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| <div class="gr-doc-title">ऐतरेयोपनिषत्</div> | | <div class="gr-doc-title" data-has-moola="1" data-has-ullekha="1">ऐतरेयोपनिषत्</div> |
| __TOC__ | | __TOC__ |
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| | <span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमारण्यके"></span> |
| == प्रथमारण्यके == | | == प्रथमारण्यके == |
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| | document_id = AIT
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| | chapter_num = 1
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| | title = प्रथमारण्यके
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| }}
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| | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयारण्यके"></span> |
| == द्वितीयारण्यके == | | == द्वितीयारण्यके == |
| | <span id="gr-C2-S1" class="gr-toc-anchor" data-level="2" data-title="प्रथमाध्यायः"></span> |
| === प्रथमाध्यायः === | | === प्रथमाध्यायः === |
| {{Adhyaya
| | <div class="gr-author-note">॥ ऐतरेयोपनिषद्भाष्यम्</div> |
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| | title = प्रथमाध्यायः
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| | verse_line1 = एष पन्था एतत्कर्म एतद्ब्रह्मैतत्सत्यम् । तस्मान्न प्रमाद्येत्तन्नातीयान्न ह्यत्यायन् पूर्वे येऽत्यायंस्ते परा बभूवुः ।
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| | <h4 class="gr-section-head gr-gadya-head">मङ्गलाचरणम्</h4> |
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| ॥ ऐतरेयोपनिषद्भाष्यम्
| | <div class="introduction" id="AIT_C02_S01_V01_I01" data-block-id="AIT_C02_S01_V01_I01" data-verse="AIT_C02_S01"> |
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| | <div class="introduction-line">नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं सर्वज्ञमच्युतमपेतसमस्तदोषम् ।</div> |
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| | <div class="introduction-line">प्राणस्य सर्वचिदचित्परमेश्वरस्य साक्षादधीश्वरमियां शरणं रमेशम् ॥</div> |
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| | <h4 class="gr-section-head gr-gadya-head">उपनिषद इतिहासः</h4> |
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| नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं सर्वज्ञमच्युतमपेतसमस्तदोषम् ।
| | <div class="introduction" id="AIT_C02_S01_V01_I02" data-block-id="AIT_C02_S01_V01_I02" data-verse="AIT_C02_S01"> |
| प्राणस्य सर्वचिदचित्परमेश्वरस्य साक्षादधीश्वरमियां शरणं रमेशम् ॥
| | <div class="introduction-line">प्रादुबर्भूव भगवांस्तपसेतराया नारायणोऽब्जजसुतस्य विशालनाम्नः ।</div> |
| }}
| | <div class="introduction-line">तस्मिन् गतेऽध्वरमभूत् सुरविप्रसङ्घो निश्चेतनस्तदनु पद्मभवोऽमुमस्तौत् ॥</div> |
| | <div class="introduction-line">तेन स्तुतः(तैः संस्तुतः .हृ) स भगवान् गिरिशेन्द्रमुख्यान् सर्वानबोधयदजेन सहैव तेऽथ ।</div> |
| | <div class="introduction-line">दासत्वमापुरत एव महत्सुराणां दासत्वतः स महिदास इति प्रसिद्धः ॥</div> |
| | <div class="introduction-line">शृण्वत्सु तेषु भगवानवदद्रमायै दिव्यां श्रुतिं स परमोऽतिमुदैतरेयीम् ।</div> |
| | <div class="introduction-line">सा बह्वृचैः प्रपठिता चतुराननास्याद् यस्यां रहस्यमुदितं परमं हि विष्णोः ॥</div> |
| | <div class="introduction-line">महाभूतिः श्रुतिः सैषा महाभूतिर्यतो हरिः ।</div> |
| | <div class="introduction-line">विशेषेणात्र कथितः सर्वज्ञः शाश्वतः प्रभुः ॥ इति ऋक्संहितायाम् ।</div> |
| | </div> |
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| {{Bhashyam
| | <h4 class="gr-section-head gr-gadya-head">हरावनन्यविश्वासिनो नैव दुर्गतिः</h4> |
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| प्रादुबर्भूव भगवांस्तपसेतराया नारायणोऽब्जजसुतस्य विशालनाम्नः ।
| | {{VerseBlock |
| तस्मिन् गतेऽध्वरमभूत् सुरविप्रसङ्घो निश्चेतनस्तदनु पद्मभवोऽमुमस्तौत् ॥
| | | verse_id = AIT_C02_S01_V01 |
| तेन स्तुतः स भगवान् गिरिशेन्द्रमुख्यान् सर्वानबोधयदजेन सहैव तेऽथ ।
| | | document_id = AIT |
| दासत्वमापुरत एव महत्सुराणां दासत्वतः स महिदास इति प्रसिद्धः ॥
| | | chapter_id = AIT_C02 |
| शृण्वत्सु तेषु भगवानवदद्रमायै दिव्यां श्रुतिं स परमोऽतिमुदैतरेयीम् ।
| | | verse_type = mantra |
| सा बह्वृचैः प्रपठिता चतुराननास्याद्यस्यां रहस्यमुदितं परमं हि विष्णोः ॥
| | | verse_line1 = एष पन्था एतत्कर्म एतद्ब्रह्मैतत्सत्यम् । तस्मान्न प्रमाद्येत् तन्नातीयान्न ह्यत्यायन् पूर्वे । येऽत्यायंस्ते ह पराबभूवुः । |
| महाभूतिः श्रुतिः सैषा महाभूतिर्यतो हरिः ।
| | | verse_lines = एष पन्था एतत्कर्म एतद्ब्रह्मैतत्सत्यम् । तस्मान्न प्रमाद्येत् तन्नातीयान्न ह्यत्यायन् पूर्वे । येऽत्यायंस्ते ह पराबभूवुः । |
| विशेषेणात्र कथितः सर्वज्ञः शाश्वतः प्रभुः ॥
| | | commentary1 = aitareya |
| इति ऋक्संहितायाम् ।
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| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S01_V01" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S01_V01"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S01_V01 | | | verse_id = AIT_C02_S01_V01 |
| | id = AIT_C02_S01_V01_B03 | | | id = AIT_C02_S01_V01_B03 |
| | text = | | | text = एष एव सदा पन्था भगवान् पुरुषोत्तमः । |
| | | नित्यं स्वप्राप्तिहेतुत्वात्, कर्तृत्वात् कर्म मातृतः ॥ |
| एष एव सदा पन्था भगवान् पुरुषोत्तमः । | | ब्रह्मैव गुणपूर्णत्वात्, सत्यं साधुस्वरूपतः । |
| नित्यं स्वप्राप्तिहेतुत्वात् कर्तृत्वात् कर्म मातृतः ॥ | | क्वापि तं विस्मरेन्नैव त्यक्त्वा तं नेतरं व्रजेत् ॥ |
| ब्रह्मैव गुणपूर्णत्वात् सत्यं साधुस्वरूपतः । | |
| क्वापि तं विस्मरेन्नैव त्यक्त्वा तं नेतरं व्रजेत् ॥
| |
| पूर्वे नैनं तत्यजुर्हि ब्रह्माद्यास्तेन संसृतेः । | | पूर्वे नैनं तत्यजुर्हि ब्रह्माद्यास्तेन संसृतेः । |
| मुक्ता श्रीश्च तदत्यागान्नित्यमुक्ता गुणाधिका ॥
| | मुक्ताः श्रीश्च तदत्यागान्नित्यमुक्ता गुणाधिका ॥ |
| }} | | }} |
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| | </div> |
| | <h4 class="gr-section-head gr-gadya-head">भगवदतिक्रमः पराभवहेतुः</h4> |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V02 | | | verse_id = AIT_C02_S01_V02 |
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| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C02 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = तदुक्तमृषिणा प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुर्न्य१न्या अर्कमभितो विविश्रे । बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः पवमानो हरन्ति आ विवेशेति । प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुरन्ति या वै ता इमाः प्रजास्तिस्रो अत्यायमायंस्तानीमानि वयांसि वङ्गावगधाश्चेरपादाः । न्य १ न्या अर्कमभितो विविश्र इति । ता इमाः प्रजा अर्कमभितो निविष्टा इममेवाग्निम् । बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तरित्यद उ एव बृहद्भुवनेष्वन्तरसावादित्यः पवमानो हरन्ति आ विविशेति । वायुरेव पवमानो दिशो हरन्ति आविष्टः ॥ | | | verse_line1 = तदुक्तमृषिणा- |
| | verse_line2 = प्रथमः खण्डः ॥ | | | verse_lines = तदुक्तमृषिणा-;‘प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुर्न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे ।;बृहद्ध तस्थौ भुवनेष्वन्तः पवमानो हरित आ विवेशेति ।’(ऋ.सं.८.१०१.१४)इति । |
| | commentary1 = aitareya
| | | verse_line2 = ‘प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुर्न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे । |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | {{VerseBlock |
| | verse_id = AIT_C02_S01_V02 | | | verse_id = AIT_C02_S01_V03 |
| | id = AIT_C02_S01_V02_B01 | | | document_id = AIT |
| | text = | | | chapter_id = AIT_C02 |
| | | | verse_type = mantra |
| विहायस्ययनात् प्रोक्ता वयांसीति पिशाचकाः ।
| | | verse_line1 = ‘प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुः’इति या वै ता इमाः प्रजास्तिस्रो अत्यायमायंस्तानीमानि वयांसि वङ्गावगधाश्चेरपादाः। ‘न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे’ इति । |
| वर्तितज्ञानतो वङ्गा नरास्तैरवनं सदा ॥
| | | verse_lines = ‘प्रजा ह तिस्रो अत्यायमीयुः’इति या वै ता इमाः प्रजास्तिस्रो अत्यायमायंस्तानीमानि वयांसि वङ्गावगधाश्चेरपादाः। ‘न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे’ इति । |
| अन्नरूपैर्गृध्नवो हि वङ्गावगधनामकाः ।
| | | commentary1 = aitareya |
| राक्षसा असुरा ईरपादा इति समीरिताः ॥
| |
| धर्मो ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं चतुरात्मकः ।
| |
| वायुर्देवोऽत्रासुराणामैश्वर्यं गुण एव हि ॥
| |
| ईरपादास्ततः प्रोक्तास्ते त्रयो विष्णुमत्यजन् ।
| |
| पराभूतास्ततस्ते तु तमस्यन्धे निपातिताः ॥
| |
| देवाश्च ऋषयो मर्त्यसत्तमा इति च त्रयः ।
| |
| आश्रिता विष्णुमेवैकं त्रिस्थानस्थितमच्युतम् ॥
| |
| अग्निस्थमाश्रिता मर्त्या विष्णुमर्काभिधं परम् ।
| |
| आजनैरर्चितत्वात् स ह्यर्क इत्युच्यते हरिः ॥
| |
| अग्नौ कर्माणि कृत्वैव मानुषा मुक्तिभागिनः ।
| |
| कर्मभिः शुद्धसत्त्वानां कर्मत्यागोऽपि नान्यथा ॥
| |
| आश्रिताः सूर्यगं विष्णुमृषयो बृहदित्यसौ ।
| |
| तेजसा बृंहणादुक्तो विष्णुरादित्य इत्यपि ॥
| |
| आदानात् सर्ववस्तूनां स्वाध्यायेनामुमाश्रिताः ।
| |
| मुच्यन्ते ऋषयो नित्यं नान्यथा तु कथञ्चन ॥
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| वायुस्थमाश्रिता देवाः पवमानाभिधं हरिम् ।
| |
| संसारात् पावयित्वा यन्महानन्दे मिनोत्ययम् ॥
| |
| पवमानस्ततो विष्णुर्व्याप्तः सर्वासु दिक्षु च ।
| |
| आश्रितो भगवान् सर्वैः सर्वत्रापि विशेषतः ॥
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| आश्रयात् पृथगुक्तोऽयं नित्यानन्दो रमापतिः ॥ १ ॥
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| }} | | }} |
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| {{VerseBlock
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S01_V03" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S01_V03"> |
| | verse_id = AIT_C02_S01_V03
| | <div class="gr-verse-text gr-gadya" id="AIT_C02_S01_V03_gadya_1" data-block-id="AIT_C02_S01_V03_gadya_1" data-verse="AIT_C02_S01_V03"> |
| | document_id = AIT
| | <div class="gr-verse-text-gr-gadya-line">तमोयोग्याः त्रिविधाः</div> |
| | chapter_id = AIT_C02
| | </div> |
| | verse_type = mantra
| |
| | verse_line1 = उक्थमुक्थमिति वै प्रजा वदन्ति तदिदमेवोक्थमियमेव पृथिवी तो हीदं सर्वमुत्तिष्ठति यदिदं किञ्च । तस्याग्निरर्कोन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । अन्तरिक्षमेवोक्थमन्तरिक्षं वा अनु पतन्त्यन्तरिक्षमनु धावयन्ति । तस्य वायुरर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते ।
| |
| | verse_line2 = असावेव द्यौरुक्थममुतःप्रदानाद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठति यदिदं किञ्च । तस्यासावादित्योऽर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । इत्यधिदैवतम् ।
| |
| | verse_line3 = अथाध्यात्मम् । पुरुष एवोक्थमयमेव महान् प्रजापतिरहमुक्थमस्मीति विद्यात् । तस्य मुखमेवोक्थं यथा पृथिवी तथा । तस्य वागर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । नासिके एवोक्थं यथाऽन्तरिक्षं तथा । तस्य प्राणोऽर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । तदेतद् ब्रध्नस्य विष्टपं यदेतन्नासिकायै विनतमिव । ललाटमेवोक्थं यथा द्यौस्तथा । तस्य चक्षुरर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते । समानमशीतयोऽध्यात्मं चैवाधिदैवतं चान्नमेव । अन्नेन हीमानि सर्वाणि भूतानि समनन्तीग्ं ३ । अन्नेनेमं लोकं जयत्यन्नेनामुम् । तस्मात् समानमशीतयोऽध्यात्मं चाधिदैवतं चान्नमेव । तदिदमन्नमन्नादमियमेव पृथिवीतो हीदं सर्वमुत्तिष्ठति यदिदं किञ्च । यद्ध किञ्चेदं प्रेता३ इ तदसौ सर्वमत्ति । यदु किञ्चातः प्रैती३ तदियं सर्वमत्ति । सेयमन्नमत्ति याद्याऽत्री । अत्ता ह वा आद्यो भवति । न तस्येशे यं नाद्याद्यद्वैनं नाद्युः ॥२ ॥
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| | commentary1 = aitareya
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| }}
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S01_V03 | | | verse_id = AIT_C02_S01_V03 |
| | id = AIT_C02_S01_V03_B01 | | | id = AIT_C02_S01_V03_B01 |
| | text = | | | text = विहायस्ययनात् प्रोक्ता वयांसीति पिशाचकाः । |
| | | वर्तितज्ञानतो वङ्गा नरास्तैरवनं सदा । |
| उत्थापनादुक्थनामा स एव पृथिवीस्थितः ।
| | अन्नरूपैर्गृध्नवो हि वङ्गावगधनामकाः ॥ |
| प्रथितः पृथिवीनामा सोऽन्तरिक्षाभिधोऽत्रगः ॥
| | राक्षसा असुरा ईरपादा इति समीरिताः । |
| अन्तरीक्ष्यो यतो द्युस्थो द्युनामाऽतिप्रकाशनात् ।
| | धर्मो ज्ञानं च वैराग्यमैश्वर्यं चतुरात्मकः ॥ |
| अध्यात्मे च निविष्टोऽसौ पुरुषाख्यो जनार्दनः ॥
| | वायुर्देवोऽत्रासुराणामैश्वर्य गुण एव हि । |
| पूर्षु स्थितत्वात् स महान् प्रजानां पतिरेव च ।
| | ईरपादास्ततः प्रोक्तास्ते त्रयो विष्णुमत्यजन् ॥ |
| अहमुक्थमिति ह्येतां विद्यामनुभवत्यसौ ॥
| | पराभूतास्ततस्ते तु तमस्यन्धे निपातिताः । |
| पृथक्पृथक्च तस्याङ्गान्युक्थानि जगदीशितुः ।
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| अग्निवातदिनेशानामुत्थानानि पृथक् पृथक् ॥
| |
| वदनं नासिका नेत्रमित्येतानि परात्मनः ।
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| तृचाऽशीतिविभिन्नस्य शस्त्रस्यान्नत्वहेतुतः ॥
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| विष्णोस्तृचाशीतिवत् स्यात् प्रसिद्धान्नमिति स्फुटम् ।
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| अन्नाभिमानिदेवश्च तृचाशीत्याश्च देवता ॥
| |
| सोम एव ततश्चान्नमशीतय इतरितम् ।
| |
| अदनाऽऽघ्राणदृष्ट्याख्यभोगत्रयविभागतः ॥
| |
| मुखनासाचक्षुषां तद्भोग्यमन्नं हरेः श्रुतम् ।
| |
| अरणं गमनं यस्मादर्कः शीघ्रगतित्वतः ॥
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| श्येन एव तदाकारा चान्नरर्कपदोदिता ।
| |
| सुपर्णप्रतिमा सा यत्तदारूढो जनार्दनः ॥
| |
| तस्मात् तस्यार्क इति सा प्रोच्यते वैदिकैः पदैः ।
| |
| योऽसौ चान्नगतो वीन्द्रः सोऽग्निवातरविष्वपि ॥
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| तथा वाक्प्राणचक्षुष्षु तस्मात् तेऽर्काः प्रकीर्तिताः
| |
| तेषु स्थिते सुपर्णे च रूपभेदैः पृथक् पृथक् ॥
| |
| स्थितो विष्णुस्तदर्कास्ते तस्मादेव प्रकीर्तिताः ।
| |
| व्याप्तत्वाज्जीवदेहेषु मुखे विष्णोर्मुखं स्मृतम् ॥
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| नासयोर्नासिका विष्णोरक्ष्णोरेव तदक्षिणी ।
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| जीववाक्प्राणचक्षुष्षु तद्वागाद्यास्ततः स्थिताः ॥
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| विष्णोर्वाग्भार्गवो रामो प्राणोऽस्य नरकेसरी ।
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| चक्षुस्तु कपिलो विष्णुरग्न्यादीनां च कारणम् ॥
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| जीववागादिसंस्थं च सुपर्णमधिसंस्थिताः ।
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| अविशेषोऽपि भगवान् पूर्णैश्वर्यस्वरूपतः ॥
| |
| अङ्गाङ्गित्वेनैक एव स्वानन्दानुभवे स्थितः ।
| |
| स एव व्यूह्य चात्मानं पृथग्रूप इव स्थितः ॥
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| सुपर्णनामा भगवान् सुपर्णे च व्यवस्थितः ।
| |
| अग्न्यादिषु च तन्नामा वासुदेवः स संस्थितः ॥
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| अन्ननामा स एवान्ने चेष्टयन् सर्वमास्थितः ।
| |
| अन्ने स्थितः स एवेशो ह्यन्नदातृगतिप्रदः ॥
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| तस्यान्तरिक्षगस्यैव नियमादनुपक्षिणः ।
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| पतन्ति धावयन्त्यश्वान् नरादींश्च नरादयः ॥
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| परस्य विष्णोर्धामत्वात् सूर्यो ब्रध्न इतीरितः ।
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| निहितश्चैव तल्लोको नासिकायां नतस्थले ॥
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| पृथिव्यां संस्थितो विष्णुः स्त्रीरूपेण द्युलोकतः ।
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| पतितं सर्वमेवात्ति तथा दिवि च संस्थितः ॥
| |
| इतो गतं सर्वमत्ति द्युनामा भगवान् परः ।
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| भोग्यत्वादाद्य इत्युक्तः एवमाद्यात्तृरूपवान् ॥
| |
| एक एव परो विष्णुरत्ताऽन्यैरुपजीव्यतः ।
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| आद्यो भवति चान्येषां नोपजीव्यो भवेद्यथा ॥
| |
| हरिः स सर्वजीवानां न भुज्यन्ते यथाऽमुना ।
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| सर्वे लोकास्तथा कर्तुं नैवेष्टे कश्चन क्वचित् ॥ २ ॥
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| }} | | }} |
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| | </div> |
| {{VerseBlock | | {{VerseBlock |
| | verse_id = AIT_C02_S01_V04 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V01 |
| | document_id = AIT | | | document_id = AIT |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C02 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = अथातो रेतसः सृष्टिः । प्रजापते रेतो देवाः । देवानां रेतो वर्षम् । वर्षस्य रेत ओषधयः । ओषधीनां रेतोऽन्नं अन्नस्य रेतो रेतो रेतसो रेतः प्रजाः प्रजानां रेतो हृदयं हृदयस्य रेतो मनो मनसो रेतो वाक् वाचो रेतः कर्म । तदिदं कर्म कृतम् । अयं पुरुषो ब्रह्मणो लोकः । स इरामयो यद्धीरामयस्तस्मात् हिरण्मयः । हिरण्मयो ह वा अमुष्मिं ल्लोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद ॥ | | | verse_line1 = एष इमं लोकमभ्यार्चत् पुरुषरूपेण, य एष तपति प्राणो वाव तदभ्यार्चत् प्राणो ह्येष य एष तपति । |
| | verse_line2 = ३ ॥ | | | verse_lines = एष इमं लोकमभ्यार्चत् पुरुषरूपेण, य एष तपति प्राणो वाव तदभ्यार्चत् प्राणो ह्येष य एष तपति । |
| | commentary1 = aitareya | | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S02_V01" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S02_V01"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S01_V04 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V01 |
| | id = AIT_C02_S01_V04_B01 | | | id = AIT_C02_S02_V01_B01 |
| | text = | | | text = एष नारायणो देवो वायुना सहेैवेमं लोकमभ्यार्चत् । ब्रह्मादिशरीरेषु प्रविवेश । पुरुष इत्यन्तर्यामिरूपस्याख्या । ‘पुरि शेते’ इति । प्रसिद्धत्वाच्च पञ्चरात्रेषु । |
| | |
| स एष भगवान् विष्णुः प्रजापतिरितीरितः ।
| |
| तस्माज्जाताः सर्वदेवा ब्रह्माद्यास्तेभ्य एव च ॥
| |
| वृष्टिः सञ्जायते तस्याः सर्वा ओषधयोऽभवन् ।
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| ओषधीभ्योऽन्नमन्नाच्च रेतो रेतस एव च ॥
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| सर्वाः प्रजाः प्रजायन्ते सङ्कल्पो हृदयाभिधः ।
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| प्रजाभ्यो जायते तस्माद् विकल्पाख्यं मनस्तथा ॥
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| विकल्पाद्वाक्प्रचारश्च वाचा नामादिवेदनात् ।
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| कर्म सञ्जायते तस्मात् कर्मणश्च जगत्पुनः ॥
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| कर्माभिमान्ययं जीवः परस्य ब्रह्मणो हरेः ।
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| आवासस्थानमुद्दिष्टो विशेषात् स इरामयः ॥
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| इच्छानुरूपं तु सुखमिरेत्येव प्रकीर्तितम् ।
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| इच्छानन्दप्रभूतत्वात् स एव च हिरण्मयः ॥
| |
| हिरुक्सुखं हिरण्यं स्याद् बाह्यानन्दात् पृथग्यतः ।
| |
| आधिक्यार्थे मयड् यस्मादधिकानन्दरूपकः ॥
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| उत्सृज्य कर्मजं रूपं निजानन्दैकरूपकः ।
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| एवं नारायणं जानन् सर्वलोकैककारणम् ॥
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| तल्लोके दृश्यते भूतैर्मुक्तैरानन्दरूपकः ॥ ३ ॥
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V05 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V01 |
| | document_id = AIT | | | id = AIT_C02_S02_V01_B02 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = य एष सूर्यमण्डले स्थित्वा तपति भगवान् स नारायणः । ‘य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद’(बृ.भा.५.७.९) इत्यादिश्रुतिभ्यः । ‘य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते’(छां.उ.१.६.६) इत्युक्त्वा ‘तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी’(छां.उ.१.७.६) इत्युक्तत्वान्न शिवादयः । शिवो हि विरूपाक्षः । प्रसिद्धश्च पुण्डरीकाक्ष इति भगवान्नारायणः । |
| | verse_type = mantra
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| | verse_line1 = तं प्रपदाभ्यां प्रापद्यत ब्रह्मेमं पुरुषम् । यत्प्रपदाभ्यां प्रापद्यत ब्रह्मेमं पुरुषं तस्मात् प्रपदे तस्मात् प्रपदे इत्याचक्षते । शफाः खुरा इत्यन्येषां पशूनाम् । तदूर्ध्वमुदसर्पत् । ता ऊरू अभवताम् । उरु गृणीहीत्यब्रवीत् । तदुदरमभवत् । उर्वेव मे कुर्वित्यब्रवीत् । तदुरोऽभवत् । उदरं ब्रह्मेति शार्कराक्ष्या उपासते हृदयं ब्रह्मेत्यारुणयो ब्रह्मा हैव ता ३ ई । ऊर्ध्वं त्वेवोदसर्पत् । तच्छिरोऽश्रयत यच्छिरोऽश्रयत तच्छिरोऽभवत् । तच्छिरसः शिरस्त्वम् । ता एताः शीर्षच्छ्रियः श्रिता श्चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक्प्राणः । श्रयन्तेऽस्मिञ्च्छ्रियो य एवमेतच्छिरसः शिरस्त्वं वेद ।
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| | commentary1 = aitareya
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V05 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V01 |
| | id = AIT_C02_S01_V05_B01 | | | id = AIT_C02_S02_V01_B03 |
| | text = | | | text = ‘यमादित्यो न वेद’ इत्युक्तत्वान्नादित्यः। ‘ओं भेदव्यपदेशाच्चान्यः’(ब्र.सू.१.१.२१) इति भगवद्वचनम् । |
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| तमिमं प्रथमज्ञानिपुरुषं चतुराननम् ।
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| वासुदेवाभिधं ब्रह्म प्राप प्रपदयोः पुरा ॥
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| यस्मात् प्रपेदे भगवान् प्रपदाच्चतुराननम् ।
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| तस्मात् प्रपदनादेव प्रपदं नाम कीर्तितम् ॥
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| चतुर्मुखाकारवतां नृणां पादतलोपरि ।
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| प्रपदाख्या वर्ततेऽतो न तु पश्वादिनां क्वचित्॥
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| अयादूर्ध्वं ततो विष्णुः प्रपदादूरुमत्र च ।
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| स्थित ऊरू च तावास्तामूरूर्ध्वगमनाद्धरेः ॥
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| ककिञ्चिदूर्ध्वं ततो गत्वा वायुना सह केशवः ।
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| वायुमाहोरुगरणं कुर्वत्र स्थित इत्यपि ॥
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| उर्वेव गरणं चक्रे वायुर्यत्र स्थितः सदा ।
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| तत्स्थानमुदरं नाम पुनराह जनार्दनः ॥
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| उरु स्थानं निवासं मे कुरु विस्तारसंयुतम् ।
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| तथाऽकरोत् स वायुश्च तदुरोऽभूदुरुत्वतः ॥
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| उरोमध्ये च हृदयं तत्रावासो हरेः सदा ।
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| सूक्ष्मदृष्टियुता ये तु मुनयः शार्कराक्ष्यकाः ॥
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| उदरे ते परं ब्रह्म वासुदेवमुपासते ।
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| हृत्स्थमेव परं विष्णुं ध्यायन्त्यारुणयः सदा ॥
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| उदरस्थं च हृद्गं च ते उभे ब्रह्म तत्परम् ।
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| एकमेव यतस्तस्मादुभये ह्यपि तद्विदः ॥
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| तत ऊर्ध्वं गतो विष्णुर्वायुना सह दैवतैः ।
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| स्थितो मूर्धनि देवेशः श्रितोऽसाविति तच्छिरः ॥
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| तत्र प्राणात्मना वायुर्मनोरूपेण शङ्करः ।
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| शेषः सुपर्ण इन्द्रश्च मनांस्येव पृथक् पृथक् ॥
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| अहम्भावमनो रुद्रः शेषोऽसौ पाञ्चरात्रकम् ।
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| वैदिकं गरुडश्चेन्द्रो यज्ञादिविषयं मनः ॥
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| श्रोत्रं चन्द्रो रविश्चक्षुर्वागग्निः परिकीर्तितः ।
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| एते देवास्तदन्ये च सर्वप्राणिषु संस्थितः ॥
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| उपासते महाविष्णुं परमात्मानमच्युतम् ।
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V06 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V01 |
| | document_id = AIT | | | id = AIT_C02_S02_V01_B04 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = ‘वृत्रं यदिन्द्र शवसाऽवधीरहिमादित् सूर्यं दिव्यारोहयो दृशे । |
| | verse_type = mantra
| | यत्सूर्यस्य हरितः पतन्तीः पुरस्सतीरुपरा एतसे कः ॥ |
| | verse_line1 = ता अहिंसन्ताहमुक्थमस्म्यहमुक्थमस्मीति । ता अब्रुवन् । हन्तास्माच्छरीरादुत्क्रामाम तद्यस्मिन् न उत्क्रान्त इदं शरीरं पत्स्यति तदुक्थं भविष्यतीति ॥
| | सीदन्निन्द्रस्य जठरे कनिक्रदन्नृभिर्यतस्सूर्यमारोहयो दिवि’।(ऋ.सं.१०.९०.१३) |
| | verse_line2 = वागुदक्रामदवदन्नन् अश्नन् पिबन्नास्तैव । चक्षुरुदक्रामदपश्यन्नश्नन् पिबन्नास्तैव । श्रोत्रमुदक्रामत् अशृण्वन् अश्नन् पिबन्नास्तैव । मन उदक्रामन्मीलित इवाश्नन् पिबन्नास्तैव । प्राण उदक्रामत् प्राण उत्क्रान्तेऽपद्यत तदशीर्यताशारीतीं३ । तच्छरीरमभवत् । तच्छरीरस्य शरीरत्वम् । शीर्यते ह वा अस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यः पराऽस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ।
| | ‘चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोस्सूर्यो अजायत ।’ (ऋ.सं.८.४.२९) |
| | commentary1 = aitareya
| | ‘यस्सूर्यं य उषसं जजान यो अपां नेता स जनास इन्द्रः । |
| | उद्वेति प्रसविता जनानां महान् केतुरर्णवः सूर्यस्य’।(ऋ.सं.२.१२.७) |
| | ‘येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्यस्तपति तेजसा भ्राजसा च । |
| | यमन्तः समुद्रे कवयो वयन्ति यदक्षरे परमे प्रजाः’।(म.ना.उ.१.३) |
| | ‘तमेताः पञ्चदेवताः परिम्रियन्ते विद्युद्वृष्टिश्चन्द्रमा आदित्योऽग्निः’ इत्यादौ सूर्यस्य सर्वत्र पराधीनत्वावगतेश्च । |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V06 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V01 |
| | id = AIT_C02_S01_V06_B01 | | | id = AIT_C02_S02_V01_B05 |
| | text = | | | text = ‘ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्तीनारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः । |
| | | केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः ॥’(तं.सासं. उ.प्र.व.अ.६२.श्लो.१७) इति नारसिंहपुराणे । |
| -वाचा हिंसामकुर्वंस्ते विनिन्दन्तः परस्परम् ॥
| | ‘तापनी पाचिका चैव शोषणी च प्रकाशनी । |
| ते विष्णोराज्ञयाऽवोचन्नुत्क्रमाम पृथक् पृथक् ।
| | नैव राजन् रवेः शक्तिः शक्तिर्नारायणस्य सा ॥ इति पाद्मे । |
| देहादब्जभवस्यास्माद्यस्मिन्नुत्क्रान्त एव हि ॥
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| शरीरं पद्यते श्रेयान् स न इत्यवधार्यताम् ।
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| ततः क्रमेण चाग्न्याद्या निष्क्रान्तास्तेषु सर्वशः ॥
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| निष्क्रान्तेषु न वै पातः शरीरस्याभवत् क्वचित् ।
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| वायावुत्क्रान्त एवैतच्छरीरमपतत् क्षितौ ॥
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| उदासीनवदास्तां तौ केशवश्चाब्जसम्भवः।
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| तेषां बलपरीक्षार्थं वाय्वादीनां च सर्वशः ॥
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| | document_id = AIT | | | id = AIT_C02_S02_V01_B06 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = ‘यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् । |
| | verse_type = mantra
| | यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥’(भ.गी.१५.१२) इति च । |
| | verse_line1 = ता अहिंसन्तैवाहमुक्थमस्महमुक्थमस्मीति । ता अब्रुवन् हन्तेदं पुनः शरीरं प्रविशाम तद्यस्मिन्नः प्रपन्न इदं शरीरमुत्थास्यति तदुक्थं भविष्यतीति । वाक्प्राविशदशयदेव । चक्षुः प्राविशदशयदेव । श्रोत्रं प्राविशदशयदेव । मनः प्राविशदशयदेव ॥
| |
| | verse_line2 = प्राणः प्राविशत् । तत्प्राणे प्रपन्न उदतिष्ठत् । तदुक्थमभवत् । तदेतदुक्थं प्राण एव । प्राण उक्थमित्येव विद्यात् । तं देवा अब्रुवन् त्वमुक्थमसि त्वमिदं सर्वमसि तव वयं स्मस्त्वमस्माकमसीति । तदप्येतदृषिणोक्तं त्वमस्माकं तव स्मसीति ॥
| |
| | verse_line3 = ४ ॥
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| | commentary1 = aitareya
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| | text = | | | text = न च विष्णोरन्याधीनत्वं श्रुतिषूक्तं कुत्रचित् । उत्पत्तिस्तु प्रादुर्भावापेक्षया । ‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’(महोपनिषत्.१) इति महाप्रलये तस्यैवावस्थानश्रुतेः । ‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्’(ऋ.सं.१०.१२५.५) इत्यादि ब्रह्मशिवादीनां देव्यधीनपद-प्राप्तिमुक्त्वा तस्या अपि भगवदधीनत्वं ‘मम योनिरप्स्वं१तः समुद्रे । ततो वितिष्ठे भुवना नु विश्वा। परो दिवा पर एना पृथिव्या’(ऋ.सं.१०.१२५.७) इत्याह । ‘अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ । अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्’(ऋ.सं.१०.१२५.६-७) इति ब्रह्मरुद्रयोर्देव्याः सकाशात् सृष्टिसंहारौ चोक्तौ । |
| | | ‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः । |
| पुनस्ते प्राविशन् सर्वे वह्निसूर्यौ शशी शिवः ।
| | विदेहि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत् ॥’(ऋ.सं.७.४०.५) |
| नोत्थानमभवत् तेषु प्रविष्टेष्वपि सर्वशः ॥
| | इत्यादिना विष्णोः प्रसादादेव शिवादीनां पदप्राप्तिकथनाच्च । |
| वायौ प्रविष्टे तूत्थानं कायस्यासीत् तदैव च ॥
| |
| उच्चैः स्थितत्वादुक्थोऽभूद् वायुरेव ततः प्रभुः ॥
| |
| उच्चत्वं च गुणाधिक्यं त्वमुच्चोऽसीति तेऽब्रुवन् ।
| |
| भृत्या वयं तवैव स्मः त्वमस्माकं पतिः सदा ॥
| |
| स्पर्धामहे त्वद्बलेन त्वया नान्येन केनचित्।
| |
| इत्यूचुर्वीन्द्रशेषेशशक्रचन्द्रादिकाः पृथक् ।
| |
| वायुः स संस्तुतस्तैश्च प्रसन्नोभूद् दिवौकसाम् ॥ ४ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = तं देवाः प्राणयन्त । स प्रणीतः प्रातायत । प्रातायीती३ तत्प्रातरभवत् । समागादिती३ तत्सायमभवत् । अहरेव प्राणो रात्रिरपानः ।
| |
| | commentary1 = aitareya
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V08 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V01 |
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| | text = | | | text = तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते। तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्त’(बृ.२.२.२) इत्यादिना शिवादिसर्वदेवोपास्यस्य वायोः ‘अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः’(बृ.२.२.१) इति मध्यमप्राण-शब्दोक्तस्य ‘प्राणः स्थूणा’(बृ.२.२.१) इति प्राणशब्दोदितो नारायण आश्रय उक्तः । तस्मात् सर्वोत्तमो भगवान् नारायणः प्राणशब्दोदित आदित्य-मण्डलस्थस्तपतीत्यादि सिद्धम् । |
| | |
| तस्माच्छ्रुत्वा परं ब्रह्म देवा नारायणाभिधम् ।
| |
| शिष्यप्रशिष्यादिषु च तेऽनयन् वायुनोदितम् ॥
| |
| वायुमप्यनयन् सर्वे यशसा तद्गुणोक्तितः ।
| |
| ये ये गुणान् विजानन्तिवायोस्तानाविशन् मरुत् ॥
| |
| तत्र तत्र प्रविष्टत्वात् प्रततोऽसौ बभूव ह ।
| |
| प्रततत्वात् प्रातरिति तस्य नामाऽभवद्विभोः ॥
| |
| सङ्गतश्चाभवज्जीवचिति रूपान्तरेण सः ।
| |
| सङ्गतत्वात् सायमिति तद्रूपं नामतोऽभवत् ॥
| |
| वायोस्तत्पुनरध्यात्मं प्राणापानाभिधं द्वयम् ।
| |
| }} | | }} |
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| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = वागग्निश्चक्षुरसावादित्यश्चन्द्रमा मनो दिशः श्रोत्रं स एष प्रहितं संयोगोऽध्यात्ममिमा देवता अद उ आविरधिदैवतमित्येतत् तदुक्तं भवति । | | | verse_line1 = तं शतं वर्षाण्यभ्यार्चत् तस्माच्छतं वर्षाणि पुरुषायुषो भवन्ति । तं यच्छतं वर्षाण्यर्भ्याचत्, तस्माच्छतर्चिनस्तस्माच्छतर्चिन इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = तं शतं वर्षाण्यभ्यार्चत् तस्माच्छतं वर्षाणि पुरुषायुषो भवन्ति । तं यच्छतं वर्षाण्यर्भ्याचत्, तस्माच्छतर्चिनस्तस्माच्छतर्चिन इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । |
| | | commentary1 = aitareya |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V09 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V02 |
| | id = AIT_C02_S01_V09_B01 | | | id = AIT_C02_S02_V02_B01 |
| | text = | | | text = ‘क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः । |
| | | आजानजाः कर्मदेवास्तात्त्विका दक्ष एव च ॥ |
| अध्यात्ममग्निर्वागाख्यश्चक्षुः सूर्यः प्रकीर्तितः ॥
| | शक्रश्चोमा च रुद्रश्च भारती वायुरेव च । |
| यज्ञादिसाधने यत्तु मनश्चन्द्रः प्रकीर्तितः ।
| | मुक्ता उक्ताः शतगुणा बलज्ञानसुखादिभिः ॥ |
| मनो यमश्च वरुणः कुबेरश्च दिगीश्वराः ॥
| | विष्णुभक्त्यादिभिश्चैव गुणैः सर्वैः क्रमाधिकाः । |
| श्रोत्राभिमानिनः सर्वे वैदिकश्रवणोचितम् ।
| | तस्माद्रमा ततो विष्णुरनन्तगुणतोऽधिकः ॥ |
| श्रोत्रं चन्द्रस्तथा स्मार्ततान्त्रिकश्रवणोचितम् ॥
| | नित्यमुक्तः स्वतन्त्रश्च न चान्यस्तादृशः क्वचित् । |
| यम एव षडङ्गानां विषयश्रवणोचितम् ।
| | कुत एवाधिकोऽन्यः स्याद् यन्मुक्ता अपि तद्वशाः ॥ |
| श्रोत्रं तु वरुणः काम्यशास्त्रार्थं मन एव च ॥
| | रमाऽपि तद्वशा नित्यं स नान्यस्य वशे प्रभुः । |
| श्रोत्रं यन्नीतिशास्त्रार्थं कुबेरश्च प्रकीर्तितः ।
| | न भेदः शेषशिवयोः सुपर्णः शेषसंमितः ॥ |
| विष्णुना प्रहितानां हि संयोगोऽध्यात्ममेष हि ॥
| | कामः शक्रसमो नित्यं प्रतिबिम्बाश्च ते क्रमात् ॥’ |
| शिवादीनां च सर्वेषां मनस्त्वं कथितं पुरा ।
| | इति च महासंहितायाम् ॥ |
| एतास्सर्वा देवता हि ब्रह्मवायुसुपर्णकाः ॥
| |
| शेषशङ्करशक्राश्च चन्द्रसूर्ययमा अपि ।
| |
| अग्निश्च मित्रावरुणौ कुबेराद्याश्च सर्वशः ॥
| |
| अधिदैवं स एवैक आधिक्यात् पुरुषोत्तमः ।
| |
| देवमात्रास्तदन्ये तु स आविः पुरुषोत्तमः ॥
| |
| पूर्णज्ञानस्वरूपत्वादेतावत् कथितं भवेत् ।
| |
| तात्पर्यात् सर्ववेदैश्च ...
| |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V10 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V0३ |
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| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C02 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = एतद्धस्म वै तद्विद्वानाह हिरण्यदन् वैदो न तस्येशेऽयं मह्यं न दद्युरिति ॥ | | | verse_line1 = स इदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च, तस्मात् मध्यमास्तस्मात् मध्यमा इत्याचक्षते। एतमेव सन्तम् । |
| | verse_line2 = प्रहितां वा अहमध्यात्मं संयोगं निविष्टं वेदैतद्ध । तदनीशानानि ह वा अस्मै भूतानि बलिं हरन्ति य एवं वेद ॥ | | | verse_lines = स इदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च, तस्मात् मध्यमास्तस्मात् मध्यमा इत्याचक्षते। एतमेव सन्तम् ।;प्राणो वै गृत्सोऽपानो मदः । स यत्प्राणो गृत्सोऽपानो मदस्तस्मात् गृत्समदः। तस्माद् गृत्समद इत्याचक्षते । एतमेव सन्तम् ।;तस्येदं विश्वं मित्रमासीद् । यदिदं किञ्च तद्यदस्येदं विश्वं मित्रमासीद् । यदिदं किञ्च तस्मात् विश्वामित्रस्तस्माद्विश्वामित्र इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।;तं देवा अब्रुवन् - अयं वै नः सर्वेषां वाम इति तं यद्देवा अब्रुवन्नयं वै नः सर्वेषां वाम इति तस्माद्वामदेवस्तस्माद् वामदेव इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।;स इदं सर्वं पाप्मनोऽत्रायत यदिदं किञ्च स यदिदं सर्वं पाप्मनोऽत्रायत यदिदं किञ्च तस्माद् अत्रयस्तस्मादत्रय इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ॥ १ ॥ |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_line2 = प्राणो वै गृत्सोऽपानो मदः । स यत्प्राणो गृत्सोऽपानो मदस्तस्मात् गृत्समदः। तस्माद् गृत्समद इत्याचक्षते । एतमेव सन्तम् । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S02_V03" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S02_V03"> |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V10 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V0३ |
| | id = AIT_C02_S01_V10_B01 | | | id = AIT_C02_S02_V03_B01 |
| | text = | | | text = स पुरुषेषु शतवर्षं गत इति शतर्चिनामा । बहुरूपत्वाद् बहुवचनम् । एतमेव तथासन्तं मुख्यत आचक्षते, ऋषींस्तूपचारतः । आत्मन उदरे धृतवान् मध्ये स्थित्वा धृतवांश्च । |
| | }} |
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|
| -... तज्जानन्नवदन् मुनिः ॥
| | {{Bhashyam |
| हिरण्यदन्नाम वैदो भूतेषु हि सुरानृते ।
| | | verse_id = AIT_C02_S02_V0३ |
| मदभीष्टं ममादातुं नैवेष्टे कश्चनाञ्जसा ॥
| | | id = AIT_C02_S02_V03_B02 |
| विष्णुना प्रहितानां हि देवानामहमुत्तमम् ।
| | | text = प्राणस्थः प्राणनामासावपानेऽपाननामकः । |
| वेद संयोगमाध्यात्मं ततो मुक्तो यथेष्टभुक् ॥
| | नेतृत्वाच्चापनेतृत्वाद् भगवान् पुरुषोत्तमः ॥इति च । |
| स्यान्नैवात्रास्ति सन्देहः स्वेच्छाविहृतिरेव च ।
| | वामो भद्रः ॥ १ ॥ |
| मन्निषेधे न शक्तोऽस्ति प्रीता देवा हि मे सदा ॥
| |
| अधिदैवेन सहिता विष्णुना प्रभविष्णुना ।
| |
| एतद्धि तेन कथितं मुनिना तत्त्ववेदिना ॥
| |
| विष्णुप्रहितदेवानां योगमध्यात्ममञ्जसा ।
| |
| वेद तं च नियोक्तारमुपास्ते विष्णुमव्ययम् ॥
| |
| एतादृशोपासनाया योग्यः सन् सततं सुधीः ।
| |
| स्वस्वाम्यन्यानि भूतानि हरेयुर्बलिमस्य हि ॥
| |
| मुक्तस्य वैष्णवे लोके मुक्तानि च न संशयः ।
| |
| इत्येतद्ध्यानयोगाश्च मुनयो देवतास्तथा ॥
| |
| मानुषा ज्ञानमात्रेण स्वावरैः पूज्यतामियुः ।
| |
| मुक्तामुक्तैर्मुक्तियोग्या इति शास्त्रस्य निर्णयः ॥
| |
| }} | | }} |
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| | </div> |
| | <div class="gr-author-note">॥ इति प्रथमः खण्डः॥</div> |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V11 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V04 |
| | document_id = AIT | | | document_id = AIT |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C02 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = तत्सत्यं सदिति प्राणस्तीत्यन्नं यमित्यसावादित्यस्तदेतत् त्रिवृत् । त्रिवृदिव वै चक्षुः शुक्लं कृष्णं कनीनिकेति । स यदि ह वा अपि मृषा वदति सत्यं हैवास्योदितं भवति य एवमेतत् सत्यस्य सत्यत्वं वेद ॥ | | | verse_line1 = एष उ एव बिभ्रद्वाजः । प्रजा वै वाजस्ता एष बिभर्ति यद् बिभर्ति तस्मात् भारद्वाजस्तस्मात् भारद्वाज इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । |
| | verse_line2 = ५ ॥ | | | verse_lines = एष उ एव बिभ्रद्वाजः । प्रजा वै वाजस्ता एष बिभर्ति यद् बिभर्ति तस्मात् भारद्वाजस्तस्मात् भारद्वाज इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।;तं देवा अब्रुवन् ‘अयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ’ इति तं यद्देवा अब्रुवन्नयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ इति तस्माद्वसिष्ठः। तस्माद्वसिष्ठ इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।;स इदं सर्वम् अभिप्रागाद् यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वमभिप्रागाद्यदिदं किञ्च, तस्मात् प्रगाथाः । तस्मात् प्रगाथा इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।;स इदं सर्वमभ्यपवयत यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वमभ्यपवयत यदिदं किञ्च, तस्मात् पावमान्यः। तस्मात् पावमान्य इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_line2 = तं देवा अब्रुवन् ‘अयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ’ इति तं यद्देवा अब्रुवन्नयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ इति तस्माद्वसिष्ठः। तस्माद्वसिष्ठ इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S02_V04" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S02_V04"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S01_V11 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V04 |
| | id = AIT_C02_S01_V11_B01 | | | id = AIT_C02_S02_V04_B01 |
| | text = | | | text = वसिष्ठः वसतामुत्तमः । अभ्यपवयत पावयामास संसारात् । |
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| स एष भगवान् विष्णुः सत्यमित्यभिधीयते ।
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| सर्वोत्तमत्वात् पूर्णत्वात् सर्वज्ञत्वात् तथैव च ॥
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| देवतात्रयमन्यच्च पृथक् सत्यमितीर्यते ।
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| शेषवीन्द्रशिवादिभ्य उत्तमत्वात् सदैव हि ॥
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| वायुः सदिति सम्प्रोक्तो जीवेषु तु सुपूर्णतः ।
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| तीति ब्रह्मा समुद्धिष्टः स एवान्नाभिमानवान् ॥
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| अन्नं प्रजापतिरिति श्रुतिरन्या ह्यभाषत ।
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| अतिनादात् सदा वेदैरप्यन्नं स चतुर्मुखः ॥
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| यमयेत्यदिति य उद्दिष्टो यमयेद् यत्प्रकाशनात् ।
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| देवतात्त्रयमेतत्तु सहितं सत्यमुच्यते ॥
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| शुक्लकृष्णकनीनासु चक्षुषोऽप्येत आस्थिताः ।
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| एवं सत्यपदार्थं हि विज्ञायोपास्त आदरात् ॥
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| योग्यस्तस्या उपासाया नैवासत्येन दुष्यति ।
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| देवता मुनयश्चैव योग्या अस्या अपि स्फुटम् ॥
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| मनुष्याणां ज्ञानमात्राद्दोषो नातितरां भवेत् ॥ ५ ॥
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| }} | | }} |
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| | </div> |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V12 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V05 |
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| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C02 |
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| | verse_line1 = तस्य वाक् तन्तिर्नामानि दामानि । तदस्येदं वाचा तन्त्या नामभिर्दामभिः सर्वं सितम् । सर्वं हीदं नामानी ३ । सर्वं वाचाऽभिवदति । वहन्ति ह वा एनं तन्तिसम्बद्धा य एवं वेद । | | | verse_line1 = सोऽब्रवीत् ‘अहमिदं सर्वमसानि, यच्च क्षुद्रं यच्च महद्’ इति । ते क्षुद्रसूक्ताश्चाभवन् महासूक्ताश्च । तस्मात् क्षुद्रसूक्ताः। तस्मात् क्षुद्रसूक्ता इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = सोऽब्रवीत् ‘अहमिदं सर्वमसानि, यच्च क्षुद्रं यच्च महद्’ इति । ते क्षुद्रसूक्ताश्चाभवन् महासूक्ताश्च । तस्मात् क्षुद्रसूक्ताः। तस्मात् क्षुद्रसूक्ता इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।;सूक्तं बतावोचतेति, तत्सूक्तमभवत् । तस्मात् सूक्तम्। तस्मात् सूक्तमित्याचक्षत एतमेव सन्तम् । |
| | | verse_line2 = सूक्तं बतावोचतेति, तत्सूक्तमभवत् । तस्मात् सूक्तम्। तस्मात् सूक्तमित्याचक्षत एतमेव सन्तम् । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| |
|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S02_V05" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S02_V05"> |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V12 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V05 |
| | id = AIT_C02_S01_V12_B01 | | | id = AIT_C02_S02_V05_B01 |
| | text = | | | text = तद्विष्ण्वाख्यं ब्रह्म सूक्तान्यवोचतेति सूक्तनामकम् अभवत् । बत इत्यास्वादने । स्वात्मनैव स्वयं सुष्ठूक्तमिति वा । इदं सर्वं परिपूर्णं सन् अहम् अल्पप्राणिषु प्रविश्य सूक्ष्मरूपः, महाप्राणिषु महारूपश्चासानीति(भवानीति) स भगवानब्रवीत् । तस्मात् क्षुद्रोऽसानीत्युक्तत्वात् क्षुद्रसूक्तास्ते क्षुद्रप्राणिषु स्थिता भगवद्रूपसङ्घाः । महानसानीत्युक्तत्वात् महासूक्ता महाप्राणिषु स्थिताः । सूक्ष्मरूपत्वादेव क्षुद्रनाम भगवतः । न तु सामर्थ्याऽल्पत्वात् । न हि सामर्थ्यादिगुणेषु कश्चिद्विशेषो भगवद्रूपेषु । |
| | |
| तस्य नारायणस्यैव सर्ववेदात्मिका हि वाक् ।
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| तन्तिरूपा जगद्बन्धे नाम ब्रह्मादिकं च यत् ॥
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| विप्रक्षत्रियवैश्यादिरूपं चाखिलमेव तु ।
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| दाम तेनैव बध्नाति सकलं जगदच्युतः ॥
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| सर्वे हि नामवन्तोऽत्र सर्वे वेदोदिता अपि ।
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| वेदात्मिक्या यतो वाचा विष्णुर्वदति सोऽखिलम् ॥
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| य एतद्विष्णुवाचैव बद्धं नामाख्यदामभिः ।
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| ज्ञात्वा जगदुपास्ते तु योग्यः संस्तदुपासने ॥
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| तं प्रत्येवाखिलान्येव भूतानि सह दैवतैः ।
| |
| बलिं हरन्ति पञ्चाथ भूतान्येनं वहन्ति च ॥
| |
| योग्यश्चास्या उपासाया योग्यो ब्रह्मपदस्य यः ।
| |
| भूतयुक्ते रथे तस्मात् स तिष्ठति सुरार्चितः ॥
| |
| मुक्तः संश्च तदन्येषां ज्ञानमात्राद्विमुक्तिगैः ।
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| स्वावरैः सेव्यतैव स्यात् कैश्चिदेव क्वचित्क्वचित्॥
| |
| तथैव वायुना बद्धं जगदेतत् ततोऽवरम् ।
| |
| सुपर्णशेषगिरिशशक्रसूर्याद्यमञ्जसा ॥
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| }} | | }} |
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| | </div> |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V13 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V06 |
| | document_id = AIT | | | document_id = AIT |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C02 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = तस्योष्णिग्लोमानि त्वग्गायत्री त्रिष्टुप् मांसमनुष्टुप् स्नावान्यस्थि जगती पङ्क्तिर्मज्जा प्राणो बृहती । स च्छन्दोभिश्छन्नो यच्छन्दोभिश्छन्नस्तस्माच्छन्दांसीत्याचक्षते । छादयन्ति ह वा एनं छन्दांसि पापात् कर्मणो यस्यां कस्याञ्चिद्दिशि कामयते य एवमेतच्छन्दसां छन्दस्त्वं वेद । | | | verse_line1 = एष वा ऋग् । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत । स यद् एभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत, तस्माद् ऋक् । तस्माद् ऋगित्याचक्षत एतमेव सन्तम् । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = एष वा ऋग् । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत । स यद् एभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत, तस्माद् ऋक् । तस्माद् ऋगित्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।;एष वा अर्धर्चः । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्योऽर्द्धेभ्योऽर्चत । स यद् एभ्यः सर्वेभ्योऽर्धेभ्योऽर्चत, तस्माद् अर्धर्चः । तस्मादर्धर्च इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।;एष वै पदम्। एष हीमानि सर्वाणि भूतानि पादि। स यद् इमानि सर्वाणि भूतानि पादि, तस्मात् पदम्। तस्मात् पदमित्यचक्षत एतमेव सन्तम् ।;एष वा अक्षरम्। एष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः क्षरति । न चैनमतिक्षरन्ति । स यद् एभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः क्षरति, न चैनम् अतिक्षरन्ति, तस्मात् अक्षरम्। तस्मादक्षरमित्याचक्षत एतमेव सन्तम् ।;ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव । प्राण ऋच इत्येव विद्यात् ॥ २ ॥ |
| | | verse_line2 = एष वा अर्धर्चः । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्योऽर्द्धेभ्योऽर्चत । स यद् एभ्यः सर्वेभ्योऽर्धेभ्योऽर्चत, तस्माद् अर्धर्चः । तस्मादर्धर्च इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
|
| |
|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S02_V06" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S02_V06"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S01_V13 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V06 |
| | id = AIT_C02_S01_V13_B01 | | | id = AIT_C02_S02_V06_B01 |
| | text = | | | text = एभ्यः प्राणिभ्यो गतवानित्यृक् । गच्छति हि मरणकाले । |
| | | ‘ब्रह्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते बुधैः’ इति हि भारते । |
| विष्णोर्वायोश्च लोमादौ छन्दांस्येवाश्रितानि च ।
| | ‘म्रियमाणमिमं जीवं वासुदेवादिदेवताः । |
| विष्णोर्विमुक्तवायोश्च लोमाद्यं तु चिदात्मकम् ॥
| | त्यक्त्वा भागेन गच्छन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ॥ |
| लोमप्राणादिभेदश्च नैव कश्चिच्चिदात्मनि ।
| | गतैर्भागैरपि पुनर्विशेयुर्भोगसिद्धये । |
| छन्नश्छन्दोभिरेवं स केशवस्तेन चाभिधा ॥
| | भोग्यलोकमनुप्राप्तं तस्मात् स्वप्नवदन्तरा ॥’इति च ॥ |
| छन्दांसीत्येव तेषां हि य एवंविदुपासकः ।
| |
| निवारयन्ति पापेभ्यश्छन्दांसि किमु केशवः ॥
| |
| योग्या अस्याश्च विद्यायाः भृग्वाद्या देवतास्तथा ।
| |
| छन्दस्सु संस्थितो विष्णुर्गोपायत्येव तद्विदम् ॥
| |
| }} | | }} |
|
| |
|
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V14 | | | verse_id = AIT_C02_S02_V06 |
| | document_id = AIT | | | id = AIT_C02_S02_V06_B02 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = ‘अर्च= गतिपूजनयोः’, ‘ऋ=गतौ’ इति धातोः । सर्वेभ्योऽर्धेभ्यः स्थानेभ्यः शरीरेभ्यो गतवानित्यर्धर्चः । सर्वाणि भूतान्यपादि । ‘पद=गतौ’ तस्मात् पदं नाम । अधिकं क्षरतीत्यक्षरम् । क्षरणं नाम सन्ततदानम् । ‘क्षर= विनाशसन्ततदानयोः’ इति धातोः । |
| | verse_type = mantra
| | (समुद्र-मेघ-वृक्षपतन-भेरीताडनादिसर्वघोषा अपि तस्यैव नामानि) |
| | verse_line1 = तदुक्तमृषिणा अपश्यं गोपामित्येष वै गोपा एष हीदं सर्वं गोपायति । अनिपद्यमानमिति न ह्येष कदाचन संविशति । आ च परा च पथिभिश्चरन्तमित्या च ह्येष परा च पथिभिश्चरति । स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान इति सध्रीचीश्च ह्येष विषूचीश्च वस्त इमा एव दिशः । आवरीवर्ति भुवनेष्वन्तरित्येष ह्यन्तर्भुवनेष्वावरीवर्ति ॥
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">एवमृषिषु शब्देषु च व्यवह्रियमाणानि सर्वाणि नामानि विष्णोरेव मुख्यतः । किमु देवतानामानि !</span> |
| | commentary1 = aitareya
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या’(ऋ.सं.१०.८८.१००) । |
| | ‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहु रथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्’ ।(ऋ.सं.१.१६४.४६) |
| | ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।’(तै.ब्रा.३.७.९.३) |
| | ‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’ ॥(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१) |
| | इत्यादिश्रुतिभ्यः । न केवलमृष्यादीनां नाम भगवतः, सर्वे वेदा अपि तस्यैव नामानि, किमु च वेदाः समुद्र-मेघ-वृक्षपतन-भेरीताडनादिसर्वघोषा अपि तस्यैव नामानि यथायोग्यं योजनीयानि ! एकमेव व्याहरणम्= एकप्रकारमेव नाम । निर्दोषगुणपूर्तिवाचकत्वादेकप्रकारता । प्राणे नारायण एव= नारायणविषय एव व्याहारः । ऋचस्तु विशेषत इन्द्रादिनामवतो विष्णोर्गुणान् अल्पज्ञानाम् अपि प्रकाशयन्तीति प्राणे नारायणे एवेति विद्यात् ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उक्तं च बृहत्संहितायाम्– |
| | ‘हुङ्कारेण सहैवाब्धिः सर्वाभिभवशक्तिताम् । |
| | विष्णोर्वक्ति यतो हुं च पराभिभववाचकः । |
| | ओमिति स्वरते नित्यं वायुर्मेघेषु संस्थितः । |
| | बलवन्नादसंयुक्तो ह्यधिकोच्चत्वमस्य तु । |
| | ओङ्कारस्यार्थ उद्दिष्ट उक्तार्थाधिक्यमेव च । |
| | नादो बली प्रवदति तथा भेरीध्वनिः प्रभोः । |
| | अनुदात्तस्वरूपत्वाद् औदार्यं वदतीशितुः ॥</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">तदपेक्षयाऽन्यनीचत्वं घण्टाद्याः स्वरितात्मकाः ॥ |
| | उच्चस्थितिमुदात्तस्तु स्वर्णचञ्च्वादिकः स्वरः । |
| | विष्णोर्वक्ति, तथा मन्द्रः श्वासादिः प्रचयात्मकः । |
| | एकप्रकारतां विष्णोः सदाऽचाल्यां वदत्यपि ॥ |
| | इत्यादयः सर्वघोषा विष्णोरेव गुणोन्नतिम् । |
| | वदन्ति, किमु वेदाद्या, मार्जाराद्यभिधास्तथा ॥ |
| | मारयित्वा प्रभक्ष्यैव जरयत्यखिलं जगत् । |
| | तेन मार्जार उद्दिष्टो, मोषणान्मूषको हरिः ॥ |
| | वर्षणाद् वृष उद्दिष्टो, बलनाद् बलिनामकः । |
| | तारणात् तृणनामाऽसावित्याद्येकोऽभिधीयते ॥</span> |
| | (सर्वनामा भगवान् सर्वविलक्षणः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">सर्वनामाऽपि भगवान् सर्वशक्तिश्च सर्ववित् । |
| | ब्रह्मरुद्रादिजीवेभ्यो जडेभ्यः श्रिय एव तु । |
| | व्यतिरिक्तः सदाऽनन्तसान्द्रानन्दैकरूपकः । |
| | तस्यैव मुख्यनामानि समाकृष्येतरेष्वपि । |
| | उपचारात् प्रवर्तन्ते व्यवहारप्रसिद्धये । |
| | तथैव सर्वनामानि प्रवर्तन्ते च मारुते । |
| | न तावन्मुख्यवृत्त्यैव, मुख्यतोऽन्यव्यपेक्षया । |
| | मुख्यतः सर्वनामा तु विष्णुरेको न चापरः । |
| | तस्मात् प्राणादिशब्दाश्च विष्णावेव हि मुख्यतः । |
| | अन्यव्यपेक्षया वायौ मुख्यवृत्तिर्विधीयते । |
| | वायुश्च सूर्यसंस्थः संस्तपत्येतज्जगत्त्रयम् । |
| | आज्ञयैव हरेर्वायोः शक्त्या सूर्यस्तपत्ययम् ॥’ इत्यादि च ।</span> |
| | (मुख्यवायुरपि सर्ववेदप्रतिपाद्यः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न प्रसिद्धसूर्यस्येयं तापनशक्तिरिति ज्ञापयितुं ‘प्राणो ह्येष य एष तपति’ इत्युक्तम् । ‘प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति’(बृ.उ.३.६.२३,सप्तान्नब्राह्मणम्) इति च श्रुतिः । प्राणशब्दश्च मुख्यतो विष्णौ प्रवर्तमानोऽपि वायावपि वर्तते । अतः सर्ववेदाद्यभिधेयत्वं वायोरप्यस्ति । ‘प्राणस्य प्राणः’(केन.१.३) इति श्रुतेरुभयोरपि प्राणशब्दः प्रसिद्ध एव ।‘अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः’(बृ.४.२.१) इति वायोर्विशेषणादुत्तमप्राणो विष्णुरिति च सिद्धम् ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">द्वावात्मानौ हि वेदेषु द्वौ प्राणौ द्वौ च चेतनौ । |
| | अज्ञानाभिभवास्पृष्टौ वायुर्नारायणश्च तौ । |
| | तदन्ये चेतनास्सर्वे प्राणाश्चात्मान एव च । |
| | अज्ञानाभिभवस्पृष्टास्तस्मात् ते ह्यधमाः श्रुताः । |
| | मध्यमो वायुरेवैक, उत्तमः केवलो हरिः । |
| | सर्वशब्दोदितौ तस्माद् एतौ द्वावेव नापरः । |
| | अन्ये चैव मितैः शब्दैरुच्यन्ते नामितैः क्वचित्। |
| | श्रीरप्यखिलशब्दोक्ता विष्णुवन्न तु मुख्यतः ॥ |
| | तस्मादमितनामानावपि तौ मितनामवत् । |
| | श्रीश्च वायुश्च विष्णुस्तु मुख्योक्तेरमिताभिधः ॥ |
| | अनन्तनामकत्वाच्च सोऽनन्तगुण ईरितः । |
| | पृथङ्नामानि यस्मात् तद्गुणानेव प्रचक्षते ॥’इत्यादि ब्रह्माण्डे ॥ २ ॥</span> |
| }} | | }} |
|
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| {{Bhashyam
| | <div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयः खण्डः</div> |
| | verse_id = AIT_C02_S01_V14
| |
| | id = AIT_C02_S01_V14_B01
| |
| | text =
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| मन्त्रोऽप्यर्थमिमं प्राहापश्यं गोपामिति स्म ह ।
| | </div> |
| एष गोप्ता हि सर्वस्य वायुस्थः पुरुषोत्तमः ॥ | | {{VerseBlock |
| छन्दस्सु संस्थितो वायुर्वायौ च स जनार्दनः ।
| | | verse_id = AIT_C02_S02_V07 |
| वायुश्च वायुसंस्थश्च कदाचिन्नैव तिष्ठतः ॥
| | | document_id = AIT |
| वायुर्हि नित्यसञ्चारी सदा सर्वप्रवृत्तिमान् ।
| | | chapter_id = AIT_C02 |
| चोदितः केशवेनैव तत्स्थेनामितशक्तिना ॥
| | | verse_type = mantra |
| आसमन्तात् पराक्चापि पञ्चभूतेभ्य ईश्वरः ।
| | | verse_line1 = विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमिन्द्र उपनिषससाद । स ह ‘अन्नम्’ इत्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः स वा ऋषे द्वितीयं शंस’ इति । स ह ‘अन्नम्’ इत्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । |
| वायुस्तत्स्थो हरिश्चैव चरत्यमितपौरुषः ॥
| | तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः स वा ऋषे तृतीयं शंस’ इति । स ह ‘अन्नम्’ इत्येव अभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । |
| सध्रीचीनासु पूर्वादिदिक्ष्वेतौ चतसृष्वपि ।
| | तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागा, वरं ते ददामि’ इति । स होवाच- ‘त्वामेव जानीयाम्’इति । |
| नन्ति यदा वसतः कोणदिक्ष्वथाऽसु विषूचिषु ॥
| | तमिन्द्र उवाच- ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे प्राणस्त्वं प्राणः सर्वाणि भूतानि । प्राणो ह्येष य एष तपति । स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि । तस्य मेऽन्नं मित्रं दक्षिणम् । तद् वैश्वामित्रम् एष तपन्नेवास्मि’ इति होवाच ॥ ३ ॥ |
| अन्तश्च सर्वलोकेषु चरतो लोकसाक्षिणौ ।
| | (बृहतीसहस्रं सर्वं नारायणस्यान्नम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya-collection"><span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः, तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम्, तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेते इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तम् इत्यादिना ॥</span> |
| | (इन्द्रकर्तृकं महाव्रतम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये । |
| | महाव्रतं कर्म चक्रे, हौत्रं चक्रेऽत्र कौशिकः । |
| | भृगुरध्वर्युरभवद्, ब्रह्मा ब्रह्माऽभवत् स्वयम् । |
| | उद्गाता वायुरभवत्, स्वयं नारायणः प्रभुः । |
| | सादस्यमकरोत् तत्र, तदन्येऽन्येऽपि चर्त्विजः ।</span> |
| | (विश्वामित्रेण बृहतीसहस्रफठनम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">बृहतीसहस्रं शंसिष्यन् यदा सस्मार केशवम् । |
| | वायुना सह देवेशस्तदा वासवमाविशत् । |
| | आविष्टो, विष्णुनाऽथेन्द्रो वायुना सह कौशिकम् । |
| | शंसेत्युक्त्वा निषण्णोऽभूद्, इदमन्नं तवेति सः । |
| | ऋक्सहस्रं शशंसाथ(शशंसात्र .हृ) यज्ञाङ्गत्वेन भक्तितः । |
| | तच्छ्रुत्वा तुष्टिमगमत् केशवो वायुसंयुतः । |
| | द्वितीयवारं शंसेति प्राह तं च जनार्दनः । |
| | प्रीत्यैव शक्रमाविष्टो, विश्वामित्रः शशंस तत् । |
| | अतिप्रियत्वाद् भगवान् पुनरप्याह कौशिकम् । |
| | तृतीयं च शशंसासौ(सास्मै) विष्णोरन्नं प्रकल्प्य तत् । |
| | ततोऽतितुष्टो भगवान् ददामि वरमित्यमुम् । |
| | ऊचे, स प्रथमे त्वेव निजसालोक्यमीश्वरः । |
| | प्रादाद् द्वितीये सामीप्यम्, तृतीये पुनरेव च ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">वरं ददानीत्युक्तः स मुनिः प्राह जनार्दनम् । |
| | सम्यक्त्वामेव जानीयाम् इति मोक्षे सुखोच्चताम् । |
| | इच्छंस्तं प्राह भगवान् इन्द्रस्थो वायुसंयुतः । |
| | सर्वनामाऽहमस्म्येक इति ज्ञानं ममोत्तमम् । |
| | यस्मात् सर्वगुणत्वं स्यात् सर्वनामत्व एव तु ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न हि दोषाभिधायीनि विष्णोर्नामानि कर्हिचित्(कानिचित् .हृ)। |
| | अदोषत्वान्महाविष्णोर्न सामान्यवचांस्यपि । |
| | सर्वोत्तमगुणात्मत्वात् सदा नारायणस्य हि । |
| | सर्वोत्तमगुणानेव नामान्याचक्षते हरेः ।</span> |
| | (विष्णौ सर्वशब्दसमन्वयक्रमप्रदर्शनम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">यावज्ज्ञानेन मोक्षः स्यात् तावज्ज्ञात्वापि कौशिकः । |
| | अधिकज्ञानलब्ध्यर्थं मोक्षेऽधिकसुखाप्तये । |
| | जानीयां त्वामिति प्राह तस्मा आह स केशवः । |
| | इन्द्राविष्टः प्राणनाम तथाऽन्याश्चाभिधाः प्रभुः । |
| | प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते । |
| | ओयत्वाद् अहंनामाऽस्म्यसनान्मनुतेरपि । |
| | ततो वेत्तीति च त्वं स, पूर्णत्वात् सर्वनामकः । |
| | सर्वाणि बहुरूपत्वात् सर्वरूपेषु पूर्तितः । |
| | प्रभूतत्वाद् भूतनामा सर्वरूपप्रभूततः । |
| | बहुरूपः स भूतानीत्युक्तो विष्णुस्सनातनः । |
| | सर्वैश्वर्यस्वरूपत्वादेष इत्यभिधीयते । |
| | स एव सूर्यसंस्थः सन् लोकं तपति केशवः ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">सर्वनामवतस्तस्य ममान्नं मित्रमुच्यते । |
| | अन्नाभिमानिनी साक्षाच्छ्रीरेव प्रमदोत्तमा । |
| | साऽन्नमित्युच्यते विष्णोर्भोग्यत्वान्मित्रमेव च । |
| | दक्षभागस्थितेनत्वाद् दक्षिणं नाम सोच्यते । |
| | तस्या इनो हि विष्णुः स दक्षभागे स्थितः सदा । |
| | यस्याभिमानिन्यन्नस्य लक्ष्मीः सा देवतोत्तमा। |
| | वैश्वामित्रं तदन्नं तु ऋक्सहस्रात्मकं मतम्। |
| | विश्वामित्रेण दृष्टत्वाद् वैश्वामित्रं तदीर्यते।</span> |
| | (शक्राविष्टो विष्णुः; न चापरः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कां परिहरन् हरिः। |
| | आदित्यसंस्थितो विष्णुः तपन्नस्मीति चोचिवान्। |
| | त्वं जानीयामिति प्रश्नं विश्वामित्रस्य कुर्वतः। |
| | अभिप्रायद्वयं ह्यस्ति ‘शक्राविष्टो न चापरः। |
| | हरेरिति तु मे तर्कस्तजोबाहुल्यतोऽजनि। |
| | तस्य तर्कस्य सत्यत्वं ज्ञातव्यं प्रथमं मया। |
| | द्वितीयं यदि विष्णुः स्याज्ज्ञातव्यो मे विशेषतः’। |
| | इत्याभिप्रायमस्यैव ज्ञात्वा विष्णुः सनातनः । |
| | अभिप्रायद्वयस्यापि परिहारं हरिर्ददौ। |
| | प्राणो वा अहमित्यादि नामसन्दर्भमुक्तवान्। |
| | विशेषज्ञानसिद्ध्यर्थं नाम्नामुक्तिः परात्मनः। |
| | इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कानुत्त्यर्थमेव च । |
| | तपन्नेवास्मीत्यावदत्, तपन्तं वेद सोऽपि हि। |
| | नारायणं सर्वगतम्, गायत्र्योपासको हि सः॥ इति ब्रह्मण्डे।</span> |
| | (‘प्राणो वा अहम्’ इत्युपदेशः भगवतैव कृतः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उपनिषण्णमिन्द्रं दृष्ट्वाऽपि त्वामेव जानीयाम् इति वरस्वीकाराद् इन्द्रादेव च, इन्द्राविष्टो भगवान् अत्रोक्त इति ज्ञायते । इन्द्रं तु जानात्येव हि विश्वामित्रः । भगवन्तमपि स्वरूपत आगतं जानात्येव । विशेषज्ञानप्रार्थने प्राणो वा अहमस्म्यृष इत्यादिकमेव पूर्यते ; एष तपन्नेवास्मि इति व्यर्थम् । प्राणो ह्येष य एष तपति इत्युक्तत्वात् ।</span> |
| | (भगवतस्तदीयरूपाणां च नास्ति भेदः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि इत्यादिनाऽपि आविष्टस्य विष्णुत्वं किञ्चिज्ज्ञायते । तथाऽपि एतेन इति तृतीयात्वात् करणत्वाशङ्का भवति । तस्य मे इति वैयधिकरण्यमिति च । अतो भगवन्नामानि पृथगुक्त्वा ‘अहं विष्णुरित्येष तपन्नेवास्मि’ इत्युवाच । इन्द्रशरीरमेव पश्यतो विश्वामित्रस्य तर्कमात्रतो भगवानिति किञ्चिज्जानत इति ज्ञायते ।</span> |
| | (न शचीपतिः सर्वशब्दवाच्यः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न चेन्द्रस्य प्राणशब्दः(प्राणशब्दाभिधेयत्वम्. हृ) सर्वशब्दाभिधेयत्वं च विद्यते । ‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितम्’(ऋ.सं.१०.८२.६) इत्युक्तस्य पद्मनाभस्य हि ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८.२३) इति सर्वदेवाभिधानत्वमुक्तम् । इन्द्रे हीन्द्रशब्दोऽपि न मुख्यतो वर्तते, परमैश्वर्याभावात्, इन्द्रशब्दोऽपि विष्णावेव वर्तते । स हि परमेश्वरः ।</span> |
| | ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।’(तै.ब्रा.३.७.९.३) |
| | ‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्’(ऋ.सं.१.१६४.४६) । इत्यादिश्रुतेश्च । ‘सप्तार्द्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोऽस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’(ऋ.सं.१.१६४.३६) इत्यादिना विष्णुरेव हि तत्र प्रस्तुतः ।</span> |
| | (नारायणादिनामानि नान्यस्य) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘नामानि विश्वाभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् ।<br/>नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१) ॥’ इति श्रुतिः ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यो देवानां नामधा एक एव’ इत्यवधारणान्नान्यस्य सर्वनामत्वम् । स च विष्णोर्नान्यः । पद्मनाभत्वादेव ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">श्रियो वायोरपि न नारायणादिनामवत्वम् । ‘एको वासुदेवस्तत्सदृशपरौ न स्तः’ इति श्रुतिः । ‘एको नारायण आसीत् तत्समो वा, अधिको वा नास्ति’ इति च । |
| | ‘येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्स्तपति तेजसा भ्राजसा च’(म.ना.उ.१.३) । |
| | ‘यमन्तःसमुद्रे कवयोऽवयन्ति यदक्षरे परमे प्रजा’(तै.आ.१०.१.१) । |
| | इत्युक्तस्य समुद्रशायिन एव नारायणस्य |
| | ‘तद् एवर्तं तद् सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’(म.ना.उ.४.३) । इति परब्रह्मत्वावधारणाच्च विष्णोः परं सदृशं वा नास्त्येव । अतस्तदत्रोच्यत इत्यपि न वक्तव्यम् ।</span> |
| | (विष्णुः सर्वेश्वरः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।<br/>न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.सं.७.९९.१) ॥इत्यादेश्च ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायान् अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम्’(ऋ.सं.४.३०.१) । इत्याद्यपि सर्वनामकत्वात् तस्यैव ।<br/> ‘किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्’ इत्यादिप्रश्नस्यापि<br/>‘परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।<br/>परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥</span> |
| | पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।<br/>दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ |
| | यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।<br/>यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ |
| | तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।<br/>विष्णोर्नामसहस्रम्... ॥’(म.भा.अनु.अ.१४९) |
| | इत्येव भारते परिहाराच्च । |
| | (मित्रं मे दक्षिणा रमा) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">मेऽन्नं दक्षिणमित्युक्तत्वाच्च विष्णुरेवेति ज्ञायते । स हि विष्णुर्दक्षिणामित्र उक्तो हरिवंशेषु धन्याश्चर्याध्यायि । |
| | ‘दक्षिणाभिः सहैवैतन्मदधस्ताज्जगत्सदा ।<br/>धन्याश्चर्योऽहमेवैको मित्रं मे दक्षिणा रमा ।<br/>इत्यवादीद्धरिर्भूपा धन्योऽसीत्युदितो मया ॥’ इति नारदवचनम् । |
| | न च बृहतीसहस्राभिमानिनीं देवीं विना अचेतनमात्रस्य मुख्यमित्रत्वं युज्यते । |
| | ‘मिनोति त्रायते चेति मित्रमित्यभिधीयते ।<br/>तस्माद्योऽयं विजानाति स मित्रं तस्य नान्यथा ॥’इति भारते</span> |
| | (विष्णुरेव बृहतीसहस्रप्रतिपाद्यः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उक्थायुत्वाच्च विष्णुरेवात्रोक्त इत्यवगम्यते । बृहतीसहस्रं ह्युक्थनामकं मुख्यतः । |
| | ‘महाव्रतनियुक्तं यदृक्सहस्रं हरेः प्रियम् ।<br/>तदुक्थमिति सम्प्रोक्तं तेने यो विष्णुरेव हि ॥ |
| | तस्मादुक्थायुरित्युक्त ऐश्वर्यादिन्द्र उच्यते ।<br/>तस्मादुक्थायुरिन्द्रेति विष्णुर्यज्ञेषु पूज्यते ॥’इति गारुडे |
| | विष्णुर्ह्युक्थायुरिन्द्र इत्युच्यते । यज्ञेष्वन्य इन्द्रः पृथक्चोच्यते । ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः’(तै.ब्रा.३.७.९.३) । इत्युक्त्वा ‘तस्मै त्वा तेभ्यस्त्वा’ इति भेदवचनाच्च । सत्य इति वायुः । ‘सदिति प्राण’ इति श्रुतेः । |
| | ‘सदेव सत्यमित्युक्तं सत्यो वायुरुदाहृतः ।<br/>साधुत्वं सत्यता प्रोक्ता साधुर्वायुर्हि सर्वतः ॥’ इति शब्दनिर्णये ।</span> |
| | (बृहतीसहस्रपठनफलम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">प्रियधाम्न उप= समीपे गमनं नाम तद्धामप्राप्तिकारणभगवत्प्रसादप्राप्तिः । अन्यथोपशब्दो व्यर्थः स्यात् । न च तदैव भगवतः प्रियं धाम विश्वामित्रेण प्राप्तम् । |
| | बृहतीसहस्रे प्रथमे सालोक्यं प्रददौ हरिः ।<br/>द्वितीये स्वपुरप्राप्तिं तृतीयेऽन्तःपुरस्य च ।<br/>तथा स्वविषयं ज्ञानं विश्वामित्रे ददौ प्रभुः ॥ इति च गारुडे ।</span> |
| | (इन्द्रे विशेषावेशस्तात्कालिकः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न चेन्द्रादिभिरैक्यमत्रोच्यते । ‘प्राणस्तथाऽनुगमाद्’(ब्र.सू.१.१.२८) इति च विष्णोरेव प्राणशब्दाभिधेयत्वमुक्त्वा ‘न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन्’(ब्र.सू.१.१.२९) इति वक्तुः= बृहतीसहस्रं शंसितुर्विश्वामित्रस्य इन्द्रेण स्वात्मोपदेशः क्रियत इति पक्षो निराकृतो हि भगवता सूत्रेषु । ‘अध्यात्मसम्बन्ध’ शब्देनावेशो विष्णोरिन्द्रे विवक्षितो भगवता । अन्येष्वन्तर्यामिरूपेण सम्बन्धोऽस्त्येव । अस्मिन्निन्द्रे तु विशेषावेशस्तात्कालिकः । अधिकात्मनः= परमात्मनः सम्बन्धोऽध्यात्मसम्बन्धः । न हि स्वात्मना स्वस्य सम्बन्धो भवति । यद्यध्यात्ममात्रमत्रोच्यत इति विवक्षितं तर्हि ‘अध्यात्मभूमा’ इत्येव स्यात्; सम्बन्धशब्दो व्यर्थः । तस्मादिन्द्रादिजीवेभ्यो विष्णोर्भेद एवात्र भगवतो विवक्षितः ।</span> |
| | (अन्तर्यामिदृष्ट्याऽभेदव्यवहारः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्’(ब्र.सू.१.१.३०) इति शास्तुरन्तर्यामिणो विष्णोः सर्वशरीरस्थितत्वात् सर्वनामाभिधेयत्वं चोक्तम् । ‘अहं मनुरभवं सूर्यश्च’ (ऋ.सं.४.२६.१) इत्यादिवत् । न हि मनुसूर्यादिर्भवति वामदेवस्तेषां पक्षेऽपि । सर्वप्रवृत्तिहीनतां हि ते मोक्षं वदन्ति । अत्र च ‘अहं भूमिमददामार्याय’(ऋ.सं.४.२६.२) इत्यादिना प्रवृत्तिरेवोच्यते ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च वामदेवेन मन्वादिकर्म क्रियते कदाऽपि । अतीतार्थश्चायं दृश्यते ‘भूमिम् अददाम्’ इत्यादिना । नहि पूर्वं वामदेवेन तानि कर्माणि कृतानि । भगवान् विष्णुर्हीन्द्राय भूमिमददात्(विष्णुर्हि आर्याय इन्द्राय भूमिमदात्(ताम्रपर्णि) । स एव च सर्वेष्वन्तर्यामित्वेन स्थित्वा नामप्रवृत्तिनिमित्तानि सर्वकर्माणि कुर्वन्नवबोध-सूरिनियमनादिभिर्मनुसूर्यादिसर्वनामा भवति । यदि भेदस्य पूर्वमपि मिथ्यात्वमङ्गीक्रियते तर्हि भूमिदानादिसर्वकर्मणां मन्वादित्वस्यापि मिथ्यात्वाद् ‘अहं मनुरभवम्’ इत्यादिकं सर्वमनर्थकमेव भवति ।</span> |
| | (मुक्तावपि पञ्चभेदाः सुनित्याः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘जीवेश्वरभिदा चैव जीवभेदः परस्परम् ।<br/>जडेश्वरभिदा चैव जडभेदस्तथैव च ॥ |
| | जडजीवभिदा चैव सत्योऽयं भेदपञ्चकः ।<br/>न कदाचिन्निवर्त्योऽयं मुक्तौ संसार एव च (वा) ॥ |
| | य एतदन्यथा ब्रूयुस्ते हि यान्त्यधरं तमः ॥’ इति भविष्यत्पर्वणि । |
| | ‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।’(भ.गी.१६.८) |
| | ‘ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ।’(भ.गी.१६.१४) |
| | ‘एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।’(भ.गी.१६.९) |
| | ‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।<br/>मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्’(भ.गी.१६.२०) ॥ इत्यादि च ।</span> |
| | (सर्वान्तर्यामित्वादिना विष्णोः सर्वशब्दवाच्यत्वम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे’ इत्यादौ अहमस्म्यादिशब्दोऽस्मच्छब्दार्थः(अस्मच्छब्दस्थः/अस्मच्छब्दाद्यर्थः) । एष तपन्नेवास्मीत्युपरितनस्य वैयर्थ्यात् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । अतोऽहमस्मीत्यादि च भगवन्नामैव । न च जीवैक्यवचनमत्र प्रस्तुतम् । ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव’ इति सर्वनामाभिधेयत्वं भगवत उक्त्वा, तत्रैव प्रमाणत्वेन विश्वामित्रं ह्येतदहरित्याद्याख्यायिकोक्ता । तस्मात् सर्वान्तर्यामित्वात्, सर्वगुणत्वात्, सर्वशक्तित्वाच्च सर्वनामवत्वमेव विष्णोरुच्यते; न तु सर्वस्वरूपत्वम् । |
| | उक्तं च भारते । |
| | ‘स्रष्टृत्वाच्चैव पातृत्वान्नियमाच्च प्रकाशनात् ।<br/>सर्वत्वमुक्तं विष्णोस्तु न तु सर्वस्वरूपतः ॥’ इति ।</span> |
| | (श्रुतिवचनानि नाभेदपराणि) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘‘ ‘पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्’(ऋ.सं.८.४.१७) इति पुरुषेणैव ‘इदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।’, ‘आ तृणाद् आकरीषात् सर्वं भगवान् इति मिथ्यादृष्टिरेव’ (एषा.हृ)’’ इति च श्रुतिः । |
| | ‘हिरण्मयो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’, |
| | ‘अमृतो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’, |
| | ‘स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् आप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’ इत्यादिना मुक्तानामपि भेदस्यैवोक्तेश्च । |
| | न हि भेदाभावे ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे’ इति युज्यते । न चामुक्तैः सर्वभूतैर्मुक्तो दृश्यते ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">एकत्वे तु ‘ददृशे’ इत्येतावता पूर्यते; ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यः’ इति व्यर्थम् । न च तेषां पक्षे स्वयमपि स्वात्मानं पश्यति । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति । अतः सर्वश्रुतिविरोध एव जीवेश्वरैक्याङ्गीकारे । नच ‘कर्तृकर्मविरोधो नामास्ति’ इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । श्रुत्यनुभवसिद्धत्वाच्च स्वदर्शनादेः ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च तेषां पक्षे प्रज्ञेन सर्वज्ञेन परमात्मना सर्वकामावाप्तिर्नामाङ्गीक्रियते शरीरादुत्क्रान्तस्य ज्ञानिनः । तस्माद् वेदविरुद्धवादिन एव तेऽपि । |
| | (न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो मायावादिनः) |
| | न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो दृश्यते । न हि सर्वावाच्यं सर्वाज्ञेयं शून्यं चेति कश्चिद्विशेषः । केनापि शब्देनावाच्यस्य लक्षणायामपि प्रमाणं नास्ति । क्षीरमाधुर्यादयोऽपि तैरेव शब्दैरुच्यन्ते । |
| | ‘विशदं क्षीरमाधुर्यं स्थिरमाज्यस्य तीक्ष्णकम् ।<br/>सितस्य (गुडस्य) पनसादीनां निर्हारीत्यभिधीयते ॥’ इति शब्दनिर्णये । |
| | न च सर्वगुणदोषक्रियाविनिर्मुक्तस्यास्तित्वमपि कुत्रचित् दृष्टम् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि ।</span> |
| | (मुक्तावपि तारतम्यम् अप्रतिहतम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति’(क.ठ.२.३.१३) इत्यादिना प्रसादादिगुणाश्च भगवतो दृश्यन्ते । ‘यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः’(क.ठ.६.११) इत्यादि कर्माणि च । ‘यस्मिन् देवाः श्रिताः सर्वे’ इत्यादिगुणाश्च तत्रैवोक्ताः(काठके न दृश्यते) ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः । |
| | अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥आदध्ना(घ्ना)स उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे’(ऋ.सं.१०.७१.७) ॥ |
| | इति मुक्तानामपि तारतम्यं चोक्तम् । |
| | ‘श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः ।<br/>अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">तारतम्यं च तेषां हि श्रुतावुदितमञ्जसा ।<br/>क्षीरसागरदध्नास्तु केचित् तिष्ठन्ति मुक्तिगाः ॥ |
| | उपस्थिता ब्रह्मवनं केचिदश्वत्थमण्डलम् ।<br/>ऐरे ह्रदे केचिदपि देवा एव परं(सदा.हृ) हरिम् ॥ |
| | नागभोगशयं मुक्ता ददृश्रेऽधिकमोदिनः ।<br/>सागरादिस्थिता विष्णुं पश्यन्ति क्वचिदेव हि ॥’ |
| | इति ब्रह्मसारे ।</span> |
| | (वेदमन्त्रेषु मुक्तलोकवर्णनम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यत्र ब्रह्मा पवमान च्छन्दस्यां वाचं वदन् ।<br/>ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ |
| | यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिल्ँलोके स्वर्हितम् ।<br/>तस्मिन् मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ |
| | यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः ।<br/>यत्राभूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ |
| | यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः ।<br/>लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ |
| | यत्र तत्परमं पदं विष्णोर्लोके महीयते ।<br/>देवैस्सुकृतकर्माभिस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ |
| | यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ।<br/>कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव’(ऋ.सं.९.११३.६-११) ॥</span> |
| | (श्रुतिसूत्राणि मुक्तभेदावेदकानि) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">इत्यादिना ब्रह्मसूर्ययमादीनां सर्वदेवानाम्, दिवो देव्या अवरोधभूतानां सर्वदेवानाम्, गङ्गाद्यब्देवतानां च वेदव्याख्यानम्, सोमयागादिकम्, कामचरणं च मुक्तानां भेदेनावस्थितानामुच्यते । मुक्ताश्चात्रोच्यन्त इति प्रतीयते; ‘अमृतं कृधि’ इति वचनात् । अमुक्तानां स्वे स्वे लोकेऽवस्थानं हि तेषाम् । मुक्तानां हि विष्णुलोकेऽवस्थानं देवानाम् । ‘मुक्तः प्रतिज्ञानात्’(ब्र.सू.४.४.२) । ‘सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः’(ब्र.सू.४.४.८) । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’(ब्र.सू.४.४.१७) । ‘भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च’(ब्र.सू.४.४.२२) । ‘अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्’(ब्र.सू.४.४.२३) इत्यादि मुक्तसूत्रेभ्यश्च मुक्तानां विष्णोर्भेदो भोगादिकं च सर्वं प्रतीयते । ‘ग्राव्णा सोमे महीयते’(ऋ.सं.९.११३.६) इति ब्रह्मणोऽन्यमुक्तैः पूज्यत्वं च प्रतीयते ।</span> |
| | (सूत्राणुसारेण श्रुतेरर्थ उपवर्णनीयः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">नच सूत्रेषु निश्चितार्थस्यौपचारिकत्वं वक्तुं युज्यते । निर्णयात्मकत्वात् तेषाम् । अतिप्रसङ्गश्चोपचारादिकल्पने । ‘ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः’(भ.गी.१३.५) इति (हि) विनिश्चितानि ब्रह्मसूत्राणि । |
| | ‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।<br/>योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रस्य निर्णयः ॥’इति आदित्यपुराणे ।</span> |
| | (न मुक्तिर्भोगरहिता) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च निर्णयकानि(निर्णयात्मकानि. हृ) भगवद्वाक्यान्यपहाय मानुषवाक्यैरेव तेषामुपचारत्वादि कल्प्यम् । न च भोगरहिता मुक्तिर्नामान्याऽस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । |
| | ‘भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः(ग्रहत्वमाप. हृ ) ।<br/>तथा मुक्तावुत्तमायां विष्णुमाविश्य भुञ्जते ॥ |
| | विष्णोर्वशाश्च ते सर्वे सर्वदा दुःखवर्जिताः ।<br/>न तु विष्णुगुणान् सर्वे भुञ्जते ते कदाचन ॥ |
| | बाह्यभोगान् भुञ्जते च तारतम्येन कांश्चन ।<br/>विष्णोर्देहाद् बहिश्चापि निर्गच्छन्ति यथेष्टतः ॥’ इति स्कान्दे । |
| | ‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।<br/>सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’(भ.गी.१४.२) इति भगवद्वचनम् । |
| | तस्मात् मुक्तैरपीज्यमानः सर्वस्माद् भिन्नः सर्वोत्तमः सर्वनामा सर्वशक्तिः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायणः सर्ववेदादिषूच्यते इति सिद्धम् ॥ ३ ॥</span> ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ |
| | | verse_lines = विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमिन्द्र उपनिषससाद । स ह ‘अन्नम्’ इत्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः स वा ऋषे द्वितीयं शंस’ इति । स ह ‘अन्नम्’ इत्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । |
| | तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागाः स वा ऋषे तृतीयं शंस’ इति । स ह ‘अन्नम्’ इत्येव अभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । |
| | तमिन्द्र उवाच- ‘ऋषे! प्रियं वै मे धामोपागा, वरं ते ददामि’ इति । स होवाच- ‘त्वामेव जानीयाम्’इति । |
| | तमिन्द्र उवाच- ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे प्राणस्त्वं प्राणः सर्वाणि भूतानि । प्राणो ह्येष य एष तपति । स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि । तस्य मेऽन्नं मित्रं दक्षिणम् । तद् वैश्वामित्रम् एष तपन्नेवास्मि’ इति होवाच ॥ ३ ॥ |
| | (बृहतीसहस्रं सर्वं नारायणस्यान्नम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya-collection"><span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः, तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम्, तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेते इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तम् इत्यादिना ॥</span> |
| | (इन्द्रकर्तृकं महाव्रतम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये । |
| | महाव्रतं कर्म चक्रे, हौत्रं चक्रेऽत्र कौशिकः । |
| | भृगुरध्वर्युरभवद्, ब्रह्मा ब्रह्माऽभवत् स्वयम् । |
| | उद्गाता वायुरभवत्, स्वयं नारायणः प्रभुः । |
| | सादस्यमकरोत् तत्र, तदन्येऽन्येऽपि चर्त्विजः ।</span> |
| | (विश्वामित्रेण बृहतीसहस्रफठनम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">बृहतीसहस्रं शंसिष्यन् यदा सस्मार केशवम् । |
| | वायुना सह देवेशस्तदा वासवमाविशत् । |
| | आविष्टो, विष्णुनाऽथेन्द्रो वायुना सह कौशिकम् । |
| | शंसेत्युक्त्वा निषण्णोऽभूद्, इदमन्नं तवेति सः । |
| | ऋक्सहस्रं शशंसाथ(शशंसात्र .हृ) यज्ञाङ्गत्वेन भक्तितः । |
| | तच्छ्रुत्वा तुष्टिमगमत् केशवो वायुसंयुतः । |
| | द्वितीयवारं शंसेति प्राह तं च जनार्दनः । |
| | प्रीत्यैव शक्रमाविष्टो, विश्वामित्रः शशंस तत् । |
| | अतिप्रियत्वाद् भगवान् पुनरप्याह कौशिकम् । |
| | तृतीयं च शशंसासौ(सास्मै) विष्णोरन्नं प्रकल्प्य तत् । |
| | ततोऽतितुष्टो भगवान् ददामि वरमित्यमुम् । |
| | ऊचे, स प्रथमे त्वेव निजसालोक्यमीश्वरः । |
| | प्रादाद् द्वितीये सामीप्यम्, तृतीये पुनरेव च ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">वरं ददानीत्युक्तः स मुनिः प्राह जनार्दनम् । |
| | सम्यक्त्वामेव जानीयाम् इति मोक्षे सुखोच्चताम् । |
| | इच्छंस्तं प्राह भगवान् इन्द्रस्थो वायुसंयुतः । |
| | सर्वनामाऽहमस्म्येक इति ज्ञानं ममोत्तमम् । |
| | यस्मात् सर्वगुणत्वं स्यात् सर्वनामत्व एव तु ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न हि दोषाभिधायीनि विष्णोर्नामानि कर्हिचित्(कानिचित् .हृ)। |
| | अदोषत्वान्महाविष्णोर्न सामान्यवचांस्यपि । |
| | सर्वोत्तमगुणात्मत्वात् सदा नारायणस्य हि । |
| | सर्वोत्तमगुणानेव नामान्याचक्षते हरेः ।</span> |
| | (विष्णौ सर्वशब्दसमन्वयक्रमप्रदर्शनम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">यावज्ज्ञानेन मोक्षः स्यात् तावज्ज्ञात्वापि कौशिकः । |
| | अधिकज्ञानलब्ध्यर्थं मोक्षेऽधिकसुखाप्तये । |
| | जानीयां त्वामिति प्राह तस्मा आह स केशवः । |
| | इन्द्राविष्टः प्राणनाम तथाऽन्याश्चाभिधाः प्रभुः । |
| | प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते । |
| | ओयत्वाद् अहंनामाऽस्म्यसनान्मनुतेरपि । |
| | ततो वेत्तीति च त्वं स, पूर्णत्वात् सर्वनामकः । |
| | सर्वाणि बहुरूपत्वात् सर्वरूपेषु पूर्तितः । |
| | प्रभूतत्वाद् भूतनामा सर्वरूपप्रभूततः । |
| | बहुरूपः स भूतानीत्युक्तो विष्णुस्सनातनः । |
| | सर्वैश्वर्यस्वरूपत्वादेष इत्यभिधीयते । |
| | स एव सूर्यसंस्थः सन् लोकं तपति केशवः ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">सर्वनामवतस्तस्य ममान्नं मित्रमुच्यते । |
| | अन्नाभिमानिनी साक्षाच्छ्रीरेव प्रमदोत्तमा । |
| | साऽन्नमित्युच्यते विष्णोर्भोग्यत्वान्मित्रमेव च । |
| | दक्षभागस्थितेनत्वाद् दक्षिणं नाम सोच्यते । |
| | तस्या इनो हि विष्णुः स दक्षभागे स्थितः सदा । |
| | यस्याभिमानिन्यन्नस्य लक्ष्मीः सा देवतोत्तमा। |
| | वैश्वामित्रं तदन्नं तु ऋक्सहस्रात्मकं मतम्। |
| | विश्वामित्रेण दृष्टत्वाद् वैश्वामित्रं तदीर्यते।</span> |
| | (शक्राविष्टो विष्णुः; न चापरः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कां परिहरन् हरिः। |
| | आदित्यसंस्थितो विष्णुः तपन्नस्मीति चोचिवान्। |
| | त्वं जानीयामिति प्रश्नं विश्वामित्रस्य कुर्वतः। |
| | अभिप्रायद्वयं ह्यस्ति ‘शक्राविष्टो न चापरः। |
| | हरेरिति तु मे तर्कस्तजोबाहुल्यतोऽजनि। |
| | तस्य तर्कस्य सत्यत्वं ज्ञातव्यं प्रथमं मया। |
| | द्वितीयं यदि विष्णुः स्याज्ज्ञातव्यो मे विशेषतः’। |
| | इत्याभिप्रायमस्यैव ज्ञात्वा विष्णुः सनातनः । |
| | अभिप्रायद्वयस्यापि परिहारं हरिर्ददौ। |
| | प्राणो वा अहमित्यादि नामसन्दर्भमुक्तवान्। |
| | विशेषज्ञानसिद्ध्यर्थं नाम्नामुक्तिः परात्मनः। |
| | इन्द्राविष्टः कोऽयमिति शङ्कानुत्त्यर्थमेव च । |
| | तपन्नेवास्मीत्यावदत्, तपन्तं वेद सोऽपि हि। |
| | नारायणं सर्वगतम्, गायत्र्योपासको हि सः॥ इति ब्रह्मण्डे।</span> |
| | (‘प्राणो वा अहम्’ इत्युपदेशः भगवतैव कृतः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उपनिषण्णमिन्द्रं दृष्ट्वाऽपि त्वामेव जानीयाम् इति वरस्वीकाराद् इन्द्रादेव च, इन्द्राविष्टो भगवान् अत्रोक्त इति ज्ञायते । इन्द्रं तु जानात्येव हि विश्वामित्रः । भगवन्तमपि स्वरूपत आगतं जानात्येव । विशेषज्ञानप्रार्थने प्राणो वा अहमस्म्यृष इत्यादिकमेव पूर्यते ; एष तपन्नेवास्मि इति व्यर्थम् । प्राणो ह्येष य एष तपति इत्युक्तत्वात् ।</span> |
| | (भगवतस्तदीयरूपाणां च नास्ति भेदः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि इत्यादिनाऽपि आविष्टस्य विष्णुत्वं किञ्चिज्ज्ञायते । तथाऽपि एतेन इति तृतीयात्वात् करणत्वाशङ्का भवति । तस्य मे इति वैयधिकरण्यमिति च । अतो भगवन्नामानि पृथगुक्त्वा ‘अहं विष्णुरित्येष तपन्नेवास्मि’ इत्युवाच । इन्द्रशरीरमेव पश्यतो विश्वामित्रस्य तर्कमात्रतो भगवानिति किञ्चिज्जानत इति ज्ञायते ।</span> |
| | (न शचीपतिः सर्वशब्दवाच्यः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न चेन्द्रस्य प्राणशब्दः(प्राणशब्दाभिधेयत्वम्. हृ) सर्वशब्दाभिधेयत्वं च विद्यते । ‘अजस्य नाभावध्येकमर्पितम्’(ऋ.सं.१०.८२.६) इत्युक्तस्य पद्मनाभस्य हि ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८.२३) इति सर्वदेवाभिधानत्वमुक्तम् । इन्द्रे हीन्द्रशब्दोऽपि न मुख्यतो वर्तते, परमैश्वर्याभावात्, इन्द्रशब्दोऽपि विष्णावेव वर्तते । स हि परमेश्वरः ।</span> |
| | ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।’(तै.ब्रा.३.७.९.३) |
| | ‘इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्’(ऋ.सं.१.१६४.४६) । इत्यादिश्रुतेश्च । ‘सप्तार्द्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोऽस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि’(ऋ.सं.१.१६४.३६) इत्यादिना विष्णुरेव हि तत्र प्रस्तुतः ।</span> |
| | (नारायणादिनामानि नान्यस्य) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘नामानि विश्वाभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् ।<br/>नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१) ॥’ इति श्रुतिः ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यो देवानां नामधा एक एव’ इत्यवधारणान्नान्यस्य सर्वनामत्वम् । स च विष्णोर्नान्यः । पद्मनाभत्वादेव ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">श्रियो वायोरपि न नारायणादिनामवत्वम् । ‘एको वासुदेवस्तत्सदृशपरौ न स्तः’ इति श्रुतिः । ‘एको नारायण आसीत् तत्समो वा, अधिको वा नास्ति’ इति च । |
| | ‘येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्स्तपति तेजसा भ्राजसा च’(म.ना.उ.१.३) । |
| | ‘यमन्तःसमुद्रे कवयोऽवयन्ति यदक्षरे परमे प्रजा’(तै.आ.१०.१.१) । |
| | इत्युक्तस्य समुद्रशायिन एव नारायणस्य |
| | ‘तद् एवर्तं तद् सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परमं कवीनाम्’(म.ना.उ.४.३) । इति परब्रह्मत्वावधारणाच्च विष्णोः परं सदृशं वा नास्त्येव । अतस्तदत्रोच्यत इत्यपि न वक्तव्यम् ।</span> |
| | (विष्णुः सर्वेश्वरः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।<br/>न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप’(ऋ.सं.७.९९.१) ॥इत्यादेश्च ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायान् अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम्’(ऋ.सं.४.३०.१) । इत्याद्यपि सर्वनामकत्वात् तस्यैव ।<br/> ‘किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम्’ इत्यादिप्रश्नस्यापि<br/>‘परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।<br/>परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥</span> |
| | पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।<br/>दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥ |
| | यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।<br/>यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥ |
| | तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।<br/>विष्णोर्नामसहस्रम्... ॥’(म.भा.अनु.अ.१४९) |
| | इत्येव भारते परिहाराच्च । |
| | (मित्रं मे दक्षिणा रमा) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">मेऽन्नं दक्षिणमित्युक्तत्वाच्च विष्णुरेवेति ज्ञायते । स हि विष्णुर्दक्षिणामित्र उक्तो हरिवंशेषु धन्याश्चर्याध्यायि । |
| | ‘दक्षिणाभिः सहैवैतन्मदधस्ताज्जगत्सदा ।<br/>धन्याश्चर्योऽहमेवैको मित्रं मे दक्षिणा रमा ।<br/>इत्यवादीद्धरिर्भूपा धन्योऽसीत्युदितो मया ॥’ इति नारदवचनम् । |
| | न च बृहतीसहस्राभिमानिनीं देवीं विना अचेतनमात्रस्य मुख्यमित्रत्वं युज्यते । |
| | ‘मिनोति त्रायते चेति मित्रमित्यभिधीयते ।<br/>तस्माद्योऽयं विजानाति स मित्रं तस्य नान्यथा ॥’इति भारते</span> |
| | (विष्णुरेव बृहतीसहस्रप्रतिपाद्यः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">उक्थायुत्वाच्च विष्णुरेवात्रोक्त इत्यवगम्यते । बृहतीसहस्रं ह्युक्थनामकं मुख्यतः । |
| | ‘महाव्रतनियुक्तं यदृक्सहस्रं हरेः प्रियम् ।<br/>तदुक्थमिति सम्प्रोक्तं तेने यो विष्णुरेव हि ॥ |
| | तस्मादुक्थायुरित्युक्त ऐश्वर्यादिन्द्र उच्यते ।<br/>तस्मादुक्थायुरिन्द्रेति विष्णुर्यज्ञेषु पूज्यते ॥’इति गारुडे |
| | विष्णुर्ह्युक्थायुरिन्द्र इत्युच्यते । यज्ञेष्वन्य इन्द्रः पृथक्चोच्यते । ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः’(तै.ब्रा.३.७.९.३) । इत्युक्त्वा ‘तस्मै त्वा तेभ्यस्त्वा’ इति भेदवचनाच्च । सत्य इति वायुः । ‘सदिति प्राण’ इति श्रुतेः । |
| | ‘सदेव सत्यमित्युक्तं सत्यो वायुरुदाहृतः ।<br/>साधुत्वं सत्यता प्रोक्ता साधुर्वायुर्हि सर्वतः ॥’ इति शब्दनिर्णये ।</span> |
| | (बृहतीसहस्रपठनफलम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">प्रियधाम्न उप= समीपे गमनं नाम तद्धामप्राप्तिकारणभगवत्प्रसादप्राप्तिः । अन्यथोपशब्दो व्यर्थः स्यात् । न च तदैव भगवतः प्रियं धाम विश्वामित्रेण प्राप्तम् । |
| | बृहतीसहस्रे प्रथमे सालोक्यं प्रददौ हरिः ।<br/>द्वितीये स्वपुरप्राप्तिं तृतीयेऽन्तःपुरस्य च ।<br/>तथा स्वविषयं ज्ञानं विश्वामित्रे ददौ प्रभुः ॥ इति च गारुडे ।</span> |
| | (इन्द्रे विशेषावेशस्तात्कालिकः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न चेन्द्रादिभिरैक्यमत्रोच्यते । ‘प्राणस्तथाऽनुगमाद्’(ब्र.सू.१.१.२८) इति च विष्णोरेव प्राणशब्दाभिधेयत्वमुक्त्वा ‘न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन्’(ब्र.सू.१.१.२९) इति वक्तुः= बृहतीसहस्रं शंसितुर्विश्वामित्रस्य इन्द्रेण स्वात्मोपदेशः क्रियत इति पक्षो निराकृतो हि भगवता सूत्रेषु । ‘अध्यात्मसम्बन्ध’ शब्देनावेशो विष्णोरिन्द्रे विवक्षितो भगवता । अन्येष्वन्तर्यामिरूपेण सम्बन्धोऽस्त्येव । अस्मिन्निन्द्रे तु विशेषावेशस्तात्कालिकः । अधिकात्मनः= परमात्मनः सम्बन्धोऽध्यात्मसम्बन्धः । न हि स्वात्मना स्वस्य सम्बन्धो भवति । यद्यध्यात्ममात्रमत्रोच्यत इति विवक्षितं तर्हि ‘अध्यात्मभूमा’ इत्येव स्यात्; सम्बन्धशब्दो व्यर्थः । तस्मादिन्द्रादिजीवेभ्यो विष्णोर्भेद एवात्र भगवतो विवक्षितः ।</span> |
| | (अन्तर्यामिदृष्ट्याऽभेदव्यवहारः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत्’(ब्र.सू.१.१.३०) इति शास्तुरन्तर्यामिणो विष्णोः सर्वशरीरस्थितत्वात् सर्वनामाभिधेयत्वं चोक्तम् । ‘अहं मनुरभवं सूर्यश्च’ (ऋ.सं.४.२६.१) इत्यादिवत् । न हि मनुसूर्यादिर्भवति वामदेवस्तेषां पक्षेऽपि । सर्वप्रवृत्तिहीनतां हि ते मोक्षं वदन्ति । अत्र च ‘अहं भूमिमददामार्याय’(ऋ.सं.४.२६.२) इत्यादिना प्रवृत्तिरेवोच्यते ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च वामदेवेन मन्वादिकर्म क्रियते कदाऽपि । अतीतार्थश्चायं दृश्यते ‘भूमिम् अददाम्’ इत्यादिना । नहि पूर्वं वामदेवेन तानि कर्माणि कृतानि । भगवान् विष्णुर्हीन्द्राय भूमिमददात्(विष्णुर्हि आर्याय इन्द्राय भूमिमदात्(ताम्रपर्णि) । स एव च सर्वेष्वन्तर्यामित्वेन स्थित्वा नामप्रवृत्तिनिमित्तानि सर्वकर्माणि कुर्वन्नवबोध-सूरिनियमनादिभिर्मनुसूर्यादिसर्वनामा भवति । यदि भेदस्य पूर्वमपि मिथ्यात्वमङ्गीक्रियते तर्हि भूमिदानादिसर्वकर्मणां मन्वादित्वस्यापि मिथ्यात्वाद् ‘अहं मनुरभवम्’ इत्यादिकं सर्वमनर्थकमेव भवति ।</span> |
| | (मुक्तावपि पञ्चभेदाः सुनित्याः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘जीवेश्वरभिदा चैव जीवभेदः परस्परम् ।<br/>जडेश्वरभिदा चैव जडभेदस्तथैव च ॥ |
| | जडजीवभिदा चैव सत्योऽयं भेदपञ्चकः ।<br/>न कदाचिन्निवर्त्योऽयं मुक्तौ संसार एव च (वा) ॥ |
| | य एतदन्यथा ब्रूयुस्ते हि यान्त्यधरं तमः ॥’ इति भविष्यत्पर्वणि । |
| | ‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।’(भ.गी.१६.८) |
| | ‘ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ।’(भ.गी.१६.१४) |
| | ‘एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।’(भ.गी.१६.९) |
| | ‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।<br/>मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्’(भ.गी.१६.२०) ॥ इत्यादि च ।</span> |
| | (सर्वान्तर्यामित्वादिना विष्णोः सर्वशब्दवाच्यत्वम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च ‘प्राणो वा अहमस्म्यृषे’ इत्यादौ अहमस्म्यादिशब्दोऽस्मच्छब्दार्थः(अस्मच्छब्दस्थः/अस्मच्छब्दाद्यर्थः) । एष तपन्नेवास्मीत्युपरितनस्य वैयर्थ्यात् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । अतोऽहमस्मीत्यादि च भगवन्नामैव । न च जीवैक्यवचनमत्र प्रस्तुतम् । ‘ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव’ इति सर्वनामाभिधेयत्वं भगवत उक्त्वा, तत्रैव प्रमाणत्वेन विश्वामित्रं ह्येतदहरित्याद्याख्यायिकोक्ता । तस्मात् सर्वान्तर्यामित्वात्, सर्वगुणत्वात्, सर्वशक्तित्वाच्च सर्वनामवत्वमेव विष्णोरुच्यते; न तु सर्वस्वरूपत्वम् । |
| | उक्तं च भारते । |
| | ‘स्रष्टृत्वाच्चैव पातृत्वान्नियमाच्च प्रकाशनात् ।<br/>सर्वत्वमुक्तं विष्णोस्तु न तु सर्वस्वरूपतः ॥’ इति ।</span> |
| | (श्रुतिवचनानि नाभेदपराणि) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘‘ ‘पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्’(ऋ.सं.८.४.१७) इति पुरुषेणैव ‘इदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।’, ‘आ तृणाद् आकरीषात् सर्वं भगवान् इति मिथ्यादृष्टिरेव’ (एषा.हृ)’’ इति च श्रुतिः । |
| | ‘हिरण्मयो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’, |
| | ‘अमृतो ह वा अमुष्मिल्ँलोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद’, |
| | ‘स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् आप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत्’ इत्यादिना मुक्तानामपि भेदस्यैवोक्तेश्च । |
| | न हि भेदाभावे ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे’ इति युज्यते । न चामुक्तैः सर्वभूतैर्मुक्तो दृश्यते ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">एकत्वे तु ‘ददृशे’ इत्येतावता पूर्यते; ‘सर्वेभ्यो भूतेभ्यः’ इति व्यर्थम् । न च तेषां पक्षे स्वयमपि स्वात्मानं पश्यति । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति । अतः सर्वश्रुतिविरोध एव जीवेश्वरैक्याङ्गीकारे । नच ‘कर्तृकर्मविरोधो नामास्ति’ इत्यत्र किञ्चिन्मानम् । श्रुत्यनुभवसिद्धत्वाच्च स्वदर्शनादेः ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च तेषां पक्षे प्रज्ञेन सर्वज्ञेन परमात्मना सर्वकामावाप्तिर्नामाङ्गीक्रियते शरीरादुत्क्रान्तस्य ज्ञानिनः । तस्माद् वेदविरुद्धवादिन एव तेऽपि । |
| | (न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो मायावादिनः) |
| | न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो दृश्यते । न हि सर्वावाच्यं सर्वाज्ञेयं शून्यं चेति कश्चिद्विशेषः । केनापि शब्देनावाच्यस्य लक्षणायामपि प्रमाणं नास्ति । क्षीरमाधुर्यादयोऽपि तैरेव शब्दैरुच्यन्ते । |
| | ‘विशदं क्षीरमाधुर्यं स्थिरमाज्यस्य तीक्ष्णकम् ।<br/>सितस्य (गुडस्य) पनसादीनां निर्हारीत्यभिधीयते ॥’ इति शब्दनिर्णये । |
| | न च सर्वगुणदोषक्रियाविनिर्मुक्तस्यास्तित्वमपि कुत्रचित् दृष्टम् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि ।</span> |
| | (मुक्तावपि तारतम्यम् अप्रतिहतम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभावः प्रसीदति’(क.ठ.२.३.१३) इत्यादिना प्रसादादिगुणाश्च भगवतो दृश्यन्ते । ‘यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः’(क.ठ.६.११) इत्यादि कर्माणि च । ‘यस्मिन् देवाः श्रिताः सर्वे’ इत्यादिगुणाश्च तत्रैवोक्ताः(काठके न दृश्यते) ।</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः । |
| | अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥आदध्ना(घ्ना)स उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे’(ऋ.सं.१०.७१.७) ॥ |
| | इति मुक्तानामपि तारतम्यं चोक्तम् । |
| | ‘श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः ।<br/>अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥</span> |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">तारतम्यं च तेषां हि श्रुतावुदितमञ्जसा ।<br/>क्षीरसागरदध्नास्तु केचित् तिष्ठन्ति मुक्तिगाः ॥ |
| | उपस्थिता ब्रह्मवनं केचिदश्वत्थमण्डलम् ।<br/>ऐरे ह्रदे केचिदपि देवा एव परं(सदा.हृ) हरिम् ॥ |
| | नागभोगशयं मुक्ता ददृश्रेऽधिकमोदिनः ।<br/>सागरादिस्थिता विष्णुं पश्यन्ति क्वचिदेव हि ॥’ |
| | इति ब्रह्मसारे ।</span> |
| | (वेदमन्त्रेषु मुक्तलोकवर्णनम्) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">‘यत्र ब्रह्मा पवमान च्छन्दस्यां वाचं वदन् ।<br/>ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ |
| | यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिल्ँलोके स्वर्हितम् ।<br/>तस्मिन् मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ |
| | यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः ।<br/>यत्राभूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ |
| | यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः ।<br/>लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ |
| | यत्र तत्परमं पदं विष्णोर्लोके महीयते ।<br/>देवैस्सुकृतकर्माभिस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव ॥ |
| | यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ।<br/>कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परि स्रव’(ऋ.सं.९.११३.६-११) ॥</span> |
| | (श्रुतिसूत्राणि मुक्तभेदावेदकानि) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">इत्यादिना ब्रह्मसूर्ययमादीनां सर्वदेवानाम्, दिवो देव्या अवरोधभूतानां सर्वदेवानाम्, गङ्गाद्यब्देवतानां च वेदव्याख्यानम्, सोमयागादिकम्, कामचरणं च मुक्तानां भेदेनावस्थितानामुच्यते । मुक्ताश्चात्रोच्यन्त इति प्रतीयते; ‘अमृतं कृधि’ इति वचनात् । अमुक्तानां स्वे स्वे लोकेऽवस्थानं हि तेषाम् । मुक्तानां हि विष्णुलोकेऽवस्थानं देवानाम् । ‘मुक्तः प्रतिज्ञानात्’(ब्र.सू.४.४.२) । ‘सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः’(ब्र.सू.४.४.८) । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’(ब्र.सू.४.४.१७) । ‘भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च’(ब्र.सू.४.४.२२) । ‘अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात्’(ब्र.सू.४.४.२३) इत्यादि मुक्तसूत्रेभ्यश्च मुक्तानां विष्णोर्भेदो भोगादिकं च सर्वं प्रतीयते । ‘ग्राव्णा सोमे महीयते’(ऋ.सं.९.११३.६) इति ब्रह्मणोऽन्यमुक्तैः पूज्यत्वं च प्रतीयते ।</span> |
| | (सूत्राणुसारेण श्रुतेरर्थ उपवर्णनीयः) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">नच सूत्रेषु निश्चितार्थस्यौपचारिकत्वं वक्तुं युज्यते । निर्णयात्मकत्वात् तेषाम् । अतिप्रसङ्गश्चोपचारादिकल्पने । ‘ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः’(भ.गी.१३.५) इति (हि) विनिश्चितानि ब्रह्मसूत्राणि । |
| | ‘बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।<br/>योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रस्य निर्णयः ॥’इति आदित्यपुराणे ।</span> |
| | (न मुक्तिर्भोगरहिता) |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">न च निर्णयकानि(निर्णयात्मकानि. हृ) भगवद्वाक्यान्यपहाय मानुषवाक्यैरेव तेषामुपचारत्वादि कल्प्यम् । न च भोगरहिता मुक्तिर्नामान्याऽस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । |
| | ‘भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः(ग्रहत्वमाप. हृ ) ।<br/>तथा मुक्तावुत्तमायां विष्णुमाविश्य भुञ्जते ॥ |
| | विष्णोर्वशाश्च ते सर्वे सर्वदा दुःखवर्जिताः ।<br/>न तु विष्णुगुणान् सर्वे भुञ्जते ते कदाचन ॥ |
| | बाह्यभोगान् भुञ्जते च तारतम्येन कांश्चन ।<br/>विष्णोर्देहाद् बहिश्चापि निर्गच्छन्ति यथेष्टतः ॥’ इति स्कान्दे । |
| | ‘इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।<br/>सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥’(भ.गी.१४.२) इति भगवद्वचनम् । |
| | तस्मात् मुक्तैरपीज्यमानः सर्वस्माद् भिन्नः सर्वोत्तमः सर्वनामा सर्वशक्तिः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायणः सर्ववेदादिषूच्यते इति सिद्धम् ॥ ३ ॥</span> ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ |
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| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C02 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = अथो आवृतासोऽवतासो न कर्तृभिरिति ॥ | | | verse_line1 = आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीद्, नान्यत् किञ्चन मिषत् । |
| | verse_line2 = सर्वं हीदं प्राणेनाऽऽवृतम् । सोऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धः । तद्यथाऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्ध एवं सर्वाणि भूतान्यापिपीलिकाभ्यः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धानीत्येवं विद्यात् ॥ | | | verse_lines = आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीद्, नान्यत् किञ्चन मिषत् । |
| | verse_line3 = ६ ॥
| | | commentary1 = aitareya |
| | commentary1 = aitareya | |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V15 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V01 |
| | id = AIT_C02_S01_V15_B01 | | | id = AIT_C02_S04_V01_B01 |
| | text = | | | text = एको नारायणस्त्वासीत् प्रलये रमया सह । |
| | | नित्याततगुणत्वात् स आत्मेति श्रुतिषूदितः । |
| हस्तयोरेतयोरेव नित्याक्षीणं वसु स्थितम् ॥
| | इदं सर्वमपेक्ष्यासौ कालतो गुणतस्तथा । |
| तद्ध्यसह्यं बलं वायोरनन्तं किमु तद्धरेः ।
| | अग्र्य एव समस्तेभ्यस्तद्वशत्वाद् रमाऽपि सा । |
| वायोराधारभूतस्य ताभ्यां हि क्रतुनामकाः ॥
| | विद्यमानाऽपि नाग्रस्था गुणैरूना ततो यतः । |
| आवृताः सर्वजीवा हि यथैव कनकावटाः ।
| | न ब्रह्मा न शिवश्चाऽसीन्नैवान्यच्च मिषत् क्वचित्। |
| आच्छाद्यन्ते वित्तवद्भिस्ताभ्यामेवं च चेतनाः ॥
| | सुप्तास्तत्र यतो जीवाः सर्वे ब्रह्मशिवादिकाः । |
| आवृता महदाद्यास्तु देहे तिष्ठन्ति चैतयोः ।
| | असुप्ता श्रीश्च मुक्ताश्च स्वतन्त्रोन्मेषवर्जनात् । |
| विष्टब्धाश्चैव सर्वेऽपि जीवा आकाश एव च ॥
| | अनुन्मेषा एव तेऽपि स्वतन्त्रोन्मेष एकराट् । |
| स वायुः प्रकृतिश्चैव विष्टब्धौ केशवेन हि ।
| | नारायणो न चान्योऽस्ति पूर्णोन्मीलद्गुणात्मकः । |
| बृहत्वात् बृहतीत्येव तयोर्नाम प्रकीर्तितम् ॥
| | पराधीनेन वित्तेन भुञ्जन्नपि हि भिक्षुकः । |
| वायुकेशवयोः प्राणनाम सर्वप्रणायनात् ।
| | वित्तवानिति नैवोक्तस्तथा श्रीर्मुक्तिगा अपि । |
| विशेषतो बृहत्प्राणो भगवांस्तत्र केशवः ॥
| | मिषन्तोऽप्यन्यतन्त्रत्वान्न मिषन्तः कथञ्चन । |
| इति विद्यात् ... ॥ ६ ॥
| | सर्वदाऽप्येक एवायं स्वतन्त्रो नापरः क्वचित्। |
| | कालाग्र्यत्वं वक्तुमस्य प्रलये स्थितिरुच्यते । |
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| | verse_line1 = अथाऽतो विभूतयोऽस्य पुरुषस्य । तस्य वाचा सृष्टौ पृथिवी चाग्निश्च । अस्यामोषधयो जायन्ते । अग्निरेनाः स्वदयतीदमाहरतेदमाहरतेति । एवमेतौ वाचं पितरं परिचरतः पृथिवी चाग्निश्च । यावदनु पृथिवी यावदन्वग्निस्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतयोर्न जीर्यते पृथिव्याश्चाग्नेश्च य एवमेतां वाचो विभूतिं वेद । | | | verse_line1 = स ईक्षत-‘इमान् लोकान्नु सृजा’ इति स इमान् लोकान् असृजत, अम्भो मरीचीर्मरम् आपः । अदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः, प्रतिष्ठा । अन्तरिक्षं मरीचयः । पृथिवी मरः । या अधस्तात् ता आपः । स ईक्षत ‘इमे नु लोकाः, लोकपालान्नु सृजा’ इति । सोऽद्भ्यः एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत् । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = स ईक्षत-‘इमान् लोकान्नु सृजा’ इति स इमान् लोकान् असृजत, अम्भो मरीचीर्मरम् आपः । अदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः, प्रतिष्ठा । अन्तरिक्षं मरीचयः । पृथिवी मरः । या अधस्तात् ता आपः । स ईक्षत ‘इमे नु लोकाः, लोकपालान्नु सृजा’ इति । सोऽद्भ्यः एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत् । |
| | | commentary1 = aitareya |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V16 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V02 |
| | id = AIT_C02_S01_V16_B01 | | | id = AIT_C02_S04_V02_B01 |
| | text = | | | text = स ऐच्छद्भगवान् विष्णुः स्रष्टुं लोकाभिमानिनः ॥ |
| | | लोकाभिधानवद्देवाञ्जडलोकांश्च शाश्वतः । |
| ... तस्य विष्णोरङ्गानामथ वैभवम् ।
| | स लोकेभ्यः पूर्वतनान् अबाख्यान् महदादिकान् ॥ |
| उच्यते तस्य वाचा हि सृष्टावग्निः क्षितिस्तथा ॥
| | ब्रह्मशर्वादिकान् सृष्ट्वा जडैस्सह जनार्दनः । |
| शुश्रूषार्थं तस्य पृथ्वी जनयत्योषधीः प्रभोः ।
| | दिवमाकाशमुर्वीं च ससृजेऽथ द्विसप्तकान् ॥ |
| ताः पचत्यग्निरुद्युक्तः आहृता आहृताः पुनः ॥
| | इति सृष्ट्वा स लोकांस्तु पुनस्तानेव लोकपान् । |
| आहरेति वचोऽस्यापि शृण्वन्त्येव महर्षयः ।
| | अण्डान्तः स्रष्टुमैच्छच्च तेषां पूज्यत्वसिद्धये ॥ |
| मुखजत्वात् तयोर्विष्णोर्मुखं जनकमिष्यते ॥
| | अम्नामकेभ्यस्तेभ्यः स पूर्वसृष्टेभ्य एव तु । |
| आस्यभोग्यं ततो विष्णोरन्नं तौ कुरुतः सदा ।
| | सर्वजीवाधिकत्वात् तु ब्रह्माणं पुरुषाभिधम् ॥ |
| सर्वैर्यद्भुज्यते चान्नं तत्र तत्र स्थितो हरिः ॥
| | अंशेनोद्धृत्य रुद्राद्यैः सह चैनमयोजयत् । |
| तद्भुङ्क्तेऽतस्तदर्थं हि तावन्नं कुरुतस्सदा ।
| | तथैव चेतनानाञ्च भागानुद्धृत्य पिण्डवत् ॥ |
| विष्णोर्वाग्विभवं वेद य उपास्ते च सर्वदा ॥
| | चेतनाचेतनं राशिमेकस्थं विदधे प्रभुः । |
| योग्यः संस्तदुपासायाः स भूम्यग्निसमन्वितः ।
| |
| समं तयोर्व्याप्तिमांश्च तद्वन्मुक्तश्च नित्यदा ॥
| |
| अनष्टलोको वसति समीपे केशवस्य च ।
| |
| योग्या अस्या उपासायाः पृथिव्यग्निपदस्य ये ॥
| |
| योग्यास्ते वै मुख्यतया तदन्ये तत्र तौ स्थितौ ।
| |
| तत्र चर्तुं समर्था स्युर्मुक्तिं प्राप्य यथेच्छया ॥
| |
| कादाचित्कोपासने तु तावत्येषां च योग्यता ।
| |
| वेदनं ह्यापरोक्ष्येण मुख्यं भवति नान्यथा ॥
| |
| एकदेशविदो यस्मात् परोक्षज्ञानिनोऽखिलाः ।
| |
| आपरोक्ष्यं भवेद् यस्मान्नैवोपासामृते क्वचित्॥
| |
| तस्मादुपासापूर्वं तु योऽपरोक्षं प्रपश्यति ।
| |
| स एव वेद नान्यस्तु योग्यस्यैवापरोक्षदृक् ॥
| |
| तस्माद्योग्यस्योक्तफलमन्येषां किञ्चिदेव हि ।
| |
| }} | | }} |
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| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C02 |
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| | verse_line1 = प्राणेन सृष्टावन्तरिक्षं च वायुश्चान्तरिक्षं वा अनु चरन्त्यन्तरिक्षमनु शृण्वन्ति । वायुरस्मै पुण्यं गन्धमावहत्येवमेतौ प्राणं पितरं परिचरतोऽन्तरिक्षं च वायुश्च । यावदन्वन्तरिक्षं यावदनु वायुस्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतयोर्न जीर्यतेऽन्तरिक्षस्य च वायोश्च य एवमेतां प्राणस्य विभूतिं वेद । | | | verse_line1 = तमभ्यतपत् । तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाऽण्डम् । मुखाद् वाग्, वाचोऽग्निः । |
| | verse_line2 = चक्षुषा सृष्टौ द्यौश्चादित्यश्च । द्यौर्हास्मै वृष्टिमन्नाद्यं सम्प्रयच्छत्यादित्योऽस्य ज्योतिः प्रकाशं करोत्येवमेतौ चक्षुः पितरं परिचरतो द्यौश्चादित्यश्च । यावदनु द्यौः यावदन्वादित्यस्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते ॥ | | | verse_lines = तमभ्यतपत् । तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाऽण्डम् । मुखाद् वाग्, वाचोऽग्निः ।;नासिके निरभिद्येताम् । नासिकाभ्यां प्राणः , प्राणाद्वायुः ।;अक्षिणी निरभिद्येताम् । अक्षिभ्यां चक्षुः , चक्षुषः आदित्यः ।;कर्णौ निरभिद्येताम् । कर्णाभ्यां श्रोत्रम् , श्रोत्राद् दिशः ।;त्वङ् निरभिद्यत । त्वचो लोमानि, लोमभ्य ओषधिवनस्पतयः ।;हृदयं निरभिद्यत । हृदयान्मनः, मनसश्चन्द्रमाः ।;नाभिर्निरभिद्यतः । नाभ्या अपानः, अपानान्मृत्युः ।;शिश्नं निरभिद्यत । शिश्नाद् रेतः, रेतस आपः ॥ |
| | verse_line3 = यावदेतयोर्न जीर्यते दिवश्चादित्यस्य च य एवमेतां चक्षुषो विभूतिं वेद ।
| | | verse_line2 = नासिके निरभिद्येताम् । नासिकाभ्यां प्राणः , प्राणाद्वायुः । |
| | verse_line4 = श्रोत्रेण सृष्टा दिशश्च चन्द्रमाश्च । दिग्भ्यो हैनमायान्तीं ३ । दिग्भ्यो विशृणोति ॥
| | | commentary1 = aitareya |
| | verse_line5 = चन्द्रमा अस्मै पूर्वपक्षापरपक्षान् विचिनोति पुण्याय कर्मणे । एवमेते श्रोत्रं पितरं परिचरन्ति दिशश्च चन्द्रमाश्च । यावदनु दिशो यावदनु चन्द्रमास्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतेषां न जीर्यते दिशां च चन्द्रमसश्च य एवमेतां श्रोत्रस्य विभूतिं वेद ।
| |
| | verse_line6 = मनसा सृष्टा आपश्च च वरुणश्च । आऽऽपो हास्मै श्रद्धां सन्नमन्ते पुण्याय कर्मणे । वरुणोऽस्य प्रजां धर्मेण दाधारैवमेते मनः पितरं परिचरन्त्यापश्च वरुणश्च । यावदन्वापो यावदनु वरुणस्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतेषां न जीर्यतेऽपां च वरुणस्य च य एवमेतां मनसो विभूतिं वेद ॥
| |
| | verse_line7 = ७ ॥ | |
| | commentary1 = aitareya | |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V17 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V03 |
| | id = AIT_C02_S01_V17_B01 | | | id = AIT_C02_S04_V03_B01 |
| | text = | | | text = पुनरैच्छञ्जगन्नाथस्तस्याङ्गोत्पत्तिम् अच्युतः ॥ |
| | | अण्डवन्मुखमस्यासीत् प्रथमं तु शिरोऽभिधम् । |
| प्राणादिभ्यश्च वाय्वाद्या एवं विष्णोः प्रजज्ञिरे ॥
| | भिन्नमास्यं पुनस्तस्य विष्णोरेवेच्छया प्रभुः ॥ |
| ब्रह्मशेषसुपर्णेन्द्रशिवाद्या आप ईरिताः ।
| | तत्र वाङ्नामकं रूपं वह्नेरासीत् पुरातनम् । |
| ते विष्णोर्मनसा जाताः सर्वे चाबभिमानिनः ॥
| | तस्यैवाथ द्वितीयं च यदग्निरिति गीयते । |
| वैश्वदेव्यस्ततो ह्यापो वरुणश्च मनोभवः ।
| | तथैव नासिकातोऽभून् मुख्यवायोः सुतो मरुत् । |
| प्राणिनां पूर्तपुण्येषु श्रद्धारूपमनोऽधिपः ॥
| | प्राणो वायुरिति द्वेधा, चक्षुषोऽभूत् तथा रविः । |
| एवं हि सर्वदेवा हि विष्ण्वङ्गेभ्यः प्रजज्ञिरे ।
| | द्विरूप एव, कर्णाभ्यां मित्र-धर्म-अप्प-वित्तपाः । |
| स्वोत्पत्त्यङ्गं च ते विष्णोः शुश्रूषन्ते पृथक् पृथक् ॥
| | दिग्देवता द्विरूपेण बभूवुः सर्व एव च । |
| विष्णोः विषयधर्मेषु ज्ञानादिषु चतुर्मुखः ।
| | हृदयाद् गरुडानन्तशिवचन्द्राः पृथक् पृथक् । |
| श्रद्धां ददाति भूतानां वैदिकश्रवणे विपः ॥
| | मनो बुद्ध्यभिमानाश्च तन्नामानश्च जज्ञिरे । |
| तान्त्रिके शेषरुद्रौ च शक्रो यज्ञादिकर्मणि ।
| | त्वचश्च रोमनामानो वृक्षनामान एव च । |
| वायुर्गन्धवहश्चास्य भक्तिज्ञानप्रदस्तथा ॥
| | द्विविधाः पारिजाताद्या बभूवुर्ब्रह्मदेहतः । |
| भूतानां तस्य विषये त्वन्तरिक्षं च कर्मणः ।
| | हस्ताभ्यां द्विविधः शक्रः, पद्भ्यां तत्सूनुरेव च । |
| तदीयस्यैव भोगार्थं जीवानां श्रुतिचारदम् ॥
| | यज्ञस्त्वजनि, पायोश्च यमो निर्ऋतिरेव च । |
| अन्तरिक्षं च विघ्नेशः सूर्यस्तत्कर्मसिद्धये ।
| | रेतोऽम्नामा द्विरूपस्तु शिव एव च गुह्यतः । |
| भूतानां ज्योतिषो दाता द्यौरप्यन्नाद्यदायिनी ॥७ ॥
| | अपानो मृत्युरिति च मुख्यो नाभेश्च(स्तु) मारुतः ॥ १ ॥ |
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| | verse_line1 = आपाः ३ इत्यापः इति । तदिदमाप एवेदं वै मूलमदस्तूलमयं पितैते पुत्रा यत्र ह क्वच पुत्रस्य तत्पितुर्यत्र वा पितुस्तद्वा पुत्रस्येत्येतत् तदुक्तं भवति तद्धस्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेय आहं मां देवेभ्यो वेदा ओमद्देवान् वेदेतः प्रदाना ह्येत इतः सम्भृता इति ।
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| | commentary1 = aitareya
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| }} | | }} |
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| {{Bhashyam
| | </div> |
| | verse_id = AIT_C02_S01_V18
| | <div class="gr-author-note">॥ इति चतुर्थाध्याये प्रथमः खण्डः ॥</div> |
| | id = AIT_C02_S01_V18_B01
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| | text =
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| आप इत्येव देवानां ब्रह्मादीनां कथं भवेत् ।
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| नामेत्यपृच्छल्लक्ष्मीस्तं महिदासं जनार्दनम् ॥
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| आप इत्येव नामैषां भवतीत्याह स प्रभुः ।
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| इदं मदाख्यं यद् ब्रह्म ह्याप इत्यभिधीयते ॥
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| आ पूर्णत्वाद् गुणैः सर्वैस्तन्मूलमखिलस्य च ।
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| तूलभूतं तदन्यत् तु पिता ह्येष जनार्दनः ॥
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| पुत्रा ब्रह्मादयः सर्वे नैवायं वृक्षमूलवत् ।
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| स्वतन्त्रत्वाज्जगन्नाथः पितृत्वात् परमेशितुः ॥
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| तन्नामाऽऽप इति ह्येतद्ब्रह्मरुद्रादिनां भवेत् ।
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| यथा यदव इत्येव रघवः कुरवस्तथा ॥
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| पुत्रनाम पितुश्च स्यात् तत्तन्त्रत्वात् सुतस्य हि ।
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| यथा पितामहाद्याश्च पितरो नाम कीर्तिताः ॥
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| तथापि मुख्यया वृत्त्या व्यवहारव्यवस्थितिः ।
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| आप इत्येव देवानां सर्वेषां प्रददौ हरिः ॥
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| स्वकीयमेवमन्यानि पृथक् पृथगदात् प्रभुः ।
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| नारायणादिनामानि ददौ नान्यस्य केशवः ॥
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| एवं स भगवान् विष्णुर्महिदासाभिधः प्रभुः ।
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| जानन्नित्योदितज्ञानादाह देवीमिदं वचः ॥
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| देवपर्यन्तमा व्याप्तिं वेदाहं मम सर्वदा ।
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| मत्पर्यन्तं यथा व्याप्तिं देवानामपि सर्वशः ॥
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| मयि देवास्तेषु चाहमिति विद्धिवरानने ।
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| मयैतानि प्रदत्तानि पदानि ब्रह्मपूर्वकाः ॥
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| अधितिष्ठन्ति सत्ताद्या अप्येतेषां मदाज्ञया ।
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| ज्ञानकर्मबलेहाद्या मद्दत्ता इति किं वदे ॥
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| सम्भृता मत्त एवैते
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V19 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V04 |
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| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C02 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = स एष गिरिश्चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक्प्राणस्तं ब्रह्मगिरिरित्याचक्षते । गिरति ह वै द्विषन्तं पाप्मानं भ्रातृव्यं पराऽस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥ | | | verse_line1 = ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतन् । तम् अशनापिपासाभ्याम् अन्ववार्जत् । ता एनमब्रुवन्- ‘आयतनं नः प्रजानीहि , यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदाम’ इति । ताभ्यो गामानयत्, ता अब्रुवन्- ‘न वै नोऽयमलम्’ इति । ताभ्यः अश्वमानयत्, ता अब्रुवन्- ‘न वै नोऽयमलम्’ इति । ताभ्यः पुरुषमानयत्, ता अब्रुवन्- ‘सुकृतं बत’ इति । पुरुषो वाव सुकृतम् । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतन् । तम् अशनापिपासाभ्याम् अन्ववार्जत् । ता एनमब्रुवन्- ‘आयतनं नः प्रजानीहि , यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदाम’ इति । ताभ्यो गामानयत्, ता अब्रुवन्- ‘न वै नोऽयमलम्’ इति । ताभ्यः अश्वमानयत्, ता अब्रुवन्- ‘न वै नोऽयमलम्’ इति । ताभ्यः पुरुषमानयत्, ता अब्रुवन्- ‘सुकृतं बत’ इति । पुरुषो वाव सुकृतम् । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S04_V04" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S04_V04"> |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V19 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V04 |
| | id = AIT_C02_S01_V19_B01 | | | id = AIT_C02_S04_V04_B01 |
| | text = | | | text = एवं रूपद्वयेनापि स्तुवन्तो विष्णुमव्ययम् । |
| | | दिव्याम्बराः कुण्डलिनः प्राविशन्नुदकार्णवम् । |
| . ... स एष भगवान् गिरिः ।
| | तदाऽशनापिपासाख्यं द्विरूपं मारुतं पुनः । |
| गिरणात् सर्वभूतानां चक्षुर्नामास्य दर्शनात् ॥
| | तस्मिन् देवसमूहे तु विष्णुः प्रावेशयत् प्रभुः । |
| सर्वश्रोतृत्वतः श्रोत्रं मनो मन्तृत्वहेतुतः ।
| | तेऽब्रुवन् देहि नो वासं यत्र चान्नमदामहे । |
| प्राणनामा प्रणेतृत्वात् तमेनं गुणपूर्तितः ॥
| | गोरूपमेभ्यो ब्रह्माणं ददौ नारायणः प्रभुः । |
| गिरणाच्चाखिलस्यास्य प्राहुर्ब्रह्मगिरिं प्रभुम् ।
| | तत्र प्रविश्य ते देवा नालमित्यब्रुवन् पुनः । |
| य एवं वेद तं विष्णुमापरोक्ष्येण शाश्वतम् ॥
| | अश्वरूपं विरिञ्चश्च पुनरेवाददत् प्रभुः । |
| गिरत्येवाखिलं पापं भ्रातृवत् सह संस्थितम्म् ।
| | तद्रूपेऽपि प्रविश्यैव नालमित्यब्रुवन् पुनः । |
| पराभवति पाप्माऽस्य द्वेष्टा निरयगः सदा ॥
| | पूर्वसृष्टं पुमाकारं ब्रह्मणोऽदात् पुनर्हरिः । |
| | तद् दृष्ट्वैवालमित्यूचुः..... |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V20 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V05 |
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| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = स एषोऽसुः । स एष प्राणः । स एष भूतिश्चाभूतिश्च तं भूतिरिति देवा उपासाञ्चक्रिरे । ते बभूवुस्तस्माद्धाप्येतर्हि सुप्तो भूर्भूररित्येव प्रश्वसिति । अभूतिरित्यसुरास्ते ह पराबभूवुर्भवत्यात्मना पराऽस्य द्विषन् पाप्मा भ्रातृव्यो भवति य एवं वेद ॥ | | | verse_line1 = ता अब्रवीद्- ‘यथाऽऽयतनं प्रविशत’ इति । अग्निः वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत् । वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् । आदित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशत् । दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन् । ओषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशन् । चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशत् । मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशत् । आपो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = ता अब्रवीद्- ‘यथाऽऽयतनं प्रविशत’ इति । अग्निः वाग् भूत्वा मुखं प्राविशत् । वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् । आदित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशत् । दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन् । ओषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशन् । चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशत् । मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशत् । आपो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S04_V05" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S04_V05"> |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V20 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V05 |
| | id = AIT_C02_S01_V20_B01 | | | id = AIT_C02_S04_V05_B01 |
| | text = | | | text = ... विशतेति स चाब्रवीत् । |
| | | विविशुश्च यथोत्पन्नाः सर्वे देवाश्चतुर्मुखम् ॥ |
| असनाद्भगवान् सोऽसुः सर्वस्यापि जनार्दनः ।
| |
| प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते ॥
| |
| स एष भूतिनामाऽपि ज्ञानैश्वर्यादिभूतिदः । | |
| अज्ञानादिप्रदातृत्वात् स एवाभूतिनामकः ॥
| |
| सुखज्ञानादिगुणदं पूर्णं सर्वगुणैः प्रभुम् ।
| |
| उपासते तं वाय्वाद्या देवास्तस्माच्च तेऽखिलाः ॥
| |
| बभूवुः सुखसज्ज्ञानपूर्वैः सर्वगुणैर्युताः ।
| |
| देवानामपि सर्वेषां प्रधानोऽद्यापि मारुतः ॥
| |
| स्थित्वा सुप्तेषु विष्णुं तं भूर्भूरित्येव शंसति ।
| |
| भूःशब्दार्थो भूतिरिति वैपरीत्येन चासुराः ॥
| |
| अभूतिकारकोऽस्माकमैश्वर्यादिगुणोज्झितिः ।
| |
| इत्येवोपासते तस्मात् पराभूताश्च सर्वशः ॥
| |
| ज्ञानैश्वर्यादिभिर्हीनाः पेतुरन्धे तमस्यथ ।
| |
| य एवं वेद तं विष्णुं भूतिदं भूतिरूपिणम् ॥
| |
| भावाभावं च देवानां दैत्यानां चैवमेव तु ।
| |
| ज्ञानैश्वर्यादिभिः सोऽपि भवेत् तस्य परात्मनः ॥
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| प्रसादात् तस्य पाप्मा च पराभवति सर्वशः ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V21 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V06 |
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| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C02 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = स एष मृत्युश्चैवामृतं च । तदुक्तमृषिणा– अपाङ्प्राङेति स्वधया गृभीत इति । अपानेन ह्ययं यतः प्राणो न पराङ्भवति । अमर्त्यो मर्त्येना सयोनिरित्येतेन हीदं सर्वं सयोनि मर्त्यानि हीमानि शरीराणी३ । अमृतैषा देवता । ता शश्वन्ता विषूचीना वियन्ता न्य१ न्यं चिक्युर्न निचिक्युरन्यमिति निचिन्वन्ति हैवेमानि शरीराणी३ । अमृतैवैषा देवता । अमृतो ह वा अमुष्मिं ल्लोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ | | | verse_line1 = तमशनापिपासे अब्रूताम्- ‘आवाभ्याम् अभिप्रजानीहि’ इति । ते अब्रवीद्- ‘एतास्वेव वां देवतास्वाभजामि, एतासु भागिन्यौ करोमि’ इति । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = तमशनापिपासे अब्रूताम्- ‘आवाभ्याम् अभिप्रजानीहि’ इति । ते अब्रवीद्- ‘एतास्वेव वां देवतास्वाभजामि, एतासु भागिन्यौ करोमि’ इति ।;तस्माद्यस्मै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते, भागिन्यावेवास्याम् अशनापिपासे भवतः ॥ २ ॥ |
| | | verse_line2 = तस्माद्यस्मै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते, भागिन्यावेवास्याम् अशनापिपासे भवतः ॥ २ ॥ |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
|
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|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S04_V06" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S04_V06"> |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V21 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V06 |
| | id = AIT_C02_S01_V21_B01 | | | id = AIT_C02_S04_V06_B01 |
| | text = | | | text = अशनापिपासामानी तु द्विरूपो मारुतोऽवदत् । |
| | | ‘कुर्वाज्ञामावयोश्चैव यथा त्वच्छासनानुगौ ॥ |
| स एष भगवान् विष्णुर्मृत्युदो मोक्षदस्तथा ॥
| | नित्यं भवाव’ इति, हरिः ‘सर्वत्र प्रविश’ इत्यमुम् । |
| स एव जीवनकरो यदाऽपानेन संयुतम् ।
| | आह, तस्माद् देवतानां सर्वासां भागभुङ् मरुत् ॥ |
| प्राणं नियमयत्यस्मिञ्च्छरीरे पुरुषोत्तमः ॥
| | एक एव प्राणनामा, नाभिस्थोऽपि स एव हि । अशनापिपासापानश्च मृत्युश्चेति चतुर्विधः ॥ |
| शरीराद् बहिरेतौ तु यदा निःसारयत्यजः ।
| | एक एव महान् वायुः सर्वदेवेषु संस्थितः ॥ २ ॥ |
| तदा मृत्युप्रदश्चायं मुक्तानामपि जीवनम् ॥
| |
| प्राणादेव हि तत्रापि प्राणाधारो जनार्दनः ।
| |
| अर्वाक्प्राक्च सदा गच्छेद्वायुरानन्दरूपिणा ॥
| |
| अनेनैव गृहीतो हि प्राणोऽपानेन संयुतः ।
| |
| अनेन हरिणा यस्मान्नियतो न पराग्भवेत् ॥
| |
| अमर्त्यस्तत्प्रसादेन वायुर्देहैः सह स्थितः ।
| |
| अनित्या अपि देहास्ते शश्वत् सन्त्याविमोक्षतः ॥
| |
| स्थूलसूक्ष्मविभागेन किमु वायुर्जगत्प्रभुः ।
| |
| नानागती तु तावेतौ वायुः प्राप्नोति केशवम् ॥
| |
| शरीरं तु विनष्टं स्यात् पञ्चत्वमुपगच्छति ।
| |
| जडं तज्जडतामेति चेतना वायुदेवता ॥
| |
| चेतनेशं हरिं याति विरुद्धगमनौ च तौ ।
| |
| ऊर्ध्वं गच्छति देवः स देहोऽधः पतति क्षितौ ॥
| |
| दृश्यमेतच्छरीरं चाप्यदृश्या वायुदेवता ।
| |
| य एवं वेद तं वायुममृतं सर्वनायकम् ॥
| |
| पूर्णानन्देन हरिणा गृहीतं तद्वशं सदा ।
| |
| स मुक्तो लोकमाप्नोति विष्णोर्मुक्तैश्च दृश्यते ॥
| |
| इति च ।
| |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam
| | </div> |
| | verse_id = AIT_C02_S01_V21
| | <div class="gr-author-note">॥ इति चतुर्थाध्याये द्वितीयः खण्डः ॥</div> |
| | id = AIT_C02_S01_V21_B01
| |
| | text =
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| ब्रह्मपन्थाः सत्यं कर्मेति तस्य नारायणस्य वासुदेवाद्याः क्रमेण चतस्रो मूर्तयः । नासिकायां यन्नेत्रयोर्मध्ये विनतमिव किञ्चिन्नतस्थानं तत्सूर्यलोकस्थानीयं विद्यात् । तथेति निर्णयः । इरामया इति दैर्घ्यमवधारणार्थम् ।
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| | | verse_id = AIT_C02_S04_V07 |
| | | document_id = AIT |
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| | | verse_line1 = स ईक्षेत- ‘इमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा’ इति । सोऽपोऽभ्यतपत् । ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत । या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् । तदेतत् पराङ् अत्यजिघांसत् । |
| | | verse_lines = स ईक्षेत- ‘इमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा’ इति । सोऽपोऽभ्यतपत् । ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत । या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् । तदेतत् पराङ् अत्यजिघांसत् । |
| | | commentary1 = aitareya |
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|
| |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S01_V21 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V07 |
| | id = AIT_C02_S01_V21_B01 | | | id = AIT_C02_S04_V07_B01 |
| | text = | | | text = पुनरैच्छत् केशवोऽसावन्नमेभ्यः सृजा इति । |
| | | अबाख्याः देवताः पूर्वसृष्टा ब्रह्मादिकाः पुनः । |
| दैर्घ्यं प्लुतं च हिङ्कारो बिन्दुरप्यवधारणे इति शब्दनिर्णये ।
| | ददर्श(ददर्शाऽशु .हृ) सुविशालाभ्यां नेत्राभ्यां पुष्करेक्षणः । |
| | तद्दर्शनात् तदिच्छातस्तासां देहोऽभवत् पृथक् । |
| | सर्वासामपि देहैकदेशेभ्यो मिळितं शुभम् । |
| | सर्वैरधिष्ठितं चैव विरिञ्चेन विशेषतः । |
| | दिव्यावयवसम्पन्नमेकमेव सुलोचनम् । |
| | भोग्यभोक्त्रात्मना नास्ति तस्य दुःखं कथञ्चन । |
| | ते हि देवाः स्वयं भोग्याः स्वयं भोक्तार एव च । |
| | क्रीडन्ते मोदिनो नित्यम्, तथाऽप्यन्नात्मकस्त्वसौ । |
| | क्रीडयाऽपाक्रमत् किञ्चित्...। |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V21 | | {{VerseBlock |
| | id = AIT_C02_S01_V21_B01 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V08 |
| | text = | | | document_id = AIT |
| | | | chapter_id = AIT_C02 |
| ब्रह्मा हैवं ता३ ईते ।
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = तद् वाचाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोद् वाचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनद् वाचाऽग्रहैष्यद् अभिव्याहृत्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् । |
| | | verse_lines = तद् वाचाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोद् वाचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनद् वाचाऽग्रहैष्यद् अभिव्याहृत्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तत् प्राणेनाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् प्राणेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनत् प्राणेनाग्रहैष्यद् अभिप्राण्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तच्चक्षुषाऽजिघृक्षत् , तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्चक्षुषाऽग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यत् श्रुत्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तत् त्वचाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् त्वचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनत् त्वचाऽग्रहैष्यत् स्पृष्ट्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तन्मनसाऽजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् मनसा ग्रहीतुम् । स यद्धैतन्मनसाऽग्रहैष्यद् ध्यात्वा हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद् विसृज्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् ।;तदपानेनाजिघृक्षत् , तदावयत् । सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद् वायुः । अन्नायुर्वा एष यद् वायुः । |
| | | verse_line2 = तत् प्राणेनाजिघृक्षत्, तन्नाशक्नोत् प्राणेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनत् प्राणेनाग्रहैष्यद् अभिप्राण्य हैवान्नम् अत्रप्स्यत् । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
|
| |
|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S04_V08" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S04_V08"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S01_V21 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V08 |
| | id = AIT_C02_S01_V21_B01 | | | id = AIT_C02_S04_V08_B01 |
| | text = | | | text = ... तं तदाऽसौ चतुर्मुखः । |
| | अत्तुं वागादिभिः सर्वैरैच्छन्नाप्यशकत् तदा । |
| | जानन्नपि क्रीडयैव तारतम्यं प्रकाशयन् । |
| | एवं चकार ब्रह्मा स क्वाज्ञानं लोककर्तरि । |
| | क्षुत्पिपासदयश्चैव देवानां भोगसाधकाः । |
| | न तु पीडाकरास्तेषामैश्वर्यादिगुणोन्नतेः । |
| | अन्नमूर्तिं ततो ब्रह्मा प्रधानेनैव वायुना । |
| | अपानाख्येनात्तुमैच्छत् तदैवाशकदाशु सः । |
| | तस्माद् भोक्तैक एवासौ सर्वस्यान्नस्य मारुतः । |
| | तत्प्रसादात् परेऽश्नन्ति किञ्चित् किञ्चिन्न चाखिलम् । |
| | आयूरूपोऽखिलानां च देवानां वायुरेव हि । |
| | अन्नदेवस्य चाऽयुः स तस्माद्देवोत्तमो मरुत् ॥ |
| | आयुःशब्दो ज्ञानवाची गतिवाची च यत्ततः । |
| | चेष्टामोक्षज्ञानदाता सुराणां मारुतस्ततः ॥ |
| | अन्योन्यगुणदातृत्वात् समानौ ब्रह्ममारुतौ । |
| | तस्मान्मोक्षे सुखे ज्ञाने विष्णुभक्त्यादिकेष्वपि(भक्त्यादिकेषु च .हृ) ॥ |
| | सर्वेभ्यश्चाधिकौ तौ हि तयोर्विष्णुः परस्सदा । |
| | }} |
|
| |
|
| देशतः कालतोऽर्थाच्च बलतो गुणतस्तथा ।
| | </div> |
| स्वरूपतोऽपि नैव स्याद् भेदोऽत्यल्पोपि यत्र हि ॥
| | {{VerseBlock |
| केवलैश्वर्ययोगेन यत्र सङ्ख्यादिवद्भवेत् ।
| | | verse_id = AIT_C02_S04_V09 |
| स्वरस्पर्शविभागेन तत्रोक्तिः स्याद् विभक्तिषु ॥
| | | document_id = AIT |
| अचिन्त्यात् तु तथैश्वर्यादेकोऽपि बहुरूपवान् ।
| | | chapter_id = AIT_C02 |
| प्रकाशयेद्यतो विष्णुः सर्वत्राप्यविशेषवान् ॥
| | | verse_type = mantra |
| न विशेषो हि रूपाणां मत्स्यादीनां कथञ्चन ।
| | | verse_line1 = स ईक्षत- ‘कथं न्विदं मदृते स्याद्’ इति । स ईक्षत- ‘कतरेण प्रपद्या’ इति । स ईक्षत- ‘यदि वाचाऽभिव्याहृतम्, यदि प्राणेनाभिप्राणितम्, यदि चक्षुषा दृष्टम्, यदि श्रोत्रेण श्रुतम्, यदि त्वचा स्पृष्टम्, यदि मनसा ध्यातम्, यद्यपानेनाभ्यपानितम्, यदि शिश्नेन विसृष्टम्, अथ कोऽहम्’इति । |
| नैश्वर्ये न बले चैव नानन्दादिगुणेष्वपि ॥
| | | verse_lines = स ईक्षत- ‘कथं न्विदं मदृते स्याद्’ इति । स ईक्षत- ‘कतरेण प्रपद्या’ इति । स ईक्षत- ‘यदि वाचाऽभिव्याहृतम्, यदि प्राणेनाभिप्राणितम्, यदि चक्षुषा दृष्टम्, यदि श्रोत्रेण श्रुतम्, यदि त्वचा स्पृष्टम्, यदि मनसा ध्यातम्, यद्यपानेनाभ्यपानितम्, यदि शिश्नेन विसृष्टम्, अथ कोऽहम्’इति । |
| इत्यादिशब्दनिर्णयवचनात् द्विवचनमत्र व्यवहारमात्रमिति दर्शयितुं ता इत्युक्तम् ।
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S04_V09" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S04_V09"> |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V21 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V09 |
| | id = AIT_C02_S01_V21_B01 | | | id = AIT_C02_S04_V09_B01 |
| | text = | | | text = देवतानां प्रवेशात् तु पूर्वमेव जनार्दनः । |
| | इत्थमैक्षत देवेशो ‘ब्रह्माद्या यदि मां विना । |
| | क्रियादिषु समर्थाः स्युर्न मे विष्ण्वभिधा भवेत् ।’ |
| | सर्वचेष्टयितृत्वाच्च विशिष्टबलतस्तथा । |
| | विष्णुरित्यभिधा मह्यम्, सा न युक्ता दिवौकसाम् । |
| | स्वतन्त्रत्वे, ततः सर्वे मद्वशा एव नान्यथा । |
| | तस्मादेषां प्रवृत्त्यर्थं प्रवेक्ष्ये सह वायुना । |
| | }} |
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| संहितायां यत्र दैर्घ्यं पदे यत्र न विद्यते ।
| | </div> |
| उक्तार्थस्य महाधिक्यं श्रुतेस्तत्र विवक्षितम् ॥
| | {{VerseBlock |
| इत्यतो ब्रह्माहेति दैर्घ्यमपि परब्रह्मत्वविवक्षया ।
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| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विदृतिर्नाम द्वाः । तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथाः । त्रयः स्वप्नाः । अयमावसथोऽयमावसथ इति । |
| | | verse_lines = स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विदृतिर्नाम द्वाः । तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथाः । त्रयः स्वप्नाः । अयमावसथोऽयमावसथ इति । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V21 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V10 |
| | id = AIT_C02_S01_V21_B01 | | | id = AIT_C02_S04_V10_B01 |
| | text = | | | text = इति मत्वा विरिञ्चस्य शरीरं प्रविवेश सः । |
| | मूर्धन्यनाड्या प्रथमं ब्रह्मवायुसमन्वितः । |
| | अग्न्यादयस्ततः पश्चात् प्रविष्टास्तन्नियोजिताः । |
| | प्रपदाभ्यां तथाऽन्येन रूपेण प्रविवेश सः । |
| | बिभर्ति देहं तेनैव मूर्धाविष्टेन(मूर्ध्नाविष्टेन) चेष्टयन् । |
| | नारायणो वासुदेव इति द्वेधा व्यवस्थितः । |
| | मूर्धाविष्टो(मूर्ध्नाविष्टो) वासुदेवस्तस्य चावसथास्त्रयः । |
| | अक्षि कण्ठो हृदित्येवं त एव स्वप्ननामकाः । |
| | आप्नोत्यत्र स्वयं विष्णुरतः स्वप्नाः प्रकीर्तिताः । |
| | अनिरुद्धादिरूपेण त्रिधा तेषु व्यवस्थितः । |
| | दाताऽवस्थात्रयस्यास्य जीवस्य क्रमशो विभुः । |
| | सुषुम्नायां वासुदेवो मूर्धन्येव व्यवस्थितः । |
| | तस्यामेव ब्रह्मनाड्यां स्थितो नारायणः प्रभुः । |
| | }} |
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| अद उ एव नारायणाख्यमधिदैवतं अन्यानि दैवतमात्राणि । स्थानान्तरेऽन्येषामप्यधिदैवत्वकथनम् । कर्मजदेवाद्यपेक्षया । मुख्याधिदैवतं नारायण एव । तस्योष्णिग्लोमानीत्यादि लोमसूष्णिगित्याद्यर्थे । सप्तसु प्रथमा इति सूत्रात् । सच्छन्दोऽभिश्छन्न इति वाक्यशेषात् । ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् इत्यादिवच्च ।
| | </div> |
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| | | verse_line1 = स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् । किमिहान्यं वावदिषदिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्मततममपश्यत् । इदमदर्शमिती३ँ (अयं रङ्गस्वरः)। तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते। परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ ३ ॥ |
| | | verse_lines = स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् । किमिहान्यं वावदिषदिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्मततममपश्यत् । इदमदर्शमिती३ँ (अयं रङ्गस्वरः)। तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते। परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ ३ ॥ |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S04_V11" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S04_V11"> |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V21 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V11 |
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| | text = | | | text = स एव भगवान् विष्णुः प्रादुर्भावात्मना पुनः । |
| | | जातो मत्स्यादिरूपेण सर्वभूतेषु चाऽविशत् । |
| <span class="gr-reference gr-ref-Skanda-id">अङ्गेषु यस्य छन्दांसि देवा लोका मखा अपि ।
| | ‘असुराणां निहन्तारं ज्ञानादिगुणदं तथा । |
| तद्वशा नियता नित्यं नमस्तस्मै परात्मने ॥</span> इति स्कान्दे ।
| | चेष्टाप्रदं च भूतेषु(देहेषु) न मदन्यं वदत्यपि’ । |
| | इति मत्वा जगन्नाथो दैत्यनिग्रहणेच्छया । |
| | ज्ञानदानार्थमपि तु प्रादुर्भूतो भुवि प्रभुः । |
| | तथा जीवेषु सर्वेषु प्रविष्टः प्रेरणेच्छया । |
| | को ह्यन्यस्तमृते विष्णुम् एतत्कर्म करिष्यति । |
| | स सर्वगुणसम्पूर्णं सर्वगं नित्यमव्ययम् । |
| | एतदेवस्वरूपं स त्वपश्यदवतारगम् । |
| | तस्मात् सर्वावताराश्च सर्वजीवेषु संस्थिताः(च स्थिताः .हृ) । |
| | प्रादुर्भावाः सर्वगुणैः पूर्णा एव सदा स्थिताः । |
| | पश्यन्ति च तथा नित्यं निर्दोषोरुस्वसंविदा । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S01_V21 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V11 |
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| | text = | | | text = गुणपूर्णस्वरूपस्य त्वापरोक्ष्येण दर्शनात् । |
| | | सर्वदैव ह्यसौ विष्णुरिदन्द्रो नामतो मतः । |
| अस्मै पुण्याय कर्मण इत्येतमुद्दिश्य जीवानां पुण्यकर्म कर्तुम् । तैर्हि स्तुत्यादिकर्माणि कृतानि श्रोत्रेण शृणोति भगवान् । दिग्भ्योऽप्यन्य एव विशृणोति जीवः । अन्येषां जीवानां श्रवणजं भोगं स्वश्रोत्रेण दिग्भिरननुगृहीतेनैव भगवान् भुङ्क्ते ।न च जीववागादिना पृथिव्यग्नादिकं सृष्टमित्यत्र किञ्चिन्मानमस्ति । मुखादिन्द्रश्चाग्निश्चेत्यादिना भगवतः सकाशाद्धि सर्वेषां सृष्टिः प्रसिद्धा । सृष्टिभेदादन्यथावचनम् । न च मुख्यकारणाङ्गीकारेऽविरोधे औपचारिकं कारणमङ्गीकर्तुं युक्तम् । अतिप्रसङ्गात् । न हि यत्ककिञ्चित् कारणत्वमस्तीत्येतावता ब्राह्मणस्य चण्डालः पितेत्युच्यते । पितृत्वं चात्रोक्तं वाचं पितरमित्यादिना ।
| | ब्रह्मादीनां हि सर्वेषां तत्प्रसादेन जायते । |
| | जानन्ति न स्वतस्तेन नेदन्द्रास्ते प्रकीर्तिताः । |
| | रमाऽपि तत्प्रसादेन जानाति किमुतापरे । |
| | अल्पज्ञाना अल्पगुणा अल्पानन्दाश्च तेऽखिलाः । |
| | रमाऽजशङ्करेन्द्राद्यास्तेनानिन्द्राः क्रमेण ते । |
| | पापैरज्ञाततां देवा मानयन्ति सदाऽऽत्मनः । |
| | हर्षेण, तेन विष्णुः स इन्द्र इत्यभिशब्द्यते । |
| | नेदन्द्रताऽसुरादीनां ज्ञायेतेति श्रुतिर्हरिम् । |
| | इन्द्र इत्येव वदति पारोक्ष्येणोरुसद्गुणम् । |
| | इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् । |
| }} | | }} |
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| | text = | | | text = आततगुणत्वाद् आत्मा नारायणः । ‘ब्रह्म’, ‘पन्थाः’, ‘सत्यम्’ ‘कर्म’इति तस्यैव पञ्चरात्रप्रसिद्धैरेव नामभिरारब्धत्वाच्च । |
| | | ‘मुख्यतः कर्मनामा तु प्रादुर्भावात्मको हरिः । |
| मनुष्याणां तु यत्कर्म न देवोत्पत्तिकारणम् ।
| | अनिरुद्धतनुश्चैव तत्र ह्यमितचेष्टितः(ह्यमितचेष्टता .हृ) । |
| दैवतैरुपकारस्तु क्रियते नरकर्मणाम् ॥
| | कर्माभासा जीवसङ्घाः, सत्यं प्रद्युम्ननामकः । |
| देवानां कर्मणैवैते जायन्ते सर्वमानुषाः ।
| | सङ्कर्षणो हरिः पन्थाः, ब्रह्मोक्तो वासुदेवकः’ ॥ इत्यादि च (हि) नामनिर्णये । |
| प्रधानत्वान्न देवानां नृकर्मोत्पत्तिकारणम् ॥
| |
| इति च ब्रह्माण्डे ।
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| }} | | }} |
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| | text = | | | text = ‘मत्सीन्द्रमिन्दो पवमान विष्णुम्’ इत्यादिश्रुतौ तस्मिन्नेव प्रसिद्धस्येन्द्रशब्दस्यात्र बहुशोऽभ्यासाच्च । अकारस्य च विष्णावेव प्रसिद्धस्यात्राप्यभ्यासात् । |
| | | ‘तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी’(छां.१.६.७) इति सूर्यमण्डले पुण्डरीकाक्षत्वेन निर्दिष्टस्यात्रापि ‘य एष तपति’ इत्यादिना बहुशोऽनुसन्धानाच्च(अभ्यासाच्च) । सूर्यो हि ‘हिरण्याक्षः सविता देव आगात्’(ऋ.सं.१.३५.८) इति पिङ्गलाक्षः(पिङ्गाक्षः .हृ) प्रसिद्धः । |
| आह महिदास ऐतरेय इति तु सर्वस्य वचनस्य तदीयत्वज्ञापनार्थं न तु सन्निहितस्यैव । यथेन्द्रं कुत्स इत्यादि । यथा च पूर्वं तु बादरायणो हेतुव्यपदेशात् इति ॥ ८ ॥
| | ‘विरूपाक्षः शिवः सूर्यः सुराचार्यो विनायकः । |
| | पुण्डरीकेक्षणो विष्णुः सहस्राक्षः सुराधिपः ॥ इति च स्कान्दे । |
| }} | | }} |
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| | id = AIT_C02_S01_author_note | | | id = AIT_C02_S04_V11_B01 |
| | text = | | | text = ‘यो देवानां नामधा एक एव’(ऋ.सं.१०.८२.३),‘नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति’(भाल्लवेयश्रुतिः, ब्र.सू.भा.१.१.१) , ‘यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुः ’(ब्रह्माण्डे,आथर्वाण.अ-१,ख-२.१), |
| | | ‘चन्द्रसूर्यादयः शब्दा विष्णावेव हि मुख्यतः । |
| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयप्रघट्टके प्रथमोऽध्यायः ॥
| | उपचारात् तदन्येषां विष्णुनैव कृताः पुरा’ ॥ |
| | extra_class = gr-author-note
| | इत्यादिना तस्यैव सर्वनामवत्वाच्च । ‘ णकारो बलं षकारः प्राण आत्मा’ इत्यादिनाऽन्ते विष्णुशब्दव्याख्यानेनोपसंहाराच्च । |
| }} | | }} |
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| === द्वितीयोऽध्यायः ===
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| | | verse_id = AIT_C02_S04_V11 |
| | document_id = AIT
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| | chapter_num = 2
| | | text = ‘आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् । |
| | section_num = 2
| | न वर्तन्ते तदन्यत्र शृङ्गिबेरेऽग्निशब्दवत् ॥’ इति च पाद्मे । |
| | title = द्वितीयोऽध्यायः
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| | document_id = AIT | |
| | chapter_id = AIT_C02 | |
| | verse_type = mantra
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| | verse_line1 = एष इमं लोकमभ्यार्चत् पुरुषरूपेण य एष तपति । प्राणो वाव तदभ्यार्चत् । प्राणो ह्येष य एष तपति ।
| |
| | commentary1 = aitareya
| |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V01 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V11 |
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| | text = | | | text = ‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’(ब्राह्मसंहिता), ‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः’(चतुर्वेदोपनिषत्,गीता.नि.१.१.१) , ‘वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’(गोपालतापिन्युपनिषत्,गीता.नि.१.१.१) ॥ इत्यादि श्रुतिभ्यश्च । |
| | |
| एष नारायणो देवो वायुना सहेमं लोकमभ्यार्चत् । ब्रह्मादिशरीरेषु प्रविवेश । पुरुष इत्यन्तर्यामिरूपस्याख्या पुरि शेत इति । प्रसिद्धत्वाच्च पञ्चरात्रेषु । य एष सूर्यमण्डले स्थित्वा तपति स भगवान् नारायणः । य आदित्ये तिष्ठन्नादित्यादन्तरो यमादित्यो न वेद इत्यादिश्रुतिभ्यः । य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते इत्युक्त्वा तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इत्युक्तत्वान्न शिवादयः । शिवो हि विरूपाक्षः । प्रसिद्धश्च पुण्डरीकाक्ष इति भगवान्नारायणः । यमादित्यो न वेदेत्युक्तत्वान्नादित्यः । भेदव्यपदेशाच्चान्यः इति भगवद्वचनम् ।
| |
| }} | | }} |
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| | text = | | | text = अग्रशब्दो गुणाधिक्यवाची । इदं रमाब्रह्माशिवादिकं सर्वं जगदपेक्ष्यात्मैवाग्रे ‘विष्णुरेवाग्र्यः सर्वगुणैः’इत्यर्थः । तत्र हेतुः तदन्यत् किञ्चिन्न मिषदासीत् । सर्वस्याप्युन्मेषणं नासीद् इत्यर्थः । स्वत उन्मेषणं कस्यापि नास्ति । अस्तिशब्दवद् आसीच्छब्दोऽपि सर्वकालसाधारणः । भगवत्प्रसादादेव सर्वदा सर्वं किञ्चिदुन्मिषति । स्वातन्त्र्येण पूर्णोन्मेषो विष्णुरेव । |
| | |
| वृत्रं यदिन्द्र शवसावधीरहिमादित् सूर्यं दिव्यारोहयो दृशे ।
| |
| यत्सूर्यस्य हरितः पतन्तीः पुरस्सतीरुपरा एतसे कः ॥
| |
| सीदन्निन्द्रस्य जठरे कनिक्रदन्नृभिर्यतस्सूर्यमारोहयो दिवि।
| |
| चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोस्सूर्यो अजायत ।
| |
| यस्सूर्यं य उषसं जजान यो अपां नेता स जनास इन्द्रः ।
| |
| उद्वेति प्रसविता जनानां महान् केतुरर्णवः सूर्यस्य ।
| |
| येनावृतं खं च दिवं महीं च येनादित्यस्तपति तेजसा भ्राजसा च ।
| |
| यमन्तः समुद्रे कवयो वयन्ति यदक्षरे परमे प्रजाः ।
| |
| तमेताः पञ्चदेवताः परिम्रियन्ते विद्युद्वृष्टिश्चन्द्रमा आदित्योऽग्निः
| |
| इत्यादौ सूर्यस्य सर्वत्र पराधीनत्वावगतेश्च ।
| |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V01 | | | verse_id = AIT_C02_S04_V11 |
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| | text = | | | text = ‘उन्मेषो गुणसम्पूर्तेरुद्रिक्तानुभवः स्मृतः । |
| | तदेव मिषणं नाम, सद्रूपं मिनुते यतः ॥ |
| | मिषच्च नान्यद् विष्णोर्हि किमुतोन्मिषदिष्यते । |
| | उच्चैर्मिषन् हि भगवान् सर्वदैव जनार्दनः ॥’इति च सत्तत्त्वे । |
| | }} |
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| ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्तीनारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः ।
| | {{Bhashyam |
| केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुः धृतशङ्खचक्रः ॥
| | | verse_id = AIT_C02_S04_V11 |
| इति नारसिंहपुराणे । | | | id = AIT_C02_S04_V11_B01 |
| | | text = ‘नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति॥’(भा.१.२३) इति च भारते । |
| }} | | }} |
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| | text = | | | text = सर्वजीवानां रमायाश्च प्रलये विद्यमानत्वादेव न अग्र इति कालापेक्षया । तदधीनमिषत्त्वादन्येषाम्, अग्र्यः स एवेत्याशयः । तदधीनत्वमेव तेषां सृष्ट्यादिना दर्शयति । स्थूलशरीरस्य पूर्वाभावस्तत एवार्थतः सिद्ध्यति । |
| | | ‘प्रलयेऽप्यखिलं देवी रमा विष्णुप्रसादतः । |
| तापनी पाचिका चैव शोषणी च प्रकाशनी ।
| | जानाति नित्यज्ञानेन, मुक्ता ध्यानस्थिता लये ॥’ इति च सत्तत्त्वे । |
| नैव राजन् रवेः शक्तिः शक्तिर्नारायणस्य सा ॥ इति पाद्मे ।
| | ब्रह्मादीनां शरीरान्तरस्यापि प्रलयेऽनुक्तेरेवाभावः सिद्ध्यति । |
| | ‘आत्मा ब्रह्माग्र इत्यादि गुणाग्र्यत्वं हरेर्वदेत् । |
| | कालज्यैष्ठ्यं न, यस्मात् तत् सृष्ट्युक्तेरेव सिध्यति ॥’इति वाक्यनिर्णये । |
| | गुणाग्र्यतायामेव कालज्यैष्ठ्यस्याप्यन्तर्भावाच्च । |
| }} | | }} |
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| | text = | | | text = ‘अं= विष्णुं बिभर्तीत्यम्भः= विष्णुलोकः’, दिवः परे महदादयश्च । दिव्यपि भगवान् प्रतितिष्ठतीति प्रतिष्ठा । तेषु सर्वेषु प्रत्यक्षतश्चरति विष्णुस्तस्मादम्भ इत्युच्यते । दिवः परे द्यौश्चाम्भोनामका इत्यर्थः । सूर्यमरीचीनां तत्र विशेषेण वितत्वाद् अन्तरिक्षं मरीचयः, मरीचीनामयनात् । पृथिव्यां क्षिप्रं मरन्तीति पृथिवीमरः । |
| | | ‘भूतेभ्योऽनन्तरं त्वण्डं सृष्ट्वा विष्णुः पुरा प्रभुः । |
| यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
| | लोकभेदांश्च चक्रेऽत्र, पश्चाद् ब्रह्मा विशेषतः । |
| यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
| | सम्यक् चकार लोकांस्तान् लोककर्ता ततः स च ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते । |
| इति च । | |
| }} | | }} |
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| | text = | | | text = या अधस्तात् पूर्वमेव सृष्टा देवताः ता आप इत्युच्यन्ते । आपा इत्याप इति इति पूर्वं भगवदङ्गसृष्टानामेवाप्छब्देनोक्तेः । ‘अयं पितैते पुत्राः’ इति च । ‘आहं मां देवेभ्यो वेदा ओ मद् देवान् वेद’ इति च । |
| | | ‘ब्रह्मवायू च तद्भार्ये वीन्द्रशेषौ च तत्स्त्रियौ । |
| न च विष्णोरन्याधीनत्वं श्रुतिषूक्तं कुत्रचित् । उत्पत्तिस्तु प्रादुर्भावापेक्षया ।
| | शिवस्तद्दयिता शक्रकामौ तद्दयितादयः । |
| एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः इति महाप्रलये तस्यैवावस्थानश्रुतेः ।
| | सर्वे सुराः क्रमेणैव विष्णोर्जाता अबाख्यकाः । |
| यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् इति ब्रह्मशिवादीनां देव्यधीनपदप्राप्तिमुक्त्वा तस्या अपि भगवदधीनत्वं मम योनिरप्स्वं१तः समुद्रे । ततो वितिष्ठे भुवना नु विश्वा परो दिवा पर एना पृथिव्या इत्याह । अहं रुद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ । अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् इति ब्रह्मरुद्रयोर्देव्यास्सकाशात् सृष्टिसंहारौ चोक्तौ ।
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| | text = | | | text = ज्ञानानन्दबलाद्येषु विष्णुभक्तौ च सर्वशः । |
| | | हीनाः शतगुणेनैव क्रमेणानेन ते मताः । |
| अस्य देवस्य मी•हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।
| | तेभ्यश्च ऋषयो मर्त्या हीना एव क्रमेण च । |
| विदेहि रुद्रो रुद्रियं महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत् ॥
| | विशेषतस्तु मुक्तानां सर्वसंसारबन्धनात् । |
| इत्यादिना विष्णोः प्रसादादेव शिवादीनां पदप्राप्तिकथनाच्च ।
| | क्रमोऽयं सम्यगुद्दिष्टो नित्यानन्दैकभोगिनाम् । |
| | न विशेषो ब्रह्मवाय्वोरधिकाराविभेदतः । |
| | न शेषशिवयोश्चैव तत्पत्नीनां च सर्वशः । |
| | सुपर्णशेषयोश्चैव साम्यं सर्वगुणेष्वपि । |
| | साम्यमेवैतयोः पत्न्योः साम्यं शक्रमनोजयोः । |
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| | text = | | | text = एते तु महादादीनां सर्वेऽपि ह्यभिमानिनः । |
| | | पूर्वस्य प्रतिबिम्बश्च चरमस्तत्सुतस्तथा । |
| तमेताः सप्ताक्षितय उपतिष्ठन्ते । तद्या इमा अक्षंल्लोहिन्यो राजयस्ताभिरेनं रुद्रोऽन्वायत्तः इत्यादिना शिवादिसर्वदेवोपास्यस्य वायोः अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः इति मध्यमशब्दोक्तस्य प्राणः स्थूणा इति प्राणशब्दोदितो नारायण आश्रय उक्तः । तस्मात् सर्वोत्तमो भगवान् नारायणः प्राणशब्दोदित आदित्यमण्डलस्थस्तपतीत्यादि सिद्धम् ।
| | तद्वशाश्चाखिला विष्णोर्न विष्णुः कस्यचिद् वशे । |
| | महदादिमानिनश्चैते जातास्तैः सह सर्वशः । |
| | एते लोका इति प्रोक्ता लोकानाम् अभिमानिनः(लोकानामभिमानिनः) । |
| | त एव लोकपालाश्च यदा पश्चाद् प्रजज्ञिरे । |
| | पश्चाज्जातैर्हि रूपैस्तैर्लोकस्थान् पालयन्त्यलम् ॥’ इत्यादि तत्त्वसारे । |
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| | text = | | | text = अमूर्च्छयद् मूर्तमकरोत् । अग्निर्वाग् भूत्वा इत्यादिना पश्चादैक्यप्रतीतेरेकस्यैव रूपद्वयं तदिति प्रतीयते । प्रजानीहि प्रकर्षेणानुजानीहि । अन्नदेवता च सर्वदेवतायुक्तो विरिञ्च एव । ग्रसनं चैतस्मिन् प्रवेश एव, न तु पीडा तस्य । एक एव हि ब्रह्मा भोक्तृभोज्यत्वेन स्थितः, भोज्यरूपेणैकीभूयातितरां मुमोदेत्यर्थः । देवानाम् उपद्रवाभावाद् भोक्तृत्वशक्तियोजनमेवाशनापिपासाभ्याम् अन्ववार्जनम् । वायुरेव च भोक्तृत्वशक्तिरूपः । |
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| क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा देवाश्च पितरश्चिराः ।
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| आजानजाः कर्मदेवास्तात्त्विका दक्ष एव च ॥
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| शक्रश्चोमा च रुद्रश्च भारती वायुरेव च ।
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| मुक्ता उक्ताः शतगुणा बलज्ञानसुखादिभिः ॥
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| विष्णुभक्त्यादिभिश्चैव गुणैः सर्वैः क्रमाधिकाः ।
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| तस्माद्रमा ततो विष्णुरनन्तगुणतोऽधिकः ॥
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| नित्यमुक्तः स्वतन्त्रश्च न चान्यस्तादृशः क्वचित् ।
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| कुत एवाधिकोऽन्यः स्याद्यन्मुक्ता अपि तद्वशाः ॥
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| रमापि तद्वशा नित्यं स नान्यस्य वशे प्रभुः ।
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| न भेदः शेषशिवयोः सुपर्णः शेषसंमितः ॥
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| कामः शक्रसमो नित्यं प्रतिबिम्बाश्च ते क्रमात् ॥
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| इति च महासंहितायाम् ॥
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| | document_id = AIT | | | id = AIT_C02_S04_V11_B01 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = यदि वागादीनामेवाभिव्याहरणादिशक्तिः स्यान्मां विना, तर्हि विष्णुत्वं न मम स्यात् । तस्मात् कोऽहं भवानि इत्याक्षेपः । विशेषेण प्राणयति सर्वान्, सर्वेभ्यो विशिष्टश्चेति हि विष्णुः । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मा इति व्याख्यानात् । तस्मान्मत्प्रेरिता एवैते ऽभिव्याहारादिशक्ता इत्यभिप्रायः । |
| | verse_type = mantra
| |
| | verse_line1 = तं शतं वर्षाण्यभ्यार्चत् । तस्माच्छतं वर्षाणि पुरुषायुषो भवन्ति । तं यच्छतं वर्षाण्यर्भ्याचत् तस्मात् शतर्चिनस्तस्मात् शतर्चिन इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।
| |
| | verse_line2 = स इदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वं मध्यतो दधे यदिदं किञ्च तस्मात् मध्यमास्तस्मात् मध्यमा इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।
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| | commentary1 = aitareya
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| | text = | | | text = पूर्णानन्दस्वरूपत्वान्नन्दनो भगवान् । प्रादुर्भावरूपेण जातोऽपि भगवान् सर्वभूतान्यभितः= सर्वकालेषु विशेषेण पश्यत्येव । इह भूतेषु मत्तोः अन्यं प्रवर्तकं वदेत् किम् इत्याक्षेपः । अहमेव स्वतन्त्रः परिपूर्णगुण इति कृष्णराघवादिसर्वावताररूपोऽपि सर्वदानुभवत्येव । |
| | | ‘नायं दशरथाज्जातो न चापि वसुदेवतः । |
| स पुरुषेषु शतवर्षं गत इति शतर्चिनामा । बहुरूपत्वाद् बहुवचनम् । एतमेव तथासन्तं मुख्यत आचक्षते । ऋषींस्तूपचारतः । आत्मन उदरे धृतवान् मध्ये स्थित्वा धृतवांश्च ।
| | क्वास्याज्ञानं कुतो दुःखं प्रादुर्भावेष्वपि प्रभोः ॥ |
| | प्रादुर्भूतश्चिदानन्दशरीरो राघवः स्वयम् । |
| | स्तम्भाद् वा नरदेहाद् वा नैवास्य प्राकृती तनुः ॥ |
| | दैत्यानां मोहनार्थाय सोऽज्ञानाद्यं प्रकाशयेत् । |
| | पूर्णचित्सुखरूपोऽपि सदा सर्वावतारगः ॥’इत्यादि स्कान्दे । |
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| | document_id = AIT | | | id = AIT_C02_S04_V11_B01 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = एतमेव पुरुषं व्यास-कृष्ण-कपिल-राघवादिरूपं ततममपश्यत् । ततमं=(तततमम्. हृ) परिपूर्णतमं ब्रह्माऽपश्यत् । इदं मे स्वरूपम् अदर्शमेव अहमिति । रङ्गस्त्ववधारणे- ‘रङ्गोऽवधारणे चैव संवादे च प्रयुज्यते’ इति पदविवेके । अपश्यद् इत्यत्र नातीतकालत्वं विवक्षितम्, अभिव्यैख्यद् इति ‘अभि’शब्दस्यानुषङ्गात् । अपश्यत् पश्यतीति चैककालसम्बन्धं विना वक्तुमशक्यत्वात् तथा प्रयोगः । |
| | verse_type = mantra
| | ‘प्रयोग एककालीनः सर्वकालेऽनुषज्यते । |
| | verse_line1 = प्राणो वै गृत्सोऽपानो मदः । स यत्प्राणो गृत्सोऽपानो मदस्तस्मात् गृत्समदस्तस्माद् गृत्समद इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।
| | ददर्श विष्णुरित्यादौ नित्यचिद्रूपतो हरेः ॥’ इत्यादि सत्तत्त्वे । |
| | verse_line2 = तस्येदं विश्वं मित्रमासीद् यदिदं किञ्च । तद्यदस्येदं विश्वं मित्रमासीद्यदिदं किञ्च । तस्मात् विश्वामित्रस्तस्माद्विश्वामित्र इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।
| | परोक्षप्रिया इव इत्यसुराणां सम्यगदर्शनेन पतनं देवानां प्रियम्, तथाऽप्यपरोक्षदर्शिन्येव प्रीतिं कुर्वन्तीति इवशब्दः ॥ ३ ॥ |
| | verse_line3 = तं देवा अब्रुवन् - अयं वै नः सर्वेषां वाम इति तं यद्देवा अब्रुवन्नयं वै नः सर्वेषां वाम इति ।
| |
| | verse_line4 = तस्माद्वामदेवस्तस्माद् वामदेव इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । स इदं सर्वं पाप्मनोऽत्रायत यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वं पाप्मनोऽत्रायत यदिदं किञ्च तस्मादत्रयस्तस्मादत्रय इत्याचक्षत एतमेव सन्तम् ॥ १ ॥
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| | commentary1 = aitareya
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| | </div> |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V03
| | <div class="gr-author-note">॥ इति तृतीयः खण्डः ॥</div> |
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| | text =
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| प्राणस्थः प्राणनामासावपानेऽपाननामकः ।
| | <div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके चतुर्थोऽध्यायः ॥</div> |
| नेतृत्वाच्चापनेतृत्वाद्भगवान् पुरुषोत्तमः ॥इति च ।
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| वामो भद्रः ॥ १ ॥
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| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C02 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = एष उ एव बिभ्रद्वाजः । प्रजा वै वाजस्ता एष बिभर्ति । यद्बिभर्ति तस्मात् भारद्वाजस्तस्मात् भारद्वाज इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | | | verse_line1 = (अपक्रामन्तु गर्भिण्यः) पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद् रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतम् । आत्मन्येवात्मानं बिभर्ति । तद् यदा स्त्रियां सिञ्चति, अथैनज्जनयति । तदस्य प्रथमं जन्म । तत् स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति यथा स्वमङ्गं तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । साऽस्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति । सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति । स यत् कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति, आत्मानमेव तद् भावयति, एषां लोकानां सन्तत्यै । एवं सन्तता हीमे लोकाः । |
| | verse_line2 = तं देवा अब्रुवन् अयं वै नः सर्वेषां वसिष्ठ इति तस्माद्वसिष्ठस्तस्मात् वसिष्ठ इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।
| | | verse_lines = (अपक्रामन्तु गर्भिण्यः) पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद् रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः सम्भूतम् । आत्मन्येवात्मानं बिभर्ति । तद् यदा स्त्रियां सिञ्चति, अथैनज्जनयति । तदस्य प्रथमं जन्म । तत् स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति यथा स्वमङ्गं तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । साऽस्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति । सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति । स यत् कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति, आत्मानमेव तद् भावयति, एषां लोकानां सन्तत्यै । एवं सन्तता हीमे लोकाः । |
| | verse_line3 = स इदं सर्वमभिप्रागाद्यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वमभिप्रागाद् यदिदं किञ्च तस्मात् प्रगाथास्तस्मात् प्रगाथा इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।
| | | commentary1 = aitareya |
| | verse_line4 = स इदं सर्वमभ्यपवयत यदिदं किञ्च । स यदिदं सर्वमभ्यपवयत यदिदं किञ्च तस्मात् पावमान्यस्तस्मात् पावमान्य इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | |
| | commentary1 = aitareya | |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S05_V01" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S05_V01"> |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V04 | | | verse_id = AIT_C02_S05_V01 |
| | id = AIT_C02_S02_V04_B01 | | | id = AIT_C02_S05_V01_B01 |
| | text = | | | text = अयं नारायणो देवः पुरुषे प्रथमं विशेत् । |
| | | अन्नस्थोऽन्नेन सहितस्तस्मिन् रेतस्त्वमागते । |
| वसिष्ठो वसतामुत्तमः । अभ्यपवयत पावयामास संसारात् ।
| | तस्मिन् स्थितं स्वरूपं(स्थितस्वरूपम्. हृ) स पुरुषस्थो बिभर्त्यजः । |
| | तद्रूपं रेतसा साकं स्वयं पुंसि स्थितो हरिः । |
| | स्त्रियां सिञ्चति, तस्यैव स्थानान्तरगतेः प्रभोः । |
| | प्रथमं जन्म विष्णोस्तु,(विष्णोस्तत्) स तस्या अङ्गवत् प्रभुः । |
| | नैनां हिनस्त्यानुकूल्यात्, सा पुत्रं भावयत्यथ । |
| | पुत्रस्य भावना सैव तद्गत्वाद् हरिभावना । |
| | सम्भावितव्या सा चैव भर्त्रा पुत्रश्च सादरम् । |
| | सम्भावनं कुमारस्य जानतः केशवे भवेत् । |
| | तस्येत्यर्पणमात्रेण पूजितो हि भवेद्धरिः । |
| | पुत्रस्थस्य हरेः पूजां कुर्वतः पृथिवीस्थितिः । |
| | स्वर्गस्थस्यापि भवति पुत्रपुण्यं यतोऽखिलम् । |
| | अत्यल्पपुण्यभाक् स स्यान्नार्चयेत् केशवं यदि ॥ |
| }} | | }} |
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| | </div> |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V05 | | | verse_id = AIT_C02_S05_V02 |
| | document_id = AIT | | | document_id = AIT |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C02 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = सोऽब्रवीत् अहमिदं सर्वमसानि यच्च क्षुद्रं यच्च महदिति ॥ ते क्षुद्रसूक्ताश्चाभवन् महासूक्ताश्च । तस्मात् क्षुद्रसूक्तास्तस्मात् क्षुद्रसूक्ता इत्याचक्षते एतमेव सन्तम् । सूक्तं बतावोचतेति तत्सूक्तमभवत् । तस्मात् सूक्तं तस्मात् सूक्तमित्याचक्षते एतमेव सन्तम् । | | | verse_line1 = तदस्य द्वितीयं जन्म । सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते । अथाऽस्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति । स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म । तदुक्तमृषिणा– |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = तदस्य द्वितीयं जन्म । सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते । अथाऽस्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति । स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म । तदुक्तमृषिणा–;‘गर्भे नु सन्नन्वेषाममवेदम् अहं देवानां जनिमानि विश्वा ।;शतं मा पुर आयसीररक्षन् अधः श्येनो जवसा निरदीयमिति(ऋ.सं.४.२७.१) ॥’;गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच । स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् (यथास्थानं गर्भिण्यः) ॥ १ ॥ |
| | | verse_line2 = ‘गर्भे नु सन्नन्वेषाममवेदम् अहं देवानां जनिमानि विश्वा । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके पञ्चमोऽध्यायः ॥</div> |
| | |
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S05_V02" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S05_V02"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V05 | | | verse_id = AIT_C02_S05_V02 |
| | id = AIT_C02_S02_V05_B01 | | | id = AIT_C02_S05_V02_B01 |
| | text = | | | text = पृथिव्यां जन्म पुत्रस्य द्वितीयं विष्णुजन्म हि । |
| | एतद्रूपं निधायैव जीवार्थे धर्मकर्तवे । |
| | पितृस्थेन तु रूपेण गच्छत्यन्यत्र केशवः । |
| | पितुरन्यत्र जननं तृतीयं जन्म तद्धरेः । |
| | अन्तर्यामितयैवं हि सर्वजीवेषु संस्थितम् । |
| | सर्वदोषोज्झितं विष्णुं कर्तारं सर्वकर्मणाम् । |
| | नित्यानन्दं स्वतन्त्रं च सर्वज्ञं सर्वतोऽधिकम् । |
| | यो वेद देहबन्धात् स विमुक्तो नित्यमुत्तमान् ॥ |
| | भोगान् भुङ्क्ते यथायोग्यम् इति वेदानुशासनम् ॥ इत्यैतरेयसंहितायाम् । |
| | }} |
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| तद्विष्ण्वाख्यं ब्रह्म सूक्तान्यवोचतेति सूक्तनामकमभवत् । बतेत्यास्वादने । स्वात्मनैव स्वयं सुष्टूक्तमिति वा । इदं सर्वं परिपूर्णं सन्नहमल्पप्राणिषु प्रविश्य सूक्ष्मरूपो महाप्राणिषु महारूपश्च भवानीति स भगवानब्रवीत् । तस्मात् क्षुद्रोऽसानीत्युक्तत्वात् क्षुद्रसूक्तास्ते क्षुद्रप्राणिषु स्थिताः भगवद्रूपसङ्घाः । महानसानीत्युक्तत्वात् महासूक्ता महाप्राणिषु स्थिताः । सूक्ष्मरूपत्वादेव क्षुद्रनाम भगवतः । न तु सामर्थ्याऽल्पत्वात् । न हि सामर्थ्यादिगुणेषु कश्चिद्विशेषो भगवद्रूपेषु ।
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| | | text = नात्र जीवोत्पत्तिमात्रमुच्यते । न हि जीवोत्पत्तिमात्रपरिज्ञानादमृतत्वं भवति । ज्ञातमेव सर्वैः पितापुत्रसम्बन्धमात्रं पश्वादिभिरपि(श्वादिभिरपि. हृ) । ‘गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा’ इत्युक्तार्थ उदाहृते मन्त्रे देवजन्मकथनाच्च । विष्णुर्हि परमो देवः । तेनैव सह सर्वेऽपि देवा जीवदेहजनने जायन्त इव । शरीरप्राप्तिरेव हि जन्मान्येषामपि । अयमेव विशेषो देवानां दुःखाभोगः । स्वातन्त्र्यं च विष्णोः । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V06 | | | verse_id = AIT_C02_S05_V02 |
| | document_id = AIT | | | id = AIT_C02_S05_V02_B02 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = ‘आत्मन्येवाऽत्मानं बिभर्ति’, ‘आत्मानमेव तद्भावयति’ इत्याद्यात्मशब्दश्च मुख्यतो विष्णावेव युज्यते । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मा इति विष्णुशब्दार्थैकदेशवाचित्वाच्चात्मशब्दस्य । ‘एतया द्वारा प्रापद्यत’ इति तस्यैव शरीरप्रवेशस्य प्रस्तुतत्वाच्च । जीवशरीरं परित्यज्यान्यत्र गमनमात्रं विष्णोरप्यस्तीति प्रैतीत्युक्तेऽप्यविरोधः । कृष्णराघवादिस्वरूपमेव ह्यसौ न परित्यजति । |
| | verse_type = mantra
| |
| | verse_line1 = एव वा ऋगेष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत । स यदेभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽर्चत तस्मात् ऋक् । तस्माद् ऋगित्याचक्षते । एतमेव सन्तम् । एष वा अर्धर्चः । एष ह्येभ्यः सर्वेभ्योऽर्द्धेभ्योऽर्चत । स यदेभ्यः सर्वेभ्योऽर्धेभ्योऽर्चत । तस्मात् अर्धर्चस्तस्मादर्धर्च इत्याचक्षते । एतमेव सन्तम् । एष वै पदमेष हीमानि सर्वाणि भूतानि पादि स यदिमानि सर्वाणि भूतानि पादि । तस्मात् पदं तस्मात् पदमित्यचक्षते । एतमेव सन्तम् । एष वा अक्षरमेष ह्येभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः क्षरति । न चैनमतिक्षरन्ति । स यदेभ्यः सर्वेभ्यो भूतेभ्यः क्षरति न चैनमतिक्षरति तस्मात् अक्षरं तस्मादक्षरमित्याचक्षते एतमेव सन्तम् ।
| |
| | verse_line2 = ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव । प्राण ऋच इत्येव विद्यात् ॥ २ ॥
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| | commentary1 = aitareya
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V06 | | | verse_id = AIT_C02_S05_V02 |
| | id = AIT_C02_S02_V06_B01 | | | id = AIT_C02_S05_V02_B03 |
| | text = | | | text = ‘कृष्णो ह्यत्यक्तदेहोऽपि त्यक्तदेहवदेव च । |
| | | लोकानां दर्शयामास स्वरूपसदृशाकृतिम् । |
| एभ्यः प्राणिभ्यो गतवानिति ऋक् । गच्छति हि मरणकाले ।
| | येन रूपेण कंसादीन् जघ्ने तद्रूपमेव(तद्रूप एव हि. हृ) हि । |
| ब्रह्मणा सम्परित्यक्तो मृत इत्युच्यते बुधैः इति हि भारते ।
| | पूज्यतेऽद्यापि शर्वाद्यैर्निर्मिताऽन्या शवाकृतिः । |
| | स्वर्गारोहणकाले तु जनास्तेनैव मोहिताः । |
| | यत्तद् रूपं निजं विष्णोर्दृष्टं सर्वजनैर्भुवि । |
| | अद्यापि तद् देवलोके पूज्यते सर्वदैवतैः ॥’ इत्यादि स्कान्दे । |
| | ‘प्रदर्श्यातप्ततपसाम् अवितृप्तदृशां नृणाम् । |
| | आदायान्तरधाद् यस्तु स्वबिम्बं लोकलोचनम्(भाग. ३.२.११) ॥’ इति च भागवते । |
| | ‘प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवा’(ऋ.सं.२.४१.१९) इत्यादिवत् प्रकृष्टगतिवाच्येवायं शब्दः । प्रकृष्टगतित्वादेव च मरणेऽपि प्रयुज्यते । |
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| | text = | | | text = एषामवेदमहम् इत्यपि जीवभेद एवोक्तः । अन्यथा ‘मम जनिमानि’ इत्येवोच्येत । व्यर्थता च एषाम् इत्यादिविशेषणानाम् । अवेदम् इत्यनेनैव स्वस्य सिद्धत्वात् । अहम् इत्यप्यहेयत्वेनेति क्रियाविशेषणम् । जन्म जानन्नपि देवानां दुःखादिहेयरहितत्वेन व्यजानामीत्यर्थः । तस्माद् ‘अहं मनुरभवम्’(ऋ.सं.४.२६.१) इत्यादावपि अहेयगुणं भगवन्तमेवाहंशब्दो वक्ति । सर्वान्तरत्वात् तस्मिन्नेव ‘अभवम्’ इत्युत्तमपुरुषशब्दोऽपि सर्वो वर्तते । |
| | | ‘अहेयत्वादहं विष्णुः स तु सर्वान्तरत्वतः । |
| म्रियमाणमिमं जीवं वासुदेवादिदेवताः ।
| | अस्यस्मीत्यादिभिः शब्दैरुच्यतेऽन्योऽपि जीवतः ॥’ इति ब्रह्मवैवर्ते । |
| त्यक्त्वा भागेन गच्छन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ॥
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| गतैर्भागैरपि पुनर्विशेयुर्भोगसिद्धये ।
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| भोग्यलोकमनुप्राप्तं तस्मात् स्वप्नवदन्तरा ॥
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| इति च ॥ | |
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| | text = | | | text = न च मूढव्यवहार एव वेदनिर्णयाय भवति ; किन्तु ? सर्वेषामनुभवो युक्तयश्च वाक्यान्तरं च निर्णयकारणम् । तस्मात् सर्वजीवादिभ्योऽन्यः सर्वोत्तमो विष्णुरेवात्रोक्तः । |
| | ‘न वेदेषु पदं ककिञ्चिद् वर्णो वा व्यर्थ इष्यते । |
| | यथायोग्यं चार्थभेद ऊह्यः सर्वत्र वेदिभिः(ईशावास्य.१६) ॥’ इति शब्दनिर्णये ॥ |
| | ‘शब्दा रेतोऽन्नमित्याद्या अपि तत्र गतं हरिम् । |
| | वदन्त्यविष्णुवाची हि न शब्दः क्वचिदिष्यते ॥’ इति च । |
| | }} |
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| अर्च गतिपूजनयोः ऋ गतौ इति धातोः । सर्वेभ्योऽर्धेभ्यः स्थानेभ्यः शरीरेभ्यो गतवानित्यर्धर्चः । सर्वाणि भूतान्यपादि । पद गतौ । तस्मात् पदं नाम । अधिकं क्षरतीत्यक्षरम् । क्षरणं नाम सन्ततदानम् । क्षर विनाशसन्ततदानयोः इति धातोः ।एवमृषिषु शब्देषु च व्यवह्रियमाणानि सर्वाणि नामानि विष्णोरेव मुख्यतः । किमु देवतानामानि ।
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| | | text = भावयति सम्भावयति । सोऽग्र एव अग्र्यो विष्णुरेव । पुत्रसम्भावनमपि तत्रस्थं विष्णुं सम्भावयामीति तत् तस्यैव भवति । एवं भावयतामेव एष पन्था उरुगायः इत्याद्यपि । तं पश्यन्ति पशवः इत्याद्यपि दिव्यपश्वादीनामेव । अन्येषां स्वभावप्रवृत्तिः । |
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| | text = | | | text = ता एव देवताः शतं पुर आयसीः ज्ञानिन्यो विशेषतः । ‘अय पय= गतौ’ इति धातोः । मानुषान् अपेक्ष्य पूर्णत्वात् पुरः । विष्णुर्मुख्यत एव पूर्णः । न च शरीरैर्जीवो रक्षितः । मुख्ये युज्यमाने च नामुख्यार्थः कल्प्यः । ‘शम् अस्य विद्यत इति शी’ विष्णुः । पूर्णानन्दत्वात् । स एव ज्ञानत्वाद् ‘यश्चेति श्यः’ । सोऽस्य जीवस्येन इति ‘श्येनः’ । विष्णुं स्वामिनं ज्ञात्वेत्यर्थः । ‘निरदीयम्’, निष्क्रम्यातीतोऽस्मि गर्भवासम् । |
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| यो देवानां नामधा एक एव तं सम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या ।
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| इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहु रथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् ।
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| यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ।
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| नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति ॥
| |
| इत्यादिश्रुतिभ्यः । न केवलमृष्यादीनां नाम भगवतः । सर्वे वेदा अपि तस्यैव नामानि । किमु च वेदाः । समुद्रमेघवृक्षपतनभेरीताडनादिसर्वघोषा अपि तस्यैव नामानि यथायोग्यं योजनीयानि । एकमेव व्याहरणम् । एकप्रकारमेव नाम । निर्दोषगुणपूर्तिवाचकत्वादेकप्रकारता । प्राणे नारायण एव । नारायणविषय एव व्याहारः । ऋचस्तु विशेषत इन्द्रादिनामवतो विष्णोर्गुणानल्पज्ञानामपि प्रकाशयन्तीति । प्राणे नारायणे एवेति विद्यात् ।
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| | text = | | | text = ‘स्वर्’ आनन्दो विष्णुः । अत्र ‘गः’ इति स्वर्गलोको विष्णुलोकः । अमृतः सन् सर्वान् कामानाप्त्वा तानेव सर्वान् कामान् समभवद् अनुभवति । अपेक्षितवस्तुस्वीकार आप्तिः । सम्भवो भोगः । ‘ताँ समभवत् ततो मनुष्या आजायन्त’(बृ.उ.३.४.३ प्राजापत्यब्राह्मणम्) इत्यादिवत् । मुक्त्यनन्तरमेव ह्यनुपचरितसर्वकामावाप्तिः । मुख्य एव चार्थः स्वीकार्यः । अमुक्तानां विष्णुलोकगानामपि न सर्वकामावाप्तिः । जय-विजयादीनामप्रियदर्शनात् । अतोऽमृतः सन् सर्वान् कामानाप्त्वेत्यर्थः(सर्वकामानाप्त्वा) । |
| | | मुक्तः कामानवाप्नोति भुङ्क्ते चैव यथेष्टतः । |
| उक्तं च बृहत्संहितायाम्–
| | सर्वानपि निरातङ्कः सर्वदा च हरेर्वशः ॥ इति सत्तत्त्वे ॥ |
| हुङ्कारेण सहैवाब्धिः सर्वाभिभवशक्तिताम् । विष्णोर्वक्ति यतो हुं च पराभिभववाचकः ॥
| |
| ओमिति स्वरते नित्यं वायुर्मेघेषु संस्थितः ।
| |
| बलवन्नादसंयुक्तो ह्यधिकोच्चत्वमस्य तु ॥
| |
| ओङ्कारस्यार्थ उद्दिष्ट उक्तार्थाधिक्यमेव च ।
| |
| नादो बली प्रवदति तथा भेरीध्वनिः प्रभोः ॥
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| अनुदात्तस्वरूपत्वादौदार्यं वदतीशितुः ।
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| तदपेक्षयाऽन्यनीचत्वं घण्टाद्याः स्वरितात्मकाः ॥
| |
| उच्चस्थितिमुदात्तस्तु स्वर्णचञ्च्वादिकः स्वरः ।
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| विष्णोर्वक्ति तथा मन्द्रः श्वासादिः प्रचयात्मकः ॥
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| एकप्रकारतां विष्णोः सदाचाल्यां वदत्यपि ।
| |
| इत्यादयः सर्वघोषा विष्णोरेव गुणोन्नतिम् ॥
| |
| वदन्ति किमु वेदाद्या मार्जाराद्यभिधास्तथा ।
| |
| मारयित्वा प्रभक्ष्यैव जरयत्यखिलं जगत् ॥
| |
| तेन मार्जार उद्दिष्टो मोषणान्मूषको हरिः ।
| |
| वर्षणाद् वृष उद्दिष्टो बलनाद्बलिनामकः ॥
| |
| तारणात् तृणनामाऽसावित्याद्येकोऽभिधीयते ।
| |
| सर्वनामापि भगवान् सर्वशक्तिश्च सर्ववित् ॥
| |
| ब्रह्मरुद्रादिजीवेभ्यो जडेभ्यः श्रिय एव तु ।
| |
| व्यतिरिक्तः सदानन्तसान्द्रानन्दैकरूपकः ॥
| |
| तस्यैव मुख्यनामानि समाकृष्येतरेष्वपि ।
| |
| उपचारात् प्रवर्तन्ते व्यवहारप्रसिद्धये ॥
| |
| तथैव सर्वनामानि प्रवर्तन्ते च मारुते ।
| |
| न तावन्मुख्यवृत्त्यैव मुख्यतोऽन्यव्यपेक्षया ॥
| |
| मुख्यतः सर्वनामा तु विष्णुरेको न चापरः ।
| |
| तस्मात् प्राणादिशब्दाश्च विष्णावेव हि मुख्यतः ॥
| |
| अन्यव्यपेक्षया वायौ मुख्यवृत्तिर्विधीयते ।
| |
| वायुश्च सूर्यसंस्थः संस्तपत्येतज्जगत्त्रयम् ॥
| |
| आज्ञयैव हरेर्वायोः शक्त्या सूर्यस्तपत्ययम् ॥
| |
| इत्यादि च ।
| |
| न प्रसिद्धसूर्यस्येयं तापनशक्तिरिति ज्ञापयितुं प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तम् । प्राणाद्वा एष उदेति प्राणेऽस्तमेति इति श्रुतिः । प्राणशब्दश्च मुख्यतो विष्णौ प्रवर्तमानोऽपि वायावपि वर्तते । अतः सर्ववेदाद्यभिधेयत्वं वायोरप्यस्ति । प्राणस्य प्राणः इति श्रुतेरुभयोरपि प्राणशब्दः प्रसिद्ध एव । अयं वाव शिशुर्योऽयं मध्यमः प्राणः इति वायोर्विशेषणादुत्तमप्राणो विष्णुरिति च सिद्धम् । | |
| द्वावात्मानौ हि वेदेषु द्वौ प्राणौ द्वौ च चेतनौ ।
| |
| अज्ञानाभिभवास्पृष्टौ वायुर्नारायणश्च तौ ॥
| |
| तदन्ये चेतनास्सर्वे प्राणाश्चात्मान एव च ।
| |
| अज्ञानाभिभवस्पृष्टास्तस्मात् ते ह्यधमाः श्रुताः ॥
| |
| मध्यमो वायुरेवैक उत्तमः केवलो हरिः ।
| |
| सर्वशब्दोदितौ तस्मादेतौ द्वावेव नापरः ॥
| |
| अन्ये चैव मितैः शब्दैरुच्यन्ते नामितैः क्वचित्।
| |
| श्रीरप्यखिलशब्दोक्ता विष्णुवन्न तु मुख्यतः ॥
| |
| तस्मादमितनामानावपि तौ मितनामवत् ।
| |
| श्रीश्च वायुश्च विष्णुस्तु मुख्योक्तेरमिताभिधः ॥
| |
| अनन्तनामकत्वाच्च सोऽनन्तगुण ईरितः ।
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| पृथङ्नामानि यस्मात् तद्गुणानेव प्रचक्षते ॥
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| इत्यादि ब्रह्माण्डे ॥ २ ॥
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| | verse_line1 = विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमिन्द्र उपनिषसाद । स हान्नमित्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । तमिन्द्र उवाच ऋषे प्रियं वै मे धामोपागाः । स वा ऋषे द्वितीयं शंसेति स हान्नमित्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । तमिन्द्र उवाच ऋषे प्रियं वै मे धामोपागाः । स वा ऋषे तृतीयं शंसेति । स हान्नमित्यभिव्याहृत्य बृहतीसहस्रं शशंस । तेनेन्द्रस्य प्रियं धामोपेयाय । तमिन्द्र उवाच ऋषे प्रियं वै मे धामोपागाः वरं ते ददामीति । | | | verse_line1 = कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा । येन वा पश्यति , येन वा शृणोति , येन वा गन्धान् आजिघ्रति , येन वा वाचं व्याकरोति , येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति । |
| | verse_line2 = स होवाच त्वामेव जानीयामिति तमिन्द्र उवाच प्राणो वा अहमस्म्यृषे प्राणस्त्वं प्राणः सर्वाणि भूतानि । प्राणो ह्येष य एष तपति । स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि ॥ | | | verse_lines = कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा । येन वा पश्यति , येन वा शृणोति , येन वा गन्धान् आजिघ्रति , येन वा वाचं व्याकरोति , येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति । |
| | verse_line3 = तस्य मेऽन्नं मित्रं दक्षिणम् । तद्वैश्वामित्रमेष तपन्नेवास्मीति होवाच ॥ ३ ॥
| | | commentary1 = aitareya |
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| | text = | | | text = ‘अयं विष्णुर्हि किंरूप उपास्योऽस्माभिरच्युतः । |
| | इत्यपृच्छद् रमा देवी महिदासं जनार्दनम् । |
| | आह तां महिदासोऽथ पूर्णानन्दतमस्त्विति । |
| | उपास्यस्तादृशो ह्यस्य स्वभावः परमात्मनः । |
| | येन जीवो दर्शनादीन् प्रेरितः कुरुते सदा । |
| | }} |
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|
| अन्यदेवताविषयत्वेन प्रतीयमाना अप्यृचो भगवद्विषया एव मुख्यतः । तदनन्तरं वायुविषयाश्च । तस्माद् बृहतीसहस्रं सर्वं मुख्यतो नारायणस्यान्नम् । तदाज्ञया वायोश्च । तस्मात् तच्छंसनेन भगवान् वायुश्चातिप्रीयेत इति दर्शयति विश्वामित्रं ह्येतदहः शंसिष्यन्तमित्यादिना ॥
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| | | verse_line1 = ‘यद्, एतद्, हृदयम्, मनः, च, आ, इतत्, संज्ञानम्, आज्ञानम्, विज्ञानम्, प्रज्ञानम्, मेधा, दृष्टिः, धृतिः, मतिः, मनीषा, जूतिः, स्मृतिः, सङ्कल्पः, क्रतुः, असुः, कामः, अवशः’ इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति । |
| | | verse_lines = ‘यद्, एतद्, हृदयम्, मनः, च, आ, इतत्, संज्ञानम्, आज्ञानम्, विज्ञानम्, प्रज्ञानम्, मेधा, दृष्टिः, धृतिः, मतिः, मनीषा, जूतिः, स्मृतिः, सङ्कल्पः, क्रतुः, असुः, कामः, अवशः’ इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति । |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C02_S06_V02 |
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| | text = | | | text = यो विष्णुर्हृदयमिति हृद्गतत्वात् प्रकीर्तितः । |
| | | मन्तृत्वान्मन इत्येव यच्च ज्ञान(तृ)स्वरूपतः । |
| वृत्रं हत्वा पुरेन्द्रस्तु महेन्द्रत्वाभिपत्तये ।
| | एतत् सन्निहितत्वाच्च पूर्णत्वादेति कीर्तितः । |
| महाव्रतं कर्म चक्रे हौत्रं चक्रेऽत्र कौशिकः ॥
| | इतत्वाच्च ततत्वाच्च स इतन्नाम केशवः । |
| भृगुरध्वर्युरभवद् ब्रह्मा ब्रह्माऽभवत् स्वयम् ।
| | गुणानामुच्चयो यस्मात् स च इत्येव शब्दितः । |
| उद्गाता वायुरभवत् स्वयं नारायणः प्रभुः ॥
| | सम्यग् ज्ञानस्वरूपत्वात् संज्ञानमिति कीर्तितः । |
| सादस्यमकरोत् तत्र तदन्येऽन्येऽपि चर्त्विजः ।
| | आततज्ञानरूपत्वाद् आज्ञानं भगवान् हरिः । |
| बृहतीसहस्रं शंसिष्यन् यदा सस्मार केशवम् ॥
| | विविधज्ञानरूपत्वाद् विज्ञानमिति कीर्तितः । |
| वायुना सह देवेशस्तदा वासवमाविशत् ।
| | प्रकृष्टात्मगुणज्ञानरूपः प्रज्ञानमुच्यते । |
| आविष्टो विष्णुनाऽथेन्द्रो वायुना सह कौशिकम् ॥
| |
| शंसेत्युक्त्वा निषण्णोऽभूदिदमन्नं तवेति सः ।
| |
| ऋक्सहस्रं शशंसाथ यज्ञाङ्गत्वेन भक्तितः ॥
| |
| तच्छ्रुत्वा तुष्टिमगमत् केशवो वायुसंयुतः ।
| |
| द्वितीयवारं शंसेति प्राह तं च जनार्दनः ॥
| |
| प्रीत्यैव शक्रमाविष्टो विश्वामित्रः शशंस तत् ।
| |
| अतिप्रियत्वाद् भगवान् पुनरप्याह कौशिकम् ॥
| |
| तृतीयं च शशंसास्मै विष्णोरन्नं प्रकल्प्य तत् ।
| |
| ततोऽतितुष्टो भगवान् ददामि वरमित्यमुम् ॥
| |
| ऊचे स प्रथमे त्वेव निजसालोक्यमीश्वरः ।
| |
| प्रादाद् द्वितीये सामीप्यं तृतीये पुनरेव च ॥
| |
| वरं ददानीत्युक्तः सन् मुनिः प्राह जनार्दनम् ।
| |
| सम्यक्त्वामेव जानीयामिति मोक्षे सुखोच्चताम् ॥
| |
| इच्छंस्तं प्राह भगवानिन्द्रस्थो वायुसंयुतः ।
| |
| सर्वनामाऽहमस्म्येक इति ज्ञानं ममोत्तमम् ॥
| |
| यस्मात् सर्वगुणत्वं स्यात् सर्वनामत्व एव तु । | |
| न हि दोषाभिधायीनि विष्णोर्नामानि कानिचित् ॥
| |
| अदोषत्वान्महाविष्णोर्न सामान्यवचांस्यपि ।
| |
| सर्वोत्तमगुणात्मत्वात् सदा नारायणस्य हि ॥
| |
| सर्वोत्तमगुणानेव नामान्याचक्षते हरेः ।
| |
| यावज्ज्ञानेन मोक्षः स्यात् तावज्ज्ञात्वापि कौशिकः ॥
| |
| अधिकज्ञानलब्ध्यर्थं मोक्षेऽधिकसुखाप्तये ।
| |
| जानीयां त्वामिति प्राह तस्मा आह स केशवः ॥
| |
| इन्द्राविष्टः प्राणनाम तथाऽन्याश्चाभिधाः प्रभुः ।
| |
| प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राण इत्यभिधीयते ॥
| |
| ओयत्वादहंनामाऽस्म्यसनान्मिनुतेरपि ।
| |
| ततो वेत्तीति च त्वं स पूर्णत्वात् सर्वनामकः ॥
| |
| सर्वाणि बहुरूपत्वात् सर्वरूपेषु पूर्तितः ।
| |
| प्रभूतत्वाद् भूतनामा सर्वरूपप्रभूततः ॥
| |
| बहुरूपः स भूतानीत्युक्तो विष्णुस्सनातनः ।
| |
| सर्वैश्वर्यस्वरूपत्वादेष इत्यभिधीयते ॥
| |
| स एव सूर्यसंस्थः सन् लोकं तपति केशवः ।
| |
| सर्वनामवतस्तस्य ममान्नं मित्रमुच्यते ॥
| |
| अन्नाभिमानिनी साक्षाच्छ्रीरेव प्रमदोत्तमा ।
| |
| साऽन्नमित्युच्यते विष्णोर्भोग्यत्वान्मित्रमेव च ॥
| |
| दक्षभागस्थितेनत्वाद् दक्षिणं नाम सोच्यते ।
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| तस्या इनो हि विष्णुः स दक्षभागे स्थितः सदा ॥
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C02_S06_V02 |
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| | text = | | | text = अविस्मृतित्वान्मेधा स दृष्टिर्दर्शनरूपतः । |
| | धृतिर्धारणरूपत्वान्मतिर्मासु ततत्वतः । |
| | मनुनाम्नाम् अजादीनां मनीषेशो यतो हरिः । |
| | सर्वप्रेरकरूपत्वाज्जूतिरित्यभिधीयते । |
| | सर्वदेशेषु कालेषु स्वरूपेषु च सर्वशः । |
| | समं रमत इत्येव स्मृतिर्नाम जनार्दनः । |
| | सर्वस्य क्लृप्तिकर्तृत्वात् सङ्कल्प इति गीयते । |
| | क्रतुः स सर्वकर्तृत्वाद् असुरप्यसनाद्धरिः । |
| | अमेयानन्दरूपत्वात् काम इत्यभिधीयते । |
| | अवशः स स्वतन्त्रत्वात् त्रयोविंशतिनामकम् ॥ |
| | यो वेदैवं हरिं सम्यङ् मुच्यतेऽखिलसंमृतेः । |
| | }} |
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|
| उपनिषण्णमिन्द्रं दृष्ट्वापि त्वामेव जानीयामिति वरस्वीकारादिन्द्रादेव चेन्द्राविष्टो भगवानत्रोक्त इति ज्ञायते । इन्द्रं तु जानात्येव हि विश्वामित्रः । भगवन्तमपि स्वरूपत आगतं जानात्येव । विशेषज्ञानप्रार्थने प्राणो वा अहमस्म्यृष इत्यादिकमेव पूर्यते । एष तपन्नेवास्मीति व्यर्थम् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् ।
| | </div> |
| स एतेन रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मीत्यादिनाप्याविष्टस्य विष्णुत्वं किञ्चिज्ज्ञायते । तथाप्येतेनेति तृतीयात्वात् करणत्वाशङ्का भवति । तस्य म इति वैयधिकरण्यमिति च । अतो भगवन्नामानि पृथगुक्त्वाऽहं विष्णुरित्येव तपन्नेवास्मीत्युवाच । इन्द्रशरीरमेव पश्यतो विश्वामित्रस्य तर्कमात्रतो भगवानिति किञ्चिज्जानत इति ज्ञायते ।न चेन्द्रस्य प्राणशब्दः सर्वशब्दाभिधेयत्वं च विद्यते । अजस्य नाभावध्येकमर्पितम् इत्युक्तस्य पद्मनाभस्य हि यो देवानां नामधा एक एव इति सर्वदेवाभिधानत्वमुक्तम् । इन्द्रे हीन्द्रशब्दोऽपि न मुख्यतो वर्तते । परमैश्वर्याभावात् । इन्द्रशब्दोऽपि विष्णावेव वर्तते । स हि परमेश्वरः ।
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| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = एष ब्रह्मा, एष इन्द्रः, एष प्रजापतिः, एते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि, पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानि, इमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि च, इतराणि चाण्डजानि च, जरायुजानि च, स्वेदजानि च, उद्भिजानि च, अश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत् किञ्चेदं प्राणि, जङ्गमं च, पतत्त्रि च, यच्च स्थावरं सर्वं तत् प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम् , प्रज्ञानेत्रोऽलोकः । प्रज्ञा प्रतिष्ठा । प्रज्ञानं ब्रह्म । |
| | | verse_lines = एष ब्रह्मा, एष इन्द्रः, एष प्रजापतिः, एते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि, पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानि, इमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि च, इतराणि चाण्डजानि च, जरायुजानि च, स्वेदजानि च, उद्भिजानि च, अश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत् किञ्चेदं प्राणि, जङ्गमं च, पतत्त्रि च, यच्च स्थावरं सर्वं तत् प्रज्ञानेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम् , प्रज्ञानेत्रोऽलोकः । प्रज्ञा प्रतिष्ठा । प्रज्ञानं ब्रह्म । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C02_S06_V03 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C02_S06_V03_B01 |
| | text = | | | text = ब्रह्मा शिवश्च शक्रश्च देवाश्चान्ये समस्तशः । |
| | तथैव पञ्चभूतानि पुण्यपापविमिश्रिताः । |
| | क्षुद्रात्मानस्तु ये मर्त्या इतरे असुरा अपि । |
| | सर्वं जगदिदं विष्णोर्वशे तिष्ठति सर्वदा । |
| | तेनैव नीयते नित्यं तस्मिन्नेव प्रतिष्ठितम् । |
| | मुक्ता येऽलोकनामानो नीयन्ते तेऽपि विष्णुना । |
| | स्वयं चानन्यनिष्ठत्वात् प्रतिष्ठेत्यभिधीयते । |
| | देशतः कालतश्चैव गुणतश्चातिपूर्तितः । |
| | विष्णोर्ब्रह्मेति नामैतन्मुख्यतोऽन्यत्र न क्वचित्। |
| | }} |
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| यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः ॥
| | </div> |
| इति श्रुतेश्च ।
| | {{VerseBlock |
| | | verse_id = AIT_C02_S06_V04 |
| | | document_id = AIT |
| | | chapter_id = AIT_C02 |
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् ॥ |
| | | verse_lines = स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मनाऽस्माल्लोकाद् उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् ॥ |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C02_S06_V04 |
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| | text = | | | text = ‘सोऽलोकनामा मुक्तास्तु चितिमात्रस्वरूपतः । |
| | | प्रकृष्टज्ञानरूपस्य प्रसादात् परमात्मनः । |
| इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् ।
| | अस्माद् देहात् समुत्क्रम्य गत्वोर्ध्वं लोकमुत्तमम् । |
| इत्यादिश्रुतेश्च ।
| | अमृतः सन् विष्णुलोके भोगान् सम्प्राप्य पुष्कलान् । |
| | भुङ्क्ते यथेष्टतो नित्यमिति वेदानुशासनम् ॥’ इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् । |
| }} | | }} |
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| | text = | | | text = जानन्त्यापि देव्या लोकानुग्रहार्थं विशेषज्ञानार्थं च कोऽयमात्मा इति पृष्टः स(सन्) भगवानाह- कतरः स आत्मेति ॥ कतरः आनन्दतमः । ‘यत्रोभयोः प्रयोगो न तत्रैकार्थो तरप्-तमौ’ इति शब्दनिर्णये । |
| | |
| सप्तार्धगर्भा भुवनस्य रेतो विष्णोस्तिष्ठन्ति प्रदिशा विधर्मणि इत्यादिना विष्णुरेव हि तत्र प्रस्तुतः ।
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| }} | | }} |
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| | text = | | | text = यत्प्रेरणाद् अयं जीवो दर्शनादीन् करोति । रमाब्रह्मादीनामपि तत्प्रेरितत्वात् सर्वेषाम्, दर्शनादिकारणत्वम् एकैकमपि तस्य लक्षणं भवतीति वाशब्दः सर्वत्रानुषज्यते । |
| | |
| नामानि विश्वाभि न सन्ति लोके यदाविरासीदनृतस्य सर्वम् ।
| |
| नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति ॥
| |
| इति श्रुतिः ।
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| }} | | }} |
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| | text = | | | text = प्रजापतिः शिवः । लिङ्गाभिमानित्वात् । |
| | | ‘प्रजापतिः शिवः शेषो(शेपो. हृ) लिङ्गमित्यभिधीयते । |
| यो देवानां नामधा एक एवेत्यवधारणान्नान्यस्य सर्वनामत्वम् । स च विष्णोर्नान्यः । पद्मनाभत्वादेव ।
| | लिङ्गाभिमानी लोकस्य स्रष्टा गिरिश एव हि ॥’ इति शैवपुराणे । |
| | ‘सममस्त्वनयोर्युद्धमिति प्राह प्रजापतिः । |
| | वाक्यं शिवस्य तत् श्रुत्वा शक्रो नेत्याह सत्वरः ॥’ इति भारते । |
| }} | | }} |
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| | text = | | | text = क्षुद्रमिश्राणीव बीजानि शाल्यादिबीजवत् भिन्नस्वभावा ब्रह्मादयः सर्वजीवाः । |
| | | ‘ब्रह्माद्याः सर्व एवैते जीवा भिन्नस्वभावकाः । |
| श्रियो वायोरपि न नारायणादिनामवत्वम् । एको वासुदेवस्तत्सदृशपरौ न स्तः इति श्रुतिः ।
| | यथा शाल्यादिबीजानि भिन्नवीर्याणि सर्वशः ॥’ इति सत्तत्त्वे । |
| एको नारायणस्तत्समो वाऽधिको वा नास्ति इति च ।
| | प्रथम-इतराणि इतिशब्दो मानुषाणाम्, द्वितीयोऽसुरादीनाम् । |
| }} | | }} |
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| | text = | | | text = प्रज्ञानेत्रोऽलोक इति । अलोकशब्देन मुक्तसमुदाय उच्यते । ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य लोकस्य सर्वं तत् प्रज्ञाननेत्रम् इति विष्ण्वधीनत्वस्य पूर्वमेवोक्तत्वात्, पुनः प्रज्ञाननोत्रोऽलोक इति मुक्तविषयमेव । मुक्तो ह्यलोक्यत्वाद् अलोकः । |
| | | अण्डजानि च इत्याद्युक्त्वा पुनः अश्वा गाव इत्यादि देवादीनां मन आदेरेव जातानामपि स्वीकारार्थम् । अण्डजत्वाद्युत्पत्तिप्रकारोऽपि विष्ण्वधीन इति ज्ञापयितुं तत्कथनम् । |
| परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति ।
| | ‘तथाऽश्मानस्तृणकाष्ठाश्च सर्वे दिदृक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते’ इति भारतवचनाद् अश्मादीनामपि प्राणित्वात् तत्स्वीकारार्थं प्राणि इति । गमन-पतन-स्थिरत्वादयोऽपि भावा विष्ण्वधीना इति ज्ञापयितुं जङ्गमम् इत्यादिवचनम् । |
| न ते विष्णो जायमानो न जातो देव महिम्नः परमन्तमाप ॥
| |
| इत्यादेश्च ।
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| | text = | | | text = स एतेन(अ.व्या.३.२.२१५) इत्यलोकशब्दोक्तो मुक्तः परामृश्यते । सकलकर्मबन्धमुक्त्यनन्तरं हि शरीराद् उत्क्रामति । प्रकृष्टज्ञानरूपेण विष्णुना प्रेरितः, प्राज्ञेन आत्मनैव उत्क्रम्य तेनैव सर्वान् कामानाप्त्वा तेनैव सर्वान् कामान् सम्भुङ्क्त इति सर्वत्रानुषज्यते । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इत्युक्ते कथं प्रज्ञानेत्रो मुक्तः? इत्याकाङ्क्षायां तस्यैव व्याख्यानं स एतेन प्रज्ञेनाऽत्मना इत्यादि । अनुक्तविशेषाणानामपि भगवदधीनत्वज्ञापनार्थं प्रज्ञानेत्रोऽलोक इति सामान्यवचनम् । |
| | |
| नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायान् अस्ति वृत्रहन् । नकिरेवा यथा त्वम् । इत्याद्यपि सर्वनामकत्वात् तस्यैव । किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् इत्यादिप्रश्नस्यापि
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| }} | | }} |
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| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C02_S06_V04_B07 |
| | text = | | | text = ‘अनारब्धफलानां च प्रारब्धानां च सर्वशः । |
| | | कर्मणां दाह एवायं मुक्तिरित्यभिधीयते ॥ |
| परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।
| | स तु मुक्तस्ततो देहाद् उद्गच्छति परात्मना । |
| परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥
| | प्रेरितो, विष्णुलोकं च प्राप्य भोगान् अवाप्य च ॥ |
| पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
| | भुङ्क्ते विष्णुप्रसादेन, न विष्णोरवशः क्वचित्। |
| दैवतं देवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥
| | विष्णुतन्त्रा इमे सर्वे मुक्ता अपि यतोऽखिलाः ॥’ इति ब्रह्माण्डे । |
| यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।
| |
| यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥
| |
| तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।
| |
| विष्णोर्नामसहस्रम्... ॥
| |
| इत्येव भारते परिहाराच्च ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C02_S06_V04 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C02_S06_V04_B08 |
| | text = | | | text = ब्रह्मेन्द्रादिशब्दा विष्णावेव मुख्यत इति तद्व्यावृत्त्या जीवानां स्वीकारार्थम् एष इत्यादिशब्दः । स हि भगवान् स्वनेतृकोऽपि नानुग्राह्यः । अनुग्राह्यत्वं हि ब्रह्मादीनाम् अत्र विवक्षितम् । ‘नेयताऽनुग्राह्यतापि न सा विष्णोः स्वतोऽपि तु’ इति शब्दतत्त्वे ॥ |
| | |
| मेऽन्नं दक्षिणमित्युक्तत्वाच्च विष्णुरेवेति ज्ञायते । स हि विष्णुर्दक्षिणामित्र उक्तो हरिवंशेषु धन्याश्चर्यपर्वणि ।
| |
| दक्षिणाभिः सहैवैतन्मदधस्ताज्जगत्सदा ।
| |
| धन्याश्चर्योहमेवैको मित्रं मे दक्षिणा रमा ॥
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| इत्यवादीद्धरिर्भूपा धन्योऽसीत्युदितो मया ॥
| |
| इति नारदवचनम् ।
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| }} | | }} |
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| {{Bhashyam
| | </div> |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07
| | <div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके षष्ठोऽध्यायः ॥</div> |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01
| |
| | text =
| |
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| न च बृहतीसहस्राभिमानिनीं देवीं विना चेतनमात्रस्य मुख्यमित्रत्वं युज्यते ।
| | {{VerseBlock |
| }} | | | verse_id = AIT_C02_S07_V01 |
| | | document_id = AIT |
| | | chapter_id = AIT_C02 |
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता । मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् । आविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थ, श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । ऋतं वदिष्यामि , सत्यं वदिष्यामि , तन्मामवतु , तद् वक्तारमवतु , अवतु माम् , अवतु वक्तारम् ॥ |
| | | verse_lines = वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता । मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् । आविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थ, श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । ऋतं वदिष्यामि , सत्यं वदिष्यामि , तन्मामवतु , तद् वक्तारमवतु , अवतु माम् , अवतु वक्तारम् ॥ |
| | | commentary1 = aitareya |
| | }} |
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| | <div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके सप्तमोऽध्यायः ॥ ॥ इति द्वितीयारण्यकः समाप्तः॥</div> |
|
| |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C02_S07_V01" data-block-id="bhashya-AIT_C02_S07_V01"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C02_S07_V01 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C02_S07_V01_B01 |
| | text = | | | text = वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता , अवबोधरूपे विष्णौ प्रतिष्ठिता । स च विष्णुर्मे वाचि स्थितः । यदेतद् हृदयं मनश्च इति विष्णुनामधेयेषूक्तत्वात् । आविराविर्म एधि, हे विष्णो ! ममाऽविराविर्भव । आणीस्थित आण्यां स्थित विष्णो ! इति सम्बोधनम् । |
| | | ‘आधारः सर्ववेदानां वेदाणी प्राण उच्यते । |
| मिनोति त्रायते चेति मित्रमित्यभिधीयते ।
| | तस्मिन् स्थितो हरिर्नित्यम् आणीस्थ इति गीयते ॥’ इति शब्दतत्त्वे । |
| तस्माद्योऽयं विजानाति स मित्रं तस्य नान्यथा ॥
| |
| इति भारते | |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C02_S07_V01 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C02_S07_V01_B01 |
| | text = | | | text = आविरावीः इति दैर्घ्यमतिशयार्थे, ‘आधिक्येऽधिकम्’ इति सूत्रात् । अणशब्दस्य गतिवाचित्वाच्चलम् आणम् उच्यते । तस्य धारणेन तद्वान् आणी, स्थापक इत्यर्थः । मे श्रुतं मा प्रहासीः मम विद्यागोचर एव सर्वदा भव, विस्मृतो मा भव । |
| | हे विष्णो ! अनेन त्वद्विषयेणैव अधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि सर्वाहोरात्रेष्वपि त्वद्विषयाध्ययनमेव करोमीत्यर्थः । ऋतं यथावत् अवगतं त्वां वदिष्यामि । सत्यं साधुगुणैस्ततं सर्वनियन्तारं च । तद् विष्ण्वाख्यं ब्रह्म मामवतु इति तस्यैव विष्णोः परोक्षत्वेनैव प्रार्थनम् । |
| | ‘वाङ् म इत्यादिकं खण्डं विष्णुप्रार्थनरूपकम् । |
| | अविघ्नत्वमभीप्सूनां शिष्याणां दृष्टवान् हरिः ॥’ इति च ॥ |
| | }} |
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|
| उक्थायुत्वाच्च विष्णुरेवात्रोक्त इत्यवगम्यते । बृहतीसहस्रं ह्युक्थनामकं मुख्यतः ।
| | </div> |
| महाव्रतनियुक्तं यदृक्सहस्रं हरेः प्रियम् ।
| | {{VerseBlock |
| तदुक्थमिति सम्प्रोक्तं तेने यो विष्णुरेव हि ॥
| | | verse_id = AIT_C03_S01_V01 |
| तस्मादुक्थायुरित्युक्त ऐश्वर्यादिन्द्र उच्यते ।
| | | document_id = AIT |
| तस्मादुक्थायुरिन्द्रेति विष्णुर्यज्ञेषु पूज्यते ॥
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| इति गारुडे
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = अथाऽतः संहितायाः उपनिषत् । |
| | | verse_lines = अथाऽतः संहितायाः उपनिषत् । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V01" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V01"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V01 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V01_B01 |
| | text = | | | text = ‘विष्णुनाम्नि षकारस्य णकारस्य च संहिताम् । |
| | विष्णोस्तु बहुरूपाणां वाचिकाम्(वाचकाम् .हृ) ऋषयो विदुः । |
| | तौ च वर्णौ हरेः सम्यक्स्वरूपप्रतिपादकौ । |
| | बहुधैव स्थितस्यास्य सदैवैकस्वरूपिणः । |
| | विष्णुनामार्थरूपत्वाद् वेदानामपि सर्वशः । |
| | अन्येषामपि शब्दानां संहिता विष्णुवाचिकाः(वाचकाः .हृ) । |
| | तद्वाचकास्तथा वर्णाः सर्वे लौकिकवैदिकाः । |
| | }} |
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|
| विष्णुर्ह्युक्थायुरिन्द्र इत्युच्यते । यज्ञेष्वन्य इन्द्रः पृथक्चोच्यते । यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुर्यं मित्रमाहुर्यमु सत्यमाहुः इत्युक्त्वा तस्मै त्वा तेभ्यस्त्वा इति भेदवचनाच्च । सत्य इति वायुः । सदिति प्राण इति श्रुतेः ।
| | </div> |
| | {{VerseBlock |
| | | verse_id = AIT_C03_S01_V02 |
| | | document_id = AIT |
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । वायुस्संहितेति माण्डूकेयः । |
| | | verse_lines = पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । वायुस्संहितेति माण्डूकेयः । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
|
| |
|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V02" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V02"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V02 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V02_B01 |
| | text = | | | text = पृथिवीनामकं रूपं पृथुत्वात् पृथिवीस्थितम् । |
| | | देवता पूर्ववर्णस्य पूर्वरूपं तदुच्यते । |
| सदेव सत्यमित्युक्तं सत्यो वायुरुदाहृतः ।
| | देवतोत्तरवर्णस्य क्रीडनाच्च द्युनामकम् । |
| साधुत्वं सत्यता प्रोक्ता साधुर्वायुर्हि सर्वतः ॥
| | दिवि स्थितं हरे रूपमुत्तरं रूपमुच्यते । |
| इति शब्दनिर्णये ।
| | वेदकत्वाच्चायनत्वाद् रूपं यद्वायुनामकम् । |
| | विष्णोस्तद्वर्णयोर्मध्यदेवतेति प्रकीर्तितम् । |
| | संहितानामकं तच्च रूपद्वयसहस्थितेः ॥ |
| }} | | }} |
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| |
|
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V02 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V02_B02 |
| | text = | | | text = वर्णद्वयं विकारं च षकारं केचिदब्रुवन् । |
| | षकारं मध्यमत्रैव णकारं केचिदुत्तरम् । |
| | पृथक्करणमेवैषां वर्णयोर्मध्यमुच्यते । |
| | उपसर्गमात्रं वीत्याहुः केचिन्नाम ष्णुमात्रकम् । |
| | षकारं च णकारं च वर्णौ पूर्वोत्तरावपि । |
| | व्यक्तिरेवोष्मणस्तत्र मध्यमित्यभिधीयते । |
| | सर्वेप्येत उपादेयाः पक्षा निर्दोषका यतः ।’इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ॥ |
| | }} |
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|
| प्रियधाम्न उप समीपे गमनं नाम तद्धामप्राप्तिकारणभगवत्प्रसादप्राप्तिः । अन्यथोपशब्दो व्यर्थः स्यात् । न च तदैव भगवतः प्रियं धाम विश्वामित्रेण प्राप्तम् ।
| | </div> |
| | {{VerseBlock |
| | | verse_id = AIT_C03_S01_V03 |
| | | document_id = AIT |
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = आकाशः संहितेत्यस्य माक्षव्यो वेदयाञ्चक्रे । |
| | | verse_lines = आकाशः संहितेत्यस्य माक्षव्यो वेदयाञ्चक्रे ।;स हाविपरिहृतो मेने ,न मेऽस्य पुत्रेण समगादिति समाने वै तत् । परिहृतो मेन इत्यागस्त्यः । |
| | | verse_line2 = स हाविपरिहृतो मेने ,न मेऽस्य पुत्रेण समगादिति समाने वै तत् । परिहृतो मेन इत्यागस्त्यः । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V03" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V03"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V03 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V03_B01 |
| | text = | | | text = आकाशस्थ आकाशनामा भगवान् वर्णयोर्मध्यदेवतेति माक्षव्यः। उभयरूपसंहितत्वात्(उभयरूपसहितत्वात् .हृ) संहितानामकः । स माण्डूकेयः, तेन माक्षव्येण अपरिहृतः स्वपक्षः इति मेने । मे मदीयेन= मदुपासितेन अस्य आकाशस्य पुत्रेण वायुना न समागादसौ माक्षव्यः । वायुस्थविष्ण्वनुपासनात् । |
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| बृहतीसहस्रे प्रथमे सालोक्यं प्रददौ हरिः ।
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| द्वितीये स्वपुरप्राप्तिं तृतीयेऽन्तःपुरस्य च ॥
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| तथा स्वविषयं ज्ञानं विश्वामित्रे ददौ प्रभुः ॥
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| इति च गारुडे । | |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V03 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V03_B02 |
| | text = | | | text = यद्यप्याकाशस्थो भगवान् संहितानामको भवति । तथाऽपि न वायुस्थस्यासंहितात्वं भवतीत्यपरिहृतत्वम् । परिहृतो माण्डूकेयपक्ष इत्यहं मेन इत्यागस्त्यः । आकाशे विष्णूपासनस्याधिकफलत्वात् । पिता ह्याकाशो वायोः । |
| | }} |
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| न चेन्द्रादिभिरैक्यमत्रोच्यते । प्राणस्तथाऽनुगमाद् इति च विष्णोरेव प्राणशब्दाभिधेयत्वमुक्त्वा न वक्तुरात्मोपदेशादिति चेदध्यात्मसम्बन्धभूमा ह्यस्मिन् इति वक्तुः बृहतीसहस्रं शंसितुर्विश्वामित्रस्येन्द्रेण स्वात्मोपदेशः क्रियत इति पक्षो निराकृतो हि भगवता सूत्रेषु । अध्यात्मसम्बन्धशब्देनावेशो विष्णोरिन्द्रे विवक्षितो भगवता । अन्येष्वन्तर्यामिरूपेण सम्बन्धोऽस्त्येव । अस्मिन्निन्द्रे तु विशेषावेशस्तात्कालिकः । अधिकात्मनः परमात्मनः सम्बन्धोऽध्यात्मसम्बन्धः । न हि स्वात्मना स्वस्य सम्बन्धो भवति । यद्यध्यात्ममात्रमत्रोच्यत इति विवक्षितं तर्ह्यध्यात्मभूमेत्येव स्यात् सम्बन्धशब्दो व्यर्थः । तस्मादिन्द्रादिजीवेभ्यो विष्णोर्भेद एवात्र भगवतो विवक्षितः ।
| | </div> |
| शास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् इति शास्तुरन्तर्यामिणो विष्णोः सर्वशरीरस्थितत्वात् सर्वनामाभिधेयत्वं चोक्तम् । अहं मनुरभवं सूर्यश्चेत्यादिवत् । न हि मनुसूर्यादिर्भवति वामदेवस्तेषां पक्षेऽपि । सर्वप्रवृत्तिहीनतां हि ते मोक्षं वदन्ति । अत्र चाहं भूमिमददामार्याय इत्यादिना प्रवृत्तिरेवोच्यते । नच वामदेवेन मन्वादिकर्म क्रियते कदापि । अतीतार्थश्चायं दृश्यते भूमिमददामित्यादिना । नहि पूर्वं वामदेवेन तानि कर्माणि कृतानि । भगवान् विष्णुर्हीन्द्राय भूमिमददात् । स एव च सर्वेष्वन्तर्यामित्वेन स्थित्वा नामप्रवृत्तिनिमित्तानि सर्वकर्माणि कुर्वन्नवबोधसूरिनियमनादिभिर्मनुसूर्यादिसर्वनामा भवति । यदि भेदस्य पूर्वमपि मिथ्यात्वमङ्गीक्रियते तर्हि भूमिदानादिसर्वकर्मणां मन्वादित्वस्यापि मिथ्यात्वादहं मनुरभवमित्यादिकं सर्वमनर्थकमेव भवति ।
| | {{VerseBlock |
| | | verse_id = AIT_C03_S01_V04 |
| | | document_id = AIT |
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = समानं ह्येतद् भवति वायुश्चाऽकाशश्चेत्यधिदैवतम् । |
| | | verse_lines = समानं ह्येतद् भवति वायुश्चाऽकाशश्चेत्यधिदैवतम् । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V04" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V04"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V04 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V04_B01 |
| | text = | | | text = भगवतस्तु पक्षः(‘भगवतः स्वपक्षः’इति ताम्रपर्णियरीत्या भाष्यपाठः) समत्वमेव वाय्वाकाशयोरिति । आकाशस्य पितृत्वाद् वायोर्बलाधिकत्वाच्च उभयोरुपासनास्थानत्वे साम्यम् । तस्मादुभावपि ग्राह्यौ । |
| | <span class="gr-unknown-inline gr-tag-bhashya">त्वगिन्द्रियदेवतात्वेनाऽकाशात् पूर्वमेव वायोः सात्विकाहङ्कारजत्वाद्, वायोराकाशाद् गुणाधिकत्वम् । तथाऽप्यत्राऽकाशस्य पितृत्वम्, व्याप्तिश्चाधिका इत्युपासनायां साम्यम् ॥</span> |
| | }} |
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| जीवेश्वरभिदा चैव जीवभेदः परस्परम् ।
| | </div> |
| जडेश्वरभिदा चैव जडभेदस्तथैव च ॥
| | {{VerseBlock |
| जडजीवभिदा चैव सत्योऽयं भेदपञ्चकः ।
| | | verse_id = AIT_C03_S01_V05 |
| न कदाचिन्निवर्त्योऽयं मुक्तौ संसार एव वा ॥
| | | document_id = AIT |
| य एतदन्यथा ब्रूयुस्ते हि यान्त्यधरं तमः ॥
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| इति भविष्यत्पर्वणि ।
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = अथाध्यात्मम् । वाक्पूर्वरूपम्, मन उत्तररूपम्, प्राणस्संहितेति शूरवीरो माण्डूकेयः । अथ हास्य पुत्र आह ज्येष्ठः। मनः पूर्वरूपम्, वागुत्तररूपम्, मनसा वा अग्रे सङ्कल्पयति । अथ वाचा व्याहरति । तस्मान्मन एव पूर्वरूपम्, वागुत्तररूपम्, प्राणस्त्वेव संहितेति । समानमेनयोरत्र पितुश्च पुत्रस्य च । |
| | | verse_lines = अथाध्यात्मम् । वाक्पूर्वरूपम्, मन उत्तररूपम्, प्राणस्संहितेति शूरवीरो माण्डूकेयः । अथ हास्य पुत्र आह ज्येष्ठः। मनः पूर्वरूपम्, वागुत्तररूपम्, मनसा वा अग्रे सङ्कल्पयति । अथ वाचा व्याहरति । तस्मान्मन एव पूर्वरूपम्, वागुत्तररूपम्, प्राणस्त्वेव संहितेति । समानमेनयोरत्र पितुश्च पुत्रस्य च । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V05" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V05"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V05 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V05_B01 |
| | text = | | | text = अत्र प्राणाख्यस्य प्राणे स्थितस्य विष्णोः संहितानामत्वे पितापुत्रयोः साम्यमेव । अन्यत्र तु पुत्रपक्ष एव बलीयान्, युक्तिमत्वात् । |
| | }} |
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| असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्।
| | </div> |
| ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥
| | {{VerseBlock |
| एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
| | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 |
| मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥
| | | document_id = AIT |
| इत्यादि च ।
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = स एषोऽश्वरथः प्रष्टिवाहनो मनोवाक्प्राणसंह(हि)तः । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन । सर्वमायुरेतीति नु माण्डूकेयानाम् ॥ १ ॥ |
| | | verse_lines = स एषोऽश्वरथः प्रष्टिवाहनो मनोवाक्प्राणसंह(हि)तः । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन । सर्वमायुरेतीति नु माण्डूकेयानाम् ॥ १ ॥ |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V06" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V06"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V06_B01 |
| | text = | | | text = ‘मनोवाक्प्राणनामाऽसौ मन आदिषु संस्थितः । |
| | | विष्णुस्तस्य रथो देह इन्द्रियाश्वः प्रकीर्तितः ॥’ इति च । |
| न च प्राणो वा अहमस्मृष इत्यादावहमस्म्यादिशब्दोऽस्मच्छब्दाद्यर्थः । एष तपन्नेवास्मीत्युपरितनस्य वैयर्थ्यात् । प्राणो ह्येष य एष तपतीत्युक्तत्वात् । अतोऽहमस्मीत्यादि च भगवन्नामैव । न च जीवैक्यवचनमत्र प्रस्तुतम् । ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एवेति सर्वनामाभिधेयत्वं भगवत उक्त्वा तत्रैव प्रमाणत्वेन – विश्वामित्रं ह्येतदहरित्याद्याख्ययिकोक्ता । तस्मात् सर्वान्तर्यामित्वात् सर्वगुणत्वात् सर्वशक्तित्वाच्च सर्वनामवत्वमेव विष्णोरुच्यते न तु सर्वस्वरूपत्वम् ।
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| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V06_B01 |
| | text = | | | text = ‘प्रष्टिः स पृच्छनीयत्वात् परमात्मा जनार्दनः । |
| | | वक्तृत्वाच्चैव वाङ्नामा मनो मन्तृत्वहेतुतः ॥’इति च । |
| उक्तं च भारते ।
| | ‘प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति, वदन् वाक्, पश्यंश्चक्षुः, शृण्वन् श्रोत्रं, मन्वानो मनः तान्यस्यैतानि कर्मनामान्येव’(बृ.उ.५.१. अव्याकृतब्राह्मणम्) इति च श्रुतिः । |
| स्रष्टृत्वाच्चैव पातृत्वान्नियमाच्च प्रकाशनात् ।
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| सर्वत्वमुक्तं विष्णोस्तु न तु सर्वस्वरूपतः ॥
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| इति । | |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V06_B01 |
| | text = | | | text = मुक्तिरेव स्वर्गलोकः अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वा इति प्रस्तुतत्वात् । |
| | |
| पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यमिति पुरुषेणैवेदं सर्वं व्याप्तं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । आ तृणादाकरीषात् सर्वं भगवानिति मिथ्यादृष्टिरेषा इति च श्रुतिः ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V06_bc_line |
| | text = | | | text = ‘मुक्तः प्रकृष्टज्ञानैश्च वेदैर्विष्णूत्थतेजसा । |
| | |
| हिरण्मयो ह वा अमुष्मिंल्लोके सम्भवति हिरण्मयः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद । अमृतो ह वा अमुष्मिंल्लोके सम्भवत्यमृतः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददृशे य एवं वेद । स एतेन प्रज्ञेनात्मनाऽस्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् आप्त्वा अमृतः समभवत् समभवत् इत्यादिना मुक्तानामपि भेदस्यैवोक्तेश्च । न हि भेदाभावे भूतेभ्यो ददृश इति युज्यते । न चामुक्तैः सर्वभूतैर्मुक्तो दृश्यते । एकत्वे तु ददृश इत्येतावता पूर्यते सर्वेभ्यो भूतेभ्य इति व्यर्थम् । न च तेषां पक्षे स्वयमपि स्वात्मानं पश्यति । कर्तृकर्मविरोध इति हि ते वदन्ति । अतः सर्वश्रुतिविरोध एव जीवेश्वरैक्याङ्गीकारे ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V06_bc_line |
| | text = | | | text = नित्यायुषा च युक्तः स्यात् संहितारूपविद्धरेः ॥’ इति च । |
| | |
| नच कर्तृकर्मविरोधो नामास्तीत्यत्र ककिञ्चिन्मानम् । श्रुत्यनुभवसिद्धत्वाच्च स्वदर्शनादेः ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V06_bc_line |
| | text = | | | text = प्रकृष्टत्वेन जननात् प्रजेति ज्ञानम् । पान्ति शंसाधनाश्चेति पशवो वेदाः । |
| | |
| न च तेषां पक्षे प्रज्ञेन सर्वज्ञेन परमात्मना सर्वकामावाप्तिर्नामाङ्गीक्रियते शरीरादुत्क्रान्तस्य ज्ञानिनः । तस्माद् वेदविरुद्धवादिन एव तेऽपि । न च शून्यवादिनः कश्चिद्विशेषो दृश्यते । न हि सर्वावाच्यं सर्वाज्ञेयं शून्यं चेति कश्चिद्विशेषः । केनापि शब्देनावाच्यस्य लक्षणायामपि प्रमाणं नास्ति । क्षीरमाधुर्यादयोऽपि तैरेव शब्दैरुच्यन्ते ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V06 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V06_bc_line |
| | text = | | | text = परब्रह्मणो विष्णोर्वरणादेव सम्यक् चायितं स्वरूपं तेजः ब्रह्मवर्चसम् । लौकिकप्रजादिकमपि तदिच्छूनां यथायोग्यं भवति । माण्डूकेयैर्ऋषिभिरुपाश्रिता एता विद्याः ॥ १ ॥ |
| | |
| विशदं क्षीरमाधुर्यं स्थिरमाज्यस्य तीक्ष्णकम् ।
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| गुडस्य पनसादीनां निर्हारीत्यभिधीयते ॥
| |
| इति शब्दनिर्णये ।
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| }} | | }} |
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| {{Bhashyam
| | </div> |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07
| | <div class="gr-author-note">॥इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके) प्रथमः खण्डः॥</div> |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01
| |
| | text =
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| न च सर्वगुणदोषक्रियाविनिर्मुक्तस्यास्तित्वमपि कुत्रचित् दृष्टम् । अतः शून्यवादिन एव तेऽपि । अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वाभावः प्रसीदति इत्यादिना प्रसादादिगुणाश्च भगवतो दृश्यन्ते । यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च चोभे भवत ओदनः इत्यादिना कर्माणि च । तस्मिन् देवाः श्रिताः सर्वे इत्यादिगुणाश्च तत्रैवोक्ताः ।
| | {{VerseBlock |
| | | verse_id = AIT_C03_S01_V07 |
| | | document_id = AIT |
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = अथ शाकल्यस्य पृथिवी पूर्वरूपम्, द्यौरुत्तररूपम् , वृष्टिः सन्धिः. पर्जन्यः सन्धाता । तदुतापि यत्रैतद् बलवद् अनूद्गृह्णन् सन्दधद् अहोरात्रे वर्षति, द्यावापृथिव्यौ समधाताम् इत्युताप्याहुः, इती नु अधिदैवतम् । |
| | | verse_lines = अथ शाकल्यस्य पृथिवी पूर्वरूपम्, द्यौरुत्तररूपम् , वृष्टिः सन्धिः. पर्जन्यः सन्धाता । तदुतापि यत्रैतद् बलवद् अनूद्गृह्णन् सन्दधद् अहोरात्रे वर्षति, द्यावापृथिव्यौ समधाताम् इत्युताप्याहुः, इती नु अधिदैवतम् । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V07" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V07"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V07 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V07_B01 |
| | text = | | | text = ‘वराहो वामनः सिंह इति रूपत्रयं हरेः । |
| | | पूर्वोत्तरार्णमध्येषु स्थितमुक्तं सनातनम् । |
| अक्षण्वन्तः कर्णवन्तः सखायो मनोजवेष्वसमा बभूवुः ।
| | माण्डूकेयैर्हि, शाकल्यो वासुदेवादिरूपिणम् । |
| आदध्नास उपकक्षास उ त्वे ह्रदा इव स्नात्वा उ त्वे ददृश्रे ॥
| | तेषु चोच्चारके चैव स्थितमाह चतुर्विधम् । |
| इति मुक्तानामपि तारतम्यं चोक्तम् ।
| | भूमिद्युवृष्टिपर्जन्यनाम्नोर्व्यादिषु संस्थितम् । |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | </div> |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | {{VerseBlock |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V08 |
| | text = | | | document_id = AIT |
| | | | chapter_id = AIT_C03 |
| श्रुत्वा विष्णुं कर्णफलं प्राप्तत्वात् कर्णसंयुताः ।
| | | verse_type = mantra |
| अक्षण्वन्तो दर्शनाच्च विष्णोर्मुक्ताश्च ये गणाः ॥
| | | verse_line1 = अथाध्यात्मम् । पुरुषो ह वा अयं सर्व आनन्दं द्वे विदले भवत इत्याहुः । तस्येदमेव पृथिव्या रूपम्, इदं दिवः । तत्रायमन्तरेणाऽकाशो यथाऽसौ द्यावापृथिव्यावन्तरेणाऽकाशः । तस्मिन् हास्मिन्नाकाशे प्राण आयत्तः, यथाऽमुष्मिन्नाकाशे वायुरायत्तः , यथाऽमूनि त्रीणि ज्योतींषि, इत्येवम् इमानि पुरुषे त्रीणि ज्योतींषि । |
| तारतम्यं च तेषां हि श्रुतावुदितमञ्जसा ।
| | | verse_lines = अथाध्यात्मम् । पुरुषो ह वा अयं सर्व आनन्दं द्वे विदले भवत इत्याहुः । तस्येदमेव पृथिव्या रूपम्, इदं दिवः । तत्रायमन्तरेणाऽकाशो यथाऽसौ द्यावापृथिव्यावन्तरेणाऽकाशः । तस्मिन् हास्मिन्नाकाशे प्राण आयत्तः, यथाऽमुष्मिन्नाकाशे वायुरायत्तः , यथाऽमूनि त्रीणि ज्योतींषि, इत्येवम् इमानि पुरुषे त्रीणि ज्योतींषि ।;यथाऽसौ दिव्यादित्य एवमिदं शिरसि चक्षुः, यथाऽसावन्तरिक्षे विद्युदेवमिदमात्मनि हृदयम्, यथाऽयमग्निः पृथिव्याम् एवम् इदमुपस्थे रेतः। एवमु ह स्म सर्वलोकमात्मानमनुविधायाऽह इदमेव पृथिव्या रूपम् इदं दिवः । स य एवमेतां संहितां वेद, सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन, सर्वमायुरेति ॥२॥ |
| क्षीरसागरदध्नास्तु केचित् तिष्ठन्ति मुक्तिगाः ॥
| | | verse_line2 = यथाऽसौ दिव्यादित्य एवमिदं शिरसि चक्षुः, यथाऽसावन्तरिक्षे विद्युदेवमिदमात्मनि हृदयम्, यथाऽयमग्निः पृथिव्याम् एवम् इदमुपस्थे रेतः। एवमु ह स्म सर्वलोकमात्मानमनुविधायाऽह इदमेव पृथिव्या रूपम् इदं दिवः । स य एवमेतां संहितां वेद, सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन, सर्वमायुरेति ॥२॥ |
| उपस्थिता ब्रह्मवनं केचिदश्वत्थमण्डलम् ।
| | | commentary1 = aitareya |
| ऐरे ह्रदे केचिदपि देवा एव परं हरिम् ॥
| |
| नागभोगशयं मुक्ता ददृश्रेऽधिकमोदिनः ।
| |
| सागरादिस्थिता विष्णुं पश्यन्ति क्वचिदेव हि ॥
| |
| इति ब्रह्मसारे ।
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| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V08" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V08"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V08 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V08_B01 |
| | text = | | | text = उर्व्यादीनां चतुर्णां च देह एव स्थितिं पुनः । |
| | | अधरार्धस्य चोर्व्याश्च साम्यमन्यस्य वै दिवा । |
| यत्र ब्रह्मा पवमान छन्दस्यां ३ वाचं वदन् ।
| | वाचो वृष्ट्यैव साम्यं च पर्जन्येनैव चाऽत्मनः । |
| ग्राव्णा सोमे महीयते सोमेनानन्दं जनयन्निन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥
| | तेषां तेषु स्थितिं चैव विष्णोश्च चतुरात्मनः । |
| | आकाशस्यान्तराकाशे नृसिंहस्यात्र संस्थितिम् । |
| | वायोः प्राणात्मतां चैव तत्र दाशरथेः स्थितिम् । |
| | सूर्यविद्युद्धुताशानां दृग्धृद्रेतःसु च स्थितिम् । |
| | कपिलस्य च हंसस्य जामदग्न्यस्य तेषु च । |
| | स्थितिं वदति विद्येयमपि मोक्षप्रदायिनी ॥’ इत्यादि च । |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V08 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V08_B02 |
| | text = | | | text = वर्षणाद् वृष्टिः । परं जनयतीति पर्जन्यनामा विष्णुः । सन्धिनोतीति सन्धिः, ‘धिनु= पृष्टौ’ इति धातुः । सम्यग्धारणात् सन्धाता । वर्षणमेव द्यावापृथिव्योः सन्धानम् । पर्जन्यस्थो भगवांस्तत्कर्ता ॥२॥ |
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| यत्र ज्योतिरजस्रं यस्मिंल्लोके स्वर्हितम् ।
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| तस्मिन् मां धेहि पवमानामृते लोके अक्षित इन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥
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| }} | | }} |
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| {{Bhashyam
| | </div> |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07
| | <div class="gr-author-note">॥इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके)द्वितीयः खण्डः॥</div> |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01
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| | text =
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| यत्र राजा वैवस्वतो यत्रावरोधनं दिवः ।
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| यत्राभूर्यह्वतीरापस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥
| | | verse_id = AIT_C03_S01_V09 |
| | | document_id = AIT |
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = अथातो निर्भुजप्रवादाः । पृथिव्यायतनं निर्भुजम् । दिव्यायतनं प्रतृण्णम् । अन्तरिक्षायतनम् उभयम् अन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तमुपवदेद्, अच्योष्ठा अवराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयाद् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तमुपवदेद् । अच्योष्ठा उत्तराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयाद् । यस्त्वेवोभयमन्तरेणाऽह तस्य नास्त्युपवादः । |
| | | verse_lines = अथातो निर्भुजप्रवादाः । पृथिव्यायतनं निर्भुजम् । दिव्यायतनं प्रतृण्णम् । अन्तरिक्षायतनम् उभयम् अन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तमुपवदेद्, अच्योष्ठा अवराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयाद् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तमुपवदेद् । अच्योष्ठा उत्तराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयाद् । यस्त्वेवोभयमन्तरेणाऽह तस्य नास्त्युपवादः । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V09" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V09"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V09 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V09_B01 |
| | text = | | | text = ‘पृथिवीस्थो वराहस्तु संहितादेवतोदिता । |
| | | दिविष्ठो वामनश्चैव सम्प्रोक्तः पददेवता । |
| यत्रानुकामं चरणं त्रिनाके त्रिदिवे दिवः ।
| | नृसिंहस्त्वन्तरिक्षस्थो भगवान् क्रमदेवता । |
| लोका यत्र ज्योतिष्मन्तस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥
| | स्वाध्यायमेवं ध्यात्वा यः करोत्यपवदेन्न तम् । |
| | तस्यापवदिता याति त्रैलोक्याद् अध एव हि । |
| | नाशमाप्नोति निरये तस्माद् अपवदेन्न तम् । |
| | गच्छस्यध इति ब्रूयाद् अन्यं ब्राह्मणतस्तथा । |
| | ब्रह्मप्राप्तेर्हि योग्यो यो ब्राह्मणः स, न चेतरः ॥’ इति च ॥ |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V09 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V09_B02 |
| | text = | | | text = भञ्जनवर्जितत्वाद् निर्भुजं संहिता । ‘तृण(तृणु. हृ)= च्छेदने’ इति धातोः प्रतृण्णं पदम् । उभयमन्तरेण क्रमः । निर्भुजमूलत्वात् पदादीनां तद्विषयप्रवादा अपि निर्भुजप्रवादा इत्येवोच्यन्ते । |
| | |
| यत्र तत्परमं पदं विष्णोर्लोके महीयते ।
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| देवैस्सुकृतकर्माभिस्तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V09 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V09_B03 |
| | text = | | | text = पृथिवीस्थितपृथिवीनामकविष्ण्वायतनं पृथिव्यायतनम् इत्यादि । |
| | | अवराभ्यां पृथिव्यन्तरिक्षाभ्यां च्युतोऽसीति । उत्तराभ्याम् अन्तरिक्षद्युभ्याम् । |
| यत्रानन्दाश्च मोदाश्च मुदः प्रमुद आसते ।
| | ‘क्रमस्वाध्यायकृद् यस्तं विशेषेण न निन्दयेत् । |
| कामस्य यत्राप्ताः कामाः तत्र माममृतं कृधीन्द्रायेन्दो परिस्रव ॥
| | लोकत्रयादपि भ्रष्टो यस्मात् तन्निन्दको भवेत् ॥’ इति च । |
| इत्यादिना ब्रह्मसूर्ययमादीनां सर्वदेवानां दिवो देव्या अवरोधभूतानां सर्वदेवानां गङ्गाद्यब्देवतानां च वेदव्याख्यानं सोमयागादिकं कामचरणं च मुक्तानां भेदेनावस्थितानामुच्यते । मुक्ताश्चात्रोच्यन्त इति प्रतीयते । अमृतं कृधीति वचनात् । अमुक्तानां स्वे स्वे लोकेऽवस्थानं हि तेषाम् । मुक्तानां हि विष्णुलोकेऽवस्थानं देवानाम् ।
| | तस्माद् अतिदुष्टत्वात् तन्निन्दको नास्त्येवेत्युक्तम्- तस्य नास्त्युपवादः इति । ‘तं कृष्णं पुण्डरीकाक्षं को नु युध्येत बुद्धिमान्’(भाग.५.६३.८) इत्यादिवत् । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | {{VerseBlock |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V10 |
| | text = | | | document_id = AIT |
| | | | chapter_id = AIT_C03 |
| मुक्तः प्रतिज्ञानात् सङ्कल्पादेव च तच्छ्रुतेः जगद्व्यापारवर्जम् भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च अनावृत्तिः शब्दात् अनावृत्तिः शब्दात् इत्यादिसूत्रेभ्यश्च मुक्तानां विष्णोर्भेदो भोगादिकं च सर्वं प्रतीयते । ग्राव्णा सोमे महीयते इति ब्रह्मणोऽन्यमुक्तैः पूज्यत्वं च प्रतीयते ।
| | | verse_type = mantra |
| नच सूत्रेषु निश्चितार्थस्यौपचारिकत्वं वक्तुं युज्यते । निर्णयात्मकत्वात् तेषाम् । अतिप्रसङ्गश्चोपचारादिकल्पने । ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः इति हि विनिश्चितानि ब्रह्मसूत्राणि ।
| | | verse_line1 = यद्धि सन्धिं विवर्तयति तन्निर्भुजस्य रूपम् । अथ यच्छुद्धे अक्षरे अभिव्याहरति तत् प्रतृण्णस्य । अग्र उ एवोभयमन्तरेणोभयं व्याप्तं भवति । अन्नाद्यकामो निर्भुजं ब्रूयात् । स्वर्गकामः प्रतृण्णम् । उभयकाम उभयमन्तरेण । |
| | | verse_lines = यद्धि सन्धिं विवर्तयति तन्निर्भुजस्य रूपम् । अथ यच्छुद्धे अक्षरे अभिव्याहरति तत् प्रतृण्णस्य । अग्र उ एवोभयमन्तरेणोभयं व्याप्तं भवति । अन्नाद्यकामो निर्भुजं ब्रूयात् । स्वर्गकामः प्रतृण्णम् । उभयकाम उभयमन्तरेण ।;अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तं पर उपवदेत्, ‘पृथिवीं देवतामारः पृथिवी त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।;अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तं पर उपवदेद्, ‘दिवं देवतामारः, द्यौस्त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।;अथ यद्येनमुभयमन्तरेण ब्रुवन्तं पर उपवदेद्, ‘अन्तरिक्षं देवतामारः, अन्तरिक्षं त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।;यथा तु कथा च ब्रुवन् वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयाद् अभ्याशमेव यत् तथा स्यात् । |
| | | verse_line2 = अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तं पर उपवदेत्, ‘पृथिवीं देवतामारः पृथिवी त्वा देवता रिष्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V10 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V10_B01 |
| | text = | | | text = उपवदेद् इत्युक्तो मनुष्यमात्रः । पर उपवदेद् इत्यसुरः । सर्वशत्रुत्वात् । |
| | | ‘अमुक्तियोग्यैस्तु नरैर्विदुषां निन्दने कृते । |
| बहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति ।
| | ब्रूयाल्लोकच्युतोऽसीति निन्दितोऽसुरसर्गगैः । |
| योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रस्य निर्णयः ॥
| | नाशयिष्यति विष्णुस्त्वाम् अन्धे तमसि पातयेत् । |
| इति आदित्यपुराणे । | | इति ब्रूयान्न तु ब्रूयाद् देवसर्गात्मकं क्वचित्॥’ इति च । |
| न च निर्णयकानि भगवद्वाक्यान्यपहाय मानुषवाक्यैरेव तेषामुपचारत्वादि कल्प्यम् । न च भोगरहिता मुक्तिर्नामान्याऽस्तीत्यत्र किञ्चिन्मानम् । | | ‘षणयोः सन्धिकरणात् संहिताध्ययनं भवेत् । |
| | विषणुस्त्विति यो ब्रूयात् पदाध्यायी भवेत सः । |
| | सन्ध्युक्तिश्च विभागश्च द्वयं व्याप्तं क्रमेण तु । |
| | तस्माद् द्विधाऽपि वचनात् क्रमाध्यायी भवेत सः ॥ |
| | भोगवृद्धिं च यो मोक्ष इच्छेद् विष्णव इत्यसौ । |
| | मोक्षकामो विष्णवे द्वयकामो द्वयं वदेत् ॥ |
| | विष्णुनामात्मकत्वाच्चाथ संहितपदक्रमाः । |
| | सर्ववेदस्थिता मोक्षतद्भोगद्वयसाधकाः ॥ |
| | तज्ज्ञानामेव नान्येषाम् इति वेदानुशासनम् । |
| | संहिताद्या ब्रुवन् वाऽपि य एवंविन्नवा ब्रुवन् ॥ |
| | परिवादं ब्रुवन्तं वा न ब्रुवन्तम् अथापि वा । |
| | यद् वदेत् तत् तथैव स्यात् क्षिप्रमेव न संशयः ॥’ इति च । |
| | अग्र एव ‘अग्र्यमेव’ उभयमन्तरेण । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | {{VerseBlock |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V11 |
| | text = | | | document_id = AIT |
| | | | chapter_id = AIT_C03 |
| भुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः ।
| | | verse_type = mantra |
| तथा मुक्तावुत्तमायां विष्णुमाविश्य भुञ्जते ॥
| | | verse_line1 = न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयाद् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयाद् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयाद् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माऽऽह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ ३ ॥ |
| विष्णोर्वशाश्च ते सर्वे सर्वदा दुःखवर्जिताः ।
| | | verse_lines = न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयाद् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयाद् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयाद् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माऽऽह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ ३ ॥ |
| न तु विष्णुगुणान् सर्वे भुञ्जते ते कदाचन ॥ | | | commentary1 = aitareya |
| बाह्यभोगान् भुञ्जते च तारतम्येन कांश्चन ।
| |
| विष्णोर्देहाद् बहिश्चापि निर्गच्छन्ति यथेष्टतः ॥
| |
| इति स्कान्दे ।
| |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V11 |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V11_B01 |
| | text = | | | text = द्युम्नो द्युतिस्वरूपत्वाद् विष्णुरेव प्रकीर्तितः । |
| | | योऽतिक्रमति तस्याज्ञाम् अतिद्युम्नः प्रकीर्तितः(स कीर्तितः .हृ) ॥ |
| इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
| | मोक्षयोग्योऽपि(मोक्षायोग्योऽपि . हृ) यस्त्वेवम् अतिद्युम्नो भवेत् पुमान् । |
| सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥
| | लोकच्युतोऽसीत्येवं तं ब्रूयान्नाज्ञास्थितं क्वचित्॥ |
| इति भगवद्वचनम् ।
| | लोकच्युतो भवेत्येनम् अपि नैव वदेत् क्वचित्। |
| | च्युतोऽसीति तु शिक्षार्थं ब्रूयान्नैवान्यथा क्वचित्॥’ इति च ॥३ ॥ |
| }} | | }} |
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| | </div> |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V07
| | <div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयारण्यके(तृतीयप्रघट्टके तृतीयः खण्डः ॥</div> |
| | id = AIT_C02_S02_V07_B01
| |
| | text =
| |
| | |
| तस्मात् मुक्तैरपीज्यमानः सर्वस्माद् भिन्नः सर्वोत्तमः सर्वनामा सर्वशक्तिः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायणः सर्ववेदादिषूच्यते इति सिद्धम् ॥ ३ ॥
| |
| }}
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V12 |
| | document_id = AIT | | | document_id = AIT |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् तस्य यानि व्यञ्जनानि तच्छरीरम् । यो घोषः स आत्मा । य ऊष्माणः स प्राणः । एतद्धस्य वै तद्विद्वान् वसिष्ठो वसिष्ठो बभूव । तत एतन्नामधेयं लेभे । एतदु हैवेन्द्रो विश्वामित्राय प्रोवाच। एतदु हैवेन्द्रो भरद्वाजाय प्रोवाच । तस्मात् स तेन बन्धुना यज्ञेषु हूयते । | | | verse_line1 = अथातोऽनुव्याहाराः । प्राणो वंश इति विद्यात् । स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत्, शक्नुवन्तं चेन्मन्येत ‘प्राणं वंशं समधां३ँ । प्राणं मां वंशं सन्दधतं न शक्नोषीत्याह । प्राणस्त्वा वंशो हास्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् । अथ चेद् अशक्नुवन्तं मन्येत ‘प्राणं वंशं समधित्सिषन्तं नाशकः सन्धातुं प्राणस्त्वा वंशो हास्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् । |
| | verse_line2 = तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य षट् त्रिंशतमक्षराणां सहस्राणि भवन्ति । तावन्ति शतसंवत्सरस्याह्नां सहस्राणि भवन्ति । व्यञ्जनैरेव रात्रीराप्नुवन्ति । स्वरैरहानि । तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । | | | verse_lines = अथातोऽनुव्याहाराः । प्राणो वंश इति विद्यात् । स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत्, शक्नुवन्तं चेन्मन्येत ‘प्राणं वंशं समधां३ँ । प्राणं मां वंशं सन्दधतं न शक्नोषीत्याह । प्राणस्त्वा वंशो हास्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् । अथ चेद् अशक्नुवन्तं मन्येत ‘प्राणं वंशं समधित्सिषन्तं नाशकः सन्धातुं प्राणस्त्वा वंशो हास्यति’ इत्येनं ब्रूयाद् ।;यथा तु कथा च ब्रुवन् वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयाद् अभ्याशमेव यत् तथा स्यात् । न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥;४ ॥ |
| | verse_line3 = तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य परस्तात् प्रज्ञामयो देवतामयो ब्रह्ममयोऽमृतमयः सम्भूय देवता अप्येति । य एवं वेद । तद्योऽहं सोऽसौ, योऽसौ सोऽहं । तदुक्तमृषिणा - सूर्य आत्मा 'जगतस्थस्थुषश्च' इति । एतदु हैवोपेक्षेतोपेक्षेत ॥४ ॥
| | | verse_line2 = यथा तु कथा च ब्रुवन् वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयाद् अभ्याशमेव यत् तथा स्यात् । न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ |
| | verse_line4 = इति श्रीमन्महैतरेयोपनिषत्सु द्वितीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥ | | | commentary1 = aitareya |
| | commentary1 = aitareya | |
| }} | | }} |
|
| |
|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V12" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V12"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V12 |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V12_B01 |
| | text = | | | text = भगवदुपासकस्य यस्मिन् कस्मिंश्चिद् दोष उक्ते तं प्रत्युक्तिप्रकारः पूर्वं दर्शितः । अनुव्याहारशब्देन भगवदुपासनाविषय एवास्याशक्त्यादिदोषं वदतः प्रत्युक्तिरुच्यते । निर्भुजं वदन्तम् इत्यादि त्ववस्थामात्रदर्शनम् । आत्मनो ज्ञानसामर्थ्यानुसारेण वक्तव्यत्वादनुव्याहारः । |
| | |
| यावतीभिर्ऋग्भिः शंसिताभिः षट् त्रिंशत्सहस्राण्यक्षराणि भवन्ति यस्मात् कस्मादपि छन्दसस्तावत्यः शंसनीयाः । तदा सम्पादितं बृहतीसहस्रं भवति । तत्र या व्यञ्जनाभिमानिदेवता सैव सर्वप्राणिनां शरीराभिमानिदेवता स्वायम्भुवो मनुः । घोषाभिमानिदेवता सर्वजीवाभिमानी ब्रह्मा । ऊष्माभिमानी वायुः ।
| |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V12 |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V12_B02 |
| | text = | | | text = ‘सर्वाधारत्वतो वंश इत्युपासीत यो हरिम् । |
| | | वायुं च, मुक्तिमाप्नोति, य एवं तदुपासकम् । |
| व्यञ्जनानां शरीरस्य चाभिमानी मनुः स्मृतः ।
| | निन्देत विष्णुविज्ञानविषये, तं वदेत सः । |
| घोषाणां सर्वजीवानामभिमानी चतुर्मुखः ॥
| | विष्णुना वंशभूतेन वायुना सहितं तथा । |
| ऊष्माभिमानी वायुश्च प्रतिपाद्यो जनार्दनः ।
| | न शक्नोषीति मामात्थ हास्यतस्त्वाम् अतो हि तौ । |
| एतेषामधिपं विष्णुं बृहत्युक्थस्य देवताम् ॥
| | ज्ञानसामर्थ्यवान् इत्थं ब्रूयाद् देवादिरुत्तमः । |
| उपास्यैव वसिष्ठोऽभूद् वसिष्ठः शक्र एव च ।
| | अन्यो गन्धर्वपित्रादिरल्पज्ञानबलो, हि यः । |
| एतां विद्यां कौशिकाय भरद्वाजाय चादरात् ॥
| | स ब्रूयाद् विष्णुवायुभ्यां सन्धिमिच्छन्तमेव माम्(मा. हृ) ॥ |
| एतद्विद्याबलेनैव विद्याधीशेन बन्धुना ।
| | सन्धातुं नाशको यस्माद् हास्यतस्त्वाम् अतो हि तौ ॥’ इति च । |
| यज्ञेष्वाहूयते नित्यमिन्द्रो विष्णुप्रसादतः ॥
| |
| षट् त्रिंशद्रूपवान् विष्णुर्व्यञ्जनेषु च संस्थितः ।
| |
| तान्येव विष्णुरूपाणि रात्रीनामपि देवताः ॥
| |
| एकैकं च सहस्रं तद्व्यञ्जनेषु च रात्रिषु ।
| |
| रूपं विष्णोः स्थितं व्यूह्य षट् त्रिंशतिसहस्रधा ॥
| |
| षट् त्रिंशतिसहस्राणि स्वरगाणि हरेरपि ।
| |
| तान्येवाह्नां दैवतानि रूपाणि परमात्मनः ॥
| |
| द्वासप्ततिसहस्राणि रूपाण्येवं रमापतेः ।
| |
| शताब्दानामहोरात्रदैवतान्युत्तमानि च ॥
| |
| बृहतीसहस्रवर्णानामपि ध्यात्वाऽखिलान्यपि ।
| |
| शतवर्षहरिध्यानफलमाप्नोति पूरूषः ॥
| |
| एवं ज्ञात्वापि सम्पाद्य बृहतीनां सहस्रकम् । | |
| ज्ञानान्नारायणस्यैव प्रकृष्टज्ञानसन्ततेः ॥
| |
| स एव मे मयो विष्णुः प्रकृष्टज्ञानरूपकः ।
| |
| प्राधान्यं मयशब्दोऽयं वक्ति विष्णोः सदैव हि ॥
| |
| प्रधानोऽस्य हरिर्यस्मात् प्रज्ञारूपोऽधिदेवता ।
| |
| ब्रह्मामृतं च तेनायं ब्रह्मादिमय उच्यते ॥
| |
| सर्वोत्तमस्वरूपत्वाद्विष्णुरुक्तः स देवता ।
| |
| ब्रह्म पूर्णगुणत्वाच्च नित्यत्वादमृतं तथा ॥
| |
| एतादृशं तु यो विष्णुं प्रधानं वेत्ति सर्वदा ।
| |
| प्रज्ञादिभिर्गुणैः स्वस्मात् परेभ्यश्च सदाधिकम् ॥
| |
| प्रज्ञादेवब्रह्मामृतमयः स परिकीर्तितः ।
| |
| प्रज्ञादिमय एवं स भूत्वा देवान् क्रमेण च ॥
| |
| एति मारुतपर्यन्तान्मारुतेन च केशवम् ।
| |
| सम्पादनाच्च विद्यायः अस्याः परत एव च ॥
| |
| द्वासप्ततिसहस्राणि रूपाणि हि रमापतेः ।
| |
| बृहतीसहस्रसंस्थानि स्वरव्यञ्जनभेदतः ॥
| |
| तान्येव पुरुषस्थानि यस्मात् पुरुषसंस्थितम् ।
| |
| बृहतीसहस्रं तच्छंस्यं व्यज्यते न ह्यृते नरम् ॥
| |
| द्वासप्ततिसहस्राणि तान्येवाहर्निशासु च ।
| |
| विष्णुरूपाणि सूर्येऽपि त्वहोरात्रं हि सूर्यगम् ॥
| |
| तस्माद्योऽयमहं नामा सदाऽहेयत्वहेतुतः ।
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| स एवासौ सूर्यसंस्थः साक्षान्नारायणः प्रभुः ॥ | |
| योऽसौ सूर्यगतो विष्णुः सोऽहेयो भास्करादिभिः ।
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| एवं मनुष्यजीवेषु सूर्यादिषु च संस्थितः ॥
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| एक एव परो विष्णुरिति जीवसमीपगम् ।
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| ईक्षेन्नारायणं देवं सर्वजीवेश्वरेश्वरम् ॥
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| इत्यैतरेयसंहितायाम् ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V12 |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V12_B03 |
| | text = | | | text = स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत्, प्राणं प्रत्येनमुपासकमुपवदेत्- ‘प्राणस्य विष्णोः प्रियत्वं तव न प्राप्स्यति’ इति । नाशकः सन्धातुम्, मया सह सन्धानं कर्तुं नाशकः । मम प्रीतिं कर्तुं नाशकः । |
| | | ‘तद्भक्तभक्तेष्वपि यो न कुर्यात् प्रीतिमञ्जसा । |
| सम्पन्नस्य परस्तादेवानन्तरमेव । न पुनः कर्मान्तरेण शरीरारम्भ एवंविदो भवति । प्रज्ञामयो देवतामय इत्यादिपृथक् पृथङ्मयशब्दोऽनिरुद्धादिचतुर्मूर्तीनामपि परस्परसाम्येन सर्वजीवेभ्य आधिक्यं ज्ञातव्यमिति दर्शयितुम् ।
| | विष्णुर्जहाति तं पापम् इह चामुत्र च प्रभुः ॥’ इति च भारते ॥४ ॥ |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam
| | </div> |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V08
| | <div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयारण्यके(तृतीयप्रघट्टके चतुर्थः खण्डः ॥</div> |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01
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| | text =
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| अन्तर्यामिस्वरूपेण ज्ञापयन्ननिरुद्धकः ।
| | {{VerseBlock |
| प्रज्ञेत्युक्तो द्योतनाच्च प्रद्युम्नो देवतोदितः ॥
| | | verse_id = AIT_C03_S01_V13 |
| अमं करोति यच्छास्त्रमृतं स्वस्मिन् पुनः पुनः ।
| | | document_id = AIT |
| सङ्कर्षणोऽमृतं तस्माद् वासुदेवस्तु बृंहणात् ॥
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| जीवानां मुक्तिदानेन ब्रह्मेति कथितः प्रभुः ।
| | | verse_type = mantra |
| एवमेकोऽपि भगवांश्चतुर्धा समुदीरितः ॥
| | | verse_line1 = अथ खल्वाहुर्निर्भुजवक्त्राः- ‘पूर्वमक्षरं पूर्वरूपम्, उत्तरम् उत्तररूपम्, योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सा संहिता’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । |
| इत्यादि चातुरात्म्ये ।
| | | verse_lines = अथ खल्वाहुर्निर्भुजवक्त्राः- ‘पूर्वमक्षरं पूर्वरूपम्, उत्तरम् उत्तररूपम्, योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सा संहिता’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।;अथ वयं ब्रूमो निर्भुजवक्त्रा इति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः- ‘पूर्वमेवाक्षरं पूर्वरूपम्, उत्तरमुत्तररूपम्, योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण, येन सन्धिं विवर्तयति, येन स्वरास्वरं विजानाति, येन मात्रामात्रां विभजते सा संहिता’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद, सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।;अथ हास्य पुत्र आह मध्यमः प्रातीबोधीपुत्रः- ‘अक्षरे खल्विमे अविकर्षन् अनेकीकुर्वन् यथावर्णमाह । तद् याऽसौ मात्रा पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सन्धिविज्ञपनी साम तद् भवति । सामैवाहं संहितां मन्ये’ इति । |
| | | verse_line2 = अथ वयं ब्रूमो निर्भुजवक्त्रा इति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः- ‘पूर्वमेवाक्षरं पूर्वरूपम्, उत्तरमुत्तररूपम्, योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण, येन सन्धिं विवर्तयति, येन स्वरास्वरं विजानाति, येन मात्रामात्रां विभजते सा संहिता’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद, सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V13" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V13"> |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V13 |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V13_B01 |
| | text = | | | text = ‘पूर्ववर्णस्थितं यत्तद् रूपं पूर्वाक्षराभिधम् । |
| | | वराहाख्यं हरेरन्यवर्णगं वामनाभिधम् । |
| सम्भूयेत्यत्र समित्युपसर्गात् बृहतीसहस्रसम्पादनानन्तरं भगवदाधिक्यं पुनराधिक्येन ज्ञायत इत्युक्तं भवति । भगवदाधिक्यमधिकं ज्ञात्वा देवता अपि क्रमेण प्राप्नोति ।
| | उत्तराक्षरसंज्ञं च, वर्णयोरन्तरस्थितम् । |
| | अवनात् काशनाच्चैतद् अवकाशाभिधं हरेः । |
| | नृसिंहरूपमित्याहुर्निर्भुजास्यास्तथाऽवदन्(त्) । |
| | ह्रस्वो येनाक्षरोच्चारो मात्रासन्धिस्वरात्मकः । |
| | व्यासरूपो हरिः साक्षात् संहितानामकस्त्विति । |
| | तत्पुत्रो मध्यमः प्राह समोच्चारणकारणः । |
| | सामनामा वासुदेवः संहितानामवानिति ॥’इति च । |
| | मापयति त्रायति चेति मात्रा भगवान् । यथोच्चारितवर्णयोर्मध्यस्थितश्च । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | {{VerseBlock |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 |
| | text = | | | document_id = AIT |
| | | | chapter_id = AIT_C03 |
| द्वासप्ततिसहस्राणां रूपाणां पर्युपासनात् ।
| | | verse_type = mantra |
| आधिक्यं ज्ञायते विष्णोर्नितरां हि पुनः पुनः ॥
| | | verse_line1 = तदप्येतदृषिणोक्तम्– ‘बृहस्पते न परः साम्नो विदुः’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ ५ ॥ |
| प्राप्नोति देवताश्चैव केशवान्ताः क्रमेण तु ।
| | | verse_lines = तदप्येतदृषिणोक्तम्– ‘बृहस्पते न परः साम्नो विदुः’ इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ ५ ॥ |
| योग्या अस्याश्च विद्यायाः देवा ऋषय एव च ॥
| | | commentary1 = aitareya |
| इत्यादि सत्तत्त्वे ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V14_B01 |
| | text = | | | text = ‘मा नः तेनेभ्यो ये अभिद्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः ।’(ऋ.सं.२.२३.१६) |
| | | ‘येषां नैतन्नापरं किञ्चनैकं ब्रह्मणस्पते ब्रूहि तेभ्यः कदाचित्।’ |
| बृहतीसहस्रस्थितानि विष्णुरूपाणि पुरुषे स्थितानि । पुरुषैरहेयत्वादहंनामकानि तान्येव सूर्ये स्थितानि यान्येव सूर्ये स्थितानि तान्यपि सूर्यादिभिरहेयत्वादहंनामकानि । एतदेवोक्तं नारायणाख्यं परं ब्रह्मैव सर्वदा उप समीपे ईक्षेत ।
| | ‘अथो शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः ।’ |
| नात्र जीवेश्वराभेदो विवक्षितः । उप समीपे ईक्षेतेति समीपे दर्शनवचनात् । न च निरर्थकत्वमुपसर्गस्याङ्गीकर्तुं युक्तम् । न ह्यार्षेषु वेदादिषु व्याकरणनिरुक्तादिषु चोपसर्गाणां वैयर्थ्यमङ्गीकृतं कुत्रचित् । उक्तं च भगवता व्यासेन–
| | ‘आ देवानामोहते वि व्रयो(वि ब्रयो. हृ) हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः ।’(ऋ.सं.२.२३.१६) |
| | अभिद्रुहस्पदे अभितो द्रोहस्य= नित्यनिरतिशयदुःखस्य अन्धतमसो(अन्धतमसस्य इति ताम्रपर्णीयपाठः) योग्याः । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V14_B02 |
| | text = | | | text = ‘ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः । |
| | | शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथावादबला जनाः । |
| नानर्थकः स्वरो वापि वर्णो वा कुत्रचिद् भवेत् ।
| | कामक्रोधाभिभूतत्वाद् अहङ्कारवशं गताः । |
| पदं वाक्यं कुतश्च स्यान्नाल्पार्थमपि कुत्रचित् ॥
| | याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः । |
| उच्चाराद्यर्थमपि वा नास्ति किञ्चित् स्वरादिकम् ।
| | ब्रह्मस्तेना निरानन्दा अपक्वमनसोऽशिवाः । |
| महार्थमेव सर्वं हि वेदे वा वैदिकेऽपि वा ॥
| | वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते । |
| इति । | | तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ॥’ |
| | इति मोक्षधर्मे भगवद्वचनाद् एवंविधा एव ‘स्तेनाः’ ‘अभिद्रुहस्पदस्थाः’ च । |
| }} | | }} |
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| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V14_B03 |
| | text = | | | text = ‘निरामिणः’ रामस्य रमणरूपस्य पूर्णानन्दस्वरूपस्य विष्णोर्जीवस्वरूपताज्ञानेन(स्वरूपतादिज्ञानेन- हृ) नीचताविदः । त एव(तत एव)) रिपवश्च तस्य । |
| | | ‘अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । |
| सुकरं च सर्वपदानामनर्थकत्वकल्पनम् । यैश्च वाक्यैरर्थवत्वं प्रतीयते तेषामप्यनर्थकत्वमेव स्याद् विशेषाभावात् । न च मानुषवाक्येन वेदपदानामानर्थक्यं कल्प्यम् ।
| | परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् । |
| जीवेश्वरैक्यङ्गीकारे योऽहं सोऽसावित्येव पूर्यते पुनर्योऽसौ सोऽहमिति व्यर्थम् । न ह्यस्य तेनैक्ये तस्यानेन भेदशङ्का भवति । अस्य तस्येति भेदाङ्गीकारे नाभेदो मुख्यः । किन्तु तदधीनत्वमेवान्यस्य भवति स्नेहविशेषो वा । चैत्रो मैत्रो मैत्रश्चैत्र इतिवत् । तत्र ह्युभयस्नेहापेक्षया पुनर्वचनं युज्यते । अभ्यासत्वे ह्येकप्रकारेण प्रयोगो दृष्टः । अत्र हि प्रयोगद्वैविध्यं दृश्यते ।
| | मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । |
| | राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥’(भ.गी.९.११-१२) |
| | इत्यादिवचनाद् असुरादयः । अन्नेषु जागृधुः भोगमात्रगृध्नवः । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V14_B04 |
| | text = | | | text = येषामेतत् सर्वोत्तमं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म नास्तीति पक्षः । ईशितव्ये विद्यमाने हीश्वरो भवतीति । न चापरं किञ्चित् । परमापेक्षया ह्यपरमिति । किं तर्हि ? किञ्चनैकम् । किमप्येकमेव वस्त्वस्ति न परमपरं चेति तेषां पक्षः । |
| | |
| एकप्रकारा बहुशो वागभ्यास इतीरितः ।
| |
| अर्थान्तरार्था द्विविधा प्रयुक्तेति हि निर्णयः ॥
| |
| इति गारुडे ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V14_B05 |
| | text = | | | text = ‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । |
| | | अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥ |
| अहंशब्दस्याहेयत्वाङ्गीकारे नराहेयत्वं सुराहेयत्वं चोच्यते इति न वैयर्थ्यम् । अः इति ब्रह्म तत्रागतमहमिति, न वा अहमिमं विजानाति, तस्योपनिषदहम् इत्यादौ विष्णोरेवाहेयत्वेनाहंनामकत्वप्रसिद्धेः । अहंशब्दस्यास्मच्छब्दार्थकत्वेऽहमिमं न जानातीति न युज्यते । तस्य भूरिति शिरो भुव इति बाहू इत्यादिनाऽक्षिसंस्थो भगवानेव ह्यहंशब्दोदितः । न हि जीवस्याक्षिणि पृथक् शिरोबाह्वादिकं विद्यते । हृदि स्थितमेव हि तस्य स्वरूपम् । जागरितेऽप्यक्ष्यादिषु विशेषसन्निहितं भवति दीपप्रकाशवत् ।
| | एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । |
| | प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ |
| | ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥’(भ.गी.१६.८-९) इत्यादि वचनात् । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V14_B06 |
| | text = | | | text = ब्रह्मणस्पते ! ब्रह्मणः= वेदस्य पते वायो ! ‘अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः’(बृ.उ.३.३.७), ‘एष उ एव ब्रह्मणस्पतिः । वाग्वै ब्रह्म । तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः । वाग्धि बृहती’(बृ.उ.३.३.२१)इत्यादि श्रुतेः । एतादृशेभ्यो मा ब्रूहि । |
| | | शमेन= विष्णुनिष्ठया उप= समीपे तस्मिन्नेव रताः साम्नः= विष्णोः परं किमपि न विदुः । तदेव देवानां व्रयः । सर्वदेवानां परतमं विष्ण्वाख्यं ब्रह्म हृदा व्योहते । वासुदेवादिरूपेण वरं नियामकं चेति व्रयः । तेभ्यो ब्रूहि । |
| अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृदि हि गुणाद्वालोकवत् इति च सूत्रात् । आदित्ये हिरण्मयः पुरुषस्तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इत्यादि सूर्ये स्थितस्य विष्णो रूपमुक्त्वाऽक्षिस्थितस्यापि तस्यैतस्य तदेव रूपमिति कथनाच्च । स एष एवैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तेषां चेष्टे इत्यादि लोकाधिपत्यकथनाच्च । न हि कश्चिद् भिक्षुकः पातालाद्यधिपतिरित्यत्र ककिञ्चिन्मानम् । तस्माद् भगवानेवाहेयत्वादहं नामा । चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः जगतस्तस्थुषश्चात्मा इत्यादि जीवेभ्यो भेददर्शनाच्च ।
| |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V14 |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V14_B07 |
| | text = | | | text = ‘वायुं विद्याः समासाद्य सर्वासां पतिमूचिरे । |
| | | स्तेनेभ्यो मैव नो ब्रूहि ब्रूह्यथो वैष्णवेषु च ॥’ इति च । |
| यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह ।
| | ‘सामनाम्ना श्रुतिर्यस्माद् विष्णुमाह ततः प्रियम् । |
| यच्चास्य सन्ततो भावस्तस्मादात्मेति कथ्यते ॥
| | तन्नाम विष्णोरिह तु संहितार्थं वदेद् यतः ॥’ इति वचनात् सामनाम्नः संहिताशब्दार्थत्वाद्, विष्णोस्तस्य नाम्नः श्रुतिसिद्धत्वाच्च सामनाम्नोः वासुदेवरूपसमाख्यासु पञ्चरात्रे पठितत्वाच्च तद् रूपं संहितानामकमिति युक्तमित्यभिप्रायः ॥५ ॥ |
| इति भारते ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | {{VerseBlock |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V15 |
| | text = | | | document_id = AIT |
| | | | chapter_id = AIT_C03 |
| देवता अप्येति प्राप्नोतीत्येव चार्थः । लयश्चेद्देवतास्वप्येतीति स्यात् । न च विनाशः पुरुषार्थः । मयट्शब्दस्य भगवत्प्राधान्यार्थत्वानङ्गीकारे सम्भूय देवता अप्येतीति ल्यप् न युज्यते । उपासनायास्तु सम्पन्नस्य परस्तादित्युक्तत्वात् पूर्वमेव सिद्धिः ।
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = बृहद्-रथन्तरयो रूपेण संहिता सन्धीयत इति तार्क्ष्यः । वाग्वै रथन्तरस्य रूपम् । प्राणो बृहतः । उभाभ्यामु खलु संहिता सन्धीयते वाचा च प्राणेन च । एतस्यां ह स्मोपनिषदि संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । एतस्यां ह स्म मात्रायां संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । तदप्येतदृषिणोक्तं– ‘रथन्तरमाजभारा वसिष्ठः’(ऋ.सं.१०.१८१.१), ‘भरद्वाजो बृहदा चक्रे अग्नेः’(ऋ.सं.१०.१८१.२) इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । |
| | | verse_lines = बृहद्-रथन्तरयो रूपेण संहिता सन्धीयत इति तार्क्ष्यः । वाग्वै रथन्तरस्य रूपम् । प्राणो बृहतः । उभाभ्यामु खलु संहिता सन्धीयते वाचा च प्राणेन च । एतस्यां ह स्मोपनिषदि संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । एतस्यां ह स्म मात्रायां संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । तदप्येतदृषिणोक्तं– ‘रथन्तरमाजभारा वसिष्ठः’(ऋ.सं.१०.१८१.१), ‘भरद्वाजो बृहदा चक्रे अग्नेः’(ऋ.सं.१०.१८१.२) इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V15 |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V15_B01 |
| | text = | | | text = ‘देवता पूर्ववर्णस्य लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता । |
| | | नारायणस्तूत्तरस्य तौ वाक्प्राणाभिधौ मतौ । |
| सर्वस्माद्भिन्नमीशेशं जीवाभेदेन यः स्मरेत् ।
| | मध्यस्थः संहितानामा सोऽर्धनारीपुमात्मकः । |
| स यात्यन्धतमो घोरं नित्यातिशयदुःखदम् ॥
| | वेदात्मकत्वाद् वाङ्नाम्नी लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता । |
| सर्वोत्तमं तु यो विष्णुं भिन्नं जानाति सर्वतः ।
| | प्राणनामा प्रणेतृत्वात् साक्षान्नारायणः स्वयम् । |
| नित्यानन्दमसौ याति वासुदेवप्रसादतः ॥
| | रमित्यानन्द उद्दिष्टः सम्भोग्यं थमुदाहृतम् । |
| इति चैतरेयसंहितायाम् ।
| | विष्णुभोग्या रतितरा लक्ष्मीरेव रथन्तरम् । |
| | नारायणो बृहत्वात्तु बृहन्नामा प्रकीर्तितः । |
| | रथन्तरस्य बृहतो देवते चैव तावुभौ । |
| | वाक् प्राणसंस्थितौ चैव ताभ्यामेव हि सन्धितम् । |
| | लक्ष्मीनारायणं रूपं संहितानामकं शुभम् । |
| | एतां विद्यामवाप्तुं हि वत्सरं गा अरक्षत । |
| | तार्क्ष्य एतावन्मात्रं(तार्क्ष्य एतन्मात्रं च- हृ) च समुद्दिश्य न चापरम् । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | {{VerseBlock |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V16 |
| | text = | | | document_id = AIT |
| | | | chapter_id = AIT_C03 |
| अतः सर्वव्यतिरिक्तः सर्वोत्तमः सर्वगुणसम्पूर्णो नारायण इति सिद्धम् ।
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = ‘वाक् प्राणेन संहिता’ इति कौण्ठरव्यः । प्राणः पवमानेन, पवमानो विश्वैर्देवैः, विश्वेदेवाः स्वर्गेण लोकेन, स्वर्गो लोको ब्रह्मणा । सैषाऽवरपरा संहिता । |
| | | verse_lines = ‘वाक् प्राणेन संहिता’ इति कौण्ठरव्यः । प्राणः पवमानेन, पवमानो विश्वैर्देवैः, विश्वेदेवाः स्वर्गेण लोकेन, स्वर्गो लोको ब्रह्मणा । सैषाऽवरपरा संहिता ।;स यो हैतामवरपरां संहितां वेद, एवं हैव स प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सन्धीयते । यथैषा संहिता । |
| | | verse_line2 = स यो हैतामवरपरां संहितां वेद, एवं हैव स प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सन्धीयते । यथैषा संहिता । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S01_V16" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S01_V16"> |
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| | verse_id = AIT_C02_S02_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V16 |
| | id = AIT_C02_S02_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V16_B01 |
| | text = | | | text = संहितादेवता बह्व्य इति कुण्ठरवात्मजः । |
| | | द्वयं द्वयं देवतानां मिलितं हरिशर्ववत् । |
| सर्वप्रमाणसिद्धत्वं वक्तुमाध्यायमूलतः ।
| | संहितानामकं तत्र वर्णमध्यस्य देवता । |
| अध्यायान्ते द्विरुक्तिः स्यात् पूर्वोक्तस्यावधारणे ॥
| | तयोरेकं देवतयोः परमन्यत् तथाऽवरम् । |
| इति शब्दनिर्णये ॥
| | अवरस्य परस्यापि संयोगात् संहिता तु सा । |
| | प्रोक्ताऽवरपरेत्येव, वाक् प्राणाख्यौ रमाऽच्युतौ । |
| | संहितैका, तथैवान्या केशवो वायुसंयुतः । |
| | वायुः स पवमानाख्यो देवताश्चाखिला अपि । |
| | तृतीया संहिता प्रोक्ता, देवतास्ताः सशङ्कराः । |
| | चतुर्थी संहिता प्रोक्ता, शङ्करो ब्रह्मणा सह । |
| | पञ्चमी संहिता चैव संहिता मोक्षदा इमाः । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S02 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V16 |
| | id = AIT_C02_S02_author_note | | | id = AIT_C03_S01_V14_B02 |
| | text = | | | text = प्रथमायां द्वितीयायां विष्णुरेव परो मतः । |
| | | तृतीयायां वायुरेव, चतुर्थ्यां सर्वदेवताः । |
| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥
| | विरिञ्च एव पञ्चम्याम्, अवरा इतरे ततः । |
| | extra_class = gr-author-note
| | प्रथमायां संहितायाम् अवरो वामभागगः । |
| | द्वितीयायां तु परमस्तृतीयायां तथाऽवरः । |
| | चतुर्थ्यां परमश्चैव पञ्चम्यां वामगोऽवरः । |
| | अवराद्याः परान्ता यद् एताः सर्वाश्च संहिताः । |
| | ततोऽवरपराः प्रोक्ता नैवोक्तास्ताः परावराः । |
| | अभिमानी द्युलोकस्य शिवः सर्वस्य लोकनात् । |
| | द्योतनाच्च .... |
| }} | | }} |
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| === तृतीयोऽध्यायः ===
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| | | verse_type = mantra |
| | title = तृतीयोऽध्यायः
| | | verse_line1 = स यदि परेण वोपसृतः स्वेन वाऽर्थेनाभिव्याहरेद्, अभिव्याहार्षन्नेव विद्यात् । ‘दिवं संहिताऽगमद् विदुषां देवानामेवं भविष्यति’ इति । शश्वत् तथा स्यात् । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । |
| }}
| | | verse_lines = स यदि परेण वोपसृतः स्वेन वाऽर्थेनाभिव्याहरेद्, अभिव्याहार्षन्नेव विद्यात् । ‘दिवं संहिताऽगमद् विदुषां देवानामेवं भविष्यति’ इति । शश्वत् तथा स्यात् । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । |
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| | | commentary1 = aitareya |
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| | verse_line1 = ॐ यो ह वा आत्मानं पञ्चविधमुक्थं वेद यस्माद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठति स सम्प्रतिवित् । | |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V01 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V17 |
| | id = AIT_C02_S03_V01_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V17_B01 |
| | text = | | | text = .... यदि ब्रूयान्मन्त्रमेतमथापि वा । |
| | | आत्मार्थेऽथ परार्थे वा चिन्तयेदेवमञ्जसा । |
| योऽसौ नारायणो देवः परमात्मा सनातनः ।
| | ‘विद्वांसो देवता यस्मात् सम्यक् तेन महत् फलम् ॥ |
| नित्याततगुणत्वात् स आत्मेत्युक्तः सदा श्रुतौ ॥
| | तेषामेव, हरिश्चैव संहितारूपकः प्रभुः । |
| नारायणादिरूपेण पञ्चधाऽवस्थितः सदा ।
| | अगमद् देवलोकं हि कर्तुं देवेष्वनुग्रहम् ॥’ |
| सर्वस्योत्थापकत्वात् स उक्थमित्यभिधीयते ॥
| | इति चिन्तयतस्तेषां प्रसादात् फलमञ्जसा । |
| बृहतीसहस्ररूपे च स उक्थे पञ्चधा स्थितः ।
| |
| पञ्चभेदं हि तच्छस्त्रं तृचाशीतित्रयं च यत् ॥
| |
| पूर्वापरं तृचीशीत्या इति पञ्चात्मकं हि तत् ।
| |
| प्रथमे पञ्चकाद्भागे स्थितो नारायणः स्वयम् ॥
| |
| ऋक्त्रयाशीतिके पूर्वे गायत्रीच्छन्दआत्मके ।
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| वासुदेवः स्थितो नित्यमृगशीतित्रये तथा ॥
| |
| द्वितीये बृहतीच्छन्दस्यसौ सङ्कर्षणः स्थितः ।
| |
| यस्यावेशबलेनैव जीवः सङ्कर्षणोऽपरः ॥
| |
| पृथिवीं बिभर्ति सततं तत्प्रसादात्तवैभवः ।
| |
| तृतीयायां तृचाशीत्यामुष्णिक्छन्दसि केशवः ॥
| |
| प्रद्युम्नरूपी सततं स्थितो यस्यैव सन्निधेः ।
| |
| कामः प्रद्युम्ननामाऽभूत् तत्प्रसादात्तवैभवः ॥
| |
| उक्थस्यैवान्त्यभागे तु सोऽनिरुद्धो हरिः स्थितः ।
| |
| कामपुत्रोऽनिरुद्धाख्यं यदावेशेन लब्धवान् ॥
| |
| एवं पञ्चात्मकं विष्णुं बृहत्युक्थस्य देवताम् ।
| |
| यो वेद सम्यग्वेत्ता स .......
| |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V02 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V18 |
| | document_id = AIT | | | document_id = AIT |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येव वा आत्मोक्थं पञ्चविधमेतस्माद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठत्येतमेवाप्येत्ययनं ह वै समानानां भवति य एवं वेद । | | | verse_line1 = वाक् संहितेति पञ्चालचण्डः। वाचा वै वेदा सन्धीयन्ते । वाचा च्छन्दांसि । वाचा मित्राणि सन्दधति । वाचा सर्वाणि भूतानि । अथो वागेवेदं सर्वमिति । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = वाक् संहितेति पञ्चालचण्डः। वाचा वै वेदा सन्धीयन्ते । वाचा च्छन्दांसि । वाचा मित्राणि सन्दधति । वाचा सर्वाणि भूतानि । अथो वागेवेदं सर्वमिति ।;तद् यत्रैतदधीयते वा भाषते वा वाचि तदा प्राणो भवति । वाक् तदा प्राणं रेळ्हि । अथ यत्र तूष्णीं वा भवति, स्वपिति वा, प्राणे तदा वाग् भवति । प्राणस्तदा वाचं रेळ्हि । तावन्योन्यं रीळ्हः । वाग् वै माता । प्राणः पुत्रः ।;तदप्येतदृषिणोक्तम्–;‘एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश।;स इदं विश्वं भुवनं विचष्टे ।;तं पाकेन मनसाऽपश्यमन्तितः।;तं माता रेळ्हि स उ रेळ्हि मातरम् ॥’(ऋ.सं.१०.११४.४) इति ।;स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ |
| | | verse_line2 = तद् यत्रैतदधीयते वा भाषते वा वाचि तदा प्राणो भवति । वाक् तदा प्राणं रेळ्हि । अथ यत्र तूष्णीं वा भवति, स्वपिति वा, प्राणे तदा वाग् भवति । प्राणस्तदा वाचं रेळ्हि । तावन्योन्यं रीळ्हः । वाग् वै माता । प्राणः पुत्रः । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V02 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V18 |
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| | text = | | | text = पञ्चालचण्डो वाचं तु ब्रह्माणीं हि सरस्वतीम् । |
| | | मन्यतेऽस्याः पुत्रवच्च देवं नारायणं प्रभुम् । |
| .... तानि रूपाणि वै हरेः ॥
| | वेदैर्हि व्यज्यते विष्णुः सा च वेदाभिमानिनी । |
| स्थितानि पञ्चभूतेषु पृथिव्याद्यभिधानि च ।
| | प्राणस्थो भगवान् विष्णुः प्राणनामा प्रणेतृतः । |
| तदावेशात् पृथिव्यादिनाम भूतेषु पञ्चसु ॥
| | ब्रह्मणोऽपि पिता नित्यं भगवान् पुरुषोत्तमः । |
| पृथुत्वात् पृथिवीनामा भूमौ नारायणः स्थितः ।
| | उपचर्यते पुत्र इति वेदैर्यद् व्यज्यते हरिः । |
| बलज्ञानस्वरूपत्वाद् वायुनामा स एव च ॥
| | सा देवी संहितानाम्नी वाच्योऽस्या विष्णुरेव हि ॥ |
| वायौ सङ्कर्षणो नित्यं स्थित आकाशनामकः ।
| |
| व्याप्तत्वाद्वासुदेवस्तु सदाकाशे स्थितः प्रभुः ॥
| |
| अनिरुद्धस्तथैवाप्सु बहुरूपो व्यवस्थितः ।
| |
| अम्नामा पालनान्नित्यं प्रद्युम्नो ज्योतिषि स्थितः ॥
| |
| ज्योतिर्नामा द्योतनाच्च बहुरूपः पृथक् पृथक् ।
| |
| यद्यप्यस्य हरेः सर्वरूपाण्यप्यखिलैर्गुणैः ॥
| |
| पूर्णान्यथापि चैकैकरूपेषु स पृथग्गुणैः ।
| |
| व्यवहारान्पृथग्देवः करोतीव हि लीलया ॥
| |
| तस्मात् पृथगिवास्येति नाम विष्णोः परात्मनः ।
| |
| सर्वत्र सर्वनाम्नोऽपि व्यवहारार्थमीर्यते ॥
| |
| एतस्माद्धि हरेर्नित्यं जगदुत्तिष्ठति प्रभोः ।
| |
| मुक्तौ लये च तं याति स च सर्वाश्रयः प्रभुः ॥
| |
| य एवं वेत्ति तं विष्णुमुपास्ते चापरोक्षतः ।
| |
| स मुक्तः समजातीनामाश्रयश्च भविष्यति ॥
| |
| स्वजातीनामुत्तमत्वपदयोग्या हि ये सुराः ।
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| ब्रह्मेन्द्राद्यास्ते हि योग्याः साक्षादस्मिन्नुपासने ॥
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| अन्येषां ज्ञानमात्रेण योग्यमाधिक्यमाप्यते ।
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| }} | | }} |
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| | </div> |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V03 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 |
| | document_id = AIT | | | document_id = AIT |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = तस्मिन् योऽन्नं चान्नादं च वेदाहास्मिन्ननादो जायते । भवत्यस्यान्नमापश्च पृथिवी चान्नमेतन्मयानि ह्यन्नानि भवन्ति ॥ | | | verse_line1 = अथातः प्रजापतिसंहिता । जाया पूर्वरूपम्, पतिरुत्तररूपम्, पुत्रः सन्धिः, प्रजननं सन्धानम्। सैषाऽदितिः संहिता । अदितिर्हीदं सर्वं यदिदं किञ्च, पिता च माता च पुत्रश्च प्रजननं च। तदप्येतदृषिणोक्तम्– ‘अदितिर्माता स पिता स पुत्रः’(ऋ.सं.१.८९.१०) इति । |
| | verse_line2 = ज्योतिश्च वायुश्चान्नादमेताभ्यां हीदं सर्वमन्नमत्त्यावपनमाकाश आकाशे हीदं सर्वं समोप्यत आवपनं ह वै समानानां भवति य एवं वेद । | | | verse_lines = अथातः प्रजापतिसंहिता । जाया पूर्वरूपम्, पतिरुत्तररूपम्, पुत्रः सन्धिः, प्रजननं सन्धानम्। सैषाऽदितिः संहिता । अदितिर्हीदं सर्वं यदिदं किञ्च, पिता च माता च पुत्रश्च प्रजननं च। तदप्येतदृषिणोक्तम्– ‘अदितिर्माता स पिता स पुत्रः’(ऋ.सं.१.८९.१०) इति ।;स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति सर्वमायुरेति ॥ ६ ॥ |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_line2 = स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति सर्वमायुरेति ॥ ६ ॥ |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
|
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|
| | <div class="gr-author-note">॥ इति षष्ठः खण्डः॥</div> |
| | |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V03 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 |
| | id = AIT_C02_S03_V03_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V19_B01 |
| | text = | | | text = प्रजापत्याख्यशर्वेण प्रोक्ताऽन्या संहिताऽपि हि । |
| | | विष्णुरेवादितिर्नाम सर्वस्यात्ता यतः प्रभुः । |
| सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तत्र भोक्तृषु संस्थितौ ॥
| | स एव पितृसंस्थस्तु पातृत्वात् पितृनामकः । |
| भोक्तृशक्तिप्रदौ नित्यं भोक्तारौ च विशेषतः ।
| | देवतोत्तरवर्णस्य मातृस्थो मातृनामकः । |
| नारायणानिरुद्धौ तौ भोग्यवस्तुषु संस्थितौ ॥
| | माननात्, पूर्ववर्णस्य देवतेति प्रकीर्तितः । |
| तर्पकौ सर्वलोकानां तस्माद्भोग्यौ न चर्व्यतः ।
| | पोषकत्वात् सन्धिनामा वर्णयोरन्तरस्थितः । |
| अवकाशप्रदो नित्यं वासुदेवो नभःस्थितः ॥
| | स एव पुत्रसंस्थश्च पुत्रनामा जनार्दनः । |
| एवं पञ्चात्मकं विष्णुं य उपास्ते सदैव च ।
| | त्राणात् पू्तित एवासौ, वर्णसन्धानकर्मणि । |
| अवकाशप्रदः सोऽपि स्वजातीनां भविष्यति ॥
| | सन्धाननामा सन्धानकर्तृत्वात् पुरुषोत्तमः । |
| भोक्ता चाप्यायकश्चैव तस्य विष्णोः प्रसादतः ।
| | प्रजातिकर्मसंस्थश्च स एव प्रजनाभिधः । |
| ब्रह्मेन्द्राद्याः स्वजातीयपदयोग्या अमुष्य च ॥
| | जनकत्वात् परो विष्णुरेवं विष्णुर्हि संहिता । |
| योग्या उपासनस्य स्युस्तदन्ये ज्ञानमात्रके ।
| | वासुदेवादिरूपेण चतुर्धैवं व्यवस्थितः । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V04 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 |
| | document_id = AIT | | | id = AIT_C03_S01_V19_B02 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = स एव दिवि संस्थश्च द्युनामा क्रीडनात् प्रभुः । |
| | verse_type = mantra
| | अन्तरेवेक्षणाच्चैव सोऽन्तरिक्षोऽन्तरिक्षगः । |
| | verse_line1 = तस्मिन् योऽन्नं चान्नादं च वेदाहास्मिन्नन्नादो जायते भवत्यस्यान्नमोषधिवनस्पतयोऽन्नं प्राणभृतोऽन्नादमोषधिवनस्पतीन् हि प्राणभृतोऽदन्ति । तेषां य उभयतोऽदन्ताः पुरुषस्यानुविधां विहितास्तेऽन्नादाः अन्नमितरे पशवस्तस्मात् त इतरान् पशूनधीव चरन्त्यधीव ह्यन्नेऽन्नादो भवत्यधीव ह समानानां जायते य एवं वेद ॥
| | पृथिवी पृथिवीस्थश्च प्रथितत्वाज्जनार्दनः । |
| | verse_line2 = १ ॥
| | मुख्यार्थत्वात् सर्वनाम्नां सर्वदेवाभिधो हरिः |
| | commentary1 = aitareya
| | विश्वे देवा इति प्रोक्तो बहुधा तेषु संस्थितः । |
| | ज्ञानद्युतेर्देवनामा स्थितो देवेषु केशवः । |
| | गां धारयंश्च गन्धर्वो गन्धर्वेषु व्यवस्थितः । |
| | माननान्मानुषो नाम मानुषेषु स्थितो हरिः(प्रभुः) । |
| | पालनात् पितृनामाऽसौ पितृष्वेव व्यवस्थितः । |
| | रतेः प्राणेऽसुराख्यश्च सोऽसुरेषु व्यवस्थितः । |
| | एवं पञ्चजनेषुस्थो हरिः पञ्चजनाभिधः । |
| | जातनामा जातसंस्थः प्रादुर्भूतगुणत्वतः । |
| | जनिक्रियास्थितश्चासौ जनित्वमिति गीयते । |
| | जनिं यस्मात् तवयति, तवनं हि प्रकाशनम् ॥इति च ॥ |
| }} | | }} |
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|
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V04 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 |
| | id = AIT_C02_S03_V04_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V19_B03 |
| | text = | | | text = प्रथश्च सप्रथश्चैव राजानौ मत्स्यदेशजौ । |
| | | यापयामासतुर्विष्णोर्हविर्नाम्नो हविर्मुखे । |
| सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नो जङ्गमेषु व्यवस्थितौ ॥
| | अनुष्टुब्देवता यस्तु नृसिंहो जगतोऽस्य च । |
| नारायणानिरुद्धौ तु स्थावरान्तर्गतौ प्रभू ।
| | स्वमुखे हवनादेव हविरित्यभिधीयते । |
| तत्राप्याकाशगो नित्यं वासुदेवो निरञ्जनः ॥
| | तस्मिन् यज्ञे वसिष्ठस्तु चतूरूपाज्जनार्दनात् । |
| प्राणानां भरणान्नित्यं प्राणभृन्नाम तद्धरेः ।
| | आजहार श्रियं देवीं रथन्तरवराभिधाम् । |
| न ह्यन्यः प्राणभर्ताऽस्ति तमृते पुरुषोत्तमम् ॥
| | चतुर्मूतिः स्तुतस्तेन प्रेषयामास तां श्रियम् । |
| ओषणाच्च निधानाच्च स एवौषधिनामकः ।
| | सा चास्मै प्रददौ विद्यां प्रययौ च पुनर्हरिम् । |
| वननीयपतित्वाच्च स एव हि वनस्पतिः ॥
| | धातेत्युक्तोऽनिरुद्धस्तु प्रद्युम्नस्तु द्युनामकः(द्युतानकः हृ.) । |
| अन्ने स्थित्वा तृप्तिदत्वं तस्याद्यत्वमपीष्यते ।
| | वासुदेवः प्रसविता सर्वस्य प्रसवाद् विभुः(प्रभवाद् प्रभुः) । |
| पुरुषस्य हरेर्ये तु सदाकारेण संस्थिताः ॥
| | सङ्कर्षणो विष्णुनामा प्रणेतृत्वाद् बलादपि । |
| देवगन्धर्वमर्त्याद्यास्तेषु सङ्कर्षणो हरिः ।
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| प्रद्युम्नश्च स्थितो नित्यं पुरुषाकृतिरेव तु ॥
| |
| तौ भोक्तारौ च भोग्यानां भोजकावखिलस्य च ।
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| नारायणानिरुद्धौ तु तथान्यपशुषु स्थितौ ॥
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| वृषभाश्वादिरूपेण तृप्तिदावखिलस्य च ।
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| वाहनोपानहादीनामारोढारो नरादयः ॥
| |
| यतः सङ्कर्षणश्चैव प्रद्युम्नस्तेषु संस्थितौ ।
| |
| ततस्तयोर्हि सञ्चार उपरीव भविष्यति ॥
| |
| आकाशगो वासुदेवः पञ्चमोऽत्राप्युपास्यते ।
| |
| वाहनादियुतो मुक्तौ भवेदेतदुपासकः ॥
| |
| इत्यैतरेयसंहितायाम् ।
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| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V04 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 |
| | id = AIT_C02_S03_V04_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V19_B03 |
| | text = | | | text = चतूरूपं परं विष्णुं राजानौ प्रथसप्रथौ । |
| | | भरद्वाजो वसिष्ठश्च ध्यात्वाऽविन्दन् परात् परम् । |
| आत्मशब्दाच्च न भूतमात्रमत्रोच्यते । न च मुख्यार्थं परित्यज्योपचारार्थोऽङ्गीकर्तव्यो विरोधाभावे । सर्वनामवत्वं च भगवतः श्रुत्यैवोपपादितं पूर्वत्र । वपनीरोमकरणावकाशप्रदानबीजवर्धनेषु इति च धातुः । तस्मिन् पञ्चके योऽन्नमन्नादं च वेद सोऽस्मिन् स्वजातियूथे विशेषेणान्नाद आजायते ह । तस्मिन् वेद अस्मिन्नाजायत इति पृथक् पृथक् पुनः पुनर्विशेषणादुपासकस्य स्वजातिसन्निधानाच्च स्वजाताविति ज्ञायते ।
| | यजनीयो यजुर्नामा विष्णुः सङ्कर्षणाभिधः । |
| | जीवानां स्कन्दनादेव स्कन्नः प्रद्युम्न उच्यते । |
| | प्रथमो वासुदेवस्तु देवयानोऽनिरुद्धकः । |
| | प्राप्यो देवैर्यतो नित्यम् अनिरुद्धाभिधो हरिः । |
| | तस्मादेवं चतुर्मूर्तेः स्तुतिसन्तोषिताद्धरेः । |
| | आजहार भरद्वाजो रूपं नारायणाभिधम् । |
| | तद् बृहन्नामकं विष्णोश्चातुरात्म्यात् समुद्गतम् । |
| | भरद्वाजमुपागम्य प्रादान्मोक्षवरं परम् । |
| | चतुर्मूर्तिः स भगवानग्निरित्यभिधीयते । |
| | अग्र्यत्वात् सर्वभूतानाम् ........ |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V04 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 |
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| | text = | | | text = .......... एवं चत्वार एव ते । |
| | अविन्दंस्तं चतुर्मूर्तिं साक्षान्नारायणं प्रभुम् । |
| | गुहायां संस्थितमपि ह्यतीव हितमस्य च । |
| | सर्वज्ञत्वाद् यज्ञनाम्नो विष्णोस्तेजः परं हि तत् । |
| | तस्मादेव चतुर्मूर्तेः सूरिप्राप्यत्वहेतुतः । |
| | सूर्यनाम्नोऽहरन् घर्मनामानं तं नृसिंहकम् । |
| | घर्षणात् सर्वलोकस्य नृसिंहो घर्म उच्यते । |
| | निर्गत्य स चतुर्मूर्तेर्विप्रक्षत्राभिसंस्तुतात् । |
| | प्रथादीनां चतुर्णां च पुरुषार्थचतुष्टयम् । |
| | दत्वा जगाम भगवान् स्वकीयां तनुमेव च । |
| | वसिष्ठाच्च भरद्वाजाद् होत्रध्वर्य्वोर्नृपौ तु तौ । |
| | यथेष्टसिद्धिं सम्प्राप्तौ सम्यगिष्टाज्जनार्दनात् ॥ इत्याद्यृग्वेदसंहितायाम् । |
| | }} |
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| क्षीराब्धिशयनं विष्णो रूपं यत्पुरुषाभिधम् । सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नस्तदाकारौ नृषु स्थितौ ॥
| | {{Bhashyam |
| नारायणानिरुद्धौ तु पश्वाकारौ पशुस्थितौ ॥
| | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 |
| इति सत्तत्त्वे । | | | id = AIT_C03_S01_V19_B04 |
| | | text = यस्य प्रथ इति नाम स च हविर्नाम्नो विष्णोर्हविर्यत्= अयत् । अटो लोपेनान्तर्णीतणिच्त्वेन अयापयद् इत्यर्थः । एवं सप्रथ इति यस्य नामासौ हविर्यदिति पृथक् सम्बन्धः । |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V04 | | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 |
| | id = AIT_C02_S03_V04_B01 | | | id = AIT_C03_S01_V19_B05 |
| | text = | | | text = आचक्रे= आकारयामास । ‘अविन्दन् ते’, ‘तेऽविन्दन्’ इत्यध्यात्म-अधिदैवतयोरुभयत्रापि भगवन्तम् अविन्दन्नित्यर्थः । ‘देवयानम्’, ‘गुहायद्’ इति वचनात् । |
| | }} |
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| गुणवैशेष्याभावेन वाहनादिषु चरणमात्रादधीव चरन्तीत्यादाविवशब्दः ॥ १ ॥
| | {{Bhashyam |
| | | verse_id = AIT_C03_S01_V19 |
| | | id = AIT_C03_S01_V19_B01 |
| | | text = ‘चतुःशिखण्डां तु रमां द्विरूपो भगवान् हरिः । |
| | परमानन्दरूपत्वात् सुपर्ण इतिनामकः । |
| | रमयामास तस्यां च निषण्णः सर्वदैव सः । |
| | एक एव च विष्णुः स प्रविष्टः क्षीरसागरम् । |
| | सर्वं पश्यत्यसौ देवः पूर्णाकुण्ठेन चेतसा । |
| | परिपक्वेन मनसाऽपश्यमित्याह तं त्वजः । |
| | मातेव व्यञ्जकत्वात् तं प्राणस्थं वाक् सरस्वती । |
| | लिहते लिह्यत इव प्राणस्थेन तु सा सदा । |
| | स्वयं तु भगवान् विष्णुर्वाक्पतेर्ब्रह्मणोऽपि हि । |
| | नित्यः पिता स्वतन्त्रश्च नास्य माता पिताऽपि वा(च) ॥’ इत्यादि च ॥ ६ ॥ |
| }} | | }} |
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| | </div> |
| | <div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके(तृतीयप्रघट्टके) प्रथमोऽध्यायः ॥</div> |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V05 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V01 |
| | document_id = AIT | | | document_id = AIT |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = तस्य य आत्मानमाविस्तरां वेदा । अश्नुते हाऽऽविर्भूय ओषधिवनस्पतयो यच्च किञ्च प्राणभृत् । स आत्मानमाविस्तरां वेद । ओषधिवनस्पतिषु हि रसो दृश्यते । चित्तं प्राणभृत्सु । प्राणभृत्सु त्वेवाविस्तरामात्मा । तेषु हि रसोऽपि दृश्यते । न चित्तमितरेषु । पुरुषे त्वेवाविस्तरामात्मा । स हि प्रज्ञानेन सम्पन्नतमः । विज्ञातं वदति विज्ञातं पश्यति वेद श्वस्तनम् । वेद लोकालोकौ । मर्त्येनामृतमीप्सत्येवं सम्पन्नः । अथेतरेषां पशूनामशनापिपासे एवाभिविज्ञानम् । न विज्ञातं वदन्ति न विज्ञातं पश्यन्ति न विदुः श्वस्तनं न लोकालोकौ । त एतावन्तो भवन्ति । यथाप्रज्ञं हि सम्भवाः ॥ | | | verse_line1 = प्राणो वंश इति स्थविरः शाकल्यः । तद् यथा शालावंशे सर्वेऽन्ये वंशाः समाहिताः स्युः, एवमस्मिन् प्राणे चक्षुः श्रोत्रं मनो वाग् इन्द्रियाणि शरीरं सर्व आत्मा समाहितस्तस्यैतस्याऽत्मनः प्राण ऊष्मरूपम् । अस्थीनि स्पर्शरूपं मज्जानः स्वररूपम् । मांसं लोहितम् इत्येतद् अन्यच्चतुर्थम् अन्तःस्थरूपम् ।(ह स्माऽह) |
| | verse_line2 = २ ॥
| | | verse_lines = प्राणो वंश इति स्थविरः शाकल्यः । तद् यथा शालावंशे सर्वेऽन्ये वंशाः समाहिताः स्युः, एवमस्मिन् प्राणे चक्षुः श्रोत्रं मनो वाग् इन्द्रियाणि शरीरं सर्व आत्मा समाहितस्तस्यैतस्याऽत्मनः प्राण ऊष्मरूपम् । अस्थीनि स्पर्शरूपं मज्जानः स्वररूपम् । मांसं लोहितम् इत्येतद् अन्यच्चतुर्थम् अन्तःस्थरूपम् ।(ह स्माऽह) |
| | commentary1 = aitareya | | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S02_V01" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S02_V01"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V05 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V01 |
| | id = AIT_C02_S03_V05_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V01_B01 |
| | text = | | | text = गृहस्याऽच्छादनादीनां मध्यवंशो यथाऽऽश्रयः । |
| | तथेन्द्रियाभिमान्यादिदेवानां वायुराश्रयः । |
| | तेषु सर्वेषु भगवान् बहुरूपो हरिः स्थितः । |
| | विष्णुनामाऽक्षरेष्वेवम् अन्येष्वपि तदर्थतः । |
| | प्राणनामा तु(अपि) भगवान् प्राणस्थश्चोष्मसु स्थितः । |
| | ऊष्मनामा समर्थत्वात् स एव भगवान् हरिः । |
| | पूर्णत्वाद् आत्मनामाऽसौ, प्रतिमात्वाद् अमुष्य तु । |
| | सङ्घात आत्मशब्दोक्तो, ह्यस्थिरश्चास्थिनामकः । |
| | अस्थिस्थितो हरिः स्पर्शसंस्थितः स्पर्शनामकः । |
| | स्पर्शहेतुत्वतः स्पर्शनामा स भगवान् हरिः । |
| | मज्जासुस्थः स मज्जाख्यो मदं जनयतीति ह । |
| | स एव स्वरसंस्थश्च स्वराख्यः स्वरतेः प्रभुः । |
| | प्रमाणं सारयेद् यस्मान्मांसाख्यो मांससंस्थितः । |
| | लोहिताख्यो रक्तवर्णो लोहितस्थो जनार्दनः । |
| | }} |
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| आविर्भावं तारतम्याद्यो वेद परमात्मनः ।
| | </div> |
| स तस्यैव विशेषेण प्रीतियोगाद् भविष्यति ॥
| | {{VerseBlock |
| स्थावरं जङ्गमं चैव भूयस्त्वेनाश्नुते हरिः ।
| | | verse_id = AIT_C03_S02_V02 |
| आविर्भूतस्तेषु सदा सम्यक्स्वात्मानमेव च ॥
| | | document_id = AIT |
| तारतम्यात् सन्निहितं सर्वभूतेषु केशवः ।
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| वेत्त्येक एव विष्णोर्यद्विशेषावेशनं सदा ॥
| | | verse_type = mantra |
| जङ्गमेषु च वृक्षेषु नैव तादृक्शिलादिषु ।
| | | verse_line1 = इति ह स्माऽह ह्रस्वो माण्डूकेयः- त्रयं त्वेव न एतत् प्रोक्तम् । तस्यैतस्य त्रयस्यास्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति, त्रीणीतः षष्टिशतानि, त्रीणीतस्तानि सप्तविंशतिशतानि भवन्ति । |
| तस्माद् वृक्षादिषु रसश्चित्तं चलनवत्सु च ॥
| | | verse_lines = इति ह स्माऽह ह्रस्वो माण्डूकेयः- त्रयं त्वेव न एतत् प्रोक्तम् । तस्यैतस्य त्रयस्यास्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति, त्रीणीतः षष्टिशतानि, त्रीणीतस्तानि सप्तविंशतिशतानि भवन्ति । |
| दृश्यते न शिलाद्येषु सन्निधिर्न हि तादृशी ।
| | | commentary1 = aitareya |
| शिलाद्येषु स्थितो विष्णुर्भारदार्ढ्यादिकारणम् ॥
| |
| नैव चित्तादिकस्यातो वृक्षाद्या उत्तमास्ततः ।
| |
| विशेषोऽयं पदार्थानां न तु विष्णोः कदाचन ॥
| |
| यत्र विष्णुर्गुणाधिक्यं दर्शयेद् वस्तु तद्वरम् ।
| |
| गुणपूर्णो हि सर्वत्र स्वयं विष्णुः सनातनः ॥
| |
| वृक्षेभ्योऽप्यधिकं विष्णुर्जङ्गमेषु प्रकाशितः ।
| |
| तेभ्योऽपि पुरुषे विष्णुर्गुणाधिक्यप्रकाशकः ॥
| |
| इत्यादि च ।
| |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S02_V02" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S02_V02"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V05 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V02 |
| | id = AIT_C02_S03_V05_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V02_B01 |
| | text = | | | text = अस्थिस्थान्येव रूपाणि पर्वस्वपि हरेर्यतः । |
| | | तत एव विभक्तानि सङ्ख्या तेषां पृथङ् न तत् । |
| य आत्मानं परमात्मानमाविस्तरां आविर्भावतारतम्येन वेद स तस्य विष्णोरेव । सर्वेषां तदीयत्वेऽपि प्रियत्वात् तदीयत्वविशेषणम् । ओषधिवनस्पतयो यच्च किञ्च प्राणभृत् तत्सर्वं शिलादिभ्यो भूयस्त्वेन तेष्वाविर्भूतोऽश्नुते भगवान् । स एव च नारायणः सम्यक् स्वात्मानमाविस्तरां वेद । अन चेष्टायामिति धातोश्चेष्टावत्त्वमेव प्राणभृत्त्वं पश्वादीनाम् । ज्ञानानुसारेण ह्युत्पत्तयः सम्भवाः ॥
| | तस्मात् सप्तशतान्येव देहे विंशच्च तस्य हि । |
| | रूपाणि विष्णोर्भागे तु षष्ठ्युत्तरशतत्रयम् । |
| }} | | }} |
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| | </div> |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V06 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V03 |
| | document_id = AIT | | | document_id = AIT |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = स एष पुरुषः समुद्रः सर्वं लोकमति यद्ध किञ्चाश्नुतेत्येनं मन्यते । यद्यन्तरिक्षलोकमश्नुतेऽत्येनं मन्यते यद्यमुं लोकमश्नुवीतात्येवैनं मन्येत । | | | verse_line1 = सप्त च वै शतानि विंशतिश्च संवत्सरस्याहोरात्राः स एषोऽहःसम्मानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = सप्त च वै शतानि विंशतिश्च संवत्सरस्याहोरात्राः स एषोऽहःसम्मानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा ।;स य एवमेतमहःसम्मानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेद, अह्नां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति, सर्वमायुरेति ॥;१ ॥ |
| | | verse_line2 = स य एवमेतमहःसम्मानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेद, अह्नां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति, सर्वमायुरेति ॥ |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
|
| |
|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S02_V03" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S02_V03"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V06 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V03 |
| | id = AIT_C02_S03_V06_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V03_B01 |
| | text = | | | text = तान्येव विष्णो रूपाणि वत्सराहस्सु सर्वशः । |
| | | अहर्नामा च भगवान् अहार्यत्वात् प्रकीर्तितः । |
| योऽस्मिन् पुरुषे पश्वादिभ्य आधिक्येन सन्निहितो भगवान् स एष पुरुषः समुद्रः समुद्रिक्तोऽन्येभ्यः । स जीवो यद्यपि भगवत्प्रसादात् सर्वलोकाधिपो भवति । सर्वलोकानतीत्य यत्ककिञ्चिदलौकिकं मोक्षाख्यमप्यश्नुते । तथापि तमेनमात्मशब्देन प्रस्तुतं विष्णुमत्येव मन्यतेऽधिकमेव मन्यते स्वात्मनः सर्वस्माच्च । मुक्तोपि न तेन साम्यं तद्भावं वा मन्यते । कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः मुक्तानां परमा गतिः अमृतस्यैष सेतुः इत्यादिवाक्याच्च ।।
| | अहोभिः समसङ्ख्यानि यस्माद् अध्यात्मगानि तु । |
| | रूपाणि विष्णोस्तेनायम् अहस्सम्मान उच्यते । |
| | पूर्णदर्शनशक्तित्वाच्चक्षुर्मय इतीरितः (उदीरितः) । |
| | तादृक् श्रवणशक्तित्वाद् तथा श्रोत्रमयः स्मृतः । |
| | छन्दोमयः सत्यकामो मन्तृवक्तृबलात्मकः । |
| | एवं विद्वांस्तस्य रूपाण्याप्नोति ज्ञानपुत्रवान् ॥ |
| | पीयमानं शमाप्नोति प्राप्याहर्नामकं हरिम् ॥ १ ॥ |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam
| | </div> |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V06
| | <div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके) प्रथमः खण्डः ॥</div> |
| | id = AIT_C02_S03_V06_B01
| |
| | text =
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| यद्यपि देवलोकाधिपत्यं तद्योग्यस्य विष्णुर्ददाति तदप्यश्नुवीतैव । बहुगणिकादिपरिवाररूपमशुचीदं पदमित्यादिबुद्ध्या नापह्नुवीत । एनं भगवन्तमतिमन्येतैव सर्वथा स्वतः सर्वस्माच्चाधिकमेव मन्येत । यद्यमुं लोकमश्नुते प्राप्नोति अश्नुवीत भुञ्जीत ।
| | {{VerseBlock |
| पृथिवीलोकाधिपत्येऽपि विष्णोराधिक्यं सत्पुरुषो मन्यत इति प्रत्यक्षसिद्धत्वान्न पृथगुक्तम् । अतिशब्दाद्यद्ध किञ्चेति प्रथमोक्तो मोक्ष इति सिद्धम् । अन्तरिक्षप्राप्तेरल्पत्वान्मोक्षे स्वतः सिद्धत्वाच्चातिमन्यते इति सिद्धवचनमेव कृतम् । स्वर्गादिप्राप्तेरधिकैश्वर्याद् भगवत्समोऽहं भगवत्स्वरूप इति वा मन्तुं प्राप्तिरस्तीत्येवैनं मन्येतेति सावधारणा विधिः ।।
| | | verse_id = AIT_C03_S02_V04 |
| }}
| | | document_id = AIT |
| | | | chapter_id = AIT_C03 |
| {{Bhashyam | | | verse_type = mantra |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V06 | | | verse_line1 = अथ कौण्ठरव्यः- त्रीणि षष्टिशतान्यक्षराणाम्, त्रीणि षष्टिशतान्यूष्मणाम्, त्रीणि षष्टिशतानि सन्धीनाम् । |
| | id = AIT_C02_S03_V06_B01 | | | verse_lines = अथ कौण्ठरव्यः- त्रीणि षष्टिशतान्यक्षराणाम्, त्रीणि षष्टिशतान्यूष्मणाम्, त्रीणि षष्टिशतानि सन्धीनाम् ।;यान्यक्षराण्यवोचामाहानि तानि, यानूष्मणोऽवोचाम रात्रयस्ताः, यान् सन्धीन् अवोचामाहोरात्राणां ते सन्धय इत्यधिदैवतम् । |
| | text = | | | verse_line2 = यान्यक्षराण्यवोचामाहानि तानि, यानूष्मणोऽवोचाम रात्रयस्ताः, यान् सन्धीन् अवोचामाहोरात्राणां ते सन्धय इत्यधिदैवतम् । |
| | |
| न च मन्यते इति काममात्रम् । मनु अवबोधन इति धातोः । न ह्यवबोध एव कामः । अन्यथा राज्यं जानन्नपि राज्यकाम इति स्यात् । न च मन्यते मन्येतेति द्विविधः प्रयोगस्तस्मिन् पक्षे युज्यते । न च सर्वलोकमतीत्याश्नतो मुक्तस्य मुक्तेरन्यत्र कामो विद्यते । सर्वलोकाधिकं च मुक्तिं विना नान्यत् । तस्मान्मुक्तैरमुक्तैरपि भगवान् सर्वोत्तमत्वेन चिन्त्य इति सिद्धम् ।
| |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 |
| | document_id = AIT | | | document_id = AIT |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = स एष पुरुषः पञ्चविधस्तस्य यदुष्णं तज्ज्योतिर्यानि खानि स आकाशोऽथ यल्लोहितं श्लेष्मा रेतस्ता आपः । यच्छरीरं सा पृथिवी । यः प्राणः स वायुः । स एष वायुः पञ्चविधः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समानः । ता एता देवताः प्राणापानयोरेव निविष्टाश्चक्षुः श्रोत्रं मनो वागिति । प्राणस्य ह्यन्वपायमेता अपि यन्ति । | | | verse_line1 = अथाध्यात्मम्- यान्यक्षराण्यधिदैवतमवोचाम, अस्थीनि तान्यध्यात्मम् । यानूष्मणोऽधिदैवतमवोचाम, मज्जानस्तेऽध्यात्मम् । एष ह वै सम्प्रति प्राणो यन्मज्जा । एतद्रेतेः । न ह वा ऋते प्राणाद् रेतः सिच्यते । यद् वा ऋते प्राणाद् रेतः सिच्येत, पूयेद् न सम्भवेत् । यान् सन्धीन् अधिदैवतमवोचाम पर्वाणि तान्यध्यात्मम् । तस्यैतस्य त्रयस्य, अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति । पञ्चेतश्चत्वारिंशच्छतानि, पञ्चेतः । तदशीतिसहस्रं भवति, अशीतिसहस्रं वा अर्कलिनो बृहतीरहरभिसम्पादयन्ति । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = अथाध्यात्मम्- यान्यक्षराण्यधिदैवतमवोचाम, अस्थीनि तान्यध्यात्मम् । यानूष्मणोऽधिदैवतमवोचाम, मज्जानस्तेऽध्यात्मम् । एष ह वै सम्प्रति प्राणो यन्मज्जा । एतद्रेतेः । न ह वा ऋते प्राणाद् रेतः सिच्यते । यद् वा ऋते प्राणाद् रेतः सिच्येत, पूयेद् न सम्भवेत् । यान् सन्धीन् अधिदैवतमवोचाम पर्वाणि तान्यध्यात्मम् । तस्यैतस्य त्रयस्य, अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति । पञ्चेतश्चत्वारिंशच्छतानि, पञ्चेतः । तदशीतिसहस्रं भवति, अशीतिसहस्रं वा अर्कलिनो बृहतीरहरभिसम्पादयन्ति ।;स एषोऽक्षरसंमानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा ।;स य एवम् एतम् अक्षरसम्मानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेद, अक्षराणां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ॥२ ॥ |
| | | verse_line2 = स एषोऽक्षरसंमानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
|
| |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S02_V04" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S02_V04"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V07 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 |
| | id = AIT_C02_S03_V07_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V04_B01 |
| | text = | | | text = ‘एवमुक्तप्रकारेण तस्य ह्यक्षरनामकम् । |
| | | अशीत्युत्तरसाहस्ररूपं वर्णेषु संस्थितम् । |
| पुरुषस्थपञ्चभूतेषु पञ्चरूपो हरिः स्थितः ।
| | विष्णुनाम्नोऽथवाऽन्येषु पञ्चाशत्सङ्ख्यकेष्वपि । |
| प्रद्युम्नादिस्वरूपेण ज्योतिरादौ पृथक् पृथक् ॥
| | तावत् सङ्ख्यानि, देहेषु पृथङ् मज्जास्थिपर्वसु । |
| स एव च पुनर्वायौ पञ्चधाऽवस्थितः प्रभुः ।
| | रूपाणि विष्णोस्तावन्ति चेष्टकानि(चेष्टकासु) पृथक् पृथक् । |
| प्राणादिरूपे वसति ह्यनिरुद्धादिरूपवान् ॥
| | अर्कस्थितबृहत्याख्यरूपाण्यह्नां च सर्वशः । |
| अनिरुद्धः स प्रद्युम्नस्तथा सङ्कर्षणः प्रभुः ।
| | सम्पादकानि तान्येव, तान्यक्षरमितानि च । |
| वासुदेवो नारायणः पञ्चरूप इति क्रमात् ॥
| | अस्थ्यादिस्थितरूपाणि तान्युपास्य विमुच्यते ॥’ इति च । |
| पञ्चरूपोऽपि भगवान् यस्माद्वायौ विशेषतः ।
| |
| स्थितस्तेन च खादिभ्यो वायुरेव विशिष्यते ॥
| |
| अत एव पृथिव्यादिस्वरूपा मनआदयः ।
| |
| देवाः प्राणाश्रिता नित्यं गच्छन्ति प्राणमन्वपि ॥
| |
| पृथिवीमयं मनस्तत्र शेषवीन्द्रशिवेन्द्रकाः ।
| |
| कामानिरुद्धौ देवगुरुर्मनोदेवाः सचन्द्रकाः ॥
| |
| श्रोत्रमाकाशरूपं च मित्रधर्मजलाधिपाः ।
| |
| कुबेरश्च दिशां देवाः श्रोत्रदेवा इति श्रुताः ॥
| |
| ज्योतीरूपं तथा चक्षुश्चक्षुर्देवो रविः स्मृतः ।
| |
| किञ्चित् तेजोयुता वाक्च विशेषेण त्वबात्मिका ॥
| |
| उपचीयते ततः साऽद्भिस्तदभावे च शुष्यति ।
| |
| तृषितस्य हि वागेव पूर्वं मन्दा प्रवर्तते ॥
| |
| वाग्देवते ततो वह्निरुमा चापि प्रकीर्तिते ।
| |
| चक्षुष्ट्वमग्नेः श्रोत्रत्वं चन्द्रस्यापि सहोच्यते ॥
| |
| स्वाहाया अपि वाक्त्वं च पर्जन्यस्य मनःस्थितिः ।
| |
| द्वितीयमेतदास्थानं श्रुतिवाक्यप्रमाणतः ॥
| |
| शेषवीन्द्रशिवादीनां मनआदिस्वरूपिणाम् ।
| |
| आश्रयो वायुरेवैकस्तस्य नारायणः स्वयम् ॥
| |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 |
| | document_id = AIT | | | id = AIT_C03_S02_V04_B02 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = तस्यैतस्याऽत्मनः तस्य शरीराख्यस्याऽत्मनो य आत्मा आदानादिकर्ता तस्य परमात्मन एतस्य । अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणां च मिलितानामपि विंशोत्तरसप्तशतत्वोक्तेरपि तत्रस्थविष्णुरूपाण्येवोच्यन्त इति सिद्धम् । अस्थ्यादीन्येव चेदशीत्युत्तरसहस्राणि सन्ति हि । |
| | verse_type = mantra
| |
| | verse_line1 = स एष वाचश्चित्तस्योत्तरत्तरिक्रमो यद्यज्ञः । स एष यज्ञः पञ्चविधोऽग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ चातुर्मास्यानि पशुः सोमः । स एव यज्ञानां सम्पन्नतमो यत्सोमः एतस्मिन् ह्येताः पञ्चविधाः अधिगम्यन्ते यत् प्राक्सवनेभ्यः सैका विधा त्रीणि सवनानि, यदूर्ध्वं सा पञ्चमी ॥
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| | verse_line2 = ३ ॥
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| | commentary1 = aitareya
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 |
| | id = AIT_C02_S03_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V04_B03 |
| | text = | | | text = ‘ष्(विष्)’ ‘ण्’ ‘ष्णुः’ इत्येतानि विष्णुनामगतान्यूष्माक्षरसन्धिनामकानि तद्गतभगवद्रूपाणि मुख्यतस्तन्नामकानि । |
| | |
| तस्माद् वायुवशानां हि वाक्चित्तादिस्वरूपिणाम् ।
| |
| देवानां क्रमवृत्तिभ्यो जाते यज्ञेऽपि केशवः ॥
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| अग्निहोत्रादिके नित्यमनिरुद्धादिरूपकः ।
| |
| पञ्चधाऽवस्थितः सोमे पञ्चरूपो व्यवस्थितः ॥
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| सवनत्रयात् पूर्वके च सवनत्रितये परे ।
| |
| अनिरुद्धादिरूपेण क्रमेणैव व्यवस्थितः ॥
| |
| तमेतं परमं विष्णुं मुक्तोऽप्यत्येव मन्यते ।
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| अधिकं ह्येव तस्मात् तं मन्येतान्योऽपि सर्वदा ॥
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| इत्यादि च ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V08 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 |
| | id = AIT_C02_S03_V08_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V04_B04 |
| | text = | | | text = अहार्यत्वादहर्नामा रात्रिनामा रतिप्रदः । |
| | | सन्धानात् सन्धिनामाऽसौ स्वयं नारायणः प्रभुः । |
| पञ्चरूपभगवद्ध्यानार्थमेव चैतत्पञ्चविधत्वं सर्वत्रोक्तम् ॥ ३ ॥
| | सन्ध्यूष्माक्षरगाण्यस्य विष्णो रूपाणि सर्वशः । |
| }}
| | सन्ध्यारात्रिदिवास्थानि साशीतिकसहस्रकम् । |
| | |
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| | verse_line1 = यो ह वै यज्ञे यज्ञं वेदाहन्यहर्देवेषु देवमध्यूळ्हं स सम्प्रतिवित् । एष वै यज्ञे यज्ञोऽहन्यहर्देवेषु देवोऽध्यूळ्हो यदेतन्महदुक्थम् । तदेतत्पञ्चविधम् । त्रिवृत्पञ्चदशं सप्तदशमेकविंशं पञ्चविंशमिति स्तोमतः । गायत्रं रथन्तरं बृहद्भद्रं राजनमिति सामतः । गायत्र्युष्णिग्बृहतीत्रिष्टुब् द्विपदेति छन्दस्तः । शिरो दक्षिणः पक्ष उत्तरः पक्षः पुच्छमात्मेत्याख्यानम् ।
| |
| | commentary1 = aitareya
| |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V09 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 |
| | id = AIT_C02_S03_V09_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V04_B05 |
| | text = | | | text = तान्येवास्थिषु मज्जासु पर्वस्वपि च सर्वशः । |
| | | परज्ञानात् तु पर्वाणि विष्णो रूपाणि तानि हि । |
| यज्ञेषु यज्ञनामानं याज्यत्वात् पुरुषोत्तमम् ।
| | अस्थानान्मदनाच्चैव ह्यस्थिमज्जाभिधानि च । |
| अधिरूढं तथाऽहस्सु चाहर्नामानमेव तु ॥
| | व्यक्तिर्मज्जासु तस्यैव प्राणो मज्जासु संस्थितः । |
| अहार्यत्वाद्धि देवेषु देवं सर्वोत्तमत्वतः ।
| | मज्जैव रेतो भवति रेतसिस्थो विशेषतः । |
| एवं च सर्वनामानं सर्वेषु स्थितमच्युतम् ॥
| | प्राणस्तेन हि तद्रेतोयुक्तं प्राणेन सर्वदा । |
| स्तोमादिषु च यो वेद स सम्यग्विदिति श्रुतः ।
| | यदि प्राणो न तद्रेतो न गर्भत्वं व्रजेत् क्वचित्। |
| य एष उक्थनामासौ सर्वोत्थापनको हरिः ॥
| | विशेषप्राणसम्बन्धवर्जितान्यत एव हि । |
| महांश्च परिपूर्णत्वात् सहस्रबृहतीस्थितः ।
| | न मांसादीनि गर्भत्वं यान्त्यतः स हि रेतसि । |
| अहरह्नां स यज्ञानां यज्ञो देवाधिकोऽपि सः ॥
| | विशेषेण स्थितः प्राणः प्राणे चैव विशेषतः । |
| अनिरुद्धादिरूपेण स विष्णुः पञ्चधा स्थितः।
| | स्थितो नारायणो देवस्तस्मान्मज्जासु च स्थितः ॥इति च । |
| स्तोमसामचितिच्छन्दश्शस्त्रेष्वपि पृथक् पृथक् ॥
| |
| एकैकमेव तद्रूपमनिरुद्धादिपञ्चकम् ।
| |
| }}
| |
| | |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V10
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| | verse_type = mantra
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| | verse_line1 = पञ्चकृत्वः प्रस्तौति पञ्चकृत्व उद्गायति पञ्चकृत्वः प्रतिहरति पञ्चकृत्व उपद्रवति पञ्चकृत्वो निधनमुपयन्ति । तत्स्तोभसहस्रं भवति । एवं ह्येताः पञ्चविधाः अनुशस्यन्ते यत्प्राक्तृचाशीतिभ्यः सैका विधा तिस्रस्तृचाशीतयो यदूर्ध्वं सा पञ्चमी ।
| |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V10 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 |
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| | text = | | | text = मज्जास्वधिकसन्निधानज्ञापनार्थम् इदं वचनम् । अशीत्युत्तरसहस्रवर्णानाम् अभावाच्च तत्स्थविष्णुरूपाण्येव तत्सङ्ख्यानीति सिद्धम् । अर्के निलीनत्वेनादृश्यत्वेन स्थिता भगवत्प्रादुर्भावा अर्कलिनः । त एव शरीरे स्थित्वा सहस्रं बृहतीः सम्पादयन्ति । वाक् प्रेरकत्वाद् । विष्णुनामार्थवत्वादेव च बृहतीसहस्रस्य तद्देवताश्चैतान्येवाशीत्युत्तरसहस्ररूपाणि । एतान्येव अहःप्रवर्तकानि च । अहःशब्देन यज्ञो दिवसश्चोभावप्यभिप्रेतौ । |
| | |
| प्रस्तावादिष्वपि विभुः पञ्चधैव व्यवस्थितः ॥
| |
| प्रस्तावादीन् पञ्चकृत्वस्तस्मादेव प्रकुर्वते ।
| |
| पञ्चरूपं तमेवैकं स्तोतुमेव पृथक् पृथक् ॥
| |
| तत्र ये स्तोमशब्दाश्च संस्थिता बहुकोटयः ।
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| पृथक् पृथक्तेऽपि विष्णोः प्रादुर्भावान् प्रचक्षते ॥
| |
| }} | | }} |
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|
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V11 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 |
| | document_id = AIT | | | id = AIT_C03_S02_V04_B07 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = ‘यज्ञानां दिवसानां च साशीतिकसहस्रकैः । |
| | verse_type = mantra
| | विष्णुः प्रवर्तको रूपैर्बृहत्युक्थस्य चाञ्जसा ॥ |
| | verse_line1 = तदेतत्सहस्रम् ।
| | बृहत्युक्थेन वाच्यानि रूपाण्येतान्यधीशितुः ॥’ इति च ॥ २ ॥ |
| | commentary1 = aitareya
| |
| }} | | }} |
|
| |
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| {{Bhashyam
| | </div> |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V11
| | <div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके) द्वितीयः खण्डः ॥</div> |
| | id = AIT_C02_S03_V11_B01
| |
| | text =
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| | |
| अनन्तरूपो हि हरिः शब्दोऽप्येष ह्यनन्तधा ।
| |
| विष्णोः सहस्रनामस्तु यत्तद्रूपसहस्रकम् ॥
| |
| बृहतीसहस्रमेतच्च तद्वक्ति हि पृथक् पृथक् ।
| |
| सहस्रशब्दोऽप्यमितं यतो वक्त्यमितान्यतः ॥
| |
| नामानि विष्णोरुच्यन्ते सहस्रमिति चाख्यया ।
| |
| अनन्तनामवचने त्वशक्तत्वात् सहस्रकम् ॥
| |
| नाम्नां पृथगिदं प्रोक्तमनन्ततनुवाचकम् ।
| |
| विष्णोरनन्तरूपाणामुक्त्वा पञ्चशतद्वये ॥
| |
| आसीत् सहस्रमित्याख्या सहस्रं मुख्यतोऽमितम् ।
| |
| ब्रह्म यावत् तावती वागिति वेदप्रमाणतः ॥
| |
| सहैवानन्तरूपैस्तु सरणेन सहस्रकम् ।
| |
| नाम्ना सह सृतेरेव रूपाणां वा सहस्रता ॥
| |
| बृहतीसहस्रं चैतस्माद्रूपानन्ताभिधायकम् ।
| |
| पृथक् पृथग्घि नामार्था ऋच एताः प्रकीर्तिताः ॥
| |
| सर्वनामात्मकं तस्मादृक्सहस्रमिदं हरेः ।
| |
| सर्वरूपाण्यतो विष्णोस्संस्तुतान्यमुनैव हि ॥४० ॥
| |
| }}
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| |
|
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V12 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 |
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| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = तत्सर्वम् । तानि दश | | | verse_line1 = चत्वारः पुरुषा इति बाध्वः- ‘शरीरपुरुषश्छन्दःपुरुषो वेदपुरुषो महापुरुषः’ इति । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = चत्वारः पुरुषा इति बाध्वः- ‘शरीरपुरुषश्छन्दःपुरुषो वेदपुरुषो महापुरुषः’ इति ।;शरीरपुरुष इति यमवोचाम, स य एवायं दैहिक आत्मा । तस्य योऽयमशरीरः प्रज्ञात्मा स रसः ।;छन्दःपुरुष इति यमवोचाम, अक्षरसमाम्नाय एव । तस्यैतस्याकारो रसः ।;वेदपुरुष इति यमवोचाम, येन वेदान् वेद, ऋग्वेदं यजुर्वेदं सामवेदम् । तस्यैतस्य ब्रह्मा रसः । तस्माद् ब्रह्माणं ब्रह्मिष्ठं कुर्वीत, यो यज्ञस्योल्बणं पश्येत् ।;महापुरुष इति यमवोचाम, संवत्सर एव प्रध्वंसयन् अन्यानि भूतानि, ऐक्याभावयन्नन्यानि तस्यैतस्यासावादित्यो रसः । |
| | | verse_line2 = शरीरपुरुष इति यमवोचाम, स य एवायं दैहिक आत्मा । तस्य योऽयमशरीरः प्रज्ञात्मा स रसः । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
|
| |
|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S02_V05" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S02_V05"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V12 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V05 |
| | id = AIT_C02_S03_V12_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V05_B01 |
| | text = | | | text = संसारबाधितैः प्राप्यो बाध्वो वायुरुदाहृतः । |
| | | स हि मोक्षप्रदो विष्णोराज्ञया स उवाच ह । |
| मत्स्यकूर्मक्रोडसिंहवटुभार्गवराघवाः ।
| | सर्वदेहाभिमानी तु शरीरपुरुषः शिवः । |
| कृष्णबुद्धौ च कल्कीति रूपाणां दशकं हरेः ॥
| | सर्ववर्णाभिमानी च शेषोऽसौ छान्दसः पुमान् । |
| पञ्चभेदविभिन्नेन ह्यृक्सहस्रेण शस्यते ।
| | सर्ववेदाभिमान्येव गरुडो वेदपूरुषः । |
| रूपाणां पञ्चकं पूर्वमपरं पञ्चकं हरेः ॥
| | संवत्सराभिमानी तु ब्रह्मैव हि महापुमान् । |
| प्रस्तावाद्यैरानिधनैः स्तूयते सामभक्तिभिः ।
| | सारः शिवस्यानिरुद्धनामा देहस्थितो हरिः । |
| तानि रूपाण्यस्य दश सर्वरूपात्मकानि च ॥
| | अ इत्याक्रियते यस्माद् वासुदेवो ह्यकारकः । |
| दशनामानि चास्यैव सर्वरूपाभिधान्यपि ।
| | शेषस्य सारः स विभुर्ब्रह्माख्यो ज्ञानबृंहणात् । |
| पञ्चकं सामभक्तीनामृक्सहस्रं च तद्द्वयम् ॥
| | सङ्कर्षणाख्यस्तु हरिः सारः स गरुडस्य च । |
| स्तावकं सर्वरूपाणामत एव रमापतेः ।
| | ब्रह्मर्त्विक्संस्थितश्चासौ तस्माद् ब्रह्मिष्ठमेव हि । |
| | कुर्याद् ब्रह्मर्त्विजं तस्मिन् विशेषेण स्थितो हरिः । |
| | ब्रह्मणः सारभूतस्तु प्रद्युम्नो भगवान् हरिः । |
| | स एवाऽदित्यसंस्थश्च स ह्यादिर्जगतो विभुः । |
| | ततश्च सर्वभूतेषु जीवानां विनियामकः । |
| }} | | }} |
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| |
|
| | </div> |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V13 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V06 |
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| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = दशेति वै सर्वम् । | | | verse_line1 = स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्य एकमेतदिति विद्यात् तस्मात् पुरुषं पुरुषं प्रत्यादित्यो भवति । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्य एकमेतदिति विद्यात् तस्मात् पुरुषं पुरुषं प्रत्यादित्यो भवति ।;तदप्येतदृषिणोक्तं–;‘चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः ।;आ प्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥’(ऋ.सं.१.११५.१) इति । |
| | | verse_line2 = तदप्येतदृषिणोक्तं– |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
|
| |
|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S02_V06" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S02_V06"> |
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| | id = AIT_C02_S03_V13_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V06_B01 |
| | text = | | | text = स एवाऽदित्यगो विष्णुर्यः प्रद्युम्नाभिधो हरिः । |
| | स एव सर्वदेहेषु चानिरुद्धतनुः स्थितः । |
| | सङ्कर्षणो वासुदेव इत्येकः स चतुर्विधः । |
| | प्रतिपूरुषमेतस्मात् स्थितो विष्णुर्नियामकः । |
| | आदित्यादिषु च स्थित्वा द्योतकोऽसौ प्रति प्रति । |
| | }} |
|
| |
|
| दशेति सर्वनामैतत्प्रथितं मुख्यतः श्रुतौ ॥
| | {{Bhashyam |
| शं रूपं भगवन्तं यद्दद्याद् व्यक्त्या समस्तशः ।
| | | verse_id = AIT_C03_S02_V06 |
| दशेत्यमितनाम्नां तदाख्या रूपेषु शन्ददेः ॥
| | | id = AIT_C03_S02_V06_B02 |
| सर्वनामार्थवचनात् पञ्चकद्वितयस्य च ।
| | | text = स चेतनतमत्वाद्धि चित्रमित्यभिधीयते । |
| अभूद्दशेति वै नाम तस्मादेतद्दशाखिलम् ॥
| | मुख्यत्वात् सर्वदेवानामननादीशितृत्वतः । |
| एतावती हि सङ्ख्या । दश दशतस्तच्छतम् । दश शतानि तत्सहस्रम् । तत्सर्वम् ।
| | कर्तृत्वादप्यनीकं स उदैत् सूर्यस्थितो हरिः । |
| दशैव मूलसङ्ख्या च तद्विभेदाः शतादयः ।
| | ज्ञानदत्वाच्च देवानां चक्षुरेतेन दर्शनात् । |
| ऋक्सहस्रमिदं तस्मादनन्तगुणमच्युतम् ॥
| | आपूरयन् सर्वलोकान् प्रकाशेन जनार्दनः । |
| अनन्तशक्तिममितरूपनामानमेव च ।
| | आदानात् सर्वजीवानाम् अत्तृत्वात् प्रलयेऽपि च । |
| वक्ति ...
| | आत्मेत्युक्तः स भगवान् जगतः स्थावरस्य च । |
| }} | | }} |
|
| |
|
| | </div> |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V15 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V07 |
| | document_id = AIT | | | document_id = AIT |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = तानि त्रीणि च्छन्दांसि भवन्ति । त्रेधा विहितं वा इदमन्नमशनं पानं खादस्तदेतैराप्नोति ॥ | | | verse_line1 = एताम् अनुविधं संहितां सन्धीयमानां मन्य इति ह स्माऽह बाध्वः । एतां ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्ते । एतमग्नावध्वर्यवः । एतं महाव्रते छन्दोगाः । एतमस्याम्, एतं दिवि, एतं वायौ, एतमाकाशे, एतमप्सु, एतमोषधीषु, एतं वनस्पतिषु, एतं चन्द्रमसि, एतं नक्षत्रेषु, एतं सर्वेषु भूतेषु एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते । |
| | verse_line2 = ४ ॥ | | | verse_lines = एताम् अनुविधं संहितां सन्धीयमानां मन्य इति ह स्माऽह बाध्वः । एतां ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्ते । एतमग्नावध्वर्यवः । एतं महाव्रते छन्दोगाः । एतमस्याम्, एतं दिवि, एतं वायौ, एतमाकाशे, एतमप्सु, एतमोषधीषु, एतं वनस्पतिषु, एतं चन्द्रमसि, एतं नक्षत्रेषु, एतं सर्वेषु भूतेषु एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते ।;स एष संवत्सरसंमानश्चक्षुर्मयः, श्रोत्रमयः, छन्दोमयः, मनोमयः, वाङ्मय आत्मा ।;स य एवमेतं संवत्सरसंमानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयम् आत्मानं परस्मै शंसति, |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_line2 = स एष संवत्सरसंमानश्चक्षुर्मयः, श्रोत्रमयः, छन्दोमयः, मनोमयः, वाङ्मय आत्मा । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
|
| |
|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S02_V07" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S02_V07"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V15 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V07 |
| | id = AIT_C02_S03_V15_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V07_B01 |
| | text = | | | text = एवं चतुर्विधो विष्णुः संहितादेवता यदा । |
| | ज्ञायते पूर्ववर्णस्य रूपं नारायणाभिधम् । |
| | प्रादुर्भावाः समस्ताश्च चरमार्णस्य देवताः । |
| | तदा तु संहितां सम्यङ् मन्येऽहं सन्धितामिति । |
| | आह वायुरिमं विष्णुं बृहत्युक्थस्य(बृहदुक्थस्य- हृ) देवताम् । |
| | महाव्रताख्यस्तोत्रस्य चेष्टकानां च देवताम् । |
| | एतमेवाखिलजगद् व्याप्तं पूर्णगुणात्मकम् । |
| | संवसद्रतिदातृत्वाद् ब्रह्मा संवत्सराभिधः । |
| | नियामकः स जीवानां सर्वेषां प्रभुरीश्वरः । |
| | अनन्तमूर्तिर्ब्रह्माऽसावनन्तजगदास्थितः । |
| | नियामकस्तस्य विष्णुस्तावद्रूपेषु संस्थितः । |
| | तत् संवत्सरसम्मानः स विष्णुः परमेश्वरः ॥ ३ ॥ |
| | }} |
|
| |
|
| .... छन्दस्त्रयं चात्र तृचाशीतित्रयात्मकम् ॥
| | </div> |
| अशनादित्रिकं तच्च भूत्वा विष्णुमुपैति च ।
| | <div class="gr-author-note">॥ इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके) तृतीयः खण्डः ॥</div> |
| सर्वच्छन्दोऽभिधश्चैव सर्वदेवाभिधस्तथा ॥
| | |
| सर्वमुन्यभिधश्चैव सर्ववस्त्वभिधो हरिः।
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| अनन्तपूर्णगुणकस्तस्माज्ज्ञेयो रमापतिः ॥
| | | verse_id = AIT_C03_S02_V08 |
| मुख्यतोऽस्यां च विद्यायां योग्य एकश्चतुर्मुखः ।
| | | document_id = AIT |
| एकदेशपरिज्ञाने त्वन्ये योग्याः शिवादयः ॥
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| इति च । | | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = दुग्धदोहा अस्य वेदा भवन्ति । न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति । न वेद सुकृतस्य पन्थानम् इति । |
| | | verse_lines = दुग्धदोहा अस्य वेदा भवन्ति । न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति । न वेद सुकृतस्य पन्थानम् इति । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
|
| |
|
| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S02_V08" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S02_V08"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V15 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V08 |
| | id = AIT_C02_S03_V15_B02 | | | id = AIT_C03_S02_V08_B01 |
| | text = | | | text = य एनं वक्त्ययोग्येभ्यो योऽथवैनं महाव्रते । |
| | | कर्मण्याचार्यतोऽन्यस्य शंसेत पितृतोऽथवा । |
| ..त्रिविधो ह्यनिरुद्धोऽसावध्यात्मादिविभेदतः ।
| | महाव्रतेन स्तोत्रेण स्तुवीतैनमथापि वा । |
| अतस्त्रिवृदिति प्रोक्तस्तथा पञ्चदशात्मकः ॥
| | महाव्रते चितिं वाऽपि कुर्यान्नास्य फलं श्रुतेः । |
| प्रद्युम्नः पञ्चभूतेषु ह्यध्यात्मादिविभेदतः ।
| | सुकृतस्य फलं चैव नासौ सम्यगवाप्स्यति । |
| लिङ्गसप्तदशस्थत्वात् तावान् सङ्कर्षणः श्रुतः ॥
| |
| सप्तधातुषु संस्थः सन्नध्यात्मादिविभेदतः ।
| |
| एकविंशो वासुदेवो मन आदिचतुष्टये ॥
| |
| गुणत्रये च प्रकृतावध्यात्मादिविभेदतः ।
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| मूलरूपेण च सह पञ्चविंशात्मकः प्रभुः ॥
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| नारायणस्त्वचिन्त्यात्मा स एकोऽपि ह्यनन्तधा ।
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| गायकानां त्राणतोऽसौ गायत्रमनिरुद्धकः ॥
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| प्रद्युम्नो हि रथारूढस्तेन चोक्तो रथन्तरम् ।
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| बृहद्रूपो बृहन्नामा तथा सङ्कर्षणः प्रभुः ॥
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| भद्रं तु वासुदेवोऽसौ भद्रमोक्षप्रदो यतः ।
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| नारायणो राजनं स्याद् राजयत्येष मोक्षिणः ॥
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| गायत्री त्वनिरुद्धोऽसौ त्रिकाले गीयते यतः ।
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| उष्णिगुष्णस्वरूपत्वात् प्रद्युम्नोऽग्न्यादिसंस्थितः ॥
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| स्त्रीरूपो बृहतीनामा बृहत्सङ्कर्षणः प्रभुः ।
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| वासुदेवस्तथा त्रिष्टुप् त्रिवेदैः स्तूयते यतः ॥
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| नारायणस्तु स्त्रीरूपो द्विधैवासौ व्यवस्थितः ।
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| द्विपदेति ततो नाम सर्वच्छन्दोभिधा इमे ॥
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| वनितातनवः प्रोक्ताः मध्यं नारायणः प्रभुः ।
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| वासुदेवोऽस्य पुच्छं च वामदक्षौ च पक्षकौ ॥
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| सङ्कर्षणश्च प्रद्युम्नः क्रमादेव प्रकीर्तितौ ।
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| अनिरुद्धः शिरश्चैव तथैकोऽपि हि पञ्चधा ॥
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| प्रस्तावनामानिरुद्धो रक्षन् संस्तूयते यतः ।
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| सृजन् जगच्च रमया प्रद्युम्नस्तत्र गीयते ॥
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| उद्गीथनामा तेनासौ जगदुद्गमनेन वा ।
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| संहारात् प्रतिहाराख्यस्तथा सङ्कर्षणः प्रभुः ॥
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| मोचयित्वा समीपं हि द्रावयेद् वासुदेवकः ।
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| तेनोपद्रवनामासौ निधीयन्ते यतोऽखिलाः ॥
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| मुक्ता नारायणे देवे तेनासौ निधनाभिधः ॥
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| इत्यादि च ।
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| }} | | }} |
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| | id = AIT_C02_S03_V15_B03 | | | id = AIT_C03_S02_V08_B02 |
| | text = | | | text = प्रत्यक्षज्ञानिनोऽप्येतद् आनन्दह्रासकृद् भवेत् । |
| | | प्रत्यक्षज्ञानिनो मोक्षो न कथञ्चिद्धि हीयते । |
| ..स्तूयमानत्वात् स्तोमः । समत्वात् साम । छन्द्यत्वात् छन्दः ॥ ४ ॥
| | आचार्यमेव तं विद्याद् गुणैर्यः स्वात्मनोऽधिकः । |
| | गुणाधिकस्य तेनैव शंसनादि न दुष्यति । |
| | अयोग्यस्योपदेशे तु कृते हौत्रादिकेऽपि वा । |
| | प्रायश्चित्तार्थमेतत्तु शंसीत शतवारकम् । |
| | अन्यथा मानुषेष्वेव जायते न दिवं व्रजेत् । |
| | योग्या अस्यास्तु विद्याया देवा ऋषय एव च । |
| | एकदेशज्ञानयोग्या मानुषा उत्तमा यदि ॥ |
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| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तद्धैतदेके नानाच्छन्दसां सहस्रं प्रतिजानते किमन्यत्सत् । अन्यद् ब्रूयामेति त्रिष्टुप्सहस्रमेके जगतीसहस्रमेकेऽनुष्टुप्सहस्रमेके । | | | verse_line1 = तदप्येतदृषिणोक्तम्– |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = तदप्येतदृषिणोक्तम्–;यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति ।;यदीं शृणोत्यलकं शृणोति न हि प्र वेद सुकृतस्य पन्थाम्(ऋ.सं.१०.७१.६) ॥ इति ।;‘न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति, न वेद सुकृतस्य पन्थानम्’ इत्येतत् तदुक्तं भवति तस्मादेवं विद्वान् न परस्मा अग्निं चिनुयाद् । न परस्मै महाव्रतेन स्तुवीत । न परस्मा एतदहः शंसेत् । कामं पित्रे वाऽऽचार्याय वा शंसेद् । आत्मन एवास्य तत् कृतं भवति । |
| | | verse_line2 = यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V16 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V08 |
| | id = AIT_C02_S03_V16_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V08_B02 |
| | text = | | | text = कर्मसञ्चयवेत्तारं त्यजेन्नारायणं हि यः । |
| | | प्रीत्यैकदेशसंस्थत्वात् सखायमिति चोदितम् । |
| तदिदमुक्तप्रकारेणैव बृहतीसहस्रं सम्पन्नं भवति । तदेके नानाच्छन्दसां सहस्रं शंसितव्यमेव बृहतीसहस्रसम्पादनमविवक्षितमिति प्रतिजानते । केचित् त्रिष्टुप्सहस्रमेव शंसितव्यमिति ।
| | न विद्यायाः फलं तस्य श्रुतं च नरकावहम् । |
| | नैव प्राप्नोति सुकृतं सन्त्यागात् परमात्मनः । |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V17 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V08 |
| | document_id = AIT | | | id = AIT_C03_S02_V08_B03 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = मुख्यत्यागो हरेरेष यन्नास्तीति वदेदमुम् । |
| | verse_type = mantra
| | तत्समं वाऽधिकं वाऽपि ब्रूयादैक्यमथापि वा । |
| | verse_line1 = तदुक्तमृषिणाऽनुष्टुभमनु चर्चूर्यमाणमिन्द्रं निचिक्युः कवयो मनीषेति । वाचि वै तदैन्द्रं प्राणं न्यचायन्नित्येतत् तदुक्तं भवति ।
| | ऐश्वर्यादिगुणानां वा ह्रासं नास्तित्वमेव वा । |
| | commentary1 = aitareya
| | तत्प्रसादं विना मोक्षं ब्रूयाद् वा कस्यचित् क्वचित्। |
| | ऐक्यं वा ब्रह्मशर्वादेर्मुक्तावैक्यम् अथापि वा । |
| | व्यत्यासं चावताराणां जीवाभेदम् अमुष्य वा । |
| | भेदज्ञानं तद्गुणानां तेन वाऽथ मिथोऽपि वा । |
| | तथैव तत्क्रियाणां च तद्रूपाणामथापि वा । |
| | असाम्यदर्शनं वाऽपि तद्रूपाणां (तद्गुणानां) परस्परम् । |
| | देहदेहिविभेदं च तस्मिन्नवयवेषु वा । |
| | परस्परं भेददृष्टिं तेन वा कुत्रचित् क्वचित्। |
| | दोषसंसर्गमस्यापि स्वतः परत एव वा । |
| | अज्ञानतो ज्ञानतो वा, निर्देहत्वममुष्य च । |
| | तद्देहस्य प्राकृतत्वम् अचिदानन्ददेहताम् । |
| | प्रादुर्भावेष्वपि विभोर्देहत्यागोद्भवादिकम् । |
| | अज्ञानदुःखासामर्थ्यपारवश्यादिकं तथा । |
| | अतद्वशत्वं कस्यापि कदाचित् क्वचिदप्युत । |
| | परिमाणं बलादेर्वा तस्य विष्णोर्महात्मनः । |
| | भेदाभेददृशिर्वाऽस्य जीवैर्वा स्वगुणादिभिः । |
| | तर्कैस्तस्यापलापो वा तत्र रक्तेन चेतसा । |
| | त्यागानामेवमुक्तानां तर्काद्यैः साधनं तथा । |
| | अचिन्त्यविभवेऽप्यस्मिन्नसम्भवनिरूपणम् । |
| | स एष मुख्यतस्त्यागो वासुदेवस्य कीर्तितः । |
| }} | | }} |
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| | text = | | | text = रमाब्रह्मादिकानां च तारतम्यानभिज्ञता । |
| | | संशयश्चोक्ततत्त्वेषु जगन्मिथ्यात्वदर्शनम् । |
| अनुष्टुप्सहस्रमेवेति वदन्तोऽनुष्टुप्प्रशंसात्मिकामृचं दर्शयन्ति । बीभत्सूनां जगद्भर्तुमिच्छूनाम् । अपां सयुजं सहैव चरन्तं चाहुः विष्णुं हंसस्वरूपिणम् । अनुष्टुभं चर्चूर्यमाणं पुनः पुनर्वदन्तं परमेश्वरं ददृशुश्च ।
| | अस्मृतिर्वासुदेवस्य तद्भक्तानां च निन्दनम् । |
| | द्वितीय एष त्यागस्तु विष्णोरेव प्रकीर्तितः । |
| }} | | }} |
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| | text = | | | text = निषिद्धकर्मकरणं विहितस्य च वर्जनम् । |
| | | त्यागस्तृतीयो हि हरेः, चतुर्थोऽयोग्यपूरुषे । |
| मेघसंस्थं हंसरूपं तं विष्णुं परमेश्वरम् ।
| | उपदेशः केशवस्य यथाशास्त्रोदितक्रमात् । |
| विरिञ्चशिवपूर्वेभ्यो नृसिंहानुष्टुभं पराम् ॥
| | आचार्यपित्रोरन्यत्र तथैव च महाव्रते । |
| उच्चारयन्तमर्थांश्च व्याचक्षाणं समन्ततः ।
| | हौत्रौद्गात्राध्वर्यवाणि, त्याग एव चतुर्विधः । |
| ददृशुर्मुनयो दिव्या आचार्यं ब्रह्मशर्वयोः ॥
| |
| एवं वायुं च ददृशुस्तत्र हंसस्वरूपिणम् ।
| |
| शिवादिभ्यो व्याहरन्तं तामेवानुष्टुभं पराम् ॥
| |
| इत्यादि च ।
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| }} | | }} |
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| | text = | | | text = त्यागद्वयात् तु प्रथमात् प्राप्यतेऽन्धन्तमः क्रमात् । |
| | | तृतीयान्निरयप्राप्तिश्चतुर्थान्न दिवं व्रजेत् । |
| वागाख्यायामनुष्टुभ्युच्चार्यमाणायां हि मुनयो विष्णुं ददृशुः । अतो ब्रह्मादयोऽपि विष्णोः सकाशादनुष्टुभर्थं सर्वदा शृण्वन्तीति ज्ञायतेऽतोऽनुष्टुबेव छन्दसां वरेति चोक्तं भवति ।
| | उपदिष्टेऽपि यस्तत्त्वे संशयं कुरुते पुमान् । |
| | सोऽन्धन्तमो व्रजेदन्यो निरयायैव गच्छति । |
| | स एव भगवान् विष्णुरेतैदोषैर्विना यदि । |
| | ज्ञायते मुक्तिदः साक्षान्नात्र कार्या विचारणा । |
| | यदि ज्ञानं नातिपक्वं सरागं च मनो भवेत् । |
| | तदा स्वर्गादिलोकाप्तिः संशयश्चेत् क्वचित् क्वचित्। |
| | आवृत्तिरेव संसारे यावन्निःसशंयो भवेत् । |
| }} | | }} |
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| | document_id = AIT | | | id = AIT_C03_S02_V08_B07 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = पुनरावृत्तिहीनं तु तमोऽन्धं मुक्तिरेव च । |
| | verse_type = mantra
| | पूर्वं तु निःसुखं तत्र, निर्दुःखं चापरं मतम् । |
| | verse_line1 = स हेश्वरो यशस्वी कल्याणकीतिर्भवितोरीश्वरो ह तु पुराऽऽयुषः प्रैतोरिति ह स्माह ।
| | निश्शेषगुणहीनं च पूर्वम्, निर्दोषकं परम् । |
| | commentary1 = aitareya
| | विमिश्रगतयस्त्वन्याः पुनरावृत्तिसंयुताः । |
| | असुरा देवता मर्त्या योग्या एतेषु च क्रमात् । |
| | न च तेषां सङ्करोऽस्ति यथायोग्या हि तद्गतिः । |
| | मानुषेषूत्तमा मुक्तिम् अधमा निरयं तथा । |
| | आप्नुवन्ति मनुष्येषु मध्यमाः सृतिभागिनः । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V18 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V08 |
| | id = AIT_C02_S03_V18_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V08_B08 |
| | text = | | | text = नियमोऽयं नान्यथा स्याद्, अच्छिद्रत्वं यथा भवेत् । |
| | | दोषेऽथवा गुणे वाऽपि तदा दैत्याः सुरा अपि । |
| अनुष्टुभां सहस्रं तु यः शंसीतात एव तु ।
| | स्वां स्वां गतिं समायान्ति तावत् संसारभागिनः । |
| भवितुं चेश्वरः स स्याद् भावो मुक्तिर्न चान्यथा ॥
| | अच्छिद्रत्वं नैव सर्वैः कदाचित् प्राप्यते यतः । |
| यशस्वी स प्रसिद्धः स्याच्छुभकीर्तिश्च सर्वदा ।
| | सृष्टिस्थितिलयादीनां नोच्छेदस्तेन कुत्रचित् । |
| स्वच्छन्दमृत्युता च स्यात् तस्येत्याहैतरेयकः ॥
| | तस्माद् दोषान् प्रहायैव विष्णुं सर्वोत्तमोत्तमम् । |
| | जानीयात् तेन मुक्तिः स्याद् अपरोक्षदृशेरनु । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V19 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V09 |
| | document_id = AIT | | | document_id = AIT |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = अकृत्स्नो ह्येष आत्मा यद्वागभि हि प्राणेन मनसेस्यमानो वाचा नानुभवति । बृहतीमभि सम्पादयेदेष वै कृत्स्न आत्मा यद्बृहती । | | | verse_line1 = स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्ये, एकमेतदित्यवोचाम । तौ यत्र विहीयेते । चन्द्रमा इवाऽदित्यो दृश्यते, न रश्मयः प्रादुर्भवन्ति । लोहिनी द्यौर्भवति यथा मञ्जिष्ठाः । व्यस्तः पायुः । काककुलायगन्धिकमस्य शिरो वायति । सम्परेतोऽस्याऽत्मा न चिरमिव जीविष्यतीति विद्यात् । स यत्करणीयं मन्येत, तत्कुर्वीत । ‘यदन्ति यच्च दूरके’(ऋ.सं.९.६७.२१) इति सप्त जपेत् । ‘आदित् प्रत्नस्य रेतस’ इत्येका । ‘यत्र ब्रह्मा पवमान’ इति षट् । ‘उद्वयं तमसस्परि’ इत्येका । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्ये, एकमेतदित्यवोचाम । तौ यत्र विहीयेते । चन्द्रमा इवाऽदित्यो दृश्यते, न रश्मयः प्रादुर्भवन्ति । लोहिनी द्यौर्भवति यथा मञ्जिष्ठाः । व्यस्तः पायुः । काककुलायगन्धिकमस्य शिरो वायति । सम्परेतोऽस्याऽत्मा न चिरमिव जीविष्यतीति विद्यात् । स यत्करणीयं मन्येत, तत्कुर्वीत । ‘यदन्ति यच्च दूरके’(ऋ.सं.९.६७.२१) इति सप्त जपेत् । ‘आदित् प्रत्नस्य रेतस’ इत्येका । ‘यत्र ब्रह्मा पवमान’ इति षट् । ‘उद्वयं तमसस्परि’ इत्येका । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V19 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V09 |
| | id = AIT_C02_S03_V19_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V09_B01 |
| | text = | | | text = सूर्यमण्डलगो विष्णुर्देहे चक्षुषि संस्थितः । |
| | | अनिरुद्धश्च हृदये न च भेदोऽनयोः क्वचित्। |
| महैतरेयो भगवान् तन्नेत्याह रमापतिः ।
| | अन्येषामपि रूपाणाम् इति विद्याद् विचक्षणः । |
| नानाच्छन्दःप्रशंसादिप्रमाणरहितत्वतः ॥
| | द्विरूपः स यदा विष्णुरपगच्छति देहतः । |
| परिहाराय चापूर्णमैतरेयमुने शृणु ।
| | तदैव दुर्निमित्तानि जायन्ते नान्यदा क्वचित्। |
| त्वं तु मन्त्रमुदाहृत्य यस्मादेतदवोचथाः ॥
| | तस्मात् तेषां दर्शने तु कर्तव्यं पारलौकिकम् । |
| तस्माद् वक्ष्याम्युत्तरं ते प्रियः शिष्योऽसि मे यतः ।
| | सर्वमेव, जपेच्चैव यदन्तीत्यादिका ऋचः । |
| उमैव वागिति प्रोक्ता साऽनुष्टुबभिमानिनी ॥
| |
| अकृत्स्ना सा ततो नैव ब्रह्मेत्युक्ता कथञ्चन।
| |
| वागिन्द्रियाभिमानिन्यां न हि ब्रह्मवचः क्वचित् ॥
| |
| वायुना प्राणरूपेण मनोरूपशिवेन च ।
| |
| अभ्यस्यमानोऽनुभवेत् पुमान् वाचा तु न क्वचित् ॥
| |
| अभिमानी बृहत्यास्तु वायुरेव यतः प्रभुः ।
| |
| तस्मादेषा छन्दसां हि वरिष्टा बृहती स्मृता ॥
| |
| पूर्णो हि वायुर्देवानां तस्माद् ब्रह्मेति चोच्यते ।
| |
| माहात्म्याधिक्यतश्चैव बृहतीत्येव नाम तत् ॥
| |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V20 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V09 |
| | document_id = AIT | | | id = AIT_C03_S02_V09_B02 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = ऋग्भिः षडि्भर्वायुरेव पवमानादिनामकः । |
| | verse_type = mantra
| | स्तूयते सोऽङ्गनेतृत्वाद् अग्निरित्यभिधीयते । |
| | verse_line1 = सोयमात्मा सर्वतः शरीरैः परिवृतः । तद्यथाऽयमात्मा सर्वतः शरीरैः परिवृत एवमेव बृहती सर्वतश्छन्दोभिः परिवृता । मध्यं ह्येषामङ्गानामात्मा । मध्यं छन्दसां बृहती । स हेश्वरो यशस्वी कल्याणकीर्तिर्भवितोरीश्वरो ह तु पुरायुषः प्रैतोरिति ह स्माऽऽह । कृत्स्नो ह्येष आत्मा यद्बृहती तस्माद् बृहतीमेवाभिसम्पादयेत् ॥ ५ ॥
| | परस्य ब्रह्मणो विष्णोर्ज्ञापनाख्यप्रसूतिभिः । |
| | commentary1 = aitareya
| | वायुः पुनाति यल्लोकान् सविता तेन कथ्यते । |
| | पवित्रं नाम साक्षात् तत् परं ब्रह्म जनार्दनः । |
| | प्रसादयित्वा तं विष्णुं तेन लोकान् पुनात्यसुः । |
| | ज्ञानाख्यप्रसवेनापि स्वयं वायुः पुनात्ययम् । |
| | प्राणाग्नेरर्चिषो देहे विततास्तेषु केशवः । |
| | अर्चिष्मान् विततो नित्यं वायुस्तेन पुनात्ययम्(पुनात्यलम्- हृ) । |
| | यत्र ब्रह्मेति षडि्भश्च प्रार्थनीयः स मारुतः । |
| | मोचयित्वैव संसारद् विष्णोर्लोके कृधीति च । |
| | आदित्प्रत्नस्येति विष्णुः स्तुत्यो वैकुण्ठलोकगः । |
| | आदित्यमण्डलस्थश्च साक्षान्नारायणः प्रभुः । |
| | उद्वयं त्वितिमन्त्रेण स्तुत्यो वायोरपीश्वरः । |
| | अपमृत्युभयं तस्य यदन्तीत्यृग्जपाद् व्रजेत् । |
| | कालमृत्युर्यदि भवेत् तथा जन्मादिकं भयम् । |
| | अन्याभिः कर्मतः पूतो यत्र ब्रह्मेति वैष्णवम् । |
| | लोकं व्रजेत् तथाऽन्याभ्यां विष्णुर्मोक्षसुखप्रदः । |
| }} | | }} |
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| |
|
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V20 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V09 |
| | id = AIT_C02_S03_V20_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V09_B03 |
| | text = | | | text = इष्टप्रदानशीलत्वाद् इन्दुर्वायुः स एव च । |
| | सोमः सौम्यस्वरूपत्वात्, पवमानश्च पावनात् । |
| | विष्णुः पुरातनत्वात् तु प्रत्नो, रेतो महारतिः । |
| | देवत्रा देव एवासौ सर्वदेवेश्वरो यतः । |
| | सूर्यश्च सूरिभिः प्राप्यो नित्यानन्दो रमापतिः । |
| | }} |
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| |
|
| अङ्गेभ्य एव सम्भूतान्यन्यच्छन्दांसि चाब्जजात् ।
| | </div> |
| मध्यात् तु बृहती जाता तस्मात् सा मध्यमुच्यते ॥
| | {{VerseBlock |
| पठ्यते तेन मध्ये सा छन्दसां प्रवरा सती ।
| | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| छन्दांस्यन्यान्यङ्गवत् स्युर्मध्यवद् बृहती परा ॥
| | | document_id = AIT |
| सप्तछन्दांसि चैवं हि प्रतिमा वैष्णवी मता ।
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| गायत्रीदेवतात्वं च लक्ष्म्या यत्राभिधीयते ॥
| | | verse_type = mantra |
| बृहती देवता तत्र भगवान् पुरुषोत्तमः ।
| | | verse_line1 = अथापि यत्र च्छिद्र इवाऽदित्यो दृश्यते, रथनाभिरिवाभिख्यायेत, च्छिद्रां वा छायां पश्येत्, तदप्येवमेव विद्यात् । अथाप्यादर्शे वोदके वा जिह्मशिरसं वाऽशिरसं वाऽऽत्मानं पश्येद्, विपर्यस्ते वा कन्याके जिह्मेन वा दृश्येयाताम्, तदप्येवमेव विद्यात् । |
| आधिक्यं छन्दसां यत्र गायत्र्यास्तु विवक्षितम् ॥
| | | verse_lines = अथापि यत्र च्छिद्र इवाऽदित्यो दृश्यते, रथनाभिरिवाभिख्यायेत, च्छिद्रां वा छायां पश्येत्, तदप्येवमेव विद्यात् । अथाप्यादर्शे वोदके वा जिह्मशिरसं वाऽशिरसं वाऽऽत्मानं पश्येद्, विपर्यस्ते वा कन्याके जिह्मेन वा दृश्येयाताम्, तदप्येवमेव विद्यात् ।;अथाप्यपिधायाक्षिणी उपेक्षेत, तद् यथा बटरकाणि सम्पतन्तीव दृश्यन्ते, तानि यदा न पश्येत्, तदप्येवमेव विद्यात् ।;अथाप्यपिधाय कर्णावुपशृणुयात्, स एषोऽग्निरिव प्रज्वलतो, रथस्येवोपब्दिस्तं यदा न शृणुयात्, तदप्येवमेव विद्यात् । अथापि यत्र नील इवाग्निर्दृश्यते यथा मयूरग्रीवा, मेघे वा विद्युतं पश्येत्, मेघे वा विद्युतं न पश्येत्, महामेघे वा मरिचीरिव पश्येत, तदप्येवमेव विद्यात् । अथापि यत्र भूमिं ज्वलन्तीमिव पश्येत तदप्येवमेव विद्याद् इति प्रत्यक्षदर्शनानि । |
| तत्र तत्पुत्रको वायुः बृहतीदेवता मता ।
| | | verse_line2 = अथाप्यपिधायाक्षिणी उपेक्षेत, तद् यथा बटरकाणि सम्पतन्तीव दृश्यन्ते, तानि यदा न पश्येत्, तदप्येवमेव विद्यात् । |
| ऋचामाधिक्ययोगार्थं नाङ्गीकर्तव्यमत्र तत् ॥
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| प्रधानत्वाद् बृहत्यास्तु जगत्याद्यं न युज्यते ।
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| सम्पादनाद् बृहत्यास्तु मुक्तो भवितुमीश्वरः ॥
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| स्यात् प्रसिद्धः सुकीर्तिश्च छन्दोमृत्युर्गुणाधिकः ।
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| इति प्राह स्वयं विष्णुर्महिदासाभिधः प्रभुः ॥ | |
| इत्यादि च ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V20 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | id = AIT_C02_S03_V20_B01 | | | document_id = AIT |
| | text = | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | | | verse_type = mantra |
| इतोऽन्यत् सत्किमित्याहुर्नानाच्छन्दस्त्ववादिनः ।
| | | verse_line1 = अथ स्वप्नाः- पुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति, स एनं हन्ति, वराह एनं हन्ति, मर्कट एनमास्कन्दयति, आशु वायुरेनं प्रवहति, सुवर्णं खादित्वाऽपगिरति, मध्वश्नाति, बिसानि भक्षयति, पुण्डरीकं धारयति, खरैर्वराहैर्युक्तैर्याति, कृष्णां धेनुं कृष्णवत्सां नलदमाली दक्षिणामुखो व्राजयति । |
| अन्यत् सद्रूपमित्याहुस्त्रिष्टुब्वादिन एव ते ॥
| | | verse_lines = अथ स्वप्नाः- पुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति, स एनं हन्ति, वराह एनं हन्ति, मर्कट एनमास्कन्दयति, आशु वायुरेनं प्रवहति, सुवर्णं खादित्वाऽपगिरति, मध्वश्नाति, बिसानि भक्षयति, पुण्डरीकं धारयति, खरैर्वराहैर्युक्तैर्याति, कृष्णां धेनुं कृष्णवत्सां नलदमाली दक्षिणामुखो व्राजयति ।;स यद्येतेषां ककिञ्चित् पश्येद्, उपोष्य पायसं स्थालीपाकं श्रपयित्वा, रात्रिसूक्तेन प्रत्यृचं हुत्वा, अन्येनान्नेन ब्राह्मणान् भोजयित्वा चरुं स्वयं प्रश्नीयात् ।;स योऽतोऽश्रुतोऽगतोऽमतोऽनतोऽदृष्टोऽविज्ञातोऽनादिष्टः । श्रोता मन्ता द्रष्टाऽदेष्टा घोष्टा विज्ञाता प्रज्ञाता सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः सम आत्मेति विद्यात् ॥ ४ ॥ |
| | | verse_line2 = स यद्येतेषां ककिञ्चित् पश्येद्, उपोष्य पायसं स्थालीपाकं श्रपयित्वा, रात्रिसूक्तेन प्रत्यृचं हुत्वा, अन्येनान्नेन ब्राह्मणान् भोजयित्वा चरुं स्वयं प्रश्नीयात् । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S02_V10" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S02_V10"> |
| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V20 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | id = AIT_C02_S03_V20_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B01 |
| | text = | | | text = देशतः कालतश्चैव गुणतश्चापि पूर्तितः । |
| | | अत इत्युच्यते विष्णुः सन्ततो ह्यत उच्यते । |
| ऐन्द्रं प्राणं परमेश्वरसहितं वायुम् । प्राणेन मनसा च अभि इस्यमानोऽभ्यस्यमानः । तृतीयोऽतिशये इति सूत्रादकारस्येकारः । मथनात् मिथिलो जातः सहनात् सिंह उच्यते । हत्वी दस्यून् इत्यादिवच्च । अभ्यस्यमानः अभितः क्षिप्यमाणो विषयेषु बहुशः । कृत्स्न आत्मा कृत्स्नप्रतिमा विष्णोः ।
| | तृतीयवर्णोऽतिशये यतस्तेनातिरेव वा । |
| | अत इत्युच्यते विष्णुः सम्यक् श्रुत्याद्यशक्यतः । |
| | पूर्णत्वाद् भगवान् विष्णुरश्रुतत्वादिनोदितः । |
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| | id = AIT_C02_S03_V20_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B02 |
| | text = | | | text = अन्तस्थः सर्वजीवानां पूर्णत्वात् पुरुषाभिधः । |
| | | समः स सर्वरूपेषु सर्वजीवनियामकः । |
| एकापि प्रतिमा विष्णोर्बृहती च्छन्दसां वरा ।
| | इति विद्यात् परं विष्णुं मुच्यते तेन संसृतेः ॥’ इत्यादि च । |
| अन्यच्छन्दोऽभिधा यत्स्यात् प्रतिमा मध्यमैव तत् ॥
| | शरीरपुरुषादीनां प्राप्यत्वात्, तदुपास्यत्वात्, तेषां नियामकत्वेन तेभ्योऽप्यत्युत्तमत्वेन तेषु स्थितत्वाच्च तेषां सार इत्युच्यते भगवान् । यद् ईम् एव । अलकं अरकम् । यत्ककिञ्चिच्छृणोति तत् सर्वम् अरतिरूपान्धतमःप्राप्तिकारणमेव तस्य भवति । तत्र हि सर्वरत्यभावः, रतिविरुद्धदुःखं च पूर्णम् । |
| इति च ।
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| | id = AIT_C02_S03_V20_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B03 |
| | text = | | | text = परस्मै शंसनमात्राद् अरतिरेव ! इत्यतः प्रस्तुते चतुर्थत्यागेन न तस्य वाच्यपि भागोऽस्ति, न हि प्र वेद सुकृतस्य पन्थाम् इति दोषद्वयमेवेत्यव-धारयति- न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति, न वेद सुकृतस्य पन्थानम् इत्येतत् तदुक्तं भवति इति । अलकं शृणोति इति त्यागद्वयस्य मुख्यतः, तृतीयस्यापि नरकं शृणोतीति किञ्चिद् भवति । |
| | | तौ यदैवास्माच्छरीराद् विहीयेते तदैव तानि निमित्तानि पश्यन्तीति नियमः । न च तदा पश्यत्येवेति । |
| एवं ब्रह्मादिभिः श्रूयमाणानुष्टुबपि बृहत्या अङ्गमिति बृहत्या एवाधिक्यमुक्तं भवति ॥ ५ ॥
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| | document_id = AIT | | | id = AIT_C03_S02_V10_B04 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = वासेन रमयतीति वासरं विष्णुर्ज्योतिः । |
| | verse_type = mantra
| | ‘यत्र ब्रह्मा वेदवाक्यं व्याचक्षाणो मखैर्यजन् । |
| | verse_line1 = तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नं तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्यैकादशानुष्टुभां शतानि भवन्ति । पञ्चविंशतिश्चानुष्टुभः । आत्तं वै भूयसा कनीयः ।
| | सोमेन च सुतेनेशमास्ते लोके हरेर्हि सः ॥’ इति स्कान्दे । |
| | commentary1 = aitareya
| | ग्राव्णा सोमविषये सोमेनेष्ट्वा महीयते, तेनैव विष्णुप्रीत्या स्वस्याऽनन्दं जनयन् । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V21 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | id = AIT_C02_S03_V21_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B05 |
| | text = | | | text = स्वर् आनन्दरूपो विष्णुः । दिवो देव्या अवरोधनं तस्याः परिवारभूताः सर्वदेव्यः । द्यौर्नाम वायुपत्नी । ‘अजनयो मरुतो वक्षणाभ्यो दिव आ वक्षणाभ्यः’(ऋ.सं.१.१३४.४) इत्यादेः । यह्वतीः स्यन्दमानाः । |
| | | ‘सर्वेष्टद जगत्प्राण मामादाय परिस्रव । |
| बृहतीसम्पादनेऽनुष्टुप्शंसनमात्रात् पञ्चविंशोत्तरशतानुष्टुबाधिक्यं च भवति । अत आधिक्यात् बृहतीसम्पादनमेव वरम् । तस्यात्रैवान्तर्भावात् । जगत्यादिकं त्वधिकत्वेऽपि बृहतीवन्माहात्म्याभावादेवोपेक्ष्यते ।
| | यत्रासौ भगवान् विष्णुस्त्वं हि मोक्षप्रदः सदा ॥’ इति च । |
| | ‘इन्दुरिष्टप्रदत्वाद् यो वायुरादाय गच्छति । |
| | इन्द्रनाम्नः केशवस्य समीपं मुक्तमञ्जसा ॥’ इति च । |
| | ‘अनन्यहेतुकं साक्षाद् भगवद्भक्तिरूपकम् । |
| | सुखमानन्द इत्युक्तो मोदो भोगनिमित्तकः । |
| | प्रमोदस्तद्विशेषोत्थो मुन्नामात्यल्पभोगतः ॥’ इत्यृग्वेदसंहितायाम् । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V22 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | document_id = AIT | | | id = AIT_C03_S02_V10_B06 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = तमसः सकाशाद् उद्गता वयम् उत्तरं सर्वोत्तमं विष्ण्वाख्यं ज्योतिः परिपश्यन्तः तमेव देवत्रा देवं देवविषयेऽपि देवम् अगन्म । तदेव ज्योतिष्ट्वेनोत्तरत्वेन च पश्यन्त इति दर्शने इत्थम्भावविधानार्थं पूर्वम् । तथैवासौ भगवानुत्तमं ज्योतिः, न राजादिष्विवाविद्यमानभक्तिमात्रम् इदम् इति ज्ञापयितुम् ‘अगन्म ज्योतिरुत्तमम्’ इति पुनर्वचनम् । |
| | verse_type = mantra
| |
| | verse_line1 = तदुक्तमृषिणा ॥
| |
| | verse_line2 = वाचमष्टापदीमहमित्यष्टौ हि चतुरक्षराणि भवित । नवस्रक्तिमिति बृहती सम्पद्यमाना नवस्रक्ति । ऋतस्पृशमिति सत्यं वै वागृचा स्पृष्टा । एन्द्रात् परि तन्वं मम इति । तद्यदेवैतद्बृहतीसहस्रमनुष्टुप्सम्पन्नं भवति । तस्मात् तदैन्द्रात् प्राणाद् बृहत्यै वाचमनुष्टुभं तन्वं संनिर्मिमीते ।
| |
| | commentary1 = aitareya
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V22 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | id = AIT_C02_S03_V22_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B07 |
| | text = | | | text = ‘अर्चिषोंऽशा वर्तुलास्तु नाम्ना वटरकाः स्मृताः’ इति शब्दनिर्णये । |
| | |
| वाचमष्टापदीमहमित्यनुष्टुभो बृहतीसम्पादनवचनाच्च । अष्टचतुरक्षराण्यनुष्टुप् । तस्या एव बृहतीसम्पादने नव स्रक्तयो भवन्ति । ऋचा वाक् ऋग्रूपेण वागृतं स्पृष्टा सत्यरूपं विष्णुं स्पृष्टा भवति । इन्द्रस्य परमेश्वरस्य विष्णोः सम्बन्धी नितरां प्रियत्वाद्यः प्राणदेवता वायुः तस्य प्रतिमारूपमिदं बृहतीसहस्रम् । स च वायुर्विष्णोर्मुख्यप्रतिमा । तस्माद् विष्णोरेव प्रतिमा बृहतीसहस्रम् ।
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V22 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | id = AIT_C02_S03_V22_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B08 |
| | text = | | | text = ‘बृहत्तमं मधु यदि सहापूपं प्रभक्षयेत् । |
| | | स्वप्ने तस्याचिरान्मृत्यू रक्ताब्जे वा शिरोधृते ॥’ इति ब्रह्माण्डे । |
| तस्मात् तस्यैव बृहतीसहस्रत्वेन सम्पन्नस्य पञ्चविंशोत्तरैकादशशतानुष्टुप्त्वेन सम्पादने बृहतीदैवतप्राणरूपाद् वायोरनुष्टुब्देवताया वाग्रूपाया उमाया उत्पत्तिः संस्मृता भवत्येवं जानतः । ततश्चोमाया अपि भगवत्प्रतिमात्वाद् विष्णुप्रतिमास्थापक एव भवत्येतत् सर्वं सम्यग्ध्यायन् ।
| |
| विष्णुरेव बृहत्याः प्राणस्याधिष्ठातृदेवता । प्रतिमाधिष्ठितदेवतावत् । तस्माद् बृहत्याः सकाशादनुष्टुप्सम्पादने तस्यैव विष्णोः प्रतिमान्तरं तस्मादेव निर्मितं भवति । अत एवेन्द्रात् परितन्वं मम इत्युक्तम् । बृहतीस्थविष्णोर्बलादेव तत्सम्पद्यते । स हि तस्याः षट् त्रिंशदक्षरादित्वमपि नियमयति तत्प्रसादाद् वायुश्च । वायुरेव यद्भगवन्नियतो नियमयति तस्मादिन्द्रात् परीत्यस्यैन्द्रात् प्राणादिति व्याख्या कृता ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V22 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | id = AIT_C02_S03_V22_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B09 |
| | text = | | | text = ‘रात्र्यास्तु देवता दुर्गा दुःस्वप्ने सा प्रपूजिता । |
| | | पायसेन हरेन्मृत्युं रात्रिसूक्तादकालिकम् । |
| यावत्सहस्रं बृहती तावच्छंसेदनुष्टुभाम् ।
| | यदि कालिकमृत्युः स्यात् पदं सा परमं नयेत् । |
| छन्दसां वा तदन्येषां बृहतीत्वं स्मरेत् ततः ॥
| | सहैव विष्णुना भक्तं विष्णोस्तद्वेदिनं तथा । |
| तेन सर्वगतो विष्णुः सर्वस्मादधिकोऽर्चितः ।
| | रतिदत्वात् परो विष्णुर्मुख्यतो रात्रिरुच्यते । |
| भवेदेवं जानतस्तु कृता च प्रतिमा भवेत् ॥
| | तदाश्रयत्वाद् दुर्गाऽपि रात्रीरित्यभिधीयते । |
| तथा वायोरपि कृता वायुर्हि प्रतिमा हरेः । | | स्त्रीरूपः स परो विष्णुः पायसेष्टो हि मोक्षदः । |
| तस्माद् वायुकृतं सर्वं क्रियते विष्णुनैव हि ॥
| | तस्मादुभौ सहैवेज्यौ भक्त्या दुःस्वप्नदर्शने । |
| बृहतीसहस्रं सम्पन्नमेकादशशतं पुनः ।
| |
| अनुष्टुभां स्मरेत् पञ्चविंशोत्तरमुदारधीः ॥
| |
| तेन वायोरुमोत्पत्तिः सम्यग्ज्ञानात् स्मृता भवेत् ।
| |
| ततो द्वितीयप्रतिमा विष्णोरेव कृता भवेत् ॥
| |
| विष्णुनाऽनुप्रविष्टौ यदुमा वायुश्च तद्वशौ ॥
| |
| इत्यादि च ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V22 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | id = AIT_C02_S03_V22_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B10 |
| | text = | | | text = बहुभिर्नयनैर्विष्णुर्बहुधेदं ददर्श ह । |
| | | आयन् सर्वेषु लोकेषु धृतास्तेनैव हि श्रियः ॥ |
| स्रक्तयो विभागाः ।
| |
| स्रक्तिरंशो विभागश्च विदलं चेति कथ्यते । इति शब्दनिर्णये ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V23 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | document_id = AIT | | | id = AIT_C03_S02_V10_B11 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = नीचान् उच्चांश्च जीवान् स ब्रह्मादीन् उर्वपूरयत् । |
| | verse_type = mantra
| | ज्ञानेन बाधतेऽज्ञानं......... |
| | verse_line1 = स वा एव वाचः परमो विकारो यदेतन्महदुक्थम् ।
| |
| | commentary1 = aitareya
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| | id = AIT_C02_S03_V23_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B11 |
| | text = | | | text = ...............स्वसारं स्वं तथाऽकरोत् । |
| | | उषआख्यं शुक्लवर्णं प्रमदारूपमेव च । |
| स वा एष वाचः परमो विकारः अकाराख्यवाग्विकारेषूत्तमो बृहतीसहस्राख्यः ।
| | तमश्चापाकरोत्येव तदा(सदा) सूर्यादिषु स्थितः । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V23 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | id = AIT_C02_S03_V23_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B11 |
| | text = | | | text = स नः स्वामी यदुदरे यमनाद् यामनामके । |
| | | आविक्ष्महि वयं सर्वे वृक्षे यद्वत् पतत्रिणः । |
| अकारः प्रथमं नाम विष्णोः सर्वगुणान् ब्रुवन् ।
| |
| सर्वदोषविरुद्धत्वाद् गुणनामन्यतामपि ॥
| |
| विष्णोर्वदति जीवेभ्यो जडेभ्यश्चैव सर्वदा ।
| |
| अभावं चैव दोषाणां सर्वेषां केशवे वदेत् ॥
| |
| सम्यग्वक्तृत्वतस्तस्मादकारो मुख्यनाम हि ।
| |
| तदर्थानेकदेशेन शब्दाः सर्वेऽपि चोचिरे ॥
| |
| व्याख्याव्याख्येयरूपत्वं विकारत्वमिहोदितम् ।
| |
| विकारत्वं च नान्यत् स्यान्नित्या वेदा यतोऽखिलाः ॥
| |
| वाचकेषु तथा विष्णोः सहस्रबृहतीमयम् ।
| |
| उक्थमुत्तममुद्दिष्टं व्याख्याऽकारस्य सा परा ॥
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| अन्येऽपि शब्दाः सर्वेऽपि ह्यकारार्थाभिधायिनः ।
| |
| येषां परममुक्थं तत् ....
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V24 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | document_id = AIT | | | id = AIT_C03_S02_V10_B11 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = शेनाख्यास्तु सुखीनत्वाद् आ समन्तात् सुरोत्तमाः । |
| | verse_type = mantra
| | पद्वन्तो मानुषाश्चैव पादमात्रप्रयायिनः । |
| | verse_line1 = तदेतत्पञ्चविधम् । मितममितं स्वरः सत्यानृते इति । ऋग्गाथा कुम्ब्या तन्मितम् । यजुर्निगदो वृथावाक्तदमितम् । सामाथो यः कश्च गेष्णः स स्वरः । ओमिति सत्यम् । नेत्यनृतम् । तदेतत्पुष्पं फलं वाचो यत्सत्यम् । सहेश्वरो यशस्वी कल्याणकीर्तिर्भवितोः पुष्पं हि फलं वाचः सत्यं वदति ॥
| | ग्रामाख्या बहुलत्वात्तु दैत्या एव प्रकीर्तिताः । |
| | verse_line2 = अथैतन्मूलं वाचो यदनृतम् । तद्यथा वृक्ष आविर्मूलः शुष्यति स उद्वर्तत एवमेवानृतं वदन्नाविर्मूलमात्मानं करोति स शुष्यति स उद्वर्तते । तस्मादनृतं न वदेद् । दयेत त्वेनेन ॥
| | अर्थिनस्तु कृतार्थत्वान्मुक्ता एव श्रुताः श्रुतौ । |
| | verse_line3 = पराग्वा एतद्रिक्तमक्षरं यदेतदोमिति । तद्यत्किञ्चोमित्याहात्रैवास्मै तद्रिच्यते । स यत्सर्वमोङ्कुर्याद्रिच्यादात्मानम् । स कामेभ्यो नालं स्यात् ॥
| |
| | verse_line4 = अथैतत्पूर्णमभ्यात्मं यन्नेति । स यत्सर्वं नेति ब्रूयात् पापिकास्य कीर्तिर्जायेत । सैनं तत्रैव हन्यात् । तस्मात् काल एव दद्यात् । काले न दद्यात् । तत्सत्यानृते मिथुनीकरोति । तयोर्मिथुनात् प्रजायते ।भूयान् भवति । यो वै तां वाचं वेद यस्या एषः विकारः स सम्प्रतिवित् । अकारो वै सर्वा वाक् सैषा स्पर्शोष्मभिर्व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति । तस्यै यदुपांशु स प्राणः । अथ यदुच्चैस्तच्छरीरम् । तस्मात् तत्तिर इव । तिर इव ह्यशरीरम् । अशरीरो हि प्राणः । अथ यदुच्चैस्तच्छरीरं तस्मात् तदाविराविर्हि शरीरम् ॥ ६ ॥
| |
| | commentary1 = aitareya
| |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V24 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | id = AIT_C02_S03_V24_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B11 |
| | text = | | | text = ऊरीकृतप्रमाणत्वाद् ऊर्म्यः स भगवान् हरिः । |
| | | वृकास्तेनैव निर्याप्याः वृकाः क्रूरत्वतोऽसुराः । |
| ....तदेतत्पञ्चधा स्थितम् ॥
| | तत्स्वभावाश्च वृक्याः स्युः स्तेनास्तत्र महासुराः । |
| व्याख्यानमेवाकारस्य सहैवोक्थेन सर्वशः ।
| | ब्रह्मस्तेना यतस्ते हि नित्यमैकात्म्यवेदिनः । |
| मितामिते स्वरस्सत्यमनृतं चेति पञ्चधा ॥
| | विष्णुः सुखतरश्चैव भक्तानां भवति प्रभुः । |
| तस्मादकार एवायं सर्ववागात्मकः श्रुतः ।
| |
| तस्यैव व्यक्तिरूपोऽयं सर्ववेदादिविस्तरः ॥
| |
| तस्मात् सर्वगुणान् विष्णोरकारो वक्ति यत्प्रभोः ।
| |
| तद्व्यक्तयोऽपि शब्दा ये सर्वे विष्णुगुणब्रुवाः ॥
| |
| अकारस्य तथोपांशोरभिमानी तु मारुतः।
| |
| देहेन्द्रियान्तःकरणनाम्नोऽस्य द्विविधस्य च ॥
| |
| स्थूलसूक्ष्मशरीरस्य सर्वेषामभिमानिनी ।
| |
| भारत्युच्चोदितस्यापि ह्यकारस्याभिमानिनी ॥
| |
| तस्मादुच्चादुपांशुर्हि जपादिषु फलाधिकः ।
| |
| वायुः पतिर्हि भारत्या उपांशोर्देवता मतः ॥
| |
| अकारस्य विकारोऽयमोङ्कार इति कथ्यते ।
| |
| अधिकोच्चत्वमानं हि तस्यार्थः समुदीरितः ॥
| |
| अकारेणैव तत्सर्वमुक्तमाधिक्यवक्तृतः ।
| |
| अधिकोच्चस्वरूपोऽसौ माता चाधिक एव हि ॥
| |
| एकार्थत्वादकारोऽसौ नकारत्वमुपागतः ।
| |
| दीर्घीभूतः पुनस्तेनैवाकारेण सह स्थितः ॥
| |
| अभाववाच्यकारस्य ह्यर्थो रेफः क्षयं वदन् ।
| |
| सोऽप्यकारेण सहितो दीर्घत्वं समुपागतः ॥
| |
| अभाववाच्यकारः स एकार्थाद्गत्यभावयोः ।
| |
| यकारत्वं गतस्तस्मान्नो रेफस्योत्तरत्वतः ॥
| |
| णत्वं गतो ह्यकारोऽसौ नो विरुद्धार्थवाचकः ।
| |
| अन्यत्वात् सर्वजीवेभ्यो जडेभ्यश्च सदैव हि ॥
| |
| सर्वदोषोज्झितत्वाच्च सर्वतोऽप्यधिकत्वतः ।
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| निरासनाच्च दोषाणां स्वभक्तेभ्यः समन्ततः ॥
| |
| सर्वदोषविरुद्धोरुगुणपूर्णस्वरूपतः ।
| |
| नारायण इति प्रोक्तो ह्यकारार्थोऽयमेव हि ॥
| |
| तस्मादकारबीजेयं विष्णोर्नारायणाभिधा ।
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| प्रणवश्च ततोऽकारः प्रधानं नाम चक्रिणः ॥
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| अकारनामा नान्योऽस्ति तमृते पुरुषोत्तमम् ।
| |
| ब्रह्मरुद्रादिनामानि ब्रह्मादिष्वप्यमुख्यतः ॥
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| वर्तन्ते न त्वकारोऽयं वर्तते केशवं विना ।
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| नारायणादिनामानि नृणां नामक्रियास्वपि ॥
| |
| विहितान्यकारो नैवायं विहितस्तमृते प्रभुम् ।
| |
| वायुर्ब्रह्मापि चाकारदेवते न तु नामिनौ ॥
| |
| यथा वेदाभिधेयोऽन्यो वेदाख्या देवता परा ।
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| एवं नामाभिमानी तु वायुर्वाच्यो जनार्दनः ॥
| |
| तस्माद इति नामेतद्विष्णोः केवलमेव हि ।
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| विशेषतोऽस्य व्याख्यानं बृहतीनां सहस्रकम् ॥
| |
| तस्मात् प्रीतो भवेद् विष्णुः शंसनादस्य सर्वदा ।
| |
| तस्माद्यज्ञेऽपि वा शंसेदयज्ञेऽपि रहः पुमान् ॥
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| ध्यात्वा नारायणं देवं विष्णोरन्नं हि तत्परम् ॥
| |
| इत्यादि ब्रह्मसारे ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V24 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | id = AIT_C02_S03_V24_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B11 |
| | text = | | | text = कृष्णं व्यक्तं तमोऽज्ञानम् अज्ञानां पेशलं हि तत् । |
| | | तद् यातयत्यृणमिव भगवान् पुरुषोत्तमः । |
| . परमविकारेण सह विकारमात्रस्यापि प्रस्तुतत्वात् तदेतत्पञ्चविधमिति परामर्शः ।
| | स एव चोषाः कथितः प्रकाशत्वाज्जनार्दनः । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V24 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | id = AIT_C02_S03_V24_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B12 |
| | text = | | | text = जयिनः स्तोममिव च ब्राह्मणाय यथा च गाः । |
| | | उपाकरं तथा स्तोमं तवाहं तद् (वृ)गृणीष्व च । |
| .स्वराणां नियमो यत्र ह्यृचो नामैव ताः स्मृताः ।
| | द्यौरिति ज्ञानमुद्दिष्टं तद्व्यङ्गत्वाज्जनार्दनः । |
| अन्या मिताक्षरा यास्तु ता गाथाः परिकीर्तिताः ॥
| | दुहिता दिव इत्युक्तः.........। |
| खण्डवाक्यानि कुम्ब्याः स्युरसमानि परस्परम् ।
| |
| यज्ञाङ्गं यजुरुद्दिष्टं निगदं वाक्यमात्रकम् ॥
| |
| इत्यादि शब्दनिर्णये ।
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| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V24 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
| | id = AIT_C02_S03_V24_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V10_B13 |
| | text = | | | text = ......... एवमर्थेन पूज्यते ॥ |
| | | रात्रीसूक्तेन भगवान् साक्षान्नारायणः प्रभुः । |
| . अकारार्थत्वान्नकारस्य ककिञ्चिन्मूलमिव । तस्मान्मूलत्वादकारार्थोऽपि ज्ञेय एव । नायोग्यानां सम्यग्वाच्य इति स्वल्प एव प्रकाशितोऽस्माभिः । वाच उद्वर्तनाशक्तेः स्वयमेवोद्वर्तते । यद्धि देवतासु करोति तदात्मन्यापतति । तस्माद् द्रव्यदानं ज्ञानदानं वा काले पात्राद्यनुसारेणैव कुर्यात् ।
| | तत्सन्निधानाद् दुर्गाया एषोऽर्थ उपचारतः । |
| | एवं स्तुतस्तथैवेष्टो भगवान् मोक्षदो भवेत् । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V24 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V10 |
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| | text = | | | text = यदन्तीत्याद्यृचः सर्वा अपि दुःस्वप्नदर्शने । |
| | जप्या एव, विशेषोऽयं होमो दुःस्वप्नदर्शने । |
| | परोक्षज्ञानिनो विष्णुरापरोक्ष्यं व्रजेत् त्वरन् । |
| | अपरोक्षदृशः प्रीतः सुखाधिक्यं करोत्यतः । |
| | मुक्तस्य, द्विविधैस्तस्माज्जपो योगश्च सर्वथा । |
| | कर्तव्यो, न्यासिभी रात्रिसूक्तं जप्यं त्रिशोऽञ्जसा ॥ इत्यैतरेयसंहितायाम् ॥ ४ ॥ |
| | }} |
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| .अकारस्योङ्कारता त्वकारलोपेनैव जातेति सत्यमोङ्कारः । अकारस्यादौ स्थितत्वेन च यथार्थरूपत्वात् । उकारादिविकारसहितत्वात् पुष्पफलात्मकश्च । अकारस्यार्थरूपः सन्नेव च भगवांस्तमेवोङ्कारो वक्ति । अतश्च सत्यमोङ्कारः । यमर्थमकारो वक्ति तमेव वक्तीति । नकारस्त्वच्छिरस्कत्वात् मूलभूतस्याकारस्यान्ते स्थितिरूपत्वादयथास्थितेरसत्यरूपः । तथाप्यकारस्य चैकार्थत्वात् मूलभूतश्च । तस्मादकारस्यैतद् वृथा वागादिकमपि व्याख्यानम् । तस्माद् विजानतः सर्वमपि भगवन्नामैव ॥ ६ ॥
| | </div> |
| }}
| | <div class="gr-author-note">॥इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके)चतुर्थः खण्डः॥</div> |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V25 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V11 |
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| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नं तद्यशः । स इन्द्रः स भूतानामधिपतिः । स य एवमेतमिन्द्रं भूतानामधिपतिं वेद विस्रसा हैवास्माल्लोकात् प्रैतीति ह स्माऽऽह महिदास ऐतरेयः । | | | verse_line1 = अथ खल्वियं सर्वस्यै वाच उपनिषत् । सर्वा ह्येवेमाः सर्वस्यै वाच उपनिषदः । इमां त्वेवाऽचक्षते । पृथिव्या रूपं स्पर्शाः, अन्तरिक्षस्योष्माणः, दिवः स्वराः । अग्ने रूपं स्पर्शाः, वायोरुष्माणः, आदित्यस्य स्वराः । ऋग्वेदस्य रूपं स्पर्शाः, यजुर्वेदस्योष्माणः, सामवेदस्य स्वराः । चक्षुषो रूपं स्पर्शाः, श्रोत्रस्योष्माणः, मनसः स्वराः । प्राणस्य रूपं स्पर्शाः, अपानस्योष्माणः, व्यानस्य स्वराः । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = अथ खल्वियं सर्वस्यै वाच उपनिषत् । सर्वा ह्येवेमाः सर्वस्यै वाच उपनिषदः । इमां त्वेवाऽचक्षते । पृथिव्या रूपं स्पर्शाः, अन्तरिक्षस्योष्माणः, दिवः स्वराः । अग्ने रूपं स्पर्शाः, वायोरुष्माणः, आदित्यस्य स्वराः । ऋग्वेदस्य रूपं स्पर्शाः, यजुर्वेदस्योष्माणः, सामवेदस्य स्वराः । चक्षुषो रूपं स्पर्शाः, श्रोत्रस्योष्माणः, मनसः स्वराः । प्राणस्य रूपं स्पर्शाः, अपानस्योष्माणः, व्यानस्य स्वराः । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | text = | | | text = अथ सर्ववाग्विषया विद्योच्यते । विष्णुनामा(शब्दा)र्थत्वात् सर्ववाचाम् । पूर्वोक्ता अपि सर्ववाग् उपनिषद एव । तथापि मुख्यत(मुखत) एव सर्ववाग्विषयत्वाद् वक्ष्यमाणामेव सर्वस्यै वाच उपनिषदिति सर्वेऽप्याचक्षते । |
| | |
| विद्यान्तरोपदेशार्थं तद्वा इदं बृहतीसहस्रमिति पुनः पुनः परामर्शः । तदिदं बृहतीसहस्रं तद्यशस्तस्य नारायणस्य यशः । यस्य नारायणस्यैतद्यशः स भगवानेवेन्द्रनामा । स हि यत्प्रथमत इन्द्रो बभूव स्वेच्छया यज्ञनामा । तस्मात् तमेव वेदा इन्द्रशब्देन वदन्ति मुख्यतः । इदि परमैश्वर्ये इति धातोश्च । तस्यैव हि परमैश्वर्यम् । अन्येषां तु द्वादशानां तेन दत्तमेवेन्द्रत्वं न तु मुख्यतः । अतो विष्णावेवेन्द्रशब्दं प्रयुङ्क्ते श्रुतिः । मत्सि सोमं वरुणं मत्सि मित्रं मत्सीन्द्रिमिन्दो पवमान विष्णुम् इति ।
| |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V25 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V11 |
| | id = AIT_C02_S03_V25_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V11_B02 |
| | text = | | | text = ‘पृथिव्यादिस्थितो विष्णुः पृथिव्याद्यभिधानवान् । |
| | स्पर्शादीनां देवताऽसौ क्रमेणैव प्रकीर्तितः ॥ |
| | }} |
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| |
|
| न चेन्द्रं विष्णुं चेति पृथगन्वयः क्रियते । तदा वरुणादिषु पृथक् पृथक् मत्सिशब्ददर्शनादत्रापि पृथङ् मत्सिशब्दो दृश्येत । न हि सर्वेषां पृथङ्मत्सिशब्ददर्शने एकस्यैवान्यथात्वं युज्यते । न चात्र द्वित्वगमकं चकारादिकं विद्यते । तस्मात् प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिमित्याद्यप्येकस्यैव विष्णोर्विशेषणम् ।
| | </div> |
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| | | document_id = AIT |
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = अथ खल्वियं दैवी वीणा भवति । तदनुकृतिरसौ मानुषी वीणा भवति । यथाऽस्याः शिरः, एवममुष्याः शिरः । यथाऽस्याः उदरम्, एवममुष्या अम्भणम् । यथाऽस्यै जिह्वा, एवममुष्यै वादनम् । यथाऽस्यास्तन्त्रयः, एवममुष्या अङ्गुलयः । यथाऽस्याः स्वराः, एवममुष्याः स्वराः । यथाऽस्याः स्पर्शाः, एवममुष्याः स्पर्शाः । |
| | | verse_lines = अथ खल्वियं दैवी वीणा भवति । तदनुकृतिरसौ मानुषी वीणा भवति । यथाऽस्याः शिरः, एवममुष्याः शिरः । यथाऽस्याः उदरम्, एवममुष्या अम्भणम् । यथाऽस्यै जिह्वा, एवममुष्यै वादनम् । यथाऽस्यास्तन्त्रयः, एवममुष्या अङ्गुलयः । यथाऽस्याः स्वराः, एवममुष्याः स्वराः । यथाऽस्याः स्पर्शाः, एवममुष्याः स्पर्शाः ।;यथा ह्येवेयं शब्दवती तर्द्मवति, एवमसौ शब्दवती तर्द्मवती । यथा ह्येवेयं लोमशेन चर्मणा पिहिता भवति, एवमसौ लोमशेन चर्मणा पिहिता । लोमशेन ह स्म वै चर्मणा पुरा वीणा अपिदधति । स यो हैतां दैवीं वीणां वेद, श्रुतवदनो भवति, भूमिप्राऽस्य कीर्तिर्भवति, यत्र क्व चाऽर्या वाचो भाषन्ते विदुरेनं तत्र । |
| | | verse_line2 = यथा ह्येवेयं शब्दवती तर्द्मवति, एवमसौ शब्दवती तर्द्मवती । यथा ह्येवेयं लोमशेन चर्मणा पिहिता भवति, एवमसौ लोमशेन चर्मणा पिहिता । लोमशेन ह स्म वै चर्मणा पुरा वीणा अपिदधति । स यो हैतां दैवीं वीणां वेद, श्रुतवदनो भवति, भूमिप्राऽस्य कीर्तिर्भवति, यत्र क्व चाऽर्या वाचो भाषन्ते विदुरेनं तत्र । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V25 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V12 |
| | id = AIT_C02_S03_V25_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V12_B01 |
| | text = | | | text = तस्य विष्णोरयं देहो वीणा साक्षात् प्रकीर्तिता । |
| | दैवी वीणा ततः सेयं लोकसिद्धा तु मानुषी । |
| | ब्रह्मादिदेहान् यो वेद विष्णोर्वीणेति भक्तितः । |
| | विद्यापूर्णसुखः स स्याद् भूमिपूरितकीर्तिमान् । |
| | }} |
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| |
|
| यत्र चैवं भूतेष्वेकत्वे विरोधो दृश्यते तत्र तेनैव विरोधेन द्वित्वं भवति । अन्यथैकत्वमेव । यो देवानां नामधा एक एव इति चोक्तम् । बहुरूपत्वाद् बहुवचनं च विष्णोरेव युज्यते । तस्मान्मुख्यतो विष्णावेवेन्द्रादिशब्दा अन्येषामुपचारतः । मत्सि महामिन्द्रमिन्दो मदायेत्यन्येन्द्रस्य पृथगुक्तेश्च मत्सीन्द्रमिन्दो पवमानेति पूर्वोक्त इन्द्रो विष्णुरेवेति सिद्धम् ।
| | </div> |
| | {{VerseBlock |
| | | verse_id = AIT_C03_S02_V13 |
| | | document_id = AIT |
| | | chapter_id = AIT_C03 |
| | | verse_type = mantra |
| | | verse_line1 = अथातो वाग्रसः । यस्यां संसद्यधीयानो वा भाषमाणो वा न विरुरुचुषेत । तत्रैतामृचं जपेत् - |
| | | verse_lines = अथातो वाग्रसः । यस्यां संसद्यधीयानो वा भाषमाणो वा न विरुरुचुषेत । तत्रैतामृचं जपेत् -;‘ओष्ठा पिधाना न कुली दन्तैः परि वृता पविः ।;सर्वस्यै वाच ईशाना चारु मामिह वादयेत्’(सा.मं.ब्रा.१.७.१५) ।;इति वाग्रसः ॥५ ॥ |
| | | verse_line2 = ‘ओष्ठा पिधाना न कुली दन्तैः परि वृता पविः । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V25 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V13 |
| | id = AIT_C02_S03_V25_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V13_B01 |
| | text = | | | text = विद्याधिक्यार्थमेवैतां वाक्साराम् अप्यृचं जपेत् । |
| | | ध्यात्वा नारायणं देवं स्त्रीरूपं वाचि संस्थितम् । |
| महत्त्वं च तस्यादितिपुत्रत्वेऽग्रजत्वमात्रम् । न तु सामर्थ्यतः । मह पूजायामिति धातोः । पूज्यो ह्यग्रजो भवति ।
| | ओष्ठा पिधानेत्येषा ह्यृक् सारो वाचः प्रकीर्तितः । |
| | विष्णोर्हि वाचि संस्थस्यैवोष्ठावेतौ पिधानवत् । |
| | कुलीति चोक्तो भगवान् प्रलीनाशेषकुत्सितः । |
| | पाति सर्वं विशिष्टश्च सर्वस्मादित्यतः पविः । |
| | सर्ववागीश्वरो विष्णुः स्त्रीरूपो मां सुवादयेत्’ ॥ इति च । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V25 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V13 |
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| | text = | | | text = (नेत्युपमार्थे)न इत्युपमानार्थम् । ओष्ठावपिधानवत् अस्येति । न च विष्णोरन्या सर्वस्या वाच ईशाना । स हि मुख्यतः सर्वेश्वरः । तस्यैव प्रस्तुतत्वाद्, वक्ष्यमाणत्वाच्च । |
| | |
| आयो विवाय सचथाय दैव्य इन्द्राय विष्णुः सुकृते सुकृत्तरः ।
| |
| वेधा अजिन्वत् त्रिषधस्थ आर्यमृतस्य भागे यजमानमभजत् ॥
| |
| }} | | }} |
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| | text = | | | text = ‘श्रियःपतिर्यज्ञपतिर्जगत्पतिर्गिराम्पतिर्लोकपतिर्धरापतिः’(भाग.२.४.२०) इति भागवते । ‘यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ् न वेद’(बृह.३.७.२७) इत्यादिश्रुतिश्च । स्त्रीलिङ्गत्वं देवतेत्यादिवदपि युज्यते । स्त्रीरूपत्वाच्च ॥ ५ ॥ |
| | |
| इतीन्द्रस्य परमदैवं जनको यज्ञभागादिप्रदाता विष्णुरेव हि श्रूयते । इन्द्रश्च यजमानः । तस्मात् तत्प्रसादादवताराग्रजत्वमेव तस्य महत्वम् ।
| |
| }} | | }} |
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| | </div> |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V25
| | <div class="gr-author-note">॥इति द्वितीयारण्यके (तृतीयप्रघट्टके)पञ्चमः खण्डः॥</div> |
| | id = AIT_C02_S03_V25_B01
| |
| | text =
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| अन्येन्द्रो ह्यहं प्रथमः पिबेयमहं प्रथमः पिबेयमिति वायुना विवदमान आजौ पराजितो वायुं प्रसादयित्वा चतुर्थे वायुना सह ग्रहमाप । विष्णुस्तु क्रतुं सचन्त मारुतस्य वेधस इति वायोरपि विधाता श्रूयते । डुधाञ् धारणपोषणयोरिति धातोर्विशेषेण धारणपोषणकर्ता हि वेधाः । तस्माद् भगवत एवैतद्यशो बृहदुक्थादिकम् ।
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| | | verse_line1 = अथ हास्मा एतत् कृष्णहारीतो वाग्ब्राह्मणमिवोपोदाहरति । प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा व्यस्रंसत संवत्सरः । स च्छन्दोभिरात्मानं समदधात् । यच्छन्दोभिरात्मानं समदधात् तस्मात् संहिता । |
| | | verse_lines = अथ हास्मा एतत् कृष्णहारीतो वाग्ब्राह्मणमिवोपोदाहरति । प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा व्यस्रंसत संवत्सरः । स च्छन्दोभिरात्मानं समदधात् । यच्छन्दोभिरात्मानं समदधात् तस्मात् संहिता । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | <div class="bhashya-collection" id="bhashya-AIT_C03_S02_V14" data-block-id="bhashya-AIT_C03_S02_V14"> |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V25 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V14 |
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| | text = | | | text = संवत्सर इति विशेषणाद् विरिञ्च एवात्र प्रजापतिः । ‘ब्रह्मा विश्वः कतमः स्वयम्भूः प्रजापतिः संवत्सरः’(महाना.उ.१७.१२) इत्यादि श्रुतेः । |
| | | ‘श्रान्तो ब्रह्मा सर्ववेदैः स्तुत्वा नारायणं प्रभुम् । |
| ऋक्सहस्रात्मकं विष्णोर्यश इन्द्राभिधस्य हि ।
| | तेनैव सम्यक् सन्धाय दार्ढ्यं देहस्य सोऽकरोत् । |
| इन्द्रो हि प्रथमो विष्णुर्यज्ञनामा जगत्पतिः ॥
| | सन्धानात् संहितेत्युक्तो विष्णुरेव सनातनः। |
| तत्प्रसादादथेन्द्रत्वं द्वादशान्ये प्रपेदिरे ।
| |
| पुरन्दरस्त्वेक एव वासुदेवप्रसादतः ॥
| |
| द्विवारमिन्द्रतामाप तस्मात् द्वादश ते परे ।
| |
| अग्रजत्वाददित्यां तु महेन्द्रो नाम चाभवत् ॥
| |
| महाव्रतं कर्म कृत्वा चैव नाम्ना महेन्द्रकः ।
| |
| महत्त्वं मुख्यतो विष्णोर्न ह्यन्यस्य कदाचन ॥
| |
| एवं यो वेद तं विष्णुं विस्रस्तो बन्धतोऽखिलात् ।
| |
| अस्माल्लोकाद्धरेर्लोकमेति नास्त्यत्र संशयः ॥
| |
| इत्याह भगवान् विष्णुर्महिदासस्वरूपकः ।
| |
| }} | | }} |
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| | </div> |
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| | verse_line1 = प्रेत्येन्द्रो भूत्वैषु लोकेषु राजति । तदाहुर्यदनेन रूपेणामुं लोकमभिसम्भवती३ । अथ केन रूपेणेमं लोकमाभवती३ । | | | verse_line1 = तस्यै वा एतस्यै संहितायै णकारो बलम् , षकारः प्राण आत्मा । स यो हैतो णकार-षकारावनुसंहितम् ऋचो वेद, सबलां सप्राणां संहितां वेद । आयुष्यमित विद्यात् । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_lines = तस्यै वा एतस्यै संहितायै णकारो बलम् , षकारः प्राण आत्मा । स यो हैतो णकार-षकारावनुसंहितम् ऋचो वेद, सबलां सप्राणां संहितां वेद । आयुष्यमित विद्यात् । |
| | | commentary1 = aitareya |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V26 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V15 |
| | id = AIT_C02_S03_V26_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V15_B01 |
| | text = | | | text = विष्णुनाम्नि णशब्देन विष्णोर्बलमुदीर्यते । |
| | | ण इत्याक्रियमाणत्वाण्णकारोऽस्य बलं मतम् । |
| श्वेतद्वीपादिकान् प्राप्य स इन्द्राख्यो हरिः स्वयम् ॥
| | विष्णुनाम्नि षकारेण रमाब्रह्मेशपूर्विणः । |
| महिदासाभिधो भूत्वा लोकेष्वेषु विराजति ।
| | प्रणेतृताऽखिलस्यैव विष्णोरुक्ता तथाऽऽत्मता । |
| तत्र पृच्छन्ति केचित्तु यद्येष भगवान् हरिः ॥
| | आततत्वं सर्वगुणैर्देशतः कालतस्तथा । |
| महिदासादिरूपेण भूमिष्ठो रमते प्रभुः ।
| | आत्मशब्दोदितं तच्च षशब्देनाभिधीयते । |
| तदा यदा स्त्रिया विष्णू रमते नित्यसत्सुखः ॥
| | ष इत्याक्रियमाणत्वं प्रणेतृत्वं च पूर्णता । |
| कया स्त्रिया रतिं कुर्यान्न ह्यन्यरतिरच्युतः ।
| | विष्णोः षकार इत्युक्ता वीत्युक्तस्य विशिष्टता । |
| स्त्रीरूपे तत्स्वयं स्वस्मिन् रमतेऽसावितीदृशम् ॥
| | अन्त्यस्थित उकारस्तु ताच्छील्यादि हरेर्वदेत् । |
| वाच्यं तत्र च भूमिष्ठरूपेण तु दिवि स्थितम् ।
| | एवं विशिष्टप्राणत्वम् आततत्वं च सर्वतः । |
| स्त्रीरूपं किमसौ गच्छेदथ यद्येवमत्र च ॥
| | विशिष्टं च बलं विष्णोः सर्वस्माच्छीलमित्यपि । |
| स्त्रीरूपं पृथिवीसंस्थं केन रूपेण संव्रजेत् ।
| | उदितं विष्णुशब्देन, तस्माद् ऋक्संहितामनु । |
| न ह्यन्यगम्यो भगवान् स्त्रीरूपोऽपि जनार्दनः ॥
| | वर्णद्वयसमायोगे ष्णुशब्दस्यार्थमेव तु । |
| | विष्णोः प्राणत्वमात्मत्वं बलं चैवात्र वेत्ति यः । |
| | स एव विष्णोर्बलवित् तथा प्राणत्वविद् भवेत् । |
| | स एव मुक्तः संसारान्नित्यायुष्मान् भविष्यति । |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C02_S03_V27 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V16 |
| | document_id = AIT | | | document_id = AIT |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | chapter_id = AIT_C03 |
| | verse_type = mantra | | | verse_type = mantra |
| | verse_line1 = तद्यदेतत् स्त्रियां लोहितं भवत्यग्नेस्तद्रूपम् । तस्मात् तस्मान्न बीभत्सेत । अथ यदेतत्पुरुषे रेतो भवत्यादित्यस्य तद्रूपम् । तस्मात् तस्मान्न बीभत्सेत । सोऽयमात्मेममात्मानममुष्मा आत्मने सम्प्रयच्छति । सावात्माऽमुमात्मानमिममस्मा आत्मने सम्प्रयच्छति । तावन्योन्यमभिसम्भवतः । अनेन अह रूपेणामुं लोकमभिसम्भवत्यमुनो रूपेणेमं लोकमाभवति ॥ | | | verse_line1 = स यदि विचिकित्सेत्, सणकारं ब्रवाणीं३ँ, अणकारा३ँ इति, सणकारमेव ब्रूयात् । सषकारं ब्रवाणी३ँ, अषकारा३ँ इति, सषकारमेव ब्रूयात् । |
| | verse_line2 = ७ ॥ | | | verse_lines = स यदि विचिकित्सेत्, सणकारं ब्रवाणीं३ँ, अणकारा३ँ इति, सणकारमेव ब्रूयात् । सषकारं ब्रवाणी३ँ, अषकारा३ँ इति, सषकारमेव ब्रूयात् ।;ते यद् वयम् अनुसंहितम् ऋचोऽधीमहे, यच्च माण्डूकेयीयम् अध्यायं प्रब्रूमः, तेन नो णकार-षकारावुपाप्ताविति ह स्माऽह ह्रस्वो माण्डूकेयः ।;अथ यद् वयम् अनुसंहितम् ऋचोऽधीमहे, यच्च माण्डूकेयीयम् अध्यायं प्रब्रूमः, तेन नो णकार-षकारावुपाप्तावन्ति ह स्माऽह स्थविरः शाकल्यः । |
| | commentary1 = aitareya | | | verse_line2 = ते यद् वयम् अनुसंहितम् ऋचोऽधीमहे, यच्च माण्डूकेयीयम् अध्यायं प्रब्रूमः, तेन नो णकार-षकारावुपाप्ताविति ह स्माऽह ह्रस्वो माण्डूकेयः । |
| | | commentary1 = aitareya |
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| {{Bhashyam | | {{Bhashyam |
| | verse_id = AIT_C02_S03_V27 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V16 |
| | id = AIT_C02_S03_V27_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V16_B01 |
| | text = | | | text = संहितासहितत्वेन यदृचोऽधीमहे वयम् । |
| | | वेदान् अन्यान् पुराणं वा तेन विष्णुपदोदितः । |
| इति पृष्ठः स्वशिष्यैः स महिदासोऽवदद्धरिः ।
| | अवाप्तो भगवान् स्यान्नस्तन्नामार्था यतोऽखिलाः । |
| स्त्रीषु यल्लोहितं लोके तत्राग्निस्थो जनार्दनः ॥
| | इत्याहुर्ऋषयः सर्वे ... ...। |
| स्त्रीरूपः सोऽग्निनामैव ज्वलज्ज्वालासमप्रभः ।
| |
| तस्माद्विष्णोः सन्निधानाद्भर्ता भार्याशरीरगात् ॥
| |
| न बीभत्सेतैव रक्तात् तथा पुं रेतसि स्थितः ।
| |
| आदित्ये संस्थितो विष्णुरादेरादित्यनामकः ॥
| |
| तस्मान्न रेतसो भार्या बीभत्सेत पतिस्थितात् ।
| |
| पुंरूपो भगवान् विष्णू रेतसिस्थो द्युमत्प्रभः ॥
| |
| तस्माद्यद्भूमिगं विष्णोः स्त्रीरूपं तत्स्वयं हरिः ।
| |
| प्रादुर्भावगतो दद्याद्दिवि स्थितपुमात्मनः ॥
| |
| सूर्यगस्य तथा पुंसो रेतसिस्थस्य चात्मनः ।
| |
| देवीषु यल्लोहितगं स्त्रीरूपं परमात्मनः ॥
| |
| तत्स सूर्यगतो विष्णुः पुंरेतःस्थस्य चात्मनः ।
| |
| दद्याद्भूमिगतस्यैव रूपद्वयमिदं ततः ॥
| |
| परस्परं सम्भवति विष्णोर्नित्यसुखात्मकम् ।
| |
| प्रादुर्भावस्थितं रूपं यच्च भूमौ पुमात्मकम् ॥
| |
| विष्णोस्तदपि देवीषु स्थितस्स्त्रीरूपकात्मना ।
| |
| एवमन्योन्यतो विष्णू रतः स्वस्मिन्न चान्यतः ॥
| |
| रमया रममाणोऽपि तत्स्थेनैव स्त्रियात्मना ।
| |
| रमते नान्यतः क्वापि रतिर्विष्णोः सुखात्मनः ॥
| |
| रमया रमणं तस्माद्रमाया रतिपात्रता ।
| |
| नैवास्या रतिदातृत्वं विष्णोर्न ह्यन्यतो रतिः ॥
| |
| इत्यादि च ।
| |
| स एव महिदास इन्द्रनामा प्राप्येमं लोकमत्र भूत्वा प्रादुर्भूय मनुष्यदृष्टिगोचरतां प्राप्येषु लोकेषु राजति । नात्र प्रेत्यशब्दो मरणवाची । किन्तु प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवे त्यादिवत् प्राप्तिवाच्येव । न हि मृतः पुनरेषु लोकेष्वेव राजति । न च यशोमात्रराजनेन स्वस्य राजनं भवति । भिन्नपदार्थत्वात् । यद्वा एति च प्रेति चेत्यादौ प्राप्त्यर्थेऽपि वेदेषु प्रसिद्धत्वाच्च ।
| |
| लक्ष्मणः प्रेत्य सुग्रीवं बभाषे रामचोदितम् इति स्कान्दे ।
| |
| यदनेन रूपेणामुं लोकमभिसम्भवति । अनेन महिदासादिरूपेणामुं लोकं दिविष्ठं स्वरूपम् । लोक्यत इति स्वरूपवाची लोकशब्दः । आत्मानमेव लोकमुपासीत इतिवत् । यच्छब्दः किंशब्दार्थे । अनेन रूपेण तद्रूपमभिसम्भवति किम्? उभयोरपि परिहारदर्शनादस्यापि प्रश्नत्वमवगम्यते । यतश्चोदेति सूर्य इत्यादिवत् । रङ्गस्तु प्रश्नविषयस्य दुरवगमत्वं प्रकाशयति ।
| |
| दुर्गमे प्रश्नविषये प्रश्नो रङ्गयुतो भवेद् इति शब्दनिर्णये ।
| |
| केन रूपेणेमं लोकमाभवति । केन स्वरूपेण भूमिष्ठेनात्मन एव स्त्रीरूपेण विष्णुः सम्बध्यते । सोऽयं महिदासादिप्रादुर्भावरूप इदं भूमिष्ठस्त्रीरूपं लोहितगतं च स्वकीयमेव रूपममुष्यै दिविष्ठाय स्वपुरुषरूपाय प्रयच्छति । देवरेतःस्थिताय च देवीलोहितस्थितमात्मनः स्त्रीरूपं महिदासादिरूपेभ्यो मानुषरेतःस्थितरूपेभ्यश्च दिविष्ठैश्च विष्ण्वादिस्वरूपैः प्रयच्छति च ।
| |
| तानि भूमिष्ठत्वेन दिविष्ठत्वेन द्विविधत्वात् तावित्युच्यन्ते । अग्नेस्तद्रूपमग्निनाम्नो विष्णोः प्रतिमा तत्सन्निधानात् । एवमादित्यनाम्नो विष्णोः । न ह्यग्न्यादिस्वरूपमेव लोहितादि । न च लौकिकस्त्रीपुरुषसम्बन्धमात्रमत्रोच्यते । अप्रस्तुतत्वात् तस्य । भगवानेव ह्यत्र प्रस्तुतः ।
| |
| असावात्मेत्यात्मशब्दाच्च भगवानेवेति ज्ञायते ।
| |
| आत्मशब्दः परे विष्णौ नान्यत्र क्वचिदिष्यते ।
| |
| गुणपूर्त्यभिधायी स नान्यस्य गुणपूर्णता ॥
| |
| अमुख्यात्मान एवातो ब्रह्माद्याः सर्व एव हि ॥
| |
| इत्यादि च ब्रह्माण्डे ।
| |
| यदक्षरं पञ्चविधं समेति । सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यत इत्यादिनोक्तार्थविषयोदाहृतैः श्लोकैरपि भगवत एव स्वरूपाणां परस्परयोगस्योक्तत्वात् । गायत्र्युष्णिग्बृहतीत्यादिना भगवत एव पञ्चविधस्य स्त्रीरूपस्य महिदासादिपञ्चपुंरूपाणां च प्रस्तुतत्वाच्च ॥
| |
| ७ ॥
| |
| }} | | }} |
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| | verse_line1 = तत्रैते श्लोकाः– | | | verse_line1 = एतद्ध स्म वै तद् विद्वांस आहुर्ऋषयः कावषेयाः किमर्था वयमध्येष्यामहे । किमर्था वयं यक्ष्यामहे । वाचि हि प्राणं जुहुमः प्राणे वा वाचम् । यो ह्येव प्रभवः स एवाप्ययः । |
| | verse_line2 = यदक्षरं पञ्चविधं समेति युजो युक्ता अभियत् संवहन्ति । | | | verse_lines = एतद्ध स्म वै तद् विद्वांस आहुर्ऋषयः कावषेयाः किमर्था वयमध्येष्यामहे । किमर्था वयं यक्ष्यामहे । वाचि हि प्राणं जुहुमः प्राणे वा वाचम् । यो ह्येव प्रभवः स एवाप्ययः । |
| | verse_line3 = सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति ॥
| | | commentary1 = aitareya |
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| | text = | | | text = .... किमन्याध्ययनाद् भवेत् । |
| | | यज्ञैर्वेत्यृषयोऽप्यन्ये कावषेया वदन्ति हि । |
| यन्नारायणादिरूपेण पञ्चविधमक्षरं परं ब्रह्म तत्स्वस्मिन्नेव स्त्रीपुंरूपेण समेति । स्त्रीपुंरूपेण युजो देवा अश्वरूपेण रथे युक्ताः सन्तो यन्नारायणाख्यं परं ब्रह्माभिसंवहन्ति । तदेतत्सत्यस्य सत्यं नारायणाख्यं ब्रह्म यत्रानुयुज्यते यस्मिन् स्वरूप एव स्त्रीपुंरूपेण युज्यते । तत्र तस्मिन् एव परे ब्रह्मणि नारायणाख्ये सर्वदेवा एकीभवन्ति मुक्ताः सन्तो मिलिता भवन्ति । नायमेकीभावो नाम स्वरूपैक्यम् । किन्त्वेकस्थाने वासोऽत्यनुकूलचित्तता च । एकीभूय नृपाः सर्वे ववृषुः पाण्डवं शरैः ।
| | मौनेन विष्णुशब्दार्थं ध्यायन्तो वाचमेव वा । |
| एकीभूता तु सा सेना पाण्डवानभ्यवर्तत ॥
| | जुहुमो विष्णुनामाख्यां जपन्तो मन्त्रमेव वा । |
| इत्यादिवत् ।
| | नमस्कारसमायुक्तं जुहुमः प्राणमत्र हि । |
| न चैकीभावशब्दः स्वरूपैकत्वविषये प्रयुज्यमानः कुत्रचिद् दृष्टः । एकः पुरुषोऽपि यदा द्विधा भूत्वा एकीभवतीत्युच्यते तदापि स्थानैक्यमेव । स्वरूपैक्यस्य पूर्वमेव सिद्धत्वात् । न चाज्ञात एकत्वे पुनर्ज्ञाते ऐक्यं प्राप्त इति प्रयोगो दृश्यते । किन्तु ज्ञात इत्येव प्रयुज्यते । तस्माद् भावसहित एकशब्दो न स्वरूपवाची । न हि पूर्वं भिन्नस्य पश्चात् स्वरूपैक्यं भवति किन्तु संसर्ग एव भवति । तस्मादत्रापि संसर्ग एव विवक्षितः । यदक्षरं पञ्चविधं समेतीत्युक्तस्य सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यत इति परामर्शं कृत्वा तत्र देवाः सर्व एकं भवन्तीत्युच्यते । तस्मान्न पुनरुक्तिः ।
| | किमन्यैर्बहुभिः कार्यैरेतस्यैवाधिकत्वतः । |
| | एतदर्थानुसन्धानपूर्वं वेदान् अथापि वा । |
| | अधीमहे यजामो वा नान्यथा तु कथञ्चन । |
| | एष एव हि सर्वेषां वेदानामर्थ ईरितः । |
| | विष्णुनामोदितो योऽर्थस्तद्व्याख्याऽन्यद् वचोऽखिलम् ॥ |
| | एवं विशिष्टप्राणात्मबलाद्यखिलसद्गुणैः । |
| | पूर्णस्वभावः सर्वेषां वचसामर्थ ईरितः ॥ |
| }} | | }} |
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| | verse_line1 = यदक्षरादक्षरमेति युक्तं युजो युक्ता अभियत् संवहन्ति । | | | verse_line1 = ता एताः संहिता नानन्तेवासिने प्रब्रूयात् , नासंवत्सवासिने, नाप्रवक्त्रे इत्याचार्या आचार्याः ॥ ६ ॥ |
| | verse_line2 = सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति ॥ | | | verse_lines = ता एताः संहिता नानन्तेवासिने प्रब्रूयात् , नासंवत्सवासिने, नाप्रवक्त्रे इत्याचार्या आचार्याः ॥ ६ ॥ |
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| | <div class="gr-author-note">॥ इति श्रीमहैतरेयोपनिषत्सु द्वितीयारण्यके(तृतीयप्रघट्टके)द्वितियोऽध्यायः॥</div> |
| | |
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| | text = | | | text = ‘संहिताख्यानि विष्णोस्तु रूपाण्येतानि सर्वशः । |
| | | अन्यविद्यास्वशिष्यस्य न ब्रूयात् प्रथमं क्वचित्। |
| यस्मादक्षरान्नारायणाख्यात् स स्वयमेव भगवान् प्रादुर्भावरूपी स्त्रीपुंरूपेण युक्त आगच्छति । तात्पर्यार्थं तस्यैवार्थस्य पुनरभ्यासः ।
| | व्याख्यानशक्तिहीनाय नैव ब्रूयात् कथञ्चन । |
| | वैष्णवाय सुवृत्ताय (सुव्रताय सुशिक्षिणे । |
| | शान्ताय सुविशुद्धाय) मेधाश्रद्धायुताय च । |
| | गुरोः शुश्रूषकायैव ब्रूयादित्यनुशासनम् ॥’ इत्यादि च । |
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| | document_id = AIT | | | id = AIT_C03_S02_V18_B01 |
| | chapter_id = AIT_C02 | | | text = य एतेन ‘ण’ इति शब्देनाक्रियमाणं विष्णोः पूर्णबलम्, ‘ष’शब्देनाक्रियमाणं देशतः कालतो गुणतश्चाऽततत्वं च सर्वां संहिताम् अनु तदर्थत्वेन वेद, अक्षरद्वयसंयोगरूपया संहितयैतदेव सर्वत्रोच्यत इति, स सम्पूर्णबलं सर्वप्रणेतृत्वशक्त्यादियुक्तं विष्णुं वेद । अथ इत्यादिका अपि संहितारूपा एव । पदवर्णयोः पृथगनभिव्याहारात् । तस्मात् सर्वशब्दा विष्णुनाम-व्याख्यानरूपा एव । |
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| | verse_line1 = यद्वाचा ओमिति यच्च नेति यच्चास्याः क्रूरं यदु चोल्बणिष्णु ।
| |
| | verse_line2 = तद्वियूया कवयोऽन्वविन्दन् आत्मायत्ता समतृप्यञ्च्छृतेऽधि ॥
| |
| | verse_line3 = यस्मिन् नामा समतृप्यञ्च्छृतेऽधि तत्र देवाः सर्वयुजो भवन्ति ।
| |
| | verse_line4 = तेन पाप्मानमपहत्य ब्रह्मणा स्वर्गं लोकमप्येति विद्वान् ॥
| |
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| | text = | | | text = यद् वयं संहितायुक्तत्वेनर्चोऽधीमहे तेनास्माकं ‘ण’शब्द-‘ष’शब्दार्थरूपो विष्णुरुपात्तः । तद्व्याख्यानत्वात् सर्ववाचाम् । ‘वि’इत्युपसर्गत्वाद् उकारस्य च ताच्छील्यार्थत्वाद् उक्तार्थविशेषणरूपत्वेन प्रसिद्धत्वान्न पृथक् तयोर्व्याख्यानमत्र कृतम् । ऋच इति सर्ववाचामुपलक्षणम् । अतः सर्ववेदादिशब्दोदितः सर्वगुणपरिपूर्णो भगवान्नारायण इति सिद्धम् ॥ ६॥ |
| | |
| वियूय विचार्य नामायत्तान्येव नामार्थभूतान्येव विष्णोर्माहात्म्यादीन्यन्वविन्दन् । ततश्चाधिकं समतृप्यन् । शृते परिपक्वे सति ज्ञाने । यस्मिन् विष्णौ नामानि ज्ञात्वा तस्मिन् ज्ञाने परिपक्वे समतृप्यन् तस्मिन्नेव देवाः सर्वयुजो भवन्तीत्यवधारणार्थं पुनर्वचनम् । सर्वयुजो भवन्ति मनोवाक्कर्मभिस्तत्रैव युक्ता भवन्ति ।
| |
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| | text = | | | text = सर्वैश्च वैदिकपदैरपि लोकशब्दैः मेघाग्निवारिधितळादि(रवैश्च)भवैश्च सर्वैः । |
| | | एकोऽभिधेयपरिपूर्णगुणः प्रियोऽलं नारायणो मम सदैव सुतुष्टिमेतु ॥ |
| अर्थतः कठिनं क्रूरमुल्बणं श्रवणाप्रियम् इति शब्दनिर्णये ।
| |
| }}
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| | verse_line1 = नैनं वाचा स्त्रियं ब्रुवन्नैनमस्त्रीपुमान् ब्रुवन् ।
| |
| | verse_line2 = पुमांसं न ब्रुवन्नेनं वदन् वदति कश्चन ॥
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| | text = | | | text = ‘यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं |
| | | बट् तद्दर्शनमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् । |
| अस्त्री पुमान् ब्रुवन् अस्त्री पुमांसं ब्रुवन् ।सप्तसु प्रथमा इति सूत्रात् । स्वातन्त्र्ये विभक्तिव्यत्ययः इति च । स्वतन्त्रो हि भगवान् तत्प्रेरित एव तं वदतीत्यभिप्रायः । वदन् वदति वदन्नेव वदति । वदन्नेव न वदति । भवत्येव हि भगवान् स्त्रीरूपः पुंरूपश्च । तस्माद् वदत्येव । अप्रसिद्धत्वान्न वदति च ।
| | वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः |
| | मध्वो यत्तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हि तेन प्रभौ ॥ |
| }} | | }} |
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| | text =
| | | text = हन(नु)शब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः । |
| | | रामस्य स्वृतरूपस्य वाचस्तेनानयन्त हि । |
| अ स्त्रीरूपश्चैव पुंरूपो यस्मान्नारायणः स्थितः ।
| | भृतमो भीम इत्युक्तो वाचो मा मातरः स्मृतः । |
| पुमांस्त्री चेति वाच्योऽतो वैलक्ष्ण्यान्न चोच्यते ॥
| | ऋगाद्या इतिहासश्च पुराणं पञ्चरात्रकम् । |
| विष्णोर्नपुंसकाकारो नैवास्ति क्वचन प्रभोः ।
| | प्रोक्ताः सप्तशिवास्तत्र शयो भीमस्ततः स्मृतः । |
| तथाप्यरागाकृष्टत्वात् तच्छब्दैरपि कथ्यते ॥
| | मध्वित्यानन्द उद्दिष्टो वेति तीर्थमुदाहृतम् । |
| इति गारुडे ।
| | मध्व आनन्दतीर्थः स्यात् तृतीया मारुतीतनुः । |
| }}
| | इति सूक्तगतं रूपत्रयमेतन्महात्मनः । |
| | | यो वेद वेदवित् स स्यात् तत्त्ववित् तत्प्रसादतः ॥ इति च । |
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| नारायणादिरूपेण पञ्चधैष हरिः स्थितः ।
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| तन्नामभिश्च स्त्रीरूपैः समेति स्वैः स केशवः ॥
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| यत्स्यन्दनं वहन्त्येते देवा भार्यासमन्विताः ।
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| अधिदैवे तथाऽध्यात्मे जीवदेहात्मकं रथम् ॥
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| स सूर्यः सूर्यभार्या च चक्षुर्द्वयसमाश्रितौ ।
| |
| वहतोऽश्वात्मकौ देहं नारायणरथात्मकम् ॥
| |
| सोमश्च रोहिणी चैव दक्षवामश्रुतिस्थितौ ।
| |
| उभयोः पक्षयोः स्थित्वा वहतोऽश्वात्मकौ तयोः ॥
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| उद्धारणार्थमेतेषामुमा वाचि समास्थिता ।
| |
| नागाकारैव रश्मित्वमगमद्वैष्णवे रथे ॥
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| मनःस्थितः शिवश्चात्र मनोनामा महाबलः ।
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| अभवत् सारथिर्विष्णोर्विष्णुर्वायुश्च तं रथम् ॥
| |
| प्रकृष्टानन्दरूपत्वात् प्राणाख्यावधितिष्ठतः ।
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| तावेव चाश्विनामानौ हयास्यौ जगदीश्वरौ ॥
| |
| इत्यादि गारुडे ।
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| तस्योपनिषत् सत्यस्य सत्यमिति । प्राणा वै सत्यम् । तेषामेष सत्यम् इति च श्रुतिः ।
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| सर्वसाधुगुणत्वात् तु वायुः सत्य इतीर्यते ।
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| तस्यापि सत्यतादाता साधुपूर्णगुणो हरिः ॥
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| सत्यस्य सत्य एतस्मात् स्त्रीपुंरूप स केशवः ।
| |
| यस्मिन् स्वात्मनि युक्तः स रमते स्त्रीपुमात्मना ॥
| |
| मुनिगन्धर्वपित्राद्यैर्न तत्प्राप्यं कथञ्चन ।
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| आप्नुवन्ति सुराः सर्वे तद्रूपं जाज्वलत् सदा ॥
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| अर्धनारीपुमाकारं तस्य वामस्थितानि च ।
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| स्त्रीरूपाणि तु सर्वाणि विष्णोरत्यद्भुतानि च ॥
| |
| विष्णोर्यानि तु पुंरूपाण्यास्थितान्यस्य दक्षिणे ।
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| तान्यस्यैव तु रूपाणि युज्यन्तेऽत्र परस्परम् ॥
| |
| एष नारायणो देवो ह्यर्धनारीपुमात्मकः ।
| |
| सर्वे देवास्सभार्याश्च तं प्राप्य पुरुषोत्तमम् ॥
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| एकीभावं स्वभार्याभिरर्धनारीपुमात्मना ।
| |
| प्राप्यैवोपासते विष्णुं मुक्ताः संसारसागरात् ॥
| |
| मोदन्ते च रमन्ते च विभागं चेच्छयाऽऽप्नुयुः ।
| |
| बहुधा च भवन्त्येते स्त्रीपुमात्मपृथक्त्वतः ॥
| |
| प्रसादाद् वासुदेवस्य भागैः स्त्रीपुंस्वरूपिणः ।
| |
| तेनैव नियता नित्यं तद्वशास्तत्परायणाः ॥
| |
| रमन्ते नान्यगम्योऽसौ देशो विष्णोः परात्मनः ।
| |
| स्त्रीपुंरूपेण युक्तं तद्विष्ण्वाख्यं परमक्षरम् ॥
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| अक्षरादेव परमात् पुंसो नारायणाभिधात् ।
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| आगच्छन्ति तदैते च देवा भार्यासमन्विताः ॥
| |
| वहन्त्यश्वादिरूपेण रथस्थं परमं वपुः ।
| |
| तत्सर्वदेवैः प्राप्यं च नान्यैः कथमपि क्वचित्॥
| |
| मितादिपञ्चरूपं यद्वाक्यं लोकेऽथवा श्रुतौ ।
| |
| नारायणस्य नामैतदिति जानन्ति देवताः ॥
| |
| मनोवाक्कर्मभिस्तस्माद् योगमाप्स्यन्ति तत्र ते ।
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| सर्वशब्दान् हरौ नेतुं कस्य देवानृते बलम् ॥
| |
| वाय्वन्तास्तारतम्येन विष्णुनामार्थवेदिनः ।
| |
| सम्यग्वेत्ता मारुतोऽत्र तस्मान्मुक्तेभ्य एव च ॥
| |
| सुरेभ्योऽधिकमानन्दं नित्यं भुङ्क्ते हरेरनु ॥
| |
| इत्याद्यर्धनारीनारायणतन्त्रे ।
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| | verse_line1 = अ इति ब्रह्म । तत्राऽऽगतमहमिति ।
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| एवं सर्वे शब्दा भगवद्वाचका इत्युक्त्वा अकारो विशेषतो नारायणवाचक इत्याह– अ इति ब्रह्मेति ॥
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| | |
| इतिशब्दोऽभिधानान्ते यत्र वैशेषिकं हि तत् ।
| |
| नाम स्यादिति मे साक्षान्निर्णयः समुदाहृतः ॥
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| इति शब्दनिर्णये ।
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| |
| | |
| तत्रागतमहमिति यस्माद् अः इत्ययं शब्दः प्रस्तुतस्य भावं विरोधिनमन्यं च वदति तस्मात् प्रत्यक्षत्वाज्जीवजडात्मकस्य जगत एवानुक्तावपि प्रस्तुतरूपत्वात् तदन्यस्तद्विरोधी तत्र दृश्यमानदोषवर्जितश्चाकारशब्दार्थ इति सिद्ध्यति । मनसि प्रस्तुतत्वादवचनेऽपि प्रस्तुतमेवेदं सर्वम् । दृष्टसम्बन्धित्वाददृष्टं सर्वमपि प्रस्तुतं भवति । भगवांस्तु अव इति पृथग्विवक्षितत्वादेव न प्रस्तुतसमुदाये ।
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| |
| | |
| न च शून्यस्याशब्दार्थता । शून्याङ्गीकारे ह्यकारस्याभावताख्य एक एवार्थ इति सिद्ध्यति । विष्णोरङ्गीकारे त्वभावताऽन्यता विरोधितेति त्रयोऽप्यर्थाः सम्यगेव सिद्ध्यन्ति । तस्मादकारस्य भगवानेव मुख्यार्थो न शून्यम् । एकदेशार्थत्वात् । तस्मादमुख्यार्थत्वादन्ययुक्तेनैवाकारेणाभाव इति तदुच्यते । न तु अव इत्येव केनचित्क्वचित्। न च तथा प्रयोगोऽस्ति । तस्मात् पारतन्त्र्याल्पगुणत्वादिसर्ववस्तुस्वभावविरुद्धस्वभावं स्वतन्त्रं पूर्णगुणं सर्वजीवजडेभ्यो अन्यदज्ञानदुःखाल्पत्वपारतन्त्र्योत्पत्तिनाशादिसर्वदोषविवर्जितं ब्रह्मैवाशब्दार्थः । पूर्णं हि ब्रह्मशब्दस्यार्थः । न च दोषयुक्तस्य पूर्णता । न च जीवजडाद्यपूर्णवस्त्वभिन्नस्य पूर्णत्वं भवति । तस्मादकारशब्दार्थ एव ब्रह्मशब्दार्थः । तदेतदुक्तं अः इति ब्रह्मेति ।
| |
| अः इति पृथक्त्वेन वचनं तत्सममधिकं वा किमपि नास्तीति दर्शयितुम् ।
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| विवृतावपि सर्गः स्यात् संहितायां च यत्र हि ।
| |
| समानोत्तमहीनत्वमुच्यते वस्तुनोऽञ्जसा ॥
| |
| इति शब्दनिर्णये ।
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| | |
| अः इति ब्रह्म पूर्णं वस्तूच्यते । तत्रागतमहमिति तत्राकारस्य पूर्णवाचित्वेऽहमेव सोऽकारवाच्य इत्याह महिदासरूपो भगवान्नारायणः । अहमेक एव परिपूर्णः । अन्येषां सर्वेषां मदधीनत्वादल्पत्वादिति । मुक्तेभ्यः प्रलये लीनेभ्यश्च सर्ववस्तुभ्यः सदा विभिन्न एव भगवानिति दर्शयितुं च अः इति पृथग्वचनम् ।
| |
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| |
| | |
| तच्चोक्तं वाक्यनिर्णये–
| |
| मुक्ता अपि न विष्णुत्वं यान्ति तत्समतामपि ।
| |
| आधिक्यं कुत एव स्यान्मुक्तानां मुक्तिदातृतः ॥
| |
| कुत एव प्रलीनानां प्रलये तु तदात्मता ।
| |
| ब्रह्मशर्वेन्द्रपूर्वाणां मुक्तावपि न विष्णुता ॥
| |
| यदा तदा तु संसारे क्व तद्रूपत्वमिष्यते ।
| |
| अन्योऽसौ सर्वतो विष्णुः स्वातन्त्र्याद् गुणपूर्तितः ॥
| |
| सर्ववस्तुस्वभावस्य विरुद्धोरुस्वभावकः ।
| |
| पारतन्त्र्याल्पताज्ञानजनिनाशादिवर्जितः ॥
| |
| अकारेण ततो विष्णुः संहितायां पदात्मना ।
| |
| बह्वृचोपनिषत्प्रोक्तस्तेनैव परमात्मना ॥
| |
| महिदासावतारेण सोऽहमेवंविधस्त्विति ।
| |
| मत्तोऽन्यो न हि पूर्णोऽस्ति यतोऽकारश्च पूर्णताम् ॥
| |
| वक्ति तस्मादकारोऽयं मामेव वदति स्फुटम् ।
| |
| नाभाववाच्यकारः स्यादर्थत्रययुतो यतः ॥
| |
| एकार्थात्मा ह्यभावः स्यान्निषेधैकस्वरूपतः ।
| |
| अन्यता च निषेधश्च विरुद्धत्वमिति त्रयः ॥
| |
| अकारार्था ह्यभावस्तु निषेधैकस्वरूपतः।
| |
| एकदेशस्वरूपत्वान्नाकारेणैव भण्यते ॥
| |
| किन्त्वभाव इति त्वेव तेनाकारोदितो हरिः ॥
| |
| इति च ।
| |
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| |
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| |
| | |
| न च निषेधस्वरूपे विरुद्धता चान्यता चास्तीत्येतावता पूर्णार्थता भवति । तदाऽर्थत्रयकल्पनस्य वैयर्थ्यात् ।
| |
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| |
| | |
| उक्तं हि शब्दनिर्णये ।
| |
| विरुद्धता निषेधान्यभावयुक्ते हि केवलः ।
| |
| अकारो वर्तते तेषामेकार्थात्मन्यभावके ॥
| |
| वर्ततेऽभाव इत्येव न त्व इत्येव केवलः ॥
| |
| इति ।
| |
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| |
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| |
| | |
| तस्मान्नारायणः एवाकारवाच्य इति सिद्धम् ।
| |
| यतोऽकारः सदा विष्णोर्वाचकत्वेन संस्थितः ।
| |
| तस्माद्वर्णत्रयात्माऽयं प्रणवोऽपि त्रयात्मकम् ॥
| |
| हरिमेव सदा वक्ति न वाऽन्यं कञ्चन क्वचित्।
| |
| सृष्टिकर्ता ब्रह्मनामा योऽसृजच्चतुराननम् ॥
| |
| अन्तर्यामी विरिञ्चस्य सोऽकारार्थो जनार्दनः ।
| |
| वैकुण्ठलोक आस्ते स द्वितीयवपुषा हरिः ॥
| |
| उकारवाच्यः स विभुर्नृसिंहो रुद्रनामकः ।
| |
| रौद्रत्वात् स शिवस्यापि स्रष्टा संहारकारकः ॥
| |
| अन्तर्यामी शिवस्यापि मकारार्थः प्रकीर्तितः ।
| |
| एवं त्रियात्मकं विष्णुं प्रणवोऽयं त्रियात्मकः ॥
| |
| एवं पृथगिवाचष्टे बिन्दुर्वक्त्यनिरुद्धकम् ।
| |
| प्रद्युम्नाद्यान्नादपूर्वाः सर्वान्नारायणात्मकान् ॥
| |
| पद्मनाभादिका एव मूर्तीर्नारायणोत्तराः ।
| |
| प्रणवोऽयं वदत्यष्टौ तस्मान्नान्याभिधायकः ॥
| |
| इति तत्त्वसारे ।
| |
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| | verse_line1 = तद्वा इदं बृहतीसहस्रं सम्पन्नम् । तस्य वा एतस्य बृहतीसहस्रस्य सम्पन्नस्य षट् त्रिंशतमक्षराणां सहस्राणि भवन्ति । तावन्ति पुरुषायुषोऽह्नां सहस्राणि भवन्ति । जीवाक्षरेणैव जीवाहराप्नोति, जीवाह्ना जीवाक्षरमित्यनकाममारः ।
| |
| | commentary1 = aitareya
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| |
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| |
| | |
| षट्त्रिंशतिसहस्राणि बृहत्युक्थार्णगानि तु ।
| |
| स्त्रीरूपाणि हरेस्तावदह्नामप्यभिमानिषु ॥
| |
| सूर्यरूपेषु रूपाणि पुमाकाराणि सर्वशः ।
| |
| एतैः पुरुषगैः रूपैर्बृहत्युक्थव्यवस्थितैः ॥
| |
| कदाचिद् भगवान् विष्णुः पुमाकाराणि तानि च ।
| |
| कृत्वा सूर्यगतान्येव स्त्रीरूपाणि विधाय च ॥
| |
| तान्याप्नोति च पुंरूपैस्तैरेवाक्षरगानि च ।
| |
| स्त्रीरूपाणि जगन्नाथः प्राप्नोत्यात्मेच्छया प्रभुः ॥
| |
| पुंरूपप्रमदारूपस्वरूपै रमते स्वयम् ।
| |
| एकीकृत्य च तान्येव द्विरूपो रमते तथा ॥
| |
| स एव रमते मायां स्थितात्मस्त्रीतनौ हरिः ।
| |
| प्राणस्योत्पत्तिकामः सन्ननेच्छामारनामकः ॥
| |
| इत्यर्धनारीनारायणतन्त्रे ।
| |
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| | text = | |
| | |
| वायोरुत्पत्तिकामो मायां रमायां रमत इत्यनकाममारः । जीवस्थितेनाक्षरगेनाक्षरनाम्ना स्वरूपेण जीवाख्यसूर्यस्थितमहराख्यं स्वरूपमाप्नोति तेन चाक्षराख्यं स्वरूपमाप्नोति । यदक्षरादक्षरमेति युक्तमित्यस्य व्याख्यानरूपत्वाच्चैतदवसीयते । पुमांसं स्त्रियं च वदन्नेव न वदतीत्युक्तत्वादुभयात्मकं रूपं प्रतीयते । अस्त्रीपुमानिति ब्रुवन्नपि न वदतीत्युक्तत्वाच्च स्त्रीत्वं पुंस्त्वं च प्रतीयते विष्णोः ।
| |
| }}
| |
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| |
| | |
| न च नपुंसकरूपं भगवतः कुत्रचिदुक्तम् । प्रसिद्धमेव च रूपद्वयम् । अतो नपुंसके वदन्नपि न वदतीति न तद्वदनुषज्यते । नपुंसकरूपे प्रमाणाभावादेव लौकिकस्त्रीपुंविलक्षणत्वादस्त्री पुमानित्यपि वदन्निति भवति ।
| |
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| |
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| |
| | |
| स्त्रीपुंरूपद्वयं विष्णोर्न तृतीयं कथञ्चन ।
| |
| साक्षान्नपुंसकस्तस्मान्मुक्तिभागी न तु क्वचित्॥
| |
| इति ब्रह्माण्डे ।
| |
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| |
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| |
| | |
| न च रक्ष इति नपुंसकशब्दमात्रेण रावणादयो नपुंसका भवन्ति । भवतीतिपदाभावादनकाममार इति भगवन्नामैवेति ज्ञायते
| |
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| | verse_line1 = अथ देवरथः । तस्य वागुद्धिः, श्रोत्रे पक्षसी, चक्षुषी युक्ते, मनः सङ्ग्रहीता । तदयं प्राणोऽधितिष्ठति । तदुक्तमृषिणा । आतेन यातं मनसो जवीयसा । निमिषश्चिज्जवीयसेति जवीयसेति ॥
| |
| | verse_line2 = ८ ॥
| |
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| |
| | |
| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके तृतीयोऽध्यायः ॥
| |
| | extra_class = gr-author-note
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| }}
| |
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| | text =
| |
| | |
| ऋष ज्ञान इति ह्यस्माद्धातोः सर्वज्ञ एकराट् ।
| |
| वेदद्रष्टा परमऋषिर्हयास्यः पुरुषोत्तमः ॥
| |
| मन्त्राणां प्रथमो द्रष्टा सर्वेषां यत एव तु ।
| |
| ऋषिणोक्तमिति प्राहुर्मन्त्रोक्तं ब्राह्मणान्यतः ॥
| |
| तत्प्रसादाद्धि तपसा पश्चान्मन्त्रान् प्रपेदिरे ।
| |
| ब्रह्माद्या ब्राह्मणं पश्चात् तैर्दृष्टमृषिभिः पृथक् ॥
| |
| मन्त्राश्चोपनिषच्चैव नाकृत्वा सुमहत्तपः ।
| |
| प्रथमं तद्धयास्येन दृष्टं केनचिदीक्ष्यते ॥
| |
| विना पृथक् तपो दृश्येत् ब्राह्मणं मुनिभिर्यतः ।
| |
| मन्त्राश्चोपनिषच्चैव ब्राह्मणादुत्तमास्ततः ॥
| |
| तत्राप्युपनिषच्छ्रेष्ठा युक्तावस्थाधिगम्यतः ॥
| |
| इत्यादि प्रमाणविवेके ।
| |
| तेन रथेनाध्यात्मशरीराख्येनाधिदैवं रथरूपेण । ऋभव इत्यत्र देवानां साधारणं नाम ।
| |
| आदित्या वसवो रुद्रा विश्वे ऋभव इत्यपि ।
| |
| सर्वदेवसमाख्या च द्वादशाष्टादिकेष्वपि ॥
| |
| इति शब्दनिर्णये ।
| |
| }}
| |
| | |
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| | text =
| |
| | |
| निर्मितो दैवतैः सर्वैर्विष्णुना वायुना सह ।
| |
| अधिष्ठितो रथो दिव्यः सोऽध्यात्मं देहनामकः ॥
| |
| सम्यग्योगो यदा तस्य मनोवाक्कर्मभिर्भवेत् ।
| |
| देहाख्यस्य रथस्यैव तदा नारायणात् प्रभोः ॥
| |
| विविधं वासवत्वात् तु विवस्वन्नामकाच्छुभम् ।
| |
| संसारवारकं ज्ञानं दिवो दुहितृनामकम् ॥
| |
| विष्णुतत्त्वापरोक्षाख्यमहनी द्वे च शोभने ।
| |
| ज्ञानावस्था मुक्त्यवस्थेत्युभे एवाहनी परे ॥
| |
| जायन्ते देवतास्त्वेषां भारती वायुरेव च ।
| |
| जीवन्मुक्तेश्च मुक्तेश्च दाता रूपद्वयी प्रभुः ॥
| |
| सर्वस्त्रीणामुत्तमत्वाद् द्यौर्नामा श्रीरुदाहृता ।
| |
| दुहिताऽस्या भारती तु नित्याहेयस्वरूपतः ॥
| |
| अहरित्युच्यते वायुर्ज्ञानात्मत्वात् तथैव च ।
| |
| अधिदैवे रथेऽप्येते विष्णोर्लक्ष्म्यां प्रजज्ञिरे ॥
| |
| रथेन तेन देवेशौ विष्णुवायू जगत्पती ।
| |
| आयातमिति हैवैतौ प्रार्थयेद्यज्ञकर्मणि ॥
| |
| अन्यथाप्यर्थयेदेतौ ज्ञानेच्छुः पुरुषः सदा ।
| |
| जपेन्मन्त्रद्वयं नित्यमातेन निमिषस्तथा ॥
| |
| रक्षणं वां समीपे स्यान्ममेत्यध्यात्ममेव च ।
| |
| हयास्यत्वाच्चाश्विनौ तावित्याह परमा श्रुतिः ॥
| |
| ऐन्द्राग्नेयादिकाश्चैवं सर्वे मन्त्रा हरिं परम् ।
| |
| वदन्ति मुख्यतो नान्यं सर्वनामानमच्युतम् ॥
| |
| अथवा वायुदेवस्थं पृथक्संस्थं च केशवम् ।
| |
| मन्त्रो द्विवचनो वक्ति तथा बहुवचस्स्वपि ॥
| |
| इत्याद्येतरेयसंहितायाम् ।
| |
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| सुखं ददत इति सुदिने । विवस्वतो विष्णोः सकाशाद्दिवो दुहिता अहनी च जायन्ते । अहनी इति द्विवचनेन द्वित्वे सिद्धेऽप्युभे इति वचनमध्यात्माधिदैवतयोरुभयोरपि वचनार्थम् ।
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| न च सूर्यरथोऽत्र वर्ण्यते । न चाहोरात्रे अहनी इत्युच्येते । सूर्यस्याश्विनामाभावात् सप्ताश्वत्वाच्च तद्रथस्य । चतुरश्वत्वं चात्रोच्यते । श्रोत्रे पक्षसी चक्षुषीयुक्ते इत्यध्यात्मसम्बन्धाच्च । न च रात्रौ सुदिनमिति प्रयोगो दृष्टः । असुदिनस्यापि तत एव जातत्वाद् व्यर्थविशेषणता च ।
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| अस्मिन् पक्षे तु लौकिकाहर्व्यावृत्त्यर्थ सुदिने इति युज्यते । जीवन्मुक्तिश्च मुक्तिश्च हि मुख्ये सुदिने । स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत्सृजते इति ज्ञानावस्थायां मुक्तौ भोगबाहुल्यकारणत्वात् सापि मुक्तिवत् सुदिनम् । न हि मुक्तावधिक्यार्जनमस्ति । न हीयते यत्र गत्वा यत्र गत्वा न वर्धते इति वचनात् । अतो ज्ञानोत्पत्तिसमनन्तरमेव मुक्तौ न पुनरार्जनमस्तीति ककिञ्चित्कालं ज्ञानित्वेनावस्थानमपि सुदिनमेव । ज्ञानात् पूर्वं तु पतनसंशयादेव न सुदिनम् ।
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| न चाश्विरथो वर्ण्यते । न ह्यश्विरथयोगादहनी जायेते । एकरासभयुक्तो हि तद्रथः । तद्रासभो नासत्या सहस्रम् इति वचनात् । न च विवस्वच्छब्दोऽश्विनोर्विद्यते । यो देवानां नामधा एक एव इति विष्णोः सर्वनामानि प्रसिद्धानि च । युजो युक्ता अभियत्संवहन्ति इत्यादिना तस्यैव प्रस्तावाच्च । अतो विष्णुरेव मुख्यतः सर्वनामोक्त इति सिद्धम् ॥ ८ ॥
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| === चतुर्थोऽध्यायः ===
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| | verse_line1 = ॐ आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत् नान्यत् किञ्चन मिषत् ।
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| एको नारायणस्त्वासीत् प्रलये रमया सह ।
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| नित्याततगुणत्वात् स आत्मेति श्रुतिषूदितः ॥
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| इदं सर्वमपेक्ष्यासौ कालतो गुणतस्तथा ।
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| अग्र्य एव समस्तेभ्यस्तद्वशत्वाद् रमापि सा ॥
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| विद्यमानाऽपि नाग्रस्था गुणैरूना ततो यतः ।
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| न ब्रह्मा न शिवश्चासीन्नैवान्यच्च मिषत् क्वचित्॥
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| सुप्तास्तत्र यतो जीवाः सर्वे ब्रह्मशिवादिकाः ।
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| असुप्ता श्रीश्च मुक्ताश्च स्वतन्त्रोन्मेषवर्जनात् ॥
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| अनुन्मेषा एव तेऽपि स्वतन्त्रोन्मेष एकराट् ।
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| नारायणो न चान्योऽस्ति पूर्णोन्मीलद्गुणात्मकः ॥
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| पराधीनेन वित्तेन भुञ्जन्नपि हि भिक्षुकः ।
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| वित्तवानिति नैवोक्तस्तथा श्रीर्मुक्तिगा अपि ॥
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| मिषन्तोऽप्यन्यतन्त्रत्वान्न मिषन्तः कथञ्चन ।
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| सर्वदाऽप्येक एवायं स्वतन्त्रो नापरः क्वचित्॥
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| कालाग्र्यत्वं वक्तुमस्य प्रलये स्थितिरुच्यते ।
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| | verse_line1 = स ईक्षतेमान् लोकान्नु सृजा इति । स इमांल्लोकान्सृजताम्भो मरीचीर्मरमापः । अदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठा । अन्तरिक्षं मरीचयः । पृथिवी मरः । या अधस्तात् ता आपः । स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति । सोऽद्भ्यः एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत् ।
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| स ऐच्छद्भगवान् विष्णुः स्रष्टुं लोकाभिमानिनः ॥
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| लोकाभिधानवद्देवाञ्जडलोकांश्च शाश्वतः ।
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| स लोकेभ्यः पूर्वतनानबाख्यान् महदादिकान् ॥
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| ब्रह्मशर्वादिकान् सृष्ट्वा जडैस्सह जनार्दनः ।
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| दिवमाकाशमुर्वीं च ससृजेऽथ द्विसप्तकान् ॥
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| इति सृष्ट्वा स लोकांस्तु पुनस्तानेव लोकपान् ।
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| अण्डान्तः स्रष्टुमैच्छच्च तेषां पूज्यत्वसिद्धये ॥
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| अम्नामकेभ्यस्तेभ्यः स पूर्वसृष्टेभ्य एव तु ।
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| सर्वजीवाधिकत्वात् तु ब्रह्माणं पुरुषाभिधम् ॥
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| अंशेनोद्धृत्य रुद्राद्यैः सह चैनमयोजयत् ।
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| तथैव चेतनानाञ्च भागानुद्धृत्य पिण्डवत् ॥
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| चेतनाचेतनं राशिमेकस्थं विदधे प्रभुः ।
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| | verse_line1 = तमभ्यतपत् । तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाऽण्डम् । मुखाद्वाक् वाचोऽग्निः नासिके निरभिद्येताम् । नासिकाभ्यां प्राणः । प्राणाद्वायुः । अक्षिणी निरभिद्येताम् । अक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुषः आदित्यः । कर्णौ निरभिद्येताम् । कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशः त्वङि्नरभिद्यत त्वचो लोमानि लोमभ्य ओषधिवनस्पतयः हृदयं निरभिद्यत । हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा । नाभिर्निरभिद्यतः । नाभ्या अपानो अपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत । शिश्नाद्रेतो रेतसः आपः ॥
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| | verse_line2 = १ ॥
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| पुनरैच्छञ्जगन्नाथस्तस्याङ्गोत्पत्तिमच्युतः ॥
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| अण्डवन्मुखमस्यासीत् प्रथमं तु शिरोऽभिधम् ।
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| भिन्नमास्यं पुनस्तस्य विष्णोरेवेच्छया प्रभोः ॥
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| तत्र वाङ्नामकं रूपं वह्नेरासीत् पुरातनम् ।
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| तस्यैवाथ द्वितीयं च यदग्निरिति गीयते ॥
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| तथैव नासिकातोऽभून्मुख्यवायोः सुतो मरुत् ।
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| प्राणो वायुरिति द्वेधा चक्षुषोऽभूत् तथा रविः ॥
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| द्विरूप एव कर्णाभ्यां मित्रधर्माप्यवित्तपाः ।
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| दिग्देवता द्विरूपेण बभूवुः सर्व एव च ॥
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| हृदयाद् गरुडानन्तशिवचन्द्राः पृथक् पृथक् ।
| |
| मनो बुद्ध्यभिमानाश्च तन्नामानश्च जज्ञिरे ॥
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| त्वचश्च रोमनामानो वृक्षनामान एव च ।
| |
| द्विविधाः पारिजाताद्या बभूवुर्ब्रह्मदेहतः ॥
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| हस्ताभ्यां द्विविधः शक्रः पद्भ्यां तत्सूनुरेव च ।
| |
| यज्ञस्त्वजनि पायोश्च यमो निर्ऋतिरेव च ॥
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| रेतोऽम्नामा द्विरूपस्तु शिव एव च गुह्यतः ।
| |
| अपानो मृत्युरिति च मुख्यो नाभेस्तु मारुतः ॥ १ ॥
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| | verse_line1 = ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतन् । तमशनापिपासाभ्यामन्ववार्जत् । ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि । यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति । ताभ्यो गामानयत् ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ताभ्योऽश्वमानयत् ता अब्रुवन् न वै नोऽयमलमिति । ताभ्यः पुरुषमानयत् ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति । पुरुषो वाव सुकृतम् ।
| |
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| | |
| एवं रूपद्वयेनापि स्तुवन्तो विष्णुमव्ययम् ।
| |
| दिव्याम्बराः कुण्डलिनः प्राविशन्नुदकार्णवम् ॥
| |
| तदाऽशनापिपासाख्यं द्विरूपं मारुतं पुनः ।
| |
| तस्मिन् देवसमूहे तु विष्णुः प्रावेशयत् प्रभुः ॥
| |
| तेऽब्रुवन् देहि नो वासं यत्र चान्नमदामहे ।
| |
| गोरूपमेभ्यो ब्रह्माणं ददौ नारायणः प्रभुः ॥
| |
| तत्र प्रविश्य ते देवा नालमित्यब्रुवन् पुनः ।
| |
| अश्वरूपं विरिञ्चश्च पुनरेवावदत् प्रभुः ॥
| |
| तद्रूपेऽपि प्रविश्यैव नालमित्यब्रुवन् पुनः ।
| |
| पूर्वसृष्टं पुमाकारं ब्रह्मणोऽदात् पुनर्हरिः ॥
| |
| तद्दृष्ट्वैवालमित्यूचुः.....
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| | verse_line1 = ता अब्रवीत् यथायतनं प्रविशतेति । अग्निः वाग्भूत्वा मुखं प्राविशत् । वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशत् आदित्यश्चक्षुर्भूत्वाऽक्षिणी प्राविशत् । दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन् । औषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशन् । चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशत् । मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशत् । आपो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन् ।
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| ... विशतेति स चाब्रवीत् ।
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| विविशुश्च यथोत्पन्नाः सर्वे देवाश्चतुर्मुखम् ॥
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| | verse_line1 = तमशनापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभि प्रजानीहीति । ते अब्रवीदेतास्वेव वां देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति । तस्माद्यस्मै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते भागिन्यावेवास्यामशनापिपासे भवतः ॥ २ ॥
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| अशनापिपासामानी तु द्विरूपो मारुतोऽवदत् ।
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| कुर्वाज्ञामावयोश्चैव यथा त्वच्छासनानुगौ ॥
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| नित्यं भवावेति हरिः सर्वत्र प्रविशेत्यमुम् ।
| |
| आह तस्माद् देवतानां सर्वासां भागभुङ् मरुत् ॥
| |
| एक एव प्राणनामा नाभिस्थोऽपि स एव तु । अशनापिपासापानश्च मृत्युश्चेति चतुर्विधः ॥
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| एक एव महान् वायुः सर्वदेवेषु संस्थितः ॥ २ ॥
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| | verse_line1 = स ईक्षेतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति । सोऽपोऽभ्यतपत् । ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत । या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् । तदेतत्सृष्टं पराङ् अत्यजिघांसत् ।
| |
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| |
| | |
| पुनरैच्छत् केशवोऽसावन्नमेभ्यः सृजा इति ।
| |
| अबाख्याः देवताः पूर्वं सृष्टा ब्रह्मादिकाः पुनः ॥
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| ददर्श सुविशालाभ्यां नेत्राभ्यां पुष्करेक्षणः ।
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| तद्दर्शनात् तदिच्छातस्तासां देहोऽभवत् पृथक् ॥
| |
| सर्वासामपि देहैकदेशेभ्यो मिलितं शुभम् ।
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| सर्वैरधिष्ठितं चैव विरिञ्चेन विशेषतः ॥
| |
| दिव्यावयवसम्पन्नमेकमेव सुलोचनम् ।
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| भोग्यभोक्त्रात्मना नास्ति तस्य दुःखं कथञ्चन ॥
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| ते हि देवाः स्वयं भोग्याः स्वयं भोक्तार एव च ।
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| क्रीडन्ते मोदिनो नित्यं तथाऽप्यन्नात्मकस्त्वसौ ॥
| |
| क्रीडयाऽपाक्रमत् किञ्चित्...
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| | verse_line1 = तद्वाचाऽजिघृक्षत् तन्नाशक्नोद् वाचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनद्वाचाऽग्रहैष्यदभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत् । तत्प्राणेनाजिघृक्षत् । तन्नाशक्नोत्प्राणेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनत् प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत् । तच्चक्षुषाऽजिघृक्षत् । तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्चक्षुषाऽग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् । तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुं । स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यत् श्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् । तत् त्वचाऽजिघृक्षत् तन्नाशक्नोत् त्वचा ग्रहीतुम् । स यद्धैनत् त्वचाऽग्रहैष्यत् स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् । तन्मनसाऽजिघृक्षत् तन्नाशक्नोत् मनसा ग्रहीतुम् । स यद्धैतन्मनसाऽग्रहैष्यद् ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् । तच्छिश्नेनाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुम् । स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत् । तदपानेनाजिघृक्षत् । तदाऽवयत् । सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद्वायुरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ।
| |
| | commentary1 = aitareya
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| | |
| ... तं तदाऽसौ चतुर्मुखः ।
| |
| अत्तुं वागादिभिः सर्वैरैच्छन्नाप्यशकत् तदा ॥
| |
| जानन्नपि क्रीडयैव तारतम्यं प्रकाशयन् ।
| |
| एवं चकार ब्रह्मा स क्वाज्ञानं लोककर्तरि ॥
| |
| क्षुत्पिपासदयश्चैव देवानां भोगसाधकाः ।
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| न तु पीडाकरास्तेषामैश्वर्यादिगुणोन्नतेः ॥
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| अन्नमूर्तिं ततो ब्रह्मा प्रधानेनैव वायुना ।
| |
| अपानाख्येनात्तुमैच्छत् तदैवाशकदाशु सः ॥
| |
| तस्माद् भोक्तैक एवासौ सर्वस्यान्नस्य मारुतः ।
| |
| तत्प्रसादात् परेऽश्नन्ति किञ्चित् किञ्चिन्न चाखिलम् ॥
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| आयुरूपोऽखिलानां च देवानां वायुरेव हि ।
| |
| अन्नदेवस्य चायुः स तस्माद्देवोत्तमो मरुत् ॥
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| आयुःशब्दो ज्ञानवाची गतिवाची च यत्ततः ।
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| चेष्टामोक्षज्ञानदाता सुराणां मारुतस्ततः ॥
| |
| अन्योन्यगुणदातृत्वात् समानौ ब्रह्ममारुतौ ।
| |
| तस्मान्मोक्षे सुखे ज्ञाने विष्णुभक्त्यादिकेष्वपि ॥
| |
| सर्वेभ्यश्चाधिकौ तौ हि तयोर्विष्णुः परस्सदा ।
| |
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| |
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| | verse_line1 = स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति । स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति । स ईक्षत यदि वाचाऽभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ।
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| |
| | |
| देवतानां प्रवेशात् तु पूर्वमेव जनार्दनः ॥
| |
| इत्थमैक्षत देवेशो ब्रह्माद्या यदि मां विना ।
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| क्रियादिषु समर्थाः स्युर्न मे विष्ण्वभिधा भवेत् ॥
| |
| सर्वचेष्टयितृत्वाच्च विशिष्टबलतस्तथा ।
| |
| विष्णुरित्यभिधा मह्यं सा न युक्ता दिवौकसाम् ॥
| |
| स्वतन्त्रत्वे ततः सर्वे मद्वशा एव नान्यथा ।
| |
| तस्मादेषां प्रवृत्त्यर्थं प्रवेक्ष्ये सह वायुना ॥
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| | verse_line1 = स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विदृतिर्नाम द्वाः । तदेतन्नान्दनम् । तस्य त्रय आवसथाः । त्रयः स्वप्नाः । अयमावसथोऽयमावसथ इति ।
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| इति मत्वा विरिञ्चस्य शरीरं प्रविवेश सः ।
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| मूर्धन्यनाड्या प्रथमं ब्रह्मवायुसमन्वितः ॥
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| अग्न्यादयस्ततः पश्चात् प्रविष्टास्तन्नियोजिताः ।
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| प्रपदाभ्यां तथाऽन्येन रूपेण प्रविवेश सः ॥
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| बिभर्ति देहं तेनैव मूर्धाविष्टेन चेष्टयन् ।
| |
| नारायणो वासुदेव इति द्वेधा व्यवस्थितः ॥
| |
| मूर्धाविष्टो वासुदेवस्तस्य चावसथास्त्रयः ।
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| अक्षि कण्ठो हृदित्येवं त एव स्वप्ननामकाः ॥
| |
| आप्नोत्यत्र स्वयं विष्णुरतः स्वप्नाः प्रकीर्तिताः ।
| |
| अनिरुद्धादिरूपेण त्रिधा तेषु व्यवस्थितः ॥
| |
| दाताऽवस्थात्रयस्यास्य जीवस्य क्रमशो विभुः ।
| |
| सुषुम्नायां वासुदेवो मूर्धन्येव व्यवस्थितः ॥
| |
| तस्यामेव ब्रह्मनाड्यां स्थितो नारायणः प्रभुः ।
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| | verse_line1 = स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् । किमिहान्यं वावदिषदिति । स एतमेव पुरुषं ब्रह्मततममपश्यत् । इदमदर्शमिती३ ॥
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| | verse_line2 = तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ ३ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके चतुर्थोऽध्यायः ॥
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| स एव भगवान् विष्णुः प्रादुर्भावात्मना पुनः ॥
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| जातो मत्स्यादिरूपेण सर्वभूतेषु चाविशत् ।
| |
| असुराणां निहन्तारं ज्ञानादिगुणदं तथा ॥
| |
| चेष्टाप्रदं च भूतेषु न मदन्यं वदत्यपि ।
| |
| इति मत्वा जगन्नाथो दैत्यनिग्रहणेच्छया ॥
| |
| ज्ञानदानार्थमपि तु प्रादुर्भूतो भुवि प्रभुः ।
| |
| तथा जीवेषु सर्वेषु प्रविष्टः प्रेरणेच्छया ॥
| |
| को ह्यन्यस्तमृते विष्णुमेतत्कर्म करिष्यति ।
| |
| स सर्वगुणसम्पूर्णं सर्वगं नित्यमव्ययम् ॥
| |
| एतदेवस्वरूपं स त्वपश्यदवतारगम् ।
| |
| तस्मात् सर्वावताराश्च सर्वजीवेषु संस्थिताः ॥
| |
| प्रादुर्भावाः सर्वगुणैः पूर्णा एव सदा स्थिताः ।
| |
| पश्यन्ति च तथा नित्यं निर्दोषोरुस्वसंविदा ॥
| |
| गुणपूर्णस्वरूपस्य त्वापरोक्ष्येण दर्शनात् ।
| |
| सर्वदैव ह्यसौ विष्णुरिदन्द्रो नामतो मतः ॥
| |
| ब्रह्मादीनां हि सर्वेषां तत्प्रसादेन जायते ।
| |
| जानन्ति न स्वतस्तेन नेदन्द्रास्ते प्रकीर्तिताः ॥
| |
| रमापि तत्प्रसादेन जानाति किमुतापरे ।
| |
| अल्पज्ञाना अल्पगुणा अल्पानन्दाश्च तेऽखिलाः ॥
| |
| रमाजशङ्करेन्द्राद्यास्तेनानिन्द्राः क्रमेण ते ।
| |
| पापैरज्ञाततां देवा मानयन्ति सदात्मनः ॥
| |
| हर्षेण तेन विष्णुः स इन्द्र इत्यभिशब्द्यते ।
| |
| नेदन्द्रताऽसुरादीनां ज्ञायेतेति श्रुतिर्हरिम् ॥
| |
| इन्द्र इत्येव वदति पारोक्ष्येणोरुसद्गुणम् ॥
| |
| इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ।
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| | |
| आततगुणत्वादात्मा नारायणः । ब्रह्म पन्थाः सत्यं कर्मेति तस्यैव पञ्चरात्रप्रसिद्धैरेव नामभिरारब्धत्वाच्च ।
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| | |
| मुख्यतः कर्मनामा तु प्रादुर्भावात्मको हरिः ।
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| अनिरुद्धतनुश्चैव तत्र ह्यमितचेष्टितः ॥
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| कर्माभासा जीवसङ्घाः सत्यं प्रद्युम्ननामकः ।
| |
| सङ्कर्षणो हरिः पन्थाः ब्रह्मोक्तो वासुदेवकः ॥
| |
| इत्यादिनामनिर्णये ।
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| मत्सीन्द्रमिन्दो पवमान विष्णुम् इत्यादिश्रुतौ तस्मिन्नेव प्रसिद्धस्येन्द्रशब्दस्य बहुशोऽभ्यासाच्च । अकारस्य च विष्णावेव प्रसिद्धस्यात्राप्यभ्यासात् । तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी इति सूर्यमण्डले पुण्डरीकाक्षत्वेन निर्दिष्टस्यात्रापि य एष तपतीत्यादिना बहुशोऽभ्यासाच्च । सूर्यो हि हिरण्याक्षः । सविता देव आगादिति पिङ्गलाक्षः प्रसिद्धः ।
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| विरूपाक्षः शिवः सूर्यः सुराचार्यो विनायकः ।
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| पुण्डरीकेक्षणो विष्णुः सहस्राक्षः सुराधिपः ॥ इति च स्कान्दे ।
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| यो देवानां नामधा एक एव । नामानि सर्वाणि यमाविशन्ति तं वै विष्णुं परममुदाहरन्ति । यमिन्द्रमाहुर्वरुणं यमाहुः ।
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| चन्द्रसूर्यादयः शब्दा विष्णावेव हि मुख्यतः ।
| |
| उपचारात् तदन्येषां विष्णुनैव कृताः पुरा ॥
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| इत्यादिना तस्यैव सर्वनामवत्वाच्च ।
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| णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेत्यादिनान्तेऽपि विष्णुशब्दव्याख्यानेनोपसंहाराच्च ।
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| आत्मब्रह्मादयः शब्दास्तमृते विष्णुमव्ययम् ।
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| न वर्तन्ते तदन्यत्र शृङ्गिबेरेऽग्निशब्दवत् ॥
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| इति च पाद्मे ।
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| | |
| एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः ।
| |
| एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः ।
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| वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः ॥
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| इत्यादि श्रुतिभ्यश्च ।
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| अग्रशब्दो गुणाधिक्यवाची । इदं रमाब्रह्माशिवादिकं सर्वं जगदपेक्ष्यात्मैवाग्रे विष्णुरेवाग्र्यः सर्वगुणैरित्यर्थः । तत्र हेतुस्तदन्यत् ककिञ्चिन्न मिषदासीत् । सर्वस्याप्युन्मेषणं नासीदित्यर्थः । स्वत उन्मेषणं कस्यापि नास्ति । अस्तिशब्दवदासीच्छब्दोऽपि सर्वकालसाधारणः । भगवत्प्रसादादेव सर्वदा सर्वं ककिञ्चिदुन्मिषति । स्वातन्त्र्येण पूर्णोन्मेषो विष्णुरेव ।
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| | |
| उन्मेषो गुणसम्पूर्तेरुद्रिक्तानुभवः स्मृतः ।
| |
| तदेव मिषणं नाम सद्रूपं मिनुते यतः ॥
| |
| मिषच्च नान्यद्विष्णोर्हि किमुतोन्मिषदिष्यते ।
| |
| उच्चैर्मिषन् हि भगवान् सर्वदैव जनार्दनः ॥
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| इति च सत्तत्त्वे ।
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| नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । इति च भारते ।
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| सर्वजीवानां रमायाश्च प्रलयेऽपि विद्यमानत्वादेव नाग्र इति कालापेक्षया । तदधीनमिषत्वादन्येषामग्र्यः स एवेत्याशयः । तदधीनत्वमेव तेषां सृष्ट्यादिना दर्शयति । स्थूलशरीरस्य पूर्वाभावस्तत एवार्थतः सिद्ध्यति ।
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| प्रलयेऽप्यखिलं देवी रमा विष्णुप्रसादतः ।
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| जानाति नित्यज्ञानेन मुक्ता ध्यानस्थिता लये ॥
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| इति च सत्तत्त्वे ।
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| ब्रह्मादीनां शरीरान्तरस्यापि प्रलयेऽनुक्तेरेवाभावः सिद्ध्यति ।
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| आत्मा ब्रह्माग्र इत्यादि गुणाग्र्यत्वं हरेर्वदेत् ।
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| कालज्यैष्ट्यं न यस्मात् तत्सृष्ट्युक्तेरेव सिध्यति ॥
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| इति वाक्यनिर्णये ।
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| | |
| गुणाग्र्यतायामेव कालज्यैष्ठ्यस्याप्यन्तर्भावाच्च । अं विष्णुं बिभर्तीत्यम्भो विष्णुलोको दिवः परे महदादयश्च । दिव्यपि भगवान् प्रतितिष्ठतीति प्रतिष्ठा । तेषु सर्वेषु प्रत्यक्षतश्चरति विष्णुस्तस्मादम्भ इत्युच्यते । दिवः परे द्यौश्चाम्भोनामका इत्यर्थः । सूर्यमरीचीनां तत्र विशेषेण वितत्वादन्तरिक्षं मरीचयः । मरीचीनामयनात् । पृथिव्यां क्षिप्रं मरन्तीति पृथिवी मरः ।
| |
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| | |
| भूतेभ्योऽनन्तरं त्वण्डं सृष्ट्वा विष्णुः सुरान् प्रभुः ।
| |
| लोकभेदांश्च चक्रेऽत्र पश्चाद् ब्रह्मा विशेषतः ॥
| |
| सम्यक्चकार लोकांस्तांल्लोककर्ता ततः स च ॥
| |
| इति ब्रह्मवैवर्ते ।
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| या अधस्तात् पूर्वमेव सृष्टा देवतास्ता आप इत्युच्यन्ते । आप इत्याप इतीति पूर्वं भगवदङ्गसृष्टानामेवाप्शब्देनोक्तेः । अयं पितैते पुत्रा इति च । आहं मां देवेभ्यो वेद ओमद्देवान् वेदेति च ।
| |
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| |
| | |
| ब्रह्मवायू च तद्भार्ये वीन्द्रशेषौ च तत्स्त्रियौ ।
| |
| शिवस्तद्दयिता शक्रकामौ तद्दयितादयः ॥
| |
| सर्वे सुराः क्रमेणैव विष्णोर्जाता अबाख्यकाः ।
| |
| ज्ञानानन्दबलाद्येषु विष्णुभक्तौ च सर्वशः ॥
| |
| हीनाः शतगुणेनैव क्रमेणानेन ते मताः ।
| |
| तेभ्यश्च ऋषयो मर्त्या हीना एव क्रमेण च ॥
| |
| विशेषतस्तु मुक्तानां सर्वसंसारबन्धनात् ।
| |
| क्रमोऽयं सम्यगुद्दिष्टो नित्यानन्दैकभोगिनाम् ॥
| |
| न विशेषो ब्रह्मवाय्वोरधिकाराविभेदतः ।
| |
| न शेषशिवयोश्चैव तत्पत्नीनां च सर्वशः ॥
| |
| सुपर्णशेषयोश्चैव साम्यं सर्वगुणेष्वपि ।
| |
| साम्यमेवैतयोः पत्न्नयोः साम्यं शक्रमनोजयोः ॥
| |
| एते तु महादादीनां सर्वेऽपि ह्यभिमानिनः ।
| |
| पूर्वस्य प्रतिबिम्बश्च चरमस्तत्सुतस्तथा ॥
| |
| तद्वशाश्चाखिला विष्णोर्न विष्णुः कस्यचिद्वशे ।
| |
| महदादिमानिनश्चैते जातास्तैः सह सर्वशः ॥
| |
| एते लोका इति प्रोक्ता लोकानामभिमानिनः ।
| |
| त एव लोकपालाश्च यदा पश्चाद् प्रजाज्ञिरे ॥
| |
| पश्चाज्जातैर्हि रूपैस्तैर्लोकस्थान् पालयन्त्यलम् ॥
| |
| इत्यादि तत्त्वसारे ।
| |
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| | |
| अमूर्च्छयत् मूर्छिर्तमकरोत् । अग्निर्वाग् भूत्वेत्यादिना पश्चादैक्यप्रतीतेरेकस्यैव रूपद्वयं तदिति प्रतीयते । प्रजानीहि प्रकर्षेणानुजानीहि । अन्नदेवता च सर्वदेवतायुक्तो विरिञ्च एव । ग्रसनं चैतस्मिन् प्रवेश एव । न तु पीडा तस्य । एक एव हि ब्रह्मा भोक्तृभोज्यत्वेन स्थितो भोज्यरूपेणैकीभूयातितरां मुमोदेत्यर्थः । देवानामुपद्रवाभावाद् भोक्तृत्वशक्तियोजनमेवाशनापिपासाभ्यामन्ववार्जनम् । वायुरेव च भोक्तृत्वशक्तिरूपः ।
| |
| यदि वागादीनामेवाभिव्याहरणादिशक्तिः स्यान्मां विना तर्हि विष्णुत्वं न मम स्यात् तस्मात् कोऽहं भवानीत्याक्षेपः । विशेषेण प्राणयति सर्वान् सर्वेभ्यो विशिष्टश्चेति हि विष्णुः । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेति व्याख्यानात् । तस्मान्मत्प्रेरिता एवैते अभिव्याहारादिशक्ता इत्यभिप्रायः ।
| |
| पूर्णानन्दस्वरूपत्वान्नन्दनो भगवान् । प्रादुर्भावरूपेण जातोऽपि भगवान् सर्वभूतान्यभितः सर्वकालेषु विशेषेण पश्यत्येव । इह भूतेषु मत्तोऽन्यं प्रवर्तकं वदेत् किमित्याक्षेपः । अहमेव स्वतन्त्रः परिपूर्णगुण इति कृष्णराघवादिसर्वावताररूपेऽपि सर्वदानुभवत्येव ।
| |
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| |
| | |
| नायं दशरथाज्जातो न चापि वसुदेवतः ।
| |
| क्वास्याज्ञानं कुतो दुःखं प्रादुर्भावेष्वपि प्रभोः ॥
| |
| प्रादुर्भूतश्चिदानन्दशरीरो राघवः स्वयम् ।
| |
| स्तम्भाद्वा नरदेहाद्वा नैवास्य प्राकृती तनुः ॥
| |
| दैत्यानां मोहनार्थाय सोऽज्ञानाद्यं प्रकाशयेत् ।
| |
| पूर्णचित्सुखरूपोऽपि सदा सर्वावतारगः ॥
| |
| इत्यादि स्कान्दे ।
| |
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| एतमेव पुरुषं व्यासकृष्णकपिलराघवादिरूपं ततममपश्यत् । ततमं परिपूर्णतमं ब्रह्माऽपश्यत् । इदं मे स्वरूपमदर्शमेवाहमिति । रङ्गस्त्ववधारणे । रङ्गोऽवधारणे चैव संवादे च प्रयुज्यते इति पदविवेके । अपश्यदित्यत्र नातीतकालत्वं विवक्षितम् । अभिव्यैख्यदित्यभिशब्दस्यानुषङ्गात् । अपश्यत् पश्यतीति चैककालसम्बन्धं विना वक्तुमशक्यत्वात् तथा प्रयोगः
| |
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| प्रयोग एककालीनः सर्वकालेऽनुषज्यते ।
| |
| ददर्श विष्णुरित्यादौ नित्यचिद्रूपतो हरेः ॥
| |
| इत्यादि सत्तत्त्वे ।
| |
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| परोक्षप्रिया इवेत्यसुराणां सम्यगदर्शनेन पतनं देवानां प्रियं तथाऽप्यपरोक्षदर्शिन्येव प्रीतिं कुर्वन्तीतीवशब्दः ॥ ३ ॥
| |
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| === पञ्चमोऽध्यायः ===
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| | verse_line1 = (अपक्रामन्तु गर्भिण्यः) ॐ पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद्रेतस्तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजस्सम्भूतम् । आत्मन्येवात्मानं बिभर्ति । तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जनयति ॥
| |
| | verse_line2 = तदस्य प्रथमं जन्म । तत्स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति यथा स्वमङ्गं तथा । तस्मादेनां न हिनस्ति । साऽस्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति । सा भावयित्री भावयितव्या भवति । तं स्त्री गर्भं बिभर्ति । सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति । स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येतेषां लोकानां सन्तत्या एवं सन्तता हीमे लोकाः ।
| |
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| | |
| अयं नारायणो देवः पुरुषे प्रथमं विशेत् ।
| |
| अन्नस्थोऽन्नेन सहितस्तस्मिन् रेतस्त्वमागते ॥
| |
| तस्मिन् स्थितं स्वरूपं स पुरुषस्थो बिभर्त्यजः ।
| |
| तद्रूपं रेतसा साकं स्वयं पुंसि स्थितो हरिः ॥
| |
| स्त्रियां सिञ्चति तस्यैव स्थानान्तरगतेः प्रभोः ।
| |
| प्रथमं जन्म विष्णोस्तु स तस्या अङ्गवत् प्रभुः ॥
| |
| नैनां हिनस्त्यानुकूल्यात् सा पुत्रं भावयत्यथ ।
| |
| पुत्रस्य भावना सैव तद्गत्वाद् हरिभावना ॥
| |
| सम्भावितव्या सा चैव भर्त्रा पुत्रश्च सादरम् ।
| |
| सम्भावनं कुमारस्य जानतः केशवे भवेत् ॥
| |
| तस्येत्यर्पणमात्रेण पूजितो हि भवेद्धरिः ।
| |
| पुत्रस्थस्य हरेः पूजां कुर्वतः पृथिवीस्थितिः ॥
| |
| स्वर्गस्थस्यापि भवति पुत्रपुण्यं यतोऽखिलम् ।
| |
| अत्यल्पपुण्यभाक् स स्यान्नार्चयेत् केशवं यदि ॥
| |
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| | verse_type = mantra
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| | verse_line1 = तदस्य द्वितीयं जन्म । सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते । अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगतः प्रैति । स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते । तदस्य तृतीयं जन्म ॥
| |
| | verse_line2 = तदुक्तमृषिणा–
| |
| | verse_line3 = गर्भे नु सन्नन्वेषाममवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा ।
| |
| | verse_line4 = शतं मा पुर आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति ॥
| |
| | verse_line5 = गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच । स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्वं उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् (यथास्थानं गर्भिण्यः) ॥ १ ॥
| |
| | commentary1 = aitareya
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| | |
| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके पञ्चमोऽध्यायः ॥
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| | text =
| |
| | |
| पृथिव्यां जन्म पुत्रस्य द्वितीयं विष्णुजन्म हि ।
| |
| एतद्रूपं निधायैव जीवार्थे धर्मकर्तवे ॥
| |
| पितृस्थेन तु रूपेण गच्छत्यन्यत्र केशवः ।
| |
| पितुरन्यत्र जननं तृतीयं जन्म तद्धरेः ॥
| |
| अन्तर्यामितयैवं हि सर्वजीवेषु संस्थितम् ।
| |
| सर्वदोषोज्झितं विष्णुं कर्तारं सर्वकर्मणाम् ॥
| |
| नित्यानन्दं स्वतन्त्रं च सर्वज्ञं सर्वतोऽधिकम् ।
| |
| यो वेद देहबन्धात् स विमुक्तो नित्यमुत्तमान् ॥
| |
| भोगान् भुङ्क्ते यथायोग्यमिति वेदानुशासनम् ॥
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| इत्यैतरेयसंहितायाम् ।
| |
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| नात्र जीवोत्पत्तिमात्रमुच्यते । न हि जीवोत्पत्तिमात्रपरिज्ञानादमृतत्वं भवति । ज्ञातमेव सर्वैः पितापुत्रसम्बन्धमात्रं पश्वादिभिरपि । गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा इत्युक्तार्थ उदाहृतमन्त्रे देवजन्मकथनाच्च । विष्णुर्हि परमो देवः । तेनैव सह सर्वेऽपि देवा जीवदेहजनने जायन्त इव । शरीरप्राप्तिरेव हि जन्मान्येषामपि । अयमेव विशेषो देवानां दुःखाभोगः । स्वातन्त्र्यं च विष्णोः ।
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| आत्मन्येवात्मानं बिभर्ति आत्मानमेव तद्भावयतीत्याद्यात्मशब्दश्च मुख्यतो विष्णावेव युज्यते । णकारो बलं षकारः प्राण आत्मेति विष्णुशब्दार्थैकदेशवाचित्वाच्चात्मशब्दस्य । एतया द्वारा प्रापद्यतेति तस्यैव शरीरप्रवेशस्य प्रस्तुतत्वाच्च । जीवशरीरं परित्यज्यान्यत्रगमनमात्रं विष्णोरप्यस्तीति प्रैतीत्युक्तेऽप्यविरोधः । कृष्णराघवादिस्वरूपमेव ह्यसौ न परित्यजति ।
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| कृष्णो ह्यत्यक्तदेहोऽपि त्यक्तदेहवदेव च ।
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| लोकानां दर्शयामास स्वरूपसदृशाकृतिम् ॥
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| येन रूपेण कंसादीन् जघ्ने तद्रूपमेव हि ।
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| पूज्यतेऽद्यापि शर्वाद्यैर्निर्मिताऽन्या शवाकृतिः ॥
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| स्वर्गारोहणकाले तु जनास्तेनैव मोहिताः ।
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| यत्तद्रूपं निजं विष्णोर्दृष्टं सर्वजनैर्भुवि ॥
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| अद्यापि तद्देवलोके पूज्यते सर्वदैवतैः ॥ इत्यादि स्कान्दे ।
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| प्रदर्श्यातप्ततपसामवितृप्तदृशां नृणाम् ।
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| आदायान्तरधाद्यस्तु स्वबिम्बं लोकलोचनम् ॥
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| इति च भागवते ।
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| प्रेतां यज्ञस्य शम्भुवेत्यादिवत् प्रकृष्टगतिवाच्येवायं शब्दः । प्रकृष्टगतित्वादेव च मरणेऽपि प्रयुज्यते । एषामवेदमहमित्यत्रापि जीवभेद एवोक्तः । अन्यथा मम जनिमानीत्येवोच्येत । व्यर्थता चैषामित्यादिविशेषणानाम् । अवेदमित्यनेनैव स्वस्य सिद्धत्वादहमित्यप्यहेयत्वेनेति क्रियाविशेषणम् । जन्म जानन्नपि देवानां दुःखादिहेयरहितत्वेन व्यजानामीत्यर्थः । तस्मादहं मनुरित्यादावप्यहेयगुणं भगवन्तमेवाहंशब्दो वक्ति । सर्वान्तरत्वात् तस्मिन्नेवाभवमित्युत्तमपुरुषशब्दोऽपि सर्वो वर्तते ।
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| ओयत्वादहं विष्णुः स तु सर्वान्तरत्वतः ।
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| अस्यस्मीत्यादिभिः शब्दैरुच्यतेऽन्योऽपि जीवतः ॥
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| इति ब्रह्मवैवर्ते ।
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| न च मूढव्यवहार एव वेदनिर्णयाय भवति । किन्तु सर्वेषामनुभवो युक्तयश्च वाक्यान्तरं च निर्णयकारणम् । तस्मात् सर्वजीवादिभ्योऽन्यः सर्वोत्तमो विष्णुरेवात्रोक्तः ।
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| न वेदेषु पदं ककिञ्चिद्वर्णो वा व्यर्थ इष्यते ।
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| यथायोग्यं चार्थभेद ऊह्यः सर्वत्र वेदिभिः ॥
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| इति शब्दनिर्णये ॥
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| शब्दा रेतोन्नमित्याद्या अपि तत्र गतं हरिम् ।
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| वदन्त्यविष्णुवाची हि न शब्दः क्वचिदिष्यते ॥
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| इति च ।
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| भावयति सम्भावयति । सोऽग्र एव सोऽग्र्यो विष्णुरेव । पुत्रसम्भावनमपि तत्रस्थं विष्णुं सम्भावयामीति तत्तस्यैव भवति । एवं भावयतामेवैष पन्था उरुगाय इत्याद्यपि । तं पश्यन्ति पशव इत्याद्यपि दिव्यपश्वादीनामेव । अन्येषां स्वभावप्रवृत्तिः । ता एव देवताः शतं पुर आयसीर्ज्ञानिन्यो विशेषतः । अय पय गताविति धातोः । मानुषानपेक्ष्य पूर्णत्वात् पुरः । विष्णुर्मुख्यत एव पूर्णः । न च शरीरैर्जीवो रक्षितः । मुख्ये युज्यमाने च नामुख्यार्थः कल्प्यः । शमस्य विद्यते इति शी विष्णुः । पूर्णानन्दत्वात् । स एव ज्ञानत्वाद्यश्चेति श्यः । सोऽस्य जीवस्येन इति श्येनः । विष्णुं स्वामिनं ज्ञात्वेत्यर्थः । निरदीयं निष्क्रम्यातीतोऽस्मि गर्भवासम् ।
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| स्वर् आनन्दो विष्णुः । अत्रग इति स्वर्गलोको विष्णुलोकः । अमृतः सन् सर्वान् कामानाप्त्वा तानेव सर्वान् कामान् समभवदनुभवति । अपेक्षितवस्तुस्वीकारः आप्तिः । सम्भवो भोगः । तां समभवत् ततो मनुष्या आजायन्तेत्यादिवत् । मुक्त्यनन्तरमेव ह्यनुपचरितसर्वकामावाप्तिः । मुख्य एव चार्थः स्वीकार्यः । अमुक्तानां विष्णुलोकगानामपि न सर्वकामावाप्तिः । जयविजयादीनामप्रियदर्शनात् । अतोऽमृतः सन् सर्वान् कामानाप्त्वेत्यर्थः ।
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| मुक्तः कामानवाप्नोति भुङ्क्ते चैव यथेष्टतः । सर्वानपि निरातङ्कः सर्वदा च हरेर्वशः ॥ इति सत्तत्त्वे ॥
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| === षष्ठोऽध्यायः ===
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| | verse_line1 = ॐ कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे । कतरः स आत्मा । येन वा पश्यति । येन वा शृणोति । येन वा गन्धानाजिघ्रति । येन वा वाचं व्याकरोति । येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ।
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| अयं विष्णुर्हि किंरूप उपास्योऽस्माभिरच्युतः ।
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| इत्यपृच्छद् रमा देवी महिदासं जनार्दनम् ॥
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| आह तां महिदासोऽथ पूर्णानन्दतमस्त्विति ।
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| उपास्यस्तादृशो ह्यस्य स्वभावः परमात्मनः ॥
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| येन जीवो दर्शनादीन् प्रेरितः कुरुते सदा ।
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| | verse_line1 = यदेतद्धृदयं मनश्चैतत्सञ्ज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिर्मतिर्मनीषा जूतिः स्मृतिः सङ्कल्पः क्रतुरसुः कामोऽवश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ।
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| यो विष्णुर्हृदयमिति हृद्गतत्वात् प्रकीर्तितः ॥
| |
| मन्तृत्वान्मन इत्येव यच्च ज्ञातृस्वरूपतः ।
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| एतत्सन्निहितत्वाच्च पूर्णत्वादेति कीर्तितः ॥
| |
| इतत्वाच्च ततत्वाच्च स इतन्नाम केशवः ।
| |
| गुणानामुच्चयो यस्मात् स च इत्येवशब्दितः ॥
| |
| सम्यग्ज्ञानस्वरूपत्वात् सञ्ज्ञानमिति कीर्तितः ।
| |
| आततज्ञानरूपत्वादाज्ञानं भगवान् हरिः ॥
| |
| विविधज्ञानरूपत्वाद्विज्ञानमिति कीर्तितः ।
| |
| प्रकृष्टात्मगुणज्ञानरूपः प्रज्ञानमुच्यते ॥
| |
| अविस्मृतित्वान्मेधा स दृष्टिर्दर्शनरूपतः ।
| |
| धृतिर्धारणरूपत्वात् मतिर्मासु ततत्वतः ॥
| |
| मनुनाम्नामजादीनां मनीषेशो यतो हरिः ।
| |
| सर्वप्रेरकरूपत्वाज्जूतिरित्यभिधीयते ॥
| |
| सर्वदेशेषु कालेषु स्वरूपेषु च सर्वशः ।
| |
| समं रमत इत्येव स्मृतिर्नाम जनार्दनः ॥
| |
| सर्वस्य क्ऌप्तिकर्तृत्वात् सङ्कल्प इति गीयते ।
| |
| क्रतुः स सर्वकर्तृत्वादसुरप्यसनाद्धरिः ॥
| |
| अमेयानन्दरूपत्वात् काम इत्यभिधीयते ।
| |
| अवशः स स्वतन्त्रत्वात् त्रयोविंशतिनामकम् ॥
| |
| यो वेदैवं हरिं सम्यङ् मुच्यतेऽखिलसंमृतेः ।
| |
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| | verse_line1 = ऐष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्चमहाभूतानि पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिजानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किञ्चेदं प्राणि जङ्गमं च पतत्त्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञाननेत्रम् । प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम् । प्रज्ञानेत्रोऽलोकः । प्रज्ञा प्रतिष्ठा । प्रज्ञानं ब्रह्म ।
| |
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| ब्रह्मा शिवश्च शक्रश्च देवाश्चान्ये समस्तशः ॥
| |
| तथैव पञ्चभूतानि पुण्यपापविमिश्रिताः ।
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| क्षुद्रात्मानस्तु ये मर्त्या इतरे असुरा अपि ॥
| |
| सर्वं जगदिदं विष्णोर्वशे तिष्ठति सर्वदा ।
| |
| तेनैव नीयते नित्यं तस्मिन्नेव प्रतिष्ठितम् ॥
| |
| मुक्ता येऽलोकनामानो नीयन्ते तेऽपि विष्णुना ।
| |
| स्वयं चानन्यनिष्ठत्वात् प्रतिष्ठेत्यभिधीयते ॥
| |
| देशतः कालतश्चैव गुणतश्चातिपूर्तितः ।
| |
| विष्णोर्ब्रह्मेति नामैतन्मुख्यतोऽन्यत्र न क्वचित्॥
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| | verse_line1 = स एतेन प्रज्ञेनात्मनाऽस्माल्लोकादुत्क्रम्य अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृतः समभवत् समभवत् ॥
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| सोऽलोकनामा मुक्तास्तु चितिमात्रस्वरूपतः ।
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| प्रकृष्टज्ञानरूपस्य प्रसादात् परमात्मनः ॥
| |
| अस्माद्देहात् समुत्क्रम्य गत्वोर्ध्वं लोकमुत्तमम् ।
| |
| अमृतः सन् विष्णुलोके भोगान् सम्प्राप्य पुष्कलान् ॥
| |
| भुङ्क्ते यथेष्टतो नित्यमिति वेदानुशासनम् ॥
| |
| इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ।
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| जानन्त्यापि देव्या लोकानुग्रहार्थं विशेषज्ञानार्थं च कोऽयमात्मेति पृष्टः स भगवानाह । कतरः स आत्मेति । कतरः आनन्दतमः ।
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| यत्रोभयोः प्रयोगो न तत्रैकार्थो तरप्तमौ इति शब्दनिर्णये ।
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| यत्प्रेरणादयं जीवो दर्शनादीन् करोति च । रमाब्रह्मादीनामपि तत्प्रेरितत्वात् । सर्वेषां दर्शनादिकारणत्वमेकैकमपि तस्य लक्षणं भवतीति वाशब्दः सर्वत्रानुषज्यते ।प्रजापतिः शिवः लिङ्गाभिमानित्वात् ।
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| प्रजापतिः शिवः शेषो लिङ्गमित्यभिधीयते ।
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| लिङ्गाभिमानी लोकस्य स्रष्टा गिरिश एव हि ॥इति शैवपुराणे ।
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| सममस्त्वनयोर्युद्धमिति प्राह प्रजापतिः ।
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| वाक्यं शिवस्य तत् श्रुत्वा शक्रो नेत्याह सत्वरः ॥ इति भारते ।
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| क्षुद्रमिश्राणीव बीजानि शाल्यादिबीजवत् । भिन्नस्वभावा ब्रह्मादयः सर्वजीवाः ।
| |
| ब्रह्माद्याः सर्व एवैते जीवा भिन्नस्वभावकाः ।
| |
| यथा शाल्यादिबीजानि भिन्नवीर्यानि सर्वशः ॥ इति सत्तत्त्वे ।
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| प्रथमेतराणीतिशब्दो मानुषाणाम् । द्वितीयो सुरादीनाम् । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इति । अलोकशब्देन मुक्तसमुदाय उच्यते । ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य लोकस्य सर्वं तत्प्रज्ञाननेत्रमिति विष्ण्वधीनत्वस्य पूर्वमेवोक्तत्वात् पुनः प्रज्ञाननोत्रोऽलोक इति मुक्तविषयमेव । मुक्तो ह्यलोक्यत्वादलोकः ।
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| अण्डजानि चेत्याद्युक्त्वा पुनरश्वा गाव इत्यादि देवादीनां मन आदेरेव जातानामपि स्वीकारार्थम् । अण्डजत्वाद्युत्पत्तिप्रकारोऽपि विष्ण्वधीन इति ज्ञापयितुं तत्कथनम् । तथाऽश्मानस्तृणकाष्ठाश्च सर्वे दिदृक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ते इति भारतवचनादश्मादीनामपि प्राणित्वात् तत्स्वीकारार्थं प्राणीति । गमनपतनस्थिरत्वादयोऽपि भावा विष्ण्वधीना इति ज्ञापयितुं जङ्गममित्यादिवचनम् ।
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| | |
| स एतेनेत्यलोकशब्दोक्तो मुक्तः परामृश्यते । सकलकर्ममुक्त्यनन्तरं हि शरीरादुत्क्रामति । प्रकृष्टज्ञानरूपेण विष्णुना प्रेरितः प्रज्ञेनात्मनैवोत्क्रम्य तेनैव सर्वान् कामानाप्त्वा तेनैव सर्वान् कामान् स भुङ्क्ते इति सर्वत्रानुषज्यते । प्रज्ञानेत्रोऽलोक इत्युक्ते कथं प्रज्ञानेत्रो मुक्त इत्याकाङ्क्षायां तस्यैव व्याख्यानं स एतेन प्रज्ञेनात्मनेत्यादि । अनुक्तविशेषणानामपि भगवदधीनत्वज्ञापनार्थं प्रज्ञानेत्रो लोक इति सामान्यवचनम् ।
| |
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| |
| | |
| अनारब्धफलानां च प्रारब्धानां च सर्वशः ।
| |
| कर्मणां दाह एवायं मुक्तिरित्यभिधीयते ॥
| |
| स तु मुक्तस्ततो देहादुद्गच्छति परात्मना ।
| |
| प्रेरितो विष्णुलोकं च प्राप्य भोगानवाप्य च ॥
| |
| भुङ्क्ते विष्णुप्रसादेन न विष्णोरवशः क्वचित्।
| |
| विष्णुतन्त्रा इमे सर्वे मुक्ता अपि यतोऽखिलाः ॥
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| इति ब्रह्माण्डे ।
| |
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| ब्रह्मेन्द्रादिशब्दा विष्णावेव मुख्यत इति तद्व्यावृत्त्या जीवानां स्वीकारार्थमेष इत्यादिशब्दः । स हि भगवान् स्वनेत्रकोऽपि नानुग्राह्यः । अनुग्राह्यत्वं हि ब्रह्मादीनामत्र विवक्षितम् । नेयताऽनुग्राह्यतापि न सा विष्णोः स्वतोऽपि तु इति शब्दतत्त्वे ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके षष्ठोऽध्यायः ॥
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| === सप्तमोऽध्यायः ===
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| | verse_line1 = ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता । मनो वाचि प्रतिष्ठितम् । आविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थ श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके सप्तमोऽध्यायः ॥ ॥ इति द्वितीयारण्यकः समाप्तः॥
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| वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता । अवबोधरूपे विष्णौ प्रतिष्ठिता । स च विष्णुर्मे वाचि स्थितः । यदेतद्धृदयं मनश्चेति विष्णुनामधेयेषूक्तत्वात् । आविराविर्म एधि हे विष्णो ममाविराविर्भव । आणीस्थित आण्यां स्थित विष्णो इति सम्बोधनम् ।
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| आधारः सर्ववेदानां वेदाणी प्राण उच्यते ।
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| तस्मिन् स्थितो हरिर्नित्यमाणीस्थ इति गीयते ॥
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| इति शब्दतत्त्वे ।
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| आविरावीरिति दैर्घ्यमतिशयार्थे । आधिक्येऽधिकमिति सूत्रात् । अणशब्दस्य गतिवाचित्वाच्चलमाणमुच्यते । तस्य धारणेन तद्वानाणी । स्थापक इत्यर्थः । मे श्रुतं मा प्रहासीः मम विद्यागोचर एव सर्वदा भव । विस्मृतो मा भव । हे विष्णो अनेन त्वद्विषयेणैवाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । सर्वाहोरात्रेष्वपि त्वद्विषयाध्ययनमेव करोमीत्यर्थः । ऋतं यथावदवगतं त्वां वदिष्यामि । सत्यं साधुगुणैस्ततं सर्वनियन्तारं च । तद्विष्ण्वाख्यं ब्रह्म मामवत्विति तस्यैव विष्णोः परोक्षत्वेनैव प्रार्थनम् ।
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| वाङ्म इत्यादिकं खण्डं विष्णुप्रार्थनरूपकम् ।
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| अविघ्नत्वमभीप्सूनां शिष्याणां दृष्टवान् हरिः ॥ इति च ॥
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| == तृतीयारण्यके ==
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| === प्रथमोऽध्यायः ===
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| विष्णुनाम्नि षकारस्य णकारस्य च संहिताम् ।
| |
| विष्णोस्तु बहुरूपाणां वाचिकामृषयो विदुः ॥
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| तौ च वर्णौ हरेः सम्यक्स्वरूपप्रतिपादकौ ।
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| बहुधैव स्थितस्यास्य सदैवैकस्वरूपिणः ॥
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| विष्णुनामार्थरूपत्वाद् वेदानामपि सर्वशः ।
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| अन्येषामपि शब्दानां संहिता विष्णुवाचिकाः ॥
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| तद्वाचकास्तथा वर्णाः सर्वे लौकिकवैदिकाः ।
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| |
| | |
| पृथिवीनामकं रूपं पृथुत्वात् पृथिवीस्थितम् ॥
| |
| देवता पूर्ववर्णस्य पूर्वरूपं तदुच्यते ।
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| देवतोत्तरवर्णस्य क्रीडनाच्च द्युनामकम् ॥
| |
| दिवि स्थितं हरे रूपमुत्तरं रूपमुच्यते ।
| |
| वेदकत्वाच्चायनत्वाद्रूपं यद्वायुनामकम् ॥
| |
| विष्णोस्तद्वर्णयोर्मध्यदेवतेति प्रकीर्तितम् ।
| |
| संहितानामकं तच्च रूपद्वयसहस्थितेः ॥
| |
| वर्णद्वयं विकारं च षकारं केचिदब्रुवन् ।
| |
| षकारं मध्यमत्रैव णकारं केचिदुत्तरम् ॥
| |
| पृथक्करणमेवैषां वर्णयोर्मध्यमुच्यते ।
| |
| उपसर्गमात्रं वीत्याहुः केचिन्नाम ष्णुमात्रकम् ॥
| |
| षकारं च णकारं च वर्णौ पूर्वोत्तरावपि ।
| |
| व्यक्तिरेवोष्मणस्तत्र मध्यमित्यभिधीयते ॥
| |
| सर्वेप्येत उपादेयाः पक्षा निर्दोषका यतः ॥
| |
| इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ॥
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| आकाशस्थ आकाशनामा भगवान् वर्णयोर्मध्यदेवतेति माक्षव्यः । उभयरूपसंहितत्वात् संहितानामकः । स माण्डूकेयस्तेन माक्षव्येणापरिहृतः स्वपक्षः इति मेने । मे मदीयेन मदुपासितेनास्याकाशस्य पुत्रेण वायुना न समागादसौ माक्षव्यः । वायुस्थविष्ण्वनुपासनात् । यद्यप्याकाशस्थो भगवान् संहितानामको भवति । तथापि न वायुस्थस्यासंहितात्वं भवतीत्यपरिहृतत्वम् । परिहृतो माण्डूकेयपक्ष इत्यहं मेन इत्यागस्त्यः । आकाशे विष्णूपासनस्याधिकफलत्वात् । पिता ह्याकाशो वायोः ।
| |
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| | verse_line1 = समानं ह्येतद्भवति वायुश्चाकाशश्चेत्यधिदैवतम् ।
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| भगवतस्तु पक्षः समत्वमेव वाय्वाकाशयोरिति । आकाशस्य पितृत्वाद् वायोर्बलाधिकत्वाच्चोभयोरुपासनास्थानत्वे साम्यम् । तस्मादुभावपि ग्राह्यौ । त्वगिन्द्रियदेवतात्वेनाकाशात् पूर्वमेव वायोः सात्विकाहङ्कारजत्वाद् वायोराकाशाद्गुणाधिकत्वम् । तथाप्यत्राकाशस्य पितृत्वं व्याप्तिश्चाधिकेत्युपासनायां साम्यम् ॥
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| | verse_line1 = अथाध्यात्मम् । वाक्पूर्वरूपम् । मन उत्तररूपम् । प्राणस्संहितेति शूरवीरो माण्डूकेयः । अथ हास्य पुत्र आह ज्येष्ठः। मनः पूर्वरूपम् । वागुत्तररूपम् । मनसा वा अग्रे सङ्कल्पयति । अथ वाचा व्याहरति । तस्मान्मन एव पूर्वरूपम् । वागुत्तररूपम् । प्राणस्त्वेव संहितेति । समानमेनयोरत्र पितुश्च पुत्रस्य च ।
| |
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| अत्र प्राणाख्यस्य प्राणे स्थितस्य विष्णोः संहितानामत्वे पितापुत्रयोः साम्यमेव । अन्यत्र तु पुत्रपक्ष एव बलीयान् । युक्तिमत्वात् ।
| |
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| | verse_line1 = स एषोऽश्वरथः प्रष्टिवाहनो मनोवाक्प्राणसंहतः । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन । सर्वमायुरेतीति नु माण्डूकेयानाम् ॥ १ ॥
| |
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| |
| | |
| मनोवाक्प्राणनामाऽसौ मन आदिषु संस्थितः ।
| |
| विष्णुस्तस्य रथो देह इन्द्रियाश्वः प्रकीर्तितः ॥
| |
| इति च ।
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| |
| | |
| प्रष्टिः स पृच्छनीयत्वात् परमात्मा जनार्दनः ।
| |
| वक्तृत्वाच्चैव वाङ्नामा मनो मन्तृत्वहेतुतः ॥
| |
| इति च ।
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| |
| | |
| प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति ।
| |
| वदन् वाक्पश्यंश्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यस्यैव तानि कर्मनामान्येव इति च श्रुतिः ।
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| |
| | |
| मुक्तिरेव स्वर्गलोकः । अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वेति प्रस्तुतत्वात् ।
| |
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| |
| | |
| मुक्तः प्रकृष्टज्ञानैश्च वेदैर्विष्णूत्थतेजसा ।
| |
| नित्यायुषा च युक्तः स्यात् संहितारूपविद्धरेः ॥ इति च ।
| |
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| |
| | |
| प्रकृष्टत्वेन जननात् प्रजेति ज्ञानम् । पान्ति शंसाधनाश्चेति पशवो वेदाः । परब्रह्मणो विष्णोर्वरणादेव सम्यक् चायितं स्वरूपं तेजः ब्रह्मवर्चसम् । लौकिकप्रजादिकमपि तदिच्छतां यथायोग्यं भवति । माण्डूकेयैर्ऋषिभिरुपाश्रिता एता विद्याः ॥ १ ॥
| |
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| | verse_line1 = अथ शाकल्यस्य । पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । वृष्टिः सन्धिः । पर्जन्यः सन्धाता । तदुतापि यत्रैतद्बलवदनूद्गृह्णन् सन्दधदहोरात्रे वर्षति । द्यावापृथिव्यौ समधातामित्युताप्याहुरितीन्वधिदैवतम् ।
| |
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| |
| | |
| वराहो वामनः सिंह इति रूपत्रयं हरेः ।
| |
| पूर्वोत्तरार्णमध्येषु स्थितमुक्तं सनातनम् ॥
| |
| माण्डूकेयैर्हि शाकल्यो वासुदेवादिरूपिणम् ।
| |
| तेषु चोच्चारके चैव स्थितमाह चतुर्विधम् ॥
| |
| तेषु चोच्चारके चैव स्थितमाह चतुर्विधम् ।
| |
| भूमिद्युवृष्टिपर्जन्यनाम्नोर्व्यादिषु संस्थितम् ॥
| |
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| |
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| | verse_line1 = अथाध्यात्मम् ॥
| |
| | verse_line2 = पुरुषो ह वा अयं सर्व आनन्दं द्वे विदले भवत इत्याहुः । तस्येदमेव पृथिव्या रूपम् । इदं दिवः । तत्रायमन्तरेणाकाशो यथाऽसौ द्यावापृथिव्यावन्तरेणाकाशः । तस्मिन्हास्मिन्नाकाशे प्राण आयत्तो यथाऽमुष्मिन्नाकाशे वायुरायत्तः । यथाऽमूनि त्रीणि ज्योतींष्येवमिमानि पुरुषे त्रीणि ज्योतींषि । यथाऽसौ दिव्यादित्य एवमिदं शिरसि चक्षुर्यथाऽसावन्तरिक्षे विद्युदेवमिदमात्मनि हृदयं यथाऽयमग्निः पृथिव्यामेवमिदमुपस्थे रेतः । एवमु ह स्म सर्वलोकमात्मानमनुविधायाहेदमेव पृथिव्या रूपमिदं दिवः । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥
| |
| | verse_line3 = २॥
| |
| | commentary1 = aitareya
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| | text =
| |
| | |
| उर्व्यादीनां चतुर्णां च देह एव स्थितिं पुनः ।
| |
| अधरार्धस्य चोर्व्याश्च साम्यमन्यस्य वै दिवा ॥
| |
| वाचो वृष्ट्यैव साम्यं च पर्जन्येनैव चात्मनः ।
| |
| तेषां तेषु स्थितिं चैव विष्णोश्च चतुरात्मनः ॥
| |
| आकाशस्यान्तराकाशे नृसिंहस्यात्र संस्थितिम् ।
| |
| वायोः प्राणात्मतां चैव तत्र दाशरथेः स्थितिम् ॥
| |
| सूर्यविद्युद्धुताशानां दृग्घृद्रेतःसु च स्थितिम् ।
| |
| कपिलस्य च हंसस्य जामदग्न्यस्य तेषु च ॥
| |
| स्थितिं वदति विद्येयमपि मोक्षप्रदायिनी ॥ इत्यादि च ।
| |
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| |
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| |
| | |
| वर्षणाद् वृष्टिः । परं जनयतीति पर्जन्यनामा विष्णुः । सन्धिनोतीति सन्धिः । धिनु पृष्टाविति धातुः । सम्यग्धारणात् सन्धाता । वर्षणमेव द्यावापृथिव्योः सन्धानम् । पर्जन्यस्थो भगवांस्तत्कर्ता ॥२॥
| |
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| | verse_line1 = अथातो निर्भुजप्रवादाः । पृथिव्यायतनं निर्भुजम् । दिव्यायतनं प्रतृण्णम् । अन्तरिक्षायतनमुभयमन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तमुपवदेदच्योष्ठाऽवराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तमुपवदेदच्योष्ठा उत्तराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयात् । यस्त्वेवोभयमन्तरेणाह तस्य नास्त्युपवादः ।
| |
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| |
| | |
| पृथिवीस्थो वराहस्तु संहितादेवतोदिता ।
| |
| दिविष्ठो वामनश्चैव सम्प्रोक्तः पददेवता ॥
| |
| नृसिंहस्त्वन्तरिक्षस्थो भगवान् क्रमदेवता ।
| |
| स्वाध्यायमेवं ध्यात्वा यः करोत्युपवदेन्न तम् ॥
| |
| तस्यापवदिता याति त्रैलोक्यादध एव हि ।
| |
| नाशमाप्नोति निरये तस्मादपवदेन्न तम् ॥
| |
| गच्छस्यध इति ब्रूयादन्यं ब्राह्मणतस्तथा ।
| |
| ब्रह्मप्राप्तेर्हि योग्यो यो ब्राह्मणः स न चेतरः ॥
| |
| इति च ॥
| |
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| |
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| |
| | |
| भञ्जनवर्जितत्वान्निर्भुजं संहिता । तृण च्छेदन इति धातोः प्रतृण्णं पदम् । उभयमन्तरेण क्रमः । निर्भुजमूलत्वात् पदादीनां तद्विषयप्रवादा अपि निर्भुजप्रवादा इत्येवोच्यन्ते ।पृथिवीस्थितपृथिवीनामकविष्ण्वायतनं पृथिव्यायतनमित्यादि । अवराभ्यां पृथिव्यन्तरिक्षाभ्यां च्युतोऽसीति । उत्तराभ्यामन्तरिक्षद्युभ्याम् ।
| |
| }}
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| |
| | |
| क्रमस्वाध्यायकृद्यस्तं विशेषेण न निन्दयेत् ।
| |
| लोकत्रयादपि भ्रष्टो यस्मात् तन्निन्दको भवेत् ॥ इति च ।
| |
| तस्मादतिदुष्टत्वात् तन्निन्दको नास्त्येवेत्युक्तं तस्य नास्त्युपवाद इति । तं कृष्णं पुण्डरीकाक्षं को नु युध्येत बुद्धिमान् इत्यादिवत् ।
| |
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| | verse_line1 = यद्धि सन्धिं विवर्तयति तन्निर्भुजस्य रूपम् । अथ यच्छुद्धे अक्षरे अभिव्याहरति तत्प्रतृण्णस्य । अग्र उ एवोभयमन्तरेणोभयं व्याप्तं भवति । अन्नाद्यकामो निर्भुजं ब्रूयात् । स्वर्गकामः प्रतृण्णम् । उभयकाम उभयमन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तं पर उपवदेत् पृथिवीं देवतामारः पृथिवी त्वा देवता रिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तं पर उपवदेद्दिवं देवतामारो द्यौस्त्वा देवता रिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनमुभयमन्तरेण ब्रुवन्तं पर उपवदेदन्तरिक्षं देवतामारोऽन्तरिक्षं त्वा देवता रिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । यथा तु कथा च ब्रुवन्वाब्रुवन्तं वा ब्रूयादभ्याशमेव यत्तथा स्यात् ।
| |
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| |
| | |
| उपवदेदित्युक्तो मनुष्यमात्रः । पर उपवदेदित्यसुरः । सर्वशत्रुत्वात् ।
| |
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| |
| | |
| अमुक्तियोग्यैस्तु नरैर्विदुषां निन्दने कृते ।
| |
| ब्रूयाल्लोकच्युतोऽसीति निन्दितोऽसुरसर्गगैः ॥
| |
| नाशयिष्यति विष्णुस्त्वामन्धे तमसि पातयेत् ।
| |
| इति ब्रूयान्न तु ब्रूयाद्देवसर्गात्मकं क्वचित्॥ इति च ।
| |
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| |
| | |
| षणयोः सन्धिकरणात् संहिताध्ययनं भवेत् ।
| |
| विषणुस्त्विति यो ब्रूयात् पदाध्यायी भवेत सः ॥
| |
| सन्ध्युक्तिश्च विभागश्च द्वयं व्याप्तं क्रमेण तु ।
| |
| तस्माद् द्विधाऽपि वचनात् क्रमाध्यायी भवेत सः ॥
| |
| भोगवृद्धिं च यो मोक्ष इच्छेद्विष्णव इत्यसौ ।
| |
| मोक्षकामो विषणवे द्वयकामो द्वयं वदेत् ॥
| |
| विष्णुनामात्मकत्वाच्चाथ संहितपदक्रमाः ।
| |
| सर्ववेदस्थिता मोक्षतद्भोगद्वयसाधकाः ॥
| |
| तज्ज्ञानामेव नान्येषामिति वेदानुशासनम् ।
| |
| संहिताद्या ब्रुवन् वाऽपि य एवंविन्न चाब्रुवन् ॥
| |
| परिवादं ब्रुवन्तं वा न ब्रुवन्तमथापि वा ।
| |
| यद्वदेत् तत्तथैव स्यात् क्षिप्रमेव न संशयः ॥ इति च ।
| |
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| |
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| अग्र एव । अग्र्यमेवोभयमन्तरेण ।
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| | verse_line1 = न त्वेवान्यत्कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माऽऽह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ ३ ॥
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| | commentary1 = aitareya
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| द्युम्नो द्युतिस्वरूपत्वाद् विष्णुरेव प्रकीर्तितः ।
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| योऽतिक्रमति तस्याज्ञामतिद्युम्नः प्रकीर्तितः ॥
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| मोक्षयोग्योऽपि यस्त्वेवमतिद्युम्नो भवेत् पुमान् ।
| |
| लोकच्युतोऽसीत्येवं तं ब्रूयान्नाज्ञास्थितं क्वचित्॥
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| लोकच्युतो भवेत्येनमपि नैव वदेत् क्वचित्।
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| च्युतोऽसीति तु शिक्षार्थं ब्रूयान्नैवान्यथा क्वचित्॥ इति च ॥३ ॥
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| | verse_line1 = अथातोऽनुव्याहाराः । प्राणो वंश इति विद्यात् । स य एनं प्राणं वंशमुपवदेच्छक्नुवन्तं चेन्मन्येत प्राणं वंशं समधां३ । प्राणं मा वंशं सन्दधतं न शक्नोषीत्याह । प्राणस्त्वा वंशो हास्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ चेदशक्नुवन्तं मन्येत प्राणं वंशं समधित्सिषन्तं नाशकः सन्धातुं प्राणस्त्वा वंशो हास्यतीत्येनं ब्रूयात् । यथा तु कथा च ब्रुवन्वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयादभ्याशमेव यत् तथा स्यात् । न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥
| |
| | verse_line2 = ४ ॥
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| भगवदुपासकस्य यस्मिन् कस्मिंश्चिद्दोष उक्ते तं प्रत्युक्तिप्रकारः पूर्वं दर्शितः । अनुव्याहारशब्देन भगवदुपासनाविषय एवास्याशक्त्यादिदोषं वदतः प्रत्युक्तिरुच्यते । निर्भुजं वदन्तमित्यादि त्ववस्थामात्रदर्शनम् । आत्मनो ज्ञानसामर्थ्यानुसारेण वक्तव्यत्वादनुव्याहारः ।
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| सर्वाधारत्वतो वंश इत्युपासीत यो हरिम् ।
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| वायुं च मुक्तिमाप्नोति य एवं तदुपासकम् ॥
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| निन्देत विष्णुविज्ञानविषये तं वदेत सः ।
| |
| विष्णुना वंशभूतेन वायुना सहितं तथा ॥
| |
| न शक्नोषीति मामात्थ हास्यतस्त्वामतो हि तौ ।
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| ज्ञानसामर्थ्यवानित्थं ब्रूयाद्देवादिरुत्तमः ॥
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| अन्यो गन्धर्वपित्रादिरल्पज्ञानबलो हि यः ।
| |
| स ब्रूयाद्विष्णुवायुभ्यां सन्धिमिच्छन्तमेव माम् ॥
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| सन्धातुं नाशको यस्माद्धास्यतस्त्वामतो हि तौ ॥ इति च ।
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| स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत् प्राणं प्रत्येनमुपासकमुपवदेत् । प्राणस्य विष्णोः प्रियत्वं तव न प्राप्स्यतीति । नाशकः सन्धातुं मया सह सन्धानं कर्तुं नाशकः । मम प्रीतिं कर्तुं नाशकः ।
| |
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| |
| | |
| तद्भक्तभक्तेष्वपि यो न कुर्यात् प्रीतिमञ्जसा ।
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| विष्णुर्जहाति तं पापमिह चामुत्र च प्रभुः ॥ इति च भारते ॥४ ॥
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| | verse_line1 = अथ खल्वाहुर्निर्भुजवक्त्राः । पूर्वमक्षरं पूर्वरूपम् । उत्तरमुत्तररूपम् । योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सा संहितेति ॥
| |
| | verse_line2 = स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । अथ वयं ब्रूमो निर्भुजवक्त्रा इति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः । पूर्वमेवाक्षरं पूर्वरूपम् । उत्तरमुत्तररूपम् । योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण येन सन्धिं विवर्तयति येन स्वरास्वरं विजानाति येन मात्रामात्रां विभजते सा संहितेति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । अथ हास्य पुत्र आह मध्यमः प्रातीबोधीपुत्रः । अक्षरे खल्विमे अविकर्षन्ननेकीकुर्वन् यथावर्णमाह । तद्याऽसौ मात्रा पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सन्धिविज्ञपनी साम तद्भवति । सामैवाहं संहितां मन्य इति ।
| |
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| | |
| पूर्ववर्णस्थितं यत्तद्रूपं पूर्वाक्षराभिधम् ।
| |
| वराहाख्यं हरेरन्यवर्णगं वामनाभिधम् ॥
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| उत्तराक्षरसञ्ज्ञं च वर्णयोरन्तरस्थितम् ।
| |
| अवनात् काशनाच्चैतदवकाशाभिधं हरेः ॥
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| नृसिंहरूपमित्याहुर्निर्भुजास्यास्तथावदत् ।
| |
| ह्रस्वो येनाक्षरोच्चारो मात्रासन्धिस्वरात्मकः ॥
| |
| व्यासरूपो हरिः साक्षात् संहितानामकस्त्विति ।
| |
| तत्पुत्रो मध्यमः प्राह समोच्चारणकारणः ॥
| |
| सामनामा वासुदेवः संहितानामवानिति ॥
| |
| इति च ।
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| मापयति त्रायति चेति मात्रा भगवान् । यथोच्चारितवर्णयोर्मध्यस्थितश्च ।
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| | verse_line1 = तदप्येतदृषिणोक्तं– बृहस्पते न परः साम्नो विदुरिति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ ५ ॥
| |
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| मानस्तेनेभ्यो ये अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः ।
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| येषां नैतन्नापरं किं च नैकं ब्रह्मणस्पते ब्रूहि तेभ्यः कदाचित्॥
| |
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| |
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| | |
| अथो शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः ।
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| आदेवानामोहते वि व्रयो हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः ॥
| |
| अभिद्रुहस्पदे अभितो द्रोहस्य नित्यनिरतिशयदुःखस्यान्धतमसो योग्याः शास्त्रदस्यवः ।
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| ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः ।
| |
| शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथावादबला जनाः ॥
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| कामक्रोधाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः ।
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| याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः ॥
| |
| ब्रह्मस्तेना निरानन्दाः अपक्वमनसोऽशिवाः ।
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| वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ॥
| |
| तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ॥
| |
| इति मोक्षधर्मे भगवद्वचनादेवंविधा एव स्तेनाः । अभिद्रुहस्पदस्थाश्च । निरामिणः रामस्य रमणरूपस्य पूर्णानन्दस्वरूपस्य विष्णोर्जीवस्वरूपताज्ञानेन नीचताविदः । त एव रिपवश्च तस्य ।
| |
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| | |
| अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
| |
| परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
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| मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
| |
| राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥
| |
| इत्यादिवचनादसुरादयः ।
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| | |
| अन्नेषु जागृधुः भोगमात्रगृध्नवः । येषामेतत्सर्वोत्तमं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म नास्तीति पक्षः । ईशितव्ये विद्यमाने हीश्वरो भवतीति । न चापरं किञ्चित्परमापेक्षया ह्यपरमिति । किं तर्हि किञ्चनैकं किमप्येकमेव वस्त्वस्ति न परमपरं चेति तेषां पक्षः ।
| |
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| |
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| |
| | |
| असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
| |
| अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥
| |
| एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
| |
| प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥
| |
| ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥
| |
| इत्यादि वचनात् ।
| |
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| |
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| |
| | |
| ब्रह्मणस्पते ब्रह्मणो वेदस्य पते वायो । अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः । एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः इत्यादि श्रुतेरेतादृशेभ्यो मा ब्रूहि । शमेन विष्णुनिष्ठया उप समीपे तस्मिन्नेव रताः साम्नो विष्णोः परं किमपि न विदुः । तदेव देवानां व्रयः । सर्वदेवानां परतमं विष्ण्वाख्यं ब्रह्म हृदा व्योहते । वासुदेवादिरूपेण वरं नियामकं चेति व्रयः । तेभ्यो ब्रूहि ।
| |
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| |
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| |
| | |
| वायुं विद्याः समासाद्य सर्वासां पतिमूचिरे ।
| |
| स्तेनेभ्यो मैव नो ब्रूहि ब्रूह्यथो वैष्णवेषु च ॥
| |
| इति च ।
| |
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| |
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| |
| | |
| सामनाम्ना श्रुतिर्यस्माद्विष्णुमाह ततः प्रियम् ।
| |
| तन्नाम विष्णोरिह तु संहितार्थं वदेद्यतः ॥
| |
| इति वचनात् ।
| |
| सामनाम्नः संहिताशब्दार्थत्वाद्विष्णोस्तस्य नाम्नः श्रुतिसिद्धत्वाच्च सामनाम्नो वासुदेवरूपसमाख्यासु पञ्चरात्रे पठितत्वाच्च तद्रूपं संहितानामकमिति युक्तमित्यभिप्रायः ॥५ ॥
| |
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| | verse_line1 = बृहद्रथन्तरयो रूपेण संहिता सन्धीयत इति तार्क्ष्यःवाग्वैरथन्तरस्य रूपम् । प्राणो बृहतः । उभाभ्यामु खलु संहिता सन्धीयते वाचा च प्राणेन च । एतस्यां ह स्मोपनिषदि संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । एतस्यां ह स्म मात्रायां संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । तदप्येतदृषिणोक्तं– रथन्तरमाजभारा वसिष्ठः । भरद्वाजो बृहदाचक्रे अग्नेरिति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।
| |
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| |
| | |
| देवता पूर्ववर्णस्य लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता ।
| |
| नारायणस्तूत्तरस्य तौ वाक्प्राणाभिधौ मतौ ॥
| |
| मध्यस्थः संहितानामा सोऽर्धनारीपुमात्मकः ।
| |
| वेदात्मकत्वाद् वाङ्नाम्नी लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता ॥
| |
| प्राणनामा प्रणेतृत्वात् साक्षान्नारायणः स्वयम् ।
| |
| रमित्यानन्द उद्दिष्टः सम्भोग्यं थमुदाहृतम् ॥
| |
| विष्णुभोग्या रतितरा लक्ष्मीरेव रथन्तरम् ।
| |
| नारायणो बृहत्वात्तु बृहन्नामा प्रकीर्तितः ॥
| |
| रथन्तरस्य बृहतो देवते चैव तावुभौ ।
| |
| वाक्प्राणसंस्थितौ चैव ताभ्यामेव हि सन्धितम् ॥
| |
| लक्ष्मीनारायणं रूपं संहितानामकं शुभम् ।
| |
| एतां विद्यामवाप्तुं हि वत्सरं गा अरक्षत ॥
| |
| तार्क्ष्य एतावन्मात्रं च समुद्दिश्य न चापरम् ।
| |
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| |
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| | verse_line1 = वाक्प्राणेन संहितेति कौण्ठरव्यः । प्राणः पवमानेन पवमानो विश्वैर्देवैः स्वर्गेण लोकेन स्वर्गो लोको ब्रह्मणा । सैषाऽवरपरा संहिता । स यो हैतामवरपरां संहितां वेदैवं हैव स प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सन्धीयते यथैषा संहिता ।
| |
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| |
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| | text =
| |
| | |
| संहितादेवता बह्व्य इति कुण्ठरवात्मजः ॥
| |
| द्वयं द्वयं देवतानां मिलितं हरिशर्ववत् ।
| |
| संहितानामकं तत्र वर्णमध्यस्य देवता ॥
| |
| तयोरेकं देवतयोः परमन्यत् तथाऽवरम् ।
| |
| अवरस्य परस्यापि संयोगात् संहिता तु सा ॥
| |
| प्रोक्ताऽवरपरेत्येव वाक्प्राणाख्यौ रमाच्युतौ ।
| |
| संहितैका तथैवान्या केशवो वायुसंयुतः ॥
| |
| वायुः स पवमानाख्यो देवताश्चाखिला अपि ।
| |
| तृतीया संहिता प्रोक्ता देवतास्ताः सशङ्कराः ॥ | |
| चतुर्थी संहिता प्रोक्ता शङ्करो ब्रह्मणा सह ।
| |
| पञ्चमी संहिता चैव संहिता मोक्षदा इमाः ॥
| |
| प्रथमायां द्वितीयायां विष्णुरेव परो मतः ।
| |
| तृतीयायां वायुरेव चतुर्थ्यां सर्वदेवताः ॥
| |
| विरिञ्च एव पञ्चम्यामवरा इतरे ततः ।
| |
| प्रथमायां संहितायामवरो वामभागगः ॥
| |
| द्वितीयायां तु परमस्तृतीयायां तथाऽवरः ।
| |
| चतुर्थ्यां परमश्चैव पञ्चम्यां वामगोऽवरः ॥
| |
| अवराद्याः परान्ता यदेताः सर्वाश्च संहिताः ।
| |
| ततोऽवरपराः प्रोक्ता नैवोक्तास्ताः परावराः ॥
| |
| अभिमानी द्युलोकस्य शिवः सर्वस्य लोकनात् ।
| |
| द्योतनाच्च ....
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = स यदि परेण वोपसृतः स्वेन वाऽर्थेनाभिव्याहरेदभिव्याहार्षन्नेव विद्याद्दिवं संहिताऽगमद्विदुषां देवानामेवं भविष्यतीति । शश्वत् तथा स्यात् । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।
| |
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| |
| | |
| .... यदि ब्रूयान्मन्त्रमेतमथापि वा ॥
| |
| आत्मार्थेऽथ परार्थे वा चिन्तयेदेवमञ्जसा ।
| |
| विद्वांसो देवता यस्मात् सम्यक्तेन महत्फलम् ॥
| |
| तेषामेव हरिश्चैव संहितारूपकः प्रभुः ।
| |
| अगमद्देवलोकं हि कर्तुं देवेष्वनुग्रहम् ॥
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| इति चिन्तयतस्तेषां प्रसादात् फलमञ्जसा ।
| |
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| | verse_line1 = वाक्संहितेति पञ्चालचण्डः वाचा वै वेदास्सन्धीयन्ते । वाचा च्छन्दांसि । वाचा मित्राणि सन्दधति । वाचा सर्वाणि भूतानि । अथो वागेवेदं सर्वमिति । तद्यत्रैतदधीयते वा भाषते वा वाचि तदा प्राणो भवति । वाक् तदा प्राणं रेह । अथ यत्र तूष्णीं वा भवति स्वपिति वा प्राणे तदा वाग्भवति । प्राणस्तदा वाचं रेह । तावन्योन्यं रीहः । वाग्वै माता । प्राणः पुत्रः । तदप्येतदृषिणोक्तम्–
| |
| | verse_line2 = एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं विश्वं भुवनं विचष्टे ।
| |
| | verse_line3 = तं पाकेन मनसाऽपश्यमन्तितस्तं माता रेळ्हि स उ रेळ्हि मातरम् ॥ इति ।
| |
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| |
| | |
| पञ्चालचण्डो वाचं तु ब्रह्माणीं हि सरस्वतीम् ॥
| |
| मन्यतेऽस्याः पुत्रवच्च देवं नारायणं प्रभुम् ।
| |
| वेदैर्हि व्यज्यते विष्णुः सा च वेदाभिमानिनी ॥
| |
| प्राणस्थो भगवान् विष्णुः प्राणनामा प्रणेतृतः ।
| |
| ब्रह्मणोऽपि पिता नित्यं भगवान् पुरुषोत्तमः ॥
| |
| उपचर्यते पुत्र इति वेदैर्यद्व्यज्यते हरिः ।
| |
| सा देवी संहितानाम्नी वाच्योऽस्या विष्णुरेव हि ॥
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| | verse_type = mantra
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| | verse_line1 = अथातः प्रजापतिसंहिता । जाया पूर्वरूपम् । पतिरुत्तररूपम् । पुत्रः सन्धिः । प्रजननं सन्धानम् । सैषाऽदितिः संहिता । अदितिर्हीदं सर्वं यदिदं किञ्च । पिता च माता च पुत्रश्च प्रजननं च तदप्येतदृषिणोक्तम्– अदितिर्माता स पिता स पुत्र इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति सर्वमायुरेति ॥
| |
| | verse_line2 = ६ ॥
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| | commentary1 = aitareya
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| }}
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये तृतीयारण्यके प्रथमोऽध्यायः ॥
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| प्रजापत्याख्यशर्वेण प्रोक्ताऽन्या संहितापि हि ।
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| विष्णुरेवादितिर्नाम सर्वस्यात्ता यतः प्रभुः ॥
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| स एव पितृसंस्थस्तु पातृत्वात् पितृनामकः ।
| |
| देवतोत्तरवर्णस्य मातृस्थो मातृनामकः ॥
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| माननात् पूर्ववर्णस्य देवतेति प्रकीर्तितः ।
| |
| पोषकत्वात् सन्धिनामा वर्णयोरन्तरस्थितः ॥
| |
| स एव पुत्रसंस्थश्च पुत्रनामा जनार्दनः ।
| |
| त्राणात् पूर्तित एवासौ वर्णसन्धानकर्मणि ॥
| |
| सन्धाननामा सन्धानकर्तृत्वात् पुरुषोत्तमः ।
| |
| प्रजातिकर्मसंस्थश्च स एव प्रजनाभिधः ॥
| |
| जनकत्वात् परो विष्णुरेवं विष्णुर्हि संहिता ।
| |
| वासुदेवादिरूपेण चतुर्धैवं व्यवस्थितः ॥
| |
| स एव दिवि संस्थश्च द्युनामा क्रीडनात् प्रभुः ।
| |
| अन्तरेवेक्षणाच्चैव सोऽन्तरिक्षोऽन्तरिक्षगः ॥
| |
| पृथिवी पृथिवीस्थश्च प्रथितत्वाज्जनार्दनः ।
| |
| मुख्यार्थत्वात् सर्वनाम्नां सर्वदेवाभिधो हरिः ॥
| |
| विश्वे देवा इति प्रोक्तो बहुधा तेषु संस्थितः ।
| |
| ज्ञानद्युतेर्देवनामा स्थितो देवेषु केशवः ॥
| |
| गां धारयंश्च गन्धर्वो गन्धर्वेषु व्यवस्थितः ।
| |
| माननान्मानुषो नाम मानुषेषु स्थितो हरिः ॥
| |
| पालनात् पितृनामासौ पितृष्वेव व्यवस्थितः ।
| |
| रतेः प्राणेऽसुराख्यश्च सोऽसुरेषु व्यवस्थितः ॥
| |
| एवं पञ्चजनेषुस्थो हरिः पञ्चजनाभिधः ।
| |
| जातनामा जातसंस्थः प्रादुर्भूतगुणत्वतः ॥
| |
| जनिक्रियास्थितश्चासौ जनित्वमिति गीयते ।
| |
| जनिं यस्मात् तवयति तवनं हि प्रकाशनम् ॥
| |
| इति च ।
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| | text =
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| प्रथश्च सप्रथश्चैव राजानौ मत्स्यदेशजौ ।
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| यापयामासतुर्विष्णोर्हविर्नाम्नो हविर्मुखे ॥
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| अनुष्टुब्देवता यस्तु नृसिंहो जगतोऽस्य च ।
| |
| स्वमुखे हवनादेव हविरित्यभिधीयते ॥
| |
| तस्मिन् यज्ञे वसिष्ठस्तु चतूरूपाज्जनार्दनात् ।
| |
| आजहार श्रियं देवीं रथन्तरवराभिधाम् ॥
| |
| चतुर्मूतिः स्तुतस्तेन प्रेषयामास तां श्रियम् ।
| |
| सा चास्मै प्रददौ विद्यां प्रययौ च पुनर्हरिम् ॥
| |
| धातेत्युक्तोऽनिरुद्धस्तु प्रद्युम्नस्तु द्युनामकः ।
| |
| वासुदेवः प्रसविता सर्वस्य प्रसवाद्विभुः ॥
| |
| सङ्कर्षणो विष्णुनामा प्रणेतृत्वाद् बलादपि ।
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| चतूरूपं परं विष्णुं राजानौ प्रथसप्रथौ ॥
| |
| भरद्वाजौ वसिष्ठश्च ध्यात्वाऽविन्दन् परात् परम् ।
| |
| यजनीयो यजुर्नामा विष्णुः सङ्कर्षणाभिधः ॥
| |
| जीवानां स्कन्दनादेव स्कन्नः प्रद्युम्न उच्यते ।
| |
| प्रथमो वासुदेवस्तु देवयानोऽनिरुद्धकः ॥
| |
| प्राप्यो देवैर्यतो नित्यमनिरुद्धाभिधो हरिः ।
| |
| तस्मादेवं चतुर्मूर्तेः स्तुतिसन्तोषिताद्धरेः ॥
| |
| आजहार भरद्वाजो रूपं नारायणाभिधम् ।
| |
| तद्बृहन्नामकं विष्णोश्चातुरात्म्यात् समुद्गतम् ॥
| |
| भरद्वाजमुपागम्य प्रादान्मोक्षवरं परम् ।
| |
| चतुर्मूर्तिः स भगवानग्निरित्यभिधीयते ॥
| |
| अग्र्यत्वात् सर्वभूतानाम् एवं चत्वार एव ते ।
| |
| अविन्दंस्तं चतुर्मूर्तिं साक्षान्नारायणं प्रभुम् ॥
| |
| गुहायां संस्थितमपि ह्यतीव हितमस्य च ।
| |
| सर्वज्ञत्वाद्यज्ञनाम्नो विष्णोस्तेजः परं हि तत् ॥
| |
| तस्मादेव चतुर्मूर्तेः सूरिप्राप्यत्वहेतुतः ।
| |
| सूर्यनाम्नोऽहरन् घर्मनामानं तं नृसिंहकम् ॥
| |
| घर्षणात् सर्वलोकस्य नृसिंहो घर्म उच्यते ।
| |
| निर्गत्य स चतुर्मूर्तेर्विप्रक्षत्राभिसंस्तुतात् ॥
| |
| प्रथादीनां चतुर्णां च पुरुषार्थचतुष्टयम् ।
| |
| दत्वा जगाम भगवान् स्वकीयां तनुमेव च ॥
| |
| वसिष्ठाच्च भरद्वाजाद्धोत्रध्वर्य्वोर्नृपौ तु तौ ।
| |
| यथेष्टसिद्धिं सम्प्राप्तौ सम्यगिष्टाज्जनार्दनात् ॥
| |
| इत्याद्यृग्वेदसंहितायाम् ।
| |
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| |
| | |
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| | |
| यस्य प्रथ इति नाम स च हविर्नाम्नो विष्णोर्हविर्यत् अयत् । अटो लोपेनान्तर्णीतणिच्त्वेन अयापयदित्यर्थः । एवं सप्रथ इति यस्य नामासौ । हविर्यदिति पृथक्सम्बन्धः । आचक्रे आकारयामास । अविन्दन् ते ते अविन्दन्नित्यध्यात्माधिदैवतयोरुभयत्रापि भगवन्तमविन्दन्नित्यर्थः । देवयानं गुहा यदिति वचनात् ।
| |
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| |
| | |
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| | |
| चतुःशिखण्डां तु रमां द्विरूपो भगवान् हरिः ।
| |
| परमानन्दरूपत्वात् सुपर्ण इति नामकः ॥
| |
| रमयामास तस्यां च निषण्णः सर्वदैव सः ।
| |
| एक एव च विष्णुः स प्रविष्टः क्षीरसागरम् ॥
| |
| सर्वं पश्यत्यसौ देवः पूर्णाकुण्ठेन चेतसा ।
| |
| परिपक्वेन मनसाऽपश्यमित्याह तं त्वजः ॥
| |
| मातेव व्यञ्जकत्वात् तं प्राणस्थं वाक् सरस्वती ।
| |
| लिहते लिह्यत इव प्राणस्थेन तु सा सदा ॥
| |
| स्वयं तु भगवान् विष्णुर्वाक्पतेर्ब्रह्मणोऽपि हि ।
| |
| नित्यः पिता स्वतन्त्रश्च नास्य माता पिताऽपि च ॥ इत्यादि च ॥ ६ ॥
| |
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| |
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| === द्वितीयोऽध्यायः ===
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| | verse_line1 = ॐ प्राणो वंश इति स्थविरः शाकल्यः । तद्यथा शालावंशे सर्वेऽन्ये वंशाः समाहिताः स्युरेवमस्मिन् प्राणे चक्षुः श्रोत्रं मनो वागिन्द्रियाणि शरीरं सर्व आत्मा समाहितस्तस्यैतस्यात्मनः प्राण ऊष्मरूपम् । अस्थीनि स्पर्शरूपम् । मज्जानः स्वररूपं मांसं लोहितमित्येतदन्यच्चतुर्थमन्तस्थरूपम् ।
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| |
| | |
| गृहस्याच्छादनादीनां मध्यवंशो यथाऽऽश्रयः ।
| |
| तथेन्द्रियाभिमान्यादिदेवानां वायुराश्रयः ॥
| |
| तेषु सर्वेषु भगवान् बहुरूपो हरिः स्थितः ।
| |
| विष्णुनामाऽक्षरेष्वेवमन्येष्वपि तदर्थतः ॥
| |
| प्राणनामापि भगवान् प्राणस्थश्चोष्मसु स्थितः ।
| |
| ऊष्मनामा समर्थत्वात् स एव भगवान् हरिः ॥
| |
| पूर्णत्वादात्मनामासौ प्रतिमात्वादमुष्य तु ।
| |
| सङ्घात आत्मशब्दोक्तो ह्यस्थिरश्चास्थिनामकः ॥
| |
| अस्थिस्थितो हरिः स्पर्शसंस्थितः स्पर्शनामकः ।
| |
| स्पर्शहेतुत्वतः स्पर्शनामा स भगवान् हरिः ॥
| |
| मज्जासुस्थो स मज्जाख्यो मदं जनयतीति ह ।
| |
| स एव स्वरसंस्थश्च स्वराख्यः स्वरतेः प्रभुः ॥
| |
| प्रमाणं सारयेद्यस्मान्मांसाख्यो मांससंस्थितः ।
| |
| लोहिताख्यो रक्तवर्णो लोहितस्थो जनार्दनः ॥
| |
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| |
| | |
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| | verse_line1 = इति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः । त्रयं त्वेव न एतत्प्रोक्तम् । तस्यैतस्य त्रयस्यास्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति त्रीणीतः षष्टि शतानि त्रीणीतः । तानि सप्तविंशति शतानि भवन्ति ।
| |
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| |
| | |
| अस्थिस्थान्येव रूपाणि पर्वस्वपि हरेर्यतः ।
| |
| तत एव विभक्तानि सङ्ख्या तेषां पृथङ् न तत् ॥
| |
| तस्मात् सप्तशतान्येव देहे विंशच्च तस्य हि ।
| |
| रूपाणि विष्णोर्भागे तु षष्ठ्युत्तरशतत्रयम् ॥
| |
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| |
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| | verse_line1 = सप्त च वै शतानि विंशतिश्च संवत्सरस्याहोरात्राः । स एषोऽहःसंमानश्चक्षुर्मयः । श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा । स य एवमेतमहःसंमानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेदाह्नां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ॥
| |
| | verse_line2 = १ ॥
| |
| | commentary1 = aitareya
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| |
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| | text =
| |
| | |
| तान्येव विष्णो रूपाणि वत्सराहस्सु सर्वशः ।
| |
| अहर्नामा च भगवानहार्यत्वात् प्रकीर्तितः ॥
| |
| अहोभिः समसङ्ख्यानि यस्मादध्यात्मगानि तु ।
| |
| रूपाणि विष्णोस्तेनायमहस्संमान उच्यते ॥
| |
| पूर्णदर्शनशक्तित्वाच्चक्षुर्मय उदीरितः ।
| |
| तादृक् श्रवणशक्तित्वात् तथा श्रोत्रमयः स्मृतः ॥
| |
| छन्दोमयः सत्यकामो मन्तृवक्तृबलात्मकः ।
| |
| एवं विद्वांस्तस्य रूपाण्याप्नोति ज्ञानपुत्रवान् ॥
| |
| पीयमानं शमाप्नोति प्राप्याहर्नामकं हरिम् ॥ १ ॥
| |
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| |
| | |
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| | verse_line1 = अथ कौण्ठरव्यः । त्रीणि षष्टिशतान्यक्षराणां त्रीणि षष्टि शतान्यूष्मणां त्रीणि षष्टि शतानि सन्धीनाम् । यान्यक्षराण्यवोचामाहानि तानि यानूष्मणोऽवोचाम रात्रयस्ता यान् सन्धीनवोचामाहोरात्राणां ते सन्धय इत्यधिदैवतम् ।
| |
| | verse_line2 = अथाध्यात्मं यान्यक्षराण्यधिदैवतमवोचामस्थीनि तान्यध्यात्मम् । यानूष्मणोऽधिदैवतमवोचाम मज्जानस्तेध्यात्मम् । एष ह वै सम्प्रति प्राणो यन्मज्जा । एतद्रेतो न ह वा ऋते प्राणाद्रेतः सिच्यते । यद्वा ऋते प्राणाद्रेतः सिच्येत । पूयेन्न सम्भवेत् । यान्सन्धीनधिदैवतमवोचाम पर्वाणि तान्यध्यात्मम् । तस्यैतस्य त्रयस्यास्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणामिति । पञ्चेतश्चत्वारिंशच्छतानि पञ्चेतः तदशीतिसहस्रं भवति । अशीतिसहस्रं वा अर्कलिनो बृहतीरहरभिसम्पादयन्ति ।
| |
| | verse_line3 = स एषोऽक्षरसंमानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयश्छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा । स य एवमेतमक्षरसंमानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं वेदाक्षराणां सायुज्यं सरूपतां सलोकतामश्नुते पुत्री पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ॥२ ॥
| |
| | commentary1 = aitareya
| |
| }}
| |
| | |
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| | text =
| |
| | |
| एवमुक्तप्रकारेण तस्य ह्यक्षरनामकम् ।
| |
| अशीत्युत्तरसाहस्ररूपं वर्णेषु संस्थितम् ॥
| |
| विष्णुनाम्नोऽथवान्येषु पञ्चाशत्सङ्ख्यकेष्वपि ।
| |
| तावत् सङ्ख्यानि देहेषु पृथङ्मज्जास्थिपर्वसु ॥
| |
| रूपाणि विष्णोस्तावन्ति चेष्टकानि पृथक् पृथक् ।
| |
| अर्कस्थितबृहत्याख्यरूपाण्यह्नां च सर्वशः ॥
| |
| सम्पादकानि तान्येव तान्यक्षरमितानि च ।
| |
| अस्थ्यादिस्थितरूपाणि तान्युपास्य विमुच्यते ॥ इति च ।
| |
| }}
| |
| | |
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| | text =
| |
| | |
| तस्यैतस्यात्मनस्तस्य शरीराख्यस्यात्मनो य आत्मा आदानादिकर्ता तस्य परमात्मन एतस्य । अस्थ्नां मज्ज्ञां पर्वणां च मिलितानामपि विंशोत्तरसप्तशतत्वोक्तेस्तत्रस्थविष्णुरूपाण्येवोच्यन्त इति सिद्धम् । अस्थ्यादीन्येव चेदशीत्युत्तरसहस्राणि सन्ति हि । विष्णुरित्येतानि विष्णुनामगतान्यूष्णाक्षरसन्धिनामकानि तद्गतभगवद्रूपाणि मुख्यतस्तन्नामकानि ।
| |
| }}
| |
| | |
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| | text =
| |
| | |
| अहार्यत्वादहर्नामा रात्रिनामा रतिप्रदः ।
| |
| सन्धानात् सन्धिनामासौ स्वयं नारायणः प्रभुः ॥
| |
| सन्ध्यूष्माक्षरगाण्यस्य विष्णो रूपाणि सर्वशः ।
| |
| सन्ध्यारात्रिदिवास्थानि साशीतिकसहस्रकम् ॥
| |
| तान्येवास्थिषु मज्जासु पर्वस्वपि च सर्वशः ।
| |
| परज्ञानात् तु पर्वाणि विष्णो रूपाणि तानि हि ॥
| |
| अस्थानान्मदनाच्चैव ह्यस्थिमज्जाभिधानि च ।
| |
| व्यक्तिर्मज्जासु तस्यैव प्राणो मज्जासु संस्थितः ॥
| |
| मज्जैव रेतो भवति रेतसिस्थो विशेषतः ।
| |
| प्राणस्तेन हि तद्रेतोयुक्तं प्राणेन सर्वदा ॥
| |
| यदि प्राणो न तद्रेतो न गर्भत्वं व्रजेत् क्वचित्।
| |
| विशेषप्राणसम्बन्धवर्जितान्यत एव हि ॥
| |
| न मांसादीनि गर्भत्वं यान्त्यतः स हि रेतसि ।
| |
| विशेषेण स्थितः प्राणः प्राणे चैव विशेषतः ॥
| |
| स्थितो नारायणो देवस्तस्मान्मज्जासु च स्थितः ॥इति च ।
| |
| }}
| |
| | |
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| |
| | |
| मज्जास्वधिकसन्निधानज्ञापनार्थमिदं वचनम् । अशीत्युत्तरसहस्रवर्णानामभावाच्च तत्स्थविष्णुरूपाण्येव तत्सङ्ख्यानीति सिद्धम् । र्ओ निलीनत्वेनादृश्यत्वेन स्थिता भगवत्प्रादुर्भावा अर्कलिनः । त एव शरीरे स्थित्वा सहस्रं बृहतीः सम्पादयन्ति । वाक्प्रेरकत्वाद् विष्णुनामार्थवत्वादेव च बृहतीसहस्रस्य तद्देवताश्चैतान्येवाशीत्युत्तरसहस्ररूपाणि । एतान्येवाहःप्रवर्तकानि च । अहःशब्देन यज्ञो दिवसश्चोभावप्यभिप्रेतौ ।
| |
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| |
| | |
| यज्ञानां दिवसानां च साशीतिकसहस्रकैः ।
| |
| विष्णुः प्रवर्तको रूपैर्बृहत्युक्थस्य चाञ्जसा ॥
| |
| बृहत्युक्थेन वाच्यानि रूपाण्येतान्यधीशितुः ॥
| |
| इति च ॥ २ ॥
| |
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| | verse_line1 = चत्वारः पुरुषाः इति बाध्वः । शरीरपुरुषश्छन्दःपुरुषो वेदपुरुषो महापुरुष इति । शरीरपुरुष इति यमवोचाम स य एवायं दैहिक आत्मा । तस्य योऽयमशरीरः प्रज्ञात्मा स रसः । छन्दःपुरुष इति यमवोचामाक्षरसमाम्नाय एव । तस्यैतस्याकारो रसः । वेदपुरुष इति यमवोचाम येन वेदान् वेद । ऋग्वेदं यजुर्वेदं सामवेदम् । तस्यैतस्य ब्रह्मा रसः । तस्माद् ब्रह्माणं ब्रह्मिष्ठं कुर्वीत । यो यज्ञस्योल्बणं पश्येत् । महापुरुष इति यमवोचाम संवत्सर एव प्रध्वंसयन् अन्यानि भूतान्यैक्याभावयन्नन्यानि । तस्यैतस्यासावादित्यो रसः ।
| |
| | commentary1 = aitareya
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| | id = AIT_C03_S02_V05_B01
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| | text =
| |
| | |
| संसारबाधितैः प्राप्यो बाध्वो वायुरुदाहृतः ।
| |
| स हि मोक्षप्रदो विष्णोराज्ञया स उवाच ह ॥
| |
| सर्वदेहाभिमानी तु शरीरपुरुषः शिवः ।
| |
| सर्ववर्णाभिमानी च शेषोऽसौ छान्दसः पुमान् ॥
| |
| सर्ववेदाभिमान्येव गरुडो वेदपूरुषः ।
| |
| संवत्सराभिमानी तु ब्रह्मैव हि महापुमान् ॥
| |
| सारः शिवस्यानिरुद्धनामा देहस्थितो हरिः ।
| |
| अ इत्याक्रियते यस्माद् वासुदेवो ह्यकारकः ॥
| |
| शेषस्य सारः स विभुर्ब्रह्माख्यो ज्ञानबृंहणात् ।
| |
| सङ्कर्षणाख्यस्तु हरिः सारः स गरुडस्य च ॥
| |
| ब्रह्मर्त्विक्संस्थितश्चासौ तस्माद् ब्रह्मिष्ठमेव हि ।
| |
| कुर्याद् ब्रह्मर्त्विजं तस्मिन् विशेषेण स्थितो हरिः ॥
| |
| ब्रह्मणः सारभूतस्तु प्रद्युम्नो भगवान् हरिः ।
| |
| स एवादित्यसंस्थश्च स ह्यादिर्जगतो विभुः ॥
| |
| ततश्च सर्वभूतेषु जीवानां विनियामकः ।
| |
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| |
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| | verse_line1 = स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्य एतमेतदिति विद्यात् । तस्मात् पुरुषं पुरुषं प्रत्यादित्यो भवति । तदप्येतदृषिणोक्तं–
| |
| | verse_line2 = चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः ।
| |
| | verse_line3 = आ प्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥ इति ।
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| स एवादित्यगो विष्णुर्यः प्रद्युम्नाभिधो हरिः ॥
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| स एव सर्वदेहेषु चानिरुद्धतनुः स्थितः ।
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| सङ्कर्षणो वासुदेव इत्येकः स चतुर्विधः ॥
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| प्रतिपूरुषमेतस्मात् स्थितो विष्णुर्नियामकः ।
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| आदित्यादिषु च स्थित्वा द्योतकोऽसौ प्रति प्रति ॥
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| स चेतनतमत्वाद्धि चित्रमित्यभिधीयते ।
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| मुख्यत्वात् सर्वदेवानामननादीशितृत्वतः ॥
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| कर्तृत्वादप्यनीकं स उदैत् सूर्यस्थितो हरिः ।
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| ज्ञानदत्वाच्च देवानां चक्षुरेनेन दर्शनात् ॥
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| आपूरयत्सर्वलोकान् प्रकाशेन जनार्दनः ।
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| आदानात् सर्वजीवानामत्तृत्वात् प्रलयेऽपि च ॥
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| आत्मेत्युक्तः स भगवान् जगतः स्थावरस्य च ।
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| | verse_line1 = एतामनुविधां संहितां सन्धीयमानां मन्य इति ह स्माऽह बाध्वः । एतां ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्ते । एतमग्नावध्वर्यवः । एतं महाव्रते छन्दोगाः । एतमस्यामेतं दिव्येतं वायावेतमाकाश एतमप्स्वेतमोषधीष्वेतं वनस्पतिष्वेतं चन्द्रमस्येतं नक्षत्रेष्वेतं सर्वेषु भूतेषु । एतमेव ब्रह्मेत्याचक्षते । स एष संवत्सरसंमानश्चक्षुर्मयः श्रोत्रमयः छन्दोमयो मनोमयो वाङ्मय आत्मा । स य एवमेतं संवत्सरसंमानं चक्षुर्मयं श्रोत्रमयं छन्दोमयं मनोमयं वाङ्मयमात्मानं परस्मै शंसति, दुग्धदोहा अस्य वेदा भवन्ति । न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति । न वेद सुकृतस्य पन्थानमिति ।
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| एवं चतुर्विधो विष्णुः संहितादेवता यदा ॥
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| ज्ञायते पूर्ववर्णस्य रूपं नारायणाभिधम् ।
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| प्रादुर्भावाः समस्ताश्च चरमार्णस्य देवताः ॥
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| तदा तु संहितां सम्यङ् मन्येऽहं सन्धितामिति ।
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| आह वायुरिमं विष्णुं बृहत्युक्थस्य देवताम् ॥
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| महाव्रताख्यस्तोत्रस्य चेष्टकानां च देवताम् ।
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| एतमेवाखिलजगद्व्याप्तं पूर्णगुणात्मकम् ॥
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| संवसद्रतिदातृत्वाद् ब्रह्मा संवत्सराभिधः ।
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| नियामकः स जीवानां सर्वेषां प्रभुरीश्वरः ॥
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| अनन्तमूर्तिर्ब्रह्मासावनन्तजगदास्थितः ।
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| नियामकस्तस्य विष्णुस्तावद्रूपेषु संस्थितः ॥
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| तत्संवत्सरसम्मानः स विष्णुः परमेश्वरः ॥ ३ ॥
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| य एनं वक्त्ययोग्येभ्यो योऽथ चैनं महाव्रते ।
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| कर्मण्याचार्यतोऽन्यस्य शंसेत पितृतोऽथवा ॥
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| महाव्रतेन स्तोत्रेण स्तुवीतैनमथापि वा ।
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| महाव्रते चितिं वापि कुर्यान्नास्य फलं श्रुतेः ॥
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| सुकृतस्य फलं चैव नासौ सम्यगवाप्स्यति ।
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| प्रत्यक्षज्ञानिनोऽप्येतदानन्दह्रासकृद्भवेत् ॥
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| प्रत्यक्षज्ञानिनो मोक्षो न कथञ्चिद्धि हीयते ।
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| आचार्यमेव तं विद्याद् गुणैर्यः स्वात्मनोऽधिकः ॥
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| गुणाधिकस्य तेनैव शंसनादि न दुष्यति ।
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| अयोग्यस्योपदेशे तु कृते हौत्रादिकेऽपि वा ॥
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| प्रायश्चित्तार्थमेतत्तु शंसीत शतवारकम् ।
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| अन्यथा मानुषेष्वेव जायते न दिवं व्रजेत् ॥
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| योग्या अस्याश्च विद्याया देवा ऋषय एव च ।
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| एकदेशज्ञानयोग्या मानुषा उत्तमा यदि ॥
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| | verse_line1 = तदप्येतदृषिणोक्तम्–
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| | verse_line2 = यस्तित्याज सचिविदं सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति ।
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| | verse_line3 = यदीं शृणोत्यलकं शृणोति न हि प्रवेद सुकृतस्य पन्थाम् ॥ इति ।
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| | verse_line4 = न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति न वेद सुकृतस्य पन्थानमित्येतत् तदुक्तं भवति । तस्मादेवं विद्वान्न परस्मा अग्निं चिनुयान्न परस्मै महाव्रतेन स्तुवीत । न परस्मा एतदहः शंसेत् । कामं पित्रे वाऽऽचार्याय वा शंसेदात्मन एवास्य तत्कृतं भवति ।
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| कर्मसञ्चयवेत्तारं त्यजेन्नारायणं हि यः ।
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| प्रीत्यैकदेशसंस्थत्वात् सखायमिति चोदितम् ॥
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| न विद्यायाः फलं तस्य श्रुतं च नरकावहम् ।
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| नैव प्राप्नोति सुकृतं सन्त्यागात् परमात्मनः ॥
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| मुख्यत्यागो हरेरेव यन्नास्तीति वदेदमुम् ।
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| तत्समं वाऽधिकं वाऽपि ब्रूयादैक्यमथापि वा ॥
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| ऐश्वर्यादिगुणानां वा ह्रासं नास्तित्वमेव वा ।
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| तत्प्रसादं विना मोक्षं ब्रूयाद्वा कस्यचित् क्वचित्॥
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| ऐक्यं वा ब्रह्मशर्वादेर्मुक्तावैक्यमथापि वा ।
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| व्यत्यासं चावताराणां जीवाभेदममुष्य वा ॥
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| भेदज्ञानं तद्गुणानां तेन वाऽथ मिथोऽपि वा ।
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| तथैव तत्क्रियाणां च तद्रूपाणामथापि वा ॥
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| असाम्यदर्शनं वापि तद्गुणानां परस्परम् ।
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| देहदेहिविभेदं च तस्मिन्नवयवेषु वा ॥
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| परस्परं भेददृष्टिं तेन वा कुत्रचित् क्वचित्।
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| दोषसंसर्गमस्यापि स्वतः परत एव वा ॥
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| अज्ञानतो ज्ञानतो वा निर्देहत्वममुष्य च ।
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| तद्देहस्य प्राकृतत्वमचिदानन्ददेहताम् ॥
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| प्रादुर्भावेष्वपि विभोर्देहत्यागोद्भवादिकम् ।
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| अज्ञानदुःखासामर्थ्यपारवश्यादिकं तथा ॥
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| अतद्वशत्वं कस्यापि कदाचित् क्वचिदप्युत ।
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| परिमाणं बलादेर्वा तस्य विष्णोर्महात्मनः ॥
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| भेदाभेददृशिर्वास्य जीवैर्वा स्वगुणादिभिः ।
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| तर्कैस्तस्यापलापो वा तत्र रक्तेन चेतसा ॥
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| त्यागानामेवमुक्तानां तर्काद्यैः साधनं तथा ।
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| अचिन्त्यविभवेऽप्यस्मिन्नसम्भवनिरूपणम् ॥
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| स एव मुख्यतस्त्यागो वासुदेवस्य कीर्तितः ।
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| रमाब्रह्मादिकानां च तारतम्यानभिज्ञता ॥
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| संशयश्चोक्ततत्त्वेषु जगन्मिथ्यात्वदर्शनम् ।
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| अस्मृतिर्वासुदेवस्य तद्भक्तानां च निन्दनम् ॥
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| द्वितीय एष त्यागस्तु विष्णोरेव प्रकीर्तितः ।
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| निषिद्धकर्मकरणं विहितस्य च वर्जनम् ॥
| |
| त्यागस्तृतीयो हि हरेश्चतुर्थोऽयोग्यपूरुषे ।
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| उपदेशः केशवस्य यथाशास्त्रोदितक्रमात् ॥
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| आचार्यपित्रोरन्यत्र तथैव च महाव्रते ।
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| हौत्रौद्गात्राध्वर्यवाणि त्याग एव चतुर्विधः ॥
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| त्यागद्वयात् तु प्रथमात् प्राप्यतेऽन्धन्तमः क्रमात् ।
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| तृतीयान्निरयप्राप्तिश्चतुर्थान्न दिवं व्रजेत् ॥
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| उपदिष्टेऽपि यस्तत्त्वे संशयं कुरुते पुमान् ।
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| सोऽन्धन्तमो व्रजेदन्यो निरयायैव गच्छति ॥
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| स एव भगवान् विष्णुरेतैदोषैर्विना यदि ।
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| ज्ञायते मुक्तिदः साक्षान्नात्र कार्या विचारणा ॥
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| यदि ज्ञानं नातिपक्वं सरागं च मनो भवेत् ।
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| तदा स्वर्गादिलोकाप्तिः संशयश्चेत् क्वचित्क्वचित्॥
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| आवृत्तिरेव संसारे यावन्निःसशंयो भवेत् ।
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| पुनरावृत्तिहीनं तु तमोऽन्धं मुक्तिरेव च ॥
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| पूर्वं तु निःसुखं तत्र निर्दुःखं चापरं मतम् ।
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| निश्शेषगुणहीनं च पूर्वं निर्दोषकं परम् ॥
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| विमिश्रगतयस्त्वन्याः पुनरावृत्तिसंयुताः ।
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| असुरा देवता मर्त्या योग्या एतेषु च क्रमात् ॥
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| न च तेषां सङ्करोऽस्ति यथायोग्या हि तद्गतिः । ।
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| मानुषेषूत्तमा मुक्तिमधमा निरयं तथा ॥
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| आप्नुवन्ति मनुष्येषु मध्यमाः सृतिभागिनः ।
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| नियमोऽयं नान्यथा स्यादच्छिद्रत्वं यथा भवेत् ॥
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| दोषेऽथवा गुणे वापि तदा दैत्याः सुरा अपि ।
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| स्वां स्वां गतिं समायान्ति तावत् संसारभागिनः ॥
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| अच्छिद्रत्वं नैव सर्वैः कदाचित् प्राप्यते यतः ।
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| सृष्टिस्थितिलयादीनां नोच्छेदस्तेन कुत्रचित् ॥
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| तस्माद्दोषान् प्रहायैव विष्णुं सर्वोत्तमोत्तमम् ।
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| जानीयात् तेन मुक्तिः स्यादपरोक्षदृशेरनु ॥
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| | verse_line1 = स यश्चायमशरीरः प्रज्ञात्मा यश्चासावादित्य एकमेतदित्यवोचाम । तौ यत्र विहीयेते चन्द्रमा इवाऽदित्यो दृश्यते । न रश्मयः प्रादुर्भवन्ति । लोहिनी द्यौर्भवति यथा मञ्जिष्ठाः । व्यस्तः पायुः । काककुलायगन्धिकमस्य शिरो वायति । सम्परेतोऽस्यात्मा न चिरमिव जीविष्यतीति विद्यात् । स यत्करणीयं मन्येत तत्कुर्वीत । यदन्ति यच्च दूरके इति सप्त जपेत् । आदित्प्रत्नस्य रेतस इत्येका । यत्र ब्रह्मा पवमानेति षट् । उद्वयं तमसस्परीत्येका ।
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| सूर्यमण्डलगो विष्णुर्देहे चक्षुषि संस्थितः ।
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| अनिरुद्धश्च हृदये न च भेदोऽनयोः क्वचित्॥
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| अन्येषामपि रूपाणामिति विद्याद् विचक्षणः ।
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| द्विरूपः स यदा विष्णुरपगच्छति देहतः ॥
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| तदैव दुर्निमित्तानि जायन्ते नान्यदा क्वचित्।
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| तस्मात् तेषां दर्शने तु कर्तव्यं पारलौकिकम् ॥
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| सर्वमेव जपेच्चैव यदन्तीत्यादिका ऋचः ।
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| ऋग्भिः षडि्भर्वायुरेव पवमानादिना मतः ॥
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| स्तूयते सोऽङ्गनेतृत्वादग्निरित्यभिधीयते ।
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| परस्य ब्रह्मणो विष्णोर्ज्ञापनाख्यप्रसूतिभिः ॥
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| वायुः पुनाति यल्लोकान् सविता तेन कथ्यते ।
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| पवित्रं नाम साक्षात् तत्परं ब्रह्म जनार्दनः ॥
| |
| प्रसादयित्वा तं विष्णुं तेन लोकान् पुनात्यसुः ।
| |
| ज्ञानाख्यप्रसवेनापि स्वयं वायुः पुनात्ययम् ।
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| प्राणाग्नेरर्चिषो देहे विततास्तेषु केशवः ॥
| |
| अचिष्मान् विततो नित्यं वायुस्तेन पुनात्ययम् ।
| |
| यत्र ब्रह्मेति षडि्भश्च प्रार्थनीयः स मारुतः ॥
| |
| मोचयित्वैव संसारद्विष्णोर्लोके कृधीति च ।
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| आदित्प्रत्नस्येति विष्णुः स्तुत्यो वैकुण्ठलोकगः ॥
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| आदित्यमण्डलस्थश्च साक्षान्नारायणः प्रभुः ।
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| उद्वयं त्वितिमन्त्रेण स्तुत्यो वायोरपीश्वरः ॥
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| अपमृत्युभयं तस्य यदन्तीत्यृग्जपाद् व्रजेत् ।
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| कालमृत्युर्यदि भवेत् तथा जन्मादिकं भयम् ॥
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| अन्याभिः कर्मतः पूतो यत्र ब्रह्मेति वैष्णवम् ।
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| लोकं व्रजेत् तथाऽन्याभ्यां विष्णुर्मोक्षसुखप्रदः ॥
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| इष्टप्रदानशीलत्वादिन्दुर्वायुः स एव च ।
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| सोमः सौम्यस्वरूपत्वात् पवमानश्च पावनात् ॥
| |
| विष्णुः पुरातनत्वात् तु प्रत्नो रेतो महारतिः ।
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| देवत्रा देव एवासौ सर्वदेवेश्वरो यतः ॥
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| सूर्यश्च सूरिभिः प्राप्यो नित्यानन्दो रमापतिः ।
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| | verse_line1 = अथापि यत्र च्छिद्र इवादित्यो दृश्यते रथनाभिरिवाभिख्यायेत च्छिद्रां वा छायां पश्येत् तदप्येवमेव विद्यात् । अथाप्यादर्शे वोदके वा जिह्मशिरसं वाऽशिरसं वाऽऽत्मानं पश्येद्विपर्यस्ते वा कन्याके जिह्मेन वा दृश्येयातां तदप्येवमेव विद्यात् । अथाप्यपिधायाक्षिणी उपेक्षेत तद्यथा वटरकाणि सम्पतन्तीव दृश्यन्ते तानि यदा न पश्येत् तदप्येवमेव विद्यात् । अथाप्यपिधाय कर्णा उपशृणुयात् स एषोऽग्निरिव प्रज्वलतो रथस्येवोपब्दिस्तं यदा न शृणुयात् तदप्येवमेव विद्यात् । अथापि यत्र नील इवाग्निर्दृश्यते यथा मयूरग्रीवा मेघे वा विद्युतं पश्येन्मेघे वा विद्युतं न पश्येन्महामेघे वा मरिचीरिव पश्येत तदप्येवमेव विद्यात् । अथापि यत्र भूमिं ज्वलन्तीमिव पश्येत तदप्येवमेव विद्यात् । इति प्रत्यक्षदर्शनानि ।
| |
| | verse_line2 = अथ स्वप्नाः । पुरुषं कृष्णं कृष्णदन्तं पश्यति स एनं हन्ति वराह एनं हन्ति मर्कट एनमास्कन्दयत्याशु वायुरेनं प्रवहति सुवर्णं खादित्वाऽपगिरति मध्वश्नाति बिसानि भक्षयत्येकपुण्डरीकं धारयति खरैर्वराहैर्युक्तैर्याति कृष्णं धेनुं कृष्णवत्सां नलदमाली दक्षिणामुखो व्राजयति । स यद्येतेषां ककिञ्चित् पश्येदुपोष्य पायसं स्थालीपाकं श्रपयित्वा रात्रिसूक्तेन प्रत्यृचं हुत्वाऽन्येनान्नेन ब्राह्मणान् भोजयित्वा चरुं स्वयं प्राश्नीयात् ।
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| | verse_line3 = स योऽतोऽश्रुतोऽगतोऽमतोऽनतोऽदृष्टो ऽविज्ञातोऽनादिष्टः श्रोता मन्ता द्रष्टाऽऽदेष्टा घोष्टा विज्ञाता प्रज्ञाता सर्वेषां भूतानामन्तरपुरुषः सम आत्मेति विद्यात् ॥ ४ ॥
| |
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| | |
| देशतः कालतश्चैव गुणतश्चापि पूर्तितः ॥
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| अत इत्युच्यते विष्णुः सन्ततो ह्यत उच्यते ।
| |
| तृतीयवर्णोऽतिशये यतस्तेनातिरेव वा ॥
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| अत इत्युच्यते विष्णुः सम्यक्श्रुत्याद्यशक्यतः ।
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| पूर्णत्वाद् भगवान् विष्णुरश्रुतत्वादिनोदितः ॥
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| अन्तस्थः सर्वजीवानां पूर्णत्वात् पुरुषाभिधः ।
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| समः स सर्वरूपेषु सर्वजीवनियामकः ॥
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| इति विद्यात् परं विष्णुं मुच्यते तेन संसृतेः ॥ इत्यादि च ।
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| | |
| शरीरपुरुषादीनां प्राप्यत्वात् तदुपास्यत्वात् तेषां नियामकत्वेन तेभ्योऽप्युत्तमत्वेन तेषु स्थितत्वाच्च तेषां सार इत्युच्यते भगवान् । यदीं एव अलकं अरकम् । यत्ककिञ्चिच्छृणोति तत्सर्वमरतिरूपान्धतमःप्राप्तिकारणमेव तस्य भवति । तत्र हि सर्वरत्यभावो रतिविरुद्धदुःखं च पूर्णम् । परस्मै शंसनमात्रादरतिरेवेत्यतः प्रस्तुते चतुर्थत्यागेन न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति । न हि प्रवेद सुकृतस्य पन्थामिति दोषद्वयमेवेत्यवधारयति । न तस्यानूक्ते भागोऽस्ति न वेद सुकृतस्य पन्थानमित्येतत् तदुक्तं भवतीति । अलकं शृणोतीति त्यागद्वयस्य मुख्यतः । तृतीयस्यापि नरकं शृणोतीति किञ्चिद्भवति । तौ यदाऽस्माच्छरीराद् विहीयेते तदैवैतानि निमित्तानि पश्यन्तीति नियमः । न च तदा पश्यत्येवेति । वासेन रमयतीति वासरं विष्णुर्ज्योतिः ।
| |
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| | |
| यत्र ब्रह्मा वेदवाक्यं व्याचक्षाणो मखैर्यजन् ।
| |
| सोमेन च सुतेनेशमास्ते लोके हरेर्हि सः ॥ इति स्कान्दे ।
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| |
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| | |
| ग्राव्णा सोमविषये सोमेनेष्ट्वा महीयते तेनैव विष्णुप्रीत्या स्वस्यानन्दं जनयन् । स्वरानन्दरूपो विष्णुः । दिवो देव्या अवरोधनं तस्याः परिवारभूताः सर्वदेव्यः । द्यौर्नाम वायुपत्नी । अजनयो मरुतो वक्षणाभ्यो दिव आवक्षणाभ्य इत्यादेः । यह्वतीः स्यन्दमानाः ।
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| सर्वेष्टद जगत्प्राण मामादाय परिस्रव ।
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| यत्रासौ भगवान् विष्णुस्त्वं हि मोक्षप्रदः सदा ॥ इति च ।
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| इन्दुरिष्टप्रदत्वाद्यो वायुरादाय गच्छति ।
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| इन्द्रनाम्नः केशवस्य समीपं मुक्तमञ्जसा ॥ इति च ।
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| | |
| अनन्यहेतुकं साक्षाद्भगवद्भक्तिरूपकम् ।
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| सुखमानन्द इत्युक्तो मोदो भोगनिमित्तकः ॥
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| प्रमोदस्तद्विशेषोत्थो मुन्नामात्यल्पभोगतः ॥ इत्यृग्वेदसंहितायाम् ।
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| तमसः सकाशात् उद्गता वयमुत्तरं सर्वोत्तमं विष्ण्वाख्यं ज्योतिः परिपश्यन्तस्तमेव देवत्रा देवं देवविषयेऽपि देवमगन्म । तदेव ज्योतिष्ट्वेनोत्तरत्वेन च पश्यन्त इति दर्शने इत्थम्भावविधानार्थं पूर्वम् । तथैवासौ भगवानुत्तमज्योतिः न राजादिष्विवाविद्यमानभक्तिमात्रमिदमिति ज्ञापयितुमगन्म ज्योतिरुत्तममिति पुनर्वचनम् ।
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| अर्चिषोंऽशा वर्तुलास्तु नाम्ना वटरकाः स्मृताः इति शब्दनिर्णये ।
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| बृहत्तमं मधु यदि सहापूपं प्रभक्षयेत् ।
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| स्वप्ने तस्याचिरान्मृत्यू रक्ताब्जे वा शिरोधृते ॥ इति ब्रह्माण्डे ।
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| | |
| रात्र्यास्तु देवता दुर्गा दुःस्वप्ने सा प्रपूजिता ।
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| पायसेन हरेन्मृत्युं रात्रिसूक्तादकालिकम् ॥
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| यदि कालिकमृत्युः स्यात् पदं सा परमं नयेत् ।
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| सहैव विष्णुना भक्तं विष्णोस्तद्वेदिनं तथा ॥
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| रतिदत्वात् परो विष्णुर्मुख्यतो रात्रिरुच्यते ।
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| तदाश्रयत्वाद् दुर्गाऽपि रात्रिरित्यभिधीयते ॥
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| स्त्रीरूपः स परो विष्णुः पायसेष्टो हि मोक्षदः ।
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| तस्मादुभौ सहैवेज्यौ भक्त्या दुःस्वप्नदर्शने ॥
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| बहुभिर्नयनैर्विष्णुर्बहुधेदं ददर्श ह ।
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| आयन् सर्वेषु लोकेषु धृतास्तेनैव हि श्रियः ॥
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| नीचानुच्चांश्च जीवान् स ब्रह्मादीनुर्वपूरयत् ।
| |
| ज्ञानेन बाधतेऽज्ञानं स्वसारं स्वं तथाऽकरोत् ॥
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| उषआख्यं शुक्लवर्णं प्रमदारूपमेव च ।
| |
| तमश्चापाकरोत्येव तदा सूर्यादिषु स्थितः ॥
| |
| स नः स्वामी यदुदरे यमनाद्यमनामके ।
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| अविक्ष्महि वयं सर्वे वृक्षे यद्वत्पतत्रिणः ॥
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| शेनाख्यास्तु सुखीनत्वादासमन्तात् सुरोत्तमाः ।
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| पद्वन्तो मानुषाश्चैव पादमात्रप्रयायिनः ॥
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| ग्रामाख्या बहुलत्वात्तु दैत्या एव प्रकीर्तिताः ।
| |
| अर्थिनस्तु कृतार्थत्वात् मुक्ता एव श्रुताः श्रुतौ ॥
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| ऊरीकृतप्रमाणत्वादूर्म्यः स भगवान् हरिः ।
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| वृकास्तेनैव निर्याप्याः वृकाः क्रूरत्वतोऽसुराः ॥
| |
| तत्स्वभावाश्च वृक्याः स्युः स्तेनास्तत्र महासुराः ।
| |
| ब्रह्मस्तेना यतस्ते हि नित्यमैकात्म्यवेदिनः ॥
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| विष्णुः सुखतरश्चैव भक्तानां भवति प्रभुः ।
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| कृष्णं व्यक्तं तमोऽज्ञानमज्ञानां पेशलं हि तत् ॥
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| तद्यातयत्यृणमिव भगवान् पुरुषोत्तमः ।
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| स एव चोषाः कथितः प्रकाशत्वाज्जनार्दनः ॥
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| जयिनः स्तोममिव च ब्राह्मणाय यथा च गाः ।
| |
| उपाकरं तथा स्तोमं तवाहं तद्वृणीष्व च ॥
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| द्यौरिति ज्ञानमुद्दिष्टं तद्व्यङ्गत्वाज्जनार्दनः ।
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| दुहिता दिव इत्युक्तः एवमर्थेन पूज्यते ॥
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| रात्रीसूक्तेन भगवान् साक्षान्नारायणः प्रभुः ।
| |
| तत्सन्निधानाद् दुर्गाया एषोऽर्थ उपचारतः ॥
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| एवं स्तुतस्तथैवेष्टो भगवान् मोक्षदो भवेत् ।
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| यदन्तीत्याद्यृचः सर्वा अपि दुःस्वप्नदर्शने ॥
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| जप्या एव विशेषोऽयं होमो दुःस्वप्नदर्शने ।
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| परोक्षज्ञानिनो विष्णुरापरोक्ष्यं व्रजेत् त्वरन् ॥
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| अपरोक्षदृशः प्रीतः सुखाधिक्यं करोत्यतः ।
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| मुक्तस्य द्विविधैस्तस्माज्जपो योगश्च सर्वथा ॥
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| कर्तव्यो न्यासिभी रात्रिसूक्तं जप्यं त्रिशोऽञ्जसा ॥
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| इत्यैतरेयसंहितायाम् ॥ ४ ॥
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| | verse_line1 = अथ खल्वियं सर्वस्यै वाच उपनिषत् । सर्वा ह्येवेमाः सर्वस्यै वाच उपनिषदः । इमां त्वेवाऽऽचक्षते । पृथिव्या रूपं स्पर्शा अन्तरिक्षस्योष्माणो दिवः स्वराः । अग्ने रूपं स्पर्शा वायोरुष्माण आदित्यस्य स्वराः । ऋग्वेदस्य रूपं स्पर्शा यजुर्वेदस्योष्माणः सामवेदस्य स्वराः । चक्षुषो रूपं स्पर्शाः श्रोत्रस्योष्माणो मनसः स्वराः । प्राणस्य रूपं स्पर्शा अपानस्योष्माणो व्यानस्य स्वराः ।
| |
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| | |
| अथ सर्ववाग्विषया विद्योच्यते । विष्णुशब्दार्थत्वात् सर्ववाचाम् । पूर्वोक्ता अपि सर्ववागुपनिषद एव । तथापि मुख्यत एव सर्ववाग्विषयत्वाद् वक्ष्यमाणामेव सर्वस्यै वाच उपनिषदिति सर्वेऽप्याचक्षते ।
| |
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| | |
| पृथिव्यादिस्थितो विष्णुः पृथिव्याद्यभिधानवान् ।
| |
| स्पर्शादीनां देवताऽसौ क्रमेणैव प्रकीर्तितः ॥
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| | verse_line1 = अथ खल्वियं दैवी वीणा भवति । तदनुकृतिरसौ मानुषी वीणा भवति । यथाऽस्याः शिर एवममुष्याः शिरः । यथाऽस्याः उदरमेवममुष्या अम्भणम् । यथाऽस्यै जिह्वैवममुष्यै वादनम् । यथाऽस्यास्तन्त्रय एवममुष्या अङ्गुलयः । यथाऽस्याः स्वरा एवममुष्याः स्वराः । यथाऽस्याः स्पर्शा एवममुष्याः स्पर्शाः । यथा ह्येवेयं शब्दवती तर्द्मवत्येवमसौ शब्दवती तर्द्मवती । यथा ह्येवेयं लोमशेन चर्मणा पिहिता भवत्येवमसौ लोमशेन चर्मणा पिहिता । लोमशेन ह स्म वै चर्मणा पुरा वीणा अपिदधति । स यो हैतां दैवीं वीणां वेद श्रुतवदनो भवति भूमिप्राऽस्य कीर्तिर्भवति यत्र क्व चार्या वाचो भाषन्ते विदुरेनं तत्र ।
| |
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| | |
| तस्य विष्णोरयं देहो वीणा साक्षात् प्रकीर्तिता ।
| |
| दैवी वीणा ततः सेयं लोकसिद्धा तु मानुषी ॥
| |
| ब्रह्मादिदेहान् यो वेद विष्णोर्वीणेति भक्तितः ।
| |
| विद्यापूर्णसुखः स स्याद्भूमिपूरितकीर्तिमान् ॥
| |
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| | verse_line1 = अथातो वाग्रसः । यस्यां संसद्यधीयानो वा भाषमाणो वा न विरुरुचुषेत । तत्रैतामृचं जपेत् । ओष्ठापिधाना न कुलीदन्तैः परिवृता पविः ।सर्वस्यै वाच ईशाना चारु मामिह वादयेत् ।
| |
| | verse_line2 = इति वाग्रसः ॥५ ॥
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| |
| | |
| विद्याधिक्यार्थमेवैतां वाक्सारामप्यृचं जपेत् ।
| |
| ध्यात्वा नारायणं देवं स्त्रीरूपं वाचि संस्थितम् ॥
| |
| ओष्ठा पिधानेत्येषा ह्यृक्सारो वाचः प्रकीर्तितः ।
| |
| विष्णोर्हि वाचि संस्थस्यैवोष्ठावेतौ पिधानवत् ॥
| |
| कुलीति चोक्तो भगवान् प्रलीनाशेषकुत्सितः ।
| |
| पाति सर्वं विशिष्टश्च सर्वस्मादित्यतः पविः ॥
| |
| सर्ववागीश्वरो विष्णुः स्त्रीरूपो मां सुवादयेत् ॥ इति च ।
| |
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| |
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| | |
| नेत्युपमानार्थम् । ओष्ठावपिधानवदस्येति । न च विष्णोरन्या सर्वस्या वाच ईशाना । स हि मुख्यतः सर्वेश्वरः । तस्यैव प्रस्तुतत्वात् वक्ष्यमाणत्वाच्च ।
| |
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| श्रियःपतिर्यज्ञपतिर्जगत्पतिर्गिराम्पतिर्लोकपतिर्धरापतिः इति भागवते ।
| |
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| यो वाचि तिष्ठन् वाचोऽन्तरो यं वाङ् न वेद इत्यादिश्रुतिश्च ।
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| स्त्रीलिङ्गत्वं देवतेत्यादिवदपि युज्यते । स्त्रीरूपत्वाच्च ॥ ५ ॥
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| | verse_line1 = अथ हास्मा एतत्कृष्णहारीतो वाग्ब्राह्मणमिवोपोदाहरति । प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा व्यस्रंसत संवत्सरः । स च्छन्दोभिरात्मानं समदधात् । यच्छन्दोभिरात्मानं समदधात् तस्मात् संहिता ।
| |
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| संवत्सर इति विशेषणाद्विरिञ्च एवात्र प्रजापतिः ।
| |
| ब्रह्मा विश्वः कतमः स्वयम्भूः प्रजापतिः संवत्सरः इत्यादि श्रुतेः ।
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| |
| | |
| श्रान्तो ब्रह्मा सर्ववेदैः स्तुत्वा नारायणं प्रभुम् ।
| |
| तेनैव सम्यक्सन्धाय दार्ढ्यं देहस्य सोऽकरोत् ॥
| |
| सन्धानात् संहितेत्युक्तो विष्णुरेव सनातनः
| |
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| | verse_line1 = तस्यै वा एतस्यै संहितायै णकारो बलम् । षकारः प्राण आत्मा । स यो हैतो णकारषकारावनुसंहितमृचो वेद । सबलां सप्राणां संहितां वेद । आयुष्यमित विद्यात् ।
| |
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| |
| | |
| विष्णुनाम्नि णशब्देन विष्णोर्बलमुदीर्यते ॥
| |
| ण इत्याक्रियमाणत्वात् णकारोऽस्य बलं मतम् ।
| |
| विष्णुनाम्नि षकारेण रमाब्रह्मेशपूर्विणः ॥
| |
| प्रणेतृताऽखिलस्यैव विष्णोरुक्ता तथात्मता ।
| |
| आततत्वं सर्वगुणैर्देशतः कालतस्तथा ॥
| |
| आत्मशब्दोदितं तच्च षशब्देनाभिधीयते ।
| |
| ष इत्याक्रियमाणत्वं प्रणेतृत्वं च पूर्णता ॥
| |
| विष्णोः षकार इत्युक्ता वीत्युक्तस्य विशिष्टता ।
| |
| अन्त्यस्थित उकारस्तु ताच्छील्यादि हरेर्वदेत् ॥
| |
| एवं विशिष्टप्राणत्वमाततत्वं च सर्वतः ।
| |
| विशिष्टं च बलं विष्णोः सर्वस्माच्छीलमित्यपि ॥
| |
| उदितं विष्णुशब्देन तस्मादृक्संहितामनु ।
| |
| वर्णद्वयसमायोगे ष्णुशब्दस्यार्थमेव तु ॥
| |
| विष्णोः प्राणत्वमात्मत्वं बलं चैवात्र वेत्ति यः ।
| |
| स एव विष्णोर्बलवित् तथा प्राणत्वविद्भवेत् ॥
| |
| स एव मुक्तः संसारान्नित्यायुष्मान् भविष्यति ।
| |
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| | verse_line1 = स यदि विचिकित्सेत् सणकारं ब्रवाणीं३ अणकारां ३ इति सणकारमेव ब्रूयात् । सषकारं ब्रवाणीं ३ अषकारां इति । सषकारमेव ब्रूयात् । ते यद्वयमनुसंहितमृचोऽधीमहे यच्च माण्डूकेयीयमध्यायं प्रब्रूमस्तेन नो णकारषकारावुपाप्ताविति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः । अथ यद्वयमनुसंहितमृचोऽधीमहे यच्च माण्डूकेयीयमध्यायं प्रब्रूमस्तेन नो णकारषकारावुपाप्तावन्ति ह स्माह स्थविरः शाकल्यः ।
| |
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| |
| | |
| संहितासहितत्वेन यदृचो धीमहे वयम् ॥
| |
| वेदानन्यान्पुराणं वा तेन विष्णुपदोदितः ।
| |
| अवाप्तो भगवान् स्यान्नस्तन्नामार्था यतोऽखिलाः ॥
| |
| इत्याहुर्ऋषयः सर्वे ...
| |
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| | verse_line1 = एतद्ध स्म वै तद्विद्वांस आहुः ऋषयः कावषेयाः किमर्था वयमध्येष्यामहे । किमर्था वयं यक्ष्यामहे । वाचि हि प्राणं जुहुमः प्राणे वा वाचम् । यो ह्येव प्रभवः स एवाप्ययः ।
| |
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| |
| | |
| .... किमन्याध्ययनाद् भवेत् ।
| |
| यज्ञैर्वेत्यृषयोऽप्यन्ये कावषेया वदन्ति हि ॥
| |
| मौनेन विष्णुशब्दार्थं ध्यायन्तो वाचमेव वा ।
| |
| जुहुमो विष्णुनामाख्यां जपन्तो मन्त्रमेव वा ॥
| |
| नमस्कारसमायुक्तं जुहुमः प्राणमत्र हि ।
| |
| किमन्यैर्बहुभिः कार्यैरेतस्यैवाधिकत्वतः ॥
| |
| एतदर्थानुसन्धानपूर्वं वेदानथापि वा ।
| |
| अधीमहे यजामो वा नान्यथा तु कथञ्चन ॥
| |
| एष एव हि सर्वेषां वेदानामर्थ ईरितः ।
| |
| विष्णुनामोदितो योऽर्थस्तद्व्याख्याऽन्यद्वचोऽखिलम् ॥
| |
| एवं विशिष्टप्राणात्मबलाद्यखिलसद्गुणैः ।
| |
| पूर्णस्वभावः सर्वेषां वचसामर्थ ईरितः ॥
| |
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| | verse_line1 = ता एताः संहिता नानन्तेवासिने प्रब्रूयात् ।
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| | verse_line2 = नासंवत्सवासिने नाप्रवक्त्रे इत्याचार्या आचार्याः ॥ ६ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते महैतरेयोपनिषद्भाष्ये तृतीयारण्यके द्वितीयोऽध्यायः ॥
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| ॥ इति श्रीमहैतरेयोपनिषद्भाष्यं समाप्तम् ॥
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| |
| | |
| संहिताख्यानि विष्णोस्तु रूपाण्येतानि सर्वशः ।
| |
| अन्यविद्यास्वशिष्यस्य न ब्रूयात् प्रथमं क्वचित्॥
| |
| व्याख्यानशक्तिहीनाय नैव ब्रूयात् कथञ्चन ।
| |
| वैष्णवाय सुवृत्ताय सुव्रताय सुशिक्षिणे ॥
| |
| शान्ताय सुविशुद्धाय मेधाश्रद्धायुताय च ।
| |
| गुरोः शुश्रूषकायैव ब्रूयादित्यनुशासनम् ॥ इति च ।
| |
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| |
| | |
| य एतेन ण इति शब्देनाक्रियमाणं विष्णोः पूर्णबलं षशब्देनाक्रियमाणं देशतः कालतो गुणतश्चाततत्वं सर्वर्चां सर्वासां संहितामनु तदर्थत्वेन वेद । अक्षरद्वयसंयोगरूपया संहितयैतदेव सर्वत्रोच्यत इति, स सम्पूर्णबलं सर्वप्रणेतृत्वशक्त्यादियुक्तं विष्णुं वेद । अथेत्यादिका अपि संहितारूपा एव । पदवर्णयोः पृथगनभिव्याहारात् । तस्मात् सर्वशब्दा विष्णुनामव्याख्यानरूपा एव । यद्द्वयं संहितायुक्तत्वेनर्चोधीमहे तेनास्माकं णशब्दषशब्दार्थरूपो विष्णुरुपात्तः । तद्व्याख्यानत्वात् सर्ववाचाम् । वीत्युपसर्गत्वादुकारस्य च ताच्छील्यार्थत्वादुक्तार्थविशेषणरूपत्वेन प्रसिद्धत्वान्न पृथक्तयोर्व्याख्यानमत्र कृतम् । ऋच इति सर्ववाचामुपलक्षणम् । अतः सर्ववेदादिशब्दोदितः सर्वगुणपरिपूर्णो भगवान्नारायण इति सिद्धम् ॥ ६॥
| |
| }} | | }} |
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| | verse_id = AIT_C03_S02_V18 | | | verse_id = AIT_C03_S02_V18 |
| | id = AIT_C03_S02_V18_B01 | | | id = AIT_C03_S02_V18_B01 |
| | text = | | | text = ‘साधको रामवाक्यानां तत्समीपगतः सदा । |
| | | हनुमान् प्रथमो ज्ञेयो भीमस्तु बहुभुक् पितोः । |
| सर्वैश्च वैदिकपदैरपि लोकशब्दैर्मेघाग्निवारिधितलादिरवैश्च सर्वैः ।
| |
| एकोऽभिधेयपरिपूर्णगुणः प्रियोऽलं नारायणो मम सदैव सुतुष्टिमेतु ॥
| |
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| |
| | |
| यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं
| |
| बट् तद्दर्शनमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।
| |
| वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं
| |
| वपुर्मध्वो यत्तु तृतीयकं कृतमिदं भाष्यं हि तेन प्रभौ ॥
| |
| }}
| |
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| | text =
| |
| | |
| हनुशब्दो ज्ञानवाची हनुमान् मतिशब्दितः ।
| |
| रामस्य स्वृतरूपस्य वाचस्तेनानयन्त हि ॥
| |
| भृतमो भीम इत्युक्तो वाचो मा मातरः स्मृतः ।
| |
| ऋगाद्या इतिहासश्च पुराणं पञ्चरात्रकम् ॥
| |
| प्रोक्ताः सप्तशिवास्तत्र शयो भीमस्ततः स्मृतः ।
| |
| मध्वित्यानन्द उद्दिष्टो वेति तीर्थमुदाहृतम् ॥
| |
| मध्व आनन्दतीर्थः स्यात् तृतीया मारुतीतनुः ।
| |
| इति सूक्तगतं रूपत्रयमेतन्महात्मनः ॥
| |
| यो वेद वेदवित् स स्यात् तत्त्ववित् तत्प्रसादतः ॥
| |
| इति च ।
| |
| }}
| |
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| |
| | |
| साधको रामवाक्यानां तत्समीपगतः सदा ।
| |
| हनुमान् प्रथमो ज्ञेयो भीमस्तु बहुभुक् पितोः ॥ | |
| पृतनाक्षयकारी च द्वितीयस्तु तृतीयकः । | | पृतनाक्षयकारी च द्वितीयस्तु तृतीयकः । |
| पूर्णप्रज्ञस्तथाऽऽनन्दतीर्थनामा प्रकीर्तितः ॥ | | पूर्णप्रज्ञस्तथाऽऽनन्दतीर्थनामा प्रकीर्तितः । |
| दशेति सर्वमुद्दिष्टं सर्वं पूर्णमिहोच्यते । | | दशेति सर्वमुद्दिष्टं सर्वं पूर्णमिहोच्यते । |
| प्रज्ञा प्रमतिरुद्दिष्टा पूर्णप्रज्ञस्ततः स्मृतः ॥ | | प्रज्ञा प्रमतिरुद्दिष्टा पूर्णप्रज्ञस्ततः स्मृतः । |
| आसमन्तात् पतित्वे तु गूढं कलियुगे हरिम् ।
| | आ समन्तात् पतित्वे तु गूढं कलियुगे हरिम् । |
| असत्यमप्रतिष्ठं तु जगदेतदनीश्वरम् ॥ | | असत्यमप्रतिष्ठं तु जगदेतदनीश्वरम् । |
| वदद्भिर्गूहितं सन्तं तृतीयोऽसुर्मथायति । | | वदद्भिर्गूहितं सन्तं तृतीयोऽसुर्मथायति । |
| येन विष्णोर्हि वर्पाख्यान् गुणानज्ञासिषुः परान् ॥ | | येन विष्णोर्हि वर्पाख्यान् गुणान् अज्ञासिषुः परान् । |
| ईशानासः सूरयश्च निगूढाभिर्गुणोक्तिभिः । | | ईशानासः सूरयश्च निगूढान् निर्गुणोक्तिभिः(निगूढाभिर्गुणोक्तिभिः) । |
| त्रेतायां द्वापरे चैव कलौ चैते क्रमात् त्रयः ॥ | | त्रेतायां द्वापरे चैव कलौ चैते क्रमात् त्रयः । |
| येषां हि परमो विष्णुर्नेता सर्वेश्वरेश्वरः । | | एतेषां(येषां हि) परमो विष्णुर्नेता सर्वेश्वरेश्वरः । |
| स्वयम्भुब्रह्मसञ्ज्ञोऽसौ परस्मै ब्रह्मणे नमः ॥ इति च ।
| | स्वयम्भुब्रह्मसंज्ञोऽसौ परस्मै ब्रह्मणे नमः ॥’ इति च । |
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| | text = | | | text = पूर्णानन्दगुणोदारधाम्ने नित्याय वेधसे । |
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| पूर्णानन्दगुणोदारधाम्ने नित्याय वेधसे । | |
| अमन्दानन्दसान्द्राय प्रेयसे विष्णवे नमः ॥ | | अमन्दानन्दसान्द्राय प्रेयसे विष्णवे नमः ॥ |
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| | <div class="gr-author-note">॥इति श्रीमदानन्दतीर्तभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये द्वितीयारण्यके(तृतीयप्रघट्टके)द्वितियोध्यायः॥</div> |
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