Katha: Difference between revisions
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| verse_id = KKN_C01_S01 | | verse_id = KKN_C01_S01 | ||
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| text = नमो भगवते तस्मै सर्वतः परमाय ते । सर्वप्राणिहृदिस्थाय वामनाय नमो नमः ॥ | | text = नमो भगवते तस्मै सर्वतः परमाय ते । | ||
सर्वप्राणिहृदिस्थाय वामनाय नमो नमः ॥ | |||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस । तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश ॥ १ ॥ | | verse_line1 = उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस । तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस । तं ह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश ॥ १ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 26: | Line 28: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । | | verse_line1 = पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । | ||
| verse_lines = पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।;अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ २ ॥ | | verse_line2 = अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ २ ॥ | ||
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| Line 35: | Line 38: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति द्वितीयं तृतीयम् । | | verse_line1 = स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति द्वितीयं तृतीयम् । | ||
| verse_lines = स होवाच पितरं तात कस्मै मां दास्यसीति द्वितीयं तृतीयम् ।;तं होवाच मृत्यवे त्वा ददानीति ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = तं होवाच मृत्यवे त्वा ददानीति ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = तं होवाच मृत्यवे त्वा ददानीति ॥ ३ ॥ | ||
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| text = अग्नौ विष्णुं सदा ध्यायंस्त्रिशोऽग्निं नाचिकेतकम् । यश्चयीत स तु प्राप्य स्वर्गं तत्र भयातिगः ॥ उष्य मन्वन्तरं कालममृतत्वं भजेत् क्रमात् ॥ इति ब्रह्मसारे ॥ इच्छन् वाजश्रवो नप्ता ददौ सर्वस्वदक्षिणाम् । उद्दालकः स्वर्गलोकं ददौ गाश्च निरिन्द्रियाः ॥ मां दत्वापि न ते गावो दातव्या ईदृशा इति । उवाच पुत्रस्तं बालस्तं शशाप पिता स्वयम् ॥ | | text = अग्नौ विष्णुं सदा ध्यायंस्त्रिशोऽग्निं नाचिकेतकम् । | ||
यश्चयीत स तु प्राप्य स्वर्गं तत्र भयातिगः ॥ | |||
उष्य मन्वन्तरं कालममृतत्वं भजेत् क्रमात् ॥ इति ब्रह्मसारे ॥ | |||
इच्छन् वाजश्रवो नप्ता ददौ सर्वस्वदक्षिणाम् । | |||
उद्दालकः स्वर्गलोकं ददौ गाश्च निरिन्द्रियाः ॥ | |||
मां दत्वापि न ते गावो दातव्या ईदृशा इति । | |||
उवाच पुत्रस्तं बालस्तं शशाप पिता स्वयम् ॥ | |||
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| Line 53: | Line 63: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः । | | verse_line1 = बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः । | ||
| verse_lines = बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः ।;किंस्विद् यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = किंस्विद् यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = किंस्विद् यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 62: | Line 73: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे । | | verse_line1 = अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे । | ||
| verse_lines = अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे ।;सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिव जायते पुनः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिव जायते पुनः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिव जायते पुनः ॥ ५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 71: | Line 83: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् । | | verse_line1 = वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् । | ||
| verse_lines = वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।;तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ६ ॥ | ||
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| Line 79: | Line 92: | ||
| verse_id = KKN_C01_S01_V06 | | verse_id = KKN_C01_S01_V06 | ||
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| text = स जगाम यमं बालो ब्रह्मचारी यमस्य तु । पत्न्या सम्पूज्यमानोऽपि जग्राहार्घ्यादिकं न तु ॥ आगते तु यमे प्राह यमं सोदकमाहर ॥ ४-६ ॥ | | text = स जगाम यमं बालो ब्रह्मचारी यमस्य तु । | ||
पत्न्या सम्पूज्यमानोऽपि जग्राहार्घ्यादिकं न तु ॥ | |||
आगते तु यमे प्राह यमं सोदकमाहर ॥ ४-६ ॥ | |||
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| verse_line1 = आशाप्रतीक्षे सङ्गतं सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् । | | verse_line1 = आशाप्रतीक्षे सङ्गतं सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् । | ||
| verse_lines = आशाप्रतीक्षे सङ्गतं सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूंश्च सर्वान् ।;एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = एतद् वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ७ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः । | | verse_line1 = तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः । | ||
| verse_lines = तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।;नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्यात् वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो । | | verse_line1 = शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्यात् वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो । | ||
| verse_lines = शान्तसङ्कल्पः सुमना यथा स्यात् वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो ।;त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ ९ ॥ | ||
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| Line 125: | Line 143: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यथा पुरस्तात् भविता प्रतीतः औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः । | | verse_line1 = यथा पुरस्तात् भविता प्रतीतः औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः । | ||
| verse_lines = यथा पुरस्तात् भविता प्रतीतः औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।;सुखं रात्रीः शयिता वीतमन्युः त्वां ददृशिवान् मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = सुखं रात्रीः शयिता वीतमन्युः त्वां ददृशिवान् मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = सुखं रात्रीः शयिता वीतमन्युः त्वां ददृशिवान् मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ १० ॥ | ||
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| text = सौमनस्यं पितुश्चैव नाचिकेताग्निगं हरिम् ॥ मुक्ते स्थितञ्च तं विष्णुमिति प्रादात् वरत्रयम् ॥ इति गतिसारे ॥ ९-१० ॥ | | text = सौमनस्यं पितुश्चैव नाचिकेताग्निगं हरिम् ॥ | ||
मुक्ते स्थितञ्च तं विष्णुमिति प्रादात् वरत्रयम् ॥ इति गतिसारे ॥ ९-१० ॥ | |||
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| Line 143: | Line 163: | ||
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| verse_line1 = स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । | | verse_line1 = स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । | ||
| verse_lines = स्वर्गे लोके न भयं किञ्चनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।;उभे तीर्त्वा अशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = उभे तीर्त्वा अशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = उभे तीर्त्वा अशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ ११ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 152: | Line 173: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् । | | verse_line1 = स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् । | ||
| verse_lines = स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि तं श्रद्दधानाय मह्यम् ।;स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १२ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् । | | verse_line1 = प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् । | ||
| verse_lines = प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।;अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
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| text = लोको विष्णोरनन्तस्य तज्ज्ञानान्नित्य आप्यते ॥ प्रतिष्ठा सर्वलोकस्य स विष्णुस्सर्वहृद्गतः ॥ १३ ॥ | | text = लोको विष्णोरनन्तस्य तज्ज्ञानान्नित्य आप्यते ॥ | ||
प्रतिष्ठा सर्वलोकस्य स विष्णुस्सर्वहृद्गतः ॥ १३ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 188: | Line 212: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा । | | verse_line1 = लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा । | ||
| verse_lines = लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।;स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं अथास्य मृत्युः पुनराह तुष्टः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं अथास्य मृत्युः पुनराह तुष्टः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं अथास्य मृत्युः पुनराह तुष्टः ॥ १४ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 208: | Line 233: | ||
| verse_id = KKN_C01_S01_V14 | | verse_id = KKN_C01_S01_V14 | ||
| id = KKN_C01_S01_V14_B01 | | id = KKN_C01_S01_V14_B01 | ||
| text = इष्टकादेवतां विष्णुं षष्ठ्युत्तरशतत्रिकम् । यथावदेव विज्ञाय मुच्यते कर्मबन्धनात् ॥ इति च ॥ १४ ॥ | | text = इष्टकादेवतां विष्णुं षष्ठ्युत्तरशतत्रिकम् । | ||
यथावदेव विज्ञाय मुच्यते कर्मबन्धनात् ॥ इति च ॥ १४ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 218: | Line 244: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददानि भूयः । | | verse_line1 = तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददानि भूयः । | ||
| verse_lines = तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददानि भूयः ।;तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः शृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः शृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः शृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 227: | Line 254: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = त्रिनाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू । | | verse_line1 = त्रिनाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू । | ||
| verse_lines = त्रिनाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू ।;ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 245: | Line 273: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = त्रिनाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वांश्चिनुते नाचिकेतम् । | | verse_line1 = त्रिनाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वांश्चिनुते नाचिकेतम् । | ||
| verse_lines = त्रिनाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वांश्चिनुते नाचिकेतम् ।;स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १७ ॥ | ||
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| verse_id = KKN_C01_S01_V17 | | verse_id = KKN_C01_S01_V17 | ||
| id = KKN_C01_S01_V17_B01 | | id = KKN_C01_S01_V17_B01 | ||
| text = ब्रह्मेति वेद उद्दिष्टस्तस्माद् व्यक्तो यतो हरिः । ब्रह्मजस्तेन कथितस्स एव ज्ञोऽखिलज्ञतः ॥ इति नामनिरुक्ते । | | text = ब्रह्मेति वेद उद्दिष्टस्तस्माद् व्यक्तो यतो हरिः । | ||
ब्रह्मजस्तेन कथितस्स एव ज्ञोऽखिलज्ञतः ॥ इति नामनिरुक्ते । | |||
}} | }} | ||
| Line 265: | Line 295: | ||
| verse_id = KKN_C01_S01_V17 | | verse_id = KKN_C01_S01_V17 | ||
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| text = अनेकरूपां सुवर्णमयीम् । बहुरूपं च पुरटं कार्तस्वरमितीर्यते इत्यभिधानात् । | | text = अनेकरूपां सुवर्णमयीम् । | ||
बहुरूपं च पुरटं कार्तस्वरमितीर्यते इत्यभिधानात् । | |||
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| Line 271: | Line 302: | ||
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| id = KKN_C01_S01_V17_B01 | | id = KKN_C01_S01_V17_B01 | ||
| text = यमोऽनुवादसन्तुष्टो वह्नेस्तन्नामतामपि । शृङ्कां स्वर्णमयीं चैव कण्ठमालामदाद् विभुः ॥ इति पाद्मे । | | text = यमोऽनुवादसन्तुष्टो वह्नेस्तन्नामतामपि । | ||
शृङ्कां स्वर्णमयीं चैव कण्ठमालामदाद् विभुः ॥ इति पाद्मे । | |||
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| Line 277: | Line 309: | ||
| verse_id = KKN_C01_S01_V17 | | verse_id = KKN_C01_S01_V17 | ||
| id = KKN_C01_S01_V17_B01 | | id = KKN_C01_S01_V17_B01 | ||
| text = लोकादिः प्रतिष्ठा ब्रह्मजज्ञो अनन्तलोकाप्तिरित्यादिविशेषणैश्च भगवानेव । स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठामिति परामर्शाच्च । भगवतो ह्युरुगायत्वं प्रसिद्धम् । गुहानिहितत्वं च तस्यैव विशेषतः प्रसिद्धम् । न चाग्निपरिज्ञानमात्रेणानन्तलोकाप्तिर्भगवज्ज्ञानं विना । तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिं ल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति इत्यादिश्रुतेः । न च मुख्ये सत्यमुख्यार्थो युज्यते । | | text = लोकादिः प्रतिष्ठा ब्रह्मजज्ञो अनन्तलोकाप्तिरित्यादिविशेषणैश्च भगवानेव । स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठामिति परामर्शाच्च । भगवतो ह्युरुगायत्वं प्रसिद्धम् । गुहानिहितत्वं च तस्यैव विशेषतः प्रसिद्धम् । न चाग्निपरिज्ञानमात्रेणानन्तलोकाप्तिर्भगवज्ज्ञानं विना । तद्वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिं ल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति इत्यादिश्रुतेः । | ||
न च मुख्ये सत्यमुख्यार्थो युज्यते । | |||
}} | }} | ||
| Line 287: | Line 320: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = एष तेऽग्निर्नाचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । | | verse_line1 = एष तेऽग्निर्नाचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । | ||
| verse_lines = एष तेऽग्निर्नाचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।;एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 296: | Line 330: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । | | verse_line1 = येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । | ||
| verse_lines = येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।;एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वृतस्तृतीयः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वृतस्तृतीयः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वृतस्तृतीयः ॥ १९ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
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| verse_id = KKN_C01_S01_V19 | | verse_id = KKN_C01_S01_V19 | ||
| id = KKN_C01_S01_V19_B01 | | id = KKN_C01_S01_V19_B01 | ||
| text = अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते ॥ एतद्वै तत् इति परिहाराच्च मुक्ते स्थितो भगवान् पृच्छ्यते इति सिद्धम् । देहाद्विशेषेण मोचनं नाम मुक्तिरेव । मुक्तेरपि मरणात्मकत्वात् मरणमित्यपि भवति । स्थूलदेहपरित्यागस्तु विस्रंसमानस्येत्यनेनैवोक्तो भवति । | | text = अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । | ||
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते ॥ एतद्वै तत् | |||
इति परिहाराच्च मुक्ते स्थितो भगवान् पृच्छ्यते इति सिद्धम् । | |||
देहाद्विशेषेण मोचनं नाम मुक्तिरेव । मुक्तेरपि मरणात्मकत्वात् मरणमित्यपि भवति । स्थूलदेहपरित्यागस्तु विस्रंसमानस्येत्यनेनैवोक्तो भवति । | |||
}} | }} | ||
| Line 316: | Line 354: | ||
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| text = अग्निस्थं परमात्मानं सामान्याज्जानतोऽपि तु । अजानतस्तु मुक्तौ च जीवान्तःस्थितमीश्वरम् ॥ नियामकं च जीवानां मुक्तानामपि सर्वदा । गुणान् सर्वोत्तमत्वादीनविज्ञाय हरेस्तथा ॥ नैव मुक्तिर्भवेत् तस्मात् कृच्छ्रात् तदवदद्यमः । तस्य गोप्यत्वविज्ञप्त्यै तथाप्यग्निस्थवेदनात् ॥ सुखाधिक्यं भवेन्मुक्तौ तस्मात् तत्पृथगीरितम् ॥ इति तत्त्वसारे । | | text = अग्निस्थं परमात्मानं सामान्याज्जानतोऽपि तु । | ||
अजानतस्तु मुक्तौ च जीवान्तःस्थितमीश्वरम् ॥ | |||
नियामकं च जीवानां मुक्तानामपि सर्वदा । | |||
गुणान् सर्वोत्तमत्वादीनविज्ञाय हरेस्तथा ॥ | |||
नैव मुक्तिर्भवेत् तस्मात् कृच्छ्रात् तदवदद्यमः । | |||
तस्य गोप्यत्वविज्ञप्त्यै तथाप्यग्निस्थवेदनात् ॥ | |||
सुखाधिक्यं भवेन्मुक्तौ तस्मात् तत्पृथगीरितम् ॥ इति तत्त्वसारे । | |||
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| Line 328: | Line 372: | ||
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| text = गुह्यं तत्परमं ब्रह्म म्रियमाणं शरीरिणम् । सम्प्राप्तमपि जीवेषु जागर्ति स्वपितेष्वपि ॥ इति ब्रह्माण्डे । | | text = गुह्यं तत्परमं ब्रह्म म्रियमाणं शरीरिणम् । | ||
सम्प्राप्तमपि जीवेषु जागर्ति स्वपितेष्वपि ॥ इति ब्रह्माण्डे । | |||
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| Line 338: | Line 383: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुज्ञेयोऽणुरेष धर्मः । | | verse_line1 = देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुज्ञेयोऽणुरेष धर्मः । | ||
| verse_lines = देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुज्ञेयोऽणुरेष धर्मः ।;अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैवम् ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैवम् ॥ २० ॥ | | verse_line2 = अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैवम् ॥ २० ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 356: | Line 402: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ । | | verse_line1 = देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ । | ||
| verse_lines = देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ ।;वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २१ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 365: | Line 412: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् । | | verse_line1 = शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् । | ||
| verse_lines = शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् ।;भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 374: | Line 422: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = एतत् तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च । | | verse_line1 = एतत् तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च । | ||
| verse_lines = एतत् तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।;महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 383: | Line 432: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामांश्छन्दतः प्रार्थयस्व । | | verse_line1 = ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामांश्छन्दतः प्रार्थयस्व । | ||
| verse_lines = ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामांश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।;इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ॥;आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं माऽनुप्राक्षीः ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ॥ | | verse_line2 = इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 401: | Line 451: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = श्वोऽभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । | | verse_line1 = श्वोऽभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । | ||
| verse_lines = श्वोऽभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः ।;अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्तगीतम् ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्तगीतम् ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्तगीतम् ॥ २५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 410: | Line 461: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वाम् । | | verse_line1 = न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वाम् । | ||
| verse_lines = न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वाम् ।;जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २६ ॥ | |||
| verse_line2 = जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २६ ॥ | | verse_line2 = जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 419: | Line 471: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन् मर्त्यः क्वाधस्थः प्रजानन् । | | verse_line1 = अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन् मर्त्यः क्वाधस्थः प्रजानन् । | ||
| verse_lines = अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन् मर्त्यः क्वाधस्थः प्रजानन् ।;अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदान् अतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २७ ॥ | |||
| verse_line2 = अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदान् अतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदान् अतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 428: | Line 481: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । | | verse_line1 = यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । | ||
| verse_lines = यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।;योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २८ ॥ ॥ | |||
| verse_line2 = योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २८ ॥ ॥ | | verse_line2 = योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २८ ॥ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 450: | Line 504: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतेव प्रेयः ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः । | | verse_line1 = अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतेव प्रेयः ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः । | ||
| verse_lines = अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतेव प्रेयः ते उभे नानार्थे पुरुषं सिनीतः ।;तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद् य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद् य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥ | | verse_line2 = तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद् य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 459: | Line 514: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । | | verse_line1 = श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः । | ||
| verse_lines = श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।;श्रेयो धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमान् वृणीते ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = श्रेयो धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमान् वृणीते ॥ २ ॥ | | verse_line2 = श्रेयो धीरोऽभिप्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमान् वृणीते ॥ २ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 468: | Line 524: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च कामान् अभिध्यायन् नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । | | verse_line1 = स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च कामान् अभिध्यायन् नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः । | ||
| verse_lines = स त्वं प्रियान् प्रियरूपांश्च कामान् अभिध्यायन् नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।;नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 486: | Line 543: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता । | | verse_line1 = दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता । | ||
| verse_lines = दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता ।;विद्याभीप्सितं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवो लोलुपन्तः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = विद्याभीप्सितं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवो लोलुपन्तः ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = विद्याभीप्सितं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवो लोलुपन्तः ॥ ४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 495: | Line 553: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः । | | verse_line1 = अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः । | ||
| verse_lines = अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।;दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 504: | Line 563: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । | | verse_line1 = न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । | ||
| verse_lines = न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।;अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥ | ||
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| Line 513: | Line 573: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः । | | verse_line1 = श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः । | ||
| verse_lines = श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।;आश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = आश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = आश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 522: | Line 583: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = न नरेणावरः प्रोक्त एष सुज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । | | verse_line1 = न नरेणावरः प्रोक्त एष सुज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । | ||
| verse_lines = न नरेणावरः प्रोक्त एष सुज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।;अनन्यप्रोक्ते गतिरस्य नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = अनन्यप्रोक्ते गतिरस्य नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = अनन्यप्रोक्ते गतिरस्य नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 536: | Line 598: | ||
| verse_id = KKN_C01_S02_V08 | | verse_id = KKN_C01_S02_V08 | ||
| id = KKN_C01_S02_V08_B01 | | id = KKN_C01_S02_V08_B01 | ||
| text = जीवानां चैव विष्णोश्च यो न वेत्ति भिदां पुमान् । तदनुव्रताश्च ये केचित्तेषां ज्ञानं न जायते ॥ इति ब्रह्मवैवर्ते । | | text = जीवानां चैव विष्णोश्च यो न वेत्ति भिदां पुमान् । | ||
तदनुव्रताश्च ये केचित्तेषां ज्ञानं न जायते ॥ इति ब्रह्मवैवर्ते । | |||
}} | }} | ||
| Line 546: | Line 609: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । | | verse_line1 = नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । | ||
| verse_lines = नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।;यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ् नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ् नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ् नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 555: | Line 619: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । | | verse_line1 = जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् । | ||
| verse_lines = जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।;ततो मया नचिकेतश्चितोऽग्नि रनित्यद्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = ततो मया नचिकेतश्चितोऽग्नि रनित्यद्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = ततो मया नचिकेतश्चितोऽग्नि रनित्यद्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 573: | Line 638: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् । | | verse_line1 = कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् । | ||
| verse_lines = कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् ।;स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 587: | Line 653: | ||
| verse_id = KKN_C01_S02_V11 | | verse_id = KKN_C01_S02_V11 | ||
| id = KKN_C01_S02_V11_B01 | | id = KKN_C01_S02_V11_B01 | ||
| text = शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । शरवत् तन्मयो भवेत् । अभयं तितीर्षतां पारम् । तादृगेव भवति । इत्यादौ सर्वत्र भेदस्यैवोक्तेश्च न जीवाभेदः । | | text = शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । शरवत् तन्मयो भवेत् । | ||
अभयं तितीर्षतां पारम् । तादृगेव भवति । | |||
इत्यादौ सर्वत्र भेदस्यैवोक्तेश्च न जीवाभेदः । | |||
}} | }} | ||
| Line 603: | Line 671: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् । | | verse_line1 = तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् । | ||
| verse_lines = तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।;अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 621: | Line 690: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेनमाप्य । | | verse_line1 = एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेनमाप्य । | ||
| verse_lines = एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेनमाप्य ।;स मोदते मोदनीयं हि लब्ध्वा विवृतं सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = स मोदते मोदनीयं हि लब्ध्वा विवृतं सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = स मोदते मोदनीयं हि लब्ध्वा विवृतं सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 635: | Line 705: | ||
| verse_id = KKN_C01_S02_V13 | | verse_id = KKN_C01_S02_V13 | ||
| id = KKN_C01_S02_V13_B01 | | id = KKN_C01_S02_V13_B01 | ||
| text = मुक्तजीवे स्थितं विष्णुं विदित्वा जीवतः पृथक् । मोदते मोदनीयं तं प्राप्य मुक्तस्सदैव च ॥ इति महावाराहे । | | text = मुक्तजीवे स्थितं विष्णुं विदित्वा जीवतः पृथक् । | ||
मोदते मोदनीयं तं प्राप्य मुक्तस्सदैव च ॥ इति महावाराहे । | |||
}} | }} | ||
| Line 645: | Line 716: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात् । | | verse_line1 = अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात् । | ||
| verse_lines = अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात् ।;अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत् पश्यसि तद्वद ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत् पश्यसि तद्वद ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत् पश्यसि तद्वद ॥ १४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 654: | Line 726: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । | | verse_line1 = सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । | ||
| verse_lines = सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।;यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 663: | Line 736: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्मैतद्ध्येवाक्षरं परम् । | | verse_line1 = एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्मैतद्ध्येवाक्षरं परम् । | ||
| verse_lines = एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्मैतद्ध्येवाक्षरं परम् ।;एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 672: | Line 746: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । | | verse_line1 = एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । | ||
| verse_lines = एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।;एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 680: | Line 755: | ||
| verse_id = KKN_C01_S02_V17 | | verse_id = KKN_C01_S02_V17 | ||
| id = KKN_C01_S02_V17_B01 | | id = KKN_C01_S02_V17_B01 | ||
| text = एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म विष्ण्वाख्यं परमव्ययम् । सर्वस्यालम्बनं ज्ञात्वा मुच्यते नात्र संशयः ॥ इति च ॥ १७ ॥ | | text = एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म विष्ण्वाख्यं परमव्ययम् । | ||
सर्वस्यालम्बनं ज्ञात्वा मुच्यते नात्र संशयः ॥ इति च ॥ १७ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 690: | Line 766: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = न जायते म्रियते वा विपश्चि न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । | | verse_line1 = न जायते म्रियते वा विपश्चि न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । | ||
| verse_lines = न जायते म्रियते वा विपश्चि न्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।;अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे ॥ १८ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 698: | Line 775: | ||
| verse_id = KKN_C01_S02_V18 | | verse_id = KKN_C01_S02_V18 | ||
| id = KKN_C01_S02_V18_B01 | | id = KKN_C01_S02_V18_B01 | ||
| text = देहोत्पत्तिविनाशाख्यौ ज्ञानिनोऽप्युद्भवाभवौ । न कुतश्चिद्यतो विष्णुर्जायतेऽतस्तदीक्षणात् ॥ भावाभावौ न विदुषो यस्माज्जीवो न कश्चन । जायते म्रियते वापि स्वरूपेण कथञ्चन ॥ अजो नित्योऽविकारश्च जीवः पुरमणन्नपि ॥ इति च । | | text = देहोत्पत्तिविनाशाख्यौ ज्ञानिनोऽप्युद्भवाभवौ । | ||
न कुतश्चिद्यतो विष्णुर्जायतेऽतस्तदीक्षणात् ॥ | |||
भावाभावौ न विदुषो यस्माज्जीवो न कश्चन । | |||
जायते म्रियते वापि स्वरूपेण कथञ्चन ॥ | |||
अजो नित्योऽविकारश्च जीवः पुरमणन्नपि ॥ इति च । | |||
}} | }} | ||
| Line 714: | Line 795: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् । | | verse_line1 = हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् । | ||
| verse_lines = हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् ।;उभौ तै न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥ | |||
| verse_line2 = उभौ तै न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = उभौ तै न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 732: | Line 814: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । | | verse_line1 = अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । | ||
| verse_lines = अणोरणीयान् महतो महीयान् आत्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।;तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २० ॥ | |||
| verse_line2 = तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २० ॥ | | verse_line2 = तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २० ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 746: | Line 829: | ||
| verse_id = KKN_C01_S02_V20 | | verse_id = KKN_C01_S02_V20 | ||
| id = KKN_C01_S02_V20_B01 | | id = KKN_C01_S02_V20_B01 | ||
| text = जीवाद् गुणपरीमाणं यस्माद्विष्णोर्महत्तरम् । तस्माज्जीवात् स महिमा विष्णुरित्युच्यते श्रुतौ ॥ इति च ॥ | | text = जीवाद् गुणपरीमाणं यस्माद्विष्णोर्महत्तरम् । | ||
तस्माज्जीवात् स महिमा विष्णुरित्युच्यते श्रुतौ ॥ इति च ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 756: | Line 840: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । | | verse_line1 = आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । | ||
| verse_lines = आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।;कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥ | |||
| verse_line2 = कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 770: | Line 855: | ||
| verse_id = KKN_C01_S02_V21 | | verse_id = KKN_C01_S02_V21 | ||
| id = KKN_C01_S02_V21_B01 | | id = KKN_C01_S02_V21_B01 | ||
| text = आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । ऐश्वर्याद् भगवान् विष्णुर्विरुद्धं घटयत्यसौ ॥ इति च ॥ २१ ॥ | | text = आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । | ||
ऐश्वर्याद् भगवान् विष्णुर्विरुद्धं घटयत्यसौ ॥ इति च ॥ २१ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 780: | Line 866: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । | | verse_line1 = अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् । | ||
| verse_lines = अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।;महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥ | |||
| verse_line2 = महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 789: | Line 876: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = नायमात्मा प्रवचेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । | | verse_line1 = नायमात्मा प्रवचेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । | ||
| verse_lines = नायमात्मा प्रवचेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।;यमेवैष वृणुते तेन लभ्य स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ २३ ॥ | |||
| verse_line2 = यमेवैष वृणुते तेन लभ्य स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ २३ ॥ | | verse_line2 = यमेवैष वृणुते तेन लभ्य स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ २३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 798: | Line 886: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = नाविरतो दुश्चरितात् नाशान्तो नासमाहितः । | | verse_line1 = नाविरतो दुश्चरितात् नाशान्तो नासमाहितः । | ||
| verse_lines = नाविरतो दुश्चरितात् नाशान्तो नासमाहितः ।;नाशान्तमनसो वापि प्रज्ञानेनैवमाप्नुयात् ॥ २४ ॥ | |||
| verse_line2 = नाशान्तमनसो वापि प्रज्ञानेनैवमाप्नुयात् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = नाशान्तमनसो वापि प्रज्ञानेनैवमाप्नुयात् ॥ २४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 807: | Line 896: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः । | | verse_line1 = यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः । | ||
| verse_lines = यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः ।;मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥ | |||
| verse_line2 = मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥ | | verse_line2 = मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 820: | Line 910: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्द्धे । | | verse_line1 = ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्द्धे । | ||
| verse_lines = ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्द्धे ।;छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिनाचिकेताः ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिनाचिकेताः ॥ १ ॥ | | verse_line2 = छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिनाचिकेताः ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 828: | Line 919: | ||
| verse_id = KKN_C01_S03_V01 | | verse_id = KKN_C01_S03_V01 | ||
| id = KKN_C01_S03_V01_B01 | | id = KKN_C01_S03_V01_B01 | ||
| text = आत्मान्तरात्मेति विभुरेक एव द्विधा स्थितः । स विष्णुः परमे वायौ परेभ्योऽप्यृद्धरूपके ॥ शुभान् पिबति भोगान् स च्छायेव विदुषां प्रभुः । आतपः पापिनां नित्यं ... ... । | | text = आत्मान्तरात्मेति विभुरेक एव द्विधा स्थितः । | ||
स विष्णुः परमे वायौ परेभ्योऽप्यृद्धरूपके ॥ | |||
शुभान् पिबति भोगान् स च्छायेव विदुषां प्रभुः । | |||
आतपः पापिनां नित्यं ... ... । | |||
}} | }} | ||
| Line 838: | Line 932: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । | | verse_line1 = यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । | ||
| verse_lines = यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् ।;अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमसि ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमसि ॥ २ ॥ | | verse_line2 = अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमसि ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 846: | Line 941: | ||
| verse_id = KKN_C01_S03_V02 | | verse_id = KKN_C01_S03_V02 | ||
| id = KKN_C01_S03_V02_B01 | | id = KKN_C01_S03_V02_B01 | ||
| text = .... ... मर्यादा विष्णुयाजिनाम् ॥ संसारस्य च पारस्थस्स विष्णुर्द्विस्वरूपकः ॥ | | text = .... ... मर्यादा विष्णुयाजिनाम् ॥ | ||
संसारस्य च पारस्थस्स विष्णुर्द्विस्वरूपकः ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 856: | Line 952: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च । | | verse_line1 = आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च । | ||
| verse_lines = आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च ।;बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 865: | Line 962: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । | | verse_line1 = इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् । | ||
| verse_lines = इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान् ।;आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 874: | Line 972: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । | | verse_line1 = यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । | ||
| verse_lines = यस्त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।;तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 883: | Line 982: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । | | verse_line1 = यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा । | ||
| verse_lines = यस्तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा ।;तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 892: | Line 992: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यस्तवविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाशुचिः । | | verse_line1 = यस्तवविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाशुचिः । | ||
| verse_lines = यस्तवविज्ञानवान् भवत्यमनस्कः सदाशुचिः ।;न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 901: | Line 1,002: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदाशुचिः । | | verse_line1 = यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदाशुचिः । | ||
| verse_lines = यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदाशुचिः ।;स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 910: | Line 1,012: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान् नरः । | | verse_line1 = विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान् नरः । | ||
| verse_lines = विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान् नरः ।;सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद् विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद् विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद् विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 919: | Line 1,022: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अथेभ्यश्च परं मनः । | | verse_line1 = इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अथेभ्यश्च परं मनः । | ||
| verse_lines = इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अथेभ्यश्च परं मनः ।;मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ १० ॥ | | verse_line2 = मनसस्तु परा बुद्धिः बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ १० ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 928: | Line 1,032: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः । | | verse_line1 = महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः । | ||
| verse_lines = महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः ।;पुरुषान्न परः किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = पुरुषान्न परः किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = पुरुषान्न परः किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 936: | Line 1,041: | ||
| verse_id = KKN_C01_S03_V11 | | verse_id = KKN_C01_S03_V11 | ||
| id = KKN_C01_S03_V11_B01 | | id = KKN_C01_S03_V11_B01 | ||
| text = देवेभ्य इन्द्रियात्मभ्यो ज्यायांसोऽर्थाभिमानिनः । सोमवित्तपसूर्याप्पा अश्व्ग्नीन्द्रेन्द्रसूनवः ॥ यमो दक्षश्चेन्द्रियेशास्सुपर्णी वारुणी तथा । उमेति चार्थमानिन्यस्तिस्रो द्विर्द्व्येकदेवताः ॥ मनोभिमानिनो रुद्रवीन्द्रशेषास्त्रयोऽपि तु । ते श्रेष्ठा अर्थमानिभ्यस्तेभ्यो बुद्धिः सरस्वती ॥ तस्या ब्रह्मा महानात्मा ततोऽव्यक्ताभिधा रमा । तस्यास्तु पुरुषो विष्णुः पूर्णत्वान्नैव तत्समः ॥ कश्चित् कुतश्चिच्छ्रेष्ठस्तु नास्तीति किमु सा कथा॥ १०-१२ ॥ | | text = देवेभ्य इन्द्रियात्मभ्यो ज्यायांसोऽर्थाभिमानिनः । | ||
सोमवित्तपसूर्याप्पा अश्व्ग्नीन्द्रेन्द्रसूनवः ॥ | |||
यमो दक्षश्चेन्द्रियेशास्सुपर्णी वारुणी तथा । | |||
उमेति चार्थमानिन्यस्तिस्रो द्विर्द्व्येकदेवताः ॥ | |||
मनोभिमानिनो रुद्रवीन्द्रशेषास्त्रयोऽपि तु । | |||
ते श्रेष्ठा अर्थमानिभ्यस्तेभ्यो बुद्धिः सरस्वती ॥ | |||
तस्या ब्रह्मा महानात्मा ततोऽव्यक्ताभिधा रमा । | |||
तस्यास्तु पुरुषो विष्णुः पूर्णत्वान्नैव तत्समः ॥ | |||
कश्चित् कुतश्चिच्छ्रेष्ठस्तु नास्तीति किमु सा कथा॥ १०-१२ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 946: | Line 1,059: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । | | verse_line1 = एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । | ||
| verse_lines = एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।;दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 955: | Line 1,069: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यच्छेद् वाङ्मनसि प्राज्ञस्तद् यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । | | verse_line1 = यच्छेद् वाङ्मनसि प्राज्ञस्तद् यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । | ||
| verse_lines = यच्छेद् वाङ्मनसि प्राज्ञस्तद् यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।;ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 963: | Line 1,078: | ||
| verse_id = KKN_C01_S03_V13 | | verse_id = KKN_C01_S03_V13 | ||
| id = KKN_C01_S03_V13_B01 | | id = KKN_C01_S03_V13_B01 | ||
| text = तस्माद्वागात्मिका देवीरुमाद्यास्तु शिवादिषु । शिवादीन् ब्रह्मवाय्वोस्तु नियच्छेन्महदात्मनोः ॥ तौ रमायां परानन्दे तां विष्णौ परमात्मनि । तद्वशत्वेन तद्ध्यानं नियमो नाम नापरः ॥ कुतस्तु मानुषो देवान्नियच्छेद्विनियामकान् ॥ इति च ॥ स्वभार्यायाः परत्वं सिद्धमिति महतः परमित्येवोक्तम् ॥ १३ ॥ | | text = तस्माद्वागात्मिका देवीरुमाद्यास्तु शिवादिषु । | ||
शिवादीन् ब्रह्मवाय्वोस्तु नियच्छेन्महदात्मनोः ॥ | |||
तौ रमायां परानन्दे तां विष्णौ परमात्मनि । | |||
तद्वशत्वेन तद्ध्यानं नियमो नाम नापरः ॥ | |||
कुतस्तु मानुषो देवान्नियच्छेद्विनियामकान् ॥ इति च ॥ | |||
स्वभार्यायाः परत्वं सिद्धमिति महतः परमित्येवोक्तम् ॥ १३ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 973: | Line 1,093: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत । | | verse_line1 = उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत । | ||
| verse_lines = उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत ।;क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत् कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 982: | Line 1,103: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् । | | verse_line1 = अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् । | ||
| verse_lines = अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।;अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 991: | Line 1,113: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम् । | | verse_line1 = नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम् । | ||
| verse_lines = नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम् ।;उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,000: | Line 1,123: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि । | | verse_line1 = य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि । | ||
| verse_lines = य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि ।;प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पते इति ॥ १७ ॥ ॥ | |||
| verse_line2 = प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पते इति ॥ १७ ॥ ॥ | | verse_line2 = प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पते इति ॥ १७ ॥ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,017: | Line 1,141: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = पराञ्चि खानि व्यतृणात् स्वयम्भूस्तस्मात् पराक् पश्यति नान्तरात्मन् । | | verse_line1 = पराञ्चि खानि व्यतृणात् स्वयम्भूस्तस्मात् पराक् पश्यति नान्तरात्मन् । | ||
| verse_lines = पराञ्चि खानि व्यतृणात् स्वयम्भूस्तस्मात् पराक् पश्यति नान्तरात्मन् ।;कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत् आवृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत् आवृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥ | | verse_line2 = कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत् आवृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,035: | Line 1,160: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = पराचः कामाननुयन्ति बालाः ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशान् । | | verse_line1 = पराचः कामाननुयन्ति बालाः ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशान् । | ||
| verse_lines = पराचः कामाननुयन्ति बालाः ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशान् ।;अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥ | | verse_line2 = अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥ २ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,044: | Line 1,170: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = येन रूपं रसं गन्धं शब्दान् स्पर्शांश्च मैथुनान् । | | verse_line1 = येन रूपं रसं गन्धं शब्दान् स्पर्शांश्च मैथुनान् । | ||
| verse_lines = येन रूपं रसं गन्धं शब्दान् स्पर्शांश्च मैथुनान् ।;एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,062: | Line 1,189: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति । | | verse_line1 = स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति । | ||
| verse_lines = स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।;महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 1,071: | Line 1,199: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = य इदं मध्वदं वेदात्मानं जीवमन्तिकात् । | | verse_line1 = य इदं मध्वदं वेदात्मानं जीवमन्तिकात् । | ||
| verse_lines = य इदं मध्वदं वेदात्मानं जीवमन्तिकात् ।;ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,089: | Line 1,218: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत । | | verse_line1 = यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत । | ||
| verse_lines = यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत ।;गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत । एतद्वै तत् ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,097: | Line 1,227: | ||
| verse_id = KKN_C02_S01_V06 | | verse_id = KKN_C02_S01_V06 | ||
| id = KKN_C02_S01_V06_B01 | | id = KKN_C02_S01_V06_B01 | ||
| text = अम्नामभ्यश्च भूतेभ्यस्तपोनाम्नः शिवादपि । पूर्वं यो जनयामास पूर्वजातं चतुर्मुखम् ॥ स्वात्मानं च गुहासंस्थं सर्वभूतैः सहाभिभूः । यः पश्यति सदा विष्णुस्स एष हृदि संस्थितः ॥ इति च ॥ | | text = अम्नामभ्यश्च भूतेभ्यस्तपोनाम्नः शिवादपि । | ||
पूर्वं यो जनयामास पूर्वजातं चतुर्मुखम् ॥ | |||
स्वात्मानं च गुहासंस्थं सर्वभूतैः सहाभिभूः । | |||
यः पश्यति सदा विष्णुस्स एष हृदि संस्थितः ॥ इति च ॥ | |||
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| Line 1,113: | Line 1,246: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी । | | verse_line1 = या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी । | ||
| verse_lines = या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी ।;गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तीं या भूतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत् ॥ ७ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,121: | Line 1,255: | ||
| verse_id = KKN_C02_S01_V07 | | verse_id = KKN_C02_S01_V07 | ||
| id = KKN_C02_S01_V07_B01 | | id = KKN_C02_S01_V07_B01 | ||
| text = अदनादितिर्विष्णुर्यः प्राणसहितः स्थितः । उत्तमो देवताभ्यश्च सोत्मानं विविधात्मना ॥ मत्स्यकूर्मादिरूपेण गुहासंस्थमजीजनत् । भूतैस्सह महाविष्णुः परमात्मा युगे युगे ॥ इति च । | | text = अदनादितिर्विष्णुर्यः प्राणसहितः स्थितः । | ||
उत्तमो देवताभ्यश्च सोत्मानं विविधात्मना ॥ | |||
मत्स्यकूर्मादिरूपेण गुहासंस्थमजीजनत् । | |||
भूतैस्सह महाविष्णुः परमात्मा युगे युगे ॥ इति च । | |||
}} | }} | ||
| Line 1,137: | Line 1,274: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः । | | verse_line1 = अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः । | ||
| verse_lines = अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः ।;दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिः हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिः हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = दिवे दिव ईड्यो जागृवद्भिः हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,145: | Line 1,283: | ||
| verse_id = KKN_C02_S01_V08 | | verse_id = KKN_C02_S01_V08 | ||
| id = KKN_C02_S01_V08_B01 | | id = KKN_C02_S01_V08_B01 | ||
| text = सर्वज्ञो भगवान् विष्णुररण्योर्गुरुशिष्ययोः । सुभृतः स्तूयते नित्यं जानद्भिः पुरुषोत्तमः ॥ इति च । अर्यते ण आभ्यामित्यरणी ॥ ८ ॥ | | text = सर्वज्ञो भगवान् विष्णुररण्योर्गुरुशिष्ययोः । | ||
सुभृतः स्तूयते नित्यं जानद्भिः पुरुषोत्तमः ॥ इति च । | |||
अर्यते ण आभ्यामित्यरणी ॥ ८ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,155: | Line 1,295: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यतश्चोदेति सूर्योस्तं यत्र च गच्छति । | | verse_line1 = यतश्चोदेति सूर्योस्तं यत्र च गच्छति । | ||
| verse_lines = यतश्चोदेति सूर्योस्तं यत्र च गच्छति ।;तं देवास्सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = तं देवास्सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = तं देवास्सर्वे अर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ ९ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,164: | Line 1,305: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । | | verse_line1 = यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । | ||
| verse_lines = यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।;मृत्योस्स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = मृत्योस्स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥ | | verse_line2 = मृत्योस्स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,172: | Line 1,314: | ||
| verse_id = KKN_C02_S01_V10 | | verse_id = KKN_C02_S01_V10 | ||
| id = KKN_C02_S01_V10_B01 | | id = KKN_C02_S01_V10_B01 | ||
| text = यः प्रादुर्भावगो विष्णुर्देहादिषु च संस्थितः । स एव मूलरूपश्च साक्षान्नारायणाभिधः ॥ मूलरूपश्च यो विष्णुः प्रादुर्भावादिगश्च यः । गुणतस्स्वरूपतो वापि विशेषं योऽत्र पश्यति ॥ अत्यल्पमपि मृत्वा स तमोऽन्धं यात्यसंशयम् । भेदाभेदविदश्चात्र तमो यान्ति न संशयः ॥ १० ॥ | | text = यः प्रादुर्भावगो विष्णुर्देहादिषु च संस्थितः । | ||
स एव मूलरूपश्च साक्षान्नारायणाभिधः ॥ | |||
मूलरूपश्च यो विष्णुः प्रादुर्भावादिगश्च यः । | |||
गुणतस्स्वरूपतो वापि विशेषं योऽत्र पश्यति ॥ | |||
अत्यल्पमपि मृत्वा स तमोऽन्धं यात्यसंशयम् । | |||
भेदाभेदविदश्चात्र तमो यान्ति न संशयः ॥ १० ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,182: | Line 1,329: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन । | | verse_line1 = मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन । | ||
| verse_lines = मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन ।;मृत्योस्स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = मृत्योस्स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = मृत्योस्स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,190: | Line 1,338: | ||
| verse_id = KKN_C02_S01_V11 | | verse_id = KKN_C02_S01_V11 | ||
| id = KKN_C02_S01_V11_B01 | | id = KKN_C02_S01_V11_B01 | ||
| text = तथैवावयवानां च गुणानां च परस्परम् । क्रियाणां तेन चैतेषां भेदविच्चोभयं विदः ॥ यान्त्येवान्धन्तमो नात्र कार्या काचिद्विचारणा ॥ इति च । | | text = तथैवावयवानां च गुणानां च परस्परम् । | ||
क्रियाणां तेन चैतेषां भेदविच्चोभयं विदः ॥ | |||
यान्त्येवान्धन्तमो नात्र कार्या काचिद्विचारणा ॥ इति च । | |||
}} | }} | ||
| Line 1,196: | Line 1,346: | ||
| verse_id = KKN_C02_S01_V11 | | verse_id = KKN_C02_S01_V11 | ||
| id = KKN_C02_S01_V11_B01 | | id = KKN_C02_S01_V11_B01 | ||
| text = भवेदेकत्र संयोग इवशब्दोऽविरुद्धयोः । धर्मयोरुपमायां वा स्वल्पत्वे वा विवक्षिते ॥ इति शब्दनिर्णये । | | text = भवेदेकत्र संयोग इवशब्दोऽविरुद्धयोः । | ||
धर्मयोरुपमायां वा स्वल्पत्वे वा विवक्षिते ॥ इति शब्दनिर्णये । | |||
}} | }} | ||
| Line 1,212: | Line 1,363: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति । | | verse_line1 = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति । | ||
| verse_lines = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।;ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥ १२ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,221: | Line 1,373: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । | | verse_line1 = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । | ||
| verse_lines = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः ।;ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः । एतद्वै तत् ॥ १३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,230: | Line 1,383: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । | | verse_line1 = यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । | ||
| verse_lines = यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति ।;एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति ॥ १४ ॥ | ||
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| Line 1,248: | Line 1,402: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । | | verse_line1 = यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति । | ||
| verse_lines = यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।;एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,266: | Line 1,421: | ||
| verse_id = KKN_C02_S01_V15 | | verse_id = KKN_C02_S01_V15 | ||
| id = KKN_C02_S01_V15_B01 | | id = KKN_C02_S01_V15_B01 | ||
| text = सर्वेषां ज्ञानिनामात्मा देवानां च विशेषतः । मुक्तो वायुश्च सादृश्यमेवं विष्णोस्तु गच्छति ॥ न तु तद्रूपतां याति किम्वन्ये देवमानुषाः । आभासाभासरूपास्तु वायोर्देवस्य सर्वशः ॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ १५ ॥ | | text = सर्वेषां ज्ञानिनामात्मा देवानां च विशेषतः । | ||
मुक्तो वायुश्च सादृश्यमेवं विष्णोस्तु गच्छति ॥ | |||
न तु तद्रूपतां याति किम्वन्ये देवमानुषाः । | |||
आभासाभासरूपास्तु वायोर्देवस्य सर्वशः ॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ १५ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,278: | Line 1,436: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । | | verse_line1 = पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । | ||
| verse_lines = पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः ।;अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद् वै तत् ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद् वै तत् ॥ १ ॥ | | verse_line2 = अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद् वै तत् ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,292: | Line 1,451: | ||
| verse_id = KKN_C02_S02_V01 | | verse_id = KKN_C02_S02_V01 | ||
| id = KKN_C02_S02_V01_B01 | | id = KKN_C02_S02_V01_B01 | ||
| text = विमुक्तो निरभीमानात् पूर्वमेवापरोक्षवित् । मुख्यतो मुच्यते पश्चात् दुःखाद्याभासहानतः ॥ इति च ॥ १ ॥ | | text = विमुक्तो निरभीमानात् पूर्वमेवापरोक्षवित् । | ||
मुख्यतो मुच्यते पश्चात् दुःखाद्याभासहानतः ॥ इति च ॥ १ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,302: | Line 1,462: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । | | verse_line1 = हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । | ||
| verse_lines = हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।;नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥ | | verse_line2 = नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ २ ॥ | ||
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| Line 1,310: | Line 1,471: | ||
| verse_id = KKN_C02_S02_V02 | | verse_id = KKN_C02_S02_V02 | ||
| id = KKN_C02_S02_V02_B01 | | id = KKN_C02_S02_V02_B01 | ||
| text = नित्यं हीनोऽखिलैर्दोषैस्साररूपो यतो हरिः । हंस इत्युच्यते तस्माद्वायुस्थश्शुचिषत्स्मृतः ॥ वरसुर्वसुरित्युक्तस्स एवाप्यन्तरिक्षगः । होता सर्वेन्द्रियादिस्थो वेद्यां पूज्यश्च वेदिषत् ॥ अत्यन्नश्चातिथिः प्रोक्तो यस्मादन्नं थमुच्यते । स द्रोणकलशे सोमे स्थित उक्तो दुरोणसत् ॥ नृषु स्थितश्च देवेषु वरेष्वपि स एव तु । ऋतरूपे तथा वेदे व्योमाख्यप्रकृतावपि ॥ व्योतं जगदिदं यस्यां सा व्योम श्रीरुदाहृता । अब्जगोजाद्रिजेष्वेवमास्ते सोऽब्जादिकस्ततः ॥ तथैवर्तेषु मुक्तेषु गतास्ते विष्णुमित्यृताः । वेदैर्मुख्यतया प्रोक्तः ऋतमित्येव चोच्यते ॥ बृहत्पूर्णगुणत्वाच्च स एव पुरुषोत्तमः ॥ २ ॥ | | text = नित्यं हीनोऽखिलैर्दोषैस्साररूपो यतो हरिः । | ||
हंस इत्युच्यते तस्माद्वायुस्थश्शुचिषत्स्मृतः ॥ | |||
वरसुर्वसुरित्युक्तस्स एवाप्यन्तरिक्षगः । | |||
होता सर्वेन्द्रियादिस्थो वेद्यां पूज्यश्च वेदिषत् ॥ | |||
अत्यन्नश्चातिथिः प्रोक्तो यस्मादन्नं थमुच्यते । | |||
स द्रोणकलशे सोमे स्थित उक्तो दुरोणसत् ॥ | |||
नृषु स्थितश्च देवेषु वरेष्वपि स एव तु । | |||
ऋतरूपे तथा वेदे व्योमाख्यप्रकृतावपि ॥ | |||
व्योतं जगदिदं यस्यां सा व्योम श्रीरुदाहृता । | |||
अब्जगोजाद्रिजेष्वेवमास्ते सोऽब्जादिकस्ततः ॥ | |||
तथैवर्तेषु मुक्तेषु गतास्ते विष्णुमित्यृताः । | |||
वेदैर्मुख्यतया प्रोक्तः ऋतमित्येव चोच्यते ॥ | |||
बृहत्पूर्णगुणत्वाच्च स एव पुरुषोत्तमः ॥ २ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,320: | Line 1,493: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । | | verse_line1 = ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । | ||
| verse_lines = ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति ।;मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,329: | Line 1,503: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । | | verse_line1 = अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । | ||
| verse_lines = अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।;देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥ ४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,338: | Line 1,513: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । | | verse_line1 = न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन । | ||
| verse_lines = न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।;इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥ | |||
| verse_line2 = इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,356: | Line 1,532: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । | | verse_line1 = हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । | ||
| verse_lines = हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।;यथा मरणं प्राप्यात्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = यथा मरणं प्राप्यात्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = यथा मरणं प्राप्यात्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥ | ||
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| Line 1,365: | Line 1,542: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । | | verse_line1 = योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । | ||
| verse_lines = योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः ।;स्थाणुमन्ये नु संयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = स्थाणुमन्ये नु संयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = स्थाणुमन्ये नु संयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,374: | Line 1,552: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = य एषु सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । | | verse_line1 = य एषु सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । | ||
| verse_lines = य एषु सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः ।;तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।;तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन ।;एतद्वै तत् ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । | | verse_line2 = तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । | ||
}} | }} | ||
| Line 1,383: | Line 1,562: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । | | verse_line1 = अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । | ||
| verse_lines = अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।;एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ ९ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,391: | Line 1,571: | ||
| verse_id = KKN_C02_S02_V09 | | verse_id = KKN_C02_S02_V09 | ||
| id = KKN_C02_S02_V09_B01 | | id = KKN_C02_S02_V09_B01 | ||
| text = अग्निर्यथैको लोकेषु प्रविष्टोऽन्यो न विद्यते । पाकादिकर्ताऽथाप्यस्य देवस्य प्रतिरूपकाः ॥ रूपं रूपं प्रति ह्येते सन्त्यचेतनवह्नयः ॥ ६९ ॥ | | text = अग्निर्यथैको लोकेषु प्रविष्टोऽन्यो न विद्यते । | ||
पाकादिकर्ताऽथाप्यस्य देवस्य प्रतिरूपकाः ॥ | |||
रूपं रूपं प्रति ह्येते सन्त्यचेतनवह्नयः ॥ ६९ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,401: | Line 1,583: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । | | verse_line1 = वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । | ||
| verse_lines = वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव ।;एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥ | | verse_line2 = एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,409: | Line 1,592: | ||
| verse_id = KKN_C02_S02_V10 | | verse_id = KKN_C02_S02_V10 | ||
| id = KKN_C02_S02_V10_B01 | | id = KKN_C02_S02_V10_B01 | ||
| text = एवं देवो वायुरपि धारकोऽन्यो न विद्यते । रूपं रूपं तथाऽप्यस्य प्रत्यभूत् प्रतिरूपकः ॥ अचेतनः स्पर्शगम्यो योऽयमेवं जनार्दनः । एकस्स्वतन्त्रो नान्योऽस्ति सर्वजीवान्तरस्थितः ॥ रूपं रूपं प्रति ह्यस्य प्रतिबिम्बाश्च चेतनाः । बाह्याश्च ते ततो नास्य स्वरूपं ते कथञ्चन ॥ अनादिप्रतिबिम्बाश्च बभूवुस्ते ह्यनन्तकाः ॥ | | text = एवं देवो वायुरपि धारकोऽन्यो न विद्यते । | ||
रूपं रूपं तथाऽप्यस्य प्रत्यभूत् प्रतिरूपकः ॥ | |||
अचेतनः स्पर्शगम्यो योऽयमेवं जनार्दनः । | |||
एकस्स्वतन्त्रो नान्योऽस्ति सर्वजीवान्तरस्थितः ॥ | |||
रूपं रूपं प्रति ह्यस्य प्रतिबिम्बाश्च चेतनाः । | |||
बाह्याश्च ते ततो नास्य स्वरूपं ते कथञ्चन ॥ | |||
अनादिप्रतिबिम्बाश्च बभूवुस्ते ह्यनन्तकाः ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,419: | Line 1,608: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । | | verse_line1 = सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः । | ||
| verse_lines = सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुः न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ।;एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,427: | Line 1,617: | ||
| verse_id = KKN_C02_S02_V11 | | verse_id = KKN_C02_S02_V11 | ||
| id = KKN_C02_S02_V11_B01 | | id = KKN_C02_S02_V11_B01 | ||
| text = सूर्यो यथाऽऽन्तरं चक्षुः प्रतिबिम्बोऽस्य बाह्यकः । बाह्यचक्षुर्गतैर्दोषैरन्तश्चक्षुर्न लिप्यते ॥ अन्तश्चक्षुर्देवता तु बाह्यचक्षुरचेतनम् । एवं बाह्यस्स्वतन्त्रत्वाज्जीवेभ्यः पुरुषोत्तमः ॥ अस्वतन्त्रस्य जीवस्य दुःखैर्नैव हि लिप्यते ॥ ११ ॥ | | text = सूर्यो यथाऽऽन्तरं चक्षुः प्रतिबिम्बोऽस्य बाह्यकः । | ||
बाह्यचक्षुर्गतैर्दोषैरन्तश्चक्षुर्न लिप्यते ॥ | |||
अन्तश्चक्षुर्देवता तु बाह्यचक्षुरचेतनम् । | |||
एवं बाह्यस्स्वतन्त्रत्वाज्जीवेभ्यः पुरुषोत्तमः ॥ | |||
अस्वतन्त्रस्य जीवस्य दुःखैर्नैव हि लिप्यते ॥ ११ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,437: | Line 1,631: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति । | | verse_line1 = एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति । | ||
| verse_lines = एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति ।;तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ १२ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,445: | Line 1,640: | ||
| verse_id = KKN_C02_S02_V12 | | verse_id = KKN_C02_S02_V12 | ||
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| text = चेतनाभासको जीवः परमश्चेतनो हरिः ॥ स्वतन्त्रत्वात् स्वतन्त्रो हि नैव दोषेण लिप्यते ॥ इति महाकौर्मे ॥ | | text = चेतनाभासको जीवः परमश्चेतनो हरिः ॥ | ||
स्वतन्त्रत्वात् स्वतन्त्रो हि नैव दोषेण लिप्यते ॥ इति महाकौर्मे ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,461: | Line 1,657: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । | | verse_line1 = नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । | ||
| verse_lines = नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।;तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,475: | Line 1,672: | ||
| verse_id = KKN_C02_S02_V13 | | verse_id = KKN_C02_S02_V13 | ||
| id = KKN_C02_S02_V13_B01 | | id = KKN_C02_S02_V13_B01 | ||
| text = आत्मनि स्थं हरिं जानन् मुच्यते नात्र संशयः । जीवैक्येन तु तं जानन् तमस्यन्धे पतेद् ध्रुवम् ॥ इति च ॥ १३ ॥ | | text = आत्मनि स्थं हरिं जानन् मुच्यते नात्र संशयः । | ||
जीवैक्येन तु तं जानन् तमस्यन्धे पतेद् ध्रुवम् ॥ इति च ॥ १३ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,485: | Line 1,683: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् । | | verse_line1 = तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् । | ||
| verse_lines = तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।;कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति न भाति वा ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति न भाति वा ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति न भाति वा ॥ १४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,494: | Line 1,693: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । | | verse_line1 = न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । | ||
| verse_lines = न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।;तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १५ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,506: | Line 1,706: | ||
| verse_id = KKN_C02_S02_V15 | | verse_id = KKN_C02_S02_V15 | ||
| id = KKN_C02_S02_V15_B01 | | id = KKN_C02_S02_V15_B01 | ||
| text = एतदेव भगवद्रूपं परमं सुखम् । ज्ञानिसुखं तु तद्विप्लुण्मात्रम् । ब्रह्मादीनां च मुक्तानां सुखं विष्णुसुखस्य तु । प्रतिबिम्बस्तु विप्लुट्को विष्णोरेव परं सुखम् ॥ सम्यग् भाति न भातीति जानीयां तत्कथं न्वहम् । तत्प्रसादमृते दिव्यमनिर्देश्यं परं सुखम् ॥ इति च महावराहे ॥ १४ ॥ | | text = एतदेव भगवद्रूपं परमं सुखम् । ज्ञानिसुखं तु तद्विप्लुण्मात्रम् । | ||
ब्रह्मादीनां च मुक्तानां सुखं विष्णुसुखस्य तु । | |||
प्रतिबिम्बस्तु विप्लुट्को विष्णोरेव परं सुखम् ॥ | |||
सम्यग् भाति न भातीति जानीयां तत्कथं न्वहम् । | |||
तत्प्रसादमृते दिव्यमनिर्देश्यं परं सुखम् ॥ इति च महावराहे ॥ १४ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,518: | Line 1,722: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । | | verse_line1 = ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । | ||
| verse_lines = ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः ।;तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥;तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ १ ॥ | |||
| verse_line2 = तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥ | | verse_line2 = तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,526: | Line 1,731: | ||
| verse_id = KKN_C02_S03_V01 | | verse_id = KKN_C02_S03_V01 | ||
| id = KKN_C02_S03_V01_B01 | | id = KKN_C02_S03_V01_B01 | ||
| text = सर्वोच्चो भगवान् विष्णुर्मूलं भूमिवदस्य तु । जगदाख्यस्य वृक्षस्य शाखा देवास्ततोऽधमाः ॥ वृक्षमूलं रमादेवी सोऽश्व आशुगतेर्हरिः । तद्व्याप्तत्वात् तदन्नत्वादश्वत्थोऽयं प्रकीर्तितः ॥ प्रवाहतस्त्वनादिश्च मुख्यतस्त्वमृतो हरिः । मुख्यामृतस्स एवैको जगन्नित्यं प्रवाहतः ॥ | | text = सर्वोच्चो भगवान् विष्णुर्मूलं भूमिवदस्य तु । जगदाख्यस्य वृक्षस्य शाखा देवास्ततोऽधमाः ॥ | ||
वृक्षमूलं रमादेवी सोऽश्व आशुगतेर्हरिः । | |||
तद्व्याप्तत्वात् तदन्नत्वादश्वत्थोऽयं प्रकीर्तितः ॥ | |||
प्रवाहतस्त्वनादिश्च मुख्यतस्त्वमृतो हरिः । | |||
मुख्यामृतस्स एवैको जगन्नित्यं प्रवाहतः ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,536: | Line 1,745: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यदिदं किञ्च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । | | verse_line1 = यदिदं किञ्च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । | ||
| verse_lines = यदिदं किञ्च जगत् सर्वं प्राण एजति निःसृतम् ।;महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥ | | verse_line2 = महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,544: | Line 1,754: | ||
| verse_id = KKN_C02_S03_V02 | | verse_id = KKN_C02_S03_V02 | ||
| id = KKN_C02_S03_V02_B01 | | id = KKN_C02_S03_V02_B01 | ||
| text = प्राणाख्ये तु हरौ सर्वमेजत्यस्माच्च निस्सृतम् । वज्रवद्भयदं चैव स्वधर्मस्यातिलङ्घने ॥ २ ॥ | | text = प्राणाख्ये तु हरौ सर्वमेजत्यस्माच्च निस्सृतम् । | ||
वज्रवद्भयदं चैव स्वधर्मस्यातिलङ्घने ॥ २ ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,554: | Line 1,765: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्यः । | | verse_line1 = भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्यः । | ||
| verse_lines = भयादस्याग्निस्तपति भयात् तपति सूर्यः ।;भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,563: | Line 1,775: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक् शरीरस्य विस्रसः । | | verse_line1 = इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक् शरीरस्य विस्रसः । | ||
| verse_lines = इह चेदशकद्बोद्धुं प्राक् शरीरस्य विस्रसः ।;ततः स्वर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = ततः स्वर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = ततः स्वर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,572: | Line 1,785: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यथादर्शे तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव दृश्यते तथा गन्धर्वलोके । छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = यथादर्शे तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव दृश्यते तथा गन्धर्वलोके । छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥ | ||
| verse_lines = यथादर्शे तथाऽऽत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव दृश्यते तथा गन्धर्वलोके । छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥ ५ ॥ | |||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
}} | }} | ||
| Line 1,579: | Line 1,793: | ||
| verse_id = KKN_C02_S03_V05 | | verse_id = KKN_C02_S03_V05 | ||
| id = KKN_C02_S03_V05_B01 | | id = KKN_C02_S03_V05_B01 | ||
| text = जीवे स्थितस्तु भगवान् दृश्यते ज्ञानदृष्टिभिः । आदर्शे मुखवत् सम्यङ् न तथा पितृलोकगः ॥ ततः किञ्चित् स्पष्टतया गान्धर्वे दृश्यते हरिः । अत्यातपे न छायायां यथैवाहनि दृश्यते ॥ स्पष्टं तथा ब्रह्मलोके दृश्यते पुरुषोत्तमः ॥ इति च ॥ ३-५ ॥ | | text = जीवे स्थितस्तु भगवान् दृश्यते ज्ञानदृष्टिभिः । | ||
आदर्शे मुखवत् सम्यङ् न तथा पितृलोकगः ॥ | |||
ततः किञ्चित् स्पष्टतया गान्धर्वे दृश्यते हरिः । | |||
अत्यातपे न छायायां यथैवाहनि दृश्यते ॥ | |||
स्पष्टं तथा ब्रह्मलोके दृश्यते पुरुषोत्तमः ॥ इति च ॥ ३-५ ॥ | |||
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| Line 1,589: | Line 1,807: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् । | | verse_line1 = इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् । | ||
| verse_lines = इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् ।;पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥ | |||
| verse_line2 = पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥ | | verse_line2 = पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् । | | verse_line1 = इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् । | ||
| verse_lines = इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् ।;सत्त्वादपि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥ | |||
| verse_line2 = सत्त्वादपि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = सत्त्वादपि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥ | ||
}} | }} | ||
| Line 1,607: | Line 1,827: | ||
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| verse_line1 = अव्यक्तात् तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च । | | verse_line1 = अव्यक्तात् तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च । | ||
| verse_lines = अव्यक्तात् तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च ।;तं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥ | |||
| verse_line2 = तं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = तं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
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| text = तारतम्यपरिज्ञानपूर्वकं सर्वतो हरेः । आधिक्ये सर्ववाक्यानां तात्पर्यं महदिष्यते ॥ इति च ॥ ६-७ ॥ | | text = तारतम्यपरिज्ञानपूर्वकं सर्वतो हरेः । | ||
आधिक्ये सर्ववाक्यानां तात्पर्यं महदिष्यते ॥ इति च ॥ ६-७ ॥ | |||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम् । | | verse_line1 = न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम् । | ||
| verse_lines = न सन्दृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम् ।;हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो य एनं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥ | |||
| verse_line2 = हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो य एनं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = हृदा मनीषा मनसाऽभिक्लृप्तो य एनं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
| Line 1,639: | Line 1,862: | ||
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| text = प्रादुर्भावानृते विष्णुमिन्द्रियैर्नैव पश्यति । प्रादुर्भावानपि यदा ज्ञानदृष्ट्यैव पश्यति ॥ तदैव मुच्यते योगी न दुष्टैरिन्द्रियैः क्वचित् ॥ इति च ॥ ९ ॥ | | text = प्रादुर्भावानृते विष्णुमिन्द्रियैर्नैव पश्यति । | ||
प्रादुर्भावानपि यदा ज्ञानदृष्ट्यैव पश्यति ॥ | |||
तदैव मुच्यते योगी न दुष्टैरिन्द्रियैः क्वचित् ॥ इति च ॥ ९ ॥ | |||
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| Line 1,649: | Line 1,874: | ||
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| verse_line1 = यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । | | verse_line1 = यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । | ||
| verse_lines = यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह ।;बुद्धिश्च न विचेष्टति तमाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥ | |||
| verse_line2 = बुद्धिश्च न विचेष्टति तमाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = बुद्धिश्च न विचेष्टति तमाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । | | verse_line1 = तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । | ||
| verse_lines = तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् ।;अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥ | |||
| verse_line2 = अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । | | verse_line1 = नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । | ||
| verse_lines = नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा ।;अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥ | |||
| verse_line2 = अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः । | | verse_line1 = अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः । | ||
| verse_lines = अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः ।;अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
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| verse_id = KKN_C02_S03_V13 | | verse_id = KKN_C02_S03_V13 | ||
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| text = अधिकस्सतोऽयं भगवान् सर्वस्मादपि केशवः । अस्तीति नामकस्तस्माज्ज्ञातव्यस्स तथैव च ॥ अनाधिक्यं जानतां तु कथं स उपलभ्यते । प्रकृतेः पुरुषाणां च तत्त्वं भावयति स्फुटम् ॥ तत्त्वभावस्ततो विष्णुस्तत्प्रसादात् तु तस्य हि । आधिक्यं ज्ञायते सत्तः प्रसादश्च तथाविदः ॥ अनादिकालादाधिक्यं सर्वस्माज्जानतो हरेः । पुनः पुनर्वृद्धिमेति तज्ज्ञानं हि भवे भवे ॥ येषामाधिक्यविज्ञानं नैव पूर्वं हरेर्भवेत् । तेषां पश्चाच्च नैव स्यादभिभूतं तु तत् पुनः ॥ व्यञ्जकाद् व्यक्तिमभ्येति तस्मात् तज्ज्ञानमुत्तमम् ॥ इति च ॥ १२-१३ ॥ | | text = अधिकस्सतोऽयं भगवान् सर्वस्मादपि केशवः । | ||
अस्तीति नामकस्तस्माज्ज्ञातव्यस्स तथैव च ॥ | |||
अनाधिक्यं जानतां तु कथं स उपलभ्यते । | |||
प्रकृतेः पुरुषाणां च तत्त्वं भावयति स्फुटम् ॥ | |||
तत्त्वभावस्ततो विष्णुस्तत्प्रसादात् तु तस्य हि । | |||
आधिक्यं ज्ञायते सत्तः प्रसादश्च तथाविदः ॥ | |||
अनादिकालादाधिक्यं सर्वस्माज्जानतो हरेः । | |||
पुनः पुनर्वृद्धिमेति तज्ज्ञानं हि भवे भवे ॥ | |||
येषामाधिक्यविज्ञानं नैव पूर्वं हरेर्भवेत् । | |||
तेषां पश्चाच्च नैव स्यादभिभूतं तु तत् पुनः ॥ | |||
व्यञ्जकाद् व्यक्तिमभ्येति तस्मात् तज्ज्ञानमुत्तमम् ॥ इति च ॥ १२-१३ ॥ | |||
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| Line 1,703: | Line 1,942: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः । | | verse_line1 = यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः । | ||
| verse_lines = यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः ।;अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यथ ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥ | |||
| verse_line2 = अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यथ ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यथ ब्रह्म समश्नुते ॥ १४ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
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| text = अन्तःकरणकामानां त्यागो व्यक्तिश्चिदात्मानाम् । कामानां तु तदा मुक्तो मृतिं नैवाभियास्यति ॥ | | text = अन्तःकरणकामानां त्यागो व्यक्तिश्चिदात्मानाम् । | ||
कामानां तु तदा मुक्तो मृतिं नैवाभियास्यति ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,721: | Line 1,962: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः । | | verse_line1 = यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः । | ||
| verse_lines = यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः ।;अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावदनुशासनम् ॥ १५ ॥ | |||
| verse_line2 = अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावदनुशासनम् ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावदनुशासनम् ॥ १५ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
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| text = मिथ्याज्ञानग्रन्थिभिस्तु नितरां मुच्यते यदा । तदाऽमृतत्वमेवैति तदर्थं चानुशासनम् ॥ १५ ॥ | | text = मिथ्याज्ञानग्रन्थिभिस्तु नितरां मुच्यते यदा । | ||
तदाऽमृतत्वमेवैति तदर्थं चानुशासनम् ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_line1 = शतं चैका च हृदयस्य नाड्य स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । | | verse_line1 = शतं चैका च हृदयस्य नाड्य स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । | ||
| verse_lines = शतं चैका च हृदयस्य नाड्य स्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।;तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वगन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥ | |||
| verse_line2 = तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वगन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वगन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । | | verse_line1 = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । | ||
| verse_lines = अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः ।;तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ॥;तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७ ॥ | |||
| verse_line2 = तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ॥ | | verse_line2 = तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
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| text = शरीरभूतो विष्णोस्तु जीवस्तद्वशगो यतः । अधिष्ठितश्च तेनैव विजानीयात् पृथक् ततः ॥ स्वाख्याच्छरीराज्जीवात् तु प्रवृहेद् विष्णुमव्ययम् ॥ इति च ॥ | | text = शरीरभूतो विष्णोस्तु जीवस्तद्वशगो यतः । | ||
अधिष्ठितश्च तेनैव विजानीयात् पृथक् ततः ॥ | |||
स्वाख्याच्छरीराज्जीवात् तु प्रवृहेद् विष्णुमव्ययम् ॥ इति च ॥ | |||
}} | }} | ||
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| text = देहाङ्गुष्ठमितो देहे जीवाङ्गुष्ठमितो हृदि । जीवस्य स तु विज्ञेयो जीवात् भेदेन मुक्तये ॥ इति च ॥ | | text = देहाङ्गुष्ठमितो देहे जीवाङ्गुष्ठमितो हृदि । | ||
जीवस्य स तु विज्ञेयो जीवात् भेदेन मुक्तये ॥ इति च ॥ | |||
}} | }} | ||
| Line 1,790: | Line 2,038: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = मृत्युप्रोक्तां नाचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् । | | verse_line1 = मृत्युप्रोक्तां नाचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् । | ||
| verse_lines = मृत्युप्रोक्तां नाचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ।;ब्रह्म प्राप्तो विरजोऽभूद् विमृत्युः अन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥ | |||
| verse_line2 = ब्रह्म प्राप्तो विरजोऽभूद् विमृत्युः अन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = ब्रह्म प्राप्तो विरजोऽभूद् विमृत्युः अन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥ | ||
| commentary1 = katha | | commentary1 = katha | ||
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| verse_id = KKN_C02_S03_V18 | | verse_id = KKN_C02_S03_V18 | ||
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| text = अतः सर्वोत्तमो विष्णुरिति सिद्धम् ॥ नमो भगवते तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे । यस्याहमाप्त आप्तेभ्यो यो म आप्ततमः सदा ॥ | | text = अतः सर्वोत्तमो विष्णुरिति सिद्धम् ॥ | ||
नमो भगवते तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे । | |||
यस्याहमाप्त आप्तेभ्यो यो म आप्ततमः सदा ॥ | |||
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Revision as of 20:41, 16 June 2026
प्रथमोध्यायः
प्रथमावल्ली
यश्चयीत स तु प्राप्य स्वर्गं तत्र भयातिगः ॥ उष्य मन्वन्तरं कालममृतत्वं भजेत् क्रमात् ॥ इति ब्रह्मसारे ॥ इच्छन् वाजश्रवो नप्ता ददौ सर्वस्वदक्षिणाम् । उद्दालकः स्वर्गलोकं ददौ गाश्च निरिन्द्रियाः ॥ मां दत्वापि न ते गावो दातव्या ईदृशा इति ।
उवाच पुत्रस्तं बालस्तं शशाप पिता स्वयम् ॥
पत्न्या सम्पूज्यमानोऽपि जग्राहार्घ्यादिकं न तु ॥
आगते तु यमे प्राह यमं सोदकमाहर ॥ ४-६ ॥
देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते ॥ एतद्वै तत् इति परिहाराच्च मुक्ते स्थितो भगवान् पृच्छ्यते इति सिद्धम् ।
देहाद्विशेषेण मोचनं नाम मुक्तिरेव । मुक्तेरपि मरणात्मकत्वात् मरणमित्यपि भवति । स्थूलदेहपरित्यागस्तु विस्रंसमानस्येत्यनेनैवोक्तो भवति ।अजानतस्तु मुक्तौ च जीवान्तःस्थितमीश्वरम् ॥ नियामकं च जीवानां मुक्तानामपि सर्वदा । गुणान् सर्वोत्तमत्वादीनविज्ञाय हरेस्तथा ॥ नैव मुक्तिर्भवेत् तस्मात् कृच्छ्रात् तदवदद्यमः । तस्य गोप्यत्वविज्ञप्त्यै तथाप्यग्निस्थवेदनात् ॥
सुखाधिक्यं भवेन्मुक्तौ तस्मात् तत्पृथगीरितम् ॥ इति तत्त्वसारे ।
द्वितीयावल्ली
अभयं तितीर्षतां पारम् । तादृगेव भवति ।
इत्यादौ सर्वत्र भेदस्यैवोक्तेश्च न जीवाभेदः ।
न कुतश्चिद्यतो विष्णुर्जायतेऽतस्तदीक्षणात् ॥ भावाभावौ न विदुषो यस्माज्जीवो न कश्चन । जायते म्रियते वापि स्वरूपेण कथञ्चन ॥
अजो नित्योऽविकारश्च जीवः पुरमणन्नपि ॥ इति च ।
तृतीयावल्ली
स विष्णुः परमे वायौ परेभ्योऽप्यृद्धरूपके ॥ शुभान् पिबति भोगान् स च्छायेव विदुषां प्रभुः ।
आतपः पापिनां नित्यं ... ... ।
सोमवित्तपसूर्याप्पा अश्व्ग्नीन्द्रेन्द्रसूनवः ॥ यमो दक्षश्चेन्द्रियेशास्सुपर्णी वारुणी तथा । उमेति चार्थमानिन्यस्तिस्रो द्विर्द्व्येकदेवताः ॥ मनोभिमानिनो रुद्रवीन्द्रशेषास्त्रयोऽपि तु । ते श्रेष्ठा अर्थमानिभ्यस्तेभ्यो बुद्धिः सरस्वती ॥ तस्या ब्रह्मा महानात्मा ततोऽव्यक्ताभिधा रमा । तस्यास्तु पुरुषो विष्णुः पूर्णत्वान्नैव तत्समः ॥
कश्चित् कुतश्चिच्छ्रेष्ठस्तु नास्तीति किमु सा कथा॥ १०-१२ ॥
शिवादीन् ब्रह्मवाय्वोस्तु नियच्छेन्महदात्मनोः ॥ तौ रमायां परानन्दे तां विष्णौ परमात्मनि । तद्वशत्वेन तद्ध्यानं नियमो नाम नापरः ॥ कुतस्तु मानुषो देवान्नियच्छेद्विनियामकान् ॥ इति च ॥
स्वभार्यायाः परत्वं सिद्धमिति महतः परमित्येवोक्तम् ॥ १३ ॥
द्वितीयाध्यायः
प्रथमावल्ली
पूर्वं यो जनयामास पूर्वजातं चतुर्मुखम् ॥ स्वात्मानं च गुहासंस्थं सर्वभूतैः सहाभिभूः ।
यः पश्यति सदा विष्णुस्स एष हृदि संस्थितः ॥ इति च ॥
उत्तमो देवताभ्यश्च सोत्मानं विविधात्मना ॥ मत्स्यकूर्मादिरूपेण गुहासंस्थमजीजनत् ।
भूतैस्सह महाविष्णुः परमात्मा युगे युगे ॥ इति च ।
सुभृतः स्तूयते नित्यं जानद्भिः पुरुषोत्तमः ॥ इति च ।
अर्यते ण आभ्यामित्यरणी ॥ ८ ॥
स एव मूलरूपश्च साक्षान्नारायणाभिधः ॥ मूलरूपश्च यो विष्णुः प्रादुर्भावादिगश्च यः । गुणतस्स्वरूपतो वापि विशेषं योऽत्र पश्यति ॥ अत्यल्पमपि मृत्वा स तमोऽन्धं यात्यसंशयम् ।
भेदाभेदविदश्चात्र तमो यान्ति न संशयः ॥ १० ॥
क्रियाणां तेन चैतेषां भेदविच्चोभयं विदः ॥
यान्त्येवान्धन्तमो नात्र कार्या काचिद्विचारणा ॥ इति च ।
मुक्तो वायुश्च सादृश्यमेवं विष्णोस्तु गच्छति ॥ न तु तद्रूपतां याति किम्वन्ये देवमानुषाः ।
आभासाभासरूपास्तु वायोर्देवस्य सर्वशः ॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ १५ ॥
द्वितीयावल्ली
हंस इत्युच्यते तस्माद्वायुस्थश्शुचिषत्स्मृतः ॥ वरसुर्वसुरित्युक्तस्स एवाप्यन्तरिक्षगः । होता सर्वेन्द्रियादिस्थो वेद्यां पूज्यश्च वेदिषत् ॥ अत्यन्नश्चातिथिः प्रोक्तो यस्मादन्नं थमुच्यते । स द्रोणकलशे सोमे स्थित उक्तो दुरोणसत् ॥ नृषु स्थितश्च देवेषु वरेष्वपि स एव तु । ऋतरूपे तथा वेदे व्योमाख्यप्रकृतावपि ॥ व्योतं जगदिदं यस्यां सा व्योम श्रीरुदाहृता । अब्जगोजाद्रिजेष्वेवमास्ते सोऽब्जादिकस्ततः ॥ तथैवर्तेषु मुक्तेषु गतास्ते विष्णुमित्यृताः । वेदैर्मुख्यतया प्रोक्तः ऋतमित्येव चोच्यते ॥
बृहत्पूर्णगुणत्वाच्च स एव पुरुषोत्तमः ॥ २ ॥
पाकादिकर्ताऽथाप्यस्य देवस्य प्रतिरूपकाः ॥
रूपं रूपं प्रति ह्येते सन्त्यचेतनवह्नयः ॥ ६९ ॥
रूपं रूपं तथाऽप्यस्य प्रत्यभूत् प्रतिरूपकः ॥ अचेतनः स्पर्शगम्यो योऽयमेवं जनार्दनः । एकस्स्वतन्त्रो नान्योऽस्ति सर्वजीवान्तरस्थितः ॥ रूपं रूपं प्रति ह्यस्य प्रतिबिम्बाश्च चेतनाः । बाह्याश्च ते ततो नास्य स्वरूपं ते कथञ्चन ॥
अनादिप्रतिबिम्बाश्च बभूवुस्ते ह्यनन्तकाः ॥
बाह्यचक्षुर्गतैर्दोषैरन्तश्चक्षुर्न लिप्यते ॥ अन्तश्चक्षुर्देवता तु बाह्यचक्षुरचेतनम् । एवं बाह्यस्स्वतन्त्रत्वाज्जीवेभ्यः पुरुषोत्तमः ॥
अस्वतन्त्रस्य जीवस्य दुःखैर्नैव हि लिप्यते ॥ ११ ॥
ब्रह्मादीनां च मुक्तानां सुखं विष्णुसुखस्य तु । प्रतिबिम्बस्तु विप्लुट्को विष्णोरेव परं सुखम् ॥ सम्यग् भाति न भातीति जानीयां तत्कथं न्वहम् ।
तत्प्रसादमृते दिव्यमनिर्देश्यं परं सुखम् ॥ इति च महावराहे ॥ १४ ॥
तृतीयावल्ली
वृक्षमूलं रमादेवी सोऽश्व आशुगतेर्हरिः । तद्व्याप्तत्वात् तदन्नत्वादश्वत्थोऽयं प्रकीर्तितः ॥ प्रवाहतस्त्वनादिश्च मुख्यतस्त्वमृतो हरिः ।
मुख्यामृतस्स एवैको जगन्नित्यं प्रवाहतः ॥
आदर्शे मुखवत् सम्यङ् न तथा पितृलोकगः ॥ ततः किञ्चित् स्पष्टतया गान्धर्वे दृश्यते हरिः । अत्यातपे न छायायां यथैवाहनि दृश्यते ॥
स्पष्टं तथा ब्रह्मलोके दृश्यते पुरुषोत्तमः ॥ इति च ॥ ३-५ ॥
प्रादुर्भावानपि यदा ज्ञानदृष्ट्यैव पश्यति ॥
तदैव मुच्यते योगी न दुष्टैरिन्द्रियैः क्वचित् ॥ इति च ॥ ९ ॥
अस्तीति नामकस्तस्माज्ज्ञातव्यस्स तथैव च ॥ अनाधिक्यं जानतां तु कथं स उपलभ्यते । प्रकृतेः पुरुषाणां च तत्त्वं भावयति स्फुटम् ॥ तत्त्वभावस्ततो विष्णुस्तत्प्रसादात् तु तस्य हि । आधिक्यं ज्ञायते सत्तः प्रसादश्च तथाविदः ॥ अनादिकालादाधिक्यं सर्वस्माज्जानतो हरेः । पुनः पुनर्वृद्धिमेति तज्ज्ञानं हि भवे भवे ॥ येषामाधिक्यविज्ञानं नैव पूर्वं हरेर्भवेत् । तेषां पश्चाच्च नैव स्यादभिभूतं तु तत् पुनः ॥
व्यञ्जकाद् व्यक्तिमभ्येति तस्मात् तज्ज्ञानमुत्तमम् ॥ इति च ॥ १२-१३ ॥
अधिष्ठितश्च तेनैव विजानीयात् पृथक् ततः ॥
स्वाख्याच्छरीराज्जीवात् तु प्रवृहेद् विष्णुमव्ययम् ॥ इति च ॥
नमो भगवते तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ।
यस्याहमाप्त आप्तेभ्यो यो म आप्ततमः सदा ॥