Aitareya: Difference between revisions
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= ऐतरेयोपनिषत् | <div class="gr-doc-title" data-has-moola="1" data-has-ullekha="1">ऐतरेयोपनिषत्</div> | ||
__TOC__ | |||
< | <span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमारण्यके"></span> | ||
== प्रथमारण्यके == | |||
< | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयारण्यके"></span> | ||
< | == द्वितीयारण्यके == | ||
< | <span id="gr-C2-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="प्रथमाध्यायः"></span> | ||
< | === प्रथमाध्यायः === | ||
< | <div class="gr-author-note">॥ ऐतरेयोपनिषद्भाष्यम्</div> | ||
<h4 class="gr-section-head gr-gadya-head">मङ्गलाचरणम्</h4> | |||
< | <div class="introduction" id="AIT_C02_S01_V01_I01" data-block-id="AIT_C02_S01_V01_I01" data-verse="AIT_C02_S01"> | ||
< | <div class="introduction-line">नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं सर्वज्ञमच्युतमपेतसमस्तदोषम् ।</div> | ||
<div class="introduction-line">प्राणस्य सर्वचिदचित्परमेश्वरस्य साक्षादधीश्वरमियां शरणं रमेशम् ॥</div> | |||
</div> | </div> | ||
<h4 class="gr-section-head gr-gadya-head">उपनिषद इतिहासः</h4> | |||
<div class="introduction" id="AIT_C02_S01_V01_I02" data-block-id="AIT_C02_S01_V01_I02" data-verse="AIT_C02_S01"> | |||
<div class="introduction-line">प्रादुबर्भूव भगवांस्तपसेतराया नारायणोऽब्जजसुतस्य विशालनाम्नः ।</div> | |||
<div class="introduction-line">तस्मिन् गतेऽध्वरमभूत् सुरविप्रसङ्घो निश्चेतनस्तदनु पद्मभवोऽमुमस्तौत् ॥</div> | |||
<div class="introduction-line">तेन स्तुतः(तैः संस्तुतः .हृ) स भगवान् गिरिशेन्द्रमुख्यान् सर्वानबोधयदजेन सहैव तेऽथ ।</div> | |||
<div class="introduction-line">दासत्वमापुरत एव महत्सुराणां दासत्वतः स महिदास इति प्रसिद्धः ॥</div> | |||
<div class="introduction-line">शृण्वत्सु तेषु भगवानवदद्रमायै दिव्यां श्रुतिं स परमोऽतिमुदैतरेयीम् ।</div> | |||
<div class="introduction-line">सा बह्वृचैः प्रपठिता चतुराननास्याद् यस्यां रहस्यमुदितं परमं हि विष्णोः ॥</div> | |||
<div class="introduction-line">महाभूतिः श्रुतिः सैषा महाभूतिर्यतो हरिः ।</div> | |||
<div class="introduction-line">विशेषेणात्र कथितः सर्वज्ञः शाश्वतः प्रभुः ॥ इति ऋक्संहितायाम् ।</div> | |||
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<h4 class="gr-section-head gr-gadya-head">हरावनन्यविश्वासिनो नैव दुर्गतिः</h4> | |||
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| verse_line1 = एष पन्था एतत्कर्म एतद्ब्रह्मैतत्सत्यम् । तस्मान्न प्रमाद्येत् तन्नातीयान्न ह्यत्यायन् पूर्वे । येऽत्यायंस्ते ह पराबभूवुः । | |||
| verse_lines = एष पन्था एतत्कर्म एतद्ब्रह्मैतत्सत्यम् । तस्मान्न प्रमाद्येत् तन्नातीयान्न ह्यत्यायन् पूर्वे । येऽत्यायंस्ते ह पराबभूवुः । | |||
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| text = | | text = एष एव सदा पन्था भगवान् पुरुषोत्तमः । | ||
एष एव सदा पन्था भगवान् पुरुषोत्तमः । | नित्यं स्वप्राप्तिहेतुत्वात्, कर्तृत्वात् कर्म मातृतः ॥ | ||
नित्यं स्वप्राप्तिहेतुत्वात् कर्तृत्वात् कर्म मातृतः ॥ | ब्रह्मैव गुणपूर्णत्वात्, सत्यं साधुस्वरूपतः । | ||
ब्रह्मैव गुणपूर्णत्वात् सत्यं साधुस्वरूपतः । | क्वापि तं विस्मरेन्नैव त्यक्त्वा तं नेतरं व्रजेत् ॥ | ||
पूर्वे नैनं तत्यजुर्हि ब्रह्माद्यास्तेन संसृतेः । | पूर्वे नैनं तत्यजुर्हि ब्रह्माद्यास्तेन संसृतेः । | ||
मुक्ताः श्रीश्च तदत्यागान्नित्यमुक्ता गुणाधिका ॥ | |||
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<h4 class="gr-section-head gr-gadya-head">भगवदतिक्रमः पराभवहेतुः</h4> | |||
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| verse_line2 = | | verse_lines = तदुक्तमृषिणा-;‘प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुर्न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे ।;बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः पवमानो हरित आ विवेशेति ।’(ऋ.सं.८.१०१.१४)इति । | ||
| verse_line2 = ‘प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुर्न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे । | |||
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| verse_lines = ‘प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुः’इति या वै ता इमाः प्रजास्तिस्रो अत्यायमायंस्तानीमानि वयांसि वङ्गावगधाश्चेरपादाः। ‘न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे’ इति । | |||
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<div class="gr-verse-text gr-gadya" id="AIT_C02_S01_V03_gadya_1" data-block-id="AIT_C02_S01_V03_gadya_1" data-verse="AIT_C02_S01_V03"> | |||
<div class="gr-verse-text-gr-gadya-line">तमोयोग्याः त्रिविधाः</div> | |||
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| text = | | text = विहायस्ययनात् प्रोक्ता वयांसीति पिशाचकाः । | ||
वर्तितज्ञानतो वङ्गा नरास्तैरवनं सदा । | |||
अन्नरूपैर्गृध्नवो हि वङ्गावगधनामकाः ॥ | |||
राक्षसा असुरा ईरपादा इति समीरिताः । | |||
धर्मो ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं चतुरात्मकः ॥ | |||
वायुर्देवोऽत्रासुराणामैश्वर्य गुण एव हि । | |||
ईरपादास्ततः प्रोक्तास्ते त्रयो विष्णुमत्यजन् ॥ | |||
पराभूतास्ततस्ते तु तमस्यन्धे निपातिताः । | |||
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| | | verse_lines = एष इमं लोकमभ्यार्चत् पुरुषरूपेण, य एष तपति प्राणो वाव तदभ्यार्चत् प्राणो ह्येष य एष तपति । | ||
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| text = | | text = एष नारायणो देवो वायुना सहेैवेमं लोकमभ्यार्चत् । ब्रह्मादिशरीरेषु प्रविवेश । पुरुष इत्यन्तर्यामिरूपस्याख्या । ‘पुरि शेते’ इति । प्रसिद्धत्वाच्च पञ्चरात्रेषु । | ||
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| | | text = य एष सूर्यमण्डले स्थित्वा तपति भगवान् स नारायणः । ‘य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद’(बृ.भा.५.७.९) इत्यादिश्रुतिभ्यः । ‘य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते’(छां.उ.१.६.६) इत्युक्त्वा ‘तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी’(छां.उ.१.७.६) इत्युक्तत्वान्न शिवादयः । शिवो हि विरूपाक्षः । प्रसिद्धश्च पुण्डरीकाक्ष इति भगवान्नारायणः । | ||
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| text = | | text = ‘यमादित्यो न वेद’ इत्युक्तत्वान्नादित्यः। ‘ओं भेदव्यपदेशाच्चान्यः’(ब्र.सू.१.१.२१) इति भगवद्वचनम् । | ||
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| | | text = ‘वृत्रं यदिन्द्र शवसाऽवधीरहिमादित् सूर्यं दिव्यारोहयो दृशे । | ||
यत्सूर्यस्य हरितः पतन्तीः पुरस्सतीरुपरा एतसे कः ॥ | |||
सीदन्निन्द्रस्य जठरे कनिक्रदन्नृभिर्यतस्सूर्यमारोहयो दिवि’।(ऋ.सं.१०.९०.१३) | |||
‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोस्सूर्यो अजायत ।’ (ऋ.सं.८.४.२९) | |||
‘यस्सूर्यं य उषसं जजान यो अपां नेता स जनास इन्द्रः । | |||
उद्वेति प्रसविता जनानां महान् केतुरर्णवः सूर्यस्य’।(ऋ.सं.२.१२.७) | |||
‘येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्यस्तपति तेजसा भ्राजसा च । | |||
यमन्तः समुद्रे कवयो वयन्ति यदक्षरे परमे प्रजाः’।(म.ना.उ.१.३) | |||
‘तमेताः पञ्चदेवताः परिम्रियन्ते विद्युद्वृष्टिश्चन्द्रमा आदित्योऽग्निः’ इत्यादौ सूर्यस्य सर्वत्र पराधीनत्वावगतेश्च । | |||
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| text = | | text = ‘ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्तीनारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः । | ||
केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः ॥’(तं.सासं. उ.प्र.व.अ.६२.श्लो.१७) इति नारसिंहपुराणे । | |||
‘तापनी पाचिका चैव शोषणी च प्रकाशनी । | |||
नैव राजन् रवेः शक्तिः शक्तिर्नारायणस्य सा ॥ इति पाद्मे । | |||
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| | | text = ‘यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । | ||
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥’(भ.गी.१५.१२) इति च । | |||
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| text = | | text = न च विष्णोरन्याधीनत्वं श्रुतिषूक्तं कुत्रचित् । उत्पत्तिस्तु प्रादुर्भावापेक्षया । ‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’(महोपनिषत्.१) इति महाप्रलये तस्यैवावस्थानश्रुतेः । ‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्’(ऋ.सं.१०.१२५.५) इत्यादि ब्रह्मशिवादीनां देव्यधीनपद-प्राप्तिमुक्त्वा तस्या अपि भगवदधीनत्वं ‘मम योनिरप्स्वं१तः समुद्रे । ततो वितिष्ठे भुवना नु विश्वा। परो दिवा पर एना पृथिव्या’(ऋ.सं.१०.१२५.७) इत्याह । ‘अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ । अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्’(ऋ.सं.१०.१२५.६-७) इति ब्रह्मरुद्रयोर्देव्याः सकाशात् सृष्टिसंहारौ चोक्तौ । | ||
‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः । | |||
विदेहि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत् ॥’(ऋ.सं.७.४०.५) | |||
इत्यादिना विष्णोः प्रसादादेव शिवादीनां पदप्राप्तिकथनाच्च । | |||
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| text = | | text = तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते। तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्त’(बृ.२.२.२) इत्यादिना शिवादिसर्वदेवोपास्यस्य वायोः ‘अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः’(बृ.२.२.१) इति मध्यमप्राण-शब्दोक्तस्य ‘प्राणः स्थूणा’(बृ.२.२.१) इति प्राणशब्दोदितो नारायण आश्रय उक्तः । तस्मात् सर्वोत्तमो भगवान् नारायणः प्राणशब्दोदित आदित्य-मण्डलस्थस्तपतीत्यादि सिद्धम् । | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = तं शतं वर्षाण्यभ्यार्चत् तस्माच्छतं वर्षाणि पुरुषायुषो भवन्ति । तं यच्छतं वर्षाण्यर्भ्याचत्, तस्माच्छतर्चिनस्तस्माच्छतर्चिन इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
| commentary1 | | verse_lines = तं शतं वर्षाण्यभ्यार्चत् तस्माच्छतं वर्षाणि पुरुषायुषो भवन्ति । तं यच्छतं वर्षाण्यर्भ्याचत्, तस्माच्छतर्चिनस्तस्माच्छतर्चिन इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
| commentary1 = aitareya | |||
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| text = | | text = ‘क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः । | ||
आजानजाः कर्मदेवास्तात्त्विका दक्ष एव च ॥ | |||
शक्रश्चोमा च रुद्रश्च भारती वायुरेव च । | |||
मुक्ता उक्ताः शतगुणा बलज्ञानसुखादिभिः ॥ | |||
विष्णुभक्त्यादिभिश्चैव गुणैः सर्वैः क्रमाधिकाः । | |||
तस्माद्रमा ततो विष्णुरनन्तगुणतोऽधिकः ॥ | |||
नित्यमुक्तः स्वतन्त्रश्च न चान्यस्तादृशः क्वचित् । | |||
कुत एवाधिकोऽन्यः स्याद् यन्मुक्ता अपि तद्वशाः ॥ | |||
रमाऽपि तद्वशा नित्यं स नान्यस्य वशे प्रभुः । | |||
न भेदः शेषशिवयोः सुपर्णः शेषसंमितः ॥ | |||
कामः शक्रसमो नित्यं प्रतिबिम्बाश्च ते क्रमात् ॥’ | |||
इति च महासंहितायाम् ॥ | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = स इदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च, तस्मात् मध्यमास्तस्मात् मध्यमा इत्याचक्षते। एतमेव सन्तम् । | ||
| verse_line2 = | | verse_lines = स इदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च, तस्मात् मध्यमास्तस्मात् मध्यमा इत्याचक्षते। एतमेव सन्तम् ।;प्राणो वै गृत्सोऽपानो मदः । स यत्प्राणो गृत्सोऽपानो मदस्तस्मात् गृत्समदः। तस्माद् गृत्समद इत्याचक्षते । एतमेव सन्तम् ।;तस्येदं विश्वं मित्रमासीद् । यदिदं किञ्च तद्यदस्येदं विश्वं मित्रमासीद् । यदिदं किञ्च तस्मात् विश्वामित्रस्तस्माद्विश्वामित्र इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।;तं देवा अब्रुवन् - अयं वै नः सर्वेषां वाम इति तं यद्देवा अब्रुवन्नयं वै नः सर्वेषां वाम इति तस्माद्वामदेवस्तस्माद् वामदेव इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।;स इदं सर्वं पाप्मनोऽत्रायत यदिदं किञ्च स यदिदं सर्वं पाप्मनोऽत्रायत यदिदं किञ्च तस्माद् अत्रयस्तस्मादत्रय इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 | | verse_line2 = प्राणो वै गृत्सोऽपानो मदः । स यत्प्राणो गृत्सोऽपानो मदस्तस्मात् गृत्समदः। तस्माद् गृत्समद इत्याचक्षते । एतमेव सन्तम् । | ||
| commentary1 = aitareya | |||
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| text = | | text = स पुरुषेषु शतवर्षं गत इति शतर्चिनामा । बहुरूपत्वाद् बहुवचनम् । एतमेव तथासन्तं मुख्यत आचक्षते, ऋषींस्तूपचारतः । आत्मन उदरे धृतवान् मध्ये स्थित्वा धृतवांश्च । | ||
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| | | text = प्राणस्थः प्राणनामासावपानेऽपाननामकः । | ||
नेतृत्वाच्चापनेतृत्वाद् भगवान् पुरुषोत्तमः ॥इति च । | |||
वामो भद्रः ॥ १ ॥ | |||
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<div class="gr-author-note">॥ इति प्रथमः खण्डः॥</div> | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = एष उ एव बिभ्रद्वाजः । प्रजा वै वाजस्ता एष बिभर्ति यद् बिभर्ति तस्मात् भारद्वाजस्तस्मात् भारद्वाज इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
| commentary1 | | verse_lines = एष उ एव बिभ्रद्वाजः । प्रजा वै वाजस्ता एष बिभर्ति यद् बिभर्ति तस्मात् भारद्वाजस्तस्मात् भारद्वाज इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।;तं देवा अब्रुवन् ‘अयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ’ इति तं यद्देवा अब्रुवन्नयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ इति तस्माद्वसिष्ठः। तस्माद्वसिष्ठ इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।;स इदं सर्वम् अभिप्रागाद् यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वमभिप्रागाद्यदिदं किञ्च, तस्मात् प्रगाथाः । तस्मात् प्रगाथा इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।;स इदं सर्वमभ्यपवयत यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वमभ्यपवयत यदिदं किञ्च, तस्मात् पावमान्यः। तस्मात् पावमान्य इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | ||
| verse_line2 = तं देवा अब्रुवन् ‘अयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ’ इति तं यद्देवा अब्रुवन्नयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ इति तस्माद्वसिष्ठः। तस्माद्वसिष्ठ इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = सोऽब्रवीत् ‘अहमिदं सर्वमसानि, यच्च क्षुद्रं यच्च महद्’ इति । ते क्षुद्रसूक्ताश्चाभवन् महासूक्ताश्च । तस्मात् क्षुद्रसूक्ताः। तस्मात् क्षुद्रसूक्ता इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् । | ||
| commentary1 | | verse_lines = सोऽब्रवीत् ‘अहमिदं सर्वमसानि, यच्च क्षुद्रं यच्च महद्’ इति । ते क्षुद्रसूक्ताश्चाभवन् महासूक्ताश्च । तस्मात् क्षुद्रसूक्ताः। तस्मात् क्षुद्रसूक्ता इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।;सूक्तं बतावोचतेति, तत्सूक्तमभवत् । तस्मात् सूक्तम्। तस्मात् सूक्तमित्याचक्षत एतमेव सन्तम् । | ||
| verse_line2 = सूक्तं बतावोचतेति, तत्सूक्तमभवत् । तस्मात् सूक्तम्। तस्मात् सूक्तमित्याचक्षत एतमेव सन्तम् । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S02_V05 | ||
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| text = | | text = तद्विष्ण्वाख्यं ब्रह्म सूक्तान्यवोचतेति सूक्तनामकम् अभवत् । बत इत्यास्वादने । स्वात्मनैव स्वयं सुष्ठूक्तमिति वा । इदं सर्वं परिपूर्णं सन् अहम् अल्पप्राणिषु प्रविश्य सूक्ष्मरूपः, महाप्राणिषु महारूपश्चासानीति(भवानीति) स भगवानब्रवीत् । तस्मात् क्षुद्रोऽसानीत्युक्तत्वात् क्षुद्रसूक्तास्ते क्षुद्रप्राणिषु स्थिता भगवद्रूपसङ्घाः । महानसानीत्युक्तत्वात् महासूक्ता महाप्राणिषु स्थिताः । सूक्ष्मरूपत्वादेव क्षुद्रनाम भगवतः । न तु सामर्थ्याऽल्पत्वात् । न हि सामर्थ्यादिगुणेषु कश्चिद्विशेषो भगवद्रूपेषु । | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = एष वा ऋग् । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत । स यद् एभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत, तस्माद् ऋक् । तस्माद् ऋगित्याचक्षत एतमेव सन्तम् । | ||
| commentary1 | | verse_lines = एष वा ऋग् । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत । स यद् एभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत, तस्माद् ऋक् । तस्माद् ऋगित्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।;एष वा अर्धर्चः । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्योऽर्द्धेभ्योऽर्चत । स यद् एभ्यः सर्वेभ्योऽर्धेभ्योऽर्चत, तस्माद् अर्धर्चः । तस्मादर्धर्च इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।;एष वै पदम्। एष हीमानि सर्वाणि भूतानि पादि। स यद् इमानि सर्वाणि भूतानि पादि, तस्मात् पदम्। तस्मात् पदमित्यचक्षत एतमेव सन्तम् ।;एष वा अक्षरम्। एष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः क्षरति । न चैनमतिक्षरन्ति । स यद् एभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः क्षरति, न चैनम् अतिक्षरन्ति, तस्मात् अक्षरम्। तस्मादक्षरमित्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।;ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव । प्राण ऋच इत्येव विद्यात् ॥ २ ॥ | ||
| verse_line2 = एष वा अर्धर्चः । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्योऽर्द्धेभ्योऽर्चत । स यद् एभ्यः सर्वेभ्योऽर्धेभ्योऽर्चत, तस्माद् अर्धर्चः । तस्मादर्धर्च इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S02_V06 | ||
| id = | | id = AIT_C02_S02_V06_B01 | ||
| text = | | text = एभ्यः प्राणिभ्यो गतवानित्यृक् । गच्छति हि मरणकाले । | ||
‘ब्रह्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते बुधैः’ इति हि भारते । | |||
‘म्रियमाणमिमं जीवं वासुदेवादिदेवताः । | |||
त्यक्त्वा भागेन गच्छन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ॥ | |||
गतैर्भागैरपि पुनर्विशेयुर्भोगसिद्धये । | |||
भोग्यलोकमनुप्राप्तं तस्मात् स्वप्नवदन्तरा ॥’इति च ॥ | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S02_V06 | ||
| id = | | id = AIT_C02_S02_V06_B02 | ||
| text = | | text = ‘अर्च= गतिपूजनयोः’, ‘ऋ=गतौ’ इति धातोः । सर्वेभ्योऽर्धेभ्यः स्थानेभ्यः शरीरेभ्यो गतवानित्यर्धर्चः । सर्वाणि भूतान्यपादि । ‘पद=गतौ’ तस्मात् पदं नाम । अधिकं क्षरतीत्यक्षरम् । क्षरणं नाम सन्ततदानम् । ‘क्षर= विनाशसन्ततदानयोः’ इति धातोः । | ||
(समुद्र-मेघ-वृक्षपतन-भेरीताडनादिसर्वघोषा अपि तस्यैव नामानि) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">एवमृषिषु शब्देषु च व्यवह्रियमाणानि सर्वाणि नामानि विष्णोरेव मुख्यतः । किमु देवतानामानि !</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या’(ऋ.सं.१०.८८.१००) । | |||
‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहु रथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्’ ।(ऋ.सं.१.१६४.४६) | |||
‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।’(तै.ब्रा.३.७.९.३) | |||
‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ ॥(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१) | |||
इत्यादिश्रुतिभ्यः । न केवलमृष्यादीनां नाम भगवतः, सर्वे वेदा अपि तस्यैव नामानि, किमु च वेदाः समुद्र-मेघ-वृक्षपतन-भेरीताडनादिसर्वघोषा अपि तस्यैव नामानि यथायोग्यं योजनीयानि ! एकमेव व्याहरणम्= एकप्रकारमेव नाम । निर्दोषगुणपूर्तिवाचकत्वादेकप्रकारता । प्राणे नारायण एव= नारायणविषय एव व्याहारः । ऋचस्तु विशेषत इन्द्रादिनामवतो विष्णोर्गुणान् अल्पज्ञानाम् अपि प्रकाशयन्तीति प्राणे नारायणे एवेति विद्यात् ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उक्तं च बृहत्संहितायाम्– | |||
‘हुङ्कारेण सहैवाब्धिः सर्वाभिभवशक्तिताम् । | |||
विष्णोर्वक्ति यतो हुं च पराभिभववाचकः । | |||
ओमिति स्वरते नित्यं वायुर्मेघेषु संस्थितः । | |||
बलवन्नादसंयुक्तो ह्यधिकोच्चत्वमस्य तु । | |||
ओङ्कारस्यार्थ उद्दिष्ट उक्तार्थाधिक्यमेव च । | |||
नादो बली प्रवदति तथा भेरीध्वनिः प्रभोः । | |||
अनुदात्तस्वरूपत्वाद् औदार्यं वदतीशितुः ॥</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">तदपेक्षयाऽन्यनीचत्वं घण्टाद्याः स्वरितात्मकाः ॥ | |||
उच्चस्थितिमुदात्तस्तु स्वर्णचञ्च्वादिकः स्वरः । | |||
विष्णोर्वक्ति, तथा मन्द्रः श्वासादिः प्रचयात्मकः । | |||
एकप्रकारतां विष्णोः सदाऽचाल्यां वदत्यपि ॥ | |||
इत्यादयः सर्वघोषा विष्णोरेव गुणोन्नतिम् । | |||
वदन्ति, किमु वेदाद्या, मार्जाराद्यभिधास्तथा ॥ | |||
मारयित्वा प्रभक्ष्यैव जरयत्यखिलं जगत् । | |||
तेन मार्जार उद्दिष्टो, मोषणान्मूषको हरिः ॥ | |||
वर्षणाद् वृष उद्दिष्टो, बलनाद् बलिनामकः । | |||
तारणात् तृणनामाऽसावित्याद्येकोऽभिधीयते ॥</span> | |||
(सर्वनामा भगवान् सर्वविलक्षणः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">सर्वनामाऽपि भगवान् सर्वशक्तिश्च सर्ववित् । | |||
ब्रह्मरुद्रादिजीवेभ्यो जडेभ्यः श्रिय एव तु । | |||
व्यतिरिक्तः सदाऽनन्तसान्द्रानन्दैकरूपकः । | |||
तस्यैव मुख्यनामानि समाकृष्येतरेष्वपि । | |||
उपचारात् प्रवर्तन्ते व्यवहारप्रसिद्धये । | |||
तथैव सर्वनामानि प्रवर्तन्ते च मारुते । | |||
न तावन्मुख्यवृत्त्यैव, मुख्यतोऽन्यव्यपेक्षया । | |||
मुख्यतः सर्वनामा तु विष्णुरेको न चापरः । | |||
तस्मात् प्राणादिशब्दाश्च विष्णावेव हि मुख्यतः । | |||
अन्यव्यपेक्षया वायौ मुख्यवृत्तिर्विधीयते । | |||
वायुश्च सूर्यसंस्थः संस्तपत्येतज्जगत्त्रयम् । | |||
आज्ञयैव हरेर्वायोः शक्त्या सूर्यस्तपत्ययम् ॥’ इत्यादि च ।</span> | |||
(मुख्यवायुरपि सर्ववेदप्रतिपाद्यः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न प्रसिद्धसूर्यस्येयं तापनशक्तिरिति ज्ञापयितुं ‘प्राणो ह्येष य एष तपति’ इत्युक्तम् । ‘प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति’(बृ.उ.३.६.२३,सप्तान्नब्राह्मणम्) इति च श्रुतिः । प्राणशब्दश्च मुख्यतो विष्णौ प्रवर्तमानोऽपि वायावपि वर्तते । अतः सर्ववेदाद्यभिधेयत्वं वायोरप्यस्ति । ‘प्राणस्य प्राणः’(केन.१.३) इति श्रुतेरुभयोरपि प्राणशब्दः प्रसिद्ध एव ।‘अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः’(बृ.४.२.१) इति वायोर्विशेषणादुत्तमप्राणो विष्णुरिति च सिद्धम् ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">द्वावात्मानौ हि वेदेषु द्वौ प्राणौ द्वौ च चेतनौ । | |||
अज्ञानाभिभवास्पृष्टौ वायुर्नारायणश्च तौ । | |||
तदन्ये चेतनास्सर्वे प्राणाश्चात्मान एव च । | |||
अज्ञानाभिभवस्पृष्टास्तस्मात् ते ह्यधमाः श्रुताः । | |||
मध्यमो वायुरेवैक, उत्तमः केवलो हरिः । | |||
सर्वशब्दोदितौ तस्माद् एतौ द्वावेव नापरः । | |||
अन्ये चैव मितैः शब्दैरुच्यन्ते नामितैः क्वचित्। | |||
श्रीरप्यखिलशब्दोक्ता विष्णुवन्न तु मुख्यतः ॥ | |||
तस्मादमितनामानावपि तौ मितनामवत् । | |||
श्रीश्च वायुश्च विष्णुस्तु मुख्योक्तेरमिताभिधः ॥ | |||
अनन्तनामकत्वाच्च सोऽनन्तगुण ईरितः । | |||
पृथङ्नामानि यस्मात् तद्गुणानेव प्रचक्षते ॥’इत्यादि ब्रह्माण्डे ॥ २ ॥</span> | |||
}} | }} | ||
<div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयः खण्डः</div> | |||
</div> | |||
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| verse_id | | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | ||
| document_id | | document_id = AIT | ||
| chapter_id | | chapter_id = AIT_C02 | ||
| verse_type | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमिन्द्र उपनिषससाद । स ह ‘अन्नम्’ इत्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः स वा ऋषे द्वितीयं शंस’ इति । स ह ‘अन्नम्’ इत्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । | ||
तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः स वा ऋषे तृतीयं शंस’ इति । स ह ‘अन्नम्’ इत्येव अभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । | |||
तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागा, वरं ते ददामि’ इति । स होवाच- ‘त्वामेव जानीयाम्’इति । | |||
| | तमिन्द्र उवाच- ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे प्राणस्त्वं प्राणः सर्वाणि भूतानि । प्राणो ह्येष य एष तपति । स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि । तस्य मेऽन्नं मित्रं दक्षिणम् । तद् वैश्वामित्रम् एष तपन्नेवास्मि’ इति होवाच ॥ ३ ॥ | ||
(बृहतीसहस्रं सर्वं नारायणस्यान्नम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya-collection"><span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः, तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम्, तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेते इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तम् इत्यादिना ॥</span> | |||
(इन्द्रकर्तृकं महाव्रतम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये । | |||
महाव्रतं कर्म चक्रे, हौत्रं चक्रेऽत्र कौशिकः । | |||
भृगुरध्वर्युरभवद्, ब्रह्मा ब्रह्माऽभवत् स्वयम् । | |||
उद्गाता वायुरभवत्, स्वयं नारायणः प्रभुः । | |||
सादस्यमकरोत् तत्र, तदन्येऽन्येऽपि चर्त्विजः ।</span> | |||
(विश्वामित्रेण बृहतीसहस्रफठनम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">बृहतीसहस्रं शंसिष्यन् यदा सस्मार केशवम् । | |||
वायुना सह देवेशस्तदा वासवमाविशत् । | |||
आविष्टो, विष्णुनाऽथेन्द्रो वायुना सह कौशिकम् । | |||
ते | शंसेत्युक्त्वा निषण्णोऽभूद्, इदमन्नं तवेति सः । | ||
ऋक्सहस्रं शशंसाथ(शशंसात्र .हृ) यज्ञाङ्गत्वेन भक्तितः । | |||
तच्छ्रुत्वा तुष्टिमगमत् केशवो वायुसंयुतः । | |||
एवं हि | द्वितीयवारं शंसेति प्राह तं च जनार्दनः । | ||
प्रीत्यैव शक्रमाविष्टो, विश्वामित्रः शशंस तत् । | |||
अतिप्रियत्वाद् भगवान् पुनरप्याह कौशिकम् । | |||
तृतीयं च शशंसासौ(सास्मै) विष्णोरन्नं प्रकल्प्य तत् । | |||
ततोऽतितुष्टो भगवान् ददामि वरमित्यमुम् । | |||
ऊचे, स प्रथमे त्वेव निजसालोक्यमीश्वरः । | |||
प्रादाद् द्वितीये सामीप्यम्, तृतीये पुनरेव च ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">वरं ददानीत्युक्तः स मुनिः प्राह जनार्दनम् । | |||
सम्यक्त्वामेव जानीयाम् इति मोक्षे सुखोच्चताम् । | |||
इच्छंस्तं प्राह भगवान् इन्द्रस्थो वायुसंयुतः । | |||
सर्वनामाऽहमस्म्येक इति ज्ञानं ममोत्तमम् । | |||
यस्मात् सर्वगुणत्वं स्यात् सर्वनामत्व एव तु ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न हि दोषाभिधायीनि विष्णोर्नामानि कर्हिचित्(कानिचित् .हृ)। | |||
अदोषत्वान्महाविष्णोर्न सामान्यवचांस्यपि । | |||
सर्वोत्तमगुणात्मत्वात् सदा नारायणस्य हि । | |||
सर्वोत्तमगुणानेव नामान्याचक्षते हरेः ।</span> | |||
(विष्णौ सर्वशब्दसमन्वयक्रमप्रदर्शनम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">यावज्ज्ञानेन मोक्षः स्यात् तावज्ज्ञात्वापि कौशिकः । | |||
अधिकज्ञानलब्ध्यर्थं मोक्षेऽधिकसुखाप्तये । | |||
जानीयां त्वामिति प्राह तस्मा आह स केशवः । | |||
इन्द्राविष्टः प्राणनाम तथाऽन्याश्चाभिधाः प्रभुः । | |||
प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते । | |||
ओयत्वाद् अहंनामाऽस्म्यसनान्मनुतेरपि । | |||
ततो वेत्तीति च त्वं स, पूर्णत्वात् सर्वनामकः । | |||
सर्वाणि बहुरूपत्वात् सर्वरूपेषु पूर्तितः । | |||
प्रभूतत्वाद् भूतनामा सर्वरूपप्रभूततः । | |||
बहुरूपः स भूतानीत्युक्तो विष्णुस्सनातनः । | |||
सर्वैश्वर्यस्वरूपत्वादेष इत्यभिधीयते । | |||
स एव सूर्यसंस्थः सन् लोकं तपति केशवः ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">सर्वनामवतस्तस्य ममान्नं मित्रमुच्यते । | |||
अन्नाभिमानिनी साक्षाच्छ्रीरेव प्रमदोत्तमा । | |||
साऽन्नमित्युच्यते विष्णोर्भोग्यत्वान्मित्रमेव च । | |||
दक्षभागस्थितेनत्वाद् दक्षिणं नाम सोच्यते । | |||
तस्या इनो हि विष्णुः स दक्षभागे स्थितः सदा । | |||
यस्याभिमानिन्यन्नस्य लक्ष्मीः सा देवतोत्तमा। | |||
वैश्वामित्रं तदन्नं तु ऋक्सहस्रात्मकं मतम्। | |||
विश्वामित्रेण दृष्टत्वाद् वैश्वामित्रं तदीर्यते।</span> | |||
(शक्राविष्टो विष्णुः; न चापरः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कां परिहरन् हरिः। | |||
आदित्यसंस्थितो विष्णुः तपन्नस्मीति चोचिवान्। | |||
त्वं जानीयामिति प्रश्नं विश्वामित्रस्य कुर्वतः। | |||
अभिप्रायद्वयं ह्यस्ति ‘शक्राविष्टो न चापरः। | |||
हरेरिति तु मे तर्कस्तजोबाहुल्यतोऽजनि। | |||
तस्य तर्कस्य सत्यत्वं ज्ञातव्यं प्रथमं मया। | |||
द्वितीयं यदि विष्णुः स्याज्ज्ञातव्यो मे विशेषतः’। | |||
इत्याभिप्रायमस्यैव ज्ञात्वा विष्णुः सनातनः । | |||
अभिप्रायद्वयस्यापि परिहारं हरिर्ददौ। | |||
प्राणो वा अहमित्यादि नामसन्दर्भमुक्तवान्। | |||
विशेषज्ञानसिद्ध्यर्थं नाम्नामुक्तिः परात्मनः। | |||
इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कानुत्त्यर्थमेव च । | |||
तपन्नेवास्मीत्यावदत्, तपन्तं वेद सोऽपि हि। | |||
नारायणं सर्वगतम्, गायत्र्योपासको हि सः॥ इति ब्रह्मण्डे।</span> | |||
(‘प्राणो वा अहम्’ इत्युपदेशः भगवतैव कृतः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उपनिषण्णमिन्द्रं दृष्ट्वाऽपि त्वामेव जानीयाम् इति वरस्वीकाराद् इन्द्रादेव च, इन्द्राविष्टो भगवान् अत्रोक्त इति ज्ञायते । इन्द्रं तु जानात्येव हि विश्वामित्रः । भगवन्तमपि स्वरूपत आगतं जानात्येव । विशेषज्ञानप्रार्थने प्राणो वा अहमस्म्यृष इत्यादिकमेव पूर्यते ; एष तपन्नेवास्मि इति व्यर्थम् । प्राणो ह्येष य एष तपति इत्युक्तत्वात् ।</span> | |||
(भगवतस्तदीयरूपाणां च नास्ति भेदः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि इत्यादिनाऽपि आविष्टस्य विष्णुत्वं किञ्चिज्ज्ञायते । तथाऽपि एतेन इति तृतीयात्वात् करणत्वाशङ्का भवति । तस्य मे इति वैयधिकरण्यमिति च । अतो भगवन्नामानि पृथगुक्त्वा ‘अहं विष्णुरित्येष तपन्नेवास्मि’ इत्युवाच । इन्द्रशरीरमेव पश्यतो विश्वामित्रस्य तर्कमात्रतो भगवानिति किञ्चिज्जानत इति ज्ञायते ।</span> | |||
(न शचीपतिः सर्वशब्दवाच्यः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न चेन्द्रस्य प्राणशब्दः(प्राणशब्दाभिधेयत्वम्. हृ) सर्वशब्दाभिधेयत्वं च विद्यते । ‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितम्’(ऋ.सं.१०.८२.६) इत्युक्तस्य पद्मनाभस्य हि ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८.२३) इति सर्वदेवाभिधानत्वमुक्तम् । इन्द्रे हीन्द्रशब्दोऽपि न मुख्यतो वर्तते, परमैश्वर्याभावात्, इन्द्रशब्दोऽपि विष्णावेव वर्तते । स हि परमेश्वरः ।</span> | |||
‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।’(तै.ब्रा.३.७.९.३) | |||
‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्’(ऋ.सं.१.१६४.४६) । इत्यादिश्रुतेश्च । ‘सप्तार्द्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोऽस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’(ऋ.सं.१.१६४.३६) इत्यादिना विष्णुरेव हि तत्र प्रस्तुतः ।</span> | |||
(नारायणादिनामानि नान्यस्य) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘नामानि विश्वाभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् ।<br/>नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१) ॥’ इति श्रुतिः ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यो देवानां नामधा एक एव’ इत्यवधारणान्नान्यस्य सर्वनामत्वम् । स च विष्णोर्नान्यः । पद्मनाभत्वादेव ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">श्रियो वायोरपि न नारायणादिनामवत्वम् । ‘एको वासुदेवस्तत्सदृशपरौ न स्तः’ इति श्रुतिः । ‘एको नारायण आसीत् तत्समो वा, अधिको वा नास्ति’ इति च । | |||
‘येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्स्तपति तेजसा भ्राजसा च’(म.ना.उ.१.३) । | |||
‘यमन्तःसमुद्रे कवयोऽवयन्ति यदक्षरे परमे प्रजा’(तै.आ.१०.१.१) । | |||
इत्युक्तस्य समुद्रशायिन एव नारायणस्य | |||
‘तद् एवर्तं तद् सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’(म.ना.उ.४.३) । इति परब्रह्मत्वावधारणाच्च विष्णोः परं सदृशं वा नास्त्येव । अतस्तदत्रोच्यत इत्यपि न वक्तव्यम् ।</span> | |||
(विष्णुः सर्वेश्वरः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।<br/>न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.सं.७.९९.१) ॥इत्यादेश्च ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायान् अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम्’(ऋ.सं.४.३०.१) । इत्याद्यपि सर्वनामकत्वात् तस्यैव ।<br/> ‘किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्’ इत्यादिप्रश्नस्यापि<br/>‘परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।<br/>परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥</span> | |||
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।<br/>दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ | |||
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।<br/>यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ | |||
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।<br/>विष्णोर्नामसहस्रम्... ॥’(म.भा.अनु.अ.१४९) | |||
इत्येव भारते परिहाराच्च । | |||
(मित्रं मे दक्षिणा रमा) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">मेऽन्नं दक्षिणमित्युक्तत्वाच्च विष्णुरेवेति ज्ञायते । स हि विष्णुर्दक्षिणामित्र उक्तो हरिवंशेषु धन्याश्चर्याध्यायि । | |||
‘दक्षिणाभिः सहैवैतन्मदधस्ताज्जगत्सदा ।<br/>धन्याश्चर्योऽहमेवैको मित्रं मे दक्षिणा रमा ।<br/>इत्यवादीद्धरिर्भूपा धन्योऽसीत्युदितो मया ॥’ इति नारदवचनम् । | |||
न च बृहतीसहस्राभिमानिनीं देवीं विना अचेतनमात्रस्य मुख्यमित्रत्वं युज्यते । | |||
‘मिनोति त्रायते चेति मित्रमित्यभिधीयते ।<br/>तस्माद्योऽयं विजानाति स मित्रं तस्य नान्यथा ॥’इति भारते</span> | |||
(विष्णुरेव बृहतीसहस्रप्रतिपाद्यः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उक्थायुत्वाच्च विष्णुरेवात्रोक्त इत्यवगम्यते । बृहतीसहस्रं ह्युक्थनामकं मुख्यतः । | |||
‘महाव्रतनियुक्तं यदृक्सहस्रं हरेः प्रियम् ।<br/>तदुक्थमिति सम्प्रोक्तं तेने यो विष्णुरेव हि ॥ | |||
तस्मादुक्थायुरित्युक्त ऐश्वर्यादिन्द्र उच्यते ।<br/>तस्मादुक्थायुरिन्द्रेति विष्णुर्यज्ञेषु पूज्यते ॥’इति गारुडे | |||
विष्णुर्ह्युक्थायुरिन्द्र इत्युच्यते । यज्ञेष्वन्य इन्द्रः पृथक्चोच्यते । ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः’(तै.ब्रा.३.७.९.३) । इत्युक्त्वा ‘तस्मै त्वा तेभ्यस्त्वा’ इति भेदवचनाच्च । सत्य इति वायुः । ‘सदिति प्राण’ इति श्रुतेः । | |||
‘सदेव सत्यमित्युक्तं सत्यो वायुरुदाहृतः ।<br/>साधुत्वं सत्यता प्रोक्ता साधुर्वायुर्हि सर्वतः ॥’ इति शब्दनिर्णये ।</span> | |||
(बृहतीसहस्रपठनफलम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">प्रियधाम्न उप= समीपे गमनं नाम तद्धामप्राप्तिकारणभगवत्प्रसादप्राप्तिः । अन्यथोपशब्दो व्यर्थः स्यात् । न च तदैव भगवतः प्रियं धाम विश्वामित्रेण प्राप्तम् । | |||
बृहतीसहस्रे प्रथमे सालोक्यं प्रददौ हरिः ।<br/>द्वितीये स्वपुरप्राप्तिं तृतीयेऽन्तःपुरस्य च ।<br/>तथा स्वविषयं ज्ञानं विश्वामित्रे ददौ प्रभुः ॥ इति च गारुडे ।</span> | |||
(इन्द्रे विशेषावेशस्तात्कालिकः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न चेन्द्रादिभिरैक्यमत्रोच्यते । ‘प्राणस्तथाऽनुगमाद्’(ब्र.सू.१.१.२८) इति च विष्णोरेव प्राणशब्दाभिधेयत्वमुक्त्वा ‘न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन्’(ब्र.सू.१.१.२९) इति वक्तुः= बृहतीसहस्रं शंसितुर्विश्वामित्रस्य इन्द्रेण स्वात्मोपदेशः क्रियत इति पक्षो निराकृतो हि भगवता सूत्रेषु । ‘अध्यात्मसम्बन्ध’ शब्देनावेशो विष्णोरिन्द्रे विवक्षितो भगवता । अन्येष्वन्तर्यामिरूपेण सम्बन्धोऽस्त्येव । अस्मिन्निन्द्रे तु विशेषावेशस्तात्कालिकः । अधिकात्मनः= परमात्मनः सम्बन्धोऽध्यात्मसम्बन्धः । न हि स्वात्मना स्वस्य सम्बन्धो भवति । यद्यध्यात्ममात्रमत्रोच्यत इति विवक्षितं तर्हि ‘अध्यात्मभूमा’ इत्येव स्यात्; सम्बन्धशब्दो व्यर्थः । तस्मादिन्द्रादिजीवेभ्यो विष्णोर्भेद एवात्र भगवतो विवक्षितः ।</span> | |||
(अन्तर्यामिदृष्ट्याऽभेदव्यवहारः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्’(ब्र.सू.१.१.३०) इति शास्तुरन्तर्यामिणो विष्णोः सर्वशरीरस्थितत्वात् सर्वनामाभिधेयत्वं चोक्तम् । ‘अहं मनुरभवं सूर्यश्च’ (ऋ.सं.४.२६.१) इत्यादिवत् । न हि मनुसूर्यादिर्भवति वामदेवस्तेषां पक्षेऽपि । सर्वप्रवृत्तिहीनतां हि ते मोक्षं वदन्ति । अत्र च ‘अहं भूमिमददामार्याय’(ऋ.सं.४.२६.२) इत्यादिना प्रवृत्तिरेवोच्यते ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च वामदेवेन मन्वादिकर्म क्रियते कदाऽपि । अतीतार्थश्चायं दृश्यते ‘भूमिम् अददाम्’ इत्यादिना । नहि पूर्वं वामदेवेन तानि कर्माणि कृतानि । भगवान् विष्णुर्हीन्द्राय भूमिमददात्(विष्णुर्हि आर्याय इन्द्राय भूमिमदात्(ताम्रपर्णि) । स एव च सर्वेष्वन्तर्यामित्वेन स्थित्वा नामप्रवृत्तिनिमित्तानि सर्वकर्माणि कुर्वन्नवबोध-सूरिनियमनादिभिर्मनुसूर्यादिसर्वनामा भवति । यदि भेदस्य पूर्वमपि मिथ्यात्वमङ्गीक्रियते तर्हि भूमिदानादिसर्वकर्मणां मन्वादित्वस्यापि मिथ्यात्वाद् ‘अहं मनुरभवम्’ इत्यादिकं सर्वमनर्थकमेव भवति ।</span> | |||
(मुक्तावपि पञ्चभेदाः सुनित्याः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘जीवेश्वरभिदा चैव जीवभेदः परस्परम् ।<br/>जडेश्वरभिदा चैव जडभेदस्तथैव च ॥ | |||
जडजीवभिदा चैव सत्योऽयं भेदपञ्चकः ।<br/>न कदाचिन्निवर्त्योऽयं मुक्तौ संसार एव च (वा) ॥ | |||
य एतदन्यथा ब्रूयुस्ते हि यान्त्यधरं तमः ॥’ इति भविष्यत्पर्वणि । | |||
‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।’(भ.गी.१६.८) | |||
‘ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ।’(भ.गी.१६.१४) | |||
‘एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।’(भ.गी.१६.९) | |||
‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।<br/>मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्’(भ.गी.१६.२०) ॥ इत्यादि च ।</span> | |||
(सर्वान्तर्यामित्वादिना विष्णोः सर्वशब्दवाच्यत्वम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे’ इत्यादौ अहमस्म्यादिशब्दोऽस्मच्छब्दार्थः(अस्मच्छब्दस्थः/अस्मच्छब्दाद्यर्थः) । एष तपन्नेवास्मीत्युपरितनस्य वैयर्थ्यात् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । अतोऽहमस्मीत्यादि च भगवन्नामैव । न च जीवैक्यवचनमत्र प्रस्तुतम् । ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव’ इति सर्वनामाभिधेयत्वं भगवत उक्त्वा, तत्रैव प्रमाणत्वेन विश्वामित्रं ह्येतदहरित्याद्याख्यायिकोक्ता । तस्मात् सर्वान्तर्यामित्वात्, सर्वगुणत्वात्, सर्वशक्तित्वाच्च सर्वनामवत्वमेव विष्णोरुच्यते; न तु सर्वस्वरूपत्वम् । | |||
उक्तं च भारते । | |||
‘स्रष्टृत्वाच्चैव पातृत्वान्नियमाच्च प्रकाशनात् ।<br/>सर्वत्वमुक्तं विष्णोस्तु न तु सर्वस्वरूपतः ॥’ इति ।</span> | |||
(श्रुतिवचनानि नाभेदपराणि) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘‘ ‘पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्’(ऋ.सं.८.४.१७) इति पुरुषेणैव ‘इदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।’, ‘आ तृणाद् आकरीषात् सर्वं भगवान् इति मिथ्यादृष्टिरेव’ (एषा.हृ)’’ इति च श्रुतिः । | |||
‘हिरण्मयो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’, | |||
‘अमृतो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’, | |||
‘स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् आप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’ इत्यादिना मुक्तानामपि भेदस्यैवोक्तेश्च । | |||
न हि भेदाभावे ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे’ इति युज्यते । न चामुक्तैः सर्वभूतैर्मुक्तो दृश्यते ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">एकत्वे तु ‘ददृशे’ इत्येतावता पूर्यते; ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यः’ इति व्यर्थम् । न च तेषां पक्षे स्वयमपि स्वात्मानं पश्यति । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति । अतः सर्वश्रुतिविरोध एव जीवेश्वरैक्याङ्गीकारे । नच ‘कर्तृकर्मविरोधो नामास्ति’ इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । श्रुत्यनुभवसिद्धत्वाच्च स्वदर्शनादेः ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च तेषां पक्षे प्रज्ञेन सर्वज्ञेन परमात्मना सर्वकामावाप्तिर्नामाङ्गीक्रियते शरीरादुत्क्रान्तस्य ज्ञानिनः । तस्माद् वेदविरुद्धवादिन एव तेऽपि । | |||
(न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो मायावादिनः) | |||
न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो दृश्यते । न हि सर्वावाच्यं सर्वाज्ञेयं शून्यं चेति कश्चिद्विशेषः । केनापि शब्देनावाच्यस्य लक्षणायामपि प्रमाणं नास्ति । क्षीरमाधुर्यादयोऽपि तैरेव शब्दैरुच्यन्ते । | |||
‘विशदं क्षीरमाधुर्यं स्थिरमाज्यस्य तीक्ष्णकम् ।<br/>सितस्य (गुडस्य) पनसादीनां निर्हारीत्यभिधीयते ॥’ इति शब्दनिर्णये । | |||
न च सर्वगुणदोषक्रियाविनिर्मुक्तस्यास्तित्वमपि कुत्रचित् दृष्टम् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि ।</span> | |||
(मुक्तावपि तारतम्यम् अप्रतिहतम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति’(क.ठ.२.३.१३) इत्यादिना प्रसादादिगुणाश्च भगवतो दृश्यन्ते । ‘यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः’(क.ठ.६.११) इत्यादि कर्माणि च । ‘यस्मिन् देवाः श्रिताः सर्वे’ इत्यादिगुणाश्च तत्रैवोक्ताः(काठके न दृश्यते) ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः । | |||
अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥आदध्ना(घ्ना)स उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे’(ऋ.सं.१०.७१.७) ॥ | |||
इति मुक्तानामपि तारतम्यं चोक्तम् । | |||
‘श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः ।<br/>अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">तारतम्यं च तेषां हि श्रुतावुदितमञ्जसा ।<br/>क्षीरसागरदध्नास्तु केचित् तिष्ठन्ति मुक्तिगाः ॥ | |||
उपस्थिता ब्रह्मवनं केचिदश्वत्थमण्डलम् ।<br/>ऐरे ह्रदे केचिदपि देवा एव परं(सदा.हृ) हरिम् ॥ | |||
नागभोगशयं मुक्ता ददृश्रेऽधिकमोदिनः ।<br/>सागरादिस्थिता विष्णुं पश्यन्ति क्वचिदेव हि ॥’ | |||
इति ब्रह्मसारे ।</span> | |||
(वेदमन्त्रेषु मुक्तलोकवर्णनम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यत्र ब्रह्मा पवमान च्छन्दस्यां वाचं वदन् ।<br/>ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ | |||
यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिल्ँलोके स्वर्हितम् ।<br/>तस्मिन् मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ | |||
यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः ।<br/>यत्राभूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ | |||
यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः ।<br/>लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ | |||
यत्र तत्परमं पदं विष्णोर्लोके महीयते ।<br/>देवैस्सुकृतकर्माभिस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ | |||
यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ।<br/>कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव’(ऋ.सं.९.११३.६-११) ॥</span> | |||
(श्रुतिसूत्राणि मुक्तभेदावेदकानि) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">इत्यादिना ब्रह्मसूर्ययमादीनां सर्वदेवानाम्, दिवो देव्या अवरोधभूतानां सर्वदेवानाम्, गङ्गाद्यब्देवतानां च वेदव्याख्यानम्, सोमयागादिकम्, कामचरणं च मुक्तानां भेदेनावस्थितानामुच्यते । मुक्ताश्चात्रोच्यन्त इति प्रतीयते; ‘अमृतं कृधि’ इति वचनात् । अमुक्तानां स्वे स्वे लोकेऽवस्थानं हि तेषाम् । मुक्तानां हि विष्णुलोकेऽवस्थानं देवानाम् । ‘मुक्तः प्रतिज्ञानात्’(ब्र.सू.४.४.२) । ‘सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः’(ब्र.सू.४.४.८) । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’(ब्र.सू.४.४.१७) । ‘भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च’(ब्र.सू.४.४.२२) । ‘अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्’(ब्र.सू.४.४.२३) इत्यादि मुक्तसूत्रेभ्यश्च मुक्तानां विष्णोर्भेदो भोगादिकं च सर्वं प्रतीयते । ‘ग्राव्णा सोमे महीयते’(ऋ.सं.९.११३.६) इति ब्रह्मणोऽन्यमुक्तैः पूज्यत्वं च प्रतीयते ।</span> | |||
(सूत्राणुसारेण श्रुतेरर्थ उपवर्णनीयः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">नच सूत्रेषु निश्चितार्थस्यौपचारिकत्वं वक्तुं युज्यते । निर्णयात्मकत्वात् तेषाम् । अतिप्रसङ्गश्चोपचारादिकल्पने । ‘ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः’(भ.गी.१३.५) इति (हि) विनिश्चितानि ब्रह्मसूत्राणि । | |||
‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।<br/>योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रस्य निर्णयः ॥’इति आदित्यपुराणे ।</span> | |||
(न मुक्तिर्भोगरहिता) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च निर्णयकानि(निर्णयात्मकानि. हृ) भगवद्वाक्यान्यपहाय मानुषवाक्यैरेव तेषामुपचारत्वादि कल्प्यम् । न च भोगरहिता मुक्तिर्नामान्याऽस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । | |||
‘भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः(ग्रहत्वमाप. हृ ) ।<br/>तथा मुक्तावुत्तमायां विष्णुमाविश्य भुञ्जते ॥ | |||
विष्णोर्वशाश्च ते सर्वे सर्वदा दुःखवर्जिताः ।<br/>न तु विष्णुगुणान् सर्वे भुञ्जते ते कदाचन ॥ | |||
बाह्यभोगान् भुञ्जते च तारतम्येन कांश्चन ।<br/>विष्णोर्देहाद् बहिश्चापि निर्गच्छन्ति यथेष्टतः ॥’ इति स्कान्दे । | |||
‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।<br/>सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’(भ.गी.१४.२) इति भगवद्वचनम् । | |||
तस्मात् मुक्तैरपीज्यमानः सर्वस्माद् भिन्नः सर्वोत्तमः सर्वनामा सर्वशक्तिः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायणः सर्ववेदादिषूच्यते इति सिद्धम् ॥ ३ ॥</span> ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ | |||
| verse_lines = विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमिन्द्र उपनिषससाद । स ह ‘अन्नम्’ इत्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः स वा ऋषे द्वितीयं शंस’ इति । स ह ‘अन्नम्’ इत्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । | |||
तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः स वा ऋषे तृतीयं शंस’ इति । स ह ‘अन्नम्’ इत्येव अभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । | |||
तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागा, वरं ते ददामि’ इति । स होवाच- ‘त्वामेव जानीयाम्’इति । | |||
तमिन्द्र उवाच- ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे प्राणस्त्वं प्राणः सर्वाणि भूतानि । प्राणो ह्येष य एष तपति । स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि । तस्य मेऽन्नं मित्रं दक्षिणम् । तद् वैश्वामित्रम् एष तपन्नेवास्मि’ इति होवाच ॥ ३ ॥ | |||
(बृहतीसहस्रं सर्वं नारायणस्यान्नम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya-collection"><span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः, तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम्, तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेते इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तम् इत्यादिना ॥</span> | |||
(इन्द्रकर्तृकं महाव्रतम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये । | |||
महाव्रतं कर्म चक्रे, हौत्रं चक्रेऽत्र कौशिकः । | |||
भृगुरध्वर्युरभवद्, ब्रह्मा ब्रह्माऽभवत् स्वयम् । | |||
उद्गाता वायुरभवत्, स्वयं नारायणः प्रभुः । | |||
सादस्यमकरोत् तत्र, तदन्येऽन्येऽपि चर्त्विजः ।</span> | |||
(विश्वामित्रेण बृहतीसहस्रफठनम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">बृहतीसहस्रं शंसिष्यन् यदा सस्मार केशवम् । | |||
वायुना सह देवेशस्तदा वासवमाविशत् । | |||
आविष्टो, विष्णुनाऽथेन्द्रो वायुना सह कौशिकम् । | |||
शंसेत्युक्त्वा निषण्णोऽभूद्, इदमन्नं तवेति सः । | |||
ऋक्सहस्रं शशंसाथ(शशंसात्र .हृ) यज्ञाङ्गत्वेन भक्तितः । | |||
तच्छ्रुत्वा तुष्टिमगमत् केशवो वायुसंयुतः । | |||
द्वितीयवारं शंसेति प्राह तं च जनार्दनः । | |||
प्रीत्यैव शक्रमाविष्टो, विश्वामित्रः शशंस तत् । | |||
अतिप्रियत्वाद् भगवान् पुनरप्याह कौशिकम् । | |||
तृतीयं च शशंसासौ(सास्मै) विष्णोरन्नं प्रकल्प्य तत् । | |||
ततोऽतितुष्टो भगवान् ददामि वरमित्यमुम् । | |||
ऊचे, स प्रथमे त्वेव निजसालोक्यमीश्वरः । | |||
प्रादाद् द्वितीये सामीप्यम्, तृतीये पुनरेव च ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">वरं ददानीत्युक्तः स मुनिः प्राह जनार्दनम् । | |||
सम्यक्त्वामेव जानीयाम् इति मोक्षे सुखोच्चताम् । | |||
इच्छंस्तं प्राह भगवान् इन्द्रस्थो वायुसंयुतः । | |||
सर्वनामाऽहमस्म्येक इति ज्ञानं ममोत्तमम् । | |||
यस्मात् सर्वगुणत्वं स्यात् सर्वनामत्व एव तु ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न हि दोषाभिधायीनि विष्णोर्नामानि कर्हिचित्(कानिचित् .हृ)। | |||
अदोषत्वान्महाविष्णोर्न सामान्यवचांस्यपि । | |||
सर्वोत्तमगुणात्मत्वात् सदा नारायणस्य हि । | |||
सर्वोत्तमगुणानेव नामान्याचक्षते हरेः ।</span> | |||
(विष्णौ सर्वशब्दसमन्वयक्रमप्रदर्शनम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">यावज्ज्ञानेन मोक्षः स्यात् तावज्ज्ञात्वापि कौशिकः । | |||
अधिकज्ञानलब्ध्यर्थं मोक्षेऽधिकसुखाप्तये । | |||
जानीयां त्वामिति प्राह तस्मा आह स केशवः । | |||
इन्द्राविष्टः प्राणनाम तथाऽन्याश्चाभिधाः प्रभुः । | |||
प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते । | |||
ओयत्वाद् अहंनामाऽस्म्यसनान्मनुतेरपि । | |||
ततो वेत्तीति च त्वं स, पूर्णत्वात् सर्वनामकः । | |||
सर्वाणि बहुरूपत्वात् सर्वरूपेषु पूर्तितः । | |||
प्रभूतत्वाद् भूतनामा सर्वरूपप्रभूततः । | |||
बहुरूपः स भूतानीत्युक्तो विष्णुस्सनातनः । | |||
सर्वैश्वर्यस्वरूपत्वादेष इत्यभिधीयते । | |||
स एव सूर्यसंस्थः सन् लोकं तपति केशवः ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">सर्वनामवतस्तस्य ममान्नं मित्रमुच्यते । | |||
अन्नाभिमानिनी साक्षाच्छ्रीरेव प्रमदोत्तमा । | |||
साऽन्नमित्युच्यते विष्णोर्भोग्यत्वान्मित्रमेव च । | |||
दक्षभागस्थितेनत्वाद् दक्षिणं नाम सोच्यते । | |||
तस्या इनो हि विष्णुः स दक्षभागे स्थितः सदा । | |||
यस्याभिमानिन्यन्नस्य लक्ष्मीः सा देवतोत्तमा। | |||
वैश्वामित्रं तदन्नं तु ऋक्सहस्रात्मकं मतम्। | |||
विश्वामित्रेण दृष्टत्वाद् वैश्वामित्रं तदीर्यते।</span> | |||
(शक्राविष्टो विष्णुः; न चापरः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कां परिहरन् हरिः। | |||
आदित्यसंस्थितो विष्णुः तपन्नस्मीति चोचिवान्। | |||
त्वं जानीयामिति प्रश्नं विश्वामित्रस्य कुर्वतः। | |||
अभिप्रायद्वयं ह्यस्ति ‘शक्राविष्टो न चापरः। | |||
हरेरिति तु मे तर्कस्तजोबाहुल्यतोऽजनि। | |||
तस्य तर्कस्य सत्यत्वं ज्ञातव्यं प्रथमं मया। | |||
द्वितीयं यदि विष्णुः स्याज्ज्ञातव्यो मे विशेषतः’। | |||
इत्याभिप्रायमस्यैव ज्ञात्वा विष्णुः सनातनः । | |||
अभिप्रायद्वयस्यापि परिहारं हरिर्ददौ। | |||
प्राणो वा अहमित्यादि नामसन्दर्भमुक्तवान्। | |||
विशेषज्ञानसिद्ध्यर्थं नाम्नामुक्तिः परात्मनः। | |||
इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कानुत्त्यर्थमेव च । | |||
तपन्नेवास्मीत्यावदत्, तपन्तं वेद सोऽपि हि। | |||
नारायणं सर्वगतम्, गायत्र्योपासको हि सः॥ इति ब्रह्मण्डे।</span> | |||
(‘प्राणो वा अहम्’ इत्युपदेशः भगवतैव कृतः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उपनिषण्णमिन्द्रं दृष्ट्वाऽपि त्वामेव जानीयाम् इति वरस्वीकाराद् इन्द्रादेव च, इन्द्राविष्टो भगवान् अत्रोक्त इति ज्ञायते । इन्द्रं तु जानात्येव हि विश्वामित्रः । भगवन्तमपि स्वरूपत आगतं जानात्येव । विशेषज्ञानप्रार्थने प्राणो वा अहमस्म्यृष इत्यादिकमेव पूर्यते ; एष तपन्नेवास्मि इति व्यर्थम् । प्राणो ह्येष य एष तपति इत्युक्तत्वात् ।</span> | |||
(भगवतस्तदीयरूपाणां च नास्ति भेदः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि इत्यादिनाऽपि आविष्टस्य विष्णुत्वं किञ्चिज्ज्ञायते । तथाऽपि एतेन इति तृतीयात्वात् करणत्वाशङ्का भवति । तस्य मे इति वैयधिकरण्यमिति च । अतो भगवन्नामानि पृथगुक्त्वा ‘अहं विष्णुरित्येष तपन्नेवास्मि’ इत्युवाच । इन्द्रशरीरमेव पश्यतो विश्वामित्रस्य तर्कमात्रतो भगवानिति किञ्चिज्जानत इति ज्ञायते ।</span> | |||
(न शचीपतिः सर्वशब्दवाच्यः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न चेन्द्रस्य प्राणशब्दः(प्राणशब्दाभिधेयत्वम्. हृ) सर्वशब्दाभिधेयत्वं च विद्यते । ‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितम्’(ऋ.सं.१०.८२.६) इत्युक्तस्य पद्मनाभस्य हि ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८.२३) इति सर्वदेवाभिधानत्वमुक्तम् । इन्द्रे हीन्द्रशब्दोऽपि न मुख्यतो वर्तते, परमैश्वर्याभावात्, इन्द्रशब्दोऽपि विष्णावेव वर्तते । स हि परमेश्वरः ।</span> | |||
‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।’(तै.ब्रा.३.७.९.३) | |||
‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्’(ऋ.सं.१.१६४.४६) । इत्यादिश्रुतेश्च । ‘सप्तार्द्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोऽस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’(ऋ.सं.१.१६४.३६) इत्यादिना विष्णुरेव हि तत्र प्रस्तुतः ।</span> | |||
(नारायणादिनामानि नान्यस्य) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘नामानि विश्वाभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् ।<br/>नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१) ॥’ इति श्रुतिः ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यो देवानां नामधा एक एव’ इत्यवधारणान्नान्यस्य सर्वनामत्वम् । स च विष्णोर्नान्यः । पद्मनाभत्वादेव ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">श्रियो वायोरपि न नारायणादिनामवत्वम् । ‘एको वासुदेवस्तत्सदृशपरौ न स्तः’ इति श्रुतिः । ‘एको नारायण आसीत् तत्समो वा, अधिको वा नास्ति’ इति च । | |||
‘येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्स्तपति तेजसा भ्राजसा च’(म.ना.उ.१.३) । | |||
‘यमन्तःसमुद्रे कवयोऽवयन्ति यदक्षरे परमे प्रजा’(तै.आ.१०.१.१) । | |||
इत्युक्तस्य समुद्रशायिन एव नारायणस्य | |||
‘तद् एवर्तं तद् सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’(म.ना.उ.४.३) । इति परब्रह्मत्वावधारणाच्च विष्णोः परं सदृशं वा नास्त्येव । अतस्तदत्रोच्यत इत्यपि न वक्तव्यम् ।</span> | |||
(विष्णुः सर्वेश्वरः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।<br/>न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.सं.७.९९.१) ॥इत्यादेश्च ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायान् अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम्’(ऋ.सं.४.३०.१) । इत्याद्यपि सर्वनामकत्वात् तस्यैव ।<br/> ‘किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्’ इत्यादिप्रश्नस्यापि<br/>‘परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।<br/>परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥</span> | |||
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।<br/>दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ | |||
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।<br/>यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ | |||
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।<br/>विष्णोर्नामसहस्रम्... ॥’(म.भा.अनु.अ.१४९) | |||
इत्येव भारते परिहाराच्च । | |||
(मित्रं मे दक्षिणा रमा) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">मेऽन्नं दक्षिणमित्युक्तत्वाच्च विष्णुरेवेति ज्ञायते । स हि विष्णुर्दक्षिणामित्र उक्तो हरिवंशेषु धन्याश्चर्याध्यायि । | |||
‘दक्षिणाभिः सहैवैतन्मदधस्ताज्जगत्सदा ।<br/>धन्याश्चर्योऽहमेवैको मित्रं मे दक्षिणा रमा ।<br/>इत्यवादीद्धरिर्भूपा धन्योऽसीत्युदितो मया ॥’ इति नारदवचनम् । | |||
न च बृहतीसहस्राभिमानिनीं देवीं विना अचेतनमात्रस्य मुख्यमित्रत्वं युज्यते । | |||
‘मिनोति त्रायते चेति मित्रमित्यभिधीयते ।<br/>तस्माद्योऽयं विजानाति स मित्रं तस्य नान्यथा ॥’इति भारते</span> | |||
(विष्णुरेव बृहतीसहस्रप्रतिपाद्यः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उक्थायुत्वाच्च विष्णुरेवात्रोक्त इत्यवगम्यते । बृहतीसहस्रं ह्युक्थनामकं मुख्यतः । | |||
‘महाव्रतनियुक्तं यदृक्सहस्रं हरेः प्रियम् ।<br/>तदुक्थमिति सम्प्रोक्तं तेने यो विष्णुरेव हि ॥ | |||
तस्मादुक्थायुरित्युक्त ऐश्वर्यादिन्द्र उच्यते ।<br/>तस्मादुक्थायुरिन्द्रेति विष्णुर्यज्ञेषु पूज्यते ॥’इति गारुडे | |||
विष्णुर्ह्युक्थायुरिन्द्र इत्युच्यते । यज्ञेष्वन्य इन्द्रः पृथक्चोच्यते । ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः’(तै.ब्रा.३.७.९.३) । इत्युक्त्वा ‘तस्मै त्वा तेभ्यस्त्वा’ इति भेदवचनाच्च । सत्य इति वायुः । ‘सदिति प्राण’ इति श्रुतेः । | |||
‘सदेव सत्यमित्युक्तं सत्यो वायुरुदाहृतः ।<br/>साधुत्वं सत्यता प्रोक्ता साधुर्वायुर्हि सर्वतः ॥’ इति शब्दनिर्णये ।</span> | |||
(बृहतीसहस्रपठनफलम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">प्रियधाम्न उप= समीपे गमनं नाम तद्धामप्राप्तिकारणभगवत्प्रसादप्राप्तिः । अन्यथोपशब्दो व्यर्थः स्यात् । न च तदैव भगवतः प्रियं धाम विश्वामित्रेण प्राप्तम् । | |||
बृहतीसहस्रे प्रथमे सालोक्यं प्रददौ हरिः ।<br/>द्वितीये स्वपुरप्राप्तिं तृतीयेऽन्तःपुरस्य च ।<br/>तथा स्वविषयं ज्ञानं विश्वामित्रे ददौ प्रभुः ॥ इति च गारुडे ।</span> | |||
(इन्द्रे विशेषावेशस्तात्कालिकः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न चेन्द्रादिभिरैक्यमत्रोच्यते । ‘प्राणस्तथाऽनुगमाद्’(ब्र.सू.१.१.२८) इति च विष्णोरेव प्राणशब्दाभिधेयत्वमुक्त्वा ‘न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन्’(ब्र.सू.१.१.२९) इति वक्तुः= बृहतीसहस्रं शंसितुर्विश्वामित्रस्य इन्द्रेण स्वात्मोपदेशः क्रियत इति पक्षो निराकृतो हि भगवता सूत्रेषु । ‘अध्यात्मसम्बन्ध’ शब्देनावेशो विष्णोरिन्द्रे विवक्षितो भगवता । अन्येष्वन्तर्यामिरूपेण सम्बन्धोऽस्त्येव । अस्मिन्निन्द्रे तु विशेषावेशस्तात्कालिकः । अधिकात्मनः= परमात्मनः सम्बन्धोऽध्यात्मसम्बन्धः । न हि स्वात्मना स्वस्य सम्बन्धो भवति । यद्यध्यात्ममात्रमत्रोच्यत इति विवक्षितं तर्हि ‘अध्यात्मभूमा’ इत्येव स्यात्; सम्बन्धशब्दो व्यर्थः । तस्मादिन्द्रादिजीवेभ्यो विष्णोर्भेद एवात्र भगवतो विवक्षितः ।</span> | |||
(अन्तर्यामिदृष्ट्याऽभेदव्यवहारः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्’(ब्र.सू.१.१.३०) इति शास्तुरन्तर्यामिणो विष्णोः सर्वशरीरस्थितत्वात् सर्वनामाभिधेयत्वं चोक्तम् । ‘अहं मनुरभवं सूर्यश्च’ (ऋ.सं.४.२६.१) इत्यादिवत् । न हि मनुसूर्यादिर्भवति वामदेवस्तेषां पक्षेऽपि । सर्वप्रवृत्तिहीनतां हि ते मोक्षं वदन्ति । अत्र च ‘अहं भूमिमददामार्याय’(ऋ.सं.४.२६.२) इत्यादिना प्रवृत्तिरेवोच्यते ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च वामदेवेन मन्वादिकर्म क्रियते कदाऽपि । अतीतार्थश्चायं दृश्यते ‘भूमिम् अददाम्’ इत्यादिना । नहि पूर्वं वामदेवेन तानि कर्माणि कृतानि । भगवान् विष्णुर्हीन्द्राय भूमिमददात्(विष्णुर्हि आर्याय इन्द्राय भूमिमदात्(ताम्रपर्णि) । स एव च सर्वेष्वन्तर्यामित्वेन स्थित्वा नामप्रवृत्तिनिमित्तानि सर्वकर्माणि कुर्वन्नवबोध-सूरिनियमनादिभिर्मनुसूर्यादिसर्वनामा भवति । यदि भेदस्य पूर्वमपि मिथ्यात्वमङ्गीक्रियते तर्हि भूमिदानादिसर्वकर्मणां मन्वादित्वस्यापि मिथ्यात्वाद् ‘अहं मनुरभवम्’ इत्यादिकं सर्वमनर्थकमेव भवति ।</span> | |||
(मुक्तावपि पञ्चभेदाः सुनित्याः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘जीवेश्वरभिदा चैव जीवभेदः परस्परम् ।<br/>जडेश्वरभिदा चैव जडभेदस्तथैव च ॥ | |||
जडजीवभिदा चैव सत्योऽयं भेदपञ्चकः ।<br/>न कदाचिन्निवर्त्योऽयं मुक्तौ संसार एव च (वा) ॥ | |||
य एतदन्यथा ब्रूयुस्ते हि यान्त्यधरं तमः ॥’ इति भविष्यत्पर्वणि । | |||
‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।’(भ.गी.१६.८) | |||
‘ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ।’(भ.गी.१६.१४) | |||
‘एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।’(भ.गी.१६.९) | |||
‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।<br/>मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्’(भ.गी.१६.२०) ॥ इत्यादि च ।</span> | |||
(सर्वान्तर्यामित्वादिना विष्णोः सर्वशब्दवाच्यत्वम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे’ इत्यादौ अहमस्म्यादिशब्दोऽस्मच्छब्दार्थः(अस्मच्छब्दस्थः/अस्मच्छब्दाद्यर्थः) । एष तपन्नेवास्मीत्युपरितनस्य वैयर्थ्यात् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । अतोऽहमस्मीत्यादि च भगवन्नामैव । न च जीवैक्यवचनमत्र प्रस्तुतम् । ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव’ इति सर्वनामाभिधेयत्वं भगवत उक्त्वा, तत्रैव प्रमाणत्वेन विश्वामित्रं ह्येतदहरित्याद्याख्यायिकोक्ता । तस्मात् सर्वान्तर्यामित्वात्, सर्वगुणत्वात्, सर्वशक्तित्वाच्च सर्वनामवत्वमेव विष्णोरुच्यते; न तु सर्वस्वरूपत्वम् । | |||
उक्तं च भारते । | |||
‘स्रष्टृत्वाच्चैव पातृत्वान्नियमाच्च प्रकाशनात् ।<br/>सर्वत्वमुक्तं विष्णोस्तु न तु सर्वस्वरूपतः ॥’ इति ।</span> | |||
(श्रुतिवचनानि नाभेदपराणि) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘‘ ‘पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्’(ऋ.सं.८.४.१७) इति पुरुषेणैव ‘इदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।’, ‘आ तृणाद् आकरीषात् सर्वं भगवान् इति मिथ्यादृष्टिरेव’ (एषा.हृ)’’ इति च श्रुतिः । | |||
‘हिरण्मयो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’, | |||
‘अमृतो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’, | |||
‘स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् आप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’ इत्यादिना मुक्तानामपि भेदस्यैवोक्तेश्च । | |||
न हि भेदाभावे ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे’ इति युज्यते । न चामुक्तैः सर्वभूतैर्मुक्तो दृश्यते ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">एकत्वे तु ‘ददृशे’ इत्येतावता पूर्यते; ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यः’ इति व्यर्थम् । न च तेषां पक्षे स्वयमपि स्वात्मानं पश्यति । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति । अतः सर्वश्रुतिविरोध एव जीवेश्वरैक्याङ्गीकारे । नच ‘कर्तृकर्मविरोधो नामास्ति’ इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । श्रुत्यनुभवसिद्धत्वाच्च स्वदर्शनादेः ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च तेषां पक्षे प्रज्ञेन सर्वज्ञेन परमात्मना सर्वकामावाप्तिर्नामाङ्गीक्रियते शरीरादुत्क्रान्तस्य ज्ञानिनः । तस्माद् वेदविरुद्धवादिन एव तेऽपि । | |||
(न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो मायावादिनः) | |||
न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो दृश्यते । न हि सर्वावाच्यं सर्वाज्ञेयं शून्यं चेति कश्चिद्विशेषः । केनापि शब्देनावाच्यस्य लक्षणायामपि प्रमाणं नास्ति । क्षीरमाधुर्यादयोऽपि तैरेव शब्दैरुच्यन्ते । | |||
‘विशदं क्षीरमाधुर्यं स्थिरमाज्यस्य तीक्ष्णकम् ।<br/>सितस्य (गुडस्य) पनसादीनां निर्हारीत्यभिधीयते ॥’ इति शब्दनिर्णये । | |||
न च सर्वगुणदोषक्रियाविनिर्मुक्तस्यास्तित्वमपि कुत्रचित् दृष्टम् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि ।</span> | |||
(मुक्तावपि तारतम्यम् अप्रतिहतम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति’(क.ठ.२.३.१३) इत्यादिना प्रसादादिगुणाश्च भगवतो दृश्यन्ते । ‘यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः’(क.ठ.६.११) इत्यादि कर्माणि च । ‘यस्मिन् देवाः श्रिताः सर्वे’ इत्यादिगुणाश्च तत्रैवोक्ताः(काठके न दृश्यते) ।</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः । | |||
अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥आदध्ना(घ्ना)स उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे’(ऋ.सं.१०.७१.७) ॥ | |||
इति मुक्तानामपि तारतम्यं चोक्तम् । | |||
‘श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः ।<br/>अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥</span> | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">तारतम्यं च तेषां हि श्रुतावुदितमञ्जसा ।<br/>क्षीरसागरदध्नास्तु केचित् तिष्ठन्ति मुक्तिगाः ॥ | |||
उपस्थिता ब्रह्मवनं केचिदश्वत्थमण्डलम् ।<br/>ऐरे ह्रदे केचिदपि देवा एव परं(सदा.हृ) हरिम् ॥ | |||
नागभोगशयं मुक्ता ददृश्रेऽधिकमोदिनः ।<br/>सागरादिस्थिता विष्णुं पश्यन्ति क्वचिदेव हि ॥’ | |||
इति ब्रह्मसारे ।</span> | |||
(वेदमन्त्रेषु मुक्तलोकवर्णनम्) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यत्र ब्रह्मा पवमान च्छन्दस्यां वाचं वदन् ।<br/>ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ | |||
यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिल्ँलोके स्वर्हितम् ।<br/>तस्मिन् मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ | |||
यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः ।<br/>यत्राभूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ | |||
यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः ।<br/>लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ | |||
यत्र तत्परमं पदं विष्णोर्लोके महीयते ।<br/>देवैस्सुकृतकर्माभिस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ | |||
यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ।<br/>कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव’(ऋ.सं.९.११३.६-११) ॥</span> | |||
(श्रुतिसूत्राणि मुक्तभेदावेदकानि) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">इत्यादिना ब्रह्मसूर्ययमादीनां सर्वदेवानाम्, दिवो देव्या अवरोधभूतानां सर्वदेवानाम्, गङ्गाद्यब्देवतानां च वेदव्याख्यानम्, सोमयागादिकम्, कामचरणं च मुक्तानां भेदेनावस्थितानामुच्यते । मुक्ताश्चात्रोच्यन्त इति प्रतीयते; ‘अमृतं कृधि’ इति वचनात् । अमुक्तानां स्वे स्वे लोकेऽवस्थानं हि तेषाम् । मुक्तानां हि विष्णुलोकेऽवस्थानं देवानाम् । ‘मुक्तः प्रतिज्ञानात्’(ब्र.सू.४.४.२) । ‘सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः’(ब्र.सू.४.४.८) । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’(ब्र.सू.४.४.१७) । ‘भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च’(ब्र.सू.४.४.२२) । ‘अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्’(ब्र.सू.४.४.२३) इत्यादि मुक्तसूत्रेभ्यश्च मुक्तानां विष्णोर्भेदो भोगादिकं च सर्वं प्रतीयते । ‘ग्राव्णा सोमे महीयते’(ऋ.सं.९.११३.६) इति ब्रह्मणोऽन्यमुक्तैः पूज्यत्वं च प्रतीयते ।</span> | |||
(सूत्राणुसारेण श्रुतेरर्थ उपवर्णनीयः) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">नच सूत्रेषु निश्चितार्थस्यौपचारिकत्वं वक्तुं युज्यते । निर्णयात्मकत्वात् तेषाम् । अतिप्रसङ्गश्चोपचारादिकल्पने । ‘ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः’(भ.गी.१३.५) इति (हि) विनिश्चितानि ब्रह्मसूत्राणि । | |||
‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।<br/>योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रस्य निर्णयः ॥’इति आदित्यपुराणे ।</span> | |||
(न मुक्तिर्भोगरहिता) | |||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च निर्णयकानि(निर्णयात्मकानि. हृ) भगवद्वाक्यान्यपहाय मानुषवाक्यैरेव तेषामुपचारत्वादि कल्प्यम् । न च भोगरहिता मुक्तिर्नामान्याऽस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । | |||
‘भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः(ग्रहत्वमाप. हृ ) ।<br/>तथा मुक्तावुत्तमायां विष्णुमाविश्य भुञ्जते ॥ | |||
विष्णोर्वशाश्च ते सर्वे सर्वदा दुःखवर्जिताः ।<br/>न तु विष्णुगुणान् सर्वे भुञ्जते ते कदाचन ॥ | |||
बाह्यभोगान् भुञ्जते च तारतम्येन कांश्चन ।<br/>विष्णोर्देहाद् बहिश्चापि निर्गच्छन्ति यथेष्टतः ॥’ इति स्कान्दे । | |||
‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।<br/>सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’(भ.गी.१४.२) इति भगवद्वचनम् । | |||
तस्मात् मुक्तैरपीज्यमानः सर्वस्माद् भिन्नः सर्वोत्तमः सर्वनामा सर्वशक्तिः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायणः सर्ववेदादिषूच्यते इति सिद्धम् ॥ ३ ॥</span> ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ | |||
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| text = | | text = एको नारायणस्त्वासीत् प्रलये रमया सह । | ||
नित्याततगुणत्वात् स आत्मेति श्रुतिषूदितः । | |||
इदं सर्वमपेक्ष्यासौ कालतो गुणतस्तथा । | |||
अग्र्य एव समस्तेभ्यस्तद्वशत्वाद् रमाऽपि सा । | |||
इदं | विद्यमानाऽपि नाग्रस्था गुणैरूना ततो यतः । | ||
न ब्रह्मा न शिवश्चाऽसीन्नैवान्यच्च मिषत् क्वचित्। | |||
सुप्तास्तत्र यतो जीवाः सर्वे ब्रह्मशिवादिकाः । | |||
असुप्ता श्रीश्च मुक्ताश्च स्वतन्त्रोन्मेषवर्जनात् । | |||
अनुन्मेषा एव तेऽपि स्वतन्त्रोन्मेष एकराट् । | |||
नारायणो न चान्योऽस्ति पूर्णोन्मीलद्गुणात्मकः । | |||
पराधीनेन वित्तेन भुञ्जन्नपि हि भिक्षुकः । | |||
वित्तवानिति नैवोक्तस्तथा श्रीर्मुक्तिगा अपि । | |||
मिषन्तोऽप्यन्यतन्त्रत्वान्न मिषन्तः कथञ्चन । | |||
सर्वदाऽप्येक एवायं स्वतन्त्रो नापरः क्वचित्। | |||
कालाग्र्यत्वं वक्तुमस्य प्रलये स्थितिरुच्यते । | |||
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| verse_type | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स | | verse_line1 = स ईक्षत-‘इमान् लोकान्नु सृजा’ इति स इमान् लोकान् असृजत, अम्भो मरीचीर्मरम् आपः । अदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः, प्रतिष्ठा । अन्तरिक्षं मरीचयः । पृथिवी मरः । या अधस्तात् ता आपः । स ईक्षत ‘इमे नु लोकाः, लोकपालान्नु सृजा’ इति । सोऽद्भ्यः एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत् । | ||
| commentary1 | | verse_lines = स ईक्षत-‘इमान् लोकान्नु सृजा’ इति स इमान् लोकान् असृजत, अम्भो मरीचीर्मरम् आपः । अदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः, प्रतिष्ठा । अन्तरिक्षं मरीचयः । पृथिवी मरः । या अधस्तात् ता आपः । स ईक्षत ‘इमे नु लोकाः, लोकपालान्नु सृजा’ इति । सोऽद्भ्यः एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत् । | ||
| commentary1 = aitareya | |||
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| text = | | text = स ऐच्छद्भगवान् विष्णुः स्रष्टुं लोकाभिमानिनः ॥ | ||
लोकाभिधानवद्देवाञ्जडलोकांश्च शाश्वतः । | |||
स लोकेभ्यः पूर्वतनान् अबाख्यान् महदादिकान् ॥ | |||
ब्रह्मशर्वादिकान् सृष्ट्वा जडैस्सह जनार्दनः । | |||
दिवमाकाशमुर्वीं च ससृजेऽथ द्विसप्तकान् ॥ | |||
इति सृष्ट्वा स लोकांस्तु पुनस्तानेव लोकपान् । | |||
अण्डान्तः स्रष्टुमैच्छच्च तेषां पूज्यत्वसिद्धये ॥ | |||
अम्नामकेभ्यस्तेभ्यः स पूर्वसृष्टेभ्य एव तु । | |||
सर्वजीवाधिकत्वात् तु ब्रह्माणं पुरुषाभिधम् ॥ | |||
अंशेनोद्धृत्य रुद्राद्यैः सह चैनमयोजयत् । | |||
तथैव चेतनानाञ्च भागानुद्धृत्य पिण्डवत् ॥ | |||
चेतनाचेतनं राशिमेकस्थं विदधे प्रभुः । | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = तमभ्यतपत् । तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाऽण्डम् । मुखाद् वाग्, वाचोऽग्निः । | ||
| commentary1 | | verse_lines = तमभ्यतपत् । तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाऽण्डम् । मुखाद् वाग्, वाचोऽग्निः ।;नासिके निरभिद्येताम् । नासिकाभ्यां प्राणः , प्राणाद्वायुः ।;अक्षिणी निरभिद्येताम् । अक्षिभ्यां चक्षुः , चक्षुषः आदित्यः ।;कर्णौ निरभिद्येताम् । कर्णाभ्यां श्रोत्रम् , श्रोत्राद् दिशः ।;त्वङ् निरभिद्यत । त्वचो लोमानि, लोमभ्य ओषधिवनस्पतयः ।;हृदयं निरभिद्यत । हृदयान्मनः, मनसश्चन्द्रमाः ।;नाभिर्निरभिद्यतः । नाभ्या अपानः, अपानान्मृत्युः ।;शिश्नं निरभिद्यत । शिश्नाद् रेतः, रेतस आपः ॥ | ||
| verse_line2 = नासिके निरभिद्येताम् । नासिकाभ्यां प्राणः , प्राणाद्वायुः । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S04_V03 | ||
| id = | | id = AIT_C02_S04_V03_B01 | ||
| text = | | text = पुनरैच्छञ्जगन्नाथस्तस्याङ्गोत्पत्तिम् अच्युतः ॥ | ||
अण्डवन्मुखमस्यासीत् प्रथमं तु शिरोऽभिधम् । | |||
भिन्नमास्यं पुनस्तस्य विष्णोरेवेच्छया प्रभुः ॥ | |||
तत्र वाङ्नामकं रूपं वह्नेरासीत् पुरातनम् । | |||
तस्यैवाथ द्वितीयं च यदग्निरिति गीयते । | |||
तथैव नासिकातोऽभून् मुख्यवायोः सुतो मरुत् । | |||
प्राणो वायुरिति द्वेधा, चक्षुषोऽभूत् तथा रविः । | |||
बभूवुः | द्विरूप एव, कर्णाभ्यां मित्र-धर्म-अप्प-वित्तपाः । | ||
दिग्देवता द्विरूपेण बभूवुः सर्व एव च । | |||
हृदयाद् गरुडानन्तशिवचन्द्राः पृथक् पृथक् । | |||
मनो बुद्ध्यभिमानाश्च तन्नामानश्च जज्ञिरे । | |||
त्वचश्च रोमनामानो वृक्षनामान एव च । | |||
द्विविधाः पारिजाताद्या बभूवुर्ब्रह्मदेहतः । | |||
हस्ताभ्यां द्विविधः शक्रः, पद्भ्यां तत्सूनुरेव च । | |||
यज्ञस्त्वजनि, पायोश्च यमो निर्ऋतिरेव च । | |||
रेतोऽम्नामा द्विरूपस्तु शिव एव च गुह्यतः । | |||
अपानो मृत्युरिति च मुख्यो नाभेश्च(स्तु) मारुतः ॥ १ ॥ | |||
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<div class="gr-author-note">॥ इति चतुर्थाध्याये प्रथमः खण्डः ॥</div> | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतन् । तम् अशनापिपासाभ्याम् अन्ववार्जत् । ता एनमब्रुवन्- ‘आयतनं नः प्रजानीहि , यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदाम’ इति । ताभ्यो गामानयत्, ता अब्रुवन्- ‘न वै नोऽयमलम्’ इति । ताभ्यः अश्वमानयत्, ता अब्रुवन्- ‘न वै नोऽयमलम्’ इति । ताभ्यः पुरुषमानयत्, ता अब्रुवन्- ‘सुकृतं बत’ इति । पुरुषो वाव सुकृतम् । | ||
| commentary1 | | verse_lines = ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतन् । तम् अशनापिपासाभ्याम् अन्ववार्जत् । ता एनमब्रुवन्- ‘आयतनं नः प्रजानीहि , यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदाम’ इति । ताभ्यो गामानयत्, ता अब्रुवन्- ‘न वै नोऽयमलम्’ इति । ताभ्यः अश्वमानयत्, ता अब्रुवन्- ‘न वै नोऽयमलम्’ इति । ताभ्यः पुरुषमानयत्, ता अब्रुवन्- ‘सुकृतं बत’ इति । पुरुषो वाव सुकृतम् । | ||
| commentary1 = aitareya | |||
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| text = | | text = एवं रूपद्वयेनापि स्तुवन्तो विष्णुमव्ययम् । | ||
दिव्याम्बराः कुण्डलिनः प्राविशन्नुदकार्णवम् । | |||
तदाऽशनापिपासाख्यं द्विरूपं मारुतं पुनः । | |||
तस्मिन् देवसमूहे तु विष्णुः प्रावेशयत् प्रभुः । | |||
तेऽब्रुवन् देहि नो वासं यत्र चान्नमदामहे । | |||
गोरूपमेभ्यो ब्रह्माणं ददौ नारायणः प्रभुः । | |||
तत्र प्रविश्य ते देवा नालमित्यब्रुवन् पुनः । | |||
अश्वरूपं विरिञ्चश्च पुनरेवाददत् प्रभुः । | |||
तद्रूपेऽपि प्रविश्यैव नालमित्यब्रुवन् पुनः । | |||
पूर्वसृष्टं पुमाकारं ब्रह्मणोऽदात् पुनर्हरिः । | |||
तद् दृष्ट्वैवालमित्यूचुः..... | |||
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| verse_line1 = ता अब्रवीद्- ‘यथाऽऽयतनं प्रविशत’ इति । अग्निः वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत् । वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् । आदित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशत् । दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन् । ओषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशन् । चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशत् । मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशत् । आपो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् । | |||
| verse_lines = ता अब्रवीद्- ‘यथाऽऽयतनं प्रविशत’ इति । अग्निः वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत् । वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् । आदित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशत् । दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन् । ओषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशन् । चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशत् । मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशत् । आपो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् । | |||
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| text = | | text = ... विशतेति स चाब्रवीत् । | ||
विविशुश्च यथोत्पन्नाः सर्वे देवाश्चतुर्मुखम् ॥ | |||
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| verse_line1 = तमशनापिपासे अब्रूताम्- ‘आवाभ्याम् अभिप्रजानीहि’ इति । ते अब्रवीद्- ‘एतास्वेव वां देवतास्वाभजामि, एतासु भागिन्यौ करोमि’ इति । | |||
| verse_lines = तमशनापिपासे अब्रूताम्- ‘आवाभ्याम् अभिप्रजानीहि’ इति । ते अब्रवीद्- ‘एतास्वेव वां देवतास्वाभजामि, एतासु भागिन्यौ करोमि’ इति ।;तस्माद्यस्मै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते, भागिन्यावेवास्याम् अशनापिपासे भवतः ॥ २ ॥ | |||
| verse_line2 = तस्माद्यस्मै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते, भागिन्यावेवास्याम् अशनापिपासे भवतः ॥ २ ॥ | |||
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| text = | | text = अशनापिपासामानी तु द्विरूपो मारुतोऽवदत् । | ||
‘कुर्वाज्ञामावयोश्चैव यथा त्वच्छासनानुगौ ॥ | |||
नित्यं भवाव’ इति, हरिः ‘सर्वत्र प्रविश’ इत्यमुम् । | |||
आह, तस्माद् देवतानां सर्वासां भागभुङ् मरुत् ॥ | |||
एक एव प्राणनामा, नाभिस्थोऽपि स एव हि । अशनापिपासापानश्च मृत्युश्चेति चतुर्विधः ॥ | |||
एक एव महान् वायुः सर्वदेवेषु संस्थितः ॥ २ ॥ | |||
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<div class="gr-author-note">॥ इति चतुर्थाध्याये द्वितीयः खण्डः ॥</div> | |||
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| verse_lines = स ईक्षेत- ‘इमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा’ इति । सोऽपोऽभ्यतपत् । ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत । या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् । तदेतत् पराङ् अत्यजिघांसत् । | |||
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| text = | | text = पुनरैच्छत् केशवोऽसावन्नमेभ्यः सृजा इति । | ||
अबाख्याः देवताः पूर्वसृष्टा ब्रह्मादिकाः पुनः । | |||
ददर्श(ददर्शाऽशु .हृ) सुविशालाभ्यां नेत्राभ्यां पुष्करेक्षणः । | |||
तद्दर्शनात् तदिच्छातस्तासां देहोऽभवत् पृथक् । | |||
सर्वासामपि देहैकदेशेभ्यो मिळितं शुभम् । | |||
सर्वैरधिष्ठितं चैव विरिञ्चेन विशेषतः । | |||
दिव्यावयवसम्पन्नमेकमेव सुलोचनम् । | |||
भोग्यभोक्त्रात्मना नास्ति तस्य दुःखं कथञ्चन । | |||
ते हि देवाः स्वयं भोग्याः स्वयं भोक्तार एव च । | |||
क्रीडन्ते मोदिनो नित्यम्, तथाऽप्यन्नात्मकस्त्वसौ । | |||
क्रीडयाऽपाक्रमत् किञ्चित्...। | |||
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| verse_line1 = तद् वाचाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोद् वाचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनद् वाचाऽग्रहैष्यद् अभिव्याहृत्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् । | |||
| verse_lines = तद् वाचाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोद् वाचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनद् वाचाऽग्रहैष्यद् अभिव्याहृत्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तत् प्राणेनाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् प्राणेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनत् प्राणेनाग्रहैष्यद् अभिप्राण्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तच्चक्षुषाऽजिघृक्षत् , तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्चक्षुषाऽग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यत् श्रुत्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तत् त्वचाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् त्वचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनत् त्वचाऽग्रहैष्यत् स्पृष्ट्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तन्मनसाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् मनसा ग्रहीतुम् । स यद्धैतन्मनसाऽग्रहैष्यद् ध्यात्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद् विसृज्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तदपानेनाजिघृक्षत् , तदावयत् । सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद् वायुः । अन्नायुर्वा एष यद् वायुः । | |||
| verse_line2 = तत् प्राणेनाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् प्राणेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनत् प्राणेनाग्रहैष्यद् अभिप्राण्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S04_V08 | ||
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| text = | | text = ... तं तदाऽसौ चतुर्मुखः । | ||
अत्तुं वागादिभिः सर्वैरैच्छन्नाप्यशकत् तदा । | |||
जानन्नपि क्रीडयैव तारतम्यं प्रकाशयन् । | |||
एवं चकार ब्रह्मा स क्वाज्ञानं लोककर्तरि । | |||
क्षुत्पिपासदयश्चैव देवानां भोगसाधकाः । | |||
न तु पीडाकरास्तेषामैश्वर्यादिगुणोन्नतेः । | |||
अन्नमूर्तिं ततो ब्रह्मा प्रधानेनैव वायुना । | |||
अपानाख्येनात्तुमैच्छत् तदैवाशकदाशु सः । | |||
तस्माद् भोक्तैक एवासौ सर्वस्यान्नस्य मारुतः । | |||
तत्प्रसादात् परेऽश्नन्ति किञ्चित् किञ्चिन्न चाखिलम् । | |||
आयूरूपोऽखिलानां च देवानां वायुरेव हि । | |||
अन्नदेवस्य चाऽयुः स तस्माद्देवोत्तमो मरुत् ॥ | |||
आयुःशब्दो ज्ञानवाची गतिवाची च यत्ततः । | |||
चेष्टामोक्षज्ञानदाता सुराणां मारुतस्ततः ॥ | |||
अन्योन्यगुणदातृत्वात् समानौ ब्रह्ममारुतौ । | |||
तस्मान्मोक्षे सुखे ज्ञाने विष्णुभक्त्यादिकेष्वपि(भक्त्यादिकेषु च .हृ) ॥ | |||
सर्वेभ्यश्चाधिकौ तौ हि तयोर्विष्णुः परस्सदा । | |||
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| verse_line1 = स ईक्षत- ‘कथं न्विदं मदृते स्याद्’ इति । स ईक्षत- ‘कतरेण प्रपद्या’ इति । स ईक्षत- ‘यदि वाचाऽभिव्याहृतम्, यदि प्राणेनाभिप्राणितम्, यदि चक्षुषा दृष्टम्, यदि श्रोत्रेण श्रुतम्, यदि त्वचा स्पृष्टम्, यदि मनसा ध्यातम्, यद्यपानेनाभ्यपानितम्, यदि शिश्नेन विसृष्टम्, अथ कोऽहम्’इति । | |||
| verse_lines = स ईक्षत- ‘कथं न्विदं मदृते स्याद्’ इति । स ईक्षत- ‘कतरेण प्रपद्या’ इति । स ईक्षत- ‘यदि वाचाऽभिव्याहृतम्, यदि प्राणेनाभिप्राणितम्, यदि चक्षुषा दृष्टम्, यदि श्रोत्रेण श्रुतम्, यदि त्वचा स्पृष्टम्, यदि मनसा ध्यातम्, यद्यपानेनाभ्यपानितम्, यदि शिश्नेन विसृष्टम्, अथ कोऽहम्’इति । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S04_V09 | ||
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| text = | | text = देवतानां प्रवेशात् तु पूर्वमेव जनार्दनः । | ||
इत्थमैक्षत देवेशो ‘ब्रह्माद्या यदि मां विना । | |||
क्रियादिषु समर्थाः स्युर्न मे विष्ण्वभिधा भवेत् ।’ | |||
सर्वचेष्टयितृत्वाच्च विशिष्टबलतस्तथा । | |||
विष्णुरित्यभिधा मह्यम्, सा न युक्ता दिवौकसाम् । | |||
स्वतन्त्रत्वे, ततः सर्वे मद्वशा एव नान्यथा । | |||
तस्मादेषां प्रवृत्त्यर्थं प्रवेक्ष्ये सह वायुना । | |||
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| verse_line1 = स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विदृतिर्नाम द्वाः । तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथाः । त्रयः स्वप्नाः । अयमावसथोऽयमावसथ इति । | |||
| verse_lines = स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विदृतिर्नाम द्वाः । तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथाः । त्रयः स्वप्नाः । अयमावसथोऽयमावसथ इति । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S04_V10 | ||
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| text = | | text = इति मत्वा विरिञ्चस्य शरीरं प्रविवेश सः । | ||
मूर्धन्यनाड्या प्रथमं ब्रह्मवायुसमन्वितः । | |||
अग्न्यादयस्ततः पश्चात् प्रविष्टास्तन्नियोजिताः । | |||
प्रपदाभ्यां तथाऽन्येन रूपेण प्रविवेश सः । | |||
बिभर्ति देहं तेनैव मूर्धाविष्टेन(मूर्ध्नाविष्टेन) चेष्टयन् । | |||
नारायणो वासुदेव इति द्वेधा व्यवस्थितः । | |||
मूर्धाविष्टो(मूर्ध्नाविष्टो) वासुदेवस्तस्य चावसथास्त्रयः । | |||
अक्षि कण्ठो हृदित्येवं त एव स्वप्ननामकाः । | |||
आप्नोत्यत्र स्वयं विष्णुरतः स्वप्नाः प्रकीर्तिताः । | |||
अनिरुद्धादिरूपेण त्रिधा तेषु व्यवस्थितः । | |||
दाताऽवस्थात्रयस्यास्य जीवस्य क्रमशो विभुः । | |||
सुषुम्नायां वासुदेवो मूर्धन्येव व्यवस्थितः । | |||
तस्यामेव ब्रह्मनाड्यां स्थितो नारायणः प्रभुः । | |||
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| verse_line1 = स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् । किमिहान्यं वावदिषदिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्मततममपश्यत् । इदमदर्शमिती३ँ (अयं रङ्गस्वरः)। तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते। परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् । किमिहान्यं वावदिषदिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्मततममपश्यत् । इदमदर्शमिती३ँ (अयं रङ्गस्वरः)। तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते। परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ ३ ॥ | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S04_V11 | ||
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| text = | | text = स एव भगवान् विष्णुः प्रादुर्भावात्मना पुनः । | ||
जातो मत्स्यादिरूपेण सर्वभूतेषु चाऽविशत् । | |||
‘असुराणां निहन्तारं ज्ञानादिगुणदं तथा । | |||
इति | चेष्टाप्रदं च भूतेषु(देहेषु) न मदन्यं वदत्यपि’ । | ||
इति मत्वा जगन्नाथो दैत्यनिग्रहणेच्छया । | |||
ज्ञानदानार्थमपि तु प्रादुर्भूतो भुवि प्रभुः । | |||
तथा जीवेषु सर्वेषु प्रविष्टः प्रेरणेच्छया । | |||
को ह्यन्यस्तमृते विष्णुम् एतत्कर्म करिष्यति । | |||
स सर्वगुणसम्पूर्णं सर्वगं नित्यमव्ययम् । | |||
एतदेवस्वरूपं स त्वपश्यदवतारगम् । | |||
तस्मात् सर्वावताराश्च सर्वजीवेषु संस्थिताः(च स्थिताः .हृ) । | |||
प्रादुर्भावाः सर्वगुणैः पूर्णा एव सदा स्थिताः । | |||
पश्यन्ति च तथा नित्यं निर्दोषोरुस्वसंविदा । | |||
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| text = | | text = गुणपूर्णस्वरूपस्य त्वापरोक्ष्येण दर्शनात् । | ||
सर्वदैव ह्यसौ विष्णुरिदन्द्रो नामतो मतः । | |||
ब्रह्मादीनां हि सर्वेषां तत्प्रसादेन जायते । | |||
जानन्ति न स्वतस्तेन नेदन्द्रास्ते प्रकीर्तिताः । | |||
रमाऽपि तत्प्रसादेन जानाति किमुतापरे । | |||
अल्पज्ञाना अल्पगुणा अल्पानन्दाश्च तेऽखिलाः । | |||
रमाऽजशङ्करेन्द्राद्यास्तेनानिन्द्राः क्रमेण ते । | |||
पापैरज्ञाततां देवा मानयन्ति सदाऽऽत्मनः । | |||
हर्षेण, तेन विष्णुः स इन्द्र इत्यभिशब्द्यते । | |||
नेदन्द्रताऽसुरादीनां ज्ञायेतेति श्रुतिर्हरिम् । | |||
इन्द्र इत्येव वदति पारोक्ष्येणोरुसद्गुणम् । | |||
इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S04_V11 | ||
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| text = | | text = आततगुणत्वाद् आत्मा नारायणः । ‘ब्रह्म’, ‘पन्थाः’, ‘सत्यम्’ ‘कर्म’इति तस्यैव पञ्चरात्रप्रसिद्धैरेव नामभिरारब्धत्वाच्च । | ||
‘मुख्यतः कर्मनामा तु प्रादुर्भावात्मको हरिः । | |||
अनिरुद्धतनुश्चैव तत्र ह्यमितचेष्टितः(ह्यमितचेष्टता .हृ) । | |||
इति च । | कर्माभासा जीवसङ्घाः, सत्यं प्रद्युम्ननामकः । | ||
सङ्कर्षणो हरिः पन्थाः, ब्रह्मोक्तो वासुदेवकः’ ॥ इत्यादि च (हि) नामनिर्णये । | |||
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| text = ‘मत्सीन्द्रमिन्दो पवमान विष्णुम्’ इत्यादिश्रुतौ तस्मिन्नेव प्रसिद्धस्येन्द्रशब्दस्यात्र बहुशोऽभ्यासाच्च । अकारस्य च विष्णावेव प्रसिद्धस्यात्राप्यभ्यासात् । | |||
‘तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी’(छां.१.६.७) इति सूर्यमण्डले पुण्डरीकाक्षत्वेन निर्दिष्टस्यात्रापि ‘य एष तपति’ इत्यादिना बहुशोऽनुसन्धानाच्च(अभ्यासाच्च) । सूर्यो हि ‘हिरण्याक्षः सविता देव आगात्’(ऋ.सं.१.३५.८) इति पिङ्गलाक्षः(पिङ्गाक्षः .हृ) प्रसिद्धः । | |||
‘विरूपाक्षः शिवः सूर्यः सुराचार्यो विनायकः । | |||
पुण्डरीकेक्षणो विष्णुः सहस्राक्षः सुराधिपः ॥ इति च स्कान्दे । | |||
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| text = | | text = ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८२.३),‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१) , ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुः ’(ब्रह्माण्डे,आथर्वाण.अ-१,ख-२.१), | ||
‘चन्द्रसूर्यादयः शब्दा विष्णावेव हि मुख्यतः । | |||
उपचारात् तदन्येषां विष्णुनैव कृताः पुरा’ ॥ | |||
इत्यादिना तस्यैव सर्वनामवत्वाच्च । ‘ णकारो बलं षकारः प्राण आत्मा’ इत्यादिनाऽन्ते विष्णुशब्दव्याख्यानेनोपसंहाराच्च । | |||
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| text = | | text = ‘आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् । | ||
न वर्तन्ते तदन्यत्र शृङ्गिबेरेऽग्निशब्दवत् ॥’ इति च पाद्मे । | |||
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| text = | | text = ‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’(ब्राह्मसंहिता), ‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः’(चतुर्वेदोपनिषत्,गीता.नि.१.१.१) , ‘वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’(गोपालतापिन्युपनिषत्,गीता.नि.१.१.१) ॥ इत्यादि श्रुतिभ्यश्च । | ||
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| text = | | text = अग्रशब्दो गुणाधिक्यवाची । इदं रमाब्रह्माशिवादिकं सर्वं जगदपेक्ष्यात्मैवाग्रे ‘विष्णुरेवाग्र्यः सर्वगुणैः’इत्यर्थः । तत्र हेतुः तदन्यत् किञ्चिन्न मिषदासीत् । सर्वस्याप्युन्मेषणं नासीद् इत्यर्थः । स्वत उन्मेषणं कस्यापि नास्ति । अस्तिशब्दवद् आसीच्छब्दोऽपि सर्वकालसाधारणः । भगवत्प्रसादादेव सर्वदा सर्वं किञ्चिदुन्मिषति । स्वातन्त्र्येण पूर्णोन्मेषो विष्णुरेव । | ||
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| | | text = ‘उन्मेषो गुणसम्पूर्तेरुद्रिक्तानुभवः स्मृतः । | ||
तदेव मिषणं नाम, सद्रूपं मिनुते यतः ॥ | |||
मिषच्च नान्यद् विष्णोर्हि किमुतोन्मिषदिष्यते । | |||
उच्चैर्मिषन् हि भगवान् सर्वदैव जनार्दनः ॥’इति च सत्तत्त्वे । | |||
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| text = | | text = ‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति॥’(भा.१.२३) इति च भारते । | ||
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| | | text = सर्वजीवानां रमायाश्च प्रलये विद्यमानत्वादेव न अग्र इति कालापेक्षया । तदधीनमिषत्त्वादन्येषाम्, अग्र्यः स एवेत्याशयः । तदधीनत्वमेव तेषां सृष्ट्यादिना दर्शयति । स्थूलशरीरस्य पूर्वाभावस्तत एवार्थतः सिद्ध्यति । | ||
‘प्रलयेऽप्यखिलं देवी रमा विष्णुप्रसादतः । | |||
जानाति नित्यज्ञानेन, मुक्ता ध्यानस्थिता लये ॥’ इति च सत्तत्त्वे । | |||
ब्रह्मादीनां शरीरान्तरस्यापि प्रलयेऽनुक्तेरेवाभावः सिद्ध्यति । | |||
‘आत्मा ब्रह्माग्र इत्यादि गुणाग्र्यत्वं हरेर्वदेत् । | |||
कालज्यैष्ठ्यं न, यस्मात् तत् सृष्ट्युक्तेरेव सिध्यति ॥’इति वाक्यनिर्णये । | |||
गुणाग्र्यतायामेव कालज्यैष्ठ्यस्याप्यन्तर्भावाच्च । | |||
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| text = | | text = ‘अं= विष्णुं बिभर्तीत्यम्भः= विष्णुलोकः’, दिवः परे महदादयश्च । दिव्यपि भगवान् प्रतितिष्ठतीति प्रतिष्ठा । तेषु सर्वेषु प्रत्यक्षतश्चरति विष्णुस्तस्मादम्भ इत्युच्यते । दिवः परे द्यौश्चाम्भोनामका इत्यर्थः । सूर्यमरीचीनां तत्र विशेषेण वितत्वाद् अन्तरिक्षं मरीचयः, मरीचीनामयनात् । पृथिव्यां क्षिप्रं मरन्तीति पृथिवीमरः । | ||
‘भूतेभ्योऽनन्तरं त्वण्डं सृष्ट्वा विष्णुः पुरा प्रभुः । | |||
लोकभेदांश्च चक्रेऽत्र, पश्चाद् ब्रह्मा विशेषतः । | |||
सम्यक् चकार लोकांस्तान् लोककर्ता ततः स च ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते । | |||
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| | | text = या अधस्तात् पूर्वमेव सृष्टा देवताः ता आप इत्युच्यन्ते । आपा इत्याप इति इति पूर्वं भगवदङ्गसृष्टानामेवाप्छब्देनोक्तेः । ‘अयं पितैते पुत्राः’ इति च । ‘आहं मां देवेभ्यो वेदा ओ मद् देवान् वेद’ इति च । | ||
‘ब्रह्मवायू च तद्भार्ये वीन्द्रशेषौ च तत्स्त्रियौ । | |||
शिवस्तद्दयिता शक्रकामौ तद्दयितादयः । | |||
सर्वे सुराः क्रमेणैव विष्णोर्जाता अबाख्यकाः । | |||
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| text = | | text = ज्ञानानन्दबलाद्येषु विष्णुभक्तौ च सर्वशः । | ||
हीनाः शतगुणेनैव क्रमेणानेन ते मताः । | |||
तेभ्यश्च ऋषयो मर्त्या हीना एव क्रमेण च । | |||
विशेषतस्तु मुक्तानां सर्वसंसारबन्धनात् । | |||
क्रमोऽयं सम्यगुद्दिष्टो नित्यानन्दैकभोगिनाम् । | |||
न विशेषो ब्रह्मवाय्वोरधिकाराविभेदतः । | |||
न शेषशिवयोश्चैव तत्पत्नीनां च सर्वशः । | |||
सुपर्णशेषयोश्चैव साम्यं सर्वगुणेष्वपि । | |||
साम्यमेवैतयोः पत्न्योः साम्यं शक्रमनोजयोः । | |||
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| | | text = एते तु महादादीनां सर्वेऽपि ह्यभिमानिनः । | ||
पूर्वस्य प्रतिबिम्बश्च चरमस्तत्सुतस्तथा । | |||
तद्वशाश्चाखिला विष्णोर्न विष्णुः कस्यचिद् वशे । | |||
महदादिमानिनश्चैते जातास्तैः सह सर्वशः । | |||
एते लोका इति प्रोक्ता लोकानाम् अभिमानिनः(लोकानामभिमानिनः) । | |||
त एव लोकपालाश्च यदा पश्चाद् प्रजज्ञिरे । | |||
पश्चाज्जातैर्हि रूपैस्तैर्लोकस्थान् पालयन्त्यलम् ॥’ इत्यादि तत्त्वसारे । | |||
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| text = | | text = अमूर्च्छयद् मूर्तमकरोत् । अग्निर्वाग् भूत्वा इत्यादिना पश्चादैक्यप्रतीतेरेकस्यैव रूपद्वयं तदिति प्रतीयते । प्रजानीहि प्रकर्षेणानुजानीहि । अन्नदेवता च सर्वदेवतायुक्तो विरिञ्च एव । ग्रसनं चैतस्मिन् प्रवेश एव, न तु पीडा तस्य । एक एव हि ब्रह्मा भोक्तृभोज्यत्वेन स्थितः, भोज्यरूपेणैकीभूयातितरां मुमोदेत्यर्थः । देवानाम् उपद्रवाभावाद् भोक्तृत्वशक्तियोजनमेवाशनापिपासाभ्याम् अन्ववार्जनम् । वायुरेव च भोक्तृत्वशक्तिरूपः । | ||
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| verse_id | | verse_id = AIT_C02_S04_V11 | ||
| | | id = AIT_C02_S04_V11_B01 | ||
| | | text = यदि वागादीनामेवाभिव्याहरणादिशक्तिः स्यान्मां विना, तर्हि विष्णुत्वं न मम स्यात् । तस्मात् कोऽहं भवानि इत्याक्षेपः । विशेषेण प्राणयति सर्वान्, सर्वेभ्यो विशिष्टश्चेति हि विष्णुः । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मा इति व्याख्यानात् । तस्मान्मत्प्रेरिता एवैते ऽभिव्याहारादिशक्ता इत्यभिप्रायः । | ||
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| text = | | text = पूर्णानन्दस्वरूपत्वान्नन्दनो भगवान् । प्रादुर्भावरूपेण जातोऽपि भगवान् सर्वभूतान्यभितः= सर्वकालेषु विशेषेण पश्यत्येव । इह भूतेषु मत्तोः अन्यं प्रवर्तकं वदेत् किम् इत्याक्षेपः । अहमेव स्वतन्त्रः परिपूर्णगुण इति कृष्णराघवादिसर्वावताररूपोऽपि सर्वदानुभवत्येव । | ||
‘नायं दशरथाज्जातो न चापि वसुदेवतः । | |||
क्वास्याज्ञानं कुतो दुःखं प्रादुर्भावेष्वपि प्रभोः ॥ | |||
प्रादुर्भूतश्चिदानन्दशरीरो राघवः स्वयम् । | |||
स्तम्भाद् वा नरदेहाद् वा नैवास्य प्राकृती तनुः ॥ | |||
दैत्यानां मोहनार्थाय सोऽज्ञानाद्यं प्रकाशयेत् । | |||
पूर्णचित्सुखरूपोऽपि सदा सर्वावतारगः ॥’इत्यादि स्कान्दे । | |||
}} | }} | ||
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| text = | | text = एतमेव पुरुषं व्यास-कृष्ण-कपिल-राघवादिरूपं ततममपश्यत् । ततमं=(तततमम्. हृ) परिपूर्णतमं ब्रह्माऽपश्यत् । इदं मे स्वरूपम् अदर्शमेव अहमिति । रङ्गस्त्ववधारणे- ‘रङ्गोऽवधारणे चैव संवादे च प्रयुज्यते’ इति पदविवेके । अपश्यद् इत्यत्र नातीतकालत्वं विवक्षितम्, अभिव्यैख्यद् इति ‘अभि’शब्दस्यानुषङ्गात् । अपश्यत् पश्यतीति चैककालसम्बन्धं विना वक्तुमशक्यत्वात् तथा प्रयोगः । | ||
‘प्रयोग एककालीनः सर्वकालेऽनुषज्यते । | |||
ददर्श विष्णुरित्यादौ नित्यचिद्रूपतो हरेः ॥’ इत्यादि सत्तत्त्वे । | |||
परोक्षप्रिया इव इत्यसुराणां सम्यगदर्शनेन पतनं देवानां प्रियम्, तथाऽप्यपरोक्षदर्शिन्येव प्रीतिं कुर्वन्तीति इवशब्दः ॥ ३ ॥ | |||
}} | }} | ||
</div> | |||
<div class="gr-author-note">॥ इति तृतीयः खण्डः ॥</div> | |||
<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके चतुर्थोऽध्यायः ॥</div> | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S05_V01 | ||
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| verse_line1 = (अपक्रामन्तु गर्भिण्यः) पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद् रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतम् । आत्मन्येवात्मानं बिभर्ति । तद् यदा स्त्रियां सिञ्चति, अथैनज्जनयति । तदस्य प्रथमं जन्म । तत् स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति यथा स्वमङ्गं तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । साऽस्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति । सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति । स यत् कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति, आत्मानमेव तद् भावयति, एषां लोकानां सन्तत्यै । एवं सन्तता हीमे लोकाः । | |||
| verse_lines = (अपक्रामन्तु गर्भिण्यः) पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद् रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतम् । आत्मन्येवात्मानं बिभर्ति । तद् यदा स्त्रियां सिञ्चति, अथैनज्जनयति । तदस्य प्रथमं जन्म । तत् स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति यथा स्वमङ्गं तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । साऽस्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति । सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति । स यत् कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति, आत्मानमेव तद् भावयति, एषां लोकानां सन्तत्यै । एवं सन्तता हीमे लोकाः । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S05_V01 | ||
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| text = | | text = अयं नारायणो देवः पुरुषे प्रथमं विशेत् । | ||
अन्नस्थोऽन्नेन सहितस्तस्मिन् रेतस्त्वमागते । | |||
तस्मिन् स्थितं स्वरूपं(स्थितस्वरूपम्. हृ) स पुरुषस्थो बिभर्त्यजः । | |||
तद्रूपं रेतसा साकं स्वयं पुंसि स्थितो हरिः । | |||
स्त्रियां सिञ्चति, तस्यैव स्थानान्तरगतेः प्रभोः । | |||
प्रथमं जन्म विष्णोस्तु,(विष्णोस्तत्) स तस्या अङ्गवत् प्रभुः । | |||
नैनां हिनस्त्यानुकूल्यात्, सा पुत्रं भावयत्यथ । | |||
पुत्रस्य भावना सैव तद्गत्वाद् हरिभावना । | |||
सम्भावितव्या सा चैव भर्त्रा पुत्रश्च सादरम् । | |||
सम्भावनं कुमारस्य जानतः केशवे भवेत् । | |||
तस्येत्यर्पणमात्रेण पूजितो हि भवेद्धरिः । | |||
पुत्रस्थस्य हरेः पूजां कुर्वतः पृथिवीस्थितिः । | |||
स्वर्गस्थस्यापि भवति पुत्रपुण्यं यतोऽखिलम् । | |||
अत्यल्पपुण्यभाक् स स्यान्नार्चयेत् केशवं यदि ॥ | |||
तस्यैव | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = तदस्य द्वितीयं जन्म । सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते । अथाऽस्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति । स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म । तदुक्तमृषिणा– | ||
| | | verse_lines = तदस्य द्वितीयं जन्म । सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते । अथाऽस्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति । स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म । तदुक्तमृषिणा–;‘गर्भे नु सन्नन्वेषाममवेदम् अहं देवानां जनिमानि विश्वा ।;शतं मा पुर आयसीररक्षन् अधः श्येनो जवसा निरदीयमिति(ऋ.सं.४.२७.१) ॥’;गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच । स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् (यथास्थानं गर्भिण्यः) ॥ १ ॥ | ||
| | | verse_line2 = ‘गर्भे नु सन्नन्वेषाममवेदम् अहं देवानां जनिमानि विश्वा । | ||
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}} | }} | ||
<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके पञ्चमोऽध्यायः ॥</div> | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S05_V02 | ||
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| text = | | text = पृथिव्यां जन्म पुत्रस्य द्वितीयं विष्णुजन्म हि । | ||
एतद्रूपं निधायैव जीवार्थे धर्मकर्तवे । | |||
पितृस्थेन तु रूपेण गच्छत्यन्यत्र केशवः । | |||
पितुरन्यत्र जननं तृतीयं जन्म तद्धरेः । | |||
अन्तर्यामितयैवं हि सर्वजीवेषु संस्थितम् । | |||
सर्वदोषोज्झितं विष्णुं कर्तारं सर्वकर्मणाम् । | |||
नित्यानन्दं स्वतन्त्रं च सर्वज्ञं सर्वतोऽधिकम् । | |||
यो वेद देहबन्धात् स विमुक्तो नित्यमुत्तमान् ॥ | |||
भोगान् भुङ्क्ते यथायोग्यम् इति वेदानुशासनम् ॥ इत्यैतरेयसंहितायाम् । | |||
तृतीयं | |||
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| id = | | id = AIT_C02_S05_V02_B01 | ||
| text = | | text = नात्र जीवोत्पत्तिमात्रमुच्यते । न हि जीवोत्पत्तिमात्रपरिज्ञानादमृतत्वं भवति । ज्ञातमेव सर्वैः पितापुत्रसम्बन्धमात्रं पश्वादिभिरपि(श्वादिभिरपि. हृ) । ‘गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा’ इत्युक्तार्थ उदाहृते मन्त्रे देवजन्मकथनाच्च । विष्णुर्हि परमो देवः । तेनैव सह सर्वेऽपि देवा जीवदेहजनने जायन्त इव । शरीरप्राप्तिरेव हि जन्मान्येषामपि । अयमेव विशेषो देवानां दुःखाभोगः । स्वातन्त्र्यं च विष्णोः । | ||
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| text = | | text = ‘आत्मन्येवाऽत्मानं बिभर्ति’, ‘आत्मानमेव तद्भावयति’ इत्याद्यात्मशब्दश्च मुख्यतो विष्णावेव युज्यते । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मा इति विष्णुशब्दार्थैकदेशवाचित्वाच्चात्मशब्दस्य । ‘एतया द्वारा प्रापद्यत’ इति तस्यैव शरीरप्रवेशस्य प्रस्तुतत्वाच्च । जीवशरीरं परित्यज्यान्यत्र गमनमात्रं विष्णोरप्यस्तीति प्रैतीत्युक्तेऽप्यविरोधः । कृष्णराघवादिस्वरूपमेव ह्यसौ न परित्यजति । | ||
इति | |||
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| text = | | text = ‘कृष्णो ह्यत्यक्तदेहोऽपि त्यक्तदेहवदेव च । | ||
लोकानां दर्शयामास स्वरूपसदृशाकृतिम् । | |||
येन रूपेण कंसादीन् जघ्ने तद्रूपमेव(तद्रूप एव हि. हृ) हि । | |||
पूज्यतेऽद्यापि शर्वाद्यैर्निर्मिताऽन्या शवाकृतिः । | |||
स्वर्गारोहणकाले तु जनास्तेनैव मोहिताः । | |||
यत्तद् रूपं निजं विष्णोर्दृष्टं सर्वजनैर्भुवि । | |||
अद्यापि तद् देवलोके पूज्यते सर्वदैवतैः ॥’ इत्यादि स्कान्दे । | |||
‘प्रदर्श्यातप्ततपसाम् अवितृप्तदृशां नृणाम् । | |||
आदायान्तरधाद् यस्तु स्वबिम्बं लोकलोचनम्(भाग. ३.२.११) ॥’ इति च भागवते । | |||
‘प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवा’(ऋ.सं.२.४१.१९) इत्यादिवत् प्रकृष्टगतिवाच्येवायं शब्दः । प्रकृष्टगतित्वादेव च मरणेऽपि प्रयुज्यते । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S05_V02 | ||
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| text = | | text = एषामवेदमहम् इत्यपि जीवभेद एवोक्तः । अन्यथा ‘मम जनिमानि’ इत्येवोच्येत । व्यर्थता च एषाम् इत्यादिविशेषणानाम् । अवेदम् इत्यनेनैव स्वस्य सिद्धत्वात् । अहम् इत्यप्यहेयत्वेनेति क्रियाविशेषणम् । जन्म जानन्नपि देवानां दुःखादिहेयरहितत्वेन व्यजानामीत्यर्थः । तस्माद् ‘अहं मनुरभवम्’(ऋ.सं.४.२६.१) इत्यादावपि अहेयगुणं भगवन्तमेवाहंशब्दो वक्ति । सर्वान्तरत्वात् तस्मिन्नेव ‘अभवम्’ इत्युत्तमपुरुषशब्दोऽपि सर्वो वर्तते । | ||
‘अहेयत्वादहं विष्णुः स तु सर्वान्तरत्वतः । | |||
अस्यस्मीत्यादिभिः शब्दैरुच्यतेऽन्योऽपि जीवतः ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते । | |||
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| text = | | text = न च मूढव्यवहार एव वेदनिर्णयाय भवति ; किन्तु ? सर्वेषामनुभवो युक्तयश्च वाक्यान्तरं च निर्णयकारणम् । तस्मात् सर्वजीवादिभ्योऽन्यः सर्वोत्तमो विष्णुरेवात्रोक्तः । | ||
‘न वेदेषु पदं ककिञ्चिद् वर्णो वा व्यर्थ इष्यते । | |||
यथायोग्यं चार्थभेद ऊह्यः सर्वत्र वेदिभिः(ईशावास्य.१६) ॥’ इति शब्दनिर्णये ॥ | |||
इति | ‘शब्दा रेतोऽन्नमित्याद्या अपि तत्र गतं हरिम् । | ||
वदन्त्यविष्णुवाची हि न शब्दः क्वचिदिष्यते ॥’ इति च । | |||
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| text = | | text = भावयति सम्भावयति । सोऽग्र एव अग्र्यो विष्णुरेव । पुत्रसम्भावनमपि तत्रस्थं विष्णुं सम्भावयामीति तत् तस्यैव भवति । एवं भावयतामेव एष पन्था उरुगायः इत्याद्यपि । तं पश्यन्ति पशवः इत्याद्यपि दिव्यपश्वादीनामेव । अन्येषां स्वभावप्रवृत्तिः । | ||
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| text = | | text = ता एव देवताः शतं पुर आयसीः ज्ञानिन्यो विशेषतः । ‘अय पय= गतौ’ इति धातोः । मानुषान् अपेक्ष्य पूर्णत्वात् पुरः । विष्णुर्मुख्यत एव पूर्णः । न च शरीरैर्जीवो रक्षितः । मुख्ये युज्यमाने च नामुख्यार्थः कल्प्यः । ‘शम् अस्य विद्यत इति शी’ विष्णुः । पूर्णानन्दत्वात् । स एव ज्ञानत्वाद् ‘यश्चेति श्यः’ । सोऽस्य जीवस्येन इति ‘श्येनः’ । विष्णुं स्वामिनं ज्ञात्वेत्यर्थः । ‘निरदीयम्’, निष्क्रम्यातीतोऽस्मि गर्भवासम् । | ||
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| text = | | text = ‘स्वर्’ आनन्दो विष्णुः । अत्र ‘गः’ इति स्वर्गलोको विष्णुलोकः । अमृतः सन् सर्वान् कामानाप्त्वा तानेव सर्वान् कामान् समभवद् अनुभवति । अपेक्षितवस्तुस्वीकार आप्तिः । सम्भवो भोगः । ‘ताँ समभवत् ततो मनुष्या आजायन्त’(बृ.उ.३.४.३ प्राजापत्यब्राह्मणम्) इत्यादिवत् । मुक्त्यनन्तरमेव ह्यनुपचरितसर्वकामावाप्तिः । मुख्य एव चार्थः स्वीकार्यः । अमुक्तानां विष्णुलोकगानामपि न सर्वकामावाप्तिः । जय-विजयादीनामप्रियदर्शनात् । अतोऽमृतः सन् सर्वान् कामानाप्त्वेत्यर्थः(सर्वकामानाप्त्वा) । | ||
मुक्तः कामानवाप्नोति भुङ्क्ते चैव यथेष्टतः । | |||
सर्वानपि निरातङ्कः सर्वदा च हरेर्वशः ॥ इति सत्तत्त्वे ॥ | |||
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| verse_line1 = कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा । येन वा पश्यति , येन वा शृणोति , येन वा गन्धान् आजिघ्रति , येन वा वाचं व्याकरोति , येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति । | |||
| verse_lines = कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा । येन वा पश्यति , येन वा शृणोति , येन वा गन्धान् आजिघ्रति , येन वा वाचं व्याकरोति , येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति । | |||
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| text = | | text = ‘अयं विष्णुर्हि किंरूप उपास्योऽस्माभिरच्युतः । | ||
इत्यपृच्छद् रमा देवी महिदासं जनार्दनम् । | |||
आह तां महिदासोऽथ पूर्णानन्दतमस्त्विति । | |||
उपास्यस्तादृशो ह्यस्य स्वभावः परमात्मनः । | |||
येन जीवो दर्शनादीन् प्रेरितः कुरुते सदा । | |||
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| verse_line1 = ‘यद्, एतद्, हृदयम्, मनः, च, आ, इतत्, संज्ञानम्, आज्ञानम्, विज्ञानम्, प्रज्ञानम्, मेधा, दृष्टिः, धृतिः, मतिः, मनीषा, जूतिः, स्मृतिः, सङ्कल्पः, क्रतुः, असुः, कामः, अवशः’ इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति । | |||
| verse_lines = ‘यद्, एतद्, हृदयम्, मनः, च, आ, इतत्, संज्ञानम्, आज्ञानम्, विज्ञानम्, प्रज्ञानम्, मेधा, दृष्टिः, धृतिः, मतिः, मनीषा, जूतिः, स्मृतिः, सङ्कल्पः, क्रतुः, असुः, कामः, अवशः’ इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति । | |||
इति | | commentary1 = aitareya | ||
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| text = | | text = यो विष्णुर्हृदयमिति हृद्गतत्वात् प्रकीर्तितः । | ||
मन्तृत्वान्मन इत्येव यच्च ज्ञान(तृ)स्वरूपतः । | |||
एतत् सन्निहितत्वाच्च पूर्णत्वादेति कीर्तितः । | |||
इतत्वाच्च ततत्वाच्च स इतन्नाम केशवः । | |||
गुणानामुच्चयो यस्मात् स च इत्येव शब्दितः । | |||
सम्यग् ज्ञानस्वरूपत्वात् संज्ञानमिति कीर्तितः । | |||
आततज्ञानरूपत्वाद् आज्ञानं भगवान् हरिः । | |||
विविधज्ञानरूपत्वाद् विज्ञानमिति कीर्तितः । | |||
प्रकृष्टात्मगुणज्ञानरूपः प्रज्ञानमुच्यते । | |||
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| text = | | text = अविस्मृतित्वान्मेधा स दृष्टिर्दर्शनरूपतः । | ||
धृतिर्धारणरूपत्वान्मतिर्मासु ततत्वतः । | |||
मनुनाम्नाम् अजादीनां मनीषेशो यतो हरिः । | |||
सर्वप्रेरकरूपत्वाज्जूतिरित्यभिधीयते । | |||
सर्वदेशेषु कालेषु स्वरूपेषु च सर्वशः । | |||
समं रमत इत्येव स्मृतिर्नाम जनार्दनः । | |||
सर्वस्य क्लृप्तिकर्तृत्वात् सङ्कल्प इति गीयते । | |||
क्रतुः स सर्वकर्तृत्वाद् असुरप्यसनाद्धरिः । | |||
अमेयानन्दरूपत्वात् काम इत्यभिधीयते । | |||
अवशः स स्वतन्त्रत्वात् त्रयोविंशतिनामकम् ॥ | |||
यो वेदैवं हरिं सम्यङ् मुच्यतेऽखिलसंमृतेः । | |||
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| verse_line1 = एष ब्रह्मा, एष इन्द्रः, एष प्रजापतिः, एते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि, पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानि, इमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि च, इतराणि चाण्डजानि च, जरायुजानि च, स्वेदजानि च, उद्भिजानि च, अश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत् किञ्चेदं प्राणि, जङ्गमं च, पतत्त्रि च, यच्च स्थावरं सर्वं तत् प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम् , प्रज्ञानेत्रोऽलोकः । प्रज्ञा प्रतिष्ठा । प्रज्ञानं ब्रह्म । | |||
| verse_lines = एष ब्रह्मा, एष इन्द्रः, एष प्रजापतिः, एते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि, पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानि, इमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि च, इतराणि चाण्डजानि च, जरायुजानि च, स्वेदजानि च, उद्भिजानि च, अश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत् किञ्चेदं प्राणि, जङ्गमं च, पतत्त्रि च, यच्च स्थावरं सर्वं तत् प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम् , प्रज्ञानेत्रोऽलोकः । प्रज्ञा प्रतिष्ठा । प्रज्ञानं ब्रह्म । | |||
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| text = | | text = ब्रह्मा शिवश्च शक्रश्च देवाश्चान्ये समस्तशः । | ||
तथैव पञ्चभूतानि पुण्यपापविमिश्रिताः । | |||
क्षुद्रात्मानस्तु ये मर्त्या इतरे असुरा अपि । | |||
सर्वं जगदिदं विष्णोर्वशे तिष्ठति सर्वदा । | |||
तेनैव नीयते नित्यं तस्मिन्नेव प्रतिष्ठितम् । | |||
मुक्ता येऽलोकनामानो नीयन्ते तेऽपि विष्णुना । | |||
स्वयं चानन्यनिष्ठत्वात् प्रतिष्ठेत्यभिधीयते । | |||
देशतः कालतश्चैव गुणतश्चातिपूर्तितः । | |||
विष्णोर्ब्रह्मेति नामैतन्मुख्यतोऽन्यत्र न क्वचित्। | |||
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| verse_line1 = स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् ॥ | |||
| verse_lines = स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् ॥ | |||
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| text = | | text = ‘सोऽलोकनामा मुक्तास्तु चितिमात्रस्वरूपतः । | ||
प्रकृष्टज्ञानरूपस्य प्रसादात् परमात्मनः । | |||
अस्माद् देहात् समुत्क्रम्य गत्वोर्ध्वं लोकमुत्तमम् । | |||
अमृतः सन् विष्णुलोके भोगान् सम्प्राप्य पुष्कलान् । | |||
भुङ्क्ते यथेष्टतो नित्यमिति वेदानुशासनम् ॥’ इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् । | |||
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| text = | | text = जानन्त्यापि देव्या लोकानुग्रहार्थं विशेषज्ञानार्थं च कोऽयमात्मा इति पृष्टः स(सन्) भगवानाह- कतरः स आत्मेति ॥ कतरः आनन्दतमः । ‘यत्रोभयोः प्रयोगो न तत्रैकार्थो तरप्-तमौ’ इति शब्दनिर्णये । | ||
इति | |||
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| text = | | text = यत्प्रेरणाद् अयं जीवो दर्शनादीन् करोति । रमाब्रह्मादीनामपि तत्प्रेरितत्वात् सर्वेषाम्, दर्शनादिकारणत्वम् एकैकमपि तस्य लक्षणं भवतीति वाशब्दः सर्वत्रानुषज्यते । | ||
}} | }} | ||
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| text = | | text = प्रजापतिः शिवः । लिङ्गाभिमानित्वात् । | ||
‘प्रजापतिः शिवः शेषो(शेपो. हृ) लिङ्गमित्यभिधीयते । | |||
लिङ्गाभिमानी लोकस्य स्रष्टा गिरिश एव हि ॥’ इति शैवपुराणे । | |||
‘सममस्त्वनयोर्युद्धमिति प्राह प्रजापतिः । | |||
वाक्यं शिवस्य तत् श्रुत्वा शक्रो नेत्याह सत्वरः ॥’ इति भारते । | |||
इति | |||
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| text = | | text = क्षुद्रमिश्राणीव बीजानि शाल्यादिबीजवत् भिन्नस्वभावा ब्रह्मादयः सर्वजीवाः । | ||
‘ब्रह्माद्याः सर्व एवैते जीवा भिन्नस्वभावकाः । | |||
यथा शाल्यादिबीजानि भिन्नवीर्याणि सर्वशः ॥’ इति सत्तत्त्वे । | |||
प्रथम-इतराणि इतिशब्दो मानुषाणाम्, द्वितीयोऽसुरादीनाम् । | |||
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| text = | | text = प्रज्ञानेत्रोऽलोक इति । अलोकशब्देन मुक्तसमुदाय उच्यते । ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य लोकस्य सर्वं तत् प्रज्ञाननेत्रम् इति विष्ण्वधीनत्वस्य पूर्वमेवोक्तत्वात्, पुनः प्रज्ञाननोत्रोऽलोक इति मुक्तविषयमेव । मुक्तो ह्यलोक्यत्वाद् अलोकः । | ||
अण्डजानि च इत्याद्युक्त्वा पुनः अश्वा गाव इत्यादि देवादीनां मन आदेरेव जातानामपि स्वीकारार्थम् । अण्डजत्वाद्युत्पत्तिप्रकारोऽपि विष्ण्वधीन इति ज्ञापयितुं तत्कथनम् । | |||
‘तथाऽश्मानस्तृणकाष्ठाश्च सर्वे दिदृक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते’ इति भारतवचनाद् अश्मादीनामपि प्राणित्वात् तत्स्वीकारार्थं प्राणि इति । गमन-पतन-स्थिरत्वादयोऽपि भावा विष्ण्वधीना इति ज्ञापयितुं जङ्गमम् इत्यादिवचनम् । | |||
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| text = | | text = स एतेन(अ.व्या.३.२.२१५) इत्यलोकशब्दोक्तो मुक्तः परामृश्यते । सकलकर्मबन्धमुक्त्यनन्तरं हि शरीराद् उत्क्रामति । प्रकृष्टज्ञानरूपेण विष्णुना प्रेरितः, प्राज्ञेन आत्मनैव उत्क्रम्य तेनैव सर्वान् कामानाप्त्वा तेनैव सर्वान् कामान् सम्भुङ्क्त इति सर्वत्रानुषज्यते । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इत्युक्ते कथं प्रज्ञानेत्रो मुक्तः? इत्याकाङ्क्षायां तस्यैव व्याख्यानं स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मना इत्यादि । अनुक्तविशेषाणानामपि भगवदधीनत्वज्ञापनार्थं प्रज्ञानेत्रोऽलोक इति सामान्यवचनम् । | ||
इति । | |||
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| text = | | text = ‘अनारब्धफलानां च प्रारब्धानां च सर्वशः । | ||
कर्मणां दाह एवायं मुक्तिरित्यभिधीयते ॥ | |||
स तु मुक्तस्ततो देहाद् उद्गच्छति परात्मना । | |||
प्रेरितो, विष्णुलोकं च प्राप्य भोगान् अवाप्य च ॥ | |||
भुङ्क्ते विष्णुप्रसादेन, न विष्णोरवशः क्वचित्। | |||
विष्णुतन्त्रा इमे सर्वे मुक्ता अपि यतोऽखिलाः ॥’ इति ब्रह्माण्डे । | |||
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| text = | | text = ब्रह्मेन्द्रादिशब्दा विष्णावेव मुख्यत इति तद्व्यावृत्त्या जीवानां स्वीकारार्थम् एष इत्यादिशब्दः । स हि भगवान् स्वनेतृकोऽपि नानुग्राह्यः । अनुग्राह्यत्वं हि ब्रह्मादीनाम् अत्र विवक्षितम् । ‘नेयताऽनुग्राह्यतापि न सा विष्णोः स्वतोऽपि तु’ इति शब्दतत्त्वे ॥ | ||
}} | }} | ||
</div> | |||
<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके षष्ठोऽध्यायः ॥</div> | |||
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| verse_line1 = वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता । मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् । आविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थ, श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । ऋतं वदिष्यामि , सत्यं वदिष्यामि , तन्मामवतु , तद् वक्तारमवतु , अवतु माम् , अवतु वक्तारम् ॥ | |||
| verse_lines = वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता । मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् । आविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थ, श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । ऋतं वदिष्यामि , सत्यं वदिष्यामि , तन्मामवतु , तद् वक्तारमवतु , अवतु माम् , अवतु वक्तारम् ॥ | |||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके सप्तमोऽध्यायः ॥ ॥ इति द्वितीयारण्यकः समाप्तः॥</div> | |||
इति | |||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S07_V01" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S07_V01"> | |||
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| text = | | text = वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता , अवबोधरूपे विष्णौ प्रतिष्ठिता । स च विष्णुर्मे वाचि स्थितः । यदेतद् हृदयं मनश्च इति विष्णुनामधेयेषूक्तत्वात् । आविराविर्म एधि, हे विष्णो ! ममाऽविराविर्भव । आणीस्थित आण्यां स्थित विष्णो ! इति सम्बोधनम् । | ||
‘आधारः सर्ववेदानां वेदाणी प्राण उच्यते । | |||
तस्मिन् स्थितो हरिर्नित्यम् आणीस्थ इति गीयते ॥’ इति शब्दतत्त्वे । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C02_S07_V01 | ||
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| text = | | text = आविरावीः इति दैर्घ्यमतिशयार्थे, ‘आधिक्येऽधिकम्’ इति सूत्रात् । अणशब्दस्य गतिवाचित्वाच्चलम् आणम् उच्यते । तस्य धारणेन तद्वान् आणी, स्थापक इत्यर्थः । मे श्रुतं मा प्रहासीः मम विद्यागोचर एव सर्वदा भव, विस्मृतो मा भव । | ||
हे विष्णो ! अनेन त्वद्विषयेणैव अधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि सर्वाहोरात्रेष्वपि त्वद्विषयाध्ययनमेव करोमीत्यर्थः । ऋतं यथावत् अवगतं त्वां वदिष्यामि । सत्यं साधुगुणैस्ततं सर्वनियन्तारं च । तद् विष्ण्वाख्यं ब्रह्म मामवतु इति तस्यैव विष्णोः परोक्षत्वेनैव प्रार्थनम् । | |||
‘वाङ् म इत्यादिकं खण्डं विष्णुप्रार्थनरूपकम् । | |||
इति | अविघ्नत्वमभीप्सूनां शिष्याणां दृष्टवान् हरिः ॥’ इति च ॥ | ||
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| verse_line1 = अथाऽतः संहितायाः उपनिषत् । | |||
| verse_lines = अथाऽतः संहितायाः उपनिषत् । | |||
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| text = | | text = ‘विष्णुनाम्नि षकारस्य णकारस्य च संहिताम् । | ||
विष्णोस्तु बहुरूपाणां वाचिकाम्(वाचकाम् .हृ) ऋषयो विदुः । | |||
तौ च वर्णौ हरेः सम्यक्स्वरूपप्रतिपादकौ । | |||
बहुधैव स्थितस्यास्य सदैवैकस्वरूपिणः । | |||
विष्णुनामार्थरूपत्वाद् वेदानामपि सर्वशः । | |||
अन्येषामपि शब्दानां संहिता विष्णुवाचिकाः(वाचकाः .हृ) । | |||
तद्वाचकास्तथा वर्णाः सर्वे लौकिकवैदिकाः । | |||
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| verse_line1 = पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । वायुस्संहितेति माण्डूकेयः । | |||
| verse_lines = पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । वायुस्संहितेति माण्डूकेयः । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V02 | ||
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| text = | | text = पृथिवीनामकं रूपं पृथुत्वात् पृथिवीस्थितम् । | ||
देवता पूर्ववर्णस्य पूर्वरूपं तदुच्यते । | |||
देवतोत्तरवर्णस्य क्रीडनाच्च द्युनामकम् । | |||
दिवि स्थितं हरे रूपमुत्तरं रूपमुच्यते । | |||
वेदकत्वाच्चायनत्वाद् रूपं यद्वायुनामकम् । | |||
विष्णोस्तद्वर्णयोर्मध्यदेवतेति प्रकीर्तितम् । | |||
संहितानामकं तच्च रूपद्वयसहस्थितेः ॥ | |||
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| text = | | text = वर्णद्वयं विकारं च षकारं केचिदब्रुवन् । | ||
षकारं मध्यमत्रैव णकारं केचिदुत्तरम् । | |||
पृथक्करणमेवैषां वर्णयोर्मध्यमुच्यते । | |||
उपसर्गमात्रं वीत्याहुः केचिन्नाम ष्णुमात्रकम् । | |||
षकारं च णकारं च वर्णौ पूर्वोत्तरावपि । | |||
व्यक्तिरेवोष्मणस्तत्र मध्यमित्यभिधीयते । | |||
सर्वेप्येत उपादेयाः पक्षा निर्दोषका यतः ।’इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ॥ | |||
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| verse_line1 = आकाशः संहितेत्यस्य माक्षव्यो वेदयाञ्चक्रे । | |||
| verse_lines = आकाशः संहितेत्यस्य माक्षव्यो वेदयाञ्चक्रे ।;स हाविपरिहृतो मेने ,न मेऽस्य पुत्रेण समगादिति समाने वै तत् । परिहृतो मेन इत्यागस्त्यः । | |||
| verse_line2 = स हाविपरिहृतो मेने ,न मेऽस्य पुत्रेण समगादिति समाने वै तत् । परिहृतो मेन इत्यागस्त्यः । | |||
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}} | }} | ||
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| text = | | text = आकाशस्थ आकाशनामा भगवान् वर्णयोर्मध्यदेवतेति माक्षव्यः। उभयरूपसंहितत्वात्(उभयरूपसहितत्वात् .हृ) संहितानामकः । स माण्डूकेयः, तेन माक्षव्येण अपरिहृतः स्वपक्षः इति मेने । मे मदीयेन= मदुपासितेन अस्य आकाशस्य पुत्रेण वायुना न समागादसौ माक्षव्यः । वायुस्थविष्ण्वनुपासनात् । | ||
}} | }} | ||
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| text = | | text = यद्यप्याकाशस्थो भगवान् संहितानामको भवति । तथाऽपि न वायुस्थस्यासंहितात्वं भवतीत्यपरिहृतत्वम् । परिहृतो माण्डूकेयपक्ष इत्यहं मेन इत्यागस्त्यः । आकाशे विष्णूपासनस्याधिकफलत्वात् । पिता ह्याकाशो वायोः । | ||
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| verse_line1 = समानं ह्येतद् भवति वायुश्चाऽकाशश्चेत्यधिदैवतम् । | |||
| verse_lines = समानं ह्येतद् भवति वायुश्चाऽकाशश्चेत्यधिदैवतम् । | |||
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| text = | | text = भगवतस्तु पक्षः(‘भगवतः स्वपक्षः’इति ताम्रपर्णियरीत्या भाष्यपाठः) समत्वमेव वाय्वाकाशयोरिति । आकाशस्य पितृत्वाद् वायोर्बलाधिकत्वाच्च उभयोरुपासनास्थानत्वे साम्यम् । तस्मादुभावपि ग्राह्यौ । | ||
<span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">त्वगिन्द्रियदेवतात्वेनाऽकाशात् पूर्वमेव वायोः सात्विकाहङ्कारजत्वाद्, वायोराकाशाद् गुणाधिकत्वम् । तथाऽप्यत्राऽकाशस्य पितृत्वम्, व्याप्तिश्चाधिका इत्युपासनायां साम्यम् ॥</span> | |||
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| verse_line1 = अथाध्यात्मम् । वाक्पूर्वरूपम्, मन उत्तररूपम्, प्राणस्संहितेति शूरवीरो माण्डूकेयः । अथ हास्य पुत्र आह ज्येष्ठः। मनः पूर्वरूपम्, वागुत्तररूपम्, मनसा वा अग्रे सङ्कल्पयति । अथ वाचा व्याहरति । तस्मान्मन एव पूर्वरूपम्, वागुत्तररूपम्, प्राणस्त्वेव संहितेति । समानमेनयोरत्र पितुश्च पुत्रस्य च । | |||
| verse_lines = अथाध्यात्मम् । वाक्पूर्वरूपम्, मन उत्तररूपम्, प्राणस्संहितेति शूरवीरो माण्डूकेयः । अथ हास्य पुत्र आह ज्येष्ठः। मनः पूर्वरूपम्, वागुत्तररूपम्, मनसा वा अग्रे सङ्कल्पयति । अथ वाचा व्याहरति । तस्मान्मन एव पूर्वरूपम्, वागुत्तररूपम्, प्राणस्त्वेव संहितेति । समानमेनयोरत्र पितुश्च पुत्रस्य च । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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| text = | | text = अत्र प्राणाख्यस्य प्राणे स्थितस्य विष्णोः संहितानामत्वे पितापुत्रयोः साम्यमेव । अन्यत्र तु पुत्रपक्ष एव बलीयान्, युक्तिमत्वात् । | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = स एषोऽश्वरथः प्रष्टिवाहनो मनोवाक्प्राणसंह(हि)तः । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन । सर्वमायुरेतीति नु माण्डूकेयानाम् ॥ १ ॥ | ||
| | | verse_lines = स एषोऽश्वरथः प्रष्टिवाहनो मनोवाक्प्राणसंह(हि)तः । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन । सर्वमायुरेतीति नु माण्डूकेयानाम् ॥ १ ॥ | ||
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| text = | | text = ‘मनोवाक्प्राणनामाऽसौ मन आदिषु संस्थितः । | ||
विष्णुस्तस्य रथो देह इन्द्रियाश्वः प्रकीर्तितः ॥’ इति च । | |||
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| text = | | text = ‘प्रष्टिः स पृच्छनीयत्वात् परमात्मा जनार्दनः । | ||
वक्तृत्वाच्चैव वाङ्नामा मनो मन्तृत्वहेतुतः ॥’इति च । | |||
‘प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति, वदन् वाक्, पश्यंश्चक्षुः, शृण्वन् श्रोत्रं, मन्वानो मनः तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव’(बृ.उ.५.१. अव्याकृतब्राह्मणम्) इति च श्रुतिः । | |||
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| text = | | text = मुक्तिरेव स्वर्गलोकः अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वा इति प्रस्तुतत्वात् । | ||
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| text = | | text = प्रकृष्टत्वेन जननात् प्रजेति ज्ञानम् । पान्ति शंसाधनाश्चेति पशवो वेदाः । | ||
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| text = | | text = परब्रह्मणो विष्णोर्वरणादेव सम्यक् चायितं स्वरूपं तेजः ब्रह्मवर्चसम् । लौकिकप्रजादिकमपि तदिच्छूनां यथायोग्यं भवति । माण्डूकेयैर्ऋषिभिरुपाश्रिता एता विद्याः ॥ १ ॥ | ||
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| verse_id = | <div class="gr-author-note">॥इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके) प्रथमः खण्डः॥</div> | ||
| | |||
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| verse_line1 = अथ शाकल्यस्य पृथिवी पूर्वरूपम्, द्यौरुत्तररूपम् , वृष्टिः सन्धिः. पर्जन्यः सन्धाता । तदुतापि यत्रैतद् बलवद् अनूद्गृह्णन् सन्दधद् अहोरात्रे वर्षति, द्यावापृथिव्यौ समधाताम् इत्युताप्याहुः, इती नु अधिदैवतम् । | |||
| verse_lines = अथ शाकल्यस्य पृथिवी पूर्वरूपम्, द्यौरुत्तररूपम् , वृष्टिः सन्धिः. पर्जन्यः सन्धाता । तदुतापि यत्रैतद् बलवद् अनूद्गृह्णन् सन्दधद् अहोरात्रे वर्षति, द्यावापृथिव्यौ समधाताम् इत्युताप्याहुः, इती नु अधिदैवतम् । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V07 | ||
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| text = | | text = ‘वराहो वामनः सिंह इति रूपत्रयं हरेः । | ||
पूर्वोत्तरार्णमध्येषु स्थितमुक्तं सनातनम् । | |||
माण्डूकेयैर्हि, शाकल्यो वासुदेवादिरूपिणम् । | |||
तेषु चोच्चारके चैव स्थितमाह चतुर्विधम् । | |||
भूमिद्युवृष्टिपर्जन्यनाम्नोर्व्यादिषु संस्थितम् । | |||
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| verse_line1 = अथाध्यात्मम् । पुरुषो ह वा अयं सर्व आनन्दं द्वे विदले भवत इत्याहुः । तस्येदमेव पृथिव्या रूपम्, इदं दिवः । तत्रायमन्तरेणाऽकाशो यथाऽसौ द्यावापृथिव्यावन्तरेणाऽकाशः । तस्मिन् हास्मिन्नाकाशे प्राण आयत्तः, यथाऽमुष्मिन्नाकाशे वायुरायत्तः , यथाऽमूनि त्रीणि ज्योतींषि, इत्येवम् इमानि पुरुषे त्रीणि ज्योतींषि । | |||
| verse_lines = अथाध्यात्मम् । पुरुषो ह वा अयं सर्व आनन्दं द्वे विदले भवत इत्याहुः । तस्येदमेव पृथिव्या रूपम्, इदं दिवः । तत्रायमन्तरेणाऽकाशो यथाऽसौ द्यावापृथिव्यावन्तरेणाऽकाशः । तस्मिन् हास्मिन्नाकाशे प्राण आयत्तः, यथाऽमुष्मिन्नाकाशे वायुरायत्तः , यथाऽमूनि त्रीणि ज्योतींषि, इत्येवम् इमानि पुरुषे त्रीणि ज्योतींषि ।;यथाऽसौ दिव्यादित्य एवमिदं शिरसि चक्षुः, यथाऽसावन्तरिक्षे विद्युदेवमिदमात्मनि हृदयम्, यथाऽयमग्निः पृथिव्याम् एवम् इदमुपस्थे रेतः। एवमु ह स्म सर्वलोकमात्मानमनुविधायाऽह इदमेव पृथिव्या रूपम् इदं दिवः । स य एवमेतां संहितां वेद, सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन, सर्वमायुरेति ॥२॥ | |||
| verse_line2 = यथाऽसौ दिव्यादित्य एवमिदं शिरसि चक्षुः, यथाऽसावन्तरिक्षे विद्युदेवमिदमात्मनि हृदयम्, यथाऽयमग्निः पृथिव्याम् एवम् इदमुपस्थे रेतः। एवमु ह स्म सर्वलोकमात्मानमनुविधायाऽह इदमेव पृथिव्या रूपम् इदं दिवः । स य एवमेतां संहितां वेद, सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन, सर्वमायुरेति ॥२॥ | |||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V08" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V08"> | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V08 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S01_V08_B01 | ||
| text = | | text = उर्व्यादीनां चतुर्णां च देह एव स्थितिं पुनः । | ||
अधरार्धस्य चोर्व्याश्च साम्यमन्यस्य वै दिवा । | |||
वाचो वृष्ट्यैव साम्यं च पर्जन्येनैव चाऽत्मनः । | |||
तेषां तेषु स्थितिं चैव विष्णोश्च चतुरात्मनः । | |||
आकाशस्यान्तराकाशे नृसिंहस्यात्र संस्थितिम् । | |||
वायोः प्राणात्मतां चैव तत्र दाशरथेः स्थितिम् । | |||
सूर्यविद्युद्धुताशानां दृग्धृद्रेतःसु च स्थितिम् । | |||
कपिलस्य च हंसस्य जामदग्न्यस्य तेषु च । | |||
स्थितिं वदति विद्येयमपि मोक्षप्रदायिनी ॥’ इत्यादि च । | |||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V08 | ||
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| text = | | text = वर्षणाद् वृष्टिः । परं जनयतीति पर्जन्यनामा विष्णुः । सन्धिनोतीति सन्धिः, ‘धिनु= पृष्टौ’ इति धातुः । सम्यग्धारणात् सन्धाता । वर्षणमेव द्यावापृथिव्योः सन्धानम् । पर्जन्यस्थो भगवांस्तत्कर्ता ॥२॥ | ||
}} | }} | ||
{{ | </div> | ||
| verse_id = | <div class="gr-author-note">॥इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके)द्वितीयः खण्डः॥</div> | ||
| | |||
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| verse_line1 = अथातो निर्भुजप्रवादाः । पृथिव्यायतनं निर्भुजम् । दिव्यायतनं प्रतृण्णम् । अन्तरिक्षायतनम् उभयम् अन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तमुपवदेद्, अच्योष्ठा अवराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयाद् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तमुपवदेद् । अच्योष्ठा उत्तराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयाद् । यस्त्वेवोभयमन्तरेणाऽह तस्य नास्त्युपवादः । | |||
| verse_lines = अथातो निर्भुजप्रवादाः । पृथिव्यायतनं निर्भुजम् । दिव्यायतनं प्रतृण्णम् । अन्तरिक्षायतनम् उभयम् अन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तमुपवदेद्, अच्योष्ठा अवराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयाद् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तमुपवदेद् । अच्योष्ठा उत्तराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयाद् । यस्त्वेवोभयमन्तरेणाऽह तस्य नास्त्युपवादः । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V09" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V09"> | |||
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| text = | | text = ‘पृथिवीस्थो वराहस्तु संहितादेवतोदिता । | ||
दिविष्ठो वामनश्चैव सम्प्रोक्तः पददेवता । | |||
नृसिंहस्त्वन्तरिक्षस्थो भगवान् क्रमदेवता । | |||
स्वाध्यायमेवं ध्यात्वा यः करोत्यपवदेन्न तम् । | |||
तस्यापवदिता याति त्रैलोक्याद् अध एव हि । | |||
नाशमाप्नोति निरये तस्माद् अपवदेन्न तम् । | |||
गच्छस्यध इति ब्रूयाद् अन्यं ब्राह्मणतस्तथा । | |||
ब्रह्मप्राप्तेर्हि योग्यो यो ब्राह्मणः स, न चेतरः ॥’ इति च ॥ | |||
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| text = | | text = भञ्जनवर्जितत्वाद् निर्भुजं संहिता । ‘तृण(तृणु. हृ)= च्छेदने’ इति धातोः प्रतृण्णं पदम् । उभयमन्तरेण क्रमः । निर्भुजमूलत्वात् पदादीनां तद्विषयप्रवादा अपि निर्भुजप्रवादा इत्येवोच्यन्ते । | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V09 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S01_V09_B03 | ||
| text = | | text = पृथिवीस्थितपृथिवीनामकविष्ण्वायतनं पृथिव्यायतनम् इत्यादि । | ||
अवराभ्यां पृथिव्यन्तरिक्षाभ्यां च्युतोऽसीति । उत्तराभ्याम् अन्तरिक्षद्युभ्याम् । | |||
‘क्रमस्वाध्यायकृद् यस्तं विशेषेण न निन्दयेत् । | |||
लोकत्रयादपि भ्रष्टो यस्मात् तन्निन्दको भवेत् ॥’ इति च । | |||
तस्माद् अतिदुष्टत्वात् तन्निन्दको नास्त्येवेत्युक्तम्- तस्य नास्त्युपवादः इति । ‘तं कृष्णं पुण्डरीकाक्षं को नु युध्येत बुद्धिमान्’(भाग.५.६३.८) इत्यादिवत् । | |||
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| | | verse_id = AIT_C03_S01_V10 | ||
| | | document_id = AIT | ||
| chapter_id = AIT_C03 | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = यद्धि सन्धिं विवर्तयति तन्निर्भुजस्य रूपम् । अथ यच्छुद्धे अक्षरे अभिव्याहरति तत् प्रतृण्णस्य । अग्र उ एवोभयमन्तरेणोभयं व्याप्तं भवति । अन्नाद्यकामो निर्भुजं ब्रूयात् । स्वर्गकामः प्रतृण्णम् । उभयकाम उभयमन्तरेण । | |||
| verse_lines = यद्धि सन्धिं विवर्तयति तन्निर्भुजस्य रूपम् । अथ यच्छुद्धे अक्षरे अभिव्याहरति तत् प्रतृण्णस्य । अग्र उ एवोभयमन्तरेणोभयं व्याप्तं भवति । अन्नाद्यकामो निर्भुजं ब्रूयात् । स्वर्गकामः प्रतृण्णम् । उभयकाम उभयमन्तरेण ।;अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तं पर उपवदेत्, ‘पृथिवीं देवतामारः पृथिवी त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।;अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तं पर उपवदेद्, ‘दिवं देवतामारः, द्यौस्त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।;अथ यद्येनमुभयमन्तरेण ब्रुवन्तं पर उपवदेद्, ‘अन्तरिक्षं देवतामारः, अन्तरिक्षं त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।;यथा तु कथा च ब्रुवन् वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयाद् अभ्याशमेव यत् तथा स्यात् । | |||
| verse_line2 = अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तं पर उपवदेत्, ‘पृथिवीं देवतामारः पृथिवी त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V10 | ||
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| text = | | text = उपवदेद् इत्युक्तो मनुष्यमात्रः । पर उपवदेद् इत्यसुरः । सर्वशत्रुत्वात् । | ||
॥ | ‘अमुक्तियोग्यैस्तु नरैर्विदुषां निन्दने कृते । | ||
ब्रूयाल्लोकच्युतोऽसीति निन्दितोऽसुरसर्गगैः । | |||
नाशयिष्यति विष्णुस्त्वाम् अन्धे तमसि पातयेत् । | |||
इति ब्रूयान्न तु ब्रूयाद् देवसर्गात्मकं क्वचित्॥’ इति च । | |||
‘षणयोः सन्धिकरणात् संहिताध्ययनं भवेत् । | |||
विषणुस्त्विति यो ब्रूयात् पदाध्यायी भवेत सः । | |||
सन्ध्युक्तिश्च विभागश्च द्वयं व्याप्तं क्रमेण तु । | |||
तस्माद् द्विधाऽपि वचनात् क्रमाध्यायी भवेत सः ॥ | |||
भोगवृद्धिं च यो मोक्ष इच्छेद् विष्णव इत्यसौ । | |||
मोक्षकामो विष्णवे द्वयकामो द्वयं वदेत् ॥ | |||
विष्णुनामात्मकत्वाच्चाथ संहितपदक्रमाः । | |||
सर्ववेदस्थिता मोक्षतद्भोगद्वयसाधकाः ॥ | |||
तज्ज्ञानामेव नान्येषाम् इति वेदानुशासनम् । | |||
संहिताद्या ब्रुवन् वाऽपि य एवंविन्नवा ब्रुवन् ॥ | |||
परिवादं ब्रुवन्तं वा न ब्रुवन्तम् अथापि वा । | |||
यद् वदेत् तत् तथैव स्यात् क्षिप्रमेव न संशयः ॥’ इति च । | |||
अग्र एव ‘अग्र्यमेव’ उभयमन्तरेण । | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयाद् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयाद् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयाद् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माऽऽह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 | | verse_lines = न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयाद् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयाद् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयाद् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माऽऽह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = aitareya | |||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V11 | ||
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| text = | | text = द्युम्नो द्युतिस्वरूपत्वाद् विष्णुरेव प्रकीर्तितः । | ||
योऽतिक्रमति तस्याज्ञाम् अतिद्युम्नः प्रकीर्तितः(स कीर्तितः .हृ) ॥ | |||
मोक्षयोग्योऽपि(मोक्षायोग्योऽपि . हृ) यस्त्वेवम् अतिद्युम्नो भवेत् पुमान् । | |||
लोकच्युतोऽसीत्येवं तं ब्रूयान्नाज्ञास्थितं क्वचित्॥ | |||
लोकच्युतो भवेत्येनम् अपि नैव वदेत् क्वचित्। | |||
च्युतोऽसीति तु शिक्षार्थं ब्रूयान्नैवान्यथा क्वचित्॥’ इति च ॥३ ॥ | |||
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<div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयारण्यके(तृतीयप्रघट्टके तृतीयः खण्डः ॥</div> | |||
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| verse_type | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = अथातोऽनुव्याहाराः । प्राणो वंश इति विद्यात् । स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत्, शक्नुवन्तं चेन्मन्येत ‘प्राणं वंशं समधां३ँ । प्राणं मां वंशं सन्दधतं न शक्नोषीत्याह । प्राणस्त्वा वंशो हास्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् । अथ चेद् अशक्नुवन्तं मन्येत ‘प्राणं वंशं समधित्सिषन्तं नाशकः सन्धातुं प्राणस्त्वा वंशो हास्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् । | ||
| commentary1 | | verse_lines = अथातोऽनुव्याहाराः । प्राणो वंश इति विद्यात् । स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत्, शक्नुवन्तं चेन्मन्येत ‘प्राणं वंशं समधां३ँ । प्राणं मां वंशं सन्दधतं न शक्नोषीत्याह । प्राणस्त्वा वंशो हास्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् । अथ चेद् अशक्नुवन्तं मन्येत ‘प्राणं वंशं समधित्सिषन्तं नाशकः सन्धातुं प्राणस्त्वा वंशो हास्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।;यथा तु कथा च ब्रुवन् वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयाद् अभ्याशमेव यत् तथा स्यात् । न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥;४ ॥ | ||
| verse_line2 = यथा तु कथा च ब्रुवन् वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयाद् अभ्याशमेव यत् तथा स्यात् । न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V12 | ||
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| text = | | text = भगवदुपासकस्य यस्मिन् कस्मिंश्चिद् दोष उक्ते तं प्रत्युक्तिप्रकारः पूर्वं दर्शितः । अनुव्याहारशब्देन भगवदुपासनाविषय एवास्याशक्त्यादिदोषं वदतः प्रत्युक्तिरुच्यते । निर्भुजं वदन्तम् इत्यादि त्ववस्थामात्रदर्शनम् । आत्मनो ज्ञानसामर्थ्यानुसारेण वक्तव्यत्वादनुव्याहारः । | ||
}} | }} | ||
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| verse_id | | verse_id = AIT_C03_S01_V12 | ||
| | | id = AIT_C03_S01_V12_B02 | ||
| | | text = ‘सर्वाधारत्वतो वंश इत्युपासीत यो हरिम् । | ||
वायुं च, मुक्तिमाप्नोति, य एवं तदुपासकम् । | |||
निन्देत विष्णुविज्ञानविषये, तं वदेत सः । | |||
विष्णुना वंशभूतेन वायुना सहितं तथा । | |||
न शक्नोषीति मामात्थ हास्यतस्त्वाम् अतो हि तौ । | |||
ज्ञानसामर्थ्यवान् इत्थं ब्रूयाद् देवादिरुत्तमः । | |||
अन्यो गन्धर्वपित्रादिरल्पज्ञानबलो, हि यः । | |||
स ब्रूयाद् विष्णुवायुभ्यां सन्धिमिच्छन्तमेव माम्(मा. हृ) ॥ | |||
सन्धातुं नाशको यस्माद् हास्यतस्त्वाम् अतो हि तौ ॥’ इति च । | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V12 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S01_V12_B03 | ||
| text = | | text = स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत्, प्राणं प्रत्येनमुपासकमुपवदेत्- ‘प्राणस्य विष्णोः प्रियत्वं तव न प्राप्स्यति’ इति । नाशकः सन्धातुम्, मया सह सन्धानं कर्तुं नाशकः । मम प्रीतिं कर्तुं नाशकः । | ||
‘तद्भक्तभक्तेष्वपि यो न कुर्यात् प्रीतिमञ्जसा । | |||
विष्णुर्जहाति तं पापम् इह चामुत्र च प्रभुः ॥’ इति च भारते ॥४ ॥ | |||
}} | }} | ||
</div> | |||
<div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयारण्यके(तृतीयप्रघट्टके चतुर्थः खण्डः ॥</div> | |||
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| verse_id | | verse_id = AIT_C03_S01_V13 | ||
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| verse_type | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = अथ खल्वाहुर्निर्भुजवक्त्राः- ‘पूर्वमक्षरं पूर्वरूपम्, उत्तरम् उत्तररूपम्, योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सा संहिता’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । | ||
| verse_line2 = | | verse_lines = अथ खल्वाहुर्निर्भुजवक्त्राः- ‘पूर्वमक्षरं पूर्वरूपम्, उत्तरम् उत्तररूपम्, योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सा संहिता’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।;अथ वयं ब्रूमो निर्भुजवक्त्रा इति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः- ‘पूर्वमेवाक्षरं पूर्वरूपम्, उत्तरमुत्तररूपम्, योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण, येन सन्धिं विवर्तयति, येन स्वरास्वरं विजानाति, येन मात्रामात्रां विभजते सा संहिता’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद, सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।;अथ हास्य पुत्र आह मध्यमः प्रातीबोधीपुत्रः- ‘अक्षरे खल्विमे अविकर्षन् अनेकीकुर्वन् यथावर्णमाह । तद् याऽसौ मात्रा पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सन्धिविज्ञपनी साम तद् भवति । सामैवाहं संहितां मन्ये’ इति । | ||
| commentary1 | | verse_line2 = अथ वयं ब्रूमो निर्भुजवक्त्रा इति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः- ‘पूर्वमेवाक्षरं पूर्वरूपम्, उत्तरमुत्तररूपम्, योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण, येन सन्धिं विवर्तयति, येन स्वरास्वरं विजानाति, येन मात्रामात्रां विभजते सा संहिता’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद, सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । | ||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V13" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V13"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V13 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S01_V13_B01 | ||
| text = | | text = ‘पूर्ववर्णस्थितं यत्तद् रूपं पूर्वाक्षराभिधम् । | ||
वराहाख्यं हरेरन्यवर्णगं वामनाभिधम् । | |||
उत्तराक्षरसंज्ञं च, वर्णयोरन्तरस्थितम् । | |||
अवनात् काशनाच्चैतद् अवकाशाभिधं हरेः । | |||
नृसिंहरूपमित्याहुर्निर्भुजास्यास्तथाऽवदन्(त्) । | |||
ह्रस्वो येनाक्षरोच्चारो मात्रासन्धिस्वरात्मकः । | |||
व्यासरूपो हरिः साक्षात् संहितानामकस्त्विति । | |||
तत्पुत्रो मध्यमः प्राह समोच्चारणकारणः । | |||
सामनामा वासुदेवः संहितानामवानिति ॥’इति च । | |||
मापयति त्रायति चेति मात्रा भगवान् । यथोच्चारितवर्णयोर्मध्यस्थितश्च । | |||
}} | |||
}} | |||
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| | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
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| verse_line1 = तदप्येतदृषिणोक्तम्– ‘बृहस्पते न परः साम्नो विदुः’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = तदप्येतदृषिणोक्तम्– ‘बृहस्पते न परः साम्नो विदुः’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ ५ ॥ | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V14" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V14"> | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S01_V14_B01 | ||
| text = | | text = ‘मा नः तेनेभ्यो ये अभिद्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः ।’(ऋ.सं.२.२३.१६) | ||
‘येषां नैतन्नापरं किञ्चनैकं ब्रह्मणस्पते ब्रूहि तेभ्यः कदाचित्।’ | |||
‘अथो शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः ।’ | |||
इति | ‘आ देवानामोहते वि व्रयो(वि ब्रयो. हृ) हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः ।’(ऋ.सं.२.२३.१६) | ||
अभिद्रुहस्पदे अभितो द्रोहस्य= नित्यनिरतिशयदुःखस्य अन्धतमसो(अन्धतमसस्य इति ताम्रपर्णीयपाठः) योग्याः । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
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| text = | | text = ‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः । | ||
शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथावादबला जनाः । | |||
कामक्रोधाभिभूतत्वाद् अहङ्कारवशं गताः । | |||
याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः । | |||
ब्रह्मस्तेना निरानन्दा अपक्वमनसोऽशिवाः । | |||
वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते । | |||
तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ॥’ | |||
इति मोक्षधर्मे भगवद्वचनाद् एवंविधा एव ‘स्तेनाः’ ‘अभिद्रुहस्पदस्थाः’ च । | |||
}} | }} | ||
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| text = | | text = ‘निरामिणः’ रामस्य रमणरूपस्य पूर्णानन्दस्वरूपस्य विष्णोर्जीवस्वरूपताज्ञानेन(स्वरूपतादिज्ञानेन- हृ) नीचताविदः । त एव(तत एव)) रिपवश्च तस्य । | ||
‘अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । | |||
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् । | |||
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । | |||
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥’(भ.गी.९.११-१२) | |||
इत्यादिवचनाद् असुरादयः । अन्नेषु जागृधुः भोगमात्रगृध्नवः । | |||
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| text = | | text = येषामेतत् सर्वोत्तमं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म नास्तीति पक्षः । ईशितव्ये विद्यमाने हीश्वरो भवतीति । न चापरं किञ्चित् । परमापेक्षया ह्यपरमिति । किं तर्हि ? किञ्चनैकम् । किमप्येकमेव वस्त्वस्ति न परमपरं चेति तेषां पक्षः । | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
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| text = | | text = ‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । | ||
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥ | |||
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । | |||
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ | |||
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥’(भ.गी.१६.८-९) इत्यादि वचनात् । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
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| text = | | text = ब्रह्मणस्पते ! ब्रह्मणः= वेदस्य पते वायो ! ‘अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः’(बृ.उ.३.३.७), ‘एष उ एव ब्रह्मणस्पतिः । वाग्वै ब्रह्म । तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः । वाग्धि बृहती’(बृ.उ.३.३.२१)इत्यादि श्रुतेः । एतादृशेभ्यो मा ब्रूहि । | ||
शमेन= विष्णुनिष्ठया उप= समीपे तस्मिन्नेव रताः साम्नः= विष्णोः परं किमपि न विदुः । तदेव देवानां व्रयः । सर्वदेवानां परतमं विष्ण्वाख्यं ब्रह्म हृदा व्योहते । वासुदेवादिरूपेण वरं नियामकं चेति व्रयः । तेभ्यो ब्रूहि । | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S01_V14_B07 | ||
| text = | | text = ‘वायुं विद्याः समासाद्य सर्वासां पतिमूचिरे । | ||
स्तेनेभ्यो मैव नो ब्रूहि ब्रूह्यथो वैष्णवेषु च ॥’ इति च । | |||
‘सामनाम्ना श्रुतिर्यस्माद् विष्णुमाह ततः प्रियम् । | |||
तन्नाम विष्णोरिह तु संहितार्थं वदेद् यतः ॥’ इति वचनात् सामनाम्नः संहिताशब्दार्थत्वाद्, विष्णोस्तस्य नाम्नः श्रुतिसिद्धत्वाच्च सामनाम्नोः वासुदेवरूपसमाख्यासु पञ्चरात्रे पठितत्वाच्च तद् रूपं संहितानामकमिति युक्तमित्यभिप्रायः ॥५ ॥ | |||
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| verse_line1 = स | | verse_line1 = बृहद्-रथन्तरयो रूपेण संहिता सन्धीयत इति तार्क्ष्यः । वाग्वै रथन्तरस्य रूपम् । प्राणो बृहतः । उभाभ्यामु खलु संहिता सन्धीयते वाचा च प्राणेन च । एतस्यां ह स्मोपनिषदि संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । एतस्यां ह स्म मात्रायां संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । तदप्येतदृषिणोक्तं– ‘रथन्तरमाजभारा वसिष्ठः’(ऋ.सं.१०.१८१.१), ‘भरद्वाजो बृहदा चक्रे अग्नेः’(ऋ.सं.१०.१८१.२) इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । | ||
| commentary1 | | verse_lines = बृहद्-रथन्तरयो रूपेण संहिता सन्धीयत इति तार्क्ष्यः । वाग्वै रथन्तरस्य रूपम् । प्राणो बृहतः । उभाभ्यामु खलु संहिता सन्धीयते वाचा च प्राणेन च । एतस्यां ह स्मोपनिषदि संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । एतस्यां ह स्म मात्रायां संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । तदप्येतदृषिणोक्तं– ‘रथन्तरमाजभारा वसिष्ठः’(ऋ.सं.१०.१८१.१), ‘भरद्वाजो बृहदा चक्रे अग्नेः’(ऋ.सं.१०.१८१.२) इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । | ||
| commentary1 = aitareya | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V15 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S01_V15_B01 | ||
| text = | | text = ‘देवता पूर्ववर्णस्य लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता । | ||
नारायणस्तूत्तरस्य तौ वाक्प्राणाभिधौ मतौ । | |||
मध्यस्थः संहितानामा सोऽर्धनारीपुमात्मकः । | |||
वेदात्मकत्वाद् वाङ्नाम्नी लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता । | |||
प्राणनामा प्रणेतृत्वात् साक्षान्नारायणः स्वयम् । | |||
रमित्यानन्द उद्दिष्टः सम्भोग्यं थमुदाहृतम् । | |||
विष्णुभोग्या रतितरा लक्ष्मीरेव रथन्तरम् । | |||
नारायणो बृहत्वात्तु बृहन्नामा प्रकीर्तितः । | |||
रथन्तरस्य बृहतो देवते चैव तावुभौ । | |||
वाक् प्राणसंस्थितौ चैव ताभ्यामेव हि सन्धितम् । | |||
लक्ष्मीनारायणं रूपं संहितानामकं शुभम् । | |||
एतां विद्यामवाप्तुं हि वत्सरं गा अरक्षत । | |||
तार्क्ष्य एतावन्मात्रं(तार्क्ष्य एतन्मात्रं च- हृ) च समुद्दिश्य न चापरम् । | |||
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| verse_id | | verse_id = AIT_C03_S01_V16 | ||
| document_id | | document_id = AIT | ||
| chapter_id | | chapter_id = AIT_C03 | ||
| verse_type | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = ‘वाक् प्राणेन संहिता’ इति कौण्ठरव्यः । प्राणः पवमानेन, पवमानो विश्वैर्देवैः, विश्वेदेवाः स्वर्गेण लोकेन, स्वर्गो लोको ब्रह्मणा । सैषाऽवरपरा संहिता । | ||
| verse_line2 = | | verse_lines = ‘वाक् प्राणेन संहिता’ इति कौण्ठरव्यः । प्राणः पवमानेन, पवमानो विश्वैर्देवैः, विश्वेदेवाः स्वर्गेण लोकेन, स्वर्गो लोको ब्रह्मणा । सैषाऽवरपरा संहिता ।;स यो हैतामवरपरां संहितां वेद, एवं हैव स प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सन्धीयते । यथैषा संहिता । | ||
| commentary1 | | verse_line2 = स यो हैतामवरपरां संहितां वेद, एवं हैव स प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सन्धीयते । यथैषा संहिता । | ||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V16 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S01_V16_B01 | ||
| text = | | text = संहितादेवता बह्व्य इति कुण्ठरवात्मजः । | ||
द्वयं द्वयं देवतानां मिलितं हरिशर्ववत् । | |||
संहितानामकं तत्र वर्णमध्यस्य देवता । | |||
तयोरेकं देवतयोः परमन्यत् तथाऽवरम् । | |||
अवरस्य परस्यापि संयोगात् संहिता तु सा । | |||
प्रोक्ताऽवरपरेत्येव, वाक् प्राणाख्यौ रमाऽच्युतौ । | |||
संहितैका, तथैवान्या केशवो वायुसंयुतः । | |||
वायुः स पवमानाख्यो देवताश्चाखिला अपि । | |||
तृतीया संहिता प्रोक्ता, देवतास्ताः सशङ्कराः । | |||
चतुर्थी संहिता प्रोक्ता, शङ्करो ब्रह्मणा सह । | |||
पञ्चमी संहिता चैव संहिता मोक्षदा इमाः । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V16 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S01_V14_B02 | ||
| text = | | text = प्रथमायां द्वितीयायां विष्णुरेव परो मतः । | ||
तृतीयायां वायुरेव, चतुर्थ्यां सर्वदेवताः । | |||
विरिञ्च एव पञ्चम्याम्, अवरा इतरे ततः । | |||
प्रथमायां संहितायाम् अवरो वामभागगः । | |||
द्वितीयायां तु परमस्तृतीयायां तथाऽवरः । | |||
चतुर्थ्यां परमश्चैव पञ्चम्यां वामगोऽवरः । | |||
अवराद्याः परान्ता यद् एताः सर्वाश्च संहिताः । | |||
ततोऽवरपराः प्रोक्ता नैवोक्तास्ताः परावराः । | |||
अभिमानी द्युलोकस्य शिवः सर्वस्य लोकनात् । | |||
द्योतनाच्च .... | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = स यदि परेण वोपसृतः स्वेन वाऽर्थेनाभिव्याहरेद्, अभिव्याहार्षन्नेव विद्यात् । ‘दिवं संहिताऽगमद् विदुषां देवानामेवं भविष्यति’ इति । शश्वत् तथा स्यात् । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । | ||
| commentary1 | | verse_lines = स यदि परेण वोपसृतः स्वेन वाऽर्थेनाभिव्याहरेद्, अभिव्याहार्षन्नेव विद्यात् । ‘दिवं संहिताऽगमद् विदुषां देवानामेवं भविष्यति’ इति । शश्वत् तथा स्यात् । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । | ||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V17 | ||
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| text = | | text = .... यदि ब्रूयान्मन्त्रमेतमथापि वा । | ||
आत्मार्थेऽथ परार्थे वा चिन्तयेदेवमञ्जसा । | |||
‘विद्वांसो देवता यस्मात् सम्यक् तेन महत् फलम् ॥ | |||
तेषामेव, हरिश्चैव संहितारूपकः प्रभुः । | |||
अगमद् देवलोकं हि कर्तुं देवेष्वनुग्रहम् ॥’ | |||
इति चिन्तयतस्तेषां प्रसादात् फलमञ्जसा । | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = वाक् संहितेति पञ्चालचण्डः। वाचा वै वेदा सन्धीयन्ते । वाचा च्छन्दांसि । वाचा मित्राणि सन्दधति । वाचा सर्वाणि भूतानि । अथो वागेवेदं सर्वमिति । | ||
| commentary1 | | verse_lines = वाक् संहितेति पञ्चालचण्डः। वाचा वै वेदा सन्धीयन्ते । वाचा च्छन्दांसि । वाचा मित्राणि सन्दधति । वाचा सर्वाणि भूतानि । अथो वागेवेदं सर्वमिति ।;तद् यत्रैतदधीयते वा भाषते वा वाचि तदा प्राणो भवति । वाक् तदा प्राणं रेळ्हि । अथ यत्र तूष्णीं वा भवति, स्वपिति वा, प्राणे तदा वाग् भवति । प्राणस्तदा वाचं रेळ्हि । तावन्योन्यं रीळ्हः । वाग् वै माता । प्राणः पुत्रः ।;तदप्येतदृषिणोक्तम्–;‘एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश।;स इदं विश्वं भुवनं विचष्टे ।;तं पाकेन मनसाऽपश्यमन्तितः।;तं माता रेळ्हि स उ रेळ्हि मातरम् ॥’(ऋ.सं.१०.११४.४) इति ।;स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ | ||
| verse_line2 = तद् यत्रैतदधीयते वा भाषते वा वाचि तदा प्राणो भवति । वाक् तदा प्राणं रेळ्हि । अथ यत्र तूष्णीं वा भवति, स्वपिति वा, प्राणे तदा वाग् भवति । प्राणस्तदा वाचं रेळ्हि । तावन्योन्यं रीळ्हः । वाग् वै माता । प्राणः पुत्रः । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V18 | ||
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| text = | | text = पञ्चालचण्डो वाचं तु ब्रह्माणीं हि सरस्वतीम् । | ||
मन्यतेऽस्याः पुत्रवच्च देवं नारायणं प्रभुम् । | |||
वेदैर्हि व्यज्यते विष्णुः सा च वेदाभिमानिनी । | |||
प्राणस्थो भगवान् विष्णुः प्राणनामा प्रणेतृतः । | |||
ब्रह्मणोऽपि पिता नित्यं भगवान् पुरुषोत्तमः । | |||
उपचर्यते पुत्र इति वेदैर्यद् व्यज्यते हरिः । | |||
}} | सा देवी संहितानाम्नी वाच्योऽस्या विष्णुरेव हि ॥ | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = अथातः प्रजापतिसंहिता । जाया पूर्वरूपम्, पतिरुत्तररूपम्, पुत्रः सन्धिः, प्रजननं सन्धानम्। सैषाऽदितिः संहिता । अदितिर्हीदं सर्वं यदिदं किञ्च, पिता च माता च पुत्रश्च प्रजननं च। तदप्येतदृषिणोक्तम्– ‘अदितिर्माता स पिता स पुत्रः’(ऋ.सं.१.८९.१०) इति । | ||
| commentary1 | | verse_lines = अथातः प्रजापतिसंहिता । जाया पूर्वरूपम्, पतिरुत्तररूपम्, पुत्रः सन्धिः, प्रजननं सन्धानम्। सैषाऽदितिः संहिता । अदितिर्हीदं सर्वं यदिदं किञ्च, पिता च माता च पुत्रश्च प्रजननं च। तदप्येतदृषिणोक्तम्– ‘अदितिर्माता स पिता स पुत्रः’(ऋ.सं.१.८९.१०) इति ।;स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति सर्वमायुरेति ॥ ६ ॥ | ||
| verse_line2 = स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति सर्वमायुरेति ॥ ६ ॥ | |||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
<div class="gr-author-note">॥ इति षष्ठः खण्डः॥</div> | |||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S01_V19_B01 | ||
| text = | | text = प्रजापत्याख्यशर्वेण प्रोक्ताऽन्या संहिताऽपि हि । | ||
विष्णुरेवादितिर्नाम सर्वस्यात्ता यतः प्रभुः । | |||
स एव पितृसंस्थस्तु पातृत्वात् पितृनामकः । | |||
देवतोत्तरवर्णस्य मातृस्थो मातृनामकः । | |||
माननात्, पूर्ववर्णस्य देवतेति प्रकीर्तितः । | |||
पोषकत्वात् सन्धिनामा वर्णयोरन्तरस्थितः । | |||
स एव पुत्रसंस्थश्च पुत्रनामा जनार्दनः । | |||
त्राणात् पू्तित एवासौ, वर्णसन्धानकर्मणि । | |||
सन्धाननामा सन्धानकर्तृत्वात् पुरुषोत्तमः । | |||
प्रजातिकर्मसंस्थश्च स एव प्रजनाभिधः । | |||
जनकत्वात् परो विष्णुरेवं विष्णुर्हि संहिता । | |||
वासुदेवादिरूपेण चतुर्धैवं व्यवस्थितः । | |||
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| verse_id | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 | ||
| | | id = AIT_C03_S01_V19_B02 | ||
| | | text = स एव दिवि संस्थश्च द्युनामा क्रीडनात् प्रभुः । | ||
अन्तरेवेक्षणाच्चैव सोऽन्तरिक्षोऽन्तरिक्षगः । | |||
पृथिवी पृथिवीस्थश्च प्रथितत्वाज्जनार्दनः । | |||
मुख्यार्थत्वात् सर्वनाम्नां सर्वदेवाभिधो हरिः | |||
विश्वे देवा इति प्रोक्तो बहुधा तेषु संस्थितः । | |||
ज्ञानद्युतेर्देवनामा स्थितो देवेषु केशवः । | |||
गां धारयंश्च गन्धर्वो गन्धर्वेषु व्यवस्थितः । | |||
माननान्मानुषो नाम मानुषेषु स्थितो हरिः(प्रभुः) । | |||
पालनात् पितृनामाऽसौ पितृष्वेव व्यवस्थितः । | |||
रतेः प्राणेऽसुराख्यश्च सोऽसुरेषु व्यवस्थितः । | |||
एवं पञ्चजनेषुस्थो हरिः पञ्चजनाभिधः । | |||
जातनामा जातसंस्थः प्रादुर्भूतगुणत्वतः । | |||
जनिक्रियास्थितश्चासौ जनित्वमिति गीयते । | |||
जनिं यस्मात् तवयति, तवनं हि प्रकाशनम् ॥इति च ॥ | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S01_V19_B03 | ||
| text = | | text = प्रथश्च सप्रथश्चैव राजानौ मत्स्यदेशजौ । | ||
यापयामासतुर्विष्णोर्हविर्नाम्नो हविर्मुखे । | |||
अनुष्टुब्देवता यस्तु नृसिंहो जगतोऽस्य च । | |||
स्वमुखे हवनादेव हविरित्यभिधीयते । | |||
तस्मिन् यज्ञे वसिष्ठस्तु चतूरूपाज्जनार्दनात् । | |||
आजहार श्रियं देवीं रथन्तरवराभिधाम् । | |||
चतुर्मूतिः स्तुतस्तेन प्रेषयामास तां श्रियम् । | |||
सा चास्मै प्रददौ विद्यां प्रययौ च पुनर्हरिम् । | |||
धातेत्युक्तोऽनिरुद्धस्तु प्रद्युम्नस्तु द्युनामकः(द्युतानकः हृ.) । | |||
वासुदेवः प्रसविता सर्वस्य प्रसवाद् विभुः(प्रभवाद् प्रभुः) । | |||
सङ्कर्षणो विष्णुनामा प्रणेतृत्वाद् बलादपि । | |||
}} | }} | ||
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| verse_id | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 | ||
| | | id = AIT_C03_S01_V19_B03 | ||
| | | text = चतूरूपं परं विष्णुं राजानौ प्रथसप्रथौ । | ||
भरद्वाजो वसिष्ठश्च ध्यात्वाऽविन्दन् परात् परम् । | |||
यजनीयो यजुर्नामा विष्णुः सङ्कर्षणाभिधः । | |||
जीवानां स्कन्दनादेव स्कन्नः प्रद्युम्न उच्यते । | |||
प्रथमो वासुदेवस्तु देवयानोऽनिरुद्धकः । | |||
प्राप्यो देवैर्यतो नित्यम् अनिरुद्धाभिधो हरिः । | |||
तस्मादेवं चतुर्मूर्तेः स्तुतिसन्तोषिताद्धरेः । | |||
आजहार भरद्वाजो रूपं नारायणाभिधम् । | |||
तद् बृहन्नामकं विष्णोश्चातुरात्म्यात् समुद्गतम् । | |||
भरद्वाजमुपागम्य प्रादान्मोक्षवरं परम् । | |||
चतुर्मूर्तिः स भगवानग्निरित्यभिधीयते । | |||
अग्र्यत्वात् सर्वभूतानाम् ........ | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S01_V19_B03 | ||
| text = | | text = .......... एवं चत्वार एव ते । | ||
अविन्दंस्तं चतुर्मूर्तिं साक्षान्नारायणं प्रभुम् । | |||
गुहायां संस्थितमपि ह्यतीव हितमस्य च । | |||
सर्वज्ञत्वाद् यज्ञनाम्नो विष्णोस्तेजः परं हि तत् । | |||
तस्मादेव चतुर्मूर्तेः सूरिप्राप्यत्वहेतुतः । | |||
सूर्यनाम्नोऽहरन् घर्मनामानं तं नृसिंहकम् । | |||
घर्षणात् सर्वलोकस्य नृसिंहो घर्म उच्यते । | |||
निर्गत्य स चतुर्मूर्तेर्विप्रक्षत्राभिसंस्तुतात् । | |||
प्रथादीनां चतुर्णां च पुरुषार्थचतुष्टयम् । | |||
दत्वा जगाम भगवान् स्वकीयां तनुमेव च । | |||
वसिष्ठाच्च भरद्वाजाद् होत्रध्वर्य्वोर्नृपौ तु तौ । | |||
यथेष्टसिद्धिं सम्प्राप्तौ सम्यगिष्टाज्जनार्दनात् ॥ इत्याद्यृग्वेदसंहितायाम् । | |||
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| | | text = यस्य प्रथ इति नाम स च हविर्नाम्नो विष्णोर्हविर्यत्= अयत् । अटो लोपेनान्तर्णीतणिच्त्वेन अयापयद् इत्यर्थः । एवं सप्रथ इति यस्य नामासौ हविर्यदिति पृथक् सम्बन्धः । | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 | ||
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| text = | | text = आचक्रे= आकारयामास । ‘अविन्दन् ते’, ‘तेऽविन्दन्’ इत्यध्यात्म-अधिदैवतयोरुभयत्रापि भगवन्तम् अविन्दन्नित्यर्थः । ‘देवयानम्’, ‘गुहायद्’ इति वचनात् । | ||
इति | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S01_V19_B01 | ||
| text = | | text = ‘चतुःशिखण्डां तु रमां द्विरूपो भगवान् हरिः । | ||
परमानन्दरूपत्वात् सुपर्ण इतिनामकः । | |||
रमयामास तस्यां च निषण्णः सर्वदैव सः । | |||
एक एव च विष्णुः स प्रविष्टः क्षीरसागरम् । | |||
सर्वं पश्यत्यसौ देवः पूर्णाकुण्ठेन चेतसा । | |||
परिपक्वेन मनसाऽपश्यमित्याह तं त्वजः । | |||
मातेव व्यञ्जकत्वात् तं प्राणस्थं वाक् सरस्वती । | |||
लिहते लिह्यत इव प्राणस्थेन तु सा सदा । | |||
स्वयं तु भगवान् विष्णुर्वाक्पतेर्ब्रह्मणोऽपि हि । | |||
नित्यः पिता स्वतन्त्रश्च नास्य माता पिताऽपि वा(च) ॥’ इत्यादि च ॥ ६ ॥ | |||
}} | }} | ||
</div> | |||
<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके(तृतीयप्रघट्टके) प्रथमोऽध्यायः ॥</div> | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = प्राणो वंश इति स्थविरः शाकल्यः । तद् यथा शालावंशे सर्वेऽन्ये वंशाः समाहिताः स्युः, एवमस्मिन् प्राणे चक्षुः श्रोत्रं मनो वाग् इन्द्रियाणि शरीरं सर्व आत्मा समाहितस्तस्यैतस्याऽत्मनः प्राण ऊष्मरूपम् । अस्थीनि स्पर्शरूपं मज्जानः स्वररूपम् । मांसं लोहितम् इत्येतद् अन्यच्चतुर्थम् अन्तःस्थरूपम् ।(ह स्माऽह) | ||
| commentary1 | | verse_lines = प्राणो वंश इति स्थविरः शाकल्यः । तद् यथा शालावंशे सर्वेऽन्ये वंशाः समाहिताः स्युः, एवमस्मिन् प्राणे चक्षुः श्रोत्रं मनो वाग् इन्द्रियाणि शरीरं सर्व आत्मा समाहितस्तस्यैतस्याऽत्मनः प्राण ऊष्मरूपम् । अस्थीनि स्पर्शरूपं मज्जानः स्वररूपम् । मांसं लोहितम् इत्येतद् अन्यच्चतुर्थम् अन्तःस्थरूपम् ।(ह स्माऽह) | ||
| commentary1 = aitareya | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V01 | ||
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| text = | | text = गृहस्याऽच्छादनादीनां मध्यवंशो यथाऽऽश्रयः । | ||
तथेन्द्रियाभिमान्यादिदेवानां वायुराश्रयः । | |||
तेषु सर्वेषु भगवान् बहुरूपो हरिः स्थितः । | |||
विष्णुनामाऽक्षरेष्वेवम् अन्येष्वपि तदर्थतः । | |||
प्राणनामा तु(अपि) भगवान् प्राणस्थश्चोष्मसु स्थितः । | |||
ऊष्मनामा समर्थत्वात् स एव भगवान् हरिः । | |||
पूर्णत्वाद् आत्मनामाऽसौ, प्रतिमात्वाद् अमुष्य तु । | |||
सङ्घात आत्मशब्दोक्तो, ह्यस्थिरश्चास्थिनामकः । | |||
अस्थिस्थितो हरिः स्पर्शसंस्थितः स्पर्शनामकः । | |||
स्पर्शहेतुत्वतः स्पर्शनामा स भगवान् हरिः । | |||
मज्जासुस्थः स मज्जाख्यो मदं जनयतीति ह । | |||
स एव स्वरसंस्थश्च स्वराख्यः स्वरतेः प्रभुः । | |||
प्रमाणं सारयेद् यस्मान्मांसाख्यो मांससंस्थितः । | |||
लोहिताख्यो रक्तवर्णो लोहितस्थो जनार्दनः । | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = इति ह स्माऽह ह्रस्वो माण्डूकेयः- त्रयं त्वेव न एतत् प्रोक्तम् । तस्यैतस्य त्रयस्यास्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति, त्रीणीतः षष्टिशतानि, त्रीणीतस्तानि सप्तविंशतिशतानि भवन्ति । | ||
| commentary1 | | verse_lines = इति ह स्माऽह ह्रस्वो माण्डूकेयः- त्रयं त्वेव न एतत् प्रोक्तम् । तस्यैतस्य त्रयस्यास्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति, त्रीणीतः षष्टिशतानि, त्रीणीतस्तानि सप्तविंशतिशतानि भवन्ति । | ||
| commentary1 = aitareya | |||
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| text = | | text = अस्थिस्थान्येव रूपाणि पर्वस्वपि हरेर्यतः । | ||
तत एव विभक्तानि सङ्ख्या तेषां पृथङ् न तत् । | |||
तस्मात् सप्तशतान्येव देहे विंशच्च तस्य हि । | |||
रूपाणि विष्णोर्भागे तु षष्ठ्युत्तरशतत्रयम् । | |||
}} | }} | ||
{{ | </div> | ||
| verse_id = | {{VerseBlock | ||
| | | verse_id = AIT_C03_S02_V03 | ||
| | | document_id = AIT | ||
| chapter_id = AIT_C03 | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = सप्त च वै शतानि विंशतिश्च संवत्सरस्याहोरात्राः स एषोऽहःसम्मानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा । | |||
| verse_lines = सप्त च वै शतानि विंशतिश्च संवत्सरस्याहोरात्राः स एषोऽहःसम्मानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा ।;स य एवमेतमहःसम्मानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेद, अह्नां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति, सर्वमायुरेति ॥;१ ॥ | |||
| verse_line2 = स य एवमेतमहःसम्मानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेद, अह्नां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति, सर्वमायुरेति ॥ | |||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V03 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S02_V03_B01 | ||
| text = | | text = तान्येव विष्णो रूपाणि वत्सराहस्सु सर्वशः । | ||
अहर्नामा च भगवान् अहार्यत्वात् प्रकीर्तितः । | |||
अहोभिः समसङ्ख्यानि यस्माद् अध्यात्मगानि तु । | |||
रूपाणि विष्णोस्तेनायम् अहस्सम्मान उच्यते । | |||
पूर्णदर्शनशक्तित्वाच्चक्षुर्मय इतीरितः (उदीरितः) । | |||
तादृक् श्रवणशक्तित्वाद् तथा श्रोत्रमयः स्मृतः । | |||
छन्दोमयः सत्यकामो मन्तृवक्तृबलात्मकः । | |||
एवं विद्वांस्तस्य रूपाण्याप्नोति ज्ञानपुत्रवान् ॥ | |||
पीयमानं शमाप्नोति प्राप्याहर्नामकं हरिम् ॥ १ ॥ | |||
}} | }} | ||
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<div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके) प्रथमः खण्डः ॥</div> | |||
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| verse_type | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = अथ कौण्ठरव्यः- त्रीणि षष्टिशतान्यक्षराणाम्, त्रीणि षष्टिशतान्यूष्मणाम्, त्रीणि षष्टिशतानि सन्धीनाम् । | ||
| | | verse_lines = अथ कौण्ठरव्यः- त्रीणि षष्टिशतान्यक्षराणाम्, त्रीणि षष्टिशतान्यूष्मणाम्, त्रीणि षष्टिशतानि सन्धीनाम् ।;यान्यक्षराण्यवोचामाहानि तानि, यानूष्मणोऽवोचाम रात्रयस्ताः, यान् सन्धीन् अवोचामाहोरात्राणां ते सन्धय इत्यधिदैवतम् । | ||
| verse_line2 = यान्यक्षराण्यवोचामाहानि तानि, यानूष्मणोऽवोचाम रात्रयस्ताः, यान् सन्धीन् अवोचामाहोरात्राणां ते सन्धय इत्यधिदैवतम् । | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 | ||
| | | document_id = AIT | ||
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| verse_line1 = अथाध्यात्मम्- यान्यक्षराण्यधिदैवतमवोचाम, अस्थीनि तान्यध्यात्मम् । यानूष्मणोऽधिदैवतमवोचाम, मज्जानस्तेऽध्यात्मम् । एष ह वै सम्प्रति प्राणो यन्मज्जा । एतद्रेतेः । न ह वा ऋते प्राणाद् रेतः सिच्यते । यद् वा ऋते प्राणाद् रेतः सिच्येत, पूयेद् न सम्भवेत् । यान् सन्धीन् अधिदैवतमवोचाम पर्वाणि तान्यध्यात्मम् । तस्यैतस्य त्रयस्य, अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति । पञ्चेतश्चत्वारिंशच्छतानि, पञ्चेतः । तदशीतिसहस्रं भवति, अशीतिसहस्रं वा अर्कलिनो बृहतीरहरभिसम्पादयन्ति । | |||
| verse_lines = अथाध्यात्मम्- यान्यक्षराण्यधिदैवतमवोचाम, अस्थीनि तान्यध्यात्मम् । यानूष्मणोऽधिदैवतमवोचाम, मज्जानस्तेऽध्यात्मम् । एष ह वै सम्प्रति प्राणो यन्मज्जा । एतद्रेतेः । न ह वा ऋते प्राणाद् रेतः सिच्यते । यद् वा ऋते प्राणाद् रेतः सिच्येत, पूयेद् न सम्भवेत् । यान् सन्धीन् अधिदैवतमवोचाम पर्वाणि तान्यध्यात्मम् । तस्यैतस्य त्रयस्य, अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति । पञ्चेतश्चत्वारिंशच्छतानि, पञ्चेतः । तदशीतिसहस्रं भवति, अशीतिसहस्रं वा अर्कलिनो बृहतीरहरभिसम्पादयन्ति ।;स एषोऽक्षरसंमानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा ।;स य एवम् एतम् अक्षरसम्मानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेद, अक्षराणां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ॥२ ॥ | |||
| verse_line2 = स एषोऽक्षरसंमानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
{{ | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S02_V04" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S02_V04"> | ||
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| | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 | ||
| | | id = AIT_C03_S02_V04_B01 | ||
| text = ‘एवमुक्तप्रकारेण तस्य ह्यक्षरनामकम् । | |||
अशीत्युत्तरसाहस्ररूपं वर्णेषु संस्थितम् । | |||
विष्णुनाम्नोऽथवाऽन्येषु पञ्चाशत्सङ्ख्यकेष्वपि । | |||
तावत् सङ्ख्यानि, देहेषु पृथङ् मज्जास्थिपर्वसु । | |||
रूपाणि विष्णोस्तावन्ति चेष्टकानि(चेष्टकासु) पृथक् पृथक् । | |||
अर्कस्थितबृहत्याख्यरूपाण्यह्नां च सर्वशः । | |||
सम्पादकानि तान्येव, तान्यक्षरमितानि च । | |||
अस्थ्यादिस्थितरूपाणि तान्युपास्य विमुच्यते ॥’ इति च । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 | ||
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| text = | | text = तस्यैतस्याऽत्मनः तस्य शरीराख्यस्याऽत्मनो य आत्मा आदानादिकर्ता तस्य परमात्मन एतस्य । अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणां च मिलितानामपि विंशोत्तरसप्तशतत्वोक्तेरपि तत्रस्थविष्णुरूपाण्येवोच्यन्त इति सिद्धम् । अस्थ्यादीन्येव चेदशीत्युत्तरसहस्राणि सन्ति हि । | ||
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| verse_id | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 | ||
| | | id = AIT_C03_S02_V04_B03 | ||
| | | text = ‘ष्(विष्)’ ‘ण्’ ‘ष्णुः’ इत्येतानि विष्णुनामगतान्यूष्माक्षरसन्धिनामकानि तद्गतभगवद्रूपाणि मुख्यतस्तन्नामकानि । | ||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 | ||
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| text = | | text = अहार्यत्वादहर्नामा रात्रिनामा रतिप्रदः । | ||
सन्धानात् सन्धिनामाऽसौ स्वयं नारायणः प्रभुः । | |||
सन्ध्यूष्माक्षरगाण्यस्य विष्णो रूपाणि सर्वशः । | |||
सन्ध्यारात्रिदिवास्थानि साशीतिकसहस्रकम् । | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 | ||
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| text = | | text = तान्येवास्थिषु मज्जासु पर्वस्वपि च सर्वशः । | ||
परज्ञानात् तु पर्वाणि विष्णो रूपाणि तानि हि । | |||
अस्थानान्मदनाच्चैव ह्यस्थिमज्जाभिधानि च । | |||
व्यक्तिर्मज्जासु तस्यैव प्राणो मज्जासु संस्थितः । | |||
मज्जैव रेतो भवति रेतसिस्थो विशेषतः । | |||
प्राणस्तेन हि तद्रेतोयुक्तं प्राणेन सर्वदा । | |||
यदि प्राणो न तद्रेतो न गर्भत्वं व्रजेत् क्वचित्। | |||
विशेषप्राणसम्बन्धवर्जितान्यत एव हि । | |||
न मांसादीनि गर्भत्वं यान्त्यतः स हि रेतसि । | |||
विशेषेण स्थितः प्राणः प्राणे चैव विशेषतः । | |||
स्थितो नारायणो देवस्तस्मान्मज्जासु च स्थितः ॥इति च । | |||
}} | }} | ||
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| text = | | text = मज्जास्वधिकसन्निधानज्ञापनार्थम् इदं वचनम् । अशीत्युत्तरसहस्रवर्णानाम् अभावाच्च तत्स्थविष्णुरूपाण्येव तत्सङ्ख्यानीति सिद्धम् । अर्के निलीनत्वेनादृश्यत्वेन स्थिता भगवत्प्रादुर्भावा अर्कलिनः । त एव शरीरे स्थित्वा सहस्रं बृहतीः सम्पादयन्ति । वाक् प्रेरकत्वाद् । विष्णुनामार्थवत्वादेव च बृहतीसहस्रस्य तद्देवताश्चैतान्येवाशीत्युत्तरसहस्ररूपाणि । एतान्येव अहःप्रवर्तकानि च । अहःशब्देन यज्ञो दिवसश्चोभावप्यभिप्रेतौ । | ||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 | ||
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| text = | | text = ‘यज्ञानां दिवसानां च साशीतिकसहस्रकैः । | ||
विष्णुः प्रवर्तको रूपैर्बृहत्युक्थस्य चाञ्जसा ॥ | |||
बृहत्युक्थेन वाच्यानि रूपाण्येतान्यधीशितुः ॥’ इति च ॥ २ ॥ | |||
इति च | |||
}} | }} | ||
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<div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके) द्वितीयः खण्डः ॥</div> | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = चत्वारः पुरुषा इति बाध्वः- ‘शरीरपुरुषश्छन्दःपुरुषो वेदपुरुषो महापुरुषः’ इति । | ||
| commentary1 | | verse_lines = चत्वारः पुरुषा इति बाध्वः- ‘शरीरपुरुषश्छन्दःपुरुषो वेदपुरुषो महापुरुषः’ इति ।;शरीरपुरुष इति यमवोचाम, स य एवायं दैहिक आत्मा । तस्य योऽयमशरीरः प्रज्ञात्मा स रसः ।;छन्दःपुरुष इति यमवोचाम, अक्षरसमाम्नाय एव । तस्यैतस्याकारो रसः ।;वेदपुरुष इति यमवोचाम, येन वेदान् वेद, ऋग्वेदं यजुर्वेदं सामवेदम् । तस्यैतस्य ब्रह्मा रसः । तस्माद् ब्रह्माणं ब्रह्मिष्ठं कुर्वीत, यो यज्ञस्योल्बणं पश्येत् ।;महापुरुष इति यमवोचाम, संवत्सर एव प्रध्वंसयन् अन्यानि भूतानि, ऐक्याभावयन्नन्यानि तस्यैतस्यासावादित्यो रसः । | ||
| verse_line2 = शरीरपुरुष इति यमवोचाम, स य एवायं दैहिक आत्मा । तस्य योऽयमशरीरः प्रज्ञात्मा स रसः । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S02_V05_B01 | ||
| text = | | text = संसारबाधितैः प्राप्यो बाध्वो वायुरुदाहृतः । | ||
स हि मोक्षप्रदो विष्णोराज्ञया स उवाच ह । | |||
सर्वदेहाभिमानी तु शरीरपुरुषः शिवः । | |||
सर्ववर्णाभिमानी च शेषोऽसौ छान्दसः पुमान् । | |||
सर्ववेदाभिमान्येव गरुडो वेदपूरुषः । | |||
संवत्सराभिमानी तु ब्रह्मैव हि महापुमान् । | |||
सारः शिवस्यानिरुद्धनामा देहस्थितो हरिः । | |||
अ इत्याक्रियते यस्माद् वासुदेवो ह्यकारकः । | |||
शेषस्य सारः स विभुर्ब्रह्माख्यो ज्ञानबृंहणात् । | |||
सङ्कर्षणाख्यस्तु हरिः सारः स गरुडस्य च । | |||
ब्रह्मर्त्विक्संस्थितश्चासौ तस्माद् ब्रह्मिष्ठमेव हि । | |||
कुर्याद् ब्रह्मर्त्विजं तस्मिन् विशेषेण स्थितो हरिः । | |||
ब्रह्मणः सारभूतस्तु प्रद्युम्नो भगवान् हरिः । | |||
स एवाऽदित्यसंस्थश्च स ह्यादिर्जगतो विभुः । | |||
ततश्च सर्वभूतेषु जीवानां विनियामकः । | |||
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| verse_id | | verse_id = AIT_C03_S02_V06 | ||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्य एकमेतदिति विद्यात् तस्मात् पुरुषं पुरुषं प्रत्यादित्यो भवति । | ||
| | | verse_lines = स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्य एकमेतदिति विद्यात् तस्मात् पुरुषं पुरुषं प्रत्यादित्यो भवति ।;तदप्येतदृषिणोक्तं–;‘चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः ।;आ प्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥’(ऋ.सं.१.११५.१) इति । | ||
| commentary1 | | verse_line2 = तदप्येतदृषिणोक्तं– | ||
| commentary1 = aitareya | |||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V06 | ||
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| text = | | text = स एवाऽदित्यगो विष्णुर्यः प्रद्युम्नाभिधो हरिः । | ||
स एव सर्वदेहेषु चानिरुद्धतनुः स्थितः । | |||
सङ्कर्षणो वासुदेव इत्येकः स चतुर्विधः । | |||
प्रतिपूरुषमेतस्मात् स्थितो विष्णुर्नियामकः । | |||
आदित्यादिषु च स्थित्वा द्योतकोऽसौ प्रति प्रति । | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V06 | ||
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| text = | | text = स चेतनतमत्वाद्धि चित्रमित्यभिधीयते । | ||
मुख्यत्वात् सर्वदेवानामननादीशितृत्वतः । | |||
कर्तृत्वादप्यनीकं स उदैत् सूर्यस्थितो हरिः । | |||
ज्ञानदत्वाच्च देवानां चक्षुरेतेन दर्शनात् । | |||
आपूरयन् सर्वलोकान् प्रकाशेन जनार्दनः । | |||
आदानात् सर्वजीवानाम् अत्तृत्वात् प्रलयेऽपि च । | |||
आत्मेत्युक्तः स भगवान् जगतः स्थावरस्य च । | |||
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| verse_line1 = एताम् अनुविधं संहितां सन्धीयमानां मन्य इति ह स्माऽह बाध्वः । एतां ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्ते । एतमग्नावध्वर्यवः । एतं महाव्रते छन्दोगाः । एतमस्याम्, एतं दिवि, एतं वायौ, एतमाकाशे, एतमप्सु, एतमोषधीषु, एतं वनस्पतिषु, एतं चन्द्रमसि, एतं नक्षत्रेषु, एतं सर्वेषु भूतेषु एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते । | |||
| verse_lines = एताम् अनुविधं संहितां सन्धीयमानां मन्य इति ह स्माऽह बाध्वः । एतां ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्ते । एतमग्नावध्वर्यवः । एतं महाव्रते छन्दोगाः । एतमस्याम्, एतं दिवि, एतं वायौ, एतमाकाशे, एतमप्सु, एतमोषधीषु, एतं वनस्पतिषु, एतं चन्द्रमसि, एतं नक्षत्रेषु, एतं सर्वेषु भूतेषु एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते ।;स एष संवत्सरसंमानश्चक्षुर्मयः, श्रोत्रमयः, छन्दोमयः, मनोमयः, वाङ्मय आत्मा ।;स य एवमेतं संवत्सरसंमानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयम् आत्मानं परस्मै शंसति, | |||
| verse_line2 = स एष संवत्सरसंमानश्चक्षुर्मयः, श्रोत्रमयः, छन्दोमयः, मनोमयः, वाङ्मय आत्मा । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V07 | ||
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| text = | | text = एवं चतुर्विधो विष्णुः संहितादेवता यदा । | ||
ज्ञायते पूर्ववर्णस्य रूपं नारायणाभिधम् । | |||
प्रादुर्भावाः समस्ताश्च चरमार्णस्य देवताः । | |||
तदा तु संहितां सम्यङ् मन्येऽहं सन्धितामिति । | |||
आह वायुरिमं विष्णुं बृहत्युक्थस्य(बृहदुक्थस्य- हृ) देवताम् । | |||
महाव्रताख्यस्तोत्रस्य चेष्टकानां च देवताम् । | |||
एतमेवाखिलजगद् व्याप्तं पूर्णगुणात्मकम् । | |||
संवसद्रतिदातृत्वाद् ब्रह्मा संवत्सराभिधः । | |||
नियामकः स जीवानां सर्वेषां प्रभुरीश्वरः । | |||
अनन्तमूर्तिर्ब्रह्माऽसावनन्तजगदास्थितः । | |||
नियामकस्तस्य विष्णुस्तावद्रूपेषु संस्थितः । | |||
तत् संवत्सरसम्मानः स विष्णुः परमेश्वरः ॥ ३ ॥ | |||
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<div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके) तृतीयः खण्डः ॥</div> | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = दुग्धदोहा अस्य वेदा भवन्ति । न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति । न वेद सुकृतस्य पन्थानम् इति । | ||
| commentary1 | | verse_lines = दुग्धदोहा अस्य वेदा भवन्ति । न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति । न वेद सुकृतस्य पन्थानम् इति । | ||
| commentary1 = aitareya | |||
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S02_V08" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S02_V08"> | |||
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| text = | | text = य एनं वक्त्ययोग्येभ्यो योऽथवैनं महाव्रते । | ||
कर्मण्याचार्यतोऽन्यस्य शंसेत पितृतोऽथवा । | |||
महाव्रतेन स्तोत्रेण स्तुवीतैनमथापि वा । | |||
महाव्रते चितिं वाऽपि कुर्यान्नास्य फलं श्रुतेः । | |||
सुकृतस्य फलं चैव नासौ सम्यगवाप्स्यति । | |||
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| text = | | text = प्रत्यक्षज्ञानिनोऽप्येतद् आनन्दह्रासकृद् भवेत् । | ||
प्रत्यक्षज्ञानिनो मोक्षो न कथञ्चिद्धि हीयते । | |||
आचार्यमेव तं विद्याद् गुणैर्यः स्वात्मनोऽधिकः । | |||
गुणाधिकस्य तेनैव शंसनादि न दुष्यति । | |||
अयोग्यस्योपदेशे तु कृते हौत्रादिकेऽपि वा । | |||
प्रायश्चित्तार्थमेतत्तु शंसीत शतवारकम् । | |||
अन्यथा मानुषेष्वेव जायते न दिवं व्रजेत् । | |||
योग्या अस्यास्तु विद्याया देवा ऋषय एव च । | |||
एकदेशज्ञानयोग्या मानुषा उत्तमा यदि ॥ | |||
}} | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = तदप्येतदृषिणोक्तम्– | ||
| | | verse_lines = तदप्येतदृषिणोक्तम्–;यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति ।;यदीं शृणोत्यलकं शृणोति न हि प्र वेद सुकृतस्य पन्थाम्(ऋ.सं.१०.७१.६) ॥ इति ।;‘न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति, न वेद सुकृतस्य पन्थानम्’ इत्येतत् तदुक्तं भवति तस्मादेवं विद्वान् न परस्मा अग्निं चिनुयाद् । न परस्मै महाव्रतेन स्तुवीत । न परस्मा एतदहः शंसेत् । कामं पित्रे वाऽऽचार्याय वा शंसेद् । आत्मन एवास्य तत् कृतं भवति । | ||
| verse_line2 = यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति । | |||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V08 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S02_V08_B02 | ||
| text = | | text = कर्मसञ्चयवेत्तारं त्यजेन्नारायणं हि यः । | ||
प्रीत्यैकदेशसंस्थत्वात् सखायमिति चोदितम् । | |||
न विद्यायाः फलं तस्य श्रुतं च नरकावहम् । | |||
नैव प्राप्नोति सुकृतं सन्त्यागात् परमात्मनः । | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V08 | ||
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| text = | | text = मुख्यत्यागो हरेरेष यन्नास्तीति वदेदमुम् । | ||
तत्समं वाऽधिकं वाऽपि ब्रूयादैक्यमथापि वा । | |||
ऐश्वर्यादिगुणानां वा ह्रासं नास्तित्वमेव वा । | |||
तत्प्रसादं विना मोक्षं ब्रूयाद् वा कस्यचित् क्वचित्। | |||
ऐक्यं वा ब्रह्मशर्वादेर्मुक्तावैक्यम् अथापि वा । | |||
व्यत्यासं चावताराणां जीवाभेदम् अमुष्य वा । | |||
भेदज्ञानं तद्गुणानां तेन वाऽथ मिथोऽपि वा । | |||
तथैव तत्क्रियाणां च तद्रूपाणामथापि वा । | |||
असाम्यदर्शनं वाऽपि तद्रूपाणां (तद्गुणानां) परस्परम् । | |||
देहदेहिविभेदं च तस्मिन्नवयवेषु वा । | |||
परस्परं भेददृष्टिं तेन वा कुत्रचित् क्वचित्। | |||
दोषसंसर्गमस्यापि स्वतः परत एव वा । | |||
अज्ञानतो ज्ञानतो वा, निर्देहत्वममुष्य च । | |||
तद्देहस्य प्राकृतत्वम् अचिदानन्ददेहताम् । | |||
प्रादुर्भावेष्वपि विभोर्देहत्यागोद्भवादिकम् । | |||
अज्ञानदुःखासामर्थ्यपारवश्यादिकं तथा । | |||
अतद्वशत्वं कस्यापि कदाचित् क्वचिदप्युत । | |||
परिमाणं बलादेर्वा तस्य विष्णोर्महात्मनः । | |||
भेदाभेददृशिर्वाऽस्य जीवैर्वा स्वगुणादिभिः । | |||
तर्कैस्तस्यापलापो वा तत्र रक्तेन चेतसा । | |||
त्यागानामेवमुक्तानां तर्काद्यैः साधनं तथा । | |||
अचिन्त्यविभवेऽप्यस्मिन्नसम्भवनिरूपणम् । | |||
स एष मुख्यतस्त्यागो वासुदेवस्य कीर्तितः । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V08 | ||
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| text = | | text = रमाब्रह्मादिकानां च तारतम्यानभिज्ञता । | ||
संशयश्चोक्ततत्त्वेषु जगन्मिथ्यात्वदर्शनम् । | |||
अस्मृतिर्वासुदेवस्य तद्भक्तानां च निन्दनम् । | |||
द्वितीय एष त्यागस्तु विष्णोरेव प्रकीर्तितः । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V08 | ||
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| text = | | text = निषिद्धकर्मकरणं विहितस्य च वर्जनम् । | ||
त्यागस्तृतीयो हि हरेः, चतुर्थोऽयोग्यपूरुषे । | |||
उपदेशः केशवस्य यथाशास्त्रोदितक्रमात् । | |||
आचार्यपित्रोरन्यत्र तथैव च महाव्रते । | |||
हौत्रौद्गात्राध्वर्यवाणि, त्याग एव चतुर्विधः । | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V08 | ||
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| text = | | text = त्यागद्वयात् तु प्रथमात् प्राप्यतेऽन्धन्तमः क्रमात् । | ||
तृतीयान्निरयप्राप्तिश्चतुर्थान्न दिवं व्रजेत् । | |||
उपदिष्टेऽपि यस्तत्त्वे संशयं कुरुते पुमान् । | |||
सोऽन्धन्तमो व्रजेदन्यो निरयायैव गच्छति । | |||
स एव भगवान् विष्णुरेतैदोषैर्विना यदि । | |||
ज्ञायते मुक्तिदः साक्षान्नात्र कार्या विचारणा । | |||
यदि ज्ञानं नातिपक्वं सरागं च मनो भवेत् । | |||
तदा स्वर्गादिलोकाप्तिः संशयश्चेत् क्वचित् क्वचित्। | |||
आवृत्तिरेव संसारे यावन्निःसशंयो भवेत् । | |||
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| verse_id | | verse_id = AIT_C03_S02_V08 | ||
| | | id = AIT_C03_S02_V08_B07 | ||
| | | text = पुनरावृत्तिहीनं तु तमोऽन्धं मुक्तिरेव च । | ||
पूर्वं तु निःसुखं तत्र, निर्दुःखं चापरं मतम् । | |||
निश्शेषगुणहीनं च पूर्वम्, निर्दोषकं परम् । | |||
विमिश्रगतयस्त्वन्याः पुनरावृत्तिसंयुताः । | |||
असुरा देवता मर्त्या योग्या एतेषु च क्रमात् । | |||
न च तेषां सङ्करोऽस्ति यथायोग्या हि तद्गतिः । | |||
मानुषेषूत्तमा मुक्तिम् अधमा निरयं तथा । | |||
आप्नुवन्ति मनुष्येषु मध्यमाः सृतिभागिनः । | |||
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| text = | | text = नियमोऽयं नान्यथा स्याद्, अच्छिद्रत्वं यथा भवेत् । | ||
दोषेऽथवा गुणे वाऽपि तदा दैत्याः सुरा अपि । | |||
स्वां स्वां गतिं समायान्ति तावत् संसारभागिनः । | |||
अच्छिद्रत्वं नैव सर्वैः कदाचित् प्राप्यते यतः । | |||
सृष्टिस्थितिलयादीनां नोच्छेदस्तेन कुत्रचित् । | |||
तस्माद् दोषान् प्रहायैव विष्णुं सर्वोत्तमोत्तमम् । | |||
जानीयात् तेन मुक्तिः स्याद् अपरोक्षदृशेरनु । | |||
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| | | verse_id = AIT_C03_S02_V09 | ||
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न | | chapter_id = AIT_C03 | ||
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| verse_line1 = स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्ये, एकमेतदित्यवोचाम । तौ यत्र विहीयेते । चन्द्रमा इवाऽदित्यो दृश्यते, न रश्मयः प्रादुर्भवन्ति । लोहिनी द्यौर्भवति यथा मञ्जिष्ठाः । व्यस्तः पायुः । काककुलायगन्धिकमस्य शिरो वायति । सम्परेतोऽस्याऽत्मा न चिरमिव जीविष्यतीति विद्यात् । स यत्करणीयं मन्येत, तत्कुर्वीत । ‘यदन्ति यच्च दूरके’(ऋ.सं.९.६७.२१) इति सप्त जपेत् । ‘आदित् प्रत्नस्य रेतस’ इत्येका । ‘यत्र ब्रह्मा पवमान’ इति षट् । ‘उद्वयं तमसस्परि’ इत्येका । | |||
| verse_lines = स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्ये, एकमेतदित्यवोचाम । तौ यत्र विहीयेते । चन्द्रमा इवाऽदित्यो दृश्यते, न रश्मयः प्रादुर्भवन्ति । लोहिनी द्यौर्भवति यथा मञ्जिष्ठाः । व्यस्तः पायुः । काककुलायगन्धिकमस्य शिरो वायति । सम्परेतोऽस्याऽत्मा न चिरमिव जीविष्यतीति विद्यात् । स यत्करणीयं मन्येत, तत्कुर्वीत । ‘यदन्ति यच्च दूरके’(ऋ.सं.९.६७.२१) इति सप्त जपेत् । ‘आदित् प्रत्नस्य रेतस’ इत्येका । ‘यत्र ब्रह्मा पवमान’ इति षट् । ‘उद्वयं तमसस्परि’ इत्येका । | |||
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| text = | | text = सूर्यमण्डलगो विष्णुर्देहे चक्षुषि संस्थितः । | ||
अनिरुद्धश्च हृदये न च भेदोऽनयोः क्वचित्। | |||
अन्येषामपि रूपाणाम् इति विद्याद् विचक्षणः । | |||
द्विरूपः स यदा विष्णुरपगच्छति देहतः । | |||
तदैव दुर्निमित्तानि जायन्ते नान्यदा क्वचित्। | |||
तस्मात् तेषां दर्शने तु कर्तव्यं पारलौकिकम् । | |||
सर्वमेव, जपेच्चैव यदन्तीत्यादिका ऋचः । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V09 | ||
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| text = | | text = ऋग्भिः षडि्भर्वायुरेव पवमानादिनामकः । | ||
स्तूयते सोऽङ्गनेतृत्वाद् अग्निरित्यभिधीयते । | |||
परस्य ब्रह्मणो विष्णोर्ज्ञापनाख्यप्रसूतिभिः । | |||
वायुः पुनाति यल्लोकान् सविता तेन कथ्यते । | |||
पवित्रं नाम साक्षात् तत् परं ब्रह्म जनार्दनः । | |||
प्रसादयित्वा तं विष्णुं तेन लोकान् पुनात्यसुः । | |||
ज्ञानाख्यप्रसवेनापि स्वयं वायुः पुनात्ययम् । | |||
प्राणाग्नेरर्चिषो देहे विततास्तेषु केशवः । | |||
अर्चिष्मान् विततो नित्यं वायुस्तेन पुनात्ययम्(पुनात्यलम्- हृ) । | |||
यत्र ब्रह्मेति षडि्भश्च प्रार्थनीयः स मारुतः । | |||
मोचयित्वैव संसारद् विष्णोर्लोके कृधीति च । | |||
आदित्प्रत्नस्येति विष्णुः स्तुत्यो वैकुण्ठलोकगः । | |||
आदित्यमण्डलस्थश्च साक्षान्नारायणः प्रभुः । | |||
उद्वयं त्वितिमन्त्रेण स्तुत्यो वायोरपीश्वरः । | |||
अपमृत्युभयं तस्य यदन्तीत्यृग्जपाद् व्रजेत् । | |||
कालमृत्युर्यदि भवेत् तथा जन्मादिकं भयम् । | |||
अन्याभिः कर्मतः पूतो यत्र ब्रह्मेति वैष्णवम् । | |||
लोकं व्रजेत् तथाऽन्याभ्यां विष्णुर्मोक्षसुखप्रदः । | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V09 | ||
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| text = | | text = इष्टप्रदानशीलत्वाद् इन्दुर्वायुः स एव च । | ||
सोमः सौम्यस्वरूपत्वात्, पवमानश्च पावनात् । | |||
विष्णुः पुरातनत्वात् तु प्रत्नो, रेतो महारतिः । | |||
देवत्रा देव एवासौ सर्वदेवेश्वरो यतः । | |||
सूर्यश्च सूरिभिः प्राप्यो नित्यानन्दो रमापतिः । | |||
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| verse_line1 = अथापि यत्र च्छिद्र इवाऽदित्यो दृश्यते, रथनाभिरिवाभिख्यायेत, च्छिद्रां वा छायां पश्येत्, तदप्येवमेव विद्यात् । अथाप्यादर्शे वोदके वा जिह्मशिरसं वाऽशिरसं वाऽऽत्मानं पश्येद्, विपर्यस्ते वा कन्याके जिह्मेन वा दृश्येयाताम्, तदप्येवमेव विद्यात् । | |||
| verse_lines = अथापि यत्र च्छिद्र इवाऽदित्यो दृश्यते, रथनाभिरिवाभिख्यायेत, च्छिद्रां वा छायां पश्येत्, तदप्येवमेव विद्यात् । अथाप्यादर्शे वोदके वा जिह्मशिरसं वाऽशिरसं वाऽऽत्मानं पश्येद्, विपर्यस्ते वा कन्याके जिह्मेन वा दृश्येयाताम्, तदप्येवमेव विद्यात् ।;अथाप्यपिधायाक्षिणी उपेक्षेत, तद् यथा बटरकाणि सम्पतन्तीव दृश्यन्ते, तानि यदा न पश्येत्, तदप्येवमेव विद्यात् ।;अथाप्यपिधाय कर्णावुपशृणुयात्, स एषोऽग्निरिव प्रज्वलतो, रथस्येवोपब्दिस्तं यदा न शृणुयात्, तदप्येवमेव विद्यात् । अथापि यत्र नील इवाग्निर्दृश्यते यथा मयूरग्रीवा, मेघे वा विद्युतं पश्येत्, मेघे वा विद्युतं न पश्येत्, महामेघे वा मरिचीरिव पश्येत, तदप्येवमेव विद्यात् । अथापि यत्र भूमिं ज्वलन्तीमिव पश्येत तदप्येवमेव विद्याद् इति प्रत्यक्षदर्शनानि । | |||
| verse_line2 = अथाप्यपिधायाक्षिणी उपेक्षेत, तद् यथा बटरकाणि सम्पतन्तीव दृश्यन्ते, तानि यदा न पश्येत्, तदप्येवमेव विद्यात् । | |||
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| verse_line1 = अथ स्वप्नाः- पुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति, स एनं हन्ति, वराह एनं हन्ति, मर्कट एनमास्कन्दयति, आशु वायुरेनं प्रवहति, सुवर्णं खादित्वाऽपगिरति, मध्वश्नाति, बिसानि भक्षयति, पुण्डरीकं धारयति, खरैर्वराहैर्युक्तैर्याति, कृष्णां धेनुं कृष्णवत्सां नलदमाली दक्षिणामुखो व्राजयति । | |||
| verse_lines = अथ स्वप्नाः- पुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति, स एनं हन्ति, वराह एनं हन्ति, मर्कट एनमास्कन्दयति, आशु वायुरेनं प्रवहति, सुवर्णं खादित्वाऽपगिरति, मध्वश्नाति, बिसानि भक्षयति, पुण्डरीकं धारयति, खरैर्वराहैर्युक्तैर्याति, कृष्णां धेनुं कृष्णवत्सां नलदमाली दक्षिणामुखो व्राजयति ।;स यद्येतेषां ककिञ्चित् पश्येद्, उपोष्य पायसं स्थालीपाकं श्रपयित्वा, रात्रिसूक्तेन प्रत्यृचं हुत्वा, अन्येनान्नेन ब्राह्मणान् भोजयित्वा चरुं स्वयं प्रश्नीयात् ।;स योऽतोऽश्रुतोऽगतोऽमतोऽनतोऽदृष्टोऽविज्ञातोऽनादिष्टः । श्रोता मन्ता द्रष्टाऽदेष्टा घोष्टा विज्ञाता प्रज्ञाता सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः सम आत्मेति विद्यात् ॥ ४ ॥ | |||
| verse_line2 = स यद्येतेषां ककिञ्चित् पश्येद्, उपोष्य पायसं स्थालीपाकं श्रपयित्वा, रात्रिसूक्तेन प्रत्यृचं हुत्वा, अन्येनान्नेन ब्राह्मणान् भोजयित्वा चरुं स्वयं प्रश्नीयात् । | |||
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{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S02_V10_B01 | ||
| text = | | text = देशतः कालतश्चैव गुणतश्चापि पूर्तितः । | ||
अत इत्युच्यते विष्णुः सन्ततो ह्यत उच्यते । | |||
तृतीयवर्णोऽतिशये यतस्तेनातिरेव वा । | |||
अत इत्युच्यते विष्णुः सम्यक् श्रुत्याद्यशक्यतः । | |||
पूर्णत्वाद् भगवान् विष्णुरश्रुतत्वादिनोदितः । | |||
}} | }} | ||
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| verse_id | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 | ||
| | | id = AIT_C03_S02_V10_B02 | ||
| | | text = अन्तस्थः सर्वजीवानां पूर्णत्वात् पुरुषाभिधः । | ||
समः स सर्वरूपेषु सर्वजीवनियामकः । | |||
इति विद्यात् परं विष्णुं मुच्यते तेन संसृतेः ॥’ इत्यादि च । | |||
शरीरपुरुषादीनां प्राप्यत्वात्, तदुपास्यत्वात्, तेषां नियामकत्वेन तेभ्योऽप्यत्युत्तमत्वेन तेषु स्थितत्वाच्च तेषां सार इत्युच्यते भगवान् । यद् ईम् एव । अलकं अरकम् । यत्ककिञ्चिच्छृणोति तत् सर्वम् अरतिरूपान्धतमःप्राप्तिकारणमेव तस्य भवति । तत्र हि सर्वरत्यभावः, रतिविरुद्धदुःखं च पूर्णम् । | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S02_V10_B03 | ||
| text = | | text = परस्मै शंसनमात्राद् अरतिरेव ! इत्यतः प्रस्तुते चतुर्थत्यागेन न तस्य वाच्यपि भागोऽस्ति, न हि प्र वेद सुकृतस्य पन्थाम् इति दोषद्वयमेवेत्यव-धारयति- न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति, न वेद सुकृतस्य पन्थानम् इत्येतत् तदुक्तं भवति इति । अलकं शृणोति इति त्यागद्वयस्य मुख्यतः, तृतीयस्यापि नरकं शृणोतीति किञ्चिद् भवति । | ||
तौ यदैवास्माच्छरीराद् विहीयेते तदैव तानि निमित्तानि पश्यन्तीति नियमः । न च तदा पश्यत्येवेति । | |||
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| verse_id | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 | ||
| | | id = AIT_C03_S02_V10_B04 | ||
| | | text = वासेन रमयतीति वासरं विष्णुर्ज्योतिः । | ||
‘यत्र ब्रह्मा वेदवाक्यं व्याचक्षाणो मखैर्यजन् । | |||
सोमेन च सुतेनेशमास्ते लोके हरेर्हि सः ॥’ इति स्कान्दे । | |||
ग्राव्णा सोमविषये सोमेनेष्ट्वा महीयते, तेनैव विष्णुप्रीत्या स्वस्याऽनन्दं जनयन् । | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 | ||
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| text = | | text = स्वर् आनन्दरूपो विष्णुः । दिवो देव्या अवरोधनं तस्याः परिवारभूताः सर्वदेव्यः । द्यौर्नाम वायुपत्नी । ‘अजनयो मरुतो वक्षणाभ्यो दिव आ वक्षणाभ्यः’(ऋ.सं.१.१३४.४) इत्यादेः । यह्वतीः स्यन्दमानाः । | ||
‘सर्वेष्टद जगत्प्राण मामादाय परिस्रव । | |||
यत्रासौ भगवान् विष्णुस्त्वं हि मोक्षप्रदः सदा ॥’ इति च । | |||
‘इन्दुरिष्टप्रदत्वाद् यो वायुरादाय गच्छति । | |||
इन्द्रनाम्नः केशवस्य समीपं मुक्तमञ्जसा ॥’ इति च । | |||
‘अनन्यहेतुकं साक्षाद् भगवद्भक्तिरूपकम् । | |||
सुखमानन्द इत्युक्तो मोदो भोगनिमित्तकः । | |||
प्रमोदस्तद्विशेषोत्थो मुन्नामात्यल्पभोगतः ॥’ इत्यृग्वेदसंहितायाम् । | |||
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| verse_id | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 | ||
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| | | text = तमसः सकाशाद् उद्गता वयम् उत्तरं सर्वोत्तमं विष्ण्वाख्यं ज्योतिः परिपश्यन्तः तमेव देवत्रा देवं देवविषयेऽपि देवम् अगन्म । तदेव ज्योतिष्ट्वेनोत्तरत्वेन च पश्यन्त इति दर्शने इत्थम्भावविधानार्थं पूर्वम् । तथैवासौ भगवानुत्तमं ज्योतिः, न राजादिष्विवाविद्यमानभक्तिमात्रम् इदम् इति ज्ञापयितुम् ‘अगन्म ज्योतिरुत्तमम्’ इति पुनर्वचनम् । | ||
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| text = | | text = ‘अर्चिषोंऽशा वर्तुलास्तु नाम्ना वटरकाः स्मृताः’ इति शब्दनिर्णये । | ||
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| | | id = AIT_C03_S02_V10_B08 | ||
| | | text = ‘बृहत्तमं मधु यदि सहापूपं प्रभक्षयेत् । | ||
स्वप्ने तस्याचिरान्मृत्यू रक्ताब्जे वा शिरोधृते ॥’ इति ब्रह्माण्डे । | |||
}} | }} | ||
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| text = | | text = ‘रात्र्यास्तु देवता दुर्गा दुःस्वप्ने सा प्रपूजिता । | ||
पायसेन हरेन्मृत्युं रात्रिसूक्तादकालिकम् । | |||
यदि कालिकमृत्युः स्यात् पदं सा परमं नयेत् । | |||
सहैव विष्णुना भक्तं विष्णोस्तद्वेदिनं तथा । | |||
रतिदत्वात् परो विष्णुर्मुख्यतो रात्रिरुच्यते । | |||
तदाश्रयत्वाद् दुर्गाऽपि रात्रीरित्यभिधीयते । | |||
स्त्रीरूपः स परो विष्णुः पायसेष्टो हि मोक्षदः । | |||
तस्मादुभौ सहैवेज्यौ भक्त्या दुःस्वप्नदर्शने । | |||
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| | | text = बहुभिर्नयनैर्विष्णुर्बहुधेदं ददर्श ह । | ||
आयन् सर्वेषु लोकेषु धृतास्तेनैव हि श्रियः ॥ | |||
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| text = | | text = नीचान् उच्चांश्च जीवान् स ब्रह्मादीन् उर्वपूरयत् । | ||
ज्ञानेन बाधतेऽज्ञानं......... | |||
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| text = | | text = ...............स्वसारं स्वं तथाऽकरोत् । | ||
उषआख्यं शुक्लवर्णं प्रमदारूपमेव च । | |||
तमश्चापाकरोत्येव तदा(सदा) सूर्यादिषु स्थितः । | |||
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| | | text = स नः स्वामी यदुदरे यमनाद् यामनामके । | ||
आविक्ष्महि वयं सर्वे वृक्षे यद्वत् पतत्रिणः । | |||
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| id = | | id = AIT_C03_S02_V10_B11 | ||
| text = | | text = शेनाख्यास्तु सुखीनत्वाद् आ समन्तात् सुरोत्तमाः । | ||
पद्वन्तो मानुषाश्चैव पादमात्रप्रयायिनः । | |||
ग्रामाख्या बहुलत्वात्तु दैत्या एव प्रकीर्तिताः । | |||
अर्थिनस्तु कृतार्थत्वान्मुक्ता एव श्रुताः श्रुतौ । | |||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S02_V10_B11 | ||
| text = | | text = ऊरीकृतप्रमाणत्वाद् ऊर्म्यः स भगवान् हरिः । | ||
वृकास्तेनैव निर्याप्याः वृकाः क्रूरत्वतोऽसुराः । | |||
तत्स्वभावाश्च वृक्याः स्युः स्तेनास्तत्र महासुराः । | |||
ब्रह्मस्तेना यतस्ते हि नित्यमैकात्म्यवेदिनः । | |||
विष्णुः सुखतरश्चैव भक्तानां भवति प्रभुः । | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 | ||
| id = | | id = AIT_C03_S02_V10_B11 | ||
| text = | | text = कृष्णं व्यक्तं तमोऽज्ञानम् अज्ञानां पेशलं हि तत् । | ||
तद् यातयत्यृणमिव भगवान् पुरुषोत्तमः । | |||
स एव चोषाः कथितः प्रकाशत्वाज्जनार्दनः । | |||
स | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 | ||
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| text = | | text = जयिनः स्तोममिव च ब्राह्मणाय यथा च गाः । | ||
उपाकरं तथा स्तोमं तवाहं तद् (वृ)गृणीष्व च । | |||
द्यौरिति ज्ञानमुद्दिष्टं तद्व्यङ्गत्वाज्जनार्दनः । | |||
दुहिता दिव इत्युक्तः.........। | |||
}} | }} | ||
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| text = | | text = ......... एवमर्थेन पूज्यते ॥ | ||
रात्रीसूक्तेन भगवान् साक्षान्नारायणः प्रभुः । | |||
तत्सन्निधानाद् दुर्गाया एषोऽर्थ उपचारतः । | |||
एवं स्तुतस्तथैवेष्टो भगवान् मोक्षदो भवेत् । | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 | ||
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| text = | | text = यदन्तीत्याद्यृचः सर्वा अपि दुःस्वप्नदर्शने । | ||
जप्या एव, विशेषोऽयं होमो दुःस्वप्नदर्शने । | |||
परोक्षज्ञानिनो विष्णुरापरोक्ष्यं व्रजेत् त्वरन् । | |||
अपरोक्षदृशः प्रीतः सुखाधिक्यं करोत्यतः । | |||
मुक्तस्य, द्विविधैस्तस्माज्जपो योगश्च सर्वथा । | |||
कर्तव्यो, न्यासिभी रात्रिसूक्तं जप्यं त्रिशोऽञ्जसा ॥ इत्यैतरेयसंहितायाम् ॥ ४ ॥ | |||
}} | }} | ||
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<div class="gr-author-note">॥इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके)चतुर्थः खण्डः॥</div> | |||
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| verse_line1 = अथ खल्वियं सर्वस्यै वाच उपनिषत् । सर्वा ह्येवेमाः सर्वस्यै वाच उपनिषदः । इमां त्वेवाऽचक्षते । पृथिव्या रूपं स्पर्शाः, अन्तरिक्षस्योष्माणः, दिवः स्वराः । अग्ने रूपं स्पर्शाः, वायोरुष्माणः, आदित्यस्य स्वराः । ऋग्वेदस्य रूपं स्पर्शाः, यजुर्वेदस्योष्माणः, सामवेदस्य स्वराः । चक्षुषो रूपं स्पर्शाः, श्रोत्रस्योष्माणः, मनसः स्वराः । प्राणस्य रूपं स्पर्शाः, अपानस्योष्माणः, व्यानस्य स्वराः । | |||
| verse_lines = अथ खल्वियं सर्वस्यै वाच उपनिषत् । सर्वा ह्येवेमाः सर्वस्यै वाच उपनिषदः । इमां त्वेवाऽचक्षते । पृथिव्या रूपं स्पर्शाः, अन्तरिक्षस्योष्माणः, दिवः स्वराः । अग्ने रूपं स्पर्शाः, वायोरुष्माणः, आदित्यस्य स्वराः । ऋग्वेदस्य रूपं स्पर्शाः, यजुर्वेदस्योष्माणः, सामवेदस्य स्वराः । चक्षुषो रूपं स्पर्शाः, श्रोत्रस्योष्माणः, मनसः स्वराः । प्राणस्य रूपं स्पर्शाः, अपानस्योष्माणः, व्यानस्य स्वराः । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
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| text = | | text = अथ सर्ववाग्विषया विद्योच्यते । विष्णुनामा(शब्दा)र्थत्वात् सर्ववाचाम् । पूर्वोक्ता अपि सर्ववाग् उपनिषद एव । तथापि मुख्यत(मुखत) एव सर्ववाग्विषयत्वाद् वक्ष्यमाणामेव सर्वस्यै वाच उपनिषदिति सर्वेऽप्याचक्षते । | ||
}} | }} | ||
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| text = | | text = ‘पृथिव्यादिस्थितो विष्णुः पृथिव्याद्यभिधानवान् । | ||
स्पर्शादीनां देवताऽसौ क्रमेणैव प्रकीर्तितः ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ खल्वियं दैवी वीणा भवति । तदनुकृतिरसौ मानुषी वीणा भवति । यथाऽस्याः शिरः, एवममुष्याः शिरः । यथाऽस्याः उदरम्, एवममुष्या अम्भणम् । यथाऽस्यै जिह्वा, एवममुष्यै वादनम् । यथाऽस्यास्तन्त्रयः, एवममुष्या अङ्गुलयः । यथाऽस्याः स्वराः, एवममुष्याः स्वराः । यथाऽस्याः स्पर्शाः, एवममुष्याः स्पर्शाः । | |||
| verse_lines = अथ खल्वियं दैवी वीणा भवति । तदनुकृतिरसौ मानुषी वीणा भवति । यथाऽस्याः शिरः, एवममुष्याः शिरः । यथाऽस्याः उदरम्, एवममुष्या अम्भणम् । यथाऽस्यै जिह्वा, एवममुष्यै वादनम् । यथाऽस्यास्तन्त्रयः, एवममुष्या अङ्गुलयः । यथाऽस्याः स्वराः, एवममुष्याः स्वराः । यथाऽस्याः स्पर्शाः, एवममुष्याः स्पर्शाः ।;यथा ह्येवेयं शब्दवती तर्द्मवति, एवमसौ शब्दवती तर्द्मवती । यथा ह्येवेयं लोमशेन चर्मणा पिहिता भवति, एवमसौ लोमशेन चर्मणा पिहिता । लोमशेन ह स्म वै चर्मणा पुरा वीणा अपिदधति । स यो हैतां दैवीं वीणां वेद, श्रुतवदनो भवति, भूमिप्राऽस्य कीर्तिर्भवति, यत्र क्व चाऽर्या वाचो भाषन्ते विदुरेनं तत्र । | |||
| verse_line2 = यथा ह्येवेयं शब्दवती तर्द्मवति, एवमसौ शब्दवती तर्द्मवती । यथा ह्येवेयं लोमशेन चर्मणा पिहिता भवति, एवमसौ लोमशेन चर्मणा पिहिता । लोमशेन ह स्म वै चर्मणा पुरा वीणा अपिदधति । स यो हैतां दैवीं वीणां वेद, श्रुतवदनो भवति, भूमिप्राऽस्य कीर्तिर्भवति, यत्र क्व चाऽर्या वाचो भाषन्ते विदुरेनं तत्र । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
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| text = | | text = तस्य विष्णोरयं देहो वीणा साक्षात् प्रकीर्तिता । | ||
दैवी वीणा ततः सेयं लोकसिद्धा तु मानुषी । | |||
ब्रह्मादिदेहान् यो वेद विष्णोर्वीणेति भक्तितः । | |||
विद्यापूर्णसुखः स स्याद् भूमिपूरितकीर्तिमान् । | |||
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| verse_line1 = अथातो वाग्रसः । यस्यां संसद्यधीयानो वा भाषमाणो वा न विरुरुचुषेत । तत्रैतामृचं जपेत् - | |||
| verse_lines = अथातो वाग्रसः । यस्यां संसद्यधीयानो वा भाषमाणो वा न विरुरुचुषेत । तत्रैतामृचं जपेत् -;‘ओष्ठा पिधाना न कुली दन्तैः परि वृता पविः ।;सर्वस्यै वाच ईशाना चारु मामिह वादयेत्’(सा.मं.ब्रा.१.७.१५) ।;इति वाग्रसः ॥५ ॥ | |||
| verse_line2 = ‘ओष्ठा पिधाना न कुली दन्तैः परि वृता पविः । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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| text = | | text = विद्याधिक्यार्थमेवैतां वाक्साराम् अप्यृचं जपेत् । | ||
ध्यात्वा नारायणं देवं स्त्रीरूपं वाचि संस्थितम् । | |||
ओष्ठा पिधानेत्येषा ह्यृक् सारो वाचः प्रकीर्तितः । | |||
विष्णोर्हि वाचि संस्थस्यैवोष्ठावेतौ पिधानवत् । | |||
कुलीति चोक्तो भगवान् प्रलीनाशेषकुत्सितः । | |||
पाति सर्वं विशिष्टश्च सर्वस्मादित्यतः पविः । | |||
सर्ववागीश्वरो विष्णुः स्त्रीरूपो मां सुवादयेत्’ ॥ इति च । | |||
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| text = | | text = (नेत्युपमार्थे)न इत्युपमानार्थम् । ओष्ठावपिधानवत् अस्येति । न च विष्णोरन्या सर्वस्या वाच ईशाना । स हि मुख्यतः सर्वेश्वरः । तस्यैव प्रस्तुतत्वाद्, वक्ष्यमाणत्वाच्च । | ||
}} | }} | ||
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| text = | | text = ‘श्रियःपतिर्यज्ञपतिर्जगत्पतिर्गिराम्पतिर्लोकपतिर्धरापतिः’(भाग.२.४.२०) इति भागवते । ‘यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ् न वेद’(बृह.३.७.२७) इत्यादिश्रुतिश्च । स्त्रीलिङ्गत्वं देवतेत्यादिवदपि युज्यते । स्त्रीरूपत्वाच्च ॥ ५ ॥ | ||
}} | }} | ||
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<div class="gr-author-note">॥इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके)पञ्चमः खण्डः॥</div> | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = अथ हास्मा एतत् कृष्णहारीतो वाग्ब्राह्मणमिवोपोदाहरति । प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा व्यस्रंसत संवत्सरः । स च्छन्दोभिरात्मानं समदधात् । यच्छन्दोभिरात्मानं समदधात् तस्मात् संहिता । | ||
| commentary1 | | verse_lines = अथ हास्मा एतत् कृष्णहारीतो वाग्ब्राह्मणमिवोपोदाहरति । प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा व्यस्रंसत संवत्सरः । स च्छन्दोभिरात्मानं समदधात् । यच्छन्दोभिरात्मानं समदधात् तस्मात् संहिता । | ||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | }} | ||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V14 | ||
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| text = | | text = संवत्सर इति विशेषणाद् विरिञ्च एवात्र प्रजापतिः । ‘ब्रह्मा विश्वः कतमः स्वयम्भूः प्रजापतिः संवत्सरः’(महाना.उ.१७.१२) इत्यादि श्रुतेः । | ||
‘श्रान्तो ब्रह्मा सर्ववेदैः स्तुत्वा नारायणं प्रभुम् । | |||
तेनैव सम्यक् सन्धाय दार्ढ्यं देहस्य सोऽकरोत् । | |||
सन्धानात् संहितेत्युक्तो विष्णुरेव सनातनः। | |||
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| verse_line1 = तस्यै वा एतस्यै संहितायै णकारो बलम् , षकारः प्राण आत्मा । स यो हैतो णकार-षकारावनुसंहितम् ऋचो वेद, सबलां सप्राणां संहितां वेद । आयुष्यमित विद्यात् । | |||
| verse_lines = तस्यै वा एतस्यै संहितायै णकारो बलम् , षकारः प्राण आत्मा । स यो हैतो णकार-षकारावनुसंहितम् ऋचो वेद, सबलां सप्राणां संहितां वेद । आयुष्यमित विद्यात् । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
}} | |||
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| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V15 | ||
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| text = | | text = विष्णुनाम्नि णशब्देन विष्णोर्बलमुदीर्यते । | ||
ण इत्याक्रियमाणत्वाण्णकारोऽस्य बलं मतम् । | |||
विष्णुनाम्नि षकारेण रमाब्रह्मेशपूर्विणः । | |||
प्रणेतृताऽखिलस्यैव विष्णोरुक्ता तथाऽऽत्मता । | |||
आततत्वं सर्वगुणैर्देशतः कालतस्तथा । | |||
आत्मशब्दोदितं तच्च षशब्देनाभिधीयते । | |||
ष इत्याक्रियमाणत्वं प्रणेतृत्वं च पूर्णता । | |||
विष्णोः षकार इत्युक्ता वीत्युक्तस्य विशिष्टता । | |||
अन्त्यस्थित उकारस्तु ताच्छील्यादि हरेर्वदेत् । | |||
एवं विशिष्टप्राणत्वम् आततत्वं च सर्वतः । | |||
विशिष्टं च बलं विष्णोः सर्वस्माच्छीलमित्यपि । | |||
उदितं विष्णुशब्देन, तस्माद् ऋक्संहितामनु । | |||
वर्णद्वयसमायोगे ष्णुशब्दस्यार्थमेव तु । | |||
विष्णोः प्राणत्वमात्मत्वं बलं चैवात्र वेत्ति यः । | |||
स एव विष्णोर्बलवित् तथा प्राणत्वविद् भवेत् । | |||
स एव मुक्तः संसारान्नित्यायुष्मान् भविष्यति । | |||
}} | }} | ||
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| verse_line1 = स यदि विचिकित्सेत्, सणकारं ब्रवाणीं३ँ, अणकारा३ँ इति, सणकारमेव ब्रूयात् । सषकारं ब्रवाणी३ँ, अषकारा३ँ इति, सषकारमेव ब्रूयात् । | |||
| verse_lines = स यदि विचिकित्सेत्, सणकारं ब्रवाणीं३ँ, अणकारा३ँ इति, सणकारमेव ब्रूयात् । सषकारं ब्रवाणी३ँ, अषकारा३ँ इति, सषकारमेव ब्रूयात् ।;ते यद् वयम् अनुसंहितम् ऋचोऽधीमहे, यच्च माण्डूकेयीयम् अध्यायं प्रब्रूमः, तेन नो णकार-षकारावुपाप्ताविति ह स्माऽह ह्रस्वो माण्डूकेयः ।;अथ यद् वयम् अनुसंहितम् ऋचोऽधीमहे, यच्च माण्डूकेयीयम् अध्यायं प्रब्रूमः, तेन नो णकार-षकारावुपाप्तावन्ति ह स्माऽह स्थविरः शाकल्यः । | |||
| verse_line2 = ते यद् वयम् अनुसंहितम् ऋचोऽधीमहे, यच्च माण्डूकेयीयम् अध्यायं प्रब्रूमः, तेन नो णकार-षकारावुपाप्ताविति ह स्माऽह ह्रस्वो माण्डूकेयः । | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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| text = | | text = संहितासहितत्वेन यदृचोऽधीमहे वयम् । | ||
वेदान् अन्यान् पुराणं वा तेन विष्णुपदोदितः । | |||
अवाप्तो भगवान् स्यान्नस्तन्नामार्था यतोऽखिलाः । | |||
इत्याहुर्ऋषयः सर्वे ... ...। | |||
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| verse_line1 = | | verse_line1 = एतद्ध स्म वै तद् विद्वांस आहुर्ऋषयः कावषेयाः किमर्था वयमध्येष्यामहे । किमर्था वयं यक्ष्यामहे । वाचि हि प्राणं जुहुमः प्राणे वा वाचम् । यो ह्येव प्रभवः स एवाप्ययः । | ||
| | | verse_lines = एतद्ध स्म वै तद् विद्वांस आहुर्ऋषयः कावषेयाः किमर्था वयमध्येष्यामहे । किमर्था वयं यक्ष्यामहे । वाचि हि प्राणं जुहुमः प्राणे वा वाचम् । यो ह्येव प्रभवः स एवाप्ययः । | ||
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<div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S02_V17" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S02_V17"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = AIT_C03_S02_V17 | ||
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| text = | | text = .... किमन्याध्ययनाद् भवेत् । | ||
॥ | यज्ञैर्वेत्यृषयोऽप्यन्ये कावषेया वदन्ति हि । | ||
मौनेन विष्णुशब्दार्थं ध्यायन्तो वाचमेव वा । | |||
जुहुमो विष्णुनामाख्यां जपन्तो मन्त्रमेव वा । | |||
नमस्कारसमायुक्तं जुहुमः प्राणमत्र हि । | |||
किमन्यैर्बहुभिः कार्यैरेतस्यैवाधिकत्वतः । | |||
एतदर्थानुसन्धानपूर्वं वेदान् अथापि वा । | |||
अधीमहे यजामो वा नान्यथा तु कथञ्चन । | |||
एष एव हि सर्वेषां वेदानामर्थ ईरितः । | |||
विष्णुनामोदितो योऽर्थस्तद्व्याख्याऽन्यद् वचोऽखिलम् ॥ | |||
एवं विशिष्टप्राणात्मबलाद्यखिलसद्गुणैः । | |||
पूर्णस्वभावः सर्वेषां वचसामर्थ ईरितः ॥ | |||
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| verse_line1 = ता एताः संहिता नानन्तेवासिने प्रब्रूयात् , नासंवत्सवासिने, नाप्रवक्त्रे इत्याचार्या आचार्याः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = ता एताः संहिता नानन्तेवासिने प्रब्रूयात् , नासंवत्सवासिने, नाप्रवक्त्रे इत्याचार्या आचार्याः ॥ ६ ॥ | |||
| commentary1 = aitareya | |||
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<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमहैतरेयोपनिषत्सु द्वितीयारण्यके(तृतीयप्रघट्टके)द्वितियोऽध्यायः॥</div> | |||
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| text = | | text = ‘संहिताख्यानि विष्णोस्तु रूपाण्येतानि सर्वशः । | ||
अन्यविद्यास्वशिष्यस्य न ब्रूयात् प्रथमं क्वचित्। | |||
व्याख्यानशक्तिहीनाय नैव ब्रूयात् कथञ्चन । | |||
वैष्णवाय सुवृत्ताय (सुव्रताय सुशिक्षिणे । | |||
शान्ताय सुविशुद्धाय) मेधाश्रद्धायुताय च । | |||
गुरोः शुश्रूषकायैव ब्रूयादित्यनुशासनम् ॥’ इत्यादि च । | |||
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| text = | | text = य एतेन ‘ण’ इति शब्देनाक्रियमाणं विष्णोः पूर्णबलम्, ‘ष’शब्देनाक्रियमाणं देशतः कालतो गुणतश्चाऽततत्वं च सर्वां संहिताम् अनु तदर्थत्वेन वेद, अक्षरद्वयसंयोगरूपया संहितयैतदेव सर्वत्रोच्यत इति, स सम्पूर्णबलं सर्वप्रणेतृत्वशक्त्यादियुक्तं विष्णुं वेद । अथ इत्यादिका अपि संहितारूपा एव । पदवर्णयोः पृथगनभिव्याहारात् । तस्मात् सर्वशब्दा विष्णुनाम-व्याख्यानरूपा एव । | ||
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| text = | | text = यद् वयं संहितायुक्तत्वेनर्चोऽधीमहे तेनास्माकं ‘ण’शब्द-‘ष’शब्दार्थरूपो विष्णुरुपात्तः । तद्व्याख्यानत्वात् सर्ववाचाम् । ‘वि’इत्युपसर्गत्वाद् उकारस्य च ताच्छील्यार्थत्वाद् उक्तार्थविशेषणरूपत्वेन प्रसिद्धत्वान्न पृथक् तयोर्व्याख्यानमत्र कृतम् । ऋच इति सर्ववाचामुपलक्षणम् । अतः सर्ववेदादिशब्दोदितः सर्वगुणपरिपूर्णो भगवान्नारायण इति सिद्धम् ॥ ६॥ | ||
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| text = सर्वैश्च वैदिकपदैरपि लोकशब्दैः मेघाग्निवारिधितळादि(रवैश्च)भवैश्च सर्वैः । | |||
एकोऽभिधेयपरिपूर्णगुणः प्रियोऽलं नारायणो मम सदैव सुतुष्टिमेतु ॥ | |||
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| text = | | text = ‘यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं | ||
बट् तद्दर्शनमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् । | |||
वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः | |||
मध्वो यत्तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हि तेन प्रभौ ॥ | |||
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| | | text = हन(नु)शब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः । | ||
रामस्य स्वृतरूपस्य वाचस्तेनानयन्त हि । | |||
भृतमो भीम इत्युक्तो वाचो मा मातरः स्मृतः । | |||
ऋगाद्या इतिहासश्च पुराणं पञ्चरात्रकम् । | |||
प्रोक्ताः सप्तशिवास्तत्र शयो भीमस्ततः स्मृतः । | |||
मध्वित्यानन्द उद्दिष्टो वेति तीर्थमुदाहृतम् । | |||
मध्व आनन्दतीर्थः स्यात् तृतीया मारुतीतनुः । | |||
इति सूक्तगतं रूपत्रयमेतन्महात्मनः । | |||
यो वेद वेदवित् स स्यात् तत्त्ववित् तत्प्रसादतः ॥ इति च । | |||
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| text = | | text = ‘साधको रामवाक्यानां तत्समीपगतः सदा । | ||
हनुमान् प्रथमो ज्ञेयो भीमस्तु बहुभुक् पितोः । | |||
पृतनाक्षयकारी च द्वितीयस्तु तृतीयकः । | |||
पूर्णप्रज्ञस्तथाऽऽनन्दतीर्थनामा प्रकीर्तितः । | |||
दशेति सर्वमुद्दिष्टं सर्वं पूर्णमिहोच्यते । | |||
प्रज्ञा प्रमतिरुद्दिष्टा पूर्णप्रज्ञस्ततः स्मृतः । | |||
आ समन्तात् पतित्वे तु गूढं कलियुगे हरिम् । | |||
असत्यमप्रतिष्ठं तु जगदेतदनीश्वरम् । | |||
वदद्भिर्गूहितं सन्तं तृतीयोऽसुर्मथायति । | |||
येन विष्णोर्हि वर्पाख्यान् गुणान् अज्ञासिषुः परान् । | |||
ईशानासः सूरयश्च निगूढान् निर्गुणोक्तिभिः(निगूढाभिर्गुणोक्तिभिः) । | |||
त्रेतायां द्वापरे चैव कलौ चैते क्रमात् त्रयः । | |||
एतेषां(येषां हि) परमो विष्णुर्नेता सर्वेश्वरेश्वरः । | |||
स्वयम्भुब्रह्मसंज्ञोऽसौ परस्मै ब्रह्मणे नमः ॥’ इति च । | |||
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| | | text = पूर्णानन्दगुणोदारधाम्ने नित्याय वेधसे । | ||
अमन्दानन्दसान्द्राय प्रेयसे विष्णवे नमः ॥ | |||
}} | }} | ||
</div> | |||
<div class="gr-author-note">॥इति श्रीमदानन्दतीर्तभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके(तृतीयप्रघट्टके)द्वितियोध्यायः॥</div> | |||
</div> | |||
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Latest revision as of 20:51, 7 June 2026
प्रथमारण्यके
द्वितीयारण्यके
प्रथमाध्यायः
मङ्गलाचरणम्
उपनिषद इतिहासः
हरावनन्यविश्वासिनो नैव दुर्गतिः
नित्यं स्वप्राप्तिहेतुत्वात्, कर्तृत्वात् कर्म मातृतः ॥ ब्रह्मैव गुणपूर्णत्वात्, सत्यं साधुस्वरूपतः । क्वापि तं विस्मरेन्नैव त्यक्त्वा तं नेतरं व्रजेत् ॥ पूर्वे नैनं तत्यजुर्हि ब्रह्माद्यास्तेन संसृतेः ।
मुक्ताः श्रीश्च तदत्यागान्नित्यमुक्ता गुणाधिका ॥भगवदतिक्रमः पराभवहेतुः
वर्तितज्ञानतो वङ्गा नरास्तैरवनं सदा । अन्नरूपैर्गृध्नवो हि वङ्गावगधनामकाः ॥ राक्षसा असुरा ईरपादा इति समीरिताः । धर्मो ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं चतुरात्मकः ॥ वायुर्देवोऽत्रासुराणामैश्वर्य गुण एव हि । ईरपादास्ततः प्रोक्तास्ते त्रयो विष्णुमत्यजन् ॥
पराभूतास्ततस्ते तु तमस्यन्धे निपातिताः ।
यत्सूर्यस्य हरितः पतन्तीः पुरस्सतीरुपरा एतसे कः ॥ सीदन्निन्द्रस्य जठरे कनिक्रदन्नृभिर्यतस्सूर्यमारोहयो दिवि’।(ऋ.सं.१०.९०.१३) ‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोस्सूर्यो अजायत ।’ (ऋ.सं.८.४.२९) ‘यस्सूर्यं य उषसं जजान यो अपां नेता स जनास इन्द्रः । उद्वेति प्रसविता जनानां महान् केतुरर्णवः सूर्यस्य’।(ऋ.सं.२.१२.७) ‘येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्यस्तपति तेजसा भ्राजसा च । यमन्तः समुद्रे कवयो वयन्ति यदक्षरे परमे प्रजाः’।(म.ना.उ.१.३)
‘तमेताः पञ्चदेवताः परिम्रियन्ते विद्युद्वृष्टिश्चन्द्रमा आदित्योऽग्निः’ इत्यादौ सूर्यस्य सर्वत्र पराधीनत्वावगतेश्च ।केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः ॥’(तं.सासं. उ.प्र.व.अ.६२.श्लो.१७) इति नारसिंहपुराणे । ‘तापनी पाचिका चैव शोषणी च प्रकाशनी ।
नैव राजन् रवेः शक्तिः शक्तिर्नारायणस्य सा ॥ इति पाद्मे ।‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः । विदेहि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत् ॥’(ऋ.सं.७.४०.५)
इत्यादिना विष्णोः प्रसादादेव शिवादीनां पदप्राप्तिकथनाच्च ।
आजानजाः कर्मदेवास्तात्त्विका दक्ष एव च ॥ शक्रश्चोमा च रुद्रश्च भारती वायुरेव च । मुक्ता उक्ताः शतगुणा बलज्ञानसुखादिभिः ॥ विष्णुभक्त्यादिभिश्चैव गुणैः सर्वैः क्रमाधिकाः । तस्माद्रमा ततो विष्णुरनन्तगुणतोऽधिकः ॥ नित्यमुक्तः स्वतन्त्रश्च न चान्यस्तादृशः क्वचित् । कुत एवाधिकोऽन्यः स्याद् यन्मुक्ता अपि तद्वशाः ॥ रमाऽपि तद्वशा नित्यं स नान्यस्य वशे प्रभुः । न भेदः शेषशिवयोः सुपर्णः शेषसंमितः ॥ कामः शक्रसमो नित्यं प्रतिबिम्बाश्च ते क्रमात् ॥’
इति च महासंहितायाम् ॥
नेतृत्वाच्चापनेतृत्वाद् भगवान् पुरुषोत्तमः ॥इति च ।
वामो भद्रः ॥ १ ॥
‘ब्रह्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते बुधैः’ इति हि भारते । ‘म्रियमाणमिमं जीवं वासुदेवादिदेवताः । त्यक्त्वा भागेन गच्छन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ॥ गतैर्भागैरपि पुनर्विशेयुर्भोगसिद्धये ।
भोग्यलोकमनुप्राप्तं तस्मात् स्वप्नवदन्तरा ॥’इति च ॥ (समुद्र-मेघ-वृक्षपतन-भेरीताडनादिसर्वघोषा अपि तस्यैव नामानि)
एवमृषिषु शब्देषु च व्यवह्रियमाणानि सर्वाणि नामानि विष्णोरेव मुख्यतः । किमु देवतानामानि !
‘यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या’(ऋ.सं.१०.८८.१००) ।
‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहु रथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्’ ।(ऋ.सं.१.१६४.४६)
‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।’(तै.ब्रा.३.७.९.३)
‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ ॥(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१)
इत्यादिश्रुतिभ्यः । न केवलमृष्यादीनां नाम भगवतः, सर्वे वेदा अपि तस्यैव नामानि, किमु च वेदाः समुद्र-मेघ-वृक्षपतन-भेरीताडनादिसर्वघोषा अपि तस्यैव नामानि यथायोग्यं योजनीयानि ! एकमेव व्याहरणम्= एकप्रकारमेव नाम । निर्दोषगुणपूर्तिवाचकत्वादेकप्रकारता । प्राणे नारायण एव= नारायणविषय एव व्याहारः । ऋचस्तु विशेषत इन्द्रादिनामवतो विष्णोर्गुणान् अल्पज्ञानाम् अपि प्रकाशयन्तीति प्राणे नारायणे एवेति विद्यात् ।
उक्तं च बृहत्संहितायाम्–
‘हुङ्कारेण सहैवाब्धिः सर्वाभिभवशक्तिताम् ।
विष्णोर्वक्ति यतो हुं च पराभिभववाचकः ।
ओमिति स्वरते नित्यं वायुर्मेघेषु संस्थितः ।
बलवन्नादसंयुक्तो ह्यधिकोच्चत्वमस्य तु ।
ओङ्कारस्यार्थ उद्दिष्ट उक्तार्थाधिक्यमेव च ।
नादो बली प्रवदति तथा भेरीध्वनिः प्रभोः ।
अनुदात्तस्वरूपत्वाद् औदार्यं वदतीशितुः ॥
तदपेक्षयाऽन्यनीचत्वं घण्टाद्याः स्वरितात्मकाः ॥
उच्चस्थितिमुदात्तस्तु स्वर्णचञ्च्वादिकः स्वरः ।
विष्णोर्वक्ति, तथा मन्द्रः श्वासादिः प्रचयात्मकः ।
एकप्रकारतां विष्णोः सदाऽचाल्यां वदत्यपि ॥
इत्यादयः सर्वघोषा विष्णोरेव गुणोन्नतिम् ।
वदन्ति, किमु वेदाद्या, मार्जाराद्यभिधास्तथा ॥
मारयित्वा प्रभक्ष्यैव जरयत्यखिलं जगत् ।
तेन मार्जार उद्दिष्टो, मोषणान्मूषको हरिः ॥
वर्षणाद् वृष उद्दिष्टो, बलनाद् बलिनामकः ।
तारणात् तृणनामाऽसावित्याद्येकोऽभिधीयते ॥
(सर्वनामा भगवान् सर्वविलक्षणः)
सर्वनामाऽपि भगवान् सर्वशक्तिश्च सर्ववित् ।
ब्रह्मरुद्रादिजीवेभ्यो जडेभ्यः श्रिय एव तु ।
व्यतिरिक्तः सदाऽनन्तसान्द्रानन्दैकरूपकः ।
तस्यैव मुख्यनामानि समाकृष्येतरेष्वपि ।
उपचारात् प्रवर्तन्ते व्यवहारप्रसिद्धये ।
तथैव सर्वनामानि प्रवर्तन्ते च मारुते ।
न तावन्मुख्यवृत्त्यैव, मुख्यतोऽन्यव्यपेक्षया ।
मुख्यतः सर्वनामा तु विष्णुरेको न चापरः ।
तस्मात् प्राणादिशब्दाश्च विष्णावेव हि मुख्यतः ।
अन्यव्यपेक्षया वायौ मुख्यवृत्तिर्विधीयते ।
वायुश्च सूर्यसंस्थः संस्तपत्येतज्जगत्त्रयम् ।
आज्ञयैव हरेर्वायोः शक्त्या सूर्यस्तपत्ययम् ॥’ इत्यादि च ।
(मुख्यवायुरपि सर्ववेदप्रतिपाद्यः)
न प्रसिद्धसूर्यस्येयं तापनशक्तिरिति ज्ञापयितुं ‘प्राणो ह्येष य एष तपति’ इत्युक्तम् । ‘प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति’(बृ.उ.३.६.२३,सप्तान्नब्राह्मणम्) इति च श्रुतिः । प्राणशब्दश्च मुख्यतो विष्णौ प्रवर्तमानोऽपि वायावपि वर्तते । अतः सर्ववेदाद्यभिधेयत्वं वायोरप्यस्ति । ‘प्राणस्य प्राणः’(केन.१.३) इति श्रुतेरुभयोरपि प्राणशब्दः प्रसिद्ध एव ।‘अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः’(बृ.४.२.१) इति वायोर्विशेषणादुत्तमप्राणो विष्णुरिति च सिद्धम् ।
द्वावात्मानौ हि वेदेषु द्वौ प्राणौ द्वौ च चेतनौ ।
अज्ञानाभिभवास्पृष्टौ वायुर्नारायणश्च तौ ।
तदन्ये चेतनास्सर्वे प्राणाश्चात्मान एव च ।
अज्ञानाभिभवस्पृष्टास्तस्मात् ते ह्यधमाः श्रुताः ।
मध्यमो वायुरेवैक, उत्तमः केवलो हरिः ।
सर्वशब्दोदितौ तस्माद् एतौ द्वावेव नापरः ।
अन्ये चैव मितैः शब्दैरुच्यन्ते नामितैः क्वचित्।
श्रीरप्यखिलशब्दोक्ता विष्णुवन्न तु मुख्यतः ॥
तस्मादमितनामानावपि तौ मितनामवत् ।
श्रीश्च वायुश्च विष्णुस्तु मुख्योक्तेरमिताभिधः ॥
अनन्तनामकत्वाच्च सोऽनन्तगुण ईरितः ।
पृथङ्नामानि यस्मात् तद्गुणानेव प्रचक्षते ॥’इत्यादि ब्रह्माण्डे ॥ २ ॥ तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः स वा ऋषे तृतीयं शंस’ इति । स ह ‘अन्नम्’ इत्येव अभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय ।
तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागा, वरं ते ददामि’ इति । स होवाच- ‘त्वामेव जानीयाम्’इति ।
तमिन्द्र उवाच- ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे प्राणस्त्वं प्राणः सर्वाणि भूतानि । प्राणो ह्येष य एष तपति । स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि । तस्य मेऽन्नं मित्रं दक्षिणम् । तद् वैश्वामित्रम् एष तपन्नेवास्मि’ इति होवाच ॥ ३ ॥
(बृहतीसहस्रं सर्वं नारायणस्यान्नम्)
अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः, तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम्, तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेते इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तम् इत्यादिना ॥
(इन्द्रकर्तृकं महाव्रतम्)
वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये ।
महाव्रतं कर्म चक्रे, हौत्रं चक्रेऽत्र कौशिकः ।
भृगुरध्वर्युरभवद्, ब्रह्मा ब्रह्माऽभवत् स्वयम् ।
उद्गाता वायुरभवत्, स्वयं नारायणः प्रभुः ।
सादस्यमकरोत् तत्र, तदन्येऽन्येऽपि चर्त्विजः ।
(विश्वामित्रेण बृहतीसहस्रफठनम्)
बृहतीसहस्रं शंसिष्यन् यदा सस्मार केशवम् ।
वायुना सह देवेशस्तदा वासवमाविशत् ।
आविष्टो, विष्णुनाऽथेन्द्रो वायुना सह कौशिकम् ।
शंसेत्युक्त्वा निषण्णोऽभूद्, इदमन्नं तवेति सः ।
ऋक्सहस्रं शशंसाथ(शशंसात्र .हृ) यज्ञाङ्गत्वेन भक्तितः ।
तच्छ्रुत्वा तुष्टिमगमत् केशवो वायुसंयुतः ।
द्वितीयवारं शंसेति प्राह तं च जनार्दनः ।
प्रीत्यैव शक्रमाविष्टो, विश्वामित्रः शशंस तत् ।
अतिप्रियत्वाद् भगवान् पुनरप्याह कौशिकम् ।
तृतीयं च शशंसासौ(सास्मै) विष्णोरन्नं प्रकल्प्य तत् ।
ततोऽतितुष्टो भगवान् ददामि वरमित्यमुम् ।
ऊचे, स प्रथमे त्वेव निजसालोक्यमीश्वरः ।
प्रादाद् द्वितीये सामीप्यम्, तृतीये पुनरेव च ।
वरं ददानीत्युक्तः स मुनिः प्राह जनार्दनम् ।
सम्यक्त्वामेव जानीयाम् इति मोक्षे सुखोच्चताम् ।
इच्छंस्तं प्राह भगवान् इन्द्रस्थो वायुसंयुतः ।
सर्वनामाऽहमस्म्येक इति ज्ञानं ममोत्तमम् ।
यस्मात् सर्वगुणत्वं स्यात् सर्वनामत्व एव तु ।
न हि दोषाभिधायीनि विष्णोर्नामानि कर्हिचित्(कानिचित् .हृ)।
अदोषत्वान्महाविष्णोर्न सामान्यवचांस्यपि ।
सर्वोत्तमगुणात्मत्वात् सदा नारायणस्य हि ।
सर्वोत्तमगुणानेव नामान्याचक्षते हरेः ।
(विष्णौ सर्वशब्दसमन्वयक्रमप्रदर्शनम्)
यावज्ज्ञानेन मोक्षः स्यात् तावज्ज्ञात्वापि कौशिकः ।
अधिकज्ञानलब्ध्यर्थं मोक्षेऽधिकसुखाप्तये ।
जानीयां त्वामिति प्राह तस्मा आह स केशवः ।
इन्द्राविष्टः प्राणनाम तथाऽन्याश्चाभिधाः प्रभुः ।
प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते ।
ओयत्वाद् अहंनामाऽस्म्यसनान्मनुतेरपि ।
ततो वेत्तीति च त्वं स, पूर्णत्वात् सर्वनामकः ।
सर्वाणि बहुरूपत्वात् सर्वरूपेषु पूर्तितः ।
प्रभूतत्वाद् भूतनामा सर्वरूपप्रभूततः ।
बहुरूपः स भूतानीत्युक्तो विष्णुस्सनातनः ।
सर्वैश्वर्यस्वरूपत्वादेष इत्यभिधीयते ।
स एव सूर्यसंस्थः सन् लोकं तपति केशवः ।
सर्वनामवतस्तस्य ममान्नं मित्रमुच्यते ।
अन्नाभिमानिनी साक्षाच्छ्रीरेव प्रमदोत्तमा ।
साऽन्नमित्युच्यते विष्णोर्भोग्यत्वान्मित्रमेव च ।
दक्षभागस्थितेनत्वाद् दक्षिणं नाम सोच्यते ।
तस्या इनो हि विष्णुः स दक्षभागे स्थितः सदा ।
यस्याभिमानिन्यन्नस्य लक्ष्मीः सा देवतोत्तमा।
वैश्वामित्रं तदन्नं तु ऋक्सहस्रात्मकं मतम्।
विश्वामित्रेण दृष्टत्वाद् वैश्वामित्रं तदीर्यते।
(शक्राविष्टो विष्णुः; न चापरः)
इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कां परिहरन् हरिः।
आदित्यसंस्थितो विष्णुः तपन्नस्मीति चोचिवान्। त्वं जानीयामिति प्रश्नं विश्वामित्रस्य कुर्वतः। अभिप्रायद्वयं ह्यस्ति ‘शक्राविष्टो न चापरः। हरेरिति तु मे तर्कस्तजोबाहुल्यतोऽजनि। तस्य तर्कस्य सत्यत्वं ज्ञातव्यं प्रथमं मया। द्वितीयं यदि विष्णुः स्याज्ज्ञातव्यो मे विशेषतः’। इत्याभिप्रायमस्यैव ज्ञात्वा विष्णुः सनातनः । अभिप्रायद्वयस्यापि परिहारं हरिर्ददौ। प्राणो वा अहमित्यादि नामसन्दर्भमुक्तवान्। विशेषज्ञानसिद्ध्यर्थं नाम्नामुक्तिः परात्मनः। इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कानुत्त्यर्थमेव च । तपन्नेवास्मीत्यावदत्, तपन्तं वेद सोऽपि हि। नारायणं सर्वगतम्, गायत्र्योपासको हि सः॥ इति ब्रह्मण्डे।
(‘प्राणो वा अहम्’ इत्युपदेशः भगवतैव कृतः)
उपनिषण्णमिन्द्रं दृष्ट्वाऽपि त्वामेव जानीयाम् इति वरस्वीकाराद् इन्द्रादेव च, इन्द्राविष्टो भगवान् अत्रोक्त इति ज्ञायते । इन्द्रं तु जानात्येव हि विश्वामित्रः । भगवन्तमपि स्वरूपत आगतं जानात्येव । विशेषज्ञानप्रार्थने प्राणो वा अहमस्म्यृष इत्यादिकमेव पूर्यते ; एष तपन्नेवास्मि इति व्यर्थम् । प्राणो ह्येष य एष तपति इत्युक्तत्वात् ।
(भगवतस्तदीयरूपाणां च नास्ति भेदः)
स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि इत्यादिनाऽपि आविष्टस्य विष्णुत्वं किञ्चिज्ज्ञायते । तथाऽपि एतेन इति तृतीयात्वात् करणत्वाशङ्का भवति । तस्य मे इति वैयधिकरण्यमिति च । अतो भगवन्नामानि पृथगुक्त्वा ‘अहं विष्णुरित्येष तपन्नेवास्मि’ इत्युवाच । इन्द्रशरीरमेव पश्यतो विश्वामित्रस्य तर्कमात्रतो भगवानिति किञ्चिज्जानत इति ज्ञायते ।
(न शचीपतिः सर्वशब्दवाच्यः)
न चेन्द्रस्य प्राणशब्दः(प्राणशब्दाभिधेयत्वम्. हृ) सर्वशब्दाभिधेयत्वं च विद्यते । ‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितम्’(ऋ.सं.१०.८२.६) इत्युक्तस्य पद्मनाभस्य हि ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८.२३) इति सर्वदेवाभिधानत्वमुक्तम् । इन्द्रे हीन्द्रशब्दोऽपि न मुख्यतो वर्तते, परमैश्वर्याभावात्, इन्द्रशब्दोऽपि विष्णावेव वर्तते । स हि परमेश्वरः ।
‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।’(तै.ब्रा.३.७.९.३)
‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्’(ऋ.सं.१.१६४.४६) । इत्यादिश्रुतेश्च । ‘सप्तार्द्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोऽस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’(ऋ.सं.१.१६४.३६) इत्यादिना विष्णुरेव हि तत्र प्रस्तुतः ।
(नारायणादिनामानि नान्यस्य)
‘नामानि विश्वाभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् ।
नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१) ॥’ इति श्रुतिः ।
‘यो देवानां नामधा एक एव’ इत्यवधारणान्नान्यस्य सर्वनामत्वम् । स च विष्णोर्नान्यः । पद्मनाभत्वादेव ।
श्रियो वायोरपि न नारायणादिनामवत्वम् । ‘एको वासुदेवस्तत्सदृशपरौ न स्तः’ इति श्रुतिः । ‘एको नारायण आसीत् तत्समो वा, अधिको वा नास्ति’ इति च ।
‘येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्स्तपति तेजसा भ्राजसा च’(म.ना.उ.१.३) ।
‘यमन्तःसमुद्रे कवयोऽवयन्ति यदक्षरे परमे प्रजा’(तै.आ.१०.१.१) ।
इत्युक्तस्य समुद्रशायिन एव नारायणस्य
‘तद् एवर्तं तद् सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’(म.ना.उ.४.३) । इति परब्रह्मत्वावधारणाच्च विष्णोः परं सदृशं वा नास्त्येव । अतस्तदत्रोच्यत इत्यपि न वक्तव्यम् ।
(विष्णुः सर्वेश्वरः)
‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।
न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.सं.७.९९.१) ॥इत्यादेश्च ।
‘नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायान् अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम्’(ऋ.सं.४.३०.१) । इत्याद्यपि सर्वनामकत्वात् तस्यैव ।
‘किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्’ इत्यादिप्रश्नस्यापि
‘परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।
परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥
पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥
यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥
तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।
विष्णोर्नामसहस्रम्... ॥’(म.भा.अनु.अ.१४९)
इत्येव भारते परिहाराच्च ।
(मित्रं मे दक्षिणा रमा)
मेऽन्नं दक्षिणमित्युक्तत्वाच्च विष्णुरेवेति ज्ञायते । स हि विष्णुर्दक्षिणामित्र उक्तो हरिवंशेषु धन्याश्चर्याध्यायि ।
‘दक्षिणाभिः सहैवैतन्मदधस्ताज्जगत्सदा ।
धन्याश्चर्योऽहमेवैको मित्रं मे दक्षिणा रमा ।
इत्यवादीद्धरिर्भूपा धन्योऽसीत्युदितो मया ॥’ इति नारदवचनम् ।
न च बृहतीसहस्राभिमानिनीं देवीं विना अचेतनमात्रस्य मुख्यमित्रत्वं युज्यते ।
‘मिनोति त्रायते चेति मित्रमित्यभिधीयते ।
तस्माद्योऽयं विजानाति स मित्रं तस्य नान्यथा ॥’इति भारते
(विष्णुरेव बृहतीसहस्रप्रतिपाद्यः)
उक्थायुत्वाच्च विष्णुरेवात्रोक्त इत्यवगम्यते । बृहतीसहस्रं ह्युक्थनामकं मुख्यतः ।
‘महाव्रतनियुक्तं यदृक्सहस्रं हरेः प्रियम् ।
तदुक्थमिति सम्प्रोक्तं तेने यो विष्णुरेव हि ॥
तस्मादुक्थायुरित्युक्त ऐश्वर्यादिन्द्र उच्यते ।
तस्मादुक्थायुरिन्द्रेति विष्णुर्यज्ञेषु पूज्यते ॥’इति गारुडे
विष्णुर्ह्युक्थायुरिन्द्र इत्युच्यते । यज्ञेष्वन्य इन्द्रः पृथक्चोच्यते । ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः’(तै.ब्रा.३.७.९.३) । इत्युक्त्वा ‘तस्मै त्वा तेभ्यस्त्वा’ इति भेदवचनाच्च । सत्य इति वायुः । ‘सदिति प्राण’ इति श्रुतेः ।
‘सदेव सत्यमित्युक्तं सत्यो वायुरुदाहृतः ।
साधुत्वं सत्यता प्रोक्ता साधुर्वायुर्हि सर्वतः ॥’ इति शब्दनिर्णये ।
(बृहतीसहस्रपठनफलम्)
प्रियधाम्न उप= समीपे गमनं नाम तद्धामप्राप्तिकारणभगवत्प्रसादप्राप्तिः । अन्यथोपशब्दो व्यर्थः स्यात् । न च तदैव भगवतः प्रियं धाम विश्वामित्रेण प्राप्तम् ।
बृहतीसहस्रे प्रथमे सालोक्यं प्रददौ हरिः ।
द्वितीये स्वपुरप्राप्तिं तृतीयेऽन्तःपुरस्य च ।
तथा स्वविषयं ज्ञानं विश्वामित्रे ददौ प्रभुः ॥ इति च गारुडे ।
(इन्द्रे विशेषावेशस्तात्कालिकः)
न चेन्द्रादिभिरैक्यमत्रोच्यते । ‘प्राणस्तथाऽनुगमाद्’(ब्र.सू.१.१.२८) इति च विष्णोरेव प्राणशब्दाभिधेयत्वमुक्त्वा ‘न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन्’(ब्र.सू.१.१.२९) इति वक्तुः= बृहतीसहस्रं शंसितुर्विश्वामित्रस्य इन्द्रेण स्वात्मोपदेशः क्रियत इति पक्षो निराकृतो हि भगवता सूत्रेषु । ‘अध्यात्मसम्बन्ध’ शब्देनावेशो विष्णोरिन्द्रे विवक्षितो भगवता । अन्येष्वन्तर्यामिरूपेण सम्बन्धोऽस्त्येव । अस्मिन्निन्द्रे तु विशेषावेशस्तात्कालिकः । अधिकात्मनः= परमात्मनः सम्बन्धोऽध्यात्मसम्बन्धः । न हि स्वात्मना स्वस्य सम्बन्धो भवति । यद्यध्यात्ममात्रमत्रोच्यत इति विवक्षितं तर्हि ‘अध्यात्मभूमा’ इत्येव स्यात्; सम्बन्धशब्दो व्यर्थः । तस्मादिन्द्रादिजीवेभ्यो विष्णोर्भेद एवात्र भगवतो विवक्षितः ।
(अन्तर्यामिदृष्ट्याऽभेदव्यवहारः)
‘शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्’(ब्र.सू.१.१.३०) इति शास्तुरन्तर्यामिणो विष्णोः सर्वशरीरस्थितत्वात् सर्वनामाभिधेयत्वं चोक्तम् । ‘अहं मनुरभवं सूर्यश्च’ (ऋ.सं.४.२६.१) इत्यादिवत् । न हि मनुसूर्यादिर्भवति वामदेवस्तेषां पक्षेऽपि । सर्वप्रवृत्तिहीनतां हि ते मोक्षं वदन्ति । अत्र च ‘अहं भूमिमददामार्याय’(ऋ.सं.४.२६.२) इत्यादिना प्रवृत्तिरेवोच्यते ।
न च वामदेवेन मन्वादिकर्म क्रियते कदाऽपि । अतीतार्थश्चायं दृश्यते ‘भूमिम् अददाम्’ इत्यादिना । नहि पूर्वं वामदेवेन तानि कर्माणि कृतानि । भगवान् विष्णुर्हीन्द्राय भूमिमददात्(विष्णुर्हि आर्याय इन्द्राय भूमिमदात्(ताम्रपर्णि) । स एव च सर्वेष्वन्तर्यामित्वेन स्थित्वा नामप्रवृत्तिनिमित्तानि सर्वकर्माणि कुर्वन्नवबोध-सूरिनियमनादिभिर्मनुसूर्यादिसर्वनामा भवति । यदि भेदस्य पूर्वमपि मिथ्यात्वमङ्गीक्रियते तर्हि भूमिदानादिसर्वकर्मणां मन्वादित्वस्यापि मिथ्यात्वाद् ‘अहं मनुरभवम्’ इत्यादिकं सर्वमनर्थकमेव भवति ।
(मुक्तावपि पञ्चभेदाः सुनित्याः)
‘जीवेश्वरभिदा चैव जीवभेदः परस्परम् ।
जडेश्वरभिदा चैव जडभेदस्तथैव च ॥
जडजीवभिदा चैव सत्योऽयं भेदपञ्चकः ।
न कदाचिन्निवर्त्योऽयं मुक्तौ संसार एव च (वा) ॥
य एतदन्यथा ब्रूयुस्ते हि यान्त्यधरं तमः ॥’ इति भविष्यत्पर्वणि ।
‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।’(भ.गी.१६.८)
‘ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ।’(भ.गी.१६.१४)
‘एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।’(भ.गी.१६.९)
‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्’(भ.गी.१६.२०) ॥ इत्यादि च ।
(सर्वान्तर्यामित्वादिना विष्णोः सर्वशब्दवाच्यत्वम्)
न च ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे’ इत्यादौ अहमस्म्यादिशब्दोऽस्मच्छब्दार्थः(अस्मच्छब्दस्थः/अस्मच्छब्दाद्यर्थः) । एष तपन्नेवास्मीत्युपरितनस्य वैयर्थ्यात् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । अतोऽहमस्मीत्यादि च भगवन्नामैव । न च जीवैक्यवचनमत्र प्रस्तुतम् । ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव’ इति सर्वनामाभिधेयत्वं भगवत उक्त्वा, तत्रैव प्रमाणत्वेन विश्वामित्रं ह्येतदहरित्याद्याख्यायिकोक्ता । तस्मात् सर्वान्तर्यामित्वात्, सर्वगुणत्वात्, सर्वशक्तित्वाच्च सर्वनामवत्वमेव विष्णोरुच्यते; न तु सर्वस्वरूपत्वम् ।
उक्तं च भारते ।
‘स्रष्टृत्वाच्चैव पातृत्वान्नियमाच्च प्रकाशनात् ।
सर्वत्वमुक्तं विष्णोस्तु न तु सर्वस्वरूपतः ॥’ इति ।
(श्रुतिवचनानि नाभेदपराणि)
‘‘ ‘पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्’(ऋ.सं.८.४.१७) इति पुरुषेणैव ‘इदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।’, ‘आ तृणाद् आकरीषात् सर्वं भगवान् इति मिथ्यादृष्टिरेव’ (एषा.हृ)’’ इति च श्रुतिः ।
‘हिरण्मयो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’,
‘अमृतो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’,
‘स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् आप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’ इत्यादिना मुक्तानामपि भेदस्यैवोक्तेश्च ।
न हि भेदाभावे ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे’ इति युज्यते । न चामुक्तैः सर्वभूतैर्मुक्तो दृश्यते ।
एकत्वे तु ‘ददृशे’ इत्येतावता पूर्यते; ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यः’ इति व्यर्थम् । न च तेषां पक्षे स्वयमपि स्वात्मानं पश्यति । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति । अतः सर्वश्रुतिविरोध एव जीवेश्वरैक्याङ्गीकारे । नच ‘कर्तृकर्मविरोधो नामास्ति’ इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । श्रुत्यनुभवसिद्धत्वाच्च स्वदर्शनादेः ।
न च तेषां पक्षे प्रज्ञेन सर्वज्ञेन परमात्मना सर्वकामावाप्तिर्नामाङ्गीक्रियते शरीरादुत्क्रान्तस्य ज्ञानिनः । तस्माद् वेदविरुद्धवादिन एव तेऽपि ।
(न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो मायावादिनः)
न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो दृश्यते । न हि सर्वावाच्यं सर्वाज्ञेयं शून्यं चेति कश्चिद्विशेषः । केनापि शब्देनावाच्यस्य लक्षणायामपि प्रमाणं नास्ति । क्षीरमाधुर्यादयोऽपि तैरेव शब्दैरुच्यन्ते ।
‘विशदं क्षीरमाधुर्यं स्थिरमाज्यस्य तीक्ष्णकम् ।
सितस्य (गुडस्य) पनसादीनां निर्हारीत्यभिधीयते ॥’ इति शब्दनिर्णये ।
न च सर्वगुणदोषक्रियाविनिर्मुक्तस्यास्तित्वमपि कुत्रचित् दृष्टम् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि ।
(मुक्तावपि तारतम्यम् अप्रतिहतम्)
‘अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति’(क.ठ.२.३.१३) इत्यादिना प्रसादादिगुणाश्च भगवतो दृश्यन्ते । ‘यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः’(क.ठ.६.११) इत्यादि कर्माणि च । ‘यस्मिन् देवाः श्रिताः सर्वे’ इत्यादिगुणाश्च तत्रैवोक्ताः(काठके न दृश्यते) ।
‘अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः ।
अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥आदध्ना(घ्ना)स उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे’(ऋ.सं.१०.७१.७) ॥
इति मुक्तानामपि तारतम्यं चोक्तम् ।
‘श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः ।
अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥
तारतम्यं च तेषां हि श्रुतावुदितमञ्जसा ।
क्षीरसागरदध्नास्तु केचित् तिष्ठन्ति मुक्तिगाः ॥
उपस्थिता ब्रह्मवनं केचिदश्वत्थमण्डलम् ।
ऐरे ह्रदे केचिदपि देवा एव परं(सदा.हृ) हरिम् ॥
नागभोगशयं मुक्ता ददृश्रेऽधिकमोदिनः ।
सागरादिस्थिता विष्णुं पश्यन्ति क्वचिदेव हि ॥’
इति ब्रह्मसारे ।
(वेदमन्त्रेषु मुक्तलोकवर्णनम्)
‘यत्र ब्रह्मा पवमान च्छन्दस्यां वाचं वदन् ।
ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिल्ँलोके स्वर्हितम् ।
तस्मिन् मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः ।
यत्राभूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः ।
लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्र तत्परमं पदं विष्णोर्लोके महीयते ।
देवैस्सुकृतकर्माभिस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥
यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ।
कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव’(ऋ.सं.९.११३.६-११) ॥
(श्रुतिसूत्राणि मुक्तभेदावेदकानि)
इत्यादिना ब्रह्मसूर्ययमादीनां सर्वदेवानाम्, दिवो देव्या अवरोधभूतानां सर्वदेवानाम्, गङ्गाद्यब्देवतानां च वेदव्याख्यानम्, सोमयागादिकम्, कामचरणं च मुक्तानां भेदेनावस्थितानामुच्यते । मुक्ताश्चात्रोच्यन्त इति प्रतीयते; ‘अमृतं कृधि’ इति वचनात् । अमुक्तानां स्वे स्वे लोकेऽवस्थानं हि तेषाम् । मुक्तानां हि विष्णुलोकेऽवस्थानं देवानाम् । ‘मुक्तः प्रतिज्ञानात्’(ब्र.सू.४.४.२) । ‘सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः’(ब्र.सू.४.४.८) । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’(ब्र.सू.४.४.१७) । ‘भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च’(ब्र.सू.४.४.२२) । ‘अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्’(ब्र.सू.४.४.२३) इत्यादि मुक्तसूत्रेभ्यश्च मुक्तानां विष्णोर्भेदो भोगादिकं च सर्वं प्रतीयते । ‘ग्राव्णा सोमे महीयते’(ऋ.सं.९.११३.६) इति ब्रह्मणोऽन्यमुक्तैः पूज्यत्वं च प्रतीयते ।
(सूत्राणुसारेण श्रुतेरर्थ उपवर्णनीयः)
नच सूत्रेषु निश्चितार्थस्यौपचारिकत्वं वक्तुं युज्यते । निर्णयात्मकत्वात् तेषाम् । अतिप्रसङ्गश्चोपचारादिकल्पने । ‘ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः’(भ.गी.१३.५) इति (हि) विनिश्चितानि ब्रह्मसूत्राणि ।
‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।
योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रस्य निर्णयः ॥’इति आदित्यपुराणे ।
(न मुक्तिर्भोगरहिता)
न च निर्णयकानि(निर्णयात्मकानि. हृ) भगवद्वाक्यान्यपहाय मानुषवाक्यैरेव तेषामुपचारत्वादि कल्प्यम् । न च भोगरहिता मुक्तिर्नामान्याऽस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् ।
‘भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः(ग्रहत्वमाप. हृ ) ।
तथा मुक्तावुत्तमायां विष्णुमाविश्य भुञ्जते ॥
विष्णोर्वशाश्च ते सर्वे सर्वदा दुःखवर्जिताः ।
न तु विष्णुगुणान् सर्वे भुञ्जते ते कदाचन ॥
बाह्यभोगान् भुञ्जते च तारतम्येन कांश्चन ।
विष्णोर्देहाद् बहिश्चापि निर्गच्छन्ति यथेष्टतः ॥’ इति स्कान्दे ।
‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’(भ.गी.१४.२) इति भगवद्वचनम् ।
तस्मात् मुक्तैरपीज्यमानः सर्वस्माद् भिन्नः सर्वोत्तमः सर्वनामा सर्वशक्तिः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायणः सर्ववेदादिषूच्यते इति सिद्धम् ॥ ३ ॥ ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥
नित्याततगुणत्वात् स आत्मेति श्रुतिषूदितः । इदं सर्वमपेक्ष्यासौ कालतो गुणतस्तथा । अग्र्य एव समस्तेभ्यस्तद्वशत्वाद् रमाऽपि सा । विद्यमानाऽपि नाग्रस्था गुणैरूना ततो यतः । न ब्रह्मा न शिवश्चाऽसीन्नैवान्यच्च मिषत् क्वचित्। सुप्तास्तत्र यतो जीवाः सर्वे ब्रह्मशिवादिकाः । असुप्ता श्रीश्च मुक्ताश्च स्वतन्त्रोन्मेषवर्जनात् । अनुन्मेषा एव तेऽपि स्वतन्त्रोन्मेष एकराट् । नारायणो न चान्योऽस्ति पूर्णोन्मीलद्गुणात्मकः । पराधीनेन वित्तेन भुञ्जन्नपि हि भिक्षुकः । वित्तवानिति नैवोक्तस्तथा श्रीर्मुक्तिगा अपि । मिषन्तोऽप्यन्यतन्त्रत्वान्न मिषन्तः कथञ्चन । सर्वदाऽप्येक एवायं स्वतन्त्रो नापरः क्वचित्।
कालाग्र्यत्वं वक्तुमस्य प्रलये स्थितिरुच्यते ।
लोकाभिधानवद्देवाञ्जडलोकांश्च शाश्वतः । स लोकेभ्यः पूर्वतनान् अबाख्यान् महदादिकान् ॥ ब्रह्मशर्वादिकान् सृष्ट्वा जडैस्सह जनार्दनः । दिवमाकाशमुर्वीं च ससृजेऽथ द्विसप्तकान् ॥ इति सृष्ट्वा स लोकांस्तु पुनस्तानेव लोकपान् । अण्डान्तः स्रष्टुमैच्छच्च तेषां पूज्यत्वसिद्धये ॥ अम्नामकेभ्यस्तेभ्यः स पूर्वसृष्टेभ्य एव तु । सर्वजीवाधिकत्वात् तु ब्रह्माणं पुरुषाभिधम् ॥ अंशेनोद्धृत्य रुद्राद्यैः सह चैनमयोजयत् । तथैव चेतनानाञ्च भागानुद्धृत्य पिण्डवत् ॥
चेतनाचेतनं राशिमेकस्थं विदधे प्रभुः ।
अण्डवन्मुखमस्यासीत् प्रथमं तु शिरोऽभिधम् । भिन्नमास्यं पुनस्तस्य विष्णोरेवेच्छया प्रभुः ॥ तत्र वाङ्नामकं रूपं वह्नेरासीत् पुरातनम् । तस्यैवाथ द्वितीयं च यदग्निरिति गीयते । तथैव नासिकातोऽभून् मुख्यवायोः सुतो मरुत् । प्राणो वायुरिति द्वेधा, चक्षुषोऽभूत् तथा रविः । द्विरूप एव, कर्णाभ्यां मित्र-धर्म-अप्प-वित्तपाः । दिग्देवता द्विरूपेण बभूवुः सर्व एव च । हृदयाद् गरुडानन्तशिवचन्द्राः पृथक् पृथक् । मनो बुद्ध्यभिमानाश्च तन्नामानश्च जज्ञिरे । त्वचश्च रोमनामानो वृक्षनामान एव च । द्विविधाः पारिजाताद्या बभूवुर्ब्रह्मदेहतः । हस्ताभ्यां द्विविधः शक्रः, पद्भ्यां तत्सूनुरेव च । यज्ञस्त्वजनि, पायोश्च यमो निर्ऋतिरेव च । रेतोऽम्नामा द्विरूपस्तु शिव एव च गुह्यतः ।
अपानो मृत्युरिति च मुख्यो नाभेश्च(स्तु) मारुतः ॥ १ ॥
दिव्याम्बराः कुण्डलिनः प्राविशन्नुदकार्णवम् । तदाऽशनापिपासाख्यं द्विरूपं मारुतं पुनः । तस्मिन् देवसमूहे तु विष्णुः प्रावेशयत् प्रभुः । तेऽब्रुवन् देहि नो वासं यत्र चान्नमदामहे । गोरूपमेभ्यो ब्रह्माणं ददौ नारायणः प्रभुः । तत्र प्रविश्य ते देवा नालमित्यब्रुवन् पुनः । अश्वरूपं विरिञ्चश्च पुनरेवाददत् प्रभुः । तद्रूपेऽपि प्रविश्यैव नालमित्यब्रुवन् पुनः । पूर्वसृष्टं पुमाकारं ब्रह्मणोऽदात् पुनर्हरिः ।
तद् दृष्ट्वैवालमित्यूचुः.....
‘कुर्वाज्ञामावयोश्चैव यथा त्वच्छासनानुगौ ॥ नित्यं भवाव’ इति, हरिः ‘सर्वत्र प्रविश’ इत्यमुम् । आह, तस्माद् देवतानां सर्वासां भागभुङ् मरुत् ॥ एक एव प्राणनामा, नाभिस्थोऽपि स एव हि । अशनापिपासापानश्च मृत्युश्चेति चतुर्विधः ॥
एक एव महान् वायुः सर्वदेवेषु संस्थितः ॥ २ ॥
अबाख्याः देवताः पूर्वसृष्टा ब्रह्मादिकाः पुनः । ददर्श(ददर्शाऽशु .हृ) सुविशालाभ्यां नेत्राभ्यां पुष्करेक्षणः । तद्दर्शनात् तदिच्छातस्तासां देहोऽभवत् पृथक् । सर्वासामपि देहैकदेशेभ्यो मिळितं शुभम् । सर्वैरधिष्ठितं चैव विरिञ्चेन विशेषतः । दिव्यावयवसम्पन्नमेकमेव सुलोचनम् । भोग्यभोक्त्रात्मना नास्ति तस्य दुःखं कथञ्चन । ते हि देवाः स्वयं भोग्याः स्वयं भोक्तार एव च । क्रीडन्ते मोदिनो नित्यम्, तथाऽप्यन्नात्मकस्त्वसौ ।
क्रीडयाऽपाक्रमत् किञ्चित्...।
अत्तुं वागादिभिः सर्वैरैच्छन्नाप्यशकत् तदा । जानन्नपि क्रीडयैव तारतम्यं प्रकाशयन् । एवं चकार ब्रह्मा स क्वाज्ञानं लोककर्तरि । क्षुत्पिपासदयश्चैव देवानां भोगसाधकाः । न तु पीडाकरास्तेषामैश्वर्यादिगुणोन्नतेः । अन्नमूर्तिं ततो ब्रह्मा प्रधानेनैव वायुना । अपानाख्येनात्तुमैच्छत् तदैवाशकदाशु सः । तस्माद् भोक्तैक एवासौ सर्वस्यान्नस्य मारुतः । तत्प्रसादात् परेऽश्नन्ति किञ्चित् किञ्चिन्न चाखिलम् । आयूरूपोऽखिलानां च देवानां वायुरेव हि । अन्नदेवस्य चाऽयुः स तस्माद्देवोत्तमो मरुत् ॥ आयुःशब्दो ज्ञानवाची गतिवाची च यत्ततः । चेष्टामोक्षज्ञानदाता सुराणां मारुतस्ततः ॥ अन्योन्यगुणदातृत्वात् समानौ ब्रह्ममारुतौ । तस्मान्मोक्षे सुखे ज्ञाने विष्णुभक्त्यादिकेष्वपि(भक्त्यादिकेषु च .हृ) ॥
सर्वेभ्यश्चाधिकौ तौ हि तयोर्विष्णुः परस्सदा ।
इत्थमैक्षत देवेशो ‘ब्रह्माद्या यदि मां विना । क्रियादिषु समर्थाः स्युर्न मे विष्ण्वभिधा भवेत् ।’ सर्वचेष्टयितृत्वाच्च विशिष्टबलतस्तथा । विष्णुरित्यभिधा मह्यम्, सा न युक्ता दिवौकसाम् । स्वतन्त्रत्वे, ततः सर्वे मद्वशा एव नान्यथा ।
तस्मादेषां प्रवृत्त्यर्थं प्रवेक्ष्ये सह वायुना ।
मूर्धन्यनाड्या प्रथमं ब्रह्मवायुसमन्वितः । अग्न्यादयस्ततः पश्चात् प्रविष्टास्तन्नियोजिताः । प्रपदाभ्यां तथाऽन्येन रूपेण प्रविवेश सः । बिभर्ति देहं तेनैव मूर्धाविष्टेन(मूर्ध्नाविष्टेन) चेष्टयन् । नारायणो वासुदेव इति द्वेधा व्यवस्थितः । मूर्धाविष्टो(मूर्ध्नाविष्टो) वासुदेवस्तस्य चावसथास्त्रयः । अक्षि कण्ठो हृदित्येवं त एव स्वप्ननामकाः । आप्नोत्यत्र स्वयं विष्णुरतः स्वप्नाः प्रकीर्तिताः । अनिरुद्धादिरूपेण त्रिधा तेषु व्यवस्थितः । दाताऽवस्थात्रयस्यास्य जीवस्य क्रमशो विभुः । सुषुम्नायां वासुदेवो मूर्धन्येव व्यवस्थितः ।
तस्यामेव ब्रह्मनाड्यां स्थितो नारायणः प्रभुः ।
जातो मत्स्यादिरूपेण सर्वभूतेषु चाऽविशत् । ‘असुराणां निहन्तारं ज्ञानादिगुणदं तथा । चेष्टाप्रदं च भूतेषु(देहेषु) न मदन्यं वदत्यपि’ । इति मत्वा जगन्नाथो दैत्यनिग्रहणेच्छया । ज्ञानदानार्थमपि तु प्रादुर्भूतो भुवि प्रभुः । तथा जीवेषु सर्वेषु प्रविष्टः प्रेरणेच्छया । को ह्यन्यस्तमृते विष्णुम् एतत्कर्म करिष्यति । स सर्वगुणसम्पूर्णं सर्वगं नित्यमव्ययम् । एतदेवस्वरूपं स त्वपश्यदवतारगम् । तस्मात् सर्वावताराश्च सर्वजीवेषु संस्थिताः(च स्थिताः .हृ) । प्रादुर्भावाः सर्वगुणैः पूर्णा एव सदा स्थिताः ।
पश्यन्ति च तथा नित्यं निर्दोषोरुस्वसंविदा ।सर्वदैव ह्यसौ विष्णुरिदन्द्रो नामतो मतः । ब्रह्मादीनां हि सर्वेषां तत्प्रसादेन जायते । जानन्ति न स्वतस्तेन नेदन्द्रास्ते प्रकीर्तिताः । रमाऽपि तत्प्रसादेन जानाति किमुतापरे । अल्पज्ञाना अल्पगुणा अल्पानन्दाश्च तेऽखिलाः । रमाऽजशङ्करेन्द्राद्यास्तेनानिन्द्राः क्रमेण ते । पापैरज्ञाततां देवा मानयन्ति सदाऽऽत्मनः । हर्षेण, तेन विष्णुः स इन्द्र इत्यभिशब्द्यते । नेदन्द्रताऽसुरादीनां ज्ञायेतेति श्रुतिर्हरिम् । इन्द्र इत्येव वदति पारोक्ष्येणोरुसद्गुणम् ।
इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ।‘मुख्यतः कर्मनामा तु प्रादुर्भावात्मको हरिः । अनिरुद्धतनुश्चैव तत्र ह्यमितचेष्टितः(ह्यमितचेष्टता .हृ) । कर्माभासा जीवसङ्घाः, सत्यं प्रद्युम्ननामकः ।
सङ्कर्षणो हरिः पन्थाः, ब्रह्मोक्तो वासुदेवकः’ ॥ इत्यादि च (हि) नामनिर्णये ।‘तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी’(छां.१.६.७) इति सूर्यमण्डले पुण्डरीकाक्षत्वेन निर्दिष्टस्यात्रापि ‘य एष तपति’ इत्यादिना बहुशोऽनुसन्धानाच्च(अभ्यासाच्च) । सूर्यो हि ‘हिरण्याक्षः सविता देव आगात्’(ऋ.सं.१.३५.८) इति पिङ्गलाक्षः(पिङ्गाक्षः .हृ) प्रसिद्धः । ‘विरूपाक्षः शिवः सूर्यः सुराचार्यो विनायकः ।
पुण्डरीकेक्षणो विष्णुः सहस्राक्षः सुराधिपः ॥ इति च स्कान्दे ।‘चन्द्रसूर्यादयः शब्दा विष्णावेव हि मुख्यतः । उपचारात् तदन्येषां विष्णुनैव कृताः पुरा’ ॥
इत्यादिना तस्यैव सर्वनामवत्वाच्च । ‘ णकारो बलं षकारः प्राण आत्मा’ इत्यादिनाऽन्ते विष्णुशब्दव्याख्यानेनोपसंहाराच्च ।तदेव मिषणं नाम, सद्रूपं मिनुते यतः ॥ मिषच्च नान्यद् विष्णोर्हि किमुतोन्मिषदिष्यते ।
उच्चैर्मिषन् हि भगवान् सर्वदैव जनार्दनः ॥’इति च सत्तत्त्वे ।‘प्रलयेऽप्यखिलं देवी रमा विष्णुप्रसादतः । जानाति नित्यज्ञानेन, मुक्ता ध्यानस्थिता लये ॥’ इति च सत्तत्त्वे । ब्रह्मादीनां शरीरान्तरस्यापि प्रलयेऽनुक्तेरेवाभावः सिद्ध्यति । ‘आत्मा ब्रह्माग्र इत्यादि गुणाग्र्यत्वं हरेर्वदेत् । कालज्यैष्ठ्यं न, यस्मात् तत् सृष्ट्युक्तेरेव सिध्यति ॥’इति वाक्यनिर्णये ।
गुणाग्र्यतायामेव कालज्यैष्ठ्यस्याप्यन्तर्भावाच्च ।‘भूतेभ्योऽनन्तरं त्वण्डं सृष्ट्वा विष्णुः पुरा प्रभुः । लोकभेदांश्च चक्रेऽत्र, पश्चाद् ब्रह्मा विशेषतः ।
सम्यक् चकार लोकांस्तान् लोककर्ता ततः स च ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते ।‘ब्रह्मवायू च तद्भार्ये वीन्द्रशेषौ च तत्स्त्रियौ । शिवस्तद्दयिता शक्रकामौ तद्दयितादयः ।
सर्वे सुराः क्रमेणैव विष्णोर्जाता अबाख्यकाः ।हीनाः शतगुणेनैव क्रमेणानेन ते मताः । तेभ्यश्च ऋषयो मर्त्या हीना एव क्रमेण च । विशेषतस्तु मुक्तानां सर्वसंसारबन्धनात् । क्रमोऽयं सम्यगुद्दिष्टो नित्यानन्दैकभोगिनाम् । न विशेषो ब्रह्मवाय्वोरधिकाराविभेदतः । न शेषशिवयोश्चैव तत्पत्नीनां च सर्वशः । सुपर्णशेषयोश्चैव साम्यं सर्वगुणेष्वपि ।
साम्यमेवैतयोः पत्न्योः साम्यं शक्रमनोजयोः ।पूर्वस्य प्रतिबिम्बश्च चरमस्तत्सुतस्तथा । तद्वशाश्चाखिला विष्णोर्न विष्णुः कस्यचिद् वशे । महदादिमानिनश्चैते जातास्तैः सह सर्वशः । एते लोका इति प्रोक्ता लोकानाम् अभिमानिनः(लोकानामभिमानिनः) । त एव लोकपालाश्च यदा पश्चाद् प्रजज्ञिरे ।
पश्चाज्जातैर्हि रूपैस्तैर्लोकस्थान् पालयन्त्यलम् ॥’ इत्यादि तत्त्वसारे ।‘नायं दशरथाज्जातो न चापि वसुदेवतः । क्वास्याज्ञानं कुतो दुःखं प्रादुर्भावेष्वपि प्रभोः ॥ प्रादुर्भूतश्चिदानन्दशरीरो राघवः स्वयम् । स्तम्भाद् वा नरदेहाद् वा नैवास्य प्राकृती तनुः ॥ दैत्यानां मोहनार्थाय सोऽज्ञानाद्यं प्रकाशयेत् ।
पूर्णचित्सुखरूपोऽपि सदा सर्वावतारगः ॥’इत्यादि स्कान्दे ।‘प्रयोग एककालीनः सर्वकालेऽनुषज्यते । ददर्श विष्णुरित्यादौ नित्यचिद्रूपतो हरेः ॥’ इत्यादि सत्तत्त्वे ।
परोक्षप्रिया इव इत्यसुराणां सम्यगदर्शनेन पतनं देवानां प्रियम्, तथाऽप्यपरोक्षदर्शिन्येव प्रीतिं कुर्वन्तीति इवशब्दः ॥ ३ ॥
अन्नस्थोऽन्नेन सहितस्तस्मिन् रेतस्त्वमागते । तस्मिन् स्थितं स्वरूपं(स्थितस्वरूपम्. हृ) स पुरुषस्थो बिभर्त्यजः । तद्रूपं रेतसा साकं स्वयं पुंसि स्थितो हरिः । स्त्रियां सिञ्चति, तस्यैव स्थानान्तरगतेः प्रभोः । प्रथमं जन्म विष्णोस्तु,(विष्णोस्तत्) स तस्या अङ्गवत् प्रभुः । नैनां हिनस्त्यानुकूल्यात्, सा पुत्रं भावयत्यथ । पुत्रस्य भावना सैव तद्गत्वाद् हरिभावना । सम्भावितव्या सा चैव भर्त्रा पुत्रश्च सादरम् । सम्भावनं कुमारस्य जानतः केशवे भवेत् । तस्येत्यर्पणमात्रेण पूजितो हि भवेद्धरिः । पुत्रस्थस्य हरेः पूजां कुर्वतः पृथिवीस्थितिः । स्वर्गस्थस्यापि भवति पुत्रपुण्यं यतोऽखिलम् ।
अत्यल्पपुण्यभाक् स स्यान्नार्चयेत् केशवं यदि ॥
एतद्रूपं निधायैव जीवार्थे धर्मकर्तवे । पितृस्थेन तु रूपेण गच्छत्यन्यत्र केशवः । पितुरन्यत्र जननं तृतीयं जन्म तद्धरेः । अन्तर्यामितयैवं हि सर्वजीवेषु संस्थितम् । सर्वदोषोज्झितं विष्णुं कर्तारं सर्वकर्मणाम् । नित्यानन्दं स्वतन्त्रं च सर्वज्ञं सर्वतोऽधिकम् । यो वेद देहबन्धात् स विमुक्तो नित्यमुत्तमान् ॥
भोगान् भुङ्क्ते यथायोग्यम् इति वेदानुशासनम् ॥ इत्यैतरेयसंहितायाम् ।लोकानां दर्शयामास स्वरूपसदृशाकृतिम् । येन रूपेण कंसादीन् जघ्ने तद्रूपमेव(तद्रूप एव हि. हृ) हि । पूज्यतेऽद्यापि शर्वाद्यैर्निर्मिताऽन्या शवाकृतिः । स्वर्गारोहणकाले तु जनास्तेनैव मोहिताः । यत्तद् रूपं निजं विष्णोर्दृष्टं सर्वजनैर्भुवि । अद्यापि तद् देवलोके पूज्यते सर्वदैवतैः ॥’ इत्यादि स्कान्दे । ‘प्रदर्श्यातप्ततपसाम् अवितृप्तदृशां नृणाम् । आदायान्तरधाद् यस्तु स्वबिम्बं लोकलोचनम्(भाग. ३.२.११) ॥’ इति च भागवते ।
‘प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवा’(ऋ.सं.२.४१.१९) इत्यादिवत् प्रकृष्टगतिवाच्येवायं शब्दः । प्रकृष्टगतित्वादेव च मरणेऽपि प्रयुज्यते ।‘अहेयत्वादहं विष्णुः स तु सर्वान्तरत्वतः ।
अस्यस्मीत्यादिभिः शब्दैरुच्यतेऽन्योऽपि जीवतः ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते ।‘न वेदेषु पदं ककिञ्चिद् वर्णो वा व्यर्थ इष्यते । यथायोग्यं चार्थभेद ऊह्यः सर्वत्र वेदिभिः(ईशावास्य.१६) ॥’ इति शब्दनिर्णये ॥ ‘शब्दा रेतोऽन्नमित्याद्या अपि तत्र गतं हरिम् ।
वदन्त्यविष्णुवाची हि न शब्दः क्वचिदिष्यते ॥’ इति च ।मुक्तः कामानवाप्नोति भुङ्क्ते चैव यथेष्टतः ।
सर्वानपि निरातङ्कः सर्वदा च हरेर्वशः ॥ इति सत्तत्त्वे ॥
इत्यपृच्छद् रमा देवी महिदासं जनार्दनम् । आह तां महिदासोऽथ पूर्णानन्दतमस्त्विति । उपास्यस्तादृशो ह्यस्य स्वभावः परमात्मनः ।
येन जीवो दर्शनादीन् प्रेरितः कुरुते सदा ।
मन्तृत्वान्मन इत्येव यच्च ज्ञान(तृ)स्वरूपतः । एतत् सन्निहितत्वाच्च पूर्णत्वादेति कीर्तितः । इतत्वाच्च ततत्वाच्च स इतन्नाम केशवः । गुणानामुच्चयो यस्मात् स च इत्येव शब्दितः । सम्यग् ज्ञानस्वरूपत्वात् संज्ञानमिति कीर्तितः । आततज्ञानरूपत्वाद् आज्ञानं भगवान् हरिः । विविधज्ञानरूपत्वाद् विज्ञानमिति कीर्तितः ।
प्रकृष्टात्मगुणज्ञानरूपः प्रज्ञानमुच्यते ।धृतिर्धारणरूपत्वान्मतिर्मासु ततत्वतः । मनुनाम्नाम् अजादीनां मनीषेशो यतो हरिः । सर्वप्रेरकरूपत्वाज्जूतिरित्यभिधीयते । सर्वदेशेषु कालेषु स्वरूपेषु च सर्वशः । समं रमत इत्येव स्मृतिर्नाम जनार्दनः । सर्वस्य क्लृप्तिकर्तृत्वात् सङ्कल्प इति गीयते । क्रतुः स सर्वकर्तृत्वाद् असुरप्यसनाद्धरिः । अमेयानन्दरूपत्वात् काम इत्यभिधीयते । अवशः स स्वतन्त्रत्वात् त्रयोविंशतिनामकम् ॥
यो वेदैवं हरिं सम्यङ् मुच्यतेऽखिलसंमृतेः ।
तथैव पञ्चभूतानि पुण्यपापविमिश्रिताः । क्षुद्रात्मानस्तु ये मर्त्या इतरे असुरा अपि । सर्वं जगदिदं विष्णोर्वशे तिष्ठति सर्वदा । तेनैव नीयते नित्यं तस्मिन्नेव प्रतिष्ठितम् । मुक्ता येऽलोकनामानो नीयन्ते तेऽपि विष्णुना । स्वयं चानन्यनिष्ठत्वात् प्रतिष्ठेत्यभिधीयते । देशतः कालतश्चैव गुणतश्चातिपूर्तितः ।
विष्णोर्ब्रह्मेति नामैतन्मुख्यतोऽन्यत्र न क्वचित्।
प्रकृष्टज्ञानरूपस्य प्रसादात् परमात्मनः । अस्माद् देहात् समुत्क्रम्य गत्वोर्ध्वं लोकमुत्तमम् । अमृतः सन् विष्णुलोके भोगान् सम्प्राप्य पुष्कलान् ।
भुङ्क्ते यथेष्टतो नित्यमिति वेदानुशासनम् ॥’ इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ।‘प्रजापतिः शिवः शेषो(शेपो. हृ) लिङ्गमित्यभिधीयते । लिङ्गाभिमानी लोकस्य स्रष्टा गिरिश एव हि ॥’ इति शैवपुराणे । ‘सममस्त्वनयोर्युद्धमिति प्राह प्रजापतिः ।
वाक्यं शिवस्य तत् श्रुत्वा शक्रो नेत्याह सत्वरः ॥’ इति भारते ।‘ब्रह्माद्याः सर्व एवैते जीवा भिन्नस्वभावकाः । यथा शाल्यादिबीजानि भिन्नवीर्याणि सर्वशः ॥’ इति सत्तत्त्वे ।
प्रथम-इतराणि इतिशब्दो मानुषाणाम्, द्वितीयोऽसुरादीनाम् ।अण्डजानि च इत्याद्युक्त्वा पुनः अश्वा गाव इत्यादि देवादीनां मन आदेरेव जातानामपि स्वीकारार्थम् । अण्डजत्वाद्युत्पत्तिप्रकारोऽपि विष्ण्वधीन इति ज्ञापयितुं तत्कथनम् ।
‘तथाऽश्मानस्तृणकाष्ठाश्च सर्वे दिदृक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते’ इति भारतवचनाद् अश्मादीनामपि प्राणित्वात् तत्स्वीकारार्थं प्राणि इति । गमन-पतन-स्थिरत्वादयोऽपि भावा विष्ण्वधीना इति ज्ञापयितुं जङ्गमम् इत्यादिवचनम् ।कर्मणां दाह एवायं मुक्तिरित्यभिधीयते ॥ स तु मुक्तस्ततो देहाद् उद्गच्छति परात्मना । प्रेरितो, विष्णुलोकं च प्राप्य भोगान् अवाप्य च ॥ भुङ्क्ते विष्णुप्रसादेन, न विष्णोरवशः क्वचित्।
विष्णुतन्त्रा इमे सर्वे मुक्ता अपि यतोऽखिलाः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।
‘आधारः सर्ववेदानां वेदाणी प्राण उच्यते ।
तस्मिन् स्थितो हरिर्नित्यम् आणीस्थ इति गीयते ॥’ इति शब्दतत्त्वे ।हे विष्णो ! अनेन त्वद्विषयेणैव अधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि सर्वाहोरात्रेष्वपि त्वद्विषयाध्ययनमेव करोमीत्यर्थः । ऋतं यथावत् अवगतं त्वां वदिष्यामि । सत्यं साधुगुणैस्ततं सर्वनियन्तारं च । तद् विष्ण्वाख्यं ब्रह्म मामवतु इति तस्यैव विष्णोः परोक्षत्वेनैव प्रार्थनम् । ‘वाङ् म इत्यादिकं खण्डं विष्णुप्रार्थनरूपकम् ।
अविघ्नत्वमभीप्सूनां शिष्याणां दृष्टवान् हरिः ॥’ इति च ॥
विष्णोस्तु बहुरूपाणां वाचिकाम्(वाचकाम् .हृ) ऋषयो विदुः । तौ च वर्णौ हरेः सम्यक्स्वरूपप्रतिपादकौ । बहुधैव स्थितस्यास्य सदैवैकस्वरूपिणः । विष्णुनामार्थरूपत्वाद् वेदानामपि सर्वशः । अन्येषामपि शब्दानां संहिता विष्णुवाचिकाः(वाचकाः .हृ) ।
तद्वाचकास्तथा वर्णाः सर्वे लौकिकवैदिकाः ।
देवता पूर्ववर्णस्य पूर्वरूपं तदुच्यते । देवतोत्तरवर्णस्य क्रीडनाच्च द्युनामकम् । दिवि स्थितं हरे रूपमुत्तरं रूपमुच्यते । वेदकत्वाच्चायनत्वाद् रूपं यद्वायुनामकम् । विष्णोस्तद्वर्णयोर्मध्यदेवतेति प्रकीर्तितम् ।
संहितानामकं तच्च रूपद्वयसहस्थितेः ॥षकारं मध्यमत्रैव णकारं केचिदुत्तरम् । पृथक्करणमेवैषां वर्णयोर्मध्यमुच्यते । उपसर्गमात्रं वीत्याहुः केचिन्नाम ष्णुमात्रकम् । षकारं च णकारं च वर्णौ पूर्वोत्तरावपि । व्यक्तिरेवोष्मणस्तत्र मध्यमित्यभिधीयते ।
सर्वेप्येत उपादेयाः पक्षा निर्दोषका यतः ।’इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ॥
वक्तृत्वाच्चैव वाङ्नामा मनो मन्तृत्वहेतुतः ॥’इति च ।
‘प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति, वदन् वाक्, पश्यंश्चक्षुः, शृण्वन् श्रोत्रं, मन्वानो मनः तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव’(बृ.उ.५.१. अव्याकृतब्राह्मणम्) इति च श्रुतिः ।
पूर्वोत्तरार्णमध्येषु स्थितमुक्तं सनातनम् । माण्डूकेयैर्हि, शाकल्यो वासुदेवादिरूपिणम् । तेषु चोच्चारके चैव स्थितमाह चतुर्विधम् ।
भूमिद्युवृष्टिपर्जन्यनाम्नोर्व्यादिषु संस्थितम् ।
अधरार्धस्य चोर्व्याश्च साम्यमन्यस्य वै दिवा । वाचो वृष्ट्यैव साम्यं च पर्जन्येनैव चाऽत्मनः । तेषां तेषु स्थितिं चैव विष्णोश्च चतुरात्मनः । आकाशस्यान्तराकाशे नृसिंहस्यात्र संस्थितिम् । वायोः प्राणात्मतां चैव तत्र दाशरथेः स्थितिम् । सूर्यविद्युद्धुताशानां दृग्धृद्रेतःसु च स्थितिम् । कपिलस्य च हंसस्य जामदग्न्यस्य तेषु च ।
स्थितिं वदति विद्येयमपि मोक्षप्रदायिनी ॥’ इत्यादि च ।
दिविष्ठो वामनश्चैव सम्प्रोक्तः पददेवता । नृसिंहस्त्वन्तरिक्षस्थो भगवान् क्रमदेवता । स्वाध्यायमेवं ध्यात्वा यः करोत्यपवदेन्न तम् । तस्यापवदिता याति त्रैलोक्याद् अध एव हि । नाशमाप्नोति निरये तस्माद् अपवदेन्न तम् । गच्छस्यध इति ब्रूयाद् अन्यं ब्राह्मणतस्तथा ।
ब्रह्मप्राप्तेर्हि योग्यो यो ब्राह्मणः स, न चेतरः ॥’ इति च ॥अवराभ्यां पृथिव्यन्तरिक्षाभ्यां च्युतोऽसीति । उत्तराभ्याम् अन्तरिक्षद्युभ्याम् । ‘क्रमस्वाध्यायकृद् यस्तं विशेषेण न निन्दयेत् । लोकत्रयादपि भ्रष्टो यस्मात् तन्निन्दको भवेत् ॥’ इति च ।
तस्माद् अतिदुष्टत्वात् तन्निन्दको नास्त्येवेत्युक्तम्- तस्य नास्त्युपवादः इति । ‘तं कृष्णं पुण्डरीकाक्षं को नु युध्येत बुद्धिमान्’(भाग.५.६३.८) इत्यादिवत् ।
‘अमुक्तियोग्यैस्तु नरैर्विदुषां निन्दने कृते । ब्रूयाल्लोकच्युतोऽसीति निन्दितोऽसुरसर्गगैः । नाशयिष्यति विष्णुस्त्वाम् अन्धे तमसि पातयेत् । इति ब्रूयान्न तु ब्रूयाद् देवसर्गात्मकं क्वचित्॥’ इति च । ‘षणयोः सन्धिकरणात् संहिताध्ययनं भवेत् । विषणुस्त्विति यो ब्रूयात् पदाध्यायी भवेत सः । सन्ध्युक्तिश्च विभागश्च द्वयं व्याप्तं क्रमेण तु । तस्माद् द्विधाऽपि वचनात् क्रमाध्यायी भवेत सः ॥ भोगवृद्धिं च यो मोक्ष इच्छेद् विष्णव इत्यसौ । मोक्षकामो विष्णवे द्वयकामो द्वयं वदेत् ॥ विष्णुनामात्मकत्वाच्चाथ संहितपदक्रमाः । सर्ववेदस्थिता मोक्षतद्भोगद्वयसाधकाः ॥ तज्ज्ञानामेव नान्येषाम् इति वेदानुशासनम् । संहिताद्या ब्रुवन् वाऽपि य एवंविन्नवा ब्रुवन् ॥ परिवादं ब्रुवन्तं वा न ब्रुवन्तम् अथापि वा । यद् वदेत् तत् तथैव स्यात् क्षिप्रमेव न संशयः ॥’ इति च ।
अग्र एव ‘अग्र्यमेव’ उभयमन्तरेण ।
योऽतिक्रमति तस्याज्ञाम् अतिद्युम्नः प्रकीर्तितः(स कीर्तितः .हृ) ॥ मोक्षयोग्योऽपि(मोक्षायोग्योऽपि . हृ) यस्त्वेवम् अतिद्युम्नो भवेत् पुमान् । लोकच्युतोऽसीत्येवं तं ब्रूयान्नाज्ञास्थितं क्वचित्॥ लोकच्युतो भवेत्येनम् अपि नैव वदेत् क्वचित्।
च्युतोऽसीति तु शिक्षार्थं ब्रूयान्नैवान्यथा क्वचित्॥’ इति च ॥३ ॥
वायुं च, मुक्तिमाप्नोति, य एवं तदुपासकम् । निन्देत विष्णुविज्ञानविषये, तं वदेत सः । विष्णुना वंशभूतेन वायुना सहितं तथा । न शक्नोषीति मामात्थ हास्यतस्त्वाम् अतो हि तौ । ज्ञानसामर्थ्यवान् इत्थं ब्रूयाद् देवादिरुत्तमः । अन्यो गन्धर्वपित्रादिरल्पज्ञानबलो, हि यः । स ब्रूयाद् विष्णुवायुभ्यां सन्धिमिच्छन्तमेव माम्(मा. हृ) ॥
सन्धातुं नाशको यस्माद् हास्यतस्त्वाम् अतो हि तौ ॥’ इति च ।‘तद्भक्तभक्तेष्वपि यो न कुर्यात् प्रीतिमञ्जसा ।
विष्णुर्जहाति तं पापम् इह चामुत्र च प्रभुः ॥’ इति च भारते ॥४ ॥
वराहाख्यं हरेरन्यवर्णगं वामनाभिधम् । उत्तराक्षरसंज्ञं च, वर्णयोरन्तरस्थितम् । अवनात् काशनाच्चैतद् अवकाशाभिधं हरेः । नृसिंहरूपमित्याहुर्निर्भुजास्यास्तथाऽवदन्(त्) । ह्रस्वो येनाक्षरोच्चारो मात्रासन्धिस्वरात्मकः । व्यासरूपो हरिः साक्षात् संहितानामकस्त्विति । तत्पुत्रो मध्यमः प्राह समोच्चारणकारणः । सामनामा वासुदेवः संहितानामवानिति ॥’इति च ।
मापयति त्रायति चेति मात्रा भगवान् । यथोच्चारितवर्णयोर्मध्यस्थितश्च ।
‘येषां नैतन्नापरं किञ्चनैकं ब्रह्मणस्पते ब्रूहि तेभ्यः कदाचित्।’ ‘अथो शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः ।’ ‘आ देवानामोहते वि व्रयो(वि ब्रयो. हृ) हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः ।’(ऋ.सं.२.२३.१६)
अभिद्रुहस्पदे अभितो द्रोहस्य= नित्यनिरतिशयदुःखस्य अन्धतमसो(अन्धतमसस्य इति ताम्रपर्णीयपाठः) योग्याः ।शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथावादबला जनाः । कामक्रोधाभिभूतत्वाद् अहङ्कारवशं गताः । याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः । ब्रह्मस्तेना निरानन्दा अपक्वमनसोऽशिवाः । वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते । तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ॥’
इति मोक्षधर्मे भगवद्वचनाद् एवंविधा एव ‘स्तेनाः’ ‘अभिद्रुहस्पदस्थाः’ च ।‘अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् । मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥’(भ.गी.९.११-१२)
इत्यादिवचनाद् असुरादयः । अन्नेषु जागृधुः भोगमात्रगृध्नवः ।अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥ एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥’(भ.गी.१६.८-९) इत्यादि वचनात् ।स्तेनेभ्यो मैव नो ब्रूहि ब्रूह्यथो वैष्णवेषु च ॥’ इति च । ‘सामनाम्ना श्रुतिर्यस्माद् विष्णुमाह ततः प्रियम् ।
तन्नाम विष्णोरिह तु संहितार्थं वदेद् यतः ॥’ इति वचनात् सामनाम्नः संहिताशब्दार्थत्वाद्, विष्णोस्तस्य नाम्नः श्रुतिसिद्धत्वाच्च सामनाम्नोः वासुदेवरूपसमाख्यासु पञ्चरात्रे पठितत्वाच्च तद् रूपं संहितानामकमिति युक्तमित्यभिप्रायः ॥५ ॥
नारायणस्तूत्तरस्य तौ वाक्प्राणाभिधौ मतौ । मध्यस्थः संहितानामा सोऽर्धनारीपुमात्मकः । वेदात्मकत्वाद् वाङ्नाम्नी लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता । प्राणनामा प्रणेतृत्वात् साक्षान्नारायणः स्वयम् । रमित्यानन्द उद्दिष्टः सम्भोग्यं थमुदाहृतम् । विष्णुभोग्या रतितरा लक्ष्मीरेव रथन्तरम् । नारायणो बृहत्वात्तु बृहन्नामा प्रकीर्तितः । रथन्तरस्य बृहतो देवते चैव तावुभौ । वाक् प्राणसंस्थितौ चैव ताभ्यामेव हि सन्धितम् । लक्ष्मीनारायणं रूपं संहितानामकं शुभम् । एतां विद्यामवाप्तुं हि वत्सरं गा अरक्षत ।
तार्क्ष्य एतावन्मात्रं(तार्क्ष्य एतन्मात्रं च- हृ) च समुद्दिश्य न चापरम् ।
द्वयं द्वयं देवतानां मिलितं हरिशर्ववत् । संहितानामकं तत्र वर्णमध्यस्य देवता । तयोरेकं देवतयोः परमन्यत् तथाऽवरम् । अवरस्य परस्यापि संयोगात् संहिता तु सा । प्रोक्ताऽवरपरेत्येव, वाक् प्राणाख्यौ रमाऽच्युतौ । संहितैका, तथैवान्या केशवो वायुसंयुतः । वायुः स पवमानाख्यो देवताश्चाखिला अपि । तृतीया संहिता प्रोक्ता, देवतास्ताः सशङ्कराः । चतुर्थी संहिता प्रोक्ता, शङ्करो ब्रह्मणा सह ।
पञ्चमी संहिता चैव संहिता मोक्षदा इमाः ।तृतीयायां वायुरेव, चतुर्थ्यां सर्वदेवताः । विरिञ्च एव पञ्चम्याम्, अवरा इतरे ततः । प्रथमायां संहितायाम् अवरो वामभागगः । द्वितीयायां तु परमस्तृतीयायां तथाऽवरः । चतुर्थ्यां परमश्चैव पञ्चम्यां वामगोऽवरः । अवराद्याः परान्ता यद् एताः सर्वाश्च संहिताः । ततोऽवरपराः प्रोक्ता नैवोक्तास्ताः परावराः । अभिमानी द्युलोकस्य शिवः सर्वस्य लोकनात् ।
द्योतनाच्च ....
आत्मार्थेऽथ परार्थे वा चिन्तयेदेवमञ्जसा । ‘विद्वांसो देवता यस्मात् सम्यक् तेन महत् फलम् ॥ तेषामेव, हरिश्चैव संहितारूपकः प्रभुः । अगमद् देवलोकं हि कर्तुं देवेष्वनुग्रहम् ॥’
इति चिन्तयतस्तेषां प्रसादात् फलमञ्जसा ।
मन्यतेऽस्याः पुत्रवच्च देवं नारायणं प्रभुम् । वेदैर्हि व्यज्यते विष्णुः सा च वेदाभिमानिनी । प्राणस्थो भगवान् विष्णुः प्राणनामा प्रणेतृतः । ब्रह्मणोऽपि पिता नित्यं भगवान् पुरुषोत्तमः । उपचर्यते पुत्र इति वेदैर्यद् व्यज्यते हरिः ।
सा देवी संहितानाम्नी वाच्योऽस्या विष्णुरेव हि ॥
विष्णुरेवादितिर्नाम सर्वस्यात्ता यतः प्रभुः । स एव पितृसंस्थस्तु पातृत्वात् पितृनामकः । देवतोत्तरवर्णस्य मातृस्थो मातृनामकः । माननात्, पूर्ववर्णस्य देवतेति प्रकीर्तितः । पोषकत्वात् सन्धिनामा वर्णयोरन्तरस्थितः । स एव पुत्रसंस्थश्च पुत्रनामा जनार्दनः । त्राणात् पू्तित एवासौ, वर्णसन्धानकर्मणि । सन्धाननामा सन्धानकर्तृत्वात् पुरुषोत्तमः । प्रजातिकर्मसंस्थश्च स एव प्रजनाभिधः । जनकत्वात् परो विष्णुरेवं विष्णुर्हि संहिता ।
वासुदेवादिरूपेण चतुर्धैवं व्यवस्थितः ।अन्तरेवेक्षणाच्चैव सोऽन्तरिक्षोऽन्तरिक्षगः । पृथिवी पृथिवीस्थश्च प्रथितत्वाज्जनार्दनः । मुख्यार्थत्वात् सर्वनाम्नां सर्वदेवाभिधो हरिः विश्वे देवा इति प्रोक्तो बहुधा तेषु संस्थितः । ज्ञानद्युतेर्देवनामा स्थितो देवेषु केशवः । गां धारयंश्च गन्धर्वो गन्धर्वेषु व्यवस्थितः । माननान्मानुषो नाम मानुषेषु स्थितो हरिः(प्रभुः) । पालनात् पितृनामाऽसौ पितृष्वेव व्यवस्थितः । रतेः प्राणेऽसुराख्यश्च सोऽसुरेषु व्यवस्थितः । एवं पञ्चजनेषुस्थो हरिः पञ्चजनाभिधः । जातनामा जातसंस्थः प्रादुर्भूतगुणत्वतः । जनिक्रियास्थितश्चासौ जनित्वमिति गीयते ।
जनिं यस्मात् तवयति, तवनं हि प्रकाशनम् ॥इति च ॥यापयामासतुर्विष्णोर्हविर्नाम्नो हविर्मुखे । अनुष्टुब्देवता यस्तु नृसिंहो जगतोऽस्य च । स्वमुखे हवनादेव हविरित्यभिधीयते । तस्मिन् यज्ञे वसिष्ठस्तु चतूरूपाज्जनार्दनात् । आजहार श्रियं देवीं रथन्तरवराभिधाम् । चतुर्मूतिः स्तुतस्तेन प्रेषयामास तां श्रियम् । सा चास्मै प्रददौ विद्यां प्रययौ च पुनर्हरिम् । धातेत्युक्तोऽनिरुद्धस्तु प्रद्युम्नस्तु द्युनामकः(द्युतानकः हृ.) । वासुदेवः प्रसविता सर्वस्य प्रसवाद् विभुः(प्रभवाद् प्रभुः) ।
सङ्कर्षणो विष्णुनामा प्रणेतृत्वाद् बलादपि ।भरद्वाजो वसिष्ठश्च ध्यात्वाऽविन्दन् परात् परम् । यजनीयो यजुर्नामा विष्णुः सङ्कर्षणाभिधः । जीवानां स्कन्दनादेव स्कन्नः प्रद्युम्न उच्यते । प्रथमो वासुदेवस्तु देवयानोऽनिरुद्धकः । प्राप्यो देवैर्यतो नित्यम् अनिरुद्धाभिधो हरिः । तस्मादेवं चतुर्मूर्तेः स्तुतिसन्तोषिताद्धरेः । आजहार भरद्वाजो रूपं नारायणाभिधम् । तद् बृहन्नामकं विष्णोश्चातुरात्म्यात् समुद्गतम् । भरद्वाजमुपागम्य प्रादान्मोक्षवरं परम् । चतुर्मूर्तिः स भगवानग्निरित्यभिधीयते ।
अग्र्यत्वात् सर्वभूतानाम् ........अविन्दंस्तं चतुर्मूर्तिं साक्षान्नारायणं प्रभुम् । गुहायां संस्थितमपि ह्यतीव हितमस्य च । सर्वज्ञत्वाद् यज्ञनाम्नो विष्णोस्तेजः परं हि तत् । तस्मादेव चतुर्मूर्तेः सूरिप्राप्यत्वहेतुतः । सूर्यनाम्नोऽहरन् घर्मनामानं तं नृसिंहकम् । घर्षणात् सर्वलोकस्य नृसिंहो घर्म उच्यते । निर्गत्य स चतुर्मूर्तेर्विप्रक्षत्राभिसंस्तुतात् । प्रथादीनां चतुर्णां च पुरुषार्थचतुष्टयम् । दत्वा जगाम भगवान् स्वकीयां तनुमेव च । वसिष्ठाच्च भरद्वाजाद् होत्रध्वर्य्वोर्नृपौ तु तौ ।
यथेष्टसिद्धिं सम्प्राप्तौ सम्यगिष्टाज्जनार्दनात् ॥ इत्याद्यृग्वेदसंहितायाम् ।परमानन्दरूपत्वात् सुपर्ण इतिनामकः । रमयामास तस्यां च निषण्णः सर्वदैव सः । एक एव च विष्णुः स प्रविष्टः क्षीरसागरम् । सर्वं पश्यत्यसौ देवः पूर्णाकुण्ठेन चेतसा । परिपक्वेन मनसाऽपश्यमित्याह तं त्वजः । मातेव व्यञ्जकत्वात् तं प्राणस्थं वाक् सरस्वती । लिहते लिह्यत इव प्राणस्थेन तु सा सदा । स्वयं तु भगवान् विष्णुर्वाक्पतेर्ब्रह्मणोऽपि हि ।
नित्यः पिता स्वतन्त्रश्च नास्य माता पिताऽपि वा(च) ॥’ इत्यादि च ॥ ६ ॥
तथेन्द्रियाभिमान्यादिदेवानां वायुराश्रयः । तेषु सर्वेषु भगवान् बहुरूपो हरिः स्थितः । विष्णुनामाऽक्षरेष्वेवम् अन्येष्वपि तदर्थतः । प्राणनामा तु(अपि) भगवान् प्राणस्थश्चोष्मसु स्थितः । ऊष्मनामा समर्थत्वात् स एव भगवान् हरिः । पूर्णत्वाद् आत्मनामाऽसौ, प्रतिमात्वाद् अमुष्य तु । सङ्घात आत्मशब्दोक्तो, ह्यस्थिरश्चास्थिनामकः । अस्थिस्थितो हरिः स्पर्शसंस्थितः स्पर्शनामकः । स्पर्शहेतुत्वतः स्पर्शनामा स भगवान् हरिः । मज्जासुस्थः स मज्जाख्यो मदं जनयतीति ह । स एव स्वरसंस्थश्च स्वराख्यः स्वरतेः प्रभुः । प्रमाणं सारयेद् यस्मान्मांसाख्यो मांससंस्थितः ।
लोहिताख्यो रक्तवर्णो लोहितस्थो जनार्दनः ।
तत एव विभक्तानि सङ्ख्या तेषां पृथङ् न तत् । तस्मात् सप्तशतान्येव देहे विंशच्च तस्य हि ।
रूपाणि विष्णोर्भागे तु षष्ठ्युत्तरशतत्रयम् ।
अहर्नामा च भगवान् अहार्यत्वात् प्रकीर्तितः । अहोभिः समसङ्ख्यानि यस्माद् अध्यात्मगानि तु । रूपाणि विष्णोस्तेनायम् अहस्सम्मान उच्यते । पूर्णदर्शनशक्तित्वाच्चक्षुर्मय इतीरितः (उदीरितः) । तादृक् श्रवणशक्तित्वाद् तथा श्रोत्रमयः स्मृतः । छन्दोमयः सत्यकामो मन्तृवक्तृबलात्मकः । एवं विद्वांस्तस्य रूपाण्याप्नोति ज्ञानपुत्रवान् ॥
पीयमानं शमाप्नोति प्राप्याहर्नामकं हरिम् ॥ १ ॥
अशीत्युत्तरसाहस्ररूपं वर्णेषु संस्थितम् । विष्णुनाम्नोऽथवाऽन्येषु पञ्चाशत्सङ्ख्यकेष्वपि । तावत् सङ्ख्यानि, देहेषु पृथङ् मज्जास्थिपर्वसु । रूपाणि विष्णोस्तावन्ति चेष्टकानि(चेष्टकासु) पृथक् पृथक् । अर्कस्थितबृहत्याख्यरूपाण्यह्नां च सर्वशः । सम्पादकानि तान्येव, तान्यक्षरमितानि च ।
अस्थ्यादिस्थितरूपाणि तान्युपास्य विमुच्यते ॥’ इति च ।सन्धानात् सन्धिनामाऽसौ स्वयं नारायणः प्रभुः । सन्ध्यूष्माक्षरगाण्यस्य विष्णो रूपाणि सर्वशः ।
सन्ध्यारात्रिदिवास्थानि साशीतिकसहस्रकम् ।परज्ञानात् तु पर्वाणि विष्णो रूपाणि तानि हि । अस्थानान्मदनाच्चैव ह्यस्थिमज्जाभिधानि च । व्यक्तिर्मज्जासु तस्यैव प्राणो मज्जासु संस्थितः । मज्जैव रेतो भवति रेतसिस्थो विशेषतः । प्राणस्तेन हि तद्रेतोयुक्तं प्राणेन सर्वदा । यदि प्राणो न तद्रेतो न गर्भत्वं व्रजेत् क्वचित्। विशेषप्राणसम्बन्धवर्जितान्यत एव हि । न मांसादीनि गर्भत्वं यान्त्यतः स हि रेतसि । विशेषेण स्थितः प्राणः प्राणे चैव विशेषतः ।
स्थितो नारायणो देवस्तस्मान्मज्जासु च स्थितः ॥इति च ।विष्णुः प्रवर्तको रूपैर्बृहत्युक्थस्य चाञ्जसा ॥
बृहत्युक्थेन वाच्यानि रूपाण्येतान्यधीशितुः ॥’ इति च ॥ २ ॥
स हि मोक्षप्रदो विष्णोराज्ञया स उवाच ह । सर्वदेहाभिमानी तु शरीरपुरुषः शिवः । सर्ववर्णाभिमानी च शेषोऽसौ छान्दसः पुमान् । सर्ववेदाभिमान्येव गरुडो वेदपूरुषः । संवत्सराभिमानी तु ब्रह्मैव हि महापुमान् । सारः शिवस्यानिरुद्धनामा देहस्थितो हरिः । अ इत्याक्रियते यस्माद् वासुदेवो ह्यकारकः । शेषस्य सारः स विभुर्ब्रह्माख्यो ज्ञानबृंहणात् । सङ्कर्षणाख्यस्तु हरिः सारः स गरुडस्य च । ब्रह्मर्त्विक्संस्थितश्चासौ तस्माद् ब्रह्मिष्ठमेव हि । कुर्याद् ब्रह्मर्त्विजं तस्मिन् विशेषेण स्थितो हरिः । ब्रह्मणः सारभूतस्तु प्रद्युम्नो भगवान् हरिः । स एवाऽदित्यसंस्थश्च स ह्यादिर्जगतो विभुः ।
ततश्च सर्वभूतेषु जीवानां विनियामकः ।
स एव सर्वदेहेषु चानिरुद्धतनुः स्थितः । सङ्कर्षणो वासुदेव इत्येकः स चतुर्विधः । प्रतिपूरुषमेतस्मात् स्थितो विष्णुर्नियामकः ।
आदित्यादिषु च स्थित्वा द्योतकोऽसौ प्रति प्रति ।मुख्यत्वात् सर्वदेवानामननादीशितृत्वतः । कर्तृत्वादप्यनीकं स उदैत् सूर्यस्थितो हरिः । ज्ञानदत्वाच्च देवानां चक्षुरेतेन दर्शनात् । आपूरयन् सर्वलोकान् प्रकाशेन जनार्दनः । आदानात् सर्वजीवानाम् अत्तृत्वात् प्रलयेऽपि च ।
आत्मेत्युक्तः स भगवान् जगतः स्थावरस्य च ।
ज्ञायते पूर्ववर्णस्य रूपं नारायणाभिधम् । प्रादुर्भावाः समस्ताश्च चरमार्णस्य देवताः । तदा तु संहितां सम्यङ् मन्येऽहं सन्धितामिति । आह वायुरिमं विष्णुं बृहत्युक्थस्य(बृहदुक्थस्य- हृ) देवताम् । महाव्रताख्यस्तोत्रस्य चेष्टकानां च देवताम् । एतमेवाखिलजगद् व्याप्तं पूर्णगुणात्मकम् । संवसद्रतिदातृत्वाद् ब्रह्मा संवत्सराभिधः । नियामकः स जीवानां सर्वेषां प्रभुरीश्वरः । अनन्तमूर्तिर्ब्रह्माऽसावनन्तजगदास्थितः । नियामकस्तस्य विष्णुस्तावद्रूपेषु संस्थितः ।
तत् संवत्सरसम्मानः स विष्णुः परमेश्वरः ॥ ३ ॥
कर्मण्याचार्यतोऽन्यस्य शंसेत पितृतोऽथवा । महाव्रतेन स्तोत्रेण स्तुवीतैनमथापि वा । महाव्रते चितिं वाऽपि कुर्यान्नास्य फलं श्रुतेः ।
सुकृतस्य फलं चैव नासौ सम्यगवाप्स्यति ।प्रत्यक्षज्ञानिनो मोक्षो न कथञ्चिद्धि हीयते । आचार्यमेव तं विद्याद् गुणैर्यः स्वात्मनोऽधिकः । गुणाधिकस्य तेनैव शंसनादि न दुष्यति । अयोग्यस्योपदेशे तु कृते हौत्रादिकेऽपि वा । प्रायश्चित्तार्थमेतत्तु शंसीत शतवारकम् । अन्यथा मानुषेष्वेव जायते न दिवं व्रजेत् । योग्या अस्यास्तु विद्याया देवा ऋषय एव च ।
एकदेशज्ञानयोग्या मानुषा उत्तमा यदि ॥
प्रीत्यैकदेशसंस्थत्वात् सखायमिति चोदितम् । न विद्यायाः फलं तस्य श्रुतं च नरकावहम् ।
नैव प्राप्नोति सुकृतं सन्त्यागात् परमात्मनः ।तत्समं वाऽधिकं वाऽपि ब्रूयादैक्यमथापि वा । ऐश्वर्यादिगुणानां वा ह्रासं नास्तित्वमेव वा । तत्प्रसादं विना मोक्षं ब्रूयाद् वा कस्यचित् क्वचित्। ऐक्यं वा ब्रह्मशर्वादेर्मुक्तावैक्यम् अथापि वा । व्यत्यासं चावताराणां जीवाभेदम् अमुष्य वा । भेदज्ञानं तद्गुणानां तेन वाऽथ मिथोऽपि वा । तथैव तत्क्रियाणां च तद्रूपाणामथापि वा । असाम्यदर्शनं वाऽपि तद्रूपाणां (तद्गुणानां) परस्परम् । देहदेहिविभेदं च तस्मिन्नवयवेषु वा । परस्परं भेददृष्टिं तेन वा कुत्रचित् क्वचित्। दोषसंसर्गमस्यापि स्वतः परत एव वा । अज्ञानतो ज्ञानतो वा, निर्देहत्वममुष्य च । तद्देहस्य प्राकृतत्वम् अचिदानन्ददेहताम् । प्रादुर्भावेष्वपि विभोर्देहत्यागोद्भवादिकम् । अज्ञानदुःखासामर्थ्यपारवश्यादिकं तथा । अतद्वशत्वं कस्यापि कदाचित् क्वचिदप्युत । परिमाणं बलादेर्वा तस्य विष्णोर्महात्मनः । भेदाभेददृशिर्वाऽस्य जीवैर्वा स्वगुणादिभिः । तर्कैस्तस्यापलापो वा तत्र रक्तेन चेतसा । त्यागानामेवमुक्तानां तर्काद्यैः साधनं तथा । अचिन्त्यविभवेऽप्यस्मिन्नसम्भवनिरूपणम् ।
स एष मुख्यतस्त्यागो वासुदेवस्य कीर्तितः ।संशयश्चोक्ततत्त्वेषु जगन्मिथ्यात्वदर्शनम् । अस्मृतिर्वासुदेवस्य तद्भक्तानां च निन्दनम् ।
द्वितीय एष त्यागस्तु विष्णोरेव प्रकीर्तितः ।त्यागस्तृतीयो हि हरेः, चतुर्थोऽयोग्यपूरुषे । उपदेशः केशवस्य यथाशास्त्रोदितक्रमात् । आचार्यपित्रोरन्यत्र तथैव च महाव्रते ।
हौत्रौद्गात्राध्वर्यवाणि, त्याग एव चतुर्विधः ।तृतीयान्निरयप्राप्तिश्चतुर्थान्न दिवं व्रजेत् । उपदिष्टेऽपि यस्तत्त्वे संशयं कुरुते पुमान् । सोऽन्धन्तमो व्रजेदन्यो निरयायैव गच्छति । स एव भगवान् विष्णुरेतैदोषैर्विना यदि । ज्ञायते मुक्तिदः साक्षान्नात्र कार्या विचारणा । यदि ज्ञानं नातिपक्वं सरागं च मनो भवेत् । तदा स्वर्गादिलोकाप्तिः संशयश्चेत् क्वचित् क्वचित्।
आवृत्तिरेव संसारे यावन्निःसशंयो भवेत् ।पूर्वं तु निःसुखं तत्र, निर्दुःखं चापरं मतम् । निश्शेषगुणहीनं च पूर्वम्, निर्दोषकं परम् । विमिश्रगतयस्त्वन्याः पुनरावृत्तिसंयुताः । असुरा देवता मर्त्या योग्या एतेषु च क्रमात् । न च तेषां सङ्करोऽस्ति यथायोग्या हि तद्गतिः । मानुषेषूत्तमा मुक्तिम् अधमा निरयं तथा ।
आप्नुवन्ति मनुष्येषु मध्यमाः सृतिभागिनः ।दोषेऽथवा गुणे वाऽपि तदा दैत्याः सुरा अपि । स्वां स्वां गतिं समायान्ति तावत् संसारभागिनः । अच्छिद्रत्वं नैव सर्वैः कदाचित् प्राप्यते यतः । सृष्टिस्थितिलयादीनां नोच्छेदस्तेन कुत्रचित् । तस्माद् दोषान् प्रहायैव विष्णुं सर्वोत्तमोत्तमम् ।
जानीयात् तेन मुक्तिः स्याद् अपरोक्षदृशेरनु ।
अनिरुद्धश्च हृदये न च भेदोऽनयोः क्वचित्। अन्येषामपि रूपाणाम् इति विद्याद् विचक्षणः । द्विरूपः स यदा विष्णुरपगच्छति देहतः । तदैव दुर्निमित्तानि जायन्ते नान्यदा क्वचित्। तस्मात् तेषां दर्शने तु कर्तव्यं पारलौकिकम् ।
सर्वमेव, जपेच्चैव यदन्तीत्यादिका ऋचः ।स्तूयते सोऽङ्गनेतृत्वाद् अग्निरित्यभिधीयते । परस्य ब्रह्मणो विष्णोर्ज्ञापनाख्यप्रसूतिभिः । वायुः पुनाति यल्लोकान् सविता तेन कथ्यते । पवित्रं नाम साक्षात् तत् परं ब्रह्म जनार्दनः । प्रसादयित्वा तं विष्णुं तेन लोकान् पुनात्यसुः । ज्ञानाख्यप्रसवेनापि स्वयं वायुः पुनात्ययम् । प्राणाग्नेरर्चिषो देहे विततास्तेषु केशवः । अर्चिष्मान् विततो नित्यं वायुस्तेन पुनात्ययम्(पुनात्यलम्- हृ) । यत्र ब्रह्मेति षडि्भश्च प्रार्थनीयः स मारुतः । मोचयित्वैव संसारद् विष्णोर्लोके कृधीति च । आदित्प्रत्नस्येति विष्णुः स्तुत्यो वैकुण्ठलोकगः । आदित्यमण्डलस्थश्च साक्षान्नारायणः प्रभुः । उद्वयं त्वितिमन्त्रेण स्तुत्यो वायोरपीश्वरः । अपमृत्युभयं तस्य यदन्तीत्यृग्जपाद् व्रजेत् । कालमृत्युर्यदि भवेत् तथा जन्मादिकं भयम् । अन्याभिः कर्मतः पूतो यत्र ब्रह्मेति वैष्णवम् ।
लोकं व्रजेत् तथाऽन्याभ्यां विष्णुर्मोक्षसुखप्रदः ।सोमः सौम्यस्वरूपत्वात्, पवमानश्च पावनात् । विष्णुः पुरातनत्वात् तु प्रत्नो, रेतो महारतिः । देवत्रा देव एवासौ सर्वदेवेश्वरो यतः ।
सूर्यश्च सूरिभिः प्राप्यो नित्यानन्दो रमापतिः ।
अत इत्युच्यते विष्णुः सन्ततो ह्यत उच्यते । तृतीयवर्णोऽतिशये यतस्तेनातिरेव वा । अत इत्युच्यते विष्णुः सम्यक् श्रुत्याद्यशक्यतः ।
पूर्णत्वाद् भगवान् विष्णुरश्रुतत्वादिनोदितः ।समः स सर्वरूपेषु सर्वजीवनियामकः । इति विद्यात् परं विष्णुं मुच्यते तेन संसृतेः ॥’ इत्यादि च ।
शरीरपुरुषादीनां प्राप्यत्वात्, तदुपास्यत्वात्, तेषां नियामकत्वेन तेभ्योऽप्यत्युत्तमत्वेन तेषु स्थितत्वाच्च तेषां सार इत्युच्यते भगवान् । यद् ईम् एव । अलकं अरकम् । यत्ककिञ्चिच्छृणोति तत् सर्वम् अरतिरूपान्धतमःप्राप्तिकारणमेव तस्य भवति । तत्र हि सर्वरत्यभावः, रतिविरुद्धदुःखं च पूर्णम् ।‘यत्र ब्रह्मा वेदवाक्यं व्याचक्षाणो मखैर्यजन् । सोमेन च सुतेनेशमास्ते लोके हरेर्हि सः ॥’ इति स्कान्दे ।
ग्राव्णा सोमविषये सोमेनेष्ट्वा महीयते, तेनैव विष्णुप्रीत्या स्वस्याऽनन्दं जनयन् ।‘सर्वेष्टद जगत्प्राण मामादाय परिस्रव । यत्रासौ भगवान् विष्णुस्त्वं हि मोक्षप्रदः सदा ॥’ इति च । ‘इन्दुरिष्टप्रदत्वाद् यो वायुरादाय गच्छति । इन्द्रनाम्नः केशवस्य समीपं मुक्तमञ्जसा ॥’ इति च । ‘अनन्यहेतुकं साक्षाद् भगवद्भक्तिरूपकम् । सुखमानन्द इत्युक्तो मोदो भोगनिमित्तकः ।
प्रमोदस्तद्विशेषोत्थो मुन्नामात्यल्पभोगतः ॥’ इत्यृग्वेदसंहितायाम् ।पायसेन हरेन्मृत्युं रात्रिसूक्तादकालिकम् । यदि कालिकमृत्युः स्यात् पदं सा परमं नयेत् । सहैव विष्णुना भक्तं विष्णोस्तद्वेदिनं तथा । रतिदत्वात् परो विष्णुर्मुख्यतो रात्रिरुच्यते । तदाश्रयत्वाद् दुर्गाऽपि रात्रीरित्यभिधीयते । स्त्रीरूपः स परो विष्णुः पायसेष्टो हि मोक्षदः ।
तस्मादुभौ सहैवेज्यौ भक्त्या दुःस्वप्नदर्शने ।उषआख्यं शुक्लवर्णं प्रमदारूपमेव च ।
तमश्चापाकरोत्येव तदा(सदा) सूर्यादिषु स्थितः ।पद्वन्तो मानुषाश्चैव पादमात्रप्रयायिनः । ग्रामाख्या बहुलत्वात्तु दैत्या एव प्रकीर्तिताः ।
अर्थिनस्तु कृतार्थत्वान्मुक्ता एव श्रुताः श्रुतौ ।वृकास्तेनैव निर्याप्याः वृकाः क्रूरत्वतोऽसुराः । तत्स्वभावाश्च वृक्याः स्युः स्तेनास्तत्र महासुराः । ब्रह्मस्तेना यतस्ते हि नित्यमैकात्म्यवेदिनः ।
विष्णुः सुखतरश्चैव भक्तानां भवति प्रभुः ।तद् यातयत्यृणमिव भगवान् पुरुषोत्तमः ।
स एव चोषाः कथितः प्रकाशत्वाज्जनार्दनः ।उपाकरं तथा स्तोमं तवाहं तद् (वृ)गृणीष्व च । द्यौरिति ज्ञानमुद्दिष्टं तद्व्यङ्गत्वाज्जनार्दनः ।
दुहिता दिव इत्युक्तः.........।रात्रीसूक्तेन भगवान् साक्षान्नारायणः प्रभुः । तत्सन्निधानाद् दुर्गाया एषोऽर्थ उपचारतः ।
एवं स्तुतस्तथैवेष्टो भगवान् मोक्षदो भवेत् ।जप्या एव, विशेषोऽयं होमो दुःस्वप्नदर्शने । परोक्षज्ञानिनो विष्णुरापरोक्ष्यं व्रजेत् त्वरन् । अपरोक्षदृशः प्रीतः सुखाधिक्यं करोत्यतः । मुक्तस्य, द्विविधैस्तस्माज्जपो योगश्च सर्वथा ।
कर्तव्यो, न्यासिभी रात्रिसूक्तं जप्यं त्रिशोऽञ्जसा ॥ इत्यैतरेयसंहितायाम् ॥ ४ ॥
दैवी वीणा ततः सेयं लोकसिद्धा तु मानुषी । ब्रह्मादिदेहान् यो वेद विष्णोर्वीणेति भक्तितः ।
विद्यापूर्णसुखः स स्याद् भूमिपूरितकीर्तिमान् ।
ध्यात्वा नारायणं देवं स्त्रीरूपं वाचि संस्थितम् । ओष्ठा पिधानेत्येषा ह्यृक् सारो वाचः प्रकीर्तितः । विष्णोर्हि वाचि संस्थस्यैवोष्ठावेतौ पिधानवत् । कुलीति चोक्तो भगवान् प्रलीनाशेषकुत्सितः । पाति सर्वं विशिष्टश्च सर्वस्मादित्यतः पविः ।
सर्ववागीश्वरो विष्णुः स्त्रीरूपो मां सुवादयेत्’ ॥ इति च ।
‘श्रान्तो ब्रह्मा सर्ववेदैः स्तुत्वा नारायणं प्रभुम् । तेनैव सम्यक् सन्धाय दार्ढ्यं देहस्य सोऽकरोत् ।
सन्धानात् संहितेत्युक्तो विष्णुरेव सनातनः।
ण इत्याक्रियमाणत्वाण्णकारोऽस्य बलं मतम् । विष्णुनाम्नि षकारेण रमाब्रह्मेशपूर्विणः । प्रणेतृताऽखिलस्यैव विष्णोरुक्ता तथाऽऽत्मता । आततत्वं सर्वगुणैर्देशतः कालतस्तथा । आत्मशब्दोदितं तच्च षशब्देनाभिधीयते । ष इत्याक्रियमाणत्वं प्रणेतृत्वं च पूर्णता । विष्णोः षकार इत्युक्ता वीत्युक्तस्य विशिष्टता । अन्त्यस्थित उकारस्तु ताच्छील्यादि हरेर्वदेत् । एवं विशिष्टप्राणत्वम् आततत्वं च सर्वतः । विशिष्टं च बलं विष्णोः सर्वस्माच्छीलमित्यपि । उदितं विष्णुशब्देन, तस्माद् ऋक्संहितामनु । वर्णद्वयसमायोगे ष्णुशब्दस्यार्थमेव तु । विष्णोः प्राणत्वमात्मत्वं बलं चैवात्र वेत्ति यः । स एव विष्णोर्बलवित् तथा प्राणत्वविद् भवेत् ।
स एव मुक्तः संसारान्नित्यायुष्मान् भविष्यति ।
वेदान् अन्यान् पुराणं वा तेन विष्णुपदोदितः । अवाप्तो भगवान् स्यान्नस्तन्नामार्था यतोऽखिलाः ।
इत्याहुर्ऋषयः सर्वे ... ...।
यज्ञैर्वेत्यृषयोऽप्यन्ये कावषेया वदन्ति हि । मौनेन विष्णुशब्दार्थं ध्यायन्तो वाचमेव वा । जुहुमो विष्णुनामाख्यां जपन्तो मन्त्रमेव वा । नमस्कारसमायुक्तं जुहुमः प्राणमत्र हि । किमन्यैर्बहुभिः कार्यैरेतस्यैवाधिकत्वतः । एतदर्थानुसन्धानपूर्वं वेदान् अथापि वा । अधीमहे यजामो वा नान्यथा तु कथञ्चन । एष एव हि सर्वेषां वेदानामर्थ ईरितः । विष्णुनामोदितो योऽर्थस्तद्व्याख्याऽन्यद् वचोऽखिलम् ॥ एवं विशिष्टप्राणात्मबलाद्यखिलसद्गुणैः ।
पूर्णस्वभावः सर्वेषां वचसामर्थ ईरितः ॥
अन्यविद्यास्वशिष्यस्य न ब्रूयात् प्रथमं क्वचित्। व्याख्यानशक्तिहीनाय नैव ब्रूयात् कथञ्चन । वैष्णवाय सुवृत्ताय (सुव्रताय सुशिक्षिणे । शान्ताय सुविशुद्धाय) मेधाश्रद्धायुताय च ।
गुरोः शुश्रूषकायैव ब्रूयादित्यनुशासनम् ॥’ इत्यादि च ।बट् तद्दर्शनमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् । वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः
मध्वो यत्तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हि तेन प्रभौ ॥रामस्य स्वृतरूपस्य वाचस्तेनानयन्त हि । भृतमो भीम इत्युक्तो वाचो मा मातरः स्मृतः । ऋगाद्या इतिहासश्च पुराणं पञ्चरात्रकम् । प्रोक्ताः सप्तशिवास्तत्र शयो भीमस्ततः स्मृतः । मध्वित्यानन्द उद्दिष्टो वेति तीर्थमुदाहृतम् । मध्व आनन्दतीर्थः स्यात् तृतीया मारुतीतनुः । इति सूक्तगतं रूपत्रयमेतन्महात्मनः ।
यो वेद वेदवित् स स्यात् तत्त्ववित् तत्प्रसादतः ॥ इति च ।हनुमान् प्रथमो ज्ञेयो भीमस्तु बहुभुक् पितोः । पृतनाक्षयकारी च द्वितीयस्तु तृतीयकः । पूर्णप्रज्ञस्तथाऽऽनन्दतीर्थनामा प्रकीर्तितः । दशेति सर्वमुद्दिष्टं सर्वं पूर्णमिहोच्यते । प्रज्ञा प्रमतिरुद्दिष्टा पूर्णप्रज्ञस्ततः स्मृतः । आ समन्तात् पतित्वे तु गूढं कलियुगे हरिम् । असत्यमप्रतिष्ठं तु जगदेतदनीश्वरम् । वदद्भिर्गूहितं सन्तं तृतीयोऽसुर्मथायति । येन विष्णोर्हि वर्पाख्यान् गुणान् अज्ञासिषुः परान् । ईशानासः सूरयश्च निगूढान् निर्गुणोक्तिभिः(निगूढाभिर्गुणोक्तिभिः) । त्रेतायां द्वापरे चैव कलौ चैते क्रमात् त्रयः । एतेषां(येषां हि) परमो विष्णुर्नेता सर्वेश्वरेश्वरः ।
स्वयम्भुब्रह्मसंज्ञोऽसौ परस्मै ब्रह्मणे नमः ॥’ इति च ।