Isha: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| (8 intermediate revisions by the same user not shown) | |||
| Line 2: | Line 2: | ||
__TOC__ | __TOC__ | ||
<div class="introduction" id="IS_C01_I01" data-block-id="IS_C01_I01" data-verse="IS_C01"> | |||
<div class="introduction-line">नित्यानित्यजगद्धात्रे नित्याय ज्ञानमूर्तये ।</div> | |||
<div class="introduction-line">पूर्णानन्दाय हरये सर्वयज्ञभुजे नमः ॥ १ ॥</div> | |||
</div> | |||
<div class="introduction" id="IS_C01_I02" data-block-id="IS_C01_I02" data-verse="IS_C01"> | |||
<div class="introduction-line">यस्माद् ब्रह्मेन्द्ररुद्रादिदेवतानां श्रियोऽपि च ।</div> | |||
<div class="introduction-line">ज्ञानस्फूर्तिः सदा तस्मै हरये गुरवे नमः ॥ २ ॥</div> | |||
</div> | |||
<div class="introduction" id="IS_C01_I03" data-block-id="IS_C01_I03" data-verse="IS_C01"> | |||
<div class="introduction-line">स्वायम्भुवो मनुरेतैर्मन्त्रैर्भगवन्तमाकूतिसूनुं यज्ञनामानं विष्णुं तुष्टाव ।</div> | |||
<div class="introduction-line">‘स्वायम्भुवः स्वदौहित्रं विष्णुं यज्ञाभिधं मनुः ।</div> | |||
<div class="introduction-line">ईशावास्यादिभिर्मन्त्रैस्तुष्टावावहितात्मना ॥</div> | |||
<div class="introduction-line">रक्षोभिरुग्रैः संप्राप्तः खादितुं मोचितस्तदा ।</div> | |||
<div class="introduction-line">स्तोत्रं श्रुत्वैव यज्ञेन तान् हत्वाऽवध्यतां गतान् ॥</div> | |||
<div class="introduction-line">प्रादाद्धि भगवांस्तेषाम् अवध्यत्वं हरः प्रभुः ।</div> | |||
<div class="introduction-line">तैर्वध्यत्वं तथाऽन्येषामतः कोऽन्यो हरेः प्रभुः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।</div> | |||
<div class="introduction-line">भागवते चायमेवार्थ उक्तः(चायमर्थ एव उक्तः .हृ) ॥</div> | |||
</div> | |||
स्वायम्भुवो मनुरेतैर्मन्त्रैर्भगवन्तमाकूतिसूनुं यज्ञनामानं विष्णुं तुष्टाव । | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V01 | | verse_id = IS_C01_V01 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । | | verse_line1 = ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । | ||
| verse_line2 = तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद् धनम् ॥ १ ॥ | | verse_lines = ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।;तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद् धनम् ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = isha | | verse_line2 = तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद् धनम् ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = isha | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V01" data-block-id="bhashya-IS_C01_V01"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = IS_C01_V01 | | verse_id = IS_C01_V01 | ||
| id = IS_C01_V01_B01 | | id = IS_C01_V01_B01 | ||
| text = | | text = ईशस्याऽवासयोग्यम्(ईशस्य वासयोग्यमीशावास्यम्) इशावास्यम् । जगत्यां प्रकृतौ । तेन ईशेन । त्यक्तेन दत्तेन । भुञ्जीथाः । स्वतः प्रवृत्यशक्तत्वाद् ईशावास्यमिदं जगत् । | ||
‘प्रवृत्तये प्रकृतिगं यस्मात् स प्रकृतीश्वरः । | |||
स्वतः | |||
तदधीनप्रवृत्तित्वात् तदीयं सर्वमेव यत् । | तदधीनप्रवृत्तित्वात् तदीयं सर्वमेव यत् । | ||
तद्दत्तेनैव भुञ्जीथाः अतो नान्यं प्रयाचयेत् | तद्दत्तेनैव भुञ्जीथाः अतो नान्यं प्रयाचयेत् ॥’ इति ब्रह्माण्डे(ब्राह्मे) ॥ १ ॥ | ||
}} | }} | ||
</div> | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V02 | | verse_id = IS_C01_V02 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = कुर्वन्नेवेह कर्माणि | | verse_line1 = कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतगꣳ समाः । | ||
| verse_line2 = एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥ | | verse_lines = कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतगꣳ समाः ।;एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = isha | | verse_line2 = एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = isha | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V02" data-block-id="bhashya-IS_C01_V02"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = IS_C01_V02 | | verse_id = IS_C01_V02 | ||
| id = IS_C01_V02_B01 | | id = IS_C01_V02_B01 | ||
| text = | | text = अकुर्वतः कर्म न लिप्यत इति नास्ति - | ||
‘अज्ञस्य कर्म लिप्येत कृष्णोपास्तिमकुर्वतः । | |||
अकुर्वतः कर्म न लिप्यत इति नास्ति | |||
ज्ञानिनोऽपि यतो ह्रासः आनन्दस्य भवेद् ध्रुवम् ॥ | ज्ञानिनोऽपि यतो ह्रासः आनन्दस्य भवेद् ध्रुवम् ॥ | ||
अतोऽलेपेऽपि लेपः | अतोऽलेपेऽपि लेपः स्याद् अतः कार्यैव सा सदा ॥’ इति नारदीये ॥ २ ॥ | ||
इति नारदीये ॥ २ ॥ | |||
}} | }} | ||
</div> | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V03 | |||
| document_id = IS | |||
| chapter_id = IS_C01 | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः । | |||
| verse_lines = असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।;ताꣳस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चाऽत्महनो जनाः ॥ ३ ॥ | |||
| verse_line2 = ताꣳस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चाऽत्महनो जनाः ॥ ३ ॥ | |||
| commentary1 = isha | |||
}} | |||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V03" data-block-id="bhashya-IS_C01_V03"> | |||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = IS_C01_V03 | | verse_id = IS_C01_V03 | ||
| | | id = IS_C01_V03_B01 | ||
| | | text = सुष्ठु रमणविरुद्धत्वादसुराणां प्राप्यत्वाच्च असुर्याः । ‘न च(खलु) रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनः’ इत्युक्तत्वात् । | ||
}} | }} | ||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = IS_C01_V03 | | verse_id = IS_C01_V03 | ||
| id = | | id = IS_C01_V03_bc_line | ||
| text = | | text = <span class="gr-moola">ये के च</span>(ये केचनेत्यनेन) इत्यनेन नियम उक्तः । | ||
‘नियमेन तमो यान्ति सर्वेऽपि विमुखा हरौ(विमुखा हरेः)।’ इति च ॥ ३ ॥ | |||
ये | |||
}} | }} | ||
</div> | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V04 | | verse_id = IS_C01_V04 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् । | | verse_line1 = अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् । | ||
| verse_line2 = तद् धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥ | | verse_lines = अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् ।;तद् धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥ | ||
| commentary1 = isha | | verse_line2 = तद् धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥ | ||
| commentary1 = isha | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V04" data-block-id="bhashya-IS_C01_V04"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = IS_C01_V04 | | verse_id = IS_C01_V04 | ||
| id = IS_C01_V04_B01 | | id = IS_C01_V04_B01 | ||
| text = | | text = ‘अनेजन्निभर्यत्वात् तदेकं प्राधान्यतस्तथा । | ||
सम्यग् ज्ञातुमशक्यत्वाद् अगम्यं तत्सुरैरपि ॥ | |||
स्वयं तु सर्वानगमत्(सर्वानुगमात्) पूर्वमेव स्वभावतः । | |||
स्वयं तु सर्वानगमत् पूर्वमेव स्वभावतः । | |||
अचिन्त्यशक्तितश्चैव सर्वगत्वाच्च तत्परम् ॥ | अचिन्त्यशक्तितश्चैव सर्वगत्वाच्च तत्परम् ॥ | ||
द्रवतोऽत्येति सन्तिष्ठत् तस्मिन् कर्माण्यधान्मरुत् । | द्रवतोऽत्येति सन्तिष्ठत् तस्मिन् कर्माण्यधान्मरुत् । | ||
मारुत्येव यतश्चेष्टा सर्वा तां | मारुत्येव यतश्चेष्टा सर्वा तां हरयेर्पयेत्॥’ इति ब्रह्माण्डे । | ||
‘ऋष= ज्ञाने’ ॥ ४ ॥ | |||
}} | }} | ||
</div> | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V05 | | verse_id = IS_C01_V05 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तदेजति तन्नेजति | | verse_line1 = तदेजति तन्नेजति तद् दूरे तद्वन्तिके । | ||
| verse_line2 = तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्य बाह्यतः ॥ ५ ॥ | | verse_lines = तदेजति तन्नेजति तद् दूरे तद्वन्तिके ।;तदन्तरस्य सर्वस्य(तदु सर्वस्यास्य) तदु सर्वस्य बाह्यतः ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = isha | | verse_line2 = तदन्तरस्य सर्वस्य(तदु सर्वस्यास्य) तदु सर्वस्य बाह्यतः ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = isha | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V05" data-block-id="bhashya-IS_C01_V05"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = IS_C01_V05 | | verse_id = IS_C01_V05 | ||
| id = IS_C01_V05_B01 | | id = IS_C01_V05_B01 | ||
| text = | | text = तदेजति(तत एजति) तत एव एजत्यन्यत् । तत् स्वयं नेजति । | ||
‘ततो बिभेति सर्वोऽपि न बिभेति हरिः स्वयम् । | |||
तदेजति तत एव एजत्यन्यत् । तत् स्वयं नेजति । | सर्वगत्वात् स दूरे च बाह्येऽन्तश्च समीपगः॥’ इति तत्त्वसंहितायाम् ॥ ५ ॥ | ||
सर्वगत्वात् स दूरे च बाह्येऽन्तश्च | |||
इति तत्त्वसंहितायाम् ॥ ५ ॥ | |||
}} | }} | ||
</div> | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V06 | | verse_id = IS_C01_V06 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । | | verse_line1 = यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । | ||
| verse_line2 = सर्वभूतेषु | | verse_lines = यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।;सर्वभूतेषु चाऽत्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = isha | | verse_line2 = सर्वभूतेषु चाऽत्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = isha | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V06" data-block-id="bhashya-IS_C01_V06"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = IS_C01_V06 | | verse_id = IS_C01_V06 | ||
| id = IS_C01_V06_B01 | | id = IS_C01_V06_B01 | ||
| text = | | text = ‘सर्वगं परमात्मानं सर्वं च परमात्मनि । | ||
यः पश्येत् स भयाभावान्नाऽत्मानं गोप्तुमिच्छति॥’ इति सौकरायणश्रुतिः ॥ ६ ॥ | |||
यः पश्येत् स | |||
इति सौकरायणश्रुतिः ॥ ६ ॥ | |||
}} | }} | ||
</div> | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V07 | | verse_id = IS_C01_V07 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः । | | verse_line1 = यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः । | ||
| verse_line2 = तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥ | | verse_lines = यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः ।;तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥ | ||
| commentary1 = isha | | verse_line2 = तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥ | ||
| commentary1 = isha | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V07" data-block-id="bhashya-IS_C01_V07"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = IS_C01_V07 | | verse_id = IS_C01_V07 | ||
| id = IS_C01_V07_B01 | | id = IS_C01_V07_B01 | ||
| text = | | text = यस्मिन् परमात्मनि सर्वभूतानि स परमा त्मैव तत्र सर्वभूतेषु अभूत् । एवं सर्वभूतेष्वेकत्वेन परमात्मानं विजानतः को मोहः ? | ||
}} | |||
</div> | |||
पूर्वोक्तानुवादेन शोकमोहाभावोऽपि विजानतः(शोकमोहाभावो विजानतः) चात्रोच्यते । अभ्यासश्च सर्वगतत्वस्य तात्पर्यद्योतनार्थः ॥ ७ ॥ | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V08 | | verse_id = IS_C01_V08 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम् | | verse_line1 = स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम् अस्नाविरꣳ शुद्धमपापविद्धम् । | ||
| verse_line2 = कविर्मनीषी परिभूः | | verse_lines = स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम् अस्नाविरꣳ शुद्धमपापविद्धम् ।;कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = isha | | verse_line2 = कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = isha | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V08" data-block-id="bhashya-IS_C01_V08"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = IS_C01_V08 | | verse_id = IS_C01_V08 | ||
| id = IS_C01_V08_B01 | | id = IS_C01_V08_B01 | ||
| text = | | text = ‘शुक्रं तच्छोकराहित्याद् अव्रणं नित्यपूर्णतः । | ||
पावनत्वात् सदा शुद्धम् अकायं लिङ्गवर्जनात् ॥ | |||
स्थूलदेहस्य राहित्याद् अस्नाविरम् उदाहृतम्। | |||
स्थूलदेहस्य | |||
एवम्भूतोऽपि सार्वज्ञ्यात् कविरित्येव शब्द्यते ॥ | एवम्भूतोऽपि सार्वज्ञ्यात् कविरित्येव शब्द्यते ॥ | ||
ब्रह्मादिसर्वमनसां प्रकृत्या मनसोऽपि च । | ब्रह्मादिसर्वमनसां (प्रकृत्या मनसोऽपि) प्रकृतेर्मनसोऽपि च । | ||
ईशितृत्वान्मनीषी स | ईशितृत्वान्मनीषी स परिभूः सर्वतो वरः ॥ | ||
सदाऽनन्याश्रयत्वाच्च स्वयम्भूः परिकीर्तितः । | सदाऽनन्याश्रयत्वाच्च स्वयम्भूः परिकीर्तितः । | ||
स सत्यं जगदेतादृङ् नित्यमेव प्रवाहतः ॥ | स सत्यं जगदेतादृङ् नित्यमेव प्रवाहतः ॥ | ||
अनाद्यनन्तकालेषु प्रवाहैकप्रकारतः । | अनाद्यनन्तकालेषु प्रवाहैकप्रकारतः(प्रवाहैकप्रकारकम् .हृ) । | ||
नियमेनैव ससृजे भगवान् पुरुषोत्तमः ॥ | नियमेनैव ससृजे भगवान् पुरुषोत्तमः ॥ | ||
सज्ज्ञानानन्दशीर्षोऽसौ सज्ज्ञानानन्दबाहुकः । | सज्ज्ञानानन्दशीर्षोऽसौ सज्ज्ञानानन्दबाहुकः । | ||
सज्ज्ञानानन्ददेहश्च सज्ज्ञानानन्दपादवान् ॥ | सज्ज्ञानानन्ददेहश्च सज्ज्ञानानन्दपादवान् ॥ | ||
एवम्भूतो महाविष्णुर्यथार्थं जगदीदृशम् । | एवम्भूतो महाविष्णुर्यथार्थं जगदीदृशम् । | ||
अनाद्यनन्तकालीनं | अनाद्यनन्तकालीनं ससर्जाऽत्मेच्छया प्रभुः ॥’ इति वाराहे ॥८॥ | ||
}} | }} | ||
</div> | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V09 | | verse_id = IS_C01_V09 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । | | verse_line1 = अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । | ||
| verse_line2 = ततो भूय इव ते तमो य उ | | verse_lines = अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।;ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳ रताः ॥ ९ ॥ | ||
| verse_line2 = ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳ रताः ॥ ९ ॥ | |||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V10 | | verse_id = IS_C01_V10 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = | | verse_line1 = अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया । | ||
| verse_line2 = इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे ॥ १० ॥ | | verse_lines = अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया ।;इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे ॥ १० ॥ | ||
| verse_line2 = इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे ॥ १० ॥ | |||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V11 | | verse_id = IS_C01_V11 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = विद्यां चाविद्यां च | | verse_line1 = विद्यां चाविद्यां च यस्तद् वेदोभयꣳ सह । | ||
| verse_line2 = अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ ११ ॥ | | verse_lines = विद्यां चाविद्यां च यस्तद् वेदोभयꣳ सह ।;अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = isha | | verse_line2 = अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = isha | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V11" data-block-id="bhashya-IS_C01_V11"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = IS_C01_V11 | | verse_id = IS_C01_V11 | ||
| id = IS_C01_V11_B01 | | id = IS_C01_V11_B01 | ||
| text = | | text = ‘अन्यथोपासका ये तु तमोऽन्धं यान्त्यसंशयम् । | ||
ततोऽधिकमिव व्यक्तं यान्ति तेषामनिन्दकाः ॥ | ततोऽधिकमिव व्यक्तं यान्ति तेषामनिन्दकाः ॥ | ||
तस्माद् यथास्वरूपं तु नारायणमनामयम् । | |||
अयथार्थस्य निन्दां च ये विदुः सह सज्जनाः । | अयथार्थस्य निन्दां च ये विदुः सह सज्जनाः(ते हि सज्जनाः) । | ||
‘ते निन्दयाऽयथार्थस्य दुःखाज्ञानादिरूपिणः ॥ | |||
दुःखाज्ञानादिसन्तीर्णाः सुखज्ञानादिरूपिणः । | दुःखाज्ञानादिसन्तीर्णाः सुखज्ञानादिरूपिणः । | ||
यथार्थस्य परिज्ञानात् सुखज्ञानादिरूपताम् ॥ | यथार्थस्य परिज्ञानात् सुखज्ञानादिरूपताम् ॥ | ||
यान्ति ... ॥ ९-११ ॥ | यान्ति(यान्त्येव .हृ) ... ॥ ९-११ ॥ | ||
}} | }} | ||
</div> | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V12 | | verse_id = IS_C01_V12 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते । | | verse_line1 = अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते । | ||
| verse_line2 = ततो भूय इव ते तमो य उ | | verse_lines = अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।;ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याꣳ रताः ॥ १२ ॥ | ||
| verse_line2 = ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याꣳ रताः ॥ १२ ॥ | |||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V13 | |||
| document_id = IS | |||
| chapter_id = IS_C01 | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = अन्यदेवाऽहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् । | |||
| verse_lines = अन्यदेवाऽहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् ।;इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे ॥ १३ ॥ | |||
| verse_line2 = इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे ॥ १३ ॥ | |||
| commentary1 = isha | |||
}} | |||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V14" data-block-id="bhashya-IS_C01_V14"> | |||
{{Bhashyam | |||
| verse_id = IS_C01_V13 | | verse_id = IS_C01_V13 | ||
| | | id = IS_C01_V13_B01 | ||
| | | text = ‘... एवं सृष्टिकर्तृत्वं नाङ्गीकुर्वन्ति ये हरेः ॥ | ||
तेऽपि यान्ति तमो घोरं तथा संहारकर्तृताम् । | |||
नाङ्गीकुर्वन्ति तेऽप्येवं तस्मात् सर्वगुणात्मकम् । | |||
सर्वकर्तारमीशेशं सर्वसंहारकारकम् ॥ | |||
}} | }} | ||
</div> | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V14 | | verse_id = IS_C01_V14 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = सम्भूतिं च विनाशं | | verse_line1 = सम्भूतिं च विनाशं यस्तद् वेदोभयꣳ सह । | ||
| verse_line2 = विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४ ॥ | | verse_lines = सम्भूतिं च विनाशं यस्तद् वेदोभयꣳ सह ।;विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४ ॥ | ||
| commentary1 = isha | | verse_line2 = विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४ ॥ | ||
| commentary1 = isha | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V14" data-block-id="bhashya-IS_C01_V14"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = IS_C01_V14 | | verse_id = IS_C01_V14 | ||
| id = IS_C01_V14_B01 | | id = IS_C01_V14_B01 | ||
| text = | | text = ‘यो वेद संहृतिज्ञानाद् देहबन्धाद् विमुच्यते । | ||
सुखज्ञानादिकर्तृत्वज्ञानात्(कर्तृृत्वज्ञानम्) तद् व्यक्तिमाव्रजेत् ॥ | |||
सुखज्ञानादिकर्तृत्वज्ञानात् | |||
सर्वदोषविनिर्मुक्तं गुणरूपं जनार्दनम् । | सर्वदोषविनिर्मुक्तं गुणरूपं जनार्दनम् । | ||
जानीयान्न गुणानां च भागहानिं प्रकल्पयेत् ॥ | जानीयान्न गुणानां च भागहानिं प्रकल्पयेत् ॥ | ||
न मुक्तानामपि हरेः साम्यं विष्णोरभिन्नताम् । | न मुक्तानामपि हरेः साम्यं विष्णोरभिन्नताम् । | ||
नैव प्रचिन्तयेत् | नैव प्रचिन्तयेत् तस्माद् ब्रह्मादेः साम्यमेव वा ॥ | ||
मानुषादिविरिञ्चान्तं तारतम्यं विमुक्तिगम् । | मानुषादिविरिञ्चान्तं तारतम्यं विमुक्तिगम् । | ||
ततो विष्णोः परोत्कर्षं | ततो विष्णोः परोत्कर्षं सम्यग् ज्ञात्वा विमुच्यते ॥’इति कौर्मे ॥ १४ ॥ | ||
}} | }} | ||
</div> | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V15 | | verse_id = IS_C01_V15 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । | | verse_line1 = हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । | ||
| verse_line2 = तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥ | | verse_lines = हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।;तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥ | ||
| commentary1 = isha | | verse_line2 = तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥ | ||
| commentary1 = isha | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V15" data-block-id="bhashya-IS_C01_V15"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = IS_C01_V15 | | verse_id = IS_C01_V15 | ||
| id = IS_C01_V15_B01 | | id = IS_C01_V15_B01 | ||
| text = | | text = ‘पात्रं हिरण्मयं सूर्यमण्डलं समुदाहृतम् । | ||
विष्णोः सत्यस्य तेनैव सर्वदाऽपिहितं मुखम् ॥ | |||
तत्तु पूर्णत्वतः पूषा विष्णुर्दर्शयति स्वयम् । | |||
विष्णोः सत्यस्य तेनैव सर्वदाऽपिहितं मुखम् ॥ तत्तु पूर्णत्वतः पूषा विष्णुर्दर्शयति स्वयम् । सत्यधर्माय भक्ताय... ॥ १५ ॥ | सत्यधर्माय भक्ताय... ॥ १५ ॥ | ||
}} | }} | ||
</div> | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V16 | | verse_id = IS_C01_V16 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् । | | verse_line1 = पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् । | ||
| verse_line2 = समूह तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि ॥ १६ ॥ | | verse_lines = पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।;समूह तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि ॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = isha | | verse_line2 = समूह तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि ॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = isha | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V16" data-block-id="bhashya-IS_C01_V16"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = IS_C01_V16 | | verse_id = IS_C01_V16 | ||
| id = IS_C01_V16_B01 | | id = IS_C01_V16_B01 | ||
| text = | | text = ‘.. ... प्रधानज्ञानरूपतः । | ||
विष्णुरेकऋषिर्ज्ञेयो यमो नियमनाद्धरिः ॥ | विष्णुरेकऋषिर्ज्ञेयो यमो नियमनाद्धरिः ॥ | ||
सूर्यः स सूरिगम्यत्वात् प्राजापत्यः प्रजापतेः । | सूर्यः स सूरिगम्यत्वात् प्राजापत्यः प्रजापतेः । | ||
विशेषेणैव | विशेषेणैव गम्यत्वाद् ... ॥ १६ ॥ | ||
}} | }} | ||
</div> | |||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| verse_id = IS_C01_V17 | | verse_id = IS_C01_V17 | ||
| document_id = IS | | document_id = IS | ||
| chapter_id = IS_C01 | | chapter_id = IS_C01 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १७ ॥ | ||
| verse_lines = योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १७ ॥ | |||
| commentary1 = isha | |||
| | |||
| commentary1 = isha | |||
}} | }} | ||
<div class="bhashya-collection" id="bhashya-IS_C01_V17" data-block-id="bhashya-IS_C01_V17"> | |||
{{Bhashyam | {{Bhashyam | ||
| verse_id = | | verse_id = IS_C01_V17 | ||
| id = IS_C01_V19_B01 | | id = IS_C01_V19_B01 | ||
| text = | | text = ‘...अहं चासावहेयतः । | ||
...अहं चासावहेयतः । | |||
अस्मि नित्यास्तितामानात् सर्वजीवेषु संस्थितः ॥ | अस्मि नित्यास्तितामानात् सर्वजीवेषु संस्थितः ॥ | ||
स्वयं तु सर्वजीवेभ्यो व्यतिरिक्तः परो हरिः । | स्वयं तु सर्वजीवेभ्यो व्यतिरिक्तः परो हरिः । | ||
स क्रतुर्ज्ञानरूपत्वादग्निरङ्गप्रणेतृतः | स क्रतुर्ज्ञानरूपत्वादग्निरङ्गप्रणेतृतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे । | ||
सत्यं ब्रह्म हृदये धारयतीति सत्यधर्मा । एकोऽसौशब्दः प्राणे स्थित इति | सत्यं ब्रह्म हृदये धारयतीति सत्यधर्मा । एकोऽसौशब्दः प्राणे स्थित इति ॥ | ||
}} | }} | ||
</div> | |||
[[Category:Sanskrit Documents]] | [[Category:Sanskrit Documents]] | ||
[[Category:Isha]] | [[Category:Isha]] | ||
Latest revision as of 07:14, 8 June 2026
‘प्रवृत्तये प्रकृतिगं यस्मात् स प्रकृतीश्वरः । तदधीनप्रवृत्तित्वात् तदीयं सर्वमेव यत् ।
तद्दत्तेनैव भुञ्जीथाः अतो नान्यं प्रयाचयेत् ॥’ इति ब्रह्माण्डे(ब्राह्मे) ॥ १ ॥
‘अज्ञस्य कर्म लिप्येत कृष्णोपास्तिमकुर्वतः । ज्ञानिनोऽपि यतो ह्रासः आनन्दस्य भवेद् ध्रुवम् ॥
अतोऽलेपेऽपि लेपः स्याद् अतः कार्यैव सा सदा ॥’ इति नारदीये ॥ २ ॥
सम्यग् ज्ञातुमशक्यत्वाद् अगम्यं तत्सुरैरपि ॥ स्वयं तु सर्वानगमत्(सर्वानुगमात्) पूर्वमेव स्वभावतः । अचिन्त्यशक्तितश्चैव सर्वगत्वाच्च तत्परम् ॥ द्रवतोऽत्येति सन्तिष्ठत् तस्मिन् कर्माण्यधान्मरुत् । मारुत्येव यतश्चेष्टा सर्वा तां हरयेर्पयेत्॥’ इति ब्रह्माण्डे ।
‘ऋष= ज्ञाने’ ॥ ४ ॥
‘ततो बिभेति सर्वोऽपि न बिभेति हरिः स्वयम् ।
सर्वगत्वात् स दूरे च बाह्येऽन्तश्च समीपगः॥’ इति तत्त्वसंहितायाम् ॥ ५ ॥
पूर्वोक्तानुवादेन शोकमोहाभावोऽपि विजानतः(शोकमोहाभावो विजानतः) चात्रोच्यते । अभ्यासश्च सर्वगतत्वस्य तात्पर्यद्योतनार्थः ॥ ७ ॥
पावनत्वात् सदा शुद्धम् अकायं लिङ्गवर्जनात् ॥ स्थूलदेहस्य राहित्याद् अस्नाविरम् उदाहृतम्। एवम्भूतोऽपि सार्वज्ञ्यात् कविरित्येव शब्द्यते ॥ ब्रह्मादिसर्वमनसां (प्रकृत्या मनसोऽपि) प्रकृतेर्मनसोऽपि च । ईशितृत्वान्मनीषी स परिभूः सर्वतो वरः ॥ सदाऽनन्याश्रयत्वाच्च स्वयम्भूः परिकीर्तितः । स सत्यं जगदेतादृङ् नित्यमेव प्रवाहतः ॥ अनाद्यनन्तकालेषु प्रवाहैकप्रकारतः(प्रवाहैकप्रकारकम् .हृ) । नियमेनैव ससृजे भगवान् पुरुषोत्तमः ॥ सज्ज्ञानानन्दशीर्षोऽसौ सज्ज्ञानानन्दबाहुकः । सज्ज्ञानानन्ददेहश्च सज्ज्ञानानन्दपादवान् ॥ एवम्भूतो महाविष्णुर्यथार्थं जगदीदृशम् ।
अनाद्यनन्तकालीनं ससर्जाऽत्मेच्छया प्रभुः ॥’ इति वाराहे ॥८॥
ततोऽधिकमिव व्यक्तं यान्ति तेषामनिन्दकाः ॥ तस्माद् यथास्वरूपं तु नारायणमनामयम् । अयथार्थस्य निन्दां च ये विदुः सह सज्जनाः(ते हि सज्जनाः) । ‘ते निन्दयाऽयथार्थस्य दुःखाज्ञानादिरूपिणः ॥ दुःखाज्ञानादिसन्तीर्णाः सुखज्ञानादिरूपिणः । यथार्थस्य परिज्ञानात् सुखज्ञानादिरूपताम् ॥
यान्ति(यान्त्येव .हृ) ... ॥ ९-११ ॥
तेऽपि यान्ति तमो घोरं तथा संहारकर्तृताम् । नाङ्गीकुर्वन्ति तेऽप्येवं तस्मात् सर्वगुणात्मकम् ।
सर्वकर्तारमीशेशं सर्वसंहारकारकम् ॥
सुखज्ञानादिकर्तृत्वज्ञानात्(कर्तृृत्वज्ञानम्) तद् व्यक्तिमाव्रजेत् ॥ सर्वदोषविनिर्मुक्तं गुणरूपं जनार्दनम् । जानीयान्न गुणानां च भागहानिं प्रकल्पयेत् ॥ न मुक्तानामपि हरेः साम्यं विष्णोरभिन्नताम् । नैव प्रचिन्तयेत् तस्माद् ब्रह्मादेः साम्यमेव वा ॥ मानुषादिविरिञ्चान्तं तारतम्यं विमुक्तिगम् ।
ततो विष्णोः परोत्कर्षं सम्यग् ज्ञात्वा विमुच्यते ॥’इति कौर्मे ॥ १४ ॥
विष्णोः सत्यस्य तेनैव सर्वदाऽपिहितं मुखम् ॥ तत्तु पूर्णत्वतः पूषा विष्णुर्दर्शयति स्वयम् ।
सत्यधर्माय भक्ताय... ॥ १५ ॥
विष्णुरेकऋषिर्ज्ञेयो यमो नियमनाद्धरिः ॥ सूर्यः स सूरिगम्यत्वात् प्राजापत्यः प्रजापतेः ।
विशेषेणैव गम्यत्वाद् ... ॥ १६ ॥
अस्मि नित्यास्तितामानात् सर्वजीवेषु संस्थितः ॥ स्वयं तु सर्वजीवेभ्यो व्यतिरिक्तः परो हरिः । स क्रतुर्ज्ञानरूपत्वादग्निरङ्गप्रणेतृतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।
सत्यं ब्रह्म हृदये धारयतीति सत्यधर्मा । एकोऽसौशब्दः प्राणे स्थित इति ॥