JSON:Pramaanalakshanam: Difference between revisions
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"अशेषगुरुमीशेशं नारायणमनामयम् ।", | |||
"सम्प्रणम्य प्रवक्ष्यामि प्रमाणानां स्वलक्षणम् ॥" | |||
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"यथार्थं प्रमाणम् । तद् द्विविधम् । केवलमनुप्रमाणं च । यथार्थज्ञानं केवलम् । तत्साधनमनुप्रमाणम् ।" | |||
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"केवलं चतुर्विधम् । ईश-लक्ष्मी-योगि-अयोगिभेदेन । पूर्वद्वयम् अनादिनित्यम् । स्वातन्त्र्य-पारतन्त्र्याभ्यां तद्विशेषाः । पूर्वं स्वपरगताखलिविशेषविषयम् । द्वितीयम् ईशेऽन्येभ्योऽधिकम् । असार्वत्रिकम् । अन्यत्र सर्वविषयम् । स्पष्टत्वे भेदः ।" | |||
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"योगिज्ञानम् ऋजूनामनादिनित्यम् । ईशे जीवेभ्योऽधिकम् । अन्यत्राऽलोचने सर्वविषयम् । क्रमेण वर्धमानम् । आ मुक्तेः । ततोऽव्ययम् । ततोऽर्वाक् क्रमेण ह्रसितम् । सादि च तात्त्विकेभ्योऽन्यत्र । अयोगिज्ञानम् उत्पत्तिविनाशवत् । अल्पम् ॥" | |||
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"अनुप्रमाणं त्रिविधम् । प्रत्यक्षम् अनुमानम् अगम इति । निर्दोषार्थेन्द्रियसन्निकर्षः प्रत्यक्षम् । निर्दोषोपपत्तिरनुमानम् । निर्दोषः शब्द आगमः । अर्थापत्त्युपमे अनुमाविशेषः । अभावोऽनुमा प्रत्यक्षं च । परामर्श-अपरामर्शविशेषात् । सम्भवपरिशेषावनुमा ।" | |||
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"आत्मान्योन्याश्रय-चक्रका-अनवस्था-कल्पनागौरव-श्रुतदृष्टहानादयो दूषणानुमा । उपक्रम-उपसंहार-तदैकरूप्य-अभ्यासा-अपूर्वता-फल-अर्थवादाश्च उपपत्तिविशेषाः । त एव सोपपत्तयो लिङ्गानि । समाख्यावाक्यप्रकरणस्थानानि च लिङ्गविशेषाः ।" | |||
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"व्याप्तिरुपपत्तिमूलम् । सा प्रतिज्ञा-हेतु-दृष्टान्तरूपा । हेतुगर्भा प्रतिज्ञा केवलाऽपि । सिद्धौ प्रतिज्ञायां हेतुमात्रं च । दृष्टान्तः सप्रतिज्ञो हेतुगर्भः ।" | |||
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"उपपत्तिदोषौ विरोध-असङ्गती । न्यूनाधिके वाचनिके । संवादानुक्तियुता निग्रहाः ।" | |||
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"प्रत्यक्षं सप्तविधम् । साक्षिषडिन्द्रियभेदेन । मानसप्रत्यक्षजा स्मृतिः । स्मृत्यनुवादयोर्नाप्रामाण्यम् । यथार्थत्वानुभवात् । अहानेश्च । विरोधो मानस्ववाक्याभ्याम् । स्ववाक्यविरोधोऽपसिद्धान्तजातिरूपेण । जातिः ‘न मेये मानापेक्षा’ इत्यादिका । ‘मेये मानापेक्षाऽस्ति’ इति च तेनैव न्यायेन सिद्धत्वात् । मानविरोधश्च । छलम् असङ्गतम् । अन्यच्च । गृष्टिविवक्षया ‘गाम् आनय’ इत्युक्ते पृथिवीविवक्षया ‘गवानयनम् अशक्यम्’ इतिवत् ।" | |||
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"त्रिविधो विरोधः । प्रतिज्ञा-हेतु-दृष्टान्तभेदेन । प्रमाणविरुद्धार्थप्रतिज्ञा प्रतिज्ञाविरोधः । हेतुस्वरूपासिद्धिरव्याप्तिश्चेति हेतुविरोधः । साध्यस्य साधनस्य वा अननुगमो दृष्टान्तविरोधः । प्रतिज्ञायाः समबलविरोध एव सप्रतिसाधनः । स एवोपाधिदोषोऽपि ।" | |||
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"सर्व एते दृश्यत्वानुमाने द्रष्टव्याः ।" | |||
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"प्रत्यक्षागमदिभिर्जगतः सत्यत्वात् । तत्पक्षे दृश्यत्वस्य च मिथ्यात्वात् । अनिर्वचनीयस्य प्रतिवादिनोऽसिद्धत्वात् । आत्मनोऽपि दृश्यत्वात् । शुक्तिरजतदेरनिर्वचनीयत्वाभावात् । अनिर्वचनीयदृश्यत्वाभावात् । मानसिद्धत्वादिति सप्रतिसाधनत्वाच्च । जगत्सत्यत्वग्राहिप्रत्यक्षस्य वर्तमानग्राहित्वे अनुमानागमप्रामाण्यग्राहिणोऽपि प्रत्यक्षत्वाविशेषाद् उत्तरक्षणे प्रामाण्यं न सेत्स्यति इति भेदादिवाक्यानामेव प्रामाण्यं स्यात् । तस्य साक्षिसिद्धत्वं चेत्, जगत्सत्यत्वमपि साक्षिसिद्धम् ।" | |||
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"व्यभिचारश्चेद् आगमार्थानुमा निर्दोषत्वाध्यवसाये च समः । अत उत्तरदिवसे अभेदवाक्यस्य भेदोऽर्थः स्यात् । निर्दोषानुमायाः सदोषत्वम् । सदोषानुमाया निर्दोषत्वम् इत्यव्यवस्था ।" | |||
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"आश्रयसाध्यव्यधिकरणासिद्धयो न दूषणम्, अतिप्रसङ्गाभावात् । अतिप्रसङ्गेन हि दोषत्वादोषत्वे कल्प्ये । व्याप्तिरेव हि प्रयोजिका । असत्यपि व्याप्तिरस्त्येव । ‘असदाश्रयस्य साधकत्वं न’ इत्यपि व्याप्तिं विना कथं निवार्यते ।" | |||
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"असदाश्रयम् इत्यादिविशेषणत्वसम्भवे कथमव्याप्तिः । न चात्यन्ताभावोऽपि सर्वधर्मरहितः । प्रमेयत्वाद्यनुभवात् । परिशेषार्थापत्तिप्रामाण्याभ्युपगमाच्च । ‘विमतं सकर्तृकम्’ इत्यत्र सर्वज्ञत्वस्य पक्षधर्मताबलेन सिध्यङ्गीकारात् ।" | |||
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"परिशेषोऽर्थापत्तिरनुमानमित्यविशेषः । उपपत्तिमात्रत्वात् । उपपत्तेश्च व्याप्त्यपेक्षा सर्वथाङ्गीकार्येत्याग्रहमात्रेण भेदः । उपमानस्यापि व्याप्तिरूपत्वात् । न हि स्वसदृशेनासदृशं क्वचिद् दृष्टम् । योग्यानुपलब्धेश्च लिङ्गत्वम्, अविशेषात् ।" | |||
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"उक्तदोषेष्वेव अशेषानुमानदोषाणामन्तर्भावः । साध्याविशिष्टोऽसिद्धः । सिद्धसाधकोऽसङ्गतः । न प्रमासाधनं प्रमाणम् । ज्ञानव्यतिरिक्तायां प्रमायां प्रमाणाभावात् । न चाज्ञातपरिच्छित्तिरेव प्रमा इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । याथार्थ्यमेव प्रामाण्यमित्यङ्गीकारात् ।" | |||
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"न चानुभूतिरेव प्रमाणम् । स्मृत्यादावव्याप्तेः । वेदानुमानादिप्रामाण्यप्रसिद्धेश्च ।", | |||
"स्मृतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम् ।", | |||
"प्रमाणमिति विज्ञेयं धर्माद्यर्थे बुभूषुभिः ॥", | |||
"इति श्रुतेश्च । ऐतिह्यमागमभेदः । न च सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणम् । ईश्वरज्ञानादावव्याप्तेः । अप्रामाण्ये प्रमाणाभावाच्च । प्रामाण्यज्ञाने च । तत्राप्यङ्गीकारेऽनवस्थितेः । स्वप्रकाशात्माङ्गीकारे तत्राव्याप्तेः । स्मृतेश्च प्रामाण्यानङ्गीकारे ‘अनुभूतं मया’ इत्यत्र प्रमाणाभावात् । लिङ्गत्वेन प्रामाण्ये कल्पनागौरवात् । दृष्टहानिश्च ।" | |||
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"स्मृतिप्रमाणद्वैविध्यमात्रकल्पने मिथ्याज्ञानादेर्निरासादनुभवविरोधः । ‘तदनुभवाभावः’ इत्युक्ते ‘अनुभवः स्मृतिश्च नास्ति’ इत्युक्ते किमुत्तरम् ? स्वसिद्धैः साधनं परसिद्धैर्दूषणम् । अतो न दूषणे अपसिद्धान्तादि । इष्टापत्तिः सिद्धसाधनत्वादसङ्गतमेव ॥" | |||
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"आनन्दतीर्थमुनिना ब्रह्मतर्कोक्तिमार्गतः । मानलक्षणमित्युक्तं सङ्क्षेपाद् ब्रह्मसिद्धये ॥" | |||
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"अशेषमानमेयैकसाक्षिणेऽक्षयमूर्तये । अजेशपुरुहूतेड्य नमो नारायणाय ते ॥" | |||
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Latest revision as of 19:27, 14 July 2026
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