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| "text": "ओमितिनामकमक्षरं सर्वसन्निहितत्वादेतत् । उच्चत्वाद् गीतत्वात् सर्वस्थानत्वाच्चोद्गीथं भगवन्तमुपासीत । उक्तं च महासंहितायाम्–",
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| "text": "एषां भूतानां पृथिवी रसः। पृथिव्या आपो रसः। अपामोषधयो रसः। ओषधीनां पुरुषो रसः। पुरुषस्य वाग्रसो। वाच (ऋक् रसः)ऋग्रसः। ऋचः साम रसः। साम्न उद्गीथो रसः। स एष रसानां रसतमः परमः परार्ध्योऽष्टमो य उद्गीथः ॥ २ ॥",
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| "tail": "अस्मादसावुच्च इति क्रमस्यान्तगतं हरिम् ॥"
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| |
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| "text": "एकमेव तु ये विद्युस्ते ह्येकान्तिन ईरिताः ।",
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| "tail": "एवं यथाक्रमज्ञाश्च सदैकान्तपरायणाः ॥"
| |
| }
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| |
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| {
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| "text": "प्रविशन्ति परं देवं नारायणमनामयम् ।",
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| "tail": "उच्चक्रमान्तगत्वेन कुर्युः पूजां हरेः सदा ॥"
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| "text": "लक्ष्म्यादेः क्रमशः पूजां ज्ञात्वा भागवता इति ।",
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| {
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| "tail": "स्वतन्त्रपूज्यताबुद्ध्या न दद्युः किञ्च कस्यचित् ॥"
| |
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| |
| },
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| {
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| "text": "ब्रह्माद्या मनुसंज्ञा ये वर्णत्वेनोदिताः(उदितान् .हृ) श्रुतौ ।",
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| "tail": "मानवाख्याश्च मुनयस्तान् यजन्ति न चेतरान् ॥"
| |
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| |
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| |
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| "text": "देवसंज्ञाश्च दीनत्वात् पूजयेयुर्न तान् क्वचित् ।",
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| "tail": "यद् भागवतबुद्ध्यैव दत्तं ब्रह्मादयः सुराः ॥"
| |
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| |
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| "text": "वैदिकाः प्रतिगृह्णीयुरपभ्रष्टास्तथेतरत् ।",
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| |
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| {
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| "text": "अच्छिद्रत्वाच्च नियतो मोक्षोन्यत्तु विडम्बनम् ।",
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| |
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| |
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| |
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| "text": "अस्मिन्सुनिष्ठितो नित्यं मोक्ष्येवान्योज्झकोऽपि सन् ।",
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| "tail": "अतस्तेषां क्रमं वक्ष्ये देवानां यः श्रुतौ श्रुतः ॥"
| |
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| |
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| "text": "पृथिवी सर्वभूतेभ्यः सदा सर्वगुणैर्वरा । ",
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| "tail": "रसः सारो वरश्चेति शब्दा एकार्थवाचकाः ॥"
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| |
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| "text": "पृथिव्या वरुणः श्रेष्ठस्तस्माद् ओषधिदेवता ।",
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| |
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| "text": "तस्मात् सरस्वती वाग्घि श्रेष्ठाऽस्या ऋक्स्वरूपिणी ।",
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| |
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| |
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| |
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| |
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| |
| {
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| "text": "अतिशयं परमर्धिगुणः परमः परार्ध्यः । उत्तमेभ्योऽप्यतिपरमोत्तमोत्तमो रसानां रसतमः परमः परार्ध्यः । रसानां सकाशादपि परमपरार्ध्यरसतम(परमः परमर्द्धरसतमः) इत्यर्थः । प्राणादीनां भूतादिभ्यः श्रेष्ठत्ववद् अस्य श्रेष्ठत्वं न भवति; किन्तु? महान् विशेष इति ज्ञापयितुं ‘रसानां रसतम’ इत्यादि बहुविशेषणम् ।",
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| "text": "भूतेभ्यः पृथिव्या रसत्वम्, तेभ्यो वरुणस्य रसतरत्वम्, सोमस्य रसतमत्वम्, रुद्रस्य परमरसतमत्वम्, वाचः परमर्द्धरसतमत्वम्, प्राणस्य परमपरार्धरसतमत्वम्, अयं तु भगवान् प्राणादपि परमपरार्द्धरसतममात्रो न भवति; किन्तु? प्राणस्यापि रसभूताया रमाया अपि परमपरार्ध्यरसतमः । ‘अस्मादप्यतिशयेन परम्’ इत्यसंख्यागोचरत्वेन परार्द्धेन ज्ञेयं हि परार्ध्यम् । ऋग्रूपाया वाचः पृथक्परत्वाङ्गीकारेऽपि भूतेभ्यः प्राणस्य परमपरार्धरसतमत्वमेव; न तु परमपरार्द्ध्य(र्धि)रसतमत्वम् । परस्माद्(दपि) आ समन्तादृद्धं हि परार्द्धम् (तेन उत्तमत्वेन ज्ञेयं परार्धि)। तेनासङ्ख्यागोचरत्वेन ज्ञेयं परार्द्ध्यम् । परार्द्धोत्तमं परार्द्धि । तेनासंख्यागोचरत्वेन ज्ञेयं परार्द्ध्यमित्यतः परार्द्धित्वं श्रियो भवति । श्रियोऽपि परार्द्ध्य भगवान् । अतो रसानां रसतमः परमः परार्द्ध्यः ।",
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| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S01_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t (ऋक्-साम-उद्गीथपदानाम् अर्थकथनम्)\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कतमा कतमर्क् कतमत् कतमत् साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति । वागेवर्क, प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथः ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S01_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S01_V03_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृथिव्याः सोमवरुणयोश्चौषध्यब्देवतात्वेन रुद्रस्य च लिङ्गदेवतात्वेन प्रसिद्धेः ऋगादीनामेव विमर्शः क्रियते-",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": " कतमा कतमर्ग्",
| |
| "tail": " इत्यादिना । तज्ज्ञानस्य विशिष्टफलत्वाच्च । वाचश्च सरस्वतीत्वेन प्रसिद्धेर्वागृचोरैक्याच्च न विमर्शः कृतः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘विशेषात् प्राणसंयुक्ता वाग् ऋगित्यभिधीयते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ऋ गताविति धातोर्हि ऋक्त्वं सर्गाभिमानिनी ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशेषसंयोगहीना यदा सा वै(सैव .हृ) सरस्वती ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदा तस्यावरा सैव प्राणसंयोगिनी मता ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणयोगवियोगाभ्यां सैषैकाऽपि विभिद्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वागेवाक् तच्छ्रुतौ प्रोक्ता प्राणः सामेति कीर्तितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अक्षयाद् रतिरूपत्वाद् अक्षेषु रमणादपि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अक्षरं भगवान् विष्णुरोमित्युच्चत्वहेतुतः(अत्युच्चत्वहेतुतः .हृ) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इतिशब्दोऽन्यथाभावनिवृत्त्यर्थ उदाहृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवमत्युच्च एवासौ सर्वदैतद्धृदि स्थितः (स्थितेः) ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उद्गीयमान उद्गीथो भगवान् पुरुषोत्तमः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S01_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t (विष्णुः सरस्वतीचतुर्मुखब्रह्मभ्यामुत्तमः)\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्च ऋक् च साम च तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S01_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य काममापयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S01_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t (ओङ्कारार्थः गुनपूर्णो हरिः)\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्वा एतदनुज्ञाक्षरम् । यद्धि किञ्चानुजानात्योमित्येव तदा हैष उ एव समृद्धिर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S01_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S01_V06_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादोमित्यनुज्ञानं कुवर्न्त्येते जनाः सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "त्वदुक्तं तत् तथा कुर्याद् भगवानेव केशवः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्यभिप्रायतः शब्दः प्रवृत्तः स पुरातनैः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " तदेतदज्ञैस्तु जनैः स्वानुज्ञेति प्रदीयते(प्रतीयते) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओमित्ययं पूर्णवाची समृद्धिर्ह्योमितीरिता।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "समृद्धस्ते हि कामोऽयमित्यनुज्ञाऽथवा भवेत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतः समृद्धिवाची स्याद्धरेरोंशब्द ईरितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इति वा दीयतेऽनुज्ञा हरिस्तव समृद्धिदः ॥ ६॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वाक्प्राणौ दम्पती चापि संसृज्येते जनार्दने ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मुक्तौ तु तत्प्रसादेन संसृज्यन्ते ततः परे ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तद्द्वारेणैव साक्षात्तु प्राणः संसृज्यते हरौ ॥ ४॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S01_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते ओमित्याश्रावयत्योमिति शंसत्योमित्युद्गायत्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै महिम्ना रसेन तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S01_V07"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S01_V07_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेनैव विष्णुनेयं च त्रयीविद्या प्रवर्तते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ओमित्युक्त्वा हि तद्व्याख्या सर्वैर्मन्त्रैः प्रवर्तते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओंनामकस्य पूजार्थं विष्णोरेव सदैव हि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "महिम्ना सारभूतेन विष्णुना ज्ञोऽज्ञ एव च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कुरुतः कर्म.............।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S01_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति अथ ह य एवायं (मुख्यप्राणः) मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीत तस्येतरैः प्राणैरुपव्याख्यानं भवति ॥ ८॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति प्रथमाध्याये प्रथमः खण्डः॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S01_V08"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S01_V08_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "...............नाज्ञस्य मुक्तिर्ज्ञस्य भवेत्तु सा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वयोग्यं तु परिज्ञानं यत् तस्योपनिषत् स्मृतम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अक्षरं भगवान् विष्णुस्तस्योप प्रणवः स्मृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपव्याख्या तु तद्व्याख्येत्येवमाह श्रुतिः परा ॥’ इति तार्तीये ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘परर्धं परमादुच्चं परार्धं तु ततोऽधिकम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ततोऽधिकं परार्धिः स्यात् परार्ध्यमिति तत्परम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परतः परमाच्चैव परार्द्धो(परार्द्धि .हृ) वायुरीरितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "परार्धिनी श्रीरुद्दिष्टा परार्ध्यो भगवान् हरिः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इति शब्दनिर्णये ॥ ८॥ १ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S02",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वितीयः खण्डः ",
| |
| "title": "प्रथमाध्याये द्वितीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": " द्वितीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मुख्यप्राणरूपप्रतीके देवकृताध्यात्मभगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S02_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवासुरा ह वै यत्र संयेतिर उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम इति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S02_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S02_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ ह वाचमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तां हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तयोभयं(तेनोभयं) वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S02_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद् विद्धम् ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C01_S02_V05",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतद् विद्धम् ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| |
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| |
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| "text": "अथ ह मन उद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं सङ्कल्पयते सङ्कल्पनीयं चासङ्कल्पनीयं च पाप्मना ह्येतत् विद्धम् ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| }
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| |
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| "text": "अथ ह य एवायं (मुख्यः प्राणः)मुख्यप्राणस्तमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः ऋत्वा विदध्वसुर्यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेतैवम् ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
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| }
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| |
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| |
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| {
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| "text": "स यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसते एवं हैव स विध्वंसते य एवं विदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माऽऽखणः ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मुख्यप्रणस्य महिमा",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C01_S02_V09",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| "text": "नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येषः तेन यदश्नाति यत् पिबति तेनेतरान् प्राणानवत्येतमु एवान्ततो वित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्तत इति ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "देवर्षिभिः मुख्यप्रणे कृताया भगवदुपासनायाःफलनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C01_S02_V10",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तं हाङ्गिरा उद्गीथमुपासाञ्चक्रे एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसस्तेन॥ १० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S02_V11",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "तं ह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते वाग्घि बृहती तस्या एष पतिस्तेन ॥ ११ ॥",
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| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "adhikarana": ""
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| "text": "तं हायास्य उद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद् यदयते तेन ॥ १२ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
| },
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| {
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| "text": "तं ह बको दाल्भ्यो विदाञ्चकार स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः कामानागायति ॥ १३ ॥",
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| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "आगता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥ १४ ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति प्रथमाध्याये द्वितीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C01_S02_V01-22"
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C01_S02_V01-22_B1"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उद्गीथाख्यस्य(उद्गीथाख्यविष्णोः .हृ) विष्णोर्विशिष्टप्रतिमा वायुरेव । अतस्तस्य सर्वोत्तमत्वज्ञानपूर्वकं तस्मिंस्ततोऽप्युत्तमत्वेनोपासित एव भगवान् सम्यक् फलं ददातीति दर्शयति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘वायौ मुख्यधिया इति च’ इति भगवद्वचनम् ।(‘वायौ मुख्यधिया’ इति भगवद्वचनम्)",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यस्माद् वायौ स्मृतो विष्णुर्वायोर्मुख्यतयाऽखिलात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वस्य मुख्यतया तस्मात् परां तुष्टिं गमिष्यति ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतो विचार्य सकलैर्देवैः प्राणे जनार्दनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपासितो दैत्यजयकारणात् पापवर्जिते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायुपुत्रं च नासिक्यम् अग्निं वागात्मकं तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सोमं श्रोत्रात्मकं चैव सूर्यं चक्षुःस्वरूपिणम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रुद्रं मनःस्वरूपं च शेषं चाहंस्वरूपिणम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चित्तात्मकं च गरुडं पापेन विविधुः सुरान् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असुरास्तैर्यतो विद्धास्तस्मात् ते दोषयोगिनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मुख्यवायौ यदा देवाः शरीरस्थे च सूर्यगे ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णुमुद्गीथनामानं तदा तं च विदध्वसुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यदा विदध्वसुः प्राणं विध्वास्तास्ते तदाऽसुराः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अखन्याश्मानमेवाप्य लोष्टो विध्वंसते यथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रतिमां प्रेयसीं प्राप्य विष्णोः प्राणं तथाऽसुराः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद् अादित्यसंस्थे वा शरीरस्थेऽपि वाऽनिले(चानिले) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बलज्ञानात्मके दिव्याकृतिमत्युज्जवलात्मनि ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वदेवोत्तमे(सर्वदेवोत्तमम्) विष्णुम् उपासीत ततोऽधिकम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अस्योपासनया देवास्सर्वे नामानि(सर्वनामानि) भेजिरे ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इन्द्रो बृहस्पतिः शम्भुरित्याद्याः प्राणगा यतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राणस्य नामशब्दाश्च मुख्यतो विष्णुसंस्थिताः॥’ इति प्रध्याने ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘उद्गीथाख्यं परं विष्णुमुपास्त्याऽऽजह्रुरञ्जसा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तथापि प्राण एवासौ प्रीतिमागाद् उपासितः ॥’ इति च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्राणं प्राप्यैव विध्वस्ता यथा सर्वेऽसुरास्तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदुपासकस्य यश्चापि प्रतीपं दातुमिच्छति ॥’ इति च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘एवं(एतं) विदित्वा संसारान्मुक्तिमेष्यत्यसंशयम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णुमप्यन्ततो वेत्ति प्राणवेत्ता यतः स्फुटम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वीति विष्णुः समुद्दिष्टो विशिष्टत्वात्तु सर्वतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आददात्येव तं प्राणवेत्ताऽन्ते तत्प्रसादतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणात् परं तु ये विष्णुं जीवांश्चैवावरांस्ततः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ये विदुस्ते विदुः प्राणं नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्राण उद्गीथ इत्याद्या नाम ब्रह्मादिकास्तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सप्तम्यर्थाः समुद्दिष्टाः सप्तसु प्रथमा यतः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राणमुद्गीथमित्याद्याः द्वितीया सप्तमी मता ॥’ इति च ॥ २ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये द्वितीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S03",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " तृतीयः खण्डः ",
| |
| "title": "प्रथमाध्याये तृतीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": " तृतीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S03_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अथाधिदैवतं मुख्यप्राणे भगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| {
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| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीतोद्यन् वा एष प्रजाभ्य उद्गायत्युद्यंस्तमोभयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S03_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S03_V01_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘आदित्यसंस्थितो नित्यं प्राणस्तपति नापरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रकाशनं च तपनं काष्ठवत् सूर्यगं भवेत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सूर्यमण्डलगो वायुरुदयास्तमयोज्झितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अपि प्रजाभ्य उद्यंश्चैवोद्गायति जनार्दनम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S03_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "शरीस्थप्राणे सूर्यमण्डलस्थप्राणे च भगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयमुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S03_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S03_V02_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदित्यमण्डलस्थश्च सर्वप्राणिगतस्तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वायुः समान एवायमुष्णोऽसावपि च स्फुटम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादस्मिन्नमुष्मिन् वाऽप्युद्गीथाख्यं जनार्दनम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपासीत विमोक्षाय सर्वकामाप्तये तथा ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "केशवः स्वः स्वतन्त्रत्वात् तद्रतेर्मारुतः स्वरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शरीरस्थश्च सूर्यस्थः प्रतिप्रत्या समन्ततः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मां प्रतीत्यत एवासौ प्रत्यास्वर उदाहृतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S03_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "व्याननामके वायौ भगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानोऽथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः सा वाक् तस्मादप्राणन्ननपानन् वाचमभिव्याहरति या वाक् सर्क्(सा ऋक्) तस्मात् अप्राणन्ननपानन् ऋचमभिव्याहरति या ऋक् तत् साम तस्मादप्राणन्ननपानन् साम गायति यत् साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्ननपानन् उद्गायति (अतः) ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S03_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "त्रिविधप्राणदिपञ्चकनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S03_V03_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणाद्यास्त्रिविधाः पञ्च प्रधानो वायुरेव च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुख्यपञ्चकरूपस्सन् गरुडो मध्यपञ्चकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अवमः पञ्चकस्त्वन्ये प्राणाद्यास्तस्य सूनवः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति त्रेधा विभागोऽयं विभागोऽन्यश्चतुर्थकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राणापानौ शेषवीन्द्रौ तथोदानसमानकौ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रुद्रेन्द्रौ तत्परः श्रेष्ठो वायुर्व्यान उदाहृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मिन्नुद्गीथनामानमुपासीत हरिं परम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योऽसौ व्यानगतो विष्णुः स वागृक्सामगः सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उद्गीथे च स एवैकस्तस्माद् व्यानाद्धि तत्क्रियाः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उद्गीथनामा भगवान् स्थितो व्यानादिपञ्चके ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S03_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाऽग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपानन् तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमोवोद्गीथमुपासीत ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S03_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S03_V04_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वीर्यवत् कर्मकृत् तस्माद् व्यान एव ह्युदाहृतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद् व्यानगतं विष्णुमुपासीतैव नित्यशः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यद्यप्येको हि भगवान् सर्वदा सर्ववस्तुगः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनूनोद्रिक्तमहिमो निर्विशेषस्सदैव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तथापि तत्क्रियाभेदान्नामरूपादिकं पृथक् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उच्यते ह्यपृथक्त्वेऽपि पूर्णैश्वर्यैकहेतुतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अविशेषोऽपि भगवान् सर्वशक्तित्वहेतुतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशेषहेतुकं सर्वं करोत्यविकृतः सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S03_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "उद्गीथाक्षरोपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीत उद्-गी-थ इति प्राण एवोत् प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग् गीर्वाचो हि गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदं सर्वं स्थितं द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्थं सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गीर्ऋग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्-गी-थ इति ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S03_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "काम्यसाधकवस्तुषु भगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ खल्वाशीःसमृद्धिरुपसरणानीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन् स्यात् तत्सामोपधावेद् यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतामभिष्टोष्यन् स्यात् तां देवतामुपधावेद् येन च्छन्दसा स्तोष्यन् स्यात् तच्छन्द उपधावेद् येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात् तं स्तोममुपधावेद् यां दिशमभिष्टोष्यन् स्यात् तां दिशमुपधावेदात्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्रमत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृध्येत यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥६॥३॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S01_V28"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S01_V28_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उद्गीथाक्षरगं चैव प्राणादिषु च संस्थितम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आशीःसमृद्धिहेतुष्वप्यखिलेषु व्यवस्थितम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एकमेव हरिं वेद यः स सर्वेष्टमाप्नुयात् ॥ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उच्छब्दवाच्याः प्राणाद्याः वागाद्या गीरितीरिताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्नाद्यास्थमिति प्रोक्तास्तेषूद्गीथो हरिः स्थितः ॥ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "आत्मानं",
| |
| "tail": " परमात्मानम् अन्ततः सर्वोत्तमत्वेन सर्वत्रो"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पसृत्य",
| |
| "tail": " ॥ ३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये तृतीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S04",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "title": "प्रथमाध्याये चतुर्थः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": " चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S04_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत। ओमिति ह्युद्गायति। तस्योपव्याख्यानम् । देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशन्। ते छन्दोभिराच्छादयन्। यदेभिराच्छादयन् तत् छन्दसां छन्दस्त्वम्। तान् उ तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येद् एवं पर्यपश्यद् ऋचि साम्नि यजुषि ते अनु वित्त्वा ऊर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S04_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा वा ऋचमाप्नोति अोमित्येव अति(भि)स्वरति। एेवं साम। एवं यजुः। एष उ स्वरो यदेतदक्षरमम्। एतदमृतमभयम्। तत् प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन्। स य एतदेवं विद्वान् अक्षरं प्रणौति एतदेवाक्षरं स्वरममृतमभयं प्रविशति। तत् प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ २ ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S04_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S01_V29_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स्वरतेस्तु स्वरो विष्णुस्तद्रतेर्वायुरुच्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वायुस्वरे स्वरं विष्णुमोमाख्यं समुपासिरे ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवास्तेनामृतं प्राप्ता मुक्त्याख्यं मृत्युवर्जिताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मारणान्मृत्युरित्युक्ता दुर्गा तद्भयतः सुराः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ओमित्युपास्य तं विष्णुं परमामृतमापिरे ॥ इति सन्ध्याने (सद्ध्याने)।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ऊर्ध्वाः",
| |
| "tail": " उत्तमाः ॥ ४ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये चतुर्थः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S05",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "title": "प्रथमाध्याये पञ्चमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": " पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S05_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "उद्गीथः प्रणवश्च एक एव",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ खलु ‘य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः’ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथः, एष प्रणवः। ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S05_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सूर्यकिरणगतवायौ भगवदुपासनाफलकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतमु एव अहमभ्यागासिषम्। तस्मात् मम त्वमेकोऽसि। इति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच। रश्मीन् त्वं पर्यावर्तयताद् बहवो वै ते भविष्यन्ति। इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S05_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "इन्द्रगतवायौ भगवदुपासनाफलकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथाध्यात्मम्। य एवायं मुख्यप्राणसः तमुद्गीथमुपासीत। ओमिति ह्येष स्वरन् एति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S05_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतमु एवाहमभ्यागासिषं। तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच। प्राणान् त्वं भूमानमभिगायतात् बहवो वै ते भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S05_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अग्निस्थभगवदुपासनया सामगानदोषस्य प्रायश्चित्तनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनुसमाहरतीति ॥ ५ ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S05_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S05_V05_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘आदित्यसंस्थितो वायुः प्रणवस्तद्गतो हरिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रकृष्टत्वाच्च नेतृत्वाद् गतित्वाद् अखिलस्य च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उद्गीथ उच्चैर्गे(र्गी)यत्वात् स एव पुरुषोत्तमः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स एव प्राणगो देह(हे) ओमित्येव सदा जपन् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एत्येष भगवान् विष्णुर्ध्यायन्नेकं तमक्षरम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एकपुत्रो मुक्तिमेति ध्यायन् प्राणेषु रश्मिषु ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बहुपुत्रो विमुक्तः स्यात् तस्माद् ध्यायेत् तथा परम्॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणस्थं भूमानम् अभिगाय, दुरुद्गीतमनुसमाहरति । अनुरूपमेव करोति । होतृसदनस्थमग्निस्थं भगवन्तं ध्यात्वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अन्यथागानजं दोषम् अग्नौ ध्यात्वा हरिं परम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अपाकरोति तस्मात् तं ध्यायेदेवाग्निगं सदा ॥’ इति त्रैविद्ये ॥ ५ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये पञ्चमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S06",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " षष्ठः खण्डः ",
| |
| "title": "प्रथमाध्याये षष्ठः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": " षष्ठः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S06_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सरस्वतीवाय्वोरुपासनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इयमेव ऋक्। अग्निः साम। (तदेतदस्याम् .हृ)तदेतत् एतस्यामृचि अयध्यूढं साम। तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते। इयमेव सा अग्निरमः। तत् साम ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S06_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्तरिक्षमेव ऋक्। वायुः साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। अन्तरिक्षमेव सा। वायुरमः। तत् साम ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S06_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्यौरेव ऋक्। आदित्यः साम तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। द्यौरेव सा। आदित्योऽमः। तत् साम ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S06_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नक्षत्राण्येव ऋक्। चन्द्रमाः साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। नक्षत्राण्येव सा। चन्द्रमा अमः। तत् साम ॥४॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S06_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव ऋक्। अथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव सा। अथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमः। तत् साम ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S06_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S06_V05_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अग्नीरसूर्यनीलेषु वायुः स्थः सामदेवता ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उर्वीवियद्द्युशुक्लेषु ऋग्देवीस्था(ऋग्देवी स्था) सरस्वती ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सेति भार्या हि वाग्देवी प्राणोऽमः पतिरीरितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं तौ सामनामानावुभावेवाप्युदाहृतौ(उभावेतावुदाहृतौ) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतो हि सामवेदोऽयं ऋक्सामात्मक ईरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S06_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सूर्यान्तर्गतप्राणस्थभगवन्महिमा",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुः हिरण्यकेशः आ प्रणखात् सर्व एव सुवर्णः ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S06_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी । तस्य उदिति नाम। स एषः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो उदितः। उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S06_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य ऋक् च साम च गेष्णौ। तस्मादुद्गीथः। तस्मात् त्वेवोद्गाता एतस्य हि गाता। स एष ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकाः तेषां चेष्टे देवकामानां च, इत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S06_V08"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S06_V08_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वागादिष्वेवमेवैतौ वाक्प्राणौ सर्वदा स्थितौ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तयोरन्तःस्थितो विष्णुर्गायको तस्य तावुभौ ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ऋक्सामाभ्यां स उन्नामा पापोद्गश्चोच्च एव च ॥’ इत्यादि सत्तत्त्वे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘कप्यासरक्तपद्माक्षः सूर्यगश्चाक्षिगश्च सः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "गायकस्तस्य विष्णोर्यः स स्वर्ग्यांश्च नृलोकगान् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कामान् दद्यान्नरश्चेत् स्यात् सुराणां च नृणामपि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मोक्षदो यदि वायुः स्यान्मुख्योद्गाता ततोऽनिलः ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादुद्गीथ उच्चोऽसौ गीयते च इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये षष्ठः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S07",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " सप्तमः खण्डः ",
| |
| "title": "प्रथमाध्याये सप्तमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": " सप्तमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S07_V01",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "gadya",
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| "text": "देहगतऋक्साम्नोरुपासना)",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथाध्यात्मं वागेवर्क् प्राणः साम तदेतदेस्यामृच्यध्यूढं साम तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते वागेव सा प्राणोऽमस्तत् साम ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C01_S07_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते चक्षुरेव (साऽत्माऽत्मः .हृ .प्रभ)सा प्राणोऽमस्तत् साम ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C01_S07_V02"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "id": "CHU_C01_S07_V02_B1"
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| "children": [
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| "attrs": {
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| "type": "Moola"
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| "text": "आत्मा",
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| |
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "‘सरस्वती हि चक्षुःस्था जीवस्थो वायुरीरितः(वायुरीश्वरः .हृ) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विदित्वा तावुभौ देवी तद्गं ध्यायेद्धरिं सदा ॥’ इति मानसे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S07_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रोत्रमेवर्ङ्(ऋक्) मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत् साम ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C01_S07_V04",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयतेऽथ यदेवैतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैव साऽथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत् साम ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S07_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अक्षिस्थोद्गीथमहिमा",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते सैवर्क् तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावदमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम ॥ ५ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C01_S07_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S07_V05_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘दृश्यते ज्ञानदृष्ट्या यः सूर्ये चक्षुषि चैकराट् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ऋङ्नामा ज्ञानरूपत्वात् साम नित्यसमत्वतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उक्थमुत्थापकत्वाच्च यजुर्याज्यस्वरूपतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रह्मासौ (गुणपूर्णत्वात्)पूर्णरूपत्वादेवं सर्वाभिधानवान् ॥’ इति च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S07_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां चेति तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात् ते धनसनयः ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S07_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदेतदेवं(य एतदेवं) विद्वान् साम गायत्युभौ साम गायति(उभौ स गायति) सोऽमुनैव स एष ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति देवकामांश्च ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S07_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S07_V09",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "कं ते काममागायानीत्येष ह्येष कामगानस्येष्टे य एवं विद्वान् साम गायति साम गायति ॥ ९ ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S07_V09"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S07_V09_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा बदरिकानाथो द्वारकानाथ इत्यपि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अर्वाङ्नाथः पराङ्नाथ इति तद्वदिहोच्यते ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वनाथोऽपि भगवान् सन्निधानविशेषतः॥’ इति च ॥ ९ ॥ ७ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये सप्तमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S08",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " अष्टमः खण्डः ",
| |
| "title": "प्रथमाध्याये अष्टमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": " अष्टमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S08_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "उद्गीथनामकभगवद्विषये कथा",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः। शिलकः शालावत्यः, चैकितायनो दाल्भ्यः, प्रवाहणो जैबिलिरिति। ते होचुरुद्गीथे ये कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S08_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथेति ते ह(ह ते) समुपविविशुः। स ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाच- भगवन्तावग्रे वदताम्। ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामीति। स ह शिलकः शालावत्यः चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति। पृच्छेति होवाच- का साम्नो गतिरिति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S08_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "शिलककृतप्रश्नानां दाल्भ्याभिहितोत्तराणि",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वर इति होवाच। स्वरस्य का गतिरिति। प्राण इति होवाच। प्राणस्य का गतिरिति। अन्नमिति होवाच। अन्नस्य का गतिरिति। आप इति होवाच। अपां का गतिरिति। असौ लोक इति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S08_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच। स्वर्गं वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। स्वर्गसंस्तावं हि सामेति । तं ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यं (चैकितायनं दाल्भ्यं इति .हृपाठे नास्ति) उवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम। यस्त्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥४॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S08_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "दाल्भ्यकृतप्रश्नानां शिलकाभिहितोत्राणि",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति। अयं लोक इति होवाच। अस्य लोकस्य का गतिरिति। न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच। प्रतिष्ठां वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति । ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "प्रवाहणस्याऽशयः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाच। अन्तवद्वै किल ते शालावत्य साम। यत्स्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति । हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच ॥ ५ ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S08_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S08_V05_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अग्निः सामाभिमानी स्याद् वरुणस्तु स्वरात्मकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राणावराभिमानी तु सूर्य एव प्रकीर्तितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्नाभिमानी दक्षश्च शक्रस्त्वबभिमानवान् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "द्व्यात्मकश्च(द्युवात्मकश्च) शिवः प्रोक्तः क्रमेणैवोत्तरोत्तराः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "क्रमेण मोक्षे प्राप्याश्च पूर्वेषामुत्तरोत्तराः ॥’ इति निवृत्ते ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अग्नेर्वागात्मकत्वात् ।(स्वरस्योदकात्मकत्वात्) उदकात्मकत्वात् स्वरस्य । ‘आदित्य एव प्राणोऽन्नं वै प्रजापतिः’ इति श्रुतेः । ‘आप एवेन्द्रो द्यौर्वाव रुद्रः’ इत्यादेश्च ।",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "कथाया उद्देशः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘विशेषज्ञानसम्प्राप्त्यै जानन्तोऽपि परं हरिम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रूयुर्देवाश्च ऋषयस्तदन्यस्य परात्मताम् ॥’इति ब्रह्मतर्के ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "(स्वर्गाभिमानिनं रुद्रं) स्वर्गाभिमानिरुद्रं प्रति ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सामाभिसंस्थापयामः",
| |
| "tail": " । तत्स्तावकं हि साम । ‘मूर्धा ते विपतेदि’ति यः कश्चिद् ब्रूयाच्चेत् विपतिष्यति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मैव हि पृथिव्यात्मा ....... ...... ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये अष्टमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S09",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " नवमः खण्डः ",
| |
| "title": "प्रथमाध्याये नवमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": " नवमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S09_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "उद्गीथनामकभगवानेव सर्वोत्तमः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणं स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S09_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हरिसर्वोत्तमत्वज्ञानफलम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकान् जयति य एतमेवं(एतदेवं) विद्वान् परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते तं (हैन)हैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रयाजमुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिंल्लोके जीवनं भविष्यति तथामुष्मिंल्लोक इति स य एतमेवं(एतदेवं) विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिंल्लोके जीवनं भविष्यति तथामुष्मिंल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ २ ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S09_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S09_V01_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘........ ..... विष्णुराकाशनामकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आदीप्तत्वाद् वरीयांश्च परमो हरिरेव हि ॥’ इति सत्तत्त्वे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘शुभाशुभानां दाहादौ साम्यात् सामाग्निरीरितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वो विष्णुः सागरे रन्ता वरुणोऽतः स्वरः स्मृतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उदयाज्जगत्प्रणेतृत्वात् सूर्यः प्राण उदाहृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अत्ता रुद्रस्तद्विरोधाद् दक्षः स्यादन्ननामकः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वो विष्णुस्तद्रतिर्वायुस्तद्गो मुक्तौ सदाशिवः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतः स्वर्गोऽसुसंस्थत्वाद् असाविति च कीर्तितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वदेवान्तरत्वात् तु ब्रह्मायं समुदाहृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "लोको ज्ञानस्वरूपत्वादेतेषां परमो हरिः ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आ पालनादाप इन्द्रः ।",
| |
| "tail": " \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अधिकं वरीयान् परोवरीयान् । तत्परोवरीयोऽस्य रक्षकं भवति । यावत्तः द्वापरादिपर्यन्तम् ॥ ८ ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये नवमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S10",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " दशमः खण्डः ",
| |
| "title": "प्रथमाध्याये दशमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": " दशमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S10_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "उषस्तेर्वृत्तान्तः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मटचीहतेषु कुरुष्वाटक्या(आटिक्य) सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास। स हेभ्यं कुल्माषान् खादन्तं बिभिक्षे ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S10_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S10_V01_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘उपला इष्टकाः स्थूला मटचीति प्रकीर्तिताः।’ इति शब्दनिर्णये । ‘आसन्नयौवना योषिद् (आटिकी .हृ)आटकीत्यभिधीयते।’ इति च । ‘प्रद्रवन्नन्नपानार्थं प्रद्राणक इतीरितः।’ इति च ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S10_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं होवाच नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता(ये मे उपनिहिताः) इत्येतेषां मे देहीति होवाच। तानस्मै प्रददौ। हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतं स्यादिति होवाच। न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S10_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वा अजीविष्यमिमान् अखादन्निति होवाच। कामो म उदपानमिति। स ह खादित्वाऽतिशेषान् जायाय आजहार। साऽग्र एव सुभिक्षा बभूव। तान् प्रतिगृह्य निदधौ स ह प्रातः सञ्जिहान उवाच यद् बतान्नस्य लभेमहि। लभेमहि धनमात्रां राजासौ यक्ष्यते। स मा सर्वैरार्त्विज्यैर्वृणीतेति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S10_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति। तान् खादित्वाऽमुं यज्ञं विततमेयाय। तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोप विवेश। स ह प्रस्तोतारमुवाच। प्रस्तोतर्या(तः या) देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या(तः या) देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या(तः या) देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासाञ्चक्रिरे ॥ ४ ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये दशमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S11",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " एकादशः खण्डः ",
| |
| "title": "प्रथमाध्याये एकादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": " एकादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S11_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हैनं यजमान उवाच- भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरार्त्विज्यैः पर्यैशिषं भगवतो वा अहमवित्त्याऽन्यानवृषि भगवांस्त्वेव मे सर्वैरार्त्विज्यैरिति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S11_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथेत्यथ तर्ह्येत एव समतिसृष्टास्तुवन्तां (मदतिसृष्टास्तुवन्तां) यावत्तेभ्यो(यावत्त्वेभ्यो) धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S11_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S11_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S11_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हैनमुद्गातोपससादोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् उद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेत्यादित्य इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यादित्यमुच्चैः सन्तं गायन्ति॥ ५॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S11_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सैषा देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुदगास्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति अथ हैनं प्रतिहर्तोपससाद प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेत्यन्नमिति होवाच । सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्यन्नमेव प्रतिहरमाणानि जीवन्ति सैषा देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यो मूर्धा ते व्यपतिष्यत् तथोक्तस्य मयेति तथोक्तस्य मयेति ॥ ६ ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S11_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S11_V06_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्राणस्थविष्णुना सर्वे प्रसूयन्ते यतस्ततः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रस्तावदेवता स स्यात् प्रस्तावस्तु जनिर्यतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदित्यसंस्थितो विष्णुर्यत्सदा सर्वगीतभुक् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "राजादौ गीतमप्यज्ञैर्भुङ्क्ते गानस्य देवता ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उद्गीथदेवता तस्मात् स एव पुरुषोत्तमः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्नस्थेनैव जीवन्ति भूतान्येतानि विष्णुना ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रतिहारदेवताऽतः स प्रतिहारो हि भोजनम् ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "उच्चैः सन्तम्",
| |
| "tail": " उत्तमं सन्तम् ॥ ११ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये एकादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S12",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वादशः खण्डः ",
| |
| "title": "प्रथमाध्याये द्वादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": " द्वादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S12_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "शौवोद्गीथोपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वव्राज तस्मै (ह) श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S12_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तान् होवाच- इहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाञ्चकार ते ह यथैवेदं बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः संरब्धाः सर्पन्तीत्येवमाससृपुस्ते ह समुपविश्य हिञ्चक्रुरो३मदा३मोम्पिबा३मों देवो वरुणः प्रजापतिः सविता३न्नमिहा३हरदन्नपते३न्नमिहा३हराऽहरोमिति ॥ २ ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S12_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S12_V02_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दल्भपुत्रो ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "बको",
| |
| "tail": " मित्रया पुत्रार्थे स्वीकृतो ग्लाववत्(ग्राववत्) तूष्णीं स्थितत्वात् तया ग्लावेत्युक्तो ग्लावनामको जातः । अत उभयथाऽस्य निर्देशो भवतीत्यर्थः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्रसादार्थं बकस्यापि वायुनोक्तः श्वरूपिणा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शौवोद्गीथ इति प्रोक्तो रुद्रादीनां श्वरूपिणाम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपासितः पौर्णमास्यां शौवोद्गीथेन केशवः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वाभीष्टं ददातीति प्रातरित्याह मारुतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओमदामादिकं मन्त्रं वायुनोक्तं तु देवताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वायुस्थविष्णुमुद्दिश्य हिङ्कृत्य प्रापुरीप्सितम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवौ विष्णुश्च वायुश्च सर्वज्ञत्वात् क्रमेण तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वरुणौ वरणीयत्वात् सवितारौ प्रसूतितः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रजानां च पती तद्वत् क्रमादेव प्रकीर्तितौ ॥’ इति च ॥ १२ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये द्वादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S13",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " त्रयोदशः खण्डः ",
| |
| "title": "प्रथमाध्याये त्रयोदशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": " त्रयोदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S13_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "स्तोभाक्षरेषु देवतोपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अयं वाव लोको हावुकारो वायुर्हायिकारश्चन्द्रमा अथकार आत्मेहकारोऽग्निरीकार आदित्य ऊकारो निहव एकारो विश्वेदेवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिङ्कारः प्राणः स्वरोऽन्नं याया वाग्विराडनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः सञ्चरो हुप्कारो दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवं साम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद इति ॥ १ ॥ १३ ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमोऽध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C01_S01_V71"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C01_S01_V71_B1"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "(हूयते चाग्निहोत्रादि)हूयतेऽत्राग्निहोत्रादिर्हावुकारस्त्वियं (ततः .हृ)यतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "हेत्याश्वर्यवदायाति हेति वा सुखकृत्त्वतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हायिकारस्ततो वायुरथेत्युक्तमनन्तरम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आनन्तर्यात् प्रकाशस्य सूर्याच्चन्द्रस्तथेरितः(सूर्याश्चन्द्रस्त्वथेरितः) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वसामीप्यतो विष्णुरिहेति कथितः सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इन्धनादग्निरीकार ऊकारस्सूर्य उष्टितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नितरामाह्वयन्त्येनमितीन्द्रो निहवः स्मृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एतीत्येकार एवासौ औहोयीत्यखिलाः सुराः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उच्चत्वाद्विष्णुरुः प्रोक्तो हूयन्तेऽस्मिन् यतोऽखिलाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मुक्तावौहोयिनस्तस्मात् सर्वे देवाः(सर्वदेवाः) प्रकीर्तिताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हीति निश्चय उद्दिष्टो निश्चयज्ञानतस्सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रह्मा हिङ्कार इत्युक्तो, वायुः "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "प्राणः",
| |
| "tail": " शरीरगः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वे विष्णौ रमयत्येनं जीवं तस्मात् स्वरः स्मृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ययिर्नित्यगतेर्वायुस्तद्गायाया सरस्वती ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सैवान्नदेवता प्रोक्ता यात्रा(याऽत्त्रा) प्राणेन नीयते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्ववागात्मिका या तु श्रीर्विशेषेण राजनात् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विराडुक्ता निरुक्तस्तु व्याप्तो नारायणस्तु यः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आहूत एव पातीति हुप्कार इति कीर्तितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हुबित्याक्रियते यस्माद् हुप्कारस्तु जनार्दनः(हुप्कारस्तज्जनार्दनः .हृ) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनिरुक्तस्त्ववाच्यत्वात् परमः पुरुषो हरिः॥’ इति माहात्म्ये ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सम्यक् चरतीति स एव सञ्चरः ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमाध्याये त्रयोदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमच्छन्दोग्योपनिषद्भाष्ये प्रथमोऽध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "chapter",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02",
| |
| "type": "adhyaya",
| |
| "name": "द्वितीयोऽध्यायः"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "chapter-heading",
| |
| "text": "द्वितीयोऽध्यायः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S01",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " प्रथमः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये प्रथमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": " प्रथमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "साधुसाधुपदयोः समानार्थकत्वम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S01_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओं समस्तस्य खलु साम्न उपासनं साधु यत् खलु साधु तत् सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S01_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S01_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S01_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एतदेवंविद्वान् साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥ ४ ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S01_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S01_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "समस्तस्य",
| |
| "tail": " पूर्णस्य साधुत्वात् सामनाम्नो विष्णोः "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "उपासनं साधु",
| |
| "tail": " । सारत्वेन मेयं "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "साम",
| |
| "tail": " । सारत्वेन धार्यं साध्वित्येक एवार्थः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘साधुत्वात् सामनामानं समस्तगुणपूर्तितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "समस्तं य उपासीत नारायणमनामयम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वसाम्नां(सर्वनाम्नां) देवतेति स मुक्तः साधुधर्मभाग् ॥ इति सामसंहितायाम् ॥ १ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये प्रथमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S02",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वितीयः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये द्वितीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वितीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "लोकेषु भगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S02_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत पृथिवी हिङ्कारोऽग्निः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथ आदित्यः प्रतिहारो द्यौर्निधनमित्यूर्ध्वेषु ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S02_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथावृत्तेषु द्यौर्हिङ्कार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम् ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S02_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वांल्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ३ ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S02_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S02_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘नारायणाख्य उद्गीथ उद्गेयः प्रणवेन यत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उद्गच्छन्ति यतोऽस्माद्वा वासुदेवादिमूर्तयः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रथमावताररूपत्वाद् वासुदेवः परः पुमान् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रस्तावो निधनं चापि सङ्कर्षण उदाहृतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सङ्कर्षणो हि संहर्ता प्रद्युम्नः परमेश्वरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "हिङ्कार इति सम्प्रोक्तो हीति सृष्टिरुदीर्यते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रसिद्धता हि सृष्टिः स्याद् अनिरुद्धः परो विभुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रतिहार इति प्रोक्तः स हि कार्येष्विदं जगत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रतिप्रति हरेन्नित्यं मूर्तिप्रतिहृतेस्तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ते पृथिव्यादिषु सदा तन्नामानः प्रतिष्ठिताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृथिवीत्यादिशब्दार्थास्ते हि मुख्यत ईरिताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्सम्बन्धात् तदर्थत्वं पृथिव्यादेरमुख्यतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रथनादेव सस्यादेः पृथिवीत्वमुदाहृतम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अग्नित्वमदनाच्चैव ह्यन्तरीक्षणयोगतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभावाद्व्यवधानस्य त्वन्तरिक्षमितीर्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आदानादायुषश्चैव(आयुषां चैव) स आदित्य उदीरितः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "द्यौः क्रीडाकारणत्वाच्च तत्सर्वं हि परे हरौ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘पञ्चात्मकं यो लोकेषु सदोपास्ते हरिं परम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ऊर्ध्वाधःसंस्थितास्तस्य पञ्चैव दश मूर्तयः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " मोक्षादिकमभीष्टं यत्कल्पन्तेऽस्य सदैव हि ॥ इति च ॥ २ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये द्वितीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S03",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " तृतीयः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये तृतीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "तृतीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S03_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वृष्टौ भगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वृष्टौ पञ्चविधं सामोपासीत । पुरोवातो हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S03_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान् वृष्टौ पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S03_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S03_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘पञ्चरूपं तु यो विष्णुं पुरोवातादिषु स्थितम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपास्ते वृष्टिरस्मै स्याद्वर्षयत्यस्य मुक्तिगान् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वभोगांश्च भगवान् पञ्चरूपी जनार्दनः ॥’ इति च ॥ ३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये तृतीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S04",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये चतुर्थः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S04_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अप्सु भगवदुपासनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपासीत । मेघो यत् सम्प्लवते स हिङ्कारो यद् वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S04_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S04_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S04_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अप्सु पञ्चविधोपासी यो नारायणवान् भवेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न चास्य मृतिरप्सु स्याद् अप्सुषद्भगवान् हरिः॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अप्सु स्थितनारायणवान् मुक्तो भवतीत्यर्थः । अपः सूत इत्यप्सूर्भगवान् । दीर्घलोपेनाप्सुमानिति वा ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये चतुर्थः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S05",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये पञ्चमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S05_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "ऋतुषु भगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋतुषु पञ्चविधं सामोपासीत । वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनम् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S05_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान् भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S05_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S05_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हेमन्तशिशिरयोरैक्येन पञ्चत्वम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘ऋतुनामानमृतुगम् (ऋतुत्वात्)ऋतत्वादृतुनामकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इत्युपासीत यो विष्णुं पञ्चात्मानममुष्य हि ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मोक्षादीन् कल्पते चास्य ऋतुसंस्थो जनार्दनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "रक्ष्यत्वात् तेन तद्वांश्च सदैव स्यादुपासकः॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘वासस्य सुखकारित्वात् वसन्तः पुरुषोत्तमः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नीरादेर्गरणाद् ग्रीष्मो वर्षणाद्वर्ष उच्यते ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शं रातीति शरत्प्रोक्तो हेमन्तो हिमकारणात् ॥’ इति च ॥ ५ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये पञ्चमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S06",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " षष्ठः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये षष्ठः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "षष्ठः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S01_V14",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "पशुषु भगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पशुषु पञ्चविधं सामोपासीताजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनं भवन्ति हास्य पशवः पशुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् पशुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S06_V01"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S06_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘पालनात् सुखरूपत्वात्(सुखकारित्वात्) पशुनामा जनार्दनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मुक्तस्तद्वान् भवत्येव पशुषूपासको हरेः ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यज्ञेनाञ्चनहेतुत्वाद्(यज्ञोदजनिहेतुत्वात्) अजस्थो भगवान् अजः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अविस्थस्त्वविरेवोक्त ऊर्णया शीततोऽवनात् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गौश्च सद्गतिहेतुत्वाद् गोस्थः स पुरुषोत्तमः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अश्वश्चैवाऽशुगन्तृत्वात् पुुरुषः पूर्तिहेतुतः॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भवन्ति हास्य पशव इति प्रसिद्धपशव एव । अजा इत्यादिबहुवचनं बहुरूपत्वाद् भगवतः ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये षष्ठः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S07",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " सप्तमः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये सप्तमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "सप्तमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S07_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "इन्द्रियेषु भगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिङ्कारः वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयांसि वा एतानि परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकान् जयति य एतदेवं विद्वान् प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S07_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S07_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘परस्मादुत्तमं प्रोक्तं परो इति ततः परम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "परोवरं परं तस्मात् प्रोक्तं पारोवरीयकम् (परोवरीयकम्)॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परोवरीयांस्येतानि विष्णो रूपाणि सर्वशः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेषां विशेषो नैवास्ति सदा तानि समानि हि ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अत्युत्तमोत्तमान्येतान्यन्यस्मात् सर्वतोऽपि तु ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्राणो नेतृत्वतो विष्णुर्वाक्सर्ववचनात् सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चक्षुश्च दर्शनान्नित्यं श्रोत्रं श्रवणहेतुतः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मनो मन्तृत्वतश्चास्य ह्येक एव तु पञ्चधा ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परोवरीयो ब्रह्मास्य भवति सर्वापेक्षितदातृत्वात् ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये सप्तमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S08",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " अष्टमः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये अष्टमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "अष्टमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S08_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वाक्येषु सप्तविधसामप्रतिपाद्यभगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधं सामोपासीत यत्किञ्च वाचो हुमिति स हिङ्कारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिर्यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतदेवं विद्वान् वाचि सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S08_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S08_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "‘आदिः कल्पादिहेतुत्वात् क्रोडात्मा केशवः स्वयम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दुष्टोपद्रवकर्तृत्वान्नरसिंह उपद्रवः॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘हुङ्कारसहिते वाक्ये प्रद्युम्नस्तु सदा स्थितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आकारयुक्ते वाराहो वासुदेवः प्रसंयुते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नारायणस्तथोद्युक्ते प्रतियुक्तेऽनिरुद्धकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपयुक्ते नृसिंहश्च नीतिसङ्कर्षणस्तथा (नीतिः सङ्कर्षणस्तथा) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभावे यावदेते स्युस्तावत् तद्दैवतं स्मृतम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं सप्तविधं विष्णुं य उपास्ते परं (सदा) विभुम् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वाङ्नामा भगवांस्तस्य भवेत् सर्वार्थदोहकृत् ॥’ इति च ॥ ८ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये अष्टमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S09",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " नवमः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये नवमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "नवमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S09_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "आदित्ये सप्तरूपीभगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपासीत सर्वदा समस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S01_V17"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S09_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘आदित्यस्थं परं विष्णुं ध्यायेदादित्यनामकम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सप्तरूपं साम चासौ सर्वदा समरूपतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वेषां मां प्रतीत्येव दृष्टिसाम्याच्च साम सः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दृष्टिसाम्यं मण्डलस्य विष्णुस्तस्य च कारणम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S09_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात् तस्य यत्पुरोदयात् स हिङ्कारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात् ते हिङ्कुर्वन्ति हिङ्कारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S09_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात् ते प्रस्तुतिकामाः प्रशंसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥३॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S09_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत्सङ्गववेलायां स आदिस्तदस्य वयांस्यन्वायत्तानि तस्मात् तान्यन्तरिक्षेऽनारम्भणान्यादायात्मानं परिपतन्त्यादिभाजीनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S09_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात् ते सत्तमाः प्राजापत्यानामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S09_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात् प्रागपराह्णात् स प्रतिहारस्तदस्य गर्भा अन्वायत्तास्तस्मात् ते प्रतिहृता नावपद्यन्ते प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S01_V23",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदूर्ध्वमपराह्णात् प्रागस्तमयात् स उपद्रवस्तदस्यारण्या अन्वायत्तास्तस्मात् ते पुरुषं दृष्ट्वा कक्षंश्वभ्रमित्युपद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S01_V24",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात् तान्निदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न एवं खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S09_V08"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S09_V08_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मिन्निमानि भूतानि सर्वाण्येवाऽश्रितानि हि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उदयात् पूर्वमेवासौ भवेत् प्रद्युम्ननामकः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पश्वाधारस्तदात्माऽसौ वासुदेवस्तथोदये ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आश्रयश्च नृणां तत्र वराहः सङ्गवे तु सः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्र पक्ष्याश्रयो विष्णुस्तथा नारायणाभिधः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मध्यन्दिने स आधारो देवानां च ततः परम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनिरुद्धस्स आधारो गर्भस्थानां सदैव हि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ततः परं नृसिंहाख्यः स आरण्याश्रयो मतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथास्तमितवेलायां स सङ्कर्षण ईरितः(इतीरितः) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आश्रयः स पितॄणां च सप्तात्मकमुपास्य तम्(सप्तात्मकमुदाहृतम्) ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राप्नोति परमं स्थानं मुक्तः संसारसागरात् ॥’ इति च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हिङ्कारनामानमाश्रितत्वाद्धिङ्कुर्वन्ति । (प्रस्तावाश्रयत्वात्)प्रस्तावाश्रयात् ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "प्रस्तुतिकामाः",
| |
| "tail": "= प्रारम्भकामाः प्रशंसाकामाश्च । प्रारम्भावतारत्वात् प्रशंसादेवतात्वाच्च तस्य ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वाधारत्वाद् वराहस्य तदाधाराणां पक्षिणाम् अनाधारेणैव गमनम् । नारायणनामार्थत्वेन सर्वगुणपूर्त्योपासनात्(उपासनादेव) सर्वोत्तमा देवाः । इतरमूर्तीनामपि सर्वगुणपूर्त्योपासने(उपासनेन) नारायणोपासनमेव भवति । सर्वगुणपूर्त्यर्थत्वान्नारायणशब्दस्य ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " अनिरुद्धाश्रयत्वाद् गर्भाणां पितुः शरीरादन्यत्र प्रतिहृता अपि न विनश्यन्ति । वर्धन्ते च तत्रैव । अन्यद्धि भुक्तं जीर्यत एव । ‘धाता गर्भं दधातु ते’(ऋ.सं.१०.१८४.१) इति च श्रुतिः । धाता हि भगवाननिरुद्धः । विष्णुस्त्वष्टा प्रजापतिर्धाता इति च चतुर्मूर्तयो ह्युच्यन्ते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘योनिक्लृप्तिर्वासुदेवाद् रूपं सङ्कर्षणाद्भवेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आसेककर्मा प्रद्युम्नाद् अनिरुद्धाच्च धारणम् ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘व्याप्तेर्विष्णुर्वासुदेवस्त्वष्टा त्वेषाद् द्वितीयकः।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रजापतिः प्रजापातान्निषेकः पातनं ततः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रजापतिस्तु प्रद्युम्नो धाता धारणकर्मतः।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनिरुद्ध इति प्रोक्तः कृष्णरामौ तथाश्विनौ ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘कक्षश्वभ्रे नृसिंहस्य सदाऽवस्थितिकारणात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "द्रवन्ति कक्षश्वभ्राभ्यां तदज्ञानेऽपि रक्षणात् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मृगा भीता यतस्तेषां नृसिंहस्त्वाश्रयः(नृसिंहः स्वाश्रयः .हृ) सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पितॄणामाश्रयो यस्मात् सङ्कर्षण उदाहृतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतस्तान् प्रति पिण्डादीन् निदधत्यज्ञका अपि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्यथा तन्मृतानां तु कुत एवोपतिष्ठति ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न रूपाणां विशेषोऽस्ति गुणतो नामतोऽपि वा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तथाऽपि तत् प्रियं नाम नारायण इति स्म ह ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशेषतः समस्तानां नाम्नां तस्यार्थ एव तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विज्ञायते गुणैः पूर्तिर्नामसाम्यं तदाऽथवा (तदा तथा .हृ) ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘नाम्नो नारायणाख्यस्य गुणैः पूर्तिं हि देवताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " विज्ञायार्थमुपास्यैव सर्वाधिक्यमथापिरे(अवापिरे)॥’ इति च ॥ ९ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये नवमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S10",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " दशमः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये दशमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "दशमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S10_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सप्तविधसामप्रतिपाद्यभगवतो रूपाणि समानि",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपासीत हिङ्कार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S10_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदिरिति द्व्यक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत इहैकं तत्समम् ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S10_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यते(अवशिष्यते) त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S10_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S10_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S10_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यस्यान्यः सदृशो नास्ति स्वरूपाणि समानि च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स आत्मसंमितो विष्णुरतिमृत्युरमृत्युतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रद्युम्नादिस्वरूपेण स विष्णुः सप्तधा स्थितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "समानि तानि सर्वाणि ज्ञानानन्दबलैस्तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानादित्रयवाचीनि त्र्यक्षराण्यपि सर्वशः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "हिङ्कारादीनि नामानि सर्वेषामपि सर्वशः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदिनाम्नः प्रकारस्तु योज्यः स्यात् प्रतिहारतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेन त्र्यक्षरमेव स्यान्नामद्वयमपि प्रभोः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपद्रवे तु वःकारो यद्यपि व्यतिरिच्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नाम नारायणस्यैव सोऽपि क्षीराब्धिशायिनः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्यञ्जनस्वरसर्गैस्तु सोऽपि ज्ञानादिवाचकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "त्रिवर्णत्वात् समः सोऽपि ज्ञानाद्यैः पुरुषोत्तमः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S10_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकविंशत्याऽऽदित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S10_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S10_V05_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वःकारार्थपरिज्ञानात् प्राप्योऽब्धिशयनः प्रभुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एकविंशार्णविज्ञानात् प्राप्योऽसौ सूर्यमण्डले ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हिङ्काराद्यक्षरप्रतिपाद्यानि भगवतो द्वाविंशद्रूपाणि",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव भगवान् विष्णुर्द्वाविंशद्रूपवान् यतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तान्येव सप्तरूपाणि विभिद्यन्ते त्रिधा त्रिधा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकः पयोऽब्धिशयन इति द्वाविंशतिः प्रभोः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रद्युम्नाद्यास्तु चत्वारो द्विषण्मासेषु संस्थिताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्रिशस्त्रिशः केशवाद्या वसन्तादिषु पञ्चमः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "रूपद्वयं च(तु) षष्ठस्य स्थितं मत्स्यादिपञ्चकम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तृतीयं पृथिवीसंस्थं जामदग्न्याख्यमेव तत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्तरिक्षद्युसूर्येषु सप्तमस्य(सत्यमस्य) त्रिधा तनुः(त्रिधात्मनः) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रामः कृष्णः कल्किरिति तज्ज्ञानात् तान्यवाप्य च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "द्वाविंशेन पयोब्धिस्थं प्राप्यते रूपमक्षरम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतद् द्वाविंशकं रूपं नाकं चासुखवर्जनात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पूर्णानन्दस्वरूपत्वाद् विशोकं शोकनाशनात् ॥’ इति सामसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S10_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आप्नोतीहादित्यस्य जयं परो हास्याऽदित्यजयाज्जयो भवति (स) य एतदेवं विद्वानात्मसम्मितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S10_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S10_V06_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "(आप्नोतीह)",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "प्राप्नोतीहाऽदित्यस्य जयम्",
| |
| "tail": " । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "इह",
| |
| "tail": " पृथिव्यादिषु स्थितभगवत्प्राप्तावप्यादित्यस्थ एव प्राप्यते । ऐक्यात् । परो "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "हास्यादित्यजयाज्जयो भवति ",
| |
| "tail": "। आदित्यस्थस्यादित्यनाम्नो भगवतः प्राप्त्या "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "परो जयः",
| |
| "tail": " रूपान्तर प्राप्तिरपि भवति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स्वरूपमेकं प्राप्तस्तु विष्णोः स्यात् सर्वरूपगः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ऐक्यात् तथापि सम्प्राप्तिर्बहूपास्त्या सुखाधिका(सुखाधिकी) ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जयो नाम प्राप्तिरेव । ‘धनजिते स्वर्जिते सत्राजिते’ इत्यादिवत् । केशवादिरूपेण ललाटादिषु स्थितेरित एकविंश इत्युच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘चित्रादियोगदातृत्वान्मासनामा स्वयं हरिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "लोकः प्रकाशरूपत्वाद् आदित्यश्चादनादपाम्॥’ इति च ॥ १० ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये दशमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S11",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " एकादशः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये एकादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "एकादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S11_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "गायत्रसामप्रतिपाद्यभगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनो हिङ्कारो वाक् प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद् गायत्रं प्राणेषु प्रोतं स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या महामनाः स्यात् तद् व्रतम् ॥ १॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S11_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S11_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्राणसंस्थे हरौ(प्राणसंस्थहरौ) प्रोतं गायत्रं साम सर्वदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तद्वाचकं नियम्यं चेत्यतः प्रोतमितीर्यते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणस्थविष्णोः सामीप्यात् तत्स्थमेतदितीर्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "क्वचिन्निर्देशसामीप्याद् विष्णोरेतदितीर्यते॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्राणस्थविष्णुलाल्यत्वात् (विष्णुलाळ्यत्वात्) प्राणीत्येवाभिधीयते।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मोक्षस्तु सर्वमायुस्तु स्यान्नित्यत्वाज्ज्योक् समस्तवित्॥’ इति च ॥ ११ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये एकादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S12",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वादशः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये द्वादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S12_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "रथन्तरसामप्रतिपाद्यभगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभिमन्थति स हिङ्कारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनं संशाम्यति तन्निधनमेतद् रथन्तमग्नौ प्रोतम् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S11_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एवमेतद् रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न प्रत्यङ्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S01_V32"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S01_V15_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘मन्थनादिस्थितं यस्तु (यत्तु) तन्नामानं हरिं परम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " तत्तत्क्रियैकहेतुत्वाद्योऽग्नौ ध्यायेज्जनार्दनम् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "रथन्तराश्रयं पञ्चरूपं स च विमुच्यते ॥’ इति च ॥ १२ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये द्वादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S13",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " त्रयोदशः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये त्रयोदशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "त्रयोदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S13_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वामदेव्यसामप्रतिपाद्यभगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "उपमन्त्रयते स हिङ्कारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रतिस्त्री(प्रति स्त्रिया) सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद् वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S13_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनीभवति मिथुनान्मिथुनात् प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥१३॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_CO2_S13_V02"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S13_V02_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘मिथुनस्थं पञ्चरूपं’(मिथुनस्थपञ्चरूपं) ध्यात्वैव पुरुषोत्तमम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "अत्यागी च स्वभार्याणां मुच्यते नात्र संशयः ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मिथो नयतीति मिथुनं भगवान् ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये त्रयोदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C02_S14",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्दशः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये चतुर्दशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्दशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S14_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "बृहत्सामप्रतिपाद्यभगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उद्यन् हिङ्कारः उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गीथोऽपराह्णः प्रतिहारोऽस्तं यन्निधनमेतद् बृहदादित्ये प्रोतं स य एवमेतद् बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या तपन्तं न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये चतुर्दशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C02_S15",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " पञ्चदशः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये पञ्चदशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "पञ्चदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S15_V01",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वैरूपसामप्रतिपाद्यभगवदुपासनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभ्राणि सम्प्लवन्ते स हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपांश्च सुरूपांश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये पञ्चदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S16",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " षोडशः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये षोडशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "षोडशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S16_V37",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वैराजसामप्रतिपाद्यभगवदुपासनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतत् वैराजमृतुषु प्रोतं स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ऋतून् न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये षोडशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S17",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " सप्तदशः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये सप्तदशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "सप्तदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S17_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "शक्वरीसामप्रतिपाद्यभगवदुपासनम्",
| |
| "tail": ")\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृथिवी हिङ्कारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकीभवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या लोकान्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये सप्तदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S18",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " अष्टादशः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये अष्टादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "अष्टादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S18_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "रेवतीसामप्रतिपाद्यभगवदुपासनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या पशून्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये अष्टादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S19",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " एकोनविंशः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये एकोनविंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "एकोनविंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S19_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "यज्ञायज्ञीयसामवेद्यभगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "लोम हिङ्कारस्त्वक् प्रस्तावो मांसमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनमेतद् यज्ञायज्ञीयेषु प्रोतं स य एवमेतद् यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गीभवति नाङ्गेन(नाङ्गेषु) विहूर्च्छति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात् तद् व्रतं मज्ज्ञु नाश्नीयादिति वा ॥ १९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये एकोनविंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S19",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " विंशः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये विंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "विंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S20_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "राजनसामप्रतिपाद्यभगवदुपासनम्",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अग्निर्हिङ्कारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानां सलोकतां सार्ष्टितां सायुज्यं गच्छति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ब्राह्मणान् न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ २० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये विंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S21",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " एकविंशः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये एकविंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "एकविंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S21_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "इतरसर्वसामप्रतिपाद्यभगवदुपासनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्रयी विद्या हिङ्कारस्त्रय इमे लोकाः स प्रस्तावोऽग्निर्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयांसि मरीचयः स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत् साम सर्वस्मिन् प्रोतं स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन् प्रोतं वेद सर्वं ह भवति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_CO2_S21_V02",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति । यस्तद् वेद स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति । सर्वमस्मीत्युपासीत तद् व्रतं तद् व्रतम् ॥ २ ॥ २१ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| },
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| {
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| "id": "CHU_CO2_S14-21_V01_B01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "‘आदित्यनाम्नि पञ्चात्मन्यभिध्याते जनार्दने ।",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "पर्जन्यनाम्नि चर्त्वाख्ये लोकाख्ये पशुसञ्ज्ञके ॥"
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "अङ्गाख्ये देवताख्ये च सर्वाख्ये च प्रतिष्ठितम् ।",
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "बृहदाद्यं च यो वेद मुच्यते नात्र संशयः ॥"
| |
| }
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S14-21_V01_B02"
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| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "समुद्रेकात् समुद्रस्तु देशनाद् दिश उच्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "लोपकत्वाल्लोम च स्यात् तवोरूपस्त्वगुच्यते ॥"
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मादनात् साररूपत्वात् मांसोऽस्थि त्वासनात् स्थिरम् ।",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मदस्य जननान्मज्जा सोऽङ्गम् अन्तिगतत्वतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायुर्ज्ञानात् तथाऽऽयुष्ट्वान्नक्षत्रं च स्वतन्त्रतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चन्द्रमाः परमानन्दात् त्रैविद्यो ज्ञानरूपतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वयांसि व्ययनाच्चैव वीत्याकाशस्तथोच्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्रायनाद् वयः प्रोक्तो मरीचिर्मितरुक्त्वतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्पः सर्पणहेतुत्वाद् गन्धर्वो गोधरत्वतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "पिता स सृष्टिहेतुत्वात् सर्वं पूर्णगुणत्वतः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एतैर्नामभिरुद्दिष्टो भगवान् पुरुषोत्तमः ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "‘सर्वं ह भवति’ इति वाक्यस्यैक्यप्रतिपादकत्वाभावकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_CO2_S14-21_V01_B03"
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| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "‘यादृश्येवोन्नतिर्योग्या तस्याः सर्वात्मनाऽऽयतिः ।",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वभावस्तु विज्ञेयो न तु सर्वस्वरूपता ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च सर्वस्वरूपता पुरुषार्थः । नारकित्वादेरपि(नरकित्वादेरपि) प्राप्तेः । न चार्थान्तरकल्पना युक्ता । प्रमाणाभावात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘असनान्मितिरूपत्वाद् अस्मीत्युक्तः परो हरिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तं सर्व इत्युपासीत पूर्णता सर्वता स्मृता ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वमस्मीत्युत्तमपुरुषत्वे ‘तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति’इति ज्यायःपरशब्दौ व्यर्थौ । अन्यस्यैवाभावात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतस्ततोऽन्यदस्तीति सिद्धम् । अतस्ततोऽन्यत् परमज्याय एव नास्ति । ज्यायो लक्ष्मीर्विद्यते । परमज्यायस्तु भगवानेव ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "‘सर्वमस्मि’ इति वाक्यस्यापि ऐक्यपरतानिरासः",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_CO2_S14-21_V01_B04"
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "जीवैक्याङ्गीकारे ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "em",
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| "attrs": {
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| "type": "Moola"
| |
| },
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| "text": "यस्तद्वेद",
| |
| "tail": " इति तच्छब्दोऽप्ययुक्तः । तदा ‘स्वात्मानं वेद’ इत्येव स्यात् । न च प्रसिद्धभेदानुवादः(प्रसिद्धभेदस्यानुवादः .हृ) । श्रुतिं विना तत्स्वरूपस्यैवासिद्धेः, तद्भेदस्यातिशयेनासिद्धिः । ऐक्य ईश्वरस्य स्वज्ञानमस्तीति न तद्रूपस्य जीवस्याज्ञानादिकं युज्यते । औपाधिकभेदाङ्गीकारेऽप्युपाधिरुभयोरैक्याद् उभयोरप्यज्ञत्वं कुर्यात् । उपाधिनिमित्तदोषाश्चोभयोरपि स्युः । उपाधिसम्बन्धस्य समत्वात् । उपाधिसम्बन्धस्यास्मिन्नन्यथा तस्मिन्नन्यथेति विशेषार्थम् अयम् असाविति भेदस्योपाधिं विना स्वत एवापेक्षितत्वात् । अतः स्वतो भिन्नस्यैवोपाधिना विशेषो भवति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S14-21_V01_B05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्तु भिन्नः स्वतः खादिस्तस्य भेदो ह्यबुद्धिनाम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपाधिभिर्ज्ञाप्य एव न तु भेदं स्वयं सृजेत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपाधिरप्यभिन्नस्य भेदं साधयितुं क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न क्षमः सिद्धभेदस्य ज्ञापकः स्यादबुद्धिनाम् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " आकाशा अप्यतस्त्वेते अनन्ता अप्कणादिवत् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतो न जीवेशाभेदः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘न तु देवः स्वयं भूत्वा देवदेवं समर्चयेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "समानव्यवहारे हि न पूज्यः पूजको भवेत् ॥’ इति च परमसंहितायाम् ।(इति परमसंहितायाम्)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S14-21_V01_B06"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "जीवब्रह्मैक्यस्य प्रमाणविरुद्धतोपपादनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यम् अणुप्रमाणात्, प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।’",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अन्यदेव तद् विदिताद् अथो अविदिताद् अधि ।’",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अन्यत्र धर्माद् अन्यत्राधर्माद् अन्यत्रास्मात् कृताकृतात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत् तत् पश्यति तद्वद ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्।’",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।’",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य(अपाश्रित्य) मम साधर्म्यमागताः ।’",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।’",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘आधिपत्यमृते चैव भोगेन विषयेण च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आनन्दादीन् ऋते मुक्ताः सर्वे ते ब्रह्मणः समाः॥’ इत्यादेश्च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S14-21_V01_B07"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सत्यपि अधिष्ठानभेदे भगवद्रूपाणां भेदाभावनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्रद्युम्नादीनि रूपाणि त्रीणि त्रीण्येव पञ्च च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ऋगादिस्थानभेदेन नित्याभिन्नानि चेशनात्॥’ इति सामसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S14-21_V01_B08"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "भेदस्य मिथ्यात्वनिरासः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दृष्टवस्तुनो मिथ्यात्वाङ्गीकारे च युक्त्यपेक्षा ; न तु सत्यत्वे ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘दृष्टस्य सत्यतायां तु युक्तिर्वाऽयुक्तिरेव वा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भूषणं तस्य मिथ्यात्वे युक्त्यभावोऽतिदूषणम् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "युक्तिश्च दोष एव स्याद् बलवन्मानवर्जिता ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च शून्यत्वमिथ्यात्वयोः कश्चिद् विशेषः । तत्प्रमाणाभावात् । अतः सत्य एव भेदः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S14-21_V01_B09"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "भेदसत्यतायाः प्रामाणिकत्वनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च कदाचित् कस्यापि ‘नासीदस्ति भविष्यति’ इति बुद्ध्यभावे व्यावहारिकसत्यम् इत्यत्रास्माकं विरोधः । तद्भावे च न शून्याद् विशेषः । ‘सत्यमेनमनुविश्वे मदन्ति’ इत्यादिश्रुतेश्च सत्यो भेदः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मायामात्रमिदं द्वैतम् अद्वैतं परमार्थतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपदेशादयं वादोऽज्ञाते द्वैतं न विद्यते ॥’(मा.उ. अ.१.ख.२.श्लो.९-१०) इत्यादिश्रुतेश्च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रपञ्चो= भेदो यदि विद्येत= भवेत= उत्पद्येत तर्हि निवर्तेत । अतो न जीवेश्वरादिभेद उत्पद्यते किन्तु? नित्य एव । अतो मायया= भगवत्प्रज्ञानेन(भगवज्ज्ञानेन .हृ) मातं रतं च मात्रम् । भगवान् जानाति रमते चास्मिन् भेद इति । तच्च भगवद्रूपम् अद्वैतम् । परमार्थो भगवान् तद्रूपेणाद्वैतम् । यद् अद्वैतं नामोच्यते तत् परमार्थभगवदपेक्षयेत्यर्थः । स्वगतभेदो भगवति नास्तीत्युक्तम् । न च कल्पनामात्रो भेदः । यदि केनचित् कल्पितो विकल्पस्तथाऽपि निवर्तेत(विनिवर्तेत .हृ) । तस्माद् उपदेशादयमेव वादः । केनापि तत्प्रसादं(तत्प्रसादेन) विनाऽविज्ञातत्वादज्ञातो भगवान् तद्गतो भेदो न विद्यते इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S14-21_V01_B10"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘जीवेश्वरगतो जीवेष्वथ जीवजडात्मनोः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जडेशयोर्जडेष्वेवं पञ्चभेदः प्रपञ्चकः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकृष्टमोक्षहेतुत्वात् तज्ज्ञानं(तज्ज्ञाने .हृ) प्रेति कथ्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रकृष्टपञ्चकत्वाद्वा प्रपञ्चोऽयं प्रकीर्तितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्ययं सादिरेव स्यान्निवर्तेत कदाचन ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न निवर्तते यतस्तेन नायं सादिर्भवेत् क्वचित् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मायेति विष्णुविज्ञानं तन्मितत्वाच्च न क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भ्रान्तत्वमस्य यद्विष्णोर्नैव भ्रान्तिः कदाचन(कथञ्चन)॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रमते चात्र यद्विष्णुर्न हि भ्रान्तौ रमेद्धरिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "परमार्थे हरौ नैव भेदोऽस्ति जडजीववत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्ययं कल्पितो भेदः कस्मान्नैव निवर्तते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्माद् भूतभविष्याख्यभवदाख्यपराभिधाः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदन्ये चैक एवास्मिन्नोङ्काराख्ये जनार्दने ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अज्ञातनामके तस्मिन्न भेदोऽस्ति कथञ्चन ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S14-21_V01_B11"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विदिः(विदि) कादाचित्कस्वरूपलाभ इति च धातुः । ‘भिद्येत’इतिवत् ‘विद्येत’ इतिशब्दः । ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "परमार्थत",
| |
| "tail": " इति ‘विश्वतश्चक्षुः’इतिवत् सप्तम्यर्थे । परमार्थेद्वैतभाव एवेत्यर्थः । ‘परमार्थः=परमात्माऽद्वैत’ इति प्रथमार्थो वा । न हि ‘विद्यमानं निवर्तते’ इति नियमः । उत्पद्यमानं हि प्रायो निवर्तते । जीवेश्वरप्रकृत्यादिकं बहुलं हि विद्यमानं न निवर्तते । न च ‘कल्पितो विकल्प’ इति पक्षे ‘कल्पितो यदि’ इति ‘यदि’शब्दो युज्यते । न च ‘निवर्तेत न संशयः’, ‘विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि’ इत्यादिनाऽनिष्टापादनरूपः शब्दो युज्यते । कल्पितत्वं चेच्छ्रुतेरभिप्रायः, ‘अविद्यमानोऽयं प्रपञ्चो निवर्तते’(विनिवर्तते) ‘कल्पितो विकल्पो विनिवर्तते’ इत्येव शब्दः स्यात् ; न तु ‘निवर्तेत’ इति । अतः सत्यताविषयमिदं वाक्यम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।’(भ.गी.१६.८), ‘एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः॥’(भ.गी.१६.९) इति निन्दनाच्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘विद्यात्मनि भिदाबोधः’, ‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य’ इत्यादिभेदज्ञानस्य प्रशंसनाच्च । अतोऽसनान्मितत्वाच्चास्मीति भगवान्नामैवैतत्॥ २१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये एकविंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C02_S22",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वाविंशः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये द्वाविंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वाविंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S22_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सामगानस्य ध्वनिप्रभेदाः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान् सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S22_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S22_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वदा समत्वात् साम भगवान् । तस्योद्गानप्रकारो ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "विनर्दि",
| |
| "tail": " वृषभस्वरवन्मेघनर्दनवद्वा । तदेव "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "वृणे",
| |
| "tail": " । सर्वोत्तमत्वात् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘विष्णोः स्वरो वृषभवन्मेघनादवदेव वा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्त्रीपशुस्वरवद् वह्नेर्गम्भीरोऽनुपमो विभोः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मणस्त्वथ सोमस्य साक्षाद् घण्टानिनादवत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मृदुमेघस्वरो वायोरिन्द्रस्य स्तनयित्नुवत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बृहस्पतेः क्रोञ्चवच्च वरुणस्य तु विस्वरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एकस्य पादवर्षस्य स्वरो विष्णोरुदाहृतः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वायोर्विंशतिवर्षस्य ब्रह्मणस्तु तदन्तरा ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘गायेदेतैः स्वरैस्तस्माद् यथाशक्ति न विस्वरम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S22_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत् स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S22_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S22_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अधिकारी सदौद्गात्रे मुख्यतः प्राण एव यत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतो मोक्षादिदाने स देवादीनां क्षमो भवेत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्येषां स ददातीह मद्धृदिस्थ इति स्मृतिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कार्या हि नान्यथा कुर्यादवमन्ताऽन्यथा भवेत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवानां मोक्षदानादौ न हि मानुष ईश्वरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतः प्राणो हृदिस्थो मे ददातीति स्मृतिर्भवेत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सङ्कल्पोक्त्यादिकर्ता च प्राण एव यतः सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आगायानीति युज्येत तस्मात् तस्मिन् हि मुख्यतः॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मेति भगवान् विष्णुः प्राणस्थः पुरुषोत्तमः।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मा अन्नं ह्यर्थतस्तु प्राणस्यान्नभुजिर्भवेत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणस्याप्यमृतत्वं हि मुख्यमेव फलं यतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "देवान्तर्भावतो विष्णोर्नामृतत्वं क्व चादिमत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S22_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सामगानकालीनानुसन्धानकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वे स्वरा इन्द्रस्याऽत्मानः सर्व ऊष्मणः प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं यदि स्वरेषूपालभेतेन्द्रं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S22_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापतिं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिपेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येनं स्पर्शेषूपालभेत मृत्युं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S22_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्वे ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशेनानभिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥ २२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_CO2_S01_V48"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S01_V20_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘इन्द्रे बलं ददानीति स्वरान् घोषबलात्मकान् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रूयादग्रस्तानिरस्तानूष्मणः स्पर्शानपि ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समस्तान् बलदानार्थमिन्द्रे चैव प्रजापतेः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णोः स्वात्मानमेवाहमर्पये मृत्युवर्जितम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मोक्षयोग्यान् करिष्यामीत्येवं स प्राण एव तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कुर्यादन्यस्तु मत्स्थस्तु प्राण एवेदृशक्षमः (एवेदृशः क्षमः) ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "करोतीति स्मरेन्नित्यं नान्यथा तु कथञ्चन ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "देवावमन्ता हि तमो यात्यसंशयतो यतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत इन्द्रं प्रजापाख्यं विष्णुं मृत्युं च सर्वदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शरणं गतोऽहमिति च (इतिवत्) ध्यायेत् सर्वत्र सर्वदा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऐश्वर्यादिन्द्रनामा तु वायुः स्वरपतिः सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ऊष्माधिपस्तु भगवान् विष्णुरेव प्रजापतिः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मृत्युनामा तु संहाराद् रुद्रः स्पर्शाधिपः स्मृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मानुषाणां तु शरणमितरेषां तु वायुतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायोस्तु बलदानाद्यं मोक्षदानादिकं हरेः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यस्माद् वायुपदे योग्या बहवस्त्विन्द्रनामकाः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अत इन्द्रे ददानीति स्मृतिः प्राणस्य युज्यते ॥’ इति सामसंहितायाम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सर्वोपद्रवकर्तॄणामसुराणां कुबुद्धिनाम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपालम्भे कृते युक्तं विष्णुस्त्वां प्रतिपेक्ष्यति ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "रुद्रस्त्वां धक्ष्यतीत्यादि नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मृत्योस्सकाशादात्मानं परिहराणीति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘ब्रह्मा प्रजापतिश्चेति विष्णुरन्यं प्रबोधयन् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तथेन्द्रनामा वायुश्च परेषां बोधको यदा ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बृंहयति प्रजाः पाति इदं रातीति व्युत्पत्तिभिः ॥ २२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये द्वाविंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C02_S23",
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| "type": "khanda",
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| "name": " त्रयोविंशः खण्डः ",
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| "title": "द्वितीयाध्याये त्रयोविंशः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "त्रयोविंशः खण्डः ",
| |
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| |
| },
| |
| {
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| |
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| "children": [
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| {
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| "text": "धर्मब्रह्मज्ञानयोः फलनिरूपणम्",
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| "tail": "\n "
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| {
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "त्रयो धर्मस्कन्धाः यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमः, तप एव द्वितीयो, ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयो, अत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "children": [
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_CO2_S22_V01_B01"
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| |
| "children": [
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| "text": "‘सर्वधर्मैः पुण्यलोको ब्रह्मज्ञानाद्विमुच्यते",
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| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
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| |
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| "children": [
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| "text": "दृष्टान्तपूर्वकं अोंकारस्य सर्ववेदसारत्वकथनम्",
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| |
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| {
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत् तामभ्यतपत् तस्या अभितप्ताया(तप्यमानाया) एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त । भूर्भुवः स्वरिति । तान्यभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् । तद् यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि सन्तृण्णान्येवमेतेनोङ्कारेण सर्वा वाक्सन्तृण्णोङ्कार एवेदं सर्वमोङ्कार एवेदं सर्वम् ॥ २ ॥ २३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "‘ओङ्कारो ब्रह्मणो नाम सर्ववागात्मकश्च सः ।",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "तद्व्याख्यात्वात्(व्याख्यानत्वात्) सर्ववाचां सर्ववागात्मता भवेत् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "सर्वशब्दान्वितत्वाच्च न लिङ्गव्यत्ययो भवेत् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आधिक्यं चैव सर्वत्वं प्रस्तुतं तद् यथेति तत् ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "‘अकाराद्याः क्रमेणैव भूरादेः साररूपिणः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अस्मादयं सार इति ज्ञानमेवाभितापनम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सम्प्रस्रावश्च तद्दृष्टिर्ब्रह्मणः परमस्य हि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "नित्यज्ञानोऽपि भगवान् क्रीडयाऽचीक्लृपद् यदा ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदाभितापशब्दोऽयं वर्तते परमात्मनि ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_CO2_S11_V02_B02"
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| "text": "\n ",
| |
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| {
| |
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| "text": "तपःशब्देनैव यतिधर्मश्चोक्तः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
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| "text": "‘सर्वेषामाश्रमस्थानामज्ञानां पुण्यलोकता ।",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "अपरोक्षदृशां विष्णोरमृतत्वं न चान्यथा ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "‘यज्ञाध्ययनदानैस्तु गृही स्यात् सोमलोकगः ।",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यतयस्तपसा सूर्यं चत्वारोऽपि विशेषतः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "गच्छन्ति तपसैवर्षीन् वनस्था ब्रह्मचारिणः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नैष्ठिका वालखिल्यांश्च गुरुशुश्रुषयैव तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "यदि पश्यन्त्येत एव साक्षादेव जनार्दनम् ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अमृतत्वं तदा यान्ति नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "id": "CHU_CO2_S11_V02_B03"
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "न च संन्यासमात्रेणामृतत्वम् । ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’() इति श्रुतेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘विद्यैव तु निर्धारणात्’(ब्र.सू.३.३.४८) इति च भगवद्वचनम् (इति भगवद्वचनम्) ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘न रोधयति मां धर्मो न साङ्ख्यं योग उद्धव ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा ॥’ इत्यादि च (इति च) ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति’(भ.गी.३.८) इति च । ‘तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति’ इत्यादेर्गृहस्थादीनामपि ज्ञानिनां मोक्षः प्रतीयते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सर्ववर्णाश्रमाणां च ज्ञानान्मोक्षो विनिश्चितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्त्यानां स्थावराणां वा तथापि यतिरुत्तमः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ज्ञानद्वारो यतो न्यासो विशेषेण भविष्यति ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः सन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः।’ इति च ॥ २३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये त्रयोविंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C02_S24",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्विंशः खण्डः ",
| |
| "title": "द्वितीयाध्याये चतुर्विंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्विंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S24_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "स्वर्गमोक्षमार्गे प्राप्तविघ्नपरिहारोपायनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद् वसूनां प्रातःसवनं रुद्राणां माध्यन्दिनं सवनमादित्यानां विश्वेषां देवानां च तृतीयसवनं(तृतीयं सवनं) क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात् कथं कुर्यादथ विद्वान् कुर्यात् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S24_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वसुस्थभगवद्रूपप्रार्थना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरा प्रातरनुवाकस्योपकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्योदङ्मुख उपविश्य स वासवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं रा ३३३३३ हु३म् आ३३ ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानास्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै वसवः प्रातःसवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ २ ॥ २४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S24_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
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| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "रुद्रस्थभगवद्रूपप्रार्थना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योददङ्मुख उपविश्य स रौद्रं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं विरा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्मत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यन्दिनं सवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S24_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यं स वैश्वदेवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं ं स्वारा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यादित्यमथ वैश्वदेवं लो३कद्वारमपा३वा३वार्णू३३ पश्येम त्वा वयं साम्ना ३३३३ हू आ ३म् ३३ ज्या ३यो ३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दतैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनं(तृतीयं सवनं) सम्प्रयच्छन्ति एष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ ४॥ २४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयोऽध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_CO2_S24_V04"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO2_S24_V04_B01"
| |
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| "text": "\n\t\t\t ",
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| "children": [
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| {
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| |
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| |
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| |
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| |
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| "text": "प्रार्थयित्वा दिवं त्वज्ञो ज्ञो मोक्षं प्राप्नुयात् तथा ।",
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| "children": [
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| {
| |
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| "tail": "यजमानो नान्यथा तु लोकोऽस्य प्राप्यते वरः ॥"
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| |
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| |
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| |
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| |
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| {
| |
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| "tail": "विराज्यमन्तरिक्षे तु स्वाराज्यं स्वर्गगं भवेत् ॥"
| |
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| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "एतेषु मोक्षोऽपि भवेन्मानुषाणां विशेषिणाम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "श्वेतद्वीपं तथा गत्वा दृष्ट्वा विष्णुं च ते ततः ॥"
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "अनुज्ञाताः प्रमोदन्ते निर्दुःखास्तु धरादिषु ॥’ इति च ।"
| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t \n "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वस्वादिनाम्नां भगवत्परत्ववर्णनम्",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_CO2_S24_V04_B02"
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| },
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| "children": [
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| {
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| "text": "‘यो देवानां नामधा एक एव’ इति श्रुतेश्च भगवत एव वस्वादिनामानि । ‘त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते’(भ.गी.९.२०) इति वचनाच्च भगवानेव प्रार्थ्यः । भगवत्स्वरूपस्य सम्यगपरिज्ञानाद् रागाच्च तेषामन्तवत् फलवत्वम् । ‘न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।’(भ.गी.९.२४),‘गतागतं कामकामा लभन्ते’ इति वचनात् ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
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| "text": "‘सर्वोत्तमत्वस्याज्ञानाद् विष्णोरन्धन्तमो भवेत् ॥",
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| |
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| {
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| "text": "तद्द्वेषात् किमु वक्तव्यं ब्रह्मादिद्वेषतोऽपि वा ।",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "तारतम्यापरिज्ञानादनुत्थानं तमो भवेत् ।"
| |
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| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "अपराधकृतस्तेषां निरयं त्वेव गच्छति ।",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "पूजाया अकृतेस्तेषां न वर्णेषु जनिर्भवेत् ॥"
| |
| }
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| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "सम्यक्कर्माननुष्ठानात् स्वर्गं नैवोपगच्छति ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अपरोक्षदृशेरौन्यान्मोक्षं नैवोपगच्छति ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
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| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
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| |
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| "children": [
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| "tail": "स्थानद्वयोत्तरे शक्ता मोक्षो नानपरोक्षिणः ॥"
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| |
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| "text": "विरुद्धरागिणां नैव ह्यपरोक्षदृशिर्भवेत् ।",
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| |
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| "text": "सर्वदैवाप्रमत्तश्च पश्येदेव हरिं परम् ।",
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| {
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| "tail": "अविस्मृतिस्सदा विष्णोरन्यथाज्ञानवर्जनम् ॥"
| |
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| |
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| "text": "शास्त्राभ्यासः सदोद्योगाच्छ्रवणाच्च विचारतः ।",
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| "children": [
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| "tail": "निषिद्धकर्मणां त्यागः स्वधर्मस्य कृतिः सदा ॥"
| |
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| |
| },
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| "text": "अप्रमाद इति प्रोक्तः शास्त्रं वेदास्तु पञ्च च ।",
| |
| "children": [
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| "tail": "भारतं पञ्चरात्रं च मूलरामायणं तथा ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "पुराणं भागवतं चैव पञ्चमो वेद उच्यते ॥’ इति च ॥"
| |
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| "tail": "\n\t\t\t "
| |
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| |
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| "tag": "br",
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| "tail": "तेषामग्न्यादिगो विष्णुरपहन्ता स्मृतो भवेत् ॥"
| |
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| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "मृतः सन्सुखभोगाय यत्र गच्छति तत्र ह ।",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tail": "एकैकः परिघोऽग्रे स्याद् गते तस्मिंस्तु विष्णुना ॥"
| |
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| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "यजमानः पृथिव्यादिलोकान् भोगाय याति हि ॥’ इति च ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "‘यस्त्राति यज्ञमातारं यज्ञमात्रा हरिस्तु सः ।",
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| "tag": "br",
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| "tail": "तमेवं वेत्ति यो भक्तो याति स्वर्मुक्तिमेव वा (मुक्तिमेव च) ॥ इति च ॥ २४ ॥"
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| |
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| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
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| }
| |
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये चतुर्विंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमच्छन्दोग्योपनिषद्भाष्ये द्वितीयोऽध्यायः ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| ],
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| |
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| "text": "ओम् असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवंशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥",
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| |
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| "text": "अ इत्याधिक्यमुद्दिष्टं मद् ज्ञानततिरुच्यते ।",
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| "tail": "तद्वत्ता ततिरुद्दिष्टा तेनानुभव ईरितः ॥"
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| |
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| "text": "अधिकोऽनुभवो यस्य सर्वस्मादीप्सितादपि ।",
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| "tail": "सोऽयं मद इति प्रोक्तः सर्वं हि सुखसाधनम् ॥"
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "तत्पूर्णो मधुनामा स्यात् तृतीयोऽतिशयार्थकः ।",
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| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "देवानामुपजीव्यत्वात् स देवमधुनामकः ॥"
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "आदित्वादाततत्वाच्च(आदित्वाच्च ततत्वाच्च) ज्ञानरूपत्वतस्तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आदित्य इति सम्प्रोक्तः प्रसिद्धमधुवच्च सः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तिरोवंशादिसंयुक्तो द्युनाम्नी च द्युसंस्थिता ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रकाशादिगुणैः श्रीस्तु वायोराश्रयरूपतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| "text": "तिरोवंश इतिप्रोक्ता मध्वपूपस्तु मारुतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मिन् सन्निहितो विष्णुर्विशेषेण यतः सदा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सोऽन्तरिक्षमितिप्रोक्तः स्वान्तस्सम्यग्घरीक्षणात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्तरिक्षस्थितश्चासौ वस्वाद्या मधुकारिणः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्पुत्रास्तु मरीच्याद्याः सूर्यरश्मिषु संस्थिताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तिर्यक् स्थित्वा वशे कुर्याद् यस्माद् देवी रमा हरिम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भक्त्यैवातस्तिरोवंशस्तिर्यक्त्वं प्रणतिः स्मृता ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तिर्यक्स्थित्वा स्वसंस्थं तु वशीकुर्याद्यतस्ततः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "वंशस्तिरश्चीनोऽन्योऽपि यस्मिन्नाप्यमुपस्थितम् ।",
| |
| "children": [
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| {
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| "tail": "सोऽपूप आप्यो भगवान् मध्वाज्यादि प्रसिद्धगम् ॥"
| |
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| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्य ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः ॥ २ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
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| }
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| }
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये प्रथमः खण्डः॥ ",
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| "title": "तृतीयाध्याये द्वितीयः खण्डः "
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूंष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S02_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तानि वा एतानि यजूंष्येतं यजुर्वेदमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S02_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद् व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तदा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्लं रूपम् ॥ ३ ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S02_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S02_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": ".....यज्ञदेवताः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इन्द्राद्या यजुरुद्दिष्टा रुद्रा इन्द्रसखा यतः (इन्द्रसहायतः, इन्द्रसहायत्वतः) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इन्द्रशब्दोदितो वायुः स याज्यः सोमभुक्पुरः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स हि शङ्करपूर्वाणां रुद्राणां मुख्य एव च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये द्वितीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S03",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " तृतीयः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये तृतीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "तृतीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_CO3_S03_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मधुनामकप्रद्युम्नोपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S03_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तानि वा एतानि सामान्येतं सामवेदमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S03_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद् व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद् यदेतदादित्यस्य परं कृष्णं रूपम् ॥ ३ ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S03_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S03_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सामनामान आदित्या मासशः समभोगतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इन्द्रो वरुण उद्दिष्टो यज्ञेषु व्रियते यतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आदित्यानामधिपतिः स हि विष्णुनियोजितः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णुस्तूपास्यरूपत्वान्नोपासकगणे युतः(नोपासकगणैर्युतः) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये तृतीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S04",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये चतुर्थः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मधुनामकानिरुद्धोपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S04_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो मधुनाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमृता आपः॥१॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S04_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीयमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S04_V13",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद् व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद् यदेतदादित्यस्य परं कृष्णं रूपम् ॥ ३ ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S04_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S04_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इतिहासपुराणानां सोमाद्या अभिमानिनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अथर्वाङ्गिरसां चैवाप्यथर्वाङ्गिरनामकाः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अधरं वर्तयेयुस्ते वृष्टिमङ्गरसास्तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मानस्त्वात् प्राणरूपत्वाद् अथर्वाङ्गिरसस्ततः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये चतुर्थः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S05",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये पञ्चमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मधुनामकनारायणोपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S05_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयस्ता एवास्योर्ध्वा मधुनाड्यो गुह्या एवाऽदेशा मधुकृतो ब्रह्मैव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S05_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते वा एते गुह्या आदेशा एतद् ब्रह्माभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S05_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद् व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद् यदेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S05_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते वा एते रसानांरसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ४ ॥५॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S01_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S04_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गुह्यादेशा ब्रह्मपदे ये योग्या ब्रह्मणा सह ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " सर्वगुह्योपदेष्टारः सर्वेषां गुरवो हि ते ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रह्मेति सर्वदेवानां नामानन्तत्त्वतः स्मृतम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋग्वेदादींस्तु ते देवा अग्न्याद्याः संव्यचारयन् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " मधुब्रह्मव्यक्तिकृत्वात् ते वै मधुकृतः स्मृताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानपोषकरत्वात् तु वेदाः पुष्पाभिधाः स्मृताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " अन्यत्र मधुकृत् पोषन्नित्यत्वादमृताश्च ताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेदवाचः सुरैः पेया भोग्यत्वाद् आप ईरिताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " वेदपानं विचारश्च श्रवणं पाठ एव च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवैर्विचारितेभ्यश्च वेदेभ्यो व्यक्ततां गतः(गताः) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " ज्ञानानन्दस्वरूपत्वाद् यशस्तेजस्वरूपकः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इन्द्रियं परमैश्वर्याद् वीर्यरूपश्च सर्वदा।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " सर्वानुग्रहशक्तित्वादन्नाद्यो बलरूपतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रसनामा च भगवान् .....।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S04_V04_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "........संस्थितः सूर्यमण्डले ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " व्यक्षरद् धर्ममोक्षादीन् देवानां भगवान् हरिः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋक्प्रोक्तो लोहिताकारो वासुदेवः परः पुमान् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " स एव सूर्यलोहित्ये प्राच्यरश्मिषु संस्थितः(च स्थितः) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सङ्कर्षणः शुक्लवर्णो यजुर्वेदोदितः प्रभुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " शुक्ले वर्णे च(शुक्लवर्णेच) सूर्यस्य दक्षरश्मिषु संस्थितः(संस्थितः) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रद्युम्नः श्यामवर्णस्तु सामवेदोदितः प्रभुः।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " प्रत्यग्रश्मिषु सूर्यस्य श्यामवर्णेऽपि च स्थितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनिरुद्धः सुनीलश्च इतिहासपुराणयोः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " अथर्ववेदे चोक्तः सन्नुदग्रश्मिषु संस्थितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुकृष्णे सूर्यरूपे च मध्ये नारायणः प्रभुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " ऊर्ध्वरश्मिषु संस्थश्च प्रोद्यदादित्यसप्रभः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "महामरीचिपुञ्जेन चलतीवाचलोऽपि सन् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " स वाच्यः सर्ववेदानामेवं पञ्चात्मको हरिः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेदानां सारभूतोऽसौ वेदानां नित्यताप्रदः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " अतोऽमृतानाममृतो रसानां रस एव च ॥ इति सामसंहितायाम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S04_V04_B03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न चाचेतनमात्रमुपासितं पुरुषार्थप्रदानशक्तम् । ‘ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात्’(३.११.५) इति वाक्यशेषाच्चैतदवगम्यते । ‘य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद’(३.११.३) इति च । कथं चाचेतनोपासनं ब्रह्मादिपदप्रदं भवति ? ‘न वै तत्र न निम्लोचो(निम्नोचः) नोदियाय कदाचन’(३.११.२), ‘सकृद् दिव हैवास्मै भवति’(३.११.३) इत्यादि च मुक्तस्यैव मुख्यतो युज्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S04_V04_B04"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यशस्तेजइन्द्रियवीर्यान्नाद्यरसत्वं च भगवन्तं विना कस्य मुख्यतो युज्यते ? तस्य नाम महद्यशः ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " ज्ञानवैराग्ययोश्चैव(ज्ञानविज्ञानयोश्चैव) षण्णां भग इतीरणा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘रसो वै रसः’, ",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सुखात्मकं षड्गुणविग्रहं परं हृदि स्थितं ब्रह्म निरञ्चनं स्वरुक् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " ऐश्वर्यवैराग्ययशोविबोधवीर्यश्रिया पूर्णमहं प्रपद्ये॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अहं तत्तेजोरश्मीन्नारायणं पुरुषम्’(पुरुषं जातमग्रतः) इत्यादेश्च । ‘ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः’ इति च (नरसिमहपुराणे ऐ.भा.)। ",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S04_V04_B05"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "न चाचेतनस्यैश्वर्यादिरूपत्वं युज्यते । ‘ज्ञानात्मको भगवानैश्वर्यात्मको भगवान् शक्त्यात्मको भगवान्’ इति च श्रुतिः । ‘सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात्’(ब्र.सू.३.३.१) इति सर्ववेदप्रतिपाद्यत्वं भगवत उक्तं भगवता । ‘स सर्वनामा स च विश्वरूपः प्रसीदतां ब्रह्म महाविभूतिः’ इति च । ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’(काठक.अ.१,ब्रा.६,श्लो.१), ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदा सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव’ ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ इत्यादेश्च ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S04_V04_B06"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपनिषत्वाच्च विशेषतो न यत्किञ्चिदुच्यत इति वक्तुं युक्तम् -",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘विष्णुरुक्तः सर्ववेदैर्मन्त्रैरपि (मन्त्रेषु च) विशेषतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " आरण्यके विशेषेण नैवान्यत् किञ्चिदुच्यते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कर्मार्थं च ब्राह्मणं स्याद् अमुख्यार्थविवक्षया ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " मुख्यतो विष्णुरेवैको ब्राह्मणेष्वपि कथ्यते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आरण्यकेष्वृते विष्णुं नैवान्यत् किञ्चिदुच्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " सूत्रात्मा तूच्यते विष्णोस्तद्विशिष्टत्ववित्तये ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कुत्रचित् तदुपास्तिश्च तस्याध्यर्धतनुत्वतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " तस्मिन् विष्णोरुपास्त्यर्थं नान्यथा किञ्चिदुच्यते ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S04_V04_B07"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवत्राणनिरोधमस्य ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " लीलावतारेधितकर्म (लीलावतारैधितकर्म) वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " यन्न व्रजन्त्यघभिदोऽरचनानुवादाः शृण्वन्ति येऽन्यविषयाः कुकथा मतिघ्नीः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " यास्तु श्रुता हतभगैर्नृभिरात्तवीर्यास्तांस्तान् क्षिपन्त्यशरणेषु तमस्सु हन्त ।’ इत्यादिभगवद्वचनाच्च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्ता वीर्यं याभिस्ता आत्तविर्या याश्च यैर्हतभगैरनृभिः श्रुता अशरणेषु।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सर्वासु शाखास्वारणमावर्तयेदारणकमावर्तयेदुपनिषदमावर्तयेदुपनिषदमावर्तयेत्’ इत्युपनिषदभ्यासस्य सतात्पर्यं विहितत्वादभगवद्विषयस्य निन्दितत्वाच्च नोपनिषत्स्वन्यदुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अभ्यसेदधियज्ञं चाप्यधिदैवं विशेषतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " अध्यात्मं तु विशेषेण यस्माद् विष्णुस्त्रिषूदितः ॥’ इति स्कान्दे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्योऽपोह्य(विकल्प्यापोह्य .हृ) इत्यहम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " इत्यस्या हृदयं साक्षान्नान्यो मद्वेद कश्चन ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्यादेश्च भगवदुपासना एव सर्वत्रोक्ताः ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये पञ्चमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S06",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " षष्ठः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये षष्ठः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "षष्ठः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मधुनामकवासुदेवोपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S06_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद् यत् प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S06_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "त एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S06_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाऽग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुदेति ॥३॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S06_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता वसूनामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ६ ॥",
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| |
| }
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| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C03_S06_V04"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S06_V04_B01"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "text": "‘प्रथमामृतस्य द्रष्टारो वसवस्त्वग्निपूर्वकाः ।",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "यावत् पश्यन्ति तं विष्णुं तावत् ते नान्यभोगिनः ॥"
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| "text": "एतदेव विशन्त्यद्धा मोक्षे ते तत एव च ।",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "स्वेच्छयैव समुद्यन्ति मुक्ताः सन्तो बहिस्तथा ॥"
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये षष्ठः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S07",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " सप्तमः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये सप्तमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "सप्तमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मधुनामकसङ्कर्षणोपासनाफलम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S07_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यद्वितीयममृतं तद् रुद्राः उपजीवन्तीन्द्रेण मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S07_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S07_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एतदेवममृतं वेद रुद्राणामेवैको भूत्वेन्द्रेणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद्रूपादुदेति ॥३॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S07_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्विस्तावद् दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S07_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S07_V07_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं द्वितीयरूपं तु शिवाद्या वायुसंस्थिताः (वायुसंश्रिताः)।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वायोर्हिरण्यगर्भत्वात् पदद्वयमुदाहृतम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रुद्राणामाश्रयत्वं च साध्यानामपि सर्वशः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतो यजुर्विचारश्च सर्ववेदात्मनस्तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायोरेव विचारः स्याद् ब्रह्मणोऽपि विशेषतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उभयाश्रयः स मोक्षोऽपि वायुरेव हि सर्वदा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये सप्तमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S08",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " अष्टमः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये अष्टमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "अष्टमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मधुनामकप्रद्युम्नोपासनाफलवर्णनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S08_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S08_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S08_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामेवैको भूत्वा वरुणेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुदेति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S08_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यावदादित्यो दक्षिणतः उदेतात्तरतोऽस्तमेता द्विस्तावत् पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेताऽऽदित्यानामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S08_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S08_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्रष्टारोऽथ तृतीयस्य शक्रमुख्यादितेः सुताः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये अष्टमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S09",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " नवमः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये नवमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "नवमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मधुनामकानिरुद्धोपासनाफलम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S09_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S09_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S09_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एतदेवममृतं वेद मरुतामेवैको भूत्वा सोमेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुदेति ॥३॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S09_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यावदादित्यः पश्चादुतेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥४॥ ९॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S09_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S09_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चतुर्थस्य तु सोमाद्या मरुतः .................",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये नवमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " दशमः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये दशमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "दशमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मधुनामकनारायणोपासनाफलम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत्पञ्चमममृतं तत् साध्याः उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुद्यन्ति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स य एतदेवममृतं वेद साध्यानामेवैको भूत्वा ब्रह्मणैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुदेति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यावदादित्यः उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्वं उदेताऽर्वाङस्तमेता साध्यानामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S10_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10_V04_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "....... ...... .......... पञ्चमस्य च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋजवो ब्रह्ममुख्या हि सुपर्णः शेष एव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सरस्वती सुपर्णी च वारुणी साध्यनामकाः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्योन्यमुखता मुक्तौ ब्रह्मणा समता तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वाक्शेषादेर्मुखं ब्रह्मा मुक्तावपि विशेषतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्रष्टोभयस्यापि शिवो द्वितीयस्यान्तगस्य(अन्त्यगस्य) च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मोक्षे त्वन्यत्र चैकस्य परतः शेषभावतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ये चेैतत्पदयोग्याः स्युर्देवाः पञ्च महागणाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेषामपि यदोपासा निच्छिद्रा मधुनामके ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदा वस्वादितां प्राप्य मुक्तिमेष्यन्त्यसंशयम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वस्वाद्याधिपत्यसम्बन्धिदेशकालनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10_V04_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उदेत्यास्तमयं यावद्याति भानुस्तु पर्वते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उदयास्ताद्रिमध्यस्य वसवः पतयः स्मृताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ततश्चास्तमयाद् यावदर्धरात्रं दिवाकरः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दक्षिणादुत्तरं याति किञ्चित् पूर्वसमन्वितम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तद्देशकालयोरीशा रुद्रा वायुपुरःसराः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वसुभेग्याद् (वसुभोज्याद्) अर्धकालमर्धदेशस्तथैव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "रुद्रभोज्योऽर्धरात्रात्तु याम आदित्यदैवतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पश्चिमात् पूर्वमार्गस्तु रौद्रादर्धः प्रकीर्तितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ततः परोऽर्धयामस्तु सौम्याद् दक्षिणमार्गकः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मारुतः काल उद्दिष्ट आदित्यार्धश्च देशतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पश्चात् पश्चादुदेत्येव(उदेत्यैव) पूर्वतोऽस्तमुपैति च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततस्तदर्धकालेन चोत्तरादुदितस्तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अस्तं दक्षिणतो याति स कालो मारुतः स्मृतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उदेत्यैन्द्रपुरे(उदेत्येन्द्रपुरे) चोर्ध्वमर्वागुदयपर्वते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अस्तमेति तदर्धेन ब्रह्मा तस्य पतिः स्मृतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वस्वादिदेवताकालव्यवस्था",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10_V04_B03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘एकत्रिंशत्तु घटिकाः साधिका वसुदैवताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " तदर्धा रुद्रदैवत्यास्तत आदित्यदैवताः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदर्धा मारुता ब्राह्मास्तदर्धा देशतस्तथा ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रौद्रो द्विगुणीभूतो वसुकालो यावांस्तावान् भवतीति द्विस्तावत् । अर्ध इत्यर्थः । ब्राह्मे मुहूर्ते (ब्राह्मो महूर्त)इत्युषःकालस्य प्रसिद्धेश्च । रौद्रः काल इति पूर्वरात्रस्य प्रसिद्धेः (प्रसिद्धेः सार्धरात्रस्य। सौम्यः काल इत्यपररात्रस्य । सौम्यकालत्वाच्च)। अपररात्रस्य सौम्यकालत्वाच्च तस्मिन् काले शीतमुत्पद्यते । मारुतकालत्वाद् वायुश्च वाति । आग्नेयकालत्वादेवाह्नि सैकघटिकं होमकर्माणि विशेषतः प्रवर्तन्ते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वस्वादिकालव्यवस्थायाः प्रामाणिकत्वनिरूपणम्",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10_V04_B04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अहः सर्वं वसूनां(सर्ववसूनां) तु परेषां रात्रिरेव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रदत्ता विष्णुना पूर्वं नालमित्यब्रुवन् परे ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुनर्विशेषतो दत्तं रुद्राणां मरुतां तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "माध्यन्दिनं तृतीयं चाप्यादित्यानां प्रदत्तवान् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विश्वेषामपि देवानां सामान्याद् वसुनामहः ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सर्वस्याधिपतिर्ब्रह्मा रुद्राद्यास्तु द्वयोर्द्वयोः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वसवस्त्वह्न एवेशाः सामान्यान्न विशेषतः ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘माध्यन्दिने तृतीये च रुद्रादे राज्यमिष्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तद्भृत्यत्वात् वसूनां तु प्रातःकाले विशेषतः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्रापि वाय्वधीनत्वम् अग्न्यादीनां प्रकीर्तितम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "देशव्यवस्था",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10_V04_B05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं पृथिव्यां रुद्राणामन्तरिक्षं प्रकीर्तितम् (एवं पृथिव्या रुद्राणां, अन्तरिक्षे प्रकीर्तितम्)।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मरुतां च द्विलोकेशा आदित्याः परिकीर्तिताः॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वेषामधिपो ब्रह्मा युवाधीशस्तु(युवादीशस्तु) मारुतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "त्रिलोकाधिपतिश्चेन्द्रस्तेषामप्यधिपो हरिः ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वाराज्यं भोगः । स्वरञ्जनात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "परमतविमर्षः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10_V04_B06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न त्विन्द्राद्यमो द्विगुणकालं तिष्ठति तस्माद् वरुणस्तस्माद् सोम इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न च सोमाद् द्विगुणमेव ब्रह्मा तिष्ठति । द्विपरार्धं हि तस्य कालः । इन्द्रादयो हि मन्वन्तरमात्रं तिष्ठन्ति । न च वसूनां पूर्वो देशो रुद्राणां दक्षिण आदित्यानां पश्चिमो मरुतामुत्तर एव नान्यत्रेत्यत्र प्रमाणमस्ति । तत्पक्षे रुद्रैः सहेन्द्रस्य दक्षिणत्वप्राप्तेश्च । न चेन्द्रशब्देन वायुस्तैर्गृहीतः । अत इन्द्रादेवेन्द्रस्य द्विगुणकालत्वमिति विरोधः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10_V04_B07"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इन्द्रादिपुरीणाम् उद्वासेनैवमङ्गीकारे (उद्वासत्वेनैवमङ्गीकारे) तत् षोडशगुणत्वाद् ऊर्ध्वोदयस्यैकेन्द्रात् परतोऽनिन्द्रत्वमेव स्यात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अथ तत ऊर्ध्वं उदेत्य’ इति तत्पक्षे पश्चादप्यादित्यभावात् कल्पान्तलयो(कल्पान्तलयोऽपि, कल्पान्तप्रलयोऽपि) न स्यादित्याद्यनन्तदोषदुष्टत्वेऽपि ग्रन्थाल्पत्वायैवोपरम्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘वस्वादीनां तु सर्वेषां सर्वदिक्षु पुराण्यपि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सन्त्येवमपि धीवृत्यै प्रत्येकं दिक्षुकथ्यते ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऐन्द्रया उद्वासे रुद्राणामेवोदयाभाव इति च दोषः । अतो यत्किञ्चिदेतत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10_V04_B08"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘उदेति पूर्वतः सूर्यो निम्लोचति च पश्चिमे ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं नियम उद्दिष्टो ब्रह्मणा विष्णुचोदनात् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्विगुणं द्विगुणं कालमुदित्वा दक्षिणादिषु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मध्ये व्यवस्थितिः(चावस्थितिः) पश्चाद् ब्रह्माणं याचिता पुरा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हिरण्यकेन सूर्यस्य हिरण्याक्षेण वै पुनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदाऽसुराणां देवत्वं ब्रह्मा तत् प्रददौ तयोः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तच्छ्रुत्वेन्द्रादिभिः प्रोक्तः कथं प्रादा वराविमौ ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "देवता हि विनश्येयुरेवं दत्ते वरे त्वया ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्युक्तो देवतैः प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न मया स वरो दत्तो दैतेयानां सुराः क्वचित् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "येन युष्मद्विनाशः स्यात् ततो व्येतु (व्यैतु) च वो भयम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दक्षिणाद्युदयो यस्तु स हि दैनन्दिनो मया ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभिप्रेतो नैव चायं कालान्तरगतः क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अर्धनाड्युत्तरा नाडीः सकाष्ठा नित्यशो रविः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पञ्चादशोत्तरां गच्छेत् पूर्वं रात्रे तु दक्षिणात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदर्धं पश्चिमात् पूर्वं(पूर्वां) तदर्धं चोत्तरादपि ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दक्षिणां च तदर्धं स ऊर्ध्वादर्वाक् च गच्छति ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दक्षिणाद्युदयस्त्वेष न तु कालान्तरे क्वचित् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदोत्तरस्मात् द्विगुणः पूर्वो भवति वै सुराः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदाऽपि द्विगुणत्वं स्यात् तन्मयाऽत्र विवक्षितम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अहःसाम्येऽपि क्रमश आतपस्याल्पकालतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "गिर्यावृत्तेः(गिर्यावृतेः) क्षिप्रमन्येषूदयास्तमयाविव ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S10_V04_B09"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कालान्तरे भाविनं तु दक्षिणाद्युदयं पुनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अपेक्ष्यैव वरो दत्तो द्वितीयो देवता मया ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "समयश्च कृतो नित्यो मया सूर्यस्य चानघाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पूर्वस्मादुदयो नित्यं(नित्यः) पश्चिमेऽस्तमयस्तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नियमो नान्यथाऽयं स्यात् कदाचित् केनचित् क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मान्न वो भयं क्वापि प्रोक्ता इत्थं सुरास्तदा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विशोका अभवन् सर्वे ययुः स्वं स्वं निकेतनम्(निवेशनम्) ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतदेव मोक्षधर्मेषु बलिवासवसंवाद उक्तम् । देवान् प्रति ब्रह्मणो वचनं रहस्यत्वादविज्ञाय बलिना दक्षिणाद्युदय उक्तः । इन्द्रेण तु ब्रह्मवचनं जानता दक्षिणाद्युदयो नास्तीत्युक्तम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘दैतेययोर्वरं ज्ञात्वा त्वविज्ञाय सुरान् प्रति ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रह्मणोक्तं हि बलिना वासवं प्रत्युदीरितम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दक्षिणाद्युदयान्ते तु त्वां जेष्यामि पुरन्दर ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इत्युक्तस्तमुवाचेन्द्रो न कदाचन तद्भवेत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मणा नियमो यस्मात् कृतः प्रागुदयो रवेः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इत्युक्त्वा तु जगामेन्द्रो दिवमैरावतस्थितः ॥ इति च ॥ १० ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये दशमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S11",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " एकादशः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये एकादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "एकादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "प्रलये भगवत उदयास्ताभावसमर्थनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S11_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S11_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वै तत्र न निम्लोचो नोदियाय कदाचन ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " देवास्तेनाहं सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ २ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S11_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S11_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ सूर्यस्थितो विष्णुरादित्यस्त्वादिमूलतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आदानाद् वाऽपि देवानामूर्ध्वं गच्छति मण्डलात् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राप्य वैकुण्ठलोकं च नोदेत्यस्तं(नोदैत्यस्तम्) न चैति सः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एकलः प्रलये स्थाता देवता नात्र संशयः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेन सत्येन न वृद्धिं प्राप्नुयां(न वृद्धिमाप्नुयां) ब्रह्मणा क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इत्युवाच पुरा ब्रह्मा देवेभ्यः स चतुर्मुखः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S11_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति च एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S11_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S11_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतां विद्यां तु यो वेद नित्यमस्य दिवा भवेत्(दिवाऽभवत्) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वैकुण्ठधामसंस्थस्य मुक्तस्यानुदयास्तकम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S11_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्धैतद् ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्धैतदुद्दालकायाऽरुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S11_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इदं वा व तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात् प्रणाय्याय वाऽन्तेवासिने ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S11_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥ ६ ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S11_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S11_V06_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘तदेतद्भगवान् विष्णुः प्रादाज्ज्ञानं विरिञ्चये ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विरिञ्चिर्मनवे प्राह प्रजाभ्यो मनुरेव च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पूरयित्वा तु पृथिवीं रत्नैः सप्तसमुद्रिणीम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दत्वापि गुरवे नैव पूर्यते गुरुदक्षिणा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवास्तूपासनायोग्या एकैकस्यामृतस्य हि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वस्योपासने ब्रह्मा तदन्ये ज्ञानमात्रके ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपासने नैव योग्यास्तद्योग्या हि सुरा यतः ॥ इति देवश्रुतौ ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ब्रह्मणा",
| |
| "tail": " परेण "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "मा विराधिषि",
| |
| "tail": " । भगवत्प्रसादादवृद्धिं न प्राप्नुयामित्यर्थः ॥ ११ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये एकादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वादशः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये द्वादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हयग्रीवमत्स्यादिरूपवाग्रूपाणामुपासनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "गायत्रीप्रतिपाद्यसूर्यान्तर्गत",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च वाग् वै गायत्री वाग् वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S12_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "यदिदं किञ्च भूतं",
| |
| "tail": " प्रभूतं परिपूर्णं तत् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सर्वं गायत्री",
| |
| "tail": " भगवानेव । ‘भू=बहौ’ इति धातोः । ‘बहुः पूर्णतायाम्’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यदिदं परितः पूर्णं मत्स्यकूर्मादिरूपकम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदिदं भगवान् विष्णुस्सर्वान्तःस्थित एव च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तन्निःसृतत्वाद् वेदानां गायकस्त्राति चाखिलम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतो गायत्रिनामासौ वासुदेवः परः पुमान् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूमा भूतमिति प्रोक्तः पूर्णत्वात् पुरुषोत्तमः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनन्यापेक्षमुद्रिक्तं सर्वस्य विनियामकम् (सर्वस्य च नियामकम्) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्यत्तत्तद्विष्णुरेव नान्यदेतादृशं क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स एव भगवान् विष्णुर्वाङ्नामा वाचि संस्थितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वचनाद्धयशीर्षाख्यो गायत्र्यां च स आस्थितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "पृथिव्याख्यतुरीयभगवद्रूपोपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यस्यां हीदं सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयन्ते ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S12_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव पृथिवीनामा पृथिव्यामपि संस्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णौ हि पृथिवीसंस्थे जगत्सर्वं प्रतिष्ठितम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नातिशेते च तं कश्चित् स हि सर्वाधिको हरिः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन् पुरुषे शरीरमस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीर्यन्ते ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S12_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृथुत्वात् पृथिवीनामा स एवान्तःशरीरगः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शरित्वादीरणाच्चैव शरीरं भगवानजः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरुषो जीव उद्दिष्टस्तस्मिन्नन्तःस्थितो विभुः(तस्मिन्नेव स्थितो विभुः) ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हृदयाख्यषष्ठभगवद्रूपोपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे हृदयमस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S12_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योऽसौ जीवे स्थितो विष्णुः शरीरमिति नामकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शन्त्वाच्च रतिरूपत्वाद् ईरणाच्च स एव तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जीवचैतन्यरूपस्य हृदयेऽपि व्यवस्थितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अयनाद्धृदि विष्णुः स हृदयं कीर्तितो बुधैः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सैषा चतुष्पदा षडि्वधा गायत्री ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S12_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V05_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गायत्र्यां संस्थितो विष्णुः स्त्रीरूपः सूर्यसप्रभः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्वितीयश्चैव मत्स्यादिर्भूतनामाऽवतारगः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तृतीयो वाचि संस्थश्च स्त्रीरूपो हयशीर्षकः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चतुर्थः पृथिवीसंस्थः स्त्रीरूपः पीतवर्णकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जीवस्यान्तर्गतो व्याप्य शरीरमितिनामकः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पञ्चमस्तद्धृदिस्थस्तु(हृदिस्थश्च) षष्ठो हृदयनामकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "गायत्रीनामको विष्णुरेवं षडि्वध उच्यते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्रिभिः स्वरूपपादैश्च भिन्नेनैकेन चैव हि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "गायत्रीनामको विष्णुश्चतुष्पात् सम्प्रकीर्तितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "......तदेतदृचाऽभ्यनूक्तम्(ऋचाऽभ्युक्तम्) ॥ ५॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ६ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S12_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V06_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भिन्नपादः(दाः) सर्वजीवास्तस्य सादृश्यमात्रतः । ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वरूपपादा विष्णोस्तु त्रयो हि दिवि संस्थिताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नारायणो वासुदेवो वैकुण्ठ इति ते त्रयः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनन्तशयनं चैव तथाऽनन्तासनं हरेः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बहुलक्षोच्छ्रिते नित्ये विमाने संस्थितं यतः(विमाने संस्थिते यतः, विमाने नियतं स्थितः) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चित्प्रकृत्यात्मनि ततो दिवीति कथितं(ते) श्रुतौ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "लोकत्रयविवक्षायां परतो लक्षयोजनम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वं द्यौरिति विज्ञेयं(स्थानद्वयं तद् विज्ञेयं) ततस्ते दिविसंस्थिताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दिवः परश्च भगवान् सप्तलोकविवक्षया ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "प्रकारान्तरेण भगवतः पादचतुष्टयविवृतिः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्वै तद् ब्रह्मेतीदं वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशो यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाशः ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अयं वाव स योयमन्तः पुरुष आकाशो यो वै सोन्तः पुरुष आकाशः ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V09",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशो यो वै सोऽन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत् पूर्णमप्रवर्ति पूर्णामप्रवर्तिनीं श्रियं लभेत य एवं वेद ॥ ९ ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S12_V09"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V09_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परम्ब्रह्मेति भगवान् सर्वगः सम्प्रकीर्तितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव जीवस्य बहिर्हृदयाकाश आस्थितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "योऽयं हृदयगः सोऽथ जीवान्तर्व्याप्य संस्थितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्याप्तो जीवान्तरे योऽसौ स जीवहृदि(जीवे हृदि) संस्थितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं चापि चतुष्पात्त्वं वासुदेवस्य कीर्तितम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव पूर्णो भगवान् अप्रवर्त्यस्तथाऽखिलैः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्यैः प्रवर्त्यते योऽसौ स प्रवर्तीति गीयते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अप्रवर्त्यो हरिर्नित्यस्वतन्त्रत्वात्(नित्यः स्वतन्त्रत्वात्) सदैव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अस्य(अस्मिन् हृ.) प्रवृत्तिर्नास्तीति सोऽप्रवर्तीति कीर्तितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पूर्णा स्वतन्त्रा श्रीश्चास्य वेत्तुर्भवति शाश्वती ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "साक्षाद् गायत्र्युपासायां(उपासायाः/या) योग्य एकश्चतुर्मुखः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद् अनन्यतन्त्राऽस्य श्रीर्भवेन्नान्यथा क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णुतन्त्रत्वमस्य स्यात् परेषां तस्य तन्त्रता ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथाक्रमेण तन्त्रत्वं योग्यताक्रमतो भवेत् ॥’ इति (च) सत्तत्त्वे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S12_V09_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मशब्दाच्च भगवानित्यवसीयते । पूर्णाप्रवृत्तित्वं च तस्मिन्नेव मुख्यम् । ‘तावानस्य महिमा’() इति मन्त्राच्च । ‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि’() इति जीवानां चतुष्पादान्तर्भावाद् ‘भूतं यदिदं किञ्च’ इति षड्विधान्तर्भूतं भूतं मत्स्याद्यवताररूपमेव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘द्वाविंशेष्ववतारेषु जीवोऽप्युक्तो यथा पृथुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " तथा पादेषु चतुर्षु सान्निध्याज्जीव ईरितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा कालः पुमान् व्यक्तं प्रकृतिश्च परस्य तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णो रूपाणि गण्यन्ते पररूपेण वै सह ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं भूतानि गण्यन्ते भिन्नान्यपि पदैः सह ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मूर्तामूर्ते यथा रूपे ब्रह्मणस्तु तथैव च ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भिन्नान्यपि तु भूतानि पदानि स्वपदैः सह ॥’ इति प्राथम्ये ।"
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सुदर्शनाख्यं स्वास्त्रं तु प्रायुङ्क्त दयितं त्रिपात्’(भाग.३.२०.२२) इति श्रीभागवते प्रयोगाच्च न जीवो भगवत्स्वरूपम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सुवर्चला यथा सूर्यपत्न्यंशः समुदाहृता ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं जीवा भगवतो वस्तुभेदेऽपि सर्वदा ॥’ इति च ॥ १२ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये द्वादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C03_S13",
| |
| "type": "khanda",
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| "name": " त्रयोदशः खण्डः ",
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| "title": "तृतीयाध्याये त्रयोदशः खण्डः "
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| "text": "\n \n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "section-heading",
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| "text": "त्रयोदशः खण्डः ",
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| "tail": "\n \n "
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| },
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| {
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| "text": "हृदयनामकपरमात्मनो द्वारपालकाः",
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| "attrs": {
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| "text": "पूर्वद्वारपालकः सूर्यः",
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| "children": [
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| "tag": "line",
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| "text": "तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ्सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेतत् तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "CHU_C03_S13_V02",
| |
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| "tag": "gadya",
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| "text": "दक्षिणद्वारपालकश्चन्द्रः",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रं स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत श्रीमान् यशस्वी भवति य एवं वेद ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C03_S13_V03",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "पश्चिमद्वारपालको वह्निः",
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| },
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अथ योऽस्य प्रत्यङ्सुषिः सोऽपानः सा वाक् सोऽग्निस्तदेतद् ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥३॥",
| |
| "tail": "\n "
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C03_S13_V04",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
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| "children": [
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| "tag": "gadya",
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| "text": "उत्तरद्वारपालक इन्द्रः",
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| },
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "अथ योऽस्योदङ् सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेत् कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान् व्युष्टिमान् भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S13_V05",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "gadya",
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| "text": "ऊर्ध्वद्वारपालकः प्रधानवायुः",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महस्वान् भवति य एवं वेद ॥५॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S13_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "द्वारपालकोपासनायाः फलम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते वा एते पञ्चब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C03_S13_V07",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अस्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद । अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद् यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिस्तस्यैषा दृष्टिः ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S13_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यत्रैतदस्मिंच्छरीरे संस्पर्शेनोष्णिमानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनदमिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत(प्रज्वलतः) उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ १३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S13_V08"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S13_V08_B01"
| |
| },
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्राणाभिमानी चक्षुश्च सूर्य एव ह्युदाहृतः ।",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेजोऽन्नाद्यभिमानी च प्राग्द्वाराधिपतिर्हरेः(तेजोऽनाद्यभिमानी च प्राग्द्वाराधिपतिः) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दक्षिणाधिपतिस्सोमो व्यानः श्रोत्राभिमानवान्(व्यानश्रोत्राभिमानवान्) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यशोलावण्यरूपश्च पश्चिमद्वारपस्तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वागपानात्मको वह्निर्ब्रह्मतेजोऽन्नदेवता ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उत्तरद्वारपस्त्विन्द्रः समानो मनआत्मकः(समानमनआत्मकः) ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कीर्त्यैश्वर्यात्मको नित्यम् ऊर्ध्वद्वारप एव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रधानवायुराकाशः सर्वज्ञादुन्नतेस्तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उदान ऊर्जितत्वात् स ओजः पूर्णत्वतो महः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "परस्य ब्रह्मणस्त्वेते पुरुषाः पञ्च कीर्तिताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्वारपा हृदये चैव विष्णुलोके च सर्वदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आन्तरद्वारपा(अन्तरद्वारपाः .हृ) ह्येते जयाद्या बाह्यतः स्मृताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवमेतानुपास्यैव तद्गुणांशांशभाग् भवेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णुलोकं तथा गच्छेद् भवेदपि सुसन्ततिः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S13_V08_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योऽसौ वैकुण्ठगो विष्णुः सप्तलोकोपरिस्थितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स एव सर्वलोकेषु विश्वतो ब्रह्मणस्तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उच्चेषूत्तमलोकेषु तथा प्रत्यवरेषु च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पुरुषेषु च सर्वेषु स एकः संव्यवस्थितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणसंस्थस्स वै विष्णुः प्राणोऽग्नौ संव्यवस्थितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्पर्शेन दृश्यते चाग्निस्तद्दृष्टिरिव सा ततः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स प्राणः स्तौति तं विष्णुं सा स्तुतिः श्रूयते सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कर्णौ पिधाय तद्विद्वान् दिव्यचक्षुः सुकीर्तिमान् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मुक्तो भूत्वा भवेद्यस्मादुपासीतैव तं ततः ॥’ इति संस्तत्त्वे ।(उपासीतैव सन्ततम्॥ इति सत्तत्वे)"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S13_V08_B03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "‘दिक्षु यानाद्यशो व्याप्तं कीर्तिः प्रत्यक्षतः स्तुतिः’ इति शब्दनिर्णये । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वतः पृष्ठेषु सर्वत उच्चेषु वैकुण्ठ-क्षीरसागर-अनन्तासनादिषु विश्वतो ब्रह्मणोऽप्युच्चेषु । तत उत्तमोऽन्यो(उत्तमो) नास्तीत्यनुत्तमाः सर्वतः स्वयमुत्तमाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘पृथिवीस्थेषु सर्वोच्चो लोकोऽनन्तासनात्मकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्तरिक्षात्मकेभ्यश्च श्वेतद्वीपे स्थितो हरेः (हरिः) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्व्यात्मकेभ्यश्च सर्वेभ्यो वैकुण्ठश्चोच्च उच्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पृथिव्यां द्यौर्महामेरुराकाशे सूर्यमण्डलम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दिवीन्द्रसदनं चैव तत्परे तु दिवः परे ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पृथिव्यां ब्रह्मणो मेरौ जयन्ते(जयन्तं) त्वन्तरिक्षगम् (वैजयन्तेऽन्तरिक्षगम्)॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तृतीयं सत्यलोके(सत्यलोकं) च सदनं त्रिविधं स्मृतम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेभ्योऽनन्तासनाद्या यत्परतो विश्वतः परे॥’ इति सत्तत्वे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘निनदः समुद्रघोषः स्यान्नदथुर्मेघसम्भवः’ इति (च) सत्तत्वे । ‘चक्षुष्यश्चक्षुषि ब्रह्मण्येष यातीत्युपासकः’ इति च ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये त्रयोदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S14",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्दशः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये चतुर्दशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्दशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हर्युपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C03_S14_V01",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वं खल्विदं ब्रह्म । तज्जलानिति शान्त उपासीत अथ खलु क्रतुमयः पुुरुषो यथा क्रतुरस्मन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S14_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसङ्कल्पः आकाश आत्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S14_V02"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S14_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "‘इदं ब्रह्मातिसामीप्यात् सर्वं पूर्णगुणत्वतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तच्च ब्रह्मजलान् साक्षाद् योऽसौ विष्णुर्जलेऽनिति(अनति .हृ) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आनीदवातमिति यं वेदवागवदत् स्फुटम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अप्रकेते तु सलिले ब्रह्म नारायणोऽपि(नारायणो हि) सः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति शान्त उपासीत यस्माज्ज्ञानमयः पुमान् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "क्रतुस्तु निश्चितं ज्ञानं(निश्चितज्ञानम् .हृ) तद्वशः पुरुषोऽमृतौ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद् विनिश्चितं ज्ञानं कुर्याद् विष्णौ महागुणे (महद्गुणे) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "महाज्ञानात्मकत्वात् तु प्रोक्तो विष्णुर्मनोमयः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्माद् बलशरीरोऽसावतः प्राणशरीरकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आ समन्तात् प्रकाशात् स आकाशात्मा प्रकीर्तितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वगन्धादिरूपश्च भोक्ता चैषां सदैव हि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इति निश्चयकृद्याति तमेव पुरुषोत्तमम् ॥’ इति सद्गुणे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S14_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "भगवान् अणोरणीयान् महतो महीयांश्च",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद् वा श्यामाकाद् वा श्यामकतण्डुलाद् वा एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥३॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_V64",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
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| "text": "भगवत्तत्त्वज्ञानिनो लभ्यफलम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः एष म आत्मान्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसम्भविताऽस्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्साऽस्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥ ४ ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S14_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S14_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकत्र सर्वगन्धादिना चिदानन्दात्मकसर्वगन्धादिरूपत्वमुच्यते । अन्यत्र तद्भोक्तृत्वम् ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये चतुर्दशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S15",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " पञ्चदशः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये पञ्चदशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "पञ्चदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S15_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "विश्वाश्रयस्य हरेः शरीरम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलं स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन् सर्वमिदं (विश्वमिदं) श्रितम् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S15_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S15_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘क इत्यानन्द उद्दिष्ट उश इच्छा प्रकीर्तिता ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आनन्देच्छास्वरूपोऽसौ कोशो विष्णुः प्रकीर्तितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्योदरेऽन्तरिक्षं च पृथिवी पादबुध्नयोः(पादमूर्ध्नयोः .हृ) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शिरोविवरगा द्यौश्च दिशो बाहुषु संस्थिताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अजरोऽयं महाविष्णुर्वसवो देवतागणाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेषां निधानं भगवांस्तस्मिन् सर्वमिदं श्रितम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S15_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "दिशामाश्रयस्य भगवतो बाहवः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य प्राची दिक् जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदं रुदम् ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-C03_S15_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S15_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राचीदिक्संस्थितस्तस्य बाहुर्दक्षिण ऊर्ध्वगः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जुहूः स होमकर्तृत्वाद् भुङ्क्ते ह्येतेन(ह्यनेन) केशवः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दक्षिणस्त्वधरो बाहुर्दक्षिणादिक् स्थितो विभोः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सहमानेति स प्रोक्तो मानं वेदात्मकं यतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शङ्खो वेदात्मकः शङ्खसहितो दक्षिणाधरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बाहुर्जुहोति चक्रेण शत्रूनित्यथवा जुहूः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रतीचीदिक्स्थितस्तस्य वामबाहुस्तथोत्तरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "राजीयुक्तगदायुक्तो राज्ञी नामा(राज्ञीनामा) प्रकीर्तितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अधरो वामबाहुर्य उत्तरादिक्स्थितो विभोः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "श्रिय आधारपद्मित्वात् सुभूतानामकः स्मृतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दिङ्नामानश्च ते प्रोक्ता धर्मज्ञानादिदेशनात् (धर्ममानातिदेशनात् .हृ)।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेभ्यो जातो महावायुर्दिशां (महान् वायुः) वत्सस्ततः स्मृतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "धर्मज्ञानादिरूपेण विष्णोर्बाहुचतुष्टयात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जातं वायुं विदित्वैव पुत्रो भूत्वा न रोदिति ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न जायते न म्रियते मुक्तो भूत्वा सुखी भवेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वायुं हरेः सुतं ज्ञात्वा नाहं पुत्रतयाऽरुदम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हरेः प्रसादसामर्थ्यादजरा चामरा ह्यहम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनादिकालसम्बन्धादित्युवाच परा(पुरा) रमा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S15_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हरेरबाहूपासनया रमया लब्धफलनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना प्राणं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भूः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भुवः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना स्वः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S15_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ(स) यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च तमेव तत् प्रापत्सि ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "C03_S15_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदवोचं भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "C03_S15_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "C03_S15_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदवोचं स्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येतदवोचं तदवोचम् ॥ ७ ॥ १५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-C03_S15_V07"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "C03_S15_V07_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अविनष्टं परानन्दकामं(अविनष्टपरानन्दम्) विष्णुं सदा ह्यहम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रपद्ये तत्प्रसादेन केवलं नात्मशक्तितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणं सर्वप्रणेतारं प्रपद्ये केशवं सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रभूतं यदिदं (किञ्च)किञ्चित् प्रादुर्भावात्मकं हरेः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मत्स्याद्यं तत्प्राण एव विष्णुर्नास्त्यत्र संशयः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मान्मत्स्यादिरूपं तं विष्णुमेव प्रपद्यथ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हे जना इत्यवोचत् सा लक्ष्मीः सर्वाः प्रजाः प्रति ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राणनामा वासुदेवो मोक्षं स्वान् प्रणयेद् यतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सङ्कर्षणस्तु भूर्नामा भूषयेज्ज्ञानतो यतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स पृथ्व्यां पृथिवीनामा स्वात्मानं प्रथयेद्यतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्तरिक्षेऽन्तरिक्षाख्यो यतः साध्वन्तरीक्षते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दिवि द्युनामा स विभुः सर्वक्रीडाकरत्वतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रद्युम्नश्च भुवोनामा सृष्ट्या यद्भावयेज्जगत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सोऽग्निनामा परो वह्नावत्ति सर्वं यतो हुतम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायुनामा स वायुस्थो वात्यायुश्च यतोऽस्य तत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आदित्याख्यः स आदित्ये आददात्यायुरस्य यत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वर्नामा त्वनिरुद्धोऽसौ(स्वर्णामा ह्यनिरुद्धोऽसौ) परानन्दप्रदत्वतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ऋग्वेदाख्यः स ऋग्वेदे ज्ञानं वेदयते यतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यजुर्वेदो यजुर्वेदे यज्ञं वेदयते यतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सामवेदः सामवेदे साम्यं वेदयते ह्ययम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं चतुर्विधं तत्त्वं तदवोचमहं हरेः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इत्युवाचेन्दिरा देवी स्तुवन्ती परमं हरिम् ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘पुंलिङ्गेनोच्यते स्त्री(श्रीश्च) च पुंवच्छक्तिमती यदि इति च’ ॥ १५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये पञ्चदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S16",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " षोडशः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये षोडशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "षोडशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S16_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "जीवनं यज्ञात्मकम् - तत्र प्रातः सवनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विंशतिवर्षाणि तत् प्रातःसवनं चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदं सर्वं वासयन्ति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S16_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिनं सवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S16_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "माध्यन्दिनसवनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनं सवनं चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप् त्रैष्टुभं मान्धन्दिनं सवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीदं सर्वं रोदयन्ति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S16_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिनं सवनं तृतीयं सवनमनुसन्तनुतेति माऽहं प्राणानां रुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥४॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S16_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यान्यष्टा(अष्ट .हृ)चत्वारिंशद्वर्षाणि तत् तृतीयसवनमष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वाव आदित्या एते हीदं सर्वमाददते ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S16_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवनमायुरनुसन्तनुतेति माऽहं प्राणानां आदित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S16_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S16_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘विष्णुपूजार्थयज्ञोऽहमित्युपासनमादरात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कुर्वीत पुरुषो नित्यं तस्य यत्षोडशोत्तरम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "(शतमायुस्तत्तु सवनत्रयम् .हृ)शतमायुस्तत्सवनत्रयमीरितमुत्तमम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चतुर्विंशत्तु यत्पूर्वं प्रातःसवनमेव तत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रार्थयित्वा वसूंस्तद्गं पुमान् मृत्युमपानुदेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मध्ये चतुश्चत्वारिंशन्मध्यमं सवनं स्मृतम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रुद्राणां प्रार्थनेनात्र पुमान् मृत्युमपानुदेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ततोऽष्टचत्वारिंशत्तु (तत् .हृ) तृतीयं सवनं स्मृतम्(मतम् .हृ) ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आदित्यानां प्रार्थनेन तद्गं मृत्युमपानुदेत् ॥’ इति सर्वयज्ञे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S16_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "पुरुषयज्ञोपासनायाः फलम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत् स ह(प्राह) षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७ ॥ १६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S16_V07"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "महिदासकृष्णकपिलाख्यजीवानां चरितम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S16_V07_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "महिदासोऽन्यः । कृष्णश्चान्यः एव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘महिदासस्त्वैतरेयः कृष्णोऽन्यो देवकीसुतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कपिलश्च द्वितीयोऽन्यस्त्रय एते पुरा नराः(पुयरातनाः .हृ) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सङ्गत्योच्चैस्तपस्तेपुर्ब्रह्मणे परमेष्ठिने ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मातुः स्वस्य च नामैक्यं विष्णुना स्यादिति ह्युभौ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वात्मशिष्यप्रशिष्याणां नामैक्यं(नामैक्ये .हृ) कपिलस्तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवमेव च वेदोक्ता भवेमेति त्वतन्द्रिताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तान् वरान् प्रददौ तेषां ब्रह्मा लोकपितामहः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मात् (तन्नामिनस्त्वासन् .हृ)तन्नामिनश्चाऽसंस्त्रयस्ते मुनयोऽपि हि ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "महिदासस्त्वैतरेयो बह्वृचोपनिषद्गतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "साक्षात् स भगवान् विष्णुस्तन्नामैको मुनिर्ह्यभूत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कृष्णस्तु वासुदेवाख्यः परमात्मैव केवलम्(केवलः .हृ) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तन्नामा देवकीपुत्रस्त्वन्योऽप्यभवदञ्जसा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कपिलो वासुदेवाख्यः साक्षान्नारायणः प्रभुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तन्नामा कपिलोऽन्यस्तु शिष्यनाम्ना सहाभवत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स षोडशशतञ्जीवी महिदासोऽपरस्त्वृषिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "घोरशिष्यस्तथा कृष्णः कपिलश्च कुशास्त्रकृत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त्रय एते वरं प्राप्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कृतकृत्याः प्रमुमुदुस्तन्नामानश्च तेऽभवन् ॥ इति कालकीये ॥ १६ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये षोडशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S17",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " सप्तदशः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये सप्तदशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "सप्तदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "पुरुषयज्ञस्य दीक्षोपसदादीनां विचारः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S17_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यदशिशिषति यत्पिपासति यन्न रमते ता अस्य दीक्षाः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S17_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदश्नाति यत् पिबति यद् रमते तदुपसदैरेति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S17_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यद्धसति यज्जक्षति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव तदेति ॥३॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S17_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत् तपो दानमार्जवमहिंसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S17_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादाहुः सोष्यत्यसोष्टेति पुनरुत्पादनमेवास्य तन्मरणमेवास्यावभृथः ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S17_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्धैतद्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणसंशितमसीति ।...",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-C03_S17_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S17_V06_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स्वरूपभूतयज्ञस्य क्षुत्पिपासाऽरतिस्तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दीक्षा भोजनपाने च रतिश्चोपसदः स्मृताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्यवायहासभक्षास्तु स्तुतशस्त्रात्मकाः(स्तुतिशस्त्रात्मकाः) स्मृताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तपो दानार्जवाहिंसाः सत्यमप्यस्य दक्षिणाः(दक्षिणा हृ.) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सोष्यत्यसोष्टेति ततो यज्ञवत् पुत्रजन्मनि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आहुर्हि पुनरुत्पत्तिं प्रसवः प्रथमा पितुः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ञस्नानं तु मरणं तदा ध्यायेत् त्रयं पुमान् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भगवन्नक्षयोऽसि त्वमच्युतोऽसि गुणैः सदा ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राणाच्च सुखितो नित्यमाधिक्येनेति चिन्तयेत् ॥ इति सत्तत्त्वे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S17_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "भगवदुपासनया अपरोक्षज्ञानम्, भगवत्प्राप्तिश्च",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "...तत्रैते द्वे ऋचौ भवतः ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S17_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदित्प्रत्नस्य रेतसो ज्योतिष्पश्यन्ति वासरम् । परो यदिध्यते दिवा । उद् वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरम् । स्वः पश्यन्त उत्तरम् देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥ इत्यगन्म ज्योतिरुत्तममिति ॥ ७ ॥ १७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-C03_S17_V07"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S17_V07_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "आदित्",
| |
| "tail": " तस्मादेव= तत्प्रसादादेव । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "प्रत्नस्य",
| |
| "tail": " पुरातनस्य= अनादेर्भगवतो "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "रेतसः",
| |
| "tail": " रतिरूपस्य "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ज्योतिः पश्यन्ति (प्रपश्यन्ति)",
| |
| "tail": " । वासेन रमयतीति "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "वासरम्",
| |
| "tail": " । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "दिवःपरतो",
| |
| "tail": " वैकुण्ठे "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "यदिध्यते",
| |
| "tail": " ऋद्धतममेव सर्वदा । ‘"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अथ यदत परो दिवः",
| |
| "tail": "’ इत्युक्तत्वाच्च(‘"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अथ यदत परः",
| |
| "tail": "’ इत्युक्तत्वाच्च) । न चाऽदित्यमण्डलं दिवः परतः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "उत्तरं ज्योतिः पश्यन्तः",
| |
| "tail": " स्वरानन्दरूपं परिपश्यन्तो वयं "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "तमस उदगन्म",
| |
| "tail": " । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "उत्तरं",
| |
| "tail": " ज्योतिः "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "पश्यन्तः",
| |
| "tail": " तदेवोत्तरं "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "स्वश्च पश्यन्तः",
| |
| "tail": " । द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्था(द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्थे हृ.) । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "उद्",
| |
| "tail": " आख्यं "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ज्योतिरुत्तमं",
| |
| "tail": " तमसः सकाशाद् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अगन्म",
| |
| "tail": " प्राप्ताः स्म इत्यर्थः । ‘तस्योदिति नाम’ इति श्रुतेः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "देवत्रा देवं",
| |
| "tail": " देवविषयेऽपि देवं, देवानां देवमित्यर्थः । सूरिभिः प्राप्यत्वात् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सूर्यम्",
| |
| "tail": " ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘रतिरूपं परं ज्योतिरनादेः केशवस्य यत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्प्रसादेन पश्यन्ति हृदि वासाद् रतिप्रदम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यत्पूर्णं सर्वदा(सत् सदा .हृ) भाति वैकुण्ठे परतो दिवः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदुदाख्यं प्रपश्यन्तो निर्गत्य तमसो वयम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्योतिरानन्दसद्रूपम् उत्तमोत्तमसूत्तमम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "देवानां दैवतं साक्षात् सूरिप्राप्यं परं पदम् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राप्ताः स्म वासुदेवाख्यमिति मन्त्रदृगब्रवीत् ॥’ इति नारायणीये ॥ १७ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये सप्तदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S18",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " अष्टादशः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये अष्टादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "अष्टादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S18_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अध्यात्माधिदैवतयोः भगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथाधिदैवतमाकाशो ब्रह्मेत्युभयमादिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S18_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अध्यात्माधिदैवतयोर्हरे रूपचतुष्टयम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेतच्चतुष्पाद् ब्रह्म वाक्पादः प्राणः पादश्चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद इत्यध्यात्ममथाधिदैवतमग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पाद इत्युभयमेवाऽदिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S18_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वागिन्द्रिये वासुदेवः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S18_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "घ्राणेन्द्रिये सङ्कर्षणः",
| |
| "tail": " \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S18_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "चक्षुरिन्द्रिये प्रद्युम्नः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स आदित्येन ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S18_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "श्रोत्रेऽनिरुद्धः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स दिग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद य एवं वेद ॥ ६ ॥ १८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S18_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S18_V06_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘मनःसंस्थस्तु यो देवः साक्षान्नारायणः प्रभुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स एवाऽकाशसंस्थश्च मन आकाशनामकः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मननान्मन आकाश आ समन्तात् प्रकाशनात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वासुदेवादिभेदेन स वागादिषु संस्थितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अग्न्यादिषु च तन्नामा वागादिस्थः स एव तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अग्न्यादिस्थैः सहैवेशो भाति दुष्टांस्तपत्यथ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं विद्वांस्तमीशेशं यशोज्ञानसुखात्मताम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कीर्तिं च ब्रह्मसम्प्राप्त्या(ब्रह्म सम्प्राप्य .हृ) वरतां मुक्तिगामपि ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राप्य भाति तपत्यद्धा स्वाज्ञानादिकमेव च॥’ इति च ॥ १८ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये अष्टादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S19",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " एकोनविंशः खण्डः ",
| |
| "title": "तृतीयाध्याये एकोनविंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "एकोनविंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S19_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "आदित्ये भगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत् तत् सदासीत् तत् समभवत् तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S19_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्यद्रजतं सेयं पृथिवी यत्सुवर्णं सा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बं स मेधो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकं स समुद्रः ॥ २॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S19_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानं घोषा उलूलवोऽनूदतिष्ठन् सर्वाणि च भूतानि च सर्वे च कामास्तस्मात् तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रति घोषा उलूलवोऽनूत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सर्वे चैव कामाः ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S19_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एतदेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेरन् ॥ ४ ॥ १९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये एकोनविंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयोऽध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C03_S19_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C03_S19_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अगम्यत्वादसन्नाम ब्रह्म नारायणाभिधम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रलये वासुदेवाख्यं गम्यं सदभवद् विदाम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्प्रकृत्या समभवत् तत आण्डमजायत ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मिन्नादित्यनामाऽसावभवत् सूर्यमण्डले ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नियन्तैव च सूर्यस्य भगवान् पुरुषोत्तमः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मिन्नादित्यनामानमादित्यस्थं जनार्दनम् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रह्मोपासीत परमं सर्ववेदज्ञता ततः॥’ इति ब्रह्मतत्त्वे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "उलूलव",
| |
| "tail": " उरूरव । अतिमहान्तो गायत्र्यादिघोषा उप च "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "निम्रेडेरन्",
| |
| "tail": " । मुक्ते तस्मिन्नेव वसेयुः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सूर्यबिम्बस्थिते विष्णौ जायमाने परात्मनि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "गायत्रीपूर्वकैर्वेदैर्ब्रह्माद्यास्समुपस्थिताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपतिष्ठन्त्यतो नित्यं गायत्र्यादिभिरञ्जसा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तद्विद्वान् मुक्त आवासो वेदानां सर्वदा भवेद्॥’ इति च ॥ १९ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमच्छन्दोग्योपनिषद्भाष्ये तृतीयोऽध्यायः ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "chapter",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04",
| |
| "type": "adhyaya",
| |
| "name": "चतुर्थाध्यायः"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "chapter-heading",
| |
| "text": "चतुर्थाध्यायः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S01",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " प्रथमः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये प्रथमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "प्रथमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S01_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "जानश्रुतेरुपाख्यानम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जानश्रुतिर्हि पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य (बहुवाक्य) आस। स ह सर्वत आवसथान् मापयाञ्चक्रे सर्वत एव मेऽत्स्यन्तीति ॥१॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S01_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ ह हंसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवं हंसो हंसमभ्युवाद होहोयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत् त्वा मा प्रधाक्षीरिति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S01_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तमु ह परः प्रत्युवाच कम्वर एनमेतत्सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S01_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद् वेद यत् स वेद स(वेद सर्वं स) मयैतदुक्त इति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S01_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "रैक्वमुनेरन्वेषणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव स ह संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्गारे ह सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S01_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत् स वेद स सर्वं मयैतदुक्त इति ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S01_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स ह क्षत्ताऽन्विष्य नाविदमिति प्रत्येया तं स होवाच यत्रारे ब्राह्मणस्यान्वेषणा तदेनमृच्छेति ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S01_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तं हाभ्युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यहं ह्यरा३ इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताऽन्विष्याविदमिति प्रत्येयाय ॥ ८ ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C04_S01_V08"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S01_V08_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "भल्लाक्ष!",
| |
| "tail": " मन्दाक्ष! । यथा कृते जिते त्रेतादिजयफलं च तस्यैव(तस्य) भवति । एवमन्येषां पुण्यफलं प्राधान्येन तस्यैव भवति । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अरे अङ्ग",
| |
| "tail": " इष्ट । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सयुग्वा",
| |
| "tail": " रैक्वो ज्ञातव्यः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अहं ह्यरा३",
| |
| "tail": " इति प्लुतिः पामकषणभावेन ॥ १ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये प्रथमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S02",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वितीयः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये द्वितीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वितीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S02_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "रैक्वस्य वैराग्यम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदु ह(अथ ह .हृ) जानश्रुतिः पौत्रायणः षट् शतानि गवां निष्कमश्वतरीरथं तदादाय प्रतिचक्रमे तं हाभ्युवाद ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S02_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रैक्वेमानि षट् शतानि गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथोऽनु म एतां भगवो देवतां शाधि यां देवतामुपास्स इति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S02_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति तदुह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S02_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं हाभ्युवाद रैक्वेदं सहस्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायाऽयं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S02_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाऽजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनाऽलापयिष्यथा इति ते हैते रैक्वपर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास तस्मै स होवाच ॥ ५ ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C04_S02_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "शूद्रशब्दव्याख्यानम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S02_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शुचाऽऽद्रवणाच्छूद्रो राजा पौत्रायणः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘राजा पौत्रायणः शोकाच्छूद्रेति मुनिनोदितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राणविद्यामवाप्यास्मात् परं धर्ममवाप्तवान् ॥’ इति पाद्मे ॥ २ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये द्वितीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S03",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " तृतीयः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये तृतीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "तृतीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S03_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": " रैक्वोपदिष्टसंवर्गविद्या",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायुर्वाव संवर्गो यदा वा महाप्रलये अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S03_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदाऽऽप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्ह्येवैतान् सर्वान् संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S03_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान् सर्वान् संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S03_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S03_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वायुरेव संवर्गः, अस्मिन् विषये ऐतिह्यम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ ह शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च काक्षसेनिं परिविष्यमाणौ ब्रह्मचारी बिभिक्षे तस्मा उ ह न ददतुः ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S03_V06",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स होवाच महात्मनश्चतुरो देव एकः कः सो जगार भुवनस्य गोपास्तं कापेय नाभिपश्यन्ति मर्त्या अभिप्रतारिन् बहुधा वसन्तं यस्मै वा एतदन्नं तस्मा एतन्न दत्तमिति ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S03_V07",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायाऽत्मा देवानां जनिता प्रजानां हिरण्यदंष्ट्रो बभसोऽनसूरिः। महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्निदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S03_V08",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतं तस्मात् सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दश कृतं सैषा विराडन्नादी तयेदं सर्वं दृष्टं सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C04_S03_V08"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S03_V08_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "‘संवृङ्क्ते सर्वदेवान् यद्वायुः संवर्ग ईरितः । ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "महिमाऽस्य महानेष यदनाद्योऽत्ति देवताः॥’ इति प्रभञ्जने ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘दशेति वै सर्वम्’(ऐ.उ.२.१.४) इति श्रुतेः । कृतस्य च पूर्णात्मकत्वाद् अध्यात्माधिदैवतभेदेन(दैवभेदेन) पञ्चदेवता दशभूताः कृतम् । तस्माद् वायुना सह दशसङ्ख्यापूरणात् सर्वदिक्षु स्थिता देवता वायुना सहान्नमेव । अन्नादी देवता विराड् विष्णुरेव । ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
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| "text": "अनद्यमान",
| |
| "tail": " इत्यन्यैरनद्यमानः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘वायुस्तु सर्वदेवात्ता वायोरत्ता जनार्दनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न तस्य कश्चिदत्ताऽस्ति स विराडधिराजनात्॥’ इति च ॥ ३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये तृतीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C04_S04",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये चतुर्थः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S04_V01",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "gadya",
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| "text": "जाबालसत्यकामोपाख्यानम्",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयाञ्चक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किङ्गोत्रो न्वहमस्मीति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S04_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साऽहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि(त्वमसीति स त्वं जाबालः .हृ) स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S04_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स ह हारिद्रुमन्तं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्यं भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S04_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं होवाच किं गोत्रो नु सोम्यासीति स होवाच नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्म्यपृच्छं मातरं सा मा प्रत्यब्रवीद् बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साऽहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति सोहं सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S04_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सोम्याऽऽहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशतं गा निराकृत्योवाचेमाः सोम्यानु संव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणाऽवर्तेयम्(आवर्तय) इति। स ह वर्षगणं प्रोवाच ता यदा सहस्रं सम्पेदुः ॥ ५ ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C04_S04_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S04_V05_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आर्जवं ब्राह्मणे साक्षाच्छूद्रोऽनार्जवलक्षणः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "गौतमस्त्विति विज्ञाय सत्यकाममुपानयत्॥’ इति सामसंहितायाम् ॥ ४ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये चतुर्थः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S05",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये पञ्चमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "ऋषभरूपिवायुना वासुदेवाख्यरूपोपदेशः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S05_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद सत्यकामा ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्राप्ताः सोम्य सहस्रं स्मः प्रापय न आचार्यकुलम् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S05_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राची दिक् कला प्रतीची दिक् कला दक्षिणा दिक् कलोदीची दिक् कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S05_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते प्रकाशवानस्मिंल्लोके भवति प्रकाशवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते ॥ ३ ॥५॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये पञ्चमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S06",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " षष्ठः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये षष्ठः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "षष्ठः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अग्निना सङ्कर्षणाख्यभगवद्रूपोपदेशः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S06_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अग्निष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ् उपोपविवेश ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S06_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तमग्निरभ्युवाद सत्यकामा३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S06_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच पृथिवी कलाऽन्तरिक्षं कला द्यौः कला समुद्रः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणोऽनन्तवान्नाम ॥ ३ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S06_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्ते अनन्तवानस्मिंल्लोके भवति अनन्तवतो ह लोकान् जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणोऽनन्तवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये षष्ठः खण्डः॥ ",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
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| "id": "CHU_C04_S07",
| |
| "type": "khanda",
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| "name": " सप्तमः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये सप्तमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "सप्तमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हंसरूपिणा चतुर्मुखब्रह्मणा प्रद्युम्नाख्यभगवद्रूपोपदेशः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "हंसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ् उपोपविवेश ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C04_S07_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तं हंस उपनिपत्याभ्युवाद सत्यकामा३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S07_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत् कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_V37",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिंल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकान् जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये सप्तमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C04_S08",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " अष्टमः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये अष्टमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "अष्टमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मद्गुरूपिवरुणेन अनिरुद्धरूपोपदेशः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S08_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मद्गुष्टे(मद्गुः ते) पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ् उपोपविवेश ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S08_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद सत्यकामा३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S08_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राणः कला चक्षुः कला श्रोत्रं कला मनः कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मण आयतनवान्नाम ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S08_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते आयतनवानस्मिंल्लोके भवत्यातनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः आयतनवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये अष्टमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S09",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " नवमः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये नवमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "नवमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S09_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राप हाऽचार्यकुलं तमाचार्योऽभ्युवाद सत्यकामा३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S09_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वाऽनुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवांस्त्वेव मे कामे ब्रूयात् ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S09_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्य आचार्यद्ध्येव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयतीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किञ्चन वीयायेति वीयायेति ॥ ३ ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C04_S09_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S09_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘वायुर्वृषभरूपः सन्नग्निर्हंसश्चतुर्मुखः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मद्गुरूपश्च वरुणः सत्यकामाय होचिरे ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रकाशानन्ततेजोवत्स्थानवत्सञ्ज्ञिका(सञ्ज्ञका) हरेः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वासुदेवादिका मूर्तीः प्रत्येकं चतुरात्मनः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दिगादिषु स्थितास्तेषामधिपाश्च तदाख्यकाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नाऽचार्यबुध्या तैरुक्तमतोऽनुज्ञां गुरोरगात् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उत्तमाचार्यसम्प्राप्त्यै नावराचार्यतः क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इच्छेदनुज्ञां श्रुत्वाऽपि नानुज्ञां प्रार्थयेत् ततः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋषिभ्यस्तूत्तमा देवा देवेभ्यो वायुरुत्तमः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वायोश्च भगवान् विष्णुर्न तस्मादुत्तमो गुरुः ॥’ इत्याचार्यसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्र ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ह न किञ्चन वीयाय",
| |
| "tail": " । देवेभ्यः श्रुत्वा न च ते(न ते) काचिद्धानिरभवदित्यर्थः ॥ ५-९ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये नवमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S10",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " दशमः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये दशमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "दशमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S10_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "उपकोसलोपाख्यानम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास तस्य ह द्वादश वर्षाण्यग्नीन् परिचचार स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयंस्तं ह स्मैव न समावर्तयति ॥१॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S10_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं जायोवाच तप्तो ब्रह्मचारी कुशलमग्नीन् परिचचारीन् मा त्वाऽग्नयः परिप्रवोचन् प्रब्रूह्यस्मा इति तस्मै हाप्रोच्यैव प्रवासाञ्चक्रे ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S10_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अग्निभिः कृतः मुख्यप्राणपरब्रह्मोपदेशः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स ह व्याधिनाऽनशितुं दध्रे तमाचार्यजायोवाच ब्रह्मचारिन्नशान किं नु नाश्नासीति स होवाच बहव इमेऽस्मिन्(बहवो ह्यस्मिन् .हृ) पुरुषे कामा नानात्यया व्याधिभिः परिपूर्णोऽस्मि(प्रतिपूर्णोऽस्मि) नाशिष्यामीति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S10_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हाग्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं नः (परि चचारीत्)पर्यचचारीद्धन्तास्मै प्रब्रवामेति तस्मै होचुः ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S10_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामीति ते होचुर्यद्वाव कं तदेव खं यदेवं खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः ॥ ५ ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C04_S10_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S10_V05_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "प्राणो ब्रह्म",
| |
| "tail": " बलरूपं ब्रह्म । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "कम्",
| |
| "tail": "आनन्दरूपम् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "खं",
| |
| "tail": " ज्ञानरूपम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अपरब्रह्म(अपरं ब्रह्म) स प्राणः साक्षाद्यो बलदेवता ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानानन्दात्मकं पूर्णं परम्ब्रह्म स्वयं हरिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नैजानन्दबलोद्रेकः कमित्युक्तो मनीषिभिः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बलज्ञानसमाहारः पूर्णः खमिति शब्दितः(पूर्णं खमिति शब्दितम्)।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदात्मकः परो विष्णुराकाश इति कीर्तितः।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं प्राणस्तथाऽऽकाशो ब्रह्मणी द्वे प्रकीर्तिते ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणशब्दस्य वायुरर्थः प्रसिद्धः । कखयोर्भिन्नार्थत्वाशङ्कया(भिन्नवस्तुत्वाशङ्काया) ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "कं च खं च न विजानामि",
| |
| "tail": " इत्याह । अत एवैक्याभिप्रायेण "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कम्",
| |
| "tail": " इत्यूचुः ॥ १० ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये दशमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S11",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " एकादशः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये एकादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "एकादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S11_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "गार्हपत्याग्निना पृथिव्यादिस्थभगवदुपदेशः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इति य एष आदित्ये पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S11_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये एकादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S12",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वादशः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये द्वादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S12_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अन्वाहार्यपचनाग्निना जलादिस्थभगवदुपदेशः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशासाऽपो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S12_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥१२॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये द्वादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S13",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " त्रयोदशः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये त्रयोदशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "त्रयोदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S13_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "आहवनीयाग्निना प्राणादिस्थभगवदुपदेशः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हैनमाहवनीयोऽनुशशास प्राण आकाशो द्यौर्विद्युदिति य एष विद्युति पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S13_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥१३॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C04_S13_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S13_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘पृथुत्वात् पृथिवी विष्णुरग्निश्चाप्यङ्गनेतृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्नमत्तृत्वतो नित्यमादित्यश्चादिरूपतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आप आपालनाच्चैव देशनाद्दिश एव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनन्यराजो नक्षत्रमानन्दत्वाच्च चन्द्रमाः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणोऽसौ बलरूपत्वादाकाशः पूर्तिहेतुतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "द्यौः प्रकाशस्वरूपत्वाद् वेदनाद् विद्युदेव च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यः सोमसूर्यविद्युत्सु(सूर्यसोमविद्युत्सु) तत्तन्नामा हरिः परः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अहेयत्वादहंनामा गार्हपत्यादिसंस्थितः ॥’ इति तत्त्वसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "‘सोऽहमस्मि’ इति वाक्यस्य जीवब्रह्मैक्यपरत्वनिरासः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवैक्यपक्षे आदित्ये पुरुषं चन्द्रमसि विद्युतीति भेदव्यपदेशो न युज्यते । ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "‘पृथिव्यग्निरन्नमादित्यः’",
| |
| "tail": ", "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "‘आदित्ये पुरुषः’ ",
| |
| "tail": "इत्यादिना आदित्यादिशब्दवाच्यौ प्रथमार्थः सप्तम्यर्थश्च द्वौ प्रतीयेते । अतो नैक्यमुच्यते । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "‘स एवाहमस्मि’",
| |
| "tail": "इत्यन्तर्यामिणोः सर्वविशेषाभावज्ञापनार्थम् । पूर्वं "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "‘सोऽहमस्मि’",
| |
| "tail": " इत्यभेदे तात्पर्याधिक्यज्ञापनाय ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अहमस्म्यादिकाः शब्दा अन्तर्यामिणि मुख्यतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्सम्बन्धाज्जीवगाश्च तस्माद् वेदगता हरौ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अस्मच्छब्दोदितोऽन्तःस्थ आत्मा व्याप्तो जनार्दनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अग्नयो द्विविधं विष्णुमवोचन्नुपकोसले ॥’ इति सामसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते ",
| |
| "tail": "भृत्यवानेव भवति । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "लोकी ",
| |
| "tail": "भगवल्लोकी "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "भवति",
| |
| "tail": " ॥ १३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये त्रयोदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S14",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्दशः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये चतुर्दशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्दशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S14_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "उपकोसलमुखे ब्रह्मवर्चः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते होचुरुपकोसलैषा सोम्य तेऽस्मद्विद्याऽऽत्मविद्या चाऽचार्यस्तु ते गतिं वक्तेत्याजगाम हास्याचाऽर्यस्तमाचार्योऽभ्युवादोपकोसला ३ इति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S14_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वाऽनुशशासेति को नु माऽनुशिष्याद् भो इतीहावेव निह्नुत इमे नूनमीदृशा अन्यादृशा इतीहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किल तेऽवोचन्निति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S14_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "चक्षुरन्तःस्थभगवदुपासनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान् वाव किल सोम्य तेऽवोचन्नहं तु ते तद् वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवं विदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच ॥ ३ ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C04_S14_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S14_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इह च अव च(अवं च) ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "इहावे",
| |
| "tail": "। इहेति मनुष्यलोकस्था उच्यन्ते, अवेति पातालस्थाः(पाताळस्थाः) । मानुषासुरौ भगवन्तं "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "निह्नुत",
| |
| "tail": " एव न वक्तुं समर्थौ । अतो देवा एव मामनुशशासुरित्यर्थः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ईदृशा",
| |
| "tail": " इति वर्णतो ज्वालावर्णा इति । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अन्यादृशाश्च",
| |
| "tail": " करशिरश्चरणादिमन्तः । चन्द्रादिसर्वनामवत्वात् । ‘यो देवानां नामधा एक एव’ इति श्रुतेर्विष्णोरेव सर्वनामानि ॥ १४ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये चतुर्दशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S15",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " पञ्चदशः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये पञ्चदशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "पञ्चदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S15_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "चक्षुरन्तःस्थभगवद्विद्या",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मैतस्मिन्न किञ्चन श्लिष्यति तद् यदस्मिन् सर्पिवोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S15_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": " चक्षुरन्तःस्थभगवन्नामानि",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतं संयद्वाम इत्याचक्षत एतं हि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति सर्वाण्येनं वामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S15_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एष उ एव वामनिरेष हि सर्वाणि वामानि नयति सर्वाणि वामानि नयति य एवं वेद ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S15_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एष उ एव भामनिरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S15_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अर्चिरादिमार्गः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदु चैवास्मिञ्च्छव्यं कुर्वन्ति यदु(यदि .हृ) च नार्चिषमेवाभिसम्भवन्ति(अभिसंविशन्ति) अर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षडुदंङ्ङेति मासांस्तान् मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो मानवः स एनान् ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन खलु प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नाऽवर्तन्ते नाऽवर्तन्ते ॥ ५ ॥ १५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C04_S15_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S15_V05_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असङ्गभगवत्स्थानत्वाच्चक्षुषोऽसङ्गत्वमुच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यत्स्थानत्वादिदं चक्षुरसङ्गं सर्ववस्तुषु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मै नमो भगवते वामनाय परात्मने ॥’ इति च महाकौर्मे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "इमं मानवमावर्तं नाऽवर्तन्ते ",
| |
| "tail": "। मानवा यत्रावर्तन्ते स मानवावर्तः । तं मानवावर्तं प्रति नावर्तन्ते ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘चक्षुस्थं वामनं वेद स पुनर्नैव जायते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मुक्तो दुस्तरसंसाराद् वामनं प्राप्नुतेऽचिरात्॥’ इति च ॥ १५ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये पञ्चदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S16",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " षोडशः खण्डः ",
| |
| "title": "चतुर्थाध्याये षोडशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "षोडशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S16_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "यज्ञनामकवायुदेवस्य पादपूजा",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एष ह वै यज्ञो योऽयं पवत एष यन्निदं सर्वं पुनाति यदेष यन्निदं सर्वं पुनाति तस्मादेष एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक् च वर्तनी ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S16_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तयोरन्यतरां मनसा संस्करोति(संस्कारः) ब्रह्मा वाचा होताऽध्वर्युरुद्गाताऽन्यतरांस यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यपवदति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S16_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्यतरामेव वर्तनीं संस्कुर्वन्ति हीयतेऽन्यतरा स यथैकपाद् व्रजन् रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यत्येवमस्य यज्ञो रिष्यति यज्ञं रिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति स इष्ट्वा पापीयान् भवति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S16_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यवदत्युभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S16_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यथोभयपाद् व्रजन् रथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान् भवति ॥ ५ ॥ १६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C04_S16_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S16_V05_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यज्ञाभिमानी यज्ञाख्यो वायुर्यज्ञे प्रतिष्ठितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ज्ञ शुद्धभाव इत्यस्माद् यन्नयं पावयेद् यतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतो वायुर्यज्ञनामा तत्पादौ वाङ्मनःस्थितौ ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दक्षिणोऽस्य मनःसंस्थो ब्रह्मर्त्विक् तस्य पूजकः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "होत्राद्या वाचि संस्थस्य(श्च) वामपादस्य पूजकाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मात् प्रातरनूवाकपरिधान्योर्यदन्तरा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मा चेदुत्सृजेद् वाचं यज्ञपाल्लोपकृद्(लोककृत्) भवेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वाङ्मनःपादयज्ञाख्यप्रतिमो वायुरीरितः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ध्यायन् वायुं हरिं चैव ततो ब्रह्मा मुनिर्भवेत् ॥ १६ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये षोडशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
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| "id": "CHU_C04_S17",
| |
| "type": "khanda",
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| "name": " सप्तदशः खण्डः ",
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| "title": "चतुर्थाध्याये सप्तदशः खण्डः "
| |
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| "text": "\n \n ",
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| "children": [
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| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "सप्तदशः खण्डः ",
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| |
| },
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| |
| },
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| "tag": "line",
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| "text": "प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेषां तप्यमानानां रसान् (प्रावहद्)प्राबृहद् अग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षादादित्यं दिवः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| },
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| "children": [
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| "text": "स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत् तासां तप्यमानानां रसान् प्राबृहद्(प्रावृहद्)अग्नेर्ऋचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
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| {
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| "children": [
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| "text": "स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत् तस्यास्तप्यमानाया रसान् प्राबृहद्(प्रावृहद्) भूरित्यृग्भ्यो भुव इति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
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| }
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| |
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| |
| "children": [
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| "text": "ऋत्विजां कर्मभङ्गे व्याहृतिहोमः प्रायश्चित्तम्",
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| {
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| "text": "तद् यद्यृक्तो रिष्येद् भूः स्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयाद् ऋचामेव तद्रसेनर्चां वीर्येणर्चां यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| {
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| "text": "अथ यदि यजुष्टो रिष्येद् भुवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयाद् यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति ॥ ५ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "id": "CHU_C04_S17_V06",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "अथ यदि सामतो रिष्येत् स्वः स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात् साम्नामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति ॥ ६ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C04_S17_V07",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तद् यथा लवणेन सुवर्णं सन्दध्यात् सुवर्णेन रजतं रजतेन त्रपु त्रपुणा सीसं सीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा ॥ ७ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "id": "CHU_C04_S17_V08",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "text": "एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविद् ब्रह्मा भवति ॥ ८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S17_V09",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एष ह वा उदक्प्रवणो यज्ञो यत्रैवंविद् ब्रह्मा भवत्येवंविदं ह वा एषा ब्रह्माणमनुगाथा यतो यत आवर्तते तत्तद् गच्छति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मानवो ब्रह्मैवैकर्त्विक् कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥ ९ ॥ १७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थोऽध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
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| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C04_S17_V09_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "‘अग्निर्नासिक्यवायुश्च सूर्यो लोकरसाह्वयः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अग्ने रसस्तु ऋग्वेदमानी ब्रह्मा प्रकीर्तितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "नासिक्यवायोस्तु रसो यजुर्वेदात्मको हरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सामवेदाभिमानी तु वायुः सूर्यरसः स्मृतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वराहसिंहकपिलास्तेषां भूरादिनामकाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "व्याहृतीभिस्ततो जुह्वन् ब्रह्मैवंविद् विरिष्टितः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वान् स ऋत्विजो रक्षेद् ब्रह्मैवंवित् ततो भवेत् ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "उदक्प्रवण",
| |
| "tail": " ऊर्ध्वप्रवणः ऊर्ध्वलोकानुसारी । यज्ञस्य दुरिष्ट्या "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "यतो यतः",
| |
| "tail": " स्थानाद्"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "आवर्तते तत्तत् ",
| |
| "tail": "स्थानमेवंविदा ब्रह्मणा "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "गच्छति",
| |
| "tail": " । तद् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "ब्रह्मैवैकर्त्विक् । कुरून्",
| |
| "tail": " कर्तॄन् यजमानादीन् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अभिरक्षति",
| |
| "tail": " । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "अश्वा",
| |
| "tail": " आशुज्ञानी । ‘वा= गतिगन्धनयोः’इति धातोः । गतिशब्दश्चावगतौ भवति । ‘दीर्घबिन्दुविसर्गादीनां लोपो वा’ इति सूत्रादाशुवैवाश्वा ॥ १७ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थाध्याये पञ्चदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
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| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमच्छन्दोग्योपनिषद्भाष्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "chapter",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05",
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| |
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| "children": [
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| {
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| "text": "पञ्चमोऽध्यायः",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C04_S01",
| |
| "type": "khanda",
| |
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| |
| "title": "पञ्चमोऽध्याये प्रथमः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| |
| "text": "प्रथमः खण्डः ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
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| |
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| |
| "children": [
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| "text": "इन्द्रियाभिमानिनां मुख्यप्राणाधीनत्वनिरूपणम्",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥",
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| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S01_V02",
| |
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
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| {
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| "text": "यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग् वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S01_V03",
| |
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| {
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| "text": "यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥",
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| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
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| |
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| "adhikarana": ""
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| "text": "यो ह वै सम्पदं वेद सं हास्मै कामाः सम्पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव सम्पत् ॥ ४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
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| |
| "id": "CHU_C05_S01_V05",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "tag": "bhashya",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "यः श्रेष्ठं ज्येष्ठमखिलदेवानां(श्रेष्ठज्येष्ठमखिलदेवानां) वायुमञ्जसा ।",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वेद स स्वसमानानां ज्येष्ठः श्रेष्ठो विमुक्तिगः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समीपे वसतां श्रेष्ठो वसिष्ठस्यैव वेदनात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एकस्थाने स्थितिस्तु स्यात् प्रतिष्ठाज्ञस्य चेच्छतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सम्पद्वेत्तुः सम्पदः स्युर्गृहं चाऽयतनं विदः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S01_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ ह प्राणा अहं श्रेयसि व्यूदिरेऽहं श्रेयानस्म्यहं श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S01_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन् को नः श्रेष्ठ इति तान् होवाच यस्मिन् व उत्क्रान्ते इदं शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S01_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सा ह(च) वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथाऽकला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चचक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S01_V09",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथाऽन्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S01_V10",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्रोत्रं होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिराः अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S01_V11",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S01_V12",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ ह प्राणः उच्चिक्रमिषन् स यथा सुहयः पट्वीशशङ्कून् सङ्खिदेदेवमितरान् प्राणान् समाखिदत् तं हाभिसमेत्योेचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S01_V13",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठाऽस्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसीति ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S01_V14",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हैनं श्रोत्रमुवाच यदहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीत्यथ हैनं मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S01_V15",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C05_S01_V15"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S01_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्येष्ठः श्रेष्ठो वसिष्ठश्च सम्पदायतनं तथा ॥",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वायुरेव महांस्तस्य प्रसादादग्निरेव तु ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपचारतो वसिष्ठः(उपचावसिष्ठः .हृ) स्यात् प्रतिष्ठैवं रविस्ततः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सम्पदिन्द्रस्तथैवोक्तो रुद्र आयतनं तथा ॥’ इति प्रभावे(प्राभवे .हृ) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सर्वेन्द्रियाणां व्यापारान् प्राण एव करोत्ययम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " इन्द्रियस्थः पृथक्चासौ शक्तोऽपि स्वयमेव तु ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "इन्द्रियनियामकतया मुख्यप्राणस्यऽवश्यकता",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "षण्मासात् पूर्वबालानां(पूर्वं बालानां) केवलं प्राणतो (केवलप्राणतो) भवेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "व्यापार्यं मनसा सर्वमतः पश्चादसंस्मृतिः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तुरीयायामवस्थायां प्राणादेव विबोधनम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तथापि संस्मृतिस्तत्र प्राणवश्यतया भवेत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणस्य वश्यतानाम तद्भक्त्या स्यात् तत्प्रसादतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राणे वश्ये मनो वश्यमिन्द्रियाणि च सर्वशः ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये प्रथमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वितीयः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये द्वितीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वितीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अस्माभिरद्यमानं सर्वं मुख्यप्राणस्यान्नसमर्पणमेव",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किञ्चिदिदमाश्वभ्य आशकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किञ्चनानन्नं भवतीति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C05_S02_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अक्षेषु प्रति प्रति स्थितत्वादनः प्रत्यक्षम् ।",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "रुद्रस्यैैव मुख्यतया सर्वभोक्तृत्ववर्णनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्राणविज्ञानयोग्यस्तु रुद्रो मुख्यतया स्मृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मात् स सर्वभोक्ता स्यात् तदन्येषां स्वयोग्यतः॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "भोजनपूर्वोत्तरयोरापोशनं प्राणदेवस्य वस्त्रसमर्पणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C05_S02_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सिद्धमेवान्नवस्त्राद्यं विष्णोः स्वातन्त्र्यतः सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वार्थं समर्पयेद् विष्णौ यथा प्राणे सुराः पुरा॥’ इति कर्मानुपूर्व्याम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्राणस्य वस्त्रबुद्ध्या तु भोजनोभयतः पिबन् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वर्गे मुक्तौ तथा दिव्यवस्त्रलाभी भवत्यलम् ॥’ इति प्रभञ्जने ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "प्राणतत्त्वज्ञानस्य मोक्षसाधनत्विरपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्धैतत् सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये (वैय्याघ्र .हृ)वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C05_S02_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘योग्यस्य प्राणविद्यायाः(यां) स्थाणोरपि हि तच्छ्रुतेः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पलाशाद्यं भवेदत्र परतो मुक्तिरेव च ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णोर्ज्ञानमनुप्राप्य भवेन्नास्त्यत्र संशयः ॥’ इति प्राणसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मन्थहोमेन महत्त्वप्राप्तिकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदि महज्जिगमिषेदमावास्यायां दीक्षित्वा पौर्णमास्यां रात्रौ सर्वौषधस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् सम्पदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यास्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C05_S02_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02_V05_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘ज्येष्ठश्रेष्ठादिकैर्हुत्वा प्राणायात्र परत्र च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ज्येष्ठः श्रेष्ठः समानेभ्यो भवेन्नात्र विचारणा ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ मन्थमाधाय जपत्यमो नामास्यमा हि ते सर्वमिदं स हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाधिपतिः स मा ज्यैष्ठ्यं श्रैष्ठ्यं राज्यमाधिपत्यं गमयत्यहमेवेदं सर्वमसानीति ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति तत्सवितुर्वृणीमह इत्याचामति वयं देवस्य भोजनमित्याचामति श्रेष्ठं सर्वधातममित्याचामति तुरं भगस्य धीमहीति सर्वं पिबति निर्णिज्य कंसं चमसं वा पश्चादग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः स यदि स्त्रियं पश्येत् समृद्धं कर्मेति विद्यात् ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेष श्लोकः–",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने तस्मिन् स्वप्न निदर्शन इति ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C05_S02_V08"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S02_V08_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "सवितुः",
| |
| "tail": " जगत्प्रसवितुर्विष्णोः सकाशाद् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "वयं भोजनं",
| |
| "tail": " रक्षां सर्वभोगांश्च वृणीमहे । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "Moola"
| |
| },
| |
| "text": "भगस्य",
| |
| "tail": " समग्रैश्वर्यादिसर्वगुणस्वरूपस्य विष्णोः । पुरुषं तुरं वायुं श्रेष्ठं सर्वधातॄणां उत्तमं च धीमहि ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘नारायणीयं तं वायुं चिन्तयित्वोत्तमोत्तमम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जगत्प्रसवितुर्विष्णोः सकाशाद् भोगमाप्नुमः ॥’ इति च ॥ १२ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये द्वितीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S03",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " तृतीयः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये तृतीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "तृतीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S03_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "देवयानपितृयान(ण)मार्गनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्वेतकेतुर्हाऽरुणेयः पञ्चालानां समितिमेयाय तं ह प्रवाहणो जैबलिरुवाच कुमारानु(कुमार .हृ) त्वाऽशिषत्(अनुशिषत् .हृ) पितेत्यनु हि भगव इति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S03_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति न भगव इति वेत्थ यथा पुनरावर्तन्ता३ इति न भगव इति वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति न भगव इति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S03_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वेत्थ यथाऽसौ लोको न सम्पूर्यता३ इति न भगव इति वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति इति नैव भगव इति ॥३॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S03_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ नु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात् कथं सोऽनुशिष्टो ब्रवीतेति स हाऽयस्तः पितुरर्धमेयाय तं होवाचाननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाऽशिषमिति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S03_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत् तेषां नैकं च नाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं (तत .रा)तातैतानवदो यथाऽहमेषां नैकं च न वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S03_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हाञ्चकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तं होवाच मानुषस्य भगवान् गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति स होवाच तवैव राजन् मानुषं वित्तं यामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तामेव मे ब्रूहीति स ह कृच्छ्री बभूव॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S03_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " तं ह चिरं वसेत्याज्ञापयाञ्चकार तं होवाच यथा मा त्वं गौतमावदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान् गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ॥ ७ ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये तृतीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C05_S04",
| |
| "type": "khanda",
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| "name": " चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये चतुर्थः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्थः खण्डः ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S04_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "gadya",
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| "text": "पञ्चााग्निविद्या",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्याऽदित्य एव समिद् रश्मयो धूमोऽहरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S04_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा सम्भवति ॥ २ ॥ ४ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये चतुर्थः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S05",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये पञ्चमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S05_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
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| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "पर्जन्यो वा गौतमाग्निः तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादुनयो विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C05_S05_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुतेः वर्षः सम्भवति ॥ २ ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये पञ्चमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C05_S06",
| |
| "type": "khanda",
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| "name": " षष्ठः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये षष्ठः खण्डः "
| |
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "षष्ठः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S06_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| |
| "children": [
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| "text": "पृथिवी वाव गौतमाग्निः तस्य संवत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रिरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S06_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्षं जुह्वति तस्या आहुतेरन्नं सम्भवति ॥ २ ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये षष्ठः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C05_S07",
| |
| "type": "khanda",
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| "name": " सप्तमः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये सप्तमः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "section-heading",
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| "text": "सप्तमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S07_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव समित् प्राणो धूमो जिह्वाऽर्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S07_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुते रेतः सम्भवति ॥ २ ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये सप्तमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C05_S08",
| |
| "type": "khanda",
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| "name": " अष्टमः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये अष्टमः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "अषष्टमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S08_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योषा वाव गौतमाग्निः तस्या उपस्थ एव समिद् यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S08_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुतेर्गर्भः सम्भवति ॥ २ ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये अष्टमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S09",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " नवमः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये नवमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "नवमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S09_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा मासानन्तः शयित्वा यावद्वाऽथ जायते ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S09_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स जातो यावदायुषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः सम्भूतो भवति ॥ २ ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C05_S09_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "नारायणादिपञ्चभगवद्रूपाण्येव पञ्चाग्नयः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S09_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘नारायणादयः पञ्च क्रमात् पञ्चाग्नयः स्मृताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अदनादगनेतृत्वात्(अदनादङ्गनेतृत्वात्) नितरामचलत्वतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समेधनात् समिद् विष्णुर्धूत्काराद् धूम उच्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अरं चितत्वादर्चिश्च सोऽङ्गारोऽङ्गरतेरपि ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विविधं स्फुरणाच्चैव विष्फुलिङ्ग इतीरितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पुनर्नारायणाद्यात्मा प्रत्येकं पञ्चरूपवान् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदित्यस्स तथाऽऽदानाद् रश्मिः स रतिरूपतः(रश्मी रतिशरूपतः) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तमसाऽहननीयत्वाद् अहश्चन्द्रः परं सुखम्(परः सुखम्) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनन्यराजो नक्षत्रं वायुर्ज्ञानायुरूपतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अभ्रमब्भरणाद्विष्णुर्विद्युद् विद्योतनादपि ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अशनादशनिश्चैव (निह्रादाद्)निर्हादाद् (ह्रा)ध्रादुनिस्तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "संवत्सरो वासनाच्च स आकाशः प्रकाशनात् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "रात्रिश्च रतिदानात् स दिशतीति दिशः स्मृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अवान्तरं दिशेद् यस्माद् अवान्तरदिगुच्यते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वचनाद् वाक् तथा प्राणस्त्वननाच्चक्षुरुच्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दर्शनाच्छ्रवणाच्छ्रोत्रं जिह्वा वै होमतः स्मृतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपस्थितेरुपस्थः स उपमन्त्रकृदेव सः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "योनिर्युनक्ति यस्मात् स सर्वान्तःकृच्च(स चान्तःकृच्च .हृ) नन्दनः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "असौ लोकः प्रकाशत्वात् प्राणस्थत्वाच्च केशवः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पर्जन्यो जनको यस्मात् पृथिवी प्रथितत्वतः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पुरुषः पुरु यस्मात् स योषा जोष्यो यतोऽखिलैः ॥’ इति सामसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये नवमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S10",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " दशमः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये दशमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "दशमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S10_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "ज्ञानिनां देवयानेन ब्रह्मप्राप्तिः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्य इत्थं विदुर्ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युुपासते तेऽर्चिषमभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षडुुदङ् एति मासांस्तान् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S10_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो मानवः स एतान् ब्रह्म गमयत्येष देवयानः पन्था इति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S10_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "काम्यकर्मिणां पितृयाणेन स्वर्गप्राप्तिः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ य इमे ग्राम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसम्भवन्ति धूमाद् रात्रिं रात्रेरपरपक्षमपरपक्षाद् यान् षड् दक्षिणैति मासांस्तान्नैते(मासांस्तानेति .हृ) संवत्सरमभिप्राप्नुवन्ति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमसमेष सोमो राजा तद्देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S10_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्मिन् यावत्सम्पातमुषित्वाऽथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतमाकाशमाकाशाद् वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S10_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिला माषा इति जायन्ते ततो वै खलु दुर्निष्प्रपतनं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S10_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाऽथ य इह कपूरचरणाः अभ्याशो ह (एते)यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S10_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथैतयोः पथोर्नैकतरेण(पथोर्न कतरेण .हृ) च न तानीमानि क्षुद्रमिश्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत् तृतीयं स्थानं तेनासौ लोको न सम्पूर्यते तस्माज्जुगुप्सेत तदेषश्लोकः ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S10_V09",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन् ब्रह्महा च । एते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरंस्तु तैरिति ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S10_V10",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन् वेद न स ह तैरप्याचरन् पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यश्लोको भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ १० ॥ ३१० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C05_S10_V10"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S10_V10_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "‘अभ्रधूमादिभावस्तु जीवस्याभ्रादिसंस्थितिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अभ्रादिमानिरूपं तु ज्ञानप्राप्यं(ज्ञानिप्राप्यं) यतो भवेत् ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S10_V10_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परम् अस्य जन्यमिति पर्जन्यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘पञ्च पञ्च स्वरूपेण सूर्यादौ संस्थितो हरिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वर्गादौ चापि तन्नामा तद्योगान्नामिनः परे ॥’ इति च ॥ ३१० ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये दशमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S11",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " एकादशः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये एकादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "एकादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S11_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वैश्वानरविद्याज्ञातारो दुर्लभाः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसाञ्चक्रुः को न आत्मा किं तद्ब्रह्मेति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S11_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते ह सम्पादयाञ्चक्रुरुद्दालको वै भगवन्तोऽयमारुणिः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तं हन्ताभ्यागच्छामेति तं हाभ्याजग्मुः ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S11_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स ह सम्पादयाञ्चकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो न सर्वमिव प्रतिपत्स्ये हन्ताहमन्यमभ्यनुशासानीति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S11_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तान् होवाचाश्वपतिर्वै भगवन्तोऽयं कैकेयः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तं हन्ताभ्यागच्छामेति तं हाभ्याजग्मुः ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S11_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयाञ्चकार स ह प्रातः सञ्जिहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपो नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतो यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद् भगवद्भ्यो दास्यामि वसन्तु भगवन्त इति ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S11_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत् तंहैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानरं सम्प्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहीति ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S11_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तान् होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्ताऽस्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्ने प्रतिचक्रमिरे तान् हानुपनीयैवैतदुवाच ॥ ७ ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C05_S11_V07"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S11_V07_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्रत्यब्दयज्ञकृत्सम्यङ्महाशालः प्रकीर्तितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वेदवेदार्थवित् सम्यङ्महाश्रोत्रिय उच्यते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये एकादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S12",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वादशः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये द्वादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S12_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वैश्वानरस्य शिरो द्युनामकमिति नीरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S12_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
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| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| "text": "क्रीडात्मकत्वाद्व्याख्यं च(द्यौश्चैव .हृ) सुतेजाश्चातितेजसा ।",
| |
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| |
| {
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| |
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| |
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| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये द्वादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C05_S13",
| |
| "type": "khanda",
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| "name": " त्रयोदशः खण्डः ",
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| "title": "पञ्चमाध्याये त्रयोदशः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "त्रयोदशः खण्डः ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "text": "वैश्वानरस्य चक्षुरादित्यनामकमिति निरूपणम्",
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| "children": [
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| "text": "अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुषिं प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
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| |
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्ट्वेतदात्मन इति होवाचान्धोऽभविष्यो (यद्) यन्मां नाऽगमिष्य(तः) इति ॥ २ ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "................. सर्वरूपातिदार्शनात् ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "चक्षुस्तु विश्वरूपाख्यमादानादायुषामपि ।",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "आदित्याख्यं च सूर्यस्याप्याश्रयं सर्वदा स्मृतम् ॥"
| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये त्रयोदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "CHU_C05_S14",
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| "type": "khanda",
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| "name": " चतुर्दशः खण्डः ",
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| "title": "पञ्चमाध्याये चतुर्दशः खण्डः "
| |
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| "text": "\n \n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
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| "text": "चतुर्दशः खण्डः ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| "text": "वैश्वानरस्य प्राणो वायुनामक इति निरूपणम्",
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै पृथग्वर्त्माऽऽत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वां पृथग्वलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १४ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
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| "tail": "\n "
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "वाय्वादिप्राणशक्यं न यत्तत्कर्ता हरेर्यतः ।",
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| "tail": "प्राणस्तेन पृथग्वर्त्मा वायुर्ज्ञानायुरूपतः ॥"
| |
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| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "text": "वायोरप्याश्रयो नित्यं .................",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये चतुर्दशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S15",
| |
| "type": "khanda",
| |
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| |
| "title": "पञ्चमाध्याये पञ्चदशः खण्डः "
| |
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| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "पञ्चदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S15_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
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| "text": "वैश्वानरस्य शरीरमध्यभाग आकाशनामक इति निरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ होवाच जनं शार्कराक्ष्यं शार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S15_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते सन्दोहस्त्वेष आत्मन इति होवाच सन्दोहस्त व्यशीर्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १५ ॥",
| |
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| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
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| |
| "children": [
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| "tag": "bhashya",
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| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "................. बहुत्वाद् बहुलः स्मृतः ।",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "आकाशनामा चाऽदीप्तेर्मध्यदेहो रमापतेः ॥"
| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये पञ्चदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| "type": "khanda",
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| "title": "पञ्चमाध्याये षोडशः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "षोडशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S16_V01",
| |
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "text": "वैश्वानरस्य कटिप्रदेशोऽम्नामक इति निरूपणम्",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "id": "CHU_C05_S16_V01",
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| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं रयिमान् पुष्टिमानसि ॥ १ ॥",
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| |
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| "tail": "\n "
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| |
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| {
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेव(न)मात्मानं वैश्वानरमुपास्ते वस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच वस्तिस्ते व्यभेत्स्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १६ ॥",
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| }
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| {
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| "id": "CHU_C05_S16_V02_B01"
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| {
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| "children": [
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| "tag": "br",
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| }
| |
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये षोडशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
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| |
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| "title": "पञ्चमाध्याये सप्तदशः खण्डः "
| |
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| "text": "\n \n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "section-heading",
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| "text": "सप्तदशः खण्डः ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
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| |
| "id": "CHU_C05_S17_V01",
| |
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| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वैश्वानरपादयोः पृथिवीनामकत्वकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम कं त्वमात्मानमुपास्स इति पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै प्रतिष्ठाऽऽत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_17_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
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| |
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| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "attrs": {
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| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "प्रथनात् पृथिवीनामा(पृथिवी नाम्ना) प्रतिष्ठा च प्रतिष्ठितेः ।",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पादौ भगवतो विष्णोः पृथिव्याश्रय एव च ॥"
| |
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| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उत्तमानां हि पादेन सर्वं रूपं हि कथ्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णोः पदमिति ह्यस्मात् प्रथितिर्वैदिकी स्मृता ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये सप्तदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S18",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " अष्टादशः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये अष्टादशः खण्डः "
| |
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "अष्टादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
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| |
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| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "हृत्कमले वैश्वानरः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तान् होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वांसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S18_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य ह वा एतस्याऽत्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्त्मा सन्दोहो बहुलो वस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥ २ ॥ १८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये अष्टादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C05_S19",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " एकोनविंशः खण्डः ",
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| "title": "पञ्चमाध्याये एकोनविंशः खण्डः "
| |
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "section-heading",
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| "text": "एकोनविंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S19_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "gadya",
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| "text": "‘प्राणाय स्वाहा’ इत्याहुतेः फलनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्यद् भक्तं प्रथममागच्छेत् तद्धोमीयं स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात् तां जुहुयात् प्राणाय स्वाहेति प्राणस्तृप्यति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C05_S19_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यत्यादित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किञ्च द्यौश्चाऽदित्यश्चाधितिष्ठतस्तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ १९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| |
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| |
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
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| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "प्राणश्चक्षुस्तथाऽऽदित्य इत्येका देवता स्मृता ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पूर्वद्वारपतिर्विष्णोः ....................॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये एकोनविंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
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| "id": "CHU_C05_S20",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " विंशः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये विंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "विंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S20_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
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| "text": "‘व्यानाय स्वाहा’ इत्याहुतेः फलनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यां द्वितीयां जुहुयात् तां जुहुयाद् व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S20_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किञ्च दिशश्चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C05_S20_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S20_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "................. व्यानः श्रोत्रं च चन्द्रमाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दक्षिणद्वारपस्त्वेकः .........................",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये विंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| |
| "type": "khanda",
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| "name": " एकविंशः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये एकविंशः खण्डः "
| |
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| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "एकविंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S21_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "‘अपानाय स्वाहा’ इत्याहुतेः फलनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यां तृतीयां जुहुयात् तां जुहुयादपानाय स्वाहेति अपानस्तृप्यति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S21_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अपाने तृप्यति वाक् तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किञ्च पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २१ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C05_S21_V02"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S21_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "................. वागपानोऽग्निरेव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "पश्चिमद्वारपोऽप्येकः ................."
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये एकविंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "attrs": {
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| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वाविंशः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये द्वाविंशः खण्डः "
| |
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वाविंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S22_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "‘समानाय स्वाहा’ इत्याहुतेः फलनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यां चतुर्थीं जुहुयात् तां जुहुयात् समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S22_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत् तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किञ्च विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २२ ॥",
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| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C05_S22_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S22_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "................. समानो मन एव च ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इन्द्र इत्येक एवोक्त उत्तरद्वाररक्षकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये द्वाविंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S23",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " त्रयोविंशः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये त्रयोविंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "त्रयोविंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S23_V01",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "‘उदानाय स्वाहा’ इत्याहुतेः फलवर्णनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यां पञ्चमीं जुहुयात् तां जुहुयादुदानाय स्वाहेत्युदानस्तृप्यति ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C05_S23_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उदाने तृप्यति वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृप्यत्याकाशे तृप्यति यत्किञ्च वायुश्चाऽकाशश्चाधितिष्ठतस्तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C05_S23_V02"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S23_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "उदानो वायुरित्येक ऊर्ध्वद्वाराधिपश्च सः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एवाऽकाशनामा च लक्ष्म्याविष्टो विशेषतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पृथिवीनामिका श्रीस्तु द्यौर्दिशो विद्युदेव च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायुपत्नी समुद्दिष्टा तत्तद्द्वाराधिपाश्च ते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अधितिष्ठन्ति ते सर्वे नारायणमनामयम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद् विष्णुर्ज्ञानरूपत्वात् किमानन्दस्वरूपतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एतेषु तृप्तेषु हरिस्तृप्यत्येषां प्रियो ह्यसौ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वैश्वानरोपासकानां नानावर्गनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सूर्यप्रसादात्तु नराः पूर्वद्वारेण केशवम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राप्नुवन्त्यथ सोमस्य प्रसादात् पितरस्तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्वारेण दक्षिणेनैव गन्धर्वाः पश्चिमेन तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अग्निप्रसादाद् ऋषय उत्तरेणेन्द्रसंश्रयात् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शिवाद्या वायुमाश्रित्य यान्त्यूर्ध्वेण हरिं सुराः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वैश्वानराख्यविष्णोस्तु सम्यग्ज्ञानेन सर्वशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये त्रयोविंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C05_S24",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्विंशः खण्डः ",
| |
| "title": "पञ्चमाध्याये चतुर्विंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्विंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S24_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "ज्ञानपूर्वककर्मणः फलप्रदत्वनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति यथाऽङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात् तादृक् तत् स्यात् ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S24_V02 ",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S24_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद् यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मनः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S24_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादु हैवंविद् यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद् वैश्वानरे हुतं स्यादिति तदेष श्लोकः ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S24_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " एवं सर्वाणि भूतान्याग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत ॥ इति ॥ ५ ॥ ११२४ ॥ "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये चतुर्विंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमोऽध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C05_S24_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C05_S24_V05_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘वैश्वानरज्ञानयोग्याः साक्षादेव सुराः स्मृताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मात् तेषां फलं सर्वमन्येषां तु स्वयोग्यतः ॥’इति वैश्वानरविद्यायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘को न आत्मा किं ब्रह्म’(५.११.१), ‘सोऽयमात्मा चतुष्पाद्’(१.१.१), ‘स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः’(माण्डूक्य.??), ‘अों वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् अोम्’(ब्र.सू.१.२.२४), ‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः’(भ.गी.१४.१५) इत्यादेश्च वैश्वानरो विष्णुरिति सिद्धम् ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स वायुः स आकाशः’(५.१२.५), ‘वायुश्चाऽकाशश्चाधितिष्ठतः’(५.२३.२) इति वचनाद् वायो रूपमन्याधिष्ठितमाकाशाख्यं वायोः स्वरूपमिति विज्ञायते ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘आकाशनामा विघ्नेशो वायुश्चाकाशकः स्मृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " आकाश इति लक्ष्मीश्च तथाऽऽकाशो हरिः स्वयम् ॥’इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सुतेजोविश्वरूपादिभेदेनाङ्गानि मापतेः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अभिन्नान्यपि कथ्यन्ते लोकदृष्टिविभेदतः॥’ इति च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमाध्याये चतुर्विंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमच्छन्दोग्योपनिषद्भाष्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "chapter",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06",
| |
| "type": "adhyaya",
| |
| "name": "षष्ठोऽध्यायः"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "chapter-heading",
| |
| "text": "षष्ठोऽध्यायः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " प्रथमः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठोऽध्याये प्रथमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "प्रथमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "gadya",
| |
| "text": "श्वेतकेतुवृत्तान्तः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अों श्वेतकेतुर्हाऽरुणेय आस तं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यं न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "श्वेतकेतोरहङ्कारपरिहारः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तं ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातमिति । कथं नु भगवः स आदेशो भवतीति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "भगवति विज्ञाते सर्वं विज्ञातप्रायमिति निरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद् वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C06_S01_V05",
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| "adhikarana": ""
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा सोम्यैकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्याद् वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं लोहमणिरित्येव सत्यम् ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा सोम्यैकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्याद् वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं कार्ष्णायसमित्येव सत्यमेवं सोम्य स आदेशो भवतीति ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वै नूनं भगवन्तस्य(भगवंस्तस्य) एतदवेदिषुर्यद्येतद्(यद्ध्येतत्) अवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवांस्त्वेव मे तद् ब्रवीत्विति यथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C06_S01_V07"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01_V07_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अधीत्यब्दद्वादशत्वाद् द्वादशाब्द इतीरितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "श्वेतकेतुर्भारते तु नोत्पत्तिद्वादशत्वतः ॥’ इति वाक्यनिर्णये ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01_V07_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मृत्पिण्डादिदृष्टान्तानां प्रयोजनकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यथा मृत्पिण्डविज्ञानात् सादृश्यादेव मृन्मयः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विज्ञायन्ते तथा विष्णोः सादृश्याज्जगदेव च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा स्वर्णस्य विज्ञानात् सर्वे लोहमयास्तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राधान्याद्विष्णुविज्ञानाद्विज्ञातं स्याज्जगत् सदा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्यल्पेऽपि हि विज्ञाते सदृशे तादृशं बहु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ज्ञायते नखकृन्तन्या(नखनिकृन्तन्या .हृ) यथा सर्वमयोमयम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "किमु विष्णोर्बहोर्ज्ञानादत्यल्पं जगदीदृशम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अनन्याधीनविज्ञानादन्याधीनं तथैव च ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मृदयोलोहनाम्नां हि ज्ञानात् साङ्केतिकं यथा ॥’इत्यादिसामसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स्वर्णं लोहमणिश्चैव पुरटं चाभिधीयते’ इति शब्दनिर्णये ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01_V07_B03"
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मृत्पिण्डादिनिदर्शनानि नाद्वैतस्यानुकूलानि",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विकारत्वविवक्षायामेकपिण्डमणिशब्दा व्यर्था स्युः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01_V07_B04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘मृत्तिकेति’, ‘लोहमणिरिति’, ‘कृष्णायसमिति’(कार्ष्णायसमिति) अत्र ‘इति’शब्दा ‘नामधेय’शब्दाश्च व्यर्थाः स्युः । विकारमिथ्यात्विवक्षायां मृत्तिकैव सत्यं लोह एव सत्यं कार्ष्णायसमेव(कृष्णायसमेव) सत्यमित्येव स्यात् । न तु नामधेयादिशब्दाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01_V07_B05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च वाचारम्भणमात्रमिति मात्रशब्दोऽस्ति । न चाऽरम्भस्याऽरम्भणमिति युज्यते शब्दः । क्रिया ह्यारम्भणम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01_V07_B06"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अनादिः संस्कृतभाषा, इतरास्तु पश्चादागताः’ इति निरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतो वाचा नाम्नामारम्भणं विकारो विविधाकारो विक्रियमाणः । सत्यं नामधेयं सर्वदा विद्यमानं नामधेयं मृत्तिकेत्यादय इत्यर्थः । सत्त्वेन कालतस्ततं ज्ञायते विद्वद्भिरिति नित्यत्वेन प्रसिद्धमेव सत्यमित्यत्र विवक्षितम् । सङ्केतेन क्रियमाणानि ह्यन्यानि नामानि । अतो विकाररूपाणि । विकारशब्दस्य नियतपुल्लिङ्गत्वादारम्भणं विकार इति वेदाः प्रमाणमितिवद् युज्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S01_V07_B07"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "संस्कृतभाषातः इतरभाषाणां जननक्रमकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च मृत्तिकादिनामविकारः साङ्केतिकं नाम(साङ्केतिकनाम) । प्राधान्यमेवात्र मृत्तिकादिनामवद् भगवतो विवक्षितम् । सृष्टिश्च प्राधान्यार्थमेवात्रोच्यते(प्राधान्यार्थमेवोच्यते .हृ)।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये प्रथमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S02",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वितीयः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये द्वितीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वितीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S02_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् । तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयं तस्मादसतः सज्जायत इति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S02_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कुतस्तु खलु सोम्यैवं स्यादिति होवाच कथमसतः सज्जायेतेति सत् त्वेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S02_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "भगवतः सकाशादादिसृष्टिकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय इति तत् तेजोऽसृजत तत्तेज ऐक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति तदपोऽसृजत तस्माद्यत्र क्व च शोचति स्वेदते वा पुरुषस्तेजस एव तद्ध्यापो जायन्ते ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S02_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C06_S02_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S02_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकमेवाद्वितीयं स्वगतभेदवर्जितं समानवर्जितं च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘एकमेवाद्वितीयं तत् समाभ्यधिकवर्जनात्(समाधिकविवर्जनात् .हृ) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वगतायां च भेदानामभावाद् ब्रह्म शाश्वतम् ॥’ इति प्रवृत्ते ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘भेदाभेदनिवृत्त्यर्थमेवशब्दोऽवधारकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "समाधिकनिवृत्त्यर्थमद्वितीयपदं तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भेदाभेदेऽप्येकशब्दो यतोऽवयविनि स्थितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एकमेवेत्यतः प्राह नारायणमियं श्रुतिः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "समे द्वितीयशब्दः स्यादद्वितीयोऽसमत्वतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "साधिकः(अधिकः) कुत एव स्यादित्याह परमा श्रुतिः॥’ इति सामसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S02_V04_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अद्वितीयशब्दो नाद्वैतसाधकः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च विजातीयभेदवर्जनं नाम कुत्रचित् प्रसिद्धम् । तत्प्रमाणाभावाच्च । ‘एक एवाद्वितीयो भगवांस्तत्सदृशपरो(तत्सदृशः परः) नास्ति’ इति च । ‘एक एव भगवान् तत्सदृशपरौ न स्तः’ इति च श्रुतिः।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " विजातीयाभावे येनाश्रुतं श्रुतं भवतीत्यादि विशेषणं च व्यर्थम् । यस्य कस्यचिज्ज्ञानं तज्ज्ञानमेव भवतीति । अज्ञानमपि ज्ञानमेव भवति । भेदाभावात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " न च मिथ्या सत्यमिति भेदः । तस्यैव विजातीयत्वप्राप्तेः । तद्भेदस्य मिथ्यात्वे तदभेदस्य सत्यत्वप्रसङ्गाच्च । मिथ्यासत्ययोरैक्ये इदं मिथ्या इदं सत्यमिदं (इदं सत्यमिति) मिथ्येति भेदाभावाज्जीवेशभेदादेरपि सत्यत्वप्रसङ्गः । अतः परमार्थं ब्रह्मान्यन्मिथ्येत्यपि न युज्यते । अतः (सजातीयः) सजातीयस्वगतभेदोऽधिकाख्यं विजातीयं चात्र निषिध्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S02_V04_B03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सर्वोत्तमत्वात् सन्नामा हरिर्नारायणः प्रभुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सोऽसृजत् प्रथमं देवीं तेजआख्यां श्रियं सतीम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तते(तत्र) स्थितेन रूपेण साऽजैव हि यतः सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेज इत्युच्यते तस्माज्जनेर्वा तत एव तु ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदस्याः सृष्टिकृद्रूपं विद्याख्यं जायते हरेः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मन्वाख्यः प्राण एवास्या अम्नामा जायतेऽथ च (जायते हरेः .हृ)॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्राह्मणादिचतुर्वर्णस्ततश्चान्नभिधो हरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेजःसंस्था च सा देवी प्राणोऽप्सु स्थित एव च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततस्तेजस एवापो जायन्तेऽन्नस्थितो हरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जायतेऽतोऽद्भ्य एवान्नं पृथिवी त्वन्नरूपिणी ॥ २ ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये द्वितीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S03",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " तृतीयः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये तृतीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "तृतीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S03_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "gadya",
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| "text": "नामरूपात्मकप्रपञ्चस्य सृष्टिकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भवन्त्यण्डजं(भवन्त्याण्डजं) जीवजमुद्भिज्जमिति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S03_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिममास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S03_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद् यथा तु(नु) खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ३ ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C06_S03_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S03_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सृष्टेष्वेतेषु भगवानीक्षाञ्चक्रे स केशवः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जीवाख्येनैव रूपेण योऽनिरुद्ध इति स्मृतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेन रूपेण लक्ष्म्यादीन् प्रविष्टो रूपनामनी ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "करिष्ये त्रिवृतश्चैतानेकैकं करवाणि च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति मत्वा प्रविश्याथ तेभ्य इन्द्रादिनामपि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नामरूपाणि कृतवांस्तांश्चान्योन्यप्रवेशिनः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कृत्वाऽग्निसोमसूर्यादिष्वेतांस्त्रीन् विदधे(निदधे) पुनः ॥ ३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये तृतीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S04",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये चतुर्थः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S04_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सृष्टेः लक्ष्मीप्राणरुद्रद्वारा भगवदधीनत्वनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं, यच्छुक्लं तदपां, यत् कृष्णं तदन्नस्यापगादग्नेरग्नित्वं वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S04_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदादित्यस्य रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत् कृष्णं तदन्नस्यापागादादित्यस्याऽदादित्यत्वं(तदन्नस्यापागादादित्यादादित्यत्वं) वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S04_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यच्चन्द्रमसो रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत्कृष्णं तदन्नस्यापागाच्चन्द्रात् चन्द्रत्वं वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S04_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद् विद्युतो रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत् कृष्णं तदन्नस्यापागाद् विद्युतो विद्युत्त्वं वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S04_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ते ह्येभ्यो विदञ्चक्रुः ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S04_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदु रोहितमिवाभूदिति तेजसस्तद्रूपमिति तद् विदाञ्चक्रुर्यदु शुक्लमिवाभूदित्यपां रूपमिति तद् विदाञ्चक्रुर्यदु कृष्णमिवाभूदित्यन्नस्य रूपमिति तद् विदाञ्चक्रुः ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S04_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद्वविज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवानां समास इति तद्विदाञ्चक्रुर्यथा तु(नु) खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ७ ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C06_S04_V07"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S04_V07_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अतो यल्लोहितं रूपं श्रियस्तद्रूपसम्भवम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यच्छुक्लं वायुजं विद्यात् कृष्णं चैव शिवोद्भवम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादग्नेर्यदत्तृत्वमग्निनामप्रवर्तकम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "लक्ष्म्यादिदेवतानां तन्नैवाग्नेरग्निना ततः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुख्यैवमाददानत्वमादित्यस्य तदुद्भवम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अत आदित्यनामैषां नैवादित्यस्य मुख्यतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यच्चन्द्राह्लादकत्वं च तत्तेषां चन्द्रता तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विद्युद्विद्योतनं (चै)तेषां ततस्ते सर्वनामिनः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथैव सर्वरूपं च तद्रूपप्रतिबिम्बितम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वरूपाश्च ते तस्माल्लोहितादिक्रमेण तु ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S04_V07_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतोऽन्यनामधेयं तु वाचाऽऽरम्भणहेतुतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "साङ्केत्येन विकारः स्यात् त्रयाणामेव नित्यता ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा लक्ष्म्यादिकानां च नाम सङ्केततोऽन्यगम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वाचारम्भणहेतोस्तद्विकारो नैव मुख्यतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुख्यं नाम त्रिरूपाणीत्याद्यं वेदोदितं परम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतस्तदेव सत्योक्तं मुख्यं सत्यमितीर्यते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इन्द्रादिनामरूपाणि यथैव त्रिषु मुख्यतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदधीनत्वतस्तेषामेषामुच्चबलत्वतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शिवनामानि रूपाणि तथा वायोस्तु मुख्यतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदीयानि तथा लक्ष्म्यास्तदीयानि हरेस्तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मात् स एव सर्वेशः सर्वरूपः स एव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वनामा स एवैकः सर्वशक्तिस्तथैव च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्येषां यच्च रूपाद्यं तत्तस्मात् प्रतिबिम्बितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S04_V07_B03"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सर्वस्य भगवदधीनत्वान्नाहङ्कृतिः कार्या",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एक एवाद्वितीयोऽसावतः सर्वोत्तमत्वतः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुख्यत्वादेव सन्नामा सत्ततिज्ञानरूपतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सत्यमित्युच्यते विष्णुस्स त्वं नासि कथञ्चन ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतोऽनूचानमानी त्वं स्तब्धोऽसि कुत एव तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "त्वत्तोऽधिका अपीन्द्राद्यास्तदुच्चाश्च श्रियादयः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वोच्चो भगवान् विष्णुर्न स्तम्भोऽस्यापि हि क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतो न विद्वन्मानी स्या महानस्मीति वा मनः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न ते स्यान्नैव च स्तम्भो ज्ञात्वा विष्णोः परं बलम्(बलं परम्) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न हि विष्णोर्बलं ज्ञात्वा स्तम्भहेतुः कथञ्चन ॥’ इत्यादि सामसंहितायाम् ॥ ४ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये चतुर्थः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C06_S05",
| |
| "type": "khanda",
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| "name": " पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये पञ्चमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S05_V01",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "लक्ष्मीप्राणरुद्राः तेजोऽप्पृथिव्यश्च अन्योन्यांशयुक्ता इति निरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S05_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S05_V03",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक् ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S05_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥४॥५॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C06_S05_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मांसादिशब्दैरभिमानिदेवता एव विवक्षिताः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवता एव मांसादिशब्दवाच्याः । तत्र प्रवेशात् । अश्यमानाश्चोपजीव्यत्वात् । न च दुःखं तासाम् । ऐश्वर्यात् । तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृत् इति प्रस्तुतत्वात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S05_V04_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "उपनिषदुक्तो जीवः परमात्मैव",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘जीव इति भगवतोऽनिरुद्धस्याख्या’ इति च श्रुतिः(इति च श्रुतिः) । ‘प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुर्जीवस्य जीवः(जीवम्) प्रधानस्य प्रधानं भगवांश्चतुर्मूर्तिः’ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्राणाधारो हरेर्नान्यो(हरेर्नान्यः) जीवशब्दस्ततो हरौ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "संसारिणो जीवता तु जननाद्वानतस्तथा(वानतेस्तथा)॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S05_V04_B03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवशब्देन संसारिविवक्षायां(जीवशब्दस्य संसारिविषयत्वे .हृ) तत् तेज ऐक्षतेत्यादिना तेषामेव चेतनत्वावगतेर्नामरूपव्याकरणे जीवान्तरानुप्रवेशो(जीवान्तरप्रवेशः .हृ) नापेक्षितः।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्रसुप्तलोकतन्त्राणां निशाम्य गतिमीश्वरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "त्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥’ इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यावद् बलिं तेऽज हराम काले यथा वयं चान्नमदाम यत्र ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथोभयेषां त इमे ह(तथोभयेषां त इमे हि) लोका बलिं हरन्तोऽन्नमदन्त्यमूढाः॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "त्वं न स चक्षुः परिदेहि शक्ता देव क्रियार्थे यदनुग्रहेण॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति तत्त्वानां प्रार्थनानन्तरं भगवत एव तेषु प्रवेशोक्तेर्भागवते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S05_V04_B04"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यतश्च स एव जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठतीति भगवत्येव जीवशब्दः प्रयुज्यते । न ह्यचेतनस्य मोदमानत्वमस्ति । अतोऽन्तर्यामिरूप एव जीवशब्दः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘भोक्तुस्तु सुखदुःखानामन्तःस्थो जीवनामकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बहिःस्थितस्तु सन्नामा भगवान् पुरुषोत्तमः ॥’ इति तत्त्वविवेके ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अग्नेरग्निरिति नाम मुख्यतो नास्ति । अग्निनामानि त्रीणि रूपाणीति नामधेयं सत्यमित्यादि ॥ ४॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये पञ्चमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S06",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " षष्ठः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये षष्ठः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "षष्ठः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S06_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वाक्प्राणमनांसि लक्ष्मीप्राणरुद्रायत्तानि",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दध्नः सोम्यः मथ्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तत्सर्पिर्भवति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S06_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तन्मनो भवति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S06_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "अपां सोम्य पीयमानानां योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति स प्राणो भवति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S06_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेजसः सोम्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति सा वाग् भवति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S06_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति (यथा)तथा सोम्येति होवाच ॥ ५ ॥६॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये षष्ठः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S07",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " सप्तमः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये सप्तमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "सप्तमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S07_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "‘अन्नाभिमानिदेवतायत्तं मनः’ इत्येतदनुभववेद्यम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "षोडशकलः सोम्य पुरुषः पञ्चदशाहानि माऽशीः काममपः पिबाऽपोमयः प्राणो न पिबतो विच्छेत्स्यत इति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S07_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स ह पञ्चदशाहानि नाऽशाथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य यजूंषि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S07_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात् तेन ततोऽपि न बहु दहेदेवं सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टा स्यात् तयैतर्हि वेदान् नानुभवस्याशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S07_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स हाशाथ हैनमुपससाद तं ह यत्किञ्च पप्रच्छ सर्वं ह प्रतिपेदे ॥ ४ ॥ तं ह होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय प्रज्वलयेत् तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥५॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S07_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " तं ह होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय प्रज्वलयेत् तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥५॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S07_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टाऽभूत् साऽन्नेनोपसमाहिता प्राज्वालीत् तयैतर्हि वेदाननुभवस्यन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयो वागिति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ६ ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S07_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "(तदेष श्लोकः-",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पञ्चेन्द्रियस्य पुरुषस्य यदेव स्यादनावृतम्।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदस्य प्रज्ञा स्रवति दृतेः पात्रादिवोदकम्।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दृतेः पादादिवोदकम्॥७॥७॥)",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये सप्तमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " अष्टमः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये अष्टमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "अष्टमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सुषुप्तिजाग्रदवस्थयोर्जीवः परमात्माधीन इति निरूपणम्",
| |
| "tail": " \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उद्दालको हाऽरुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः(यत्रायं पुरुषः .शाखान्तरपाठः) स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धः दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयत(उपश्रयते .श) एवमेव खलु सोम्यैतन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्राऽयतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते(उपाश्रयते .श) प्राणबन्धनं हि सोम्य मन इति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C06_S08_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वप्नस्यान्तः(स्वप्नान्तः .हृ) सुषुप्तिः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स्वातन्त्र्यात् स्व इति प्रोक्तो विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तं प्राप्नोति मनोनामा संसारी स्वपितीत्यतः ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मननान्मनोनामा संसारी ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "जाग्रदवस्थायां जीवः परमात्माधीन इति प्रतिपादनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अशनापिपासे(अशनायापिपासे) मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यान्नेन शुङ्गेनापोमूलमन्विच्छद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भ्यः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C06_S08_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "परमात्मनो जगत्कर्तृत्वमेव, न तदुपादानत्वम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V06_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘शुङ्गमित्यङ्कुरं प्रोक्तं तन्मूलं भगवान् हरिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जगतो मूलमप्येष निमित्तं न विकारवान् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "बीजजीवो यथा मूलमङ्कुरस्याविकारतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथा पिता पुत्रतन्वास्तद्देहो(पुत्रतन्वस्तद्देहो) हि विकारवान् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं हरिर्मूलमपि न विकारः(विकारी .हृ) कथञ्चन ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राथम्याच्च तेजआद्या लक्ष्म्यादय इति सिद्धम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘तेजोऽभिमानिनी लक्ष्मीः प्राणस्त्वबभिमानवान् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्नाभिमानी रुद्रश्च तिस्रस्ता देवताः पुरा ॥’ इति च ब्रह्माण्डे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V06_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यत्रैतत्पुरुषः स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति’ इति संसारिणो ब्रह्मप्राप्तिमुक्त्वा ‘स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धः’ इति तस्योपपादनान्मनोनामा पुरुषः, प्राणनामा भगवान् । ‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः(सोम्येमाः प्रजाः .हृ) सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’ इत्युपसंहारात् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रजाशब्दश्च चेतनेष्वेव प्रसिद्धः । ‘प्रजानां सुखदुःखेन राजाप्नोति शुभाशुभम् ।’ इत्यादेश्च ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V06_B03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘शरीरधातुकृत्त्वेन लक्ष्म्याद्याश्च मुमुक्षुणा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ध्येयस्तदीशितृत्वेन भगवान् पुरुषोत्तमः॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति वचनादनुसन्धानकर्तव्यताज्ञापनार्थं तदुक्तं पुरस्तादित्युक्तम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V06_B04"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मुक्तौ मरणावस्थायां च देवतानां लयक्रमकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुक्तावुमा तु वागाख्या रुद्रं याति मनोऽभिधम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वायुं याति शिवश्चापि वायुश्तेजोऽभिधां श्रियम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायुमादाय सा देवी याति विष्णुं परात् परम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "द्वारमात्रा तु सा देवी वायुप्राप्यो जनार्दनः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मृतिकाले च मुक्तौ च पुरुषा वाचमाप्नुयुः ॥ इति सत्तत्त्वे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अतत्त्वमसिवाक्यार्थः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C06_S08_V07"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V07_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| |
| "text": "‘योऽसौ नियमनाद् विष्णुः सारत्वात् स इति स्मृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अणिमा सूक्ष्मतो गम्य ऐतदात्म्यं च तद्वशम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परानन्दत्वतः सत्य(सत्यम्) आत्मा पूर्णगुणत्वतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सत्यतो नासि तत्वं हि माभूत् ते स्तब्धता ततः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V07_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
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| |
| "text": "असुराः स्तब्धतां याता ब्रह्माहमिति मानिनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "असत्यं जगदित्याहुः सिद्धोऽहं बलवानिति ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनीश्वरं जगच्चाहुरप्रतिष्ठं(जगत् प्राहुरप्रतिष्ठं) तथैव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चेतनैकत्वविषयान् वेदानाहुश्च सर्वशः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कुतर्कपरमा नित्यं न सहन्ते गुणान् हरेः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय ब्रूयुर्वेदेषु(देवेषु) चैकताम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यान्ति चैव तमो घोरं परमात्मविनिन्दकाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S08_V07_B03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आलम्ब्य तन्मतं न त्वमेकत्वं विद्धि विष्णुना ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकत्वाभावतो(एकताभावतः .हृ) नैव भवेथाश्च महामनाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तन्निष्ठा हि प्रजा यस्मात् तत्प्रतिष्ठाश्च मोक्षगाः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तन्मूलाश्च यतस्तासां तद्भावः(सद्भावः) कुत एव तु ॥ ८ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये अष्टमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C06_S09",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " नवमः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये नवमः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
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| "text": "नवमः खण्डः ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S09_V01",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| "text": "जीवब्रह्मभेदविषये पुष्परसदृष्टान्तः",
| |
| "tail": " \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणां रसानां(रसान् .पा) समवहारमेकतांं गमयन्ति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S09_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S09_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यत् भवन्ति तत्तदा भवन्ति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S09_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ(ऽ)तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C06_S09_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S09_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदि स्वतोऽन्यः परमो देहेऽस्मिन् संव्यवस्थितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न दृश्यते कुत इति भूयः पप्रच्छ पुत्रकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अज्ञैरदृश्यमानोऽपि न भेदो नास्ति पुत्रक ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा पुष्परसा युक्ता अजानन्तोऽपि भेदिनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अजानन्तोऽपि पुरुषास्तथा विष्णोर्हि भेदिनः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति पित्रोपदिष्टः सन् पुनः पप्रच्छ तं पुनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चेतनानामविज्ञानं कथमित्येव चिन्तयन् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं प्रत्याह ........... ........... ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये नवमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S10",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " दशमः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये दशमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "दशमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S10_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "जीवब्रह्मभेदविषये नदीसमुद्रदृष्टान्तः",
| |
| "tail": " \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात् प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात् प्रतीच्यस्ताः समुद्रात् समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S10_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामहे इति त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यद् भवन्ति तत् तदा भवन्ति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S10_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १० ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C06_S10_V03"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S10_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "....... यथा नद्यश्चेतनाश्च समुद्रगाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वं वारि(स्वावरि .हृ) नैव जानन्ति प्रजास्तद्वत् प्रजालये ॥"
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वतोऽन्योऽस्ति परो देह इति ज्ञायेत मे कथम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "इति पृष्टः पुनः प्राह वृक्षदृष्टान्ततः पिता ॥ १० ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये दशमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S11",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " एकादशः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये एकादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "एकादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S11_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "‘जीवोऽस्वतन्त्रः’ इत्यस्मिन् विषये वृक्षदृष्टान्तः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद् यो मध्येऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद् योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेत् स एष जीवेनात्मनाऽनुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S11_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अस्य यदैकां शाखां जीवो जहात्यथ सा शुष्यति द्वितीयां जहात्यथ सा शुष्यति तृतीयां जहात्यथ सा शुष्यति सर्वं जहाति सर्वः शुष्यत्येवमेव खलु सोम्य विद्धीति होवाच ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S11_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियत इति स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C06_S11_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S11_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभिमानिनोऽस्वतन्त्रत्वाद्भेदेन ज्ञायते तरौ ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "हरिः किमु मनुष्येषु शोषो ह्यस्यास्वतन्त्रतः ॥ ११ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये एकादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C06_S12",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वादशः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये द्वादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S12_V01",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "gadya",
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| "text": "परमात्मनोऽप्रत्यक्षत्वविषये वटबीजदृष्टान्तः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न्यग्रोधफलमत आहरेति इदं भगव इति भिन्धीति भिन्नं भगव इति किमत्र पश्यसीत्यण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C06_S12_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं होवाच यं वै सौम्य एतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्नः एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति श्रद्धस्व सोम्येति ॥२॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C06_S12_V03",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C06_S12_V03"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S12_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "ज्ञायते न कथं स्वस्मिन् सूक्ष्मे ज्ञाते परो हरिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्रस्थ इति पृष्ट संस्तमाहोद्दालकः सुतम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वटबीजे यथा सूक्ष्मे महान्न्यग्रोधभावयुक् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न दृश्यतेऽभिमानी स एवं जीवगतो हरिः ॥ १२ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये द्वादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C06_S13",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " त्रयोदशः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये त्रयोदशः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
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| "text": "त्रयोदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S13_V01",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "‘परमात्मनः कार्यं प्रत्यक्षम्’ इति विषये लवणोदकदृष्टान्तः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह(तद्ध) तथा चकार तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S13_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्त्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यभिप्रास्यैतदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत् संवर्तते तं होवाचात्र वाव किल स सोम्यैतमणिमानं न निभालयसेऽत्रैव किलेति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S13_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C06_S13_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S13_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कथं दृश्येत तच्छक्तिः पृथक् तस्य ह्यदर्शने ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इति भावयुतं प्राह पुत्रमुद्दालकः पुनः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथाप्सु लवणं व्याप्तं रसदृष्टौ न दृश्यते(रसदृष्ट्यैव दृश्यते) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं चेतनगो विष्णुस्तद्भिन्नोऽपि न दृश्यते ॥ १३ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये त्रयोदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S14",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्दशः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये चतुर्दशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्दशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S14_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "गुरूपदेशादेव भगवत्प्राप्तिः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षमानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत् स यथा तत्र प्राङ्वोदङ्वाऽधराङ्वा प्राध्मायीताऽभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S14_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्य यथाऽभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद् ग्रामं पृच्छन् पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पद्येतैवमेवेहाऽचार्यवान् पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्यत इति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S14_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C06_S14_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S14_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कथं स ज्ञायते विष्णुर्भिन्न इत्यत्र चाब्रवीत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथैवान्योपदेशेन बद्धाक्षः स्वगृहं(स्वं गृहं) व्रजेत् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तथाऽऽचार्योपदेशेन भिन्नमीशं व्रजेत् पुमान् ॥ १४ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये चतुर्दशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S15",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " पञ्चदशः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये पञ्चदशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "पञ्चदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S15_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
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| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मनुष्यस्यास्वातन्त्र्यविषये मरणावस्थानिदर्शनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरुषं सोम्योपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S15_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदाऽस्य वाङ् मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायामथ न जानाति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S15_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C06_S15_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S15_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा पुंसोऽस्वतन्त्रत्वं तज्ज्ञापयतु मा भवान् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इत्युक्त आह ज्ञाने हि दृष्टैवास्यास्वतन्त्रता ॥ १५ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये पञ्चदशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " षोडशः खण्डः ",
| |
| "title": "षष्ठाध्याये षोडशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "षोडशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अभेदज्ञानस्यानर्थकारित्वे चोरदृष्टान्तः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरुषं सोम्योत हस्तगृहीतमानयन्त्यपहार्षीत् स्तेयमकार्षीत् परशुमस्मै तपतेति स यदि तस्य कर्ता भवति तत एवानृतमात्मानं कुरुते सोऽनृताभिसन्धोऽनृतेनाऽत्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स दह्यतेऽथ हन्यते ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ स यदि तस्याकर्ता भवति तत एव सत्यमात्मानं कुरुते स सत्याभिसन्धः सत्येनाऽत्मानमन्तर्धाय परशुं तप्तं प्रतिगृह्णाति स न दह्यतेऽथ मुच्यते ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यथा तत्र (नादाह्येत)न दाह्येत एतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति तद्धास्य विजज्ञाविति तद्धास्य विजज्ञाविति । (इत आरभ्य खण्डान्तं वेदेशियटीकानुसारेण उपनिषदि दृश्यमानोऽधिकः पाठः। अयं श्रीराघवेन्द्रतीर्थीयटीकानुसारी न इत्यवगन्तव्यम्। हृषीकेशतीर्थीयेऽपि पाठोऽयं न दृश्यते) (सर्वेषां खलु भुतानामात्मा सत्ये प्रतिष्ठितः। तेनाऽत्मानमन्तर्धाय न किञ्चित् पापमृच्छति। आत्मा सत्य आत्मा साक्षी सतां धर्मः प्रतापवान् । न स पापानि कुरुते यस्याऽत्मा भवति प्रियः।जायत्येको म्रियत्येकोऽश्नात्येकः शुभाशुभम्॥ इति॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति। तदेश श्लोकः-",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वभूतात्मभूतेभ्यः सम्यग् भूतानि पश्यतो देवा अपि मार्गे मुह्यन्ति पदज्ञानात् पदैषिणः इति। पदज्ञानात् पदैषिण इति)॥ ३ ॥ १६ ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठोऽध्याये षोडशः खण्डः॥",
| |
| "tail": "\n\t\t\t"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि षष्ठोऽध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C06_S16_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अभेदज्ञानिनां दोषः कीदृशः स्यादितीर्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राह यस्मात् परस्वानां हर्ता राज्ञा निहन्यते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "किमु राज्ञोऽपहर्तैवं ब्रह्मस्तेनो निहन्यते(हि हन्यते) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वेषां शास्तृ यद् ब्रह्म तत्स्वरूपतया स्मरन् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मस्तेनो निहन्येत(हि हन्येत) तमस्यन्धे सदैव हि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दोषा ह्यज्ञानपूर्वास्तु बद्ध्वा पुरुषमीशितुः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णोर्हर्तेति बाधन्ते चाभिमानकृतास्पदम् ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततो विचारयन्त्येनं देवता हरिणा सह ॥",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नाहं विष्णुर्न स्वतन्त्रो न च पूर्णगुणोऽस्म्यहम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मम स्वामी हरिर्नित्यं स्वतन्त्रः पूर्णसद्गुणः(पूर्णषड्गुणः .हृ) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं दार्ढ्यं शपथवद्यदा कुर्यादयं तदा(सदा .हृ) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जीवन्नेव(जानन्नेवं .हृ) न तापी स्यादन्तरानन्दभोगतः(अनन्तानन्तभोगतः, अनन्तानन्दभोगतः .हृ) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदा तेभ्यो मोचयित्वा हत्वा मिथ्याभिशंसिनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वकीयं कुरुते विष्णुरन्यथा तैः सह प्रभुः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तमस्यन्धे पातयति महाकारागृहोपमे ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "महान्धे वा पातयति हस्तच्छेदादिसंमिते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ततोऽधरे वा तद्योग्यं दृढाभेदं वधोपमे ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मादाचार्यतो ज्ञात्वा विष्णोर्भेदेन पूर्णताम् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपासीत ततो मुक्तिं याति नास्त्यत्र संशयः ॥’ इत्यादि सामसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B03"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "‘स्वमपीतो भवति’ इति श्रुतेरभेदपरत्वनिरासः",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वयम्भूरिति विष्णुजत्वाद् विरिञ्च(विष्णुजत्वाद्धि विरिञ्च) उच्यते । न हि विरिञ्चादेव विरिञ्चो जातः । ‘यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्’ इत्यादि श्रुतेः । आत्मा भगवान् । ततो भूतत्वादात्मभूः । ‘दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मसम्भवान्’ इति वचनात् । अ इति विष्णुस्तज्जातत्वादजः ‘अ इति ब्रह्म’ इत्यादि श्रुतेः । ‘वासुदेवात् परो नैव ब्रह्मशब्दोदितो भवेत्’ इत्यादेश्च । अतः स्वशब्दो विष्णावेव प्रसिद्धः । ततः ‘स्वमपीतो भवति’ इति युज्यते ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अप्ययो नामाविज्ञेयत्वेन प्रवेशः ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " ‘अविज्ञातं प्रविष्टं यदपीतमिति कीर्त्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथा नद्यः समुद्रे तु यथा विष्णुं लये प्रजाः॥’ इति शब्दनिर्णये ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B04"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च जीवस्य तद्भावोऽस्ति । उत्थितस्य सुप्तिसंसारयोः परामर्शदर्शनात् । ‘अहं विश्वं भुवनमभ्यभवाम्’। ‘आजन्ममरणं स्मृत्वा मुक्ता हर्षमवाप्नुयुः’ इति तद्भावस्यापरामर्शाच्च । ‘प्राज्ञेनाऽत्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्’ इत्यादिश्रुतेश्च । ‘सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन’ इति च भगवद्वचनम् ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B05"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "नवदृष्टान्ता अपि भेदपरा एव",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः।‘, ‘सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति ।’, ‘सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति ।’, ‘स एष जीवेनाऽत्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति’ । ",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति ।’",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह तथा चकार तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति । मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्त्यादाचामेति कथमिति लवणमिति ।’",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अत्र वाव किल सत्सोम्य(किल सोम्य) न निभालयसेऽत्रैव किलेति ।’, ‘एतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति।’, ‘तेजः परस्यां देवतायां तावन्न जानाति(तावज्जानाति) ।’, ‘अपहार्षीत् स्तेनमकार्षीत्।’ इत्यादि नवकृत्वो(नवकृत्वोऽपि) भिन्नस्य वस्तुनो भेदापरिज्ञानादनर्थं सूक्ष्मत्वाद् भेदस्य दुर्ज्ञेयत्वं(दुर्विज्ञेयत्वं) च सदृष्टान्तं तात्पर्येणाऽह ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B06"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "नैकोऽपि दृष्टान्तोऽभेदपरः",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न चाभेदे कश्चिद् दृष्टान्त उक्तः। न हि शकुनिसूत्रयोर्नानावृक्षरसानां नदीसमुद्रयोर्वृक्षपरमात्मनोर्धानापरमात्मनोर्लवणोदकयोः पुरुषगन्धारयोर्नियतज्ञानानियतज्ञानयोश्चोरापह्रियमाणयोश्चाभेदोऽस्ति ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B07"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "विष्णुसर्वोत्तमत्वं सकलशास्त्राणां मुख्यतात्पर्यम्",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "महातात्पर्यविरोधश्चाभेदे । विष्णोः परमोत्कर्षे हि सर्वप्रमाणानां महातात्पर्यं भगवताऽभिहितम् ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्माद् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥’ इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।’",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं(मोहनीम् .हृ) श्रिताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यो मामजामनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B08"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘ये मां ज्ञात्वा गुणैः पूर्णं न चलन्ति ततः क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तैरेवाऽप्यो न चैवान्यैरहं सर्वेश्वरेश्वरः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ये तु मद्गुणसम्पूर्तौ ज्ञानस्नेहस्थिरात्मकाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेषां हस्तगतो मोक्षो मामेव स्मरतां सदा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ये मन्यन्ते गुणापूर्तिं तमस्तेषां परायणम्।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न च तेभ्यो प्रियो मह्यं यश्च स्याद्गुणपूर्तिवित् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स मामाप्नोति नियतं न च तस्मात् प्रियो मम ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रमाणान्यखिलान्येव तर्काश्चैतत्पराः सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एतद्विरुद्धं यन्मानं तर्कश्चाऽभास एव तु (आभास एव सः .हृ)॥’ इत्यादौ(इत्यादि) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B09"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘तं भूतिरिति देवा उपासाञ्चक्रिरे ते बभूवुस्तस्माद्धाप्येतर्हि सुप्तो भूर्भूरित्येव प्रश्वसित्यभूतिरित्यसुरास्ते ह पराबभूवुः ।’",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘भूमैव देवः परमो ह्युपास्यो नैवाभूमा फलमेषां विधत्ते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्माद् भूमा गुणतो वै विशिष्टो यथा क्रतुः कर्ममध्ये विशिष्टः ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘असुन्वन्तं समं जहि दूणाशं यो न मे मयः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अस्मभ्यमस्य वेदनं दद्धि सूरिश्चिदोहते ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " एतावानस्य महिमा अतो ज्यायांश्च पूरुषः ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ।’",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B10"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सृष्टिः स्थितिश्च संहारो नियतिर्ज्ञानमावृतिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बन्धमोक्षौ च कथ्यन्ते यस्योत्कर्षप्रसिद्धये ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्योत्कर्षप्रसिद्ध्यर्थं सर्वे वेदाश्च(सर्ववेदाश्च) युक्तयः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ज्ञात्वैव च यदुत्कर्षं मुच्यन्ते स हरिः परः॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अद्या तमस्य महिमानमायवोऽनुष्टुवन्ति पूर्वथा’ इत्यादिश्रुतिश्च विष्णोरुत्कर्षे महातात्पर्यं कथयति ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘महातत्परता विष्णोरुत्कर्षेऽवान्तरा ततः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्यत्र सर्ववाक्यानां युक्तीनां च विशेषतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " ‘ओं भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति ओम्’(ब्र.सू.३.३.५९) ‘ओं ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ओम्’(ब्र.सू.४.१.५) इत्यादि च निर्णयात्मकं भगवद्वचनम् ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B11"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "जीवब्रह्मैक्यस्य न शास्त्रतात्पर्यविषयता",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च शारीरपराभेदे तात्पर्यमआ इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । ‘अतत्त्वमसि’ इति भेदस्य नवकृत्वोऽभ्यासाच्च । ‘ओं भेदव्यपदेशात् ओम्’(ब्र.सू.१.३.५), ‘ओं भेदव्यपदेशाच्चान्यः ओम्’(ब्र.सू.१.१.२१), ‘ओम् अनुपपत्तेस्तु न शरीरः ओम्’(ब्र.सू.१.२.३), ‘ओं शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ओम्’(ब्र.सू.१.२.२०), ‘ओं पृथगुपदेशात् ओम्’(ब्र.सू.२.३.२८) इत्यादिना सर्वत्र भेदस्यैव भगवता निर्णीतत्वाच्च । ",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B12"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘पुरुष एवेदं सर्वमिति च पुरुषेणेदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।’(पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यमिति । पुरुषेणैवेदं सर्वं व्याप्तं यद् भूतं यच्च भाव्यम् । .हृ) ‘(न भगवान्)न च भगवान् गोत्वेन मनुष्यत्वेन वा भवति । आ तृणादा करीषात् सर्वं भगवानिति मिथ्यादृष्टिरेषा । दधिसक्तवो घृतौदनमित्यादौ व्याप्तशब्दाभावेऽपि व्याप्तशब्दोऽवगम्यते । दधिसिक्ताः सक्तवो घृतसिक्तमोदनम्’(घृतोदनमित्यादिषु व्याप्तिशब्दाभावेऽपि व्याप्तिशब्दोऽवगम्यते । यथा दधिसिक्ताः .हृ) इति च श्रुतिः ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यमिति पुरुषेण हीदं नेनीयते(सर्वं नेनीयते)’ इति च । अतः सर्वप्रमाणानां भगवदुत्कर्ष एव महातात्पर्याच्छारीराभेदं वदतां महातात्पर्यविरोधः ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B13"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "जीवब्रह्मैक्यं सकलशास्त्रमुख्यतात्पर्यविरुद्धम्",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अज्ञानदुःखासम्बन्धाद् यावज्ज्ञानं शरीरिणः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वदा ज्ञानकं विष्णुमहमस्मीति ये विदुः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अज्ञानदुःखमन्तारस्ततस्ते नीचतां विदुः(विदः .हृ) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णोरुत्कर्षहर्तॄणां(उत्कर्षहातॄणाम्) नैव तेषां सुखं क्वचित् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योऽन्यथा सन्तमीशेशं स्वरूपं प्रतिपद्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "किं तेन न कृतं पापं चोरेणेशापहारिणा ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथा वादबलाः जनाः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कामक्रोधाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रह्मस्तेना निरानन्दा(निरालम्बाः) अपक्वमनसोऽशिवाः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यतः स्वरूपतश्चान्यो(स रूपतश्चान्यः .हृ) जातितः श्रुतितोऽर्थतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कथमस्मि स इत्येव सम्बन्धः(सम्बद्धः .हृ) स्यादसंहितः॥’ इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B14"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘बहवः पुरुषा ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "को ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वैशम्पायन उवाच–",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
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| "text": "नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ।",
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| {
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| "tail": "बहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ॥"
| |
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| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "तथा तं पुरुषं विश्वमाख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥’इति च मोक्षधर्मवचनाच्च ।"
| |
| }
| |
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| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B15"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अभेदपरत्वेन प्रतीयमानानि वाक्यान्यपि वस्तुतः भेदपराणि",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘हंनाम हन्यमानत्वाज्जीवस्य समुदाहृतम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जीवादन्यो यतो विष्णुरहंनामा ततः स्मृतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्मीति जीवः समुद्दिष्टः स्मीत्यल्पं सुमितत्वतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पूर्णत्वादस्मिनामाऽसौ पूर्णपूर्णत्वहेतुतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मास्मीत्युच्यते विष्णुर्बृहत्पूर्णो यतः सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "असौ सूर्यगतो विष्णुर्दूरस्थत्वात् प्रकीर्तितः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अहंनामा जीवगतो नित्याहेयत्वहेतुतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B16"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मोक्षेऽपि विद्यमानजीवब्रह्मभेदो नातात्त्विकः",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः(उत्तमपुरुषः) स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा’, ‘स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा’ ,",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । इमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् । एतत्साम गायन्नास्ते ।’",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " ‘स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येेवाऽत्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते ।’, ‘ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः।’, ’तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति।’, ‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति।’",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘(नानात्वेनाभिसम्बुद्धाः)नानात्वेनाभिसम्बद्धास्तदा तत्कालभाविना ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रकृतौ करणातीताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "संयोगः प्रकृतेर्नैषां मुक्तानां तत्त्वदर्शनात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पुरुषान्यबहुत्वेन प्रतीता न प्रवर्तते ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रवर्तति पुनः सर्गे तेषां सा न प्रवर्तते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः’ इत्यादिश्रुतिस्मृतिषु सतात्पर्यं मुक्तानां विष्णोर्भेदस्यैवोक्तेः ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B17"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
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| "text": "अस्मिन्नेव प्रकरणे जीवब्रह्मभेदप्रतिपादकवाक्यानि विपुलानि सन्तीति प्रदर्शनम्।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः(इमाः प्रजाः .हृ) सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’, ‘सति सम्पद्य न विदुः’(सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामहे इति .हृ) इत्यादौ भेद एव ह्यत्र सतात्पर्यं प्रतिपादितः । ता नद्यः समुद्रादागत्य समुद्रं प्रविशन्ति । स समुद्र एव भवति । न नदीभावं प्राप्नोति । स एव च समुद्रो भवति । समुद्र एव समुद्रो भवति, न नद्य इति भेदस्यैवावधारणं क्रियते ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B17"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "नानुकूलश्चोरदृष्टान्तोऽभेदस्य",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च स्वकीयस्य ब्रह्मभावस्याज्ञोऽपहर्ता भवति । किं त्वविद्यमानब्रह्मभावाभिमन्तैवपहर्ता । न हि स्वकीयवित्तपरित्याग्यपहर्ता भवति । किन्तु परस्वहर्तैव । तस्मादविद्यमानब्रह्मभावाभिमन्तैव ‘अपहार्षीत् स्तेयमकार्षीदआ’ इति दृष्टान्तपूर्वकमुच्यते । ",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B18"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अदुःखित्वपूर्णज्ञानानन्दस्वातन्त्र्यादि ब्रह्मस्वभावाननुभवं स्वात्मनोऽपि ज्ञात्वैव तद्भावाभिमतेः स्तैन्यम् । परकीयाभिमतेरपहारः ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘परस्वभावाभिमतेरपहर्ता स्ववञ्चनात् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्तेनश्चाभेदवेत्ता तु ब्रह्मणो हन्यते सदा ॥’ इति तत्त्वविवेके ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B19"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च दार्ढ्यमात्रे दृष्टान्तोऽयम्(दार्ढ्यमात्रदृष्टान्तोऽयम्)। ‘स यदि तस्य कर्ता भवति’, ‘स यदि तस्य कर्ता न भवति’ इति हतिमुक्त्योरपहारानपहारैकहेतुकत्वश्रुतेः(हेतुत्वश्रुतेः) । अन्यथा यदि दृढो भवति यद्यदृढो भवतीत्युच्येत ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B20"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च सत्यासत्यमात्रम् । तदा सत्यानृतवाग्दृष्टान्तेन पूर्तेरपहारदृष्टान्तो न स्यात् । तस्मादभेदज्ञानेन महान्तं विनाशं प्रदर्श्य भेदज्ञानान्मुक्तिपरमेवैतद्वाक्यम् ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B21"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "भेदाभेदोऽपि शास्त्रमहातात्पर्यविरोधी",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भिन्नस्यैवोत्कर्षो भवति(भवतीति .हृ) । अभिन्नस्य कुत उत्कर्षः स्यात् ? अज्ञानदुःखयुक्तत्वाच्च ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": " न हि तत्पक्षे परमार्थदुःखिनो भ्रान्त्या दुःखिनश्च तत्काले कश्चिद् विशेषः । अस्वातन्त्र्यं च भ्रान्तस्य निश्चितमेव । न हि भ्रमः स्वेच्छया युज्यते ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स्वात्मानं परमं विष्णुं विदित्वाऽपि स राघवः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दैत्यानां मोहनार्थाय दर्शयामास मूढताम् ॥’ इति (च) पाद्मे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘ओं जगद्व्यापारवर्जम् ओम्’(ब्र.सू.४.४.१७), ‘ ...प्रकरणात् ’(ब्र.सू.४.४.१८) इत्यादिनैश्वर्यमर्यादया मुक्तानां ब्रह्मणश्च भेदस्यैव निर्णीतत्वाच्च भगवता ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘ब्रह्मसूत्रानुसारेण वेदाद्यं सर्वमेव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "योज्यं न ब्रह्मसूत्राणि दृश्यमानार्थतोऽन्यथा ॥’ इति च ब्रह्मवैवर्ते ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘चोरदृष्टान्ततो यस्य ह्यभेदज्ञानतस्तमः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भेदेनोत्कर्षवेत्तुस्तु मुक्तिरेव ह्यचोरवत् ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C06_S16_V03_B22"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "‘सारत्वात् स इति प्रोक्तो ज्ञानत्वाद्य इतीरितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वस्येष्ट इति ह्येष मानानामणकोऽणिमा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्तन्त्रत्वादैतदात्म्यं स सत्यः साधुरूपतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्ततेः पूर्णतश्चात्मा सादनात् स इतीरितः(सदनाच्च स ईरितः) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतत्त्वमसि पुत्रेति य उक्तो गौतमेन तु ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नवकृत्वः सदृष्टान्तं सर्वभेदेन केशवः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मै नमो भगवते चिदचित्परमाय ते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पुरुषोत्तमाय देवाय पूर्णानन्दैकरूपिणे ॥’ इति सामसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतः सर्वचिदचिद्विलक्षणः सर्वोत्तमः (सर्वगुणपरिपूर्णो) सर्वगुणपूर्णो भगवान् पुरुषोत्तम इति सिद्धम् ॥",
| |
| "tail": "\n\t\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठाध्याये षोडशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमच्छन्दोग्योपनिषद्भाष्ये षष्ठोऽध्यायः ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
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| "tag": "chapter",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C07",
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| |
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| "children": [
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| },
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| "title": "सप्तमोऽध्याये प्रथमः खण्डः "
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| "children": [
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| |
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| "text": "ओम् अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदस्तं होवाच यद् वेत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति स होवाच ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| |
| "text": "ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यामेतद् भगवोऽध्येमि ॥ २ ॥",
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| "id": "bhashya-CHU_C07_V02"
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| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘पितृलक्षणं तु पित्र्यं स्याद् राशिः स्यात् पूगलक्षणम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "देवतालक्षणं दैवं निधिश्च निधिलक्षणम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वाकोवाक्यं मूलवेदो वेदसारोपसंहृतिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एकायनमितिप्रोक्तं देवविद्या त्वमानुषी(देवविद्याऽत्यमानुषी .प्रा) ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "देवज्ञेयैव या विद्या ब्रह्मविद्या तथाऽऽरणम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भूतविद्या भूतचिह्नं क्षत्रविद्या तु नीतिका ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नाक्षत्री ज्यौतिषाख्या(ज्योतिषाख्या .हृ) च सर्पलक्षणमेव च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्पविद्येति सम्प्रोक्ता या देवपरिचारगा ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सा देवजनविद्या स्यादेता वेद स नारदः ॥’ इति सामसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C07_S01_V03",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तन्मा भगवांञ्च्छोकस्य पारं तारयत्विति तं होवाच यद्वै किञ्चैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत् ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C07_S01_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "gadya",
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| "text": "नामाभिमानिन्यामुषादेव्यां भगवदुपासनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नाम वा ऋग्वेदः यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमः वेदानां वेदः पित्र्यो राशिर्दैवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्मविद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्या नामैवैतन्नामोपास्वेति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C07_S01_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो नाम ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो (वाग्वा)वावा भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ५ ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C07_S01_V05"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S01_V05_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "‘विद्यानां निर्णयाज्ञानादविद्वानुच्यते पुमान् ।",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "br",
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| "tail": "सर्वविद्याविदप्यद्धा तस्मान्निर्णयवित्तये ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कुमारमैच्छद्देवर्षिर्नारदो ब्रह्मवित्तमम् ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘विष्णोर्नाम यतो विद्याः सर्वनामेत्यतः स्मृतः(स्मृताः .हृ) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नामाभिमानिनी चोषास्तस्या(चोषा तस्या .हृ) ब्रह्म परं स्मरेत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदेषा न त्वमेया स्यान्मीयते ह्युषसि ध्रुवम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "रात्रिमानमजानद्भिस्ततो नामेत्युषाः(नामेत्युषा) स्मृता’ ॥ १ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये प्रथमः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C07_S02",
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| "type": "khanda",
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| "name": " द्वितीयः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये द्वितीयः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "section-heading",
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| "text": "द्वितीयः खण्डः ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C07_S02_V01",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "gadya",
| |
| "text": "नामाभिमान्युषोदेव्याः सकाशाद् वागभिमानिस्वाहादेव्याः उत्तमत्वकथनम्",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "वाग्वाव नाम्नो भूयसी वाग्वा ऋग्वेदं विज्ञापयति यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाऽकाशं चाऽपश्च तेजश्च देवांश्च मनुष्यांश्च पशूंश्च वयांसि च तृणवनस्पतीञ्च्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं च यद्वै वाङ् नाभविष्यन्न धर्मो नाधर्मो व्यज्ञापयिष्यन्न सत्यं नानृतं न साधु नासाधु न हृदयज्ञो वागेवैतत् सर्वं विज्ञापयति वाचमुपास्स्वेति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C07_S03_V02",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "स यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो वाचं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो वाचो भूय इति वाचो भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
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| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C07_S02_V02"
| |
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S02_V01_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तस्यास्तु भूयसी स्वाहा धर्मज्ञानसुखादिभिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वैगुणैर्विमुक्तौ च तथा बन्धे च सर्वदा ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "वाचोऽभिमानिनी सैव वाङ्नाम्नी चाञ्चनाद् वसोः ॥ २ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये द्वितीयः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C07_S03",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " तृतीयः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये तृतीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "तृतीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S03_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "वागभिमानिस्वाहादेव्याः सकाशान्मनोऽभिमानिपर्जन्यस्योत्तमत्वकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वाऽऽमलके द्वे वा कोले द्वौ वाऽक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम च मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि कुर्वीयेत्यथ कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्स्वेति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S03_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यो मनो ब्रह्मेत्युपास्ते स यावन्मनसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो मनो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो मनसो भूय इति मनसो भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C07_V09"
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_V05_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "एवं तस्या विमुक्तौ च पर्जन्यः सर्वतो वरः ।",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "मनोऽभिमानी सम्प्रोक्तो वृष्ट्या निर्माणतो मनः ॥ ३ ॥"
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये तृतीयः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C07_S04",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये चतुर्थः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S04_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मनोऽभिमानिपर्जन्यात् सङ्कल्पाभिमानिमित्रस्य श्रैष्ठ्यनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
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| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सङ्कल्पो वाव मनसो भूयान् यदा वै सङ्कल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S04_V02",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| "children": [
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| "text": "तानि ह वा एतानि सङ्कल्पैकायनानि सङ्कल्पात्मकानि सङ्कल्पे प्रतिष्ठितानि समक्लृपतां द्यावापृथिवी समकल्पेतां वायुश्चाऽकाशश्च समकल्पन्ताऽ(मा)पश्च तेजश्च तेषां सङ्क्लृप्त्यै वर्षं सङ्कल्पते वर्षस्य सङ्क्लृप्त्या अन्नं सङ्कल्पतेऽन्नस्य सङ्ग्क्लृप्त्यै प्राणाः सङ्कल्पन्ते प्राणानां सङ्क्लृप्त्यै मन्त्राः सङ्कल्पन्ते मन्त्राणां सङ्क्लृप्त्यै कर्माणि सङ्कल्पन्ते कर्मणां सङ्क्लृप्त्यै लोकाः सङ्कल्पन्ते लोकानां सङ्क्लृप्त्यै सर्वं सङ्कल्पते स एष सङ्कल्पः सङ्कल्पमुपास्स्वेति ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
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| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S04_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यः सङ्कल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते क्लृप्तान् वै स लोकान् ध्रुवान् ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिद्ध्यति यावत् सङ्कल्पस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः सङ्कल्पं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति (भगवो वाचो) भगवः सङ्कल्पाद् भूय इति सङ्कल्पात् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥ ४ ॥",
| |
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| |
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| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये चतुर्थः खण्डः खण्डः॥ ",
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| "title": "सप्तमोऽध्याये पञ्चमः खण्डः "
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| "text": "चित्तं वाव सङ्कल्पाद् भूयो यदा चेतयतेऽथ सङ्कल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
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| "text": "तानि ह वा एतानि चित्तैकायनानि चित्तात्मकानि चित्ते प्रतिष्ठितानि तस्माद् यद्यपि बहुविदचित्तो भवति नायमस्तीत्येवैनमाहुर्यदयं वेद यद्वा अयं विद्वान् नेत्थमचित्तः स्यादित्यथ यद्यल्पविच्चित्तवान् भवति तस्मा एवोत शुश्रूषन्ते चित्तं ह्येवैषामेकायनं चित्तमात्मा चित्तं प्रतिष्ठा चित्तमुपास्स्वेति ॥ २ ॥",
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| "text": "स यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्ते चित्तान् वै स लोकान् ध्रुवान् ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिद्ध्यति यावच्चित्तस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवश्चित्ताद् भूय इति चित्ताद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥ ५ ॥",
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| {
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| }
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| ],
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| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये पञ्चमः खण्डः खण्डः॥ ",
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| "tail": "\n "
| |
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| "text": "ध्यानं वाव चित्ताद्भूयो ध्यायतीव पृथिवी ध्यायतीव द्यौर्ध्यायतीवान्तरिक्षं ध्यायन्तीवाऽपो ध्यायन्तीव पर्वता ध्यायन्तीव देवमनुष्यास्तस्माद् य इह मनुष्याणां महत्तां प्राप्नुवन्ति ध्यानापादांशा इवैव ते भवन्त्यथ येऽल्पाः कलहिनः पिशुना उपवादिनस्तेऽथ ये प्रभवो ध्यानापादांशा इवैव ते भवन्ति ध्यानमुपास्स्वेति ॥ १ ॥",
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| "text": "स यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत् ध्यानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो ध्यानाद् भूय इति ध्यानाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥६॥",
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| "tail": "\n "
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| "tail": "\n "
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| |
| {
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| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये षष्ठः खण्डः खण्डः॥ ",
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| |
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| "tail": "\n "
| |
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| "tail": "\n "
| |
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| {
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| },
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| {
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| "text": "विज्ञानं वाव ध्यानाद् भूयो विज्ञानेन वा ऋग्वेदं विजानाति यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यां दिवं च पृथिवीं च वायुं चाकाशं चापश्च तेजश्च देवांश्च मनुष्यांश्च पशूंश्च वयांसि च तृणवनस्पतीञ्छ्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं धर्मं चाधर्मं च सत्यं चानृतं च साधु चासाधु च हृदयज्ञं चाहृदयज्ञं चान्नं च रसं चेमं च लोकममुं च विज्ञानेनैव विजानाति विज्ञानमुपास्स्वेति ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
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| }
| |
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| }
| |
| ],
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| |
| },
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| {
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| "text": "स यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते विज्ञानवतो वै स लोकान् ज्ञानवतोऽभिसिद्ध्यति यावद् विज्ञानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो विज्ञानाद् भूय इति विज्ञानाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥७॥",
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| }
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| },
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| {
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये सप्तमः खण्डः खण्डः॥ ",
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| }
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| "tail": "\n "
| |
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| "children": [
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| |
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| "adhikarana": ""
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| }
| |
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| |
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| "text": "स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद् बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद् भूय इति बलाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ८ ॥",
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| |
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| "id": "CHU_C07_S08_V02_B01"
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| "text": "बलात्मकस्तथा ..........................।",
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| "tail": "\n "
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| },
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| "tag": "author-note",
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| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये अष्टमः खण्डः खण्डः॥ ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S09",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " नवमः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये नवमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "नवमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S09_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "बलाभिमानिप्रवहाद् अन्नाभिमान्यनिरुद्ध उत्तमः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्नं वाव बलाद् भूयस्तस्माद् यद्यपि दशरात्रीर्नाश्नीयाद् यदु ह जीवेऽदथवाऽद्रष्टाऽश्रोताऽमन्ताऽबोद्धाऽकर्ताऽविज्ञाता भवत्यथान्नस्याशी द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवत्यन्नमुपास्स्वेति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S09_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽन्नवतो वै स लोकान् पानवतोऽभिसिद्ध्यति यावत् अन्नस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽन्नात् भूय इत्यन्नाद् वाव भूयोस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C07_S09_V02"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S09_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "................. तस्मादन्नदेवोऽनिरुद्धकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्ननामाऽनुनादित्वात् .................",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये नवमः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S10",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " दशमः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये दशमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "दशमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S10_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अन्नाभिमान्यनिरुद्धाद् अबभिमान्याहङ्कारिकः प्राण उत्तमः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आपो वावान्नाद् भूयस्यस्तस्माद् यदा सुवृष्टिर्न भवति व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो भविष्यतीत्यथ यदा सुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहु भविष्यतीत्याप एवेमा मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्षं यद् द्यौर्यत् पर्वता यद् देवमनुष्या यत् पशवश्च वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकमाप एवेमा मूर्ता अप उपास्स्वेति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S10_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्ते आप्नोति सर्वान् कामांस्तृप्तिमान् भवति यावदपां गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽपो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो अद्भ्य भूय इति अद्भ्यो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C07_V24"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_V12_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "................. तैजसाहम्भवस्ततः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथा वरिष्ठः प्राणाख्यो वायुः सोऽपां च देवता ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अम्नामा देहसंव्याप्तेः ........................॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये दशमः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S11",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " एकादशः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये एकादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "एकादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S11_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अबभिमान्याहङ्कारिकप्राणात् तेजोभिमानी पुरन्दर उत्तमः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेजो वावाद्भ्यो भूयस्तद्वा एतद् वायुमागृह्याकाशमभितपति तदाऽऽहुर्निशोचति नितपति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तदेतदूर्ध्वाभिश्च तिरश्चीभिश्च विद्युदि्भराह्रादाश्चरन्ति तस्मादाहुर्विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S11_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वै स तेजस्वतो लोकान् भास्वतोऽपहततमस्कानभिसिद्ध्यति यावत्तेजसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो तेजसो भूय इति तेजसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C07_S11_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S11_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "................. तथा तस्मात् पुरन्दरः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेजोभिमानी तन्नामा तेजो ह्योज इतीर्यते(उदीर्यते .हृ) ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये एकादशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S12",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वादशः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये द्वादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S12_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "तेजोभिमानीपुरन्दरादाकाशाभिमान्युमाया उत्तमत्वनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निराकाशेन आह्वयत्याकाशेन शृृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S12_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्ते आकाशवतो ह वै स लोकान् प्रकाशवतोऽसम्बाधानुरुगायवतोऽभिसिद्ध्यति यावदाकाशस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आकाशं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो आकाशाद् भूय इति आकाशाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C07_V28"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S12_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथा तस्मादुमा चैव सा चाकाशाभिमानिनी ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आकाशनाम्नी दीप्तत्वात् .................।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये द्वादशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S13",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " त्रयोदशः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये त्रयोदशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "त्रयोदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S13_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "आकाशाभिमान्युमायाा सकाशात् स्मारणाभिमानी रुद्र उत्तमः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्मरो वा आकाशाद् भूयांस्तस्माद् यद्यपि बहव आसीरन्नस्मरन्तो नैव ते कञ्चन शृणुयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन् यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन् स्मरेण वै पुत्रान् विजानाति स्मरेण पशूं स्मरमुपास्स्वेति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S13_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत् स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो स्मराद् भूय इति स्मराद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥१३॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C07_S13_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S13_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "................. तस्याश्चैव सदा शिवः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्थिरस्मृत्यभिमानी स सममेव रतेः स्मरः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये त्रयोदशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S14",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्दशः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये चतुर्दशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्दशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S14_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": " स्मारणाभिमानीरुद्रादाशाभिमानीभारत्याः श्रैष्ठ्यकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आशा वाव स्मराद् भूयस्याशेद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते कर्माणि कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S14_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स य आशां ब्रह्मेत्युपास्ते आशायाऽस्य सर्वे कामाः समृध्यन्त्यमोघा हास्याऽशिषो भवन्ति यावदाशाया गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आशां ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आशाया भूय इत्याशाया वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ १४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C07_S14_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S14_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मुख्यवायुप्रिया तस्मात् परमैव सरस्वती ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बन्धमुक्त्योः सर्वगुणैः सर्वदाऽऽशास्वरूपिणी ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शमित्यानन्द उद्दिष्ट आशापूर्णसुखत्वतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये चतुर्दशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S15",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " पञ्चदशः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये पञ्चदशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "पञ्चदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S15_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": " आशाभिमानीभारत्याः सकाशात् स्वरूपाभिमानी प्राण उत्तमः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणो वा आशाया भूयान् यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्वं समर्पितं प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S15_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मातापित्रादिषु प्राणोपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा स्वसारं वाऽऽचार्यं वा ब्राह्मणं वा किञ्चिद्भृशमिव प्रत्याह धिक्त्वाऽस्त्वित्येवैनमाहुः पितृहा वै त्वमसि मातृहा वै त्वमसि भ्रातृहा वै त्वमसि स्वसृहा वै त्वमस्याचार्यहा वै त्वमसि ब्राह्मणहा वै त्वमसीति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S15_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्च्छूलेन समासं व्यतिषं दहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहाऽसीति न मातृहाऽसीति न भ्रातृहाऽसीति न स्वसृहाऽसीति नाचार्यहाऽसीति न ब्राह्मणहाऽसीति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S15_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीत्येव ब्रूयान्नापह्नुवीत ॥ ४ ॥ १५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C07_S15_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘तस्याः श्रेष्ठो मुख्यवायुः प्रकृष्टानां च नायकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणनामा ‘ण’इत्येव ह्यानन्दः समुदीरितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आणा सरस्वती प्रोक्ता तत्प्रकृष्टसुखत्वतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राण इत्युच्यते वायुः .... ..... ........।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "देवतातारतम्यपरिमाणनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": ".... .......... ...... सर्वे त्वेते दशोत्तराः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पर्जन्यमित्रशिखिनो भूतवायुस्तथैव च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "द्विगुणा एवानिरुद्धोऽनिलात् पञ्चगुणाधिकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पादोनो वरुणादग्निरध्यर्धोनस्स सोमतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शिवादाशा तथैवास्या मुख्यवायुः शतोत्तरौ ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सङ्ख्यान्यथात्वं यत्र स्यात् तत्राऽवेशविशेषतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अवराणां गुणस्यापि परमीयत्वतस्तथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राणात्तु भगवान् विष्णुरनन्तगुणतोऽधिकः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नित्यमुक्तो नित्यशक्तिर्नित्योद्रिक्तगुणः प्रभुः ॥’ इति तत्त्वविवेके ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सैषाऽऽनन्दस्य मीमांसा भवति इत्यादेश्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B03"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मोक्षेऽपि देवतातारतम्यस्य प्रामाणिकत्वनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अथातः सम्भूतिः परमाद् विद्या विद्यायाः प्राणः प्राणाच्छ्रद्धा श्रद्धायाः शिवः शिवाद् बुद्धिर्बुद्धेरिन्द्र इन्द्रात् तैजसः(तैजसप्राणः हृ.) प्राणस्तैजसादनिरुद्धो(तैजसप्राणादनिरुद्ः .हृ) अनिरुद्धात् स्पर्शवातः स्पर्शवातात् सोमः सोमाद् वरुणो वरुणादग्निरग्नेर्मित्रो मित्रात् पर्जन्यः पर्जन्यात् स्वाहा स्वाहाया उषा जायते तेषां परः परोज्यायान् गुणैरुत्तर उत्तरः प्रत्यवरः परस्मात् परस्मादुत्तर उत्तरो मुच्यते। स्वं स्वं भावमापद्यते । नैषां पारावर्यमुच्छिद्यते कदाचन । नैषां पारावर्यमुच्छिद्यते कुतश्चन । पारावर्येणैव(पारावर्येण .हृ) ब्रह्मोपयन्ति पारावर्येण(पारावर्येणैव .हृ) मुक्ताः सञ्चरन्ति’ इत्यादिश्रुतेश्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B04"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "नामादिब्रह्मोपासना नाम न अभेदोपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘नामादिमारुतान्तेषु देवेष्वेभ्यश्च भेदतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपासितो हरिर्मुक्तिं दद्यान्नास्त्यत्र संशयः ॥’ इति सत्तत्त्वे ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘उषादिमारुतान्तेषु समः समगुणोऽपि सन् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ध्यातः प्रीतिं हरिर्यायादधिकामुत्तरोत्तरे ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उत्तमेषूत्तमा प्रीतिस्तस्य तत्र स्मृतस्ततः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ध्यातुरप्युत्तमां प्रीतिं यायान्नास्त्यत्र संशयः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तारतम्यपरिज्ञानात् तेषु ध्यातो विमुक्तिदः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रीतिं न चान्यथा यायादिति शास्त्रस्य निर्णयः ॥’ इति तत्त्वविवेके ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B05"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "नामादिषु ब्रह्माभेदो न श्रुत्यभिप्रेतः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘नामादिप्राणपर्यन्ताः सप्तम्यर्थाः प्रकीर्तिताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तृतीयापञ्चमीषष्ठीचतुर्थ्यर्थाश्च सर्वशः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शब्दास्ते ब्रह्मशब्देन सम्बध्येयुर्यदा तदा(सम्बद्ध्येत यदा तदा .हृ) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्राह्मणोऽस्य मुखं यद्वदात्मा वै पुत्रको यथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा च यूप आदित्य एवमेष प्रकीर्तितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सप्तसु प्रथमा यस्माद् भूयो भूयस्त्वतस्तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "षट्सुद्वितीया यस्माच्च कारणत्वात् परस्य च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B06"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अन्यथोपासनाया अनर्थकारित्ववर्णनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न ह्यन्यदन्यदित्येव (ह्यन्यदन्य इत्येव) ध्यातं स्यात् पुरुषार्थदम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनर्थश्च भवेत् तस्माद् भृत्ये(भृत्यो) राजेति बोधवत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "राजपूजां यथा(यदा .हृ) भृत्ये कुर्याद् राजा हिनस्ति हि ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्वशत्वात् तथा भृत्य एवं नामादिकं च यः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपास्ते ब्रह्मरूपेण तं ब्रह्माथेतराणि च ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पातयन्ति तमस्यन्धे तस्मान्नेक्षेत तांस्तथा ॥’ इति सामसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B07"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अचेतन-अयोग्य-असत्योपासना अनर्थकारिण्यः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अचेतनमयोग्यं च तथैवातात्त्विकं क्वचित् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नोपासीत परोऽनर्थः स्यात् तथोपासनाकृतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दर्भचर्मादयश्चातो देवता ह्यभिमानिनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न ह्यचेतनकं किञ्चित् फलदं स्यात् कथञ्चन ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "औषधादिषु चैतस्माद् देवा एव वरप्रदाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "औषधादिस्थिता देवास्तेऽज्ञे दृष्टफलप्रदाः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानिन्यदृष्टदाश्च स्युर्नादैवं किञ्चिदिष्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B08"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथाऽज्ञस्यापि(यथाऽज्ञस्यैव .हृ) राज्ञस्तु भोजनं क्ल्ृप्तमिष्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न त्वविज्ञाय(न क्वचाज्ञाय .हृ) राजानं ग्रामप्राप्तिस्ततो भवेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं देवा दृष्टफलं दद्युरज्ञस्य चाल्पतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "किञ्चिज्ज्ञानकृतादृष्टात् तच्च नैवान्यथा भवेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अदृष्टाख्यं फलं यत्तु तज्ज्ञस्यैव न चान्यगम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादचेतनोपासां न कुर्यात् क्वापि कश्चन ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न चासत्यां न चायोग्यां यदीच्छेदुत्तमं फलम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदि नेच्छेत् तमो गन्तुं यदि चेच्छेद्धरेः(यदि वेच्छेद्धरेः) प्रियम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अथ कर्तव्यकारी च मुमुक्षुरथवा भवेत् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सोऽपीच्छेत हरेः प्रीतिं नात्र कार्या विचारणा ॥’ इत्युपासनालक्षणे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B09"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अचेतोपासना वृथेति निरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘ओम् अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ओम्’(ब्र.सू.२.१.६), ‘पयोऽम्बुवच्चेत् तत्रापि’(ब्र.सू.२.२.३) इति(च) भगवद्वचनम् । ‘देवेषु चर्मादिनामानि संवादादेः’ इति च देव(ता)मीमांसायाम् । ‘अचेतनासत्यायोग्यन्यनुपास्यान्यफलत्वविपर्ययाभ्याम्’ इति सङ्कर्षणसूत्रम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B10"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘ओषधयः संवदन्ते सोमेन सह राज्ञा’, ‘प्र वो ग्रावाणः सविता देवः सुवतु धर्मणा’, ‘न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे महामर्कं मघवन् चित्रमर्च’ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B11"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अचेतनेषु अभिमानिचेतनोपासना युक्ता इति निरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘न देवानामति व्रतं शतात्मा न जीवति’, ‘अनेहसो व ऊतयः सु ऊतयो व ऊतयः’ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B12"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘द्यावापृथिवी जनयन्नभिव्रताऽऽप(य) ओषधीर्वनिनानि यज्ञिया ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अन्तरिक्षं स्वारापरूतये वशं देवासस्तन्वी३ नि मामृजुः ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B13"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अचेतनं चेतनेभ्यो दैवतेभ्यश्च चेतनाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "देवाः प्राणाच्च स प्राणो विष्णोरेव सदैव तु ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वभावं च प्रवृत्तिं च विकारं च समाप्नुयुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कश्चिद्भाव ऋते तेषां नैतत्स्याच्च(नैतैः स्यात् .हृ) कदाचन ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अचेतनप्रवृत्तौ तु न दृष्टान्तोऽस्ति(प्रवृत्तौ तन्न दृष्टान्तोस्ति हृ.) कश्चन ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चेतनानां प्रवृत्तेश्च दृष्टत्वादेव सर्वशः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अदृष्टं दृष्टवज्ज्ञेयं यथा दृष्टप्रणेतृकम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विसर्पत् तण्डुलं दृष्ट्वा कल्प्या तत्र पिपीलिका ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न तद् दृष्ट्वैव दृष्टानामपिपीलिकसर्पणम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एवं दृष्टानुसारेण चिदधीनमचेतनम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B14"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दुर्घटा शक्तिरपि हि(तु .हृ) पिशाचानां हि(च .हृ) दृश्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "देवानां किमु किम्वेव परमस्य हरेः प्रभोः ॥’ इत्यादेश्च(दि) ब्रह्मतर्के ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B15"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हृदयेत्यादिशब्दानां विवक्षितार्थकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हृदयज्ञो भगवत्तत्त्वज्ञः । हृद्ययनाद्धृदयम् । ‘उदरं ब्रह्मेति शार्कराक्ष्या उपासते हृदयं ब्रह्मेत्यारुणयः’ इति श्रुतिः(‘हृदयं ब्रह्मेति शार्कराक्ष्या उपासते’ इति श्रुतिः .हृ) । ‘कोलं पूगफलं प्रोक्तं कलं ताम्बूलपत्रकम्’ इत्यभिधानम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘भूतानां भौतिकानां च मन्त्राहुतिगणस्य च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अचेतनगणस्यास्य कल्पको मित्रनामकः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राणा भूतानि मन्त्राद्याश्चिदचित्त्वविभेदिनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अचितां कल्पको मित्रश्चितां वाय्वादयः स्मृताः ॥’ इति वस्तुतत्त्वे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सर्वमचेतनं सङ्कल्प्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B16"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘अस्थिरस्मरणं चित्तं स्थिरसंस्मरणं स्मरः’(स्थिरं स स्मरणं .हृ) इति शब्दनिर्णये । ‘वेदनं ज्ञानमात्रं स्याद् विद्वत्त्वं तु विशेषतः’ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘मोक्षे यस्मिन् प्रवेशः स्यात् सा प्रतिष्ठा हि मुख्यतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "उपचारतस्त्ववस्थानमिति शब्दविदो विदुः ॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘देवा मनुष्यतां प्राप्ता विज्ञेया देवमानुषाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ध्यानं कुर्वन्त इव ते नैव स्युर्बहुभाषिणः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रूयुरर्थवतीं वाचं नानर्थां(नानार्थाम् .क) प्रायशो हि ते ॥’ इति पाद्मे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘बलं ज्ञानबलं चैव बाह्यं चेति द्विधा मतम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "युक्तिज्ञता ज्ञानबलं(युक्तिज्ञञानाद् ज्ञानबलं .हृ) सा ज्ञानादधिका मता(तत् ज्ञानादिकं मतम् .हृ) ॥ इति तत्त्वसारे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B17"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अन्नाद्यचेतनपदार्थेष्वपि तारतम्यनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्नं ज्ञानरसान्नं च बाह्यमन्नमिति द्विधा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ज्ञानान्नं ज्ञानबलतः श्रेष्ठं ज्ञानरतिर्हि तत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यद् बाह्यं तु बलं तस्माद् बाह्यमन्नं विशिष्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आपश्च द्विविधाः प्रोक्तास्तृप्तिर्या ज्ञानतो रतेः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ता ज्ञेया आन्तरा आपो बाह्यास्तु द्रवरूपकाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आन्तरान्नादान्तरापो बाह्याद् बाह्यास्तथा वराः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं तेजः प्रातिभाख्यं बाह्यं चेति द्विधा मतम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रातिभं ज्ञानतृप्तेश्च परमाकाश एव च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्थिरा तु प्रतिभाऽन्तस्थाश्छिद्रमेव तु बाह्यगः (बाह्यगम् .हृ)।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्थिरा हि प्रतिभा श्रेष्ठा चञ्चला या स्मराभिधा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एकधैव स्मृतिः श्रेष्ठाऽऽशाऽपरोक्षदृगात्मकम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "श्रेष्ठं सुखं ततो मोक्षे प्राणाख्यं परमं सुखम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B18"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उत्तरोत्तरमेतद्धि वाय्वन्ताभिमतं सदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "बाह्याद्भ्यो बाह्यमन्नं च जायतेऽन्यत् तदन्यथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "व्यक्तिरन्तर्गतानां तु विपरीतक्रमाद् भवेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तथाऽपि मोक्षगं यस्मात् स्वभावो नित्य एव तु ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतस्तस्मादापरोक्ष्यं कादाचित्कं हि जायते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दृष्ट्यधीना स्मृतिश्चेयं प्रतिभा स्मृतिसम्भवा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्थैर्यमालम्ब्य तु चलमन्यथा नैव तिष्ठति ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रतिभातस्य तृप्तिः स्यादतृप्तस्य तु का रतिः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत(अत .हृ) एवं क्रमादेवं वरिष्ठः प्राणजो गुणः ॥’ इति च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_VS15_V04_B19"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "योऽसौ प्राणः स प्राणेन परब्रह्मणा याति । स एव (एष) भगवान् प्राणं प्रत्यभीष्टं ददाति । ‘प्राणस्य प्राणम्’ इति श्रुतेः । प्राणो वायुः परमात्मानं च ज्ञानेन दर्शयन् ददाति । सर्वस्मादतीतमुत्तमं वदतीत्यतिवादी ॥ १५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये पञ्चदशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S16",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " षोडशः खण्डः ",
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| "title": "सप्तमोऽध्याये षोडशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "षोडशः खण्डः ",
| |
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| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S16_V01",
| |
| "type": "mantra",
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| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "text": "मुख्यप्राणादपि विष्णुरुत्तमः",
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| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानीति सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ १६ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C07_C07_S16"
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "‘एष तु वा अतिवदति’ इति ‘तु’शब्दोऽर्थान्तरवाची । ‘अस्ति भगवः प्राणाद्भूय’ इति प्रश्नो व्यतिहार्यः(प्रश्नोऽप्यध्याहार्यः .हृ) ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "‘यत्रानवसरोऽन्यत्र पदं तत्र प्रतिष्ठितम् ।",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "यत्र प्रमाणं वाक्यं वा व्यतिहार्यं(चाप्यतिहार्यं .हृ) न संशयः ॥’"
| |
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| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘ओं व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत्’(ब्र.सू.३.३.३८) इति च भगवद्वचनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "‘अतिवादी प्राणवादी विष्णुवादी विशेषतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "स सत्यो भगवान् विष्णुर्यन्निर्दोषो नियामकः ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये षोडशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C07_S17",
| |
| "type": "khanda",
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| "name": " सप्तदशः खण्डः ",
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| "title": "सप्तमोऽध्याये सप्तदशः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "सप्तदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S17_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "gadya",
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| "text": "भगवान् सत्यज्ञानादिगुणपरिपूर्णः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन् सत्यं वदति विजानन्नैव सत्यं वदति विज्ञानं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ १७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये सप्तदशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S18",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " अष्टादशः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये अष्टादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "अष्टादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S18_V01",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ १८॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C07_S18_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S18_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विशिष्टज्ञानरूपश्च सामान्यज्ञानरूपकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ]
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये अष्टादशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S19",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " एकोनविंशः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये एकोनविंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "एकोनविंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S19_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते नाश्रद्दधन्मनुते श्रद्दधदेव मनुते श्रद्धा त्वेव विजिज्ञासितव्येति श्रद्धां भगवो विजिज्ञास इति॥ १॥१९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये एकोनविंशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S20",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " विंशः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये विंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "विंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S20_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा वै निस्तिष्ठत्यथ श्रद्धधाति नानिस्तिष्ठन् श्रद्दधाति निस्तिष्ठन्नेव श्रद्दधाति निष्ठा त्वेव विजिज्ञासितव्येति निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ २० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C07_S20_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S20_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नित्यश्रद्धास्वरूपश्च तथैव स्थैर्यरूपकः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये विंशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "attrs": {
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| "type": "khanda",
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| "name": " एकविंशः खण्डः ",
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| "title": "सप्तमोऽध्याये एकविंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "एकविंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S21_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा वै करोत्यथ निस्तिष्ठति नाकृत्वा निस्तिष्ठति कृत्वैव निस्तिष्ठति कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति कृतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १॥ २१ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये एकविंशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
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| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वाविंशः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये द्वाविंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वाविंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S22_V01",
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| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदा वै सुखं लभतेऽथ करोति नासुखं लब्ध्वा करोति सुखमेव लब्ध्वा करोति सुखं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सुखं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १॥ २२ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C07_S22_V01"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S22_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "स एव सर्वकर्ता च सुपूर्णानन्दरूपकः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये द्वाविंशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "section",
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| |
| "type": "khanda",
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| "name": " त्रयोविंशः खण्डः ",
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| "title": "सप्तमोऽध्याये त्रयोविंशः खण्डः "
| |
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "त्रयोविंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S23_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "पूर्णसुखात्मकत्वं भगवतो लक्षणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १॥ २३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C07_V44"
| |
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_V23_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स च सर्वगुणैः पूर्णो भूमेत्युच्चार्यते ततः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये त्रयोविंशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S24",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्विंशः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये चतुर्विंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्विंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "स्वातन्त्र्यनित्यमुक्तत्वे अपि भगवल्लक्षणे",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S24_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाऽथ यत्रान्यत् पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद् विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यं स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नीति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S24_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "गोअश्वमिह महिमेत्याचक्षते हस्तिहिरण्यं दासभार्यं क्षेत्राण्यायतनानीति नाहमेव ब्रवीमीति होवाचान्यो ह्यन्यस्मिन् प्रतिष्ठित इति ॥ २ ॥ २४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C07_S24_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S24_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदधीनं विना नान्यत् किञ्चिदस्ति कुतश्चन ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स भूमोक्तोऽतिपूर्णत्वादन्यदल्पमुदीर्यते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये चतुर्विंशः खण्डः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S25",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " पञ्चविंशः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये पञ्चविंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "पञ्चविंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सर्वत्र व्याप्तत्वमपि भगवल्लक्षणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S25_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एवाधस्तात् स उपरिष्टात् स पश्चात् स पुरस्तात् स दक्षिणतः स उत्तरतः स एवेदं सर्वमिति। ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "भगवतः सर्वेष्वपि रूपेषु तल्लक्षणानि समानानि",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथातोऽहङ्कारादेशो एवाहमेवाधस्तादहमुपरिष्टादहं पश्चादहं पुरस्तादहं दक्षिणतोऽहमुत्तरतोऽहमेवेदं सर्वमिति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S25_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथात आत्मादेश एवाऽत्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदं सर्वमिति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराड् भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवत्यथ येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥ २५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C07_S25_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_V25_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदेशेषु सर्वदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वतन्त्रः सर्ववस्तूनि तदधीनानि सर्वशः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पूर्णत्वात् सुखरूपोऽसौ सर्वकर्ता सुखत्वतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कर्तृत्वात् सुस्थिरश्चासौ स्थिरत्वादास्तिकस्तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आस्तिकत्वाच्च(अस्तीकत्वाच्च) मन्ताऽसौ विज्ञाता च ततो हरिः।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विज्ञातृत्वात् स निर्दोषः(विज्ञातृत्वाच्च निर्दोषः .हृ) सर्वस्यापि नियामकः॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूमा नारायणाख्यः स्यात् स एवाहङ्कृतिः स्मृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आकार्योऽहमिति ह्येष ततोऽहङ्कार उच्यते ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जीवस्थस्त्वनिरुद्धो यः सोऽहङ्कार इतीरितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सोऽप्यणुत्वेऽपि संव्यापी परमैश्वर्ययोगतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा बालतनौ विष्णौ मार्कण्डेयेन धीमता ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्रविश्य नान्तोऽधिगत एवं व्याप्तो हरिः परः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अणुरूपोऽपि भगवान् वासुदेवः परो विभुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आत्मेत्युक्तः स च व्यापी न च भेदो हरौ क्वचित् ॥’ इति परमसारे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूमप्रसादं विना नाल्पे सुखमस्ति । मर्त्यं च पूर्वम् । ‘अल्पापि ह्यमृता देवी श्रीः पूर्णातिप्रियत्वतः’ इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मरतिर्भगवद्रतिः । स्वो भगवान् । सोऽस्य प्रत्यक्षत आज्ञापिता(आज्ञापयिता) भवतीति स्वराट् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये पञ्चविंशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S26",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " षड्विंशः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये षड्विंशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "षड्विंशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मुक्तो भगवत्कार्याणि सक्षात् पश्यति",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S26_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आशाऽऽत्मतः स्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्मत आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमात्मतो विज्ञानमात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतः सङ्कल्पः आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामाऽत्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेदं सर्वमिति ॥१॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S26_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेष श्लोकः-",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताम् । सर्वं ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः । शतं च दश चैकं च सहस्राणि च विंशतिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः । स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारं दर्शयति देवर्षये नारदाय भगवान् सनत्कुमारस्तं स्कन्द इत्याचक्षते तं स्कन्द इत्याचक्षते ॥ २ ॥ २६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": " ॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमोऽध्यायः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C07_S26_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S26_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘आत्मतः प्राण आत्मत आशा’ इत्यादि मुक्तः सन् प्राणादीनां सृष्ट्यादिकं पश्यतीत्यर्थः । ‘सर्वं हि(ह .हृ) पश्यः पश्यति’ इति वाक्यशेषात् । पश्य इति द्रष्टा । ‘यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णम्’ इति श्रुतेः ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘भूमोपासनयोग्यस्तु साक्षाद्ब्रह्मैव मुख्यतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स तद्विद्याबलेनैव विष्णुना रतिमाप्नुयात् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेनैव क्रीडते नित्यं स्त्रीरूपो मिथुनीभवेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तदानन्दः स एवास्य राजा भवति नापरः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पश्येच्च प्राणसृष्ट्याद्यं ये तदन्य उपासकाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ते यथायोग्यमाप्स्यन्ति फलं मुक्तौ न संशयः ॥ ’इति परमतत्त्वे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S26_V02_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अहङ्कारशब्दवाच्यो भगवाननिरुद्धः, न जीवः",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च ‘भूमानं भगवो विजिज्ञास’ इति पृष्टः सन् भूम्नो लक्षणं ‘स एवाधस्तात् स उपरिष्टाद्’ इत्यादिना पूर्णत्वं भगवतोऽन्यस्याहङ्कारस्योपदिशतीति युज्यते । न चाहङ्कारस्य पूर्णत्वमस्ति । न च मुख्ये पूर्णत्वे युज्यमाने उपचरितं युज्यते । न चाहङ्कारस्य काचित् प्रस्तुतिः । अथशब्दस्तु रूपान्तरापेक्षया युज्यते । अतःशब्दस्तत्प्रसादादिति ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S26_V02_B03"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "‘आत्मरतिः स्वराट्’ इत्यत्र आत्मस्वशब्दौ विष्णुवाचकौ",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आत्मरतिः स्वराडि(ळि)त्यादि । ‘यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्’ इति ब्रह्मण उत्पत्तिप्रसिद्धेः(इति ब्रह्मणि प्रसिद्धेः) स्वयम्भूरात्मभूरित्यादिष्वात्मशब्दः स्वयंशब्दश्च यथा विष्णुवाची तद्वदेवात्राप्यात्मशब्दो विष्णुवाच्येव ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S26_V02_B04"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मुक्तेभ्यः सकाशात् प्राणिसृष्टिनिराकरणम्",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च मुक्तेभ्यः प्राणादिकमुत्पद्यते । ‘ओं जगद्व्यापारवर्जम् ओम्’(ब्र.सू.४.४.१७)इति वर्णितत्वाद्(निर्णीतत्वाद्) भगवता । ‘आत्मत एष(एव) प्राणो जायते’ इत्यवधारणान्न भगवतोऽन्यस्मात् प्राणो जायते ।",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘आत्मेति मुख्यतो विष्णुस्तदन्ये तूपचारतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तथैव स्व इति प्रोक्तस्तस्माद् ब्रह्माऽऽत्मभूः स्वभूः ॥’ इति स्कान्दे ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S26_V02_B05"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "‘स एवेदं सर्वम्’ इत्येतत् नाभेदपरम् ",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘इदं नामातिसामीप्यात् सर्वं(सर्बः हृ.) पूर्णगुणत्वतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भूमाऽहमात्मेति हरिस्त्रिविधोऽपि हि सर्वदा ॥’ इति विश्वनिर्णये ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S26_V02_B06"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "लिङ्गत्रयमपि भगवति युक्तम्",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स्त्रीगुणाः पुङ्गुणाश्चैव नपुंसकगुणा अपि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यदधीना व्यत्ययः स्याद् लिङ्गानां तत्र सर्वशः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "कः किं कं तत्सर्वमात्माऽदितिर्देवादयस्ततः ॥’इति लिङ्गनिर्णये ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C07_S26_V02_B07"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "शास्त्रश्रवणशुद्धिरेवाऽहारशुद्धिः",
| |
| "tail": "\n\t\t\t "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘गुरोर्विद्याहृतिर्या तु स आहार इति स्मृतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तच्छुद्धौ ज्ञानशुद्धिः स्याज्ज्ञानशुद्धी स्थिरा स्मृतिः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्मृतिस्थैर्ये त्वापरोक्ष्यं हरेर्मोक्षस्ततो भवेत् ॥’इति साधननिर्णये ॥ २६ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "॥ "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमच्छन्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्याये षड्विंशः खण्डः ॥",
| |
| "tail": "author-note\u003E\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमच्छन्दोग्योपनिषद्भाष्ये सप्तमोऽध्यायः ॥",
| |
| "tail": "author-note\u003E\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "chapter",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08",
| |
| "type": "adhyaya",
| |
| "name": "अष्टमोऽध्यायः"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "chapter-heading",
| |
| "text": "अष्टमोऽध्यायः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S01",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " प्रथमः खण्डः ",
| |
| "title": "सप्तमोऽध्याये प्रथमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "प्रथमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हृदयकमले भगगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S01_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हृदयकमले भगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओम् अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S01_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S01_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे’ इति ‘ब्रह्मपुर’शब्देन ब्रह्माख्यं पुरं पूर्णत्वात् पुरमिति परं ब्रह्म, ब्रह्मणः पुरमिति शरीरं चोभयं विवक्षितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘प्राप्तोऽस्म्यवध्यं(प्राप्तोऽवध्यं) ब्रह्मपुरं राजेव निवसाम्यहम् ।’,‘अस्मिंश्चेदिदं (अस्मिंश्चेद्यदिदं) ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितम् ।’,‘(यदैनं जरा .हृ) यदैतज्जराऽवाप्नोति प्रध्वंसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत् सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युः’ (इति वाक्यशेषाद्) इत्यादिवाक्यशेषाद् भगवद्वचनाच्च ‘ब्रह्मपुर’शब्देन परं ब्रह्मोच्यत इत्यवसीयते । ‘यत्पुण्डरीकं पुरमध्यसंस्थम्’, ‘यदिदं शरीरं तदेतदाद्यं देवसदनम्’ इत्यादेः शरीरं च ।",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हृत्कमलस्थभगवानेव हृत्कमलस्याप्याधार इति निरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यद् वै तद् ब्रह्मेतीदं वाव तद् योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशः’, ‘यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति’ इत्यादिना परब्रह्मण्येव (च) हृदयं स्थितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S01_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं चेद् ब्रूयुर्यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद् वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S01_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यावान् वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन् समाहितमिति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S01_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S01_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हृदयस्थदहराकाशस्य परब्रह्मत्वाभावनिरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यम्’, ‘दहरोस्मिन्नन्तर आकाशः किं तदत्र विद्यते’ इत्याकाश(इत्यत्राकाश)शब्देन भूताकाशो विवक्षितः। ‘किं तदत्र विद्यते?’ इत्यस्यायं परिहारः– अस्मिन् भूताकाशे परब्रह्माख्य आकाशो विद्यते । आसमन्तात् काशनाद् आकाशः । आसमन्तात् कमश्नातीति वा । ‘अस्मिन् कामाः समाहिताः’ इति वाक्यशेषात् । आसमन्तात् कामानश्नातीति वा । स च यावान् बहिः परमात्मा व्याप्तोऽस्ति तावानेव विद्यते गुणतः । पूर्णगुणत्वात् । अल्पपरिमाणस्यापि महत्परिमाणत्वं च युज्यते । अचिन्त्यशक्तित्वात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘यस्मिन् विरुद्धगतयोऽप्यनिशं(ह्यनिशं .हृ) पतन्ति।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विद्यादयो विविधशक्तय आनूपूर्व्या ॥’ इति वचनात् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आनुपूर्व्येति श्रुतिप्रमाणादित्यर्थः । ‘आनुपूर्वी श्रुतिर्वेद आम्नायश्चेति कथ्यते’ इत्यभिधानात् । अन्यथाऽनिशमित्युक्तिविरोधात् । ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा’, ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्याः’ इति हृदयस्थस्यैवाणुत्वमहत्वोक्तेश्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सन्त्यश्रुता अपि नैवात्रशङ्का ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ॥’ इति च श्रुतिः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘सुविरुद्धा अश्रुताश्च गुणाः सन्त्येव सर्वशः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दोषाः केऽपि(अपि .हृ) न सन्त्येव श्रुता अपि तु सर्वशः ॥’ इति गारुडे ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S01_V03_B02"
| |
| },
| |
| "text": " \n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "दहराकाशस्थमहाकाशस्य परब्रह्मत्वखथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘किं तदत्र विद्यते ?’ इति पृष्टत्वात् हृद्गत आकाशो हृदयशब्देनोच्यते ; हृद्ययनात् । तस्मिन् हृदयाख्य आकाशे (बहिराकाशो) परब्रह्माख्य आकाशो विद्यत इत्यर्थः । अन्यथा कथं भूताकाशस्य दहरस्य बहिराकाशसमत्वम् ? ‘दहरोऽस्मिन् अन्तराकाश’ इति(च) पूर्वोक्ताकाशस्य दहरत्वमुक्तम् । उत्तरस्य तु ‘यावान् वा अयमाकाशः’ इत्यनन्तरपरिमाणत्वम् । अतो ब्रह्माकाश एवोत्तरः । पूर्वोक्तस्याभूताकाशत्वे(पूर्वोक्ताकाश भूताकाशत्वे) ‘तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यम्’, ‘तत्रापि दहरं(दह्रं हृ,) गगनं विशोकस्तस्मिन् यदन्तस्तदुपासितव्यम्’, ‘सहस्रशीर्षं देवम्’ इत्यादि कथं युज्यते(युज्येत .हृ)? न हि भगवदन्तःस्थितमेवान्यत् किञ्चिद्विजिज्ञास्यम् । तद् वावेत्यवधारणाय । उत्तरस्यापरब्रह्मत्वे च सर्वाधारत्वं ‘नास्य जरयैतज्जीर्यते न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा’ इत्यादि न युज्यते ।",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "परब्रह्मस्थप्रपञ्चो न जिज्ञासार्हः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद् वाव विजिज्ञासितव्यम् इत्यस्य य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः’ इत्येव परिहारः । न तु ‘उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी’ इत्यादि । तत्तु विजिज्ञासितव्यत्वे हेतुत्वेन सामर्थ्यकथनमेव । न हि द्यावापृथिव्यादेरेव विजिज्ञास्यत्वम् । ‘तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चत’(मुञ्चत .हृ) इति हि श्रुतिः ।",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मुक्तामुक्तसकलदेवानां भगवानेवाऽश्रयः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उभे अस्मिन् द्यावापृथिवीत्याद्युभयशब्दो मुक्तामुक्तराशिव्यपेक्षया । ‘यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति’ इति वाक्यशेषात् । ‘अस्य’ इति संसारिणः । न हि संसारिणो मुक्ता उपकारकाः । यद्यस्य नोपकारकं तत्तस्य नास्तीत्युच्यतेऽन्यस्य सत्वेऽपि । यथा वित्तादि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S01_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अनित्यहृदयस्थोऽपि भगवान् नित्यः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं चेद् ब्रूयुरस्मिंश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितं सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदैनं जराऽ(यदैतज्जरा .प्र)वाप्नोति प्रध्वंसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S01_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत् सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S01_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S01_V05_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथायोग्यमेवैनं भगवन्तं प्रजा मुक्ता अन्वाविशन्ति तच्छासनानुसारेण यं यं कामं कामयते तं तस्मादेवोपजीवन्ति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S01_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य इहाऽत्मानमननुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान् कामां स्तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवत्यथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान् कामां स्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ६ ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S01_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S01_V06_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदविदुषां पुण्यानि क्षयिष्णुफलान्येव भवन्ति । एतांश्च सत्यान् कामान् भगवदीयान् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘बृहत्त्वात् पूर्णकामत्वाद् विष्णुर्ब्रह्मपुराभिधः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्मिंस्तस्य पुरं देहस्तस्मिन् हृदयमास्थितम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "हृदयाकाशगो विष्णुस्तस्मिन् सर्वमिदं स्थितम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स सत्यकामो भगवान् यदिष्टं तस्य तद्भवेत् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "(अस्मिन्)तस्मिन् समाहिताः कामाः सत्याः पुंसामपि ध्रुवम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तस्यैव ह्यनुसारेण सत्यत्वं नान्यथा क्वचित् ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्याये प्रथमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S02",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वितीयः खण्डः ",
| |
| "title": "अष्टमोऽध्याये द्वितीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वितीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मुक्ताकाङ्क्षितं सकलं सुलभ्यं इति निरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S02_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति तेन पितृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S02_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदि मातृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य मातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन मातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S02_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदि भ्रातृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य भ्रातरः समुत्तिष्ठन्ति तेन भ्रातृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S02_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदि स्वसृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य स्वसारः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्वसृलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S02_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदि सखिलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य सखायः समुत्तिष्ठन्ति तेन सखिलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S02_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदि गन्धमाल्यलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतस्तेन गन्धमाल्यलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S02_V07",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यद्यन्नपालोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य अन्नपाने समुत्तिष्ठतः तेनान्नपानलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S02_V08",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदि गीतवादित्रलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य गीतवादित्रे समुत्तिष्ठतः तेन गीतवादित्रलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ८ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S02_V09",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदि स्त्रीलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य स्त्रियः समुत्तिष्ठन्ति तेन स्त्रीलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S02_V10",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यं यमन्तमभिकामो भवति यं कामं कामयते सोऽस्य सङ्कल्पादेवास्य समुत्तिष्ठति तेन सम्पन्नो महीयते ॥ १० ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S02_V10"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S02_V10_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा बिम्बानुसारेण प्रतिबिम्बप्रकाशनम् ॥ १० ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्याये द्वितीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S03",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " तृतीयः खण्डः ",
| |
| "title": "अष्टमोऽध्याये तृतीयः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "तृतीयः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "संसारे आकाङ्क्षितं सर्वं कुतो न लभ्यते इत्यत्र कारणवर्णनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S03_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषां सत्यानां सतामनृतमपिधानं यो यो ह्यस्येतः प्रैति न तमिह दर्शनाय लभते ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S03_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S03_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद्ये मुक्तियोग्याः स्युस्तेषां कामाः पुराऽपि तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्याः सन्तस्तदज्ञानान्न दृश्यन्ते तथाऽखिलाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अज्ञानमनृतं प्रोक्तमृगताविति धातुतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद् द्रष्टुं यदिष्टं स्यात् तद्दृष्टिनियमो न तु (स्याददृष्टं वियमेन तु)।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अमुक्तस्य ........ ...... .......॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S03_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन् न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानास्तद्यथापि हिरण्यनिधिं निहतमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वा प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S03_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तं हृद्ययमिति तस्माद्धृदयमहरहर्वा एवंवित् स्वर्गं लोकमेति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S03_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S03_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "........ हरेर्लोकं मुक्तो गत्वा हि पश्यति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अज्ञत्वादेव सुप्तौ तु नित्यं यान्तोऽपि माधवम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "नैव पश्यन्त्यसौ विष्णुर्हृदयं नाम हृद्गतेः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं हृदयनामानं विष्णुं जानन् हि नित्यशः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णुलोकगतेः पुण्यमाप्त्वा विष्णुं व्रजेत् तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S03_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "परमात्मनः पूर्णानुग्रहादेव मुक्तिरि कथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति ॥४॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S03_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S03_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यस्य सम्यक् प्रसादोऽस्ति विष्णोरेव स उच्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सम्प्रसादः स उत्थाय शरीरात् प्राप्य केशवम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथास्वरूपस्तु भवेद् यं प्राप्यासौ स्वरूपताम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आप्नोति स परो ह्यात्मा भगवानिन्दिरापतिः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्याह सा रमादेवी पश्यन्ती परमं पदम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S03_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सत्यशब्दवाच्यो मुक्तामुक्तनियामको भगवान्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तानि ह वा एतानि त्रीण्यक्षराणि सत् ति यमिति तद् यत् सत् तदमृतमथ यत् ति तन्मर्त्यमथ यद्यं तेनोभे यच्छति यदनेनोभे यच्छति तस्माद् यमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमेति ॥ ५ ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S03_V05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S03_V05_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सदित्यमृतधर्माणो मुक्ताः श्रीरपि चेरिताः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तीत्युक्ता मर्त्यधर्माणस्तेषां नियमानाद्धरिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सत्यमित्युच्यते सद्भिः ........ .........॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्याये तृतीयः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S04",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "title": "अष्टमोऽध्याये चतुर्थः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "चतुर्थः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "निर्दुःखभगवत्प्राप्तितो दुःखनाश इति कथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S04_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसम्भेदाय नैतंसेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुष्कृतं सर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S04_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S04_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "........ ......... सेतुश्चापि विधारणात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सितमस्मिन् जगत्सर्वमिति सेतुरितीरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S04_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वाऽन्धः सन्ननन्धो भवति विद्धः सन्नविद्धो भवत्युपतापी सन्ननुपतापी भवति तस्माद्वा एतं सेतुं तीर्त्वाऽपि नक्तमहरेवाभिनिष्पद्यतेऽसकृद्विभातो ह्येवैष ब्रह्मलोकः ॥२॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S04_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S04_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतं सेतुं प्रतिपुमानन्यत्तीर्त्वा ह्यदोषवान् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S04_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ३ ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S04_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S04_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स प्राप्यो ब्रह्मचर्येण मनोवाक्कर्मभिस्तु यत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "चरणं ब्रह्मणि परे ब्रह्मचर्यं हि तत्स्मृतम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेनैव ब्रह्मचर्येण भवेयुर्ब्रह्मलोकगाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "एतेषां(येन तेषां .हृ) ब्रह्मलोकः स्यात् परं ब्रह्मैव लोकनात् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ब्रह्मलोक इति प्रोक्तं तस्य लोकोऽपि कथ्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्याये चतुर्थः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S05",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "title": "अष्टमोऽध्याये पञ्चमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "पञ्चमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "ब्रह्मचर्यस्वरूपकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S05_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दतेऽथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्वाऽऽत्मानमनुविन्दते ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S05_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत् सत्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येव सत आत्मनस्त्राणं विन्दतेऽथ यन्मौनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्येमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येवाऽत्मानमनुविद्य मनुते ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S05_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यदनाशकायनमित्यचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "अद्भुतं श्वेतद्वीपाख्यं विष्णुधाम",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अऽथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत् । अरश्च ह वै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि तदैरं मदीयं सरस्तदश्वत्थः सोमसवनस्तदपराजिता पूर्ब्रह्मणः प्रभुविमितं हिरण्मयम् ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S05_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद् य एवैतावरं च वै ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ४ ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S05_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S05_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यज्ञ इष्टं च सत्रं च मौनं चानशनं तथा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परस्य ब्रह्मणो ज्ञानं सर्वमेतदुदीरितम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "परस्य ब्रह्मणो लोके श्वेतद्वीपाभिधे परे ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अरण्यौ चार्णवौ (अरो ण्यश्चार्णवौ .हृ) दिव्यौ चिदानन्दरसात्मकौ ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यावानुच्चः स्वर्गलोकस्तावानुच्चस्तथा स च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "श्वेतद्वीपो दिविष्टोऽतस्तत्र मद्यं सरोवरम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सर्वभोज्यात्मकं दिव्यं तत्राश्वत्थाः सुधास्रवाः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्र विष्णोः पुरं दिव्यमपराजितनामकम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विमिताख्यं च पर्यङ्कं विष्णोर्मानेन संमितम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "चित्सुवर्णमयं दिव्यं लक्ष्मीस्तत्तत् स्वरूपिणी ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स श्वेतद्वीपगो विष्णुः पर्यङ्कब्रह्मनामकः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्याये पञ्चमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S06",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " षष्ठः खण्डः ",
| |
| "title": "अष्टमोऽध्याये षष्ठः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "षष्ठः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हृदयस्थनाडीषु भगवद्रूपोपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
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| "id": "CHU_C08_S06_V01",
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| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष पीत एष लोहितः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C08_S06_V01"
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S06_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "स एष हृदि नाडीषु पञ्चरूपः प्रतिष्ठितः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णोरणिम्नो रूपाणि पञ्चनाडीस्थितानि तु ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नारायणाख्यं सौषुम्नं मध्यस्थं रक्तवर्णकम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "शुक्लं तु वासुदेवाख्यं नादिन्यामग्रतः(नान्दिन्यामग्रतः .हृ) स्थितम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पिङ्गलायां पिङ्गलं तु(च .हृ) रूपं सङ्कर्षणाभिधम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "पश्चिमे वज्रिकायां च पीतं प्रद्युम्ननामकम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इडायामनिरुद्धाख्यं नीलरूपं व्यवस्थितम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सूर्येऽप्येवं पञ्चरूपो भगवान् संव्यवस्थितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "आदित्यनामा चादित्वात् .................।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S06_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छतीमं चामुं चैवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते त आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S06_V02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S06_V02_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "................. तद्व्याप्तं सूर्यमण्डलम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तद्रश्मिभिस्तथा व्याप्ताः समस्ताः सूर्यरश्मयः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मिन्नाडीषु च प्रोतास्तथा नाडीस्थरश्मयः(नाडीषु रश्मयः .हृ) ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S06_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "हृदयस्तभगवद्रूपं प्राप्तवतो न पापलेप इति निरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्यासु तदा नाडीषु सृप्तो भवति तं न कश्चन पाप्मा स्पृशति तेजसा हि तदा सम्पन्नो भवति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S06_V03"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S06_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तन्नीडीसंस्थितं विष्णुं मध्ये जीवः प्रपद्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्तेजसा हि सम्पन्नः सुप्त इत्यभिधीयते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S06_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत्रैतदबलिमानं नीतो भवति तमभित आसीना आहुर्जानासि मां जानासि मामिति स यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति तावज्जानाति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S06_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सुषुम्नानाडीत उत्क्रमणं मुक्तेर्द्वारम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत्रैतस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वं आक्रमते स ओमितिवाहोद्वामीयते स यावत् क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम् ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S06_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदेष श्लोकः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ् अन्या उत्क्रमणे भवन्ति उत्क्रमणे भवन्ति ॥ ६ ॥ ६ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S06_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S06_V06_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ओमित्येव वहन्नित्यं वायुरोंवाडितीरितः (वायुरोंव इतीरितः)॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तेन वामत्वमायाति मुक्तिकाले ह्युपासकः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दिव्यचिद्रूपभावो हि वामभाव उदीरितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदैनं नेतुमन्विच्छन् मनः क्षिपति मारुतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आदित्याख्यं तदा विष्णुं याति जीवः स्वविद्यया ॥’ इति पर्यङ्कोपासनायाम् ॥ ६ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्याये षष्ठः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S07",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " सप्तमः खण्डः ",
| |
| "title": "अष्टमोऽध्याये सप्तमः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "सप्तमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "इन्द्रविरोचनौ प्रति चतुर्मुखब्रह्मकृत उपदेशः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S07_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति स सर्वांश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S07_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामानितीन्द्रो ह वै देवानामभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणां तौ हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापतिसकाशमाजग्मतुः ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S07_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तौ ह द्वात्रिंशतं वर्षाणि प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्ताववास्तामिति तौ होचतुर्य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह भगवतो वचो हरन्तो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S07_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽन्तरक्षणि(अन्तरक्षिणि) पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेत्यथ योऽयं भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादर्शे कतम एष इत्येष(व) उ एवैषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायत इति होवाच ॥ ४ ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S07_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S07_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘इन्द्रो विरोचनश्चैव श्रुत्वा तु(तं .हृ) ब्रह्मणोऽक्षिगम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विष्णुमानन्दरूपं तं सम्यग्ज्ञानविपर्ययौ ॥"
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "आपतुस्तत्र देवेन्द्रो जानन्नपि विरोचनम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "मोहयन्ननुरूपाणि तस्य वाक्यान्युवाच ह ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा विरोचनो नैव जानीयाद् विष्णुमञ्जसा(तत्त्वमञ्जसा) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्ववाक्यं चानृतं न स्यात् तथा ब्रह्माऽप्युवाच ह ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अयोग्या ह्यसुरा ज्ञाने वक्तव्यं नैव चानृतम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "मच्छापादासुरो भावः प्रह्लादादेर्न तु स्वतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अयं त्वासुर(चासुर .हृ) एवातो वक्ष्याम्यस्योभयं यथा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "इन्द्रस्तु शुद्धभावत्वात् पुनरायास्यति ध्रुवम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्यभिप्रायतः प्रोक्तो ब्रह्मणाऽक्षिगतो हरिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अयोग्यत्वात्तु तच्छ्रुत्वा प्रतिरूपं विरोचनः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मत्वाऽप्स्वादर्शके चैव पप्रच्छ कतमस्त्विति ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तत्रापि तु हरेर्भावं हृदि कृत्वा चतुर्मुखः ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दृश्यते ह्येष एवेति तत्त्ववेदिविवक्षया ॥ ७ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्याये सप्तमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "section",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C08_S08",
| |
| "type": "khanda",
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| "name": " अष्टमः खण्डः ",
| |
| "title": "अष्टमोऽध्याये अष्टमः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "section-heading",
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| "text": "अष्टमः खण्डः ",
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| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "gadya",
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| "text": "विरोचनस्य अयथार्थज्ञानमुत्पन्नमिति निरूपणम्",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C08_S08_V01",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानीथस्तन्मे प्रब्रूतमिति तौ होदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C08_S08_V02",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "text": "तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामिति तौ ह साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C08_S08_V03",
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| "adhikarana": ""
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तौ होचतुर्यथैवेदमावां भगवः साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ स्व एवमेवेमौ भगवः साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृताविति एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति तौ ह शान्तहृदयौ प्रवव्रजतुः ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C08_S08_V04",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचानुपलभ्याऽत्मानमननुविद्य व्रजतो यतर एतदुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वाऽसुरा वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्तहृदय एव विरोचनोऽसुरान् जगाम तेभ्यो हैतामुपनिषदं प्रोवाचात्मैवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महय्यन्नात्मानं परिचरन्नुभौ लोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S08_V05",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्मादप्यद्येहाददानमश्रद्दधानमयजमानमाहुरासुरो बतेत्यसुराणां ह्येषोपनिषत् प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसनेनालङ्कारेणेति संस्कुवर्न्त्येतेन ह्यमुं लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥ ५ ॥ ८ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "bhashya-collection",
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| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C08_S08_V05"
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| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "bhashya",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C08_S08_V05_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तथापि योग्यतैवात्र भूयसीति निवेदितुम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "दर्शयन् प्रतिरूपस्य दोषानाह प्रजापतिः ॥"
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अलङ्कारादिभिर्युक्तः पश्यस्वेति विवेचयन् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "यथा देहगुणे गौण्यं दोषे दोषास्तथेति(तथैव) तु ॥"
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तथाऽप्यशुद्धभावत्वात् प्रतिरूपस्य तद्गुणान् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "br",
| |
| "tail": "परस्य ब्रह्मणो जानन् ययौ तुष्टमनाः स्वयम् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "असुराणामविश्वासनिवृत्त्यर्थं पितामहः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "माध्यस्थ्यं ज्ञापयानश्च जानन् वैरोचनं मनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "प्राहाज्ञानां पराभाव इत्युच्चैश्च पुनः पुनः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तथाप्यशुद्धभावत्वादजानन्नेव निर्ययौ ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "गत्वा चैव परम्ब्रह्म प्रतिरूपात्मकं सदा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "दिदेश सर्वासुराणां शरीरालङ्कृतेरपि ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अलङ्कृतिं ब्रह्मणश्च प्रत्यक्षेणोपलम्भिताम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अतोऽसुरा न दास्यन्ति न यजन्त्यात्मनः परम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वभोगेनैव तृप्तिः स्यादिति सर्वेऽपि मेनिरे ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्संस्कारवशेनैव स्वयं ब्रह्मेति वादिनः (वेदिनः)।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अभवन्नपतंश्चैव तमोऽन्धे नित्यदुःखिताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्याये अष्टमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S09",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " नवमः खण्डः ",
| |
| "title": "अष्टमोऽध्याये नवमः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "नवमः खण्डः ",
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| "tail": "\n \n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "gadya",
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| "text": "इन्द्रकृतनिरन्तराध्ययनम्",
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| |
| },
| |
| {
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| "tag": "verse",
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| "attrs": {
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| "id": "CHU_C08_S09_V01",
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| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद् भयं ददर्श यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S09_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "नाहमत्र भोज्यं पश्यामीति स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन् यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः सार्धं विरोचनेन किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोज्यं पश्यमीति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S09_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै स होवाच ॥ ३ ॥ ९ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| |
| "attrs": {
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| "id": "bhashya-CHU_C08_S09_V03"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S09_V03_B01"
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
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| "text": "इन्द्रश्च(स्तु .हृ) जानन्नपि तु मोहयन्नसुरं तदा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "गत्वा निववृते पश्चादिव पश्यन् सदोषताम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "पुनः पुनश्च मोहाय गत्वा गत्वा निवर्तते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "br",
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| "tail": "कथञ्चिदेव विज्ञातं मयेत्यज्ञान् विमोहितुम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्याये नवमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S10",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " दशमः खण्डः ",
| |
| "title": "अष्टमोऽध्याये दशमः खण्डः "
| |
| },
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| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "दशमः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S10_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "gadya",
| |
| "text": "तत्त्वज्ञानप्राप्तौ योग्यताऽवश्यकीति कथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद् भयं ददर्श तद्यदपीदं शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ १ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S10_V02",
| |
| "type": "mantra",
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| "adhikarana-id": "",
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| "adhikarana": ""
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| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वधेनास्य हन्यते नास्य स्रामेण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोज्यं पश्यामीति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S10_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन् यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच तद्यदपीदं शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S10_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न वधेनास्य हन्यते नास्य स्रामेण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं(ज्यं) पश्यामीत्येवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै स होवाच ॥ ४ ॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S10_V04"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S10_V04_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
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| "text": "तद्योग्यान्येव वाक्यानि ब्रह्माप्याह पुनः पुनः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "गरीयसी योग्यतेति ज्ञापयन्पूर्ववत् पुनः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सन्दिग्धान्येव वाक्यानि प्रोवाचेन्द्राय चाऽत्मभूः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वप्नं प्रदर्शयन्यस्तु पूज्यते सर्वदैवतैः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एव विष्णुरित्याह तत्राप्याह पुरन्दरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दर्शयन्नासुरीं बुद्धिं स्वप्नदृश्यविवक्षया ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "घ्नन्तीवैनमदन्तीव तथा च स्यात् परो हरिः ॥ १० ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्याये दशमः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S11",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " एकादशः खण्डः ",
| |
| "title": "अष्टमोऽध्याये एकादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "एकादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S11_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "एकशतवर्षावधिकः इन्द्रकृतगुरुकुलवासः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्तः सन् प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श नाहं खल्वयमेवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यमीति ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S11_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन् यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमेवेच्छन् पुनरागम इति स होवाच नाहं खल्वयं भगव एवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यमीति ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S11_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "verse-text",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्माद् वसापराणि पञ्च वर्षाणीति स हापराणि पञ्च वर्षाण्युवास तान्येकशतं सम्पेदुरेतत् तद् यदाहुरेकशतं ह वै वर्षाणि मघवान् प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास तस्मै स होवाच ॥ ३ ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S11_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S11_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "इत्युक्त आह ब्रह्मैव सुप्तिस्थो भगवानिति ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यत्र सुप्तो ह्ययं जीव इत्युक्तः(इत्युक्तं .हृ) प्राह वासवः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नाहं जानामि मत्तोऽन्यं सुप्तौ(सुप्तः .हृ) नान्योऽपि दर्शयेत् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अहमस्मीति भूतानि न च पश्यन्ति कानिचित् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदि जीवः परात्मा वाऽप्यन्योन्यस्मिन्नपीतताम्(चाथोऽन्योन्यास्मिन्नपीतताम्) ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "गतौ तदाऽप्यपीतस्तु शं विनैव भवेदिति ॥ ११ ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्याये एकादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " द्वादशः खण्डः ",
| |
| "title": "अष्टमोऽध्याये द्वादशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "द्वादशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "सति शरीराभिमाने दुःखमवर्जनीयम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मघवन् मर्त्यं वाव इदं शरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्याऽत्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S12_V01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V01_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उक्तो ब्रह्माऽब्रवीच्छक्रं ज्ञापयंस्तत्त्वमञ्जसा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "योऽयं शरीरसम्बन्धी जीव इत्यवधार्यताम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूतैष्यद्वर्तमानेषु यस्य नो देहसङ्गतिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "सोऽशरीरः परो विष्णुरमृतो नित्यमूर्तिमान् (नित्यपूर्तिमान् .हृ) ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अधिष्ठाय तथाऽपीमं देहमास्ते स ईश्वरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जरामृत्युपरीतोऽयं जीवात्मा देहसङ्गतेः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परेणेयं सुखं प्रोक्तं प्रियमित्येव पण्डितैः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "परेणेयमभद्रं यदप्रियं तदुदीरितम् ॥ "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न जीवस्य तयोर्हानिः कदाचिद् विद्यते क्वचित् (विद्यते द्वयोः .हृ)।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अशरीरं परं ब्रह्म नैव ते स्पृशतः क्वचित् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V02",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "प्राकृतशरीररहितभगवत्सकाशादेव मुक्तिः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अशरीरो वायुरभ्रं विद्युत् स्तनयित्नुरशरीराण्येतानि तद् यथैतान्यमुष्मादकाशात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यन्ते ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V03",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः स यत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वाऽज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरं स यथा प्रायोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्छरीरे प्राणो युक्तः ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S12_V03"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V03_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अम्नामा भगवान् विष्णुर्व्याप्तत्वात् परमेश्वरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तेनैव म्रियमाणत्वाद् ब्रह्माभ्रमिति कीर्तितः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वायोः पत्नी विद्युदुक्ता विशेषद्युतिहेतुतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "ब्रह्माणी स्तनयित्नुः स्यात् सर्वशब्दात्मिका यतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एतेषां ज्ञानवैशेष्यान्नातिदेहेन सङ्गतिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "अतः प्रियाप्रिये तेषामपि न ब्रह्मणः किमु ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्ण्वीयं हि सुखं तेषां स्वभर्त्रीयमथापि च ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न ह्यन्येयं सुखं तेषामतस्ते प्रियवर्जिताः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा ते परमाकाशाद् विष्णोरेव समुत्थिताः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तमेव प्राप्य संयान्ति नैजमानन्दमूर्जितम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं सम्यक्प्रसादेन विष्णोर्मुक्तोऽपि योऽपरः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यं प्राप्य ते निजानन्दमाप्नुवन्ति स केशवः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तं प्राप्य रमते मुक्तः स्त्रीभिर्यानैश्च बन्धुभिः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथैव सारथिर्याने एवं देहे च मारुतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा रथी तथा विष्णुर्जीवोऽन्यरथगो यथा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V04",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "gadya",
| |
| "text": "इन्द्रियेषु भगवदुपासना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यत्रैतदाकाशमनुविषण्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माऽभिव्याहाराय वागथ यो वेदेदं शृणवानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V05",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा(मननाय) मनोऽस्य दैवं चक्षुः स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते ॥ ५ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V06",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
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| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "य एते ब्रह्मलोके तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात् तेषां सर्वे च लोकाः आत्ताः सर्वे च कामाः सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच ॥ ६ ॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya-collection",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "bhashya-CHU_C08_S12_V06"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V06_B01"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदाश्रितानीन्द्रियाणि प्राणश्चापि यदाश्रयः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदाश्रयोऽप्ययं जीवो यो वेदैषां प्रवर्तनम् ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "दर्शनं श्रवणं घ्राणं जिह्वां स्पर्शं मनस्तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदीयान् विषयांश्चैव यो वेदाखिलमञ्जसा ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स विष्णुः परमो ज्ञेयो देवताः करणानि च ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एतैरिन्द्रियैर्विष्णुर्भोगाननुभवत्यजः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "स्वरूपेणैव शक्तोऽपि जीवदेहस्थितो हरिः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भुङ्क्ते तदिन्द्रियैर्भोगाञ्छुरितैरिन्द्रियैः स्वकैः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "जीवं तदिन्द्रियाण्येवं प्राणं च व्याप्य कृत्स्नशः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भुङ्क्ते तत्तद्गुणान् विष्णुर्नैव दोषान् कदाचन ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तमेतं(तमेवं) देवताः सर्वाः वाय्वाद्याः समुपासते ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्माद् देववशा लोकाः सर्वकामाः सजीवकाः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तमेतं यो यथा ज्ञात्वा पश्येद् विष्णुं सनातनम् ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "आप्नोति सर्वकामांश्च सर्वलोकांश्च कामतः ॥’ इति सामसंहितायाम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V06_B02"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उभौ लोकाववाप्नोति वचनान्न लोकायतिकमतं वरोचनेनोक्तम्(विरोचनोक्तम् .हृ)। किन्तु बिम्बप्रतिबिम्बयोरभिमान्यैक्याभिप्रायेण(बिम्बप्रतिबिम्बाभिमान्यैक्याभिप्रायेण) जीवात्मैव महय्य इति मायावाद एव । न चात्र (नचान्यत्र .हृ) जीव आत्मशब्दोक्तः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘‘तदस्यामृतस्याशरीरस्याऽत्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः स्वकैरिन्द्रियैश्छुरितैः व्याप्तः। तथा च ‘दैवं चक्षुः’इत्येतदुपलक्षणप्रियाप्रियाभ्यां न ह वै(न वै) सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः’’ इतीशजीवयोः सतात्पर्यं भेदाभिधानात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न हि जीवादन्यस्य प्रियाप्रियानुभवोऽस्ति । न च मुक्तस्यापि प्रियाप्रियापहतिरस्ति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V06_B03"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "प्रियाप्रियरहितो भगवानेव, न जीवः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च विष्णोरत्र विवक्षितं प्रियम् । पराधीनरतिप्राप्तिर्हि(प्राप्तिः .हृ) प्रियमत्र विवक्षितम्। न हि तद्भगवतः । मुक्तानां तु भगवदधीनरतित्वात् प्रियमस्त्येव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘जीवा मुक्ता अमुक्ताश्च पराधीनरतित्वतः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "न प्रियापहतिः क्वापि स्वातन्त्र्यान्न हरेः प्रियम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पराधीनरतिर्यस्मात् प्रियमित्युच्यते बुधैः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "हरेरधीनता तु स्याद् यद्यपि ब्रह्मवायुवोः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदन्यवशताभावादप्रियाविति तौ श्रुतौ ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथा राज्ञः स्वराट्शब्दो रुद्रस्येश्वरता तथा ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यथा शक्रस्य चेन्द्रत्वं तद्वदप्रियता तयोः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "यथा राज्ञ्याश्च राज्ञीत्वं(राज्ञ्याः स्वराज्ञीत्वं यथैवोमेश्वरी .हृ)यथा वोमेश्वरी स्मृता ॥"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "विद्युतः स्तनयित्नोश्च तथैवाप्रियता श्रुता ॥’ इति च परमश्रुतौ ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V06_B04"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति मुक्तस्य तत्प्रसादात् तत्प्राप्त्या निजानन्दानुभवश्रुतेश्च ।",
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "उत्तमपुरुष इति कथितो भगवानेव",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स उत्तमः पुरुष(उत्तमपुरुषः)’ इति तस्य जीवादुत्तमत्वश्रुतेश्च । अपरपुरुषापेक्षया ह्युत्तमपुरुषशब्दो भवति । अन्यथोत्तमशब्द एव स्यात् । ‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः’(भ.गी.१५.१७) इति च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत् प्राप्तुं नैव शक्यते ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "तद्यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलो हरे ॥’"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ’।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V06_B05"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य(ज्ञानमपाश्रित्य .हृ) मम साधर्म्यमागताः’, ‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’ इति, ‘एतमानन्दमयामात्मानमुपसङ्क्रम्येमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन्’, ‘न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रताः (हरेरनुव्रता) यत्र सुरासुरार्चिताः’, ‘कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः इत्यादेश्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम्’ इत्यत्रापि भेदेनावस्थानश्रुतेः । (उपशब्दादन्तशब्दाच्च .हृ)उपशब्दादन्तरशब्दाच्च मुक्तस्य परञ्ज्योतिःसमीपावस्थानावगतेश्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V06_B06"
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t\t\t\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "‘जीवोपासनां न चतुरानन उपदिशेत््’ इति निरूपणम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "न च जीवमात्रं देवा उपासते । ‘ऊर्जं पृथिव्या भक्त्वायोरुगायमुपासते’ इति हि श्रुतिः । ‘भेददृष्ट्याऽभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा’ इत्यादेश्च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V06_B07"
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "भगवतः इन्द्रियैर्भोगकथनम्",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भूतैर्महद्भिर्य इमाः पुरो विभुर्निर्माय शेते यदमूषु पूरुषः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "भुङ्क्ते गुणान् षोडश षोडशात्मकः सोऽलङ्कृषीष्ट भगवान् वचांसि मे ॥’ इत्यादौ भगवत एवेन्द्रियैर्भोगोक्तेश्च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे’ इति च । ‘ओं गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् अोम्’(ब्र.सू.१.२.११) इति भगवद्वचनं च ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S12_V06_B08"
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘इदं पश्यामि जिघ्राणीत्यपि जीवा न वै विदुः ।",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "द्रव्याणामपरिज्ञानाद्(द्रव्याणामपि च ज्ञानात्) वेदासौ पुरुषोत्तमः॥’ इति च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "उत्तमपुरुषत्वेन भगवानेव परामृष्टः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स उत्तमः पुरुषः’ इति भगवत एवायं परामर्शः । ‘अोम् अन्यार्थश्च परामर्शः अोम्’(ब्र.सू.१.३.२०) इति भगवद्वचनात् । ‘ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः’(भ.गी.१५.१७) इति च । ‘अों जगद्व्यापारवर्जम् अोम्’(ब्र.सू.४.४.१७) इत्यल्पैश्वर्यत्वं च मुक्तस्य भगवताऽभिहितम् । अतो ‘यं प्राप्य जीवः स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स भगवानुत्तमः पुरुषः’ इति परामर्शः । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "‘स्वप्ने महीयमानश्चरति यत्रैतत्सुप्तः’ इति पुरस्तादपि भेदोक्तेः । न हि महीयमान एव जीवश्चरति । प्रायोग्यः सारथिः । प्रयोगेन यानस्य । ‘यन्ता सारथिरानेता प्रायोग्य इति कीर्तितः(कीर्त्यते .हृ)’ इत्यभिधानात् । ‘अन्येभ्यो दीप्यमानत्वाद् दैवं चक्षुर्मनः स्मृतम्’ इति च । ‘य एते ब्रह्मलोके’ तेषु ‘रमते’ । अनुविद्य । शास्त्राचार्यानुसारेण विदित्वा विजानात्यापरोक्ष्येण । ‘वेदनं शास्त्रतो ज्ञानं विज्ञानं ब्रह्मदर्शनम्’ इति च ॥ ७॥ १२ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": " \n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "॥ इति छान्दोग्योपनिषद्भाष्ये अष्टमोऽध्याये द्वादशः खण्डः॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "section",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S13",
| |
| "type": "khanda",
| |
| "name": " त्रयोदशः खण्डः ",
| |
| "title": "अष्टमोऽध्याये त्रयोदशः खण्डः "
| |
| },
| |
| "text": "\n \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "section-heading",
| |
| "text": "त्रयोदशः खण्डः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": "CHU_C08_S13_V01",
| |
| "type": "mantra",
| |
| "adhikarana-id": "",
| |
| "adhikarana": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n\t\t \n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "gadya",
| |
| "text": "मोक्षप्रार्थना",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "verse-text",
| |
| "text": "\n ",
| |
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| "text": "हयग्रीवमुखोद्गीर्णगीर्भिर्देवी(वम् .हृ) रमा पतिम् ।\nअस्तुवद् विस्तृतगुणं भोगिप्रस्तरशायिनम् ॥\nओमितिनामकमक्षरं सर्वसन्निहितत्वादेतत् । उच्चत्वाद् गीतत्वात् सर्वस्थानत्वाच्चोद्गीथं भगवन्तमुपासीत । उक्तं च महासंहितायाम्–\n‘हयग्रीवोद्गीतवाक्यैः रमा देवी रमापतिम् ।\nओमित्येतन्मुखैर्देवम् अस्तुवत्सामवेदगैः ॥ इति ।\n‘ओंनामानमुपासीत तदर्थगुणपूर्वकम् ।\nओतत्वाद् अवनान्मानाद् अधिकोच्चत्वकारणात् ॥\nआनन्दाद् ओजसश्चैव भरणाद् ओमुदाहृतः ॥’ इति समन्वये ।\n‘ओतमस्मिन् जगत्सर्वम् अत्युच्चश्चाखिलैर्गुणैः ।\nइत्योमिति सदोपास्यः सोऽक्षरः पुरुषोत्तमः ॥\nउच्चत्वाद्गीयमानत्वात् स्थानाद् उद्गीथ उच्यते ।" | | "lines": [ |
| | "हयग्रीवमुखोद्गीर्णगीर्भिर्देवी(वम् .हृ) रमा पतिम् ।", |
| | "अस्तुवद् विस्तृतगुणं भोगिप्रस्तरशायिनम् ॥", |
| | "ओमितिनामकमक्षरं सर्वसन्निहितत्वादेतत् । उच्चत्वाद् गीतत्वात् सर्वस्थानत्वाच्चोद्गीथं भगवन्तमुपासीत । उक्तं च महासंहितायाम्–", |
| | "‘हयग्रीवोद्गीतवाक्यैः रमा देवी रमापतिम् ।", |
| | "ओमित्येतन्मुखैर्देवम् अस्तुवत्सामवेदगैः ॥ इति ।", |
| | "‘ओंनामानमुपासीत तदर्थगुणपूर्वकम् ।", |
| | "ओतत्वाद् अवनान्मानाद् अधिकोच्चत्वकारणात् ॥", |
| | "आनन्दाद् ओजसश्चैव भरणाद् ओमुदाहृतः ॥’ इति समन्वये ।", |
| | "‘ओतमस्मिन् जगत्सर्वम् अत्युच्चश्चाखिलैर्गुणैः ।", |
| | "इत्योमिति सदोपास्यः सोऽक्षरः पुरुषोत्तमः ॥", |
| | "उच्चत्वाद्गीयमानत्वात् स्थानाद् उद्गीथ उच्यते ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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Line 77: |
| "chapter": "CHU_C01", | | "chapter": "CHU_C01", |
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| "text": "ओमित्येनं समुद्दिश्य ह्युद्गाता गायति स्फुटम् ॥\nविष्णोरोमिति नाम्नोऽस्य व्याख्यानम् अधिकोच्चता ।\nअकारेणाधिकं प्रोक्तम् उकारेणोच्चमुच्यते ॥\nतथा मितं सर्ववेदैर्मकारेणाभिधीयते ।\nअधिकोच्चमिति ज्ञातम् ओमित्यस्यार्थ ईरितः ॥" | | "lines": [ |
| | "ओमित्येनं समुद्दिश्य ह्युद्गाता गायति स्फुटम् ॥", |
| | "विष्णोरोमिति नाम्नोऽस्य व्याख्यानम् अधिकोच्चता ।", |
| | "अकारेणाधिकं प्रोक्तम् उकारेणोच्चमुच्यते ॥", |
| | "तथा मितं सर्ववेदैर्मकारेणाभिधीयते ।", |
| | "अधिकोच्चमिति ज्ञातम् ओमित्यस्यार्थ ईरितः ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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Line 92: |
| "chapter": "CHU_C01", | | "chapter": "CHU_C01", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "एषां भूतानां पृथिवी रसः। पृथिव्या आपो रसः। अपामोषधयो रसः। ओषधीनां पुरुषो रसः। पुरुषस्य वाग्रसो। वाच (ऋक् रसः)ऋग्रसः। ऋचः साम रसः। साम्न उद्गीथो रसः। स एष रसानां रसतमः परमः परार्ध्योऽष्टमो य उद्गीथः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "एषां भूतानां पृथिवी रसः। पृथिव्या आपो रसः। अपामोषधयो रसः। ओषधीनां पुरुषो रसः। पुरुषस्य वाग्रसो। वाच (ऋक् रसः)ऋग्रसः। ऋचः साम रसः। साम्न उद्गीथो रसः। स एष रसानां रसतमः परमः परार्ध्योऽष्टमो य उद्गीथः ॥ २ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "तदेतत् परमत्वं तु यथाक्रममुदीर्यते ।\nदेवतानुक्रमज्ञाश्च विष्णोः परमताविदः ॥\nएकान्तिनस्ते विज्ञेया यथाक्रमपरास्तथा ।\nअस्मादसावुच्च इति क्रमस्यान्तगतं हरिम् ॥\nएकमेव तु ये विद्युस्ते ह्येकान्तिन ईरिताः ।\nएवं यथाक्रमज्ञाश्च सदैकान्तपरायणाः ॥\nप्रविशन्ति परं देवं नारायणमनामयम् ।\nउच्चक्रमान्तगत्वेन कुर्युः पूजां हरेः सदा ॥\nलक्ष्म्यादेः क्रमशः पूजां ज्ञात्वा भागवता इति ।\nस्वतन्त्रपूज्यताबुद्ध्या न दद्युः किञ्च कस्यचित् ॥\nब्रह्माद्या मनुसंज्ञा ये वर्णत्वेनोदिताः(उदितान् .हृ) श्रुतौ ।\nमानवाख्याश्च मुनयस्तान् यजन्ति न चेतरान् ॥\nपितृत्वेन गुरुत्वेन साक्षाद्भागवतत्वतः ।\nअपभ्रष्टा अदेवाश्च ब्रह्माद्याख्यायुता अपि ॥\nदेवसंज्ञाश्च दीनत्वात् पूजयेयुर्न तान् क्वचित् ।\nयद् भागवतबुद्ध्यैव दत्तं ब्रह्मादयः सुराः ॥\nवैदिकाः प्रतिगृह्णीयुरपभ्रष्टास्तथेतरत् ।\nयथाक्रमपरिज्ञानाद् एकान्तित्वाच्च केवलम् ॥\nअच्छिद्रत्वाच्च नियतो मोक्षोन्यत्तु विडम्बनम् ।" | | "lines": [ |
| | "तदेतत् परमत्वं तु यथाक्रममुदीर्यते ।", |
| | "देवतानुक्रमज्ञाश्च विष्णोः परमताविदः ॥", |
| | "एकान्तिनस्ते विज्ञेया यथाक्रमपरास्तथा ।", |
| | "अस्मादसावुच्च इति क्रमस्यान्तगतं हरिम् ॥", |
| | "एकमेव तु ये विद्युस्ते ह्येकान्तिन ईरिताः ।", |
| | "एवं यथाक्रमज्ञाश्च सदैकान्तपरायणाः ॥", |
| | "प्रविशन्ति परं देवं नारायणमनामयम् ।", |
| | "उच्चक्रमान्तगत्वेन कुर्युः पूजां हरेः सदा ॥", |
| | "लक्ष्म्यादेः क्रमशः पूजां ज्ञात्वा भागवता इति ।", |
| | "स्वतन्त्रपूज्यताबुद्ध्या न दद्युः किञ्च कस्यचित् ॥", |
| | "ब्रह्माद्या मनुसंज्ञा ये वर्णत्वेनोदिताः(उदितान् .हृ) श्रुतौ ।", |
| | "मानवाख्याश्च मुनयस्तान् यजन्ति न चेतरान् ॥", |
| | "पितृत्वेन गुरुत्वेन साक्षाद्भागवतत्वतः ।", |
| | "अपभ्रष्टा अदेवाश्च ब्रह्माद्याख्यायुता अपि ॥", |
| | "देवसंज्ञाश्च दीनत्वात् पूजयेयुर्न तान् क्वचित् ।", |
| | "यद् भागवतबुद्ध्यैव दत्तं ब्रह्मादयः सुराः ॥", |
| | "वैदिकाः प्रतिगृह्णीयुरपभ्रष्टास्तथेतरत् ।", |
| | "यथाक्रमपरिज्ञानाद् एकान्तित्वाच्च केवलम् ॥", |
| | "अच्छिद्रत्वाच्च नियतो मोक्षोन्यत्तु विडम्बनम् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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Line 132: |
| "chapter": "CHU_C01", | | "chapter": "CHU_C01", |
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| "text": "(विष्णोर्भक्ति .हृ)विष्णौ भक्तिर्विशेषेण मोक्षावाप्तौ हि कारणम् ॥\nतद्भक्तेषु क्रमेणैव रमाद्येषु त्वनन्तरम् ।\nतृतीयमपि वैराग्यं न (नैवान्यत् .हृ)चान्यन्मोक्षकारणम् ॥\nएतत्साधनताहेतोस्तदन्यद्धि विधीयते ।\nअतोऽन्यत् सर्वकृच्चापि गच्छेदेवाधरं तमः ॥\nअस्मिन्सुनिष्ठितो नित्यं मोक्ष्येवान्योज्झकोऽपि सन् ।\nअतस्तेषां क्रमं वक्ष्ये देवानां यः श्रुतौ श्रुतः ॥\nपृथिवी सर्वभूतेभ्यः सदा सर्वगुणैर्वरा ।\nरसः सारो वरश्चेति शब्दा एकार्थवाचकाः ॥\nपृथिव्या वरुणः श्रेष्ठस्तस्माद् ओषधिदेवता ।\nसोमस्तस्मात्तु पुरुषो रुद्रो यत्पौंस्यदेवता ॥\nतस्मात् सरस्वती वाग्घि श्रेष्ठाऽस्या ऋक्स्वरूपिणी ।\nसैव श्रेष्ठा ततो वायुर्वरिष्ठः सामगायकः ॥\nसमत्वात् सर्वभूतेषु साम साम्नां च देवता ।\nततः श्रेष्ठतमो विष्णुः श्रेष्ठश्रेष्ठतमः(श्रेष्ठः श्रेष्ठतमः) सदा ॥\nश्रेष्ठाच्छ्रेष्ठतमाच्चापि परमात् परमो विभुः ।\nपरमर्द्धियुतत्वाच्च परार्ध्य इति कीर्तितः ॥’ इति सारनिर्णये ।\nअतिशयं परमर्धिगुणः परमः परार्ध्यः । उत्तमेभ्योऽप्यतिपरमोत्तमोत्तमो रसानां रसतमः परमः परार्ध्यः । रसानां सकाशादपि परमपरार्ध्यरसतम(परमः परमर्द्धरसतमः) इत्यर्थः । प्राणादीनां भूतादिभ्यः श्रेष्ठत्ववद् अस्य श्रेष्ठत्वं न भवति; किन्तु? महान् विशेष इति ज्ञापयितुं ‘रसानां रसतम’ इत्यादि बहुविशेषणम् ।\nभूतेभ्यः पृथिव्या रसत्वम्, तेभ्यो वरुणस्य रसतरत्वम्, सोमस्य रसतमत्वम्, रुद्रस्य परमरसतमत्वम्, वाचः परमर्द्धरसतमत्वम्, प्राणस्य परमपरार्धरसतमत्वम्, अयं तु भगवान् प्राणादपि परमपरार्द्धरसतममात्रो न भवति; किन्तु? प्राणस्यापि रसभूताया रमाया अपि परमपरार्ध्यरसतमः । ‘अस्मादप्यतिशयेन परम्’ इत्यसंख्यागोचरत्वेन परार्द्धेन ज्ञेयं हि परार्ध्यम् । ऋग्रूपाया वाचः पृथक्परत्वाङ्गीकारेऽपि भूतेभ्यः प्राणस्य परमपरार्धरसतमत्वमेव; न तु परमपरार्द्ध्य(र्धि)रसतमत्वम् । परस्माद्(दपि) आ समन्तादृद्धं हि परार्द्धम् (तेन उत्तमत्वेन ज्ञेयं परार्धि)। तेनासङ्ख्यागोचरत्वेन ज्ञेयं परार्द्ध्यम् । परार्द्धोत्तमं परार्द्धि । तेनासंख्यागोचरत्वेन ज्ञेयं परार्द्ध्यमित्यतः परार्द्धित्वं श्रियो भवति । श्रियोऽपि परार्द्ध्य भगवान् । अतो रसानां रसतमः परमः परार्द्ध्यः ।" | | "lines": [ |
| | "(विष्णोर्भक्ति .हृ)विष्णौ भक्तिर्विशेषेण मोक्षावाप्तौ हि कारणम् ॥", |
| | "तद्भक्तेषु क्रमेणैव रमाद्येषु त्वनन्तरम् ।", |
| | "तृतीयमपि वैराग्यं न (नैवान्यत् .हृ)चान्यन्मोक्षकारणम् ॥", |
| | "एतत्साधनताहेतोस्तदन्यद्धि विधीयते ।", |
| | "अतोऽन्यत् सर्वकृच्चापि गच्छेदेवाधरं तमः ॥", |
| | "अस्मिन्सुनिष्ठितो नित्यं मोक्ष्येवान्योज्झकोऽपि सन् ।", |
| | "अतस्तेषां क्रमं वक्ष्ये देवानां यः श्रुतौ श्रुतः ॥", |
| | "पृथिवी सर्वभूतेभ्यः सदा सर्वगुणैर्वरा ।", |
| | "रसः सारो वरश्चेति शब्दा एकार्थवाचकाः ॥", |
| | "पृथिव्या वरुणः श्रेष्ठस्तस्माद् ओषधिदेवता ।", |
| | "सोमस्तस्मात्तु पुरुषो रुद्रो यत्पौंस्यदेवता ॥", |
| | "तस्मात् सरस्वती वाग्घि श्रेष्ठाऽस्या ऋक्स्वरूपिणी ।", |
| | "सैव श्रेष्ठा ततो वायुर्वरिष्ठः सामगायकः ॥", |
| | "समत्वात् सर्वभूतेषु साम साम्नां च देवता ।", |
| | "ततः श्रेष्ठतमो विष्णुः श्रेष्ठश्रेष्ठतमः(श्रेष्ठः श्रेष्ठतमः) सदा ॥", |
| | "श्रेष्ठाच्छ्रेष्ठतमाच्चापि परमात् परमो विभुः ।", |
| | "परमर्द्धियुतत्वाच्च परार्ध्य इति कीर्तितः ॥’ इति सारनिर्णये ।", |
| | "अतिशयं परमर्धिगुणः परमः परार्ध्यः । उत्तमेभ्योऽप्यतिपरमोत्तमोत्तमो रसानां रसतमः परमः परार्ध्यः । रसानां सकाशादपि परमपरार्ध्यरसतम(परमः परमर्द्धरसतमः) इत्यर्थः । प्राणादीनां भूतादिभ्यः श्रेष्ठत्ववद् अस्य श्रेष्ठत्वं न भवति; किन्तु? महान् विशेष इति ज्ञापयितुं ‘रसानां रसतम’ इत्यादि बहुविशेषणम् ।", |
| | "भूतेभ्यः पृथिव्या रसत्वम्, तेभ्यो वरुणस्य रसतरत्वम्, सोमस्य रसतमत्वम्, रुद्रस्य परमरसतमत्वम्, वाचः परमर्द्धरसतमत्वम्, प्राणस्य परमपरार्धरसतमत्वम्, अयं तु भगवान् प्राणादपि परमपरार्द्धरसतममात्रो न भवति; किन्तु? प्राणस्यापि रसभूताया रमाया अपि परमपरार्ध्यरसतमः । ‘अस्मादप्यतिशयेन परम्’ इत्यसंख्यागोचरत्वेन परार्द्धेन ज्ञेयं हि परार्ध्यम् । ऋग्रूपाया वाचः पृथक्परत्वाङ्गीकारेऽपि भूतेभ्यः प्राणस्य परमपरार्धरसतमत्वमेव; न तु परमपरार्द्ध्य(र्धि)रसतमत्वम् । परस्माद्(दपि) आ समन्तादृद्धं हि परार्द्धम् (तेन उत्तमत्वेन ज्ञेयं परार्धि)। तेनासङ्ख्यागोचरत्वेन ज्ञेयं परार्द्ध्यम् । परार्द्धोत्तमं परार्द्धि । तेनासंख्यागोचरत्वेन ज्ञेयं परार्द्ध्यमित्यतः परार्द्धित्वं श्रियो भवति । श्रियोऽपि परार्द्ध्य भगवान् । अतो रसानां रसतमः परमः परार्द्ध्यः ।" |
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| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "कतमा कतमर्क् कतमत् कतमत् साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति । वागेवर्क, प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथः ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "कतमा कतमर्क् कतमत् कतमत् साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति । वागेवर्क, प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथः ॥ ३ ॥" |
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| "text": "पृथिव्याः सोमवरुणयोश्चौषध्यब्देवतात्वेन रुद्रस्य च लिङ्गदेवतात्वेन प्रसिद्धेः ऋगादीनामेव विमर्शः क्रियते-\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eकतमा कतमर्ग्\u003C/span\u003E इत्यादिना । तज्ज्ञानस्य विशिष्टफलत्वाच्च । वाचश्च सरस्वतीत्वेन प्रसिद्धेर्वागृचोरैक्याच्च न विमर्शः कृतः ।\n‘विशेषात् प्राणसंयुक्ता वाग् ऋगित्यभिधीयते ।\nऋ गताविति धातोर्हि ऋक्त्वं सर्गाभिमानिनी ॥\nविशेषसंयोगहीना यदा सा वै(सैव .हृ) सरस्वती ।\nतदा तस्यावरा सैव प्राणसंयोगिनी मता ॥\nप्राणयोगवियोगाभ्यां सैषैकाऽपि विभिद्यते ।\nवागेवाक् तच्छ्रुतौ प्रोक्ता प्राणः सामेति कीर्तितः ॥\nअक्षयाद् रतिरूपत्वाद् अक्षेषु रमणादपि ।\nअक्षरं भगवान् विष्णुरोमित्युच्चत्वहेतुतः(अत्युच्चत्वहेतुतः .हृ) ॥\nइतिशब्दोऽन्यथाभावनिवृत्त्यर्थ उदाहृतः ।\nएवमत्युच्च एवासौ सर्वदैतद्धृदि स्थितः (स्थितेः) ॥\nउद्गीयमान उद्गीथो भगवान् पुरुषोत्तमः ॥" | | "lines": [ |
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| | "‘विशेषात् प्राणसंयुक्ता वाग् ऋगित्यभिधीयते ।", |
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| "text": "तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्च ऋक् च साम च तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्च ऋक् च साम च तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते ॥ ४ ॥" |
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| "text": "यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य काममापयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य काममापयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ५ ॥" |
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| "text": "तद्वा एतदनुज्ञाक्षरम् । यद्धि किञ्चानुजानात्योमित्येव तदा हैष उ एव समृद्धिर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "तद्वा एतदनुज्ञाक्षरम् । यद्धि किञ्चानुजानात्योमित्येव तदा हैष उ एव समृद्धिर्यदनुज्ञा समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ६ ॥" |
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| "text": "तस्मादोमित्यनुज्ञानं कुवर्न्त्येते जनाः सदा ।\nत्वदुक्तं तत् तथा कुर्याद् भगवानेव केशवः ॥\nइत्यभिप्रायतः शब्दः प्रवृत्तः स पुरातनैः ।\nतदेतदज्ञैस्तु जनैः स्वानुज्ञेति प्रदीयते(प्रतीयते) ॥\nओमित्ययं पूर्णवाची समृद्धिर्ह्योमितीरिता।\nसमृद्धस्ते हि कामोऽयमित्यनुज्ञाऽथवा भवेत् ॥\nअतः समृद्धिवाची स्याद्धरेरोंशब्द ईरितः ।\nइति वा दीयतेऽनुज्ञा हरिस्तव समृद्धिदः ॥ ६॥\nवाक्प्राणौ दम्पती चापि संसृज्येते जनार्दने ।\nमुक्तौ तु तत्प्रसादेन संसृज्यन्ते ततः परे ॥\nतद्द्वारेणैव साक्षात्तु प्राणः संसृज्यते हरौ ॥ ४॥" | | "lines": [ |
| | "तस्मादोमित्यनुज्ञानं कुवर्न्त्येते जनाः सदा ।", |
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| "text": "तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते ओमित्याश्रावयत्योमिति शंसत्योमित्युद्गायत्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै महिम्ना रसेन तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "तेनेयं त्रयी विद्या वर्तते ओमित्याश्रावयत्योमिति शंसत्योमित्युद्गायत्येतस्यैवाक्षरस्यापचित्यै महिम्ना रसेन तेनोभौ कुरुतो यश्चैतदेवं वेद यश्च न वेद ॥ ७ ॥" |
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| "text": "तेनैव विष्णुनेयं च त्रयीविद्या प्रवर्तते ।\nओमित्युक्त्वा हि तद्व्याख्या सर्वैर्मन्त्रैः प्रवर्तते ॥\nओंनामकस्य पूजार्थं विष्णोरेव सदैव हि ।\nमहिम्ना सारभूतेन विष्णुना ज्ञोऽज्ञ एव च ॥\nकुरुतः कर्म.............।" | | "lines": [ |
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| "text": "नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति अथ ह य एवायं (मुख्यप्राणः) मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीत तस्येतरैः प्राणैरुपव्याख्यानं भवति ॥ ८॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "नाना तु विद्या चाविद्या च यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवतीति खल्वेतस्यैवाक्षरस्योपव्याख्यानं भवति अथ ह य एवायं (मुख्यप्राणः) मुख्यः प्राणस्तमुद्गीथमुपासीत तस्येतरैः प्राणैरुपव्याख्यानं भवति ॥ ८॥ १ ॥" |
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| "text": "...............नाज्ञस्य मुक्तिर्ज्ञस्य भवेत्तु सा ।\nस्वयोग्यं तु परिज्ञानं यत् तस्योपनिषत् स्मृतम् ॥\nअक्षरं भगवान् विष्णुस्तस्योप प्रणवः स्मृतः ।\nउपव्याख्या तु तद्व्याख्येत्येवमाह श्रुतिः परा ॥’ इति तार्तीये ।\n‘परर्धं परमादुच्चं परार्धं तु ततोऽधिकम् ।\nततोऽधिकं परार्धिः स्यात् परार्ध्यमिति तत्परम् ॥\nपरतः परमाच्चैव परार्द्धो(परार्द्धि .हृ) वायुरीरितः ।\nपरार्धिनी श्रीरुद्दिष्टा परार्ध्यो भगवान् हरिः ॥\nइति शब्दनिर्णये ॥ ८॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "...............नाज्ञस्य मुक्तिर्ज्ञस्य भवेत्तु सा ।", |
| | "स्वयोग्यं तु परिज्ञानं यत् तस्योपनिषत् स्मृतम् ॥", |
| | "अक्षरं भगवान् विष्णुस्तस्योप प्रणवः स्मृतः ।", |
| | "उपव्याख्या तु तद्व्याख्येत्येवमाह श्रुतिः परा ॥’ इति तार्तीये ।", |
| | "‘परर्धं परमादुच्चं परार्धं तु ततोऽधिकम् ।", |
| | "ततोऽधिकं परार्धिः स्यात् परार्ध्यमिति तत्परम् ॥", |
| | "परतः परमाच्चैव परार्द्धो(परार्द्धि .हृ) वायुरीरितः ।", |
| | "परार्धिनी श्रीरुद्दिष्टा परार्ध्यो भगवान् हरिः ॥", |
| | "इति शब्दनिर्णये ॥ ८॥ १ ॥" |
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| | "द्वितीयः खण्डः" |
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| "text": "देवासुरा ह वै यत्र संयेतिर उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम इति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "देवासुरा ह वै यत्र संयेतिर उभये प्राजापत्यास्तद्ध देवा उद्गीथमाजह्रुरनेनैनानभिभविष्याम इति ॥ १ ॥" |
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| "text": "ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "ते ह नासिक्यं प्राणमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं जिघ्रति सुरभि च दुर्गन्धि च पाप्मना ह्येष विद्धः ॥ २ ॥" |
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| "text": "अथ ह वाचमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तां हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तयोभयं(तेनोभयं) वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ ह वाचमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तां हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तयोभयं(तेनोभयं) वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येषा विद्धा ॥ ३ ॥" |
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| "text": "अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद् विद्धम् ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ ह चक्षुरुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं पश्यति दर्शनीयं चादर्शनीयं च पाप्मना ह्येतद् विद्धम् ॥ ४ ॥" |
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| "text": "अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतद् विद्धम् ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ ह श्रोत्रमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं शृणोति श्रवणीयं चाश्रवणीयं च पाप्मना ह्येतद् विद्धम् ॥ ५ ॥" |
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| "text": "अथ ह मन उद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं सङ्कल्पयते सङ्कल्पनीयं चासङ्कल्पनीयं च पाप्मना ह्येतत् विद्धम् ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ ह मन उद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तद्धासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात् तेनोभयं सङ्कल्पयते सङ्कल्पनीयं चासङ्कल्पनीयं च पाप्मना ह्येतत् विद्धम् ॥ ६ ॥" |
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| "text": "अथ ह य एवायं (मुख्यः प्राणः)मुख्यप्राणस्तमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः ऋत्वा विदध्वसुर्यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेतैवम् ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ ह य एवायं (मुख्यः प्राणः)मुख्यप्राणस्तमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तं हासुराः ऋत्वा विदध्वसुर्यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसेतैवम् ॥ ७ ॥" |
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| "text": "स यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसते एवं हैव स विध्वंसते य एवं विदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माऽऽखणः ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "स यथाऽश्मानमाखणमृत्वा विध्वंसते एवं हैव स विध्वंसते य एवं विदि पापं कामयते यश्चैनमभिदासति स एषोऽश्माऽऽखणः ॥ ८ ॥" |
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| "text": "नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येषः तेन यदश्नाति यत् पिबति तेनेतरान् प्राणानवत्येतमु एवान्ततो वित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्तत इति ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "नैवैतेन सुरभि न दुर्गन्धि विजानात्यपहतपाप्मा ह्येषः तेन यदश्नाति यत् पिबति तेनेतरान् प्राणानवत्येतमु एवान्ततो वित्त्वोत्क्रामति व्याददात्येवान्तत इति ॥ ९ ॥" |
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| | "तं हाङ्गिरा उद्गीथमुपासाञ्चक्रे एतमु एवाङ्गिरसं मन्यन्तेऽङ्गानां यद्रसस्तेन॥ १० ॥" |
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| "text": "तं ह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते वाग्घि बृहती तस्या एष पतिस्तेन ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "तं ह बृहस्पतिरुद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एव बृहस्पतिं मन्यन्ते वाग्घि बृहती तस्या एष पतिस्तेन ॥ ११ ॥" |
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| "text": "तं हायास्य उद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद् यदयते तेन ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "तं हायास्य उद्गीथमुपासाञ्चक्र एतमु एवायास्यं मन्यन्त आस्याद् यदयते तेन ॥ १२ ॥" |
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| | "तं ह बको दाल्भ्यो विदाञ्चकार स ह नैमिशीयानामुद्गाता बभूव स ह स्मैभ्यः कामानागायति ॥ १३ ॥" |
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| | "आगता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्त इत्यध्यात्मम् ॥ १४ ॥ २ ॥" |
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| "text": "उद्गीथाख्यस्य(उद्गीथाख्यविष्णोः .हृ) विष्णोर्विशिष्टप्रतिमा वायुरेव । अतस्तस्य सर्वोत्तमत्वज्ञानपूर्वकं तस्मिंस्ततोऽप्युत्तमत्वेनोपासित एव भगवान् सम्यक् फलं ददातीति दर्शयति ।\n‘वायौ मुख्यधिया इति च’ इति भगवद्वचनम् ।(‘वायौ मुख्यधिया’ इति भगवद्वचनम्)\n‘यस्माद् वायौ स्मृतो विष्णुर्वायोर्मुख्यतयाऽखिलात् ।\nस्वस्य मुख्यतया तस्मात् परां तुष्टिं गमिष्यति ॥\nअतो विचार्य सकलैर्देवैः प्राणे जनार्दनः ।\nउपासितो दैत्यजयकारणात् पापवर्जिते ॥\nवायुपुत्रं च नासिक्यम् अग्निं वागात्मकं तथा ।\nसोमं श्रोत्रात्मकं चैव सूर्यं चक्षुःस्वरूपिणम् ॥\nरुद्रं मनःस्वरूपं च शेषं चाहंस्वरूपिणम् ।\nचित्तात्मकं च गरुडं पापेन विविधुः सुरान् ॥\nअसुरास्तैर्यतो विद्धास्तस्मात् ते दोषयोगिनः ।\nमुख्यवायौ यदा देवाः शरीरस्थे च सूर्यगे ॥\nविष्णुमुद्गीथनामानं तदा तं च विदध्वसुः ।\nयदा विदध्वसुः प्राणं विध्वास्तास्ते तदाऽसुराः ॥\nअखन्याश्मानमेवाप्य लोष्टो विध्वंसते यथा ।\nप्रतिमां प्रेयसीं प्राप्य विष्णोः प्राणं तथाऽसुराः ॥\nतस्माद् अादित्यसंस्थे वा शरीरस्थेऽपि वाऽनिले(चानिले) ।\nबलज्ञानात्मके दिव्याकृतिमत्युज्जवलात्मनि ॥\nसर्वदेवोत्तमे(सर्वदेवोत्तमम्) विष्णुम् उपासीत ततोऽधिकम् ।\nअस्योपासनया देवास्सर्वे नामानि(सर्वनामानि) भेजिरे ॥\nइन्द्रो बृहस्पतिः शम्भुरित्याद्याः प्राणगा यतः ।\nप्राणस्य नामशब्दाश्च मुख्यतो विष्णुसंस्थिताः॥’ इति प्रध्याने ॥\n‘उद्गीथाख्यं परं विष्णुमुपास्त्याऽऽजह्रुरञ्जसा ।\nतथापि प्राण एवासौ प्रीतिमागाद् उपासितः ॥’ इति च ॥\n‘प्राणं प्राप्यैव विध्वस्ता यथा सर्वेऽसुरास्तथा ।\nतदुपासकस्य यश्चापि प्रतीपं दातुमिच्छति ॥’ इति च ॥\n‘एवं(एतं) विदित्वा संसारान्मुक्तिमेष्यत्यसंशयम् ।\nविष्णुमप्यन्ततो वेत्ति प्राणवेत्ता यतः स्फुटम् ॥\nवीति विष्णुः समुद्दिष्टो विशिष्टत्वात्तु सर्वतः ।\nआददात्येव तं प्राणवेत्ताऽन्ते तत्प्रसादतः ॥\nप्राणात् परं तु ये विष्णुं जीवांश्चैवावरांस्ततः ।\nये विदुस्ते विदुः प्राणं नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति च ॥\n‘प्राण उद्गीथ इत्याद्या नाम ब्रह्मादिकास्तथा ।\nसप्तम्यर्थाः समुद्दिष्टाः सप्तसु प्रथमा यतः ॥\nप्राणमुद्गीथमित्याद्याः द्वितीया सप्तमी मता ॥’ इति च ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "उद्गीथाख्यस्य(उद्गीथाख्यविष्णोः .हृ) विष्णोर्विशिष्टप्रतिमा वायुरेव । अतस्तस्य सर्वोत्तमत्वज्ञानपूर्वकं तस्मिंस्ततोऽप्युत्तमत्वेनोपासित एव भगवान् सम्यक् फलं ददातीति दर्शयति ।", |
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| | "तस्माद् अादित्यसंस्थे वा शरीरस्थेऽपि वाऽनिले(चानिले) ।", |
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| | "सप्तम्यर्थाः समुद्दिष्टाः सप्तसु प्रथमा यतः ॥", |
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| "text": "अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीतोद्यन् वा एष प्रजाभ्य उद्गायत्युद्यंस्तमोभयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथाधिदैवतं य एवासौ तपति तमुद्गीथमुपासीतोद्यन् वा एष प्रजाभ्य उद्गायत्युद्यंस्तमोभयमपहन्त्यपहन्ता ह वै भयस्य तमसो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥" |
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| "text": "‘आदित्यसंस्थितो नित्यं प्राणस्तपति नापरः ।\nप्रकाशनं च तपनं काष्ठवत् सूर्यगं भवेत् ॥\nसूर्यमण्डलगो वायुरुदयास्तमयोज्झितः ।\nअपि प्रजाभ्य उद्यंश्चैवोद्गायति जनार्दनम् ॥" | | "lines": [ |
| | "‘आदित्यसंस्थितो नित्यं प्राणस्तपति नापरः ।", |
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| "text": "समान उ एवायं चासौ चोष्णोऽयमुष्णोऽसौ स्वर इतीममाचक्षते स्वर इति प्रत्यास्वर इत्यमुं तस्माद्वा एतमिमममुं चोद्गीथमुपासीत ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "आदित्यमण्डलस्थश्च सर्वप्राणिगतस्तथा ।\nवायुः समान एवायमुष्णोऽसावपि च स्फुटम् ॥\nतस्मादस्मिन्नमुष्मिन् वाऽप्युद्गीथाख्यं जनार्दनम् ।\nउपासीत विमोक्षाय सर्वकामाप्तये तथा ॥’ इति च ।\nकेशवः स्वः स्वतन्त्रत्वात् तद्रतेर्मारुतः स्वरः ।\nशरीरस्थश्च सूर्यस्थः प्रतिप्रत्या समन्ततः ॥\nमां प्रतीत्यत एवासौ प्रत्यास्वर उदाहृतः ।" | | "lines": [ |
| | "आदित्यमण्डलस्थश्च सर्वप्राणिगतस्तथा ।", |
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| "text": "अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानोऽथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः सा वाक् तस्मादप्राणन्ननपानन् वाचमभिव्याहरति या वाक् सर्क्(सा ऋक्) तस्मात् अप्राणन्ननपानन् ऋचमभिव्याहरति या ऋक् तत् साम तस्मादप्राणन्ननपानन् साम गायति यत् साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्ननपानन् उद्गायति (अतः) ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ खलु व्यानमेवोद्गीथमुपासीत यद्वै प्राणिति स प्राणो यदपानिति सोऽपानोऽथ यः प्राणापानयोः सन्धिः स व्यानो यो व्यानः सा वाक् तस्मादप्राणन्ननपानन् वाचमभिव्याहरति या वाक् सर्क्(सा ऋक्) तस्मात् अप्राणन्ननपानन् ऋचमभिव्याहरति या ऋक् तत् साम तस्मादप्राणन्ननपानन् साम गायति यत् साम स उद्गीथस्तस्मादप्राणन्ननपानन् उद्गायति (अतः) ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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Line 589: |
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| "text": "प्राणाद्यास्त्रिविधाः पञ्च प्रधानो वायुरेव च ॥\nमुख्यपञ्चकरूपस्सन् गरुडो मध्यपञ्चकः ।\nअवमः पञ्चकस्त्वन्ये प्राणाद्यास्तस्य सूनवः ॥\nइति त्रेधा विभागोऽयं विभागोऽन्यश्चतुर्थकः ।\nप्राणापानौ शेषवीन्द्रौ तथोदानसमानकौ ॥\nरुद्रेन्द्रौ तत्परः श्रेष्ठो वायुर्व्यान उदाहृतः ।\nतस्मिन्नुद्गीथनामानमुपासीत हरिं परम् ॥\nयोऽसौ व्यानगतो विष्णुः स वागृक्सामगः सदा ।\nउद्गीथे च स एवैकस्तस्माद् व्यानाद्धि तत्क्रियाः ॥\nउद्गीथनामा भगवान् स्थितो व्यानादिपञ्चके ।" | | "lines": [ |
| | "प्राणाद्यास्त्रिविधाः पञ्च प्रधानो वायुरेव च ॥", |
| | "मुख्यपञ्चकरूपस्सन् गरुडो मध्यपञ्चकः ।", |
| | "अवमः पञ्चकस्त्वन्ये प्राणाद्यास्तस्य सूनवः ॥", |
| | "इति त्रेधा विभागोऽयं विभागोऽन्यश्चतुर्थकः ।", |
| | "प्राणापानौ शेषवीन्द्रौ तथोदानसमानकौ ॥", |
| | "रुद्रेन्द्रौ तत्परः श्रेष्ठो वायुर्व्यान उदाहृतः ।", |
| | "तस्मिन्नुद्गीथनामानमुपासीत हरिं परम् ॥", |
| | "योऽसौ व्यानगतो विष्णुः स वागृक्सामगः सदा ।", |
| | "उद्गीथे च स एवैकस्तस्माद् व्यानाद्धि तत्क्रियाः ॥", |
| | "उद्गीथनामा भगवान् स्थितो व्यानादिपञ्चके ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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Line 609: |
| "chapter": "CHU_C01", | | "chapter": "CHU_C01", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाऽग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपानन् तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमोवोद्गीथमुपासीत ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "अतो यान्यन्यानि वीर्यवन्ति कर्माणि यथाऽग्नेर्मन्थनमाजेः सरणं दृढस्य धनुष आयमनमप्राणन्ननपानन् तानि करोत्येतस्य हेतोर्व्यानमोवोद्गीथमुपासीत ॥ ४ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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Line 620: |
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| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "वीर्यवत् कर्मकृत् तस्माद् व्यान एव ह्युदाहृतः ॥\nतस्माद् व्यानगतं विष्णुमुपासीतैव नित्यशः ।\nयद्यप्येको हि भगवान् सर्वदा सर्ववस्तुगः ॥\nअनूनोद्रिक्तमहिमो निर्विशेषस्सदैव च ।\nतथापि तत्क्रियाभेदान्नामरूपादिकं पृथक् ॥\nउच्यते ह्यपृथक्त्वेऽपि पूर्णैश्वर्यैकहेतुतः ।\nअविशेषोऽपि भगवान् सर्वशक्तित्वहेतुतः ॥\nविशेषहेतुकं सर्वं करोत्यविकृतः सदा ।" | | "lines": [ |
| | "वीर्यवत् कर्मकृत् तस्माद् व्यान एव ह्युदाहृतः ॥", |
| | "तस्माद् व्यानगतं विष्णुमुपासीतैव नित्यशः ।", |
| | "यद्यप्येको हि भगवान् सर्वदा सर्ववस्तुगः ॥", |
| | "अनूनोद्रिक्तमहिमो निर्विशेषस्सदैव च ।", |
| | "तथापि तत्क्रियाभेदान्नामरूपादिकं पृथक् ॥", |
| | "उच्यते ह्यपृथक्त्वेऽपि पूर्णैश्वर्यैकहेतुतः ।", |
| | "अविशेषोऽपि भगवान् सर्वशक्तित्वहेतुतः ॥", |
| | "विशेषहेतुकं सर्वं करोत्यविकृतः सदा ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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Line 638: |
| "chapter": "CHU_C01", | | "chapter": "CHU_C01", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीत उद्-गी-थ इति प्राण एवोत् प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग् गीर्वाचो हि गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदं सर्वं स्थितं द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्थं सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गीर्ऋग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्-गी-थ इति ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ खलूद्गीथाक्षराण्युपासीत उद्-गी-थ इति प्राण एवोत् प्राणेन ह्युत्तिष्ठति वाग् गीर्वाचो हि गिर इत्याचक्षतेऽन्नं थमन्ने हीदं सर्वं स्थितं द्यौरेवोदन्तरिक्षं गीः पृथिवी थमादित्य एवोद्वायुर्गीरग्निस्थं सामवेद एवोद्यजुर्वेदो गीर्ऋग्वेदस्थं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतान्येवं विद्वानुद्गीथाक्षराण्युपास्त उद्-गी-थ इति ॥ ५ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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Line 649: |
| "chapter": "CHU_C01", | | "chapter": "CHU_C01", |
| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "अथ खल्वाशीःसमृद्धिरुपसरणानीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन् स्यात् तत्सामोपधावेद् यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतामभिष्टोष्यन् स्यात् तां देवतामुपधावेद् येन च्छन्दसा स्तोष्यन् स्यात् तच्छन्द उपधावेद् येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात् तं स्तोममुपधावेद् यां दिशमभिष्टोष्यन् स्यात् तां दिशमुपधावेदात्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्रमत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृध्येत यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥६॥३॥" | | "lines": [ |
| | "अथ खल्वाशीःसमृद्धिरुपसरणानीत्युपासीत येन साम्ना स्तोष्यन् स्यात् तत्सामोपधावेद् यस्यामृचि तामृचं यदार्षेयं तमृषिं यां देवतामभिष्टोष्यन् स्यात् तां देवतामुपधावेद् येन च्छन्दसा स्तोष्यन् स्यात् तच्छन्द उपधावेद् येन स्तोमेन स्तोष्यमाणः स्यात् तं स्तोममुपधावेद् यां दिशमभिष्टोष्यन् स्यात् तां दिशमुपधावेदात्मानमन्तत उपसृत्य स्तुवीत कामं ध्यायन्नप्रमत्तोऽभ्याशो ह यदस्मै स कामः समृध्येत यत्कामः स्तुवीतेति यत्कामः स्तुवीतेति ॥६॥३॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "CHU_C01", | | "chapter": "CHU_C01", |
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| "text": "उद्गीथाक्षरगं चैव प्राणादिषु च संस्थितम् ॥\nआशीःसमृद्धिहेतुष्वप्यखिलेषु व्यवस्थितम् ।\nएकमेव हरिं वेद यः स सर्वेष्टमाप्नुयात् ॥ इति च ।\nउच्छब्दवाच्याः प्राणाद्याः वागाद्या गीरितीरिताः ।\nअन्नाद्यास्थमिति प्रोक्तास्तेषूद्गीथो हरिः स्थितः ॥ इति च ।\n\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eआत्मानं\u003C/span\u003E परमात्मानम् अन्ततः सर्वोत्तमत्वेन सर्वत्रो\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eपसृत्य\u003C/span\u003E ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "उद्गीथाक्षरगं चैव प्राणादिषु च संस्थितम् ॥", |
| | "आशीःसमृद्धिहेतुष्वप्यखिलेषु व्यवस्थितम् ।", |
| | "एकमेव हरिं वेद यः स सर्वेष्टमाप्नुयात् ॥ इति च ।", |
| | "उच्छब्दवाच्याः प्राणाद्याः वागाद्या गीरितीरिताः ।", |
| | "अन्नाद्यास्थमिति प्रोक्तास्तेषूद्गीथो हरिः स्थितः ॥ इति च ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eआत्मानं\u003C/span\u003E परमात्मानम् अन्ततः सर्वोत्तमत्वेन सर्वत्रो\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eपसृत्य\u003C/span\u003E ॥ ३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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| "chapter": "CHU_C01", | | "chapter": "CHU_C01", |
| "verseType": "khanda", | | "verseType": "khanda", |
| "text": "चतुर्थः खण्डः" | | "lines": [ |
| | "चतुर्थः खण्डः" |
| | ] |
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| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत। ओमिति ह्युद्गायति। तस्योपव्याख्यानम् । देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशन्। ते छन्दोभिराच्छादयन्। यदेभिराच्छादयन् तत् छन्दसां छन्दस्त्वम्। तान् उ तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येद् एवं पर्यपश्यद् ऋचि साम्नि यजुषि ते अनु वित्त्वा ऊर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत। ओमिति ह्युद्गायति। तस्योपव्याख्यानम् । देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशन्। ते छन्दोभिराच्छादयन्। यदेभिराच्छादयन् तत् छन्दसां छन्दस्त्वम्। तान् उ तत्र मृत्युर्यथा मत्स्यमुदके परिपश्येद् एवं पर्यपश्यद् ऋचि साम्नि यजुषि ते अनु वित्त्वा ऊर्ध्वा ऋचः साम्नो यजुषः स्वरमेव प्राविशन् ॥ १ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "यदा वा ऋचमाप्नोति अोमित्येव अति(भि)स्वरति। एेवं साम। एवं यजुः। एष उ स्वरो यदेतदक्षरमम्। एतदमृतमभयम्। तत् प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन्। स य एतदेवं विद्वान् अक्षरं प्रणौति एतदेवाक्षरं स्वरममृतमभयं प्रविशति। तत् प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ २ ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "यदा वा ऋचमाप्नोति अोमित्येव अति(भि)स्वरति। एेवं साम। एवं यजुः। एष उ स्वरो यदेतदक्षरमम्। एतदमृतमभयम्। तत् प्रविश्य देवा अमृता अभया अभवन्। स य एतदेवं विद्वान् अक्षरं प्रणौति एतदेवाक्षरं स्वरममृतमभयं प्रविशति। तत् प्रविश्य यदमृता देवास्तदमृतो भवति ॥ २ ॥ ४ ॥" |
| | ] |
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Line 709: |
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| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "‘स्वरतेस्तु स्वरो विष्णुस्तद्रतेर्वायुरुच्यते ।\nवायुस्वरे स्वरं विष्णुमोमाख्यं समुपासिरे ॥\nदेवास्तेनामृतं प्राप्ता मुक्त्याख्यं मृत्युवर्जिताः ।\nमारणान्मृत्युरित्युक्ता दुर्गा तद्भयतः सुराः ।\nओमित्युपास्य तं विष्णुं परमामृतमापिरे ॥ इति सन्ध्याने (सद्ध्याने)।\n\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eऊर्ध्वाः\u003C/span\u003E उत्तमाः ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘स्वरतेस्तु स्वरो विष्णुस्तद्रतेर्वायुरुच्यते ।", |
| | "वायुस्वरे स्वरं विष्णुमोमाख्यं समुपासिरे ॥", |
| | "देवास्तेनामृतं प्राप्ता मुक्त्याख्यं मृत्युवर्जिताः ।", |
| | "मारणान्मृत्युरित्युक्ता दुर्गा तद्भयतः सुराः ।", |
| | "ओमित्युपास्य तं विष्णुं परमामृतमापिरे ॥ इति सन्ध्याने (सद्ध्याने)।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eऊर्ध्वाः\u003C/span\u003E उत्तमाः ॥ ४ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "पञ्चमः खण्डः" | | "lines": [ |
| | "पञ्चमः खण्डः" |
| | ] |
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| "verseType": "mantra", | | "verseType": "mantra", |
| "text": "अथ खलु ‘य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः’ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथः, एष प्रणवः। ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ खलु ‘य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः’ इत्यसौ वा आदित्य उद्गीथः, एष प्रणवः। ओमिति ह्येष स्वरन्नेति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "एतमु एव अहमभ्यागासिषम्। तस्मात् मम त्वमेकोऽसि। इति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच। रश्मीन् त्वं पर्यावर्तयताद् बहवो वै ते भविष्यन्ति। इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "एतमु एव अहमभ्यागासिषम्। तस्मात् मम त्वमेकोऽसि। इति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच। रश्मीन् त्वं पर्यावर्तयताद् बहवो वै ते भविष्यन्ति। इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥" |
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| "text": "अथाध्यात्मम्। य एवायं मुख्यप्राणसः तमुद्गीथमुपासीत। ओमिति ह्येष स्वरन् एति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथाध्यात्मम्। य एवायं मुख्यप्राणसः तमुद्गीथमुपासीत। ओमिति ह्येष स्वरन् एति ॥ ३ ॥" |
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| "text": "एतमु एवाहमभ्यागासिषं। तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच। प्राणान् त्वं भूमानमभिगायतात् बहवो वै ते भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "एतमु एवाहमभ्यागासिषं। तस्मान्मम त्वमेकोऽसीति ह कौषीतकिः पुत्रमुवाच। प्राणान् त्वं भूमानमभिगायतात् बहवो वै ते भविष्यन्तीति ॥ ४ ॥" |
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| "text": "अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनुसमाहरतीति ॥ ५ ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ खलु य उद्गीथः स प्रणवो यः प्रणवः स उद्गीथः इति होतृषदनाद्धैवापि दुरुद्गीतमनुसमाहरतीत्यनुसमाहरतीति ॥ ५ ॥ ५ ॥" |
| | ] |
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| "text": "‘आदित्यसंस्थितो वायुः प्रणवस्तद्गतो हरिः ।\nप्रकृष्टत्वाच्च नेतृत्वाद् गतित्वाद् अखिलस्य च ॥\nउद्गीथ उच्चैर्गे(र्गी)यत्वात् स एव पुरुषोत्तमः ।\nस एव प्राणगो देह(हे) ओमित्येव सदा जपन् ॥\nएत्येष भगवान् विष्णुर्ध्यायन्नेकं तमक्षरम् ।\nएकपुत्रो मुक्तिमेति ध्यायन् प्राणेषु रश्मिषु ।\nबहुपुत्रो विमुक्तः स्यात् तस्माद् ध्यायेत् तथा परम्॥’ इति च ।\nप्राणस्थं भूमानम् अभिगाय, दुरुद्गीतमनुसमाहरति । अनुरूपमेव करोति । होतृसदनस्थमग्निस्थं भगवन्तं ध्यात्वा ।\n‘अन्यथागानजं दोषम् अग्नौ ध्यात्वा हरिं परम् ।\nअपाकरोति तस्मात् तं ध्यायेदेवाग्निगं सदा ॥’ इति त्रैविद्ये ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘आदित्यसंस्थितो वायुः प्रणवस्तद्गतो हरिः ।", |
| | "प्रकृष्टत्वाच्च नेतृत्वाद् गतित्वाद् अखिलस्य च ॥", |
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| | "स एव प्राणगो देह(हे) ओमित्येव सदा जपन् ॥", |
| | "एत्येष भगवान् विष्णुर्ध्यायन्नेकं तमक्षरम् ।", |
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| | "प्राणस्थं भूमानम् अभिगाय, दुरुद्गीतमनुसमाहरति । अनुरूपमेव करोति । होतृसदनस्थमग्निस्थं भगवन्तं ध्यात्वा ।", |
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| | "षष्ठः खण्डः" |
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| "text": "इयमेव ऋक्। अग्निः साम। (तदेतदस्याम् .हृ)तदेतत् एतस्यामृचि अयध्यूढं साम। तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते। इयमेव सा अग्निरमः। तत् साम ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "इयमेव ऋक्। अग्निः साम। (तदेतदस्याम् .हृ)तदेतत् एतस्यामृचि अयध्यूढं साम। तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते। इयमेव सा अग्निरमः। तत् साम ॥ १ ॥" |
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| "text": "अन्तरिक्षमेव ऋक्। वायुः साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। अन्तरिक्षमेव सा। वायुरमः। तत् साम ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "अन्तरिक्षमेव ऋक्। वायुः साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। अन्तरिक्षमेव सा। वायुरमः। तत् साम ॥ २ ॥" |
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| "text": "नक्षत्राण्येव ऋक्। चन्द्रमाः साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। नक्षत्राण्येव सा। चन्द्रमा अमः। तत् साम ॥४॥" | | "lines": [ |
| | "नक्षत्राण्येव ऋक्। चन्द्रमाः साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। नक्षत्राण्येव सा। चन्द्रमा अमः। तत् साम ॥४॥" |
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| "text": "अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव ऋक्। अथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव सा। अथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमः। तत् साम ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ यदेतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव ऋक्। अथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम। तदेतदेतस्याम् ऋचि अध्यूढं साम। तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते। अथ यदेवैतदादित्यस्य शुक्लं भाः सैव सा। अथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमः। तत् साम ॥ ५ ॥" |
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| "text": "‘अग्नीरसूर्यनीलेषु वायुः स्थः सामदेवता ।\nउर्वीवियद्द्युशुक्लेषु ऋग्देवीस्था(ऋग्देवी स्था) सरस्वती ॥\nसेति भार्या हि वाग्देवी प्राणोऽमः पतिरीरितः ।\nएवं तौ सामनामानावुभावेवाप्युदाहृतौ(उभावेतावुदाहृतौ) ॥\nअतो हि सामवेदोऽयं ऋक्सामात्मक ईरितः ।" | | "lines": [ |
| | "‘अग्नीरसूर्यनीलेषु वायुः स्थः सामदेवता ।", |
| | "उर्वीवियद्द्युशुक्लेषु ऋग्देवीस्था(ऋग्देवी स्था) सरस्वती ॥", |
| | "सेति भार्या हि वाग्देवी प्राणोऽमः पतिरीरितः ।", |
| | "एवं तौ सामनामानावुभावेवाप्युदाहृतौ(उभावेतावुदाहृतौ) ॥", |
| | "अतो हि सामवेदोऽयं ऋक्सामात्मक ईरितः ।" |
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| "text": "अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुः हिरण्यकेशः आ प्रणखात् सर्व एव सुवर्णः ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुः हिरण्यकेशः आ प्रणखात् सर्व एव सुवर्णः ॥ ६ ॥" |
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| "text": "तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी । तस्य उदिति नाम। स एषः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो उदितः। उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी । तस्य उदिति नाम। स एषः सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो उदितः। उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद ॥ ७ ॥" |
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| "text": "तस्य ऋक् च साम च गेष्णौ। तस्मादुद्गीथः। तस्मात् त्वेवोद्गाता एतस्य हि गाता। स एष ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकाः तेषां चेष्टे देवकामानां च, इत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्य ऋक् च साम च गेष्णौ। तस्मादुद्गीथः। तस्मात् त्वेवोद्गाता एतस्य हि गाता। स एष ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकाः तेषां चेष्टे देवकामानां च, इत्यधिदैवतम् ॥ ८ ॥ ६ ॥" |
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| "text": "वागादिष्वेवमेवैतौ वाक्प्राणौ सर्वदा स्थितौ ॥\nतयोरन्तःस्थितो विष्णुर्गायको तस्य तावुभौ ।\nऋक्सामाभ्यां स उन्नामा पापोद्गश्चोच्च एव च ॥’ इत्यादि सत्तत्त्वे ।\n‘कप्यासरक्तपद्माक्षः सूर्यगश्चाक्षिगश्च सः ।\nगायकस्तस्य विष्णोर्यः स स्वर्ग्यांश्च नृलोकगान् ॥\nकामान् दद्यान्नरश्चेत् स्यात् सुराणां च नृणामपि ।\nमोक्षदो यदि वायुः स्यान्मुख्योद्गाता ततोऽनिलः ॥’ इति च ।\nतस्मादुद्गीथ उच्चोऽसौ गीयते च इति ।" | | "lines": [ |
| | "वागादिष्वेवमेवैतौ वाक्प्राणौ सर्वदा स्थितौ ॥", |
| | "तयोरन्तःस्थितो विष्णुर्गायको तस्य तावुभौ ।", |
| | "ऋक्सामाभ्यां स उन्नामा पापोद्गश्चोच्च एव च ॥’ इत्यादि सत्तत्त्वे ।", |
| | "‘कप्यासरक्तपद्माक्षः सूर्यगश्चाक्षिगश्च सः ।", |
| | "गायकस्तस्य विष्णोर्यः स स्वर्ग्यांश्च नृलोकगान् ॥", |
| | "कामान् दद्यान्नरश्चेत् स्यात् सुराणां च नृणामपि ।", |
| | "मोक्षदो यदि वायुः स्यान्मुख्योद्गाता ततोऽनिलः ॥’ इति च ।", |
| | "तस्मादुद्गीथ उच्चोऽसौ गीयते च इति ।" |
| | ] |
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| | "सप्तमः खण्डः" |
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| "text": "अथाध्यात्मं वागेवर्क् प्राणः साम तदेतदेस्यामृच्यध्यूढं साम तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते वागेव सा प्राणोऽमस्तत् साम ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथाध्यात्मं वागेवर्क् प्राणः साम तदेतदेस्यामृच्यध्यूढं साम तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते वागेव सा प्राणोऽमस्तत् साम ॥ १ ॥" |
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| "text": "चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते चक्षुरेव (साऽत्माऽत्मः .हृ .प्रभ)सा प्राणोऽमस्तत् साम ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "चक्षुरेवर्गात्मा साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते चक्षुरेव (साऽत्माऽत्मः .हृ .प्रभ)सा प्राणोऽमस्तत् साम ॥ २ ॥" |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eआत्मा\u003C/span\u003E जीवः ।\n‘सरस्वती हि चक्षुःस्था जीवस्थो वायुरीरितः(वायुरीश्वरः .हृ) ।\nविदित्वा तावुभौ देवी तद्गं ध्यायेद्धरिं सदा ॥’ इति मानसे ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eआत्मा\u003C/span\u003E जीवः ।", |
| | "‘सरस्वती हि चक्षुःस्था जीवस्थो वायुरीरितः(वायुरीश्वरः .हृ) ।", |
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| "text": "श्रोत्रमेवर्ङ्(ऋक्) मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत् साम ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "श्रोत्रमेवर्ङ्(ऋक्) मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्माद् ऋच्यध्यूढं साम गीयते श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत् साम ॥ ३ ॥" |
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| | "अथ यदेतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैवर्गथ यन्नीलं परः कृष्णं तत् साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयतेऽथ यदेवैतदक्ष्णः शुक्लं भाः सैव साऽथ यन्नीलं परः कृष्णं तदमस्तत् साम ॥ ४ ॥" |
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| "text": "अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते सैवर्क् तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावदमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते सैवर्क् तत्साम तदुक्थं तद्यजुस्तद्ब्रह्म तस्यैतस्य तदेव रूपं यदमुष्य रूपं यावदमुष्य गेष्णौ तौ गेष्णौ यन्नाम तन्नाम ॥ ५ ॥" |
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| | "‘दृश्यते ज्ञानदृष्ट्या यः सूर्ये चक्षुषि चैकराट् ।", |
| | "ऋङ्नामा ज्ञानरूपत्वात् साम नित्यसमत्वतः ॥", |
| | "उक्थमुत्थापकत्वाच्च यजुर्याज्यस्वरूपतः ।", |
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| | "स एष ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे मनुष्यकामानां चेति तद्य इमे वीणायां गायन्त्येतं ते गायन्ति तस्मात् ते धनसनयः ॥ ६ ॥" |
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| | "अथ यदेतदेवं(य एतदेवं) विद्वान् साम गायत्युभौ साम गायति(उभौ स गायति) सोऽमुनैव स एष ये चामुष्मात् पराञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति देवकामांश्च ॥ ७ ॥" |
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| | "अथानेनैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयात् ॥ ८ ॥" |
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| | "कं ते काममागायानीत्येष ह्येष कामगानस्येष्टे य एवं विद्वान् साम गायति साम गायति ॥ ९ ॥ ७ ॥" |
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| | "यथा बदरिकानाथो द्वारकानाथ इत्यपि ।", |
| | "अर्वाङ्नाथः पराङ्नाथ इति तद्वदिहोच्यते ॥", |
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| | "त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः। शिलकः शालावत्यः, चैकितायनो दाल्भ्यः, प्रवाहणो जैबिलिरिति। ते होचुरुद्गीथे ये कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ॥ १ ॥" |
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| | "तथेति ते ह(ह ते) समुपविविशुः। स ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाच- भगवन्तावग्रे वदताम्। ब्राह्मणयोर्वदतोर्वाचं श्रोष्यामीति। स ह शिलकः शालावत्यः चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच हन्त त्वा पृच्छानीति। पृच्छेति होवाच- का साम्नो गतिरिति ॥ २ ॥" |
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| "text": "स्वर इति होवाच। स्वरस्य का गतिरिति। प्राण इति होवाच। प्राणस्य का गतिरिति। अन्नमिति होवाच। अन्नस्य का गतिरिति। आप इति होवाच। अपां का गतिरिति। असौ लोक इति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्वर इति होवाच। स्वरस्य का गतिरिति। प्राण इति होवाच। प्राणस्य का गतिरिति। अन्नमिति होवाच। अन्नस्य का गतिरिति। आप इति होवाच। अपां का गतिरिति। असौ लोक इति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति॥ ३ ॥" |
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| "text": "न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच। स्वर्गं वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। स्वर्गसंस्तावं हि सामेति । तं ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यं (चैकितायनं दाल्भ्यं इति .हृपाठे नास्ति) उवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम। यस्त्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥४॥" | | "lines": [ |
| | "न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच। स्वर्गं वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। स्वर्गसंस्तावं हि सामेति । तं ह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यं (चैकितायनं दाल्भ्यं इति .हृपाठे नास्ति) उवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम। यस्त्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥४॥" |
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| "text": "हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच। अमुष्य लोकस्य का गतिरिति। अयं लोक इति होवाच। अस्य लोकस्य का गतिरिति। न प्रतिष्ठां लोकमतिनयेदिति होवाच। प्रतिष्ठां वयं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। प्रतिष्ठासंस्तावं हि सामेति ।\nतं ह प्रवाहणो जैबिलिरुवाच। अन्तवद्वै किल ते शालावत्य साम। यत्स्वेतर्हि ब्रूयान् मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति । हन्ताहमेतद् भगवतो वेदानीति। विद्धीति होवाच ॥ ५ ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "‘अग्निः सामाभिमानी स्याद् वरुणस्तु स्वरात्मकः ।\nप्राणावराभिमानी तु सूर्य एव प्रकीर्तितः ॥\nअन्नाभिमानी दक्षश्च शक्रस्त्वबभिमानवान् ।\nद्व्यात्मकश्च(द्युवात्मकश्च) शिवः प्रोक्तः क्रमेणैवोत्तरोत्तराः ।\nक्रमेण मोक्षे प्राप्याश्च पूर्वेषामुत्तरोत्तराः ॥’ इति निवृत्ते ।\nअग्नेर्वागात्मकत्वात् ।(स्वरस्योदकात्मकत्वात्) उदकात्मकत्वात् स्वरस्य । ‘आदित्य एव प्राणोऽन्नं वै प्रजापतिः’ इति श्रुतेः । ‘आप एवेन्द्रो द्यौर्वाव रुद्रः’ इत्यादेश्च ।\nकथाया उद्देशः\n‘विशेषज्ञानसम्प्राप्त्यै जानन्तोऽपि परं हरिम् ।\nब्रूयुर्देवाश्च ऋषयस्तदन्यस्य परात्मताम् ॥’इति ब्रह्मतर्के ।\n(स्वर्गाभिमानिनं रुद्रं) स्वर्गाभिमानिरुद्रं प्रति \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eसामाभिसंस्थापयामः\u003C/span\u003E । तत्स्तावकं हि साम । ‘मूर्धा ते विपतेदि’ति यः कश्चिद् ब्रूयाच्चेत् विपतिष्यति ।\nब्रह्मैव हि पृथिव्यात्मा ....... ...... ।" | | "lines": [ |
| | "‘अग्निः सामाभिमानी स्याद् वरुणस्तु स्वरात्मकः ।", |
| | "प्राणावराभिमानी तु सूर्य एव प्रकीर्तितः ॥", |
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| | "द्व्यात्मकश्च(द्युवात्मकश्च) शिवः प्रोक्तः क्रमेणैवोत्तरोत्तराः ।", |
| | "क्रमेण मोक्षे प्राप्याश्च पूर्वेषामुत्तरोत्तराः ॥’ इति निवृत्ते ।", |
| | "अग्नेर्वागात्मकत्वात् ।(स्वरस्योदकात्मकत्वात्) उदकात्मकत्वात् स्वरस्य । ‘आदित्य एव प्राणोऽन्नं वै प्रजापतिः’ इति श्रुतेः । ‘आप एवेन्द्रो द्यौर्वाव रुद्रः’ इत्यादेश्च ।", |
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| "text": "अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणं स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाश इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते आकाशं प्रत्यस्तं यन्त्याकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणं स एष परोवरीयानुद्गीथः स एषोऽनन्तः ॥ १ ॥" |
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| | "परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकान् जयति य एतमेवं(एतदेवं) विद्वान् परोवरीयांसमुद्गीथमुपास्ते तं (हैन)हैतमतिधन्वा शौनक उदरशाण्डिल्यायोक्त्वोवाच यावत्त एनं प्रयाजमुद्गीथं वेदिष्यन्ते परोवरीयो हैभ्यस्तावदस्मिंल्लोके जीवनं भविष्यति तथामुष्मिंल्लोक इति स य एतमेवं(एतदेवं) विद्वानुपास्ते परोवरीय एव हास्यास्मिंल्लोके जीवनं भविष्यति तथामुष्मिंल्लोके लोक इति लोके लोक इति ॥ २ ॥ ९ ॥" |
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| "text": "‘........ ..... विष्णुराकाशनामकः ।\nआदीप्तत्वाद् वरीयांश्च परमो हरिरेव हि ॥’ इति सत्तत्त्वे ।\n‘शुभाशुभानां दाहादौ साम्यात् सामाग्निरीरितः ।\nस्वो विष्णुः सागरे रन्ता वरुणोऽतः स्वरः स्मृतः ॥\nउदयाज्जगत्प्रणेतृत्वात् सूर्यः प्राण उदाहृतः ।\nअत्ता रुद्रस्तद्विरोधाद् दक्षः स्यादन्ननामकः ॥\nस्वो विष्णुस्तद्रतिर्वायुस्तद्गो मुक्तौ सदाशिवः ।\nअतः स्वर्गोऽसुसंस्थत्वाद् असाविति च कीर्तितः ॥\nसर्वदेवान्तरत्वात् तु ब्रह्मायं समुदाहृतः ।\nलोको ज्ञानस्वरूपत्वादेतेषां परमो हरिः ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।\nआ पालनादाप इन्द्रः ।\nअधिकं वरीयान् परोवरीयान् । तत्परोवरीयोऽस्य रक्षकं भवति । यावत्तः द्वापरादिपर्यन्तम् ॥ ८ ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘........ ..... विष्णुराकाशनामकः ।", |
| | "आदीप्तत्वाद् वरीयांश्च परमो हरिरेव हि ॥’ इति सत्तत्त्वे ।", |
| | "‘शुभाशुभानां दाहादौ साम्यात् सामाग्निरीरितः ।", |
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| | "आ पालनादाप इन्द्रः ।", |
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| | "मटचीहतेषु कुरुष्वाटक्या(आटिक्य) सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास। स हेभ्यं कुल्माषान् खादन्तं बिभिक्षे ॥ १ ॥" |
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| | "‘उपला इष्टकाः स्थूला मटचीति प्रकीर्तिताः।’ इति शब्दनिर्णये । ‘आसन्नयौवना योषिद् (आटिकी .हृ)आटकीत्यभिधीयते।’ इति च । ‘प्रद्रवन्नन्नपानार्थं प्रद्राणक इतीरितः।’ इति च ॥ १० ॥" |
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| | "तं होवाच नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता(ये मे उपनिहिताः) इत्येतेषां मे देहीति होवाच। तानस्मै प्रददौ। हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतं स्यादिति होवाच। न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति ॥ २ ॥" |
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| "text": "न वा अजीविष्यमिमान् अखादन्निति होवाच। कामो म उदपानमिति। स ह खादित्वाऽतिशेषान् जायाय आजहार। साऽग्र एव सुभिक्षा बभूव। तान् प्रतिगृह्य निदधौ स ह प्रातः सञ्जिहान उवाच यद् बतान्नस्य लभेमहि। लभेमहि धनमात्रां राजासौ यक्ष्यते। स मा सर्वैरार्त्विज्यैर्वृणीतेति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "न वा अजीविष्यमिमान् अखादन्निति होवाच। कामो म उदपानमिति। स ह खादित्वाऽतिशेषान् जायाय आजहार। साऽग्र एव सुभिक्षा बभूव। तान् प्रतिगृह्य निदधौ स ह प्रातः सञ्जिहान उवाच यद् बतान्नस्य लभेमहि। लभेमहि धनमात्रां राजासौ यक्ष्यते। स मा सर्वैरार्त्विज्यैर्वृणीतेति ॥ ३ ॥" |
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| "text": "तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति। तान् खादित्वाऽमुं यज्ञं विततमेयाय। तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोप विवेश। स ह प्रस्तोतारमुवाच। प्रस्तोतर्या(तः या) देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या(तः या) देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या(तः या) देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासाञ्चक्रिरे ॥ ४ ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति। तान् खादित्वाऽमुं यज्ञं विततमेयाय। तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोप विवेश। स ह प्रस्तोतारमुवाच। प्रस्तोतर्या(तः या) देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या(तः या) देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीत्येवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या(तः या) देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासाञ्चक्रिरे ॥ ४ ॥ १० ॥" |
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| | "अथ हैनं यजमान उवाच- भगवन्तं वा अहं विविदिषाणीत्युषस्तिरस्मि चाक्रायण इति होवाच स होवाच भगवन्तं वा अहमेभिः सर्वैरार्त्विज्यैः पर्यैशिषं भगवतो वा अहमवित्त्याऽन्यानवृषि भगवांस्त्वेव मे सर्वैरार्त्विज्यैरिति ॥ १ ॥" |
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| | "तथेत्यथ तर्ह्येत एव समतिसृष्टास्तुवन्तां (मदतिसृष्टास्तुवन्तां) यावत्तेभ्यो(यावत्त्वेभ्यो) धनं दद्यास्तावन्मम दद्या इति तथेति ह यजमान उवाच ॥ २ ॥" |
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| | "अथ हैनं प्रस्तोतोपससाद प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति मा भगवानवोचत् कतमा सा देवतेति ॥ ३ ॥" |
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| "text": "‘प्राणस्थविष्णुना सर्वे प्रसूयन्ते यतस्ततः ।\nप्रस्तावदेवता स स्यात् प्रस्तावस्तु जनिर्यतः ॥\nआदित्यसंस्थितो विष्णुर्यत्सदा सर्वगीतभुक् ।\nराजादौ गीतमप्यज्ञैर्भुङ्क्ते गानस्य देवता ॥\nउद्गीथदेवता तस्मात् स एव पुरुषोत्तमः ।\nअन्नस्थेनैव जीवन्ति भूतान्येतानि विष्णुना ॥\nप्रतिहारदेवताऽतः स प्रतिहारो हि भोजनम् ॥’ इति च ।\n\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eउच्चैः सन्तम्\u003C/span\u003E उत्तमं सन्तम् ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘प्राणस्थविष्णुना सर्वे प्रसूयन्ते यतस्ततः ।", |
| | "प्रस्तावदेवता स स्यात् प्रस्तावस्तु जनिर्यतः ॥", |
| | "आदित्यसंस्थितो विष्णुर्यत्सदा सर्वगीतभुक् ।", |
| | "राजादौ गीतमप्यज्ञैर्भुङ्क्ते गानस्य देवता ॥", |
| | "उद्गीथदेवता तस्मात् स एव पुरुषोत्तमः ।", |
| | "अन्नस्थेनैव जीवन्ति भूतान्येतानि विष्णुना ॥", |
| | "प्रतिहारदेवताऽतः स प्रतिहारो हि भोजनम् ॥’ इति च ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eउच्चैः सन्तम्\u003C/span\u003E उत्तमं सन्तम् ॥ ११ ॥" |
| | ] |
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| "text": "द्वादशः खण्डः" | | "lines": [ |
| | "द्वादशः खण्डः" |
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| "text": "अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वव्राज तस्मै (ह) श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथातः शौव उद्गीथस्तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः स्वाध्यायमुद्वव्राज तस्मै (ह) श्वा श्वेतः प्रादुर्बभूव तमन्ये श्वान उपसमेत्योचुरन्नं नो भगवानागायत्वशनायाम वा इति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "तान् होवाच- इहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाञ्चकार ते ह यथैवेदं बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः संरब्धाः सर्पन्तीत्येवमाससृपुस्ते ह समुपविश्य हिञ्चक्रुरो३मदा३मोम्पिबा३मों देवो वरुणः प्रजापतिः सविता३न्नमिहा३हरदन्नपते३न्नमिहा३हराऽहरोमिति ॥ २ ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "तान् होवाच- इहैव मा प्रातरुपसमीयातेति तद्ध बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेयः प्रतिपालयाञ्चकार ते ह यथैवेदं बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः संरब्धाः सर्पन्तीत्येवमाससृपुस्ते ह समुपविश्य हिञ्चक्रुरो३मदा३मोम्पिबा३मों देवो वरुणः प्रजापतिः सविता३न्नमिहा३हरदन्नपते३न्नमिहा३हराऽहरोमिति ॥ २ ॥ १२ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "दल्भपुत्रो \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eबको\u003C/span\u003E मित्रया पुत्रार्थे स्वीकृतो ग्लाववत्(ग्राववत्) तूष्णीं स्थितत्वात् तया ग्लावेत्युक्तो ग्लावनामको जातः । अत उभयथाऽस्य निर्देशो भवतीत्यर्थः ।\n‘प्रसादार्थं बकस्यापि वायुनोक्तः श्वरूपिणा ।\nशौवोद्गीथ इति प्रोक्तो रुद्रादीनां श्वरूपिणाम् ॥\nउपासितः पौर्णमास्यां शौवोद्गीथेन केशवः ।\nसर्वाभीष्टं ददातीति प्रातरित्याह मारुतः ॥\nओमदामादिकं मन्त्रं वायुनोक्तं तु देवताः ।\nवायुस्थविष्णुमुद्दिश्य हिङ्कृत्य प्रापुरीप्सितम् ॥\nदेवौ विष्णुश्च वायुश्च सर्वज्ञत्वात् क्रमेण तु ।\nवरुणौ वरणीयत्वात् सवितारौ प्रसूतितः ॥\nप्रजानां च पती तद्वत् क्रमादेव प्रकीर्तितौ ॥’ इति च ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "दल्भपुत्रो \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eबको\u003C/span\u003E मित्रया पुत्रार्थे स्वीकृतो ग्लाववत्(ग्राववत्) तूष्णीं स्थितत्वात् तया ग्लावेत्युक्तो ग्लावनामको जातः । अत उभयथाऽस्य निर्देशो भवतीत्यर्थः ।", |
| | "‘प्रसादार्थं बकस्यापि वायुनोक्तः श्वरूपिणा ।", |
| | "शौवोद्गीथ इति प्रोक्तो रुद्रादीनां श्वरूपिणाम् ॥", |
| | "उपासितः पौर्णमास्यां शौवोद्गीथेन केशवः ।", |
| | "सर्वाभीष्टं ददातीति प्रातरित्याह मारुतः ॥", |
| | "ओमदामादिकं मन्त्रं वायुनोक्तं तु देवताः ।", |
| | "वायुस्थविष्णुमुद्दिश्य हिङ्कृत्य प्रापुरीप्सितम् ॥", |
| | "देवौ विष्णुश्च वायुश्च सर्वज्ञत्वात् क्रमेण तु ।", |
| | "वरुणौ वरणीयत्वात् सवितारौ प्रसूतितः ॥", |
| | "प्रजानां च पती तद्वत् क्रमादेव प्रकीर्तितौ ॥’ इति च ॥ १२ ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "CHU_C01", | | "chapter": "CHU_C01", |
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| "text": "त्रयोदशः खण्डः" | | "lines": [ |
| | "त्रयोदशः खण्डः" |
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| "chapter": "CHU_C01", | | "chapter": "CHU_C01", |
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| "text": "अयं वाव लोको हावुकारो वायुर्हायिकारश्चन्द्रमा अथकार आत्मेहकारोऽग्निरीकार आदित्य ऊकारो निहव एकारो विश्वेदेवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिङ्कारः प्राणः स्वरोऽन्नं याया वाग्विराडनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः सञ्चरो हुप्कारो दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवं साम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद इति ॥ १ ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "अयं वाव लोको हावुकारो वायुर्हायिकारश्चन्द्रमा अथकार आत्मेहकारोऽग्निरीकार आदित्य ऊकारो निहव एकारो विश्वेदेवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिङ्कारः प्राणः स्वरोऽन्नं याया वाग्विराडनिरुक्तस्त्रयोदशः स्तोभः सञ्चरो हुप्कारो दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतामेवं साम्नामुपनिषदं वेदोपनिषदं वेद इति ॥ १ ॥ १३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "CHU_C01", | | "chapter": "CHU_C01", |
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| "text": "(हूयते चाग्निहोत्रादि)हूयतेऽत्राग्निहोत्रादिर्हावुकारस्त्वियं (ततः .हृ)यतः ।\nहेत्याश्वर्यवदायाति हेति वा सुखकृत्त्वतः ॥\nहायिकारस्ततो वायुरथेत्युक्तमनन्तरम् ।\nआनन्तर्यात् प्रकाशस्य सूर्याच्चन्द्रस्तथेरितः(सूर्याश्चन्द्रस्त्वथेरितः) ॥\nसर्वसामीप्यतो विष्णुरिहेति कथितः सदा ।\nइन्धनादग्निरीकार ऊकारस्सूर्य उष्टितः ॥\nनितरामाह्वयन्त्येनमितीन्द्रो निहवः स्मृतः ।\nएतीत्येकार एवासौ औहोयीत्यखिलाः सुराः ॥\nउच्चत्वाद्विष्णुरुः प्रोक्तो हूयन्तेऽस्मिन् यतोऽखिलाः ।\nमुक्तावौहोयिनस्तस्मात् सर्वे देवाः(सर्वदेवाः) प्रकीर्तिताः ॥\nहीति निश्चय उद्दिष्टो निश्चयज्ञानतस्सदा ।\nब्रह्मा हिङ्कार इत्युक्तो, वायुः \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eप्राणः\u003C/span\u003E शरीरगः ॥\nस्वे विष्णौ रमयत्येनं जीवं तस्मात् स्वरः स्मृतः ।\nययिर्नित्यगतेर्वायुस्तद्गायाया सरस्वती ॥\nसैवान्नदेवता प्रोक्ता यात्रा(याऽत्त्रा) प्राणेन नीयते ।\nसर्ववागात्मिका या तु श्रीर्विशेषेण राजनात् ॥\nविराडुक्ता निरुक्तस्तु व्याप्तो नारायणस्तु यः ।\nआहूत एव पातीति हुप्कार इति कीर्तितः ॥\nहुबित्याक्रियते यस्माद् हुप्कारस्तु जनार्दनः(हुप्कारस्तज्जनार्दनः .हृ) ।\nअनिरुक्तस्त्ववाच्यत्वात् परमः पुरुषो हरिः॥’ इति माहात्म्ये ।\nसम्यक् चरतीति स एव सञ्चरः ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "(हूयते चाग्निहोत्रादि)हूयतेऽत्राग्निहोत्रादिर्हावुकारस्त्वियं (ततः .हृ)यतः ।", |
| | "हेत्याश्वर्यवदायाति हेति वा सुखकृत्त्वतः ॥", |
| | "हायिकारस्ततो वायुरथेत्युक्तमनन्तरम् ।", |
| | "आनन्तर्यात् प्रकाशस्य सूर्याच्चन्द्रस्तथेरितः(सूर्याश्चन्द्रस्त्वथेरितः) ॥", |
| | "सर्वसामीप्यतो विष्णुरिहेति कथितः सदा ।", |
| | "इन्धनादग्निरीकार ऊकारस्सूर्य उष्टितः ॥", |
| | "नितरामाह्वयन्त्येनमितीन्द्रो निहवः स्मृतः ।", |
| | "एतीत्येकार एवासौ औहोयीत्यखिलाः सुराः ॥", |
| | "उच्चत्वाद्विष्णुरुः प्रोक्तो हूयन्तेऽस्मिन् यतोऽखिलाः ।", |
| | "मुक्तावौहोयिनस्तस्मात् सर्वे देवाः(सर्वदेवाः) प्रकीर्तिताः ॥", |
| | "हीति निश्चय उद्दिष्टो निश्चयज्ञानतस्सदा ।", |
| | "ब्रह्मा हिङ्कार इत्युक्तो, वायुः \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eप्राणः\u003C/span\u003E शरीरगः ॥", |
| | "स्वे विष्णौ रमयत्येनं जीवं तस्मात् स्वरः स्मृतः ।", |
| | "ययिर्नित्यगतेर्वायुस्तद्गायाया सरस्वती ॥", |
| | "सैवान्नदेवता प्रोक्ता यात्रा(याऽत्त्रा) प्राणेन नीयते ।", |
| | "सर्ववागात्मिका या तु श्रीर्विशेषेण राजनात् ॥", |
| | "विराडुक्ता निरुक्तस्तु व्याप्तो नारायणस्तु यः ।", |
| | "आहूत एव पातीति हुप्कार इति कीर्तितः ॥", |
| | "हुबित्याक्रियते यस्माद् हुप्कारस्तु जनार्दनः(हुप्कारस्तज्जनार्दनः .हृ) ।", |
| | "अनिरुक्तस्त्ववाच्यत्वात् परमः पुरुषो हरिः॥’ इति माहात्म्ये ।", |
| | "सम्यक् चरतीति स एव सञ्चरः ॥ १३ ॥" |
| | ] |
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| | "प्रथमः खण्डः" |
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| | "ओं समस्तस्य खलु साम्न उपासनं साधु यत् खलु साधु तत् सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥ १ ॥" |
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| "text": "तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥" |
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| | "अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥ ३ ॥" |
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| | "स य एतदेवंविद्वान् साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥ ४ ॥ १ ॥" |
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| "text": "‘नारायणाख्य उद्गीथ उद्गेयः प्रणवेन यत् ।\nउद्गच्छन्ति यतोऽस्माद्वा वासुदेवादिमूर्तयः ॥\nप्रथमावताररूपत्वाद् वासुदेवः परः पुमान् ।\nप्रस्तावो निधनं चापि सङ्कर्षण उदाहृतः ॥\nसङ्कर्षणो हि संहर्ता प्रद्युम्नः परमेश्वरः ।\nहिङ्कार इति सम्प्रोक्तो हीति सृष्टिरुदीर्यते ॥\nप्रसिद्धता हि सृष्टिः स्याद् अनिरुद्धः परो विभुः ।\nप्रतिहार इति प्रोक्तः स हि कार्येष्विदं जगत् ॥\nप्रतिप्रति हरेन्नित्यं मूर्तिप्रतिहृतेस्तथा ।\nते पृथिव्यादिषु सदा तन्नामानः प्रतिष्ठिताः ॥\nपृथिवीत्यादिशब्दार्थास्ते हि मुख्यत ईरिताः ।\nतत्सम्बन्धात् तदर्थत्वं पृथिव्यादेरमुख्यतः ॥\nप्रथनादेव सस्यादेः पृथिवीत्वमुदाहृतम् ।\nअग्नित्वमदनाच्चैव ह्यन्तरीक्षणयोगतः ॥\nअभावाद्व्यवधानस्य त्वन्तरिक्षमितीर्यते ।\nआदानादायुषश्चैव(आयुषां चैव) स आदित्य उदीरितः ॥\nद्यौः क्रीडाकारणत्वाच्च तत्सर्वं हि परे हरौ॥’ इति च ।\n‘पञ्चात्मकं यो लोकेषु सदोपास्ते हरिं परम् ।\nऊर्ध्वाधःसंस्थितास्तस्य पञ्चैव दश मूर्तयः ।\nमोक्षादिकमभीष्टं यत्कल्पन्तेऽस्य सदैव हि ॥ इति च ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘नारायणाख्य उद्गीथ उद्गेयः प्रणवेन यत् ।", |
| | "उद्गच्छन्ति यतोऽस्माद्वा वासुदेवादिमूर्तयः ॥", |
| | "प्रथमावताररूपत्वाद् वासुदेवः परः पुमान् ।", |
| | "प्रस्तावो निधनं चापि सङ्कर्षण उदाहृतः ॥", |
| | "सङ्कर्षणो हि संहर्ता प्रद्युम्नः परमेश्वरः ।", |
| | "हिङ्कार इति सम्प्रोक्तो हीति सृष्टिरुदीर्यते ॥", |
| | "प्रसिद्धता हि सृष्टिः स्याद् अनिरुद्धः परो विभुः ।", |
| | "प्रतिहार इति प्रोक्तः स हि कार्येष्विदं जगत् ॥", |
| | "प्रतिप्रति हरेन्नित्यं मूर्तिप्रतिहृतेस्तथा ।", |
| | "ते पृथिव्यादिषु सदा तन्नामानः प्रतिष्ठिताः ॥", |
| | "पृथिवीत्यादिशब्दार्थास्ते हि मुख्यत ईरिताः ।", |
| | "तत्सम्बन्धात् तदर्थत्वं पृथिव्यादेरमुख्यतः ॥", |
| | "प्रथनादेव सस्यादेः पृथिवीत्वमुदाहृतम् ।", |
| | "अग्नित्वमदनाच्चैव ह्यन्तरीक्षणयोगतः ॥", |
| | "अभावाद्व्यवधानस्य त्वन्तरिक्षमितीर्यते ।", |
| | "आदानादायुषश्चैव(आयुषां चैव) स आदित्य उदीरितः ॥", |
| | "द्यौः क्रीडाकारणत्वाच्च तत्सर्वं हि परे हरौ॥’ इति च ।", |
| | "‘पञ्चात्मकं यो लोकेषु सदोपास्ते हरिं परम् ।", |
| | "ऊर्ध्वाधःसंस्थितास्तस्य पञ्चैव दश मूर्तयः ।", |
| | "मोक्षादिकमभीष्टं यत्कल्पन्तेऽस्य सदैव हि ॥ इति च ॥ २ ॥" |
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| | "तृतीयः खण्डः" |
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| "text": "वृष्टौ पञ्चविधं सामोपासीत । पुरोवातो हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "वृष्टौ पञ्चविधं सामोपासीत । पुरोवातो हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः ॥ १ ॥" |
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| | "उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान् वृष्टौ पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ३ ॥" |
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| | "‘पञ्चरूपं तु यो विष्णुं पुरोवातादिषु स्थितम् ।", |
| | "उपास्ते वृष्टिरस्मै स्याद्वर्षयत्यस्य मुक्तिगान् ॥", |
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| | "सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपासीत । मेघो यत् सम्प्लवते स हिङ्कारो यद् वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥ १ ॥" |
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| | "न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ४ ॥" |
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| | "‘अप्सु पञ्चविधोपासी यो नारायणवान् भवेत् ।", |
| | "न चास्य मृतिरप्सु स्याद् अप्सुषद्भगवान् हरिः॥’ इति च ।", |
| | "अप्सु स्थितनारायणवान् मुक्तो भवतीत्यर्थः । अपः सूत इत्यप्सूर्भगवान् । दीर्घलोपेनाप्सुमानिति वा ॥ ४ ॥" |
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| | "ऋतुषु पञ्चविधं सामोपासीत । वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनम् ॥ १ ॥" |
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| | "कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान् भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ५ ॥" |
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| "text": "हेमन्तशिशिरयोरैक्येन पञ्चत्वम् ।\n‘ऋतुनामानमृतुगम् (ऋतुत्वात्)ऋतत्वादृतुनामकः ।\nइत्युपासीत यो विष्णुं पञ्चात्मानममुष्य हि ॥\nमोक्षादीन् कल्पते चास्य ऋतुसंस्थो जनार्दनः ।\nरक्ष्यत्वात् तेन तद्वांश्च सदैव स्यादुपासकः॥’ इति च ।\n‘वासस्य सुखकारित्वात् वसन्तः पुरुषोत्तमः ।\nनीरादेर्गरणाद् ग्रीष्मो वर्षणाद्वर्ष उच्यते ॥\nशं रातीति शरत्प्रोक्तो हेमन्तो हिमकारणात् ॥’ इति च ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "हेमन्तशिशिरयोरैक्येन पञ्चत्वम् ।", |
| | "‘ऋतुनामानमृतुगम् (ऋतुत्वात्)ऋतत्वादृतुनामकः ।", |
| | "इत्युपासीत यो विष्णुं पञ्चात्मानममुष्य हि ॥", |
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| | "पशुषु पञ्चविधं सामोपासीताजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनं भवन्ति हास्य पशवः पशुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् पशुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ६ ॥" |
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| "text": "‘पालनात् सुखरूपत्वात्(सुखकारित्वात्) पशुनामा जनार्दनः ।\nमुक्तस्तद्वान् भवत्येव पशुषूपासको हरेः ॥’ इति च ।\n‘यज्ञेनाञ्चनहेतुत्वाद्(यज्ञोदजनिहेतुत्वात्) अजस्थो भगवान् अजः ।\nअविस्थस्त्वविरेवोक्त ऊर्णया शीततोऽवनात् ॥\nगौश्च सद्गतिहेतुत्वाद् गोस्थः स पुरुषोत्तमः ।\nअश्वश्चैवाऽशुगन्तृत्वात् पुुरुषः पूर्तिहेतुतः॥’ इति च ।\nभवन्ति हास्य पशव इति प्रसिद्धपशव एव । अजा इत्यादिबहुवचनं बहुरूपत्वाद् भगवतः ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘पालनात् सुखरूपत्वात्(सुखकारित्वात्) पशुनामा जनार्दनः ।", |
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| | "सप्तमः खण्डः" |
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| "text": "प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिङ्कारः वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयांसि वा एतानि परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकान् जयति य एतदेवं विद्वान् प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिङ्कारः वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयांसि वा एतानि परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकान् जयति य एतदेवं विद्वान् प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ ७ ॥" |
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| "text": "‘परस्मादुत्तमं प्रोक्तं परो इति ततः परम् ।\nपरोवरं परं तस्मात् प्रोक्तं पारोवरीयकम् (परोवरीयकम्)॥\nपरोवरीयांस्येतानि विष्णो रूपाणि सर्वशः ।\nतेषां विशेषो नैवास्ति सदा तानि समानि हि ॥\nअत्युत्तमोत्तमान्येतान्यन्यस्मात् सर्वतोऽपि तु ॥’ इति च ।\n‘प्राणो नेतृत्वतो विष्णुर्वाक्सर्ववचनात् सदा ।\nचक्षुश्च दर्शनान्नित्यं श्रोत्रं श्रवणहेतुतः ॥\nमनो मन्तृत्वतश्चास्य ह्येक एव तु पञ्चधा ॥’ इति च ।\nपरोवरीयो ब्रह्मास्य भवति सर्वापेक्षितदातृत्वात् ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘परस्मादुत्तमं प्रोक्तं परो इति ततः परम् ।", |
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| | "परोवरीयांस्येतानि विष्णो रूपाणि सर्वशः ।", |
| | "तेषां विशेषो नैवास्ति सदा तानि समानि हि ॥", |
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| "text": "अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधं सामोपासीत यत्किञ्च वाचो हुमिति स हिङ्कारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिर्यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतदेवं विद्वान् वाचि सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधं सामोपासीत यत्किञ्च वाचो हुमिति स हिङ्कारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिर्यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतदेवं विद्वान् वाचि सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ १ ॥" |
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| "text": "‘आदिः कल्पादिहेतुत्वात् क्रोडात्मा केशवः स्वयम् ।\nदुष्टोपद्रवकर्तृत्वान्नरसिंह उपद्रवः॥’ इति च ।\n‘हुङ्कारसहिते वाक्ये प्रद्युम्नस्तु सदा स्थितः ।\nआकारयुक्ते वाराहो वासुदेवः प्रसंयुते ॥\nनारायणस्तथोद्युक्ते प्रतियुक्तेऽनिरुद्धकः ।\nउपयुक्ते नृसिंहश्च नीतिसङ्कर्षणस्तथा (नीतिः सङ्कर्षणस्तथा) ॥\nअभावे यावदेते स्युस्तावत् तद्दैवतं स्मृतम् ।\nएवं सप्तविधं विष्णुं य उपास्ते परं (सदा) विभुम् ॥\nवाङ्नामा भगवांस्तस्य भवेत् सर्वार्थदोहकृत् ॥’ इति च ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘आदिः कल्पादिहेतुत्वात् क्रोडात्मा केशवः स्वयम् ।", |
| | "दुष्टोपद्रवकर्तृत्वान्नरसिंह उपद्रवः॥’ इति च ।", |
| | "‘हुङ्कारसहिते वाक्ये प्रद्युम्नस्तु सदा स्थितः ।", |
| | "आकारयुक्ते वाराहो वासुदेवः प्रसंयुते ॥", |
| | "नारायणस्तथोद्युक्ते प्रतियुक्तेऽनिरुद्धकः ।", |
| | "उपयुक्ते नृसिंहश्च नीतिसङ्कर्षणस्तथा (नीतिः सङ्कर्षणस्तथा) ॥", |
| | "अभावे यावदेते स्युस्तावत् तद्दैवतं स्मृतम् ।", |
| | "एवं सप्तविधं विष्णुं य उपास्ते परं (सदा) विभुम् ॥", |
| | "वाङ्नामा भगवांस्तस्य भवेत् सर्वार्थदोहकृत् ॥’ इति च ॥ ८ ॥" |
| | ] |
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| | "नवमः खण्डः" |
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| | "अथ खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपासीत सर्वदा समस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ १ ॥" |
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| "text": "‘आदित्यस्थं परं विष्णुं ध्यायेदादित्यनामकम् ।\nसप्तरूपं साम चासौ सर्वदा समरूपतः ॥\nसर्वेषां मां प्रतीत्येव दृष्टिसाम्याच्च साम सः ।\nदृष्टिसाम्यं मण्डलस्य विष्णुस्तस्य च कारणम् ॥" | | "lines": [ |
| | "‘आदित्यस्थं परं विष्णुं ध्यायेदादित्यनामकम् ।", |
| | "सप्तरूपं साम चासौ सर्वदा समरूपतः ॥", |
| | "सर्वेषां मां प्रतीत्येव दृष्टिसाम्याच्च साम सः ।", |
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| "text": "तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात् तस्य यत्पुरोदयात् स हिङ्कारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात् ते हिङ्कुर्वन्ति हिङ्कारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात् तस्य यत्पुरोदयात् स हिङ्कारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात् ते हिङ्कुर्वन्ति हिङ्कारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ २ ॥" |
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| | "अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात् ते प्रस्तुतिकामाः प्रशंसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥३॥" |
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| | "अथ यत्सङ्गववेलायां स आदिस्तदस्य वयांस्यन्वायत्तानि तस्मात् तान्यन्तरिक्षेऽनारम्भणान्यादायात्मानं परिपतन्त्यादिभाजीनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥" |
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| | "अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात् ते सत्तमाः प्राजापत्यानामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ५ ॥" |
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| | "अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात् प्रागपराह्णात् स प्रतिहारस्तदस्य गर्भा अन्वायत्तास्तस्मात् ते प्रतिहृता नावपद्यन्ते प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ६ ॥" |
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| | "अथ यदूर्ध्वमपराह्णात् प्रागस्तमयात् स उपद्रवस्तदस्यारण्या अन्वायत्तास्तस्मात् ते पुरुषं दृष्ट्वा कक्षंश्वभ्रमित्युपद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ७ ॥" |
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| | "अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात् तान्निदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न एवं खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ ९ ॥" |
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| "text": "तस्मिन्निमानि भूतानि सर्वाण्येवाऽश्रितानि हि ।\nउदयात् पूर्वमेवासौ भवेत् प्रद्युम्ननामकः ॥\nपश्वाधारस्तदात्माऽसौ वासुदेवस्तथोदये ।\nआश्रयश्च नृणां तत्र वराहः सङ्गवे तु सः ॥\nतत्र पक्ष्याश्रयो विष्णुस्तथा नारायणाभिधः ।\nमध्यन्दिने स आधारो देवानां च ततः परम् ॥\nअनिरुद्धस्स आधारो गर्भस्थानां सदैव हि ।\nततः परं नृसिंहाख्यः स आरण्याश्रयो मतः ॥\nअथास्तमितवेलायां स सङ्कर्षण ईरितः(इतीरितः) ।\nआश्रयः स पितॄणां च सप्तात्मकमुपास्य तम्(सप्तात्मकमुदाहृतम्) ॥\nप्राप्नोति परमं स्थानं मुक्तः संसारसागरात् ॥’ इति च ॥\nहिङ्कारनामानमाश्रितत्वाद्धिङ्कुर्वन्ति । (प्रस्तावाश्रयत्वात्)प्रस्तावाश्रयात् \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eप्रस्तुतिकामाः\u003C/span\u003E= प्रारम्भकामाः प्रशंसाकामाश्च । प्रारम्भावतारत्वात् प्रशंसादेवतात्वाच्च तस्य ।\nसर्वाधारत्वाद् वराहस्य तदाधाराणां पक्षिणाम् अनाधारेणैव गमनम् । नारायणनामार्थत्वेन सर्वगुणपूर्त्योपासनात्(उपासनादेव) सर्वोत्तमा देवाः । इतरमूर्तीनामपि सर्वगुणपूर्त्योपासने(उपासनेन) नारायणोपासनमेव भवति । सर्वगुणपूर्त्यर्थत्वान्नारायणशब्दस्य ।\nअनिरुद्धाश्रयत्वाद् गर्भाणां पितुः शरीरादन्यत्र प्रतिहृता अपि न विनश्यन्ति । वर्धन्ते च तत्रैव । अन्यद्धि भुक्तं जीर्यत एव । ‘धाता गर्भं दधातु ते’(ऋ.सं.१०.१८४.१) इति च श्रुतिः । धाता हि भगवाननिरुद्धः । विष्णुस्त्वष्टा प्रजापतिर्धाता इति च चतुर्मूर्तयो ह्युच्यन्ते ।\n‘योनिक्लृप्तिर्वासुदेवाद् रूपं सङ्कर्षणाद्भवेत् ।\nआसेककर्मा प्रद्युम्नाद् अनिरुद्धाच्च धारणम् ॥’ इति च ।\n‘व्याप्तेर्विष्णुर्वासुदेवस्त्वष्टा त्वेषाद् द्वितीयकः।\nप्रजापतिः प्रजापातान्निषेकः पातनं ततः ॥\nप्रजापतिस्तु प्रद्युम्नो धाता धारणकर्मतः।\nअनिरुद्ध इति प्रोक्तः कृष्णरामौ तथाश्विनौ ॥’ इति च ।\n‘कक्षश्वभ्रे नृसिंहस्य सदाऽवस्थितिकारणात् ।\nद्रवन्ति कक्षश्वभ्राभ्यां तदज्ञानेऽपि रक्षणात् ॥\nमृगा भीता यतस्तेषां नृसिंहस्त्वाश्रयः(नृसिंहः स्वाश्रयः .हृ) सदा ।\nपितॄणामाश्रयो यस्मात् सङ्कर्षण उदाहृतः ॥\nअतस्तान् प्रति पिण्डादीन् निदधत्यज्ञका अपि ।\nअन्यथा तन्मृतानां तु कुत एवोपतिष्ठति ॥’ इति च ।\nन रूपाणां विशेषोऽस्ति गुणतो नामतोऽपि वा ।\nतथाऽपि तत् प्रियं नाम नारायण इति स्म ह ॥\nविशेषतः समस्तानां नाम्नां तस्यार्थ एव तु ।\nविज्ञायते गुणैः पूर्तिर्नामसाम्यं तदाऽथवा (तदा तथा .हृ) ॥’ इति च ।\n‘नाम्नो नारायणाख्यस्य गुणैः पूर्तिं हि देवताः ।\nविज्ञायार्थमुपास्यैव सर्वाधिक्यमथापिरे(अवापिरे)॥’ इति च ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्मिन्निमानि भूतानि सर्वाण्येवाऽश्रितानि हि ।", |
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| | "सर्वाधारत्वाद् वराहस्य तदाधाराणां पक्षिणाम् अनाधारेणैव गमनम् । नारायणनामार्थत्वेन सर्वगुणपूर्त्योपासनात्(उपासनादेव) सर्वोत्तमा देवाः । इतरमूर्तीनामपि सर्वगुणपूर्त्योपासने(उपासनेन) नारायणोपासनमेव भवति । सर्वगुणपूर्त्यर्थत्वान्नारायणशब्दस्य ।", |
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| "text": "उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यते(अवशिष्यते) त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षरमतिशिष्यते(अवशिष्यते) त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३ ॥" |
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| "text": "निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥" |
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| "text": "‘यस्यान्यः सदृशो नास्ति स्वरूपाणि समानि च ।\nस आत्मसंमितो विष्णुरतिमृत्युरमृत्युतः ॥\nप्रद्युम्नादिस्वरूपेण स विष्णुः सप्तधा स्थितः ।\nसमानि तानि सर्वाणि ज्ञानानन्दबलैस्तथा ॥\nज्ञानादित्रयवाचीनि त्र्यक्षराण्यपि सर्वशः ।\nहिङ्कारादीनि नामानि सर्वेषामपि सर्वशः ॥\nआदिनाम्नः प्रकारस्तु योज्यः स्यात् प्रतिहारतः ।\nतेन त्र्यक्षरमेव स्यान्नामद्वयमपि प्रभोः ॥\nउपद्रवे तु वःकारो यद्यपि व्यतिरिच्यते ।\nनाम नारायणस्यैव सोऽपि क्षीराब्धिशायिनः ॥\nव्यञ्जनस्वरसर्गैस्तु सोऽपि ज्ञानादिवाचकः ।\nत्रिवर्णत्वात् समः सोऽपि ज्ञानाद्यैः पुरुषोत्तमः ॥" | | "lines": [ |
| | "‘यस्यान्यः सदृशो नास्ति स्वरूपाणि समानि च ।", |
| | "स आत्मसंमितो विष्णुरतिमृत्युरमृत्युतः ॥", |
| | "प्रद्युम्नादिस्वरूपेण स विष्णुः सप्तधा स्थितः ।", |
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| | "उपद्रवे तु वःकारो यद्यपि व्यतिरिच्यते ।", |
| | "नाम नारायणस्यैव सोऽपि क्षीराब्धिशायिनः ॥", |
| | "व्यञ्जनस्वरसर्गैस्तु सोऽपि ज्ञानादिवाचकः ।", |
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| "text": "एकविंशत्याऽऽदित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "एकविंशत्याऽऽदित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥" |
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| "text": "वःकारार्थपरिज्ञानात् प्राप्योऽब्धिशयनः प्रभुः ।\nएकविंशार्णविज्ञानात् प्राप्योऽसौ सूर्यमण्डले ॥\nहिङ्काराद्यक्षरप्रतिपाद्यानि भगवतो द्वाविंशद्रूपाणि\nस एव भगवान् विष्णुर्द्वाविंशद्रूपवान् यतः ।\nतान्येव सप्तरूपाणि विभिद्यन्ते त्रिधा त्रिधा ॥\nएकः पयोऽब्धिशयन इति द्वाविंशतिः प्रभोः ।\nप्रद्युम्नाद्यास्तु चत्वारो द्विषण्मासेषु संस्थिताः ॥\nत्रिशस्त्रिशः केशवाद्या वसन्तादिषु पञ्चमः ।\nरूपद्वयं च(तु) षष्ठस्य स्थितं मत्स्यादिपञ्चकम् ॥\nतृतीयं पृथिवीसंस्थं जामदग्न्याख्यमेव तत् ।\nअन्तरिक्षद्युसूर्येषु सप्तमस्य(सत्यमस्य) त्रिधा तनुः(त्रिधात्मनः) ॥\nरामः कृष्णः कल्किरिति तज्ज्ञानात् तान्यवाप्य च ।\nद्वाविंशेन पयोब्धिस्थं प्राप्यते रूपमक्षरम् ॥\nएतद् द्वाविंशकं रूपं नाकं चासुखवर्जनात् ।\nपूर्णानन्दस्वरूपत्वाद् विशोकं शोकनाशनात् ॥’ इति सामसंहितायाम् ।" | | "lines": [ |
| | "वःकारार्थपरिज्ञानात् प्राप्योऽब्धिशयनः प्रभुः ।", |
| | "एकविंशार्णविज्ञानात् प्राप्योऽसौ सूर्यमण्डले ॥", |
| | "हिङ्काराद्यक्षरप्रतिपाद्यानि भगवतो द्वाविंशद्रूपाणि", |
| | "स एव भगवान् विष्णुर्द्वाविंशद्रूपवान् यतः ।", |
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| | "प्रद्युम्नाद्यास्तु चत्वारो द्विषण्मासेषु संस्थिताः ॥", |
| | "त्रिशस्त्रिशः केशवाद्या वसन्तादिषु पञ्चमः ।", |
| | "रूपद्वयं च(तु) षष्ठस्य स्थितं मत्स्यादिपञ्चकम् ॥", |
| | "तृतीयं पृथिवीसंस्थं जामदग्न्याख्यमेव तत् ।", |
| | "अन्तरिक्षद्युसूर्येषु सप्तमस्य(सत्यमस्य) त्रिधा तनुः(त्रिधात्मनः) ॥", |
| | "रामः कृष्णः कल्किरिति तज्ज्ञानात् तान्यवाप्य च ।", |
| | "द्वाविंशेन पयोब्धिस्थं प्राप्यते रूपमक्षरम् ॥", |
| | "एतद् द्वाविंशकं रूपं नाकं चासुखवर्जनात् ।", |
| | "पूर्णानन्दस्वरूपत्वाद् विशोकं शोकनाशनात् ॥’ इति सामसंहितायाम् ।" |
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| "text": "आप्नोतीहादित्यस्य जयं परो हास्याऽदित्यजयाज्जयो भवति (स) य एतदेवं विद्वानात्मसम्मितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "आप्नोतीहादित्यस्य जयं परो हास्याऽदित्यजयाज्जयो भवति (स) य एतदेवं विद्वानात्मसम्मितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥ १० ॥" |
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| "text": "(आप्नोतीह)\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eप्राप्नोतीहाऽदित्यस्य जयम्\u003C/span\u003E । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eइह\u003C/span\u003E पृथिव्यादिषु स्थितभगवत्प्राप्तावप्यादित्यस्थ एव प्राप्यते । ऐक्यात् । परो \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eहास्यादित्यजयाज्जयो भवति\u003C/span\u003E। आदित्यस्थस्यादित्यनाम्नो भगवतः प्राप्त्या \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eपरो जयः\u003C/span\u003E रूपान्तर प्राप्तिरपि भवति ।\n‘स्वरूपमेकं प्राप्तस्तु विष्णोः स्यात् सर्वरूपगः ।\nऐक्यात् तथापि सम्प्राप्तिर्बहूपास्त्या सुखाधिका(सुखाधिकी) ॥’ इति च ।\nजयो नाम प्राप्तिरेव । ‘धनजिते स्वर्जिते सत्राजिते’ इत्यादिवत् । केशवादिरूपेण ललाटादिषु स्थितेरित एकविंश इत्युच्यते ।\n‘चित्रादियोगदातृत्वान्मासनामा स्वयं हरिः ।\nलोकः प्रकाशरूपत्वाद् आदित्यश्चादनादपाम्॥’ इति च ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "(आप्नोतीह)\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eप्राप्नोतीहाऽदित्यस्य जयम्\u003C/span\u003E । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eइह\u003C/span\u003E पृथिव्यादिषु स्थितभगवत्प्राप्तावप्यादित्यस्थ एव प्राप्यते । ऐक्यात् । परो \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eहास्यादित्यजयाज्जयो भवति\u003C/span\u003E। आदित्यस्थस्यादित्यनाम्नो भगवतः प्राप्त्या \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eपरो जयः\u003C/span\u003E रूपान्तर प्राप्तिरपि भवति ।", |
| | "‘स्वरूपमेकं प्राप्तस्तु विष्णोः स्यात् सर्वरूपगः ।", |
| | "ऐक्यात् तथापि सम्प्राप्तिर्बहूपास्त्या सुखाधिका(सुखाधिकी) ॥’ इति च ।", |
| | "जयो नाम प्राप्तिरेव । ‘धनजिते स्वर्जिते सत्राजिते’ इत्यादिवत् । केशवादिरूपेण ललाटादिषु स्थितेरित एकविंश इत्युच्यते ।", |
| | "‘चित्रादियोगदातृत्वान्मासनामा स्वयं हरिः ।", |
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| | "एकादशः खण्डः" |
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| "text": "मनो हिङ्कारो वाक् प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद् गायत्रं प्राणेषु प्रोतं स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या महामनाः स्यात् तद् व्रतम् ॥ १॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "मनो हिङ्कारो वाक् प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद् गायत्रं प्राणेषु प्रोतं स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या महामनाः स्यात् तद् व्रतम् ॥ १॥ ११ ॥" |
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| "text": "‘प्राणसंस्थे हरौ(प्राणसंस्थहरौ) प्रोतं गायत्रं साम सर्वदा ।\nतद्वाचकं नियम्यं चेत्यतः प्रोतमितीर्यते ॥\nप्राणस्थविष्णोः सामीप्यात् तत्स्थमेतदितीर्यते ।\nक्वचिन्निर्देशसामीप्याद् विष्णोरेतदितीर्यते॥’ इति च ।\n‘प्राणस्थविष्णुलाल्यत्वात् (विष्णुलाळ्यत्वात्) प्राणीत्येवाभिधीयते।\nमोक्षस्तु सर्वमायुस्तु स्यान्नित्यत्वाज्ज्योक् समस्तवित्॥’ इति च ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘प्राणसंस्थे हरौ(प्राणसंस्थहरौ) प्रोतं गायत्रं साम सर्वदा ।", |
| | "तद्वाचकं नियम्यं चेत्यतः प्रोतमितीर्यते ॥", |
| | "प्राणस्थविष्णोः सामीप्यात् तत्स्थमेतदितीर्यते ।", |
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| | "‘प्राणस्थविष्णुलाल्यत्वात् (विष्णुलाळ्यत्वात्) प्राणीत्येवाभिधीयते।", |
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| | "अभिमन्थति स हिङ्कारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनं संशाम्यति तन्निधनमेतद् रथन्तमग्नौ प्रोतम् ॥ १ ॥" |
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| "text": "स य एवमेतद् रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न प्रत्यङ्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "स य एवमेतद् रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न प्रत्यङ्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥ १२ ॥" |
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| | "‘मन्थनादिस्थितं यस्तु (यत्तु) तन्नामानं हरिं परम् ।", |
| | "तत्तत्क्रियैकहेतुत्वाद्योऽग्नौ ध्यायेज्जनार्दनम् ॥", |
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| | "उपमन्त्रयते स हिङ्कारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रतिस्त्री(प्रति स्त्रिया) सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद् वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥ १ ॥" |
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| | "स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनीभवति मिथुनान्मिथुनात् प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥१३॥" |
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| "text": "‘मिथुनस्थं पञ्चरूपं’(मिथुनस्थपञ्चरूपं) ध्यात्वैव पुरुषोत्तमम् ।\nअत्यागी च स्वभार्याणां मुच्यते नात्र संशयः ॥’ इति च ।\nमिथो नयतीति मिथुनं भगवान् ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘मिथुनस्थं पञ्चरूपं’(मिथुनस्थपञ्चरूपं) ध्यात्वैव पुरुषोत्तमम् ।", |
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| | "उद्यन् हिङ्कारः उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गीथोऽपराह्णः प्रतिहारोऽस्तं यन्निधनमेतद् बृहदादित्ये प्रोतं स य एवमेतद् बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या तपन्तं न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १४ ॥" |
| | ] |
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| | "पञ्चदशः खण्डः" |
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| | "अभ्राणि सम्प्लवन्ते स हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपांश्च सुरूपांश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १५ ॥" |
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| | "षोडशः खण्डः" |
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| | "वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतत् वैराजमृतुषु प्रोतं स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ऋतून् न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १६ ॥" |
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| | "सप्तदशः खण्डः" |
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| | "पृथिवी हिङ्कारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकीभवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या लोकान्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १७ ॥" |
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| | "अष्टादशः खण्डः" |
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| | "अजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या पशून्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १८ ॥" |
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| | "एकोनविंशः खण्डः" |
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| "text": "लोम हिङ्कारस्त्वक् प्रस्तावो मांसमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनमेतद् यज्ञायज्ञीयेषु प्रोतं स य एवमेतद् यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गीभवति नाङ्गेन(नाङ्गेषु) विहूर्च्छति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात् तद् व्रतं मज्ज्ञु नाश्नीयादिति वा ॥ १९ ॥" | | "lines": [ |
| | "लोम हिङ्कारस्त्वक् प्रस्तावो मांसमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनमेतद् यज्ञायज्ञीयेषु प्रोतं स य एवमेतद् यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गीभवति नाङ्गेन(नाङ्गेषु) विहूर्च्छति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात् तद् व्रतं मज्ज्ञु नाश्नीयादिति वा ॥ १९ ॥" |
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| | "अग्निर्हिङ्कारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानां सलोकतां सार्ष्टितां सायुज्यं गच्छति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ब्राह्मणान् न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ २० ॥" |
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| | "एकविंशः खण्डः" |
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| "text": "त्रयी विद्या हिङ्कारस्त्रय इमे लोकाः स प्रस्तावोऽग्निर्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयांसि मरीचयः स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत् साम सर्वस्मिन् प्रोतं स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन् प्रोतं वेद सर्वं ह भवति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "त्रयी विद्या हिङ्कारस्त्रय इमे लोकाः स प्रस्तावोऽग्निर्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयांसि मरीचयः स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत् साम सर्वस्मिन् प्रोतं स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन् प्रोतं वेद सर्वं ह भवति ॥ १ ॥" |
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| "text": "तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति । यस्तद् वेद स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति । सर्वमस्मीत्युपासीत तद् व्रतं तद् व्रतम् ॥ २ ॥ २१ ॥" | | "lines": [ |
| | "तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति । यस्तद् वेद स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति । सर्वमस्मीत्युपासीत तद् व्रतं तद् व्रतम् ॥ २ ॥ २१ ॥" |
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| "text": "‘आदित्यनाम्नि पञ्चात्मन्यभिध्याते जनार्दने ।\nपर्जन्यनाम्नि चर्त्वाख्ये लोकाख्ये पशुसञ्ज्ञके ॥\nअङ्गाख्ये देवताख्ये च सर्वाख्ये च प्रतिष्ठितम् ।\nबृहदाद्यं च यो वेद मुच्यते नात्र संशयः ॥" | | "lines": [ |
| | "‘आदित्यनाम्नि पञ्चात्मन्यभिध्याते जनार्दने ।", |
| | "पर्जन्यनाम्नि चर्त्वाख्ये लोकाख्ये पशुसञ्ज्ञके ॥", |
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| "text": "समुद्रेकात् समुद्रस्तु देशनाद् दिश उच्यते ।\nलोपकत्वाल्लोम च स्यात् तवोरूपस्त्वगुच्यते ॥\nमादनात् साररूपत्वात् मांसोऽस्थि त्वासनात् स्थिरम् ।\nमदस्य जननान्मज्जा सोऽङ्गम् अन्तिगतत्वतः ॥\nवायुर्ज्ञानात् तथाऽऽयुष्ट्वान्नक्षत्रं च स्वतन्त्रतः ।\nचन्द्रमाः परमानन्दात् त्रैविद्यो ज्ञानरूपतः ॥\nवयांसि व्ययनाच्चैव वीत्याकाशस्तथोच्यते ।\nतत्रायनाद् वयः प्रोक्तो मरीचिर्मितरुक्त्वतः ॥\nसर्पः सर्पणहेतुत्वाद् गन्धर्वो गोधरत्वतः ।\nपिता स सृष्टिहेतुत्वात् सर्वं पूर्णगुणत्वतः ॥\nएतैर्नामभिरुद्दिष्टो भगवान् पुरुषोत्तमः ॥’ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "समुद्रेकात् समुद्रस्तु देशनाद् दिश उच्यते ।", |
| | "लोपकत्वाल्लोम च स्यात् तवोरूपस्त्वगुच्यते ॥", |
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| | "चन्द्रमाः परमानन्दात् त्रैविद्यो ज्ञानरूपतः ॥", |
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| "text": "‘यादृश्येवोन्नतिर्योग्या तस्याः सर्वात्मनाऽऽयतिः ।\nसर्वभावस्तु विज्ञेयो न तु सर्वस्वरूपता ॥’ इति च ।\nन च सर्वस्वरूपता पुरुषार्थः । नारकित्वादेरपि(नरकित्वादेरपि) प्राप्तेः । न चार्थान्तरकल्पना युक्ता । प्रमाणाभावात् ।\n‘असनान्मितिरूपत्वाद् अस्मीत्युक्तः परो हरिः ।\nतं सर्व इत्युपासीत पूर्णता सर्वता स्मृता ॥’ इति च ।\nसर्वमस्मीत्युत्तमपुरुषत्वे ‘तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति’इति ज्यायःपरशब्दौ व्यर्थौ । अन्यस्यैवाभावात् ।\nअतस्ततोऽन्यदस्तीति सिद्धम् । अतस्ततोऽन्यत् परमज्याय एव नास्ति । ज्यायो लक्ष्मीर्विद्यते । परमज्यायस्तु भगवानेव ।" | | "lines": [ |
| | "‘यादृश्येवोन्नतिर्योग्या तस्याः सर्वात्मनाऽऽयतिः ।", |
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| | "न च सर्वस्वरूपता पुरुषार्थः । नारकित्वादेरपि(नरकित्वादेरपि) प्राप्तेः । न चार्थान्तरकल्पना युक्ता । प्रमाणाभावात् ।", |
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| "text": "जीवैक्याङ्गीकारे \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eयस्तद्वेद\u003C/span\u003E इति तच्छब्दोऽप्ययुक्तः । तदा ‘स्वात्मानं वेद’ इत्येव स्यात् । न च प्रसिद्धभेदानुवादः(प्रसिद्धभेदस्यानुवादः .हृ) । श्रुतिं विना तत्स्वरूपस्यैवासिद्धेः, तद्भेदस्यातिशयेनासिद्धिः । ऐक्य ईश्वरस्य स्वज्ञानमस्तीति न तद्रूपस्य जीवस्याज्ञानादिकं युज्यते । औपाधिकभेदाङ्गीकारेऽप्युपाधिरुभयोरैक्याद् उभयोरप्यज्ञत्वं कुर्यात् । उपाधिनिमित्तदोषाश्चोभयोरपि स्युः । उपाधिसम्बन्धस्य समत्वात् । उपाधिसम्बन्धस्यास्मिन्नन्यथा तस्मिन्नन्यथेति विशेषार्थम् अयम् असाविति भेदस्योपाधिं विना स्वत एवापेक्षितत्वात् । अतः स्वतो भिन्नस्यैवोपाधिना विशेषो भवति ।" | | "lines": [ |
| | "जीवैक्याङ्गीकारे \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eयस्तद्वेद\u003C/span\u003E इति तच्छब्दोऽप्ययुक्तः । तदा ‘स्वात्मानं वेद’ इत्येव स्यात् । न च प्रसिद्धभेदानुवादः(प्रसिद्धभेदस्यानुवादः .हृ) । श्रुतिं विना तत्स्वरूपस्यैवासिद्धेः, तद्भेदस्यातिशयेनासिद्धिः । ऐक्य ईश्वरस्य स्वज्ञानमस्तीति न तद्रूपस्य जीवस्याज्ञानादिकं युज्यते । औपाधिकभेदाङ्गीकारेऽप्युपाधिरुभयोरैक्याद् उभयोरप्यज्ञत्वं कुर्यात् । उपाधिनिमित्तदोषाश्चोभयोरपि स्युः । उपाधिसम्बन्धस्य समत्वात् । उपाधिसम्बन्धस्यास्मिन्नन्यथा तस्मिन्नन्यथेति विशेषार्थम् अयम् असाविति भेदस्योपाधिं विना स्वत एवापेक्षितत्वात् । अतः स्वतो भिन्नस्यैवोपाधिना विशेषो भवति ।" |
| | ] |
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| "text": "यस्तु भिन्नः स्वतः खादिस्तस्य भेदो ह्यबुद्धिनाम् ।\nउपाधिभिर्ज्ञाप्य एव न तु भेदं स्वयं सृजेत् ॥\nउपाधिरप्यभिन्नस्य भेदं साधयितुं क्वचित् ।\nन क्षमः सिद्धभेदस्य ज्ञापकः स्यादबुद्धिनाम् ॥\nआकाशा अप्यतस्त्वेते अनन्ता अप्कणादिवत् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।\nअतो न जीवेशाभेदः ।\n‘न तु देवः स्वयं भूत्वा देवदेवं समर्चयेत् ।\nसमानव्यवहारे हि न पूज्यः पूजको भवेत् ॥’ इति च परमसंहितायाम् ।(इति परमसंहितायाम्)" | | "lines": [ |
| | "यस्तु भिन्नः स्वतः खादिस्तस्य भेदो ह्यबुद्धिनाम् ।", |
| | "उपाधिभिर्ज्ञाप्य एव न तु भेदं स्वयं सृजेत् ॥", |
| | "उपाधिरप्यभिन्नस्य भेदं साधयितुं क्वचित् ।", |
| | "न क्षमः सिद्धभेदस्य ज्ञापकः स्यादबुद्धिनाम् ॥", |
| | "आकाशा अप्यतस्त्वेते अनन्ता अप्कणादिवत् ॥ इति ब्रह्मतर्के ।", |
| | "अतो न जीवेशाभेदः ।", |
| | "‘न तु देवः स्वयं भूत्वा देवदेवं समर्चयेत् ।", |
| | "समानव्यवहारे हि न पूज्यः पूजको भवेत् ॥’ इति च परमसंहितायाम् ।(इति परमसंहितायाम्)" |
| | ] |
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| "text": "जीवब्रह्मैक्यस्य प्रमाणविरुद्धतोपपादनम्\n‘अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यम् अणुप्रमाणात्, प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।’\n‘अन्यदेव तद् विदिताद् अथो अविदिताद् अधि ।’\n‘अन्यत्र धर्माद् अन्यत्राधर्माद् अन्यत्रास्मात् कृताकृतात् ।\nअन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत् तत् पश्यति तद्वद ॥’\n‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्।’\n‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।’\n‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य(अपाश्रित्य) मम साधर्म्यमागताः ।’\n‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।’\n‘आधिपत्यमृते चैव भोगेन विषयेण च ।\nआनन्दादीन् ऋते मुक्ताः सर्वे ते ब्रह्मणः समाः॥’ इत्यादेश्च ।" | | "lines": [ |
| | "जीवब्रह्मैक्यस्य प्रमाणविरुद्धतोपपादनम्", |
| | "‘अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यम् अणुप्रमाणात्, प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ।’", |
| | "‘अन्यदेव तद् विदिताद् अथो अविदिताद् अधि ।’", |
| | "‘अन्यत्र धर्माद् अन्यत्राधर्माद् अन्यत्रास्मात् कृताकृतात् ।", |
| | "अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत् तत् पश्यति तद्वद ॥’", |
| | "‘नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्।’", |
| | "‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।’", |
| | "‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य(अपाश्रित्य) मम साधर्म्यमागताः ।’", |
| | "‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ।’", |
| | "‘आधिपत्यमृते चैव भोगेन विषयेण च ।", |
| | "आनन्दादीन् ऋते मुक्ताः सर्वे ते ब्रह्मणः समाः॥’ इत्यादेश्च ।" |
| | ] |
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| "text": "सत्यपि अधिष्ठानभेदे भगवद्रूपाणां भेदाभावनिरूपणम्\n‘प्रद्युम्नादीनि रूपाणि त्रीणि त्रीण्येव पञ्च च ।\nऋगादिस्थानभेदेन नित्याभिन्नानि चेशनात्॥’ इति सामसंहितायाम् ।" | | "lines": [ |
| | "सत्यपि अधिष्ठानभेदे भगवद्रूपाणां भेदाभावनिरूपणम्", |
| | "‘प्रद्युम्नादीनि रूपाणि त्रीणि त्रीण्येव पञ्च च ।", |
| | "ऋगादिस्थानभेदेन नित्याभिन्नानि चेशनात्॥’ इति सामसंहितायाम् ।" |
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| "text": "भेदस्य मिथ्यात्वनिरासः\nदृष्टवस्तुनो मिथ्यात्वाङ्गीकारे च युक्त्यपेक्षा ; न तु सत्यत्वे ।\n‘दृष्टस्य सत्यतायां तु युक्तिर्वाऽयुक्तिरेव वा ।\nभूषणं तस्य मिथ्यात्वे युक्त्यभावोऽतिदूषणम् ॥\nयुक्तिश्च दोष एव स्याद् बलवन्मानवर्जिता ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।\nन च शून्यत्वमिथ्यात्वयोः कश्चिद् विशेषः । तत्प्रमाणाभावात् । अतः सत्य एव भेदः ।" | | "lines": [ |
| | "भेदस्य मिथ्यात्वनिरासः", |
| | "दृष्टवस्तुनो मिथ्यात्वाङ्गीकारे च युक्त्यपेक्षा ; न तु सत्यत्वे ।", |
| | "‘दृष्टस्य सत्यतायां तु युक्तिर्वाऽयुक्तिरेव वा ।", |
| | "भूषणं तस्य मिथ्यात्वे युक्त्यभावोऽतिदूषणम् ॥", |
| | "युक्तिश्च दोष एव स्याद् बलवन्मानवर्जिता ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।", |
| | "न च शून्यत्वमिथ्यात्वयोः कश्चिद् विशेषः । तत्प्रमाणाभावात् । अतः सत्य एव भेदः ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "भेदसत्यतायाः प्रामाणिकत्वनिरूपणम्\nन च कदाचित् कस्यापि ‘नासीदस्ति भविष्यति’ इति बुद्ध्यभावे व्यावहारिकसत्यम् इत्यत्रास्माकं विरोधः । तद्भावे च न शून्याद् विशेषः । ‘सत्यमेनमनुविश्वे मदन्ति’ इत्यादिश्रुतेश्च सत्यो भेदः ।\n‘प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।\nमायामात्रमिदं द्वैतम् अद्वैतं परमार्थतः ॥\nविकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।\nउपदेशादयं वादोऽज्ञाते द्वैतं न विद्यते ॥’(मा.उ. अ.१.ख.२.श्लो.९-१०) इत्यादिश्रुतेश्च ।\nप्रपञ्चो= भेदो यदि विद्येत= भवेत= उत्पद्येत तर्हि निवर्तेत । अतो न जीवेश्वरादिभेद उत्पद्यते किन्तु? नित्य एव । अतो मायया= भगवत्प्रज्ञानेन(भगवज्ज्ञानेन .हृ) मातं रतं च मात्रम् । भगवान् जानाति रमते चास्मिन् भेद इति । तच्च भगवद्रूपम् अद्वैतम् । परमार्थो भगवान् तद्रूपेणाद्वैतम् । यद् अद्वैतं नामोच्यते तत् परमार्थभगवदपेक्षयेत्यर्थः । स्वगतभेदो भगवति नास्तीत्युक्तम् । न च कल्पनामात्रो भेदः । यदि केनचित् कल्पितो विकल्पस्तथाऽपि निवर्तेत(विनिवर्तेत .हृ) । तस्माद् उपदेशादयमेव वादः । केनापि तत्प्रसादं(तत्प्रसादेन) विनाऽविज्ञातत्वादज्ञातो भगवान् तद्गतो भेदो न विद्यते इति ।" | | "lines": [ |
| | "भेदसत्यतायाः प्रामाणिकत्वनिरूपणम्", |
| | "न च कदाचित् कस्यापि ‘नासीदस्ति भविष्यति’ इति बुद्ध्यभावे व्यावहारिकसत्यम् इत्यत्रास्माकं विरोधः । तद्भावे च न शून्याद् विशेषः । ‘सत्यमेनमनुविश्वे मदन्ति’ इत्यादिश्रुतेश्च सत्यो भेदः ।", |
| | "‘प्रपञ्चो यदि विद्येत निवर्तेत न संशयः ।", |
| | "मायामात्रमिदं द्वैतम् अद्वैतं परमार्थतः ॥", |
| | "विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि केनचित् ।", |
| | "उपदेशादयं वादोऽज्ञाते द्वैतं न विद्यते ॥’(मा.उ. अ.१.ख.२.श्लो.९-१०) इत्यादिश्रुतेश्च ।", |
| | "प्रपञ्चो= भेदो यदि विद्येत= भवेत= उत्पद्येत तर्हि निवर्तेत । अतो न जीवेश्वरादिभेद उत्पद्यते किन्तु? नित्य एव । अतो मायया= भगवत्प्रज्ञानेन(भगवज्ज्ञानेन .हृ) मातं रतं च मात्रम् । भगवान् जानाति रमते चास्मिन् भेद इति । तच्च भगवद्रूपम् अद्वैतम् । परमार्थो भगवान् तद्रूपेणाद्वैतम् । यद् अद्वैतं नामोच्यते तत् परमार्थभगवदपेक्षयेत्यर्थः । स्वगतभेदो भगवति नास्तीत्युक्तम् । न च कल्पनामात्रो भेदः । यदि केनचित् कल्पितो विकल्पस्तथाऽपि निवर्तेत(विनिवर्तेत .हृ) । तस्माद् उपदेशादयमेव वादः । केनापि तत्प्रसादं(तत्प्रसादेन) विनाऽविज्ञातत्वादज्ञातो भगवान् तद्गतो भेदो न विद्यते इति ।" |
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| "text": "‘जीवेश्वरगतो जीवेष्वथ जीवजडात्मनोः ।\nजडेशयोर्जडेष्वेवं पञ्चभेदः प्रपञ्चकः ॥\nप्रकृष्टमोक्षहेतुत्वात् तज्ज्ञानं(तज्ज्ञाने .हृ) प्रेति कथ्यते ।\nप्रकृष्टपञ्चकत्वाद्वा प्रपञ्चोऽयं प्रकीर्तितः ॥\nयद्ययं सादिरेव स्यान्निवर्तेत कदाचन ।\nन निवर्तते यतस्तेन नायं सादिर्भवेत् क्वचित् ॥\nमायेति विष्णुविज्ञानं तन्मितत्वाच्च न क्वचित् ।\nभ्रान्तत्वमस्य यद्विष्णोर्नैव भ्रान्तिः कदाचन(कथञ्चन)॥\nरमते चात्र यद्विष्णुर्न हि भ्रान्तौ रमेद्धरिः ।\nपरमार्थे हरौ नैव भेदोऽस्ति जडजीववत् ॥\nयद्ययं कल्पितो भेदः कस्मान्नैव निवर्तते ।\nतस्माद् भूतभविष्याख्यभवदाख्यपराभिधाः ॥\nतदन्ये चैक एवास्मिन्नोङ्काराख्ये जनार्दने ।\nअज्ञातनामके तस्मिन्न भेदोऽस्ति कथञ्चन ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।" | | "lines": [ |
| | "‘जीवेश्वरगतो जीवेष्वथ जीवजडात्मनोः ।", |
| | "जडेशयोर्जडेष्वेवं पञ्चभेदः प्रपञ्चकः ॥", |
| | "प्रकृष्टमोक्षहेतुत्वात् तज्ज्ञानं(तज्ज्ञाने .हृ) प्रेति कथ्यते ।", |
| | "प्रकृष्टपञ्चकत्वाद्वा प्रपञ्चोऽयं प्रकीर्तितः ॥", |
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| "text": "विदिः(विदि) कादाचित्कस्वरूपलाभ इति च धातुः । ‘भिद्येत’इतिवत् ‘विद्येत’ इतिशब्दः । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eपरमार्थत\u003C/span\u003E इति ‘विश्वतश्चक्षुः’इतिवत् सप्तम्यर्थे । परमार्थेद्वैतभाव एवेत्यर्थः । ‘परमार्थः=परमात्माऽद्वैत’ इति प्रथमार्थो वा । न हि ‘विद्यमानं निवर्तते’ इति नियमः । उत्पद्यमानं हि प्रायो निवर्तते । जीवेश्वरप्रकृत्यादिकं बहुलं हि विद्यमानं न निवर्तते । न च ‘कल्पितो विकल्प’ इति पक्षे ‘कल्पितो यदि’ इति ‘यदि’शब्दो युज्यते । न च ‘निवर्तेत न संशयः’, ‘विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि’ इत्यादिनाऽनिष्टापादनरूपः शब्दो युज्यते । कल्पितत्वं चेच्छ्रुतेरभिप्रायः, ‘अविद्यमानोऽयं प्रपञ्चो निवर्तते’(विनिवर्तते) ‘कल्पितो विकल्पो विनिवर्तते’ इत्येव शब्दः स्यात् ; न तु ‘निवर्तेत’ इति । अतः सत्यताविषयमिदं वाक्यम् ।\n‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।’(भ.गी.१६.८), ‘एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः॥’(भ.गी.१६.९) इति निन्दनाच्च ।\n‘विद्यात्मनि भिदाबोधः’, ‘जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य’ इत्यादिभेदज्ञानस्य प्रशंसनाच्च । अतोऽसनान्मितत्वाच्चास्मीति भगवान्नामैवैतत्॥ २१ ॥" | | "lines": [ |
| | "विदिः(विदि) कादाचित्कस्वरूपलाभ इति च धातुः । ‘भिद्येत’इतिवत् ‘विद्येत’ इतिशब्दः । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eपरमार्थत\u003C/span\u003E इति ‘विश्वतश्चक्षुः’इतिवत् सप्तम्यर्थे । परमार्थेद्वैतभाव एवेत्यर्थः । ‘परमार्थः=परमात्माऽद्वैत’ इति प्रथमार्थो वा । न हि ‘विद्यमानं निवर्तते’ इति नियमः । उत्पद्यमानं हि प्रायो निवर्तते । जीवेश्वरप्रकृत्यादिकं बहुलं हि विद्यमानं न निवर्तते । न च ‘कल्पितो विकल्प’ इति पक्षे ‘कल्पितो यदि’ इति ‘यदि’शब्दो युज्यते । न च ‘निवर्तेत न संशयः’, ‘विकल्पो विनिवर्तेत कल्पितो यदि’ इत्यादिनाऽनिष्टापादनरूपः शब्दो युज्यते । कल्पितत्वं चेच्छ्रुतेरभिप्रायः, ‘अविद्यमानोऽयं प्रपञ्चो निवर्तते’(विनिवर्तते) ‘कल्पितो विकल्पो विनिवर्तते’ इत्येव शब्दः स्यात् ; न तु ‘निवर्तेत’ इति । अतः सत्यताविषयमिदं वाक्यम् ।", |
| | "‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।’(भ.गी.१६.८), ‘एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः॥’(भ.गी.१६.९) इति निन्दनाच्च ।", |
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| | "विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान् सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥" |
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| "text": "सर्वदा समत्वात् साम भगवान् । तस्योद्गानप्रकारो \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eविनर्दि\u003C/span\u003E वृषभस्वरवन्मेघनर्दनवद्वा । तदेव \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eवृणे\u003C/span\u003E । सर्वोत्तमत्वात् ।\n‘विष्णोः स्वरो वृषभवन्मेघनादवदेव वा ।\nस्त्रीपशुस्वरवद् वह्नेर्गम्भीरोऽनुपमो विभोः ॥\nब्रह्मणस्त्वथ सोमस्य साक्षाद् घण्टानिनादवत् ।\nमृदुमेघस्वरो वायोरिन्द्रस्य स्तनयित्नुवत् ॥\nबृहस्पतेः क्रोञ्चवच्च वरुणस्य तु विस्वरः ।\nएकस्य पादवर्षस्य स्वरो विष्णोरुदाहृतः ॥\nवायोर्विंशतिवर्षस्य ब्रह्मणस्तु तदन्तरा ॥’ इति च ।\n‘गायेदेतैः स्वरैस्तस्माद् यथाशक्ति न विस्वरम् ।" | | "lines": [ |
| | "सर्वदा समत्वात् साम भगवान् । तस्योद्गानप्रकारो \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eविनर्दि\u003C/span\u003E वृषभस्वरवन्मेघनर्दनवद्वा । तदेव \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eवृणे\u003C/span\u003E । सर्वोत्तमत्वात् ।", |
| | "‘विष्णोः स्वरो वृषभवन्मेघनादवदेव वा ।", |
| | "स्त्रीपशुस्वरवद् वह्नेर्गम्भीरोऽनुपमो विभोः ॥", |
| | "ब्रह्मणस्त्वथ सोमस्य साक्षाद् घण्टानिनादवत् ।", |
| | "मृदुमेघस्वरो वायोरिन्द्रस्य स्तनयित्नुवत् ॥", |
| | "बृहस्पतेः क्रोञ्चवच्च वरुणस्य तु विस्वरः ।", |
| | "एकस्य पादवर्षस्य स्वरो विष्णोरुदाहृतः ॥", |
| | "वायोर्विंशतिवर्षस्य ब्रह्मणस्तु तदन्तरा ॥’ इति च ।", |
| | "‘गायेदेतैः स्वरैस्तस्माद् यथाशक्ति न विस्वरम् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत् स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत् स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| "text": "अधिकारी सदौद्गात्रे मुख्यतः प्राण एव यत् ।\nअतो मोक्षादिदाने स देवादीनां क्षमो भवेत् ॥\nअन्येषां स ददातीह मद्धृदिस्थ इति स्मृतिः ।\nकार्या हि नान्यथा कुर्यादवमन्ताऽन्यथा भवेत् ॥\nदेवानां मोक्षदानादौ न हि मानुष ईश्वरः ।\nअतः प्राणो हृदिस्थो मे ददातीति स्मृतिर्भवेत् ॥\nसङ्कल्पोक्त्यादिकर्ता च प्राण एव यतः सदा ।\nआगायानीति युज्येत तस्मात् तस्मिन् हि मुख्यतः॥\nआत्मेति भगवान् विष्णुः प्राणस्थः पुरुषोत्तमः।\nतस्मा अन्नं ह्यर्थतस्तु प्राणस्यान्नभुजिर्भवेत् ॥\nप्राणस्याप्यमृतत्वं हि मुख्यमेव फलं यतः ।\nदेवान्तर्भावतो विष्णोर्नामृतत्वं क्व चादिमत् ॥" | | "lines": [ |
| | "अधिकारी सदौद्गात्रे मुख्यतः प्राण एव यत् ।", |
| | "अतो मोक्षादिदाने स देवादीनां क्षमो भवेत् ॥", |
| | "अन्येषां स ददातीह मद्धृदिस्थ इति स्मृतिः ।", |
| | "कार्या हि नान्यथा कुर्यादवमन्ताऽन्यथा भवेत् ॥", |
| | "देवानां मोक्षदानादौ न हि मानुष ईश्वरः ।", |
| | "अतः प्राणो हृदिस्थो मे ददातीति स्मृतिर्भवेत् ॥", |
| | "सङ्कल्पोक्त्यादिकर्ता च प्राण एव यतः सदा ।", |
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| | "आत्मेति भगवान् विष्णुः प्राणस्थः पुरुषोत्तमः।", |
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| | "प्राणस्याप्यमृतत्वं हि मुख्यमेव फलं यतः ।", |
| | "देवान्तर्भावतो विष्णोर्नामृतत्वं क्व चादिमत् ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "सर्वे स्वरा इन्द्रस्याऽत्मानः सर्व ऊष्मणः प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं यदि स्वरेषूपालभेतेन्द्रं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "सर्वे स्वरा इन्द्रस्याऽत्मानः सर्व ऊष्मणः प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं यदि स्वरेषूपालभेतेन्द्रं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥" |
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| | "अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापतिं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिपेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येनं स्पर्शेषूपालभेत मृत्युं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥" |
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| | "सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्वे ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशेनानभिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥ २२ ॥" |
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| "text": "‘इन्द्रे बलं ददानीति स्वरान् घोषबलात्मकान् ।\nब्रूयादग्रस्तानिरस्तानूष्मणः स्पर्शानपि ॥\nसमस्तान् बलदानार्थमिन्द्रे चैव प्रजापतेः ।\nविष्णोः स्वात्मानमेवाहमर्पये मृत्युवर्जितम् ॥\nमोक्षयोग्यान् करिष्यामीत्येवं स प्राण एव तु ।\nकुर्यादन्यस्तु मत्स्थस्तु प्राण एवेदृशक्षमः (एवेदृशः क्षमः) ।\nकरोतीति स्मरेन्नित्यं नान्यथा तु कथञ्चन ।\nदेवावमन्ता हि तमो यात्यसंशयतो यतः ॥\nअत इन्द्रं प्रजापाख्यं विष्णुं मृत्युं च सर्वदा ।\nशरणं गतोऽहमिति च (इतिवत्) ध्यायेत् सर्वत्र सर्वदा ॥\nऐश्वर्यादिन्द्रनामा तु वायुः स्वरपतिः सदा ।\nऊष्माधिपस्तु भगवान् विष्णुरेव प्रजापतिः ॥\nमृत्युनामा तु संहाराद् रुद्रः स्पर्शाधिपः स्मृतः ।\nमानुषाणां तु शरणमितरेषां तु वायुतः ॥\nवायोस्तु बलदानाद्यं मोक्षदानादिकं हरेः ।\nयस्माद् वायुपदे योग्या बहवस्त्विन्द्रनामकाः ॥\nअत इन्द्रे ददानीति स्मृतिः प्राणस्य युज्यते ॥’ इति सामसंहितायाम् ॥\n‘सर्वोपद्रवकर्तॄणामसुराणां कुबुद्धिनाम् ।\nउपालम्भे कृते युक्तं विष्णुस्त्वां प्रतिपेक्ष्यति ॥\nरुद्रस्त्वां धक्ष्यतीत्यादि नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति च ।\nमृत्योस्सकाशादात्मानं परिहराणीति ।\n‘ब्रह्मा प्रजापतिश्चेति विष्णुरन्यं प्रबोधयन् ।\nतथेन्द्रनामा वायुश्च परेषां बोधको यदा ॥’ इति च ।\nबृंहयति प्रजाः पाति इदं रातीति व्युत्पत्तिभिः ॥ २२ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘इन्द्रे बलं ददानीति स्वरान् घोषबलात्मकान् ।", |
| | "ब्रूयादग्रस्तानिरस्तानूष्मणः स्पर्शानपि ॥", |
| | "समस्तान् बलदानार्थमिन्द्रे चैव प्रजापतेः ।", |
| | "विष्णोः स्वात्मानमेवाहमर्पये मृत्युवर्जितम् ॥", |
| | "मोक्षयोग्यान् करिष्यामीत्येवं स प्राण एव तु ।", |
| | "कुर्यादन्यस्तु मत्स्थस्तु प्राण एवेदृशक्षमः (एवेदृशः क्षमः) ।", |
| | "करोतीति स्मरेन्नित्यं नान्यथा तु कथञ्चन ।", |
| | "देवावमन्ता हि तमो यात्यसंशयतो यतः ॥", |
| | "अत इन्द्रं प्रजापाख्यं विष्णुं मृत्युं च सर्वदा ।", |
| | "शरणं गतोऽहमिति च (इतिवत्) ध्यायेत् सर्वत्र सर्वदा ॥", |
| | "ऐश्वर्यादिन्द्रनामा तु वायुः स्वरपतिः सदा ।", |
| | "ऊष्माधिपस्तु भगवान् विष्णुरेव प्रजापतिः ॥", |
| | "मृत्युनामा तु संहाराद् रुद्रः स्पर्शाधिपः स्मृतः ।", |
| | "मानुषाणां तु शरणमितरेषां तु वायुतः ॥", |
| | "वायोस्तु बलदानाद्यं मोक्षदानादिकं हरेः ।", |
| | "यस्माद् वायुपदे योग्या बहवस्त्विन्द्रनामकाः ॥", |
| | "अत इन्द्रे ददानीति स्मृतिः प्राणस्य युज्यते ॥’ इति सामसंहितायाम् ॥", |
| | "‘सर्वोपद्रवकर्तॄणामसुराणां कुबुद्धिनाम् ।", |
| | "उपालम्भे कृते युक्तं विष्णुस्त्वां प्रतिपेक्ष्यति ॥", |
| | "रुद्रस्त्वां धक्ष्यतीत्यादि नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति च ।", |
| | "मृत्योस्सकाशादात्मानं परिहराणीति ।", |
| | "‘ब्रह्मा प्रजापतिश्चेति विष्णुरन्यं प्रबोधयन् ।", |
| | "तथेन्द्रनामा वायुश्च परेषां बोधको यदा ॥’ इति च ।", |
| | "बृंहयति प्रजाः पाति इदं रातीति व्युत्पत्तिभिः ॥ २२ ॥" |
| | ] |
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| | "त्रयोविंशः खण्डः" |
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| "text": "त्रयो धर्मस्कन्धाः यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमः, तप एव द्वितीयो, ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयो, अत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "त्रयो धर्मस्कन्धाः यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमः, तप एव द्वितीयो, ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयो, अत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥" |
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| | "प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत् तामभ्यतपत् तस्या अभितप्ताया(तप्यमानाया) एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त । भूर्भुवः स्वरिति । तान्यभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् । तद् यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि सन्तृण्णान्येवमेतेनोङ्कारेण सर्वा वाक्सन्तृण्णोङ्कार एवेदं सर्वमोङ्कार एवेदं सर्वम् ॥ २ ॥ २३ ॥" |
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| "text": "‘ओङ्कारो ब्रह्मणो नाम सर्ववागात्मकश्च सः ।\nतद्व्याख्यात्वात्(व्याख्यानत्वात्) सर्ववाचां सर्ववागात्मता भवेत् ।\nइदं तु प्रस्तुतत्वात् स सर्वं चाप्यर्थपूर्णतः ।\nसर्वशब्दान्वितत्वाच्च न लिङ्गव्यत्ययो भवेत् ।\nआधिक्यं चैव सर्वत्वं प्रस्तुतं तद् यथेति तत् ॥’ इति च ।\n‘अकाराद्याः क्रमेणैव भूरादेः साररूपिणः ।\nअस्मादयं सार इति ज्ञानमेवाभितापनम् ॥\nसम्प्रस्रावश्च तद्दृष्टिर्ब्रह्मणः परमस्य हि ।\nनित्यज्ञानोऽपि भगवान् क्रीडयाऽचीक्लृपद् यदा ॥\nतदाभितापशब्दोऽयं वर्तते परमात्मनि ॥’ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "‘ओङ्कारो ब्रह्मणो नाम सर्ववागात्मकश्च सः ।", |
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| "text": "तपःशब्देनैव यतिधर्मश्चोक्तः ।\n‘सर्वेषामाश्रमस्थानामज्ञानां पुण्यलोकता ।\nअपरोक्षदृशां विष्णोरमृतत्वं न चान्यथा ॥’ इति च ।\n‘यज्ञाध्ययनदानैस्तु गृही स्यात् सोमलोकगः ।\nयतयस्तपसा सूर्यं चत्वारोऽपि विशेषतः ।\nगच्छन्ति तपसैवर्षीन् वनस्था ब्रह्मचारिणः ॥\nनैष्ठिका वालखिल्यांश्च गुरुशुश्रुषयैव तु ।\nयदि पश्यन्त्येत एव साक्षादेव जनार्दनम् ।\nअमृतत्वं तदा यान्ति नान्यथा तु कथञ्चन ॥’ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "तपःशब्देनैव यतिधर्मश्चोक्तः ।", |
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| "text": "न च संन्यासमात्रेणामृतत्वम् । ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति श्रुतेः ।\n‘विद्यैव तु निर्धारणात्’(ब्र.सू.३.३.४८) इति च भगवद्वचनम् (इति भगवद्वचनम्) ।\n‘न रोधयति मां धर्मो न साङ्ख्यं योग उद्धव ।\nन स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा ॥’ इत्यादि च (इति च) ।\n‘न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति’(भ.गी.३.८) इति च । ‘तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति’ इत्यादेर्गृहस्थादीनामपि ज्ञानिनां मोक्षः प्रतीयते ।\n‘सर्ववर्णाश्रमाणां च ज्ञानान्मोक्षो विनिश्चितः ।\nअन्त्यानां स्थावराणां वा तथापि यतिरुत्तमः ।\nज्ञानद्वारो यतो न्यासो विशेषेण भविष्यति ॥’ इति च ।\n‘वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः सन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः।’ इति च ॥ २३ ॥" | | "lines": [ |
| | "न च संन्यासमात्रेणामृतत्वम् । ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति श्रुतेः ।", |
| | "‘विद्यैव तु निर्धारणात्’(ब्र.सू.३.३.४८) इति च भगवद्वचनम् (इति भगवद्वचनम्) ।", |
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| | "चतुर्विंशः खण्डः" |
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| | "ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद् वसूनां प्रातःसवनं रुद्राणां माध्यन्दिनं सवनमादित्यानां विश्वेषां देवानां च तृतीयसवनं(तृतीयं सवनं) क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात् कथं कुर्यादथ विद्वान् कुर्यात् ॥ १ ॥" |
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| "text": "पुरा प्रातरनुवाकस्योपकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्योदङ्मुख उपविश्य स वासवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं रा ३३३३३ हु३म् आ३३ ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानास्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै वसवः प्रातःसवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ २ ॥ २४ ॥" | | "lines": [ |
| | "पुरा प्रातरनुवाकस्योपकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्योदङ्मुख उपविश्य स वासवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं रा ३३३३३ हु३म् आ३३ ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानास्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै वसवः प्रातःसवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ २ ॥ २४ ॥" |
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| "text": "पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योददङ्मुख उपविश्य स रौद्रं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं विरा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्मत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यन्दिनं सवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योददङ्मुख उपविश्य स रौद्रं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं विरा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्मत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यन्दिनं सवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ ३ ॥" |
| | ] |
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| "text": "पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यं स वैश्वदेवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं ं स्वारा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यादित्यमथ वैश्वदेवं लो३कद्वारमपा३वा३वार्णू३३ पश्येम त्वा वयं साम्ना ३३३३ हू आ ३म् ३३ ज्या ३यो ३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दतैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनं(तृतीयं सवनं) सम्प्रयच्छन्ति एष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ ४॥ २४ ॥" | | "lines": [ |
| | "पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यं स वैश्वदेवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं ं स्वारा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यादित्यमथ वैश्वदेवं लो३कद्वारमपा३वा३वार्णू३३ पश्येम त्वा वयं साम्ना ३३३३ हू आ ३म् ३३ ज्या ३यो ३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दतैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनं(तृतीयं सवनं) सम्प्रयच्छन्ति एष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ ४॥ २४ ॥" |
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| "text": "‘वसुरुद्रादितेयेषु विश्वेषु स्थितमीश्वरम् ।\nतन्नामानं हरिं मन्त्रैर्लोकद्वारादिभिः प्रभुम् ॥\nप्रार्थयित्वा दिवं त्वज्ञो ज्ञो मोक्षं प्राप्नुयात् तथा ।\nयजमानो नान्यथा तु लोकोऽस्य प्राप्यते वरः ॥\nराजनं पृथिवीलोके राज्यमित्युच्यते बुधैः ।\nविराज्यमन्तरिक्षे तु स्वाराज्यं स्वर्गगं भवेत् ॥\nएतेषु मोक्षोऽपि भवेन्मानुषाणां विशेषिणाम् ।\nश्वेतद्वीपं तथा गत्वा दृष्ट्वा विष्णुं च ते ततः ॥\nअनुज्ञाताः प्रमोदन्ते निर्दुःखास्तु धरादिषु ॥’ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "‘वसुरुद्रादितेयेषु विश्वेषु स्थितमीश्वरम् ।", |
| | "तन्नामानं हरिं मन्त्रैर्लोकद्वारादिभिः प्रभुम् ॥", |
| | "प्रार्थयित्वा दिवं त्वज्ञो ज्ञो मोक्षं प्राप्नुयात् तथा ।", |
| | "यजमानो नान्यथा तु लोकोऽस्य प्राप्यते वरः ॥", |
| | "राजनं पृथिवीलोके राज्यमित्युच्यते बुधैः ।", |
| | "विराज्यमन्तरिक्षे तु स्वाराज्यं स्वर्गगं भवेत् ॥", |
| | "एतेषु मोक्षोऽपि भवेन्मानुषाणां विशेषिणाम् ।", |
| | "श्वेतद्वीपं तथा गत्वा दृष्ट्वा विष्णुं च ते ततः ॥", |
| | "अनुज्ञाताः प्रमोदन्ते निर्दुःखास्तु धरादिषु ॥’ इति च ।" |
| | ] |
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| "text": "‘यो देवानां नामधा एक एव’ इति श्रुतेश्च भगवत एव वस्वादिनामानि । ‘त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते’(भ.गी.९.२०) इति वचनाच्च भगवानेव प्रार्थ्यः । भगवत्स्वरूपस्य सम्यगपरिज्ञानाद् रागाच्च तेषामन्तवत् फलवत्वम् । ‘न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।’(भ.गी.९.२४),‘गतागतं कामकामा लभन्ते’ इति वचनात् ।\n‘सर्वोत्तमत्वस्याज्ञानाद् विष्णोरन्धन्तमो भवेत् ॥\nतद्द्वेषात् किमु वक्तव्यं ब्रह्मादिद्वेषतोऽपि वा ।\nतारतम्यापरिज्ञानादनुत्थानं तमो भवेत् ।\nअपराधकृतस्तेषां निरयं त्वेव गच्छति ।\nपूजाया अकृतेस्तेषां न वर्णेषु जनिर्भवेत् ॥\nसम्यक्कर्माननुष्ठानात् स्वर्गं नैवोपगच्छति ।\nअपरोक्षदृशेरौन्यान्मोक्षं नैवोपगच्छति ॥’ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "‘यो देवानां नामधा एक एव’ इति श्रुतेश्च भगवत एव वस्वादिनामानि । ‘त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते’(भ.गी.९.२०) इति वचनाच्च भगवानेव प्रार्थ्यः । भगवत्स्वरूपस्य सम्यगपरिज्ञानाद् रागाच्च तेषामन्तवत् फलवत्वम् । ‘न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते।’(भ.गी.९.२४),‘गतागतं कामकामा लभन्ते’ इति वचनात् ।", |
| | "‘सर्वोत्तमत्वस्याज्ञानाद् विष्णोरन्धन्तमो भवेत् ॥", |
| | "तद्द्वेषात् किमु वक्तव्यं ब्रह्मादिद्वेषतोऽपि वा ।", |
| | "तारतम्यापरिज्ञानादनुत्थानं तमो भवेत् ।", |
| | "अपराधकृतस्तेषां निरयं त्वेव गच्छति ।", |
| | "पूजाया अकृतेस्तेषां न वर्णेषु जनिर्भवेत् ॥", |
| | "सम्यक्कर्माननुष्ठानात् स्वर्गं नैवोपगच्छति ।", |
| | "अपरोक्षदृशेरौन्यान्मोक्षं नैवोपगच्छति ॥’ इति च ।" |
| | ] |
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| | "lines": [ |
| | "पूर्वपूर्वगुणैर्दोषानशक्ता उत्तरोत्तराः ।", |
| | "स्थानद्वयोत्तरे शक्ता मोक्षो नानपरोक्षिणः ॥", |
| | "विरुद्धरागिणां नैव ह्यपरोक्षदृशिर्भवेत् ।", |
| | "यावद्रागविनाशः स्याद्विरक्तो भक्तिसंयुतः ॥", |
| | "सर्वदैवाप्रमत्तश्च पश्येदेव हरिं परम् ।", |
| | "अविस्मृतिस्सदा विष्णोरन्यथाज्ञानवर्जनम् ॥", |
| | "शास्त्राभ्यासः सदोद्योगाच्छ्रवणाच्च विचारतः ।", |
| | "निषिद्धकर्मणां त्यागः स्वधर्मस्य कृतिः सदा ॥", |
| | "अप्रमाद इति प्रोक्तः शास्त्रं वेदास्तु पञ्च च ।", |
| | "भारतं पञ्चरात्रं च मूलरामायणं तथा ॥", |
| | "पुराणं भागवतं चैव पञ्चमो वेद उच्यते ॥’ इति च ॥" |
| | ] |
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| "chapter": null, | | "chapter": null, |
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| "text": "पूर्वपूर्वगुणैर्दोषानशक्ता उत्तरोत्तराः ।\nस्थानद्वयोत्तरे शक्ता मोक्षो नानपरोक्षिणः ॥\nविरुद्धरागिणां नैव ह्यपरोक्षदृशिर्भवेत् ।\nयावद्रागविनाशः स्याद्विरक्तो भक्तिसंयुतः ॥\nसर्वदैवाप्रमत्तश्च पश्येदेव हरिं परम् ।\nअविस्मृतिस्सदा विष्णोरन्यथाज्ञानवर्जनम् ॥\nशास्त्राभ्यासः सदोद्योगाच्छ्रवणाच्च विचारतः ।\nनिषिद्धकर्मणां त्यागः स्वधर्मस्य कृतिः सदा ॥\nअप्रमाद इति प्रोक्तः शास्त्रं वेदास्तु पञ्च च ।\nभारतं पञ्चरात्रं च मूलरामायणं तथा ॥\nपुराणं भागवतं चैव पञ्चमो वेद उच्यते ॥’ इति च ॥" | | "lines": [ |
| | "त्रिलोकप्राप्तिपरिघास्त्रयः सन्ति सदातनाः(सनातनाः) ।", |
| | "तेषामग्न्यादिगो विष्णुरपहन्ता स्मृतो भवेत् ॥", |
| | "मृतः सन्सुखभोगाय यत्र गच्छति तत्र ह ।", |
| | "एकैकः परिघोऽग्रे स्याद् गते तस्मिंस्तु विष्णुना ॥", |
| | "यजमानः पृथिव्यादिलोकान् भोगाय याति हि ॥’ इति च ।", |
| | "‘यस्त्राति यज्ञमातारं यज्ञमात्रा हरिस्तु सः ।", |
| | "तमेवं वेत्ति यो भक्तो याति स्वर्मुक्तिमेव वा (मुक्तिमेव च) ॥ इति च ॥ २४ ॥" |
| | ] |
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| | "प्रथमः खण्डः" |
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| "text": "ओम् असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवंशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "ओम् असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवंशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "‘य आदित्यगतो विष्णुः स एव मधुनामकः ।\nमदधिर्मध्विति प्रोक्तो मदः सुखमिहोच्यते ॥\nअ इत्याधिक्यमुद्दिष्टं मद् ज्ञानततिरुच्यते ।\nतद्वत्ता ततिरुद्दिष्टा तेनानुभव ईरितः ॥\nअधिकोऽनुभवो यस्य सर्वस्मादीप्सितादपि ।\nसोऽयं मद इति प्रोक्तः सर्वं हि सुखसाधनम् ॥\nतत्पूर्णो मधुनामा स्यात् तृतीयोऽतिशयार्थकः ।\nदेवानामुपजीव्यत्वात् स देवमधुनामकः ॥\nआदित्वादाततत्वाच्च(आदित्वाच्च ततत्वाच्च) ज्ञानरूपत्वतस्तथा ।\nआदित्य इति सम्प्रोक्तः प्रसिद्धमधुवच्च सः ॥\nतिरोवंशादिसंयुक्तो द्युनाम्नी च द्युसंस्थिता ।\nप्रकाशादिगुणैः श्रीस्तु वायोराश्रयरूपतः ॥\nतिरोवंश इतिप्रोक्ता मध्वपूपस्तु मारुतः ।\nतस्मिन् सन्निहितो विष्णुर्विशेषेण यतः सदा ॥\nसोऽन्तरिक्षमितिप्रोक्तः स्वान्तस्सम्यग्घरीक्षणात् ।\nअन्तरिक्षस्थितश्चासौ वस्वाद्या मधुकारिणः ॥\nतत्पुत्रास्तु मरीच्याद्याः सूर्यरश्मिषु संस्थिताः ।\nतिर्यक् स्थित्वा वशे कुर्याद् यस्माद् देवी रमा हरिम् ॥\nभक्त्यैवातस्तिरोवंशस्तिर्यक्त्वं प्रणतिः स्मृता ।\nतिर्यक्स्थित्वा स्वसंस्थं तु वशीकुर्याद्यतस्ततः ॥\nवंशस्तिरश्चीनोऽन्योऽपि यस्मिन्नाप्यमुपस्थितम् ।\nसोऽपूप आप्यो भगवान् मध्वाज्यादि प्रसिद्धगम् ॥" | | "lines": [ |
| | "‘य आदित्यगतो विष्णुः स एव मधुनामकः ।", |
| | "मदधिर्मध्विति प्रोक्तो मदः सुखमिहोच्यते ॥", |
| | "अ इत्याधिक्यमुद्दिष्टं मद् ज्ञानततिरुच्यते ।", |
| | "तद्वत्ता ततिरुद्दिष्टा तेनानुभव ईरितः ॥", |
| | "अधिकोऽनुभवो यस्य सर्वस्मादीप्सितादपि ।", |
| | "सोऽयं मद इति प्रोक्तः सर्वं हि सुखसाधनम् ॥", |
| | "तत्पूर्णो मधुनामा स्यात् तृतीयोऽतिशयार्थकः ।", |
| | "देवानामुपजीव्यत्वात् स देवमधुनामकः ॥", |
| | "आदित्वादाततत्वाच्च(आदित्वाच्च ततत्वाच्च) ज्ञानरूपत्वतस्तथा ।", |
| | "आदित्य इति सम्प्रोक्तः प्रसिद्धमधुवच्च सः ॥", |
| | "तिरोवंशादिसंयुक्तो द्युनाम्नी च द्युसंस्थिता ।", |
| | "प्रकाशादिगुणैः श्रीस्तु वायोराश्रयरूपतः ॥", |
| | "तिरोवंश इतिप्रोक्ता मध्वपूपस्तु मारुतः ।", |
| | "तस्मिन् सन्निहितो विष्णुर्विशेषेण यतः सदा ॥", |
| | "सोऽन्तरिक्षमितिप्रोक्तः स्वान्तस्सम्यग्घरीक्षणात् ।", |
| | "अन्तरिक्षस्थितश्चासौ वस्वाद्या मधुकारिणः ॥", |
| | "तत्पुत्रास्तु मरीच्याद्याः सूर्यरश्मिषु संस्थिताः ।", |
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| | "तिर्यक्स्थित्वा स्वसंस्थं तु वशीकुर्याद्यतस्ततः ॥", |
| | "वंशस्तिरश्चीनोऽन्योऽपि यस्मिन्नाप्यमुपस्थितम् ।", |
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| "text": "तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्य ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्य ये प्राञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्राच्यो मधुनाड्य ऋच एव मधुकृत ऋग्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपस्ता वा एता ऋचः ॥ २ ॥" |
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| | "एतमृग्वेदमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ ३ ॥" |
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| "text": "प्राच्यरश्मिषु संस्थस्तु रतिशंमानरूपतः(स्वरतिर्मानरूपतः) ।\nप्राच्यरश्मिरिति प्रोक्तो वासुदेवाभिधो हरिः ॥\nएतद् विना(द्या) नालमिति नाडीत्यंश उदाहृतः ।\nस्वरूपांशैर्विना प्राप्तुं नालं हि प्रापितांशिनम् ॥\nऋग्वेदमानिनश्चैव वह्न्याद्या वसवस्त्वृचः ।\nअर्च्यत्वात् प्रथमं चैव विशेषाद् ..... ॥" | | "lines": [ |
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| | "अथ येऽस्य दक्षिणा रश्मयस्ता एवास्य दक्षिणा मधुनाड्यो यजूंष्येव मधुकृतो यजुर्वेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥" |
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| "text": ".....यज्ञदेवताः\nइन्द्राद्या यजुरुद्दिष्टा रुद्रा इन्द्रसखा यतः (इन्द्रसहायतः, इन्द्रसहायत्वतः) ।\nइन्द्रशब्दोदितो वायुः स याज्यः सोमभुक्पुरः ॥\nस हि शङ्करपूर्वाणां रुद्राणां मुख्य एव च ।" | | "lines": [ |
| | ".....यज्ञदेवताः", |
| | "इन्द्राद्या यजुरुद्दिष्टा रुद्रा इन्द्रसखा यतः (इन्द्रसहायतः, इन्द्रसहायत्वतः) ।", |
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| | "अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥" |
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| | "तानि वा एतानि सामान्येतं सामवेदमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ २ ॥" |
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| | "तद् व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद् यदेतदादित्यस्य परं कृष्णं रूपम् ॥ ३ ॥ ३ ॥" |
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| "text": "सामनामान आदित्या मासशः समभोगतः ॥\nइन्द्रो वरुण उद्दिष्टो यज्ञेषु व्रियते यतः ।\nआदित्यानामधिपतिः स हि विष्णुनियोजितः ॥\nविष्णुस्तूपास्यरूपत्वान्नोपासकगणे युतः(नोपासकगणैर्युतः) ॥" | | "lines": [ |
| | "सामनामान आदित्या मासशः समभोगतः ॥", |
| | "इन्द्रो वरुण उद्दिष्टो यज्ञेषु व्रियते यतः ।", |
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| | "अथ येऽस्योदञ्चो रश्मयस्ता एवास्योदीच्यो मधुनाड्योऽथर्वाङ्गिरस एव मधुकृत इतिहासपुराणं पुष्पं ता अमृता आपः॥१॥" |
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| | "ते वा एतेऽथर्वाङ्गिरस एतदितिहासपुराणमभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीयमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ २ ॥" |
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| | "तद् व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद् यदेतदादित्यस्य परं कृष्णं रूपम् ॥ ३ ॥ ४ ॥" |
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| "text": "इतिहासपुराणानां सोमाद्या अभिमानिनः ।\nअथर्वाङ्गिरसां चैवाप्यथर्वाङ्गिरनामकाः ॥\nअधरं वर्तयेयुस्ते वृष्टिमङ्गरसास्तथा ।\nमानस्त्वात् प्राणरूपत्वाद् अथर्वाङ्गिरसस्ततः ॥" | | "lines": [ |
| | "इतिहासपुराणानां सोमाद्या अभिमानिनः ।", |
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| | "अथ येऽस्योर्ध्वा रश्मयस्ता एवास्योर्ध्वा मधुनाड्यो गुह्या एवाऽदेशा मधुकृतो ब्रह्मैव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥" |
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| | "ते वा एते गुह्या आदेशा एतद् ब्रह्माभ्यतपंस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यं रसोऽजायत ॥ २ ॥" |
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| | "तद् व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद् यदेतदादित्यस्य मध्ये क्षोभत इव ॥ ३ ॥" |
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| "text": "ते वा एते रसानांरसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ४ ॥५॥" | | "lines": [ |
| | "ते वा एते रसानांरसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ४ ॥५॥" |
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| | "गुह्यादेशा ब्रह्मपदे ये योग्या ब्रह्मणा सह ।", |
| | "सर्वगुह्योपदेष्टारः सर्वेषां गुरवो हि ते ।", |
| | "ब्रह्मेति सर्वदेवानां नामानन्तत्त्वतः स्मृतम् ॥", |
| | "ऋग्वेदादींस्तु ते देवा अग्न्याद्याः संव्यचारयन् ।", |
| | "मधुब्रह्मव्यक्तिकृत्वात् ते वै मधुकृतः स्मृताः ॥", |
| | "ज्ञानपोषकरत्वात् तु वेदाः पुष्पाभिधाः स्मृताः ।", |
| | "अन्यत्र मधुकृत् पोषन्नित्यत्वादमृताश्च ताः ॥", |
| | "वेदवाचः सुरैः पेया भोग्यत्वाद् आप ईरिताः ।", |
| | "वेदपानं विचारश्च श्रवणं पाठ एव च ॥", |
| | "देवैर्विचारितेभ्यश्च वेदेभ्यो व्यक्ततां गतः(गताः) ।", |
| | "ज्ञानानन्दस्वरूपत्वाद् यशस्तेजस्वरूपकः ॥", |
| | "इन्द्रियं परमैश्वर्याद् वीर्यरूपश्च सर्वदा।", |
| | "सर्वानुग्रहशक्तित्वादन्नाद्यो बलरूपतः ॥", |
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| "text": "........संस्थितः सूर्यमण्डले ।\nव्यक्षरद् धर्ममोक्षादीन् देवानां भगवान् हरिः ॥\nऋक्प्रोक्तो लोहिताकारो वासुदेवः परः पुमान् ।\nस एव सूर्यलोहित्ये प्राच्यरश्मिषु संस्थितः(च स्थितः) ॥\nसङ्कर्षणः शुक्लवर्णो यजुर्वेदोदितः प्रभुः ।\nशुक्ले वर्णे च(शुक्लवर्णेच) सूर्यस्य दक्षरश्मिषु संस्थितः(संस्थितः) ॥\nप्रद्युम्नः श्यामवर्णस्तु सामवेदोदितः प्रभुः।\nप्रत्यग्रश्मिषु सूर्यस्य श्यामवर्णेऽपि च स्थितः ॥\nअनिरुद्धः सुनीलश्च इतिहासपुराणयोः ।\nअथर्ववेदे चोक्तः सन्नुदग्रश्मिषु संस्थितः ॥\nसुकृष्णे सूर्यरूपे च मध्ये नारायणः प्रभुः ।\nऊर्ध्वरश्मिषु संस्थश्च प्रोद्यदादित्यसप्रभः ॥\nमहामरीचिपुञ्जेन चलतीवाचलोऽपि सन् ।\nस वाच्यः सर्ववेदानामेवं पञ्चात्मको हरिः ॥\nवेदानां सारभूतोऽसौ वेदानां नित्यताप्रदः ।\nअतोऽमृतानाममृतो रसानां रस एव च ॥ इति सामसंहितायाम् ॥" | | "lines": [ |
| | "........संस्थितः सूर्यमण्डले ।", |
| | "व्यक्षरद् धर्ममोक्षादीन् देवानां भगवान् हरिः ॥", |
| | "ऋक्प्रोक्तो लोहिताकारो वासुदेवः परः पुमान् ।", |
| | "स एव सूर्यलोहित्ये प्राच्यरश्मिषु संस्थितः(च स्थितः) ॥", |
| | "सङ्कर्षणः शुक्लवर्णो यजुर्वेदोदितः प्रभुः ।", |
| | "शुक्ले वर्णे च(शुक्लवर्णेच) सूर्यस्य दक्षरश्मिषु संस्थितः(संस्थितः) ॥", |
| | "प्रद्युम्नः श्यामवर्णस्तु सामवेदोदितः प्रभुः।", |
| | "प्रत्यग्रश्मिषु सूर्यस्य श्यामवर्णेऽपि च स्थितः ॥", |
| | "अनिरुद्धः सुनीलश्च इतिहासपुराणयोः ।", |
| | "अथर्ववेदे चोक्तः सन्नुदग्रश्मिषु संस्थितः ॥", |
| | "सुकृष्णे सूर्यरूपे च मध्ये नारायणः प्रभुः ।", |
| | "ऊर्ध्वरश्मिषु संस्थश्च प्रोद्यदादित्यसप्रभः ॥", |
| | "महामरीचिपुञ्जेन चलतीवाचलोऽपि सन् ।", |
| | "स वाच्यः सर्ववेदानामेवं पञ्चात्मको हरिः ॥", |
| | "वेदानां सारभूतोऽसौ वेदानां नित्यताप्रदः ।", |
| | "अतोऽमृतानाममृतो रसानां रस एव च ॥ इति सामसंहितायाम् ॥" |
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| "chapter": "CHU_C03", | | "chapter": "CHU_C03", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "न चाचेतनमात्रमुपासितं पुरुषार्थप्रदानशक्तम् । ‘ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात्’(३.११.५) इति वाक्यशेषाच्चैतदवगम्यते । ‘य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद’(३.११.३) इति च । कथं चाचेतनोपासनं ब्रह्मादिपदप्रदं भवति ? ‘न वै तत्र न निम्लोचो(निम्नोचः) नोदियाय कदाचन’(३.११.२), ‘सकृद् दिव हैवास्मै भवति’(३.११.३) इत्यादि च मुक्तस्यैव मुख्यतो युज्यते ।" | | "lines": [ |
| | "न चाचेतनमात्रमुपासितं पुरुषार्थप्रदानशक्तम् । ‘ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात्’(३.११.५) इति वाक्यशेषाच्चैतदवगम्यते । ‘य एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद’(३.११.३) इति च । कथं चाचेतनोपासनं ब्रह्मादिपदप्रदं भवति ? ‘न वै तत्र न निम्लोचो(निम्नोचः) नोदियाय कदाचन’(३.११.२), ‘सकृद् दिव हैवास्मै भवति’(३.११.३) इत्यादि च मुक्तस्यैव मुख्यतो युज्यते ।" |
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| "text": "यशस्तेजइन्द्रियवीर्यान्नाद्यरसत्वं च भगवन्तं विना कस्य मुख्यतो युज्यते ? तस्य नाम महद्यशः ।\nऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः ।\nज्ञानवैराग्ययोश्चैव(ज्ञानविज्ञानयोश्चैव) षण्णां भग इतीरणा ॥\n‘रसो वै रसः’,\n‘सुखात्मकं षड्गुणविग्रहं परं हृदि स्थितं ब्रह्म निरञ्चनं स्वरुक् ।\nऐश्वर्यवैराग्ययशोविबोधवीर्यश्रिया पूर्णमहं प्रपद्ये॥’\n‘अहं तत्तेजोरश्मीन्नारायणं पुरुषम्’(पुरुषं जातमग्रतः) इत्यादेश्च । ‘ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः’ इति च (नरसिमहपुराणे ऐ.भा.)।" | | "lines": [ |
| | "यशस्तेजइन्द्रियवीर्यान्नाद्यरसत्वं च भगवन्तं विना कस्य मुख्यतो युज्यते ? तस्य नाम महद्यशः ।", |
| | "ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः ।", |
| | "ज्ञानवैराग्ययोश्चैव(ज्ञानविज्ञानयोश्चैव) षण्णां भग इतीरणा ॥", |
| | "‘रसो वै रसः’,", |
| | "‘सुखात्मकं षड्गुणविग्रहं परं हृदि स्थितं ब्रह्म निरञ्चनं स्वरुक् ।", |
| | "ऐश्वर्यवैराग्ययशोविबोधवीर्यश्रिया पूर्णमहं प्रपद्ये॥’", |
| | "‘अहं तत्तेजोरश्मीन्नारायणं पुरुषम्’(पुरुषं जातमग्रतः) इत्यादेश्च । ‘ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः’ इति च (नरसिमहपुराणे ऐ.भा.)।" |
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| "text": "न चाचेतनस्यैश्वर्यादिरूपत्वं युज्यते । ‘ज्ञानात्मको भगवानैश्वर्यात्मको भगवान् शक्त्यात्मको भगवान्’ इति च श्रुतिः । ‘सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात्’(ब्र.सू.३.३.१) इति सर्ववेदप्रतिपाद्यत्वं भगवत उक्तं भगवता । ‘स सर्वनामा स च विश्वरूपः प्रसीदतां ब्रह्म महाविभूतिः’ इति च । ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’(काठक.अ.१,ब्रा.६,श्लो.१), ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदा सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव’ ।\n‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।\nआदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते ॥’\n‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ इत्यादेश्च ।" | | "lines": [ |
| | "न चाचेतनस्यैश्वर्यादिरूपत्वं युज्यते । ‘ज्ञानात्मको भगवानैश्वर्यात्मको भगवान् शक्त्यात्मको भगवान्’ इति च श्रुतिः । ‘सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्यविशेषात्’(ब्र.सू.३.३.१) इति सर्ववेदप्रतिपाद्यत्वं भगवत उक्तं भगवता । ‘स सर्वनामा स च विश्वरूपः प्रसीदतां ब्रह्म महाविभूतिः’ इति च । ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’(काठक.अ.१,ब्रा.६,श्लो.१), ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदा सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव’ ।", |
| | "‘वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।", |
| | "आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते ॥’", |
| | "‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ इत्यादेश्च ।" |
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| "text": "उपनिषत्वाच्च विशेषतो न यत्किञ्चिदुच्यत इति वक्तुं युक्तम् -\n‘विष्णुरुक्तः सर्ववेदैर्मन्त्रैरपि (मन्त्रेषु च) विशेषतः ।\nआरण्यके विशेषेण नैवान्यत् किञ्चिदुच्यते ॥\nकर्मार्थं च ब्राह्मणं स्याद् अमुख्यार्थविवक्षया ।\nमुख्यतो विष्णुरेवैको ब्राह्मणेष्वपि कथ्यते ॥\nआरण्यकेष्वृते विष्णुं नैवान्यत् किञ्चिदुच्यते ।\nसूत्रात्मा तूच्यते विष्णोस्तद्विशिष्टत्ववित्तये ॥\nकुत्रचित् तदुपास्तिश्च तस्याध्यर्धतनुत्वतः ।\nतस्मिन् विष्णोरुपास्त्यर्थं नान्यथा किञ्चिदुच्यते ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।" | | "lines": [ |
| | "उपनिषत्वाच्च विशेषतो न यत्किञ्चिदुच्यत इति वक्तुं युक्तम् -", |
| | "‘विष्णुरुक्तः सर्ववेदैर्मन्त्रैरपि (मन्त्रेषु च) विशेषतः ।", |
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| | "कर्मार्थं च ब्राह्मणं स्याद् अमुख्यार्थविवक्षया ।", |
| | "मुख्यतो विष्णुरेवैको ब्राह्मणेष्वपि कथ्यते ॥", |
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| | "कुत्रचित् तदुपास्तिश्च तस्याध्यर्धतनुत्वतः ।", |
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| "text": "‘यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवत्राणनिरोधमस्य ।\nलीलावतारेधितकर्म (लीलावतारैधितकर्म) वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ।\nवित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ।\nयन्न व्रजन्त्यघभिदोऽरचनानुवादाः शृण्वन्ति येऽन्यविषयाः कुकथा मतिघ्नीः ।\nयास्तु श्रुता हतभगैर्नृभिरात्तवीर्यास्तांस्तान् क्षिपन्त्यशरणेषु तमस्सु हन्त ।’ इत्यादिभगवद्वचनाच्च ।\nआत्ता वीर्यं याभिस्ता आत्तविर्या याश्च यैर्हतभगैरनृभिः श्रुता अशरणेषु।\n‘सर्वासु शाखास्वारणमावर्तयेदारणकमावर्तयेदुपनिषदमावर्तयेदुपनिषदमावर्तयेत्’ इत्युपनिषदभ्यासस्य सतात्पर्यं विहितत्वादभगवद्विषयस्य निन्दितत्वाच्च नोपनिषत्स्वन्यदुच्यते ।\n‘अभ्यसेदधियज्ञं चाप्यधिदैवं विशेषतः ।\nअध्यात्मं तु विशेषेण यस्माद् विष्णुस्त्रिषूदितः ॥’ इति स्कान्दे ।\n‘मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्योऽपोह्य(विकल्प्यापोह्य .हृ) इत्यहम् ।\nइत्यस्या हृदयं साक्षान्नान्यो मद्वेद कश्चन ॥’\nइत्यादेश्च भगवदुपासना एव सर्वत्रोक्ताः ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवत्राणनिरोधमस्य ।", |
| | "लीलावतारेधितकर्म (लीलावतारैधितकर्म) वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ।", |
| | "वित्तं त्वतीर्थीकृतमङ्ग वाचं हीनां मया रक्षति दुःखदुःखी ।", |
| | "यन्न व्रजन्त्यघभिदोऽरचनानुवादाः शृण्वन्ति येऽन्यविषयाः कुकथा मतिघ्नीः ।", |
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| | "आत्ता वीर्यं याभिस्ता आत्तविर्या याश्च यैर्हतभगैरनृभिः श्रुता अशरणेषु।", |
| | "‘सर्वासु शाखास्वारणमावर्तयेदारणकमावर्तयेदुपनिषदमावर्तयेदुपनिषदमावर्तयेत्’ इत्युपनिषदभ्यासस्य सतात्पर्यं विहितत्वादभगवद्विषयस्य निन्दितत्वाच्च नोपनिषत्स्वन्यदुच्यते ।", |
| | "‘अभ्यसेदधियज्ञं चाप्यधिदैवं विशेषतः ।", |
| | "अध्यात्मं तु विशेषेण यस्माद् विष्णुस्त्रिषूदितः ॥’ इति स्कान्दे ।", |
| | "‘मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्योऽपोह्य(विकल्प्यापोह्य .हृ) इत्यहम् ।", |
| | "इत्यस्या हृदयं साक्षान्नान्यो मद्वेद कश्चन ॥’", |
| | "इत्यादेश्च भगवदुपासना एव सर्वत्रोक्ताः ॥ ५ ॥" |
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| | "तद् यत् प्रथमममृतं तद्वसव उपजीवन्त्यग्निना मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥" |
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| | "स य एतदेवममृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाऽग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुदेति ॥३॥" |
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| | "अथ यद्वितीयममृतं तद् रुद्राः उपजीवन्तीन्द्रेण मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥" |
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| | "स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्विस्तावद् दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ७ ॥" |
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| "text": "एवं द्वितीयरूपं तु शिवाद्या वायुसंस्थिताः (वायुसंश्रिताः)।\nवायोर्हिरण्यगर्भत्वात् पदद्वयमुदाहृतम् ॥\nरुद्राणामाश्रयत्वं च साध्यानामपि सर्वशः ।\nअतो यजुर्विचारश्च सर्ववेदात्मनस्तथा ॥\nवायोरेव विचारः स्याद् ब्रह्मणोऽपि विशेषतः ।\nउभयाश्रयः स मोक्षोऽपि वायुरेव हि सर्वदा ॥" | | "lines": [ |
| | "एवं द्वितीयरूपं तु शिवाद्या वायुसंस्थिताः (वायुसंश्रिताः)।", |
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| | "रुद्राणामाश्रयत्वं च साध्यानामपि सर्वशः ।", |
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| | "स य एतदेवममृतं वेदादित्यानामेवैको भूत्वा वरुणेनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति स य एतदेव रूपमभिसंविशत्येतस्माद् रूपादुदेति ॥ ३ ॥" |
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| | "स यावदादित्यो दक्षिणतः उदेतात्तरतोऽस्तमेता द्विस्तावत् पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेताऽऽदित्यानामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ८ ॥" |
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| | "अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥" |
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| "text": "स यावदादित्यः पश्चादुतेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥४॥ ९॥" | | "lines": [ |
| | "स यावदादित्यः पश्चादुतेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥४॥ ९॥" |
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| | "अथ यत्पञ्चमममृतं तत् साध्याः उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन न वै देवा अश्नन्ति न पिबन्त्येतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ॥ १ ॥" |
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| | "स यावदादित्यः उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्वं उदेताऽर्वाङस्तमेता साध्यानामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ १० ॥" |
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| "text": "....... ...... .......... पञ्चमस्य च ॥\nऋजवो ब्रह्ममुख्या हि सुपर्णः शेष एव च ।\nसरस्वती सुपर्णी च वारुणी साध्यनामकाः ॥\nअन्योन्यमुखता मुक्तौ ब्रह्मणा समता तथा ।\nवाक्शेषादेर्मुखं ब्रह्मा मुक्तावपि विशेषतः ॥\nद्रष्टोभयस्यापि शिवो द्वितीयस्यान्तगस्य(अन्त्यगस्य) च ।\nमोक्षे त्वन्यत्र चैकस्य परतः शेषभावतः ॥\nये चेैतत्पदयोग्याः स्युर्देवाः पञ्च महागणाः ।\nतेषामपि यदोपासा निच्छिद्रा मधुनामके ॥\nतदा वस्वादितां प्राप्य मुक्तिमेष्यन्त्यसंशयम् ।" | | "lines": [ |
| | "....... ...... .......... पञ्चमस्य च ॥", |
| | "ऋजवो ब्रह्ममुख्या हि सुपर्णः शेष एव च ।", |
| | "सरस्वती सुपर्णी च वारुणी साध्यनामकाः ॥", |
| | "अन्योन्यमुखता मुक्तौ ब्रह्मणा समता तथा ।", |
| | "वाक्शेषादेर्मुखं ब्रह्मा मुक्तावपि विशेषतः ॥", |
| | "द्रष्टोभयस्यापि शिवो द्वितीयस्यान्तगस्य(अन्त्यगस्य) च ।", |
| | "मोक्षे त्वन्यत्र चैकस्य परतः शेषभावतः ॥", |
| | "ये चेैतत्पदयोग्याः स्युर्देवाः पञ्च महागणाः ।", |
| | "तेषामपि यदोपासा निच्छिद्रा मधुनामके ॥", |
| | "तदा वस्वादितां प्राप्य मुक्तिमेष्यन्त्यसंशयम् ।" |
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| "text": "उदेत्यास्तमयं यावद्याति भानुस्तु पर्वते ॥\nउदयास्ताद्रिमध्यस्य वसवः पतयः स्मृताः ।\nततश्चास्तमयाद् यावदर्धरात्रं दिवाकरः ॥\nदक्षिणादुत्तरं याति किञ्चित् पूर्वसमन्वितम् ।\nतद्देशकालयोरीशा रुद्रा वायुपुरःसराः ॥\nवसुभेग्याद् (वसुभोज्याद्) अर्धकालमर्धदेशस्तथैव च ।\nरुद्रभोज्योऽर्धरात्रात्तु याम आदित्यदैवतः ॥\nपश्चिमात् पूर्वमार्गस्तु रौद्रादर्धः प्रकीर्तितः ।\nततः परोऽर्धयामस्तु सौम्याद् दक्षिणमार्गकः ॥\nमारुतः काल उद्दिष्ट आदित्यार्धश्च देशतः ।\nपश्चात् पश्चादुदेत्येव(उदेत्यैव) पूर्वतोऽस्तमुपैति च ॥\nततस्तदर्धकालेन चोत्तरादुदितस्तथा ।\nअस्तं दक्षिणतो याति स कालो मारुतः स्मृतः ॥\nउदेत्यैन्द्रपुरे(उदेत्येन्द्रपुरे) चोर्ध्वमर्वागुदयपर्वते ।\nअस्तमेति तदर्धेन ब्रह्मा तस्य पतिः स्मृतः ॥" | | "lines": [ |
| | "उदेत्यास्तमयं यावद्याति भानुस्तु पर्वते ॥", |
| | "उदयास्ताद्रिमध्यस्य वसवः पतयः स्मृताः ।", |
| | "ततश्चास्तमयाद् यावदर्धरात्रं दिवाकरः ॥", |
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| | "वसुभेग्याद् (वसुभोज्याद्) अर्धकालमर्धदेशस्तथैव च ।", |
| | "रुद्रभोज्योऽर्धरात्रात्तु याम आदित्यदैवतः ॥", |
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| | "ततः परोऽर्धयामस्तु सौम्याद् दक्षिणमार्गकः ॥", |
| | "मारुतः काल उद्दिष्ट आदित्यार्धश्च देशतः ।", |
| | "पश्चात् पश्चादुदेत्येव(उदेत्यैव) पूर्वतोऽस्तमुपैति च ॥", |
| | "ततस्तदर्धकालेन चोत्तरादुदितस्तथा ।", |
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| | "उदेत्यैन्द्रपुरे(उदेत्येन्द्रपुरे) चोर्ध्वमर्वागुदयपर्वते ।", |
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| | ] |
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| Line 38,263: |
Line 3,917: |
| "chapter": "CHU_C03", | | "chapter": "CHU_C03", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "‘एकत्रिंशत्तु घटिकाः साधिका वसुदैवताः ।\nतदर्धा रुद्रदैवत्यास्तत आदित्यदैवताः ।\nतदर्धा मारुता ब्राह्मास्तदर्धा देशतस्तथा ॥’ इति च ।\nरौद्रो द्विगुणीभूतो वसुकालो यावांस्तावान् भवतीति द्विस्तावत् । अर्ध इत्यर्थः । ब्राह्मे मुहूर्ते (ब्राह्मो महूर्त)इत्युषःकालस्य प्रसिद्धेश्च । रौद्रः काल इति पूर्वरात्रस्य प्रसिद्धेः (प्रसिद्धेः सार्धरात्रस्य। सौम्यः काल इत्यपररात्रस्य । सौम्यकालत्वाच्च)। अपररात्रस्य सौम्यकालत्वाच्च तस्मिन् काले शीतमुत्पद्यते । मारुतकालत्वाद् वायुश्च वाति । आग्नेयकालत्वादेवाह्नि सैकघटिकं होमकर्माणि विशेषतः प्रवर्तन्ते ।" | | "lines": [ |
| | "‘एकत्रिंशत्तु घटिकाः साधिका वसुदैवताः ।", |
| | "तदर्धा रुद्रदैवत्यास्तत आदित्यदैवताः ।", |
| | "तदर्धा मारुता ब्राह्मास्तदर्धा देशतस्तथा ॥’ इति च ।", |
| | "रौद्रो द्विगुणीभूतो वसुकालो यावांस्तावान् भवतीति द्विस्तावत् । अर्ध इत्यर्थः । ब्राह्मे मुहूर्ते (ब्राह्मो महूर्त)इत्युषःकालस्य प्रसिद्धेश्च । रौद्रः काल इति पूर्वरात्रस्य प्रसिद्धेः (प्रसिद्धेः सार्धरात्रस्य। सौम्यः काल इत्यपररात्रस्य । सौम्यकालत्वाच्च)। अपररात्रस्य सौम्यकालत्वाच्च तस्मिन् काले शीतमुत्पद्यते । मारुतकालत्वाद् वायुश्च वाति । आग्नेयकालत्वादेवाह्नि सैकघटिकं होमकर्माणि विशेषतः प्रवर्तन्ते ।" |
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| "id": "Chandogya-290", | | "id": "Chandogya-297", |
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| "type": "bhashya", | | "type": "bhashya", |
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| "chapter": "CHU_C03", | | "chapter": "CHU_C03", |
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| "text": "‘अहः सर्वं वसूनां(सर्ववसूनां) तु परेषां रात्रिरेव च ।\nप्रदत्ता विष्णुना पूर्वं नालमित्यब्रुवन् परे ॥\nपुनर्विशेषतो दत्तं रुद्राणां मरुतां तथा ।\nमाध्यन्दिनं तृतीयं चाप्यादित्यानां प्रदत्तवान् ॥\nविश्वेषामपि देवानां सामान्याद् वसुनामहः ॥’ इति च ।\n‘सर्वस्याधिपतिर्ब्रह्मा रुद्राद्यास्तु द्वयोर्द्वयोः ।\nवसवस्त्वह्न एवेशाः सामान्यान्न विशेषतः ॥’ इति च ।\n‘माध्यन्दिने तृतीये च रुद्रादे राज्यमिष्यते ।\nतद्भृत्यत्वात् वसूनां तु प्रातःकाले विशेषतः ॥\nतत्रापि वाय्वधीनत्वम् अग्न्यादीनां प्रकीर्तितम् ॥" | | "lines": [ |
| | "‘अहः सर्वं वसूनां(सर्ववसूनां) तु परेषां रात्रिरेव च ।", |
| | "प्रदत्ता विष्णुना पूर्वं नालमित्यब्रुवन् परे ॥", |
| | "पुनर्विशेषतो दत्तं रुद्राणां मरुतां तथा ।", |
| | "माध्यन्दिनं तृतीयं चाप्यादित्यानां प्रदत्तवान् ॥", |
| | "विश्वेषामपि देवानां सामान्याद् वसुनामहः ॥’ इति च ।", |
| | "‘सर्वस्याधिपतिर्ब्रह्मा रुद्राद्यास्तु द्वयोर्द्वयोः ।", |
| | "वसवस्त्वह्न एवेशाः सामान्यान्न विशेषतः ॥’ इति च ।", |
| | "‘माध्यन्दिने तृतीये च रुद्रादे राज्यमिष्यते ।", |
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| "chapter": "CHU_C03", | | "chapter": "CHU_C03", |
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| "text": "एवं पृथिव्यां रुद्राणामन्तरिक्षं प्रकीर्तितम् (एवं पृथिव्या रुद्राणां, अन्तरिक्षे प्रकीर्तितम्)।\nमरुतां च द्विलोकेशा आदित्याः परिकीर्तिताः॥\nसर्वेषामधिपो ब्रह्मा युवाधीशस्तु(युवादीशस्तु) मारुतः ।\nत्रिलोकाधिपतिश्चेन्द्रस्तेषामप्यधिपो हरिः ॥’ इति च ।\nस्वाराज्यं भोगः । स्वरञ्जनात् ।" | | "lines": [ |
| | "एवं पृथिव्यां रुद्राणामन्तरिक्षं प्रकीर्तितम् (एवं पृथिव्या रुद्राणां, अन्तरिक्षे प्रकीर्तितम्)।", |
| | "मरुतां च द्विलोकेशा आदित्याः परिकीर्तिताः॥", |
| | "सर्वेषामधिपो ब्रह्मा युवाधीशस्तु(युवादीशस्तु) मारुतः ।", |
| | "त्रिलोकाधिपतिश्चेन्द्रस्तेषामप्यधिपो हरिः ॥’ इति च ।", |
| | "स्वाराज्यं भोगः । स्वरञ्जनात् ।" |
| | ] |
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| "text": "न त्विन्द्राद्यमो द्विगुणकालं तिष्ठति तस्माद् वरुणस्तस्माद् सोम इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न च सोमाद् द्विगुणमेव ब्रह्मा तिष्ठति । द्विपरार्धं हि तस्य कालः । इन्द्रादयो हि मन्वन्तरमात्रं तिष्ठन्ति । न च वसूनां पूर्वो देशो रुद्राणां दक्षिण आदित्यानां पश्चिमो मरुतामुत्तर एव नान्यत्रेत्यत्र प्रमाणमस्ति । तत्पक्षे रुद्रैः सहेन्द्रस्य दक्षिणत्वप्राप्तेश्च । न चेन्द्रशब्देन वायुस्तैर्गृहीतः । अत इन्द्रादेवेन्द्रस्य द्विगुणकालत्वमिति विरोधः ।" | | "lines": [ |
| | "न त्विन्द्राद्यमो द्विगुणकालं तिष्ठति तस्माद् वरुणस्तस्माद् सोम इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । न च सोमाद् द्विगुणमेव ब्रह्मा तिष्ठति । द्विपरार्धं हि तस्य कालः । इन्द्रादयो हि मन्वन्तरमात्रं तिष्ठन्ति । न च वसूनां पूर्वो देशो रुद्राणां दक्षिण आदित्यानां पश्चिमो मरुतामुत्तर एव नान्यत्रेत्यत्र प्रमाणमस्ति । तत्पक्षे रुद्रैः सहेन्द्रस्य दक्षिणत्वप्राप्तेश्च । न चेन्द्रशब्देन वायुस्तैर्गृहीतः । अत इन्द्रादेवेन्द्रस्य द्विगुणकालत्वमिति विरोधः ।" |
| | ] |
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| "text": "इन्द्रादिपुरीणाम् उद्वासेनैवमङ्गीकारे (उद्वासत्वेनैवमङ्गीकारे) तत् षोडशगुणत्वाद् ऊर्ध्वोदयस्यैकेन्द्रात् परतोऽनिन्द्रत्वमेव स्यात् ।\n‘अथ तत ऊर्ध्वं उदेत्य’ इति तत्पक्षे पश्चादप्यादित्यभावात् कल्पान्तलयो(कल्पान्तलयोऽपि, कल्पान्तप्रलयोऽपि) न स्यादित्याद्यनन्तदोषदुष्टत्वेऽपि ग्रन्थाल्पत्वायैवोपरम्यते ॥\n‘वस्वादीनां तु सर्वेषां सर्वदिक्षु पुराण्यपि ।\nसन्त्येवमपि धीवृत्यै प्रत्येकं दिक्षुकथ्यते ॥’ इति च ।\nऐन्द्रया उद्वासे रुद्राणामेवोदयाभाव इति च दोषः । अतो यत्किञ्चिदेतत् ।" | | "lines": [ |
| | "इन्द्रादिपुरीणाम् उद्वासेनैवमङ्गीकारे (उद्वासत्वेनैवमङ्गीकारे) तत् षोडशगुणत्वाद् ऊर्ध्वोदयस्यैकेन्द्रात् परतोऽनिन्द्रत्वमेव स्यात् ।", |
| | "‘अथ तत ऊर्ध्वं उदेत्य’ इति तत्पक्षे पश्चादप्यादित्यभावात् कल्पान्तलयो(कल्पान्तलयोऽपि, कल्पान्तप्रलयोऽपि) न स्यादित्याद्यनन्तदोषदुष्टत्वेऽपि ग्रन्थाल्पत्वायैवोपरम्यते ॥", |
| | "‘वस्वादीनां तु सर्वेषां सर्वदिक्षु पुराण्यपि ।", |
| | "सन्त्येवमपि धीवृत्यै प्रत्येकं दिक्षुकथ्यते ॥’ इति च ।", |
| | "ऐन्द्रया उद्वासे रुद्राणामेवोदयाभाव इति च दोषः । अतो यत्किञ्चिदेतत् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "‘उदेति पूर्वतः सूर्यो निम्लोचति च पश्चिमे ।\nएवं नियम उद्दिष्टो ब्रह्मणा विष्णुचोदनात् ॥\nद्विगुणं द्विगुणं कालमुदित्वा दक्षिणादिषु ।\nमध्ये व्यवस्थितिः(चावस्थितिः) पश्चाद् ब्रह्माणं याचिता पुरा ॥\nहिरण्यकेन सूर्यस्य हिरण्याक्षेण वै पुनः ।\nतदाऽसुराणां देवत्वं ब्रह्मा तत् प्रददौ तयोः ॥\nतच्छ्रुत्वेन्द्रादिभिः प्रोक्तः कथं प्रादा वराविमौ ।\nदेवता हि विनश्येयुरेवं दत्ते वरे त्वया ॥\nइत्युक्तो देवतैः प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः ।\nन मया स वरो दत्तो दैतेयानां सुराः क्वचित् ॥\nयेन युष्मद्विनाशः स्यात् ततो व्येतु (व्यैतु) च वो भयम् ।\nदक्षिणाद्युदयो यस्तु स हि दैनन्दिनो मया ॥\nअभिप्रेतो नैव चायं कालान्तरगतः क्वचित् ।\nअर्धनाड्युत्तरा नाडीः सकाष्ठा नित्यशो रविः ॥\nपञ्चादशोत्तरां गच्छेत् पूर्वं रात्रे तु दक्षिणात् ।\nतदर्धं पश्चिमात् पूर्वं(पूर्वां) तदर्धं चोत्तरादपि ॥\nदक्षिणां च तदर्धं स ऊर्ध्वादर्वाक् च गच्छति ।\nदक्षिणाद्युदयस्त्वेष न तु कालान्तरे क्वचित् ॥\nयदोत्तरस्मात् द्विगुणः पूर्वो भवति वै सुराः ।\nतदाऽपि द्विगुणत्वं स्यात् तन्मयाऽत्र विवक्षितम् ॥\nअहःसाम्येऽपि क्रमश आतपस्याल्पकालतः ।\nगिर्यावृत्तेः(गिर्यावृतेः) क्षिप्रमन्येषूदयास्तमयाविव ॥" | | "lines": [ |
| | "‘उदेति पूर्वतः सूर्यो निम्लोचति च पश्चिमे ।", |
| | "एवं नियम उद्दिष्टो ब्रह्मणा विष्णुचोदनात् ॥", |
| | "द्विगुणं द्विगुणं कालमुदित्वा दक्षिणादिषु ।", |
| | "मध्ये व्यवस्थितिः(चावस्थितिः) पश्चाद् ब्रह्माणं याचिता पुरा ॥", |
| | "हिरण्यकेन सूर्यस्य हिरण्याक्षेण वै पुनः ।", |
| | "तदाऽसुराणां देवत्वं ब्रह्मा तत् प्रददौ तयोः ॥", |
| | "तच्छ्रुत्वेन्द्रादिभिः प्रोक्तः कथं प्रादा वराविमौ ।", |
| | "देवता हि विनश्येयुरेवं दत्ते वरे त्वया ॥", |
| | "इत्युक्तो देवतैः प्राह ब्रह्मा लोकपितामहः ।", |
| | "न मया स वरो दत्तो दैतेयानां सुराः क्वचित् ॥", |
| | "येन युष्मद्विनाशः स्यात् ततो व्येतु (व्यैतु) च वो भयम् ।", |
| | "दक्षिणाद्युदयो यस्तु स हि दैनन्दिनो मया ॥", |
| | "अभिप्रेतो नैव चायं कालान्तरगतः क्वचित् ।", |
| | "अर्धनाड्युत्तरा नाडीः सकाष्ठा नित्यशो रविः ॥", |
| | "पञ्चादशोत्तरां गच्छेत् पूर्वं रात्रे तु दक्षिणात् ।", |
| | "तदर्धं पश्चिमात् पूर्वं(पूर्वां) तदर्धं चोत्तरादपि ॥", |
| | "दक्षिणां च तदर्धं स ऊर्ध्वादर्वाक् च गच्छति ।", |
| | "दक्षिणाद्युदयस्त्वेष न तु कालान्तरे क्वचित् ॥", |
| | "यदोत्तरस्मात् द्विगुणः पूर्वो भवति वै सुराः ।", |
| | "तदाऽपि द्विगुणत्वं स्यात् तन्मयाऽत्र विवक्षितम् ॥", |
| | "अहःसाम्येऽपि क्रमश आतपस्याल्पकालतः ।", |
| | "गिर्यावृत्तेः(गिर्यावृतेः) क्षिप्रमन्येषूदयास्तमयाविव ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "CHU_C03", | | "chapter": "CHU_C03", |
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| "text": "कालान्तरे भाविनं तु दक्षिणाद्युदयं पुनः ।\nअपेक्ष्यैव वरो दत्तो द्वितीयो देवता मया ॥\nसमयश्च कृतो नित्यो मया सूर्यस्य चानघाः ।\nपूर्वस्मादुदयो नित्यं(नित्यः) पश्चिमेऽस्तमयस्तथा ॥\nनियमो नान्यथाऽयं स्यात् कदाचित् केनचित् क्वचित् ।\nतस्मान्न वो भयं क्वापि प्रोक्ता इत्थं सुरास्तदा ।\nविशोका अभवन् सर्वे ययुः स्वं स्वं निकेतनम्(निवेशनम्) ॥’ इति च ।\nएतदेव मोक्षधर्मेषु बलिवासवसंवाद उक्तम् । देवान् प्रति ब्रह्मणो वचनं रहस्यत्वादविज्ञाय बलिना दक्षिणाद्युदय उक्तः । इन्द्रेण तु ब्रह्मवचनं जानता दक्षिणाद्युदयो नास्तीत्युक्तम् ।\n‘दैतेययोर्वरं ज्ञात्वा त्वविज्ञाय सुरान् प्रति ।\nब्रह्मणोक्तं हि बलिना वासवं प्रत्युदीरितम् ॥\nदक्षिणाद्युदयान्ते तु त्वां जेष्यामि पुरन्दर ।\nइत्युक्तस्तमुवाचेन्द्रो न कदाचन तद्भवेत् ॥\nब्रह्मणा नियमो यस्मात् कृतः प्रागुदयो रवेः ।\nइत्युक्त्वा तु जगामेन्द्रो दिवमैरावतस्थितः ॥ इति च ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "कालान्तरे भाविनं तु दक्षिणाद्युदयं पुनः ।", |
| | "अपेक्ष्यैव वरो दत्तो द्वितीयो देवता मया ॥", |
| | "समयश्च कृतो नित्यो मया सूर्यस्य चानघाः ।", |
| | "पूर्वस्मादुदयो नित्यं(नित्यः) पश्चिमेऽस्तमयस्तथा ॥", |
| | "नियमो नान्यथाऽयं स्यात् कदाचित् केनचित् क्वचित् ।", |
| | "तस्मान्न वो भयं क्वापि प्रोक्ता इत्थं सुरास्तदा ।", |
| | "विशोका अभवन् सर्वे ययुः स्वं स्वं निकेतनम्(निवेशनम्) ॥’ इति च ।", |
| | "एतदेव मोक्षधर्मेषु बलिवासवसंवाद उक्तम् । देवान् प्रति ब्रह्मणो वचनं रहस्यत्वादविज्ञाय बलिना दक्षिणाद्युदय उक्तः । इन्द्रेण तु ब्रह्मवचनं जानता दक्षिणाद्युदयो नास्तीत्युक्तम् ।", |
| | "‘दैतेययोर्वरं ज्ञात्वा त्वविज्ञाय सुरान् प्रति ।", |
| | "ब्रह्मणोक्तं हि बलिना वासवं प्रत्युदीरितम् ॥", |
| | "दक्षिणाद्युदयान्ते तु त्वां जेष्यामि पुरन्दर ।", |
| | "इत्युक्तस्तमुवाचेन्द्रो न कदाचन तद्भवेत् ॥", |
| | "ब्रह्मणा नियमो यस्मात् कृतः प्रागुदयो रवेः ।", |
| | "इत्युक्त्वा तु जगामेन्द्रो दिवमैरावतस्थितः ॥ इति च ॥ १० ॥" |
| | ] |
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| | "एकादशः खण्डः" |
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| "text": "अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ तत ऊर्ध्व उदेत्य नैवोदेता नास्तमेतैकल एव मध्ये स्थाता तदेष श्लोकः ॥ १ ॥" |
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| "text": "न वै तत्र न निम्लोचो नोदियाय कदाचन ।\nदेवास्तेनाहं सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "न वै तत्र न निम्लोचो नोदियाय कदाचन ।", |
| | "देवास्तेनाहं सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणेति ॥ २ ॥" |
| | ] |
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| | "chapter": "CHU_C03", |
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| | "lines": [ |
| | "अथ सूर्यस्थितो विष्णुरादित्यस्त्वादिमूलतः ।", |
| | "आदानाद् वाऽपि देवानामूर्ध्वं गच्छति मण्डलात् ॥", |
| | "प्राप्य वैकुण्ठलोकं च नोदेत्यस्तं(नोदैत्यस्तम्) न चैति सः ।", |
| | "एकलः प्रलये स्थाता देवता नात्र संशयः ॥", |
| | "तेन सत्येन न वृद्धिं प्राप्नुयां(न वृद्धिमाप्नुयां) ब्रह्मणा क्वचित् ।", |
| | "इत्युवाच पुरा ब्रह्मा देवेभ्यः स चतुर्मुखः ॥" |
| | ] |
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| "text": "न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति च एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति च एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥" |
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| "text": "एतां विद्यां तु यो वेद नित्यमस्य दिवा भवेत्(दिवाऽभवत्) ।\nवैकुण्ठधामसंस्थस्य मुक्तस्यानुदयास्तकम् ॥" | | "lines": [ |
| | "एतां विद्यां तु यो वेद नित्यमस्य दिवा भवेत्(दिवाऽभवत्) ।", |
| | "वैकुण्ठधामसंस्थस्य मुक्तस्यानुदयास्तकम् ॥" |
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| "text": "तद्धैतद् ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्धैतदुद्दालकायाऽरुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "तद्धैतद् ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यस्तद्धैतदुद्दालकायाऽरुणये ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रोवाच ॥ ४ ॥" |
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| | "इदं वा व तज्ज्येष्ठाय पुत्राय पिता ब्रह्म प्रब्रूयात् प्रणाय्याय वाऽन्तेवासिने ॥ ५ ॥" |
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| "text": "नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥ ६ ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामद्भिः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥ ६ ॥ ११ ॥" |
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| "text": "‘तदेतद्भगवान् विष्णुः प्रादाज्ज्ञानं विरिञ्चये ।\nविरिञ्चिर्मनवे प्राह प्रजाभ्यो मनुरेव च ॥\nपूरयित्वा तु पृथिवीं रत्नैः सप्तसमुद्रिणीम् ।\nदत्वापि गुरवे नैव पूर्यते गुरुदक्षिणा ॥\nदेवास्तूपासनायोग्या एकैकस्यामृतस्य हि ।\nसर्वस्योपासने ब्रह्मा तदन्ये ज्ञानमात्रके ॥\nउपासने नैव योग्यास्तद्योग्या हि सुरा यतः ॥ इति देवश्रुतौ ।\n\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eब्रह्मणा\u003C/span\u003E परेण \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eमा विराधिषि\u003C/span\u003E । भगवत्प्रसादादवृद्धिं न प्राप्नुयामित्यर्थः ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘तदेतद्भगवान् विष्णुः प्रादाज्ज्ञानं विरिञ्चये ।", |
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| "text": "गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च वाग् वै गायत्री वाग् वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eयदिदं किञ्च भूतं\u003C/span\u003E प्रभूतं परिपूर्णं तत् \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eसर्वं गायत्री\u003C/span\u003E भगवानेव । ‘भू=बहौ’ इति धातोः । ‘बहुः पूर्णतायाम्’ इति च ।\n‘यदिदं परितः पूर्णं मत्स्यकूर्मादिरूपकम् ।\nतदिदं भगवान् विष्णुस्सर्वान्तःस्थित एव च ॥\nतन्निःसृतत्वाद् वेदानां गायकस्त्राति चाखिलम् ।\nअतो गायत्रिनामासौ वासुदेवः परः पुमान् ॥\nभूमा भूतमिति प्रोक्तः पूर्णत्वात् पुरुषोत्तमः ।\nअनन्यापेक्षमुद्रिक्तं सर्वस्य विनियामकम् (सर्वस्य च नियामकम्) ॥\nयद्यत्तत्तद्विष्णुरेव नान्यदेतादृशं क्वचित् ।\nस एव भगवान् विष्णुर्वाङ्नामा वाचि संस्थितः ॥\nवचनाद्धयशीर्षाख्यो गायत्र्यां च स आस्थितः ।" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eयदिदं किञ्च भूतं\u003C/span\u003E प्रभूतं परिपूर्णं तत् \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eसर्वं गायत्री\u003C/span\u003E भगवानेव । ‘भू=बहौ’ इति धातोः । ‘बहुः पूर्णतायाम्’ इति च ।", |
| | "‘यदिदं परितः पूर्णं मत्स्यकूर्मादिरूपकम् ।", |
| | "तदिदं भगवान् विष्णुस्सर्वान्तःस्थित एव च ॥", |
| | "तन्निःसृतत्वाद् वेदानां गायकस्त्राति चाखिलम् ।", |
| | "अतो गायत्रिनामासौ वासुदेवः परः पुमान् ॥", |
| | "भूमा भूतमिति प्रोक्तः पूर्णत्वात् पुरुषोत्तमः ।", |
| | "अनन्यापेक्षमुद्रिक्तं सर्वस्य विनियामकम् (सर्वस्य च नियामकम्) ॥", |
| | "यद्यत्तत्तद्विष्णुरेव नान्यदेतादृशं क्वचित् ।", |
| | "स एव भगवान् विष्णुर्वाङ्नामा वाचि संस्थितः ॥", |
| | "वचनाद्धयशीर्षाख्यो गायत्र्यां च स आस्थितः ।" |
| | ] |
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| | "या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यस्यां हीदं सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयन्ते ॥ २ ॥" |
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| "text": "स एव पृथिवीनामा पृथिव्यामपि संस्थितः ॥\nविष्णौ हि पृथिवीसंस्थे जगत्सर्वं प्रतिष्ठितम् ।\nनातिशेते च तं कश्चित् स हि सर्वाधिको हरिः ॥" | | "lines": [ |
| | "स एव पृथिवीनामा पृथिव्यामपि संस्थितः ॥", |
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| | "नातिशेते च तं कश्चित् स हि सर्वाधिको हरिः ॥" |
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| | "या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन् पुरुषे शरीरमस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीर्यन्ते ॥ ३ ॥" |
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| "text": "यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे हृदयमस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "पृथुत्वात् पृथिवीनामा स एवान्तःशरीरगः ।", |
| | "शरित्वादीरणाच्चैव शरीरं भगवानजः ॥", |
| | "पुरुषो जीव उद्दिष्टस्तस्मिन्नन्तःस्थितो विभुः(तस्मिन्नेव स्थितो विभुः) ।" |
| | ] |
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| | "यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे हृदयमस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥ ४ ॥" |
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| "text": "योऽसौ जीवे स्थितो विष्णुः शरीरमिति नामकः ॥\nशन्त्वाच्च रतिरूपत्वाद् ईरणाच्च स एव तु ।\nजीवचैतन्यरूपस्य हृदयेऽपि व्यवस्थितः ॥\nअयनाद्धृदि विष्णुः स हृदयं कीर्तितो बुधैः ।" | | "lines": [ |
| | "योऽसौ जीवे स्थितो विष्णुः शरीरमिति नामकः ॥", |
| | "शन्त्वाच्च रतिरूपत्वाद् ईरणाच्च स एव तु ।", |
| | "जीवचैतन्यरूपस्य हृदयेऽपि व्यवस्थितः ॥", |
| | "अयनाद्धृदि विष्णुः स हृदयं कीर्तितो बुधैः ।" |
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| | "सैषा चतुष्पदा षडि्वधा गायत्री ।" |
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| "text": "गायत्र्यां संस्थितो विष्णुः स्त्रीरूपः सूर्यसप्रभः ॥\nद्वितीयश्चैव मत्स्यादिर्भूतनामाऽवतारगः ।\nतृतीयो वाचि संस्थश्च स्त्रीरूपो हयशीर्षकः ॥\nचतुर्थः पृथिवीसंस्थः स्त्रीरूपः पीतवर्णकः ।\nजीवस्यान्तर्गतो व्याप्य शरीरमितिनामकः ॥\nपञ्चमस्तद्धृदिस्थस्तु(हृदिस्थश्च) षष्ठो हृदयनामकः ।\nगायत्रीनामको विष्णुरेवं षडि्वध उच्यते ॥\nत्रिभिः स्वरूपपादैश्च भिन्नेनैकेन चैव हि ।\nगायत्रीनामको विष्णुश्चतुष्पात् सम्प्रकीर्तितः ॥" | | "lines": [ |
| | "गायत्र्यां संस्थितो विष्णुः स्त्रीरूपः सूर्यसप्रभः ॥", |
| | "द्वितीयश्चैव मत्स्यादिर्भूतनामाऽवतारगः ।", |
| | "तृतीयो वाचि संस्थश्च स्त्रीरूपो हयशीर्षकः ॥", |
| | "चतुर्थः पृथिवीसंस्थः स्त्रीरूपः पीतवर्णकः ।", |
| | "जीवस्यान्तर्गतो व्याप्य शरीरमितिनामकः ॥", |
| | "पञ्चमस्तद्धृदिस्थस्तु(हृदिस्थश्च) षष्ठो हृदयनामकः ।", |
| | "गायत्रीनामको विष्णुरेवं षडि्वध उच्यते ॥", |
| | "त्रिभिः स्वरूपपादैश्च भिन्नेनैकेन चैव हि ।", |
| | "गायत्रीनामको विष्णुश्चतुष्पात् सम्प्रकीर्तितः ॥" |
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| | "......तदेतदृचाऽभ्यनूक्तम्(ऋचाऽभ्युक्तम्) ॥ ५॥" |
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| "text": "तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः ।\nपादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
| | "तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः ।", |
| | "पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ६ ॥" |
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| "text": "भिन्नपादः(दाः) सर्वजीवास्तस्य सादृश्यमात्रतः ।\nस्वरूपपादा विष्णोस्तु त्रयो हि दिवि संस्थिताः ॥\nनारायणो वासुदेवो वैकुण्ठ इति ते त्रयः ।\nअनन्तशयनं चैव तथाऽनन्तासनं हरेः ॥\nबहुलक्षोच्छ्रिते नित्ये विमाने संस्थितं यतः(विमाने संस्थिते यतः, विमाने नियतं स्थितः) ।\nचित्प्रकृत्यात्मनि ततो दिवीति कथितं(ते) श्रुतौ ॥\nलोकत्रयविवक्षायां परतो लक्षयोजनम् ।\nसर्वं द्यौरिति विज्ञेयं(स्थानद्वयं तद् विज्ञेयं) ततस्ते दिविसंस्थिताः ॥\nदिवः परश्च भगवान् सप्तलोकविवक्षया ।" | | "lines": [ |
| | "भिन्नपादः(दाः) सर्वजीवास्तस्य सादृश्यमात्रतः ।", |
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| | "यद्वै तद् ब्रह्मेतीदं वाव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशो यो वै स बहिर्धा पुरुषादाकाशः ॥ ७ ॥" |
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| "text": "अयं वाव स योयमन्तः पुरुष आकाशो यो वै सोन्तः पुरुष आकाशः ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "अयं वाव स योयमन्तः पुरुष आकाशो यो वै सोन्तः पुरुष आकाशः ॥ ८ ॥" |
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| "text": "अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशो यो वै सोऽन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत् पूर्णमप्रवर्ति पूर्णामप्रवर्तिनीं श्रियं लभेत य एवं वेद ॥ ९ ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "परम्ब्रह्मेति भगवान् सर्वगः सम्प्रकीर्तितः ॥\nस एव जीवस्य बहिर्हृदयाकाश आस्थितः ।\nयोऽयं हृदयगः सोऽथ जीवान्तर्व्याप्य संस्थितः ॥\nव्याप्तो जीवान्तरे योऽसौ स जीवहृदि(जीवे हृदि) संस्थितः ।\nएवं चापि चतुष्पात्त्वं वासुदेवस्य कीर्तितम् ॥\nस एव पूर्णो भगवान् अप्रवर्त्यस्तथाऽखिलैः ।\nअन्यैः प्रवर्त्यते योऽसौ स प्रवर्तीति गीयते ॥\nअप्रवर्त्यो हरिर्नित्यस्वतन्त्रत्वात्(नित्यः स्वतन्त्रत्वात्) सदैव च ।\nअस्य(अस्मिन् हृ.) प्रवृत्तिर्नास्तीति सोऽप्रवर्तीति कीर्तितः ॥\nपूर्णा स्वतन्त्रा श्रीश्चास्य वेत्तुर्भवति शाश्वती ।\nसाक्षाद् गायत्र्युपासायां(उपासायाः/या) योग्य एकश्चतुर्मुखः ॥\nतस्माद् अनन्यतन्त्राऽस्य श्रीर्भवेन्नान्यथा क्वचित् ।\nविष्णुतन्त्रत्वमस्य स्यात् परेषां तस्य तन्त्रता ।\nयथाक्रमेण तन्त्रत्वं योग्यताक्रमतो भवेत् ॥’ इति (च) सत्तत्त्वे ।" | | "lines": [ |
| | "परम्ब्रह्मेति भगवान् सर्वगः सम्प्रकीर्तितः ॥", |
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| "chapter": "CHU_C03", | | "chapter": "CHU_C03", |
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| "text": "ब्रह्मशब्दाच्च भगवानित्यवसीयते । पूर्णाप्रवृत्तित्वं च तस्मिन्नेव मुख्यम् । ‘तावानस्य महिमा’ इति मन्त्राच्च । ‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि’ इति जीवानां चतुष्पादान्तर्भावाद् ‘भूतं यदिदं किञ्च’ इति षड्विधान्तर्भूतं भूतं मत्स्याद्यवताररूपमेव ।\n‘द्वाविंशेष्ववतारेषु जीवोऽप्युक्तो यथा पृथुः ।\nतथा पादेषु चतुर्षु सान्निध्याज्जीव ईरितः ॥\nयथा कालः पुमान् व्यक्तं प्रकृतिश्च परस्य तु ।\nविष्णो रूपाणि गण्यन्ते पररूपेण वै सह ॥\nएवं भूतानि गण्यन्ते भिन्नान्यपि पदैः सह ।\nमूर्तामूर्ते यथा रूपे ब्रह्मणस्तु तथैव च ॥\nभिन्नान्यपि तु भूतानि पदानि स्वपदैः सह ॥’ इति प्राथम्ये ।\n‘सुदर्शनाख्यं स्वास्त्रं तु प्रायुङ्क्त दयितं त्रिपात्’(भाग.३.२०.२२) इति श्रीभागवते प्रयोगाच्च न जीवो भगवत्स्वरूपम् ।\nसुवर्चला यथा सूर्यपत्न्यंशः समुदाहृता ।\nएवं जीवा भगवतो वस्तुभेदेऽपि सर्वदा ॥’ इति च ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "ब्रह्मशब्दाच्च भगवानित्यवसीयते । पूर्णाप्रवृत्तित्वं च तस्मिन्नेव मुख्यम् । ‘तावानस्य महिमा’ इति मन्त्राच्च । ‘पादोऽस्य विश्वा भूतानि’ इति जीवानां चतुष्पादान्तर्भावाद् ‘भूतं यदिदं किञ्च’ इति षड्विधान्तर्भूतं भूतं मत्स्याद्यवताररूपमेव ।", |
| | "‘द्वाविंशेष्ववतारेषु जीवोऽप्युक्तो यथा पृथुः ।", |
| | "तथा पादेषु चतुर्षु सान्निध्याज्जीव ईरितः ॥", |
| | "यथा कालः पुमान् व्यक्तं प्रकृतिश्च परस्य तु ।", |
| | "विष्णो रूपाणि गण्यन्ते पररूपेण वै सह ॥", |
| | "एवं भूतानि गण्यन्ते भिन्नान्यपि पदैः सह ।", |
| | "मूर्तामूर्ते यथा रूपे ब्रह्मणस्तु तथैव च ॥", |
| | "भिन्नान्यपि तु भूतानि पदानि स्वपदैः सह ॥’ इति प्राथम्ये ।", |
| | "‘सुदर्शनाख्यं स्वास्त्रं तु प्रायुङ्क्त दयितं त्रिपात्’(भाग.३.२०.२२) इति श्रीभागवते प्रयोगाच्च न जीवो भगवत्स्वरूपम् ।", |
| | "सुवर्चला यथा सूर्यपत्न्यंशः समुदाहृता ।", |
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| | "त्रयोदशः खण्डः" |
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| | "तस्य ह वा एतस्य हृदयस्य पञ्च देवसुषयः स योऽस्य प्राङ्सुषिः स प्राणस्तच्चक्षुः स आदित्यस्तदेतत् तेजोऽन्नाद्यमित्युपासीत तेजस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥ १ ॥" |
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| | "अथ योऽस्य दक्षिणः सुषिः स व्यानस्तच्छ्रोत्रं स चन्द्रमास्तदेतच्छ्रीश्च यशश्चेत्युपासीत श्रीमान् यशस्वी भवति य एवं वेद ॥ २ ॥" |
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| | "अथ योऽस्य प्रत्यङ्सुषिः सोऽपानः सा वाक् सोऽग्निस्तदेतद् ब्रह्मवर्चसमन्नाद्यमित्युपासीत ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति य एवं वेद ॥३॥" |
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| | "अथ योऽस्योदङ् सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेत् कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान् व्युष्टिमान् भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥" |
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| | "अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महस्वान् भवति य एवं वेद ॥५॥" |
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| | "ते वा एते पञ्चब्रह्मपुरुषाः स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपाः स य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद ॥ ६ ॥" |
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| | "अस्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद । अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूत्तमेषु लोकेष्विदं वाव तद् यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे ज्योतिस्तस्यैषा दृष्टिः ॥ ७ ॥" |
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| "text": "यत्रैतदस्मिंच्छरीरे संस्पर्शेनोष्णिमानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनदमिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत(प्रज्वलतः) उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "यत्रैतदस्मिंच्छरीरे संस्पर्शेनोष्णिमानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनदमिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत(प्रज्वलतः) उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ १३ ॥" |
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| "text": "‘प्राणाभिमानी चक्षुश्च सूर्य एव ह्युदाहृतः ।\nतेजोऽन्नाद्यभिमानी च प्राग्द्वाराधिपतिर्हरेः(तेजोऽनाद्यभिमानी च प्राग्द्वाराधिपतिः) ॥\nदक्षिणाधिपतिस्सोमो व्यानः श्रोत्राभिमानवान्(व्यानश्रोत्राभिमानवान्) ।\nयशोलावण्यरूपश्च पश्चिमद्वारपस्तथा ॥\nवागपानात्मको वह्निर्ब्रह्मतेजोऽन्नदेवता ।\nउत्तरद्वारपस्त्विन्द्रः समानो मनआत्मकः(समानमनआत्मकः) ॥’\nकीर्त्यैश्वर्यात्मको नित्यम् ऊर्ध्वद्वारप एव च ।\nप्रधानवायुराकाशः सर्वज्ञादुन्नतेस्तथा ॥\nउदान ऊर्जितत्वात् स ओजः पूर्णत्वतो महः ।\nपरस्य ब्रह्मणस्त्वेते पुरुषाः पञ्च कीर्तिताः ॥\nद्वारपा हृदये चैव विष्णुलोके च सर्वदा ।\nआन्तरद्वारपा(अन्तरद्वारपाः .हृ) ह्येते जयाद्या बाह्यतः स्मृताः ॥\nएवमेतानुपास्यैव तद्गुणांशांशभाग् भवेत् ।\nविष्णुलोकं तथा गच्छेद् भवेदपि सुसन्ततिः ॥" | | "lines": [ |
| | "‘प्राणाभिमानी चक्षुश्च सूर्य एव ह्युदाहृतः ।", |
| | "तेजोऽन्नाद्यभिमानी च प्राग्द्वाराधिपतिर्हरेः(तेजोऽनाद्यभिमानी च प्राग्द्वाराधिपतिः) ॥", |
| | "दक्षिणाधिपतिस्सोमो व्यानः श्रोत्राभिमानवान्(व्यानश्रोत्राभिमानवान्) ।", |
| | "यशोलावण्यरूपश्च पश्चिमद्वारपस्तथा ॥", |
| | "वागपानात्मको वह्निर्ब्रह्मतेजोऽन्नदेवता ।", |
| | "उत्तरद्वारपस्त्विन्द्रः समानो मनआत्मकः(समानमनआत्मकः) ॥’", |
| | "कीर्त्यैश्वर्यात्मको नित्यम् ऊर्ध्वद्वारप एव च ।", |
| | "प्रधानवायुराकाशः सर्वज्ञादुन्नतेस्तथा ॥", |
| | "उदान ऊर्जितत्वात् स ओजः पूर्णत्वतो महः ।", |
| | "परस्य ब्रह्मणस्त्वेते पुरुषाः पञ्च कीर्तिताः ॥", |
| | "द्वारपा हृदये चैव विष्णुलोके च सर्वदा ।", |
| | "आन्तरद्वारपा(अन्तरद्वारपाः .हृ) ह्येते जयाद्या बाह्यतः स्मृताः ॥", |
| | "एवमेतानुपास्यैव तद्गुणांशांशभाग् भवेत् ।", |
| | "विष्णुलोकं तथा गच्छेद् भवेदपि सुसन्ततिः ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "CHU_C03", | | "chapter": "CHU_C03", |
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| "text": "योऽसौ वैकुण्ठगो विष्णुः सप्तलोकोपरिस्थितः ।\nस एव सर्वलोकेषु विश्वतो ब्रह्मणस्तथा ॥\nउच्चेषूत्तमलोकेषु तथा प्रत्यवरेषु च ।\nपुरुषेषु च सर्वेषु स एकः संव्यवस्थितः ॥\nप्राणसंस्थस्स वै विष्णुः प्राणोऽग्नौ संव्यवस्थितः ।\nस्पर्शेन दृश्यते चाग्निस्तद्दृष्टिरिव सा ततः ॥\nस प्राणः स्तौति तं विष्णुं सा स्तुतिः श्रूयते सदा ।\nकर्णौ पिधाय तद्विद्वान् दिव्यचक्षुः सुकीर्तिमान् ॥\nमुक्तो भूत्वा भवेद्यस्मादुपासीतैव तं ततः ॥’ इति संस्तत्त्वे ।(उपासीतैव सन्ततम्॥ इति सत्तत्वे)" | | "lines": [ |
| | "योऽसौ वैकुण्ठगो विष्णुः सप्तलोकोपरिस्थितः ।", |
| | "स एव सर्वलोकेषु विश्वतो ब्रह्मणस्तथा ॥", |
| | "उच्चेषूत्तमलोकेषु तथा प्रत्यवरेषु च ।", |
| | "पुरुषेषु च सर्वेषु स एकः संव्यवस्थितः ॥", |
| | "प्राणसंस्थस्स वै विष्णुः प्राणोऽग्नौ संव्यवस्थितः ।", |
| | "स्पर्शेन दृश्यते चाग्निस्तद्दृष्टिरिव सा ततः ॥", |
| | "स प्राणः स्तौति तं विष्णुं सा स्तुतिः श्रूयते सदा ।", |
| | "कर्णौ पिधाय तद्विद्वान् दिव्यचक्षुः सुकीर्तिमान् ॥", |
| | "मुक्तो भूत्वा भवेद्यस्मादुपासीतैव तं ततः ॥’ इति संस्तत्त्वे ।(उपासीतैव सन्ततम्॥ इति सत्तत्वे)" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "‘दिक्षु यानाद्यशो व्याप्तं कीर्तिः प्रत्यक्षतः स्तुतिः’ इति शब्दनिर्णये ।\nसर्वतः पृष्ठेषु सर्वत उच्चेषु वैकुण्ठ-क्षीरसागर-अनन्तासनादिषु विश्वतो ब्रह्मणोऽप्युच्चेषु । तत उत्तमोऽन्यो(उत्तमो) नास्तीत्यनुत्तमाः सर्वतः स्वयमुत्तमाः ।\n‘पृथिवीस्थेषु सर्वोच्चो लोकोऽनन्तासनात्मकः ।\nअन्तरिक्षात्मकेभ्यश्च श्वेतद्वीपे स्थितो हरेः (हरिः) ॥\nद्व्यात्मकेभ्यश्च सर्वेभ्यो वैकुण्ठश्चोच्च उच्यते ।\nपृथिव्यां द्यौर्महामेरुराकाशे सूर्यमण्डलम् ॥\nदिवीन्द्रसदनं चैव तत्परे तु दिवः परे ।\nपृथिव्यां ब्रह्मणो मेरौ जयन्ते(जयन्तं) त्वन्तरिक्षगम् (वैजयन्तेऽन्तरिक्षगम्)॥\nतृतीयं सत्यलोके(सत्यलोकं) च सदनं त्रिविधं स्मृतम् ।\nतेभ्योऽनन्तासनाद्या यत्परतो विश्वतः परे॥’ इति सत्तत्वे ।\n‘निनदः समुद्रघोषः स्यान्नदथुर्मेघसम्भवः’ इति (च) सत्तत्वे । ‘चक्षुष्यश्चक्षुषि ब्रह्मण्येष यातीत्युपासकः’ इति च ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘दिक्षु यानाद्यशो व्याप्तं कीर्तिः प्रत्यक्षतः स्तुतिः’ इति शब्दनिर्णये ।", |
| | "सर्वतः पृष्ठेषु सर्वत उच्चेषु वैकुण्ठ-क्षीरसागर-अनन्तासनादिषु विश्वतो ब्रह्मणोऽप्युच्चेषु । तत उत्तमोऽन्यो(उत्तमो) नास्तीत्यनुत्तमाः सर्वतः स्वयमुत्तमाः ।", |
| | "‘पृथिवीस्थेषु सर्वोच्चो लोकोऽनन्तासनात्मकः ।", |
| | "अन्तरिक्षात्मकेभ्यश्च श्वेतद्वीपे स्थितो हरेः (हरिः) ॥", |
| | "द्व्यात्मकेभ्यश्च सर्वेभ्यो वैकुण्ठश्चोच्च उच्यते ।", |
| | "पृथिव्यां द्यौर्महामेरुराकाशे सूर्यमण्डलम् ॥", |
| | "दिवीन्द्रसदनं चैव तत्परे तु दिवः परे ।", |
| | "पृथिव्यां ब्रह्मणो मेरौ जयन्ते(जयन्तं) त्वन्तरिक्षगम् (वैजयन्तेऽन्तरिक्षगम्)॥", |
| | "तृतीयं सत्यलोके(सत्यलोकं) च सदनं त्रिविधं स्मृतम् ।", |
| | "तेभ्योऽनन्तासनाद्या यत्परतो विश्वतः परे॥’ इति सत्तत्वे ।", |
| | "‘निनदः समुद्रघोषः स्यान्नदथुर्मेघसम्भवः’ इति (च) सत्तत्वे । ‘चक्षुष्यश्चक्षुषि ब्रह्मण्येष यातीत्युपासकः’ इति च ॥ १३ ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| | "चतुर्दशः खण्डः" |
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| "text": "सर्वं खल्विदं ब्रह्म । तज्जलानिति शान्त उपासीत अथ खलु क्रतुमयः पुुरुषो यथा क्रतुरस्मन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "सर्वं खल्विदं ब्रह्म । तज्जलानिति शान्त उपासीत अथ खलु क्रतुमयः पुुरुषो यथा क्रतुरस्मन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत ॥ १ ॥" |
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| | "मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसङ्कल्पः आकाश आत्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥ २ ॥" |
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| "text": "‘इदं ब्रह्मातिसामीप्यात् सर्वं पूर्णगुणत्वतः ।\nतच्च ब्रह्मजलान् साक्षाद् योऽसौ विष्णुर्जलेऽनिति(अनति .हृ) ॥\nआनीदवातमिति यं वेदवागवदत् स्फुटम् ।\nअप्रकेते तु सलिले ब्रह्म नारायणोऽपि(नारायणो हि) सः ॥\nइति शान्त उपासीत यस्माज्ज्ञानमयः पुमान् ।\nक्रतुस्तु निश्चितं ज्ञानं(निश्चितज्ञानम् .हृ) तद्वशः पुरुषोऽमृतौ ॥\nतस्माद् विनिश्चितं ज्ञानं कुर्याद् विष्णौ महागुणे (महद्गुणे) ।\nमहाज्ञानात्मकत्वात् तु प्रोक्तो विष्णुर्मनोमयः ॥\nयस्माद् बलशरीरोऽसावतः प्राणशरीरकः ।\nआ समन्तात् प्रकाशात् स आकाशात्मा प्रकीर्तितः ॥\nसर्वगन्धादिरूपश्च भोक्ता चैषां सदैव हि ।\nइति निश्चयकृद्याति तमेव पुरुषोत्तमम् ॥’ इति सद्गुणे ।" | | "lines": [ |
| | "‘इदं ब्रह्मातिसामीप्यात् सर्वं पूर्णगुणत्वतः ।", |
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| "text": "एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद् वा श्यामाकाद् वा श्यामकतण्डुलाद् वा एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥३॥" | | "lines": [ |
| | "एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद्वा सर्षपाद् वा श्यामाकाद् वा श्यामकतण्डुलाद् वा एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥३॥" |
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| "text": "सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः एष म आत्मान्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसम्भविताऽस्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्साऽस्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥ ४ ॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः एष म आत्मान्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसम्भविताऽस्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्साऽस्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥ ४ ॥ १४ ॥" |
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| "text": "एकत्र सर्वगन्धादिना चिदानन्दात्मकसर्वगन्धादिरूपत्वमुच्यते । अन्यत्र तद्भोक्तृत्वम् ॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "एकत्र सर्वगन्धादिना चिदानन्दात्मकसर्वगन्धादिरूपत्वमुच्यते । अन्यत्र तद्भोक्तृत्वम् ॥ १४ ॥" |
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| | "पञ्चदशः खण्डः" |
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| | "अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलं स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन् सर्वमिदं (विश्वमिदं) श्रितम् ॥ १ ॥" |
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| "text": "‘क इत्यानन्द उद्दिष्ट उश इच्छा प्रकीर्तिता ।\nआनन्देच्छास्वरूपोऽसौ कोशो विष्णुः प्रकीर्तितः ॥\nतस्योदरेऽन्तरिक्षं च पृथिवी पादबुध्नयोः(पादमूर्ध्नयोः .हृ) ।\nशिरोविवरगा द्यौश्च दिशो बाहुषु संस्थिताः ॥\nअजरोऽयं महाविष्णुर्वसवो देवतागणाः ।\nतेषां निधानं भगवांस्तस्मिन् सर्वमिदं श्रितम् ॥" | | "lines": [ |
| | "‘क इत्यानन्द उद्दिष्ट उश इच्छा प्रकीर्तिता ।", |
| | "आनन्देच्छास्वरूपोऽसौ कोशो विष्णुः प्रकीर्तितः ॥", |
| | "तस्योदरेऽन्तरिक्षं च पृथिवी पादबुध्नयोः(पादमूर्ध्नयोः .हृ) ।", |
| | "शिरोविवरगा द्यौश्च दिशो बाहुषु संस्थिताः ॥", |
| | "अजरोऽयं महाविष्णुर्वसवो देवतागणाः ।", |
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| "text": "तस्य प्राची दिक् जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदं रुदम् ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्य प्राची दिक् जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदं रुदम् ॥ २ ॥" |
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| "text": "प्राचीदिक्संस्थितस्तस्य बाहुर्दक्षिण ऊर्ध्वगः ।\nजुहूः स होमकर्तृत्वाद् भुङ्क्ते ह्येतेन(ह्यनेन) केशवः ॥\nदक्षिणस्त्वधरो बाहुर्दक्षिणादिक् स्थितो विभोः ।\nसहमानेति स प्रोक्तो मानं वेदात्मकं यतः ॥\nशङ्खो वेदात्मकः शङ्खसहितो दक्षिणाधरः ।\nबाहुर्जुहोति चक्रेण शत्रूनित्यथवा जुहूः ॥\nप्रतीचीदिक्स्थितस्तस्य वामबाहुस्तथोत्तरः ।\nराजीयुक्तगदायुक्तो राज्ञी नामा(राज्ञीनामा) प्रकीर्तितः ॥\nअधरो वामबाहुर्य उत्तरादिक्स्थितो विभोः ।\nश्रिय आधारपद्मित्वात् सुभूतानामकः स्मृतः ॥\nदिङ्नामानश्च ते प्रोक्ता धर्मज्ञानादिदेशनात् (धर्ममानातिदेशनात् .हृ)।\nतेभ्यो जातो महावायुर्दिशां (महान् वायुः) वत्सस्ततः स्मृतः ॥\nधर्मज्ञानादिरूपेण विष्णोर्बाहुचतुष्टयात् ।\nजातं वायुं विदित्वैव पुत्रो भूत्वा न रोदिति ॥\nन जायते न म्रियते मुक्तो भूत्वा सुखी भवेत् ।\nवायुं हरेः सुतं ज्ञात्वा नाहं पुत्रतयाऽरुदम् ॥\nहरेः प्रसादसामर्थ्यादजरा चामरा ह्यहम् ।\nअनादिकालसम्बन्धादित्युवाच परा(पुरा) रमा ॥" | | "lines": [ |
| | "प्राचीदिक्संस्थितस्तस्य बाहुर्दक्षिण ऊर्ध्वगः ।", |
| | "जुहूः स होमकर्तृत्वाद् भुङ्क्ते ह्येतेन(ह्यनेन) केशवः ॥", |
| | "दक्षिणस्त्वधरो बाहुर्दक्षिणादिक् स्थितो विभोः ।", |
| | "सहमानेति स प्रोक्तो मानं वेदात्मकं यतः ॥", |
| | "शङ्खो वेदात्मकः शङ्खसहितो दक्षिणाधरः ।", |
| | "बाहुर्जुहोति चक्रेण शत्रूनित्यथवा जुहूः ॥", |
| | "प्रतीचीदिक्स्थितस्तस्य वामबाहुस्तथोत्तरः ।", |
| | "राजीयुक्तगदायुक्तो राज्ञी नामा(राज्ञीनामा) प्रकीर्तितः ॥", |
| | "अधरो वामबाहुर्य उत्तरादिक्स्थितो विभोः ।", |
| | "श्रिय आधारपद्मित्वात् सुभूतानामकः स्मृतः ॥", |
| | "दिङ्नामानश्च ते प्रोक्ता धर्मज्ञानादिदेशनात् (धर्ममानातिदेशनात् .हृ)।", |
| | "तेभ्यो जातो महावायुर्दिशां (महान् वायुः) वत्सस्ततः स्मृतः ॥", |
| | "धर्मज्ञानादिरूपेण विष्णोर्बाहुचतुष्टयात् ।", |
| | "जातं वायुं विदित्वैव पुत्रो भूत्वा न रोदिति ॥", |
| | "न जायते न म्रियते मुक्तो भूत्वा सुखी भवेत् ।", |
| | "वायुं हरेः सुतं ज्ञात्वा नाहं पुत्रतयाऽरुदम् ॥", |
| | "हरेः प्रसादसामर्थ्यादजरा चामरा ह्यहम् ।", |
| | "अनादिकालसम्बन्धादित्युवाच परा(पुरा) रमा ॥" |
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| "text": "अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना प्राणं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भूः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भुवः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना स्वः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "अरिष्टं कोशं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना प्राणं प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भूः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना भुवः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना स्वः प्रपद्येऽमुनाऽमुनाऽमुना ॥ ३ ॥" |
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| | "अथ(स) यदवोचं प्राणं प्रपद्य इति प्राणो वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च तमेव तत् प्रापत्सि ॥ ४ ॥" |
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| | "अथ यदवोचं भूः प्रपद्य इति पृथिवीं प्रपद्येऽन्तरिक्षं प्रपद्ये दिवं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ५ ॥" |
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| | "अथ यदवोचं भुवः प्रपद्य इत्यग्निं प्रपद्ये वायुं प्रपद्य आदित्यं प्रपद्य इत्येव तदवोचम् ॥ ६ ॥" |
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| | "अथ यदवोचं स्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येतदवोचं तदवोचम् ॥ ७ ॥ १५ ॥" |
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| "text": "अविनष्टं परानन्दकामं(अविनष्टपरानन्दम्) विष्णुं सदा ह्यहम् ।\nप्रपद्ये तत्प्रसादेन केवलं नात्मशक्तितः ॥\nप्राणं सर्वप्रणेतारं प्रपद्ये केशवं सदा ।\nप्रभूतं यदिदं (किञ्च)किञ्चित् प्रादुर्भावात्मकं हरेः ॥\nमत्स्याद्यं तत्प्राण एव विष्णुर्नास्त्यत्र संशयः ।\nतस्मान्मत्स्यादिरूपं तं विष्णुमेव प्रपद्यथ ॥\nहे जना इत्यवोचत् सा लक्ष्मीः सर्वाः प्रजाः प्रति ।\nप्राणनामा वासुदेवो मोक्षं स्वान् प्रणयेद् यतः ॥\nसङ्कर्षणस्तु भूर्नामा भूषयेज्ज्ञानतो यतः ।\nस पृथ्व्यां पृथिवीनामा स्वात्मानं प्रथयेद्यतः ॥\nअन्तरिक्षेऽन्तरिक्षाख्यो यतः साध्वन्तरीक्षते ।\nदिवि द्युनामा स विभुः सर्वक्रीडाकरत्वतः ॥\nप्रद्युम्नश्च भुवोनामा सृष्ट्या यद्भावयेज्जगत् ।\nसोऽग्निनामा परो वह्नावत्ति सर्वं यतो हुतम् ॥\nवायुनामा स वायुस्थो वात्यायुश्च यतोऽस्य तत् ।\nआदित्याख्यः स आदित्ये आददात्यायुरस्य यत् ॥\nस्वर्नामा त्वनिरुद्धोऽसौ(स्वर्णामा ह्यनिरुद्धोऽसौ) परानन्दप्रदत्वतः ।\nऋग्वेदाख्यः स ऋग्वेदे ज्ञानं वेदयते यतः ॥\nयजुर्वेदो यजुर्वेदे यज्ञं वेदयते यतः ।\nसामवेदः सामवेदे साम्यं वेदयते ह्ययम् ॥\nएवं चतुर्विधं तत्त्वं तदवोचमहं हरेः ।\nइत्युवाचेन्दिरा देवी स्तुवन्ती परमं हरिम् ॥’ इति च ।\n‘पुंलिङ्गेनोच्यते स्त्री(श्रीश्च) च पुंवच्छक्तिमती यदि इति च’ ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अविनष्टं परानन्दकामं(अविनष्टपरानन्दम्) विष्णुं सदा ह्यहम् ।", |
| | "प्रपद्ये तत्प्रसादेन केवलं नात्मशक्तितः ॥", |
| | "प्राणं सर्वप्रणेतारं प्रपद्ये केशवं सदा ।", |
| | "प्रभूतं यदिदं (किञ्च)किञ्चित् प्रादुर्भावात्मकं हरेः ॥", |
| | "मत्स्याद्यं तत्प्राण एव विष्णुर्नास्त्यत्र संशयः ।", |
| | "तस्मान्मत्स्यादिरूपं तं विष्णुमेव प्रपद्यथ ॥", |
| | "हे जना इत्यवोचत् सा लक्ष्मीः सर्वाः प्रजाः प्रति ।", |
| | "प्राणनामा वासुदेवो मोक्षं स्वान् प्रणयेद् यतः ॥", |
| | "सङ्कर्षणस्तु भूर्नामा भूषयेज्ज्ञानतो यतः ।", |
| | "स पृथ्व्यां पृथिवीनामा स्वात्मानं प्रथयेद्यतः ॥", |
| | "अन्तरिक्षेऽन्तरिक्षाख्यो यतः साध्वन्तरीक्षते ।", |
| | "दिवि द्युनामा स विभुः सर्वक्रीडाकरत्वतः ॥", |
| | "प्रद्युम्नश्च भुवोनामा सृष्ट्या यद्भावयेज्जगत् ।", |
| | "सोऽग्निनामा परो वह्नावत्ति सर्वं यतो हुतम् ॥", |
| | "वायुनामा स वायुस्थो वात्यायुश्च यतोऽस्य तत् ।", |
| | "आदित्याख्यः स आदित्ये आददात्यायुरस्य यत् ॥", |
| | "स्वर्नामा त्वनिरुद्धोऽसौ(स्वर्णामा ह्यनिरुद्धोऽसौ) परानन्दप्रदत्वतः ।", |
| | "ऋग्वेदाख्यः स ऋग्वेदे ज्ञानं वेदयते यतः ॥", |
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| | "षोडशः खण्डः" |
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| | "अथ यानि चतुश्चत्वारिंशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनं सवनं चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप् त्रैष्टुभं मान्धन्दिनं सवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीदं सर्वं रोदयन्ति ॥ ३ ॥" |
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| "text": "तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिनं सवनं तृतीयं सवनमनुसन्तनुतेति माऽहं प्राणानां रुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥४॥" | | "lines": [ |
| | "तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिनं सवनं तृतीयं सवनमनुसन्तनुतेति माऽहं प्राणानां रुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥४॥" |
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| | "अथ यान्यष्टा(अष्ट .हृ)चत्वारिंशद्वर्षाणि तत् तृतीयसवनमष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती जागतं तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वाव आदित्या एते हीदं सर्वमाददते ॥ ५ ॥" |
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| | "तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवनमायुरनुसन्तनुतेति माऽहं प्राणानां आदित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ ६ ॥" |
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| "text": "‘विष्णुपूजार्थयज्ञोऽहमित्युपासनमादरात् ।\nकुर्वीत पुरुषो नित्यं तस्य यत्षोडशोत्तरम् ॥\n(शतमायुस्तत्तु सवनत्रयम् .हृ)शतमायुस्तत्सवनत्रयमीरितमुत्तमम् ।\nचतुर्विंशत्तु यत्पूर्वं प्रातःसवनमेव तत् ॥\nप्रार्थयित्वा वसूंस्तद्गं पुमान् मृत्युमपानुदेत् ।\nमध्ये चतुश्चत्वारिंशन्मध्यमं सवनं स्मृतम् ॥\nरुद्राणां प्रार्थनेनात्र पुमान् मृत्युमपानुदेत् ।\nततोऽष्टचत्वारिंशत्तु (तत् .हृ) तृतीयं सवनं स्मृतम्(मतम् .हृ) ॥\nआदित्यानां प्रार्थनेन तद्गं मृत्युमपानुदेत् ॥’ इति सर्वयज्ञे ।" | | "lines": [ |
| | "‘विष्णुपूजार्थयज्ञोऽहमित्युपासनमादरात् ।", |
| | "कुर्वीत पुरुषो नित्यं तस्य यत्षोडशोत्तरम् ॥", |
| | "(शतमायुस्तत्तु सवनत्रयम् .हृ)शतमायुस्तत्सवनत्रयमीरितमुत्तमम् ।", |
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| "text": "एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत् स ह(प्राह) षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७ ॥ १६ ॥" | | "lines": [ |
| | "एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत् स ह(प्राह) षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७ ॥ १६ ॥" |
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| "text": "महिदासोऽन्यः । कृष्णश्चान्यः एव ।\n‘महिदासस्त्वैतरेयः कृष्णोऽन्यो देवकीसुतः ।\nकपिलश्च द्वितीयोऽन्यस्त्रय एते पुरा नराः(पुयरातनाः .हृ) ॥\nसङ्गत्योच्चैस्तपस्तेपुर्ब्रह्मणे परमेष्ठिने ।\nमातुः स्वस्य च नामैक्यं विष्णुना स्यादिति ह्युभौ ॥\nस्वात्मशिष्यप्रशिष्याणां नामैक्यं(नामैक्ये .हृ) कपिलस्तथा ।\nएवमेव च वेदोक्ता भवेमेति त्वतन्द्रिताः ॥\nतान् वरान् प्रददौ तेषां ब्रह्मा लोकपितामहः ।\nतस्मात् (तन्नामिनस्त्वासन् .हृ)तन्नामिनश्चाऽसंस्त्रयस्ते मुनयोऽपि हि ॥\nमहिदासस्त्वैतरेयो बह्वृचोपनिषद्गतः ।\nसाक्षात् स भगवान् विष्णुस्तन्नामैको मुनिर्ह्यभूत् ॥\nकृष्णस्तु वासुदेवाख्यः परमात्मैव केवलम्(केवलः .हृ) ।\nतन्नामा देवकीपुत्रस्त्वन्योऽप्यभवदञ्जसा ॥\nकपिलो वासुदेवाख्यः साक्षान्नारायणः प्रभुः ।\nतन्नामा कपिलोऽन्यस्तु शिष्यनाम्ना सहाभवत् ॥\nस षोडशशतञ्जीवी महिदासोऽपरस्त्वृषिः ।\nघोरशिष्यस्तथा कृष्णः कपिलश्च कुशास्त्रकृत् ॥\nत्रय एते वरं प्राप्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः ।\nकृतकृत्याः प्रमुमुदुस्तन्नामानश्च तेऽभवन् ॥ इति कालकीये ॥ १६ ॥" | | "lines": [ |
| | "महिदासोऽन्यः । कृष्णश्चान्यः एव ।", |
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| "text": "\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eआदित्\u003C/span\u003E तस्मादेव= तत्प्रसादादेव । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eप्रत्नस्य\u003C/span\u003E पुरातनस्य= अनादेर्भगवतो \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eरेतसः\u003C/span\u003E रतिरूपस्य \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eज्योतिः पश्यन्ति (प्रपश्यन्ति)\u003C/span\u003E । वासेन रमयतीति \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eवासरम्\u003C/span\u003E । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eदिवःपरतो\u003C/span\u003E वैकुण्ठे \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eयदिध्यते\u003C/span\u003E ऋद्धतममेव सर्वदा । ‘\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eअथ यदत परो दिवः\u003C/span\u003E’ इत्युक्तत्वाच्च(‘\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eअथ यदत परः\u003C/span\u003E’ इत्युक्तत्वाच्च) । न चाऽदित्यमण्डलं दिवः परतः । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eउत्तरं ज्योतिः पश्यन्तः\u003C/span\u003E स्वरानन्दरूपं परिपश्यन्तो वयं \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eतमस उदगन्म\u003C/span\u003E । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eउत्तरं\u003C/span\u003E ज्योतिः \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eपश्यन्तः\u003C/span\u003E तदेवोत्तरं \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eस्वश्च पश्यन्तः\u003C/span\u003E । द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्था(द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्थे हृ.) । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eउद्\u003C/span\u003E आख्यं \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eज्योतिरुत्तमं\u003C/span\u003E तमसः सकाशाद् \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eअगन्म\u003C/span\u003E प्राप्ताः स्म इत्यर्थः । ‘तस्योदिति नाम’ इति श्रुतेः । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eदेवत्रा देवं\u003C/span\u003E देवविषयेऽपि देवं, देवानां देवमित्यर्थः । सूरिभिः प्राप्यत्वात् \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eसूर्यम्\u003C/span\u003E ।\n‘रतिरूपं परं ज्योतिरनादेः केशवस्य यत् ।\nतत्प्रसादेन पश्यन्ति हृदि वासाद् रतिप्रदम् ॥\nयत्पूर्णं सर्वदा(सत् सदा .हृ) भाति वैकुण्ठे परतो दिवः ।\nतदुदाख्यं प्रपश्यन्तो निर्गत्य तमसो वयम् ॥\nज्योतिरानन्दसद्रूपम् उत्तमोत्तमसूत्तमम् ।\nदेवानां दैवतं साक्षात् सूरिप्राप्यं परं पदम् ॥\nप्राप्ताः स्म वासुदेवाख्यमिति मन्त्रदृगब्रवीत् ॥’ इति नारायणीये ॥ १७ ॥" | | "lines": [ |
| | "\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eआदित्\u003C/span\u003E तस्मादेव= तत्प्रसादादेव । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eप्रत्नस्य\u003C/span\u003E पुरातनस्य= अनादेर्भगवतो \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eरेतसः\u003C/span\u003E रतिरूपस्य \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eज्योतिः पश्यन्ति (प्रपश्यन्ति)\u003C/span\u003E । वासेन रमयतीति \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eवासरम्\u003C/span\u003E । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eदिवःपरतो\u003C/span\u003E वैकुण्ठे \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eयदिध्यते\u003C/span\u003E ऋद्धतममेव सर्वदा । ‘\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eअथ यदत परो दिवः\u003C/span\u003E’ इत्युक्तत्वाच्च(‘\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eअथ यदत परः\u003C/span\u003E’ इत्युक्तत्वाच्च) । न चाऽदित्यमण्डलं दिवः परतः । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eउत्तरं ज्योतिः पश्यन्तः\u003C/span\u003E स्वरानन्दरूपं परिपश्यन्तो वयं \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eतमस उदगन्म\u003C/span\u003E । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eउत्तरं\u003C/span\u003E ज्योतिः \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eपश्यन्तः\u003C/span\u003E तदेवोत्तरं \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eस्वश्च पश्यन्तः\u003C/span\u003E । द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्था(द्विरुक्तिस्तात्पर्यार्थे हृ.) । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eउद्\u003C/span\u003E आख्यं \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eज्योतिरुत्तमं\u003C/span\u003E तमसः सकाशाद् \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eअगन्म\u003C/span\u003E प्राप्ताः स्म इत्यर्थः । ‘तस्योदिति नाम’ इति श्रुतेः । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eदेवत्रा देवं\u003C/span\u003E देवविषयेऽपि देवं, देवानां देवमित्यर्थः । सूरिभिः प्राप्यत्वात् \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eसूर्यम्\u003C/span\u003E ।", |
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| | "मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्ममथाधिदैवतमाकाशो ब्रह्मेत्युभयमादिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च ॥ १ ॥" |
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| | "तदेतच्चतुष्पाद् ब्रह्म वाक्पादः प्राणः पादश्चक्षुः पादः श्रोत्रं पाद इत्यध्यात्ममथाधिदैवतमग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पाद इत्युभयमेवाऽदिष्टं भवत्यध्यात्मं चाधिदैवतं च ॥ २ ॥" |
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| "text": "वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "वागेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः सोऽग्निना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ३ ॥" |
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| | "प्राण एव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स वायुना ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ४ ॥" |
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| | "चक्षुरेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स आदित्येन ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद ॥ ५ ॥" |
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| | "श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स दिग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद य एवं वेद ॥ ६ ॥ १८ ॥" |
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| "text": "‘मनःसंस्थस्तु यो देवः साक्षान्नारायणः प्रभुः ।\nस एवाऽकाशसंस्थश्च मन आकाशनामकः ॥\nमननान्मन आकाश आ समन्तात् प्रकाशनात् ।\nवासुदेवादिभेदेन स वागादिषु संस्थितः ॥\nअग्न्यादिषु च तन्नामा वागादिस्थः स एव तु ।\nअग्न्यादिस्थैः सहैवेशो भाति दुष्टांस्तपत्यथ ॥\nएवं विद्वांस्तमीशेशं यशोज्ञानसुखात्मताम् ।\nकीर्तिं च ब्रह्मसम्प्राप्त्या(ब्रह्म सम्प्राप्य .हृ) वरतां मुक्तिगामपि ॥\nप्राप्य भाति तपत्यद्धा स्वाज्ञानादिकमेव च॥’ इति च ॥ १८ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘मनःसंस्थस्तु यो देवः साक्षान्नारायणः प्रभुः ।", |
| | "स एवाऽकाशसंस्थश्च मन आकाशनामकः ॥", |
| | "मननान्मन आकाश आ समन्तात् प्रकाशनात् ।", |
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| | "अग्न्यादिषु च तन्नामा वागादिस्थः स एव तु ।", |
| | "अग्न्यादिस्थैः सहैवेशो भाति दुष्टांस्तपत्यथ ॥", |
| | "एवं विद्वांस्तमीशेशं यशोज्ञानसुखात्मताम् ।", |
| | "कीर्तिं च ब्रह्मसम्प्राप्त्या(ब्रह्म सम्प्राप्य .हृ) वरतां मुक्तिगामपि ॥", |
| | "प्राप्य भाति तपत्यद्धा स्वाज्ञानादिकमेव च॥’ इति च ॥ १८ ॥" |
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| | "एकोनविंशः खण्डः" |
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| "text": "आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत् तत् सदासीत् तत् समभवत् तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम् ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानमसदेवेदमग्र आसीत् तत् सदासीत् तत् समभवत् तदाण्डं निरवर्तत तत्संवत्सरस्य मात्रामशयत तन्निरभिद्यत ते आण्डकपाले रजतं च सुवर्णं चाभवताम् ॥ १ ॥" |
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| "text": "तद्यद्रजतं सेयं पृथिवी यत्सुवर्णं सा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बं स मेधो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकं स समुद्रः ॥ २॥" | | "lines": [ |
| | "तद्यद्रजतं सेयं पृथिवी यत्सुवर्णं सा द्यौर्यज्जरायु ते पर्वता यदुल्बं स मेधो नीहारो या धमनयस्ता नद्यो यद्वास्तेयमुदकं स समुद्रः ॥ २॥" |
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| "text": "अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानं घोषा उलूलवोऽनूदतिष्ठन् सर्वाणि च भूतानि च सर्वे च कामास्तस्मात् तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रति घोषा उलूलवोऽनूत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सर्वे चैव कामाः ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ यत्तदजायत सोऽसावादित्यस्तं जायमानं घोषा उलूलवोऽनूदतिष्ठन् सर्वाणि च भूतानि च सर्वे च कामास्तस्मात् तस्योदयं प्रति प्रत्यायनं प्रति घोषा उलूलवोऽनूत्तिष्ठन्ति सर्वाणि च भूतानि सर्वे चैव कामाः ॥ ३ ॥" |
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| "text": "स य एतदेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेरन् ॥ ४ ॥ १९ ॥" | | "lines": [ |
| | "स य एतदेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेरन् ॥ ४ ॥ १९ ॥" |
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| "text": "‘अगम्यत्वादसन्नाम ब्रह्म नारायणाभिधम् ।\nप्रलये वासुदेवाख्यं गम्यं सदभवद् विदाम् ॥\nतत्प्रकृत्या समभवत् तत आण्डमजायत ।\nतस्मिन्नादित्यनामाऽसावभवत् सूर्यमण्डले ॥\nनियन्तैव च सूर्यस्य भगवान् पुरुषोत्तमः ।\nतस्मिन्नादित्यनामानमादित्यस्थं जनार्दनम् ॥\nब्रह्मोपासीत परमं सर्ववेदज्ञता ततः॥’ इति ब्रह्मतत्त्वे ।\n\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eउलूलव\u003C/span\u003E उरूरव । अतिमहान्तो गायत्र्यादिघोषा उप च \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eनिम्रेडेरन्\u003C/span\u003E । मुक्ते तस्मिन्नेव वसेयुः ।\n‘सूर्यबिम्बस्थिते विष्णौ जायमाने परात्मनि ।\nगायत्रीपूर्वकैर्वेदैर्ब्रह्माद्यास्समुपस्थिताः ॥\nउपतिष्ठन्त्यतो नित्यं गायत्र्यादिभिरञ्जसा ।\nतद्विद्वान् मुक्त आवासो वेदानां सर्वदा भवेद्॥’ इति च ॥ १९ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘अगम्यत्वादसन्नाम ब्रह्म नारायणाभिधम् ।", |
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| | "जानश्रुतिर्हि पौत्रायणः श्रद्धादेयो बहुदायी बहुपाक्य (बहुवाक्य) आस। स ह सर्वत आवसथान् मापयाञ्चक्रे सर्वत एव मेऽत्स्यन्तीति ॥१॥" |
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| | "अथ ह हंसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवं हंसो हंसमभ्युवाद होहोयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत् त्वा मा प्रधाक्षीरिति ॥ २ ॥" |
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| | "तमु ह परः प्रत्युवाच कम्वर एनमेतत्सन्तं सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति ॥ ३ ॥" |
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| | "यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद् वेद यत् स वेद स(वेद सर्वं स) मयैतदुक्त इति ॥ ४ ॥" |
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| | "तदु ह जानश्रुतिः पौत्रायण उपशुश्राव स ह संजिहान एव क्षत्तारमुवाचाङ्गारे ह सयुग्वानमिव रैक्वमात्थेति यो नु कथं सयुग्वा रैक्व इति ॥ ५ ॥" |
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| | "यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत् स वेद स सर्वं मयैतदुक्त इति ॥ ६ ॥" |
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| | "स ह क्षत्ताऽन्विष्य नाविदमिति प्रत्येया तं स होवाच यत्रारे ब्राह्मणस्यान्वेषणा तदेनमृच्छेति ॥ ८ ॥" |
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| "text": "सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तं हाभ्युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यहं ह्यरा३ इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताऽन्विष्याविदमिति प्रत्येयाय ॥ ८ ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तं हाभ्युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यहं ह्यरा३ इति ह प्रतिजज्ञे स ह क्षत्ताऽन्विष्याविदमिति प्रत्येयाय ॥ ८ ॥ १ ॥" |
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| | "रैक्वेमानि षट् शतानि गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथोऽनु म एतां भगवो देवतां शाधि यां देवतामुपास्स इति ॥ २ ॥" |
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| "text": "तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति तदुह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "तमु ह परः प्रत्युवाचाह हारेत्वा शूद्र तवैव सह गोभिरस्त्विति तदुह पुनरेव जानश्रुतिः पौत्रायणः सहस्रं गवां निष्कमश्वतरीरथं दुहितरं तदादाय प्रतिचक्रमे ॥ ३ ॥" |
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| "text": "तं हाभ्युवाद रैक्वेदं सहस्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायाऽयं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "तं हाभ्युवाद रैक्वेदं सहस्रं गवामयं निष्कोऽयमश्वतरीरथ इयं जायाऽयं ग्रामो यस्मिन्नास्सेऽन्वेव मा भगवः शाधीति ॥ ४ ॥" |
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| "text": "तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाऽजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनाऽलापयिष्यथा इति ते हैते रैक्वपर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास तस्मै स होवाच ॥ ५ ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाऽजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनाऽलापयिष्यथा इति ते हैते रैक्वपर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास तस्मै स होवाच ॥ ५ ॥ २ ॥" |
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| "text": "शुचाऽऽद्रवणाच्छूद्रो राजा पौत्रायणः ।\n‘राजा पौत्रायणः शोकाच्छूद्रेति मुनिनोदितः ।\nप्राणविद्यामवाप्यास्मात् परं धर्ममवाप्तवान् ॥’ इति पाद्मे ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "शुचाऽऽद्रवणाच्छूद्रो राजा पौत्रायणः ।", |
| | "‘राजा पौत्रायणः शोकाच्छूद्रेति मुनिनोदितः ।", |
| | "प्राणविद्यामवाप्यास्मात् परं धर्ममवाप्तवान् ॥’ इति पाद्मे ॥ २ ॥" |
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| | "तृतीयः खण्डः" |
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| "text": "वायुर्वाव संवर्गो यदा वा महाप्रलये अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "वायुर्वाव संवर्गो यदा वा महाप्रलये अग्निरुद्वायति वायुमेवाप्येति यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ॥ १ ॥" |
| | ] |
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| "text": "यदाऽऽप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्ह्येवैतान् सर्वान् संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "यदाऽऽप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्ह्येवैतान् सर्वान् संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥" |
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| | "अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणं श्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान् सर्वान् संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥" |
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| "text": "तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायाऽत्मा देवानां जनिता प्रजानां हिरण्यदंष्ट्रो बभसोऽनसूरिः। महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्निदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "तदु ह शौनकः कापेयः प्रतिमन्वानः प्रत्येयायाऽत्मा देवानां जनिता प्रजानां हिरण्यदंष्ट्रो बभसोऽनसूरिः। महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यमानो यदन्नमत्तीति वै वयं ब्रह्मचारिन्निदमुपास्महे दत्तास्मै भिक्षामिति ॥ ७ ॥" |
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| | "तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतं तस्मात् सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दश कृतं सैषा विराडन्नादी तयेदं सर्वं दृष्टं सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ ३ ॥" |
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| "text": "‘संवृङ्क्ते सर्वदेवान् यद्वायुः संवर्ग ईरितः ।\nमहिमाऽस्य महानेष यदनाद्योऽत्ति देवताः॥’ इति प्रभञ्जने ।\n‘दशेति वै सर्वम्’(ऐ.उ.२.१.४) इति श्रुतेः । कृतस्य च पूर्णात्मकत्वाद् अध्यात्माधिदैवतभेदेन(दैवभेदेन) पञ्चदेवता दशभूताः कृतम् । तस्माद् वायुना सह दशसङ्ख्यापूरणात् सर्वदिक्षु स्थिता देवता वायुना सहान्नमेव । अन्नादी देवता विराड् विष्णुरेव । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eअनद्यमान\u003C/span\u003E इत्यन्यैरनद्यमानः ।\n‘वायुस्तु सर्वदेवात्ता वायोरत्ता जनार्दनः ।\nन तस्य कश्चिदत्ताऽस्ति स विराडधिराजनात्॥’ इति च ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘संवृङ्क्ते सर्वदेवान् यद्वायुः संवर्ग ईरितः ।", |
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| | "‘दशेति वै सर्वम्’(ऐ.उ.२.१.४) इति श्रुतेः । कृतस्य च पूर्णात्मकत्वाद् अध्यात्माधिदैवतभेदेन(दैवभेदेन) पञ्चदेवता दशभूताः कृतम् । तस्माद् वायुना सह दशसङ्ख्यापूरणात् सर्वदिक्षु स्थिता देवता वायुना सहान्नमेव । अन्नादी देवता विराड् विष्णुरेव । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eअनद्यमान\u003C/span\u003E इत्यन्यैरनद्यमानः ।", |
| | "‘वायुस्तु सर्वदेवात्ता वायोरत्ता जनार्दनः ।", |
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| | "सत्यकामो ह जाबालो जबालां मातरमामन्त्रयाञ्चक्रे ब्रह्मचर्यं भवति विवत्स्यामि किङ्गोत्रो न्वहमस्मीति ॥ १ ॥" |
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| | "सा हैनमुवाच नाहमेतद्वेद तात यद्गोत्रस्त्वमसि बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साऽहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसि(त्वमसीति स त्वं जाबालः .हृ) स सत्यकाम एव जाबालो ब्रुवीथा इति ॥ २ ॥" |
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| | "स ह हारिद्रुमन्तं गौतममेत्योवाच ब्रह्मचर्यं भगवति वत्स्याम्युपेयां भगवन्तमिति ॥ ३ ॥" |
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| | "तं होवाच किं गोत्रो नु सोम्यासीति स होवाच नाहमेतद्वेद भो यद्गोत्रोऽहमस्म्यपृच्छं मातरं सा मा प्रत्यब्रवीद् बह्वहं चरन्ती परिचारिणी यौवने त्वामलभे साऽहमेतन्न वेद यद्गोत्रस्त्वमसि जबाला तु नामाहमस्मि सत्यकामो नाम त्वमसीति सोहं सत्यकामो जाबालोऽस्मि भो इति ॥ ४ ॥" |
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| | "तं होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सोम्याऽऽहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशतं गा निराकृत्योवाचेमाः सोम्यानु संव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणाऽवर्तेयम्(आवर्तय) इति। स ह वर्षगणं प्रोवाच ता यदा सहस्रं सम्पेदुः ॥ ५ ॥ ४ ॥" |
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| | "आर्जवं ब्राह्मणे साक्षाच्छूद्रोऽनार्जवलक्षणः ।", |
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| | "अथ हैनमृषभोऽभ्युवाद सत्यकामा ३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव प्राप्ताः सोम्य सहस्रं स्मः प्रापय न आचार्यकुलम् ॥ १ ॥" |
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| | "ब्रह्मणश्च ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच प्राची दिक् कला प्रतीची दिक् कला दक्षिणा दिक् कलोदीची दिक् कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणः प्रकाशवान्नाम ॥ २ ॥" |
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| | "स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते प्रकाशवानस्मिंल्लोके भवति प्रकाशवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः प्रकाशवानित्युपास्ते ॥ ३ ॥५॥" |
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| | "अग्निष्टे पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ् उपोपविवेश ॥ १ ॥" |
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| | "हंसस्ते पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ् उपोपविवेश ॥ १ ॥" |
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| | "तं हंस उपनिपत्याभ्युवाद सत्यकामा३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥" |
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| | "ब्रह्मणः सोम्य ते पादं ब्रवाणीति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाचाग्निः कला सूर्यः कला चन्द्रः कला विद्युत् कलैष वै सोम्य चतुष्कलः पादो ब्रह्मणो ज्योतिष्मान्नाम ॥ ३ ॥" |
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| | "स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः ज्योतिष्मानित्युपास्ते ज्योतिष्मानस्मिंल्लोके भवति ज्योतिष्मतो ह लोकान् जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणो ज्योतिष्मानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ ७ ॥" |
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| | "मद्गुष्टे(मद्गुः ते) पादं वक्तेति स ह श्वोभूते गा अभिप्रस्थापयाञ्चकार ता यत्राभिसायं बभूवुस्तत्राग्निमुपसमाधाय गा उपरुध्य समिधमाधाय पश्चादग्नेः प्राङ् उपोपविवेश ॥ १ ॥" |
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| | "तं मद्गुरुपनिपत्याभ्युवाद सत्यकामा३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव ॥ २ ॥" |
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| | "स य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मण आयतनवानित्युपास्ते आयतनवानस्मिंल्लोके भवत्यातनवतो ह लोकाञ्जयति य एतमेवं विद्वांश्चतुष्कलं पादं ब्रह्मणः आयतनवानित्युपास्ते ॥ ४ ॥ ८ ॥" |
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| | "ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वाऽनुशशासेत्यन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे भगवांस्त्वेव मे कामे ब्रूयात् ॥ २ ॥" |
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| | "श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्य आचार्यद्ध्येव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयतीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किञ्चन वीयायेति वीयायेति ॥ ३ ॥ ९ ॥" |
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| "text": "‘वायुर्वृषभरूपः सन्नग्निर्हंसश्चतुर्मुखः ।\nमद्गुरूपश्च वरुणः सत्यकामाय होचिरे ॥\nप्रकाशानन्ततेजोवत्स्थानवत्सञ्ज्ञिका(सञ्ज्ञका) हरेः ।\nवासुदेवादिका मूर्तीः प्रत्येकं चतुरात्मनः ॥\nदिगादिषु स्थितास्तेषामधिपाश्च तदाख्यकाः ।\nनाऽचार्यबुध्या तैरुक्तमतोऽनुज्ञां गुरोरगात् ॥\nउत्तमाचार्यसम्प्राप्त्यै नावराचार्यतः क्वचित् ।\nइच्छेदनुज्ञां श्रुत्वाऽपि नानुज्ञां प्रार्थयेत् ततः ॥\nऋषिभ्यस्तूत्तमा देवा देवेभ्यो वायुरुत्तमः ।\nवायोश्च भगवान् विष्णुर्न तस्मादुत्तमो गुरुः ॥’ इत्याचार्यसंहितायाम् ।\nअत्र \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eह न किञ्चन वीयाय\u003C/span\u003E । देवेभ्यः श्रुत्वा न च ते(न ते) काचिद्धानिरभवदित्यर्थः ॥ ५-९ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘वायुर्वृषभरूपः सन्नग्निर्हंसश्चतुर्मुखः ।", |
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| | "उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास तस्य ह द्वादश वर्षाण्यग्नीन् परिचचार स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयंस्तं ह स्मैव न समावर्तयति ॥१॥" |
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| | "तं जायोवाच तप्तो ब्रह्मचारी कुशलमग्नीन् परिचचारीन् मा त्वाऽग्नयः परिप्रवोचन् प्रब्रूह्यस्मा इति तस्मै हाप्रोच्यैव प्रवासाञ्चक्रे ॥ २ ॥" |
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| | "अथ हाग्नयः समूदिरे तप्तो ब्रह्मचारी कुशलं नः (परि चचारीत्)पर्यचचारीद्धन्तास्मै प्रब्रवामेति तस्मै होचुः ॥ ४ ॥" |
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| | "स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥ ११ ॥" |
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| | "अथ हैनमन्वाहार्यपचनोऽनुशशासाऽपो दिशो नक्षत्राणि चन्द्रमा इति य एष चन्द्रमसि पुरुषो दृश्यते सोऽहमस्मि स एवाहमस्मीति ॥ १ ॥" |
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| | "स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥१२॥" |
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| | "स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग् जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥१३॥" |
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| "text": "‘पृथुत्वात् पृथिवी विष्णुरग्निश्चाप्यङ्गनेतृतः ।\nअन्नमत्तृत्वतो नित्यमादित्यश्चादिरूपतः ॥\nआप आपालनाच्चैव देशनाद्दिश एव च ।\nअनन्यराजो नक्षत्रमानन्दत्वाच्च चन्द्रमाः ॥\nप्राणोऽसौ बलरूपत्वादाकाशः पूर्तिहेतुतः ।\nद्यौः प्रकाशस्वरूपत्वाद् वेदनाद् विद्युदेव च ॥\nयः सोमसूर्यविद्युत्सु(सूर्यसोमविद्युत्सु) तत्तन्नामा हरिः परः ।\nअहेयत्वादहंनामा गार्हपत्यादिसंस्थितः ॥’ इति तत्त्वसंहितायाम् ।\n‘सोऽहमस्मि’ इति वाक्यस्य जीवब्रह्मैक्यपरत्वनिरासः\nजीवैक्यपक्षे आदित्ये पुरुषं चन्द्रमसि विद्युतीति भेदव्यपदेशो न युज्यते । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003E‘पृथिव्यग्निरन्नमादित्यः’\u003C/span\u003E, \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003E‘आदित्ये पुरुषः’\u003C/span\u003Eइत्यादिना आदित्यादिशब्दवाच्यौ प्रथमार्थः सप्तम्यर्थश्च द्वौ प्रतीयेते । अतो नैक्यमुच्यते । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003E‘स एवाहमस्मि’\u003C/span\u003Eइत्यन्तर्यामिणोः सर्वविशेषाभावज्ञापनार्थम् । पूर्वं \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003E‘सोऽहमस्मि’\u003C/span\u003E इत्यभेदे तात्पर्याधिक्यज्ञापनाय ।\n‘अहमस्म्यादिकाः शब्दा अन्तर्यामिणि मुख्यतः ।\nतत्सम्बन्धाज्जीवगाश्च तस्माद् वेदगता हरौ ॥\nअस्मच्छब्दोदितोऽन्तःस्थ आत्मा व्याप्तो जनार्दनः ।\nअग्नयो द्विविधं विष्णुमवोचन्नुपकोसले ॥’ इति सामसंहितायाम् ।\n\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eनास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते\u003C/span\u003Eभृत्यवानेव भवति । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eलोकी\u003C/span\u003Eभगवल्लोकी \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eभवति\u003C/span\u003E ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘पृथुत्वात् पृथिवी विष्णुरग्निश्चाप्यङ्गनेतृतः ।", |
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| | "ते होचुरुपकोसलैषा सोम्य तेऽस्मद्विद्याऽऽत्मविद्या चाऽचार्यस्तु ते गतिं वक्तेत्याजगाम हास्याचाऽर्यस्तमाचार्योऽभ्युवादोपकोसला ३ इति ॥ १ ॥" |
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| | "भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वाऽनुशशासेति को नु माऽनुशिष्याद् भो इतीहावेव निह्नुत इमे नूनमीदृशा अन्यादृशा इतीहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किल तेऽवोचन्निति ॥ २ ॥" |
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| | "इदमिति ह प्रतिजज्ञे लोकान् वाव किल सोम्य तेऽवोचन्नहं तु ते तद् वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवं विदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति ब्रवीतु मे भगवानिति तस्मै होवाच ॥ ३ ॥ १४ ॥" |
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| | "इह च अव च(अवं च) \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eइहावे\u003C/span\u003E। इहेति मनुष्यलोकस्था उच्यन्ते, अवेति पातालस्थाः(पाताळस्थाः) । मानुषासुरौ भगवन्तं \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eनिह्नुत\u003C/span\u003E एव न वक्तुं समर्थौ । अतो देवा एव मामनुशशासुरित्यर्थः । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eईदृशा\u003C/span\u003E इति वर्णतो ज्वालावर्णा इति । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eअन्यादृशाश्च\u003C/span\u003E करशिरश्चरणादिमन्तः । चन्द्रादिसर्वनामवत्वात् । ‘यो देवानां नामधा एक एव’ इति श्रुतेर्विष्णोरेव सर्वनामानि ॥ १४ ॥" |
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| "text": "अथ यदु चैवास्मिञ्च्छव्यं कुर्वन्ति यदु(यदि .हृ) च नार्चिषमेवाभिसम्भवन्ति(अभिसंविशन्ति) अर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षडुदंङ्ङेति मासांस्तान् मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो मानवः स एनान् ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन खलु प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नाऽवर्तन्ते नाऽवर्तन्ते ॥ ५ ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ यदु चैवास्मिञ्च्छव्यं कुर्वन्ति यदु(यदि .हृ) च नार्चिषमेवाभिसम्भवन्ति(अभिसंविशन्ति) अर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षडुदंङ्ङेति मासांस्तान् मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो मानवः स एनान् ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन खलु प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नाऽवर्तन्ते नाऽवर्तन्ते ॥ ५ ॥ १५ ॥" |
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| "text": "असङ्गभगवत्स्थानत्वाच्चक्षुषोऽसङ्गत्वमुच्यते ।\nयत्स्थानत्वादिदं चक्षुरसङ्गं सर्ववस्तुषु ।\nतस्मै नमो भगवते वामनाय परात्मने ॥’ इति च महाकौर्मे ।\n\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eइमं मानवमावर्तं नाऽवर्तन्ते\u003C/span\u003E। मानवा यत्रावर्तन्ते स मानवावर्तः । तं मानवावर्तं प्रति नावर्तन्ते ।\n‘चक्षुस्थं वामनं वेद स पुनर्नैव जायते ।\nमुक्तो दुस्तरसंसाराद् वामनं प्राप्नुतेऽचिरात्॥’ इति च ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "असङ्गभगवत्स्थानत्वाच्चक्षुषोऽसङ्गत्वमुच्यते ।", |
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| | "तस्मै नमो भगवते वामनाय परात्मने ॥’ इति च महाकौर्मे ।", |
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| | "एष ह वै यज्ञो योऽयं पवत एष यन्निदं सर्वं पुनाति यदेष यन्निदं सर्वं पुनाति तस्मादेष एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक् च वर्तनी ॥ १ ॥" |
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| | "तयोरन्यतरां मनसा संस्करोति(संस्कारः) ब्रह्मा वाचा होताऽध्वर्युरुद्गाताऽन्यतरांस यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यपवदति ॥ २ ॥" |
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| | "अन्यतरामेव वर्तनीं संस्कुर्वन्ति हीयतेऽन्यतरा स यथैकपाद् व्रजन् रथो वैकेन चक्रेण वर्तमानो रिष्यत्येवमस्य यज्ञो रिष्यति यज्ञं रिष्यन्तं यजमानोऽनुरिष्यति स इष्ट्वा पापीयान् भवति ॥ ३ ॥" |
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| | "अथ यत्रोपाकृते प्रातरनुवाके न पुरा परिधानीयाया ब्रह्मा व्यवदत्युभे एव वर्तनी संस्कुर्वन्ति न हीयतेऽन्यतरा ॥ ४ ॥" |
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| | "स यथोभयपाद् व्रजन् रथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान् भवति ॥ ५ ॥ १६ ॥" |
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| "text": "‘यज्ञाभिमानी यज्ञाख्यो वायुर्यज्ञे प्रतिष्ठितः ।\nज्ञ शुद्धभाव इत्यस्माद् यन्नयं पावयेद् यतः ॥\nअतो वायुर्यज्ञनामा तत्पादौ वाङ्मनःस्थितौ ।\nदक्षिणोऽस्य मनःसंस्थो ब्रह्मर्त्विक् तस्य पूजकः ॥\nहोत्राद्या वाचि संस्थस्य(श्च) वामपादस्य पूजकाः ।\nतस्मात् प्रातरनूवाकपरिधान्योर्यदन्तरा ॥\nब्रह्मा चेदुत्सृजेद् वाचं यज्ञपाल्लोपकृद्(लोककृत्) भवेत् ।\nवाङ्मनःपादयज्ञाख्यप्रतिमो वायुरीरितः ॥\nध्यायन् वायुं हरिं चैव ततो ब्रह्मा मुनिर्भवेत् ॥ १६ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘यज्ञाभिमानी यज्ञाख्यो वायुर्यज्ञे प्रतिष्ठितः ।", |
| | "ज्ञ शुद्धभाव इत्यस्माद् यन्नयं पावयेद् यतः ॥", |
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| | "दक्षिणोऽस्य मनःसंस्थो ब्रह्मर्त्विक् तस्य पूजकः ॥", |
| | "होत्राद्या वाचि संस्थस्य(श्च) वामपादस्य पूजकाः ।", |
| | "तस्मात् प्रातरनूवाकपरिधान्योर्यदन्तरा ॥", |
| | "ब्रह्मा चेदुत्सृजेद् वाचं यज्ञपाल्लोपकृद्(लोककृत्) भवेत् ।", |
| | "वाङ्मनःपादयज्ञाख्यप्रतिमो वायुरीरितः ॥", |
| | "ध्यायन् वायुं हरिं चैव ततो ब्रह्मा मुनिर्भवेत् ॥ १६ ॥" |
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| | "प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेषां तप्यमानानां रसान् (प्रावहद्)प्राबृहद् अग्निं पृथिव्या वायुमन्तरिक्षादादित्यं दिवः ॥ १ ॥" |
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| | "स एतास्तिस्रो देवता अभ्यतपत् तासां तप्यमानानां रसान् प्राबृहद्(प्रावृहद्)अग्नेर्ऋचो वायोर्यजूंषि सामान्यादित्यात् ॥ २ ॥" |
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| | "स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत् तस्यास्तप्यमानाया रसान् प्राबृहद्(प्रावृहद्) भूरित्यृग्भ्यो भुव इति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ॥ ३ ॥" |
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| | "तद् यद्यृक्तो रिष्येद् भूः स्वाहेति गार्हपत्ये जुहुयाद् ऋचामेव तद्रसेनर्चां वीर्येणर्चां यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति ॥ ४ ॥" |
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| | "अथ यदि यजुष्टो रिष्येद् भुवः स्वाहेति दक्षिणाग्नौ जुहुयाद् यजुषामेव तद्रसेन यजुषां वीर्येण यजुषां यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति ॥ ५ ॥" |
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| | "अथ यदि सामतो रिष्येत् स्वः स्वाहेत्याहवनीये जुहुयात् साम्नामेव तद्रसेन साम्नां वीर्येण साम्नां यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति ॥ ६ ॥" |
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| | "तद् यथा लवणेन सुवर्णं सन्दध्यात् सुवर्णेन रजतं रजतेन त्रपु त्रपुणा सीसं सीसेन लोहं लोहेन दारु दारु चर्मणा ॥ ७ ॥" |
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| | "एवमेषां लोकानामासां देवतानामस्यास्त्रय्या विद्याया वीर्येण यज्ञस्य विरिष्टिं सन्दधाति भेषजकृतो ह वा एष यज्ञो यत्रैवंविद् ब्रह्मा भवति ॥ ८ ॥" |
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| | "अग्ने रसस्तु ऋग्वेदमानी ब्रह्मा प्रकीर्तितः ॥", |
| | "नासिक्यवायोस्तु रसो यजुर्वेदात्मको हरः ।", |
| | "सामवेदाभिमानी तु वायुः सूर्यरसः स्मृतः ॥", |
| | "वराहसिंहकपिलास्तेषां भूरादिनामकाः ।", |
| | "व्याहृतीभिस्ततो जुह्वन् ब्रह्मैवंविद् विरिष्टितः ।", |
| | "सर्वान् स ऋत्विजो रक्षेद् ब्रह्मैवंवित् ततो भवेत् ॥’ इति च ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eउदक्प्रवण\u003C/span\u003E ऊर्ध्वप्रवणः ऊर्ध्वलोकानुसारी । यज्ञस्य दुरिष्ट्या \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eयतो यतः\u003C/span\u003E स्थानाद्\u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eआवर्तते तत्तत्\u003C/span\u003Eस्थानमेवंविदा ब्रह्मणा \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eगच्छति\u003C/span\u003E । तद् \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eब्रह्मैवैकर्त्विक् । कुरून्\u003C/span\u003E कर्तॄन् यजमानादीन् \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eअभिरक्षति\u003C/span\u003E । \u003Cspan class=\"gr-moola\"\u003Eअश्वा\u003C/span\u003E आशुज्ञानी । ‘वा= गतिगन्धनयोः’इति धातोः । गतिशब्दश्चावगतौ भवति । ‘दीर्घबिन्दुविसर्गादीनां लोपो वा’ इति सूत्रादाशुवैवाश्वा ॥ १७ ॥" |
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| | "प्रथमः खण्डः" |
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| "text": "यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥" |
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| "text": "यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग् वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग् वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥" |
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| | "यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥" |
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| | "यो ह वै सम्पदं वेद सं हास्मै कामाः सम्पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव सम्पत् ॥ ४ ॥" |
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| | "यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥" |
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| "text": "यः श्रेष्ठं ज्येष्ठमखिलदेवानां(श्रेष्ठज्येष्ठमखिलदेवानां) वायुमञ्जसा ।\nवेद स स्वसमानानां ज्येष्ठः श्रेष्ठो विमुक्तिगः ॥\nसमीपे वसतां श्रेष्ठो वसिष्ठस्यैव वेदनात् ।\nएकस्थाने स्थितिस्तु स्यात् प्रतिष्ठाज्ञस्य चेच्छतः ॥\nसम्पद्वेत्तुः सम्पदः स्युर्गृहं चाऽयतनं विदः ।" | | "lines": [ |
| | "यः श्रेष्ठं ज्येष्ठमखिलदेवानां(श्रेष्ठज्येष्ठमखिलदेवानां) वायुमञ्जसा ।", |
| | "वेद स स्वसमानानां ज्येष्ठः श्रेष्ठो विमुक्तिगः ॥", |
| | "समीपे वसतां श्रेष्ठो वसिष्ठस्यैव वेदनात् ।", |
| | "एकस्थाने स्थितिस्तु स्यात् प्रतिष्ठाज्ञस्य चेच्छतः ॥", |
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| | "अथ ह प्राणा अहं श्रेयसि व्यूदिरेऽहं श्रेयानस्म्यहं श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥" |
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| | "ते ह प्राणाः प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन् को नः श्रेष्ठ इति तान् होवाच यस्मिन् व उत्क्रान्ते इदं शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥" |
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| "text": "सा ह(च) वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथाऽकला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चचक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "सा ह(च) वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथाऽकला अवदन्तः प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चचक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥" |
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| | "चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथाऽन्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥" |
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| | "श्रोत्रं होच्चक्राम तत् संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिराः अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥" |
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| | "मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥" |
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| | "अथ ह प्राणः उच्चिक्रमिषन् स यथा सुहयः पट्वीशशङ्कून् सङ्खिदेदेवमितरान् प्राणान् समाखिदत् तं हाभिसमेत्योेचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥" |
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| | "अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठाऽस्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसीति ॥ १३ ॥" |
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| | "अथ हैनं श्रोत्रमुवाच यदहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीत्यथ हैनं मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥" |
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| "text": "न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ १ ॥" |
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| "text": "ज्येष्ठः श्रेष्ठो वसिष्ठश्च सम्पदायतनं तथा ॥\nवायुरेव महांस्तस्य प्रसादादग्निरेव तु ।\nउपचारतो वसिष्ठः(उपचावसिष्ठः .हृ) स्यात् प्रतिष्ठैवं रविस्ततः ।\nसम्पदिन्द्रस्तथैवोक्तो रुद्र आयतनं तथा ॥’ इति प्रभावे(प्राभवे .हृ) ॥\n‘सर्वेन्द्रियाणां व्यापारान् प्राण एव करोत्ययम् ।\nइन्द्रियस्थः पृथक्चासौ शक्तोऽपि स्वयमेव तु ॥\nइन्द्रियनियामकतया मुख्यप्राणस्यऽवश्यकता\nषण्मासात् पूर्वबालानां(पूर्वं बालानां) केवलं प्राणतो (केवलप्राणतो) भवेत् ।\nव्यापार्यं मनसा सर्वमतः पश्चादसंस्मृतिः ॥\nतुरीयायामवस्थायां प्राणादेव विबोधनम् ।\nतथापि संस्मृतिस्तत्र प्राणवश्यतया भवेत् ॥\nप्राणस्य वश्यतानाम तद्भक्त्या स्यात् तत्प्रसादतः ।\nप्राणे वश्ये मनो वश्यमिन्द्रियाणि च सर्वशः ॥’ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "ज्येष्ठः श्रेष्ठो वसिष्ठश्च सम्पदायतनं तथा ॥", |
| | "वायुरेव महांस्तस्य प्रसादादग्निरेव तु ।", |
| | "उपचारतो वसिष्ठः(उपचावसिष्ठः .हृ) स्यात् प्रतिष्ठैवं रविस्ततः ।", |
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| | "इन्द्रियनियामकतया मुख्यप्राणस्यऽवश्यकता", |
| | "षण्मासात् पूर्वबालानां(पूर्वं बालानां) केवलं प्राणतो (केवलप्राणतो) भवेत् ।", |
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| | "द्वितीयः खण्डः" |
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| "text": "स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किञ्चिदिदमाश्वभ्य आशकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किञ्चनानन्नं भवतीति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किञ्चिदिदमाश्वभ्य आशकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किञ्चनानन्नं भवतीति ॥ १ ॥" |
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| "text": "अक्षेषु प्रति प्रति स्थितत्वादनः प्रत्यक्षम् ।\nरुद्रस्यैैव मुख्यतया सर्वभोक्तृत्ववर्णनम्\n‘प्राणविज्ञानयोग्यस्तु रुद्रो मुख्यतया स्मृतः ।\nतस्मात् स सर्वभोक्ता स्यात् तदन्येषां स्वयोग्यतः॥’ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "अक्षेषु प्रति प्रति स्थितत्वादनः प्रत्यक्षम् ।", |
| | "रुद्रस्यैैव मुख्यतया सर्वभोक्तृत्ववर्णनम्", |
| | "‘प्राणविज्ञानयोग्यस्तु रुद्रो मुख्यतया स्मृतः ।", |
| | "तस्मात् स सर्वभोक्ता स्यात् तदन्येषां स्वयोग्यतः॥’ इति च ।" |
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| "text": "स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चाद्भिः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥" |
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| "text": "‘सिद्धमेवान्नवस्त्राद्यं विष्णोः स्वातन्त्र्यतः सदा ।\nस्वार्थं समर्पयेद् विष्णौ यथा प्राणे सुराः पुरा॥’ इति कर्मानुपूर्व्याम् ।\n‘प्राणस्य वस्त्रबुद्ध्या तु भोजनोभयतः पिबन् ।\nस्वर्गे मुक्तौ तथा दिव्यवस्त्रलाभी भवत्यलम् ॥’ इति प्रभञ्जने ।" | | "lines": [ |
| | "‘सिद्धमेवान्नवस्त्राद्यं विष्णोः स्वातन्त्र्यतः सदा ।", |
| | "स्वार्थं समर्पयेद् विष्णौ यथा प्राणे सुराः पुरा॥’ इति कर्मानुपूर्व्याम् ।", |
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| | "तद्धैतत् सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये (वैय्याघ्र .हृ)वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥" |
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| "text": "‘योग्यस्य प्राणविद्यायाः(यां) स्थाणोरपि हि तच्छ्रुतेः ।\nपलाशाद्यं भवेदत्र परतो मुक्तिरेव च ॥\nविष्णोर्ज्ञानमनुप्राप्य भवेन्नास्त्यत्र संशयः ॥’ इति प्राणसंहितायाम् ।" | | "lines": [ |
| | "‘योग्यस्य प्राणविद्यायाः(यां) स्थाणोरपि हि तच्छ्रुतेः ।", |
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| | "अथ यदि महज्जिगमिषेदमावास्यायां दीक्षित्वा पौर्णमास्यां रात्रौ सर्वौषधस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ॥ ४ ॥" |
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| | "वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् सम्पदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यास्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ॥ ५ ॥" |
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| | "‘ज्येष्ठश्रेष्ठादिकैर्हुत्वा प्राणायात्र परत्र च ।", |
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| | "अथ प्रतिसृप्याञ्जलौ मन्थमाधाय जपत्यमो नामास्यमा हि ते सर्वमिदं स हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाधिपतिः स मा ज्यैष्ठ्यं श्रैष्ठ्यं राज्यमाधिपत्यं गमयत्यहमेवेदं सर्वमसानीति ॥ ६ ॥" |
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| | "अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति तत्सवितुर्वृणीमह इत्याचामति वयं देवस्य भोजनमित्याचामति श्रेष्ठं सर्वधातममित्याचामति तुरं भगस्य धीमहीति सर्वं पिबति निर्णिज्य कंसं चमसं वा पश्चादग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः स यदि स्त्रियं पश्येत् समृद्धं कर्मेति विद्यात् ॥ ७ ॥" |
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| | "तदेष श्लोकः–", |
| | "यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति । समृद्धिं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने तस्मिन् स्वप्न निदर्शन इति ॥ ८ ॥" |
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| | "श्वेतकेतुर्हाऽरुणेयः पञ्चालानां समितिमेयाय तं ह प्रवाहणो जैबलिरुवाच कुमारानु(कुमार .हृ) त्वाऽशिषत्(अनुशिषत् .हृ) पितेत्यनु हि भगव इति ॥ १ ॥" |
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| | "वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति न भगव इति वेत्थ यथा पुनरावर्तन्ता३ इति न भगव इति वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति न भगव इति ॥ २ ॥" |
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| | "वेत्थ यथाऽसौ लोको न सम्पूर्यता३ इति न भगव इति वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति इति नैव भगव इति ॥३॥" |
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| | "अथ नु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात् कथं सोऽनुशिष्टो ब्रवीतेति स हाऽयस्तः पितुरर्धमेयाय तं होवाचाननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाऽशिषमिति ॥ ४ ॥" |
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| | "असौ वाव लोको गौतमाग्निस्तस्याऽदित्य एव समिद् रश्मयो धूमोऽहरर्चिश्चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥" |
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| | "पर्जन्यो वा गौतमाग्निः तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादुनयो विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥" |
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| | "योषा वाव गौतमाग्निः तस्या उपस्थ एव समिद् यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥" |
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| | "इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा मासानन्तः शयित्वा यावद्वाऽथ जायते ॥ १ ॥" |
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| | "स जातो यावदायुषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः सम्भूतो भवति ॥ २ ॥ ९ ॥" |
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| "text": "‘नारायणादयः पञ्च क्रमात् पञ्चाग्नयः स्मृताः ।\nअदनादगनेतृत्वात्(अदनादङ्गनेतृत्वात्) नितरामचलत्वतः ॥\nसमेधनात् समिद् विष्णुर्धूत्काराद् धूम उच्यते ।\nअरं चितत्वादर्चिश्च सोऽङ्गारोऽङ्गरतेरपि ॥\nविविधं स्फुरणाच्चैव विष्फुलिङ्ग इतीरितः ।\nपुनर्नारायणाद्यात्मा प्रत्येकं पञ्चरूपवान् ॥\nआदित्यस्स तथाऽऽदानाद् रश्मिः स रतिरूपतः(रश्मी रतिशरूपतः) ।\nतमसाऽहननीयत्वाद् अहश्चन्द्रः परं सुखम्(परः सुखम्) ॥\nअनन्यराजो नक्षत्रं वायुर्ज्ञानायुरूपतः ।\nअभ्रमब्भरणाद्विष्णुर्विद्युद् विद्योतनादपि ॥\nअशनादशनिश्चैव (निह्रादाद्)निर्हादाद् (ह्रा)ध्रादुनिस्तथा ।\nसंवत्सरो वासनाच्च स आकाशः प्रकाशनात् ॥\nरात्रिश्च रतिदानात् स दिशतीति दिशः स्मृतः ।\nअवान्तरं दिशेद् यस्माद् अवान्तरदिगुच्यते ॥\nवचनाद् वाक् तथा प्राणस्त्वननाच्चक्षुरुच्यते ।\nदर्शनाच्छ्रवणाच्छ्रोत्रं जिह्वा वै होमतः स्मृतः ॥\nउपस्थितेरुपस्थः स उपमन्त्रकृदेव सः ।\nयोनिर्युनक्ति यस्मात् स सर्वान्तःकृच्च(स चान्तःकृच्च .हृ) नन्दनः ॥\nअसौ लोकः प्रकाशत्वात् प्राणस्थत्वाच्च केशवः ।\nपर्जन्यो जनको यस्मात् पृथिवी प्रथितत्वतः ॥\nपुरुषः पुरु यस्मात् स योषा जोष्यो यतोऽखिलैः ॥’ इति सामसंहितायाम् ।" | | "lines": [ |
| | "‘नारायणादयः पञ्च क्रमात् पञ्चाग्नयः स्मृताः ।", |
| | "अदनादगनेतृत्वात्(अदनादङ्गनेतृत्वात्) नितरामचलत्वतः ॥", |
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| | "विविधं स्फुरणाच्चैव विष्फुलिङ्ग इतीरितः ।", |
| | "पुनर्नारायणाद्यात्मा प्रत्येकं पञ्चरूपवान् ॥", |
| | "आदित्यस्स तथाऽऽदानाद् रश्मिः स रतिरूपतः(रश्मी रतिशरूपतः) ।", |
| | "तमसाऽहननीयत्वाद् अहश्चन्द्रः परं सुखम्(परः सुखम्) ॥", |
| | "अनन्यराजो नक्षत्रं वायुर्ज्ञानायुरूपतः ।", |
| | "अभ्रमब्भरणाद्विष्णुर्विद्युद् विद्योतनादपि ॥", |
| | "अशनादशनिश्चैव (निह्रादाद्)निर्हादाद् (ह्रा)ध्रादुनिस्तथा ।", |
| | "संवत्सरो वासनाच्च स आकाशः प्रकाशनात् ॥", |
| | "रात्रिश्च रतिदानात् स दिशतीति दिशः स्मृतः ।", |
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| | "वचनाद् वाक् तथा प्राणस्त्वननाच्चक्षुरुच्यते ।", |
| | "दर्शनाच्छ्रवणाच्छ्रोत्रं जिह्वा वै होमतः स्मृतः ॥", |
| | "उपस्थितेरुपस्थः स उपमन्त्रकृदेव सः ।", |
| | "योनिर्युनक्ति यस्मात् स सर्वान्तःकृच्च(स चान्तःकृच्च .हृ) नन्दनः ॥", |
| | "असौ लोकः प्रकाशत्वात् प्राणस्थत्वाच्च केशवः ।", |
| | "पर्जन्यो जनको यस्मात् पृथिवी प्रथितत्वतः ॥", |
| | "पुरुषः पुरु यस्मात् स योषा जोष्यो यतोऽखिलैः ॥’ इति सामसंहितायाम् ।" |
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| "text": "तद्य इत्थं विदुर्ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युुपासते तेऽर्चिषमभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षडुुदङ् एति मासांस्तान् ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "तद्य इत्थं विदुर्ये चेमेऽरण्ये श्रद्धा तप इत्युुपासते तेऽर्चिषमभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद् यान् षडुुदङ् एति मासांस्तान् ॥ १ ॥" |
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| | "अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिला माषा इति जायन्ते ततो वै खलु दुर्निष्प्रपतनं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥" |
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| | "तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाऽथ य इह कपूरचरणाः अभ्याशो ह (एते)यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ ७ ॥" |
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| | "अथैतयोः पथोर्नैकतरेण(पथोर्न कतरेण .हृ) च न तानीमानि क्षुद्रमिश्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत् तृतीयं स्थानं तेनासौ लोको न सम्पूर्यते तस्माज्जुगुप्सेत तदेषश्लोकः ॥ ८ ॥" |
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| | "स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन् ब्रह्महा च । एते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरंस्तु तैरिति ॥ ९ ॥" |
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| | "अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन् वेद न स ह तैरप्याचरन् पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यश्लोको भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ १० ॥ ३१० ॥" |
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| | "‘अभ्रधूमादिभावस्तु जीवस्याभ्रादिसंस्थितिः ।", |
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| | "परम् अस्य जन्यमिति पर्जन्यः ।", |
| | "‘पञ्च पञ्च स्वरूपेण सूर्यादौ संस्थितो हरिः ।", |
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| | "एकादशः खण्डः" |
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| | "प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसाञ्चक्रुः को न आत्मा किं तद्ब्रह्मेति ॥ १ ॥" |
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| | "ते ह सम्पादयाञ्चक्रुरुद्दालको वै भगवन्तोऽयमारुणिः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तं हन्ताभ्यागच्छामेति तं हाभ्याजग्मुः ॥ २ ॥" |
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| | "स ह सम्पादयाञ्चकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो न सर्वमिव प्रतिपत्स्ये हन्ताहमन्यमभ्यनुशासानीति ॥ ३ ॥" |
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| | "तान् होवाचाश्वपतिर्वै भगवन्तोऽयं कैकेयः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तं हन्ताभ्यागच्छामेति तं हाभ्याजग्मुः ॥ ४ ॥" |
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| | "तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयाञ्चकार स ह प्रातः सञ्जिहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपो नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतो यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद् भगवद्भ्यो दास्यामि वसन्तु भगवन्त इति ॥ ५ ॥" |
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| | "ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत् तंहैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानरं सम्प्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहीति ॥ ६ ॥" |
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| | "तान् होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्ताऽस्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्ने प्रतिचक्रमिरे तान् हानुपनीयैवैतदुवाच ॥ ७ ॥ ११ ॥" |
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| | "‘प्रत्यब्दयज्ञकृत्सम्यङ्महाशालः प्रकीर्तितः ।", |
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| | "औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥ १ ॥" |
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| | "अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १२ ॥" |
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| | "................. सर्वरूपातिदार्शनात् ॥", |
| | "चक्षुस्तु विश्वरूपाख्यमादानादायुषामपि ।", |
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| | "अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै पृथग्वर्त्माऽऽत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वां पृथग्वलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥" |
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| | "अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १४ ॥" |
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| | "वाय्वादिप्राणशक्यं न यत्तत्कर्ता हरेर्यतः ।", |
| | "प्राणस्तेन पृथग्वर्त्मा वायुर्ज्ञानायुरूपतः ॥", |
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| | "अथ होवाच जनं शार्कराक्ष्यं शार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै बहुल आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥" |
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| | "अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते सन्दोहस्त्वेष आत्मन इति होवाच सन्दोहस्त व्यशीर्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १५ ॥" |
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| | "................. बहुत्वाद् बहुलः स्मृतः ।", |
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| | "अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं रयिमान् पुष्टिमानसि ॥ १ ॥" |
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| | "अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेव(न)मात्मानं वैश्वानरमुपास्ते वस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच वस्तिस्ते व्यभेत्स्यद् यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १६ ॥" |
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| | "व्याप्तत्वादाप इत्युक्तो रयी रतिकरत्वतः ।", |
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| | "अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम कं त्वमात्मानमुपास्स इति पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै प्रतिष्ठाऽऽत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ॥ १ ॥" |
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| | "अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नाऽगमिष्य इति ॥ २ ॥ १७ ॥" |
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| "text": "प्रथनात् पृथिवीनामा(पृथिवी नाम्ना) प्रतिष्ठा च प्रतिष्ठितेः ।\nपादौ भगवतो विष्णोः पृथिव्याश्रय एव च ॥\nउत्तमानां हि पादेन सर्वं रूपं हि कथ्यते ।\nविष्णोः पदमिति ह्यस्मात् प्रथितिर्वैदिकी स्मृता ॥" | | "lines": [ |
| | "प्रथनात् पृथिवीनामा(पृथिवी नाम्ना) प्रतिष्ठा च प्रतिष्ठितेः ।", |
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| "text": "तान् होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वांसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "तान् होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वांसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥ १ ॥" |
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| | "अपाने तृप्यति वाक् तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यामग्निस्तृप्यत्यग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किञ्च पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २१ ॥" |
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| | "उदाने तृप्यति वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यत्याकाशस्तृप्यत्याकाशे तृप्यति यत्किञ्च वायुश्चाऽकाशश्चाधितिष्ठतस्तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २३ ॥" |
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| "text": "उदानो वायुरित्येक ऊर्ध्वद्वाराधिपश्च सः ॥\nस एवाऽकाशनामा च लक्ष्म्याविष्टो विशेषतः ।\nपृथिवीनामिका श्रीस्तु द्यौर्दिशो विद्युदेव च ॥\nवायुपत्नी समुद्दिष्टा तत्तद्द्वाराधिपाश्च ते ।\nअधितिष्ठन्ति ते सर्वे नारायणमनामयम् ॥\nयद् विष्णुर्ज्ञानरूपत्वात् किमानन्दस्वरूपतः ।\nएतेषु तृप्तेषु हरिस्तृप्यत्येषां प्रियो ह्यसौ ॥\nवैश्वानरोपासकानां नानावर्गनिरूपणम्\nसूर्यप्रसादात्तु नराः पूर्वद्वारेण केशवम् ।\nप्राप्नुवन्त्यथ सोमस्य प्रसादात् पितरस्तथा ॥\nद्वारेण दक्षिणेनैव गन्धर्वाः पश्चिमेन तु ।\nअग्निप्रसादाद् ऋषय उत्तरेणेन्द्रसंश्रयात् ॥\nशिवाद्या वायुमाश्रित्य यान्त्यूर्ध्वेण हरिं सुराः ॥\nवैश्वानराख्यविष्णोस्तु सम्यग्ज्ञानेन सर्वशः ।" | | "lines": [ |
| | "उदानो वायुरित्येक ऊर्ध्वद्वाराधिपश्च सः ॥", |
| | "स एवाऽकाशनामा च लक्ष्म्याविष्टो विशेषतः ।", |
| | "पृथिवीनामिका श्रीस्तु द्यौर्दिशो विद्युदेव च ॥", |
| | "वायुपत्नी समुद्दिष्टा तत्तद्द्वाराधिपाश्च ते ।", |
| | "अधितिष्ठन्ति ते सर्वे नारायणमनामयम् ॥", |
| | "यद् विष्णुर्ज्ञानरूपत्वात् किमानन्दस्वरूपतः ।", |
| | "एतेषु तृप्तेषु हरिस्तृप्यत्येषां प्रियो ह्यसौ ॥", |
| | "वैश्वानरोपासकानां नानावर्गनिरूपणम्", |
| | "सूर्यप्रसादात्तु नराः पूर्वद्वारेण केशवम् ।", |
| | "प्राप्नुवन्त्यथ सोमस्य प्रसादात् पितरस्तथा ॥", |
| | "द्वारेण दक्षिणेनैव गन्धर्वाः पश्चिमेन तु ।", |
| | "अग्निप्रसादाद् ऋषय उत्तरेणेन्द्रसंश्रयात् ॥", |
| | "शिवाद्या वायुमाश्रित्य यान्त्यूर्ध्वेण हरिं सुराः ॥", |
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| "text": "‘वैश्वानरज्ञानयोग्याः साक्षादेव सुराः स्मृताः ।\nतस्मात् तेषां फलं सर्वमन्येषां तु स्वयोग्यतः ॥’इति वैश्वानरविद्यायाम् ।\n‘को न आत्मा किं ब्रह्म’(५.११.१), ‘सोऽयमात्मा चतुष्पाद्’(१.१.१), ‘स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः’(माण्डूक्य.??), ‘अों वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् अोम्’(ब्र.सू.१.२.२४), ‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः’(भ.गी.१४.१५) इत्यादेश्च वैश्वानरो विष्णुरिति सिद्धम् ।\n‘स वायुः स आकाशः’(५.१२.५), ‘वायुश्चाऽकाशश्चाधितिष्ठतः’(५.२३.२) इति वचनाद् वायो रूपमन्याधिष्ठितमाकाशाख्यं वायोः स्वरूपमिति विज्ञायते ।\n‘आकाशनामा विघ्नेशो वायुश्चाकाशकः स्मृतः ।\nआकाश इति लक्ष्मीश्च तथाऽऽकाशो हरिः स्वयम् ॥’इति शब्दनिर्णये ।\n‘सुतेजोविश्वरूपादिभेदेनाङ्गानि मापतेः ।\nअभिन्नान्यपि कथ्यन्ते लोकदृष्टिविभेदतः॥’ इति च ॥" | | "lines": [ |
| | "‘वैश्वानरज्ञानयोग्याः साक्षादेव सुराः स्मृताः ।", |
| | "तस्मात् तेषां फलं सर्वमन्येषां तु स्वयोग्यतः ॥’इति वैश्वानरविद्यायाम् ।", |
| | "‘को न आत्मा किं ब्रह्म’(५.११.१), ‘सोऽयमात्मा चतुष्पाद्’(१.१.१), ‘स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः’(माण्डूक्य.??), ‘अों वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् अोम्’(ब्र.सू.१.२.२४), ‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः’(भ.गी.१४.१५) इत्यादेश्च वैश्वानरो विष्णुरिति सिद्धम् ।", |
| | "‘स वायुः स आकाशः’(५.१२.५), ‘वायुश्चाऽकाशश्चाधितिष्ठतः’(५.२३.२) इति वचनाद् वायो रूपमन्याधिष्ठितमाकाशाख्यं वायोः स्वरूपमिति विज्ञायते ।", |
| | "‘आकाशनामा विघ्नेशो वायुश्चाकाशकः स्मृतः ।", |
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| | "‘सुतेजोविश्वरूपादिभेदेनाङ्गानि मापतेः ।", |
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| | "अों श्वेतकेतुर्हाऽरुणेय आस तं ह पितोवाच श्वेतकेतो वस ब्रह्मचर्यं न वै सोम्यास्मत्कुलीनोऽननूच्य ब्रह्मबन्धुरिव भवतीति ॥ १ ॥" |
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| | "स ह द्वादशवर्ष उपेत्य चतुर्विंशतिवर्षः सर्वान् वेदानधीत्य महामना अनूचानमानी स्तब्ध एयाय तं ह पितोवाच श्वेतकेतो यन्नु सोम्येदं महामना अनूचानमानी स्तब्धोऽस्युत तमादेशमप्राक्ष्यः ॥ २ ॥" |
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| | "यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद् वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् ॥ ४ ॥" |
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| "text": "न वै नूनं भगवन्तस्य(भगवंस्तस्य) एतदवेदिषुर्यद्येतद्(यद्ध्येतत्) अवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवांस्त्वेव मे तद् ब्रवीत्विति यथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "न वै नूनं भगवन्तस्य(भगवंस्तस्य) एतदवेदिषुर्यद्येतद्(यद्ध्येतत्) अवेदिष्यन् कथं मे नावक्ष्यन्निति भगवांस्त्वेव मे तद् ब्रवीत्विति यथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ १ ॥" |
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| | "‘अधीत्यब्दद्वादशत्वाद् द्वादशाब्द इतीरितः ।", |
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| "text": "मृत्पिण्डादिदृष्टान्तानां प्रयोजनकथनम्\n‘यथा मृत्पिण्डविज्ञानात् सादृश्यादेव मृन्मयः ।\nविज्ञायन्ते तथा विष्णोः सादृश्याज्जगदेव च ॥\nयथा स्वर्णस्य विज्ञानात् सर्वे लोहमयास्तथा ।\nप्राधान्याद्विष्णुविज्ञानाद्विज्ञातं स्याज्जगत् सदा ॥\nअत्यल्पेऽपि हि विज्ञाते सदृशे तादृशं बहु ।\nज्ञायते नखकृन्तन्या(नखनिकृन्तन्या .हृ) यथा सर्वमयोमयम् ॥\nकिमु विष्णोर्बहोर्ज्ञानादत्यल्पं जगदीदृशम् ।\nअनन्याधीनविज्ञानादन्याधीनं तथैव च ।\nमृदयोलोहनाम्नां हि ज्ञानात् साङ्केतिकं यथा ॥’इत्यादिसामसंहितायाम् ।\n‘स्वर्णं लोहमणिश्चैव पुरटं चाभिधीयते’ इति शब्दनिर्णये ।" | | "lines": [ |
| | "मृत्पिण्डादिदृष्टान्तानां प्रयोजनकथनम्", |
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| | "मृत्पिण्डादिनिदर्शनानि नाद्वैतस्यानुकूलानि", |
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| | "‘मृत्तिकेति’, ‘लोहमणिरिति’, ‘कृष्णायसमिति’(कार्ष्णायसमिति) अत्र ‘इति’शब्दा ‘नामधेय’शब्दाश्च व्यर्थाः स्युः । विकारमिथ्यात्विवक्षायां मृत्तिकैव सत्यं लोह एव सत्यं कार्ष्णायसमेव(कृष्णायसमेव) सत्यमित्येव स्यात् । न तु नामधेयादिशब्दाः ।" |
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| | "न च वाचारम्भणमात्रमिति मात्रशब्दोऽस्ति । न चाऽरम्भस्याऽरम्भणमिति युज्यते शब्दः । क्रिया ह्यारम्भणम् ।" |
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| "text": "अनादिः संस्कृतभाषा, इतरास्तु पश्चादागताः’ इति निरूपणम्\nअतो वाचा नाम्नामारम्भणं विकारो विविधाकारो विक्रियमाणः । सत्यं नामधेयं सर्वदा विद्यमानं नामधेयं मृत्तिकेत्यादय इत्यर्थः । सत्त्वेन कालतस्ततं ज्ञायते विद्वद्भिरिति नित्यत्वेन प्रसिद्धमेव सत्यमित्यत्र विवक्षितम् । सङ्केतेन क्रियमाणानि ह्यन्यानि नामानि । अतो विकाररूपाणि । विकारशब्दस्य नियतपुल्लिङ्गत्वादारम्भणं विकार इति वेदाः प्रमाणमितिवद् युज्यते ।" | | "lines": [ |
| | "अनादिः संस्कृतभाषा, इतरास्तु पश्चादागताः’ इति निरूपणम्", |
| | "अतो वाचा नाम्नामारम्भणं विकारो विविधाकारो विक्रियमाणः । सत्यं नामधेयं सर्वदा विद्यमानं नामधेयं मृत्तिकेत्यादय इत्यर्थः । सत्त्वेन कालतस्ततं ज्ञायते विद्वद्भिरिति नित्यत्वेन प्रसिद्धमेव सत्यमित्यत्र विवक्षितम् । सङ्केतेन क्रियमाणानि ह्यन्यानि नामानि । अतो विकाररूपाणि । विकारशब्दस्य नियतपुल्लिङ्गत्वादारम्भणं विकार इति वेदाः प्रमाणमितिवद् युज्यते ।" |
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| "text": "ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "ता आप ऐक्षन्त बह्व्यः स्याम प्रजायेमहीति ता अन्नमसृजन्त तस्माद्यत्र क्व च वर्षति तदेव भूयिष्ठमन्नं भवत्यद्भ्य एव तदन्नाद्यं जायते ॥ ४ ॥ २ ॥" |
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| "text": "एकमेवाद्वितीयं स्वगतभेदवर्जितं समानवर्जितं च ।\n‘एकमेवाद्वितीयं तत् समाभ्यधिकवर्जनात्(समाधिकविवर्जनात् .हृ) ।\nस्वगतायां च भेदानामभावाद् ब्रह्म शाश्वतम् ॥’ इति प्रवृत्ते ।\n‘भेदाभेदनिवृत्त्यर्थमेवशब्दोऽवधारकः ।\nसमाधिकनिवृत्त्यर्थमद्वितीयपदं तथा ॥\nभेदाभेदेऽप्येकशब्दो यतोऽवयविनि स्थितः ।\nएकमेवेत्यतः प्राह नारायणमियं श्रुतिः ॥\nसमे द्वितीयशब्दः स्यादद्वितीयोऽसमत्वतः ।\nसाधिकः(अधिकः) कुत एव स्यादित्याह परमा श्रुतिः॥’ इति सामसंहितायाम् ।" | | "lines": [ |
| | "एकमेवाद्वितीयं स्वगतभेदवर्जितं समानवर्जितं च ।", |
| | "‘एकमेवाद्वितीयं तत् समाभ्यधिकवर्जनात्(समाधिकविवर्जनात् .हृ) ।", |
| | "स्वगतायां च भेदानामभावाद् ब्रह्म शाश्वतम् ॥’ इति प्रवृत्ते ।", |
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| | "भेदाभेदेऽप्येकशब्दो यतोऽवयविनि स्थितः ।", |
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| | "समे द्वितीयशब्दः स्यादद्वितीयोऽसमत्वतः ।", |
| | "साधिकः(अधिकः) कुत एव स्यादित्याह परमा श्रुतिः॥’ इति सामसंहितायाम् ।" |
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| "text": "अद्वितीयशब्दो नाद्वैतसाधकः\nन च विजातीयभेदवर्जनं नाम कुत्रचित् प्रसिद्धम् । तत्प्रमाणाभावाच्च । ‘एक एवाद्वितीयो भगवांस्तत्सदृशपरो(तत्सदृशः परः) नास्ति’ इति च । ‘एक एव भगवान् तत्सदृशपरौ न स्तः’ इति च श्रुतिः।\nविजातीयाभावे येनाश्रुतं श्रुतं भवतीत्यादि विशेषणं च व्यर्थम् । यस्य कस्यचिज्ज्ञानं तज्ज्ञानमेव भवतीति । अज्ञानमपि ज्ञानमेव भवति । भेदाभावात् ।\nन च मिथ्या सत्यमिति भेदः । तस्यैव विजातीयत्वप्राप्तेः । तद्भेदस्य मिथ्यात्वे तदभेदस्य सत्यत्वप्रसङ्गाच्च । मिथ्यासत्ययोरैक्ये इदं मिथ्या इदं सत्यमिदं (इदं सत्यमिति) मिथ्येति भेदाभावाज्जीवेशभेदादेरपि सत्यत्वप्रसङ्गः । अतः परमार्थं ब्रह्मान्यन्मिथ्येत्यपि न युज्यते । अतः (सजातीयः) सजातीयस्वगतभेदोऽधिकाख्यं विजातीयं चात्र निषिध्यते ।" | | "lines": [ |
| | "अद्वितीयशब्दो नाद्वैतसाधकः", |
| | "न च विजातीयभेदवर्जनं नाम कुत्रचित् प्रसिद्धम् । तत्प्रमाणाभावाच्च । ‘एक एवाद्वितीयो भगवांस्तत्सदृशपरो(तत्सदृशः परः) नास्ति’ इति च । ‘एक एव भगवान् तत्सदृशपरौ न स्तः’ इति च श्रुतिः।", |
| | "विजातीयाभावे येनाश्रुतं श्रुतं भवतीत्यादि विशेषणं च व्यर्थम् । यस्य कस्यचिज्ज्ञानं तज्ज्ञानमेव भवतीति । अज्ञानमपि ज्ञानमेव भवति । भेदाभावात् ।", |
| | "न च मिथ्या सत्यमिति भेदः । तस्यैव विजातीयत्वप्राप्तेः । तद्भेदस्य मिथ्यात्वे तदभेदस्य सत्यत्वप्रसङ्गाच्च । मिथ्यासत्ययोरैक्ये इदं मिथ्या इदं सत्यमिदं (इदं सत्यमिति) मिथ्येति भेदाभावाज्जीवेशभेदादेरपि सत्यत्वप्रसङ्गः । अतः परमार्थं ब्रह्मान्यन्मिथ्येत्यपि न युज्यते । अतः (सजातीयः) सजातीयस्वगतभेदोऽधिकाख्यं विजातीयं चात्र निषिध्यते ।" |
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| "text": "‘सर्वोत्तमत्वात् सन्नामा हरिर्नारायणः प्रभुः ।\nसोऽसृजत् प्रथमं देवीं तेजआख्यां श्रियं सतीम् ॥\nतते(तत्र) स्थितेन रूपेण साऽजैव हि यतः सदा ।\nतेज इत्युच्यते तस्माज्जनेर्वा तत एव तु ॥\nयदस्याः सृष्टिकृद्रूपं विद्याख्यं जायते हरेः ।\nमन्वाख्यः प्राण एवास्या अम्नामा जायतेऽथ च (जायते हरेः .हृ)॥\nब्राह्मणादिचतुर्वर्णस्ततश्चान्नभिधो हरः ।\nतेजःसंस्था च सा देवी प्राणोऽप्सु स्थित एव च ॥\nततस्तेजस एवापो जायन्तेऽन्नस्थितो हरः ।\nजायतेऽतोऽद्भ्य एवान्नं पृथिवी त्वन्नरूपिणी ॥ २ ॥’" | | "lines": [ |
| | "‘सर्वोत्तमत्वात् सन्नामा हरिर्नारायणः प्रभुः ।", |
| | "सोऽसृजत् प्रथमं देवीं तेजआख्यां श्रियं सतीम् ॥", |
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| | "यदस्याः सृष्टिकृद्रूपं विद्याख्यं जायते हरेः ।", |
| | "मन्वाख्यः प्राण एवास्या अम्नामा जायतेऽथ च (जायते हरेः .हृ)॥", |
| | "ब्राह्मणादिचतुर्वर्णस्ततश्चान्नभिधो हरः ।", |
| | "तेजःसंस्था च सा देवी प्राणोऽप्सु स्थित एव च ॥", |
| | "ततस्तेजस एवापो जायन्तेऽन्नस्थितो हरः ।", |
| | "जायतेऽतोऽद्भ्य एवान्नं पृथिवी त्वन्नरूपिणी ॥ २ ॥’" |
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| | "तृतीयः खण्डः" |
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| | "तेषां खल्वेषां भूतानां त्रीण्येव बीजानि भवन्त्यण्डजं(भवन्त्याण्डजं) जीवजमुद्भिज्जमिति ॥ १ ॥" |
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| | "सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिममास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणीति ॥ २ ॥" |
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| | "तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणीति सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकामकरोद् यथा तु(नु) खलु सोम्येमास्तिस्रो देवतास्त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ३ ॥ ३ ॥" |
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| "text": "सृष्टेष्वेतेषु भगवानीक्षाञ्चक्रे स केशवः ।\nजीवाख्येनैव रूपेण योऽनिरुद्ध इति स्मृतः ॥\nतेन रूपेण लक्ष्म्यादीन् प्रविष्टो रूपनामनी ।\nकरिष्ये त्रिवृतश्चैतानेकैकं करवाणि च ॥\nइति मत्वा प्रविश्याथ तेभ्य इन्द्रादिनामपि ।\nनामरूपाणि कृतवांस्तांश्चान्योन्यप्रवेशिनः ।\nकृत्वाऽग्निसोमसूर्यादिष्वेतांस्त्रीन् विदधे(निदधे) पुनः ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "सृष्टेष्वेतेषु भगवानीक्षाञ्चक्रे स केशवः ।", |
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| "text": "यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं, यच्छुक्लं तदपां, यत् कृष्णं तदन्नस्यापगादग्नेरग्नित्वं वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं, यच्छुक्लं तदपां, यत् कृष्णं तदन्नस्यापगादग्नेरग्नित्वं वाचाऽऽरम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ १ ॥" |
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| | "यदादित्यस्य रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत् कृष्णं तदन्नस्यापागादादित्यस्याऽदादित्यत्वं(तदन्नस्यापागादादित्यादादित्यत्वं) वाचारम्भणं विकारो नामधेयं त्रीणि रूपाणीत्येव सत्यम् ॥ २ ॥" |
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| "text": "एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुः पूर्वे महाशाला महाश्रोत्रिया न नोऽद्य कश्चनाश्रुतममतमविज्ञातमुदाहरिष्यतीति ते ह्येभ्यो विदञ्चक्रुः ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "यद्वविज्ञातमिवाभूदित्येतासामेव देवानां समास इति तद्विदाञ्चक्रुर्यथा तु(नु) खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तन्मे विजानीहीति ॥ ७ ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "‘अतो यल्लोहितं रूपं श्रियस्तद्रूपसम्भवम् ।\nयच्छुक्लं वायुजं विद्यात् कृष्णं चैव शिवोद्भवम् ॥\nतस्मादग्नेर्यदत्तृत्वमग्निनामप्रवर्तकम् ।\nलक्ष्म्यादिदेवतानां तन्नैवाग्नेरग्निना ततः ॥\nमुख्यैवमाददानत्वमादित्यस्य तदुद्भवम् ।\nअत आदित्यनामैषां नैवादित्यस्य मुख्यतः ॥\nयच्चन्द्राह्लादकत्वं च तत्तेषां चन्द्रता तथा ।\nविद्युद्विद्योतनं (चै)तेषां ततस्ते सर्वनामिनः ॥\nतथैव सर्वरूपं च तद्रूपप्रतिबिम्बितम् ।\nसर्वरूपाश्च ते तस्माल्लोहितादिक्रमेण तु ॥" | | "lines": [ |
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| | "यच्चन्द्राह्लादकत्वं च तत्तेषां चन्द्रता तथा ।", |
| | "विद्युद्विद्योतनं (चै)तेषां ततस्ते सर्वनामिनः ॥", |
| | "तथैव सर्वरूपं च तद्रूपप्रतिबिम्बितम् ।", |
| | "सर्वरूपाश्च ते तस्माल्लोहितादिक्रमेण तु ॥" |
| | ] |
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| "text": "अतोऽन्यनामधेयं तु वाचाऽऽरम्भणहेतुतः ।\nसाङ्केत्येन विकारः स्यात् त्रयाणामेव नित्यता ॥\nयथा लक्ष्म्यादिकानां च नाम सङ्केततोऽन्यगम् ।\nवाचारम्भणहेतोस्तद्विकारो नैव मुख्यतः ॥\nमुख्यं नाम त्रिरूपाणीत्याद्यं वेदोदितं परम् ।\nअतस्तदेव सत्योक्तं मुख्यं सत्यमितीर्यते ॥\nइन्द्रादिनामरूपाणि यथैव त्रिषु मुख्यतः ।\nतदधीनत्वतस्तेषामेषामुच्चबलत्वतः ॥\nशिवनामानि रूपाणि तथा वायोस्तु मुख्यतः ।\nतदीयानि तथा लक्ष्म्यास्तदीयानि हरेस्तथा ॥\nतस्मात् स एव सर्वेशः सर्वरूपः स एव च ।\nसर्वनामा स एवैकः सर्वशक्तिस्तथैव च ॥\nअन्येषां यच्च रूपाद्यं तत्तस्मात् प्रतिबिम्बितम् ।" | | "lines": [ |
| | "अतोऽन्यनामधेयं तु वाचाऽऽरम्भणहेतुतः ।", |
| | "साङ्केत्येन विकारः स्यात् त्रयाणामेव नित्यता ॥", |
| | "यथा लक्ष्म्यादिकानां च नाम सङ्केततोऽन्यगम् ।", |
| | "वाचारम्भणहेतोस्तद्विकारो नैव मुख्यतः ॥", |
| | "मुख्यं नाम त्रिरूपाणीत्याद्यं वेदोदितं परम् ।", |
| | "अतस्तदेव सत्योक्तं मुख्यं सत्यमितीर्यते ॥", |
| | "इन्द्रादिनामरूपाणि यथैव त्रिषु मुख्यतः ।", |
| | "तदधीनत्वतस्तेषामेषामुच्चबलत्वतः ॥", |
| | "शिवनामानि रूपाणि तथा वायोस्तु मुख्यतः ।", |
| | "तदीयानि तथा लक्ष्म्यास्तदीयानि हरेस्तथा ॥", |
| | "तस्मात् स एव सर्वेशः सर्वरूपः स एव च ।", |
| | "सर्वनामा स एवैकः सर्वशक्तिस्तथैव च ॥", |
| | "अन्येषां यच्च रूपाद्यं तत्तस्मात् प्रतिबिम्बितम् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "सर्वस्य भगवदधीनत्वान्नाहङ्कृतिः कार्या\nएक एवाद्वितीयोऽसावतः सर्वोत्तमत्वतः ॥\nमुख्यत्वादेव सन्नामा सत्ततिज्ञानरूपतः ।\nसत्यमित्युच्यते विष्णुस्स त्वं नासि कथञ्चन ॥\nअतोऽनूचानमानी त्वं स्तब्धोऽसि कुत एव तु ।\nत्वत्तोऽधिका अपीन्द्राद्यास्तदुच्चाश्च श्रियादयः ॥\nसर्वोच्चो भगवान् विष्णुर्न स्तम्भोऽस्यापि हि क्वचित् ।\nअतो न विद्वन्मानी स्या महानस्मीति वा मनः ॥\nन ते स्यान्नैव च स्तम्भो ज्ञात्वा विष्णोः परं बलम्(बलं परम्) ।\nन हि विष्णोर्बलं ज्ञात्वा स्तम्भहेतुः कथञ्चन ॥’ इत्यादि सामसंहितायाम् ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "सर्वस्य भगवदधीनत्वान्नाहङ्कृतिः कार्या", |
| | "एक एवाद्वितीयोऽसावतः सर्वोत्तमत्वतः ॥", |
| | "मुख्यत्वादेव सन्नामा सत्ततिज्ञानरूपतः ।", |
| | "सत्यमित्युच्यते विष्णुस्स त्वं नासि कथञ्चन ॥", |
| | "अतोऽनूचानमानी त्वं स्तब्धोऽसि कुत एव तु ।", |
| | "त्वत्तोऽधिका अपीन्द्राद्यास्तदुच्चाश्च श्रियादयः ॥", |
| | "सर्वोच्चो भगवान् विष्णुर्न स्तम्भोऽस्यापि हि क्वचित् ।", |
| | "अतो न विद्वन्मानी स्या महानस्मीति वा मनः ॥", |
| | "न ते स्यान्नैव च स्तम्भो ज्ञात्वा विष्णोः परं बलम्(बलं परम्) ।", |
| | "न हि विष्णोर्बलं ज्ञात्वा स्तम्भहेतुः कथञ्चन ॥’ इत्यादि सामसंहितायाम् ॥ ४ ॥" |
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| | "पञ्चमः खण्डः" |
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| "text": "अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अन्नमशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तत्पुरीषं भवति यो मध्यमस्तन्मांसं योऽणिष्ठस्तन्मनः ॥ १ ॥" |
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| "text": "आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "आपः पीतास्त्रेधा विधीयन्ते तासां यः स्थविष्ठो धातुस्तन्मूत्रं भवति यो मध्यमस्तल्लोहितं योऽणिष्ठः स प्राणः ॥ २ ॥" |
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| | "तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते तस्य यः स्थविष्ठो धातुस्तदस्थि भवति यो मध्यमः स मज्जा योऽणिष्ठः सा वाक् ॥ ३ ॥" |
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| | "अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥४॥५॥" |
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| "text": "मांसादिशब्दैरभिमानिदेवता एव विवक्षिताः\nदेवता एव मांसादिशब्दवाच्याः । तत्र प्रवेशात् । अश्यमानाश्चोपजीव्यत्वात् । न च दुःखं तासाम् । ऐश्वर्यात् । तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृत् इति प्रस्तुतत्वात् ।" | | "lines": [ |
| | "मांसादिशब्दैरभिमानिदेवता एव विवक्षिताः", |
| | "देवता एव मांसादिशब्दवाच्याः । तत्र प्रवेशात् । अश्यमानाश्चोपजीव्यत्वात् । न च दुःखं तासाम् । ऐश्वर्यात् । तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृत् इति प्रस्तुतत्वात् ।" |
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| "text": "उपनिषदुक्तो जीवः परमात्मैव\n‘जीव इति भगवतोऽनिरुद्धस्याख्या’ इति च श्रुतिः(इति च श्रुतिः) । ‘प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुर्जीवस्य जीवः(जीवम्) प्रधानस्य प्रधानं भगवांश्चतुर्मूर्तिः’ इति च ।\n‘प्राणाधारो हरेर्नान्यो(हरेर्नान्यः) जीवशब्दस्ततो हरौ।\nसंसारिणो जीवता तु जननाद्वानतस्तथा(वानतेस्तथा)॥’ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "उपनिषदुक्तो जीवः परमात्मैव", |
| | "‘जीव इति भगवतोऽनिरुद्धस्याख्या’ इति च श्रुतिः(इति च श्रुतिः) । ‘प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुर्जीवस्य जीवः(जीवम्) प्रधानस्य प्रधानं भगवांश्चतुर्मूर्तिः’ इति च ।", |
| | "‘प्राणाधारो हरेर्नान्यो(हरेर्नान्यः) जीवशब्दस्ततो हरौ।", |
| | "संसारिणो जीवता तु जननाद्वानतस्तथा(वानतेस्तथा)॥’ इति च ।" |
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| "text": "जीवशब्देन संसारिविवक्षायां(जीवशब्दस्य संसारिविषयत्वे .हृ) तत् तेज ऐक्षतेत्यादिना तेषामेव चेतनत्वावगतेर्नामरूपव्याकरणे जीवान्तरानुप्रवेशो(जीवान्तरप्रवेशः .हृ) नापेक्षितः।\n‘प्रसुप्तलोकतन्त्राणां निशाम्य गतिमीश्वरः ।\nत्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥’ इति ।\n‘यावद् बलिं तेऽज हराम काले यथा वयं चान्नमदाम यत्र ।\nयथोभयेषां त इमे ह(तथोभयेषां त इमे हि) लोका बलिं हरन्तोऽन्नमदन्त्यमूढाः॥\nत्वं न स चक्षुः परिदेहि शक्ता देव क्रियार्थे यदनुग्रहेण॥’\nइति तत्त्वानां प्रार्थनानन्तरं भगवत एव तेषु प्रवेशोक्तेर्भागवते ।" | | "lines": [ |
| | "जीवशब्देन संसारिविवक्षायां(जीवशब्दस्य संसारिविषयत्वे .हृ) तत् तेज ऐक्षतेत्यादिना तेषामेव चेतनत्वावगतेर्नामरूपव्याकरणे जीवान्तरानुप्रवेशो(जीवान्तरप्रवेशः .हृ) नापेक्षितः।", |
| | "‘प्रसुप्तलोकतन्त्राणां निशाम्य गतिमीश्वरः ।", |
| | "त्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥’ इति ।", |
| | "‘यावद् बलिं तेऽज हराम काले यथा वयं चान्नमदाम यत्र ।", |
| | "यथोभयेषां त इमे ह(तथोभयेषां त इमे हि) लोका बलिं हरन्तोऽन्नमदन्त्यमूढाः॥", |
| | "त्वं न स चक्षुः परिदेहि शक्ता देव क्रियार्थे यदनुग्रहेण॥’", |
| | "इति तत्त्वानां प्रार्थनानन्तरं भगवत एव तेषु प्रवेशोक्तेर्भागवते ।" |
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| "text": "यतश्च स एव जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठतीति भगवत्येव जीवशब्दः प्रयुज्यते । न ह्यचेतनस्य मोदमानत्वमस्ति । अतोऽन्तर्यामिरूप एव जीवशब्दः ।\n‘भोक्तुस्तु सुखदुःखानामन्तःस्थो जीवनामकः ।\nबहिःस्थितस्तु सन्नामा भगवान् पुरुषोत्तमः ॥’ इति तत्त्वविवेके ।\nअग्नेरग्निरिति नाम मुख्यतो नास्ति । अग्निनामानि त्रीणि रूपाणीति नामधेयं सत्यमित्यादि ॥ ४॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "यतश्च स एव जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठतीति भगवत्येव जीवशब्दः प्रयुज्यते । न ह्यचेतनस्य मोदमानत्वमस्ति । अतोऽन्तर्यामिरूप एव जीवशब्दः ।", |
| | "‘भोक्तुस्तु सुखदुःखानामन्तःस्थो जीवनामकः ।", |
| | "बहिःस्थितस्तु सन्नामा भगवान् पुरुषोत्तमः ॥’ इति तत्त्वविवेके ।", |
| | "अग्नेरग्निरिति नाम मुख्यतो नास्ति । अग्निनामानि त्रीणि रूपाणीति नामधेयं सत्यमित्यादि ॥ ४॥ ५ ॥" |
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| | "दध्नः सोम्यः मथ्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तत्सर्पिर्भवति ॥ १ ॥" |
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| | "एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तन्मनो भवति ॥ २ ॥" |
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| | "अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयी वागिति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति (यथा)तथा सोम्येति होवाच ॥ ५ ॥६॥" |
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| "text": "स ह पञ्चदशाहानि नाऽशाथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य यजूंषि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "स ह पञ्चदशाहानि नाऽशाथ हैनमुपससाद किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य यजूंषि सामानीति स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति ॥ २ ॥" |
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| "text": "तं होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात् तेन ततोऽपि न बहु दहेदेवं सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टा स्यात् तयैतर्हि वेदान् नानुभवस्याशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "तं होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात् तेन ततोऽपि न बहु दहेदेवं सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टा स्यात् तयैतर्हि वेदान् नानुभवस्याशानाथ मे विज्ञास्यसीति ॥ ३ ॥" |
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| | "स हाशाथ हैनमुपससाद तं ह यत्किञ्च पप्रच्छ सर्वं ह प्रतिपेदे ॥ ४ ॥ तं ह होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय प्रज्वलयेत् तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥५॥" |
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| | "तं ह होवाच यथा सोम्य महतोऽभ्याहितस्यैकमङ्गारं खद्योतमात्रं परिशिष्टं तं तृणैरुपसमाधाय प्रज्वलयेत् तेन ततोऽपि बहु दहेत् ॥५॥" |
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| | "एवं सोम्य ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टाऽभूत् साऽन्नेनोपसमाहिता प्राज्वालीत् तयैतर्हि वेदाननुभवस्यन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणस्तेजोमयो वागिति तद्धास्य विजज्ञाविति विजज्ञाविति ॥ ६ ॥ ७ ॥" |
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| | "(तदेष श्लोकः-", |
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| "text": "उद्दालको हाऽरुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः(यत्रायं पुरुषः .शाखान्तरपाठः) स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "उद्दालको हाऽरुणिः श्वेतकेतुं पुत्रमुवाच स्वप्नान्तं मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषः(यत्रायं पुरुषः .शाखान्तरपाठः) स्वपिति नाम सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति तस्मादेनं स्वपितीत्याचक्षते स्वं ह्यपीतो भवति ॥ १ ॥" |
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| | "स यथा शकुनिः सूत्रेण प्रबद्धः दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपाश्रयत(उपश्रयते .श) एवमेव खलु सोम्यैतन्मनो दिशं दिशं पतित्वाऽन्यत्राऽयतनमलब्ध्वा प्राणमेवोपाश्रयते(उपाश्रयते .श) प्राणबन्धनं हि सोम्य मन इति ॥ २ ॥" |
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| "text": "स्वप्नस्यान्तः(स्वप्नान्तः .हृ) सुषुप्तिः ।\n‘स्वातन्त्र्यात् स्व इति प्रोक्तो विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः ।\nतं प्राप्नोति मनोनामा संसारी स्वपितीत्यतः ॥’ इति च ।\nमननान्मनोनामा संसारी ।" | | "lines": [ |
| | "स्वप्नस्यान्तः(स्वप्नान्तः .हृ) सुषुप्तिः ।", |
| | "‘स्वातन्त्र्यात् स्व इति प्रोक्तो विष्णुः सर्वेश्वरेश्वरः ।", |
| | "तं प्राप्नोति मनोनामा संसारी स्वपितीत्यतः ॥’ इति च ।", |
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| "text": "अशनापिपासे(अशनायापिपासे) मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "अशनापिपासे(अशनायापिपासे) मे सोम्य विजानीहीति यत्रैतत्पुरुषोऽशिशिषति नामाप एव तदशितं नयन्ते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तदप आचक्षतेऽशनायेति तत्रैतच्छुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ३ ॥" |
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| | "तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्रान्नादेवमेव खलु सोम्यान्नेन शुङ्गेनापोमूलमन्विच्छद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः ॥ ४ ॥" |
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| | "अथ यत्रैतत्पुरुषः पिपासति नाम तेज एव तत्पीतं नयते तद्यथा गोनायोऽश्वनायः पुरुषनाय इत्येवं तत्तेज आचष्ट उदन्येति तत्रैतदेव शुङ्गमुत्पतितं सोम्य विजानीहि नेदममूलं भविष्यतीति ॥ ५ ॥" |
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| | "तस्य क्व मूलं स्यादन्यत्राद्भ्योऽद्भ्यः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः यथा तु खलु सोम्येमास्तिस्रो देवताः पुरुषं प्राप्य त्रिवृत् त्रिवृदेकैका भवति तदुक्तं पुरस्तादेव भवत्यस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम् ॥ ६ ॥" |
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| "text": "‘शुङ्गमित्यङ्कुरं प्रोक्तं तन्मूलं भगवान् हरिः ।\nजगतो मूलमप्येष निमित्तं न विकारवान् ॥\nबीजजीवो यथा मूलमङ्कुरस्याविकारतः ।\nयथा पिता पुत्रतन्वास्तद्देहो(पुत्रतन्वस्तद्देहो) हि विकारवान् ॥\nएवं हरिर्मूलमपि न विकारः(विकारी .हृ) कथञ्चन ॥’ इति च ।\nप्राथम्याच्च तेजआद्या लक्ष्म्यादय इति सिद्धम् ।\n‘तेजोऽभिमानिनी लक्ष्मीः प्राणस्त्वबभिमानवान् ।\nअन्नाभिमानी रुद्रश्च तिस्रस्ता देवताः पुरा ॥’ इति च ब्रह्माण्डे ।" | | "lines": [ |
| | "‘शुङ्गमित्यङ्कुरं प्रोक्तं तन्मूलं भगवान् हरिः ।", |
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| | "‘शरीरधातुकृत्त्वेन लक्ष्म्याद्याश्च मुमुक्षुणा ।", |
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| "text": "मुक्तौ मरणावस्थायां च देवतानां लयक्रमकथनम्\nमुक्तावुमा तु वागाख्या रुद्रं याति मनोऽभिधम् ।\nवायुं याति शिवश्चापि वायुश्तेजोऽभिधां श्रियम् ॥\nवायुमादाय सा देवी याति विष्णुं परात् परम् ।\nद्वारमात्रा तु सा देवी वायुप्राप्यो जनार्दनः ॥\nमृतिकाले च मुक्तौ च पुरुषा वाचमाप्नुयुः ॥ इति सत्तत्त्वे ।" | | "lines": [ |
| | "मुक्तौ मरणावस्थायां च देवतानां लयक्रमकथनम्", |
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| "text": "स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ७ ॥ ८ ॥" |
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| "text": "‘योऽसौ नियमनाद् विष्णुः सारत्वात् स इति स्मृतः ।\nअणिमा सूक्ष्मतो गम्य ऐतदात्म्यं च तद्वशम् ॥\nपरानन्दत्वतः सत्य(सत्यम्) आत्मा पूर्णगुणत्वतः ।\nसत्यतो नासि तत्वं हि माभूत् ते स्तब्धता ततः ॥" | | "lines": [ |
| | "‘योऽसौ नियमनाद् विष्णुः सारत्वात् स इति स्मृतः ।", |
| | "अणिमा सूक्ष्मतो गम्य ऐतदात्म्यं च तद्वशम् ॥", |
| | "परानन्दत्वतः सत्य(सत्यम्) आत्मा पूर्णगुणत्वतः ।", |
| | "सत्यतो नासि तत्वं हि माभूत् ते स्तब्धता ततः ॥" |
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| "text": "असुराः स्तब्धतां याता ब्रह्माहमिति मानिनः ।\nअसत्यं जगदित्याहुः सिद्धोऽहं बलवानिति ॥\nअनीश्वरं जगच्चाहुरप्रतिष्ठं(जगत् प्राहुरप्रतिष्ठं) तथैव च ।\nचेतनैकत्वविषयान् वेदानाहुश्च सर्वशः ॥\nकुतर्कपरमा नित्यं न सहन्ते गुणान् हरेः ।\nशास्त्रतत्त्वमविज्ञाय ब्रूयुर्वेदेषु(देवेषु) चैकताम् ॥\nयान्ति चैव तमो घोरं परमात्मविनिन्दकाः ।" | | "lines": [ |
| | "असुराः स्तब्धतां याता ब्रह्माहमिति मानिनः ।", |
| | "असत्यं जगदित्याहुः सिद्धोऽहं बलवानिति ॥", |
| | "अनीश्वरं जगच्चाहुरप्रतिष्ठं(जगत् प्राहुरप्रतिष्ठं) तथैव च ।", |
| | "चेतनैकत्वविषयान् वेदानाहुश्च सर्वशः ॥", |
| | "कुतर्कपरमा नित्यं न सहन्ते गुणान् हरेः ।", |
| | "शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय ब्रूयुर्वेदेषु(देवेषु) चैकताम् ॥", |
| | "यान्ति चैव तमो घोरं परमात्मविनिन्दकाः ।" |
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| "text": "आलम्ब्य तन्मतं न त्वमेकत्वं विद्धि विष्णुना ॥\nएकत्वाभावतो(एकताभावतः .हृ) नैव भवेथाश्च महामनाः ।\nतन्निष्ठा हि प्रजा यस्मात् तत्प्रतिष्ठाश्च मोक्षगाः ॥\nतन्मूलाश्च यतस्तासां तद्भावः(सद्भावः) कुत एव तु ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "आलम्ब्य तन्मतं न त्वमेकत्वं विद्धि विष्णुना ॥", |
| | "एकत्वाभावतो(एकताभावतः .हृ) नैव भवेथाश्च महामनाः ।", |
| | "तन्निष्ठा हि प्रजा यस्मात् तत्प्रतिष्ठाश्च मोक्षगाः ॥", |
| | "तन्मूलाश्च यतस्तासां तद्भावः(सद्भावः) कुत एव तु ॥ ८ ॥" |
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| | "नवमः खण्डः" |
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| | "यथा सोम्य मधु मधुकृतो निस्तिष्ठन्ति नानात्ययानां वृक्षाणां रसानां(रसान् .पा) समवहारमेकतांं गमयन्ति ॥ १ ॥" |
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| | "ते यथा तत्र न विवेकं लभन्तेऽमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्म्यमुष्याहं वृक्षस्य रसोऽस्मीत्येवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति ॥ २ ॥" |
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| | "त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यत् भवन्ति तत्तदा भवन्ति ॥ ३ ॥" |
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| "text": "स एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ(ऽ)तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "स एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽ(ऽ)तत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ४ ॥ ९ ॥" |
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| "text": "यदि स्वतोऽन्यः परमो देहेऽस्मिन् संव्यवस्थितः ॥\nन दृश्यते कुत इति भूयः पप्रच्छ पुत्रकः ।\nअज्ञैरदृश्यमानोऽपि न भेदो नास्ति पुत्रक ॥\nयथा पुष्परसा युक्ता अजानन्तोऽपि भेदिनः ।\nअजानन्तोऽपि पुरुषास्तथा विष्णोर्हि भेदिनः ॥\nइति पित्रोपदिष्टः सन् पुनः पप्रच्छ तं पुनः ।\nचेतनानामविज्ञानं कथमित्येव चिन्तयन् ॥\nतं प्रत्याह ........... ........... ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
| | "यदि स्वतोऽन्यः परमो देहेऽस्मिन् संव्यवस्थितः ॥", |
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| | "इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात् प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात् प्रतीच्यस्ताः समुद्रात् समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न विदुरियमहमस्मीयमहमस्मीति ॥ १ ॥" |
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| | "एवमेव खलु सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामहे इति त इह व्याघ्रो वा सिंहो वा वृको वा वराहो वा कीटो वा पतङ्गो वा दंशो वा मशको वा यद्यद् भवन्ति तत् तदा भवन्ति ॥ २ ॥" |
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| | "अस्य सोम्य महतो वृक्षस्य यो मूलेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद् यो मध्येऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेद् योऽग्रेऽभ्याहन्याज्जीवन् स्रवेत् स एष जीवेनात्मनाऽनुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति ॥ १ ॥" |
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| | "स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १२ ॥" |
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| "text": "ज्ञायते न कथं स्वस्मिन् सूक्ष्मे ज्ञाते परो हरिः ।\nतत्रस्थ इति पृष्ट संस्तमाहोद्दालकः सुतम् ॥\nवटबीजे यथा सूक्ष्मे महान्न्यग्रोधभावयुक् ।\nन दृश्यतेऽभिमानी स एवं जीवगतो हरिः ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "ज्ञायते न कथं स्वस्मिन् सूक्ष्मे ज्ञाते परो हरिः ।", |
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| | "लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह(तद्ध) तथा चकार तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद ॥ १ ॥" |
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| | "यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्त्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यभिप्रास्यैतदथ मोपसीदथा इति तद्ध तथा चकार तच्छश्वत् संवर्तते तं होवाचात्र वाव किल स सोम्यैतमणिमानं न निभालयसेऽत्रैव किलेति ॥ २ ॥" |
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| | "स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत् सत्यं स आत्माऽतत्त्वमसि श्वेतकेतो इति भूय एव मा भगवान् विज्ञापयत्विति तथा सोम्येति होवाच ॥ ३ ॥ १३ ॥" |
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| "text": "कथं दृश्येत तच्छक्तिः पृथक् तस्य ह्यदर्शने ।\nइति भावयुतं प्राह पुत्रमुद्दालकः पुनः ॥\nयथाप्सु लवणं व्याप्तं रसदृष्टौ न दृश्यते(रसदृष्ट्यैव दृश्यते) ।\nएवं चेतनगो विष्णुस्तद्भिन्नोऽपि न दृश्यते ॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "कथं दृश्येत तच्छक्तिः पृथक् तस्य ह्यदर्शने ।", |
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| | "यथा सोम्य पुरुषं गन्धारेभ्योऽभिनद्धाक्षमानीय तं ततोऽतिजने विसृजेत् स यथा तत्र प्राङ्वोदङ्वाऽधराङ्वा प्राध्मायीताऽभिनद्धाक्ष आनीतोऽभिनद्धाक्षो विसृष्टः ॥ १ ॥" |
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| | "तस्य यथाऽभिनहनं प्रमुच्य प्रब्रूयादेतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति स ग्रामाद् ग्रामं पृच्छन् पण्डितो मेधावी गन्धारानेवोपसम्पद्येतैवमेवेहाऽचार्यवान् पुरुषो वेद तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ सम्पत्स्यत इति ॥ २ ॥" |
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| | "कथं स ज्ञायते विष्णुर्भिन्न इत्यत्र चाब्रवीत् ।", |
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| | "पुरुषं सोम्योपतापिनं ज्ञातयः पर्युपासते जानासि मां जानासि मामिति तस्य यावन्न वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायां तावज्जानाति ॥ १ ॥" |
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| "text": "अभेदज्ञानिनां दोषः कीदृशः स्यादितीर्यते ।\nप्राह यस्मात् परस्वानां हर्ता राज्ञा निहन्यते ॥\nकिमु राज्ञोऽपहर्तैवं ब्रह्मस्तेनो निहन्यते(हि हन्यते) ।\nसर्वेषां शास्तृ यद् ब्रह्म तत्स्वरूपतया स्मरन् ॥\nब्रह्मस्तेनो निहन्येत(हि हन्येत) तमस्यन्धे सदैव हि ।\nदोषा ह्यज्ञानपूर्वास्तु बद्ध्वा पुरुषमीशितुः ॥\nविष्णोर्हर्तेति बाधन्ते चाभिमानकृतास्पदम् ।" | | "lines": [ |
| | "अभेदज्ञानिनां दोषः कीदृशः स्यादितीर्यते ।", |
| | "प्राह यस्मात् परस्वानां हर्ता राज्ञा निहन्यते ॥", |
| | "किमु राज्ञोऽपहर्तैवं ब्रह्मस्तेनो निहन्यते(हि हन्यते) ।", |
| | "सर्वेषां शास्तृ यद् ब्रह्म तत्स्वरूपतया स्मरन् ॥", |
| | "ब्रह्मस्तेनो निहन्येत(हि हन्येत) तमस्यन्धे सदैव हि ।", |
| | "दोषा ह्यज्ञानपूर्वास्तु बद्ध्वा पुरुषमीशितुः ॥", |
| | "विष्णोर्हर्तेति बाधन्ते चाभिमानकृतास्पदम् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "id": "Chandogya-742", | | "id": "Chandogya-757", |
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| "chapter": "CHU_C06", | | "chapter": "CHU_C06", |
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| "text": "ततो विचारयन्त्येनं देवता हरिणा सह ॥\nनाहं विष्णुर्न स्वतन्त्रो न च पूर्णगुणोऽस्म्यहम् ।\nमम स्वामी हरिर्नित्यं स्वतन्त्रः पूर्णसद्गुणः(पूर्णषड्गुणः .हृ) ॥\nएवं दार्ढ्यं शपथवद्यदा कुर्यादयं तदा(सदा .हृ) ।\nजीवन्नेव(जानन्नेवं .हृ) न तापी स्यादन्तरानन्दभोगतः(अनन्तानन्तभोगतः, अनन्तानन्दभोगतः .हृ) ॥\nतदा तेभ्यो मोचयित्वा हत्वा मिथ्याभिशंसिनः ।\nस्वकीयं कुरुते विष्णुरन्यथा तैः सह प्रभुः ॥\nतमस्यन्धे पातयति महाकारागृहोपमे ।\nमहान्धे वा पातयति हस्तच्छेदादिसंमिते ॥\nततोऽधरे वा तद्योग्यं दृढाभेदं वधोपमे ।\nतस्मादाचार्यतो ज्ञात्वा विष्णोर्भेदेन पूर्णताम् ॥\nउपासीत ततो मुक्तिं याति नास्त्यत्र संशयः ॥’ इत्यादि सामसंहितायाम् ।" | | "lines": [ |
| | "ततो विचारयन्त्येनं देवता हरिणा सह ॥", |
| | "नाहं विष्णुर्न स्वतन्त्रो न च पूर्णगुणोऽस्म्यहम् ।", |
| | "मम स्वामी हरिर्नित्यं स्वतन्त्रः पूर्णसद्गुणः(पूर्णषड्गुणः .हृ) ॥", |
| | "एवं दार्ढ्यं शपथवद्यदा कुर्यादयं तदा(सदा .हृ) ।", |
| | "जीवन्नेव(जानन्नेवं .हृ) न तापी स्यादन्तरानन्दभोगतः(अनन्तानन्तभोगतः, अनन्तानन्दभोगतः .हृ) ॥", |
| | "तदा तेभ्यो मोचयित्वा हत्वा मिथ्याभिशंसिनः ।", |
| | "स्वकीयं कुरुते विष्णुरन्यथा तैः सह प्रभुः ॥", |
| | "तमस्यन्धे पातयति महाकारागृहोपमे ।", |
| | "महान्धे वा पातयति हस्तच्छेदादिसंमिते ॥", |
| | "ततोऽधरे वा तद्योग्यं दृढाभेदं वधोपमे ।", |
| | "तस्मादाचार्यतो ज्ञात्वा विष्णोर्भेदेन पूर्णताम् ॥", |
| | "उपासीत ततो मुक्तिं याति नास्त्यत्र संशयः ॥’ इत्यादि सामसंहितायाम् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "id": "Chandogya-743", | | "id": "Chandogya-758", |
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| "chapter": "CHU_C06", | | "chapter": "CHU_C06", |
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| "text": "‘स्वमपीतो भवति’ इति श्रुतेरभेदपरत्वनिरासः\nस्वयम्भूरिति विष्णुजत्वाद् विरिञ्च(विष्णुजत्वाद्धि विरिञ्च) उच्यते । न हि विरिञ्चादेव विरिञ्चो जातः । ‘यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्’ इत्यादि श्रुतेः । आत्मा भगवान् । ततो भूतत्वादात्मभूः । ‘दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मसम्भवान्’ इति वचनात् । अ इति विष्णुस्तज्जातत्वादजः ‘अ इति ब्रह्म’ इत्यादि श्रुतेः । ‘वासुदेवात् परो नैव ब्रह्मशब्दोदितो भवेत्’ इत्यादेश्च । अतः स्वशब्दो विष्णावेव प्रसिद्धः । ततः ‘स्वमपीतो भवति’ इति युज्यते ।\nअप्ययो नामाविज्ञेयत्वेन प्रवेशः ।\n‘अविज्ञातं प्रविष्टं यदपीतमिति कीर्त्यते ।\nयथा नद्यः समुद्रे तु यथा विष्णुं लये प्रजाः॥’ इति शब्दनिर्णये ।" | | "lines": [ |
| | "‘स्वमपीतो भवति’ इति श्रुतेरभेदपरत्वनिरासः", |
| | "स्वयम्भूरिति विष्णुजत्वाद् विरिञ्च(विष्णुजत्वाद्धि विरिञ्च) उच्यते । न हि विरिञ्चादेव विरिञ्चो जातः । ‘यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्’ इत्यादि श्रुतेः । आत्मा भगवान् । ततो भूतत्वादात्मभूः । ‘दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मसम्भवान्’ इति वचनात् । अ इति विष्णुस्तज्जातत्वादजः ‘अ इति ब्रह्म’ इत्यादि श्रुतेः । ‘वासुदेवात् परो नैव ब्रह्मशब्दोदितो भवेत्’ इत्यादेश्च । अतः स्वशब्दो विष्णावेव प्रसिद्धः । ततः ‘स्वमपीतो भवति’ इति युज्यते ।", |
| | "अप्ययो नामाविज्ञेयत्वेन प्रवेशः ।", |
| | "‘अविज्ञातं प्रविष्टं यदपीतमिति कीर्त्यते ।", |
| | "यथा नद्यः समुद्रे तु यथा विष्णुं लये प्रजाः॥’ इति शब्दनिर्णये ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Chandogya-744", | | "id": "Chandogya-759", |
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Line 9,586: |
| "chapter": "CHU_C06", | | "chapter": "CHU_C06", |
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| "text": "न च जीवस्य तद्भावोऽस्ति । उत्थितस्य सुप्तिसंसारयोः परामर्शदर्शनात् । ‘अहं विश्वं भुवनमभ्यभवाम्’। ‘आजन्ममरणं स्मृत्वा मुक्ता हर्षमवाप्नुयुः’ इति तद्भावस्यापरामर्शाच्च । ‘प्राज्ञेनाऽत्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्’ इत्यादिश्रुतेश्च । ‘सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन’ इति च भगवद्वचनम् ।" | | "lines": [ |
| | "न च जीवस्य तद्भावोऽस्ति । उत्थितस्य सुप्तिसंसारयोः परामर्शदर्शनात् । ‘अहं विश्वं भुवनमभ्यभवाम्’। ‘आजन्ममरणं स्मृत्वा मुक्ता हर्षमवाप्नुयुः’ इति तद्भावस्यापरामर्शाच्च । ‘प्राज्ञेनाऽत्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्’ इत्यादिश्रुतेश्च । ‘सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन’ इति च भगवद्वचनम् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Chandogya-745", | | "id": "Chandogya-760", |
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| "chapter": "CHU_C06", | | "chapter": "CHU_C06", |
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| "text": "नवदृष्टान्ता अपि भेदपरा एव\n‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः।‘, ‘सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति ।’, ‘सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति ।’, ‘स एष जीवेनाऽत्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति’ ।\n‘अण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति ।’\n‘लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह तथा चकार तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति । मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्त्यादाचामेति कथमिति लवणमिति ।’\nअत्र वाव किल सत्सोम्य(किल सोम्य) न निभालयसेऽत्रैव किलेति ।’, ‘एतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति।’, ‘तेजः परस्यां देवतायां तावन्न जानाति(तावज्जानाति) ।’, ‘अपहार्षीत् स्तेनमकार्षीत्।’ इत्यादि नवकृत्वो(नवकृत्वोऽपि) भिन्नस्य वस्तुनो भेदापरिज्ञानादनर्थं सूक्ष्मत्वाद् भेदस्य दुर्ज्ञेयत्वं(दुर्विज्ञेयत्वं) च सदृष्टान्तं तात्पर्येणाऽह ।" | | "lines": [ |
| | "नवदृष्टान्ता अपि भेदपरा एव", |
| | "‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः।‘, ‘सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामह इति ।’, ‘सत आगम्य न विदुः सत आगच्छामह इति ।’, ‘स एष जीवेनाऽत्मनानुप्रभूतः पेपीयमानो मोदमानस्तिष्ठति’ ।", |
| | "‘अण्व्य इवेमा धाना भगव इत्यासामङ्गैकां भिन्धीति भिन्ना भगव इति किमत्र पश्यसीति न किञ्चन भगव इति यं वै सोम्यैतमणिमानं न निभालयस एतस्य वै सोम्यैषोऽणिम्न एवं महान् न्यग्रोधस्तिष्ठति ।’", |
| | "‘लवणमेतदुदकेऽवधायाथ मा प्रातरुपसीदथा इति स ह तथा चकार तं होवाच यद्दोषा लवणमेतदुदकेऽवधा अङ्ग तदाहरेति तद्धावमृश्य न विवेद यथा विलीनमेवाङ्गास्यान्तादाचामेति कथमिति लवणमिति । मध्यादाचामेति कथमिति लवणमित्यन्त्यादाचामेति कथमिति लवणमिति ।’", |
| | "अत्र वाव किल सत्सोम्य(किल सोम्य) न निभालयसेऽत्रैव किलेति ।’, ‘एतां दिशं गन्धारा एतां दिशं व्रजेति।’, ‘तेजः परस्यां देवतायां तावन्न जानाति(तावज्जानाति) ।’, ‘अपहार्षीत् स्तेनमकार्षीत्।’ इत्यादि नवकृत्वो(नवकृत्वोऽपि) भिन्नस्य वस्तुनो भेदापरिज्ञानादनर्थं सूक्ष्मत्वाद् भेदस्य दुर्ज्ञेयत्वं(दुर्विज्ञेयत्वं) च सदृष्टान्तं तात्पर्येणाऽह ।" |
| | ] |
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| "id": "Chandogya-746", | | "id": "Chandogya-761", |
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| "text": "नैकोऽपि दृष्टान्तोऽभेदपरः\nन चाभेदे कश्चिद् दृष्टान्त उक्तः। न हि शकुनिसूत्रयोर्नानावृक्षरसानां नदीसमुद्रयोर्वृक्षपरमात्मनोर्धानापरमात्मनोर्लवणोदकयोः पुरुषगन्धारयोर्नियतज्ञानानियतज्ञानयोश्चोरापह्रियमाणयोश्चाभेदोऽस्ति ।" | | "lines": [ |
| | "नैकोऽपि दृष्टान्तोऽभेदपरः", |
| | "न चाभेदे कश्चिद् दृष्टान्त उक्तः। न हि शकुनिसूत्रयोर्नानावृक्षरसानां नदीसमुद्रयोर्वृक्षपरमात्मनोर्धानापरमात्मनोर्लवणोदकयोः पुरुषगन्धारयोर्नियतज्ञानानियतज्ञानयोश्चोरापह्रियमाणयोश्चाभेदोऽस्ति ।" |
| | ] |
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| "chapter": "CHU_C06", | | "chapter": "CHU_C06", |
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| "text": "विष्णुसर्वोत्तमत्वं सकलशास्त्राणां मुख्यतात्पर्यम्\nमहातात्पर्यविरोधश्चाभेदे । विष्णोः परमोत्कर्षे हि सर्वप्रमाणानां महातात्पर्यं भगवताऽभिहितम् ।\n‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।\nक्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥\nउत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।\nयो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥\nयस्माद् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।\nअतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥\nयो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।\nस सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥\nइति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।\nएतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥’ इति ।\n‘भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।\nसुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥’\n‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।\nयज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥’\n‘मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।\nमयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥’\n‘राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।\nप्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥\nअश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।\nअप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥\nमया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।\nमत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥\nन च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।’\nअवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।\nपरं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥\nमोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।\nराक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं(मोहनीम् .हृ) श्रिताः ॥\nमहात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।\nभजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥’\n‘यो मामजामनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।\nअसम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥’" | | "lines": [ |
| | "विष्णुसर्वोत्तमत्वं सकलशास्त्राणां मुख्यतात्पर्यम्", |
| | "महातात्पर्यविरोधश्चाभेदे । विष्णोः परमोत्कर्षे हि सर्वप्रमाणानां महातात्पर्यं भगवताऽभिहितम् ।", |
| | "‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।", |
| | "क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥", |
| | "उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।", |
| | "यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥", |
| | "यस्माद् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।", |
| | "अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥", |
| | "यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।", |
| | "स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥", |
| | "इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।", |
| | "एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ॥’ इति ।", |
| | "‘भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।", |
| | "सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥’", |
| | "‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।", |
| | "यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥’", |
| | "‘मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।", |
| | "मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥’", |
| | "‘राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।", |
| | "प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥", |
| | "अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।", |
| | "अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥", |
| | "मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।", |
| | "मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥", |
| | "न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।’", |
| | "अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।", |
| | "परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥", |
| | "मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।", |
| | "राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं(मोहनीम् .हृ) श्रिताः ॥", |
| | "महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।", |
| | "भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥’", |
| | "‘यो मामजामनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।", |
| | "असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥’" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "CHU_C06", | | "chapter": "CHU_C06", |
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| "text": "परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।\nयज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥’\n‘मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।\nसम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥’\n‘ये मां ज्ञात्वा गुणैः पूर्णं न चलन्ति ततः क्वचित् ।\nतैरेवाऽप्यो न चैवान्यैरहं सर्वेश्वरेश्वरः ॥\nये तु मद्गुणसम्पूर्तौ ज्ञानस्नेहस्थिरात्मकाः ।\nतेषां हस्तगतो मोक्षो मामेव स्मरतां सदा ॥\nये मन्यन्ते गुणापूर्तिं तमस्तेषां परायणम्।\nन च तेभ्यो प्रियो मह्यं यश्च स्याद्गुणपूर्तिवित् ॥\nस मामाप्नोति नियतं न च तस्मात् प्रियो मम ॥\nप्रमाणान्यखिलान्येव तर्काश्चैतत्पराः सदा ।\nएतद्विरुद्धं यन्मानं तर्कश्चाऽभास एव तु (आभास एव सः .हृ)॥’ इत्यादौ(इत्यादि) ॥" | | "lines": [ |
| | "परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।", |
| | "यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥’", |
| | "‘मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।", |
| | "सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥’", |
| | "‘ये मां ज्ञात्वा गुणैः पूर्णं न चलन्ति ततः क्वचित् ।", |
| | "तैरेवाऽप्यो न चैवान्यैरहं सर्वेश्वरेश्वरः ॥", |
| | "ये तु मद्गुणसम्पूर्तौ ज्ञानस्नेहस्थिरात्मकाः ।", |
| | "तेषां हस्तगतो मोक्षो मामेव स्मरतां सदा ॥", |
| | "ये मन्यन्ते गुणापूर्तिं तमस्तेषां परायणम्।", |
| | "न च तेभ्यो प्रियो मह्यं यश्च स्याद्गुणपूर्तिवित् ॥", |
| | "स मामाप्नोति नियतं न च तस्मात् प्रियो मम ॥", |
| | "प्रमाणान्यखिलान्येव तर्काश्चैतत्पराः सदा ।", |
| | "एतद्विरुद्धं यन्मानं तर्कश्चाऽभास एव तु (आभास एव सः .हृ)॥’ इत्यादौ(इत्यादि) ॥" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Chandogya-749", | | "id": "Chandogya-764", |
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Line 9,690: |
| "chapter": "CHU_C06", | | "chapter": "CHU_C06", |
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| "text": "‘तं भूतिरिति देवा उपासाञ्चक्रिरे ते बभूवुस्तस्माद्धाप्येतर्हि सुप्तो भूर्भूरित्येव प्रश्वसित्यभूतिरित्यसुरास्ते ह पराबभूवुः ।’\n‘भूमैव देवः परमो ह्युपास्यो नैवाभूमा फलमेषां विधत्ते ।\nतस्माद् भूमा गुणतो वै विशिष्टो यथा क्रतुः कर्ममध्ये विशिष्टः ॥’\n‘असुन्वन्तं समं जहि दूणाशं यो न मे मयः ।\nअस्मभ्यमस्य वेदनं दद्धि सूरिश्चिदोहते ॥’\n‘सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये।\nएतावानस्य महिमा अतो ज्यायांश्च पूरुषः ॥’\n‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ।’" | | "lines": [ |
| | "‘तं भूतिरिति देवा उपासाञ्चक्रिरे ते बभूवुस्तस्माद्धाप्येतर्हि सुप्तो भूर्भूरित्येव प्रश्वसित्यभूतिरित्यसुरास्ते ह पराबभूवुः ।’", |
| | "‘भूमैव देवः परमो ह्युपास्यो नैवाभूमा फलमेषां विधत्ते ।", |
| | "तस्माद् भूमा गुणतो वै विशिष्टो यथा क्रतुः कर्ममध्ये विशिष्टः ॥’", |
| | "‘असुन्वन्तं समं जहि दूणाशं यो न मे मयः ।", |
| | "अस्मभ्यमस्य वेदनं दद्धि सूरिश्चिदोहते ॥’", |
| | "‘सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये।", |
| | "एतावानस्य महिमा अतो ज्यायांश्च पूरुषः ॥’", |
| | "‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ।’" |
| | ] |
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| "text": "‘सृष्टिः स्थितिश्च संहारो नियतिर्ज्ञानमावृतिः ।\nबन्धमोक्षौ च कथ्यन्ते यस्योत्कर्षप्रसिद्धये ॥\nयस्योत्कर्षप्रसिद्ध्यर्थं सर्वे वेदाश्च(सर्ववेदाश्च) युक्तयः ।\nज्ञात्वैव च यदुत्कर्षं मुच्यन्ते स हरिः परः॥’\n‘अद्या तमस्य महिमानमायवोऽनुष्टुवन्ति पूर्वथा’ इत्यादिश्रुतिश्च विष्णोरुत्कर्षे महातात्पर्यं कथयति ।\n‘महातत्परता विष्णोरुत्कर्षेऽवान्तरा ततः ।\nअन्यत्र सर्ववाक्यानां युक्तीनां च विशेषतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।\n‘ओं भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति ओम्’(ब्र.सू.३.३.५९) ‘ओं ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ओम्’(ब्र.सू.४.१.५) इत्यादि च निर्णयात्मकं भगवद्वचनम् ।" | | "lines": [ |
| | "‘सृष्टिः स्थितिश्च संहारो नियतिर्ज्ञानमावृतिः ।", |
| | "बन्धमोक्षौ च कथ्यन्ते यस्योत्कर्षप्रसिद्धये ॥", |
| | "यस्योत्कर्षप्रसिद्ध्यर्थं सर्वे वेदाश्च(सर्ववेदाश्च) युक्तयः ।", |
| | "ज्ञात्वैव च यदुत्कर्षं मुच्यन्ते स हरिः परः॥’", |
| | "‘अद्या तमस्य महिमानमायवोऽनुष्टुवन्ति पूर्वथा’ इत्यादिश्रुतिश्च विष्णोरुत्कर्षे महातात्पर्यं कथयति ।", |
| | "‘महातत्परता विष्णोरुत्कर्षेऽवान्तरा ततः ।", |
| | "अन्यत्र सर्ववाक्यानां युक्तीनां च विशेषतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।", |
| | "‘ओं भूम्नः क्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति ओम्’(ब्र.सू.३.३.५९) ‘ओं ब्रह्मदृष्टिरुत्कर्षात् ओम्’(ब्र.सू.४.१.५) इत्यादि च निर्णयात्मकं भगवद्वचनम् ।" |
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| "text": "जीवब्रह्मैक्यस्य न शास्त्रतात्पर्यविषयता\nन च शारीरपराभेदे तात्पर्यमआ इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । ‘अतत्त्वमसि’ इति भेदस्य नवकृत्वोऽभ्यासाच्च । ‘ओं भेदव्यपदेशात् ओम्’(ब्र.सू.१.३.५), ‘ओं भेदव्यपदेशाच्चान्यः ओम्’(ब्र.सू.१.१.२१), ‘ओम् अनुपपत्तेस्तु न शरीरः ओम्’(ब्र.सू.१.२.३), ‘ओं शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ओम्’(ब्र.सू.१.२.२०), ‘ओं पृथगुपदेशात् ओम्’(ब्र.सू.२.३.२८) इत्यादिना सर्वत्र भेदस्यैव भगवता निर्णीतत्वाच्च ।" | | "lines": [ |
| | "जीवब्रह्मैक्यस्य न शास्त्रतात्पर्यविषयता", |
| | "न च शारीरपराभेदे तात्पर्यमआ इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । ‘अतत्त्वमसि’ इति भेदस्य नवकृत्वोऽभ्यासाच्च । ‘ओं भेदव्यपदेशात् ओम्’(ब्र.सू.१.३.५), ‘ओं भेदव्यपदेशाच्चान्यः ओम्’(ब्र.सू.१.१.२१), ‘ओम् अनुपपत्तेस्तु न शरीरः ओम्’(ब्र.सू.१.२.३), ‘ओं शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ओम्’(ब्र.सू.१.२.२०), ‘ओं पृथगुपदेशात् ओम्’(ब्र.सू.२.३.२८) इत्यादिना सर्वत्र भेदस्यैव भगवता निर्णीतत्वाच्च ।" |
| | ] |
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| "text": "‘पुरुष एवेदं सर्वमिति च पुरुषेणेदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।’(पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यमिति । पुरुषेणैवेदं सर्वं व्याप्तं यद् भूतं यच्च भाव्यम् । .हृ) ‘(न भगवान्)न च भगवान् गोत्वेन मनुष्यत्वेन वा भवति । आ तृणादा करीषात् सर्वं भगवानिति मिथ्यादृष्टिरेषा । दधिसक्तवो घृतौदनमित्यादौ व्याप्तशब्दाभावेऽपि व्याप्तशब्दोऽवगम्यते । दधिसिक्ताः सक्तवो घृतसिक्तमोदनम्’(घृतोदनमित्यादिषु व्याप्तिशब्दाभावेऽपि व्याप्तिशब्दोऽवगम्यते । यथा दधिसिक्ताः .हृ) इति च श्रुतिः ।\nपुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यमिति पुरुषेण हीदं नेनीयते(सर्वं नेनीयते)’ इति च । अतः सर्वप्रमाणानां भगवदुत्कर्ष एव महातात्पर्याच्छारीराभेदं वदतां महातात्पर्यविरोधः ।" | | "lines": [ |
| | "‘पुरुष एवेदं सर्वमिति च पुरुषेणेदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भव्यम् ।’(पुरुष एवेदं सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यमिति । पुरुषेणैवेदं सर्वं व्याप्तं यद् भूतं यच्च भाव्यम् । .हृ) ‘(न भगवान्)न च भगवान् गोत्वेन मनुष्यत्वेन वा भवति । आ तृणादा करीषात् सर्वं भगवानिति मिथ्यादृष्टिरेषा । दधिसक्तवो घृतौदनमित्यादौ व्याप्तशब्दाभावेऽपि व्याप्तशब्दोऽवगम्यते । दधिसिक्ताः सक्तवो घृतसिक्तमोदनम्’(घृतोदनमित्यादिषु व्याप्तिशब्दाभावेऽपि व्याप्तिशब्दोऽवगम्यते । यथा दधिसिक्ताः .हृ) इति च श्रुतिः ।", |
| | "पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यमिति पुरुषेण हीदं नेनीयते(सर्वं नेनीयते)’ इति च । अतः सर्वप्रमाणानां भगवदुत्कर्ष एव महातात्पर्याच्छारीराभेदं वदतां महातात्पर्यविरोधः ।" |
| | ] |
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| "text": "जीवब्रह्मैक्यं सकलशास्त्रमुख्यतात्पर्यविरुद्धम्\n‘अज्ञानदुःखासम्बन्धाद् यावज्ज्ञानं शरीरिणः ।\nसर्वदा ज्ञानकं विष्णुमहमस्मीति ये विदुः ॥\nअज्ञानदुःखमन्तारस्ततस्ते नीचतां विदुः(विदः .हृ) ।\nविष्णोरुत्कर्षहर्तॄणां(उत्कर्षहातॄणाम्) नैव तेषां सुखं क्वचित् ॥\nयोऽन्यथा सन्तमीशेशं स्वरूपं प्रतिपद्यते ।\nकिं तेन न कृतं पापं चोरेणेशापहारिणा ॥’\n‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः।\nशास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथा वादबलाः जनाः ॥\nकामक्रोधाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः ।\nब्रह्मस्तेना निरानन्दा(निरालम्बाः) अपक्वमनसोऽशिवाः ॥\nयाथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः।\nवैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ॥\nतेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ॥\n‘यतः स्वरूपतश्चान्यो(स रूपतश्चान्यः .हृ) जातितः श्रुतितोऽर्थतः ।\nकथमस्मि स इत्येव सम्बन्धः(सम्बद्धः .हृ) स्यादसंहितः॥’ इति ।" | | "lines": [ |
| | "जीवब्रह्मैक्यं सकलशास्त्रमुख्यतात्पर्यविरुद्धम्", |
| | "‘अज्ञानदुःखासम्बन्धाद् यावज्ज्ञानं शरीरिणः ।", |
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| | "‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः।", |
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| | ] |
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| "text": "‘बहवः पुरुषा ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु ।\nको ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति ॥\nवैशम्पायन उवाच–\nनैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ।\nबहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ॥\nतथा तं पुरुषं विश्वमाख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥’इति च मोक्षधर्मवचनाच्च ।" | | "lines": [ |
| | "‘बहवः पुरुषा ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु ।", |
| | "को ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति ॥", |
| | "वैशम्पायन उवाच–", |
| | "नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ।", |
| | "बहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ॥", |
| | "तथा तं पुरुषं विश्वमाख्यास्यामि गुणाधिकम् ॥’इति च मोक्षधर्मवचनाच्च ।" |
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| "text": "अभेदपरत्वेन प्रतीयमानानि वाक्यान्यपि वस्तुतः भेदपराणि\n‘हंनाम हन्यमानत्वाज्जीवस्य समुदाहृतम् ।\nजीवादन्यो यतो विष्णुरहंनामा ततः स्मृतः ॥\nस्मीति जीवः समुद्दिष्टः स्मीत्यल्पं सुमितत्वतः ।\nपूर्णत्वादस्मिनामाऽसौ पूर्णपूर्णत्वहेतुतः ॥\nब्रह्मास्मीत्युच्यते विष्णुर्बृहत्पूर्णो यतः सदा ।\nअसौ सूर्यगतो विष्णुर्दूरस्थत्वात् प्रकीर्तितः ॥\nअहंनामा जीवगतो नित्याहेयत्वहेतुतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।" | | "lines": [ |
| | "अभेदपरत्वेन प्रतीयमानानि वाक्यान्यपि वस्तुतः भेदपराणि", |
| | "‘हंनाम हन्यमानत्वाज्जीवस्य समुदाहृतम् ।", |
| | "जीवादन्यो यतो विष्णुरहंनामा ततः स्मृतः ॥", |
| | "स्मीति जीवः समुद्दिष्टः स्मीत्यल्पं सुमितत्वतः ।", |
| | "पूर्णत्वादस्मिनामाऽसौ पूर्णपूर्णत्वहेतुतः ॥", |
| | "ब्रह्मास्मीत्युच्यते विष्णुर्बृहत्पूर्णो यतः सदा ।", |
| | "असौ सूर्यगतो विष्णुर्दूरस्थत्वात् प्रकीर्तितः ॥", |
| | "अहंनामा जीवगतो नित्याहेयत्वहेतुतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।" |
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| "text": "मोक्षेऽपि विद्यमानजीवब्रह्मभेदो नातात्त्विकः\n‘परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः(उत्तमपुरुषः) स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा’, ‘स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा’ ,\n‘यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।\nसोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ॥’\n‘एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । इमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् । एतत्साम गायन्नास्ते ।’\n‘स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येेवाऽत्मनो यद्यत् कामयते तत्तत् सृजते ।’, ‘ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः।’, ’तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति।’, ‘यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति।’\n‘(नानात्वेनाभिसम्बुद्धाः)नानात्वेनाभिसम्बद्धास्तदा तत्कालभाविना ।\nप्रकृतौ करणातीताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः ॥\nसंयोगः प्रकृतेर्नैषां मुक्तानां तत्त्वदर्शनात् ।\nपुरुषान्यबहुत्वेन प्रतीता न प्रवर्तते ॥\nप्रवर्तति पुनः सर्गे तेषां सा न प्रवर्तते ॥\n‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।\nसर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’\nन यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः’ इत्यादिश्रुतिस्मृतिषु सतात्पर्यं मुक्तानां विष्णोर्भेदस्यैवोक्तेः ।" | | "lines": [ |
| | "मोक्षेऽपि विद्यमानजीवब्रह्मभेदो नातात्त्विकः", |
| | "‘परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः(उत्तमपुरुषः) स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा’, ‘स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा’ ,", |
| | "‘यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।", |
| | "सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता ॥’", |
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| | "प्रकृतौ करणातीताः स्वात्मन्येव व्यवस्थिताः ॥", |
| | "संयोगः प्रकृतेर्नैषां मुक्तानां तत्त्वदर्शनात् ।", |
| | "पुरुषान्यबहुत्वेन प्रतीता न प्रवर्तते ॥", |
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| | "अस्मिन्नेव प्रकरणे जीवब्रह्मभेदप्रतिपादकवाक्यानि विपुलानि सन्तीति प्रदर्शनम्।", |
| | "‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः(इमाः प्रजाः .हृ) सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’, ‘सति सम्पद्य न विदुः’(सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामहे इति .हृ) इत्यादौ भेद एव ह्यत्र सतात्पर्यं प्रतिपादितः । ता नद्यः समुद्रादागत्य समुद्रं प्रविशन्ति । स समुद्र एव भवति । न नदीभावं प्राप्नोति । स एव च समुद्रो भवति । समुद्र एव समुद्रो भवति, न नद्य इति भेदस्यैवावधारणं क्रियते ।" |
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| "chapter": "CHU_C06", | | "chapter": "CHU_C06", |
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| "text": "अस्मिन्नेव प्रकरणे जीवब्रह्मभेदप्रतिपादकवाक्यानि विपुलानि सन्तीति प्रदर्शनम्।\n‘सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः(इमाः प्रजाः .हृ) सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः’, ‘सति सम्पद्य न विदुः’(सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पत्स्यामहे इति .हृ) इत्यादौ भेद एव ह्यत्र सतात्पर्यं प्रतिपादितः । ता नद्यः समुद्रादागत्य समुद्रं प्रविशन्ति । स समुद्र एव भवति । न नदीभावं प्राप्नोति । स एव च समुद्रो भवति । समुद्र एव समुद्रो भवति, न नद्य इति भेदस्यैवावधारणं क्रियते ।" | | "lines": [ |
| | "नानुकूलश्चोरदृष्टान्तोऽभेदस्य", |
| | "न च स्वकीयस्य ब्रह्मभावस्याज्ञोऽपहर्ता भवति । किं त्वविद्यमानब्रह्मभावाभिमन्तैवपहर्ता । न हि स्वकीयवित्तपरित्याग्यपहर्ता भवति । किन्तु परस्वहर्तैव । तस्मादविद्यमानब्रह्मभावाभिमन्तैव ‘अपहार्षीत् स्तेयमकार्षीदआ’ इति दृष्टान्तपूर्वकमुच्यते ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| "id": "Chandogya-758", | | "id": "Chandogya-774", |
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| "text": "अदुःखित्वपूर्णज्ञानानन्दस्वातन्त्र्यादि ब्रह्मस्वभावाननुभवं स्वात्मनोऽपि ज्ञात्वैव तद्भावाभिमतेः स्तैन्यम् । परकीयाभिमतेरपहारः ।\n‘परस्वभावाभिमतेरपहर्ता स्ववञ्चनात् ।\nस्तेनश्चाभेदवेत्ता तु ब्रह्मणो हन्यते सदा ॥’ इति तत्त्वविवेके ।" | | "lines": [ |
| | "अदुःखित्वपूर्णज्ञानानन्दस्वातन्त्र्यादि ब्रह्मस्वभावाननुभवं स्वात्मनोऽपि ज्ञात्वैव तद्भावाभिमतेः स्तैन्यम् । परकीयाभिमतेरपहारः ।", |
| | "‘परस्वभावाभिमतेरपहर्ता स्ववञ्चनात् ।", |
| | "स्तेनश्चाभेदवेत्ता तु ब्रह्मणो हन्यते सदा ॥’ इति तत्त्वविवेके ।" |
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| "text": "न च दार्ढ्यमात्रे दृष्टान्तोऽयम्(दार्ढ्यमात्रदृष्टान्तोऽयम्)। ‘स यदि तस्य कर्ता भवति’, ‘स यदि तस्य कर्ता न भवति’ इति हतिमुक्त्योरपहारानपहारैकहेतुकत्वश्रुतेः(हेतुत्वश्रुतेः) । अन्यथा यदि दृढो भवति यद्यदृढो भवतीत्युच्येत ।" | | "lines": [ |
| | "न च दार्ढ्यमात्रे दृष्टान्तोऽयम्(दार्ढ्यमात्रदृष्टान्तोऽयम्)। ‘स यदि तस्य कर्ता भवति’, ‘स यदि तस्य कर्ता न भवति’ इति हतिमुक्त्योरपहारानपहारैकहेतुकत्वश्रुतेः(हेतुत्वश्रुतेः) । अन्यथा यदि दृढो भवति यद्यदृढो भवतीत्युच्येत ।" |
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| "text": "न च सत्यासत्यमात्रम् । तदा सत्यानृतवाग्दृष्टान्तेन पूर्तेरपहारदृष्टान्तो न स्यात् । तस्मादभेदज्ञानेन महान्तं विनाशं प्रदर्श्य भेदज्ञानान्मुक्तिपरमेवैतद्वाक्यम् ।" | | "lines": [ |
| | "न च सत्यासत्यमात्रम् । तदा सत्यानृतवाग्दृष्टान्तेन पूर्तेरपहारदृष्टान्तो न स्यात् । तस्मादभेदज्ञानेन महान्तं विनाशं प्रदर्श्य भेदज्ञानान्मुक्तिपरमेवैतद्वाक्यम् ।" |
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| "text": "भेदाभेदोऽपि शास्त्रमहातात्पर्यविरोधी\nभिन्नस्यैवोत्कर्षो भवति(भवतीति .हृ) । अभिन्नस्य कुत उत्कर्षः स्यात् ? अज्ञानदुःखयुक्तत्वाच्च ।\nन हि तत्पक्षे परमार्थदुःखिनो भ्रान्त्या दुःखिनश्च तत्काले कश्चिद् विशेषः । अस्वातन्त्र्यं च भ्रान्तस्य निश्चितमेव । न हि भ्रमः स्वेच्छया युज्यते ।\n‘स्वात्मानं परमं विष्णुं विदित्वाऽपि स राघवः ।\nदैत्यानां मोहनार्थाय दर्शयामास मूढताम् ॥’ इति (च) पाद्मे ।\n‘ओं जगद्व्यापारवर्जम् ओम्’(ब्र.सू.४.४.१७), ‘ ...प्रकरणात् ’(ब्र.सू.४.४.१८) इत्यादिनैश्वर्यमर्यादया मुक्तानां ब्रह्मणश्च भेदस्यैव निर्णीतत्वाच्च भगवता ।\n‘ब्रह्मसूत्रानुसारेण वेदाद्यं सर्वमेव च ।\nयोज्यं न ब्रह्मसूत्राणि दृश्यमानार्थतोऽन्यथा ॥’ इति च ब्रह्मवैवर्ते ।\n‘चोरदृष्टान्ततो यस्य ह्यभेदज्ञानतस्तमः ।\nभेदेनोत्कर्षवेत्तुस्तु मुक्तिरेव ह्यचोरवत् ॥’ इति च ।" | | "lines": [ |
| | "भेदाभेदोऽपि शास्त्रमहातात्पर्यविरोधी", |
| | "भिन्नस्यैवोत्कर्षो भवति(भवतीति .हृ) । अभिन्नस्य कुत उत्कर्षः स्यात् ? अज्ञानदुःखयुक्तत्वाच्च ।", |
| | "न हि तत्पक्षे परमार्थदुःखिनो भ्रान्त्या दुःखिनश्च तत्काले कश्चिद् विशेषः । अस्वातन्त्र्यं च भ्रान्तस्य निश्चितमेव । न हि भ्रमः स्वेच्छया युज्यते ।", |
| | "‘स्वात्मानं परमं विष्णुं विदित्वाऽपि स राघवः ।", |
| | "दैत्यानां मोहनार्थाय दर्शयामास मूढताम् ॥’ इति (च) पाद्मे ।", |
| | "‘ओं जगद्व्यापारवर्जम् ओम्’(ब्र.सू.४.४.१७), ‘ ...प्रकरणात् ’(ब्र.सू.४.४.१८) इत्यादिनैश्वर्यमर्यादया मुक्तानां ब्रह्मणश्च भेदस्यैव निर्णीतत्वाच्च भगवता ।", |
| | "‘ब्रह्मसूत्रानुसारेण वेदाद्यं सर्वमेव च ।", |
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| "text": "‘सारत्वात् स इति प्रोक्तो ज्ञानत्वाद्य इतीरितः ।\nसर्वस्येष्ट इति ह्येष मानानामणकोऽणिमा ॥\nतत्तन्त्रत्वादैतदात्म्यं स सत्यः साधुरूपतः ।\nतत्ततेः पूर्णतश्चात्मा सादनात् स इतीरितः(सदनाच्च स ईरितः) ॥\nअतत्त्वमसि पुत्रेति य उक्तो गौतमेन तु ।\nनवकृत्वः सदृष्टान्तं सर्वभेदेन केशवः ॥\nतस्मै नमो भगवते चिदचित्परमाय ते ।\nपुरुषोत्तमाय देवाय पूर्णानन्दैकरूपिणे ॥’ इति सामसंहितायाम् ।\nअतः सर्वचिदचिद्विलक्षणः सर्वोत्तमः (सर्वगुणपरिपूर्णो) सर्वगुणपूर्णो भगवान् पुरुषोत्तम इति सिद्धम् ॥" | | "lines": [ |
| | "‘सारत्वात् स इति प्रोक्तो ज्ञानत्वाद्य इतीरितः ।", |
| | "सर्वस्येष्ट इति ह्येष मानानामणकोऽणिमा ॥", |
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| | "प्रथमः खण्डः" |
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| | "ओम् अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदस्तं होवाच यद् वेत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति स होवाच ॥ १ ॥" |
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| | "यद्वेत्थ तेन तदुक्त्वा मामुपसीद ।" |
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| | "ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्यं राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्यां सर्पदेवजनविद्यामेतद् भगवोऽध्येमि ॥ २ ॥" |
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| | "‘पितृलक्षणं तु पित्र्यं स्याद् राशिः स्यात् पूगलक्षणम् ।", |
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| | "सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मविदिति सोऽहं भगवः शोचामि तन्मा भगवांञ्च्छोकस्य पारं तारयत्विति तं होवाच यद्वै किञ्चैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत् ॥ ३ ॥" |
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| | "नाम वा ऋग्वेदः यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमः वेदानां वेदः पित्र्यो राशिर्दैवो निधिर्वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्या ब्रह्मविद्या भूतविद्या क्षत्रविद्या नक्षत्रविद्या सर्पदेवजनविद्या नामैवैतन्नामोपास्वेति ॥ ४ ॥" |
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| | "स यो नाम ब्रह्मेत्युपास्ते यावन्नाम्नो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो नाम ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो नाम्नो भूय इति नाम्नो (वाग्वा)वावा भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ५ ॥ १ ॥" |
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| | "‘विद्यानां निर्णयाज्ञानादविद्वानुच्यते पुमान् ।", |
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| "text": "तस्यास्तु भूयसी स्वाहा धर्मज्ञानसुखादिभिः ।\nसर्वैगुणैर्विमुक्तौ च तथा बन्धे च सर्वदा ॥\nवाचोऽभिमानिनी सैव वाङ्नाम्नी चाञ्चनाद् वसोः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
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| | "मनो वाव वाचो भूयो यथा वै द्वे वाऽऽमलके द्वे वा कोले द्वौ वाऽक्षौ मुष्टिरनुभवत्येवं वाचं च नाम च मनोऽनुभवति स यदा मनसा मनस्यति मन्त्रानधीयीयेत्यथाधीते कर्माणि कुर्वीयेत्यथ कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छेयेत्यथेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छेयेत्यथेच्छते मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म मन उपास्स्वेति ॥ १ ॥" |
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| | "एवं तस्या विमुक्तौ च पर्जन्यः सर्वतो वरः ।", |
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| | "सङ्कल्पो वाव मनसो भूयान् यदा वै सङ्कल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥" |
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| | "तानि ह वा एतानि सङ्कल्पैकायनानि सङ्कल्पात्मकानि सङ्कल्पे प्रतिष्ठितानि समक्लृपतां द्यावापृथिवी समकल्पेतां वायुश्चाऽकाशश्च समकल्पन्ताऽ(मा)पश्च तेजश्च तेषां सङ्क्लृप्त्यै वर्षं सङ्कल्पते वर्षस्य सङ्क्लृप्त्या अन्नं सङ्कल्पतेऽन्नस्य सङ्ग्क्लृप्त्यै प्राणाः सङ्कल्पन्ते प्राणानां सङ्क्लृप्त्यै मन्त्राः सङ्कल्पन्ते मन्त्राणां सङ्क्लृप्त्यै कर्माणि सङ्कल्पन्ते कर्मणां सङ्क्लृप्त्यै लोकाः सङ्कल्पन्ते लोकानां सङ्क्लृप्त्यै सर्वं सङ्कल्पते स एष सङ्कल्पः सङ्कल्पमुपास्स्वेति ॥ २ ॥" |
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| | "स यः सङ्कल्पं ब्रह्मेत्युपास्ते क्लृप्तान् वै स लोकान् ध्रुवान् ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिद्ध्यति यावत् सङ्कल्पस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः सङ्कल्पं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति (भगवो वाचो) भगवः सङ्कल्पाद् भूय इति सङ्कल्पात् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥ ४ ॥" |
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| | "तथा तस्माद् वरो मित्रो मुक्तौ सङ्कल्पदेवता ।", |
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| | "चित्तं वाव सङ्कल्पाद् भूयो यदा चेतयतेऽथ सङ्कल्पयतेऽथ मनस्यत्यथ वाचमीरयति तामु नाम्नीरयति नाम्नि मन्त्रा एकं भवन्ति मन्त्रेषु कर्माणि ॥ १ ॥" |
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| "text": "तानि ह वा एतानि चित्तैकायनानि चित्तात्मकानि चित्ते प्रतिष्ठितानि तस्माद् यद्यपि बहुविदचित्तो भवति नायमस्तीत्येवैनमाहुर्यदयं वेद यद्वा अयं विद्वान् नेत्थमचित्तः स्यादित्यथ यद्यल्पविच्चित्तवान् भवति तस्मा एवोत शुश्रूषन्ते चित्तं ह्येवैषामेकायनं चित्तमात्मा चित्तं प्रतिष्ठा चित्तमुपास्स्वेति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "तानि ह वा एतानि चित्तैकायनानि चित्तात्मकानि चित्ते प्रतिष्ठितानि तस्माद् यद्यपि बहुविदचित्तो भवति नायमस्तीत्येवैनमाहुर्यदयं वेद यद्वा अयं विद्वान् नेत्थमचित्तः स्यादित्यथ यद्यल्पविच्चित्तवान् भवति तस्मा एवोत शुश्रूषन्ते चित्तं ह्येवैषामेकायनं चित्तमात्मा चित्तं प्रतिष्ठा चित्तमुपास्स्वेति ॥ २ ॥" |
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| | "स यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्ते चित्तान् वै स लोकान् ध्रुवान् ध्रुवः प्रतिष्ठितान् प्रतिष्ठितोऽव्यथमानानव्यथमानोऽभिसिद्ध्यति यावच्चित्तस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यश्चित्तं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवश्चित्ताद् भूय इति चित्ताद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ ३ ॥ ५ ॥" |
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| "text": ".................तथा तस्मान्निशाकरः ॥\nविज्ञानदेवता चासौ तन्नामा च विवेचनात् ।\nसत्यस्य ..........॥" | | "lines": [ |
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| | "बलं वाव विज्ञानाद् भूयोऽपीह शतं विज्ञानवतामेको बलवानाकम्पयते स यदा बली भवत्यथोत्थाता भवत्युत्तिष्ठन् परिचरिता भवति परिचरन्नुपसत्ता भवत्युपसीदन् द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवति बलेन वै पृथिवी तिष्ठति बलेनान्तरिक्षं बलेन द्यौर्बलेनापो बलेन पर्वता बलेन देवमनुष्या बलेन पशवश्च वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकं बलेन वै लोकस्तिष्ठति बलमुपास्स्वेति ॥ १ ॥ स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद् बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद् भूय इति बलाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ८ ॥" |
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| | "स यो बलं ब्रह्मेत्युपास्ते यावद् बलस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो बलं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो बलाद् भूय इति बलाद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ८ ॥" |
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| | "अन्नं वाव बलाद् भूयस्तस्माद् यद्यपि दशरात्रीर्नाश्नीयाद् यदु ह जीवेऽदथवाऽद्रष्टाऽश्रोताऽमन्ताऽबोद्धाऽकर्ताऽविज्ञाता भवत्यथान्नस्याशी द्रष्टा भवति श्रोता भवति मन्ता भवति बोद्धा भवति कर्ता भवति विज्ञाता भवत्यन्नमुपास्स्वेति ॥ १ ॥" |
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| | "स योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽन्नवतो वै स लोकान् पानवतोऽभिसिद्ध्यति यावत् अन्नस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽन्नं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवोऽन्नात् भूय इत्यन्नाद् वाव भूयोस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ९ ॥" |
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| "text": "आपो वावान्नाद् भूयस्यस्तस्माद् यदा सुवृष्टिर्न भवति व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो भविष्यतीत्यथ यदा सुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहु भविष्यतीत्याप एवेमा मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्षं यद् द्यौर्यत् पर्वता यद् देवमनुष्या यत् पशवश्च वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकमाप एवेमा मूर्ता अप उपास्स्वेति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "आपो वावान्नाद् भूयस्यस्तस्माद् यदा सुवृष्टिर्न भवति व्याधीयन्ते प्राणा अन्नं कनीयो भविष्यतीत्यथ यदा सुवृष्टिर्भवत्यानन्दिनः प्राणा भवन्त्यन्नं बहु भविष्यतीत्याप एवेमा मूर्ता येयं पृथिवी यदन्तरिक्षं यद् द्यौर्यत् पर्वता यद् देवमनुष्या यत् पशवश्च वयांसि च तृणवनस्पतयः श्वापदान्याकीटपतङ्गपिपीलिकमाप एवेमा मूर्ता अप उपास्स्वेति ॥ १ ॥" |
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| | "स योऽपो ब्रह्मेत्युपास्ते आप्नोति सर्वान् कामांस्तृप्तिमान् भवति यावदपां गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति योऽपो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो अद्भ्य भूय इति अद्भ्यो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ १० ॥" |
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| | "................. तैजसाहम्भवस्ततः ॥", |
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| "text": "तेजो वावाद्भ्यो भूयस्तद्वा एतद् वायुमागृह्याकाशमभितपति तदाऽऽहुर्निशोचति नितपति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तदेतदूर्ध्वाभिश्च तिरश्चीभिश्च विद्युदि्भराह्रादाश्चरन्ति तस्मादाहुर्विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "तेजो वावाद्भ्यो भूयस्तद्वा एतद् वायुमागृह्याकाशमभितपति तदाऽऽहुर्निशोचति नितपति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तदेतदूर्ध्वाभिश्च तिरश्चीभिश्च विद्युदि्भराह्रादाश्चरन्ति तस्मादाहुर्विद्योतते स्तनयति वर्षिष्यति वा इति तेज एव तत्पूर्वं दर्शयित्वाऽथापः सृजते तेज उपास्स्वेति ॥ १ ॥" |
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| | "स यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्ते तेजस्वी वै स तेजस्वतो लोकान् भास्वतोऽपहततमस्कानभिसिद्ध्यति यावत्तेजसो गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यस्तेजो ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो तेजसो भूय इति तेजसो वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ ११ ॥" |
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| "text": "आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निराकाशेन आह्वयत्याकाशेन शृृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निराकाशेन आह्वयत्याकाशेन शृृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ॥ १ ॥" |
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| "text": "स्मरो वा आकाशाद् भूयांस्तस्माद् यद्यपि बहव आसीरन्नस्मरन्तो नैव ते कञ्चन शृणुयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन् यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन् स्मरेण वै पुत्रान् विजानाति स्मरेण पशूं स्मरमुपास्स्वेति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "स्मरो वा आकाशाद् भूयांस्तस्माद् यद्यपि बहव आसीरन्नस्मरन्तो नैव ते कञ्चन शृणुयुर्न मन्वीरन्न विजानीरन् यदा वाव ते स्मरेयुरथ शृणुयुरथ मन्वीरन्नथ विजानीरन् स्मरेण वै पुत्रान् विजानाति स्मरेण पशूं स्मरमुपास्स्वेति ॥ १ ॥" |
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| "text": "स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत् स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो स्मराद् भूय इति स्मराद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥१३॥" | | "lines": [ |
| | "स यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्ते यावत् स्मरस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यः स्मरं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगवो स्मराद् भूय इति स्मराद् वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥१३॥" |
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| | "................. तस्याश्चैव सदा शिवः ।", |
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| "text": "आशा वाव स्मराद् भूयस्याशेद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते कर्माणि कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "आशा वाव स्मराद् भूयस्याशेद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते कर्माणि कुरुते पुत्रांश्च पशूंश्चेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति ॥ १ ॥" |
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| | "स य आशां ब्रह्मेत्युपास्ते आशायाऽस्य सर्वे कामाः समृध्यन्त्यमोघा हास्याऽशिषो भवन्ति यावदाशाया गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति य आशां ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति भगव आशाया भूय इत्याशाया वाव भूयोऽस्तीति तन्मे भगवान् ब्रवीत्विति ॥ २ ॥ १४ ॥" |
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| "text": "मुख्यवायुप्रिया तस्मात् परमैव सरस्वती ।\nबन्धमुक्त्योः सर्वगुणैः सर्वदाऽऽशास्वरूपिणी ॥\nशमित्यानन्द उद्दिष्ट आशापूर्णसुखत्वतः ।" | | "lines": [ |
| | "मुख्यवायुप्रिया तस्मात् परमैव सरस्वती ।", |
| | "बन्धमुक्त्योः सर्वगुणैः सर्वदाऽऽशास्वरूपिणी ॥", |
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| | "पञ्चदशः खण्डः" |
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| "text": "प्राणो वा आशाया भूयान् यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्वं समर्पितं प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "प्राणो वा आशाया भूयान् यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्वं समर्पितं प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥ १ ॥" |
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| | "स यदि पितरं वा मातरं वा भ्रातरं वा स्वसारं वाऽऽचार्यं वा ब्राह्मणं वा किञ्चिद्भृशमिव प्रत्याह धिक्त्वाऽस्त्वित्येवैनमाहुः पितृहा वै त्वमसि मातृहा वै त्वमसि भ्रातृहा वै त्वमसि स्वसृहा वै त्वमस्याचार्यहा वै त्वमसि ब्राह्मणहा वै त्वमसीति ॥ २ ॥" |
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| | "अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्च्छूलेन समासं व्यतिषं दहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहाऽसीति न मातृहाऽसीति न भ्रातृहाऽसीति न स्वसृहाऽसीति नाचार्यहाऽसीति न ब्राह्मणहाऽसीति ॥ ३ ॥" |
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| "text": "प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीत्येव ब्रूयान्नापह्नुवीत ॥ ४ ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति तं चेद्ब्रूयुरतिवाद्यसीत्यतिवाद्यस्मीत्येव ब्रूयान्नापह्नुवीत ॥ ४ ॥ १५ ॥" |
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| "text": "‘तस्याः श्रेष्ठो मुख्यवायुः प्रकृष्टानां च नायकः ॥\nप्राणनामा ‘ण’इत्येव ह्यानन्दः समुदीरितः ।\nआणा सरस्वती प्रोक्ता तत्प्रकृष्टसुखत्वतः ॥\nप्राण इत्युच्यते वायुः .... ..... ........।" | | "lines": [ |
| | "‘तस्याः श्रेष्ठो मुख्यवायुः प्रकृष्टानां च नायकः ॥", |
| | "प्राणनामा ‘ण’इत्येव ह्यानन्दः समुदीरितः ।", |
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| "text": "देवतातारतम्यपरिमाणनिरूपणम्\n.... .......... ...... सर्वे त्वेते दशोत्तराः ।\nपर्जन्यमित्रशिखिनो भूतवायुस्तथैव च ॥\nद्विगुणा एवानिरुद्धोऽनिलात् पञ्चगुणाधिकः ।\nपादोनो वरुणादग्निरध्यर्धोनस्स सोमतः ॥\nशिवादाशा तथैवास्या मुख्यवायुः शतोत्तरौ ।\nसङ्ख्यान्यथात्वं यत्र स्यात् तत्राऽवेशविशेषतः ॥\nअवराणां गुणस्यापि परमीयत्वतस्तथा ।\nप्राणात्तु भगवान् विष्णुरनन्तगुणतोऽधिकः ॥\nनित्यमुक्तो नित्यशक्तिर्नित्योद्रिक्तगुणः प्रभुः ॥’ इति तत्त्वविवेके ।\n‘सैषाऽऽनन्दस्य मीमांसा भवति इत्यादेश्च ।" | | "lines": [ |
| | "देवतातारतम्यपरिमाणनिरूपणम्", |
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| "text": "मोक्षेऽपि देवतातारतम्यस्य प्रामाणिकत्वनिरूपणम्\n‘अथातः सम्भूतिः परमाद् विद्या विद्यायाः प्राणः प्राणाच्छ्रद्धा श्रद्धायाः शिवः शिवाद् बुद्धिर्बुद्धेरिन्द्र इन्द्रात् तैजसः(तैजसप्राणः हृ.) प्राणस्तैजसादनिरुद्धो(तैजसप्राणादनिरुद्ः .हृ) अनिरुद्धात् स्पर्शवातः स्पर्शवातात् सोमः सोमाद् वरुणो वरुणादग्निरग्नेर्मित्रो मित्रात् पर्जन्यः पर्जन्यात् स्वाहा स्वाहाया उषा जायते तेषां परः परोज्यायान् गुणैरुत्तर उत्तरः प्रत्यवरः परस्मात् परस्मादुत्तर उत्तरो मुच्यते। स्वं स्वं भावमापद्यते । नैषां पारावर्यमुच्छिद्यते कदाचन । नैषां पारावर्यमुच्छिद्यते कुतश्चन । पारावर्येणैव(पारावर्येण .हृ) ब्रह्मोपयन्ति पारावर्येण(पारावर्येणैव .हृ) मुक्ताः सञ्चरन्ति’ इत्यादिश्रुतेश्च ।" | | "lines": [ |
| | "मोक्षेऽपि देवतातारतम्यस्य प्रामाणिकत्वनिरूपणम्", |
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| "text": "नामादिब्रह्मोपासना नाम न अभेदोपासना\n‘नामादिमारुतान्तेषु देवेष्वेभ्यश्च भेदतः ।\nउपासितो हरिर्मुक्तिं दद्यान्नास्त्यत्र संशयः ॥’ इति सत्तत्त्वे ॥" | | "lines": [ |
| | "नामादिब्रह्मोपासना नाम न अभेदोपासना", |
| | "‘नामादिमारुतान्तेषु देवेष्वेभ्यश्च भेदतः ।", |
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| | "‘उषादिमारुतान्तेषु समः समगुणोऽपि सन् ।", |
| | "ध्यातः प्रीतिं हरिर्यायादधिकामुत्तरोत्तरे ॥", |
| | "उत्तमेषूत्तमा प्रीतिस्तस्य तत्र स्मृतस्ततः ।", |
| | "ध्यातुरप्युत्तमां प्रीतिं यायान्नास्त्यत्र संशयः ॥", |
| | "तारतम्यपरिज्ञानात् तेषु ध्यातो विमुक्तिदः ।", |
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| "text": "‘उषादिमारुतान्तेषु समः समगुणोऽपि सन् ।\nध्यातः प्रीतिं हरिर्यायादधिकामुत्तरोत्तरे ॥\nउत्तमेषूत्तमा प्रीतिस्तस्य तत्र स्मृतस्ततः ।\nध्यातुरप्युत्तमां प्रीतिं यायान्नास्त्यत्र संशयः ॥\nतारतम्यपरिज्ञानात् तेषु ध्यातो विमुक्तिदः ।\nप्रीतिं न चान्यथा यायादिति शास्त्रस्य निर्णयः ॥’ इति तत्त्वविवेके ।" | | "lines": [ |
| | "नामादिषु ब्रह्माभेदो न श्रुत्यभिप्रेतः", |
| | "‘नामादिप्राणपर्यन्ताः सप्तम्यर्थाः प्रकीर्तिताः ।", |
| | "तृतीयापञ्चमीषष्ठीचतुर्थ्यर्थाश्च सर्वशः ॥", |
| | "शब्दास्ते ब्रह्मशब्देन सम्बध्येयुर्यदा तदा(सम्बद्ध्येत यदा तदा .हृ) ।", |
| | "ब्राह्मणोऽस्य मुखं यद्वदात्मा वै पुत्रको यथा ॥", |
| | "यथा च यूप आदित्य एवमेष प्रकीर्तितः ।", |
| | "सप्तसु प्रथमा यस्माद् भूयो भूयस्त्वतस्तथा ॥", |
| | "षट्सुद्वितीया यस्माच्च कारणत्वात् परस्य च ।" |
| | ] |
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| "chapter": "CHU_C07", | | "chapter": "CHU_C07", |
| "verseType": null, | | "verseType": null, |
| "text": "अन्यथोपासनाया अनर्थकारित्ववर्णनम्\nन ह्यन्यदन्यदित्येव (ह्यन्यदन्य इत्येव) ध्यातं स्यात् पुरुषार्थदम् ॥\nअनर्थश्च भवेत् तस्माद् भृत्ये(भृत्यो) राजेति बोधवत् ।\nराजपूजां यथा(यदा .हृ) भृत्ये कुर्याद् राजा हिनस्ति हि ॥\nतद्वशत्वात् तथा भृत्य एवं नामादिकं च यः ।\nउपास्ते ब्रह्मरूपेण तं ब्रह्माथेतराणि च ॥\nपातयन्ति तमस्यन्धे तस्मान्नेक्षेत तांस्तथा ॥’ इति सामसंहितायाम् ।" | | "lines": [ |
| | "अन्यथोपासनाया अनर्थकारित्ववर्णनम्", |
| | "न ह्यन्यदन्यदित्येव (ह्यन्यदन्य इत्येव) ध्यातं स्यात् पुरुषार्थदम् ॥", |
| | "अनर्थश्च भवेत् तस्माद् भृत्ये(भृत्यो) राजेति बोधवत् ।", |
| | "राजपूजां यथा(यदा .हृ) भृत्ये कुर्याद् राजा हिनस्ति हि ॥", |
| | "तद्वशत्वात् तथा भृत्य एवं नामादिकं च यः ।", |
| | "उपास्ते ब्रह्मरूपेण तं ब्रह्माथेतराणि च ॥", |
| | "पातयन्ति तमस्यन्धे तस्मान्नेक्षेत तांस्तथा ॥’ इति सामसंहितायाम् ।" |
| | ] |
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| "text": "अचेतन-अयोग्य-असत्योपासना अनर्थकारिण्यः\n‘अचेतनमयोग्यं च तथैवातात्त्विकं क्वचित् ।\nनोपासीत परोऽनर्थः स्यात् तथोपासनाकृतः ॥\nदर्भचर्मादयश्चातो देवता ह्यभिमानिनः ।\nन ह्यचेतनकं किञ्चित् फलदं स्यात् कथञ्चन ॥\nऔषधादिषु चैतस्माद् देवा एव वरप्रदाः ।\nऔषधादिस्थिता देवास्तेऽज्ञे दृष्टफलप्रदाः ॥\nज्ञानिन्यदृष्टदाश्च स्युर्नादैवं किञ्चिदिष्यते ।" | | "lines": [ |
| | "अचेतन-अयोग्य-असत्योपासना अनर्थकारिण्यः", |
| | "‘अचेतनमयोग्यं च तथैवातात्त्विकं क्वचित् ।", |
| | "नोपासीत परोऽनर्थः स्यात् तथोपासनाकृतः ॥", |
| | "दर्भचर्मादयश्चातो देवता ह्यभिमानिनः ।", |
| | "न ह्यचेतनकं किञ्चित् फलदं स्यात् कथञ्चन ॥", |
| | "औषधादिषु चैतस्माद् देवा एव वरप्रदाः ।", |
| | "औषधादिस्थिता देवास्तेऽज्ञे दृष्टफलप्रदाः ॥", |
| | "ज्ञानिन्यदृष्टदाश्च स्युर्नादैवं किञ्चिदिष्यते ।" |
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| "text": "यथाऽज्ञस्यापि(यथाऽज्ञस्यैव .हृ) राज्ञस्तु भोजनं क्ल्ृप्तमिष्यते ॥\nन त्वविज्ञाय(न क्वचाज्ञाय .हृ) राजानं ग्रामप्राप्तिस्ततो भवेत् ।\nएवं देवा दृष्टफलं दद्युरज्ञस्य चाल्पतः ॥\nकिञ्चिज्ज्ञानकृतादृष्टात् तच्च नैवान्यथा भवेत् ।\nअदृष्टाख्यं फलं यत्तु तज्ज्ञस्यैव न चान्यगम् ॥\nतस्मादचेतनोपासां न कुर्यात् क्वापि कश्चन ।\nन चासत्यां न चायोग्यां यदीच्छेदुत्तमं फलम् ॥\nयदि नेच्छेत् तमो गन्तुं यदि चेच्छेद्धरेः(यदि वेच्छेद्धरेः) प्रियम् ।\nअथ कर्तव्यकारी च मुमुक्षुरथवा भवेत् ॥\nसोऽपीच्छेत हरेः प्रीतिं नात्र कार्या विचारणा ॥’ इत्युपासनालक्षणे ।" | | "lines": [ |
| | "यथाऽज्ञस्यापि(यथाऽज्ञस्यैव .हृ) राज्ञस्तु भोजनं क्ल्ृप्तमिष्यते ॥", |
| | "न त्वविज्ञाय(न क्वचाज्ञाय .हृ) राजानं ग्रामप्राप्तिस्ततो भवेत् ।", |
| | "एवं देवा दृष्टफलं दद्युरज्ञस्य चाल्पतः ॥", |
| | "किञ्चिज्ज्ञानकृतादृष्टात् तच्च नैवान्यथा भवेत् ।", |
| | "अदृष्टाख्यं फलं यत्तु तज्ज्ञस्यैव न चान्यगम् ॥", |
| | "तस्मादचेतनोपासां न कुर्यात् क्वापि कश्चन ।", |
| | "न चासत्यां न चायोग्यां यदीच्छेदुत्तमं फलम् ॥", |
| | "यदि नेच्छेत् तमो गन्तुं यदि चेच्छेद्धरेः(यदि वेच्छेद्धरेः) प्रियम् ।", |
| | "अथ कर्तव्यकारी च मुमुक्षुरथवा भवेत् ॥", |
| | "सोऽपीच्छेत हरेः प्रीतिं नात्र कार्या विचारणा ॥’ इत्युपासनालक्षणे ।" |
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| "text": "अचेतोपासना वृथेति निरूपणम्\n‘ओम् अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ओम्’(ब्र.सू.२.१.६), ‘पयोऽम्बुवच्चेत् तत्रापि’(ब्र.सू.२.२.३) इति(च) भगवद्वचनम् । ‘देवेषु चर्मादिनामानि संवादादेः’ इति च देव(ता)मीमांसायाम् । ‘अचेतनासत्यायोग्यन्यनुपास्यान्यफलत्वविपर्ययाभ्याम्’ इति सङ्कर्षणसूत्रम् ।" | | "lines": [ |
| | "अचेतोपासना वृथेति निरूपणम्", |
| | "‘ओम् अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ओम्’(ब्र.सू.२.१.६), ‘पयोऽम्बुवच्चेत् तत्रापि’(ब्र.सू.२.२.३) इति(च) भगवद्वचनम् । ‘देवेषु चर्मादिनामानि संवादादेः’ इति च देव(ता)मीमांसायाम् । ‘अचेतनासत्यायोग्यन्यनुपास्यान्यफलत्वविपर्ययाभ्याम्’ इति सङ्कर्षणसूत्रम् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "‘ओषधयः संवदन्ते सोमेन सह राज्ञा’, ‘प्र वो ग्रावाणः सविता देवः सुवतु धर्मणा’, ‘न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे महामर्कं मघवन् चित्रमर्च’ ।" | | "lines": [ |
| | "‘ओषधयः संवदन्ते सोमेन सह राज्ञा’, ‘प्र वो ग्रावाणः सविता देवः सुवतु धर्मणा’, ‘न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे महामर्कं मघवन् चित्रमर्च’ ।" |
| | ] |
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| "text": "अचेतनेषु अभिमानिचेतनोपासना युक्ता इति निरूपणम्\n‘न देवानामति व्रतं शतात्मा न जीवति’, ‘अनेहसो व ऊतयः सु ऊतयो व ऊतयः’ ।" | | "lines": [ |
| | "अचेतनेषु अभिमानिचेतनोपासना युक्ता इति निरूपणम्", |
| | "‘न देवानामति व्रतं शतात्मा न जीवति’, ‘अनेहसो व ऊतयः सु ऊतयो व ऊतयः’ ।" |
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| "text": "‘द्यावापृथिवी जनयन्नभिव्रताऽऽप(य) ओषधीर्वनिनानि यज्ञिया ।\nअन्तरिक्षं स्वारापरूतये वशं देवासस्तन्वी३ नि मामृजुः ॥’" | | "lines": [ |
| | "‘द्यावापृथिवी जनयन्नभिव्रताऽऽप(य) ओषधीर्वनिनानि यज्ञिया ।", |
| | "अन्तरिक्षं स्वारापरूतये वशं देवासस्तन्वी३ नि मामृजुः ॥’" |
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| "text": "‘अचेतनं चेतनेभ्यो दैवतेभ्यश्च चेतनाः ।\nदेवाः प्राणाच्च स प्राणो विष्णोरेव सदैव तु ॥\nस्वभावं च प्रवृत्तिं च विकारं च समाप्नुयुः ।\nकश्चिद्भाव ऋते तेषां नैतत्स्याच्च(नैतैः स्यात् .हृ) कदाचन ॥\nअचेतनप्रवृत्तौ तु न दृष्टान्तोऽस्ति(प्रवृत्तौ तन्न दृष्टान्तोस्ति हृ.) कश्चन ।\nचेतनानां प्रवृत्तेश्च दृष्टत्वादेव सर्वशः ॥\nअदृष्टं दृष्टवज्ज्ञेयं यथा दृष्टप्रणेतृकम् ।\nविसर्पत् तण्डुलं दृष्ट्वा कल्प्या तत्र पिपीलिका ॥\nन तद् दृष्ट्वैव दृष्टानामपिपीलिकसर्पणम् ।\nएवं दृष्टानुसारेण चिदधीनमचेतनम् ।" | | "lines": [ |
| | "‘अचेतनं चेतनेभ्यो दैवतेभ्यश्च चेतनाः ।", |
| | "देवाः प्राणाच्च स प्राणो विष्णोरेव सदैव तु ॥", |
| | "स्वभावं च प्रवृत्तिं च विकारं च समाप्नुयुः ।", |
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| | "अचेतनप्रवृत्तौ तु न दृष्टान्तोऽस्ति(प्रवृत्तौ तन्न दृष्टान्तोस्ति हृ.) कश्चन ।", |
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| | "विसर्पत् तण्डुलं दृष्ट्वा कल्प्या तत्र पिपीलिका ॥", |
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| "text": "दुर्घटा शक्तिरपि हि(तु .हृ) पिशाचानां हि(च .हृ) दृश्यते ।\nदेवानां किमु किम्वेव परमस्य हरेः प्रभोः ॥’ इत्यादेश्च(दि) ब्रह्मतर्के ।" | | "lines": [ |
| | "दुर्घटा शक्तिरपि हि(तु .हृ) पिशाचानां हि(च .हृ) दृश्यते ।", |
| | "देवानां किमु किम्वेव परमस्य हरेः प्रभोः ॥’ इत्यादेश्च(दि) ब्रह्मतर्के ।" |
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| "text": "हृदयेत्यादिशब्दानां विवक्षितार्थकथनम्\nहृदयज्ञो भगवत्तत्त्वज्ञः । हृद्ययनाद्धृदयम् । ‘उदरं ब्रह्मेति शार्कराक्ष्या उपासते हृदयं ब्रह्मेत्यारुणयः’ इति श्रुतिः(‘हृदयं ब्रह्मेति शार्कराक्ष्या उपासते’ इति श्रुतिः .हृ) । ‘कोलं पूगफलं प्रोक्तं कलं ताम्बूलपत्रकम्’ इत्यभिधानम् ।\n‘भूतानां भौतिकानां च मन्त्राहुतिगणस्य च ।\nअचेतनगणस्यास्य कल्पको मित्रनामकः ॥\nप्राणा भूतानि मन्त्राद्याश्चिदचित्त्वविभेदिनः ।\nअचितां कल्पको मित्रश्चितां वाय्वादयः स्मृताः ॥’ इति वस्तुतत्त्वे ।\nसर्वमचेतनं सङ्कल्प्यते ।" | | "lines": [ |
| | "हृदयेत्यादिशब्दानां विवक्षितार्थकथनम्", |
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| | "‘भूतानां भौतिकानां च मन्त्राहुतिगणस्य च ।", |
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| "text": "‘अस्थिरस्मरणं चित्तं स्थिरसंस्मरणं स्मरः’(स्थिरं स स्मरणं .हृ) इति शब्दनिर्णये । ‘वेदनं ज्ञानमात्रं स्याद् विद्वत्त्वं तु विशेषतः’ इति च ।\n‘मोक्षे यस्मिन् प्रवेशः स्यात् सा प्रतिष्ठा हि मुख्यतः ।\nउपचारतस्त्ववस्थानमिति शब्दविदो विदुः ॥’ इति च ।\n‘देवा मनुष्यतां प्राप्ता विज्ञेया देवमानुषाः ।\nध्यानं कुर्वन्त इव ते नैव स्युर्बहुभाषिणः ॥\nब्रूयुरर्थवतीं वाचं नानर्थां(नानार्थाम् .क) प्रायशो हि ते ॥’ इति पाद्मे ।\n‘बलं ज्ञानबलं चैव बाह्यं चेति द्विधा मतम् ।\nयुक्तिज्ञता ज्ञानबलं(युक्तिज्ञञानाद् ज्ञानबलं .हृ) सा ज्ञानादधिका मता(तत् ज्ञानादिकं मतम् .हृ) ॥ इति तत्त्वसारे ।" | | "lines": [ |
| | "‘अस्थिरस्मरणं चित्तं स्थिरसंस्मरणं स्मरः’(स्थिरं स स्मरणं .हृ) इति शब्दनिर्णये । ‘वेदनं ज्ञानमात्रं स्याद् विद्वत्त्वं तु विशेषतः’ इति च ।", |
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| "text": "अन्नाद्यचेतनपदार्थेष्वपि तारतम्यनिरूपणम्\nअन्नं ज्ञानरसान्नं च बाह्यमन्नमिति द्विधा ।\nज्ञानान्नं ज्ञानबलतः श्रेष्ठं ज्ञानरतिर्हि तत् ॥\nयद् बाह्यं तु बलं तस्माद् बाह्यमन्नं विशिष्यते ।\nआपश्च द्विविधाः प्रोक्तास्तृप्तिर्या ज्ञानतो रतेः ॥\nता ज्ञेया आन्तरा आपो बाह्यास्तु द्रवरूपकाः ।\nआन्तरान्नादान्तरापो बाह्याद् बाह्यास्तथा वराः ॥\nएवं तेजः प्रातिभाख्यं बाह्यं चेति द्विधा मतम् ।\nप्रातिभं ज्ञानतृप्तेश्च परमाकाश एव च ॥\nस्थिरा तु प्रतिभाऽन्तस्थाश्छिद्रमेव तु बाह्यगः (बाह्यगम् .हृ)।\nस्थिरा हि प्रतिभा श्रेष्ठा चञ्चला या स्मराभिधा ॥\nएकधैव स्मृतिः श्रेष्ठाऽऽशाऽपरोक्षदृगात्मकम् ।\nश्रेष्ठं सुखं ततो मोक्षे प्राणाख्यं परमं सुखम् ॥" | | "lines": [ |
| | "अन्नाद्यचेतनपदार्थेष्वपि तारतम्यनिरूपणम्", |
| | "अन्नं ज्ञानरसान्नं च बाह्यमन्नमिति द्विधा ।", |
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| | "ता ज्ञेया आन्तरा आपो बाह्यास्तु द्रवरूपकाः ।", |
| | "आन्तरान्नादान्तरापो बाह्याद् बाह्यास्तथा वराः ॥", |
| | "एवं तेजः प्रातिभाख्यं बाह्यं चेति द्विधा मतम् ।", |
| | "प्रातिभं ज्ञानतृप्तेश्च परमाकाश एव च ॥", |
| | "स्थिरा तु प्रतिभाऽन्तस्थाश्छिद्रमेव तु बाह्यगः (बाह्यगम् .हृ)।", |
| | "स्थिरा हि प्रतिभा श्रेष्ठा चञ्चला या स्मराभिधा ॥", |
| | "एकधैव स्मृतिः श्रेष्ठाऽऽशाऽपरोक्षदृगात्मकम् ।", |
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| "text": "उत्तरोत्तरमेतद्धि वाय्वन्ताभिमतं सदा ।\nबाह्याद्भ्यो बाह्यमन्नं च जायतेऽन्यत् तदन्यथा ॥\nव्यक्तिरन्तर्गतानां तु विपरीतक्रमाद् भवेत् ।\nतथाऽपि मोक्षगं यस्मात् स्वभावो नित्य एव तु ॥\nअतस्तस्मादापरोक्ष्यं कादाचित्कं हि जायते ।\nदृष्ट्यधीना स्मृतिश्चेयं प्रतिभा स्मृतिसम्भवा ॥\nस्थैर्यमालम्ब्य तु चलमन्यथा नैव तिष्ठति ।\nप्रतिभातस्य तृप्तिः स्यादतृप्तस्य तु का रतिः ॥\nतत(अत .हृ) एवं क्रमादेवं वरिष्ठः प्राणजो गुणः ॥’ इति च ॥" | | "lines": [ |
| | "उत्तरोत्तरमेतद्धि वाय्वन्ताभिमतं सदा ।", |
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| "text": "योऽसौ प्राणः स प्राणेन परब्रह्मणा याति । स एव (एष) भगवान् प्राणं प्रत्यभीष्टं ददाति । ‘प्राणस्य प्राणम्’ इति श्रुतेः । प्राणो वायुः परमात्मानं च ज्ञानेन दर्शयन् ददाति । सर्वस्मादतीतमुत्तमं वदतीत्यतिवादी ॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "योऽसौ प्राणः स प्राणेन परब्रह्मणा याति । स एव (एष) भगवान् प्राणं प्रत्यभीष्टं ददाति । ‘प्राणस्य प्राणम्’ इति श्रुतेः । प्राणो वायुः परमात्मानं च ज्ञानेन दर्शयन् ददाति । सर्वस्मादतीतमुत्तमं वदतीत्यतिवादी ॥ १५ ॥" |
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| | "एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानीति सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति सत्यं भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ १६ ॥" |
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| "text": "‘एष तु वा अतिवदति’ इति ‘तु’शब्दोऽर्थान्तरवाची । ‘अस्ति भगवः प्राणाद्भूय’ इति प्रश्नो व्यतिहार्यः(प्रश्नोऽप्यध्याहार्यः .हृ) ।\n‘यत्रानवसरोऽन्यत्र पदं तत्र प्रतिष्ठितम् ।\nयत्र प्रमाणं वाक्यं वा व्यतिहार्यं(चाप्यतिहार्यं .हृ) न संशयः ॥’\n‘ओं व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत्’(ब्र.सू.३.३.३८) इति च भगवद्वचनम् ।\n‘अतिवादी प्राणवादी विष्णुवादी विशेषतः ।\nस सत्यो भगवान् विष्णुर्यन्निर्दोषो नियामकः ॥’" | | "lines": [ |
| | "‘एष तु वा अतिवदति’ इति ‘तु’शब्दोऽर्थान्तरवाची । ‘अस्ति भगवः प्राणाद्भूय’ इति प्रश्नो व्यतिहार्यः(प्रश्नोऽप्यध्याहार्यः .हृ) ।", |
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| | "यत्र प्रमाणं वाक्यं वा व्यतिहार्यं(चाप्यतिहार्यं .हृ) न संशयः ॥’", |
| | "‘ओं व्यतिहारो विशिंषन्ति हीतरवत्’(ब्र.सू.३.३.३८) इति च भगवद्वचनम् ।", |
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| | "यदा वै विजानात्यथ सत्यं वदति नाविजानन् सत्यं वदति विजानन्नैव सत्यं वदति विज्ञानं त्वेव विजिज्ञासितव्यमिति विज्ञानं भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ १७ ॥" |
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| | "यदा वै मनुतेऽथ विजानाति नामत्वा विजानाति मत्वैव विजानाति मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति मतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ १८॥" |
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| | "यदा वै श्रद्दधात्यथ मनुते नाश्रद्दधन्मनुते श्रद्दधदेव मनुते श्रद्धा त्वेव विजिज्ञासितव्येति श्रद्धां भगवो विजिज्ञास इति॥ १॥१९ ॥" |
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| | "यदा वै निस्तिष्ठत्यथ श्रद्धधाति नानिस्तिष्ठन् श्रद्दधाति निस्तिष्ठन्नेव श्रद्दधाति निष्ठा त्वेव विजिज्ञासितव्येति निष्ठां भगवो विजिज्ञास इति ॥१॥ २० ॥" |
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| | "यदा वै करोत्यथ निस्तिष्ठति नाकृत्वा निस्तिष्ठति कृत्वैव निस्तिष्ठति कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्येति कृतिं भगवो विजिज्ञास इति ॥ १॥ २१ ॥" |
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| "text": "अथात आत्मादेश एवाऽत्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदं सर्वमिति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराड् भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवत्यथ येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥ २५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथात आत्मादेश एवाऽत्मैवाधस्तादात्मोपरिष्टादात्मा पश्चादात्मा पुरस्तादात्मा दक्षिणत आत्मोत्तरत आत्मैवेदं सर्वमिति स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानन्दः स स्वराड् भवति तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवत्यथ येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवति ॥ २ ॥ २५ ॥" |
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| "text": "‘स सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदेशेषु सर्वदा ।\nस्वतन्त्रः सर्ववस्तूनि तदधीनानि सर्वशः ॥\nपूर्णत्वात् सुखरूपोऽसौ सर्वकर्ता सुखत्वतः ।\nकर्तृत्वात् सुस्थिरश्चासौ स्थिरत्वादास्तिकस्तथा ॥\nआस्तिकत्वाच्च(अस्तीकत्वाच्च) मन्ताऽसौ विज्ञाता च ततो हरिः।\nविज्ञातृत्वात् स निर्दोषः(विज्ञातृत्वाच्च निर्दोषः .हृ) सर्वस्यापि नियामकः॥\nभूमा नारायणाख्यः स्यात् स एवाहङ्कृतिः स्मृतः ।\nआकार्योऽहमिति ह्येष ततोऽहङ्कार उच्यते ॥\nजीवस्थस्त्वनिरुद्धो यः सोऽहङ्कार इतीरितः ।\nसोऽप्यणुत्वेऽपि संव्यापी परमैश्वर्ययोगतः ॥\nयथा बालतनौ विष्णौ मार्कण्डेयेन धीमता ।\nप्रविश्य नान्तोऽधिगत एवं व्याप्तो हरिः परः ॥\nअणुरूपोऽपि भगवान् वासुदेवः परो विभुः ।\nआत्मेत्युक्तः स च व्यापी न च भेदो हरौ क्वचित् ॥’ इति परमसारे ।\nभूमप्रसादं विना नाल्पे सुखमस्ति । मर्त्यं च पूर्वम् । ‘अल्पापि ह्यमृता देवी श्रीः पूर्णातिप्रियत्वतः’ इति च ।\nआत्मरतिर्भगवद्रतिः । स्वो भगवान् । सोऽस्य प्रत्यक्षत आज्ञापिता(आज्ञापयिता) भवतीति स्वराट् ।" | | "lines": [ |
| | "‘स सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदेशेषु सर्वदा ।", |
| | "स्वतन्त्रः सर्ववस्तूनि तदधीनानि सर्वशः ॥", |
| | "पूर्णत्वात् सुखरूपोऽसौ सर्वकर्ता सुखत्वतः ।", |
| | "कर्तृत्वात् सुस्थिरश्चासौ स्थिरत्वादास्तिकस्तथा ॥", |
| | "आस्तिकत्वाच्च(अस्तीकत्वाच्च) मन्ताऽसौ विज्ञाता च ततो हरिः।", |
| | "विज्ञातृत्वात् स निर्दोषः(विज्ञातृत्वाच्च निर्दोषः .हृ) सर्वस्यापि नियामकः॥", |
| | "भूमा नारायणाख्यः स्यात् स एवाहङ्कृतिः स्मृतः ।", |
| | "आकार्योऽहमिति ह्येष ततोऽहङ्कार उच्यते ॥", |
| | "जीवस्थस्त्वनिरुद्धो यः सोऽहङ्कार इतीरितः ।", |
| | "सोऽप्यणुत्वेऽपि संव्यापी परमैश्वर्ययोगतः ॥", |
| | "यथा बालतनौ विष्णौ मार्कण्डेयेन धीमता ।", |
| | "प्रविश्य नान्तोऽधिगत एवं व्याप्तो हरिः परः ॥", |
| | "अणुरूपोऽपि भगवान् वासुदेवः परो विभुः ।", |
| | "आत्मेत्युक्तः स च व्यापी न च भेदो हरौ क्वचित् ॥’ इति परमसारे ।", |
| | "भूमप्रसादं विना नाल्पे सुखमस्ति । मर्त्यं च पूर्वम् । ‘अल्पापि ह्यमृता देवी श्रीः पूर्णातिप्रियत्वतः’ इति च ।", |
| | "आत्मरतिर्भगवद्रतिः । स्वो भगवान् । सोऽस्य प्रत्यक्षत आज्ञापिता(आज्ञापयिता) भवतीति स्वराट् ।" |
| | ] |
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| "text": "षड्विंशः खण्डः" | | "lines": [ |
| | "षड्विंशः खण्डः" |
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| "text": "तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आशाऽऽत्मतः स्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्मत आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमात्मतो विज्ञानमात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतः सङ्कल्पः आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामाऽत्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेदं सर्वमिति ॥१॥" | | "lines": [ |
| | "तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आशाऽऽत्मतः स्मर आत्मत आकाश आत्मतस्तेज आत्मत आप आत्मत आविर्भावतिरोभावावात्मतोऽन्नमात्मतो बलमात्मतो विज्ञानमात्मतो ध्यानमात्मतश्चित्तमात्मतः सङ्कल्पः आत्मतो मन आत्मतो वागात्मतो नामाऽत्मतो मन्त्रा आत्मतः कर्माण्यात्मत एवेदं सर्वमिति ॥१॥" |
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| "text": "तदेष श्लोकः-\nन पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताम् । सर्वं ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति ॥\nस एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः । शतं च दश चैकं च सहस्राणि च विंशतिः ॥\nआहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः । स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारं दर्शयति देवर्षये नारदाय भगवान् सनत्कुमारस्तं स्कन्द इत्याचक्षते तं स्कन्द इत्याचक्षते ॥ २ ॥ २६ ॥" | | "lines": [ |
| | "तदेष श्लोकः-", |
| | "न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताम् । सर्वं ह पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वश इति ॥", |
| | "स एकधा भवति त्रिधा भवति पञ्चधा सप्तधा नवधा चैव पुनश्चैकादशः स्मृतः । शतं च दश चैकं च सहस्राणि च विंशतिः ॥", |
| | "आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः । स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षस्तस्मै मृदितकषायाय तमसः पारं दर्शयति देवर्षये नारदाय भगवान् सनत्कुमारस्तं स्कन्द इत्याचक्षते तं स्कन्द इत्याचक्षते ॥ २ ॥ २६ ॥" |
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| "text": "‘आत्मतः प्राण आत्मत आशा’ इत्यादि मुक्तः सन् प्राणादीनां सृष्ट्यादिकं पश्यतीत्यर्थः । ‘सर्वं हि(ह .हृ) पश्यः पश्यति’ इति वाक्यशेषात् । पश्य इति द्रष्टा । ‘यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णम्’ इति श्रुतेः ।\n‘भूमोपासनयोग्यस्तु साक्षाद्ब्रह्मैव मुख्यतः ।\nस तद्विद्याबलेनैव विष्णुना रतिमाप्नुयात् ॥\nतेनैव क्रीडते नित्यं स्त्रीरूपो मिथुनीभवेत् ।\nतदानन्दः स एवास्य राजा भवति नापरः ॥\nपश्येच्च प्राणसृष्ट्याद्यं ये तदन्य उपासकाः ।\nते यथायोग्यमाप्स्यन्ति फलं मुक्तौ न संशयः ॥ ’इति परमतत्त्वे ।" | | "lines": [ |
| | "‘आत्मतः प्राण आत्मत आशा’ इत्यादि मुक्तः सन् प्राणादीनां सृष्ट्यादिकं पश्यतीत्यर्थः । ‘सर्वं हि(ह .हृ) पश्यः पश्यति’ इति वाक्यशेषात् । पश्य इति द्रष्टा । ‘यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णम्’ इति श्रुतेः ।", |
| | "‘भूमोपासनयोग्यस्तु साक्षाद्ब्रह्मैव मुख्यतः ।", |
| | "स तद्विद्याबलेनैव विष्णुना रतिमाप्नुयात् ॥", |
| | "तेनैव क्रीडते नित्यं स्त्रीरूपो मिथुनीभवेत् ।", |
| | "तदानन्दः स एवास्य राजा भवति नापरः ॥", |
| | "पश्येच्च प्राणसृष्ट्याद्यं ये तदन्य उपासकाः ।", |
| | "ते यथायोग्यमाप्स्यन्ति फलं मुक्तौ न संशयः ॥ ’इति परमतत्त्वे ।" |
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| "text": "अहङ्कारशब्दवाच्यो भगवाननिरुद्धः, न जीवः\nन च ‘भूमानं भगवो विजिज्ञास’ इति पृष्टः सन् भूम्नो लक्षणं ‘स एवाधस्तात् स उपरिष्टाद्’ इत्यादिना पूर्णत्वं भगवतोऽन्यस्याहङ्कारस्योपदिशतीति युज्यते । न चाहङ्कारस्य पूर्णत्वमस्ति । न च मुख्ये पूर्णत्वे युज्यमाने उपचरितं युज्यते । न चाहङ्कारस्य काचित् प्रस्तुतिः । अथशब्दस्तु रूपान्तरापेक्षया युज्यते । अतःशब्दस्तत्प्रसादादिति ।" | | "lines": [ |
| | "अहङ्कारशब्दवाच्यो भगवाननिरुद्धः, न जीवः", |
| | "न च ‘भूमानं भगवो विजिज्ञास’ इति पृष्टः सन् भूम्नो लक्षणं ‘स एवाधस्तात् स उपरिष्टाद्’ इत्यादिना पूर्णत्वं भगवतोऽन्यस्याहङ्कारस्योपदिशतीति युज्यते । न चाहङ्कारस्य पूर्णत्वमस्ति । न च मुख्ये पूर्णत्वे युज्यमाने उपचरितं युज्यते । न चाहङ्कारस्य काचित् प्रस्तुतिः । अथशब्दस्तु रूपान्तरापेक्षया युज्यते । अतःशब्दस्तत्प्रसादादिति ।" |
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| "text": "‘आत्मरतिः स्वराट्’ इत्यत्र आत्मस्वशब्दौ विष्णुवाचकौ\nआत्मरतिः स्वराडि(ळि)त्यादि । ‘यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्’ इति ब्रह्मण उत्पत्तिप्रसिद्धेः(इति ब्रह्मणि प्रसिद्धेः) स्वयम्भूरात्मभूरित्यादिष्वात्मशब्दः स्वयंशब्दश्च यथा विष्णुवाची तद्वदेवात्राप्यात्मशब्दो विष्णुवाच्येव ।" | | "lines": [ |
| | "‘आत्मरतिः स्वराट्’ इत्यत्र आत्मस्वशब्दौ विष्णुवाचकौ", |
| | "आत्मरतिः स्वराडि(ळि)त्यादि । ‘यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम्’ इति ब्रह्मण उत्पत्तिप्रसिद्धेः(इति ब्रह्मणि प्रसिद्धेः) स्वयम्भूरात्मभूरित्यादिष्वात्मशब्दः स्वयंशब्दश्च यथा विष्णुवाची तद्वदेवात्राप्यात्मशब्दो विष्णुवाच्येव ।" |
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| "text": "मुक्तेभ्यः सकाशात् प्राणिसृष्टिनिराकरणम्\nन च मुक्तेभ्यः प्राणादिकमुत्पद्यते । ‘ओं जगद्व्यापारवर्जम् ओम्’(ब्र.सू.४.४.१७)इति वर्णितत्वाद्(निर्णीतत्वाद्) भगवता । ‘आत्मत एष(एव) प्राणो जायते’ इत्यवधारणान्न भगवतोऽन्यस्मात् प्राणो जायते ।\n‘आत्मेति मुख्यतो विष्णुस्तदन्ये तूपचारतः ।\nतथैव स्व इति प्रोक्तस्तस्माद् ब्रह्माऽऽत्मभूः स्वभूः ॥’ इति स्कान्दे ।" | | "lines": [ |
| | "मुक्तेभ्यः सकाशात् प्राणिसृष्टिनिराकरणम्", |
| | "न च मुक्तेभ्यः प्राणादिकमुत्पद्यते । ‘ओं जगद्व्यापारवर्जम् ओम्’(ब्र.सू.४.४.१७)इति वर्णितत्वाद्(निर्णीतत्वाद्) भगवता । ‘आत्मत एष(एव) प्राणो जायते’ इत्यवधारणान्न भगवतोऽन्यस्मात् प्राणो जायते ।", |
| | "‘आत्मेति मुख्यतो विष्णुस्तदन्ये तूपचारतः ।", |
| | "तथैव स्व इति प्रोक्तस्तस्माद् ब्रह्माऽऽत्मभूः स्वभूः ॥’ इति स्कान्दे ।" |
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| "text": "‘स एवेदं सर्वम्’ इत्येतत् नाभेदपरम्\n‘इदं नामातिसामीप्यात् सर्वं(सर्बः हृ.) पूर्णगुणत्वतः ।\nभूमाऽहमात्मेति हरिस्त्रिविधोऽपि हि सर्वदा ॥’ इति विश्वनिर्णये ।" | | "lines": [ |
| | "‘स एवेदं सर्वम्’ इत्येतत् नाभेदपरम्", |
| | "‘इदं नामातिसामीप्यात् सर्वं(सर्बः हृ.) पूर्णगुणत्वतः ।", |
| | "भूमाऽहमात्मेति हरिस्त्रिविधोऽपि हि सर्वदा ॥’ इति विश्वनिर्णये ।" |
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| "text": "लिङ्गत्रयमपि भगवति युक्तम्\n‘स्त्रीगुणाः पुङ्गुणाश्चैव नपुंसकगुणा अपि ।\nयदधीना व्यत्ययः स्याद् लिङ्गानां तत्र सर्वशः ॥\nकः किं कं तत्सर्वमात्माऽदितिर्देवादयस्ततः ॥’इति लिङ्गनिर्णये ।" | | "lines": [ |
| | "लिङ्गत्रयमपि भगवति युक्तम्", |
| | "‘स्त्रीगुणाः पुङ्गुणाश्चैव नपुंसकगुणा अपि ।", |
| | "यदधीना व्यत्ययः स्याद् लिङ्गानां तत्र सर्वशः ॥", |
| | "कः किं कं तत्सर्वमात्माऽदितिर्देवादयस्ततः ॥’इति लिङ्गनिर्णये ।" |
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| | "शास्त्रश्रवणशुद्धिरेवाऽहारशुद्धिः", |
| | "‘गुरोर्विद्याहृतिर्या तु स आहार इति स्मृतः ।", |
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| | "प्रथमः खण्डः" |
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| "text": "ओम् अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "ओम् अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यमिति ॥ १ ॥" |
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| "chapter": "CHU_C08", | | "chapter": "CHU_C08", |
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| "text": "‘यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे’ इति ‘ब्रह्मपुर’शब्देन ब्रह्माख्यं पुरं पूर्णत्वात् पुरमिति परं ब्रह्म, ब्रह्मणः पुरमिति शरीरं चोभयं विवक्षितम् ।\n‘प्राप्तोऽस्म्यवध्यं(प्राप्तोऽवध्यं) ब्रह्मपुरं राजेव निवसाम्यहम् ।’,‘अस्मिंश्चेदिदं (अस्मिंश्चेद्यदिदं) ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितम् ।’,‘(यदैनं जरा .हृ) यदैतज्जराऽवाप्नोति प्रध्वंसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत् सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युः’ (इति वाक्यशेषाद्) इत्यादिवाक्यशेषाद् भगवद्वचनाच्च ‘ब्रह्मपुर’शब्देन परं ब्रह्मोच्यत इत्यवसीयते । ‘यत्पुण्डरीकं पुरमध्यसंस्थम्’, ‘यदिदं शरीरं तदेतदाद्यं देवसदनम्’ इत्यादेः शरीरं च ।\nहृत्कमलस्थभगवानेव हृत्कमलस्याप्याधार इति निरूपणम्\n‘यद् वै तद् ब्रह्मेतीदं वाव तद् योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशः’, ‘यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति’ इत्यादिना परब्रह्मण्येव (च) हृदयं स्थितम् ।" | | "lines": [ |
| | "‘यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे’ इति ‘ब्रह्मपुर’शब्देन ब्रह्माख्यं पुरं पूर्णत्वात् पुरमिति परं ब्रह्म, ब्रह्मणः पुरमिति शरीरं चोभयं विवक्षितम् ।", |
| | "‘प्राप्तोऽस्म्यवध्यं(प्राप्तोऽवध्यं) ब्रह्मपुरं राजेव निवसाम्यहम् ।’,‘अस्मिंश्चेदिदं (अस्मिंश्चेद्यदिदं) ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितम् ।’,‘(यदैनं जरा .हृ) यदैतज्जराऽवाप्नोति प्रध्वंसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत् सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युः’ (इति वाक्यशेषाद्) इत्यादिवाक्यशेषाद् भगवद्वचनाच्च ‘ब्रह्मपुर’शब्देन परं ब्रह्मोच्यत इत्यवसीयते । ‘यत्पुण्डरीकं पुरमध्यसंस्थम्’, ‘यदिदं शरीरं तदेतदाद्यं देवसदनम्’ इत्यादेः शरीरं च ।", |
| | "हृत्कमलस्थभगवानेव हृत्कमलस्याप्याधार इति निरूपणम्", |
| | "‘यद् वै तद् ब्रह्मेतीदं वाव तद् योऽयं बहिर्धा पुरुषादाकाशः’, ‘यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति’ इत्यादिना परब्रह्मण्येव (च) हृदयं स्थितम् ।" |
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| "text": "तं चेद् ब्रूयुर्यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद् वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "तं चेद् ब्रूयुर्यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद् वाव विजिज्ञासितव्यमिति स ब्रूयात् ॥ २ ॥" |
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| "text": "यावान् वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन् समाहितमिति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "यावान् वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदस्मिन् समाहितमिति ॥ ३ ॥" |
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| "text": "हृदयस्थदहराकाशस्य परब्रह्मत्वाभावनिरूपणम्\n‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यम्’, ‘दहरोस्मिन्नन्तर आकाशः किं तदत्र विद्यते’ इत्याकाश(इत्यत्राकाश)शब्देन भूताकाशो विवक्षितः। ‘किं तदत्र विद्यते?’ इत्यस्यायं परिहारः– अस्मिन् भूताकाशे परब्रह्माख्य आकाशो विद्यते । आसमन्तात् काशनाद् आकाशः । आसमन्तात् कमश्नातीति वा । ‘अस्मिन् कामाः समाहिताः’ इति वाक्यशेषात् । आसमन्तात् कामानश्नातीति वा । स च यावान् बहिः परमात्मा व्याप्तोऽस्ति तावानेव विद्यते गुणतः । पूर्णगुणत्वात् । अल्पपरिमाणस्यापि महत्परिमाणत्वं च युज्यते । अचिन्त्यशक्तित्वात् ।\n‘यस्मिन् विरुद्धगतयोऽप्यनिशं(ह्यनिशं .हृ) पतन्ति।\nविद्यादयो विविधशक्तय आनूपूर्व्या ॥’ इति वचनात् ।\nआनुपूर्व्येति श्रुतिप्रमाणादित्यर्थः । ‘आनुपूर्वी श्रुतिर्वेद आम्नायश्चेति कथ्यते’ इत्यभिधानात् । अन्यथाऽनिशमित्युक्तिविरोधात् । ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा’, ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्याः’ इति हृदयस्थस्यैवाणुत्वमहत्वोक्तेश्च ।\n‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे\nसन्त्यश्रुता अपि नैवात्रशङ्का ।\nचिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः\nश्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ॥’ इति च श्रुतिः ।\n‘सुविरुद्धा अश्रुताश्च गुणाः सन्त्येव सर्वशः ।\nदोषाः केऽपि(अपि .हृ) न सन्त्येव श्रुता अपि तु सर्वशः ॥’ इति गारुडे ॥" | | "lines": [ |
| | "हृदयस्थदहराकाशस्य परब्रह्मत्वाभावनिरूपणम्", |
| | "‘दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यम्’, ‘दहरोस्मिन्नन्तर आकाशः किं तदत्र विद्यते’ इत्याकाश(इत्यत्राकाश)शब्देन भूताकाशो विवक्षितः। ‘किं तदत्र विद्यते?’ इत्यस्यायं परिहारः– अस्मिन् भूताकाशे परब्रह्माख्य आकाशो विद्यते । आसमन्तात् काशनाद् आकाशः । आसमन्तात् कमश्नातीति वा । ‘अस्मिन् कामाः समाहिताः’ इति वाक्यशेषात् । आसमन्तात् कामानश्नातीति वा । स च यावान् बहिः परमात्मा व्याप्तोऽस्ति तावानेव विद्यते गुणतः । पूर्णगुणत्वात् । अल्पपरिमाणस्यापि महत्परिमाणत्वं च युज्यते । अचिन्त्यशक्तित्वात् ।", |
| | "‘यस्मिन् विरुद्धगतयोऽप्यनिशं(ह्यनिशं .हृ) पतन्ति।", |
| | "विद्यादयो विविधशक्तय आनूपूर्व्या ॥’ इति वचनात् ।", |
| | "आनुपूर्व्येति श्रुतिप्रमाणादित्यर्थः । ‘आनुपूर्वी श्रुतिर्वेद आम्नायश्चेति कथ्यते’ इत्यभिधानात् । अन्यथाऽनिशमित्युक्तिविरोधात् । ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा’, ‘एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्याः’ इति हृदयस्थस्यैवाणुत्वमहत्वोक्तेश्च ।", |
| | "‘गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे", |
| | "सन्त्यश्रुता अपि नैवात्रशङ्का ।", |
| | "चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः", |
| | "श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः ॥’ इति च श्रुतिः ।", |
| | "‘सुविरुद्धा अश्रुताश्च गुणाः सन्त्येव सर्वशः ।", |
| | "दोषाः केऽपि(अपि .हृ) न सन्त्येव श्रुता अपि तु सर्वशः ॥’ इति गारुडे ॥" |
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| "text": "दहराकाशस्थमहाकाशस्य परब्रह्मत्वखथनम्\n‘किं तदत्र विद्यते ?’ इति पृष्टत्वात् हृद्गत आकाशो हृदयशब्देनोच्यते ; हृद्ययनात् । तस्मिन् हृदयाख्य आकाशे (बहिराकाशो) परब्रह्माख्य आकाशो विद्यत इत्यर्थः । अन्यथा कथं भूताकाशस्य दहरस्य बहिराकाशसमत्वम् ? ‘दहरोऽस्मिन् अन्तराकाश’ इति(च) पूर्वोक्ताकाशस्य दहरत्वमुक्तम् । उत्तरस्य तु ‘यावान् वा अयमाकाशः’ इत्यनन्तरपरिमाणत्वम् । अतो ब्रह्माकाश एवोत्तरः । पूर्वोक्तस्याभूताकाशत्वे(पूर्वोक्ताकाश भूताकाशत्वे) ‘तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यम्’, ‘तत्रापि दहरं(दह्रं हृ,) गगनं विशोकस्तस्मिन् यदन्तस्तदुपासितव्यम्’, ‘सहस्रशीर्षं देवम्’ इत्यादि कथं युज्यते(युज्येत .हृ)? न हि भगवदन्तःस्थितमेवान्यत् किञ्चिद्विजिज्ञास्यम् । तद् वावेत्यवधारणाय । उत्तरस्यापरब्रह्मत्वे च सर्वाधारत्वं ‘नास्य जरयैतज्जीर्यते न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा’ इत्यादि न युज्यते ।\nपरब्रह्मस्थप्रपञ्चो न जिज्ञासार्हः\n‘किं तदत्र विद्यते यदन्वेष्टव्यं यद् वाव विजिज्ञासितव्यम् इत्यस्य य एषोऽन्तर्हृदय आकाशः’ इत्येव परिहारः । न तु ‘उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी’ इत्यादि । तत्तु विजिज्ञासितव्यत्वे हेतुत्वेन सामर्थ्यकथनमेव । न हि द्यावापृथिव्यादेरेव विजिज्ञास्यत्वम् । ‘तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चत’(मुञ्चत .हृ) इति हि श्रुतिः ।\nमुक्तामुक्तसकलदेवानां भगवानेवाऽश्रयः\nउभे अस्मिन् द्यावापृथिवीत्याद्युभयशब्दो मुक्तामुक्तराशिव्यपेक्षया । ‘यच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति’ इति वाक्यशेषात् । ‘अस्य’ इति संसारिणः । न हि संसारिणो मुक्ता उपकारकाः । यद्यस्य नोपकारकं तत्तस्य नास्तीत्युच्यतेऽन्यस्य सत्वेऽपि । यथा वित्तादि ।" | | "lines": [ |
| | "दहराकाशस्थमहाकाशस्य परब्रह्मत्वखथनम्", |
| | "‘किं तदत्र विद्यते ?’ इति पृष्टत्वात् हृद्गत आकाशो हृदयशब्देनोच्यते ; हृद्ययनात् । तस्मिन् हृदयाख्य आकाशे (बहिराकाशो) परब्रह्माख्य आकाशो विद्यत इत्यर्थः । अन्यथा कथं भूताकाशस्य दहरस्य बहिराकाशसमत्वम् ? ‘दहरोऽस्मिन् अन्तराकाश’ इति(च) पूर्वोक्ताकाशस्य दहरत्वमुक्तम् । उत्तरस्य तु ‘यावान् वा अयमाकाशः’ इत्यनन्तरपरिमाणत्वम् । अतो ब्रह्माकाश एवोत्तरः । पूर्वोक्तस्याभूताकाशत्वे(पूर्वोक्ताकाश भूताकाशत्वे) ‘तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यम्’, ‘तत्रापि दहरं(दह्रं हृ,) गगनं विशोकस्तस्मिन् यदन्तस्तदुपासितव्यम्’, ‘सहस्रशीर्षं देवम्’ इत्यादि कथं युज्यते(युज्येत .हृ)? न हि भगवदन्तःस्थितमेवान्यत् किञ्चिद्विजिज्ञास्यम् । तद् वावेत्यवधारणाय । उत्तरस्यापरब्रह्मत्वे च सर्वाधारत्वं ‘नास्य जरयैतज्जीर्यते न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा’ इत्यादि न युज्यते ।", |
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| "text": "तं चेद् ब्रूयुरस्मिंश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितं सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदैनं जराऽ(यदैतज्जरा .प्र)वाप्नोति प्रध्वंसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "तं चेद् ब्रूयुरस्मिंश्चेदिदं ब्रह्मपुरे सर्वं समाहितं सर्वाणि च भूतानि सर्वे च कामा यदैनं जराऽ(यदैतज्जरा .प्र)वाप्नोति प्रध्वंसते वा किं ततोऽतिशिष्यत इति ॥ ४ ॥" |
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| | "स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत् सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन् कामाः समाहिता एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ॥ ५ ॥" |
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| | "यथायोग्यमेवैनं भगवन्तं प्रजा मुक्ता अन्वाविशन्ति तच्छासनानुसारेण यं यं कामं कामयते तं तस्मादेवोपजीवन्ति ।" |
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| | "तद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते तद्य इहाऽत्मानमननुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान् कामां स्तेषां सर्वेषु लोकेष्वकामचारो भवत्यथ य इहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान् कामां स्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ६ ॥ १ ॥" |
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| "text": "तदविदुषां पुण्यानि क्षयिष्णुफलान्येव भवन्ति । एतांश्च सत्यान् कामान् भगवदीयान् ।\n‘बृहत्त्वात् पूर्णकामत्वाद् विष्णुर्ब्रह्मपुराभिधः ।\nतस्मिंस्तस्य पुरं देहस्तस्मिन् हृदयमास्थितम् ॥\nहृदयाकाशगो विष्णुस्तस्मिन् सर्वमिदं स्थितम् ।\nस सत्यकामो भगवान् यदिष्टं तस्य तद्भवेत् ॥\n(अस्मिन्)तस्मिन् समाहिताः कामाः सत्याः पुंसामपि ध्रुवम् ।\nतस्यैव ह्यनुसारेण सत्यत्वं नान्यथा क्वचित् ॥’" | | "lines": [ |
| | "तदविदुषां पुण्यानि क्षयिष्णुफलान्येव भवन्ति । एतांश्च सत्यान् कामान् भगवदीयान् ।", |
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| | "द्वितीयः खण्डः" |
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| | "अथ यदि गन्धमाल्यलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य गन्धमाल्ये समुत्तिष्ठतस्तेन गन्धमाल्यलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ६ ॥" |
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| | "अथ यद्यन्नपालोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य अन्नपाने समुत्तिष्ठतः तेनान्नपानलोकेन सम्पन्नो महीयते ॥ ७ ॥" |
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| | "यं यमन्तमभिकामो भवति यं कामं कामयते सोऽस्य सङ्कल्पादेवास्य समुत्तिष्ठति तेन सम्पन्नो महीयते ॥ १० ॥ २ ॥" |
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| | "त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषां सत्यानां सतामनृतमपिधानं यो यो ह्यस्येतः प्रैति न तमिह दर्शनाय लभते ॥ १ ॥" |
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| | "तस्माद्ये मुक्तियोग्याः स्युस्तेषां कामाः पुराऽपि तु ॥", |
| | "सत्याः सन्तस्तदज्ञानान्न दृश्यन्ते तथाऽखिलाः ।", |
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| | "अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेता यच्चान्यदिच्छन् न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानास्तद्यथापि हिरण्यनिधिं निहतमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वा प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥ २ ॥" |
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| | "स वा एष आत्मा हृदि तस्यैतदेव निरुक्तं हृद्ययमिति तस्माद्धृदयमहरहर्वा एवंवित् स्वर्गं लोकमेति ॥ ३ ॥" |
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| "text": "........ हरेर्लोकं मुक्तो गत्वा हि पश्यति ॥\nअज्ञत्वादेव सुप्तौ तु नित्यं यान्तोऽपि माधवम् ।\nनैव पश्यन्त्यसौ विष्णुर्हृदयं नाम हृद्गतेः ॥\nएवं हृदयनामानं विष्णुं जानन् हि नित्यशः ।\nविष्णुलोकगतेः पुण्यमाप्त्वा विष्णुं व्रजेत् तथा ॥" | | "lines": [ |
| | "........ हरेर्लोकं मुक्तो गत्वा हि पश्यति ॥", |
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| | "अथ य एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यमिति ॥४॥" |
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| "text": "यस्य सम्यक् प्रसादोऽस्ति विष्णोरेव स उच्यते ।\nसम्प्रसादः स उत्थाय शरीरात् प्राप्य केशवम् ॥\nयथास्वरूपस्तु भवेद् यं प्राप्यासौ स्वरूपताम् ।\nआप्नोति स परो ह्यात्मा भगवानिन्दिरापतिः ॥\nइत्याह सा रमादेवी पश्यन्ती परमं पदम् ।" | | "lines": [ |
| | "यस्य सम्यक् प्रसादोऽस्ति विष्णोरेव स उच्यते ।", |
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| | "तानि ह वा एतानि त्रीण्यक्षराणि सत् ति यमिति तद् यत् सत् तदमृतमथ यत् ति तन्मर्त्यमथ यद्यं तेनोभे यच्छति यदनेनोभे यच्छति तस्माद् यमहरहर्वा एवंवित्स्वर्गं लोकमेति ॥ ५ ॥ ३ ॥" |
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| | "अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानामसम्भेदाय नैतंसेतुमहोरात्रे तरतो न जरा न मृत्युर्न शोको न सुकृतं न दुष्कृतं सर्वे पाप्मानोऽतो निवर्तन्तेऽपहतपाप्मा ह्येष ब्रह्मलोकः ॥ १ ॥" |
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| "text": "एतं सेतुं प्रतिपुमानन्यत्तीर्त्वा ह्यदोषवान् ॥" | | "lines": [ |
| | "एतं सेतुं प्रतिपुमानन्यत्तीर्त्वा ह्यदोषवान् ॥" |
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| | "तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ३ ॥ ४ ॥" |
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| "text": "स प्राप्यो ब्रह्मचर्येण मनोवाक्कर्मभिस्तु यत् ।\nचरणं ब्रह्मणि परे ब्रह्मचर्यं हि तत्स्मृतम् ॥\nतेनैव ब्रह्मचर्येण भवेयुर्ब्रह्मलोकगाः ।\nएतेषां(येन तेषां .हृ) ब्रह्मलोकः स्यात् परं ब्रह्मैव लोकनात् ॥\nब्रह्मलोक इति प्रोक्तं तस्य लोकोऽपि कथ्यते ।" | | "lines": [ |
| | "स प्राप्यो ब्रह्मचर्येण मनोवाक्कर्मभिस्तु यत् ।", |
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| "text": "अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दतेऽथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्वाऽऽत्मानमनुविन्दते ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दतेऽथ यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्वाऽऽत्मानमनुविन्दते ॥ १ ॥" |
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| "text": "अथ यत् सत्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येव सत आत्मनस्त्राणं विन्दतेऽथ यन्मौनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्येमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येवाऽत्मानमनुविद्य मनुते ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ यत् सत्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येव सत आत्मनस्त्राणं विन्दतेऽथ यन्मौनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्येमेव तद् ब्रह्मचर्येण ह्येवाऽत्मानमनुविद्य मनुते ॥ २ ॥" |
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| "text": "अथ यदनाशकायनमित्यचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते ।\nअऽथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत् । अरश्च ह वै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके तृतीयस्यामितो दिवि तदैरं मदीयं सरस्तदश्वत्थः सोमसवनस्तदपराजिता पूर्ब्रह्मणः प्रभुविमितं हिरण्मयम् ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ यदनाशकायनमित्यचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणानुविन्दते ।", |
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| "text": "तद् य एवैतावरं च वै ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ४ ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "तद् य एवैतावरं च वै ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ४ ॥ ५ ॥" |
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| "text": "यज्ञ इष्टं च सत्रं च मौनं चानशनं तथा ॥\nपरस्य ब्रह्मणो ज्ञानं सर्वमेतदुदीरितम् ।\nपरस्य ब्रह्मणो लोके श्वेतद्वीपाभिधे परे ॥\nअरण्यौ चार्णवौ (अरो ण्यश्चार्णवौ .हृ) दिव्यौ चिदानन्दरसात्मकौ ।\nयावानुच्चः स्वर्गलोकस्तावानुच्चस्तथा स च ॥\nश्वेतद्वीपो दिविष्टोऽतस्तत्र मद्यं सरोवरम् ।\nसर्वभोज्यात्मकं दिव्यं तत्राश्वत्थाः सुधास्रवाः ॥\nतत्र विष्णोः पुरं दिव्यमपराजितनामकम् ।\nविमिताख्यं च पर्यङ्कं विष्णोर्मानेन संमितम् ॥\nचित्सुवर्णमयं दिव्यं लक्ष्मीस्तत्तत् स्वरूपिणी ।\nस श्वेतद्वीपगो विष्णुः पर्यङ्कब्रह्मनामकः ॥" | | "lines": [ |
| | "यज्ञ इष्टं च सत्रं च मौनं चानशनं तथा ॥", |
| | "परस्य ब्रह्मणो ज्ञानं सर्वमेतदुदीरितम् ।", |
| | "परस्य ब्रह्मणो लोके श्वेतद्वीपाभिधे परे ॥", |
| | "अरण्यौ चार्णवौ (अरो ण्यश्चार्णवौ .हृ) दिव्यौ चिदानन्दरसात्मकौ ।", |
| | "यावानुच्चः स्वर्गलोकस्तावानुच्चस्तथा स च ॥", |
| | "श्वेतद्वीपो दिविष्टोऽतस्तत्र मद्यं सरोवरम् ।", |
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| | "चित्सुवर्णमयं दिव्यं लक्ष्मीस्तत्तत् स्वरूपिणी ।", |
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| | "षष्ठः खण्डः" |
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| "text": "अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष पीत एष लोहितः ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष पीत एष लोहितः ॥ १ ॥" |
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| "text": "स एष हृदि नाडीषु पञ्चरूपः प्रतिष्ठितः ।\nविष्णोरणिम्नो रूपाणि पञ्चनाडीस्थितानि तु ॥\nनारायणाख्यं सौषुम्नं मध्यस्थं रक्तवर्णकम् ।\nशुक्लं तु वासुदेवाख्यं नादिन्यामग्रतः(नान्दिन्यामग्रतः .हृ) स्थितम् ॥\nपिङ्गलायां पिङ्गलं तु(च .हृ) रूपं सङ्कर्षणाभिधम् ।\nपश्चिमे वज्रिकायां च पीतं प्रद्युम्ननामकम् ॥\nइडायामनिरुद्धाख्यं नीलरूपं व्यवस्थितम् ।\nसूर्येऽप्येवं पञ्चरूपो भगवान् संव्यवस्थितः ॥\nआदित्यनामा चादित्वात् .................।" | | "lines": [ |
| | "स एष हृदि नाडीषु पञ्चरूपः प्रतिष्ठितः ।", |
| | "विष्णोरणिम्नो रूपाणि पञ्चनाडीस्थितानि तु ॥", |
| | "नारायणाख्यं सौषुम्नं मध्यस्थं रक्तवर्णकम् ।", |
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| | "पिङ्गलायां पिङ्गलं तु(च .हृ) रूपं सङ्कर्षणाभिधम् ।", |
| | "पश्चिमे वज्रिकायां च पीतं प्रद्युम्ननामकम् ॥", |
| | "इडायामनिरुद्धाख्यं नीलरूपं व्यवस्थितम् ।", |
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| | "तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छतीमं चामुं चैवमेवैता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते त आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥ २ ॥" |
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| | "तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्यासु तदा नाडीषु सृप्तो भवति तं न कश्चन पाप्मा स्पृशति तेजसा हि तदा सम्पन्नो भवति ॥ ३ ॥" |
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| | "अथ यत्रैतदबलिमानं नीतो भवति तमभित आसीना आहुर्जानासि मां जानासि मामिति स यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति तावज्जानाति ॥ ४ ॥" |
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| "text": "ओमित्येव वहन्नित्यं वायुरोंवाडितीरितः (वायुरोंव इतीरितः)॥\nतेन वामत्वमायाति मुक्तिकाले ह्युपासकः ।\nदिव्यचिद्रूपभावो हि वामभाव उदीरितः ॥\nयदैनं नेतुमन्विच्छन् मनः क्षिपति मारुतः ।\nआदित्याख्यं तदा विष्णुं याति जीवः स्वविद्यया ॥’ इति पर्यङ्कोपासनायाम् ॥ ६ ॥" | | "lines": [ |
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| | "सप्तमः खण्डः" |
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| "text": "य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति स सर्वांश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति स सर्वांश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच ॥ १ ॥" |
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| "text": "तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामानितीन्द्रो ह वै देवानामभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणां तौ हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापतिसकाशमाजग्मतुः ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "तद्धोभये देवासुरा अनुबुबुधिरे ते होचुर्हन्त तमात्मानमन्विच्छामो यमात्मानमन्विष्य सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामानितीन्द्रो ह वै देवानामभिप्रवव्राज विरोचनोऽसुराणां तौ हासंविदानावेव समित्पाणी प्रजापतिसकाशमाजग्मतुः ॥ २ ॥" |
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| "text": "तौ ह द्वात्रिंशतं वर्षाणि प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्ताववास्तामिति तौ होचतुर्य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह भगवतो वचो हरन्तो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ॥ ३ ॥" | | "lines": [ |
| | "तौ ह द्वात्रिंशतं वर्षाणि प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमूषतुस्तौ ह प्रजापतिरुवाच किमिच्छन्ताववास्तामिति तौ होचतुर्य आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोकोऽविजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह भगवतो वचो हरन्तो वेदयन्ते तमिच्छन्ताववास्तमिति ॥ ३ ॥" |
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| "text": "तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽन्तरक्षणि(अन्तरक्षिणि) पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेत्यथ योऽयं भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादर्शे कतम एष इत्येष(व) उ एवैषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायत इति होवाच ॥ ४ ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "तौ ह प्रजापतिरुवाच य एषोऽन्तरक्षणि(अन्तरक्षिणि) पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेत्यथ योऽयं भगवोऽप्सु परिख्यायते यश्चायमादर्शे कतम एष इत्येष(व) उ एवैषु सर्वेष्वन्तेषु परिख्यायत इति होवाच ॥ ४ ॥ ७ ॥" |
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| "text": "‘इन्द्रो विरोचनश्चैव श्रुत्वा तु(तं .हृ) ब्रह्मणोऽक्षिगम् ।\nविष्णुमानन्दरूपं तं सम्यग्ज्ञानविपर्ययौ ॥\nआपतुस्तत्र देवेन्द्रो जानन्नपि विरोचनम् ।\nमोहयन्ननुरूपाणि तस्य वाक्यान्युवाच ह ॥\nयथा विरोचनो नैव जानीयाद् विष्णुमञ्जसा(तत्त्वमञ्जसा) ।\nस्ववाक्यं चानृतं न स्यात् तथा ब्रह्माऽप्युवाच ह ॥\nअयोग्या ह्यसुरा ज्ञाने वक्तव्यं नैव चानृतम् ।\nमच्छापादासुरो भावः प्रह्लादादेर्न तु स्वतः ॥\nअयं त्वासुर(चासुर .हृ) एवातो वक्ष्याम्यस्योभयं यथा ।\nइन्द्रस्तु शुद्धभावत्वात् पुनरायास्यति ध्रुवम् ॥\nइत्यभिप्रायतः प्रोक्तो ब्रह्मणाऽक्षिगतो हरिः ।\nअयोग्यत्वात्तु तच्छ्रुत्वा प्रतिरूपं विरोचनः ॥\nमत्वाऽप्स्वादर्शके चैव पप्रच्छ कतमस्त्विति ।\nतत्रापि तु हरेर्भावं हृदि कृत्वा चतुर्मुखः ॥\nदृश्यते ह्येष एवेति तत्त्ववेदिविवक्षया ॥ ७ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘इन्द्रो विरोचनश्चैव श्रुत्वा तु(तं .हृ) ब्रह्मणोऽक्षिगम् ।", |
| | "विष्णुमानन्दरूपं तं सम्यग्ज्ञानविपर्ययौ ॥", |
| | "आपतुस्तत्र देवेन्द्रो जानन्नपि विरोचनम् ।", |
| | "मोहयन्ननुरूपाणि तस्य वाक्यान्युवाच ह ॥", |
| | "यथा विरोचनो नैव जानीयाद् विष्णुमञ्जसा(तत्त्वमञ्जसा) ।", |
| | "स्ववाक्यं चानृतं न स्यात् तथा ब्रह्माऽप्युवाच ह ॥", |
| | "अयोग्या ह्यसुरा ज्ञाने वक्तव्यं नैव चानृतम् ।", |
| | "मच्छापादासुरो भावः प्रह्लादादेर्न तु स्वतः ॥", |
| | "अयं त्वासुर(चासुर .हृ) एवातो वक्ष्याम्यस्योभयं यथा ।", |
| | "इन्द्रस्तु शुद्धभावत्वात् पुनरायास्यति ध्रुवम् ॥", |
| | "इत्यभिप्रायतः प्रोक्तो ब्रह्मणाऽक्षिगतो हरिः ।", |
| | "अयोग्यत्वात्तु तच्छ्रुत्वा प्रतिरूपं विरोचनः ॥", |
| | "मत्वाऽप्स्वादर्शके चैव पप्रच्छ कतमस्त्विति ।", |
| | "तत्रापि तु हरेर्भावं हृदि कृत्वा चतुर्मुखः ॥", |
| | "दृश्यते ह्येष एवेति तत्त्ववेदिविवक्षया ॥ ७ ॥" |
| | ] |
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| "chapter": "CHU_C08", | | "chapter": "CHU_C08", |
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| "text": "अष्टमः खण्डः" | | "lines": [ |
| | "अष्टमः खण्डः" |
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| "chapter": "CHU_C08", | | "chapter": "CHU_C08", |
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| "text": "उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानीथस्तन्मे प्रब्रूतमिति तौ होदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "उदशराव आत्मानमवेक्ष्य यदात्मनो न विजानीथस्तन्मे प्रब्रूतमिति तौ होदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति तौ होचतुः सर्वमेवेदमावां भगव आत्मानं पश्याव आ लोमभ्य आ नखेभ्यः प्रतिरूपमिति ॥ १ ॥" |
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| "text": "तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामिति तौ ह साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "तौ ह प्रजापतिरुवाच साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षेथामिति तौ ह साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ भूत्वोदशरावेऽवेक्षाञ्चक्राते तौ ह प्रजापतिरुवाच किं पश्यथ इति ॥ २ ॥" |
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| | "तौ होचतुर्यथैवेदमावां भगवः साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृतौ स्व एवमेवेमौ भगवः साध्वलङ्कृतौ सुवसनौ परिष्कृताविति एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति तौ ह शान्तहृदयौ प्रवव्रजतुः ॥ ३ ॥" |
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| "text": "तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचानुपलभ्याऽत्मानमननुविद्य व्रजतो यतर एतदुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वाऽसुरा वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्तहृदय एव विरोचनोऽसुरान् जगाम तेभ्यो हैतामुपनिषदं प्रोवाचात्मैवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महय्यन्नात्मानं परिचरन्नुभौ लोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "तौ हान्वीक्ष्य प्रजापतिरुवाचानुपलभ्याऽत्मानमननुविद्य व्रजतो यतर एतदुपनिषदो भविष्यन्ति देवा वाऽसुरा वा ते पराभविष्यन्तीति स ह शान्तहृदय एव विरोचनोऽसुरान् जगाम तेभ्यो हैतामुपनिषदं प्रोवाचात्मैवेह महय्य आत्मा परिचर्य आत्मानमेवेह महय्यन्नात्मानं परिचरन्नुभौ लोकाववाप्नोतीमं चामुं चेति ॥ ४ ॥" |
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| "text": "तस्मादप्यद्येहाददानमश्रद्दधानमयजमानमाहुरासुरो बतेत्यसुराणां ह्येषोपनिषत् प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसनेनालङ्कारेणेति संस्कुवर्न्त्येतेन ह्यमुं लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥ ५ ॥ ८ ॥" | | "lines": [ |
| | "तस्मादप्यद्येहाददानमश्रद्दधानमयजमानमाहुरासुरो बतेत्यसुराणां ह्येषोपनिषत् प्रेतस्य शरीरं भिक्षया वसनेनालङ्कारेणेति संस्कुवर्न्त्येतेन ह्यमुं लोकं जेष्यन्तो मन्यन्ते ॥ ५ ॥ ८ ॥" |
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| "text": "तथापि योग्यतैवात्र भूयसीति निवेदितुम् ।\nदर्शयन् प्रतिरूपस्य दोषानाह प्रजापतिः ॥\nअलङ्कारादिभिर्युक्तः पश्यस्वेति विवेचयन् ।\nयथा देहगुणे गौण्यं दोषे दोषास्तथेति(तथैव) तु ॥\nतथाऽप्यशुद्धभावत्वात् प्रतिरूपस्य तद्गुणान् ।\nपरस्य ब्रह्मणो जानन् ययौ तुष्टमनाः स्वयम् ॥\nअसुराणामविश्वासनिवृत्त्यर्थं पितामहः ॥\nमाध्यस्थ्यं ज्ञापयानश्च जानन् वैरोचनं मनः ।\nप्राहाज्ञानां पराभाव इत्युच्चैश्च पुनः पुनः ॥\nतथाप्यशुद्धभावत्वादजानन्नेव निर्ययौ ।\nगत्वा चैव परम्ब्रह्म प्रतिरूपात्मकं सदा ॥\nदिदेश सर्वासुराणां शरीरालङ्कृतेरपि ।\nअलङ्कृतिं ब्रह्मणश्च प्रत्यक्षेणोपलम्भिताम् ॥\nअतोऽसुरा न दास्यन्ति न यजन्त्यात्मनः परम् ।\nस्वभोगेनैव तृप्तिः स्यादिति सर्वेऽपि मेनिरे ॥\nतत्संस्कारवशेनैव स्वयं ब्रह्मेति वादिनः (वेदिनः)।\nअभवन्नपतंश्चैव तमोऽन्धे नित्यदुःखिताः ॥" | | "lines": [ |
| | "तथापि योग्यतैवात्र भूयसीति निवेदितुम् ।", |
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| "text": "अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद् भयं ददर्श यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ हेन्द्रोऽप्राप्यैव देवानेतद् भयं ददर्श यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति ॥ १ ॥" |
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| "text": "नाहमत्र भोज्यं पश्यामीति स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन् यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः सार्धं विरोचनेन किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोज्यं पश्यमीति ॥ २ ॥" | | "lines": [ |
| | "नाहमत्र भोज्यं पश्यामीति स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन् यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः सार्धं विरोचनेन किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच यथैव खल्वयमस्मिञ्छरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोज्यं पश्यमीति ॥ २ ॥" |
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| "text": "इन्द्रश्च(स्तु .हृ) जानन्नपि तु मोहयन्नसुरं तदा ।\nगत्वा निववृते पश्चादिव पश्यन् सदोषताम् ॥\nपुनः पुनश्च मोहाय गत्वा गत्वा निवर्तते ।\nकथञ्चिदेव विज्ञातं मयेत्यज्ञान् विमोहितुम् ॥" | | "lines": [ |
| | "इन्द्रश्च(स्तु .हृ) जानन्नपि तु मोहयन्नसुरं तदा ।", |
| | "गत्वा निववृते पश्चादिव पश्यन् सदोषताम् ॥", |
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| | "दशमः खण्डः" |
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| | "य एष स्वप्ने महीयमानश्चरत्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद् भयं ददर्श तद्यदपीदं शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ १ ॥" |
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| | "न वधेनास्य हन्यते नास्य स्रामेण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोज्यं पश्यामीति ॥ २ ॥" |
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| | "स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन् यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच तद्यदपीदं शरीरमन्धं भवत्यनन्धः स भवति यदि स्राममस्रामो नैवैषोऽस्य दोषेण दुष्यति ॥ ३ ॥" |
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| | "न वधेनास्य हन्यते नास्य स्रामेण स्रामो घ्नन्ति त्वेवैनं विच्छादयन्तीवाप्रियवेत्तेव भवत्यपि रोदितीव नाहमत्र भोग्यं(ज्यं) पश्यामीत्येवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि वसापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाणीति स हापराणि द्वात्रिंशतं वर्षाण्युवास तस्मै स होवाच ॥ ४ ॥ १० ॥" |
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| "text": "तद्योग्यान्येव वाक्यानि ब्रह्माप्याह पुनः पुनः ।\nगरीयसी योग्यतेति ज्ञापयन्पूर्ववत् पुनः ॥\nसन्दिग्धान्येव वाक्यानि प्रोवाचेन्द्राय चाऽत्मभूः ।\nस्वप्नं प्रदर्शयन्यस्तु पूज्यते सर्वदैवतैः ॥\nस एव विष्णुरित्याह तत्राप्याह पुरन्दरः ।\nदर्शयन्नासुरीं बुद्धिं स्वप्नदृश्यविवक्षया ॥\nघ्नन्तीवैनमदन्तीव तथा च स्यात् परो हरिः ॥ १० ॥" | | "lines": [ |
| | "तद्योग्यान्येव वाक्यानि ब्रह्माप्याह पुनः पुनः ।", |
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| | "एकादशः खण्डः" |
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| "text": "तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्तः सन् प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श नाहं खल्वयमेवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यमीति ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "तद्यत्रैतत् सुप्तः समस्तः सन् प्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्येष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति स ह शान्तहृदयः प्रवव्राज स हाप्राप्यैव देवानेतद्भयं ददर्श नाहं खल्वयमेवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यमीति ॥ १ ॥" |
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| | "स समित्पाणिः पुनरेयाय तं ह प्रजापतिरुवाच मघवन् यच्छान्तहृदयः प्राव्राजीः किमेवेच्छन् पुनरागम इति स होवाच नाहं खल्वयं भगव एवं सम्प्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति नो एवेमानि भूतानि विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्र भोग्यं पश्यमीति ॥ २ ॥" |
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| | "एवमेवैष मघवन्निति होवाचैतं त्वेव ते भूयोऽनुव्याख्यास्यामि नो एवान्यत्रैतस्माद् वसापराणि पञ्च वर्षाणीति स हापराणि पञ्च वर्षाण्युवास तान्येकशतं सम्पेदुरेतत् तद् यदाहुरेकशतं ह वै वर्षाणि मघवान् प्रजापतौ ब्रह्मचर्यमुवास तस्मै स होवाच ॥ ३ ॥ ११ ॥" |
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| "text": "इत्युक्त आह ब्रह्मैव सुप्तिस्थो भगवानिति ।\nयत्र सुप्तो ह्ययं जीव इत्युक्तः(इत्युक्तं .हृ) प्राह वासवः ॥\nनाहं जानामि मत्तोऽन्यं सुप्तौ(सुप्तः .हृ) नान्योऽपि दर्शयेत् ।\nअहमस्मीति भूतानि न च पश्यन्ति कानिचित् ॥\nयदि जीवः परात्मा वाऽप्यन्योन्यस्मिन्नपीतताम्(चाथोऽन्योन्यास्मिन्नपीतताम्) ।\nगतौ तदाऽप्यपीतस्तु शं विनैव भवेदिति ॥ ११ ॥" | | "lines": [ |
| | "इत्युक्त आह ब्रह्मैव सुप्तिस्थो भगवानिति ।", |
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| | "मघवन् मर्त्यं वाव इदं शरीरमात्तं मृत्युना तदस्यामृतस्याशरीरस्याऽत्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः प्रियाप्रियाभ्यां न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः ॥ १ ॥" |
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| "text": "उक्तो ब्रह्माऽब्रवीच्छक्रं ज्ञापयंस्तत्त्वमञ्जसा ।\nयोऽयं शरीरसम्बन्धी जीव इत्यवधार्यताम् ।\nभूतैष्यद्वर्तमानेषु यस्य नो देहसङ्गतिः ।\nसोऽशरीरः परो विष्णुरमृतो नित्यमूर्तिमान् (नित्यपूर्तिमान् .हृ) ।\nअधिष्ठाय तथाऽपीमं देहमास्ते स ईश्वरः ।\nजरामृत्युपरीतोऽयं जीवात्मा देहसङ्गतेः ॥\nपरेणेयं सुखं प्रोक्तं प्रियमित्येव पण्डितैः ।\nपरेणेयमभद्रं यदप्रियं तदुदीरितम् ॥\nन जीवस्य तयोर्हानिः कदाचिद् विद्यते क्वचित् (विद्यते द्वयोः .हृ)।\nअशरीरं परं ब्रह्म नैव ते स्पृशतः क्वचित् ॥" | | "lines": [ |
| | "उक्तो ब्रह्माऽब्रवीच्छक्रं ज्ञापयंस्तत्त्वमञ्जसा ।", |
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| | "एवमेवैष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः स यत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वाऽज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरं स यथा प्रायोग्य आचरणे युक्त एवमेवायमस्मिञ्छरीरे प्राणो युक्तः ॥ ३ ॥" |
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| "text": "अम्नामा भगवान् विष्णुर्व्याप्तत्वात् परमेश्वरः ।\nतेनैव म्रियमाणत्वाद् ब्रह्माभ्रमिति कीर्तितः ॥\nवायोः पत्नी विद्युदुक्ता विशेषद्युतिहेतुतः ।\nब्रह्माणी स्तनयित्नुः स्यात् सर्वशब्दात्मिका यतः ॥\nएतेषां ज्ञानवैशेष्यान्नातिदेहेन सङ्गतिः ।\nअतः प्रियाप्रिये तेषामपि न ब्रह्मणः किमु ॥\nविष्ण्वीयं हि सुखं तेषां स्वभर्त्रीयमथापि च ।\nन ह्यन्येयं सुखं तेषामतस्ते प्रियवर्जिताः ॥\nयथा ते परमाकाशाद् विष्णोरेव समुत्थिताः ।\nतमेव प्राप्य संयान्ति नैजमानन्दमूर्जितम् ॥\nएवं सम्यक्प्रसादेन विष्णोर्मुक्तोऽपि योऽपरः ।\nयं प्राप्य ते निजानन्दमाप्नुवन्ति स केशवः ॥\nतं प्राप्य रमते मुक्तः स्त्रीभिर्यानैश्च बन्धुभिः ।\nयथैव सारथिर्याने एवं देहे च मारुतः ॥\nयथा रथी तथा विष्णुर्जीवोऽन्यरथगो यथा ।" | | "lines": [ |
| | "अम्नामा भगवान् विष्णुर्व्याप्तत्वात् परमेश्वरः ।", |
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| | "एतेषां ज्ञानवैशेष्यान्नातिदेहेन सङ्गतिः ।", |
| | "अतः प्रियाप्रिये तेषामपि न ब्रह्मणः किमु ॥", |
| | "विष्ण्वीयं हि सुखं तेषां स्वभर्त्रीयमथापि च ।", |
| | "न ह्यन्येयं सुखं तेषामतस्ते प्रियवर्जिताः ॥", |
| | "यथा ते परमाकाशाद् विष्णोरेव समुत्थिताः ।", |
| | "तमेव प्राप्य संयान्ति नैजमानन्दमूर्जितम् ॥", |
| | "एवं सम्यक्प्रसादेन विष्णोर्मुक्तोऽपि योऽपरः ।", |
| | "यं प्राप्य ते निजानन्दमाप्नुवन्ति स केशवः ॥", |
| | "तं प्राप्य रमते मुक्तः स्त्रीभिर्यानैश्च बन्धुभिः ।", |
| | "यथैव सारथिर्याने एवं देहे च मारुतः ॥", |
| | "यथा रथी तथा विष्णुर्जीवोऽन्यरथगो यथा ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "text": "अथ यत्रैतदाकाशमनुविषण्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माऽभिव्याहाराय वागथ यो वेदेदं शृणवानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ यत्रैतदाकाशमनुविषण्णं चक्षुः स चाक्षुषः पुरुषो दर्शनाय चक्षुरथ यो वेदेदं जिघ्राणीति स आत्मा गन्धाय घ्राणमथ यो वेदेदमभिव्याहराणीति स आत्माऽभिव्याहाराय वागथ यो वेदेदं शृणवानीति स आत्मा श्रवणाय श्रोत्रम् ॥ ४ ॥" |
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| "text": "अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा(मननाय) मनोऽस्य दैवं चक्षुः स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते ॥ ५ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ यो वेदेदं मन्वानीति स आत्मा(मननाय) मनोऽस्य दैवं चक्षुः स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते ॥ ५ ॥" |
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| "text": "य एते ब्रह्मलोके तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात् तेषां सर्वे च लोकाः आत्ताः सर्वे च कामाः सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच ॥ ६ ॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "य एते ब्रह्मलोके तं वा एतं देवा आत्मानमुपासते तस्मात् तेषां सर्वे च लोकाः आत्ताः सर्वे च कामाः सर्वांश्च लोकानाप्नोति सर्वांश्च कामान् यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच प्रजापतिरुवाच ॥ ६ ॥ १२ ॥" |
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| "text": "यदाश्रितानीन्द्रियाणि प्राणश्चापि यदाश्रयः ॥\nयदाश्रयोऽप्ययं जीवो यो वेदैषां प्रवर्तनम् ।\nदर्शनं श्रवणं घ्राणं जिह्वां स्पर्शं मनस्तथा ॥\nतदीयान् विषयांश्चैव यो वेदाखिलमञ्जसा ।\nस विष्णुः परमो ज्ञेयो देवताः करणानि च ॥\nस एतैरिन्द्रियैर्विष्णुर्भोगाननुभवत्यजः ।\nस्वरूपेणैव शक्तोऽपि जीवदेहस्थितो हरिः ॥\nभुङ्क्ते तदिन्द्रियैर्भोगाञ्छुरितैरिन्द्रियैः स्वकैः ।\nजीवं तदिन्द्रियाण्येवं प्राणं च व्याप्य कृत्स्नशः ॥\nभुङ्क्ते तत्तद्गुणान् विष्णुर्नैव दोषान् कदाचन ।\nतमेतं(तमेवं) देवताः सर्वाः वाय्वाद्याः समुपासते ।\nतस्माद् देववशा लोकाः सर्वकामाः सजीवकाः ।\nतमेतं यो यथा ज्ञात्वा पश्येद् विष्णुं सनातनम् ॥\nआप्नोति सर्वकामांश्च सर्वलोकांश्च कामतः ॥’ इति सामसंहितायाम् ।" | | "lines": [ |
| | "यदाश्रितानीन्द्रियाणि प्राणश्चापि यदाश्रयः ॥", |
| | "यदाश्रयोऽप्ययं जीवो यो वेदैषां प्रवर्तनम् ।", |
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| | ] |
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| "text": "उभौ लोकाववाप्नोति वचनान्न लोकायतिकमतं वरोचनेनोक्तम्(विरोचनोक्तम् .हृ)। किन्तु बिम्बप्रतिबिम्बयोरभिमान्यैक्याभिप्रायेण(बिम्बप्रतिबिम्बाभिमान्यैक्याभिप्रायेण) जीवात्मैव महय्य इति मायावाद एव । न चात्र (नचान्यत्र .हृ) जीव आत्मशब्दोक्तः ।\n‘‘तदस्यामृतस्याशरीरस्याऽत्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः स्वकैरिन्द्रियैश्छुरितैः व्याप्तः। तथा च ‘दैवं चक्षुः’इत्येतदुपलक्षणप्रियाप्रियाभ्यां न ह वै(न वै) सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः’’ इतीशजीवयोः सतात्पर्यं भेदाभिधानात् ।\nन हि जीवादन्यस्य प्रियाप्रियानुभवोऽस्ति । न च मुक्तस्यापि प्रियाप्रियापहतिरस्ति ।" | | "lines": [ |
| | "उभौ लोकाववाप्नोति वचनान्न लोकायतिकमतं वरोचनेनोक्तम्(विरोचनोक्तम् .हृ)। किन्तु बिम्बप्रतिबिम्बयोरभिमान्यैक्याभिप्रायेण(बिम्बप्रतिबिम्बाभिमान्यैक्याभिप्रायेण) जीवात्मैव महय्य इति मायावाद एव । न चात्र (नचान्यत्र .हृ) जीव आत्मशब्दोक्तः ।", |
| | "‘‘तदस्यामृतस्याशरीरस्याऽत्मनोऽधिष्ठानमात्तो वै सशरीरः स्वकैरिन्द्रियैश्छुरितैः व्याप्तः। तथा च ‘दैवं चक्षुः’इत्येतदुपलक्षणप्रियाप्रियाभ्यां न ह वै(न वै) सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्त्यशरीरं वाव सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः’’ इतीशजीवयोः सतात्पर्यं भेदाभिधानात् ।", |
| | "न हि जीवादन्यस्य प्रियाप्रियानुभवोऽस्ति । न च मुक्तस्यापि प्रियाप्रियापहतिरस्ति ।" |
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| "text": "प्रियाप्रियरहितो भगवानेव, न जीवः\nन च विष्णोरत्र विवक्षितं प्रियम् । पराधीनरतिप्राप्तिर्हि(प्राप्तिः .हृ) प्रियमत्र विवक्षितम्। न हि तद्भगवतः । मुक्तानां तु भगवदधीनरतित्वात् प्रियमस्त्येव ।\n‘जीवा मुक्ता अमुक्ताश्च पराधीनरतित्वतः ।\nन प्रियापहतिः क्वापि स्वातन्त्र्यान्न हरेः प्रियम् ॥\nपराधीनरतिर्यस्मात् प्रियमित्युच्यते बुधैः ।\nहरेरधीनता तु स्याद् यद्यपि ब्रह्मवायुवोः ॥\nतदन्यवशताभावादप्रियाविति तौ श्रुतौ ।\nयथा राज्ञः स्वराट्शब्दो रुद्रस्येश्वरता तथा ॥\nयथा शक्रस्य चेन्द्रत्वं तद्वदप्रियता तयोः ।\nयथा राज्ञ्याश्च राज्ञीत्वं(राज्ञ्याः स्वराज्ञीत्वं यथैवोमेश्वरी .हृ)यथा वोमेश्वरी स्मृता ॥\nविद्युतः स्तनयित्नोश्च तथैवाप्रियता श्रुता ॥’ इति च परमश्रुतौ ।" | | "lines": [ |
| | "प्रियाप्रियरहितो भगवानेव, न जीवः", |
| | "न च विष्णोरत्र विवक्षितं प्रियम् । पराधीनरतिप्राप्तिर्हि(प्राप्तिः .हृ) प्रियमत्र विवक्षितम्। न हि तद्भगवतः । मुक्तानां तु भगवदधीनरतित्वात् प्रियमस्त्येव ।", |
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| | "‘स एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परञ्ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ इति मुक्तस्य तत्प्रसादात् तत्प्राप्त्या निजानन्दानुभवश्रुतेश्च ।", |
| | "उत्तमपुरुष इति कथितो भगवानेव", |
| | "‘स उत्तमः पुरुष(उत्तमपुरुषः)’ इति तस्य जीवादुत्तमत्वश्रुतेश्च । अपरपुरुषापेक्षया ह्युत्तमपुरुषशब्दो भवति । अन्यथोत्तमशब्द एव स्यात् । ‘उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः’(भ.गी.१५.१७) इति च ।", |
| | "‘ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत् प्राप्तुं नैव शक्यते ।", |
| | "तद्यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान् केवलो हरे ॥’", |
| | "‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ’।" |
| | ] |
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| "text": "‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य(ज्ञानमपाश्रित्य .हृ) मम साधर्म्यमागताः’, ‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’ इति, ‘एतमानन्दमयामात्मानमुपसङ्क्रम्येमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन्’, ‘न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रताः (हरेरनुव्रता) यत्र सुरासुरार्चिताः’, ‘कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः इत्यादेश्च ।\n‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम्’ इत्यत्रापि भेदेनावस्थानश्रुतेः । (उपशब्दादन्तशब्दाच्च .हृ)उपशब्दादन्तरशब्दाच्च मुक्तस्य परञ्ज्योतिःसमीपावस्थानावगतेश्च ।" | | "lines": [ |
| | "‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य(ज्ञानमपाश्रित्य .हृ) मम साधर्म्यमागताः’, ‘सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’ इति, ‘एतमानन्दमयामात्मानमुपसङ्क्रम्येमांल्लोकान् कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन्’, ‘न यत्र माया किमुतापरे हरेरनुव्रताः (हरेरनुव्रता) यत्र सुरासुरार्चिताः’, ‘कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः इत्यादेश्च ।", |
| | "‘स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा ज्ञातिभिर्वा नोपजनं स्मरन्निदं शरीरम्’ इत्यत्रापि भेदेनावस्थानश्रुतेः । (उपशब्दादन्तशब्दाच्च .हृ)उपशब्दादन्तरशब्दाच्च मुक्तस्य परञ्ज्योतिःसमीपावस्थानावगतेश्च ।" |
| | ] |
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| "text": "‘जीवोपासनां न चतुरानन उपदिशेत््’ इति निरूपणम्\nन च जीवमात्रं देवा उपासते । ‘ऊर्जं पृथिव्या भक्त्वायोरुगायमुपासते’ इति हि श्रुतिः । ‘भेददृष्ट्याऽभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा’ इत्यादेश्च ।" | | "lines": [ |
| | "‘जीवोपासनां न चतुरानन उपदिशेत््’ इति निरूपणम्", |
| | "न च जीवमात्रं देवा उपासते । ‘ऊर्जं पृथिव्या भक्त्वायोरुगायमुपासते’ इति हि श्रुतिः । ‘भेददृष्ट्याऽभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा’ इत्यादेश्च ।" |
| | ] |
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| "text": "भगवतः इन्द्रियैर्भोगकथनम्\nभूतैर्महद्भिर्य इमाः पुरो विभुर्निर्माय शेते यदमूषु पूरुषः ।\nभुङ्क्ते गुणान् षोडश षोडशात्मकः सोऽलङ्कृषीष्ट भगवान् वचांसि मे ॥’ इत्यादौ भगवत एवेन्द्रियैर्भोगोक्तेश्च ।\n‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे’ इति च । ‘ओं गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् अोम्’(ब्र.सू.१.२.११) इति भगवद्वचनं च ।" | | "lines": [ |
| | "भगवतः इन्द्रियैर्भोगकथनम्", |
| | "भूतैर्महद्भिर्य इमाः पुरो विभुर्निर्माय शेते यदमूषु पूरुषः ।", |
| | "भुङ्क्ते गुणान् षोडश षोडशात्मकः सोऽलङ्कृषीष्ट भगवान् वचांसि मे ॥’ इत्यादौ भगवत एवेन्द्रियैर्भोगोक्तेश्च ।", |
| | "‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे’ इति च । ‘ओं गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् अोम्’(ब्र.सू.१.२.११) इति भगवद्वचनं च ।" |
| | ] |
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| "text": "‘इदं पश्यामि जिघ्राणीत्यपि जीवा न वै विदुः ।\nद्रव्याणामपरिज्ञानाद्(द्रव्याणामपि च ज्ञानात्) वेदासौ पुरुषोत्तमः॥’ इति च ।\nउत्तमपुरुषत्वेन भगवानेव परामृष्टः\n‘स उत्तमः पुरुषः’ इति भगवत एवायं परामर्शः । ‘अोम् अन्यार्थश्च परामर्शः अोम्’(ब्र.सू.१.३.२०) इति भगवद्वचनात् । ‘ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः’(भ.गी.१५.१७) इति च । ‘अों जगद्व्यापारवर्जम् अोम्’(ब्र.सू.४.४.१७) इत्यल्पैश्वर्यत्वं च मुक्तस्य भगवताऽभिहितम् । अतो ‘यं प्राप्य जीवः स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स भगवानुत्तमः पुरुषः’ इति परामर्शः ।\n‘स्वप्ने महीयमानश्चरति यत्रैतत्सुप्तः’ इति पुरस्तादपि भेदोक्तेः । न हि महीयमान एव जीवश्चरति । प्रायोग्यः सारथिः । प्रयोगेन यानस्य । ‘यन्ता सारथिरानेता प्रायोग्य इति कीर्तितः(कीर्त्यते .हृ)’ इत्यभिधानात् । ‘अन्येभ्यो दीप्यमानत्वाद् दैवं चक्षुर्मनः स्मृतम्’ इति च । ‘य एते ब्रह्मलोके’ तेषु ‘रमते’ । अनुविद्य । शास्त्राचार्यानुसारेण विदित्वा विजानात्यापरोक्ष्येण । ‘वेदनं शास्त्रतो ज्ञानं विज्ञानं ब्रह्मदर्शनम्’ इति च ॥ ७॥ १२ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘इदं पश्यामि जिघ्राणीत्यपि जीवा न वै विदुः ।", |
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| | "त्रयोदशः खण्डः" |
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| "text": "श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छयामं प्रपद्येऽश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात् प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसम्भवामीत्यभिसम्भवामीति ॥ १॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "श्यामाच्छबलं प्रपद्ये शबलाच्छयामं प्रपद्येऽश्व इव रोमाणि विधूय पापं चन्द्र इव राहोर्मुखात् प्रमुच्य धूत्वा शरीरमकृतं कृतात्मा ब्रह्मलोकमभिसम्भवामीत्यभिसम्भवामीति ॥ १॥ १३ ॥" |
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| "text": "‘श्यामो हृदिस्थितो विष्णुः शबलो विश्वरूपवान् ।\nजीववर्णो जीवगतो लोहितश्चक्षुषि स्थितः॥’ इति मानसे ॥\n‘हयग्रीवमुखोत्थानि यानि वाक्यानि तानि तु ।\nरमा ददर्श तान्येव ब्रह्मा तान्येव नारदः ॥\nयानि विष्णोरयोग्यानि प्रार्थनाद्यात्मकानि तु ।\nतान्युत्तरेषां वाक्यानि भविष्याण्यवदद्धरिः ॥\nएवं रमा तथा ब्रह्मा छान्दोग्योपनिषद्धि सा ॥’ इति सामसंहितायाम् ॥ १॥ १३ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘श्यामो हृदिस्थितो विष्णुः शबलो विश्वरूपवान् ।", |
| | "जीववर्णो जीवगतो लोहितश्चक्षुषि स्थितः॥’ इति मानसे ॥", |
| | "‘हयग्रीवमुखोत्थानि यानि वाक्यानि तानि तु ।", |
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| | "तान्युत्तरेषां वाक्यानि भविष्याण्यवदद्धरिः ॥", |
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| "text": "आकाशो वै नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद् ब्रह्म तदमृतं स आत्मा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवानि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशो विशां यशोऽहमनुप्रापत्सि स हाहं यशसां यशः श्वेतमदत्कमदत्कं श्वेतं लिन्दुमाऽभिगां लिन्दुमाऽभिगाम् ॥ १॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "आकाशो वै नामरूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद् ब्रह्म तदमृतं स आत्मा प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवानि ब्राह्मणानां यशो राज्ञां यशो विशां यशोऽहमनुप्रापत्सि स हाहं यशसां यशः श्वेतमदत्कमदत्कं श्वेतं लिन्दुमाऽभिगां लिन्दुमाऽभिगाम् ॥ १॥ १४ ॥" |
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| "text": "‘आकाशोऽतिप्रकाशत्वान्नामरूपे ऋते स्थितः ।\nब्रह्माख्यो भगवान् विष्णुस्तद्वेश्म प्राप्नुयामहम् ॥\nयशोऽहं सर्ववर्णानां मत्तोऽन्येषां(मत्तो ह्येषां) यशो भवेत् ।\nसोऽहं मम यशोदातृ यशसां यश उत्तमम् ॥\nविष्ण्वाख्यं परमं ब्रह्म श्वेतं श्वसनगं यतः ।\nअदत्कमद्यमानं कं स्वानन्दानुभवात्मकम् ॥\nलिन्दु तद्रतिदं यस्माद् तदहं प्राप्नुयां सदा ॥’॥ १४ ॥" | | "lines": [ |
| | "‘आकाशोऽतिप्रकाशत्वान्नामरूपे ऋते स्थितः ।", |
| | "ब्रह्माख्यो भगवान् विष्णुस्तद्वेश्म प्राप्नुयामहम् ॥", |
| | "यशोऽहं सर्ववर्णानां मत्तोऽन्येषां(मत्तो ह्येषां) यशो भवेत् ।", |
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| | "पञ्चदशः खण्डः" |
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| "text": "तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यः आचार्यकुलाद् वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषणाभिसमावृत्य कुटुम्बी(कुटुम्बे .हृ) शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिंसन् सर्वाणि भूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन् यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते ॥ १॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "तद्धैतद्ब्रह्मा प्रजापतय उवाच प्रजापतिर्मनवे मनुः प्रजाभ्यः आचार्यकुलाद् वेदमधीत्य यथाविधानं गुरोः कर्मातिशेषणाभिसमावृत्य कुटुम्बी(कुटुम्बे .हृ) शुचौ देशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधदात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिंसन् सर्वाणि भूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः स खल्वेवं वर्तयन् यावदायुषं ब्रह्मलोकमभिसम्पद्यते न च पुनरावर्तते न च पुनरावर्तते ॥ १॥ १५ ॥" |
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| "text": "उपदिष्टः परेणैव त्वेवमाह चतुर्मुखः ।\nउवाच च मनोर्विद्यां प्रजाभ्यो मनुरेव च ॥\nतस्मात् सर्वेन्द्रियाणीशो निधाय पुरुषोत्तमे ।\nदृष्ट्वा तं परमं विष्णुं तल्लोकं प्रतिपद्यते ॥\nनावर्तेत पुनस्तस्मात् कदाचित् केनचित् क्वचित्(केनचिद्धरेः .हृ) ॥ इति च ॥ १॥ १५ ॥" | | "lines": [ |
| | "उपदिष्टः परेणैव त्वेवमाह चतुर्मुखः ।", |
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| "text": "अन्तिममङ्गलाचरणम्\nपूर्णानन्दमहोदधिः परतमो विष्णुः परस्मात् सदा\nसर्वज्ञः सकलेशिता गुणनिधिर्नित्योत्सवस्तद्विदाम् ।\nसर्वस्मादधिकं मम प्रियतमस्त्विष्टादपीष्टोत्तमः\nसर्वस्माच्च हितात् सदा हिततमः प्रीतो भवेन्मे हरिः ॥\nयस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं\nबट् तद्दर्शनमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।\nवायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः\nम्ध्वो यत्तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हरौ तेन हि ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "बळित्थासूक्तार्थः\n‘हनुशब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः ।\nरामस्य स्वृतरूपस्य(ह्यृतरूपस्य. हृ) वाचो नेता गुणोदधिः ॥\nभृतमो भीम इत्युक्तो वाचो मा मातरः स्मृताः ।\nऋगाद्या इतिहासश्च पुराणं पञ्चरात्रकम् ॥\nप्रोक्ताः सप्तशिवास्तत्र शयो भीमस्ततः स्मृतः ।\nमध्वित्यानन्द उद्दिष्टो वेति तीर्थमुदाहृतम् ।\nमध्व आनन्दतीर्थः स्यात् तृतीया मारुतीतनुः ॥\nइति सूक्तगतं रूपत्रयमेतन्महात्मनः ।\nयो वेद वेदवित् स स्यात् तत्त्ववित् तत्प्रसादतः ॥’ इति सद्भावे ।\nआनन्दतीर्थ इति तु यस्य नाम तृतीयकम् (द्वितीयकम् .हृ)।\nपूर्णप्रज्ञेन तेनेदं कृतं भाष्यं हरेः प्रियम् ॥\nनित्यानन्दो हरिः पूर्णो नित्यदा प्रीयतां मम ।\nनमस्तस्मै नमस्तस्मै नमस्तस्मै च विष्णवे ॥" | | "lines": [ |
| | "बळित्थासूक्तार्थः", |
| | "‘हनुशब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः ।", |
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| | "प्रोक्ताः सप्तशिवास्तत्र शयो भीमस्ततः स्मृतः ।", |
| | "मध्वित्यानन्द उद्दिष्टो वेति तीर्थमुदाहृतम् ।", |
| | "मध्व आनन्दतीर्थः स्यात् तृतीया मारुतीतनुः ॥", |
| | "इति सूक्तगतं रूपत्रयमेतन्महात्मनः ।", |
| | "यो वेद वेदवित् स स्यात् तत्त्ववित् तत्प्रसादतः ॥’ इति सद्भावे ।", |
| | "आनन्दतीर्थ इति तु यस्य नाम तृतीयकम् (द्वितीयकम् .हृ)।", |
| | "पूर्णप्रज्ञेन तेनेदं कृतं भाष्यं हरेः प्रियम् ॥", |
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