Anuvyakhyana/Data: Difference between revisions
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| verse_text = ओतत्ववाची ह्योङ्कारो वक्त्यसौ तद्गुणोतताम् | | verse_text = ओतत्ववाची ह्योङ्कारो वक्त्यसौ तद्गुणोतताम् ।¦स एव ब्रह्मशब्दार्थो नारायणपदोदितः ॥9॥ | ||
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| verse_text = अन्तस्समुद्रगं विश्वप्रसूतेः कारणं तु यत् | | verse_text = अन्तस्समुद्रगं विश्वप्रसूतेः कारणं तु यत् ।¦सूक्तोपनिषदाद्युक्तं ‘जन्माद्यस्य’ इति लक्ष्यते ॥89॥ | ||
| verse_lines = अन्तस्समुद्रगं विश्वप्रसूतेः कारणं तु यत् ।¦सूक्तोपनिषदाद्युक्तं ‘जन्माद्यस्य’ इति लक्ष्यते ॥89॥ | | verse_lines = अन्तस्समुद्रगं विश्वप्रसूतेः कारणं तु यत् ।¦सूक्तोपनिषदाद्युक्तं ‘जन्माद्यस्य’ इति लक्ष्यते ॥89॥ | ||
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| verse_text = एवं धर्मानिति श्रुत्या तदभेदोऽप्युदीर्यते | | verse_text = एवं धर्मानिति श्रुत्या तदभेदोऽप्युदीर्यते ।¦शैवाद्यागमसम्प्राप्तदृष्टगेन फलेन तु ॥112॥ | ||
| verse_lines = एवं धर्मानिति श्रुत्या तदभेदोऽप्युदीर्यते ।¦शैवाद्यागमसम्प्राप्तदृष्टगेन फलेन तु ॥112॥ | | verse_lines = एवं धर्मानिति श्रुत्या तदभेदोऽप्युदीर्यते ।¦शैवाद्यागमसम्प्राप्तदृष्टगेन फलेन तु ॥112॥ | ||
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| verse_text = उपक्रमादिलिङ्गेभ्यो नान्या स्यादनुमा ततः | | verse_text = उपक्रमादिलिङ्गेभ्यो नान्या स्यादनुमा ततः ।¦त एवान्वयनामानः तैः सम्यक् प्रविचारिते ॥120॥ | ||
| verse_lines = उपक्रमादिलिङ्गेभ्यो नान्या स्यादनुमा ततः ।¦त एवान्वयनामानः तैः सम्यक् प्रविचारिते ॥120॥ | | verse_lines = उपक्रमादिलिङ्गेभ्यो नान्या स्यादनुमा ततः ।¦त एवान्वयनामानः तैः सम्यक् प्रविचारिते ॥120॥ | ||
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| verse_text = ............ देवानां तत्र शक्तताम् | | verse_text = ............ देवानां तत्र शक्तताम् ।¦आशङ्क्य तत्र रूढिं च तच्छब्दानामपि स्वयम् ॥242॥ | ||
| verse_lines = ............ देवानां तत्र शक्तताम् ।¦आशङ्क्य तत्र रूढिं च तच्छब्दानामपि स्वयम् ॥242॥ | | verse_lines = ............ देवानां तत्र शक्तताम् ।¦आशङ्क्य तत्र रूढिं च तच्छब्दानामपि स्वयम् ॥242॥ | ||
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| verse_text = चेष्टा हि चेतनानां या सा भवेत् तत्प्रसादतः | | verse_text = चेष्टा हि चेतनानां या सा भवेत् तत्प्रसादतः ।¦अचेतनस्वभावस्तु विवरादिः कथं ततः ॥244॥ | ||
| verse_lines = चेष्टा हि चेतनानां या सा भवेत् तत्प्रसादतः ।¦अचेतनस्वभावस्तु विवरादिः कथं ततः ॥244॥ | | verse_lines = चेष्टा हि चेतनानां या सा भवेत् तत्प्रसादतः ।¦अचेतनस्वभावस्तु विवरादिः कथं ततः ॥244॥ | ||
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| verse_text = नित्यत्वादेव शब्दस्य तत्स्वभावः कथं हरेः | | verse_text = नित्यत्वादेव शब्दस्य तत्स्वभावः कथं हरेः ।¦कथं प्रसिद्धबहुलशब्दानामन्यथार्थता ॥248॥ | ||
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| verse_text = लिङ्गात्मकानां शब्दानां वृत्तिर्नारायणे परे ॥ १ | | verse_text = लिङ्गात्मकानां शब्दानां वृत्तिर्नारायणे परे ॥ १ ॥¦चिन्त्यते सर्वगत्वं तु प्रथमं प्रविचार्यते ।¦तत्र तत्र स्थितो विष्णुस्तत्तच्छक्तिप्रबोधकः ॥1॥ | ||
| verse_lines = लिङ्गात्मकानां शब्दानां वृत्तिर्नारायणे परे ॥ १ ॥¦चिन्त्यते सर्वगत्वं तु प्रथमं प्रविचार्यते ।¦तत्र तत्र स्थितो विष्णुस्तत्तच्छक्तिप्रबोधकः ॥1॥ | | verse_lines = लिङ्गात्मकानां शब्दानां वृत्तिर्नारायणे परे ॥ १ ॥¦चिन्त्यते सर्वगत्वं तु प्रथमं प्रविचार्यते ।¦तत्र तत्र स्थितो विष्णुस्तत्तच्छक्तिप्रबोधकः ॥1॥ | ||
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| verse_text = अतो विरुद्धवद्भातमपि व्याख्याय तत्त्वतः | | verse_text = अतो विरुद्धवद्भातमपि व्याख्याय तत्त्वतः ।¦योजनीयं हरौ वाक्यं विरुद्धैर्लक्षणैर्युतम् ॥3॥ | ||
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| verse_lines = लिङ्गं साधारणं शब्दौ स्थानं लिङ्गमनुग्रहः ।¦पुनः शब्दा लिङ्गशब्दौ विचार्या द्विःस्थिता इह ॥7॥ | | verse_lines = लिङ्गं साधारणं शब्दौ स्थानं लिङ्गमनुग्रहः ।¦पुनः शब्दा लिङ्गशब्दौ विचार्या द्विःस्थिता इह ॥7॥ | ||
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| verse_text = स्त्रीशब्दाश्च निषेधार्थाः सर्वेऽपि ब्रह्मवाचकाः | | verse_text = स्त्रीशब्दाश्च निषेधार्थाः सर्वेऽपि ब्रह्मवाचकाः ।¦विरोधिसर्वबाहुल्यकारणस्त्रीनिषेधिनाम् ॥22॥ | ||
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| verse_text = वासनाः सर्ववस्तूनामनाद्यनुभवागताः | | verse_text = वासनाः सर्ववस्तूनामनाद्यनुभवागताः ।¦सन्त्येवाशेषजीवानामनादिमनसि स्थिताः ॥5॥ | ||
| verse_lines = वासनाः सर्ववस्तूनामनाद्यनुभवागताः ।¦सन्त्येवाशेषजीवानामनादिमनसि स्थिताः ॥5॥ | | verse_lines = वासनाः सर्ववस्तूनामनाद्यनुभवागताः ।¦सन्त्येवाशेषजीवानामनादिमनसि स्थिताः ॥5॥ | ||
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| verse_text = सृष्ट्वैव वासनाभिश्च प्रपञ्चं स्वाप्नमीश्वरः | | verse_text = सृष्ट्वैव वासनाभिश्च प्रपञ्चं स्वाप्नमीश्वरः ।¦वासनामात्रतां तस्य नीत्वाऽन्तर्धापयत्यजः ॥107॥ | ||
| verse_lines = सृष्ट्वैव वासनाभिश्च प्रपञ्चं स्वाप्नमीश्वरः ।¦वासनामात्रतां तस्य नीत्वाऽन्तर्धापयत्यजः ॥107॥ | | verse_lines = सृष्ट्वैव वासनाभिश्च प्रपञ्चं स्वाप्नमीश्वरः ।¦वासनामात्रतां तस्य नीत्वाऽन्तर्धापयत्यजः ॥107॥ | ||
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| verse_text = सुषुप्तिबोधमोहांश्च स्ववशस्तद्वशं सदा | | verse_text = सुषुप्तिबोधमोहांश्च स्ववशस्तद्वशं सदा ।¦जीवं नयति देवेशः नान्यः कर्ताऽस्य कश्चन ॥108॥ | ||
| verse_lines = सुषुप्तिबोधमोहांश्च स्ववशस्तद्वशं सदा ।¦जीवं नयति देवेशः नान्यः कर्ताऽस्य कश्चन ॥108॥ | | verse_lines = सुषुप्तिबोधमोहांश्च स्ववशस्तद्वशं सदा ।¦जीवं नयति देवेशः नान्यः कर्ताऽस्य कश्चन ॥108॥ | ||
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| verse_text = न स्थानतोभेदतोऽप्यस्य भेदः कश्चित् परेशितुः | | verse_text = न स्थानतोभेदतोऽप्यस्य भेदः कश्चित् परेशितुः ।¦सर्वत्राशेषदोषोज्झपूर्णकल्याणचिद्गुणः ॥109॥ | ||
| verse_lines = न स्थानतोभेदतोऽप्यस्य भेदः कश्चित् परेशितुः ।¦सर्वत्राशेषदोषोज्झपूर्णकल्याणचिद्गुणः ॥109॥ | | verse_lines = न स्थानतोभेदतोऽप्यस्य भेदः कश्चित् परेशितुः ।¦सर्वत्राशेषदोषोज्झपूर्णकल्याणचिद्गुणः ॥109॥ | ||
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| verse_text = यत आभासतामेव श्रुतिरस्य वदत्यलम् | | verse_text = यत आभासतामेव श्रुतिरस्य वदत्यलम् ।¦‘‘यथैषा पुरुषे छाया एतस्मिन्नेतदाततम्’’ ॥121॥ | ||
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| verse_lines = प्रधानवायुस्त्विह वायुनामा भूतेष्विति प्रोक्तगतोऽपि युक्त्या ।¦यस्मात् श्रुतौ पवते चेति भूरिप्रोक्तो यतो भूतमानी च सोऽपि ॥130॥ | | verse_lines = प्रधानवायुस्त्विह वायुनामा भूतेष्विति प्रोक्तगतोऽपि युक्त्या ।¦यस्मात् श्रुतौ पवते चेति भूरिप्रोक्तो यतो भूतमानी च सोऽपि ॥130॥ | ||
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| verse_text = सिद्धान्तनिर्णीतिकराः प्रतीकं देहादिकं तद्गतमेव ये नराः | | verse_text = सिद्धान्तनिर्णीतिकराः प्रतीकं देहादिकं तद्गतमेव ये नराः ।¦उपासते ते पुरतः समाप्नुयुर्ब्रह्माणमस्मान्मतिमाप्य विष्णुम् ॥3॥ | ||
| verse_lines = सिद्धान्तनिर्णीतिकराः प्रतीकं देहादिकं तद्गतमेव ये नराः ।¦उपासते ते पुरतः समाप्नुयुर्ब्रह्माणमस्मान्मतिमाप्य विष्णुम् ॥3॥ | | verse_lines = सिद्धान्तनिर्णीतिकराः प्रतीकं देहादिकं तद्गतमेव ये नराः ।¦उपासते ते पुरतः समाप्नुयुर्ब्रह्माणमस्मान्मतिमाप्य विष्णुम् ॥3॥ | ||
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| verse_lines = अनन्यभृत्यत्वमिहोदितेभ्यस्त्वन्यस्य भृत्यत्वनिवारणाय ॥3॥ | | verse_lines = अनन्यभृत्यत्वमिहोदितेभ्यस्त्वन्यस्य भृत्यत्वनिवारणाय ॥3॥ | ||
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| verse_text = नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं निर्दोषमाप्यतममप्यखिलैः सुवाक्यैः ।¦अस्योद्भवादिदमशेषविशेषतोऽपि वन्द्यं सदा प्रियतमं मम सन्नमामि ॥1॥ | |||
| verse_lines = नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं निर्दोषमाप्यतममप्यखिलैः सुवाक्यैः ।¦अस्योद्भवादिदमशेषविशेषतोऽपि वन्द्यं सदा प्रियतमं मम सन्नमामि ॥1॥ | |||
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| verse_text = तमेव शास्त्रप्रभवं प्रणम्य जगद्गुरूणां गुरुमञ्जसैव ।¦विशेषतो मे परमाख्यविद्याव्याख्यां करोम्यन्वपि चाहमेव ॥2॥ | |||
| verse_lines = तमेव शास्त्रप्रभवं प्रणम्य जगद्गुरूणां गुरुमञ्जसैव ।¦विशेषतो मे परमाख्यविद्याव्याख्यां करोम्यन्वपि चाहमेव ॥2॥ | |||
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| verse_text = प्रादुर्भूतो हरिर्व्यासो विरिञ्चभवपूर्वकैः ।¦अर्थितः परविद्याख्यं चक्रे शास्त्रमनुत्तमम् ॥3॥ | |||
| verse_lines = प्रादुर्भूतो हरिर्व्यासो विरिञ्चभवपूर्वकैः ।¦अर्थितः परविद्याख्यं चक्रे शास्त्रमनुत्तमम् ॥3॥ | |||
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| verse_lines = गुरुर्गुरूणां प्रभवः शास्त्राणां बादरायणः ।¦यतस्तदुदितं मानमजादिभ्यस्तदर्थतः ॥4॥ | |||
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| verse_lines = वक्तृश्रोतृप्रसक्तीनां यदाप्तिरनुकूलता ।¦आप्तवाक्यतया तेन श्रुतिमूलतया तथा ॥5॥ | |||
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| verse_lines = युक्तिमूलतया चैव प्रामाण्यं त्रिविधं महत् ।¦दृश्यते ब्रह्मसूत्राणामेकधाऽन्यत्र सर्वशः ॥6॥ | |||
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| verse_lines = अतो नैतादृशं किञ्चित् प्रमाणतममिष्यते ।¦स्वयङ्कृताऽपि तद्य्वाख्या क्रियते स्पष्टतार्थतः ॥7॥ | |||
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| verse_lines = तत्र ताराथमूलत्वं सर्वशास्त्रस्य चेष्यते ।¦सर्वत्रानुगतत्वेन पृथगोङ्क्रियतेऽखिलैः ॥8॥ | |||
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| verse_lines = तत्रान्यत्र प्रसिद्धानां(तत्रान्यत्र च सिद्धानां) लिङ्गानाम्नां पुनर्हरिः ।¦विशेषान्मुख्यतो वृत्तिं स्वस्मिन्नेवात्र वक्त्यजः ॥1॥ | |||
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| verse_lines = उक्तः समन्वयः साक्षादविरोधोऽत्र साध्यते ।¦चतुर्विधस्य तस्यादौ यौक्तः तत्रापि च स्मृतेः ॥1॥ | |||
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| verse_lines = तस्याश्चतुःस्वरूपत्वात् प्रत्येकं चतुरात्मकाः ।¦पादाः सर्वे तदंशाश्च मूर्तीनां वर्णमागमात् ॥2॥ | |||
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| verse_text = एवं चतुर्विधा नैव विरुद्ध्यन्तेऽन्वयं प्रति ।¦इति प्रथमपादेन निर्णीतेऽप्यभियोगतः ॥2॥ | |||
| verse_lines = एवं चतुर्विधा नैव विरुद्ध्यन्तेऽन्वयं प्रति ।¦इति प्रथमपादेन निर्णीतेऽप्यभियोगतः ॥2॥ | |||
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| verse_lines = दर्शनानां प्रवृत्तत्वान्मन्द आशङ्कते पुनः ।¦अनादिकालतो वृत्ताः समया हि प्रवाहतः ॥3॥ | |||
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| verse_lines = न चोच्छेदोऽस्ति कस्यापि समयस्येत्यतो विभुः ।¦भ्रान्तिमूलत्वमेतेषां पृथग्दर्शयति स्फुटम् ॥4॥ | |||
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| verse_lines = दृष्टायुक्तिः समानत्वं कर्तृशक्तिर्विमिश्रिता ।¦युक्तयः पूर्वपक्षेषु सुनिर्णीतास्तु तादृशाः ॥¦युक्तयो निर्णयस्यैव स्वयं भगवतोदिताः ॥3॥ | |||
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| verse_text = योग्यता बलवत्त्वं च विभागः कारणाभवः ।¦क्लृप्तिरन्या गतिश्चैव सिद्धान्तस्यैव साधकाः ॥4॥ | |||
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| verse_text = कथं समन्वयो ज्ञेयः स्वल्पशाखाविदां नृणाम् ।¦‘वेदा ह्यनन्ता’ इति हि श्रुतिराहाप्यनन्ताम् ॥24॥ | |||
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| verse_text = मज्ज्ञानाव्याकृताकाशे प्राप्नोति परमाणुताम् ।¦इति प्रकाशयन् (वेद)विश्वपतिराह प्रमेयताम् ॥28॥ | |||
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| verse_text = देवर्षिमानुषादीनां तत्तज्जात्यनुसारतः ।¦जैमिन्युक्तं मानुषाणां तद्विशेषाश्च केचन ॥2॥ | |||
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| verse_lines = ततः प्रोक्तास्तु ते सर्वे भक्त्योग्रतपआदयः ।¦अपश्यन् परमं विष्णुं तत्प्रसादैधिताः(तत्प्रसादेधिताः) सदा ॥9॥ | |||
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| verse_text = इत्युक्तं विष्णुना साक्षात् ग्रन्थे सत्तत्त्वसञ्ज्ञिते ।¦आत्मेति नाम कथितं साक्षान्नारायणस्य हि ॥10॥ | |||
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| verse_text = उत्क्रान्तिमार्गौ देवानां न प्रायेण भविष्यतः ।¦कर्मक्षयस्तथोत्क्रान्तिर्मार्गो भोगश्चतुष्टयम् ॥2॥ | |||
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| verse_text = फलं मोक्ष इति प्रोक्तः क्रमात् पादेषु चोदितः ।¦स्रष्टृष्वेव च(तु) सृज्यानां प्रवेशो ब्रह्मणो लये ॥3॥ | |||
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| verse_lines = उत्क्रान्तिमार्गौ भवतो न तदा मुक्तिरिष्यते ।¦अन्येषामपि साक्षाततु मुक्तिः प्राप्यापि तं हरिम् ॥¦सहैव ब्रह्मणा भूयादिति शास्त्रस्य निर्णयः ॥7॥ | |||
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| verse_lines = एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टाः ये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागाः ।¦तेनैव साकममृतं पुरुषं पुराणं ब्रह्म प्रधानमुपयान्त्यगताभिमानाः(भाग.३.३२.१०) ॥9॥ | |||
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| verse_lines = इति तत्केन मानेन मोक्षरूपं प्रदर्श्यते(प्रदृश्यते) ।¦गतिरूर्ध्वा च दुःखेता गतित्वाल्लौकिकी यथा ॥26॥ | |||
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| verse_text = लोकाकाशगतित्वं चेदुपाधिः साधनानुगः ।¦सोऽपीत्युक्ते वदेत् किं स तस्माद्वेदोदितो भवेत् ॥32॥ | |||
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| verse_text = मोक्ष एवं स्वयं विष्णुर्यद्यपीशो ह्यशेषवित् ।¦चकार सौगतमतं मोहायैव चकार यत् ॥33॥ | |||
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| verse_text = असुराणामयोग्यानां वेदमार्गे प्रवर्तताम् ।¦अतोऽसुराधिकारत्वान्न ग्राह्यं तन्मतं क्वचित् ॥34॥ | |||
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| verse_text = चतुष्प्रकारं तच्चोक्तं शून्यं विज्ञानमेकलम् ।¦अनुमेयबहिस्तत्त्वं तथा प्रत्यक्षबाह्यगम् ॥35॥ | |||
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| verse_text = इति तत्र तु ये शून्यं वदन्त्यज्ञानमोहिताः ।¦ते मोक्षं तादृशं ब्रूयुर्निःशङ्कं मायिनो यथा ॥36॥ | |||
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| verse_text = तत्संवृत्यैव भेदोऽयं चेतनाचेतनात्मकः ।¦दृश्यते संसृतेर्ध्वंसे निर्विशेषैव शून्यता ॥38॥ | |||
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| verse_lines = संसृत्यवस्था विज्ञेया(विज्ञेयं) संवृत्यैव विशिष्यते(विशेष्यते) ।¦स्थितया ध्वस्तया चैव संसृतिर्मोक्ष इत्यपि ॥42॥ | |||
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| verse_text = केचित् तेष्वन्यथा प्राहुः संवृत्यैव त्वनेकधा ।¦अवच्छिन्नं महाशून्यं नाना पुद्गलशब्दितम् ॥43॥ | |||
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| verse_lines = संवृत्त्या यस्त्ववच्छिन्नो(संवृत्याऽन्यस्त्ववच्छिन्नः) दुःखान्यनुभवत्यलम् ।¦इत्येवं मायिनश्चाहुरेकजीवत्ववादिनः ॥45॥ | |||
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| verse_lines = बहुजीवमताश्चेति माया तेषां तु संवृतिः ।¦निर्विशेषत्ववाचैव शून्यं ब्रह्मेति नो भिदा(ब्रह्मैव तो भिदा) ॥46॥ | |||
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| verse_text = प्रामाण्यादि च वेदस्य फलतः सममेव हि ।¦अतत्त्वावेदकं यस्मात् प्रमाणं तेन कथ्यते ॥49॥ | |||
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| verse_text = प्रतिपन्नो यथेत्येतदनुमानं तदुत्तरम् ।¦अनुमानानि सर्वाणि प्रतिसाधनयोगतः ॥75॥ | |||
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| verse_text = सञ्ज्ञा नास्तीत्यपि ह्यस्य नामुक्तज्ञेयतेति हि ।¦धर्मानुच्छित्तिमेवास्य यतो वक्त्युत्तरश्रुतिः ॥83॥ | |||
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| verse_text = न स्वविज्ञानितायां च विरोधः कश्चनेष्यते ।¦कर्तृकर्मविरोधश्च नित्यानुभवरोधतः ॥91॥ | |||
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| verse_lines = परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते’(भाग.११.१५.१७) ।¦‘न विष्णुसदृशं दैवं न मोक्षसदृशं सुखम् ॥105॥ | |||
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| verse_text = शिरःकराद्यैरपि मुक्तिभाजो युक्ता यतस्ते पुरुषा इदानीम् ।¦यथेति पूर्वा अनुमाश्च जीव स्वरूपमङ्गादिकमावयन्ति(आपयन्ति) ॥116॥ | |||
| verse_lines = शिरःकराद्यैरपि मुक्तिभाजो युक्ता यतस्ते पुरुषा इदानीम् ।¦यथेति पूर्वा अनुमाश्च जीव स्वरूपमङ्गादिकमावयन्ति(आपयन्ति) ॥116॥ | |||
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| verse_lines = न ब्रह्मरूपत्वममुष्य देहिनो मुक्तावपि स्यात् प्रमया कथञ्चित् ।¦स ब्रह्मणा सहितोऽशेषभोगान् भुङ्क्ते तथोपेत्य सुखार्णवं तम् ॥117॥ | |||
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| verse_lines = यत्तत्परं ज्योतिरुपेत्य जीवो निजस्वरूपत्वमवाप्य कामान् ।¦भुङ्क्ते स देवः(दैवं) पुरुषोत्तमोऽजः आत्मेति चोक्तो गुणपूर्तिहेतोः ॥118॥ | |||
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| verse_lines = सेतुः स देवोऽखिलमुक्तिभाजामुतामृतस्येष्ट इहेशिता यत् ।¦इत्यादिवाक्यैर्भगवद्वशः सन् भुङ्क्तेऽखिलान् मुक्तिगतोऽपि भोगान् ॥119॥ | |||
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| verse_lines = कालोऽप्यसौ नैक्ययुतः परेण जीवस्य कालो यत एष यद्वत् ।¦इत्यादिका अप्यनुमाः प्रमाणं मुक्तौ च जीवस्य परत्वरोधे ॥120॥ | |||
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| verse_lines = कथं च यः पूर्वमसौ न पश्चाद्भवेत् स एवेत्यपि युक्तिमेति ।¦यतो न दृष्टं यदभून्न पूर्वं पश्चात् तदासेति कुतश्च किञ्चित् ॥121॥ | |||
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| verse_lines = न चैव मुक्तौ न(तु) हरेः पृथक्त्वमैक्यं तथा स्यादिति युक्तिमेति ।¦यतो न कुत्रापि भिदाभिदा च दृष्टा चितश्चेतनया कुतश्चित् ॥122॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं मतानि भ्रमजानि यस्मात् मोक्षं समुद्देश्यमपि भ्रमेण ।¦विदुर्न सम्यग्यदपीह लौकिकाः सुखं मम स्याच्च सदेति जानते ॥123॥ | |||
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| verse_lines = औदार्यमुच्चावचशक्तिरात्मस्वरूपदार्ढ्यं च निजस्वभावः ।¦स्वातन्त्र्यमापूर्णविशेषयोग्यता विरोधहानिश्च चतुर्थपादे ॥124॥ | |||
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| verse_lines = व्यवस्थितिस्त्वविशेषस्थितिश्च निषेधसामान्यविधिक्रियाणाम् ।¦विभक्तता चात्वरयैव सिद्धिर्विपक्षसम्प्राप्तिविरुद्धहेतवः ॥125॥ | |||
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| verse_lines = सुशक्यता शश्वदतिप्रसिद्धिर्विवेक(प्रसिद्धिविवेक)विन्यासविचारसञ्ज्ञाः ।¦नानाप्रवृत्तिः कृतकृत्यता च विपक्षतर्काः समतीतपादे ॥126॥ | |||
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| verse_lines = महाफलत्वं प्रविविक्तता च सन्धिग्रहः साधनमाप्तकृत्यम् ।¦विशेषकार्यं कृतिसंस्थितिश्च(कृतसंस्थितिश्च) सुयुक्तयो निर्णयगाः स्वपक्षे ॥127॥ | |||
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| verse_lines = व्यामिश्रता कार्यकरत्वमर्थक्लृप्तिः सुदार्ढ्यं परतन्त्रता च ।¦समानधर्मः कृतशेषता च लोकोपमा पूर्वमतानुसाराः ॥128॥ | |||
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| verse_lines = विशेषसाम्यश्रुतिराढ्यता च समानलोपो महिमाविशेषः ।¦कृतार्थता शश्वदनुप्रवृत्तिः सिद्धान्तनिर्णीतिविशिष्टहेतवः ॥129॥ | |||
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| verse_lines = समस्तकार्यं वशिता च विश्वसम्भावना युक्तयस्त्वन्यपक्षके ।¦सामान्यरूपं प्रतिभानमुक्तिराश्चर्यता कृत्रिमतास्तदोषः ॥2॥¦विशेषक्लृतिः कृतनिश्चयश्च माहात्म्यमित्येव सुनिर्णयार्थाः । | |||
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