Krishnamrutamaharnava: Difference between revisions
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= कृष्णामृतमहार्णवः | <div class="gr-doc-title" data-has-moola="1">कृष्णामृतमहार्णवः</div> | ||
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| verse_line1 = अर्चितः संस्मृतो ध्यातः कीर्तितः कथितः श्रुतः । | | verse_line1 = अर्चितः संस्मृतो ध्यातः कीर्तितः कथितः श्रुतः । | ||
| verse_lines = अर्चितः संस्मृतो ध्यातः कीर्तितः कथितः श्रुतः ।;यो ददात्यमृतत्वं हि स मां रक्षतु केशवः॥ १॥ | |||
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| verse_lines = तापत्रयेण सन्तप्तं यदेतदखिलं जगत् ।;वक्ष्यामि शान्तये तस्य कृष्णामृतमहार्णवम्॥ २॥ | |||
| verse_line2 = वक्ष्यामि शान्तये तस्य कृष्णामृतमहार्णवम्॥ २॥ | | verse_line2 = वक्ष्यामि शान्तये तस्य कृष्णामृतमहार्णवम्॥ २॥ | ||
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| verse_line1 = ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् । | | verse_line1 = ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् । | ||
| verse_lines = ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् ।;यैर्न लब्धा हरेर्दीक्षा नार्चितो वा जनार्दनः॥ ३॥ | |||
| verse_line2 = यैर्न लब्धा हरेर्दीक्षा नार्चितो वा जनार्दनः॥ ३॥ | | verse_line2 = यैर्न लब्धा हरेर्दीक्षा नार्चितो वा जनार्दनः॥ ३॥ | ||
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| verse_line1 = संसारेस्मिन् महाघोरे जन्मरोगभयाकुले । | | verse_line1 = संसारेस्मिन् महाघोरे जन्मरोगभयाकुले । | ||
| verse_lines = संसारेस्मिन् महाघोरे जन्मरोगभयाकुले ।;अयमेको महाभागः पूज्यते यदधोक्षजः॥ ४॥ | |||
| verse_line2 = अयमेको महाभागः पूज्यते यदधोक्षजः॥ ४॥ | | verse_line2 = अयमेको महाभागः पूज्यते यदधोक्षजः॥ ४॥ | ||
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| verse_lines = स नाम सुकृती लोके कुलं तेनाभ्यलङ्कृतम् ।;आधारः सर्वभूतानां येन विष्णुः प्रसादितः॥ ५॥ | |||
| verse_line2 = आधारः सर्वभूतानां येन विष्णुः प्रसादितः॥ ५॥ | | verse_line2 = आधारः सर्वभूतानां येन विष्णुः प्रसादितः॥ ५॥ | ||
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| verse_lines = यज्ञानां तपसां चैव शुभानां चैव कर्मणाम् ।;तद्विशिष्टफलं नॄणां सदैवाराधनं हरेः॥ ६॥ | |||
| verse_line2 = तद्विशिष्टफलं नॄणां सदैवाराधनं हरेः॥ ६॥ | | verse_line2 = तद्विशिष्टफलं नॄणां सदैवाराधनं हरेः॥ ६॥ | ||
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| verse_lines = कलौ कलिमलध्वंसिसर्वपापहरं हरिम् ।;येर्चयन्ति सदा नित्यं तेपि वन्द्या यथा हरिः॥ ७॥ | |||
| verse_line2 = येर्चयन्ति सदा नित्यं तेपि वन्द्या यथा हरिः॥ ७॥ | | verse_line2 = येर्चयन्ति सदा नित्यं तेपि वन्द्या यथा हरिः॥ ७॥ | ||
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| verse_line1 = नास्ति श्रेयस्तमं नॄणां विष्णोराराधनान्मुने । | | verse_line1 = नास्ति श्रेयस्तमं नॄणां विष्णोराराधनान्मुने । | ||
| verse_lines = नास्ति श्रेयस्तमं नॄणां विष्णोराराधनान्मुने ।;युगेस्मिंस्तामसे लोके सततं पूज्यते नृभिः॥ ८॥ | |||
| verse_line2 = युगेस्मिंस्तामसे लोके सततं पूज्यते नृभिः॥ ८॥ | | verse_line2 = युगेस्मिंस्तामसे लोके सततं पूज्यते नृभिः॥ ८॥ | ||
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| verse_lines = अर्चिते देवदेवेशे शङ्खचक्रगदाधरे ।;अर्चिताः सर्वदेवाः स्युर्यतः सर्वगतो हरिः॥ ९॥ | |||
| verse_line2 = अर्चिताः सर्वदेवाः स्युर्यतः सर्वगतो हरिः॥ ९॥ | | verse_line2 = अर्चिताः सर्वदेवाः स्युर्यतः सर्वगतो हरिः॥ ९॥ | ||
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| verse_lines = स्वर्चिते सर्वलोकेशे सुरासुरनमस्कृते ।;केशवे कंसकेशिघ्ने न याति नरकं नरः॥ १०॥ | |||
| verse_line2 = केशवे कंसकेशिघ्ने न याति नरकं नरः॥ १०॥ | | verse_line2 = केशवे कंसकेशिघ्ने न याति नरकं नरः॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = सकृदभ्यर्च्य गोविन्दं बिल्वपत्रेण मानवः ।;मुक्तिभागी निरातङ्की विष्णुलोके चिरं वसेत्॥ ११॥ | |||
| verse_line2 = मुक्तिभागी निरातङ्की विष्णुलोके चिरं वसेत्॥ ११॥ | | verse_line2 = मुक्तिभागी निरातङ्की विष्णुलोके चिरं वसेत्॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = शङ्करः;सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः ।;यत्कृतं तत्कृतं तेन सम्प्राप्तं परमं पदम्॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = सकृदभ्यर्चितो येन हेलयापि नमस्कृतः ।;स याति परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्॥ १३॥ | |||
| verse_line2 = स याति परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्॥ १३॥ | | verse_line2 = स याति परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्॥ १३॥ | ||
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| verse_lines = नारदः समस्तलोकनाथस्य देवदेवस्य शांर्गिणः ।;साक्षाद्भगवतो विष्णोः पूजनं जन्मनः फलम्॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = पुलस्त्यः भक्त्या दूर्वाङ्कुरैः पुम्भिः पूजितः पुरुषोत्तमः ।;हरिर्ददाति हि फलं सर्वयज्ञैश्च दुर्लभम्॥ १५॥ | |||
| verse_line2 = हरिर्ददाति हि फलं सर्वयज्ञैश्च दुर्लभम्॥ १५॥ | | verse_line2 = हरिर्ददाति हि फलं सर्वयज्ञैश्च दुर्लभम्॥ १५॥ | ||
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| verse_lines = विधिना देवदेवेशः शङ्खचक्रधरो हरिः ।;फलं ददाति सुलभं सलिलेनापि पूजितः॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = नरके पच्यमानस्तु यमेन परिभाषितः ।;किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः॥ १७॥ | |||
| verse_line2 = किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः॥ १७॥ | | verse_line2 = किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = धर्मः द्रव्याणामप्यभावे तु सलिलेनापि पूजितः ।;यो ददाति स्वकं स्थानं स त्वया किं न पूजितः॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = नरसिंहो हृषीकेशः पुण्डरीकनिभेक्षणः ।;स्मरणान्मुक्तिदो नॄणां स त्वया किं न पूजितः॥ १९॥ | |||
| verse_line2 = स्मरणान्मुक्तिदो नॄणां स त्वया किं न पूजितः॥ १९॥ | | verse_line2 = स्मरणान्मुक्तिदो नॄणां स त्वया किं न पूजितः॥ १९॥ | ||
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| verse_lines = ब्रह्मा गर्भस्थिता मृता वापि मुषितास्ते सुदूषिताः ।;न प्राप्ता यैर्हरेर्दीक्षा सर्वदुःखविमोचनी॥ २०॥ | |||
| verse_line2 = न प्राप्ता यैर्हरेर्दीक्षा सर्वदुःखविमोचनी॥ २०॥ | | verse_line2 = न प्राप्ता यैर्हरेर्दीक्षा सर्वदुःखविमोचनी॥ २०॥ | ||
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| verse_lines = मार्कण्डेयः सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः ।;यत्कृतं तत्कृतं तेन सम्प्राप्तं परमं पदम्॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं शङ्खचक्रगदाधरम् ।;सर्वपापविनिर्मुक्ताः परं ब्रह्म विशन्ति ते॥ ३०॥ | |||
| verse_line2 = सर्वपापविनिर्मुक्ताः परं ब्रह्म विशन्ति ते॥ ३०॥ | | verse_line2 = सर्वपापविनिर्मुक्ताः परं ब्रह्म विशन्ति ते॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = ततोनिरुद्धं देवेशं प्रद्युम्नं च ततः परम् ।;ततः सङ्कर्षणं देवं वासुदेवं परात्परम्॥ ३१॥ | |||
| verse_line2 = ततः सङ्कर्षणं देवं वासुदेवं परात्परम्॥ ३१॥ | | verse_line2 = ततः सङ्कर्षणं देवं वासुदेवं परात्परम्॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = वासुदेवात् परं नास्ति इति वेदान्तनिश्चयः ।;वासुदेवं प्रविष्टानां पुनरावर्तनं कुतः॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = आत्रेयः;यो यानिछेन्नरः कामान् नारी वा वरवर्णिनी ।;तान्समाप्नोति विपुलान्समाराध्य जनार्दनम्॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मा;बाहुभ्यां सागरं तर्तुं क इच्छेत पुमान् भुवि ।;वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं गन्तुमिच्छति॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = कौशिकः;अनाराधितगोवन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।;आराध्य वासुदेवं स्युर्नित्यानन्दैकभागिनः॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = शङ्करः;कृते पापेनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते ।;प्रायश्चित्तं तु तस्योक्तं हरिसंस्मरणं परम्॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = नाम्नोस्ति यवती शक्तिः पापनिर्हरणे हरेः ।;तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः॥ ३७॥ | |||
| verse_line2 = तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः॥ ३७॥ | | verse_line2 = तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = तदैव पुरुषो मुक्तो जन्मदुःखजरादिभिः ।;जितेन्द्रियो विशुद्धात्मा यदैव स्मरते हरिम्॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = प्राप्ते कलियुगे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिते ।;न कश्चित्स्मरते देवं कृष्णं कलिमलापहम्॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = न कलौ देवदेवस्य जन्मदुखापहारिणः ।;करोति मर्त्यो मूढात्मा स्मरणं कीर्तनं हरेः॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = यममार्गं महाघोरं नरकाणि यमं तथा ।;स्वप्नेपि नैव पश्येत यः स्मरेद्गरुडध्वजम्॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = हृदि रूपं मुखे नाम नैवेद्यमुदरे हरेः ।;पादोदकं च निर्माल्यं मस्तके यस्य सोच्युतः॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति तद्भावितास्तद्गतमानसाश्च ।;भिन्नेपि देहे प्रविशन्ति कृष्णं हविर्यथा मन्त्रहुतं हुताशे॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चान्धजडमूकता ।;यन्मूहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवो न चिन्त्यते॥ ४९॥ | |||
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| verse_line1 = कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् । | | verse_line1 = कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् । | ||
| verse_lines = कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् ।;प्रयाति विलयं सद्यः सकृत्सङ्कीर्तितेच्युते॥ ६०॥ | |||
| verse_line2 = प्रयाति विलयं सद्यः सकृत्सङ्कीर्तितेच्युते॥ ६०॥ | | verse_line2 = प्रयाति विलयं सद्यः सकृत्सङ्कीर्तितेच्युते॥ ६०॥ | ||
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| verse_lines = अनायासेन चायान्ति मुक्तिं केशवसंश्रिताः ।;तद्विघाताय जायन्ते शक्राद्याः परिपन्थिनः॥ ६१॥ | |||
| verse_line2 = तद्विघाताय जायन्ते शक्राद्याः परिपन्थिनः॥ ६१॥ | | verse_line2 = तद्विघाताय जायन्ते शक्राद्याः परिपन्थिनः॥ ६१॥ | ||
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| verse_lines = चतुःसागरमासाद्य जम्बूद्वीपोत्तमे क्वचित् ।;न पुमान्केशवादन्यः सर्वपापचिकित्सकः॥ ६२॥ | |||
| verse_line2 = न पुमान्केशवादन्यः सर्वपापचिकित्सकः॥ ६२॥ | | verse_line2 = न पुमान्केशवादन्यः सर्वपापचिकित्सकः॥ ६२॥ | ||
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| verse_lines = यदभ्यर्च्य हरिं भक्त्या कृते वर्षसहस्रकम् ।;फलं प्राप्नोति विपुलं कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ ६३॥ | |||
| verse_line2 = फलं प्राप्नोति विपुलं कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ ६३॥ | | verse_line2 = फलं प्राप्नोति विपुलं कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ ६३॥ | ||
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| verse_lines = क्षीयते तु यदा धर्मः प्राप्ते घोरे कलौ युगे ।;तदा न कीर्तयेत्कश्चिन्मुक्तिदं देवमच्युतम्॥ ६४॥ | |||
| verse_line2 = तदा न कीर्तयेत्कश्चिन्मुक्तिदं देवमच्युतम्॥ ६४॥ | | verse_line2 = तदा न कीर्तयेत्कश्चिन्मुक्तिदं देवमच्युतम्॥ ६४॥ | ||
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| verse_lines = अवशेनापि यन्नामि्न कीर्तिते सर्वपातकैः ।;पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहत्रस्तमृगैरिव॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = नारायणेति मन्त्रोस्ति वागस्ति वशवर्तिनी ।;तथापि नरके घोरे पतन्तीत्येतदद्भुतम्॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।;सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति॥ ६७॥ | |||
| verse_line2 = सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति॥ ६७॥ | | verse_line2 = सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति॥ ६७॥ | ||
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| verse_lines = कौशिकः;अनाराधितगोविन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।;आराध्य वासुदेवं स्युः सदानन्दैकभोगिनः॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = सकृदुच्चरितं यैस्तु कृष्णेति न विशन्ति ते ।;गर्भागारगृहं मातुर्यमलोकं च दुस्सहम्॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम् ।;क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम्॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = बुद्ध्या बुद्ध्वाभ्यसेदेतत् हरिरित्यक्षरद्वयम् ।;स्मरणात्कीर्तनाद्यस्य न पुनर्जायते भुवि॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = हे जिह्वे मम निस्नेहे हरिं किं नानुभाषसे ।;हरिं वदस्व कल्याणि संसारोदधिनौर्हरिः॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = असारे खलु संसारे सारात्सारतरो हरिः ।;पुण्यहीना न विन्दन्ति सारङ्गाश्च यथा जलम्॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = कुरुक्षेत्रेण किं तस्य किं काश्या पुष्करेण किम् ।;जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पणम् ।;तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = यस्तु विष्णुपरो नित्यं दृढभक्तिर्जितेन्द्रियः ।;स्वगृहेपि वसन् याति तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = शङ्करः साधु साधु महाभाग साधु दानवनाशन ।;यन्मां पृच्छसि धर्मज्ञ केशवाराधनं प्रति॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = किं तेन मनसा कार्यं यन्न तिष्ठति केशवे ।;मनो मुक्तिफलावाप्तौ कारणं सुप्रयोजितम्॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = अश्वमेधसहस्राणां यः सहस्रं समाचरेत् ।;नासौ तत्फलमाप्नोति तद्भक्तैर्यदवाप्यते॥ ८८॥ | |||
| verse_line2 = नासौ तत्फलमाप्नोति तद्भक्तैर्यदवाप्यते॥ ८८॥ | | verse_line2 = नासौ तत्फलमाप्नोति तद्भक्तैर्यदवाप्यते॥ ८८॥ | ||
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| verse_line1 = रे रे मनुष्याः पुरुषोत्तमस्य करौ न कस्मान्मुकुलीकुरुध्वम् । | | verse_line1 = रे रे मनुष्याः पुरुषोत्तमस्य करौ न कस्मान्मुकुलीकुरुध्वम् । | ||
| verse_lines = रे रे मनुष्याः पुरुषोत्तमस्य करौ न कस्मान्मुकुलीकुरुध्वम् ।;क्रियाजुषां को भवतां प्रयासः फलं हि यत्तत्पदमच्युतस्य॥ ८९॥ | |||
| verse_line2 = क्रियाजुषां को भवतां प्रयासः फलं हि यत्तत्पदमच्युतस्य॥ ८९॥ | | verse_line2 = क्रियाजुषां को भवतां प्रयासः फलं हि यत्तत्पदमच्युतस्य॥ ८९॥ | ||
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| verse_lines = विष्णोर्विमानं यः कुर्यात्सकृद्भक्त्या प्रदक्षिणम् ।;अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = प्रदक्षिणं तु यः कुर्याद्धरिं भक्तिसमन्वितः ।;हंसयुक्तविमानेन विष्णुलोकं स गच्छति॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = तीर्थकोटिसहस्राणि व्रतकोटिशतानि च ।;नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा ।;पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोष्टाङ्ग ईरितः॥ ९३॥ | |||
| verse_line2 = पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोष्टाङ्ग ईरितः॥ ९३॥ | | verse_line2 = पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोष्टाङ्ग ईरितः॥ ९३॥ | ||
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| verse_lines = शाठ्येनापि नमस्कारं कुर्वतः शांर्गपाणये ।;शतजन्मार्जितं पापं नश्यत्येव न संशयः॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = संसारार्णवमग्नानां नराणां पापकर्मणाम् ।;नान्योद्धर्ता जगन्नाथं मुक्त्वा नारायणं प्रभुम्॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = रेणुकुण्ठितगात्रस्य कणा यावन्ति भारत ।;तावद्वर्षसहस्राणि विष्णुलोके महीयते॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = पावनं विष्णुनैवेद्यं सुभोज्यमृषिभिः स्मृतम् ।;अन्यदेवस्य नैवेद्यं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = कोट्यैन्दवसहस्रैस्तु मासोपोषणकोटिभिः ।;तत्फलं लभ्यते पुम्भिर्विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात्॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = षण्मासफलदा गोदा वत्सरस्य तु जाह्नवी ।;विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = गङ्गाप्रयागगयपुष्करनैमिषाणि संसेवितानि बहुशः कुरुजाङ्गलानि ।;कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापं पादोदकं भगवतः प्रपुनाति सद्यः॥ १०१॥ | |||
| verse_line2 = कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापं पादोदकं भगवतः प्रपुनाति सद्यः॥ १०१॥ | | verse_line2 = कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापं पादोदकं भगवतः प्रपुनाति सद्यः॥ १०१॥ | ||
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| verse_lines = तुलस्यास्तु रजोजुष्टनैवेद्यस्य च भक्षणम् ।;निर्माल्यं शिरसा धार्यं महपातकनाशनम्॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = गां च त्यक्त्वा स मूढात्मा गार्दभीं वन्दते यथा ।;तथा हरिं परित्यज्य चान्यं दैवमुपासते॥ ११७॥ | |||
| verse_line2 = तथा हरिं परित्यज्य चान्यं दैवमुपासते॥ ११७॥ | | verse_line2 = तथा हरिं परित्यज्य चान्यं दैवमुपासते॥ ११७॥ | ||
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| verse_lines = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते ।;तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः॥ ११८॥ | |||
| verse_line2 = तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः॥ ११८॥ | | verse_line2 = तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः॥ ११८॥ | ||
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| verse_lines = यथा गङ्गोदकं त्यक्त्वा पिबेत् कूपोदकं नरः ।;तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = स्वमातरं परित्यज्य श्वपाकीं वन्दते यथा ।;तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = यावत्स्वस्थमिदं पिण्डं नीरुजं करणान्वितम् ।;तावत्कुरुष्वात्महितं पश्चात्तापेन तप्यसे॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = क्षये वाप्यथवा वृद्धौ सम्प्राप्ते वा दिनक्षये ।;उपोष्या द्वादशी पुण्या पूर्वविद्धां परित्यजेत्॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वविद्धां प्रकुर्वाणो नरो धर्मान् निकृन्तति ।;सन्ततेस्तु विनाशाय सम्पदो हरणाय च॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = श्वदृतौ पञ्चगव्यं च दशम्या दूषितां त्यजेत् ।;एकादशीं द्विजश्रेष्ठाः पक्षयोरुभयोरपि॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिपत्प्रभृतयः सर्वा उदयादुदयाद्रवेः ।;सम्पूर्णा इति विज्ञेया हरिवासरवर्जिताः॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = चतस्रो घटिकाः प्रातररुणोदय उच्यते ।;यतीनां स्नानकालोयं गङ्गाम्भःसदृशं जलम्॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = एकादश्यां तु विद्धायां सम्प्राप्ते श्रवणे तथा ।;उपोष्या द्वादशी पुण्या पक्षयोरुभयोरपि॥ १४६॥ | |||
| verse_line2 = उपोष्या द्वादशी पुण्या पक्षयोरुभयोरपि॥ १४६॥ | | verse_line2 = उपोष्या द्वादशी पुण्या पक्षयोरुभयोरपि॥ १४६॥ | ||
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| verse_line1 = उपरागसहस्राणि व्यतीपातायुतानि च । | | verse_line1 = उपरागसहस्राणि व्यतीपातायुतानि च । | ||
| verse_lines = उपरागसहस्राणि व्यतीपातायुतानि च ।;अमालक्षं तु द्वादश्याः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १४७॥ | |||
| verse_line2 = अमालक्षं तु द्वादश्याः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १४७॥ | | verse_line2 = अमालक्षं तु द्वादश्याः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १४७॥ | ||
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| verse_lines = शुद्धापि द्वादशी ग्राह्या परतो द्वादशी यदि ।;विषं तु दशमी ज्ञेयामृतं चैकादशी तिथिः ।;विषप्रधाना वर्ज्या सामृता ग्राह्या प्रयत्नतः॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = द्वादश्यां भोजनं चैव विद्धायां हर्युपोषणम् ।;यः कुर्यान्मन्दबुदि्धत्वान्निरयं सोधिगच्छति॥ १४९॥ | |||
| verse_line2 = यः कुर्यान्मन्दबुदि्धत्वान्निरयं सोधिगच्छति॥ १४९॥ | | verse_line2 = यः कुर्यान्मन्दबुदि्धत्वान्निरयं सोधिगच्छति॥ १४९॥ | ||
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| verse_lines = यानि कानि च वाक्यानि विद्धोपोषपराणि च ।;धनदार्चापराणि स्युर्वैष्णवी न दशायुता॥ १५०॥ | |||
| verse_line2 = धनदार्चापराणि स्युर्वैष्णवी न दशायुता॥ १५०॥ | | verse_line2 = धनदार्चापराणि स्युर्वैष्णवी न दशायुता॥ १५०॥ | ||
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| verse_lines = अथवा मोहनार्थाय मोहिन्या भगवान् हरिः ।;अर्थितः कारयामास व्यासरूपी जनार्दनः॥ १५१॥ | |||
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| verse_lines = धनदार्चाविवृध्द्यर्थं महावित्तलयस्य च ।;असुराणां मोहनार्थं पाषण्डानां विवृद्धये ।;आत्मस्वरूपाविज्ञप्त्यै स्वलोकाप्राप्तये तथा॥ १५२॥ | |||
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| verse_lines = एवं विद्धां परित्यज्य द्वादश्यामुपवासयेत् ।;कोटिजन्मार्जितं पापमेकयैव विनश्यति॥ १५३॥ | |||
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| verse_lines = अभर्तृका तथान्ये च सूतवैदेहिकादयः ।;एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १५८॥ | |||
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| verse_lines = यथा गौर्नैव हन्तव्या शुक्ला कृष्णेति भामिनि ।;एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १६१॥ | |||
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| verse_lines = कामिनोपि हि सिद्ध्यर्थं कुर्युरेवोपवासनम् ।;प्रीणनाय हरेर्नित्यं न तु काम्यव्यपेक्षया॥ १६३॥ | |||
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| verse_lines = तस्माच्छुक्लामथो कृष्णां भरण्यादियुतामपि ।;प्रत्यवायनिषेधार्थमुपवासीत नित्यशः ।;प्रीणनार्थं हरेश्चापि विष्णुलोकस्य चाप्तये॥ १६४॥ | |||
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| verse_lines = न काशी न गया गङ्गा न रेवा न च पुष्करम् ।;न चापि कौरवं क्षेत्रं तुल्यं भूप हरेर्दिनात्॥ १७५॥ | |||
| verse_line2 = न चापि कौरवं क्षेत्रं तुल्यं भूप हरेर्दिनात्॥ १७५॥ | | verse_line2 = न चापि कौरवं क्षेत्रं तुल्यं भूप हरेर्दिनात्॥ १७५॥ | ||
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| verse_lines = अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयायुतानि च ।;एकादश्युपवासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १७६॥ | |||
| verse_line2 = एकादश्युपवासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १७६॥ | | verse_line2 = एकादश्युपवासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १७६॥ | ||
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| verse_lines = एकादशीसमुत्थेन वह्निना पातकेन्धनम् ।;भस्मीभवति राजेन्द्र अपि जन्मशतोद्भवम्॥ १७७॥ | |||
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| verse_lines = नेदृशं पावनं किञ्चिन्नराणां भुवि विद्यते ।;यादृशं पद्मनाभस्य दिनं पातकहानिदम्॥ १७८॥ | |||
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| verse_lines = तावत्पापानि देहेस्मिन् तिष्ठन्ति मनुजाधिप ।;यावन्नोपोषयेज्जन्तुः पद्मनाभदिनं शुभम्॥ १७९॥ | |||
| verse_line2 = यावन्नोपोषयेज्जन्तुः पद्मनाभदिनं शुभम्॥ १७९॥ | | verse_line2 = यावन्नोपोषयेज्जन्तुः पद्मनाभदिनं शुभम्॥ १७९॥ | ||
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| verse_lines = एकादशेन्द्रियैः पापं यत्कृतं भवति प्रभो ।;एकादश्युपावासेन तत्सर्वं विलयं व्रजेत्॥ १८०॥ | |||
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| verse_lines = एकादशीसमं किञ्चित् पवित्रं न हि विद्यते ।;व्याजेनापि कृता राजन्न दर्शयति भास्करिम्॥ १८१॥ | |||
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| verse_lines = श्रीव्यासः अन्नं निवेदयेन्मह्यं प्राप्तं मद्वासरे शुभे ।;तस्यापि नरकप्राप्तिः किं पुनर्भोजने कृते॥१८२॥ | |||
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| verse_lines = वरं स्वमातृगमनं वरं गोमांसभक्षणम् ।;वरं हत्या सुरापानमेकाश्यन्नभक्षणात्॥ १८४॥ | |||
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| verse_lines = पिता वा यदि वा पुत्रो भार्या वापि सुहृज्जनः ।;पद्मनाभदिने भुङ्क्ते निग्राह्यो दस्युवद्भवेत्॥ १८८॥ | |||
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| verse_lines = भक्त्या ग्राह्यो हृषीकेशो न धनैर्धरणीसुराः ।;भक्त्या सम्पूजितो विष्णुः फलं धत्ते समीहितम्॥१९२॥ | |||
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| verse_lines = आसीनस्य शयानस्य तिष्ठतो ब्रजतोपि वा ।;रमस्व पुण्डरीकाक्ष हृदये मम सर्वदा॥ १९४॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादिदं सदा सेव्यं श्रोतव्यं च सदैव हि ।;कुतर्कदावदग्धेभ्यो न दातव्यं कथञ्चन॥ २०४॥ | |||
| verse_line2 = कुतर्कदावदग्धेभ्यो न दातव्यं कथञ्चन॥ २०४॥ | | verse_line2 = कुतर्कदावदग्धेभ्यो न दातव्यं कथञ्चन॥ २०४॥ | ||
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| verse_lines = संसारविषपानेन ये मृताः प्राणिनो भुवि ।;अमृताय स्मृतस्तेषां कृष्णामृतमहार्णवः॥ २०५॥ | |||
| verse_line2 = अमृताय स्मृतस्तेषां कृष्णामृतमहार्णवः॥ २०५॥ | | verse_line2 = अमृताय स्मृतस्तेषां कृष्णामृतमहार्णवः॥ २०५॥ | ||
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| verse_lines = क्लिन्नं पादोदकेनैव यस्य नित्यं कलेवरम् ।;तीर्थकोटिसहस्रैस्तु स्नातो भवति प्रत्यहम्॥ २०६॥ | |||
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| verse_lines = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम् ।;तोयं यदि पिबेन्नित्यं शालग्रामशिलाच्युतम्॥ २०७॥ | |||
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| verse_lines = शालग्रामशिलास्पर्शं ये कुर्वन्ति दिनेदिने ।;वाञ्छन्ति करसंस्पर्शं तेषां देवाः सवासवाः॥ २०८॥ | |||
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| verse_lines = दुःसहो नारको वह्निर्दुःसहा यमकिङ्कराः ।;विषमश्चान्तकपथः प्रेतत्वं चातिदारुणम्॥ २०९॥ | |||
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| verse_lines = सञ्चित्य मनसाप्येवं पातकाद्विनिवर्तयेत् ।;स्मरणं कीर्तनं विष्णोः सदैव न परित्यजेत्॥ २१०॥ | |||
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| verse_lines = अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् ।;नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ २११॥ | |||
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| verse_lines = सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते ।;वेदशास्त्रात्परं नास्ति न दैवं केशवात् परम्॥ २१२॥ | |||
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| verse_lines = सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम् ।;बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥ २१३॥ | |||
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| verse_lines = एवं ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।;कीर्तयन्ति सुरश्रेष्ठं देवं नारायणं प्रभुम्॥ २१४॥ | |||
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| verse_lines = किं तस्य दानैः किं तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ।;यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ २१५॥ | |||
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| verse_lines = नित्योत्सवो भवत्तेषां नित्यश्रीर्नित्यमङ्गलम् ।;येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः॥ २१६॥ | |||
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| verse_lines = जीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु ।;स्त्री वाप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जयेत्॥ २१७॥ | |||
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| verse_lines = चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः ।;अतोवित्वा परं देवं मोक्षाशा का महामुने॥ २१८॥ | |||
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| verse_lines = आचतुदर्शमाद्वर्षात् कर्माणि नियमेन तु ।;दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् ।;अतः कर्मक्षयान्मुक्तिः कुत एव भविष्यति॥ २१९॥ | |||
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| verse_lines = समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा ।;क्रियते येन देवोपि स्वपदाद्भ्रश्यते हि सः॥ २२०॥ | |||
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| verse_lines = (इति पाद्मे);वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु पञ्चमी ।;एतानि मान्यस्थानानि गरीयो ह्युत्तरोत्तरम्॥ २२१॥ | |||
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| verse_lines = गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः ।;सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति॥ २२२॥ | |||
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| verse_lines = यथा सुहृत्सु कर्तव्यं पितृमातृसुतेषु च ।;तथा करोति पूजादि समबुदि्धः स उच्यते॥ २२३॥ | |||
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| verse_lines = नैवेद्यशेषं देवस्य यो भुनक्ति दिने दिने ।;सिक्थे सिक्थे भवेत्पुण्यं चान्द्रायणशताधिकम्॥ २२५॥ | |||
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| verse_line1 = किं तेन जातमात्रेण भूभारेणान्नशत्रुणा । | | verse_line1 = किं तेन जातमात्रेण भूभारेणान्नशत्रुणा । | ||
| verse_lines = किं तेन जातमात्रेण भूभारेणान्नशत्रुणा ।;यो जातो नार्चयेद्विष्णुं न स्मरेन्नापि कीर्तयेत्॥ २३३॥ | |||
| verse_line2 = यो जातो नार्चयेद्विष्णुं न स्मरेन्नापि कीर्तयेत्॥ २३३॥ | | verse_line2 = यो जातो नार्चयेद्विष्णुं न स्मरेन्नापि कीर्तयेत्॥ २३३॥ | ||
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| verse_line1 = यो ददाति द्विजातिभ्यश्चन्दनं गोपिमर्दितम् । | | verse_line1 = यो ददाति द्विजातिभ्यश्चन्दनं गोपिमर्दितम् । | ||
| verse_lines = यो ददाति द्विजातिभ्यश्चन्दनं गोपिमर्दितम् ।;अपि सर्षपमात्रेण पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ २३४॥ | |||
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| verse_line1 = ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत॥ २३५॥ | | verse_line1 = ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत॥ २३५॥ | ||
| verse_lines = ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत॥ २३५॥ | |||
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| verse_lines = अतीतानागतज्ञानी त्रैलोक्योद्धरणक्षमः ।;एतादृशोपि नाचारं श्रौतं स्मार्तं परित्यजेत्॥ २३६॥ | |||
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| verse_lines = ''कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।;एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे'''॥ २३८॥ | |||
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| verse_lines = आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ।;वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः॥ २३९॥ | |||
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| verse_lines = निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिह चोच्यते ।;निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम्॥ २४०॥ | |||
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| verse_lines = श्रीमदानन्दतीर्थार्यसहस्रकिरणोत्थिता ।;गोततिः सततं सेव्या गीर्वाणैः सिदि्धदा भवेत्॥ २४१॥ | |||
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| verse_line1 = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं | | verse_line1 = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं | ||
| verse_lines = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं;ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।;वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपु-;र्मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे॥२४२॥ | |||
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| verse_line1 = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः । | | verse_line1 = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः । | ||
| verse_lines = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः ।;प्रीयतां प्रीत एवालं विष्णुर्मे परमः सुहृत्॥ २४३॥ | |||
| verse_line2 = प्रीयतां प्रीत एवालं विष्णुर्मे परमः सुहृत्॥ २४३॥ | | verse_line2 = प्रीयतां प्रीत एवालं विष्णुर्मे परमः सुहृत्॥ २४३॥ | ||
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<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीकृष्णामृतमहार्णवः समाप्तः॥</div> | |||
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीकृष्णामृतमहार्णवः समाप्तः॥ | |||
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