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| "तमोनुदाऽऽनन्दमवाप लोक- स्तत्वप्रदीपाकृतिगोगणेन ।",
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| "मुकुन्दभक्त्यै गुरुभक्तिजायै सतां प्रसत्त्यॆ च निरन्तरायै ।",
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| "तां मन्त्रवर्णैरनुवर्णनीयां शर्वेन्द्रपूर्वैरपि वक्तुकामे ।",
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| "सङ्क्षिप्नुवाक्ये मयि मन्दबुद्धौ सन्तो गुणाढ्याः करुणां क्रियासुः ॥ ६ ॥"
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| "उच्चावचा येन समस्तचेष्टाः किं तत्र चित्रं चरितं निवेद्यम् ।",
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| "मालाकृतस्तच्चरिताख्यरत्नै रसूक्ष्मदृष्टेः सकुतूहलस्य ।",
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| "श्रीवल्लभाज्ञां ससुरेन्द्रयाच्ञां सम्भाव्य सम्भाव्यतमां त्रिलोक्याम् ।",
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| "प्राणेश्वरः प्राणिगणप्रणेता गुरुः सतां केसरिणो गृहेऽभूत् ॥ ९ ॥"
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| "ये ये गुणा नाम जगत्प्रसिद्धा यं तेषु तेषु स्म निदर्शयन्ति ।",
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| "साक्षान्महाभागवतप्रबर्हं श्रीमन्तमेनं हनुमन्तमाहुः ॥ १० ॥"
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| "कर्माणि कुर्वन् परमाद्भुतानि सभासु दैवीषु सभाजितानि ।",
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| "सुग्रीवमित्रं स जगत्पवित्रं रमापतिं रामतनुं ददर्श ॥ ११ ॥"
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| "पा(प)दारविन्दप्रणतो हरीन्द्र- स्तदा महाभक्तिभराभिनुन्नः ।",
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| "अग्राहि पद्मोदरसुन्दराभ्यां दोर्भ्यां पुराणेन स पूरुषेण ॥ १२ ॥"
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| "अदार्यसालावलिदारणेन व्यापादितेन्द्रप्रभवेन तेन ।",
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| "प्राद्योतनिप्रीतिकृता निकामं मधुद्विषा सन्दिदिशे स वीरः ॥ १३ ॥"
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| "कर्णान्तमानीय गुणग्रहीत्रा रामेण मुक्तो रणकोविदेन ।",
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| "गोभिः समानन्दितरूपसीतः स्ववह्निनिर्दग्धपलाशिराशिः ।",
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| "अपक्षपाती पुरुषस्त्रिलोक्या- मभोगभोक्ता पतगाधिराजम् ।",
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| "निबद्ध्य सेतुं रघुवंशकेतु- भ्रूभङ्गसम्भ्रान्तपयोधिमध्ये ।",
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| "जाज्वल्यमानोज्ज्वलराघवाग्नौ चक्रे स सुग्रीवसुयायजूके ।",
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| "रामार्चने यो नयतः प्रसूनं द्वाभ्यां कराभ्यामभवत् प्रयत्नः ।",
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| "एकेन दोष्णा नयतो गिरीन्द्रं सञ्जीवनाद्याश्रयमस्य नाभूत् ॥ १९ ॥"
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| "स दारितारिं परमं पुमांसं समन्वयासीन्नरदेवपुत्र्या ।",
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| "श्यामं स्मितास्यं पृथुदीर्घहस्तं सरोजनेत्रं गजराजयात्रम् ।",
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| "वपुर्जगन्मङ्गलमेष दृग्भ्यां चिरादयोध्याधिपतेः सिषेवे ॥ २१ ॥"
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| "राज्याभिषेकेऽवसितेऽत्र सीता प्रेष्ठाय नस्तां भजतां दिशेति ।",
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| "रामस्य वाण्या मणिमञ्जुमाला- व्याजेन दीर्घां करुणां बबन्ध ॥ २२ ॥"
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| "हृदोरुसौहार्दभृताऽधिमौलि न्यस्तेन हस्तेन दयार्द्रदृष्ट्या ।",
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| "सेवाप्रसन्नोऽमृतकल्पवाचा दिदेश देवः सहभोगमस्मै ॥ २३॥"
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| "प्रेष्ठो न रामस्य बभूव तस्मा- न्न रामराज्येऽसुलभं च किञ्चित् ।",
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| "तत्पादसेवारतिरेष नैच्छत् तथाऽपि भोगान्ननु सा विरक्तिः ॥ २४ ॥"
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| "नमो नमो नाथ नमो नमस्ते नमो नमो राम नमो नमस्ते ।",
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| "किं वर्णयामः परमं प्रसादं सीतापतेस्तत्र हरिप्रबर्हे ।",
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| "स्वानन्दहेतौ भजतां जनानां मग्नः सदा रामकथासुधायाम् ।",
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| "तस्यैव वायोरवतारमेनं सन्तो द्वितीयं प्रवदन्ति भीमम् ।",
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| "स्पृष्टैव यं प्रीतिमताऽनिलेन नरेन्द्रकान्ता सुषुवेऽत्र कुन्ती ॥ २८ ॥"
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| "इन्द्रायुधं हीन्द्रकराभिनुन्नं चिच्छेद पक्षान् क्षितिधारिणां प्राक् ।",
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| "बिभेद भूभृद्वपुरङ्गसङ्गात् चित्रं स पन्नो जननीकराग्रात् ॥ २९ ॥"
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| "पुरे कुमारानलसान् विहारा- न्निरीक्ष्य सर्वानपि मन्दलीलः ।",
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| "कैशोरलीलां हतसिंहसङ्घां वने प्रवृत्तां स्मरति स्म सूत्कः ॥ ३० ॥"
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| "भुक्तं च जीर्णं परिपन्थिदत्तं विषं विषण्णो विषभृद्गणोऽतः ।",
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| "प्रमाणकोटेः स हि हेलयाऽगा- न्नेदं जगज्जीवनदेऽत्र चित्रम् ॥ ३१ ॥"
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| "दग्ध्वा पुरं योगबलात् स निर्यन् धर्मानिव स्वान् सहजान् दधानः ।",
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| "समर्प्य कृत्यानि कृती कृतानि व्यासाय भूम्ने सुकृतानि तावत् ।",
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| "ससोदरोऽथादित राजहंसः स राजहंसीमिव राजकन्याम् ॥ ३४ ॥"
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| "महागदं चण्डरणं पृथिव्यां बार्हद्रथं मङ्क्षु निरस्य वीरः ।",
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| "राजानमत्युज्ज्वलराजसूयं चकार गोविन्दसुरेन्द्रजाभ्याम् ॥ ३६ ॥"
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| "जिघांसया वैरिजनस्य तीक्ष्णः स कृष्णसर्पानिव सञ्चिकाय ॥ ३७ ॥"
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| "भोगाधिकाभोगवतोऽरुणाक्षा-– नितस्ततः सञ्चलतो धरेन्द्रे ।",
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| "बहून् द्विजिह्वान् मणिमत्पुरोगा-– नसौ कटून् क्रोधवशान् जघान ॥ ३९ ॥"
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| "रुद्धाखिलाशं मुखरं प्रचण्डं भस्मीचकाराखिलकीचकौघम् ॥ ४० ॥"
| |
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| "भीष्मद्विजाद्यैरतिभीषणाभं विपक्षकक्षं क्षपयन् विरेजे ॥ ४१ ॥"
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| "स धार्तराष्ट्रान् बहुहेतिलीलो विनाश्य विश्वान् परया श्रियाऽऽभात् ॥ ४२ ॥"
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| "पौत्रे पवित्राह्वयजामिपौत्रे धरां निधायासुरधीषु तापम् ।",
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| "कीर्तिं त्रिलोक्यां हृदयं मुकुन्दे भेजे पदं स्वं सहजैः स भीमः ॥ ४४ ॥"
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| "विष्णोः पदान्तं भजताऽनिलेन घोरप्रघातैरिति नाशितास्ते ।",
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| "रसोज्झिताश्चञ्चलवृत्तयोऽलं शोभां न भेजुः सुरवैरिमेघाः ॥ ४५ ॥"
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| "एतत्प्रतीपं किल कर्तुकामा नष्टौजसः सङ्कटमेवमाप्य ।",
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| "मुकुन्दवैगुण्यकथां स्वयोग्यां काले कलावाकलयन्त तेऽलम् ॥ ४६ ॥"
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| "यो भूरिवैरो मणिमान् मृतः प्राग्- वाग्मी बुभूषुः परितोषितेशः ।",
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| "स सङ्कराख्योऽङ्घ्रितळेषु जज्ञे स्पृधाऽपरेऽप्यासुरिहासुरेन्द्राः ॥ ४७ ॥"
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| "सान्नाय्यमव्यक्तहृदाखुभुग् वा श्वा वा पुरोडाशमसारकामः ।",
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| "मणिस्रजं वा प्लवगोऽव्यवस्थो जग्राह वेदादिकमेष पापः ॥ ४८ ॥"
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| "जनो नमेन्नापरथेति मत्वा शठश्चतुर्थाश्रममेष भेजे ।",
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| "पद्माकरं वा कलुषीचिकीर्षुः सुदुर्दमो दुष्टगजो विशुद्धम् ॥ ४९ ॥"
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| "अवैदिकं माध्यमिकं निरस्तं निरीक्ष्य तत्पक्षसुपक्षपाती ।",
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| "तमेव पक्षं प्रतिपादुकोऽसौ न्यरूरुपन्मार्गमिहानुरूपम् ॥ ५० ॥"
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| "असत्पदेऽसन् सदसद्विविक्तं मायाख्यया संवृतिमभ्यधत्त ।",
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| "ब्रह्माप्यखण्डं बत शून्यसिद्ध्यॆ प्रच्छन्नबौद्धोऽयमतः प्रसिद्धः ॥ ५१ ॥"
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| "यद् ब्रह्मसूत्रोत्करभास्करं च प्रकाशयन्तं सकलं स्वगोभिः ।",
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| "अचूचुरद् वेदसमूहवाहं ततो महातस्करमेनमाहुः ॥ ५२ ॥"
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| "स्वसूत्रजातस्य विरुद्धभाषी तद्भाष्यकारोऽहमिति ब्रुवन् यः ।",
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| "तं तत्क्षणाद् यो न दिधक्षति स्म स व्यासरूपो भगवान् क्षमाब्धि ः ॥ ५३ ॥"
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| "निगमसन्मणिदीपगणोऽभवत्-तदुरुवाग्गणपङ्कनिगूढभाः ।",
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| "अविदुषामिति सङ्करताकरः स किल सङ्कर इत्यभिशुश्रुवे ॥ ५४ ॥"
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| "विश्वं मिथ्या विभुरगुणवानात्मनां नास्ति भेदो दैत्या इत्थं व्यदधत गिरां दिक्षु भूयः प्रसिद्धिम् ।",
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| "आनन्दाद्यैर्गुरुगुणगणैः पूरितो वासुदेवो मन्दं मन्दं मनसि च सतां हन्त नूनं तिरोऽभूत् ॥"
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| "॥श्रीमत्कविकुलतिलक त्रिविक्रमपण्डिताचार्यसुत नारायणपण्डिताचार्यविरचिते श्रीमत्सुमध्वविजयमहाकाव्ये आनन्दाङ्के प्रथमः सर्गः ॥ "
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