Talavakara: Difference between revisions
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== अथ प्रथमः खण्डः == | == अथ प्रथमः खण्डः == | ||
<div class="introduction" id="TLK_C01_I01" data-block-id="TLK_C01_I01" data-verse="TLK_C01"> | <div class="introduction" id="TLK_C01_I01" data-block-id="TLK_C01_I01" data-verse="TLK_C01"> | ||
<div class="introduction-line"> | <div class="introduction-line">अनन्तगुणपूर्णत्वाद् अगम्याय सुरैरपि ।</div> | ||
<div class="introduction-line">सर्वेष्टदात्रे देवानां नमो नारायणाय ते ॥</div> | <div class="introduction-line">सर्वेष्टदात्रे देवानां नमो नारायणाय ते ॥</div> | ||
</div> | </div> | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । | | verse_line1 = केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । | ||
| verse_lines = केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः ।;केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥ | | verse_line2 = केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥ | ||
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| Line 24: | Line 25: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः । | | verse_line1 = श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः । | ||
| verse_lines = श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः ।;चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २ ॥ | | verse_line2 = चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 33: | Line 35: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग् गच्छति नो मनः । | | verse_line1 = न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग् गच्छति नो मनः । | ||
| verse_lines = न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग् गच्छति नो मनः ।;न विद्म न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = न विद्म न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = न विद्म न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 42: | Line 45: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अन्यदेव तद् विदितादथो अविदितादधि । | | verse_line1 = अन्यदेव तद् विदितादथो अविदितादधि । | ||
| verse_line2 = इति शुश्रुम पूर्वेषां ये | | verse_lines = अन्यदेव तद् विदितादथो अविदितादधि ।;इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद् व्याचचक्षिरे ॥ ४ ॥ | ||
| verse_line2 = इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद् व्याचचक्षिरे ॥ ४ ॥ | |||
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| Line 51: | Line 55: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यद् वाचाऽनभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । | | verse_line1 = यद् वाचाऽनभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । | ||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं | | verse_lines = यद् वाचाऽनभ्युदितं येन वागभ्युद्यते ।;तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपास ते ॥ ५ ॥ | ||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपास ते ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_line1 = यन्मनसा न मनुते | | verse_line1 = यन्मनसा न मनुते येनाऽहुर्मनो मतम् । | ||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं | | verse_lines = यन्मनसा न मनुते येनाऽहुर्मनो मतम् ।;तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपास ते ॥ ६ ॥ | ||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपास ते ॥ ६ ॥ | |||
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| Line 69: | Line 75: | ||
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| verse_line1 = यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति । | | verse_line1 = यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति । | ||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं | | verse_lines = यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति ।;तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपास ते ॥ ७ ॥ | ||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपास ते ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_line1 = यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् । | | verse_line1 = यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् । | ||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं | | verse_lines = यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् ।;तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपास ते ॥ ८ ॥ | ||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपास ते ॥ ८ ॥ | |||
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| Line 87: | Line 95: | ||
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| verse_line1 = यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । | | verse_line1 = यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । | ||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं | | verse_lines = यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते ।;तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपास ते ॥ ९ ॥ | ||
| verse_line2 = तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपास ते ॥ ९ ॥ | |||
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| text = वैजयन्ते | | text = वैजयन्ते समासीनम् एकान्ते चतुराननम् । | ||
विष्णोर्विविदिषुस्तत्त्वं पर्यपृच्छत् सदाशिवः ॥ | |||
यदिदं पुरुषावश्यं(यदि सत्पुरुषावश्यं. हृ) तत्र तत्र पतेन्मनः । | |||
केन तत् प्रेरितं याति प्राणः सर्वोत्तमस्तथा ॥ | |||
चक्षुःश्रोत्रं तथा वाचं को देवो विनियोजयेत् । | |||
इति पृष्टस्तदा ब्रह्मा प्राह देवमुमापतिम् ॥ | |||
ध्यात्वा नारायणं देवं सर्वाधारमनूपमम् । | |||
सर्वज्ञं सर्वशक्तिं च सर्वदोषविवर्जितम् ॥ | |||
यः प्राणस्य प्रणेता च चक्षुरादेश्च सर्वशः । | |||
अगम्यस्सर्वदेवैश्च(अगम्यं सर्वदेवैश्च. हृ) परिपूर्णत्वहेतुतः ॥ | |||
प्राणादीनां प्रणेता च सर्ववेत्ता च सर्वशः । | |||
सर्वोत्तमश्च सर्वत्र स विष्णुरिति धार्यताम् ॥ | |||
}} | }} | ||
</div> | </div> | ||
<div class="gr-author-note">॥ इति प्रथमखण्डभाष्यम् ॥</div> | |||
<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ द्वितीयः खण्डः"></span> | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ द्वितीयः खण्डः"></span> | ||
== अथ द्वितीयः खण्डः == | == अथ द्वितीयः खण्डः == | ||
| Line 110: | Line 132: | ||
| chapter_id = TLK_C02 | | chapter_id = TLK_C02 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् । | | verse_line1 = यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि(दह्रमेवापि) नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् । | ||
| verse_line2 = यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते | | verse_lines = यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि(दह्रमेवापि) नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् ।;यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये(ऽ) विदितम्॥ १ ॥ | ||
| verse_line2 = यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये(ऽ) विदितम्॥ १ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 119: | Line 142: | ||
| chapter_id = TLK_C02 | | chapter_id = TLK_C02 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = नाहमन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । | ||
| verse_lines = नाहमन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च ।;यो नस्तद् वेद तद् वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = यो नस्तद् वेद तद् वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥ | | verse_line2 = यो नस्तद् वेद तद् वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । | | verse_line1 = यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । | ||
| verse_lines = यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।;अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । | | verse_line1 = प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । | ||
| verse_lines = प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते ।;आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । | | verse_line1 = इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । | ||
| verse_lines = इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः ।;भूतेषु भूतेषु विचिन्त्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = भूतेषु भूतेषु विचिन्त्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = भूतेषु भूतेषु विचिन्त्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = talavakara | | commentary1 = talavakara | ||
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-TLK_C02_V05" data-block-id="bhashya-TLK_C02_V05"> | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-TLK_C02_V05" data-block-id="bhashya-TLK_C02_V05"> | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
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| id = TLK_C02_V05_B01 | | id = TLK_C02_V05_B01 | ||
| text = यं सम्यङ् नैव जानाति कश्चिन्निरवशेषतः । सर्वात्मना विजानामीति तु यस्य मतं भवेत् ॥ तस्याज्ञातस्स भगवान् यो नैवं मन्यते सदा । ज्ञातस्तस्य तथाऽस्यैव निश्शेषं मननं कृतम् ॥ इति यो मन्यते नास्य | | text = यं सम्यङ् नैव जानाति कश्चिन्निरवशेषतः । | ||
सर्वात्मना विजानामीति तु यस्य मतं भवेत् ॥ | |||
तस्याज्ञातस्स भगवान् यो नैवं मन्यते सदा । | |||
ज्ञातस्तस्य तथाऽस्यैव निश्शेषं मननं कृतम् ॥ | |||
इति यो मन्यते नास्य मतः स पुरुषोत्तमः । | |||
नातिवेद्यो न चावेद्यस्तस्मात् स परमेश्वरः ॥ | |||
नेदं जीवस्वरूपं तद् ब्रह्म विष्ण्वाख्यमव्ययम् । | |||
किन्तु यत् ते समीपस्थ मास ते विनियामकम् ॥ | |||
तदेव ब्रह्म विद्धि त्वं विष्ण्वाख्यं परमव्ययम् । | |||
नियामकं तद् देवानां मर्त्यानां किमुतोत्तमम् ॥ | |||
तत्प्रसादं विना जीवे मन्तव्या न प्रवृत्तयः । | |||
किमु जीवस्य तद्भावो न मन्तव्य इतीर्यते ॥ | |||
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</div> | </div> | ||
<div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयखण्डभाष्यम्॥</div> | |||
<span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ तृतीयः खण्डः"></span> | <span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ तृतीयः खण्डः"></span> | ||
== अथ तृतीयः खण्डः == | == अथ तृतीयः खण्डः == | ||
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| chapter_id = TLK_C03 | | chapter_id = TLK_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये । तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये । तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति तद्धैषां विजज्ञौ ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये । तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽस्माकमेवायं महिमेति तद्धैषां विजज्ञौ ॥ १ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 178: | Line 219: | ||
| chapter_id = TLK_C03 | | chapter_id = TLK_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव । तन्न व्यजानन्त किमिदं यक्षमिति । तेऽग्निमब्रुवन् जातवेद एतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदत् कोऽसीति । अग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति । तस्मिन्, त्वयि किं वीर्यमित्यपि(वीर्यमिति । अपीदम्) । इदं सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति । तस्मै तृणं निदधावेतद् दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाक दग्धुम् । स तत एव निववृते । नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति॥ २ ॥ | ||
| verse_lines = तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव । तन्न व्यजानन्त किमिदं यक्षमिति । तेऽग्निमब्रुवन् जातवेद एतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदत् कोऽसीति । अग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति । तस्मिन्, त्वयि किं वीर्यमित्यपि(वीर्यमिति । अपीदम्) । इदं सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति । तस्मै तृणं निदधावेतद् दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाक दग्धुम् । स तत एव निववृते । नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति॥ २ ॥ | |||
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| chapter_id = TLK_C03 | | chapter_id = TLK_C03 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति । तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदत् कोऽसीति । वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति । तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपि । इदं सर्वमाददीयं यदिदं पृथिव्यामिति । तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाकाऽदातुम् । स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति ॥ | ||
| verse_lines = अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति । तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदत् कोऽसीति । वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति । तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपि । इदं सर्वमाददीयं यदिदं पृथिव्यामिति । तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाकाऽदातुम् । स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद् यक्षमिति ॥;अथेन्द्रमब्रुवन्(अथवेन्द्रमब्रुवन्)- मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति तदभ्यद्रवत् । तस्मात् तिरोदधे । स तस्मिन्नेवाऽकाशे स्त्रियमाजगाम बहु शोभमानामुमां हैमवतीम् । तां होवाच किमेतद् यक्षमिति ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = अथेन्द्रमब्रुवन्(अथवेन्द्रमब्रुवन्)- मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति तदभ्यद्रवत् । तस्मात् तिरोदधे । स तस्मिन्नेवाऽकाशे स्त्रियमाजगाम बहु शोभमानामुमां हैमवतीम् । तां होवाच किमेतद् यक्षमिति ॥ ३ ॥ | |||
| | |||
| | |||
| commentary1 = talavakara | | commentary1 = talavakara | ||
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-TLK_C03_V12" data-block-id="bhashya-TLK_C03_V12"> | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-TLK_C03_V12" data-block-id="bhashya-TLK_C03_V12"> | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = TLK_C03_V03 | ||
| id = TLK_C03_V12 | | id = TLK_C03_V12 | ||
| text = इत्यत्राख्यायिकां वच्मि शृणु तां त्वं महेश्वर । स्थित्वा देवेषु तद् ब्रह्म | | text = इत्यत्राख्यायिकां वच्मि शृणु तां त्वं महेश्वर । | ||
स्थित्वा देवेषु तद् ब्रह्म व्यजयद् दैत्यदानवान् ॥ | |||
देवेभ्योऽर्थाय विजयं ते देवा मेनिरे स्वकम्(ते देवा मेनिरे स्वयम्. हृ) । | |||
आविष्टा असुरैस्तेषां प्रबोधाय जनार्दनः ॥ | |||
यक्षरूपः प्रादुरभूद् उमाशिवसमन्वितः । | |||
ब्रह्मणा चापि(चैव) सहित एतेभ्योऽपि परो ह्यहम् ॥ | |||
एतेऽपि मे भृत्यभूताः परिवार्य व्यवस्थिताः । | |||
इति ज्ञापयितुं विष्णुः सह तैरप्युपागतः । | |||
यूयमेतानपि ज्ञातुमशक्ताः किमु मामिति ॥ | |||
तज्ज्ञानार्थं हुताशश्च नासिक्यो वायुरेव च । | |||
इन्द्रश्च क्रमशो जग्मुस्तं ज्ञातुं नैव चाशकन् । | |||
तत्रेन्द्रोऽधिकबुद्धित्वात् पृच्छतीति जनार्दनः । | |||
मत्तः शिवाद् ब्रह्मणश्च श्रोतुं नैवापि शक्तिमान् । | |||
इति ज्ञापयितुं तत्र नादृश्यत स केशवः । | |||
एषैव ज्ञानदाने ते योग्योमेति व्यदर्शयत् ॥ | |||
}} | }} | ||
</div> | </div> | ||
<div class="gr-author-note">॥ इति तृतीयखण्डभाष्यम्॥</div> | |||
<span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ चतुर्थः खण्डः"></span> | <span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अथ चतुर्थः खण्डः"></span> | ||
== अथ चतुर्थः खण्डः == | == अथ चतुर्थः खण्डः == | ||
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| chapter_id = TLK_C04 | | chapter_id = TLK_C04 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = ब्रह्मेति होवाच । ब्रह्मणो वा एतद्विजयेऽमहीयध्वमिति । ततो ह वै विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = ब्रह्मेति होवाच । ब्रह्मणो वा एतद्विजयेऽमहीयध्वमिति । ततो ह वै विदाञ्चकार ब्रह्मेति । तस्माद् वा एते देवा अतितरामिवान्यान् देवान् यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुः ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = ब्रह्मेति होवाच । ब्रह्मणो वा एतद्विजयेऽमहीयध्वमिति । ततो ह वै विदाञ्चकार ब्रह्मेति । तस्माद् वा एते देवा अतितरामिवान्यान् देवान् यदग्निर्वायुरिन्द्रस्ते ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुः ॥ १ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 289: | Line 278: | ||
| chapter_id = TLK_C04 | | chapter_id = TLK_C04 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ते ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति । तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान् देवान् स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ २ ॥ | ||
| verse_lines = ते ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति । तस्माद्वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान् देवान् स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत् प्रथमो विदाञ्चकार ब्रह्मेति ॥ २ ॥ | |||
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| chapter_id = TLK_C04 | | chapter_id = TLK_C04 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यद्युतदा३(व्युद्युतदा)) इति । न्यमीमिषदा३ इत्यधिदैवतम् । अथाध्यात्मम् । यदेतद् गच्छतीव च मनोऽनेन(अनेन चैनदुप स्मरन्ति. हृ) वै तदुपस्मरत्यभीक्ष्णं सङ्कल्पस्तद्ध । तद्वनं नाम । तद्वनमित्युपासितव्यम् ॥ ३ ॥ | ||
| verse_lines = तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यद्युतदा३(व्युद्युतदा)) इति । न्यमीमिषदा३ इत्यधिदैवतम् । अथाध्यात्मम् । यदेतद् गच्छतीव च मनोऽनेन(अनेन चैनदुप स्मरन्ति. हृ) वै तदुपस्मरत्यभीक्ष्णं सङ्कल्पस्तद्ध । तद्वनं नाम । तद्वनमित्युपासितव्यम् ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = स य एतदेवं वेदाभि हैनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति । उपनिषदं भो ब्रूहीति । उक्ता त उपनिषदत् । ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति । तस्यैै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा । वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् । यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥ ४ ॥ | ||
| verse_lines = स य एतदेवं वेदाभि हैनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति । उपनिषदं भो ब्रूहीति । उक्ता त उपनिषदत् । ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति । तस्यैै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा । वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् । यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥ ४ ॥ | |||
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<div class="gr-author-note">॥ इति चतुर्थः खण्डः ॥</div> | |||
<div class="gr-author-note">इति तलवकारोपनिषत्</div> | |||
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{{Bhashyam | |||
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| text = उमा सा सम्यगाचष्ट तस्मै विष्णुं परं पदम् । | |||
यस्माद् ब्रह्मा च वायुश्च शेषवीन्द्रौ शिवस्तथा । | |||
सभार्या गर्विणो नाऽसन् सुरेभ्यस्तेऽधिकास्ततः ॥ | |||
इन्द्रस्तु प्रथमं ब्रह्म व्यजानात् तेन तूत्तमः । | |||
दक्षादिभ्यस्तथा कामस्तज्ज्ञातुं (कामः स ज्ञातुम्) पूर्वमुक्तवान् ॥ | |||
दक्षो बृहस्पतिश्चैव मनुः कामात्मजस्तथा । | |||
सूर्याचन्द्रमसौ धर्मो वरुणश्चोचुरोमिति(वरुणश्च पुरोमिति. हृ) ॥ | |||
नासिक्यवायुरग्निश्च प्रथमं तदपश्यताम् । | |||
सर्वदेवाधिकास्तस्मादेते देवाः प्रकीर्तिताः । | |||
एतेभ्यश्चेन्द्रकामौ तु ताभ्यां ब्रह्मादयोऽधिकाः ॥ | |||
एतेषामवमो वह्निः परमो विष्णुरुच्यते । | |||
अन्तराले स्थितास्त्वन्ये ब्रह्माद्याः पूर्वमीरिताः ॥ | |||
अग्निः पश्चाद् व्यजानात् तद् इन्द्रवाक्यात् ततोऽवमः । | |||
तस्माद् विष्ण्वभिसम्बन्धात् पारावर्यं सुरेष्विदम् ॥ | |||
व्यद्योतयद् विद्युदादीन् कपिलाख्यस्तु यो हरिः । | |||
अक्ष्णोर्निमेषणं(अक्ष्णोर्निमीलनं) कृत्वा यः शेते क्षीरसागरे ॥ | |||
स एवैकः परं ब्रह्मेत्येवं तस्योपदेशनम् । | |||
अधिदैवे तथाऽध्यात्मे यं मनो गच्छतीव च ॥ | |||
सम्यङ् न गच्छति क्वापि मनो येन स्मरत्यपि । | |||
सोऽनिरुद्धाख्य ईशेशः परं ब्रह्मेति कीर्त्यते ॥ | |||
स विष्णुस्तद्वनं नाम ततत्वाद् वननीयतः । | |||
एवमेनं तु यो वेद भवेत् सर्वैरपेक्षितः ॥ | |||
एतत् श्रुत्वा हरोऽपृच्छद् ब्रह्माणं पुनरेव तु । | |||
विद्याकारं मम ब्रूहीत्युक्तो ब्रह्माऽऽह तं पुनः ॥ | |||
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| text = विद्यावेद्यं तव प्रोक्तम् आस्थानं ते वदाम्यहम् ।<br/>तपोदानस्वधर्मेषु ये स्थितास्तेषु(स्थिरास्तेषु. हृ) तिष्ठति ॥ | |||
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| text = ‘विद्यास्थानानि तस्यास्तु वेदा अङ्गानि निर्णयः ।<br/>‘वेदैतामेवमखिलां यो विष्णौ प्रतितिष्ठति ॥’ इत्यादि ब्रह्मसारे(ब्रह्मपारे. हृ) ॥ | |||
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| | | text = <span class="gr-moola">विद्युतः</span> सूर्यादिप्रकाशान्(विद्युत्सूर्यादिप्रकाशान्. हृ) । <span class="gr-moola">आ</span> समन्ताद् <span class="gr-moola">व्यद्युतत्</span> प्राकाशयत्(प्रकाशयत्) । | ||
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| text = ‘यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।<br/>यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत् तेजो विद्धि मामकम् ॥’ इति वचनात् । | |||
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| | | text = ‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति’ इति च । | ||
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| | | text = <span class="gr-moola">न्यमीमिषदा आ</span> समन्तात् निमीलिताक्षम् अभवत्- | ||
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| | | text = ‘स वै किलायं पुरुषः पुरातनो य एक आसीदविशेष आत्मनि ।<br/>अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे निमीलितात्मा निशि सुप्तशक्तिषु’ ॥ इति वचनात् । | ||
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| | | text = पूर्णत्वाच्च आः । <span class="gr-moola">अभीक्ष्णं सङ्कल्प</span> इति मनसो विशेषणम्, सङ्कल्पकमित्यर्थः(व्यक्तम्. हृ) ॥ | ||
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| | | text = सप्रतिष्ठां सायतनाम् उपनिषदं ब्रूहीत्युक्ते सम्यगेव मयोपनिषत् स्वरूपमुक्तम् । तत्र वक्तव्यं नास्ति । | ||
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| text = <span class="gr-moola">तपो दमः कर्म च</span> विद्यायाः <span class="gr-moola">प्रतिष्ठा</span> । तद्वत्सु विद्या प्रतितिष्ठतीत्यर्थः । <span class="gr-moola">सत्यम्</span> इति मीमांसा । | |||
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| text = ‘निर्णीयते यतः सम्यग् इदं सत्यमिति स्फुटम् ।<br/>श्रुतिस्मृत्युदितं सर्वं व्यस्तं (व्यक्तं) मीमांसयैतया ॥<br/>सत्यमित्युच्यते तस्मान्मीमांसा ब्रह्मनिश्चयाः ॥’ इति शब्दनिर्णये ॥ | |||
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| text = ‘ऋग्यजुस्सामाथर्वाख्याः पञ्चरात्रं च भारतम् ।<br/>मूलरामायणं चैव पुराणं भगवत्परम् ॥ | |||
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| text = | | text = वेदा इत्युच्यते सद्भिः शिक्षाद्याः (शीक्षाद्यं) स्मृतयस्तथा ।<br/>अङ्गानि सत्यं मीमांसा तद् विद्यायतनं त्रयम् ॥’ इति विद्यानिर्णये ॥ | ||
}} | }} | ||
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यश्चिदानन्दसच्छक्तिसम्पूर्णो भगवान् परः ।<br/>नमोऽस्तु विष्णवे तस्मै प्रेयसे मे परात्मने ॥ | |||
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Latest revision as of 07:15, 8 June 2026
अथ प्रथमः खण्डः
विष्णोर्विविदिषुस्तत्त्वं पर्यपृच्छत् सदाशिवः ॥ यदिदं पुरुषावश्यं(यदि सत्पुरुषावश्यं. हृ) तत्र तत्र पतेन्मनः । केन तत् प्रेरितं याति प्राणः सर्वोत्तमस्तथा ॥ चक्षुःश्रोत्रं तथा वाचं को देवो विनियोजयेत् । इति पृष्टस्तदा ब्रह्मा प्राह देवमुमापतिम् ॥ ध्यात्वा नारायणं देवं सर्वाधारमनूपमम् । सर्वज्ञं सर्वशक्तिं च सर्वदोषविवर्जितम् ॥ यः प्राणस्य प्रणेता च चक्षुरादेश्च सर्वशः । अगम्यस्सर्वदेवैश्च(अगम्यं सर्वदेवैश्च. हृ) परिपूर्णत्वहेतुतः ॥ प्राणादीनां प्रणेता च सर्ववेत्ता च सर्वशः ।
सर्वोत्तमश्च सर्वत्र स विष्णुरिति धार्यताम् ॥
अथ द्वितीयः खण्डः
सर्वात्मना विजानामीति तु यस्य मतं भवेत् ॥ तस्याज्ञातस्स भगवान् यो नैवं मन्यते सदा । ज्ञातस्तस्य तथाऽस्यैव निश्शेषं मननं कृतम् ॥ इति यो मन्यते नास्य मतः स पुरुषोत्तमः । नातिवेद्यो न चावेद्यस्तस्मात् स परमेश्वरः ॥ नेदं जीवस्वरूपं तद् ब्रह्म विष्ण्वाख्यमव्ययम् । किन्तु यत् ते समीपस्थ मास ते विनियामकम् ॥ तदेव ब्रह्म विद्धि त्वं विष्ण्वाख्यं परमव्ययम् । नियामकं तद् देवानां मर्त्यानां किमुतोत्तमम् ॥ तत्प्रसादं विना जीवे मन्तव्या न प्रवृत्तयः ।
किमु जीवस्य तद्भावो न मन्तव्य इतीर्यते ॥
अथ तृतीयः खण्डः
स्थित्वा देवेषु तद् ब्रह्म व्यजयद् दैत्यदानवान् ॥ देवेभ्योऽर्थाय विजयं ते देवा मेनिरे स्वकम्(ते देवा मेनिरे स्वयम्. हृ) । आविष्टा असुरैस्तेषां प्रबोधाय जनार्दनः ॥ यक्षरूपः प्रादुरभूद् उमाशिवसमन्वितः । ब्रह्मणा चापि(चैव) सहित एतेभ्योऽपि परो ह्यहम् ॥ एतेऽपि मे भृत्यभूताः परिवार्य व्यवस्थिताः । इति ज्ञापयितुं विष्णुः सह तैरप्युपागतः । यूयमेतानपि ज्ञातुमशक्ताः किमु मामिति ॥ तज्ज्ञानार्थं हुताशश्च नासिक्यो वायुरेव च । इन्द्रश्च क्रमशो जग्मुस्तं ज्ञातुं नैव चाशकन् । तत्रेन्द्रोऽधिकबुद्धित्वात् पृच्छतीति जनार्दनः । मत्तः शिवाद् ब्रह्मणश्च श्रोतुं नैवापि शक्तिमान् । इति ज्ञापयितुं तत्र नादृश्यत स केशवः ।
एषैव ज्ञानदाने ते योग्योमेति व्यदर्शयत् ॥
अथ चतुर्थः खण्डः
यस्माद् ब्रह्मा च वायुश्च शेषवीन्द्रौ शिवस्तथा । सभार्या गर्विणो नाऽसन् सुरेभ्यस्तेऽधिकास्ततः ॥ इन्द्रस्तु प्रथमं ब्रह्म व्यजानात् तेन तूत्तमः । दक्षादिभ्यस्तथा कामस्तज्ज्ञातुं (कामः स ज्ञातुम्) पूर्वमुक्तवान् ॥ दक्षो बृहस्पतिश्चैव मनुः कामात्मजस्तथा । सूर्याचन्द्रमसौ धर्मो वरुणश्चोचुरोमिति(वरुणश्च पुरोमिति. हृ) ॥ नासिक्यवायुरग्निश्च प्रथमं तदपश्यताम् । सर्वदेवाधिकास्तस्मादेते देवाः प्रकीर्तिताः । एतेभ्यश्चेन्द्रकामौ तु ताभ्यां ब्रह्मादयोऽधिकाः ॥ एतेषामवमो वह्निः परमो विष्णुरुच्यते । अन्तराले स्थितास्त्वन्ये ब्रह्माद्याः पूर्वमीरिताः ॥ अग्निः पश्चाद् व्यजानात् तद् इन्द्रवाक्यात् ततोऽवमः । तस्माद् विष्ण्वभिसम्बन्धात् पारावर्यं सुरेष्विदम् ॥ व्यद्योतयद् विद्युदादीन् कपिलाख्यस्तु यो हरिः । अक्ष्णोर्निमेषणं(अक्ष्णोर्निमीलनं) कृत्वा यः शेते क्षीरसागरे ॥ स एवैकः परं ब्रह्मेत्येवं तस्योपदेशनम् । अधिदैवे तथाऽध्यात्मे यं मनो गच्छतीव च ॥ सम्यङ् न गच्छति क्वापि मनो येन स्मरत्यपि । सोऽनिरुद्धाख्य ईशेशः परं ब्रह्मेति कीर्त्यते ॥ स विष्णुस्तद्वनं नाम ततत्वाद् वननीयतः । एवमेनं तु यो वेद भवेत् सर्वैरपेक्षितः ॥ एतत् श्रुत्वा हरोऽपृच्छद् ब्रह्माणं पुनरेव तु ।
विद्याकारं मम ब्रूहीत्युक्तो ब्रह्माऽऽह तं पुनः ॥तपोदानस्वधर्मेषु ये स्थितास्तेषु(स्थिरास्तेषु. हृ) तिष्ठति ॥
‘वेदैतामेवमखिलां यो विष्णौ प्रतितिष्ठति ॥’ इत्यादि ब्रह्मसारे(ब्रह्मपारे. हृ) ॥
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत् तेजो विद्धि मामकम् ॥’ इति वचनात् ।
अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे निमीलितात्मा निशि सुप्तशक्तिषु’ ॥ इति वचनात् ।
श्रुतिस्मृत्युदितं सर्वं व्यस्तं (व्यक्तं) मीमांसयैतया ॥
सत्यमित्युच्यते तस्मान्मीमांसा ब्रह्मनिश्चयाः ॥’ इति शब्दनिर्णये ॥
मूलरामायणं चैव पुराणं भगवत्परम् ॥
अङ्गानि सत्यं मीमांसा तद् विद्यायतनं त्रयम् ॥’ इति विद्यानिर्णये ॥
यश्चिदानन्दसच्छक्तिसम्पूर्णो भगवान् परः ।
नमोऽस्तु विष्णवे तस्मै प्रेयसे मे परात्मने ॥