Bhagavadgitatatparya/Moola: Difference between revisions
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== प्रथमोऽध्यायः == | == प्रथमोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।;मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।;आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत्॥२ ॥ | |||
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| verse_lines = पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।;व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥३ ॥ | |||
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| verse_lines = अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।;युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४ ॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।;पुरुजित् कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।;सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।;नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान् ब्रवीमि ते॥७ ॥ | |||
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| verse_lines = भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।;अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।;नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥९ ॥ | |||
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| verse_lines = अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।;पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्॥१० ॥ | |||
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| verse_lines = अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।;भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥११ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्य सञ्जनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।;सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान्॥१२ ॥ | |||
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| verse_lines = ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।;सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोभवत्॥१३ ॥ | |||
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| verse_lines = ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।;माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः॥१४ ॥ | |||
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| verse_lines = पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।;प्रौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः॥१५ ॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठरः ।;नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥१६ ॥ | |||
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| verse_lines = काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।;धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥१७ ॥ | |||
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| verse_lines = द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।;सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक्॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।;नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।;पृवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥२० ॥ | |||
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| verse_lines = यावदेतान् निरीक्षेहं योद्धुकामानवस्थितान् ।;कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥२२ ॥ | |||
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| verse_lines = योत्स्यमानानवेक्षेहं य एतेत्र समागताः ।;धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥२३ ॥ | |||
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| verse_lines = एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।;सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्॥२४ ॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।;उवाच पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥२५ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।;आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन् पुत्रान् पौत्रान् सखींस्तथा॥२६ ॥ | |||
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| verse_lines = श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।;तान् समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान् बन्धूनवस्थितान्॥२७ ॥ | |||
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| verse_lines = कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् । | |||
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| verse_lines = सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।;वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥२९ ॥ | |||
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| verse_lines = गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।;न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥३० ॥ | |||
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| verse_lines = निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।;न च श्रेयोनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥३१ ॥ | |||
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| verse_lines = न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।;किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा॥३२ ॥ | |||
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| verse_lines = येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।;त इमेवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥३३ ॥ | |||
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| verse_lines = आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।;मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥३४ ॥ | |||
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| verse_lines = एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोपि मधुसूदन ।;अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥३५ ॥ | |||
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| verse_lines = निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।;पापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वैतानाततायिनः॥३६ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।;स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥३७ ॥ | |||
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| verse_lines = यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।;कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्॥३८ ॥ | |||
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| verse_lines = कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।;कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥३९ ॥ | |||
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| verse_lines = कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।;धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोभिभवत्युत॥४० ॥ | |||
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| verse_lines = अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।;स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करः॥४१ ॥ | |||
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| verse_lines = सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।;पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥४२ ॥ | |||
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| verse_lines = उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।;नरके नियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥४४ ॥ | |||
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| verse_lines = अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।;यद् राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥४५ ॥ | |||
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| verse_lines = तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।;विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।;अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥२ ॥ | |||
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| verse_lines = क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।;क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥३ ॥ | |||
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| verse_lines = कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।;इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥४ ॥ | |||
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| verse_lines = गुरूनहत्वा हि महानुभावान्;श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।;हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव;भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो;यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।;यानेव हत्वा न जिजीविषाम–;स्तेवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः;पृच्छामि त्वा धर्मसम्मूढचेताः ।;यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे;शिष्यस्तेहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥७ ॥ | |||
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| verse_lines = न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्;यच्छोकमुच्छोषणमिंद्रियाणाम् ।;अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं;राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ।;न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥९ ॥ | |||
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| verse_lines = तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।;सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः॥१० ॥ | |||
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| verse_lines = अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।;गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥११ ॥ | |||
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| verse_lines = न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।;न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्॥१२ ॥ | |||
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| verse_lines = देहिनोस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।;तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति॥१३ ॥ | |||
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| verse_lines = मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।;आगमापायिनोनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥१४ ॥ | |||
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| verse_lines = यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।;समदुःखसुखं धीरं सोमृतत्वाय कल्पते॥१५ ॥ | |||
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| verse_lines = नासतो विद्यतेभावो नाभावो विद्यते सतः ।;उभयोरपि दृष्टोन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥१६ ॥ | |||
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| verse_lines = अविनाशि तु तद् विदि्ध येन सर्वमिदं ततम् ।;विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति॥१७ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।;अनाशिनोप्रमेयस्य तस्माद् युद्ध्यस्व भारत॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।;उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = न जायते म्रियते वा कदाचि-;न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।;अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणो;न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ २० ॥ | |||
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| verse_lines = वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।;कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥२१ ॥ | |||
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| verse_lines = वासांसि जीर्णानि यथा विहाय;नवानि गृह्णाति नरोपराणि;तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-;न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।;नचैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥२३ ॥ | |||
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| verse_lines = अच्छेद्योयमदाह्योयमक्लेद्योशोष्य एव च ।;नित्यः सर्वगतस्थाणुरचलोयं सनातनः॥२४ ॥ | |||
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| verse_lines = अव्यक्तोयमचिन्त्योयमविकार्योयमुच्यते ।;तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥२५ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।;तथापि त्वं महाबाहो नैनं शोचितुमर्हसि॥२६ ॥ | |||
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| verse_lines = जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।;तस्मादपरिहार्येर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥२७ ॥ | |||
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| verse_lines = अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।;अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥२८ ॥ | |||
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| verse_lines = आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः ।;आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति;श्रुत्वाप्येनं वेद नचैव कश्चित्॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = देही नित्यमवध्योयं देहे सर्वस्य भारत ।;तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥३० ॥ | |||
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| verse_lines = स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।;धर्म्यादि्ध युद्धाच्छ्रेयोन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते॥३१ ॥ | |||
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| verse_lines = यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।;सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥३२ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि ।;ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥३३ ॥ | |||
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| verse_lines = अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेव्ययाम् ।;सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥३४ ॥ | |||
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| verse_lines = भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।;येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥३५ ॥ | |||
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| verse_lines = अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।;निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥३६ ॥ | |||
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| verse_lines = हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।;तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥३७ ॥ | |||
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| verse_lines = व्यवसायात्मिका बुदि्धरेकेह कुरुनन्दन ।;बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोव्यवसायिनाम्॥४१ ॥ | |||
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| verse_lines = भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।;व्यवसायात्मिका बुदि्धः समाधौ न विधीयते॥४४ ॥ | |||
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| verse_lines = बुदि्धयुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।;तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥५० ॥ | |||
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| verse_lines = कर्मजं बुदि्धयुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।;जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥५१ ॥ | |||
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| verse_lines = यदा ते मोहकलिलं बुदि्धर्व्यतितरिष्यति ।;तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥५२ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यथा स्थास्यति निश्चला ॥;समाधावचला बुदि्धस्तदा योगमवाप्स्यसि॥ ५३ ॥ | |||
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| verse_lines = स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।;स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥५४ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।;आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥५५ ॥ | |||
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| verse_lines = दुःखेष्वनुद्विग्नमना सुखेषु विगतस्पृहः ।;वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥५६ ॥ | |||
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| verse_lines = यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् ।;नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५७ ॥ | |||
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| verse_lines = यदा संहरते चायं कूर्मोङ्गानीव सर्वशः ।;इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥५८ ॥ | |||
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| verse_lines = विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।;रसवर्जं रसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते॥५९ ॥ | |||
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| verse_lines = यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।;इंद्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥६० ॥ | |||
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| verse_lines = तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।;वशे हि यस्येंद्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६१ ॥ | |||
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| verse_lines = ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।;सङ्गात् सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोभिजायते॥६२ ॥ | |||
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| verse_lines = क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृऽतिविभ्रमः ।;स्मृऽतिभ्रंशाद् बुदि्धनाशो बुदि्धनाशाद् प्र(वि)नश्यति ॥६३ ॥ | |||
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| verse_lines = रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिंद्रियैश्चरन् ।;आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥६४ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।;प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुदि्धः पर्यवतिष्ठति॥६५ ॥ | |||
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| verse_lines = नास्ति बुदि्धरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।;न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥६६ ॥ | |||
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| verse_lines = इंद्रियाणां हि चरतां यन्मनोनुविधीयते ।;तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥६७ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।;इंद्रियाणींद्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥६८ ॥ | |||
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| verse_lines = या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।;यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥६९ ॥ | |||
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| verse_lines = आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।;तद्वत् कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥ ७० ॥ | |||
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| verse_lines = विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।;निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति॥७१ ॥ | |||
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| verse_lines = एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।;स्थित्वास्यामन्तकालेपि ब्रह्म निर्वाणमृच्छति॥७२ ॥ | |||
}} | |||
<span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयोऽध्यायः"></span> | ||
== तृतीयोऽध्यायः == | == तृतीयोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुदि्धर्जनार्दन ।;तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुदि्धं मोहयसीव मे ।;तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोहमाप्नुयाम्॥२ ॥ | |||
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| verse_lines = न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोश्नुते ।;न च संन्यसनादेव सिदि्धं समधिगच्छति॥४ ॥ | |||
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| verse_lines = न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।;कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = कर्मेंद्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।;इंद्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्त्विंद्रियाणि मनसा नियम्यारभतेर्जुन ।;कर्मेंद्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥७ ॥ | |||
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| verse_lines = नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।;शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = यज्ञार्थात् कर्मणोन्यत्र लोकोयं कर्मबन्धनः ।;तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥९ ॥ | |||
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| verse_lines = सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।;अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोस्त्विष्टकामधुक्॥१० ॥ | |||
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| verse_lines = इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।;तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।;अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥२७ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।;गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥२८ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।;तानकृस्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥२९ ॥ | |||
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| verse_lines = मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।;निराशीर्निर्ममो भूत्वा युद्ध्यस्व विगतज्वरः॥३० ॥ | |||
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| verse_lines = ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।;श्रद्धावन्तोनसूयन्तो मुच्यन्ते तेपि कर्मभिः॥३१ ॥ | |||
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| verse_lines = ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।;सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विदि्ध नष्टानचेतसः॥३२ ॥ | |||
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| verse_lines = सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।;प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३ ॥ | |||
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| verse_lines = इंद्रियस्येंद्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ॥ तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।;स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३५ ॥ | |||
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| verse_lines = अथ केन प्रयुक्तोयं पापं चरति पूरुषः ।;अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥३६ ॥ | |||
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| verse_lines = काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।;महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥३७ ॥ | |||
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| verse_lines = धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।;यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥३८ ॥ | |||
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| verse_lines = आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।;कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९ ॥ | |||
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| verse_lines = इंद्रियाणि मनोबुदि्धरस्याधिष्ठानमुच्यते ।;एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४० ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात्त्वमिंद्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।;पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१ ॥ | |||
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| verse_lines = इंद्रियाणि पराण्याहुरिंद्रियेभ्यः परं मनः ।;मनसस्तु परा बुदि्धर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥४२ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।;जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३ ॥ | |||
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<span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थोऽध्यायः"></span> | ||
== चतुर्थोऽध्यायः == | == चतुर्थोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।;विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेब्रवीत्॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।;स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥२ ॥ | |||
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| verse_lines = स एवायं मया तेद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।;भक्तोसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥३ ॥ | |||
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| verse_lines = अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।;कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥४ ॥ | |||
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| verse_lines = बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।;तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = अजोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् ।;प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।;अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥७ ॥ | |||
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| verse_lines = परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।;धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।;त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोर्जुन॥९ ॥ | |||
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| verse_lines = वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।;बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥१० ॥ | |||
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| verse_lines = ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।;मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥११ ॥ | |||
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| verse_lines = न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।;इति मां योभिजानाति कर्मभिर्न स बद्ध्यते॥१४ ॥ | |||
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| verse_lines = एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।;कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥१५ ॥ | |||
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| verse_lines = किं कर्म किमकर्मेति कवयोप्यत्र मोहिताः ।;तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेशुभात्॥१६ ॥ | |||
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| verse_lines = कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।;स बुदि्धमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।;ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तोनिराश्रयः ।;कर्मण्यभिप्रवृत्तोपि नैव किञ्चित्करोति सः॥२० ॥ | |||
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| verse_lines = एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।;कर्मजान्विदि्ध तान् सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥३२ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।;सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥३३ ॥ | |||
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| verse_lines = तद्विदि्ध प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया ।;उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः॥३४ ॥ | |||
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| verse_lines = यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।;येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥३५ ॥ | |||
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| verse_lines = अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।;सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥३६ ॥ | |||
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| verse_lines = यथैधांसि समिद्धोग्निर्भस्मसात्कुरुतेर्जुन ।;ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥३७ ॥ | |||
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| verse_lines = न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।;तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥३८ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रद्धावाल्लभते ज्ञानं मत्परः संयतेंद्रियः ।;ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥३९ ॥ | |||
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| verse_lines = अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।;नायं लोकोस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥४० ॥ | |||
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| verse_lines = योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।;आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय॥४१ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।;छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥४२ ॥ | |||
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<span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमोऽध्यायः"></span> | ||
== पञ्चमोऽध्यायः == | == पञ्चमोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।;यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।;तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥२ ॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।;निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥३ ॥ | |||
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| verse_lines = साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।;एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥४ ॥ | |||
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| verse_lines = यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।;एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।;योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेंद्रियः;सर्वभूतात्मभूतात्माकुर्वन्नपि न लिप्यते॥ ७ ॥ | |||
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| verse_lines = नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।;पश्यन् शृृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन् अश्नन् गच्छन् स्वपन् श्वसन् ॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन् अपि ।;इंद्रियाणींद्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥९ ॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।;लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥१० ॥ | |||
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| verse_lines = कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिंद्रियैरपि ।;योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥११ ॥ | |||
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| verse_lines = युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।;अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥१२ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।;नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥१३ ॥ | |||
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| verse_lines = न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।;न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥१४ ॥ | |||
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| verse_lines = नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।;अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥१५ ॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।;तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥१६ ॥ | |||
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| verse_lines = तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।;गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥१७ ॥ | |||
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| verse_lines = विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।;शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।;निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।;स्थिरबुदि्धरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥२० ॥ | |||
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| verse_lines = बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।;स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥२१ ॥ | |||
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| verse_lines = ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।;आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥२२ ॥ | |||
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| verse_lines = शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।;कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥२३ ॥ | |||
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| verse_lines = योन्तः सुखोन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।;स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोधिगच्छति॥२४ ॥ | |||
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| verse_lines = कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।;अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥२६ ॥ | |||
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<span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठोऽध्यायः"></span> | ||
== षष्ठोऽध्यायः == | == षष्ठोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।;स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।;साधुष्वपि च पापेषु समबुदि्धर्विशिष्यते॥९ ॥ | |||
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| verse_lines = योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।;एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥१० ॥ | |||
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| verse_lines = शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।;नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥११ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेंद्रियक्रियः ।;उपविश्यासने युञ्ज््याद्योगमात्मविशुद्धये॥१२ ॥ | |||
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| verse_lines = समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।;सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥१३ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।;मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥१४ ॥ | |||
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| verse_lines = युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।;शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥१५ ॥ | |||
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| verse_lines = नात्यश्नतस्तु योगोस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।;न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥१६ ॥ | |||
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| verse_lines = युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।;युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥१७ ॥ | |||
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| verse_lines = यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।;निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृऽता ।;योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।;यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥२० ॥ | |||
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| verse_lines = सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुदि्धग्राह्यमतींद्रियम् ।;वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥२१ ॥ | |||
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| verse_lines = यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।;यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥२२ ॥ | |||
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| verse_lines = तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।;स निश्चयेन योक्तव्यो योगोनिर्विण्णचेतसा॥२३ ॥ | |||
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| verse_lines = संङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।;मनसैवेंद्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥२४ ॥ | |||
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| verse_lines = शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।;आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्॥२५ ॥ | |||
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| verse_lines = यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।;ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥२६ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।;उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥२७ ॥ | |||
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| verse_lines = युञ्जन् एवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।;सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते॥२८ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।;ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥२९ ॥ | |||
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| verse_lines = यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।;तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥३० ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।;सर्वथा वर्तमानोपि स योगी मयि वर्तते॥३१ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योर्जुन ।;सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥३२ ॥ | |||
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| verse_lines = योयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।;एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥३३ ॥ | |||
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| verse_lines = चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।;तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥३४ ॥ | |||
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| verse_lines = असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।;अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥३५ ॥ | |||
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| verse_lines = असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।;वश्यात्मना तु यतता शक्योवाप्तुमुपायतः॥३६ ॥ | |||
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| verse_lines = अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।;अप्राप्य योगसंसिदि्धं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥३७ ॥ | |||
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| verse_lines = कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।;अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥३८ ॥ | |||
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| verse_lines = एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।;त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥३९ ॥ | |||
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| verse_lines = पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।;न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति॥४० ॥ | |||
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| verse_lines = प्राप्य पुण्यकृतान् लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।;शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोभिजायते॥४१ ॥ | |||
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| verse_lines = अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।;एतदि्ध दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥४२ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्र तं बुदि्धसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।;यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥४३ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।;अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥४५ ॥ | |||
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== सप्तमोऽध्यायः == | == सप्तमोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् ।;धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोस्मि भरतर्षभ॥११ ॥ | |||
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| verse_lines = ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।;मत्त एवेति तान्विदि्ध न त्वहं तेषु ते मयि॥१२ ॥ | |||
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| verse_lines = त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।;मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥१३ ॥ | |||
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| verse_lines = दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।;मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥१४ ॥ | |||
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| verse_lines = न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।;माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥१५ ॥ | |||
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| verse_lines = चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्जुन ।;आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥१६ ॥ | |||
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| verse_lines = तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।;प्रियो हि ज्ञानिनोत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥१७ ॥ | |||
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| verse_lines = उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।;आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते ।;वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेन्यदेवताः ।;तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥२० ॥ | |||
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| verse_lines = यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।;तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥२१ ॥ | |||
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| verse_lines = स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।;लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥२२ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।;देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥२३ ॥ | |||
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| verse_lines = अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।;परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥२४ ॥ | |||
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| verse_lines = नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।;मूढोयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥२५ ॥ | |||
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| verse_lines = वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।;भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥२६ ॥ | |||
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| verse_lines = इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।;सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥२७ ॥ | |||
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| verse_lines = येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।;ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥२८ ॥ | |||
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| verse_lines = जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।;ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥२९ ॥ | |||
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| verse_lines = साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।;प्रयाणकालेपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥३० ॥ | |||
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<span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमोऽध्यायः"></span> | ||
== अष्टमोऽध्यायः == | == अष्टमोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।;अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = अधियज्ञः कथं कोत्र देहेस्मिन्मधुसूदन ।;प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोसि नियतात्मभिः॥२ ॥ | |||
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| verse_lines = अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोध्यात्ममुच्यते ।;भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसञ्ज्ञितः॥३ ॥ | |||
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| verse_lines = अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥;अधियज्ञोहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।;यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।;तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध्य च ।;मय्यर्पितमनोबुदि्धर्मामेवैष्यस्यसंशयः॥७ ॥ | |||
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| verse_lines = अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।;परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।;सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥॥ ९ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।;भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥॥ १० ॥ | |||
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| verse_lines = यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।;यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥॥ ११ ॥ | |||
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| verse_lines = ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।;यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥१३ ॥ | |||
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== नवमोऽध्यायः == | == नवमोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।;ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेशुभात्॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।;प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥२ ॥ | |||
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| verse_lines = अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।;अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥३ ॥ | |||
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| verse_lines = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।;मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥४ ॥ | |||
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| verse_lines = न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।;भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।;तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।;कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।;भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।;उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥९ ॥ | |||
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| verse_lines = मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।;हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥१० ॥ | |||
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| verse_lines = अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।;परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११ ॥ | |||
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| verse_lines = मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।;राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२ ॥ | |||
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| verse_lines = महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।;भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३ ॥ | |||
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| verse_lines = सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।;नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४ ॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।;एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥१५ ॥ | |||
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| verse_lines = अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।;मन्त्रोहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥१६ ॥ | |||
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| verse_lines = पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।;वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥१७ ॥ | |||
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| verse_lines = गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।;प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।;अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं;क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।;एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना;गतागतं कामकामा लभन्ते॥ २१ ॥ | |||
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| verse_lines = अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।;तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२ ॥ | |||
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| verse_lines = येप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।;तेपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३ ॥ | |||
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| verse_lines = अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।;न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४ ॥ | |||
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| verse_lines = यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः ।;भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोपि माम् ॥॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।;तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥२६ ॥ | |||
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| verse_lines = यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।;यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥२७ ॥ | |||
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| verse_lines = शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।;संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥२८ ॥ | |||
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| verse_lines = समोहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योस्ति न प्रियः ।;ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥२९ ॥ | |||
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| verse_lines = अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।;साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३० ॥ | |||
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| verse_lines = क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।;कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥३१ ॥ | |||
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| verse_lines = मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येपि स्युः पापयोनयः ।;स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेपि यान्ति परां गतिम्॥३२ ॥ | |||
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| verse_lines = किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।;अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥३३ ॥ | |||
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| verse_lines = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।;मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥३४ ॥ | |||
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<span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमोऽध्यायः"></span> | ||
== दशमोऽध्यायः == | == दशमोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः ।;यत्तेहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।;अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥२ ॥ | |||
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| verse_lines = कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।;केषु केषु च भावेषु चिन्त्योसि भगवन्मया॥१७ ॥ | |||
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| verse_lines = विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।;भूयः कथय तृप्तिर्हि शृृण्वतो नास्ति मेमृतम्॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।;प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।;अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥२० ॥ | |||
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| verse_lines = आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।;मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥२१ ॥ | |||
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| verse_lines = वेदानां सामवेदोस्मि देवानामस्मि वासवः ।;इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥२२ ॥ | |||
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| verse_lines = रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।;वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्॥२३ ॥ | |||
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| verse_lines = पुरोधसां च मुख्यं मां विदि्ध पार्थ बृहस्पतिम् ।;सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥२४ ॥ | |||
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| verse_lines = महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।;यज्ञानां जपयज्ञोस्मि स्थावराणां हिमालयः॥२५ ॥ | |||
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| verse_lines = अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।;गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥२६ ॥ | |||
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| verse_lines = उच्चैःश्रवसमश्वानां विदि्ध माममृतोद्भवम् ।;ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥२७ ॥ | |||
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| verse_lines = आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।;प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥२८ ॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।;पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥२९ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।;मृगाणां च मृगेन्द्रोहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्॥३० ॥ | |||
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| verse_lines = पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।;झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥३१ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।;अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥३२ ॥ | |||
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| verse_lines = अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।;अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥३३ ॥ | |||
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| verse_lines = मृत्युः सर्वहरश्चाहं उद्भवश्च भविष्यताम् ।;कीर्तिः श्रीर्वाक् च नारीणां स्मृऽतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥३४ ॥ | |||
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| verse_lines = बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।;मासानां मार्गशीर्षोहं ऋतूनां कुसुमाकरः॥३५ ॥ | |||
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| verse_lines = द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।;जयोस्मि व्यवसायोस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्॥३६ ॥ | |||
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| verse_lines = वृष्णीनां वासुदेवोस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।;मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥३७ ॥ | |||
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| verse_lines = दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।;मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्॥३८ ॥ | |||
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| verse_lines = यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।;न तदस्ति विना यत्स्यात् मया भूतं चराचरम्॥३९ ॥ | |||
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| verse_lines = नान्तोस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।;एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥४० ॥ | |||
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| verse_lines = यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।;तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसम्भवम्॥४१ ॥ | |||
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| verse_lines = अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।;विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नं एकांशेन स्थितो जगत्॥४२ ॥ | |||
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<span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशोऽध्यायः"></span> | ||
== एकादशोऽध्यायः == | == एकादशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् ।;यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोयं विगतो मम॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।;त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्॥२ ॥ | |||
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| verse_lines = एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।;द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥३ ॥ | |||
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| verse_lines = मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।;योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्॥४ ॥ | |||
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| verse_lines = पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रशः ।;नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।;बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।;मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि॥७ ॥ | |||
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| verse_lines = न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।;दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।;अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥१० ॥ | |||
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| verse_lines = पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।;ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थं ऋषींश्च सर्वान् उरगांश्च दिव्यान्॥ १५ ॥ | |||
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| verse_lines = किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।;पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्॥ १७ ॥ | |||
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| verse_lines = रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।;गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ २२ ॥ | |||
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| verse_lines = रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।;बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्॥ २३ ॥ | |||
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| verse_lines = नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।;दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ २४ ॥ | |||
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| verse_lines = दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।;दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ २५ ॥ | |||
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| verse_lines = अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।;भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥ २६ ॥ | |||
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| verse_lines = वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।;केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः॥ २७ ॥ | |||
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| verse_lines = यथा नदीनां बहवोम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।;तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।;तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्तात्- लोकान् समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।;तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥ ३० ॥ | |||
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| verse_lines = आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोस्तु ते देववर प्रसीद ।;विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_lines = कालोस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।;ऋतेपि त्वा न भविष्यन्ति सर्वे येवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।;मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।;मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_lines = एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।;नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_lines = स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।;रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_lines = कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोप्यादिकर्त्रे ॥ अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_lines = त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण- स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।;वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_lines = वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।;नमो नमस्तेस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोपि नमो नमस्ते॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_lines = नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोस्तु ते सर्वत एव सर्व ।;अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोसि सर्वः॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।;अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात् प्रणयेन वापि॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = यच्चापहासार्थमसत्कृतोसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।;एकोथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्॥ ४२ ॥ | |||
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| verse_lines = पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।;न त्वत्समोस्त्यभ्यधिकः कुतोन्यो लोकत्रयेप्यप्रतिमप्रभाव॥ ४३ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड््यम् ।;पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_lines = अदृष्टपूर्वं हृषितोस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।;तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_lines = किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।;तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ४६ ॥ | |||
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| verse_lines = मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।;तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥ ४७ ॥ | |||
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| verse_lines = न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।;एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ ४८ ॥ | |||
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| verse_lines = मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ग्ममेदम् ।;व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ ४९ ॥ | |||
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| verse_lines = इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।;आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥ ५० ॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।;इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥५१ ॥ | |||
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| verse_lines = सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।;देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः॥५२ ॥ | |||
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| verse_lines = नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।;शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा॥५३ ॥ | |||
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| verse_lines = भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोर्जुन ।;ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥५४ ॥ | |||
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| verse_lines = मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।;निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥५५ ॥ | |||
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<span id="gr-C12" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वादशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C12" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वादशोऽध्यायः"></span> | ||
== द्वादशोऽध्यायः == | == द्वादशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।;ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।;श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥२ ॥ | |||
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| verse_lines = ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।;सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥३ ॥ | |||
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| verse_lines = सन्नियम्येंद्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।;ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥४ ॥ | |||
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| verse_lines = क्लेशोधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।;अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = अथैतदप्यशक्तोसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।;सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्॥११ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।;ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥१२ ॥ | |||
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| verse_lines = ओष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।;निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥१३ ॥ | |||
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| verse_lines = सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।;मय्यर्पितमनोबुदि्धर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१४ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।;हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥१५ ॥ | |||
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| verse_lines = अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।;सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥१६ ॥ | |||
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| verse_lines = यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।;शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् यः स मे प्रियः॥१७ ॥ | |||
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| verse_lines = समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।;शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।;अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान् मे प्रियो नरः॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।;श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेतीव मे प्रियाः॥२० ॥ | |||
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== त्रयोदशोऽध्यायः == | == त्रयोदशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।;एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।;एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥२ ॥ | |||
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| verse_lines = क्षेत्रज्ञं चापि मां विदि्ध सर्वक्षेत्रेषु भारत ।;क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥३ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।;स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥४ ॥ | |||
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| verse_lines = ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।;ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = महाभूतान्यहङ्कारो बुदि्धरव्यक्तमेव च ।;इंद्रियाणि दशैकं च पञ्च चेंद्रियगोचराः॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।;एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥७ ॥ | |||
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| verse_lines = अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।;आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = इंद्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।;जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥९ ॥ | |||
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| verse_lines = असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।;नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥१० ॥ | |||
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| verse_lines = मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।;विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥११ ॥ | |||
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| verse_lines = अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।;एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा॥१२ ॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।;अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥१३ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम् ।;सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥१४ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेंद्रियगुणाभासं सर्वेंद्रियविवर्जितं ।;असक्तं सर्व(भृच्चैव)भुक्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥१५ ॥ | |||
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| verse_lines = अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।;भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥१७ ॥ | |||
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| verse_lines = ज्योतिषामपि तज्जयोतिस्तमसः परमुच्यते ।;ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।;मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।;विकारांश्च गुणांश्चैव विदि्ध प्रकृतिसम्भवान्॥२० ॥ | |||
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| verse_lines = कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।;पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥२१ ॥ | |||
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| verse_lines = उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।;परमात्मेति चाप्युक्तो देहेस्मिन्पुरुषः परः॥२३ ॥ | |||
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| verse_lines = य (एनं) एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।;सर्वथा वर्तमानोपि न स भूयोभिजायते॥२४ ॥ | |||
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| verse_lines = अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।;तेपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥२६ ॥ | |||
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| verse_lines = समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।;विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥२८ ॥ | |||
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| verse_lines = समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।;न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥२९ ॥ | |||
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<span id="gr-C14" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्दशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C14" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्दशोऽध्यायः"></span> | ||
== चतुर्दशोऽध्यायः == | == चतुर्दशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।;तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥४ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।;निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।;सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = रजो रागात्मकं विदि्ध तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।;तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥७ ॥ | |||
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| verse_lines = तमस्त्वज्ञानजं विदि्ध मोहनं सर्वदेहिनाम् ।;प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।;ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥९ ॥ | |||
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| verse_lines = रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।;रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥१० ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वद्वारेषु देहेस्मिन्प्रकाश उपजायते ।;ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥११ ॥ | |||
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| verse_lines = लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।;रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥१२ ॥ | |||
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| verse_lines = अप्रकाशोप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।;तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥१३ ॥ | |||
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| verse_lines = यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।;तदोत्तमविदां लोकानमलान् प्रतिपद्यते॥१४ ॥ | |||
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| verse_lines = रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।;तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥१५ ॥ | |||
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| verse_lines = कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।;रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्॥१६ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।;प्रमादमोहौ तमसो भवतोज्ञानमेव च॥१७ ॥ | |||
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| verse_lines = ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।;जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।;गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोधिगच्छति॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।;जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोमृतमश्नुते॥२० ॥ | |||
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| verse_lines = कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।;किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन् गुणानतिवर्तते॥२१ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।;न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति॥२२ ॥ | |||
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| verse_lines = उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।;गुणा वर्तन्त इत्येव योवतिष्ठति नेङ्गते॥२३ ॥ | |||
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| verse_lines = समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।;तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥२४ ॥ | |||
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| verse_lines = मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।;सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते॥२५ ॥ | |||
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| verse_lines = मां च योव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।;स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥२६ ॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।;शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥२७ ॥ | |||
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<span id="gr-C15" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चदशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C15" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चदशोऽध्यायः"></span> | ||
== पञ्चदशोऽध्यायः == | == पञ्चदशोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">श्री भगवानुवाच</div> | <div class="uvacha-block">श्री भगवानुवाच</div> | ||
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| verse_lines = ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।;छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।;अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥ | |||
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| verse_lines = न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।;अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल- मसङ्गशस्रेण दृढेन छित्त्वा॥ ३ ॥ | |||
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| verse_lines = ततः परं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।;तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।;द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञै- र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥ ५ ॥ | |||
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| verse_lines = न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।;यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।;मनःषष्ठानींद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥७ ॥ | |||
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| verse_lines = शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।;गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।;अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥९ ॥ | |||
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| verse_lines = उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।;विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥१० ॥ | |||
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| verse_lines = यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।;यतन्तोप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥११ ॥ | |||
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| verse_lines = यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेखिलम् ।;यच्चन्द्रमासि यच्चाग्नौ तत्तेजो विदि्ध मामकम्॥१२ ॥ | |||
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| verse_lines = इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।;एतद्बुद्ध्वा बुदि्धमान् स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥२० ॥ | |||
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== षोडशोऽध्यायः == | == षोडशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = दम्भो दर्पोभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।;अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्॥४ ॥ | |||
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| verse_lines = दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।;मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोसि पाण्डव॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = द्वौ भूतसर्गौ लोकेस्मिन् दैव आसुर एव च ।;दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृृणु॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।;न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥७ ॥ | |||
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| verse_lines = असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।;अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।;प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोहिताः॥९ ॥ | |||
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| verse_lines = काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।;मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेशुचिव्रताः॥१० ॥ | |||
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| verse_lines = चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।;कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः॥११ ॥ | |||
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| verse_lines = आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।;ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान्॥१२ ॥ | |||
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| verse_lines = इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।;इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्॥१३ ॥ | |||
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| verse_lines = असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।;ईश्वरोहमहं भोगी सिद्धोहं बलवान् सुखी॥१४ ॥ | |||
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| verse_lines = आढ््योभिजनवानस्मि कोन्योस्ति सदृशो मया ।;यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥१५ ॥ | |||
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| verse_lines = अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।;प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेशुचौ॥१६ ॥ | |||
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| verse_lines = आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।;यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥१७ ॥ | |||
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| verse_lines = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।;मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोम्यसूयकाः॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।;क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।;मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥२० ॥ | |||
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| verse_lines = त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।;कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्त्रयं त्यजेत्॥२१ ॥ | |||
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| verse_lines = एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।;आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥२२ ॥ | |||
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| verse_lines = यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।;न स सिदि्धमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥२३ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।;ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥२४ ॥ | |||
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<span id="gr-C17" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तदशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C17" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तदशोऽध्यायः"></span> | ||
== सप्तदशोऽध्यायः == | == सप्तदशोऽध्यायः == | ||
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| verse_lines = ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।;तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।;सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृृणु॥२ ॥ | |||
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| verse_lines = सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।;श्रद्धामयोयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३ ॥ | |||
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| verse_lines = यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।;प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४ ॥ | |||
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| verse_lines = अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।;दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।;मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।;यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृृणु॥७ ॥ | |||
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| verse_lines = आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।;रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।;उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१० ॥ | |||
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<span id="gr-C18" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टादशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C18" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टादशोऽध्यायः"></span> | ||
== अष्टादशोऽध्यायः == | == अष्टादशोऽध्यायः == | ||
<div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | <div class="uvacha-block">अर्जुन उवाच</div> | ||
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| verse_lines = संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।;त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन॥१ ॥ | |||
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| verse_lines = काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः ।;सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः॥२ ॥ | |||
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| verse_lines = त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।;यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३ ॥ | |||
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| verse_lines = निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।;त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः॥४ ॥ | |||
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| verse_lines = यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।;यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्॥५ ॥ | |||
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| verse_lines = एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।;कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्॥६ ॥ | |||
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| verse_lines = नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।;मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥७ ॥ | |||
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| verse_lines = दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।;स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्॥८ ॥ | |||
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| verse_lines = कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेर्जुन ।;सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥९ ॥ | |||
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| verse_lines = न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।;त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१० ॥ | |||
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| verse_lines = न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।;यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥११ ॥ | |||
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| verse_lines = अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।;भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित्॥१२ ॥ | |||
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| verse_lines = पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।;साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्॥१३ ॥ | |||
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| verse_lines = अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।;विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्॥१४ ॥ | |||
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| verse_lines = शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।;न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५ ॥ | |||
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| verse_lines = तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।;पश्यत्यकृतबुदि्धत्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६ ॥ | |||
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| verse_lines = यस्य नाहङ्कृतो भावो बुदि्धर्यस्य न लिप्यते ।;हत्वापि स इमाल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१७ ॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।;करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥१८ ॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।;प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥१९ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।;अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विदि्ध सात्त्विकम्॥२० ॥ | |||
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| verse_lines = पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् ।;वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विदि्ध राजसम्॥२१ ॥ | |||
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| verse_lines = यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।;अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥ | |||
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| verse_lines = नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।;अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥२३ ॥ | |||
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| verse_lines = यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।;क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥२४ ॥ | |||
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| verse_lines = अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् ।;मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥२५ ॥ | |||
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| verse_lines = मुक्तसङ्गोनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।;सिद्ध्यसिद्ध्योः निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते॥२६ ॥ | |||
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| verse_lines = रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोशुचिः ।;हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७ ॥ | |||
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| verse_lines = अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोलसः ।;विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥२८ ॥ | |||
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| verse_lines = बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु ।;प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९ ॥ | |||
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| verse_lines = प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।;बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुदि्धः सा पार्थ सत्त्विकी ॥३० ॥ | |||
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| verse_lines = यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।;अयथावत्प्रजानाति बुदि्धः सा पार्थ राजसी॥३१ ॥ | |||
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| verse_lines = अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।;सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुदि्धः सा पार्थ तामसी॥३२ ॥ | |||
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| verse_lines = धृत्या यया धारयते मनःप्राणेंद्रियक्रियाः ।;योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥३३ ॥ | |||
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| verse_lines = यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेर्जुन ।;प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥३४ ॥ | |||
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| verse_lines = यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।;न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥३५ ॥ | |||
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| verse_lines = सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ ।;अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥३६ ॥ | |||
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| verse_lines = यत्तदग्रे विषमिव परिणामेमृतोपमम् ।;तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुदि्धप्रसादजम्॥३७ ॥ | |||
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| verse_lines = विषयेंद्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेमृतोपमम् ।;परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृऽतम्॥३८ ॥ | |||
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| verse_lines = न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।;सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः॥४० ॥ | |||
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| verse_lines = सिदि्धं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।;समासेनैव कौन्तेव निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥५० ॥ | |||
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| verse_lines = बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।;शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥५१ ॥ | |||
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| verse_lines = विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।;ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥५२ ॥ | |||
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| verse_lines = अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।;विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥५३ ॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।;समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्॥५४ ॥ | |||
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| verse_lines = भक्त्या मां अभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।;ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥५५ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।;मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्॥५६ ॥ | |||
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| verse_lines = चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।;बुदि्धयोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥५७ ॥ | |||
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| verse_lines = मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।;अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥५८ ॥ | |||
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| verse_lines = यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।;मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥५९ ॥ | |||
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| verse_lines = स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।;कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोपि तत्॥६० ॥ | |||
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| verse_lines = ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति ।;भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥६१ ॥ | |||
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| verse_lines = तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।;तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥६२ ॥ | |||
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| verse_lines = इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यात् गुह्यतरं मया ।;विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥६३ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः ।;इष्टोसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥६४ ॥ | |||
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| verse_lines = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।;मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोसि मे॥६५ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।;अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६ ॥ | |||
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| verse_lines = इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।;न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योभ्यसूयति॥६७ ॥ | |||
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| verse_lines = य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।;भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥६८ ॥ | |||
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| verse_lines = न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।;भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥६९ ॥ | |||
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| verse_lines = अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।;ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥७० ॥ | |||
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| verse_lines = श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः ।;सोपि मुक्तः शुभान् लोकान् प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ।;॥७१ ॥ | |||
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| verse_lines = कच्चिदेतत् श्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।;कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥७२ ॥ | |||
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| verse_lines = नष्टो मोहः स्मृऽतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।;स्थितोस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३ ॥ | |||
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| verse_lines = इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।;संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४ ॥ | |||
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| verse_lines = तच्च संस्मृऽत्य संस्मृऽत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।;विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥७७ ॥ | |||
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| verse_lines = यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।;तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८ ॥ | |||
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Latest revision as of 07:04, 8 June 2026
श्रीमद्भगवद्गीताप्रस्थानम् — मूलम्
प्रथमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् ।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् ।
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान् निबोध द्विजोत्तम ।
भवान् भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः ।
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः ।
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम् ।
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
तस्य सञ्जनयन् हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः ।
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ ।
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठरः ।
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
अर्जुन उवाच
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
यावदेतान् निरीक्षेहं योद्धुकामानवस्थितान् ।
सञ्जय उवाच
योत्स्यमानानवेक्षेहं य एतेत्र समागताः ।
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम् ।
तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः पितॄनथ पितामहान् ।
श्वशुरान् सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
अर्जुन उवाच
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात् त्वक् चैव परिदह्यते ।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोपि मधुसूदन ।
निहत्य धार्तराष्ट्रान् नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः ।
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम् ।
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः ।
अधर्माभिभवात् कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः ।
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
अहो बत महत् पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
द्वितीयोऽध्यायः
सञ्जय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
श्री भगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
अजुर्न उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तपः ।
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत ।
श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
देहिनोस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
नासतो विद्यतेभावो नाभावो विद्यते सतः ।
अविनाशि तु तद् विदि्ध येन सर्वमिदं ततम् ।
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
न जायते म्रियते वा कदाचि-
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
अच्छेद्योयमदाह्योयमक्लेद्योशोष्य एव च ।
अव्यक्तोयमचिन्त्योयमविकार्योयमुच्यते ।
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद् वदति तथैव चान्यः ।
देही नित्यमवध्योयं देहे सर्वस्य भारत ।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि ।
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेव्ययाम् ।
भयाद् रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः ।
अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
एषा तेभिहिता साङ्ख्ये बुदि्धर्योगे त्विमां शृणु ।
नेहाभिक्रमनाशोस्ति प्रत्यवायो न विद्यते ।
व्यवसायात्मिका बुदि्धरेकेह कुरुनन्दन ।
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः ।
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् ।
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन ।
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय ।
दूरेण ह्यवरं कर्म बुदि्धयोगाद् धनञ्जय ।
बुदि्धयुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
कर्मजं बुदि्धयुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।
यदा ते मोहकलिलं बुदि्धर्व्यतितरिष्यति ।
अर्जुन उवाच
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यथा स्थास्यति निश्चला ॥
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।
श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
दुःखेष्वनुद्विग्नमना सुखेषु विगतस्पृहः ।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत् प्राप्य शुभाशुभम् ।
यदा संहरते चायं कूर्मोङ्गानीव सर्वशः ।
विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः ।
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः ।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
क्रोधाद् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृऽतिविभ्रमः ।
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिंद्रियैश्चरन् ।
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।
नास्ति बुदि्धरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।
इंद्रियाणां हि चरतां यन्मनोनुविधीयते ।
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
विहाय कामान् यः सर्वान् पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति ।
तृतीयोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुदि्धर्जनार्दन ।
व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुदि्धं मोहयसीव मे ।
श्रीभगवानुवाच
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोश्नुते ।
न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
कर्मेंद्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
यस्त्विंद्रियाणि मनसा नियम्यारभतेर्जुन ।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
यज्ञार्थात् कर्मणोन्यत्र लोकोयं कर्मबन्धनः ।
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
कर्म ब्रह्मोद्भवं विदि्ध ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
कर्मणैव हि संसिदि्धमास्थिता जनकादयः ।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतंद्रितः ।
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
न बुदि्धभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
इंद्रियस्येंद्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ॥ तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४ ॥
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोयं पापं चरति पूरुषः ।
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
इंद्रियाणि मनोबुदि्धरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
तस्मात्त्वमिंद्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
इंद्रियाणि पराण्याहुरिंद्रियेभ्यः परं मनः ।
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
चतुर्थोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स एवायं मया तेद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।
श्रीभगवानुवाच
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।
अजोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् ।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिदि्धं यजन्त इह देवताः ।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।
किं कर्म किमकर्मेति कवयोप्यत्र मोहिताः ।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तोनिराश्रयः ।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।
श्रोत्रादीनींद्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।
सर्वाणींद्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
अपाने जुह्वनि प्राणं प्राणेपानं तथापरे ।
अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।
श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
तद्विदि्ध प्रणिपातेन परिप्रश्रेन सेवया ।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।
यथैधांसि समिद्धोग्निर्भस्मसात्कुरुतेर्जुन ।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
श्रद्धावाल्लभते ज्ञानं मत्परः संयतेंद्रियः ।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः ।
पञ्चमोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
श्री भगवानुवाच
संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः ।
योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेंद्रियः
नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
प्रलपन् विसृजन् गृह्णन् उन्मिषन् निमिषन् अपि ।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिंद्रियैरपि ।
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् ।
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी ।
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते ।
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
योन्तः सुखोन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः ।
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् ।
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
यतेंद्रियमनोबुदि्धर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
षष्ठोऽध्यायः
श्री भगवानुवाच
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विदि्ध पाण्डव ।
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
यदा हि नेंद्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः ।
जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः ।
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूढस्थो विजितेंद्रियः ।
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु ।
योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः ।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः ।
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेंद्रियक्रियः ।
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः ।
प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः ।
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।
नात्यश्नतस्तु योगोस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते ।
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृऽता ।
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुदि्धग्राह्यमतींद्रियम् ।
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।
संङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः ।
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया ।
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् ।
युञ्जन् एवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः ।
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योर्जुन ।
अर्जुन उवाच
योयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन ।
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
श्रीभगवानुवाच
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः ।
अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः ।
कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति ।
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः ।
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते ।
प्राप्य पुण्यकृतान् लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः ।
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम् ।
तत्र तं बुदि्धसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम् ।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोपि सः ।
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः ।
तपस्विभ्योधिको योगी ज्ञानिभ्योपि मतोधिकः ।
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
सप्तमोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
ज्ञानं तेहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
भूमिरापोनलो वायुः खं मनो बुदि्धरेव च ।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विदि्ध मे पराम् ।
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
रसोहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
बीजं मां सर्वभूतानां विदि्ध पार्थ सनातनम् ।
बलं बलवतां (चाहं) अस्मि कामरागविवर्जितम् ।
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोर्जुन ।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानावान्मां प्रपद्यते ।
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेन्यदेवताः ।
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
अष्टमोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधियज्ञः कथं कोत्र देहेस्मिन्मधुसूदन ।
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोध्यात्ममुच्यते ।
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ॥
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध्य च ।
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः।
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् ।
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
आब्रह्मभवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोर्जुन ।
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
परस्तस्मात्तुभावोन्योव्यक्तोव्यक्तात्सनातनः ।
अव्यक्तोक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
नैते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ।
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
नवमोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
येप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः ।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
समोहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योस्ति न प्रियः ।
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येपि स्युः पापयोनयः ।
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
दशमोऽध्यायः
भूय एव महाबाहो शृृणु मे परमं वचः ।
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
बुदि्धर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोयशः ।
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
श्रीभगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
वेदानां सामवेदोस्मि देवानामस्मि वासवः ।
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
पुरोधसां च मुख्यं मां विदि्ध पार्थ बृहस्पतिम् ।
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
उच्चैःश्रवसमश्वानां विदि्ध माममृतोद्भवम् ।
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
मृत्युः सर्वहरश्चाहं उद्भवश्च भविष्यताम् ।
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
वृष्णीनां वासुदेवोस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
नान्तोस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
एकादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् ।
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर ।
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
श्रीभगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोथ सहस्रशः ।
पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा ।
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः ।
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् ।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोनन्तरूपम् ।
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः ।
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
यथा नदीनां बहवोम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्तात्- लोकान् समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोस्तु ते देववर प्रसीद ।
श्रीभगवानुवाच
कालोस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान् समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोप्यादिकर्त्रे ॥ अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥ ३७ ॥
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण- स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वायुर्यमोग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
यच्चापहासार्थमसत्कृतोसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड््यम् ।
अदृष्टपूर्वं हृषितोस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
श्रीभगवानुवाच
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ग्ममेदम् ।
सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
श्रीभगवानुवाच
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोर्जुन ।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
द्वादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सन्नियम्येंद्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
क्लेशोधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुदि्धं निवेशय ।
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासेप्यसमर्थोसि मत्कर्मपरमो भव ।
अथैतदप्यशक्तोसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासात् ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ओष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
तुल्यनिन्दास्तुनिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
त्रयोदशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
श्रीभगवानुवाच
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
क्षेत्रज्ञं चापि मां विदि्ध सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
महाभूतान्यहङ्कारो बुदि्धरव्यक्तमेव च ।
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
इंद्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वेंद्रियगुणाभासं सर्वेंद्रियविवर्जितं ।
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
ज्योतिषामपि तज्जयोतिस्तमसः परमुच्यते ।
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान् ।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
य (एनं) एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
चतुर्दशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः ।
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
रजो रागात्मकं विदि्ध तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तमस्त्वज्ञानजं विदि्ध मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत ।
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
सर्वद्वारेषु देहेस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा ।
अप्रकाशोप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् ।
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणानेतानतीतो भवति प्रभो ।
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
मां च योव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च ।
पञ्चदशोऽध्यायः
श्री भगवानुवाच
ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
ततः परं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेखिलम् ।
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृऽतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यस्मात्क्षरमतीतोहमक्षरादपि चोत्तमः ।
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
षोडशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
अभयं सत्त्वसंशुदि्धर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ १ ॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
दम्भो दर्पोभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
द्वौ भूतसर्गौ लोकेस्मिन् दैव आसुर एव च ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
आढ््योभिजनवानस्मि कोन्योस्ति सदृशो मया ।
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
सप्तदशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
कवाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेनुपकारिणे ।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
ओशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः ।
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
अष्टादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्यासं कवयो विदुः ।
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
निश्चयं शृृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
कार्यमित्येव यत् कर्म नियतं क्रियतेर्जुन ।
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुदि्धर्यस्य न लिप्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान् पृथग्विधान् ।
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम् ।
मुक्तसङ्गोनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोशुचिः ।
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोलसः ।
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृृणु ।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेंद्रियक्रियाः ।
यया तु धर्मकामार्थान् धृत्या धारयतेर्जुन ।
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृृणु मे भरतर्षभ ।
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेमृतोपमम् ।
विषयेंद्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेमृतोपमम् ।
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ॥ दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥ ४३ ॥
कृषिगोरक्षवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिदि्धं लभते नरः ।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
असक्तबुदि्धः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
सिदि्धं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
भक्त्या मां अभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेर्जुन तिष्ठति ।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्यात् गुह्यतरं मया ।
सर्वगुह्यतमं भूयः शृृणु मे परमं वचः ।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
श्रद्धावाननसूयश्च शृृणुयादपि यो नरः ।
कच्चिदेतत् श्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृऽतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
व्यासप्रसादात् श्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
राजन् संस्मृऽत्य संस्मृऽत्य संवादमिममद्भुतम् ।
तच्च संस्मृऽत्य संस्मृऽत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।