Krishnamrutamaharnava: Difference between revisions

Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
 
(7 intermediate revisions by the same user not shown)
Line 1: Line 1:
<div class="gr-doc-title">कृष्णामृतमहार्णवः</div>
<div class="gr-doc-title" data-has-moola="1">कृष्णामृतमहार्णवः</div>
__TOC__


{{Adhyaya
{{VerseBlock
| verse_id    = KMM_C01_V01
| document_id  = KMM
| document_id  = KMM
| chapter_num  = 1
| chapter_id   = KMM_C01
| title        = कृष्णामृतमहार्णवः
| verse_type   = shloka
}}
{{VerseBlock
| verse_id      = KMM_C01_V01
| document_id   = KMM
| chapter_id    = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अर्चितः संस्मृतो ध्यातः कीर्तितः कथितः श्रुतः ।
| verse_line1  = अर्चितः संस्मृतो ध्यातः कीर्तितः कथितः श्रुतः ।
| verse_lines  = अर्चितः संस्मृतो ध्यातः कीर्तितः कथितः श्रुतः ।;यो ददात्यमृतत्वं हि स मां रक्षतु केशवः॥ १॥
| verse_line2  = यो ददात्यमृतत्वं हि स मां रक्षतु केशवः॥ १॥
| verse_line2  = यो ददात्यमृतत्वं हि स मां रक्षतु केशवः॥ १॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V02
| verse_id     = KMM_C01_V02
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = तापत्रयेण सन्तप्तं यदेतदखिलं जगत् ।
| verse_line1  = तापत्रयेण सन्तप्तं यदेतदखिलं जगत् ।
| verse_lines  = तापत्रयेण सन्तप्तं यदेतदखिलं जगत् ।;वक्ष्यामि शान्तये तस्य कृष्णामृतमहार्णवम्॥ २॥
| verse_line2  = वक्ष्यामि शान्तये तस्य कृष्णामृतमहार्णवम्॥ २॥
| verse_line2  = वक्ष्यामि शान्तये तस्य कृष्णामृतमहार्णवम्॥ २॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V03
| verse_id     = KMM_C01_V03
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् ।
| verse_line1  = ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् ।
| verse_lines  = ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् ।;यैर्न लब्धा हरेर्दीक्षा नार्चितो वा जनार्दनः॥ ३॥
| verse_line2  = यैर्न लब्धा हरेर्दीक्षा नार्चितो वा जनार्दनः॥ ३॥
| verse_line2  = यैर्न लब्धा हरेर्दीक्षा नार्चितो वा जनार्दनः॥ ३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V04
| verse_id     = KMM_C01_V04
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = संसारेस्मिन् महाघोरे जन्मरोगभयाकुले ।
| verse_line1  = संसारेस्मिन् महाघोरे जन्मरोगभयाकुले ।
| verse_lines  = संसारेस्मिन् महाघोरे जन्मरोगभयाकुले ।;अयमेको महाभागः पूज्यते यदधोक्षजः॥ ४॥
| verse_line2  = अयमेको महाभागः पूज्यते यदधोक्षजः॥ ४॥
| verse_line2  = अयमेको महाभागः पूज्यते यदधोक्षजः॥ ४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V05
| verse_id     = KMM_C01_V05
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = स नाम सुकृती लोके कुलं तेनाभ्यलङ्कृतम् ।
| verse_line1  = स नाम सुकृती लोके कुलं तेनाभ्यलङ्कृतम् ।
| verse_lines  = स नाम सुकृती लोके कुलं तेनाभ्यलङ्कृतम् ।;आधारः सर्वभूतानां येन विष्णुः प्रसादितः॥ ५॥
| verse_line2  = आधारः सर्वभूतानां येन विष्णुः प्रसादितः॥ ५॥
| verse_line2  = आधारः सर्वभूतानां येन विष्णुः प्रसादितः॥ ५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V06
| verse_id     = KMM_C01_V06
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यज्ञानां तपसां चैव शुभानां चैव कर्मणाम् ।
| verse_line1  = यज्ञानां तपसां चैव शुभानां चैव कर्मणाम् ।
| verse_lines  = यज्ञानां तपसां चैव शुभानां चैव कर्मणाम् ।;तद्विशिष्टफलं नॄणां सदैवाराधनं हरेः॥ ६॥
| verse_line2  = तद्विशिष्टफलं नॄणां सदैवाराधनं हरेः॥ ६॥
| verse_line2  = तद्विशिष्टफलं नॄणां सदैवाराधनं हरेः॥ ६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V07
| verse_id     = KMM_C01_V07
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = कलौ कलिमलध्वंसिसर्वपापहरं हरिम् ।
| verse_line1  = कलौ कलिमलध्वंसिसर्वपापहरं हरिम् ।
| verse_lines  = कलौ कलिमलध्वंसिसर्वपापहरं हरिम् ।;येर्चयन्ति सदा नित्यं तेपि वन्द्या यथा हरिः॥ ७॥
| verse_line2  = येर्चयन्ति सदा नित्यं तेपि वन्द्या यथा हरिः॥ ७॥
| verse_line2  = येर्चयन्ति सदा नित्यं तेपि वन्द्या यथा हरिः॥ ७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V08
| verse_id     = KMM_C01_V08
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = नास्ति श्रेयस्तमं नॄणां विष्णोराराधनान्मुने ।
| verse_line1  = नास्ति श्रेयस्तमं नॄणां विष्णोराराधनान्मुने ।
| verse_lines  = नास्ति श्रेयस्तमं नॄणां विष्णोराराधनान्मुने ।;युगेस्मिंस्तामसे लोके सततं पूज्यते नृभिः॥ ८॥
| verse_line2  = युगेस्मिंस्तामसे लोके सततं पूज्यते नृभिः॥ ८॥
| verse_line2  = युगेस्मिंस्तामसे लोके सततं पूज्यते नृभिः॥ ८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V09
| verse_id     = KMM_C01_V09
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अर्चिते देवदेवेशे शङ्खचक्रगदाधरे ।
| verse_line1  = अर्चिते देवदेवेशे शङ्खचक्रगदाधरे ।
| verse_lines  = अर्चिते देवदेवेशे शङ्खचक्रगदाधरे ।;अर्चिताः सर्वदेवाः स्युर्यतः सर्वगतो हरिः॥ ९॥
| verse_line2  = अर्चिताः सर्वदेवाः स्युर्यतः सर्वगतो हरिः॥ ९॥
| verse_line2  = अर्चिताः सर्वदेवाः स्युर्यतः सर्वगतो हरिः॥ ९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V10
| verse_id     = KMM_C01_V10
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = स्वर्चिते सर्वलोकेशे सुरासुरनमस्कृते ।
| verse_line1  = स्वर्चिते सर्वलोकेशे सुरासुरनमस्कृते ।
| verse_lines  = स्वर्चिते सर्वलोकेशे सुरासुरनमस्कृते ।;केशवे कंसकेशिघ्ने न याति नरकं नरः॥ १०॥
| verse_line2  = केशवे कंसकेशिघ्ने न याति नरकं नरः॥ १०॥
| verse_line2  = केशवे कंसकेशिघ्ने न याति नरकं नरः॥ १०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V11
| verse_id     = KMM_C01_V11
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = सकृदभ्यर्च्य गोविन्दं बिल्वपत्रेण मानवः ।
| verse_line1  = सकृदभ्यर्च्य गोविन्दं बिल्वपत्रेण मानवः ।
| verse_lines  = सकृदभ्यर्च्य गोविन्दं बिल्वपत्रेण मानवः ।;मुक्तिभागी निरातङ्की विष्णुलोके चिरं वसेत्॥ ११॥
| verse_line2  = मुक्तिभागी निरातङ्की विष्णुलोके चिरं वसेत्॥ ११॥
| verse_line2  = मुक्तिभागी निरातङ्की विष्णुलोके चिरं वसेत्॥ ११॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V12
| verse_id     = KMM_C01_V12
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = शङ्करः
| verse_line1  = शङ्करः
| verse_lines  = शङ्करः;सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः ।;यत्कृतं तत्कृतं तेन सम्प्राप्तं परमं पदम्॥ १२॥
| verse_line2  = सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः ।
| verse_line2  = सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः ।
| verse_line3  = यत्कृतं तत्कृतं तेन सम्प्राप्तं परमं पदम्॥ १२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V13
| verse_id     = KMM_C01_V13
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = सकृदभ्यर्चितो येन हेलयापि नमस्कृतः ।
| verse_line1  = सकृदभ्यर्चितो येन हेलयापि नमस्कृतः ।
| verse_lines  = सकृदभ्यर्चितो येन हेलयापि नमस्कृतः ।;स याति परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्॥ १३॥
| verse_line2  = स याति परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्॥ १३॥
| verse_line2  = स याति परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्॥ १३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V14
| verse_id     = KMM_C01_V14
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = नारदः समस्तलोकनाथस्य देवदेवस्य शांर्गिणः ।
| verse_line1  = नारदः समस्तलोकनाथस्य देवदेवस्य शांर्गिणः ।
| verse_lines  = नारदः समस्तलोकनाथस्य देवदेवस्य शांर्गिणः ।;साक्षाद्भगवतो विष्णोः पूजनं जन्मनः फलम्॥ १४॥
| verse_line2  = साक्षाद्भगवतो विष्णोः पूजनं जन्मनः फलम्॥ १४॥
| verse_line2  = साक्षाद्भगवतो विष्णोः पूजनं जन्मनः फलम्॥ १४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V15
| verse_id     = KMM_C01_V15
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = पुलस्त्यः भक्त्या दूर्वाङ्कुरैः पुम्भिः पूजितः पुरुषोत्तमः ।
| verse_line1  = पुलस्त्यः भक्त्या दूर्वाङ्कुरैः पुम्भिः पूजितः पुरुषोत्तमः ।
| verse_lines  = पुलस्त्यः भक्त्या दूर्वाङ्कुरैः पुम्भिः पूजितः पुरुषोत्तमः ।;हरिर्ददाति हि फलं सर्वयज्ञैश्च दुर्लभम्॥ १५॥
| verse_line2  = हरिर्ददाति हि फलं सर्वयज्ञैश्च दुर्लभम्॥ १५॥
| verse_line2  = हरिर्ददाति हि फलं सर्वयज्ञैश्च दुर्लभम्॥ १५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V16
| verse_id     = KMM_C01_V16
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = विधिना देवदेवेशः शङ्खचक्रधरो हरिः ।
| verse_line1  = विधिना देवदेवेशः शङ्खचक्रधरो हरिः ।
| verse_lines  = विधिना देवदेवेशः शङ्खचक्रधरो हरिः ।;फलं ददाति सुलभं सलिलेनापि पूजितः॥ १६॥
| verse_line2  = फलं ददाति सुलभं सलिलेनापि पूजितः॥ १६॥
| verse_line2  = फलं ददाति सुलभं सलिलेनापि पूजितः॥ १६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V17
| verse_id     = KMM_C01_V17
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = नरके पच्यमानस्तु यमेन परिभाषितः ।
| verse_line1  = नरके पच्यमानस्तु यमेन परिभाषितः ।
| verse_lines  = नरके पच्यमानस्तु यमेन परिभाषितः ।;किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः॥ १७॥
| verse_line2  = किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः॥ १७॥
| verse_line2  = किं त्वया नार्चितो देवः केशवः क्लेशनाशनः॥ १७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V18
| verse_id     = KMM_C01_V18
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = धर्मः द्रव्याणामप्यभावे तु सलिलेनापि पूजितः ।
| verse_line1  = धर्मः द्रव्याणामप्यभावे तु सलिलेनापि पूजितः ।
| verse_lines  = धर्मः द्रव्याणामप्यभावे तु सलिलेनापि पूजितः ।;यो ददाति स्वकं स्थानं स त्वया किं न पूजितः॥ १८॥
| verse_line2  = यो ददाति स्वकं स्थानं स त्वया किं न पूजितः॥ १८॥
| verse_line2  = यो ददाति स्वकं स्थानं स त्वया किं न पूजितः॥ १८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V19
| verse_id     = KMM_C01_V19
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = नरसिंहो हृषीकेशः पुण्डरीकनिभेक्षणः ।
| verse_line1  = नरसिंहो हृषीकेशः पुण्डरीकनिभेक्षणः ।
| verse_lines  = नरसिंहो हृषीकेशः पुण्डरीकनिभेक्षणः ।;स्मरणान्मुक्तिदो नॄणां स त्वया किं न पूजितः॥ १९॥
| verse_line2  = स्मरणान्मुक्तिदो नॄणां स त्वया किं न पूजितः॥ १९॥
| verse_line2  = स्मरणान्मुक्तिदो नॄणां स त्वया किं न पूजितः॥ १९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V20
| verse_id     = KMM_C01_V20
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ब्रह्मा गर्भस्थिता मृता वापि मुषितास्ते सुदूषिताः ।
| verse_line1  = ब्रह्मा गर्भस्थिता मृता वापि मुषितास्ते सुदूषिताः ।
| verse_lines  = ब्रह्मा गर्भस्थिता मृता वापि मुषितास्ते सुदूषिताः ।;न प्राप्ता यैर्हरेर्दीक्षा सर्वदुःखविमोचनी॥ २०॥
| verse_line2  = न प्राप्ता यैर्हरेर्दीक्षा सर्वदुःखविमोचनी॥ २०॥
| verse_line2  = न प्राप्ता यैर्हरेर्दीक्षा सर्वदुःखविमोचनी॥ २०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V21
| verse_id     = KMM_C01_V21
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = मार्कण्डेयः सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः ।
| verse_line1  = मार्कण्डेयः सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः ।
| verse_lines  = मार्कण्डेयः सकृदभ्यर्चितो येन देवदेवो जनार्दनः ।;यत्कृतं तत्कृतं तेन सम्प्राप्तं परमं पदम्॥ २१॥
| verse_line2  = यत्कृतं तत्कृतं तेन सम्प्राप्तं परमं पदम्॥ २१॥
| verse_line2  = यत्कृतं तत्कृतं तेन सम्प्राप्तं परमं पदम्॥ २१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V22
| verse_id     = KMM_C01_V22
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = धर्मार्थकाममोक्षाणां नान्योपायस्तु विद्यते ।
| verse_line1  = धर्मार्थकाममोक्षाणां नान्योपायस्तु विद्यते ।
| verse_lines  = धर्मार्थकाममोक्षाणां नान्योपायस्तु विद्यते ।;सत्यं ब्रवीमि देवेश हृषीकेशार्चनादृते॥ २२॥
| verse_line2  = सत्यं ब्रवीमि देवेश हृषीकेशार्चनादृते॥ २२॥
| verse_line2  = सत्यं ब्रवीमि देवेश हृषीकेशार्चनादृते॥ २२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V23
| verse_id     = KMM_C01_V23
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = तस्य यज्ञवराहस्य विष्णोरमिततेजसः ।
| verse_line1  = तस्य यज्ञवराहस्य विष्णोरमिततेजसः ।
| verse_lines  = तस्य यज्ञवराहस्य विष्णोरमिततेजसः ।;प्रणामं ये प्रकुर्वन्ति तेषामपि नमो नमः॥ २३॥
| verse_line2  = प्रणामं ये प्रकुर्वन्ति तेषामपि नमो नमः॥ २३॥
| verse_line2  = प्रणामं ये प्रकुर्वन्ति तेषामपि नमो नमः॥ २३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V24
| verse_id     = KMM_C01_V24
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = मरीचिः अनाराधितगोविन्दैर्नरैः स्थानं नृपात्मज ।
| verse_line1  = मरीचिः अनाराधितगोविन्दैर्नरैः स्थानं नृपात्मज ।
| verse_lines  = मरीचिः अनाराधितगोविन्दैर्नरैः स्थानं नृपात्मज ।;न हि सम्प्राप्यते श्रेष्ठं तस्मादाराधयाच्युतम्॥ २४॥
| verse_line2  = न हि सम्प्राप्यते श्रेष्ठं तस्मादाराधयाच्युतम्॥ २४॥
| verse_line2  = न हि सम्प्राप्यते श्रेष्ठं तस्मादाराधयाच्युतम्॥ २४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V25
| verse_id     = KMM_C01_V25
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अत्रिः
| verse_line1  = अत्रिः
| verse_lines  = अत्रिः;परः पराणां पुरुषस्तुष्टो यस्य जनार्दनः ।;स चाप्नोत्यक्षयं स्थानमेतत्सत्यं मयोदितम्॥ २५॥
| verse_line2  = परः पराणां पुरुषस्तुष्टो यस्य जनार्दनः ।
| verse_line2  = परः पराणां पुरुषस्तुष्टो यस्य जनार्दनः ।
| verse_line3  = स चाप्नोत्यक्षयं स्थानमेतत्सत्यं मयोदितम्॥ २५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V26
| verse_id     = KMM_C01_V26
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अङ्गिराः
| verse_line1  = अङ्गिराः
| verse_lines  = अङ्गिराः;यस्यान्तः सर्वमेवेदमच्युतस्याव्ययात्मनः ।;तमाराधय गोविन्दं स्थानमग्य्रं यदीच्छसि॥ २६॥
| verse_line2  = यस्यान्तः सर्वमेवेदमच्युतस्याव्ययात्मनः ।
| verse_line2  = यस्यान्तः सर्वमेवेदमच्युतस्याव्ययात्मनः ।
| verse_line3  = तमाराधय गोविन्दं स्थानमग्य्रं यदीच्छसि॥ २६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V27
| verse_id     = KMM_C01_V27
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = पुलस्त्यः
| verse_line1  = पुलस्त्यः
| verse_lines  = पुलस्त्यः;परं ब्रह्म परं धाम योसौ ब्रह्म सनातनम् ।;तमाराध्य हरिं याति मुक्तिमप्यतिदुर्लभाम्॥ २७॥
| verse_line2  = परं ब्रह्म परं धाम योसौ ब्रह्म सनातनम् ।
| verse_line2  = परं ब्रह्म परं धाम योसौ ब्रह्म सनातनम् ।
| verse_line3  = तमाराध्य हरिं याति मुक्तिमप्यतिदुर्लभाम्॥ २७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V28
| verse_id     = KMM_C01_V28
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ऐन्द्रमिन्द्रः परं स्थानं यमाराध्य जगत्पतिम् ।
| verse_line1  = ऐन्द्रमिन्द्रः परं स्थानं यमाराध्य जगत्पतिम् ।
| verse_lines  = ऐन्द्रमिन्द्रः परं स्थानं यमाराध्य जगत्पतिम् ।;प्राप यज्ञपतिं विष्णुं तमाराधय सुव्रत॥ २८॥
| verse_line2  = प्राप यज्ञपतिं विष्णुं तमाराधय सुव्रत॥ २८॥
| verse_line2  = प्राप यज्ञपतिं विष्णुं तमाराधय सुव्रत॥ २८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V29
| verse_id     = KMM_C01_V29
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = प्राप्नोत्याराधिते विष्णौ मनसा यद्यदिच्छति ।
| verse_line1  = प्राप्नोत्याराधिते विष्णौ मनसा यद्यदिच्छति ।
| verse_lines  = प्राप्नोत्याराधिते विष्णौ मनसा यद्यदिच्छति ।;त्रैलोक्यान्तर्गतं स्थानं किमु लोकोत्तरोत्तरम्॥ २९॥
| verse_line2  = त्रैलोक्यान्तर्गतं स्थानं किमु लोकोत्तरोत्तरम्॥ २९॥
| verse_line2  = त्रैलोक्यान्तर्गतं स्थानं किमु लोकोत्तरोत्तरम्॥ २९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V30
| verse_id     = KMM_C01_V30
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं शङ्खचक्रगदाधरम् ।
| verse_line1  = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं शङ्खचक्रगदाधरम् ।
| verse_lines  = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं शङ्खचक्रगदाधरम् ।;सर्वपापविनिर्मुक्ताः परं ब्रह्म विशन्ति ते॥ ३०॥
| verse_line2  = सर्वपापविनिर्मुक्ताः परं ब्रह्म विशन्ति ते॥ ३०॥
| verse_line2  = सर्वपापविनिर्मुक्ताः परं ब्रह्म विशन्ति ते॥ ३०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V31
| verse_id     = KMM_C01_V31
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ततोनिरुद्धं देवेशं प्रद्युम्नं च ततः परम् ।
| verse_line1  = ततोनिरुद्धं देवेशं प्रद्युम्नं च ततः परम् ।
| verse_lines  = ततोनिरुद्धं देवेशं प्रद्युम्नं च ततः परम् ।;ततः सङ्कर्षणं देवं वासुदेवं परात्परम्॥ ३१॥
| verse_line2  = ततः सङ्कर्षणं देवं वासुदेवं परात्परम्॥ ३१॥
| verse_line2  = ततः सङ्कर्षणं देवं वासुदेवं परात्परम्॥ ३१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V32
| verse_id     = KMM_C01_V32
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = वासुदेवात् परं नास्ति इति वेदान्तनिश्चयः ।
| verse_line1  = वासुदेवात् परं नास्ति इति वेदान्तनिश्चयः ।
| verse_lines  = वासुदेवात् परं नास्ति इति वेदान्तनिश्चयः ।;वासुदेवं प्रविष्टानां पुनरावर्तनं कुतः॥ ३२॥
| verse_line2  = वासुदेवं प्रविष्टानां पुनरावर्तनं कुतः॥ ३२॥
| verse_line2  = वासुदेवं प्रविष्टानां पुनरावर्तनं कुतः॥ ३२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V33
| verse_id     = KMM_C01_V33
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = आत्रेयः
| verse_line1  = आत्रेयः
| verse_lines  = आत्रेयः;यो यानिछेन्नरः कामान् नारी वा वरवर्णिनी ।;तान्समाप्नोति विपुलान्समाराध्य जनार्दनम्॥ ३३॥
| verse_line2  = यो यानिछेन्नरः कामान् नारी वा वरवर्णिनी ।
| verse_line2  = यो यानिछेन्नरः कामान् नारी वा वरवर्णिनी ।
| verse_line3  = तान्समाप्नोति विपुलान्समाराध्य जनार्दनम्॥ ३३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V34
| verse_id     = KMM_C01_V34
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ब्रह्मा
| verse_line1  = ब्रह्मा
| verse_lines  = ब्रह्मा;बाहुभ्यां सागरं तर्तुं क इच्छेत पुमान् भुवि ।;वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं गन्तुमिच्छति॥ ३४॥
| verse_line2  = बाहुभ्यां सागरं तर्तुं क इच्छेत पुमान् भुवि ।
| verse_line2  = बाहुभ्यां सागरं तर्तुं क इच्छेत पुमान् भुवि ।
| verse_line3  = वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं गन्तुमिच्छति॥ ३४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V35
| verse_id     = KMM_C01_V35
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = कौशिकः
| verse_line1  = कौशिकः
| verse_lines  = कौशिकः;अनाराधितगोवन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।;आराध्य वासुदेवं स्युर्नित्यानन्दैकभागिनः॥ ३५॥
| verse_line2  = अनाराधितगोवन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।
| verse_line2  = अनाराधितगोवन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।
| verse_line3  = आराध्य वासुदेवं स्युर्नित्यानन्दैकभागिनः॥ ३५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V36
| verse_id     = KMM_C01_V36
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = शङ्करः
| verse_line1  = शङ्करः
| verse_lines  = शङ्करः;कृते पापेनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते ।;प्रायश्चित्तं तु तस्योक्तं हरिसंस्मरणं परम्॥ ३६॥
| verse_line2  = कृते पापेनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते ।
| verse_line2  = कृते पापेनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते ।
| verse_line3  = प्रायश्चित्तं तु तस्योक्तं हरिसंस्मरणं परम्॥ ३६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V37
| verse_id     = KMM_C01_V37
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = नाम्नोस्ति यवती शक्तिः पापनिर्हरणे हरेः ।
| verse_line1  = नाम्नोस्ति यवती शक्तिः पापनिर्हरणे हरेः ।
| verse_lines  = नाम्नोस्ति यवती शक्तिः पापनिर्हरणे हरेः ।;तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः॥ ३७॥
| verse_line2  = तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः॥ ३७॥
| verse_line2  = तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः॥ ३७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V38
| verse_id     = KMM_C01_V38
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ब्रह्मा
| verse_line1  = ब्रह्मा
| verse_lines  = ब्रह्मा;न ह्यपुण्यवतां लोके मूढानां कुटिलात्मनाम् ।;भक्तिर्भवति गोविन्दे स्मरणं कीर्तनं तथा॥ ३८॥
| verse_line2  = न ह्यपुण्यवतां लोके मूढानां कुटिलात्मनाम् ।
| verse_line2  = न ह्यपुण्यवतां लोके मूढानां कुटिलात्मनाम् ।
| verse_line3  = भक्तिर्भवति गोविन्दे स्मरणं कीर्तनं तथा॥ ३८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V39
| verse_id     = KMM_C01_V39
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = तदैव पुरुषो मुक्तो जन्मदुःखजरादिभिः ।
| verse_line1  = तदैव पुरुषो मुक्तो जन्मदुःखजरादिभिः ।
| verse_lines  = तदैव पुरुषो मुक्तो जन्मदुःखजरादिभिः ।;जितेन्द्रियो विशुद्धात्मा यदैव स्मरते हरिम्॥ ३९॥
| verse_line2  = जितेन्द्रियो विशुद्धात्मा यदैव स्मरते हरिम्॥ ३९॥
| verse_line2  = जितेन्द्रियो विशुद्धात्मा यदैव स्मरते हरिम्॥ ३९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V40
| verse_id     = KMM_C01_V40
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = प्राप्ते कलियुगे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिते ।
| verse_line1  = प्राप्ते कलियुगे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिते ।
| verse_lines  = प्राप्ते कलियुगे घोरे धर्मज्ञानविवर्जिते ।;न कश्चित्स्मरते देवं कृष्णं कलिमलापहम्॥ ४०॥
| verse_line2  = न कश्चित्स्मरते देवं कृष्णं कलिमलापहम्॥ ४०॥
| verse_line2  = न कश्चित्स्मरते देवं कृष्णं कलिमलापहम्॥ ४०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V41
| verse_id     = KMM_C01_V41
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = न कलौ देवदेवस्य जन्मदुखापहारिणः ।
| verse_line1  = न कलौ देवदेवस्य जन्मदुखापहारिणः ।
| verse_lines  = न कलौ देवदेवस्य जन्मदुखापहारिणः ।;करोति मर्त्यो मूढात्मा स्मरणं कीर्तनं हरेः॥ ४१॥
| verse_line2  = करोति मर्त्यो मूढात्मा स्मरणं कीर्तनं हरेः॥ ४१॥
| verse_line2  = करोति मर्त्यो मूढात्मा स्मरणं कीर्तनं हरेः॥ ४१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V42
| verse_id     = KMM_C01_V42
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं विशुद्धेनान्तरात्मना ।
| verse_line1  = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं विशुद्धेनान्तरात्मना ।
| verse_lines  = ये स्मरन्ति सदा विष्णुं विशुद्धेनान्तरात्मना ।;ते प्रयान्ति भयं त्यक्त्वा विष्णुलोकमनामयम्॥ ४२॥
| verse_line2  = ते प्रयान्ति भयं त्यक्त्वा विष्णुलोकमनामयम्॥ ४२॥
| verse_line2  = ते प्रयान्ति भयं त्यक्त्वा विष्णुलोकमनामयम्॥ ४२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V43
| verse_id     = KMM_C01_V43
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = गर्भजन्मजरारोगदुःखसंसारबन्धनैः ।
| verse_line1  = गर्भजन्मजरारोगदुःखसंसारबन्धनैः ।
| verse_lines  = गर्भजन्मजरारोगदुःखसंसारबन्धनैः ।;न बाध्यते नरो नित्यं वासुदेवमनुस्मरन्॥ ४३॥
| verse_line2  = न बाध्यते नरो नित्यं वासुदेवमनुस्मरन्॥ ४३॥
| verse_line2  = न बाध्यते नरो नित्यं वासुदेवमनुस्मरन्॥ ४३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V44
| verse_id     = KMM_C01_V44
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यममार्गं महाघोरं नरकाणि यमं तथा ।
| verse_line1  = यममार्गं महाघोरं नरकाणि यमं तथा ।
| verse_lines  = यममार्गं महाघोरं नरकाणि यमं तथा ।;स्वप्नेपि नैव पश्येत यः स्मरेद्गरुडध्वजम्॥ ४४॥
| verse_line2  = स्वप्नेपि नैव पश्येत यः स्मरेद्गरुडध्वजम्॥ ४४॥
| verse_line2  = स्वप्नेपि नैव पश्येत यः स्मरेद्गरुडध्वजम्॥ ४४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V45
| verse_id     = KMM_C01_V45
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = हृदि रूपं मुखे नाम नैवेद्यमुदरे हरेः ।
| verse_line1  = हृदि रूपं मुखे नाम नैवेद्यमुदरे हरेः ।
| verse_lines  = हृदि रूपं मुखे नाम नैवेद्यमुदरे हरेः ।;पादोदकं च निर्माल्यं मस्तके यस्य सोच्युतः॥ ४५॥
| verse_line2  = पादोदकं च निर्माल्यं मस्तके यस्य सोच्युतः॥ ४५॥
| verse_line2  = पादोदकं च निर्माल्यं मस्तके यस्य सोच्युतः॥ ४५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V46
| verse_id     = KMM_C01_V46
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = गोविन्दस्मरणं पुंसां पापराशिमहाचलम् ।
| verse_line1  = गोविन्दस्मरणं पुंसां पापराशिमहाचलम् ।
| verse_lines  = गोविन्दस्मरणं पुंसां पापराशिमहाचलम् ।;असंशयं दहत्याशु तूलराशिमिवानलः॥ ४६॥
| verse_line2  = असंशयं दहत्याशु तूलराशिमिवानलः॥ ४६॥
| verse_line2  = असंशयं दहत्याशु तूलराशिमिवानलः॥ ४६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V47
| verse_id     = KMM_C01_V47
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अगस्त्यः
| verse_line1  = अगस्त्यः
| verse_lines  = अगस्त्यः;स्मरणादेव कृष्णस्य पापसङ्घातपञ्जरः ।;शतधा भेदमायाति गिरिर्वज्रहतो यथा॥ ४७॥
| verse_line2  = स्मरणादेव कृष्णस्य पापसङ्घातपञ्जरः ।
| verse_line2  = स्मरणादेव कृष्णस्य पापसङ्घातपञ्जरः ।
| verse_line3  = शतधा भेदमायाति गिरिर्वज्रहतो यथा॥ ४७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V48
| verse_id     = KMM_C01_V48
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = कृष्णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति तद्भावितास्तद्गतमानसाश्च ।
| verse_line1  = कृष्णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति तद्भावितास्तद्गतमानसाश्च ।
| verse_lines  = कृष्णे रताः कृष्णमनुस्मरन्ति तद्भावितास्तद्गतमानसाश्च ।;भिन्नेपि देहे प्रविशन्ति कृष्णं हविर्यथा मन्त्रहुतं हुताशे॥ ४८॥
| verse_line2  = भिन्नेपि देहे प्रविशन्ति कृष्णं हविर्यथा मन्त्रहुतं हुताशे॥ ४८॥
| verse_line2  = भिन्नेपि देहे प्रविशन्ति कृष्णं हविर्यथा मन्त्रहुतं हुताशे॥ ४८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V49
| verse_id     = KMM_C01_V49
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चान्धजडमूकता ।
| verse_line1  = सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चान्धजडमूकता ।
| verse_lines  = सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चान्धजडमूकता ।;यन्मूहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवो न चिन्त्यते॥ ४९॥
| verse_line2  = यन्मूहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवो न चिन्त्यते॥ ४९॥
| verse_line2  = यन्मूहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवो न चिन्त्यते॥ ४९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V50
| verse_id     = KMM_C01_V50
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्धचोरः कथितः पृथिव्याम् ।
| verse_line1  = नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्धचोरः कथितः पृथिव्याम् ।
| verse_lines  = नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्धचोरः कथितः पृथिव्याम् ।;अनेकजन्मार्जितपापसञ्चयं हरत्यशेषं स्मृतमात्र एव॥५०॥
| verse_line2  = अनेकजन्मार्जितपापसञ्चयं हरत्यशेषं स्मृतमात्र एव॥५०॥
| verse_line2  = अनेकजन्मार्जितपापसञ्चयं हरत्यशेषं स्मृतमात्र एव॥५०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V51
| verse_id     = KMM_C01_V51
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यस्य संस्मरणादेव वासुदेवस्य चक्रिणः ।
| verse_line1  = यस्य संस्मरणादेव वासुदेवस्य चक्रिणः ।
| verse_lines  = यस्य संस्मरणादेव वासुदेवस्य चक्रिणः ।;कोटिजन्मार्जितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥ ५१॥
| verse_line2  = कोटिजन्मार्जितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥ ५१॥
| verse_line2  = कोटिजन्मार्जितं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥ ५१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V52
| verse_id     = KMM_C01_V52
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = किं तस्य बहुभिस्तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ।
| verse_line1  = किं तस्य बहुभिस्तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ।
| verse_lines  = किं तस्य बहुभिस्तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ।;यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ ५२॥
| verse_line2  = यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ ५२॥
| verse_line2  = यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ ५२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V53
| verse_id     = KMM_C01_V53
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरन्ति ।
| verse_line1  = ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरन्ति ।
| verse_lines  = ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरन्ति ।;ध्यानेन तेन हतकिल्बिषचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति॥ ५३॥
| verse_line2  = ध्यानेन तेन हतकिल्बिषचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति॥ ५३॥
| verse_line2  = ध्यानेन तेन हतकिल्बिषचेतनास्ते मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति॥ ५३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V54
| verse_id     = KMM_C01_V54
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = हे चित्त चिन्तयस्वेह वासुदेवमहर्निशम् ।
| verse_line1  = हे चित्त चिन्तयस्वेह वासुदेवमहर्निशम् ।
| verse_lines  = हे चित्त चिन्तयस्वेह वासुदेवमहर्निशम् ।;नूनं यश्चिन्तितः पुंसां हन्ति संसारबन्धनम्॥ ५४॥
| verse_line2  = नूनं यश्चिन्तितः पुंसां हन्ति संसारबन्धनम्॥ ५४॥
| verse_line2  = नूनं यश्चिन्तितः पुंसां हन्ति संसारबन्धनम्॥ ५४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V55
| verse_id     = KMM_C01_V55
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।
| verse_line1  = आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।
| verse_lines  = आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।;इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥ ५५॥
| verse_line2  = इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥ ५५॥
| verse_line2  = इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा॥ ५५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V56
| verse_id     = KMM_C01_V56
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते ।
| verse_line1  = स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते ।
| verse_lines  = स्मृते सकलकल्याणभाजनं यत्र जायते ।;पुरुषस्तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम्॥ ५६॥
| verse_line2  = पुरुषस्तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम्॥ ५६॥
| verse_line2  = पुरुषस्तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम्॥ ५६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V57
| verse_id     = KMM_C01_V57
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु तीर्थेषु व्रतेषु यच्च ।
| verse_line1  = वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु तीर्थेषु व्रतेषु यच्च ।
| verse_lines  = वेदेषु यज्ञेषु तपस्सु चैव दानेषु तीर्थेषु व्रतेषु यच्च ।;इष्टेषु पूर्तेषु च यत्प्रदिष्टं पुण्यं स्मृते तत्खलु वासुदेवे॥ ५७॥
| verse_line2  = इष्टेषु पूर्तेषु च यत्प्रदिष्टं पुण्यं स्मृते तत्खलु वासुदेवे॥ ५७॥
| verse_line2  = इष्टेषु पूर्तेषु च यत्प्रदिष्टं पुण्यं स्मृते तत्खलु वासुदेवे॥ ५७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V58
| verse_id     = KMM_C01_V58
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = आराध्यैवं नरो विष्णुं मनसा यद्यदिच्छति ।
| verse_line1  = आराध्यैवं नरो विष्णुं मनसा यद्यदिच्छति ।
| verse_lines  = आराध्यैवं नरो विष्णुं मनसा यद्यदिच्छति ।;फलं प्राप्नोति विपुलं भूरि स्वल्पमथापि वा॥ ५८॥
| verse_line2  = फलं प्राप्नोति विपुलं भूरि स्वल्पमथापि वा॥ ५८॥
| verse_line2  = फलं प्राप्नोति विपुलं भूरि स्वल्पमथापि वा॥ ५८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V59
| verse_id     = KMM_C01_V59
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलापनमनुत्तमम् ।
| verse_line1  = यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलापनमनुत्तमम् ।
| verse_lines  = यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलापनमनुत्तमम् ।;मैत्रेयाशेषपापानां धातूनामिव पावकः॥ ५९॥
| verse_line2  = मैत्रेयाशेषपापानां धातूनामिव पावकः॥ ५९॥
| verse_line2  = मैत्रेयाशेषपापानां धातूनामिव पावकः॥ ५९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V60
| verse_id     = KMM_C01_V60
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् ।
| verse_line1  = कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् ।
| verse_lines  = कलिकल्मषमत्युग्रं नरकार्तिप्रदं नृणाम् ।;प्रयाति विलयं सद्यः सकृत्सङ्कीर्तितेच्युते॥ ६०॥
| verse_line2  = प्रयाति विलयं सद्यः सकृत्सङ्कीर्तितेच्युते॥ ६०॥
| verse_line2  = प्रयाति विलयं सद्यः सकृत्सङ्कीर्तितेच्युते॥ ६०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V61
| verse_id     = KMM_C01_V61
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अनायासेन चायान्ति मुक्तिं केशवसंश्रिताः ।
| verse_line1  = अनायासेन चायान्ति मुक्तिं केशवसंश्रिताः ।
| verse_lines  = अनायासेन चायान्ति मुक्तिं केशवसंश्रिताः ।;तद्विघाताय जायन्ते शक्राद्याः परिपन्थिनः॥ ६१॥
| verse_line2  = तद्विघाताय जायन्ते शक्राद्याः परिपन्थिनः॥ ६१॥
| verse_line2  = तद्विघाताय जायन्ते शक्राद्याः परिपन्थिनः॥ ६१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V62
| verse_id     = KMM_C01_V62
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = चतुःसागरमासाद्य जम्बूद्वीपोत्तमे क्वचित् ।
| verse_line1  = चतुःसागरमासाद्य जम्बूद्वीपोत्तमे क्वचित् ।
| verse_lines  = चतुःसागरमासाद्य जम्बूद्वीपोत्तमे क्वचित् ।;न पुमान्केशवादन्यः सर्वपापचिकित्सकः॥ ६२॥
| verse_line2  = न पुमान्केशवादन्यः सर्वपापचिकित्सकः॥ ६२॥
| verse_line2  = न पुमान्केशवादन्यः सर्वपापचिकित्सकः॥ ६२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V63
| verse_id     = KMM_C01_V63
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यदभ्यर्च्य हरिं भक्त्या कृते वर्षसहस्रकम् ।
| verse_line1  = यदभ्यर्च्य हरिं भक्त्या कृते वर्षसहस्रकम् ।
| verse_lines  = यदभ्यर्च्य हरिं भक्त्या कृते वर्षसहस्रकम् ।;फलं प्राप्नोति विपुलं कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ ६३॥
| verse_line2  = फलं प्राप्नोति विपुलं कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ ६३॥
| verse_line2  = फलं प्राप्नोति विपुलं कलौ सङ्कीर्त्य केशवम्॥ ६३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V64
| verse_id     = KMM_C01_V64
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = क्षीयते तु यदा धर्मः प्राप्ते घोरे कलौ युगे ।
| verse_line1  = क्षीयते तु यदा धर्मः प्राप्ते घोरे कलौ युगे ।
| verse_lines  = क्षीयते तु यदा धर्मः प्राप्ते घोरे कलौ युगे ।;तदा न कीर्तयेत्कश्चिन्मुक्तिदं देवमच्युतम्॥ ६४॥
| verse_line2  = तदा न कीर्तयेत्कश्चिन्मुक्तिदं देवमच्युतम्॥ ६४॥
| verse_line2  = तदा न कीर्तयेत्कश्चिन्मुक्तिदं देवमच्युतम्॥ ६४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V65
| verse_id     = KMM_C01_V65
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अवशेनापि यन्नामि्न कीर्तिते सर्वपातकैः ।
| verse_line1  = अवशेनापि यन्नामि्न कीर्तिते सर्वपातकैः ।
| verse_lines  = अवशेनापि यन्नामि्न कीर्तिते सर्वपातकैः ।;पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहत्रस्तमृगैरिव॥ ६५॥
| verse_line2  = पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहत्रस्तमृगैरिव॥ ६५॥
| verse_line2  = पुमान्विमुच्यते सद्यः सिंहत्रस्तमृगैरिव॥ ६५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V66
| verse_id     = KMM_C01_V66
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = नारायणेति मन्त्रोस्ति वागस्ति वशवर्तिनी ।
| verse_line1  = नारायणेति मन्त्रोस्ति वागस्ति वशवर्तिनी ।
| verse_lines  = नारायणेति मन्त्रोस्ति वागस्ति वशवर्तिनी ।;तथापि नरके घोरे पतन्तीत्येतदद्भुतम्॥ ६६॥
| verse_line2  = तथापि नरके घोरे पतन्तीत्येतदद्भुतम्॥ ६६॥
| verse_line2  = तथापि नरके घोरे पतन्तीत्येतदद्भुतम्॥ ६६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V67
| verse_id     = KMM_C01_V67
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।
| verse_line1  = आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।
| verse_lines  = आर्ता विषण्णाः शिथिलाश्च भीता घोरेषु च व्याधिषु वर्तमानाः ।;सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति॥ ६७॥
| verse_line2  = सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति॥ ६७॥
| verse_line2  = सङ्कीर्त्य नारायणशब्दमात्रं विमुक्तदुःखाः सुखिनो भवन्ति॥ ६७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V68
| verse_id     = KMM_C01_V68
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = कौशिकः
| verse_line1  = कौशिकः
| verse_lines  = कौशिकः;अनाराधितगोविन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।;आराध्य वासुदेवं स्युः सदानन्दैकभोगिनः॥ ६८॥
| verse_line2  = अनाराधितगोविन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।
| verse_line2  = अनाराधितगोविन्दा ये नरा दुःखभागिनः ।
| verse_line3  = आराध्य वासुदेवं स्युः सदानन्दैकभोगिनः॥ ६८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V69
| verse_id     = KMM_C01_V69
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = सकृदुच्चरितं यैस्तु कृष्णेति न विशन्ति ते ।
| verse_line1  = सकृदुच्चरितं यैस्तु कृष्णेति न विशन्ति ते ।
| verse_lines  = सकृदुच्चरितं यैस्तु कृष्णेति न विशन्ति ते ।;गर्भागारगृहं मातुर्यमलोकं च दुस्सहम्॥ ६९॥
| verse_line2  = गर्भागारगृहं मातुर्यमलोकं च दुस्सहम्॥ ६९॥
| verse_line2  = गर्भागारगृहं मातुर्यमलोकं च दुस्सहम्॥ ६९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V70
| verse_id     = KMM_C01_V70
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम् ।
| verse_line1  = क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम् ।
| verse_lines  = क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम् ।;क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम्॥ ७०॥
| verse_line2  = क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम्॥ ७०॥
| verse_line2  = क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम्॥ ७०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V71
| verse_id     = KMM_C01_V71
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = बुद्ध्या बुद्ध्वाभ्यसेदेतत् हरिरित्यक्षरद्वयम् ।
| verse_line1  = बुद्ध्या बुद्ध्वाभ्यसेदेतत् हरिरित्यक्षरद्वयम् ।
| verse_lines  = बुद्ध्या बुद्ध्वाभ्यसेदेतत् हरिरित्यक्षरद्वयम् ।;स्मरणात्कीर्तनाद्यस्य न पुनर्जायते भुवि॥ ७१॥
| verse_line2  = स्मरणात्कीर्तनाद्यस्य न पुनर्जायते भुवि॥ ७१॥
| verse_line2  = स्मरणात्कीर्तनाद्यस्य न पुनर्जायते भुवि॥ ७१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V72
| verse_id     = KMM_C01_V72
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = हे जिह्वे मम निस्नेहे हरिं किं नानुभाषसे ।
| verse_line1  = हे जिह्वे मम निस्नेहे हरिं किं नानुभाषसे ।
| verse_lines  = हे जिह्वे मम निस्नेहे हरिं किं नानुभाषसे ।;हरिं वदस्व कल्याणि संसारोदधिनौर्हरिः॥ ७२॥
| verse_line2  = हरिं वदस्व कल्याणि संसारोदधिनौर्हरिः॥ ७२॥
| verse_line2  = हरिं वदस्व कल्याणि संसारोदधिनौर्हरिः॥ ७२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V73
| verse_id     = KMM_C01_V73
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = असारे खलु संसारे सारात्सारतरो हरिः ।
| verse_line1  = असारे खलु संसारे सारात्सारतरो हरिः ।
| verse_lines  = असारे खलु संसारे सारात्सारतरो हरिः ।;पुण्यहीना न विन्दन्ति सारङ्गाश्च यथा जलम्॥ ७३॥
| verse_line2  = पुण्यहीना न विन्दन्ति सारङ्गाश्च यथा जलम्॥ ७३॥
| verse_line2  = पुण्यहीना न विन्दन्ति सारङ्गाश्च यथा जलम्॥ ७३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V74
| verse_id     = KMM_C01_V74
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = कुरुक्षेत्रेण किं तस्य किं काश्या पुष्करेण किम् ।
| verse_line1  = कुरुक्षेत्रेण किं तस्य किं काश्या पुष्करेण किम् ।
| verse_lines  = कुरुक्षेत्रेण किं तस्य किं काश्या पुष्करेण किम् ।;जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्॥ ७४॥
| verse_line2  = जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्॥ ७४॥
| verse_line2  = जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्॥ ७४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V75
| verse_id     = KMM_C01_V75
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ब्रह्मा
| verse_line1  = ब्रह्मा
| verse_lines  = ब्रह्मा;असारे खलु संसारे सारमेकं निरूपितम् ।;समस्तलोकनाथस्य सारमाराधनं हरेः॥ ७५॥
| verse_line2  = असारे खलु संसारे सारमेकं निरूपितम् ।
| verse_line2  = असारे खलु संसारे सारमेकं निरूपितम् ।
| verse_line3  = समस्तलोकनाथस्य सारमाराधनं हरेः॥ ७५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V76
| verse_id     = KMM_C01_V76
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पणम् ।
| verse_line1  = सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पणम् ।
| verse_lines  = सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पणम् ।;तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥ ७६॥
| verse_line2  = तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥ ७६॥
| verse_line2  = तावेव केवलौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ॥ ७६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V77
| verse_id     = KMM_C01_V77
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यस्तु विष्णुपरो नित्यं दृढभक्तिर्जितेन्द्रियः ।
| verse_line1  = यस्तु विष्णुपरो नित्यं दृढभक्तिर्जितेन्द्रियः ।
| verse_lines  = यस्तु विष्णुपरो नित्यं दृढभक्तिर्जितेन्द्रियः ।;स्वगृहेपि वसन् याति तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ७७॥
| verse_line2  = स्वगृहेपि वसन् याति तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ७७॥
| verse_line2  = स्वगृहेपि वसन् याति तद्विष्णोः परमं पदम्॥ ७७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V78
| verse_id     = KMM_C01_V78
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = शङ्करः साधु साधु महाभाग साधु दानवनाशन ।
| verse_line1  = शङ्करः साधु साधु महाभाग साधु दानवनाशन ।
| verse_lines  = शङ्करः साधु साधु महाभाग साधु दानवनाशन ।;यन्मां पृच्छसि धर्मज्ञ केशवाराधनं प्रति॥ ७८॥
| verse_line2  = यन्मां पृच्छसि धर्मज्ञ केशवाराधनं प्रति॥ ७८॥
| verse_line2  = यन्मां पृच्छसि धर्मज्ञ केशवाराधनं प्रति॥ ७८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V79
| verse_id     = KMM_C01_V79
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = निमिषं निमिषार्धं वा मुहूर्तमपि भार्गव ।
| verse_line1  = निमिषं निमिषार्धं वा मुहूर्तमपि भार्गव ।
| verse_lines  = निमिषं निमिषार्धं वा मुहूर्तमपि भार्गव ।;नादग्धाशेषपापानां भक्तिर्भवति केशवे॥ ७९॥
| verse_line2  = नादग्धाशेषपापानां भक्तिर्भवति केशवे॥ ७९॥
| verse_line2  = नादग्धाशेषपापानां भक्तिर्भवति केशवे॥ ७९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V80
| verse_id     = KMM_C01_V80
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = किं तेन मनसा कार्यं यन्न तिष्ठति केशवे ।
| verse_line1  = किं तेन मनसा कार्यं यन्न तिष्ठति केशवे ।
| verse_lines  = किं तेन मनसा कार्यं यन्न तिष्ठति केशवे ।;मनो मुक्तिफलावाप्तौ कारणं सुप्रयोजितम्॥ ८०॥
| verse_line2  = मनो मुक्तिफलावाप्तौ कारणं सुप्रयोजितम्॥ ८०॥
| verse_line2  = मनो मुक्तिफलावाप्तौ कारणं सुप्रयोजितम्॥ ८०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V81
| verse_id     = KMM_C01_V81
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = रोगो नाम न सा जिह्वा यया न स्तूयते हरिः ।
| verse_line1  = रोगो नाम न सा जिह्वा यया न स्तूयते हरिः ।
| verse_lines  = रोगो नाम न सा जिह्वा यया न स्तूयते हरिः ।;गर्तौ नाम न तौ कर्णौ याभ्यां तत्कर्म न श्रुतम्॥
| verse_line2  = गर्तौ नाम न तौ कर्णौ याभ्यां तत्कर्म न श्रुतम्॥
| verse_line2  = गर्तौ नाम न तौ कर्णौ याभ्यां तत्कर्म न श्रुतम्॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V82
| verse_id     = KMM_C01_V82
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = नूनं तत्कण्ठशालूकमथवाप्युपजिह्विका ।
| verse_line1  = नूनं तत्कण्ठशालूकमथवाप्युपजिह्विका ।
| verse_lines  = नूनं तत्कण्ठशालूकमथवाप्युपजिह्विका ।;रोगो नाम न सा जिह्वा या न वक्ति हरेर्गुणान्॥ ८२॥
| verse_line2  = रोगो नाम न सा जिह्वा या न वक्ति हरेर्गुणान्॥ ८२॥
| verse_line2  = रोगो नाम न सा जिह्वा या न वक्ति हरेर्गुणान्॥ ८२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V83
| verse_id     = KMM_C01_V83
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = भारभूतैः करैः कार्यं किं तस्य नृपशोर्द्विजाः ।
| verse_line1  = भारभूतैः करैः कार्यं किं तस्य नृपशोर्द्विजाः ।
| verse_lines  = भारभूतैः करैः कार्यं किं तस्य नृपशोर्द्विजाः ।;यैर्हि न क्रियते विष्णोर्गृहसंमार्जनादिकम्॥ ८३॥
| verse_line2  = यैर्हि न क्रियते विष्णोर्गृहसंमार्जनादिकम्॥ ८३॥
| verse_line2  = यैर्हि न क्रियते विष्णोर्गृहसंमार्जनादिकम्॥ ८३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V84
| verse_id     = KMM_C01_V84
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = चरणौ तौ तु सफलौ केशवालयगामिनौ ।
| verse_line1  = चरणौ तौ तु सफलौ केशवालयगामिनौ ।
| verse_lines  = चरणौ तौ तु सफलौ केशवालयगामिनौ ।;ते च नेत्रे महाभागे याभ्यां सन्दृश्यते हरिः॥ ८४॥
| verse_line2  = ते च नेत्रे महाभागे याभ्यां सन्दृश्यते हरिः॥ ८४॥
| verse_line2  = ते च नेत्रे महाभागे याभ्यां सन्दृश्यते हरिः॥ ८४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V85
| verse_id     = KMM_C01_V85
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = किं तस्य चरणैः कार्यं वृथासञ्चरणैर्द्विजाः ।
| verse_line1  = किं तस्य चरणैः कार्यं वृथासञ्चरणैर्द्विजाः ।
| verse_lines  = किं तस्य चरणैः कार्यं वृथासञ्चरणैर्द्विजाः ।;यैर्हि न व्रजते जन्तुः केशवालयदर्शने॥ ८५॥
| verse_line2  = यैर्हि न व्रजते जन्तुः केशवालयदर्शने॥ ८५॥
| verse_line2  = यैर्हि न व्रजते जन्तुः केशवालयदर्शने॥ ८५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V86
| verse_id     = KMM_C01_V86
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = वेदवेदान्तविदुषां मुनीनां भावितात्मनाम् ।
| verse_line1  = वेदवेदान्तविदुषां मुनीनां भावितात्मनाम् ।
| verse_lines  = वेदवेदान्तविदुषां मुनीनां भावितात्मनाम् ।;ऋषित्वमपि धर्मज्ञ विज्ञेयं तत्प्रसादजम्॥ ८६॥
| verse_line2  = ऋषित्वमपि धर्मज्ञ विज्ञेयं तत्प्रसादजम्॥ ८६॥
| verse_line2  = ऋषित्वमपि धर्मज्ञ विज्ञेयं तत्प्रसादजम्॥ ८६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V87
| verse_id     = KMM_C01_V87
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = विचित्ररत्नपर्यङ्के महाभोगे च भोगिनः ।
| verse_line1  = विचित्ररत्नपर्यङ्के महाभोगे च भोगिनः ।
| verse_lines  = विचित्ररत्नपर्यङ्के महाभोगे च भोगिनः ।;रमन्ते नाकिरामाभिः केशवस्मरणात् फलम्॥ ८७॥
| verse_line2  = रमन्ते नाकिरामाभिः केशवस्मरणात् फलम्॥ ८७॥
| verse_line2  = रमन्ते नाकिरामाभिः केशवस्मरणात् फलम्॥ ८७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V88
| verse_id     = KMM_C01_V88
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अश्वमेधसहस्राणां यः सहस्रं समाचरेत् ।
| verse_line1  = अश्वमेधसहस्राणां यः सहस्रं समाचरेत् ।
| verse_lines  = अश्वमेधसहस्राणां यः सहस्रं समाचरेत् ।;नासौ तत्फलमाप्नोति तद्भक्तैर्यदवाप्यते॥ ८८॥
| verse_line2  = नासौ तत्फलमाप्नोति तद्भक्तैर्यदवाप्यते॥ ८८॥
| verse_line2  = नासौ तत्फलमाप्नोति तद्भक्तैर्यदवाप्यते॥ ८८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V89
| verse_id     = KMM_C01_V89
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = रे रे मनुष्याः पुरुषोत्तमस्य करौ न कस्मान्मुकुलीकुरुध्वम् ।
| verse_line1  = रे रे मनुष्याः पुरुषोत्तमस्य करौ न कस्मान्मुकुलीकुरुध्वम् ।
| verse_lines  = रे रे मनुष्याः पुरुषोत्तमस्य करौ न कस्मान्मुकुलीकुरुध्वम् ।;क्रियाजुषां को भवतां प्रयासः फलं हि यत्तत्पदमच्युतस्य॥ ८९॥
| verse_line2  = क्रियाजुषां को भवतां प्रयासः फलं हि यत्तत्पदमच्युतस्य॥ ८९॥
| verse_line2  = क्रियाजुषां को भवतां प्रयासः फलं हि यत्तत्पदमच्युतस्य॥ ८९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V90
| verse_id     = KMM_C01_V90
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = विष्णोर्विमानं यः कुर्यात्सकृद्भक्त्या प्रदक्षिणम् ।
| verse_line1  = विष्णोर्विमानं यः कुर्यात्सकृद्भक्त्या प्रदक्षिणम् ।
| verse_lines  = विष्णोर्विमानं यः कुर्यात्सकृद्भक्त्या प्रदक्षिणम् ।;अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ९०॥
| verse_line2  = अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ९०॥
| verse_line2  = अश्वमेधसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ९०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V91
| verse_id     = KMM_C01_V91
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = प्रदक्षिणं तु यः कुर्याद्धरिं भक्तिसमन्वितः ।
| verse_line1  = प्रदक्षिणं तु यः कुर्याद्धरिं भक्तिसमन्वितः ।
| verse_lines  = प्रदक्षिणं तु यः कुर्याद्धरिं भक्तिसमन्वितः ।;हंसयुक्तविमानेन विष्णुलोकं स गच्छति॥ ९१॥
| verse_line2  = हंसयुक्तविमानेन विष्णुलोकं स गच्छति॥ ९१॥
| verse_line2  = हंसयुक्तविमानेन विष्णुलोकं स गच्छति॥ ९१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V92
| verse_id     = KMM_C01_V92
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = तीर्थकोटिसहस्राणि व्रतकोटिशतानि च ।
| verse_line1  = तीर्थकोटिसहस्राणि व्रतकोटिशतानि च ।
| verse_lines  = तीर्थकोटिसहस्राणि व्रतकोटिशतानि च ।;नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ९२॥
| verse_line2  = नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ९२॥
| verse_line2  = नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ९२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V93
| verse_id     = KMM_C01_V93
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा ।
| verse_line1  = उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा ।
| verse_lines  = उरसा शिरसा दृष्ट्या मनसा वचसा तथा ।;पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोष्टाङ्ग ईरितः॥ ९३॥
| verse_line2  = पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोष्टाङ्ग ईरितः॥ ९३॥
| verse_line2  = पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यां प्रणामोष्टाङ्ग ईरितः॥ ९३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V94
| verse_id     = KMM_C01_V94
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = शाठ्येनापि नमस्कारं कुर्वतः शांर्गपाणये ।
| verse_line1  = शाठ्येनापि नमस्कारं कुर्वतः शांर्गपाणये ।
| verse_lines  = शाठ्येनापि नमस्कारं कुर्वतः शांर्गपाणये ।;शतजन्मार्जितं पापं नश्यत्येव न संशयः॥ ९४॥
| verse_line2  = शतजन्मार्जितं पापं नश्यत्येव न संशयः॥ ९४॥
| verse_line2  = शतजन्मार्जितं पापं नश्यत्येव न संशयः॥ ९४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V95
| verse_id     = KMM_C01_V95
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = संसारार्णवमग्नानां नराणां पापकर्मणाम् ।
| verse_line1  = संसारार्णवमग्नानां नराणां पापकर्मणाम् ।
| verse_lines  = संसारार्णवमग्नानां नराणां पापकर्मणाम् ।;नान्योद्धर्ता जगन्नाथं मुक्त्वा नारायणं प्रभुम्॥ ९५॥
| verse_line2  = नान्योद्धर्ता जगन्नाथं मुक्त्वा नारायणं प्रभुम्॥ ९५॥
| verse_line2  = नान्योद्धर्ता जगन्नाथं मुक्त्वा नारायणं प्रभुम्॥ ९५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V96
| verse_id     = KMM_C01_V96
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = रेणुकुण्ठितगात्रस्य कणा यावन्ति भारत ।
| verse_line1  = रेणुकुण्ठितगात्रस्य कणा यावन्ति भारत ।
| verse_lines  = रेणुकुण्ठितगात्रस्य कणा यावन्ति भारत ।;तावद्वर्षसहस्राणि विष्णुलोके महीयते॥ ९६॥
| verse_line2  = तावद्वर्षसहस्राणि विष्णुलोके महीयते॥ ९६॥
| verse_line2  = तावद्वर्षसहस्राणि विष्णुलोके महीयते॥ ९६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V97
| verse_id     = KMM_C01_V97
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = पावनं विष्णुनैवेद्यं सुभोज्यमृषिभिः स्मृतम् ।
| verse_line1  = पावनं विष्णुनैवेद्यं सुभोज्यमृषिभिः स्मृतम् ।
| verse_lines  = पावनं विष्णुनैवेद्यं सुभोज्यमृषिभिः स्मृतम् ।;अन्यदेवस्य नैवेद्यं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९७॥
| verse_line2  = अन्यदेवस्य नैवेद्यं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९७॥
| verse_line2  = अन्यदेवस्य नैवेद्यं भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत्॥ ९७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V98
| verse_id     = KMM_C01_V98
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = कोट्यैन्दवसहस्रैस्तु मासोपोषणकोटिभिः ।
| verse_line1  = कोट्यैन्दवसहस्रैस्तु मासोपोषणकोटिभिः ।
| verse_lines  = कोट्यैन्दवसहस्रैस्तु मासोपोषणकोटिभिः ।;तत्फलं लभ्यते पुम्भिर्विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात्॥ ९८॥
| verse_line2  = तत्फलं लभ्यते पुम्भिर्विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात्॥ ९८॥
| verse_line2  = तत्फलं लभ्यते पुम्भिर्विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात्॥ ९८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V99
| verse_id     = KMM_C01_V99
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = त्रिरात्रफलदा नद्यो याः काश्चिदसमुद्रगाः ।
| verse_line1  = त्रिरात्रफलदा नद्यो याः काश्चिदसमुद्रगाः ।
| verse_lines  = त्रिरात्रफलदा नद्यो याः काश्चिदसमुद्रगाः ।;समुद्रगास्तु पक्षस्य मासस्य सरितां पतिः॥ ९९॥
| verse_line2  = समुद्रगास्तु पक्षस्य मासस्य सरितां पतिः॥ ९९॥
| verse_line2  = समुद्रगास्तु पक्षस्य मासस्य सरितां पतिः॥ ९९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V100
| verse_id     = KMM_C01_V100
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = षण्मासफलदा गोदा वत्सरस्य तु जाह्नवी ।
| verse_line1  = षण्मासफलदा गोदा वत्सरस्य तु जाह्नवी ।
| verse_lines  = षण्मासफलदा गोदा वत्सरस्य तु जाह्नवी ।;विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १००॥
| verse_line2  = विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १००॥
| verse_line2  = विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १००॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V101
| verse_id     = KMM_C01_V101
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = गङ्गाप्रयागगयपुष्करनैमिषाणि संसेवितानि बहुशः कुरुजाङ्गलानि ।
| verse_line1  = गङ्गाप्रयागगयपुष्करनैमिषाणि संसेवितानि बहुशः कुरुजाङ्गलानि ।
| verse_lines  = गङ्गाप्रयागगयपुष्करनैमिषाणि संसेवितानि बहुशः कुरुजाङ्गलानि ।;कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापं पादोदकं भगवतः प्रपुनाति सद्यः॥ १०१॥
| verse_line2  = कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापं पादोदकं भगवतः प्रपुनाति सद्यः॥ १०१॥
| verse_line2  = कालेन तीर्थसलिलानि पुनन्ति पापं पादोदकं भगवतः प्रपुनाति सद्यः॥ १०१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V102
| verse_id     = KMM_C01_V102
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यानि कानि च तीर्थानि ब्रह्माण्डान्तर्गतानि च ।
| verse_line1  = यानि कानि च तीर्थानि ब्रह्माण्डान्तर्गतानि च ।
| verse_lines  = यानि कानि च तीर्थानि ब्रह्माण्डान्तर्गतानि च ।;विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १०२॥
| verse_line2  = विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १०२॥
| verse_line2  = विष्णुपादोदकस्यैताः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १०२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V103
| verse_id     = KMM_C01_V103
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = स्नात्वा पादोदकं विष्णोः पिबन् शिरसि धारयेत् ।
| verse_line1  = स्नात्वा पादोदकं विष्णोः पिबन् शिरसि धारयेत् ।
| verse_lines  = स्नात्वा पादोदकं विष्णोः पिबन् शिरसि धारयेत् ।;सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवीं सिदि्धमाप्नुयात्॥ १०३॥
| verse_line2  = सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवीं सिदि्धमाप्नुयात्॥ १०३॥
| verse_line2  = सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवीं सिदि्धमाप्नुयात्॥ १०३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V104
| verse_id     = KMM_C01_V104
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यथा पादोदकं पुण्यं निर्माल्यं चानुलेपनम् ।
| verse_line1  = यथा पादोदकं पुण्यं निर्माल्यं चानुलेपनम् ।
| verse_lines  = यथा पादोदकं पुण्यं निर्माल्यं चानुलेपनम् ।;नैवेद्यं धूपशेषश्च आरार्तिश्च तथा हरेः॥ १०४॥
| verse_line2  = नैवेद्यं धूपशेषश्च आरार्तिश्च तथा हरेः॥ १०४॥
| verse_line2  = नैवेद्यं धूपशेषश्च आरार्तिश्च तथा हरेः॥ १०४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V105
| verse_id     = KMM_C01_V105
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = तुलस्यास्तु रजोजुष्टनैवेद्यस्य च भक्षणम् ।
| verse_line1  = तुलस्यास्तु रजोजुष्टनैवेद्यस्य च भक्षणम् ।
| verse_lines  = तुलस्यास्तु रजोजुष्टनैवेद्यस्य च भक्षणम् ।;निर्माल्यं शिरसा धार्यं महपातकनाशनम्॥ १०५॥
| verse_line2  = निर्माल्यं शिरसा धार्यं महपातकनाशनम्॥ १०५॥
| verse_line2  = निर्माल्यं शिरसा धार्यं महपातकनाशनम्॥ १०५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V106
| verse_id     = KMM_C01_V106
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = भक्त्या वा यदि वाभक्त्या चक्राङ्कितशिलां प्रति ।
| verse_line1  = भक्त्या वा यदि वाभक्त्या चक्राङ्कितशिलां प्रति ।
| verse_lines  = भक्त्या वा यदि वाभक्त्या चक्राङ्कितशिलां प्रति ।;दर्शनं स्पर्शनं वापि सर्वपापप्रणाशनम्॥ १०६॥
| verse_line2  = दर्शनं स्पर्शनं वापि सर्वपापप्रणाशनम्॥ १०६॥
| verse_line2  = दर्शनं स्पर्शनं वापि सर्वपापप्रणाशनम्॥ १०६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V107
| verse_id     = KMM_C01_V107
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = शालग्रामोद्भवो देवो देवो द्वारवतीभवः ।
| verse_line1  = शालग्रामोद्भवो देवो देवो द्वारवतीभवः ।
| verse_lines  = शालग्रामोद्भवो देवो देवो द्वारवतीभवः ।;उभयोः स्नानतोयेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ १०७॥
| verse_line2  = उभयोः स्नानतोयेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ १०७॥
| verse_line2  = उभयोः स्नानतोयेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ १०७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V108
| verse_id     = KMM_C01_V108
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = शालग्रामशिला यत्र तत्र सन्निहितो हरिः ।
| verse_line1  = शालग्रामशिला यत्र तत्र सन्निहितो हरिः ।
| verse_lines  = शालग्रामशिला यत्र तत्र सन्निहितो हरिः ।;तत्र स्नानं च दानं च वाराणस्याः शताधिकम्॥ १०७॥
| verse_line2  = तत्र स्नानं च दानं च वाराणस्याः शताधिकम्॥ १०७॥
| verse_line2  = तत्र स्नानं च दानं च वाराणस्याः शताधिकम्॥ १०७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V109
| verse_id     = KMM_C01_V109
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = म्लेच्छदेशेशुचौ वापि चक्राङ्को यत्र तिष्ठति ।
| verse_line1  = म्लेच्छदेशेशुचौ वापि चक्राङ्को यत्र तिष्ठति ।
| verse_lines  = म्लेच्छदेशेशुचौ वापि चक्राङ्को यत्र तिष्ठति ।;योजनानि तथा त्रीणि मम क्षेत्रं वसुन्धरे॥ १०९॥
| verse_line2  = योजनानि तथा त्रीणि मम क्षेत्रं वसुन्धरे॥ १०९॥
| verse_line2  = योजनानि तथा त्रीणि मम क्षेत्रं वसुन्धरे॥ १०९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V110
| verse_id     = KMM_C01_V110
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = शालग्रामोद्भवो देवो शैलं चक्राङ्कमण्डलम् ।
| verse_line1  = शालग्रामोद्भवो देवो शैलं चक्राङ्कमण्डलम् ।
| verse_lines  = शालग्रामोद्भवो देवो शैलं चक्राङ्कमण्डलम् ।;यत्रापि नीयते तत्र वाराणस्याः शताधिकम्॥ ११०॥
| verse_line2  = यत्रापि नीयते तत्र वाराणस्याः शताधिकम्॥ ११०॥
| verse_line2  = यत्रापि नीयते तत्र वाराणस्याः शताधिकम्॥ ११०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V111
| verse_id     = KMM_C01_V111
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = शालग्रामोद्भवो देवो देवो द्वारवतीभवः ।
| verse_line1  = शालग्रामोद्भवो देवो देवो द्वारवतीभवः ।
| verse_lines  = शालग्रामोद्भवो देवो देवो द्वारवतीभवः ।;उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः॥ १११॥
| verse_line2  = उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः॥ १११॥
| verse_line2  = उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः॥ १११॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V112
| verse_id     = KMM_C01_V112
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = हरिणा मुक्तिदानीह मुक्तिस्थानानि सर्वशः ।
| verse_line1  = हरिणा मुक्तिदानीह मुक्तिस्थानानि सर्वशः ।
| verse_lines  = हरिणा मुक्तिदानीह मुक्तिस्थानानि सर्वशः ।;स यस्य सर्वभावेषु तस्य तैः किं प्रयोजनम्॥ ११२॥
| verse_line2  = स यस्य सर्वभावेषु तस्य तैः किं प्रयोजनम्॥ ११२॥
| verse_line2  = स यस्य सर्वभावेषु तस्य तैः किं प्रयोजनम्॥ ११२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V113
| verse_id     = KMM_C01_V113
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = हरिर्याति हरिर्याति दस्युव्याजेन यो वदेत् ।
| verse_line1  = हरिर्याति हरिर्याति दस्युव्याजेन यो वदेत् ।
| verse_lines  = हरिर्याति हरिर्याति दस्युव्याजेन यो वदेत् ।;सोपि सद्गतिमाप्नोति गतिं सुकृतिनो यथा॥ ११३॥
| verse_line2  = सोपि सद्गतिमाप्नोति गतिं सुकृतिनो यथा॥ ११३॥
| verse_line2  = सोपि सद्गतिमाप्नोति गतिं सुकृतिनो यथा॥ ११३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V114
| verse_id     = KMM_C01_V114
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं देवमुपासते ।
| verse_line1  = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं देवमुपासते ।
| verse_lines  = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं देवमुपासते ।;त्यक्त्वामृतं स मूढात्मा भुङ्क्ते हालाहलं विषम्॥ ११४॥
| verse_line2  = त्यक्त्वामृतं स मूढात्मा भुङ्क्ते हालाहलं विषम्॥ ११४॥
| verse_line2  = त्यक्त्वामृतं स मूढात्मा भुङ्क्ते हालाहलं विषम्॥ ११४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V115
| verse_id     = KMM_C01_V115
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = त्यक्त्वामृतं यथा कश्चिदन्यपानं पिबेन्नरः ।
| verse_line1  = त्यक्त्वामृतं यथा कश्चिदन्यपानं पिबेन्नरः ।
| verse_lines  = त्यक्त्वामृतं यथा कश्चिदन्यपानं पिबेन्नरः ।;तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११५॥
| verse_line2  = तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११५॥
| verse_line2  = तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V116
| verse_id     = KMM_C01_V116
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = स्वधर्मं तु परित्यज्य परधर्मं चरेद्यथा ।
| verse_line1  = स्वधर्मं तु परित्यज्य परधर्मं चरेद्यथा ।
| verse_lines  = स्वधर्मं तु परित्यज्य परधर्मं चरेद्यथा ।;तथा हिरं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११६॥
| verse_line2  = तथा हिरं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११६॥
| verse_line2  = तथा हिरं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V117
| verse_id     = KMM_C01_V117
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = गां च त्यक्त्वा स मूढात्मा गार्दभीं वन्दते यथा ।
| verse_line1  = गां च त्यक्त्वा स मूढात्मा गार्दभीं वन्दते यथा ।
| verse_lines  = गां च त्यक्त्वा स मूढात्मा गार्दभीं वन्दते यथा ।;तथा हरिं परित्यज्य चान्यं दैवमुपासते॥ ११७॥
| verse_line2  = तथा हरिं परित्यज्य चान्यं दैवमुपासते॥ ११७॥
| verse_line2  = तथा हरिं परित्यज्य चान्यं दैवमुपासते॥ ११७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V118
| verse_id     = KMM_C01_V118
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते ।
| verse_line1  = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते ।
| verse_lines  = वासुदेवं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते ।;तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः॥ ११८॥
| verse_line2  = तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः॥ ११८॥
| verse_line2  = तृषितो जाह्नवीतीरे कूपं खनति दुर्मतिः॥ ११८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V119
| verse_id     = KMM_C01_V119
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यथा गङ्गोदकं त्यक्त्वा पिबेत् कूपोदकं नरः ।
| verse_line1  = यथा गङ्गोदकं त्यक्त्वा पिबेत् कूपोदकं नरः ।
| verse_lines  = यथा गङ्गोदकं त्यक्त्वा पिबेत् कूपोदकं नरः ।;तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११९॥
| verse_line2  = तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११९॥
| verse_line2  = तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ ११९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V120
| verse_id     = KMM_C01_V120
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = स्वमातरं परित्यज्य श्वपाकीं वन्दते यथा ।
| verse_line1  = स्वमातरं परित्यज्य श्वपाकीं वन्दते यथा ।
| verse_lines  = स्वमातरं परित्यज्य श्वपाकीं वन्दते यथा ।;तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ १२०॥
| verse_line2  = तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ १२०॥
| verse_line2  = तथा हरिं परित्यज्य योन्यं दैवमुपासते॥ १२०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V121
| verse_id     = KMM_C01_V121
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यावत्स्वस्थमिदं पिण्डं नीरुजं करणान्वितम् ।
| verse_line1  = यावत्स्वस्थमिदं पिण्डं नीरुजं करणान्वितम् ।
| verse_lines  = यावत्स्वस्थमिदं पिण्डं नीरुजं करणान्वितम् ।;तावत्कुरुष्वात्महितं पश्चात्तापेन तप्यसे॥ १२१॥
| verse_line2  = तावत्कुरुष्वात्महितं पश्चात्तापेन तप्यसे॥ १२१॥
| verse_line2  = तावत्कुरुष्वात्महितं पश्चात्तापेन तप्यसे॥ १२१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V122
| verse_id     = KMM_C01_V122
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यावत्स्वास्त्थ्यं शरीरेषु करणेषु च पाटवम् ।
| verse_line1  = यावत्स्वास्त्थ्यं शरीरेषु करणेषु च पाटवम् ।
| verse_lines  = यावत्स्वास्त्थ्यं शरीरेषु करणेषु च पाटवम् ।;तावदर्चय गोविन्दमायुष्यं सार्थकं कुरु॥ १२२॥
| verse_line2  = तावदर्चय गोविन्दमायुष्यं सार्थकं कुरु॥ १२२॥
| verse_line2  = तावदर्चय गोविन्दमायुष्यं सार्थकं कुरु॥ १२२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V123
| verse_id     = KMM_C01_V123
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = स्मर्यतां तु हृषीकेशो हृषीकेषु दृढेषु च ।
| verse_line1  = स्मर्यतां तु हृषीकेशो हृषीकेषु दृढेषु च ।
| verse_lines  = स्मर्यतां तु हृषीकेशो हृषीकेषु दृढेषु च ।;अदृढेषु हृषीकेषु हृषीकेशं स्मरन्ति के॥ १२३॥
| verse_line2  = अदृढेषु हृषीकेषु हृषीकेशं स्मरन्ति के॥ १२३॥
| verse_line2  = अदृढेषु हृषीकेषु हृषीकेशं स्मरन्ति के॥ १२३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V124
| verse_id     = KMM_C01_V124
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यावच्चिन्तयते जन्तुर्विषयान् विषसन्निभान् ।
| verse_line1  = यावच्चिन्तयते जन्तुर्विषयान् विषसन्निभान् ।
| verse_lines  = यावच्चिन्तयते जन्तुर्विषयान् विषसन्निभान् ।;तावच्चेत्स्मरते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२४॥
| verse_line2  = तावच्चेत्स्मरते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२४॥
| verse_line2  = तावच्चेत्स्मरते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V125
| verse_id     = KMM_C01_V125
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यावत्प्रलपते जन्तुर्लोकवार्तादिभिः सदा ।
| verse_line1  = यावत्प्रलपते जन्तुर्लोकवार्तादिभिः सदा ।
| verse_lines  = यावत्प्रलपते जन्तुर्लोकवार्तादिभिः सदा ।;तावच्चेद्वदते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२५॥
| verse_line2  = तावच्चेद्वदते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२५॥
| verse_line2  = तावच्चेद्वदते विष्णुं को न मुच्येत बन्धनात्॥ १२५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V126
| verse_id     = KMM_C01_V126
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = सूतः
| verse_line1  = सूतः
| verse_lines  = सूतः;ज्ञात्वा विप्रैस्तिथिं सम्यग् दैवज्ञैः समुदीरिताम् ।;कर्तव्य उपवासस्तु ह्यन्यथा नरकं व्रजेत्॥ १२६॥
| verse_line2  = ज्ञात्वा विप्रैस्तिथिं सम्यग् दैवज्ञैः समुदीरिताम् ।
| verse_line2  = ज्ञात्वा विप्रैस्तिथिं सम्यग् दैवज्ञैः समुदीरिताम् ।
| verse_line3  = कर्तव्य उपवासस्तु ह्यन्यथा नरकं व्रजेत्॥ १२६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V127
| verse_id     = KMM_C01_V127
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = क्षये वाप्यथवा वृद्धौ सम्प्राप्ते वा दिनक्षये ।
| verse_line1  = क्षये वाप्यथवा वृद्धौ सम्प्राप्ते वा दिनक्षये ।
| verse_lines  = क्षये वाप्यथवा वृद्धौ सम्प्राप्ते वा दिनक्षये ।;उपोष्या द्वादशी पुण्या पूर्वविद्धां परित्यजेत्॥ १२७॥
| verse_line2  = उपोष्या द्वादशी पुण्या पूर्वविद्धां परित्यजेत्॥ १२७॥
| verse_line2  = उपोष्या द्वादशी पुण्या पूर्वविद्धां परित्यजेत्॥ १२७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V128
| verse_id     = KMM_C01_V128
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = पूर्वविद्धां प्रकुर्वाणो नरो धर्मान् निकृन्तति ।
| verse_line1  = पूर्वविद्धां प्रकुर्वाणो नरो धर्मान् निकृन्तति ।
| verse_lines  = पूर्वविद्धां प्रकुर्वाणो नरो धर्मान् निकृन्तति ।;सन्ततेस्तु विनाशाय सम्पदो हरणाय च॥ १२८॥
| verse_line2  = सन्ततेस्तु विनाशाय सम्पदो हरणाय च॥ १२८॥
| verse_line2  = सन्ततेस्तु विनाशाय सम्पदो हरणाय च॥ १२८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V129
| verse_id     = KMM_C01_V129
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = कलावेधे तु विप्रेन्द्र दशम्यैकादशीं त्यजेत् ।
| verse_line1  = कलावेधे तु विप्रेन्द्र दशम्यैकादशीं त्यजेत् ।
| verse_lines  = कलावेधे तु विप्रेन्द्र दशम्यैकादशीं त्यजेत् ।;सुराया बिन्दुना स्पृष्टं गङ्गाम्भ इव सन्त्यजेत्॥ १२९॥
| verse_line2  = सुराया बिन्दुना स्पृष्टं गङ्गाम्भ इव सन्त्यजेत्॥ १२९॥
| verse_line2  = सुराया बिन्दुना स्पृष्टं गङ्गाम्भ इव सन्त्यजेत्॥ १२९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V130
| verse_id     = KMM_C01_V130
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = श्वदृतौ पञ्चगव्यं च दशम्या दूषितां त्यजेत् ।
| verse_line1  = श्वदृतौ पञ्चगव्यं च दशम्या दूषितां त्यजेत् ।
| verse_lines  = श्वदृतौ पञ्चगव्यं च दशम्या दूषितां त्यजेत् ।;एकादशीं द्विजश्रेष्ठाः पक्षयोरुभयोरपि॥ १३०॥
| verse_line2  = एकादशीं द्विजश्रेष्ठाः पक्षयोरुभयोरपि॥ १३०॥
| verse_line2  = एकादशीं द्विजश्रेष्ठाः पक्षयोरुभयोरपि॥ १३०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V131
| verse_id     = KMM_C01_V131
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = तस्माद्विप्रा न विद्धा हि कर्तव्यैकादशी क्वचित् ।
| verse_line1  = तस्माद्विप्रा न विद्धा हि कर्तव्यैकादशी क्वचित् ।
| verse_lines  = तस्माद्विप्रा न विद्धा हि कर्तव्यैकादशी क्वचित् ।;विद्धा हन्ति पुरापुण्यं श्राद्धं च वृषलीपतिः॥ १३१॥
| verse_line2  = विद्धा हन्ति पुरापुण्यं श्राद्धं च वृषलीपतिः॥ १३१॥
| verse_line2  = विद्धा हन्ति पुरापुण्यं श्राद्धं च वृषलीपतिः॥ १३१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V132
| verse_id     = KMM_C01_V132
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = जप्तं दत्तं हुतं स्नातं तथा पूजा कृता हरेः ।
| verse_line1  = जप्तं दत्तं हुतं स्नातं तथा पूजा कृता हरेः ।
| verse_lines  = जप्तं दत्तं हुतं स्नातं तथा पूजा कृता हरेः ।;तत्सर्वं विलयं याति तमः सूर्योदये यथा॥ १३२॥
| verse_line2  = तत्सर्वं विलयं याति तमः सूर्योदये यथा॥ १३२॥
| verse_line2  = तत्सर्वं विलयं याति तमः सूर्योदये यथा॥ १३२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V133
| verse_id     = KMM_C01_V133
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = एकादश्यां यदा ब्रह्मन् दिनक्षयतिथिर्भवेत् ।
| verse_line1  = एकादश्यां यदा ब्रह्मन् दिनक्षयतिथिर्भवेत् ।
| verse_lines  = एकादश्यां यदा ब्रह्मन् दिनक्षयतिथिर्भवेत् ।;उपोष्या द्वादशी तत्र त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १३३॥
| verse_line2  = उपोष्या द्वादशी तत्र त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १३३॥
| verse_line2  = उपोष्या द्वादशी तत्र त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १३३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V134
| verse_id     = KMM_C01_V134
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = प्रतिपत्प्रभृतयः सर्वा उदयादुदयाद्रवेः ।
| verse_line1  = प्रतिपत्प्रभृतयः सर्वा उदयादुदयाद्रवेः ।
| verse_lines  = प्रतिपत्प्रभृतयः सर्वा उदयादुदयाद्रवेः ।;सम्पूर्णा इति विज्ञेया हरिवासरवर्जिताः॥ १३४॥
| verse_line2  = सम्पूर्णा इति विज्ञेया हरिवासरवर्जिताः॥ १३४॥
| verse_line2  = सम्पूर्णा इति विज्ञेया हरिवासरवर्जिताः॥ १३४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V135
| verse_id     = KMM_C01_V135
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अरुणोदयकाले तु दशमी यदि दृश्यते ।
| verse_line1  = अरुणोदयकाले तु दशमी यदि दृश्यते ।
| verse_lines  = अरुणोदयकाले तु दशमी यदि दृश्यते ।;न तत्रैकादशी कार्या धर्मकामार्थनाशिनी॥ १३५॥
| verse_line2  = न तत्रैकादशी कार्या धर्मकामार्थनाशिनी॥ १३५॥
| verse_line2  = न तत्रैकादशी कार्या धर्मकामार्थनाशिनी॥ १३५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V136
| verse_id     = KMM_C01_V136
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अरुणोदयवेलायां दशमी यदि दृश्यते ।
| verse_line1  = अरुणोदयवेलायां दशमी यदि दृश्यते ।
| verse_lines  = अरुणोदयवेलायां दशमी यदि दृश्यते ।;पापमूलं तदा ज्ञेयमेकादश्युपवासनम्॥ १३६॥
| verse_line2  = पापमूलं तदा ज्ञेयमेकादश्युपवासनम्॥ १३६॥
| verse_line2  = पापमूलं तदा ज्ञेयमेकादश्युपवासनम्॥ १३६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V137
| verse_id     = KMM_C01_V137
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = चतस्रो घटिकाः प्रातररुणोदय उच्यते ।
| verse_line1  = चतस्रो घटिकाः प्रातररुणोदय उच्यते ।
| verse_lines  = चतस्रो घटिकाः प्रातररुणोदय उच्यते ।;यतीनां स्नानकालोयं गङ्गाम्भःसदृशं जलम्॥ १३७॥
| verse_line2  = यतीनां स्नानकालोयं गङ्गाम्भःसदृशं जलम्॥ १३७॥
| verse_line2  = यतीनां स्नानकालोयं गङ्गाम्भःसदृशं जलम्॥ १३७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V138
| verse_id     = KMM_C01_V138
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = उदयात्प्राग्यदा विप्रा मुहूर्तद्वयसंयुता ।
| verse_line1  = उदयात्प्राग्यदा विप्रा मुहूर्तद्वयसंयुता ।
| verse_lines  = उदयात्प्राग्यदा विप्रा मुहूर्तद्वयसंयुता ।;सम्पूर्णैकादशी नाम तत्रैवोपवसेद्गृही॥ १३८॥
| verse_line2  = सम्पूर्णैकादशी नाम तत्रैवोपवसेद्गृही॥ १३८॥
| verse_line2  = सम्पूर्णैकादशी नाम तत्रैवोपवसेद्गृही॥ १३८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V139
| verse_id     = KMM_C01_V139
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = उदयात्प्राक्त्रिघटिकाव्यापिन्यैकादशी यदा ।
| verse_line1  = उदयात्प्राक्त्रिघटिकाव्यापिन्यैकादशी यदा ।
| verse_lines  = उदयात्प्राक्त्रिघटिकाव्यापिन्यैकादशी यदा ।;सन्दिग्धैकादशी नाम वर्ज्या धर्मार्थकांिक्षभिः॥ १३९॥
| verse_line2  = सन्दिग्धैकादशी नाम वर्ज्या धर्मार्थकांिक्षभिः॥ १३९॥
| verse_line2  = सन्दिग्धैकादशी नाम वर्ज्या धर्मार्थकांिक्षभिः॥ १३९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V140
| verse_id     = KMM_C01_V140
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = पुत्रपौत्रविवद्ध्यर्थं द्वादश्यामुपवासयेत् ।
| verse_line1  = पुत्रपौत्रविवद्ध्यर्थं द्वादश्यामुपवासयेत् ।
| verse_lines  = पुत्रपौत्रविवद्ध्यर्थं द्वादश्यामुपवासयेत् ।;तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४०॥
| verse_line2  = तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४०॥
| verse_line2  = तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V141
| verse_id     = KMM_C01_V141
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = उदयात्प्राग् द्विघटिकाव्यापिन्यैकादशी यदा ।
| verse_line1  = उदयात्प्राग् द्विघटिकाव्यापिन्यैकादशी यदा ।
| verse_lines  = उदयात्प्राग् द्विघटिकाव्यापिन्यैकादशी यदा ।;सङ्कीर्णैकादशी नाम वर्ज्या धर्मार्थकांिक्षभिः॥ १४१॥
| verse_line2  = सङ्कीर्णैकादशी नाम वर्ज्या धर्मार्थकांिक्षभिः॥ १४१॥
| verse_line2  = सङ्कीर्णैकादशी नाम वर्ज्या धर्मार्थकांिक्षभिः॥ १४१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V142
| verse_id     = KMM_C01_V142
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = पुत्रराज्यविवृद्ध्यर्थं द्वादश्यामुपवासनम् ।
| verse_line1  = पुत्रराज्यविवृद्ध्यर्थं द्वादश्यामुपवासनम् ।
| verse_lines  = पुत्रराज्यविवृद्ध्यर्थं द्वादश्यामुपवासनम् ।;तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४२॥
| verse_line2  = तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४२॥
| verse_line2  = तत्र क्रतुशतं पुण्यं त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V143
| verse_id     = KMM_C01_V143
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = दशमीशेषसंयुक्ता गान्धार्या समुपोषिता ।
| verse_line1  = दशमीशेषसंयुक्ता गान्धार्या समुपोषिता ।
| verse_lines  = दशमीशेषसंयुक्ता गान्धार्या समुपोषिता ।;तस्याः पुत्रशतं नष्टं तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ १४३॥
| verse_line2  = तस्याः पुत्रशतं नष्टं तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ १४३॥
| verse_line2  = तस्याः पुत्रशतं नष्टं तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ १४३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V144
| verse_id     = KMM_C01_V144
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अपीषद्दशमीविद्धा तदा तां परिवर्जयेत् ।
| verse_line1  = अपीषद्दशमीविद्धा तदा तां परिवर्जयेत् ।
| verse_lines  = अपीषद्दशमीविद्धा तदा तां परिवर्जयेत् ।;सुराबिन्दुसमायुक्तां प्रवदन्ति मनीषिणः॥ १४४॥
| verse_line2  = सुराबिन्दुसमायुक्तां प्रवदन्ति मनीषिणः॥ १४४॥
| verse_line2  = सुराबिन्दुसमायुक्तां प्रवदन्ति मनीषिणः॥ १४४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V145
| verse_id     = KMM_C01_V145
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = बह्वागमविरोधेषु ब्राह्मणेषु विवादिषु ।
| verse_line1  = बह्वागमविरोधेषु ब्राह्मणेषु विवादिषु ।
| verse_lines  = बह्वागमविरोधेषु ब्राह्मणेषु विवादिषु ।;उपोष्या द्वादशी तत्र त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४५॥
| verse_line2  = उपोष्या द्वादशी तत्र त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४५॥
| verse_line2  = उपोष्या द्वादशी तत्र त्रयोदश्यां तु पारणम्॥ १४५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V146
| verse_id     = KMM_C01_V146
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = एकादश्यां तु विद्धायां सम्प्राप्ते श्रवणे तथा ।
| verse_line1  = एकादश्यां तु विद्धायां सम्प्राप्ते श्रवणे तथा ।
| verse_lines  = एकादश्यां तु विद्धायां सम्प्राप्ते श्रवणे तथा ।;उपोष्या द्वादशी पुण्या पक्षयोरुभयोरपि॥ १४६॥
| verse_line2  = उपोष्या द्वादशी पुण्या पक्षयोरुभयोरपि॥ १४६॥
| verse_line2  = उपोष्या द्वादशी पुण्या पक्षयोरुभयोरपि॥ १४६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V147
| verse_id     = KMM_C01_V147
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = उपरागसहस्राणि व्यतीपातायुतानि च ।
| verse_line1  = उपरागसहस्राणि व्यतीपातायुतानि च ।
| verse_lines  = उपरागसहस्राणि व्यतीपातायुतानि च ।;अमालक्षं तु द्वादश्याः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १४७॥
| verse_line2  = अमालक्षं तु द्वादश्याः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १४७॥
| verse_line2  = अमालक्षं तु द्वादश्याः कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १४७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V148
| verse_id     = KMM_C01_V148
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = शुद्धापि द्वादशी ग्राह्या परतो द्वादशी यदि ।
| verse_line1  = शुद्धापि द्वादशी ग्राह्या परतो द्वादशी यदि ।
| verse_lines  = शुद्धापि द्वादशी ग्राह्या परतो द्वादशी यदि ।;विषं तु दशमी ज्ञेयामृतं चैकादशी तिथिः ।;विषप्रधाना वर्ज्या सामृता ग्राह्या प्रयत्नतः॥ १४८॥
| verse_line2  = विषं तु दशमी ज्ञेयामृतं चैकादशी तिथिः ।
| verse_line2  = विषं तु दशमी ज्ञेयामृतं चैकादशी तिथिः ।
| verse_line3  = विषप्रधाना वर्ज्या सामृता ग्राह्या प्रयत्नतः॥ १४८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V149
| verse_id     = KMM_C01_V149
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = द्वादश्यां भोजनं चैव विद्धायां हर्युपोषणम् ।
| verse_line1  = द्वादश्यां भोजनं चैव विद्धायां हर्युपोषणम् ।
| verse_lines  = द्वादश्यां भोजनं चैव विद्धायां हर्युपोषणम् ।;यः कुर्यान्मन्दबुदि्धत्वान्निरयं सोधिगच्छति॥ १४९॥
| verse_line2  = यः कुर्यान्मन्दबुदि्धत्वान्निरयं सोधिगच्छति॥ १४९॥
| verse_line2  = यः कुर्यान्मन्दबुदि्धत्वान्निरयं सोधिगच्छति॥ १४९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V150
| verse_id     = KMM_C01_V150
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यानि कानि च वाक्यानि विद्धोपोषपराणि च ।
| verse_line1  = यानि कानि च वाक्यानि विद्धोपोषपराणि च ।
| verse_lines  = यानि कानि च वाक्यानि विद्धोपोषपराणि च ।;धनदार्चापराणि स्युर्वैष्णवी न दशायुता॥ १५०॥
| verse_line2  = धनदार्चापराणि स्युर्वैष्णवी न दशायुता॥ १५०॥
| verse_line2  = धनदार्चापराणि स्युर्वैष्णवी न दशायुता॥ १५०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V151
| verse_id     = KMM_C01_V151
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अथवा मोहनार्थाय मोहिन्या भगवान् हरिः ।
| verse_line1  = अथवा मोहनार्थाय मोहिन्या भगवान् हरिः ।
| verse_lines  = अथवा मोहनार्थाय मोहिन्या भगवान् हरिः ।;अर्थितः कारयामास व्यासरूपी जनार्दनः॥ १५१॥
| verse_line2  = अर्थितः कारयामास व्यासरूपी जनार्दनः॥ १५१॥
| verse_line2  = अर्थितः कारयामास व्यासरूपी जनार्दनः॥ १५१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V152
| verse_id     = KMM_C01_V152
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = धनदार्चाविवृध्द्यर्थं महावित्तलयस्य च ।
| verse_line1  = धनदार्चाविवृध्द्यर्थं महावित्तलयस्य च ।
| verse_lines  = धनदार्चाविवृध्द्यर्थं महावित्तलयस्य च ।;असुराणां मोहनार्थं पाषण्डानां विवृद्धये ।;आत्मस्वरूपाविज्ञप्त्यै स्वलोकाप्राप्तये तथा॥ १५२॥
| verse_line2  = असुराणां मोहनार्थं पाषण्डानां विवृद्धये ।
| verse_line2  = असुराणां मोहनार्थं पाषण्डानां विवृद्धये ।
| verse_line3  = आत्मस्वरूपाविज्ञप्त्यै स्वलोकाप्राप्तये तथा॥ १५२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V153
| verse_id     = KMM_C01_V153
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = एवं विद्धां परित्यज्य द्वादश्यामुपवासयेत् ।
| verse_line1  = एवं विद्धां परित्यज्य द्वादश्यामुपवासयेत् ।
| verse_lines  = एवं विद्धां परित्यज्य द्वादश्यामुपवासयेत् ।;कोटिजन्मार्जितं पापमेकयैव विनश्यति॥ १५३॥
| verse_line2  = कोटिजन्मार्जितं पापमेकयैव विनश्यति॥ १५३॥
| verse_line2  = कोटिजन्मार्जितं पापमेकयैव विनश्यति॥ १५३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V154
| verse_id     = KMM_C01_V154
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ततः कोटिगुणं चापि निषिद्धस्येतरैर्जनैः ।
| verse_line1  = ततः कोटिगुणं चापि निषिद्धस्येतरैर्जनैः ।
| verse_lines  = ततः कोटिगुणं चापि निषिद्धस्येतरैर्जनैः ।;यदनादिकृतं पापं यदूर्ध्वं यत्करिष्यति॥ १५४॥
| verse_line2  = यदनादिकृतं पापं यदूर्ध्वं यत्करिष्यति॥ १५४॥
| verse_line2  = यदनादिकृतं पापं यदूर्ध्वं यत्करिष्यति॥ १५४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V155
| verse_id     = KMM_C01_V155
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = तत्सर्वं विलयं याति परेषामुपवासनात् ।
| verse_line1  = तत्सर्वं विलयं याति परेषामुपवासनात् ।
| verse_lines  = तत्सर्वं विलयं याति परेषामुपवासनात् ।;न च तस्मात्प्रियतमः केशवस्य ममापि च॥ १५५॥
| verse_line2  = न च तस्मात्प्रियतमः केशवस्य ममापि च॥ १५५॥
| verse_line2  = न च तस्मात्प्रियतमः केशवस्य ममापि च॥ १५५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V156
| verse_id     = KMM_C01_V156
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = एकादश्यां ह्यवेधे तु द्वादशीं न परित्यजेत् ।
| verse_line1  = एकादश्यां ह्यवेधे तु द्वादशीं न परित्यजेत् ।
| verse_lines  = एकादश्यां ह्यवेधे तु द्वादशीं न परित्यजेत् ।;पारणे मरणे चैव तिथिस्तात्कालिकी स्मृता॥ १५६॥
| verse_line2  = पारणे मरणे चैव तिथिस्तात्कालिकी स्मृता॥ १५६॥
| verse_line2  = पारणे मरणे चैव तिथिस्तात्कालिकी स्मृता॥ १५६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V157
| verse_id     = KMM_C01_V157
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा ।
| verse_line1  = ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा ।
| verse_lines  = ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिस्तथा ।;ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो भर्तृमती तथा॥ १५७॥
| verse_line2  = ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो भर्तृमती तथा॥ १५७॥
| verse_line2  = ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो भर्तृमती तथा॥ १५७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V158
| verse_id     = KMM_C01_V158
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अभर्तृका तथान्ये च सूतवैदेहिकादयः ।
| verse_line1  = अभर्तृका तथान्ये च सूतवैदेहिकादयः ।
| verse_lines  = अभर्तृका तथान्ये च सूतवैदेहिकादयः ।;एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १५८॥
| verse_line2  = एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १५८॥
| verse_line2  = एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १५८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V159
| verse_id     = KMM_C01_V159
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = एकादश्यां तु यो भुङ्क्ते मोहेनावृतचेतसा ।
| verse_line1  = एकादश्यां तु यो भुङ्क्ते मोहेनावृतचेतसा ।
| verse_lines  = एकादश्यां तु यो भुङ्क्ते मोहेनावृतचेतसा ।;शुक्लायामथ कृष्णायां निरयं याति स ध्रुवम्॥ १५९॥
| verse_line2  = शुक्लायामथ कृष्णायां निरयं याति स ध्रुवम्॥ १५९॥
| verse_line2  = शुक्लायामथ कृष्णायां निरयं याति स ध्रुवम्॥ १५९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V160
| verse_id     = KMM_C01_V160
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = विवेचयति यो मोहाच्छुक्ला कृष्णेति पापकृत् ।
| verse_line1  = विवेचयति यो मोहाच्छुक्ला कृष्णेति पापकृत् ।
| verse_lines  = विवेचयति यो मोहाच्छुक्ला कृष्णेति पापकृत् ।;एकादशीं स वै याति निरयं नात्र संशयः॥ १६०॥
| verse_line2  = एकादशीं स वै याति निरयं नात्र संशयः॥ १६०॥
| verse_line2  = एकादशीं स वै याति निरयं नात्र संशयः॥ १६०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V161
| verse_id     = KMM_C01_V161
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यथा गौर्नैव हन्तव्या शुक्ला कृष्णेति भामिनि ।
| verse_line1  = यथा गौर्नैव हन्तव्या शुक्ला कृष्णेति भामिनि ।
| verse_lines  = यथा गौर्नैव हन्तव्या शुक्ला कृष्णेति भामिनि ।;एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १६१॥
| verse_line2  = एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १६१॥
| verse_line2  = एकादश्यां न भुञ्जीत पक्षयोरुभयोरपि॥ १६१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V162
| verse_id     = KMM_C01_V162
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यानि कानि च वाक्यानि कृष्णैकादशिवर्जने ।
| verse_line1  = यानि कानि च वाक्यानि कृष्णैकादशिवर्जने ।
| verse_lines  = यानि कानि च वाक्यानि कृष्णैकादशिवर्जने ।;भरण्यादिनिषेधे च तानि काम्यफलार्थिनाम्॥ १६२॥
| verse_line2  = भरण्यादिनिषेधे च तानि काम्यफलार्थिनाम्॥ १६२॥
| verse_line2  = भरण्यादिनिषेधे च तानि काम्यफलार्थिनाम्॥ १६२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V163
| verse_id     = KMM_C01_V163
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = कामिनोपि हि सिद्ध्यर्थं कुर्युरेवोपवासनम् ।
| verse_line1  = कामिनोपि हि सिद्ध्यर्थं कुर्युरेवोपवासनम् ।
| verse_lines  = कामिनोपि हि सिद्ध्यर्थं कुर्युरेवोपवासनम् ।;प्रीणनाय हरेर्नित्यं न तु काम्यव्यपेक्षया॥ १६३॥
| verse_line2  = प्रीणनाय हरेर्नित्यं न तु काम्यव्यपेक्षया॥ १६३॥
| verse_line2  = प्रीणनाय हरेर्नित्यं न तु काम्यव्यपेक्षया॥ १६३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V164
| verse_id     = KMM_C01_V164
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = तस्माच्छुक्लामथो कृष्णां भरण्यादियुतामपि ।
| verse_line1  = तस्माच्छुक्लामथो कृष्णां भरण्यादियुतामपि ।
| verse_lines  = तस्माच्छुक्लामथो कृष्णां भरण्यादियुतामपि ।;प्रत्यवायनिषेधार्थमुपवासीत नित्यशः ।;प्रीणनार्थं हरेश्चापि विष्णुलोकस्य चाप्तये॥ १६४॥
| verse_line2  = प्रत्यवायनिषेधार्थमुपवासीत नित्यशः ।
| verse_line2  = प्रत्यवायनिषेधार्थमुपवासीत नित्यशः ।
| verse_line3  = प्रीणनार्थं हरेश्चापि विष्णुलोकस्य चाप्तये॥ १६४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V165
| verse_id     = KMM_C01_V165
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = कला वार्धकला वापि परतो द्वादशी यदि ।
| verse_line1  = कला वार्धकला वापि परतो द्वादशी यदि ।
| verse_lines  = कला वार्धकला वापि परतो द्वादशी यदि ।;द्वादश द्वादशीर्हन्ति पूर्वेद्युः पारणे कृते॥ १६५॥
| verse_line2  = द्वादश द्वादशीर्हन्ति पूर्वेद्युः पारणे कृते॥ १६५॥
| verse_line2  = द्वादश द्वादशीर्हन्ति पूर्वेद्युः पारणे कृते॥ १६५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V166
| verse_id     = KMM_C01_V166
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अतिरिक्ता द्वादशी चेद्यस्तां नोपोषयेद्यदि ।
| verse_line1  = अतिरिक्ता द्वादशी चेद्यस्तां नोपोषयेद्यदि ।
| verse_lines  = अतिरिक्ता द्वादशी चेद्यस्तां नोपोषयेद्यदि ।;द्वादश द्वादशीर्हन्ति द्वादशी चातिलङ्घिता॥ १६६॥
| verse_line2  = द्वादश द्वादशीर्हन्ति द्वादशी चातिलङ्घिता॥ १६६॥
| verse_line2  = द्वादश द्वादशीर्हन्ति द्वादशी चातिलङ्घिता॥ १६६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V167
| verse_id     = KMM_C01_V167
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = द्वादश्यामतिरिक्तायां यो भुङ्क्ते पूर्ववासरे ।
| verse_line1  = द्वादश्यामतिरिक्तायां यो भुङ्क्ते पूर्ववासरे ।
| verse_lines  = द्वादश्यामतिरिक्तायां यो भुङ्क्ते पूर्ववासरे ।;द्वादश द्वादशीर्हन्ति द्वादशीं न परित्यजेत्॥ १६७॥
| verse_line2  = द्वादश द्वादशीर्हन्ति द्वादशीं न परित्यजेत्॥ १६७॥
| verse_line2  = द्वादश द्वादशीर्हन्ति द्वादशीं न परित्यजेत्॥ १६७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V168
| verse_id     = KMM_C01_V168
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = द्वादशीं श्रवणोपेतां यो नोपोष्यात् सुमन्दधीः ।
| verse_line1  = द्वादशीं श्रवणोपेतां यो नोपोष्यात् सुमन्दधीः ।
| verse_lines  = द्वादशीं श्रवणोपेतां यो नोपोष्यात् सुमन्दधीः ।;पञ्चसंवत्सरकृतं पुण्यं तस्य विनश्यति॥ १६८॥
| verse_line2  = पञ्चसंवत्सरकृतं पुण्यं तस्य विनश्यति॥ १६८॥
| verse_line2  = पञ्चसंवत्सरकृतं पुण्यं तस्य विनश्यति॥ १६८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V169
| verse_id     = KMM_C01_V169
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = एकादशीमुपोष्याथ द्वादशीमप्युपोषयेत् ।
| verse_line1  = एकादशीमुपोष्याथ द्वादशीमप्युपोषयेत् ।
| verse_lines  = एकादशीमुपोष्याथ द्वादशीमप्युपोषयेत् ।;न तत्र विधिलोपः स्यादुभयोर्देवता हरिः॥ १६९॥
| verse_line2  = न तत्र विधिलोपः स्यादुभयोर्देवता हरिः॥ १६९॥
| verse_line2  = न तत्र विधिलोपः स्यादुभयोर्देवता हरिः॥ १६९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V170
| verse_id     = KMM_C01_V170
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अल्पायामपि विप्रेन्द्र पारणं तु कथं भवेत् ।
| verse_line1  = अल्पायामपि विप्रेन्द्र पारणं तु कथं भवेत् ।
| verse_lines  = अल्पायामपि विप्रेन्द्र पारणं तु कथं भवेत् ।;पारयित्वोदकेनापि भुञ्जानो नैव दुष्यति॥ १७०॥
| verse_line2  = पारयित्वोदकेनापि भुञ्जानो नैव दुष्यति॥ १७०॥
| verse_line2  = पारयित्वोदकेनापि भुञ्जानो नैव दुष्यति॥ १७०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V171
| verse_id     = KMM_C01_V171
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यदाल्पां द्वादशीं दृष्ट्वा निशीथादूर्ध्वमेव तु ।
| verse_line1  = यदाल्पां द्वादशीं दृष्ट्वा निशीथादूर्ध्वमेव तु ।
| verse_lines  = यदाल्पां द्वादशीं दृष्ट्वा निशीथादूर्ध्वमेव तु ।;आमध्याह्नाः क्रियाः सर्वाः कर्तव्याः शम्भुशासनात्॥१७१॥
| verse_line2  = आमध्याह्नाः क्रियाः सर्वाः कर्तव्याः शम्भुशासनात्॥१७१॥
| verse_line2  = आमध्याह्नाः क्रियाः सर्वाः कर्तव्याः शम्भुशासनात्॥१७१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V172
| verse_id     = KMM_C01_V172
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = व्यासः उषसि द्वे तु कर्तव्ये प्रातर्माध्याह्निकक्रिये ।
| verse_line1  = व्यासः उषसि द्वे तु कर्तव्ये प्रातर्माध्याह्निकक्रिये ।
| verse_lines  = व्यासः उषसि द्वे तु कर्तव्ये प्रातर्माध्याह्निकक्रिये ।;भुजेर्यदापकर्षस्य तदन्तर्न्यायतो भवेत्॥ १७२॥
| verse_line2  = भुजेर्यदापकर्षस्य तदन्तर्न्यायतो भवेत्॥ १७२॥
| verse_line2  = भुजेर्यदापकर्षस्य तदन्तर्न्यायतो भवेत्॥ १७२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V173
| verse_id     = KMM_C01_V173
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = कर्तुं साध्यं यदा नालं द्वादश्यदि्भस्तु पारयेत् ।
| verse_line1  = कर्तुं साध्यं यदा नालं द्वादश्यदि्भस्तु पारयेत् ।
| verse_lines  = कर्तुं साध्यं यदा नालं द्वादश्यदि्भस्तु पारयेत् ।;क्रतावल्पाशिवत् पश्चात् भुञ्जीतेत्यपरे जगुः॥ १७३॥
| verse_line2  = क्रतावल्पाशिवत् पश्चात् भुञ्जीतेत्यपरे जगुः॥ १७३॥
| verse_line2  = क्रतावल्पाशिवत् पश्चात् भुञ्जीतेत्यपरे जगुः॥ १७३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V174
| verse_id     = KMM_C01_V174
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अशितानशिता यस्मादापो विद्वदि्भरीरिताः ।
| verse_line1  = अशितानशिता यस्मादापो विद्वदि्भरीरिताः ।
| verse_lines  = अशितानशिता यस्मादापो विद्वदि्भरीरिताः ।;अम्भसा केवलेनैव करिष्ये व्रतपारणम्॥ १७४॥
| verse_line2  = अम्भसा केवलेनैव करिष्ये व्रतपारणम्॥ १७४॥
| verse_line2  = अम्भसा केवलेनैव करिष्ये व्रतपारणम्॥ १७४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V175
| verse_id     = KMM_C01_V175
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = न काशी न गया गङ्गा न रेवा न च पुष्करम् ।
| verse_line1  = न काशी न गया गङ्गा न रेवा न च पुष्करम् ।
| verse_lines  = न काशी न गया गङ्गा न रेवा न च पुष्करम् ।;न चापि कौरवं क्षेत्रं तुल्यं भूप हरेर्दिनात्॥ १७५॥
| verse_line2  = न चापि कौरवं क्षेत्रं तुल्यं भूप हरेर्दिनात्॥ १७५॥
| verse_line2  = न चापि कौरवं क्षेत्रं तुल्यं भूप हरेर्दिनात्॥ १७५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V176
| verse_id     = KMM_C01_V176
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयायुतानि च ।
| verse_line1  = अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयायुतानि च ।
| verse_lines  = अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयायुतानि च ।;एकादश्युपवासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १७६॥
| verse_line2  = एकादश्युपवासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १७६॥
| verse_line2  = एकादश्युपवासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ १७६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V177
| verse_id     = KMM_C01_V177
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = एकादशीसमुत्थेन वह्निना पातकेन्धनम् ।
| verse_line1  = एकादशीसमुत्थेन वह्निना पातकेन्धनम् ।
| verse_lines  = एकादशीसमुत्थेन वह्निना पातकेन्धनम् ।;भस्मीभवति राजेन्द्र अपि जन्मशतोद्भवम्॥ १७७॥
| verse_line2  = भस्मीभवति राजेन्द्र अपि जन्मशतोद्भवम्॥ १७७॥
| verse_line2  = भस्मीभवति राजेन्द्र अपि जन्मशतोद्भवम्॥ १७७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V178
| verse_id     = KMM_C01_V178
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = नेदृशं पावनं किञ्चिन्नराणां भुवि विद्यते ।
| verse_line1  = नेदृशं पावनं किञ्चिन्नराणां भुवि विद्यते ।
| verse_lines  = नेदृशं पावनं किञ्चिन्नराणां भुवि विद्यते ।;यादृशं पद्मनाभस्य दिनं पातकहानिदम्॥ १७८॥
| verse_line2  = यादृशं पद्मनाभस्य दिनं पातकहानिदम्॥ १७८॥
| verse_line2  = यादृशं पद्मनाभस्य दिनं पातकहानिदम्॥ १७८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V179
| verse_id     = KMM_C01_V179
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = तावत्पापानि देहेस्मिन् तिष्ठन्ति मनुजाधिप ।
| verse_line1  = तावत्पापानि देहेस्मिन् तिष्ठन्ति मनुजाधिप ।
| verse_lines  = तावत्पापानि देहेस्मिन् तिष्ठन्ति मनुजाधिप ।;यावन्नोपोषयेज्जन्तुः पद्मनाभदिनं शुभम्॥ १७९॥
| verse_line2  = यावन्नोपोषयेज्जन्तुः पद्मनाभदिनं शुभम्॥ १७९॥
| verse_line2  = यावन्नोपोषयेज्जन्तुः पद्मनाभदिनं शुभम्॥ १७९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V180
| verse_id     = KMM_C01_V180
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = एकादशेन्द्रियैः पापं यत्कृतं भवति प्रभो ।
| verse_line1  = एकादशेन्द्रियैः पापं यत्कृतं भवति प्रभो ।
| verse_lines  = एकादशेन्द्रियैः पापं यत्कृतं भवति प्रभो ।;एकादश्युपावासेन तत्सर्वं विलयं व्रजेत्॥ १८०॥
| verse_line2  = एकादश्युपावासेन तत्सर्वं विलयं व्रजेत्॥ १८०॥
| verse_line2  = एकादश्युपावासेन तत्सर्वं विलयं व्रजेत्॥ १८०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V181
| verse_id     = KMM_C01_V181
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = एकादशीसमं किञ्चित् पवित्रं न हि विद्यते ।
| verse_line1  = एकादशीसमं किञ्चित् पवित्रं न हि विद्यते ।
| verse_lines  = एकादशीसमं किञ्चित् पवित्रं न हि विद्यते ।;व्याजेनापि कृता राजन्न दर्शयति भास्करिम्॥ १८१॥
| verse_line2  = व्याजेनापि कृता राजन्न दर्शयति भास्करिम्॥ १८१॥
| verse_line2  = व्याजेनापि कृता राजन्न दर्शयति भास्करिम्॥ १८१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V182
| verse_id     = KMM_C01_V182
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = श्रीव्यासः अन्नं निवेदयेन्मह्यं प्राप्तं मद्वासरे शुभे ।
| verse_line1  = श्रीव्यासः अन्नं निवेदयेन्मह्यं प्राप्तं मद्वासरे शुभे ।
| verse_lines  = श्रीव्यासः अन्नं निवेदयेन्मह्यं प्राप्तं मद्वासरे शुभे ।;तस्यापि नरकप्राप्तिः किं पुनर्भोजने कृते॥१८२॥
| verse_line2  = तस्यापि नरकप्राप्तिः किं पुनर्भोजने कृते॥१८२॥
| verse_line2  = तस्यापि नरकप्राप्तिः किं पुनर्भोजने कृते॥१८२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V183
| verse_id     = KMM_C01_V183
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = स ब्रह्महा स गोघ्नश्च स स्तेनो गुरुतल्पगः ।
| verse_line1  = स ब्रह्महा स गोघ्नश्च स स्तेनो गुरुतल्पगः ।
| verse_lines  = स ब्रह्महा स गोघ्नश्च स स्तेनो गुरुतल्पगः ।;एकादश्यां तु भुञ्जानः पक्षयोरुभयोरपि॥ १८३॥
| verse_line2  = एकादश्यां तु भुञ्जानः पक्षयोरुभयोरपि॥ १८३॥
| verse_line2  = एकादश्यां तु भुञ्जानः पक्षयोरुभयोरपि॥ १८३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V184
| verse_id     = KMM_C01_V184
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = वरं स्वमातृगमनं वरं गोमांसभक्षणम् ।
| verse_line1  = वरं स्वमातृगमनं वरं गोमांसभक्षणम् ।
| verse_lines  = वरं स्वमातृगमनं वरं गोमांसभक्षणम् ।;वरं हत्या सुरापानमेकाश्यन्नभक्षणात्॥ १८४॥
| verse_line2  = वरं हत्या सुरापानमेकाश्यन्नभक्षणात्॥ १८४॥
| verse_line2  = वरं हत्या सुरापानमेकाश्यन्नभक्षणात्॥ १८४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V185
| verse_id     = KMM_C01_V185
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = एकादशीदिने पुण्ये भुञ्जते ये नराधमाः ।
| verse_line1  = एकादशीदिने पुण्ये भुञ्जते ये नराधमाः ।
| verse_lines  = एकादशीदिने पुण्ये भुञ्जते ये नराधमाः ।;अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ १८५॥
| verse_line2  = अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ १८५॥
| verse_line2  = अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ १८५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V186
| verse_id     = KMM_C01_V186
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = पृथिव्यां यानि पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च ।
| verse_line1  = पृथिव्यां यानि पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च ।
| verse_lines  = पृथिव्यां यानि पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च ।;अन्नमाश्रित्य तिष्ठन्ति सम्प्राप्ते हरिवासरे॥ १८६॥
| verse_line2  = अन्नमाश्रित्य तिष्ठन्ति सम्प्राप्ते हरिवासरे॥ १८६॥
| verse_line2  = अन्नमाश्रित्य तिष्ठन्ति सम्प्राप्ते हरिवासरे॥ १८६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V187
| verse_id     = KMM_C01_V187
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = रुग्माङ्गदः
| verse_line1  = रुग्माङ्गदः
| verse_lines  = रुग्माङ्गदः;अष्टवर्षाधिको यस्तु ह्यशीतिर्न हि पूर्यते ।;यो भुङ्क्ते मानवः पापी विष्णोरहनि चागते॥ १८७॥
| verse_line2  = अष्टवर्षाधिको यस्तु ह्यशीतिर्न हि पूर्यते ।
| verse_line2  = अष्टवर्षाधिको यस्तु ह्यशीतिर्न हि पूर्यते ।
| verse_line3  = यो भुङ्क्ते मानवः पापी विष्णोरहनि चागते॥ १८७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V188
| verse_id     = KMM_C01_V188
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = पिता वा यदि वा पुत्रो भार्या वापि सुहृज्जनः ।
| verse_line1  = पिता वा यदि वा पुत्रो भार्या वापि सुहृज्जनः ।
| verse_lines  = पिता वा यदि वा पुत्रो भार्या वापि सुहृज्जनः ।;पद्मनाभदिने भुङ्क्ते निग्राह्यो दस्युवद्भवेत्॥ १८८॥
| verse_line2  = पद्मनाभदिने भुङ्क्ते निग्राह्यो दस्युवद्भवेत्॥ १८८॥
| verse_line2  = पद्मनाभदिने भुङ्क्ते निग्राह्यो दस्युवद्भवेत्॥ १८८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V189
| verse_id     = KMM_C01_V189
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ब्रह्मा उपोष्य द्वादशीं पुण्यां सर्वपापक्षयप्रदाम् ।
| verse_line1  = ब्रह्मा उपोष्य द्वादशीं पुण्यां सर्वपापक्षयप्रदाम् ।
| verse_lines  = ब्रह्मा उपोष्य द्वादशीं पुण्यां सर्वपापक्षयप्रदाम् ।;न पश्यन्ति यमं वापि नरकाणि न यातनाम्॥ १८९॥
| verse_line2  = न पश्यन्ति यमं वापि नरकाणि न यातनाम्॥ १८९॥
| verse_line2  = न पश्यन्ति यमं वापि नरकाणि न यातनाम्॥ १८९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V190
| verse_id     = KMM_C01_V190
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = शङ्करः रटन्तीह पुराणानि भूयो भूयो वरानने ।
| verse_line1  = शङ्करः रटन्तीह पुराणानि भूयो भूयो वरानने ।
| verse_lines  = शङ्करः रटन्तीह पुराणानि भूयो भूयो वरानने ।;न भोक्तव्यं न भोक्तव्यं सम्प्राप्ते हरिवासरे॥ १९०॥
| verse_line2  = न भोक्तव्यं न भोक्तव्यं सम्प्राप्ते हरिवासरे॥ १९०॥
| verse_line2  = न भोक्तव्यं न भोक्तव्यं सम्प्राप्ते हरिवासरे॥ १९०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V191
| verse_id     = KMM_C01_V191
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = द्वादशी न प्रमोक्तव्या यावदायुः प्रवर्तते ।
| verse_line1  = द्वादशी न प्रमोक्तव्या यावदायुः प्रवर्तते ।
| verse_lines  = द्वादशी न प्रमोक्तव्या यावदायुः प्रवर्तते ।;अर्चनीयो हृषीकेशो विशुद्धेनान्तरात्मना॥ १९१॥
| verse_line2  = अर्चनीयो हृषीकेशो विशुद्धेनान्तरात्मना॥ १९१॥
| verse_line2  = अर्चनीयो हृषीकेशो विशुद्धेनान्तरात्मना॥ १९१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V192
| verse_id     = KMM_C01_V192
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = भक्त्या ग्राह्यो हृषीकेशो न धनैर्धरणीसुराः ।
| verse_line1  = भक्त्या ग्राह्यो हृषीकेशो न धनैर्धरणीसुराः ।
| verse_lines  = भक्त्या ग्राह्यो हृषीकेशो न धनैर्धरणीसुराः ।;भक्त्या सम्पूजितो विष्णुः फलं धत्ते समीहितम्॥१९२॥
| verse_line2  = भक्त्या सम्पूजितो विष्णुः फलं धत्ते समीहितम्॥१९२॥
| verse_line2  = भक्त्या सम्पूजितो विष्णुः फलं धत्ते समीहितम्॥१९२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V193
| verse_id     = KMM_C01_V193
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = जलेनापि जगन्नाथः पूजितः क्लेशनाशनः ।
| verse_line1  = जलेनापि जगन्नाथः पूजितः क्लेशनाशनः ।
| verse_lines  = जलेनापि जगन्नाथः पूजितः क्लेशनाशनः ।;परितोषं प्रयात्याशु तृषार्तास्तु यथा जलैः॥ १९३॥
| verse_line2  = परितोषं प्रयात्याशु तृषार्तास्तु यथा जलैः॥ १९३॥
| verse_line2  = परितोषं प्रयात्याशु तृषार्तास्तु यथा जलैः॥ १९३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V194
| verse_id     = KMM_C01_V194
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = आसीनस्य शयानस्य तिष्ठतो ब्रजतोपि वा ।
| verse_line1  = आसीनस्य शयानस्य तिष्ठतो ब्रजतोपि वा ।
| verse_lines  = आसीनस्य शयानस्य तिष्ठतो ब्रजतोपि वा ।;रमस्व पुण्डरीकाक्ष हृदये मम सर्वदा॥ १९४॥
| verse_line2  = रमस्व पुण्डरीकाक्ष हृदये मम सर्वदा॥ १९४॥
| verse_line2  = रमस्व पुण्डरीकाक्ष हृदये मम सर्वदा॥ १९४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V195
| verse_id     = KMM_C01_V195
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = सर्वगश्चैव सर्वात्मा सर्वावस्थासु चाच्युत ।
| verse_line1  = सर्वगश्चैव सर्वात्मा सर्वावस्थासु चाच्युत ।
| verse_lines  = सर्वगश्चैव सर्वात्मा सर्वावस्थासु चाच्युत ।;रमस्व पुण्डरीकाक्ष नृसिंह हृदये मम॥ १९५॥
| verse_line2  = रमस्व पुण्डरीकाक्ष नृसिंह हृदये मम॥ १९५॥
| verse_line2  = रमस्व पुण्डरीकाक्ष नृसिंह हृदये मम॥ १९५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V196
| verse_id     = KMM_C01_V196
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = करावलम्बनं देहि श्रीकृष्ण कमलेक्षण ।
| verse_line1  = करावलम्बनं देहि श्रीकृष्ण कमलेक्षण ।
| verse_lines  = करावलम्बनं देहि श्रीकृष्ण कमलेक्षण ।;भवपङ्कार्णवे घोरे मज्जतो मम शाश्वत (सर्वदा)॥१९६॥
| verse_line2  = भवपङ्कार्णवे घोरे मज्जतो मम शाश्वत (सर्वदा)॥१९६॥
| verse_line2  = भवपङ्कार्णवे घोरे मज्जतो मम शाश्वत (सर्वदा)॥१९६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V197
| verse_id     = KMM_C01_V197
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = त्राहि त्राहि जगन्नाथ वासुदेवाच्युताव्यय ।
| verse_line1  = त्राहि त्राहि जगन्नाथ वासुदेवाच्युताव्यय ।
| verse_lines  = त्राहि त्राहि जगन्नाथ वासुदेवाच्युताव्यय ।;मां समुद्धर गोविन्द दुःखसंसारसागरात्॥ १९७॥
| verse_line2  = मां समुद्धर गोविन्द दुःखसंसारसागरात्॥ १९७॥
| verse_line2  = मां समुद्धर गोविन्द दुःखसंसारसागरात्॥ १९७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V198
| verse_id     = KMM_C01_V198
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = एतत्पुण्यं परं गुह्यं पवित्रं पापनाशनम् ।
| verse_line1  = एतत्पुण्यं परं गुह्यं पवित्रं पापनाशनम् ।
| verse_lines  = एतत्पुण्यं परं गुह्यं पवित्रं पापनाशनम् ।;आयुष्यं च यशस्यं च धन्यं दुःस्वप्ननाशनम्॥ १९८॥
| verse_line2  = आयुष्यं च यशस्यं च धन्यं दुःस्वप्ननाशनम्॥ १९८॥
| verse_line2  = आयुष्यं च यशस्यं च धन्यं दुःस्वप्ननाशनम्॥ १९८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V199
| verse_id     = KMM_C01_V199
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = कलौ पापं कियन्मात्रं हत्यास्तेयादिसम्भवम् ।
| verse_line1  = कलौ पापं कियन्मात्रं हत्यास्तेयादिसम्भवम् ।
| verse_lines  = कलौ पापं कियन्मात्रं हत्यास्तेयादिसम्भवम् ।;स्मृते मनसि गोविन्दे दह्यते तूलराशिवत्॥ १९९॥
| verse_line2  = स्मृते मनसि गोविन्दे दह्यते तूलराशिवत्॥ १९९॥
| verse_line2  = स्मृते मनसि गोविन्दे दह्यते तूलराशिवत्॥ १९९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V200
| verse_id     = KMM_C01_V200
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = कलौ केशवभक्तानां न भयं विद्यते क्वचित् ।
| verse_line1  = कलौ केशवभक्तानां न भयं विद्यते क्वचित् ।
| verse_lines  = कलौ केशवभक्तानां न भयं विद्यते क्वचित् ।;स्मृते सङ्कीर्तिते ध्याते सङ्क्षयं याति पातकम्॥ २००॥
| verse_line2  = स्मृते सङ्कीर्तिते ध्याते सङ्क्षयं याति पातकम्॥ २००॥
| verse_line2  = स्मृते सङ्कीर्तिते ध्याते सङ्क्षयं याति पातकम्॥ २००॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V201
| verse_id     = KMM_C01_V201
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अध्येतव्यमिदं शास्त्रं श्रोतव्यमनसूयया ।
| verse_line1  = अध्येतव्यमिदं शास्त्रं श्रोतव्यमनसूयया ।
| verse_lines  = अध्येतव्यमिदं शास्त्रं श्रोतव्यमनसूयया ।;भक्तेभ्यश्च प्रदातव्यं धार्मिकेभ्यः पुनःपुनः॥ २०१॥
| verse_line2  = भक्तेभ्यश्च प्रदातव्यं धार्मिकेभ्यः पुनःपुनः॥ २०१॥
| verse_line2  = भक्तेभ्यश्च प्रदातव्यं धार्मिकेभ्यः पुनःपुनः॥ २०१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V202
| verse_id     = KMM_C01_V202
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अधीयाना इदं शास्त्रं विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ।
| verse_line1  = अधीयाना इदं शास्त्रं विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ।
| verse_lines  = अधीयाना इदं शास्त्रं विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ।;सर्वपापविनिर्मुक्ताः प्राप्नुवन्ति परं पदम्॥२०२॥
| verse_line2  = सर्वपापविनिर्मुक्ताः प्राप्नुवन्ति परं पदम्॥२०२॥
| verse_line2  = सर्वपापविनिर्मुक्ताः प्राप्नुवन्ति परं पदम्॥२०२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V203
| verse_id     = KMM_C01_V203
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् ।
| verse_line1  = श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् ।
| verse_lines  = श्रुत्वा धर्मं विजानाति श्रुत्वा त्यजति दुर्मतिम् ।;श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षं च गच्छति॥ २०३॥
| verse_line2  = श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षं च गच्छति॥ २०३॥
| verse_line2  = श्रुत्वा ज्ञानमवाप्नोति श्रुत्वा मोक्षं च गच्छति॥ २०३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V204
| verse_id     = KMM_C01_V204
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = तस्मादिदं सदा सेव्यं श्रोतव्यं च सदैव हि ।
| verse_line1  = तस्मादिदं सदा सेव्यं श्रोतव्यं च सदैव हि ।
| verse_lines  = तस्मादिदं सदा सेव्यं श्रोतव्यं च सदैव हि ।;कुतर्कदावदग्धेभ्यो न दातव्यं कथञ्चन॥ २०४॥
| verse_line2  = कुतर्कदावदग्धेभ्यो न दातव्यं कथञ्चन॥ २०४॥
| verse_line2  = कुतर्कदावदग्धेभ्यो न दातव्यं कथञ्चन॥ २०४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V205
| verse_id     = KMM_C01_V205
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = संसारविषपानेन ये मृताः प्राणिनो भुवि ।
| verse_line1  = संसारविषपानेन ये मृताः प्राणिनो भुवि ।
| verse_lines  = संसारविषपानेन ये मृताः प्राणिनो भुवि ।;अमृताय स्मृतस्तेषां कृष्णामृतमहार्णवः॥ २०५॥
| verse_line2  = अमृताय स्मृतस्तेषां कृष्णामृतमहार्णवः॥ २०५॥
| verse_line2  = अमृताय स्मृतस्तेषां कृष्णामृतमहार्णवः॥ २०५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V206
| verse_id     = KMM_C01_V206
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = क्लिन्नं पादोदकेनैव यस्य नित्यं कलेवरम् ।
| verse_line1  = क्लिन्नं पादोदकेनैव यस्य नित्यं कलेवरम् ।
| verse_lines  = क्लिन्नं पादोदकेनैव यस्य नित्यं कलेवरम् ।;तीर्थकोटिसहस्रैस्तु स्नातो भवति प्रत्यहम्॥ २०६॥
| verse_line2  = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु स्नातो भवति प्रत्यहम्॥ २०६॥
| verse_line2  = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु स्नातो भवति प्रत्यहम्॥ २०६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V207
| verse_id     = KMM_C01_V207
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम् ।
| verse_line1  = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम् ।
| verse_lines  = तीर्थकोटिसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम् ।;तोयं यदि पिबेन्नित्यं शालग्रामशिलाच्युतम्॥ २०७॥
| verse_line2  = तोयं यदि पिबेन्नित्यं शालग्रामशिलाच्युतम्॥ २०७॥
| verse_line2  = तोयं यदि पिबेन्नित्यं शालग्रामशिलाच्युतम्॥ २०७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V208
| verse_id     = KMM_C01_V208
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = शालग्रामशिलास्पर्शं ये कुर्वन्ति दिनेदिने ।
| verse_line1  = शालग्रामशिलास्पर्शं ये कुर्वन्ति दिनेदिने ।
| verse_lines  = शालग्रामशिलास्पर्शं ये कुर्वन्ति दिनेदिने ।;वाञ्छन्ति करसंस्पर्शं तेषां देवाः सवासवाः॥ २०८॥
| verse_line2  = वाञ्छन्ति करसंस्पर्शं तेषां देवाः सवासवाः॥ २०८॥
| verse_line2  = वाञ्छन्ति करसंस्पर्शं तेषां देवाः सवासवाः॥ २०८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V209
| verse_id     = KMM_C01_V209
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = दुःसहो नारको वह्निर्दुःसहा यमकिङ्कराः ।
| verse_line1  = दुःसहो नारको वह्निर्दुःसहा यमकिङ्कराः ।
| verse_lines  = दुःसहो नारको वह्निर्दुःसहा यमकिङ्कराः ।;विषमश्चान्तकपथः प्रेतत्वं चातिदारुणम्॥ २०९॥
| verse_line2  = विषमश्चान्तकपथः प्रेतत्वं चातिदारुणम्॥ २०९॥
| verse_line2  = विषमश्चान्तकपथः प्रेतत्वं चातिदारुणम्॥ २०९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V210
| verse_id     = KMM_C01_V210
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = सञ्चित्य मनसाप्येवं पातकाद्विनिवर्तयेत् ।
| verse_line1  = सञ्चित्य मनसाप्येवं पातकाद्विनिवर्तयेत् ।
| verse_lines  = सञ्चित्य मनसाप्येवं पातकाद्विनिवर्तयेत् ।;स्मरणं कीर्तनं विष्णोः सदैव न परित्यजेत्॥ २१०॥
| verse_line2  = स्मरणं कीर्तनं विष्णोः सदैव न परित्यजेत्॥ २१०॥
| verse_line2  = स्मरणं कीर्तनं विष्णोः सदैव न परित्यजेत्॥ २१०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V211
| verse_id     = KMM_C01_V211
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् ।
| verse_line1  = अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् ।
| verse_lines  = अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात् ।;नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ २११॥
| verse_line2  = नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ २११॥
| verse_line2  = नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥ २११॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V212
| verse_id     = KMM_C01_V212
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते ।
| verse_line1  = सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते ।
| verse_lines  = सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते ।;वेदशास्त्रात्परं नास्ति न दैवं केशवात् परम्॥ २१२॥
| verse_line2  = वेदशास्त्रात्परं नास्ति न दैवं केशवात् परम्॥ २१२॥
| verse_line2  = वेदशास्त्रात्परं नास्ति न दैवं केशवात् परम्॥ २१२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V213
| verse_id     = KMM_C01_V213
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम् ।
| verse_line1  = सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम् ।
| verse_lines  = सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम् ।;बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥ २१३॥
| verse_line2  = बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥ २१३॥
| verse_line2  = बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥ २१३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V214
| verse_id     = KMM_C01_V214
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = एवं ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
| verse_line1  = एवं ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
| verse_lines  = एवं ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।;कीर्तयन्ति सुरश्रेष्ठं देवं नारायणं प्रभुम्॥ २१४॥
| verse_line2  = कीर्तयन्ति सुरश्रेष्ठं देवं नारायणं प्रभुम्॥ २१४॥
| verse_line2  = कीर्तयन्ति सुरश्रेष्ठं देवं नारायणं प्रभुम्॥ २१४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V215
| verse_id     = KMM_C01_V215
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = किं तस्य दानैः किं तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ।
| verse_line1  = किं तस्य दानैः किं तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ।
| verse_lines  = किं तस्य दानैः किं तीर्थैः किं तपोभिः किमध्वरैः ।;यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ २१५॥
| verse_line2  = यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ २१५॥
| verse_line2  = यो नित्यं ध्यायते देवं नारायणमनन्यधीः॥ २१५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V216
| verse_id     = KMM_C01_V216
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = नित्योत्सवो भवत्तेषां नित्यश्रीर्नित्यमङ्गलम् ।
| verse_line1  = नित्योत्सवो भवत्तेषां नित्यश्रीर्नित्यमङ्गलम् ।
| verse_lines  = नित्योत्सवो भवत्तेषां नित्यश्रीर्नित्यमङ्गलम् ।;येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः॥ २१६॥
| verse_line2  = येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः॥ २१६॥
| verse_line2  = येषां हृदिस्थो भगवान् मङ्गलायतनं हरिः॥ २१६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V217
| verse_id     = KMM_C01_V217
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = जीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु ।
| verse_line1  = जीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु ।
| verse_lines  = जीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु ।;स्त्री वाप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जयेत्॥ २१७॥
| verse_line2  = स्त्री वाप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जयेत्॥ २१७॥
| verse_line2  = स्त्री वाप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जयेत्॥ २१७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V218
| verse_id     = KMM_C01_V218
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः ।
| verse_line1  = चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः ।
| verse_lines  = चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः ।;अतोवित्वा परं देवं मोक्षाशा का महामुने॥ २१८॥
| verse_line2  = अतोवित्वा परं देवं मोक्षाशा का महामुने॥ २१८॥
| verse_line2  = अतोवित्वा परं देवं मोक्षाशा का महामुने॥ २१८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V219
| verse_id     = KMM_C01_V219
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = आचतुदर्शमाद्वर्षात् कर्माणि नियमेन तु ।
| verse_line1  = आचतुदर्शमाद्वर्षात् कर्माणि नियमेन तु ।
| verse_lines  = आचतुदर्शमाद्वर्षात् कर्माणि नियमेन तु ।;दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् ।;अतः कर्मक्षयान्मुक्तिः कुत एव भविष्यति॥ २१९॥
| verse_line2  = दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् ।
| verse_line2  = दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् ।
| verse_line3  = अतः कर्मक्षयान्मुक्तिः कुत एव भविष्यति॥ २१९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V220
| verse_id     = KMM_C01_V220
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा ।
| verse_line1  = समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा ।
| verse_lines  = समानां विषमा पूजा विषमाणां समा तथा ।;क्रियते येन देवोपि स्वपदाद्भ्रश्यते हि सः॥ २२०॥
| verse_line2  = क्रियते येन देवोपि स्वपदाद्भ्रश्यते हि सः॥ २२०॥
| verse_line2  = क्रियते येन देवोपि स्वपदाद्भ्रश्यते हि सः॥ २२०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V221
| verse_id     = KMM_C01_V221
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = (इति पाद्मे)
| verse_line1  = (इति पाद्मे)
| verse_lines  = (इति पाद्मे);वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु पञ्चमी ।;एतानि मान्यस्थानानि गरीयो ह्युत्तरोत्तरम्॥ २२१॥
| verse_line2  = वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु पञ्चमी ।
| verse_line2  = वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या चैव तु पञ्चमी ।
| verse_line3  = एतानि मान्यस्थानानि गरीयो ह्युत्तरोत्तरम्॥ २२१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V222
| verse_id     = KMM_C01_V222
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः ।
| verse_line1  = गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः ।
| verse_lines  = गुणानुसारिणीं पूजां समां दृष्टिं च यो नरः ।;सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति॥ २२२॥
| verse_line2  = सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति॥ २२२॥
| verse_line2  = सर्वभूतेषु कुरुते तस्य विष्णुः प्रसीदति॥ २२२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V223
| verse_id     = KMM_C01_V223
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यथा सुहृत्सु कर्तव्यं पितृमातृसुतेषु च ।
| verse_line1  = यथा सुहृत्सु कर्तव्यं पितृमातृसुतेषु च ।
| verse_lines  = यथा सुहृत्सु कर्तव्यं पितृमातृसुतेषु च ।;तथा करोति पूजादि समबुदि्धः स उच्यते॥ २२३॥
| verse_line2  = तथा करोति पूजादि समबुदि्धः स उच्यते॥ २२३॥
| verse_line2  = तथा करोति पूजादि समबुदि्धः स उच्यते॥ २२३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V224
| verse_id     = KMM_C01_V224
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = तिर्यक्पुण्ड्रं न कुर्वीत सम्प्राप्ते मरणेपि वा ।
| verse_line1  = तिर्यक्पुण्ड्रं न कुर्वीत सम्प्राप्ते मरणेपि वा ।
| verse_lines  = तिर्यक्पुण्ड्रं न कुर्वीत सम्प्राप्ते मरणेपि वा ।;न चान्यन्नाम विब्रूयात् परान्नारायणादृते॥ २२४॥
| verse_line2  = न चान्यन्नाम विब्रूयात् परान्नारायणादृते॥ २२४॥
| verse_line2  = न चान्यन्नाम विब्रूयात् परान्नारायणादृते॥ २२४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V225
| verse_id     = KMM_C01_V225
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = नैवेद्यशेषं देवस्य यो भुनक्ति दिने दिने ।
| verse_line1  = नैवेद्यशेषं देवस्य यो भुनक्ति दिने दिने ।
| verse_lines  = नैवेद्यशेषं देवस्य यो भुनक्ति दिने दिने ।;सिक्थे सिक्थे भवेत्पुण्यं चान्द्रायणशताधिकम्॥ २२५॥
| verse_line2  = सिक्थे सिक्थे भवेत्पुण्यं चान्द्रायणशताधिकम्॥ २२५॥
| verse_line2  = सिक्थे सिक्थे भवेत्पुण्यं चान्द्रायणशताधिकम्॥ २२५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V226
| verse_id     = KMM_C01_V226
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ऊर्ध्वपुण्ड्रमृजुं सौम्यं ललाटे यस्य दृश्यते ।
| verse_line1  = ऊर्ध्वपुण्ड्रमृजुं सौम्यं ललाटे यस्य दृश्यते ।
| verse_lines  = ऊर्ध्वपुण्ड्रमृजुं सौम्यं ललाटे यस्य दृश्यते ।;स चण्डालोपि शुद्धात्मा पूज्य एव न संशयः॥ २२६॥
| verse_line2  = स चण्डालोपि शुद्धात्मा पूज्य एव न संशयः॥ २२६॥
| verse_line2  = स चण्डालोपि शुद्धात्मा पूज्य एव न संशयः॥ २२६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V227
| verse_id     = KMM_C01_V227
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अशुचिर्वाप्यनाचारो मनसा पापमाचरन् ।
| verse_line1  = अशुचिर्वाप्यनाचारो मनसा पापमाचरन् ।
| verse_lines  = अशुचिर्वाप्यनाचारो मनसा पापमाचरन् ।;शुचिरेव भवेन्नित्यमूर्ध्वपुण्ड्राङ्कितो नरः॥ २२७॥
| verse_line2  = शुचिरेव भवेन्नित्यमूर्ध्वपुण्ड्राङ्कितो नरः॥ २२७॥
| verse_line2  = शुचिरेव भवेन्नित्यमूर्ध्वपुण्ड्राङ्कितो नरः॥ २२७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V228
| verse_id     = KMM_C01_V228
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ऊर्ध्वपुण्ड्रविहीनस्य श्मशानसदृशं मुखम् ।
| verse_line1  = ऊर्ध्वपुण्ड्रविहीनस्य श्मशानसदृशं मुखम् ।
| verse_lines  = ऊर्ध्वपुण्ड्रविहीनस्य श्मशानसदृशं मुखम् ।;अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ २२८॥
| verse_line2  = अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ २२८॥
| verse_line2  = अवलोक्य मुखं तेषामादित्यमवलोकयेत्॥ २२८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V229
| verse_id     = KMM_C01_V229
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यज्ञो दानं तपश्चैव स्वाध्यायः पितृतर्पणम् ।
| verse_line1  = यज्ञो दानं तपश्चैव स्वाध्यायः पितृतर्पणम् ।
| verse_lines  = यज्ञो दानं तपश्चैव स्वाध्यायः पितृतर्पणम् ।;व्यर्थं भवति तत्सर्वमूर्ध्वपुण्ड्रं विना कृतम्॥ २२९॥
| verse_line2  = व्यर्थं भवति तत्सर्वमूर्ध्वपुण्ड्रं विना कृतम्॥ २२९॥
| verse_line2  = व्यर्थं भवति तत्सर्वमूर्ध्वपुण्ड्रं विना कृतम्॥ २२९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V230
| verse_id     = KMM_C01_V230
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = गोपीचन्दनलिप्ताङ्गो यं यं पश्यति चक्षुषा ।
| verse_line1  = गोपीचन्दनलिप्ताङ्गो यं यं पश्यति चक्षुषा ।
| verse_lines  = गोपीचन्दनलिप्ताङ्गो यं यं पश्यति चक्षुषा ।;तं तं शुद्धं विजानीयान्नात्र कार्या विचारणा॥ २३०॥
| verse_line2  = तं तं शुद्धं विजानीयान्नात्र कार्या विचारणा॥ २३०॥
| verse_line2  = तं तं शुद्धं विजानीयान्नात्र कार्या विचारणा॥ २३०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V231
| verse_id     = KMM_C01_V231
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = आस्फोटयन्ति पितरः प्रनृत्यन्ति पितामहाः ।
| verse_line1  = आस्फोटयन्ति पितरः प्रनृत्यन्ति पितामहाः ।
| verse_lines  = आस्फोटयन्ति पितरः प्रनृत्यन्ति पितामहाः ।;वैष्णवोस्मत्कुले जातः स नः सन्तारयिष्यति॥ २३१॥
| verse_line2  = वैष्णवोस्मत्कुले जातः स नः सन्तारयिष्यति॥ २३१॥
| verse_line2  = वैष्णवोस्मत्कुले जातः स नः सन्तारयिष्यति॥ २३१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V232
| verse_id     = KMM_C01_V232
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = जीवितं विष्णुभक्तस्य वरं पञ्चदिनान्यपि ।
| verse_line1  = जीवितं विष्णुभक्तस्य वरं पञ्चदिनान्यपि ।
| verse_lines  = जीवितं विष्णुभक्तस्य वरं पञ्चदिनान्यपि ।;न तु कल्पसहस्रैस्तु भक्तिहीनस्य केशवे॥ २३२॥
| verse_line2  = न तु कल्पसहस्रैस्तु भक्तिहीनस्य केशवे॥ २३२॥
| verse_line2  = न तु कल्पसहस्रैस्तु भक्तिहीनस्य केशवे॥ २३२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V233
| verse_id     = KMM_C01_V233
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = किं तेन जातमात्रेण भूभारेणान्नशत्रुणा ।
| verse_line1  = किं तेन जातमात्रेण भूभारेणान्नशत्रुणा ।
| verse_lines  = किं तेन जातमात्रेण भूभारेणान्नशत्रुणा ।;यो जातो नार्चयेद्विष्णुं न स्मरेन्नापि कीर्तयेत्॥ २३३॥
| verse_line2  = यो जातो नार्चयेद्विष्णुं न स्मरेन्नापि कीर्तयेत्॥ २३३॥
| verse_line2  = यो जातो नार्चयेद्विष्णुं न स्मरेन्नापि कीर्तयेत्॥ २३३॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V234
| verse_id     = KMM_C01_V234
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यो ददाति द्विजातिभ्यश्चन्दनं गोपिमर्दितम् ।
| verse_line1  = यो ददाति द्विजातिभ्यश्चन्दनं गोपिमर्दितम् ।
| verse_lines  = यो ददाति द्विजातिभ्यश्चन्दनं गोपिमर्दितम् ।;अपि सर्षपमात्रेण पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ २३४॥
| verse_line2  = अपि सर्षपमात्रेण पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ २३४॥
| verse_line2  = अपि सर्षपमात्रेण पुनात्यासप्तमं कुलम्॥ २३४॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V235
| verse_id     = KMM_C01_V235
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत॥ २३५॥
| verse_line1  = ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत॥ २३५॥
| verse_lines  = ज्ञानी च कर्माणि सदोदितानि कुर्यादकामः सततं भवेत॥ २३५॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V236
| verse_id     = KMM_C01_V236
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = अतीतानागतज्ञानी त्रैलोक्योद्धरणक्षमः ।
| verse_line1  = अतीतानागतज्ञानी त्रैलोक्योद्धरणक्षमः ।
| verse_lines  = अतीतानागतज्ञानी त्रैलोक्योद्धरणक्षमः ।;एतादृशोपि नाचारं श्रौतं स्मार्तं परित्यजेत्॥ २३६॥
| verse_line2  = एतादृशोपि नाचारं श्रौतं स्मार्तं परित्यजेत्॥ २३६॥
| verse_line2  = एतादृशोपि नाचारं श्रौतं स्मार्तं परित्यजेत्॥ २३६॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V237
| verse_id     = KMM_C01_V237
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ''यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति'''॥ २३७॥
| verse_line1  = ''यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति'''॥ २३७॥
| verse_lines  = ''यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति'''॥ २३७॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V238
| verse_id     = KMM_C01_V238
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = ''कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।
| verse_line1  = ''कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।
| verse_lines  = ''कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।;एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे'''॥ २३८॥
| verse_line2  = एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे'''॥ २३८॥
| verse_line2  = एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे'''॥ २३८॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V239
| verse_id     = KMM_C01_V239
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ।
| verse_line1  = आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ।
| verse_lines  = आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च ।;वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः॥ २३९॥
| verse_line2  = वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः॥ २३९॥
| verse_line2  = वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः॥ २३९॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V240
| verse_id     = KMM_C01_V240
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिह चोच्यते ।
| verse_line1  = निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिह चोच्यते ।
| verse_lines  = निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिह चोच्यते ।;निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम्॥ २४०॥
| verse_line2  = निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम्॥ २४०॥
| verse_line2  = निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम्॥ २४०॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V241
| verse_id     = KMM_C01_V241
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = श्रीमदानन्दतीर्थार्यसहस्रकिरणोत्थिता ।
| verse_line1  = श्रीमदानन्दतीर्थार्यसहस्रकिरणोत्थिता ।
| verse_lines  = श्रीमदानन्दतीर्थार्यसहस्रकिरणोत्थिता ।;गोततिः सततं सेव्या गीर्वाणैः सिदि्धदा भवेत्॥ २४१॥
| verse_line2  = गोततिः सततं सेव्या गीर्वाणैः सिदि्धदा भवेत्॥ २४१॥
| verse_line2  = गोततिः सततं सेव्या गीर्वाणैः सिदि्धदा भवेत्॥ २४१॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V242
| verse_id     = KMM_C01_V242
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं
| verse_line1  = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं
| verse_lines  = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं;ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।;वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपु-;र्मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे॥२४२॥
| verse_line2  = ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।
| verse_line2  = ब तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।
| verse_line3  = वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपु-
| verse_line4  = र्मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे॥२४२॥
}}
}}


{{VerseBlock
{{VerseBlock
| verse_id     = KMM_C01_V243
| verse_id     = KMM_C01_V243
| document_id   = KMM
| document_id = KMM
| chapter_id   = KMM_C01
| chapter_id   = KMM_C01
| verse_type   = shloka
| verse_type   = shloka
| verse_line1  = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः ।
| verse_line1  = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः ।
| verse_lines  = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः ।;प्रीयतां प्रीत एवालं विष्णुर्मे परमः सुहृत्॥ २४३॥
| verse_line2  = प्रीयतां प्रीत एवालं विष्णुर्मे परमः सुहृत्॥ २४३॥
| verse_line2  = प्रीयतां प्रीत एवालं विष्णुर्मे परमः सुहृत्॥ २४३॥
}}
}}


{{Bhashyam
<div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीकृष्णामृतमहार्णवः समाप्तः॥</div>
| verse_id = KMM_C01
 
| id      = KMM_C01_author-note
| text    =
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीकृष्णामृतमहार्णवः समाप्तः॥
}}


[[Category:Sanskrit Documents]]
[[Category:Sanskrit Documents]]
[[Category:Krishnamrutamaharnava]]
[[Category:Krishnamrutamaharnava]]