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| "tag": "line",
| |
| "text": "लक्ष्मीपतेः पदाम्भोजयुगं नत्वा गुरोरपि ।",
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| |
| },
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "करिष्ये तत्त्वसङ्ख्यानव्याख्यानं नातिविस्तरम् ॥ १ ॥",
| |
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| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "मुमुक्षुणा खलु परमात्मा जगदुदयादिनिमित्तत्वेन अवश्यमवगन्तव्यः इति सकलसच्छास्त्राणामविप्रतिपन्नोऽर्थः। इदं च अवान्तरभेदभिन्नस्य जगतो विज्ञानमपेक्षते, इति जगदपि तथाऽवगन्तव्यम् । तदिदं प्रधानाङ्गभूतं, शास्त्रे विक्षिप्य प्रतिपादितम्, शिष्यहिततया संगृह्य प्रतिपादयितुं प्रकरणमिदमारभते भगवानाचार्यः ।\t",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "ननु प्रकरणादौ किमपि मङ्गलं कस्मान्नानुष्ठितम्? न तावत्तदफलमेव, प्रेक्षावद्भिरनुष्ठितत्वात् । नापि प्रारिप्सितपरिसमाप्त्यादिव्यतिरिक्तफलम् । नियमेन प्रारंभे तदनुष्ठानात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "उच्यते अनुष्ठितमेव भगवता मङ्गलम्, मानसादेरपि तस्य सम्भवात् । तच्च परमास्तिकत्वादनुमीयते ॥ यच्चायं स्वातन्त्र्यादिविशिष्टस्य विष्णोः आदितः एव सङ्कीर्तनं करोति । किं ततोऽन्यन्मङ्गलं नाम ? अन्यपरमपि तत् भक्त्या अनुष्ठितं स्वभावात् सम्पादयत्येव अखिलमङ्गलानीति ॥ इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तत्र तावत् तत्त्वं सामान्यतो विभागेन उद्दिशति ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "स्वतन्त्रमिति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "स्वतन्त्रमस्वतन्त्रं च द्विविधं तत्वमिष्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तत्वम् अनारोपितिम् । प्रमितिविषयः इति यावत् । तेन ‘तस्य भावः तत्वम्’ इत्यादिखण्डनानवकाशः।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु शुक्तरजतादिकं कथं न तत्त्वम् ? न हि धर्मी वा रजतत्त्वं वा न प्रमेयम्, नापि तयोः सम्बन्धः । शुक्तिव्यक्तौ रजतत्त्वस्य स नास्ति इति चेत्, मा भूत् । न हि गृहे देवदत्तो नास्ति इत्येतावता न प्रमेय इति । स्यादिदम् आरोपितस्य अन्यत्र सत्तामभ्युपगच्छतां दूषणम्। अत्यन्तासदेव रजतं दोषवशात् शुक्तिकायाम् आरोप्यत इति वादे तु नायं दोषः।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "एतेन ‘भाविपाकरागः कुंभः श्यामतादशायां रक्तपित्तिना रक्ततया उपलभ्यमानः तत्त्वं स्यात्’ इत्यपि परास्तम् । भाविनः प्रमेयत्वेऽपि पूर्वस्य तथाभावाभावात्, धर्मिणः तथाभावाङ्गीकारादिति।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तत् द्विविधम् । स्वतन्त्रमस्वतन्त्रञ्च इति इतिशब्दाध्याहारेण योज्यम् । अन्यथा स्वतन्त्रम् अस्वतन्त्रं च तत्त्वं प्रत्येकं द्विविधम् इति प्रतीतिः स्यात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "स्वरूप-प्रमिति-प्रवृत्ति-लक्षणसत्तात्रैविध्ये परानपेक्षं स्वतन्त्रम्। परापेक्षं अस्वतन्त्रम्। तदुपपादनायोक्तम् ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
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| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "इष्यत इति ।",
| |
| "tail": "प्रामाणिकैः इति शेषः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तथाहि यदि तत्त्वमेव नास्तीति ब्रूयात् तदा प्रत्यक्षादिविरोधः । भ्रान्तिः सा इति चेत् न, बाधकाभावात् । न च निरधिष्ठाना भ्रान्तिरस्ति, नापि निरवधिको बाधः । नास्त्येव तत्त्वम् इत्यस्यार्थस्य प्रमितित्वाप्रमितत्त्वयोर्व्याघातश्च।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदि च एकमेव तत्त्वं तदा भेदोपलम्भविरोधः। तद्भ्रान्तितायाञ्च बाधकं वाच्यम् । तच्च अन्यत्र निरस्तम्।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "यदि वा सर्वमेव स्वतन्त्रं स्यात् तदा पारतन्त्र्यादिप्रतीतिविरोधः। नित्यसुखादिप्रसङ्गश्च।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यदि वा परतन्त्रमेव तत्त्वं भवेत् तदा अनवस्थितेः असम्भवाच्च न कस्यापि सत्तादिकं स्यात् । आगमविरोधश्च।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यद्यपि भावाभावतया वा चेतनाचेतनत्वेन वा नित्यानित्यतया वा अस्य द्वैविध्यं शक्यते वक्तुम् । तथापि अस्य वैय्यर्थ्यात् अयमेव विभागो न्याय्यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "परतन्त्रप्रमेयं स्वतन्त्रप्रमेयायत्ततया विदितं हि निःश्रेयसाय भवति । तथा च प्रकरणान्ते वक्ष्यति । अन्यथा गङ्गावालुकापरिगणनवदिदं तत्त्वं अपार्थकं स्यात् । अतः स्वतन्त्रास्वतन्त्रभेदात् द्विविधं तत्त्वम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "स्वतन्त्रतत्वस्य प्राधान्यात् तदेवादौ उद्दिष्टम् । उद्देशेनैव लक्षणं लब्धम् । अत एवादौ तन्निर्दिशति ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "em",
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| "attrs": {
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| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "स्वतन्त्रेति",
| |
| "tail": "।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "स्वतन्त्रो भगवान् विष्णुः... ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्र ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": " भगवानिति",
| |
| "tail": " विष्णोः स्वातन्त्र्योपपादकम् ॥ अन्यत् अस्वतन्त्रम् इति शेषः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " अथवा, द्वे तत्वे इत्युक्ते स्वतन्त्रमिव परतन्त्रम् एका व्यक्तिरेव प्रसज्येत । तथा च प्रमाणविरोधो वक्ष्यमाणविभागविरोधश्च । अतः द्विविधमित्युक्तम् । ततश्च स्वतन्त्रमप्यनेकविधं स्यादित्यत इदमुक्तम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अथवा स्वतन्त्रास्वतन्त्रभेदेन तत्वद्वैविध्यं अङ्गीकुर्वाणाः साङ्ख्यादयः प्रधानादिकं स्वतन्त्रतत्वमातिष्ठन्ते । तन्निरासायेदमुदितमिति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
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| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "द्विविध",
| |
| "tail": "मित्युक्त्या ‘परतन्त्रतत्त्वमवान्तरभेदवदिति सूचितम् । तत्कथम् ? तत्र आह "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "भावेति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "......भावाभावौ द्विधेतरत् ॥ १ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "इतरत्",
| |
| "tail": "स्वतन्त्रात् अस्वतन्त्रतत्वं द्विधा। कथम् । भावः अभावः च इति।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अभावप्रतीतिः भावप्रतीत्यधीना नियमेन, इति प्राधान्यात् प्रथमं भावस्य उद्देशः।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रथमप्रतीतौ ‘अस्ति’ इति उपलभ्यते यः सः भावः।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यश्च प्रथमोपाब्धौ ‘नास्ति’ इति प्रतीयते सः अभावः।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "कुत एतत् ? स्वरूपेण हि भावाभावौ विधिनिषेधात्मानौ, रूपान्तरेण तु निषेधविधिरूपौ। तत्र आपातजायां संविदि स्वरूपमेव भासते, द्वितीयादिप्रतीतौ रूपान्तरम्, कार्यगम्यत्वात् सामग्रीभेदस्य। तथाच प्रतीतिः— अस्त्यत्र घटः स न शुक्ल इति । एवं नास्ति घटः अस्ति घटाभाव इति॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु स्वतन्त्रतत्वं भावोऽभावोऽन्यद्वा, नाद्यद्वितीयौ । भावाभावयोः परतन्त्रप्रभेदत्वात्, न तृतीयः व्याघातात्। मैवम् । भावलक्षणाऽऽक्रान्तत्वात्। ‘‘परतन्त्रं भावाभावतया द्विधा एव, न पुनरेकविधम्, नापि त्रिविधम् ’ इत्येवं परो विभागः, न पुनः ‘परतन्त्रमेव भावाभावात्मकमिति।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यथा भावेषु स्वतन्त्रतत्वं प्रविशति तथा विभागः क्रियताम् इति चेत्, नैवम् शङ्क्यम् । तद्धि प्रधानतया सर्वविविक्तमेव वेदितव्यम्। अन्यथा ‘‘द्विविधं तत्वं भावोऽभावश्च, भावोऽपि द्विविधः नित्योऽनित्यश्च, नित्योऽपि द्विविधः चेतनोऽचेतनश्च, चेतनोऽपि द्विविधः स्वतन्त्रोऽस्वतन्त्रश्च’’ इति कर्तव्यम् । एवं सति न प्राधान्येन प्रतिपत्तिः स्यात्, भगवद्व्यतिरिक्तस्य सर्वस्यापि अस्वातन्त्र्यप्रतीतिः न स्यात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "‘अस्मिन्पक्षे स्वतन्त्रस्य भावत्वं न विदितं स्यात्, इति सममेव’ इति चेत् न, पुरुषार्थोपयोगानुपयोगाभ्यां विशेषात्। अभावादीनां नित्यत्वाद्यनुक्तिश्च समैव। तस्मात् यथान्यासमेवास्तु ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अथ अस्वतन्त्रं चेतनत्वादिना एव विभज्यताम् । किं चेतनत्वादिना विभज्य भावाभावतया विभागः कर्तव्य उताऽयं न कर्तव्यः एव । नाद्यः । विशेषाभावात् । अभावस्य अचेतनत्वं एवं सति न उक्तं स्यात् इति चेत्, तथा सति चेतनस्य भावत्वमप्युक्तं स्यादिति समम् । तर्हि केन विशेषेणास्य प्राधान्यम् ? इति चेत्, वादिविप्रतिपत्तिभावाभावाभ्यां विशेषात् । अत एव न द्वितीयोऽपीति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "‘अभाव एव नास्तीति केचित् । तदसत्, ‘नास्ति’ इति प्रतीतेः दुरपह्नवत्वात् । ‘‘ ‘घटो नास्ति इति प्रतीतिः भूतलमात्रविषया’’ इति चेत्, ‘मात्र’ इति किम् ? भूतलमेव उच्यते उत अतिरिक्तं किञ्चित् । आद्ये घटवत्यपि प्रसङ्गः। अतिरिक्तोऽपि घटः चेत्, उक्तो दोषः । भावानन्तरं चेत् रूपवति घटे ‘गन्धो नास्ती’ति प्रतीतिप्रसङ्गः।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु घटाभावः घटाभाववति भूतले सम्बध्यते उत घटवति । नाद्यः । आत्माश्रयादिदोषप्रसङ्गात् । न द्वितीयः । विरोधात् । अतो वक्तव्यं ‘भूतलमात्रे’ति। तदेवास्तु ‘नास्तीति प्रतीतिविषय’ इति चेत् न ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रश्न एव अयं विविच्यताम् । यदि अभावसम्बन्धात् प्राक् कीदृशं भूतलम् ? इति, यदि वा सम्बन्धसमये कीदृशं भूतलम् ? इति, यद्वा यदि अभावात् इदं विविच्येत तदा कादृशं नाम स्यात् इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "आद्ये ‘सघटम्’ इत्येव उत्तरम् । द्वितीये ‘घटाभाववत्’ इति । तृतीये यदि विवेको वस्तुकृतः तदा अभावस्य नष्टत्वात् । ‘घटवत्’ इति । यदि बुद्धिकृतः तदा ‘बुद्ध्या एव घटप्रसक्तिमत्’ इति । अन्यथा एवं भावप्रतिक्षेपोऽपि स्यात्। इति आस्तां विस्तरः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "द्विधा",
| |
| "tail": "इत्युक्त्या भावाभावतयोरवान्तरभेदोऽस्तीति सूचितम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "TSK_C01_V02",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": " तत्र भावनिरूपणात् अभावनिरूपणस्य अल्पत्वात् सूचीकटाहन्यायेन पश्चादुद्दिष्टमप्यभावम् आदौ विभागेन उद्दिशति ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "प्रागिति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "प्राक्प्रध्वंससदात्वेन त्रिविधोऽभाव इष्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्राक्त्वेन, प्रध्वंसत्वेन, सदात्वेन च उपलक्षितोऽभावः ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": " त्रिविध",
| |
| "tail": "इष्यते । ‘प्रामाणिकै’रिति शेषः। "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "उत्तरैकावधिरभावः प्रागभागः । प्रतियोग्युत्पत्तेः प्रागेवास्ति, उत्पन्ने तु नास्ति इति कृत्वा ॥ पूर्वैकावधिरभावः प्रध्वंसाभावः । प्रतियोगिप्रध्वंसानन्तरमेव अभावः, न तु प्राक् अस्तीति ॥ न चैवम् । ‘‘प्रागभावप्रध्वंसः, प्रध्वंसप्रागभाव’’ इति प्रवाहौ प्रसज्ज्येते । प्रतियोगिन एव प्रागभावप्रध्वंसत्वेन प्रध्वंसप्रागभावत्वेन च अङ्गीकृतत्वात् । तर्हि घटप्रध्वंसो नाम ‘प्रागभावनिवृतेर्निवृत्तिः’ इति प्रागभावोन्मज्जनप्रसङ्ग इति चेत् न । घटवत् तद्ध्वंसस्यापि तद्विरोधित्वात् ॥ निरवधिकोऽभावः सदाऽभावः । सदा अभावः अस्ति इति कृत्वा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अथ ‘अत्यन्ताभावः’ इति प्रसिद्धसंज्ञाऽतिक्रमेण ‘सदाऽभावः’ इति संज्ञान्तरकरणं किमर्थम् । लक्षणस्यापि उद्देशेनैव सूचनार्थम्। यच्च अन्यैः अत्यन्ताभावस्वरूपम् उक्तम्— ‘संसर्गप्रतियोगिकाभावः अत्यन्ताभावः इति । यथा एतद्घटे एतद्भूतलसंसर्गाभाव’’ इति तदपि निराकर्तुं एतत्, तस्य निरवधिकत्वाभावात् ।तर्हि उदाहृतः चतुर्थः स्यात् इति चेत्, न । तस्यापि यथासम्भवं प्रागभावादिषु अन्तर्भावात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "एके ब्रुवते—‘संसर्गाभावः अन्योन्याभावश्चेति द्विविध एवाभाव इति । अन्ये तु ‘प्राक्प्रध्वंसात्यन्तान्योन्याभावात्मना चतुर्विध’ इति । तदुभयं निराकर्तुं ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "इष्यत",
| |
| "tail": "इत्युक्तम् । अन्योन्याभावो हि भेद एव । ‘स च स्वरूपमेव’ इति अन्यत्र उपपादितम् । कार्यकारणयोः संसर्गस्य अन्यत्र निराकृतत्वेन, प्रागभावप्रध्वंसाभावयोः संसर्गाभावत्वानुपपत्तेश्चेति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "भावं विभज्य दर्शयति ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": " चेतन",
| |
| "tail": " इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "चेतनाचेतनत्वेन भावोऽपि द्विविधो मतः ॥ २ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "न केवलमभावोऽपि भेदवान्, किन्तु भावोऽपि इति ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "अपि",
| |
| "tail": " शब्दः । चेतयत इति चेतनः । अनेवंविध अचेतनः । तेन विष्णोः चेतनत्वम्, अभवस्य अचेतनत्वञ्च ज्ञातव्यम् ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सर्वमचेतनं चेतनार्थम् इति चेतनस्य प्राधान्यात् पूर्वमुद्देशः । ‘ मृदब्रवीत्’ इत्यादिवचनात् सर्वं चेतनमेव’ इति मतनिरासाय मत इत्युक्तम् । तच्च अभिमान्यधिकरणे निरस्तम् ॥ चेतनादिविभागस्य नित्यादिविभागात् अभ्यर्हितत्वात् स एव आदौ उदाहृतः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "TSK_C01_V03",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "यथोद्देशं चेतनाविभागमाह ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "दुःखेति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "दुःखस्पृष्टं तदस्पृष्टमिति द्वेधैव चेतनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "कदाचिद्दुःखसंबद्धम् एव दुःखस्पृष्टम् । कदाऽपि दुःखासंबद्धं तदस्पृष्टम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "‘कल्पितत्वात् दुःखादीनां न किञ्चित् दुःखस्पृष्टम्’ इत्येके । ‘ईश्वरातिरिक्तं सर्वमपि दुःखस्पृष्टमेव’ इत्यन्ये ॥ तदुभयनिरासाय ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "एव",
| |
| "tail": "कारः । आद्यस्य प्रत्यक्षविरुद्धत्वात्, द्वितीयस्य आगमविरुद्धत्वात् । परमेश्वरस्य दुःखास्पृष्टत्वं स्वातन्त्र्येणैव सिद्धम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यद्यपि अनयोः दुःखास्पृष्टं चेतनं प्रधानम् । तथापि अभावस्य भावनिरूप्यत्वात् दुःखस्पृष्टस्य प्रथममुद्देशः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तथाऽपि प्राधान्यक्रमस्य मुख्यत्वात्, तदनुसारेण द्वे अपि निर्दिशति ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "नित्येति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "नित्यादुःखा रमाऽन्ये तु स्पृष्टदुःखास्समस्तशः ॥ ३ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "अन्ये",
| |
| "tail": "चेतनाः । एके तु व्यष्टिसमष्टिभेदेन जीवान् परिकल्प्य गरुडानन्तविष्वक्सेनादीन् समष्टिजीवानपि नित्यादुःखान् आचक्षते । तन्निरासाय समस्तश इत्युक्तम् । अत्र च आगमानां प्रामाण्यम्। अत एव दुःखास्पृष्टे प्रभेदाभावात्, दुःखस्पृष्टापेक्षया एव ‘धा’ प्रत्ययः पूर्वोक्तो ज्ञातव्यः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "TSK_C01_V04",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "अत एव तद्विभागमाह ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "स्पृष्टेति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "स्पृष्टदुःखा विमुक्ताश्च दुःखसंस्था इति द्विधा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "विमुक्ताः",
| |
| "tail": "दुःखात्। "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "दुःखसंस्थाः",
| |
| "tail": "वर्तमानदुःखाः । चशब्दः "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "दुःखसंस्थाः",
| |
| "tail": "इत्यतःपरं योज्यः । अत्र प्राधान्यक्रमेण उद्देशः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "दुःखसंस्थानां प्रभेदमाह",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": " दुःखसंस्थेति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "दुःखसंस्था मुक्तियोग्या अयोग्या इति च द्विधा ॥ ४ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "अयोग्याः",
| |
| "tail": "मुक्तेः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "अयोग्याः",
| |
| "tail": "इत्यतः परं च शब्दो ज्ञातव्यः । अत्रापि तदेव उद्देशक्रमे निमित्तम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु च प्राधान्यात् विमुक्तभेदः प्रथमं वक्तव्यः । सत्यम् । योग्यायोग्यभेदस्य दुःखसंस्थेषु एव भावात्, तदभिधानानन्तरं मुक्तियोग्यभेदकथनस्य सौकर्यात् क्रमोल्लङ्घनम्।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "TSK_C01_V05",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "इदानीं मुक्तानां प्रभेदमाह ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": " देवर्षीति।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "देवर्षिपितृपनरा इति मुक्तास्तु पञ्चधा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "पान्तीति ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "पाः",
| |
| "tail": "चक्रवर्तिनः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "नराः",
| |
| "tail": "मनुष्योत्तमाः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "तु",
| |
| "tail": "शब्दोऽवधारणे । तेन ये मोक्षे तारतम्यं न मन्यन्ते तन्मतं निराचष्टे । गन्धर्वादीनां, केषाञ्चित् एषु एव अन्तर्भावात्, केषाञ्चित् अविवक्षितत्वात् न ग्रन्थान्तरविरोधः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "‘दुःखसंस्था मुक्तियोग्यायोग्यभेदात् द्विविधा इति उक्तम् । तत्र मुक्तप्रभेदं योग्येषु अतिदिशति ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "एवमिति",
| |
| "tail": "।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "एवं विमुक्तयोग्याश्च ..",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "‘देवर्ष्यादिभेदेन पञ्चधा’ इत्यस्यानुकर्षणार्थश्चकारः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "मुक्त्ययोग्यविभागमाह ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "तमोगा इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "....................तमोगाः सृतिसंस्थिताः ॥ ५ ॥ इति द्विधा मुक्त्ययोग्याः ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "तमोगाः",
| |
| "tail": "तमोयोग्याः । न तु प्राप्ततमसः, वक्ष्यमाणविभागविरोधात् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": " सृतिसंस्थिताः",
| |
| "tail": " नित्यसंसारिणः । अयोग्यताऽतिशयानुसारेणोद्देशः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "TSK_C01_V06",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तमोयोग्यानां प्रभेदमाह ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "दैत्येति",
| |
| "tail": "।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".... दैत्यरक्षः पिशाचकाः ।मर्त्याधमाश्चतुर्धैव तमोयोग्याः प्रकार्तिताः ॥ ६ ॥ ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "मर्त्याधमाः इत्यतःपरम् इतिशब्दोऽध्याहार्यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अप्रसिद्धत्वात् अस्य भेदस्य अश्रद्धेयत्वं निवारयितुम् ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "एव",
| |
| "tail": "शब्दः । "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "प्रकार्तिता",
| |
| "tail": "इत्यत्र आगमसम्मतिमाचष्टे। स च अन्यत्रोदाहृतः द्रष्टव्यः । "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "TSK_C01_V07",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "चतुर्धा अपि एते प्रत्येकं द्विधा इत्याह",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "ते च इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "ते च प्राप्तान्धतमसः सृतिसंस्था इति द्विधा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ते च चतुर्विधा अपि। ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "सृतिसंस्थिताः",
| |
| "tail": "संसारे वर्तमानाः, न अधुनाऽपि तमःप्राप्ताः । योग्यतायाः चैतन्यस्वभावत्वेन, तमोयोग्यानाम् अयं विभागः न अनुपपन्नः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "एवं चेतनविभागं विस्तरेण अभिधाय अवसरप्राप्तं अचेतनविभागमाह ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "नित्या इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "नित्यानित्यविभागेन त्रिधैवाचेतनं मतम् ॥ ७ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्रापि ‘अचेतनम् एव एवंविभागवत्’ इति अर्थानभ्युपगमात्, पूर्वोक्तत्वानामपि प्रमाणान्तरेण नित्यत्वादि ग्रहणं न विरुद्धम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "नित्यानित्यविभागेन ",
| |
| "tail": " इत्यस्य नित्यानित्यत्वेन तद्विभागेन च इत्यर्थः। तथा च नित्यानित्यं, नित्यम् अनित्यं च इति अचेतनं त्रिविधमित्युक्तं भवति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "केचित् सर्वं क्षणिकं मन्यमानाः नित्यं न मन्यन्ते, अपरे तु सत्कार्यवादिनः अनित्यं न अंगीकुर्वन्ति, सर्वे अपि नित्यानित्यं विरोधात् न अभ्युपगच्छन्ति । तन्निरासाय एवकारः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "न प्रतिज्ञामात्रेणार्थसिद्धिः इति प्रामाणिकत्वम् उक्तविभागस्य सूचयति ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "मतमिति ।",
| |
| "tail": " तच्च लेशतो दर्शयिष्यामः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यद्यपि नित्यं, नित्यानित्यम्, अनित्यम् इत्युद्देशः कार्यः । प्राधान्यात् । तथापि उक्तिलाघवाय क्रमोल्लङ्घनम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "TSK_C01_V08",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "क्रमेण त्रयं दर्शयिष्यन् नित्यं तावत् दर्शयिष्यति ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "नित्या इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "नित्या वेदाः.. ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्र नित्यत्वं नाम कूटस्थतया आद्यन्तशून्यत्वम् । तच्च वेदानां ‘‘नित्या वेदाः समस्ताश्च’’ इत्यादि प्रमाणसिद्धम् । अत्र ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "वेदा",
| |
| "tail": "इत्युपलक्षणम् । पञ्चाशद्वर्णानां अव्याकृताकाशस्य च तथाभावात् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "नित्यानित्यं विभागेन आह ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "पुराणाद्या इति",
| |
| "tail": "।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "... पुराणाद्याः कालः प्रकृतिरेव च ।नित्यानित्यं त्रिधा प्रोक्तं.. ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "पुराणाद्याः",
| |
| "tail": "पौरुषेयग्रन्थाः एका विधा । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "कालः",
| |
| "tail": "अपरा । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "प्रकृतिः",
| |
| "tail": "अन्या । ननु च त्रिधा इति प्रकारत्रैविध्यमुक्तम्, न च अत्र कश्चित् प्रकारः दर्शितः । किन्तु वस्तुनिर्देश एव कृतः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "नैष दोषः । यत् न सर्वथा कूटस्थम्, नापि अनित्यमेव । तदुच्यते ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": " नित्यानित्यमिति ।",
| |
| "tail": "तस्य तिस्रः विधाः सम्भवन्ति — उत्पत्तिमत्वे सति विनाशाभावः, एकदेशैः उत्पत्तिविनाशौ एकदेशिनः तदभावः, स्वरूपेण उत्पत्त्याद्यभावेऽपि अवस्थाऽऽगमापायवत्त्वम् च इति । तदेतत् विधात्रयमुक्तवस्तुत्रये अस्ति इति तस्यैव ग्रहणं कृतम्।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु अत्र यस्य उत्पत्त्यादिकं तत् अनित्यमेव यस्य तु तत् नास्ति । तत् नित्यमेव, नित्यानित्यं क्वास्ति ? इति । मैवम् । स्यात् एतत् एवं यदि अंशांशिनोः विकारविकारिणोः वा अत्यन्तभेदः स्यात् । ‘न च एवम्’ इति अन्यत्र उपपादितम्॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "अनित्यं विभज्य दर्शयति ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "अनित्यमिति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "........................अनित्यं द्विविधं मतम् ॥ ८ ॥असंसृष्टं च संसृष्टम्.......................... ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सम्यस्कृष्टं",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": " संसृष्टम्",
| |
| "tail": "। अतथाभूतम् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "असंसृष्टम्",
| |
| "tail": "। सम्यक्तायाः इयत्ताऽभावात् । त्रैविध्याद्यपि किं न स्यात् इत्यतः"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": " मतम्",
| |
| "tail": "इत्युक्तम् । तद्वक्ष्यामः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "TSK_C01_V09",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "तत्र असंसृष्टं निर्दिशति ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "असंसृष्टमिति",
| |
| "tail": "।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "असंसृष्टं महानहम् ।बुद्धिर्मनः खानि दशमात्रा भूतानि पञ्च च ॥ ९ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "TSK_C01_V10",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
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| "text": " संसृष्टं निर्दिशति ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
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| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "संसृष्टमिति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "संसृष्टमण्डं तद्गं च समस्तं सम्प्रकीर्तितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु एषां चतुर्विंशतितत्वानामसंसृष्टत्त्वं नाम यदि एकदेशेन उत्पत्तिः तर्हि अनुत्पन्नस्य असत्वात् उत्पन्नमेव तत्त्वम् । तच्च संसृष्टमेव, इति न द्वैविध्यम् । न च प्रकारान्तरम् अस्ति इति । मैवम् । सूक्ष्मरूपेण नित्यानां महदादीनां प्राकृताद्यंशैः उपचयमात्रं क्रियते इति तानि असंसृष्टानि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "नच एवं ब्रह्मांडं तदन्तर्गतानि इति संसृष्टानि । ‘तेषामपि मूलरूपं नित्यम्’ इति चेत् , न । साक्षान्मूलरूपस्य विवक्षितत्वात् । एवंसति महदादीनां नित्यानित्यत्वं कथं न स्यात् ? इति चेत्, स्यादेवम् । यदि सूक्ष्मरूपे महदादिव्यवहारः स्यात्, किन्तु प्रकृतिरेव सा उच्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "केचित् महदादिस्वरूपमेव न अभ्युपगच्छन्ति । दूरेण उक्तं विशेषम् । तेषामतिबहुतराऽऽगमविरोधं दर्शयितुं ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": " सम्प्रकीर्तितम्",
| |
| "tail": "इत्युक्तम् ॥ आगमाश्च अन्यत्र द्रष्टव्याः । विस्तरभिया नेह उदाह्रियन्ते॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "यदि इदं विष्णुव्यतिरिक्तं भावाभावादिभेदभिन्नं जगत् अस्वतन्त्रम् तर्हि कस्मिन् आयत्तम् ? कस्मिन् च विषये ? इत्याकाङ्क्षायामाह ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": " सृष्टिरिति",
| |
| "tail": "।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "सृष्टिः स्थितिः संहृतिश्च नियमोऽज्ञानबोधने॥ १० ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "नियमः",
| |
| "tail": "व्यापारेषु प्रेरणम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "TSK_C01_V11",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": "बन्धो मोक्षः सुखं दुःखमावृतिर्ज्योतिरेव च ।विष्णुनाऽस्य समस्तस्य................... ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "बन्धः",
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| "tail": " प्रकृतेः। "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "मोक्षः",
| |
| "tail": " बन्धात् । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "आवृतिज्योतिषी",
| |
| "tail": "बाह्यतमःप्रकाशौ । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "एव",
| |
| "tail": "कारः "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "विष्णुना",
| |
| "tail": "इत्यनेन सम्बध्यते । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "अस्य समस्तस्य",
| |
| "tail": "अस्वतन्त्रस्य भवन्ति इति शेषः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "avataranika",
| |
| "text": "ननु एतत् पूर्वविरुद्धम् । समस्तस्य सृष्टिस्थितिसंहारोक्तौ नित्यत्वोक्तिविरोधः, अचेतनस्य बोधविरोधः, इत्यादि । तत्र उक्तम् ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "समासेति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "mulaprateeka",
| |
| "text": ".......................समासव्यासयोगतः ॥ ११ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "समासः",
| |
| "tail": "सङ्क्षेपः ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": " व्यासो",
| |
| "tail": "विस्तरः । तौ एव योगौ उपायौ उक्तार्थघटनायाम् ततः । इदमुक्तं भवति— उक्तधर्मेषु यत्र तत्त्वे अल्पीयांसः सम्भवन्ति तत्र तावन्तः विष्ण्वधीनाः ज्ञातव्याः । यत्र तु बहवः तत्र तावन्तः सर्वथा स्वरूपस्वभावौ अस्य तदधीनौ इति । तत्र स्थितिनियमौ सर्वस्य, सृष्टिसंहृती नित्यानित्यस्य अनित्यस्य च, अज्ञानम् भावरूपं दुःखस्पृष्टस्य, ज्ञानाभावस्तु सर्वस्य, बोधनं चेतनस्य, सुखं प्राप्ततमसो विना, दुःखम् दुःखास्पृष्टं विना इत्यादि द्रष्टव्यम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "पदार्थानां सृष्ट्यादि अन्यतः अपि प्रतीयते । अतः ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "एव",
| |
| "tail": " इति उक्तम् । सकलसत्तादेः तदधीनत्वात् तत्तद्वस्तु निमित्तमात्रमेव । स्वातन्त्र्येण विष्णुरेव अस्य ईश्वर इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "bhashya",
| |
| "attrs": {
| |
| "id": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पद्मापद्मासनानन्तप्रभृतीदं यदिच्छया ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "सत्तादि लभते देवः प्रीयतां श्रीपतिस्स मे॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "author-note",
| |
| "text": "इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिततत्वसङ्ख्यानप्रकरणविवरणं श्रीजयतीर्थभिक्षुरचितं समाप्तम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
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| }
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| ],
| |
| "tail": "\n"
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| }, | | }, |
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| "parent": "TSK_C01_V01", | | "parent": "TSK_C01_V01", |
| "chapter": "TSK_C01", | | "chapter": "TSK_C01", |
| "text": "लक्ष्मीपतेः पदाम्भोजयुगं नत्वा गुरोरपि ।\nकरिष्ये तत्त्वसङ्ख्यानव्याख्यानं नातिविस्तरम् ॥ १ ॥\nमुमुक्षुणा खलु परमात्मा जगदुदयादिनिमित्तत्वेन अवश्यमवगन्तव्यः इति सकलसच्छास्त्राणामविप्रतिपन्नोऽर्थः। इदं च अवान्तरभेदभिन्नस्य जगतो विज्ञानमपेक्षते, इति जगदपि तथाऽवगन्तव्यम् । तदिदं प्रधानाङ्गभूतं, शास्त्रे विक्षिप्य प्रतिपादितम्, शिष्यहिततया संगृह्य प्रतिपादयितुं प्रकरणमिदमारभते भगवानाचार्यः ।\nननु प्रकरणादौ किमपि मङ्गलं कस्मान्नानुष्ठितम्? न तावत्तदफलमेव, प्रेक्षावद्भिरनुष्ठितत्वात् । नापि प्रारिप्सितपरिसमाप्त्यादिव्यतिरिक्तफलम् । नियमेन प्रारंभे तदनुष्ठानात् ।\nउच्यते अनुष्ठितमेव भगवता मङ्गलम्, मानसादेरपि तस्य सम्भवात् । तच्च परमास्तिकत्वादनुमीयते ॥ यच्चायं स्वातन्त्र्यादिविशिष्टस्य विष्णोः आदितः एव सङ्कीर्तनं करोति । किं ततोऽन्यन्मङ्गलं नाम ? अन्यपरमपि तत् भक्त्या अनुष्ठितं स्वभावात् सम्पादयत्येव अखिलमङ्गलानीति ॥ इति ॥\nतत्र तावत् तत्त्वं सामान्यतो विभागेन उद्दिशति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्वतन्त्रमिति ।\u003C/span\u003E\nस्वतन्त्रमस्वतन्त्रं च द्विविधं तत्वमिष्यते ।\nतत्वम् अनारोपितिम् । प्रमितिविषयः इति यावत् । तेन ‘तस्य भावः तत्वम्’ इत्यादिखण्डनानवकाशः।\nननु शुक्तरजतादिकं कथं न तत्त्वम् ? न हि धर्मी वा रजतत्त्वं वा न प्रमेयम्, नापि तयोः सम्बन्धः । शुक्तिव्यक्तौ रजतत्त्वस्य स नास्ति इति चेत्, मा भूत् । न हि गृहे देवदत्तो नास्ति इत्येतावता न प्रमेय इति । स्यादिदम् आरोपितस्य अन्यत्र सत्तामभ्युपगच्छतां दूषणम्। अत्यन्तासदेव रजतं दोषवशात् शुक्तिकायाम् आरोप्यत इति वादे तु नायं दोषः।\nएतेन ‘भाविपाकरागः कुंभः श्यामतादशायां रक्तपित्तिना रक्ततया उपलभ्यमानः तत्त्वं स्यात्’ इत्यपि परास्तम् । भाविनः प्रमेयत्वेऽपि पूर्वस्य तथाभावाभावात्, धर्मिणः तथाभावाङ्गीकारादिति।\nतत् द्विविधम् । स्वतन्त्रमस्वतन्त्रञ्च इति इतिशब्दाध्याहारेण योज्यम् । अन्यथा स्वतन्त्रम् अस्वतन्त्रं च तत्त्वं प्रत्येकं द्विविधम् इति प्रतीतिः स्यात् ।\nस्वरूप-प्रमिति-प्रवृत्ति-लक्षणसत्तात्रैविध्ये परानपेक्षं स्वतन्त्रम्। परापेक्षं अस्वतन्त्रम्। तदुपपादनायोक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eइष्यत इति ।\u003C/span\u003Eप्रामाणिकैः इति शेषः ।\nतथाहि यदि तत्त्वमेव नास्तीति ब्रूयात् तदा प्रत्यक्षादिविरोधः । भ्रान्तिः सा इति चेत् न, बाधकाभावात् । न च निरधिष्ठाना भ्रान्तिरस्ति, नापि निरवधिको बाधः । नास्त्येव तत्त्वम् इत्यस्यार्थस्य प्रमितित्वाप्रमितत्त्वयोर्व्याघातश्च।\nयदि च एकमेव तत्त्वं तदा भेदोपलम्भविरोधः। तद्भ्रान्तितायाञ्च बाधकं वाच्यम् । तच्च अन्यत्र निरस्तम्।\nयदि वा सर्वमेव स्वतन्त्रं स्यात् तदा पारतन्त्र्यादिप्रतीतिविरोधः। नित्यसुखादिप्रसङ्गश्च।\nयदि वा परतन्त्रमेव तत्त्वं भवेत् तदा अनवस्थितेः असम्भवाच्च न कस्यापि सत्तादिकं स्यात् । आगमविरोधश्च।\nयद्यपि भावाभावतया वा चेतनाचेतनत्वेन वा नित्यानित्यतया वा अस्य द्वैविध्यं शक्यते वक्तुम् । तथापि अस्य वैय्यर्थ्यात् अयमेव विभागो न्याय्यः ।\nपरतन्त्रप्रमेयं स्वतन्त्रप्रमेयायत्ततया विदितं हि निःश्रेयसाय भवति । तथा च प्रकरणान्ते वक्ष्यति । अन्यथा गङ्गावालुकापरिगणनवदिदं तत्त्वं अपार्थकं स्यात् । अतः स्वतन्त्रास्वतन्त्रभेदात् द्विविधं तत्त्वम् ।\nस्वतन्त्रतत्वस्य प्राधान्यात् तदेवादौ उद्दिष्टम् । उद्देशेनैव लक्षणं लब्धम् । अत एवादौ तन्निर्दिशति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्वतन्त्रेति\u003C/span\u003E।\nस्वतन्त्रो भगवान् विष्णुः...\nअत्र \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eभगवानिति\u003C/span\u003E विष्णोः स्वातन्त्र्योपपादकम् ॥ अन्यत् अस्वतन्त्रम् इति शेषः ।\u003Cbr/\u003E अथवा, द्वे तत्वे इत्युक्ते स्वतन्त्रमिव परतन्त्रम् एका व्यक्तिरेव प्रसज्येत । तथा च प्रमाणविरोधो वक्ष्यमाणविभागविरोधश्च । अतः द्विविधमित्युक्तम् । ततश्च स्वतन्त्रमप्यनेकविधं स्यादित्यत इदमुक्तम् ।\nअथवा स्वतन्त्रास्वतन्त्रभेदेन तत्वद्वैविध्यं अङ्गीकुर्वाणाः साङ्ख्यादयः प्रधानादिकं स्वतन्त्रतत्वमातिष्ठन्ते । तन्निरासायेदमुदितमिति ।\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eद्विविध\u003C/span\u003Eमित्युक्त्या ‘परतन्त्रतत्त्वमवान्तरभेदवदिति सूचितम् । तत्कथम् ? तत्र आह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eभावेति ।\u003C/span\u003E\n......भावाभावौ द्विधेतरत् ॥ १ ॥\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eइतरत्\u003C/span\u003Eस्वतन्त्रात् अस्वतन्त्रतत्वं द्विधा। कथम् । भावः अभावः च इति।\nअभावप्रतीतिः भावप्रतीत्यधीना नियमेन, इति प्राधान्यात् प्रथमं भावस्य उद्देशः।\nप्रथमप्रतीतौ ‘अस्ति’ इति उपलभ्यते यः सः भावः।\nयश्च प्रथमोपाब्धौ ‘नास्ति’ इति प्रतीयते सः अभावः।\nकुत एतत् ? स्वरूपेण हि भावाभावौ विधिनिषेधात्मानौ, रूपान्तरेण तु निषेधविधिरूपौ। तत्र आपातजायां संविदि स्वरूपमेव भासते, द्वितीयादिप्रतीतौ रूपान्तरम्, कार्यगम्यत्वात् सामग्रीभेदस्य। तथाच प्रतीतिः— अस्त्यत्र घटः स न शुक्ल इति । एवं नास्ति घटः अस्ति घटाभाव इति॥\nननु स्वतन्त्रतत्वं भावोऽभावोऽन्यद्वा, नाद्यद्वितीयौ । भावाभावयोः परतन्त्रप्रभेदत्वात्, न तृतीयः व्याघातात्। मैवम् । भावलक्षणाऽऽक्रान्तत्वात्। ‘‘परतन्त्रं भावाभावतया द्विधा एव, न पुनरेकविधम्, नापि त्रिविधम् ’ इत्येवं परो विभागः, न पुनः ‘परतन्त्रमेव भावाभावात्मकमिति।\nयथा भावेषु स्वतन्त्रतत्वं प्रविशति तथा विभागः क्रियताम् इति चेत्, नैवम् शङ्क्यम् । तद्धि प्रधानतया सर्वविविक्तमेव वेदितव्यम्। अन्यथा ‘‘द्विविधं तत्वं भावोऽभावश्च, भावोऽपि द्विविधः नित्योऽनित्यश्च, नित्योऽपि द्विविधः चेतनोऽचेतनश्च, चेतनोऽपि द्विविधः स्वतन्त्रोऽस्वतन्त्रश्च’’ इति कर्तव्यम् । एवं सति न प्राधान्येन प्रतिपत्तिः स्यात्, भगवद्व्यतिरिक्तस्य सर्वस्यापि अस्वातन्त्र्यप्रतीतिः न स्यात् ।\n‘अस्मिन्पक्षे स्वतन्त्रस्य भावत्वं न विदितं स्यात्, इति सममेव’ इति चेत् न, पुरुषार्थोपयोगानुपयोगाभ्यां विशेषात्। अभावादीनां नित्यत्वाद्यनुक्तिश्च समैव। तस्मात् यथान्यासमेवास्तु ।\nअथ अस्वतन्त्रं चेतनत्वादिना एव विभज्यताम् । किं चेतनत्वादिना विभज्य भावाभावतया विभागः कर्तव्य उताऽयं न कर्तव्यः एव । नाद्यः । विशेषाभावात् । अभावस्य अचेतनत्वं एवं सति न उक्तं स्यात् इति चेत्, तथा सति चेतनस्य भावत्वमप्युक्तं स्यादिति समम् । तर्हि केन विशेषेणास्य प्राधान्यम् ? इति चेत्, वादिविप्रतिपत्तिभावाभावाभ्यां विशेषात् । अत एव न द्वितीयोऽपीति ।\n‘अभाव एव नास्तीति केचित् । तदसत्, ‘नास्ति’ इति प्रतीतेः दुरपह्नवत्वात् । ‘‘ ‘घटो नास्ति इति प्रतीतिः भूतलमात्रविषया’’ इति चेत्, ‘मात्र’ इति किम् ? भूतलमेव उच्यते उत अतिरिक्तं किञ्चित् । आद्ये घटवत्यपि प्रसङ्गः। अतिरिक्तोऽपि घटः चेत्, उक्तो दोषः । भावानन्तरं चेत् रूपवति घटे ‘गन्धो नास्ती’ति प्रतीतिप्रसङ्गः।\nननु घटाभावः घटाभाववति भूतले सम्बध्यते उत घटवति । नाद्यः । आत्माश्रयादिदोषप्रसङ्गात् । न द्वितीयः । विरोधात् । अतो वक्तव्यं ‘भूतलमात्रे’ति। तदेवास्तु ‘नास्तीति प्रतीतिविषय’ इति चेत् न ।\nप्रश्न एव अयं विविच्यताम् । यदि अभावसम्बन्धात् प्राक् कीदृशं भूतलम् ? इति, यदि वा सम्बन्धसमये कीदृशं भूतलम् ? इति, यद्वा यदि अभावात् इदं विविच्येत तदा कादृशं नाम स्यात् इति ।\nआद्ये ‘सघटम्’ इत्येव उत्तरम् । द्वितीये ‘घटाभाववत्’ इति । तृतीये यदि विवेको वस्तुकृतः तदा अभावस्य नष्टत्वात् । ‘घटवत्’ इति । यदि बुद्धिकृतः तदा ‘बुद्ध्या एव घटप्रसक्तिमत्’ इति । अन्यथा एवं भावप्रतिक्षेपोऽपि स्यात्। इति आस्तां विस्तरः ।\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eद्विधा\u003C/span\u003Eइत्युक्त्या भावाभावतयोरवान्तरभेदोऽस्तीति सूचितम् ।" | | "lines": [ |
| | "लक्ष्मीपतेः पदाम्भोजयुगं नत्वा गुरोरपि ।", |
| | "करिष्ये तत्त्वसङ्ख्यानव्याख्यानं नातिविस्तरम् ॥ १ ॥", |
| | "मुमुक्षुणा खलु परमात्मा जगदुदयादिनिमित्तत्वेन अवश्यमवगन्तव्यः इति सकलसच्छास्त्राणामविप्रतिपन्नोऽर्थः। इदं च अवान्तरभेदभिन्नस्य जगतो विज्ञानमपेक्षते, इति जगदपि तथाऽवगन्तव्यम् । तदिदं प्रधानाङ्गभूतं, शास्त्रे विक्षिप्य प्रतिपादितम्, शिष्यहिततया संगृह्य प्रतिपादयितुं प्रकरणमिदमारभते भगवानाचार्यः ।", |
| | "ननु प्रकरणादौ किमपि मङ्गलं कस्मान्नानुष्ठितम्? न तावत्तदफलमेव, प्रेक्षावद्भिरनुष्ठितत्वात् । नापि प्रारिप्सितपरिसमाप्त्यादिव्यतिरिक्तफलम् । नियमेन प्रारंभे तदनुष्ठानात् ।", |
| | "उच्यते अनुष्ठितमेव भगवता मङ्गलम्, मानसादेरपि तस्य सम्भवात् । तच्च परमास्तिकत्वादनुमीयते ॥ यच्चायं स्वातन्त्र्यादिविशिष्टस्य विष्णोः आदितः एव सङ्कीर्तनं करोति । किं ततोऽन्यन्मङ्गलं नाम ? अन्यपरमपि तत् भक्त्या अनुष्ठितं स्वभावात् सम्पादयत्येव अखिलमङ्गलानीति ॥ इति ॥", |
| | "तत्र तावत् तत्त्वं सामान्यतो विभागेन उद्दिशति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्वतन्त्रमिति ।\u003C/span\u003E", |
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| | "एतेन ‘भाविपाकरागः कुंभः श्यामतादशायां रक्तपित्तिना रक्ततया उपलभ्यमानः तत्त्वं स्यात्’ इत्यपि परास्तम् । भाविनः प्रमेयत्वेऽपि पूर्वस्य तथाभावाभावात्, धर्मिणः तथाभावाङ्गीकारादिति।", |
| | "तत् द्विविधम् । स्वतन्त्रमस्वतन्त्रञ्च इति इतिशब्दाध्याहारेण योज्यम् । अन्यथा स्वतन्त्रम् अस्वतन्त्रं च तत्त्वं प्रत्येकं द्विविधम् इति प्रतीतिः स्यात् ।", |
| | "स्वरूप-प्रमिति-प्रवृत्ति-लक्षणसत्तात्रैविध्ये परानपेक्षं स्वतन्त्रम्। परापेक्षं अस्वतन्त्रम्। तदुपपादनायोक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eइष्यत इति ।\u003C/span\u003Eप्रामाणिकैः इति शेषः ।", |
| | "तथाहि यदि तत्त्वमेव नास्तीति ब्रूयात् तदा प्रत्यक्षादिविरोधः । भ्रान्तिः सा इति चेत् न, बाधकाभावात् । न च निरधिष्ठाना भ्रान्तिरस्ति, नापि निरवधिको बाधः । नास्त्येव तत्त्वम् इत्यस्यार्थस्य प्रमितित्वाप्रमितत्त्वयोर्व्याघातश्च।", |
| | "यदि च एकमेव तत्त्वं तदा भेदोपलम्भविरोधः। तद्भ्रान्तितायाञ्च बाधकं वाच्यम् । तच्च अन्यत्र निरस्तम्।", |
| | "यदि वा सर्वमेव स्वतन्त्रं स्यात् तदा पारतन्त्र्यादिप्रतीतिविरोधः। नित्यसुखादिप्रसङ्गश्च।", |
| | "यदि वा परतन्त्रमेव तत्त्वं भवेत् तदा अनवस्थितेः असम्भवाच्च न कस्यापि सत्तादिकं स्यात् । आगमविरोधश्च।", |
| | "यद्यपि भावाभावतया वा चेतनाचेतनत्वेन वा नित्यानित्यतया वा अस्य द्वैविध्यं शक्यते वक्तुम् । तथापि अस्य वैय्यर्थ्यात् अयमेव विभागो न्याय्यः ।", |
| | "परतन्त्रप्रमेयं स्वतन्त्रप्रमेयायत्ततया विदितं हि निःश्रेयसाय भवति । तथा च प्रकरणान्ते वक्ष्यति । अन्यथा गङ्गावालुकापरिगणनवदिदं तत्त्वं अपार्थकं स्यात् । अतः स्वतन्त्रास्वतन्त्रभेदात् द्विविधं तत्त्वम् ।", |
| | "स्वतन्त्रतत्वस्य प्राधान्यात् तदेवादौ उद्दिष्टम् । उद्देशेनैव लक्षणं लब्धम् । अत एवादौ तन्निर्दिशति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्वतन्त्रेति\u003C/span\u003E।", |
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| | "ननु स्वतन्त्रतत्वं भावोऽभावोऽन्यद्वा, नाद्यद्वितीयौ । भावाभावयोः परतन्त्रप्रभेदत्वात्, न तृतीयः व्याघातात्। मैवम् । भावलक्षणाऽऽक्रान्तत्वात्। ‘‘परतन्त्रं भावाभावतया द्विधा एव, न पुनरेकविधम्, नापि त्रिविधम् ’ इत्येवं परो विभागः, न पुनः ‘परतन्त्रमेव भावाभावात्मकमिति।", |
| | "यथा भावेषु स्वतन्त्रतत्वं प्रविशति तथा विभागः क्रियताम् इति चेत्, नैवम् शङ्क्यम् । तद्धि प्रधानतया सर्वविविक्तमेव वेदितव्यम्। अन्यथा ‘‘द्विविधं तत्वं भावोऽभावश्च, भावोऽपि द्विविधः नित्योऽनित्यश्च, नित्योऽपि द्विविधः चेतनोऽचेतनश्च, चेतनोऽपि द्विविधः स्वतन्त्रोऽस्वतन्त्रश्च’’ इति कर्तव्यम् । एवं सति न प्राधान्येन प्रतिपत्तिः स्यात्, भगवद्व्यतिरिक्तस्य सर्वस्यापि अस्वातन्त्र्यप्रतीतिः न स्यात् ।", |
| | "‘अस्मिन्पक्षे स्वतन्त्रस्य भावत्वं न विदितं स्यात्, इति सममेव’ इति चेत् न, पुरुषार्थोपयोगानुपयोगाभ्यां विशेषात्। अभावादीनां नित्यत्वाद्यनुक्तिश्च समैव। तस्मात् यथान्यासमेवास्तु ।", |
| | "अथ अस्वतन्त्रं चेतनत्वादिना एव विभज्यताम् । किं चेतनत्वादिना विभज्य भावाभावतया विभागः कर्तव्य उताऽयं न कर्तव्यः एव । नाद्यः । विशेषाभावात् । अभावस्य अचेतनत्वं एवं सति न उक्तं स्यात् इति चेत्, तथा सति चेतनस्य भावत्वमप्युक्तं स्यादिति समम् । तर्हि केन विशेषेणास्य प्राधान्यम् ? इति चेत्, वादिविप्रतिपत्तिभावाभावाभ्यां विशेषात् । अत एव न द्वितीयोऽपीति ।", |
| | "‘अभाव एव नास्तीति केचित् । तदसत्, ‘नास्ति’ इति प्रतीतेः दुरपह्नवत्वात् । ‘‘ ‘घटो नास्ति इति प्रतीतिः भूतलमात्रविषया’’ इति चेत्, ‘मात्र’ इति किम् ? भूतलमेव उच्यते उत अतिरिक्तं किञ्चित् । आद्ये घटवत्यपि प्रसङ्गः। अतिरिक्तोऽपि घटः चेत्, उक्तो दोषः । भावानन्तरं चेत् रूपवति घटे ‘गन्धो नास्ती’ति प्रतीतिप्रसङ्गः।", |
| | "ननु घटाभावः घटाभाववति भूतले सम्बध्यते उत घटवति । नाद्यः । आत्माश्रयादिदोषप्रसङ्गात् । न द्वितीयः । विरोधात् । अतो वक्तव्यं ‘भूतलमात्रे’ति। तदेवास्तु ‘नास्तीति प्रतीतिविषय’ इति चेत् न ।", |
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| "text": "तत्र भावनिरूपणात् अभावनिरूपणस्य अल्पत्वात् सूचीकटाहन्यायेन पश्चादुद्दिष्टमप्यभावम् आदौ विभागेन उद्दिशति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eप्रागिति ।\u003C/span\u003E\nप्राक्प्रध्वंससदात्वेन त्रिविधोऽभाव इष्यते ।\nप्राक्त्वेन, प्रध्वंसत्वेन, सदात्वेन च उपलक्षितोऽभावः \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eत्रिविध\u003C/span\u003Eइष्यते । ‘प्रामाणिकै’रिति शेषः।\nउत्तरैकावधिरभावः प्रागभागः । प्रतियोग्युत्पत्तेः प्रागेवास्ति, उत्पन्ने तु नास्ति इति कृत्वा ॥ पूर्वैकावधिरभावः प्रध्वंसाभावः । प्रतियोगिप्रध्वंसानन्तरमेव अभावः, न तु प्राक् अस्तीति ॥ न चैवम् । ‘‘प्रागभावप्रध्वंसः, प्रध्वंसप्रागभाव’’ इति प्रवाहौ प्रसज्ज्येते । प्रतियोगिन एव प्रागभावप्रध्वंसत्वेन प्रध्वंसप्रागभावत्वेन च अङ्गीकृतत्वात् । तर्हि घटप्रध्वंसो नाम ‘प्रागभावनिवृतेर्निवृत्तिः’ इति प्रागभावोन्मज्जनप्रसङ्ग इति चेत् न । घटवत् तद्ध्वंसस्यापि तद्विरोधित्वात् ॥ निरवधिकोऽभावः सदाऽभावः । सदा अभावः अस्ति इति कृत्वा ।\nअथ ‘अत्यन्ताभावः’ इति प्रसिद्धसंज्ञाऽतिक्रमेण ‘सदाऽभावः’ इति संज्ञान्तरकरणं किमर्थम् । लक्षणस्यापि उद्देशेनैव सूचनार्थम्। यच्च अन्यैः अत्यन्ताभावस्वरूपम् उक्तम्— ‘संसर्गप्रतियोगिकाभावः अत्यन्ताभावः इति । यथा एतद्घटे एतद्भूतलसंसर्गाभाव’’ इति तदपि निराकर्तुं एतत्, तस्य निरवधिकत्वाभावात् ।तर्हि उदाहृतः चतुर्थः स्यात् इति चेत्, न । तस्यापि यथासम्भवं प्रागभावादिषु अन्तर्भावात् ।\nएके ब्रुवते—‘संसर्गाभावः अन्योन्याभावश्चेति द्विविध एवाभाव इति । अन्ये तु ‘प्राक्प्रध्वंसात्यन्तान्योन्याभावात्मना चतुर्विध’ इति । तदुभयं निराकर्तुं \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eइष्यत\u003C/span\u003Eइत्युक्तम् । अन्योन्याभावो हि भेद एव । ‘स च स्वरूपमेव’ इति अन्यत्र उपपादितम् । कार्यकारणयोः संसर्गस्य अन्यत्र निराकृतत्वेन, प्रागभावप्रध्वंसाभावयोः संसर्गाभावत्वानुपपत्तेश्चेति ।\nभावं विभज्य दर्शयति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eचेतन\u003C/span\u003E इति ।\nचेतनाचेतनत्वेन भावोऽपि द्विविधो मतः ॥ २ ॥\nन केवलमभावोऽपि भेदवान्, किन्तु भावोऽपि इति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअपि\u003C/span\u003E शब्दः । चेतयत इति चेतनः । अनेवंविध अचेतनः । तेन विष्णोः चेतनत्वम्, अभवस्य अचेतनत्वञ्च ज्ञातव्यम् ॥\nसर्वमचेतनं चेतनार्थम् इति चेतनस्य प्राधान्यात् पूर्वमुद्देशः । ‘ मृदब्रवीत्’ इत्यादिवचनात् सर्वं चेतनमेव’ इति मतनिरासाय मत इत्युक्तम् । तच्च अभिमान्यधिकरणे निरस्तम् ॥ चेतनादिविभागस्य नित्यादिविभागात् अभ्यर्हितत्वात् स एव आदौ उदाहृतः ।" | | "lines": [ |
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| | "प्राक्प्रध्वंससदात्वेन त्रिविधोऽभाव इष्यते ।", |
| | "प्राक्त्वेन, प्रध्वंसत्वेन, सदात्वेन च उपलक्षितोऽभावः \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eत्रिविध\u003C/span\u003Eइष्यते । ‘प्रामाणिकै’रिति शेषः।", |
| | "उत्तरैकावधिरभावः प्रागभागः । प्रतियोग्युत्पत्तेः प्रागेवास्ति, उत्पन्ने तु नास्ति इति कृत्वा ॥ पूर्वैकावधिरभावः प्रध्वंसाभावः । प्रतियोगिप्रध्वंसानन्तरमेव अभावः, न तु प्राक् अस्तीति ॥ न चैवम् । ‘‘प्रागभावप्रध्वंसः, प्रध्वंसप्रागभाव’’ इति प्रवाहौ प्रसज्ज्येते । प्रतियोगिन एव प्रागभावप्रध्वंसत्वेन प्रध्वंसप्रागभावत्वेन च अङ्गीकृतत्वात् । तर्हि घटप्रध्वंसो नाम ‘प्रागभावनिवृतेर्निवृत्तिः’ इति प्रागभावोन्मज्जनप्रसङ्ग इति चेत् न । घटवत् तद्ध्वंसस्यापि तद्विरोधित्वात् ॥ निरवधिकोऽभावः सदाऽभावः । सदा अभावः अस्ति इति कृत्वा ।", |
| | "अथ ‘अत्यन्ताभावः’ इति प्रसिद्धसंज्ञाऽतिक्रमेण ‘सदाऽभावः’ इति संज्ञान्तरकरणं किमर्थम् । लक्षणस्यापि उद्देशेनैव सूचनार्थम्। यच्च अन्यैः अत्यन्ताभावस्वरूपम् उक्तम्— ‘संसर्गप्रतियोगिकाभावः अत्यन्ताभावः इति । यथा एतद्घटे एतद्भूतलसंसर्गाभाव’’ इति तदपि निराकर्तुं एतत्, तस्य निरवधिकत्वाभावात् ।तर्हि उदाहृतः चतुर्थः स्यात् इति चेत्, न । तस्यापि यथासम्भवं प्रागभावादिषु अन्तर्भावात् ।", |
| | "एके ब्रुवते—‘संसर्गाभावः अन्योन्याभावश्चेति द्विविध एवाभाव इति । अन्ये तु ‘प्राक्प्रध्वंसात्यन्तान्योन्याभावात्मना चतुर्विध’ इति । तदुभयं निराकर्तुं \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eइष्यत\u003C/span\u003Eइत्युक्तम् । अन्योन्याभावो हि भेद एव । ‘स च स्वरूपमेव’ इति अन्यत्र उपपादितम् । कार्यकारणयोः संसर्गस्य अन्यत्र निराकृतत्वेन, प्रागभावप्रध्वंसाभावयोः संसर्गाभावत्वानुपपत्तेश्चेति ।", |
| | "भावं विभज्य दर्शयति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eचेतन\u003C/span\u003E इति ।", |
| | "चेतनाचेतनत्वेन भावोऽपि द्विविधो मतः ॥ २ ॥", |
| | "न केवलमभावोऽपि भेदवान्, किन्तु भावोऽपि इति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअपि\u003C/span\u003E शब्दः । चेतयत इति चेतनः । अनेवंविध अचेतनः । तेन विष्णोः चेतनत्वम्, अभवस्य अचेतनत्वञ्च ज्ञातव्यम् ॥", |
| | "सर्वमचेतनं चेतनार्थम् इति चेतनस्य प्राधान्यात् पूर्वमुद्देशः । ‘ मृदब्रवीत्’ इत्यादिवचनात् सर्वं चेतनमेव’ इति मतनिरासाय मत इत्युक्तम् । तच्च अभिमान्यधिकरणे निरस्तम् ॥ चेतनादिविभागस्य नित्यादिविभागात् अभ्यर्हितत्वात् स एव आदौ उदाहृतः ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 1,377: |
Line 85: |
| "parent": "TSK_C01_V03", | | "parent": "TSK_C01_V03", |
| "chapter": "TSK_C01", | | "chapter": "TSK_C01", |
| "text": "यथोद्देशं चेतनाविभागमाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eदुःखेति ।\u003C/span\u003E\nदुःखस्पृष्टं तदस्पृष्टमिति द्वेधैव चेतनम् ।\nकदाचिद्दुःखसंबद्धम् एव दुःखस्पृष्टम् । कदाऽपि दुःखासंबद्धं तदस्पृष्टम् ॥\n‘कल्पितत्वात् दुःखादीनां न किञ्चित् दुःखस्पृष्टम्’ इत्येके । ‘ईश्वरातिरिक्तं सर्वमपि दुःखस्पृष्टमेव’ इत्यन्ये ॥ तदुभयनिरासाय \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eएव\u003C/span\u003Eकारः । आद्यस्य प्रत्यक्षविरुद्धत्वात्, द्वितीयस्य आगमविरुद्धत्वात् । परमेश्वरस्य दुःखास्पृष्टत्वं स्वातन्त्र्येणैव सिद्धम् ।\nयद्यपि अनयोः दुःखास्पृष्टं चेतनं प्रधानम् । तथापि अभावस्य भावनिरूप्यत्वात् दुःखस्पृष्टस्य प्रथममुद्देशः ।\nतथाऽपि प्राधान्यक्रमस्य मुख्यत्वात्, तदनुसारेण द्वे अपि निर्दिशति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनित्येति ।\u003C/span\u003E\nनित्यादुःखा रमाऽन्ये तु स्पृष्टदुःखास्समस्तशः ॥ ३ ॥\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअन्ये\u003C/span\u003Eचेतनाः । एके तु व्यष्टिसमष्टिभेदेन जीवान् परिकल्प्य गरुडानन्तविष्वक्सेनादीन् समष्टिजीवानपि नित्यादुःखान् आचक्षते । तन्निरासाय समस्तश इत्युक्तम् । अत्र च आगमानां प्रामाण्यम्। अत एव दुःखास्पृष्टे प्रभेदाभावात्, दुःखस्पृष्टापेक्षया एव ‘धा’ प्रत्ययः पूर्वोक्तो ज्ञातव्यः ।" | | "lines": [ |
| | "यथोद्देशं चेतनाविभागमाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eदुःखेति ।\u003C/span\u003E", |
| | "दुःखस्पृष्टं तदस्पृष्टमिति द्वेधैव चेतनम् ।", |
| | "कदाचिद्दुःखसंबद्धम् एव दुःखस्पृष्टम् । कदाऽपि दुःखासंबद्धं तदस्पृष्टम् ॥", |
| | "‘कल्पितत्वात् दुःखादीनां न किञ्चित् दुःखस्पृष्टम्’ इत्येके । ‘ईश्वरातिरिक्तं सर्वमपि दुःखस्पृष्टमेव’ इत्यन्ये ॥ तदुभयनिरासाय \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eएव\u003C/span\u003Eकारः । आद्यस्य प्रत्यक्षविरुद्धत्वात्, द्वितीयस्य आगमविरुद्धत्वात् । परमेश्वरस्य दुःखास्पृष्टत्वं स्वातन्त्र्येणैव सिद्धम् ।", |
| | "यद्यपि अनयोः दुःखास्पृष्टं चेतनं प्रधानम् । तथापि अभावस्य भावनिरूप्यत्वात् दुःखस्पृष्टस्य प्रथममुद्देशः ।", |
| | "तथाऽपि प्राधान्यक्रमस्य मुख्यत्वात्, तदनुसारेण द्वे अपि निर्दिशति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनित्येति ।\u003C/span\u003E", |
| | "नित्यादुःखा रमाऽन्ये तु स्पृष्टदुःखास्समस्तशः ॥ ३ ॥", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअन्ये\u003C/span\u003Eचेतनाः । एके तु व्यष्टिसमष्टिभेदेन जीवान् परिकल्प्य गरुडानन्तविष्वक्सेनादीन् समष्टिजीवानपि नित्यादुःखान् आचक्षते । तन्निरासाय समस्तश इत्युक्तम् । अत्र च आगमानां प्रामाण्यम्। अत एव दुःखास्पृष्टे प्रभेदाभावात्, दुःखस्पृष्टापेक्षया एव ‘धा’ प्रत्ययः पूर्वोक्तो ज्ञातव्यः ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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| "parent": "TSK_C01_V04", | | "parent": "TSK_C01_V04", |
| "chapter": "TSK_C01", | | "chapter": "TSK_C01", |
| "text": "अत एव तद्विभागमाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्पृष्टेति ।\u003C/span\u003E\nस्पृष्टदुःखा विमुक्ताश्च दुःखसंस्था इति द्विधा ।\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eविमुक्ताः\u003C/span\u003Eदुःखात्। \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eदुःखसंस्थाः\u003C/span\u003Eवर्तमानदुःखाः । चशब्दः \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eदुःखसंस्थाः\u003C/span\u003Eइत्यतःपरं योज्यः । अत्र प्राधान्यक्रमेण उद्देशः ।\nदुःखसंस्थानां प्रभेदमाह\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eदुःखसंस्थेति ।\u003C/span\u003E\nदुःखसंस्था मुक्तियोग्या अयोग्या इति च द्विधा ॥ ४ ॥\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअयोग्याः\u003C/span\u003Eमुक्तेः । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअयोग्याः\u003C/span\u003Eइत्यतः परं च शब्दो ज्ञातव्यः । अत्रापि तदेव उद्देशक्रमे निमित्तम् ।\nननु च प्राधान्यात् विमुक्तभेदः प्रथमं वक्तव्यः । सत्यम् । योग्यायोग्यभेदस्य दुःखसंस्थेषु एव भावात्, तदभिधानानन्तरं मुक्तियोग्यभेदकथनस्य सौकर्यात् क्रमोल्लङ्घनम्।" | | "lines": [ |
| | "अत एव तद्विभागमाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्पृष्टेति ।\u003C/span\u003E", |
| | "स्पृष्टदुःखा विमुक्ताश्च दुःखसंस्था इति द्विधा ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eविमुक्ताः\u003C/span\u003Eदुःखात्। \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eदुःखसंस्थाः\u003C/span\u003Eवर्तमानदुःखाः । चशब्दः \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eदुःखसंस्थाः\u003C/span\u003Eइत्यतःपरं योज्यः । अत्र प्राधान्यक्रमेण उद्देशः ।", |
| | "दुःखसंस्थानां प्रभेदमाह\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eदुःखसंस्थेति ।\u003C/span\u003E", |
| | "दुःखसंस्था मुक्तियोग्या अयोग्या इति च द्विधा ॥ ४ ॥", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअयोग्याः\u003C/span\u003Eमुक्तेः । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअयोग्याः\u003C/span\u003Eइत्यतः परं च शब्दो ज्ञातव्यः । अत्रापि तदेव उद्देशक्रमे निमित्तम् ।", |
| | "ननु च प्राधान्यात् विमुक्तभेदः प्रथमं वक्तव्यः । सत्यम् । योग्यायोग्यभेदस्य दुःखसंस्थेषु एव भावात्, तदभिधानानन्तरं मुक्तियोग्यभेदकथनस्य सौकर्यात् क्रमोल्लङ्घनम्।" |
| | ] |
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| "chapter": "TSK_C01", | | "chapter": "TSK_C01", |
| "text": "इदानीं मुक्तानां प्रभेदमाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eदेवर्षीति।\u003C/span\u003E\nदेवर्षिपितृपनरा इति मुक्तास्तु पञ्चधा ॥\nपान्तीति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eपाः\u003C/span\u003Eचक्रवर्तिनः । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनराः\u003C/span\u003Eमनुष्योत्तमाः । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतु\u003C/span\u003Eशब्दोऽवधारणे । तेन ये मोक्षे तारतम्यं न मन्यन्ते तन्मतं निराचष्टे । गन्धर्वादीनां, केषाञ्चित् एषु एव अन्तर्भावात्, केषाञ्चित् अविवक्षितत्वात् न ग्रन्थान्तरविरोधः ।\n‘दुःखसंस्था मुक्तियोग्यायोग्यभेदात् द्विविधा इति उक्तम् । तत्र मुक्तप्रभेदं योग्येषु अतिदिशति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eएवमिति\u003C/span\u003E।\nएवं विमुक्तयोग्याश्च ..\n‘देवर्ष्यादिभेदेन पञ्चधा’ इत्यस्यानुकर्षणार्थश्चकारः ।\nमुक्त्ययोग्यविभागमाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतमोगा इति ।\u003C/span\u003E\n....................तमोगाः सृतिसंस्थिताः ॥ ५ ॥ इति द्विधा मुक्त्ययोग्याः\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतमोगाः\u003C/span\u003Eतमोयोग्याः । न तु प्राप्ततमसः, वक्ष्यमाणविभागविरोधात् । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसृतिसंस्थिताः\u003C/span\u003E नित्यसंसारिणः । अयोग्यताऽतिशयानुसारेणोद्देशः ।" | | "lines": [ |
| | "इदानीं मुक्तानां प्रभेदमाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eदेवर्षीति।\u003C/span\u003E", |
| | "देवर्षिपितृपनरा इति मुक्तास्तु पञ्चधा ॥", |
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| | "एवं विमुक्तयोग्याश्च ..", |
| | "‘देवर्ष्यादिभेदेन पञ्चधा’ इत्यस्यानुकर्षणार्थश्चकारः ।", |
| | "मुक्त्ययोग्यविभागमाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतमोगा इति ।\u003C/span\u003E", |
| | "....................तमोगाः सृतिसंस्थिताः ॥ ५ ॥ इति द्विधा मुक्त्ययोग्याः", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतमोगाः\u003C/span\u003Eतमोयोग्याः । न तु प्राप्ततमसः, वक्ष्यमाणविभागविरोधात् । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसृतिसंस्थिताः\u003C/span\u003E नित्यसंसारिणः । अयोग्यताऽतिशयानुसारेणोद्देशः ।" |
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| "chapter": "TSK_C01", | | "chapter": "TSK_C01", |
| "text": "तमोयोग्यानां प्रभेदमाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eदैत्येति\u003C/span\u003E।\n.... दैत्यरक्षः पिशाचकाः ।मर्त्याधमाश्चतुर्धैव तमोयोग्याः प्रकार्तिताः ॥ ६ ॥\nमर्त्याधमाः इत्यतःपरम् इतिशब्दोऽध्याहार्यः ।\nअप्रसिद्धत्वात् अस्य भेदस्य अश्रद्धेयत्वं निवारयितुम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eएव\u003C/span\u003Eशब्दः ।\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eप्रकार्तिता\u003C/span\u003Eइत्यत्र आगमसम्मतिमाचष्टे। स च अन्यत्रोदाहृतः द्रष्टव्यः ।" | | "lines": [ |
| | "तमोयोग्यानां प्रभेदमाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eदैत्येति\u003C/span\u003E।", |
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| | "मर्त्याधमाः इत्यतःपरम् इतिशब्दोऽध्याहार्यः ।", |
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| "chapter": "TSK_C01", | | "chapter": "TSK_C01", |
| "text": "चतुर्धा अपि एते प्रत्येकं द्विधा इत्याह\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eते च इति ।\u003C/span\u003E\nते च प्राप्तान्धतमसः सृतिसंस्था इति द्विधा ॥\nते च चतुर्विधा अपि। \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसृतिसंस्थिताः\u003C/span\u003Eसंसारे वर्तमानाः, न अधुनाऽपि तमःप्राप्ताः । योग्यतायाः चैतन्यस्वभावत्वेन, तमोयोग्यानाम् अयं विभागः न अनुपपन्नः ।\nएवं चेतनविभागं विस्तरेण अभिधाय अवसरप्राप्तं अचेतनविभागमाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनित्या इति ।\u003C/span\u003E\nनित्यानित्यविभागेन त्रिधैवाचेतनं मतम् ॥ ७ ॥\nअत्रापि ‘अचेतनम् एव एवंविभागवत्’ इति अर्थानभ्युपगमात्, पूर्वोक्तत्वानामपि प्रमाणान्तरेण नित्यत्वादि ग्रहणं न विरुद्धम् ।\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनित्यानित्यविभागेन\u003C/span\u003E इत्यस्य नित्यानित्यत्वेन तद्विभागेन च इत्यर्थः। तथा च नित्यानित्यं, नित्यम् अनित्यं च इति अचेतनं त्रिविधमित्युक्तं भवति ।\nकेचित् सर्वं क्षणिकं मन्यमानाः नित्यं न मन्यन्ते, अपरे तु सत्कार्यवादिनः अनित्यं न अंगीकुर्वन्ति, सर्वे अपि नित्यानित्यं विरोधात् न अभ्युपगच्छन्ति । तन्निरासाय एवकारः ।\nन प्रतिज्ञामात्रेणार्थसिद्धिः इति प्रामाणिकत्वम् उक्तविभागस्य सूचयति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eमतमिति ।\u003C/span\u003E तच्च लेशतो दर्शयिष्यामः ।\nयद्यपि नित्यं, नित्यानित्यम्, अनित्यम् इत्युद्देशः कार्यः । प्राधान्यात् । तथापि उक्तिलाघवाय क्रमोल्लङ्घनम् ।" | | "lines": [ |
| | "चतुर्धा अपि एते प्रत्येकं द्विधा इत्याह\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eते च इति ।\u003C/span\u003E", |
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| | "एवं चेतनविभागं विस्तरेण अभिधाय अवसरप्राप्तं अचेतनविभागमाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनित्या इति ।\u003C/span\u003E", |
| | "नित्यानित्यविभागेन त्रिधैवाचेतनं मतम् ॥ ७ ॥", |
| | "अत्रापि ‘अचेतनम् एव एवंविभागवत्’ इति अर्थानभ्युपगमात्, पूर्वोक्तत्वानामपि प्रमाणान्तरेण नित्यत्वादि ग्रहणं न विरुद्धम् ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनित्यानित्यविभागेन\u003C/span\u003E इत्यस्य नित्यानित्यत्वेन तद्विभागेन च इत्यर्थः। तथा च नित्यानित्यं, नित्यम् अनित्यं च इति अचेतनं त्रिविधमित्युक्तं भवति ।", |
| | "केचित् सर्वं क्षणिकं मन्यमानाः नित्यं न मन्यन्ते, अपरे तु सत्कार्यवादिनः अनित्यं न अंगीकुर्वन्ति, सर्वे अपि नित्यानित्यं विरोधात् न अभ्युपगच्छन्ति । तन्निरासाय एवकारः ।", |
| | "न प्रतिज्ञामात्रेणार्थसिद्धिः इति प्रामाणिकत्वम् उक्तविभागस्य सूचयति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eमतमिति ।\u003C/span\u003E तच्च लेशतो दर्शयिष्यामः ।", |
| | "यद्यपि नित्यं, नित्यानित्यम्, अनित्यम् इत्युद्देशः कार्यः । प्राधान्यात् । तथापि उक्तिलाघवाय क्रमोल्लङ्घनम् ।" |
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| "chapter": "TSK_C01", | | "chapter": "TSK_C01", |
| "text": "क्रमेण त्रयं दर्शयिष्यन् नित्यं तावत् दर्शयिष्यति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनित्या इति ।\u003C/span\u003E\nनित्या वेदाः.. ।\nअत्र नित्यत्वं नाम कूटस्थतया आद्यन्तशून्यत्वम् । तच्च वेदानां ‘‘नित्या वेदाः समस्ताश्च’’ इत्यादि प्रमाणसिद्धम् । अत्र \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eवेदा\u003C/span\u003Eइत्युपलक्षणम् । पञ्चाशद्वर्णानां अव्याकृताकाशस्य च तथाभावात् ।\nनित्यानित्यं विभागेन आह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eपुराणाद्या इति\u003C/span\u003E।\n... पुराणाद्याः कालः प्रकृतिरेव च ।नित्यानित्यं त्रिधा प्रोक्तं.. ।\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eपुराणाद्याः\u003C/span\u003Eपौरुषेयग्रन्थाः एका विधा । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eकालः\u003C/span\u003Eअपरा । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eप्रकृतिः\u003C/span\u003Eअन्या । ननु च त्रिधा इति प्रकारत्रैविध्यमुक्तम्, न च अत्र कश्चित् प्रकारः दर्शितः । किन्तु वस्तुनिर्देश एव कृतः ।\nनैष दोषः । यत् न सर्वथा कूटस्थम्, नापि अनित्यमेव । तदुच्यते \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनित्यानित्यमिति ।\u003C/span\u003Eतस्य तिस्रः विधाः सम्भवन्ति — उत्पत्तिमत्वे सति विनाशाभावः, एकदेशैः उत्पत्तिविनाशौ एकदेशिनः तदभावः, स्वरूपेण उत्पत्त्याद्यभावेऽपि अवस्थाऽऽगमापायवत्त्वम् च इति । तदेतत् विधात्रयमुक्तवस्तुत्रये अस्ति इति तस्यैव ग्रहणं कृतम्।\nननु अत्र यस्य उत्पत्त्यादिकं तत् अनित्यमेव यस्य तु तत् नास्ति । तत् नित्यमेव, नित्यानित्यं क्वास्ति ? इति । मैवम् । स्यात् एतत् एवं यदि अंशांशिनोः विकारविकारिणोः वा अत्यन्तभेदः स्यात् । ‘न च एवम्’ इति अन्यत्र उपपादितम्॥\nअनित्यं विभज्य दर्शयति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअनित्यमिति ।\u003C/span\u003E\n........................अनित्यं द्विविधं मतम् ॥ ८ ॥असंसृष्टं च संसृष्टम्.......................... ।\nसम्यस्कृष्टं\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसंसृष्टम्\u003C/span\u003E। अतथाभूतम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअसंसृष्टम्\u003C/span\u003E। सम्यक्तायाः इयत्ताऽभावात् । त्रैविध्याद्यपि किं न स्यात् इत्यतः\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eमतम्\u003C/span\u003Eइत्युक्तम् । तद्वक्ष्यामः ।" | | "lines": [ |
| | "क्रमेण त्रयं दर्शयिष्यन् नित्यं तावत् दर्शयिष्यति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनित्या इति ।\u003C/span\u003E", |
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| | "अत्र नित्यत्वं नाम कूटस्थतया आद्यन्तशून्यत्वम् । तच्च वेदानां ‘‘नित्या वेदाः समस्ताश्च’’ इत्यादि प्रमाणसिद्धम् । अत्र \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eवेदा\u003C/span\u003Eइत्युपलक्षणम् । पञ्चाशद्वर्णानां अव्याकृताकाशस्य च तथाभावात् ।", |
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| | "नैष दोषः । यत् न सर्वथा कूटस्थम्, नापि अनित्यमेव । तदुच्यते \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनित्यानित्यमिति ।\u003C/span\u003Eतस्य तिस्रः विधाः सम्भवन्ति — उत्पत्तिमत्वे सति विनाशाभावः, एकदेशैः उत्पत्तिविनाशौ एकदेशिनः तदभावः, स्वरूपेण उत्पत्त्याद्यभावेऽपि अवस्थाऽऽगमापायवत्त्वम् च इति । तदेतत् विधात्रयमुक्तवस्तुत्रये अस्ति इति तस्यैव ग्रहणं कृतम्।", |
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| "text": "तत्र असंसृष्टं निर्दिशति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअसंसृष्टमिति\u003C/span\u003E।\nअसंसृष्टं महानहम् ।बुद्धिर्मनः खानि दशमात्रा भूतानि पञ्च च ॥ ९ ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "संसृष्टं निर्दिशति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसंसृष्टमिति ।\u003C/span\u003E\nसंसृष्टमण्डं तद्गं च समस्तं सम्प्रकीर्तितम् ।\nननु एषां चतुर्विंशतितत्वानामसंसृष्टत्त्वं नाम यदि एकदेशेन उत्पत्तिः तर्हि अनुत्पन्नस्य असत्वात् उत्पन्नमेव तत्त्वम् । तच्च संसृष्टमेव, इति न द्वैविध्यम् । न च प्रकारान्तरम् अस्ति इति । मैवम् । सूक्ष्मरूपेण नित्यानां महदादीनां प्राकृताद्यंशैः उपचयमात्रं क्रियते इति तानि असंसृष्टानि ।\nनच एवं ब्रह्मांडं तदन्तर्गतानि इति संसृष्टानि । ‘तेषामपि मूलरूपं नित्यम्’ इति चेत् , न । साक्षान्मूलरूपस्य विवक्षितत्वात् । एवंसति महदादीनां नित्यानित्यत्वं कथं न स्यात् ? इति चेत्, स्यादेवम् । यदि सूक्ष्मरूपे महदादिव्यवहारः स्यात्, किन्तु प्रकृतिरेव सा उच्यते ।\nकेचित् महदादिस्वरूपमेव न अभ्युपगच्छन्ति । दूरेण उक्तं विशेषम् । तेषामतिबहुतराऽऽगमविरोधं दर्शयितुं \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसम्प्रकीर्तितम्\u003C/span\u003Eइत्युक्तम् ॥ आगमाश्च अन्यत्र द्रष्टव्याः । विस्तरभिया नेह उदाह्रियन्ते॥\nयदि इदं विष्णुव्यतिरिक्तं भावाभावादिभेदभिन्नं जगत् अस्वतन्त्रम् तर्हि कस्मिन् आयत्तम् ? कस्मिन् च विषये ? इत्याकाङ्क्षायामाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसृष्टिरिति\u003C/span\u003E।\nसृष्टिः स्थितिः संहृतिश्च नियमोऽज्ञानबोधने॥ १० ॥\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनियमः\u003C/span\u003Eव्यापारेषु प्रेरणम् ।" | | "lines": [ |
| | "संसृष्टं निर्दिशति \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसंसृष्टमिति ।\u003C/span\u003E", |
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| | "ननु एषां चतुर्विंशतितत्वानामसंसृष्टत्त्वं नाम यदि एकदेशेन उत्पत्तिः तर्हि अनुत्पन्नस्य असत्वात् उत्पन्नमेव तत्त्वम् । तच्च संसृष्टमेव, इति न द्वैविध्यम् । न च प्रकारान्तरम् अस्ति इति । मैवम् । सूक्ष्मरूपेण नित्यानां महदादीनां प्राकृताद्यंशैः उपचयमात्रं क्रियते इति तानि असंसृष्टानि ।", |
| | "नच एवं ब्रह्मांडं तदन्तर्गतानि इति संसृष्टानि । ‘तेषामपि मूलरूपं नित्यम्’ इति चेत् , न । साक्षान्मूलरूपस्य विवक्षितत्वात् । एवंसति महदादीनां नित्यानित्यत्वं कथं न स्यात् ? इति चेत्, स्यादेवम् । यदि सूक्ष्मरूपे महदादिव्यवहारः स्यात्, किन्तु प्रकृतिरेव सा उच्यते ।", |
| | "केचित् महदादिस्वरूपमेव न अभ्युपगच्छन्ति । दूरेण उक्तं विशेषम् । तेषामतिबहुतराऽऽगमविरोधं दर्शयितुं \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसम्प्रकीर्तितम्\u003C/span\u003Eइत्युक्तम् ॥ आगमाश्च अन्यत्र द्रष्टव्याः । विस्तरभिया नेह उदाह्रियन्ते॥", |
| | "यदि इदं विष्णुव्यतिरिक्तं भावाभावादिभेदभिन्नं जगत् अस्वतन्त्रम् तर्हि कस्मिन् आयत्तम् ? कस्मिन् च विषये ? इत्याकाङ्क्षायामाह \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसृष्टिरिति\u003C/span\u003E।", |
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| "chapter": "TSK_C01", | | "chapter": "TSK_C01", |
| "text": "बन्धो मोक्षः सुखं दुःखमावृतिर्ज्योतिरेव च ।विष्णुनाऽस्य समस्तस्य................... ।\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eबन्धः\u003C/span\u003E प्रकृतेः। \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eमोक्षः\u003C/span\u003E बन्धात् । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eआवृतिज्योतिषी\u003C/span\u003Eबाह्यतमःप्रकाशौ । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eएव\u003C/span\u003Eकारः \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eविष्णुना\u003C/span\u003Eइत्यनेन सम्बध्यते । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअस्य समस्तस्य\u003C/span\u003Eअस्वतन्त्रस्य भवन्ति इति शेषः ।\nननु एतत् पूर्वविरुद्धम् । समस्तस्य सृष्टिस्थितिसंहारोक्तौ नित्यत्वोक्तिविरोधः, अचेतनस्य बोधविरोधः, इत्यादि । तत्र उक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसमासेति ।\u003C/span\u003E\n.......................समासव्यासयोगतः ॥ ११ ॥\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसमासः\u003C/span\u003Eसङ्क्षेपः ।\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eव्यासो\u003C/span\u003Eविस्तरः । तौ एव योगौ उपायौ उक्तार्थघटनायाम् ततः । इदमुक्तं भवति— उक्तधर्मेषु यत्र तत्त्वे अल्पीयांसः सम्भवन्ति तत्र तावन्तः विष्ण्वधीनाः ज्ञातव्याः । यत्र तु बहवः तत्र तावन्तः सर्वथा स्वरूपस्वभावौ अस्य तदधीनौ इति । तत्र स्थितिनियमौ सर्वस्य, सृष्टिसंहृती नित्यानित्यस्य अनित्यस्य च, अज्ञानम् भावरूपं दुःखस्पृष्टस्य, ज्ञानाभावस्तु सर्वस्य, बोधनं चेतनस्य, सुखं प्राप्ततमसो विना, दुःखम् दुःखास्पृष्टं विना इत्यादि द्रष्टव्यम् ।\nपदार्थानां सृष्ट्यादि अन्यतः अपि प्रतीयते । अतः \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eएव\u003C/span\u003E इति उक्तम् । सकलसत्तादेः तदधीनत्वात् तत्तद्वस्तु निमित्तमात्रमेव । स्वातन्त्र्येण विष्णुरेव अस्य ईश्वर इति ।\nपद्मापद्मासनानन्तप्रभृतीदं यदिच्छया ।\nसत्तादि लभते देवः प्रीयतां श्रीपतिस्स मे॥\nइति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिततत्वसङ्ख्यानप्रकरणविवरणं श्रीजयतीर्थभिक्षुरचितं समाप्तम् ॥" | | "lines": [ |
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| | "ननु एतत् पूर्वविरुद्धम् । समस्तस्य सृष्टिस्थितिसंहारोक्तौ नित्यत्वोक्तिविरोधः, अचेतनस्य बोधविरोधः, इत्यादि । तत्र उक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसमासेति ।\u003C/span\u003E", |
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