Chandogya/Data: Difference between revisions
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| verse_text = हरिःओम्॥ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुःश्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्मनिराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि | | verse_text = हरिःओम्॥ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुःश्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्मनिराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥¦ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः | ||
| verse_lines = हरिःओम्॥ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुःश्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्मनिराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥¦ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः | | verse_lines = हरिःओम्॥ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुःश्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मौपनिषदं माऽहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्मनिराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु॥¦ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः | ||
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| verse_text = हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति। अयं लोक इति होवाच। अस्य लोकस्य का गतिरिति। न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच। प्रतिष्ठां वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति | | verse_text = हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति। अयं लोक इति होवाच। अस्य लोकस्य का गतिरिति। न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच। प्रतिष्ठां वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति ।¦तं ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाच। अन्तवद्वै किल ते शालावत्य साम। यत्स्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति । हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच ॥ ५ ॥ ८ ॥ | ||
| verse_lines = हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति। अयं लोक इति होवाच। अस्य लोकस्य का गतिरिति। न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच। प्रतिष्ठां वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति ।¦तं ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाच। अन्तवद्वै किल ते शालावत्य साम। यत्स्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति । हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच ॥ ५ ॥ ८ ॥ | | verse_lines = हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति। अयं लोक इति होवाच। अस्य लोकस्य का गतिरिति। न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच। प्रतिष्ठां वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति ।¦तं ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाच। अन्तवद्वै किल ते शालावत्य साम। यत्स्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति । हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच ॥ ५ ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_text = न वै तत्र न निम्लोचो नोदियाय कदाचन | | verse_text = न वै तत्र न निम्लोचो नोदियाय कदाचन ।¦देवास्तेनाहं सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ २ ॥ | ||
| verse_lines = न वै तत्र न निम्लोचो नोदियाय कदाचन ।¦देवास्तेनाहं सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ २ ॥ | | verse_lines = न वै तत्र न निम्लोचो नोदियाय कदाचन ।¦देवास्तेनाहं सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_text = तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः | | verse_text = तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः ।¦पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ६ ॥ | ||
| verse_lines = तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः ।¦पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ६ ॥ | | verse_lines = तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः ।¦पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_text = एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद् ब्रह्मा भवत्येवंविदं ह वा एषा ब्रह्माणमनुगाथा यतो यत आवर्तते तत्तद् गच्छति | | verse_text = एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद् ब्रह्मा भवत्येवंविदं ह वा एषा ब्रह्माणमनुगाथा यतो यत आवर्तते तत्तद् गच्छति ॥¦मानवो ब्रह्मैवैकर्त्विक् कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥ ९ ॥ १७ ॥ | ||
| verse_lines = एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद् ब्रह्मा भवत्येवंविदं ह वा एषा ब्रह्माणमनुगाथा यतो यत आवर्तते तत्तद् गच्छति ॥¦मानवो ब्रह्मैवैकर्त्विक् कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥ ९ ॥ १७ ॥ | | verse_lines = एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद् ब्रह्मा भवत्येवंविदं ह वा एषा ब्रह्माणमनुगाथा यतो यत आवर्तते तत्तद् गच्छति ॥¦मानवो ब्रह्मैवैकर्त्विक् कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥ ९ ॥ १७ ॥ | ||
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| verse_text = तदेष | | verse_text = तदेष श्लोकः–¦यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने तस्मिन् स्वप्न निदर्शन इति ॥ ८ ॥ | ||
| verse_lines = तदेष श्लोकः–¦यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने तस्मिन् स्वप्न निदर्शन इति ॥ ८ ॥ | | verse_lines = तदेष श्लोकः–¦यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने तस्मिन् स्वप्न निदर्शन इति ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_text = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते सन्दोहस्त्वेष आत्मन इति होवाच सन्दोहस्त व्यशीर्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १५ ॥ | | verse_text = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते सन्दोहस्त्वेष आत्मन इति होवाच सन्दोहस्त व्यशीर्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १५ ॥ | ||
| verse_lines = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते सन्दोहस्त्वेष आत्मन इति होवाच सन्दोहस्त व्यशीर्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १५ ॥ | | verse_lines = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते सन्दोहस्त्वेष आत्मन इति होवाच सन्दोहस्त व्यशीर्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_text = वैश्वानरस्य कटिप्रदेशोऽम्नामक इति निरूपणम्¦॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये षोडशः खण्डः॥ | |||
| verse_lines = वैश्वानरस्य कटिप्रदेशोऽम्नामक इति निरूपणम्¦॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये षोडशः खण्डः॥ | |||
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| verse_text = अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ २ ॥ | | verse_text = अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_text = यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते | | verse_text = यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते ।¦एवं सर्वाणि भूतान्याग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत ॥ इति ॥ ५ ॥ ११२४ ॥ | ||
| verse_lines = यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते ।¦एवं सर्वाणि भूतान्याग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत ॥ इति ॥ ५ ॥ ११२४ ॥ | | verse_lines = यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते ।¦एवं सर्वाणि भूतान्याग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत ॥ इति ॥ ५ ॥ ११२४ ॥ | ||
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| verse_text = (तदेष श्लोकः- | | verse_text = (तदेष श्लोकः-¦पञ्चेन्द्रियस्य पुरुषस्य यदेव स्यादनावृतम्।¦तदस्य प्रज्ञा स्रवति दृतेः पात्रादिवोदकम्।¦दृतेः पादादिवोदकम्॥७॥७॥) | ||
| verse_lines = (तदेष श्लोकः-¦पञ्चेन्द्रियस्य पुरुषस्य यदेव स्यादनावृतम्।¦तदस्य प्रज्ञा स्रवति दृतेः पात्रादिवोदकम्।¦दृतेः पादादिवोदकम्॥७॥७॥) | | verse_lines = (तदेष श्लोकः-¦पञ्चेन्द्रियस्य पुरुषस्य यदेव स्यादनावृतम्।¦तदस्य प्रज्ञा स्रवति दृतेः पात्रादिवोदकम्।¦दृतेः पादादिवोदकम्॥७॥७॥) | ||
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| verse_text = स यथा तत्र (नादाह्येत)न दाह्येत एतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति तद्धास्य विजज्ञाविति । (इत आरभ्य खण्डान्तं वेदेशियटीकानुसारेण उपनिषदि दृश्यमानोऽधिकः पाठः। अयं श्रीराघवेन्द्रतीर्थीयटीकानुसारी न इत्यवगन्तव्यम्। हृषीकेशतीर्थीयेऽपि पाठोऽयं न दृश्यते) (सर्वेषां खलु भुतानामात्मा सत्ये प्रतिष्ठितः। तेनाऽत्मानमन्तर्धाय न किञ्चित् पापमृच्छति। आत्मा सत्य आत्मा साक्षी सतां धर्मः प्रतापवान् । न स पापानि कुरुते यस्याऽत्मा भवति प्रियः।जायत्येको म्रियत्येकोऽश्नात्येकः शुभाशुभम्॥ | | verse_text = स यथा तत्र (नादाह्येत)न दाह्येत एतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति तद्धास्य विजज्ञाविति । (इत आरभ्य खण्डान्तं वेदेशियटीकानुसारेण उपनिषदि दृश्यमानोऽधिकः पाठः। अयं श्रीराघवेन्द्रतीर्थीयटीकानुसारी न इत्यवगन्तव्यम्। हृषीकेशतीर्थीयेऽपि पाठोऽयं न दृश्यते) (सर्वेषां खलु भुतानामात्मा सत्ये प्रतिष्ठितः। तेनाऽत्मानमन्तर्धाय न किञ्चित् पापमृच्छति। आत्मा सत्य आत्मा साक्षी सतां धर्मः प्रतापवान् । न स पापानि कुरुते यस्याऽत्मा भवति प्रियः।जायत्येको म्रियत्येकोऽश्नात्येकः शुभाशुभम्॥ इति॥¦तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति। तदेश श्लोकः-¦सर्वभूतात्मभूतेभ्यः सम्यग् भूतानि पश्यतो देवा अपि मार्गे मुह्यन्ति पदज्ञानात् पदैषिणः इति। पदज्ञानात् पदैषिण इति)॥ ३ ॥ १६ ॥ | ||
| verse_lines = स यथा तत्र (नादाह्येत)न दाह्येत एतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति तद्धास्य विजज्ञाविति । (इत आरभ्य खण्डान्तं वेदेशियटीकानुसारेण उपनिषदि दृश्यमानोऽधिकः पाठः। अयं श्रीराघवेन्द्रतीर्थीयटीकानुसारी न इत्यवगन्तव्यम्। हृषीकेशतीर्थीयेऽपि पाठोऽयं न दृश्यते) (सर्वेषां खलु भुतानामात्मा सत्ये प्रतिष्ठितः। तेनाऽत्मानमन्तर्धाय न किञ्चित् पापमृच्छति। आत्मा सत्य आत्मा साक्षी सतां धर्मः प्रतापवान् । न स पापानि कुरुते यस्याऽत्मा भवति प्रियः।जायत्येको म्रियत्येकोऽश्नात्येकः शुभाशुभम्॥ इति॥¦तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति। तदेश श्लोकः-¦सर्वभूतात्मभूतेभ्यः सम्यग् भूतानि पश्यतो देवा अपि मार्गे मुह्यन्ति पदज्ञानात् पदैषिणः इति। पदज्ञानात् पदैषिण इति)॥ ३ ॥ १६ ॥ | | verse_lines = स यथा तत्र (नादाह्येत)न दाह्येत एतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति तद्धास्य विजज्ञाविति । (इत आरभ्य खण्डान्तं वेदेशियटीकानुसारेण उपनिषदि दृश्यमानोऽधिकः पाठः। अयं श्रीराघवेन्द्रतीर्थीयटीकानुसारी न इत्यवगन्तव्यम्। हृषीकेशतीर्थीयेऽपि पाठोऽयं न दृश्यते) (सर्वेषां खलु भुतानामात्मा सत्ये प्रतिष्ठितः। तेनाऽत्मानमन्तर्धाय न किञ्चित् पापमृच्छति। आत्मा सत्य आत्मा साक्षी सतां धर्मः प्रतापवान् । न स पापानि कुरुते यस्याऽत्मा भवति प्रियः।जायत्येको म्रियत्येकोऽश्नात्येकः शुभाशुभम्॥ इति॥¦तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति। तदेश श्लोकः-¦सर्वभूतात्मभूतेभ्यः सम्यग् भूतानि पश्यतो देवा अपि मार्गे मुह्यन्ति पदज्ञानात् पदैषिणः इति। पदज्ञानात् पदैषिण इति)॥ ३ ॥ १६ ॥ | ||
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| verse_text = स एवाधस्तात् स उपरिष्टात् स पश्चात् स पुरस्तात् स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेदं | | verse_text = स एवाधस्तात् स उपरिष्टात् स पश्चात् स पुरस्तात् स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेदं सर्वमिति।¦अथातोऽहङ्कारादेशो एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेदं सर्वमिति ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = स एवाधस्तात् स उपरिष्टात् स पश्चात् स पुरस्तात् स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेदं सर्वमिति।¦अथातोऽहङ्कारादेशो एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेदं सर्वमिति ॥ १ ॥ | | verse_lines = स एवाधस्तात् स उपरिष्टात् स पश्चात् स पुरस्तात् स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेदं सर्वमिति।¦अथातोऽहङ्कारादेशो एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेदं सर्वमिति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_lines = तदेष श्लोकः-¦न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताम् । सर्वं ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति ॥¦स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः । शतं च दश चैकं च सहस्राणि च विंशतिः ॥¦आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः । स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारं दर्शयति देवर्षये नारदाय भगवान् सनत्कुमारस्तं स्कन्द इत्याचक्षते तं स्कन्द इत्याचक्षते ॥ २ ॥ २६ ॥ | | verse_lines = तदेष श्लोकः-¦न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताम् । सर्वं ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति ॥¦स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः । शतं च दश चैकं च सहस्राणि च विंशतिः ॥¦आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः । स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारं दर्शयति देवर्षये नारदाय भगवान् सनत्कुमारस्तं स्कन्द इत्याचक्षते तं स्कन्द इत्याचक्षते ॥ २ ॥ २६ ॥ | ||
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| verse_lines = तदेष श्लोकः¦शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।¦तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ् अन्या उत्क्रमणे भवन्ति उत्क्रमणे भवन्ति ॥ ६ ॥ ६ ॥ | | verse_lines = तदेष श्लोकः¦शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।¦तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ् अन्या उत्क्रमणे भवन्ति उत्क्रमणे भवन्ति ॥ ६ ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_lines = तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यः आचार्यकुलाद् वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषणाभिसमावृत्य कुटुम्बी(कुटुम्बे .हृ) शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिंसन् सर्वाणि भूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन् यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते ॥ १॥ १५ ॥ | | verse_lines = तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यः आचार्यकुलाद् वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषणाभिसमावृत्य कुटुम्बी(कुटुम्बे .हृ) शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिंसन् सर्वाणि भूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन् यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते ॥ १॥ १५ ॥ | ||
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| verse_text = हयग्रीवमुखोद्गीर्णगीर्भिर्देवी(वम् .हृ) रमा पतिम् ।¦अस्तुवद् विस्तृतगुणं भोगिप्रस्तरशायिनम् ॥¦ओमितिनामकमक्षरं सर्वसन्निहितत्वादेतत् । उच्चत्वाद् गीतत्वात् सर्वस्थानत्वाच्चोद्गीथं भगवन्तमुपासीत । उक्तं च महासंहितायाम्–¦‘हयग्रीवोद्गीतवाक्यैः रमा देवी रमापतिम् ।¦ओमित्येतन्मुखैर्देवम् अस्तुवत्सामवेदगैः ॥ इति ।¦‘ओंनामानमुपासीत तदर्थगुणपूर्वकम् ।¦ओतत्वाद् अवनान्मानाद् अधिकोच्चत्वकारणात् ॥¦आनन्दाद् ओजसश्चैव भरणाद् ओमुदाहृतः ॥’ इति समन्वये ।¦‘ओतमस्मिन् जगत्सर्वम् अत्युच्चश्चाखिलैर्गुणैः ।¦इत्योमिति सदोपास्यः सोऽक्षरः पुरुषोत्तमः ॥¦उच्चत्वाद्गीयमानत्वात् स्थानाद् उद्गीथ उच्यते । | |||
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| verse_text = ओमित्येनं समुद्दिश्य ह्युद्गाता गायति स्फुटम् ॥¦विष्णोरोमिति नाम्नोऽस्य व्याख्यानम् अधिकोच्चता ।¦अकारेणाधिकं प्रोक्तम् उकारेणोच्चमुच्यते ॥¦तथा मितं सर्ववेदैर्मकारेणाभिधीयते ।¦अधिकोच्चमिति ज्ञातम् ओमित्यस्यार्थ ईरितः ॥ | |||
| verse_lines = ओमित्येनं समुद्दिश्य ह्युद्गाता गायति स्फुटम् ॥¦विष्णोरोमिति नाम्नोऽस्य व्याख्यानम् अधिकोच्चता ।¦अकारेणाधिकं प्रोक्तम् उकारेणोच्चमुच्यते ॥¦तथा मितं सर्ववेदैर्मकारेणाभिधीयते ।¦अधिकोच्चमिति ज्ञातम् ओमित्यस्यार्थ ईरितः ॥ | |||
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| verse_id = CHU_C01_S01_V02_B1 | |||
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| verse_text = तदेतत् परमत्वं तु यथाक्रममुदीर्यते ।¦देवतानुक्रमज्ञाश्च विष्णोः परमताविदः ॥¦एकान्तिनस्ते विज्ञेया यथाक्रमपरास्तथा ।¦अस्मादसावुच्च इति क्रमस्यान्तगतं हरिम् ॥¦एकमेव तु ये विद्युस्ते ह्येकान्तिन ईरिताः ।¦एवं यथाक्रमज्ञाश्च सदैकान्तपरायणाः ॥¦प्रविशन्ति परं देवं नारायणमनामयम् ।¦उच्चक्रमान्तगत्वेन कुर्युः पूजां हरेः सदा ॥¦लक्ष्म्यादेः क्रमशः पूजां ज्ञात्वा भागवता इति ।¦स्वतन्त्रपूज्यताबुद्ध्या न दद्युः किञ्च कस्यचित् ॥¦ब्रह्माद्या मनुसंज्ञा ये वर्णत्वेनोदिताः(उदितान् .हृ) श्रुतौ ।¦मानवाख्याश्च मुनयस्तान् यजन्ति न चेतरान् ॥¦पितृत्वेन गुरुत्वेन साक्षाद्भागवतत्वतः ।¦अपभ्रष्टा अदेवाश्च ब्रह्माद्याख्यायुता अपि ॥¦देवसंज्ञाश्च दीनत्वात् पूजयेयुर्न तान् क्वचित् ।¦यद् भागवतबुद्ध्यैव दत्तं ब्रह्मादयः सुराः ॥¦वैदिकाः प्रतिगृह्णीयुरपभ्रष्टास्तथेतरत् ।¦यथाक्रमपरिज्ञानाद् एकान्तित्वाच्च केवलम् ॥¦अच्छिद्रत्वाच्च नियतो मोक्षोन्यत्तु विडम्बनम् । | |||
| verse_lines = तदेतत् परमत्वं तु यथाक्रममुदीर्यते ।¦देवतानुक्रमज्ञाश्च विष्णोः परमताविदः ॥¦एकान्तिनस्ते विज्ञेया यथाक्रमपरास्तथा ।¦अस्मादसावुच्च इति क्रमस्यान्तगतं हरिम् ॥¦एकमेव तु ये विद्युस्ते ह्येकान्तिन ईरिताः ।¦एवं यथाक्रमज्ञाश्च सदैकान्तपरायणाः ॥¦प्रविशन्ति परं देवं नारायणमनामयम् ।¦उच्चक्रमान्तगत्वेन कुर्युः पूजां हरेः सदा ॥¦लक्ष्म्यादेः क्रमशः पूजां ज्ञात्वा भागवता इति ।¦स्वतन्त्रपूज्यताबुद्ध्या न दद्युः किञ्च कस्यचित् ॥¦ब्रह्माद्या मनुसंज्ञा ये वर्णत्वेनोदिताः(उदितान् .हृ) श्रुतौ ।¦मानवाख्याश्च मुनयस्तान् यजन्ति न चेतरान् ॥¦पितृत्वेन गुरुत्वेन साक्षाद्भागवतत्वतः ।¦अपभ्रष्टा अदेवाश्च ब्रह्माद्याख्यायुता अपि ॥¦देवसंज्ञाश्च दीनत्वात् पूजयेयुर्न तान् क्वचित् ।¦यद् भागवतबुद्ध्यैव दत्तं ब्रह्मादयः सुराः ॥¦वैदिकाः प्रतिगृह्णीयुरपभ्रष्टास्तथेतरत् ।¦यथाक्रमपरिज्ञानाद् एकान्तित्वाच्च केवलम् ॥¦अच्छिद्रत्वाच्च नियतो मोक्षोन्यत्तु विडम्बनम् । | |||
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| verse_text = (विष्णोर्भक्ति .हृ)विष्णौ भक्तिर्विशेषेण मोक्षावाप्तौ हि कारणम् ॥¦तद्भक्तेषु क्रमेणैव रमाद्येषु त्वनन्तरम् ।¦तृतीयमपि वैराग्यं न (नैवान्यत् .हृ)चान्यन्मोक्षकारणम् ॥¦एतत्साधनताहेतोस्तदन्यद्धि विधीयते ।¦अतोऽन्यत् सर्वकृच्चापि गच्छेदेवाधरं तमः ॥¦अस्मिन्सुनिष्ठितो नित्यं मोक्ष्येवान्योज्झकोऽपि सन् ।¦अतस्तेषां क्रमं वक्ष्ये देवानां यः श्रुतौ श्रुतः ॥¦पृथिवी सर्वभूतेभ्यः सदा सर्वगुणैर्वरा ।¦रसः सारो वरश्चेति शब्दा एकार्थवाचकाः ॥¦पृथिव्या वरुणः श्रेष्ठस्तस्माद् ओषधिदेवता ।¦सोमस्तस्मात्तु पुरुषो रुद्रो यत्पौंस्यदेवता ॥¦तस्मात् सरस्वती वाग्घि श्रेष्ठाऽस्या ऋक्स्वरूपिणी ।¦सैव श्रेष्ठा ततो वायुर्वरिष्ठः सामगायकः ॥¦समत्वात् सर्वभूतेषु साम साम्नां च देवता ।¦ततः श्रेष्ठतमो विष्णुः श्रेष्ठश्रेष्ठतमः(श्रेष्ठः श्रेष्ठतमः) सदा ॥¦श्रेष्ठाच्छ्रेष्ठतमाच्चापि परमात् परमो विभुः ।¦परमर्द्धियुतत्वाच्च परार्ध्य इति कीर्तितः ॥’ इति सारनिर्णये ।¦अतिशयं परमर्धिगुणः परमः परार्ध्यः । उत्तमेभ्योऽप्यतिपरमोत्तमोत्तमो रसानां रसतमः परमः परार्ध्यः । रसानां सकाशादपि परमपरार्ध्यरसतम(परमः परमर्द्धरसतमः) इत्यर्थः । प्राणादीनां भूतादिभ्यः श्रेष्ठत्ववद् अस्य श्रेष्ठत्वं न भवति; किन्तु? महान् विशेष इति ज्ञापयितुं ‘रसानां रसतम’ इत्यादि बहुविशेषणम् ।¦भूतेभ्यः पृथिव्या रसत्वम्, तेभ्यो वरुणस्य रसतरत्वम्, सोमस्य रसतमत्वम्, रुद्रस्य परमरसतमत्वम्, वाचः परमर्द्धरसतमत्वम्, प्राणस्य परमपरार्धरसतमत्वम्, अयं तु भगवान् प्राणादपि परमपरार्द्धरसतममात्रो न भवति; किन्तु? प्राणस्यापि रसभूताया रमाया अपि परमपरार्ध्यरसतमः । ‘अस्मादप्यतिशयेन परम्’ इत्यसंख्यागोचरत्वेन परार्द्धेन ज्ञेयं हि परार्ध्यम् । ऋग्रूपाया वाचः पृथक्परत्वाङ्गीकारेऽपि भूतेभ्यः प्राणस्य परमपरार्धरसतमत्वमेव; न तु परमपरार्द्ध्य(र्धि)रसतमत्वम् । परस्माद्(दपि) आ समन्तादृद्धं हि परार्द्धम् (तेन उत्तमत्वेन ज्ञेयं परार्धि)। तेनासङ्ख्यागोचरत्वेन ज्ञेयं परार्द्ध्यम् । परार्द्धोत्तमं परार्द्धि । तेनासंख्यागोचरत्वेन ज्ञेयं परार्द्ध्यमित्यतः परार्द्धित्वं श्रियो भवति । श्रियोऽपि परार्द्ध्य भगवान् । अतो रसानां रसतमः परमः परार्द्ध्यः । | |||
| verse_lines = (विष्णोर्भक्ति .हृ)विष्णौ भक्तिर्विशेषेण मोक्षावाप्तौ हि कारणम् ॥¦तद्भक्तेषु क्रमेणैव रमाद्येषु त्वनन्तरम् ।¦तृतीयमपि वैराग्यं न (नैवान्यत् .हृ)चान्यन्मोक्षकारणम् ॥¦एतत्साधनताहेतोस्तदन्यद्धि विधीयते ।¦अतोऽन्यत् सर्वकृच्चापि गच्छेदेवाधरं तमः ॥¦अस्मिन्सुनिष्ठितो नित्यं मोक्ष्येवान्योज्झकोऽपि सन् ।¦अतस्तेषां क्रमं वक्ष्ये देवानां यः श्रुतौ श्रुतः ॥¦पृथिवी सर्वभूतेभ्यः सदा सर्वगुणैर्वरा ।¦रसः सारो वरश्चेति शब्दा एकार्थवाचकाः ॥¦पृथिव्या वरुणः श्रेष्ठस्तस्माद् ओषधिदेवता ।¦सोमस्तस्मात्तु पुरुषो रुद्रो यत्पौंस्यदेवता ॥¦तस्मात् सरस्वती वाग्घि श्रेष्ठाऽस्या ऋक्स्वरूपिणी ।¦सैव श्रेष्ठा ततो वायुर्वरिष्ठः सामगायकः ॥¦समत्वात् सर्वभूतेषु साम साम्नां च देवता ।¦ततः श्रेष्ठतमो विष्णुः श्रेष्ठश्रेष्ठतमः(श्रेष्ठः श्रेष्ठतमः) सदा ॥¦श्रेष्ठाच्छ्रेष्ठतमाच्चापि परमात् परमो विभुः ।¦परमर्द्धियुतत्वाच्च परार्ध्य इति कीर्तितः ॥’ इति सारनिर्णये ।¦अतिशयं परमर्धिगुणः परमः परार्ध्यः । उत्तमेभ्योऽप्यतिपरमोत्तमोत्तमो रसानां रसतमः परमः परार्ध्यः । रसानां सकाशादपि परमपरार्ध्यरसतम(परमः परमर्द्धरसतमः) इत्यर्थः । प्राणादीनां भूतादिभ्यः श्रेष्ठत्ववद् अस्य श्रेष्ठत्वं न भवति; किन्तु? महान् विशेष इति ज्ञापयितुं ‘रसानां रसतम’ इत्यादि बहुविशेषणम् ।¦भूतेभ्यः पृथिव्या रसत्वम्, तेभ्यो वरुणस्य रसतरत्वम्, सोमस्य रसतमत्वम्, रुद्रस्य परमरसतमत्वम्, वाचः परमर्द्धरसतमत्वम्, प्राणस्य परमपरार्धरसतमत्वम्, अयं तु भगवान् प्राणादपि परमपरार्द्धरसतममात्रो न भवति; किन्तु? प्राणस्यापि रसभूताया रमाया अपि परमपरार्ध्यरसतमः । ‘अस्मादप्यतिशयेन परम्’ इत्यसंख्यागोचरत्वेन परार्द्धेन ज्ञेयं हि परार्ध्यम् । ऋग्रूपाया वाचः पृथक्परत्वाङ्गीकारेऽपि भूतेभ्यः प्राणस्य परमपरार्धरसतमत्वमेव; न तु परमपरार्द्ध्य(र्धि)रसतमत्वम् । परस्माद्(दपि) आ समन्तादृद्धं हि परार्द्धम् (तेन उत्तमत्वेन ज्ञेयं परार्धि)। तेनासङ्ख्यागोचरत्वेन ज्ञेयं परार्द्ध्यम् । परार्द्धोत्तमं परार्द्धि । तेनासंख्यागोचरत्वेन ज्ञेयं परार्द्ध्यमित्यतः परार्द्धित्वं श्रियो भवति । श्रियोऽपि परार्द्ध्य भगवान् । अतो रसानां रसतमः परमः परार्द्ध्यः । | |||
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| verse_text = पृथिव्याः सोमवरुणयोश्चौषध्यब्देवतात्वेन रुद्रस्य च लिङ्गदेवतात्वेन प्रसिद्धेः ऋगादीनामेव विमर्शः क्रियते-<span class="gr-moola">कतमा कतमर्ग्</span> इत्यादिना । तज्ज्ञानस्य विशिष्टफलत्वाच्च । वाचश्च सरस्वतीत्वेन प्रसिद्धेर्वागृचोरैक्याच्च न विमर्शः कृतः ।¦‘विशेषात् प्राणसंयुक्ता वाग् ऋगित्यभिधीयते ।¦ऋ गताविति धातोर्हि ऋक्त्वं सर्गाभिमानिनी ॥¦विशेषसंयोगहीना यदा सा वै(सैव .हृ) सरस्वती ।¦तदा तस्यावरा सैव प्राणसंयोगिनी मता ॥¦प्राणयोगवियोगाभ्यां सैषैकाऽपि विभिद्यते ।¦वागेवाक् तच्छ्रुतौ प्रोक्ता प्राणः सामेति कीर्तितः ॥¦अक्षयाद् रतिरूपत्वाद् अक्षेषु रमणादपि ।¦अक्षरं भगवान् विष्णुरोमित्युच्चत्वहेतुतः(अत्युच्चत्वहेतुतः .हृ) ॥¦इतिशब्दोऽन्यथाभावनिवृत्त्यर्थ उदाहृतः ।¦एवमत्युच्च एवासौ सर्वदैतद्धृदि स्थितः (स्थितेः) ॥¦उद्गीयमान उद्गीथो भगवान् पुरुषोत्तमः ॥ | |||
| verse_lines = पृथिव्याः सोमवरुणयोश्चौषध्यब्देवतात्वेन रुद्रस्य च लिङ्गदेवतात्वेन प्रसिद्धेः ऋगादीनामेव विमर्शः क्रियते-<span class="gr-moola">कतमा कतमर्ग्</span> इत्यादिना । तज्ज्ञानस्य विशिष्टफलत्वाच्च । वाचश्च सरस्वतीत्वेन प्रसिद्धेर्वागृचोरैक्याच्च न विमर्शः कृतः ।¦‘विशेषात् प्राणसंयुक्ता वाग् ऋगित्यभिधीयते ।¦ऋ गताविति धातोर्हि ऋक्त्वं सर्गाभिमानिनी ॥¦विशेषसंयोगहीना यदा सा वै(सैव .हृ) सरस्वती ।¦तदा तस्यावरा सैव प्राणसंयोगिनी मता ॥¦प्राणयोगवियोगाभ्यां सैषैकाऽपि विभिद्यते ।¦वागेवाक् तच्छ्रुतौ प्रोक्ता प्राणः सामेति कीर्तितः ॥¦अक्षयाद् रतिरूपत्वाद् अक्षेषु रमणादपि ।¦अक्षरं भगवान् विष्णुरोमित्युच्चत्वहेतुतः(अत्युच्चत्वहेतुतः .हृ) ॥¦इतिशब्दोऽन्यथाभावनिवृत्त्यर्थ उदाहृतः ।¦एवमत्युच्च एवासौ सर्वदैतद्धृदि स्थितः (स्थितेः) ॥¦उद्गीयमान उद्गीथो भगवान् पुरुषोत्तमः ॥ | |||
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| verse_text = तस्मादोमित्यनुज्ञानं कुवर्न्त्येते जनाः सदा ।¦त्वदुक्तं तत् तथा कुर्याद् भगवानेव केशवः ॥¦इत्यभिप्रायतः शब्दः प्रवृत्तः स पुरातनैः ।¦तदेतदज्ञैस्तु जनैः स्वानुज्ञेति प्रदीयते(प्रतीयते) ॥¦ओमित्ययं पूर्णवाची समृद्धिर्ह्योमितीरिता।¦समृद्धस्ते हि कामोऽयमित्यनुज्ञाऽथवा भवेत् ॥¦अतः समृद्धिवाची स्याद्धरेरोंशब्द ईरितः ।¦इति वा दीयतेऽनुज्ञा हरिस्तव समृद्धिदः ॥ ६॥¦वाक्प्राणौ दम्पती चापि संसृज्येते जनार्दने ।¦मुक्तौ तु तत्प्रसादेन संसृज्यन्ते ततः परे ॥¦तद्द्वारेणैव साक्षात्तु प्राणः संसृज्यते हरौ ॥ ४॥ | |||
| verse_lines = तस्मादोमित्यनुज्ञानं कुवर्न्त्येते जनाः सदा ।¦त्वदुक्तं तत् तथा कुर्याद् भगवानेव केशवः ॥¦इत्यभिप्रायतः शब्दः प्रवृत्तः स पुरातनैः ।¦तदेतदज्ञैस्तु जनैः स्वानुज्ञेति प्रदीयते(प्रतीयते) ॥¦ओमित्ययं पूर्णवाची समृद्धिर्ह्योमितीरिता।¦समृद्धस्ते हि कामोऽयमित्यनुज्ञाऽथवा भवेत् ॥¦अतः समृद्धिवाची स्याद्धरेरोंशब्द ईरितः ।¦इति वा दीयतेऽनुज्ञा हरिस्तव समृद्धिदः ॥ ६॥¦वाक्प्राणौ दम्पती चापि संसृज्येते जनार्दने ।¦मुक्तौ तु तत्प्रसादेन संसृज्यन्ते ततः परे ॥¦तद्द्वारेणैव साक्षात्तु प्राणः संसृज्यते हरौ ॥ ४॥ | |||
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| verse_text = तेनैव विष्णुनेयं च त्रयीविद्या प्रवर्तते ।¦ओमित्युक्त्वा हि तद्व्याख्या सर्वैर्मन्त्रैः प्रवर्तते ॥¦ओंनामकस्य पूजार्थं विष्णोरेव सदैव हि ।¦महिम्ना सारभूतेन विष्णुना ज्ञोऽज्ञ एव च ॥¦कुरुतः कर्म.............। | |||
| verse_lines = तेनैव विष्णुनेयं च त्रयीविद्या प्रवर्तते ।¦ओमित्युक्त्वा हि तद्व्याख्या सर्वैर्मन्त्रैः प्रवर्तते ॥¦ओंनामकस्य पूजार्थं विष्णोरेव सदैव हि ।¦महिम्ना सारभूतेन विष्णुना ज्ञोऽज्ञ एव च ॥¦कुरुतः कर्म.............। | |||
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| verse_text = ...............नाज्ञस्य मुक्तिर्ज्ञस्य भवेत्तु सा ।¦स्वयोग्यं तु परिज्ञानं यत् तस्योपनिषत् स्मृतम् ॥¦अक्षरं भगवान् विष्णुस्तस्योप प्रणवः स्मृतः ।¦उपव्याख्या तु तद्व्याख्येत्येवमाह श्रुतिः परा ॥’ इति तार्तीये ।¦‘परर्धं परमादुच्चं परार्धं तु ततोऽधिकम् ।¦ततोऽधिकं परार्धिः स्यात् परार्ध्यमिति तत्परम् ॥¦परतः परमाच्चैव परार्द्धो(परार्द्धि .हृ) वायुरीरितः ।¦परार्धिनी श्रीरुद्दिष्टा परार्ध्यो भगवान् हरिः ॥¦इति शब्दनिर्णये ॥ ८॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = ...............नाज्ञस्य मुक्तिर्ज्ञस्य भवेत्तु सा ।¦स्वयोग्यं तु परिज्ञानं यत् तस्योपनिषत् स्मृतम् ॥¦अक्षरं भगवान् विष्णुस्तस्योप प्रणवः स्मृतः ।¦उपव्याख्या तु तद्व्याख्येत्येवमाह श्रुतिः परा ॥’ इति तार्तीये ।¦‘परर्धं परमादुच्चं परार्धं तु ततोऽधिकम् ।¦ततोऽधिकं परार्धिः स्यात् परार्ध्यमिति तत्परम् ॥¦परतः परमाच्चैव परार्द्धो(परार्द्धि .हृ) वायुरीरितः ।¦परार्धिनी श्रीरुद्दिष्टा परार्ध्यो भगवान् हरिः ॥¦इति शब्दनिर्णये ॥ ८॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = उद्गीथाख्यस्य(उद्गीथाख्यविष्णोः .हृ) विष्णोर्विशिष्टप्रतिमा वायुरेव । अतस्तस्य सर्वोत्तमत्वज्ञानपूर्वकं तस्मिंस्ततोऽप्युत्तमत्वेनोपासित एव भगवान् सम्यक् फलं ददातीति दर्शयति ।¦‘वायौ मुख्यधिया इति च’ इति भगवद्वचनम् ।(‘वायौ मुख्यधिया’ इति भगवद्वचनम्)¦‘यस्माद् वायौ स्मृतो विष्णुर्वायोर्मुख्यतयाऽखिलात् ।¦स्वस्य मुख्यतया तस्मात् परां तुष्टिं गमिष्यति ॥¦अतो विचार्य सकलैर्देवैः प्राणे जनार्दनः ।¦उपासितो दैत्यजयकारणात् पापवर्जिते ॥¦वायुपुत्रं च नासिक्यम् अग्निं वागात्मकं तथा ।¦सोमं श्रोत्रात्मकं चैव सूर्यं चक्षुःस्वरूपिणम् ॥¦रुद्रं मनःस्वरूपं च शेषं चाहंस्वरूपिणम् ।¦चित्तात्मकं च गरुडं पापेन विविधुः सुरान् ॥¦असुरास्तैर्यतो विद्धास्तस्मात् ते दोषयोगिनः ।¦मुख्यवायौ यदा देवाः शरीरस्थे च सूर्यगे ॥¦विष्णुमुद्गीथनामानं तदा तं च विदध्वसुः ।¦यदा विदध्वसुः प्राणं विध्वास्तास्ते तदाऽसुराः ॥¦अखन्याश्मानमेवाप्य लोष्टो विध्वंसते यथा ।¦प्रतिमां प्रेयसीं प्राप्य विष्णोः प्राणं तथाऽसुराः ॥¦तस्माद् अादित्यसंस्थे वा शरीरस्थेऽपि वाऽनिले(चानिले) ।¦बलज्ञानात्मके दिव्याकृतिमत्युज्जवलात्मनि ॥¦सर्वदेवोत्तमे(सर्वदेवोत्तमम्) विष्णुम् उपासीत ततोऽधिकम् ।¦अस्योपासनया देवास्सर्वे नामानि(सर्वनामानि) भेजिरे ॥¦इन्द्रो बृहस्पतिः शम्भुरित्याद्याः प्राणगा यतः ।¦प्राणस्य नामशब्दाश्च मुख्यतो विष्णुसंस्थिताः॥’ इति प्रध्याने ॥¦‘उद्गीथाख्यं परं विष्णुमुपास्त्याऽऽजह्रुरञ्जसा ।¦तथापि प्राण एवासौ प्रीतिमागाद् उपासितः ॥’ इति च ॥¦‘प्राणं प्राप्यैव विध्वस्ता यथा सर्वेऽसुरास्तथा ।¦तदुपासकस्य यश्चापि प्रतीपं दातुमिच्छति ॥’ इति च ॥¦‘एवं(एतं) विदित्वा संसारान्मुक्तिमेष्यत्यसंशयम् ।¦विष्णुमप्यन्ततो वेत्ति प्राणवेत्ता यतः स्फुटम् ॥¦वीति विष्णुः समुद्दिष्टो विशिष्टत्वात्तु सर्वतः ।¦आददात्येव तं प्राणवेत्ताऽन्ते तत्प्रसादतः ॥¦प्राणात् परं तु ये विष्णुं जीवांश्चैवावरांस्ततः ।¦ये विदुस्ते विदुः प्राणं नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति च ॥¦‘प्राण उद्गीथ इत्याद्या नाम ब्रह्मादिकास्तथा ।¦सप्तम्यर्थाः समुद्दिष्टाः सप्तसु प्रथमा यतः ॥¦प्राणमुद्गीथमित्याद्याः द्वितीया सप्तमी मता ॥’ इति च ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = उद्गीथाख्यस्य(उद्गीथाख्यविष्णोः .हृ) विष्णोर्विशिष्टप्रतिमा वायुरेव । अतस्तस्य सर्वोत्तमत्वज्ञानपूर्वकं तस्मिंस्ततोऽप्युत्तमत्वेनोपासित एव भगवान् सम्यक् फलं ददातीति दर्शयति ।¦‘वायौ मुख्यधिया इति च’ इति भगवद्वचनम् ।(‘वायौ मुख्यधिया’ इति भगवद्वचनम्)¦‘यस्माद् वायौ स्मृतो विष्णुर्वायोर्मुख्यतयाऽखिलात् ।¦स्वस्य मुख्यतया तस्मात् परां तुष्टिं गमिष्यति ॥¦अतो विचार्य सकलैर्देवैः प्राणे जनार्दनः ।¦उपासितो दैत्यजयकारणात् पापवर्जिते ॥¦वायुपुत्रं च नासिक्यम् अग्निं वागात्मकं तथा ।¦सोमं श्रोत्रात्मकं चैव सूर्यं चक्षुःस्वरूपिणम् ॥¦रुद्रं मनःस्वरूपं च शेषं चाहंस्वरूपिणम् ।¦चित्तात्मकं च गरुडं पापेन विविधुः सुरान् ॥¦असुरास्तैर्यतो विद्धास्तस्मात् ते दोषयोगिनः ।¦मुख्यवायौ यदा देवाः शरीरस्थे च सूर्यगे ॥¦विष्णुमुद्गीथनामानं तदा तं च विदध्वसुः ।¦यदा विदध्वसुः प्राणं विध्वास्तास्ते तदाऽसुराः ॥¦अखन्याश्मानमेवाप्य लोष्टो विध्वंसते यथा ।¦प्रतिमां प्रेयसीं प्राप्य विष्णोः प्राणं तथाऽसुराः ॥¦तस्माद् अादित्यसंस्थे वा शरीरस्थेऽपि वाऽनिले(चानिले) ।¦बलज्ञानात्मके दिव्याकृतिमत्युज्जवलात्मनि ॥¦सर्वदेवोत्तमे(सर्वदेवोत्तमम्) विष्णुम् उपासीत ततोऽधिकम् ।¦अस्योपासनया देवास्सर्वे नामानि(सर्वनामानि) भेजिरे ॥¦इन्द्रो बृहस्पतिः शम्भुरित्याद्याः प्राणगा यतः ।¦प्राणस्य नामशब्दाश्च मुख्यतो विष्णुसंस्थिताः॥’ इति प्रध्याने ॥¦‘उद्गीथाख्यं परं विष्णुमुपास्त्याऽऽजह्रुरञ्जसा ।¦तथापि प्राण एवासौ प्रीतिमागाद् उपासितः ॥’ इति च ॥¦‘प्राणं प्राप्यैव विध्वस्ता यथा सर्वेऽसुरास्तथा ।¦तदुपासकस्य यश्चापि प्रतीपं दातुमिच्छति ॥’ इति च ॥¦‘एवं(एतं) विदित्वा संसारान्मुक्तिमेष्यत्यसंशयम् ।¦विष्णुमप्यन्ततो वेत्ति प्राणवेत्ता यतः स्फुटम् ॥¦वीति विष्णुः समुद्दिष्टो विशिष्टत्वात्तु सर्वतः ।¦आददात्येव तं प्राणवेत्ताऽन्ते तत्प्रसादतः ॥¦प्राणात् परं तु ये विष्णुं जीवांश्चैवावरांस्ततः ।¦ये विदुस्ते विदुः प्राणं नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति च ॥¦‘प्राण उद्गीथ इत्याद्या नाम ब्रह्मादिकास्तथा ।¦सप्तम्यर्थाः समुद्दिष्टाः सप्तसु प्रथमा यतः ॥¦प्राणमुद्गीथमित्याद्याः द्वितीया सप्तमी मता ॥’ इति च ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = प्राणाद्यास्त्रिविधाः पञ्च प्रधानो वायुरेव च ॥¦मुख्यपञ्चकरूपस्सन् गरुडो मध्यपञ्चकः ।¦अवमः पञ्चकस्त्वन्ये प्राणाद्यास्तस्य सूनवः ॥¦इति त्रेधा विभागोऽयं विभागोऽन्यश्चतुर्थकः ।¦प्राणापानौ शेषवीन्द्रौ तथोदानसमानकौ ॥¦रुद्रेन्द्रौ तत्परः श्रेष्ठो वायुर्व्यान उदाहृतः ।¦तस्मिन्नुद्गीथनामानमुपासीत हरिं परम् ॥¦योऽसौ व्यानगतो विष्णुः स वागृक्सामगः सदा ।¦उद्गीथे च स एवैकस्तस्माद् व्यानाद्धि तत्क्रियाः ॥¦उद्गीथनामा भगवान् स्थितो व्यानादिपञ्चके । | |||
| verse_lines = प्राणाद्यास्त्रिविधाः पञ्च प्रधानो वायुरेव च ॥¦मुख्यपञ्चकरूपस्सन् गरुडो मध्यपञ्चकः ।¦अवमः पञ्चकस्त्वन्ये प्राणाद्यास्तस्य सूनवः ॥¦इति त्रेधा विभागोऽयं विभागोऽन्यश्चतुर्थकः ।¦प्राणापानौ शेषवीन्द्रौ तथोदानसमानकौ ॥¦रुद्रेन्द्रौ तत्परः श्रेष्ठो वायुर्व्यान उदाहृतः ।¦तस्मिन्नुद्गीथनामानमुपासीत हरिं परम् ॥¦योऽसौ व्यानगतो विष्णुः स वागृक्सामगः सदा ।¦उद्गीथे च स एवैकस्तस्माद् व्यानाद्धि तत्क्रियाः ॥¦उद्गीथनामा भगवान् स्थितो व्यानादिपञ्चके । | |||
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| verse_id = CHU_C01_S03_V04_B1 | |||
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| verse_text = वीर्यवत् कर्मकृत् तस्माद् व्यान एव ह्युदाहृतः ॥¦तस्माद् व्यानगतं विष्णुमुपासीतैव नित्यशः ।¦यद्यप्येको हि भगवान् सर्वदा सर्ववस्तुगः ॥¦अनूनोद्रिक्तमहिमो निर्विशेषस्सदैव च ।¦तथापि तत्क्रियाभेदान्नामरूपादिकं पृथक् ॥¦उच्यते ह्यपृथक्त्वेऽपि पूर्णैश्वर्यैकहेतुतः ।¦अविशेषोऽपि भगवान् सर्वशक्तित्वहेतुतः ॥¦विशेषहेतुकं सर्वं करोत्यविकृतः सदा । | |||
| verse_lines = वीर्यवत् कर्मकृत् तस्माद् व्यान एव ह्युदाहृतः ॥¦तस्माद् व्यानगतं विष्णुमुपासीतैव नित्यशः ।¦यद्यप्येको हि भगवान् सर्वदा सर्ववस्तुगः ॥¦अनूनोद्रिक्तमहिमो निर्विशेषस्सदैव च ।¦तथापि तत्क्रियाभेदान्नामरूपादिकं पृथक् ॥¦उच्यते ह्यपृथक्त्वेऽपि पूर्णैश्वर्यैकहेतुतः ।¦अविशेषोऽपि भगवान् सर्वशक्तित्वहेतुतः ॥¦विशेषहेतुकं सर्वं करोत्यविकृतः सदा । | |||
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| verse_text = उद्गीथाक्षरगं चैव प्राणादिषु च संस्थितम् ॥¦आशीःसमृद्धिहेतुष्वप्यखिलेषु व्यवस्थितम् ।¦एकमेव हरिं वेद यः स सर्वेष्टमाप्नुयात् ॥ इति च ।¦उच्छब्दवाच्याः प्राणाद्याः वागाद्या गीरितीरिताः ।¦अन्नाद्यास्थमिति प्रोक्तास्तेषूद्गीथो हरिः स्थितः ॥ इति च ।¦<span class="gr-moola">आत्मानं</span> परमात्मानम् अन्ततः सर्वोत्तमत्वेन सर्वत्रो<span class="gr-moola">पसृत्य</span> ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = उद्गीथाक्षरगं चैव प्राणादिषु च संस्थितम् ॥¦आशीःसमृद्धिहेतुष्वप्यखिलेषु व्यवस्थितम् ।¦एकमेव हरिं वेद यः स सर्वेष्टमाप्नुयात् ॥ इति च ।¦उच्छब्दवाच्याः प्राणाद्याः वागाद्या गीरितीरिताः ।¦अन्नाद्यास्थमिति प्रोक्तास्तेषूद्गीथो हरिः स्थितः ॥ इति च ।¦<span class="gr-moola">आत्मानं</span> परमात्मानम् अन्ततः सर्वोत्तमत्वेन सर्वत्रो<span class="gr-moola">पसृत्य</span> ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = ‘स्वरतेस्तु स्वरो विष्णुस्तद्रतेर्वायुरुच्यते ।¦वायुस्वरे स्वरं विष्णुमोमाख्यं समुपासिरे ॥¦देवास्तेनामृतं प्राप्ता मुक्त्याख्यं मृत्युवर्जिताः ।¦मारणान्मृत्युरित्युक्ता दुर्गा तद्भयतः सुराः ।¦ओमित्युपास्य तं विष्णुं परमामृतमापिरे ॥ इति सन्ध्याने (सद्ध्याने)।¦<span class="gr-moola">ऊर्ध्वाः</span> उत्तमाः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = ‘स्वरतेस्तु स्वरो विष्णुस्तद्रतेर्वायुरुच्यते ।¦वायुस्वरे स्वरं विष्णुमोमाख्यं समुपासिरे ॥¦देवास्तेनामृतं प्राप्ता मुक्त्याख्यं मृत्युवर्जिताः ।¦मारणान्मृत्युरित्युक्ता दुर्गा तद्भयतः सुराः ।¦ओमित्युपास्य तं विष्णुं परमामृतमापिरे ॥ इति सन्ध्याने (सद्ध्याने)।¦<span class="gr-moola">ऊर्ध्वाः</span> उत्तमाः ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = ‘आदित्यसंस्थितो वायुः प्रणवस्तद्गतो हरिः ।¦प्रकृष्टत्वाच्च नेतृत्वाद् गतित्वाद् अखिलस्य च ॥¦उद्गीथ उच्चैर्गे(र्गी)यत्वात् स एव पुरुषोत्तमः ।¦स एव प्राणगो देह(हे) ओमित्येव सदा जपन् ॥¦एत्येष भगवान् विष्णुर्ध्यायन्नेकं तमक्षरम् ।¦एकपुत्रो मुक्तिमेति ध्यायन् प्राणेषु रश्मिषु ।¦बहुपुत्रो विमुक्तः स्यात् तस्माद् ध्यायेत् तथा परम्॥’ इति च ।¦प्राणस्थं भूमानम् अभिगाय, दुरुद्गीतमनुसमाहरति । अनुरूपमेव करोति । होतृसदनस्थमग्निस्थं भगवन्तं ध्यात्वा ।¦‘अन्यथागानजं दोषम् अग्नौ ध्यात्वा हरिं परम् ।¦अपाकरोति तस्मात् तं ध्यायेदेवाग्निगं सदा ॥’ इति त्रैविद्ये ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = ‘आदित्यसंस्थितो वायुः प्रणवस्तद्गतो हरिः ।¦प्रकृष्टत्वाच्च नेतृत्वाद् गतित्वाद् अखिलस्य च ॥¦उद्गीथ उच्चैर्गे(र्गी)यत्वात् स एव पुरुषोत्तमः ।¦स एव प्राणगो देह(हे) ओमित्येव सदा जपन् ॥¦एत्येष भगवान् विष्णुर्ध्यायन्नेकं तमक्षरम् ।¦एकपुत्रो मुक्तिमेति ध्यायन् प्राणेषु रश्मिषु ।¦बहुपुत्रो विमुक्तः स्यात् तस्माद् ध्यायेत् तथा परम्॥’ इति च ।¦प्राणस्थं भूमानम् अभिगाय, दुरुद्गीतमनुसमाहरति । अनुरूपमेव करोति । होतृसदनस्थमग्निस्थं भगवन्तं ध्यात्वा ।¦‘अन्यथागानजं दोषम् अग्नौ ध्यात्वा हरिं परम् ।¦अपाकरोति तस्मात् तं ध्यायेदेवाग्निगं सदा ॥’ इति त्रैविद्ये ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = ‘अग्नीरसूर्यनीलेषु वायुः स्थः सामदेवता ।¦उर्वीवियद्द्युशुक्लेषु ऋग्देवीस्था(ऋग्देवी स्था) सरस्वती ॥¦सेति भार्या हि वाग्देवी प्राणोऽमः पतिरीरितः ।¦एवं तौ सामनामानावुभावेवाप्युदाहृतौ(उभावेतावुदाहृतौ) ॥¦अतो हि सामवेदोऽयं ऋक्सामात्मक ईरितः । | |||
| verse_lines = ‘अग्नीरसूर्यनीलेषु वायुः स्थः सामदेवता ।¦उर्वीवियद्द्युशुक्लेषु ऋग्देवीस्था(ऋग्देवी स्था) सरस्वती ॥¦सेति भार्या हि वाग्देवी प्राणोऽमः पतिरीरितः ।¦एवं तौ सामनामानावुभावेवाप्युदाहृतौ(उभावेतावुदाहृतौ) ॥¦अतो हि सामवेदोऽयं ऋक्सामात्मक ईरितः । | |||
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| verse_text = वागादिष्वेवमेवैतौ वाक्प्राणौ सर्वदा स्थितौ ॥¦तयोरन्तःस्थितो विष्णुर्गायको तस्य तावुभौ ।¦ऋक्सामाभ्यां स उन्नामा पापोद्गश्चोच्च एव च ॥’ इत्यादि सत्तत्त्वे ।¦‘कप्यासरक्तपद्माक्षः सूर्यगश्चाक्षिगश्च सः ।¦गायकस्तस्य विष्णोर्यः स स्वर्ग्यांश्च नृलोकगान् ॥¦कामान् दद्यान्नरश्चेत् स्यात् सुराणां च नृणामपि ।¦मोक्षदो यदि वायुः स्यान्मुख्योद्गाता ततोऽनिलः ॥’ इति च ।¦तस्मादुद्गीथ उच्चोऽसौ गीयते च इति । | |||
| verse_lines = वागादिष्वेवमेवैतौ वाक्प्राणौ सर्वदा स्थितौ ॥¦तयोरन्तःस्थितो विष्णुर्गायको तस्य तावुभौ ।¦ऋक्सामाभ्यां स उन्नामा पापोद्गश्चोच्च एव च ॥’ इत्यादि सत्तत्त्वे ।¦‘कप्यासरक्तपद्माक्षः सूर्यगश्चाक्षिगश्च सः ।¦गायकस्तस्य विष्णोर्यः स स्वर्ग्यांश्च नृलोकगान् ॥¦कामान् दद्यान्नरश्चेत् स्यात् सुराणां च नृणामपि ।¦मोक्षदो यदि वायुः स्यान्मुख्योद्गाता ततोऽनिलः ॥’ इति च ।¦तस्मादुद्गीथ उच्चोऽसौ गीयते च इति । | |||
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| verse_text = <span class="gr-moola">आत्मा</span> जीवः ।¦‘सरस्वती हि चक्षुःस्था जीवस्थो वायुरीरितः(वायुरीश्वरः .हृ) ।¦विदित्वा तावुभौ देवी तद्गं ध्यायेद्धरिं सदा ॥’ इति मानसे । | |||
| verse_lines = <span class="gr-moola">आत्मा</span> जीवः ।¦‘सरस्वती हि चक्षुःस्था जीवस्थो वायुरीरितः(वायुरीश्वरः .हृ) ।¦विदित्वा तावुभौ देवी तद्गं ध्यायेद्धरिं सदा ॥’ इति मानसे । | |||
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| verse_text = ‘दृश्यते ज्ञानदृष्ट्या यः सूर्ये चक्षुषि चैकराट् ।¦ऋङ्नामा ज्ञानरूपत्वात् साम नित्यसमत्वतः ॥¦उक्थमुत्थापकत्वाच्च यजुर्याज्यस्वरूपतः ।¦ब्रह्मासौ (गुणपूर्णत्वात्)पूर्णरूपत्वादेवं सर्वाभिधानवान् ॥’ इति च ॥ | |||
| verse_lines = ‘दृश्यते ज्ञानदृष्ट्या यः सूर्ये चक्षुषि चैकराट् ।¦ऋङ्नामा ज्ञानरूपत्वात् साम नित्यसमत्वतः ॥¦उक्थमुत्थापकत्वाच्च यजुर्याज्यस्वरूपतः ।¦ब्रह्मासौ (गुणपूर्णत्वात्)पूर्णरूपत्वादेवं सर्वाभिधानवान् ॥’ इति च ॥ | |||
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| verse_text = यथा बदरिकानाथो द्वारकानाथ इत्यपि ।¦अर्वाङ्नाथः पराङ्नाथ इति तद्वदिहोच्यते ॥¦सर्वनाथोऽपि भगवान् सन्निधानविशेषतः॥’ इति च ॥ ९ ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = यथा बदरिकानाथो द्वारकानाथ इत्यपि ।¦अर्वाङ्नाथः पराङ्नाथ इति तद्वदिहोच्यते ॥¦सर्वनाथोऽपि भगवान् सन्निधानविशेषतः॥’ इति च ॥ ९ ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = ‘अग्निः सामाभिमानी स्याद् वरुणस्तु स्वरात्मकः ।¦प्राणावराभिमानी तु सूर्य एव प्रकीर्तितः ॥¦अन्नाभिमानी दक्षश्च शक्रस्त्वबभिमानवान् ।¦द्व्यात्मकश्च(द्युवात्मकश्च) शिवः प्रोक्तः क्रमेणैवोत्तरोत्तराः ।¦क्रमेण मोक्षे प्राप्याश्च पूर्वेषामुत्तरोत्तराः ॥’ इति निवृत्ते ।¦अग्नेर्वागात्मकत्वात् ।(स्वरस्योदकात्मकत्वात्) उदकात्मकत्वात् स्वरस्य । ‘आदित्य एव प्राणोऽन्नं वै प्रजापतिः’ इति श्रुतेः । ‘आप एवेन्द्रो द्यौर्वाव रुद्रः’ इत्यादेश्च ।¦कथाया उद्देशः¦‘विशेषज्ञानसम्प्राप्त्यै जानन्तोऽपि परं हरिम् ।¦ब्रूयुर्देवाश्च ऋषयस्तदन्यस्य परात्मताम् ॥’इति ब्रह्मतर्के ।¦(स्वर्गाभिमानिनं रुद्रं) स्वर्गाभिमानिरुद्रं प्रति <span class="gr-moola">सामाभिसंस्थापयामः</span> । तत्स्तावकं हि साम । ‘मूर्धा ते विपतेदि’ति यः कश्चिद् ब्रूयाच्चेत् विपतिष्यति ।¦ब्रह्मैव हि पृथिव्यात्मा ....... ...... । | |||
| verse_lines = ‘अग्निः सामाभिमानी स्याद् वरुणस्तु स्वरात्मकः ।¦प्राणावराभिमानी तु सूर्य एव प्रकीर्तितः ॥¦अन्नाभिमानी दक्षश्च शक्रस्त्वबभिमानवान् ।¦द्व्यात्मकश्च(द्युवात्मकश्च) शिवः प्रोक्तः क्रमेणैवोत्तरोत्तराः ।¦क्रमेण मोक्षे प्राप्याश्च पूर्वेषामुत्तरोत्तराः ॥’ इति निवृत्ते ।¦अग्नेर्वागात्मकत्वात् ।(स्वरस्योदकात्मकत्वात्) उदकात्मकत्वात् स्वरस्य । ‘आदित्य एव प्राणोऽन्नं वै प्रजापतिः’ इति श्रुतेः । ‘आप एवेन्द्रो द्यौर्वाव रुद्रः’ इत्यादेश्च ।¦कथाया उद्देशः¦‘विशेषज्ञानसम्प्राप्त्यै जानन्तोऽपि परं हरिम् ।¦ब्रूयुर्देवाश्च ऋषयस्तदन्यस्य परात्मताम् ॥’इति ब्रह्मतर्के ।¦(स्वर्गाभिमानिनं रुद्रं) स्वर्गाभिमानिरुद्रं प्रति <span class="gr-moola">सामाभिसंस्थापयामः</span> । तत्स्तावकं हि साम । ‘मूर्धा ते विपतेदि’ति यः कश्चिद् ब्रूयाच्चेत् विपतिष्यति ।¦ब्रह्मैव हि पृथिव्यात्मा ....... ...... । | |||
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| verse_text = ‘........ ..... विष्णुराकाशनामकः ।¦आदीप्तत्वाद् वरीयांश्च परमो हरिरेव हि ॥’ इति सत्तत्त्वे ।¦‘शुभाशुभानां दाहादौ साम्यात् सामाग्निरीरितः ।¦स्वो विष्णुः सागरे रन्ता वरुणोऽतः स्वरः स्मृतः ॥¦उदयाज्जगत्प्रणेतृत्वात् सूर्यः प्राण उदाहृतः ।¦अत्ता रुद्रस्तद्विरोधाद् दक्षः स्यादन्ननामकः ॥¦स्वो विष्णुस्तद्रतिर्वायुस्तद्गो मुक्तौ सदाशिवः ।¦अतः स्वर्गोऽसुसंस्थत्वाद् असाविति च कीर्तितः ॥¦सर्वदेवान्तरत्वात् तु ब्रह्मायं समुदाहृतः ।¦लोको ज्ञानस्वरूपत्वादेतेषां परमो हरिः ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।¦आ पालनादाप इन्द्रः ।¦अधिकं वरीयान् परोवरीयान् । तत्परोवरीयोऽस्य रक्षकं भवति । यावत्तः द्वापरादिपर्यन्तम् ॥ ८ ॥ ९ ॥ | |||
| verse_lines = ‘........ ..... विष्णुराकाशनामकः ।¦आदीप्तत्वाद् वरीयांश्च परमो हरिरेव हि ॥’ इति सत्तत्त्वे ।¦‘शुभाशुभानां दाहादौ साम्यात् सामाग्निरीरितः ।¦स्वो विष्णुः सागरे रन्ता वरुणोऽतः स्वरः स्मृतः ॥¦उदयाज्जगत्प्रणेतृत्वात् सूर्यः प्राण उदाहृतः ।¦अत्ता रुद्रस्तद्विरोधाद् दक्षः स्यादन्ननामकः ॥¦स्वो विष्णुस्तद्रतिर्वायुस्तद्गो मुक्तौ सदाशिवः ।¦अतः स्वर्गोऽसुसंस्थत्वाद् असाविति च कीर्तितः ॥¦सर्वदेवान्तरत्वात् तु ब्रह्मायं समुदाहृतः ।¦लोको ज्ञानस्वरूपत्वादेतेषां परमो हरिः ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।¦आ पालनादाप इन्द्रः ।¦अधिकं वरीयान् परोवरीयान् । तत्परोवरीयोऽस्य रक्षकं भवति । यावत्तः द्वापरादिपर्यन्तम् ॥ ८ ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = ‘उपला इष्टकाः स्थूला मटचीति प्रकीर्तिताः।’ इति शब्दनिर्णये । ‘आसन्नयौवना योषिद् (आटिकी .हृ)आटकीत्यभिधीयते।’ इति च । ‘प्रद्रवन्नन्नपानार्थं प्रद्राणक इतीरितः।’ इति च ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = ‘प्राणस्थविष्णुना सर्वे प्रसूयन्ते यतस्ततः ।¦प्रस्तावदेवता स स्यात् प्रस्तावस्तु जनिर्यतः ॥¦आदित्यसंस्थितो विष्णुर्यत्सदा सर्वगीतभुक् ।¦राजादौ गीतमप्यज्ञैर्भुङ्क्ते गानस्य देवता ॥¦उद्गीथदेवता तस्मात् स एव पुरुषोत्तमः ।¦अन्नस्थेनैव जीवन्ति भूतान्येतानि विष्णुना ॥¦प्रतिहारदेवताऽतः स प्रतिहारो हि भोजनम् ॥’ इति च ।¦<span class="gr-moola">उच्चैः सन्तम्</span> उत्तमं सन्तम् ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = दल्भपुत्रो <span class="gr-moola">बको</span> मित्रया पुत्रार्थे स्वीकृतो ग्लाववत्(ग्राववत्) तूष्णीं स्थितत्वात् तया ग्लावेत्युक्तो ग्लावनामको जातः । अत उभयथाऽस्य निर्देशो भवतीत्यर्थः ।¦‘प्रसादार्थं बकस्यापि वायुनोक्तः श्वरूपिणा ।¦शौवोद्गीथ इति प्रोक्तो रुद्रादीनां श्वरूपिणाम् ॥¦उपासितः पौर्णमास्यां शौवोद्गीथेन केशवः ।¦सर्वाभीष्टं ददातीति प्रातरित्याह मारुतः ॥¦ओमदामादिकं मन्त्रं वायुनोक्तं तु देवताः ।¦वायुस्थविष्णुमुद्दिश्य हिङ्कृत्य प्रापुरीप्सितम् ॥¦देवौ विष्णुश्च वायुश्च सर्वज्ञत्वात् क्रमेण तु ।¦वरुणौ वरणीयत्वात् सवितारौ प्रसूतितः ॥¦प्रजानां च पती तद्वत् क्रमादेव प्रकीर्तितौ ॥’ इति च ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = दल्भपुत्रो <span class="gr-moola">बको</span> मित्रया पुत्रार्थे स्वीकृतो ग्लाववत्(ग्राववत्) तूष्णीं स्थितत्वात् तया ग्लावेत्युक्तो ग्लावनामको जातः । अत उभयथाऽस्य निर्देशो भवतीत्यर्थः ।¦‘प्रसादार्थं बकस्यापि वायुनोक्तः श्वरूपिणा ।¦शौवोद्गीथ इति प्रोक्तो रुद्रादीनां श्वरूपिणाम् ॥¦उपासितः पौर्णमास्यां शौवोद्गीथेन केशवः ।¦सर्वाभीष्टं ददातीति प्रातरित्याह मारुतः ॥¦ओमदामादिकं मन्त्रं वायुनोक्तं तु देवताः ।¦वायुस्थविष्णुमुद्दिश्य हिङ्कृत्य प्रापुरीप्सितम् ॥¦देवौ विष्णुश्च वायुश्च सर्वज्ञत्वात् क्रमेण तु ।¦वरुणौ वरणीयत्वात् सवितारौ प्रसूतितः ॥¦प्रजानां च पती तद्वत् क्रमादेव प्रकीर्तितौ ॥’ इति च ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_type = bhashya | |||
| verse_text = (हूयते चाग्निहोत्रादि)हूयतेऽत्राग्निहोत्रादिर्हावुकारस्त्वियं (ततः .हृ)यतः ।¦हेत्याश्वर्यवदायाति हेति वा सुखकृत्त्वतः ॥¦हायिकारस्ततो वायुरथेत्युक्तमनन्तरम् ।¦आनन्तर्यात् प्रकाशस्य सूर्याच्चन्द्रस्तथेरितः(सूर्याश्चन्द्रस्त्वथेरितः) ॥¦सर्वसामीप्यतो विष्णुरिहेति कथितः सदा ।¦इन्धनादग्निरीकार ऊकारस्सूर्य उष्टितः ॥¦नितरामाह्वयन्त्येनमितीन्द्रो निहवः स्मृतः ।¦एतीत्येकार एवासौ औहोयीत्यखिलाः सुराः ॥¦उच्चत्वाद्विष्णुरुः प्रोक्तो हूयन्तेऽस्मिन् यतोऽखिलाः ।¦मुक्तावौहोयिनस्तस्मात् सर्वे देवाः(सर्वदेवाः) प्रकीर्तिताः ॥¦हीति निश्चय उद्दिष्टो निश्चयज्ञानतस्सदा ।¦ब्रह्मा हिङ्कार इत्युक्तो, वायुः <span class="gr-moola">प्राणः</span> शरीरगः ॥¦स्वे विष्णौ रमयत्येनं जीवं तस्मात् स्वरः स्मृतः ।¦ययिर्नित्यगतेर्वायुस्तद्गायाया सरस्वती ॥¦सैवान्नदेवता प्रोक्ता यात्रा(याऽत्त्रा) प्राणेन नीयते ।¦सर्ववागात्मिका या तु श्रीर्विशेषेण राजनात् ॥¦विराडुक्ता निरुक्तस्तु व्याप्तो नारायणस्तु यः ।¦आहूत एव पातीति हुप्कार इति कीर्तितः ॥¦हुबित्याक्रियते यस्माद् हुप्कारस्तु जनार्दनः(हुप्कारस्तज्जनार्दनः .हृ) ।¦अनिरुक्तस्त्ववाच्यत्वात् परमः पुरुषो हरिः॥’ इति माहात्म्ये ।¦सम्यक् चरतीति स एव सञ्चरः ॥ १३ ॥ | |||
| verse_lines = (हूयते चाग्निहोत्रादि)हूयतेऽत्राग्निहोत्रादिर्हावुकारस्त्वियं (ततः .हृ)यतः ।¦हेत्याश्वर्यवदायाति हेति वा सुखकृत्त्वतः ॥¦हायिकारस्ततो वायुरथेत्युक्तमनन्तरम् ।¦आनन्तर्यात् प्रकाशस्य सूर्याच्चन्द्रस्तथेरितः(सूर्याश्चन्द्रस्त्वथेरितः) ॥¦सर्वसामीप्यतो विष्णुरिहेति कथितः सदा ।¦इन्धनादग्निरीकार ऊकारस्सूर्य उष्टितः ॥¦नितरामाह्वयन्त्येनमितीन्द्रो निहवः स्मृतः ।¦एतीत्येकार एवासौ औहोयीत्यखिलाः सुराः ॥¦उच्चत्वाद्विष्णुरुः प्रोक्तो हूयन्तेऽस्मिन् यतोऽखिलाः ।¦मुक्तावौहोयिनस्तस्मात् सर्वे देवाः(सर्वदेवाः) प्रकीर्तिताः ॥¦हीति निश्चय उद्दिष्टो निश्चयज्ञानतस्सदा ।¦ब्रह्मा हिङ्कार इत्युक्तो, वायुः <span class="gr-moola">प्राणः</span> शरीरगः ॥¦स्वे विष्णौ रमयत्येनं जीवं तस्मात् स्वरः स्मृतः ।¦ययिर्नित्यगतेर्वायुस्तद्गायाया सरस्वती ॥¦सैवान्नदेवता प्रोक्ता यात्रा(याऽत्त्रा) प्राणेन नीयते ।¦सर्ववागात्मिका या तु श्रीर्विशेषेण राजनात् ॥¦विराडुक्ता निरुक्तस्तु व्याप्तो नारायणस्तु यः ।¦आहूत एव पातीति हुप्कार इति कीर्तितः ॥¦हुबित्याक्रियते यस्माद् हुप्कारस्तु जनार्दनः(हुप्कारस्तज्जनार्दनः .हृ) ।¦अनिरुक्तस्त्ववाच्यत्वात् परमः पुरुषो हरिः॥’ इति माहात्म्ये ।¦सम्यक् चरतीति स एव सञ्चरः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_text = <span class="gr-moola">समस्तस्य</span> पूर्णस्य साधुत्वात् सामनाम्नो विष्णोः <span class="gr-moola">उपासनं साधु</span> । सारत्वेन मेयं <span class="gr-moola">साम</span> । सारत्वेन धार्यं साध्वित्येक एवार्थः ।¦‘साधुत्वात् सामनामानं समस्तगुणपूर्तितः ।¦समस्तं य उपासीत नारायणमनामयम् ।¦सर्वसाम्नां(सर्वनाम्नां) देवतेति स मुक्तः साधुधर्मभाग् ॥ इति सामसंहितायाम् ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = <span class="gr-moola">समस्तस्य</span> पूर्णस्य साधुत्वात् सामनाम्नो विष्णोः <span class="gr-moola">उपासनं साधु</span> । सारत्वेन मेयं <span class="gr-moola">साम</span> । सारत्वेन धार्यं साध्वित्येक एवार्थः ।¦‘साधुत्वात् सामनामानं समस्तगुणपूर्तितः ।¦समस्तं य उपासीत नारायणमनामयम् ।¦सर्वसाम्नां(सर्वनाम्नां) देवतेति स मुक्तः साधुधर्मभाग् ॥ इति सामसंहितायाम् ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = ‘नारायणाख्य उद्गीथ उद्गेयः प्रणवेन यत् ।¦उद्गच्छन्ति यतोऽस्माद्वा वासुदेवादिमूर्तयः ॥¦प्रथमावताररूपत्वाद् वासुदेवः परः पुमान् ।¦प्रस्तावो निधनं चापि सङ्कर्षण उदाहृतः ॥¦सङ्कर्षणो हि संहर्ता प्रद्युम्नः परमेश्वरः ।¦हिङ्कार इति सम्प्रोक्तो हीति सृष्टिरुदीर्यते ॥¦प्रसिद्धता हि सृष्टिः स्याद् अनिरुद्धः परो विभुः ।¦प्रतिहार इति प्रोक्तः स हि कार्येष्विदं जगत् ॥¦प्रतिप्रति हरेन्नित्यं मूर्तिप्रतिहृतेस्तथा ।¦ते पृथिव्यादिषु सदा तन्नामानः प्रतिष्ठिताः ॥¦पृथिवीत्यादिशब्दार्थास्ते हि मुख्यत ईरिताः ।¦तत्सम्बन्धात् तदर्थत्वं पृथिव्यादेरमुख्यतः ॥¦प्रथनादेव सस्यादेः पृथिवीत्वमुदाहृतम् ।¦अग्नित्वमदनाच्चैव ह्यन्तरीक्षणयोगतः ॥¦अभावाद्व्यवधानस्य त्वन्तरिक्षमितीर्यते ।¦आदानादायुषश्चैव(आयुषां चैव) स आदित्य उदीरितः ॥¦द्यौः क्रीडाकारणत्वाच्च तत्सर्वं हि परे हरौ॥’ इति च ।¦‘पञ्चात्मकं यो लोकेषु सदोपास्ते हरिं परम् ।¦ऊर्ध्वाधःसंस्थितास्तस्य पञ्चैव दश मूर्तयः ।¦मोक्षादिकमभीष्टं यत्कल्पन्तेऽस्य सदैव हि ॥ इति च ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = ‘नारायणाख्य उद्गीथ उद्गेयः प्रणवेन यत् ।¦उद्गच्छन्ति यतोऽस्माद्वा वासुदेवादिमूर्तयः ॥¦प्रथमावताररूपत्वाद् वासुदेवः परः पुमान् ।¦प्रस्तावो निधनं चापि सङ्कर्षण उदाहृतः ॥¦सङ्कर्षणो हि संहर्ता प्रद्युम्नः परमेश्वरः ।¦हिङ्कार इति सम्प्रोक्तो हीति सृष्टिरुदीर्यते ॥¦प्रसिद्धता हि सृष्टिः स्याद् अनिरुद्धः परो विभुः ।¦प्रतिहार इति प्रोक्तः स हि कार्येष्विदं जगत् ॥¦प्रतिप्रति हरेन्नित्यं मूर्तिप्रतिहृतेस्तथा ।¦ते पृथिव्यादिषु सदा तन्नामानः प्रतिष्ठिताः ॥¦पृथिवीत्यादिशब्दार्थास्ते हि मुख्यत ईरिताः ।¦तत्सम्बन्धात् तदर्थत्वं पृथिव्यादेरमुख्यतः ॥¦प्रथनादेव सस्यादेः पृथिवीत्वमुदाहृतम् ।¦अग्नित्वमदनाच्चैव ह्यन्तरीक्षणयोगतः ॥¦अभावाद्व्यवधानस्य त्वन्तरिक्षमितीर्यते ।¦आदानादायुषश्चैव(आयुषां चैव) स आदित्य उदीरितः ॥¦द्यौः क्रीडाकारणत्वाच्च तत्सर्वं हि परे हरौ॥’ इति च ।¦‘पञ्चात्मकं यो लोकेषु सदोपास्ते हरिं परम् ।¦ऊर्ध्वाधःसंस्थितास्तस्य पञ्चैव दश मूर्तयः ।¦मोक्षादिकमभीष्टं यत्कल्पन्तेऽस्य सदैव हि ॥ इति च ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = ‘पञ्चरूपं तु यो विष्णुं पुरोवातादिषु स्थितम् ।¦उपास्ते वृष्टिरस्मै स्याद्वर्षयत्यस्य मुक्तिगान् ॥¦सर्वभोगांश्च भगवान् पञ्चरूपी जनार्दनः ॥’ इति च ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = ‘पञ्चरूपं तु यो विष्णुं पुरोवातादिषु स्थितम् ।¦उपास्ते वृष्टिरस्मै स्याद्वर्षयत्यस्य मुक्तिगान् ॥¦सर्वभोगांश्च भगवान् पञ्चरूपी जनार्दनः ॥’ इति च ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = ‘अप्सु पञ्चविधोपासी यो नारायणवान् भवेत् ।¦न चास्य मृतिरप्सु स्याद् अप्सुषद्भगवान् हरिः॥’ इति च ।¦अप्सु स्थितनारायणवान् मुक्तो भवतीत्यर्थः । अपः सूत इत्यप्सूर्भगवान् । दीर्घलोपेनाप्सुमानिति वा ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = ‘अप्सु पञ्चविधोपासी यो नारायणवान् भवेत् ।¦न चास्य मृतिरप्सु स्याद् अप्सुषद्भगवान् हरिः॥’ इति च ।¦अप्सु स्थितनारायणवान् मुक्तो भवतीत्यर्थः । अपः सूत इत्यप्सूर्भगवान् । दीर्घलोपेनाप्सुमानिति वा ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = हेमन्तशिशिरयोरैक्येन पञ्चत्वम् ।¦‘ऋतुनामानमृतुगम् (ऋतुत्वात्)ऋतत्वादृतुनामकः ।¦इत्युपासीत यो विष्णुं पञ्चात्मानममुष्य हि ॥¦मोक्षादीन् कल्पते चास्य ऋतुसंस्थो जनार्दनः ।¦रक्ष्यत्वात् तेन तद्वांश्च सदैव स्यादुपासकः॥’ इति च ।¦‘वासस्य सुखकारित्वात् वसन्तः पुरुषोत्तमः ।¦नीरादेर्गरणाद् ग्रीष्मो वर्षणाद्वर्ष उच्यते ॥¦शं रातीति शरत्प्रोक्तो हेमन्तो हिमकारणात् ॥’ इति च ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = हेमन्तशिशिरयोरैक्येन पञ्चत्वम् ।¦‘ऋतुनामानमृतुगम् (ऋतुत्वात्)ऋतत्वादृतुनामकः ।¦इत्युपासीत यो विष्णुं पञ्चात्मानममुष्य हि ॥¦मोक्षादीन् कल्पते चास्य ऋतुसंस्थो जनार्दनः ।¦रक्ष्यत्वात् तेन तद्वांश्च सदैव स्यादुपासकः॥’ इति च ।¦‘वासस्य सुखकारित्वात् वसन्तः पुरुषोत्तमः ।¦नीरादेर्गरणाद् ग्रीष्मो वर्षणाद्वर्ष उच्यते ॥¦शं रातीति शरत्प्रोक्तो हेमन्तो हिमकारणात् ॥’ इति च ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = ‘पालनात् सुखरूपत्वात्(सुखकारित्वात्) पशुनामा जनार्दनः ।¦मुक्तस्तद्वान् भवत्येव पशुषूपासको हरेः ॥’ इति च ।¦‘यज्ञेनाञ्चनहेतुत्वाद्(यज्ञोदजनिहेतुत्वात्) अजस्थो भगवान् अजः ।¦अविस्थस्त्वविरेवोक्त ऊर्णया शीततोऽवनात् ॥¦गौश्च सद्गतिहेतुत्वाद् गोस्थः स पुरुषोत्तमः ।¦अश्वश्चैवाऽशुगन्तृत्वात् पुुरुषः पूर्तिहेतुतः॥’ इति च ।¦भवन्ति हास्य पशव इति प्रसिद्धपशव एव । अजा इत्यादिबहुवचनं बहुरूपत्वाद् भगवतः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = ‘पालनात् सुखरूपत्वात्(सुखकारित्वात्) पशुनामा जनार्दनः ।¦मुक्तस्तद्वान् भवत्येव पशुषूपासको हरेः ॥’ इति च ।¦‘यज्ञेनाञ्चनहेतुत्वाद्(यज्ञोदजनिहेतुत्वात्) अजस्थो भगवान् अजः ।¦अविस्थस्त्वविरेवोक्त ऊर्णया शीततोऽवनात् ॥¦गौश्च सद्गतिहेतुत्वाद् गोस्थः स पुरुषोत्तमः ।¦अश्वश्चैवाऽशुगन्तृत्वात् पुुरुषः पूर्तिहेतुतः॥’ इति च ।¦भवन्ति हास्य पशव इति प्रसिद्धपशव एव । अजा इत्यादिबहुवचनं बहुरूपत्वाद् भगवतः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = ‘परस्मादुत्तमं प्रोक्तं परो इति ततः परम् ।¦परोवरं परं तस्मात् प्रोक्तं पारोवरीयकम् (परोवरीयकम्)॥¦परोवरीयांस्येतानि विष्णो रूपाणि सर्वशः ।¦तेषां विशेषो नैवास्ति सदा तानि समानि हि ॥¦अत्युत्तमोत्तमान्येतान्यन्यस्मात् सर्वतोऽपि तु ॥’ इति च ।¦‘प्राणो नेतृत्वतो विष्णुर्वाक्सर्ववचनात् सदा ।¦चक्षुश्च दर्शनान्नित्यं श्रोत्रं श्रवणहेतुतः ॥¦मनो मन्तृत्वतश्चास्य ह्येक एव तु पञ्चधा ॥’ इति च ।¦परोवरीयो ब्रह्मास्य भवति सर्वापेक्षितदातृत्वात् ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = ‘परस्मादुत्तमं प्रोक्तं परो इति ततः परम् ।¦परोवरं परं तस्मात् प्रोक्तं पारोवरीयकम् (परोवरीयकम्)॥¦परोवरीयांस्येतानि विष्णो रूपाणि सर्वशः ।¦तेषां विशेषो नैवास्ति सदा तानि समानि हि ॥¦अत्युत्तमोत्तमान्येतान्यन्यस्मात् सर्वतोऽपि तु ॥’ इति च ।¦‘प्राणो नेतृत्वतो विष्णुर्वाक्सर्ववचनात् सदा ।¦चक्षुश्च दर्शनान्नित्यं श्रोत्रं श्रवणहेतुतः ॥¦मनो मन्तृत्वतश्चास्य ह्येक एव तु पञ्चधा ॥’ इति च ।¦परोवरीयो ब्रह्मास्य भवति सर्वापेक्षितदातृत्वात् ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = ‘आदिः कल्पादिहेतुत्वात् क्रोडात्मा केशवः स्वयम् ।¦दुष्टोपद्रवकर्तृत्वान्नरसिंह उपद्रवः॥’ इति च ।¦‘हुङ्कारसहिते वाक्ये प्रद्युम्नस्तु सदा स्थितः ।¦आकारयुक्ते वाराहो वासुदेवः प्रसंयुते ॥¦नारायणस्तथोद्युक्ते प्रतियुक्तेऽनिरुद्धकः ।¦उपयुक्ते नृसिंहश्च नीतिसङ्कर्षणस्तथा (नीतिः सङ्कर्षणस्तथा) ॥¦अभावे यावदेते स्युस्तावत् तद्दैवतं स्मृतम् ।¦एवं सप्तविधं विष्णुं य उपास्ते परं (सदा) विभुम् ॥¦वाङ्नामा भगवांस्तस्य भवेत् सर्वार्थदोहकृत् ॥’ इति च ॥ ८ ॥ | |||
| verse_lines = ‘आदिः कल्पादिहेतुत्वात् क्रोडात्मा केशवः स्वयम् ।¦दुष्टोपद्रवकर्तृत्वान्नरसिंह उपद्रवः॥’ इति च ।¦‘हुङ्कारसहिते वाक्ये प्रद्युम्नस्तु सदा स्थितः ।¦आकारयुक्ते वाराहो वासुदेवः प्रसंयुते ॥¦नारायणस्तथोद्युक्ते प्रतियुक्तेऽनिरुद्धकः ।¦उपयुक्ते नृसिंहश्च नीतिसङ्कर्षणस्तथा (नीतिः सङ्कर्षणस्तथा) ॥¦अभावे यावदेते स्युस्तावत् तद्दैवतं स्मृतम् ।¦एवं सप्तविधं विष्णुं य उपास्ते परं (सदा) विभुम् ॥¦वाङ्नामा भगवांस्तस्य भवेत् सर्वार्थदोहकृत् ॥’ इति च ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_lines = ‘आदित्यस्थं परं विष्णुं ध्यायेदादित्यनामकम् ।¦सप्तरूपं साम चासौ सर्वदा समरूपतः ॥¦सर्वेषां मां प्रतीत्येव दृष्टिसाम्याच्च साम सः ।¦दृष्टिसाम्यं मण्डलस्य विष्णुस्तस्य च कारणम् ॥ | |||
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| verse_text = तस्मिन्निमानि भूतानि सर्वाण्येवाऽश्रितानि हि ।¦उदयात् पूर्वमेवासौ भवेत् प्रद्युम्ननामकः ॥¦पश्वाधारस्तदात्माऽसौ वासुदेवस्तथोदये ।¦आश्रयश्च नृणां तत्र वराहः सङ्गवे तु सः ॥¦तत्र पक्ष्याश्रयो विष्णुस्तथा नारायणाभिधः ।¦मध्यन्दिने स आधारो देवानां च ततः परम् ॥¦अनिरुद्धस्स आधारो गर्भस्थानां सदैव हि ।¦ततः परं नृसिंहाख्यः स आरण्याश्रयो मतः ॥¦अथास्तमितवेलायां स सङ्कर्षण ईरितः(इतीरितः) ।¦आश्रयः स पितॄणां च सप्तात्मकमुपास्य तम्(सप्तात्मकमुदाहृतम्) ॥¦प्राप्नोति परमं स्थानं मुक्तः संसारसागरात् ॥’ इति च ॥¦हिङ्कारनामानमाश्रितत्वाद्धिङ्कुर्वन्ति । (प्रस्तावाश्रयत्वात्)प्रस्तावाश्रयात् <span class="gr-moola">प्रस्तुतिकामाः</span>= प्रारम्भकामाः प्रशंसाकामाश्च । प्रारम्भावतारत्वात् प्रशंसादेवतात्वाच्च तस्य ।¦सर्वाधारत्वाद् वराहस्य तदाधाराणां पक्षिणाम् अनाधारेणैव गमनम् । नारायणनामार्थत्वेन सर्वगुणपूर्त्योपासनात्(उपासनादेव) सर्वोत्तमा देवाः । इतरमूर्तीनामपि सर्वगुणपूर्त्योपासने(उपासनेन) नारायणोपासनमेव भवति । सर्वगुणपूर्त्यर्थत्वान्नारायणशब्दस्य ।¦अनिरुद्धाश्रयत्वाद् गर्भाणां पितुः शरीरादन्यत्र प्रतिहृता अपि न विनश्यन्ति । वर्धन्ते च तत्रैव । अन्यद्धि भुक्तं जीर्यत एव । ‘धाता गर्भं दधातु ते’(ऋ.सं.१०.१८४.१) इति च श्रुतिः । धाता हि भगवाननिरुद्धः । विष्णुस्त्वष्टा प्रजापतिर्धाता इति च चतुर्मूर्तयो ह्युच्यन्ते ।¦‘योनिक्लृप्तिर्वासुदेवाद् रूपं सङ्कर्षणाद्भवेत् ।¦आसेककर्मा प्रद्युम्नाद् अनिरुद्धाच्च धारणम् ॥’ इति च ।¦‘व्याप्तेर्विष्णुर्वासुदेवस्त्वष्टा त्वेषाद् द्वितीयकः।¦प्रजापतिः प्रजापातान्निषेकः पातनं ततः ॥¦प्रजापतिस्तु प्रद्युम्नो धाता धारणकर्मतः।¦अनिरुद्ध इति प्रोक्तः कृष्णरामौ तथाश्विनौ ॥’ इति च ।¦‘कक्षश्वभ्रे नृसिंहस्य सदाऽवस्थितिकारणात् ।¦द्रवन्ति कक्षश्वभ्राभ्यां तदज्ञानेऽपि रक्षणात् ॥¦मृगा भीता यतस्तेषां नृसिंहस्त्वाश्रयः(नृसिंहः स्वाश्रयः .हृ) सदा ।¦पितॄणामाश्रयो यस्मात् सङ्कर्षण उदाहृतः ॥¦अतस्तान् प्रति पिण्डादीन् निदधत्यज्ञका अपि ।¦अन्यथा तन्मृतानां तु कुत एवोपतिष्ठति ॥’ इति च ।¦न रूपाणां विशेषोऽस्ति गुणतो नामतोऽपि वा ।¦तथाऽपि तत् प्रियं नाम नारायण इति स्म ह ॥¦विशेषतः समस्तानां नाम्नां तस्यार्थ एव तु ।¦विज्ञायते गुणैः पूर्तिर्नामसाम्यं तदाऽथवा (तदा तथा .हृ) ॥’ इति च ।¦‘नाम्नो नारायणाख्यस्य गुणैः पूर्तिं हि देवताः ।¦विज्ञायार्थमुपास्यैव सर्वाधिक्यमथापिरे(अवापिरे)॥’ इति च ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_type = bhashya | |||
| verse_text = ‘यस्यान्यः सदृशो नास्ति स्वरूपाणि समानि च ।¦स आत्मसंमितो विष्णुरतिमृत्युरमृत्युतः ॥¦प्रद्युम्नादिस्वरूपेण स विष्णुः सप्तधा स्थितः ।¦समानि तानि सर्वाणि ज्ञानानन्दबलैस्तथा ॥¦ज्ञानादित्रयवाचीनि त्र्यक्षराण्यपि सर्वशः ।¦हिङ्कारादीनि नामानि सर्वेषामपि सर्वशः ॥¦आदिनाम्नः प्रकारस्तु योज्यः स्यात् प्रतिहारतः ।¦तेन त्र्यक्षरमेव स्यान्नामद्वयमपि प्रभोः ॥¦उपद्रवे तु वःकारो यद्यपि व्यतिरिच्यते ।¦नाम नारायणस्यैव सोऽपि क्षीराब्धिशायिनः ॥¦व्यञ्जनस्वरसर्गैस्तु सोऽपि ज्ञानादिवाचकः ।¦त्रिवर्णत्वात् समः सोऽपि ज्ञानाद्यैः पुरुषोत्तमः ॥ | |||
| verse_lines = ‘यस्यान्यः सदृशो नास्ति स्वरूपाणि समानि च ।¦स आत्मसंमितो विष्णुरतिमृत्युरमृत्युतः ॥¦प्रद्युम्नादिस्वरूपेण स विष्णुः सप्तधा स्थितः ।¦समानि तानि सर्वाणि ज्ञानानन्दबलैस्तथा ॥¦ज्ञानादित्रयवाचीनि त्र्यक्षराण्यपि सर्वशः ।¦हिङ्कारादीनि नामानि सर्वेषामपि सर्वशः ॥¦आदिनाम्नः प्रकारस्तु योज्यः स्यात् प्रतिहारतः ।¦तेन त्र्यक्षरमेव स्यान्नामद्वयमपि प्रभोः ॥¦उपद्रवे तु वःकारो यद्यपि व्यतिरिच्यते ।¦नाम नारायणस्यैव सोऽपि क्षीराब्धिशायिनः ॥¦व्यञ्जनस्वरसर्गैस्तु सोऽपि ज्ञानादिवाचकः ।¦त्रिवर्णत्वात् समः सोऽपि ज्ञानाद्यैः पुरुषोत्तमः ॥ | |||
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| verse_id = CHU_CO2_S10_V05_B01 | |||
| verse_type = bhashya | |||
| verse_text = वःकारार्थपरिज्ञानात् प्राप्योऽब्धिशयनः प्रभुः ।¦एकविंशार्णविज्ञानात् प्राप्योऽसौ सूर्यमण्डले ॥¦हिङ्काराद्यक्षरप्रतिपाद्यानि भगवतो द्वाविंशद्रूपाणि¦स एव भगवान् विष्णुर्द्वाविंशद्रूपवान् यतः ।¦तान्येव सप्तरूपाणि विभिद्यन्ते त्रिधा त्रिधा ॥¦एकः पयोऽब्धिशयन इति द्वाविंशतिः प्रभोः ।¦प्रद्युम्नाद्यास्तु चत्वारो द्विषण्मासेषु संस्थिताः ॥¦त्रिशस्त्रिशः केशवाद्या वसन्तादिषु पञ्चमः ।¦रूपद्वयं च(तु) षष्ठस्य स्थितं मत्स्यादिपञ्चकम् ॥¦तृतीयं पृथिवीसंस्थं जामदग्न्याख्यमेव तत् ।¦अन्तरिक्षद्युसूर्येषु सप्तमस्य(सत्यमस्य) त्रिधा तनुः(त्रिधात्मनः) ॥¦रामः कृष्णः कल्किरिति तज्ज्ञानात् तान्यवाप्य च ।¦द्वाविंशेन पयोब्धिस्थं प्राप्यते रूपमक्षरम् ॥¦एतद् द्वाविंशकं रूपं नाकं चासुखवर्जनात् ।¦पूर्णानन्दस्वरूपत्वाद् विशोकं शोकनाशनात् ॥’ इति सामसंहितायाम् । | |||
| verse_lines = वःकारार्थपरिज्ञानात् प्राप्योऽब्धिशयनः प्रभुः ।¦एकविंशार्णविज्ञानात् प्राप्योऽसौ सूर्यमण्डले ॥¦हिङ्काराद्यक्षरप्रतिपाद्यानि भगवतो द्वाविंशद्रूपाणि¦स एव भगवान् विष्णुर्द्वाविंशद्रूपवान् यतः ।¦तान्येव सप्तरूपाणि विभिद्यन्ते त्रिधा त्रिधा ॥¦एकः पयोऽब्धिशयन इति द्वाविंशतिः प्रभोः ।¦प्रद्युम्नाद्यास्तु चत्वारो द्विषण्मासेषु संस्थिताः ॥¦त्रिशस्त्रिशः केशवाद्या वसन्तादिषु पञ्चमः ।¦रूपद्वयं च(तु) षष्ठस्य स्थितं मत्स्यादिपञ्चकम् ॥¦तृतीयं पृथिवीसंस्थं जामदग्न्याख्यमेव तत् ।¦अन्तरिक्षद्युसूर्येषु सप्तमस्य(सत्यमस्य) त्रिधा तनुः(त्रिधात्मनः) ॥¦रामः कृष्णः कल्किरिति तज्ज्ञानात् तान्यवाप्य च ।¦द्वाविंशेन पयोब्धिस्थं प्राप्यते रूपमक्षरम् ॥¦एतद् द्वाविंशकं रूपं नाकं चासुखवर्जनात् ।¦पूर्णानन्दस्वरूपत्वाद् विशोकं शोकनाशनात् ॥’ इति सामसंहितायाम् । | |||
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| verse_id = CHU_CO2_S10_V06_B01 | |||
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| verse_text = (आप्नोतीह)<span class="gr-moola">प्राप्नोतीहाऽदित्यस्य जयम्</span> । <span class="gr-moola">इह</span> पृथिव्यादिषु स्थितभगवत्प्राप्तावप्यादित्यस्थ एव प्राप्यते । ऐक्यात् । परो <span class="gr-moola">हास्यादित्यजयाज्जयो भवति</span>। आदित्यस्थस्यादित्यनाम्नो भगवतः प्राप्त्या <span class="gr-moola">परो जयः</span> रूपान्तर प्राप्तिरपि भवति ।¦‘स्वरूपमेकं प्राप्तस्तु विष्णोः स्यात् सर्वरूपगः ।¦ऐक्यात् तथापि सम्प्राप्तिर्बहूपास्त्या सुखाधिका(सुखाधिकी) ॥’ इति च ।¦जयो नाम प्राप्तिरेव । ‘धनजिते स्वर्जिते सत्राजिते’ इत्यादिवत् । केशवादिरूपेण ललाटादिषु स्थितेरित एकविंश इत्युच्यते ।¦‘चित्रादियोगदातृत्वान्मासनामा स्वयं हरिः ।¦लोकः प्रकाशरूपत्वाद् आदित्यश्चादनादपाम्॥’ इति च ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = (आप्नोतीह)<span class="gr-moola">प्राप्नोतीहाऽदित्यस्य जयम्</span> । <span class="gr-moola">इह</span> पृथिव्यादिषु स्थितभगवत्प्राप्तावप्यादित्यस्थ एव प्राप्यते । ऐक्यात् । परो <span class="gr-moola">हास्यादित्यजयाज्जयो भवति</span>। आदित्यस्थस्यादित्यनाम्नो भगवतः प्राप्त्या <span class="gr-moola">परो जयः</span> रूपान्तर प्राप्तिरपि भवति ।¦‘स्वरूपमेकं प्राप्तस्तु विष्णोः स्यात् सर्वरूपगः ।¦ऐक्यात् तथापि सम्प्राप्तिर्बहूपास्त्या सुखाधिका(सुखाधिकी) ॥’ इति च ।¦जयो नाम प्राप्तिरेव । ‘धनजिते स्वर्जिते सत्राजिते’ इत्यादिवत् । केशवादिरूपेण ललाटादिषु स्थितेरित एकविंश इत्युच्यते ।¦‘चित्रादियोगदातृत्वान्मासनामा स्वयं हरिः ।¦लोकः प्रकाशरूपत्वाद् आदित्यश्चादनादपाम्॥’ इति च ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = ‘प्राणसंस्थे हरौ(प्राणसंस्थहरौ) प्रोतं गायत्रं साम सर्वदा ।¦तद्वाचकं नियम्यं चेत्यतः प्रोतमितीर्यते ॥¦प्राणस्थविष्णोः सामीप्यात् तत्स्थमेतदितीर्यते ।¦क्वचिन्निर्देशसामीप्याद् विष्णोरेतदितीर्यते॥’ इति च ।¦‘प्राणस्थविष्णुलाल्यत्वात् (विष्णुलाळ्यत्वात्) प्राणीत्येवाभिधीयते।¦मोक्षस्तु सर्वमायुस्तु स्यान्नित्यत्वाज्ज्योक् समस्तवित्॥’ इति च ॥ ११ ॥ | |||
| verse_lines = ‘प्राणसंस्थे हरौ(प्राणसंस्थहरौ) प्रोतं गायत्रं साम सर्वदा ।¦तद्वाचकं नियम्यं चेत्यतः प्रोतमितीर्यते ॥¦प्राणस्थविष्णोः सामीप्यात् तत्स्थमेतदितीर्यते ।¦क्वचिन्निर्देशसामीप्याद् विष्णोरेतदितीर्यते॥’ इति च ।¦‘प्राणस्थविष्णुलाल्यत्वात् (विष्णुलाळ्यत्वात्) प्राणीत्येवाभिधीयते।¦मोक्षस्तु सर्वमायुस्तु स्यान्नित्यत्वाज्ज्योक् समस्तवित्॥’ इति च ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = ‘मन्थनादिस्थितं यस्तु (यत्तु) तन्नामानं हरिं परम् ।¦तत्तत्क्रियैकहेतुत्वाद्योऽग्नौ ध्यायेज्जनार्दनम् ॥¦रथन्तराश्रयं पञ्चरूपं स च विमुच्यते ॥’ इति च ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = ‘मन्थनादिस्थितं यस्तु (यत्तु) तन्नामानं हरिं परम् ।¦तत्तत्क्रियैकहेतुत्वाद्योऽग्नौ ध्यायेज्जनार्दनम् ॥¦रथन्तराश्रयं पञ्चरूपं स च विमुच्यते ॥’ इति च ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = ‘मिथुनस्थं पञ्चरूपं’(मिथुनस्थपञ्चरूपं) ध्यात्वैव पुरुषोत्तमम् ।¦अत्यागी च स्वभार्याणां मुच्यते नात्र संशयः ॥’ इति च ।¦मिथो नयतीति मिथुनं भगवान् ॥ १३ ॥ | |||
| verse_lines = ‘मिथुनस्थं पञ्चरूपं’(मिथुनस्थपञ्चरूपं) ध्यात्वैव पुरुषोत्तमम् ।¦अत्यागी च स्वभार्याणां मुच्यते नात्र संशयः ॥’ इति च ।¦मिथो नयतीति मिथुनं भगवान् ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_text = ‘आदित्यनाम्नि पञ्चात्मन्यभिध्याते जनार्दने ।¦पर्जन्यनाम्नि चर्त्वाख्ये लोकाख्ये पशुसञ्ज्ञके ॥¦अङ्गाख्ये देवताख्ये च सर्वाख्ये च प्रतिष्ठितम् ।¦बृहदाद्यं च यो वेद मुच्यते नात्र संशयः ॥ | |||
| verse_lines = ‘आदित्यनाम्नि पञ्चात्मन्यभिध्याते जनार्दने ।¦पर्जन्यनाम्नि चर्त्वाख्ये लोकाख्ये पशुसञ्ज्ञके ॥¦अङ्गाख्ये देवताख्ये च सर्वाख्ये च प्रतिष्ठितम् ।¦बृहदाद्यं च यो वेद मुच्यते नात्र संशयः ॥ | |||
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| verse_text = समुद्रेकात् समुद्रस्तु देशनाद् दिश उच्यते ।¦लोपकत्वाल्लोम च स्यात् तवोरूपस्त्वगुच्यते ॥¦मादनात् साररूपत्वात् मांसोऽस्थि त्वासनात् स्थिरम् ।¦मदस्य जननान्मज्जा सोऽङ्गम् अन्तिगतत्वतः ॥¦वायुर्ज्ञानात् तथाऽऽयुष्ट्वान्नक्षत्रं च स्वतन्त्रतः ।¦चन्द्रमाः परमानन्दात् त्रैविद्यो ज्ञानरूपतः ॥¦वयांसि व्ययनाच्चैव वीत्याकाशस्तथोच्यते ।¦तत्रायनाद् वयः प्रोक्तो मरीचिर्मितरुक्त्वतः ॥¦सर्पः सर्पणहेतुत्वाद् गन्धर्वो गोधरत्वतः ।¦पिता स सृष्टिहेतुत्वात् सर्वं पूर्णगुणत्वतः ॥¦एतैर्नामभिरुद्दिष्टो भगवान् पुरुषोत्तमः ॥’ इति च । | |||
| verse_lines = समुद्रेकात् समुद्रस्तु देशनाद् दिश उच्यते ।¦लोपकत्वाल्लोम च स्यात् तवोरूपस्त्वगुच्यते ॥¦मादनात् साररूपत्वात् मांसोऽस्थि त्वासनात् स्थिरम् ।¦मदस्य जननान्मज्जा सोऽङ्गम् अन्तिगतत्वतः ॥¦वायुर्ज्ञानात् तथाऽऽयुष्ट्वान्नक्षत्रं च स्वतन्त्रतः ।¦चन्द्रमाः परमानन्दात् त्रैविद्यो ज्ञानरूपतः ॥¦वयांसि व्ययनाच्चैव वीत्याकाशस्तथोच्यते ।¦तत्रायनाद् वयः प्रोक्तो मरीचिर्मितरुक्त्वतः ॥¦सर्पः सर्पणहेतुत्वाद् गन्धर्वो गोधरत्वतः ।¦पिता स सृष्टिहेतुत्वात् सर्वं पूर्णगुणत्वतः ॥¦एतैर्नामभिरुद्दिष्टो भगवान् पुरुषोत्तमः ॥’ इति च । | |||
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| verse_text = ‘यादृश्येवोन्नतिर्योग्या तस्याः सर्वात्मनाऽऽयतिः ।¦सर्वभावस्तु विज्ञेयो न तु सर्वस्वरूपता ॥’ इति च ।¦न च सर्वस्वरूपता पुरुषार्थः । नारकित्वादेरपि(नरकित्वादेरपि) प्राप्तेः । न चार्थान्तरकल्पना युक्ता । प्रमाणाभावात् ।¦‘असनान्मितिरूपत्वाद् अस्मीत्युक्तः परो हरिः ।¦तं सर्व इत्युपासीत पूर्णता सर्वता स्मृता ॥’ इति च ।¦सर्वमस्मीत्युत्तमपुरुषत्वे ‘तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति’इति ज्यायःपरशब्दौ व्यर्थौ । अन्यस्यैवाभावात् ।¦अतस्ततोऽन्यदस्तीति सिद्धम् । अतस्ततोऽन्यत् परमज्याय एव नास्ति । ज्यायो लक्ष्मीर्विद्यते । परमज्यायस्तु भगवानेव । | |||
| verse_lines = ‘यादृश्येवोन्नतिर्योग्या तस्याः सर्वात्मनाऽऽयतिः ।¦सर्वभावस्तु विज्ञेयो न तु सर्वस्वरूपता ॥’ इति च ।¦न च सर्वस्वरूपता पुरुषार्थः । नारकित्वादेरपि(नरकित्वादेरपि) प्राप्तेः । न चार्थान्तरकल्पना युक्ता । प्रमाणाभावात् ।¦‘असनान्मितिरूपत्वाद् अस्मीत्युक्तः परो हरिः ।¦तं सर्व इत्युपासीत पूर्णता सर्वता स्मृता ॥’ इति च ।¦सर्वमस्मीत्युत्तमपुरुषत्वे ‘तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति’इति ज्यायःपरशब्दौ व्यर्थौ । अन्यस्यैवाभावात् ।¦अतस्ततोऽन्यदस्तीति सिद्धम् । अतस्ततोऽन्यत् परमज्याय एव नास्ति । ज्यायो लक्ष्मीर्विद्यते । परमज्यायस्तु भगवानेव । | |||
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| verse_text = जीवैक्याङ्गीकारे <span class="gr-moola">यस्तद्वेद</span> इति तच्छब्दोऽप्ययुक्तः । तदा ‘स्वात्मानं वेद’ इत्येव स्यात् । न च प्रसिद्धभेदानुवादः(प्रसिद्धभेदस्यानुवादः .हृ) । श्रुतिं विना तत्स्वरूपस्यैवासिद्धेः, तद्भेदस्यातिशयेनासिद्धिः । ऐक्य ईश्वरस्य स्वज्ञानमस्तीति न तद्रूपस्य जीवस्याज्ञानादिकं युज्यते । औपाधिकभेदाङ्गीकारेऽप्युपाधिरुभयोरैक्याद् उभयोरप्यज्ञत्वं कुर्यात् । उपाधिनिमित्तदोषाश्चोभयोरपि स्युः । उपाधिसम्बन्धस्य समत्वात् । उपाधिसम्बन्धस्यास्मिन्नन्यथा तस्मिन्नन्यथेति विशेषार्थम् अयम् असाविति भेदस्योपाधिं विना स्वत एवापेक्षितत्वात् । अतः स्वतो भिन्नस्यैवोपाधिना विशेषो भवति । | |||
| verse_lines = जीवैक्याङ्गीकारे <span class="gr-moola">यस्तद्वेद</span> इति तच्छब्दोऽप्ययुक्तः । तदा ‘स्वात्मानं वेद’ इत्येव स्यात् । न च प्रसिद्धभेदानुवादः(प्रसिद्धभेदस्यानुवादः .हृ) । श्रुतिं विना तत्स्वरूपस्यैवासिद्धेः, तद्भेदस्यातिशयेनासिद्धिः । ऐक्य ईश्वरस्य स्वज्ञानमस्तीति न तद्रूपस्य जीवस्याज्ञानादिकं युज्यते । औपाधिकभेदाङ्गीकारेऽप्युपाधिरुभयोरैक्याद् उभयोरप्यज्ञत्वं कुर्यात् । उपाधिनिमित्तदोषाश्चोभयोरपि स्युः । उपाधिसम्बन्धस्य समत्वात् । उपाधिसम्बन्धस्यास्मिन्नन्यथा तस्मिन्नन्यथेति विशेषार्थम् अयम् असाविति भेदस्योपाधिं विना स्वत एवापेक्षितत्वात् । अतः स्वतो भिन्नस्यैवोपाधिना विशेषो भवति । | |||
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| verse_text = यस्तु भिन्नः स्वतः खादिस्तस्य भेदो ह्यबुद्धिनाम् ।¦उपाधिभिर्ज्ञाप्य एव न तु भेदं स्वयं सृजेत् ॥¦उपाधिरप्यभिन्नस्य भेदं साधयितुं क्वचित् ।¦न क्षमः सिद्धभेदस्य ज्ञापकः स्यादबुद्धिनाम् ॥¦आकाशा अप्यतस्त्वेते अनन्ता अप्कणादिवत् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।¦अतो न जीवेशाभेदः ।¦‘न तु देवः स्वयं भूत्वा देवदेवं समर्चयेत् ।¦समानव्यवहारे हि न पूज्यः पूजको भवेत् ॥’ इति च परमसंहितायाम् ।(इति परमसंहितायाम्) | |||
| verse_lines = यस्तु भिन्नः स्वतः खादिस्तस्य भेदो ह्यबुद्धिनाम् ।¦उपाधिभिर्ज्ञाप्य एव न तु भेदं स्वयं सृजेत् ॥¦उपाधिरप्यभिन्नस्य भेदं साधयितुं क्वचित् ।¦न क्षमः सिद्धभेदस्य ज्ञापकः स्यादबुद्धिनाम् ॥¦आकाशा अप्यतस्त्वेते अनन्ता अप्कणादिवत् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।¦अतो न जीवेशाभेदः ।¦‘न तु देवः स्वयं भूत्वा देवदेवं समर्चयेत् ।¦समानव्यवहारे हि न पूज्यः पूजको भवेत् ॥’ इति च परमसंहितायाम् ।(इति परमसंहितायाम्) | |||
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| verse_text = जीवब्रह्मैक्यस्य प्रमाणविरुद्धतोपपादनम्¦‘अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यम् अणुप्रमाणात्, प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।’¦‘अन्यदेव तद् विदिताद् अथो अविदिताद् अधि ।’¦‘अन्यत्र धर्माद् अन्यत्राधर्माद् अन्यत्रास्मात् कृताकृतात् ।¦अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत् तत् पश्यति तद्वद ॥’¦‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्।’¦‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।’¦‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य(अपाश्रित्य) मम साधर्म्यमागताः ।’¦‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।’¦‘आधिपत्यमृते चैव भोगेन विषयेण च ।¦आनन्दादीन् ऋते मुक्ताः सर्वे ते ब्रह्मणः समाः॥’ इत्यादेश्च । | |||
| verse_lines = जीवब्रह्मैक्यस्य प्रमाणविरुद्धतोपपादनम्¦‘अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यम् अणुप्रमाणात्, प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।’¦‘अन्यदेव तद् विदिताद् अथो अविदिताद् अधि ।’¦‘अन्यत्र धर्माद् अन्यत्राधर्माद् अन्यत्रास्मात् कृताकृतात् ।¦अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत् तत् पश्यति तद्वद ॥’¦‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्।’¦‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।’¦‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य(अपाश्रित्य) मम साधर्म्यमागताः ।’¦‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।’¦‘आधिपत्यमृते चैव भोगेन विषयेण च ।¦आनन्दादीन् ऋते मुक्ताः सर्वे ते ब्रह्मणः समाः॥’ इत्यादेश्च । | |||
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| verse_text = सत्यपि अधिष्ठानभेदे भगवद्रूपाणां भेदाभावनिरूपणम्¦‘प्रद्युम्नादीनि रूपाणि त्रीणि त्रीण्येव पञ्च च ।¦ऋगादिस्थानभेदेन नित्याभिन्नानि चेशनात्॥’ इति सामसंहितायाम् । | |||
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| verse_text = भेदस्य मिथ्यात्वनिरासः¦दृष्टवस्तुनो मिथ्यात्वाङ्गीकारे च युक्त्यपेक्षा ; न तु सत्यत्वे ।¦‘दृष्टस्य सत्यतायां तु युक्तिर्वाऽयुक्तिरेव वा ।¦भूषणं तस्य मिथ्यात्वे युक्त्यभावोऽतिदूषणम् ॥¦युक्तिश्च दोष एव स्याद् बलवन्मानवर्जिता ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।¦न च शून्यत्वमिथ्यात्वयोः कश्चिद् विशेषः । तत्प्रमाणाभावात् । अतः सत्य एव भेदः । | |||
| verse_lines = भेदस्य मिथ्यात्वनिरासः¦दृष्टवस्तुनो मिथ्यात्वाङ्गीकारे च युक्त्यपेक्षा ; न तु सत्यत्वे ।¦‘दृष्टस्य सत्यतायां तु युक्तिर्वाऽयुक्तिरेव वा ।¦भूषणं तस्य मिथ्यात्वे युक्त्यभावोऽतिदूषणम् ॥¦युक्तिश्च दोष एव स्याद् बलवन्मानवर्जिता ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।¦न च शून्यत्वमिथ्यात्वयोः कश्चिद् विशेषः । तत्प्रमाणाभावात् । अतः सत्य एव भेदः । | |||
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| verse_type = bhashya | |||
| verse_text = भेदसत्यतायाः प्रामाणिकत्वनिरूपणम्¦न च कदाचित् कस्यापि ‘नासीदस्ति भविष्यति’ इति बुद्ध्यभावे व्यावहारिकसत्यम् इत्यत्रास्माकं विरोधः । तद्भावे च न शून्याद् विशेषः । ‘सत्यमेनमनुविश्वे मदन्ति’ इत्यादिश्रुतेश्च सत्यो भेदः ।¦‘प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।¦मायामात्रमिदं द्वैतम् अद्वैतं परमार्थतः ॥¦विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।¦उपदेशादयं वादोऽज्ञाते द्वैतं न विद्यते ॥’(मा.उ. अ.१.ख.२.श्लो.९-१०) इत्यादिश्रुतेश्च ।¦प्रपञ्चो= भेदो यदि विद्येत= भवेत= उत्पद्येत तर्हि निवर्तेत । अतो न जीवेश्वरादिभेद उत्पद्यते किन्तु? नित्य एव । अतो मायया= भगवत्प्रज्ञानेन(भगवज्ज्ञानेन .हृ) मातं रतं च मात्रम् । भगवान् जानाति रमते चास्मिन् भेद इति । तच्च भगवद्रूपम् अद्वैतम् । परमार्थो भगवान् तद्रूपेणाद्वैतम् । यद् अद्वैतं नामोच्यते तत् परमार्थभगवदपेक्षयेत्यर्थः । स्वगतभेदो भगवति नास्तीत्युक्तम् । न च कल्पनामात्रो भेदः । यदि केनचित् कल्पितो विकल्पस्तथाऽपि निवर्तेत(विनिवर्तेत .हृ) । तस्माद् उपदेशादयमेव वादः । केनापि तत्प्रसादं(तत्प्रसादेन) विनाऽविज्ञातत्वादज्ञातो भगवान् तद्गतो भेदो न विद्यते इति । | |||
| verse_lines = भेदसत्यतायाः प्रामाणिकत्वनिरूपणम्¦न च कदाचित् कस्यापि ‘नासीदस्ति भविष्यति’ इति बुद्ध्यभावे व्यावहारिकसत्यम् इत्यत्रास्माकं विरोधः । तद्भावे च न शून्याद् विशेषः । ‘सत्यमेनमनुविश्वे मदन्ति’ इत्यादिश्रुतेश्च सत्यो भेदः ।¦‘प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।¦मायामात्रमिदं द्वैतम् अद्वैतं परमार्थतः ॥¦विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।¦उपदेशादयं वादोऽज्ञाते द्वैतं न विद्यते ॥’(मा.उ. अ.१.ख.२.श्लो.९-१०) इत्यादिश्रुतेश्च ।¦प्रपञ्चो= भेदो यदि विद्येत= भवेत= उत्पद्येत तर्हि निवर्तेत । अतो न जीवेश्वरादिभेद उत्पद्यते किन्तु? नित्य एव । अतो मायया= भगवत्प्रज्ञानेन(भगवज्ज्ञानेन .हृ) मातं रतं च मात्रम् । भगवान् जानाति रमते चास्मिन् भेद इति । तच्च भगवद्रूपम् अद्वैतम् । परमार्थो भगवान् तद्रूपेणाद्वैतम् । यद् अद्वैतं नामोच्यते तत् परमार्थभगवदपेक्षयेत्यर्थः । स्वगतभेदो भगवति नास्तीत्युक्तम् । न च कल्पनामात्रो भेदः । यदि केनचित् कल्पितो विकल्पस्तथाऽपि निवर्तेत(विनिवर्तेत .हृ) । तस्माद् उपदेशादयमेव वादः । केनापि तत्प्रसादं(तत्प्रसादेन) विनाऽविज्ञातत्वादज्ञातो भगवान् तद्गतो भेदो न विद्यते इति । | |||
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| verse_text = ‘जीवेश्वरगतो जीवेष्वथ जीवजडात्मनोः ।¦जडेशयोर्जडेष्वेवं पञ्चभेदः प्रपञ्चकः ॥¦प्रकृष्टमोक्षहेतुत्वात् तज्ज्ञानं(तज्ज्ञाने .हृ) प्रेति कथ्यते ।¦प्रकृष्टपञ्चकत्वाद्वा प्रपञ्चोऽयं प्रकीर्तितः ॥¦यद्ययं सादिरेव स्यान्निवर्तेत कदाचन ।¦न निवर्तते यतस्तेन नायं सादिर्भवेत् क्वचित् ॥¦मायेति विष्णुविज्ञानं तन्मितत्वाच्च न क्वचित् ।¦भ्रान्तत्वमस्य यद्विष्णोर्नैव भ्रान्तिः कदाचन(कथञ्चन)॥¦रमते चात्र यद्विष्णुर्न हि भ्रान्तौ रमेद्धरिः ।¦परमार्थे हरौ नैव भेदोऽस्ति जडजीववत् ॥¦यद्ययं कल्पितो भेदः कस्मान्नैव निवर्तते ।¦तस्माद् भूतभविष्याख्यभवदाख्यपराभिधाः ॥¦तदन्ये चैक एवास्मिन्नोङ्काराख्ये जनार्दने ।¦अज्ञातनामके तस्मिन्न भेदोऽस्ति कथञ्चन ॥’ इति ब्रह्मतर्के । | |||
| verse_lines = ‘जीवेश्वरगतो जीवेष्वथ जीवजडात्मनोः ।¦जडेशयोर्जडेष्वेवं पञ्चभेदः प्रपञ्चकः ॥¦प्रकृष्टमोक्षहेतुत्वात् तज्ज्ञानं(तज्ज्ञाने .हृ) प्रेति कथ्यते ।¦प्रकृष्टपञ्चकत्वाद्वा प्रपञ्चोऽयं प्रकीर्तितः ॥¦यद्ययं सादिरेव स्यान्निवर्तेत कदाचन ।¦न निवर्तते यतस्तेन नायं सादिर्भवेत् क्वचित् ॥¦मायेति विष्णुविज्ञानं तन्मितत्वाच्च न क्वचित् ।¦भ्रान्तत्वमस्य यद्विष्णोर्नैव भ्रान्तिः कदाचन(कथञ्चन)॥¦रमते चात्र यद्विष्णुर्न हि भ्रान्तौ रमेद्धरिः ।¦परमार्थे हरौ नैव भेदोऽस्ति जडजीववत् ॥¦यद्ययं कल्पितो भेदः कस्मान्नैव निवर्तते ।¦तस्माद् भूतभविष्याख्यभवदाख्यपराभिधाः ॥¦तदन्ये चैक एवास्मिन्नोङ्काराख्ये जनार्दने ।¦अज्ञातनामके तस्मिन्न भेदोऽस्ति कथञ्चन ॥’ इति ब्रह्मतर्के । | |||
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| verse_text = विदिः(विदि) कादाचित्कस्वरूपलाभ इति च धातुः । ‘भिद्येत’इतिवत् ‘विद्येत’ इतिशब्दः । <span class="gr-moola">परमार्थत</span> इति ‘विश्वतश्चक्षुः’इतिवत् सप्तम्यर्थे । परमार्थेद्वैतभाव एवेत्यर्थः । ‘परमार्थः=परमात्माऽद्वैत’ इति प्रथमार्थो वा । न हि ‘विद्यमानं निवर्तते’ इति नियमः । उत्पद्यमानं हि प्रायो निवर्तते । जीवेश्वरप्रकृत्यादिकं बहुलं हि विद्यमानं न निवर्तते । न च ‘कल्पितो विकल्प’ इति पक्षे ‘कल्पितो यदि’ इति ‘यदि’शब्दो युज्यते । न च ‘निवर्तेत न संशयः’, ‘विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि’ इत्यादिनाऽनिष्टापादनरूपः शब्दो युज्यते । कल्पितत्वं चेच्छ्रुतेरभिप्रायः, ‘अविद्यमानोऽयं प्रपञ्चो निवर्तते’(विनिवर्तते) ‘कल्पितो विकल्पो विनिवर्तते’ इत्येव शब्दः स्यात् ; न तु ‘निवर्तेत’ इति । अतः सत्यताविषयमिदं वाक्यम् ।¦‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।’(भ.गी.१६.८), ‘एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः॥’(भ.गी.१६.९) इति निन्दनाच्च ।¦‘विद्यात्मनि भिदाबोधः’, ‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य’ इत्यादिभेदज्ञानस्य प्रशंसनाच्च । अतोऽसनान्मितत्वाच्चास्मीति भगवान्नामैवैतत्॥ २१ ॥ | |||
| verse_lines = विदिः(विदि) कादाचित्कस्वरूपलाभ इति च धातुः । ‘भिद्येत’इतिवत् ‘विद्येत’ इतिशब्दः । <span class="gr-moola">परमार्थत</span> इति ‘विश्वतश्चक्षुः’इतिवत् सप्तम्यर्थे । परमार्थेद्वैतभाव एवेत्यर्थः । ‘परमार्थः=परमात्माऽद्वैत’ इति प्रथमार्थो वा । न हि ‘विद्यमानं निवर्तते’ इति नियमः । उत्पद्यमानं हि प्रायो निवर्तते । जीवेश्वरप्रकृत्यादिकं बहुलं हि विद्यमानं न निवर्तते । न च ‘कल्पितो विकल्प’ इति पक्षे ‘कल्पितो यदि’ इति ‘यदि’शब्दो युज्यते । न च ‘निवर्तेत न संशयः’, ‘विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि’ इत्यादिनाऽनिष्टापादनरूपः शब्दो युज्यते । कल्पितत्वं चेच्छ्रुतेरभिप्रायः, ‘अविद्यमानोऽयं प्रपञ्चो निवर्तते’(विनिवर्तते) ‘कल्पितो विकल्पो विनिवर्तते’ इत्येव शब्दः स्यात् ; न तु ‘निवर्तेत’ इति । अतः सत्यताविषयमिदं वाक्यम् ।¦‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।’(भ.गी.१६.८), ‘एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः॥’(भ.गी.१६.९) इति निन्दनाच्च ।¦‘विद्यात्मनि भिदाबोधः’, ‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य’ इत्यादिभेदज्ञानस्य प्रशंसनाच्च । अतोऽसनान्मितत्वाच्चास्मीति भगवान्नामैवैतत्॥ २१ ॥ | |||
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| verse_text = सर्वदा समत्वात् साम भगवान् । तस्योद्गानप्रकारो <span class="gr-moola">विनर्दि</span> वृषभस्वरवन्मेघनर्दनवद्वा । तदेव <span class="gr-moola">वृणे</span> । सर्वोत्तमत्वात् ।¦‘विष्णोः स्वरो वृषभवन्मेघनादवदेव वा ।¦स्त्रीपशुस्वरवद् वह्नेर्गम्भीरोऽनुपमो विभोः ॥¦ब्रह्मणस्त्वथ सोमस्य साक्षाद् घण्टानिनादवत् ।¦मृदुमेघस्वरो वायोरिन्द्रस्य स्तनयित्नुवत् ॥¦बृहस्पतेः क्रोञ्चवच्च वरुणस्य तु विस्वरः ।¦एकस्य पादवर्षस्य स्वरो विष्णोरुदाहृतः ॥¦वायोर्विंशतिवर्षस्य ब्रह्मणस्तु तदन्तरा ॥’ इति च ।¦‘गायेदेतैः स्वरैस्तस्माद् यथाशक्ति न विस्वरम् । | |||
| verse_lines = सर्वदा समत्वात् साम भगवान् । तस्योद्गानप्रकारो <span class="gr-moola">विनर्दि</span> वृषभस्वरवन्मेघनर्दनवद्वा । तदेव <span class="gr-moola">वृणे</span> । सर्वोत्तमत्वात् ।¦‘विष्णोः स्वरो वृषभवन्मेघनादवदेव वा ।¦स्त्रीपशुस्वरवद् वह्नेर्गम्भीरोऽनुपमो विभोः ॥¦ब्रह्मणस्त्वथ सोमस्य साक्षाद् घण्टानिनादवत् ।¦मृदुमेघस्वरो वायोरिन्द्रस्य स्तनयित्नुवत् ॥¦बृहस्पतेः क्रोञ्चवच्च वरुणस्य तु विस्वरः ।¦एकस्य पादवर्षस्य स्वरो विष्णोरुदाहृतः ॥¦वायोर्विंशतिवर्षस्य ब्रह्मणस्तु तदन्तरा ॥’ इति च ।¦‘गायेदेतैः स्वरैस्तस्माद् यथाशक्ति न विस्वरम् । | |||
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| verse_text = अधिकारी सदौद्गात्रे मुख्यतः प्राण एव यत् ।¦अतो मोक्षादिदाने स देवादीनां क्षमो भवेत् ॥¦अन्येषां स ददातीह मद्धृदिस्थ इति स्मृतिः ।¦कार्या हि नान्यथा कुर्यादवमन्ताऽन्यथा भवेत् ॥¦देवानां मोक्षदानादौ न हि मानुष ईश्वरः ।¦अतः प्राणो हृदिस्थो मे ददातीति स्मृतिर्भवेत् ॥¦सङ्कल्पोक्त्यादिकर्ता च प्राण एव यतः सदा ।¦आगायानीति युज्येत तस्मात् तस्मिन् हि मुख्यतः॥¦आत्मेति भगवान् विष्णुः प्राणस्थः पुरुषोत्तमः।¦तस्मा अन्नं ह्यर्थतस्तु प्राणस्यान्नभुजिर्भवेत् ॥¦प्राणस्याप्यमृतत्वं हि मुख्यमेव फलं यतः ।¦देवान्तर्भावतो विष्णोर्नामृतत्वं क्व चादिमत् ॥ | |||
| verse_lines = अधिकारी सदौद्गात्रे मुख्यतः प्राण एव यत् ।¦अतो मोक्षादिदाने स देवादीनां क्षमो भवेत् ॥¦अन्येषां स ददातीह मद्धृदिस्थ इति स्मृतिः ।¦कार्या हि नान्यथा कुर्यादवमन्ताऽन्यथा भवेत् ॥¦देवानां मोक्षदानादौ न हि मानुष ईश्वरः ।¦अतः प्राणो हृदिस्थो मे ददातीति स्मृतिर्भवेत् ॥¦सङ्कल्पोक्त्यादिकर्ता च प्राण एव यतः सदा ।¦आगायानीति युज्येत तस्मात् तस्मिन् हि मुख्यतः॥¦आत्मेति भगवान् विष्णुः प्राणस्थः पुरुषोत्तमः।¦तस्मा अन्नं ह्यर्थतस्तु प्राणस्यान्नभुजिर्भवेत् ॥¦प्राणस्याप्यमृतत्वं हि मुख्यमेव फलं यतः ।¦देवान्तर्भावतो विष्णोर्नामृतत्वं क्व चादिमत् ॥ | |||
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| verse_text = ‘इन्द्रे बलं ददानीति स्वरान् घोषबलात्मकान् ।¦ब्रूयादग्रस्तानिरस्तानूष्मणः स्पर्शानपि ॥¦समस्तान् बलदानार्थमिन्द्रे चैव प्रजापतेः ।¦विष्णोः स्वात्मानमेवाहमर्पये मृत्युवर्जितम् ॥¦मोक्षयोग्यान् करिष्यामीत्येवं स प्राण एव तु ।¦कुर्यादन्यस्तु मत्स्थस्तु प्राण एवेदृशक्षमः (एवेदृशः क्षमः) ।¦करोतीति स्मरेन्नित्यं नान्यथा तु कथञ्चन ।¦देवावमन्ता हि तमो यात्यसंशयतो यतः ॥¦अत इन्द्रं प्रजापाख्यं विष्णुं मृत्युं च सर्वदा ।¦शरणं गतोऽहमिति च (इतिवत्) ध्यायेत् सर्वत्र सर्वदा ॥¦ऐश्वर्यादिन्द्रनामा तु वायुः स्वरपतिः सदा ।¦ऊष्माधिपस्तु भगवान् विष्णुरेव प्रजापतिः ॥¦मृत्युनामा तु संहाराद् रुद्रः स्पर्शाधिपः स्मृतः ।¦मानुषाणां तु शरणमितरेषां तु वायुतः ॥¦वायोस्तु बलदानाद्यं मोक्षदानादिकं हरेः ।¦यस्माद् वायुपदे योग्या बहवस्त्विन्द्रनामकाः ॥¦अत इन्द्रे ददानीति स्मृतिः प्राणस्य युज्यते ॥’ इति सामसंहितायाम् ॥¦‘सर्वोपद्रवकर्तॄणामसुराणां कुबुद्धिनाम् ।¦उपालम्भे कृते युक्तं विष्णुस्त्वां प्रतिपेक्ष्यति ॥¦रुद्रस्त्वां धक्ष्यतीत्यादि नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति च ।¦मृत्योस्सकाशादात्मानं परिहराणीति ।¦‘ब्रह्मा प्रजापतिश्चेति विष्णुरन्यं प्रबोधयन् ।¦तथेन्द्रनामा वायुश्च परेषां बोधको यदा ॥’ इति च ।¦बृंहयति प्रजाः पाति इदं रातीति व्युत्पत्तिभिः ॥ २२ ॥ | |||
| verse_lines = ‘इन्द्रे बलं ददानीति स्वरान् घोषबलात्मकान् ।¦ब्रूयादग्रस्तानिरस्तानूष्मणः स्पर्शानपि ॥¦समस्तान् बलदानार्थमिन्द्रे चैव प्रजापतेः ।¦विष्णोः स्वात्मानमेवाहमर्पये मृत्युवर्जितम् ॥¦मोक्षयोग्यान् करिष्यामीत्येवं स प्राण एव तु ।¦कुर्यादन्यस्तु मत्स्थस्तु प्राण एवेदृशक्षमः (एवेदृशः क्षमः) ।¦करोतीति स्मरेन्नित्यं नान्यथा तु कथञ्चन ।¦देवावमन्ता हि तमो यात्यसंशयतो यतः ॥¦अत इन्द्रं प्रजापाख्यं विष्णुं मृत्युं च सर्वदा ।¦शरणं गतोऽहमिति च (इतिवत्) ध्यायेत् सर्वत्र सर्वदा ॥¦ऐश्वर्यादिन्द्रनामा तु वायुः स्वरपतिः सदा ।¦ऊष्माधिपस्तु भगवान् विष्णुरेव प्रजापतिः ॥¦मृत्युनामा तु संहाराद् रुद्रः स्पर्शाधिपः स्मृतः ।¦मानुषाणां तु शरणमितरेषां तु वायुतः ॥¦वायोस्तु बलदानाद्यं मोक्षदानादिकं हरेः ।¦यस्माद् वायुपदे योग्या बहवस्त्विन्द्रनामकाः ॥¦अत इन्द्रे ददानीति स्मृतिः प्राणस्य युज्यते ॥’ इति सामसंहितायाम् ॥¦‘सर्वोपद्रवकर्तॄणामसुराणां कुबुद्धिनाम् ।¦उपालम्भे कृते युक्तं विष्णुस्त्वां प्रतिपेक्ष्यति ॥¦रुद्रस्त्वां धक्ष्यतीत्यादि नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति च ।¦मृत्योस्सकाशादात्मानं परिहराणीति ।¦‘ब्रह्मा प्रजापतिश्चेति विष्णुरन्यं प्रबोधयन् ।¦तथेन्द्रनामा वायुश्च परेषां बोधको यदा ॥’ इति च ।¦बृंहयति प्रजाः पाति इदं रातीति व्युत्पत्तिभिः ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_text = ‘ओङ्कारो ब्रह्मणो नाम सर्ववागात्मकश्च सः ।¦तद्व्याख्यात्वात्(व्याख्यानत्वात्) सर्ववाचां सर्ववागात्मता भवेत् ।¦इदं तु प्रस्तुतत्वात् स सर्वं चाप्यर्थपूर्णतः ।¦सर्वशब्दान्वितत्वाच्च न लिङ्गव्यत्ययो भवेत् ।¦आधिक्यं चैव सर्वत्वं प्रस्तुतं तद् यथेति तत् ॥’ इति च ।¦‘अकाराद्याः क्रमेणैव भूरादेः साररूपिणः ।¦अस्मादयं सार इति ज्ञानमेवाभितापनम् ॥¦सम्प्रस्रावश्च तद्दृष्टिर्ब्रह्मणः परमस्य हि ।¦नित्यज्ञानोऽपि भगवान् क्रीडयाऽचीक्लृपद् यदा ॥¦तदाभितापशब्दोऽयं वर्तते परमात्मनि ॥’ इति च । | |||
| verse_lines = ‘ओङ्कारो ब्रह्मणो नाम सर्ववागात्मकश्च सः ।¦तद्व्याख्यात्वात्(व्याख्यानत्वात्) सर्ववाचां सर्ववागात्मता भवेत् ।¦इदं तु प्रस्तुतत्वात् स सर्वं चाप्यर्थपूर्णतः ।¦सर्वशब्दान्वितत्वाच्च न लिङ्गव्यत्ययो भवेत् ।¦आधिक्यं चैव सर्वत्वं प्रस्तुतं तद् यथेति तत् ॥’ इति च ।¦‘अकाराद्याः क्रमेणैव भूरादेः साररूपिणः ।¦अस्मादयं सार इति ज्ञानमेवाभितापनम् ॥¦सम्प्रस्रावश्च तद्दृष्टिर्ब्रह्मणः परमस्य हि ।¦नित्यज्ञानोऽपि भगवान् क्रीडयाऽचीक्लृपद् यदा ॥¦तदाभितापशब्दोऽयं वर्तते परमात्मनि ॥’ इति च । | |||
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| verse_lines = तपःशब्देनैव यतिधर्मश्चोक्तः ।¦‘सर्वेषामाश्रमस्थानामज्ञानां पुण्यलोकता ।¦अपरोक्षदृशां विष्णोरमृतत्वं न चान्यथा ॥’ इति च ।¦‘यज्ञाध्ययनदानैस्तु गृही स्यात् सोमलोकगः ।¦यतयस्तपसा सूर्यं चत्वारोऽपि विशेषतः ।¦गच्छन्ति तपसैवर्षीन् वनस्था ब्रह्मचारिणः ॥¦नैष्ठिका वालखिल्यांश्च गुरुशुश्रुषयैव तु ।¦यदि पश्यन्त्येत एव साक्षादेव जनार्दनम् ।¦अमृतत्वं तदा यान्ति नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति च । | |||
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| verse_text = न च संन्यासमात्रेणामृतत्वम् । ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति श्रुतेः ।¦‘विद्यैव तु निर्धारणात्’(ब्र.सू.३.३.४८) इति च भगवद्वचनम् (इति भगवद्वचनम्) ।¦‘न रोधयति मां धर्मो न साङ्ख्यं योग उद्धव ।¦न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा ॥’ इत्यादि च (इति च) ।¦‘न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति’(भ.गी.३.८) इति च । ‘तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति’ इत्यादेर्गृहस्थादीनामपि ज्ञानिनां मोक्षः प्रतीयते ।¦‘सर्ववर्णाश्रमाणां च ज्ञानान्मोक्षो विनिश्चितः ।¦अन्त्यानां स्थावराणां वा तथापि यतिरुत्तमः ।¦ज्ञानद्वारो यतो न्यासो विशेषेण भविष्यति ॥’ इति च ।¦‘वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः सन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः।’ इति च ॥ २३ ॥ | |||
| verse_lines = न च संन्यासमात्रेणामृतत्वम् । ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति श्रुतेः ।¦‘विद्यैव तु निर्धारणात्’(ब्र.सू.३.३.४८) इति च भगवद्वचनम् (इति भगवद्वचनम्) ।¦‘न रोधयति मां धर्मो न साङ्ख्यं योग उद्धव ।¦न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा ॥’ इत्यादि च (इति च) ।¦‘न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति’(भ.गी.३.८) इति च । ‘तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति’ इत्यादेर्गृहस्थादीनामपि ज्ञानिनां मोक्षः प्रतीयते ।¦‘सर्ववर्णाश्रमाणां च ज्ञानान्मोक्षो विनिश्चितः ।¦अन्त्यानां स्थावराणां वा तथापि यतिरुत्तमः ।¦ज्ञानद्वारो यतो न्यासो विशेषेण भविष्यति ॥’ इति च ।¦‘वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः सन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः।’ इति च ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_text = ‘वसुरुद्रादितेयेषु विश्वेषु स्थितमीश्वरम् ।¦तन्नामानं हरिं मन्त्रैर्लोकद्वारादिभिः प्रभुम् ॥¦प्रार्थयित्वा दिवं त्वज्ञो ज्ञो मोक्षं प्राप्नुयात् तथा ।¦यजमानो नान्यथा तु लोकोऽस्य प्राप्यते वरः ॥¦राजनं पृथिवीलोके राज्यमित्युच्यते बुधैः ।¦विराज्यमन्तरिक्षे तु स्वाराज्यं स्वर्गगं भवेत् ॥¦एतेषु मोक्षोऽपि भवेन्मानुषाणां विशेषिणाम् ।¦श्वेतद्वीपं तथा गत्वा दृष्ट्वा विष्णुं च ते ततः ॥¦अनुज्ञाताः प्रमोदन्ते निर्दुःखास्तु धरादिषु ॥’ इति च । | |||
| verse_lines = ‘वसुरुद्रादितेयेषु विश्वेषु स्थितमीश्वरम् ।¦तन्नामानं हरिं मन्त्रैर्लोकद्वारादिभिः प्रभुम् ॥¦प्रार्थयित्वा दिवं त्वज्ञो ज्ञो मोक्षं प्राप्नुयात् तथा ।¦यजमानो नान्यथा तु लोकोऽस्य प्राप्यते वरः ॥¦राजनं पृथिवीलोके राज्यमित्युच्यते बुधैः ।¦विराज्यमन्तरिक्षे तु स्वाराज्यं स्वर्गगं भवेत् ॥¦एतेषु मोक्षोऽपि भवेन्मानुषाणां विशेषिणाम् ।¦श्वेतद्वीपं तथा गत्वा दृष्ट्वा विष्णुं च ते ततः ॥¦अनुज्ञाताः प्रमोदन्ते निर्दुःखास्तु धरादिषु ॥’ इति च । | |||
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| verse_id = CHU_CO2_S24_V04_B02 | |||
| verse_type = bhashya | |||
| verse_text = ‘यो देवानां नामधा एक एव’ इति श्रुतेश्च भगवत एव वस्वादिनामानि । ‘त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते’(भ.गी.९.२०) इति वचनाच्च भगवानेव प्रार्थ्यः । भगवत्स्वरूपस्य सम्यगपरिज्ञानाद् रागाच्च तेषामन्तवत् फलवत्वम् । ‘न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।’(भ.गी.९.२४),‘गतागतं कामकामा लभन्ते’ इति वचनात् ।¦‘सर्वोत्तमत्वस्याज्ञानाद् विष्णोरन्धन्तमो भवेत् ॥¦तद्द्वेषात् किमु वक्तव्यं ब्रह्मादिद्वेषतोऽपि वा ।¦तारतम्यापरिज्ञानादनुत्थानं तमो भवेत् ।¦अपराधकृतस्तेषां निरयं त्वेव गच्छति ।¦पूजाया अकृतेस्तेषां न वर्णेषु जनिर्भवेत् ॥¦सम्यक्कर्माननुष्ठानात् स्वर्गं नैवोपगच्छति ।¦अपरोक्षदृशेरौन्यान्मोक्षं नैवोपगच्छति ॥’ इति च । | |||
| verse_lines = ‘यो देवानां नामधा एक एव’ इति श्रुतेश्च भगवत एव वस्वादिनामानि । ‘त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते’(भ.गी.९.२०) इति वचनाच्च भगवानेव प्रार्थ्यः । भगवत्स्वरूपस्य सम्यगपरिज्ञानाद् रागाच्च तेषामन्तवत् फलवत्वम् । ‘न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।’(भ.गी.९.२४),‘गतागतं कामकामा लभन्ते’ इति वचनात् ।¦‘सर्वोत्तमत्वस्याज्ञानाद् विष्णोरन्धन्तमो भवेत् ॥¦तद्द्वेषात् किमु वक्तव्यं ब्रह्मादिद्वेषतोऽपि वा ।¦तारतम्यापरिज्ञानादनुत्थानं तमो भवेत् ।¦अपराधकृतस्तेषां निरयं त्वेव गच्छति ।¦पूजाया अकृतेस्तेषां न वर्णेषु जनिर्भवेत् ॥¦सम्यक्कर्माननुष्ठानात् स्वर्गं नैवोपगच्छति ।¦अपरोक्षदृशेरौन्यान्मोक्षं नैवोपगच्छति ॥’ इति च । | |||
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| verse_text = पूर्वपूर्वगुणैर्दोषानशक्ता उत्तरोत्तराः ।¦स्थानद्वयोत्तरे शक्ता मोक्षो नानपरोक्षिणः ॥¦विरुद्धरागिणां नैव ह्यपरोक्षदृशिर्भवेत् ।¦यावद्रागविनाशः स्याद्विरक्तो भक्तिसंयुतः ॥¦सर्वदैवाप्रमत्तश्च पश्येदेव हरिं परम् ।¦अविस्मृतिस्सदा विष्णोरन्यथाज्ञानवर्जनम् ॥¦शास्त्राभ्यासः सदोद्योगाच्छ्रवणाच्च विचारतः ।¦निषिद्धकर्मणां त्यागः स्वधर्मस्य कृतिः सदा ॥¦अप्रमाद इति प्रोक्तः शास्त्रं वेदास्तु पञ्च च ।¦भारतं पञ्चरात्रं च मूलरामायणं तथा ॥¦पुराणं भागवतं चैव पञ्चमो वेद उच्यते ॥’ इति च ॥ | |||
| verse_lines = पूर्वपूर्वगुणैर्दोषानशक्ता उत्तरोत्तराः ।¦स्थानद्वयोत्तरे शक्ता मोक्षो नानपरोक्षिणः ॥¦विरुद्धरागिणां नैव ह्यपरोक्षदृशिर्भवेत् ।¦यावद्रागविनाशः स्याद्विरक्तो भक्तिसंयुतः ॥¦सर्वदैवाप्रमत्तश्च पश्येदेव हरिं परम् ।¦अविस्मृतिस्सदा विष्णोरन्यथाज्ञानवर्जनम् ॥¦शास्त्राभ्यासः सदोद्योगाच्छ्रवणाच्च विचारतः ।¦निषिद्धकर्मणां त्यागः स्वधर्मस्य कृतिः सदा ॥¦अप्रमाद इति प्रोक्तः शास्त्रं वेदास्तु पञ्च च ।¦भारतं पञ्चरात्रं च मूलरामायणं तथा ॥¦पुराणं भागवतं चैव पञ्चमो वेद उच्यते ॥’ इति च ॥ | |||
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| verse_text = ‘य आदित्यगतो विष्णुः स एव मधुनामकः ।¦मदधिर्मध्विति प्रोक्तो मदः सुखमिहोच्यते ॥¦अ इत्याधिक्यमुद्दिष्टं मद् ज्ञानततिरुच्यते ।¦तद्वत्ता ततिरुद्दिष्टा तेनानुभव ईरितः ॥¦अधिकोऽनुभवो यस्य सर्वस्मादीप्सितादपि ।¦सोऽयं मद इति प्रोक्तः सर्वं हि सुखसाधनम् ॥¦तत्पूर्णो मधुनामा स्यात् तृतीयोऽतिशयार्थकः ।¦देवानामुपजीव्यत्वात् स देवमधुनामकः ॥¦आदित्वादाततत्वाच्च(आदित्वाच्च ततत्वाच्च) ज्ञानरूपत्वतस्तथा ।¦आदित्य इति सम्प्रोक्तः प्रसिद्धमधुवच्च सः ॥¦तिरोवंशादिसंयुक्तो द्युनाम्नी च द्युसंस्थिता ।¦प्रकाशादिगुणैः श्रीस्तु वायोराश्रयरूपतः ॥¦तिरोवंश इतिप्रोक्ता मध्वपूपस्तु मारुतः ।¦तस्मिन् सन्निहितो विष्णुर्विशेषेण यतः सदा ॥¦सोऽन्तरिक्षमितिप्रोक्तः स्वान्तस्सम्यग्घरीक्षणात् ।¦अन्तरिक्षस्थितश्चासौ वस्वाद्या मधुकारिणः ॥¦तत्पुत्रास्तु मरीच्याद्याः सूर्यरश्मिषु संस्थिताः ।¦तिर्यक् स्थित्वा वशे कुर्याद् यस्माद् देवी रमा हरिम् ॥¦भक्त्यैवातस्तिरोवंशस्तिर्यक्त्वं प्रणतिः स्मृता ।¦तिर्यक्स्थित्वा स्वसंस्थं तु वशीकुर्याद्यतस्ततः ॥¦वंशस्तिरश्चीनोऽन्योऽपि यस्मिन्नाप्यमुपस्थितम् ।¦सोऽपूप आप्यो भगवान् मध्वाज्यादि प्रसिद्धगम् ॥ | |||
| verse_lines = ‘य आदित्यगतो विष्णुः स एव मधुनामकः ।¦मदधिर्मध्विति प्रोक्तो मदः सुखमिहोच्यते ॥¦अ इत्याधिक्यमुद्दिष्टं मद् ज्ञानततिरुच्यते ।¦तद्वत्ता ततिरुद्दिष्टा तेनानुभव ईरितः ॥¦अधिकोऽनुभवो यस्य सर्वस्मादीप्सितादपि ।¦सोऽयं मद इति प्रोक्तः सर्वं हि सुखसाधनम् ॥¦तत्पूर्णो मधुनामा स्यात् तृतीयोऽतिशयार्थकः ।¦देवानामुपजीव्यत्वात् स देवमधुनामकः ॥¦आदित्वादाततत्वाच्च(आदित्वाच्च ततत्वाच्च) ज्ञानरूपत्वतस्तथा ।¦आदित्य इति सम्प्रोक्तः प्रसिद्धमधुवच्च सः ॥¦तिरोवंशादिसंयुक्तो द्युनाम्नी च द्युसंस्थिता ।¦प्रकाशादिगुणैः श्रीस्तु वायोराश्रयरूपतः ॥¦तिरोवंश इतिप्रोक्ता मध्वपूपस्तु मारुतः ।¦तस्मिन् सन्निहितो विष्णुर्विशेषेण यतः सदा ॥¦सोऽन्तरिक्षमितिप्रोक्तः स्वान्तस्सम्यग्घरीक्षणात् ।¦अन्तरिक्षस्थितश्चासौ वस्वाद्या मधुकारिणः ॥¦तत्पुत्रास्तु मरीच्याद्याः सूर्यरश्मिषु संस्थिताः ।¦तिर्यक् स्थित्वा वशे कुर्याद् यस्माद् देवी रमा हरिम् ॥¦भक्त्यैवातस्तिरोवंशस्तिर्यक्त्वं प्रणतिः स्मृता ।¦तिर्यक्स्थित्वा स्वसंस्थं तु वशीकुर्याद्यतस्ततः ॥¦वंशस्तिरश्चीनोऽन्योऽपि यस्मिन्नाप्यमुपस्थितम् ।¦सोऽपूप आप्यो भगवान् मध्वाज्यादि प्रसिद्धगम् ॥ | |||
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| verse_text = प्राच्यरश्मिषु संस्थस्तु रतिशंमानरूपतः(स्वरतिर्मानरूपतः) ।¦प्राच्यरश्मिरिति प्रोक्तो वासुदेवाभिधो हरिः ॥¦एतद् विना(द्या) नालमिति नाडीत्यंश उदाहृतः ।¦स्वरूपांशैर्विना प्राप्तुं नालं हि प्रापितांशिनम् ॥¦ऋग्वेदमानिनश्चैव वह्न्याद्या वसवस्त्वृचः ।¦अर्च्यत्वात् प्रथमं चैव विशेषाद् ..... ॥ | |||
| verse_lines = प्राच्यरश्मिषु संस्थस्तु रतिशंमानरूपतः(स्वरतिर्मानरूपतः) ।¦प्राच्यरश्मिरिति प्रोक्तो वासुदेवाभिधो हरिः ॥¦एतद् विना(द्या) नालमिति नाडीत्यंश उदाहृतः ।¦स्वरूपांशैर्विना प्राप्तुं नालं हि प्रापितांशिनम् ॥¦ऋग्वेदमानिनश्चैव वह्न्याद्या वसवस्त्वृचः ।¦अर्च्यत्वात् प्रथमं चैव विशेषाद् ..... ॥ | |||
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| verse_text = .....यज्ञदेवताः¦इन्द्राद्या यजुरुद्दिष्टा रुद्रा इन्द्रसखा यतः (इन्द्रसहायतः, इन्द्रसहायत्वतः) ।¦इन्द्रशब्दोदितो वायुः स याज्यः सोमभुक्पुरः ॥¦स हि शङ्करपूर्वाणां रुद्राणां मुख्य एव च । | |||
| verse_lines = .....यज्ञदेवताः¦इन्द्राद्या यजुरुद्दिष्टा रुद्रा इन्द्रसखा यतः (इन्द्रसहायतः, इन्द्रसहायत्वतः) ।¦इन्द्रशब्दोदितो वायुः स याज्यः सोमभुक्पुरः ॥¦स हि शङ्करपूर्वाणां रुद्राणां मुख्य एव च । | |||
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| verse_text = सामनामान आदित्या मासशः समभोगतः ॥¦इन्द्रो वरुण उद्दिष्टो यज्ञेषु व्रियते यतः ।¦आदित्यानामधिपतिः स हि विष्णुनियोजितः ॥¦विष्णुस्तूपास्यरूपत्वान्नोपासकगणे युतः(नोपासकगणैर्युतः) ॥ | |||
| verse_lines = सामनामान आदित्या मासशः समभोगतः ॥¦इन्द्रो वरुण उद्दिष्टो यज्ञेषु व्रियते यतः ।¦आदित्यानामधिपतिः स हि विष्णुनियोजितः ॥¦विष्णुस्तूपास्यरूपत्वान्नोपासकगणे युतः(नोपासकगणैर्युतः) ॥ | |||
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| verse_text = इतिहासपुराणानां सोमाद्या अभिमानिनः ।¦अथर्वाङ्गिरसां चैवाप्यथर्वाङ्गिरनामकाः ॥¦अधरं वर्तयेयुस्ते वृष्टिमङ्गरसास्तथा ।¦मानस्त्वात् प्राणरूपत्वाद् अथर्वाङ्गिरसस्ततः ॥ | |||
| verse_lines = इतिहासपुराणानां सोमाद्या अभिमानिनः ।¦अथर्वाङ्गिरसां चैवाप्यथर्वाङ्गिरनामकाः ॥¦अधरं वर्तयेयुस्ते वृष्टिमङ्गरसास्तथा ।¦मानस्त्वात् प्राणरूपत्वाद् अथर्वाङ्गिरसस्ततः ॥ | |||
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| verse_text = ........संस्थितः सूर्यमण्डले ।¦व्यक्षरद् धर्ममोक्षादीन् देवानां भगवान् हरिः ॥¦ऋक्प्रोक्तो लोहिताकारो वासुदेवः परः पुमान् ।¦स एव सूर्यलोहित्ये प्राच्यरश्मिषु संस्थितः(च स्थितः) ॥¦सङ्कर्षणः शुक्लवर्णो यजुर्वेदोदितः प्रभुः ।¦शुक्ले वर्णे च(शुक्लवर्णेच) सूर्यस्य दक्षरश्मिषु संस्थितः(संस्थितः) ॥¦प्रद्युम्नः श्यामवर्णस्तु सामवेदोदितः प्रभुः।¦प्रत्यग्रश्मिषु सूर्यस्य श्यामवर्णेऽपि च स्थितः ॥¦अनिरुद्धः सुनीलश्च इतिहासपुराणयोः ।¦अथर्ववेदे चोक्तः सन्नुदग्रश्मिषु संस्थितः ॥¦सुकृष्णे सूर्यरूपे च मध्ये नारायणः प्रभुः ।¦ऊर्ध्वरश्मिषु संस्थश्च प्रोद्यदादित्यसप्रभः ॥¦महामरीचिपुञ्जेन चलतीवाचलोऽपि सन् ।¦स वाच्यः सर्ववेदानामेवं पञ्चात्मको हरिः ॥¦वेदानां सारभूतोऽसौ वेदानां नित्यताप्रदः ।¦अतोऽमृतानाममृतो रसानां रस एव च ॥ इति सामसंहितायाम् ॥ | |||
| verse_lines = ........संस्थितः सूर्यमण्डले ।¦व्यक्षरद् धर्ममोक्षादीन् देवानां भगवान् हरिः ॥¦ऋक्प्रोक्तो लोहिताकारो वासुदेवः परः पुमान् ।¦स एव सूर्यलोहित्ये प्राच्यरश्मिषु संस्थितः(च स्थितः) ॥¦सङ्कर्षणः शुक्लवर्णो यजुर्वेदोदितः प्रभुः ।¦शुक्ले वर्णे च(शुक्लवर्णेच) सूर्यस्य दक्षरश्मिषु संस्थितः(संस्थितः) ॥¦प्रद्युम्नः श्यामवर्णस्तु सामवेदोदितः प्रभुः।¦प्रत्यग्रश्मिषु सूर्यस्य श्यामवर्णेऽपि च स्थितः ॥¦अनिरुद्धः सुनीलश्च इतिहासपुराणयोः ।¦अथर्ववेदे चोक्तः सन्नुदग्रश्मिषु संस्थितः ॥¦सुकृष्णे सूर्यरूपे च मध्ये नारायणः प्रभुः ।¦ऊर्ध्वरश्मिषु संस्थश्च प्रोद्यदादित्यसप्रभः ॥¦महामरीचिपुञ्जेन चलतीवाचलोऽपि सन् ।¦स वाच्यः सर्ववेदानामेवं पञ्चात्मको हरिः ॥¦वेदानां सारभूतोऽसौ वेदानां नित्यताप्रदः ।¦अतोऽमृतानाममृतो रसानां रस एव च ॥ इति सामसंहितायाम् ॥ | |||
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| verse_text = न चाचेतनमात्रमुपासितं पुरुषार्थप्रदानशक्तम् । ‘ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात्’(३.११.५) इति वाक्यशेषाच्चैतदवगम्यते । ‘य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद’(३.११.३) इति च । कथं चाचेतनोपासनं ब्रह्मादिपदप्रदं भवति ? ‘न वै तत्र न निम्लोचो(निम्नोचः) नोदियाय कदाचन’(३.११.२), ‘सकृद् दिव हैवास्मै भवति’(३.११.३) इत्यादि च मुक्तस्यैव मुख्यतो युज्यते । | |||
| verse_lines = न चाचेतनमात्रमुपासितं पुरुषार्थप्रदानशक्तम् । ‘ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात्’(३.११.५) इति वाक्यशेषाच्चैतदवगम्यते । ‘य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद’(३.११.३) इति च । कथं चाचेतनोपासनं ब्रह्मादिपदप्रदं भवति ? ‘न वै तत्र न निम्लोचो(निम्नोचः) नोदियाय कदाचन’(३.११.२), ‘सकृद् दिव हैवास्मै भवति’(३.११.३) इत्यादि च मुक्तस्यैव मुख्यतो युज्यते । | |||
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| verse_text = यशस्तेजइन्द्रियवीर्यान्नाद्यरसत्वं च भगवन्तं विना कस्य मुख्यतो युज्यते ? तस्य नाम महद्यशः ।¦ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः ।¦ज्ञानवैराग्ययोश्चैव(ज्ञानविज्ञानयोश्चैव) षण्णां भग इतीरणा ॥¦‘रसो वै रसः’,¦‘सुखात्मकं षड्गुणविग्रहं परं हृदि स्थितं ब्रह्म निरञ्चनं स्वरुक् ।¦ऐश्वर्यवैराग्ययशोविबोधवीर्यश्रिया पूर्णमहं प्रपद्ये॥’¦‘अहं तत्तेजोरश्मीन्नारायणं पुरुषम्’(पुरुषं जातमग्रतः) इत्यादेश्च । ‘ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः’ इति च (नरसिमहपुराणे ऐ.भा.)। | |||
| verse_lines = यशस्तेजइन्द्रियवीर्यान्नाद्यरसत्वं च भगवन्तं विना कस्य मुख्यतो युज्यते ? तस्य नाम महद्यशः ।¦ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः ।¦ज्ञानवैराग्ययोश्चैव(ज्ञानविज्ञानयोश्चैव) षण्णां भग इतीरणा ॥¦‘रसो वै रसः’,¦‘सुखात्मकं षड्गुणविग्रहं परं हृदि स्थितं ब्रह्म निरञ्चनं स्वरुक् ।¦ऐश्वर्यवैराग्ययशोविबोधवीर्यश्रिया पूर्णमहं प्रपद्ये॥’¦‘अहं तत्तेजोरश्मीन्नारायणं पुरुषम्’(पुरुषं जातमग्रतः) इत्यादेश्च । ‘ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः’ इति च (नरसिमहपुराणे ऐ.भा.)। | |||
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| verse_text = न चाचेतनस्यैश्वर्यादिरूपत्वं युज्यते । ‘ज्ञानात्मको भगवानैश्वर्यात्मको भगवान् शक्त्यात्मको भगवान्’ इति च श्रुतिः । ‘सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात्’(ब्र.सू.३.३.१) इति सर्ववेदप्रतिपाद्यत्वं भगवत उक्तं भगवता । ‘स सर्वनामा स च विश्वरूपः प्रसीदतां ब्रह्म महाविभूतिः’ इति च । ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’(काठक.अ.१,ब्रा.६,श्लो.१), ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदा सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव’ ।¦‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।¦आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते ॥’¦‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ इत्यादेश्च । | |||
| verse_lines = न चाचेतनस्यैश्वर्यादिरूपत्वं युज्यते । ‘ज्ञानात्मको भगवानैश्वर्यात्मको भगवान् शक्त्यात्मको भगवान्’ इति च श्रुतिः । ‘सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात्’(ब्र.सू.३.३.१) इति सर्ववेदप्रतिपाद्यत्वं भगवत उक्तं भगवता । ‘स सर्वनामा स च विश्वरूपः प्रसीदतां ब्रह्म महाविभूतिः’ इति च । ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’(काठक.अ.१,ब्रा.६,श्लो.१), ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदा सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव’ ।¦‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।¦आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते ॥’¦‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ इत्यादेश्च । | |||
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| verse_text = उपनिषत्वाच्च विशेषतो न यत्किञ्चिदुच्यत इति वक्तुं युक्तम् -¦‘विष्णुरुक्तः सर्ववेदैर्मन्त्रैरपि (मन्त्रेषु च) विशेषतः ।¦आरण्यके विशेषेण नैवान्यत् किञ्चिदुच्यते ॥¦कर्मार्थं च ब्राह्मणं स्याद् अमुख्यार्थविवक्षया ।¦मुख्यतो विष्णुरेवैको ब्राह्मणेष्वपि कथ्यते ॥¦आरण्यकेष्वृते विष्णुं नैवान्यत् किञ्चिदुच्यते ।¦सूत्रात्मा तूच्यते विष्णोस्तद्विशिष्टत्ववित्तये ॥¦कुत्रचित् तदुपास्तिश्च तस्याध्यर्धतनुत्वतः ।¦तस्मिन् विष्णोरुपास्त्यर्थं नान्यथा किञ्चिदुच्यते ॥’ इति ब्रह्माण्डे । | |||
| verse_lines = उपनिषत्वाच्च विशेषतो न यत्किञ्चिदुच्यत इति वक्तुं युक्तम् -¦‘विष्णुरुक्तः सर्ववेदैर्मन्त्रैरपि (मन्त्रेषु च) विशेषतः ।¦आरण्यके विशेषेण नैवान्यत् किञ्चिदुच्यते ॥¦कर्मार्थं च ब्राह्मणं स्याद् अमुख्यार्थविवक्षया ।¦मुख्यतो विष्णुरेवैको ब्राह्मणेष्वपि कथ्यते ॥¦आरण्यकेष्वृते विष्णुं नैवान्यत् किञ्चिदुच्यते ।¦सूत्रात्मा तूच्यते विष्णोस्तद्विशिष्टत्ववित्तये ॥¦कुत्रचित् तदुपास्तिश्च तस्याध्यर्धतनुत्वतः ।¦तस्मिन् विष्णोरुपास्त्यर्थं नान्यथा किञ्चिदुच्यते ॥’ इति ब्रह्माण्डे । | |||
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| verse_text = ‘यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवत्राणनिरोधमस्य ।¦लीलावतारेधितकर्म (लीलावतारैधितकर्म) वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ।¦वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ।¦यन्न व्रजन्त्यघभिदोऽरचनानुवादाः शृण्वन्ति येऽन्यविषयाः कुकथा मतिघ्नीः ।¦यास्तु श्रुता हतभगैर्नृभिरात्तवीर्यास्तांस्तान् क्षिपन्त्यशरणेषु तमस्सु हन्त ।’ इत्यादिभगवद्वचनाच्च ।¦आत्ता वीर्यं याभिस्ता आत्तविर्या याश्च यैर्हतभगैरनृभिः श्रुता अशरणेषु।¦‘सर्वासु शाखास्वारणमावर्तयेदारणकमावर्तयेदुपनिषदमावर्तयेदुपनिषदमावर्तयेत्’ इत्युपनिषदभ्यासस्य सतात्पर्यं विहितत्वादभगवद्विषयस्य निन्दितत्वाच्च नोपनिषत्स्वन्यदुच्यते ।¦‘अभ्यसेदधियज्ञं चाप्यधिदैवं विशेषतः ।¦अध्यात्मं तु विशेषेण यस्माद् विष्णुस्त्रिषूदितः ॥’ इति स्कान्दे ।¦‘मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्योऽपोह्य(विकल्प्यापोह्य .हृ) इत्यहम् ।¦इत्यस्या हृदयं साक्षान्नान्यो मद्वेद कश्चन ॥’¦इत्यादेश्च भगवदुपासना एव सर्वत्रोक्ताः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = ‘यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवत्राणनिरोधमस्य ।¦लीलावतारेधितकर्म (लीलावतारैधितकर्म) वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ।¦वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ।¦यन्न व्रजन्त्यघभिदोऽरचनानुवादाः शृण्वन्ति येऽन्यविषयाः कुकथा मतिघ्नीः ।¦यास्तु श्रुता हतभगैर्नृभिरात्तवीर्यास्तांस्तान् क्षिपन्त्यशरणेषु तमस्सु हन्त ।’ इत्यादिभगवद्वचनाच्च ।¦आत्ता वीर्यं याभिस्ता आत्तविर्या याश्च यैर्हतभगैरनृभिः श्रुता अशरणेषु।¦‘सर्वासु शाखास्वारणमावर्तयेदारणकमावर्तयेदुपनिषदमावर्तयेदुपनिषदमावर्तयेत्’ इत्युपनिषदभ्यासस्य सतात्पर्यं विहितत्वादभगवद्विषयस्य निन्दितत्वाच्च नोपनिषत्स्वन्यदुच्यते ।¦‘अभ्यसेदधियज्ञं चाप्यधिदैवं विशेषतः ।¦अध्यात्मं तु विशेषेण यस्माद् विष्णुस्त्रिषूदितः ॥’ इति स्कान्दे ।¦‘मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्योऽपोह्य(विकल्प्यापोह्य .हृ) इत्यहम् ।¦इत्यस्या हृदयं साक्षान्नान्यो मद्वेद कश्चन ॥’¦इत्यादेश्च भगवदुपासना एव सर्वत्रोक्ताः ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = ‘प्रथमामृतस्य द्रष्टारो वसवस्त्वग्निपूर्वकाः ।¦यावत् पश्यन्ति तं विष्णुं तावत् ते नान्यभोगिनः ॥¦एतदेव विशन्त्यद्धा मोक्षे ते तत एव च ।¦स्वेच्छयैव समुद्यन्ति मुक्ताः सन्तो बहिस्तथा ॥ | |||
| verse_lines = ‘प्रथमामृतस्य द्रष्टारो वसवस्त्वग्निपूर्वकाः ।¦यावत् पश्यन्ति तं विष्णुं तावत् ते नान्यभोगिनः ॥¦एतदेव विशन्त्यद्धा मोक्षे ते तत एव च ।¦स्वेच्छयैव समुद्यन्ति मुक्ताः सन्तो बहिस्तथा ॥ | |||
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| verse_text = एवं द्वितीयरूपं तु शिवाद्या वायुसंस्थिताः (वायुसंश्रिताः)।¦वायोर्हिरण्यगर्भत्वात् पदद्वयमुदाहृतम् ॥¦रुद्राणामाश्रयत्वं च साध्यानामपि सर्वशः ।¦अतो यजुर्विचारश्च सर्ववेदात्मनस्तथा ॥¦वायोरेव विचारः स्याद् ब्रह्मणोऽपि विशेषतः ।¦उभयाश्रयः स मोक्षोऽपि वायुरेव हि सर्वदा ॥ | |||
| verse_lines = एवं द्वितीयरूपं तु शिवाद्या वायुसंस्थिताः (वायुसंश्रिताः)।¦वायोर्हिरण्यगर्भत्वात् पदद्वयमुदाहृतम् ॥¦रुद्राणामाश्रयत्वं च साध्यानामपि सर्वशः ।¦अतो यजुर्विचारश्च सर्ववेदात्मनस्तथा ॥¦वायोरेव विचारः स्याद् ब्रह्मणोऽपि विशेषतः ।¦उभयाश्रयः स मोक्षोऽपि वायुरेव हि सर्वदा ॥ | |||
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| verse_text = द्रष्टारोऽथ तृतीयस्य शक्रमुख्यादितेः सुताः । | |||
| verse_lines = द्रष्टारोऽथ तृतीयस्य शक्रमुख्यादितेः सुताः । | |||
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| verse_text = चतुर्थस्य तु सोमाद्या मरुतः ................. | |||
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| verse_text = ....... ...... .......... पञ्चमस्य च ॥¦ऋजवो ब्रह्ममुख्या हि सुपर्णः शेष एव च ।¦सरस्वती सुपर्णी च वारुणी साध्यनामकाः ॥¦अन्योन्यमुखता मुक्तौ ब्रह्मणा समता तथा ।¦वाक्शेषादेर्मुखं ब्रह्मा मुक्तावपि विशेषतः ॥¦द्रष्टोभयस्यापि शिवो द्वितीयस्यान्तगस्य(अन्त्यगस्य) च ।¦मोक्षे त्वन्यत्र चैकस्य परतः शेषभावतः ॥¦ये चेैतत्पदयोग्याः स्युर्देवाः पञ्च महागणाः ।¦तेषामपि यदोपासा निच्छिद्रा मधुनामके ॥¦तदा वस्वादितां प्राप्य मुक्तिमेष्यन्त्यसंशयम् । | |||
| verse_lines = ....... ...... .......... पञ्चमस्य च ॥¦ऋजवो ब्रह्ममुख्या हि सुपर्णः शेष एव च ।¦सरस्वती सुपर्णी च वारुणी साध्यनामकाः ॥¦अन्योन्यमुखता मुक्तौ ब्रह्मणा समता तथा ।¦वाक्शेषादेर्मुखं ब्रह्मा मुक्तावपि विशेषतः ॥¦द्रष्टोभयस्यापि शिवो द्वितीयस्यान्तगस्य(अन्त्यगस्य) च ।¦मोक्षे त्वन्यत्र चैकस्य परतः शेषभावतः ॥¦ये चेैतत्पदयोग्याः स्युर्देवाः पञ्च महागणाः ।¦तेषामपि यदोपासा निच्छिद्रा मधुनामके ॥¦तदा वस्वादितां प्राप्य मुक्तिमेष्यन्त्यसंशयम् । | |||
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| verse_text = उदेत्यास्तमयं यावद्याति भानुस्तु पर्वते ॥¦उदयास्ताद्रिमध्यस्य वसवः पतयः स्मृताः ।¦ततश्चास्तमयाद् यावदर्धरात्रं दिवाकरः ॥¦दक्षिणादुत्तरं याति किञ्चित् पूर्वसमन्वितम् ।¦तद्देशकालयोरीशा रुद्रा वायुपुरःसराः ॥¦वसुभेग्याद् (वसुभोज्याद्) अर्धकालमर्धदेशस्तथैव च ।¦रुद्रभोज्योऽर्धरात्रात्तु याम आदित्यदैवतः ॥¦पश्चिमात् पूर्वमार्गस्तु रौद्रादर्धः प्रकीर्तितः ।¦ततः परोऽर्धयामस्तु सौम्याद् दक्षिणमार्गकः ॥¦मारुतः काल उद्दिष्ट आदित्यार्धश्च देशतः ।¦पश्चात् पश्चादुदेत्येव(उदेत्यैव) पूर्वतोऽस्तमुपैति च ॥¦ततस्तदर्धकालेन चोत्तरादुदितस्तथा ।¦अस्तं दक्षिणतो याति स कालो मारुतः स्मृतः ॥¦उदेत्यैन्द्रपुरे(उदेत्येन्द्रपुरे) चोर्ध्वमर्वागुदयपर्वते ।¦अस्तमेति तदर्धेन ब्रह्मा तस्य पतिः स्मृतः ॥ | |||
| verse_lines = उदेत्यास्तमयं यावद्याति भानुस्तु पर्वते ॥¦उदयास्ताद्रिमध्यस्य वसवः पतयः स्मृताः ।¦ततश्चास्तमयाद् यावदर्धरात्रं दिवाकरः ॥¦दक्षिणादुत्तरं याति किञ्चित् पूर्वसमन्वितम् ।¦तद्देशकालयोरीशा रुद्रा वायुपुरःसराः ॥¦वसुभेग्याद् (वसुभोज्याद्) अर्धकालमर्धदेशस्तथैव च ।¦रुद्रभोज्योऽर्धरात्रात्तु याम आदित्यदैवतः ॥¦पश्चिमात् पूर्वमार्गस्तु रौद्रादर्धः प्रकीर्तितः ।¦ततः परोऽर्धयामस्तु सौम्याद् दक्षिणमार्गकः ॥¦मारुतः काल उद्दिष्ट आदित्यार्धश्च देशतः ।¦पश्चात् पश्चादुदेत्येव(उदेत्यैव) पूर्वतोऽस्तमुपैति च ॥¦ततस्तदर्धकालेन चोत्तरादुदितस्तथा ।¦अस्तं दक्षिणतो याति स कालो मारुतः स्मृतः ॥¦उदेत्यैन्द्रपुरे(उदेत्येन्द्रपुरे) चोर्ध्वमर्वागुदयपर्वते ।¦अस्तमेति तदर्धेन ब्रह्मा तस्य पतिः स्मृतः ॥ | |||
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| verse_text = ‘एकत्रिंशत्तु घटिकाः साधिका वसुदैवताः ।¦तदर्धा रुद्रदैवत्यास्तत आदित्यदैवताः ।¦तदर्धा मारुता ब्राह्मास्तदर्धा देशतस्तथा ॥’ इति च ।¦रौद्रो द्विगुणीभूतो वसुकालो यावांस्तावान् भवतीति द्विस्तावत् । अर्ध इत्यर्थः । ब्राह्मे मुहूर्ते (ब्राह्मो महूर्त)इत्युषःकालस्य प्रसिद्धेश्च । रौद्रः काल इति पूर्वरात्रस्य प्रसिद्धेः (प्रसिद्धेः सार्धरात्रस्य। सौम्यः काल इत्यपररात्रस्य । सौम्यकालत्वाच्च)। अपररात्रस्य सौम्यकालत्वाच्च तस्मिन् काले शीतमुत्पद्यते । मारुतकालत्वाद् वायुश्च वाति । आग्नेयकालत्वादेवाह्नि सैकघटिकं होमकर्माणि विशेषतः प्रवर्तन्ते । | |||
| verse_lines = ‘एकत्रिंशत्तु घटिकाः साधिका वसुदैवताः ।¦तदर्धा रुद्रदैवत्यास्तत आदित्यदैवताः ।¦तदर्धा मारुता ब्राह्मास्तदर्धा देशतस्तथा ॥’ इति च ।¦रौद्रो द्विगुणीभूतो वसुकालो यावांस्तावान् भवतीति द्विस्तावत् । अर्ध इत्यर्थः । ब्राह्मे मुहूर्ते (ब्राह्मो महूर्त)इत्युषःकालस्य प्रसिद्धेश्च । रौद्रः काल इति पूर्वरात्रस्य प्रसिद्धेः (प्रसिद्धेः सार्धरात्रस्य। सौम्यः काल इत्यपररात्रस्य । सौम्यकालत्वाच्च)। अपररात्रस्य सौम्यकालत्वाच्च तस्मिन् काले शीतमुत्पद्यते । मारुतकालत्वाद् वायुश्च वाति । आग्नेयकालत्वादेवाह्नि सैकघटिकं होमकर्माणि विशेषतः प्रवर्तन्ते । | |||
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| verse_text = ‘अहः सर्वं वसूनां(सर्ववसूनां) तु परेषां रात्रिरेव च ।¦प्रदत्ता विष्णुना पूर्वं नालमित्यब्रुवन् परे ॥¦पुनर्विशेषतो दत्तं रुद्राणां मरुतां तथा ।¦माध्यन्दिनं तृतीयं चाप्यादित्यानां प्रदत्तवान् ॥¦विश्वेषामपि देवानां सामान्याद् वसुनामहः ॥’ इति च ।¦‘सर्वस्याधिपतिर्ब्रह्मा रुद्राद्यास्तु द्वयोर्द्वयोः ।¦वसवस्त्वह्न एवेशाः सामान्यान्न विशेषतः ॥’ इति च ।¦‘माध्यन्दिने तृतीये च रुद्रादे राज्यमिष्यते ।¦तद्भृत्यत्वात् वसूनां तु प्रातःकाले विशेषतः ॥¦तत्रापि वाय्वधीनत्वम् अग्न्यादीनां प्रकीर्तितम् ॥ | |||
| verse_lines = ‘अहः सर्वं वसूनां(सर्ववसूनां) तु परेषां रात्रिरेव च ।¦प्रदत्ता विष्णुना पूर्वं नालमित्यब्रुवन् परे ॥¦पुनर्विशेषतो दत्तं रुद्राणां मरुतां तथा ।¦माध्यन्दिनं तृतीयं चाप्यादित्यानां प्रदत्तवान् ॥¦विश्वेषामपि देवानां सामान्याद् वसुनामहः ॥’ इति च ।¦‘सर्वस्याधिपतिर्ब्रह्मा रुद्राद्यास्तु द्वयोर्द्वयोः ।¦वसवस्त्वह्न एवेशाः सामान्यान्न विशेषतः ॥’ इति च ।¦‘माध्यन्दिने तृतीये च रुद्रादे राज्यमिष्यते ।¦तद्भृत्यत्वात् वसूनां तु प्रातःकाले विशेषतः ॥¦तत्रापि वाय्वधीनत्वम् अग्न्यादीनां प्रकीर्तितम् ॥ | |||
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| verse_text = एवं पृथिव्यां रुद्राणामन्तरिक्षं प्रकीर्तितम् (एवं पृथिव्या रुद्राणां, अन्तरिक्षे प्रकीर्तितम्)।¦मरुतां च द्विलोकेशा आदित्याः परिकीर्तिताः॥¦सर्वेषामधिपो ब्रह्मा युवाधीशस्तु(युवादीशस्तु) मारुतः ।¦त्रिलोकाधिपतिश्चेन्द्रस्तेषामप्यधिपो हरिः ॥’ इति च ।¦स्वाराज्यं भोगः । स्वरञ्जनात् । | |||
| verse_lines = एवं पृथिव्यां रुद्राणामन्तरिक्षं प्रकीर्तितम् (एवं पृथिव्या रुद्राणां, अन्तरिक्षे प्रकीर्तितम्)।¦मरुतां च द्विलोकेशा आदित्याः परिकीर्तिताः॥¦सर्वेषामधिपो ब्रह्मा युवाधीशस्तु(युवादीशस्तु) मारुतः ।¦त्रिलोकाधिपतिश्चेन्द्रस्तेषामप्यधिपो हरिः ॥’ इति च ।¦स्वाराज्यं भोगः । स्वरञ्जनात् । | |||
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| verse_text = न त्विन्द्राद्यमो द्विगुणकालं तिष्ठति तस्माद् वरुणस्तस्माद् सोम इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न च सोमाद् द्विगुणमेव ब्रह्मा तिष्ठति । द्विपरार्धं हि तस्य कालः । इन्द्रादयो हि मन्वन्तरमात्रं तिष्ठन्ति । न च वसूनां पूर्वो देशो रुद्राणां दक्षिण आदित्यानां पश्चिमो मरुतामुत्तर एव नान्यत्रेत्यत्र प्रमाणमस्ति । तत्पक्षे रुद्रैः सहेन्द्रस्य दक्षिणत्वप्राप्तेश्च । न चेन्द्रशब्देन वायुस्तैर्गृहीतः । अत इन्द्रादेवेन्द्रस्य द्विगुणकालत्वमिति विरोधः । | |||
| verse_lines = न त्विन्द्राद्यमो द्विगुणकालं तिष्ठति तस्माद् वरुणस्तस्माद् सोम इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न च सोमाद् द्विगुणमेव ब्रह्मा तिष्ठति । द्विपरार्धं हि तस्य कालः । इन्द्रादयो हि मन्वन्तरमात्रं तिष्ठन्ति । न च वसूनां पूर्वो देशो रुद्राणां दक्षिण आदित्यानां पश्चिमो मरुतामुत्तर एव नान्यत्रेत्यत्र प्रमाणमस्ति । तत्पक्षे रुद्रैः सहेन्द्रस्य दक्षिणत्वप्राप्तेश्च । न चेन्द्रशब्देन वायुस्तैर्गृहीतः । अत इन्द्रादेवेन्द्रस्य द्विगुणकालत्वमिति विरोधः । | |||
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| verse_text = इन्द्रादिपुरीणाम् उद्वासेनैवमङ्गीकारे (उद्वासत्वेनैवमङ्गीकारे) तत् षोडशगुणत्वाद् ऊर्ध्वोदयस्यैकेन्द्रात् परतोऽनिन्द्रत्वमेव स्यात् ।¦‘अथ तत ऊर्ध्वं उदेत्य’ इति तत्पक्षे पश्चादप्यादित्यभावात् कल्पान्तलयो(कल्पान्तलयोऽपि, कल्पान्तप्रलयोऽपि) न स्यादित्याद्यनन्तदोषदुष्टत्वेऽपि ग्रन्थाल्पत्वायैवोपरम्यते ॥¦‘वस्वादीनां तु सर्वेषां सर्वदिक्षु पुराण्यपि ।¦सन्त्येवमपि धीवृत्यै प्रत्येकं दिक्षुकथ्यते ॥’ इति च ।¦ऐन्द्रया उद्वासे रुद्राणामेवोदयाभाव इति च दोषः । अतो यत्किञ्चिदेतत् । | |||
| verse_lines = इन्द्रादिपुरीणाम् उद्वासेनैवमङ्गीकारे (उद्वासत्वेनैवमङ्गीकारे) तत् षोडशगुणत्वाद् ऊर्ध्वोदयस्यैकेन्द्रात् परतोऽनिन्द्रत्वमेव स्यात् ।¦‘अथ तत ऊर्ध्वं उदेत्य’ इति तत्पक्षे पश्चादप्यादित्यभावात् कल्पान्तलयो(कल्पान्तलयोऽपि, कल्पान्तप्रलयोऽपि) न स्यादित्याद्यनन्तदोषदुष्टत्वेऽपि ग्रन्थाल्पत्वायैवोपरम्यते ॥¦‘वस्वादीनां तु सर्वेषां सर्वदिक्षु पुराण्यपि ।¦सन्त्येवमपि धीवृत्यै प्रत्येकं दिक्षुकथ्यते ॥’ इति च ।¦ऐन्द्रया उद्वासे रुद्राणामेवोदयाभाव इति च दोषः । अतो यत्किञ्चिदेतत् । | |||
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| verse_text = ‘उदेति पूर्वतः सूर्यो निम्लोचति च पश्चिमे ।¦एवं नियम उद्दिष्टो ब्रह्मणा विष्णुचोदनात् ॥¦द्विगुणं द्विगुणं कालमुदित्वा दक्षिणादिषु ।¦मध्ये व्यवस्थितिः(चावस्थितिः) पश्चाद् ब्रह्माणं याचिता पुरा ॥¦हिरण्यकेन सूर्यस्य हिरण्याक्षेण वै पुनः ।¦तदाऽसुराणां देवत्वं ब्रह्मा तत् प्रददौ तयोः ॥¦तच्छ्रुत्वेन्द्रादिभिः प्रोक्तः कथं प्रादा वराविमौ ।¦देवता हि विनश्येयुरेवं दत्ते वरे त्वया ॥¦इत्युक्तो देवतैः प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः ।¦न मया स वरो दत्तो दैतेयानां सुराः क्वचित् ॥¦येन युष्मद्विनाशः स्यात् ततो व्येतु (व्यैतु) च वो भयम् ।¦दक्षिणाद्युदयो यस्तु स हि दैनन्दिनो मया ॥¦अभिप्रेतो नैव चायं कालान्तरगतः क्वचित् ।¦अर्धनाड्युत्तरा नाडीः सकाष्ठा नित्यशो रविः ॥¦पञ्चादशोत्तरां गच्छेत् पूर्वं रात्रे तु दक्षिणात् ।¦तदर्धं पश्चिमात् पूर्वं(पूर्वां) तदर्धं चोत्तरादपि ॥¦दक्षिणां च तदर्धं स ऊर्ध्वादर्वाक् च गच्छति ।¦दक्षिणाद्युदयस्त्वेष न तु कालान्तरे क्वचित् ॥¦यदोत्तरस्मात् द्विगुणः पूर्वो भवति वै सुराः ।¦तदाऽपि द्विगुणत्वं स्यात् तन्मयाऽत्र विवक्षितम् ॥¦अहःसाम्येऽपि क्रमश आतपस्याल्पकालतः ।¦गिर्यावृत्तेः(गिर्यावृतेः) क्षिप्रमन्येषूदयास्तमयाविव ॥ | |||
| verse_lines = ‘उदेति पूर्वतः सूर्यो निम्लोचति च पश्चिमे ।¦एवं नियम उद्दिष्टो ब्रह्मणा विष्णुचोदनात् ॥¦द्विगुणं द्विगुणं कालमुदित्वा दक्षिणादिषु ।¦मध्ये व्यवस्थितिः(चावस्थितिः) पश्चाद् ब्रह्माणं याचिता पुरा ॥¦हिरण्यकेन सूर्यस्य हिरण्याक्षेण वै पुनः ।¦तदाऽसुराणां देवत्वं ब्रह्मा तत् प्रददौ तयोः ॥¦तच्छ्रुत्वेन्द्रादिभिः प्रोक्तः कथं प्रादा वराविमौ ।¦देवता हि विनश्येयुरेवं दत्ते वरे त्वया ॥¦इत्युक्तो देवतैः प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः ।¦न मया स वरो दत्तो दैतेयानां सुराः क्वचित् ॥¦येन युष्मद्विनाशः स्यात् ततो व्येतु (व्यैतु) च वो भयम् ।¦दक्षिणाद्युदयो यस्तु स हि दैनन्दिनो मया ॥¦अभिप्रेतो नैव चायं कालान्तरगतः क्वचित् ।¦अर्धनाड्युत्तरा नाडीः सकाष्ठा नित्यशो रविः ॥¦पञ्चादशोत्तरां गच्छेत् पूर्वं रात्रे तु दक्षिणात् ।¦तदर्धं पश्चिमात् पूर्वं(पूर्वां) तदर्धं चोत्तरादपि ॥¦दक्षिणां च तदर्धं स ऊर्ध्वादर्वाक् च गच्छति ।¦दक्षिणाद्युदयस्त्वेष न तु कालान्तरे क्वचित् ॥¦यदोत्तरस्मात् द्विगुणः पूर्वो भवति वै सुराः ।¦तदाऽपि द्विगुणत्वं स्यात् तन्मयाऽत्र विवक्षितम् ॥¦अहःसाम्येऽपि क्रमश आतपस्याल्पकालतः ।¦गिर्यावृत्तेः(गिर्यावृतेः) क्षिप्रमन्येषूदयास्तमयाविव ॥ | |||
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| verse_text = कालान्तरे भाविनं तु दक्षिणाद्युदयं पुनः ।¦अपेक्ष्यैव वरो दत्तो द्वितीयो देवता मया ॥¦समयश्च कृतो नित्यो मया सूर्यस्य चानघाः ।¦पूर्वस्मादुदयो नित्यं(नित्यः) पश्चिमेऽस्तमयस्तथा ॥¦नियमो नान्यथाऽयं स्यात् कदाचित् केनचित् क्वचित् ।¦तस्मान्न वो भयं क्वापि प्रोक्ता इत्थं सुरास्तदा ।¦विशोका अभवन् सर्वे ययुः स्वं स्वं निकेतनम्(निवेशनम्) ॥’ इति च ।¦एतदेव मोक्षधर्मेषु बलिवासवसंवाद उक्तम् । देवान् प्रति ब्रह्मणो वचनं रहस्यत्वादविज्ञाय बलिना दक्षिणाद्युदय उक्तः । इन्द्रेण तु ब्रह्मवचनं जानता दक्षिणाद्युदयो नास्तीत्युक्तम् ।¦‘दैतेययोर्वरं ज्ञात्वा त्वविज्ञाय सुरान् प्रति ।¦ब्रह्मणोक्तं हि बलिना वासवं प्रत्युदीरितम् ॥¦दक्षिणाद्युदयान्ते तु त्वां जेष्यामि पुरन्दर ।¦इत्युक्तस्तमुवाचेन्द्रो न कदाचन तद्भवेत् ॥¦ब्रह्मणा नियमो यस्मात् कृतः प्रागुदयो रवेः ।¦इत्युक्त्वा तु जगामेन्द्रो दिवमैरावतस्थितः ॥ इति च ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = कालान्तरे भाविनं तु दक्षिणाद्युदयं पुनः ।¦अपेक्ष्यैव वरो दत्तो द्वितीयो देवता मया ॥¦समयश्च कृतो नित्यो मया सूर्यस्य चानघाः ।¦पूर्वस्मादुदयो नित्यं(नित्यः) पश्चिमेऽस्तमयस्तथा ॥¦नियमो नान्यथाऽयं स्यात् कदाचित् केनचित् क्वचित् ।¦तस्मान्न वो भयं क्वापि प्रोक्ता इत्थं सुरास्तदा ।¦विशोका अभवन् सर्वे ययुः स्वं स्वं निकेतनम्(निवेशनम्) ॥’ इति च ।¦एतदेव मोक्षधर्मेषु बलिवासवसंवाद उक्तम् । देवान् प्रति ब्रह्मणो वचनं रहस्यत्वादविज्ञाय बलिना दक्षिणाद्युदय उक्तः । इन्द्रेण तु ब्रह्मवचनं जानता दक्षिणाद्युदयो नास्तीत्युक्तम् ।¦‘दैतेययोर्वरं ज्ञात्वा त्वविज्ञाय सुरान् प्रति ।¦ब्रह्मणोक्तं हि बलिना वासवं प्रत्युदीरितम् ॥¦दक्षिणाद्युदयान्ते तु त्वां जेष्यामि पुरन्दर ।¦इत्युक्तस्तमुवाचेन्द्रो न कदाचन तद्भवेत् ॥¦ब्रह्मणा नियमो यस्मात् कृतः प्रागुदयो रवेः ।¦इत्युक्त्वा तु जगामेन्द्रो दिवमैरावतस्थितः ॥ इति च ॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = ‘तदेतद्भगवान् विष्णुः प्रादाज्ज्ञानं विरिञ्चये ।¦विरिञ्चिर्मनवे प्राह प्रजाभ्यो मनुरेव च ॥¦पूरयित्वा तु पृथिवीं रत्नैः सप्तसमुद्रिणीम् ।¦दत्वापि गुरवे नैव पूर्यते गुरुदक्षिणा ॥¦देवास्तूपासनायोग्या एकैकस्यामृतस्य हि ।¦सर्वस्योपासने ब्रह्मा तदन्ये ज्ञानमात्रके ॥¦उपासने नैव योग्यास्तद्योग्या हि सुरा यतः ॥ इति देवश्रुतौ ।¦<span class="gr-moola">ब्रह्मणा</span> परेण <span class="gr-moola">मा विराधिषि</span> । भगवत्प्रसादादवृद्धिं न प्राप्नुयामित्यर्थः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = <span class="gr-moola">यदिदं किञ्च भूतं</span> प्रभूतं परिपूर्णं तत् <span class="gr-moola">सर्वं गायत्री</span> भगवानेव । ‘भू=बहौ’ इति धातोः । ‘बहुः पूर्णतायाम्’ इति च ।¦‘यदिदं परितः पूर्णं मत्स्यकूर्मादिरूपकम् ।¦तदिदं भगवान् विष्णुस्सर्वान्तःस्थित एव च ॥¦तन्निःसृतत्वाद् वेदानां गायकस्त्राति चाखिलम् ।¦अतो गायत्रिनामासौ वासुदेवः परः पुमान् ॥¦भूमा भूतमिति प्रोक्तः पूर्णत्वात् पुरुषोत्तमः ।¦अनन्यापेक्षमुद्रिक्तं सर्वस्य विनियामकम् (सर्वस्य च नियामकम्) ॥¦यद्यत्तत्तद्विष्णुरेव नान्यदेतादृशं क्वचित् ।¦स एव भगवान् विष्णुर्वाङ्नामा वाचि संस्थितः ॥¦वचनाद्धयशीर्षाख्यो गायत्र्यां च स आस्थितः । | |||
| verse_lines = <span class="gr-moola">यदिदं किञ्च भूतं</span> प्रभूतं परिपूर्णं तत् <span class="gr-moola">सर्वं गायत्री</span> भगवानेव । ‘भू=बहौ’ इति धातोः । ‘बहुः पूर्णतायाम्’ इति च ।¦‘यदिदं परितः पूर्णं मत्स्यकूर्मादिरूपकम् ।¦तदिदं भगवान् विष्णुस्सर्वान्तःस्थित एव च ॥¦तन्निःसृतत्वाद् वेदानां गायकस्त्राति चाखिलम् ।¦अतो गायत्रिनामासौ वासुदेवः परः पुमान् ॥¦भूमा भूतमिति प्रोक्तः पूर्णत्वात् पुरुषोत्तमः ।¦अनन्यापेक्षमुद्रिक्तं सर्वस्य विनियामकम् (सर्वस्य च नियामकम्) ॥¦यद्यत्तत्तद्विष्णुरेव नान्यदेतादृशं क्वचित् ।¦स एव भगवान् विष्णुर्वाङ्नामा वाचि संस्थितः ॥¦वचनाद्धयशीर्षाख्यो गायत्र्यां च स आस्थितः । | |||
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| verse_text = स एव पृथिवीनामा पृथिव्यामपि संस्थितः ॥¦विष्णौ हि पृथिवीसंस्थे जगत्सर्वं प्रतिष्ठितम् ।¦नातिशेते च तं कश्चित् स हि सर्वाधिको हरिः ॥ | |||
| verse_lines = स एव पृथिवीनामा पृथिव्यामपि संस्थितः ॥¦विष्णौ हि पृथिवीसंस्थे जगत्सर्वं प्रतिष्ठितम् ।¦नातिशेते च तं कश्चित् स हि सर्वाधिको हरिः ॥ | |||
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| verse_text = योऽसौ जीवे स्थितो विष्णुः शरीरमिति नामकः ॥¦शन्त्वाच्च रतिरूपत्वाद् ईरणाच्च स एव तु ।¦जीवचैतन्यरूपस्य हृदयेऽपि व्यवस्थितः ॥¦अयनाद्धृदि विष्णुः स हृदयं कीर्तितो बुधैः । | |||
| verse_lines = योऽसौ जीवे स्थितो विष्णुः शरीरमिति नामकः ॥¦शन्त्वाच्च रतिरूपत्वाद् ईरणाच्च स एव तु ।¦जीवचैतन्यरूपस्य हृदयेऽपि व्यवस्थितः ॥¦अयनाद्धृदि विष्णुः स हृदयं कीर्तितो बुधैः । | |||
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| verse_text = गायत्र्यां संस्थितो विष्णुः स्त्रीरूपः सूर्यसप्रभः ॥¦द्वितीयश्चैव मत्स्यादिर्भूतनामाऽवतारगः ।¦तृतीयो वाचि संस्थश्च स्त्रीरूपो हयशीर्षकः ॥¦चतुर्थः पृथिवीसंस्थः स्त्रीरूपः पीतवर्णकः ।¦जीवस्यान्तर्गतो व्याप्य शरीरमितिनामकः ॥¦पञ्चमस्तद्धृदिस्थस्तु(हृदिस्थश्च) षष्ठो हृदयनामकः ।¦गायत्रीनामको विष्णुरेवं षडि्वध उच्यते ॥¦त्रिभिः स्वरूपपादैश्च भिन्नेनैकेन चैव हि ।¦गायत्रीनामको विष्णुश्चतुष्पात् सम्प्रकीर्तितः ॥ | |||
| verse_lines = गायत्र्यां संस्थितो विष्णुः स्त्रीरूपः सूर्यसप्रभः ॥¦द्वितीयश्चैव मत्स्यादिर्भूतनामाऽवतारगः ।¦तृतीयो वाचि संस्थश्च स्त्रीरूपो हयशीर्षकः ॥¦चतुर्थः पृथिवीसंस्थः स्त्रीरूपः पीतवर्णकः ।¦जीवस्यान्तर्गतो व्याप्य शरीरमितिनामकः ॥¦पञ्चमस्तद्धृदिस्थस्तु(हृदिस्थश्च) षष्ठो हृदयनामकः ।¦गायत्रीनामको विष्णुरेवं षडि्वध उच्यते ॥¦त्रिभिः स्वरूपपादैश्च भिन्नेनैकेन चैव हि ।¦गायत्रीनामको विष्णुश्चतुष्पात् सम्प्रकीर्तितः ॥ | |||
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| verse_text = भिन्नपादः(दाः) सर्वजीवास्तस्य सादृश्यमात्रतः ।¦स्वरूपपादा विष्णोस्तु त्रयो हि दिवि संस्थिताः ॥¦नारायणो वासुदेवो वैकुण्ठ इति ते त्रयः ।¦अनन्तशयनं चैव तथाऽनन्तासनं हरेः ॥¦बहुलक्षोच्छ्रिते नित्ये विमाने संस्थितं यतः(विमाने संस्थिते यतः, विमाने नियतं स्थितः) ।¦चित्प्रकृत्यात्मनि ततो दिवीति कथितं(ते) श्रुतौ ॥¦लोकत्रयविवक्षायां परतो लक्षयोजनम् ।¦सर्वं द्यौरिति विज्ञेयं(स्थानद्वयं तद् विज्ञेयं) ततस्ते दिविसंस्थिताः ॥¦दिवः परश्च भगवान् सप्तलोकविवक्षया । | |||
| verse_lines = भिन्नपादः(दाः) सर्वजीवास्तस्य सादृश्यमात्रतः ।¦स्वरूपपादा विष्णोस्तु त्रयो हि दिवि संस्थिताः ॥¦नारायणो वासुदेवो वैकुण्ठ इति ते त्रयः ।¦अनन्तशयनं चैव तथाऽनन्तासनं हरेः ॥¦बहुलक्षोच्छ्रिते नित्ये विमाने संस्थितं यतः(विमाने संस्थिते यतः, विमाने नियतं स्थितः) ।¦चित्प्रकृत्यात्मनि ततो दिवीति कथितं(ते) श्रुतौ ॥¦लोकत्रयविवक्षायां परतो लक्षयोजनम् ।¦सर्वं द्यौरिति विज्ञेयं(स्थानद्वयं तद् विज्ञेयं) ततस्ते दिविसंस्थिताः ॥¦दिवः परश्च भगवान् सप्तलोकविवक्षया । | |||
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| verse_text = परम्ब्रह्मेति भगवान् सर्वगः सम्प्रकीर्तितः ॥¦स एव जीवस्य बहिर्हृदयाकाश आस्थितः ।¦योऽयं हृदयगः सोऽथ जीवान्तर्व्याप्य संस्थितः ॥¦व्याप्तो जीवान्तरे योऽसौ स जीवहृदि(जीवे हृदि) संस्थितः ।¦एवं चापि चतुष्पात्त्वं वासुदेवस्य कीर्तितम् ॥¦स एव पूर्णो भगवान् अप्रवर्त्यस्तथाऽखिलैः ।¦अन्यैः प्रवर्त्यते योऽसौ स प्रवर्तीति गीयते ॥¦अप्रवर्त्यो हरिर्नित्यस्वतन्त्रत्वात्(नित्यः स्वतन्त्रत्वात्) सदैव च ।¦अस्य(अस्मिन् हृ.) प्रवृत्तिर्नास्तीति सोऽप्रवर्तीति कीर्तितः ॥¦पूर्णा स्वतन्त्रा श्रीश्चास्य वेत्तुर्भवति शाश्वती ।¦साक्षाद् गायत्र्युपासायां(उपासायाः/या) योग्य एकश्चतुर्मुखः ॥¦तस्माद् अनन्यतन्त्राऽस्य श्रीर्भवेन्नान्यथा क्वचित् ।¦विष्णुतन्त्रत्वमस्य स्यात् परेषां तस्य तन्त्रता ।¦यथाक्रमेण तन्त्रत्वं योग्यताक्रमतो भवेत् ॥’ इति (च) सत्तत्त्वे । | |||
| verse_lines = परम्ब्रह्मेति भगवान् सर्वगः सम्प्रकीर्तितः ॥¦स एव जीवस्य बहिर्हृदयाकाश आस्थितः ।¦योऽयं हृदयगः सोऽथ जीवान्तर्व्याप्य संस्थितः ॥¦व्याप्तो जीवान्तरे योऽसौ स जीवहृदि(जीवे हृदि) संस्थितः ।¦एवं चापि चतुष्पात्त्वं वासुदेवस्य कीर्तितम् ॥¦स एव पूर्णो भगवान् अप्रवर्त्यस्तथाऽखिलैः ।¦अन्यैः प्रवर्त्यते योऽसौ स प्रवर्तीति गीयते ॥¦अप्रवर्त्यो हरिर्नित्यस्वतन्त्रत्वात्(नित्यः स्वतन्त्रत्वात्) सदैव च ।¦अस्य(अस्मिन् हृ.) प्रवृत्तिर्नास्तीति सोऽप्रवर्तीति कीर्तितः ॥¦पूर्णा स्वतन्त्रा श्रीश्चास्य वेत्तुर्भवति शाश्वती ।¦साक्षाद् गायत्र्युपासायां(उपासायाः/या) योग्य एकश्चतुर्मुखः ॥¦तस्माद् अनन्यतन्त्राऽस्य श्रीर्भवेन्नान्यथा क्वचित् ।¦विष्णुतन्त्रत्वमस्य स्यात् परेषां तस्य तन्त्रता ।¦यथाक्रमेण तन्त्रत्वं योग्यताक्रमतो भवेत् ॥’ इति (च) सत्तत्त्वे । | |||
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| verse_text = ब्रह्मशब्दाच्च भगवानित्यवसीयते । पूर्णाप्रवृत्तित्वं च तस्मिन्नेव मुख्यम् । ‘तावानस्य महिमा’ इति मन्त्राच्च । ‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि’ इति जीवानां चतुष्पादान्तर्भावाद् ‘भूतं यदिदं किञ्च’ इति षड्विधान्तर्भूतं भूतं मत्स्याद्यवताररूपमेव ।¦‘द्वाविंशेष्ववतारेषु जीवोऽप्युक्तो यथा पृथुः ।¦तथा पादेषु चतुर्षु सान्निध्याज्जीव ईरितः ॥¦यथा कालः पुमान् व्यक्तं प्रकृतिश्च परस्य तु ।¦विष्णो रूपाणि गण्यन्ते पररूपेण वै सह ॥¦एवं भूतानि गण्यन्ते भिन्नान्यपि पदैः सह ।¦मूर्तामूर्ते यथा रूपे ब्रह्मणस्तु तथैव च ॥¦भिन्नान्यपि तु भूतानि पदानि स्वपदैः सह ॥’ इति प्राथम्ये ।¦‘सुदर्शनाख्यं स्वास्त्रं तु प्रायुङ्क्त दयितं त्रिपात्’(भाग.३.२०.२२) इति श्रीभागवते प्रयोगाच्च न जीवो भगवत्स्वरूपम् ।¦सुवर्चला यथा सूर्यपत्न्यंशः समुदाहृता ।¦एवं जीवा भगवतो वस्तुभेदेऽपि सर्वदा ॥’ इति च ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = ब्रह्मशब्दाच्च भगवानित्यवसीयते । पूर्णाप्रवृत्तित्वं च तस्मिन्नेव मुख्यम् । ‘तावानस्य महिमा’ इति मन्त्राच्च । ‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि’ इति जीवानां चतुष्पादान्तर्भावाद् ‘भूतं यदिदं किञ्च’ इति षड्विधान्तर्भूतं भूतं मत्स्याद्यवताररूपमेव ।¦‘द्वाविंशेष्ववतारेषु जीवोऽप्युक्तो यथा पृथुः ।¦तथा पादेषु चतुर्षु सान्निध्याज्जीव ईरितः ॥¦यथा कालः पुमान् व्यक्तं प्रकृतिश्च परस्य तु ।¦विष्णो रूपाणि गण्यन्ते पररूपेण वै सह ॥¦एवं भूतानि गण्यन्ते भिन्नान्यपि पदैः सह ।¦मूर्तामूर्ते यथा रूपे ब्रह्मणस्तु तथैव च ॥¦भिन्नान्यपि तु भूतानि पदानि स्वपदैः सह ॥’ इति प्राथम्ये ।¦‘सुदर्शनाख्यं स्वास्त्रं तु प्रायुङ्क्त दयितं त्रिपात्’(भाग.३.२०.२२) इति श्रीभागवते प्रयोगाच्च न जीवो भगवत्स्वरूपम् ।¦सुवर्चला यथा सूर्यपत्न्यंशः समुदाहृता ।¦एवं जीवा भगवतो वस्तुभेदेऽपि सर्वदा ॥’ इति च ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = ‘प्राणाभिमानी चक्षुश्च सूर्य एव ह्युदाहृतः ।¦तेजोऽन्नाद्यभिमानी च प्राग्द्वाराधिपतिर्हरेः(तेजोऽनाद्यभिमानी च प्राग्द्वाराधिपतिः) ॥¦दक्षिणाधिपतिस्सोमो व्यानः श्रोत्राभिमानवान्(व्यानश्रोत्राभिमानवान्) ।¦यशोलावण्यरूपश्च पश्चिमद्वारपस्तथा ॥¦वागपानात्मको वह्निर्ब्रह्मतेजोऽन्नदेवता ।¦उत्तरद्वारपस्त्विन्द्रः समानो मनआत्मकः(समानमनआत्मकः) ॥’¦कीर्त्यैश्वर्यात्मको नित्यम् ऊर्ध्वद्वारप एव च ।¦प्रधानवायुराकाशः सर्वज्ञादुन्नतेस्तथा ॥¦उदान ऊर्जितत्वात् स ओजः पूर्णत्वतो महः ।¦परस्य ब्रह्मणस्त्वेते पुरुषाः पञ्च कीर्तिताः ॥¦द्वारपा हृदये चैव विष्णुलोके च सर्वदा ।¦आन्तरद्वारपा(अन्तरद्वारपाः .हृ) ह्येते जयाद्या बाह्यतः स्मृताः ॥¦एवमेतानुपास्यैव तद्गुणांशांशभाग् भवेत् ।¦विष्णुलोकं तथा गच्छेद् भवेदपि सुसन्ततिः ॥ | |||
| verse_lines = ‘प्राणाभिमानी चक्षुश्च सूर्य एव ह्युदाहृतः ।¦तेजोऽन्नाद्यभिमानी च प्राग्द्वाराधिपतिर्हरेः(तेजोऽनाद्यभिमानी च प्राग्द्वाराधिपतिः) ॥¦दक्षिणाधिपतिस्सोमो व्यानः श्रोत्राभिमानवान्(व्यानश्रोत्राभिमानवान्) ।¦यशोलावण्यरूपश्च पश्चिमद्वारपस्तथा ॥¦वागपानात्मको वह्निर्ब्रह्मतेजोऽन्नदेवता ।¦उत्तरद्वारपस्त्विन्द्रः समानो मनआत्मकः(समानमनआत्मकः) ॥’¦कीर्त्यैश्वर्यात्मको नित्यम् ऊर्ध्वद्वारप एव च ।¦प्रधानवायुराकाशः सर्वज्ञादुन्नतेस्तथा ॥¦उदान ऊर्जितत्वात् स ओजः पूर्णत्वतो महः ।¦परस्य ब्रह्मणस्त्वेते पुरुषाः पञ्च कीर्तिताः ॥¦द्वारपा हृदये चैव विष्णुलोके च सर्वदा ।¦आन्तरद्वारपा(अन्तरद्वारपाः .हृ) ह्येते जयाद्या बाह्यतः स्मृताः ॥¦एवमेतानुपास्यैव तद्गुणांशांशभाग् भवेत् ।¦विष्णुलोकं तथा गच्छेद् भवेदपि सुसन्ततिः ॥ | |||
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| verse_text = योऽसौ वैकुण्ठगो विष्णुः सप्तलोकोपरिस्थितः ।¦स एव सर्वलोकेषु विश्वतो ब्रह्मणस्तथा ॥¦उच्चेषूत्तमलोकेषु तथा प्रत्यवरेषु च ।¦पुरुषेषु च सर्वेषु स एकः संव्यवस्थितः ॥¦प्राणसंस्थस्स वै विष्णुः प्राणोऽग्नौ संव्यवस्थितः ।¦स्पर्शेन दृश्यते चाग्निस्तद्दृष्टिरिव सा ततः ॥¦स प्राणः स्तौति तं विष्णुं सा स्तुतिः श्रूयते सदा ।¦कर्णौ पिधाय तद्विद्वान् दिव्यचक्षुः सुकीर्तिमान् ॥¦मुक्तो भूत्वा भवेद्यस्मादुपासीतैव तं ततः ॥’ इति संस्तत्त्वे ।(उपासीतैव सन्ततम्॥ इति सत्तत्वे) | |||
| verse_lines = योऽसौ वैकुण्ठगो विष्णुः सप्तलोकोपरिस्थितः ।¦स एव सर्वलोकेषु विश्वतो ब्रह्मणस्तथा ॥¦उच्चेषूत्तमलोकेषु तथा प्रत्यवरेषु च ।¦पुरुषेषु च सर्वेषु स एकः संव्यवस्थितः ॥¦प्राणसंस्थस्स वै विष्णुः प्राणोऽग्नौ संव्यवस्थितः ।¦स्पर्शेन दृश्यते चाग्निस्तद्दृष्टिरिव सा ततः ॥¦स प्राणः स्तौति तं विष्णुं सा स्तुतिः श्रूयते सदा ।¦कर्णौ पिधाय तद्विद्वान् दिव्यचक्षुः सुकीर्तिमान् ॥¦मुक्तो भूत्वा भवेद्यस्मादुपासीतैव तं ततः ॥’ इति संस्तत्त्वे ।(उपासीतैव सन्ततम्॥ इति सत्तत्वे) | |||
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| verse_text = ‘दिक्षु यानाद्यशो व्याप्तं कीर्तिः प्रत्यक्षतः स्तुतिः’ इति शब्दनिर्णये ।¦सर्वतः पृष्ठेषु सर्वत उच्चेषु वैकुण्ठ-क्षीरसागर-अनन्तासनादिषु विश्वतो ब्रह्मणोऽप्युच्चेषु । तत उत्तमोऽन्यो(उत्तमो) नास्तीत्यनुत्तमाः सर्वतः स्वयमुत्तमाः ।¦‘पृथिवीस्थेषु सर्वोच्चो लोकोऽनन्तासनात्मकः ।¦अन्तरिक्षात्मकेभ्यश्च श्वेतद्वीपे स्थितो हरेः (हरिः) ॥¦द्व्यात्मकेभ्यश्च सर्वेभ्यो वैकुण्ठश्चोच्च उच्यते ।¦पृथिव्यां द्यौर्महामेरुराकाशे सूर्यमण्डलम् ॥¦दिवीन्द्रसदनं चैव तत्परे तु दिवः परे ।¦पृथिव्यां ब्रह्मणो मेरौ जयन्ते(जयन्तं) त्वन्तरिक्षगम् (वैजयन्तेऽन्तरिक्षगम्)॥¦तृतीयं सत्यलोके(सत्यलोकं) च सदनं त्रिविधं स्मृतम् ।¦तेभ्योऽनन्तासनाद्या यत्परतो विश्वतः परे॥’ इति सत्तत्वे ।¦‘निनदः समुद्रघोषः स्यान्नदथुर्मेघसम्भवः’ इति (च) सत्तत्वे । ‘चक्षुष्यश्चक्षुषि ब्रह्मण्येष यातीत्युपासकः’ इति च ॥ १३ ॥ | |||
| verse_lines = ‘दिक्षु यानाद्यशो व्याप्तं कीर्तिः प्रत्यक्षतः स्तुतिः’ इति शब्दनिर्णये ।¦सर्वतः पृष्ठेषु सर्वत उच्चेषु वैकुण्ठ-क्षीरसागर-अनन्तासनादिषु विश्वतो ब्रह्मणोऽप्युच्चेषु । तत उत्तमोऽन्यो(उत्तमो) नास्तीत्यनुत्तमाः सर्वतः स्वयमुत्तमाः ।¦‘पृथिवीस्थेषु सर्वोच्चो लोकोऽनन्तासनात्मकः ।¦अन्तरिक्षात्मकेभ्यश्च श्वेतद्वीपे स्थितो हरेः (हरिः) ॥¦द्व्यात्मकेभ्यश्च सर्वेभ्यो वैकुण्ठश्चोच्च उच्यते ।¦पृथिव्यां द्यौर्महामेरुराकाशे सूर्यमण्डलम् ॥¦दिवीन्द्रसदनं चैव तत्परे तु दिवः परे ।¦पृथिव्यां ब्रह्मणो मेरौ जयन्ते(जयन्तं) त्वन्तरिक्षगम् (वैजयन्तेऽन्तरिक्षगम्)॥¦तृतीयं सत्यलोके(सत्यलोकं) च सदनं त्रिविधं स्मृतम् ।¦तेभ्योऽनन्तासनाद्या यत्परतो विश्वतः परे॥’ इति सत्तत्वे ।¦‘निनदः समुद्रघोषः स्यान्नदथुर्मेघसम्भवः’ इति (च) सत्तत्वे । ‘चक्षुष्यश्चक्षुषि ब्रह्मण्येष यातीत्युपासकः’ इति च ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_text = ‘इदं ब्रह्मातिसामीप्यात् सर्वं पूर्णगुणत्वतः ।¦तच्च ब्रह्मजलान् साक्षाद् योऽसौ विष्णुर्जलेऽनिति(अनति .हृ) ॥¦आनीदवातमिति यं वेदवागवदत् स्फुटम् ।¦अप्रकेते तु सलिले ब्रह्म नारायणोऽपि(नारायणो हि) सः ॥¦इति शान्त उपासीत यस्माज्ज्ञानमयः पुमान् ।¦क्रतुस्तु निश्चितं ज्ञानं(निश्चितज्ञानम् .हृ) तद्वशः पुरुषोऽमृतौ ॥¦तस्माद् विनिश्चितं ज्ञानं कुर्याद् विष्णौ महागुणे (महद्गुणे) ।¦महाज्ञानात्मकत्वात् तु प्रोक्तो विष्णुर्मनोमयः ॥¦यस्माद् बलशरीरोऽसावतः प्राणशरीरकः ।¦आ समन्तात् प्रकाशात् स आकाशात्मा प्रकीर्तितः ॥¦सर्वगन्धादिरूपश्च भोक्ता चैषां सदैव हि ।¦इति निश्चयकृद्याति तमेव पुरुषोत्तमम् ॥’ इति सद्गुणे । | |||
| verse_lines = ‘इदं ब्रह्मातिसामीप्यात् सर्वं पूर्णगुणत्वतः ।¦तच्च ब्रह्मजलान् साक्षाद् योऽसौ विष्णुर्जलेऽनिति(अनति .हृ) ॥¦आनीदवातमिति यं वेदवागवदत् स्फुटम् ।¦अप्रकेते तु सलिले ब्रह्म नारायणोऽपि(नारायणो हि) सः ॥¦इति शान्त उपासीत यस्माज्ज्ञानमयः पुमान् ।¦क्रतुस्तु निश्चितं ज्ञानं(निश्चितज्ञानम् .हृ) तद्वशः पुरुषोऽमृतौ ॥¦तस्माद् विनिश्चितं ज्ञानं कुर्याद् विष्णौ महागुणे (महद्गुणे) ।¦महाज्ञानात्मकत्वात् तु प्रोक्तो विष्णुर्मनोमयः ॥¦यस्माद् बलशरीरोऽसावतः प्राणशरीरकः ।¦आ समन्तात् प्रकाशात् स आकाशात्मा प्रकीर्तितः ॥¦सर्वगन्धादिरूपश्च भोक्ता चैषां सदैव हि ।¦इति निश्चयकृद्याति तमेव पुरुषोत्तमम् ॥’ इति सद्गुणे । | |||
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| verse_text = एकत्र सर्वगन्धादिना चिदानन्दात्मकसर्वगन्धादिरूपत्वमुच्यते । अन्यत्र तद्भोक्तृत्वम् ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_text = ‘क इत्यानन्द उद्दिष्ट उश इच्छा प्रकीर्तिता ।¦आनन्देच्छास्वरूपोऽसौ कोशो विष्णुः प्रकीर्तितः ॥¦तस्योदरेऽन्तरिक्षं च पृथिवी पादबुध्नयोः(पादमूर्ध्नयोः .हृ) ।¦शिरोविवरगा द्यौश्च दिशो बाहुषु संस्थिताः ॥¦अजरोऽयं महाविष्णुर्वसवो देवतागणाः ।¦तेषां निधानं भगवांस्तस्मिन् सर्वमिदं श्रितम् ॥ | |||
| verse_lines = ‘क इत्यानन्द उद्दिष्ट उश इच्छा प्रकीर्तिता ।¦आनन्देच्छास्वरूपोऽसौ कोशो विष्णुः प्रकीर्तितः ॥¦तस्योदरेऽन्तरिक्षं च पृथिवी पादबुध्नयोः(पादमूर्ध्नयोः .हृ) ।¦शिरोविवरगा द्यौश्च दिशो बाहुषु संस्थिताः ॥¦अजरोऽयं महाविष्णुर्वसवो देवतागणाः ।¦तेषां निधानं भगवांस्तस्मिन् सर्वमिदं श्रितम् ॥ | |||
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| verse_type = bhashya | |||
| verse_text = प्राचीदिक्संस्थितस्तस्य बाहुर्दक्षिण ऊर्ध्वगः ।¦जुहूः स होमकर्तृत्वाद् भुङ्क्ते ह्येतेन(ह्यनेन) केशवः ॥¦दक्षिणस्त्वधरो बाहुर्दक्षिणादिक् स्थितो विभोः ।¦सहमानेति स प्रोक्तो मानं वेदात्मकं यतः ॥¦शङ्खो वेदात्मकः शङ्खसहितो दक्षिणाधरः ।¦बाहुर्जुहोति चक्रेण शत्रूनित्यथवा जुहूः ॥¦प्रतीचीदिक्स्थितस्तस्य वामबाहुस्तथोत्तरः ।¦राजीयुक्तगदायुक्तो राज्ञी नामा(राज्ञीनामा) प्रकीर्तितः ॥¦अधरो वामबाहुर्य उत्तरादिक्स्थितो विभोः ।¦श्रिय आधारपद्मित्वात् सुभूतानामकः स्मृतः ॥¦दिङ्नामानश्च ते प्रोक्ता धर्मज्ञानादिदेशनात् (धर्ममानातिदेशनात् .हृ)।¦तेभ्यो जातो महावायुर्दिशां (महान् वायुः) वत्सस्ततः स्मृतः ॥¦धर्मज्ञानादिरूपेण विष्णोर्बाहुचतुष्टयात् ।¦जातं वायुं विदित्वैव पुत्रो भूत्वा न रोदिति ॥¦न जायते न म्रियते मुक्तो भूत्वा सुखी भवेत् ।¦वायुं हरेः सुतं ज्ञात्वा नाहं पुत्रतयाऽरुदम् ॥¦हरेः प्रसादसामर्थ्यादजरा चामरा ह्यहम् ।¦अनादिकालसम्बन्धादित्युवाच परा(पुरा) रमा ॥ | |||
| verse_lines = प्राचीदिक्संस्थितस्तस्य बाहुर्दक्षिण ऊर्ध्वगः ।¦जुहूः स होमकर्तृत्वाद् भुङ्क्ते ह्येतेन(ह्यनेन) केशवः ॥¦दक्षिणस्त्वधरो बाहुर्दक्षिणादिक् स्थितो विभोः ।¦सहमानेति स प्रोक्तो मानं वेदात्मकं यतः ॥¦शङ्खो वेदात्मकः शङ्खसहितो दक्षिणाधरः ।¦बाहुर्जुहोति चक्रेण शत्रूनित्यथवा जुहूः ॥¦प्रतीचीदिक्स्थितस्तस्य वामबाहुस्तथोत्तरः ।¦राजीयुक्तगदायुक्तो राज्ञी नामा(राज्ञीनामा) प्रकीर्तितः ॥¦अधरो वामबाहुर्य उत्तरादिक्स्थितो विभोः ।¦श्रिय आधारपद्मित्वात् सुभूतानामकः स्मृतः ॥¦दिङ्नामानश्च ते प्रोक्ता धर्मज्ञानादिदेशनात् (धर्ममानातिदेशनात् .हृ)।¦तेभ्यो जातो महावायुर्दिशां (महान् वायुः) वत्सस्ततः स्मृतः ॥¦धर्मज्ञानादिरूपेण विष्णोर्बाहुचतुष्टयात् ।¦जातं वायुं विदित्वैव पुत्रो भूत्वा न रोदिति ॥¦न जायते न म्रियते मुक्तो भूत्वा सुखी भवेत् ।¦वायुं हरेः सुतं ज्ञात्वा नाहं पुत्रतयाऽरुदम् ॥¦हरेः प्रसादसामर्थ्यादजरा चामरा ह्यहम् ।¦अनादिकालसम्बन्धादित्युवाच परा(पुरा) रमा ॥ | |||
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| verse_id = C03_S15_V07_B01 | |||
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| verse_text = अविनष्टं परानन्दकामं(अविनष्टपरानन्दम्) विष्णुं सदा ह्यहम् ।¦प्रपद्ये तत्प्रसादेन केवलं नात्मशक्तितः ॥¦प्राणं सर्वप्रणेतारं प्रपद्ये केशवं सदा ।¦प्रभूतं यदिदं (किञ्च)किञ्चित् प्रादुर्भावात्मकं हरेः ॥¦मत्स्याद्यं तत्प्राण एव विष्णुर्नास्त्यत्र संशयः ।¦तस्मान्मत्स्यादिरूपं तं विष्णुमेव प्रपद्यथ ॥¦हे जना इत्यवोचत् सा लक्ष्मीः सर्वाः प्रजाः प्रति ।¦प्राणनामा वासुदेवो मोक्षं स्वान् प्रणयेद् यतः ॥¦सङ्कर्षणस्तु भूर्नामा भूषयेज्ज्ञानतो यतः ।¦स पृथ्व्यां पृथिवीनामा स्वात्मानं प्रथयेद्यतः ॥¦अन्तरिक्षेऽन्तरिक्षाख्यो यतः साध्वन्तरीक्षते ।¦दिवि द्युनामा स विभुः सर्वक्रीडाकरत्वतः ॥¦प्रद्युम्नश्च भुवोनामा सृष्ट्या यद्भावयेज्जगत् ।¦सोऽग्निनामा परो वह्नावत्ति सर्वं यतो हुतम् ॥¦वायुनामा स वायुस्थो वात्यायुश्च यतोऽस्य तत् ।¦आदित्याख्यः स आदित्ये आददात्यायुरस्य यत् ॥¦स्वर्नामा त्वनिरुद्धोऽसौ(स्वर्णामा ह्यनिरुद्धोऽसौ) परानन्दप्रदत्वतः ।¦ऋग्वेदाख्यः स ऋग्वेदे ज्ञानं वेदयते यतः ॥¦यजुर्वेदो यजुर्वेदे यज्ञं वेदयते यतः ।¦सामवेदः सामवेदे साम्यं वेदयते ह्ययम् ॥¦एवं चतुर्विधं तत्त्वं तदवोचमहं हरेः ।¦इत्युवाचेन्दिरा देवी स्तुवन्ती परमं हरिम् ॥’ इति च ।¦‘पुंलिङ्गेनोच्यते स्त्री(श्रीश्च) च पुंवच्छक्तिमती यदि इति च’ ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = अविनष्टं परानन्दकामं(अविनष्टपरानन्दम्) विष्णुं सदा ह्यहम् ।¦प्रपद्ये तत्प्रसादेन केवलं नात्मशक्तितः ॥¦प्राणं सर्वप्रणेतारं प्रपद्ये केशवं सदा ।¦प्रभूतं यदिदं (किञ्च)किञ्चित् प्रादुर्भावात्मकं हरेः ॥¦मत्स्याद्यं तत्प्राण एव विष्णुर्नास्त्यत्र संशयः ।¦तस्मान्मत्स्यादिरूपं तं विष्णुमेव प्रपद्यथ ॥¦हे जना इत्यवोचत् सा लक्ष्मीः सर्वाः प्रजाः प्रति ।¦प्राणनामा वासुदेवो मोक्षं स्वान् प्रणयेद् यतः ॥¦सङ्कर्षणस्तु भूर्नामा भूषयेज्ज्ञानतो यतः ।¦स पृथ्व्यां पृथिवीनामा स्वात्मानं प्रथयेद्यतः ॥¦अन्तरिक्षेऽन्तरिक्षाख्यो यतः साध्वन्तरीक्षते ।¦दिवि द्युनामा स विभुः सर्वक्रीडाकरत्वतः ॥¦प्रद्युम्नश्च भुवोनामा सृष्ट्या यद्भावयेज्जगत् ।¦सोऽग्निनामा परो वह्नावत्ति सर्वं यतो हुतम् ॥¦वायुनामा स वायुस्थो वात्यायुश्च यतोऽस्य तत् ।¦आदित्याख्यः स आदित्ये आददात्यायुरस्य यत् ॥¦स्वर्नामा त्वनिरुद्धोऽसौ(स्वर्णामा ह्यनिरुद्धोऽसौ) परानन्दप्रदत्वतः ।¦ऋग्वेदाख्यः स ऋग्वेदे ज्ञानं वेदयते यतः ॥¦यजुर्वेदो यजुर्वेदे यज्ञं वेदयते यतः ।¦सामवेदः सामवेदे साम्यं वेदयते ह्ययम् ॥¦एवं चतुर्विधं तत्त्वं तदवोचमहं हरेः ।¦इत्युवाचेन्दिरा देवी स्तुवन्ती परमं हरिम् ॥’ इति च ।¦‘पुंलिङ्गेनोच्यते स्त्री(श्रीश्च) च पुंवच्छक्तिमती यदि इति च’ ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_text = ‘विष्णुपूजार्थयज्ञोऽहमित्युपासनमादरात् ।¦कुर्वीत पुरुषो नित्यं तस्य यत्षोडशोत्तरम् ॥¦(शतमायुस्तत्तु सवनत्रयम् .हृ)शतमायुस्तत्सवनत्रयमीरितमुत्तमम् ।¦चतुर्विंशत्तु यत्पूर्वं प्रातःसवनमेव तत् ॥¦प्रार्थयित्वा वसूंस्तद्गं पुमान् मृत्युमपानुदेत् ।¦मध्ये चतुश्चत्वारिंशन्मध्यमं सवनं स्मृतम् ॥¦रुद्राणां प्रार्थनेनात्र पुमान् मृत्युमपानुदेत् ।¦ततोऽष्टचत्वारिंशत्तु (तत् .हृ) तृतीयं सवनं स्मृतम्(मतम् .हृ) ॥¦आदित्यानां प्रार्थनेन तद्गं मृत्युमपानुदेत् ॥’ इति सर्वयज्ञे । | |||
| verse_lines = ‘विष्णुपूजार्थयज्ञोऽहमित्युपासनमादरात् ।¦कुर्वीत पुरुषो नित्यं तस्य यत्षोडशोत्तरम् ॥¦(शतमायुस्तत्तु सवनत्रयम् .हृ)शतमायुस्तत्सवनत्रयमीरितमुत्तमम् ।¦चतुर्विंशत्तु यत्पूर्वं प्रातःसवनमेव तत् ॥¦प्रार्थयित्वा वसूंस्तद्गं पुमान् मृत्युमपानुदेत् ।¦मध्ये चतुश्चत्वारिंशन्मध्यमं सवनं स्मृतम् ॥¦रुद्राणां प्रार्थनेनात्र पुमान् मृत्युमपानुदेत् ।¦ततोऽष्टचत्वारिंशत्तु (तत् .हृ) तृतीयं सवनं स्मृतम्(मतम् .हृ) ॥¦आदित्यानां प्रार्थनेन तद्गं मृत्युमपानुदेत् ॥’ इति सर्वयज्ञे । | |||
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| verse_text = महिदासोऽन्यः । कृष्णश्चान्यः एव ।¦‘महिदासस्त्वैतरेयः कृष्णोऽन्यो देवकीसुतः ।¦कपिलश्च द्वितीयोऽन्यस्त्रय एते पुरा नराः(पुयरातनाः .हृ) ॥¦सङ्गत्योच्चैस्तपस्तेपुर्ब्रह्मणे परमेष्ठिने ।¦मातुः स्वस्य च नामैक्यं विष्णुना स्यादिति ह्युभौ ॥¦स्वात्मशिष्यप्रशिष्याणां नामैक्यं(नामैक्ये .हृ) कपिलस्तथा ।¦एवमेव च वेदोक्ता भवेमेति त्वतन्द्रिताः ॥¦तान् वरान् प्रददौ तेषां ब्रह्मा लोकपितामहः ।¦तस्मात् (तन्नामिनस्त्वासन् .हृ)तन्नामिनश्चाऽसंस्त्रयस्ते मुनयोऽपि हि ॥¦महिदासस्त्वैतरेयो बह्वृचोपनिषद्गतः ।¦साक्षात् स भगवान् विष्णुस्तन्नामैको मुनिर्ह्यभूत् ॥¦कृष्णस्तु वासुदेवाख्यः परमात्मैव केवलम्(केवलः .हृ) ।¦तन्नामा देवकीपुत्रस्त्वन्योऽप्यभवदञ्जसा ॥¦कपिलो वासुदेवाख्यः साक्षान्नारायणः प्रभुः ।¦तन्नामा कपिलोऽन्यस्तु शिष्यनाम्ना सहाभवत् ॥¦स षोडशशतञ्जीवी महिदासोऽपरस्त्वृषिः ।¦घोरशिष्यस्तथा कृष्णः कपिलश्च कुशास्त्रकृत् ॥¦त्रय एते वरं प्राप्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।¦कृतकृत्याः प्रमुमुदुस्तन्नामानश्च तेऽभवन् ॥ इति कालकीये ॥ १६ ॥ | |||
| verse_lines = महिदासोऽन्यः । कृष्णश्चान्यः एव ।¦‘महिदासस्त्वैतरेयः कृष्णोऽन्यो देवकीसुतः ।¦कपिलश्च द्वितीयोऽन्यस्त्रय एते पुरा नराः(पुयरातनाः .हृ) ॥¦सङ्गत्योच्चैस्तपस्तेपुर्ब्रह्मणे परमेष्ठिने ।¦मातुः स्वस्य च नामैक्यं विष्णुना स्यादिति ह्युभौ ॥¦स्वात्मशिष्यप्रशिष्याणां नामैक्यं(नामैक्ये .हृ) कपिलस्तथा ।¦एवमेव च वेदोक्ता भवेमेति त्वतन्द्रिताः ॥¦तान् वरान् प्रददौ तेषां ब्रह्मा लोकपितामहः ।¦तस्मात् (तन्नामिनस्त्वासन् .हृ)तन्नामिनश्चाऽसंस्त्रयस्ते मुनयोऽपि हि ॥¦महिदासस्त्वैतरेयो बह्वृचोपनिषद्गतः ।¦साक्षात् स भगवान् विष्णुस्तन्नामैको मुनिर्ह्यभूत् ॥¦कृष्णस्तु वासुदेवाख्यः परमात्मैव केवलम्(केवलः .हृ) ।¦तन्नामा देवकीपुत्रस्त्वन्योऽप्यभवदञ्जसा ॥¦कपिलो वासुदेवाख्यः साक्षान्नारायणः प्रभुः ।¦तन्नामा कपिलोऽन्यस्तु शिष्यनाम्ना सहाभवत् ॥¦स षोडशशतञ्जीवी महिदासोऽपरस्त्वृषिः ।¦घोरशिष्यस्तथा कृष्णः कपिलश्च कुशास्त्रकृत् ॥¦त्रय एते वरं प्राप्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।¦कृतकृत्याः प्रमुमुदुस्तन्नामानश्च तेऽभवन् ॥ इति कालकीये ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_text = ‘स्वरूपभूतयज्ञस्य क्षुत्पिपासाऽरतिस्तथा ।¦दीक्षा भोजनपाने च रतिश्चोपसदः स्मृताः ॥¦व्यवायहासभक्षास्तु स्तुतशस्त्रात्मकाः(स्तुतिशस्त्रात्मकाः) स्मृताः ।¦तपो दानार्जवाहिंसाः सत्यमप्यस्य दक्षिणाः(दक्षिणा हृ.) ॥¦सोष्यत्यसोष्टेति ततो यज्ञवत् पुत्रजन्मनि ।¦आहुर्हि पुनरुत्पत्तिं प्रसवः प्रथमा पितुः ॥¦यज्ञस्नानं तु मरणं तदा ध्यायेत् त्रयं पुमान् ।¦भगवन्नक्षयोऽसि त्वमच्युतोऽसि गुणैः सदा ॥¦प्राणाच्च सुखितो नित्यमाधिक्येनेति चिन्तयेत् ॥ इति सत्तत्त्वे । | |||
| verse_lines = ‘स्वरूपभूतयज्ञस्य क्षुत्पिपासाऽरतिस्तथा ।¦दीक्षा भोजनपाने च रतिश्चोपसदः स्मृताः ॥¦व्यवायहासभक्षास्तु स्तुतशस्त्रात्मकाः(स्तुतिशस्त्रात्मकाः) स्मृताः ।¦तपो दानार्जवाहिंसाः सत्यमप्यस्य दक्षिणाः(दक्षिणा हृ.) ॥¦सोष्यत्यसोष्टेति ततो यज्ञवत् पुत्रजन्मनि ।¦आहुर्हि पुनरुत्पत्तिं प्रसवः प्रथमा पितुः ॥¦यज्ञस्नानं तु मरणं तदा ध्यायेत् त्रयं पुमान् ।¦भगवन्नक्षयोऽसि त्वमच्युतोऽसि गुणैः सदा ॥¦प्राणाच्च सुखितो नित्यमाधिक्येनेति चिन्तयेत् ॥ इति सत्तत्त्वे । | |||
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| verse_text = <span class="gr-moola">आदित्</span> तस्मादेव= तत्प्रसादादेव । <span class="gr-moola">प्रत्नस्य</span> पुरातनस्य= अनादेर्भगवतो <span class="gr-moola">रेतसः</span> रतिरूपस्य <span class="gr-moola">ज्योतिः पश्यन्ति (प्रपश्यन्ति)</span> । वासेन रमयतीति <span class="gr-moola">वासरम्</span> । <span class="gr-moola">दिवःपरतो</span> वैकुण्ठे <span class="gr-moola">यदिध्यते</span> ऋद्धतममेव सर्वदा । ‘<span class="gr-moola">अथ यदत परो दिवः</span>’ इत्युक्तत्वाच्च(‘<span class="gr-moola">अथ यदत परः</span>’ इत्युक्तत्वाच्च) । न चाऽदित्यमण्डलं दिवः परतः । <span class="gr-moola">उत्तरं ज्योतिः पश्यन्तः</span> स्वरानन्दरूपं परिपश्यन्तो वयं <span class="gr-moola">तमस उदगन्म</span> । <span class="gr-moola">उत्तरं</span> ज्योतिः <span class="gr-moola">पश्यन्तः</span> तदेवोत्तरं <span class="gr-moola">स्वश्च पश्यन्तः</span> । द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्था(द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्थे हृ.) । <span class="gr-moola">उद्</span> आख्यं <span class="gr-moola">ज्योतिरुत्तमं</span> तमसः सकाशाद् <span class="gr-moola">अगन्म</span> प्राप्ताः स्म इत्यर्थः । ‘तस्योदिति नाम’ इति श्रुतेः । <span class="gr-moola">देवत्रा देवं</span> देवविषयेऽपि देवं, देवानां देवमित्यर्थः । सूरिभिः प्राप्यत्वात् <span class="gr-moola">सूर्यम्</span> ।¦‘रतिरूपं परं ज्योतिरनादेः केशवस्य यत् ।¦तत्प्रसादेन पश्यन्ति हृदि वासाद् रतिप्रदम् ॥¦यत्पूर्णं सर्वदा(सत् सदा .हृ) भाति वैकुण्ठे परतो दिवः ।¦तदुदाख्यं प्रपश्यन्तो निर्गत्य तमसो वयम् ॥¦ज्योतिरानन्दसद्रूपम् उत्तमोत्तमसूत्तमम् ।¦देवानां दैवतं साक्षात् सूरिप्राप्यं परं पदम् ॥¦प्राप्ताः स्म वासुदेवाख्यमिति मन्त्रदृगब्रवीत् ॥’ इति नारायणीये ॥ १७ ॥ | |||
| verse_lines = <span class="gr-moola">आदित्</span> तस्मादेव= तत्प्रसादादेव । <span class="gr-moola">प्रत्नस्य</span> पुरातनस्य= अनादेर्भगवतो <span class="gr-moola">रेतसः</span> रतिरूपस्य <span class="gr-moola">ज्योतिः पश्यन्ति (प्रपश्यन्ति)</span> । वासेन रमयतीति <span class="gr-moola">वासरम्</span> । <span class="gr-moola">दिवःपरतो</span> वैकुण्ठे <span class="gr-moola">यदिध्यते</span> ऋद्धतममेव सर्वदा । ‘<span class="gr-moola">अथ यदत परो दिवः</span>’ इत्युक्तत्वाच्च(‘<span class="gr-moola">अथ यदत परः</span>’ इत्युक्तत्वाच्च) । न चाऽदित्यमण्डलं दिवः परतः । <span class="gr-moola">उत्तरं ज्योतिः पश्यन्तः</span> स्वरानन्दरूपं परिपश्यन्तो वयं <span class="gr-moola">तमस उदगन्म</span> । <span class="gr-moola">उत्तरं</span> ज्योतिः <span class="gr-moola">पश्यन्तः</span> तदेवोत्तरं <span class="gr-moola">स्वश्च पश्यन्तः</span> । द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्था(द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्थे हृ.) । <span class="gr-moola">उद्</span> आख्यं <span class="gr-moola">ज्योतिरुत्तमं</span> तमसः सकाशाद् <span class="gr-moola">अगन्म</span> प्राप्ताः स्म इत्यर्थः । ‘तस्योदिति नाम’ इति श्रुतेः । <span class="gr-moola">देवत्रा देवं</span> देवविषयेऽपि देवं, देवानां देवमित्यर्थः । सूरिभिः प्राप्यत्वात् <span class="gr-moola">सूर्यम्</span> ।¦‘रतिरूपं परं ज्योतिरनादेः केशवस्य यत् ।¦तत्प्रसादेन पश्यन्ति हृदि वासाद् रतिप्रदम् ॥¦यत्पूर्णं सर्वदा(सत् सदा .हृ) भाति वैकुण्ठे परतो दिवः ।¦तदुदाख्यं प्रपश्यन्तो निर्गत्य तमसो वयम् ॥¦ज्योतिरानन्दसद्रूपम् उत्तमोत्तमसूत्तमम् ।¦देवानां दैवतं साक्षात् सूरिप्राप्यं परं पदम् ॥¦प्राप्ताः स्म वासुदेवाख्यमिति मन्त्रदृगब्रवीत् ॥’ इति नारायणीये ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_text = ‘मनःसंस्थस्तु यो देवः साक्षान्नारायणः प्रभुः ।¦स एवाऽकाशसंस्थश्च मन आकाशनामकः ॥¦मननान्मन आकाश आ समन्तात् प्रकाशनात् ।¦वासुदेवादिभेदेन स वागादिषु संस्थितः ॥¦अग्न्यादिषु च तन्नामा वागादिस्थः स एव तु ।¦अग्न्यादिस्थैः सहैवेशो भाति दुष्टांस्तपत्यथ ॥¦एवं विद्वांस्तमीशेशं यशोज्ञानसुखात्मताम् ।¦कीर्तिं च ब्रह्मसम्प्राप्त्या(ब्रह्म सम्प्राप्य .हृ) वरतां मुक्तिगामपि ॥¦प्राप्य भाति तपत्यद्धा स्वाज्ञानादिकमेव च॥’ इति च ॥ १८ ॥ | |||
| verse_lines = ‘मनःसंस्थस्तु यो देवः साक्षान्नारायणः प्रभुः ।¦स एवाऽकाशसंस्थश्च मन आकाशनामकः ॥¦मननान्मन आकाश आ समन्तात् प्रकाशनात् ।¦वासुदेवादिभेदेन स वागादिषु संस्थितः ॥¦अग्न्यादिषु च तन्नामा वागादिस्थः स एव तु ।¦अग्न्यादिस्थैः सहैवेशो भाति दुष्टांस्तपत्यथ ॥¦एवं विद्वांस्तमीशेशं यशोज्ञानसुखात्मताम् ।¦कीर्तिं च ब्रह्मसम्प्राप्त्या(ब्रह्म सम्प्राप्य .हृ) वरतां मुक्तिगामपि ॥¦प्राप्य भाति तपत्यद्धा स्वाज्ञानादिकमेव च॥’ इति च ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_text = ‘अगम्यत्वादसन्नाम ब्रह्म नारायणाभिधम् ।¦प्रलये वासुदेवाख्यं गम्यं सदभवद् विदाम् ॥¦तत्प्रकृत्या समभवत् तत आण्डमजायत ।¦तस्मिन्नादित्यनामाऽसावभवत् सूर्यमण्डले ॥¦नियन्तैव च सूर्यस्य भगवान् पुरुषोत्तमः ।¦तस्मिन्नादित्यनामानमादित्यस्थं जनार्दनम् ॥¦ब्रह्मोपासीत परमं सर्ववेदज्ञता ततः॥’ इति ब्रह्मतत्त्वे ।¦<span class="gr-moola">उलूलव</span> उरूरव । अतिमहान्तो गायत्र्यादिघोषा उप च <span class="gr-moola">निम्रेडेरन्</span> । मुक्ते तस्मिन्नेव वसेयुः ।¦‘सूर्यबिम्बस्थिते विष्णौ जायमाने परात्मनि ।¦गायत्रीपूर्वकैर्वेदैर्ब्रह्माद्यास्समुपस्थिताः ॥¦उपतिष्ठन्त्यतो नित्यं गायत्र्यादिभिरञ्जसा ।¦तद्विद्वान् मुक्त आवासो वेदानां सर्वदा भवेद्॥’ इति च ॥ १९ ॥ | |||
| verse_lines = ‘अगम्यत्वादसन्नाम ब्रह्म नारायणाभिधम् ।¦प्रलये वासुदेवाख्यं गम्यं सदभवद् विदाम् ॥¦तत्प्रकृत्या समभवत् तत आण्डमजायत ।¦तस्मिन्नादित्यनामाऽसावभवत् सूर्यमण्डले ॥¦नियन्तैव च सूर्यस्य भगवान् पुरुषोत्तमः ।¦तस्मिन्नादित्यनामानमादित्यस्थं जनार्दनम् ॥¦ब्रह्मोपासीत परमं सर्ववेदज्ञता ततः॥’ इति ब्रह्मतत्त्वे ।¦<span class="gr-moola">उलूलव</span> उरूरव । अतिमहान्तो गायत्र्यादिघोषा उप च <span class="gr-moola">निम्रेडेरन्</span> । मुक्ते तस्मिन्नेव वसेयुः ।¦‘सूर्यबिम्बस्थिते विष्णौ जायमाने परात्मनि ।¦गायत्रीपूर्वकैर्वेदैर्ब्रह्माद्यास्समुपस्थिताः ॥¦उपतिष्ठन्त्यतो नित्यं गायत्र्यादिभिरञ्जसा ।¦तद्विद्वान् मुक्त आवासो वेदानां सर्वदा भवेद्॥’ इति च ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_text = <span class="gr-moola">भल्लाक्ष!</span> मन्दाक्ष! । यथा कृते जिते त्रेतादिजयफलं च तस्यैव(तस्य) भवति । एवमन्येषां पुण्यफलं प्राधान्येन तस्यैव भवति । <span class="gr-moola">अरे अङ्ग</span> इष्ट । <span class="gr-moola">सयुग्वा</span> रैक्वो ज्ञातव्यः । <span class="gr-moola">अहं ह्यरा३</span> इति प्लुतिः पामकषणभावेन ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = <span class="gr-moola">भल्लाक्ष!</span> मन्दाक्ष! । यथा कृते जिते त्रेतादिजयफलं च तस्यैव(तस्य) भवति । एवमन्येषां पुण्यफलं प्राधान्येन तस्यैव भवति । <span class="gr-moola">अरे अङ्ग</span> इष्ट । <span class="gr-moola">सयुग्वा</span> रैक्वो ज्ञातव्यः । <span class="gr-moola">अहं ह्यरा३</span> इति प्लुतिः पामकषणभावेन ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = शुचाऽऽद्रवणाच्छूद्रो राजा पौत्रायणः ।¦‘राजा पौत्रायणः शोकाच्छूद्रेति मुनिनोदितः ।¦प्राणविद्यामवाप्यास्मात् परं धर्ममवाप्तवान् ॥’ इति पाद्मे ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = शुचाऽऽद्रवणाच्छूद्रो राजा पौत्रायणः ।¦‘राजा पौत्रायणः शोकाच्छूद्रेति मुनिनोदितः ।¦प्राणविद्यामवाप्यास्मात् परं धर्ममवाप्तवान् ॥’ इति पाद्मे ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = ‘संवृङ्क्ते सर्वदेवान् यद्वायुः संवर्ग ईरितः ।¦महिमाऽस्य महानेष यदनाद्योऽत्ति देवताः॥’ इति प्रभञ्जने ।¦‘दशेति वै सर्वम्’(ऐ.उ.२.१.४) इति श्रुतेः । कृतस्य च पूर्णात्मकत्वाद् अध्यात्माधिदैवतभेदेन(दैवभेदेन) पञ्चदेवता दशभूताः कृतम् । तस्माद् वायुना सह दशसङ्ख्यापूरणात् सर्वदिक्षु स्थिता देवता वायुना सहान्नमेव । अन्नादी देवता विराड् विष्णुरेव । <span class="gr-moola">अनद्यमान</span> इत्यन्यैरनद्यमानः ।¦‘वायुस्तु सर्वदेवात्ता वायोरत्ता जनार्दनः ।¦न तस्य कश्चिदत्ताऽस्ति स विराडधिराजनात्॥’ इति च ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = ‘संवृङ्क्ते सर्वदेवान् यद्वायुः संवर्ग ईरितः ।¦महिमाऽस्य महानेष यदनाद्योऽत्ति देवताः॥’ इति प्रभञ्जने ।¦‘दशेति वै सर्वम्’(ऐ.उ.२.१.४) इति श्रुतेः । कृतस्य च पूर्णात्मकत्वाद् अध्यात्माधिदैवतभेदेन(दैवभेदेन) पञ्चदेवता दशभूताः कृतम् । तस्माद् वायुना सह दशसङ्ख्यापूरणात् सर्वदिक्षु स्थिता देवता वायुना सहान्नमेव । अन्नादी देवता विराड् विष्णुरेव । <span class="gr-moola">अनद्यमान</span> इत्यन्यैरनद्यमानः ।¦‘वायुस्तु सर्वदेवात्ता वायोरत्ता जनार्दनः ।¦न तस्य कश्चिदत्ताऽस्ति स विराडधिराजनात्॥’ इति च ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = आर्जवं ब्राह्मणे साक्षाच्छूद्रोऽनार्जवलक्षणः ।¦गौतमस्त्विति विज्ञाय सत्यकाममुपानयत्॥’ इति सामसंहितायाम् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = आर्जवं ब्राह्मणे साक्षाच्छूद्रोऽनार्जवलक्षणः ।¦गौतमस्त्विति विज्ञाय सत्यकाममुपानयत्॥’ इति सामसंहितायाम् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = ‘वायुर्वृषभरूपः सन्नग्निर्हंसश्चतुर्मुखः ।¦मद्गुरूपश्च वरुणः सत्यकामाय होचिरे ॥¦प्रकाशानन्ततेजोवत्स्थानवत्सञ्ज्ञिका(सञ्ज्ञका) हरेः ।¦वासुदेवादिका मूर्तीः प्रत्येकं चतुरात्मनः ॥¦दिगादिषु स्थितास्तेषामधिपाश्च तदाख्यकाः ।¦नाऽचार्यबुध्या तैरुक्तमतोऽनुज्ञां गुरोरगात् ॥¦उत्तमाचार्यसम्प्राप्त्यै नावराचार्यतः क्वचित् ।¦इच्छेदनुज्ञां श्रुत्वाऽपि नानुज्ञां प्रार्थयेत् ततः ॥¦ऋषिभ्यस्तूत्तमा देवा देवेभ्यो वायुरुत्तमः ।¦वायोश्च भगवान् विष्णुर्न तस्मादुत्तमो गुरुः ॥’ इत्याचार्यसंहितायाम् ।¦अत्र <span class="gr-moola">ह न किञ्चन वीयाय</span> । देवेभ्यः श्रुत्वा न च ते(न ते) काचिद्धानिरभवदित्यर्थः ॥ ५-९ ॥ | |||
| verse_lines = ‘वायुर्वृषभरूपः सन्नग्निर्हंसश्चतुर्मुखः ।¦मद्गुरूपश्च वरुणः सत्यकामाय होचिरे ॥¦प्रकाशानन्ततेजोवत्स्थानवत्सञ्ज्ञिका(सञ्ज्ञका) हरेः ।¦वासुदेवादिका मूर्तीः प्रत्येकं चतुरात्मनः ॥¦दिगादिषु स्थितास्तेषामधिपाश्च तदाख्यकाः ।¦नाऽचार्यबुध्या तैरुक्तमतोऽनुज्ञां गुरोरगात् ॥¦उत्तमाचार्यसम्प्राप्त्यै नावराचार्यतः क्वचित् ।¦इच्छेदनुज्ञां श्रुत्वाऽपि नानुज्ञां प्रार्थयेत् ततः ॥¦ऋषिभ्यस्तूत्तमा देवा देवेभ्यो वायुरुत्तमः ।¦वायोश्च भगवान् विष्णुर्न तस्मादुत्तमो गुरुः ॥’ इत्याचार्यसंहितायाम् ।¦अत्र <span class="gr-moola">ह न किञ्चन वीयाय</span> । देवेभ्यः श्रुत्वा न च ते(न ते) काचिद्धानिरभवदित्यर्थः ॥ ५-९ ॥ | |||
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| verse_text = <span class="gr-moola">प्राणो ब्रह्म</span> बलरूपं ब्रह्म । <span class="gr-moola">कम्</span>आनन्दरूपम् । <span class="gr-moola">खं</span> ज्ञानरूपम् ॥¦‘अपरब्रह्म(अपरं ब्रह्म) स प्राणः साक्षाद्यो बलदेवता ॥¦ज्ञानानन्दात्मकं पूर्णं परम्ब्रह्म स्वयं हरिः ।¦नैजानन्दबलोद्रेकः कमित्युक्तो मनीषिभिः ॥¦बलज्ञानसमाहारः पूर्णः खमिति शब्दितः(पूर्णं खमिति शब्दितम्)।¦तदात्मकः परो विष्णुराकाश इति कीर्तितः।¦एवं प्राणस्तथाऽऽकाशो ब्रह्मणी द्वे प्रकीर्तिते ॥’ इति च ।¦प्राणशब्दस्य वायुरर्थः प्रसिद्धः । कखयोर्भिन्नार्थत्वाशङ्कया(भिन्नवस्तुत्वाशङ्काया) <span class="gr-moola">कं च खं च न विजानामि</span> इत्याह । अत एवैक्याभिप्रायेण <span class="gr-moola">यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कम्</span> इत्यूचुः ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = <span class="gr-moola">प्राणो ब्रह्म</span> बलरूपं ब्रह्म । <span class="gr-moola">कम्</span>आनन्दरूपम् । <span class="gr-moola">खं</span> ज्ञानरूपम् ॥¦‘अपरब्रह्म(अपरं ब्रह्म) स प्राणः साक्षाद्यो बलदेवता ॥¦ज्ञानानन्दात्मकं पूर्णं परम्ब्रह्म स्वयं हरिः ।¦नैजानन्दबलोद्रेकः कमित्युक्तो मनीषिभिः ॥¦बलज्ञानसमाहारः पूर्णः खमिति शब्दितः(पूर्णं खमिति शब्दितम्)।¦तदात्मकः परो विष्णुराकाश इति कीर्तितः।¦एवं प्राणस्तथाऽऽकाशो ब्रह्मणी द्वे प्रकीर्तिते ॥’ इति च ।¦प्राणशब्दस्य वायुरर्थः प्रसिद्धः । कखयोर्भिन्नार्थत्वाशङ्कया(भिन्नवस्तुत्वाशङ्काया) <span class="gr-moola">कं च खं च न विजानामि</span> इत्याह । अत एवैक्याभिप्रायेण <span class="gr-moola">यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कम्</span> इत्यूचुः ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = ‘पृथुत्वात् पृथिवी विष्णुरग्निश्चाप्यङ्गनेतृतः ।¦अन्नमत्तृत्वतो नित्यमादित्यश्चादिरूपतः ॥¦आप आपालनाच्चैव देशनाद्दिश एव च ।¦अनन्यराजो नक्षत्रमानन्दत्वाच्च चन्द्रमाः ॥¦प्राणोऽसौ बलरूपत्वादाकाशः पूर्तिहेतुतः ।¦द्यौः प्रकाशस्वरूपत्वाद् वेदनाद् विद्युदेव च ॥¦यः सोमसूर्यविद्युत्सु(सूर्यसोमविद्युत्सु) तत्तन्नामा हरिः परः ।¦अहेयत्वादहंनामा गार्हपत्यादिसंस्थितः ॥’ इति तत्त्वसंहितायाम् ।¦‘सोऽहमस्मि’ इति वाक्यस्य जीवब्रह्मैक्यपरत्वनिरासः¦जीवैक्यपक्षे आदित्ये पुरुषं चन्द्रमसि विद्युतीति भेदव्यपदेशो न युज्यते । <span class="gr-moola">‘पृथिव्यग्निरन्नमादित्यः’</span>, <span class="gr-moola">‘आदित्ये पुरुषः’</span>इत्यादिना आदित्यादिशब्दवाच्यौ प्रथमार्थः सप्तम्यर्थश्च द्वौ प्रतीयेते । अतो नैक्यमुच्यते । <span class="gr-moola">‘स एवाहमस्मि’</span>इत्यन्तर्यामिणोः सर्वविशेषाभावज्ञापनार्थम् । पूर्वं <span class="gr-moola">‘सोऽहमस्मि’</span> इत्यभेदे तात्पर्याधिक्यज्ञापनाय ।¦‘अहमस्म्यादिकाः शब्दा अन्तर्यामिणि मुख्यतः ।¦तत्सम्बन्धाज्जीवगाश्च तस्माद् वेदगता हरौ ॥¦अस्मच्छब्दोदितोऽन्तःस्थ आत्मा व्याप्तो जनार्दनः ।¦अग्नयो द्विविधं विष्णुमवोचन्नुपकोसले ॥’ इति सामसंहितायाम् ।¦<span class="gr-moola">नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते</span>भृत्यवानेव भवति । <span class="gr-moola">लोकी</span>भगवल्लोकी <span class="gr-moola">भवति</span> ॥ १३ ॥ | |||
| verse_lines = ‘पृथुत्वात् पृथिवी विष्णुरग्निश्चाप्यङ्गनेतृतः ।¦अन्नमत्तृत्वतो नित्यमादित्यश्चादिरूपतः ॥¦आप आपालनाच्चैव देशनाद्दिश एव च ।¦अनन्यराजो नक्षत्रमानन्दत्वाच्च चन्द्रमाः ॥¦प्राणोऽसौ बलरूपत्वादाकाशः पूर्तिहेतुतः ।¦द्यौः प्रकाशस्वरूपत्वाद् वेदनाद् विद्युदेव च ॥¦यः सोमसूर्यविद्युत्सु(सूर्यसोमविद्युत्सु) तत्तन्नामा हरिः परः ।¦अहेयत्वादहंनामा गार्हपत्यादिसंस्थितः ॥’ इति तत्त्वसंहितायाम् ।¦‘सोऽहमस्मि’ इति वाक्यस्य जीवब्रह्मैक्यपरत्वनिरासः¦जीवैक्यपक्षे आदित्ये पुरुषं चन्द्रमसि विद्युतीति भेदव्यपदेशो न युज्यते । <span class="gr-moola">‘पृथिव्यग्निरन्नमादित्यः’</span>, <span class="gr-moola">‘आदित्ये पुरुषः’</span>इत्यादिना आदित्यादिशब्दवाच्यौ प्रथमार्थः सप्तम्यर्थश्च द्वौ प्रतीयेते । अतो नैक्यमुच्यते । <span class="gr-moola">‘स एवाहमस्मि’</span>इत्यन्तर्यामिणोः सर्वविशेषाभावज्ञापनार्थम् । पूर्वं <span class="gr-moola">‘सोऽहमस्मि’</span> इत्यभेदे तात्पर्याधिक्यज्ञापनाय ।¦‘अहमस्म्यादिकाः शब्दा अन्तर्यामिणि मुख्यतः ।¦तत्सम्बन्धाज्जीवगाश्च तस्माद् वेदगता हरौ ॥¦अस्मच्छब्दोदितोऽन्तःस्थ आत्मा व्याप्तो जनार्दनः ।¦अग्नयो द्विविधं विष्णुमवोचन्नुपकोसले ॥’ इति सामसंहितायाम् ।¦<span class="gr-moola">नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते</span>भृत्यवानेव भवति । <span class="gr-moola">लोकी</span>भगवल्लोकी <span class="gr-moola">भवति</span> ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_text = इह च अव च(अवं च) <span class="gr-moola">इहावे</span>। इहेति मनुष्यलोकस्था उच्यन्ते, अवेति पातालस्थाः(पाताळस्थाः) । मानुषासुरौ भगवन्तं <span class="gr-moola">निह्नुत</span> एव न वक्तुं समर्थौ । अतो देवा एव मामनुशशासुरित्यर्थः । <span class="gr-moola">ईदृशा</span> इति वर्णतो ज्वालावर्णा इति । <span class="gr-moola">अन्यादृशाश्च</span> करशिरश्चरणादिमन्तः । चन्द्रादिसर्वनामवत्वात् । ‘यो देवानां नामधा एक एव’ इति श्रुतेर्विष्णोरेव सर्वनामानि ॥ १४ ॥ | |||
| verse_lines = इह च अव च(अवं च) <span class="gr-moola">इहावे</span>। इहेति मनुष्यलोकस्था उच्यन्ते, अवेति पातालस्थाः(पाताळस्थाः) । मानुषासुरौ भगवन्तं <span class="gr-moola">निह्नुत</span> एव न वक्तुं समर्थौ । अतो देवा एव मामनुशशासुरित्यर्थः । <span class="gr-moola">ईदृशा</span> इति वर्णतो ज्वालावर्णा इति । <span class="gr-moola">अन्यादृशाश्च</span> करशिरश्चरणादिमन्तः । चन्द्रादिसर्वनामवत्वात् । ‘यो देवानां नामधा एक एव’ इति श्रुतेर्विष्णोरेव सर्वनामानि ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_text = असङ्गभगवत्स्थानत्वाच्चक्षुषोऽसङ्गत्वमुच्यते ।¦यत्स्थानत्वादिदं चक्षुरसङ्गं सर्ववस्तुषु ।¦तस्मै नमो भगवते वामनाय परात्मने ॥’ इति च महाकौर्मे ।¦<span class="gr-moola">इमं मानवमावर्तं नाऽवर्तन्ते</span>। मानवा यत्रावर्तन्ते स मानवावर्तः । तं मानवावर्तं प्रति नावर्तन्ते ।¦‘चक्षुस्थं वामनं वेद स पुनर्नैव जायते ।¦मुक्तो दुस्तरसंसाराद् वामनं प्राप्नुतेऽचिरात्॥’ इति च ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = असङ्गभगवत्स्थानत्वाच्चक्षुषोऽसङ्गत्वमुच्यते ।¦यत्स्थानत्वादिदं चक्षुरसङ्गं सर्ववस्तुषु ।¦तस्मै नमो भगवते वामनाय परात्मने ॥’ इति च महाकौर्मे ।¦<span class="gr-moola">इमं मानवमावर्तं नाऽवर्तन्ते</span>। मानवा यत्रावर्तन्ते स मानवावर्तः । तं मानवावर्तं प्रति नावर्तन्ते ।¦‘चक्षुस्थं वामनं वेद स पुनर्नैव जायते ।¦मुक्तो दुस्तरसंसाराद् वामनं प्राप्नुतेऽचिरात्॥’ इति च ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = ‘यज्ञाभिमानी यज्ञाख्यो वायुर्यज्ञे प्रतिष्ठितः ।¦ज्ञ शुद्धभाव इत्यस्माद् यन्नयं पावयेद् यतः ॥¦अतो वायुर्यज्ञनामा तत्पादौ वाङ्मनःस्थितौ ।¦दक्षिणोऽस्य मनःसंस्थो ब्रह्मर्त्विक् तस्य पूजकः ॥¦होत्राद्या वाचि संस्थस्य(श्च) वामपादस्य पूजकाः ।¦तस्मात् प्रातरनूवाकपरिधान्योर्यदन्तरा ॥¦ब्रह्मा चेदुत्सृजेद् वाचं यज्ञपाल्लोपकृद्(लोककृत्) भवेत् ।¦वाङ्मनःपादयज्ञाख्यप्रतिमो वायुरीरितः ॥¦ध्यायन् वायुं हरिं चैव ततो ब्रह्मा मुनिर्भवेत् ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_text = ‘अग्निर्नासिक्यवायुश्च सूर्यो लोकरसाह्वयः ।¦अग्ने रसस्तु ऋग्वेदमानी ब्रह्मा प्रकीर्तितः ॥¦नासिक्यवायोस्तु रसो यजुर्वेदात्मको हरः ।¦सामवेदाभिमानी तु वायुः सूर्यरसः स्मृतः ॥¦वराहसिंहकपिलास्तेषां भूरादिनामकाः ।¦व्याहृतीभिस्ततो जुह्वन् ब्रह्मैवंविद् विरिष्टितः ।¦सर्वान् स ऋत्विजो रक्षेद् ब्रह्मैवंवित् ततो भवेत् ॥’ इति च ।¦<span class="gr-moola">उदक्प्रवण</span> ऊर्ध्वप्रवणः ऊर्ध्वलोकानुसारी । यज्ञस्य दुरिष्ट्या <span class="gr-moola">यतो यतः</span> स्थानाद्<span class="gr-moola">आवर्तते तत्तत्</span>स्थानमेवंविदा ब्रह्मणा <span class="gr-moola">गच्छति</span> । तद् <span class="gr-moola">ब्रह्मैवैकर्त्विक् । कुरून्</span> कर्तॄन् यजमानादीन् <span class="gr-moola">अभिरक्षति</span> । <span class="gr-moola">अश्वा</span> आशुज्ञानी । ‘वा= गतिगन्धनयोः’इति धातोः । गतिशब्दश्चावगतौ भवति । ‘दीर्घबिन्दुविसर्गादीनां लोपो वा’ इति सूत्रादाशुवैवाश्वा ॥ १७ ॥ | |||
| verse_lines = ‘अग्निर्नासिक्यवायुश्च सूर्यो लोकरसाह्वयः ।¦अग्ने रसस्तु ऋग्वेदमानी ब्रह्मा प्रकीर्तितः ॥¦नासिक्यवायोस्तु रसो यजुर्वेदात्मको हरः ।¦सामवेदाभिमानी तु वायुः सूर्यरसः स्मृतः ॥¦वराहसिंहकपिलास्तेषां भूरादिनामकाः ।¦व्याहृतीभिस्ततो जुह्वन् ब्रह्मैवंविद् विरिष्टितः ।¦सर्वान् स ऋत्विजो रक्षेद् ब्रह्मैवंवित् ततो भवेत् ॥’ इति च ।¦<span class="gr-moola">उदक्प्रवण</span> ऊर्ध्वप्रवणः ऊर्ध्वलोकानुसारी । यज्ञस्य दुरिष्ट्या <span class="gr-moola">यतो यतः</span> स्थानाद्<span class="gr-moola">आवर्तते तत्तत्</span>स्थानमेवंविदा ब्रह्मणा <span class="gr-moola">गच्छति</span> । तद् <span class="gr-moola">ब्रह्मैवैकर्त्विक् । कुरून्</span> कर्तॄन् यजमानादीन् <span class="gr-moola">अभिरक्षति</span> । <span class="gr-moola">अश्वा</span> आशुज्ञानी । ‘वा= गतिगन्धनयोः’इति धातोः । गतिशब्दश्चावगतौ भवति । ‘दीर्घबिन्दुविसर्गादीनां लोपो वा’ इति सूत्रादाशुवैवाश्वा ॥ १७ ॥ | |||
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| verse_text = यः श्रेष्ठं ज्येष्ठमखिलदेवानां(श्रेष्ठज्येष्ठमखिलदेवानां) वायुमञ्जसा ।¦वेद स स्वसमानानां ज्येष्ठः श्रेष्ठो विमुक्तिगः ॥¦समीपे वसतां श्रेष्ठो वसिष्ठस्यैव वेदनात् ।¦एकस्थाने स्थितिस्तु स्यात् प्रतिष्ठाज्ञस्य चेच्छतः ॥¦सम्पद्वेत्तुः सम्पदः स्युर्गृहं चाऽयतनं विदः । | |||
| verse_lines = यः श्रेष्ठं ज्येष्ठमखिलदेवानां(श्रेष्ठज्येष्ठमखिलदेवानां) वायुमञ्जसा ।¦वेद स स्वसमानानां ज्येष्ठः श्रेष्ठो विमुक्तिगः ॥¦समीपे वसतां श्रेष्ठो वसिष्ठस्यैव वेदनात् ।¦एकस्थाने स्थितिस्तु स्यात् प्रतिष्ठाज्ञस्य चेच्छतः ॥¦सम्पद्वेत्तुः सम्पदः स्युर्गृहं चाऽयतनं विदः । | |||
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| verse_text = ज्येष्ठः श्रेष्ठो वसिष्ठश्च सम्पदायतनं तथा ॥¦वायुरेव महांस्तस्य प्रसादादग्निरेव तु ।¦उपचारतो वसिष्ठः(उपचावसिष्ठः .हृ) स्यात् प्रतिष्ठैवं रविस्ततः ।¦सम्पदिन्द्रस्तथैवोक्तो रुद्र आयतनं तथा ॥’ इति प्रभावे(प्राभवे .हृ) ॥¦‘सर्वेन्द्रियाणां व्यापारान् प्राण एव करोत्ययम् ।¦इन्द्रियस्थः पृथक्चासौ शक्तोऽपि स्वयमेव तु ॥¦इन्द्रियनियामकतया मुख्यप्राणस्यऽवश्यकता¦षण्मासात् पूर्वबालानां(पूर्वं बालानां) केवलं प्राणतो (केवलप्राणतो) भवेत् ।¦व्यापार्यं मनसा सर्वमतः पश्चादसंस्मृतिः ॥¦तुरीयायामवस्थायां प्राणादेव विबोधनम् ।¦तथापि संस्मृतिस्तत्र प्राणवश्यतया भवेत् ॥¦प्राणस्य वश्यतानाम तद्भक्त्या स्यात् तत्प्रसादतः ।¦प्राणे वश्ये मनो वश्यमिन्द्रियाणि च सर्वशः ॥’ इति च । | |||
| verse_lines = ज्येष्ठः श्रेष्ठो वसिष्ठश्च सम्पदायतनं तथा ॥¦वायुरेव महांस्तस्य प्रसादादग्निरेव तु ।¦उपचारतो वसिष्ठः(उपचावसिष्ठः .हृ) स्यात् प्रतिष्ठैवं रविस्ततः ।¦सम्पदिन्द्रस्तथैवोक्तो रुद्र आयतनं तथा ॥’ इति प्रभावे(प्राभवे .हृ) ॥¦‘सर्वेन्द्रियाणां व्यापारान् प्राण एव करोत्ययम् ।¦इन्द्रियस्थः पृथक्चासौ शक्तोऽपि स्वयमेव तु ॥¦इन्द्रियनियामकतया मुख्यप्राणस्यऽवश्यकता¦षण्मासात् पूर्वबालानां(पूर्वं बालानां) केवलं प्राणतो (केवलप्राणतो) भवेत् ।¦व्यापार्यं मनसा सर्वमतः पश्चादसंस्मृतिः ॥¦तुरीयायामवस्थायां प्राणादेव विबोधनम् ।¦तथापि संस्मृतिस्तत्र प्राणवश्यतया भवेत् ॥¦प्राणस्य वश्यतानाम तद्भक्त्या स्यात् तत्प्रसादतः ।¦प्राणे वश्ये मनो वश्यमिन्द्रियाणि च सर्वशः ॥’ इति च । | |||
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| verse_text = ‘ज्येष्ठश्रेष्ठादिकैर्हुत्वा प्राणायात्र परत्र च ।¦ज्येष्ठः श्रेष्ठः समानेभ्यो भवेन्नात्र विचारणा ॥’ इति च । | |||
| verse_lines = ‘ज्येष्ठश्रेष्ठादिकैर्हुत्वा प्राणायात्र परत्र च ।¦ज्येष्ठः श्रेष्ठः समानेभ्यो भवेन्नात्र विचारणा ॥’ इति च । | |||
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| verse_text = <span class="gr-moola">सवितुः</span> जगत्प्रसवितुर्विष्णोः सकाशाद् <span class="gr-moola">वयं भोजनं</span> रक्षां सर्वभोगांश्च वृणीमहे । <span class="gr-moola">भगस्य</span> समग्रैश्वर्यादिसर्वगुणस्वरूपस्य विष्णोः । पुरुषं तुरं वायुं श्रेष्ठं सर्वधातॄणां उत्तमं च धीमहि ।¦‘नारायणीयं तं वायुं चिन्तयित्वोत्तमोत्तमम् ।¦जगत्प्रसवितुर्विष्णोः सकाशाद् भोगमाप्नुमः ॥’ इति च ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = <span class="gr-moola">सवितुः</span> जगत्प्रसवितुर्विष्णोः सकाशाद् <span class="gr-moola">वयं भोजनं</span> रक्षां सर्वभोगांश्च वृणीमहे । <span class="gr-moola">भगस्य</span> समग्रैश्वर्यादिसर्वगुणस्वरूपस्य विष्णोः । पुरुषं तुरं वायुं श्रेष्ठं सर्वधातॄणां उत्तमं च धीमहि ।¦‘नारायणीयं तं वायुं चिन्तयित्वोत्तमोत्तमम् ।¦जगत्प्रसवितुर्विष्णोः सकाशाद् भोगमाप्नुमः ॥’ इति च ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = ‘नारायणादयः पञ्च क्रमात् पञ्चाग्नयः स्मृताः ।¦अदनादगनेतृत्वात्(अदनादङ्गनेतृत्वात्) नितरामचलत्वतः ॥¦समेधनात् समिद् विष्णुर्धूत्काराद् धूम उच्यते ।¦अरं चितत्वादर्चिश्च सोऽङ्गारोऽङ्गरतेरपि ॥¦विविधं स्फुरणाच्चैव विष्फुलिङ्ग इतीरितः ।¦पुनर्नारायणाद्यात्मा प्रत्येकं पञ्चरूपवान् ॥¦आदित्यस्स तथाऽऽदानाद् रश्मिः स रतिरूपतः(रश्मी रतिशरूपतः) ।¦तमसाऽहननीयत्वाद् अहश्चन्द्रः परं सुखम्(परः सुखम्) ॥¦अनन्यराजो नक्षत्रं वायुर्ज्ञानायुरूपतः ।¦अभ्रमब्भरणाद्विष्णुर्विद्युद् विद्योतनादपि ॥¦अशनादशनिश्चैव (निह्रादाद्)निर्हादाद् (ह्रा)ध्रादुनिस्तथा ।¦संवत्सरो वासनाच्च स आकाशः प्रकाशनात् ॥¦रात्रिश्च रतिदानात् स दिशतीति दिशः स्मृतः ।¦अवान्तरं दिशेद् यस्माद् अवान्तरदिगुच्यते ॥¦वचनाद् वाक् तथा प्राणस्त्वननाच्चक्षुरुच्यते ।¦दर्शनाच्छ्रवणाच्छ्रोत्रं जिह्वा वै होमतः स्मृतः ॥¦उपस्थितेरुपस्थः स उपमन्त्रकृदेव सः ।¦योनिर्युनक्ति यस्मात् स सर्वान्तःकृच्च(स चान्तःकृच्च .हृ) नन्दनः ॥¦असौ लोकः प्रकाशत्वात् प्राणस्थत्वाच्च केशवः ।¦पर्जन्यो जनको यस्मात् पृथिवी प्रथितत्वतः ॥¦पुरुषः पुरु यस्मात् स योषा जोष्यो यतोऽखिलैः ॥’ इति सामसंहितायाम् । | |||
| verse_lines = ‘नारायणादयः पञ्च क्रमात् पञ्चाग्नयः स्मृताः ।¦अदनादगनेतृत्वात्(अदनादङ्गनेतृत्वात्) नितरामचलत्वतः ॥¦समेधनात् समिद् विष्णुर्धूत्काराद् धूम उच्यते ।¦अरं चितत्वादर्चिश्च सोऽङ्गारोऽङ्गरतेरपि ॥¦विविधं स्फुरणाच्चैव विष्फुलिङ्ग इतीरितः ।¦पुनर्नारायणाद्यात्मा प्रत्येकं पञ्चरूपवान् ॥¦आदित्यस्स तथाऽऽदानाद् रश्मिः स रतिरूपतः(रश्मी रतिशरूपतः) ।¦तमसाऽहननीयत्वाद् अहश्चन्द्रः परं सुखम्(परः सुखम्) ॥¦अनन्यराजो नक्षत्रं वायुर्ज्ञानायुरूपतः ।¦अभ्रमब्भरणाद्विष्णुर्विद्युद् विद्योतनादपि ॥¦अशनादशनिश्चैव (निह्रादाद्)निर्हादाद् (ह्रा)ध्रादुनिस्तथा ।¦संवत्सरो वासनाच्च स आकाशः प्रकाशनात् ॥¦रात्रिश्च रतिदानात् स दिशतीति दिशः स्मृतः ।¦अवान्तरं दिशेद् यस्माद् अवान्तरदिगुच्यते ॥¦वचनाद् वाक् तथा प्राणस्त्वननाच्चक्षुरुच्यते ।¦दर्शनाच्छ्रवणाच्छ्रोत्रं जिह्वा वै होमतः स्मृतः ॥¦उपस्थितेरुपस्थः स उपमन्त्रकृदेव सः ।¦योनिर्युनक्ति यस्मात् स सर्वान्तःकृच्च(स चान्तःकृच्च .हृ) नन्दनः ॥¦असौ लोकः प्रकाशत्वात् प्राणस्थत्वाच्च केशवः ।¦पर्जन्यो जनको यस्मात् पृथिवी प्रथितत्वतः ॥¦पुरुषः पुरु यस्मात् स योषा जोष्यो यतोऽखिलैः ॥’ इति सामसंहितायाम् । | |||
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| verse_text = ‘अभ्रधूमादिभावस्तु जीवस्याभ्रादिसंस्थितिः ।¦अभ्रादिमानिरूपं तु ज्ञानप्राप्यं(ज्ञानिप्राप्यं) यतो भवेत् ॥’ इति च । | |||
| verse_lines = ‘अभ्रधूमादिभावस्तु जीवस्याभ्रादिसंस्थितिः ।¦अभ्रादिमानिरूपं तु ज्ञानप्राप्यं(ज्ञानिप्राप्यं) यतो भवेत् ॥’ इति च । | |||
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| verse_text = परम् अस्य जन्यमिति पर्जन्यः ।¦‘पञ्च पञ्च स्वरूपेण सूर्यादौ संस्थितो हरिः ।¦स्वर्गादौ चापि तन्नामा तद्योगान्नामिनः परे ॥’ इति च ॥ ३१० ॥ | |||
| verse_lines = परम् अस्य जन्यमिति पर्जन्यः ।¦‘पञ्च पञ्च स्वरूपेण सूर्यादौ संस्थितो हरिः ।¦स्वर्गादौ चापि तन्नामा तद्योगान्नामिनः परे ॥’ इति च ॥ ३१० ॥ | |||
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| verse_text = ‘प्रत्यब्दयज्ञकृत्सम्यङ्महाशालः प्रकीर्तितः ।¦वेदवेदार्थवित् सम्यङ्महाश्रोत्रिय उच्यते ॥ | |||
| verse_lines = ‘प्रत्यब्दयज्ञकृत्सम्यङ्महाशालः प्रकीर्तितः ।¦वेदवेदार्थवित् सम्यङ्महाश्रोत्रिय उच्यते ॥ | |||
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| verse_text = क्रीडात्मकत्वाद्व्याख्यं च(द्यौश्चैव .हृ) सुतेजाश्चातितेजसा ।¦स्वर्गाधारं शिरो विष्णोः ................. | |||
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| verse_text = ................. सर्वरूपातिदार्शनात् ॥¦चक्षुस्तु विश्वरूपाख्यमादानादायुषामपि ।¦आदित्याख्यं च सूर्यस्याप्याश्रयं सर्वदा स्मृतम् ॥ | |||
| verse_lines = ................. सर्वरूपातिदार्शनात् ॥¦चक्षुस्तु विश्वरूपाख्यमादानादायुषामपि ।¦आदित्याख्यं च सूर्यस्याप्याश्रयं सर्वदा स्मृतम् ॥ | |||
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| verse_text = वाय्वादिप्राणशक्यं न यत्तत्कर्ता हरेर्यतः ।¦प्राणस्तेन पृथग्वर्त्मा वायुर्ज्ञानायुरूपतः ॥¦वायोरप्याश्रयो नित्यं ................. | |||
| verse_lines = वाय्वादिप्राणशक्यं न यत्तत्कर्ता हरेर्यतः ।¦प्राणस्तेन पृथग्वर्त्मा वायुर्ज्ञानायुरूपतः ॥¦वायोरप्याश्रयो नित्यं ................. | |||
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| verse_text = ................. बहुत्वाद् बहुलः स्मृतः ।¦आकाशनामा चाऽदीप्तेर्मध्यदेहो रमापतेः ॥ | |||
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| verse_text = व्याप्तत्वादाप इत्युक्तो रयी रतिकरत्वतः ।¦वस्तिराकाशवार्योश्च(वस्तिराकाशवाय्वोश्च .हृ) तावाधारौ प्रकीर्तितौ ॥ | |||
| verse_lines = व्याप्तत्वादाप इत्युक्तो रयी रतिकरत्वतः ।¦वस्तिराकाशवार्योश्च(वस्तिराकाशवाय्वोश्च .हृ) तावाधारौ प्रकीर्तितौ ॥ | |||
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| verse_text = प्रथनात् पृथिवीनामा(पृथिवी नाम्ना) प्रतिष्ठा च प्रतिष्ठितेः ।¦पादौ भगवतो विष्णोः पृथिव्याश्रय एव च ॥¦उत्तमानां हि पादेन सर्वं रूपं हि कथ्यते ।¦विष्णोः पदमिति ह्यस्मात् प्रथितिर्वैदिकी स्मृता ॥ | |||
| verse_lines = प्रथनात् पृथिवीनामा(पृथिवी नाम्ना) प्रतिष्ठा च प्रतिष्ठितेः ।¦पादौ भगवतो विष्णोः पृथिव्याश्रय एव च ॥¦उत्तमानां हि पादेन सर्वं रूपं हि कथ्यते ।¦विष्णोः पदमिति ह्यस्मात् प्रथितिर्वैदिकी स्मृता ॥ | |||
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| verse_text = ................. वागपानोऽग्निरेव च ।¦पश्चिमद्वारपोऽप्येकः ................. | |||
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| verse_text = ................. समानो मन एव च ॥¦इन्द्र इत्येक एवोक्त उत्तरद्वाररक्षकः । | |||
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| verse_text = उदानो वायुरित्येक ऊर्ध्वद्वाराधिपश्च सः ॥¦स एवाऽकाशनामा च लक्ष्म्याविष्टो विशेषतः ।¦पृथिवीनामिका श्रीस्तु द्यौर्दिशो विद्युदेव च ॥¦वायुपत्नी समुद्दिष्टा तत्तद्द्वाराधिपाश्च ते ।¦अधितिष्ठन्ति ते सर्वे नारायणमनामयम् ॥¦यद् विष्णुर्ज्ञानरूपत्वात् किमानन्दस्वरूपतः ।¦एतेषु तृप्तेषु हरिस्तृप्यत्येषां प्रियो ह्यसौ ॥¦वैश्वानरोपासकानां नानावर्गनिरूपणम्¦सूर्यप्रसादात्तु नराः पूर्वद्वारेण केशवम् ।¦प्राप्नुवन्त्यथ सोमस्य प्रसादात् पितरस्तथा ॥¦द्वारेण दक्षिणेनैव गन्धर्वाः पश्चिमेन तु ।¦अग्निप्रसादाद् ऋषय उत्तरेणेन्द्रसंश्रयात् ॥¦शिवाद्या वायुमाश्रित्य यान्त्यूर्ध्वेण हरिं सुराः ॥¦वैश्वानराख्यविष्णोस्तु सम्यग्ज्ञानेन सर्वशः । | |||
| verse_lines = उदानो वायुरित्येक ऊर्ध्वद्वाराधिपश्च सः ॥¦स एवाऽकाशनामा च लक्ष्म्याविष्टो विशेषतः ।¦पृथिवीनामिका श्रीस्तु द्यौर्दिशो विद्युदेव च ॥¦वायुपत्नी समुद्दिष्टा तत्तद्द्वाराधिपाश्च ते ।¦अधितिष्ठन्ति ते सर्वे नारायणमनामयम् ॥¦यद् विष्णुर्ज्ञानरूपत्वात् किमानन्दस्वरूपतः ।¦एतेषु तृप्तेषु हरिस्तृप्यत्येषां प्रियो ह्यसौ ॥¦वैश्वानरोपासकानां नानावर्गनिरूपणम्¦सूर्यप्रसादात्तु नराः पूर्वद्वारेण केशवम् ।¦प्राप्नुवन्त्यथ सोमस्य प्रसादात् पितरस्तथा ॥¦द्वारेण दक्षिणेनैव गन्धर्वाः पश्चिमेन तु ।¦अग्निप्रसादाद् ऋषय उत्तरेणेन्द्रसंश्रयात् ॥¦शिवाद्या वायुमाश्रित्य यान्त्यूर्ध्वेण हरिं सुराः ॥¦वैश्वानराख्यविष्णोस्तु सम्यग्ज्ञानेन सर्वशः । | |||
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| verse_text = ‘वैश्वानरज्ञानयोग्याः साक्षादेव सुराः स्मृताः ।¦तस्मात् तेषां फलं सर्वमन्येषां तु स्वयोग्यतः ॥’इति वैश्वानरविद्यायाम् ।¦‘को न आत्मा किं ब्रह्म’(५.११.१), ‘सोऽयमात्मा चतुष्पाद्’(१.१.१), ‘स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः’(माण्डूक्य.??), ‘अों वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् अोम्’(ब्र.सू.१.२.२४), ‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः’(भ.गी.१४.१५) इत्यादेश्च वैश्वानरो विष्णुरिति सिद्धम् ।¦‘स वायुः स आकाशः’(५.१२.५), ‘वायुश्चाऽकाशश्चाधितिष्ठतः’(५.२३.२) इति वचनाद् वायो रूपमन्याधिष्ठितमाकाशाख्यं वायोः स्वरूपमिति विज्ञायते ।¦‘आकाशनामा विघ्नेशो वायुश्चाकाशकः स्मृतः ।¦आकाश इति लक्ष्मीश्च तथाऽऽकाशो हरिः स्वयम् ॥’इति शब्दनिर्णये ।¦‘सुतेजोविश्वरूपादिभेदेनाङ्गानि मापतेः ।¦अभिन्नान्यपि कथ्यन्ते लोकदृष्टिविभेदतः॥’ इति च ॥ | |||
| verse_lines = ‘वैश्वानरज्ञानयोग्याः साक्षादेव सुराः स्मृताः ।¦तस्मात् तेषां फलं सर्वमन्येषां तु स्वयोग्यतः ॥’इति वैश्वानरविद्यायाम् ।¦‘को न आत्मा किं ब्रह्म’(५.११.१), ‘सोऽयमात्मा चतुष्पाद्’(१.१.१), ‘स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः’(माण्डूक्य.??), ‘अों वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् अोम्’(ब्र.सू.१.२.२४), ‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः’(भ.गी.१४.१५) इत्यादेश्च वैश्वानरो विष्णुरिति सिद्धम् ।¦‘स वायुः स आकाशः’(५.१२.५), ‘वायुश्चाऽकाशश्चाधितिष्ठतः’(५.२३.२) इति वचनाद् वायो रूपमन्याधिष्ठितमाकाशाख्यं वायोः स्वरूपमिति विज्ञायते ।¦‘आकाशनामा विघ्नेशो वायुश्चाकाशकः स्मृतः ।¦आकाश इति लक्ष्मीश्च तथाऽऽकाशो हरिः स्वयम् ॥’इति शब्दनिर्णये ।¦‘सुतेजोविश्वरूपादिभेदेनाङ्गानि मापतेः ।¦अभिन्नान्यपि कथ्यन्ते लोकदृष्टिविभेदतः॥’ इति च ॥ | |||
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| verse_text = ‘अधीत्यब्दद्वादशत्वाद् द्वादशाब्द इतीरितः ।¦श्वेतकेतुर्भारते तु नोत्पत्तिद्वादशत्वतः ॥’ इति वाक्यनिर्णये । | |||
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| verse_lines = मृत्पिण्डादिदृष्टान्तानां प्रयोजनकथनम्¦‘यथा मृत्पिण्डविज्ञानात् सादृश्यादेव मृन्मयः ।¦विज्ञायन्ते तथा विष्णोः सादृश्याज्जगदेव च ॥¦यथा स्वर्णस्य विज्ञानात् सर्वे लोहमयास्तथा ।¦प्राधान्याद्विष्णुविज्ञानाद्विज्ञातं स्याज्जगत् सदा ॥¦अत्यल्पेऽपि हि विज्ञाते सदृशे तादृशं बहु ।¦ज्ञायते नखकृन्तन्या(नखनिकृन्तन्या .हृ) यथा सर्वमयोमयम् ॥¦किमु विष्णोर्बहोर्ज्ञानादत्यल्पं जगदीदृशम् ।¦अनन्याधीनविज्ञानादन्याधीनं तथैव च ।¦मृदयोलोहनाम्नां हि ज्ञानात् साङ्केतिकं यथा ॥’इत्यादिसामसंहितायाम् ।¦‘स्वर्णं लोहमणिश्चैव पुरटं चाभिधीयते’ इति शब्दनिर्णये । | |||
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| verse_text = ‘मृत्तिकेति’, ‘लोहमणिरिति’, ‘कृष्णायसमिति’(कार्ष्णायसमिति) अत्र ‘इति’शब्दा ‘नामधेय’शब्दाश्च व्यर्थाः स्युः । विकारमिथ्यात्विवक्षायां मृत्तिकैव सत्यं लोह एव सत्यं कार्ष्णायसमेव(कृष्णायसमेव) सत्यमित्येव स्यात् । न तु नामधेयादिशब्दाः । | |||
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| verse_text = न च वाचारम्भणमात्रमिति मात्रशब्दोऽस्ति । न चाऽरम्भस्याऽरम्भणमिति युज्यते शब्दः । क्रिया ह्यारम्भणम् । | |||
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| verse_text = अनादिः संस्कृतभाषा, इतरास्तु पश्चादागताः’ इति निरूपणम्¦अतो वाचा नाम्नामारम्भणं विकारो विविधाकारो विक्रियमाणः । सत्यं नामधेयं सर्वदा विद्यमानं नामधेयं मृत्तिकेत्यादय इत्यर्थः । सत्त्वेन कालतस्ततं ज्ञायते विद्वद्भिरिति नित्यत्वेन प्रसिद्धमेव सत्यमित्यत्र विवक्षितम् । सङ्केतेन क्रियमाणानि ह्यन्यानि नामानि । अतो विकाररूपाणि । विकारशब्दस्य नियतपुल्लिङ्गत्वादारम्भणं विकार इति वेदाः प्रमाणमितिवद् युज्यते । | |||
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| verse_text = संस्कृतभाषातः इतरभाषाणां जननक्रमकथनम्¦न च मृत्तिकादिनामविकारः साङ्केतिकं नाम(साङ्केतिकनाम) । प्राधान्यमेवात्र मृत्तिकादिनामवद् भगवतो विवक्षितम् । सृष्टिश्च प्राधान्यार्थमेवात्रोच्यते(प्राधान्यार्थमेवोच्यते .हृ)। | |||
| verse_lines = संस्कृतभाषातः इतरभाषाणां जननक्रमकथनम्¦न च मृत्तिकादिनामविकारः साङ्केतिकं नाम(साङ्केतिकनाम) । प्राधान्यमेवात्र मृत्तिकादिनामवद् भगवतो विवक्षितम् । सृष्टिश्च प्राधान्यार्थमेवात्रोच्यते(प्राधान्यार्थमेवोच्यते .हृ)। | |||
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| verse_id = CHU_C06_S02_V04_B01 | |||
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| verse_text = एकमेवाद्वितीयं स्वगतभेदवर्जितं समानवर्जितं च ।¦‘एकमेवाद्वितीयं तत् समाभ्यधिकवर्जनात्(समाधिकविवर्जनात् .हृ) ।¦स्वगतायां च भेदानामभावाद् ब्रह्म शाश्वतम् ॥’ इति प्रवृत्ते ।¦‘भेदाभेदनिवृत्त्यर्थमेवशब्दोऽवधारकः ।¦समाधिकनिवृत्त्यर्थमद्वितीयपदं तथा ॥¦भेदाभेदेऽप्येकशब्दो यतोऽवयविनि स्थितः ।¦एकमेवेत्यतः प्राह नारायणमियं श्रुतिः ॥¦समे द्वितीयशब्दः स्यादद्वितीयोऽसमत्वतः ।¦साधिकः(अधिकः) कुत एव स्यादित्याह परमा श्रुतिः॥’ इति सामसंहितायाम् । | |||
| verse_lines = एकमेवाद्वितीयं स्वगतभेदवर्जितं समानवर्जितं च ।¦‘एकमेवाद्वितीयं तत् समाभ्यधिकवर्जनात्(समाधिकविवर्जनात् .हृ) ।¦स्वगतायां च भेदानामभावाद् ब्रह्म शाश्वतम् ॥’ इति प्रवृत्ते ।¦‘भेदाभेदनिवृत्त्यर्थमेवशब्दोऽवधारकः ।¦समाधिकनिवृत्त्यर्थमद्वितीयपदं तथा ॥¦भेदाभेदेऽप्येकशब्दो यतोऽवयविनि स्थितः ।¦एकमेवेत्यतः प्राह नारायणमियं श्रुतिः ॥¦समे द्वितीयशब्दः स्यादद्वितीयोऽसमत्वतः ।¦साधिकः(अधिकः) कुत एव स्यादित्याह परमा श्रुतिः॥’ इति सामसंहितायाम् । | |||
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| verse_text = अद्वितीयशब्दो नाद्वैतसाधकः¦न च विजातीयभेदवर्जनं नाम कुत्रचित् प्रसिद्धम् । तत्प्रमाणाभावाच्च । ‘एक एवाद्वितीयो भगवांस्तत्सदृशपरो(तत्सदृशः परः) नास्ति’ इति च । ‘एक एव भगवान् तत्सदृशपरौ न स्तः’ इति च श्रुतिः।¦विजातीयाभावे येनाश्रुतं श्रुतं भवतीत्यादि विशेषणं च व्यर्थम् । यस्य कस्यचिज्ज्ञानं तज्ज्ञानमेव भवतीति । अज्ञानमपि ज्ञानमेव भवति । भेदाभावात् ।¦न च मिथ्या सत्यमिति भेदः । तस्यैव विजातीयत्वप्राप्तेः । तद्भेदस्य मिथ्यात्वे तदभेदस्य सत्यत्वप्रसङ्गाच्च । मिथ्यासत्ययोरैक्ये इदं मिथ्या इदं सत्यमिदं (इदं सत्यमिति) मिथ्येति भेदाभावाज्जीवेशभेदादेरपि सत्यत्वप्रसङ्गः । अतः परमार्थं ब्रह्मान्यन्मिथ्येत्यपि न युज्यते । अतः (सजातीयः) सजातीयस्वगतभेदोऽधिकाख्यं विजातीयं चात्र निषिध्यते । | |||
| verse_lines = अद्वितीयशब्दो नाद्वैतसाधकः¦न च विजातीयभेदवर्जनं नाम कुत्रचित् प्रसिद्धम् । तत्प्रमाणाभावाच्च । ‘एक एवाद्वितीयो भगवांस्तत्सदृशपरो(तत्सदृशः परः) नास्ति’ इति च । ‘एक एव भगवान् तत्सदृशपरौ न स्तः’ इति च श्रुतिः।¦विजातीयाभावे येनाश्रुतं श्रुतं भवतीत्यादि विशेषणं च व्यर्थम् । यस्य कस्यचिज्ज्ञानं तज्ज्ञानमेव भवतीति । अज्ञानमपि ज्ञानमेव भवति । भेदाभावात् ।¦न च मिथ्या सत्यमिति भेदः । तस्यैव विजातीयत्वप्राप्तेः । तद्भेदस्य मिथ्यात्वे तदभेदस्य सत्यत्वप्रसङ्गाच्च । मिथ्यासत्ययोरैक्ये इदं मिथ्या इदं सत्यमिदं (इदं सत्यमिति) मिथ्येति भेदाभावाज्जीवेशभेदादेरपि सत्यत्वप्रसङ्गः । अतः परमार्थं ब्रह्मान्यन्मिथ्येत्यपि न युज्यते । अतः (सजातीयः) सजातीयस्वगतभेदोऽधिकाख्यं विजातीयं चात्र निषिध्यते । | |||
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| verse_text = ‘सर्वोत्तमत्वात् सन्नामा हरिर्नारायणः प्रभुः ।¦सोऽसृजत् प्रथमं देवीं तेजआख्यां श्रियं सतीम् ॥¦तते(तत्र) स्थितेन रूपेण साऽजैव हि यतः सदा ।¦तेज इत्युच्यते तस्माज्जनेर्वा तत एव तु ॥¦यदस्याः सृष्टिकृद्रूपं विद्याख्यं जायते हरेः ।¦मन्वाख्यः प्राण एवास्या अम्नामा जायतेऽथ च (जायते हरेः .हृ)॥¦ब्राह्मणादिचतुर्वर्णस्ततश्चान्नभिधो हरः ।¦तेजःसंस्था च सा देवी प्राणोऽप्सु स्थित एव च ॥¦ततस्तेजस एवापो जायन्तेऽन्नस्थितो हरः ।¦जायतेऽतोऽद्भ्य एवान्नं पृथिवी त्वन्नरूपिणी ॥ २ ॥’ | |||
| verse_lines = ‘सर्वोत्तमत्वात् सन्नामा हरिर्नारायणः प्रभुः ।¦सोऽसृजत् प्रथमं देवीं तेजआख्यां श्रियं सतीम् ॥¦तते(तत्र) स्थितेन रूपेण साऽजैव हि यतः सदा ।¦तेज इत्युच्यते तस्माज्जनेर्वा तत एव तु ॥¦यदस्याः सृष्टिकृद्रूपं विद्याख्यं जायते हरेः ।¦मन्वाख्यः प्राण एवास्या अम्नामा जायतेऽथ च (जायते हरेः .हृ)॥¦ब्राह्मणादिचतुर्वर्णस्ततश्चान्नभिधो हरः ।¦तेजःसंस्था च सा देवी प्राणोऽप्सु स्थित एव च ॥¦ततस्तेजस एवापो जायन्तेऽन्नस्थितो हरः ।¦जायतेऽतोऽद्भ्य एवान्नं पृथिवी त्वन्नरूपिणी ॥ २ ॥’ | |||
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| verse_text = सृष्टेष्वेतेषु भगवानीक्षाञ्चक्रे स केशवः ।¦जीवाख्येनैव रूपेण योऽनिरुद्ध इति स्मृतः ॥¦तेन रूपेण लक्ष्म्यादीन् प्रविष्टो रूपनामनी ।¦करिष्ये त्रिवृतश्चैतानेकैकं करवाणि च ॥¦इति मत्वा प्रविश्याथ तेभ्य इन्द्रादिनामपि ।¦नामरूपाणि कृतवांस्तांश्चान्योन्यप्रवेशिनः ।¦कृत्वाऽग्निसोमसूर्यादिष्वेतांस्त्रीन् विदधे(निदधे) पुनः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = सृष्टेष्वेतेषु भगवानीक्षाञ्चक्रे स केशवः ।¦जीवाख्येनैव रूपेण योऽनिरुद्ध इति स्मृतः ॥¦तेन रूपेण लक्ष्म्यादीन् प्रविष्टो रूपनामनी ।¦करिष्ये त्रिवृतश्चैतानेकैकं करवाणि च ॥¦इति मत्वा प्रविश्याथ तेभ्य इन्द्रादिनामपि ।¦नामरूपाणि कृतवांस्तांश्चान्योन्यप्रवेशिनः ।¦कृत्वाऽग्निसोमसूर्यादिष्वेतांस्त्रीन् विदधे(निदधे) पुनः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = ‘अतो यल्लोहितं रूपं श्रियस्तद्रूपसम्भवम् ।¦यच्छुक्लं वायुजं विद्यात् कृष्णं चैव शिवोद्भवम् ॥¦तस्मादग्नेर्यदत्तृत्वमग्निनामप्रवर्तकम् ।¦लक्ष्म्यादिदेवतानां तन्नैवाग्नेरग्निना ततः ॥¦मुख्यैवमाददानत्वमादित्यस्य तदुद्भवम् ।¦अत आदित्यनामैषां नैवादित्यस्य मुख्यतः ॥¦यच्चन्द्राह्लादकत्वं च तत्तेषां चन्द्रता तथा ।¦विद्युद्विद्योतनं (चै)तेषां ततस्ते सर्वनामिनः ॥¦तथैव सर्वरूपं च तद्रूपप्रतिबिम्बितम् ।¦सर्वरूपाश्च ते तस्माल्लोहितादिक्रमेण तु ॥ | |||
| verse_lines = ‘अतो यल्लोहितं रूपं श्रियस्तद्रूपसम्भवम् ।¦यच्छुक्लं वायुजं विद्यात् कृष्णं चैव शिवोद्भवम् ॥¦तस्मादग्नेर्यदत्तृत्वमग्निनामप्रवर्तकम् ।¦लक्ष्म्यादिदेवतानां तन्नैवाग्नेरग्निना ततः ॥¦मुख्यैवमाददानत्वमादित्यस्य तदुद्भवम् ।¦अत आदित्यनामैषां नैवादित्यस्य मुख्यतः ॥¦यच्चन्द्राह्लादकत्वं च तत्तेषां चन्द्रता तथा ।¦विद्युद्विद्योतनं (चै)तेषां ततस्ते सर्वनामिनः ॥¦तथैव सर्वरूपं च तद्रूपप्रतिबिम्बितम् ।¦सर्वरूपाश्च ते तस्माल्लोहितादिक्रमेण तु ॥ | |||
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| verse_text = अतोऽन्यनामधेयं तु वाचाऽऽरम्भणहेतुतः ।¦साङ्केत्येन विकारः स्यात् त्रयाणामेव नित्यता ॥¦यथा लक्ष्म्यादिकानां च नाम सङ्केततोऽन्यगम् ।¦वाचारम्भणहेतोस्तद्विकारो नैव मुख्यतः ॥¦मुख्यं नाम त्रिरूपाणीत्याद्यं वेदोदितं परम् ।¦अतस्तदेव सत्योक्तं मुख्यं सत्यमितीर्यते ॥¦इन्द्रादिनामरूपाणि यथैव त्रिषु मुख्यतः ।¦तदधीनत्वतस्तेषामेषामुच्चबलत्वतः ॥¦शिवनामानि रूपाणि तथा वायोस्तु मुख्यतः ।¦तदीयानि तथा लक्ष्म्यास्तदीयानि हरेस्तथा ॥¦तस्मात् स एव सर्वेशः सर्वरूपः स एव च ।¦सर्वनामा स एवैकः सर्वशक्तिस्तथैव च ॥¦अन्येषां यच्च रूपाद्यं तत्तस्मात् प्रतिबिम्बितम् । | |||
| verse_lines = अतोऽन्यनामधेयं तु वाचाऽऽरम्भणहेतुतः ।¦साङ्केत्येन विकारः स्यात् त्रयाणामेव नित्यता ॥¦यथा लक्ष्म्यादिकानां च नाम सङ्केततोऽन्यगम् ।¦वाचारम्भणहेतोस्तद्विकारो नैव मुख्यतः ॥¦मुख्यं नाम त्रिरूपाणीत्याद्यं वेदोदितं परम् ।¦अतस्तदेव सत्योक्तं मुख्यं सत्यमितीर्यते ॥¦इन्द्रादिनामरूपाणि यथैव त्रिषु मुख्यतः ।¦तदधीनत्वतस्तेषामेषामुच्चबलत्वतः ॥¦शिवनामानि रूपाणि तथा वायोस्तु मुख्यतः ।¦तदीयानि तथा लक्ष्म्यास्तदीयानि हरेस्तथा ॥¦तस्मात् स एव सर्वेशः सर्वरूपः स एव च ।¦सर्वनामा स एवैकः सर्वशक्तिस्तथैव च ॥¦अन्येषां यच्च रूपाद्यं तत्तस्मात् प्रतिबिम्बितम् । | |||
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| verse_text = सर्वस्य भगवदधीनत्वान्नाहङ्कृतिः कार्या¦एक एवाद्वितीयोऽसावतः सर्वोत्तमत्वतः ॥¦मुख्यत्वादेव सन्नामा सत्ततिज्ञानरूपतः ।¦सत्यमित्युच्यते विष्णुस्स त्वं नासि कथञ्चन ॥¦अतोऽनूचानमानी त्वं स्तब्धोऽसि कुत एव तु ।¦त्वत्तोऽधिका अपीन्द्राद्यास्तदुच्चाश्च श्रियादयः ॥¦सर्वोच्चो भगवान् विष्णुर्न स्तम्भोऽस्यापि हि क्वचित् ।¦अतो न विद्वन्मानी स्या महानस्मीति वा मनः ॥¦न ते स्यान्नैव च स्तम्भो ज्ञात्वा विष्णोः परं बलम्(बलं परम्) ।¦न हि विष्णोर्बलं ज्ञात्वा स्तम्भहेतुः कथञ्चन ॥’ इत्यादि सामसंहितायाम् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = सर्वस्य भगवदधीनत्वान्नाहङ्कृतिः कार्या¦एक एवाद्वितीयोऽसावतः सर्वोत्तमत्वतः ॥¦मुख्यत्वादेव सन्नामा सत्ततिज्ञानरूपतः ।¦सत्यमित्युच्यते विष्णुस्स त्वं नासि कथञ्चन ॥¦अतोऽनूचानमानी त्वं स्तब्धोऽसि कुत एव तु ।¦त्वत्तोऽधिका अपीन्द्राद्यास्तदुच्चाश्च श्रियादयः ॥¦सर्वोच्चो भगवान् विष्णुर्न स्तम्भोऽस्यापि हि क्वचित् ।¦अतो न विद्वन्मानी स्या महानस्मीति वा मनः ॥¦न ते स्यान्नैव च स्तम्भो ज्ञात्वा विष्णोः परं बलम्(बलं परम्) ।¦न हि विष्णोर्बलं ज्ञात्वा स्तम्भहेतुः कथञ्चन ॥’ इत्यादि सामसंहितायाम् ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_text = मांसादिशब्दैरभिमानिदेवता एव विवक्षिताः¦देवता एव मांसादिशब्दवाच्याः । तत्र प्रवेशात् । अश्यमानाश्चोपजीव्यत्वात् । न च दुःखं तासाम् । ऐश्वर्यात् । तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृत् इति प्रस्तुतत्वात् । | |||
| verse_lines = मांसादिशब्दैरभिमानिदेवता एव विवक्षिताः¦देवता एव मांसादिशब्दवाच्याः । तत्र प्रवेशात् । अश्यमानाश्चोपजीव्यत्वात् । न च दुःखं तासाम् । ऐश्वर्यात् । तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृत् इति प्रस्तुतत्वात् । | |||
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| verse_text = उपनिषदुक्तो जीवः परमात्मैव¦‘जीव इति भगवतोऽनिरुद्धस्याख्या’ इति च श्रुतिः(इति च श्रुतिः) । ‘प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुर्जीवस्य जीवः(जीवम्) प्रधानस्य प्रधानं भगवांश्चतुर्मूर्तिः’ इति च ।¦‘प्राणाधारो हरेर्नान्यो(हरेर्नान्यः) जीवशब्दस्ततो हरौ।¦संसारिणो जीवता तु जननाद्वानतस्तथा(वानतेस्तथा)॥’ इति च । | |||
| verse_lines = उपनिषदुक्तो जीवः परमात्मैव¦‘जीव इति भगवतोऽनिरुद्धस्याख्या’ इति च श्रुतिः(इति च श्रुतिः) । ‘प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुर्जीवस्य जीवः(जीवम्) प्रधानस्य प्रधानं भगवांश्चतुर्मूर्तिः’ इति च ।¦‘प्राणाधारो हरेर्नान्यो(हरेर्नान्यः) जीवशब्दस्ततो हरौ।¦संसारिणो जीवता तु जननाद्वानतस्तथा(वानतेस्तथा)॥’ इति च । | |||
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| verse_text = जीवशब्देन संसारिविवक्षायां(जीवशब्दस्य संसारिविषयत्वे .हृ) तत् तेज ऐक्षतेत्यादिना तेषामेव चेतनत्वावगतेर्नामरूपव्याकरणे जीवान्तरानुप्रवेशो(जीवान्तरप्रवेशः .हृ) नापेक्षितः।¦‘प्रसुप्तलोकतन्त्राणां निशाम्य गतिमीश्वरः ।¦त्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥’ इति ।¦‘यावद् बलिं तेऽज हराम काले यथा वयं चान्नमदाम यत्र ।¦यथोभयेषां त इमे ह(तथोभयेषां त इमे हि) लोका बलिं हरन्तोऽन्नमदन्त्यमूढाः॥¦त्वं न स चक्षुः परिदेहि शक्ता देव क्रियार्थे यदनुग्रहेण॥’¦इति तत्त्वानां प्रार्थनानन्तरं भगवत एव तेषु प्रवेशोक्तेर्भागवते । | |||
| verse_lines = जीवशब्देन संसारिविवक्षायां(जीवशब्दस्य संसारिविषयत्वे .हृ) तत् तेज ऐक्षतेत्यादिना तेषामेव चेतनत्वावगतेर्नामरूपव्याकरणे जीवान्तरानुप्रवेशो(जीवान्तरप्रवेशः .हृ) नापेक्षितः।¦‘प्रसुप्तलोकतन्त्राणां निशाम्य गतिमीश्वरः ।¦त्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥’ इति ।¦‘यावद् बलिं तेऽज हराम काले यथा वयं चान्नमदाम यत्र ।¦यथोभयेषां त इमे ह(तथोभयेषां त इमे हि) लोका बलिं हरन्तोऽन्नमदन्त्यमूढाः॥¦त्वं न स चक्षुः परिदेहि शक्ता देव क्रियार्थे यदनुग्रहेण॥’¦इति तत्त्वानां प्रार्थनानन्तरं भगवत एव तेषु प्रवेशोक्तेर्भागवते । | |||
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| verse_text = यतश्च स एव जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठतीति भगवत्येव जीवशब्दः प्रयुज्यते । न ह्यचेतनस्य मोदमानत्वमस्ति । अतोऽन्तर्यामिरूप एव जीवशब्दः ।¦‘भोक्तुस्तु सुखदुःखानामन्तःस्थो जीवनामकः ।¦बहिःस्थितस्तु सन्नामा भगवान् पुरुषोत्तमः ॥’ इति तत्त्वविवेके ।¦अग्नेरग्निरिति नाम मुख्यतो नास्ति । अग्निनामानि त्रीणि रूपाणीति नामधेयं सत्यमित्यादि ॥ ४॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = यतश्च स एव जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठतीति भगवत्येव जीवशब्दः प्रयुज्यते । न ह्यचेतनस्य मोदमानत्वमस्ति । अतोऽन्तर्यामिरूप एव जीवशब्दः ।¦‘भोक्तुस्तु सुखदुःखानामन्तःस्थो जीवनामकः ।¦बहिःस्थितस्तु सन्नामा भगवान् पुरुषोत्तमः ॥’ इति तत्त्वविवेके ।¦अग्नेरग्निरिति नाम मुख्यतो नास्ति । अग्निनामानि त्रीणि रूपाणीति नामधेयं सत्यमित्यादि ॥ ४॥ ५ ॥ | |||
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| verse_text = स्वप्नस्यान्तः(स्वप्नान्तः .हृ) सुषुप्तिः ।¦‘स्वातन्त्र्यात् स्व इति प्रोक्तो विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः ।¦तं प्राप्नोति मनोनामा संसारी स्वपितीत्यतः ॥’ इति च ।¦मननान्मनोनामा संसारी । | |||
| verse_lines = स्वप्नस्यान्तः(स्वप्नान्तः .हृ) सुषुप्तिः ।¦‘स्वातन्त्र्यात् स्व इति प्रोक्तो विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः ।¦तं प्राप्नोति मनोनामा संसारी स्वपितीत्यतः ॥’ इति च ।¦मननान्मनोनामा संसारी । | |||
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| verse_text = ‘शुङ्गमित्यङ्कुरं प्रोक्तं तन्मूलं भगवान् हरिः ।¦जगतो मूलमप्येष निमित्तं न विकारवान् ॥¦बीजजीवो यथा मूलमङ्कुरस्याविकारतः ।¦यथा पिता पुत्रतन्वास्तद्देहो(पुत्रतन्वस्तद्देहो) हि विकारवान् ॥¦एवं हरिर्मूलमपि न विकारः(विकारी .हृ) कथञ्चन ॥’ इति च ।¦प्राथम्याच्च तेजआद्या लक्ष्म्यादय इति सिद्धम् ।¦‘तेजोऽभिमानिनी लक्ष्मीः प्राणस्त्वबभिमानवान् ।¦अन्नाभिमानी रुद्रश्च तिस्रस्ता देवताः पुरा ॥’ इति च ब्रह्माण्डे । | |||
| verse_lines = ‘शुङ्गमित्यङ्कुरं प्रोक्तं तन्मूलं भगवान् हरिः ।¦जगतो मूलमप्येष निमित्तं न विकारवान् ॥¦बीजजीवो यथा मूलमङ्कुरस्याविकारतः ।¦यथा पिता पुत्रतन्वास्तद्देहो(पुत्रतन्वस्तद्देहो) हि विकारवान् ॥¦एवं हरिर्मूलमपि न विकारः(विकारी .हृ) कथञ्चन ॥’ इति च ।¦प्राथम्याच्च तेजआद्या लक्ष्म्यादय इति सिद्धम् ।¦‘तेजोऽभिमानिनी लक्ष्मीः प्राणस्त्वबभिमानवान् ।¦अन्नाभिमानी रुद्रश्च तिस्रस्ता देवताः पुरा ॥’ इति च ब्रह्माण्डे । | |||
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| verse_text = ‘यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति संसारिणो ब्रह्मप्राप्तिमुक्त्वा ‘स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धः’ इति तस्योपपादनान्मनोनामा पुरुषः, प्राणनामा भगवान् । ‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः(सोम्येमाः प्रजाः .हृ) सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’ इत्युपसंहारात् ।¦प्रजाशब्दश्च चेतनेष्वेव प्रसिद्धः । ‘प्रजानां सुखदुःखेन राजाप्नोति शुभाशुभम् ।’ इत्यादेश्च । | |||
| verse_lines = ‘यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति संसारिणो ब्रह्मप्राप्तिमुक्त्वा ‘स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धः’ इति तस्योपपादनान्मनोनामा पुरुषः, प्राणनामा भगवान् । ‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः(सोम्येमाः प्रजाः .हृ) सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’ इत्युपसंहारात् ।¦प्रजाशब्दश्च चेतनेष्वेव प्रसिद्धः । ‘प्रजानां सुखदुःखेन राजाप्नोति शुभाशुभम् ।’ इत्यादेश्च । | |||
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| verse_text = ‘शरीरधातुकृत्त्वेन लक्ष्म्याद्याश्च मुमुक्षुणा ।¦ध्येयस्तदीशितृत्वेन भगवान् पुरुषोत्तमः॥’¦इति वचनादनुसन्धानकर्तव्यताज्ञापनार्थं तदुक्तं पुरस्तादित्युक्तम् । | |||
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| verse_text = मुक्तौ मरणावस्थायां च देवतानां लयक्रमकथनम्¦मुक्तावुमा तु वागाख्या रुद्रं याति मनोऽभिधम् ।¦वायुं याति शिवश्चापि वायुश्तेजोऽभिधां श्रियम् ॥¦वायुमादाय सा देवी याति विष्णुं परात् परम् ।¦द्वारमात्रा तु सा देवी वायुप्राप्यो जनार्दनः ॥¦मृतिकाले च मुक्तौ च पुरुषा वाचमाप्नुयुः ॥ इति सत्तत्त्वे । | |||
| verse_lines = मुक्तौ मरणावस्थायां च देवतानां लयक्रमकथनम्¦मुक्तावुमा तु वागाख्या रुद्रं याति मनोऽभिधम् ।¦वायुं याति शिवश्चापि वायुश्तेजोऽभिधां श्रियम् ॥¦वायुमादाय सा देवी याति विष्णुं परात् परम् ।¦द्वारमात्रा तु सा देवी वायुप्राप्यो जनार्दनः ॥¦मृतिकाले च मुक्तौ च पुरुषा वाचमाप्नुयुः ॥ इति सत्तत्त्वे । | |||
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| verse_id = CHU_C06_S08_V07_B01 | |||
| verse_type = bhashya | |||
| verse_text = ‘योऽसौ नियमनाद् विष्णुः सारत्वात् स इति स्मृतः ।¦अणिमा सूक्ष्मतो गम्य ऐतदात्म्यं च तद्वशम् ॥¦परानन्दत्वतः सत्य(सत्यम्) आत्मा पूर्णगुणत्वतः ।¦सत्यतो नासि तत्वं हि माभूत् ते स्तब्धता ततः ॥ | |||
| verse_lines = ‘योऽसौ नियमनाद् विष्णुः सारत्वात् स इति स्मृतः ।¦अणिमा सूक्ष्मतो गम्य ऐतदात्म्यं च तद्वशम् ॥¦परानन्दत्वतः सत्य(सत्यम्) आत्मा पूर्णगुणत्वतः ।¦सत्यतो नासि तत्वं हि माभूत् ते स्तब्धता ततः ॥ | |||
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| verse_text = असुराः स्तब्धतां याता ब्रह्माहमिति मानिनः ।¦असत्यं जगदित्याहुः सिद्धोऽहं बलवानिति ॥¦अनीश्वरं जगच्चाहुरप्रतिष्ठं(जगत् प्राहुरप्रतिष्ठं) तथैव च ।¦चेतनैकत्वविषयान् वेदानाहुश्च सर्वशः ॥¦कुतर्कपरमा नित्यं न सहन्ते गुणान् हरेः ।¦शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय ब्रूयुर्वेदेषु(देवेषु) चैकताम् ॥¦यान्ति चैव तमो घोरं परमात्मविनिन्दकाः । | |||
| verse_lines = असुराः स्तब्धतां याता ब्रह्माहमिति मानिनः ।¦असत्यं जगदित्याहुः सिद्धोऽहं बलवानिति ॥¦अनीश्वरं जगच्चाहुरप्रतिष्ठं(जगत् प्राहुरप्रतिष्ठं) तथैव च ।¦चेतनैकत्वविषयान् वेदानाहुश्च सर्वशः ॥¦कुतर्कपरमा नित्यं न सहन्ते गुणान् हरेः ।¦शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय ब्रूयुर्वेदेषु(देवेषु) चैकताम् ॥¦यान्ति चैव तमो घोरं परमात्मविनिन्दकाः । | |||
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| verse_text = आलम्ब्य तन्मतं न त्वमेकत्वं विद्धि विष्णुना ॥¦एकत्वाभावतो(एकताभावतः .हृ) नैव भवेथाश्च महामनाः ।¦तन्निष्ठा हि प्रजा यस्मात् तत्प्रतिष्ठाश्च मोक्षगाः ॥¦तन्मूलाश्च यतस्तासां तद्भावः(सद्भावः) कुत एव तु ॥ ८ ॥ | |||
| verse_lines = आलम्ब्य तन्मतं न त्वमेकत्वं विद्धि विष्णुना ॥¦एकत्वाभावतो(एकताभावतः .हृ) नैव भवेथाश्च महामनाः ।¦तन्निष्ठा हि प्रजा यस्मात् तत्प्रतिष्ठाश्च मोक्षगाः ॥¦तन्मूलाश्च यतस्तासां तद्भावः(सद्भावः) कुत एव तु ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_text = यदि स्वतोऽन्यः परमो देहेऽस्मिन् संव्यवस्थितः ॥¦न दृश्यते कुत इति भूयः पप्रच्छ पुत्रकः ।¦अज्ञैरदृश्यमानोऽपि न भेदो नास्ति पुत्रक ॥¦यथा पुष्परसा युक्ता अजानन्तोऽपि भेदिनः ।¦अजानन्तोऽपि पुरुषास्तथा विष्णोर्हि भेदिनः ॥¦इति पित्रोपदिष्टः सन् पुनः पप्रच्छ तं पुनः ।¦चेतनानामविज्ञानं कथमित्येव चिन्तयन् ॥¦तं प्रत्याह ........... ........... ॥ ९ ॥ | |||
| verse_lines = यदि स्वतोऽन्यः परमो देहेऽस्मिन् संव्यवस्थितः ॥¦न दृश्यते कुत इति भूयः पप्रच्छ पुत्रकः ।¦अज्ञैरदृश्यमानोऽपि न भेदो नास्ति पुत्रक ॥¦यथा पुष्परसा युक्ता अजानन्तोऽपि भेदिनः ।¦अजानन्तोऽपि पुरुषास्तथा विष्णोर्हि भेदिनः ॥¦इति पित्रोपदिष्टः सन् पुनः पप्रच्छ तं पुनः ।¦चेतनानामविज्ञानं कथमित्येव चिन्तयन् ॥¦तं प्रत्याह ........... ........... ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_text = ....... यथा नद्यश्चेतनाश्च समुद्रगाः ।¦स्वं वारि(स्वावरि .हृ) नैव जानन्ति प्रजास्तद्वत् प्रजालये ॥¦स्वतोऽन्योऽस्ति परो देह इति ज्ञायेत मे कथम् ।¦इति पृष्टः पुनः प्राह वृक्षदृष्टान्ततः पिता ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = ....... यथा नद्यश्चेतनाश्च समुद्रगाः ।¦स्वं वारि(स्वावरि .हृ) नैव जानन्ति प्रजास्तद्वत् प्रजालये ॥¦स्वतोऽन्योऽस्ति परो देह इति ज्ञायेत मे कथम् ।¦इति पृष्टः पुनः प्राह वृक्षदृष्टान्ततः पिता ॥ १० ॥ | |||
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| verse_text = अभिमानिनोऽस्वतन्त्रत्वाद्भेदेन ज्ञायते तरौ ।¦हरिः किमु मनुष्येषु शोषो ह्यस्यास्वतन्त्रतः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_lines = अभिमानिनोऽस्वतन्त्रत्वाद्भेदेन ज्ञायते तरौ ।¦हरिः किमु मनुष्येषु शोषो ह्यस्यास्वतन्त्रतः ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = ज्ञायते न कथं स्वस्मिन् सूक्ष्मे ज्ञाते परो हरिः ।¦तत्रस्थ इति पृष्ट संस्तमाहोद्दालकः सुतम् ॥¦वटबीजे यथा सूक्ष्मे महान्न्यग्रोधभावयुक् ।¦न दृश्यतेऽभिमानी स एवं जीवगतो हरिः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = ज्ञायते न कथं स्वस्मिन् सूक्ष्मे ज्ञाते परो हरिः ।¦तत्रस्थ इति पृष्ट संस्तमाहोद्दालकः सुतम् ॥¦वटबीजे यथा सूक्ष्मे महान्न्यग्रोधभावयुक् ।¦न दृश्यतेऽभिमानी स एवं जीवगतो हरिः ॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = कथं दृश्येत तच्छक्तिः पृथक् तस्य ह्यदर्शने ।¦इति भावयुतं प्राह पुत्रमुद्दालकः पुनः ॥¦यथाप्सु लवणं व्याप्तं रसदृष्टौ न दृश्यते(रसदृष्ट्यैव दृश्यते) ।¦एवं चेतनगो विष्णुस्तद्भिन्नोऽपि न दृश्यते ॥ १३ ॥ | |||
| verse_lines = कथं दृश्येत तच्छक्तिः पृथक् तस्य ह्यदर्शने ।¦इति भावयुतं प्राह पुत्रमुद्दालकः पुनः ॥¦यथाप्सु लवणं व्याप्तं रसदृष्टौ न दृश्यते(रसदृष्ट्यैव दृश्यते) ।¦एवं चेतनगो विष्णुस्तद्भिन्नोऽपि न दृश्यते ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_text = कथं स ज्ञायते विष्णुर्भिन्न इत्यत्र चाब्रवीत् ।¦यथैवान्योपदेशेन बद्धाक्षः स्वगृहं(स्वं गृहं) व्रजेत् ॥¦तथाऽऽचार्योपदेशेन भिन्नमीशं व्रजेत् पुमान् ॥ १४ ॥ | |||
| verse_lines = कथं स ज्ञायते विष्णुर्भिन्न इत्यत्र चाब्रवीत् ।¦यथैवान्योपदेशेन बद्धाक्षः स्वगृहं(स्वं गृहं) व्रजेत् ॥¦तथाऽऽचार्योपदेशेन भिन्नमीशं व्रजेत् पुमान् ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_text = यथा पुंसोऽस्वतन्त्रत्वं तज्ज्ञापयतु मा भवान् ।¦इत्युक्त आह ज्ञाने हि दृष्टैवास्यास्वतन्त्रता ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = यथा पुंसोऽस्वतन्त्रत्वं तज्ज्ञापयतु मा भवान् ।¦इत्युक्त आह ज्ञाने हि दृष्टैवास्यास्वतन्त्रता ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_text = अभेदज्ञानिनां दोषः कीदृशः स्यादितीर्यते ।¦प्राह यस्मात् परस्वानां हर्ता राज्ञा निहन्यते ॥¦किमु राज्ञोऽपहर्तैवं ब्रह्मस्तेनो निहन्यते(हि हन्यते) ।¦सर्वेषां शास्तृ यद् ब्रह्म तत्स्वरूपतया स्मरन् ॥¦ब्रह्मस्तेनो निहन्येत(हि हन्येत) तमस्यन्धे सदैव हि ।¦दोषा ह्यज्ञानपूर्वास्तु बद्ध्वा पुरुषमीशितुः ॥¦विष्णोर्हर्तेति बाधन्ते चाभिमानकृतास्पदम् । | |||
| verse_lines = अभेदज्ञानिनां दोषः कीदृशः स्यादितीर्यते ।¦प्राह यस्मात् परस्वानां हर्ता राज्ञा निहन्यते ॥¦किमु राज्ञोऽपहर्तैवं ब्रह्मस्तेनो निहन्यते(हि हन्यते) ।¦सर्वेषां शास्तृ यद् ब्रह्म तत्स्वरूपतया स्मरन् ॥¦ब्रह्मस्तेनो निहन्येत(हि हन्येत) तमस्यन्धे सदैव हि ।¦दोषा ह्यज्ञानपूर्वास्तु बद्ध्वा पुरुषमीशितुः ॥¦विष्णोर्हर्तेति बाधन्ते चाभिमानकृतास्पदम् । | |||
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| verse_text = ततो विचारयन्त्येनं देवता हरिणा सह ॥¦नाहं विष्णुर्न स्वतन्त्रो न च पूर्णगुणोऽस्म्यहम् ।¦मम स्वामी हरिर्नित्यं स्वतन्त्रः पूर्णसद्गुणः(पूर्णषड्गुणः .हृ) ॥¦एवं दार्ढ्यं शपथवद्यदा कुर्यादयं तदा(सदा .हृ) ।¦जीवन्नेव(जानन्नेवं .हृ) न तापी स्यादन्तरानन्दभोगतः(अनन्तानन्तभोगतः, अनन्तानन्दभोगतः .हृ) ॥¦तदा तेभ्यो मोचयित्वा हत्वा मिथ्याभिशंसिनः ।¦स्वकीयं कुरुते विष्णुरन्यथा तैः सह प्रभुः ॥¦तमस्यन्धे पातयति महाकारागृहोपमे ।¦महान्धे वा पातयति हस्तच्छेदादिसंमिते ॥¦ततोऽधरे वा तद्योग्यं दृढाभेदं वधोपमे ।¦तस्मादाचार्यतो ज्ञात्वा विष्णोर्भेदेन पूर्णताम् ॥¦उपासीत ततो मुक्तिं याति नास्त्यत्र संशयः ॥’ इत्यादि सामसंहितायाम् । | |||
| verse_lines = ततो विचारयन्त्येनं देवता हरिणा सह ॥¦नाहं विष्णुर्न स्वतन्त्रो न च पूर्णगुणोऽस्म्यहम् ।¦मम स्वामी हरिर्नित्यं स्वतन्त्रः पूर्णसद्गुणः(पूर्णषड्गुणः .हृ) ॥¦एवं दार्ढ्यं शपथवद्यदा कुर्यादयं तदा(सदा .हृ) ।¦जीवन्नेव(जानन्नेवं .हृ) न तापी स्यादन्तरानन्दभोगतः(अनन्तानन्तभोगतः, अनन्तानन्दभोगतः .हृ) ॥¦तदा तेभ्यो मोचयित्वा हत्वा मिथ्याभिशंसिनः ।¦स्वकीयं कुरुते विष्णुरन्यथा तैः सह प्रभुः ॥¦तमस्यन्धे पातयति महाकारागृहोपमे ।¦महान्धे वा पातयति हस्तच्छेदादिसंमिते ॥¦ततोऽधरे वा तद्योग्यं दृढाभेदं वधोपमे ।¦तस्मादाचार्यतो ज्ञात्वा विष्णोर्भेदेन पूर्णताम् ॥¦उपासीत ततो मुक्तिं याति नास्त्यत्र संशयः ॥’ इत्यादि सामसंहितायाम् । | |||
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| verse_text = ‘स्वमपीतो भवति’ इति श्रुतेरभेदपरत्वनिरासः¦स्वयम्भूरिति विष्णुजत्वाद् विरिञ्च(विष्णुजत्वाद्धि विरिञ्च) उच्यते । न हि विरिञ्चादेव विरिञ्चो जातः । ‘यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्’ इत्यादि श्रुतेः । आत्मा भगवान् । ततो भूतत्वादात्मभूः । ‘दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मसम्भवान्’ इति वचनात् । अ इति विष्णुस्तज्जातत्वादजः ‘अ इति ब्रह्म’ इत्यादि श्रुतेः । ‘वासुदेवात् परो नैव ब्रह्मशब्दोदितो भवेत्’ इत्यादेश्च । अतः स्वशब्दो विष्णावेव प्रसिद्धः । ततः ‘स्वमपीतो भवति’ इति युज्यते ।¦अप्ययो नामाविज्ञेयत्वेन प्रवेशः ।¦‘अविज्ञातं प्रविष्टं यदपीतमिति कीर्त्यते ।¦यथा नद्यः समुद्रे तु यथा विष्णुं लये प्रजाः॥’ इति शब्दनिर्णये । | |||
| verse_lines = ‘स्वमपीतो भवति’ इति श्रुतेरभेदपरत्वनिरासः¦स्वयम्भूरिति विष्णुजत्वाद् विरिञ्च(विष्णुजत्वाद्धि विरिञ्च) उच्यते । न हि विरिञ्चादेव विरिञ्चो जातः । ‘यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्’ इत्यादि श्रुतेः । आत्मा भगवान् । ततो भूतत्वादात्मभूः । ‘दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मसम्भवान्’ इति वचनात् । अ इति विष्णुस्तज्जातत्वादजः ‘अ इति ब्रह्म’ इत्यादि श्रुतेः । ‘वासुदेवात् परो नैव ब्रह्मशब्दोदितो भवेत्’ इत्यादेश्च । अतः स्वशब्दो विष्णावेव प्रसिद्धः । ततः ‘स्वमपीतो भवति’ इति युज्यते ।¦अप्ययो नामाविज्ञेयत्वेन प्रवेशः ।¦‘अविज्ञातं प्रविष्टं यदपीतमिति कीर्त्यते ।¦यथा नद्यः समुद्रे तु यथा विष्णुं लये प्रजाः॥’ इति शब्दनिर्णये । | |||
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| verse_text = न च जीवस्य तद्भावोऽस्ति । उत्थितस्य सुप्तिसंसारयोः परामर्शदर्शनात् । ‘अहं विश्वं भुवनमभ्यभवाम्’। ‘आजन्ममरणं स्मृत्वा मुक्ता हर्षमवाप्नुयुः’ इति तद्भावस्यापरामर्शाच्च । ‘प्राज्ञेनाऽत्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्’ इत्यादिश्रुतेश्च । ‘सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन’ इति च भगवद्वचनम् । | |||
| verse_lines = न च जीवस्य तद्भावोऽस्ति । उत्थितस्य सुप्तिसंसारयोः परामर्शदर्शनात् । ‘अहं विश्वं भुवनमभ्यभवाम्’। ‘आजन्ममरणं स्मृत्वा मुक्ता हर्षमवाप्नुयुः’ इति तद्भावस्यापरामर्शाच्च । ‘प्राज्ञेनाऽत्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्’ इत्यादिश्रुतेश्च । ‘सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन’ इति च भगवद्वचनम् । | |||
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| verse_text = नवदृष्टान्ता अपि भेदपरा एव¦‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः।‘, ‘सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति ।’, ‘सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति ।’, ‘स एष जीवेनाऽत्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति’ ।¦‘अण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति ।’¦‘लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह तथा चकार तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति । मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्त्यादाचामेति कथमिति लवणमिति ।’¦अत्र वाव किल सत्सोम्य(किल सोम्य) न निभालयसेऽत्रैव किलेति ।’, ‘एतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति।’, ‘तेजः परस्यां देवतायां तावन्न जानाति(तावज्जानाति) ।’, ‘अपहार्षीत् स्तेनमकार्षीत्।’ इत्यादि नवकृत्वो(नवकृत्वोऽपि) भिन्नस्य वस्तुनो भेदापरिज्ञानादनर्थं सूक्ष्मत्वाद् भेदस्य दुर्ज्ञेयत्वं(दुर्विज्ञेयत्वं) च सदृष्टान्तं तात्पर्येणाऽह । | |||
| verse_lines = नवदृष्टान्ता अपि भेदपरा एव¦‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः।‘, ‘सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति ।’, ‘सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति ।’, ‘स एष जीवेनाऽत्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति’ ।¦‘अण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति ।’¦‘लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह तथा चकार तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति । मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्त्यादाचामेति कथमिति लवणमिति ।’¦अत्र वाव किल सत्सोम्य(किल सोम्य) न निभालयसेऽत्रैव किलेति ।’, ‘एतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति।’, ‘तेजः परस्यां देवतायां तावन्न जानाति(तावज्जानाति) ।’, ‘अपहार्षीत् स्तेनमकार्षीत्।’ इत्यादि नवकृत्वो(नवकृत्वोऽपि) भिन्नस्य वस्तुनो भेदापरिज्ञानादनर्थं सूक्ष्मत्वाद् भेदस्य दुर्ज्ञेयत्वं(दुर्विज्ञेयत्वं) च सदृष्टान्तं तात्पर्येणाऽह । | |||
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| verse_text = नैकोऽपि दृष्टान्तोऽभेदपरः¦न चाभेदे कश्चिद् दृष्टान्त उक्तः। न हि शकुनिसूत्रयोर्नानावृक्षरसानां नदीसमुद्रयोर्वृक्षपरमात्मनोर्धानापरमात्मनोर्लवणोदकयोः पुरुषगन्धारयोर्नियतज्ञानानियतज्ञानयोश्चोरापह्रियमाणयोश्चाभेदोऽस्ति । | |||
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| verse_type = bhashya | |||
| verse_text = विष्णुसर्वोत्तमत्वं सकलशास्त्राणां मुख्यतात्पर्यम्¦महातात्पर्यविरोधश्चाभेदे । विष्णोः परमोत्कर्षे हि सर्वप्रमाणानां महातात्पर्यं भगवताऽभिहितम् ।¦‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।¦क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥¦उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।¦यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥¦यस्माद् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।¦अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥¦यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।¦स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥¦इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।¦एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥’ इति ।¦‘भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।¦सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥’¦‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।¦यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥’¦‘मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।¦मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥’¦‘राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।¦प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥¦अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।¦अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥¦मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।¦मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥¦न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।’¦अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।¦परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥¦मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।¦राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं(मोहनीम् .हृ) श्रिताः ॥¦महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।¦भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥’¦‘यो मामजामनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।¦असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥’ | |||
| verse_lines = विष्णुसर्वोत्तमत्वं सकलशास्त्राणां मुख्यतात्पर्यम्¦महातात्पर्यविरोधश्चाभेदे । विष्णोः परमोत्कर्षे हि सर्वप्रमाणानां महातात्पर्यं भगवताऽभिहितम् ।¦‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।¦क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥¦उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।¦यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥¦यस्माद् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।¦अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥¦यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।¦स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥¦इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।¦एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥’ इति ।¦‘भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।¦सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥’¦‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।¦यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥’¦‘मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।¦मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥’¦‘राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।¦प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥¦अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।¦अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥¦मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।¦मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥¦न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।’¦अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।¦परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥¦मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।¦राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं(मोहनीम् .हृ) श्रिताः ॥¦महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।¦भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥’¦‘यो मामजामनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।¦असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥’ | |||
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| verse_id = CHU_C06_S16_V03_B08 | |||
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| verse_text = परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।¦यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥’¦‘मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।¦सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥’¦‘ये मां ज्ञात्वा गुणैः पूर्णं न चलन्ति ततः क्वचित् ।¦तैरेवाऽप्यो न चैवान्यैरहं सर्वेश्वरेश्वरः ॥¦ये तु मद्गुणसम्पूर्तौ ज्ञानस्नेहस्थिरात्मकाः ।¦तेषां हस्तगतो मोक्षो मामेव स्मरतां सदा ॥¦ये मन्यन्ते गुणापूर्तिं तमस्तेषां परायणम्।¦न च तेभ्यो प्रियो मह्यं यश्च स्याद्गुणपूर्तिवित् ॥¦स मामाप्नोति नियतं न च तस्मात् प्रियो मम ॥¦प्रमाणान्यखिलान्येव तर्काश्चैतत्पराः सदा ।¦एतद्विरुद्धं यन्मानं तर्कश्चाऽभास एव तु (आभास एव सः .हृ)॥’ इत्यादौ(इत्यादि) ॥ | |||
| verse_lines = परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।¦यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥’¦‘मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।¦सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥’¦‘ये मां ज्ञात्वा गुणैः पूर्णं न चलन्ति ततः क्वचित् ।¦तैरेवाऽप्यो न चैवान्यैरहं सर्वेश्वरेश्वरः ॥¦ये तु मद्गुणसम्पूर्तौ ज्ञानस्नेहस्थिरात्मकाः ।¦तेषां हस्तगतो मोक्षो मामेव स्मरतां सदा ॥¦ये मन्यन्ते गुणापूर्तिं तमस्तेषां परायणम्।¦न च तेभ्यो प्रियो मह्यं यश्च स्याद्गुणपूर्तिवित् ॥¦स मामाप्नोति नियतं न च तस्मात् प्रियो मम ॥¦प्रमाणान्यखिलान्येव तर्काश्चैतत्पराः सदा ।¦एतद्विरुद्धं यन्मानं तर्कश्चाऽभास एव तु (आभास एव सः .हृ)॥’ इत्यादौ(इत्यादि) ॥ | |||
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| verse_text = ‘तं भूतिरिति देवा उपासाञ्चक्रिरे ते बभूवुस्तस्माद्धाप्येतर्हि सुप्तो भूर्भूरित्येव प्रश्वसित्यभूतिरित्यसुरास्ते ह पराबभूवुः ।’¦‘भूमैव देवः परमो ह्युपास्यो नैवाभूमा फलमेषां विधत्ते ।¦तस्माद् भूमा गुणतो वै विशिष्टो यथा क्रतुः कर्ममध्ये विशिष्टः ॥’¦‘असुन्वन्तं समं जहि दूणाशं यो न मे मयः ।¦अस्मभ्यमस्य वेदनं दद्धि सूरिश्चिदोहते ॥’¦‘सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये।¦एतावानस्य महिमा अतो ज्यायांश्च पूरुषः ॥’¦‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ।’ | |||
| verse_lines = ‘तं भूतिरिति देवा उपासाञ्चक्रिरे ते बभूवुस्तस्माद्धाप्येतर्हि सुप्तो भूर्भूरित्येव प्रश्वसित्यभूतिरित्यसुरास्ते ह पराबभूवुः ।’¦‘भूमैव देवः परमो ह्युपास्यो नैवाभूमा फलमेषां विधत्ते ।¦तस्माद् भूमा गुणतो वै विशिष्टो यथा क्रतुः कर्ममध्ये विशिष्टः ॥’¦‘असुन्वन्तं समं जहि दूणाशं यो न मे मयः ।¦अस्मभ्यमस्य वेदनं दद्धि सूरिश्चिदोहते ॥’¦‘सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये।¦एतावानस्य महिमा अतो ज्यायांश्च पूरुषः ॥’¦‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ।’ | |||
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| verse_text = ‘सृष्टिः स्थितिश्च संहारो नियतिर्ज्ञानमावृतिः ।¦बन्धमोक्षौ च कथ्यन्ते यस्योत्कर्षप्रसिद्धये ॥¦यस्योत्कर्षप्रसिद्ध्यर्थं सर्वे वेदाश्च(सर्ववेदाश्च) युक्तयः ।¦ज्ञात्वैव च यदुत्कर्षं मुच्यन्ते स हरिः परः॥’¦‘अद्या तमस्य महिमानमायवोऽनुष्टुवन्ति पूर्वथा’ इत्यादिश्रुतिश्च विष्णोरुत्कर्षे महातात्पर्यं कथयति ।¦‘महातत्परता विष्णोरुत्कर्षेऽवान्तरा ततः ।¦अन्यत्र सर्ववाक्यानां युक्तीनां च विशेषतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।¦‘ओं भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति ओम्’(ब्र.सू.३.३.५९) ‘ओं ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ओम्’(ब्र.सू.४.१.५) इत्यादि च निर्णयात्मकं भगवद्वचनम् । | |||
| verse_lines = ‘सृष्टिः स्थितिश्च संहारो नियतिर्ज्ञानमावृतिः ।¦बन्धमोक्षौ च कथ्यन्ते यस्योत्कर्षप्रसिद्धये ॥¦यस्योत्कर्षप्रसिद्ध्यर्थं सर्वे वेदाश्च(सर्ववेदाश्च) युक्तयः ।¦ज्ञात्वैव च यदुत्कर्षं मुच्यन्ते स हरिः परः॥’¦‘अद्या तमस्य महिमानमायवोऽनुष्टुवन्ति पूर्वथा’ इत्यादिश्रुतिश्च विष्णोरुत्कर्षे महातात्पर्यं कथयति ।¦‘महातत्परता विष्णोरुत्कर्षेऽवान्तरा ततः ।¦अन्यत्र सर्ववाक्यानां युक्तीनां च विशेषतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।¦‘ओं भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति ओम्’(ब्र.सू.३.३.५९) ‘ओं ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ओम्’(ब्र.सू.४.१.५) इत्यादि च निर्णयात्मकं भगवद्वचनम् । | |||
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| verse_text = जीवब्रह्मैक्यस्य न शास्त्रतात्पर्यविषयता¦न च शारीरपराभेदे तात्पर्यमआ इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । ‘अतत्त्वमसि’ इति भेदस्य नवकृत्वोऽभ्यासाच्च । ‘ओं भेदव्यपदेशात् ओम्’(ब्र.सू.१.३.५), ‘ओं भेदव्यपदेशाच्चान्यः ओम्’(ब्र.सू.१.१.२१), ‘ओम् अनुपपत्तेस्तु न शरीरः ओम्’(ब्र.सू.१.२.३), ‘ओं शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ओम्’(ब्र.सू.१.२.२०), ‘ओं पृथगुपदेशात् ओम्’(ब्र.सू.२.३.२८) इत्यादिना सर्वत्र भेदस्यैव भगवता निर्णीतत्वाच्च । | |||
| verse_lines = जीवब्रह्मैक्यस्य न शास्त्रतात्पर्यविषयता¦न च शारीरपराभेदे तात्पर्यमआ इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । ‘अतत्त्वमसि’ इति भेदस्य नवकृत्वोऽभ्यासाच्च । ‘ओं भेदव्यपदेशात् ओम्’(ब्र.सू.१.३.५), ‘ओं भेदव्यपदेशाच्चान्यः ओम्’(ब्र.सू.१.१.२१), ‘ओम् अनुपपत्तेस्तु न शरीरः ओम्’(ब्र.सू.१.२.३), ‘ओं शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ओम्’(ब्र.सू.१.२.२०), ‘ओं पृथगुपदेशात् ओम्’(ब्र.सू.२.३.२८) इत्यादिना सर्वत्र भेदस्यैव भगवता निर्णीतत्वाच्च । | |||
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| verse_text = ‘पुरुष एवेदं सर्वमिति च पुरुषेणेदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।’(पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यमिति । पुरुषेणैवेदं सर्वं व्याप्तं यद् भूतं यच्च भाव्यम् । .हृ) ‘(न भगवान्)न च भगवान् गोत्वेन मनुष्यत्वेन वा भवति । आ तृणादा करीषात् सर्वं भगवानिति मिथ्यादृष्टिरेषा । दधिसक्तवो घृतौदनमित्यादौ व्याप्तशब्दाभावेऽपि व्याप्तशब्दोऽवगम्यते । दधिसिक्ताः सक्तवो घृतसिक्तमोदनम्’(घृतोदनमित्यादिषु व्याप्तिशब्दाभावेऽपि व्याप्तिशब्दोऽवगम्यते । यथा दधिसिक्ताः .हृ) इति च श्रुतिः ।¦पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यमिति पुरुषेण हीदं नेनीयते(सर्वं नेनीयते)’ इति च । अतः सर्वप्रमाणानां भगवदुत्कर्ष एव महातात्पर्याच्छारीराभेदं वदतां महातात्पर्यविरोधः । | |||
| verse_lines = ‘पुरुष एवेदं सर्वमिति च पुरुषेणेदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।’(पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यमिति । पुरुषेणैवेदं सर्वं व्याप्तं यद् भूतं यच्च भाव्यम् । .हृ) ‘(न भगवान्)न च भगवान् गोत्वेन मनुष्यत्वेन वा भवति । आ तृणादा करीषात् सर्वं भगवानिति मिथ्यादृष्टिरेषा । दधिसक्तवो घृतौदनमित्यादौ व्याप्तशब्दाभावेऽपि व्याप्तशब्दोऽवगम्यते । दधिसिक्ताः सक्तवो घृतसिक्तमोदनम्’(घृतोदनमित्यादिषु व्याप्तिशब्दाभावेऽपि व्याप्तिशब्दोऽवगम्यते । यथा दधिसिक्ताः .हृ) इति च श्रुतिः ।¦पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यमिति पुरुषेण हीदं नेनीयते(सर्वं नेनीयते)’ इति च । अतः सर्वप्रमाणानां भगवदुत्कर्ष एव महातात्पर्याच्छारीराभेदं वदतां महातात्पर्यविरोधः । | |||
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| verse_text = जीवब्रह्मैक्यं सकलशास्त्रमुख्यतात्पर्यविरुद्धम्¦‘अज्ञानदुःखासम्बन्धाद् यावज्ज्ञानं शरीरिणः ।¦सर्वदा ज्ञानकं विष्णुमहमस्मीति ये विदुः ॥¦अज्ञानदुःखमन्तारस्ततस्ते नीचतां विदुः(विदः .हृ) ।¦विष्णोरुत्कर्षहर्तॄणां(उत्कर्षहातॄणाम्) नैव तेषां सुखं क्वचित् ॥¦योऽन्यथा सन्तमीशेशं स्वरूपं प्रतिपद्यते ।¦किं तेन न कृतं पापं चोरेणेशापहारिणा ॥’¦‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः।¦शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथा वादबलाः जनाः ॥¦कामक्रोधाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः ।¦ब्रह्मस्तेना निरानन्दा(निरालम्बाः) अपक्वमनसोऽशिवाः ॥¦याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः।¦वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ॥¦तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ॥¦‘यतः स्वरूपतश्चान्यो(स रूपतश्चान्यः .हृ) जातितः श्रुतितोऽर्थतः ।¦कथमस्मि स इत्येव सम्बन्धः(सम्बद्धः .हृ) स्यादसंहितः॥’ इति । | |||
| verse_lines = जीवब्रह्मैक्यं सकलशास्त्रमुख्यतात्पर्यविरुद्धम्¦‘अज्ञानदुःखासम्बन्धाद् यावज्ज्ञानं शरीरिणः ।¦सर्वदा ज्ञानकं विष्णुमहमस्मीति ये विदुः ॥¦अज्ञानदुःखमन्तारस्ततस्ते नीचतां विदुः(विदः .हृ) ।¦विष्णोरुत्कर्षहर्तॄणां(उत्कर्षहातॄणाम्) नैव तेषां सुखं क्वचित् ॥¦योऽन्यथा सन्तमीशेशं स्वरूपं प्रतिपद्यते ।¦किं तेन न कृतं पापं चोरेणेशापहारिणा ॥’¦‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः।¦शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथा वादबलाः जनाः ॥¦कामक्रोधाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः ।¦ब्रह्मस्तेना निरानन्दा(निरालम्बाः) अपक्वमनसोऽशिवाः ॥¦याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः।¦वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ॥¦तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ॥¦‘यतः स्वरूपतश्चान्यो(स रूपतश्चान्यः .हृ) जातितः श्रुतितोऽर्थतः ।¦कथमस्मि स इत्येव सम्बन्धः(सम्बद्धः .हृ) स्यादसंहितः॥’ इति । | |||
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| verse_text = ‘बहवः पुरुषा ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु ।¦को ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति ॥¦वैशम्पायन उवाच–¦नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ।¦बहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ॥¦तथा तं पुरुषं विश्वमाख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥’इति च मोक्षधर्मवचनाच्च । | |||
| verse_lines = ‘बहवः पुरुषा ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु ।¦को ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति ॥¦वैशम्पायन उवाच–¦नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ।¦बहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ॥¦तथा तं पुरुषं विश्वमाख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥’इति च मोक्षधर्मवचनाच्च । | |||
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| verse_text = अभेदपरत्वेन प्रतीयमानानि वाक्यान्यपि वस्तुतः भेदपराणि¦‘हंनाम हन्यमानत्वाज्जीवस्य समुदाहृतम् ।¦जीवादन्यो यतो विष्णुरहंनामा ततः स्मृतः ॥¦स्मीति जीवः समुद्दिष्टः स्मीत्यल्पं सुमितत्वतः ।¦पूर्णत्वादस्मिनामाऽसौ पूर्णपूर्णत्वहेतुतः ॥¦ब्रह्मास्मीत्युच्यते विष्णुर्बृहत्पूर्णो यतः सदा ।¦असौ सूर्यगतो विष्णुर्दूरस्थत्वात् प्रकीर्तितः ॥¦अहंनामा जीवगतो नित्याहेयत्वहेतुतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे । | |||
| verse_lines = अभेदपरत्वेन प्रतीयमानानि वाक्यान्यपि वस्तुतः भेदपराणि¦‘हंनाम हन्यमानत्वाज्जीवस्य समुदाहृतम् ।¦जीवादन्यो यतो विष्णुरहंनामा ततः स्मृतः ॥¦स्मीति जीवः समुद्दिष्टः स्मीत्यल्पं सुमितत्वतः ।¦पूर्णत्वादस्मिनामाऽसौ पूर्णपूर्णत्वहेतुतः ॥¦ब्रह्मास्मीत्युच्यते विष्णुर्बृहत्पूर्णो यतः सदा ।¦असौ सूर्यगतो विष्णुर्दूरस्थत्वात् प्रकीर्तितः ॥¦अहंनामा जीवगतो नित्याहेयत्वहेतुतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे । | |||
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| verse_text = मोक्षेऽपि विद्यमानजीवब्रह्मभेदो नातात्त्विकः¦‘परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः(उत्तमपुरुषः) स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा’, ‘स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा’ ,¦‘यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।¦सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ॥’¦‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । इमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् । एतत्साम गायन्नास्ते ।’¦‘स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येेवाऽत्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते ।’, ‘ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः।’, ’तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति।’, ‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति।’¦‘(नानात्वेनाभिसम्बुद्धाः)नानात्वेनाभिसम्बद्धास्तदा तत्कालभाविना ।¦प्रकृतौ करणातीताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः ॥¦संयोगः प्रकृतेर्नैषां मुक्तानां तत्त्वदर्शनात् ।¦पुरुषान्यबहुत्वेन प्रतीता न प्रवर्तते ॥¦प्रवर्तति पुनः सर्गे तेषां सा न प्रवर्तते ॥¦‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।¦सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’¦न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः’ इत्यादिश्रुतिस्मृतिषु सतात्पर्यं मुक्तानां विष्णोर्भेदस्यैवोक्तेः । | |||
| verse_lines = मोक्षेऽपि विद्यमानजीवब्रह्मभेदो नातात्त्विकः¦‘परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः(उत्तमपुरुषः) स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा’, ‘स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा’ ,¦‘यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।¦सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ॥’¦‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । इमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् । एतत्साम गायन्नास्ते ।’¦‘स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येेवाऽत्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते ।’, ‘ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः।’, ’तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति।’, ‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति।’¦‘(नानात्वेनाभिसम्बुद्धाः)नानात्वेनाभिसम्बद्धास्तदा तत्कालभाविना ।¦प्रकृतौ करणातीताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः ॥¦संयोगः प्रकृतेर्नैषां मुक्तानां तत्त्वदर्शनात् ।¦पुरुषान्यबहुत्वेन प्रतीता न प्रवर्तते ॥¦प्रवर्तति पुनः सर्गे तेषां सा न प्रवर्तते ॥¦‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।¦सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’¦न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः’ इत्यादिश्रुतिस्मृतिषु सतात्पर्यं मुक्तानां विष्णोर्भेदस्यैवोक्तेः । | |||
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| verse_text = अस्मिन्नेव प्रकरणे जीवब्रह्मभेदप्रतिपादकवाक्यानि विपुलानि सन्तीति प्रदर्शनम्।¦‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः(इमाः प्रजाः .हृ) सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’, ‘सति सम्पद्य न विदुः’(सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामहे इति .हृ) इत्यादौ भेद एव ह्यत्र सतात्पर्यं प्रतिपादितः । ता नद्यः समुद्रादागत्य समुद्रं प्रविशन्ति । स समुद्र एव भवति । न नदीभावं प्राप्नोति । स एव च समुद्रो भवति । समुद्र एव समुद्रो भवति, न नद्य इति भेदस्यैवावधारणं क्रियते । | |||
| verse_lines = अस्मिन्नेव प्रकरणे जीवब्रह्मभेदप्रतिपादकवाक्यानि विपुलानि सन्तीति प्रदर्शनम्।¦‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः(इमाः प्रजाः .हृ) सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’, ‘सति सम्पद्य न विदुः’(सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामहे इति .हृ) इत्यादौ भेद एव ह्यत्र सतात्पर्यं प्रतिपादितः । ता नद्यः समुद्रादागत्य समुद्रं प्रविशन्ति । स समुद्र एव भवति । न नदीभावं प्राप्नोति । स एव च समुद्रो भवति । समुद्र एव समुद्रो भवति, न नद्य इति भेदस्यैवावधारणं क्रियते । | |||
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| verse_text = अदुःखित्वपूर्णज्ञानानन्दस्वातन्त्र्यादि ब्रह्मस्वभावाननुभवं स्वात्मनोऽपि ज्ञात्वैव तद्भावाभिमतेः स्तैन्यम् । परकीयाभिमतेरपहारः ।¦‘परस्वभावाभिमतेरपहर्ता स्ववञ्चनात् ।¦स्तेनश्चाभेदवेत्ता तु ब्रह्मणो हन्यते सदा ॥’ इति तत्त्वविवेके । | |||
| verse_lines = अदुःखित्वपूर्णज्ञानानन्दस्वातन्त्र्यादि ब्रह्मस्वभावाननुभवं स्वात्मनोऽपि ज्ञात्वैव तद्भावाभिमतेः स्तैन्यम् । परकीयाभिमतेरपहारः ।¦‘परस्वभावाभिमतेरपहर्ता स्ववञ्चनात् ।¦स्तेनश्चाभेदवेत्ता तु ब्रह्मणो हन्यते सदा ॥’ इति तत्त्वविवेके । | |||
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| verse_text = न च दार्ढ्यमात्रे दृष्टान्तोऽयम्(दार्ढ्यमात्रदृष्टान्तोऽयम्)। ‘स यदि तस्य कर्ता भवति’, ‘स यदि तस्य कर्ता न भवति’ इति हतिमुक्त्योरपहारानपहारैकहेतुकत्वश्रुतेः(हेतुत्वश्रुतेः) । अन्यथा यदि दृढो भवति यद्यदृढो भवतीत्युच्येत । | |||
| verse_lines = न च दार्ढ्यमात्रे दृष्टान्तोऽयम्(दार्ढ्यमात्रदृष्टान्तोऽयम्)। ‘स यदि तस्य कर्ता भवति’, ‘स यदि तस्य कर्ता न भवति’ इति हतिमुक्त्योरपहारानपहारैकहेतुकत्वश्रुतेः(हेतुत्वश्रुतेः) । अन्यथा यदि दृढो भवति यद्यदृढो भवतीत्युच्येत । | |||
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| verse_text = न च सत्यासत्यमात्रम् । तदा सत्यानृतवाग्दृष्टान्तेन पूर्तेरपहारदृष्टान्तो न स्यात् । तस्मादभेदज्ञानेन महान्तं विनाशं प्रदर्श्य भेदज्ञानान्मुक्तिपरमेवैतद्वाक्यम् । | |||
| verse_lines = न च सत्यासत्यमात्रम् । तदा सत्यानृतवाग्दृष्टान्तेन पूर्तेरपहारदृष्टान्तो न स्यात् । तस्मादभेदज्ञानेन महान्तं विनाशं प्रदर्श्य भेदज्ञानान्मुक्तिपरमेवैतद्वाक्यम् । | |||
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| verse_text = भेदाभेदोऽपि शास्त्रमहातात्पर्यविरोधी¦भिन्नस्यैवोत्कर्षो भवति(भवतीति .हृ) । अभिन्नस्य कुत उत्कर्षः स्यात् ? अज्ञानदुःखयुक्तत्वाच्च ।¦न हि तत्पक्षे परमार्थदुःखिनो भ्रान्त्या दुःखिनश्च तत्काले कश्चिद् विशेषः । अस्वातन्त्र्यं च भ्रान्तस्य निश्चितमेव । न हि भ्रमः स्वेच्छया युज्यते ।¦‘स्वात्मानं परमं विष्णुं विदित्वाऽपि स राघवः ।¦दैत्यानां मोहनार्थाय दर्शयामास मूढताम् ॥’ इति (च) पाद्मे ।¦‘ओं जगद्व्यापारवर्जम् ओम्’(ब्र.सू.४.४.१७), ‘ ...प्रकरणात् ’(ब्र.सू.४.४.१८) इत्यादिनैश्वर्यमर्यादया मुक्तानां ब्रह्मणश्च भेदस्यैव निर्णीतत्वाच्च भगवता ।¦‘ब्रह्मसूत्रानुसारेण वेदाद्यं सर्वमेव च ।¦योज्यं न ब्रह्मसूत्राणि दृश्यमानार्थतोऽन्यथा ॥’ इति च ब्रह्मवैवर्ते ।¦‘चोरदृष्टान्ततो यस्य ह्यभेदज्ञानतस्तमः ।¦भेदेनोत्कर्षवेत्तुस्तु मुक्तिरेव ह्यचोरवत् ॥’ इति च । | |||
| verse_lines = भेदाभेदोऽपि शास्त्रमहातात्पर्यविरोधी¦भिन्नस्यैवोत्कर्षो भवति(भवतीति .हृ) । अभिन्नस्य कुत उत्कर्षः स्यात् ? अज्ञानदुःखयुक्तत्वाच्च ।¦न हि तत्पक्षे परमार्थदुःखिनो भ्रान्त्या दुःखिनश्च तत्काले कश्चिद् विशेषः । अस्वातन्त्र्यं च भ्रान्तस्य निश्चितमेव । न हि भ्रमः स्वेच्छया युज्यते ।¦‘स्वात्मानं परमं विष्णुं विदित्वाऽपि स राघवः ।¦दैत्यानां मोहनार्थाय दर्शयामास मूढताम् ॥’ इति (च) पाद्मे ।¦‘ओं जगद्व्यापारवर्जम् ओम्’(ब्र.सू.४.४.१७), ‘ ...प्रकरणात् ’(ब्र.सू.४.४.१८) इत्यादिनैश्वर्यमर्यादया मुक्तानां ब्रह्मणश्च भेदस्यैव निर्णीतत्वाच्च भगवता ।¦‘ब्रह्मसूत्रानुसारेण वेदाद्यं सर्वमेव च ।¦योज्यं न ब्रह्मसूत्राणि दृश्यमानार्थतोऽन्यथा ॥’ इति च ब्रह्मवैवर्ते ।¦‘चोरदृष्टान्ततो यस्य ह्यभेदज्ञानतस्तमः ।¦भेदेनोत्कर्षवेत्तुस्तु मुक्तिरेव ह्यचोरवत् ॥’ इति च । | |||
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| verse_text = ‘सारत्वात् स इति प्रोक्तो ज्ञानत्वाद्य इतीरितः ।¦सर्वस्येष्ट इति ह्येष मानानामणकोऽणिमा ॥¦तत्तन्त्रत्वादैतदात्म्यं स सत्यः साधुरूपतः ।¦तत्ततेः पूर्णतश्चात्मा सादनात् स इतीरितः(सदनाच्च स ईरितः) ॥¦अतत्त्वमसि पुत्रेति य उक्तो गौतमेन तु ।¦नवकृत्वः सदृष्टान्तं सर्वभेदेन केशवः ॥¦तस्मै नमो भगवते चिदचित्परमाय ते ।¦पुरुषोत्तमाय देवाय पूर्णानन्दैकरूपिणे ॥’ इति सामसंहितायाम् ।¦अतः सर्वचिदचिद्विलक्षणः सर्वोत्तमः (सर्वगुणपरिपूर्णो) सर्वगुणपूर्णो भगवान् पुरुषोत्तम इति सिद्धम् ॥ | |||
| verse_lines = ‘सारत्वात् स इति प्रोक्तो ज्ञानत्वाद्य इतीरितः ।¦सर्वस्येष्ट इति ह्येष मानानामणकोऽणिमा ॥¦तत्तन्त्रत्वादैतदात्म्यं स सत्यः साधुरूपतः ।¦तत्ततेः पूर्णतश्चात्मा सादनात् स इतीरितः(सदनाच्च स ईरितः) ॥¦अतत्त्वमसि पुत्रेति य उक्तो गौतमेन तु ।¦नवकृत्वः सदृष्टान्तं सर्वभेदेन केशवः ॥¦तस्मै नमो भगवते चिदचित्परमाय ते ।¦पुरुषोत्तमाय देवाय पूर्णानन्दैकरूपिणे ॥’ इति सामसंहितायाम् ।¦अतः सर्वचिदचिद्विलक्षणः सर्वोत्तमः (सर्वगुणपरिपूर्णो) सर्वगुणपूर्णो भगवान् पुरुषोत्तम इति सिद्धम् ॥ | |||
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| verse_text = यद्वेत्थ तेन तदुक्त्वा मामुपसीद । | |||
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| verse_text = ‘पितृलक्षणं तु पित्र्यं स्याद् राशिः स्यात् पूगलक्षणम् ।¦देवतालक्षणं दैवं निधिश्च निधिलक्षणम् ॥¦वाकोवाक्यं मूलवेदो वेदसारोपसंहृतिः ।¦एकायनमितिप्रोक्तं देवविद्या त्वमानुषी(देवविद्याऽत्यमानुषी .प्रा) ॥¦देवज्ञेयैव या विद्या ब्रह्मविद्या तथाऽऽरणम् ।¦भूतविद्या भूतचिह्नं क्षत्रविद्या तु नीतिका ॥¦नाक्षत्री ज्यौतिषाख्या(ज्योतिषाख्या .हृ) च सर्पलक्षणमेव च ।¦सर्पविद्येति सम्प्रोक्ता या देवपरिचारगा ॥¦सा देवजनविद्या स्यादेता वेद स नारदः ॥’ इति सामसंहितायाम् । | |||
| verse_lines = ‘पितृलक्षणं तु पित्र्यं स्याद् राशिः स्यात् पूगलक्षणम् ।¦देवतालक्षणं दैवं निधिश्च निधिलक्षणम् ॥¦वाकोवाक्यं मूलवेदो वेदसारोपसंहृतिः ।¦एकायनमितिप्रोक्तं देवविद्या त्वमानुषी(देवविद्याऽत्यमानुषी .प्रा) ॥¦देवज्ञेयैव या विद्या ब्रह्मविद्या तथाऽऽरणम् ।¦भूतविद्या भूतचिह्नं क्षत्रविद्या तु नीतिका ॥¦नाक्षत्री ज्यौतिषाख्या(ज्योतिषाख्या .हृ) च सर्पलक्षणमेव च ।¦सर्पविद्येति सम्प्रोक्ता या देवपरिचारगा ॥¦सा देवजनविद्या स्यादेता वेद स नारदः ॥’ इति सामसंहितायाम् । | |||
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| verse_text = ‘विद्यानां निर्णयाज्ञानादविद्वानुच्यते पुमान् ।¦सर्वविद्याविदप्यद्धा तस्मान्निर्णयवित्तये ॥¦कुमारमैच्छद्देवर्षिर्नारदो ब्रह्मवित्तमम् ॥’ इति च ।¦‘विष्णोर्नाम यतो विद्याः सर्वनामेत्यतः स्मृतः(स्मृताः .हृ) ।¦नामाभिमानिनी चोषास्तस्या(चोषा तस्या .हृ) ब्रह्म परं स्मरेत् ॥¦यदेषा न त्वमेया स्यान्मीयते ह्युषसि ध्रुवम् ।¦रात्रिमानमजानद्भिस्ततो नामेत्युषाः(नामेत्युषा) स्मृता’ ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = ‘विद्यानां निर्णयाज्ञानादविद्वानुच्यते पुमान् ।¦सर्वविद्याविदप्यद्धा तस्मान्निर्णयवित्तये ॥¦कुमारमैच्छद्देवर्षिर्नारदो ब्रह्मवित्तमम् ॥’ इति च ।¦‘विष्णोर्नाम यतो विद्याः सर्वनामेत्यतः स्मृतः(स्मृताः .हृ) ।¦नामाभिमानिनी चोषास्तस्या(चोषा तस्या .हृ) ब्रह्म परं स्मरेत् ॥¦यदेषा न त्वमेया स्यान्मीयते ह्युषसि ध्रुवम् ।¦रात्रिमानमजानद्भिस्ततो नामेत्युषाः(नामेत्युषा) स्मृता’ ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = तस्यास्तु भूयसी स्वाहा धर्मज्ञानसुखादिभिः ।¦सर्वैगुणैर्विमुक्तौ च तथा बन्धे च सर्वदा ॥¦वाचोऽभिमानिनी सैव वाङ्नाम्नी चाञ्चनाद् वसोः ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = तस्यास्तु भूयसी स्वाहा धर्मज्ञानसुखादिभिः ।¦सर्वैगुणैर्विमुक्तौ च तथा बन्धे च सर्वदा ॥¦वाचोऽभिमानिनी सैव वाङ्नाम्नी चाञ्चनाद् वसोः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = एवं तस्या विमुक्तौ च पर्जन्यः सर्वतो वरः ।¦मनोऽभिमानी सम्प्रोक्तो वृष्ट्या निर्माणतो मनः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = एवं तस्या विमुक्तौ च पर्जन्यः सर्वतो वरः ।¦मनोऽभिमानी सम्प्रोक्तो वृष्ट्या निर्माणतो मनः ॥ ३ ॥ | |||
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| verse_text = तथा तस्माद् वरो मित्रो मुक्तौ सङ्कल्पदेवता ।¦अह्नि सङ्कल्पयेद्यस्मात् स्वप्स्यन्ति निशि यत्ततः ॥ | |||
| verse_lines = तथा तस्माद् वरो मित्रो मुक्तौ सङ्कल्पदेवता ।¦अह्नि सङ्कल्पयेद्यस्मात् स्वप्स्यन्ति निशि यत्ततः ॥ | |||
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| verse_text = ................. तस्याश्चैव सदा शिवः ।¦स्थिरस्मृत्यभिमानी स सममेव रतेः स्मरः ॥ | |||
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| verse_lines = ‘तस्याः श्रेष्ठो मुख्यवायुः प्रकृष्टानां च नायकः ॥¦प्राणनामा ‘ण’इत्येव ह्यानन्दः समुदीरितः ।¦आणा सरस्वती प्रोक्ता तत्प्रकृष्टसुखत्वतः ॥¦प्राण इत्युच्यते वायुः .... ..... ........। | |||
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| verse_text = देवतातारतम्यपरिमाणनिरूपणम्¦.... .......... ...... सर्वे त्वेते दशोत्तराः ।¦पर्जन्यमित्रशिखिनो भूतवायुस्तथैव च ॥¦द्विगुणा एवानिरुद्धोऽनिलात् पञ्चगुणाधिकः ।¦पादोनो वरुणादग्निरध्यर्धोनस्स सोमतः ॥¦शिवादाशा तथैवास्या मुख्यवायुः शतोत्तरौ ।¦सङ्ख्यान्यथात्वं यत्र स्यात् तत्राऽवेशविशेषतः ॥¦अवराणां गुणस्यापि परमीयत्वतस्तथा ।¦प्राणात्तु भगवान् विष्णुरनन्तगुणतोऽधिकः ॥¦नित्यमुक्तो नित्यशक्तिर्नित्योद्रिक्तगुणः प्रभुः ॥’ इति तत्त्वविवेके ।¦‘सैषाऽऽनन्दस्य मीमांसा भवति इत्यादेश्च । | |||
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| verse_text = नामादिब्रह्मोपासना नाम न अभेदोपासना¦‘नामादिमारुतान्तेषु देवेष्वेभ्यश्च भेदतः ।¦उपासितो हरिर्मुक्तिं दद्यान्नास्त्यत्र संशयः ॥’ इति सत्तत्त्वे ॥ | |||
| verse_lines = नामादिब्रह्मोपासना नाम न अभेदोपासना¦‘नामादिमारुतान्तेषु देवेष्वेभ्यश्च भेदतः ।¦उपासितो हरिर्मुक्तिं दद्यान्नास्त्यत्र संशयः ॥’ इति सत्तत्त्वे ॥ | |||
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| verse_text = ‘उषादिमारुतान्तेषु समः समगुणोऽपि सन् ।¦ध्यातः प्रीतिं हरिर्यायादधिकामुत्तरोत्तरे ॥¦उत्तमेषूत्तमा प्रीतिस्तस्य तत्र स्मृतस्ततः ।¦ध्यातुरप्युत्तमां प्रीतिं यायान्नास्त्यत्र संशयः ॥¦तारतम्यपरिज्ञानात् तेषु ध्यातो विमुक्तिदः ।¦प्रीतिं न चान्यथा यायादिति शास्त्रस्य निर्णयः ॥’ इति तत्त्वविवेके । | |||
| verse_lines = ‘उषादिमारुतान्तेषु समः समगुणोऽपि सन् ।¦ध्यातः प्रीतिं हरिर्यायादधिकामुत्तरोत्तरे ॥¦उत्तमेषूत्तमा प्रीतिस्तस्य तत्र स्मृतस्ततः ।¦ध्यातुरप्युत्तमां प्रीतिं यायान्नास्त्यत्र संशयः ॥¦तारतम्यपरिज्ञानात् तेषु ध्यातो विमुक्तिदः ।¦प्रीतिं न चान्यथा यायादिति शास्त्रस्य निर्णयः ॥’ इति तत्त्वविवेके । | |||
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| verse_text = अन्यथोपासनाया अनर्थकारित्ववर्णनम्¦न ह्यन्यदन्यदित्येव (ह्यन्यदन्य इत्येव) ध्यातं स्यात् पुरुषार्थदम् ॥¦अनर्थश्च भवेत् तस्माद् भृत्ये(भृत्यो) राजेति बोधवत् ।¦राजपूजां यथा(यदा .हृ) भृत्ये कुर्याद् राजा हिनस्ति हि ॥¦तद्वशत्वात् तथा भृत्य एवं नामादिकं च यः ।¦उपास्ते ब्रह्मरूपेण तं ब्रह्माथेतराणि च ॥¦पातयन्ति तमस्यन्धे तस्मान्नेक्षेत तांस्तथा ॥’ इति सामसंहितायाम् । | |||
| verse_lines = अन्यथोपासनाया अनर्थकारित्ववर्णनम्¦न ह्यन्यदन्यदित्येव (ह्यन्यदन्य इत्येव) ध्यातं स्यात् पुरुषार्थदम् ॥¦अनर्थश्च भवेत् तस्माद् भृत्ये(भृत्यो) राजेति बोधवत् ।¦राजपूजां यथा(यदा .हृ) भृत्ये कुर्याद् राजा हिनस्ति हि ॥¦तद्वशत्वात् तथा भृत्य एवं नामादिकं च यः ।¦उपास्ते ब्रह्मरूपेण तं ब्रह्माथेतराणि च ॥¦पातयन्ति तमस्यन्धे तस्मान्नेक्षेत तांस्तथा ॥’ इति सामसंहितायाम् । | |||
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| verse_text = अचेतन-अयोग्य-असत्योपासना अनर्थकारिण्यः¦‘अचेतनमयोग्यं च तथैवातात्त्विकं क्वचित् ।¦नोपासीत परोऽनर्थः स्यात् तथोपासनाकृतः ॥¦दर्भचर्मादयश्चातो देवता ह्यभिमानिनः ।¦न ह्यचेतनकं किञ्चित् फलदं स्यात् कथञ्चन ॥¦औषधादिषु चैतस्माद् देवा एव वरप्रदाः ।¦औषधादिस्थिता देवास्तेऽज्ञे दृष्टफलप्रदाः ॥¦ज्ञानिन्यदृष्टदाश्च स्युर्नादैवं किञ्चिदिष्यते । | |||
| verse_lines = अचेतन-अयोग्य-असत्योपासना अनर्थकारिण्यः¦‘अचेतनमयोग्यं च तथैवातात्त्विकं क्वचित् ।¦नोपासीत परोऽनर्थः स्यात् तथोपासनाकृतः ॥¦दर्भचर्मादयश्चातो देवता ह्यभिमानिनः ।¦न ह्यचेतनकं किञ्चित् फलदं स्यात् कथञ्चन ॥¦औषधादिषु चैतस्माद् देवा एव वरप्रदाः ।¦औषधादिस्थिता देवास्तेऽज्ञे दृष्टफलप्रदाः ॥¦ज्ञानिन्यदृष्टदाश्च स्युर्नादैवं किञ्चिदिष्यते । | |||
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| verse_text = यथाऽज्ञस्यापि(यथाऽज्ञस्यैव .हृ) राज्ञस्तु भोजनं क्ल्ृप्तमिष्यते ॥¦न त्वविज्ञाय(न क्वचाज्ञाय .हृ) राजानं ग्रामप्राप्तिस्ततो भवेत् ।¦एवं देवा दृष्टफलं दद्युरज्ञस्य चाल्पतः ॥¦किञ्चिज्ज्ञानकृतादृष्टात् तच्च नैवान्यथा भवेत् ।¦अदृष्टाख्यं फलं यत्तु तज्ज्ञस्यैव न चान्यगम् ॥¦तस्मादचेतनोपासां न कुर्यात् क्वापि कश्चन ।¦न चासत्यां न चायोग्यां यदीच्छेदुत्तमं फलम् ॥¦यदि नेच्छेत् तमो गन्तुं यदि चेच्छेद्धरेः(यदि वेच्छेद्धरेः) प्रियम् ।¦अथ कर्तव्यकारी च मुमुक्षुरथवा भवेत् ॥¦सोऽपीच्छेत हरेः प्रीतिं नात्र कार्या विचारणा ॥’ इत्युपासनालक्षणे । | |||
| verse_lines = यथाऽज्ञस्यापि(यथाऽज्ञस्यैव .हृ) राज्ञस्तु भोजनं क्ल्ृप्तमिष्यते ॥¦न त्वविज्ञाय(न क्वचाज्ञाय .हृ) राजानं ग्रामप्राप्तिस्ततो भवेत् ।¦एवं देवा दृष्टफलं दद्युरज्ञस्य चाल्पतः ॥¦किञ्चिज्ज्ञानकृतादृष्टात् तच्च नैवान्यथा भवेत् ।¦अदृष्टाख्यं फलं यत्तु तज्ज्ञस्यैव न चान्यगम् ॥¦तस्मादचेतनोपासां न कुर्यात् क्वापि कश्चन ।¦न चासत्यां न चायोग्यां यदीच्छेदुत्तमं फलम् ॥¦यदि नेच्छेत् तमो गन्तुं यदि चेच्छेद्धरेः(यदि वेच्छेद्धरेः) प्रियम् ।¦अथ कर्तव्यकारी च मुमुक्षुरथवा भवेत् ॥¦सोऽपीच्छेत हरेः प्रीतिं नात्र कार्या विचारणा ॥’ इत्युपासनालक्षणे । | |||
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| verse_text = अचेतोपासना वृथेति निरूपणम्¦‘ओम् अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ओम्’(ब्र.सू.२.१.६), ‘पयोऽम्बुवच्चेत् तत्रापि’(ब्र.सू.२.२.३) इति(च) भगवद्वचनम् । ‘देवेषु चर्मादिनामानि संवादादेः’ इति च देव(ता)मीमांसायाम् । ‘अचेतनासत्यायोग्यन्यनुपास्यान्यफलत्वविपर्ययाभ्याम्’ इति सङ्कर्षणसूत्रम् । | |||
| verse_lines = अचेतोपासना वृथेति निरूपणम्¦‘ओम् अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ओम्’(ब्र.सू.२.१.६), ‘पयोऽम्बुवच्चेत् तत्रापि’(ब्र.सू.२.२.३) इति(च) भगवद्वचनम् । ‘देवेषु चर्मादिनामानि संवादादेः’ इति च देव(ता)मीमांसायाम् । ‘अचेतनासत्यायोग्यन्यनुपास्यान्यफलत्वविपर्ययाभ्याम्’ इति सङ्कर्षणसूत्रम् । | |||
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| verse_text = ‘ओषधयः संवदन्ते सोमेन सह राज्ञा’, ‘प्र वो ग्रावाणः सविता देवः सुवतु धर्मणा’, ‘न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे महामर्कं मघवन् चित्रमर्च’ । | |||
| verse_lines = ‘ओषधयः संवदन्ते सोमेन सह राज्ञा’, ‘प्र वो ग्रावाणः सविता देवः सुवतु धर्मणा’, ‘न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे महामर्कं मघवन् चित्रमर्च’ । | |||
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| verse_text = अचेतनेषु अभिमानिचेतनोपासना युक्ता इति निरूपणम्¦‘न देवानामति व्रतं शतात्मा न जीवति’, ‘अनेहसो व ऊतयः सु ऊतयो व ऊतयः’ । | |||
| verse_lines = अचेतनेषु अभिमानिचेतनोपासना युक्ता इति निरूपणम्¦‘न देवानामति व्रतं शतात्मा न जीवति’, ‘अनेहसो व ऊतयः सु ऊतयो व ऊतयः’ । | |||
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| verse_text = ‘द्यावापृथिवी जनयन्नभिव्रताऽऽप(य) ओषधीर्वनिनानि यज्ञिया ।¦अन्तरिक्षं स्वारापरूतये वशं देवासस्तन्वी३ नि मामृजुः ॥’ | |||
| verse_lines = ‘द्यावापृथिवी जनयन्नभिव्रताऽऽप(य) ओषधीर्वनिनानि यज्ञिया ।¦अन्तरिक्षं स्वारापरूतये वशं देवासस्तन्वी३ नि मामृजुः ॥’ | |||
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| verse_text = ‘अचेतनं चेतनेभ्यो दैवतेभ्यश्च चेतनाः ।¦देवाः प्राणाच्च स प्राणो विष्णोरेव सदैव तु ॥¦स्वभावं च प्रवृत्तिं च विकारं च समाप्नुयुः ।¦कश्चिद्भाव ऋते तेषां नैतत्स्याच्च(नैतैः स्यात् .हृ) कदाचन ॥¦अचेतनप्रवृत्तौ तु न दृष्टान्तोऽस्ति(प्रवृत्तौ तन्न दृष्टान्तोस्ति हृ.) कश्चन ।¦चेतनानां प्रवृत्तेश्च दृष्टत्वादेव सर्वशः ॥¦अदृष्टं दृष्टवज्ज्ञेयं यथा दृष्टप्रणेतृकम् ।¦विसर्पत् तण्डुलं दृष्ट्वा कल्प्या तत्र पिपीलिका ॥¦न तद् दृष्ट्वैव दृष्टानामपिपीलिकसर्पणम् ।¦एवं दृष्टानुसारेण चिदधीनमचेतनम् । | |||
| verse_lines = ‘अचेतनं चेतनेभ्यो दैवतेभ्यश्च चेतनाः ।¦देवाः प्राणाच्च स प्राणो विष्णोरेव सदैव तु ॥¦स्वभावं च प्रवृत्तिं च विकारं च समाप्नुयुः ।¦कश्चिद्भाव ऋते तेषां नैतत्स्याच्च(नैतैः स्यात् .हृ) कदाचन ॥¦अचेतनप्रवृत्तौ तु न दृष्टान्तोऽस्ति(प्रवृत्तौ तन्न दृष्टान्तोस्ति हृ.) कश्चन ।¦चेतनानां प्रवृत्तेश्च दृष्टत्वादेव सर्वशः ॥¦अदृष्टं दृष्टवज्ज्ञेयं यथा दृष्टप्रणेतृकम् ।¦विसर्पत् तण्डुलं दृष्ट्वा कल्प्या तत्र पिपीलिका ॥¦न तद् दृष्ट्वैव दृष्टानामपिपीलिकसर्पणम् ।¦एवं दृष्टानुसारेण चिदधीनमचेतनम् । | |||
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| verse_text = दुर्घटा शक्तिरपि हि(तु .हृ) पिशाचानां हि(च .हृ) दृश्यते ।¦देवानां किमु किम्वेव परमस्य हरेः प्रभोः ॥’ इत्यादेश्च(दि) ब्रह्मतर्के । | |||
| verse_lines = दुर्घटा शक्तिरपि हि(तु .हृ) पिशाचानां हि(च .हृ) दृश्यते ।¦देवानां किमु किम्वेव परमस्य हरेः प्रभोः ॥’ इत्यादेश्च(दि) ब्रह्मतर्के । | |||
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| verse_text = हृदयेत्यादिशब्दानां विवक्षितार्थकथनम्¦हृदयज्ञो भगवत्तत्त्वज्ञः । हृद्ययनाद्धृदयम् । ‘उदरं ब्रह्मेति शार्कराक्ष्या उपासते हृदयं ब्रह्मेत्यारुणयः’ इति श्रुतिः(‘हृदयं ब्रह्मेति शार्कराक्ष्या उपासते’ इति श्रुतिः .हृ) । ‘कोलं पूगफलं प्रोक्तं कलं ताम्बूलपत्रकम्’ इत्यभिधानम् ।¦‘भूतानां भौतिकानां च मन्त्राहुतिगणस्य च ।¦अचेतनगणस्यास्य कल्पको मित्रनामकः ॥¦प्राणा भूतानि मन्त्राद्याश्चिदचित्त्वविभेदिनः ।¦अचितां कल्पको मित्रश्चितां वाय्वादयः स्मृताः ॥’ इति वस्तुतत्त्वे ।¦सर्वमचेतनं सङ्कल्प्यते । | |||
| verse_lines = हृदयेत्यादिशब्दानां विवक्षितार्थकथनम्¦हृदयज्ञो भगवत्तत्त्वज्ञः । हृद्ययनाद्धृदयम् । ‘उदरं ब्रह्मेति शार्कराक्ष्या उपासते हृदयं ब्रह्मेत्यारुणयः’ इति श्रुतिः(‘हृदयं ब्रह्मेति शार्कराक्ष्या उपासते’ इति श्रुतिः .हृ) । ‘कोलं पूगफलं प्रोक्तं कलं ताम्बूलपत्रकम्’ इत्यभिधानम् ।¦‘भूतानां भौतिकानां च मन्त्राहुतिगणस्य च ।¦अचेतनगणस्यास्य कल्पको मित्रनामकः ॥¦प्राणा भूतानि मन्त्राद्याश्चिदचित्त्वविभेदिनः ।¦अचितां कल्पको मित्रश्चितां वाय्वादयः स्मृताः ॥’ इति वस्तुतत्त्वे ।¦सर्वमचेतनं सङ्कल्प्यते । | |||
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| verse_text = ‘अस्थिरस्मरणं चित्तं स्थिरसंस्मरणं स्मरः’(स्थिरं स स्मरणं .हृ) इति शब्दनिर्णये । ‘वेदनं ज्ञानमात्रं स्याद् विद्वत्त्वं तु विशेषतः’ इति च ।¦‘मोक्षे यस्मिन् प्रवेशः स्यात् सा प्रतिष्ठा हि मुख्यतः ।¦उपचारतस्त्ववस्थानमिति शब्दविदो विदुः ॥’ इति च ।¦‘देवा मनुष्यतां प्राप्ता विज्ञेया देवमानुषाः ।¦ध्यानं कुर्वन्त इव ते नैव स्युर्बहुभाषिणः ॥¦ब्रूयुरर्थवतीं वाचं नानर्थां(नानार्थाम् .क) प्रायशो हि ते ॥’ इति पाद्मे ।¦‘बलं ज्ञानबलं चैव बाह्यं चेति द्विधा मतम् ।¦युक्तिज्ञता ज्ञानबलं(युक्तिज्ञञानाद् ज्ञानबलं .हृ) सा ज्ञानादधिका मता(तत् ज्ञानादिकं मतम् .हृ) ॥ इति तत्त्वसारे । | |||
| verse_lines = ‘अस्थिरस्मरणं चित्तं स्थिरसंस्मरणं स्मरः’(स्थिरं स स्मरणं .हृ) इति शब्दनिर्णये । ‘वेदनं ज्ञानमात्रं स्याद् विद्वत्त्वं तु विशेषतः’ इति च ।¦‘मोक्षे यस्मिन् प्रवेशः स्यात् सा प्रतिष्ठा हि मुख्यतः ।¦उपचारतस्त्ववस्थानमिति शब्दविदो विदुः ॥’ इति च ।¦‘देवा मनुष्यतां प्राप्ता विज्ञेया देवमानुषाः ।¦ध्यानं कुर्वन्त इव ते नैव स्युर्बहुभाषिणः ॥¦ब्रूयुरर्थवतीं वाचं नानर्थां(नानार्थाम् .क) प्रायशो हि ते ॥’ इति पाद्मे ।¦‘बलं ज्ञानबलं चैव बाह्यं चेति द्विधा मतम् ।¦युक्तिज्ञता ज्ञानबलं(युक्तिज्ञञानाद् ज्ञानबलं .हृ) सा ज्ञानादधिका मता(तत् ज्ञानादिकं मतम् .हृ) ॥ इति तत्त्वसारे । | |||
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| verse_text = अन्नाद्यचेतनपदार्थेष्वपि तारतम्यनिरूपणम्¦अन्नं ज्ञानरसान्नं च बाह्यमन्नमिति द्विधा ।¦ज्ञानान्नं ज्ञानबलतः श्रेष्ठं ज्ञानरतिर्हि तत् ॥¦यद् बाह्यं तु बलं तस्माद् बाह्यमन्नं विशिष्यते ।¦आपश्च द्विविधाः प्रोक्तास्तृप्तिर्या ज्ञानतो रतेः ॥¦ता ज्ञेया आन्तरा आपो बाह्यास्तु द्रवरूपकाः ।¦आन्तरान्नादान्तरापो बाह्याद् बाह्यास्तथा वराः ॥¦एवं तेजः प्रातिभाख्यं बाह्यं चेति द्विधा मतम् ।¦प्रातिभं ज्ञानतृप्तेश्च परमाकाश एव च ॥¦स्थिरा तु प्रतिभाऽन्तस्थाश्छिद्रमेव तु बाह्यगः (बाह्यगम् .हृ)।¦स्थिरा हि प्रतिभा श्रेष्ठा चञ्चला या स्मराभिधा ॥¦एकधैव स्मृतिः श्रेष्ठाऽऽशाऽपरोक्षदृगात्मकम् ।¦श्रेष्ठं सुखं ततो मोक्षे प्राणाख्यं परमं सुखम् ॥ | |||
| verse_lines = अन्नाद्यचेतनपदार्थेष्वपि तारतम्यनिरूपणम्¦अन्नं ज्ञानरसान्नं च बाह्यमन्नमिति द्विधा ।¦ज्ञानान्नं ज्ञानबलतः श्रेष्ठं ज्ञानरतिर्हि तत् ॥¦यद् बाह्यं तु बलं तस्माद् बाह्यमन्नं विशिष्यते ।¦आपश्च द्विविधाः प्रोक्तास्तृप्तिर्या ज्ञानतो रतेः ॥¦ता ज्ञेया आन्तरा आपो बाह्यास्तु द्रवरूपकाः ।¦आन्तरान्नादान्तरापो बाह्याद् बाह्यास्तथा वराः ॥¦एवं तेजः प्रातिभाख्यं बाह्यं चेति द्विधा मतम् ।¦प्रातिभं ज्ञानतृप्तेश्च परमाकाश एव च ॥¦स्थिरा तु प्रतिभाऽन्तस्थाश्छिद्रमेव तु बाह्यगः (बाह्यगम् .हृ)।¦स्थिरा हि प्रतिभा श्रेष्ठा चञ्चला या स्मराभिधा ॥¦एकधैव स्मृतिः श्रेष्ठाऽऽशाऽपरोक्षदृगात्मकम् ।¦श्रेष्ठं सुखं ततो मोक्षे प्राणाख्यं परमं सुखम् ॥ | |||
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| verse_text = उत्तरोत्तरमेतद्धि वाय्वन्ताभिमतं सदा ।¦बाह्याद्भ्यो बाह्यमन्नं च जायतेऽन्यत् तदन्यथा ॥¦व्यक्तिरन्तर्गतानां तु विपरीतक्रमाद् भवेत् ।¦तथाऽपि मोक्षगं यस्मात् स्वभावो नित्य एव तु ॥¦अतस्तस्मादापरोक्ष्यं कादाचित्कं हि जायते ।¦दृष्ट्यधीना स्मृतिश्चेयं प्रतिभा स्मृतिसम्भवा ॥¦स्थैर्यमालम्ब्य तु चलमन्यथा नैव तिष्ठति ।¦प्रतिभातस्य तृप्तिः स्यादतृप्तस्य तु का रतिः ॥¦तत(अत .हृ) एवं क्रमादेवं वरिष्ठः प्राणजो गुणः ॥’ इति च ॥ | |||
| verse_lines = उत्तरोत्तरमेतद्धि वाय्वन्ताभिमतं सदा ।¦बाह्याद्भ्यो बाह्यमन्नं च जायतेऽन्यत् तदन्यथा ॥¦व्यक्तिरन्तर्गतानां तु विपरीतक्रमाद् भवेत् ।¦तथाऽपि मोक्षगं यस्मात् स्वभावो नित्य एव तु ॥¦अतस्तस्मादापरोक्ष्यं कादाचित्कं हि जायते ।¦दृष्ट्यधीना स्मृतिश्चेयं प्रतिभा स्मृतिसम्भवा ॥¦स्थैर्यमालम्ब्य तु चलमन्यथा नैव तिष्ठति ।¦प्रतिभातस्य तृप्तिः स्यादतृप्तस्य तु का रतिः ॥¦तत(अत .हृ) एवं क्रमादेवं वरिष्ठः प्राणजो गुणः ॥’ इति च ॥ | |||
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| verse_text = योऽसौ प्राणः स प्राणेन परब्रह्मणा याति । स एव (एष) भगवान् प्राणं प्रत्यभीष्टं ददाति । ‘प्राणस्य प्राणम्’ इति श्रुतेः । प्राणो वायुः परमात्मानं च ज्ञानेन दर्शयन् ददाति । सर्वस्मादतीतमुत्तमं वदतीत्यतिवादी ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = योऽसौ प्राणः स प्राणेन परब्रह्मणा याति । स एव (एष) भगवान् प्राणं प्रत्यभीष्टं ददाति । ‘प्राणस्य प्राणम्’ इति श्रुतेः । प्राणो वायुः परमात्मानं च ज्ञानेन दर्शयन् ददाति । सर्वस्मादतीतमुत्तमं वदतीत्यतिवादी ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = ‘एष तु वा अतिवदति’ इति ‘तु’शब्दोऽर्थान्तरवाची । ‘अस्ति भगवः प्राणाद्भूय’ इति प्रश्नो व्यतिहार्यः(प्रश्नोऽप्यध्याहार्यः .हृ) ।¦‘यत्रानवसरोऽन्यत्र पदं तत्र प्रतिष्ठितम् ।¦यत्र प्रमाणं वाक्यं वा व्यतिहार्यं(चाप्यतिहार्यं .हृ) न संशयः ॥’¦‘ओं व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत्’(ब्र.सू.३.३.३८) इति च भगवद्वचनम् ।¦‘अतिवादी प्राणवादी विष्णुवादी विशेषतः ।¦स सत्यो भगवान् विष्णुर्यन्निर्दोषो नियामकः ॥’ | |||
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| verse_text = यदधीनं विना नान्यत् किञ्चिदस्ति कुतश्चन ।¦स भूमोक्तोऽतिपूर्णत्वादन्यदल्पमुदीर्यते ॥ | |||
| verse_lines = यदधीनं विना नान्यत् किञ्चिदस्ति कुतश्चन ।¦स भूमोक्तोऽतिपूर्णत्वादन्यदल्पमुदीर्यते ॥ | |||
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| verse_text = ‘स सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदेशेषु सर्वदा ।¦स्वतन्त्रः सर्ववस्तूनि तदधीनानि सर्वशः ॥¦पूर्णत्वात् सुखरूपोऽसौ सर्वकर्ता सुखत्वतः ।¦कर्तृत्वात् सुस्थिरश्चासौ स्थिरत्वादास्तिकस्तथा ॥¦आस्तिकत्वाच्च(अस्तीकत्वाच्च) मन्ताऽसौ विज्ञाता च ततो हरिः।¦विज्ञातृत्वात् स निर्दोषः(विज्ञातृत्वाच्च निर्दोषः .हृ) सर्वस्यापि नियामकः॥¦भूमा नारायणाख्यः स्यात् स एवाहङ्कृतिः स्मृतः ।¦आकार्योऽहमिति ह्येष ततोऽहङ्कार उच्यते ॥¦जीवस्थस्त्वनिरुद्धो यः सोऽहङ्कार इतीरितः ।¦सोऽप्यणुत्वेऽपि संव्यापी परमैश्वर्ययोगतः ॥¦यथा बालतनौ विष्णौ मार्कण्डेयेन धीमता ।¦प्रविश्य नान्तोऽधिगत एवं व्याप्तो हरिः परः ॥¦अणुरूपोऽपि भगवान् वासुदेवः परो विभुः ।¦आत्मेत्युक्तः स च व्यापी न च भेदो हरौ क्वचित् ॥’ इति परमसारे ।¦भूमप्रसादं विना नाल्पे सुखमस्ति । मर्त्यं च पूर्वम् । ‘अल्पापि ह्यमृता देवी श्रीः पूर्णातिप्रियत्वतः’ इति च ।¦आत्मरतिर्भगवद्रतिः । स्वो भगवान् । सोऽस्य प्रत्यक्षत आज्ञापिता(आज्ञापयिता) भवतीति स्वराट् । | |||
| verse_lines = ‘स सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदेशेषु सर्वदा ।¦स्वतन्त्रः सर्ववस्तूनि तदधीनानि सर्वशः ॥¦पूर्णत्वात् सुखरूपोऽसौ सर्वकर्ता सुखत्वतः ।¦कर्तृत्वात् सुस्थिरश्चासौ स्थिरत्वादास्तिकस्तथा ॥¦आस्तिकत्वाच्च(अस्तीकत्वाच्च) मन्ताऽसौ विज्ञाता च ततो हरिः।¦विज्ञातृत्वात् स निर्दोषः(विज्ञातृत्वाच्च निर्दोषः .हृ) सर्वस्यापि नियामकः॥¦भूमा नारायणाख्यः स्यात् स एवाहङ्कृतिः स्मृतः ।¦आकार्योऽहमिति ह्येष ततोऽहङ्कार उच्यते ॥¦जीवस्थस्त्वनिरुद्धो यः सोऽहङ्कार इतीरितः ।¦सोऽप्यणुत्वेऽपि संव्यापी परमैश्वर्ययोगतः ॥¦यथा बालतनौ विष्णौ मार्कण्डेयेन धीमता ।¦प्रविश्य नान्तोऽधिगत एवं व्याप्तो हरिः परः ॥¦अणुरूपोऽपि भगवान् वासुदेवः परो विभुः ।¦आत्मेत्युक्तः स च व्यापी न च भेदो हरौ क्वचित् ॥’ इति परमसारे ।¦भूमप्रसादं विना नाल्पे सुखमस्ति । मर्त्यं च पूर्वम् । ‘अल्पापि ह्यमृता देवी श्रीः पूर्णातिप्रियत्वतः’ इति च ।¦आत्मरतिर्भगवद्रतिः । स्वो भगवान् । सोऽस्य प्रत्यक्षत आज्ञापिता(आज्ञापयिता) भवतीति स्वराट् । | |||
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| verse_id = CHU_C07_S26_V02_B01 | |||
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| verse_text = ‘आत्मतः प्राण आत्मत आशा’ इत्यादि मुक्तः सन् प्राणादीनां सृष्ट्यादिकं पश्यतीत्यर्थः । ‘सर्वं हि(ह .हृ) पश्यः पश्यति’ इति वाक्यशेषात् । पश्य इति द्रष्टा । ‘यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णम्’ इति श्रुतेः ।¦‘भूमोपासनयोग्यस्तु साक्षाद्ब्रह्मैव मुख्यतः ।¦स तद्विद्याबलेनैव विष्णुना रतिमाप्नुयात् ॥¦तेनैव क्रीडते नित्यं स्त्रीरूपो मिथुनीभवेत् ।¦तदानन्दः स एवास्य राजा भवति नापरः ॥¦पश्येच्च प्राणसृष्ट्याद्यं ये तदन्य उपासकाः ।¦ते यथायोग्यमाप्स्यन्ति फलं मुक्तौ न संशयः ॥ ’इति परमतत्त्वे । | |||
| verse_lines = ‘आत्मतः प्राण आत्मत आशा’ इत्यादि मुक्तः सन् प्राणादीनां सृष्ट्यादिकं पश्यतीत्यर्थः । ‘सर्वं हि(ह .हृ) पश्यः पश्यति’ इति वाक्यशेषात् । पश्य इति द्रष्टा । ‘यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णम्’ इति श्रुतेः ।¦‘भूमोपासनयोग्यस्तु साक्षाद्ब्रह्मैव मुख्यतः ।¦स तद्विद्याबलेनैव विष्णुना रतिमाप्नुयात् ॥¦तेनैव क्रीडते नित्यं स्त्रीरूपो मिथुनीभवेत् ।¦तदानन्दः स एवास्य राजा भवति नापरः ॥¦पश्येच्च प्राणसृष्ट्याद्यं ये तदन्य उपासकाः ।¦ते यथायोग्यमाप्स्यन्ति फलं मुक्तौ न संशयः ॥ ’इति परमतत्त्वे । | |||
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| verse_text = अहङ्कारशब्दवाच्यो भगवाननिरुद्धः, न जीवः¦न च ‘भूमानं भगवो विजिज्ञास’ इति पृष्टः सन् भूम्नो लक्षणं ‘स एवाधस्तात् स उपरिष्टाद्’ इत्यादिना पूर्णत्वं भगवतोऽन्यस्याहङ्कारस्योपदिशतीति युज्यते । न चाहङ्कारस्य पूर्णत्वमस्ति । न च मुख्ये पूर्णत्वे युज्यमाने उपचरितं युज्यते । न चाहङ्कारस्य काचित् प्रस्तुतिः । अथशब्दस्तु रूपान्तरापेक्षया युज्यते । अतःशब्दस्तत्प्रसादादिति । | |||
| verse_lines = अहङ्कारशब्दवाच्यो भगवाननिरुद्धः, न जीवः¦न च ‘भूमानं भगवो विजिज्ञास’ इति पृष्टः सन् भूम्नो लक्षणं ‘स एवाधस्तात् स उपरिष्टाद्’ इत्यादिना पूर्णत्वं भगवतोऽन्यस्याहङ्कारस्योपदिशतीति युज्यते । न चाहङ्कारस्य पूर्णत्वमस्ति । न च मुख्ये पूर्णत्वे युज्यमाने उपचरितं युज्यते । न चाहङ्कारस्य काचित् प्रस्तुतिः । अथशब्दस्तु रूपान्तरापेक्षया युज्यते । अतःशब्दस्तत्प्रसादादिति । | |||
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| verse_text = ‘आत्मरतिः स्वराट्’ इत्यत्र आत्मस्वशब्दौ विष्णुवाचकौ¦आत्मरतिः स्वराडि(ळि)त्यादि । ‘यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्’ इति ब्रह्मण उत्पत्तिप्रसिद्धेः(इति ब्रह्मणि प्रसिद्धेः) स्वयम्भूरात्मभूरित्यादिष्वात्मशब्दः स्वयंशब्दश्च यथा विष्णुवाची तद्वदेवात्राप्यात्मशब्दो विष्णुवाच्येव । | |||
| verse_lines = ‘आत्मरतिः स्वराट्’ इत्यत्र आत्मस्वशब्दौ विष्णुवाचकौ¦आत्मरतिः स्वराडि(ळि)त्यादि । ‘यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्’ इति ब्रह्मण उत्पत्तिप्रसिद्धेः(इति ब्रह्मणि प्रसिद्धेः) स्वयम्भूरात्मभूरित्यादिष्वात्मशब्दः स्वयंशब्दश्च यथा विष्णुवाची तद्वदेवात्राप्यात्मशब्दो विष्णुवाच्येव । | |||
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| verse_text = मुक्तेभ्यः सकाशात् प्राणिसृष्टिनिराकरणम्¦न च मुक्तेभ्यः प्राणादिकमुत्पद्यते । ‘ओं जगद्व्यापारवर्जम् ओम्’(ब्र.सू.४.४.१७)इति वर्णितत्वाद्(निर्णीतत्वाद्) भगवता । ‘आत्मत एष(एव) प्राणो जायते’ इत्यवधारणान्न भगवतोऽन्यस्मात् प्राणो जायते ।¦‘आत्मेति मुख्यतो विष्णुस्तदन्ये तूपचारतः ।¦तथैव स्व इति प्रोक्तस्तस्माद् ब्रह्माऽऽत्मभूः स्वभूः ॥’ इति स्कान्दे । | |||
| verse_lines = मुक्तेभ्यः सकाशात् प्राणिसृष्टिनिराकरणम्¦न च मुक्तेभ्यः प्राणादिकमुत्पद्यते । ‘ओं जगद्व्यापारवर्जम् ओम्’(ब्र.सू.४.४.१७)इति वर्णितत्वाद्(निर्णीतत्वाद्) भगवता । ‘आत्मत एष(एव) प्राणो जायते’ इत्यवधारणान्न भगवतोऽन्यस्मात् प्राणो जायते ।¦‘आत्मेति मुख्यतो विष्णुस्तदन्ये तूपचारतः ।¦तथैव स्व इति प्रोक्तस्तस्माद् ब्रह्माऽऽत्मभूः स्वभूः ॥’ इति स्कान्दे । | |||
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| verse_text = ‘स एवेदं सर्वम्’ इत्येतत् नाभेदपरम्¦‘इदं नामातिसामीप्यात् सर्वं(सर्बः हृ.) पूर्णगुणत्वतः ।¦भूमाऽहमात्मेति हरिस्त्रिविधोऽपि हि सर्वदा ॥’ इति विश्वनिर्णये । | |||
| verse_lines = ‘स एवेदं सर्वम्’ इत्येतत् नाभेदपरम्¦‘इदं नामातिसामीप्यात् सर्वं(सर्बः हृ.) पूर्णगुणत्वतः ।¦भूमाऽहमात्मेति हरिस्त्रिविधोऽपि हि सर्वदा ॥’ इति विश्वनिर्णये । | |||
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| verse_text = लिङ्गत्रयमपि भगवति युक्तम्¦‘स्त्रीगुणाः पुङ्गुणाश्चैव नपुंसकगुणा अपि ।¦यदधीना व्यत्ययः स्याद् लिङ्गानां तत्र सर्वशः ॥¦कः किं कं तत्सर्वमात्माऽदितिर्देवादयस्ततः ॥’इति लिङ्गनिर्णये । | |||
| verse_lines = लिङ्गत्रयमपि भगवति युक्तम्¦‘स्त्रीगुणाः पुङ्गुणाश्चैव नपुंसकगुणा अपि ।¦यदधीना व्यत्ययः स्याद् लिङ्गानां तत्र सर्वशः ॥¦कः किं कं तत्सर्वमात्माऽदितिर्देवादयस्ततः ॥’इति लिङ्गनिर्णये । | |||
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| verse_text = शास्त्रश्रवणशुद्धिरेवाऽहारशुद्धिः¦‘गुरोर्विद्याहृतिर्या तु स आहार इति स्मृतः ।¦तच्छुद्धौ ज्ञानशुद्धिः स्याज्ज्ञानशुद्धी स्थिरा स्मृतिः ॥¦स्मृतिस्थैर्ये त्वापरोक्ष्यं हरेर्मोक्षस्ततो भवेत् ॥’इति साधननिर्णये ॥ २६ ॥¦॥ | |||
| verse_lines = शास्त्रश्रवणशुद्धिरेवाऽहारशुद्धिः¦‘गुरोर्विद्याहृतिर्या तु स आहार इति स्मृतः ।¦तच्छुद्धौ ज्ञानशुद्धिः स्याज्ज्ञानशुद्धी स्थिरा स्मृतिः ॥¦स्मृतिस्थैर्ये त्वापरोक्ष्यं हरेर्मोक्षस्ततो भवेत् ॥’इति साधननिर्णये ॥ २६ ॥¦॥ | |||
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| verse_text = ‘यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे’ इति ‘ब्रह्मपुर’शब्देन ब्रह्माख्यं पुरं पूर्णत्वात् पुरमिति परं ब्रह्म, ब्रह्मणः पुरमिति शरीरं चोभयं विवक्षितम् ।¦‘प्राप्तोऽस्म्यवध्यं(प्राप्तोऽवध्यं) ब्रह्मपुरं राजेव निवसाम्यहम् ।’,‘अस्मिंश्चेदिदं (अस्मिंश्चेद्यदिदं) ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितम् ।’,‘(यदैनं जरा .हृ) यदैतज्जराऽवाप्नोति प्रध्वंसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत् सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युः’ (इति वाक्यशेषाद्) इत्यादिवाक्यशेषाद् भगवद्वचनाच्च ‘ब्रह्मपुर’शब्देन परं ब्रह्मोच्यत इत्यवसीयते । ‘यत्पुण्डरीकं पुरमध्यसंस्थम्’, ‘यदिदं शरीरं तदेतदाद्यं देवसदनम्’ इत्यादेः शरीरं च ।¦हृत्कमलस्थभगवानेव हृत्कमलस्याप्याधार इति निरूपणम्¦‘यद् वै तद् ब्रह्मेतीदं वाव तद् योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशः’, ‘यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति’ इत्यादिना परब्रह्मण्येव (च) हृदयं स्थितम् । | |||
| verse_lines = ‘यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे’ इति ‘ब्रह्मपुर’शब्देन ब्रह्माख्यं पुरं पूर्णत्वात् पुरमिति परं ब्रह्म, ब्रह्मणः पुरमिति शरीरं चोभयं विवक्षितम् ।¦‘प्राप्तोऽस्म्यवध्यं(प्राप्तोऽवध्यं) ब्रह्मपुरं राजेव निवसाम्यहम् ।’,‘अस्मिंश्चेदिदं (अस्मिंश्चेद्यदिदं) ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितम् ।’,‘(यदैनं जरा .हृ) यदैतज्जराऽवाप्नोति प्रध्वंसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत् सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युः’ (इति वाक्यशेषाद्) इत्यादिवाक्यशेषाद् भगवद्वचनाच्च ‘ब्रह्मपुर’शब्देन परं ब्रह्मोच्यत इत्यवसीयते । ‘यत्पुण्डरीकं पुरमध्यसंस्थम्’, ‘यदिदं शरीरं तदेतदाद्यं देवसदनम्’ इत्यादेः शरीरं च ।¦हृत्कमलस्थभगवानेव हृत्कमलस्याप्याधार इति निरूपणम्¦‘यद् वै तद् ब्रह्मेतीदं वाव तद् योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशः’, ‘यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति’ इत्यादिना परब्रह्मण्येव (च) हृदयं स्थितम् । | |||
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| verse_id = CHU_C08_S01_V03_B01 | |||
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| verse_text = हृदयस्थदहराकाशस्य परब्रह्मत्वाभावनिरूपणम्¦‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यम्’, ‘दहरोस्मिन्नन्तर आकाशः किं तदत्र विद्यते’ इत्याकाश(इत्यत्राकाश)शब्देन भूताकाशो विवक्षितः। ‘किं तदत्र विद्यते?’ इत्यस्यायं परिहारः– अस्मिन् भूताकाशे परब्रह्माख्य आकाशो विद्यते । आसमन्तात् काशनाद् आकाशः । आसमन्तात् कमश्नातीति वा । ‘अस्मिन् कामाः समाहिताः’ इति वाक्यशेषात् । आसमन्तात् कामानश्नातीति वा । स च यावान् बहिः परमात्मा व्याप्तोऽस्ति तावानेव विद्यते गुणतः । पूर्णगुणत्वात् । अल्पपरिमाणस्यापि महत्परिमाणत्वं च युज्यते । अचिन्त्यशक्तित्वात् ।¦‘यस्मिन् विरुद्धगतयोऽप्यनिशं(ह्यनिशं .हृ) पतन्ति।¦विद्यादयो विविधशक्तय आनूपूर्व्या ॥’ इति वचनात् ।¦आनुपूर्व्येति श्रुतिप्रमाणादित्यर्थः । ‘आनुपूर्वी श्रुतिर्वेद आम्नायश्चेति कथ्यते’ इत्यभिधानात् । अन्यथाऽनिशमित्युक्तिविरोधात् । ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा’, ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्याः’ इति हृदयस्थस्यैवाणुत्वमहत्वोक्तेश्च ।¦‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे¦सन्त्यश्रुता अपि नैवात्रशङ्का ।¦चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः¦श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ॥’ इति च श्रुतिः ।¦‘सुविरुद्धा अश्रुताश्च गुणाः सन्त्येव सर्वशः ।¦दोषाः केऽपि(अपि .हृ) न सन्त्येव श्रुता अपि तु सर्वशः ॥’ इति गारुडे ॥ | |||
| verse_lines = हृदयस्थदहराकाशस्य परब्रह्मत्वाभावनिरूपणम्¦‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यम्’, ‘दहरोस्मिन्नन्तर आकाशः किं तदत्र विद्यते’ इत्याकाश(इत्यत्राकाश)शब्देन भूताकाशो विवक्षितः। ‘किं तदत्र विद्यते?’ इत्यस्यायं परिहारः– अस्मिन् भूताकाशे परब्रह्माख्य आकाशो विद्यते । आसमन्तात् काशनाद् आकाशः । आसमन्तात् कमश्नातीति वा । ‘अस्मिन् कामाः समाहिताः’ इति वाक्यशेषात् । आसमन्तात् कामानश्नातीति वा । स च यावान् बहिः परमात्मा व्याप्तोऽस्ति तावानेव विद्यते गुणतः । पूर्णगुणत्वात् । अल्पपरिमाणस्यापि महत्परिमाणत्वं च युज्यते । अचिन्त्यशक्तित्वात् ।¦‘यस्मिन् विरुद्धगतयोऽप्यनिशं(ह्यनिशं .हृ) पतन्ति।¦विद्यादयो विविधशक्तय आनूपूर्व्या ॥’ इति वचनात् ।¦आनुपूर्व्येति श्रुतिप्रमाणादित्यर्थः । ‘आनुपूर्वी श्रुतिर्वेद आम्नायश्चेति कथ्यते’ इत्यभिधानात् । अन्यथाऽनिशमित्युक्तिविरोधात् । ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा’, ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्याः’ इति हृदयस्थस्यैवाणुत्वमहत्वोक्तेश्च ।¦‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे¦सन्त्यश्रुता अपि नैवात्रशङ्का ।¦चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः¦श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ॥’ इति च श्रुतिः ।¦‘सुविरुद्धा अश्रुताश्च गुणाः सन्त्येव सर्वशः ।¦दोषाः केऽपि(अपि .हृ) न सन्त्येव श्रुता अपि तु सर्वशः ॥’ इति गारुडे ॥ | |||
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| verse_id = CHU_C08_S01_V03_B02 | |||
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| verse_text = दहराकाशस्थमहाकाशस्य परब्रह्मत्वखथनम्¦‘किं तदत्र विद्यते ?’ इति पृष्टत्वात् हृद्गत आकाशो हृदयशब्देनोच्यते ; हृद्ययनात् । तस्मिन् हृदयाख्य आकाशे (बहिराकाशो) परब्रह्माख्य आकाशो विद्यत इत्यर्थः । अन्यथा कथं भूताकाशस्य दहरस्य बहिराकाशसमत्वम् ? ‘दहरोऽस्मिन् अन्तराकाश’ इति(च) पूर्वोक्ताकाशस्य दहरत्वमुक्तम् । उत्तरस्य तु ‘यावान् वा अयमाकाशः’ इत्यनन्तरपरिमाणत्वम् । अतो ब्रह्माकाश एवोत्तरः । पूर्वोक्तस्याभूताकाशत्वे(पूर्वोक्ताकाश भूताकाशत्वे) ‘तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यम्’, ‘तत्रापि दहरं(दह्रं हृ,) गगनं विशोकस्तस्मिन् यदन्तस्तदुपासितव्यम्’, ‘सहस्रशीर्षं देवम्’ इत्यादि कथं युज्यते(युज्येत .हृ)? न हि भगवदन्तःस्थितमेवान्यत् किञ्चिद्विजिज्ञास्यम् । तद् वावेत्यवधारणाय । उत्तरस्यापरब्रह्मत्वे च सर्वाधारत्वं ‘नास्य जरयैतज्जीर्यते न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा’ इत्यादि न युज्यते ।¦परब्रह्मस्थप्रपञ्चो न जिज्ञासार्हः¦‘किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद् वाव विजिज्ञासितव्यम् इत्यस्य य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः’ इत्येव परिहारः । न तु ‘उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी’ इत्यादि । तत्तु विजिज्ञासितव्यत्वे हेतुत्वेन सामर्थ्यकथनमेव । न हि द्यावापृथिव्यादेरेव विजिज्ञास्यत्वम् । ‘तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चत’(मुञ्चत .हृ) इति हि श्रुतिः ।¦मुक्तामुक्तसकलदेवानां भगवानेवाऽश्रयः¦उभे अस्मिन् द्यावापृथिवीत्याद्युभयशब्दो मुक्तामुक्तराशिव्यपेक्षया । ‘यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति’ इति वाक्यशेषात् । ‘अस्य’ इति संसारिणः । न हि संसारिणो मुक्ता उपकारकाः । यद्यस्य नोपकारकं तत्तस्य नास्तीत्युच्यतेऽन्यस्य सत्वेऽपि । यथा वित्तादि । | |||
| verse_lines = दहराकाशस्थमहाकाशस्य परब्रह्मत्वखथनम्¦‘किं तदत्र विद्यते ?’ इति पृष्टत्वात् हृद्गत आकाशो हृदयशब्देनोच्यते ; हृद्ययनात् । तस्मिन् हृदयाख्य आकाशे (बहिराकाशो) परब्रह्माख्य आकाशो विद्यत इत्यर्थः । अन्यथा कथं भूताकाशस्य दहरस्य बहिराकाशसमत्वम् ? ‘दहरोऽस्मिन् अन्तराकाश’ इति(च) पूर्वोक्ताकाशस्य दहरत्वमुक्तम् । उत्तरस्य तु ‘यावान् वा अयमाकाशः’ इत्यनन्तरपरिमाणत्वम् । अतो ब्रह्माकाश एवोत्तरः । पूर्वोक्तस्याभूताकाशत्वे(पूर्वोक्ताकाश भूताकाशत्वे) ‘तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यम्’, ‘तत्रापि दहरं(दह्रं हृ,) गगनं विशोकस्तस्मिन् यदन्तस्तदुपासितव्यम्’, ‘सहस्रशीर्षं देवम्’ इत्यादि कथं युज्यते(युज्येत .हृ)? न हि भगवदन्तःस्थितमेवान्यत् किञ्चिद्विजिज्ञास्यम् । तद् वावेत्यवधारणाय । उत्तरस्यापरब्रह्मत्वे च सर्वाधारत्वं ‘नास्य जरयैतज्जीर्यते न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा’ इत्यादि न युज्यते ।¦परब्रह्मस्थप्रपञ्चो न जिज्ञासार्हः¦‘किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद् वाव विजिज्ञासितव्यम् इत्यस्य य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः’ इत्येव परिहारः । न तु ‘उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी’ इत्यादि । तत्तु विजिज्ञासितव्यत्वे हेतुत्वेन सामर्थ्यकथनमेव । न हि द्यावापृथिव्यादेरेव विजिज्ञास्यत्वम् । ‘तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चत’(मुञ्चत .हृ) इति हि श्रुतिः ।¦मुक्तामुक्तसकलदेवानां भगवानेवाऽश्रयः¦उभे अस्मिन् द्यावापृथिवीत्याद्युभयशब्दो मुक्तामुक्तराशिव्यपेक्षया । ‘यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति’ इति वाक्यशेषात् । ‘अस्य’ इति संसारिणः । न हि संसारिणो मुक्ता उपकारकाः । यद्यस्य नोपकारकं तत्तस्य नास्तीत्युच्यतेऽन्यस्य सत्वेऽपि । यथा वित्तादि । | |||
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| verse_text = तदविदुषां पुण्यानि क्षयिष्णुफलान्येव भवन्ति । एतांश्च सत्यान् कामान् भगवदीयान् ।¦‘बृहत्त्वात् पूर्णकामत्वाद् विष्णुर्ब्रह्मपुराभिधः ।¦तस्मिंस्तस्य पुरं देहस्तस्मिन् हृदयमास्थितम् ॥¦हृदयाकाशगो विष्णुस्तस्मिन् सर्वमिदं स्थितम् ।¦स सत्यकामो भगवान् यदिष्टं तस्य तद्भवेत् ॥¦(अस्मिन्)तस्मिन् समाहिताः कामाः सत्याः पुंसामपि ध्रुवम् ।¦तस्यैव ह्यनुसारेण सत्यत्वं नान्यथा क्वचित् ॥’ | |||
| verse_lines = तदविदुषां पुण्यानि क्षयिष्णुफलान्येव भवन्ति । एतांश्च सत्यान् कामान् भगवदीयान् ।¦‘बृहत्त्वात् पूर्णकामत्वाद् विष्णुर्ब्रह्मपुराभिधः ।¦तस्मिंस्तस्य पुरं देहस्तस्मिन् हृदयमास्थितम् ॥¦हृदयाकाशगो विष्णुस्तस्मिन् सर्वमिदं स्थितम् ।¦स सत्यकामो भगवान् यदिष्टं तस्य तद्भवेत् ॥¦(अस्मिन्)तस्मिन् समाहिताः कामाः सत्याः पुंसामपि ध्रुवम् ।¦तस्यैव ह्यनुसारेण सत्यत्वं नान्यथा क्वचित् ॥’ | |||
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| verse_text = यथा बिम्बानुसारेण प्रतिबिम्बप्रकाशनम् ॥ १० ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = तस्माद्ये मुक्तियोग्याः स्युस्तेषां कामाः पुराऽपि तु ॥¦सत्याः सन्तस्तदज्ञानान्न दृश्यन्ते तथाऽखिलाः ।¦अज्ञानमनृतं प्रोक्तमृगताविति धातुतः ॥¦तस्माद् द्रष्टुं यदिष्टं स्यात् तद्दृष्टिनियमो न तु (स्याददृष्टं वियमेन तु)।¦अमुक्तस्य ........ ...... .......॥ | |||
| verse_lines = तस्माद्ये मुक्तियोग्याः स्युस्तेषां कामाः पुराऽपि तु ॥¦सत्याः सन्तस्तदज्ञानान्न दृश्यन्ते तथाऽखिलाः ।¦अज्ञानमनृतं प्रोक्तमृगताविति धातुतः ॥¦तस्माद् द्रष्टुं यदिष्टं स्यात् तद्दृष्टिनियमो न तु (स्याददृष्टं वियमेन तु)।¦अमुक्तस्य ........ ...... .......॥ | |||
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| verse_text = ........ हरेर्लोकं मुक्तो गत्वा हि पश्यति ॥¦अज्ञत्वादेव सुप्तौ तु नित्यं यान्तोऽपि माधवम् ।¦नैव पश्यन्त्यसौ विष्णुर्हृदयं नाम हृद्गतेः ॥¦एवं हृदयनामानं विष्णुं जानन् हि नित्यशः ।¦विष्णुलोकगतेः पुण्यमाप्त्वा विष्णुं व्रजेत् तथा ॥ | |||
| verse_lines = ........ हरेर्लोकं मुक्तो गत्वा हि पश्यति ॥¦अज्ञत्वादेव सुप्तौ तु नित्यं यान्तोऽपि माधवम् ।¦नैव पश्यन्त्यसौ विष्णुर्हृदयं नाम हृद्गतेः ॥¦एवं हृदयनामानं विष्णुं जानन् हि नित्यशः ।¦विष्णुलोकगतेः पुण्यमाप्त्वा विष्णुं व्रजेत् तथा ॥ | |||
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| verse_text = यस्य सम्यक् प्रसादोऽस्ति विष्णोरेव स उच्यते ।¦सम्प्रसादः स उत्थाय शरीरात् प्राप्य केशवम् ॥¦यथास्वरूपस्तु भवेद् यं प्राप्यासौ स्वरूपताम् ।¦आप्नोति स परो ह्यात्मा भगवानिन्दिरापतिः ॥¦इत्याह सा रमादेवी पश्यन्ती परमं पदम् । | |||
| verse_lines = यस्य सम्यक् प्रसादोऽस्ति विष्णोरेव स उच्यते ।¦सम्प्रसादः स उत्थाय शरीरात् प्राप्य केशवम् ॥¦यथास्वरूपस्तु भवेद् यं प्राप्यासौ स्वरूपताम् ।¦आप्नोति स परो ह्यात्मा भगवानिन्दिरापतिः ॥¦इत्याह सा रमादेवी पश्यन्ती परमं पदम् । | |||
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| verse_text = सदित्यमृतधर्माणो मुक्ताः श्रीरपि चेरिताः ॥¦तीत्युक्ता मर्त्यधर्माणस्तेषां नियमानाद्धरिः ।¦सत्यमित्युच्यते सद्भिः ........ .........॥ | |||
| verse_lines = सदित्यमृतधर्माणो मुक्ताः श्रीरपि चेरिताः ॥¦तीत्युक्ता मर्त्यधर्माणस्तेषां नियमानाद्धरिः ।¦सत्यमित्युच्यते सद्भिः ........ .........॥ | |||
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| verse_text = ........ ......... सेतुश्चापि विधारणात् ॥¦सितमस्मिन् जगत्सर्वमिति सेतुरितीरितः । | |||
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| verse_text = एतं सेतुं प्रतिपुमानन्यत्तीर्त्वा ह्यदोषवान् ॥ | |||
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| verse_text = स प्राप्यो ब्रह्मचर्येण मनोवाक्कर्मभिस्तु यत् ।¦चरणं ब्रह्मणि परे ब्रह्मचर्यं हि तत्स्मृतम् ॥¦तेनैव ब्रह्मचर्येण भवेयुर्ब्रह्मलोकगाः ।¦एतेषां(येन तेषां .हृ) ब्रह्मलोकः स्यात् परं ब्रह्मैव लोकनात् ॥¦ब्रह्मलोक इति प्रोक्तं तस्य लोकोऽपि कथ्यते । | |||
| verse_lines = स प्राप्यो ब्रह्मचर्येण मनोवाक्कर्मभिस्तु यत् ।¦चरणं ब्रह्मणि परे ब्रह्मचर्यं हि तत्स्मृतम् ॥¦तेनैव ब्रह्मचर्येण भवेयुर्ब्रह्मलोकगाः ।¦एतेषां(येन तेषां .हृ) ब्रह्मलोकः स्यात् परं ब्रह्मैव लोकनात् ॥¦ब्रह्मलोक इति प्रोक्तं तस्य लोकोऽपि कथ्यते । | |||
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| verse_text = यज्ञ इष्टं च सत्रं च मौनं चानशनं तथा ॥¦परस्य ब्रह्मणो ज्ञानं सर्वमेतदुदीरितम् ।¦परस्य ब्रह्मणो लोके श्वेतद्वीपाभिधे परे ॥¦अरण्यौ चार्णवौ (अरो ण्यश्चार्णवौ .हृ) दिव्यौ चिदानन्दरसात्मकौ ।¦यावानुच्चः स्वर्गलोकस्तावानुच्चस्तथा स च ॥¦श्वेतद्वीपो दिविष्टोऽतस्तत्र मद्यं सरोवरम् ।¦सर्वभोज्यात्मकं दिव्यं तत्राश्वत्थाः सुधास्रवाः ॥¦तत्र विष्णोः पुरं दिव्यमपराजितनामकम् ।¦विमिताख्यं च पर्यङ्कं विष्णोर्मानेन संमितम् ॥¦चित्सुवर्णमयं दिव्यं लक्ष्मीस्तत्तत् स्वरूपिणी ।¦स श्वेतद्वीपगो विष्णुः पर्यङ्कब्रह्मनामकः ॥ | |||
| verse_lines = यज्ञ इष्टं च सत्रं च मौनं चानशनं तथा ॥¦परस्य ब्रह्मणो ज्ञानं सर्वमेतदुदीरितम् ।¦परस्य ब्रह्मणो लोके श्वेतद्वीपाभिधे परे ॥¦अरण्यौ चार्णवौ (अरो ण्यश्चार्णवौ .हृ) दिव्यौ चिदानन्दरसात्मकौ ।¦यावानुच्चः स्वर्गलोकस्तावानुच्चस्तथा स च ॥¦श्वेतद्वीपो दिविष्टोऽतस्तत्र मद्यं सरोवरम् ।¦सर्वभोज्यात्मकं दिव्यं तत्राश्वत्थाः सुधास्रवाः ॥¦तत्र विष्णोः पुरं दिव्यमपराजितनामकम् ।¦विमिताख्यं च पर्यङ्कं विष्णोर्मानेन संमितम् ॥¦चित्सुवर्णमयं दिव्यं लक्ष्मीस्तत्तत् स्वरूपिणी ।¦स श्वेतद्वीपगो विष्णुः पर्यङ्कब्रह्मनामकः ॥ | |||
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| verse_text = स एष हृदि नाडीषु पञ्चरूपः प्रतिष्ठितः ।¦विष्णोरणिम्नो रूपाणि पञ्चनाडीस्थितानि तु ॥¦नारायणाख्यं सौषुम्नं मध्यस्थं रक्तवर्णकम् ।¦शुक्लं तु वासुदेवाख्यं नादिन्यामग्रतः(नान्दिन्यामग्रतः .हृ) स्थितम् ॥¦पिङ्गलायां पिङ्गलं तु(च .हृ) रूपं सङ्कर्षणाभिधम् ।¦पश्चिमे वज्रिकायां च पीतं प्रद्युम्ननामकम् ॥¦इडायामनिरुद्धाख्यं नीलरूपं व्यवस्थितम् ।¦सूर्येऽप्येवं पञ्चरूपो भगवान् संव्यवस्थितः ॥¦आदित्यनामा चादित्वात् .................। | |||
| verse_lines = स एष हृदि नाडीषु पञ्चरूपः प्रतिष्ठितः ।¦विष्णोरणिम्नो रूपाणि पञ्चनाडीस्थितानि तु ॥¦नारायणाख्यं सौषुम्नं मध्यस्थं रक्तवर्णकम् ।¦शुक्लं तु वासुदेवाख्यं नादिन्यामग्रतः(नान्दिन्यामग्रतः .हृ) स्थितम् ॥¦पिङ्गलायां पिङ्गलं तु(च .हृ) रूपं सङ्कर्षणाभिधम् ।¦पश्चिमे वज्रिकायां च पीतं प्रद्युम्ननामकम् ॥¦इडायामनिरुद्धाख्यं नीलरूपं व्यवस्थितम् ।¦सूर्येऽप्येवं पञ्चरूपो भगवान् संव्यवस्थितः ॥¦आदित्यनामा चादित्वात् .................। | |||
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| verse_text = ................. तद्व्याप्तं सूर्यमण्डलम् ।¦तद्रश्मिभिस्तथा व्याप्ताः समस्ताः सूर्यरश्मयः ॥¦तस्मिन्नाडीषु च प्रोतास्तथा नाडीस्थरश्मयः(नाडीषु रश्मयः .हृ) । | |||
| verse_lines = ................. तद्व्याप्तं सूर्यमण्डलम् ।¦तद्रश्मिभिस्तथा व्याप्ताः समस्ताः सूर्यरश्मयः ॥¦तस्मिन्नाडीषु च प्रोतास्तथा नाडीस्थरश्मयः(नाडीषु रश्मयः .हृ) । | |||
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| verse_text = तन्नीडीसंस्थितं विष्णुं मध्ये जीवः प्रपद्यते ॥¦तत्तेजसा हि सम्पन्नः सुप्त इत्यभिधीयते । | |||
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| verse_text = ओमित्येव वहन्नित्यं वायुरोंवाडितीरितः (वायुरोंव इतीरितः)॥¦तेन वामत्वमायाति मुक्तिकाले ह्युपासकः ।¦दिव्यचिद्रूपभावो हि वामभाव उदीरितः ॥¦यदैनं नेतुमन्विच्छन् मनः क्षिपति मारुतः ।¦आदित्याख्यं तदा विष्णुं याति जीवः स्वविद्यया ॥’ इति पर्यङ्कोपासनायाम् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = ओमित्येव वहन्नित्यं वायुरोंवाडितीरितः (वायुरोंव इतीरितः)॥¦तेन वामत्वमायाति मुक्तिकाले ह्युपासकः ।¦दिव्यचिद्रूपभावो हि वामभाव उदीरितः ॥¦यदैनं नेतुमन्विच्छन् मनः क्षिपति मारुतः ।¦आदित्याख्यं तदा विष्णुं याति जीवः स्वविद्यया ॥’ इति पर्यङ्कोपासनायाम् ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = ‘इन्द्रो विरोचनश्चैव श्रुत्वा तु(तं .हृ) ब्रह्मणोऽक्षिगम् ।¦विष्णुमानन्दरूपं तं सम्यग्ज्ञानविपर्ययौ ॥¦आपतुस्तत्र देवेन्द्रो जानन्नपि विरोचनम् ।¦मोहयन्ननुरूपाणि तस्य वाक्यान्युवाच ह ॥¦यथा विरोचनो नैव जानीयाद् विष्णुमञ्जसा(तत्त्वमञ्जसा) ।¦स्ववाक्यं चानृतं न स्यात् तथा ब्रह्माऽप्युवाच ह ॥¦अयोग्या ह्यसुरा ज्ञाने वक्तव्यं नैव चानृतम् ।¦मच्छापादासुरो भावः प्रह्लादादेर्न तु स्वतः ॥¦अयं त्वासुर(चासुर .हृ) एवातो वक्ष्याम्यस्योभयं यथा ।¦इन्द्रस्तु शुद्धभावत्वात् पुनरायास्यति ध्रुवम् ॥¦इत्यभिप्रायतः प्रोक्तो ब्रह्मणाऽक्षिगतो हरिः ।¦अयोग्यत्वात्तु तच्छ्रुत्वा प्रतिरूपं विरोचनः ॥¦मत्वाऽप्स्वादर्शके चैव पप्रच्छ कतमस्त्विति ।¦तत्रापि तु हरेर्भावं हृदि कृत्वा चतुर्मुखः ॥¦दृश्यते ह्येष एवेति तत्त्ववेदिविवक्षया ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = ‘इन्द्रो विरोचनश्चैव श्रुत्वा तु(तं .हृ) ब्रह्मणोऽक्षिगम् ।¦विष्णुमानन्दरूपं तं सम्यग्ज्ञानविपर्ययौ ॥¦आपतुस्तत्र देवेन्द्रो जानन्नपि विरोचनम् ।¦मोहयन्ननुरूपाणि तस्य वाक्यान्युवाच ह ॥¦यथा विरोचनो नैव जानीयाद् विष्णुमञ्जसा(तत्त्वमञ्जसा) ।¦स्ववाक्यं चानृतं न स्यात् तथा ब्रह्माऽप्युवाच ह ॥¦अयोग्या ह्यसुरा ज्ञाने वक्तव्यं नैव चानृतम् ।¦मच्छापादासुरो भावः प्रह्लादादेर्न तु स्वतः ॥¦अयं त्वासुर(चासुर .हृ) एवातो वक्ष्याम्यस्योभयं यथा ।¦इन्द्रस्तु शुद्धभावत्वात् पुनरायास्यति ध्रुवम् ॥¦इत्यभिप्रायतः प्रोक्तो ब्रह्मणाऽक्षिगतो हरिः ।¦अयोग्यत्वात्तु तच्छ्रुत्वा प्रतिरूपं विरोचनः ॥¦मत्वाऽप्स्वादर्शके चैव पप्रच्छ कतमस्त्विति ।¦तत्रापि तु हरेर्भावं हृदि कृत्वा चतुर्मुखः ॥¦दृश्यते ह्येष एवेति तत्त्ववेदिविवक्षया ॥ ७ ॥ | |||
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| verse_text = तथापि योग्यतैवात्र भूयसीति निवेदितुम् ।¦दर्शयन् प्रतिरूपस्य दोषानाह प्रजापतिः ॥¦अलङ्कारादिभिर्युक्तः पश्यस्वेति विवेचयन् ।¦यथा देहगुणे गौण्यं दोषे दोषास्तथेति(तथैव) तु ॥¦तथाऽप्यशुद्धभावत्वात् प्रतिरूपस्य तद्गुणान् ।¦परस्य ब्रह्मणो जानन् ययौ तुष्टमनाः स्वयम् ॥¦असुराणामविश्वासनिवृत्त्यर्थं पितामहः ॥¦माध्यस्थ्यं ज्ञापयानश्च जानन् वैरोचनं मनः ।¦प्राहाज्ञानां पराभाव इत्युच्चैश्च पुनः पुनः ॥¦तथाप्यशुद्धभावत्वादजानन्नेव निर्ययौ ।¦गत्वा चैव परम्ब्रह्म प्रतिरूपात्मकं सदा ॥¦दिदेश सर्वासुराणां शरीरालङ्कृतेरपि ।¦अलङ्कृतिं ब्रह्मणश्च प्रत्यक्षेणोपलम्भिताम् ॥¦अतोऽसुरा न दास्यन्ति न यजन्त्यात्मनः परम् ।¦स्वभोगेनैव तृप्तिः स्यादिति सर्वेऽपि मेनिरे ॥¦तत्संस्कारवशेनैव स्वयं ब्रह्मेति वादिनः (वेदिनः)।¦अभवन्नपतंश्चैव तमोऽन्धे नित्यदुःखिताः ॥ | |||
| verse_lines = तथापि योग्यतैवात्र भूयसीति निवेदितुम् ।¦दर्शयन् प्रतिरूपस्य दोषानाह प्रजापतिः ॥¦अलङ्कारादिभिर्युक्तः पश्यस्वेति विवेचयन् ।¦यथा देहगुणे गौण्यं दोषे दोषास्तथेति(तथैव) तु ॥¦तथाऽप्यशुद्धभावत्वात् प्रतिरूपस्य तद्गुणान् ।¦परस्य ब्रह्मणो जानन् ययौ तुष्टमनाः स्वयम् ॥¦असुराणामविश्वासनिवृत्त्यर्थं पितामहः ॥¦माध्यस्थ्यं ज्ञापयानश्च जानन् वैरोचनं मनः ।¦प्राहाज्ञानां पराभाव इत्युच्चैश्च पुनः पुनः ॥¦तथाप्यशुद्धभावत्वादजानन्नेव निर्ययौ ।¦गत्वा चैव परम्ब्रह्म प्रतिरूपात्मकं सदा ॥¦दिदेश सर्वासुराणां शरीरालङ्कृतेरपि ।¦अलङ्कृतिं ब्रह्मणश्च प्रत्यक्षेणोपलम्भिताम् ॥¦अतोऽसुरा न दास्यन्ति न यजन्त्यात्मनः परम् ।¦स्वभोगेनैव तृप्तिः स्यादिति सर्वेऽपि मेनिरे ॥¦तत्संस्कारवशेनैव स्वयं ब्रह्मेति वादिनः (वेदिनः)।¦अभवन्नपतंश्चैव तमोऽन्धे नित्यदुःखिताः ॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रश्च(स्तु .हृ) जानन्नपि तु मोहयन्नसुरं तदा ।¦गत्वा निववृते पश्चादिव पश्यन् सदोषताम् ॥¦पुनः पुनश्च मोहाय गत्वा गत्वा निवर्तते ।¦कथञ्चिदेव विज्ञातं मयेत्यज्ञान् विमोहितुम् ॥ | |||
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| verse_text = इत्युक्त आह ब्रह्मैव सुप्तिस्थो भगवानिति ।¦यत्र सुप्तो ह्ययं जीव इत्युक्तः(इत्युक्तं .हृ) प्राह वासवः ॥¦नाहं जानामि मत्तोऽन्यं सुप्तौ(सुप्तः .हृ) नान्योऽपि दर्शयेत् ।¦अहमस्मीति भूतानि न च पश्यन्ति कानिचित् ॥¦यदि जीवः परात्मा वाऽप्यन्योन्यस्मिन्नपीतताम्(चाथोऽन्योन्यास्मिन्नपीतताम्) ।¦गतौ तदाऽप्यपीतस्तु शं विनैव भवेदिति ॥ ११ ॥ | |||
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| verse_text = अम्नामा भगवान् विष्णुर्व्याप्तत्वात् परमेश्वरः ।¦तेनैव म्रियमाणत्वाद् ब्रह्माभ्रमिति कीर्तितः ॥¦वायोः पत्नी विद्युदुक्ता विशेषद्युतिहेतुतः ।¦ब्रह्माणी स्तनयित्नुः स्यात् सर्वशब्दात्मिका यतः ॥¦एतेषां ज्ञानवैशेष्यान्नातिदेहेन सङ्गतिः ।¦अतः प्रियाप्रिये तेषामपि न ब्रह्मणः किमु ॥¦विष्ण्वीयं हि सुखं तेषां स्वभर्त्रीयमथापि च ।¦न ह्यन्येयं सुखं तेषामतस्ते प्रियवर्जिताः ॥¦यथा ते परमाकाशाद् विष्णोरेव समुत्थिताः ।¦तमेव प्राप्य संयान्ति नैजमानन्दमूर्जितम् ॥¦एवं सम्यक्प्रसादेन विष्णोर्मुक्तोऽपि योऽपरः ।¦यं प्राप्य ते निजानन्दमाप्नुवन्ति स केशवः ॥¦तं प्राप्य रमते मुक्तः स्त्रीभिर्यानैश्च बन्धुभिः ।¦यथैव सारथिर्याने एवं देहे च मारुतः ॥¦यथा रथी तथा विष्णुर्जीवोऽन्यरथगो यथा । | |||
| verse_lines = अम्नामा भगवान् विष्णुर्व्याप्तत्वात् परमेश्वरः ।¦तेनैव म्रियमाणत्वाद् ब्रह्माभ्रमिति कीर्तितः ॥¦वायोः पत्नी विद्युदुक्ता विशेषद्युतिहेतुतः ।¦ब्रह्माणी स्तनयित्नुः स्यात् सर्वशब्दात्मिका यतः ॥¦एतेषां ज्ञानवैशेष्यान्नातिदेहेन सङ्गतिः ।¦अतः प्रियाप्रिये तेषामपि न ब्रह्मणः किमु ॥¦विष्ण्वीयं हि सुखं तेषां स्वभर्त्रीयमथापि च ।¦न ह्यन्येयं सुखं तेषामतस्ते प्रियवर्जिताः ॥¦यथा ते परमाकाशाद् विष्णोरेव समुत्थिताः ।¦तमेव प्राप्य संयान्ति नैजमानन्दमूर्जितम् ॥¦एवं सम्यक्प्रसादेन विष्णोर्मुक्तोऽपि योऽपरः ।¦यं प्राप्य ते निजानन्दमाप्नुवन्ति स केशवः ॥¦तं प्राप्य रमते मुक्तः स्त्रीभिर्यानैश्च बन्धुभिः ।¦यथैव सारथिर्याने एवं देहे च मारुतः ॥¦यथा रथी तथा विष्णुर्जीवोऽन्यरथगो यथा । | |||
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| verse_id = CHU_C08_S12_V06_B01 | |||
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| verse_text = यदाश्रितानीन्द्रियाणि प्राणश्चापि यदाश्रयः ॥¦यदाश्रयोऽप्ययं जीवो यो वेदैषां प्रवर्तनम् ।¦दर्शनं श्रवणं घ्राणं जिह्वां स्पर्शं मनस्तथा ॥¦तदीयान् विषयांश्चैव यो वेदाखिलमञ्जसा ।¦स विष्णुः परमो ज्ञेयो देवताः करणानि च ॥¦स एतैरिन्द्रियैर्विष्णुर्भोगाननुभवत्यजः ।¦स्वरूपेणैव शक्तोऽपि जीवदेहस्थितो हरिः ॥¦भुङ्क्ते तदिन्द्रियैर्भोगाञ्छुरितैरिन्द्रियैः स्वकैः ।¦जीवं तदिन्द्रियाण्येवं प्राणं च व्याप्य कृत्स्नशः ॥¦भुङ्क्ते तत्तद्गुणान् विष्णुर्नैव दोषान् कदाचन ।¦तमेतं(तमेवं) देवताः सर्वाः वाय्वाद्याः समुपासते ।¦तस्माद् देववशा लोकाः सर्वकामाः सजीवकाः ।¦तमेतं यो यथा ज्ञात्वा पश्येद् विष्णुं सनातनम् ॥¦आप्नोति सर्वकामांश्च सर्वलोकांश्च कामतः ॥’ इति सामसंहितायाम् । | |||
| verse_lines = यदाश्रितानीन्द्रियाणि प्राणश्चापि यदाश्रयः ॥¦यदाश्रयोऽप्ययं जीवो यो वेदैषां प्रवर्तनम् ।¦दर्शनं श्रवणं घ्राणं जिह्वां स्पर्शं मनस्तथा ॥¦तदीयान् विषयांश्चैव यो वेदाखिलमञ्जसा ।¦स विष्णुः परमो ज्ञेयो देवताः करणानि च ॥¦स एतैरिन्द्रियैर्विष्णुर्भोगाननुभवत्यजः ।¦स्वरूपेणैव शक्तोऽपि जीवदेहस्थितो हरिः ॥¦भुङ्क्ते तदिन्द्रियैर्भोगाञ्छुरितैरिन्द्रियैः स्वकैः ।¦जीवं तदिन्द्रियाण्येवं प्राणं च व्याप्य कृत्स्नशः ॥¦भुङ्क्ते तत्तद्गुणान् विष्णुर्नैव दोषान् कदाचन ।¦तमेतं(तमेवं) देवताः सर्वाः वाय्वाद्याः समुपासते ।¦तस्माद् देववशा लोकाः सर्वकामाः सजीवकाः ।¦तमेतं यो यथा ज्ञात्वा पश्येद् विष्णुं सनातनम् ॥¦आप्नोति सर्वकामांश्च सर्वलोकांश्च कामतः ॥’ इति सामसंहितायाम् । | |||
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| verse_text = उभौ लोकाववाप्नोति वचनान्न लोकायतिकमतं वरोचनेनोक्तम्(विरोचनोक्तम् .हृ)। किन्तु बिम्बप्रतिबिम्बयोरभिमान्यैक्याभिप्रायेण(बिम्बप्रतिबिम्बाभिमान्यैक्याभिप्रायेण) जीवात्मैव महय्य इति मायावाद एव । न चात्र (नचान्यत्र .हृ) जीव आत्मशब्दोक्तः ।¦‘‘तदस्यामृतस्याशरीरस्याऽत्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः स्वकैरिन्द्रियैश्छुरितैः व्याप्तः। तथा च ‘दैवं चक्षुः’इत्येतदुपलक्षणप्रियाप्रियाभ्यां न ह वै(न वै) सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः’’ इतीशजीवयोः सतात्पर्यं भेदाभिधानात् ।¦न हि जीवादन्यस्य प्रियाप्रियानुभवोऽस्ति । न च मुक्तस्यापि प्रियाप्रियापहतिरस्ति । | |||
| verse_lines = उभौ लोकाववाप्नोति वचनान्न लोकायतिकमतं वरोचनेनोक्तम्(विरोचनोक्तम् .हृ)। किन्तु बिम्बप्रतिबिम्बयोरभिमान्यैक्याभिप्रायेण(बिम्बप्रतिबिम्बाभिमान्यैक्याभिप्रायेण) जीवात्मैव महय्य इति मायावाद एव । न चात्र (नचान्यत्र .हृ) जीव आत्मशब्दोक्तः ।¦‘‘तदस्यामृतस्याशरीरस्याऽत्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः स्वकैरिन्द्रियैश्छुरितैः व्याप्तः। तथा च ‘दैवं चक्षुः’इत्येतदुपलक्षणप्रियाप्रियाभ्यां न ह वै(न वै) सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः’’ इतीशजीवयोः सतात्पर्यं भेदाभिधानात् ।¦न हि जीवादन्यस्य प्रियाप्रियानुभवोऽस्ति । न च मुक्तस्यापि प्रियाप्रियापहतिरस्ति । | |||
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| verse_text = प्रियाप्रियरहितो भगवानेव, न जीवः¦न च विष्णोरत्र विवक्षितं प्रियम् । पराधीनरतिप्राप्तिर्हि(प्राप्तिः .हृ) प्रियमत्र विवक्षितम्। न हि तद्भगवतः । मुक्तानां तु भगवदधीनरतित्वात् प्रियमस्त्येव ।¦‘जीवा मुक्ता अमुक्ताश्च पराधीनरतित्वतः ।¦न प्रियापहतिः क्वापि स्वातन्त्र्यान्न हरेः प्रियम् ॥¦पराधीनरतिर्यस्मात् प्रियमित्युच्यते बुधैः ।¦हरेरधीनता तु स्याद् यद्यपि ब्रह्मवायुवोः ॥¦तदन्यवशताभावादप्रियाविति तौ श्रुतौ ।¦यथा राज्ञः स्वराट्शब्दो रुद्रस्येश्वरता तथा ॥¦यथा शक्रस्य चेन्द्रत्वं तद्वदप्रियता तयोः ।¦यथा राज्ञ्याश्च राज्ञीत्वं(राज्ञ्याः स्वराज्ञीत्वं यथैवोमेश्वरी .हृ)यथा वोमेश्वरी स्मृता ॥¦विद्युतः स्तनयित्नोश्च तथैवाप्रियता श्रुता ॥’ इति च परमश्रुतौ । | |||
| verse_lines = प्रियाप्रियरहितो भगवानेव, न जीवः¦न च विष्णोरत्र विवक्षितं प्रियम् । पराधीनरतिप्राप्तिर्हि(प्राप्तिः .हृ) प्रियमत्र विवक्षितम्। न हि तद्भगवतः । मुक्तानां तु भगवदधीनरतित्वात् प्रियमस्त्येव ।¦‘जीवा मुक्ता अमुक्ताश्च पराधीनरतित्वतः ।¦न प्रियापहतिः क्वापि स्वातन्त्र्यान्न हरेः प्रियम् ॥¦पराधीनरतिर्यस्मात् प्रियमित्युच्यते बुधैः ।¦हरेरधीनता तु स्याद् यद्यपि ब्रह्मवायुवोः ॥¦तदन्यवशताभावादप्रियाविति तौ श्रुतौ ।¦यथा राज्ञः स्वराट्शब्दो रुद्रस्येश्वरता तथा ॥¦यथा शक्रस्य चेन्द्रत्वं तद्वदप्रियता तयोः ।¦यथा राज्ञ्याश्च राज्ञीत्वं(राज्ञ्याः स्वराज्ञीत्वं यथैवोमेश्वरी .हृ)यथा वोमेश्वरी स्मृता ॥¦विद्युतः स्तनयित्नोश्च तथैवाप्रियता श्रुता ॥’ इति च परमश्रुतौ । | |||
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| verse_text = ‘स एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति मुक्तस्य तत्प्रसादात् तत्प्राप्त्या निजानन्दानुभवश्रुतेश्च ।¦उत्तमपुरुष इति कथितो भगवानेव¦‘स उत्तमः पुरुष(उत्तमपुरुषः)’ इति तस्य जीवादुत्तमत्वश्रुतेश्च । अपरपुरुषापेक्षया ह्युत्तमपुरुषशब्दो भवति । अन्यथोत्तमशब्द एव स्यात् । ‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः’(भ.गी.१५.१७) इति च ।¦‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत् प्राप्तुं नैव शक्यते ।¦तद्यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलो हरे ॥’¦‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ’। | |||
| verse_lines = ‘स एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति मुक्तस्य तत्प्रसादात् तत्प्राप्त्या निजानन्दानुभवश्रुतेश्च ।¦उत्तमपुरुष इति कथितो भगवानेव¦‘स उत्तमः पुरुष(उत्तमपुरुषः)’ इति तस्य जीवादुत्तमत्वश्रुतेश्च । अपरपुरुषापेक्षया ह्युत्तमपुरुषशब्दो भवति । अन्यथोत्तमशब्द एव स्यात् । ‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः’(भ.गी.१५.१७) इति च ।¦‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत् प्राप्तुं नैव शक्यते ।¦तद्यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलो हरे ॥’¦‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ’। | |||
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| verse_text = ‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य(ज्ञानमपाश्रित्य .हृ) मम साधर्म्यमागताः’, ‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’ इति, ‘एतमानन्दमयामात्मानमुपसङ्क्रम्येमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन्’, ‘न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रताः (हरेरनुव्रता) यत्र सुरासुरार्चिताः’, ‘कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः इत्यादेश्च ।¦‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम्’ इत्यत्रापि भेदेनावस्थानश्रुतेः । (उपशब्दादन्तशब्दाच्च .हृ)उपशब्दादन्तरशब्दाच्च मुक्तस्य परञ्ज्योतिःसमीपावस्थानावगतेश्च । | |||
| verse_lines = ‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य(ज्ञानमपाश्रित्य .हृ) मम साधर्म्यमागताः’, ‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’ इति, ‘एतमानन्दमयामात्मानमुपसङ्क्रम्येमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन्’, ‘न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रताः (हरेरनुव्रता) यत्र सुरासुरार्चिताः’, ‘कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः इत्यादेश्च ।¦‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम्’ इत्यत्रापि भेदेनावस्थानश्रुतेः । (उपशब्दादन्तशब्दाच्च .हृ)उपशब्दादन्तरशब्दाच्च मुक्तस्य परञ्ज्योतिःसमीपावस्थानावगतेश्च । | |||
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| verse_text = ‘जीवोपासनां न चतुरानन उपदिशेत््’ इति निरूपणम्¦न च जीवमात्रं देवा उपासते । ‘ऊर्जं पृथिव्या भक्त्वायोरुगायमुपासते’ इति हि श्रुतिः । ‘भेददृष्ट्याऽभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा’ इत्यादेश्च । | |||
| verse_lines = ‘जीवोपासनां न चतुरानन उपदिशेत््’ इति निरूपणम्¦न च जीवमात्रं देवा उपासते । ‘ऊर्जं पृथिव्या भक्त्वायोरुगायमुपासते’ इति हि श्रुतिः । ‘भेददृष्ट्याऽभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा’ इत्यादेश्च । | |||
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| verse_text = भगवतः इन्द्रियैर्भोगकथनम्¦भूतैर्महद्भिर्य इमाः पुरो विभुर्निर्माय शेते यदमूषु पूरुषः ।¦भुङ्क्ते गुणान् षोडश षोडशात्मकः सोऽलङ्कृषीष्ट भगवान् वचांसि मे ॥’ इत्यादौ भगवत एवेन्द्रियैर्भोगोक्तेश्च ।¦‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे’ इति च । ‘ओं गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् अोम्’(ब्र.सू.१.२.११) इति भगवद्वचनं च । | |||
| verse_lines = भगवतः इन्द्रियैर्भोगकथनम्¦भूतैर्महद्भिर्य इमाः पुरो विभुर्निर्माय शेते यदमूषु पूरुषः ।¦भुङ्क्ते गुणान् षोडश षोडशात्मकः सोऽलङ्कृषीष्ट भगवान् वचांसि मे ॥’ इत्यादौ भगवत एवेन्द्रियैर्भोगोक्तेश्च ।¦‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे’ इति च । ‘ओं गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् अोम्’(ब्र.सू.१.२.११) इति भगवद्वचनं च । | |||
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| verse_text = ‘इदं पश्यामि जिघ्राणीत्यपि जीवा न वै विदुः ।¦द्रव्याणामपरिज्ञानाद्(द्रव्याणामपि च ज्ञानात्) वेदासौ पुरुषोत्तमः॥’ इति च ।¦उत्तमपुरुषत्वेन भगवानेव परामृष्टः¦‘स उत्तमः पुरुषः’ इति भगवत एवायं परामर्शः । ‘अोम् अन्यार्थश्च परामर्शः अोम्’(ब्र.सू.१.३.२०) इति भगवद्वचनात् । ‘ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः’(भ.गी.१५.१७) इति च । ‘अों जगद्व्यापारवर्जम् अोम्’(ब्र.सू.४.४.१७) इत्यल्पैश्वर्यत्वं च मुक्तस्य भगवताऽभिहितम् । अतो ‘यं प्राप्य जीवः स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स भगवानुत्तमः पुरुषः’ इति परामर्शः ।¦‘स्वप्ने महीयमानश्चरति यत्रैतत्सुप्तः’ इति पुरस्तादपि भेदोक्तेः । न हि महीयमान एव जीवश्चरति । प्रायोग्यः सारथिः । प्रयोगेन यानस्य । ‘यन्ता सारथिरानेता प्रायोग्य इति कीर्तितः(कीर्त्यते .हृ)’ इत्यभिधानात् । ‘अन्येभ्यो दीप्यमानत्वाद् दैवं चक्षुर्मनः स्मृतम्’ इति च । ‘य एते ब्रह्मलोके’ तेषु ‘रमते’ । अनुविद्य । शास्त्राचार्यानुसारेण विदित्वा विजानात्यापरोक्ष्येण । ‘वेदनं शास्त्रतो ज्ञानं विज्ञानं ब्रह्मदर्शनम्’ इति च ॥ ७॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = ‘इदं पश्यामि जिघ्राणीत्यपि जीवा न वै विदुः ।¦द्रव्याणामपरिज्ञानाद्(द्रव्याणामपि च ज्ञानात्) वेदासौ पुरुषोत्तमः॥’ इति च ।¦उत्तमपुरुषत्वेन भगवानेव परामृष्टः¦‘स उत्तमः पुरुषः’ इति भगवत एवायं परामर्शः । ‘अोम् अन्यार्थश्च परामर्शः अोम्’(ब्र.सू.१.३.२०) इति भगवद्वचनात् । ‘ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः’(भ.गी.१५.१७) इति च । ‘अों जगद्व्यापारवर्जम् अोम्’(ब्र.सू.४.४.१७) इत्यल्पैश्वर्यत्वं च मुक्तस्य भगवताऽभिहितम् । अतो ‘यं प्राप्य जीवः स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स भगवानुत्तमः पुरुषः’ इति परामर्शः ।¦‘स्वप्ने महीयमानश्चरति यत्रैतत्सुप्तः’ इति पुरस्तादपि भेदोक्तेः । न हि महीयमान एव जीवश्चरति । प्रायोग्यः सारथिः । प्रयोगेन यानस्य । ‘यन्ता सारथिरानेता प्रायोग्य इति कीर्तितः(कीर्त्यते .हृ)’ इत्यभिधानात् । ‘अन्येभ्यो दीप्यमानत्वाद् दैवं चक्षुर्मनः स्मृतम्’ इति च । ‘य एते ब्रह्मलोके’ तेषु ‘रमते’ । अनुविद्य । शास्त्राचार्यानुसारेण विदित्वा विजानात्यापरोक्ष्येण । ‘वेदनं शास्त्रतो ज्ञानं विज्ञानं ब्रह्मदर्शनम्’ इति च ॥ ७॥ १२ ॥ | |||
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| verse_text = ‘श्यामो हृदिस्थितो विष्णुः शबलो विश्वरूपवान् ।¦जीववर्णो जीवगतो लोहितश्चक्षुषि स्थितः॥’ इति मानसे ॥¦‘हयग्रीवमुखोत्थानि यानि वाक्यानि तानि तु ।¦रमा ददर्श तान्येव ब्रह्मा तान्येव नारदः ॥¦यानि विष्णोरयोग्यानि प्रार्थनाद्यात्मकानि तु ।¦तान्युत्तरेषां वाक्यानि भविष्याण्यवदद्धरिः ॥¦एवं रमा तथा ब्रह्मा छान्दोग्योपनिषद्धि सा ॥’ इति सामसंहितायाम् ॥ १॥ १३ ॥ | |||
| verse_lines = ‘श्यामो हृदिस्थितो विष्णुः शबलो विश्वरूपवान् ।¦जीववर्णो जीवगतो लोहितश्चक्षुषि स्थितः॥’ इति मानसे ॥¦‘हयग्रीवमुखोत्थानि यानि वाक्यानि तानि तु ।¦रमा ददर्श तान्येव ब्रह्मा तान्येव नारदः ॥¦यानि विष्णोरयोग्यानि प्रार्थनाद्यात्मकानि तु ।¦तान्युत्तरेषां वाक्यानि भविष्याण्यवदद्धरिः ॥¦एवं रमा तथा ब्रह्मा छान्दोग्योपनिषद्धि सा ॥’ इति सामसंहितायाम् ॥ १॥ १३ ॥ | |||
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| verse_text = ‘आकाशोऽतिप्रकाशत्वान्नामरूपे ऋते स्थितः ।¦ब्रह्माख्यो भगवान् विष्णुस्तद्वेश्म प्राप्नुयामहम् ॥¦यशोऽहं सर्ववर्णानां मत्तोऽन्येषां(मत्तो ह्येषां) यशो भवेत् ।¦सोऽहं मम यशोदातृ यशसां यश उत्तमम् ॥¦विष्ण्वाख्यं परमं ब्रह्म श्वेतं श्वसनगं यतः ।¦अदत्कमद्यमानं कं स्वानन्दानुभवात्मकम् ॥¦लिन्दु तद्रतिदं यस्माद् तदहं प्राप्नुयां सदा ॥’॥ १४ ॥ | |||
| verse_lines = ‘आकाशोऽतिप्रकाशत्वान्नामरूपे ऋते स्थितः ।¦ब्रह्माख्यो भगवान् विष्णुस्तद्वेश्म प्राप्नुयामहम् ॥¦यशोऽहं सर्ववर्णानां मत्तोऽन्येषां(मत्तो ह्येषां) यशो भवेत् ।¦सोऽहं मम यशोदातृ यशसां यश उत्तमम् ॥¦विष्ण्वाख्यं परमं ब्रह्म श्वेतं श्वसनगं यतः ।¦अदत्कमद्यमानं कं स्वानन्दानुभवात्मकम् ॥¦लिन्दु तद्रतिदं यस्माद् तदहं प्राप्नुयां सदा ॥’॥ १४ ॥ | |||
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| verse_text = उपदिष्टः परेणैव त्वेवमाह चतुर्मुखः ।¦उवाच च मनोर्विद्यां प्रजाभ्यो मनुरेव च ॥¦तस्मात् सर्वेन्द्रियाणीशो निधाय पुरुषोत्तमे ।¦दृष्ट्वा तं परमं विष्णुं तल्लोकं प्रतिपद्यते ॥¦नावर्तेत पुनस्तस्मात् कदाचित् केनचित् क्वचित्(केनचिद्धरेः .हृ) ॥ इति च ॥ १॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = उपदिष्टः परेणैव त्वेवमाह चतुर्मुखः ।¦उवाच च मनोर्विद्यां प्रजाभ्यो मनुरेव च ॥¦तस्मात् सर्वेन्द्रियाणीशो निधाय पुरुषोत्तमे ।¦दृष्ट्वा तं परमं विष्णुं तल्लोकं प्रतिपद्यते ॥¦नावर्तेत पुनस्तस्मात् कदाचित् केनचित् क्वचित्(केनचिद्धरेः .हृ) ॥ इति च ॥ १॥ १५ ॥ | |||
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| verse_text = अन्तिममङ्गलाचरणम्¦पूर्णानन्दमहोदधिः परतमो विष्णुः परस्मात् सदा¦सर्वज्ञः सकलेशिता गुणनिधिर्नित्योत्सवस्तद्विदाम् ।¦सर्वस्मादधिकं मम प्रियतमस्त्विष्टादपीष्टोत्तमः¦सर्वस्माच्च हितात् सदा हिततमः प्रीतो भवेन्मे हरिः ॥¦यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं¦बट् तद्दर्शनमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।¦वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः¦म्ध्वो यत्तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हरौ तेन हि ॥ | |||
| verse_lines = अन्तिममङ्गलाचरणम्¦पूर्णानन्दमहोदधिः परतमो विष्णुः परस्मात् सदा¦सर्वज्ञः सकलेशिता गुणनिधिर्नित्योत्सवस्तद्विदाम् ।¦सर्वस्मादधिकं मम प्रियतमस्त्विष्टादपीष्टोत्तमः¦सर्वस्माच्च हितात् सदा हिततमः प्रीतो भवेन्मे हरिः ॥¦यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं¦बट् तद्दर्शनमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।¦वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः¦म्ध्वो यत्तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हरौ तेन हि ॥ | |||
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| verse_text = बळित्थासूक्तार्थः¦‘हनुशब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः ।¦रामस्य स्वृतरूपस्य(ह्यृतरूपस्य. हृ) वाचो नेता गुणोदधिः ॥¦भृतमो भीम इत्युक्तो वाचो मा मातरः स्मृताः ।¦ऋगाद्या इतिहासश्च पुराणं पञ्चरात्रकम् ॥¦प्रोक्ताः सप्तशिवास्तत्र शयो भीमस्ततः स्मृतः ।¦मध्वित्यानन्द उद्दिष्टो वेति तीर्थमुदाहृतम् ।¦मध्व आनन्दतीर्थः स्यात् तृतीया मारुतीतनुः ॥¦इति सूक्तगतं रूपत्रयमेतन्महात्मनः ।¦यो वेद वेदवित् स स्यात् तत्त्ववित् तत्प्रसादतः ॥’ इति सद्भावे ।¦आनन्दतीर्थ इति तु यस्य नाम तृतीयकम् (द्वितीयकम् .हृ)।¦पूर्णप्रज्ञेन तेनेदं कृतं भाष्यं हरेः प्रियम् ॥¦नित्यानन्दो हरिः पूर्णो नित्यदा प्रीयतां मम ।¦नमस्तस्मै नमस्तस्मै नमस्तस्मै च विष्णवे ॥ | |||
| verse_lines = बळित्थासूक्तार्थः¦‘हनुशब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः ।¦रामस्य स्वृतरूपस्य(ह्यृतरूपस्य. हृ) वाचो नेता गुणोदधिः ॥¦भृतमो भीम इत्युक्तो वाचो मा मातरः स्मृताः ।¦ऋगाद्या इतिहासश्च पुराणं पञ्चरात्रकम् ॥¦प्रोक्ताः सप्तशिवास्तत्र शयो भीमस्ततः स्मृतः ।¦मध्वित्यानन्द उद्दिष्टो वेति तीर्थमुदाहृतम् ।¦मध्व आनन्दतीर्थः स्यात् तृतीया मारुतीतनुः ॥¦इति सूक्तगतं रूपत्रयमेतन्महात्मनः ।¦यो वेद वेदवित् स स्यात् तत्त्ववित् तत्प्रसादतः ॥’ इति सद्भावे ।¦आनन्दतीर्थ इति तु यस्य नाम तृतीयकम् (द्वितीयकम् .हृ)।¦पूर्णप्रज्ञेन तेनेदं कृतं भाष्यं हरेः प्रियम् ॥¦नित्यानन्दो हरिः पूर्णो नित्यदा प्रीयतां मम ।¦नमस्तस्मै नमस्तस्मै नमस्तस्मै च विष्णवे ॥ | |||
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