनेनैकतरमन्वेति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = स | | verse_line1 = स यद्येकमात्रम् अभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्याम् अभिसम्पद्यते । तम् ऋचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते । स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानम् अनुभवति । | ||
| | | verse_lines = स यद्येकमात्रम् अभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्याम् अभिसम्पद्यते । तम् ऋचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते । स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानम् अनुभवति ।;अथ यदि द्वितीयमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम् । स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ।;यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतैनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नो यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यते एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम् । स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते ॥ २ ॥ | ||
| verse_line2 = अथ यदि द्वितीयमात्रेण मनसि सम्पद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम् । स सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते । | |||
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| verse_line1 = तदैतौ श्लोकौ भवतः | | verse_line1 = तदैतौ श्लोकौ भवतः । | ||
| | | verse_lines = तदैतौ श्लोकौ भवतः ।;तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः ।;क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक् प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः॥;ऋग्भिरेतं (यजुर्)यजुभिरन्तरिक्षं सामभिर्यत् तत् कवयो वेदयन्ते ।;तमोङ्कारेणैवायनेनान्वेति विद्वान् यत् तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति॥ ३॥ | ||
| verse_line2 = तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ता अनविप्रयुक्ताः । | |||
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| text = | | text = ‘प्रणवेन हरिं ध्यायन् ब्रह्मलोकं समेत्य च । | ||
ज्ञानं चतुर्मुखात् प्राप्य मुच्यते नात्र संशयः ॥’ | |||
ज्ञानं चतुर्मुखात् प्राप्य मुच्यते नात्र संशयः | |||
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<div class="gr-author-note">॥ इति पञ्चमप्रश्नप्रतिवचनम् ॥</div> | |||
<span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठः प्रश्नः"></span> | |||
== षष्ठः प्रश्नः == | == षष्ठः प्रश्नः == | ||
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| verse_line1 = अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ । भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैनं प्रश्नमपृच्छत । षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ । (तं मह्यं ब्रवीहीति।) तमहं कुमारमब्रुवम्। नाहमिमं वेद । यद्यहमिममवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति । समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति । तस्मान्नार्हाम्यहमनृतं वक्तुम् । स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज । तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ । भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैनं प्रश्नमपृच्छत । षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ । (तं मह्यं ब्रवीहीति।) तमहं कुमारमब्रुवम्। नाहमिमं वेद । यद्यहमिममवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति । समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति । तस्मान्नार्हाम्यहमनृतं वक्तुम् । स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज । तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति स ईक्षाञ्चक्रे । कस्मिन् न्वहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि । कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति । स प्राणमसृजत । प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद् वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु नाम च ॥ २ ॥ | ||
| | | verse_lines = तस्मै स होवाच । इहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति स ईक्षाञ्चक्रे । कस्मिन् न्वहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि । कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति । स प्राणमसृजत । प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद् वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु नाम च ॥ २ ॥ | ||
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| verse_id = | | verse_id = SPB_C06_V02 | ||
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| text = | | text = ‘कर्मेति पुष्करः प्रोक्त उषा नामाभिमानिनी । | ||
लोकाभिमानी पर्जन्यः स्वाहा वै मन्त्रदेवता ॥ | लोकाभिमानी पर्जन्यः स्वाहा वै मन्त्रदेवता ॥ | ||
तपोऽभिमानी वह्निश्च वरुणो वीर्यदेवता । | |||
अन्नस्य देवता सोमो | अन्नस्य देवता सोमो मनोनामाऽनिरुद्धकः ॥ | ||
इन्द्रियेशाश्च सूर्याद्याश्चक्षुराद्यभिमानिनः । | इन्द्रियेशाश्च सूर्याद्याश्चक्षुराद्यभिमानिनः । | ||
रुद्रो वीन्द्रः शेषकामौ मनसस्त्वेव देवताः ॥ | रुद्रो वीन्द्रः शेषकामौ मनसस्त्वेव देवताः ॥ | ||
| Line 577: | Line 487: | ||
तस्याश्च कारणं प्राणः सर्वेषामुत्तमोत्तमः ॥ | तस्याश्च कारणं प्राणः सर्वेषामुत्तमोत्तमः ॥ | ||
तस्यापीशः कारणं च वासुदेवः परोऽव्ययः । | तस्यापीशः कारणं च वासुदेवः परोऽव्ययः । | ||
न तस्य सदृशः कश्चित् कुत एवोत्तमो भवेत् | न तस्य सदृशः कश्चित् कुत एवोत्तमो भवेत् । | ||
तं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुर्विदित्वैवं | तं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुर्विदित्वैवं (परावरम् .हृ) परात्परम्॥’ इति तत्त्वविवेके । | ||
एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । | एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । | ||
खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य | खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी॥’ | ||
इति मन्त्रोक्त एव क्रमः । न हीन्द्रियेभ्यो मनः पश्चात् । तत्प्राक् श्रुतेश्च इति च भगवद्वचनम् ॥ | इति मन्त्रोक्त एव क्रमः । न हीन्द्रियेभ्यो मनः पश्चात् । तत्प्राक् श्रुतेश्च इति च भगवद्वचनम् ॥ | ||
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| Line 602: | Line 496: | ||
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| text = | | text = विष्णोः प्राणस्ततः श्रद्धा तस्या रुद्रो मनोऽभिधः । | ||
तस्माद् इन्द्रस्त्विन्द्रियात्मा तस्य सोमोऽन्नदेवता ॥ | |||
विष्णोः प्राणस्ततः श्रद्धा तस्या रुद्रो | ततश्च वरुणस्सृष्टस्तस्माद् अग्निस्ततोऽवरः । | ||
ततश्च | |||
आकाशदेवता विघ्नस्ततो वायोः सुतो मरुत् ॥ | आकाशदेवता विघ्नस्ततो वायोः सुतो मरुत् ॥ | ||
तस्माद् अग्निः पावकाख्यः प्रथमोऽग्नेः सुतस्ततः । | |||
ततः पर्जन्य उद्भूतः | ततः पर्जन्य उद्भूतः स्वाहाऽतो मन्त्रदेवता ॥ | ||
उदात्मको बुधस्तस्या उषा नामात्मिका ततः । | उदात्मको(उदकात्मकः .हृ) बुधस्तस्या उषा (नामात्मका .हृ)नामात्मिका ततः । | ||
ततः शनिः पृथिव्यात्मा कर्मात्मा पुष्करस्ततः ॥ | ततः शनिः पृथिव्यात्मा कर्मात्मा पुष्करस्ततः ॥ | ||
क्रमात् प्रत्यवरा ह्येते मुक्ताः सर्वगुणैरपि । | क्रमात् प्रत्यवरा ह्येते(एते .हृ) मुक्ताः सर्वगुणैरपि । | ||
नित्यमुक्तस्ततो विष्णुः | नित्यमुक्तस्ततो(नित्यमुक्तस्तथा) विष्णुः प्राणादप्युत्तमोत्तमः॥’ इति च। | ||
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| verse_id = SPB_C06_V03 | | verse_id = SPB_C06_V03 | ||
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| chapter_id = SPB_C06 | | chapter_id = SPB_C06 | ||
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| verse_line1 = स | | verse_line1 = स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति। भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र(समुद्रे) इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति । भिद्येते चाऽसां नामरूपे । पुरुष इत्येवं प्रोच्यते । स एषोऽकलोऽमृतो भवति ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = satprashna | | verse_lines = स यथेमा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति। भिद्येते तासां नामरूपे समुद्र(समुद्रे) इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति । भिद्येते चाऽसां नामरूपे । पुरुष इत्येवं प्रोच्यते । स एषोऽकलोऽमृतो भवति ॥ ३ ॥;तदेष श्लोकः-;अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन् प्रतिष्ठिताः ।;तं वेद्यं पुरुषं वेदयथा मा वो मृत्युः परिव्यथाः इति ॥ | ||
| verse_line2 = तदेष श्लोकः- | |||
| commentary1 = satprashna | |||
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| text = | | text = <span class="gr-moola">समुद्रे</span> इत्येव प्रोच्यते । <span class="gr-moola">पुरुषे</span> इत्येवं प्रोच्यते । ‘भिद्येते तासां नामरूपे’, <span class="gr-moola">‘भिद्येते चासां नामरूपे’</span> इत्युक्तत्वात् । अज्ञैरनवगतान्यपि समुद्रे स्थितानां नदीनाम्, विष्णौ स्थितानां मुक्तानां च भिन्नान्येव नामरूपाणि सन्त्येवेत्यर्थः । | ||
समुद्रे इत्येव प्रोच्यते । पुरुषे इत्येवं प्रोच्यते । | |||
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| text = | | text = न च भेदशब्दो नाशे प्रयुज्यमानः क्वापि(क्वचिद्) दृष्टः । घटादावपि बहुभाव एव भेदशब्दः प्रयुज्यते । नाशस्त्वर्थत एवावगम्यते । न चात्रार्थतोऽपि नाशोऽवगम्यते । न हि नामानि रूपाणि च कपालवद् बहुधा भूतानि तिष्ठन्ति । अतो ‘भिद्येते’ इति पृथक्त्वमेवोच्यते । ‘अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन् प्रतिष्ठिताः’ इति वाक्यशेषाच्च । अतः पुरुषे भिन्नानि(भिन्नानि प्रतिष्ठितानि) नामरूपाणि प्रतिष्ठितानीत्येवार्थः । | ||
अस्तगमनं त्वादित्यवदज्ञानामविज्ञेयत्वमेव । | |||
न च भेदशब्दो नाशे प्रयुज्यमानः | ‘प्राणादयः कला यस्मिन् मुक्ता नित्यं प्रतिष्ठिताः । | ||
पृथक्पृथङ् नामरूपैर्नमस्तस्मै पराय ते ॥’ इति(च) सत्तत्त्वे ॥ | |||
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| text = | | text = ‘नामरूपाद् विमुक्तः’ इत्यनेनापि नामरूपामुक्तत्वमुच्यते । ‘विप्रिय’ इत्यादिवत् । ‘नामरूपे अविहाय’ इति च पूर्वत्र । ‘अनन्तं वै नामानन्ता वै विश्वेदेवाः’ इति नामरूपयोरनन्तत्वं हि श्रुतिर्वक्ति । ‘यत्र पूर्वे साध्या सन्ति देवाः’, ‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः’, ‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’,‘ऋचां त्वः पोषमास्ते पुपुष्वान् गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु’ इत्यादेश्च । अतः सर्वमुक्तेभ्योऽप्युत्तमोत्तमः परिपूर्णो नारायण इति सिद्धम् ॥ | ||
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| verse_line1 = तान् होवाच । एतावदेवाहमेतत् परं ब्रह्म वेद नातः परमस्तीति। ते हि तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति । नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = तान् होवाच । एतावदेवाहमेतत् परं ब्रह्म वेद नातः परमस्तीति। ते हि तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविद्यायाः परं पारं तारयसीति । नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ४ ॥;भग्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।;स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितँय्यदायुः॥;स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।;स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥;ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥ | |||
| verse_line2 = भग्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। | |||
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<div class="gr-author-note">इति षट्प्रश्नोपनिषत् समाप्ता ॥</div> | |||
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नमो | |||
परमानन्दसन्दोहसान्द्रानन्दवपुष्मते ॥ | परमानन्दसन्दोहसान्द्रानन्दवपुष्मते ॥ | ||
}} | }} | ||
</div> | |||
<div class="gr-author-note">इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं षट्प्रश्नोपनिषद्भाष्यं सम्पूर्णम् ॥</div> | |||
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं षट्प्रश्नोपनिषद्भाष्यं सम्पूर्णम् ॥ | |||
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Latest revision as of 07:15, 8 June 2026
प्रथमप्रश्नः
स वायुं सूर्यनामानं चन्द्रनाम्नीं सरस्वतीम् ॥ सूर्याचन्द्रगतौ देवः ससर्ज पुरुषोत्तमः ।
तावाविश्य स्वयं विष्णुः सर्वसृष्टीः(सर्वसृष्टिं .हृ) करोत्यजः ॥
आदित्यस्थः स वायुस्तु प्राणान् आत्मनि सन्नयेत् ॥ प्राच्याः प्राणास्तथेन्द्राद्या दक्षिणाश्च यमादयः । प्रतीच्या वरुणाद्यास्तु सोमाद्या उत्तराः स्मृताः । शेषमित्राववाचीनौ वीन्द्रकामावुदक्तनौ ।
सभार्याः कोणपैः सार्धं चत्वारो दिशिदिश्यपि ॥
अहोरात्रे तु भगवान् प्राणो(प्राणोऽह्न्यथ च .हृ) ह्यहनि वाङ् निशि ॥ दम्पत्योर्भगवान् विष्णुर्भार्यास्था तु सरस्वती ।
भर्तृस्थः स स्वयं वायुरेवं जानन् विमुच्यते ॥ इति प्रजापतिसंहितायाम्
द्वितीयः प्रश्नः
तृतीयः प्रश्नः
प्राणाद्यास्तान्नयन् प्राण आज्ञापयति राजवत् ॥
स्वयं च पञ्चरूपस्सन् दद्यान्मोक्षादिकं प्रभुः ॥’ इति प्रभञ्जने
चतुर्थः प्रश्नः
सूर्यस्य मण्डलं यान्तीत्युच्यन्ते तददर्शनात् ॥ एवं विष्णोस्तु सामीप्याद् देवानां सुप्तिगस्य तु ।
व्यवहाराकरत्वाच्च एकीभाव इतीर्यते (इवेर्यते .हृ)॥’ इति च
सादृश्याद् देहवज्जीवो विष्णोस्तस्य सुखं भवेत् ।
सुप्तौ तस्य सुखार्थं हि भगवान् सुप्तिमानयेत्॥’ इति च
पञ्चमप्रश्नः
षष्ठः प्रश्नः
लोकाभिमानी पर्जन्यः स्वाहा वै मन्त्रदेवता ॥ तपोऽभिमानी वह्निश्च वरुणो वीर्यदेवता । अन्नस्य देवता सोमो मनोनामाऽनिरुद्धकः ॥ इन्द्रियेशाश्च सूर्याद्याश्चक्षुराद्यभिमानिनः । रुद्रो वीन्द्रः शेषकामौ मनसस्त्वेव देवताः ॥ श्रद्धेति वायोः पत्नी स्यात् सर्वेषां प्रभवाप्यया । तस्याश्च कारणं प्राणः सर्वेषामुत्तमोत्तमः ॥ तस्यापीशः कारणं च वासुदेवः परोऽव्ययः । न तस्य सदृशः कश्चित् कुत एवोत्तमो भवेत् । तं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुर्विदित्वैवं (परावरम् .हृ) परात्परम्॥’ इति तत्त्वविवेके । एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी॥’
इति मन्त्रोक्त एव क्रमः । न हीन्द्रियेभ्यो मनः पश्चात् । तत्प्राक् श्रुतेश्च इति च भगवद्वचनम् ॥तस्माद् इन्द्रस्त्विन्द्रियात्मा तस्य सोमोऽन्नदेवता ॥ ततश्च वरुणस्सृष्टस्तस्माद् अग्निस्ततोऽवरः । आकाशदेवता विघ्नस्ततो वायोः सुतो मरुत् ॥ तस्माद् अग्निः पावकाख्यः प्रथमोऽग्नेः सुतस्ततः । ततः पर्जन्य उद्भूतः स्वाहाऽतो मन्त्रदेवता ॥ उदात्मको(उदकात्मकः .हृ) बुधस्तस्या उषा (नामात्मका .हृ)नामात्मिका ततः । ततः शनिः पृथिव्यात्मा कर्मात्मा पुष्करस्ततः ॥ क्रमात् प्रत्यवरा ह्येते(एते .हृ) मुक्ताः सर्वगुणैरपि ।
नित्यमुक्तस्ततो(नित्यमुक्तस्तथा) विष्णुः प्राणादप्युत्तमोत्तमः॥’ इति च।
अस्तगमनं त्वादित्यवदज्ञानामविज्ञेयत्वमेव । ‘प्राणादयः कला यस्मिन् मुक्ता नित्यं प्रतिष्ठिताः ।
पृथक्पृथङ् नामरूपैर्नमस्तस्मै पराय ते ॥’ इति(च) सत्तत्त्वे ॥