Bhagavatatatparyanirnaya/Moola: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 4: | Line 4: | ||
<span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमः स्कन्धः"></span> | <span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमः स्कन्धः"></span> | ||
== प्रथमः स्कन्धः == | == प्रथमः स्कन्धः == | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S01_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = जन्माद्यस्य यतोऽन्वायादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् | |||
| verse_lines = जन्माद्यस्य यतोऽन्वायादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्;तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यं सूरयः ।;तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गो मृषा;धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S01_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धर्मः प्रेज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां | |||
| verse_lines = धर्मः प्रेज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां;वेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम् ।;श्रीमद्भागवते महामुनिकृते किं वा परैरीश्वरः;सद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S01_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = निगमकल्पतरोर्गलितं फलं | |||
| verse_lines = निगमकल्पतरोर्गलितं फलं;शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम् ।;पिबत भागवतं रसमालयं;मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S01_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः | |||
| verse_lines = नैमिषेऽनिमिषक्षेत्रे ऋषयः शौनकादयः;सत्रं स्वर्गाय लोकाय सहस्त्रसममासत ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S01_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यानि वेदविदां श्रेष्ठो भगवान् बादरायणः । | |||
| verse_lines = यानि वेदविदां श्रेष्ठो भगवान् बादरायणः ।;अन्ये च मुनयः सूत परावरविदो विदुः ॥ ७ ॥;वेत्थ त्वं सौम्य तत्सर्वं तत्त्वतस्तदनुग्रहात् ।;ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S01_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् । | |||
| verse_lines = आपन्नः संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् ।;ततः सद्यो विमुच्येत यं बिभेति स्वयं भवः ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S01_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथाऽख्याहि हरेर्धीमन्नवतारकथाः शुभाः । | |||
| verse_lines = अथाऽख्याहि हरेर्धीमन्नवतारकथाः शुभाः ।;लीला विदधतः स्वैरमीश्वरस्यात्ममायया ॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S02_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सूत उवाच– | |||
| verse_lines = सूत उवाच–;यं प्रव्रजन्तमनुपेतमपेतकृत्यं;द्वैपायनो विरहकातर आजुहाव ।;पुत्रेति तन्मयतया तरवोऽपि नेदु-;स्तं सर्वभूतहृदयं मुनिमानतोऽस्मि ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S02_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक- | |||
| verse_lines = यः स्वानुभावमखिलश्रुतिसारमेक-;मध्यात्मदीपमतितीर्षतां तमोऽन्धम् ।;संसारिणां करुणयाऽऽह पुराणगुह्यं;तं व्याससूनुमुपयामि गुरुं मुनीनाम् ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S02_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वदन्ति तत्तत्वविदस्तत्वं यज्ज्ञानमद्वयम् । | |||
| verse_lines = वदन्ति तत्तत्वविदस्तत्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।;ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S02_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सत्तामात्रं तु यत्किञ्चित्सदसच्चाविशेषणम् । | |||
| verse_lines = सत्तामात्रं तु यत्किञ्चित्सदसच्चाविशेषणम् ।;उभाभ्यां भाष्यते साक्षाद्भगवान् केवलः स्मृतः ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S02_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया । | |||
| verse_lines = तच्छ्रद्दधाना मुनयो ज्ञानवैराग्ययुक्तया ।;पश्यन्त्यात्मनि चात्मानं भक्त्या श्रुतिगृहीतया ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S02_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । | |||
| verse_lines = भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।;क्षीयन्ते चास्य कर्माणि दृष्ट एवात्मनीश्वरे ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S02_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै- | |||
| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति प्रकृतेर्गुणास्तै-;र्युक्तः परः पुरुष एव इहास्य धत्ते ।;स्थित्यादये हरिविरिञ्चहरेति सञ्ज्ञाः;श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्वतनौ नृणां स्युः ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S02_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्निस्त्रयीमयः । | |||
| verse_lines = पार्थिवाद्दारुणो धूमस्तस्मादग्निस्त्रयीमयः ।;तमसस्तु रजस्तस्मात् सत्त्वं यद् ब्रह्मदर्शनम् ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S02_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम् । | |||
| verse_lines = भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम् ।;सत्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पते नेतराविह ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S02_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रजस्तमःप्रकृतयः समशीलान् भजन्ति वै । | |||
| verse_lines = रजस्तमःप्रकृतयः समशीलान् भजन्ति वै ।;पितृभूतप्रजेशादीन् श्रियैश्वर्यप्रजेप्सवः ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S02_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया । | |||
| verse_lines = स एवेदं ससर्जाग्रे भगवानात्ममायया ।;सदसद्रूपया चासौ गुणमय्याऽगुणो विभुः ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S02_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव । | |||
| verse_lines = तया विलसितेष्वेषु गुणेषु गुणवानिव ।;अन्तःप्रविष्ट आभाति विज्ञानेन विजृम्भितः ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S02_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः । | |||
| verse_lines = असौ गुणमयैर्भावैर्भूतसूक्ष्मेन्द्रियात्मभिः ।;स्वनिर्मितेषु निर्विष्टो भुङ्क्ते भूतेषु तद्गुणान् ॥ ३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सूत उवाच– | |||
| verse_lines = सूत उवाच–;जगृहे पौरुषं रूपं भगवान् महदादिभिः ।;सम्भूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः । | |||
| verse_lines = यस्यावयवसंस्थानैः कल्पितो लोकविस्तरः ।;तद्वै भगवतो रूपं विशुद्धं सत्त्वमूर्जितम् ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् । | |||
| verse_lines = एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् ।;यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देवतिर्यङ्नरादयः ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स एव प्रथमं देवः कौमारं सर्गमास्थितः । | |||
| verse_lines = स एव प्रथमं देवः कौमारं सर्गमास्थितः ।;चचार दुश्चरं ब्रह्मा ब्रह्मचर्यमखण्डितम् ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तृतीयमृषिसर्गं वै देवर्षित्वमुपेत्य सः । | |||
| verse_lines = तृतीयमृषिसर्गं वै देवर्षित्वमुपेत्य सः ।;तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कर्म्यं कर्मणां यतः ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तुर्यं धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी । | |||
| verse_lines = तुर्यं धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी ।;भूत्वाऽऽत्मोपशमोपेतमकरोद्दुश्चरं तमः ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् । | |||
| verse_lines = पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् ।;प्रोवाचाऽऽसुरये साङ्ख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम् ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = षष्ठमत्रेरपत्यत्वं वृतः प्राप्तोऽनसूयया । | |||
| verse_lines = षष्ठमत्रेरपत्यत्वं वृतः प्राप्तोऽनसूयया ।;आन्वीक्षिकीमलर्काय प्रह्लादादिभ्य ऊचिवान् ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः । | |||
| verse_lines = ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः ।;दुग्धवानोेषधीर्विप्रास्तेनायं च उशत्तमः ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् । | |||
| verse_lines = ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात् ।;चक्रे वेदतरोः शाखा दृष्ट्वा पुंसोऽल्पमेधसः ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी । | |||
| verse_lines = एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी ।;रामकृष्णाविति भुवो भगवानहरद्भरम् ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् । | |||
| verse_lines = ततः कलौ सम्प्रवृत्ते सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।;बुद्धो नाम्ना जिनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अवतारा ह्यसङ्ख्येया हरेः सत्वनिधेर्द्विजाः । | |||
| verse_lines = अवतारा ह्यसङ्ख्येया हरेः सत्वनिधेर्द्विजाः ।;यथा विदासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् । | |||
| verse_lines = एते स्वांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।;इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः । | |||
| verse_lines = एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः ।;मायागुणैर्विरचितं महदादिभिरात्मनि ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथा नभसि मेघौघा रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले । | |||
| verse_lines = यथा नभसि मेघौघा रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले ।;एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् । | |||
| verse_lines = अतः परं यदव्यक्तमव्यूढगुणबृंहितम् ।;अदृष्टाश्रुतवस्तुत्वात् स जीवो यः पुनर्भवः ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्रेमे सदसद्रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा । | |||
| verse_lines = यत्रेमे सदसद्रूपे प्रतिषिद्धे स्वसंविदा ।;अविद्ययाऽऽत्मनि कृते इति तद्ब्रह्मदर्शनम् ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः । | |||
| verse_lines = यद्येषोपरता देवी माया वैशारदी मतिः ।;सम्पन्न एवेति विदुर्महिमि्न स्वे महीयते ॥ ३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च । वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_lines = एवं जन्मानि कर्माणि ह्यकर्तुरजनस्य च । वर्णयन्ति स्म कवयो वेदगुह्यानि हृत्पतेः ॥ ३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S03_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । | |||
| verse_lines = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।;उत्तमश्लोकचरितं चकार भगवानृषिः ॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्य पुत्रो महायोगी समदृक् निर्विकल्पकः । | |||
| verse_lines = तस्य पुत्रो महायोगी समदृक् निर्विकल्पकः ।;एकान्तगतिरुन्निद्रो गूढो मूढ इवेयते ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सूत उवाच— | |||
| verse_lines = सूत उवाच—;द्वापरे समनुप्राप्ते तृतीये युगपर्यये ।;जातः पराशराद्योगी वासव्यां कलया हरेः ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दुर्भगांश्च जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुसा । | |||
| verse_lines = दुर्भगांश्च जनान् वीक्ष्य मुनिर्दिव्येन चक्षुसा ।;सर्ववर्णाश्रमाणां यद् दध्यौ चिरममोघदृक् ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्त्रीशूद्रब्रह्मबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा । | |||
| verse_lines = स्त्रीशूद्रब्रह्मबन्धूनां त्रयी न श्रुतिगोचरा ।;कर्मश्रेयसि मूढानां श्रेय एवं भवेदिह ।;इति भारतमाख्यानं कृपया मुनिना कृतम् ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः । | |||
| verse_lines = एवं प्रवृत्तस्य सदा भूतानां श्रेयसि द्विजाः ।;सर्वात्मकेनाऽपि यदा नातुष्यद् हृदयं ततः ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नातिप्रसन्नहृदयः सरस्वत्यास्तटे शुचौ । | |||
| verse_lines = नातिप्रसन्नहृदयः सरस्वत्यास्तटे शुचौ ।;वितर्कयन् विविक्तस्थ इदं चोवाच धर्मवित् ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः । | |||
| verse_lines = धृतव्रतेन हि मया छन्दांसि गुरवोऽग्नयः ।;मानिता निर्व्यलीकेन गृहीतं चानुशासनम् ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवाऽत्मना विभुः । | |||
| verse_lines = अथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवाऽत्मना विभुः ।;असम्पन्न इवाऽभाति ब्रह्मवर्चस्विसत्तमः ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः । | |||
| verse_lines = किं वा भागवता धर्मा न प्रायेण निरूपिताः ।;प्रियाः परमहंसानां त एव ह्यच्युतप्रियाः ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S04_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्यैवं खिन्नमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः । | |||
| verse_lines = तस्यैवं खिन्नमात्मानं मन्यमानस्य खिद्यतः ।;कृष्णस्य नारदोऽभ्यागादाश्रमं प्रागुदाहृतम् ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S05_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नारद उवाच— | |||
| verse_lines = नारद उवाच—;पाराशर्य महाभाग भवतः कच्चिदात्मना ।;परितुष्यति शारीर आत्मा मानस एव वा ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S05_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = जिज्ञासितमधीतं च ब्रह्म यत्तत् सनातनम् । | |||
| verse_lines = जिज्ञासितमधीतं च ब्रह्म यत्तत् सनातनम् ।;तथाऽपि शोचस्यात्मानमकृतार्थ इव प्रभो ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S05_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = व्यास उवाच— | |||
| verse_lines = व्यास उवाच—;अस्त्येव मे सर्वमिदं त्वयोक्तं, तथाऽपि नात्मा परितुष्यते मे ।;तत्मूलमव्यक्तमगाधबोधं, पृच्छामहे त्वाऽऽत्मभवात्मभूतम् ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S05_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथा धर्मादयो ह्यर्था मुनिवर्यानुवर्णिताः । | |||
| verse_lines = यथा धर्मादयो ह्यर्था मुनिवर्यानुवर्णिताः ।;न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S05_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो | |||
| verse_lines = न यद्वचश्चित्रपदं हरेर्यशो;जगत्पवित्रं न गृणीत कर्हिचित् ।;तद्वायसं तीर्थमुशन्ति मानसा;न यत्र हंसा न्यपतन् मिमङ्क्षया ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S05_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं | |||
| verse_lines = नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं;न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् ।;कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे;न चार्षितं कर्म यदप्यकारणम् ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S05_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अतो महाभाग भवानमोघदृक् | |||
| verse_lines = अतो महाभाग भवानमोघदृक्;शुचिश्रवाः सत्यरतो धृतव्रतः ।;उरुक्रमस्याखिलबन्धमुक्तये;समाधिनाऽनुस्मर यद्विचेष्टितम् ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S05_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = जुगुस्पिसं धर्मकृतेऽनुशासनं | |||
| verse_lines = जुगुस्पिसं धर्मकृतेऽनुशासनं;स्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः ।;यद्वाक्यतो धर्म इतीतरस्थितो;न मन्यते तस्य निवारणं जनः ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S05_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभो- | |||
| verse_lines = विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभो-;रनन्तपारस्य निवृत्तितः सुखम् ।;प्रवर्तमानस्य गुणैरनात्मन-;स्ततो भवान् दर्शय चेष्टितं विभोः ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S05_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो | |||
| verse_lines = इदं हि विश्वं भगवानिवेतरो;यतो जगत्स्थाननिरोधसम्भवः ।;तद्धि स्वयं वेद भवांस्तथापि;प्रादेशमात्रं भवतः प्रदर्शितम् ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S05_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मिंस्तदा लब्धरुचेर्महामते | |||
| verse_lines = तस्मिंस्तदा लब्धरुचेर्महामते;प्रियश्रवस्यस्खलिता मतिर्मम ।;ययाऽहमेतत् सदसत् स्वमायया;पश्ये मयि ब्रह्मणि कल्पितं परे ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S05_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वमप्यदभ्रश्रुत विश्रुतं विभोः | |||
| verse_lines = त्वमप्यदभ्रश्रुत विश्रुतं विभोः;समाप्यते येन विदां बुभुत्सितम् ।;प्रख्याहि दुःखैर्मुहुरर्दितात्मनां;सङ्क्लेशनिर्वाणमुशन्ति नान्यथा ॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S06_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्फीतान् जनपदान् तत्र पुरग्रामव्रजाकरान् । | |||
| verse_lines = स्फीतान् जनपदान् तत्र पुरग्रामव्रजाकरान् ।;खेटान् पट्टनवाटीश्च वनान्युपवनानि च ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S06_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रेमातिभारनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः । | |||
| verse_lines = प्रेमातिभारनिर्भिन्नपुलकाङ्गोऽतिनिर्वृतः ।;आनन्दसंप्लवे लीनो नापश्यमुभयं मुने ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S07_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सूत उवाच— | |||
| verse_lines = सूत उवाच—;ब्रह्मनद्याः सरस्वत्याः आश्रमः पश्चिमे तटे ।;शम्याप्रास इति प्रोक्त ऋषीणां सत्रवर्धनः ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S07_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले । | |||
| verse_lines = भक्तियोगेन मनसि सम्यक् प्रणिहितेऽमले ।;अपश्यत् पुरुषं पूर्णं मायां च तदपाश्रयाम् ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S07_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भर्तुः प्रियं द्रौणिरिति स्म पश्यन् | |||
| verse_lines = भर्तुः प्रियं द्रौणिरिति स्म पश्यन्;कृष्णासुतानां स्वपतां शिरांसि ।;अपाहरद्विप्रियमेतदस्य;जुगुप्सितं कर्म विगर्हयन्ती ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S07_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = माता शिशूनां निधनं सुतानां | |||
| verse_lines = माता शिशूनां निधनं सुतानां;निशम्य घोरं परितप्यमाना ।;तदाऽरुदद् बाष्पकलाकुलाक्षी;तां सान्त्वयन्नाह किरीटमाली ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S08_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् । | |||
| verse_lines = तथा परमहंसानां मुनीनाममलात्मनाम् ।;भक्तियोगविधानार्थं कथं पश्येमहि स्त्रियः ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S08_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विपदः सन्तु नः शश्वत् तत्र तत्र जगत्पते । | |||
| verse_lines = विपदः सन्तु नः शश्वत् तत्र तत्र जगत्पते ।;भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम् ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S08_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मन्ये त्वां कालमीशानं अनादिनिधनं परम् । | |||
| verse_lines = मन्ये त्वां कालमीशानं अनादिनिधनं परम् ।;समं चरन्तं सर्वत्र भूतानां यन्मिथः कलिः ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S08_V41 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ते वयं नामरूपाभ्यां यदुभिः सह पाण्डवाः । | |||
| verse_lines = ते वयं नामरूपाभ्यां यदुभिः सह पाण्डवाः ।;भवतो दर्शनं यर्हि हृषीकाणामिवेशितुः ॥ ४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S09_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नैनो राज्ञः प्रजाभर्तुः धर्मो युद्धे वधो द्विषाम् । | |||
| verse_lines = नैनो राज्ञः प्रजाभर्तुः धर्मो युद्धे वधो द्विषाम् ।;इति मे न तु बोधाय कल्पते शाश्वतं वचः ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S09_V45 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शितविशिखहतो विशीर्णदंसः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे । | |||
| verse_lines = शितविशिखहतो विशीर्णदंसः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे ।;प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् मुदे मुकुन्दः ॥ ४५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S10_V0 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = निशम्य भीष्मोक्तमथाच्युतोदितं | |||
| verse_lines = निशम्य भीष्मोक्तमथाच्युतोदितं;प्रवृत्तिविज्ञानविधूतविभ्रमः।;शशास गामिन्द्र इवाजिताश्रयः;प्रणिध्युपात्तामनुजानुवर्तितः ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S10_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अश्रूयन्ताऽशिषः सत्यास्तत्र तत्र द्विजेरिताः । | |||
| verse_lines = अश्रूयन्ताऽशिषः सत्यास्तत्र तत्र द्विजेरिताः ।;नानुरूपाऽनुरूपाश्च निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S10_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्त्रिय ऊचुः— | |||
| verse_lines = स्त्रिय ऊचुः—;स वै किलायं पुरुषः पुरातनो;य एक आसीदविशेष आत्मनि ।;अग्रे गुणेभ्यो जगदात्मनीश्वरे;निमीलितात्मा निशि सुप्तशक्तिषु ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S10_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स एव भूयो निजवीर्यचोदितां | |||
| verse_lines = स एव भूयो निजवीर्यचोदितां;स्वजीवमायां प्रकृतिं सिसृक्षतीम् ।;अनामरूपात्मनि रूपनामनी;विधित्समानोऽनुससार शास्तिकृत् ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S10_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदा ह्यधर्मेण तमोऽधिका नृपाः | |||
| verse_lines = यदा ह्यधर्मेण तमोऽधिका नृपाः;जीवन्ति तत्रैष हि सात्वतः किल ।;धर्मं भगं सत्यमृतं दयां यशो;भवाय रूपाणि दधद्युगे युगे ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S10_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एताः पुरा स्त्रीत्वमवाप्तये समं | |||
| verse_lines = एताः पुरा स्त्रीत्वमवाप्तये समं;निरस्तशोकं बत साधु कुर्वते ।;यासां गृहात्पुष्करलोचनः पतिः;न जात्वपैत्याकृतिभिः हृदि स्पृशन् ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S10_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अजातशत्रुः पृतनां गोपीथाय मधुद्विषः । | |||
| verse_lines = अजातशत्रुः पृतनां गोपीथाय मधुद्विषः ।;परेभ्यः शङ्कितः स्नेहात् प्रायुङ्क्त चतुरङ्गिणीम् ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S10_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्र तत्र च तत्रत्यैर्हरिः प्रत्युद्यतार्हणः । | |||
| verse_lines = तत्र तत्र च तत्रत्यैर्हरिः प्रत्युद्यतार्हणः ।;सायं भेजे दिशं पश्चाद्गविष्ठो गां गतस्तदा ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S10_V46 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यर्ह्यम्बुजाक्षाञ्चति माधवो भवान् | |||
| verse_lines = यर्ह्यम्बुजाक्षाञ्चति माधवो भवान्;कुरून् मधून् वाऽथ सुहृद्दिदृक्षया ।;तत्राब्दकोटिप्रतिमः क्षणो भवेद्;रविं विनाऽक्ष्णामिव नस्तवाच्युत ॥ ४६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S10_V75 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्तदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः । | |||
| verse_lines = यत्तदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः ।;न युज्यते सदाऽऽत्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ॥ ७५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S10_V76 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तं मेनिरे खला मूढाः स्त्रैणं चानुव्रतं हरेः । | |||
| verse_lines = तं मेनिरे खला मूढाः स्त्रैणं चानुव्रतं हरेः ।;अप्रमाणविदो भर्तुरीश्वरं मतयो यथा ॥ ७६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S11_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ब्राह्मणा ऊचुः— | |||
| verse_lines = ब्राह्मणा ऊचुः—;पार्थ प्रजाविता साक्षादिक्ष्वाकुरिव मानवः ।;ब्रह्मण्यः सत्यसन्धश्च रामो दाशरर्थियथा ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S11_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स राजपुत्रो ववृधे आशु शुक्ल इवोडुपः । | |||
| verse_lines = स राजपुत्रो ववृधे आशु शुक्ल इवोडुपः ।;आपूर्यमाणः पितृभिः काष्ठाभिरिव सोऽन्वहम् ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रत्युज्जग्मुः प्रहर्षेण प्राणांस्तन्व इवाऽगतान् । | |||
| verse_lines = प्रत्युज्जग्मुः प्रहर्षेण प्राणांस्तन्व इवाऽगतान् ।;अभिसङ्गम्य विधिवत्परिष्वङ्गाभिवन्दनैः ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इत्युक्तो धर्मराजेन सर्वं तत्समवर्णयत् । | |||
| verse_lines = इत्युक्तो धर्मराजेन सर्वं तत्समवर्णयत् ।;यथानुभूतं भ्रमता विना यदुकुलक्षयम् ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अबिभ्रदर्यमा दण्डं यथाघमघकारिषु । | |||
| verse_lines = अबिभ्रदर्यमा दण्डं यथाघमघकारिषु ।;यावद्बभार शूद्रत्वं शापाद्वर्षशतं यमः ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रतिक्रिया न यस्येह कुतश्चित् कर्हिचित् प्रभो । | |||
| verse_lines = प्रतिक्रिया न यस्येह कुतश्चित् कर्हिचित् प्रभो ।;स एष भगवान् कालः सर्वेषां नः समागतः ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथोदीचीं दिशं यातु स्वैरज्ञातगतिर्भवान् । | |||
| verse_lines = अथोदीचीं दिशं यातु स्वैरज्ञातगतिर्भवान् ।;इतोऽर्वाक्प्रायशः कालः पुंसां गुणविकर्षणः ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अजातशत्रुः कृतमैत्रो हुताग्निर्विप्रान्नत्वा तिलगोवस्त्ररुग्मैः । | |||
| verse_lines = अजातशत्रुः कृतमैत्रो हुताग्निर्विप्रान्नत्वा तिलगोवस्त्ररुग्मैः ।;गृहान्प्रविष्टो गुरुवन्दनाय न चापश्यत्पितरौ सौबलीं च ॥३१॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः । | |||
| verse_lines = तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः ।;गावद्गणे क्व नस्तातो वृद्धो हीनश्च नेत्रयोः ।;अम्बा वा हतपुत्राऽऽर्ता पितृव्यः क्व गतः सुहृत् ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पितर्युपरते पाण्डौ सर्वान्नः सुहृदः शिशून् । | |||
| verse_lines = पितर्युपरते पाण्डौ सर्वान्नः सुहृदः शिशून् ।;अरक्षतां व्यसनतः पितृव्यौ क्व गतावितः ॥ ३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सञ्जय उवाच— | |||
| verse_lines = सञ्जय उवाच—;अहं च व्यंसितो राजन् पित्रोर्वः कुलनन्दन ।;न वेद साध्व्या गान्धार्या मुषितोऽस्मि महात्मभिः ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = युधिष्ठिर उवाच— | |||
| verse_lines = युधिष्ठिर उवाच—;नाहं वेद गतिं पित्रोर्भगवान् क्वगतावितः ।;अम्बा वा हतपुत्राऽऽर्ता क्व गता च तपस्विनी ।;कर्णधार इवापारे सीदतां पारदर्शनः ॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं चाथवोभयम् । | |||
| verse_lines = यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं चाथवोभयम् ।;सर्वथा हि न शोच्यास्ते स्नेहादन्यत्र मोहजात् ॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V51 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धृतराष्ट्रः सह भ्रात्रा गान्धार्या च स्वभार्यया । | |||
| verse_lines = धृतराष्ट्रः सह भ्रात्रा गान्धार्या च स्वभार्यया ।;दक्षिणेन हिमवता ऋषीणामाश्रमं गतः ॥ ५१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V53 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्नात्वा त्रिषवणं तस्मिन् हुत्वा चाग्नीन् यथाविधि । | |||
| verse_lines = स्नात्वा त्रिषवणं तस्मिन् हुत्वा चाग्नीन् यथाविधि ।;अब्भक्ष उपशान्तात्मा स आस्तेऽ)विगतेक्षणः ॥ ५३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V55 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विज्ञानात्मनि संयोज्य क्षेत्रज्ञे प्रविलाप्य तम् । | |||
| verse_lines = विज्ञानात्मनि संयोज्य क्षेत्रज्ञे प्रविलाप्य तम् ।;ब्रह्मण्यात्मानमाधारे घटाम्बरमिवाम्बरे ॥ ५५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V56 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ध्वस्तमायागुणोद्रेको निरुद्धकरणाशयः । | |||
| verse_lines = ध्वस्तमायागुणोद्रेको निरुद्धकरणाशयः ।;निवर्तिताखिलाहार आस्ते स्थाणुरिवाधुना॥ ५६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V57 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स वा अद्यतनाद् राजा परतः पञ्चमेऽहनि । | |||
| verse_lines = स वा अद्यतनाद् राजा परतः पञ्चमेऽहनि ।;कलेवरं हास्यति ह तच्च भस्मीभविष्यति ॥ ५७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S12_V59 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विदुरस्तु तदाश्चर्यं निशाम्य कुरुनन्दन । | |||
| verse_lines = विदुरस्तु तदाश्चर्यं निशाम्य कुरुनन्दन ।;हर्षशोकयुतस्तस्माद् गन्ता तीर्थनिषेवकः ॥ ५९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S13_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = व्यतीताः कतिचिन् मासास्तदा तु शतशो नृपः । | |||
| verse_lines = व्यतीताः कतिचिन् मासास्तदा तु शतशो नृपः ।;ददर्श घोररूपाणि निमित्तानि भृगूद्वह ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S13_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अपि देवर्षिणाऽऽदिष्टः स कालः प्रत्युपस्थितः । | |||
| verse_lines = अपि देवर्षिणाऽऽदिष्टः स कालः प्रत्युपस्थितः ।;यदाऽऽत्मनोऽङ्गमाक्रीडं भगवानुत्सिसृक्षति ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S13_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मृत्युदूतः कपोतोऽग्नावुलूकः कम्पयन्मनः । | |||
| verse_lines = मृत्युदूतः कपोतोऽग्नावुलूकः कम्पयन्मनः ।;प्रत्युलूकश्च हुङ्कारैरनिद्रौ शून्यमिच्छतः ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S13_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भगवानपि गोविन्दो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः । | |||
| verse_lines = भगवानपि गोविन्दो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः ।;कच्चित्पुरे सुधर्मायां सुखमास्ते सुहृद्वृतः ॥ ३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S13_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे । | |||
| verse_lines = कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे ।;अलब्धमानोऽवज्ञातः किं वा तात चिरोषितः ॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S14_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पत्न््नयास्तवापि मखक्लृप्तमहाभिषेक- | |||
| verse_lines = पत्न््नयास्तवापि मखक्लृप्तमहाभिषेक-;श्लाघिष्ठचारुकबरं कितवैः सभायाम् ।;स्पृष्टं विकीर्य पदयोः पतिताश्रुमुख्यो;यैस्तत्स्त्रियो न्यकृत तत् सविमुक्तकेश्यः ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S14_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते | |||
| verse_lines = तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते;सोऽहं रथी नृपतयो यत आमनन्ति ।;सर्वं क्षणेन तदभूदसदीशरिक्तं;भस्मन् हुतं कुहकराद्धमिवोप्तमूषे ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S15_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सूत उवाच— | |||
| verse_lines = सूत उवाच—;वासुदेवाङ्घ्र्यभिध्यानपरिबृंहितरंहसा ।;भक्त्या निर्मथिताशेषकषायधिषणोऽर्जुनः ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S15_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गीतं भगवता ज्ञानं यत्तत्सङ्ग्राममूर्धनि । | |||
| verse_lines = गीतं भगवता ज्ञानं यत्तत्सङ्ग्राममूर्धनि ।;कालकर्मतमोरुद्धं पुनरध्यगमद्विभुः ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S15_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विशोको ब्रह्मसम्पत्या सञ्छिन्नद्वैतसंशयः । | |||
| verse_lines = विशोको ब्रह्मसम्पत्या सञ्छिन्नद्वैतसंशयः ।;लीनप्रकृतिनैर्गुण्यादलिङ्गत्वादसम्भवः ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S15_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्वराट् पौत्रं विनीतं तमात्मनोऽनवमं गुणैः । | |||
| verse_lines = स्वराट् पौत्रं विनीतं तमात्मनोऽनवमं गुणैः ।;तोयनीव्याः पतिं भूमेरभ्यषिञ्चद्गजाह्वये ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S15_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे परम् । | |||
| verse_lines = वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे परम् ।;धृत्या ह्यपानं सोत्सर्गं तत्परत्वे ह्यजोहवीत् ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S15_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्रित्वे हुत्वाऽथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः । | |||
| verse_lines = त्रित्वे हुत्वाऽथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः ।;सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S15_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उदीचीं प्रविवेशाऽशां गतपूर्वां महात्मभिः । | |||
| verse_lines = उदीचीं प्रविवेशाऽशां गतपूर्वां महात्मभिः ।;हृदि ब्रह्म ध्यायन् नाऽवर्तेत गतो यतः ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S15_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ते साधुकृतसर्वार्थाः ज्ञात्वाऽऽत्यन्तिकमात्मनः । | |||
| verse_lines = ते साधुकृतसर्वार्थाः ज्ञात्वाऽऽत्यन्तिकमात्मनः ।;मनसा धारयामासुर्वैकुण्ठचरणाम्बुजम् ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S16_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शौनक उवाच— | |||
| verse_lines = शौनक उवाच—;कस्य हेतोर्निजग्राह कलिं दिग्विजये नृपः ।;नृदेवचिह्नधृक् शूद्रः कोऽसौ गां यः पदाऽहनत् ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S16_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्कथ्यतां महाभाग यदि विष्णुकथाश्रयम् । | |||
| verse_lines = तत्कथ्यतां महाभाग यदि विष्णुकथाश्रयम् ।;अथ वाऽस्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम् ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S16_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः । | |||
| verse_lines = किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः ।;क्षुद्रायुषां नृणामङ्ग मर्त्यानां मृतिच्छताम् ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S16_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एतदर्थं हि भगवान् आहूतः परमर्षिभिः । | |||
| verse_lines = एतदर्थं हि भगवान् आहूतः परमर्षिभिः ।;अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं वचः ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S16_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सारथ्यपार्षदसेवनसख्यदौत्य- | |||
| verse_lines = सारथ्यपार्षदसेवनसख्यदौत्य-;वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामैः ।;स्निग्धेषु पाण्डुषु जगत्प्रणतस्य विष्णोः;भक्तिं करोति नृपतिश्चरणारविन्दे ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S16_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धरोवाच— | |||
| verse_lines = धरोवाच—;सत्यं शौचं दया दानं त्यागः सन्तोष आर्जवम् ।;शमो दमः तपः साम्यं तितिक्षोपरतिः श्रुतम् ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S16_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो धृतिः स्मृतिः । | |||
| verse_lines = ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो धृतिः स्मृतिः ।;स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिः सौभगं मार्दवं क्षमा ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S16_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः । | |||
| verse_lines = प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः ।;गाम्भीर्यं स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहङ्कृतिः ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S16_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इमे चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः । | |||
| verse_lines = इमे चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः ।;प्रार्थ्या महत्वमिच्छद्भिः न च यान्ति स्म कर्हिचित् ॥३०॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S17_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वृषं मृणालधवलं मेहन्तमिव बिभ्यतम् । | |||
| verse_lines = वृषं मृणालधवलं मेहन्तमिव बिभ्यतम् ।;वेपमानं पदैकेन सीदन्तं शूद्रपीडितम् ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S17_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धर्मं ब्रवीषि धर्मज्ञ धर्मोऽसि वृषरूपधृक् । | |||
| verse_lines = धर्मं ब्रवीषि धर्मज्ञ धर्मोऽसि वृषरूपधृक् ।;यदधर्मकृतः स्थानं सूचकस्यापि तद्भवेत् ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S17_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा । | |||
| verse_lines = अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा ।;चेतसो वचसश्चापि भूतानामिति निश्चयः ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S17_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये । | |||
| verse_lines = न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये ।;ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्ञैः यज्ञेश्वरं ब्रह्मवितानयज्ञाः ॥३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S17_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान इष्टात्ममूर्तिर्यजतां शं तनोति । | |||
| verse_lines = यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान इष्टात्ममूर्तिर्यजतां शं तनोति ।;कामानमोघान् स्थिरजङ्गमानां अन्तर्बहिर्वायुरिवेश आत्मा ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S17_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथैतानि न सेवेत बुभूषु पुरुषः क्वचित् । | |||
| verse_lines = अथैतानि न सेवेत बुभूषु पुरुषः क्वचित् ।;विशेषतो धर्मशीलो राजा लोकपतिर्गुरुः ॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S18_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञानार्जितसंस्थितिः । | |||
| verse_lines = उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञानार्जितसंस्थितिः ।;वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वकलेवरम् ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S18_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् । | |||
| verse_lines = तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।;भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताऽशिषः ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S18_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य । | |||
| verse_lines = कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य ।;योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो महद्गुणत्वाद्यमनन्तमाहुः ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S18_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्रानुरक्ताः सहसैव धीराः व्यपोह्य देहादिषु सङ्गमूढम् । | |||
| verse_lines = यत्रानुरक्ताः सहसैव धीराः व्यपोह्य देहादिषु सङ्गमूढम् ।;व्रजन्ति तत्पारमहंस्यसत्यं यस्मिन्नहिंसोपरमश्च धर्मः ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S18_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रतिरुद्धेन्द्रियप्राणमनोबुद्धिमुपारतम् । | |||
| verse_lines = प्रतिरुद्धेन्द्रियप्राणमनोबुद्धिमुपारतम् ।;स्थानत्रयात्परं प्राप्तं ब्रह्मभूतमविक्रियम् ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S18_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः । | |||
| verse_lines = अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः ।;ब्राह्मणं प्रत्यभूद्ब्रह्मन् मत्सरो मन्युरेव च ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S18_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षः वयस्यान् ऋषिबालकान् । | |||
| verse_lines = इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षः वयस्यान् ऋषिबालकान् ।;कौशिक्यप उपस्पृश्य वाग्वज्रं विससर्ज ह ॥ ३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S18_V43 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अरक्ष्यमाणे नरदेवनामि्न | |||
| verse_lines = अरक्ष्यमाणे नरदेवनामि्न;रथाङ्गपाणावयमङ्ग लोकः ।;तदा हि चोरप्रचुरो विनङ्क्ष-;त्यरक्ष्यमाणो विवरूथवत् क्षणात् ॥ ४३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S18_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तदद्य नः पापमुपैत्यनन्वयं | |||
| verse_lines = तदद्य नः पापमुपैत्यनन्वयं;यन्नष्टनाथस्य पशोर्विलुम्पकाः ।;परस्परं घ्नन्ति शपन्ति वृञ्जते;पशून् स्त्रियोऽर्थान् पुरुदस्यवो जनाः ॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S18_V50 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = साधवः प्रायशो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः । | |||
| verse_lines = साधवः प्रायशो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः ।;न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्माऽ)गुणाश्रयः ॥ ५० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S19_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इति स्म राजा व्यवसाययुक्तः | |||
| verse_lines = इति स्म राजा व्यवसाययुक्तः;प्राचीनमूलेषुु कुशेषु धीरः ।;उदङ्मुखो दक्षिणकूल आस्ते;समुद्रपत्न््नयाः स्वसुते न्यस्तभारः ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C01 | |||
| verse_id = BTN_C01_S20_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्यामं सदाऽऽपीच्यवयोङ्गलक्ष्म्या | |||
| verse_lines = श्यामं सदाऽऽपीच्यवयोङ्गलक्ष्म्या;स्त्रीणां मनोज्ञं रुचिरस्मितेन ।;प्रत्युत्थिता मुनयश्चाऽसनेभ्यः;तल्लक्षणज्ञा अपि गूढवर्चसम् ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयस्कन्धः"></span> | ||
== द्वितीयस्कन्धः == | == द्वितीयस्कन्धः == | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रीशुक उवाच— | |||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच—;वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितं नृप ।;आत्मवित्सम्मतः पुंसां श्रोतव्यादिषु यः परः ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रोतव्यानीह राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः । | |||
| verse_lines = श्रोतव्यानीह राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः ।;अपश्यतामात्मतत्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन नवं वयः । | |||
| verse_lines = निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन नवं वयः ।;दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देहापत्यकलत्रादिष्वात्मदैन्येष्वसत्स्वपि । | |||
| verse_lines = देहापत्यकलत्रादिष्वात्मदैन्येष्वसत्स्वपि ।;तेषु प्रसक्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधिनिषेधतः । | |||
| verse_lines = प्रायेण मुनयो राजन्निवृत्ता विधिनिषेधतः ।;नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । | |||
| verse_lines = इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ।;अधीतवान् द्वापरादौ पितुर्द्वैपायनादहम् ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया । | |||
| verse_lines = परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया ।;गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः । | |||
| verse_lines = नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान्मनसा बुद्धिसारथिः ।;मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया ॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा । | |||
| verse_lines = तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा ।;मनो निर्विषयं युंक्त्वा ततः किञ्चिन्न संस्मरेत् ।;पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः । | |||
| verse_lines = यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः ।;आशु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षतः ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = राजोवाच— | |||
| verse_lines = राजोवाच—;यथा सन्धार्यते ब्रह्मन् धारणा यत्र सम्मता ।;यादृशी वा हरेदाशु पुरुषस्य मनोमलम् ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रीशुक उवाच— | |||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच—;जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रियः ।;स्थूले भगवतो रूपे मनः सन्धारयेद्धिया ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम् । | |||
| verse_lines = विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम् ।;यत्रेदं दृश्यते विश्वं भूतं भव्यं भवच्च यत् ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आण्डकोशे शरीरेऽस्मिन्सप्तावरणसंयुते । | |||
| verse_lines = आण्डकोशे शरीरेऽस्मिन्सप्तावरणसंयुते ।;वैराजः पुरुषो योऽसौ भगवान्धारणाश्रयः ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पार्ष्णिप्रपदे रसातलम् । | |||
| verse_lines = पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पार्ष्णिप्रपदे रसातलम् ।;महातलं विश्वसृजस्सुगुल्फौ तलातलं वै पुरुषस्य जङ्घे ॥२६॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S01_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = छन्दांस्यनन्तस्य गिरो गृणन्ति दंष्ट्राऽर्यमेन्दूडुगणा द्विजानि । | |||
| verse_lines = छन्दांस्यनन्तस्य गिरो गृणन्ति दंष्ट्राऽर्यमेन्दूडुगणा द्विजानि ।;हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः ॥३१॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S02_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शब्दस्य हि ब्रह्मण एष पन्था यन्नामभिर्ध्यायति धीरपार्थैः । | |||
| verse_lines = शब्दस्य हि ब्रह्मण एष पन्था यन्नामभिर्ध्यायति धीरपार्थैः ।;परिभ्रमंस्तत्र न विन्दतेऽर्थान् मायामये वासनया शयानः ॥२॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S02_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अतः कविर्नामसु यावदर्थः स्यादप्रमत्तो व्यवसायबुद्धिः । | |||
| verse_lines = अतः कविर्नामसु यावदर्थः स्यादप्रमत्तो व्यवसायबुद्धिः ।;सिद्धेऽन्यथार्थे न यतेत तत्तत् परिश्रमं तत्र समीक्षमाणः ॥३॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S02_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं स्वचित्ते स्वत एव सिद्ध आत्माप््रिायोऽर्थो भगवाननन्तः । | |||
| verse_lines = एवं स्वचित्ते स्वत एव सिद्ध आत्माप््रिायोऽर्थो भगवाननन्तः ।;तं निर्वृतो नियतार्थो भजेत संसारहेतूपरमश्च यत्र ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S02_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स सर्वविद्हृद्यनुभूश्च सर्व आत्मा यथा सुप्तजनेक्षितैकः । | |||
| verse_lines = स सर्वविद्हृद्यनुभूश्च सर्व आत्मा यथा सुप्तजनेक्षितैकः ।;तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत सर्वात्मनाऽतोऽन्यत आत्मघातः ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S02_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसद्भ्रूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् । | |||
| verse_lines = अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लसद्भ्रूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् ।;ईक्षेत चिन्तामयमेनमीश्वरं यावन्मनो धारणयाऽवतिष्ठते ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S02_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यावन्न जायेत परावरेऽस्मिन् विश्वेश्वरे द्रष्टरि भक्तियोगः । | |||
| verse_lines = यावन्न जायेत परावरेऽस्मिन् विश्वेश्वरे द्रष्टरि भक्तियोगः ।;तावत्स्थवीयः पुरुषस्य रूपं क्रियावसाने प्रयतः स्मरेत ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S02_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्थिरं सुखञ्चासनमास्थितो यतिः | |||
| verse_lines = स्थिरं सुखञ्चासनमास्थितो यतिः;यदा जिहासुरिममङ्ग लोकम् ।;काले च देशे च मनो न सज्जेत्;प्राणान्नियच्छेन्मनसा जितासुः ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C02 | |||
| verse_id = BTN_C02_S02_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मनश्च बुध्याऽमलया नियम्य | |||
| verse_lines = मनश्च बुध्याऽमलया नियम्य;क्षेत्रज्ञ एतां निनयेत्तमात्मनि ।;आत्मानमात्मन्यवरुध्य धीरो;लब्धोपशान्तिर्विरमेत कृत्यात् | |||
<span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयः स्कन्धः"></span> | <span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयः स्कन्धः"></span> | ||
== तृतीयः स्कन्धः == | == तृतीयः स्कन्धः == | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S01_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रीशुक उवाच– | |||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच–;एवमेतत् पुरा पृष्टो मैत्रेयो भगवान् किल ।;क्षत्त्रा वनं प्रविष्टेन त्यक्त्वा स्वगृहमृद्धिमत् ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S01_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदा त्वयं मन्त्रकृद् वो भगवानखिलेश्वरः । पौरवेन्द्रपुरं हित्वा प्रविवेशात्मसात्कृतम् ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = यदा त्वयं मन्त्रकृद् वो भगवानखिलेश्वरः । पौरवेन्द्रपुरं हित्वा प्रविवेशात्मसात्कृतम् ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S01_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रीशुक उवाच– | |||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच–;यदा तु राजा स्वसुतानसाधून्;पुष्णन्नधर्मेण विनष्टदृष्टिः ।;भ्रातुर्यविष्ठस्य सुतान् विबन्धून्;प्रवेश्य लाक्षाभवने ददाह ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S01_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदा सभायां कुरुदेवदेव्याः | |||
| verse_lines = यदा सभायां कुरुदेवदेव्याः;केशाभिमर्शं सुतकर्म गर्ह्यम् ।;न वारयामास नृपः स्नुषाया;और्हरन्त्याः कुचकुङ्कुमानि ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S01_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इत्थं व्रजन् भारतमेव वर्षं | |||
| verse_lines = इत्थं व्रजन् भारतमेव वर्षं;कालेन यावद् गतवान् प्रभासम् ।;तावच्छशास क्षितिमेकचक्रा-;मेकातपत्रामजितेन पार्थः ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S01_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्राथ शुश्राव सुहृद्विनष्टिं | |||
| verse_lines = तत्राथ शुश्राव सुहृद्विनष्टिं;वनं यथा वेणुजवह्निनाऽऽश्रयम् ।;संस्पर्धया दग्धमथानुशोचन्;सरस्वतीं प्रत्यगियाय तूष्णीम् ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S01_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अन्यानि चेह द्विजदेवदेवैः | |||
| verse_lines = अन्यानि चेह द्विजदेवदेवैः;कृतानि नानायतनानि विष्णोः ।;प्रत्यङ्कमुख्याङ्कितमन्दिराणि;यद्दर्शनात् कृष्णमनुस्मरन्ति ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S01_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कच्चित् पुराणौ पुरुषौ स्वनाभ्य- | |||
| verse_lines = कच्चित् पुराणौ पुरुषौ स्वनाभ्य-;पद्मानुवृत्त्येह कलावतीर्णौ ।;आसात उर्व्याः कुशलं विधाय;कृतक्षणौ कुशलं शूरगेहे ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S01_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कच्चित् कुरूणां परमः सुहृन्नो | |||
| verse_lines = कच्चित् कुरूणां परमः सुहृन्नो;भामः स आस्ते सुखमङ्ग शौरिः ।;यो वै स्वसॄणां पितृवद् ददाति;वरान् वदान्यो वरतर्पणेन ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S01_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कच्चित् सुखं सात्वतवृष्णिभोज- | |||
| verse_lines = कच्चित् सुखं सात्वतवृष्णिभोज-;दाशार्हकाणामधिपः सः आस्ते ।;यमभ्यषिञ्चच्छतपत्रनेत्रो;नृपासनाधिं परिहृत्य दूरात् ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S01_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = किं वा कृताघेष्वघमत्यमर्षी | |||
| verse_lines = किं वा कृताघेष्वघमत्यमर्षी;भीमोऽहिवद् दीर्घतमं व्यमुञ्चत् ।;यस्याङ्घ्रिपातं रणभूर्न सेहे;मार्गं गदायाश्चरतो विचित्रम् ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S01_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अजस्य जन्मोत्पथनाशनाय | |||
| verse_lines = अजस्य जन्मोत्पथनाशनाय;कर्माण्यकर्तुर्ग्रहणाय पुंसाम् ।;न त्वन्यथा कोऽर्हति देहयोगं;परो गुणानामुत कर्मतन्त्रम् ॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S02_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यद्धर्मसूनोर्बत राजसूये | |||
| verse_lines = यद्धर्मसूनोर्बत राजसूये;निरीक्ष्य दृक्स्वस्त्ययनं त्रिलोकः ।;कार्त्स्न्येन चात्रोपगतं विधातु-;रर्वाक् सृतौ कौशलमित्यमन्यत ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S02_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मन्येऽसुरान् भागवतांस्त्र्यधीशे | |||
| verse_lines = मन्येऽसुरान् भागवतांस्त्र्यधीशे;संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् ।;ये संयुगेऽचक्षत तार्क्षपुत्र-;स्यांसे सुनाभायुधमापतन्तम् ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S03_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = समाहुता भीष्मककन्यया ये | |||
| verse_lines = समाहुता भीष्मककन्यया ये;श्रियः सवर्णेन जिहीर्षयैषाम् ।;गान्धर्ववृत्त्या मिषतां स्वभागं;जह्रे पदं मूधर्ि्न दधत् सुपर्णः ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S03_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तास्वपत्यान्यजनयदात्मतुल्यानि सर्वतः । | |||
| verse_lines = तास्वपत्यान्यजनयदात्मतुल्यानि सर्वतः ।;एकैकस्यां दश दश प्रकृतेर्विबुभूषया ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S03_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भगवानपि विश्वात्मा लोकवेदपथानुगः । | |||
| verse_lines = भगवानपि विश्वात्मा लोकवेदपथानुगः ।;कामान् सिषेवे द्वार्वत्यामसक्तः साङ्ख्यमास्थितः ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S03_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्येत्थं रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् । | |||
| verse_lines = तस्येत्थं रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् ।;गृहमेधेषु योगेषु विरागः समजायत ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S03_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दैवाधीनेषु कामेषु दैवाधीनः स्वयं पुमान् । | |||
| verse_lines = दैवाधीनेषु कामेषु दैवाधीनः स्वयं पुमान् ।;को विश्रंभेत योगेन योगेश्वरमनुव्रतः ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S03_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ततः कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादयः । | |||
| verse_lines = ततः कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादयः ।;ययुः प्रभासं संहृष्टा रथैर्दैवविमोहिताः ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S03_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्र स्नात्वा पितॄन् देवान् ऋषींश्चैव तदम्भसा । | |||
| verse_lines = तत्र स्नात्वा पितॄन् देवान् ऋषींश्चैव तदम्भसा ।;तर्पयित्वाऽथ विप््रोभ्यो गावो बहुगुणा ददुः ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S03_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = हिरण्यं रजतं शय्यां वासांस्यजिनकम्बलान् । | |||
| verse_lines = हिरण्यं रजतं शय्यां वासांस्यजिनकम्बलान् ।;हयान् रथानिभान् कन्यां धरां वृत्तिकरीमपि ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S03_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अन्नं चोरुरसं तेभ्यो दत्वा भगवदर्पणम् । | |||
| verse_lines = अन्नं चोरुरसं तेभ्यो दत्वा भगवदर्पणम् ।;गोविप्रार्थासवः शूराः प्रणेमुर्भुवि मूर्धभिः ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S04_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उद्धव उवाच– | |||
| verse_lines = उद्धव उवाच–;भगवानात्ममायाया गतिं तामवलोक्य सः ।;सरस्वतीमुपस्पृश्य वृक्षमूलमुपाविशत् ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S04_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहं चोक्तो भगवता प्रपन्नार्तिहरेण ह । | |||
| verse_lines = अहं चोक्तो भगवता प्रपन्नार्तिहरेण ह ।;बदरीं त्वं प्रयाहीति स्वकुलं सञ्जिहीर्षुणा ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S04_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथापि तदभिप््रोतं जानन्नहमरिंदम । | |||
| verse_lines = अथापि तदभिप््रोतं जानन्नहमरिंदम ।;पृष्ठतोऽन्वगमं भर्तुः पादविश्लेषणाक्षमः ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S04_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = राजोवाच– | |||
| verse_lines = राजोवाच–;निधनमुपगतेषु वृष्णिभोजे-;ष्वधिरथयूथपयूथपेषु मुख्यः ।;स तु कथमवशिष्ट उद्धवो यद्;हरिरपि तत्यज आकृतिं त्र्यधीशः ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S04_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शुक उवाच– | |||
| verse_lines = शुक उवाच–;ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छितः ।;संहृत्य स्वकुलं नूनं त्यक्ष्यन् देहमचिन्तयत् ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S04_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्निर्जितः प्रभुः । | |||
| verse_lines = नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्निर्जितः प्रभुः ।;अतो मद्वत् पुनर्लोकं ग्राहयन्निह तिष्ठतु ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S05_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = परावरेषां भगवन् कृतानि | |||
| verse_lines = परावरेषां भगवन् कृतानि;श्रुतानि मे व्यासमुखादभीक्ष्णम् ।;न तृप्नुमः कर्णसुखावहानां;तेषामृते कृष्णकथामृतौघात् ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S05_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां | |||
| verse_lines = मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां;सखाऽपि ते भारतमाह कृष्णः ।;यस्मिन् नृणां ग्राम्यसुखानुवादै;र्मतिर्गृहीता न हरेः कथायाम् ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S05_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सा श्रद्धधानस्य विवर्धमाना | |||
| verse_lines = सा श्रद्धधानस्य विवर्धमाना;विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसः ।;हरेः सदाऽनुस्मृतिनिर्वृतस्य;समस्तदुःखाप्ययमाशु धत्ते ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S06_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मैत्रेय उवाच– | |||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;भगवानेक आसेदमग्र आत्मात्मनां विभुः ।;आत्मेच्छानुगतो ह्यात्मा नानाशक्त्युपलक्षितः ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S06_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स वा एष तदा द्रष्टा नापश्यद् विश्वमेकराट् । | |||
| verse_lines = स वा एष तदा द्रष्टा नापश्यद् विश्वमेकराट् ।;मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तदृक् ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S06_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सोऽप्यंशगुणकालात्मा भगवद्दृष्टिगोचरः । | |||
| verse_lines = सोऽप्यंशगुणकालात्मा भगवद्दृष्टिगोचरः ।;आत्मानं व्यकरोदात्मा विश्वस्यास्य सिसृक्षया ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S06_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कालमायांशयोगेन भगवद्वीक्षितं नभः । | |||
| verse_lines = कालमायांशयोगेन भगवद्वीक्षितं नभः ।;तामसानुसृतं स्पर्शं विकुर्वन् निर्ममेऽनिलम् ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S06_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वितः । | |||
| verse_lines = अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वितः ।;ससर्ज रूपतन्मात्रां ज्योतिर्लोकस्य लोचनम् ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S06_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अनिलेनान्वितं ज्योतिर्विकुर्वत् परवीक्षितम् । | |||
| verse_lines = अनिलेनान्वितं ज्योतिर्विकुर्वत् परवीक्षितम् ।;आधत्ताम्भो रसमयं कालमायांशयोगतः ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S06_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्योतिषाऽम्भोऽनुसंसृष्टं विकुर्वत् परवीक्षितम् । | |||
| verse_lines = ज्योतिषाऽम्भोऽनुसंसृष्टं विकुर्वत् परवीक्षितम् ।;महीं गन्धगुणामाधात् कालमायांशयोगतः ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S06_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशलिङ्गिनः । | |||
| verse_lines = एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशलिङ्गिनः ।;नानात्वात् स्वक्रियानीशाः प्रचुः प्रञ्जलयो विभुम् ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S06_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवा- | |||
| verse_lines = ऋते यदस्मिन् भव ईश जीवा-;स्तापत्रयेणाभिहता न शर्म ।;आत्मल्लभन्ते भगवंस्तवाङ्घ्रि-;च्छायांशविद्यामत आश्रयेम ॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S06_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मार्गन्ति यत् ते मुखपद्मनीडै- | |||
| verse_lines = मार्गन्ति यत् ते मुखपद्मनीडै-;श्छन्दःसुपर्णैर्ऋषयो विविक्ते ।;यच्चाघमर्षो द्युसरिद्धरायाः;परं पदं तीर्थपदः प्रपन्नाः ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S06_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तथापरे त्वात्मसमाधियोग- | |||
| verse_lines = तथापरे त्वात्मसमाधियोग-;बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् ।;त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति;तेषां श्रमः स्यान्न तु सेवया ते ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S06_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत् ते वयं लोकसिसृक्षयाऽद्य | |||
| verse_lines = तत् ते वयं लोकसिसृक्षयाऽद्य;त्वया विसृष्टास्त्रिभिरात्मभिर्ये ।;सर्वे वियुक्ताः स्वविहारतन्त्रं;न शक्नुमस्तत् प्रतिकर्तवे ते ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S06_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थे | |||
| verse_lines = ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थे;बभूविमात्मन् करवाम किं ते ।;त्वं नः स चक्षुः परिदेहि शक्ता;देव क्रियार्थे यदनुग्रहेण ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ऋषिरुवाच– | |||
| verse_lines = ऋषिरुवाच–;इति तासां स्वशक्तीनामसतीनां समेत्य सः ।;प्रसुप्तलोकतन्त्राणां निशम्य गिरमीश्वरः ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कालसंज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिमुरुक्रमः । | |||
| verse_lines = कालसंज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिमुरुक्रमः ।;त्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सोऽनुप्रविष्टो भगवान् चेष्टारूपेण तं गणम् । | |||
| verse_lines = सोऽनुप्रविष्टो भगवान् चेष्टारूपेण तं गणम् ।;भिन्नं संयोजयामास सुप्तं कर्म प्रबोधयन् ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
<span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थस्कन्धः"></span> | ||
== चतुर्थस्कन्धः == | == चतुर्थस्कन्धः == | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मैत्रेय उवाच– | |||
| verse_lines = मैत्रेय उवाच–;मनोस्तु शतरूपायां तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे ।;आकूतिर्देवहूतिश्च प्रसूतिरिति विश्रुताः ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः । | |||
| verse_lines = शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः ।;प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन् ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधिताग्निना । | |||
| verse_lines = तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधिताग्निना ।;निर्गतेन मुनेर्मूघ्नः समीक्ष्य प्रभवस्त्रयः ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः । | |||
| verse_lines = अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः ।;वितायमानयशसो मुदाऽऽश्रमपदं ययुः ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देवा ऊचुः– | |||
| verse_lines = देवा ऊचुः–;यथा कृतस्ते संकल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा ।;तत्संकल्पस्य ते ब्रह्मन् यद् वै ध्यायसि ते वयम् ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सोमोऽभूद् ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् । | |||
| verse_lines = सोमोऽभूद् ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् ।;दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V52 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम् । | |||
| verse_lines = मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम् ।;मूर्तिः सर्वगुणोत्पत्ती नरनारायणावृषी ॥ ५२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V55 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत् परममङ्गलम् । | |||
| verse_lines = नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत् परममङ्गलम् ।;देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः ॥ ५५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V56 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देवा ऊचुः– | |||
| verse_lines = देवा ऊचुः–;यो मायया विरचितं निजयात्मनीदं;खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय ।;एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाऽद्य;प्रादुश्चकार पुरुषाय नमः परस्मै ॥ ५६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V59 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहाऽगतौ । | |||
| verse_lines = ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहाऽगतौ ।;भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ॥ ५९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V66 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा । | |||
| verse_lines = पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा ।;अप्रौढेवात्मनात्मानमजहाद् योगसंयुता ॥ ६६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S02_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नन्दिरुवाच– | |||
| verse_lines = नन्दिरुवाच–;य एतन्मर्त्यमुद्दिश्य भगवत्यप्रतिद्रुहि ।;द्रुह्यत्यज्ञः पृथग्दृष्टिस्तत्त्वतो विमुखो भवेत् ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S02_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गृहेषु कूटधर्मेषु सक्तो ग्राम्यसुखेच्छया । | |||
| verse_lines = गृहेषु कूटधर्मेषु सक्तो ग्राम्यसुखेच्छया ।;कर्मतन्त्रं वितनुताद् वेदवादविपन्नधीः ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S02_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बुद्ध्या पराभिध्यायिन्या विस्मृतात्मगतिः पशुः । | |||
| verse_lines = बुद्ध्या पराभिध्यायिन्या विस्मृतात्मगतिः पशुः ।;स्त्रीकामः सोऽस्तु नितरां दक्षो बस्तमुखोऽचिरात् ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S02_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसावजः । | |||
| verse_lines = विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसावजः ।;संसरन्त्विह ये चामुमनुशर्वावमानिनम् ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S02_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गिरेः सुतायाः पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा । | |||
| verse_lines = गिरेः सुतायाः पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा ।;मथ्ना चोन्मथितात्मानः संमुह्यन्तु हरद्विषः ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S03_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं | |||
| verse_lines = सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं;यदीयते तत्र पुमानपावृतः ।;सत्त्वं च यस्मिन् भगवान् वासुदेवो;ह्यधोक्षजो मे मनसा विधीयते ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S04_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिभि- | |||
| verse_lines = यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिभि-;र्निषेवितं ब्रह्मरसासवार्थिभिः ।;लोकस्य यद् वर्षति चाशिषोऽर्थिनः;तस्मै भवान् द्रुह्यति विश्वबन्धवे ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S04_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = किं वा शिवाख्यमशिवं न विदुस्त्वदन्ये | |||
| verse_lines = किं वा शिवाख्यमशिवं न विदुस्त्वदन्ये;ब्रह्मादयस्तमवकीर्य जटाः श्मशाने ।;तन्माल्यभस्मनृकपाल्यवसत्पिशाचै-;र्ये मूर्धभिर्दधति तच्चरणावसृष्टम् ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S04_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कर्म प्रवृत्तं च निवृत्तमप्युत | |||
| verse_lines = कर्म प्रवृत्तं च निवृत्तमप्युत;वेदे विविच्योभयलिङ्गमाश्रितम् ।;विरोधि तद् यौगपदेककर्तरि;द्वयं यथाऽऽब्रह्मणि कर्म नर्च्छति ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S05_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ततः स्वभर्तुश्चरणाम्बुजासवं | |||
| verse_lines = ततः स्वभर्तुश्चरणाम्बुजासवं;जगद्गुरोश्चिन्तयती न चापरम् ।;ददर्श देहे हतकल्मषा सती;सद्यः प्रजज्वाल समाधिजाग्निना ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S06_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आक्रम्योरसि दक्षस्य शितधारेण हेतिना । | |||
| verse_lines = आक्रम्योरसि दक्षस्य शितधारेण हेतिना ।;छिन्दन्नपि तदुद्धर्तुं नाशक्नोत् त्र्यम्बकस्तदा ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S06_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शस्त्रैरस्त्रान्वितैरेनमनिर्भिण्णत्वचं हरः । | |||
| verse_lines = शस्त्रैरस्त्रान्वितैरेनमनिर्भिण्णत्वचं हरः ।;विस्मयं परमापन्नो दध्यौ पशुपतिश्चिरम् ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S06_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दृष्ट्वा सञ्ज्ञपने योगं पशूनां स पतिर्मखे । | |||
| verse_lines = दृष्ट्वा सञ्ज्ञपने योगं पशूनां स पतिर्मखे ।;यजमानपशोः कस्य कायात् तेनाहरच्छिरः ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S06_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = जुहावैतच्छिरस्तस्मिन् दक्षिणाग्नावमर्षितः । | |||
| verse_lines = जुहावैतच्छिरस्तस्मिन् दक्षिणाग्नावमर्षितः ।;तद् देवयजनं दग्ध्वा प्रातिष्ठद् गुह्यकालयम् ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S07_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उपलभ्य पुरैवैतद् भगवानब्जसम्भवः । | |||
| verse_lines = उपलभ्य पुरैवैतद् भगवानब्जसम्भवः ।;नारायणश्च विश्वात्मा न कस्याध्वरमीयतुः ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S07_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नाहं न यज्ञो न च यूयमन्ये | |||
| verse_lines = नाहं न यज्ञो न च यूयमन्ये;ये देहभाजो मुनयश्च तत्त्वम् ।;विदुः प्रमाणं बलवीर्ययोर्वा;तस्यात्मतन्त्रस्य क उद्विधित्सेत् ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S07_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मिन् महायोगमये मुमुक्षुशरणे सुराः । | |||
| verse_lines = तस्मिन् महायोगमये मुमुक्षुशरणे सुराः ।;ददृशुः शिवमासीनं त्यक्तामर्षमिवान्तकम् ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| verse_id = BTN_C04_S07_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स तूपलभ्यागतमात्मयोनिं | |||
| verse_lines = स तूपलभ्यागतमात्मयोनिं; | |||
<span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमस्कन्धः"></span> | ||
== पञ्चमस्कन्धः == | == पञ्चमस्कन्धः == | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S01_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वं त्वब्जनाभाङ्घ्रिसरोजकोश- | |||
| verse_lines = त्वं त्वब्जनाभाङ्घ्रिसरोजकोश-;दुर्गाश्रितो निर्जितषट्सपत्नः ।;भुङ्क्ष्वेह भोगान् पुरुषातिसृष्टान्;विमुक्तसङ्गः प्रकृतिं भजस्व ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S01_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = या वा इह तद्रथचरणनेमिकृतपरिखास्ताः सप्तसिन्धव आसन् | |||
| verse_lines = या वा इह तद्रथचरणनेमिकृतपरिखास्ताः सप्तसिन्धव आसन्;यत एव कृता सप्तभुवो द्वीपाः ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S02_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = का त्वं चिकीर्षसि च किं मुनिवर्य शैले | |||
| verse_lines = का त्वं चिकीर्षसि च किं मुनिवर्य शैले;मायाऽसि काऽपि भगवत्परदेवतायाः ।;विज्ये बिभर्षि धनुषी सुहृदात्मनोऽर्थे;किं वा मृगान् मृगयसे विपिने प्रमत्तान् ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S03_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = किञ्चायं राजर्षिरपत्यकामः प्रजां भवादृशीमाशासान ईश्वरमाशिषां स्वर्गापवर्गयोरपि | |||
| verse_lines = किञ्चायं राजर्षिरपत्यकामः प्रजां भवादृशीमाशासान ईश्वरमाशिषां स्वर्गापवर्गयोरपि;भगवन्तमुपधावति प्रजायामर्थप्रत्ययो धनदमि-वाधनः फलीकरणं को वा ईहते ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S04_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्य हीन्द्रः स्पर्धमानो भगवान् वर्षे न ववर्ष तदवधार्य भगवान् ऋषभदेवो योगेश्वरः | |||
| verse_lines = यस्य हीन्द्रः स्पर्धमानो भगवान् वर्षे न ववर्ष तदवधार्य भगवान् ऋषभदेवो योगेश्वरः;प्रहस्यात्मयोगमायया स्ववर्षमाञ्जनाभं नामाभ्यवर्षीत् ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S05_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् । | |||
| verse_lines = पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् ।;तावत्क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्मकं येन शरीरबन्धः ॥५॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S05_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं मनः कर्मवशं प्रयुङ्क्त अविद्ययात्मन्व्यवधीयमाने । | |||
| verse_lines = एवं मनः कर्मवशं प्रयुङ्क्त अविद्ययात्मन्व्यवधीयमाने ।;प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन तावत् ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S05_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पुंसः स्त्रिया मिथुनीभाव एष तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः । | |||
| verse_lines = पुंसः स्त्रिया मिथुनीभाव एष तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः ।;यतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तैर्जनस्य मोहोऽयमहं ममेति ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S05_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = हरौ गुरौ मयि भक्त्यानुवृत्त्या वितृष्णया द्वन्द्वतितिक्षया च । | |||
| verse_lines = हरौ गुरौ मयि भक्त्यानुवृत्त्या वितृष्णया द्वन्द्वतितिक्षया च ।;सर्वत्र जन्तोर्व्यसनावगत्या जिज्ञासया तपसेहानिवृत्त्या ॥१०॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S05_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वत्र मद्भावविचक्षणेन | |||
| verse_lines = सर्वत्र मद्भावविचक्षणेन;ज्ञानेन विज्ञानविराजितेन ।;योगेन धृत्युद्भवसत्वयुक्तो;लिङ्गं व्यपोहेत्कुशलोऽहमाख्यम् ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S05_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्माद्भवन्तो हृदयेन जाताः सर्वे महीयांसममुं सुनाभम् । | |||
| verse_lines = तस्माद्भवन्तो हृदयेन जाताः सर्वे महीयांसममुं सुनाभम् ।;अक्लृष्टबुद्ध्या भरतं भजध्वं शुश्रूषणं तद्भरणं प्रजानाम् ॥२०॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S05_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देवासुरेभ्यो मघवान् प्रधानो | |||
| verse_lines = देवासुरेभ्यो मघवान् प्रधानो;दक्षादयो ब्रह्मसुताश्च तेषाम् ।;भवः परः सोथ विरिञ्चिवीर्यः;स मत्परोहं द्विजदेवदेवः ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S05_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वाणि मद्धिष्ण्यतया भवद्भि- | |||
| verse_lines = सर्वाणि मद्धिष्ण्यतया भवद्भि-;श्चराणि भूतानि सुता ध्रुवाणि ।;सम्भावितव्यानि पदेपदे वो;विविक्तदृष्टिस्तदुतार्हणं मे ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = राजोवाच– | |||
| verse_lines = राजोवाच–;न नूनं भगवन्नात्मरामाणां योगसमीरितज्ञानावभर्जितकर्मबीजा-नामैश्वर्याणि पुनः क्लेशदानि;भवितुमर्हन्ति यदृच्छयोपगतानि॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तथा चोक्तम्– | |||
| verse_lines = तथा चोक्तम्–;न कुर्यात्कस्यचित्सख्यं मनसि ह्यनवस्थिते ।;यद्विस्रम्भाच्चिराच्चीर्णं चस्कन्द तप ऐश्वरम् ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नित्यं ददाति कामस्य छिद्रं तदनु येऽरयः । | |||
| verse_lines = नित्यं ददाति कामस्य छिद्रं तदनु येऽरयः ।;योगिनः कृतमैत्रस्य पत्युर्जायेव पुंश्चली ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कामो मन्युर्मदो लोभः शोकमोहभयादयः । | |||
| verse_lines = कामो मन्युर्मदो लोभः शोकमोहभयादयः ।;कर्मबन्धश्च यन्मूलः स्वीकुर्यात्को नु तद्बुधः ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथैवमखिललोकपालललामो विलक्षणो जडवदवधूतवेषभाषाचरितैरविलक्षितभगवत्प्रभावो योगिनां | |||
| verse_lines = अथैवमखिललोकपालललामो विलक्षणो जडवदवधूतवेषभाषाचरितैरविलक्षितभगवत्प्रभावो योगिनां;साम्परायविधिमनुशिक्ष-यन्स्वकलेवरं;जिहासुरात्मन्यात्मानमसंव्यवहितमनर्थान्तरभावे-नान्वीक्षमाण उपरतानुवृत्तिरुपरराम ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमाया-वसानो देह इमां जगतीमभिमानाभासेन चङ्क्रममाणः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमाया-वसानो देह इमां जगतीमभिमानाभासेन चङ्क्रममाणः ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एकदा तु काङ्कटकर्णाटकाद्दक्षिणकर्णाटकान् देशान् यदृच्छयोपगतः कुटचाचलोपवने आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्द्धजोऽ-संवीत एव विचचार ॥ ८ ॥ | |||
| verse_lines = एकदा तु काङ्कटकर्णाटकाद्दक्षिणकर्णाटकान् देशान् यदृच्छयोपगतः कुटचाचलोपवने आस्यकृताश्मकवल उन्माद इव मुक्तमूर्द्धजोऽ-संवीत एव विचचार ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथ समीरवेगविधुतवेणुनिकर्षोपजातो दावानलस्तद्वनमाले-लिहानः समन्तात् सह तेन ददाह ॥ ९ ॥ | |||
| verse_lines = अथ समीरवेगविधुतवेणुनिकर्षोपजातो दावानलस्तद्वनमाले-लिहानः समन्तात् सह तेन ददाह ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य काङ्कटकर्णाटकानां दक्षिणकर्णाटकानां राजार्हतनामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथं पाषण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्त्तयिष्यते ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = यस्य किलानुचरितमुपाकर्ण्य काङ्कटकर्णाटकानां दक्षिणकर्णाटकानां राजार्हतनामोपशिक्ष्य कलावधर्म उत्कृष्यमाणे भवितव्येन विमोहितः स्वधर्मपथमकुतोभयमपहाय कुपथं पाषण्डमसमञ्जसं निजमनीषया मन्दः सम्प्रवर्त्तयिष्यते ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = येन ह वा कलौ मनुजापसदा देवमायाविमोहिताः स्वविधि-नियोगशौचाचारविहीना देवहेलनादीन्यपव्रतानि निजेच्छया गृह्णाना अस्नानानाचमनाशौचकेशोल्लुञ्चनादीनि कलिनाऽधर्म-बहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुषलोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति ॥ ११ ॥ | |||
| verse_lines = येन ह वा कलौ मनुजापसदा देवमायाविमोहिताः स्वविधि-नियोगशौचाचारविहीना देवहेलनादीन्यपव्रतानि निजेच्छया गृह्णाना अस्नानानाचमनाशौचकेशोल्लुञ्चनादीनि कलिनाऽधर्म-बहुलेनोपहतधियो ब्रह्मब्राह्मणयज्ञपुरुषलोकविदूषकाः प्रायेण भविष्यन्ति ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहो भुवः सप्तसमुद्रवत्या | |||
| verse_lines = अहो भुवः सप्तसमुद्रवत्या;द्वीपेषु वर्षेष्वधिपुण्यमेतत् ।;गायन्ति यत्रत्यजना मुरारेः;कर्माणि भद्राण्यवतारवन्ति ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = को न्वस्य काष्ठामपरोऽनुगच्छे- | |||
| verse_lines = को न्वस्य काष्ठामपरोऽनुगच्छे-;न्मनोरथेनाप्यभवाय योगी ।;यद्योगमायां स्पृहयन्त्व्युदस्तां;महत्तमा येन कृतप्रयत्नाः ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्यामेव कवय आत्मानमविरतविविधवृजिनसंसारपरितापोप-तप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्या ह्यापवर्गिक-मात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नैवाद्रियन्ते भागव-तत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः ॥ १८ ॥ | |||
| verse_lines = यस्यामेव कवय आत्मानमविरतविविधवृजिनसंसारपरितापोप-तप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्या ह्यापवर्गिक-मात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नैवाद्रियन्ते भागव-तत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः ॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S06_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां | |||
| verse_lines = राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां;देवप्रियः कुलपतिः क्व च किङ्करो वः ।;अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजतां मुकुन्दो;मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम् ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S07_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = परो रजाः सवितर्जातवेदो | |||
| verse_lines = परो रजाः सवितर्जातवेदो;वेदस्य गर्भो मनसेदं जजान ।;स्वरेतसाऽदः पुनराविश्य चष्टे;हंसं गृध्राणामृषभं सङ्गृणीमः ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S10_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं बह्वबद्धमभिभाषमाणं नरदेवाभिमानिनं रजसा तमसाऽनु-विद्धेन मदेन तिरस्कृताशेषभगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥ ९ ॥ | |||
| verse_lines = एवं बह्वबद्धमभिभाषमाणं नरदेवाभिमानिनं रजसा तमसाऽनु-विद्धेन मदेन तिरस्कृताशेषभगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूतसुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S10_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ब्राह्मण उवाच– | |||
| verse_lines = ब्राह्मण उवाच–;त्वयोदितं व्यक्तमविप्रलब्धं;भर्तुः स मे स्याद्यदि वीर भारः ।;गन्तुर्यदि स्यादधिगम्यमध्वा;पीवेति चासौ न विदां प्रवादः ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S10_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्थौल्यं कार्श्यं व्याधय आधयश्च | |||
| verse_lines = स्थौल्यं कार्श्यं व्याधय आधयश्च;क्षुत्तृड्भयं कलिरिच्छा जरा च ।;निद्राऽरतिर्मन्युरहंमदश्च;देहेन जातस्य हि मे न सन्ति ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S10_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = जीवन्मृतत्वं नियमेन राज- | |||
| verse_lines = जीवन्मृतत्वं नियमेन राज-;न्नाद्यन्तवद्यद्विकृतस्य दृष्टम् ।;स्वस्वामिभावो ध्रुव एष यत्र;तर्ह्यच्युतेऽसाविति कृत्ययोगः ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S10_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक् च | |||
| verse_lines = विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक् च;पश्यामि यन्न व्यवहारतोऽन्यत् ।;क ईश्वरस्तत्र किमीशितव्य-;मथापि राजन् करवाम किं ते ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S10_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न विक्रिया विश्वसुहृत्सखस्य | |||
| verse_lines = न विक्रिया विश्वसुहृत्सखस्य;साम्येन वीताभिमतेस्तवापि ।;महद्विमानात्स्वकृताद्धिमादृग्;धक्षत्यदूरादपि शूलपाणिः ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S11_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तथैव राजन्नुरुगार्हमेध- | |||
| verse_lines = तथैव राजन्नुरुगार्हमेध-;वितानविद्योरुविजृम्भितेषु ।;न वेदवादेषु हि तत्त्ववादः;प्रायेण शुद्धो नु चकास्ति साधु ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S11_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स वासनात्मा विषयोपरक्तो | |||
| verse_lines = स वासनात्मा विषयोपरक्तो;गुणप्रवाहो विकृतः षोडशात्मा ।;चित्रं पृथङ्नामभी रूपभेद-;मन्तर्बहिष्ठः स्वपुरैस्तनोति ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S11_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दुःखं सुखं व्यतिमिश्रं च तीव्रं | |||
| verse_lines = दुःखं सुखं व्यतिमिश्रं च तीव्रं;कालोपपन्नं फलमाव्यनक्ति ।;आलिङ्ग्य मायारचितान्तरात्मा;स्वदेहिनं संसृतिचक्रकूटम् ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S11_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तावानयं व्यवहारः सदा वै | |||
| verse_lines = तावानयं व्यवहारः सदा वै;क्षेत्रज्ञसाक्ष्योर्भवति स्थूलसूक्ष्मः ।;तस्मान्मनोलिङ्गमदो वदन्ति;गुणागुणस्यास्य परावरस्य ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S11_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः | |||
| verse_lines = गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः;क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनः स्यात् ।;यथा प्रदीपो घृतवर्तिमास्थितो;स्थितिं स धूमां भजति ह्यन्यदा स्वम् ।;पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं;बहिर्मनः श्रयतेऽन्यत्र तत्वम् ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S11_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पदं विषयम् । | |||
| verse_lines = पदं विषयम् ।;एकादशासन्मनसोऽस्य वृत्ती-;राकूतयः पञ्च धियोऽभिमानाः ।;मात्राणि कर्माणि पुरं च तासां;वदन्ति हैकादश वीर भूमिम् ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S11_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गन्धाकृतिस्पर्शरसश्रवांसि | |||
| verse_lines = गन्धाकृतिस्पर्शरसश्रवांसि;विसर्गगत्यत्त्यभिजल्पशिल्पाः ।;एकादशं स्वीकरणं ममेति;मायामहं द्वादशमेकमाहुः ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S11_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै- | |||
| verse_lines = द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै-;रेकादशामी मनसो विकाराः ।;सहस्रशः शतशः कोटिशश्च;क्षेत्रज्ञतो न मिथो न स्वतः स्युः ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S11_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः | |||
| verse_lines = क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः;साक्षात्स्वयं ज्योतिरजः परेशः ।;नारायणो भगवान्वासुदेवः;स्वमाययाऽऽत्मन्व्यवधीयमानः ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S11_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भ्रातृव्यमेनं त्वमदभ्रवीर्य- | |||
| verse_lines = भ्रातृव्यमेनं त्वमदभ्रवीर्य-;मुपेक्षयाऽप्येधितमप्रमत्तः ।;गुरोर्हरेश्चरणोपासनास्त्रो;जहि व्यलीकं स्वयमात्ममोहम् ॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S12_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ब्राह्मण उवाच– | |||
| verse_lines = ब्राह्मण उवाच–;अयं जनो नाम चलन्पृथिव्यां;यः पार्थिवः पार्थिव कस्य हेतोः ।;तस्यापि चाङ्घ्र्योरधि गुल्फजङ्घा-;जानूरुमध्योरशिरोधरांसाः ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S12_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अंसे च दार्वी शिबिका च यस्यां | |||
| verse_lines = अंसे च दार्वी शिबिका च यस्यां;सौवीरराजेत्यपदेश आस्ते ।;यस्मिन् भवान् रूढनिजाभिमानो;राजाऽस्मि सिन्धुष्विति दुर्मदान्धः ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S12_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शोच्यानिमांस्तानधिकस्तवाधि- | |||
| verse_lines = शोच्यानिमांस्तानधिकस्तवाधि-;र्विष्ट्या निगृह्णन्निरनुग्रहोऽसि ।;जनस्य गोप्तेति विकत्थमानो;न शोभसे वृद्धसभासु दुष्टः ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S12_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदि क्षितावेव चराचरस्य | |||
| verse_lines = यदि क्षितावेव चराचरस्य;विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम् ।;तन्नामतोऽन्यद्व्यवहारमात्रं;निरूप्यतां तत्क्रिययानुतिष्ठन् ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S12_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त- | |||
| verse_lines = एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त-;मसन्निधानं परमाणवो ये ।;अविद्यया मनसा कल्पितास्ते;येषां समूहेन कृतो विशेषः ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S12_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्य- | |||
| verse_lines = एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्य-;दसच्च सज्जीवमजीवमन्यत् ।;द्रव्यस्वभावाशयकालकर्म-;नाम््नयाऽजयाऽवैहि कृतं द्वितीयम् ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S12_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक- | |||
| verse_lines = ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक-;मनन्तरं न बहिर्ब्रह्म सत्यम् ।;प्रत्यक् प्रशान्तं भगवच्छब्दवाच्यं;यद्वासुदेवं कवयो वदन्ति ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S13_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्येमान् श्लोकान् गायन्ति । | |||
| verse_lines = तस्येमान् श्लोकान् गायन्ति ।;आर्षभस्येह राजर्षेर्मनसाऽपि महात्मनः ।;नानुवर्त्मार्हति नृपो मक्षिकेव गरुत्मतः ॥ २६॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S13_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यज्ञाय धर्मपतये विधिनैपुणाय | |||
| verse_lines = यज्ञाय धर्मपतये विधिनैपुणाय;योगाय साङ्ख्यशिरसे प्रकृतीश्वराय ।;नारायणाय हरये नम इत्युदारं;गायन्मृगत्वमपि यः समुदाजहार ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S15_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्येमां गाथां पाण्डवेय पुराविद उपगायन्ति । | |||
| verse_lines = तस्येमां गाथां पाण्डवेय पुराविद उपगायन्ति ।;गयं नृपं कः प्रतियाति कर्मभि-;र्यज्वाभिमानी बहुविद्धर्मगोप्ता ।;सदागतश्रीः सदसस्पतिः सतां;सत्सेवकोऽन्यो भगवत्कलामृते ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S16_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तामनु परितो लोकपालानामष्टानां यथादिशं यथारूपं तुरीयभागेन पुरोऽष्टावुपक्लृप्ताः ॥ २९ ॥ | |||
| verse_lines = तामनु परितो लोकपालानामष्टानां यथादिशं यथारूपं तुरीयभागेन पुरोऽष्टावुपक्लृप्ताः ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S17_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रीशुक उवाच– | |||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच–;तत्र भगवतः साक्षाद्यज्ञलिङ्गस्य विष्णोर्विक्रमतो;वामपादाङ्गुष्ठ-नखनिर्भिन्नोर्ध्वाण्डकटाहविवरेणान्तःप्रविष्टा या बाह्यजलधारा;तच्चरणपङ्कजावनेजनारुणकिञ्जल्कोपरञ्जिताखिलजगदघमलापहोपस्पर्शनामला;साक्षाद्भगवत्पदीत्यनुपलक्षितवचोभिरभिधीय-मानातिमहता कालेन युगसहस्रोपलक्षणेन दिवो;मूर्धन्यवततार यत्तद्विष्णुपदमाहुः ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S17_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महा-पुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञां आत्मसमाधिरूपेण सन्निधायैतदभिगृणन् भव उपधावति ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = भवानीनाथैः स्त्रीगणार्बुदसहस्रैरवरुध्यमानो भगवतश्चतुर्मूर्तेर्महा-पुरुषस्य तुरीयां तामसीं मूर्तिं प्रकृतिमात्मनः सङ्कर्षणसंज्ञां आत्मसमाधिरूपेण सन्निधायैतदभिगृणन् भव उपधावति ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S17_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भव उवाच– | |||
| verse_lines = भव उवाच–;ॐ नमो भगवते महापुरुषाय सर्वगुणसङ्ख्यातायानन्ताया-व्यक्ताय नम इति ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S18_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म ते | |||
| verse_lines = विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म ते;ह्यकर्तुरङ्गीकृतमप्यपावृतम् ।;युक्तं न चित्रं त्वयि कार्यकारणे;सर्वात्मनि व्यतिरिक्ते च वस्तुनि ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S18_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = केतुमाले भगवान्कामदेवस्वरूपेणास्ते लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितॄणां च तद्वर्षपतीनां पुरुषायुषाऽहोरात्रपरिसङ्ख्यानानां यासां गर्भा महापुरुषमहास्त्रतेजसोद्वेजितमनसां विध्वस्ता व्यसवः संवत्सरान्ते निपतन्ति ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = केतुमाले भगवान्कामदेवस्वरूपेणास्ते लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितॄणां च तद्वर्षपतीनां पुरुषायुषाऽहोरात्रपरिसङ्ख्यानानां यासां गर्भा महापुरुषमहास्त्रतेजसोद्वेजितमनसां विध्वस्ता व्यसवः संवत्सरान्ते निपतन्ति ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S18_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमादेवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताऽहस्सु तद्भर्तृभिरुपेतोपास्ते । इदं चोदाहरति ॥ १७ ॥ | |||
| verse_lines = तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमादेवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताऽहस्सु तद्भर्तृभिरुपेतोपास्ते । इदं चोदाहरति ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S18_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यं लोकपालाः किल मत्सरज्वरा | |||
| verse_lines = यं लोकपालाः किल मत्सरज्वरा;हित्वा यतन्तोऽपि पृथक्समेत्य च ।;पातुं न शेकुर्द्विपदश्चतुष्पदः;सरीसृपस्थास्नु यदत्र दृश्यते ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S18_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यद्रूपमेतन्निजमाययाऽर्पितं | |||
| verse_lines = यद्रूपमेतन्निजमाययाऽर्पितं;अर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् ।;सङ्ख्या न यस्यास्त्ययथोपलम्भना-;त्तस्मै नमस्तेऽव्यपदेशरूपिणे ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S18_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिजं | |||
| verse_lines = जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिजं;चराचरं देवर्षिपितृभूतभेदम् ।;द्यौः खं क्षितिः शैलसरित्समुद्र-;द्वीपग्रहर्क्षेत्यभिधेय एकः ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S18_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्मिन्नसंख्येयविशेषनाम- | |||
| verse_lines = यस्मिन्नसंख्येयविशेषनाम-;रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम् ।;सङ्ख्या यया तत्त्वदृशा विनीयते;तस्मै नमः सांख्यनिदर्शनाय हि ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S18_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो | |||
| verse_lines = यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितो;गुणेषु योनिष्विव जातवेदसम् ।;मथ्नन्ति मथ्ना मनसा दिदृक्षवो;गूढं क्रियार्थैर्नम ईरितात्मने ॥ ३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S18_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि- | |||
| verse_lines = द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि-;र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने ।;तथैव तत्रातिशयात्मबुद्धिभि-;र्निरस्तमायाकृतये नमो नमः ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S19_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः | |||
| verse_lines = यथैहिकामुष्मिककामलम्पटः;सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन् ।;शङ्केत विद्वान् कुकलेवरात्यया-;द्यस्तस्य यत्नः श्रम एव केवलम् ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S19_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तन्नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां | |||
| verse_lines = तन्नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां;त्वन्माययाऽहं ममतामधोक्षज ।;भिन्द्याम येनाशु वयं सुदुर्भिदां;विधेहि योगं त्वयि नः सुभावितम् ॥ इति ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S19_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं | |||
| verse_lines = यद्यत्र नः स्वर्गसुखावशेषितं;स्विष्टस्य दत्तस्य कृतस्य शोभनम् ।;तेनाब्जनाभस्मृतिजन्मनः स्या-;द्वर्षे हरिर्यद्भजतां शं तनोति ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S20_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रत्नस्य विष्णो रूपं यत्सत्यर्तस्य ब्रह्मणः । अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमात्मानमीमहीति ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = प्रत्नस्य विष्णो रूपं यत्सत्यर्तस्य ब्रह्मणः । अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमात्मानमीमहीति ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S20_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं परस्तात्क्षीरोदात्परित उपवेशितः शाकद्वीपो द्वात्रिंश-ल्लक्षयोजनायामः समानेन च दधिमण्डोदेन परित उपक्लृप्तः यस्मिन् शाको नाम महीरुहः स्वक्षेत्रव्यपदेशको यस्य ह महान्सुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ॥ २४ ॥ | |||
| verse_lines = एवं परस्तात्क्षीरोदात्परित उपवेशितः शाकद्वीपो द्वात्रिंश-ल्लक्षयोजनायामः समानेन च दधिमण्डोदेन परित उपक्लृप्तः यस्मिन् शाको नाम महीरुहः स्वक्षेत्रव्यपदेशको यस्य ह महान्सुरभिगन्धस्तं द्वीपमनुवासयति ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S22_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं | |||
| verse_lines = ग्रहर्क्षतारामयमाधिदैविकं;रूपं हरेर्मंत्रकृतस्त्रिकालम् ।;नमस्यतः स्तुवतो नश्यते वै;स्वयं त्रिकालं कृतमाशु पापम् ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C05 | |||
| verse_id = BTN_C05_S23_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्यानुभावमिमं भगवान्स्वायंभुवो नारदः सह तुंबुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ४० ॥ | |||
| verse_lines = तस्यानुभावमिमं भगवान्स्वायंभुवो नारदः सह तुंबुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठस्कन्धः"></span> | ||
== षष्ठस्कन्धः == | == षष्ठस्कन्धः == | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S01_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यमदूता ऊचुः– | |||
| verse_lines = यमदूता ऊचुः–;वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः ।;वेदो नारायणः साक्षात्स्वयम्भूरिति शुश्रुम ॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S02_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा । वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः ॥ १४ ॥ | |||
| verse_lines = साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा । वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदुः ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S02_V52 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम् । | |||
| verse_lines = म्रियमाणो हरेर्नाम गृणन् पुत्रोपचारितम् ।;अजामिलोऽप्यगान्मुक्तिं किमुत श्रद्धया गृणन् ॥ ५२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S03_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यम उवाच– | |||
| verse_lines = यम उवाच–;परो मदन्यो जगतस्तस्थुषश्च;ओतं प्रोतं पटवद् यत्र विश्वम् ।;यदंशतोऽस्य स्थितिजन्मनाशा;नस्योतवद् यस्य वशे च लोकः ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न यस्य सख्यं पुरुषो वेत्ति सख्युः | |||
| verse_lines = न यस्य सख्यं पुरुषो वेत्ति सख्युः;सखा वसन् संवसतः पुरेऽस्मिन् ।;गुणो यथा गुणिनोऽव्यक्तदृष्टि-;स्तस्मै महेशाय नमस्करोमि ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देहोऽसवोऽक्षा मनवो भूतमात्रा | |||
| verse_lines = देहोऽसवोऽक्षा मनवो भूतमात्रा;नात्मानमन्यं च विदुः परं यत् ।;सर्वं पुमान् वेद गुणांश्च तज्ज्ञो;न वेद सर्वज्ञमनन्तमीडे ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदोपरामो मनसो नामरूप- | |||
| verse_lines = यदोपरामो मनसो नामरूप-;रूपस्य दृष्टिस्मृतिसंप्रमोषात् ।;य ईयते केवलया स्वसंस्थया;हंसाय तस्मै शुचिसद्मने नमः ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मनीषिणोऽन्तर्हृदि सन्निवेशितं | |||
| verse_lines = मनीषिणोऽन्तर्हृदि सन्निवेशितं;स्वशक्तिभिर्नवभिश्च त्रिवृद्भिः ।;वह्निं यथा दारुणि पाञ्चदश्यं;मनीषया निष्कृषन्तीह गूढम् ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स वै ममाशेषविशेषमाया- | |||
| verse_lines = स वै ममाशेषविशेषमाया-;निषेधनिर्वाणसुखानुभूतिः ।;स सर्वनामा स च विश्वरूपः;प्रसीदतामनिरुक्तात्मशक्तिः ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यद्यन्निरुक्तं वचसा निरूपितं | |||
| verse_lines = यद्यन्निरुक्तं वचसा निरूपितं;धियाऽक्षिभिर्वा मनसा वोत यस्य ।;मा भूत् स्वरूपं गुणरूपबृंहितं;स वै गुणापायनिसर्गलक्षणः ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्मिन् यतो येन च यस्य यस्मै | |||
| verse_lines = यस्मिन् यतो येन च यस्य यस्मै;यं यो यथा कुरुते कार्यते वा ।;परावरेषां परमं प्राक् स्वसिद्धं;तद् ब्रह्म तद्धेतुरनन्यदेकम् ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अस्तीति नास्तीति च वस्तुनिष्ठयो- | |||
| verse_lines = अस्तीति नास्तीति च वस्तुनिष्ठयो-;रेकस्थयोर्भिन्नविरुद्धधर्मयोः ।;अपेक्षितं किञ्चन सांख्ययोगयोः;समं परं ह्यनुकूलं बृहत् तत् ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल- | |||
| verse_lines = योऽनुग्रहार्थं भजतां पादमूल-;मनामरूपो भगवाननन्तः ।;नामानि रूपाणि च जन्मकर्मभि-;र्भेजे स मह्यं परमः प्रसीदताम् ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानां | |||
| verse_lines = यः प्राकृतैर्ज्ञानपथैर्जनानां;यथाशयं देहगतो विभाति ।;यथाऽनिलः पार्थिवमाश्रितो गुणं;स ईश्वरो मे कुरुतान्मनोरथम् ॥ ३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V45 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः । | |||
| verse_lines = ब्रह्मा भवो भवन्तश्च मनवो विबुधेश्वराः ।;विभूतयो मम ह्येता भूतानां भूतिहेतवः ॥ ४५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V46 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः । | |||
| verse_lines = तपो मे हृदयं ब्रह्म तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः ।;अङ्गानि क्रतवो जाता धर्म आत्माऽसवः सुराः ॥ ४६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V47 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहमेवेदमासाग्रे नान्यत् किञ्चान्तरं बहिः । | |||
| verse_lines = अहमेवेदमासाग्रे नान्यत् किञ्चान्तरं बहिः ।;संज्ञानमात्रमव्यक्तं प्रसुप्तमिव विश्वतः ॥ ४७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S04_V48 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे । | |||
| verse_lines = मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे ।;यदासीत् तत एवाद्यः स्वयम्भूः समभूदजः ॥ ४८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S08_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा- | |||
| verse_lines = सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-;द्धयशीर्षो मां पथि देवहेलनात् ।;देवर्षिवर्यः पुरुषान्तरार्चनात्;कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S08_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् । | |||
| verse_lines = यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् ।;सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S08_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तथैकात्म्यानुभावेन विकल्परहितः स्वयम् । | |||
| verse_lines = तथैकात्म्यानुभावेन विकल्परहितः स्वयम् ।;भूषणायुधलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S08_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः । | |||
| verse_lines = तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः ।;पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S08_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा । | |||
| verse_lines = एतद् धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा ।;पदा वा संस्पृशेत् सद्यः साध्वसात् स विमुच्यते ॥ ३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S08_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न कुतश्चिद् भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् । | |||
| verse_lines = न कुतश्चिद् भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् ।;राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याध्यादिभ्यश्च कर्हिचित् ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S09_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देवा ऊचुः– | |||
| verse_lines = देवा ऊचुः–;वाय्वम्बराग्न्यप्क्षितयस्त्रिलोका;ब्रह्मादयो ये वयमुद्विजन्तः ।;हराम यस्मै बलिमन्तकोऽसौ;बिभेति यस्मादरणं ततो नः ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S09_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पुरा स्वयम्भूरपि संयमाम्भ- | |||
| verse_lines = पुरा स्वयम्भूरपि संयमाम्भ-;स्युदीर्णवातोर्मिरवैः कराले ।;एकोऽरविन्दात् पतितस्ततार;तस्माद् भयाद् येन स नोऽस्तु पारः ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S09_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = य एक ईशो निजमायया नः | |||
| verse_lines = य एक ईशो निजमायया नः;ससर्ज येनानुसृजाम विश्वम् ।;वयं च यस्यापि पुरः समेताः;पश्याम लिङ्गं पृथगीशमानिनः ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S09_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आत्मतुल्यैः षोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ । | |||
| verse_lines = आत्मतुल्यैः षोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ ।;पर्युपासितमुन्निद्रशरदम्बुरुहेक्षणम् ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S09_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देवा ऊचुः– | |||
| verse_lines = देवा ऊचुः–;नमस्ते यज्ञवीर्याय वयसे उत ते नमः ।;नमस्ते अस्तु चक्राय नमोऽस्तु पुरुहूतये ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S09_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत् ते गतीनां तिसृणामीशितुः परमं पदम् । | |||
| verse_lines = यत् ते गतीनां तिसृणामीशितुः परमं पदम् ।;नार्वाचीनो विसर्गस्य धातुर्वेदितुमर्हति ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S09_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अथ तत्र भगवान् किं देवदत्तवदिह गुणविसर्गापतितः पारतन्त्र्येण | |||
| verse_lines = अथ तत्र भगवान् किं देवदत्तवदिह गुणविसर्गापतितः पारतन्त्र्येण;स्वकृतकुशलाकुशलफलमुपाददाति आहोस्विदात्माराम उपशमशीलः समञ्जसदर्शन उदास्त इति ह;वाव न विदामः ।न हि विरोध उभयं भगवत्यपरिगणितगुणगण ईश्वर अनवगाह्य-माहात्म्ये;अर्वाचीनविकल्पवितर्कविचारप्रमाणाभासकुतर्कशास्त्रकलिलान्तःकरणदुरवग्रहवादिनां च;विवादानवसरे उपरतसमस्तमाया-मये केवलस्वात्ममायामन्तर्धाय को नु दुर्घट इव भवति ।;स्वरूपद्वयाभावात् समविषममतीनां मतमनुसरसि यथा रज्जुखण्डः सर्पादिधियाम् । स एव हि पुनः सर्ववस्तुषु वस्तुस्वरूपः सर्वेश्वरः सकलजगत्कारणकारणभूतः सर्वप्रत्यगात्मत्वात्;सर्वगुणाभासोपलक्षित एक एव पर्यवशेषितः ।अथ ह वाव तव;महिमामहामृतरससमुद्रविप्लुषाऽसकृल्लीढया स्व-मनसि निष्यन्दमानानवरतसुखेन;विस्मारितदृष्टश्रुतविषयसुखलेशाभासाः परमभागवता एकान्तिनो भगवति सर्वभूतप्रियसुहृदि;सर्वात्मनि निरन्तरनिर्वृतमनसः कथमु ह वा एते मधुमथन पुनः स्वार्थकुशला ह्यात्मप्रियसुहृदः;साधवस्त्वच्चरणाम्बुजानुसेवां विसृजन्ति न यत्र पुनरयं संसारपरिवर्तः ।;त्रिभुवनात्मभवन त्रिविक्रम त्रिनयन त्रिलोकमनोहरानुभाव तवैव विभूतयोऽभूवन्;दितिजदनुजादयश्चापि तेषामनुपक्रमसमयोऽयमिति स्वात्ममायया सुरनरमृगमिश्रितजलचराकृतिभिः;यथाऽ-पराधं दण्डं दधर्थावतीर्य ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S09_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = हंसाय दभ्रनिलयाय निरीक्षकाय | |||
| verse_lines = हंसाय दभ्रनिलयाय निरीक्षकाय;कृष्णाय मृष्टयशसे निरुपक्रमाय ।;सत्संग्रहाय भवपान्थनिजाश्रयाय;शश्वद् वरिष्ठगतये हरये नमस्ते ॥ ३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S09_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न वेद कृपणः श्रेय आत्मनो गुणवस्तुदृक् । | |||
| verse_lines = न वेद कृपणः श्रेय आत्मनो गुणवस्तुदृक् ।;तस्य तानिच्छतो यच्छे यदि सोऽपि तथाविधः ॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S09_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्वयं निःश्रेयसं विद्वान् न वक्त्यज्ञाय कर्मभिः । | |||
| verse_lines = स्वयं निःश्रेयसं विद्वान् न वक्त्यज्ञाय कर्मभिः ।;न राति रोगिणोऽपथ्यं वाञ्छतोऽपि भिषग्यथा ॥ ४०॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S09_V41 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मघवन् यात भद्रं वो दध्यञ्चमृषिसत्तमम् । | |||
| verse_lines = मघवन् यात भद्रं वो दध्यञ्चमृषिसत्तमम् ।;विद्याव्रततपःसारं गात्रं याचत मा चिरम् ॥ ४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S10_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नूनं स्वार्थपरो लोको न वेद परसङ्कटम् । | |||
| verse_lines = नूनं स्वार्थपरो लोको न वेद परसङ्कटम् ।;यदि वेद न याचेत नेति नाह यदीश्वरः ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S12_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमात्मभूतेन्द्रियाशयाः । | |||
| verse_lines = पुरुषः प्रकृतिर्व्यक्तमात्मभूतेन्द्रियाशयाः ।;शक्नुवन्त्यस्य सर्गादौ न विना यदनुग्रहम् ।;अविद्वानेवमात्मानं मन्यतेऽनीशमीश्वरम् ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S12_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वज्रस्तु तत्कन्धरमाशुवेगः | |||
| verse_lines = वज्रस्तु तत्कन्धरमाशुवेगः;कृन्तन्समन्तात् परिवर्तमानः ।;न्यपातयत् तावदहर्गणेन;यो ज्योतिषामयने वार्त्रहत्ये ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S13_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रीशुक उवाच– | |||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच–;एवं सञ्चोदितो विप्रैर्मरुत्वानहनद् रिपुम् ।;ब्रह्महत्या हते तस्मिन्नाससाद वृषाकपिम् ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S13_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तयेन्द्रं स्म ह सन्तप्तं निर्वृतिर्नामुमाविशत् । | |||
| verse_lines = तयेन्द्रं स्म ह सन्तप्तं निर्वृतिर्नामुमाविशत् ।;ह्रीमतां वाच्यतां प्राप्तं;सुखयन्त्यपि नो गुणाः ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S14_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः । | |||
| verse_lines = मुक्तानामपि सिद्धानां नारायणपरायणः ।;सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महामुने ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S14_V53 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहो विधातस्त्वमतीव बालिशो | |||
| verse_lines = अहो विधातस्त्वमतीव बालिशो;यस्त्वात्मसृष्ट्यप्रतिरूपमीहसे ।;परे तु जीवत्यपरस्य या मृतिः;विपर्ययश्चेत् त्वमसि ध्रुवं परः ॥ ५३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S14_V54 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न हि क्रमश्चेदिह मृत्युजन्मनोः | |||
| verse_lines = न हि क्रमश्चेदिह मृत्युजन्मनोः;शरीरिणामस्तु तदाऽऽत्मकर्मभिः ।;यः स्नेहपाशो निजसर्गवृद्धये;स्वयं कृतस्ते तमिमं विवृश्चसि ॥ ५४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S14_V55 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वं तात नार्हसि स मां कृपणामनाथां | |||
| verse_lines = त्वं तात नार्हसि स मां कृपणामनाथां;त्यक्तुं विचक्ष्व पितरं तव शोकतप्तम् ।;अञ्जस्तरेम भवताऽप्रजदुस्तरं यद्;ध्वान्तं न याह्यकरुणेन यमेन दूरम् ॥ ५५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S14_V56 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उत्तिष्ठ तात त इमे शिशवो वयस्या- | |||
| verse_lines = उत्तिष्ठ तात त इमे शिशवो वयस्या-;स्त्वामाह्वयन्ति नृपनन्दन संविहर्तुम् ।;सुप्तश्चिरं ह्यशनया च भवान् परीतो;भुंक्ष्व स्तनं पिब शुचो हर नः स्वकानाम् ॥ ५६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S14_V57 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नाहं तनूज ददृशे हतमङ्गला ते | |||
| verse_lines = नाहं तनूज ददृशे हतमङ्गला ते;मुग्धस्मितं मुदितवीक्षणमाननाब्जम् ।;किं वा गतोऽस्यपुनरन्वयमन्यलोकं;नीतोऽघृणेन न शृृणोमि कला गिरस्ते ॥ ५७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S15_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = चरन्ति ह्यवनौ कामं ब्राह्मणा भगवत्प्रियाः । | |||
| verse_lines = चरन्ति ह्यवनौ कामं ब्राह्मणा भगवत्प्रियाः ।;मादृशां ग्राम्यबुद्धीनां बोधायोन्मत्तलिङ्गिनः ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S15_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कुमारो नारद ऋभुरङ्गिरा देवलोऽसितः । | |||
| verse_lines = कुमारो नारद ऋभुरङ्गिरा देवलोऽसितः ।;अपान्तरतमो व्यासो मार्कण्डेयोऽथ गौतमः ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S15_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वसिष्ठो भगवान् रामः कपिलो बादरायणिः । | |||
| verse_lines = वसिष्ठो भगवान् रामः कपिलो बादरायणिः ।;दूर्वासा याज्ञवल्क्यश्च जातूकर्ण्यस्तथाऽऽरुणिः ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S15_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रोमशश्च्यवनो दत्त आसुरिः सपतञ्जलिः । | |||
| verse_lines = रोमशश्च्यवनो दत्त आसुरिः सपतञ्जलिः ।;पराशरोऽथ मैत्रेयो भरद्वाजश्च आरुणः ।;ऋषिर्वेदशिरा बोध्यो मुनिः पञ्चशिखस्तथा ॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S15_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = हिरण्यनाभः कौशल्यः श्रुतदेवः क्रतुध्वजः । | |||
| verse_lines = हिरण्यनाभः कौशल्यः श्रुतदेवः क्रतुध्वजः ।;एते परे च सिद्धेशाश्चरन्ति ज्ञानहेतवः ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S15_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते । | |||
| verse_lines = अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते ।;एवं दारा गृहा रायो विविधैश्वर्यसम्पदः ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S15_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदाः । | |||
| verse_lines = सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदाः ।;गन्धर्वनगरप्रख्याः स्वप्नमायामनोरथाः ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S15_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दृश्यमाना विनाऽर्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाः | |||
| verse_lines = दृश्यमाना विनाऽर्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाः;कर्माभिध्यायतो नाना कर्माणि मनसोऽभवन् ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S15_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः । | |||
| verse_lines = अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ।;देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृतः ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S15_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मात् स्वस्थेन मनसा विमृश्य गतिमात्मनः । | |||
| verse_lines = तस्मात् स्वस्थेन मनसा विमृश्य गतिमात्मनः ।;द्वैते ध्रुवार्थविश्रम्भं त्यजोपशममाविश ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S15_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वे | |||
| verse_lines = यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वे;शर्वादयो भ्रममिमं द्वितयं विसृज्य ।;सद्यस्तदीयमतुलानधिकं महित्वं;प्रापुर्भवानपि परं न चिरादुपैति ॥ ३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S16_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एकः सर्वाश्रयः स्वदृक् । | |||
| verse_lines = एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एकः सर्वाश्रयः स्वदृक् ।;आत्ममायागुणैर्विश्वमात्मानं सृजते प्रभुः ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S16_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नादत्त आत्मा हि गुणं न दोषं न क्रियाफलम् । | |||
| verse_lines = नादत्त आत्मा हि गुणं न दोषं न क्रियाफलम् ।;उदासीन इवासीनः परावरदृगीश्वरः ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S16_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वचस्युपरते प्राप्यो य एको मनसा सह । | |||
| verse_lines = वचस्युपरते प्राप्यो य एको मनसा सह ।;अनामरूपचिन्मात्रः सोऽव्ययः सदसत्परः ॥२१॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S16_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्मिन्निदं यतश्चेदं तिष्ठत्यप्येति जायते । | |||
| verse_lines = यस्मिन्निदं यतश्चेदं तिष्ठत्यप्येति जायते ।;मृन्मयेष्विव मृज्जातिस्तस्मै ते ब्रह्मणे नमः ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S16_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ततः कतिपयाहोभिर्विद्ययेद्धमनोगतिः । | |||
| verse_lines = ततः कतिपयाहोभिर्विद्ययेद्धमनोगतिः ।;जगाम देवदेवस्य शेषस्य चरणान्तिकम् ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S16_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः स्वच्छामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुहुः । | |||
| verse_lines = तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः स्वच्छामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुहुः ।;प्रवृद्धभक्त्याऽऽप्रणयाश्रुलोचनः;प्रहृष्टरोमा तमनादिपूरुषम् ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S16_V51 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः । | |||
| verse_lines = अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः ।;शब्दब्रह्म परं ब्रह्म ममोभे शाश्वती तनू ॥ ५१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S16_V52 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = लोकेऽविततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् । | |||
| verse_lines = लोकेऽविततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् ।;उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम् ॥ ५२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S16_V54 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः । | |||
| verse_lines = एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः ।;मायामात्राणि विज्ञाय तद्द्रष्टारं परं स्मरेत् ॥ ५४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S16_V56 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः । | |||
| verse_lines = उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः ।;अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत् परम् ॥ ५६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S16_V57 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यद्येष विस्मृतः पुंसो मद्भावो भिन्न आत्मनः । | |||
| verse_lines = यद्येष विस्मृतः पुंसो मद्भावो भिन्न आत्मनः ।;ततः संसार एतस्य देहाद् देहो मृतेर्मृतिः ॥ ५७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S17_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं | |||
| verse_lines = एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं;जगद्गुरुं मङ्गलमङ्गलं स्वयम् ।;यः क्षत्रबन्धुः परिभूय सूरीन्;प्रशास्ति धृष्टस्तदयं हि दण्ड््यः ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S17_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न चास्य कश्चिद् दयितः प्रतीपो | |||
| verse_lines = न चास्य कश्चिद् दयितः प्रतीपो;न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः ।;समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य;कुतोऽनुरागः कुत एव रोषः ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S17_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वानीश्वरलीलया । | |||
| verse_lines = देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वानीश्वरलीलया ।;सुखं दुःखं मृतिर्जन्म शापानुग्रह एव च ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S17_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इहात्मनि । | |||
| verse_lines = अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इहात्मनि ।;गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्वप्नकल्पिता ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S17_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः । | |||
| verse_lines = इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः ।;मूर्ध्ना सञ्जगृहे शापमेतावत् साधुलक्षणम् ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S19_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्या अधीश्वरः साक्षात् त्वमेकः पुरुषः परः । | |||
| verse_lines = तस्या अधीश्वरः साक्षात् त्वमेकः पुरुषः परः ।;त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग् भवान् ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S19_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग् भवान् । | |||
| verse_lines = गुणव्यक्तिरियं देवी व्यञ्जको गुणभुग् भवान् ।;त्वं हि सर्वशरीरात्मा श्रीः शरीरेन्द्रियाशया ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C06 | |||
| verse_id = BTN_C06_S19_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रयः । | |||
| verse_lines = नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रयः ।;यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ ।;तथेमा उत्तमश्लोक सन्तु सत्या महाशिषः ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमस्कन्धः"></span> | ||
== सप्तमस्कन्धः == | == सप्तमस्कन्धः == | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः । | |||
| verse_lines = निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः ।;स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते । | |||
| verse_lines = ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते ।;विन्दन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्ततः ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयः प्रधानपुंभ्यां नरदेव सत्यकृत् । स तत्र तत्रोभयसिद्धिमाप्नुयात् लिङ्गात्मनो लिङ्गगुणाश्च सन्ति ॥ ११ ॥ | |||
| verse_lines = कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयः प्रधानपुंभ्यां नरदेव सत्यकृत् । स तत्र तत्रोभयसिद्धिमाप्नुयात् लिङ्गात्मनो लिङ्गगुणाश्च सन्ति ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्वं सुरानीकमिवैधयत्यजः । तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवाः ॥ १२ ॥ | |||
| verse_lines = य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्वं सुरानीकमिवैधयत्यजः । तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवाः ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शपतोरसकृद् विष्णुं यद् ब्रह्म परमव्ययम् । | |||
| verse_lines = शपतोरसकृद् विष्णुं यद् ब्रह्म परमव्ययम् ।;श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तमः ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यन्निबन्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात् प्राणिनां वधः । | |||
| verse_lines = यन्निबन्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात् प्राणिनां वधः ।;तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः । परस्येदमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्माद् वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा । | |||
| verse_lines = तस्माद् वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा ।;स्नेहात् कामेन वा युञ्ज््यात् कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात् । | |||
| verse_lines = यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात् ।;न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्ये यान्तमनुस्मरन् । | |||
| verse_lines = कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्ये यान्तमनुस्मरन् ।;संरम्भभययोगेन विन्दते तत्सरूपताम् ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे । | |||
| verse_lines = एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे ।;वैरेण धूतपाप्मानः तमापुरनुचिन्तया ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कामात् स्नेहाद् भयाद् द्वेषाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः । | |||
| verse_lines = कामात् स्नेहाद् भयाद् द्वेषाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः ।;आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः । | |||
| verse_lines = गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः ।;सम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कतमोऽपि न वेनस्य पञ्चानां पुरुषं प्रति । | |||
| verse_lines = कतमोऽपि न वेनस्य पञ्चानां पुरुषं प्रति ।;तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पार्थिव । | |||
| verse_lines = मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पार्थिव ।;पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात् पदच्युतौ ॥ ३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः । | |||
| verse_lines = पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः ।;दिग्वाससः शिशून् मत्वा द्वाःस्थौ तान् प्रत्यषेधताम् ॥३८॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तं सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम् । | |||
| verse_lines = तं सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम् ।;भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः ॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V45 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रवःसुतौ । | |||
| verse_lines = ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रवःसुतौ ।;रावणः कुम्भकर्णश्च सर्वलोकप्रतापिनौ ॥ ४५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V46 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तावद्य क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव । | |||
| verse_lines = तावद्य क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव ।;अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ ॥ ४६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V48 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसाम्यताम् । | |||
| verse_lines = वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसाम्यताम् ।;नीतौ पुनर्हरेः पार्श्वं जग्मतुर्विष्णुपार्षदौ ॥ ४८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तावद् यात भुवं यूयं ब्रह्मक्षत्रसमेधिताम् । | |||
| verse_lines = तावद् यात भुवं यूयं ब्रह्मक्षत्रसमेधिताम् ।;सूदयध्वं तपोयज्ञस्वाध्यायव्रतदानकान् ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विष्णुर्द्विजक्रियामूलो यज्ञो धर्ममयः पुमान् । देवर्षिपितृभूतानां धर्मस्य च परायणम् ॥ ११ ॥ | |||
| verse_lines = विष्णुर्द्विजक्रियामूलो यज्ञो धर्ममयः पुमान् । देवर्षिपितृभूतानां धर्मस्य च परायणम् ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नित्य आत्माऽव्ययः शुद्धः सर्ववित् सर्वगः परः । | |||
| verse_lines = नित्य आत्माऽव्ययः शुद्धः सर्ववित् सर्वगः परः ।;धत्तेऽसावात्मनो लिङ्गं मायया विसृजन् गुणान् ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथाऽम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव । | |||
| verse_lines = यथाऽम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव ।;चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् । | |||
| verse_lines = एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् ।;याति तत्साम्यतां भद्रे ह्यलिङ्गो लिङ्गवानिव ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सम्भवश्च विनाशश्च शोकश्च विविधः स्मृतः । | |||
| verse_lines = सम्भवश्च विनाशश्च शोकश्च विविधः स्मृतः ।;अविवेकश्च चिन्ता च विवेकस्मृतिरेव च ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यम उवाच– अहो अमीषां वयसाऽधिकानां विपश्यतां लोकविधिं विमोहः । यत्रोद्भवस्तत्र गतं मनुष्यं स्वयं सधर्मा अनुशोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_lines = यम उवाच– अहो अमीषां वयसाऽधिकानां विपश्यतां लोकविधिं विमोहः । यत्रोद्भवस्तत्र गतं मनुष्यं स्वयं सधर्मा अनुशोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V41 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि- | |||
| verse_lines = भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि-;र्भवन्ति काले न भवन्ति सर्वशः ।;न तत्र हात्मा प्रकृतावपि स्थित-;स्तस्या गुणैरन्यतमो निबध्यते ॥ ४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V43 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यथाऽनलो दारुषु भिन्न ईयते | |||
| verse_lines = यथाऽनलो दारुषु भिन्न ईयते;यथाऽनिलो देहगतः पृथक् स्थितः ।;यथा नभः सर्वगतं न सज्जते;तथा गुणैः सर्वगुणाश्रयः परः ॥ ४३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ । | |||
| verse_lines = सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ ।;यः श्रोता योऽनुवक्तेह न स दृश्येत कर्हिचित् ॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V45 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न श्रोता नानुवक्ताऽयं मुख्योऽप्यत्र महानसुः । | |||
| verse_lines = न श्रोता नानुवक्ताऽयं मुख्योऽप्यत्र महानसुः ।;यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्यः प्राणदेहयोः ॥ ४५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V46 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भूतेन्द्रियमनोलिङ्गान् देहानुच्चावचान् विभुः । | |||
| verse_lines = भूतेन्द्रियमनोलिङ्गान् देहानुच्चावचान् विभुः ।;भजत्युत्सृजति ह्यन्यस्तच्चापि स्वेन तेजसा ॥ ४६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V47 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यावल्लिङ्गान्वितो ह्यात्मा तावत् कर्मनिबन्धनः । | |||
| verse_lines = यावल्लिङ्गान्वितो ह्यात्मा तावत् कर्मनिबन्धनः ।;ततो विपर्ययः क्लेशो मायायोगोऽनुवर्तते ॥ ४७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V48 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वितथाभिनिवेशोऽयं यद्गुणेष्वर्थदृग्वचः । | |||
| verse_lines = वितथाभिनिवेशोऽयं यद्गुणेष्वर्थदृग्वचः ।;यथा मनोरथः स्वप्नः सर्वमैन्द्रियकं मृषा ॥ ४८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V58 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = हिरण्यकशिपुरुवाच– | |||
| verse_lines = हिरण्यकशिपुरुवाच–;बाल एवं प्रवदति सर्वे विस्मितचेतसः ।;ज्ञातयो मेनिरे सर्वमनित्यमयथोत्थितम् ॥ ५८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V60 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = क आत्मा कः परो वाऽत्र स्वीयः पारक्य एव च । | |||
| verse_lines = क आत्मा कः परो वाऽत्र स्वीयः पारक्य एव च ।;स्वपराभिनिवेशेन विनाऽज्ञानेन देहिनः ॥ ६० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S03_V09 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सृष्ट्वा चराचरमिदं तपोयोगसमाधिना । | |||
| verse_lines = सृष्ट्वा चराचरमिदं तपोयोगसमाधिना ।;अध्यास्ते सर्वधिष्ण्येभ्यः परमेष्ठी निजासनम् ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S03_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तदहं वर्धमानेन तपोयज्ञसमाधिना । | |||
| verse_lines = तदहं वर्धमानेन तपोयज्ञसमाधिना ।;कालात्मनोश्च नित्यत्वात् साधयिष्ये तथाऽऽत्मनः ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S03_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अन्यथेदं विधास्येऽहमयथापूर्वमोजसा । | |||
| verse_lines = अन्यथेदं विधास्येऽहमयथापूर्वमोजसा ।;किमन्यैः कालनिर्धूतैः कल्पान्तैर्वैष्णवादिभिः ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S03_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तवासनं हि जगतां पारमेष्ठ्यं जगत्पते । | |||
| verse_lines = तवासनं हि जगतां पारमेष्ठ्यं जगत्पते ।;भवाय श्रेयसे भूत्यै क्षेमाय विजयाय च ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S03_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तपन्तं तपसा लोकान् यथा भाविततं रविम् । | |||
| verse_lines = तपन्तं तपसा लोकान् यथा भाविततं रविम् ।;विलक्ष्य विस्मितः प्राह हसंस्तं हंसवाहनः ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S03_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = व्यवसायेन तेऽनेन दुष्करेणामनस्विभिः । | |||
| verse_lines = व्यवसायेन तेऽनेन दुष्करेणामनस्विभिः ।;तपोनिष्ठेन भवता जितोऽहं दितिनन्दन ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S03_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = हिरण्यकशिपुरुवाच– | |||
| verse_lines = हिरण्यकशिपुरुवाच–;कल्पान्ते कालसृष्टेन योऽन्धेन तमसाऽऽवृतम् ।;अभिव्यनग् जगदिदं स्वयंज्योतिः स्वरोचिषा ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S03_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति । | |||
| verse_lines = आत्मना त्रिवृता चेदं सृजत्यवति लुम्पति ।;रजःसत्वतमोधाम्ने पराय महते नमः ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S03_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम् । | |||
| verse_lines = त्वमीशिषे जगतस्तस्थुषश्च प्राणेन मुख्येन पतिः प्रजानाम् ।;चित्तस्य चित्तिर्मनइन्द्रियाणां पतिर्महाभूतगुणाशयेशः ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S03_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वं सप्ततन्तून् वितनोषि तन्वा | |||
| verse_lines = त्वं सप्ततन्तून् वितनोषि तन्वा;त्रय्या चतुर्होत्रकविद्यया च ।;त्वमेक आत्माऽऽत्मवतामनादि-;रनन्तपारः कविरव्ययात्मा ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S03_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना- | |||
| verse_lines = त्वमेव कालोऽनिमिषो जनाना-;मायुर्लवाद्यावयवैः क्षिणोषि ।;कूटस्थ आत्मा परमेष्ठ्यजो महान्;त्वं जीवलोकस्य च जीव आत्मा ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S03_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वत्तः परं नापरमप्यनेज- | |||
| verse_lines = त्वत्तः परं नापरमप्यनेज-;देजच्च किञ्चिद् व्यतिरिक्तमस्ति ।;विद्याकलास्ते तनवश्च सर्वा;हिरण्यगर्भोऽसि बृहत् त्रिपृष्ठः ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S03_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नान्तर्बहिर्दिवानक्तमन्यस्मादपि चायुधैः । | |||
| verse_lines = नान्तर्बहिर्दिवानक्तमन्यस्मादपि चायुधैः ।;न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि ॥ ३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S04_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद्धेममयं वपुः । | |||
| verse_lines = एवं लब्धवरो दैत्यो बिभ्रद्धेममयं वपुः ।;भगवत्यकरोद् द्वेषं भ्रातुर्वधमनुस्मरन् ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S04_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मिन् महेन्द्रभवने महासुरो | |||
| verse_lines = तस्मिन् महेन्द्रभवने महासुरो;महाबलो निर्जितलोक एकराट् ।;रेमेऽभिवन्द्याङ्घ्रियुगः सुरादिभिः;प्रतापितैरूर्जितचण्डशासनः ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S04_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तमङ्ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना | |||
| verse_lines = तमङ्ग मत्तं मधुनोरुगन्धिना;विवृत्तताम्राक्षमशेषधिष्ण्यपाः ।;उपासतोपायनपाणिभिर्विना;त्रिभिस्तपोयोगबलौजसां पदम् ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S04_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु । | |||
| verse_lines = यदा देवेषु वेदेषु गोषु विप्रेषु साधुषु ।;धर्मे मयि च विद्वेषः स वा आशु विनश्यति ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S04_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने । | |||
| verse_lines = निर्वैराय प्रशान्ताय स्वसुताय महात्मने ।;प्रह्लादाय यदा द्रुह्येद्धनिष्येऽपि वरोर्जितम् ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S04_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्मिन् महागुणा राजन् गृह्यन्ते कविभिर्मुहुः । | |||
| verse_lines = यस्मिन् महागुणा राजन् गृह्यन्ते कविभिर्मुहुः ।;न तेऽधुनाऽभिधीयन्ते यथा भगवतीश्वरे ॥ ३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S05_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रह्लाद उवाच– | |||
| verse_lines = प्रह्लाद उवाच–;परः स्वश्चेत्यसद्ग्राहः पुंसां यन्मायया कृतः ।;विमोहितधियां दृष्टः तस्मै भगवते नमः ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S05_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स यदाऽनुगतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते । | |||
| verse_lines = स यदाऽनुगतः पुंसां पशुबुद्धिर्विभिद्यते ।;अन्य एष तथाऽन्योऽहमिति देहगताऽसती ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S05_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रह्लाद उवाच– | |||
| verse_lines = प्रह्लाद उवाच–;श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।;अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S05_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गुरुपुत्र उवाच– | |||
| verse_lines = गुरुपुत्र उवाच–;न मत्प्रणीतं न परप्रणीतं;सुतो वदत्येष तवेन्द्रशत्रो ।;नैसर्गिकीयं मतिरस्य राजन्;नियच्छ मन्युं क्व तदाऽऽत्ममानः ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S06_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रत्यगात्मस्वरूपेण कालरूपेण च स्वयम् । | |||
| verse_lines = प्रत्यगात्मस्वरूपेण कालरूपेण च स्वयम् ।;व्याप्यव्यापकनिर्देश्यो ह्यनिर्देश्योविकल्पितः ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S06_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = केवलानुभवानन्दस्वरूपः परमेश्वरः । | |||
| verse_lines = केवलानुभवानन्दस्वरूपः परमेश्वरः ।;माययान्तर्हितैश्वर्य ईयते गुणसर्गया ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S06_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् । | |||
| verse_lines = तस्मात् सर्वेषु भूतेषु दयां कुरुत सौहृदम् ।;भावमासुरमुन्मुच्य तया तुष्यत्यधोक्षजः ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S06_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्ये | |||
| verse_lines = तुष्टे च तत्र किमलभ्यमनन्त आद्ये;किं तैर्गुणव्यतिकरैरिह येऽनुसिद्धाः ।;धर्मादिभिः किमगुणेन च कांक्षितेन;सारं जुषां चरणयोरुपगायतां नः ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः । | |||
| verse_lines = जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः ।;फलानामिव वृक्षस्य कालेनेश्वरमूर्तिना ॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्तास्त्रय एव हि तद्गुणाः । | |||
| verse_lines = अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्तास्त्रय एव हि तद्गुणाः ।;विकाराः षोडशाचार्यैः पुमानेकः समन्वयात् ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः । | |||
| verse_lines = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः ।;ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्षः पुरुषः परः ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एभिस्त्रिवर्णैः पर्यस्तैर्बुद्धिभेदैः क्रियोद्भवैः । | |||
| verse_lines = एभिस्त्रिवर्णैः पर्यस्तैर्बुद्धिभेदैः क्रियोद्भवैः ।;सरूपमात्मनो धत्ते गन्धैर्वायुरिवान्वयात् ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एतद्द्वारो हि संसारो गुणकर्मनिबन्धनः । | |||
| verse_lines = एतद्द्वारो हि संसारो गुणकर्मनिबन्धनः ।;अज्ञानमूलोऽपार्थोऽपि पुंसः स्वप्न इवाप्यते ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्माद् भवद्भिः कर्तव्यः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम् । | |||
| verse_lines = तस्माद् भवद्भिः कर्तव्यः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम् ।;बीजनिर्हरणे योगः प्रवाहोपरमो धियः ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = निशम्य कर्माणि गुणानतुल्यान् वीर्याणि लीलातनुभिः कृतानि । | |||
| verse_lines = निशम्य कर्माणि गुणानतुल्यान् वीर्याणि लीलातनुभिः कृतानि ।;यदाऽऽतिहर्षोत्पुलकाश्रुगद्गदः प्रोत्कण्ठ उद्गायति रौति नृत्यति॥ ३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचिद्धस- | |||
| verse_lines = यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचिद्धस-;त्याक्रन्दते ध्यायति वन्दते जनम् ।;मुहुः श्वसन् वक्ति हरे जगत्पते;नारायणेत्यात्मगतिर्गतत्रपः ॥ ३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तदा पुमान् मुक्तसमस्तबन्धन- | |||
| verse_lines = तदा पुमान् मुक्तसमस्तबन्धन-;स्तद्भावभावानुकृताशयाकृतिः ।;निर्दग्धबीजानुशयो महीयसा;भक्तिप्रयोगेण समेत्यधोक्षजम् ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अधोक्षजालापमिहाशुभात्मनः | |||
| verse_lines = अधोक्षजालापमिहाशुभात्मनः;शरीरिणः संसृतिचक्रशातनम् ।;तद् ब्रह्मनिर्वाणसुखं विदुर्बुधा-;स्ततो भजध्वं हृदये हृदीश्वरम् ॥ ३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरे- | |||
| verse_lines = कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरे-;रुपासने स्वे हृदि छिद्रवत् सतः ।;अस्यात्मनः सख्युरशेषदेहिनां;सामान्यतः किं विषयोपपादनैः ॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V49 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मादर्थाश्च कामाश्च धर्माश्च यदपाश्रयाः । | |||
| verse_lines = तस्मादर्थाश्च कामाश्च धर्माश्च यदपाश्रयाः ।;भजतानीहयाऽऽत्मानमनीहं हरिमीश्वरम् ॥ ४९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V50 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्मेश्वरः प्रियः । | |||
| verse_lines = सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्मेश्वरः प्रियः ।;भूतैर्महद्भिः स्वकृतैः कृतानां बीजसंज्ञितः ॥ ५० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S07_V55 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा व्रजौकसः । | |||
| verse_lines = दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा व्रजौकसः ।;खगा मृगाः पापजीवाः सन्ति ह्यच्युततां गताः ॥ ५५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S08_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ऋषय ऊचुः– | |||
| verse_lines = ऋषय ऊचुः–;त्वं नस्तपः परममात्थ यदात्मतेजो;येनेदमादिपुरुषात्मगतं समस्तम् ।;तद् विप्रलुप्तममुनाद्य शरण्यपाल;रक्षागृहीतवपुषा पुनरन्वमंस्थाः ॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S08_V51 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गन्धर्वा ऊचुः– | |||
| verse_lines = गन्धर्वा ऊचुः–;वयं विभो ते नटनाट्यगायका;येनात्मसाद् वीर्यबलौजसा कृताः ।;स एष नीतो भवता दशामिमां;किमुत्पथस्थः कुशलाय कल्पते ॥ ५१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = साक्षाच्छ्रीः प्रेषिता देवैर्दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् । | |||
| verse_lines = साक्षाच्छ्रीः प्रेषिता देवैर्दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ।;अदृष्टाश्रुतपूर्वत्वात् सा नोपेयाय शङ्किता ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रह्लादं प्रेषयामास ब्रह्माऽवस्थितमन्तिके । | |||
| verse_lines = प्रह्लादं प्रेषयामास ब्रह्माऽवस्थितमन्तिके ।;तात प्रशमयोपेहि स्वपित्रे कुपितं प्रभुम् ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- | |||
| verse_lines = विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ-;पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् ।;मन्ये तदर्पितमनोवचनात्मगेह-;प्राणः पुनाति सकलं न तु भूरिमानः ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्मिन् यतो येन च यर्हि यस्य | |||
| verse_lines = यस्मिन् यतो येन च यर्हि यस्य;यस्मै यथा यमुत यस्त्वपरः परो वा ।;भावं करोति विकरोति पृथक् स्वभावः;सञ्चोदितस्तदखिलं भवतः स्वरूपम् ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः | |||
| verse_lines = माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः;कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः ।;छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारं;संसारचक्रमज कोऽतितरेत्त्वदन्यः ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V26 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = क्वाहं रजःप्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिन् | |||
| verse_lines = क्वाहं रजःप्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिन्;जातः सुरेतरकुले क्व तवानुकम्पा ।;न ब्रह्मणो न तु भवस्य न वै रमाया;यन्मेऽर्पितः शिरसि पद्मकरप्रसादः ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नैषा परावरमतिर्भवतो ननु स्यात् | |||
| verse_lines = नैषा परावरमतिर्भवतो ननु स्यात्;जन्तोर्यथाऽऽत्मसुहृदो जगतस्तथाऽपि ।;संसेवया सुरतरोरिव ते प्रसादः;सेवानुरूप उदयो न परावरत्वम् ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो | |||
| verse_lines = त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो;माया यदात्मपरबुद्धिरियं ह्यपार्था ।;यद् यस्य जन्मनिधनं स्थितिरीक्षणं च;तद् वै तदेव खलु कालवदुष्टितर्वोः ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न्यस्येदमात्मनि जगद् विलयाम्बुमध्ये | |||
| verse_lines = न्यस्येदमात्मनि जगद् विलयाम्बुमध्ये;शेषासनो निजसुखानुभवो निरीहः ।;योगेन मीलितदृगात्मनि वीतनिद्र-;स्तुर्यस्थितो ननु तमोऽनुगुणांश्च युंक्षे ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या | |||
| verse_lines = तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या;सञ्चोदितं प्रकृतिधर्मिण आत्मगूढम् ।;अम्भस्यनन्तशयनाद्विरमत्समाधेः;नाभेरभूत् स्वकणिकाद्वटवन्महाब्जम् ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान- | |||
| verse_lines = तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान-;स्त्वां बीजमात्मनि ततं स बहिर्विचिन्वन् ।;नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्जमानो;जातेऽङ्कुरे कथमिहोपलभेत बीजम् ॥ ३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आश्रितोऽब्जं | |||
| verse_lines = स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आश्रितोऽब्जं;कालेन तीव्रतपसा परिशुद्धभावः ।;त्वामात्मनीश भुवि गन्धमिवातिसूक्ष्मं;भूतेन्द्रियाशयमये विततं ददर्श ॥ ३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं सहस्रवदनाङ्घ्रिशिरःकरोरु- | |||
| verse_lines = एवं सहस्रवदनाङ्घ्रिशिरःकरोरु-;नासास्यकर्णनयनाभरणायुधाढ्यम् ।;मायामयं सदुपलक्षणसन्निवेशं;दृष्ट्वा महापुरुषमाप मुदं विरिञ्चः ॥ ३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रायेण देवमुनयः स्वविमुक्तिकामा | |||
| verse_lines = प्रायेण देवमुनयः स्वविमुक्तिकामा;मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः ।;नैतान् विहाय कृपणान् विमुमुक्ष एको;नान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनुपश्ये ॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S09_V47 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रूपे इमे सदसती तव वेददृष्टे | |||
| verse_lines = रूपे इमे सदसती तव वेददृष्टे;बीजाङ्कुराविव न चान्यदरूपकस्य ।;युक्ताः समक्षमुभयत्र विचिन्वते त्वां;योगेन वह्निमिव दारुषु नान्यतः स्यात् ॥ ४७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S10_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रीभगवानुवाच– त्रिः सप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ । यत् साधोऽस्य कुले जातो भवान् वै कुलपावनः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– त्रिः सप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ । यत् साधोऽस्य कुले जातो भवान् वै कुलपावनः ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S10_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भवन्ति पुरुषा लोके मद्भक्तास्त्वामनुव्रताः । | |||
| verse_lines = भवन्ति पुरुषा लोके मद्भक्तास्त्वामनुव्रताः ।;भवान् मे खलु भक्तानां सर्वेषां प्रतिरूपधृक् ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S10_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कुरु ते प्रेतकार्याणि पितुः पूतस्य सर्वशः । | |||
| verse_lines = कुरु ते प्रेतकार्याणि पितुः पूतस्य सर्वशः ।;मदङ्गस्पर्शनेनाङ्ग लोकान् यास्यति सुप्रजाः ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S10_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रीभगवानुवाच– मैवंविधोऽसुराणां ते प्रदेयः पद्मसम्भव । वरः क्रूरनिसर्गाणामहीनाममृतं यथा ॥ ३१ ॥ | |||
| verse_lines = श्रीभगवानुवाच– मैवंविधोऽसुराणां ते प्रदेयः पद्मसम्भव । वरः क्रूरनिसर्गाणामहीनाममृतं यथा ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S10_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एनः पूर्वकृतं यत् तद् राजानः कृष्णवैरिणः । | |||
| verse_lines = एनः पूर्वकृतं यत् तद् राजानः कृष्णवैरिणः ।;जहुस्तेऽन्ते तदात्मानः कीटाः पेशस्कृतो यथा ॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S10_V43 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एषा ब्रह्मण्यदेवस्य कृष्णस्य च महात्मनः । | |||
| verse_lines = एषा ब्रह्मण्यदेवस्य कृष्णस्य च महात्मनः ।;अवतारकथा पुण्या वधो यत्रादिदैत्ययोः ॥ ४३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S10_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रह्लादस्यानुचरितं महाभागवतस्य च । | |||
| verse_lines = प्रह्लादस्यानुचरितं महाभागवतस्य च ।;भक्तिर्ज्ञानं विरक्तिश्च याथात्म्यं चास्य वै हरेः ॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S10_V45 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम् । | |||
| verse_lines = सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम् ।;परावरेषां स्थानानां कालेन व्यत्ययो महान् ॥ ४५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S10_V46 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धर्मो भागवतानां च भगवान् येन गम्यते । | |||
| verse_lines = धर्मो भागवतानां च भगवान् येन गम्यते ।;आख्यानेऽस्मिन् समाख्यातमाध्यात्मिकमशेषतः ॥ ४६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S10_V50 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स वा अयं ब्रह्म महद् विमृग्यं | |||
| verse_lines = स वा अयं ब्रह्म महद् विमृग्यं;कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः ।;प्रियः सुहृद् वः खलु मातुलेय;आत्माऽर्हणीयो विधिकृद् गुरुश्च ॥ ५० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S11_V01 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नारद उवाच– स एष भगवान् राजन् व्यतनोद् विततं यशः । पुरा रुद्रस्य देवस्य मयेनानन्तमायिना ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = नारद उवाच– स एष भगवान् राजन् व्यतनोद् विततं यशः । पुरा रुद्रस्य देवस्य मयेनानन्तमायिना ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S11_V02 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = राजोवाच– कस्मिन् कर्मणि देवस्य यशोऽभूज्जगदीशितुः । यथा चोपचिता कीर्तिः कृष्णेनानेन कथ्यताम् ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = राजोवाच– कस्मिन् कर्मणि देवस्य यशोऽभूज्जगदीशितुः । यथा चोपचिता कीर्तिः कृष्णेनानेन कथ्यताम् ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S11_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वत्स आसीत् तदा ब्रह्मा स्वयं विष्णुरयं हि गौः । | |||
| verse_lines = वत्स आसीत् तदा ब्रह्मा स्वयं विष्णुरयं हि गौः ।;प्रविश्य त्रिपुरं काले रसकूपामृतं पपौ ॥ तेऽसुरा ह्यपि पश्यन्तो न न्यषेधन् विमोहिताः ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S11_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देवोऽसुरो नरोऽन्यो वा नेश्वरोऽस्तीह कश्चन । | |||
| verse_lines = देवोऽसुरो नरोऽन्यो वा नेश्वरोऽस्तीह कश्चन ।;आत्मनोऽन्यस्य वा दिष्टं दैवेनापोहितुं द्वयोः ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S12_V11 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गतेः । | |||
| verse_lines = श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गतेः ।;सेवेज्याऽवनतिः सख्यं दास्यमात्मसमर्पणम् ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S12_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = या पतिं हरिभावेन भजेच्छ्रीरिव तत्परा । | |||
| verse_lines = या पतिं हरिभावेन भजेच्छ्रीरिव तत्परा ।;हर्यात्मना हरेर्लोके पत्या श्रीरिव मोदते ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S13_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = द्वैतं तावन्न विरमेत् ततो ह्यस्य विपर्ययः ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = द्वैतं तावन्न विरमेत् ततो ह्यस्य विपर्ययः ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S13_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दत्वा वरमनुज्ञातो गुरोः कामं यदीश्वरः । | |||
| verse_lines = दत्वा वरमनुज्ञातो गुरोः कामं यदीश्वरः ।;गृहं वनं वा प्रविशेत् प्रव्रजेत् तत्र वा वसेत् ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S13_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेष्वधोक्षजम् । | |||
| verse_lines = अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेष्वधोक्षजम् ।;भूतैः स्वधामभिः पश्येदप्रविष्टं प्रविष्टवत् ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S13_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आत्मन्यग्नीन् समारोप्य संन्यस्याहं ममात्मताम् । | |||
| verse_lines = आत्मन्यग्नीन् समारोप्य संन्यस्याहं ममात्मताम् ।;कारणेषु न्यसेत् सम्यक् सङ्घातं तु यथार्हतः ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S13_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मनो मनोरथैश्चन्द्रे बुद्धिं बोध्यैः कवौ परे ॥ २८ ॥ | |||
| verse_lines = मनो मनोरथैश्चन्द्रे बुद्धिं बोध्यैः कवौ परे ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S13_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कर्माण्यध्यात्मना रुद्रे यदहंसम्मताः क्रियाः । | |||
| verse_lines = कर्माण्यध्यात्मना रुद्रे यदहंसम्मताः क्रियाः ।;सत्त्वेन चित्तं क्षेत्रज्ञे गुणैर्वैकारिकं परे ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S13_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इत्यक्षरतयाऽऽत्मानं चिन्मात्रमवशेषितम् । | |||
| verse_lines = इत्यक्षरतयाऽऽत्मानं चिन्मात्रमवशेषितम् ।;ज्ञात्वाऽद्वयोऽथ विरमेद् दग्धयोनिरिवानिलः ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S14_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पश्येदात्मन्यदो विश्वं परे सदसतोऽद्वये । | |||
| verse_lines = पश्येदात्मन्यदो विश्वं परे सदसतोऽद्वये ।;आत्मानं च परं ब्रह्म सर्वत्र सदसन्मये ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S14_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम् । | |||
| verse_lines = नासच्छास्त्रेषु सज्जेत नोपजीवेत जीविकाम् ।;अतिवादान् त्यजेत् तर्कान् पक्षं कञ्चिन्न संश्रयेत् ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S14_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान् नैवाभ्यसेद् बहून् । | |||
| verse_lines = न शिष्याननुबध्नीत ग्रन्थान् नैवाभ्यसेद् बहून् ।;न व्याख्यामुपजीवेत नारम्भानारभेत् क्वचित् ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S14_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विकल्पं जुहुयाच्चित्ते तन्मनस्यर्थविभ्रमे । | |||
| verse_lines = विकल्पं जुहुयाच्चित्ते तन्मनस्यर्थविभ्रमे ।;मनो वैकारिके हुत्वा मायायां वै जुहोत्यमुम् ॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S14_V46 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्वात्मवृत्तं मयेत्थं ते सुगुप्तमनुवर्णितम् । | |||
| verse_lines = स्वात्मवृत्तं मयेत्थं ते सुगुप्तमनुवर्णितम् ।;व्यपेतं लोकशास्त्राभ्यां भवान् हि भगवत्प्रियः ॥ ४६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S15_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कृमिविड्भस्मनिष्ठान्तं क्वेदं तुच्छं कलेवरम् । | |||
| verse_lines = कृमिविड्भस्मनिष्ठान्तं क्वेदं तुच्छं कलेवरम् ।;क्व तदीयरतिर्भार्या क्वायमात्मा नभश्छदिः ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S15_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके । | |||
| verse_lines = तृतीयायां शुक्लपक्षे नवम्यामथ कार्तिके ।;चतसृष्वप्यष्टकासु हेमन्ते शिशिरे तथा ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S15_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पुराण्यनेन सृष्टानि नृतिर्यगृषिदेवताः । | |||
| verse_lines = पुराण्यनेन सृष्टानि नृतिर्यगृषिदेवताः ।;शेते जीवेन रूपेण पुरेषु पुरुषो ह्यसौ ॥ ३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S15_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तेष्वीशो भगवान् राजन् तारतम्येन वर्तते । | |||
| verse_lines = तेष्वीशो भगवान् राजन् तारतम्येन वर्तते ।;तस्मात् पात्रं हि पुरुषो यावानात्मा यथेयते ॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S15_V42 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पुरुषेष्वपि राजेन्द्र सुपात्रं ब्राह्मणं विदुः । | |||
| verse_lines = पुरुषेष्वपि राजेन्द्र सुपात्रं ब्राह्मणं विदुः ।;तपसा विद्यया तुष्ट्या धत्ते वेदं हरेस्तनुम् ॥ ४२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S15_V43 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तन्वोऽस्य ब्राह्मणा राजन् कृष्णस्य जगदात्मनः । | |||
| verse_lines = तन्वोऽस्य ब्राह्मणा राजन् कृष्णस्य जगदात्मनः ।;पुनन्तः पादरजसा त्रिलोकीं दैवतं महत् ॥ ४३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S16_V52 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = निषेकादिश्मशानान्तैः संस्कारैः संस्कृताः द्विजाः । | |||
| verse_lines = निषेकादिश्मशानान्तैः संस्कारैः संस्कृताः द्विजाः ।;इन्द्रियेषु क्रियायज्ञान् ज्ञानदीपेषु जुह्वति ॥ ५२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S16_V53 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इन्द्रियाणि मनस्येवं वाचि वैकारिकं मनः । | |||
| verse_lines = इन्द्रियाणि मनस्येवं वाचि वैकारिकं मनः ।;तां तु वर्णसमाम्नाये तमोङ्कारे स्वरे न्यसेत् ॥ ५३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S16_V54 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अग्निः सूर्यो दिवा वायुः शुक्लो राकोत्तरः स्वराट् ॥ ५४ ॥ | |||
| verse_lines = अग्निः सूर्यो दिवा वायुः शुक्लो राकोत्तरः स्वराट् ॥ ५४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S16_V55 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विश्वोऽथ तैजसः प्राज्ञस्तुर्य आत्मा समन्वयः । | |||
| verse_lines = विश्वोऽथ तैजसः प्राज्ञस्तुर्य आत्मा समन्वयः ।;देवयानमिदं प्राहुर्भूत्वा भूत्वाऽनुपूर्वशः । आत्मयाज्युपशान्तात्मा ह्यात्मस्थो न निवर्तते ॥ ५५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S16_V56 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = य एते पितृदेवानामयने देवनिर्मिते । | |||
| verse_lines = य एते पितृदेवानामयने देवनिर्मिते ।;शास्त्रेण चक्षुषा वेद जनस्थोऽपि न मुह्यति ॥ ५६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S16_V57 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आदावन्तेऽजनानाशं बहिरन्तः परावरम् । | |||
| verse_lines = आदावन्तेऽजनानाशं बहिरन्तः परावरम् ।;ज्ञानं ज्ञेयं वचो वाच्यं तमो ज्योतिश्च यत् स्वयम् ॥ ५७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S16_V58 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अबाधितोऽपि ह्याभासो यथा वस्तुतया स्मृतः । | |||
| verse_lines = अबाधितोऽपि ह्याभासो यथा वस्तुतया स्मृतः ।;दुर्घटत्वादैन्द्रियकं तद्वदर्थविकल्पितम् ॥ ५८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S16_V59 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = क्षित्यादीनां इहार्थानां छाया न कतमाऽपि हि । | |||
| verse_lines = क्षित्यादीनां इहार्थानां छाया न कतमाऽपि हि ।;न संघातो विकारोऽपि न पृथङ् नान्वितोऽपि वा ॥ ५९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S16_V60 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धातवोऽवयवित्वाच्च तन्मात्रावयवैर्विना । | |||
| verse_lines = धातवोऽवयवित्वाच्च तन्मात्रावयवैर्विना ।;न स्युर्ह्यसत्यवयविन्यासन्नावयवा इव ॥ ६० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S16_V61 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्यात् सादृश्यभ्रमस्तावद् विकल्पे सति वस्तुनः । | |||
| verse_lines = स्यात् सादृश्यभ्रमस्तावद् विकल्पे सति वस्तुनः ।;जाग्रत्स्वप्नौ यथा स्वप्ने तथा विधिनिषेधता ॥ ६१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| verse_id = BTN_C07_S16_V69 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अहं पुराऽभवं कश्चिद् गन्धर्व उपबर्हणः । | |||
| verse_lines = अहं पुराऽभवं कश्चिद् गन्धर्व उपबर्हणः ।;नाम्नाऽतीते महाकल्पे गन्धर्वाणां सुसम्मतः ॥ ६९ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमस्कन्धः"></span> | ||
== अष्टमस्कन्धः == | == अष्टमस्कन्धः == | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S03_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् । | |||
| verse_lines = यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् ।;योऽस्मात् परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S05_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न यस्य वध्यो न च रक्षणीयो | |||
| verse_lines = न यस्य वध्यो न च रक्षणीयो;नोपेक्षणीयादरणीयपक्षः ।;अथापि सर्गस्थितिसंयमार्थं;धत्ते रजःसत्वतमांसि काले ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S05_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विपश्चितं प्राणमनोधियात्मना- | |||
| verse_lines = विपश्चितं प्राणमनोधियात्मना-;मर्थेन्द्रियाभासमनिद्रमव्रणम् ।;छायातपौ यत्र न गृध्रपक्षौ;तमक्षरं खं त्रियुगं व्रजामहे ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S05_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अजस्य चक्रं त्वजयेर्यमाणं मनोमयं पञ्चदशारमाशु । | |||
| verse_lines = अजस्य चक्रं त्वजयेर्यमाणं मनोमयं पञ्चदशारमाशु ।;त्रिनाभि विद्युद्बलमष्टनेमि यदक्षमाहुस्तमृतं प्रपद्ये ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S05_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न यस्य कश्चातिपिपर्ति मायां | |||
| verse_lines = न यस्य कश्चातिपिपर्ति मायां;यया जनो मुह्यति वेदनार्थम् ।;तं निर्जितात्मात्मगुणं परेशं;नमामि भूतेषु समं चरन्तम् ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S05_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अम्भस्तु यद्रेत उदारवीर्यं | |||
| verse_lines = अम्भस्तु यद्रेत उदारवीर्यं;सिध्यन्ति जीवन्त्युत वर्धमानाः ।;लोकास्त्रयोऽथाखिललोकपालाः;प्रसीदतां ब्रह्म माविभूतिः ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S05_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सोमं मनो यस्य समामनन्ति | |||
| verse_lines = सोमं मनो यस्य समामनन्ति;दिवौकसां वै बलमन्ध आयुः ।;ईशो नगानां प्रजनः प्रजानां;प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ॥ ३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S05_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अग्निर्मुखं यस्य तु जातवेदा | |||
| verse_lines = अग्निर्मुखं यस्य तु जातवेदा;जातः क्रियाकाण्डनिमित्तजन्मा ।;अन्तः समुद्रे पचतः स्वधातून्;प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ॥ ३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S05_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यच्चक्षुरासीत् तरणिर्देवयानं | |||
| verse_lines = यच्चक्षुरासीत् तरणिर्देवयानं;त्रयीमयो ब्रह्मण एष धिष्ण्यम् ।;द्वारं च मुक्तेरमृतस्य मृत्योः;प्रसीदतां नः स महाविभूतिः ॥ ३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S06_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अवरोप्य गिरिं स्कन्धात् सुपर्णः पततां वरः । | |||
| verse_lines = अवरोप्य गिरिं स्कन्धात् सुपर्णः पततां वरः ।;ययौ जलान्त उत्सृज्य हरिणा स विसर्जितः ॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S07_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तदुग्रवेगं दिशि दिश्युपर्यधो | |||
| verse_lines = तदुग्रवेगं दिशि दिश्युपर्यधो;विसर्पदुत्सर्पदसह्यवीर्यम् ।;भीताः प्रजा दुद्रुवुरङ्ग सेश्वरा;अरक्ष्यमाणाः शरणं सदाशिवम् ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S07_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विलोक्य तं देववरं त्रिलोक्या | |||
| verse_lines = विलोक्य तं देववरं त्रिलोक्या;भवाय देव्याऽभियुतं मुनीनाम् ।;आसीनमद्रावपवर्गहेतो-;स्तपो जुषाणं स्तुतिभिः प्रणेमुः ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S07_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रजा ऊचुः– देवदेव महादेव भूतात्मन् भूतभावन । त्राहि नः शरणापन्नान् त्रैलोक्यदहनाद् विषात् ॥ २१ ॥ | |||
| verse_lines = प्रजा ऊचुः– देवदेव महादेव भूतात्मन् भूतभावन । त्राहि नः शरणापन्नान् त्रैलोक्यदहनाद् विषात् ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S07_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वमेकः सर्वजगत ईश्वरो बन्धमोक्षयोः । | |||
| verse_lines = त्वमेकः सर्वजगत ईश्वरो बन्धमोक्षयोः ।;तं त्वामर्चन्ति कुशलाः प्रपन्नार्तिहरं गुरुम् ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S08_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रीशुक उवाच– नूनं तपो यस्य न मन्युनिर्जयो ज्ञानं क्वचित् तच्च न सङ्गवर्जितम् । कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः स ईश्वरः किं परतो व्यपाश्रयः ॥ १९ ॥ | |||
| verse_lines = श्रीशुक उवाच– नूनं तपो यस्य न मन्युनिर्जयो ज्ञानं क्वचित् तच्च न सङ्गवर्जितम् । कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः स ईश्वरः किं परतो व्यपाश्रयः ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S08_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धर्मः क्वचित् तस्य न भूतसौहृदं | |||
| verse_lines = धर्मः क्वचित् तस्य न भूतसौहृदं;त्यागः क्वचित् तच्च न मुक्तिकारणम् ।;वीर्यं न पुंसोऽस्त्यजवेगनिष्कृतं;न हि द्वितीयो गुणसङ्गवर्जितः ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S08_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = क्वचिच्चिरायुर्न हि शीलमङ्गलं | |||
| verse_lines = क्वचिच्चिरायुर्न हि शीलमङ्गलं;क्वचित् तदप्यस्ति न वेद्यमायुषः ।;यत्रोभयं कुत्र च सोऽप्यमङ्गलः;सुमङ्गलः कश्चन काङ्क्षते हि माम् ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S08_V33 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अमृतस्य पूर्णकलशं बिभ्रद्वलयभूषितः । | |||
| verse_lines = अमृतस्य पूर्णकलशं बिभ्रद्वलयभूषितः ।;स वै भगवतस्साक्षात् विष्णोरंशांशसम्भवः ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S08_V34 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धन्वन्तरिरीति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक् । | |||
| verse_lines = धन्वन्तरिरीति ख्यात आयुर्वेददृगिज्यभाक् ।;तमालोक्यासुरास्सर्वे कलशं चामृताहृतम् ॥ ३४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S08_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = विषण्णमनसो देवा हरिं शरणमाययुः ॥ ३५ ॥ | |||
| verse_lines = विषण्णमनसो देवा हरिं शरणमाययुः ॥ ३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S09_V56 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दृष्ट्वा मृधे गरुडवाहमिभारिवाह | |||
| verse_lines = दृष्ट्वा मृधे गरुडवाहमिभारिवाह;आविध्य शूलमहिनोदथ कालनेमिः ।;तल्लीलया गरुडमूधर्ि्न पतद् गृहीत्वा;तेनाहनन्नृप सवाहमरिं त्र्यधीशः ॥ ५६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S09_V57 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = माली सुमाल्यतिबलौ युधि पेततुर्य- | |||
| verse_lines = माली सुमाल्यतिबलौ युधि पेततुर्य-;च्चक्रेणकृत्तशिरसावथ माल्यवांस्तम् ।;आहत्य तिग्मगदयाऽहनदण्डजेन्द्रं;तावच्छिरोऽच्छिनदरेर्नदतोऽरिणाऽऽद्यः ॥ ५७॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S19_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यद्यप्यसावधर्मेण मां बध्नीयादनागसम् । | |||
| verse_lines = यद्यप्यसावधर्मेण मां बध्नीयादनागसम् ।;तथाप्येनं न हिंसिष्ये भीतं ब्रह्मतनुं रिपुम् ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S19_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एष वा उत्तमश्लोको न जिहासति यद् यशः । | |||
| verse_lines = एष वा उत्तमश्लोको न जिहासति यद् यशः ।;हत्वा मैनां हरेद् युद्धे शयीत निहतो मया ॥ १३ ॥॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C08 | |||
| verse_id = BTN_C08_S22_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मीन उवाच– न म एतदलं राजन् सुखं वस्तुमुदञ्चनम् । पृथु देहि पदं मह्यं यत् त्वाऽहं शरणं गता ॥ २० ॥ | |||
| verse_lines = मीन उवाच– न म एतदलं राजन् सुखं वस्तुमुदञ्चनम् । पृथु देहि पदं मह्यं यत् त्वाऽहं शरणं गता ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C9" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="नवमस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C9" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="नवमस्कन्धः"></span> | ||
== नवमस्कन्धः == | == नवमस्कन्धः == | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C09 | |||
| verse_id = BTN_C09_S06_V84 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवंविधानेकगुणः स राजा | |||
| verse_lines = एवंविधानेकगुणः स राजा;परात्मनि ब्रह्मणि वासुदेवे ।;क्रियाकलापैः समुवाह भक्तिं;यया विरिञ्चादिमधश्चकार ॥ ८४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C09 | |||
| verse_id = BTN_C09_S08_V90 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रक्षःस्वसुर्व्यकृत रूपमशुद्धबुद्धे- | |||
| verse_lines = रक्षःस्वसुर्व्यकृत रूपमशुद्धबुद्धे-;स्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् ।;जघ्ने चतुर्दशसहस्रमवारणीय-;कोदण्डपाणिरटमान उवास कृच्छ्रम् ॥ ९० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C09 | |||
| verse_id = BTN_C09_S08_V92 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = रक्षोधमेन वृकवद् विपिनेऽसमक्षं | |||
| verse_lines = रक्षोधमेन वृकवद् विपिनेऽसमक्षं;वैदेहराजदुहितुर्यपयापितायाम् ।;भ्रात्रा वने कृपणवत् प्रियया वियुक्तः;स्त्रीसङ्गिनामिति रतिं प्रथयंश्चचार ॥ ९२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C09 | |||
| verse_id = BTN_C09_S09_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मुनौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता । | |||
| verse_lines = मुनौ निक्षिप्य तनयौ सीता भर्त्रा विवासिता ।;ध्यायन्ती रामचरणौ विवरं प्रविवेश ह ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C09 | |||
| verse_id = BTN_C09_S09_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तच्छ्रुत्वा भगवान् रामो रुन्धन्नपि धिया शुचः । | |||
| verse_lines = तच्छ्रुत्वा भगवान् रामो रुन्धन्नपि धिया शुचः ।;स्मरंस्तस्या गुणांस्तांस्तान् नाशक्नोद् रोद्धुमीश्वरः ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C09 | |||
| verse_id = BTN_C09_S09_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्त्रीपुम्प्रसङ्ग एतादृक् सर्वत्र त्रासमावहः । | |||
| verse_lines = स्त्रीपुम्प्रसङ्ग एतादृक् सर्वत्र त्रासमावहः ।;अपीश्वराणां किमुत ग्राम्यस्य गृहमेधिनः ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C09 | |||
| verse_id = BTN_C09_S09_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धारयन्नजुहोत् प्रभुः । | |||
| verse_lines = तत ऊर्ध्वं ब्रह्मचर्यं धारयन्नजुहोत् प्रभुः ।;त्रयोदशाब्दसाहस्त्रमग्निहोत्रमखण्डितम् ॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C09 | |||
| verse_id = BTN_C09_S09_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्मरतां हृदि विन्यस्य बुद्धं पद्ममिवांशुकैः । | |||
| verse_lines = स्मरतां हृदि विन्यस्य बुद्धं पद्ममिवांशुकैः ।;स्वपादपल्लवं राम आत्मज्योतिरगात् ततः ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C09 | |||
| verse_id = BTN_C09_S09_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् । | |||
| verse_lines = पुरुषो रामचरितं श्रवणैरुपधारयन् ।;आनृशंस्यपरो राजन् कर्मबन्धैर्विमुच्यते ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C09 | |||
| verse_id = BTN_C09_S14_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वरेण छन्दयामास प्रीतः सत्यवतीसुतः । | |||
| verse_lines = वरेण छन्दयामास प्रीतः सत्यवतीसुतः ।;वव्रे हतानां रामोऽपि जीवितं चास्मृतिं वधे ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C09 | |||
| verse_id = BTN_C09_S17_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = मूढे भर द्वाजमिमं भरद्वाजं बृहस्पतेः । | |||
| verse_lines = मूढे भर द्वाजमिमं भरद्वाजं बृहस्पतेः ।;त्राता तु दुःखात् पितरौ भरद्वाजस्ततस्त्वयम् ॥ ३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C09 | |||
| verse_id = BTN_C09_S17_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा तं देवमात्मजम् । | |||
| verse_lines = चोद्यमाना सुरैरेवं मत्वा तं देवमात्मजम् ।;व्यसृजन्मरुतोऽबिभ्रन् दत्तोऽयं वितथेऽन्वये ॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमस्कन्धः"></span> | ||
== दशमस्कन्धः == | == दशमस्कन्धः == | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S01_V41 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्वप्ने यथा पश्यति देहमीदृशं | |||
| verse_lines = स्वप्ने यथा पश्यति देहमीदृशं;मनोरथेनाभिनिविष्टचेतनः ।;दृष्टश्रुताभ्यां मनसाऽनुचिन्तयन्;प्रपद्यते तत् किमपि ह्यपस्मृतिः ॥ ४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S01_V42 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यतो यतो धावति दैवचोदितं | |||
| verse_lines = यतो यतो धावति दैवचोदितं;मनो विकारात्मकमात्मपञ्चसु ।;गुणेषु मायारचितेषु देह्यसौ;प्रपद्यमानः सह तेन जायते ॥ ४२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S01_V43 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ज्योतिर्यथैवोदकपार्थिवेष्वदः | |||
| verse_lines = ज्योतिर्यथैवोदकपार्थिवेष्वदः;समीरवेगानुगतं विभाव्यते ।;एवं स्वमायारचितेष्वसौ पुमान्;गुणेषु रागानुगतो विमुह्यति ॥ ४३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S01_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्मान्न कस्यचिद् द्रोहमाचरेत् स तथाविधः । | |||
| verse_lines = तस्मान्न कस्यचिद् द्रोहमाचरेत् स तथाविधः ।;आत्मनः क्षेममन्विच्छन् द्रोग्धुर्वै परतो भयम् ॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S01_V49 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अग्नेर्यथा दारुवियोगयोगयो- | |||
| verse_lines = अग्नेर्यथा दारुवियोगयोगयो-;रदृष्टतोऽन्यन्न निमित्तमस्ति ।;एवं हि जन्तोरपि दुर्विभाव्यः;शरीरसंयोगवियोगहेतुः ॥ ५१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः । | |||
| verse_lines = भगवानपि विश्वात्मा भक्तानामभयङ्करः ।;आविवेशांशभागेन मन आनकदुन्दुभेः ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं | |||
| verse_lines = ततो जगन्मङ्गलमच्युतांशं;समाहितं शूरसुतेन देवी ।;दधार सर्वात्मकमात्मभूतं;काष्ठा यथाऽऽनन्दकरं नभस्तः ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ब्रह्मभवावूचतुः– सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमुत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ २७ ॥ | |||
| verse_lines = ब्रह्मभवावूचतुः– सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यमुत सत्यनेत्रं सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्नाः ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V28 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एकायनोऽसौ द्विफलस्त्रिमूल- | |||
| verse_lines = एकायनोऽसौ द्विफलस्त्रिमूल-;श्चतूरसः पञ्चशिफः षडात्मा ।;सप्तत्वगष्टविटपो नवाक्षो;दशच्छदी द्विखगो ह्यादिवृक्षः ॥ २८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V29 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वमेक एवास्य सतः प्रसूतिः | |||
| verse_lines = त्वमेक एवास्य सतः प्रसूतिः;स्थानं निधानं त्वमनुग्रहश्च ।;त्वन्मायया संवृतचेतसस्त्वां;पश्यन्ति नाना न विपश्चितो ये ॥ २९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मन् क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥ ३० ॥ | |||
| verse_lines = बिभर्षि रूपाण्यवबोध आत्मन् क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य । सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V31 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधामि्न | |||
| verse_lines = त्वय्यम्बुजाक्षाखिलसत्त्वधामि्न;समाधिनाऽऽवेशितचेतसो ये ।;त्वत्पादपोतेन महत्कृतेन;कुर्वन्ति गोवत्सपदं भवाब्धिम् ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V32 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन् | |||
| verse_lines = स्वयं समुत्तीर्य सुदुस्तरं द्युमन्;भवार्णवं भीममदभ्रसौहृदाः ।;भवत्पदाम्भोरुहनावमत्र ते;निधाय याताः सदनुग्रहो भवान् ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V35 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौ | |||
| verse_lines = सत्त्वं विशुद्धं श्रयते भवान् स्थितौ;शरीरिणां श्रेयउपायनं वपुः ।;वेदक्रियायोगतपःसमाधिभि-;स्तवार्हणं येन जनः समीहते ॥ ३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सत्त्वं न चेद् धातरिदं निजं भवेद् | |||
| verse_lines = सत्त्वं न चेद् धातरिदं निजं भवेद्;विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् ।;गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान्;प्रकाशते यस्य च येन वाऽगुणः ॥ ३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न नामरूपे गुणजन्मकर्मभिः | |||
| verse_lines = न नामरूपे गुणजन्मकर्मभिः;निरूपितव्ये तव तस्य साक्षिणः ।;मनोवचोभ्यामनुमेयवर्त्मनो;देवक्रियायाः प्रतियन्त्यथापि हि ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन् | |||
| verse_lines = शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन्;नामानि रूपाणि च मङ्गलानि ते ।;क्रियासु यस्त्वच्चरणारविन्दयो-;राविष्टचित्तो न भवाय कल्प्यते ॥ ३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = दिष्ट्या हरेऽस्या भवतः पदो भुवो | |||
| verse_lines = दिष्ट्या हरेऽस्या भवतः पदो भुवो;भारोऽपनीतस्तव जन्मनेशितुः ।;दिष्ट्याऽङ्कितां त्वत्पदकैः सुशोभनै-;र्द्रक्ष्याम गां द्यां च तवानुकम्पिताम् ॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S03_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न तेऽभवस्येश भवस्य कारणं | |||
| verse_lines = न तेऽभवस्येश भवस्य कारणं;विना विनोदं बत तर्कयामहे ।;भवो निरोधः स्थितिरप्यविद्ययाऽऽ-;कृता यतस्त्वय्यभवाश्रयात्मनि ॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S04_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = स एव स्वप्रकृत्येदं सृष्ट्वाऽग्रे त्रिगुणात्मकम् । | |||
| verse_lines = स एव स्वप्रकृत्येदं सृष्ट्वाऽग्रे त्रिगुणात्मकम् ।;तदनु त्वं ह्यप्रविष्टः प्रविष्टः इव भाव्यसे ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| verse_id = BTN_C10_S04_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = य एतेऽविकृता भावाः सप्त ते विकृतैः सह । | |||
| verse_lines = य एतेऽविकृता भावाः सप्त ते विकृतैः सह ।;नानावीर्याः पृथग्भूता विराजं शयनं तव ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id | |||
<span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशस्कन्धः"></span> | ||
== एकादशस्कन्धः == | == एकादशस्कन्धः == | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S02_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च । | |||
| verse_lines = भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च ।;सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम् ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S02_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वसुदेव उवाच– भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान् । छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = वसुदेव उवाच– भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान् । छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S02_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथो यथा । तत्कर्म सङ्कल्पविकल्पकं मनो बुधो निदध्यादभयं ततः स्यात् ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_lines = अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथो यथा । तत्कर्म सङ्कल्पविकल्पकं मनो बुधो निदध्यादभयं ततः स्यात् ॥ ३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S02_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवंव््रातश्च प््रिायनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः । हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ ४० ॥ | |||
| verse_lines = एवंव््रातश्च प््रिायनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः । हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S02_V41 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित् समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यम् ॥ ४१ ॥ | |||
| verse_lines = खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित् समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यम् ॥ ४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S02_V45 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = हरिरुवाच– सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्नेष भागवतोत्तमः ॥ ४५ ॥ | |||
| verse_lines = हरिरुवाच– सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्नेष भागवतोत्तमः ॥ ४५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S02_V46 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च । प््रोममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥ | |||
| verse_lines = ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च । प््रोममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S02_V47 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते । न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ४७ ॥ | |||
| verse_lines = अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते । न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ४७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S02_V48 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति । | |||
| verse_lines = गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति ।;विष्णोर्मायामिमां पश्यन् स वै भागवतोत्तमः ॥ ४८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S02_V49 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रैः । | |||
| verse_lines = देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रैः ।;संसारधर्मैरविमुह्यमानः स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥ ४९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S02_V52 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न यस्य स्वः पर इति चित्ते स्वात्मनि वाऽभिदा । | |||
| verse_lines = न यस्य स्वः पर इति चित्ते स्वात्मनि वाऽभिदा ।;सर्वभूतसमः शान्तः स वै भागवतोत्तमः ॥ ५२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अन्तरिक्ष उवाच– एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज । ससर्जोच्चावचान्यादौ स्वयमात्मप्रसिद्धये ॥ ३ ॥ | |||
| verse_lines = अन्तरिक्ष उवाच– एभिर्भूतानि भूतात्मा महाभूतैर्महाभुज । ससर्जोच्चावचान्यादौ स्वयमात्मप्रसिद्धये ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं सृष्ट्वा स भूतानि स्थविष्ठैः पञ्चधातुभिः । | |||
| verse_lines = एवं सृष्ट्वा स भूतानि स्थविष्ठैः पञ्चधातुभिः ।;एकधा दशधाऽऽत्मानं विभजन् जुषते गुणान् ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = गुणैर्गुणान् स भुञ्जान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः । | |||
| verse_lines = गुणैर्गुणान् स भुञ्जान आत्मप्रद्योतितैः प्रभुः ।;मन्यमान इदं सृष्टमात्मानमिह सज्जते ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत् । | |||
| verse_lines = कर्माणि कर्मभिः कुर्वन् सनिमित्तानि देहभृत् ।;तत्तत्कर्मफलं गृह्णन् भ््रामतीह सुखेतरम् ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रावहः पुमान् । | |||
| verse_lines = इत्थं कर्मगतीर्गच्छन् बह्वभद्रावहः पुमान् ।;आभूतसंप्लवात् स्वर्गप्रलयावश्नुतेऽवशः ॥ ७॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V08 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम् । | |||
| verse_lines = धातूपप्लव आसन्ने व्यक्तं द्रव्यगुणात्मकम् ।;अनादिनिधनः कालो ह्यव्यक्ताय विकर्षति ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V12 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप । | |||
| verse_lines = ततो विराजमुत्सृज्य वैराजः पुरुषो नृप ।;अव्यक्तं विशते सूक्ष्मं निरिन्धन इवानलः ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V13 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वारिणा हृतगन्धा भूः सलिलत्वाय कल्पते । | |||
| verse_lines = वारिणा हृतगन्धा भूः सलिलत्वाय कल्पते ।;सलिलं तद् हृतरसं ज्योतिष्ट्वायोपकल्पते ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V14 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते । हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते ॥ १४ ॥ | |||
| verse_lines = हृतरूपं तु तमसा वायौ ज्योतिः प्रलीयते । हृतस्पर्शोऽवकाशेन वायुर्नभसि लीयते ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V15 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते । | |||
| verse_lines = कालात्मना हृतगुणं नभ आत्मनि लीयते ।;इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सह वैकारिकैर्नृप ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V16 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥ १६ ॥ | |||
| verse_lines = प्रविशन्ति ह्यहंकारं स्वगुणैरहमात्मनि ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यन्तकारिणी । | |||
| verse_lines = एषा माया भगवतः सर्गस्थित्यन्तकारिणी ।;त्रिवर्णा वर्णिताऽस्माभिः किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V18 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = राजोवाच– यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः । तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ १८॥ | |||
| verse_lines = राजोवाच– यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः । तरन्त्यञ्जः स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम् ॥ १८॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V19 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = प्रबुद्ध उवाच– कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च । पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १९ ॥ | |||
| verse_lines = प्रबुद्ध उवाच– कर्माण्यारभमाणानां दुःखहत्यै सुखाय च । पश्येत् पाकविपर्यासं मिथुनीचारिणां नृणाम् ॥ १९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना । | |||
| verse_lines = नित्यार्तिदेन वित्तेन दुर्लभेनात्ममृत्युना ।;गृहापत्याप्तपशुभिः का प्रीतिः साधितैश्चलैः ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V21 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं लोकं परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम् । | |||
| verse_lines = एवं लोकं परं विद्यान्नश्वरं कर्मनिर्मितम् ।;अतुल्यातिशयध्वंसाद् यथा मण्डलवर्तिनाम् ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् । | |||
| verse_lines = तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् ।;शाब्दे परे च निष्णातं ब््राह्मण्युपशमाश्रयम् ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः । | |||
| verse_lines = तत्र भागवतान् धर्मान् शिक्षेद् गुर्वात्मदैवतः ।;अमाययाऽनुवृत्त्या च तुष्येदात्माऽऽत्मदो हरिः ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु । | |||
| verse_lines = सर्वतो मनसोऽसङ्गमादौ सङ्गं च साधुषु ।;दयां मैत्रीं प्रश्रयं च भूतेष्वद्धा यथोचितम् ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि । | |||
| verse_lines = श्रद्धां भागवते शास्त्रेऽनिन्दामन्यत्र चापि हि ।;मनोवाक्कायदण्डं च सत्यं शमदमावपि ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम् । | |||
| verse_lines = एवं कृष्णात्मनाथेषु मनुष्येषु च सौहृदम् ।;परिचर्यां चोभयत्र महत्सु नृषु साधुषु ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V36 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = पिप्पलायन उवाच– स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यः स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सन् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवैहि परं नरेन्द्र ॥ ३६ ॥ | |||
| verse_lines = पिप्पलायन उवाच– स्थित्युद्भवप्रलयहेतुरहेतुरस्य यः स्वप्नजागरसुषुप्तिषु सन् बहिश्च । देहेन्द्रियासुहृदयानि चरन्ति येन सञ्जीवितानि तदवैहि परं नरेन्द्र ॥ ३६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V37 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नैनं मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽप्यबोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेध्यसिद्धिः ॥ ३७ ॥ | |||
| verse_lines = नैनं मनो विशति वागुत चक्षुरात्मा प्राणेन्द्रियाणि च यथाऽनलमर्चिषः स्वाः । शब्दोऽप्यबोधकनिषेधतयाऽऽत्ममूल- मर्थोक्तमाह यदृते न निषेध्यसिद्धिः ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V38 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब््राह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ ३८ ॥ | |||
| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति त्रिवृदेकमादौ सूत्रं महानहमिति प्रवदन्ति जीवम् । ज्ञानक्रियार्थफलरूपतयोरुशक्ति ब््राह्मैव भाति सदसच्च तयोः परं यत् ॥ ३८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V39 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते स च न विध्यति चारिणा हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ ३९ ॥ | |||
| verse_lines = नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ न क्षीयते स च न विध्यति चारिणा हि । सर्वत्र शश्वदनपाय्युपलब्धिमात्रं प्राणो यथेन्द्रियबलेन विकल्पितं सत् ॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V40 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अण्डेषु पेशिषु तरुष्ववनिस्थितेषु प्राणेन जीव उपधावति तत्र तत्र । छन्ने मतीन्द्रियगुणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आस यमृते तदनुस्मृतिर्न ॥ ४० ॥ | |||
| verse_lines = अण्डेषु पेशिषु तरुष्ववनिस्थितेषु प्राणेन जीव उपधावति तत्र तत्र । छन्ने मतीन्द्रियगुणेऽहमि च प्रसुप्ते कूटस्थ आस यमृते तदनुस्मृतिर्न ॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V43 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = राजोवाच– एवं प्रश्नमृषीन् पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके । नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम् ॥ ४३ ॥॥ | |||
| verse_lines = राजोवाच– एवं प्रश्नमृषीन् पूर्वमपृच्छं पितुरन्तिके । नाब्रुवन् ब्रह्मणः पुत्रास्तत्र कारणमुच्यताम् ॥ ४३ ॥॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V44 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आविर्होत्र उवाच– कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः । वेदस्य चेश्वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥ ४४ ॥ | |||
| verse_lines = आविर्होत्र उवाच– कर्माकर्मविकर्मेति वेदवादो न लौकिकः । वेदस्य चेश्वरात्मत्वात् तत्र मुह्यन्ति सूरयः ॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V46 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नाऽऽचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः । | |||
| verse_lines = नाऽऽचरेद् यस्तु वेदोक्तं स्वयमज्ञोऽजितेन्द्रियः ।;विकर्मणा ह्यधर्मेण मृत्योर्मृत्युमुपैति सः ॥ ४६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V47 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्थं फलश्रुतिः ॥ ४७ ॥ | |||
| verse_lines = वेदोक्तमेव कुर्वाणो निःसङ्गोऽर्पितमीश्वरे । नैष्कर्म्यां लभते सिद्धिं रोचनार्थं फलश्रुतिः ॥ ४७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V49 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = लब्ध्वा चाव्यग््रामाचार्यं तेन सन्दर्शितागमः । | |||
| verse_lines = लब्ध्वा चाव्यग््रामाचार्यं तेन सन्दर्शितागमः ।;महापुरुषमभ्यर्चेन्मूर्त्याऽभिमतयाऽऽत्मनः ॥ ४९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V51 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = अर्चादौ हृदये वापि यथालब्धोपचारकैः । | |||
| verse_lines = अर्चादौ हृदये वापि यथालब्धोपचारकैः ।;द्रव्यक्षित्यात्मलिङ्गानि निष्पाद्य प्रोक्ष्य चासनम् ॥ ५१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V55 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद् हरेः । | |||
| verse_lines = आत्मानं तन्मयं ध्यायन् मूर्तिं सम्पूजयेद् हरेः ।;शेषमाधाय शिरसि स्वधाम््नयुद्वास्य सत्कृतम् ॥ ५५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S03_V56 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एवमग्न्यर्कतोयादावर्चयेद् हृदये च यः । | |||
| verse_lines = एवमग्न्यर्कतोयादावर्चयेद् हृदये च यः ।;यज्ञेश्वरं स्वमात्मानमचिरान्मुच्यते हि सः ॥ ५६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S04_V03 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टैः पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन् । | |||
| verse_lines = भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टैः पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन् ।;स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधानमवाप नारायण आदिदेवः ॥३॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S04_V04 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि । ज्ञानांशकेन विशतो बलमोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि । ज्ञानांशकेन विशतो बलमोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S04_V05 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = आदावभूच्छतधृती रजसाऽस्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः । रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥ ५ ॥ | |||
| verse_lines = आदावभूच्छतधृती रजसाऽस्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः । रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S04_V06 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार योगं योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार योगं योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S04_V07 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इन्द्रोऽपि नाक्यसुखमेष जिघृक्षतीति कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम् । गत्वाऽप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः स्त्रीप््रोक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः ॥ ७ ॥ | |||
| verse_lines = इन्द्रोऽपि नाक्यसुखमेष जिघृक्षतीति कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम् । गत्वाऽप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः स्त्रीप््रोक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S04_V10 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = त्वां सुन्वतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः कस्तान् विलंघ्य व््राजतात् परमं पदं ते । नान्यस्य बर्हिषि बलिं ददतः स्वभागं धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्धि्न ॥ १० ॥ | |||
| verse_lines = त्वां सुन्वतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः कस्तान् विलंघ्य व््राजतात् परमं पदं ते । नान्यस्य बर्हिषि बलिं ददतः स्वभागं धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्धि्न ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C11 | |||
| verse_id = BTN_C11_S04_V17 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः । विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्ण- स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७ ॥ | |||
| verse_lines = हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः । विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्ण- स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id | |||
<span id="gr-C12" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वादशस्कन्धः"></span> | <span id="gr-C12" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वादशस्कन्धः"></span> | ||
== द्वादशस्कन्धः == | == द्वादशस्कन्धः == | ||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C12 | |||
| verse_id = BTN_C12_S04_V20 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं तमो रजो वा महदादयोऽमी । न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वा न सन्निवेशः खलु लोककल्पः ॥ २० ॥ | |||
| verse_lines = न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं तमो रजो वा महदादयोऽमी । न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वा न सन्निवेशः खलु लोककल्पः ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C12 | |||
| verse_id = BTN_C12_S04_V25 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति होच्यते । | |||
| verse_lines = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति होच्यते ।;मायामात्रमिदं राजन् नानात्वं प्रत्यगात्मनि ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C12 | |||
| verse_id = BTN_C12_S04_V27 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = एते ह्यवयवाः प्रोक्ताः सर्वावयविनामिह । | |||
| verse_lines = एते ह्यवयवाः प्रोक्ताः सर्वावयविनामिह ।;विनाऽर्थेन प्रतीयेरन् पटस्येवाङ्ग तन्तवः ॥ २७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C12 | |||
| verse_id = BTN_C12_S04_V30 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = न हि सत्यस्य नानात्वमविद्वान् यदि मन्यते । | |||
| verse_lines = न हि सत्यस्य नानात्वमविद्वान् यदि मन्यते ।;नानात्वं छिद्रयोर्यद्वज्ज्योतिषोर्वा तयोरपि ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C12 | |||
| verse_id = BTN_C12_S05_V22 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = इति ब्रह्मोदिताक्षेपैः स्थानादिन्द्रः प्रचालितः । | |||
| verse_lines = इति ब्रह्मोदिताक्षेपैः स्थानादिन्द्रः प्रचालितः ।;बभूव सम्भ्रान्तमतिः सविमानः सतक्षकः ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C12 | |||
| verse_id = BTN_C12_S05_V23 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = तं पतन्तं विमानेन सहतक्षकमम्बरात् । | |||
| verse_lines = तं पतन्तं विमानेन सहतक्षकमम्बरात् ।;विलोक्याङ्गिरसः प्राह राजानं तं बृहस्पतिः ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C12 | |||
| verse_id = BTN_C12_S05_V24 | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_text = नित्यादोषस्वरूपाय गुणपूर्णाय सर्वदा । | |||
| verse_lines = नित्यादोषस्वरूपाय गुणपूर्णाय सर्वदा ।;नारायणाय हरये नमः प्रेष्ठतमाय मे ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
[[Category:Moola]] | [[Category:Moola]] | ||