Mahabharatatatparyanirnaya/Moola: Difference between revisions
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=== | <span id="gr-C1" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="प्रथमोऽध्यायः"></span> | ||
== प्रथमोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = नारायणाय परिपूर्णगुणार्णवाय विश्वोदयस्थितिलयोन्नियति प्रदाय।;ज्ञानप्रदाय विबुधासुरसौख्यदुःखसत्कारणाय वितताय नमो नमस्ते ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = आसीदुदारगुणवारिधिरप्रमेयो नारायणः परतमः परमात् स एकः।;संशान्तसंविदखिलं जठरे निधाय लक्ष्मीभुजान्तरगतः स्वरतोऽपि चाग्रे ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = तस्योदरस्थजगतः सदमन्दसान्द्रस्वानन्दतुष्टवपुषोऽपि रमारमस्य।;भूत्यै निजाश्रितजनस्य हि सृज्यसृष्टावीक्षा बभूव परनामनिमेषकान्ते ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा स चेतनगणान् जठरे शयानान् आनन्दमात्रवपुषः सृतिविप्रमुक्तान्।;ध्यानं गतान् सृतिगतांश्च सुषुप्तिसंस्थान् ब्रह्मादिकान् कलिपरान् मनुजांस्तथैक्षत् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = स्रक्ष्ये हि चेतनगणान् सुखदुःखमध्यसम्प्राप्तये तनुभृतां विहृतिं ममेच्छन्।;सोऽयं विहार इह मे तनुभृत् स्वभावसम्भूतये भवति भूतिकृदेव भूत्याः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं विचिन्त्य परमः स तु वासुदेवनामा बभूव निजमुक्तिपदप्रदाता।;तस्याज्ञयैव नियताऽथ रमाऽपि रूपं बभ्रे द्वितीयमपि यत् प्रवदन्ति मायाम् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = सङ्कर्षणश्च स बभूव पुनः सुनित्यः संहारकारणवपुस्तदनुज्ञयैव।;देवी जयेत्यनु बभूव स सृष्टिहेतोः प्रद्युम्नतामुपगतः कृतितां च देवी ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = स्थित्यै पुनः स भगवाननिरुद्धनामा देवी च शान्तिरभवच्छरदां सहस्रम्।;स्थित्वा स्वमूर्तिभिरमूभिरचिन्त्यशक्तिः प्रद्युम्नरूपक इमांश्चरमात्मनेऽदात् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = निर्देहकान् स भगवाननिरुद्धनामा जीवान् स्वकर्मसहितान् उदरे निवेश्य ।;चक्रेऽथ देहसहितान् क्रमशः स्वयम्भुप्राणात्मशेषगरुडेशमुखान् समग्रान् ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = पञ्चात्मकः स भगवान् द्विषडात्मकोऽभूत् पञ्चद्वयी शतसहस्रपरोऽमितश्च।;एकः समोऽप्यखिलदोषसमुज्झितोऽपि सर्वत्र पूर्णगुणकोऽपि बहूपमोऽभूत् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आत्मतन्त्रो निश्चेतनात्मकशरीरगुणैश्च हीनः।;आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादिः सर्वत्र च स्वगतभेदविवर्जितात्मा ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = कालाच्च देशगुणतोऽस्य न चाऽदिरन्तो वृद्धिक्षयौ न तु परस्य सदातनस्य।;नैतादृशः क्व च बभूव न चैव भाव्यो नास्त्युत्तरः किमु परात् परमस्य विष्णोः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = सर्वज्ञ ईश्वरतमः स च सर्वशक्तिः पूर्णाव्ययात्मबलचित्-सुखवीर्यसारः।;यस्याऽज्ञया रहितमिन्दिरया समेतं ब्रह्मेशपूर्वकमिदं न तु कस्य चेशम् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = आभासकोऽस्य पवनः पवनस्य रुद्रः शेषात्मको गरुड एव च शक्रकामौ।;वीन्द्रेशयोस्तदपरे त्वनयोश्च तेषां ऋष्यादयः क्रमश ऊनगुणाः शतांशाः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = आभासका त्वथ रमाऽस्य मरुत्स्वरूपाच्छ्रेष्ठाऽप्यजात् तदनु गीः शिवतो वरिष्ठा।;तस्या उमा विपतिनी च गिरस्तयोऽस्तु शच्यादिकाः क्रमश एव यथा पुमांसः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = ताभ्यश्च ते शतगुणैर्दशतो वरिष्ठाः पञ्चोत्तरैरपि यथाक्रमतः श्रुतिस्थाः।;शब्दो बहुत्ववचनः शतमित्यतश्च श्रुत्यन्तरेषु बहुधोक्तिविरुद्धता न ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = तेषां स्वरूपमिदमेव यतोऽथ मुक्तावप्येवमेव सततोच्चविनीचरूपाः।;शब्दः शतं दशसहस्रमिति स्म यस्मात् तस्मान्न हीनवचनोऽथ ततोऽग्र्यरूपाः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = एवं नरोत्तमपरास्तु विमुक्तियोग्या अन्ये च संसृतिपरा असुरास्तमोगाः।;एवं सदैव नियमः क्वचिदन्यथा न यावन्न पूर्तिरुत संसृतिगाः समस्ताः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = पूर्तिश्च नैव नियमाद् भविता हि यस्मात् तस्मात् समाप्तिमपि यान्ति न जीवसङ्घाः।;आनन्त्यमेव गणशोऽस्ति यतो हि तेषां इत्थं ततः सकलकालगता प्रवृत्तिः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = एतैः सुरादिभिरतिप्रतिभादियुक्तैर्युक्तैः सहैव सततं प्रविचिन्तयद्भिः।;पूर्तेरचिन्त्यमहिमः परमः परात्मा नारायणोऽस्य गुणविस्तृतिरन्यगा क्व ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = साम्यं न चास्य परमस्य च केन चाऽप्यं मुक्तेन च क्वचिदतस्त्वभिदा कुतोऽस्य।;प्राप्येत चेतनगणैः सततास्वतन्त्रैः नित्यस्वतन्त्रवपुषः परमात् परस्य ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = अर्थोऽयमेव निखिलैरपि वेदवाक्यै रामायणैः सहितभारतपञ्चरात्रैः।;अन्यैश्च शास्त्रवचनैः सहतत्त्वसूत्रैः निर्णीयते सहृदयं हरिणा सदैव ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = नारायणस्य न समः पुरुषोत्तमोऽहं;जीवाक्षरे ह्यतिगतोऽस्मि ततो <span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘ऽन्यदार्तम्’ (बृ.उ. ५.५.१)</span> ।;<span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘मुक्तोऽपसृप्य’ (ब्र.सू. १.३.२)</span> इह नास्ति कुतश्च कश्चित्;<span class="gr-reference gr-ref-kathopanishat-id">‘नानेव’ (क.उ. २.१.११)</span> धर्मपृथगात्मदृगेत्यधो हि॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = <span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘आभास एव’ (ब्र.सू. २.३.५०)</span> पृथगीशत एष जीवो;मुक्तस्य नास्ति जगतो विषये तु शक्तिः।;मात्रापरोऽसि न तु तेऽश्नुवते महित्वं;‘षाड्गुण्यविग्रह’ ‘सुपूर्णगुणैकदेहः’॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = ‘माहात्म्यदेह’ ‘सृतिमुक्तिगते’ ‘शिवश्च;ब्रह्मा च तद्गुणगतौ न कथञ्चनेशौ’ ।;‘न श्रीः कुतस्तदपरे’‘ऽस्य सुखस्य मात्राम्;अश्नन्ति मुक्तसुगणाश्च शतावरेण’ ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = ‘आभासकाभासपरावभासरूपाण्यजस्राणि च चेतनानाम् ।;विष्णोः सदैवाति वशात् कदापि गच्छन्ति केशादिगणा न मुक्तौ’ ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = ‘यस्मिन् परेऽन्येऽप्यजजीवकोशा’;‘नाहं परायुर्न मरीचिमुख्याः’ ।;‘जानन्ति यद्गुणगणान् न रमादयोऽपि;नित्यस्वतन्त्र उत कोऽस्ति तदन्य ईशः’ ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = ‘नैवैक एव पुरुषः पुरुषोत्तमोऽसौ;एकः कुतः स पुरुषो’ ‘यत एव जात्या ।;अर्थात् श्रुतेश्च गुणतो निजरूपतश्च;नित्यान्य एव कथमस्मि स इत्यपि स्यात्’ ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = ‘सर्वोत्तमो हरिरिदं तु तदाज्ञयैव;चेत्तुं क्षमं स तु हरिः परमस्वतन्त्रः ।;पूर्णाव्ययागणितनित्यगुणार्णवोऽसौ’;इत्येव वेदवचनानि परोक्तयश्च ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्माद्यभेदः साम्यं वा कुतस्तस्य महात्मनः।;यदेवं वाचकं शास्त्रं तद्धि शास्त्रं परं मतम् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = निर्णयायैव यत् प्रोक्तं ब्रह्मसूत्रं तु विष्णुना।;व्यासरूपेण तद् ग्राह्यं तत्रोक्ताः सर्वनिर्णयाः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = यथार्थवचनानां च मोहार्थानां च संशयम्।;अपनेतुं हि भगवान् ब्रह्मसूत्रमचीक्लृपत् ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् सूत्रार्थमागृह्य कर्तव्यः सर्वनिर्णयः।;सर्वदोषविहीनत्वं गुणैः सर्वैरुदीर्णता ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = अभेदः सर्वरूपेषु जीवभेदः सदैव च।;विष्णोरुक्तानि सूत्रेषु सर्ववेदेड्यता तथा ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = तारतम्यं च मुक्तानां विमुक्तिर्विद्यया तथा।;तस्मादेतद्विरुद्धं यन्मोहाय तदुदाहृतम् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् ‘ये ये गुणा विष्णोर्ग्राह्यास्ते सर्व एव तु’।;इत्याद्युक्तं भगवता भविष्यत्पर्वणि स्फुटम् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = ‘एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति।;त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = अतत्थ्यानि वितत्थ्यानि दर्शयस्व महाभुज।;प्रकाशं कुरु चाऽत्मानम् अप्रकाशं च मां कुरु’ ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = इति वाराहवचनं ब्रह्माण्डोक्तं तथाऽपरम् ।;‘अमोहाय गुणा विष्णोराकारश्चिच्छरीरता ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = निर्दोषत्वं तारतम्यं मुक्तानामपि चोच्यते ।;एतद्विरुद्धं यत् सर्वं तन्मोहायेति निर्णयः’ ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = स्कान्देऽप्युक्तं शिवेनैव षण्मुखायैव सादरम् ।;शिवशास्त्रेऽपि तद् ग्राह्यं भगवच्छास्त्रयोगि यत् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = ‘परमो विष्णुरेवैकस्तज्ज्ञानं मोक्षसाधनम् ।;शास्त्राणां निर्णयस्त्वेष तदन्यन्मोहनाय हि ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं विना तु या मुक्तिः साम्यं च मम विष्णुना ।;तीर्थाऽदिमात्रतो ज्ञानं ममाऽधिक्यं च विष्णुतः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = अभेदश्चास्मदादीनां मुक्तानां हरिणा तथा ।;इत्यादि सर्वं मोहाय कथ्यते पुत्र नान्यथा’ ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = उक्तं (पा)पद्मपुराणे च शैव एव शिवेन तु ।;यदुक्तं हरिणा पूर्वं उमायै प्राह तद्धरः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = ‘त्वामाराध्य तथा शम्भो ग्रहीष्यामि वरं सदा ।;द्वापराऽदौ युगे भूत्वा कलया मानुषाऽदिषु ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = स्वाऽगमैः कल्पितैस्त्वं च जनान् मद्विमुखान् कुरु ।;मां च गोपाय येन स्यात् सृष्टिरेषोत्तराधरा’(पद्म पु. ६.७१.१०६-१०७) ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = न च वैष्णवशास्त्रेषु वेदेष्वपि हरेः परः ।;क्वचिदुक्तोऽन्यशास्त्रेषु परमो विष्णुरीरितः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = निर्दोषत्वाच्च वेदानां वेदोक्तं ग्राह्यमेव हि ।;वेदेषु च परो विष्णुः सर्वस्मादुच्यते सदा ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = ‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।;विदे हि रुद्रो रुद्रियम् महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत्’(ऋग्वेद ७.४०.५) ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = ‘स्तुहि श्रुतं गर्तसदं युवानं मृगं न भीममुपहत्नुमुग्रम्’ ।;‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्’ ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = ‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’ ।;‘वासुदेवो वा इदमग्र आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’ ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = ‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।;तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति’(मु. उ.५.३(३.१.३)) ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = ‘यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।;सोऽश्नुते सर्वान् कामान्त्सह ब्रह्मणा विपश्चिता’(तै. उ.२.१) ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = ‘प्र घा न्वस्य महतो महानि सत्या सत्यस्य करणानि वोचम्’ ।;‘सत्यमेनमनु विश्वे मदन्ति रातिं देवस्य गृणतो मघोनः’(ऋग्वेद २.१५.१, ४.१७.५) ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = ‘यच्चिकेत सत्यमिइत् तन्न मोघं वसु स्पार्हम् उत जेतोत दाता’ ।;‘सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये’(ऋ.१०.५५.६, ८.३.४) ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = ‘सत्या विष्णोर्गुणाः सर्वे सत्या जीवेशयोर्भिदा ।;सत्यो मिथो जीवभेदः सत्यं च जगदीदृशम् ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = असत्यः स्वगतो भेदो विष्णोर्नान्यदसत्यकम् ।;जगत्प्रवाहः सत्योऽयं पञ्चभेदसमन्वितः ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = जीवेशयोर्भिदा चैव जीवभेदः परस्परम् ।;जडेशयोर्जडानां च जडजीवभिदा तथा ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = पञ्चभेदा इमे नित्याः सर्वावस्थासु सर्वशः ।;मुक्तानां च न हीयन्ते तारतम्यं च सर्वदा ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = रुद्रः सरस्वती वायुर्मुक्ताः शतगुणोत्तराः ।;एको ब्रह्मा च वायुश्च वीन्द्रो रुद्रसमस्तथा ।;एको रुद्रस्तथा शेषो न कश्चिद्वायुना समः ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = मुक्तेषु श्रीस्तथा वायोः सहस्रगुणिता गुणैः ।;ततोऽनन्तगुणो विष्णुर्न कश्चित् तत्समः सदा’ ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादि वेदवाक्यं विष्णोरुत्कर्षमेव वक्त्युच्चैः ।;तात्पर्यं महदत्रेत्युक्तं ‘यो माम्’ (भ.गी.१५.१९) इति स्वयं तेन ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = ‘भूम्नो ज्यायस्त्वम्’(‘भूम्नःक्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति’ ब्र.सू.३.३.५९) इति ह्युक्तं सूत्रेषु निर्णयात् तेन ।;तत्प्रीत्यैव च मोक्षः प्राप्यस्तेनैव नान्येन ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = ‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।;यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं(नू) स्वाम्’ (क.उ.१.२.२३; मु.उ.३.२.३) ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = ‘विष्णुर्हि दाता मोक्षस्य वायुश्च तदनुज्ञया ।;मोक्षो ज्ञानं च क्रमशो मुक्तिगो भोग एव च ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = तारतम्यं ततो ज्ञेयं सर्वोच्चत्वं हरेस्तथा ।;एतद्विना न कस्यापि विमुक्तिः स्यात् कथञ्चन ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = मध्यमा मानुषा ये तु सृतियोग्याः सदैव हि ।;अधमा निरयायैव दानवास्तु तमोलयाः ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = मुक्तिर्नित्या तमश्चैव नाऽवृत्तिः पुनरेतयोः ।;देवानां निरयो नास्ति तमश्चापि कथञ्चन ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = नासुराणां तथा मुक्तिः कदाचित् केनचित् क्वचित् ।;मानुषाणां मध्यमानां नैवैतद्द्वयमाप्यते ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = असुराणां तमःप्राप्तिस्तदा नियमतो भवेत् ।;यदा तु ज्ञानिसद्भावे नैव गृह्णन्ति तत्परम् ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = तदा मुक्तिश्च देवानां यदा प्रत्यक्षगो हरिः ।;स्वयोग्ययोपासनया तन्वा तद्योग्यया तथा ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = सर्वैर्गुणैर्ब्रह्मणा तु समुपास्यो हरिः सदा ।;आनन्दो ज्ञः सदात्मेति ह्युपास्यो मानुषैर्हरिः ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = यथाक्रमं गुणोद्रेकात् तदन्यैराविरिञ्चतः ।;ब्रह्मत्वयोग्या ऋजवो नाम देवाः पृथग्गणाः ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = तैरेवाप्यं पदं तत्तु नैवान्यैः साधनैरपि ।;एवं सर्वपदानां तु योग्याः सन्ति पृथग् गणाः ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादनाद्यनन्तं हि तारतम्यं चिदात्मनाम् ।;तच्च नैवान्यथा कर्तुं शक्यं केनापि कुत्रचित् ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = अयोग्यमिच्छन् पुरुषः पतत्येव न संशयः ।;तस्माद् योग्यानुसारेण सेव्यो विष्णुः सदैव हि ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = अच्छिद्रसेवनाच्चैव निष्कामत्वाच्च योग्यतः ।;द्रष्टुं शक्यो हरिः सर्वैर्नान्यथा तु कथञ्चन ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = नियमोऽयं हरेर्यस्मान्नोल्लङ्घ्यः सर्वचेतनैः ।;सत्यसङ्कल्पतो विष्णुर्नान्यथा च करिष्यति ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = दानतीर्थतपोयज्ञपूर्वाः सर्वेऽपि सर्वदा ।;अङ्गानि हरिसेवायां भक्तिस्त्वेका विमुक्तये’ ॥;भविष्यत्पर्ववचनमित्येतदखिलं परम् ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = ‘शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमायन् अन्यमन्यमतिनेनीयमानः ।;एधमानद्विळुभयस्य राजा चोष्कूयते विश इन्द्रो मनुष्यान् ॥ १००॥ \\ | |||
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| verse_lines = परा पूर्वेषां सख्या वृणक्ति वितर्तुराणो अपरेभिरेति ।;अनानुभूतीरवधून्वानः पूर्वीरिन्द्रः शरदस्तर्तरीति’(ऋग्वेद ६.४७.१६-१७) ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै. आ. ३.१२.१७, श्वे. उ. ३.८) ।;‘तमेव विदित्वाऽति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’ ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = ‘यस्य देवे परा भक्तिर्यथादेवे तथा गुरौ ।;तस्यैतेऽकथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः’(श्वे. उ. ६.२३) ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = ‘भक्त्यर्थान्यखिलान्येव भक्तिर्मोक्षाय केवला ।;मुक्तानामपि भक्तिर्हि नित्यानन्दस्वरूपिणी ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानपूर्वः परः स्नेहो नित्यो भक्तिरितीर्यते’।;इत्यादि वेदवचनं साधनप्रविधायकम् ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = ‘निश्शेषधर्मकर्ताऽप्यभक्तस्ते नरके हरे।;सदा तिष्ठति भक्तश्चेद् ब्रह्महाऽपि विमुच्यते’ ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = ‘धर्मो भवत्यधर्मोऽपि कृतो भक्तैस्तवाऽच्युत ।;पापं भवति धर्मोऽपि यो न भक्तैः कृतो हरे’ ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = ‘भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।;ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप’(भ.गी.११.५४) ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = ‘अनादिद्वेषिणो दैत्या विष्णौ द्वेषो विवर्धितः ।;तमस्यन्धे पातयति दैत्यानन्ते विनिश्चयात् ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = पूर्णदुःखात्मको द्वेषः सोऽनन्तो ह्यवतिष्ठते ।;पतितानां तमस्यन्धे निःशेषसुखवर्जिते ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = जीवाभेदो निर्गुणत्वं अपूर्णगुणता तथा ।;साम्याधिक्ये तदन्येषां भेदस्तद्गत एव च ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = प्रादुर्भावविपर्यासस्तद्भक्तद्वेष एव च ।;तत्प्रमाणस्य निन्दा च द्वेषा एतेऽखिला मताः ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = एतैर्विहीना या भक्तिः सा भक्तिरिति निश्चिता ।;अनादिभक्तिर्देवानां क्रमाद् वृद्धिं गतैव सा ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = अपरोक्षदृशेर्हेतुर्मुक्तिहेतुश्च सा पुनः ।;सैवाऽनन्दस्वरूपेण नित्या मुक्तेषु तिष्ठति ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = यथा शौक्ल्यादिकं रूपं गोर्भवत्येव सर्वदा ।;सुखज्ञानादिकं रूपं एवं भक्तेर्न चान्यथा ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = भक्त्यैव तुष्टिमभ्येति विष्णुर्नान्येन केनचित् ।;स एव मुक्तिदाता च भक्तिस्तत्रैककारणम् ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मादीनां च मुक्तानां तारतम्ये तु कारणम् ।;तारतम्यस्थिताऽनादिर्नित्या भक्तिर्न चेतरत् ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = मानुषेष्वधमाः किञ्चिद् द्वेषयुक्ताः सदा हरौ ।;दुःखनिष्ठास्ततस्तेऽपि नित्यमेव न संशयः ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = मध्यमा मिश्रभूतत्वान्नित्यं मिश्रफलाः स्मृताः ।;किञ्चिद्भक्तियुता नित्यं उत्तमास्तेन मोक्षिणः ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मणः परमा भक्तिः सर्वेभ्यः परमस्ततः’ ।;इत्यादीनि च वाक्यानि पुराणेषु पृथक् पृथक् ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = ‘षण्णवत्यङ्गुलो यस्तु न्यग्रोधपरिमण्डलः ।;सप्तपादश्चतुर्हस्तो द्वात्रिंशल्लक्षणैर्युतः ॥;असंशयः संशयच्छिद् गुरुरुक्तो मनीषिभिः ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = क्रमाल्लक्षणहीनाश्च लक्षणालक्षणैः समाः ।;मानुषा मध्यमाः सम्यग् दुर्लक्षणयुतः कलिः ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = सम्यग्लक्षणसम्पन्नो यद् दद्यात् सुप्रसन्नधीः ।;शिष्याय सत्यं भवति तत्सर्वं नात्र संशयः ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = अगम्यत्वाद्धरिस्तस्मिन्नाविष्टो मुक्तिदो भवेत् ।;नातिप्रसन्नहृदयो यद् दद्याद् गुरुरप्यसौ ॥;न तत् सत्यं भवेत् तस्माद् अर्चनीयो गुरुः सदा ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = स्वावराणां गुरुत्वं तु भवेत् कारणतः क्वचित् ।;मर्यादार्थं तेऽपि पूज्या न तु यद्वत् परो गुरुः’ ॥;इत्येतत् पञ्चरात्रोक्तं पुराणेष्वनुमोदितम् ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = ‘यदा मुक्तिप्रदानाय स्वयोग्यं पश्यति ध्रुवम् ।;रूपं हरेस्तदा तस्य सर्वपापानि भस्मसात् ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = यान्ति पूर्वाण्युत्तराणि न श्लेषं यान्ति कानिचित् ।;मोक्षश्च नियतस्तस्मात् स्वयोग्यहरिदर्शने’ ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = भविष्यत्पर्ववचनमित्येतत् सूत्रगं तथा ।;श्रुतिश्च तत्परा तद्वत् ' तद्यथे' (छा. उ. ४.१४.३)त्यवदत् स्फुटम् ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = ‘मुक्तास्तु मानुषा देवान् देवा इन्द्रं स शङ्करम् ।;स ब्रह्माणं क्रमेणैव तेन यान्त्यखिला हरिम् ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = उत्तरोत्तरवश्याश्च मुक्ता रुद्रपुरस्सराः ।;निर्दोषा नित्यसुखिनः पुनरावृत्तिवर्जिताः ।;स्वेच्छयैव रमन्तेऽत्र नानिष्टं तेषु किञ्चन ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = मुक्तोऽपि सर्वमुक्तानां आधिपत्ये स्थितः सदा ।;आश्रयस्तस्य भगवान् सदा नारायणः प्रभुः’ ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = इत्यृग्यजुःसामाथर्वपञ्चरात्रेतिहासतः ।;पुराणेभ्यस्तथाऽन्येभ्यः शास्त्रेभ्यो निर्णयः कृतः ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = विष्ण्वाज्ञयैव विदुषा तत्प्रसादबलोन्नतेः ।;आनन्दतीर्थमुनिना पूर्णप्रज्ञाभिधायुजा ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = तात्पर्यं शास्त्राणां सर्वेषामुत्तमं मया प्रोक्तम् ।;प्राप्यानुज्ञां विष्णोरेतज्ज्ञात्वैव विष्णुराप्योऽसौ ॥ १३७॥ | |||
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<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयोऽध्यायः"></span> | |||
== द्वितीयोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ जयति हरिरचिन्त्यः सर्वदेवैकवन्द्यः परमगुरुरभीष्टावाप्तिदः सज्जनानाम् ।;निखिलगुणगणार्णो नित्यनिर्मुक्तदोषः सरसिजनयनोऽसौ श्रीपतिर्मानदो नः ॥१॥ | |||
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| verse_lines = उक्तः पूर्वेऽध्याये शास्त्राणां निर्णयः परो दिव्यः ।;श्रीमद्भारतवाक्यान्येतैरेवाध्यवस्यन्ते ॥२॥ | |||
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| verse_lines = क्वचिद् ग्रन्थान् प्रक्षिपन्ति क्वचिदन्तरितानपि ।;कुर्युः क्वचिच्च व्यत्यासं प्रमादात् क्वचिदन्यथा ॥३॥ | |||
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| verse_lines = अनुत्सन्ना अपि ग्रन्था व्याकुला इति सर्वशः ।;उत्सन्नाः प्रायशः सर्वे कोट्यंशोऽपि न वर्तते ॥४॥ | |||
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| verse_lines = ग्रन्थोऽप्येवं विलुळितः किम्वर्थो देवदुर्गमः ।;कलावेवं व्याकुलिते निर्णयाय प्रचोदितः ॥५॥ | |||
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| verse_lines = हरिणा निर्णयान् वच्मि विजानंस्तत्प्रसादतः ।;शास्त्रान्तराणि सञ्जानन् वेदांश्चास्य प्रसादतः ॥६॥ | |||
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| verse_lines = देशे देशे तथा ग्रन्थान् दृष्ट्वा चैव पृथग्विधान् ।;यथा स भगवान् व्यासः साक्षान्नारायणः प्रभुः ॥७॥ | |||
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| verse_lines = जगाद भारताद्येषु तथा वक्ष्ये तदीक्षया ।;सङ्क्षेपात् सर्वशास्त्रार्थं भारतार्थानुसारतः ॥८॥ | |||
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| verse_lines = ‘भारतं सर्ववेदाश्च तुलामारोपिताः पुरा ।;देवैर्ब्रह्मादिभिः सर्वैरृषिभिश्च समन्वितैः ।;व्यासस्यैवाऽज्ञया तत्र त्वत्यरिच्यत भारतम्’ ॥१०॥ | |||
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| verse_lines = ‘महत्वाद् भारवत्वाच्च महाभारतमुच्यते ।;निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते’(महा. १.१.२०९) ॥११॥ | |||
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| verse_lines = ‘निर्णयः सर्वशास्त्राणां सदृष्टान्तो हि भारते ।;कृतो विष्णुवशत्वं हि ब्रह्मादीनां प्रकाशितम् ॥१२॥ | |||
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| verse_lines = यतः कृष्णवशे सर्वे भीमाद्याः सम्यगीरिताः ।;सर्वेषां ज्ञानदो विष्णुर्यशोदातेति चोदितः ॥१३॥ | |||
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| verse_lines = यस्माद्व्यासात्मना तेषां भारते यश ऊचिवान् ।;ज्ञानदश्च शुकादीनां ब्रह्मरुद्रादिरूपिणाम् ॥१४॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्माधिकश्च देवेभ्यः शेषाद्रुद्रादपीरितः ।;प्रियश्च विष्णोः सर्वेभ्य इति भीमनिदर्शनात् ॥१५॥ | |||
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| verse_lines = भूभारहारिणो विष्णोः प्रधानाङ्गं हि मारुतिः ।;मागधादिवधादेव दुर्योधनवधादपि ॥१६॥ | |||
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| verse_lines = यो य एव बलज्येष्ठः क्षत्रियेषु स उत्तमः ।;अङ्गं चेद्विष्णुकार्येषु तद्भक्त्यैव न चान्यथा ॥१७॥ | |||
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| verse_lines = बलं नैसर्गिकं तच्चेद्वरास्त्रादेस्तदन्यथा ।;अन्यावेशनिमित्तं चेद् बलमन्यात्मकं हि तत् ॥१८॥ | |||
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| verse_lines = देवेषु बलिनामेव भक्तिज्ञाने न चान्यथा ।;स एव च प्रियो विष्णोर्नान्यथा तु कथञ्चन ॥१९॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद्यो यो बलज्येष्ठः स गुणज्येष्ठ एव च ।;बलं हि क्षत्रिये व्यक्तं ज्ञायते स्थूलदृष्टिभिः ॥२०॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानादयो गुणा यस्माज्ज्ञायन्ते सूक्ष्मदृष्टिभिः ।;तस्माद्यत्र बलं तत्र विज्ञातव्या गुणाः परे ॥२१॥ | |||
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| verse_lines = देवेष्वेव न चान्येषु वासुदेवप्रतीपतः ।;क्षत्रादन्येष्वपि बलं प्रमाणं यत्र केशवः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = प्रवृत्तो दुष्टनिधने ज्ञानकार्ये तथैव च ।;अन्यत्र ब्राह्मणानां तु प्रमाणं ज्ञानमेव हि ।;क्षत्रियाणां बलं चैव सर्वेषां विष्णुकार्यता ॥२३॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णरामादिरूपेषु बलकार्यो जनार्दनः ।;दत्तव्यासादिरूपेषु ज्ञानकार्यस्तथा प्रभुः ॥२४॥ | |||
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| verse_lines = मत्स्यकूर्मवराहाश्च सिंहवामनभार्गवाः ।;राघवः कृष्णबुद्धौ च कृष्णद्वैपायनस्तथा ॥२५॥ | |||
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| verse_lines = कपिलो दत्त ऋषभौ शिंशुमारो रुचेः सुतः ।;नारायणो हरिः कृष्णस्तापसो मनुरेव च ॥२६॥ | |||
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| verse_lines = महिदासस्तथा हंसः स्त्रीरूपो हयशीर्षवान् ।;तथैव वडवावक्त्रः कल्की धन्वन्तरिः प्रभुः ॥२७॥ | |||
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| verse_lines = इत्याद्याः केवलो विष्णुर्नैषां भेदः कथञ्चन ।;न विशेषो गुणैः सर्वैर्बलज्ञानादिभिः क्वचित् ॥२८॥ | |||
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| verse_lines = श्रीब्रह्मरुद्रशेषाश्च वीन्द्रेन्द्रौ काम एव च ।;कामपुत्रोऽनिरुद्धश्च सूर्यश्चन्द्रो बृहस्पतिः ॥२९॥ | |||
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| verse_lines = धर्म एषां तथा भार्या दक्षाद्या मनवस्तथा ।;मनुपुत्राश्च ऋषयो नारदः पर्वतस्तथा ॥३०॥ | |||
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| verse_lines = कश्यपः सनकाद्याश्च वह्न्याद्याश्चैव देवताः ।;भरतः कार्तवीर्यश्च वैन्याद्याश्चक्रवर्तिनः ॥३१॥ | |||
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| verse_lines = गयश्च लक्ष्मणाद्याश्च त्रयो रोहिणिनन्दनः ।;प्रद्युम्नो रौक्मिणेयश्च तत्पुत्रश्चानिरुद्धकः ॥३२ ॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद्बलप्रवृत्तस्य रामकृष्णात्मनो हरेः ।;अन्तरङ्गं हनूमांश्च भीमस्तत्कार्यसाधकौ ॥३४॥ | |||
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| verse_lines = यत्र रूपं तत्र गुणाः भक्त्याद्यास्त्रीषु नित्यशः ।;रूपं हि स्थूलदृष्टीनां दृश्यं व्यक्तं ततो हि तत् ॥३६॥ | |||
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| verse_lines = रामवज्जाम्बवत्याद्याः षट् ततो रेवती तथा ।;लक्ष्मणो हनुमत्पश्चात् ततो भरतवालिनौ ।;शत्रुघ्नस्तु ततः पश्चात् सुग्रीवाद्यास्ततोऽवराः ॥४४॥ | |||
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| verse_lines = रामकार्यं तु यैः सम्यक् स्वयोग्यं न कृतं पुरा ।;तैः पूरितं तत् कृष्णाय बीभत्स्वाद्यैः समन्ततः ॥४५॥ | |||
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| verse_lines = अधिकं यैः कृतं तत्र तैरूनं कृतमत्र तत् ।;कर्णाद्यैरधिकं यैस्तु प्रादुर्भावद्वये कृतम् ।;विविदाद्यैर्हि तैः पश्चाद् विप्रतीपं कृतं हरेः ॥४६॥ | |||
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| verse_lines = प्रादुर्भावद्वये ह्यस्मिन् सर्वेषां निर्णयः कृतः ।;नैतयोरकृतं किञ्चिच्छुभं वा यदि वाऽशुभम् ।;अन्यत्र पूर्यते क्वापि तस्मादत्रैव निर्णयः ॥४७॥ | |||
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| verse_lines = पश्चात्तनत्वात् कृष्णस्य वैशेष्यात् तत्र निर्णयः ।;प्रादुर्भावमिमं यस्माद् गृहीत्वा भारतं कृतम् ॥४८॥ | |||
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| verse_lines = उक्ता रामकथाऽप्यस्मिन् मार्कण्डेयसमाख्य(स्य)या ।;तस्माद् यद् भारते नोक्तं तद्धि नैवास्ति कुत्रचित् ।;॥४९॥ | |||
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| verse_lines = अत्रोक्तं सर्वशास्त्रेषु नहि सम्यगुदाहृतम्'।;इत्यादि कथितं सर्वं ब्रह्माण्डे हरिणा स्वयम् ॥५०॥ | |||
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| verse_lines = मार्कण्डेयेऽपि कथितं भारतस्य प्रशंसनम् ।;‘देवतानां यथा व्यासो द्विपदां ब्राह्मणो वरः ॥५१॥ | |||
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| verse_lines = आयुधानां यथा वज्रमोषधीनां यथा यवाः ।;तथैव सर्वशास्त्राणां महाभारतमुत्तमम्' ॥५२॥ | |||
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| verse_lines = वायुप्रोक्तेऽपि तत् प्रोक्तं भारतस्य प्रशंसनम् ।;‘कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम् ।;को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत्’ ॥५३॥(पद्म पु. १.१.४३-४४; विष्णु पु. ३.४-५; महा. १२.३३४.९(१२.३५६.११)) | |||
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| verse_lines = एवं हि सर्वशास्त्रेषु पृथक् पृथगुदीरितम् ।;उक्तोऽर्थः सर्व एवायं माहात्म्यक्रमपूर्वकः ॥५४॥ | |||
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| verse_lines = भारतेऽपि यथा प्रोक्तो निर्णयोऽयं क्रमेण तु ।;तथा प्रदर्शयिष्यामस्तद्वाक्यैरेव सर्वशः ॥५५॥ | |||
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| verse_lines = ‘नारायणं सुरगुरुं जगदेकनाथं भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च ।;त्रैगुण्यवर्जितमजं विभुमाद्यमीशं वन्दे भवघ्नममरासुरसिद्धवन्द्यम्’ ॥५६॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानप्रदः स भगवान् कमलाविरिञ्चशर्वादिपूर्वजगतो निखिलाद्वरिष्ठः ।;भक्त्यैव तुष्यति हरिप्रवणत्वमेव सर्वस्य धर्म इति पूर्वविभागसंस्थः ॥५७॥ | |||
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| verse_lines = निर्दोषकः सृतिविहीन उदारपूर्णसंविद्गुणः प्रथमकृत् सकलात्मशक्तिः ।;मोक्षैकहेतुरसुरूपसुरैश्च मुक्तैर्वन्द्यः स एक इति चोक्तमथोत्तरार्धे ॥५८॥ | |||
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| verse_lines = नम्यत्वमुक्तमुभयत्र यतस्ततोऽस्य मुक्तैरमुक्तिगगणैश्च विनम्यतोक्ता ।;इत्थं हि सर्वगुणपूर्तिरमुष्य विष्णोः प्रस्ताविता प्रथमतः प्रतिजानतैव ॥५९॥ | |||
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| verse_lines = ‘कृष्णो यज्ञैरिज्यते सोमपूतैः कृष्णो वीरैरिज्यते विक्रमद्भिः ।;कृष्णो वन्यैरिज्यते सम्मृशानैः कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः’ ॥६०॥ | |||
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| verse_lines = सृष्टा ब्रह्मादयो देवा निहता येन दानवाः ।;तस्मै देवादिदेवाय नमस्ते शार्ङ्गधारिणे ॥६१॥ | |||
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| verse_lines = स्रष्टृत्वं देवानां मुक्तिस्रष्टृत्वमुच्यते नान्यत् ।;उत्पत्तिर्दैत्यानामपि यस्मात् सम्मिता विशेषोऽयम् ॥६२॥ | |||
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| verse_lines = अथ च दैत्यहतिस्तमसि स्थिरा नियतसंस्थितिरेव न चान्यथा ।;तनुविभागकृतिः सकलेष्वियं नहि विशेषकृता सुरदैत्यगा ॥६३॥ | |||
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| verse_lines = तमिममेव सुरासुरसञ्चये हरिकृतं प्रविशेषमुदीक्षितुम् ।;प्रतिविभज्य च भीमसुयोधनौ स्वपरपक्षभिदा कथिता कथा ॥६४॥ | |||
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| verse_lines = ‘नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे ।;यस्य प्रसादाद् वक्ष्यामि नारायणकथामिमाम् ॥६५॥ | |||
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| verse_lines = वासुदेवस्तु भगवान् कीर्तितोऽत्र सनातनः ।;प्रतिबिम्बमिवाऽदर्शे यं पश्यन्त्यात्मनि स्थितम् ॥६६॥ | |||
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| verse_lines = नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति ।;एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान् साधयाम्यहम्' ॥६७॥ | |||
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| verse_lines = आद्यन्तयोरित्यवदत् स यस्माद् व्यासात्मको विष्णुरुदारशक्तिः ।;तस्मात् समस्ता हरिसद्गुणानां निर्णीयते(तये) भारतगा कथैषा ॥६८॥ | |||
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| verse_lines = ‘सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते ।;वेदशास्त्रात् परं नास्ति न दैवं केशवात् परम्’ ॥६९॥ | |||
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| verse_lines = ‘आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।;इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा’(अनुषासपर्वणि.१८६.११,गरुडपुाणे आचारकाण्डे.२३०.१) ॥७०॥ | |||
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| verse_lines = ‘स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित् ।;सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतयोरेव किङ्कराः’(पाद्मे.उत्तरखण्डे.७१.१००) ॥७१॥ | |||
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| verse_lines = ‘को हि तं वेदितुं शक्तो यो न स्यात् तद्विधोऽपरः(तद्वधः परः) ।;तद्विधश्चापरो नास्ति तस्मात् तं वेद सः स्वयम् ॥७२॥ | |||
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| verse_lines = को हि तं वेदितुं शक्तो नारायणमनामयम् ।;ऋते सत्यवतीसूनोः कृष्णाद् वा देवकीसुतात् (म.भा.सभा.प.६१.३१) ॥७३॥ | |||
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| verse_lines = अप्रमेयोऽनियोज्यश्च स्वयं कामगमो वशी ।;मोदत्येष सदा भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव ॥७४॥ | |||
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| verse_lines = न प्रमातुं महाबाहुः शक्योऽयं मधुसूदनः ।;परमात् परमेतस्माद् विश्वरूपान्न विद्यते ॥७५॥ | |||
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| verse_lines = वसुदेवसुतो नायं नायं गर्भेऽवसत् प्रभुः ।;नायं दशरथाज्जातो न चापि जमदग्नितः ॥७६॥ | |||
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| verse_lines = जायते नैव कुत्रापि म्रियते कुत एव तु ।;न(म) वेध्यो मुह्यते नायं बद्ध्यते नैव केनचित् ।;कुतो दुःखं स्वतन्त्रस्य नित्यानन्दैकरूपिणः ॥७७॥ | |||
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| verse_lines = ईशन्नपि हि देवेशः सर्वस्य जगतो हरिः ।;कर्माणि कुरुते नित्यं कीनाश इव दुर्बलः (म.भा.उद्योग.६७.१४)॥७८॥ | |||
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| verse_lines = नाऽत्मानं वेद मुग्धोऽयं दुःखी सीतां च मार्गते ।;बद्धः शक्रजितेत्यादि लीलैषाऽसुरमोहिनी ॥७९॥ | |||
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| verse_lines = मुह्यते शस्त्रपातेन भिन्नत्वग्रुधिरस्रवः ।;अजानन् पृच्छति स्मान्यांस्तनुं त्यक्त्वा दिवं गतः ॥८०॥ | |||
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| verse_lines = इत्याद्यसुरमोहाय दर्शयामास नाट्यवत् ।;अविद्यमानमेवेशः कुहकं तद्विदुः सुराः ॥८१॥ | |||
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| verse_lines = प्रादुर्भावा हरेः सर्वे नैव प्रकृतिदेहिनः ।;निर्दोषा गुणसम्पूर्णा दर्शयन्त्यन्यथैव तु ॥८२॥ | |||
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| verse_lines = ‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।;यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते’(भ. गी. ७.२) ॥८४॥ | |||
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| verse_lines = ‘अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रळयस्तथा ।;मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय’(भ. गी. ७.६-७) ॥८५॥ | |||
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| verse_lines = ‘अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्’(भ. गी. ९.११) ।;परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥८६॥ | |||
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| verse_lines = ‘पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।;न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव’(भ. गी. ११.४३) ॥८९॥ | |||
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| verse_lines = ‘परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।;यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः’(भ. गी. १४.१) ॥९०॥ | |||
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| verse_lines = ‘ममयोनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।;सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत’(भ. गी. १४.३) ॥९१॥ | |||
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| verse_lines = ‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।;क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥९२॥ | |||
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| verse_lines = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।;यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥९३॥ | |||
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| verse_lines = यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।;अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥९४॥ | |||
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| verse_lines = यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।;स सर्वविद् भजति मां सर्वभावेन भारत ॥९५॥ (इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।;सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥) | |||
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| verse_lines = (इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।;सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥(भ.गी.१४.२))इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।;एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत’(भ. गी. १५.१६-२०) ॥९६॥ | |||
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| verse_lines = ‘द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च । दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु’(भ. गी. १६.६) ॥९७॥ | |||
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| verse_lines = ‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्’ ।;अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥(भ. गी. १६.८) ’॥९८॥ | |||
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| verse_lines = एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।;प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोहिताः॥’ (भ. गी. १६.९)॥९९ ॥ | |||
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| verse_lines = ‘ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ।आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया’(भ. गी. १६.१४-१५) ॥१००॥ | |||
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| verse_lines = ‘मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः’(भ. गी. १६.१८)।;‘ तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् ।;क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु’(भ. गी. १६.१९) ॥१०१॥ | |||
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| verse_lines = ‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।;मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्’(भ. गी. १६.२०) ॥१०२॥ | |||
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| verse_lines = ‘सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।;अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकम्’(भ. गी. १८.२०) ॥१०३॥ | |||
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| verse_lines = ‘सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।;इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्’(भ. गी. १८.६४) ॥१०४॥ | |||
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| verse_lines = ‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।;मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे’(भ. गी. १८.६५) ॥१०५॥ | |||
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| verse_lines = ‘पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता नारायणः स्वयम् ।;सर्वेष्वेतेषु राजेन्द्र ज्ञानेष्वेतद् विशिष्यते’(महा. १२.३३७.६३(२५९.६८)) ॥१०६॥ | |||
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| verse_lines = ‘ज्ञानेष्वेतेषु राजेन्द्र साङ्ख्यपाशुपतादिषु ।;यथायोगं यथान्यायं निष्ठा नारायणः परः’(महा. १२.३३७.६४ \३५९.६९) ॥१०७॥ | |||
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| verse_lines = ‘पञ्चरात्रविदो मुख्या यथाक्रमपरा नृप ।;एकान्तभावोपगता वासुदेवं विशन्ति ते’(महा. १२.३३७.६७ \३५९.७२) ॥१०८॥ | |||
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| verse_lines = \ (जनमेजय उवाच);‘बहवः पुरुषा ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु ।;को ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति’(महा. १२.३३८.१ \३६०.१) ॥१०९॥ | |||
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| verse_lines = (वैशम्पायन उवाच)‘ नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ।;बहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ।;तथा तं पुरुषं विश्वमाख्यास्यामि गुणाधिकम्’(महा. १२.३३८.२\३६०.३ ) ॥११०॥ | |||
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| verse_lines = ‘आह ब्रह्मैतमेवार्थं महादेवाय पृच्छते ।;तस्यैकस्य ममत्वं हि स चैकः पुरुषो विराट्’(महा.१२.३६१.९ ) ॥१११॥ | |||
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| verse_lines = ‘अहं ब्रह्मा चाऽद्य ईशः प्रजानां तस्माज्जातस्त्वं च मत्तः प्रसूतः ।;मत्तो जगत् स्थावरं जङ्गमं च सर्वे वेदा सरहस्याश्च पुत्र’(महा.१२.३६१.२०-२१ ) ॥११२॥ | |||
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| verse_lines = तथैव भीमवचनं धर्मजं प्रत्युदीरितम् ।;‘ब्रह्मेशानादिभिः सर्वैः समेतैर्यद्गुणांशकः ।;नावसाययितुं शक्यो व्याचक्षाणैश्च सर्वदा ॥११३॥ | |||
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| verse_lines = स एष भगवान् कृष्णो नैव केवलमानुषः ।;यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रश्च क्रोधसम्भवः’(महा.१२.३५०.१२ ) ॥११४॥ | |||
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| verse_lines = वचनं चैव कृष्णस्य ज्येष्ठं कुन्तीसुतं प्रति ।;‘रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ।;ब्रह्मा मामाश्रितो नित्यं नाहं (कि)कञ्चिदुपाश्रितः (म.भा.१४.११८.३७)॥११५॥ | |||
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| verse_lines = यथाऽऽश्रितानि ज्योतींषि ज्योतिःश्रेष्ठं दिवाकरम् ।;एवं मुक्तगणाः सर्वे वासुदेवमुपाश्रिताः’ ॥११६॥ | |||
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| verse_lines = भविष्यत्पर्वगं चापि वचो व्यासस्य सादरम् ।;‘वासुदेवस्य महिमा भारते निर्णयोदितः ॥११७॥ | |||
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| verse_lines = तदर्थास्तु कथाः सर्वा नान्यार्थं वैष्णवं यशः ।;तत्प्रतीपं तु यद् दृश्येन्न तन्मम मनीषितम् ॥११८॥ | |||
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| verse_lines = भाषास्तु त्रिविधास्तत्र मया वै सम्प्रदर्शिताः ।;उक्तो यो महिमा विष्णोः स तूक्तो हि समाधिना ॥११९॥ | |||
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| verse_lines = शैवदर्शनमालम्ब्य क्वचिच्छैवी कथोदिता ।;समाधिभाषयोक्तं यत् तत् सर्वं ग्राह्यमेव हि ॥१२०॥ | |||
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| verse_lines = अविरुद्धं समाधेस्तु दर्शनोक्तं च गृह्यते ।;आद्यन्तयोर्विरुद्धं यद् दर्शनं तदुदाहृतम् ॥१२१॥ | |||
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| verse_lines = तस्याङ्गं प्रथमं वायुः प्रादुर्भावत्रयान्वितः ।;प्रथमो हनुमान् नाम द्वितीयो भीम एव च ।;पूर्णप्रज्ञस्तृतीयस्तु भगवत्कार्यसाधकः ॥१२३॥ | |||
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| verse_lines = त्रेताद्येषु युगेष्वेष सम्भूतः केशवाज्ञया ।;एकैकशस्त्रिषु पृथग् द्वितीयाङ्गं सरस्वती ॥१२४॥ | |||
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| verse_lines = शंरूपे तु रतेर्वायौ श्रीरित्येव च कीर्त्यते ।;सैव च द्रौपदी नाम काळी चन्द्रेति चोच्यते ॥१२५॥ | |||
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| verse_lines = तृतीयाङ्गं हरेः शेषः प्रादुर्भावसमन्वितः ।;प्रादुर्भावा नरश्चैव लक्ष्मणो बल एव च ॥१२६॥ | |||
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| verse_lines = रुद्रात्मकत्वाच्छेषस्य शुको द्रौणिश्च तत्तनू ।;इन्द्रे नरांशसम्पत्त्या पार्थोऽपीषत् तदात्मकः ॥१२७॥ | |||
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| verse_lines = तथा भागवतेऽप्युक्तं हनूमद्वचनं परम् ।;‘मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ।;कुतोऽन्यथा स्यू(स्य हि स्यू) रमतः स्व आत्मन् सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ॥१२९॥ | |||
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| verse_lines = न वै स आत्माऽऽत्मवतामधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः ।;न स्त्रीकृतं कश्मलमश्नुवीत न लक्ष्मणं चापि जहाति कर्हिचित्’(भा.पु. ५.१९.५-६) ॥१३०॥ | |||
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| verse_lines = ‘क्वचिच्छिवं क्वचिदृषीन् क्वचिद् देवान् क्वचिन्नरान् ।;नमत्यर्चयति स्तौति वरानर्थयतेऽपि च ॥१३२॥ | |||
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| verse_lines = लिङ्गं प्रतिष्ठापयति वृणोत्यसुरतो वरान् ।;सर्वेश्वरः स्वतन्त्रोऽपि सर्वशक्तिश्च सर्वदा ।;सर्वज्ञोऽपि विमोहाय जनानां पुरुषोत्तमः’ ॥१३३॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् यो महिमा विष्णोः सर्वशास्त्रोदितः स हि ।;नान्यदित्येष शास्त्राणां निर्णयः समुदाहृतः॥१३४॥ | |||
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| verse_lines = भारतार्थस्त्रिधा प्रोक्तः स्वयं भगवतैव हि ।;‘मन्वादि केचिद् ब्रुवते ह्यास्तीकादि तथा परे ।;तथोपरिचराद्यन्ये भारतं परिचक्षते’(महा. १.१.५०) ॥१३५॥ | |||
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| verse_lines = ‘सकृष्णान् पाण्डवान् गृह्य योऽयमर्थः प्रवर्तते ।;प्रातिलोम्यादिवैचित्र्यात् तमास्तीकं प्रचक्षते ॥१३६॥ | |||
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| verse_lines = धर्मो भक्त्यादिदशकः श्रुतादिः शीलवैनयौ ।;सब्रह्मकास्तु ते यत्र मन्वादिं तं विदुर्बुधाः ॥१३७॥ | |||
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| verse_lines = नारायणस्य नामानि सर्वाणि वचनानि तु ।;तत्सामर्थ्याभिधायीनि तमौपरिचरं विदुः ॥१३८॥ | |||
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| verse_lines = भक्तिर्ज्ञानं सवैराग्यं प्रज्ञा मेधा धृतिः स्थितिः ।;योगः प्राणो बलं चैव वृकोदर इति स्मृतः ॥१३७॥ | |||
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| verse_lines = एतद्दशात्मको वायुस्तस्माद् भीमस्तदात्मकः ।;सर्वविद्या द्रौपदी तु यस्मात् सैव सरस्वती ॥१३५॥ | |||
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| verse_lines = अज्ञानादिस्वरूपस्तु कलिर्दुर्योधनः स्मृतः ।;विपरीतं तु यज्ज्ञानं दुःशासन इतीरितः ॥१४१॥ | |||
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| verse_lines = नास्तिक्यं शकुनिर्नाम सर्वदोषात्मकाः परे ।;धार्तराष्ट्रास्त्वहङ्कारो द्रौणी रुद्रात्मको यतः ॥१४२॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणाद्या इन्द्रियाण्येव पापान्यन्ये तु सैनिकाः ।;पाण्डवेयाश्च पुण्यानि तेषां विष्णुर्नियोजकः ॥१४३॥ | |||
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| verse_lines = एवमध्यात्मनिष्ठं हि भारतं सर्वमुच्यते ।;दुर्विज्ञेयमतः सर्वैर्भारतं तु सुरैरपि ॥१४४॥ | |||
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| verse_lines = स्वयं व्यासो हि तद् वेद ब्रह्मा वा तत्प्रसादतः ।;तथाऽपि विष्णुपरता भारते सारसङ्ग्रहः’ ॥१४५॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादिव्यासवाक्यैस्तु विष्णूत्कर्षोऽवगम्यते ।;वाय्वादीनां क्रमश्चैव तद्वाक्यैरेव चिन्त्यते ॥१४६॥ | |||
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| verse_lines = ‘वायुर्हि ब्रह्मतामेति तस्माद् ब्रह्मैव स स्मृतः ।;न ब्रह्मसदृशः कश्चिच्छिवादिषु कथञ्चन’ ॥१४७॥ | |||
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| verse_lines = ‘ज्ञाने विरागे हरिभक्तिभावे धृतिस्थितिप्राणबलेषु योगे ।;बुद्धौ च नान्यो हनुमत्समानः पुमान् कदाचित् क्व च कश्चनैव’ ॥१४८॥ | |||
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| verse_lines = ‘बळित्था तद् वपुषे धायि दर्शतं देवस्य भर्गः सहसो यतो जनि ।;यदीमुप ह्वरते साधते मतिर्ऋतस्य धेना अनयन्त सस्रुतः ॥१४९॥ | |||
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| verse_lines = पृक्षो वपुः पितुमान् नित्य आ शये द्वितीयमा सप्तशिवासु मातृषु ।;तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः ॥१५०॥ | |||
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| verse_lines = निर्यदीं बुध्नान्महिषस्य वर्पस ईशानासः शवसा क्रन्त सूरयः ।;यदीमनु प्रदिवो मध्व आधवे गुहा सन्तम् मातरिश्वा मथायति ॥१५१॥ | |||
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| verse_lines = प्र यत्पितुः परमान्नीयते पर्या पृक्षुधो वीरुधो दंसु रोहति ।;उभा यदस्य जनुषं यदिन्वत आदिद् यविष्ठो अभवद् घृणा शुचिः ॥१५२॥ | |||
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| verse_lines = आदिन् मात्रॄराविशद्यास्वा शुचिरहिंस्यमान उर्विया वि वावृधे ।;अनु यत्पूर्वा अरुहत् सनाजुवो नि नव्यसीष्ववरासु धावते’(ऋग्वेद १.१४१.१-५) ॥१५३॥ | |||
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| verse_lines = ‘अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिःश्रेष्ठो दिवाकरः ।;ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठो देवश्रेष्ठस्तु मारुतः’(म.भा.१.१२९.४६) ॥१५४॥ | |||
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| verse_lines = ‘बलमिन्द्रस्य गिरिशो गिरिशस्य बलं मरुत् ।;बलं तस्य हरिः साक्षान्न हरेर्बलमन्यतः’ ॥१५५॥ | |||
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| verse_lines = ‘वायुर्भीमो भीमनादो महौजाः सर्वेषां च प्राणिनां प्राणभूतः ।;अनावृत्तिर्देहिनां देहपाते तस्माद् वायुर्देवदेवो विशिष्टः’(म.भा.१२.२६४.४१) ॥१५६॥ | |||
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| verse_lines = ‘तत्त्वज्ञाने विष्णुभक्तौ धैर्ये स्थैर्ये पराक्रमे ।;वेगे च लाघवे चैव प्रलापस्य च वर्जने ॥१५७॥ | |||
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| verse_lines = भीमसेनसमो नास्ति सेनयोरुभयोरपि ।;पाण्डित्ये च पटुत्वे च शूरत्वे च बलेऽपि च’ ॥१५८॥ | |||
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| verse_lines = तथा युधिष्ठिरेणापि भीमं प्रति समीरितम् ।;‘ धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चैव यशो ध्रुवम् ।;त्वय्यायत्तमिदं सर्वं सर्वलोकस्य भारत’ ॥१५९॥ | |||
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| verse_lines = विराटपर्वगं चापि वचो दुर्योधनस्य हि ।;‘वीराणां शास्त्रविदुषां कृतिनां तत्त्वनिर्णये ।;सत्त्वे बाहुबले धैर्ये प्राणे शारीरसम्भवे’(म.भा.४.३२.१६) ॥१६०॥ | |||
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| verse_lines = साम्प्रतं मानुषे लोके सदैत्यनरराक्षसे ।;चत्वारः प्राणिनां श्रेष्ठाः सम्पूर्णबलपौरुषाः(म.भा.४.३२.१७) ॥१६१॥ | |||
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| verse_lines = भीमश्च बलभद्रश्च मद्रराजश्च वीर्यवान् ।;चतुर्थः कीचकस्तेषां पञ्चमं नानुशुश्रुमः ॥(म.भा.४.३२.१८);अन्योन्यानन्तरबलाः क्रमादेव प्रकीर्तिताः’(म.भा.४.३२.१९) ॥१६२॥ | |||
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| verse_lines = वचनं वासुदेवस्य तथोद्योगगतं परम् ।;‘यत् किञ्चाऽऽत्मनि कल्याणं सम्भावयसि पाण्डव ।;सहस्रगुणमप्येतत् त्वयि सम्भावयाम्यहम्(म.भा.५.७६.३) ॥१६३॥ | |||
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| verse_lines = यादृशे च कुले जातः सर्वराजाभिपूजिते ।;यादृशानि च कर्माणि भीम त्वमसि तादृशः’(महा. ५.७६.४) ॥१६४॥ | |||
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| verse_lines = ‘अस्मिन् युद्धे भीमसेन त्वयि भारः समाहितः ।;धूरर्जुनेन वोढव्या वोढव्य इतरो जनः’ (महा. ५.७६.१८ )॥१६५॥ | |||
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| verse_lines = उक्तं पुराणे ब्रह्माण्डे ब्रह्मणा नारदाय च ।;‘यस्याः प्रसादात् परमं विदन्ति शेषः सुपर्णो गिरिशः सुरेन्द्रः ।;माता च यैषां प्रथमैव भारती सा द्रौपदी नाम बभूव भूमौ ॥१६६॥ | |||
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| verse_lines = या मारुताद् गर्भमधत्त पूर्वं शेषं सुपर्णं गिरीशं सुरेन्द्रम् ।;चतुर्मुखाभांश्चतुरः कुमारान् सा द्रौपदी नाम बभूव भूमौ’ ॥१६७॥ | |||
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| verse_lines = ‘यस्याधिको बले नास्ति भीमसेनमृते(भीममेकमृते) क्वचित् ।;न विज्ञाने न च ज्ञान एष रामः स लाङ्गली’ ॥१६८॥ | |||
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| verse_lines = ‘यस्य न प्रतियोद्धाऽस्ति भीमेमेकमृते क्वचित् ।;अन्विष्यापि त्रिलोकेषु स एष मुसलायुधः’ ॥१६९॥ | |||
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| verse_lines = तथा युधिष्ठिरेणैव भीमाय समुदीरितम् ।;‘अनुज्ञातो रौहिणेयात् त्वया चैवापराजित । सर्वविद्यासु बीभत्सुः कृष्णेन च महात्मना ॥१७०॥ | |||
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| verse_lines = अन्वेष रौहिणेयं च त्वां च भीमापराजितम् ।;वीर्ये शौर्येऽपि वा नान्यस्तृतीयः फल्गुनादृते’ ॥१७१॥ | |||
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| verse_lines = तथैव द्रौपदीवाक्यं वासुदेवं प्रतीरितम् ।;‘अधिज्यमपि यत् कर्तुं शक्यते नैव गाण्डिवम् ।;अन्यत्र भीमपार्थाभ्यां भवतश्च जनार्दन’ ॥१७२॥ | |||
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| verse_lines = तथैवान्यत्र वचनं कृष्णद्वैपायनेरितम् ।;‘द्वावेव पुरुषौ लोके वासुदेवादनन्तरौ ।;भीमस्तु प्रथमस्तत्र द्वितीयो द्रौणिरेव च ॥१६८॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादुक्तक्रमेणैव पुरुषोत्तमता हरेः ।;अनौपचारिकी सिद्धा ब्रह्मता च विनिर्णयात् ॥१७६॥ | |||
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| verse_lines = पूर्णप्रज्ञकृतेयं सङ्क्षेपादुद्धृतिः सुवाक्यानाम् । श्रीमद्भारतगानां विष्णोः पूर्णत्वनिर्णयायैव ॥१७७॥ | |||
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| verse_lines = स प्रीयतां परतमः परमादनन्तः सन्तारकः सततसंसृतिदुस्तरार्णात् । यत्पादपद्ममकरन्दजुषो हि पार्थाः स्वाराज्यमापुरुभयत्र सदा विनोदात् ॥१७८॥ | |||
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<span id="gr-C3" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="तृतीयोऽध्यायः"></span> | |||
== तृतीयोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ जयत्यजोऽखण्डगुणोरुमण्डलः सदोदितो ज्ञानमरीचिमाली ।;स्वभक्तहार्दोच्चतमोनिहन्ता व्यासावतारो हरिरात्मभास्करः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = जयत्यजोऽक्षीणसुखात्मबिम्बः स्वैश्वर्यकान्तिप्रततः सदोदितः ।;स्वभक्तसन्तापदुरिष्टहन्ता रामावतारो हरिरीशचन्द्रमाः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = जयत्यसङ्ख्योरुबलाम्बुपूरो गुणोच्चरत्नाकर आत्मवैभवः ।;सदा सदात्मज्ञनदीभिराप्यः कृष्णावतारो हरिरेकसागरः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = ‘नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।;देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरये’ ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = जयो नामेतिहासोऽयं कृष्णद्वैपायनेरितः ।;वायुर्नरोत्तमो नाम देवीति श्रीरुदीरिता ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = नारायणो व्यास इति वाच्यवक्तृस्वरूपकः ।;एकः स भगवानुक्तः साधकेशो नरोत्तमः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = उपसाधको नरश्चोक्तो देवी भाग्यात्मिका नृणाम् ।;सरस्वती वाक्यरूपा तस्मान्नम्या हि तेऽखिलाः ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = सर्वस्य निर्णयसुवाक्यसमुद्धृती तु स्वाध्याययोर्हरिपदस्मरणेन कृत्वा ।;आनन्दतीर्थवरनामवती तृतीया (भौ) भैमी तनुर्मरुत आह कथाः परस्य ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = व्यूढश्चतुर्धा भगवान् स एको मायां श्रियं सृष्टिविधित्सयाऽऽर ।;रूपेण पूर्वेण स वासुदेवनाम्ना विरिञ्चं सुषुवे च साऽतः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = सङ्कर्षणाच्चापि जयातनूजो बभूव साक्षाद्बलसंविदात्मा ।;वायुर्य एवाथ विरिञ्चनामा भविष्य आद्यो न परस्ततो हि ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = सूत्रं स वायुः पुरुषो विरिञ्चः प्रद्युम्नतश्चाथ कृतौ स्त्रियौ द्वे ।;प्रजज्ञतुर्यमळे तत्र पूर्वा प्रधानसञ्ज्ञा प्रकृतिर्जनित्री ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = श्रद्धा द्वितीयाऽथ तयोश्च योगो बभूव पुंसैव च सूत्रनाम्ना ।;हरेर्नियोगादथ सम्प्रसूतौ शेषः सुपर्णश्च तयोः सहैव ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = शेषस्तयोरेव हि जीवनामा कालात्मकः सोऽथ सुपर्ण आसीत् ।;तौ वाहनं शयनं चैव विष्णोः काला जयाद्याश्च तत प्रसूताः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = काला जयाद्या अपि विष्णुपार्षदा यस्मादण्डात् परतः सम्प्रसूताः ।;नीचाः सुरेभ्यस्तत एव तेऽखिला विष्वक्सेनो वायुजः खेन तुल्यः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = व्यूहात्तृतीयात्पुनरेव विष्णोर्देवांश्चतुर्वर्णगतान् समस्तान् ।;सङ्गृह्य बीजात्मतयाऽनिरुद्धो न्यधत्त शान्त्यां त्रिगुणात्मिकायाम् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = ततो महत्तत्त्वतनुर्विरिञ्चः स्थूलात्मनैवाजनि वाक् च देवी ।;तस्यामहङ्कारतनुं स रुद्रं ससर्ज बुद्धिं च तदर्द्धदेहाम् ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = बुद्ध्यामुमायां स शिवस्त्रिरूपो मनश्च वैकारिकदेवसङ्घान् ।;दशेन्द्रियाण्येव च तैजसानि क्रमेण खादीन् विषयैश्च सार्द्धम् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = पुंसः प्रकृत्यां च पुनर्विरिञ्चाच्छिवोऽथ तस्मादखिलाः सुरेशाः ।;जाताः सशक्राः पुनरेव सूत्राच्छ्रद्धा सुतानाप सुरप्रवीरान् ।;शेषं शिवं चेन्द्रमथेन्द्रतश्च सर्वे सुरा यज्ञगणाश्च जाताः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च माया त्रिविधा बभूव सत्त्वादिरूपैरथ वासुदेवात् ।;सत्त्वात्मिकायां स बभूव तस्मात् स विष्णुनामैव निरन्तरोऽपि ।;रजस्तनौ चैव विरिञ्च आसीत् तमस्तनौ शर्व इति त्रयोऽस्मात् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = एते हि देवाः पुनरण्डसृष्टावशक्नुवन्तो हरिमेत्य तुष्टुवुः ।;त्वन्नो जगच्चित्रविचित्रसर्गनिस्सीमशक्तिः कुरु सन्निकेतम् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = इति स्तुतस्तैः पुरुषोत्तमोऽसौ स विष्णुनामा श्रियमाप सृष्टये ।;सुषाव सैवाण्डमधोक्षजस्य शुष्मं हिरण्यात्मकमम्बुमध्ये ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् प्रविष्टा हरिणैव सार्द्धं सर्वे सुरास्तस्य बभूव नाभेः ।;लोकात्मकं पद्मममुष्य मध्ये पुनर्विरिञ्चोऽजनि सद्गुणात्मा ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् पुनः सर्वसुराः प्रसूतास्ते जायमाना अपि निर्णयाय ।;निस्सृत्य कायादुत पद्मयोनेः सम्प्राविशन् क्रमशो मारुतान्ताः ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = पपात वायोर्गमनाच्छरीरं तस्यैव चावेशत उत्थितं पुनः ।;तस्मात् स एको विबुधप्रधान इत्याश्रिता देवगणास्तमेव । ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = हरेर्विरिञ्चस्य च मध्यसंस्थितेस्तदन्यदेवाधिपतिः स मारुतः ।;ततो विरिञ्चो भुवनानि सप्त ससप्तकान्याशु चकार सोऽब्जात् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = अग्रे शिवोऽहं भव एव बुद्धेरुमा मनोजौ सह शक्रकामौ ।;गुरुर्मनुर्दक्ष उतानिरुद्धः सहैव (पश्चान्) शच्या मनसः प्रसूताः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_lines = चक्षुःश्रुतिभ्यां स्पर्शात्सहैव रविः शशी धर्म इमे प्रसूताः ।;जिह्वाभवो वारिपतिर्नसोश्च नासत्यदस्रौ क्रमशः प्रसूताः ।;ततः सनाद्याश्च मरीचिमुख्या देवाश्च सर्वे क्रमशः प्रसूताः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_lines = उक्तक्रमात् पूर्वभवस्तु यो यः श्रेष्ठः स स ह्यासुरकानृते च ।;पूर्वश्च (पूर्वस्तु) पश्चात् पुनरेव जातो नाश्रेष्ठतामेति कथञ्चिदस्य ।;गुणास्तु कालात् पितृमातृदोषात् स्वकर्मतो वाऽभिभवं प्रयान्ति ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = लयो भवेद् व्युत्क्रमतो हि तेषां ततो हरिः प्रलये श्रीसहायः ।;शेते निजानन्दममन्दसान्द्रसन्दोहमेकोऽनुभवन्ननन्तः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तशीर्षास्यकरोरुपादः सोऽनन्तमूर्तिः स्वगुणाननन्तान् ।;अनन्तशक्तिः परिपूर्णभोगो भुञ्जन्नजस्रं निजरूप आस्ते ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = एवं पुनः सृजते सर्वमेतदनाद्यनन्तो हि जगत्प्रवाहः ।;नित्या हि (श्च) जीवाः प्रकृतिश्च नित्या कालश्च नित्यः किमु देवदेवः ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = यथा समुद्रात् सरितः प्रजाताः पुनस्तमेव प्रविशन्ति शश्वत् ।;एवं हरेर्नित्यजगत्प्रवाहस्तमेव चासौ प्रविशत्यजस्रम् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = एवं विदुर्ये परमामनन्तामजस्य शक्तिं पुरुषोत्तमस्य ।;तस्य प्रसादादथ दग्धदोषास्तमाप्नुवन्त्याशु परं सुरेशम् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च मारीचत एव देवाः जाता आदित्यामसुराश्च दित्याम् ।;गावो मृगाः पक्ष्युरगादिसत्त्वा दाक्षायणीष्वेव समस्तशोऽपि ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = (हतो) ततो हिरण्याक्ष उदारविक्रमो दितेः सुतो योऽवरजः सुरार्थे ।;धात्रार्थितेनैव वराहरूपिणा धरोद्धृतौ पूर्वहतोऽब्जजोद्भवः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = अथो विधातुर्मुखतो विनिःसृतान् वेदान् हयास्यो जगृहेऽसुरेन्द्रः ।;निहत्य तं मत्स्यवपुर्जुगोप मनुं मुनींस्तांश्च ददौ विधातुः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = मन्वन्तरप्रलये मत्स्यरूपो विद्यामदान्मनवे देवदेवः ।;वैवस्वतायोत्तमसंविदात्मा विष्णोः स्वरूपप्रतिपत्तिरूपाम् ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = अथो दितेर्ज्येष्ठसुतेन शश्वत् प्रपीडिता ब्रह्मवरात् सुरेशाः ।;हरिं विरिञ्चेन सहोपजग्मुर्दौरात्म्यमस्यापि शशंसुरस्मै ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = अभिष्टुतस्तैर्हरिरुग्रवीर्यो नृसिंहरूपेण स आविरासीत् ।;हत्वा हिरण्यं च सुताय तस्य दत्वाऽभयं देवगणानतोषयत् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = सुरासुराणामुदधिं विमथ्नतां दधार पृष्ठेन गिरिं स मन्दरम् ।;वरप्रदानादपरैरधार्यं हरस्य कूर्मो बृहदण्डवोढा ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = वरादजेयत्वमवाप दैत्यराट् चतुर्मुखस्यैव बलिर्यदा तदा ।;अजायतेन्द्रावरजोऽदितेः सुतो महानजोऽप्यब्जभवादिसंस्तुतः ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = ‘स वामनात्माऽसुरभूभृतोऽध्वरं जगाम गां सन्नमयन् पदे पदे ।;जहार चास्माच्छलतस्त्रिविष्टपं त्रिभिः क्रमैस्तच्च ददौ निजाग्रजे’ ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = पितामहेनास्य पुरा हि (भि) याचितो बलेः कृते केशव आह यद्वचः ।;नायाञ्चयाऽहं प्रतिहन्मि तं बलिं शुभाननेत्येव ततोऽभ्ययाचत ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = बभूविरे चन्द्रललामतो वरात् पुरा ह्यजेया असुरा धरातले ।;तैरर्दिता वासवनायकाः सुराः पुरो निधायाब्जजमस्तुवन् हरिम् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = विरिञ्चसृष्टैर्नितरामवध्यौ वराद् विधातुर्दितिजौ हिरण्यकौ ।;तथा हयग्रीव उदारविक्रमस्त्वया हता ब्रह्मपुरातनेन ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = स चासुरान् रुद्रवरादवध्यानिमान् समस्तैरपि देवदेव ।;निःसीमशक्त्यैव निहत्य सर्वान् हृदम्बुजे नो निवसाथ शश्वत् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादरोक्तस्त्रिदशैरजेयः स शार्ङ्गधन्वाऽथ भृगूद्वहोऽभूत् ।;रामो निहत्यासुरपूगमुग्रं (न) ह्रदाननादिर्विदधेऽसृजैव ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = ततः पुलस्त्यस्य कुले प्रसूतौ तावादिदैत्यौ जगदेकशत्रू ।;परैरवध्यौ वरतः पुरा हरेः सुरैरजेयौ च वराद्विधातुः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = सर्वैरजेयः स च कुम्भकर्णः पुरातने जन्मनि धातुरेव ।;वरान्नरादीनृत एव रावणस्तदातनात्तौ त्रिदशानबाधताम् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = तदाऽब्जजं शूलिनमेव चाग्रतो निधाय देवाः पुरुहूतपूर्वकाः ।;पयोम्बुधौ भोगिपभोगशायिनं समेत्य योग्यां स्तुतिमभ्ययोजयन् ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = त्वमेक ईशः परमः स्वतन्त्रस्त्वमादिरन्तो जगतो नियोक्ता ।;त्वदाज्ञयैवाखिलमम्बुजोद्भवा वितेनिरेऽग्र्याश्चरमाश्च येऽन्ये ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = मनुष्यमानात् त्रिशतं सषष्टिकं दिवौकसामेकमुशन्ति वत्सरम् ।;द्विषट्सहस्रैरपि तैश्चतुर्युगं त्रेतादिभिः पादश एव हीनैः ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = सहस्त्रवृत्तं तदहः स्वयम्भुवो निशा च तन्मानमितं शरच्छतम् ।;त्वदाज्ञया स्वाननुभूय भोगानुपैति सोऽपि त्वरितस्त्वदन्तिकम् ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = त्वया पुरा कर्णपुटाद्विनिर्मितौ महासुरौ तौ मधुकैटभाख्यौ ।;प्रभञ्जनावेशवशात् (तवाऽज्ञया) त्वदाज्ञया बलोद्धतावाशु जलेऽभ्यवर्धताम् (व्यवर्धताम्)॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = त्वदाज्ञया ब्रह्मवरादवध्यौ चिक्रीडिषासम्भवया (मुखोद्गतान्) मुखोद्गतौ ।;स्वयम्भुवो वेदगणानहार्षतां तदाऽभवस्त्वं हयशीर्ष ईश्वरः ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = आहृत्य वेदानखिलान् प्रदाय स्वयम्भुवे तौ च जघन्थ दस्यू ।;निष्पीड्य तावूरुतळे कराभ्यां तन्मेदसैवाऽशु चकर्थ मेदिनीम् ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = एवं सुराणां च निसर्गजं बलं तथाऽसुराणां वरदानसम्भवम् ।;वशे तवैतद्द्वयमप्यतो वयं निवेदयामः पितुरेव तेऽखिलम् ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = इमौ च रक्षोऽधिपती विरोद्धतौ जहि स्ववीर्येण नृषु प्रभूतः ।;इतीरिते तैरखिलैः सुरेश्वरैर्बभूव रामो जगतीपतिः प्रभुः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = स कश्यपस्यादितिगर्भजन्मनो विवस्वतस्तन्तुभवस्य भूभृतः ।;गृहे दशस्यन्दननामिनोऽभूत् कौसल्यकानाम्नि तदर्थिनेष्टः ॥ ६५ ॥ | |||
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| verse_lines = तदाज्ञया देवगणा बभूविरे पुरैव पश्चादपि तस्य भूम्नः ।;निषेवणायोरुगुणस्य वानरेष्वथो नरेष्वेव च पश्चिमोद्भवाः ॥ ६६ ॥ | |||
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| verse_lines = स देवतानां प्रथमो गुणाधिको बभूव नाम्ना हनुमान् प्रभञ्जनः ।;स्वसम्भवः केसरिणो गृहे प्रभुर्बभूव वाली स्वत एव वासवः ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = य एव सूर्यात् पुनरेव संज्ञया नाम्ना यमो दक्षिणदिक्प आसीत् ।;स जाम्बवान् दैवतकार्यदर्शिना पुरैव सृष्टो मुखतः स्वयम्भुवा ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मोद्भवः सोम उतास्य सूनोरत्रेरभूत् सोऽङ्गद एव जातः ।;बृहस्पतिस्तार उतो शची च शक्रस्य भार्यैव बभूव तारा ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = बृहस्पतिर्ब्रह्मसुतोऽपि पूर्वं सहैव शच्या मनसोऽभिजातः ।;ब्रह्मोद्भवस्याङ्गिरसः सुतोऽभून्मारीचजस्यैव शची पुलोम्नः ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = स एव शच्या सह वानरोऽभूत् स्वयम्भुवो देवगुरुर्बृहस्पतिः ।;अभूत् सुषेणो वरुणोऽश्विनौ च बभूवतुस्तौ विविदश्च मैन्दः ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मोद्भवौ तौ पुनरेव सूर्याद् बभूवतुस्तत्र कनीयसस्तु ।;आवेश ऐन्द्रो वरदानतोऽभूत् ततो बलीयान् विविदो हि मैन्दात् ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = नीलोऽग्निरासीत् कमलोद्भवोत्थः कामः पुनः श्रीरमणाद् रमायाम् ।;प्रद्युम्ननामाऽभवदेवमीशात् स स्कन्दतामाप स चक्रतां च ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं हरेश्चक्रमभूद्धि दुर्गा तमःस्थिता श्रीरिति यां वदन्ति ।;सत्त्वात्मिका शङ्खमथो रजस्था भूर्नामिका पद्ममभूद्धरेर्हि ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा शार्ङ्गं च विद्येति रमैव खड्गः ।;दुर्गात्मिका सैव च चर्मनाम्नी पञ्चात्मको मारुत एव बाणाः ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = एवं स्थितेष्वेव पुरातनेषु वराद् रथाङ्गत्वमवाप कामः ।;तत्सूनुतामाप च सोऽनिरुद्धो ब्रह्मोद्भवः शङ्खतनुः पुमात्मा ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = तावेव जातौ भरतश्च नाम्ना शत्रुघ्न इत्येष च रामतोऽनु ।;पूर्वं सुमित्रातनयश्च शेषः स लक्ष्मणो नाम रघूत्तमादनु ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = कौसल्यकापुत्र उरुक्रमोऽसावेकस्तथैको भरतस्य मातुः ।;उभौ सुमित्रातनयौ नृपस्य चत्वार एते ह्यमरोत्तमाः सुताः ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = सङ्कर्षणाद्यैस्त्रिभिरेव रूपैराविष्ट आसीत् त्रिषु तेषु विष्णुः ।;इन्द्रोऽङ्गदे चैव ततोऽङ्गदो हि बली नितान्तं स बभूव शश्वत् ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = येऽन्ये च भूपाः कृतवीर्यजाद्याः बलाधिकाः सन्ति सहस्रशोऽपि ।;सर्वे हरेः सन्निधिभावयुक्ताः धर्मप्रधानाश्च गुणप्रधानाः ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादिकल्पोत्थित एष सर्गो मया समस्तागमनिर्णयात्मकः ।;सहानुसर्गः कथितोऽत्र पूर्वो यो यो गुणैर्नित्यमसौ वरो हि ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = पाश्चात्त्यकल्पेष्वपि सर्गभेदाः श्रुतौ पुराणेष्वपि चान्यथोक्ताः ।;नोत्कर्षहेतुः प्रथमत्वमेषु विशेषवाक्यैरवगम्यमेतत् ॥ ८४॥ | |||
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<span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थोऽध्यायः"></span> | |||
== चतुर्थोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ अथाभ्यवर्धंश्चतुराः कुमारा नृपस्य गेहे पुरुषोत्तमाद्याः ।;नित्यप्रवृद्धस्य च तस्य वृद्धिरपेक्ष्य लोकस्य हि मन्ददृष्टिम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = निरीक्ष्य नित्यं चतुरः कुमारान् पिता मुदं सन्ततमाप चोच्चम् ।;विशेषतो राममुखेन्दुबिम्बमवेक्ष्य राजा कृतकृत्य आसीत् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = तन्मातरः पौरजना अमात्या अन्तःपुरा वैषयिकाश्च सर्वे ।;अवेक्षमाणाः परमं पुमांसं स्वानन्दतृप्ता इव सम्बभूवुः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = ततः सुवंशे शशिनः प्रसूतो गाधीति शक्रस्तनुजोऽस्य चाऽसीत् ।;वरेण विप्रत्वमवाप योऽसौ विश्वस्य मित्रं स इहाऽजगाम ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = तेनार्थितो यज्ञरिरक्षयैव कृच्छ्रेण पित्राऽस्य भयाद्विसृष्टः ।;जगाम रामः सह लक्ष्मणेन सिद्धाश्रमं सिद्धजनाभिवन्द्यः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = अनुग्रहार्थं स ऋषेरवाप सलक्ष्मणोऽस्त्रं मुनितो हि केवलम् ।;ववन्दिरे ब्रह्ममुखाः सुरेशास्तमस्त्ररूपाः प्रकटाः समेत्य ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = अथो जघानाऽऽशु शरेण ताटकां वराद् विधातुस्तदनन्यवध्याम् ।;ररक्ष यज्ञं च मुनेर्निहत्य सुबाहुमीशानगिरा विमृत्युम् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = शरेण मारीचमथार्णवेऽक्षिपद् वचो विरिञ्चस्य तु मानयानः ।;अवध्यता तेन हि तस्य दत्ता जघान चान्यान् रजनीचरानथ ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = तदा विदेहेन सुतास्वयंवरो विघोषितो दिक्षु विदिक्षु सर्वशः ।;निधार्य तद् गाधिसुतानुयायी ययौ विदेहाननुजानुयातः ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = अथो अहल्यां पतिनाऽभिशप्तां प्रधर्षणादिन्द्रकृताच्छिलीकृताम् ।;स्वदर्शनान्मानुषतामुपेतां सुयोजयामास स गौतमेन ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = बलं स्वभक्तेरधिकं प्रकाशयन्ननुग्रहं च त्रिदशेष्वतुल्यम् ।;अनन्यभक्तां च सुरेशकाङ्क्षया विधाय नारीं प्रययौ तयाऽर्चितः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = श्यामावदाते जगदेकसारे स्वनन्तचन्द्राधिककान्तिकान्ते ।;सहानुजे कार्मुकबाणपाणौ पुरीं प्रविष्टे तुतुषुर्विदेहजाः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = पपुर्नितान्तं सरसाक्षिभृङ्गैर्वराननाब्जं पुरुषोत्तमस्य ।;विदेहनारीनरवर्यसङ्घा यथा महापौरुषिकास्तदङ्घ्रिम् (महापूरुषिकास्तदङ्घ्रिम्) ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = तथा विदेहः प्रतिलभ्य रामं सहस्रनेत्रावरजं गविष्ठम् ।;समर्चयामास सहानुजं तमृषिं च साक्षाज्ज्वलनप्रकाशम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = मेने च जामातरमात्मकन्यागुणोचितं रूपनवावतारम् ।;उवाच चास्मै ऋषिरुग्रतेजाः कुरुष्व जामातरमेनमाश्विति ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = स आह चैनं परमं वचस्ते करोमि नात्रास्ति विचारणा मे ।;शृणुष्व मेऽथापि यथा प्रतिज्ञा सुताप्रदानाय कृता पुरस्तात् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = तपो मया चीर्णमुमापतेः पुरा वरायुधावाप्तिधृतेन चेतसा ।;स मे ददौ दिव्यमिदं धनुस्तदा कथञ्चनाचाल्यमृते पिनाकिनम् ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = न देवदैत्योरगदेवगायका अलं धनुश्चालयितुं सवासवाः ।;कुतो नरास्तद्वरतो हि किङ्कराः सहानसैवात्र कृषन्ति कृच्छ्रतः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = अधार्यमेतद्धनुराप्य शङ्करादहं नृणां वीर्यपरीक्षणे धृतः ।;सुतार्थमेतां चकर प्रतिज्ञां ददामि कन्यां य इदं हि पूरयेत् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितां मे गिरमभ्यवेत्य दितेः सुता दानवयक्षराक्षसाः ।;समेत्य भूपाश्च समीपमाशु प्रगृह्य तच्चालयितुं न शेकुः ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = संस्विन्नगात्राः परिवृत्तनेत्राः दशाननाद्याः पतिता विमूर्छिताः ।;तथाऽपि मां धर्षयितुं न शेकुः सुताकृते ते वचनात्स्वयम्भुवः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = पुरा हि मेऽदात् प्रभुरब्जजो वरं प्रसादितो मे तपसा कथञ्चन ।;बलान्न ते कश्चिदुपैति कन्यकां तदिच्छुभिस्ते न च धर्षणेति ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु ते नष्टमदा इतो गताः समस्तशो ह्यस्तन एव पार्थिवाः ।;ततो ममायं प्रतिपूर्य मानसं वृणोतु कन्यामयमेव मेऽर्थितः ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = तथेति चोक्ते मुनिना स किङ्करैरनन्तभोगोपममाश्वथाऽनयत् ।;समीक्ष्य तद्वामकरेण राघवः सलीलमुद्धृत्य हसन्नपूरयत् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = विकृष्यमाणं तदनन्तराधसा परेण निःसीमबलेन लीलया ।;अभज्यतासह्यममुष्य तद्बलं प्रसोढुमीशं कुत एव तद्भवेत् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = स मध्यतस्तत् प्रविभज्य लीलया यथेक्षुदण्डं शतमन्युकुञ्जरः ।;विलोकयन् वक्त्रमृषेरवस्थितः सलक्ष्मणः पूर्णतनुर्यथा शशी ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = तमब्जनेत्रं पृथुतुङ्गवक्षसं श्यामावदातं चलकुण्डलोज्ज्वलम् ।;शशक्षतोत्थोपमचन्दनोक्षितं ददर्श विद्युद्वसनं नृपात्मजा ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = अथो कराभ्यां प्रतिगृह्य मालामम्लानपद्मां जलजायताक्षी ।;उपेत्य मन्दं ललितैः पदैस्तां तदंस आसज्य च पार्श्वतोऽभवत्(पार्श्वतोऽभूत्) ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = ततः प्रमोदो नितरां जनानां विदेहपुर्यामभवत् समन्तात् ।;रामं समालोक्य नरेन्द्रपुत्र्या समेतमानन्दनिधिं परेशम् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = लक्ष्म्या समेते प्रकटं रमेशे सम्प्रेषयामास तदाऽऽशु पित्रे ।;‘विदेहराजो दशदिग्रथाय स तन्निशम्याऽशु तुतोष भूमिपः’ ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽत्मजाभ्यां सहितः सभार्यो ययौ गजस्यन्दनपत्तियुक्तया ।;स्वसेनयाऽग्रे प्रणिधाय धातृजं वसिष्ठमाश्वेव स यत्र मैथिलः ॥ ३१॥(भा\.पु\. ७\.८\.३६) | |||
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| verse_lines = स मैथिलेनातितरां समर्चितो विवाहयामास सुतं मुदम्भरः ।;पुरोहितो गाधिसुतानुमोदितो जुहाव वह्निं विधिना वसिष्ठः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = तदा विमानावलिभिर्नभस्तलं दिदृक्षतां सङ्कुलमास नाकिनाम् ।;सुरानका दुन्दभयो विनेदिरे जगुश्व गन्धर्ववराः सहस्रशः ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = विजानमाना जगतां हि मातरं पुराऽर्थितुं नाऽययुरत्र देवताः ।;तदा तु रामं रमया युतं प्रभुं दिदृक्षवश्चक्रुरलं नभस्तलम् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = यथा पुरा सागरजास्वयंवरे सुमानसानामभवत्समागमः ।;तथा ह्यभूत्सर्वदिवौकसां तदा तथा मुनीनां सहभूभृतां भुवि ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = प्रगृह्य पाणिं च नृपात्मजाया रराज राजीवसमाननेत्रः ।;यथा पुरा सागरजासमेतः सुरासुराणाममृताब्धिमन्थने ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = स्वलङ्कृतास्तत्र विचेरुरङ्गना विदेहराजस्य च या हि योषितः ।;मुदा समेतं रमया रमापतिं विलोक्य रामाय ददौ धनं नृपः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = प्रियाणि वस्त्राणि रथान् सकुञ्जरान् परार्द्ध्यरत्नान्यखिलस्य चेशितुः ।;ददौ च कन्यात्रयमुत्तमं मुदा तदा स रामावरजेभ्य एव च ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = अजानतां राघवमादिपूरुषं समागतं ज्ञापयितुं निदर्शनैः ।;समाह्वयन्तं रघुपं स्पृधेव नृपो ययाचे प्रणिपत्य भीतः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = न मे सुतं हन्तुमिहार्हसि प्रभो वयोगतस्येत्युदितः स भार्गवः ।;सुतत्रयं ते प्रददामि राघवं रणे स्थितं द्रष्टुमिहाऽऽगतोऽस्म्यहम् ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = स इत्थमुक्त्वा नृपतिं रघूत्तमं भृगूत्तमः प्राह निजां तनुं हरिः ।;अभेदमज्ञेष्वपि दर्शयन् परं पुरातनोऽहं हरिरेष इत्यपि ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = शृणुष्व राम त्वमिहोदितं मया धनुर्द्वयं पूर्वमभून्महाद्भुतम् ।;उमापतिस्त्वेकमधारयत् ततो रमापतिश्चापरमुत्तमोत्तमम् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = तदा तु लोकस्य निदर्शनार्थिभिः समर्थितौ तौ हरिशङ्करौ सुरैः ।;रणस्थितौ वां प्रसमीक्षितुं वयं समर्थयामोऽत्र निदर्शनार्थिनः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = ततो हि युद्धाय रमेशशङ्करौ व्यवस्थितौ तौ धनुषी प्रगृह्य ।;यतोऽन्तरस्यैष नियामको हरिस्ततो हरोऽग्रेऽस्य शिलोपमोऽभूत् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = शशाक नैवाथ यदाऽभिवीक्षितुं प्रस्पन्दितुं वा कुत एव योद्धुम् ।;शिवस्तदा देवगणास्समस्ताः शशंसुरुच्चैर्जगतो हरेर्बलम् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = यदीरणेनैव विनैष शङ्करः शशाक न प्रश्वसितुं च केवलम् ।;किमत्र वक्तव्यमतो हरेर्बलं हरात् परं सर्वत एव चेति ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = ततः प्रणम्याऽऽशु जनार्दनं हरः प्रसन्नदृष्ट्या हरिणाऽभिवीक्षितः ।;जगाम कैलासममुष्य तद्धनुस्त्वया प्रभग्नं किल लोकसन्निधौ ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = धनुर्यदन्यद्धरिहस्तयोग्यं तत्कार्मुकात् कोटिगुणं पुनश्च ।;वरं हि हस्ते तदिदं गृहीतं मया गृहाणैतदतो हि वैष्णवम् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = यदीदमागृह्य विकर्षसि त्वं तदा हरिर्नात्र विचार्यमस्ति ।;इति ब्रुवाणः प्रददौ धनुर्वरं प्रदर्शयत् विष्णुबलं हराद्वरम् ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = प्रगृह्य तच्चापवरं स राघवश्चकार सज्यं निमिषेण लीलया ।;चकर्ष सन्धाय शरं च पश्यतः समस्तलोकस्य च संशयं नुदन् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = प्रदर्शिते विष्णुबले समस्ततो हराच्च निःसङ्ख्यतया महाधिके ।;जगाद मेघौघगभीरया गिरा स राघवं भार्गव आदिपूरुषः ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = अलं बलं ते जगतोऽखिलाद्वरं परोऽसि नारायण एव नान्यथा ।;विसर्जयस्वेह शरं तपोमये महासुरे लोकमये वराद्विभोः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = पुरोऽतुलो नाम महासुरोऽभवद् वरात् स तु ब्रह्मण आप लोकताम् ।;पुनश्च तं प्राह जगद्गुरुर्यदा हरिर्जितः स्याद्धि तदैव वध्यसे ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = अतो वधार्थं जगदन्तकस्य सर्वाजितोऽहं जितवद् व्यवस्थितः ।;इतीरिते लोकमये स राघवो मुमोच बाणं जगदन्तकेऽसुरे ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = पुरा वरोऽनेन शिवोपलम्भितो मुमुक्षया विष्णुतनुप्रवेशनम् ।;स तेन रामोदरगो बहिर्गतस्तदाज्ञयैवाऽऽशु बभूव भस्मसात् ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = इतीव रामाय स राघवः शरं विकर्षमाणो विनिहत्य चासुरम् ।;तपस्तदीयं प्रवदन् मुमोद तदीयमेव ह्यभवत् समस्तम् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = निरन्तरानन्तविबोधसारः स जानमानोऽखिलमादिपूरुषः ।;वदञ्छृणोतीव विनोदतो हरिः स एक एव द्वितनुर्मुमोद ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = स चेष्टितं चैव निजाश्रयस्य जनस्य सत्तत्त्वविबोधकारणम् ।;विमोहकं चान्यतमस्य कुर्वन् चिक्रीड एकोऽपि नरान्तरे यथा ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = ततः स कारुण्यनिधिर्निजे जने नितान्तमैक्यं स्वगतं प्रकाशयन् ।;द्विधेव भूत्वा भृगुवर्य आत्मना रघूत्तमेनैक्यमगात् समक्षम् ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = समेत्य चैक्यं जगतोऽभिपश्यतः प्रणुद्य शङ्कामखिलां जनस्य ।;प्रदाय रामाय धनुर्वरं तदा जगाम रामानुमतो रमापतिः ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = ततो नृपोऽत्यर्थमुदाऽभिपूरितः सुतैः समस्तैः स्वपुरीमवाप ह ।;रेमेऽथ रामोऽपि रमास्वरूपया तयैव राजात्मजया हि सीतया ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = यथा पुरा श्रीरमणः श्रिया तया रतो नितान्तं हि पयोब्धिमध्ये ।;तथा त्वयोध्यापुरिगो रघूत्तमोऽप्युवास कालं सुचिरं रतस्तया ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = इमानि कर्माणि रघूत्तमस्य हरेर्विचित्राण्यपि नाद्भुतानि ।;दुरन्तशक्तेरथ चास्य वैभवं स्वकीयकर्तव्यतयाऽनुवर्ण्यते ॥ ६५॥ | |||
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<span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमोऽध्यायः"></span> | |||
== पञ्चमोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ इत्थं विश्वेश्वरेऽस्मिन्नखिलजगदवस्थाप्य सीतासहाये भूमिष्ठे सर्वलोकास्तुतुषुरनुदिनं वृद्धभक्त्यानितान्तम् ।;राजा राज्याभिषेके प्रकृतिजनवचो मानयन्नात्मनोऽर्थ्यं दध्रे तन्मन्थरायाः श्रुतिपथमगमद् भूमिगाया अलक्ष्म्याः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं क्षीराब्धिजाता कथमपि तपसैवाप्सरस्त्वं प्रयाता तां नेतुं तत्तमोऽन्धं कमलजनिरुवाचाऽऽशु रामाभिषेकम् ।;भूत्वा दासी विलुम्प स्वगतिमपि ततः कर्मणा प्राप्स्यसे त्वं सेत्युक्ता मन्थराऽऽसीत् तदनु कृतवत्येव चैतत् कुकर्म ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = तद्वाक्यात् कैकयी सा पतिगवरबलादाजहारैव राज्यं रामस्तद्गौरवेण त्रिदशमुनिकृतेऽरण्यमेवाऽविवेश ।;सीतायुक्तोऽनुजेन प्रतिदिनसुविवृद्धोरुभक्त्या समेतः संस्थाप्याशेषजन्तून् स्वविरहजशुचा त्यक्तसर्वेषणार्थान् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = वृक्षान् पक्षीभकीटान् पितरमथ सखीन् मातृपूर्वान् विसृज्य प्रोत्थां गङ्गांस्वपादाद्धर इव गुहेनार्चितः सोऽथ तीर्त्वा ।;देवार्च्यस्यापि पुत्रादृषिगणसहितात् प्राप्य पूजां प्रयातः शैलेशं चित्रकूटं कतिपयदिवसान्यत्र मोदन्नुवास ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = एतस्मिन्नेव काले दशरथनृपतिः स्वर्गतोऽभूद्वियोगाद् रामस्यैवाथ पुत्रौ विधिसुतसहितैर्मन्त्रिभिः केकयेभ्यः ।;आनीतौ तस्य कृत्वा श्रुतिगणविहितप्रेतकार्याणि सद्यः शोचन्तौ राममार्गं पुरजनसहितौ जग्मतुर्मातृभिश्च ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = धिक्कुर्वन्तौ नितान्तं सकलदुरितगां मन्थरां कैकयीं च प्राप्तौ रामस्य पादौ मुनिगणसहितौ तत्र चोवाच नत्वा ।;रामं राजीवनेत्रं भरत इह पुनः प्रीतयेऽस्माकमीश प्राप्याऽऽशु स्वामयोध्यामवरजसहितः पालयेमां धरित्रीम् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तः कर्तुमीशः सकलसुरगणाप्यायनं रामदेवः सत्यां कर्तुं च वाणीमवददतितरां नेति सद्भक्तिनम्रम् ।;भूयोभूयोऽर्थयन्तं द्विगुणितशरदां सप्तके त्वभ्यतीते कर्तैतत्ते वचोऽहं सुदृढमृतमिदं मे वचो नात्र शङ्का ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वैतद्रामवाक्यं हुतभुजि पतने स प्रतिज्ञां च कृत्वा रामोक्तस्यान्यथात्वे न तु परमभिवेक्ष्येऽहमित्येव तावत् ।;कृत्वाऽन्यां स प्रतिज्ञामवसदथ बहिर्ग्रामके नन्दिनाम्नि श्रीशस्यैवास्य कृत्वा शिरसि परमकं पौरटं पादपीठम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = समस्तपौरानुगतेऽनुजे गते स चित्रकूटे भगवानुवास ह ।;अथाऽजगामेन्द्रसुतोऽपि वायसो महासुरेणाऽत्मगतेन चोदितः ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = स चासुरावेशवशाद्रमास्तने यदा व्यधात्तुण्डमथाभिवीक्षितः ।;जनार्दनेनाऽऽशु तृणे प्रयोजिते चचार तेन ज्वलताऽनुयातः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = स्वयम्भुशर्वेन्द्रमुखान्सुरेश्वरान् जिजीविषुस्ताञ्छरणं गतोऽपि ।;बहिष्कृतस्तैर्हरिभक्तिभावतो ह्यलङ्घ्यशक्त्या परमस्य चाक्षमैः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = पुनः प्रयातः शरणं रघूत्तमं विसर्जितस्तेन निहत्य चासुरम् ।;तदक्षिगं साक्षिकमप्यवध्यं प्रसादतश्चन्द्रविभूषणस्य ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = स वायसानामसुरोऽखिलानां वरादुमेशस्य बभूव चाक्षिगः ।;निपातितोऽसौ सह वायसाक्षिभिस्तृणेन रामस्य बभूव भस्मसात् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = भविष्यतामप्यथ यावदेव द्विनेत्रता काककुलोद्भवानाम् ।;तावत्तदक्ष्यस्य कुरङ्गनाम्नः शिवेन दत्तं दितिजस्य चाक्षयम् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = अतः पुनर्भावममुष्य हिन्वन् भविष्यतश्चैकदृशश्चकार ।;स वायसान् राघव आदिपूरुषस्ततो ययौ शक्रसुतस्तदाज्ञया ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = रामोऽथ दण्डकवनं मुनिवर्यनीतो लोकाननेकश उदारबलैर्निरस्तान् ।;श्रुत्वा खरप्रभृतिभिर्वरतो हरस्य सर्वैरवध्यतनुभिः प्रययौ सभार्यः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = आसीच्च तत्र शरभङ्ग इति स्म जीर्णो लोकं हरेर्जिगमिषुर्मुनिरुग्रतेजाः ।;तेनाऽदरोपहृतसार्ध्यसपर्यया स प्रीतो ददौ निजपदं परमं रमेशः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = धर्मो यतोऽस्य वनगस्य नितान्तशक्तिह्रासे स्वधर्मकरणस्य हुताशनादौ ।;देहात्ययः स तत एव तनुं निजाग्नौ सन्त्यज्य रामपुरतः प्रययौ परेशम् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = रामोऽपि तत्र ददृशे धनदस्य शापाद् गन्धर्वमुर्वशिरतेरथ यातुधानीम् ।;प्राप्तं दशां सपदि तुम्बुरुनामधेयं नाम्ना विराधमपि शर्ववरादवध्यम् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = भङ्क्त्वाऽस्य बाहुयुगलं बिलगं चकार सम्मानयन् वचनमम्बुजजन्मनोऽसौ ।;प्रादाच्च तस्य सुगतिं निजगायकस्य भक्षार्थमंसकमितोऽपि सहानुजेन ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = प्रीतिं विधित्सुरगमद्भवनं निजस्य कुम्भोद्भवस्य परमादरतोऽमुना च ।;सम्पूजितो धनुरनेन गृहीतमिन्द्राच्छार्ङ्गं तदादिपुरुषो निजमाजहार ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = आत्मार्थमेव हि पुरा हरिणा प्रदत्तमिन्द्रे तदिन्द्र उत रामकरार्थमेव ।;प्रादादगस्त्यमुनये तदवाप्य रामो रक्षन् ऋषीनवसदेव स दण्डकेषु ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = काले तदैव खरदूषणयोर्बलेन रक्षःस्वसा पतिनिमार्गणतत्पराऽऽसीत् ।;व्यापादिते निजपतौ हि दशाननेन प्रामादिकेन विधिनाऽभिससार रामम् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = साऽनुज्ञयैव रजनीचरभर्तुरुग्रा भ्रातृद्वयेन सहिता वनमावसन्ती ।;रामं समेत्य भव मे पतिरित्यवोचद्भानुं यथा तम उपेत्य सुयोगकामम् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = तां तत्र हास्यकथया जनकासुताग्रे गच्छानुजं म इह मेति वचः स उक्त्वा ।;तेनैव दुष्टचरितां हि विकर्णनासां चक्रे समस्तरजनीचरनाशहेतोः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = तत्प्रेरितान् सपदि भीमबलान् प्रयातांस्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् ।;जघ्ने चतुर्दशसहस्रमवारणीयकोदण्डपाणिरखिलस्य सुखं विधातुम् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = दत्तेऽभये रघुवरेण महामुनीनां दत्ते भये च रजनीचरमण्डलस्य ।;रक्षःपतिः स्वसृमुखादविकम्पनाच्च श्रुत्वा बलं रघुपतेः परमाप चिन्ताम् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽऽशु कार्यमवमृश्य जगाम तीरे क्षेत्रं नदीनदपतेः श्रवणं धरित्र्याः ।;मारीचमत्र तपसि प्रतिवर्तमानं भीतं शराद्रघुपतेर्नितरां ददर्श ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = तेनार्थितः सपदि राघववञ्चनार्थे मारीच आह शरवेगममुष्य जानन् ।;शक्यो न ते रघुवरेण हि विग्रहोऽत्र जानामि संस्पर्शमस्य शरस्य पूर्वम् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवन्तमथ रावण आह खड्गं निष्कृष्य हन्मि यदि मे न करोषि वाक्यम् ।;तच्छुश्रुवान् भययुतोऽथ निसर्गतश्च पापो जगाम रघुवर्यसकाशमाशु ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = सम्प्राप्य हैममृगतां बहुरत्नचित्रः सीतासमीप उरुधा विचचार शीघ्रम् ।;निर्दोषनित्यवरसंविदपि स्म देवी रक्षोवधाय जनमोहकृते तथाऽऽह ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = देवेममाशु परिगृह्य च देहि मे त्वं क्रीडामृगं त्विति तयोदित एव रामः ।;अन्वक् ससार ह शरासनबाणपाणिर्मायामृगं निशिचरं निजघान जानन् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = तेनाऽहतः शरवरेण भृशं ममार विक्रुश्य लक्ष्मणमुरुव्यथया स पापः ।;श्रुत्वैव लक्ष्मणमचूचुददुग्रवाक्यैः सोऽप्याप रामपथमेव सचापबाणः ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = यां यां परेश उरुधैव करोति लीलां तां तां करोत्यनु तथैव रमापि देवी ।;नैतावताऽस्य परमस्य तथा रमाया दोषोऽणुरप्यनुविचिन्त्य उरुप्रभू यत् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = क्वाज्ञानमापदपि मन्दकटाक्षमात्रात् सर्गस्थितिप्रलयसंसृतिमोक्षहेतोः ।;देव्या हरेः किमु विडम्बनमात्रमेतद् विक्रीडतोः सुरनरादिदेव तस्मात् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = देव्याः समीपमथ रावण आससाद साऽदृश्यतामगमदप्यविषह्यशक्तिः ।;सृष्ट्वाऽऽत्मनः प्रतिकृतिं प्रययौ च शीघ्रं कैलासमर्चितपदा न्यवसच्छिवाभ्याम् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = तस्यास्तु तां प्रतिकृतिं प्रविवेश शक्रो देव्याश्च सन्निधियुतां व्यवहारसिद्ध्यै ।;आदाय तामथ ययौ रजनीचरेन्द्रो हत्वा जटायुषमुरुश्रमतो निरुद्धः ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = मार्गे व्रजन्तमभियाय ततो हनूमान् संवारितो रविसुतेन च जानमानः ।;दैवं तु कार्यमथ कीर्तिमभीप्समानो रामस्य नैनमहनद्वचनाद्धरेश्व ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = प्राप्यैव राक्षस उताऽऽत्मपुरीं स तत्र सीताकृतिं प्रतिनिधाय ररक्ष चाथ ।;रामोऽपि तत्तु विनिहत्य सुदुष्टरक्षः प्राप्याऽश्रमं स्वदयितां नहि पश्यतीव ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = अन्वेषमाण इव तं च ददर्श गृध्रं सीतां रिरक्षिषुमथो रिपुणा विशस्तम् ।;मन्दात्मचेष्टममुनोक्तमरेश्च कर्म श्रुत्वा मृतं तमदहत् स्वगतिं तथाऽदात् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = अन्यत्र चैव विचरन् सहितोऽनुजेन प्राप्तः करौ स सहसाऽथ कबन्धनाम्नः ।;धातुर्वरादखिलजायिन उज्झितस्य मृत्योश्च वज्रपतनादतिकुञ्चितस्य ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = छित्वाऽस्य बाहुयुगलं सहितोऽनुजेन तं पूर्ववत् प्रतिविधाय सुरेन्द्रभृत्यम् ।;नाम्ना दनुं त्रिजटयैव पुराऽभिजातं गन्धर्वमाशु च ततोऽपि तदर्चितोऽगात् ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा तमेव शबरी परमं हरिं च ज्ञात्वा विवेश दहनं पुरतोऽस्य तस्यै ।;प्रादात् स्वलोकमिममेव हि सा प्रतीक्ष्य पूर्वं मतङ्गवचनेन वनेऽत्र साऽभूत् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = शापाद् वराप्सरसमेव हि तां विमुच्य शच्या कृतात् पतिपुरस्त्वतिदर्पहेतोः ।;गत्वा ददर्श पवनात्मजमृश्यमूके स ह्येक एनमवगच्छति सम्यगीशम् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = देहेऽपि यत्र पवनोऽत्र हरिर्यतोऽसौ तत्रैव वायुरिति वेदवचः प्रसिद्धम् ।;‘कस्मिन् न्वहं’ त्विति तथैव हि सोऽवतारे तस्मात् स मारुतिकृते रविजं ररक्ष ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = एवं स कृष्णतनुरर्जुनमप्यरक्षद् भीमार्थमेव तदरिं रविजं निहत्य ।;पूर्वं हि मारुतिमवाप रवेः सुतोऽयं तेनास्य वालिनमहन् रघुपः प्रतीपम् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = एवं सुराश्च पवनस्य वशे यतोऽतः सुग्रीवमत्र तु परत्र च शक्रसूनुम् ।;सर्वे श्रिता हनुमतस्तदनुग्रहाय तत्रागमद् रघुपतिः सह लक्ष्मणेन ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = ‘यत्पादपङ्कजरजः शिरसा विभर्ति श्रीरब्जजश्च गिरिशः सह लोकपालैः’ ।;सर्वेश्वरस्य परमस्य हि सर्वशक्तेः किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = समागते तु राघवे प्लवङ्गमाः ससूर्यजाः ।;विपुप्लुवुर्भयार्दिता न्यवारयच्च मारुतिः (भा\.पु\. १०\.५८\.३८)॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = संस्थाप्याऽशु हरीन्द्रान् जानन् विष्णोर्गुणाननन्तान् सः ।;साक्षाद् ब्रह्मपिताऽसावित्येतेनास्य पादयोः पेते ॥ ५१॥ | |||
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== षष्ठोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ उत्थाप्य चैनमरविन्ददलायताक्षश्चक्राङ्कितेन वरदेन कराम्बुजेन ।;कृत्वा च संविदमनेन नुतोऽस्य चांसं प्रीत्याऽऽरुरोह स हसन् सह लक्ष्मणेन ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = आरोप्य चांसयुगळं भगवन्तमेनं तस्यानुजं च हनुमान् प्रययौ कपीन्द्रम् ।;सख्यं चकार हुतभुक्प्रमुखे च तस्य रामेण शाश्वतनिजार्तिहरेण शीघ्रम् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = वीक्ष्यैव तां निपतितामथ रामदेवः सोऽङ्गुष्ठमात्रचलनादतिलीलयैव ।;सम्प्रास्य योजनशतेऽथ तयैव चोर्वीं सर्वान् विदार्य दितिजानहनद्रसास्थान् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = शर्वप्रसादजबलाद्दितिजानवध्यान् सर्वान् निहत्य कुणपेन पुनश्च सख्या ।;भीतेन वालिबलतः कथितः स्म सप्तसालान् प्रदर्श्य दितिजान् सुदृढांश्च वज्रात् ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = एकैकमेषु स विकम्पयितुं समर्थः पत्राणि लोप्तुमपि तूत्सहते न शक्तः ।;विष्वक्स्थितान् यदि भवान् प्रतिभेत्स्यतीमानेकेषुणा तर्हि वालिवधे समर्थः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = जेतुं चतुर्गुणबलो हि पुमान् प्रभुः स्याद्धन्तुं शताधिकबलोऽतिबलं सुशक्तः ।;तस्मादिमान् हरिहयात्मजबाह्वलोप्यपत्रान् विभिद्य मम संशयमाशु भिन्धि ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽस्य वाक्यमवमृश्य दितेः सुतांस्तान् धातुर्वरादखिलपुम्भिरभेद्यरूपान् ।;ब्रह्मत्वमाप्तुमचलं तपसि प्रवृत्तानेकेषुणा सपदि तान् प्रबिभेद रामः ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = सन्धाय कार्मुकवरे निशिते तु बाणेऽथाऽकृष्य दक्षिणभुजेन तदा प्रमुक्ते ।;रामेण सत्वरमनन्तबलेन सर्वे चूर्णीकृताः सपदि ते तरवो रवेण ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = भित्त्वा च तान् सगिरिकुं भगवत्प्रमुक्तः पातालसप्तकमथात्र च ये त्ववध्याः ।;नाम्नाऽसुराः कुमुदिनोऽब्जजवाक्यरक्षाः सर्वांश्च तानदहदाशु शरः स एकः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = नैतद्विचित्रममितोरुबलस्य विष्णोर्यत्प्रेरणात् सपवनस्य भवेत् प्रवृत्तिः ।;लोकस्य सप्रकृतिकस्य सरुद्रकालकर्मादिकस्य तदपीदमनन्यसाध्यम् ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा बलं भगवतोऽथ हरीश्वरोऽसावग्रे निधाय तमयात् पुरमग्रजस्य ।;आश्रुत्य रावमनुजस्य बिलात् स चाऽगादभ्येनमाशु दयिताप्रतिवारितोऽपि ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = तन्मुष्टिभिः प्रतिहतः प्रययावशक्तः सुग्रीव आशु रघुपोऽपि हि धर्ममीक्षन् ।;नैनं जघान विदिताखिललोकचेष्टोऽप्येनं स आह युधि वां न मया विविक्तौ ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = सौभ्रात्रमेष यदि वाञ्छति वालिनैव नाहं निरागसमथाग्रजनिं हनिष्ये ।;दीर्घः सहोदरगतो न भवेद्धि कोपो दीर्घोऽपि कारणमृते विनिवर्तते च ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = कोपः सहोदरजने पुनरन्तकाले प्रायो निवृत्तिमुपगच्छति तापकश्च ।;एकस्य भङ्ग इति नैव झटित्यपास्तदोषो निहन्तुमिह योग्य इति स्म मेने ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = तस्मान्न बन्धुजनगे जनिते विरोधे कार्यो वधस्तदनुबन्धिभिराश्वितीह ।;धर्मं प्रदर्शयितुमेव रवेः सुतस्य भावी न ताप इति विच्च न तं जघान ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = यः प्रेरकः सकलशेमुषिसन्ततेश्च तस्याज्ञता कुत इहेशवरस्य विष्णोः ।;तेनोदितोऽथ सुदृढं पुनरागतेन वज्रोपमं शरममूमुचदिन्द्रसूनौ ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = रामाज्ञयैव लतया रविजे विभक्ते वायोः सुतेन रघुपेण शरे च मुक्ते ।;श्रुत्वाऽस्य शब्दमतुलं हृदि तेन विद्ध इन्द्रात्मजो गिरिरिवापतदाशु सन्नः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = भक्तो ममैष यदि मामभिपश्यतीह पादौ ध्रुवं मम समेष्यति निर्विचारः ।;योग्यो वधो नहि जनस्य पदानतस्य राज्यार्थिना रविसुतेन वधोऽर्थितश्च ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = कार्यं ह्यभीष्टमपि तत् प्रणतस्य पूर्वं शस्तो वधो न पदयोः प्रणतस्य चैव ।;तस्माददृश्यतनुरेव निहन्मि शक्रपुत्रं त्वितिस्म तमदृष्टतया जघान ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = यः प्रेरकः सकललोकबलस्य नित्यं पूर्णाव्ययोच्चबलवीर्यतनुः स्वतन्त्रः ।;किं तस्य दृष्टिपथगस्य च वानरोऽयं कर्तैशचापमपि येन पुरा प्रभग्नम् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = सन्नेऽथ वालिनि जगाम च तस्य पार्श्वं प्राहैनमार्द्रवचसा यदि वाञ्छसि त्वम् ।;उज्जीवयिष्य इति नैच्छदसौ त्वदग्रे को नाम नेच्छति मृतिं पुरुषोत्तमेति ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = कार्याणि तस्य चरमाणि विधाय पुत्रं त्वग्रे निधाय रविजः कपिराज्य आसीत् ।;रामोऽपि तद्गिरिवरे चतुरोऽथ मासान् दृष्ट्वा घनागममुवास सलक्ष्मणोऽसौ ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = अथातिसक्ते क्षितिपे कपीनां प्रविस्मृते रामकृतोपकारे ।;प्रसह्य तं बुद्धिमतां वरिष्ठो रामाङ्घ्रिभक्तो हनुमानुवाच ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = न विस्मृतिस्ते रघुवर्यकार्ये कार्या कथञ्चित् स हि नोऽभिपूज्यः ।;न चेत् स्वयं कर्तुमभीष्टमद्य ते ध्रुवं बलेनापि हि कारयामि ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = स एवमुक्त्वा हरिराजसन्निधौ द्वीपेषु सप्तस्वपि वानरान् प्रति ।;सम्मेलनायाऽशुगतीन् स्म वानरान् प्रस्थापयामास समस्तशः प्रभुः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = हरीश्वराज्ञाप्रणिधानपूर्वकं हनूमता ते प्रहिता हि वानराः ।;समस्तशैलद्रुमषण्डसंस्थितान् हरीन् समादाय तदाऽभिजग्मुः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = तदैव रामोऽपि हि भोगसक्तं प्रमत्तमालक्ष्य कपीश्वरं प्रभुः ।;जगाद सौमित्रिमिदं वचो मे प्लवङ्गमेशाय वदाऽशु याहि ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = यदि प्रमत्तोऽसि मदीयकार्ये नयाम्यहं त्वेन्द्रसुतस्य मार्गम् ।;प्रायः स्वकार्ये प्रतिपादिते हि मदोद्धता न प्रतिकर्तुमीशते ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = इतीड्यरामेण समीरिते तदा ययौ सबाणः सधनुः स लक्ष्मणः ।;दृष्ट्वैव तं तेन सहैव तापनिर्भयाद्ययौ रामपदान्तिकं त्वरन् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = हनूमतः साधुवचोभिराशु प्रसन्नचेतस्यधिपे कपीनाम् ।;समागते सर्वहरिप्रवीरैः सहैव तं वीक्ष्य ननन्द राघवः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = ससम्भ्रमं तं पतितं पदाब्जयोस्त्वरन् समुत्थाप्य समाश्लिषत् प्रभुः ।;स चोपविष्टो जगदीशसन्निधौ तदाज्ञयैवाऽऽदिशदाशु वानरान् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = समस्तदिक्षु प्रहितेषु तेन प्रभुर्हनूमन्तमिदं बभाषे ।;न कश्चिदीशस्त्वदृतेऽस्ति साधने समस्तकार्यप्रवरस्य मेऽस्य ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = अतस्त्वमेव प्रतियाहि दक्षिणां दिशं समादाय मदङ्गुलीयकम् ।;इतीरितोऽसौ पुरुषोत्तमेन ययौ दिशं तां युवराजयुक्तः ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = समस्तदिक्षु प्रतियापिता हि ते हरीश्वराज्ञामुपधार्य मासतः ।;समाययुस्तेऽङ्गदजाम्बवन्मुखाः सुतेन वायोः सहिता न चाययुः ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = समस्तदुर्गप्रवरं दुरासदं विमार्गतां विन्ध्यगिरिं महात्मनाम् ।;गतः स कालो हरिराडुदीरितः समासदंश्चाथ बिलं महाद्भुतम् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = कृतं मयेनातिविचित्रमुत्तमं समीक्ष्य तत्तार उवाच चाङ्गदम् ।;वयं न यामो हरिराजसन्निधिं विलङ्घितो नः समयो यतोऽस्य ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = दुरासदोऽसावतिचण्डशासनो हनिष्यति त्वामपि किं मदादिकान् ।;अगम्यमेतद् बिलमाप्य तत् सुखं वसाम सर्वे किमसाविहाऽऽचरेत् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = न चैव रामेण सलक्ष्मणेन प्रयोजनं नो वनचारिणां सदा ।;न चेह नः पीडयितुं स च क्षमस्ततो ममेयं सुविनिश्चिता मतिः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितं मातुलवाक्यमाशु स आददे वालिसुतोऽपि सादरम् ।;उवाच वाक्यं च न नो हरीश्वरः क्षमी भवेल्लङ्घितशासनानाम् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = राज्यार्थिना येन हि घातितोऽग्रजो हृताश्च दाराः सुनृशंसकेन ।;स नः कथं रक्षति शासनातिगान् निराश्रयान् दुर्बलकान् बले स्थितः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = वचो ममैतद्यदि चाऽऽदरेण ग्राह्यं भवेद्वस्तदतिप्रियं मे ।;न चेद् बलादप्यनये प्रवृत्तान् प्रशास्य सन्मार्गगतान् करोमि ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितं तत् पवनात्मजस्य श्रुत्वाऽतिभीता धृतमूकभावाः ।;सर्वेऽनुजग्मुस्तमथाद्रिमुख्यं महेन्द्रमासेदुरगाधबोधाः ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = निरीक्ष्य ते सागरमप्रधृष्यमपारमेयं सहसा विषण्णाः ।;दृढं निराशाश्च मतिं हि दध्रुः प्रायोपवेशाय तथा च चक्रुः ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = प्रायोपविष्टाश्च कथा वदन्तो रामस्य संसारविमुक्तिदातुः ।;जटायुषः पातनमूचिरे तत्सम्पातिनाम्नः श्रवणं जगाम ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = तस्याग्रजोऽसावरुणस्य सूनुः सूर्यस्य बिम्बं सह तेन यातः ।;जवं परीक्षन्नथ तं सुतप्तं गुप्त्वा पतत्रक्षयमाप्य चापतत् ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = स दग्धपक्षः सवितृप्रतापाच्छ्रुत्वैव रामस्य कथां सपक्षः ।;भूत्वा पुनश्चापि मृतिं जटायुषः शुश्राव पृष्ट्वा पुनरेव सम्यक् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = स रावणस्याथ गतिं सुतोक्तां निवेद्य दृष्ट्वा जनकात्मजाकृतिम् ।;स्वयं तथाऽशोकवने निषण्णामवोचदेभ्यो हरिपुङ्गवेभ्यः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु ते ब्रह्मसुतेन पृष्टा न्यवेदयन्नात्मबलं पृथक् पृथक् ।;दशैव चाऽरभ्य दशोत्तरस्य क्रमात् पथो योजनतोऽभियाने ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = सनीलमैन्दद्विविदाः सताराः सर्वेऽप्यशीत्याः परतो न शक्ताः ।;गन्तुं यदाऽऽथाऽत्मबलं स जाम्बवान् जगाद तस्मात् पुनरष्टमांशम् ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = बलेर्यदा विष्णुरवाप लोकांस्त्रिभिः क्रमैर्नन्दिरवं प्रकुर्वता ।;तदा मया भ्रान्तमिदं जगत्त्रयं सवेदनं जानु ममाऽऽस मेरुतः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = अतो जवो मे न हि पूर्वसम्मितः पुरा त्वहं षण्णवतिप्लवोऽस्मि ।;ततः कुमारोऽङ्गद आह चास्माच्छतं प्लवेयं न ततोऽभिजाने ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = अपूरिते तैः सकलैः शतस्य गमागमे शत्रुबलं च वीक्ष्य ।;सुदुर्गमत्वं च निशाचरेशपुर्याः स धातुः सुत आबभाषे ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = अयं हि गृध्रः शतयोजनं गिरिं त्रिकूटमाहेत उतात्र विघ्नाः ।;भवेयुरन्येऽपि ततो हनूमानेकः समर्थो न परोऽस्ति कश्चित् ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = उक्त्वा स इत्थं पुनराह सूनुं प्राणस्य निःसीमबलं प्रशंसयन् ।;त्वमेक एवात्र परं समर्थः कुरुष्व चैतत् परिपाहि वानरान् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितोऽसौ हनुमान् निजेप्सितं तेषामशक्तिं प्रकटां विधाय ।;अवर्धताऽऽशु प्रविचिन्त्य रामं सुपूर्णशक्तिं चरितोस्तदाज्ञाम् ॥ ५९॥ | |||
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<span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमोऽध्यायः"></span> | |||
== सप्तमोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ रामाय शाश्वतसुविस्तृतषड्गुणाय सर्वेश्वराय सुखसारमहार्णवाय।;नत्वा लिलङ्घयिषुरर्णवमुत्पपात निष्पीड्य तं गिरिवरं पवनस्य सूनुः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = चुक्षोभ वारिधिरनुप्रययौ च शीघ्रं यादोगणैः सह तदीयबलाभिकृष्टः ।;वृक्षाश्च पर्वतगताः पवनेन पूर्वं क्षिप्तोऽर्णवे गिरिरुदागमदस्य हेतोः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = श्यालो हरस्य गिरिपक्षविनाशकाले क्षिप्तोऽर्णवे स मरुतोर्वरितात्मपक्षः ।;हैमो गिरिः पवनजस्य तु विश्रमार्थमुद्भिद्य वारिधिमवर्द्धदनेकसानुः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = नैवात्र विश्रमणमैच्छत निःश्रमोऽसौ निःसीमपौरुषगुणस्य कुतः श्रमोऽस्य ।;आश्लिष्य पर्वतवरं स ददर्श गच्छन् देवैस्तु नागजननीं प्रहितां वरेण ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = जिज्ञासुभिर्निजबलं तव भक्षमेतु यद्यत् त्वमिच्छसि तदित्यमरोदितायाः ।;आस्यं प्रविश्य सपदि प्रविनिस्सृतोऽस्माद् देवाननन्दयदुत स्वृतमेषु रक्षन् ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा सुरप्रणयितां बलमस्य चोग्रं देवाः प्रतुष्टुवुरमुं सुमनोभिवृष्ट्या ।;तैरादृतः पुनरसौ वियतैव गच्छन् छायाग्रहं प्रतिददर्श च सिंहिकाख्यम् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = लङ्कावनाय सकलस्य च निग्रहेऽस्याः सामर्थ्यमप्रतिहतं प्रददौ विधाता ।;छायामवाक्षिपदसौ पवनात्मजस्य सोऽस्याः शरीरमनुविश्य बिभेद चाऽशु ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = निस्सीममात्मबलमित्यनुदर्शयानो हत्वैव तामपि विधातृवराभिगुप्ताम् ।;लम्बे स लम्बशिखरे निपपात लङ्काप्राकाररूपकगिरावथ सञ्चुकोच ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = भूत्वा बिडालसमितो निशि तां पुरीं च प्राप्स्यन् ददर्श निजरूपवतीं स लङ्काम् ।;रुद्धोऽनयाऽऽश्वथ विजित्य च तां स्वमुष्टिपिष्टां तयाऽनुमत एव विवेश लङ्काम् ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = मार्गमाणो बहिश्चान्तः सोऽशोकवनिकातले ।;ददर्श शिंशपावृक्षमूलस्थितरमाकृतिम् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = नरलोकविडम्बस्य जानन् रामस्य हृद्गतम् ।;तस्य चेष्टानुसारेण कृत्वा चेष्टाश्च संविदः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = तादृक्चेष्टासमेताया अङ्गुलीयमदात् ततः ।;सीताया यानि चैवाऽऽसन्नाकृतेस्तानि सर्वशः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = भूषणानि द्विधा भूत्वा तान्येवाऽसन् तथैव च ।;अथ चूडामणिं दिव्यं दातुं रामाय सा ददौ ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = यद्यप्येतन्न पश्यन्ति निशाचरगणास्तु ते ।;द्युलोकचारिणः सर्वं पश्यन्त्यृषय एव च ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_lines = तेषां विडम्बनायैव दैत्यानां वञ्चनाय च ।;पश्यतां कलिमुख्यानां विडम्बोऽयं कृतो भवेत् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = कृत्वा कार्यमिदं सर्वं विशङ्कः पवनात्मजः ।;आत्माविष्करणे चित्तं चक्रे मतिमतां वरः ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = अथ वनमखिलं तद् रावणस्यावलुम्प्य क्षितिरुहमिममेकं वर्जयित्वाऽऽशु वीरः ।;रजनिचरविनाशं काङ्क्षमाणोऽतिवेलं मुहुरतिरवनादी तोरणं चाऽऽरुरोह ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = अशीतिकोटियूथपं पुरस्सराष्टकायुतम् ।;अनेकहेतिसङ्कुलं कपीन्द्रमावृणोद् बलम् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च मन्त्रिपुत्रकान् स रावणप्रचोदितान् ।;ममर्द सप्तपर्वतप्रभान् वराभिरक्षितान् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = बलाग्रगामिनस्तथा स शर्ववाक्सुगर्वितान् ।;निहत्य सर्वरक्षसां तृतीयभागमक्षिणोत् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = अनौपमं हरेर्बलं निशम्य राक्षसाधिपः ।;कुमारमक्षमात्मनः समं सुतं न्ययोजयत् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = विचूर्णिते धरातले निजे सुते स रावणः ।;निशम्य शोकतापितस्तदग्रजं समादिशत् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = अथेन्द्रजिन्महाशरैर्वरास्त्रसम्प्रयोजितैः ।;ततक्ष वानरोत्तमं न चाशकद् विचालने ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = अथास्त्रमुत्तमं विधेर्युयोज सर्वदुस्सहम् ।;स तेन ताडितो हरिर्व्यचिन्तयन्निराकुलः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = मया वरा विलङ्घिता ह्यनेकशः स्वयम्भुवः ।;स माननीय एव मे ततोऽत्र मानयाम्यहम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = इमे च कुर्युरत्र किं प्रहृष्टरक्षसां गणाः ।;इतीह लक्ष्यमेव मे स रावणश्च दृश्यते ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = इदं समीक्ष्य बद्धवत् स्थितं कपीन्द्रमाशु ते ।;बबन्धुरन्यपाशकैर्जगाम चास्त्रमस्य तत् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = अथ प्रगृह्य तं कपिं समीपमानयंश्च ते ।;निशाचरेश्वरस्य तं स पृष्टवांश्च रावणः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = कपे कुतोऽसि कस्य वा किमर्थमीदृशं कृतम् ।;इतीरितः स चावदत् प्रणम्य राममीश्वरम् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = अवैहि दूतमागतं दुरन्तविक्रमस्य माम् ।;रघूत्तमस्य मारुतिं कुलक्षये तवेश्वरम् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = न चेत् प्रदास्यसि त्वरन् रघूत्तमप्रियां तदा ।;सपुत्रमित्रबान्धवो विनाशमाशु यास्यसि ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = न रामबाणधारणे क्षमाः सुरेश्वरा अपि ।;विरिञ्चिशर्वपूर्वकाः किमु त्वमल्पसारकः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = प्रकोपितस्य तस्य कः पुरस्थितौ क्षमो भवेत् ।;सुरासुरोरगादिके जगत्यचिन्त्यकर्मणः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते वधोद्यतं न्यवारयद् विभीषणः ।;स पुच्छदाहकर्मणि न्ययोजयन्निशाचरान् ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = अथास्य वस्त्रसञ्चयैः पिधाय पुच्छमग्नये ।;दुदुर्ददाह नास्य तन्मरुत्सखो हुताशनः ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = ममर्ष सर्वचेष्टितं स रक्षसां निरामयः ।;बलोद्धतश्च कौतुकात् प्रदग्धुमेव तां पुरीम् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = ददाह चाखिलं पुरं स्वपुच्छगेन वह्निना ।;कृतस्तु विश्वकर्मणोऽप्यदह्यतास्य तेजसा ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = सुवर्णरत्नकारितां स राक्षसोत्तमैः सह ।;प्रदह्य सर्वशः पुरीं मुदाऽन्वितो जगर्ज च ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = स रावणं सपुत्रकं तृणोपमं विधाय च ।;तयोः प्रपश्यतोः पुरं विधाय भस्मसाद्ययौ ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = विलङ्घ्य चार्णवं पुनः स्वजातिभिः प्रपूजितः ।;प्रभक्ष्य वानरेशितुर्मधु प्रभुं समेयिवान् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = रामं सुरेश्वरमगण्यगुणाभिरामं सम्प्राप्य सर्वकपिवीरवरैः समेतः ।;चूडामणिं पवनजः पदयोर्निधाय सर्वाङ्गकैः प्रणतिमस्य चकार भक्त्या ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = रामोऽपि नान्यदनुदातुममुष्य योग्यमत्यन्तभक्तिभरितस्य विलक्ष्य किञ्चित् ।;स्वात्मप्रदानमधिकं पवनात्मजस्य कुर्वन् समाश्लिषदमुं परमाभितुष्टः ॥ ५०॥ | |||
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<span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमोऽध्यायः"></span> | |||
== अष्टमोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ श्रुत्वा हनूमदुदितं कृतमस्य सर्वं प्रीतः प्रयाणमभिरोचयते स रामः ।;आरुह्य वायुसुतमङ्गदगेन युक्तः सौमित्रिणा सरविजः सह सेनयाऽगात् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = सम्प्राप्य दक्षिणमपान्निधिमत्र देवः शिश्ये जगद्गुरुतमोऽप्यविषह्यशक्तिः (विचिन्त्यशक्तिः) ।;अग्रे हि मार्दवमनुप्रथयन् स धर्मं पन्थानमर्थितुमपाम्पतितः प्रतीतः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = तत्राऽऽजगाम स विभीषणनामधेयो रक्षःपतेरवरजोऽप्यथ रावणेन ।;भक्तोऽधिकं रघुपताविति धर्मनिष्ठस्त्यक्तो जगाम शरणं च रघूत्तमं तम् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मात्मजेन रविजेन बलप्रणेत्रा नीलेन मैन्दविविदाङ्गदतारपूर्वैः ।;सर्वैश्च शत्रुसदनादुपयात एष भ्राताऽस्य न ग्रहणयोग्य इति स्थिरोक्तः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = अत्राऽह रूपमपरं बलदेवताया ग्राह्यः स एष नितरां शरणं प्रपन्नः ।;भक्तश्च रामपदयोर्विनशिष्णु रक्षो विज्ञाय राज्यमुपभोक्तुमिहाभियातः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवत्यथ हनूमति देवदेवः सङ्गृह्य तद्वचनमाह यथैव पूर्वम् ।;सुग्रीवहेतुत इमं स्थिरमाग्रहीष्ये पादप्रपन्नमिदमेव सदा व्रतं मे ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = सब्रह्मकाः सुरगणाः सहदैत्यमर्त्याः सर्वे समेत्य च मदङ्गुलिचालनेऽपि ।;नेशा भयं न मम रात्रिचरादमुष्माच्छुद्धस्वभाव इति चैनमहं विजाने ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवाक्य उत तं स्वजनं विधाय राज्येऽभ्यषेचयदपारसुसत्त्वराशिः ।;मत्वा तृणोपममशेषसदन्तकं तं रक्षःपतेस्त्ववरजस्य ददौ स लङ्काम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = ‘कल्पान्तमस्य निशिचारिपतित्वपूर्वमायुः प्रदाय निजलोकगतिं तदन्ते ।;रात्रित्रयेऽप्यनुपगामिनमीक्ष्य सोऽब्धिं चुक्रोध रक्तनयनान्तमयुञ्जदब्धौ ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = स क्रोधदीप्तनयनान्तहतः परस्य शोषं क्षणादुपगतो दनुजादिसत्त्वैः ।;सिन्धुः शिरस्यर्हणं परिगृह्य रूपी पादारविन्दमुपगम्य बभाष एतत् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = तं त्वा वयं जडधियो न विदाम भूमन् कूटस्थमादिपुरुषं जगतामधीशम् ।;त्वं सत्वतः सुरगणान् रजसो मनुष्यांस्तार्तीयतोऽसुरगणानभितस्तथाऽस्राः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = ‘कामं प्रयाहि जहि विश्रवसोऽवमेहं त्रैलोक्यरावणमवाप्नुहि वीर पत्नीम् ।;बध्नीहि सेतुमिह ते यशसो वितत्यै गायन्ति दिग्विजयिनो यमुपेत्य भूपाः’ ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवन्तममुमाश्वनुगृह्य बाणं तस्मै धृतं दितिसुतात्मसु चान्त्यजेषु ।(भा\.पु\. ९\.१०\.१३\-१५);शार्वाद्वराद्विगतमृत्युषु दुर्जयेषु निःसङ्ख्यकेष्वमुचदाशु ददाह सर्वान् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = कृत्वेरिणं तदथ मूलफलानि चात्र सम्यग्विधाय भवशत्रुरमोघचेष्टः ।;बद्धुं दिदेश सुरवर्धकिणोऽवतारं तज्जं नलं हरिवरानपरांश्च सेतुम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = बध्वोदधौ रघुपतिर्विविधाद्रिकूटैः सेतुं कपीन्द्रकरकम्पितभूरुहाङ्गैः ।;सुग्रीवनीलहनुमत्प्रमुखैरनेकैर्लङ्कां विभीषणदृशाऽविशदाशु दग्धाम् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = प्राप्तं निशम्य परमं भुवनैकसारं निःसीमपौरुषमनन्तमसौ दशास्यः ।;त्रासाद्विषण्णहृदयो नितरां बभूव कर्तव्यकर्मविषये च विमूढचेताः ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = प्रस्थाप्य वालिसुतमेव च राजनीत्यै रामस्तदुक्तवचनेऽप्यमुनाऽगृहीते ।;द्वारो रुरोध स च तत्र उदीर्णसैन्यो रक्षःपतेः पुर उदारगुणः परेशः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = द्वारां निरोधसमये स दिदेश पुत्रं वाराम्पतेर्दिशि सुरेश्वरशत्रुमुग्रम् ।;प्राच्यां प्रहस्तमदिशद्दिशि वज्रदंष्ट्रं प्रेताधिपस्य शशिनः स्वयमेव चागात् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञाय तत् स भगवान् हनुमन्तमेव देवेन्द्रशत्रुविजयाय दिदेश चाऽऽशु ।;नीलं प्रहस्तनिधनाय च वज्रदंष्ट्रं हन्तुं सुरेन्द्रसुतसूनुमथाऽऽदिदेश ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = मध्ये हरीश्वरमधिज्य धनुर्नियुज्य यस्यां स राक्षसपतिस्स्वयमेव तां हि ।;उद्दिश्य संस्थित उपात्तशरः सखड्गो देदीप्यमानवपुरुत्तमपूरुषोऽसौ ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = विद्रावितो हनुमतेन्द्रजिदाशु हस्तं तस्य प्रपन्न इव वीर्यममुष्य जानन् ।;नीलो विभीषण उभौ शिलया च शक्त्या सञ्चक्रतुर्यमवशं गमितं प्रहस्तम् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = नीलस्य नैव वशमेति स इत्यमोघशक्त्या विभीषण इमं प्रजहार साकम् ।;तस्मिन् हतेऽङ्गद उपेत्य जघान वज्रदंष्ट्रं निपात्य भुवि शीर्षममुष्य (मृत्नन्) मृद्गन् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेषु तेषु निहतेषु दिदेश धूम्रनेत्रं स राक्षसपतिः स च पश्चिमेन ।;द्वारेण मारुतसुतं समुपेत्य दग्धो गुप्तोऽपि शूलिवचनेन दुरन्तशक्तिम् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = अकम्पनोऽपि राक्षसो निशाचरेशचोदितः ।;उमापतेर्वरोद्धतः क्षणाद्धतो हनूमता ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = अथास्त्रसम्प्रदीपितैः समस्तशो महोल्मुकैः ।;रघुप्रवीरचोदिताः पुरं निशि स्वदाहयन् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तौ निकुम्भोऽथ कुम्भश्च कोपात् प्रदिष्टौ दशास्येन कुम्भश्रुतेर्हि ।;सुतौ सुप्रहृष्टौ रणायाभियातौ कपींस्तान् बहिः सर्वशो यातयित्वा ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = स कुम्भो विधातुः सुतं तारनीलौ नलं चाश्विपुत्रौ जिगायाङ्गदं च ।;सुयुद्धं च कृत्वा दिनेशात्मजेन प्रणीतो यमस्याऽशु लोकं सुपापः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = ततो निकुम्भोऽद्रिवरप्रदारणं महान्तमुग्रं परिघं प्रगृह्य ।;ससार सूर्यात्मजमाशु भीतः स पुप्लुवे पश्चिमतो धनुःशतम् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = तं भ्रामयत्याशु भुजेन वीरे भ्रान्ता दिशो द्यौश्च (सचन्द्रसूर्या) सचन्द्रसूर्याः ।;सुराश्च तस्योरुबलं वरं च शर्वोद्भवं वीक्ष्य विषेदुरीषत् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = अनन्यसाध्यं तमथो निरीक्ष्य समुत्पपाताऽशु पुरोऽस्य मारुतिः ।;प्रकाश्य बाह्वन्तरमाह चैनं किमेभिरत्र प्रहराऽयुधं ते ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितस्तेन स राक्षसोत्तमो वरादमोघं प्रजहार वक्षसि ।;विचूर्णितोऽसौ तदुरस्यभेद्ये यथैव वज्रो विपतौ वृथाऽभवत् ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = विचूर्णिते निजायुधे निकुम्भ एत्य मारुतिम् ।;प्रगृह्य चात्मनोंऽसके निधाय जग्मिवान् द्रुतम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = प्रगृह्य कण्ठमस्य स प्रधानमारुतात्मजः ।;स्वमाशु मोचयंस्ततो न्यपातयद् धरातले ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = चकार तं रणात्मके मखे रमेशदैवते ।;पशुं प्रभञ्जनात्मजो विनेदुरत्र देवताः ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च शकुनिर्देवतापनः ।;विद्युज्जिह्वः प्रमाथी च शुकसारणसंयुताः ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = रावणप्रेरिताः सर्वान् मथ्नन्तः कपिकुञ्जरान् ।;अवध्या ब्रह्मवरतो निहता रामसायकैः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च देवान्तकनरान्तकौ ।;त्रिशिरा अतिकायश्च निर्ययू रावणाज्ञया ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = नरान्तको रावणजो हयवर्योपरि स्थितः ।;अभीः ससार समरे प्रासोद्यतकरो हरीन् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = तं दहन्तमनीकानि युवराजोऽङ्गदो बली ।;उत्पपात निरीक्ष्याऽशु समदर्शयदप्युरः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = तस्योरसि प्रासवरं प्रजहार स राक्षसः ।;द्विधा समभवत् तत्तु वालिपुत्रस्य तेजसा ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = अथास्य हयमाश्वेव निजघान मुखे कपिः ।;पेततुश्चाक्षिणी तस्य स पपात ममार च ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = स खड्गवरमादाय प्रससार रणे कपिम् ।;आच्छिद्य खड्गमस्यैव निहतो वालिसूनुना ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्वकन्यकासूते निहते रावणात्मजे ।;आजगामाग्रजस्तस्य सोदर्यो देवतान्तकः ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = तस्याऽपतत एवाऽशु शरवर्षप्रतापिताः ।;प्रदुद्रुवुर्भयात् सर्वे कपयो जाम्बवन्मुखाः ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = स शरं तरसाऽऽदाय रविपुत्रायुधोपमम् ।;अङ्गदं प्रजहारोरस्यपतत् स मुमोह च ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = अथ तिग्मांशुतनयः शैलं प्रचलपादपम् ।;अभिदुद्राव सङ्गृह्य चिक्षेप च निशाचरे ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = तमापतन्तमालक्ष्य दूराच्छरविदारितम् ।;सुरान्तकश्चकाराऽशु दधार च परं शरम् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = स तमाकर्णमाकृष्य यमदण्डोपमं शरम् ।;अविद्ध्यद्धृदये राज्ञः कपीनां स पपात ह ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = बलमप्रतिमं वीक्ष्य सुरशत्रोस्तु मारुतिः ।;आह्वयामास युद्धाय केशवः कैटभं यथा ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = तमापतन्तमालोक्य रथं सहयसारथिम् ।;चूर्णयित्वा धनुश्चास्य समाच्छिद्य बभञ्ज ह ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = अथ खड्गं समादाय पुर आपततो रिपोः ।;हरिः प्रगृह्य केशेषु पातयित्वैनमाहवे ।;शिरो ममर्द तरसा पवमानात्मजः पदा ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = वरदानादवध्यं तं निहत्य पवनात्मजः ।;समीडितः सुरवरैः प्लवगैर्वीक्षितो मुदा ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = विद्राविताखिलकपिं वरात् त्रिशिरसं विभोः ।;भङ्क्त्वा रथं धनुः खड्गमाच्छिद्याशिरसं व्यधात् ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च पार्वतीवरदर्पितौ ।;प्रमथ्नन्तौ कपीन् सर्वान् हतौ मारुतिमुष्टिना ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽतिकायोऽतिरथो रथेन स्वयम्भुदत्तेन हरीन् (प्रमृद्गन्) प्रमृत्नन्।;चचार कालानलसन्निकाशो गन्धर्विकायां जनितो दशास्यात् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = बृहत्तनुः कुम्भवदेव कर्णावस्येत्यतो नाम च कुम्भकर्णः ।;इत्यस्य सोऽर्कात्मजपूर्वकान् कपीन् जिगाय रामं सहसाऽभ्यधावत् ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = तमापतन्तं शरवर्षधारं महाघनाभं स्तनयित्नुघोषम् ।;निवारयामास यथा समीरः सौमित्रिरात्तेष्वसनः शरौघैः ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = ववर्षतुस्तावतिमात्रवीर्यौ शरान् सुरेशाशनितुल्यवेगान् ।;तमोमयं चक्रतुरन्तरिक्षं स्वशिक्षया क्षिप्रतरास्त्रबाणैः ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = शरैः शरानस्य निवार्य वीरः सौमित्रिरस्त्राणि महास्त्रजालैः ।;चिच्छेद बाहू शिरसा सहैव चतुर्भुजोऽभूत् स पुनर्द्विशीर्षः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = छिन्नेषु तेषु द्विगुणास्यबाहुः पुनःपुनः सोऽथ बभूव वीरः ।;उवाच सौमित्रिमथान्तरात्मा समस्तलोकस्य मरुद् विषण्णम् ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मास्त्रतोऽन्येन न वध्य एष वराद् विधातुः सुमुखेत्यदृश्यः ।;रक्षःसुतस्याश्रवणीयमित्थमुक्त्वा समीरोऽरुहदन्तरिक्षम् ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = अथानुजो देवतमस्य सोऽस्त्रं ब्राह्मं तनूजे दशकन्धरस्य ।;मुमोच दग्धः सरथाश्वसूतस्तेनातिकायः प्रवरोऽस्त्रवित्सु ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = हतेषु पुत्रेषु स राक्षसेशः स्वयं प्रयाणं समरार्थमैच्छत् ।;सज्जीभवत्येव निशाचरेशे खरात्मजः प्राह धनुर्धरोत्तमः ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = नियुङ्क्ष्व मां मे पितुरन्तकस्य वधाय राजन् सहलक्ष्मणं तम् ।;कपिप्रवीरांश्च निहत्य सर्वान् प्रतोषये त्वामहमद्य सुष्ठु ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = प्रहस्य रामोऽस्य निवार्य चास्त्रैरस्त्राण्यमेयोऽशनिसन्निभेन ।;शिरः शरेणोत्तमकुण्डलोज्ज्वलं खरात्मजस्याथ समुन्ममाथ ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = विदुद्रुवुस्तस्य तु येऽनुयायिनः कपिप्रवीरैर्निहतावशेषिताः ।;यथैव धूम्राक्षमुखेषु पूर्वं हतेषु पृथ्वीरुहशैलधारिभिः ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = ततः स सज्जीकृतमात्तधन्वा रथं समास्थाय निशाचरेश्वरः ।;वृतः सहस्रायुतकोट्यनीकपैर्निशाचरैराशु ययौ रणाय ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = बलैस्तु तस्याथ बलं कपीनां नैकप्रकारायुधपूगभग्नम् ।;दिशः प्रदुद्राव हरीन्द्रमुख्याः समार्दयन्नाशु निशाचरांस्तदा ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = गजो गवाक्षो गवयो वृषश्च सगन्धमादा धनदेन जाताः ।;प्राणादयः पञ्च मरुत्प्रवीराः स कत्थनो वित्तपतिश्च जघ्नुः ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = शरैस्तु तान् षड्भिरमोघवेगैर्निपातयामास दशाननो द्राक् ।;अथाश्विपुत्रौ (च) सहजाम्बवन्तौ प्रजह्रतुः शैलवरैस्त्रिभिस्तम् ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = गिरीन् विदार्याऽशु शरैरथान्याञ्छरान् दशास्योऽमुचदाशु तेषु ।;एकैकमेभिर्विनिपातितास्ते ससार तं शक्रसुतात्मजोऽथ ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = शिलां समादाय तमापतन्तं विभेद रक्षो हृदये शरेण ।;दृढाहतः सोऽप्यगमद् धरातलं रवेः सुतोऽथैनमभिप्रजग्मिवान् ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = तद्धस्तगं भूरुहमाशु बाणैर्दशाननः खण्डश एव कृत्वा ।;ग्रीवाप्रदेशेऽस्य मुमोच बाणं भृशाहतः सोऽपि पपात भूमौ ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = अथो हनूमानुरगेन्द्रभोगसमं स्वबाहुं भृशमुन्नमय्य ।;तताड वक्षस्यधिपं तु रक्षसां मुखैः स रक्तं प्रवमन् पपात ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = स लब्धसञ्ज्ञः प्रशशंस मारुतिं त्वया समो नास्ति पुमान् हि कश्चित् ।;कः प्रापयेदन्य इमां दशां मामितीरितो मारुतिराह तं पुनः ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = अत्यल्पमेतद् यदुपात्तजीवितः पुनस्त्वमित्युक्त उवाच रावणः ।;गृहाण मत्तोऽपि समुद्यतं त्वं मुष्टिप्रहारं त्विति तं पुपोथ ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = किञ्चित् प्रहारेण तु विह्वलाङ्गवत् स्थिते हि तस्मिन्निदमन्तरं मम ।;इत्यग्निसूनुं प्रययौ स रावणो निवारितो मारुतिनाऽपि वाचा ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य नीलो धनुर्ध्वजाग्राश्वरथेषु तस्य ।;चचार मूर्धस्वपि चञ्चलोऽलं जडीकृतस्तेन स रावणोऽपि ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = स क्षिप्रमादाय हुताशनास्त्रं मुमोच नीले रजनीचरेशः ।;स तेन भूमौ पतितो नचैनं ददाह वह्निः स्वतनुर्यतोऽसौ ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = ततो ययौ राघवमेव रावणो निवारयामास तमाशु लक्ष्मणः ।;ततक्षतुस्तावधिकौ धनुर्भृतां शरैः शरीरावरणावदारणैः ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = निवारितस्तेन स रावणो (दशाननो) भृशं रुषाऽन्वितो बाणममोघमुग्रम् ।;स्वयम्भुदत्तं प्रविकृष्य चाऽशु ललाटमध्ये प्रमुमोच तस्य ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = भृशाहतस्तेन मुमोह लक्ष्मणो रथादवप्लुत्य दशाननोऽपि ।;क्षणादभिद्रुत्य बलात् प्रगृह्य स्वबाहुभिर्नेतुमिमं समैच्छत् ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = सम्प्राप्य सञ्ज्ञां स सुविह्वलोऽपि सस्मार रूपं निजमेव लक्ष्मणः ।;शेषं हरेरंशयुतं नचास्य स चालनायापि शशाक रावणः ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = बलात् स्वदोर्भिः प्रतिगृह्य चाखिलैर्यदा स वीरं प्रचकर्ष रावणः ।;चचाल पृथ्वी सहमेरुमन्दरा ससागरा नैव चचाल लक्ष्मणः ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = सहस्रमूर्ध्नोऽस्य बतैकमूर्ध्नि ससप्तपाता(ल)ळगिरीन्द्रसागरा ।;धराऽखिलेयं ननु सर्षपायति प्रसह्य को नाम हरेत् तमेनम् ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = प्रकर्षति त्वेव निशाचरेश्वरे तथैव रामावरजं त्वरान्वितः ।;समस्तजीवाधिपतेः परा तनुः समुत्पपातास्य पुरो हनूमान् ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = स मुष्टिमावृत्य (आवर्त्य) च वज्रकल्पं जघान तेनैव च रावणं रुषा ।;प्रसार्य बाहूनखिलैर्मुखैर्वमन् स रक्तमुष्णं व्यसुवत् पपात ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = निपात्य रक्षोधिपतिं स मारुतिः प्रगृह्य सौमित्रिमुरङ्गशायिनः ।;जगाम रामाख्यतनोः समीपं सौमित्रिमुद्धर्तुमलं ह्यसौ कपिः ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = स रामसंस्पर्शनिवारितक्लमः समुत्थितस्तेन समुद्धृते शरे ।;बभौ यथा राहुमुखात् प्रमुक्तः शशी सुपूर्णो (विचकत्स्वरश्मिभिः)विकचस्वरश्मिभिः ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = स शेषभोगाभमथो जनार्दनः प्रगृह्य चापं सशरं पुनश्च ।;सुलब्धसञ्ज्ञं रजनीचरेशं जगाद सज्जीभव रावणेति ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = रथं समारुह्य पुनः सकार्मुकः समार्गणो रावण आशु रामम् ।;अभ्येत्य सर्वाश्च दिशश्चकार शरान्धकाराः परमास्त्रवेत्ता ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = रथस्थितेऽस्मिन् रजनीचरेशे न मे पतिर्भूमितळे(ले) स्थितः स्यात् ।;इति स्म पुत्रः पवनस्य रामं स्कन्धं समारोप्य ययौ च राक्षसम् ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = प्रहस्य रामोऽस्य हयान् निहत्य सूतं च कृत्वा तिलशो ध्वजं रथम् ।;धनूंषि खड्गं सकलायुधानि छत्रं च सञ्छिद्य चकर्त मौलिम् ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = कर्तव्यमूढं तमवेक्ष्य रामः पुनर्जगादाऽशु गृहं प्रयाहि ।;समस्तभोगाननुभूय शीघ्रं प्रतोष्य बन्धून् पुनरेहि मर्तुम् ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितोऽवाग्वदनो ययौ गृहं विचार्य कार्यं सह मन्त्रिभिः स्वकैः ।;हतावशेषैरथ कुम्भकर्णप्रबोधनायाऽशु मतिं चकार ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = सशैलशृङ्गासिपरश्वधायुधैर्निशाचराणामयुतैरनेकैः ।;तच्छ्वासवेगाभिहतैः कथञ्चिद् गतैः समीपं कथमप्यबोधयत् ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = शैलोपमानस्य च मांसराशीन् विधाय (भक्षान्) भक्ष्यानपि शोणितह्रदान् ।;सुतृप्तमेनं परमादरेण समाह्वयामास सभातला(ळा)य ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = उवाच चैनं रजनीचरेन्द्रः पराजितोऽस्म्यद्य हि जीवति त्वयि ।;रणे नरेणैव च (हि) रामनाम्ना कुरुष्व मे प्रीतिममुं निहत्य ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः कारणमप्यशेषं श्रुत्वा जगर्हाग्रजमेव वीरः ।;अमोघवीर्येण हि राघवेण त्वया विरोधश्चरितो बताद्य ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = प्रशस्यते नो बलिभिर्विरोधः कथञ्चिदेषोऽतिबलो मतो मम ।;इतीरितो रावण आह दुर्नयोऽप्यहं त्वयाऽव्यो हि किमन्यथा त्वया ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = चरन्ति राजान उताक्रमं क्वचित् त्वयोपमान् बन्धुजनान् बलाधिकान् ।;समीक्ष्य हीत्थं गदितोऽग्रजेन स कुम्भकर्णः प्रययौ रणाय ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = प्राकारमुल्लङ्घ्य(मालङ्घ्य) स पञ्चयोजनं यदा ययौ शूलवरायुधो रणम् ।;कपिप्रवीरा अखिलाः प्रदुद्रुवुर्भयादतीत्यैव च सेतुमाशु ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = शतवलिपनसाख्यौ तत्र वस्वंशभूतौ पवनगणवरांशौ श्वेतसम्पातिनौ च ।;निर्ऋतितनुमथोग्रं दुर्मुखं केसरीति प्रवरमथ मरुत्सु प्रास्यदेतान् मुखे सः ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = अथापरं महाचलं प्रगृह्य भास्करात्मजः ।;मुमोच राक्षसेऽथ तं प्रगृह्य तं जघान सः ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = तदा पपात सूर्यजस्तताड चाङ्गदं रुषा ।;स जाम्बवन्तमाशु तौ निपेततुस्तला(ळा)हतौ ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = अथ प्रगृह्य भास्करिं ययौ स राक्षसो बली ।;जगाम चानु मारुतिः सुसूक्ष्ममक्षिकोपमः ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = यदैनमेष बाधते तदा विमोचयाम्यहम् ।;यदि स्म शक्यतेऽस्य तु स्वमोचनाय तद्वरम् ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = इति व्रजत्यनु स्म तं मरुत्सुते निशाचरः ।;पुरं विवेश चार्चितः स्वबन्धुभिः समस्तशः ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = तुहिनसलिलमाल्यैः सर्वतोऽभिप्रवृष्टे रजनिचरवरेऽस्मिंस्तेन सिक्तः कपीशः ।;विगतसकलयुद्धग्लानिरावञ्चयित्वा रजनिचरवरं तं तस्य नासां ददंश ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = कराभ्यामस्य कर्णौ च नासिकां दशनैरपि ।;सञ्छिद्य क्षिप्रमेवासावुत्पपात हरीश्वरः ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = तळेन चैनं निजघान राक्षसः पिपेष भूमौ पतितं ततोऽपि ।;समुद्गतोऽसौ विवरेऽङ्गुलीनां जघान शूलेन पुनः स राक्षसः ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = अमोघशूलं प्रपतन् (प्रपतत्)तमीक्ष्य(तदीक्ष्य) रवेः सुतस्योपरि मारुतात्मजः ।;प्रगृह्य जानौ प्रणिधाय शीघ्रं बभञ्ज तं प्रेक्ष्य ननाद चोच्चैः ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = अथैनमावृत्य जघान मुष्टिना स राक्षसो वायुसुतं स्तनान्तरे ।;जगर्ज तेनाभिहतो हनूमानचिन्तयंस्तत् प्रजहार चैनम् ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = तले(ळे)न वक्षस्यभिताडितो रुषा हनूमता मोहमवाप राक्षसः ।;पुनश्च सञ्ज्ञां समवाप्य शीघ्रं ययौ स यत्रैव रघुप्रवीरः ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = विचिन्तयामास ततो हनूमान् मयैव हन्तुं समरे हि शक्यः ।;असौ तथाऽप्येनमहं न हन्मि यशो हि रामस्य दृढं प्रकाशयन् ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = अनन्यवध्यं तमिमं निहत्य स्वयं स रामो यश आहरेत ।;दत्तो वरो द्वारपयोः स्वयं च जनार्दनेनैव पुरातनश्च ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = मयैव वध्यौ भवतं त्रिजन्मसु प्रवृद्धवीर्याविति केशवेन ।;उक्तं ममैवैष यदप्यनुग्रहं वधेऽस्य कुर्यान्नतु मे स धर्मः ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = इति स्म सञ्चिन्त्य कपीशयुक्तो जगाम यत्रैव कपिप्रवीराः ।;स कुम्भकर्णोऽखिलवानरांस्तु प्रभक्षयन् राममुपाजगाम ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = ते भक्षितास्तेन कपिप्रवीराः सर्वे विनिर्जग्मुरमुष्य देहात् ।;स्रोतोभिरेवाथ च रोमकूपैः केचित् तमेवाऽरुरुहुर्यथा गिरिम् ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = स तान् विधूयाऽशु यथा महागजो जगाम रामं समरार्थमेकः ।;प्रभक्षयन् स्वानपरांश्च सर्वशो मत्तः समाघ्राय च शोणितं पिबन् ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = न्यवारयत् तं शरवर्षधारया स लक्ष्मणो नैनमचिन्तयत् सः ।;जगाम रामं गिरिशृङ्गधारी समाह्वयत् तं समराय चाऽशु ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = अथो समादाय धनुः सुघोरं शरान्सुरेशाशनितुल्यवेगान् ।;प्रवेशयामास निशाचरे प्रभुः स राघवः पूर्वहतेषु यद्वत् ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = यावद्बलेन न्यहनत् खरादिकान् न तावतैव न्यपतत् स राक्षसः ।;अथ प्रहस्याऽत्मबलैकदेशं प्रदर्शयन् बाणवरान् मुमोच ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = द्वाभ्यां स बाहू निचकर्त तस्य पदद्वयं चैव तथा शराभ्याम् ।;अथापरेणास्य शिरो निकृत्य सम्प्राक्षिपत् सागरतोय आशु ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = अवर्धताब्धिः पतितेऽस्य काये महाचलाभे क्षणदाचरस्य ।;सुराश्च सर्वे ववृषुः प्रसूनैर्मुदा स्तुवन्तो रघुवर्यमूर्ध्नि ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = योजनानां त्रिलक्षं हि कुम्भकर्णोऽभ्यवर्धत ।;पूर्वं पश्चात् सञ्चुकोच लङ्कायामुषितुं स्वयम् ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = स तु स्वभावमापन्नो म्रियमाणोऽभ्यवर्धत ।;तेनास्मिन् पतिते त्वब्धिरवर्धदधिकं तदा ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = अथापरे ये रजनीचरास्तदा कपिप्रवीरैर्निहताश्च सर्वशः ।;हतावशिष्टास्त्वरिताः प्रदुद्रुवुर्भ्रातुर्वधं चोचुरुपेत्य रावणम् ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = स दुःखतप्तो निपपात मूर्छितो निराशकश्चाभवदात्मजीविते ।;तमाह पुत्रस्त्रिदशेशशत्रुर्नियुङ्क्ष्व मां शत्रुवधाय माचिरम् ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = मया गृहीतस्त्रिदशेश्वरः पुरा विषीदसे किं नरराजपुत्रतः ।;स एवमुक्त्वा प्रजुहाव पावकं शिवं समभ्यर्च्य समारुहद्रथम् ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = स आत्तधन्वा सशरो रथेन वियत्समारुह्य ययावदर्शनम् ।;स नागपाशैर्वरतः शिवस्य बबन्ध सर्वान् कपिवीरसङ्घान् ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = पुराऽवताराय यदा स विष्णुर्दिदेश सर्वांस्त्रिदशांस्तदैव ।;ममापि सेवा भवता(भवते) प्रयोज्येत्येवं गरुत्मानवदद् वृषाकपिम् ॥ १३८॥ | |||
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| verse_lines = तमाह विष्णुर्न भुवि प्रजातिमुपैहि सेवां तव चान्यथाऽहम् ।;आदास्य एवात्र यथा यशः स्याद् धर्मश्च कर्तव्यकृदेव च स्याः ॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = वरेण शर्वस्य हि रावणात्मजो यदा निबध्नाति कपीन् सलक्ष्मणान् ।;उरङ्गपाशेन तदा त्वमेव समेत्य सर्वानपि मोचयस्व ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = अहं समर्थोऽपि स लक्ष्मणश्च तथा हनूमान् न विमोचयामः ।;तव प्रियार्थं गरुडैष एव कृतस्तवाऽदेश इमं कुरुष्व ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = तदेतदुक्तं हि पुराऽऽत्मना यत् ततो हि रामो न मुमोच कञ्चन ।;(स) न लक्ष्मणो नैव च मारुतात्मजः स चैव जानाति हि देवगुह्यम् ॥ १४२॥ | |||
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| verse_lines = अथो निबद्ध्याऽशु हरीन् सलक्ष्मणान् जगाम रक्षः स्वपितुः सकाशम् ।;ननन्द चासौ पिशिताशनेश्वरः शशंस पुत्रं च कृतात्मकार्यम् ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = स पक्षिराजोऽथ हरेर्निदेशं स्मरंस्त्वरावानिह चाऽजगाम ।;तत्पक्षवातस्पर्शेन केवलं विनष्ट एषां स उरङ्गबन्धः ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = स राममानम्य परात्मदैवतं ययौ सुमाल्याभरणानुलेपनः ।;कपिप्रवीराश्च तरूञ्छिलाश्च प्रगृह्य नेदुर्बलिनः प्रहृष्टाः ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा निनादं प्लवगेश्वराणां पुनः सपुत्रोऽत्रसदत्र रावणः ।;बन्धादमुष्मात् प्रतिनिस्सृतास्ते किमत्र कार्यं त्विति चिन्तयानः ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च हुत्वा स हुताशमेव रथं समारुह्य ययावदर्शनम् ।;ववर्ष चास्त्राणि महान्त्यजस्रं वरादुमेशस्य तथाऽब्जजस्य ॥ १४७॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च तस्यास्त्रनिपीडितास्ते निपेतुरुर्व्यां कपयः सलक्ष्मणाः ।;स्पृशन्ति नास्त्राणि दुरन्तशक्तिं तनुं समीरस्य हि कानिचित् क्वचित् ॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञातुकामः पुरि सम्प्रवृत्तिं विभीषणः पूर्वगतस्तदाऽऽगात् ।;ददर्श सर्वान् पतितान् स वानरान् मरुत्सुतं त्वेकमनाकुलं च ॥ १४९॥ | |||
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| verse_lines = स तं समादाय ययौ विधातृजं विमूर्च्छितं चोदकसेकतस्तम् ।;आश्वास्य किं जीवसि हीत्युवाच तथेति स प्राह च मन्दवाक्यः ॥ १५०॥ | |||
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| verse_lines = ऊचे पुनर्जीवति किं हनूमान् जीवाम सर्वेऽपि हि जीवमाने ।;तस्मिन् हते निहताश्चैव सर्व इतीरितेऽस्मीत्यवदत् स मारुतिः ॥ १५१॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो जाम्बवानाह हनूमन्तमनन्तरम् ।;योऽसौ मेरोः समीपस्थो गन्धमादनसञ्ज्ञितः(संज्ञकः) ।;गिरिस्तस्मात् समाहार्यं त्वयौषधि(ध)चतुष्टयम् ॥ १५२॥ | |||
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| verse_lines = मृतसञ्जीवनी मुख्या सन्धानकरणी परा ।;सवर्णकरणी चैव विशल्यकरणीति च ॥ १५३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तः स क्षणेनैव प्रापतद् गन्धमादनम् ।;अवाप चाम्बरचरो राममुक्तः शरो यथा ॥ १५४॥ | |||
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| verse_lines = अन्तर्हिताश्चौषधीस्तु तदा विज्ञाय मारुतिः ।;उद्बबर्ह गिरिं क्रोधाच्छतयोजनमण्डलम् ॥ १५५॥ | |||
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| verse_lines = स तं समुत्पाट्य गिरिं करेण प्रतोल(ळ)यित्वा बलदेवसूनुः ।;समुत्पपाताम्बरमुग्रवेगो यथा हरिश्चक्रधरस्त्रिविक्रमे ॥ १५६॥ | |||
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| verse_lines = अवाप चाक्ष्णोः स निमेषमात्रतो निपातिता यत्र कपिप्रवीराः ।;तच्छैलवातस्पर्शात् समुत्थिताः समस्तशो वानरयूथपाः क्षणात् ॥ १५७॥ | |||
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| verse_lines = अपूजयन् मारुतिमुग्रपौरुषं रघूत्तमोऽस्यानुजनिस्तथाऽपरे ।;पपात मूर्ध्न्यस्य च पुष्पसन्ततिः प्रमोदितैर्देववरैर्विसर्जिता ॥ १५८॥ | |||
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| verse_lines = स देवगन्धर्वमहर्षिसत्तमैरभिष्टुतो रामकरोप(करेण)गूहितः ।;पुनर्गिरिं तं शतयोजनोच्छ्रितं न्यपातयत् संस्थित एव तत्र (च) ॥ १५९॥ | |||
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| verse_lines = स पूर्ववन्मारुतिवेगचोदितो निरन्तरं श्लिष्टतरोऽत्र चाभवत् ।;पुनश्च सर्वे तरुशैलहस्ता रणाय चोत्तस्थुरलं नदन्तः ॥ १६०॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च तान् प्रेक्ष्य समुत्थितान् कपीन् भयं महच्छक्रजितं विवेश ।;स पूर्ववद्धव्यवहे समर्च्य शिवं तथाऽदर्शनमेव जग्मिवान् ॥ १६१॥ | |||
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| verse_lines = वराश्रयेणाजगिरीशयोस्तथा पुनर्महास्त्रैः स बबन्ध तान् कपीन् ।;अथाऽह रामस्य मनोऽनुसारतः पुराऽस्त्रमेवानुसरन् स लक्ष्मणः ॥ १६२॥ | |||
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| verse_lines = पितामहास्त्रेण निहन्मि दुर्मतिं तवाऽज्ञया शक्रजितं सबान्धवम् ।;इतीरिते तेन स चाऽह राघवो भयाददृश्ये न विमोक्तुमर्हसि ॥ १६३॥ | |||
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| verse_lines = न सोढुमीशोऽसि यदि त्वमेतदस्त्रं तदाऽहं शरमात्रकेण ।;अदृश्यमप्याशु निहन्मि सन्तं रसातले(ळे)ऽथापि हि सत्यलोके ॥ १६४॥ | |||
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| verse_lines = इति स्म वीन्द्रस्य हनूमतश्च बलप्रकाशाय पुरा प्रभुः स्वयम् ।;सम्मानयित्वाऽस्त्रममुष्य रामो दुरन्तशक्तिः शरमाददेऽथ ॥ १६५॥ | |||
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| verse_lines = अनेन दृष्टोऽहमिति स्म दुष्टो विज्ञाय बाह्वोर्बलमस्य चोग्रम् ।;विनिश्चयं देवतमस्य पश्यन् प्रदुद्रुवे प्राणपरीप्सुराशु ॥ १६६॥ | |||
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| verse_lines = हाहाकृते प्रद्रुत इन्द्रशत्रौ रघूत्तमः शत्रुविभीषणत्वात् ।;विभीषणेत्येव सुरैरभिष्टुतो विज्ञानमस्त्रं त्वमुचत् स्वसैन्ये ॥ १६७॥ | |||
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| verse_lines = निशाचरास्त्रं ह्यगमत् क्षणेन रामास्त्रवीर्याद्धरयो नदन्तः ।;उत्तस्थुरुच्चोरुगिरीन् प्रगृह्य प्रशंसमाना रघुवीरमुच्चैः ॥ १६८॥ | |||
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| verse_lines = सुरैश्च पुष्पं वर्षद्भिरीडितस्तस्थौ धनुष्पाणिरनन्तवीर्यः ।;स रावणस्याथ सुतो निकुम्भिलां पुनः समासाद्य जुहाव पावकम् ॥ १६९॥ | |||
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| verse_lines = विभीषणोऽथाऽह रघूत्तमं प्रभुं नियोजयाद्यैव वधाय दुर्मतेः ।;कृताग्निपूजो नहि वध्य एष वरो विधातुः प्रथितोऽस्य तादृशः ॥ १७०॥ | |||
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| verse_lines = न वै वधं राम इयेष तस्य पलायितस्याऽत्मसमीक्षणात् पुनः ।;सत्त्वोज्झितोऽसावपि कूटयोधी न मे वधार्होऽयमिति स्म स प्रभुः ॥ १७१॥ | |||
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| verse_lines = स आदिदेशावरजं जनार्दनो हनूमता चैव विभीषणेन ।;सहैव सर्वैरपि वानरेन्द्रैर्ययौ महात्मा स च तद्वधाय ॥ १७२॥ | |||
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| verse_lines = स जुह्वतस्तस्य चकार विघ्नं प्लवङ्गमैः सोऽथ युयुत्सया रथम् ।;समास्थितः कार्मुकबाणपाणिः प्रत्युद्ययौ लक्ष्मणमाशु गर्जन् ॥ १७३॥ | |||
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| verse_lines = उभौ च तावस्त्रविदां वरिष्ठौ शरैः शरीरान्तकरैस्ततक्षतुः ।;दिशश्च सर्वाः प्रदिशः शरोत्तमैर्विधाय शिक्षास्त्रबलैर्निरन्तराः ॥ १७४॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्राणि तस्यास्त्रवरैः स लक्ष्मणो निवार्य शत्रोश्चलकुण्डलोज्ज्वलम् ।;शिरः शरेणाऽशु समुन्ममाथ सुरैः प्रसूनैरथ चाभिवृष्टः ॥ १७५॥ | |||
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| verse_lines = निपातितेऽस्मिन् नितरां निशाचरान् प्लवङ्गमा जघ्नुरनेककोटिशः ।;हतावशिष्टास्तु दशाननाय शशंसुरत्याप्तसुतप्रणाशम् ॥ १७६॥ | |||
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| verse_lines = स तन्निशम्याप्रियमुग्ररूपं भृशं विनिश्वस्य विलप्य दुःखात् ।;संस्थापयामास मतिं पुनश्च मरिष्य इत्येव विनिश्चितार्थः ॥ १७७॥ | |||
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| verse_lines = मरणाभिमुखः शीघ्रं रावणो रणकर्मणे ।;सज्जीभवन्नन्तरैव दिदेश बलमूर्जितम् ॥ १७८॥ | |||
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| verse_lines = त्रिंशत् सहस्राणि महौघकानामक्षोहिणीनां (अपि) सह षट्सहस्रम् ।;श्रमेण संयोजयताऽशु रामं सज्जो भवामीति दिदेश रावणः ॥ १७९॥ | |||
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| verse_lines = तदप्रधृष्यं वरतः स्वयम्भुवो युगान्तकालार्णवघूर्णितोपमम् ।;प्रगृह्य नानाविधमस्त्रशस्त्रं बलं कपीञ्छीघ्रतमं जगाम ॥ १८०॥ | |||
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| verse_lines = आगच्छमानं तदपारमेयं बलं सुघोरं प्रल(ळ)यार्णवोपमम् ।;भयात् समुद्विग्नविषण्णचेतसः कपिप्रवीरा नितरां प्रदुद्रुवुः ॥ १८१॥ | |||
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| verse_lines = वरो हि दत्तोऽस्य पुरा स्वयम्भुवा धरातले(ळे)ऽल्पेऽपि निवासशक्तिः ।;अजेयता चेत्यत एव सार्कजाः प्लवङ्गमा द्रष्टुमपि स्म नाशकन् ॥ १८२॥ | |||
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| verse_lines = प्रगृह्य रामोऽथ धनुः शरांश्च समन्ततस्तानवधीच्छरौघैः ।;स एव सर्वत्र च दृश्यमानो विदिक्षु दिक्षु प्रजहार सर्वशः ॥ १८३॥ | |||
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| verse_lines = क्षणेन सर्वांश्च निहत्य राघवः प्लवङ्गमानामृषभैः स पूजितः ।;अभिष्टुतः सर्वसुरोत्तमैर्मुदा भृशं प्रसूनोत्करवर्षिभिः प्रभुः ॥ १८४॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽययौ सर्वनिशाचरेश्वरो हतावशिष्टेन बलेन संवृतः ।;विमानमारुह्य च पुष्पकं त्वरन् शरीरनाशाय महायुधोद्धतः ॥ १८५॥ | |||
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| verse_lines = अथास्य सैन्यानि निजघ्नुरोजसा समन्ततः शैलशिलाभिवृष्टिभिः ।;प्लवङ्गमास्तानभिवीक्ष्य वीर्यवान् ससार वेगेन महोदरो रुषा ॥ १८७॥ | |||
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| verse_lines = वीक्ष्यातिकायं तमभिद्रवन्तं स कुम्भकर्णोऽयमिति ब्रुवन्तः ।;प्रदुद्रुवुर्वानरवीरसङ्घास्तमाससादाऽशु सुतोऽथ वालिनः ॥ १८८॥ | |||
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| verse_lines = वदन् स तिष्ठध्वमिति स्म वीरो विभीषिकामात्रमिदं न यात ।;इतीरयन्नग्रत एष पुप्लुवे महोदरस्येन्द्रसुतात्मजो बली ॥ १८९॥ | |||
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| verse_lines = अथो शरानाशु विमुञ्चमानं शिरः परामृश्य निपात्य भूतळे ।;ममर्द पद्भ्यामभवद् गतासुर्महोदरो वालिसुतेन चूर्णितः ॥ १९०॥ | |||
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| verse_lines = अथो महापार्श्व उपाजगाम प्रवर्षमाणोऽस्य शराम्बुधाराः ।;प्रसह्य चाऽच्छिद्य धनुः करस्थं समाददे खड्गममुष्य सोऽङ्गदः ॥ १९१॥ | |||
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| verse_lines = निगृह्य केशेषु निपात्य भूतले(ळे) चकर्त वामांसत औदरं परम् ।;यथोपवीतं स तथा द्विधाकृतो ममार मन्त्री रजनीचरेशितुः ॥ १९२॥ | |||
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| verse_lines = उभौ च तौ तेन विचूर्णितौ रणे रवेः सुतस्योरुबलेरितेन ।;निशाचरेशोऽथ शरेण सूर्यजं बिभेद वक्षस्यपि सोऽपतद् भुवि ॥ १९५॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु सर्वांश्च हरिप्रवीरान् विधूय बाणैर्बलवान् दशाननः ।;जगाम रामाभिमुखस्तदैनं रुरोध रामावरजः शरौघैः ॥ १९६॥ | |||
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| verse_lines = तदा दशास्योऽन्तकदण्डकल्पां मयाय दत्तां कमलोद्भवेन ।;मयाद्गृहीतां च विवाहकाले प्रगृह्य शक्तिं विससर्ज लक्ष्मणे ॥ १९७॥ | |||
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| verse_lines = तया स वीरः सुविदारितोराः पपात भूमौ सुभृशं विमूर्च्छितः ।;मरुत्सुतः शैलमतिप्रमाणं चिक्षेप रक्षःपतिवक्षसि द्रुतम् ॥ १९८॥ | |||
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| verse_lines = तेनातिगाढं व्यथितो दशाननो मुखैर्वमञ्छोणितपूरमाशु ।;तदन्तरेण प्रतिगृह्य लक्ष्मणं जगाम शक्त्या सह रामसन्निधिम् ॥ १९९॥ | |||
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| verse_lines = समुद्बबर्हाथ च तां स राघवो दिदेश च प्राणवरात्मजं पुनः ।;प्रभुः समानेतुमथो वरौषधीः स चाऽनिनायाऽशु गिरिं पुनस्तम् ॥ २००॥ | |||
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| verse_lines = तद्गन्धमात्रेण समुत्थितोऽसौ सौमित्रिरात्तोरुबलश्च पूर्ववत् ।;शशंस चाश्लिष्य मरुत्सुतं प्रभुः स राघवोऽगण्यगुणार्णवः स्मयन् ॥ २०१॥ | |||
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| verse_lines = प्राक्षिपत् तं गिरिवरं लङ्कास्थः सन् स मारुतिः ।;अर्धलक्षे योजनानां यत्रासौ पूर्वसंस्थितः ॥ २०२॥ | |||
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| verse_lines = तद्बाहुवेगात् संश्लेषं प्राप पूर्ववदेव सः ।;मृताश्च ये प्लवङ्गास्तु तद्गन्धात् तेऽपि जीविताः ॥ २०३॥ | |||
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| verse_lines = रामाज्ञयैव रक्षांसि हरयोऽब्धाववाक्षिपन् ।;नोज्जीवितास्ततस्ते तु वानरा निरुजोऽभवन् ॥ २०४॥ | |||
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| verse_lines = छिन्नप्ररोहिणश्चैव विशल्याः पूर्ववर्णिनः ।;औषधीनां प्रभावेन सर्वेऽपि हरयोऽभवन् ॥ २०५॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽससादोत्तमपूरुषं प्रभुं विमानगो रावण आयुधौघान् ।;प्रवर्षमाणो रघुवंशनाथं तमात्तधन्वाऽभिययौ च रामः(राघवः) ॥ २०६॥ | |||
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| verse_lines = सम्मानयन् राघवमादिपूरुषं निर्यातयामास रथं पुरन्दरः ।;सहायुधं मातलिसङ्गृहीतं समारुरोहाऽशु स लक्ष्मणाग्रजः ॥ २०७॥ | |||
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| verse_lines = आरुह्य तं रथवरं जगदेकनाथो लोकाभयाय रजनीचरनाथमाशु ।;अभ्युद्ययौ दशशतांशुरिवान्धकारं लोकानशेषत इमान् निगिरन्तमुद्यन् ॥ २०८॥ | |||
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| verse_lines = आयान्तमीक्ष्य रजनीचरलोकनाथः शस्त्राण्यथास्त्रसहितानि मुमोच रामे ।;रामस्तु तानि विनिकृत्य(विनिवार्य) निजैर्महास्त्रैस्तस्योत्तमाङ्गदशकं युगपन्न्यकृन्तत् ॥ २०९॥ | |||
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| verse_lines = कृत्तानि तानि पुनरेव समुत्थितानि दृष्ट्वा वराच्छतधृतेर्हृदयं विभेद ।;बाणेन वज्रसदृशेन स भिन्नहृत्को रक्तं वमन् न्यपतदाशु महाविमानात् ॥ २१०॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् हते त्रिजगतां परमप्रतीपे ब्रह्मा शिवेन सहितः सह लोकपालैः ।;अभ्येत्य पादयुगळं जगदेकभर्तू रामस्य भक्तिभरितः शिरसा ननाम ॥ २११॥ | |||
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| verse_lines = अथैनमस्तौत् पितरं कृताञ्जलिर्गुणाभिरामं जगतः पितामहः ।;जितं जितं तेऽजित लोकभावन प्रपन्नपालाय नताः स्म ते वयम् ॥ २१२॥ | |||
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| verse_lines = त्वमेक ईशोऽस्य नचाऽदिरन्तस्तवेड्य कालेन तथैव देशतः ।;गुणा ह्यगण्यास्तव तेप्यनन्ताः प्रत्येकशश्चाऽदिविनाशवर्जिताः ॥ २१३॥ | |||
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| verse_lines = नचोद्भवो नैव तिरस्कृतिस्ते क्वचिद् गुणानां परतः स्वतो वा ।;त्वमेक आद्यः परमः स्वतन्त्रो भृत्यास्तवाहं शिवपूर्वकाश्च ये ॥ २१४॥ | |||
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| verse_lines = यथाऽर्चिषोऽग्नेः पवनस्य वेगा मरीचयोऽर्कस्य नदीषु चाऽपः ।;गच्छन्ति चाऽयन्ति च सन्तताश्च तद्वन्मदाद्याः शिवपूर्वकाश्च ये ॥ २१५॥ | |||
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| verse_lines = ये ये च मुक्तास्त्वथ ये च बद्धाः सर्वे तवेशेश वशे सदैव ।;वयं सदा त्वद्गुणपूगमुच्चैः सर्वे वदन्तोऽपि न पारगामिनः ॥ २१६॥ | |||
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| verse_lines = किमेष ईदृग्गुणकस्य ते प्रभो रक्षोवधोऽशेषसुरप्रपालनम् ।;अनन्यसाध्यं हि तथाऽपि तद् द्वयं कृतं त्वया तस्य नमोनमस्ते ॥ २१७॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते त्वब्जभवेन शूली समाह्वयद् राघवमाहवाय ।;वरं मदीयं त्वगणय्य रक्षो हतं त्वया तेन रणाय मेहि (मैहि)॥ २१८॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितेऽस्त्वित्यभिधाय राघवो धनुः प्रगृह्याऽशु शरं च सन्दधे ।;विकृष्यमाणे चलिता वसुन्धरा पपात रुद्रोऽपि धराप्रकम्पतः ॥ २१९॥ | |||
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| verse_lines = अथोत्थितश्चाऽसुरभाववर्जितः क्षमस्व देवेति ननाम पादयोः ।;उवाच च त्वद्वशगोऽस्मि सर्वदा प्रसीद मे त्वद्विषयं मनः कुरु ॥ २२०॥ | |||
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| verse_lines = अथेन्द्रमुख्याश्च तमूचिरे सुरास्त्वयाऽविताः स्मोऽद्य निशाचराद् वयम् ।;तथैव सर्वापद एव नस्त्वं प्रपाहि सर्वे भवदीयकाः स्म ॥ २२१॥ | |||
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| verse_lines = सीताकृतिं तामथ तत्र चाऽगतां दिव्यच्छलेन प्रणिधाय पावके ।;कैलासतस्तां पुनरेव चाऽगतां सीतामगृह्णाद्धुतभुक्समर्पिताम् ॥ २२२॥ | |||
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| verse_lines = जानन् गिरीशालयगां स सीतां समग्रहीत् पावकसम्प्रदत्ताम् ।;मुमोद सम्प्राप्य च तां स रामः सा चैव देवी भगवन्तमाप्य ॥ २२३॥ | |||
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| verse_lines = अथो गिरेरानयनात् परस्ताद् ये वानरा रावणबाणपीडिताः ।;तारापिता तान् निरुजश्चकार सुषेणनामा भिषजां वरिष्ठः ॥ २२४॥ | |||
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| verse_lines = तदा मृतान् राघव आनिनाय यमक्षयाद् देवगणांश्च सर्वशः ।;समन्वजानात् पितरं च तत्र समागतं गन्तुमियेष चाथ ॥ २२५॥ | |||
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| verse_lines = विभीषणेनार्पितमारुरोह स पुष्पकं तत्सहितः सवानरः ।;पुरीं जगामाऽशु निजामयोध्यां पुरो हनूमन्तमथ न्ययोजयत् ॥ २२६॥ | |||
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| verse_lines = ददर्श चासौ भरतं हुताशनं प्रवेष्टुकामं जगदीश्वरस्य ।;अदर्शनात् तं विनिवार्य रामं समागतं चास्य शशंस मारुतिः ॥ २२७॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा प्रमोदोरुभरः स तेन सहैव पौरैः सहितः समातृकः ।;शत्रुघ्नयुक्तोऽभिसमेत्य राघवं ननाम बाष्पाकुललोचनाननः ॥ २२८॥ | |||
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| verse_lines = उत्थाप्य तं रघुपतिः सस्वजे प्रणयान्वितः ।;शत्रुघ्नं च तदन्येषु प्रतिपेदे यथावयः ॥ २२९॥ | |||
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| verse_lines = पुरीं प्रविश्य मुनिभिः साम्राज्ये चाभिषेचितः ।;यथोचितं च सम्मान्य सर्वानाहेदमीश्वरः ॥ २३०॥ | |||
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| verse_lines = सर्वैर्भवद्भिः सुकृतं विधाय देहं मनोवाक्सहितं मदीयम् ।;एतावदेवाखिलसद्विधेयं यत् कायवाक्चित्तभवं मदर्चनम् ॥ २३१॥ | |||
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| verse_lines = मुक्तिप्रदानात् प्रतिकर्तृता मे सर्वस्य चाथो भवतां भवेत (त्)।;हनूमतो न प्रतिकर्तृता स्यात् स्वभावभक्तस्य निरौपधं मे ॥ २३२॥ | |||
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| verse_lines = मद्भक्तौ ज्ञानपूर्तावनुपधिकबलप्रोन्नतिस्थैर्यधैर्यस्वाभाव्याधिक्यतेजःसुमतिदमशमेष्वस्य तुल्यो न कश्चित् ।;शेषो रुद्रः सुपर्णोऽप्युरुगुणसमितौ नो सहस्रांशतुल्या अस्येत्यस्मान् (अस्मिन्) मदैशं (मदंशं) पदमहममुना सार्धमेवोपभोक्ष्ये ॥ २३३॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं जिगाय भुवनं दशकन्धरोऽसावब्जोद्भवस्य वरतो नतु तं कदाचित् ।;कश्चिज्जिगाय पुरुहूतसुतः कपित्वाद् विष्णोर्वरादजयदर्जुन एव चैनम् ॥ २३४॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च युद्धाय समाह्वयन्तं न्यपातयं रावणमेकमुष्टिना ।;महाबलोऽहं कपिलाख्यरूपस्त्रिकोटिरूपः पवनश्च मे सुतः ॥ २३७॥ | |||
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| verse_lines = आवां स्वशक्त्या जयिनाविति स्म शिवो वरान्मेऽजयदेनमेवम् ।;ज्ञात्वा सुराजेयमिमं हि वव्रे हरो जयेयाहममुं दशाननम् ॥ २३८॥ | |||
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| verse_lines = अतः स्वभावाज्जयिनावहं च वायुश्च वायुर्हनुमान् स एषः ।;अमुष्य हेतोस्तु पुरा हि वायुना शिवेन्द्रपूर्वा अपि काष्ठवत् कृताः ॥ २३९॥ | |||
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| verse_lines = अतो हनूमान् पदमेतु धातुर्मदाज्ञया सृष्ट्यवनादि कर्म ।;मोक्षं च लोकस्य सदैव कुर्वन् मुक्तश्च मुक्तान् सुखयन् प्रवर्तताम् ॥ २४०॥ | |||
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| verse_lines = भोगाश्च ये यानि च कर्मजातान्यनाद्यनन्तानि ममेह सन्ति ।;मदाज्ञया तान्यखिलानि सन्ति धातुः पदे तत् सहभोगनाम ॥ २४१॥ | |||
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| verse_lines = एतादृशं मे सहभोजनं ते मया प्रदत्तं हनुमन् सदैव ।;इतीरितस्तं हनुमान् प्रणम्य जगाद वाक्यं स्थिरभक्तिनम्रः ॥ २४२॥ | |||
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| verse_lines = को न्वीश ते पादसरोजभाजां सुदुर्लभोऽर्थेषु चतुर्ष्वपीह ।;तथाऽपि नाहं प्रवृणोमि भूमन् भवत्पदाम्भोजनिषेवणादृते ॥ २४३॥ | |||
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| verse_lines = त्वमेव साक्षात् परमस्वतन्त्रस्त्वमेव साक्षादखिलोरुशक्तिः ।;त्वमेव चागण्यगुणार्णवः सदा रमाविरिञ्चादिभिरप्यशेषैः ॥ २४४॥ | |||
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| verse_lines = समेत्य सर्वेऽपि सदा वदन्तोऽप्यनन्तकालाच्च नवै समाप्नुयुः ।;गुणांस्त्वदीयान् परिपूर्णसौख्यज्ञानात्मकस्त्वं हि सदाऽतिशुद्धः ॥ २४५॥ | |||
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| verse_lines = यस्ते कथासेवक एव सर्वदा सदारतिस्त्वय्यचलैकभक्तिः ।;स जीवमानो न परः कथञ्चित् तज्जीवनं मेऽस्त्वधिकं समस्तात् ॥ २४६॥ | |||
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| verse_lines = प्रवर्द्धतां भक्तिरलं क्षणेक्षणे त्वयीश मे ह्रासविवर्जिता सदा ।;अनुग्रहस्ते मयि चैवमेव निरौपधौ तौ मम सर्वकामः ॥ २४७॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितस्तस्य ददौ स तद्द्वयं पदं विधातुं सकलैश्च शोभनम् ।;समाश्लिषच्चैनमथाऽर्द्रया धिया यथोचितं सर्वजनानपूजयत् ॥ २४८॥ | |||
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<span id="gr-C9" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="नवमोऽध्यायः"></span> | |||
== नवमोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ अथाऽप्तराज्यो भगवान् स लक्ष्मणं जगाद राजा तरुणो भवाऽशु ।;इतीरितस्त्वाह स लक्ष्मणो गुरुं भवत्पदाब्जान्न परं वृणोम्यहम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = न मां भवत्पादनिषेवणैकस्पृहं तदन्यत्र नियोक्तुमर्हति ।;नहीदृशः कश्चिदनुग्रहः क्वचित् तदेव मे देहि ततः सदैव ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितस्तस्य तदेव दत्त्वा दृढं समाश्लिष्य च राघवः प्रभुः ।;स यौवराज्यं भरते निधाय जुगोप लोकानखिलान् सधर्मकान् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = प्रशासतीशे पृथिवी बभूव विरिञ्चलोकस्य समा गुणोन्नतौ ।;जनोऽखिलो विष्णुपरो बभूव न धर्महानिश्च बभूव कस्यचित् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = गुणैश्च सर्वैरुदिताश्च सर्वे यथायथा योग्यतयोच्चनीचाः ।;समस्तरोगादिभिरुज्झिताश्च सर्वे सहस्रायुष ऊर्जिता धनैः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेऽजरा नित्यबलोपपन्ना यथेष्टसिद्ध्या च सदोपपन्नाः ।;समस्तदोषैश्च सदा विहीनाः सर्वे सुरूपाश्च सदा महोत्सवाः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = सर्वे मनोवाक्तनुभिः सदैव विष्णुं यजन्ते नतु कञ्चिदन्यम् ।;समस्तरत्नोद्भरिता च पृथ्वी यथेष्टधान्या बहुदुग्धगोमती ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = समस्तगन्धाश्च सदाऽतिहृद्या रसा मनोहारिण एव तत्र ।;शब्दाश्च सर्वे श्रवणातिहारिणः स्पर्शाश्च सर्वे स्पर्शेन्द्रियप्रियाः ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = न कस्यचिद् दुःखमभूत् कथञ्चिन्न वित्तहीनश्च बभूव कस्यचित् (कश्चन) ।;नाधर्मशीलो न च कश्चनाप्रजो न दुष्प्रजो नैव कुभार्यकश्च ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रियो नचाऽसन् विधवाः कथञ्चिन्न वै पुमांसो विधुरा बभूवुः ।;नानिष्टयोगश्च बभूव कस्यचिन्नचेष्टहानिर्नच पूर्वमृत्युः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = यथेष्टमाल्याभरणानुलेपना यथेष्टपानाशनवाससोऽखिलाः ।;बभूवुरीशे जगतां प्रशासति प्रकृष्टधर्मेण जनार्दने नृपे ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = स ब्रह्मरुद्रमरुदश्विदिवाकरादिमूर्द्धन्यरत्नपरिघट्टितपादपीठः ।;नित्यं सुरैः सह नरैरथ वानरैश्च सम्पूज्यमानचरणो रमते रमेशः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = तस्याखिलेशितुरनाद्यनुगैव लक्ष्मीः सीताभिधा त्वरमयत् स्वरतं सुरेशम् ।;नित्यावियोगिपरमोच्चनिजस्वभावा सौन्दर्यविभ्रमसुलक्षणपूर्वभावा ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = रेमे तया स परमः स्वरतोऽपि नित्यं नित्योन्नतप्रमदभारभृतस्वभावः ।;पूर्णोडुराजसुविराजितसन्निशासु दीप्यन्नशोकवनिकासु सुपुष्पितासु ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = गायन्ति चैनमनुरक्तधियः सुकण्ठा गन्धर्वचारणगणाः सह चाप्सरोभिः ।;तं तुष्टुवुर्मुनिगणाः सहिताः सुरेशै राजान एनमनुयान्ति सदाऽप्रमत्ताः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = एवं त्रयोदशसहस्रमसौ समास्तु पृथ्वीं ररक्ष विजितारिरमोघवीर्यः ।;आनन्दमिन्दुरिव सन्दधदिन्दिरेशो लोकस्य सान्द्रसुखवारिधिरप्रमेयः ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = देव्यां स चाजनयदिन्द्रहुताशनौ द्वौ पुत्रौ यमौ कुशलवौ बलिनौ गुणाढ्यौ ।;शत्रुघ्नतो लवणमुद्बणबाणदग्धं कृत्वा चकार मधुरां पुरमुग्रवीर्यः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = कोटित्रयं स निजघान तथाऽसुराणां गन्धर्वजन्म भरतेन सतां च धर्मम् ।;संशिक्षयन्नयजदुत्तमकल्पकैः स्वं यज्ञैर्भवाजमुखसत्सचिवाश्च यत्र ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = अथ शूद्रतपश्चर्यानिहतं विप्रपुत्रकम् ।;उज्जीवयामास विभुर्हत्वा तं शूद्रतापसम् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = जङ्घनामाऽसुरः पूर्वं गिरिजावरदानतः ।;बभूव शूद्रः कल्पायुः स लोकक्षयकाम्यया ।;तपश्चचार दुर्बुद्धिरिच्छन् माहेश्वरं पदम् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = अनन्नयज्ञकृच्छ्वेतो राजा क्षुद्विनिवर्तनम् ।;कुर्वन् स्वमांसैर्धात्रोक्तो मालां रामार्थमर्पयत् ।;अगस्त्याय न साक्षात्तु रामे दद्यादयं नृपः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = क्षुदभावमात्रफलदं न साक्षाद् राघवेऽर्पितम् ।;क्षुदभावमात्रमाकाङ्क्षन् मामसौ परिपृच्छति ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = व्यवधानतस्ततो रामे दद्याच्छ्वेत इति प्रभुः ।;मत्वा ब्रह्माऽदिशन्मालां प्रदातुं कुम्भयोनये ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = तामगस्त्यकरपल्लवार्पितां भक्त एष मम कुम्भसम्भवः ।;इत्यवेत्य जगृहे जनार्दनस्तेन संस्तुत उपागमत् पुरम् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = अथ केचिदासुरसुराः सुराणका इत्युरुप्रथितपौरुषाः पुरा ।;ते तपः सुमहदास्थिता विभुं पद्मसम्भवमवेत्य (अवेक्ष्य) चोचिरे ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = भूरिपापकृतिनोऽपि निश्चयान्मुक्तिमाप्नुम उदारसद्गुण ।;इत्युदीरितमजोऽवधार्य तत् प्राह च प्रहसिताननः प्रभुः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = यावदेव रमया रमेश्वरं नो वियोजयथ सद्गुणार्णवम् ।;तावदुच्चमपि दुष्कृतं भवन्मोक्षमार्गपरिपन्थि नो भवेत् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मवाक्यमृतमेव कारयन् पातयंस्तमसि चान्ध आसुरान् ।;नित्यमेव सहितोऽपि सीतया सोऽज्ञसाक्षिकमभूद् वियुक्तवत् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = तेन चान्धतम ईयुरासुरा यज्ञमाह्वयदसौ च मैथिलीम् ।;तत्र भूमिशपथच्छलान्नृणां दृष्टिमार्गमपहाय सा स्थिता ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = गुरुं हि जगतो विष्णुर्ब्रह्माणमसृजत् स्वयम् ।;तेन तद्वचनं सत्सु नानृतं कुरुते क्वचित् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = नासत्स्वप्यनृतं कुर्याद् वचनं पारलौकिकम् ।;ऐहिकं त्वसुरेष्वेव क्वचिद्धन्ति जनार्दनः ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = निजाधिक्यस्य विज्ञप्त्यै क्वचिद् वायुस्तदाज्ञया ।;हन्ति ब्रह्मत्वमात्मीयमद्धा ज्ञापयितुं प्रभुः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = नान्यः कश्चित् तद्वराणां शापानामप्यतिक्रमी ।;अयोग्येषु तु रुद्रादिवाक्यं तौ कुरुतो मृषा ।;एकदेशेन सत्यं तु योग्येष्वपि कदाचन ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = न विष्णोर्वचनं क्वापि मृषा भवति कस्यचित् ।;एतदर्थोऽवतारश्च विष्णोर्भवति सर्वदा ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = प्रविश्य भूमौ सा देवी लोकदृष्ट्यनुसारतः ।;रेमे रामेणावियुक्ता भास्करेण प्रभा यथा ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = एवं रमालाळितपादपल्लवः पुनः स यज्ञैरयजत्स्वमेव ।;वराश्वमेधादिभिराप्तकामो रेमेऽभिरामो नृपतीन् विशिक्षयन् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = रामस्य दृश्या त्वन्येषामदृश्या जनकात्मजा ।;भूमिप्रवेशादूर्ध्वं सा रेमे सप्तशतं समाः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = एवं विधान्यगणितानि जनार्दनस्य रामावतारचरितानि तदन्यपुम्भिः ।;शक्यानि नैव मनसाऽपि हि तानि कर्तुं ब्रह्मेशशेषपुरुहूतमुखैः सुरैश्च ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = तस्यैवमब्जभवलोकसमामिमां क्ष्मां कृत्वाऽनुशासत उदीक्ष्य गुणान् धरायाः ।;वैशेष्यमात्मसदनस्य हि काङ्क्षमाणा वृन्दारकाः कमलजं प्रति तच्छशंसुः ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = आमन्त्र्य तैः सह विभुर्भगवत्प्रयाणं स्वीयाय सद्मन इयेष दिदेश चाशु ।;रुद्रं स्वलोकगमनाय रघूत्तमस्य सम्प्रार्थने स च समेत्य विभुं ययाचे ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = एकान्तमेत्य रघुपेण समस्तकालो रुद्रो जगाद वचनं जगतो विधातुः ।;वैशेष्यमात्मभवनस्य हि काङ्क्षमाणास्त्वामर्थयन्ति विबुधाः सहिता विधात्रा ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = पुत्रस्तवेश कमलप्रभवस्तथाऽहं पौत्रस्तु पौत्रकवचो यदपि ह्ययोग्यम् ।;सम्भावयन्ति गुणिनस्तदहं ययाचे गन्तुं स्वसद्म नतिपूर्वमितो भवन्तम् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = यत्कार्यसाधनकृते विबुधार्थितस्त्वं प्रादुश्चकर्थ निजरूपमशेषमेव ।;तत् साधितं हि भवता तदितः स्वधाम क्षिप्रं प्रयाहि हर्षं विबुधेषु कुर्वन् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = ओम् इत्युवाच भगवांस्तदशेषमेव श्रुत्वा रहस्यथ तनुस्त्वपरा हरस्य ।;दुर्वासनामयुगिहाऽगमदाशु राम मां भोजय क्षुधितमित्यसकृद् ब्रुवाणः ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = सिद्धं न देयमथ साध्यमपीति वाचं श्रुत्वाऽस्य वाक्समयजातमुरु स्वहस्तात् ।;अन्नं चतुर्गुणमदादमृतोपमानं रामस्तदाप्य बुभुजेऽथ मुनिः सुतुष्टः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = तृप्तो ययौ च सकलान् प्रति कोपयानः कश्चिन्न मेऽर्थितवरं प्रतिदातुमीशः ।;एवम्प्रतिज्ञक ऋषिः स हि तत्प्रतिज्ञां मोघां चकार भगवान् नतु कश्चिदन्यः ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = कुन्ती तु तस्य हि मुनेर्वरतोऽजयत् तु रामः स कृष्णतनुवा स्वबलाज्जिगाय ।;तस्मिञ्छिवे प्रतिगते मुनिरूपके च याहीति लक्ष्मणमुवाच रमापतिः सः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = एकान्ते तु यदा रामश्चक्रे रुद्रेण संविदम् ।;द्वारपालं स कृतवांस्तदा लक्ष्मणमेव सः ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = यद्यत्र प्रविशेत् कश्चिद्धन्मि त्वेति वचो ब्रुवन् ।;तदन्तराऽऽगतमृषिं दृष्ट्वाऽमन्यत लक्ष्मणः ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = दुर्वाससः प्रतिज्ञा तु रामं प्राप्यैव भज्यताम् ।;अन्यथा त्वयशो रामे करोत्येष मुनिर्ध्रुवम् ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = राघवो घ्नन्नपि तु मां करोत्येव दयां मयि ।;इति मत्वा ददौ मार्गं स तु दुर्वाससे तदा ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = स्वलोकगमनाकाङ्क्षी स्वयमेव तु राघवः ।;इयं प्रतिज्ञा हेतुः स्यादिति हन्मीति सोऽकरोत् ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = अत्यन्तबन्धुनिधनं त्याग एवेति चिन्तयन् ।;याहि स्वलोकमचिरादित्युवाच स लक्ष्मणम् ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तः स ययौ जगद्भवभयध्वान्तच्छिदं राघवं ध्यायन्नाप च तत्पदं दशशतैर्युक्तो मुखाम्भोरुहैः ।;आसिच्छेषमहाफणी मुसलभृद् दिव्याकृतिर्लाङ्गली पर्यङ्कत्वमवाप यो जलनिधौ विष्णोः शयानस्य च ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = अथ राघवः स्वभवनोपगतौ विदधे मतिं सह जनैरखिलैः ।;समघोषयच्च य इहेच्छति तत् पदमक्षयं सपदि मैत्वितिसः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा तु तद् य इह मोक्षपदेच्छवस्ते सर्वे समाययुरथाऽतृणमापिपीलम् ।;रामाज्ञया गमनशक्तिरभूत् तृणादेर्ये तत्र दीर्घभविनो नहि ते तदैच्छन् ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = संस्थापयामास कुशं स्वराज्ये तैः साकमेव च लवं युवराजमीशः ।;संस्थाप्य वालितनयं कपिराज्य आशु सूर्यात्मजोऽपि रघुवीरसमीपमायात् ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह वायुनन्दनं स राघवः समाश्लिषन् ।;तवाहमक्षगोचरः सदा भवामि नान्यथा ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = त्वया सदा महत् तपः सुकार्यमुत्तमोत्तमम् ।;तदेव मे महत् प्रियं चिरं तपस्त्वया कृतम् ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = दशास्यकुम्भकर्णकौ यथा सुशक्तिमानपि ।;जघन्थ न प्रियाय मे तथैव जीव कल्पकम् ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = यथेष्टभोगसंयुतः सुरेशगायकादिभिः ।;समीड्यमानसद्यशा रमस्व मत्पुरः सदा ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = तवेप्सितं न किञ्चन क्वचित् कदाचिदेव (कुतश्चिदेव) वा ।;मृषा भवेत् प्रियश्च मे पुनःपुनर्भविष्यसि ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = सदा प्रवर्द्धमानया तया रमेऽहमञ्जसा ।;समस्तजीवसञ्चयात् सदाऽधिका हि मेऽस्तु सा ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = नमो नमो नमो नमो नतोऽस्मि ते सदा पदम् ।;समस्तसद्गुणोच्छ्रितं नमामि ते पदं पुनः ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = दिवाकरौघकौस्तुभप्रभासकोरुकन्धरः ।;सुपीवरोन्नतोरुसज्जगद्भरांसयुग्मकः ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = सुवृत्तदीर्घपीवरोल्लसद्भुजद्वयाङ्कितः ।;जगद् विमथ्य सम्भृतः शरोऽस्य दक्षिणे करे ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = स्वयं स तेन निर्मितो हतौ मधुश्च कैटभः ।;शरेण तेन विष्णुना ददौ च लक्ष्मणानुजे ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = स शत्रुसूदनोऽवधीन्मधोः सुतं रसाह्वयम् ।;शरेण येन चाकरोत् पुरीं च माधुराभिधाम् ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = समस्तसारसम्भवं शरं दधार तं करे ।;स वामबाहुना धनुर्दधार शार्ङ्गसञ्ज्ञितम् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = उदारबाहुभूषणः शुभाङ्गदः सकङ्कणः ।;महाङ्गुलीयभूषितः सुरक्तसत्कराम्बुजः ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = अनर्घ्यरत्नमालया वनाख्यया च मालया ।;विलासिविस्तृतोरसा बभार च श्रियं प्रभुः ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = स भूतिवत्सभूषणस्तनूदरे वलित्रयी ।;उदारमध्यभूषणोल्लसत्तडित्प्रभाम्बरः ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = करीन्द्रसत्करोरुयुक् सुवृत्तजानुमण्डलः ।;क्रमाल्पवृत्तजङ्घकः सुरक्तपादपल्लवः ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = लसद्धरिन्मणिद्युती रराज राघवोऽधिकम् ।;असङ्ख्यसत्सुखार्णवः समस्तशक्तिसत्तनुः ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं नेत्राब्जयुग्मान्मुखवरकमलात् सर्ववेदार्थसारान्स्तन्वा ब्रह्माण्डबाह्यान्तरमधिकरुचा भासयन् भासुरास्यः ।;सर्वाभीष्टाभये च स्वकरवरयुगेनार्थिनामादधानः प्रायाद् देवाधिदेवः स्वपदमभिमुखश्चोत्तराशां विशोकाम् ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = दघ्रे च्छत्रं हनूमान् स्रवदमृतमयं पूर्णचन्द्रायुताभं सीता सैवाखिलाक्ष्णां विषयमुपगता श्रीरिति ह्रीरथैका ।;द्वेधा भूत्वा दधार व्यजनमुभयतः पूर्णचन्द्रांशुगौरं प्रोद्यद्भास्वत्प्रभाभा सकलगुणतनुर्भूषिता भूषणैः स्वैः ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = साक्षाच्चक्रतनुस्तथैव भरतश्चक्रं दधद् दक्षिणेनाऽयात् सव्यत एव शङ्खवरभृच्छङ्खात्मकः शत्रुहा ।;अग्रे ब्रह्मपुरोगमाः सुरगणा वेदाश्च सोङ्कारकाः पश्चात् सर्वजगज्जगाम रघुपं यान्तं निजं धाम तम् ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = तस्य सूर्यसुतपूर्ववानरा दक्षिणेन मनुजास्तु सव्यतः ।;रामजन्मचरितानि तस्य ते कीर्तयन्त उचथैर्द्रुतं ययुः ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्वैर्गीयमानो विबुधमुनिगणैरब्जसम्भूतिपूर्वैर्वेदोदारार्थवाग्भिः प्रणिहितसुमनः सर्वदा स्तूयमानः ।;सर्वैर्भूतैश्च भक्त्या स्वनिमिषनयनैः कौतुकाद् वीक्ष्यमाणः प्रायाच्छेषगरुत्मदादिकनिजैः संसेवितः स्वं पदम् ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मरुद्रगरुडैः सशेषकैः प्रोच्यमानसुगुणोरुविस्तरः ।;आरुरोह विभुरम्बरं शनैस्ते च दिव्यवपुषोऽभवंस्तदा ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = अथ ब्रह्मा हरिं स्तुत्वा जगादेदं वचो विभुम् ।;त्वदाज्ञया मया दत्तं स्थानं दशरथस्य हि ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = मातॄणां चापि तल्लोकस्त्वयुताब्दादितोऽग्रतः ।;अनर्हायास्त्वयाऽऽज्ञप्ता कैकेय्या अपि सद्गतिः ।;सूत्वा तु भरतं नैषा गच्छेत निरयानिति ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽपि सा यदावेशाच्चकार त्वय्यशोभनम् ।;निकृतिर्नाम सा क्षिप्ता मया तमसि शाश्वते ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = कैकयी तु चलान् लोकान् प्राप्ता नैवाचलान् क्वचित् ।;पश्चाद् भक्तिमती यस्मात् त्वयि सा युक्तमेव तत् ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = मन्थरा तु तमस्यन्धे पातिता दुष्टचारिणी ।;सीतार्थं येऽप्यनिन्दंस्त्वां तेऽपि याता महत् तमः ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = प्रायशो राक्षसाश्चैव त्वयि कृष्णत्वमागते ।;शेषा यास्यन्ति तच्छेषा अष्टाविंशे कलौ युगे ।;गते चतुस्सहस्राब्दे तमोगास्त्रिशतोत्तरे ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = अथ ये त्वत्पदाम्भोजमकरन्दैकलिप्सवः ।;त्वया सहाऽगतास्तेषां विधेहि स्थानमुत्तमम् ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = अहं भवः सुरेशाद्याः किङ्कराः स्म तवेश्वर ।;यच्च कार्यमिहास्माभिस्तदप्याज्ञापयाऽशु नः ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = इत्युदीरितमाकर्ण्य शतानन्देन राघवः ।;जगाद भावगम्भीरं सुस्मिताधरपल्लवः ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = जगद्गुरुत्वमादिष्टं मया ते कमलोद्भव ।;गुर्वादेशानुसारेण मयाऽऽदिष्टा च सद्गतिः ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = अतस्त्वया प्रदेया हि लोका एषां मदाज्ञया ।;हृदि स्थितं च जानासि त्वमेवैकः सदा मम ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितो हरेर्भावविज्ञानी कञ्जसम्भवः ।;पिपीलिकातृणान्तानां ददौ लोकाननुत्तमान् ।;वैष्णवान् सन्ततत्वाच्च नाम्ना सान्तानिकान् विभुः ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = ते जरामृतिहीनाश्च सर्वदुःखविवर्जिताः ।;संसारमुक्ता न्यवसंस्तत्र नित्यसुखाधिकाः ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = ये तु देवा इहोद्भूता नृवानरशरीरिणः ।;ते सर्वे स्वांशितामापुस्तन्मैन्दविविदावृते ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = असुरावेशतस्तौ तु न राममनुजग्मतुः ।;पीतामृतौ पुरा यस्मान्मम्रतुर्नच तौ तदा ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = तयोश्च तपसा तुष्टश्चक्रे तावजरामरौ ।;पुरा स्वयम्भूस्तेनोभौ दर्पादमृतमन्थने ।;प्रसह्यापिबतां देवैर्देवांशत्वादुपेक्षितौ ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = पीतामृतेषु देवेषु युद्ध्यमानेषु दानवैः ।;तैर्दत्तमात्महस्ते ते रक्षायै पीतमाशु तत् ।;तस्माद् दोषादापतुस्तावासुरं भावमूर्जितम् ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = अथो रघूणां प्रवरः सुरार्चितः स्वयैकतन्वा न्यवसत् सुरालये ।;द्वितीयया ब्रह्मसदस्यधीश्वरस्तेनार्चितोऽथापरया निजालये ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = तृतीयरूपेण निजं पदं प्रभुं व्रजन्तमुच्चैरनुगम्य देवताः ।;अगम्यमर्यादमुपेत्य च क्रमाद् विलोकयन्तोऽतिविदूरतोऽस्तुवन् ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मा मरुन्मारुतसूनुरीशः शेषो गरुत्मान् हरिजः शक्रकाद्याः ।;क्रमादनुव्रज्य तु राघवस्य शिरस्यथाऽज्ञां प्रणिधाय निर्ययुः ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = स्वं स्वं च सर्वे सदनं सुरा ययुः पुरन्दराद्याश्च विरिञ्चपूर्वकाः ।;मरुत्सुतोऽथो बदरीमवाप्य नारायणस्यैव पदं सिषेवे ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = समस्तशास्त्रोद्भरितं हरेर्वचो मुदा तदा श्रोत्रपुटेन सम्भरन् ।;वदंश्च तत्त्वं विबुधर्षभाणां सदा मुनीनां च सुखं ह्युवास ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं स गायञ्छतकोटिविस्तरं रामायणं भारतपञ्चरात्रम् ।;वेदांश्च सर्वान् सहितब्रह्मसूत्रान् व्याचक्षाणो नित्यसुखोद्भरोऽभूत् ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = कदाचिदीशः सकलावतारानेकं विधायाहिपतौ च शेते ।;पृथक् च संव्यूह्य कदाचिदिच्छया रेमे रमेशोऽमितसद्गुणार्णवः ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = इत्यशेषपुराणेभ्यः पञ्चरात्रेभ्य एव च ।;भारताच्चैव वेदेभ्यो महारामायणादपि ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = परस्परविरोधस्य हानान्निर्णीय तत्त्वतः ।;युक्त्या बुद्धिबलाच्चैव विष्णोरेव प्रसादतः ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = बहुकल्पानुसारेण मयेयं सत्कथोदिता ।;नैकग्रन्थाश्रयात् तस्मान्नाऽशङ्क्याऽत्र विरुद्धता ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = क्वचिन्मोहायासुराणां व्यत्यासः प्रतिलोमता ।;उक्ता ग्रन्थेषु तस्माद्धि निर्णयोऽयं कृतो मया ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = एवं च वक्ष्यमाणेषु नैवाऽशङ्क्या विरुद्धता ।;सर्वकल्पसमश्चायं पारम्पर्यक्रमः सदा ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = पुंव्यत्यासेन चोक्तिः स्यात् पुराणादिषु कुत्रचित् ।;कृष्णामाह यथा कृष्णो धनञ्जयशरैर्हतान् ।;शतं दुर्योधनादींस्ते दर्शयिष्य इति प्रभुः ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = भीमसेनहतास्ते हि ज्ञायन्ते बहुवाक्यतः ।;विस्तारे भीमनिहताः सङ्क्षेपेऽर्जुनपातिताः ।;उच्यन्ते बहवश्चान्ये पुंव्यत्याससमाश्रयात् ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = विस्तारे कृष्णनिहता बलभद्रहता इति ।;उच्यन्ते च क्वचित् कालव्यत्यासोऽपि क्वचिद् भवेत् ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = यथा सुयोधनं भीमः प्राहसत् कृष्णसन्निधौ ।;इति वाक्येषु बहुषु ज्ञायते(ज्ञायन्ते) निर्णयादपि ।;अनिर्णये तु कृष्णस्य पूर्वमुक्ता गतिस्ततः ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = व्यत्यासास्त्वेवमाद्याश्च प्रातिलोम्यादयस्तथा ।;दृश्यन्ते भारताद्येषु लक्षणग्रन्थतश्च ते ।;ज्ञायन्ते बहुभिर्वाक्यैर्निर्णयग्रन्थतस्तथा ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् विनिर्णयग्रन्थानाश्रित्यैव च लक्षणम् ।;बहुवाक्यानुसारेण निर्णयोऽयं मया कृतः ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = उक्तं लक्षणशास्त्रे च कृष्णद्वैपायनोदिते ।;त्रिभाषा यो न जानाति रीतीनां शतमेव च ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = व्यत्यासादीन् सप्तभेदान् वेदाद्यर्थं तथा वदेत् ।;स याति निरयं घोरमन्यथाज्ञानसम्भवम् ।;इत्यन्येषु च शास्त्रेषु तत्र तत्रोदितं बहु ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = ‘व्यत्यासः प्रातिलोम्यं च गोमूत्री प्रघसस्तथा ।;उक्षणः सुधुरः साधु सप्त भेदाः प्रकीर्तिताः’ ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादिलक्षणान्यत्र नोच्यन्तेऽन्यप्रसङ्गतः ।;अनुसारेण तेषां तु निर्णयः क्रियते मया ।;तस्मान्निर्णयशास्त्रत्वाद् ग्राह्यमेतद् बुभूषुभिः ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिता रामकथा परा मया समस्तशास्त्रानुसृतेर्भवापहा ।;पठेदिमां यः शृणुयादथापि वा विमुक्तबन्धश्चरणं हरेर्व्रजेत् ॥ १३७॥ | |||
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<span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमोऽध्यायः"></span> | |||
== दशमोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = ओं ॥ द्वापरेऽथ युगे प्राप्ते त्वष्टाविंशतिमे पुनः ।;स्वयम्भुशर्वशक्राद्या दुग्धाब्धेस्तीरमाययुः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = पयोब्धेरुत्तरं तीरमासाद्य विबुधर्षभाः ।;तुष्टुवुः पुण्डरीकाक्षमक्षयं पुरुषोत्तमम् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = नमोनमोऽगण्यगुणैकधाम्ने समस्तविज्ञानमरीचिमालिने ।;अनाद्यविज्ञानतमोनिहन्त्रे परामृतानन्दपदप्रदायिने ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = स्वदत्तमालाभुविपातकोपतो दुर्वाससः शापत आशु हि श्रिया ।;शक्रे विहीने दितिजैः पराजिते पुरा वयं त्वां शरणं गता स्म ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = त्वदाज्ञया बलिना सन्दधाना वराद् गिरीशस्य परैरचाल्यम् ।;वृन्दारका मन्दरमेत्य बाहुभिर्न शेकुरुद्धर्तुमिमे समेताः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = तदा त्वया नित्यबलत्वहेतुतो योऽनन्तनामा गरुडस्तदंसके ।;उत्पाट्य चैकेन करेण मन्दरो निधापितस्तं स सह त्वयाऽवहत् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = पुनः परीक्षद्भिरसौ गिरिः सुरैः सहासुरैरुन्नमितस्तदंसतः ।;व्यचूर्णयत् तानखिलान् पुनश्च ते त्वदीक्षया पूर्ववदुत्थिताः प्रभो ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च वामेन करेण वीश्वरे निधाय तं स्कन्धगतस्त्वमस्य ।;अगाः पयोब्धिं सहितः सुरासुरैर्मथ्ना च तेनाब्धिमथाप्यमथ्नाः ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = कृतश्च कद्रो(द्र्वा)स्तनयोऽत्र वासुकिर्नेत्रं त्वया कश्यपजः स नागराट् ।;ममन्थुरब्धिं सहितास्त्वया सुराः सहासुरा दिव्यपयो घृताधिकम् ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = नैच्छन्त पुच्छं दितिजा अमङ्गलं(ळं) तदित्यथाग्रं जगृहुर्विषोल्बणम् ।;श्रान्ताश्च तेऽतो विबुधास्तु पुच्छं त्वया समेता जगृहुस्त्वदाश्रयाः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = अथातिभारादविशत् सुकाञ्चनो गिरिः स पाताल(ळ)मथ त्वमेव ।;तं कच्छपात्मा त्वभरः स्वपृष्ठे ह्यनन्यधार्यं पुरुलीलयैव ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = उपर्यधश्चाऽत्मनि नेत्रगोत्रयोस्त्वया परेणाऽविशता समेधिताः ।;ममन्थुरब्धिं तरसा मदोत्कटाः सुरासुराः क्षोभितनक्रचक्रम्(भाग. ८.७.१३) ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = श्रान्तेषु तेष्वेक उरुक्रम त्वं सुधारसाप्त्यै मुदितो ह्यमथ्नाः ।;तदा जगद्ग्रासि विषं समुत्थितं त्वदाज्ञया वायुरधात् करे निजे ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = कलेः स्वरूपं तदतीव दुष्षहं वराद् विधातुः सकलैश्च दुःस्पृशम् ।;करे विमथ्यास्तबलं विधाय ददौ स किञ्चिद् गिरिशाय वायुः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = स तत् पिबत्(पिबन्) कण्ठगतेन तेन निपातितो मूर्च्छित आशु रुद्रः ।;हरेः करस्पर्शबलात् स सञ्ज्ञामवाप नीलोऽस्य गल(ळ)स्तदाऽऽसीत् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = अथ त्वदाज्ञां पुरतो निधाय निधाय पात्रे तपनीयरूपे ।;स्वयं च निर्मथ्य बलोपपन्नं पपौ स वायुस्तदु चास्य जीर्णम् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = अत्यल्पपानाच्च बभूव शूला शिवस्य शीर्ष्ण्यस्य करावशिष्टम् ।;अभूत् कलिः सर्वजगत्सु पूर्णं पीत्वा विकारो न बभूव वायोः ।;कलेः शरीरादभवन् कुनागाः सवृश्चिकाः श्वापदयातुधानाः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = अथ त्वयाऽब्धौ तु विमथ्यमाने सुराऽभवत् तामसुरा अवापुः ।;उच्चैःश्रवा नाम तुरङ्गमोऽथ करी तथैरावतनामधेयः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = अन्ये च दिक्पालगजा बभूवुर्वरं तथैवाप्सरसां सहस्रम् ।;तथाऽऽयुधान्याभरणानि चैव दिवौकसां पारिजातस्तरुश्च ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = तथैव साक्षात् सुरभिर्निशेशो बभूव तत् कौस्तुभं लोकसारम् ।;अथेन्दिरा यद्यपि नित्यदेहा बभूव तत्रापरया स्वतन्वा ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = ततो भवान् दक्षिणबाहुना सुधाकमण्डलुं कलशं चापरेण ।;प्रगृह्य तस्मान्निरगात् समुद्राद् धन्वन्तरिर्नाम हरिन्मणिद्युतिः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = ततो भवद्धस्तगतं दितेः सुताः सुधाभरं कलशं चापजह्रुः ।;मुक्तं त्वया शक्तिमताऽपि दैत्यान् सत्यच्युतान् कारयितुं वधाय ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = ततो भवाननुपममुत्तमं वपुर्बभूव दिव्यप्रमदात्मकं त्वरन् ।;श्यामं नितम्बार्पितरत्नमेखलं जाम्बूनदाभाम्बरभृत् सुमध्यमम् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = बृहन्नितम्बं कलशोपमस्तनं सत्पुण्डरीकायतनेत्रमुज्ज्वलम् ।;समस्तसारं परिपूर्णसद्गुणं दृष्ट्वैव तत् सम्मुमुहुः सुरारयः ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = परस्परं तेऽमृतहेतुतोऽखिला विरुद्ध्यमानाः प्रददुः स्म ते करे ।;समं सुधायाः कलशं विभज्य निपाययास्मानिति वञ्चितास्त्वया ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = धर्मच्छलं पापजनेषु धर्म इति त्वया ज्ञापयितुं तदोक्तम् ।;यद्यत् कृतं मे भवतां यदीह संवाद एवोद्विभजे सुधामिमाम् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = यथेष्टतोऽहं विभजामि सर्वथा न विश्वसध्वं(अविश्वसध्वं) मयि केनचित् क्वचित् ।;इति प्रहस्याभिहितं निशम्य स्त्रीभावमुग्धास्तु तथेति तेऽवदन् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = ततश्च संस्थाप्य पृथक् सुरासुरांस्तवातिरूपोच्चलितान् सुरेतरान् ।;सर्वान् भवद्दर्शिन ईक्ष्य लज्जिताऽस्म्यहं दृशो मीलयतेत्यवोचः ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = निमीलिताक्षेष्वसुरेषु देवता न्यपाययः साध्वमृतं ततः पुमान् ।;क्षणेन भूत्वा पिबतः सुधां शिरो राहोर्न्यकृन्तश्च सुदर्शनेन ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = तेनामृतार्थं हि सहस्रजन्मसु प्रतप्य भूयस्तप आरितो वरः ।;स्वयम्भुवस्तेन भवान् करेऽस्य बिन्दुं सुधां प्रास्य शिरो जहार ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = शिरस्तु तस्य ग्रहतामवाप सुरैः समाविष्टमथो सबाहुः ।;क्षिप्तः कबन्धोऽस्य शुभोदसागरे त्वया स्थितोऽद्यापि हि तत्र सामृतः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = अथासुराः प्रत्यपतन्नुदायुधाः समस्तशस्ते च हतास्त्वया रणे ।;कलिस्तु स ब्रह्मवरादजेयो ऋते भवन्तं पुरुषेषु संस्थितः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = तस्यार्द्धदेहात् समभूदलक्ष्मीस्तत्पुत्रका दोषगणाश्च सर्वशः ।;अथेन्दिरा वक्षसि ते समास्थिता त्वत्कण्ठगं कौस्तुभमास धाता ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = यथाविभागं च सुरेषु दत्तास्त्वया तथाऽन्येऽपि हि तत्र जाताः ।;इत्थं त्वया साध्वमृतं सुरेषु दत्तं हि मोक्षस्य निदर्शनाय ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = भवेद्धि मोक्षो नियतं सुराणां नैवासुराणां स कथञ्चन स्यात् ।;उत्साहयुक्तस्य च तत् प्रतीपं भवेद्धि राहोरिव दुःखरूपम् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = कलिस्त्वयं ब्रह्मवरादिदानीं विबाधतेऽस्मान् सकलान् प्रजाश्च ।;अज्ञानमिथ्यामतिरूपतोऽसौ प्रविश्य सज्ज्ञानविरुद्धरूपः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = त्वदाज्ञया तस्य वरोऽब्जजेन दत्तः स आविश्य शिवं चकार ।;कदागमांस्तस्य कुयुक्तिबाधाम् नहि त्वदन्यश्चरितुं(चलितुं) समर्थः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = वेदाश्च सर्वे सहशास्त्रसङ्घा उत्सादितास्तेन न सन्ति तेऽद्य ।;तत् साधु भूमाववतीर्य वेदानुद्धृत्य शास्त्राणि कुरुष्व सम्यक् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = अदृश्यमज्ञेयमतर्क्यरूपं कलिं निलीनं हृदयेऽखिलस्य ।;सच्छास्त्रशस्त्रेण निहत्य शीघ्रं पदं निजं देहि महाजनस्य ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = ऋते भवन्तं नहि तं निहन्ता(तन्निहन्ता) त्वमेक एवाखिलशक्तिपूर्णः ।;ततो भवन्तं शरणं गता वयं तमोनिहत्यै निजबोधविग्रहम् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितस्तैरभयं प्रदाय सुरेश्वराणां परमोऽप्रमेयः ।;प्रादुर्बभूवामृतभूरिला(ळा)यां विशुद्धविज्ञानघनस्वरूपः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = वसिष्ठनामा कमलोद्भवात्मजः सुतोऽस्य शक्तिस्तनयः पराशरः ।;तस्योत्तमं सोऽपि तपोऽचरद्धरिः सुतो मम स्यादिति तद्धरिर्ददौ ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = उवाच चैनं भगवान् सुतोषितो वसोर्मदीयस्य सुताऽस्ति शोभना ।;वने मृगार्थं चरतोऽस्य वीर्यं पपात भार्यां मनसा गतस्य ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = तच्छ्येनहस्ते प्रददौ स तस्यै दातुं तदन्येन तु युद्ध्यतोऽपतत् ।;जग्रास तन्मत्स्यवधूर्यमस्वसुर्जलस्थमेनां जगृहुस्म (श्च) दाशाः ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = तद्गर्भतोऽभून्मिथुनं स्वराज्ञे न्यवेदयन् सोऽपि वसोः समर्पयत् ।;पुत्रं समादाय सुतां स तस्मै ददौ सुतोऽभूदथ मत्स्यराजः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = कन्या तु सा दाशराजस्य सद्मन्यवर्द्धतातीव सुरूपयुक्ता ।;नाम्ना च सा सत्यवतीति तस्यां तवाऽत्मजोऽहं भविताऽस्म्यजोऽपि ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितश्चक्रधरेण तां मुनिर्जगाम मार्ताण्डसुतां समुद्रगाम् ।;उत्तारयन्तीमथ तत्र विष्णुः प्रादुर्बभूवाऽशु विशुद्धचिद्घनः ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = विदोषविज्ञानसुखैकरूपोऽप्यजो जनान् मोहयितुं मृषैव ।;योषित्सु पुंसो ह्यजनीव दृश्यते न जायते क्वापि बलादिविग्रहः ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = यथा नृसिंहाकृतिराविरासीत् स्तम्भात् तथा नित्यतनुत्वतो विभुः ।;आविर्भवेद् योषिति नो मलोत्थस्तथाऽपि मोहाय निदर्शयेत् तथा ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रीपुम्प्रसङ्गात् परतो यतो हरिः प्रादुर्भवत्येष विमोहयन् जनम् ।;अतो मलोत्थोऽयमिति स्म मन्यते जनोऽशुभः पूर्णगुणैकविग्रहम् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = द्वीपे भगिन्याः स(तु/च) यमस्य विश्वकृत् प्रकाशते ज्ञानमरीचिमण्डलः ।;प्रभासयन्नण्डबहिस्तथाऽन्तः सहस्रलक्षामितसूर्य(भानु)दीधितिः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = अगण्यदिव्योरुगुणार्णवः प्रभुः समस्तविद्याधिपतिर्जगद्गुरुः ।;अनन्तशक्तिर्जगदीश्वरः समस्तदोषातिविदूरविग्रहः ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = शुभमरतकवर्णो रक्तपादाब्जनेत्राधरकरनखरसनाग्रश्चक्रशङ्खाब्जरेखः ।;रविकरवरगौरं चर्म चैणं वसानस्तटिदमलजटासन्दीप्तजूटं दधानः ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = विस्तीर्णवक्षाः कमलायताक्षो बृहद्भुजः कम्बुसमानकण्ठः ।;समस्तवेदान् मुखतः समुद्गिरन्ननन्तचन्द्राधिककान्तसन्मुखः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = प्रबोधमुद्राभयदोर्द्वयान्वि(ङ्कि)तो यज्ञोपवीताजिनमेखलोल्लसन् ।;दृशा महाज्ञानभुजङ्गदष्टमुज्जीवयानो जगदत्यरोचत ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = स लोकधर्माभिरिरक्षया पितुर्द्विजत्वमाप्याऽशु पितुर्ददौ निजम् ।;ज्ञानं तयोः संस्मृतिमात्रतः सदा प्रत्यक्षभावं परमात्मनो ददौ ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = द्वैपायनः सोऽथ जगाम मेरुं चतुर्मुखाद्यैरनुगम्यमानः ।;उद्धृत्य वेदानखिलान् सुरेभ्यो ददौ मुनिभ्यश्च यथाऽऽदिसृष्टौ ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = सर्वाणि शास्त्राणि तथैव कृत्वा विनिर्णयं ब्रह्मसूत्रं चकार ।;तच्छुश्रुवुर्ब्रह्मगिरीशमुख्याः सुरा मुनीनां प्रवराश्च तस्मात् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = समस्तशास्त्रार्थनिदर्शनात्मकं चक्रे महाभारतनामधेयम् ।;वेदोत्तमं तच्च विधातृशङ्करप्रधानकैस्तन्मुखतः सुरैः श्रुतम् ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = अथो गिरीशादिमनोनुशायी कलिर्ममाराऽशु सुवाङ्मयैः शरैः ।;निकृत्तशीर्षो भगवन्मुखेरितैः सुराश्च सज्ज्ञानसुधारसं पपुः ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = अथो मनुष्येषु तथाऽसुरेषु रूपान्तरैः कलिरेवावशिष्टः ।;ततो मनुष्येषु च सत्सु संस्थितो विनाश्य इत्येव(ष) हरिर्व्यचिन्तयत् ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = ततो नृणां कालबलात् सुमन्दमायुर्मतिं कर्म च वीक्ष्य कृष्णः ।;विव्यास वेदान् स विभुश्चतुर्धा चक्रे तथा भागवतं पुराणम् ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = येये च सन्तस्तमसाऽनुविष्टास्तांस्तान् सुवाक्यैस्तमसो विमुञ्चन् ।;चचार लोकान् स पथि प्रयान्तं कीटं व्यपश्यत् तमुवाच कृष्णः ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = भवस्व राजा कुशरीरमेतत् त्यक्त्वेति नैच्छत् तदसौ ततस्तम् ।;अत्यक्तदेहं नृपतिं चकार पुरा स्वभक्तं वृषलं सुलुब्धम् ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = लोभात् स कीटत्वमुपेत्य कृष्णप्रसादतश्चाऽशु बभूव राजा ।;तदैव तं सर्वनृपाः प्रणेमुर्ददुः करं चास्य यथैव वैश्याः ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = उवाच तं भगवान् मुक्तिमस्मिंस्तव क्षणे दातुमहं समर्थः ।;तथाऽपि सीमार्थमवाप्य विप्रतनुं विमुक्तो भव मत्प्रसादात् ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं च तस्मै विमलं ददौ स महीं च सर्वां बुभुजे तदन्ते ।;त्यक्त्वा तनुं विप्रवरत्वमेत्य पदं हरेश्चाप सुतत्त्ववेदी ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = एवं बहून् संसृतिबन्धतः स व्यमोचयद् व्यासतनुर्जनार्दनः ।;बहून्यचिन्त्यानि च तस्य कर्माण्यशेषदेवेशसदोदितानि ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = अथास्य पुत्रत्वमवाप्तुमिच्छंश्चचार रुद्रः सुतपस्तदीयम् ।;ददौ च तस्मै भगवान् वरं तं स्वयं च तप्त्वेव तपो विमोहयन् ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = विमोहनायासुरसर्गिणां प्रभुः स्वयं करोतीव तपः प्रदर्शयेत् ।;कामादिदोषांश्च मृषैव दर्शयेन्न(दर्शयन्) तावता तस्य हि सन्ति कुत्रचित् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = ततस्त्वरण्योस्स बभूव पुत्रकः शिवोऽस्य सोऽभूच्छुकनामधेयः ।;शुकी हि भूत्वाऽह्यगमद् घृताची व्यासं विमथ्नन्तमुतारणीं तम् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = अकामयन् कामुकवत् स भूत्वा तयाऽर्थितस्तं शुकनामधेयम् ।;चक्रे ह्यरण्योस्तनयं च सृष्ट्वा विमोहयंस्तत्त्वमार्गेष्वयोग्यान् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = शुकं तमाशु प्रविवेश वायुर्व्यासस्य सेवार्थमथास्य सर्वम् ।;ज्ञानं ददौ भगवान् सर्ववेदान् सभारतं भागवतं पुराणम् ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = शेषोऽथ पैलं मुनिमाविशत् तदा वीशः सुमन्तुमपि वारुणिं(वारुणं) मुनिम् ।;ब्रह्माऽविशत् तमुत वैशम्पायनं शक्रश्च जैमिनिमथाऽविशद् विभुः ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णस्य पादपरिसेवनोत्सुकाः सुरेश्वरा विविशुराशु तान् मुनीन् ।;समस्तविद्याः प्रतिपाद्य तेष्वसौ प्रवर्तकांस्तान् विदधे हरिः पुनः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = ऋचां प्रवर्तकं पैलं यजुषां च प्रवर्तकम् ।;वैशम्पायनमेवैकं द्वितीयं सूर्यमेव च ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = चक्रेऽथ जैमिनिं साम्नामथर्वाङ्गिरसामपि ।;सुमन्तुं भारतस्यापि वैशम्पायनमादिशत् ।;प्रवर्तने मानुषेषु गन्धर्वादिषु चाऽत्मजम् ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = नारदं पाठयित्वा च देवलोकप्रवृत्तये ।;आदिशत् ससृजे सोऽथ रोमाञ्चाद् रोमहर्षणम् ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = तं भारतपुराणानां महारामायणस्य च ।;पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य प्रवृत्त्यर्थमथाऽदिशत् ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = तमाविशत् कामदेवः कृष्णसेवासमुत्सुकः ।;स तस्मै ज्ञानमखिलं ददौ द्वैपायनः प्रभुः ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = सनत्कुमारप्रमुखांश्चक्रे योगप्रवर्तकान् ।;भृग्वादीन् कर्मयोगस्य ज्ञानं दत्वाऽमलं शुभम् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = जैमिनिं कर्ममीमांसाकर्तारमकरोत् प्रभुः ।;देवमीमांसि(स)काद्यन्तं कृत्वा पैलमथाऽदिशत् ।;शेषं च मध्यकरणे पुराणान्यथ चाकरोत् ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = शैवान् (पाशुपतान्) पाशुपताच्चक्रे संशयार्थं सुरद्विषाम् ।;वैष्णवान् पञ्चरात्राच्च यथार्थज्ञानसिद्धये ।;ब्राह्मांश्च वेदतश्चक्रे पुराणग्रन्थसङ्ग्रहान् ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = एवं ज्ञानं पुनः प्रापुर्देवाश्च ऋषयस्तथा ।;सनत्कुमारप्रमुखा योगिनो मानुषास्तथा ।;कृष्णद्वैपायनात् प्राप्य ज्ञानं ते मुमुदुः सदा ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = समस्तविज्ञानगभस्तिचक्रं विताय विज्ञानमहादिवाकरः ।;निरस्य(निपीय) चाज्ञानतमो जगत्ततं प्रभासते भानुरिवावभासयन् ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = चतुर्मुखेशानसुरेन्द्रपूर्वकैः सदा सुरैः सेवितपादपल्लवः ।;प्रकाशयंस्तेषु सदाऽऽत्मगुह्यं मुमोद मेरौ च तथा बदर्याम् ॥ ८६॥ | |||
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<span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशोऽध्यायः"></span> | |||
== एकादशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ शशाङ्कपुत्रादभवत् पुरूरवास्तस्याऽयुरायोर्नहुषो ययातिः ।;तस्याऽस पत्नीयुगलं सुताश्च पञ्चाऽभवन् विष्णुपदैकभक्ताः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।;द्रुह्यं चाऽनुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥।;२॥ | |||
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| verse_lines = यदोर्वंशे चक्रवर्ती कार्तवीर्यार्जुनोऽभवत् ।;विष्णोर्दत्तात्रेयनाम्नः प्रसादाद् योगवीर्यवान् ।;तस्यान्ववाये यदवो बभूवुर्विष्णुसंश्रयाः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = पूरोर्वंशे तु भरतश्चक्रवर्ती हरिप्रियः ।;तद्वंशजः कुरुर्नाम प्रतीपोऽभूत् तदन्वये ॥।;४॥ | |||
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| verse_lines = प्रतीपस्याभवन् पुत्रास्त्रयस्त्रेताग्निवर्चसः ।;देवापिरथ बाह्लीको गुणज्येष्ठश्च शन्तनुः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = त्वग्दोषयुक्तो देवापिर्जगाम तपसे वनम् ।;‘विष्णोः प्रसादात् स कृते युगे राजा भविष्यति’ ॥ ६॥ (भा\.पु\. १२\.२\.३७) | |||
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| verse_lines = पुत्रिकापुत्रतां यातो बाह्लीको राजसत्तमः ।;हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लादो भगवत्प्रियः (भगवत्परः) ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = वायुना च समाविष्टो महाबलसमन्वितः ।;येनैव जायमानेन तरसा भूर्विदारिता ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = भूभारक्षपणे विष्णोरङ्गतामाप्तुमेव सः ।;प्रतीपपुत्रतामाप्य बाह्लीकेष्वभवत् पतिः ।;रुद्रेषु पत्रतापाख्यः सोमदत्तोऽस्य चाऽत्मजः ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = अजैकपादहिर्बुध्निर्विरूपाक्ष इति त्रयः ।;रुद्राणां सोमदत्तस्य बभूवुः प्रथिताः सुताः ।;विष्णोरेवाङ्गतामाप्तुं भूरिभूरिश्रवाः (भूरिर्भूरिश्रवाः) शलः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = शिवादिसर्वरुद्राणामावेशाद् वरतस्तथा ।;भूरिश्रवा अतिबलस्तत्राऽसीत् परमास्त्रवित् ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = तदर्थं हि तपश्चीर्णं सोमदत्तेन शम्भवे ।;दत्तो वरश्च तेनास्य त्वत्प्रतीपाभिभूतिकृत् ।;बलवीर्यगुणोपेतो नाम्ना भूरिश्रवाः सुतः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = भविष्यति मयाऽऽविष्टो यज्ञशील इति स्म ह ।;तेन भूरिश्रवा जातः सोमदत्तसुतो बली ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वोदधेस्तीरगतेऽब्जसम्भवे गङ्गायुतः पर्वणि घूर्णितोऽब्धिः ।;अवाक्षिपत् तस्य तनौ निजोदबिन्दुं शशापैनमथाब्जयोनिः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = महाभिषङ् नाम नरेश्वरस्त्वं भूत्वा पुनः शन्तनुनामधेयः ।;जनिष्यसे विष्णुपदी तथैषा तत्रापि भार्या भवतो भविष्यति ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = शान्तो भवत्येव मयोदितस्त्वं तनुत्वमाप्तोऽसि(आप्नोषि) ततश्च शन्तनुः ।;इतीरितः सोऽथ नृपो बभूव महाभिषङ् नाम हरेःपदाश्रयः ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = स तत्र भुक्त्वा चिरकालमुर्वीं तनुं विहायाऽप सदो विधातुः ।;तत्रापि तिष्ठन् सुरवृन्दसन्निधौ ददर्श गङ्गां श्लथिताम्बरां स्वकाम् ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = अवाङ्मुखेषु द्युसदस्सु रागान्निरीक्षमाणं पुनरात्मसम्भवः ।;उवाच भूमौ नृपतिर्भवाऽशु शप्तो यथा त्वं हि पुरा मयैव ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितस्तत्क्षणतः प्रतीपाद् बभूव नाम्ना नृपतिश्च (नृपतिः) स शन्तनुः ।;अवाप्य गङ्गां दयितां स्वकीयां तया मुमोदाब्दगणान् बहूंश्च ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = अथाष्टमो वसुरासीद् द्युनामा वराङ्गिनाम्न्यस्य बभूव भार्या ।;बभूव तस्याश्च सखी नृपस्य सुविन्दनाम्नो दयिता सनाम्नी ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = तस्या जरामृतिविध्वंसहेतोर्वसिष्ठधेनुं स्वमृतं क्षरन्तीम् ।;जरापहां नन्दिनिनामधेयां बद्धुं पतिं चोदयामास देवी ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = तया द्युनामा स वसुः प्रचोदितो भ्रातृस्नेहात् सप्तभिरन्वितोऽपरैः ।;बबन्ध तां गामथ ताञ्छशाप वसिष्ठसंस्थः कमलोद्भवः प्रभुः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = अधर्मवृत्ताः प्रतियात मानुषीं योनिं द्रुतं यत्कृते सर्व एव ।;धर्माच्च्युताः स तथाऽष्टायुराप्यतामन्ये पुनः क्षिप्रमतो विमोक्ष्यथ ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = प्रचोदयामास च या कुमार्गे पतिं हि साऽम्बेति नरेषु जाता ।;अभर्तृका पुंस्त्वसमाश्रयेण पत्युर्मृतौ कारणत्वं व्रजेत ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = भवत्वसौ ब्रह्मचर्यैकनिष्ठो महान् विरोधश्च तयोर्भवेत ।;स गर्भवासाष्टकदुःखमेव समाप्नुतां शरतल्पे शयानः ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = मृत्यष्टकोत्थामपि वेदनां सः प्राप्नोतु शस्त्रैर्बहुधा निकृत्तः ।;इतीरितास्ते कमलोद्भवं तं ज्ञात्वा समुत्सृज्य च गां प्रणेमुः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = न मानुषं (मानुषीं) गर्भमवाप्नुमो वयं भवत्वयं सर्ववित् कीर्तिमांश्च ।;महास्त्रवेत्ता भवदंशयुक्तस्तथा बलं नोऽखिलानामुपैतु ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितेऽस्त्वित्युदिताः स्वयम्भुवा वसिष्ठसंस्थेन सुरापगां ययुः ।;ऊचुस्तथैनामुदरे वयं ते जायेमहि क्षिप्रमस्मान् हन त्वम् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिता सा वरमाशु वव्रे तेभ्योऽप्यपापत्वमथ प्रयत्वम् ।;तेषां सदैवाऽत्मन एकमेषां दीर्घायुषं तान् सुषुवेऽथ शन्तनोः ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = अविघ्नतस्तान् विनिहन्तुमेव पुरा प्रतीपस्य हि दक्षिणोरुम् ।;समाश्रिता कामिनीवत्त्वकामा तत्पुत्रभार्या भवितुं विडम्बात् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = तेनैव चोक्ता भव मे सुतस्य भार्या यतो दक्षिणोरुस्थिताऽसि ।;भागो हि दक्षो दुहितुः स्नुषाया भार्याभागो वाम इति प्रसिद्धः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = उवाच सा तं नतु मां सुतस्ते काऽसीति पृच्छेन्न तु मां निवारयेत् ।;अयोग्यकर्त्रीमपि कारणं च मत्कर्मणो नैव पृच्छेत् कदाचित् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = यदा त्रयाणामपि चैकमेष करोति गच्छेयमहं विसृज्य ।;तदा त्वदीयं सुतमित्युदीरिते तथेति राजाऽप्यवदत् प्रतीपः ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = तथैव पुत्राय च तेन तद्वचो वधूक्तमुक्तं वचनाद् द्युनद्याः ।;कनीयसे सा ह्यवदत् सुतस्ते नान्यः पतिः शन्तनुरेव मे वृतः ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु सा शन्तनुतोऽष्टपुत्रानवाप्य सप्त न्यहनत् तथाऽष्टमम् ।;गन्तुं ततो मतिमाधाय हन्तुमिवोद्योगं सा हि मृषा चकार ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = अवस्थितिर्नातिसुखाय मानुषे यतः सुराणामत एव गन्तुम् ।;ऐच्छन्न तस्या हि बभूव मानुषो देहो नरोत्थो हि (तथा)तदाऽऽस शन्तनोः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = तां पुत्रनिधनोद्युक्तां न्यवारयत शन्तनुः ।;काऽसि त्वं हेतुना केन हंसि पुत्रान् नृशंसवत् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = रूपं सुरवरस्त्रीणां तव तेन न पापकम् (पातकम्)।;भवेत् कर्म त्वदीयं तन्महत् कारणमत्र हि ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = तत् कारणं वद शुभे यदि मच्छ्रोत्रमर्हति ।;इतीरिताऽवदत् सर्वं प्रययौ च सुरापगा ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = न धर्मो देवतानां हि ज्ञातवासश्चिरं नृषु ।;कारणादेव हि सुरा नृषु वासं प्रकुर्वते ।;कारणापगमे यान्ति धर्मोऽप्येषां तथाविधः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = अदृश्यत्वमसंस्पर्शो ह्यसम्भाषणमेव च ।;सुरैरपि नृजातैस्तु गुह्यधर्मो दिवौकसाम् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = अतः सा वरुणं देवं पूर्वभर्तारमप्यमुम् ।;नृजातं शन्तनुं त्यक्त्वा प्रययौ वरुणालयम् ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = सुतमष्टममादाय भर्तुरेवाप्यनुज्ञया ।;वधोद्योगान्निवृत्ता सा ददौ पुत्रं बृहस्पतौ ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = देवव्रतोऽसावनुशासनाय मात्रा दत्तो देवगुरौ शतार्द्धम् ।;संवत्सराणामखिलांश्च वेदान् समभ्यसत् तद्वशगान्तरात्मा ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = ततश्च मात्रा जगतां गरीयस्यनन्तपारेऽखिलसद्गुणार्णवे ।;रामे भृगूणामधिपे प्रदत्तः शुश्राव तत्त्वं च शतार्द्धवर्षम् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = स पञ्चविंशत् पुनरब्दकानामस्त्राणि चाऽभ्यस्य पतेर्भृगूणाम् ।;मात्रा समानीय निजे तटे तु संस्थापितः प्रार्पयितुं स्वपित्रे ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = स तत्र बद्ध्वा शरपञ्जरेण गङ्गां विजह्रेऽस्य पिता तदैव ।;व्रजन् मृगार्थी तृषितो विलोकयन् गङ्गामतोयामभवत् सुविस्मितः ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = स मार्गयामास ततोऽस्य हेतुं ज्ञप्त्यै तदा स्वं च ददर्श सूनुम् ।;क्रीडन्तमस्त्रेण बभूव सोऽपि क्षणाददृश्यः पितृदर्शनादनु ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = मीमांसमानं तमवाप गङ्गा सुतं समादाय पतिं जगाद च ।;अयं सुतस्ते परमास्त्रवेत्ता समर्पितो वीर्यबलोपपन्नः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = अस्याग्रजाः स्वां स्थितिमेव याता हरेः पदाम्भोजसुपाविते जले ।;तनूर्मदीये प्रणिधाय तत् त्वं तान् मा शुचोऽनेन च मोदमानः ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = इति प्रदायामुमदृश्यतामगाद् गङ्गा तमादाय ययौ स्वकं गृहम् ।;राजाऽभिषिच्याथ च यौवराज्ये मुमोद तत्सद्गुणतर्पितो भृशम् ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = पुनः स पित्राऽनुमतो बृहस्पतेरवाप वेदान् पुरुषायुषोऽर्द्धतः ।;रामात् तथाऽस्त्राणि पुनस्त्ववाप तावद्भिरब्दैस्त्रिशतैश्च तत्त्वम् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = स सर्ववित्त्वं समवाप्य रामात् समस्तविद्याधिपतेर्गुणार्णवात् ।;पितुं समीपं समवाप्य तं च शुश्रूषमाणः प्रमुमोद वीरः ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = यदैव गङ्गा सुषुवेऽष्टमं सुतं तदैव यातो मृगयां स शन्तनुः ।;शरद्वतो जातमपश्यदुत्तमं वने विसृष्टं मिथुनं त्वयोनिजम् ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = शरद्वांस्तु तपः कुर्वन् ददर्श सहसोर्वशीम् ।;चस्कन्द रेतस्तस्याथ शरस्तम्बे ततोऽभवत् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = विष्कम्भो नाम रुद्राणां भूभारहरणेऽङ्गताम् ।;हरेः प्राप्तुं तथा तारा भार्या या हि बृहस्पतेः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = तावुभौ शन्तनुर्दृष्ट्वा कृपाविष्टः स्वकं गृहम् ।;निनाय नाम चक्रे च कृपाया विषयौ यतः ।;कृपः कृपीति स कृपस्तपो विष्णोश्चकार ह ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = तस्य प्रीतस्तदा विष्णुः सर्वलोकेश्वरेश्वरः ।;प्रादादेष्यत्सप्तर्षित्वमायुः कल्पान्तमेव च ।;स शन्तनुगृहे तिष्ठन् देवव्रतसखाऽभवत् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = सर्ववेदानधिजगौ सर्वशास्त्राणि कौशिकात् ।;तत्त्वज्ञानं तथा व्यासादाप्य सर्वज्ञतां गतः ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = यदा हि जातः स कृपस्तदैव बृहस्पतेः सूनुरगाच्च गङ्गाम् ।;स्नातुं घृताचीं स ददर्श तत्र श्लथद्दुकूलां सुरवर्यकामिनीम् ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = तद्दर्शनात् स्कन्नमथेन्द्रियं स द्रोणे दधाराऽशु ततोऽभवत् स्वयम् ।;अम्भोजजावेशयुतो बृहस्पतिः कर्तुं हरेः कर्म भुवो भरोद्धृतौ ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणेतिनामास्य चकार तातो मुनिर्भरद्वाज उतास्य वेदान् ।;अध्यापयामास सशास्त्रसङ्घान् सर्वज्ञतामाप च सोऽचिरेण ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = काले च तस्मिन् पृषतोऽनपत्यो वने तु पाञ्चालपतिश्चचार ।;तपो महत् तस्य तथा वराप्सरावलोकनात् स्कन्दितमाशु रेतः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = स तद् विलज्जावशतः पदेन समाक्रमत् तस्य बभूव सूनुः ।;हूहूस्तु तु नाम्ना स विरिञ्चगायको नाम्नाऽऽवहो यो मरुतां तदंशयुक् ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = स द्रोणतातात् समवाप वेदानस्त्राणि विद्याश्च तथा समस्ताः ।;द्रोणेन युक्तः स तदा गुरोः सुतं सहैव नौ राज्यमिति ह्यवादीत् ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = पदे द्रुतत्वाद् द्रुपदाभिधेयः स राज्यमापाथ निजां कृपीं सः ।;द्रोणोऽपि भार्यां समवाप्य सर्वप्रतिग्रहोज्झश्च पुरेऽवसत् सुखी ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = ततः कदाचिन्मृगयां गतः स ददर्श कन्याप्रवरां तु शन्तनुः ।;या पूर्वसर्गे पितृपुत्रिका सती चचार विष्णोस्तप उत्तमं चिरम् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = यस्यै वरं विष्णुरदात् पुराऽहं सुतस्तव स्यामिति या वसोः सुता ।;जाता पुनर्दाशगृहे विवर्द्धिता व्यासात्मना विष्णुरभूच्च यस्याम् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = तद्दर्शनान्नृपतिर्जातहृच्छ्रयो(च्छयः) वव्रे प्रदानाय च दाशराजम् ।;ऋते स तस्यास्तनयस्य राज्यं नैच्छद् दातुं तामथाऽयाद् गृहं स्वम् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = तच्चिन्तया म्लानमुखं(ग्लानमुखं) जनित्रं दृष्ट्वैव देवव्रत आश्वपृच्छत् ।;तत्कारणं सारथिमस्य तस्माच्छ्रुत्वाऽखिलं दाशगृहं जगाम ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = स तस्य विश्वासकृते प्रतिज्ञां चकार नाहं करवाणि राज्यम् ।;तथैव मे सन्ततितो भयं ते व्यैतूर्ध्वरेताः सततं भवानि ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = भीमव्रतत्वाद्धि तदाऽस्य नाम कृत्वा देवा भीष्म इति ह्यचीक्लृपन् ।;प्रसूनवृष्टिं स च दाशदत्तां कालीं समादाय पितुः समर्पयत् ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञात्वा तु तां राजपुत्रीं गुणाढ्यां सत्यस्य विष्णोर्मातरं नामतस्तत् ।;लोके प्रसिद्धां सत्यवतीत्युदारां विवाहयामास पितुः स भीष्मः ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = प्रायः सतां न मनः पापमार्गे गच्छेदिति ह्यात्ममनश्च सक्तम् ।;ज्ञात्वाऽपि तां दाशगृहे विवर्द्धितां जग्राह सद्धर्मरतश्च शन्तनुः ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = स्वच्छन्दमृत्युत्ववरं प्रदाय तथाऽप्यजेयत्वमधृष्यतां च ।;युद्धेषु भीष्मस्य नृपोत्तमः स रेमे तयैवाब्दगणान् बहूंश्च ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = लेभे स चित्राङ्गदमत्र पुत्रं तथा द्वितीयं च विचित्रवीर्यम् ।;तयोश्च बाल्ये व्यसृजच्छरीरं जीर्णेन देहेन हि किं ममेति ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = स्वेच्छया वरुणत्वं स प्राप नानिच्छया तनुः ।;तस्मिन् काले त्यज्यते हि बलवद्भिर्वधं विना ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = अतिसक्तास्तपोहीनाः कथञ्चिन्मृतिमाप्नुयुः ।;अनिच्छयाऽपि हि यथा मृतश्चित्राङ्गदानुजः ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = अथौर्ध्वदैहिकं कृत्वा पितुर्भीष्मोऽभ्यषेचयत् ।;राज्ये चित्राङ्गदं वीरं यौवराज्येऽस्य चानुजम् ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = चित्राङ्गदेन निहतो नाम स्वं त्वपरित्यजन् ।;चित्राङ्गदोऽकृतोद्वाहो गन्धर्वेण महारणे ।;विचित्रवीर्यं राजानं कृत्वा भीष्मोऽन्वपालयत् ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = अथ काशिसुतास्तिस्रस्तदर्थं भीष्म आहरत् ।;अम्बामप्यम्बिकानाम्नीं तथैवाम्बालिकां पराम् ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = पाणिग्रहणकाले तु ब्रह्मदत्तस्य वीर्यवान् ।;विजित्य तं साल्वराजं समेतान् क्षत्रियानपि ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = अम्बिकाम्बालिके तत्र संवादं चक्रतुः शुभे ।;अम्बा सा भीष्मभार्यैव पूर्वदेहे तु नैच्छत ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = शापाद्धिरण्यगर्भस्य साल्वकामाऽहमित्यपि ।;उवाच तां स तत्याज साऽगमत् साल्वमेव च ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = तेनापि सम्परित्यक्ता परामृष्टेति सा पुनः ।;भीष्ममाप स नागृह्णात् प्रययौ साऽपि भार्गवम् ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = भ्रातुर्विवाहयामास सोऽम्बिकाम्बालिके ततः ।;भीष्माय तु यशो दातुं युयुधे तेन भार्गवः ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तशक्तिरपि स न भीष्मं निजघान ह ।;नचाम्बां ग्राहयामास भीष्मकारुण्ययन्त्रितः ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तशक्तिः सकलान्तरात्मा यः सर्ववित् सर्ववशी च सर्वजित् ।;न यत्समोऽन्योऽस्ति कथञ्च कुत्रचित् कथं ह्यशक्तिः परमस्य तस्य ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मं स्वभक्तं यशसाऽभिपूरयन् विमोहयन्नासुरांश्चैव रामः ।;जित्वैव भीष्मं न जघान देवो वाचं च सत्यामकरोत् स तस्य ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = ‘विद्धवन्मुग्धवच्चैव केशवो वेदनार्तवत् ।;दर्शयन्नपि मोहाय नैव विष्णुस्तथा भवेत्’ ॥ एवमादिपुराणोत्थवाक्याद् रामः सदा जयी ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = यशो भीष्मस्य दत्वा तु सोऽम्बां च शरणागताम् ।;उन्मुच्य भर्तृद्वेषोत्थपापात् तेनाऽश्वयोजयत् ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तरं शिखण्डित्वात् तदा सा शाङ्करं तपः ।;भीष्मस्य निधनार्थाय पुंस्त्वार्थं च चकार ह ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मो यथा त्वां गृह्णीयात् तथा कुर्यामितीरितम् ।;रामेण सत्यं तच्चक्रे भीष्मे देहान्तरं गते ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = रुद्रस्तु तस्यास्तपसा तुष्टः प्रादाद् वरं तदा ।;भीष्मस्य मृतिहेतुत्वं कालात् पुन्देहसम्भवम् ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = मालां च य इमां मालां गृह्णीयात् स हनिष्यति ।;भीष्ममित्येव तां मालां गृहीत्वा सा नृपान् ययौ ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = तां न भीष्मभयात् केऽपि जगृहुस्तां हि सा ततः ।;द्रुपदस्य गृहद्वारि न्यस्य योगात् तनुं जहौ ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = एतस्मिन्नेव काले तु सुतार्थं द्रुपदस्तपः ।;चकार शम्भवे चैनं सोऽब्रवीत् कन्यका तव ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = भूत्वा भविष्यति पुमानिति साम्बा ततोऽजनि ।;नाम्ना शिखण्डिनी तस्याः पुंवत् कर्माणि चाकरोत् ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = तस्यै पाञ्चालराजः स दशार्णाधिपतेः सुताम् ।;उद्वाहयामास सा तां पुंवेषेणैव गूहिताम् ।;अन्यत्र मातापित्रोस्तु न विज्ञातां बुबोध ह ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = धात्र्यै न्यवेदयत् साऽथ तत्पित्रे सा न्यवेदयत् ।;स क्रुद्धः प्रेषयामास निहन्मि त्वां सबान्धवम् ।;इति पाञ्चालराजाय निर्जगाम च सेनया ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = विश्वस्य वाक्यं रुद्रस्य पुमानेवेति पार्षतः ।;प्रेषयामास धिग् बुद्धिर्भिन्ना ते बालवाक्यतः ।;अपरीक्षकस्य ते राष्ट्रं कथमित्येव नर्मकृत् ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = अथ भार्यासमेतं तं पितरं चिन्तयाऽऽकुलम् ।;दृष्ट्वा शिखण्डिनी दुःखान्मन्निमित्तान्न नश्यतु ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = स तस्या अखिलं श्रुत्वा कृपां चक्रे महामनाः ।;स तस्यै स्वं वपुः प्रादात् तदीयं जगृहे तथा ।;अंशेन पुंस्वभावार्थं पूर्वदेहे समास्थितः ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = नास्या देहः पुंस्त्वमाप नच पुंसाऽनधिष्ठिते ।;पुंदेहे न्यवसत् साऽथ गन्धर्वेण त्वधिष्ठितम् ।;गान्धर्वं देहमाविश्य स्वकीयं भवनं ययौ ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = श्वो देहि मम देहं मे स्वं च देहं समाविश ।;इत्युक्त्वा स तु गन्धर्वः कन्यादेहं समास्थितः ।;उवासैव वने तस्मिन् धनदस्तत्र चाऽगमत् ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽवसत् स गन्धर्वः कन्या पित्रोरशेषतः ।;कथयामासानुभूतं तौ भृशं मुदमापतुः ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = परीक्ष्य तामुपायैश्च श्वशुरो लज्जितो ययौ ।;श्वोभूते सा तु गन्धर्वं प्राप्य तद्वचनात् पुनः ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = ययौ तेनैव देहेन पुंस्त्वमेव समाश्रिता ।;स शिखण्डी नामतोऽभूदस्त्रशस्त्रप्रतापवान् ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = विचित्रवीर्यः प्रमदाद्वयं तत् सम्प्राप्य रेमेऽब्दगणान् सुसक्तः ।;तत्याज देहं च स यक्ष्मणाऽर्दितस्ततोऽस्य माताऽस्मरदाशु कृष्णम् ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = आविर्बभूवाऽशु जगज्जनित्रो जनार्दनो जन्मजराभयापहः ।;समस्तविज्ञानतनुः सुखार्णवः सम्पूजयामास च तं जनित्री ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = तं भीष्मपूर्वैः परमादरार्चितं स्वभिष्टुतं चावददस्य माता ।;पुत्रौ मृतौ मे नतु राज्यमैच्छद् भीष्मो मया नितरामर्थितोऽपि ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = क्षेत्रे ततो भ्रातुरपत्यमुत्तममुत्पादयास्मत्परमादरार्थितः ।;इतीरितः प्रणतश्चाप्यभिष्टुतो भीष्मादिभिश्चाऽह जगद्गुरुर्वचः ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = ऋते रमां जातु (ममाङ्गयोगयोग्या)ममाङ्गसङ्गयोग्याऽङ्गना नैव सुरालयेऽपि ।;तथाऽपि ते वाक्यमहं करिष्ये सांवत्सरं सा चरतु व्रतं मे ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = सा पूतदेहाऽथ च वैष्णवव्रतान्मत्तः समाप्नोतु सुतं वरिष्ठम् ।;इतीरिते राष्ट्रमुपैति नाशमिति ब्रुवन्तीं पुनराह वाक्यम् ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = सौम्यस्वरूपोऽप्यतिभीषणं मृषा तच्चक्षुषो रूपमहं प्रदर्शये ।;सहेत सा तद् यदि पुत्रकोऽस्या भवेद् गुणाढ्यो बलवीर्ययुक्तः ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितेऽस्त्वित्युदितस्तयाऽगमत् कृष्णोऽम्बिकां सा तु भिया न्यमीलयत् ।;अभूच्च तस्यां धृतराष्ट्रनामको गन्धर्वराट् पवनावेशयुक्तः ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = स मारुतावेशबलाद् बलाधिको बभूव राजा धृतराष्ट्रनामा ।;अदाद् वरं चास्य बलाधिकत्वं कृष्णोऽन्ध आसीत् स तु मातृदोषतः ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञात्वा तमन्धं पुनरेव कृष्णं माताऽब्रवीज्जनयान्यं गुणाढ्यम् ।;अम्बालिकायामिति तत् तथाऽकरोद् भयात्तु सा पाण्डुरभून्मृषादृक् ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = परावहो नाम मरुत् ततोऽभवद् वर्णेन पाण्डुः स हि नामतश्च ।;स चाऽस वीर्याधिक एव वायोरावेशतः सर्वशस्त्रास्त्रवेत्ता ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = तस्मै तथा बलवीर्याधिकत्ववरं प्रादात् कृष्ण एवाथ पाण्डुम् ।;विज्ञाय तं प्राह पुनश्च माता निर्दोषमन्यं जनयोत्तमं सुतम् ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = उक्त्वेति कृष्णं पुनरेव च स्नुषामाह त्वयाऽक्ष्णोर्हि निमीलनं पुरा ।;कृतं ततस्ते सुत आस चान्धस्ततः पुनः कृष्णमुपास्व भक्तितः ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिताऽप्यस्य हि मायया सा भीता भुजिष्यां कुमतिर्न्ययोजयत् ।;सा तं परानन्दतनुं गुणार्णवं सम्प्राप्य भक्त्या परयैव रेमे ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = तस्यां स देवोऽजनि धर्मराजो माण्डव्यशापाद् य उवाह शूद्रताम् ।;वसिष्ठसाम्यं समभीप्समानं प्रच्यावयन्निच्छया शापमाप ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = अयोग्यसम्प्राप्तिकृतप्रयत्नदोषात् समारोपितमेव शूले ।;चोरैर्हृतेऽर्थेऽपितु चोरबुद्ध्या मक्षीवधादित्यवदद् यमस्तम् ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = नासत्यता तस्य च तत्र हेतुतः शापं गृहीतुं स तथैव चोक्त्वा ।;अवाप शूद्रत्वमथास्य नाम चक्रे कृष्णः सर्ववित्त्वं तथाऽदात् ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = विद्यारतेर्विदुरो नाम चायं भविष्यति ज्ञानबलोपपन्नः ।;महाधनुर्बाहुबलाधिकश्च सुनीतिमानित्यवदत् स कृष्णः ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञात्वाऽस्य शूद्रत्वमथास्य माता पुनश्च कृष्णं प्रणता ययाचे ।;अम्बालिकायां जनयान्यमित्यथो नैच्छत् स कृष्णोऽभवदप्यदृश्यः ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = योग्यानि कर्माणि ततस्तु तेषां चकार भीष्मो मुनिभिर्यथावत् ।;विद्याः समस्ता अददाच्च कृष्णस्तेषां पाण्डोरस्त्रशस्त्राणि भीष्मः ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = ते सर्वविद्याप्रवरा बभूवुर्विशेषतो विदुरः सर्ववेत्ता ।;पाण्डुः समस्तास्त्रविदेकवीरो जिगाय पृथ्वीमखिलां धनुर्धरः ॥ १३८॥ | |||
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| verse_lines = गवद्गणादास तथैव सूतात् समस्तगन्धर्वपतिः स तुम्बुरुः ।;य उद्वहो नाम मरुत् तदंशयुक्तो वशी सञ्जयनामधेयः ॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = विचित्रवीर्यस्य स सूतपुत्रः सखा च तेषामभवत् प्रियश्च ।;समस्तविन्मतिमान् व्यासशिष्यो विशेषतो धृतराष्ट्रानुवर्ती ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = गान्धारराजस्य सुतामुवाह गान्धारिनाम्नीं सुबलस्य राजा ।;ज्येष्ठो ज्येष्ठां शकुनेर्द्वापरस्य नास्तिक्यरूपस्य कुकर्महेतोः ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = शूरस्य पुत्री गुणशीलरूपयुक्ता दत्ता सख्युरेव स्वपित्रा ।;नाम्ना पृथा कुन्तिभोजस्य तेन कुन्ती भार्या पूर्वदेहेऽपि पाण्डोः ॥ १४२॥ | |||
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| verse_lines = कूर्मश्च नाम्ना मरुदेव कुन्तिभोजोऽथैनां वर्द्धयामास सम्यक् ।;तत्राऽगमच्छङ्करांशोऽतिकोपो दुर्वासास्तं प्राह मां वासयेति ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = तमाह राजा यदि कन्यकायाः क्षमिष्यसे शक्तितः कर्म कर्त्र्याः ।;सुखं वसेत्योमिति तेन चोक्तः शुश्रूषणायाऽदिशदाशु कुन्तीम् ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = चकार कर्म सा पृथा मुनेः सुकोपनस्य हि ।;यथा न शक्यते परैः शरीरवाङ्मनोनुगा ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = स वत्सरत्रयोदशं तया यथावदर्चितः ।;उपादिशत् परं मनुं समस्तदेववश्यदम् ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = ऋतौ तु सा समाप्लुता परीक्षणाय तन्मनोः ।;समाह्वयद् दिवाकरं स चाऽजगाम तत्क्षणात् ॥ १४७॥ | |||
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| verse_lines = ततो न सा विसर्जितुं शशाक तं विना रतिम् ।;सुवाक्प्रयत्नतोऽपि(षि) तामथाऽससाद भास्करः ॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = स तत्र जज्ञिवान् स्वयं द्वितीयरूपको विभुः ।;सवर्मदिव्यकुण्डलो ज्वलन्निव स्वतेजसा ॥ १४९॥ | |||
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| verse_lines = पुरा स वालिमारणप्रभूतदोषकारणात् ।;सहस्रवर्मनामिनाऽसुरेण वेष्टितोऽजनि ॥ १५०॥ | |||
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| verse_lines = सूतेनाधिरथेन लालिततनुस्तद्भार्यया राधया ।;संवृद्धो निखिलाः श्रुतीरधिजगौ शास्त्राणि सर्वाणि च ।;बाल्यादेव महाबलो निजगुणैः सम्भासमानोऽवसन्नाम्नाऽसौ वसुषेण(वसुसेन)तामगमदस्याऽसीद्ध्यमा तद् वसु ॥ १५५॥ | |||
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| verse_lines = स मारुतावेशवशात् पृथिव्यां बलाधिकोऽभूद् वरतश्च धातुः ।;शल्यश्च नाम्नाऽखिलशत्रुशल्यो बभूव कन्याऽस्य च माद्रिनाम्नी ॥ १५९॥ | |||
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| verse_lines = सा पाण्डुभार्यैव च पूर्वजन्मन्यभूत् पुनश्च प्रतिपादिताऽस्मै ।;शल्यश्च राज्यं पितृदत्तमञ्जो जुगोप धर्मेण समस्तशास्त्रवित् ॥ १६०॥ | |||
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| verse_lines = अथाङ्गनारत्नमवाप्य तद् द्वयं पाण्डुस्तु भोगान् बुभुजे यथेष्टतः ।;अपीपलद् धर्मसमाश्रयो महीं ज्येष्ठापचायी विदुरोक्तमार्गतः ॥ १६१॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मो हि राष्ट्रे धृतराष्ट्रमेव संस्थाप्य पाण्डुं युवराजमेव ।;चक्रे तथाऽप्यन्ध इति स्म राज्यं चकार नासावकरोच्च पाण्डुः ॥ १६२॥ | |||
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| verse_lines = भीष्माम्बिकेयोक्तिपरः सदैव पाण्डुः शशासावनिमेकवीरः ।;अथाऽम्बिकेयो बहुभिश्च यज्ञैरीजे सपाण्डुश्च महाधनौघैः ॥ १६३॥ | |||
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| verse_lines = नैषा विरोधे कुरुपाण्डवानां तिष्ठेदिति व्यास उदीर्णसद्गुणः ।;स्वमातरं स्वाश्रममेव निन्ये स्नुषे च तस्या ययतुः स्म तामनु ॥ १६४॥ | |||
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| verse_lines = सुतोक्तमार्गेण विचिन्त्य तं हरिं सुतात्मना ब्रह्मतया च सा ययौ ।;परं पदं वैष्णवमेव कृष्णप्रसादतः स्वर्ययतुः स्नुषे च ॥ १६५॥ | |||
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| verse_lines = माता च सा विदुरस्याऽप लोकं वैरिञ्चमन्वेव गताऽम्बिकां सती ।;व्यासप्रसादात् सुतसद्गुणैश्च कालेन मुक्तिं च जगाम सन्मतिः ॥ १६६॥ | |||
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| verse_lines = अम्बालिकाऽपि क्रमयोगतोऽगात् परां गतिं नैव तथाऽम्बिका ययौ ।;यथायथा विष्णुपरश्चिदात्मा तथातथा ह्यस्य गतिः परत्र ॥ १६७॥ | |||
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| verse_lines = पाण्डुस्ततो राज्यभरं निधाय ज्येष्ठेऽनुजे चैव वनं जगाम ।;पत्नीद्वयेनानुगतो बदर्यामुवास नारायणपालितायाम् ॥ १६८॥ | |||
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| verse_lines = गृहाश्रमेणैव वने निवासं कुर्वन् स भोगान् बभुजे तपश्च ।;चक्रे मुनीन्द्रैः सहितो जगत्पतिं रमापतिं भक्तियुतोऽभिपूजयन् ॥ १६९॥ | |||
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| verse_lines = स कामतो हरिणत्वं प्रपन्नं दैवादृषिं ग्राम्यकर्मानुषक्तम् ।;विद्ध्वा शापं प्राप तस्मात् स्त्रिया युङ् मरिष्यसीत्येव बभूव चाऽर्तः ॥ १७०॥ | |||
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| verse_lines = न्यसिष्णुरुक्तः पृथया स नेति प्रणामपूर्वं न्यवसत् तथैव ।;ताभ्यां समेतः शतशृङ्गपर्वते नारायणस्याऽश्रममध्यगे पुरः ॥ १७१॥ | |||
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| verse_lines = तपो नितान्तं स चचार ताभ्यां समन्वितः कृष्णपदाम्बुजाश्रयः ।;तत्सङ्गपूतद्युसरिद्वराम्भःसदावगाहातिपवित्रिताङ्गः ॥ १७२॥ | |||
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| verse_lines = एतस्मिन्नेव काले कमलभवशिवाग्रेसराः शक्रपूर्वा ।;भूम्या पापात्मदैत्यैर्भुवि कृतनिलयैराक्रमं चासहन्त्या ।;ईयुर्देवादिदेवं शरणमजमुरुं पूर्णषाड्गुण्यमूर्तिं क्षीराब्धौ नागभोगे शयितमनुपमानन्दसन्दोहदेहम् ॥ १७३॥ | |||
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| verse_lines = ऊचुः परं पुरुषमेनमनन्तशक्तिं सूक्तेन तेऽब्जजमुखा अपि पौरुषेण ।;स्तुत्वा धराऽसुरवराक्रमणात् परेश खिन्ना यतो हि विमुखास्तव तेऽतिपापाः ॥ १७४॥ | |||
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| verse_lines = दुस्सङ्गतिर्भवति भारवदेव देव नित्यं सतामपि हि नः शृणु वाक्यमीश ।;पूर्वं हता दितिसुता भवता रणेषु ह्यस्मत्प्रियार्थमधुना भुवि तेऽभिजाताः ॥ १७५॥ | |||
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| verse_lines = आसीत् पुरा दितिसुतैरमरोत्तमानां सङ्ग्राम उत्तमगजाश्वरथद्विपद्भिः ।;अक्षोहिणी शतमहौघमहौघमेव सैन्यं सुरात्मकमभूत् परमास्त्रयुक्तम् ।;तस्मान्महौघगुणमास महासुराणां सैन्यं शिलागिरिमहास्त्रधरं सुघोरम् ॥ १७६॥ | |||
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| verse_lines = तेषां रथाश्च बहुनल्वपरिप्रमाणा देवासुरप्रवरकार्मुकबाणपूर्णाः ।;नानाम्बराभरणवेषवरायुधाढ्या देवासुराः ससृपुराशु परस्परं ते ॥ १७७॥ | |||
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| verse_lines = जघ्नुर्गिरीन्द्रतलमुष्टिमहास्त्रशस्त्रैश्चक्रुर्नदीश्च रुधिरौघवहा महौघम् ।;तत्र स्म देववृषभैरसुरेशचमम्वा युद्धे निसूदित उतौघबलैः शतांशः ॥ १७८॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽत्मसेनामवमृद्यमानां वीक्ष्यासुरः शम्बरनामधेयः ।;ससार मायाविदसह्यमायो वरादुमेशस्य सुरान् विमोहयन् ॥ १७९॥ | |||
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| verse_lines = मायासहस्रेण सुराः समर्दिता(विमर्दिताः) रणे विषेदुः शशिसूर्यमुख्याः ।;तान् वीक्ष्य वज्री परमां तु विद्यां स्वयम्भुदत्तां प्रयुयोज वैष्णवीम् ॥ १८०॥ | |||
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| verse_lines = समस्तमायापहया तयैव वराद् रमेशस्य सदाऽप्यसह्यया ।;माया विनेशुर्दितिजेन्द्रसृष्टा वारीशवह्नीन्द्र(इन्दु)मुखाश्च मोचिताः ॥ १८१॥ | |||
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| verse_lines = यमेन्दुसूर्यादिसुरास्ततोऽसुरान् निजघ्नुराप्यायितविक्रमास्तदा ।;सुरेश्वरेणोर्जितपौरुषा बहून् वज्रेण वज्री निजघान शम्बरम् ॥ १८२॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् हते दानवलोकपाले दितेः सुता दुद्रुवुरिन्द्रभीषिताः ।;तान् विप्रचित्तिर्विनिवार्य धन्वी ससार शक्रप्रमुखान् सुरोत्तमान् ॥ १८३॥ | |||
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| verse_lines = वरादजेयेन विधातुरेव सुरोत्तमांस्तेन शरैर्निपातितान् ।;निरीक्ष्य शक्रं च विमोहितं द्रुतं न्यवारयत् तं पवनः शरौघैः ॥ १८४॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्राणि तस्यास्त्रवरैर्निवार्य चिक्षेप तस्योरसि काञ्चनीं गदाम् ।;विचूर्णितोऽसौ निपपात मेरौ महाबलो वायुबलाभिनुन्नः ॥ १८५॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽससादाऽशु स कालनेमिस्त्वदाज्ञया यस्य वरं ददौ पुरा ।;सर्वैरजेयत्वमजोऽसुरः(स्य) ससहस्रशीर्षो द्विसहस्रबाहुयुक् ॥ १८६॥ | |||
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| verse_lines = तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य मारुतस्त्वदाज्ञया दत्तवरस्त्वयैव ।;हन्तव्य इत्यस्मरदाशु हि त्वां तदाऽऽविरासीस्त्वमनन्तपौरुषः ॥ १८७॥ | |||
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| verse_lines = तमस्त्रशस्त्राणि बहूनि बाहुभिः प्रवर्षमाणं भुवनाप्तदेहम् ।;चक्रेण बाहून् विनिकृत्य कानि च न्यवेदयश्चाऽशु यमाय पापम् ॥ १८८॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽसुरास्ते निहता अशेषास्त्वया त्रिभागा निहताश्चतुर्थम् ।;जघान वायुः पुनरेव जातास्ते भूतले धर्मबलोपपन्नाः ॥ १८९॥ | |||
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| verse_lines = राज्ञां महावंशसुजन्मनां तु तेषामभूद् धर्ममतिर्विपापा ।;शिक्षामवाप्य द्विजपुङ्गवानां त्वद्भक्तिरप्येषु हि काचन स्यात् ॥ १९०॥ | |||
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| verse_lines = त्वद्भक्तिलेशाभियुतः सुकर्मा व्रजेन्न पापां तु गतिं कथञ्चित् ।;दैत्येश्वराणां च तमोऽन्धमेव त्वयैव क्लृप्तं ननु सत्यकाम ॥ १९१॥ | |||
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| verse_lines = धर्मस्य मिथ्यात्वभयाद् वयं त्वामथापिवा दैत्यशुभाप्तिभीषा ।;सम्प्रार्थयामो दितिजान् सुकर्मणस्त्वद्भक्तितश्च्यावयितुं च शीघ्रम् ॥ १९२॥ | |||
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| verse_lines = य उग्रसेनः सुरगायकः स जातो यदुष्वेष तथाऽभिधेयः ।;तवैव सेवार्थममुष्य पुत्रो जातोऽसुरः कालनेमिः स ईश ॥ १९३॥ | |||
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| verse_lines = यस्त्वत्प्रियार्थं न हतो हि वायुना भवत्प्रसादात् परमीशिताऽपि ।;स एष भोजेषु पुनश्च जातो वरादुमेशस्य परैरजेयः ॥ १९४॥ | |||
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| verse_lines = स औग्रसेने जनितोऽसुरेण क्षेत्रे हि तद्रूपधरेण मायया ।;गन्धर्विजेन द्रमिलेन नाम्ना कंसो जितो येन वराच्छचीपतिः ॥ १९५॥ | |||
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| verse_lines = जित्वा जलेशं च हृतानि येन रत्नानि यक्षाश्च जिताः शिवस्य ।;कन्यावनार्थं मगधाधिपेन प्रयोजितास्ते च हृते बलेन ॥ १९६॥ | |||
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| verse_lines = स विप्रचित्तिश्च जरासुतोऽभूद् वराद् विधातुर्गिरिशस्य चैव ।;सर्वैरजेयो बलमुत्तमं ततो ज्ञात्वैव कंसस्य मुदा सुते ददौ ॥ १९७॥ | |||
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| verse_lines = निवारयामास न कंसमुद्धतं शक्तोऽपि यो यस्य बले न कश्चित् ।;तुल्यः पृथिव्यां विवरेषु वा क्वचिद् वशे बलाद् यो(ढ्यो) नृपतीश्च चक्रे ॥ १९८॥ | |||
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| verse_lines = हतौ पुरा यौ मधुकैटभाख्यौ त्वयैव हंसो डिभकश्च जातौ ।;वरादजेयौ गिरिशस्य वीरौ भक्तौ जरासन्धमनु स्म तौ शिवे ॥ १९९॥ | |||
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| verse_lines = अन्येऽपि भूमावसुराः प्रजातास्त्वया हता ये सुरदैत्यसङ्गरे ।;अन्ये तथैवान्धतमः प्रपेदिरे कार्या तथैषां च तमोगतिस्त्वया ॥ २००॥ | |||
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| verse_lines = व्यासावतारे निहतस्त्वयायः कलिः सुशास्त्रोक्तिभिरेव चाद्य ।;श्रुत्वा त्वदुक्तीः पुरुषेषु तिष्ठन्नीषच्चकारेव मनस्त्वयीश ॥ २०१॥ | |||
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| verse_lines = रामात्मना(रामावतारे) ये निहताश्च राक्षसा दृष्ट्वा बलं तेऽपि तदा तवाद्य ।;समं तवान्यं नहि चिन्तयन्ति सुपापिनोऽपीश तथा हनूमतः ॥ २०२॥ | |||
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| verse_lines = ये केशव त्वद्बहुमानयुक्तास्तथैव वायौ नहि ते तमोऽन्धम् ।;योग्याः प्रवेष्टुं तदतो हि मार्गाच्चाल्यास्त्वया जनयित्वैव भूमौ ॥ २०३॥ | |||
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| verse_lines = नितान्तमुत्पाद्य भवद्विरोधं तथाच (तथैव) वायौ बहुभिः प्रकारैः ।;सर्वेषु देवेषु च पातनीयास्तमस्यथान्धे कलिपूर्वकासुराः ॥ २०४॥ | |||
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| verse_lines = हतौ च यौ रावणकुम्भकर्णौ त्वया त्वदीयौ प्रतिहारपालौ ।;महासुरावेशयुतौ हि शापात् त्वयैव तावद्य विमोचनीयौ ॥ २०५॥ | |||
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| verse_lines = यौ तौ तवारी ह तयोः प्रविष्टौ दैत्यौ तु तावन्धतमः प्रवेश्यौ ।;यौ तौ त्वदीयौ भवदीयवेश्म त्वया पुनः प्रापणीयौ परेश ॥ २०६॥ | |||
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| verse_lines = आविश्य यो बलिमञ्जश्चकार प्रतीपमस्मासु तथा त्वयीश ।;स चासुरो बलिनामैव भूमौ साल्वो नाम्ना ब्रह्मदत्तस्य जातः ॥ २०७॥ | |||
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| verse_lines = मायामयं तेन विमानमग्र्यमभेद्यमाप्तं सकलैर्गिरीशात् ।;विद्रावितो यो बहुशस्त्वयैव रामस्वरूपेण भृगूद्वहेन ॥ २०८॥ | |||
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| verse_lines = नासौ हतः शक्तिमताऽपि तत्र कृष्णावतारे स मयैव वध्यः ।;इत्यात्मसङ्कल्पमृतं विधातुं स चात्र वध्यो भवताऽतिपापी ॥ २०९॥ | |||
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| verse_lines = यदीयमारुह्य विमानमस्य पिताऽभवत् सौभपतिश्च नाम्ना ।;यदा स भीष्मेण जितः पिताऽस्य तदा स साल्वस्तपसि स्थितोऽभूत् ॥ २१०॥ | |||
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| verse_lines = स चाद्य तस्मात् तपसो निवृत्तो जरासुतस्यानुमते स्थितो हि ।;अनन्यवध्यो भवताऽद्य वध्यः स प्रापणीयश्च तमस्यथोग्रे ॥ २११॥ | |||
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| verse_lines = यो बाणमाविश्य महासुरोऽभूत् स्थितः स नाम्ना(सनाम्ना) प्रथितोऽपि बाणः ।;स कीचको नाम बभूव रुद्रवरादवध्यः स तमः प्रवेश्यः ॥ २१२॥ | |||
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| verse_lines = अतस्त्वया भुव्यवतीर्य देवकार्याणि कार्याण्यखिलानि देव ।;त्वमेव देवेश गतिः सुराणां ब्रह्मेशशक्रेन्दुयमादिकानाम् ॥ २१३॥ | |||
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| verse_lines = त्वमेव नित्योदितपूर्णशक्तिस्त्वमेव नित्योदितपूर्णचिद्धनः ।;त्वमेव नित्योदितपूर्णसत्सुखस्त्वाद्दृङ् न कश्चित् कुत एव तेऽधिकः ॥ २१४॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितो देववरैरुदारगुणार्णवोऽक्षोभ्यतमामृताकृतिः ।;उत्थाय तस्मात् प्रययावनन्तसोमार्ककान्तिद्युतिरन्वितोऽमरैः ॥ २१५॥ | |||
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| verse_lines = स मेरुमाप्याऽह चतुर्मुखं प्रभुर्यत्र त्वयोक्तोऽस्मि हि तत्र सर्वथा ।;प्रादुर्भविष्ये भवतो हि भक्त्या वशस्त्विवाहं स्ववशोऽपि चेच्छया ॥ २१६॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मा प्रणम्याऽह तमात्मकारणं प्रादां पुराऽहं वरुणाय गाः शुभाः ।;जहार तास्तस्य पिताऽमृतस्रवाः स कश्यपो द्राक् सहसाऽतिगर्वितः ॥ २१७॥ | |||
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| verse_lines = मात्रा त्वदित्या च तथा सुरभ्या प्रचोदितेनैव हृतासु तासु ।;श्रुत्वा जलेशात् स मया तु(भि) शप्तः क्षत्रेषु(क्षेत्रेषु) गोजीवनको भवेति ॥ २१८॥ | |||
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| verse_lines = शूरात् स जातो बहुगोधनाढ्यो भूमौ यमाहुर्वसुदेव इत्यपि ।;तस्यैव भार्या त्वदितिश्च देवकी बभूव चान्या सुरभिश्च रोहिणी ॥ २१९॥ | |||
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| verse_lines = तत् त्वं भवस्वाऽशु च देवकीसुतस्तथैव यो द्रोणनामा वसुः सः ।;स्वभार्यया धरया त्वत्पितृत्वं प्राप्तुं तपस्तेप उदारमानसः ॥ २२०॥ | |||
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| verse_lines = तस्मै वरः स मया सन्निसृष्टः स चाऽस नन्दाख्य उतास्य भार्या ।;नाम्ना यशोदा स च शूरतातसुतस्य वैश्याप्रभवोऽथ गोपः ॥ २२१॥ | |||
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| verse_lines = तौ देवकीवसुदेवौ च तेपतुस्तपस्त्वदीयं सुतमिच्छमानौ ।;त्वामेव(त्वमेव) तस्मात् प्रथमं प्रदर्श्य तत्र स्वरूपं हि ततो व्रजं व्रज ॥ २२२॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते सोऽब्जभवेन केशवस्तथेति चोक्त्वा पुनराह देवताः ।;सर्वे भवन्तो भवताऽशु मानुषे कार्यानुसारेण यथानुरूपतः ॥ २२३॥ | |||
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| verse_lines = अथावतीर्णाः सकलाश्च देवता यथायथैवाऽह हरिस्तथातथा ।;वित्तेश्वरः पूर्वमभूद्धि भौमाद्धरेः सुतत्वेऽपि तदिच्छयाऽसुरात् ॥ २२४॥ | |||
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| verse_lines = पापेन तेनापहृतो हि हस्ती शिवप्रदत्तः सुप्रतीकाभिधानः ।;तदर्थमेवास्य सुतोऽभिजातो धनेश्वरो भगदत्ताभिधानः ॥ २२५॥ | |||
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| verse_lines = महासुरस्यांशयुतः स एव रुद्रावेशाद् बलवानस्त्रवांश्च ।;शिष्यो महेन्द्रस्य हते बभूव ताते स्वधर्माभिरतश्च नित्यम् ॥ २२६॥ | |||
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| verse_lines = अभूच्छिनिर्नाम यदुप्रवीरस्तस्याऽत्मजः सत्यक आस तस्मात् ।;कृष्णः पक्षो युयुधानाभिधेयो गुरुत्मतोऽंशेन युतो बभूव ॥ २२७॥ | |||
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| verse_lines = यः संवहो नाम मरुत् तदंशश्चक्रस्य विष्णोश्च बभूव तस्मिन् ।;यदुष्वभूद्धृदिको भोजवंशे सितः पक्षस्तस्य सुतो बभूव ॥ २२८॥ | |||
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| verse_lines = स पाञ्चजन्यांशयुतो मरुत्सु तथाऽंशयुक्तः प्रवहस्य वीरः ।;नामास्य चाभूत् कृतवर्मेत्यथान्ये ये यादवास्तेऽपि सुराः सगोपाः ॥ २२९॥ | |||
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| verse_lines = ये पाण्डवानामभवन् सहाया देवाश्च देवानुचराः समस्ताः ।;अन्ये तु सर्वेऽप्यसुरा हि मध्यमा ये मानुषास्ते चलबुद्धिप्रवृत्तयः ॥ २३०॥ | |||
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| verse_lines = लिङ्गं सुराणां हि परैव भक्तिर्विष्णौ तदन्येषु च तत्प्रतीपता ।;अतोऽत्र येये हरिभक्तितत्परास्तेते सुरास्तद्भरिता विशेषतः ॥ २३१॥ | |||
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<span id="gr-C12" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वादशोऽध्यायः"></span> | |||
== द्वादशोऽध्यायः == | |||
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| verse_text = औं ॥ बभूव गन्धर्वमुनिस्तु देवकः स आस सेवार्थमथाऽहुकाद्धरेः । | |||
| verse_lines = औं ॥ बभूव गन्धर्वमुनिस्तु देवकः स आस सेवार्थमथाऽहुकाद्धरेः ।;स उग्रसेनावरजस्तथैव नामास्य तस्मादजनि स्म देवकी ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = अन्याश्च याः काश्यपस्यैव भार्या ज्येष्ठां तु तामाहुक आत्मपुत्रीम् ।;चकार तस्माद्धि पितृष्वसा सा स्वसा च कंसस्य बभूव देवकी ॥ २॥ | |||
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| verse_text = सैवादितिर्वसुदेवस्य दत्ता तस्या रथं माङ्गलं (मङ्गलं) कंस एव । | |||
| verse_lines = सैवादितिर्वसुदेवस्य दत्ता तस्या रथं माङ्गलं (मङ्गलं) कंस एव ।;संयापयामास तदा हि वायुर्जगाद वाक्यं गगनस्थितोऽमुम् ॥ ३॥ | |||
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| verse_text = (विनाऽपराधं न) विनापराधाद्धि ततो गरीयसो न मातुलो वध्यतामेति विष्णोः । | |||
| verse_lines = (विनाऽपराधं न) विनापराधाद्धि ततो गरीयसो न मातुलो वध्यतामेति विष्णोः ।;लोकस्य धर्माननुवर्ततोऽतः पित्रोर्विरोधार्थमुवाच वायुः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = मृत्युस्तवास्या भविताऽष्टमः सुतो मूढेति चोक्तो जगृहे कृपाणाम् ।;पुत्रान् समर्प्यास्य च शूरसूनुर्विमोच्य तां तत्सहितो गृहं ययौ ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = षट् कन्यकाश्चावरजा गृहीतास्तेनैव ताभिश्च मुमोद शूरजः ।;बाह्लीकपुत्री च पुरा गृहीता पुराऽस्य भार्या सुरभिस्तु रोहिणी ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = राज्ञश्च काशिप्रभवस्य कन्यां स पुत्रिकापुत्रकधर्मतोऽवहत् ।;कन्यां तथा करवीरेश्वरस्य धर्मेण तेनैव दितिं दनुं पुरा ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = यो मन्यते विष्णुरेवाहमित्यसौ पापो वेनः पौण्ड्रको वासुदेवः ।;जातः पुनः शूरजात् काशिजायां नान्यो मत्तो विष्णुरस्तीति वादी ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = धुन्धुर्हतो यो हरिणा मधोः सुत आसीत् सुतायां करवीरेश्वरस्य ।;सृगालनामा वासुदेवोऽथ देवकीमुदूह्य शौरिर्न ययावुभे ते ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = येये हि देवाः पृथिवीं गतास्ते सर्वे शिष्याः सत्यवतीसुतस्य ।;विष्णुज्ञानं (विष्णोः ज्ञानम्) प्राप्य सर्वेऽखिलज्ञास्तस्माद् यथायोग्यतया बभूवुः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = मरीचिजाः षण् मुनयो बभूवुस्ते देवलं प्राहसन् कार्श्यहेतोः ।;तच्छापतः कालनेमिप्रसूता अवध्यतार्थं तप एव चक्रुः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = धाता प्रादाद् वरमेषां तथैव शशाप तान् क्ष्मातले सम्भवध्वम् ।;तत्र स्वतातो भवतां निहन्तेत्यात्मान्यतो वरलिप्सून् हिरण्यः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = दुर्गा तदा तान् भगवत्प्रचोदिता प्रस्वापयित्वा प्रचकर्ष कायात् ।;क्रमात् समावेशयदाशु देवकीगर्भाशये तान् न्यहनच्च कंसः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = तदा मुनीन्द्रसंयुतः सदो विधातुरुत्तमम् ।;स पाण्डुराप्तुमैच्छत न्यवारयंश्च ते तदा ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = यधर्थमेव जायते पुमान् हि तस्य सोऽकृतेः ।;शुभां गतिं नतु व्रजेद् ध्रुवम् ततो न्यवारयन् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = प्रधानदेवताजनौ (प्रधानदेवताजने) नियोक्तुमात्मनः प्रियाम् ।;बभूव पाण्डुरेष तद् विना न तस्य सद्गतिः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = अतोऽन्यथा सुतानृते व्रजन्ति सद्गतिं नराः ।;यथैव धर्मभूषणो जगाम सन्ध्यकासुतः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = तदा कलिश्च राक्षसा बभूवुरिन्द्रजिन्मुखाः ।;विचित्रवीर्यनन्दनप्रियोदरे हि गर्भगाः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = तदस्य(तदास्य) सोऽनुजोऽशृणोन्मुनीन्द्रदूषितं च तत् ।;विचार्य तु प्रियामिदं जगाद वासुदेवधीः ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = य एव मद्गुणाधिकस्ततः सुतं समाप्नुहि ।;सुतं विना न नो गतिं शुभां वदन्ति साधवः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = तदस्य कृच्छ्रतो वचः पृथाऽग्रहीज्जगाद च ।;ममास्ति देववश्यदो मनूत्तमः सुताप्तिदः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = न ते सुरानृते समः सुरेषु केचिदेव च ।;अतस्तवाधिकं सुरं कमाह्वये त्वदाज्ञया ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = वरं समाश्रिता पतिं व्रजेत या ततोऽधमम् ।;न काचिदस्ति निष्कृतिर्न भर्तृलोकमृच्छति ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = कृते पुरा सुरास्तथा सुराङ्गनाश्च केवलम् ।;निमित्ततोऽपि ताः क्वचिन्न तान् विहाय रेमिरे ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = मनोवचःशरीरतो यतो हि ताः पतिव्रताः ।;अनादिकालतोऽभवंस्ततः सभर्तृकाः सदा ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = स्वभर्तृभिर्विमुक्तिगाः सहैव ता भवन्ति हि ।;कृतान्तमाप्य चाप्सरःस्त्रियो बभूवुरूर्जिताः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = अनावृताश्च तास्तथा यथेष्टभर्तृकाः सदा ।;अतस्तु ता न भर्तृभिर्विमुक्तिमापुरुत्तमाम् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = सुरस्त्रियोऽतिकारणैर्यदऽन्यथा स्थितास्तदा ।;दुरन्वयात् सुदुःसहा विपत् ततो भविष्यति ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = अयुक्तमुक्तवांस्ततो भवांस्तथाऽपि ते वचः ।;अलङ्घ्यमेव मे (मतो) ततो वदस्व पुत्रदं सुरम् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितोऽब्रवीन्नृपो न धर्मतो विना भुवः ।;नृपोऽभिरक्षिता भवेत् तदाह्वयाऽशु तं विभुम् ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = स धर्मजः सुधार्मिको भवेद्धि सूनुरुत्तमः ।;इतीरिते तया यमः समाहुतोऽगमद् द्रुतम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = ततश्च सद्य एव सा सुषाव पुत्रमुत्तमम् ।;युधिष्ठिरं यमो हि स प्रपेद आत्मपुत्रताम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = यमे सुते तु कुन्तितः प्रजात एव सौबली ।;अदह्यतेर्ष्यया चिरं बभञ्ज गर्भमेव च ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = स्वगर्भपातने कृते तया जगाम केशवः ।;पराशरात्मजो न्यधाद् घटेषु तान् विभागशः ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = शतात्मना विभेदिताः शतं सुयोधनादयः ।;बभूवुरन्वहं ततः शतोत्तरा च दुःशला ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = स देवकार्यसिद्धये ररक्ष गर्भमीश्वरः ।;पराशरात्मजो विभु (प्रभु)र्विचित्रवीर्यजोद्भवम् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = कलिः सुयोधनोऽजनि प्रभूतबाहुवीर्ययुक् ।;प्रधानवायुसन्निधेर्बलाधिकत्वमस्य तत् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = पुरा हि मेरुमूर्धनि त्रिविष्टपौकसां वचः ।;वसुन्धरातलोद्भवोन्मुखं श्रुतं दितेः सुतैः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु ते त्रिलोचनं तपोबलादतोषयन् ।;वृतश्च देवकण्टको ह्यवध्य एव सर्वतः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = वरादुमापतेस्ततः कलिः स देवकण्टकः ।;बभूव वज्रकाययुक् सुयोधनो महाबलः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = स दुःखशासनोऽभवत् ततोऽतिकायसम्भवः ।;स वै विकर्ण उच्यते ततः खरोऽभवद् बली ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = स चित्रसेननामकस्तथाऽपरे च राक्षसाः ।;बभूवुरुग्रपौरुषा विचित्रवीर्यजात्मजाः ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = समस्तदोषरूपिणः शरीरिणो हि तेऽभवन् ।;मृषेति नामतो हि या बभूव दुःशलाऽऽसुरी ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = कुहूप्रवेशसंयुता ययाऽऽर्जुनेर्वधाय हि ।;तपः कृतं त्रिशूलिने ततो हि साऽत्र जज्ञुषी ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽऽस निर्ऋथाभिधोऽनुजः स निर्ऋतेरभूत् ।;स नासिकामरुद्युतो युयुत्सुनामकः कृती ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरे जात उवाच पाण्डुर्बाह्वोर्बलाज्ज्ञानबलाच्च धर्मः ।;रक्ष्योऽन्यथा नाशमुपैति तस्माद् बलद्वयाढ्यं (जनय)प्रसुवाऽशु पुत्रम् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = यज्ञाधिको ह्यश्वमेधो मनुष्यदृश्येषु तेजस्स्वधिको हि भास्करः ।;वर्णेषु विप्रः सकलैर्गुणैर्वरो देवेषु वायुः पुरुषोत्तमादृते ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = विशेषतोऽप्येष पितैव मे प्रभुर्व्यासात्मना विष्णुरनन्तपौरुषः ।;अतश्च ते श्वशुरो नैव योग्यो दातुं पुत्रं वायुमुपैहि तं प्रभुम् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते पृथयाऽऽहूतवायुसंस्पर्शमात्रादभवद् बलद्वये ।;समो जगत्यस्ति न यस्य कश्चिद् भक्तौ च विष्णोर्भगवद्वशः सुतः ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = स वायुरेवाभवदत्र भीमनामा भृता माः सकला हि यस्मिन् ।;स विष्णुनेशेन युतः सदैव नाम्ना सेनो भीमसेनस्ततोऽसौ ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = तज्जन्ममात्रेण धरा विदारिता शार्दूलभीताज्जननीकराद् यदा ।;पपात सञ्चूर्णित एव पर्वतस्तेनाखिलोऽसौ शतशृङ्गनामा ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = स तत्र मासत्रयमुष्य दुर्गयाऽपवाहितो रोहिणीगर्भमाशु ।;नियुक्तया केशवेनाथ तत्र स्थित्वा मासान् सप्त जातः पृथिव्याम् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = स नामतो बलदेवो बलाढ्यो बभूव तस्यानु जनार्दनः प्रभुः ।;आविर्बभूवाखिलसद्गुणैकपूर्णः(जातः) सुतायामिह देवकस्य ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = यः सत्सुखज्ञानबलैकदेहः समस्तदोषस्पर्शोज्झितः सदा ।;अव्यक्ततत्कार्यमयो न यस्य देहः कुतश्चित् क्वच स ह्यजो हरिः ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = न शुक्लरक्तप्रभवोऽस्य कायस्तथाऽपि तत्पुत्रतयोच्यते मृषा ।;जनस्य मोहाय शरीरतोऽस्या यदाविरासीदमलस्वरूपः ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = आविश्य पूर्वं वसुदेवमेव विवेश तस्मादृतुकाल एव ।;देवीमुवासात्र च सप्त मासान् सार्धांस्ततश्चाऽविरभूदजोऽपि ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = यथा पुरा स्तम्भत आविरासीदशुक्लरक्तोऽपि नृसिंहरूपः ।;तथैव कृष्णोऽपि तथाऽपि मातापितृक्रमादेव विमोहयत्यजः ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = पितृक्रमं मोहनार्थं समेति न तावता शुक्लतो रक्ततश्च ।;जातोऽस्य देहस्त्विति दर्शनाय सशङ्खचक्राब्जगदः स दृष्टः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = अनेकसूर्याभकिरीटयुक्तो विद्युत्प्रभे कुण्डले धारयंश्च ।;पीताम्बरो वनमाली स्वनन्तसूर्योरुदीप्तिर्ददृशे गुणार्णवः ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = स कञ्जयोनिप्रमुखैः सुरैः स्तुतः पित्रा च मात्रा च जगाद शूरजम् ।;नयस्व मां नन्दगृहानिति स्म ततो बभूव द्विभुजो जनार्दनः ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = तदैव जाता च हरेरनुज्ञया दुर्गाभिधा श्रीरनु नन्दपत्न्याम् ।;ततस्तमादाय हरिं ययौ स शूरात्मजो नन्दगृहान् निशीथे ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = संस्थाप्य तं तत्र तथैव कन्यकामादाय तस्मात् स्वगृहं पुनर्ययौ ।;हत्वा स्वसुर्गर्भषट्कं क्रमेण मत्वाऽष्टमं तत्र जगाम कंसः ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = गर्भं देवक्यां सप्तमं मेनिरे हि लोकाः सुतं त्वष्टमं तां ततः सः ।;मत्वा हन्तुं पादयोः सम्प्रगृह्य सम्पोथयामास शिलातले च ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = सा तद्धस्तात् क्षिप्रमुत्पत्य देवी खेऽदृश्यतैवाष्टभुजा समग्रा ।;ब्रह्मादिभिः पूज्यमाना समग्रैरत्यद्भुताकारवती हरिप्रिया ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = उवाच चार्या तव मृत्युरत्र क्वचित् प्रजातो हि वृथैव पाप ।;अनागसीं मां विनिहन्तुमिच्छस्यशक्यकार्ये तव चोद्यमोऽयम् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = उक्त्वेति कंसं पुनरेव देवकीतल्पेऽशयद् बालरूपैव दुर्गा ।;नाज्ञासिषुस्तामथ केचनात्र ऋते हि मातापितरौ गुणाढ्याम् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा तयोक्तं तु तदैव कंसः पश्चात्तापाद् वसुदेवं सभार्यम् ।;प्रसादयामास पुनःपुनश्च विहाय कोपं च तमूचतुस्तौ ।;सुखस्य दुःखस्य च राजसिंह नान्यः कर्ता वासुदेवादिति स्म ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = आनीय कंसोऽथ गृहे स्वमन्त्रिणः प्रोवाच कन्यावचनं समस्तम् ।;श्रुत्वा च ते प्रोचुरत्यन्तपापाः कार्यं बालानां निधनं सर्वशोऽपि ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = तथेति तांस्तत्र नियुज्य कंसो गृहं स्वकीयं प्रविवेश पापः ।;चेरुश्च ते बालवधे सदोद्यता हिंसाविहाराः सततं स्वभावतः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = अथ प्रभाते शयने शयानमपश्यतामब्जदलायताक्षम् ।;कृष्णं यशोदा च तथैव नन्द आनन्दसान्द्राकृतिमप्रमेयम् ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = मेनात एतौ निजपुत्रमेनं स्रष्टारमब्जप्रभवस्य चेशम् ।;महोत्सवात् पूर्णमनाश्च नन्दो विप्रेभ्योऽदाल्लक्षमितास्तदा(तथा) गाः ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = सुवर्णरत्नाम्बरभूषणानां बहूनि गोजीविगणाधिनाथः ।;प्रादादथोपायनपाणयस्तं गोपा यशोदां च मुदा स्त्रियोऽगमन् ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = गतेषु तत्रैव दिनेषु केषुचिज्जगाम कंसस्य गृहं स नन्दः ।;पूर्वं हि नन्दः स करं हि दातुं बृहद्वनान्निस्सृतः प्राप कृष्णाम् ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = सहाऽगता तेन तदा यशोदा सुषाव दुर्गामथ तत्र शौरिः ।;निधाय कृष्णं प्रतिगृह्य कन्यकां गृहं ययौ नन्द उवास तत्र ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = निरुष्य तस्मिन् यमुनातटे स मासं ययौ द्रष्टुकामो नरेन्द्रम् ।;राज्ञेऽथ तं दत्तकरं ददर्श शूरात्मजो वाक्यमुवाच चैनम् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = याह्युत्पाताः सन्ति तत्रेत्युदीरितो जगाम शीघ्रं यमुनां स नन्दः ।;रात्रावेवाऽगच्छमाने तु नन्दे कंसस्य धात्री तु जगाम गोष्ठम् ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = सा पूतना नाम निजस्वरूपमाच्छाद्य रात्रौ शुभरूपवच्च ।;विवेश नन्दस्य गृहं बृहद्वनप्रान्ते हि मार्गे रचितं प्रयाणे ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = तीरे भगिन्यास्तु यमस्य वस्त्रगृहे शयानं पुरुषोत्तमं तम् ।;जग्राह मात्रा तु यशोदया तया निद्रायुजा प्रेक्ष्यमाणा शुभेव ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = तन्मायया धर्षिता निद्रया च न्यवारयन्नैव हि नन्दजाया ।;तया प्रदत्तं स्तनमीशिताऽसुभिः पपौ सहैवाऽशु जनार्दनः प्रभुः ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = मृता स्वरूपेण सुभीषणेन पपात सा व्याप्य वनं समस्तम् ।;तदाऽऽगमन्नन्दगोपोऽपि तत्र दृष्ट्वा च सर्वेऽप्यभवन् सुविस्मिताः ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = सा ताटका चोर्वशिसम्प्रविष्टा कृष्णावध्यानान्निरयं जगाम ।;सा तूर्वशी कृष्णभुक्तस्तनेन पूता स्वर्गं प्रययौ तत्क्षणेन ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = सा तुम्बुरोः सङ्गत आविवेश रक्षस्तनुं शापतो वित्तपस्य ।;कृष्णस्पर्शाच्छुद्धरूपा पुनर्दिवं ययौ तुष्टे किमलभ्यं रमेशे ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = यदाऽऽप देवश्चतुरः स मासांस्तदोपनिष्क्रामणमस्य चाऽसीत् ।;जन्मर्क्षमस्मिन् दिन एव चाऽसीत् प्रातः किञ्चित् तत्र महोत्सवोऽभूत् ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = तदा शयानः शकटस्य सोऽधः पदाऽक्षिपत् तं दितिजं निहन्तुम् ।;अनः समाविश्य दितेः सुतोऽसौ स्थितः प्रतीपाय हरेः सुपापः ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = क्षिप्तोऽनसिस्थः शकटाक्षनामा स विष्णुनेत्वा सहितः पपात ।;ममार चाऽशु प्रतिभग्नगात्रो व्यत्यस्तचक्राक्षमभूदनश्च ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = ससम्भ्रमात् तं प्रतिगृह्य शङ्क्या कृष्णं यशोदा द्विजवर्यसूक्तिभिः ।;सा स्नापयामास नदीतटात् तदा समागता नन्दवचोऽभितर्जिता ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = हत्वा तु तं कंसभृत्यं स कृष्णः शिश्ये पुनः शिशुवत् सर्वशास्ता ।;एवं गोपान् प्रीणयन् बालकेलीविनोदतो न्यवसत् तत्र देवः ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = विवर्द्धमाने लोकदृष्ट्यैव कृष्णे पाण्डुः पुनः प्राह पृथामिदं वचः ।;धर्मिष्ठो नौ सूनुरग्रे बभूव बलद्वयज्येष्ठ उतापरश्च ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = शस्त्रास्त्रविद् वीर्यवान् नौ सुतोऽन्यो भवेद् देवं तादृशमाह्वयातः ।;शेषस्तव भ्रातृसुतोऽभिजातस्तस्मान्नासौ सुतदानाय योग्यः ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = नवै सुपर्णः सुतदो नरेषु प्रजायते वाऽस्य यतस्तथाऽऽज्ञा ।;कृता पुरा हरिणा शङ्करस्तु क्रोधात्मकः पालने नैव योग्यः ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = अतो महेन्द्रो बलवाननन्तरस्तेषां समाह्वानमिहार्हति स्वराट् ।;इतीरिता साऽऽह्वयदाशु वासवं ततः प्रजज्ञे स्वयमेव शक्रः ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = स चार्जुनो नाम नरांशयुक्तो विष्ण्वावेशी बलवानस्त्रवेत्ता ।;रूप्यन्यः स्यात् सूनुरित्युच्यमाना भर्त्रा कुन्ती नेति तं प्राह धर्मात् ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = बृहस्पतिः पूर्वमभूद्धरेः पदं संसेवितुं पवनावेशयुक्तः ।;स उद्धवो नाम यदुप्रवीराज्जातो विद्वानुपगवनामधेयात् ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणात्मकं नातितरां स्वसेवकं कुर्याद्धरिर्मामिति भूय एव ।;स उद्धवात्माऽवततार यादवेष्वासेवनार्थं पुरुषोत्तमस्य ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = बृहस्पतेरेव स सर्वविद्या अवाप मन्त्री निपुणः सर्ववेत्ता ।;वर्षत्रये तत्परतः स सात्यकिर्जज्ञे दिने चेकितानश्च तस्मिन् ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = मरुत्सु नाम प्रतिभो यदुष्वभूत् स चेकितानो हरिसेवनार्थम् ।;तदैव जातो हृदिकात्मजोऽपि वर्षत्रये तत्परतो युधिष्ठिरः ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽब्दतो भूभरसंहृतौ हरेरङ्गत्वमाप्तुं गिरिशोऽजनिष्ट ।;अश्वत्थामा नामतोऽश्वध्वनिं स यस्माच्चक्रे जायमानो महात्मा ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = स सर्वविद् बलवानस्त्रवेत्ता कृपस्वसायां द्रोणवीर्योद्भवोऽभूत् ।;दुर्योधनस्तच्चतुर्थेऽह्नि जातस्तस्यापरेद्युर्भीमसेनः सुधीरः ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = यदा स मासद्वितयी बभूव तदा रोहिण्यां बलदेवोऽभिजातः ।;बली गुणाढ्यः सर्ववेदी य एव सेवाखिन्नो लक्ष्मणोऽग्रे हरेर्भूत् ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = यदा हि पुत्रान् विनिहन्तुमेतौ सहैव बद्धौ गतिशृङ्खलायाम् ।;कंसेनापापौ देवकीशूरपुत्रौ वियोजिताः शौरिभार्याः पराश्च ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = विनिश्चयार्थं देवकीगर्भजानामन्या भार्या धृतगर्भाः स कंसः ।;स्थानान्तरे प्रसवो यावदासां संस्थापयामास सुपापबुद्धिः ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = हेतोरेतस्माद् रोहिणी नन्दगेहे प्रसूत्यर्थं स्थापिता तेन देवी ।;लेभे पुत्रं गोकुले पूर्णचन्द्रकान्ताननं बलभद्रं सुशुभ्रम् ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = यदा त्रिमासः स बभूव देवस्तदाऽऽविरासीत् पुरुषोत्तमोऽजः ।;तौ कृष्णशेषावाप्तुकामौ सुतौ हि तपश्चक्राते देवकीशूरपुत्रौ ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = विष्ण्वावेशी बलवान् यो गुणाधिकः स मे सुतः स्यादिति रोहिणी च ।;तेपे तपोऽतो हरिशुक्लकेशयुतः शेषो देवकीरोहिणीजः ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = अवर्द्धतासौ हरिशुक्लकेशसमावेशी गोकुले रौहिणेयः ।;कृष्णोऽपि लीला ललिताः प्रदर्शयन् बलद्वितीयो रमयामास गोष्ठम् ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = स प्राकृतं शिशुमात्मनमुच्चैर्विजानन्त्या मातुरादर्शनाय ।;विजृम्भमाणोऽखिलमात्मसंस्थं प्रदर्शयामास कदाचिदीशः ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = साऽण्डं महाभूतमनोऽभिमानमहत्प्रकृत्यावृतमब्जजादिभिः ।;सुरैः शिवेतैर्नरदैत्यसङ्घैर्युतं ददर्शास्य तनौ यशोदा ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = न्यमीलयच्चाक्षिणी भीतभीता जुगूह चाऽत्मानमथो रमेशः ।;वपुः स्वकीयं सुखचित्स्वरूपं पूर्णं सत्सु ज्ञापयंस्तद्ध्यदर्शयत् ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = कदाचित् तं लालयन्ती यशोदा वोढुं नाशक्नोद् भूरिभाराधिकार्ता ।;निधाय तं भूमितले स्वकर्म यदा चक्रे दैत्य आगात् सुघोरः ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = तृणावर्तो नामतः कंसभृत्यः सृष्ट्वाऽत्युग्रं चक्रवातं शिशुं तम् ।;आदायाऽगा(या)दन्तरिक्षं स तेन शस्तः कण्ठग्राहसंरुद्धवायुः ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = पपात कृष्णेन हतः शिलातळे तृणावर्तः पर्वतोदग्रदेहः ।;सुविस्मयं चाऽपुरथो जनास्ते तृणावर्तं वीक्ष्य सञ्चूर्णिताङ्गम् ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = अक्रुद्ध्यतां केशवोऽनुग्रहाय शुभं स्वयोग्यादधिकं निहन्तुम् ।;स क्रुद्ध्यतां नवनीतादि मृष्णंश्चचार देवो निजसत्सुखाम्बुधिः ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिन्नब्दे भाद्रपदे स मासे सिंहस्थयोर्गुरुरव्योः परेशः ।;उदैत् ततः फाल्गुने फल्गुनोऽभूद् गते ततो माद्रवती बभाषे ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = जाताः सुतास्ते प्रवराः पृथायामेकाऽनपत्याऽहमतः प्रसादात् ।;तवैव भूयासमहं सुतेता विधत्स्व कुन्तीं मम मन्त्रदात्रीम् ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः प्राह पृथां स माद्र्यै दिशस्व मन्त्रं सुतदं वरिष्ठम् ।;इत्यूचिवांसं पतिमाह यादवी दद्यां त्वदर्थे तु सकृत्फलाय ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = उवाच माद्र्यै सुतदं मनुं च पुनः फलं ते न भविष्यतीति ।;मन्त्रं समादाय च मद्रपुत्री व्यचिन्तयत् स्यां नु कथं द्विपुत्रा ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = सदाऽवियोगो दिविजेषु दस्रौ नचैतयोर्नामभेदः क्वचिद्धि।;एका भार्या सैतयोरप्युषा हि तदाऽऽयातः सकृदावर्तनाद् द्वौ ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = इतीक्षन्त्याऽऽकारितावश्विनौ तौ शीघ्रं प्राप्तौ पुत्रकौ तत्प्रसूतौ ।;तावेव देवौ नकुलः पूर्वजातः सहदेवोऽभूत् पश्चिमस्तौ यमौ हि (च) ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = पुनर्मनोः फलवत्त्वाय माद्री सम्प्रार्थयामास पतिं तदुक्ता ।;पृथाऽवादीत् कुटिलैषा मदाज्ञामृते देवावाह्वयामास दस्रौ ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = अतो विरोधं च मदात्मजानां कुर्यादेषेत्येव भीतां न मां त्वम् ।;नियोक्तुमर्हः पुनरेव राजन्नितीरितोऽसौ विरराम क्षितीशः ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = विशेषनाम्नैव समाहुताः सुरा (सुतान्) दद्युः सुरा इत्यविशेषितं ययोः ।;विशेषनामापि समाह्वयत् तौ मन्त्रावृत्तिर्नामभेदेऽस्य चोक्ता ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिराद्येषु चतुर्षु वायुः समाविष्टः फल्गुनेऽथो विशेषात् ।;युधिष्ठिरे सौम्यरूपेण विष्टो वीरेण रूपेण धनञ्जयेऽसौ ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = शृङ्गाररूपं केवलं दर्शयानो विवेश वायुर्यमजौ प्रधानः ।;शृङ्गारकैवल्यमभीप्समानः पाण्डुर्हि पुत्रं चकमे चतुर्थम् ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = शृङ्गाररूपो नकुले विशेषात् सुनीतिरूपः सहदेवं विवेश ।;गुणैः समस्तैः स्वयमेव वायुर्बभूव भीमो जगदान्तरात्मा ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = सुपुल्लवाकारतनुर्हि कोमळः प्रायो जनैः प्रोच्यते रूपशाली ।;ततः सुजातं वरवज्रकायौ भीमार्जुनावप्यृते पाण्डुरैच्छत् ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = अप्राकृतानां तु मनोहरं यद् रूपं द्वात्रिंशल्लक्षणोपेतमग्र्यम् ।;तन्मारुतो नकुले कोमलाभ एवं वायुः पञ्चरूपोऽत्र चाऽसीत् ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = अतीतेन्द्रा एव ते विष्णुषष्ठाः पूर्वेन्द्रोऽसौ यज्ञनामा रमेशः ।;स वै कृष्णो वायुरथ द्वितीयः स भीमसेनो धर्म आसीत् तृतीयः ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरोऽसावथ नासत्यदस्रौ क्रमात् तावेतौ माद्रवतीसुतौ च ।;पुरन्दरः षष्ठ उतात्र सप्तमः स एवैकः फल्गुनो ह्येत इन्द्राः ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = क्रमात् संस्कारान् क्षत्रियाणामवाप्य तेऽवर्द्धन्त स्वतवसो महित्वना ।;सर्वे सर्वज्ञाः सर्वधर्मोपपन्नाः सर्वे भक्ताः केशवेऽत्यन्तयुक्ताः ॥ १३६॥ | |||
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<span id="gr-C13" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रयोदशोऽध्यायः"></span> | |||
== त्रयोदशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ गर्गः शूरसुतोक्त्या व्रजमायात् सात्त्वतां पुरोधास्सः ।;चक्रे क्षत्रिययोग्यान् संस्कारान् कृष्णरोहिणीसून्वोः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = ऊचे नन्द सुतोऽयं तव विष्णोर्नावमो गुणैः सर्वैः ।;सर्वे चैतत्त्राताः सुखमाप्स्यन्त्युन्नतं भवत्पूर्वाः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = स कदाचिच्छिशुभावं कुर्वन्त्या मातुरात्मनो भूयः ।;अपनेतुं परमेशो मृदं जघासेक्षतां वयस्यानाम् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = मात्रोपालब्ध ईशो मुखविवृतिमकर्नाम्ब मृद्भक्षिताऽहं ।;पश्येत्यास्यान्तरे तु प्रकृतिविकृतियुक् सा जगत् पर्यपश्यत् ।;इत्थं देवोऽत्यचिन्त्यामपरदुरधिगां शक्तिमुच्चां प्रदर्श्य प्रायो ज्ञातात्मतत्त्वां पुनरपि भगवानावृणोदात्मशक्त्या ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = इति प्रभुः स लीलया हरिर्जगद् विडम्बयन् ।;चचार गोष्ठमण्डलेऽप्यनन्तसौख्यचिद्धनः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = कदाचिदीश्वरः स्तनं पिबन् यशोदया पयः ।;सृतं (शृतं) निधातुमुज्झितो बभञ्ज दध्यमत्रकम् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = (स) प्रमथ्यमानदध्युरुप्रजातमिन्दुसन्निभम् ।;नवं हि नीतमाददे रहो जघास चेशिता ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = प्रजायते हि यत्कुले यथा युगं यथा वयः ।;तथा प्रवर्तनं भवेद् दिवौकसां समुद्भवे ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = इति स्वधर्ममुत्तमं दिवौकसां प्रदर्शयन् ।;अधर्मपावकोऽपि सन् विडम्बते जनार्दनः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = नृतिर्यगादिरूपकः स बाल्ययौवनादि यत् ।;क्रियाश्च तत्तदुद्भवाः करोति शाश्वतोऽपि सन् ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = स विप्रराजगोपकस्वरूपकस्तदुद्भवाः ।;तदा तदा विचेष्टते क्रियाः सुरान् विशिक्षयन् ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽप्यनन्यदेवतासमं निजं बलं प्रभुः ।;प्रकाशयन् पुनः पुनः प्रदर्शयत्यजो गुणान् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽत्तयष्टिमीक्ष्य तां स्वमातरं जगद्गुरुः ।;प्रपुप्लुवे तमन्वयान्मनोविदूरमङ्गना ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = पुनः समीक्ष्य तच्छ्रमं जगाम तत्करग्रहम् ।;प्रभुः स्वभक्तवश्यतां प्रकाशयन्नुरुक्रमः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = सदा विमुक्तमीश्वरं निबद्धुमञ्जसाऽऽददे ।;यदैव दाम गोपिका न तत् पुपूर तं प्रति ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = समस्तदामसञ्चयः सुसन्धितोऽप्यपूर्णताम् ।;ययावनन्तविग्रहे शिशुत्वसम्प्रदर्शके ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = अबन्धयोग्यतां प्रभुः प्रदर्श्य लीलया पुनः ।;स एकवत्सपाशकान्तरं गतोऽखिलम्भरः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = सुतस्य मातृवश्यतां प्रदर्श्य धर्ममीश्वरः ।;बभञ्ज तौ दिविस्पृशौ यमार्जुनौ सुरात्मजौ ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = पुरा धुनिश्चमुस्तथाऽपि पूतनासमन्वितौ ।;अनोक्षसंयुतौ तपः प्रचक्रतुः शिवां प्रति ।;तया वरोऽप्यवध्यता चतुर्षु च प्रयोजितः ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तरं तृणोद्भृमिस्तपोऽचरद् वरं च तम् ।;अवाप ते त्रयो हताः शिशुस्वरूपविष्णुना ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = धुनिश्चमुश्च तौ तरू समाश्रितौ निषूदितौ ।;तरुप्रभङ्गतोऽमुना तरू च शापसम्भवौ ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = पुरा हि नारदान्तिके दिगम्बरौ शशाप सः ।;धनेशपुत्रकौ द्रुतं तरुत्वमाप्नुतं त्विति ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = ततो हि तौ निजां तनुं हरेः प्रसादतः शुभौ ।;अवापतुः स्तुतिं प्रभोर्विधाय जग्मतुर्गृहम् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = नलकूबरमणिग्रीवौ मोचयित्वा तु शापतः ।;वासुदेवोऽथ गोपालैर्विस्मितैरभिवीक्षितः ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = वृन्दावनयियासुः स नन्दसूनुर्बृहद्वने ।;ससर्ज रोमकूपेभ्यो वृकान् व्याघ्रसमान् बले ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = अनेककोटिसङ्घैस्तैः पीड्यमाना व्रजालयाः ।;युयुर्वृन्दावनं नित्यानन्दमादाय नन्दजम् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = इन्दिरापतिरानन्दपूर्णो वृन्दावने प्रभुः ।;नन्दयामास नन्दादीनुद्दामतरचेष्टितैः ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = स चन्द्रतो हसत्कान्तवदनेनेन्दुवर्चसा ।;संयुतो रौहिणेयेन वत्सपालो बभूव ह ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = दैत्यं स वत्सतनुमप्रमयः प्रगृह्य कंसानुगं हरवरादपरैरवध्यम् ।;प्रक्षिप्य वृक्षशिरसि न्यहनद् बकोऽपि कंसानुगोऽथ विभुमच्युतमाससाद ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = स्कन्दप्रसादकवचः स मुखे चकार गोविन्दमग्निवदमुं प्रदहन्तमुच्चैः ।;चच्छर्द तुण्डशिरसैव निहन्तुमेतमायान्तमीक्ष्य जगृहेऽस्य स तुण्डमीशः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = तुण्डद्वयं यदुपतिः करपल्लवाभ्यां सङ्गृह्य चाऽशु विददार ह पक्षिदैत्यम् ।;ब्रह्मादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः सायं ययौ व्रजभुवं सहितोऽग्रजेन ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = एवं स देववरवन्दितपादपद्मो गोपालकेषु विहरन् भुवि षष्ठमब्दम् ।;प्राप्तो गवामखिलपोऽपि स पालकोऽभूद् वृन्दावनान्तरगसान्द्रलताविताने ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = ज्येष्ठं विहाय स कदाचिदचिन्त्यशक्तिर्गोगोपगोगणयुतो यमुनातटेषु (जलेषु) ।;रेमे भविष्यदनुवीक्ष्य हि गोपदुःखं तद्बोधनाय निजमग्रजमेषु सोऽधात् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = (स) तं ब्रह्मणो वरबलादुरगं त्ववध्यं सर्वैरवार्यविषवीर्यमृते सुपर्णात् ।;विज्ञाय तद्विषविदूषितवारिपानसन्नान् पशूनपि वयस्यजनान् स आवीत् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = तद्दृष्टिदिव्यसुधया सहसाऽभिवृष्टाः सर्वेऽपि जीवितमवापुरथोच्छशाखम् ।;कृष्णः कदम्बमधिरुह्य ततोऽतितुङ्गादास्फोट्य गाढरशनो न्यपतद् विषोदे ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = ‘सार्पह्रदः पुरुषसारनिपातवेगसङ्क्षोभितोरगविषोचच्छ्वसिताम्बुराशिः ।;पर्यक्प्लुतो विषकषायविभीषणोर्मिभीमो धनुःशतमनन्तबलस्य किं तत्’ ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = तं यामुनह्रदविलोलकमाप्य नागः काल्यो निजैः समदशत् सह वासुदेवम्(भा\.पु\. १०\.१६\.६\-७) ।;भोगैर्बबन्ध च निजेश्वरमेनमज्ञः सेहे तमीश उत भक्तिमतोऽपराधम् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = उत्पातमीक्ष्य तु तदाऽखिलगोपसङ्घस्तत्राऽजगाम हलिना प्रतिबोधितोऽपि ।;दृष्ट्वा निजाश्रयजनस्य बहोः सुदुःखं कृष्णः स्वभक्तमपि नागममुं ममर्द ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = तस्योन्नतेषु स फणेषु ननर्त कृष्णो ब्रह्मादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः ।;आर्तो मुखैरुरु वमन् रुधिरं स नागो नारायणं तमरणं मनसा जगाम ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = तच्चित्रताण्डवविरुग्णफणातपत्रं रक्तं वमन्तमुरु सन्नधियं नितान्तम् ।;दृष्ट्वाऽहिराजमुपसेदुरमुष्य पत्न्यो नेमुश्च सर्वजगदादिगुरुं भुवीशम् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = ताभिः स्तुतः स भगवानमुना च तस्मै दत्त्वाऽभयं यमसहोदरवारितोऽमुम् ।;उत्सृज्य निर्विषजलां यमुनां चकार संस्तूयमानचरितः सुरसिद्धसाध्यैः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = गोपैर्बलादिभिरुदीर्णतरप्रमोदैः सार्द्धं समेत्य भगवानरविन्दनेत्रः ।;तां रात्रिमत्र निवसन् यमुनातटे स दावाग्निमुद्धतबलं च पपौ व्रजार्थे ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं सुरासुरगणैरविचिन्त्यदिव्यकर्माणि गोकुलगतेऽगणितोरुशक्तौ ।;कुर्वत्यजे व्रजभुवामभवद् विनाश उग्राभिधादसुरतस्तरुरूपतोऽलम् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = तद्गन्धतो नृपशुमुख्यसमस्तभूतान्यापुर्मृतिं बहुलरोगनिपीडितानि ।;धातुर्वराज्जगदभावकृतैकबुद्धिर्वद्ध्यो न केनचिदसौ तरुरूपदैत्यः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = सङ्कर्षणेऽपि तदुदारविषानुविष्टे कृष्णो निजस्पर्शतस्तमपेतरोगम् ।;कृत्वा बभञ्ज विषवृक्षममुं बलेन तस्यानुगैः सह तदाकृतिभिः समस्तैः ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = दैत्यांश्च गोवपुष आत्तवरान् विरिञ्चान्मृत्यूज्झितानपि निपात्य ददाह वृक्षान् ।;विक्रीड्य रामसहितो यमुनाजले स नीरोगमाशु कृतवान् व्रजमब्जनाभः ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = सप्तोक्षणोऽतिबलवीर्ययुतानदम्यान् सर्वैर्गिरीशवरतो दितिजप्रधानान् ।;हत्वा सुतामलभदाशु विभुर्यशोदाभ्रातुः स कुम्भकसमाह्वयिनोऽपि नीलाम् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = या पूर्वजन्मनि तपः प्रथमैव भार्या भूयासमित्यचरदस्य हि सङ्गमो मे ।;स्यात् कृष्णजन्मनि समस्तवराङ्गनाभ्यः पूर्वं त्विति स्म तदिमां प्रथमं स आप ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = अग्रे द्विजत्वत उपावहदेष नीलां गोपाङ्गना अपि पुरा वरमापिरे यत् ।;संस्कारतः प्रथममेव सुसङ्गमो नो भूयात् तवेति परमाप्सरसः पुरा याः ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = तत्राथ कृष्णमवदन् सबलं वयस्याः पक्वानि तालसुफलान्यनुभोजयेति ।;इत्यर्थितः सबल आप स तालवृन्दं गोपैर्दुरासदमतीव हि धेनुकेन ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = विघ्नेशतो वरमवाप्य (स) सुदुष्टदैत्यो दीर्घायुरुत्तमबलः कदनप्रियोऽभूत् ।;नित्योद्धतः स उत राममवेक्ष्य तालवृन्तात् फलानि गलयन्तमथाभ्यधावत् ।;तस्य प्रहारमभिकाङ्क्षत आशु पृष्ठपादौ प्रगृह्य तृणराजशिरोऽहरत् सः ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् हते खरतरे खररूपदैत्ये सर्वे खराश्च खरतालवनान्तरस्थाः ।;प्रापुः खरस्वरतराः खरराक्षसारिं कृष्णं बलेन सहितं निहताश्च तेन ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = सर्वान् निहत्य खररूपधरान् स दैत्यान् विघ्नेश्वरस्य वरतोऽन्यजनैरवध्यान् ।;पक्वानि तालसुफलानि निजेषु चादाद् दुर्वारपौरुषगुणोद्भरितो रमेशः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = पक्षद्वयेन विहरत्स्वथ गोपकेषु दैत्यः प्रलम्ब इति कंसविसृष्ट आगात् ।;कृष्णस्य पक्षिषु जयत्स्वथ राममेत्य पापः पराजित उवाह तमुग्ररूपः ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = भीतेन रोहिणिसुतेन हरिः स्तुतोऽसौ स्वाविष्टतामुपदिदेश बलाभिपूर्त्यै ।;तेनैव पूरितबलोऽम्बरचारिणं तं पापं प्रलम्बमुरुमुष्टिहतं चकार ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् हते सुरगणा बलदेवनाम रामस्य चक्रुरतितृप्तियुता हरिश्च ।;वह्निं पपौ पुनरपि प्रदहन्तमुच्चैर्गोपांश्च गोगणमगण्यगुणार्णवोऽपात् ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णं कदाचिदतिदूरगतं वयस्या ऊचुः क्षुधाऽर्दिततरा वयमित्युदारम् ।;सोऽप्याह सत्रमिह विप्रगणाश्चरन्ति तान् याचतेति परिपूर्णसमस्तकामः ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = तान् प्राप्य काममनवाप्य पुनश्च गोपाः कृष्णं समापुरथ तानवदत् स देवः ।;पत्नीः समर्थयत मद्वचनादिति स्म चक्रुश्च ते तदपि ता भगवन्तमापुः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = ताः षड्विधान्नपरिपूर्णकराः समेताः प्राप्ता विसृज्य पतिपुत्रसमस्तबन्धून् ।;आत्मार्चनैकपरमा विससर्ज देहं एका पतिप्रविधुता पदमाप विष्णोः ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = भुक्त्वाऽथ गोपसहितो भगवांस्तदन्नं रेमे च गोकुलमवाप्य समस्तनाथः ।;आज्ञातिलङ्घनकृतेः स्वकृतापराधात् पश्चात् सुतप्तमनसोऽप्यभवन् स्म विप्राः ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽथ वीक्ष्य पुरुहूतमहप्रयत्नं गोपान् न्यवारयदविस्मरणाय तस्य ।;मा मानुषोऽयमिति मामवगच्छतात्स इत्यव्ययोऽस्य विदधे महभङ्गमीशः ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = गोपांश्च तान् गिरिमहोऽस्मदुरुस्वधर्म इत्युक्तिसच्छलत आत्ममहेऽवतार्य ।;भूत्वाऽतिविस्तृततनुर्बुभुजे बलिं स नानाविधान्नरसपानगुणैः सहैव ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रोऽथ विस्मृतरथाङ्गधरावतारो मेघान् समादिशदुरूदकपूगवृष्ट्यै ।;ते प्रेरिताः सकलगोकुलनाशनाय धारा वितेरुरुनागकरप्रकाराः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = ताभिर्निपीडितमुदीक्ष्य स कञ्जनाभः सर्वं व्रजं गिरिवरं प्रसभं दधार ।;वामेन कञ्जदलकोमलपाणिनैव तत्राखिलाः प्रविविशुः पशुषाः स्वगोभिः ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = वृष्ट्वोरुवार्यथ निरन्तरसप्तरात्रं त्रातं समीक्ष्य हरिणा व्रजमश्रमेण ।;शक्रोऽनुसंस्मृतसुरप्रवरावतारः पादाम्बुजं यदुपतेः शरणं जगाम ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = तुष्टाव चैनमुरुवेदशिरोगताभिर्गीर्भिः सदाऽगणितपूर्णगुणार्णवं तम् ।;गोभृद् गुरुं हरगुरोरपि गोगणेन युक्तः सहस्रगुरगाधगुमग्र्यमग्र्यात् ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = त्वत्तो जगत् सकलमाविरभूदगण्यधाम्नस्त्वमेव परिपासि समस्तमन्ते ।;अत्सि त्वयैव जगतोऽस्य हि बन्धमोक्षौ न त्वत्समोऽस्ति (कुतश्चित्) कुहचित् परिपूर्णशक्ते ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = क्षन्तव्यमेव भवता मम बाल्यमीश त्वत्संश्रयोऽस्मि हि सदेत्यभिवन्दितोऽजः ।;क्षान्तं सदैव भवतस्तव शिक्षणाय पूजापहारविधिरित्यवदद् रमेशः ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = गोविन्दमेनमभिषिच्य स गोगणेशो गोभिर्जगाम गुणपूर्णममुं प्रणम्य ।;गोपैर्गिराम्पतिरपि प्रणतोऽभिगम्य गोवर्द्धनोद्धरणसङ्गतसंशयैः सः ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णं ततः प्रभृति गोपगणा व्यजानन् नारायणोऽयमिति गर्गवचश्च नन्दात् ।;नारायणस्य सम इत्युदितं निशम्य पूजां च चक्रुरधिकामरविन्दनेत्रे ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = स्कन्दादुपात्तवरतो मरणादपेतं दृष्ट्वा च रामनिहतं बलिनं प्रलम्बम् ।;चक्रुर्विनिश्चयममुष्य सुराधिकत्वे गोपा अथास्य विदधुः परमां च पूजाम् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = कात्यायनीव्रतपराः स्वपतित्वहेतोः कन्या उवाह भगवानपराश्च गोपीः ।;अन्यैर्धृता अयुगबाणशराभिनुन्नाः प्राप्ता निशास्वरमयच्छशिराजितासु ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = तास्वत्र तेन जनिता दशलक्षपुत्रा नारायणाह्वययुता बलिनश्च गोपाः ।;सर्वेऽपि दैवतगणा भगवत्सुतत्वमाप्तुं धरातलगता हरिभक्तिहेतोः ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = तास्तत्र पूर्ववरदानकृते रमेशो रामाद्(रामा) द्विजत्वगमनादपि पूर्वमेव ।;सर्वा निशास्वरमयत् समभीष्टसिद्धिचिन्तामणिर्हि भगवानशुभैरलिप्तः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = सम्पूर्णचन्द्रकरराजितसद्रजन्यां वृन्दावने कुमुदकुन्दसुगन्धवाते ।;श्रुत्वा मुकुन्दमुखनिस्सृतगीतसारं गोपाङ्गना मुमुहुरत्र ससार यक्षः ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = रुद्रप्रसादकृतरक्ष उतास्य सख्युर्भृत्यो बली खलतरोऽपिच शङ्खचूडः ।;ताः कालयन् भगवतस्तलताडनेन मृत्युं जगाम मणिमस्य जहार कृष्णः ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = नाम्नाऽप्यरिष्ट उरुगायविलोमचेष्टो गोष्ठं जगाम वृषभाकृतिरप्यवध्यः ।;शम्भोर्वरादनुगतश्च सदैव कंसं गां भीषयन्तममुमाह्वयदाशु कृष्णः ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = सोऽप्याससाद हरिमुग्रविषाणकोटिमग्रे निधाय जगृहेऽस्य विषाणमीशः ।;भूमौ निपात्य च वृषासुरमुग्रवीर्यं यज्ञे यथा पशुममारयदग्र्यशक्तिः ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = केशी (च) तु कंसविहितस्तुरगस्वरूपो गिर्यात्मजावरमवाप्य सदा विमृत्युः ।;पापः स केशवमवाप मुखेऽस्य बाहुं प्रावेशयत् स भगवान् ववृधेऽथ देहे ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = तत्खादनाय कुमतिः स कृतप्रयासः शीर्णास्यदन्तदशनच्छदरुद्धवायुः ।;(दीर्णः) शीर्णः पपात च मृतो हरिरप्यशेषैर्ब्रह्मेशशक्रदिनकृत्प्रमुखैः स्तुतोऽभूत् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = व्योमश्च नाम मयसूनुरजप्रसादाल्लब्धायुतायुरखिलान् विदधे बिले सः ।;तं श्रीपतिः सुरपतिः पशुवद् विशस्य निःसारितान् बिलमुखादखिलांश्चकार ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = कुर्वत्यनन्यविषयाणि दुरन्तशक्तौ कर्माणि गोकुलगतेऽखिललोकनाथे ।;कंसाय सर्वमवदत् सुरकार्यहेतोर्ब्रह्माङ्कजो मुनिरकारि यदीशपित्रा ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽतिकोपरभसोच्चलितः स कंसो बद्ध्वा सभार्यमथ शूरजमुग्रकर्मा ।;अक्रूरमाश्वदिशदानयनाय विष्णो रामान्वितस्य सह गोपगणै रथेन ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = संसेवनाय स हरेरभवत् पुरैव नाम्ना किशोर इति यः सुरगायकोऽभूत् ।;स्वायम्भुवस्य च मनोः परमांशयुक्त आवेशयुक् कमलजस्य बभूव विद्वान् ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = आरुह्य तद्रथवरं भगवत्पदाब्जमब्जोद्भवप्रणतमन्तरमन्तरेण ।;सञ्चिन्तयन् पथि जगाम स गोष्ठमाराद् दृष्ट्वा पदाङ्कितभुवं मुमुदे परस्य ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = सोऽचेष्टतात्र जगदीशितुरङ्गसङ्गलब्धोच्चयेन निखिलाघविदारणेषु ।;पांसुष्वजेशपुरुहूतमुखोच्चविद्युद्भ्राजत्किरीटमणिलोचनगोचरेषु ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = सोऽपश्यताथ जगदेकगुरुं समेतमग्रोद्भवेन भुवि गा अपि दोहयन्तम् ।;आनन्दसान्द्रतनुमक्षयमेनमीक्ष्य हृष्टः पपात पदयोः पुरुषोत्तमस्य ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = उत्थाप्य तं यदुपतिः सबलो गृहं स्वं नीत्वोपचारमखिलं प्रविधाय तस्मिन् ।;नित्योदिताक्षयचिदप्यखिलं स तस्माच्छुश्राव लोकचरितानुविडम्बनेन ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा स कंसहृदि संस्थितमब्जनाभः प्रातस्तु गोपसहितो रथमारुरोह ।;रामश्वफल्कतनयाभियुतो जगाम यानेन तेन यमुनातटमव्ययात्मा ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = संस्थाप्य तौ रथवरे जगताऽभिवन्द्यौ श्वाफल्किराश्ववततार यमस्वसारम् ।;स्नात्वा स तत्र विधिनैव कृताघमर्षः शेषासनं परमपूरुषमत्र चैक्षत् ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = नित्यं हि शेषमभिपश्यति सिद्धमन्त्रो दानेश्वरः स तु तदा ददृशे हरिं च ।;अग्रे हि बालतनुमत्र समीक्ष्य कृष्णं किं नास्ति यान इति यानमुखो बभूव ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = तत्रापि कृष्णमभिवीक्ष्य पुनर्निमज्य शेषोरुभोगशयनं परमं ददर्श ।;ब्रह्मेशशक्रमुखदेवमुनीन्द्रवृन्दसंवन्दिताङ्घ्रियुगमिन्दिरया समेतम् ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = स्तुत्वा वरस्तुतिभिरव्ययमब्जनाभं सोऽन्तर्हिते भगवति स्वकमारुरोह ।;यानं च तेन सहितो भगवान् जगाम सायं पुरीं सहबलो मधुरामनन्तः ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = अग्रेऽथ दानपतिमक्षयपौरुषोऽसावीशो विसृज्य सबलः सहितो वयस्यैः ।;द्रष्टुं पुरीमभिजगाम नरेन्द्रमार्गे पौरैः कुतूहलयुतैरभिपूज्यमानः ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = आसाद्य कुञ्जरगतं रजकं ययाचे वस्त्राणि कंसदयितं गिरिजावरेण ।;मृत्यूज्झितं सपदि तेन दुरुक्तिविद्धः पापं कराग्रमृदितं व्यनयद् यमाय ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = हत्वा तमक्षतबलो भगवान् प्रगृह्य वस्त्राणि चाऽत्मसमितानि बलस्य चादात् ।;दत्वाऽपराणि सखिगोपजनस्य शिष्टान्यास्तीर्य तत्र च पदं प्रणिधाय चागात् ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = ग्राह्याऽपहेयरहितैकचिदात्मसान्द्रस्वानन्दपूर्णवपुरप्ययशोषहीनः ।;लोकान् विडम्ब्य नरवत् समलक्तकाद्यैर्वप्त्रा विभूषित इवाभवदप्रमेयः ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = मालामवाप्य च सुदामत आत्मतन्त्रस्तावक्षयोऽनुजगृहे निजपार्षदौ हि ।;पूर्वं विकुण्ठसदनाद्धरिसेवनाय प्राप्तौ भुवं मृजनपुष्पकरौ पुराऽपि ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेष्टपुष्टिमिह तत्र सरूपतां च कृष्णस्तयोर्वरमदादथ राजमार्गे ।;गच्छन् ददर्श वनितां नरदेवयोग्यमादाय गन्धमधिकं कुटिलां व्रजन्तीम् ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = तेनार्थिता सपदि गन्धमदात् त्रिवक्रा तेनाग्रजेन सहितो भगवान् लिलिम्पे ।;तां चाऽश्वृजुत्वमनयत् स तयाऽर्थितोऽलमायामि कालत इति प्रहसन्नमुञ्चत् ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = पूर्णेन्दुवृन्दनिवहाधिककान्तिकान्तसूर्यामितोरुपरमद्युतिसौख्यदेहः ।;पीताम्बरः कनकभासुरगन्धमाल्यः शृङ्गारवारिधिरगण्यगुणार्णवोऽगात् ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = प्राप्याथ चाऽयुधगृहं धनुरीशदत्तं कृष्णः प्रसह्य जगृहे सकलैरभेद्यम् ।;कांसं स नित्यपरिपूर्णसमस्तशक्तिरारोप्य चैनमनुकृष्य बभञ्ज मध्ये ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् सुरासुरगणैरखिलैरभेद्ये भग्ने बभूव जगदण्डविभेदभीमः ।;शब्दः स येन निपपात भुवि प्रभग्नसारोऽसुरो धृतियुतोऽपि तदैव कंसः ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = आदिष्टमप्युरुबलं भगवान् स तेन सर्वं निहत्य सबलः प्रययौ पुनश्च ।;नन्दादिगोपसमितिं हरिरत्र रात्रौ भुक्त्वा पयोऽन्वितशुभान्नमुवास कामम् ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = कंसोऽप्यतीव भयकम्पितहृत्सरोजः प्रातर्नरेन्द्रगणमध्यगतोऽधिकोच्चम् ।;मञ्चं विवेश सह जानपदैश्च पौरैर्नानाऽनुमञ्चकगतैर्युवतीसमेतैः ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = संस्थाप्य नागमुरुरङ्गमुखे कुवल्यापीडं गिरीन्द्रसदृशं करिसादियुक्तम् ।;चाणूरमुष्टिकमुखानपि मल्लवीरान् रङ्गे निधाय हरिसंयमनं किलैच्छत् ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = अक्षोहिणी गणितमस्य बलं च विंशदासीदसह्यमुरुवीर्यमनन्यवध्यम् ।;शम्भोर्वरादपि च तस्य सुनीथनामा यः पूर्वमास वृक इत्यसुरोऽनुजोऽभूत् ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = सप्तानुजा अपि हि तस्य पुरातना ये सर्वेऽपि कंसपृतनासहिताः स्म रङ्गे ।;तस्थुः सराममभियान्तमुदीक्ष्य कृष्णमात्तायुधा युधि विजेतुमजं सुपापाः ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽपि सूर उदिते सबलो वयस्यैः सार्द्धं जगाम वररङ्गमुखं सुरेशैः ।;संस्तूयमान उरुविक्रम आसुराणां निर्मूलनाय सकळाचलितोरुशक्तिः ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = आयन् जगद्गुरुतमो बलिनं गजेन्द्रं रुद्रप्रसादपरिरक्षितमाश्वपश्यत् ।;(दुष्टोरुरङ्ग) दृष्ट्वोरुरङ्गमुखसंस्थितमीक्ष्य चैभ्यं पापापयाहि नचिरादिति वाचमूचे ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = क्षिप्तः स ईश्वरतमेन गिरीशलब्धाद् दृप्तो वराज्जगति सर्वजनैरवध्यः ।;नागं त्ववध्यमभियापयते ततोऽग्रे पापो दुरन्तमहिमं प्रति वासुदेवम् ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = विक्रीड्य तेन करिणा भगवान् स किञ्चिद्धस्ते प्रगृह्य विनिकृष्य निपात्य भूमौ ।;कुम्भे पदं प्रतिनिधाय विषाणयुग्ममुत्कृष्य हस्तिपमहन् निपपात सोऽपि ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = नागं ससादिनमवध्यमसौ निहत्य स्कन्धे विषाणमवसज्य सहाग्रजेन ।;नागेन्द्रसान्द्रमदबिन्दुभिरञ्चिताङ्गः पूर्णात्मशक्तिरमलः प्रविवेश रङ्गम् ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = विष्टे जगद्गुरुतमे बलवीर्यमूर्तौ रङ्गं मुमोद च शुशोष जनोऽखिलोऽत्र ।;कञ्जं तथाऽपि कुमुदं च यथैव सूर्य उद्यत्यजेऽनुभविनो विपरीतकाश्च ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = रङ्गप्रविष्टमभिवीक्ष्य जगाद मल्लः कंसप्रियार्थमभिभाष्य जगन्निवासम् ।;चाणूर इत्यभिहितो जगतामवध्यः शम्भुप्रसादत इदं शृणु माधवेति ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = राजैव दैवतमिति प्रवदन्ति विप्रा राज्ञः प्रियं कृतवतः परमा हि सिद्धिः ।;योत्स्याव तेन नृपतिप्रियकाम्यया वां रामोऽभियुद्ध्यतु बली सह मुष्टिकेन ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आह भगवान् (अपहासपूर्वं) परिहासपूर्वमेवं भवत्विति स तेन तदाऽभियातः ।;सन्दर्श्य दैवतपतिर्युधि मल्ललीलां मौहूर्तिकीमथ पदोर्जगृहे स्वशत्रुम् ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = उत्क्षिप्य तं गगनगं गिरिसन्निकाशमुद्भ्राम्य चाथ शतशः कुलिशक्षताङ्गम् (कुलिशाक्षताङ्गम्) ।;आविद्ध्य दुर्धरबलो भुवि निष्पिपेष चूर्णीकृतः स निपपात यथा गिरीन्द्रः ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णं च तुष्टुवुरथो दिवि देवसङ्घा मर्त्या भुवि प्रवरमुत्तमपूरुषाणाम् ।;तद्वद् बलस्य दृढमुष्टिनिपिष्टमूर्धा भ्रष्टस्तदैव निपपात स मुष्टिकोऽपि ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = कूटश्च कोसल उत च्छलनामधेयो द्वौ तत्र कृष्णनिहतावपरो बलेन ।;कंसस्य ये त्ववरजाश्च सुनीथमुख्याः सर्वे बलेन निहताः परिघेण वीराः ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = ताभ्यां हतानभिसमीक्ष्य निजान् समस्तान् कंसो दिदेश बलमक्षयमुग्रवीर्यम् ।;रुद्रप्रसादकृतरक्षमवध्यमेतौ निस्सार्य दण्डमधिकं कुरुतेति पापः ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वैव राजवचनं बलमक्षयं तदक्षोहिणीदशकयुग्ममनन्तवीर्यम् ।;कृष्णं चकार विविधास्त्रधरं स्वकोष्ठे सिंहं यथा किल सृगालबलं समेतम् ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = जानन्नपीश्वरमनन्तबलं महेन्द्रः कृष्णं रथं निजमयापयदायुधाढ्यम् ।;शुश्रूषणाय परमस्य यथा समुद्रमर्घ्येण पूरयति पूर्णजलं जनोऽयम् ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = निःशेषतो विनिहते स्वबले स कंसश्चर्मासिपाणिरभियातुमियेष कृष्णम् ।;तावत् तमेव भगवन्तमभिप्रयान्तमुत्तुङ्गमञ्चशिरसि प्रददर्श वीरम् ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = तं श्येनवेगमभितः प्रतिसञ्चरन्तं निश्छिद्रमाशु जगृहे भगवान् प्रसह्य ।;केशेषु चैनमभिभृश्य करेण वामेनोद्धृत्य दक्षिणकरेण जघान केऽस्य ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = सञ्चालितेन मुकुटेन विकुण्डलेन कर्णद्वयेन विगताभरणोरसा च ।;स्रस्ताम्बरेण जघनेन सुशोच्यरूपः कंसो बभूव नरसिंहकराग्रसंस्थः ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = उत्कृष्य तं सुरपतिः परमोच्चमञ्चादन्यैरजेयमतिवीर्यबलोपपन्नम् ।;अब्जोद्भवेशवरगुप्तमनन्तशक्तिर्भूमौ निपात्य स ददौ पदयोः प्रहारम् ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = देहे तु योऽभवदमुष्य रमेशबन्धुर्वायुः स कृष्णतनुमाश्रयदन्यपापम् ।;दैत्यं चकर्ष हरिरत्र शरीरसंस्थं पश्यत्सु कञ्जजमुखेषु सुरेष्वनन्तः ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = द्वेषात् स सर्वजगदेकगुरोः स्वकीयैः पूर्वप्रमापितजनैः सहितः समस्तैः ।;धात्र्यादिभिः प्रतिययौ कुमतिस्तमोऽन्धमन्येऽपि चैवमुपयान्ति हरावभक्ताः ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = नित्यातिदुःखमनिवृत्ति सुखव्यपेतमन्धं तमो नियतमेति हरावभक्तः ।;भक्तोऽपि कञ्जजगिरीशमुखेषु सर्वधर्मार्णवोऽपि निखिलागमनिर्णयेन ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = यो वेत्ति निश्चितमतिर्हरिमब्जजेशपूर्वाखिलस्य जगतः सकलेऽपि काले ।;सृष्टिस्थितिप्रळयमोक्षदमात्मतन्त्रं लक्ष्म्या अपीशमतिभक्तियुतः स मुच्येत् ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादनन्तगुणपूर्णममुं रमेशं निश्चित्य दोषरहितं परयैव भक्त्या ।;विज्ञाय दैवतगणांश्च यथाक्रमेण भक्ता हरेरिति सदैव भजेत धीरः ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = निहत्य कंसमोजसा विधातृशम्भुपूर्वकैः ।;स्तुतः प्रसूनवर्षिभिर्मुमोद केशवोऽधिकम् ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = सदैव मोदरूपिणो मुदोक्तिरस्य लौकिकी ।;यथोदयो रवेर्भवेत् सदोदितस्य लोकतः ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तचित्सुखार्णवः सदोदितैकरूपकः ।;समस्तदोषवर्जितो हरिर्गुणात्मकः सदा ॥ १३८॥ | |||
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<span id="gr-C14" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्दशोऽध्यायः"></span> | |||
== चतुर्दशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ कृष्णो विमोच्य पितरावभिवन्द्य सर्ववन्द्योऽपि रामसहितः प्रतिपालनाय ।;धर्मस्य राज्यपदवीं प्रणिधाय चोग्रसेने द्विजत्वमुपगम्य मुमोच नन्दम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = नन्दोऽपि सान्त्ववचनैरनुनीय मुक्तः कृष्णेन तच्चरणपङ्कजमात्मसंस्थम् ।;कृत्वा जगाम सह गोपगणेन कृच्छ्राद् ध्यायन् जनार्दनमुवास वने सभार्यः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽप्यवन्तिपुरवासिनमेत्य विप्रं सान्दीपनिं सह बलेन ततोऽध्यगीष्ट ।;वेदान् सकृन्निगदितान् निखिलाश्च विद्याः सम्पूर्णसंविदपि दैवतशिक्षणाय ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = धर्मो हि सर्वविदुषामपि दैवतानां प्राप्ते नरेषु जनने नरवत् प्रवृत्तिः ।;ज्ञानादिगूहनमुताध्ययनादिरत्र तज्ज्ञापनार्थमवसद् भगवान् गुरौ च ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = गुर्वर्थमेष मृतपुत्रमदात् पुनश्च रामेण सार्द्धमगमन्मधुरां रमेशः ।;पौरैः सजानपदमबन्धुजनैरजस्रमभ्यर्चितो न्यवसदिष्टकृदात्मपित्रोः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेऽपि ते पतिमवाप्य हरिं पुराऽभितप्ता हि भोजपतिना मुमुदुर्नितान्तम् ।;किं वाच्यमत्र सुतमाप्य हरिं स्वपित्रोर्यत्राखिलस्य सुजनस्य बभूव मोदः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णाश्रयो वसति यत्र जनोऽपि तत्र वृद्धिर्भवेत् किमु रमाधिपतेर्निवासे ।;वृन्दावनं यदधिवासत आस सध्र्यङ् माहेन्द्रसद्मसदृशं किमु तत्र पुर्याम् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = येनाधिवासमृषभो जगतां विधत्ते विष्णुस्ततो हि वरता सदने विधातुः ।;तस्मात् प्रभोर्निवसनान्मधुरा पुरी सा शश्वत् समृद्धजनसङ्कुलिता बभूव ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = रक्षत्यजे त्रिजगतां परिरक्षकेऽस्मिन् सर्वान् यदून् मगधराजसुते स्वभर्तुः ।;कृष्णान्मृतिं पितुरवाप्य समीपमस्तिप्रास्ती शशंसतुरतीव च दूःखितेऽस्मै ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वैव तन्मगधराज उरुप्ररूढबाह्वोर्बलेन नजितो युधि सर्वलोकैः ।;ब्रह्मेशचण्डमुनिदत्तवरैरजेयो मृत्यूज्झितश्च विजयी जगतश्चुकोप ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = क्षुब्धोऽतिकोपवशतः स्वगदाममोघां दत्तां शिवेन जगृहे शिवभक्तवन्द्यः ।;शैवागमाखिलविदत्र च सुस्थिरोऽसौ चिक्षेप योजनशतं स तु तां परस्मै ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = अर्वाक् पपात च गदा मधुराप्रदेशात् सा योजनेन यदिमं प्रजगाद पृष्टः ।;एकोत्तरामपि शताच्छतयोजनेति देवर्षिरत्र मधुरां भगवत्प्रियार्थे ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = शक्तस्य चापि हि गदाप्रविघातने तु शुश्रूषणं मदुचितं त्विति चिन्तयानः ।;विष्णोर्मुनिः स निजगाद ह योजनोनं मार्गं पुरो भगवतो मगधेशपृष्टः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = क्षिप्ता तु सा भगवतोऽथ गदा जराख्यां तत्सन्धिनीमसुभिराशु वियोज्य पापाम् ।;मर्त्याशनीं भगवतः पुनराज्ञयैव याता गिरीशसदनं मगधं विसृज्य ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = राजा स्वमातृत उतो गदया च हीनः क्रोधात् समस्तनृपतीनभिसन्निपात्य ।;अक्षोहिणीत्र्यधिकविंशयुतोऽतिवेलं दर्पोद्धतः सपदि कृष्णपुरीं जगाम ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = सर्वां पुरीं प्रतिनिरुद्ध्य दिदेश विन्दविन्दानुजौ भगवतः कुमतिः स दूतौ ।;तावूचतुर्भगवतेऽस्य वचोऽतिदर्पपूर्णं तथा भगवतोऽप्यपहासयुक्तम् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = लोकेऽप्रतीतबलपौरुषसाररूपस्त्वं ह्येक एष्यभवतो बलवीर्यसारम् ।;ज्ञात्वा सुते नतु मया प्रतिपादिते हि कंसस्य वीर्यरहितेन हतस्त्वया सः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = सोऽहं हि दुर्बलतमो बलिनां वरिष्ठं कृत्वैव दृष्टिविषयं विगतप्रतापः ।;यास्ये तपोवनमथो सहितः सुताभ्यां क्षिप्रं ममाद्य विषये भव चक्षुषोऽतः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = साक्षेपमीरितमिदं बलदर्पपूर्णमात्मापहाससहितं भगवान् निशम्य ।;सत्यं तदित्युरु वचोऽर्थवदभ्युदीर्य मन्दं प्रहस्य निरगात् सहितो बलेन ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = द्वारेषु सात्यकिपुरस्सरमात्मसैन्यं त्रिष्वभ्युदीर्य भगवान् स्वयमुत्तरेण ।;रामद्वितीय उदगान्मगधाधिराजं योद्धुं नृपेन्द्रकटकेन युतं परेशः ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = तस्येच्छयैव पृथिवीमवतेरुराशु तस्याऽयुधानि सबलस्य सुभास्वराणि ।;शार्ङ्गासिचक्रदरतूणगदाः स्वकीया जग्राह दारुकगृहीतरथे स्थितः सः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = आरुह्य भूमयरथं प्रतियुक्तमश्वैर्वेदात्मकैर्धनुरधिज्यमथ प्रगृह्य ।;शार्ङ्गं शरांश्च निशितान् मगधाधिराजमुग्रं नृपेन्द्रसहितं प्रययौ जवेन ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = रामः प्रगृह्य मुसलं स हलं च यानमास्थाय सायकशरासनतूणयुक्तः ।;सैन्यं जरासुतसुरक्षितमभ्यधावद्धर्षान्नदन्नुरुबलोऽरिबलैरधृष्यः ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = उद्वीक्ष्य कृष्णमभियान्तमनन्तशक्तिं राजेन्द्रवृन्दसहितो मगधाधिराजः ।;उद्वेलसागरवदाश्वभियाय कोपान्नानाविधायुधवरैरभिवर्षमाणः ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = तं वै चुकोपयिषुरग्रत उग्रसेनं कृष्णो निधाय समगात् स्वयमस्य पश्चात् ।;दृष्ट्वाऽग्रतो मगधराट् स्थितमुग्रसेनं कोपाच्चलत्तनुरिदं वचनं बभाषे ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = पापापयाहि पुरतो मम राज्यकाम निर्लज्ज पुत्रवधकारण शत्रुपक्ष ।;त्वं जीर्णबस्तसदृशो न मयेह वध्यः सिंहो हि सिंहमभियाति न वै सृगालम् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = आयान्तमीक्ष्य भगवन्तमनन्तवीर्यं चेदीशपौण्ड्रमुखराजगणैः समेतः ।;नानाविधास्त्रवरशस्त्रगणैर्ववर्ष मेरुं यथा घन उदीर्णरवो जलौघैः ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = शस्त्रास्त्रवृष्टिमभितो भगवान् विवृश्च्य शार्ङ्गोत्थसायकगणैर्विरथाश्वसूतम् ।;चक्रे निरायुधमसौ मगधेन्द्रमाशु च्छिन्नातपत्रवरकेतुमचिन्त्यशक्तिः ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = नैनं जघान भगवान् सुशकं च भीमे भक्तिं निजां प्रथयितुं यश उच्चधर्मम् ।;चेदीशपौण्ड्रकसकीचकमद्रराजसाल्वैकलव्यकमुखान् विरथांश्चकार ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = ये चापि हंसडिभकद्रुमरुग्मिमुख्या बाह्लीकभौमसुतमैन्दपुरस्सराश्च ।;सर्वे प्रदुद्रुवुरजस्य शरैर्विभिन्ना अन्ये च भूमिपतयो य इहाऽसुरुर्व्याम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = छिन्नायुधध्वजपताकरथाश्वसूतवर्माण उग्रशरताडितभिन्नगात्राः ।;स्रस्ताम्बराभरणमूर्धजमाल्यहीना रक्तं वमन्त उरु दुद्रुवुराशु भीताः ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = शोच्यां दशामुपगतेषु नृपेषु (सर्वेष्वस्तायुधेषु) सर्वेष्वात्तायुधेषु हरिणा युधि विद्रवत्सु ।;नानायुधाढ्यमपरं रथमुग्रवीर्यम् आस्थाय मागधपतिः प्रससार रामम् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = आधावतोऽस्य मुसलेन रथं बभञ्ज रामो गदामुरुतरोरसि सोऽपि तस्य ।;चिक्षेप तं च मुसलेन तताड रामस्तावुत्तमौ बलवतां युयुधात उग्रम् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = तौ चक्रतुः पुरु नियुद्धमपि स्म तत्र सञ्चूर्ण्य सर्वगिरिवृक्षशिलासमूहान् ।;दीर्घं नियुद्धमभवत् सममेतयोस्तद् वज्राद् दृढाङ्गतमयोर्बलिनोर्नितान्तम् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽथ शङ्खरवमम्बुजलोचनस्य विद्रावितानपि नृपानभिवीक्ष्य रामः ।;युद्ध्यन्तमीक्ष्य च रिपुं ववृधे बलेन त्यक्त्वा रिपुं मुसलमादद आश्वमोघम् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = तेनाऽहतः शिरसि सम्मुमुहेऽतिवेलं बार्हद्रथो जगृह एनमथो हली सः ।;तत्रैकलव्य उत कृष्णशरैः पलायन्नस्त्राणि रामशिरसि प्रमुमोच शीघ्रम् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = भीतेन तेन समरं भगवाननिच्छन् प्रद्युम्नमाश्वसृजदात्मसुतं मनोजम् ।;प्रद्युम्न एनमभियाय महास्त्रजालै रामस्तु मागधमथाऽत्मरथं निनाय ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = युद्ध्वा चिरं रणमुखे भगवत्सुतोऽसौ चक्रे निरायुधममुं स्थिरमेकलव्यम् ।;अंशेन यो भुवमगान्मणिमानिति स्म स क्रोधतन्त्रकगणेष्वधिपो निषादः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = प्रद्युम्नमात्मनि निधाय पुनः स कृष्णः संहृत्य मागधबलं निखिलं शरौघैः ।;भूयश्चमूमभिविनेतुमुदारकर्मा बार्हद्रथं त्वमुचदक्षयपौरुषाऽजः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = व्रीडानताच्छविमुखः सहितो नृपैस्तैर्बार्हद्रथः प्रतिययौ स्वपुरीं स पापः ।;आत्माभिषिक्तमपि भोजवराधिपत्ये दौहित्रमग्रत उत प्रणिधाय मन्दः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = जित्वा तमूर्जितबलं भगवानजेशशक्रादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः ।;रामादिभिः सहित आशु पुरं(पुरीं) प्रविश्य रेमेऽभिवन्दितपदो महतां समूहैः ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = वर्द्धत्सु पाण्डुतनयेषु चतुर्दशं तु जन्मर्क्षमास तनयस्य सहस्रदृष्टेः ।;प्रत्याब्दिकं मुनिगणान् परिवेषयन्ती कुन्ती तदाऽऽस बहुकार्यपरा नयज्ञा ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = तत्काल एव नृपतिः सह माद्रवत्या पुंस्कोकिलाकुलितफुल्लवनं ददर्श ।;तस्मिन् वसन्तपवनस्पर्शेधितः स कन्दर्पमार्गणवशं सहसा जगाम ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = जग्राह तामथ तया रममाण एव यातो यमस्य सदनं हरिपादसङ्गी ।;पूर्वं शचीरमणमिच्छत एव विघ्नं शक्रस्य तद्दर्शनोपगतो हि चक्रे ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = तेनैव मानुषमवाप्य रतिस्थ एव पञ्चत्वमाप रतिविघ्नमपुत्रतां च(हि) ।;स्वात्मोत्तमेष्वथ सुरेषु विशेषतश्च स्वल्पोऽपि दोष उरुतामभियाति(उपयाति) यस्मात् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = माद्री पतिं मृतमवेक्ष्य रुराव दूरात् तच्छुश्रुवुश्च पृथया सह पाण्डुपुत्राः ।;तेष्वागतेषु वचनादपि माद्रवत्याः पुत्रान् निवार्य तु पृथा स्वयमत्र चाऽगात् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = पत्युः कलेवरमवेक्ष्य निशम्य माद्र्याः कुन्ती भृशं व्यथितहृत्कमलैव माद्रीम् ।;धिक्कृत्य चानुमरणाय मतिं चकार तस्याः स्वनो रुदितजः श्रुत आशु पार्थैः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = तेष्वागतेष्वधिक आस विराव एतं सर्वेऽपि शुश्रुवुर्ऋषिप्रवरा अथात्र ।;आजग्मुरुत्तमकृपा ऋषिलोकमध्ये पत्नी नृपानुगमनाय च पस्पृधाते ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = ते सन्निवार्य तु पृथामथ माद्रवत्या भर्तुः सहानुगमनं बहु चार्थयन्त्याः ।;संवादमेव निजदोषमवेक्ष्य तस्याश्चक्रुः सदाऽवगतभागवतोच्चधर्माः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = भर्तुर्गुणैरनधिकौ तनयार्थमेव माद्र्या कृतौ (आकृतौ) सुरवरावधिकौ स्वतोऽपि ।;तेनैव भर्तृमृतिहेतुरभूत् समस्तलोकैश्च नातिमहिता सुगुणाऽपि माद्री ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = पाण्डोः सुता मुनिगणैः पितृमेधमत्र चक्रुर्यथावदथ तेन सहैव माद्री ।;हुत्वाऽऽत्मदेहमुरु पापमदः कृतं च सम्मार्ज्य लोकमगमन्निजभर्तुरेव ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = पाण्डुश्च पुत्रकगुणैः स्वगुणैश्च साक्षात् कृष्णात्मजः सततमस्य पदैकभक्तः ।;लोकानवाप विमलान् महितान् महद्भिः किं चित्रमत्र हरिपादविनम्रचित्ते ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = पाण्डोः सुताश्च पृथया सहिता मुनीन्द्रैर्नारायणाश्रमत आशु पुरं स्वकीयम् ।;जग्मुस्तथैव धृतराष्ट्रपुरो मुनीन्द्राः वृत्तं समस्तमवदन्ननुजं मृतं च ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = तूष्णीं स्थिते तु नृपतौ तनुजे द्युनद्याः क्षत्तर्युतात्त उरुमोदमतीव पापाः ।;ऊचुः सुयोधनमुखाः सह सौबलेन पाण्डोर्मृतिः किल पुरा तनयाः क्व तस्य ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = न क्षेत्रजा अपि मृते पितरि स्वकीयैः सम्यङ् नियोगमनवाप्य भवाय योग्याः ।;तेषामितीरितवचोऽनु जगाद वायुराभाष्य कौरवगणान् गगनस्थ एव ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = एते हि धर्ममरुदिन्द्रभिषग्वरेभ्यो जाताः प्रजीवति पितर्युरुधामसाराः ।;शक्याश्च नैव भवतां क्वचिदग्रहाय नारायणेन सततं परिरक्षिता यत् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = वायोरदृश्यवचनं परिशङ्कमानेष्वाविर्बभूव भगवान् स्वयमब्जनाभः ।;व्यासस्वरूप उरुसर्वगुणैकदेह आदाय तानगमदाशु च पाण्डुगेहम् ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = तत्स्वीकृतेषु सकला अपि भीष्ममुख्या वैचित्रवीर्यसहिताः परिपूज्य सर्वान् ।;कुन्त्या सहैव जगृहुः सुभृशं तदाऽऽर्ता वैचित्रवीर्यतनयाः सह सौबलेन ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = वैचित्रवीर्यतनयाः कृपतो महास्त्राण्यापुश्च पाण्डुतनयैः सह सर्वराज्ञाम् ।;पुत्राश्च तत्र विविधा अपि बालचेष्टाः कुर्वत्सु वायुतनयेन जिताः समस्ताः ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = पक्वोरुभोज्यफलसन्नयनाय वृक्षेष्वारूढराजतनयानभिवीक्ष्य भीमः ।;पादप्रहारमुरुवृक्षतले प्रदाय साकं फलैर्विनिपतत्सु फलान्यभुङ्क्त ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = युद्धे नियुद्ध उत धावन उत्प्लवे च वारिप्लवे च सहितान् निखिलान् कुमारान् ।;एको जिगाय तरसा परमार्यकर्मा विष्णोः सुपूर्णसदनुग्रहतः सुनित्यात् ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = द्वेषं ह्यृते नहि हरौ तमसि प्रवेशः प्राणे च तेन जगतीमनु तौ प्रपन्नौ ।;तत्कारणान्यकुरुतां परमौ करांसि देवद्विषां सततविस्तृतसाधुपौंस्यौ ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वाऽमितान्यथ करांसि मरुत्सुतेन नित्यं कृतानि तनया निखिलाश्च राज्ञाम् ।;तस्यामितं बलमुदीक्ष्य सदोरुवृद्धद्वेषा बभूवुरथ मन्त्रममन्त्रयंश्च ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = येये हि तत्र नरदेवसुताः सुरांशाः प्रीतिं परां पवनजे निखिला अकुर्वन् ।;तांस्तान् विहाय दितिजा नरदेववंशजाता विचार्य वधनिश्चयमस्य चक्रुः ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = अस्मिन् हते विनिहता अखिलाश्च पार्थाः शक्यो बलाच्च न निहन्तुमयं बलाढ्यः ।;छद्मप्रयोगत इमं विनिहत्य वीर्यात् पार्थं निहत्य निगडे च विदध्महेऽन्यान् ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = एवं कृते निहतकण्टकमस्य राज्यं दुर्योधनस्य हि भवेन्न ततोऽन्यथा स्यात् ।;अस्मिन् हते निपतिते च सुरेन्द्रसूनौ शेषा भवेयुरपि सौबलिपुत्रदासाः ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = एवं विचार्य विषमुल्बणमन्तकाभं क्षीरोदधेर्मथनजं तपसा गिरीशात् ।;शुक्रेण लब्धममुतः सुबलात्मजेन प्राप्तं प्रतोष्य मरुतस्तनयाय चादुः ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = सम्मन्त्र्य राजतनयैर्धृतराष्ट्रजैस्तद् दत्तं स्वसूदमुखतोऽखिलभक्ष्यभोज्ये ।;ज्ञात्वा युयुत्सुगदितं बलवान् स भीमो विष्णोरनुग्रहबलाज्जरयाञ्चकार ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = जीर्णे विषे कुमतयः परमाभितप्ताः प्रासादमाशु विदधुर्हरिपादतोये ।;ज्ञात्वा युयुत्सुमुखतः स्वयमत्र चान्ते सुष्वाप मारुतिरमा धृतराष्ट्रपुत्रैः ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = दोषान् प्रकाशयितुमेव विचित्रवीर्यपुत्रात्मजेषु नृवरं प्रतिसुप्तमीक्ष्य ।;बद्ध्वाऽभिमन्त्रणदृढैरयसा कृतैस्तं पाशैर्विचिक्षिपुरुदे हरिपादजायाः ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = तत् कोटियोजनगभीरमुदं विगाह्य भीमो विजृम्भणत एव विवृश्च्य पाशान् ।;उत्तीर्य सज्जनगणस्य विधाय हर्षं तस्थावनन्तगुणविष्णुसदातिहार्दः ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = तं वीक्ष्य दुष्टमनसोऽतिविपन्नचित्ताः सम्मन्त्र्य भूय उरुनागगणानथाष्टौ ।;शुक्रोक्तमन्त्रबलतः पुर आह्वयित्वा पश्चात् सुपञ्जरगतान् प्रददुः स्वसूते ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनेन पृथुमन्त्रबलोपहूतांस्तत्सारथिः फणिगणान् पवनात्मजस्य ।;सुप्तस्य विस्तृत उरस्यमुचद् विशीर्णदन्ता बभूवुरमुमाशु विदश्य नागाः ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = क्षिप्त्वा सुदूरमुरुनागगणानथाष्टौ तद्वंशजान् स विनिहत्य पिपीलिकावत् ।;जघ्ने च सूतमपहस्तत एव भीमः सुष्वाप पूर्ववदनुत्थित एव तल्पात् ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = तत् तस्य (नैजबलमप्रमेयं) नैजबलमप्रतिमं निरीक्ष्य सर्वे क्षितीशतनया अधिकं विषेदुः ।;निश्वासतोऽथ दर्शनादपि भस्म येषां भूयासुरेव भुवनानि च ते मृषाऽऽसन् ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = दद्भिर्विदश्य न विकारममुष्य कर्तुं शेकुर्भुजङ्गमवरा अपि सुप्रयत्नाः ।;कस्यापि नेदृशबलं श्रुतपूर्वमासीद् दृष्टं किमु स्म तनयेऽपि हिरण्यकस्य ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = स्वात्मावनार्थमधिकां स्तुतिमेव कृत्वा विष्णोः स दैत्यतनयो हरिणाऽवितोऽभूत् ।;नत्वौरसं बलममुष्य स कृष्यते हि भृत्यैर्बलात् स पितुरौरसमस्य वीर्यम् ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = नैसर्गिकं प्रियमिमं प्रवदन्ति विप्रा विष्णोर्नितान्तमपि सत्यमिदं ध्रुवं हि ।;नैवान्यथौरसबलं भवतीदृशं तदुत्साद्य एष हरिणैव सहैष नोऽर्थः ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णः किलैष च हरिर्यदुषु प्रजातः सोऽस्याऽश्रयः कुरुत तस्य बहु प्रतीपम् ।;सम्मन्त्र्य चैवमतिपापतमा नरेन्द्रपुत्रा हरेश्च बहु चक्रुरथ प्रतीपम् ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = तैः प्रेरिता नृपतयः पितरश्च तेषां साकं बृहद्रथसुतेन हरेः सकाशम् ।;युद्धाय जग्मुरमुनाऽष्टदशेषु युद्धेष्वत्यन्तभग्नबलदर्पमदा निवृत्ताः ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = तेनाऽगृहीतगजवाजिगजा नितान्तं शस्त्रैः परिक्षततनूभिरलं वमन्तः ।;रक्तं विशस्त्रकवचध्वजवाजिसूताः स्रस्ताम्बराः श्लथितमूर्द्धजिनो निवृत्ताः ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = एवं बृहद्रथसुतोऽपि सुशोच्यरूप आर्तो ययौ बहुश एव पुरं स्वकीयम् ।;कृष्णेन पूर्णबलवीर्यगुणेन मुक्तो जीवेत्यतीव विजितः श्वसितावशेषः ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = एवं गतेषु बहुशो नतकन्धरेषु राजस्वजोऽपि मधुरां स्वपुरीं प्रविश्य ।;रामेण सार्धमखिलैर्यदुभिः समेतो रेमे रमापतिरचिन्त्यबलो जयश्रीः ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = व्यर्थोद्यमाः पुनरपि स्म सधार्तराष्ट्रा भीमं निहन्तुमुरुयत्नमकुर्वताज्ञाः ।;राज्ञां सुतास्तमखिलं स मृषैव कृत्वा चक्रे जयाय च दिशां बलवान् प्रयत्नम् ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = प्राचीं दिशं प्रथममेव जिगाय पश्चाद् याम्यां जलेशपरिपालितया सहान्याम् ।;यौ तौ पुरातनदशाननकुम्भकर्णौ मातृष्वसातनयतां च गतौ जिगाय ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वस्तयोर्हि दमघोषसुतः प्रजातः प्राहुश्च यं नृपतयः शिशुपालनाम्ना ।;अन्यं वदन्ति च करूशनृपं तथाऽन्यमातृष्वसातनयमेव च दन्तवक्रम् ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = जित्वैव तावपि जिगाय च पौण्ड्रकाख्यं शौरैः सुतं सुतमजैदथ भीष्मकस्य ।;यः पूर्वमास दितिजो नरहेल्वलाख्यो रुग्मीति नाम च बभूव स कुण्डिनेशः ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = भागेत एव तनयस्य स एव वह्नेर्नाम्ना शुचेः स तु पिताऽस्य हि मित्रभागः ।;राह्वंशयुक् तदनुजौ क्रथकैशिकाख्यौ भागौ तथाऽग्निसुतयोः पवमानशुन्ध्योः ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = बन्धोर्निजस्य तु बलं सुपरीक्षमाणः शल्योऽपि तेन युयुधे विजितस्तथैव ।;भीमो जिगाय युधि वीरमथैकलव्यं सर्वे नृपाश्च विजिता अमुनैवमेव ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = तद्बाहुवीर्यपरिपालित इन्द्रसूनुः शेषान् नृपांश्च समजैद् बलवानयत्नात् ।;साल्वं च हंसडिभकौ च विजित्य भीमो नागाह्वयं पुरमगात् सहितोऽर्जुनेन ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = तद्बाहुवीर्यमथ वीक्ष्य मुमोद धर्मसूनुः समातृयमजो विदुरः सभीष्मः ।;अन्ये च सज्जनगणाः सहपौरराष्ट्राः श्रुत्वैव सर्वयदवो जहृषुर्नितान्तम् ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णः सुयोधनमुखाक्रममाम्बिकेयं जानन् स्वपुत्रवशवर्तिनमेव गत्वा ।;श्वाफल्किनो गृहममुं धृतराष्ट्रशान्त्यै गन्तुं दिदेश गजनाम पुरं रमेशः ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = सोऽयाद् गजाह्वयममुत्र विचित्रवीर्यपुत्रेण भीष्मसहितैः कुरुभिः समस्तैः ।;सम्पूजितः कतिपयानवसच्च मासान् ज्ञातुं हि पाण्डुषु मनःप्रसृतिं कुरूणाम् ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञात्वा स कुन्तिविदुरोक्तित आत्मना च मित्रारिमध्यमजनांस्तनयेषु पाण्डोः ।;विज्ञाय पुत्रवशगं धृतराष्ट्रमञ्जः साम्नैव भेदसहितेन जगाद विद्वान् ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = पुत्रेषु पाण्डुतनयेषु च साम्यवृत्तिः कीर्तिं च धर्ममुरुमेषि तथाऽर्थकामौ ।;प्रीतिं परां त्वयि करिष्यति वासुदेवः साकं समस्तयदुभिः सहितः सुराद्यैः ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = धर्मार्थकामसहितां च विमुक्तिमेषि तत्प्रीतितः सुनियतं विपरीतवृत्तिः ।;यास्येव राजवर तत्फलवैपरीत्यमित्थं वचो निगदितं तव कार्ष्णमद्य ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं समस्तकुरुमध्य उपात्तवाक्यो राजाऽपि पुत्रवशगो वचनं जगाद ।;सर्वं वशे भगवतो न वयं स्वतन्त्रा भूभारसंहृतिकृते स इहावतीर्णः ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = एतन्निशम्य वचनं स तु यादवोऽस्य ज्ञात्वा मनोऽस्य कलुषं तव नैव पुत्राः ।;इत्यूचिवान् सह मरुत्तनयार्जुनाभ्यां प्रायात् पुरीं च सहदेवयुतः स्वकीयाम् ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं तु भागवतमुत्तममात्मयोग्यं भीमार्जुनौ भगवतः समवाप्य कृष्णात् ।;तत्रोषतुर्भगवता सह युक्तचेष्टौ सम्पूजितौ यदुभिरुत्तमकर्मसारौ ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्युद्यमो भगवताऽपि भवेद् गदायाः शिक्षा यदा भगवता क्रियते नचेमम् ।;कुर्यादिति स्म भगवत्समनुज्ञयैव रामादशिक्षदुरुगायपुरः स भीमः ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = रामोऽपि शिक्षितमरीन्द्रधरात् पुरोऽस्य भीमे ददावथ वराणि हरेरवाप ।;अस्त्राणि शक्रतनयः सहदेव आर नीतिं तथोद्धवमुखात् सकलामुदाराम् ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽथ चौपगविमुत्तमनीतियुक्तं सम्प्रेषयन्निदमुवाच ह गोकुलाय ।;दुःखं विनाशय वचोभिररे मदीयैर्नन्दादिनां विरहजं मम चाऽशु याहि ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = मत्तो वियोग इह कस्यचिदस्ति नैव यस्मादहं तनुभृतां निहतोऽन्तरेव ।;नाहं मनुष्य इति कुत्रच वोऽस्तु बुद्धिर्ब्रह्मैव निर्मलतमं प्रवदन्ति मां हि ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं यदा ह्यजगरो निजगार नन्दं सर्वे न शेकुरथ तत्प्रविमोक्षणाय(तत्प्रतिमोक्षणाय) ।;मत्पादसंस्पर्शतः स तदाऽतिदिव्यो विद्याधरस्तदुदितं निखिलं स्मरन्तु ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं स रूपमदतः प्रजहास विप्रान् नित्यं तपःकृशतराङ्गिरसो विरूपान् ।;तैः प्रापितः सपदि सोऽजगरत्वमेव मत्तो निजां तनुमवाप्य जगाद नन्दम् ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = नायं नरो हरिरयं परमः परेभ्यो विश्वेश्वरः सकलकारण आत्मतन्त्रः ।;विज्ञाय चैनमुरुसंसृतितो विमुक्ता यान्त्यस्य पादयुगलं मुनयो विरागाः ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = नन्दं यदा च जगृहे वरुणस्य दूतस्तत्रापि मां जलपतेर्गृहमाशु यान्तम् ।;सम्पूज्य वारिपतिराह विमुच्य नन्दं नायं सुतस्तव पुमान् परमः स एषः ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = सन्दर्शितो ननु मयैव विकुण्ठलोको गोजीविनां स्थितिरपि प्रवरा मदीया ।;मानुष्यबुद्धिमपनेतुमजे मयि स्म तस्मान्मयि स्थितिमवाप्य शमं प्रयान्तु ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वोद्धवो निगदितं परमस्य पुंसो वृन्दावनं प्रति ययौ वचनैश्च तस्य ।;दुःखं व्यपोह्य निखिलं पशुजीवनानामायात् पुनश्चरणसन्निधिमेव विष्णोः ॥ ११२॥ | |||
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<span id="gr-C15" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चदशोऽध्यायः"></span> | |||
== पञ्चदशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ एवं प्रशासति जगत् पुरुषोत्तमेऽस्मिन् भीमार्जुनौ तु सहदेवयुतावनुज्ञाम् ।;कृष्णादवाप्य वर्षत्रितयात् पुरं स्वमाजग्मतुर्हरिसुतेन विशोकनाम्ना ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = सैरन्ध्रिकोदरभवः स तु नारदस्य शिष्यो वृकोदररथस्य बभूव यन्ता ।;या पिङ्गलाऽन्यभव आत्मनि संस्थितं तं संस्मृत्य कान्तमुरुगायमभूत् त्रिवक्रा ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = तं पञ्चरात्रविदमाप्य सुसारथिं स भीमो मुमोद पुनराप परात्मविद्याम् ।;व्यासात् परात्मत उवाच च फल्गुनादिदैवेषु(फल्गुणादिदैवेषु) सर्वविजयी परविद्ययैषः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = सर्वानभागवतशास्त्रपथान् विधूय मार्गं चकार स तु वैष्णवमेव शुभ्रम् ।;क्रीडार्थमेव विजिगाय तथोभयात्मयुद्धे बलं च करवाक्प्रभवेऽमितात्मा ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = नित्यप्रभूतसुशुभप्रतिभोऽपि विष्णोः श्रुत्वा परां पुनरपि प्रतिभामवाप ।;को नाम विष्ण्वनुपजीवक आस यस्य नित्याश्रयादभिहिताऽपि रमा सदा श्रीः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = व्यासादवाप परमात्मसतत्त्वविद्यां धर्मात्मजोऽपि सततं भगवत्प्रपन्नाः ।;ते पञ्च पाण्डुतनया मुमुदुर्नितान्तं सद्धर्मचारिण उरुक्रमशिक्षितार्थाः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = यदा भरद्वाजसुतस्त्वसञ्चयी प्रतिग्रहोज्झो निजधर्मवर्ती ।;द्रौणिस्तदा धार्तराष्ट्रैः समेत्य क्रीडन् पयः पातुमुपैति सद्म ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = तस्मै माता पिष्टमालोड्य पातुं ददाति पीत्वैति तदेष नित्यम् ।;पीतक्षीरान् धार्तराष्ट्रान् समेत्य मया पीतं क्षीरमित्याह नित्यम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = नृत्यन्तमेनं पाययामासुरेते पयः कदाचिद् रसमस्य सोऽवैत् ।;पुनः कदाचित् स तु मातृदत्ते पिष्टे नेदं क्षीरमित्यारुराव ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा रुवन्तं(रुदन्तं) सुतमात्मजस्य स्नेहान्नियत्यैव जनार्दनस्य ।;सम्प्रेरितः कृपया चाऽर्तरूपो द्रोणो ययावार्जयितुं तदा गाम् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तः स रामं ययौ न विष्णोर्हि भवेत् प्रतिग्रहः ।;दोषाय यस्मात् स पिताऽखिलस्य स्वामी गुरुः परमं दैवतं च ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैवैनं जामदग्न्योऽप्यचिन्तयद् द्रोणं कर्तुं क्षितिभारापनोदे ।;हेतुं सुराणां नरयोनिजानां हन्ता चायं स्यात् सह पुत्रेण चेति ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = तेषां वृद्धिः स्यात् पाण्डवार्थे हतानां मोक्षेऽपि सौख्यस्य न सन्ततिश्च ।;योग्या सुराणां कलिजा सुपापाः प्रायो यस्मात् कलिजाः सम्भवन्ति ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = न देवानामाशतं पूरुषा हि सन्तानजाः प्रायशः पापयोग्याः ।;नाकारणात् सन्ततेरप्यभावो योग्यः सुराणां सदमोघरेतसाम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = अव्युच्छिन्ने सकलानां सुराणां तन्तौ कलिर्नो भविता कथञ्चित् ।;तस्मादुत्साद्याः सर्व एते सुरांशा एतेन साकं तनयेन वीराः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = एवं विचिन्त्याप्रतिमः स भार्गवो बभाष ईषत्स्मितशोचिषा गिरा ।;अनन्तशक्तिः सकलेश्वरोऽपि त्यक्तं सर्वं नाद्य वित्तं ममास्ति ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = आत्मा विद्या शस्त्रमेतावदस्ति तेषां मध्ये रुचितं त्वं गृहाण ।;उक्तः स इत्थं प्रविचिन्त्य विप्रो जगाद कस्त्वद्ग्रहणे समर्थः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेशिता सर्वपरः स्वतन्त्रस्त्वमेव कोऽन्यः सदृशस्तवेश ।;स्वाम्यं तवेच्छन् प्रतियात्यधो हि यस्मान्न चोत्थातुमलं कदाचित् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = सर्वोत्तमस्येश तवोच्चशस्त्रैः कार्यं किमस्माकमनुद्बलानाम् (अतद्बलानाम्)।;विद्यैव देया भवता ततोऽज सर्वप्रकाशिन्यचला सुसूक्ष्मा ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितस्तत्त्वविद्यादिकाः स विद्याः सर्वाः प्रददौ सास्त्रशस्त्राः ।;अब्दद्विषट्केन समाप्य ताः स ययौ सखायं द्रुपदं महात्मा ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = दानेऽर्द्धराज्यस्य हि तत्प्रतिज्ञां संस्मृत्य पूर्वामुपयातं सखायम् ।;सखा तवास्मीति तदोदितोऽपि जगाद वाक्यं द्रुपदोऽतिदर्पात् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = न निर्धनो राजसखो भवेत यथेष्टतो गच्छ विप्रेति दैवात् ।;इतीरितस्याऽशु बभूव कोपो जितेन्द्रियस्यापि मुनेर्हरीच्छया ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तेन सोऽयं मया प्राप्तो मत्पितुः शिष्यकत्वात् ।;पितुः शिष्यो ह्यात्मशिष्यो भवेत शिष्यस्यार्थः स्वीय एवेति मत्वा ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = सोऽयं पापो मामवज्ञाय मूढो दुष्टं वचोऽश्रावयदस्य दर्पम् ।;हनिष्य इत्येव मतिं निधाय ययौ कुरूञ्छिष्यतां नेतुमेतान् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिग्रहाद् विनिवृत्तस्य चार्थः स्याच्छिष्येभ्यः कौरवेभ्यो ममात्र ।;एवं मन्वानः क्रीडतः पाण्डवेयान् सधार्तराष्ट्रान् पुरबाह्यतोऽख्यत् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = विक्रीडतो धर्मसूनोस्तदैव सहाङ्गुलीयेन च कन्दुकोऽपतत् ।;कूपे न शेकुः सहिताः कुमारा उद्धर्तुमेतं पवनात्मजोऽवदत् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = निष्पत्य चोद्धृत्य समुत्पतिष्ये कूपादमुष्माद् भृशनीचादपि स्म ।;सकन्दुकां मुद्रिकां पश्यताद्य सर्वे कुमारा इति वीर्यसंश्रयात् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = तदा कुमारानवदत् स विप्रो धिगस्त्रबाह्यां भवतां प्रवृत्तिम् ।;जाताः कुले भरतानां न वित्थ दिव्यानि चास्त्राणि सुरार्चितानि ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिता अस्त्रविदं कुमारा विज्ञाय विप्रं सुरपूज्यपौत्रम्(सुरपूज्यपौत्रात्) ।;सम्प्रार्थयामासुरथोद्धृतिं प्रति प्रधानमुद्रायुतकन्दुकस्य ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = स चाऽश्विषीकाभिरथोत्तरोत्तरं सम्प्रास्य दिव्यास्त्रबलेन कन्दुकम् ।;उद्धृत्य मुद्रोद्धरणार्थिनः पुनर्जगाद भुक्तिर्मम कल्प्यतामिति ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = पप्रच्छुरेनं सहिताः कुमाराः कोऽसीति सोऽप्याह पितामहो वः ।;वक्तेति ते दुद्रुवुराशु भीष्मं द्रोणोऽयमित्येव स तांस्तदोचे ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = न राजगेहं स कदाचिदेति तेनादृष्टः स कुमारैः पुराऽतः ।;भीष्मो विद्यास्तेन सहैव चिन्तयन्नस्त्रप्राप्तिं तस्य शुश्राव रामात् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा वृद्धं कृष्णवर्णं द्विजं तं महास्त्रविद्यामपि तां महामतिः ।;द्रोणं ज्ञात्वा तस्य शिष्यत्व एतान् ददौ कुमारांस्तत्र गत्वा स्वयं च ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणोऽथ तानवदद् यो मदिष्टं कर्तुं प्रतिज्ञां प्रथमं करोति ।;तं धन्विनां प्रवरं साधयिष्य इत्यर्जुनस्तामकरोत् प्रतिज्ञाम् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = उन्मादनादीनि स वेद कृष्णादस्त्राण्यनापत्सु न तानि मुञ्चेत् ।;इत्याज्ञया केशवस्यापराणि प्रयोगयोग्यानि सदेच्छति स्म ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मादिभिर्भविता सङ्गरो नस्तदा नाहं गुरुभिर्नित्ययोद्धा ।;भवेयमेकः फल्गुनोऽस्त्रज्ञ एषां निवारकश्चेन्मम धर्मलाभः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = न बुद्धिपूर्वं वर इन्दिरापतेरन्यत्र मे ग्राह्य इतश्च जिष्णुः ।;करोतु गुर्वर्थमिति स्म चिन्तयन् भीमः प्रतिज्ञां न चकार तत्र ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = तत्प्रेरितेनार्जुनेन प्रतिज्ञा कृता यदा विप्रवरस्ततः परम् ।;स्नेहं नितान्तं सुरराजसूनौ कृत्वा महास्त्राणि ददौ स तस्य ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = स पक्षपातं च चकार तस्मिन् करोति चास्योरुतरां प्रशंसाम् ।;रहस्यविद्याश्च ददाति तस्य नान्यस्य कस्यापि तथा कथञ्चित् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = भीमः समस्तं प्रतिभाबलेन जानन् स्नेहं त्वद्वितीयं कनिष्ठे ।;द्रोणस्य कृत्वा सकलास्त्रवेदिनं कर्तुं पार्थं नार्जुनवच्चकार ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = नैवातियत्नेन ददर्श लक्षं शुश्रूषायां पार्थमग्रे करोति ।;स्वबाहुवीर्याद् भगवत्प्रसादान्निहन्मि शत्रून् किमनेन चेति ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = तदा समीयुः सकलाः क्षितीशपुत्रा द्रोणात् सकलास्त्राण्यवाप्तुम् ।;ददौ स तेषां परमास्त्राणि विप्रो रामादवाप्तान्यगतानि चान्यैः ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्राणि चित्राणि महान्ति दिव्यान्यन्यैर्नृपैर्मनसाऽप्यस्मृतानि ।;अवाप्य सर्वे तनया नृपाणां शक्ता बभूवुर्न यथैव पूर्वे ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = नैतादृशाः पूर्वमासन् नरेन्द्रा अस्त्रे बले सर्वविद्यासु चैव ।;दौष्यन्तिमान्धातृमरुत्तपूर्वाश्चैतत्समानाः नासुरदारवीर्याः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = तदा कर्णोऽथैकलव्यश्च दिव्यान्यस्त्राण्याप्तुं द्रोणसमीपमीयतुः ।;सूतो निषाद इति नैतयोरदादस्त्राणि विप्रः स तु रामशिष्यः ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = कर्णोऽनवाप्य निजमीप्सितमुच्चमानो यस्मादवाप पुरुषोत्तमतोऽस्त्रवृन्दम् ।;विप्रोऽप्ययं तमजमेमि भृगोः कुलोत्थमित्थं विचिन्त्य स ययौ भृगुपाश्रमाय ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = स सर्ववेत्तुश्च विभोर्भयेन विप्रोऽहमित्यवददस्त्रवरातिलोभात् ।;जानन्नपि प्रददावस्य रामो दिव्यान्यस्त्राण्यखिलान्यव्ययात्मा(अव्यथात्मा) ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रज्ञचूळामणिमिन्द्रसूनुं विश्वस्य हन्तुं धृतराष्ट्रपुत्रः ।;एनं समाश्रित्य दृढो भवेतेत्यदाज्ज्ञात्वैवास्त्रमस्मै रमेशः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं च भागवतमप्यपराश्च विद्या रामादवाप्य विजयं धनुरग्र्ययानम् ।;अब्दैश्चतुर्भिरथ च न्यवसत् तदन्ते हातुं न शक्त उरुगायमिमं स कर्णः ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = अङ्के निधाय स कदाचिदमुष्य रामः शिश्ये शिरो विगतनिद्र उदारबोधः ।;संसुप्तवत् सुरवरः सुरकार्यहेतोर्दातुं च वालिनिधनस्य फलं तदस्य ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = तत्राऽस राक्षसवरः स तु हेतिनामा काले महेन्द्रमनुपास्य हि शापतोऽस्य ।;कीटस्तमिन्द्र उत तत्र समाविवेश कर्णस्य शापमुपपादयितुं सुतार्थे ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = कर्णः स कीटतनुगेन किरीटिनैव ह्यूरोरधस्तनत (ओपरिगात्वचः)औपरिगात्वचश्च ।;विद्धः शरेण स यथा रुधिरस्य धारां सुस्राव तं विगतनिद्र इवाऽह रामः ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = किं त्वं न चालयसि मां रुधिरप्रसेके प्राप्तेऽपि पावनविरोधिनि कोऽसि चेति ।;तं प्राह कर्ण इह नैव मया विधेयो निद्राविरोध इति कीट उपेक्षितो मे ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = जात्याऽस्मि सूत उत ते तनयोऽस्मि सत्यं तेनास्मि विप्र इति भार्गववंशजोऽहम् ।;अग्रेऽब्रुवं भवत ईश नहि त्वदन्यो माता पिता गुरुतरो जगतोऽपि मुख्यः ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तमात्रवचने स तु कीटकोऽस्य रामस्य दृष्टिविषयत्वत एव रूपम् ।;सम्प्राप्य नैजमतिपूर्णगुणस्य तस्य विष्णोरनुग्रहत आप विमानगः स्वः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह रामस्तमसत्यवाचो न ते सकाशे मम वासयोग्यता ।;तथाऽपि ते नैव वृथा मदीया भक्तिर्भवेज्जेष्यसि सर्वशत्रून् ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = अस्पर्धमानं न कथञ्चन त्वां जेता कश्चित् स्पर्धमानस्तु यासि ।;पराभूतिं नात्र विचार्यमस्ति प्रमादी त्वं भविता चास्त्रसङ्घे (अस्त्रसङ्ख्ये)॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = याहीति तेनोक्त उदारकर्मणा कर्णो ययौ तं प्रणम्येशितारम् ।;तथैकलव्योऽपि निराकृतोऽमुना द्रोणेन तस्य प्रतिमां वनेऽर्चयत् ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = ततः कदाचिद् धृतराष्ट्रपुत्रैः पाण्डोः सुता मृगयां सम्प्रयाताः ।;अग्रे गच्छन् सारमेयो रुराव धर्मात्मजस्यात्र वने मृगार्थी ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा रावं सारमेयस्य दूराच्छरैर्मुखं शब्दवेधी पुपूरे ।;स एकलव्यो व्रणमस्य नाकरोच्छ्वा पूरितास्यः पाण्डवानभ्ययात् सः ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा चित्रं कुरवः पाण्डवाश्च द्रष्टुं कर्तारं मार्गयामासुरत्र ।;द्रोणाकृतिं मार्त्तिकीं पूजयन्तं ददृशुश्चैनं धनुरेवाभ्यसन्तम् ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = पैशाचमेवैष पिशाचकेभ्यः पूर्वं विवेदास्त्रवृन्दं निषादः ।;दिव्यान्यस्त्राण्याप्तुमेतां च शिक्षां द्रोणं सदा पूजयति स्म भक्त्या ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा विशेषं तममुष्य पार्थो द्रोणायोचे त्वद्वरो मे मृषाऽऽसीत् ।;इत्युक्त एनं त्वभिगम्य दक्षिणां विप्रो ययाचे दक्षिणाङ्गुष्ठमेव ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = तस्य प्रसादोपचितोरुशिक्षो निषादोऽदाद् दक्षिणाङ्गुष्ठमस्मै ।;ततः परं नास्य बभूव शिक्षा सन्मुष्टिहीनस्य समाऽर्जुनेन ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = पुनः कृपालू रैवतपर्वते तं द्रोणः प्राप्याऽदादस्त्रवराणि तस्मै ।;एकान्त एवास्य भक्त्या सुतुष्टो धन्विश्रेष्ठं कृतवानर्जुनं च ॥ ६६॥ | |||
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<span id="gr-C16" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षोडशोऽध्यायः"></span> | |||
== षोडशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ काले त्वेतस्मिन् भूय एवाखिलैश्च नृपैर्युक्तो मागधो योद्धुकामः ।;प्रायाद् यदूंस्तत्र नित्याव्ययातिबलैश्वर्योऽपीच्छयाऽगात् स कृष्णः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = सन्दर्शयन् बलिनामल्पसेनाद्युपस्कराणां बहलोपस्करैश्च ।;प्राप्ते विरोधे बलिभिर्नीतिमग्र्यां ययौ सरामो दक्षिणाशां रमेशः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = सोऽनन्तवीर्यः परमोऽभयोऽपि नीत्यै गच्छन् जामदग्न्यं ददर्श ।;क्रीडार्थमेकोऽपि ततोऽतिदुर्गं श्रुत्वा गोमन्तं तत्र ययौ सहाग्रजः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = तदा दुग्धाब्धौ संसृतिस्थैः सुराद्यैः पूजां प्राप्तुं स्थानमेषां च योग्यम् ।;मुक्तस्थानादाप नारायणोऽजो बलिश्चाऽगात् तत्र सन्द्रष्टुमीशम् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = तत्रासुरावेशममुष्य विष्णुः सन्दर्शयन् सुप्तिहीनोऽपि नित्यम् ।;संसुप्तविच्छश्य उदारकर्मा सञ्ज्ञायै देवानां मुखमीक्ष्याप्रमेयः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = तत् तस्य शीर्ष्णि प्रतिमुच्य नत्वा खगः स्तुत्वा देवदेवं रमेशम् ।;स्मृत आगच्छेत्येव विसर्जितोऽमुना ययौ दुग्धाब्धिं यत्र नारायणोऽसौ ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = किरीटं तत् कृष्णमूर्ध्नि प्रविष्टं तत्तुल्यमासीत् तस्य रूपेष्वभेदात् ।;तदिच्छया चैव नारायणस्य शीर्ष्ण्यप्यासीद् युगपद् दुग्धवार्धौ ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं प्राप्तान्येव दिव्यायुधानि पुनर्वैकुण्ठं लोकमितानि भूयः ।;तदाऽवतेरू रौहिणेयस्य चैवं भार्याऽप्यायाद् वारुणी नाम पूर्वा ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = सैवापरं रूपमास्थाय चाऽगाच्छ्रीरित्याख्यं सेन्दिरावेशमग्र्यम् ।;कान्तिश्चाऽगात् तस्य सोमस्य चान्या भार्या द्वयोः पूर्वतना सुरूपा ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = ताभी रामो मुमुदे तत्र तिष्ठञ्छशाङ्कपूगोद्रिक्तकान्तिः सुधामा ।;तस्या वारुण्याः प्रतिमा पेयरूपा कादम्बरी वारुणी(वारुणीं) तां पपौ सः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = एवं तयोः क्रीडतोः स्वैरमत्र राजन्यवृन्दानुगतो जरासुतः ।;गिरिं गोमन्तं परिवार्यादहत् तं दृष्ट्वा देवौ पुप्लुवतुर्बलाढ्यौ ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = गिरिस्ताभ्यां पीडितः सन् निमग्नो भूमौ पद्भ्यां योजनैकादशं सः ।;निष्पीडिताज्जलधारोद्गताऽस्माद् वह्निं व्याप्तं शमयामास सर्वम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = सेनां प्रविष्टौ सर्वराजन्यवृन्दं व्यमथ्नतां देववरौ स्वशस्त्रैः ।;तत्र हंसो डिभिकश्चैकलव्यः (स कीचक)सकीचकस्तौ शिशुपालपौण्ड्रकौ ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = भौमात्मजो दन्तवक्रश्च रुग्मी सौभाधिपो मैन्दमैन्दानुजौ च ।;अन्ये च ये पार्थिवाः सर्व एव क्रोधात् कृष्णं परिवार्याभ्यवर्षन् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = शस्त्रैरस्त्रैर्द्रुमपूगैः शिलाभिर्भक्ताश्च ये शल्यबाह्लीकमुख्याः ।;ससोमदत्ताः सौमदत्तिर्विराटः पाञ्चालराजश्च जरासुतस्य ।;भयात् कृष्णं शस्त्रवर्षैरवर्षन् कारागृहे वासिता मागधेन ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = सर्वानेताञ्छरवर्षेण कृष्णो विसूतवाजिध्वजशस्त्रवर्मणः ।;कृत्वा वमच्छोणितानार्तरूपान् विद्रावयामास हरिर्यथा मृगान् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = हत्वा सेनां विंशदक्षोहिणीं तां त्रिभिर्युक्तां रुग्मिणं नैव कृष्णः ।;रुग्मिण्यर्थे पीडयामास शस्त्राण्यस्य च्छित्वा विरथं द्रावयानः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = जरासुतो रौहिणेयेन युद्धं चिरं कृत्वा तन्मुसलेन पोथितः ।;विमोहितः प्राप्तसञ्ज्ञश्चिरेण क्रुद्धो गदां तदुरस्यभ्यपातयत् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = तेनाऽहतः सुभृशं रौहिणेयः पपात मूर्च्छाभिगतः क्षणेन ।;अजेयत्वं तस्य दत्तं हि धात्रा पूर्वं गृहीतं (गृहीतो) विष्णुना रामगेन ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = तथाकृते बलभद्रे तु कृष्णो गदामादाय स्वामगान्मागधेशम् ।;तताड जत्रौ स तयाऽभिताडितो जगाम गां मूर्च्छयाऽभिप्लुताङ्गः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = अथोत्तस्थौ रौहिणेयः सहैव समुत्तस्थौ मागधोऽप्यग्र्यवीर्यः ।;क्रुद्धो गृहीत्वा मौलिमस्याऽशु रामो वधायोद्यच्छन्मुसलं बाहुषाली ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = अथाब्रवीद् वायुरेनं न राम त्वया हन्तुं शक्यते मागधोऽयम् ।;वृथा न ते बाहुबलं प्रयोज्यममोघं ते यद् बलं तद्वदस्त्रम् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = अन्यो हन्ता बलवानस्य चेति श्रुत्वा ययौ बलभद्रो विमुच्य ।;जरासुतं पुनरुद्यच्छमानं जघान कृष्णो गदया स्वयैव ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = तेनाऽहतः स्रस्तसमस्तगात्रः पपात मूर्च्छाभिगतः स राजा ।;चिरात् सञ्ज्ञां प्राप्य चान्तर्हितोऽसौ सम्प्राद्रवद् भीतभीतः सलज्जः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = ययौ शिष्टै राजभिः संयुतश्च पुरं जीवेत्येव कृष्णेन मुक्तः ।;पुनर्युद्धं बहुशः केशवेन कृत्वा जितो राजगणैः समेतः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णो जित्वा मागधं रौहिणेययुक्तो ययौ दमघोषेण सार्द्धम् ।;पितृष्वसायाः पतिना तेन चोक्तः पूर्वं जितेनापि युधि स्म बान्धवात् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = यामः पुरं करिवीराख्यमेव महालक्ष्म्याः क्षेत्रसन्दर्शनाय ।;श्रुत्वा वाक्यं तस्य युद्धे जितस्य भीत्या(प्रीत्या) युक्तस्याऽत्मना तद्युतोऽगात् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्वोऽसौ दनुनामा नरोऽभूत् तस्मात् कृष्णे भक्तिमांश्चाऽस राजा ।;पुरप्राप्तांस्तान् स विज्ञाय पापः सृगालाख्यो वासुदेवः क्रुधाऽऽगात् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = सूर्यप्रदत्तं रथमारुह्य दिव्यं वरादवध्यस्तिग्मरुचेः स कृष्णम् ।;योद्धुं ययावमुचच्चास्त्रसङ्घाञ्छिरस्तस्याथाऽशु जहार कृष्णः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = द्विधा कृत्वा देहमस्यारिणा च पुत्रं भक्तं तस्य राज्येऽभिषिच्य ।;स शक्रदेवं माणिभद्रः पुरा यो ययौ पुरीं स्वां सहितोऽग्रजेन ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = नीतिं बलिष्ठस्य विहाय सेनां दूराद् युद्धं युद्धं दर्शयित्वैव गुप्त्यै ।;स्वसेनायाः सर्वपूर्णात्मशक्तिः पुनः पुरीं प्राप्य स पूजितोऽवसत् ॥ ३३॥ | |||
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<span id="gr-C17" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तदशोऽध्यायः"></span> | |||
== सप्तदशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ गतेऽथ चेदिपे स्वकं पुरं जनार्दनोऽशृणोत् ।;रमैव रुग्मिणीति योद्यतां स्वयम्बराय ताम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = स रुक्मिनामकोऽग्रजः श्रियो(श्रिया) द्विषन् रमापतिम् ।;हरेः प्रदातुमुद्यतां(उद्यतान्) न्यवारयद्धरिप्रियाम् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = प्रघोषिते स्वयंवरेऽथ तेन मागधादयः ।;समीयुरुग्रपौरुषाः ससाल्वपौण्ड्रचेदिपाः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = पतत्रवायुनाऽस्य ते नरेश्वराः प्रपातिताः ।;यदेदृशं(यदीदृशं) पतत्रिणो बलं हरेः किमुच्यते ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = किमत्र नः कृतं भवेत् सुखाय हीति तेऽब्रुवन् ।;अथाब्रवीज्जरासुतो जयी पयोब्धिमन्दिरः ।;किलैष पक्षिवाहनो यतश्च नान्यथा भवेत् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = जिता वयं च सर्वशोऽमुनैकलेन संयुगे ।;अनेकशो न सङ्गतैर्जितः कदाचिदेष हि ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = अमुष्य चाग्रजः पुरा निहन्तुमुद्यतो हि माम् ।;अदृश्यवाक्यतोऽत्यजत् प्रताडनात् सुपीडितम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = किमस्य (चोच्यते)तूच्यते बलं वयं तृणोपमाः कृताः ।;समस्तशो मृधेमृधे हि येन चाक्षतेन हा ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = किमत्र कुर्वतां सुखं भवेदुदीर्णसङ्कटे ।;इति ब्रुवन्नवाङ्मुखं नृपश्चकार विच्छविः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह चेदिभूपतिः सदन्तवक्रको वचः ।;पुरा हरेर्हि पार्षदः प्रसन्नबुद्धिरेकदा ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = न कारणं च विद्महे न संशयः परो हरिः ।;व्रजाम तं सुखार्थिनो वयं विहाय शत्रुताम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = स्वधर्म एष नः सदा दृढप्रतीपता हरौ ।;स्वधर्मिणो हता अपि प्रयाम सद्गतिं ध्रुवम् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = शिवश्च नः परा गतिर्गुरुर्भवानरिर्हरेः ।;इतीरितः स मागधो जगाद साधु साध्विति ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = तथैव रुक्मिपूर्वकाः करूशचेदिपौ च तौ ।;विनिश्चयं कुबुद्धयो युधे च चक्रुरूर्जितम् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = सदा प्रतीपकारिणौ भवाव कृष्ण इत्यपि ।;गुरोः प्रसादमाप्नुतां करूशचेदिभूभृतौ ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च ते त्वमन्त्रयन् सहैव पापबुद्धयः ।;ध्रुवं समागतो हरिर्लभेत रुक्मिणीमिमाम् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = अयं त्रिलोकसुन्दरोऽनुरूपिणी च रुक्मिणी ।;मुखेन बाहुनाऽप्ययं समस्तलोकजिद् वशी ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = समस्तवेदिनां वरं जितारिमग्र्यरूपिणम् ।;समस्तयोषितां वरा व्रजेत रुक्मिणी ध्रुवम् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = वयं च मानसङ्क्षयं नितान्तमाप्नुमस्तदा ।;न शक्नुमो निवारितुं शरैरमुं कथञ्चन ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = अतः स्वयंवरे यथा न सङ्गमो हरेर्भवेत् ।;तथा विधानमेव नः सुनीतिरूर्जिता ध्रुवम् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = अतो न देयमस्य नः सुभूभुजां समागमे ।;क्वचित् कदाचिदासनं नचार्घ्यपूर्वको विधिः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = नचाऽस्यति क्षितौ क्वचिद् विमानितः पुरो हि नः ।;वरासनस्थभूभुजां स मानितो हि दैवतैः ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = स दर्पमानसंयुतः क्रुधा प्रयास्यति ध्रुवम् ।;पुरीं स्वकां ततौ वयं विधेम च स्वयंवरम् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = इति स्म सर्वभूभृतां विनिश्चयं सकैशिकः ।;क्रथोऽवगम्य भीष्मकानुजोऽभ्ययाद्धरिं द्रुतम् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = प्रणम्य पादपद्मयोर्निजं गृहं प्रवेश्य च ।;महासनं प्रदाय तौ प्रचक्रतुर्वरार्चनम् ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽगमच्छतक्रतोर्वचः प्रगृह्य भूभुजः ।;जरासुतादिकान् पुमानुवाच चार्थवद् वचः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = अहं प्रियः शचीपतेः सदाऽस्य चाक्षिगोचरः ।;सुरेन्द्र आज्ञयाऽवदन्नृपान् व ईश्वरो हि सः ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = समस्तराजसत्पतिर्हरिर्न चान्य इत्यपि ।;वराभिषेकमीशितुः कुरुध्वमाश्वसंशयम् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = अतोऽन्यथा शिरस्यहं निपातयामि वोऽशनिम् ।;इतीदमिन्द्रशासनं कुरुध्वमित्यसौ ययौ ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = तदीरितं निशम्य ते पुनः सुतप्तचेतसः ।;बभूवुरूचिरे वचः सुगर्वितो हि वासवः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = पुरा बिभेति नः सदा प्रतिप्रति स्म वासवः ।;उताद्य कृष्णसंश्रयाद् दृढं विभीषयत्यसौ ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = अदृश्य एव देवराड् यदि स्म वज्रमुत्सृजेत् ।;भवेम पीडिता वयं वरादमृत्यवोऽपि हि ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = पुरा दिविस्थितस्य च प्रमर्दने वयं क्षमाः ।;उताद्य यद्यमुं वयं व्रजेम कृष्ण एष्यति ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = अतोऽभिषेचनाद् यदीह शार्ङ्गिणः शचीपतिः ।;न वज्रमुत्सृजेत् तदाऽभिषेचयाम तं वयम् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = अतोऽन्यथा दनुर्यथा वरादमृत्युकोऽपि सन् ।;सुरेन्द्रवज्रताडितो बभूव कुक्षिगास्ययुक् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = तथैव कृष्णसंश्रयात् स नः शचीपतिर्नयेत् ।;इति स्म निश्चिता नृपानयातयन्त शौरये ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = समस्तशो जरासुतादिभिः कृतेऽभिषेचने ।;अतीव भग्नमानकान् न चानुयाति कश्चन ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = समाश्रयं च केशवं तदैव जीवनार्थिनः ।;प्रकुर्युरासुरा अपीति देवकार्यसङ्क्षयः(देवकार्यसञ्चयम्) ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = इतीक्ष्य (उदीक्ष्य) पाकशासनोऽवदज्जरासुतादिकान् ।;सरुक्मिसाल्वचेदिपो न यातु मागधो हरिम् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु तान् विनाऽपरेऽधिराजराज इत्यमुम् ।;तदाऽभिषेक्तुमुद्यता नृपाः सुरेशशासनात् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = अतः शचीपतिर्निजं वरासनं हरेरदात् ।;विवेश तत्र केशवो नभस्तलावतारिते ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = करे प्रगृह्य केशवो न्यवेशयत् सहाऽसने ।;पतत्रिपुङ्गवं च तौ स भीष्मकानुजौ प्रभुः ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = अथाखिला नरेश्वरा मुनीन्द्रसंयुता हरिम् ।;सुशातकौम्भकुम्भकैः प्रचक्रुराभिषेकिणम् ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह भीष्मकं प्रभुः स्वयंवरः किल त्वया ।;अभीप्सितः सुताकृते शुभाय ते भवेन्न सः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = तदद्भुतं समीक्ष्य तु प्रभीत आशु भीष्मकः ।;पपात पादयोर्विभोः(प्रभोः) करोमि तत् तथेति च ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = स्वयंवरः क्षितेर्भुजां स्वधर्म इत्यतो द्वयोः ।;न दोष आस भीष्मको न केशवार्थमैच्छत ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = अतो हरौ प्रबोध्य तं गते कृपालुसत्तमे ।;वशीकृते च भीष्मके नृपास्त्वमन्त्रयन् पुनः ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = यशश्च धर्ममुत्तमं विधित्सता वृकोदरे ।;न केशवेन सूदितो जरासुतो हि मन्यते ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = अभूपतेर्न चाऽसनं प्रदेयमित्युदाहृतम् ।;अमुष्य नस्तदन्यथा बभूव चिन्तितं नृपाः ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = अयं नृपोत्तमाङ्कणे महेन्द्रपीठमारुहत् ।;समस्तराजराजतामवाप नोऽप्यनिच्छताम् ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = अतः पुनः कथं हरिं वयं जयेम चिन्त्यताम् ।;यथा च भीष्मकात्मजामवाप्नुयाच्च चेदिराट् ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = अयं हि दत्तपुत्रको म औरसाद् विशिष्यते ।;अतो निवेश्य एष मे सुरूपिणी च रुग्मिणी ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = शिवागमेषु शिष्यकाः सरुक्मिसाल्वपौण्ड्रकाः ।;ममाखिला नृपास्ततः कुरुध्वमेतदेव मे ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते तु सौभराड् जगाद रुक्मिसंविदा ।;स्वयंवरो निवर्तितः स्वसारमेष दास्यति ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = नचातिवर्तितुं क्षमः पिताऽस्य चेदिपाय ताम् ।;प्रदातुकाममात्मजं वयोगतस्तथाऽबलः ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = स्वयं तु कृष्ण एत्य नो विजित्य कन्यकां हरेत् ।;ततोऽस्य पूर्वमेव नो ह्यभावता कृता शुभा ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = उपाय एष चिन्तितो मयाऽत्र मागधेश्वर ।;मुनिं हि गर्गनामकं ह्यमुष्य स्याल(शाल) आक्षिपत् ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = यदाऽस्य षण्ढतोदिता मुनेः पुरो हि तस्य च ।;परेण वृष्णयोऽहसंश्चुकोप गर्ग एषु ह ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = चकार हि प्रतिश्रवं समार्जये सुतं द्रुतम् ।;अकृष्णतां य आनयेद् भुवोऽपि वृष्णिनाशकः ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = यतो हि कृष्णसंश्रयाद् बतापहासिता वयम् ।;इति ब्रुवन् वनं ययौ तपश्च शैवमाचरत् ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = स चूर्णमायसं त्वदन् ददर्श चाब्दतः शिवम् ।;वरं ततोऽभिपेदिवान् सुतं हरेरभावदम् ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = स विष्णुदैवतोऽपि सन् प्रविष्ट उल्बणासुरैः ।;व्यधाद्धरेः प्रतीपकं व्रतं च नैष्ठिकं जहौ ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = तमार चाऽसुराप्सरा बलिष्ठपुत्रकाम्यया ।;प्रविश्य गोपिकाङ्गनासमूहमध्यमुल्बणा ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = स यावनेन भूभृता हि गोपिकाभिरर्चितः ।;अपुत्रकेण जानता मुनेर्मनोऽनुचिन्तितम् ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = स चाप्सरस्तनौ सुतं निषिच्य यावनाय च ।;ददौ विमोहितः क्रुधा किमेतदीशवैरिणः ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = स आश्रमाच्च नैष्ठिकाद् विदूषितः प्रतीपकृत् ।;हरेश्च तापमेयिवान् जगर्ह चाऽत्मशेमुषीम् ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = जगाम चारणं हरिं प्रपाहि मां सुपापिनम् ।;इति स्म विष्ण्वनुज्ञया चकार वैष्णवं तपः ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = कुतो हि भाग्यमापतेन्मुनेः शिवार्चने सदा ।;भवादृशा हि दानवाः स्थिराः शिवार्चने सदा(असदा) ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = सुतोऽस्य कालनामको बभूव कृष्णमर्दितुम् ।;सदैव कालकाङ्क्षणात् स यावनाभिषेचितः ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = तवैव शिष्य एष चातिभक्तिमान् हि शङ्करे ।;प्रभूतसेनया युतो बलोद्धतश्च सर्वदा ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = तमेष यामि शासनात् तवोपनीय सत्वरम् ।;विकृष्णकं क्षितेस्तलं विधाय संरमामहे ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = ततश्च रुक्मिणीं वयं प्रदापयाम चेदिपे ।;विनाश्य देवपक्षिणो यथेष्टमास्म सर्वदा ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितो जरासुतो बभूव दुर्मना भृशम् ।;किरीटमण्डितं शिरश्चकार चाऽश्ववाग् भृशम् ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = करं करेण पीडयन् निशाम्य चाऽत्मनो भुजौ ।;जगाद कार्यसिद्धये कथं प्रयाचये परम् ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = सुदुर्गकार्यसन्ततिं ह्यगुः स्म मद्भुजाश्रयाः ।;समस्तभूतळे नृपाः स चाहमेष मागधः ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = कदाऽप्यचीर्णमद्य तत् कथं करोमि केवलम् ।;गिरीशपादसंश्रयः प्रभुः समस्तभूभृताम् ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः स सौभराड् जगाद वाक्यमुत्तमम् ।;भवानपि स्म मुह्यते किमस्मदादयः प्रभो ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = स्वशिष्यकैः कृतं तु यत् किमन्यसाधितं भवेत् ।;स्वशिष्यदासवर्गकैः समर्थयन्ति भूभुजः ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = कुठारसम्मितो ह्यसौ तवैव यावनेश्वरः ।;विना भवद्बलं क्वचित् प्रवर्तितुं नहि क्षमः ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = वरो हि कृष्णमर्दने वृतोऽस्य केवलः शिवात् ।;तदन्यशत्रुपीडनात् त्वमेव तस्य रक्षकः ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = स कालयावनोऽथ तं जरासुतान्तिकागतम् ।;निशम्य भक्तिपूर्वकं प्रणम्य चाऽर्चयद् द्रुतम् ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = स यादवान् हनिष्यति प्रभङ्गतस्तु कोपतः (कोपितः) ।;पुरा जयाशया हि नौ यदून् न जघ्निवानसौ ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = निराशकोऽद्य यादवानपि स्म पीडयिष्यति ।;अतः समुद्रमध्यगापुरीविधानमद्य मे ।;प्ररोचते निधानमप्यमुत्र सर्वसात्त्वताम् ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = उदीर्य चैवमीश्वरोऽस्मरत् सुरेशवर्धकिम् ।;स भौवनः समागतः कुशस्थलीं विनिर्ममे ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = निरम्बुके तु सागरे जनार्दनाज्ञया कृते ।;महोदकस्य मध्यतश्चकार तां पुरीं शुभाम् ।;द्विषट्कयोजनायतां पयोब्धिमध्यगोपमाम् ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = सम्स्तमाधुरान् प्रभुः कुशस्थलीस्थितान् क्षणात् ।;विधाय बाहुयोधकः स यावनं समभ्ययात् ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तशक्तिरप्यजः सुनीतिदृष्टये नृणाम् ।;व्यवासयन्निजान् जनान् स लीलयैव केवलम् ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = अनाद्यनन्तकालकं समस्तलोकमण्डलम् ।;यदीक्षयैव रक्ष्यते किमस्य वृष्णिरक्षणम् ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = निरायुधं च मामयं वराच्छिवस्य न क्षमः ।;समस्तसेनया युतोऽपि योद्धुमित्यदर्शयत् ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = स कृष्णपन्नगं घटे निधाय केशवोऽर्पयत् ।;निरायुधोऽप्यहं क्षमो निहन्तुमप्रियानिति ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = घटं पिपीलिकागणैः प्रपूर्य यावनोऽस्य च ।;बहुत्वतो विजेष्य इत्यहिं मृतं व्यदर्शयत् ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = किमत्र सत्यमित्यहं प्रदर्शयिष्य इत्यजः ।;उदीर्य दूतमभ्ययात् स यावनं प्रबाधितुम् ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = स बाहुनैव केशवो विजित्य यावनं प्रभुः ।;निहत्य सर्वसैनिकान् स्वमस्य यापयत् पुरीम् ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = सहास्त्रशस्त्रसञ्चयान् सृजन्तमाशु यावनम् ।;न्यपातयद् रथोत्तमात् तलेन केशवोऽरिहा ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = विवाहनं निरायुधं विधाय बाहुना क्षणात् ।;विमूर्च्छितं नचाहनत् सुरार्थितं स्मरन् हरिः ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = पुरा हि यौवनाश्वजे वरप्रदाः सुरेश्वराः ।;ययाचिरे जनार्दनं वरं वरप्रदेश्वरम् ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = अनर्थको वरोऽमुना वृतोऽपि सार्थको भवेत् ।;अरिं भविष्ययावनं दहत्वयं तवेश्वर ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽस्त्विति प्रभाषितं स्ववाक्यमेव केशवः ।;ऋतं विधातुमभ्ययात् स यौवनाश्वजान्तिकम् ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = ससञ्ज्ञकोऽथ यावनो धरातलात् समुत्थितः ।;निपात्य यान्तमीश्वरं स पृष्ठतोऽन्वयात् क्रुधा ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = हरिर्गुहां नृपस्य तु प्रविश्य संव्यवस्थितः ।;स यावनः पदाऽहनन्नृपं स तं ददर्श ह ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = स तस्य दृष्टिमात्रतो बभूव भस्मसात् क्षणात् ।;स एव विष्णुरव्ययो ददाह तं हि वह्निवत् ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = वराच्छिवस्य दैवतैरवध्यदानवान् पुरा ।;हरेर्वरान्निहत्य स प्रपेद आश्विमं वरम् ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = सुदीर्घसुप्तिमात्मनः प्रसुप्तिभङ्गकृत्क्षयम् ।;स्वदृष्टिमात्रतस्ततो हतः स यावनस्तदा ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = अतश्च पुण्यमाप्तवान् सुरप्रसादतोऽक्षयम् ।;स यौवनाश्वजो नृपो न देवतोषणं वृथा ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = ततो हरिं निरीक्ष्य स स्तुतिं विधाय चोत्तमाम् ।;हरेरनुज्ञया तपश्चचार मुक्तिमाप च ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = ततो गुहामुखाद्धरिर्विनिस्सृतो जरासुतम् ।;समस्तभूपसंवृतं(संयुतं) जिगाय बाहुनेश्वरः ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = तलेन मुष्टिभिस्तथा महीरुहैश्च चूर्णिताः ।;निपेतुरस्य सैनिकाः स्वयं च मूर्च्छितोऽपतत् ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = ससाल्वपौण्ड्रचेदिपान् निपात्य सर्वभूभुजः ।;स पुप्लुवे जनार्दनः क्षणेन तां कुशस्थलीम् ॥ १३८॥ | |||
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| verse_lines = ससञ्ज्ञकाः समुत्थितास्ततो नृपाः पुनर्ययुः ।;जिगीषवोऽथ रुक्मिणीं विधाय(प्रदाय) चेदिपे हरिम् ॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = समस्तराजमण्डले विनिश्चयादुपागते ।;सभीष्मके च रुक्मिणि प्रदातुमुद्यते मुदा(तदा) ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = समस्तलोकयोषितां वरा विदर्भनन्दना ।;द्विजोत्तमं हरेः पदोः सकाशमाश्वयापयत् ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = निशम्य तद्वचो हरिः क्षणाद् विदर्भकानगात् ।;तमन्वयाद्धलायुधः समस्तयादवैः सह ॥ १४२॥ | |||
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| verse_lines = समस्तराजमण्डलं प्रयान्तमीक्ष्य केशवम् ।;सुयत्तमात्तकार्मुकं बभूव कन्यकावने ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = पुरा प्रदानतः सुरेक्षणच्छलाद् बहिर्गताम् ।;रथे न्यवेशयद्धरिः प्रपश्यतां च भूभृताम् ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = पुनर्गृहीतकार्मुकान् हरिं प्रयातुमुद्यतान् ।;न्यवारयद्धलायुधो बलाद् बलोर्जिताग्रणीः ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = तदा सितः शिरोरुहो हरेर्हलायुधस्थितः ।;प्रकाशमाविशद् बलं विजेतुमत्र मागधम् ॥ १४७॥ | |||
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| verse_lines = स तस्य मागधो रणे गदानिपातचूर्णितः ।;पपात भूतले बलो विजित्य तं ययौ पुरीम् ॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = समस्तराजसन्निधावयादवीं महीमहम् ।;करिष्य इत्युदीर्य स व्यधात् तपोऽतिदुश्चरम् ॥ १६५॥ | |||
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| verse_lines = अथो विवेश केशवः पुरीं कुशस्थलीं विभुः ।;प्रियायुतोऽब्जजादिभिः समीडितः सुरेश्वरैः ॥ १६६॥ | |||
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| verse_lines = पुरा ततो हलायुधः प्रियां निजां पुराऽपि हि ।;स वारुणीसमाह्वयामवाप रैवतीं विभुः ॥ १६७॥ | |||
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| verse_lines = पतिं यथाऽनुरूपिणं तदीयमेव पूर्वकम् ।;पिता तदीय ऐच्छत प्रवेत्तुमब्जसम्भवात् ॥ १६८॥ | |||
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| verse_lines = स तत्सदो गतो वरात् तदीयतः प्रगीतिकाम् ।;निशम्य नाविदद् गतं युगोरुकालपर्ययम् ॥ १६९॥ | |||
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| verse_lines = नरानयोग्यगीतिका विमोहयेत् ततो नृपः ।;सुमूढबुद्धिरन्ततोऽल्पकाल इत्यमन्यत ॥ १७०॥ | |||
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| verse_lines = स मूर्च्छितः प्रबोधितोऽब्जजेन तं त्वपृच्छत ।;सुतापतिं बलं च सोऽब्रवीद् युगात्यये बहौ ॥ १७१॥ | |||
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| verse_lines = स रैवतो बलाय तां प्रदाय गन्धमादनम् ।;गतोऽत्र चीर्णसत्तपा अवाप केशवान्तिकम् ॥ १७२॥ | |||
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| verse_lines = बलोऽपि तां पुरातनप्रमाणसम्मितां विभुः ।;हलेन चाऽज्ञया समां चकार सत्यवाञ्छितः ॥ १७३॥ | |||
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| verse_lines = तया रतः सुतावुभौ शठोल्मुकाभिधावधात् ।;पुराऽर्यमांशकौ सुरावुदारचेष्टितो बलः ॥ १७४॥ | |||
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| verse_lines = जनार्दनश्च रुग्मिणीकरं शुभे दिनेऽग्रहीत् ।;महोत्सवस्तदाऽभवत् कुशस्थलीनिवासिनाम् ॥ १७५॥ | |||
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| verse_lines = चतुर्मुखेशपूर्वकाः सुरा वियत्यवस्थिताः ।;प्रतुष्टुवुर्जनार्दनं रमासमेतमव्ययम् ॥ १७६॥ | |||
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| verse_lines = मुनीन्द्रदेवगायनादयोऽपि यादवैः सह ।;विचेरुरुत्तमोत्सवे रमारमेशयोगिनि ॥ १७७॥ | |||
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| verse_lines = सुरांशकाश्च ये नृपाः समाहुता महोत्सवे ।;सपाण्डवाः समाययुर्हरिं रमासमायुतम् ॥ १७८॥ | |||
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| verse_lines = समस्तलोकसुन्दरौ युतौ रमारमेश्वरौ ।;समीक्ष्य मोदमाययुः समस्तलोकसज्जनाः ॥ १७९॥ | |||
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| verse_lines = तया रमन् जनार्दनो वियोगशून्यया सदा ।;अधत्त पुत्रमुत्तमं मनोभवं पुरातनम् ॥ १८०॥ | |||
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| verse_lines = चतुस्तनोर्हरेः प्रभोस्तृतीयरूपसंयुतः ।;ततस्तदाह्वयोऽभवत् स रुग्मिणीसुतो बली ॥ १८१॥ | |||
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| verse_lines = पुरैव मृत्यवेऽवदत् तमेव शम्बरस्य ह ।;प्रजातमब्जजाङ्कजस्तवान्तकोऽयमित्यपि ॥ १८२॥ | |||
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| verse_lines = स मायया हरेः सुतं प्रगृह्य सूतिकागृहात् ।;अवाक्षिपन्महोदधावुपेक्षितोऽरिपाणिना ॥ १८३॥ | |||
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| verse_lines = तमग्रसज्जलेचरः स दाशहस्तमागतः ।;कुमारमस्य तूदरे निरीक्ष्य शम्बरे ददुः ॥ १८४॥ | |||
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| verse_lines = विपाट्य मत्स्यकोदरं स शम्बरः कुमारकम् ।;न्यवेदयन्मनोभवप्रियाकरे सुरूपिणम् ॥ १८५॥ | |||
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| verse_lines = अनङ्गतामुपागते पुरा हरेण साऽङ्गजे ।;वशं विरिञ्चशापतो जगाम शम्बरस्य हि ॥ १८६॥ | |||
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| verse_lines = पुरा हि पञ्चभर्तृकां निशम्य कञ्जजोदिताम् ।;जहास पार्षतात्मजां शशाप तां ततस्त्वजः ॥ १८७॥ | |||
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| verse_lines = भवासुरेण दूषितेति सा ततो हि मायया ।;पिधाय तां निजां तनुं जगाम चान्ययाऽसुरम् ॥ १८८॥ | |||
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| verse_lines = गृहेऽपि साऽऽसुरे स्थिता निजस्वरूपतोऽसुरम् ।;न गच्छति स्म सा पतिं निजं समीक्ष्य हर्षिता ॥ १८९॥ | |||
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| verse_lines = रसायनैः कुमारकं व्यवर्द्धयद् रतिः पतिम् ।;स पूर्णयौवनोऽभवच्चतुर्भिरेव वत्सरैः ॥ १९०॥ | |||
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| verse_lines = पतिं सुपूर्णयौवनं निरीक्ष्य तां विषज्जतीम् ।;उवाच कार्ष्णिरम्ब ते कुचेष्टितं कथं न्विति ॥ १९१॥ | |||
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| verse_lines = जगाद साऽखिलं पतौ तदस्य(तदास्य) जन्म चाऽगतिम् ।;ततोऽग्रहीत् स तां प्रियां रतिं रमापतेः सुतः ॥ १९२॥ | |||
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| verse_lines = ददौ च मन्त्रमुत्तमं समस्तमायिनाशकम् ।;भृगूत्थरामदैवतं रतिर्हरेः सुताय सा ॥ १९३॥ | |||
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| verse_lines = ततः स्वदारधर्षकं समाह्वयद् युधेऽङ्गजः ।;स शम्बरं स चैत्य तं युयोध शक्तितो बली ॥ १९४॥ | |||
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| verse_lines = स चर्मखड्गधारिणं वरास्त्रशस्त्रपादपैः ।;यदा न योद्धुमाशकद्धरेः सुतं न दृश्यते ॥ १९५॥ | |||
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| verse_lines = स विद्यया विनाशितोरुमाय आशु शम्बरः ।;निकृत्तकन्धरोऽपतद् वरासिनाऽमुना क्षणात् ॥ १९७॥ | |||
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| verse_lines = स रुग्मिणीजनार्दनादिभिः सरामयादवैः ।;पितामहेन चाऽदरात् सुलालितोऽवसत् सुखम् ॥ २००॥ | |||
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| verse_lines = तदा स सत्रजिद्धरिं शशंस सोदरान्तकम् ।;उपांशु वर्त्मना ततो हरिः सयादवो ययौ ॥ २०४॥ | |||
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| verse_lines = वने स सिंहसूदितं पदैः प्रदर्श्य वृष्णिनाम् ।;प्रसेनमृक्षपातितं स सिंहमप्यदर्शयत् ॥ २०५॥ | |||
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| verse_lines = ततो निधाय तान् बिलं स जाम्बवत्परिग्रहम् ।;विवेश तत्र संयुगं बभूव तेन चेशितुः ॥ २०६॥ | |||
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| verse_lines = गुहाप्रविष्टमीश्वरं बहून्यहान्यनिर्गतम् ।;प्रतीक्ष्य यादवास्तु ये गता गृहं तदाऽहृषुः ॥ २१३॥ | |||
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| verse_lines = समस्तवृष्णिसन्निधौ यदूत्तमः स्यमन्तकम् ।;ददौ च सत्रजित्करे स विच्छविर्बभूव ह ॥ २१४॥ | |||
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| verse_lines = स दुर्यशो रमापतावनूच्य मिथ्यया तपन् ।;स्वपापहान(नि)काङ्क्षया ददौ सुतां जनार्दने ॥ २१५॥ | |||
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| verse_lines = मणिं च तं प्रदाय तं ननाम ह क्षमापयन् ।;मणिं पुनर्ददौ हरिर्मुमोद सत्यभामया ॥ २१६॥ | |||
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| verse_lines = रमैव सा हि भूरिति द्वितीयमूर्तिरुत्तमा ।;बभूव सत्रजित्सुता समस्तलोकसुन्दरी ॥ २१७॥ | |||
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| verse_lines = ततो हि सा च रुगक्मिणी प्रिये प्रियासु तेऽधिकम् ।;जनार्दनस्य ते हरेः सदाऽवियोगिनी यतः ॥ २१८॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽप साम्बनामकं सुतं च रोहिणी हरेः ।;चतुर्मुखांशसंयुतं कुमारमेव षण्मुखम् ॥ २१९॥ | |||
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| verse_lines = इति प्रशासति प्रभौ जगज्जनार्दनेऽखिलम् ।;अगण्यसद्गुणार्णवे कदाचिदाययौ द्विजः ॥ २२०॥ | |||
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| verse_lines = जनार्दनः स नामतो रमेशपादसंश्रयः ।;स मानितश्च विष्णुना प्रणम्य वाक्यमब्रवीत् ॥ २२१॥ | |||
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| verse_lines = क्षमस्व मे वचः प्रभो ब्रवीम्यतीव (पातकम्)पापकम् ।;यतः सुपापदूतकस्ततो हि तादृशं वचः ॥ २२२॥ | |||
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| verse_lines = न तेऽस्त्यगोचरं क्वचित् तथाऽपि चाऽज्ञया वदे ।;वदेति चोदितोऽमुना द्विजो जगाद माधवम् ॥ २२३॥ | |||
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| verse_lines = सुतौ हि साल्वभूपतेर्बभूवतुः शिवाश्रयौ ।;शिवप्रसादसम्भवौ पितुस्तपोबलेन तौ ॥ २२४॥ | |||
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| verse_lines = अजेयतामवध्यतां (अजेयवध्यतां) च तौ शिवाद् वरं समापतुः ।;जरासुतस्य शिष्यकौ तपोबलेन केवलम् ॥ २२५॥ | |||
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| verse_lines = महोदरं च कुण्डधारिणं च भूतकावुभौ ।;तथाऽजिताववध्यकौ दिदेश शङ्करस्तयोः ॥ २२६॥ | |||
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| verse_lines = तयोः सहाय एव तौ वराच्छिवस्य भूतकौ ।;अजेयतामवापतुर्न चान्यथाऽमरावपि ॥ २२७॥ | |||
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| verse_lines = अजेयतामवध्यतामवाप्य तावुभौ शिवात् ।;पितुस्तु राजसूयितां समिच्छतो मदोद्धतौ(महोद्धतौ) ॥ २२८॥ | |||
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| verse_lines = जरासुतो गुरुत्वतो विरोद्धुमत्र नेच्छति ।;नृपांस्तु देवपक्षिणो विजित्य कर्तुमिच्छतः ॥ २२९॥ | |||
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| verse_lines = स्वयं हि राजसूयितां जरासुतो न मन्यते ।;यतो हि वैष्णवं क्रतुं तमाहुरीश वैदिकाः ॥ २३०॥ | |||
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| verse_lines = इमौ पितुर्यशोऽर्थिनौ पराभवाय ते तथा ।;समिच्छतोऽद्य(समिच्छतोऽच्युतक्रतुं) तं क्रतुं भवन्तमूचतुश्च तौ ॥ २३१॥ | |||
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| verse_lines = समुद्रसंश्रयो भवान् बहून् प्रगृह्य लावणान् ।;सुभारकानुपैहि नाविति क्षमस्व मे वचः ॥ २३२॥ | |||
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| verse_lines = इतीर्य तं ननाम स प्र चाहसन् स्म यादवाः ।;हरिस्तु सात्यकिं वचो जगाद मेघनिस्वनः ॥ २३३॥ | |||
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| verse_lines = प्रयाहि सात्यके वचो ब्रवीहि मे नृपाधमौ ।;समेत्य वां वरायुधैः करं ददान्यसंशयम् ॥ २३४॥ | |||
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| verse_lines = उपैतमाशु संयुगार्थिनौ च पुष्करं प्रति ।;इतीरितः शिनेः सुतो जगाम विप्रसंयुतः ॥ २३५॥ | |||
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| verse_lines = उपेत्य तौ हरेर्वचो जगाद सात्यकिर्बली ।;विधाय तौ तृणोपमौ गिरा जगाम केशवम् ॥ २३६॥ | |||
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| verse_lines = ततः पुरैव तावुभौ द्विजं हरस्वरूपिणम् ।;सुदुःखवासनामकं प्रचक्रतुस्तृणोपमम् ॥ २३७॥ | |||
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| verse_lines = दशत्रिकैः शतैर्वृतो यतीश्वरैः स सर्ववित् ।;विपाटितात्मकौपिनादिसर्वमात्रकोऽभवत् ॥ २३८॥ | |||
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| verse_lines = वरात् स्वसम्भवादसौ न शापशक्तिमानभूत् ।;ततः समस्तभञ्जनोरुशक्तिमाप केशवम् ॥ २३९॥ | |||
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| verse_lines = स तान् समर्च्य माधवः प्रदाय चोरुमात्रकाः ।;ययौ च तैः समन्वितो वधाय साल्वपुत्रयोः ॥ २४०॥ | |||
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| verse_lines = तमत्रिजं हरात्मकं यतो हि वेद मागधः ।;ततोऽत्यजत् स्वशिष्यकौ निशम्य तत्प्रतीपकौ ॥ २४१॥ | |||
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| verse_lines = हरौ तु पुष्करं गते मुनीश्वरैः समर्चिते ।;समीयतुश्च तावुभावथात्र हंसडीभकौ ॥ २४२॥ | |||
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| verse_lines = स ब्रह्मदत्तनामकोऽत्र तत्पिताऽप्युपाययौ ।;समागतौ च भूतकौ शिवस्य यौ पुरस्सरौ ॥ २४३॥ | |||
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| verse_lines = विचक्रनामकोऽसुरः पुरा विरिञ्चतो वरम् ।;अवध्यतामजेयतामवाप्य बाधते सुरान् ॥ २४४॥ | |||
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| verse_lines = स चाभवत् तयोः सखा सहायकाम्ययाऽगमत् ।;हिडिम्बराक्षसोऽपि यः पुराऽऽप शङ्कराद् वरम् ॥ २४५॥ | |||
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| verse_lines = न जीयसे न वध्यसे कुतश्चनेति तोषितात् (तोषणात्)।;स चैतयोः सखाऽभवत् समाजगाम तत्र च ॥ २४६॥ | |||
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| verse_lines = पुरा स चण्डको गणो हरेर्निवेदिताशनः ।;समाह्वयद् रणाय वै तयोः स तातमेव हि ॥ २५१॥ | |||
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| verse_lines = हरिर्विचक्रमोजसा महास्त्रशस्त्रवर्षिणम् ।;विवाहनं निरायुधं क्षणाच्चकार सायकैः ॥ २५३॥ | |||
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| verse_lines = प्रसूनवर्षिभिः स्तुतश्चतुर्मुखादिभिः प्रभुः ।;ससार तौ हरानुगौ प्रभक्षकौ(प्रभञ्जकौ) स सात्त्वताम् ॥ २५५॥ | |||
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| verse_lines = उभौ हि बाहुषालिनावयुद्ध्यतां च मुष्टिभिः ।;चिरं प्रयुद्ध्य तं बलोऽग्रहीत् स जङ्घयोर्विभुः ॥ २६२॥ | |||
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| verse_lines = अथैनमुद्धृतं बलाद् बलः स दूरमाक्षिपत् ।;पपात पादयोजने स नाऽजगाम तं पुनः ॥ २६३॥ | |||
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| verse_lines = विहाय सैनिकांश्च तौ नृपौ ययौ वनाय सः ।;निहत्य तस्य राक्षसान् हलायुधो ननाद ह ॥ २६४॥ | |||
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| verse_lines = गदस्तु साल्वभूभृता वयोगतेन योधयन् ।;विवाहनं निरायुधं चकार सोऽप्यपाद्रवत् ॥ २६५॥ | |||
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| verse_lines = सुतेन तस्य कन्यसा युयोध सात्यकी रथी ।;वरास्त्रशस्त्रयोधिनौ विजह्रतुश्च तावुभौ ॥ २६६॥ | |||
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| verse_lines = चिरं प्रयुद्ध्य सात्यकिः स हंसकन्यसा बली ।;शतं सपञ्चकं रणे चकर्त तस्य धन्विनाम् ॥ २६७॥ | |||
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| verse_lines = स खड्गचर्मभृद् रणेऽभ्ययात् सुतात्मजं शिनेः ।;स चैनमभ्ययात् तथा वरासिचर्मभृद् विभीः ॥ २६८॥ | |||
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| verse_lines = द्विषोडशप्रभेदकं वरासियुद्धमश्रमौ ।;प्रदर्श्य निर्विशेषकावुभौ व्यवस्थितौ चिरम् ॥ २६९॥ | |||
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| verse_lines = परस्परान्तरैषिणौ(अन्तरेषिणौ) नचान्तरं व्यपश्यताम् ।;ततो विहाय सङ्गरं गतौ निरर्थकं त्विति ॥ २७०॥ | |||
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| verse_lines = ततः स हंससंयुतो जगाम योद्धुमच्युतम् ।;क्षणेन तौ निरायुधौ चकार केशवः शरैः ॥ २७१॥ | |||
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| verse_lines = हतं च सैन्यमेतयोश्चतुर्थभागशेषितम् ।;क्षणेन केशवेन तद्भयादपेयतुश्च तौ ॥ २७२॥ | |||
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| verse_lines = स पुष्करेक्षणस्तदा सुरैर्नुतोऽथ पुष्करे ।;उवास तां निशां प्रभुः सयादवोऽमितप्रभः ॥ २७३॥ | |||
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| verse_lines = परे दिने जनार्दनो नृपात्मजौ प्रविद्रुतौ ।;यमस्वसुस्तटे प्रभुः समाससाद पृष्ठतः ॥ २७४॥ | |||
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| verse_lines = स रौहिणेयसंयुतः समन्वितश्च सेनया ।;स्वशिष्टसेनया वृतौ पलायिनाववारयत् ॥ २७५॥ | |||
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| verse_lines = निवृत्य तौ स्वसेनया शरोत्तमैर्ववर्षतुः ।;सुकोपितौ समस्तशो यदूनवार्यपौरुषौ ॥ २७६॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽससाद हंसको हलायुधं महाधनुः ।;अनन्तरोऽस्य सात्यकिं गदं च सर्वसैनिकान् ॥ २७७॥ | |||
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| verse_lines = स सात्यकिं निरायुधं विवाहनं विवर्मकम् ।;व्यधाद् गदं च तौ रणं विहाय हापजग्मतुः ॥ २७८॥ | |||
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| verse_lines = विधूय सैनिकांश्च स प्रगृह्य चापमाततम् ।;हरिं जगाम चोन्नदन् महास्त्रशस्त्रवर्षणः ॥ २७९॥ | |||
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| verse_lines = तमाशु केशवोऽरिहा समस्तसाधनोज्झितम् ।;क्षणाच्चकार सोऽप्यगाद् विसृज्य तं हलायुधम् ॥ २८०॥ | |||
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| verse_lines = हलायुधो निरायुधं विधाय हंसमोजसा ।;विकृष्टचाप आगतं ददर्श तस्य चानुजम् ॥ २८१॥ | |||
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| verse_lines = स हंस आशु कार्मुकं पुनः प्रगृह्य तं बलम् ।;यदाऽऽससाद केशवो न्यवारयत् तमोजसा ॥ २८२॥ | |||
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| verse_lines = शिनेः सुतात्मजोऽप्यसौ विहाय हंसकानुजम् ।;रथान्तरं समास्थितो जगाम तातमस्य च ॥ २८३॥ | |||
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| verse_lines = वयोगतः पिता तयोर्युयोध तेन वृष्णिना ।;शरं च कण्ठकूबरे व्यसर्जयत् स सात्यकेः ॥ २८४॥ | |||
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| verse_lines = स सात्यकिर्दृढाहतो जगाम मोहमाशु च ।;सुलब्धसञ्ज्ञ उत्थितः समाददेऽर्द्धचन्द्रकम् ॥ २८५॥ | |||
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| verse_lines = स तेन तच्छिरो बली चकर्त शुक्लमूर्द्धजम् ।;यदम्बयाऽभिकामितं पुरा पपात तत् क्षितौ ॥ २८६॥ | |||
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| verse_lines = नदंश्च सात्यकिर्हरेर्जगाम पार्श्वमुद्धतः ।;बलोऽपि हंसकानुजं युयोध सेनया युतम् ॥ २८७॥ | |||
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| verse_lines = हरिस्तु हंसमुल्बणैः शरैः समर्दयन् बलम् ।;जघान तस्य सर्वशो न कश्चिदत्र शेषितः ॥ २८८॥ | |||
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| verse_lines = स एक एव केशवं महास्त्रमुक् ससार ह ।;निवार्य तानि सर्वशो हरिर्निजास्त्रमाददे ॥ २८९॥ | |||
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| verse_lines = स वैष्णवास्त्रमुद्यतं निरीक्ष्य यानतो महीम् ।;गतः पराद्रवद् भयात् पपात यामुनोदके ॥ २९०॥ | |||
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| verse_lines = वरास्त्रपाणिरीश्वरः पदाऽहनिच्छरस्यमुम् ।;स मूर्छितो मुखेऽपतन्महाभुजङ्गमस्य ह ॥ २९१॥ | |||
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| verse_lines = स धार्तराष्ट्रकोदरे यथा तमोऽन्धमेयिवान् ।;तथा सुदुःखसंयुतो वसन् मनोः परं म्रियेत् ॥ २९२॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽन्धमेव तत् तमो हरेर्द्विडेति निश्चयात् ।;तदाऽस्य चानुजोऽग्रजं विमार्गयन् जलेऽपतत् ॥ २९३॥ | |||
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| verse_lines = विहाय रोहिणीसुतं जले निमज्ज्य मार्गयन् ।;अपश्यमान आत्मनो व्यपाटयच्च काकुदम् ॥ २९४॥ | |||
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| verse_lines = विहाय देहमुल्बणं तमोऽवतीर्य चाग्रजम् ।;प्रतीक्षमाण उल्बणं समत्ति तत् सुखेतरम् ॥ २९५॥ | |||
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| verse_lines = ततो हरिर्बलैर्युतो बलान्वितो मुनीश्वरैः ।;समं कुशस्थलीं ययौ स्तुतः कशङ्करादिभिः ॥ २९६॥ | |||
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| verse_lines = स्वकीयपादपल्लवाश्रयं जनं प्रहर्षयन् ।;उवास नित्यसत्सुखार्णवो रमापतिर्गृहे ॥ २९७॥ | |||
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== अष्टादशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ यदा रामादवाप्तानि दिव्यास्त्राणि प्रपेदिरे ।;द्रोणात् कुमारास्तेष्वासीत् सर्वेष्वप्यधिकोऽर्जुनः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = निजप्रतिभया जानन् सर्वास्त्राणि ततोऽधिकम् ।;नास्त्रयुद्धं क्वचिद् भीमो मन्यते धर्ममञ्जसा ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = न हि भागवतो धर्मो देवताभ्युपयाचनम् ।;ज्ञानभक्ती हरेस्तृप्तिं विना विष्णोरपि क्वचित् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = नाऽकाङ्क्ष्यं किमुतान्येभ्यो ह्यस्त्रं काम्यफलप्रदम् ।;शुद्धे भागवते धर्मे निरतो यद् वृकोदरः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = न काम्यकर्मकृत् तस्मान्नायाचद् देवमानुषान्(दैवमानुषान्) ।;न हरिश्चार्थितस्तेन कदाचित् कामलिप्सया(काम्यलिप्सया) ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = भिक्षामटंश्च हुङ्कारात् करवद् वैश्यतोऽग्रहीत् ।;नान्यदेवा नतास्तेन वासुदेवान्न पूजिताः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = न प्रतीपं हरेः क्वापि स करोति कथञ्चन ।;अनुपस्करिणो युद्धे नाभियाति ह्युपस्करी ।;नापयाति युधः क्वापि न क्वचिच्छद्म चाऽचरेत् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = (न चौर्ध्वदैहिकानुज्ञां) नैवोर्ध्वदैहिकानुज्ञामवैष्णवकृतेऽकरोत् ।;न करोति स्वयं नैषां प्रियमप्याचरेत् क्वचित् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = सख्यं नावैष्णवैश्चक्रे प्रतीपं वैष्णवेन च(तु) ।;परोक्षेऽपि हरेर्निन्दाकृतो जिह्वां छिनत्ति च ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = प्रतीपकारिणो हन्ति विष्णोर्वैतानजीघनत्(विष्णोर्वै तान्) ।;न संशयं कदाऽप्येष धर्मे ज्ञानेऽपि वाऽकरोत् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = विद्योपजीवनं नैष चकाराऽपद्यपि क्वचित् ।;अतो न धर्मनहुषौ प्रत्युवाच कथञ्चन ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = आज्ञयैव हरेर्द्रौणेरस्त्राण्यस्त्रैरशामयत् ।;अदृश्योऽलम्बुसो भग्नो नान्यत्र तु कथञ्चन ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = नह्यस्त्रयुद्धे सदृशो द्रौणेरस्त्यर्जुनादृते ।;सर्ववित्त्वं ततो भीमे प्रदर्शयितुमीश्वरः ।;अदादाज्ञामस्त्रयुद्धे तथैवालम्बुसं प्रति ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्यक्षीभूतदेवेषु बन्धुज्येष्ठेषु वा नतिम् ।;मर्यादास्थितयेऽशासद् भगवान् पुरुषोत्तमः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = तत्रापि विष्णुमेवासौ नमेन्नान्यं कथञ्चन ।;आज्ञयैवास्त्रदेवांश्च प्रेरयामास(प्रेषयामास) नार्थनात् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = अन्वेनमेव तद्धर्मे कृष्णैका संस्थिता सदा ।;धृतराष्ट्रादपि वरं ततो नाऽत्मार्थमग्रहीत् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = नाशपद् धार्तराष्ट्रांश्च महापद्यपि सा ततः ।;न वाचा मनसा वाऽपि प्रतीपं केशवेऽचरत् ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = अन्ये भागवतत्वेऽपि छिन्नधर्माः क्वचित्क्वचित् ।;स्यमन्तकार्थे रामोऽपि कृष्णस्य विमनाऽभवत् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = अवमेनेऽर्जुनः कृष्णं विप्रस्य शिशुरक्षणे ।;प्रद्युम्न उद्धवः साम्बोऽनिरुद्धाद्याश्च सर्वशः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = हरेरिष्टं सुभद्रायाः फल्गुने दानमञ्जसा ।;ज्ञात्वाऽपि रुरुधुः सम्यक् सात्यकिः कृष्णसम्मितम् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = कदाचिन्मन्यते पार्थं धर्मजोऽपि नरं हरिम् ।;मत्वाऽबिभेज्जरासन्धवधे कृष्णमुदीरितुम् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = बन्धनं शङ्कमानो हि कृष्णस्य विदुरोऽपितु ।;कौरवेयसभामध्ये नावतारमरोचयत् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = नकुलः करदानाय प्रेषयामास केशवे ।;अवमेने हरेर्बुद्धिं सहदेवः कुलक्षयात् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = देवकीवसुदेवाद्या मेनिरे मानुषं हरिम् ।;भीष्मस्तु भार्गवं राममवमेने युयोध च ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणकर्णद्रौणिकृपाः कृष्णाभावे मनो दधुः ।;देवाः शिवाद्या अपितु विरोधं चक्रिरे क्वचित् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = ऋषिमानुषगन्धर्वा वक्तव्याः किमतः परम् (परे)।;जन्मजन्मान्तरेऽज्ञानादवजानन्ति यत् सदा ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादेको वायुरेव धर्मे भागवते स्थिरः ।;लक्ष्मीः सरस्वती चेति परशुक्लत्रयं श्रुतम् (स्मृतम्) ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = सर्वमेतच्च कथितं तत्रतत्रामितात्मना ।;व्यासेनैव पुराणेषु भारते च स्वसंविदा ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = यदा ते सर्वशस्त्रास्त्रवेदिनो राजपुत्रकाः ।;बभूवू रङ्गमध्ये तान् भारद्वाजोऽप्यदर्शयत् (व्यदर्शयत्)॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = रक्तचन्दनसत्पुष्पवस्त्रशस्त्रगुडोदनैः ।;सम्पूज्य भार्गवं राममनुजज्ञे कुमारकान् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = ते भीष्मद्रोणविदुरगान्धारीधृतराष्ट्रकान् ।;सराजमण्डलान् नत्वा कुन्तीं चादर्शयञ्छ्रमम् ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = सर्वैः प्रदर्शितेऽस्त्रे तु द्रोणादात्तमहास्त्रवित् ।;द्रौणिरस्त्राण्यमेयानि दर्शयामास चाधिकम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽप्यतितरां पार्थो दिव्यास्त्राणि व्यदर्शयत् (दिव्यास्त्राण्यप्यदर्शयत्)।;अविध्यन्माशके पादे पक्षिणः पक्ष्म एव च(पक्ष्ममेव च) ।;एवमादीनि चित्राणि बहून्येष व्यदर्शयत् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = तदैव कर्ण आगत्य रामोपात्तास्त्रसम्पदम् ।;दर्शयन्नधिकः पार्थादभूद् राजन्यसंसदि ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = कुन्ती निजं सुतं(निजसुतं) ज्ञात्वा लज्जया नावदच्च तम् ।;पार्थोऽसहंस्तं युद्धायैवाऽह्वयामास संसदि ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = रणायाक्षत्रियाह्वानं जानन् धर्मप्रतीपकम् ।;भीमो निवार्य बीभत्सुं कर्णायादात् प्रतोदकम् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = अक्षत्रसंस्कारयुतो जातोऽपि क्षत्रिये कुले ।;न क्षत्रियो हि भवति यथा व्रात्यो द्विजोत्तमः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = निरुत्तरे कृते कर्णे भीमेनैव सुयोधनः ।;अभ्यषेचयदङ्गेषु राजानं पित्रनुज्ञया ।;धृतराष्ट्रः पक्षपातात् पुत्रस्यानुवशोऽभवत् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = अभिषिक्ते तदा कर्णे प्रायादधिरथः पिता ।;सर्वराजसदोमध्ये(सभामध्ये) ववन्दे तं वृषा तदा ।;तुतुषुः कर्मणा तस्य सन्तः सर्वे समागताः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = भीमदुर्योधनौ तत्र शिक्षासन्दर्शनच्छलात् ।;समादाय गदे गुर्वी संरम्भादभ्युदीयतुः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = देवासुरमनुष्यादि जगदेतच्चराचरम् ।;सर्वं तदा द्विधा भूतं भीमदुर्योधनाश्रयात् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = देवा देवानुकूलाश्च भीममेव समाश्रिताः ।;असुरा आसुराश्चैव दुर्योधनसमाश्रयाः ।;द्विधाभूता मानुषाश्च(मनुष्याश्च) देवासुरविभेदतः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = जय भीम महाबाहो जय दुर्योधनेति च ।;हुङ्कारांश्चैव फट्कारांश्चक्रुर्देवासुरा अपि ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा जगत् सुसंरब्धं द्रोणोऽथ द्विजसत्तमः ।;नेदं जगद् विनश्येत भीमदुर्योधनाश्रयात् ।;इति पुत्रेण तौ वीरौ न्यवारयदरिन्दमौ ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = स्वकीयायां स्वकीयायां योग्यतायां नतु क्वचित् ।;युवयोः सम इत्युक्त्वा द्रौणिरेतौ न्यवारयत् ।;द्रोणाज्ञया वारितौ तौ ययतुः स्वं स्वमालयम् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = सुरासुरान् सुसंरब्धान् कालेन द्रक्ष्यथेति च ।;ब्रह्मा निवार्य ससुरो ययौ सेशः स्वमालयम् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = पार्थेन कर्णो हन्तव्य इत्यासीद् भीमनिश्चयः ।;वैपरीत्येन तस्याऽसीद् दुर्योधनविनिश्चयः ।;तदर्थं नीतिमतुलां चक्रतुस्तावुभावपि ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = तथोत्कर्षे फल्गुनस्य यशसो निजयस्य च ।;उद्योग आसीद् भीमस्य धार्तराष्ट्रस्य चान्यथा ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = भीमार्थं केशवोऽन्ये च देवाः फल्गुनपक्षिणः ।;आसन् यथैव रामाद्याः सङ्ग्रहेण हनूमतः ।;सुराः सुग्रीवपक्षस्थाः पूर्वमासंस्तथैव हि ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = तदर्थमेव भीमस्य ह्यनुजत्वं सुरेश्वरः ।;आप पूर्वानुतापेन तेन भीमस्तथाऽकरोत् ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनार्थं कर्णस्य पक्षिणो दैत्यदानवाः ।;आसुः सर्वे ग्लहावेतावासतुः कर्णफल्गुनौ ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = अथ पृष्टो दक्षिणार्थं(दक्षिणायां) द्रोण आह कुमारकान् ।;बद्ध्वा पाञ्चालराजानं दत्तेत्यूचुस्तथेति ते ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह भीमः सामर्थ्यविवेकाभीप्सया गुरुम् ।;गर्व एष कुमाराणामनिवार्यो द्विजोत्तम ।;गच्छन्त्वेतेऽग्रतो नैषां वशगो द्रुपदो भवेत् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = ते शरैरभिवर्षन्तः परिवार्य कुमारकान् ।;अर्दयामासुरुद्द्वृत्तान् स्त्रियो बालाश्च सर्वशः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = हर्म्यसंस्थाः स्त्रियो बाला ग्रावभिर्मुसलैरपि ।;अत्यर्थमर्दयामासुः कुमारान् सुसुखेधितान् ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = द्रुपदस्य वरो ह्यस्ति सूर्यदत्तस्तपोबलात् ।;आ योजनात् पुरमुप न त्वा जेष्यति कश्चन ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = इति तेन वरेणैव सुखसंवर्द्धिताश्च ते ।;भग्नाः कुमारा आवृत्य दुद्रुवुर्यत्र पाण्डवाः ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रीबालवृद्धसहितैः पाञ्चालैरप्यनुद्रुताः ।;भीमार्जुनेति वाशन्तो ययुर्यत्र स्म पाण्डवाः ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = तान् प्रभग्नान् समालोक्य भीमः प्रहरतां वरः ।;आरुरोह रथं वीरः पुर आत्तशरासनः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = तमन्वयादिन्द्रसूनुः यमौ तस्यैव चक्रयोः ।;युधिष्ठिरस्तु द्रोणेन सह तस्थौ निरीक्षकः ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = आयान्तमग्रतो दृष्ट्वा भीममात्तशरासनम् ।;दुद्रुवुः सर्वपाञ्चालाः विविशुः पुरमेव च ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = द्रुपदस्त्वभ्ययाद् भीमं सपुत्रः सारसेनया ।;चक्ररक्षौ तु तस्याऽस्तां युधामन्यूत्तमौजसौ ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = धात्रर्यमावेशयुतौ विश्वावसुपरावसू ।;सुतौ तस्य महावीर्यौ सत्यजित् पृष्ठतोऽभवत् ।;स मित्रांशयुतो वीरश्चित्रसेनो महारथः ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = अग्रतस्तु शिखण्ड्यागाद् रथोदारः शरान् क्षिपन् ।;जनमेजयस्तमन्वेव पूर्वं चित्ररथो हि यः ।;त्वष्टुरावेशसंयुक्तः स शरानभ्यवर्षत ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = तावुभौ विरथौ कृत्वा विचापौ च विवर्मकौ ।;भीमो जघान तां सेनां सवाजिरथकुञ्जराम् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = अथैनं शरवर्षेण युधामन्यूत्तमौजसौ ।;अभीयतुस्तौ विरथौ चक्रे भीमो निरायुधौ ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = हस्तप्राप्तं च पाञ्चालं नाग्रहीत् स वृकोदरः ।;गुर्वर्थामर्जुनस्योर्वीं प्रतिज्ञां कर्तुमप्यृताम् ।;मानभङ्गाय कर्णस्य पार्थमेव न्ययोजयत् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = स शरान् क्षिपतस्तस्य पाञ्चालस्यार्जुनो द्रुतम् ।;पुप्लुवे स्यन्दने चापं छित्वा तं चाग्रहीत् क्षणात् ।;सिंहो मृगमिवाऽदाय स्वरथं नाभिपेदिवान् (स्वरथे चाभिपेतिवान्) ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = अथ प्रकुपितं सैन्यं फल्गुनं पर्यवारयत् ।;जघान भीमस्तरसा तत् सैन्यं शरवृष्टिभिः ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = अथ सत्यजिदभ्यागात् पार्थं मुञ्चञ्छरान् बहून् ।;तमर्जुनः क्षणेनैव चक्रे विरथकार्मुकम् ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = घ्नन्तं भीमं पुनः सैन्यमर्जुनः प्राह मा भवान् ।;सेनामर्हति राज्ञोऽस्य वीर हन्तुमशेषतः ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = सम्बन्धयोग्यस्तातस्य सखाऽयं न सुधार्मिकः ।;नेष्याम एनमेवातो गुरोर्वचनगौरवात् ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = स्नेहपाशं ततश्चक्रे बीभत्सौ द्रुपदोऽधिकम् ।;ततः सेनां विहायैव भीमो बीभत्सुमन्वयात् ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = मुक्ता कथञ्चिद् भीमास्यात् सा सेना दुद्रुवे भयात् ।;द्रुपदं स्थापयामासाथार्जुनो द्रोणसन्निधौ ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = पप्रच्छैनं तदा द्रोणसख्यमस्त्युत नेति वा ।;अस्तीदानीमिति प्राह द्रुपदोऽङ्गिरसां वरम् ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह द्रुपदं द्रोणः सख्यमिच्छेऽक्षयं तव ।;नह्यराज्ञो भवेत् सख्यं तवेतीदं कृतं मया ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = न विप्रधर्मो यद् युद्धमतस्त्वं न मया धृतः ।;शिष्यैरेतत् कारितं मे तव सख्यमभीप्सता ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = अतः सख्यार्थमेवाद्य त्वद्राज्यार्धो हृतो मया ।;गङ्गाया दक्षिणे कूले त्वं राजैवोत्तरे त्वहम् ।;न ह्यराजत्व एकस्य सख्यं स्यादावयोः सखे ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त्वोन्मुच्य तं द्रोणो राज्यार्धं गृह्य चामुतः ।;ययौ शिष्यैर्नागपुरं न्यवसत् सुखमत्र च ।;ब्राह्मण्यत्यागभीरुः स नागृह्णन् धनुरप्यसौ ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = धार्तराष्ट्रैस्तु भीमस्य भयात् पादौ प्रणम्य च ।;शरणार्थं याचितत्वात् सपुत्रो युयुधे परैः ।;एवं हरीच्छयैवासौ क्षात्रं(क्षत्रधर्मम्) धर्ममुपेयिवान् ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = द्रुपदस्तु दिवारात्रं तप्यमानः पराभवात् ।;भीमार्जुनबलं दृष्ट्वा चेच्छन्(चैच्छत्) पाण्डवसंश्रयम् ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = सम्बन्धीत्यर्जुनवचश्चिकीर्षुः सत्यमेव च ।;मार्दवं चार्जुने दृष्ट्वा सुतामैच्छत् तदर्थतः ।;पुत्रं च द्रोणहन्तारमिच्छन् विप्रवरौ ययौ ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = याजोपयाजावानीयाथार्बुदेन गवां नृपः ।;चकारेष्टिं तु तद्भार्या द्विजाभ्यामत्र चाऽहुता ।;द्रुपदात् सुतलब्ध्यर्थं साऽहङ्काराद्(सालङ्कारात्) व्यलम्बयत् ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = किमेतयेत्यवज्ञाय तावुभौ विप्रसत्तमौ ।;अजुह्वतां तत् पुत्रार्थं पत्न्या प्राश्यं हविस्तदा ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = हुते हविषि मन्त्राभ्यां वैष्णवाभ्यां तदैव हि ।;दीप्ताङ्गारनिभो वह्निः कुण्डमद्ध्यात् समुत्थितः ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = किरीटी कुण्डली दीप्तौ हेममाली वरासिमान् ।;रथेनाऽदित्यवर्णेन नदन् द्रुपदमभ्ययात्(द्रुपदमाद्रवत्) ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टत्वाद् द्योतनत्वाच्च धृष्टद्युम्न इतीरितः ।;मुनिभिर्द्रुपदेनापि सर्ववेदार्थतत्त्ववित् ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = अन्वेनं भारती साक्षाद् वेदिमद्ध्यात् समुत्थिता ।;प्राणो हि भरतो नाम सर्वस्य भरणाच्छ्रुतः ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = तद्भार्या भारती नाम वेदरूपा सरस्वती ।;शंरूपमाश्रिता वायुं श्रीरित्येव च कीर्तिता ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = सा कृष्णा नामतश्चाऽसीदुत्कृष्टत्वाद्धि योषिताम् ।;कृष्णा सा वर्णतश्चाऽसीदुत्कृष्टानन्दिनी च सा ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = उत्पत्तितश्च सर्वज्ञा सर्वाभरणभूषिता ।;सम्प्राप्तयौवनैवाऽसीदजरा लोकसुन्दरी ।;उमांशयुक्ताऽतितरां सर्वलक्षणसंयुता ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं ह्युमा च देव्यस्ताः कदाचिद् भर्तृभिर्युताः ।;विलासं दर्शयामासुर्ब्रह्मणः पश्यतोऽधिकम् ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = विचार्य भारतीमेत्य सर्वमस्यै निवेद्य च ।;सहस्रवत्सरं चैनां शुश्रूषित्वा बभाषिरे ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = चतुर्जन्म भवेद् भूमौ त्वां नान्यो मारुताद् व्रजेत् ।;नियमोऽयं हरेर्यस्मादनादिर्नित्य एव च ।;अतस्त्वयैकदेहान्नो नान्य आप्नोति मारुतात् ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते तथेत्युक्त्वा पार्वत्यादियुतैव सा ।;विप्रकन्याऽभवत् तत्र चतस्रः पार्वतीयुताः ।;एकदेहस्थिताश्चक्रुर्गिरीशाय तपो महत् ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = तद्देहस्था भारती तु रुद्रदेहस्थितं हरिम् ।;तोषयामास तपसा कर्मैक्यार्थं धृतव्रता ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = तस्यै स रुद्रदेहस्थो हरिः प्रादाद् वरं प्रभुः ।;अनन्ततोषणं विष्णोः स्वभर्त्रा सह जन्मसु ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेष्वपीति चान्यासां ददौ शङ्कर एव च ।;वरं स्वभर्तृसंयोगं मानुषेष्वपि जन्मसु ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तदैव देहं ता विसृज्य नलनन्दिनी ।;बभूवुरिन्द्रसेनेति देहैक्येन सुसङ्गताः ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = तदाऽऽसीन्मुद्गलो नाम मुनिस्तपसि संस्थितः ।;चकमे पुत्रिकां ब्रह्मेत्यशृणोत् स कथान्तरे ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = अपाहसत् सोऽब्जयोनिं शशापैनं चतुर्मुखः ।;भारत्याद्याः पञ्च देवीर्गच्छ मानिन्नभूतये(मानिन् न भूतये) ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितस्तं तपसा तोषयामास मुद्गलः ।;शापानुग्रहमस्याथ चक्रे कञ्जसमुद्भवः ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = न त्वं यास्यसि ता देवी मारुतस्त्वच्छरीरगः ।;यास्यति त्वं सदा मूर्छां गतो नैव विबुद्ध्यसे ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = नच पापं ततस्ते स्यादित्युक्ते चैनमाविशत् ।;मारुतोऽथेन्द्रसेनां च गृहीत्वाऽथाभवद् गृही ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = रेमे च स तया सार्द्धं दीर्घकालं जगत्प्रभुः ।;ततो मुद्गलमुद्बोध्य ययौ च स्वं निकेतनम् ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = ततो देशान्तरं गत्वा तपश्चक्रे स मुद्गलः ।;सेन्द्रसेना वियुक्ताथ भर्त्रा चक्रे महत् तपः ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = तद्देहगा भारती तु केशवं शङ्करे स्थितम् ।;तोषयामास तपसा कर्मैक्यार्थं हि पूर्ववत् ।;उमाद्या रौद्रमेवात्र तपश्चक्रुर्यथा पुरा ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्यक्षे च शिवे जाते तद्देहस्थे च केशवे ।;पृथक्पृथक् स्वभर्त्राप्त्यै ताः पञ्चाप्येकदेहगाः ।;प्रार्थयामासुरभवत् पञ्चकृत्वो वचो हि तत् ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = शिवदेहस्थितो विष्णुर्भारत्यै तु ददौ पतिम् ।;अन्यासां शिव एवाथ प्रददौ चतुरः पतीन् ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = देव्यश्चतस्रस्तु तदा दत्तमात्रे वरेऽमुना ।;देवानामवतारार्थं पञ्च देव्यः स्म इत्यथ ।;नाजानन्नेकदेहत्वाच्चिद्योगात् क्षीरनीरवत् ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = ताः श्रुत्वा स्वपतिं देवि नचिरात् प्राप्स्यसीति च ।;विष्णूक्तं शङ्करोक्तं च चत्वारः पतयः पृथक् ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = भविष्यन्तीत्यथैकस्या मेनिरे पञ्चभर्तृताम् ।;रुरुदुश्चैकदेहस्था एकैवाहमिति स्थिताः ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = अथाभ्यागान्महेन्द्रोऽत्र सोऽब्रवीत् तां वरस्त्रियम् ।;किमर्थं रोदिषीत्येव साऽब्रवीद् वटुरूपिणम् ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = शङ्करं दर्शयित्वैव पञ्चभर्तृत्वमेष मे ।;वरार्थमर्थितः प्रादादिति तं शिव इत्यथ ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = अजानन् शक्र आहोच्चैः किमेतद् भुवनत्रये ।;मत्पालिते योषितं त्वं वृथा शपसि दुर्मते ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते शिवः प्राह पत मानुष्यमाप्नुहि ।;अस्याश्च भर्ता भवसि त्वामेवैषा वरिष्यति ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = पश्यात्र मदवज्ञानात् पतितांस्त्वादृशान् सुरान् ।;गिरेरधस्तादस्यैवेत्युक्तोऽसौ पाकशासनः ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = उद्बबर्ह गिरिं तं तु ददर्शात्र च तान् सुरान् ।;पूर्वेन्द्रान् मारुतवृषनासत्यांश्चतुरः स्थितान् ।;मानुषेष्ववताराय मन्त्रं रहसि कुर्वतः ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = ततो वरेण्यं वरदं विष्णुं प्राप्य स वासवः ।;तत्प्रसादान्नरांशेन युक्तो भूमावजायत ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = मदवज्ञानिमित्तेन पतिता इति तान् सुरान् ।;मारुतादीन् मृषाऽवादीरिति ब्रह्मा शिवं तदा ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = शशाप मानुषेषु त्वं क्षिप्रं जातः पराभवम् ।;शक्रान्नरतनोर्यासि यस्मै त्वं तु मृषाऽवदः ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = मच्छप्तानां च देवीनामविचार्य मया यतः ।;पतियोगवरं प्रादा नावाप्स्यसि ततः प्रियाम् ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = मानुषेषु ततः पश्चाद् भारतीदेहनिर्गताम् ।;स्वलोके प्राप्स्यसि स्वार्थे वरोऽयं ते मृषा भवेत् ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = एषा सा द्रौपदी नाम पञ्चदेवीतनुर्भवेत् ।;मृषा वाग् येषु ते प्रोक्ता मारुताद्यास्तु तेऽखिलाः ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = तासां पतित्वमाप्स्यन्ति भारत्यैव तु पार्वती ।;संयुक्ता व्यवहारेषु प्रवर्तेत नचान्यथा ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = एते हि मारुताद्यास्ते देवकार्यार्थगौरवात् ।;जाता इति श्रुतिस्तत्र नावज्ञा तेऽत्र कारणम् ।;दीर्घकालं मनुष्येषु ततस्त्वं स्थितिमाप्स्यसि ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = जातमात्मनिहन्तारं भारद्वाजो निशम्य तम् ।;यशोर्थमस्त्राणि ददावग्रहीत् सोऽपि लोभतः ।;रामास्त्राणां दुर्लभत्वात् त्रिदशेष्वपि वीर्यवान् ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = भीमार्जुनाभ्यां बद्धं तं श्रुत्वा पाञ्चालभूपतिम् ।;प्राहिणोत् कृतवर्माणं पाण्डवानां जनार्दनः ।;पाण्डवेष्वतुलां प्रीतिं लोके ख्यापयितुं प्रभुः ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = सन्मान्य(सम्मान्य) पाण्डवान् सोऽपि शूरानुजसुतासुतः ।;तैर्मानितः कृष्णभक्त्या भ्रातृत्वाच्च हरिं ययौ ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = धृतराष्ट्रो बलं दृष्ट्वा (ज्ञात्वा) बहुशो भीमपार्थयोः ।;दैवत्वाच्च स्वभावेन ज्येष्ठत्वाद् धर्मजस्य च ।;सुप्रीत एव तं चक्रे यौवराज्याभिषेकिणम्(यौवराज्येऽभिषेकिणम्) ॥ १५२॥ | |||
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| verse_lines = भीमार्जुनावथो जित्वा सर्वदिक्षु च भूपतीन् ।;चक्रतुः करदान् सर्वान् धृतराष्ट्रस्य दुर्जयौ ॥ १५३॥ | |||
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| verse_lines = तयोः प्रीतोऽभवत् सोऽपि पौरजानपदास्तथा ।;भीष्मद्रोणमुखाः सर्वेऽप्यतिमानुषकर्मणा ॥ १५४॥ | |||
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<span id="gr-C19" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकोनविंशोऽध्यायः"></span> | |||
== एकोनविंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ एवं शुभोच्चगुणवत्सु जनार्दनेन;युक्तेषु पाण्डुषु चरत्स्वधिकं शुभानि ।;नास्तिक्यनीतिमखिलां(नास्तिक्यनीतिमतुलां) गुरुदेवतादि;सत्स्वञ्जसैव जगृहुर्धृतराष्ट्रपुत्राः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = नाम्ना कणिङ्क इति चासुरको द्विजोऽभूत्;शिष्यः सुरेतरगुरोः शकुनेर्गुरुः सः ।;नीतिं स कुत्सिततमां(सुकुत्सिततमाम्) धृतराष्ट्रपुत्रेषु;अधाद् रहो वचनतः शकुनेः समस्ताम् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = छद्मैव यत्र परमं न सुराश्च पूज्याः;स्वार्थेन वञ्चनकृते जगतोऽखिलं च ।;धर्मादिकार्यमपि यस्य महोपाधिः स्याचत्;श्रेष्ठः स एव निखिलासुरदैत्यसङ्घात्(निखिलात् सुरदैत्यसङ्घात्) ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादि कुत्सिततमां(कल्पिततमाम्) जगृहुः स्म विद्याम्;अज्ञात एव धृतराष्ट्रमुखैः समस्तैः ।;तेषां स्वभावबलतो रुचिता च सैव;विस्तारिता च निजबुद्धिबलादतोऽपि ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = सम्पूर्णदुर्मतिरथो धृतराष्ट्रसूनुः;तातप्यमानहृदयो निखिलान्यहानि ।;दृष्ट्वा श्रियं परमिकां विजयं च पार्थेषु;आहेदमेत्य पितरं सह सौबलेन ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = ज्येष्ठस्य तेऽपि हि वयं हृदयप्रजाता;नार्हत्वमेव गमिता भवतैव राज्ये ।;भ्रातुः कनीयस उतापि हि दारजाता;अन्यैश्च राज्यपदवीं भवतैव नीताः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = राज्यं महच्च समवाप्स्यति धर्मसूनुः;त्वत्तोऽथवाऽनुजबलात्(अथ चानुजबलात्) प्रसभं वयं तु ।;दासा भवेम निजतन्तुभिरेव साकं;कुन्तीसुतस्य परतोऽपि तदन्वयस्य ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = नाऽत्मार्थमस्ति मम दुःखमथातिशुद्ध;लोकप्रसिद्धयशसस्तव कीर्तिनाशः ।;अस्मन्निमित्त इति दुःखमतो हि सर्वेऽपि;इच्छाम मर्तुमथ नः कुरु चाप्यनुज्ञाम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = एवं स्वपुत्रवचनं स निशम्य राजा;प्रोवाच नानुगुणमेतदहो मनस्ते ।;को नाम पाण्डुतनयेषु गुणोत्तमेषु;प्रीतिं न याति निजवीर्यभवोच्चयेषु(निजवीर्यभवोच्छ्रयेषु) ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = ते हि स्वबाहुबलतोऽखिलभूपभूतिं;मय्याकृषन्ति नच वः प्रतिषेधकास्ते ।;तस्माच्छमं व्रज शुभाय कुलस्य तात;क्षेमाय नो भवति वो बलवद्विरोधः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = एवं ब्रुवत्यपि नृपे पुनराह पाप;आश्रित्य सौबलमतं यदि नैव पार्थान् ।;अन्यत्र यापयसि(प्रापयसि) नागपुरात् परेतान्;दृष्ट्वाऽखिलानपि हि नो मुदमेहि पार्थैः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = एवं निशम्य गदितं सुतहार्दपाशैः आकृष्यताऽशु स नृपोऽरिधरेच्छयैव ।;प्रोवाच पुत्रमपि ते बलिनो न पार्थाः;शक्याः पुरात् तनय यापयितुं कथञ्चित् ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आह पितरं(नृपतिम्) शकुनिं निरीक्ष्य;सृष्टो मया विधिरिहाद्य शृणुष्व तं च ।;आसंस्त्रयोदश समा नगरं प्रविष्टे-;ष्वेतेषु तावदयमेव विधिर्मयेष्टः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = द्रौणेर्हि नास्ति सदृशो बलवान् प्रतापी;सोऽयं मया बहुविधैः परमैरुपायैः ।;नीतो वशं वशगतोऽस्य च मातुलेन;साकं पिता तमनु चैष नदीप्रसूतः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = एवं हि सैनिकगणा अपि दानमानैः;प्रायो वशं मम गता अपि चैष कर्णः ।;अस्त्रे बलेऽप्यधिक एव सुरेन्द्रसूनोः;जेष्ये च मन्त्रबलतस्त्वहमेव भीमम् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = त्रिंशच्छतं परमकाः सुरदुर्लभाश्च;दुर्वाससो हि मनवोऽद्य मया गृहीताः ।;अन्यत्र ते प्रविहिता नहि वीर्यवन्तः;स्युर्भीम इत्यहममून् न नियोजयामि ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = ते वीर्यदा विजयदा अपि वारिवह्नि;स्तम्भादिदाः सकलदेवनिकायरोधाः ।;वृष्ट्याद्यभीप्सितसमस्तकरा अमूभिः;जेष्यामि भीमममुमेकमयातयामैः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = सौहार्दमेषु यदिवाऽतितरां(यदि वा नितराम्) करोषि;तत्रापि नैव हि मया क्रियते विरोधः ।;वत्स्यन्तु वारणवते भवतु स्म राष्ट्रं;तेषां तदेव मम नागपुरं त्वदर्थे ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = एवं स्वपुत्रपरिपालनतो यशस्ते;भूयाद् विनश्यति परप्रसवातिपुष्टौ ।;जाते बले तव विरोधकृतश्च ते स्युः;स्वार्थं हि तावदनुयान्त्यपि केवलं त्वाम् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = क्षत्तैक एव सततं परिपोषकोऽलं;तेषां मम द्विडथ मन्त्रबलादमुष्य ।;पौराश्च जानपदकाः(जानपदिकाः) सततं द्विषन्ति;मां तेष्वतीव दृढसौहृदचेतसश्च ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = ते तेषु(एतेषु) दूरगमितेषु निराश्रयत्वात्;मामेव दुर्बलतया परितः श्रयन्ते ।;भीष्मादयश्च नहि तन्निकटे विरोधं;कुर्युर्विनश्यति गतेषु हि सौहृदं तत् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = भेदः कुलस्य भविता कुलनाशहेतु;अस्माभिरेषु सहितेषु पुरे वसत्सु ।;तस्मादुपायबलतः प्रतियापनीयाः;ते वारणावतमितो विहितोऽप्युपायः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = विष्णुर्जयन्त इति शम्भुसहाय आस्ते;देवोत्सवश्च सुमहान् भविताऽत्र सुष्ठु ।;भक्ताश्च ते हि नितरामरिशङ्खपाणौ;त्वच्चोदिताः समुपयान्ति तमुत्सवं द्राक् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = अज्ञाप्य मत्पुरुषतां पुरुषैर्मदीयैः;मध्यस्थवद् बहुगुणा उदिताश्च तत्र ।;तेषां पुरोऽत्र गमनाभिरुचिश्च जाता;द्रष्टुं पुरं बहुगुणं ननु पाण्डवानाम् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवत्यथ सुते स तथेत्युवाच;प्राप्तेषु पाण्डुतनयेषु तथैव चोचे ।;ज्ञात्वैव तेऽपि नृपतेर्हृदयं समस्तं;जग्मुः पितेति पृथया सह नीतिहेतोः ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = भीमस्तदा ह(तदाऽऽह/तदैव) भविताऽत्र हि भैक्षचार;इत्येव सम्यगनुविद्य निजं न कर्म ।;त्याज्यं त्विति प्रतिजगाद निजाग्रजाय;यामो वयं नतु गृहात् स हि नः स्वधर्मः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = निष्कालयन्ति यदि नो निजधर्मसंस्थान्;योत्स्यामहेऽत्र नहि दस्युवधोऽप्यधर्मः ।;इत्यूचिवांसममुमाह च धर्मसूनुः;कीर्तिर्विनश्यति हि नो गुरुभिर्विरोधे ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवाक्यममुमग्रजमन्वगात् स;भीमः प्रदर्श्य निजधर्ममथानुवृत्त्यै ।;दोषो भवेदुभयतो यत एव तेन;वाच्यः स्वधर्म उत न स्थितिरत्र कार्या ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = कीर्त्यर्थमेव निजधर्मपरिप्रहाणे;प्राप्तेऽग्रजस्य वचनात् प्रविहातुमेव(प्रतिहातुं, प्रतिहन्तुम्) ।;भीमस्य दोषमुभयं प्रतिहन्तुमीशो;ज्येष्ठं चकार हरिरत्र सुतं वृषस्य ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = हन्तव्यतामुपगतेषु सुयोधनादि-;ष्वन्योवधान्नहि भवेन्निजधर्म एव ।;पूर्वं वधे नहि समस्तश एव दोषाः;तेषां प्रयान्ति विवृतिं च तदर्थतोऽपि ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = क्षत्ताऽथ चाऽह सुवचोऽन्त्यजभाषयैव;धर्मात्मजं विषहुताशभयात् प्रतीताः ।;आध्वं त्विति स्म स तथेति वचोऽप्युदीर्य;प्रायाच्च वारणवतं पृथयाऽनुजैश्च ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = तान् हन्तुमेव च तदा धृतराष्ट्रसूनुः;लाक्षागृहं सपदि काञ्चनरत्नगूढम् ।;कृत्वाऽभ्ययातयदमुत्र हि(च) विष्णुपद्या(विष्णुपद्यां);स्वामात्यमेव च पुरोचननामधेयम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं प्रहस्त इति यस्त्वभवत् सुपापः;सोऽभ्येत्य पाण्डुतनयानभवच्च मन्त्री ।;दुर्योधनं प्रतिविहाय भवत्सकाशम्;आयात इत्यवददेषु स कूटवाक्यम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = दिव्यं गृहं च भवतां हि मयोपनीतं;प्रीत्यैव पापमनुयातुमहं न शक्तः ।;युष्मासु धर्मधृतिमत्सु सदा निवत्स्य;इत्यूचिवांसममुमाहुरहो सुभद्रम् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव जातुषगृहं वसया समेतं;तद्गन्धतो वृषसुतः पवमानजातम् ।;तं चातिपापमवदत् सुमुखैष पापो;हन्तुं न इच्छति सदा भव च प्रतीतः ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = क्षत्ताऽथ नीतिबलतोऽखिललोकवृत्तं;जानन् स्वचारमुखतः खनकाय चोचे ।;उक्त्वैव धर्मतनयाय मदीयवाक्यं;पूर्वोक्तमाशु कुरु तत्र बिलं सुदूरम् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = तं भागिनेयसहितं भगिनीं च तस्य;पापां ददाह सगृहां पवमानसूनुः ।;साऽप्यागता हि गरलेन निहन्तुमेतान्;भीमस्य पूर्वभुजितो न शशाक चैतत् ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = तप्तं तया ससुतया च तपो नितान्तं;स्यां सूनुभिः सह बलाददितिस्तथाऽब्दात् ।;तस्या अदाच्च गिरिशो यदि पुत्रकैस्त्वं;युक्ता न यासि मृतिमेष वरस्तवेति ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = जानन्निदं सकलमेव स(च) भीमसेनो;हत्वा सुतैः सह कुबुद्धिमिमां हि तं च ।;भ्रातॄंश्च मातरमुदूह्य ययौ बिलात् स;निर्गत्य भीतिवशतोऽबलतां प्रयातान् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञात्वा पुरोचनवधं यदि भीष्ममुख्यैः;वैचित्रवीर्यतनया अभियोधयेयुः ।;किं नो भवेदिति भयं सुमहद् विवेश;भीमं त्वृते च तनयान् सकलान् पृथायाः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = भीमोऽभयोऽपि गुरुभिः स्वमुखेन युद्धम्;अप्रीयमाण उत धर्मजवाक्यहेतोः ।;ऊह्यैव तानपि(तान् उरु) ययौ द्युनदीं च तीर्त्वा;क्षत्त्राऽतिसृष्टमधिरुह्य(क्षत्ता निसृष्टमधिरुह्य) जलप्रयाणम् ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = विश्वासिता विदुरपूर्ववचोभिरेव;दाशोदिताभिरधिरुह्य च भीमपृष्ठम् ।;सर्वे ययुर्वनमथाभ्युदिते च सूर्ये;दृष्ट्वैव सप्त मृतकानरुदंश्च(मृतकान् रुरुदुश्च) पौराः ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = हा पाण्डवानदहदेष हि धार्तराष्ट्रो;धर्मस्थितान् कुमतिरेव पुरोचनेन ।;सोऽप्येष दग्ध इह दैववशात् सुपापः;को नाम सत्सु विषमः प्रभवेत् सुखाय ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = पौरेभ्य एव निखिलेन च भीष्ममुख्या;वैचित्रवीर्यसहितास्तु निशम्य हेति ।;ऊचुः सुदुःखितधियोऽथ सुयोधनाद्याः;क्षत्ता मृषैव रुरुदुर्युयुजुश्च कर्म ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = भीमोऽप्युदूह्य वनमाप हिडिम्बकस्य;भ्रातॄन् पृथां च तृषितैरभियाचितश्च ।;पानीयमुत्तरपटेऽम्बुजपत्रनद्धं;दूरादुदूह्य ददृशे स्वपतोऽथ तांश्च ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = रक्षार्थमेव परिजाग्रति भीमसेने;रक्षः स्वसारमभियापयते हिडिम्बीम् ।;सा रूपमेत्य शुभमेव ददर्श भीमं;साक्षात् समस्तशुभलक्षणसारभूतम् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = सा राक्षसीतनुमवाप सुरेन्द्रलोक;श्रीरेव शक्रदयिता त्वपरैव शच्याः ।;शापात् स्पृधा पतिमवाप्य च मारुतिं (मारुतं) सा;प्राप्तुं निजां तनुमयाचत भीमसेनम् ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = तां भीम आह कमनीयतनुं न पूर्वं;ज्येष्ठादुपैमि वनितां नहि धर्म एषः ।;सा चाऽह कामवशगा पुनरेतदेव;स्वावेशयुग्धि मरुदग्र्यपरिग्रहस्य ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = सा भारती वरमिमं प्रददावमुष्यै;स्वावेशमात्मदयितस्य च सङ्गमेन ।;शापाद् विमुक्तिमतितीव्रतपःप्रसन्ना;तेनाऽह(तेनाऽप) सा निजतनुं पवमानसूनोः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं च नैजमभिदर्शयितुं पुनश्च;प्राहेश्वरोऽखिलजगद्गुरुरिन्दिरेशः ।;व्यासस्वरूप इह चेत्य परश्व एव;मां ते प्रदास्यति तदा प्रकरोषि मेऽर्थ्यम् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = काले तदैव कुपितः प्रययौ हिडिम्बो;भीमं निहन्तुमपि तां च निजस्वसारम् ।;भक्षार्थमेव हि पुरा स तु तां न्ययुङ्क्त;नेतुं च तानथ समासददाशु भीमम् ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = सा भीममेव शरणं प्रजगाम तां च;भ्रातॄंश्च मातरमथावितुमभ्ययात् तम् ।;भीमः सुदूरमपकृष्य सहोदराणां;निद्राप्रभङ्गभयतो युयुधेऽमुना च ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = तौ मुष्टिभिस्तरुभिरश्मभिरद्रिभिश्च;युद्ध्वा नितान्तरवतः प्रतिबोधितांस्तान् ।;सञ्चक्रतुस्तदनु सोदरसम्भ्रमं तं;दृष्ट्वैव मारुतिरहन्नुरसि स्म रक्षः ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = तद् भीमबाहुबलताडितमीशवाक्यात्;सर्वैरजेयमपि भूमितले पपात ।;वक्त्रस्रवद्बहुलशोणितमाप मृत्युं;प्रायात् तमोऽन्धमपि नित्यमथ क्रमेण ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = हत्वैव शर्ववररक्षितराक्षसं तं;सर्वैरवध्यमपि सोदरमातृयुक्तः ।;भीमो ययौ तमनु सा प्रययौ हिडिम्बी;कुन्ती युधिष्ठिरमथास्य कृते ययाचे ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = ताभ्यामनूक्तमपि यन्न करोति भीमः;प्रादुर्बभूव निखिलोरुगुणाभिपूर्णः ।;व्यासात्मको हरिरनन्तसुखाम्बुराशिः(अनन्तसुखाब्धिराशिः);विद्यामरीचिविततः सकलोत्तमोऽलम् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव तं परममोदिन आशु पार्था;मात्रा सहैव परिपूज्य गुरुं विरिञ्चेः ।;सल्लालिताश्च (उल्लालिताश्च) हरिणा परमातिहार्द;प्रोत्फुल्लपद्मनयनेन सदोपविष्टाः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = तान् भक्तिनम्रशिरसः समुदीक्ष्य कृष्णो;भीमं जगाद नत आशु हिडिम्बया च ।;एतां गृहाण युवतीं सुरसद्मशोभां;जाते सुते सहसुता प्रतियातु चैषा ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = एवं ब्रुवत्यगणितोरुगुणे रमेश;ओमित्युदीर्य कृतवांश्च तथैव भीमः ।;स्कन्धेन चोह्य विबुधाचरितप्रदेशान्;भीमं प्रयात्युदय एव रवेर्हिडिम्बी ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = सा नन्दनादिषु वनेषु विहृत्य तेन;सायं प्रयाति पृथया सहितांश्च पार्थान् ।;एवं ययावपि तयोरिह वत्सरार्द्धो;जातश्च सूनुरतिवीर्यबलोपपन्नः ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = देवोऽपि राक्षसतनुर्निर्हृतिः पुरा य;आवेशयुक् च गिरिशस्य घटोत्कचाख्यः ।;पूर्वं घटोपमममुष्य शिरो बभूव;केशा निमेषत उदासुरतो हि नाम ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = जाते सुते समयतो भगवत्कृतात् स;भीमो जगाद ससुतां गमनाय तां च ।;स्मृत्याऽभियान उभयोरपि सा प्रतिज्ञां;तेषां विधाय च ययौ सुरलोकमेव ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = व्यासोऽपि पाण्डुतनयैः सहितो बकस्य;रौद्राद् वराज्जयवधापगतस्य नित्यम् ।;यातो वधाय परमागणितोरुधामा;पूर्णाक्षयोरुसुख आशु तदैकचक्राम् ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = तान् ब्राह्मणस्य च गृहे प्रणिधाय कृष्णः;शिष्या ममैत इति विप्रकुमाररूपान् ।;आयामि काल इति ताननुशास्य चायात्;ते तत्र वासमथ चक्रुरनूच्य वेदान् ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = भिक्षामटत्सु सततं प्रतिहुङ्कृतेन;भीमे विशां सदन एव गृहप्रमाणम् ।;भाण्डं कुलालविहितं प्रतिगृह्य गच्छ-;त्याशङ्कयाऽवगमनस्य तमाह धार्मः ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = स्थूलं हि सद्म पृथिवीसहितं त्वरक्ष;उद्धृत्य वह्निमुखतस्तदु(तदुतैकदोष्णा) चैकदोष्णा ।;भाण्डं तदर्थमुरु कुम्भकरेण दत्तं;भिक्षां च तेन चरसि प्रतिहुङ्कृतेन ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = धर्मस्य ते सुनियतेर्बलश्च बोधो;भूयात् सुयोधनजनस्य ततो भयं मे ।;मात्रा सहैव वस फल्गुनपूर्वकैस्त्वम्;आनीतमेव परिभुङ्क्ष्व नतु व्रजेथाः ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आशु स चकार तथैव भीमः;तेऽपि स्वधर्मपरिरक्षणहेतुमौनाः ।;भिक्षां चरन्त्यथ चतुर्ष्वपि तेषु याते-;ष्वेकत्र मातृसहितः स कदाचिदास्ते ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = तत्काल एव रुदितं निजवासहेतोः;विप्रस्य दारसहितस्य निशम्य भीमः ।;स्त्रीबालसंयुतगृहे शिशुलालनादौ (शिशुपालनादौ);लज्जेदिति स्म जननीमवदन्नचागात् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = जानीहि विप्ररुदितं कुत इत्यतश्च;योग्यं विधास्य इति सा प्रययौ च शीघ्रम् ।;सा संवृतैव सकलं वचनं गृहेऽस्य;शुश्राव विप्रवर आह तदा प्रियां सः ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = दातव्य एव हि करोऽद्य च रक्षसस्य;साक्षाद् बकस्य गिरिसन्निभभक्ष्यभोज्यः(गिरिसन्निभभक्षभोज्यः) ।;पुंसाऽनसा च सहितानडुहा पुमांस्तु;नैवास्ति नोऽप्रददतां(नो प्रददतां) च समस्तनाशः ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = अन्यत्र याम इति पूर्वमुदाहृतं मे;नैतत् प्रिये तव मनोगतमास तेन ।;यास्यामि राक्षसमुखं स्वयमेव मर्तुं;भार्यैनमाह न भवानहमत्र यामि ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = अर्थे तवाद्य तनुसन्त्यजनादहं स्यां;लोके सतीप्रचरिते(सती प्रचलिते) तदृते त्वधश्च ।;कन्याऽऽह चैनमहमेव(चैनमहमेवि) न कन्ययाऽर्थ;इत्युक्त आह धिगिति स्म स विप्रवर्यः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = कन्योदिता बत कुलद्वयतारिणीति;जाया सखेति वचनं श्रुतिगं सुतश्च ।;आत्मैव तेन नतु जीवनहेतुतोऽहं;धीपूर्वकं न्रशनके(नृशनके) प्रतिपादयामि ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = एवं रुदत्सु सहितेषु कुमारकोऽस्य;प्राह स्वहस्तगतृणं प्रतिदर्श्य चैषाम् ।;एतेन राक्षसमहं निहनिष्य एवे-;त्युक्ते सुवाक्यमनु सा प्रविवेश कुन्ती ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = पृष्टस्तयाऽऽह स तु विप्रवरो बकस्य;वीर्यं बलं च दितिजारिभिरप्यसह्यम् ।;संवत्सरत्रययुते दशके करं च;प्रातिस्विकं दशमुखस्य च मातुलस्य ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा तमुग्रबलमत्युरुवीर्यमेव;रामायणे रघुवरोरुशरातिभीतम् ।;विष्टं बिलेष्वथ नृपान् वशमाशु कृत्वा;भीत्यैव तैस्तदनु दत्तकरं ननन्द ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = एवं बलाढ्यममुमाशु निहत्य भीमः;कीर्तिं च धर्ममधिकं प्रतियास्यतीह ।;सर्वे वयं च तमनु प्रगृहीतधर्मा(प्र गृहीतधर्मा);यास्याम इत्यवददाशु धरासुरं तम् ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = सन्ति स्म विप्रवर पञ्च सुता ममाद्य;तेष्वेक एव नरवैरिमुखाय यातु ।;इत्युक्त आह स न ते सुतवध्ययाऽहं;पापो भवानि(भवामि)तव हन्त मनोऽतिधीरम् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = उक्तैवमाह च पृथा तनये मदीये;विद्याऽस्ति दिक्पतिभिरप्यविषह्यरूपा ।;उक्तोऽपि नो गुरुभिरेष नियुङ्क्त एतां;वध्यस्तथाऽपि न सुरासुरपालकैश्च ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = उक्त्वैवमेत्य निखिलं च जगाद भीम;उद्धर्ष आस स निशम्य महास्वधर्मम् ।;प्राप्तं विलोक्य तमतीव विघूर्णनेत्रं;दृष्ट्वा जगाद यमसूनुरुपेत्य चान्यैः ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = मातः किमेष मुदितोऽतितरामिति स्म(मुदितो नितराम्);तस्मै च सा निखिलमाह स चाब्रवीत् ताम् ।;कष्टं त्वया कृतमहो बलमेव यस्य;सर्वे श्रिता वयममुं च निहंसि (विहंसि) भीमम् ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = यद्बाहुवीर्यपरमाश्रयतो हि राज्यम्;इच्छाम एव निखिलारिवधं स्वधर्मम् ।;सोऽयं त्वयाऽद्य निशिचारिमुखाय(निशिचारमुखाय)मातः;प्रस्थाप्यते वद ममाऽशु कयैव बुद्ध्या ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवन्तममुमाह सुधीरबुद्धिः;कुन्ती न पुत्रक निहन्तुमयं हि शक्यः ।;सर्वैः सुरैरसुरयोगिभिरप्यनेन;चूर्णीकृतो हि शतशृङ्गगिरिः प्रसूत्याम् ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = एष स्वयं हि मरुदेव नरात्मकोऽभूत्;को नाम हन्तुमिममाप्तबलो जगत्सु ।;इत्येवमस्त्विति स तामवदत् परेद्युः;भीमो जगाम शकटेन कृतोरुभोगः ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = गत्वा त्वरन् बकवनाय सकाशमाशु;भीमः सपायससुभक्ष्यपयोघटाद्यैः ।;युक्तं च शैलनिभमुत्तममन्नराशिं;स्पर्शात् पुरैव नरभक्षितुरत्तुमैच्छत् ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = तेनैव चान्नसमितौ परिभुज्यमान;उत्पाट्य वृक्षममुमाद्रवदाशु रक्षः ।;वामेन मारुतिरपोह्य तदा प्रहारान्;हस्तेन भोज्यमखिलं सहभक्ष्यमादत् ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = पीत्वा पयो त्वरित एनमवेक्षमाण(अवेक्ष्यमाण);आचम्य तेन युयुधे गुरुवृक्षशैलैः ।;तेनाऽहतोऽथ बहुभिर्गिरिभिर्बलेन;जग्राह चैनमथ भूमितले पिपेष ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = आक्रम्य पादमपि पादतलेन तस्य;दोर्भ्यां प्रगृह्य च परं विददार भीमः ।;मृत्वा स चोरु तम एव जगाम पापो;विष्णुद्विडेव हि शनैरनिवृत्ति चोग्रम् ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = हत्वा तमक्षतबलो जगदन्तकं स;यो राक्षसो न वश आस जरासुतस्य ।;भौमस्य पूर्वमपि नो भरतस्य राज्ञो;भीमो न्यधापयदमुष्य शरीरमग्रे ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = द्वार्येव तत् प्रतिनिधाय पुनः स भीमः;स्नात्वा जगाम निजसोदरपार्श्वमेव ।;श्रुत्वाऽस्य कर्म परमं तुतुषुः समेता;मात्रा च ते तदनुभीतियुताः पुरस्थाः(भीतियुताश्च जाताः) ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव राक्षसशरीरमुरु प्रभीता;ज्ञात्वैव हेतुभिरथ क्रमशो मृतं च ।;विप्रस्य तस्य वचनादपि भीमसेन-;भग्नं निशम्य परमं तुतुषुश्च तस्मै ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = अन्नात्मकं करममुष्य च सम्प्रचक्रुः;सोऽप्येनमाशु(सोऽप्येतमाशु) नरसिंहवपुर्धरस्य ।;चक्रे हरेस्तदनु सत्यवतीसुतस्य;विष्णोर्हि वाक्प्रमुदिताः(वाक्प्रचुदिताः) प्रययुस्ततश्च ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = उत्पत्तिपूर्वककथां द्रुपदात्मजाया;व्यासो ह्यनूच्य जगतां गुरुरीश्वरेशः(गुरुरीश्वरश्च) ।;यातेत्यचोदयदथाप्यपरे द्विजाग्र्याः;तान् ब्राह्मणा इति भुजिर्भवतेति चोचुः(भवतीति चोचुः) ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं हि पार्षत इमान् जतुगेहदग्धान्;श्रुत्वाऽतिदुःखितमनाः पुनरेव(पुनरेष) मन्त्रः ।;याजोपयाजमुखनिस्सृत एवमेष;नासत्यतार्ह इति जीवनमेषु मेने ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = यत्रक्वचित् प्रतिवसन्ति निलीनरूपाः;पार्था इति स्म स तु फल्गुनकारणेन ।;चक्रे स्वयम्बरविघोषणमाशु राजा;स्वन्यैरधार्यधनुरीशवराच्च चक्रे ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = तत्काल एव वसुदेवसुतोऽपि कृष्णः;सम्पूर्णनैजपरिबोधत एव सर्वम् ।;जानन्नपि स्म हलिना सहितो जगाम;पार्थान् निशम्य च मृतानथ कुल्यहेतोः ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = स प्राप्य(सम्प्राप्य) हस्तिनपुरं धृतराष्ट्रपुत्रान्;संवञ्चयंस्तदनुसारिकथाश्च कृत्वा(श्रुत्वा) ।;भीष्मादिभिः परिगतो(परिगताप्रियवत्,परिवृतोऽप्रियवत्)ऽप्रियवज्जगाम द्वारावतीमुदितपूर्णसुनित्यसौख्यः ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = तस्यान्तरे हृदिकसूनुरनन्तरं स्वं;श्वाफल्किबुद्धिबलमाश्रित इत्युवाच ।;सत्राजिदेष हि पुरा प्रतिजज्ञ एनाम्;अस्मत्कृते स्वतनयां मणिना सहैव ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = सर्वांश्च नः पुनरसाववमत्य कृष्णा-;यादात् सुतां जहि च तं निशि पापबुद्धिम् ।;आदाय रत्नमुपयाहि च नौ विरोधे;कृष्णस्य दानपतिना सह साह्यमेमि ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आशु कुमतिः स तु(स हि) पूर्वदेहे;दैत्यो यतस्तदकरोदथ सत्यभामा ।;आनन्दसंविदपि लोकविडम्बनाय;तद्देहमस्य तिलजे पतिमभ्युपागात् ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा तदीयवचनं भगवान् पुरीं स्वाम्;आयात एव तु निशम्य महोत्सवं तम् ।;पाञ्चालराजपुरुषोदितमाशु वृष्णि-;वर्यैरगान्मुसलिना सह तत्पुरीं च ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = भीमोऽपि रुद्रवररक्षितराक्षसं तं;हत्वा तृणोपमतया हरिभक्ति(क्त)वन्द्यः ।;उष्याथ तत्र कतिचिद्दिनमच्युतस्य;व्यासात्मनो वचनतः प्रययौ निजैश्च ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = मङ्गल्यमेतदतुलं प्रतियात शीघ्रं;पाञ्चालकान् परमभोजनमत्र सिद्ध्येत् ।;विप्रैरितस्तत इतीरितवाक्यमेते;शृण्वन्त एव परिचक्रमुरुत्तराशाम् ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = षण्णां च मध्यगमुदीर्णभुजं विशाल-;वक्षस्थलं बहुलपौरुषलक्षणं च ।;दृष्ट्वैव मारुतिमसावुपलप्स्यतीह;कृष्णामिति स्म च वचः प्रवदन्ति विप्राः ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = रात्रौ दिवा च सततं पथि गच्छमानाः;प्रापुः कदाचिदथ विष्णुपदीं निशायाम् ।;सर्वस्य रक्षितुमगादिह पृष्ठतस्तु;भीमोऽग्र एव शतमन्युसुतोऽन्तरेऽन्ये ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = प्राप्ते तदोल्मुकधरेऽर्जुन एव गङ्गां;गन्धर्वराज इह चित्ररथोऽर्द्धरात्रे ।;दृष्ट्वैव विप्ररहितानुदकान्तरस्थः;क्षत्रात्मजा इति ह धर्षयितुं स चाऽगात् ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = हन्ताऽस्मि वो ह्युपगतानुदकान्तमस्या;नद्याश्च मर्त्यचरणाय निषिद्धकाले ।;इत्थं वदन्तममुमाह सुरेन्द्रसूनुः;गन्धर्व नास्त्रविदुषां भयमस्ति तेऽद्य ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = सर्वं हि फेनवदिदं बहुलं बलं ते;नार्थप्रदं भवति चास्त्रविदि प्रयुक्तम् ।;इत्युक्तवन्तममुमुत्तमयानसंस्थो;बाणान् क्षिपन्नभिससार सुरेशभृत्यः ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = आग्नेयमस्त्रमभिमन्त्र्य तदोल्मुके स;चिक्षेप शक्रतनयोऽस्य रथश्च दग्धः ।;तं चाग्निना परिगृहीतमभिप्रगृह्य;केशेषु सञ्चकर्षाऽशु सुरेन्द्रसूनुः ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = पार्थेन सन्धर्षितः शरणं जगाम;धर्मात्मजं तमपि सोऽथ निजास्त्रमुग्रम् ।;सञ्जह्र एव तत आस च नामतोऽसौ;अङ्गारवर्ण इति वर्णविपर्ययेण ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्व उल्बणसुरक्ततनुः स भूत्वा;स्वर्णावदात उत पूर्वमुपेत्य सख्यम् ।;पार्थेन दुर्लभमहास्त्रमिदं ययाचे;जानन्नपि स्म नहि तादृशमेष वेद ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = विद्या सुशिक्षिततमा हि सुरेशसूनौ;तामस्य चावददसावपि कालतोऽस्मै ।;गन्धर्वगामवददन्वगदृश्यविद्यां;पश्चादिति स्म पुरुहूतसुतस्य वाक्यात् ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = आधिक्यतः स्वगतसंविद एव साम्ये;नैवेच्छति स्म निमयं स धनञ्जयोऽत्र ।;धर्मार्थमेव स तु तां परिदाय तस्मै;कालेन संविदममुष्य च धर्मतोऽयात् ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = पार्थेन सोऽपि बहुलाश्च कथाः कथित्वा;धौम्यस्य सङ्ग्रहणमाह पुरोहितत्वे ।;दास्यामि दिव्यतुरगानिति सोऽर्जुनाय;वाचं निगद्य दिवमारुहदप्यगुस्ते ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = ते धौम्यमाप्य च पुरोधसमुत्तमज्ञं;विप्रात्मजोपमतया विविशुः पुरं च ।;पाञ्चालकस्य निखिलां ददृशुश्च तत्र;मूर्धाभिषिक्तसमितिं समलङ्कृतां च ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = राजन्यमण्डलमुदीक्ष्य सुपूर्णमत्र;कृष्णां प्रगृह्य सहजः प्रगृहीतमालाम् ।;तेषां च मध्यमगमत् कुलवीर्यसम्पद्;युक्तां विभूतिमथ चाऽह समस्तराज्ञाम् ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = तांश्च प्रदर्श्य सकलान्(निखिलान्) स हुताशनांशः;चापं च तत् प्रतिनिधाय सपञ्चबाणम् ।;आहाभिभाष्य सकलान् नृपतीनथोच्चैः;दीप्यद्धुताशनवपुर्घनतुल्यघोषः ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = एतेन कार्मुकवरेण तरूपरिस्थं;मत्स्यावभासमुदके प्रतिवीक्ष्य येन ।;एतैः शरैः प्रतिहतो भवतीह मत्स्यः;कृष्णाऽनुयास्यति तमद्य नरेन्द्रवीराः ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = इत्यस्य वाक्यमनु सर्वनरेन्द्रपुत्रा;उत्तस्थुरुद्धतमदाश्चलकुण्डलास्याः ।;अस्त्रं बलं च बहु नैजमभीक्षमाणाः;स्पर्धन्त एव च मिथः समलङ्कृताङ्गाः ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = केचिन्निरीक्ष्य धनुरेत्य न मे सुशक्यम्;इत्येव चापययुरन्य उत प्रचाल्य ।;तत्राऽससाद शिशुपाल उरुप्रतापः;सङ्गृह्य तत् समधिरोपणयत्न(समनुरोपणयत्न) आसीत् ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = माषान्तराय स चकर्ष यदैव कोट्या;उन्नम्य तत् प्रतिजघान तमेव चाऽशु ।;अन्यत्र फल्गुनत एतदशक्यमेवे-;त्यञ्जो गिरीशवरतः स ययौ च भग्नः ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = मद्रेश एत्य चकृषे स्थविरोऽपि वीर्यात्;चेदीशतोऽप्यधिकमेव स मुद्गमात्रे ।;शिष्टे(शिष्ये)ऽमुना प्रतिहतः स ययावशक्यं;मत्वाऽऽत्मनस्तदनु भूपतयो विषण्णाः ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = सन्नेषु भूपतिषु मागध आससाद;सोऽवज्ञयैव बलवीर्यमदेन दृप्तः ।;चापं चकर्ष चलपादतलो बलेन;शिष्टे स सर्षपमितेऽभिहतोऽमुनैव ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = जानुन्यमुष्य धरणीं ययतुस्तदैव;दर्पेण चास्थिरपदस्थितिमात्रहेतोः (चास्थिरपदः स्थितिमात्रहेतोः) ।;रौद्राद् वरात् स जडतां गमितोऽथ राजा;राज्ञां मुखान्यभिवीक्ष्य ययौ स्वराष्ट्रम् ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = प्रायो गतास्तमनु(गतास्तदनु) भूपतयोऽथ कर्णो;दुर्योधनार्थमनुगृह्य धनुश्चकर्ष ।;रामादुपात्तशुभशिक्षितमात्रतोऽसौ;रोमावशिष्टमकरोद् धनुषोऽन्तमाशु ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिंश्च तेन विहते(निहते) प्रतिसन्निवृत्ते;भीमार्जुनौ द्विजसदस्युपसन्निविष्टौ ।;उत्तस्थतू रविशशिप्रतिमानरूपौ;विप्रेषु तत्र च भिया विनिवारयत्सु ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = विप्राश्च केचिदतियुक्तमिमौ हि वीरौ;देवोपमाविति वचो जगदुस्ततस्तौ ।;दृष्ट्वैव कृष्णमुखपङ्कजमाशु चाप;सान्निध्यमाययतुरुत्तमवीर्यसारौ ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = तत्रार्जुनः पवनजात् प्रियतोऽप्यनुज्ञाम्(अभ्यनुज्ञाम्);आदाय केशवमजं मनसा प्रणम्य ।;कृत्वा गुणान्वितमदो(मथो) धनुरश्रमेण;यन्त्रान्तरेण स शरैरधुनोच्च लक्षम् ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णा तदाऽस्य विदधे नवकञ्जमालां;मध्ये च तां प्रतिविधाय(प्रतिनिधाय) नरेन्द्रपुत्रौ ।;भीमार्जुनौ ययतुरच्युतमाभिनम्य;क्षुब्धं तदा नृपवराब्धिरिमावधावत् ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = द्रष्टुं हि केवलगतिर्नतु कन्यकाया;अर्थे न चापमिह वृष्णिवराः स्पृशन्तु ।;इत्याज्ञयैव वरचक्रधरस्य लिप्साम्;अन्यत्र(अप्यत्र) चक्रुरिह नैव यदुप्रवीराः ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = भीमस्तु राजसमितिं प्रतिसम्प्रयातां;दृष्ट्वैव योजनदशोच्छ्रयमाशु वृक्षम् ।;आरुज्य(आगृह्य) सर्वनृपतीनभितोऽप्यतिष्ठद्;दृष्ट्वा पलायनपराश्च बभूवुरेते ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = भीमोऽयमेष पुरुहूतसुतोऽन्य एते;पार्था इति स्म हलिने हरिरभ्यवोचत् ।;दृष्ट्वैव सोऽपि मुदमाप शिनेश्च पौत्रः;खड्गं प्रगृह्य हर्षात् परिपुप्लुवेऽत्र ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = प्रीतेषु सर्वयदुषु प्रपलायितेषु;दुर्योधनादिनृपतिष्वखिलेषु भीमात् ।;कर्णोऽभ्ययाद्धरिहयात्मजमाशु मद्र-;राजो जगाम पवनात्मजमेव वीरः ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = विप्रेषु दण्डपटदर्भमहाजिनानि;कोपात् क्षिपत्सु न विनाशनमत्र भूयात् ।;क्षत्रस्य वैरत इति द्रुपदे च कृष्णं;विप्रांश्च याचति स मारुतिरार शल्यम् ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = वृक्षं त्वसौ प्रतिनिधाय च मद्रराजं;दोर्भ्यां प्रगृह्य जवतो गगने निधाय ।;बन्धुत्वतो भुवि शनैरदधात् स तस्य;विज्ञाय वीर्यमगमन्निजराजधानीम् ॥ १३८॥ | |||
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| verse_lines = पार्थोऽपि तेन धनुषा युयुधे स्म कर्णं;सोऽप्यस्त्रबाहुबलमाविरमुत्र चक्रे ।;तौ धन्विनामनुपमौ चिरमस्यतां च;सूर्यात्मजोऽत्र वचनं व्यथितो बभाषे ॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = त्वं फल्गुनो हरिहयो द्विजसत्तमो(सत्तपो) वा;मूर्तं(मर्त्यः) न मे प्रमुखतः स्थितिमन्य ईष्टे ।;यो वाऽस्मि कोऽपि यदि ते क्षममद्य बाणान्;मुञ्चान्यथैहि(यथेहि) रणतस्त्विति पार्थ आह ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = कार्यं न मे द्विजवरैः प्रतियोधनेने-;त्युक्त्वा ययौ रविसुतः स सुयोधनाद्यैः ।;नागाह्वयं पुरमथ द्रुपदात्मजां ताम्;आदाय चार्जुनयुतः प्रययौ स भीमः ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = अग्रेऽश्विपुत्रसहितः स तु धर्मसूनुः;प्रायात् कुलालगृहमन्वपि भीमपार्थौ ।;भिक्षेति तैरभिहिते प्रजगाद कुन्ती;भुङ्ग्ध्वं समस्तश इति प्रददर्श कन्याम् ॥ १४२॥ | |||
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| verse_lines = प्रामादिकं च वचनं न मृषा तयोक्तं;प्रायो हि तेन कथमेतदिति स्म चिन्ता ।;तेषां बभूव वसुदेवसुतो हरिश्च;तत्राऽजगाम परमेण हि सौहृदेन ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = सम्भाष्य तैः स भगवानमितात्मशक्तिः;प्रायान्निजां पुरममा यदुभिः समस्तैः ।;ज्ञातुं च तान् निशि स तु द्रुपदः स्वपुत्रं;प्रास्थापयत् स च विलीनं इमानपश्यत्(विलीन इमामपश्यत्) ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = भिक्षान्नभोजिन उतो भगिनीं निजां च(इमां भगिनीं);तत्रातितृप्तहृदयामथ युद्धवार्ताम् ।;तेषां निशम्य नदतां धनवद् गभीरं;क्षत्रोत्तमा इति मतिं स चकार वीरः ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = प्रातस्तु तस्य जनितुर्वचसा पुरोधाः;तान् प्राप्य मन्त्रविधिना मरुदात्मजेन ।;सम्पूजितोऽतिविदुषा प्रतिगृह्य तांश्च;प्रावेशयन्नृपतिगेहममैव मात्रा ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = तानागतान् समभिपूज्य निजात्मजां च;विप्रादियोग्यपृथगुक्तपदार्थजातैः ।;पूर्णान् गृहांश्चतुर एव दिदेश राजा;तत्राऽयुधादिपरिपूर्णगृहं च तेऽगुः ॥ १४७॥ | |||
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| verse_lines = चेष्टास्वराकृतिविवक्षितवीर्यशौर्य-;प्रागल्भ्यपूर्वकगुणैः क्षितिभर्तृपुत्रान् ।;विज्ञाय तान् द्रुपद एत्य च धर्मसूनुं;पप्रच्छ कोऽसि नरवर्य वदस्व सत्यम्(मह्यम्) ॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = स प्राह मन्दहसितः किमिहाद्य राजन्;पूर्वं हि वर्णविषये न विशेष उक्तः ।;पुत्रीकृते तव सुतेन तु लक्ष्य(लक्ष)वेध;उक्तो नरेन्द्रसमितौ स कृतोऽप्यनेन ॥ १४९॥ | |||
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| verse_lines = एवं ब्रुवाणमथ तं पृथया सहैव;राजा वदेति पुनरेव ययाच एषः ।;सर्वं पृथाऽप्यवदतां स च तेन तुष्टो;वाचं जगाद कृतकृत्य इहाऽसमद्य ॥ १५०॥ | |||
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| verse_lines = पार्थार्थमेव हि मयैष कृतः प्रयत्नः;त्वं फल्गुनोऽन्य उतवाऽद्य करं सुतायाः ।;गृह्णात्वितीरित इमं स तु धर्मसूनुः;आह स्म सर्व इति मे मनसि प्ररूढम् ॥ १५१॥ | |||
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| verse_lines = नात्र प्रमा मम हृदि प्रतिभात्यथापि;धर्माचला मम मतिर्हि तदेव मानम् ।;इत्युक्तवत्यपि सहैव सुतेन राजा;नैवैच्छदत्र भगवानगमच्च कृष्णः ॥ १५२॥ | |||
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| verse_lines = व्यासं तमीक्ष्य (भगवन्तमगम्यपूर्ण)भगवन्तमगण्यपूर्ण-;नित्याव्ययात्मगुणमाशु समस्त एव ।;नत्वाऽभिपूज्य वरपीठगतस्य चाऽज्ञाम्;आदाय चोपविविशुः सहितास्तदन्ते ॥ १५३॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णस्तदाऽह नृपतिं प्रति देहि कन्यां;सर्वेभ्य एव वृषवायुपुरन्दरा हि ।;नासत्यदस्रसहिता इम एव इन्द्राः;पूर्वे च सम्प्रतितनश्च(सम्प्रतितनाश्च) हरेर्हि पश्चात् ॥ १५४॥ | |||
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| verse_lines = एषां श्रियश्च निखिला अपिचैकदेहाः;पुत्री तवैव न ततोऽत्र विरुद्धता हि ।;इत्युक्तवत्यपि यदा द्रुपदश्चकार;संवादिनीं न धियमेनमथाऽह कृष्णः ॥ १५५॥ | |||
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| verse_lines = दिव्यं हि दर्शनमिदं तव दत्तमद्य;पश्याऽशु पाण्डुतनयान् दिवि संस्थितांस्त्वम् ।;एतां च ते दुहितरं सह तैः पृथक्स्थां;तल्लक्षणैः सह ततः कुरु ते यथेष्टम् ॥ १५६॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवाक्यमनु तान् स ददर्श राजा;कृष्णप्रसादबलतो दिवि तादृशांश्च ।;एतान् निशाम्य चरणौ जगदीशितुश्च;भीतो जगाम शरणं तदनादरेण ॥ १५७॥ | |||
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| verse_lines = दत्वाऽभयं स भगवान् द्रुपदस्य कार्ये;तेनोमिति स्म कथिते स्वयमेव सर्वाम् ।;वैवाहिकीं कृतिमथ(विधिमथ) व्यदधाच्च धौम्य-;युक्तः क्रमेण जगृहुर्निखिलाश्च पाणिम् ॥ १५८॥ | |||
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| verse_lines = पाञ्चालकेषु च महोत्सव आस राजा;तुष्टोऽभवत् सह सुतैः स्वजनैश्च सर्वैः(सुतैश्च निजैश्च सर्वैः) ।;पौरैश्च जानपदिकैश्च यथैव रामे;दत्वा सुतां जनक आप मुदं ततोऽनु ॥ १५९॥ | |||
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| verse_lines = उद्बाह्य तत्र निवसत्सु च पाण्डवेषु;श्रुत्वैव रामसहितः सह यादवैश्च ।;आदाय पारिबर्हं बहुलं स कृष्ण;आयान्मुदैव पृथया सहितांश्च पार्थान् ॥ १६०॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव तं मुमुदुराशु कुरुप्रवीरा;आश्लिष्य कृष्णमथ नेमुरसौ च कृष्णाम् ।;दृष्ट्वा प्रदाय गृहयोग्यसमस्तभाण्डं;सौवर्णमेभ्य उरु भूषणमच्युतोऽदात् ॥ १६१॥ | |||
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| verse_lines = रत्नानि गोगजतुरङ्गरथान् सुवर्ण-;भारान् बहूनपि ददावथ चाऽशिषोऽग्र्याः ।;व्यासोऽप्यदादिह परत्र च(परत्र स) पार्षतोऽपि;भूषारथाश्वगजरत्नसुकाञ्चनानि ॥ १६३॥ | |||
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| verse_lines = दासीश्च दाससहिताः शुभरूपवेषाः;सहस्रशो ददतुरत्र हरिर्नृपश्च ।;तासां विचित्रवसनान्युरुरत्नमालाः;प्रत्येकशो ददतुरप्युरुभूषणानाम् ॥ १६४॥ | |||
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| verse_lines = मासान् बहूनिह विहृत्य सहैव पार्थैः;कृष्णो ययौ यदुपुरीं सहितोऽग्रजेन ।;अन्तर्हिते भगवति प्रततोरुशक्तौ;व्यासे च वत्सरमिहोषुरिमे तु पार्थाः ॥ १६५॥ | |||
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| verse_lines = वैचित्रवीर्यतनयाः सह सौबलेन;कर्णेन सिन्धुपतिना रथहस्तियौधैः ।;भूरिश्रवः प्रभृतिभिश्च सहैव हन्तुं;पाञ्चालराजमगुरेत्य पुरीं पुनस्ते ॥ १६६॥ | |||
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| verse_lines = तैरर्दिते स्वपुर आशु स सोमकानां;राजा सुतैः सह ससैनिक उद्गतोऽभूत् ।;तेषां च तस्य च बभूव महान् विमर्दः;पुत्रौ च तस्य निहतौ विधुताश्च सेनाः ॥ १६७॥ | |||
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| verse_lines = चित्रे हते समर आशु सचित्रकेतौ;धावत्सु सैनिकवरेषु च पार्षतस्य ।;पार्था रथैरभिययुर्धृतचापबाणा;वैचित्रवीर्यतनयान् रविसूनुयुक्तान् ॥ १६८॥ | |||
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| verse_lines = तैस्तेषु पञ्चसु समं प्रतियोधयत्सु;भूरिश्रवाः सरविजो विरथं चकार ।;शक्रात्मजं तदनु पर्वतसन्निकाशं;दोर्भ्यां तु मारुतिरुरुं तरुमुद्बबर्ह ॥ १६९॥ | |||
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| verse_lines = आयान्तमीक्ष्य तरुहस्तमिमं समीर-;सूनुं सुयोधनमुखा निखिलाः सकर्णाः ।;भूरिश्रवाः शकुनिभूरिजयद्रथाश्च;सर्वेऽपि दुद्रुवुरथो विविशुः पुरं स्वम् ॥ १७०॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञात्वा समस्तमपि तद् विदुरोऽग्रजं स्वं;वर्द्धन्त एव तनया भवतो नरेन्द्र ।;इत्याह सोऽपि मुदितः स्वसुतेन कृष्णा;प्राप्तेति भूषणवराण्यदिशच्च वासः ॥ १७१॥ | |||
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| verse_lines = पार्था इति स्म विदुरोऽवददाशु सोऽपि;स्वाकारगूहनपरो यदि तर्ह्यतीव ।;भद्रं मृता नहि पृथासहिताः स्म पार्थाः;तेषां प्रवृत्तिमपि मे वद सर्वशस्त्वम् ॥ १७२॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आह विदुरः स हिडिम्बवध्या-;पूर्वां प्रवृत्तिमखिलामपि लक्ष्यवेधम्(लक्षवेधम्) ।;उद्बाहमप्यथ नदीजमुखाश्च सर्वे;तुष्टा बभूवुरपि वत्सरमूषुरेवम् ॥ १७३॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽथ कृष्णमुपयातमुरु प्रदाय;रत्नं च पाण्डुतनयेषु गतं पुनश्च ।;तातप्यमानहृदयास्तु सुयोधनाद्या;मन्त्रं प्रचक्रुरथ कर्णमुखा युयुश्च ॥ १७४॥ | |||
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| verse_lines = युद्धाय तेषु पुनरेव रथैः प्रयाते-;ष्वाहाग्रजं स विदुरोऽपि नदीजमुख्यान् ।;एते हि पापतमचेतस एत्य पार्थान्;युद्धाय मृत्युमुपयान्ति न संशयोऽत्र ॥ १७५॥ | |||
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| verse_lines = भीमार्जुनौ विषहितुं नहि कश्चनास्ति;सामर्थ्ययुक् सुरवरेष्वपि वर्द्धितास्ते ।;ज्ञात्वैव वत्सरत एव महानधर्मः;तेषामुपेक्षणकृतस्तदलं नियुङ्क्ष्व ॥ १७६॥ | |||
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| verse_lines = आनीतये च विनियुज्य सुसान्त्वपूर्वम्;आनीय योजय नृपेषु(नृपैषु) तथाऽर्द्धराज्यम् ।;एवं कृते(कृतं) तव भवेत् कुलवृद्धये हि;धर्माय चोभयविनाशकरोऽन्यथा स्याः ॥ १७७॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवत्यनु तथेत्यवदन्नदीजो;द्रोणः कृपश्च विदुरं स नृपोऽप्युवाच ।;याह्यानयेति स च वेगवता रथेन;तत्रागमत् तदनु तैरभिपूजितश्च ॥ १७८॥ | |||
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| verse_lines = तत्काल एव वसुदेवसुतश्च कृष्णो;व्यासश्च तानुपसमेत्य दुरन्तशक्ती ।;आदाय कुन्तिसहितान् विदुरेण युक्तौ;नागाह्वयं पुरमितां सह भार्ययैव ॥ १७९॥ | |||
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| verse_lines = तेष्वागतेषु सुमहानभवत् प्रहर्षः;पौरस्य जानपदिकस्य जनस्य चोच्चैः ।;भीष्मादिकाश्च मुदिताः प्रतिपूज्य गेहम्;आवेशयन् सह नृपेण महोत्सवेन ॥ १८०॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णामपूजयदतीव च सौबली सा;दुर्योधनस्य दयितासहिताऽत्र तेऽपि ।;ऊषुस्ततश्च निजपुत्रकदुर्विनीत्या;कृष्णानिमित्तमुरुभीतित आह भीमात् ॥ १८१॥ | |||
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| verse_lines = कुन्ति प्रयाहि सहिता स्नुषया गृहं स्वं;भीमाद् बिभेमि निजपुत्रकदुर्विनीत्या ।;कृष्णा त्रिलोकवनिताधिकरूपसारा;यस्मादिति स्म ससुता प्रययौ गृहं सा ॥ १८२॥ | |||
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| verse_lines = ऊषुस्तथैव परिवत्सरपञ्चकं ते;पाण्डोर्गृहे सुसुखिनोऽखिलभोगयुक्ताः ।;कृष्णा च तेषु पृथगेव चतुःस्वरूपा;रेमे तथैकतनुरप्यभिमानिभेदात् ॥ १८३॥ | |||
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| verse_lines = कन्यैव साऽभवदतः प्रतिवासरं च;जन्माभवद्ध्यभिमतेः पृथगेव नाशात् ।;प्रायो हि नाभिमतिनाशमवाप वाणी;तस्मान्मरुच्च सकलेष्वभिविष्ट(सकलेष्वनुविष्ट) आसीत् ॥ १८४॥ | |||
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| verse_lines = धर्मात्मजादिषु मरुत् प्रतिविष्ट एषां;बुद्धिं विमोह्य(विपोह्य) रमते सततं तया यत् ।;शुद्धैव सा हि तत एव दिनेदिने च;सम्मोहतो मरणवद् भवतीह कन्या ॥ १८५॥ | |||
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| verse_lines = नो सुप्तिवत्(सुप्तवत्) त्विदमतोऽन्यवशत्वतो हि;देहस्य संस्मृतित एव हरेर्न मोहः ।;नाऽवेशवच्च तत एव मृतेः स्वरूपम्;एतत् त्वतः प्रतिदिनं जननाद्धि कन्या ॥ १८६॥ | |||
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| verse_lines = एवं स वायुरनुविष्टयुधिष्ठिरादि-;भीमात्मनैव रमते सततं तयैकः ।;अन्यादृशा(अन्यादृशी) हि सुरभुक्तिरतोऽन्यरूपा;मानुष्यभुक्तिरिति नात्र विचार्यमस्ति ॥ १८७॥ | |||
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| verse_lines = वासिष्ठयादववृषावपि केशवौ तौ;तत्रोषतुः परमसौहृदतो हि तेषु ।;ताभ्यामनन्तगुणपूर्णसुखात्मकाभ्यां;पार्थाश्च ते मुमुदिरे युतसत्कथाभिः(अयुतसत्कथाभिः) ॥ १८८॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं हि तेषु वनगेषु बभूव काशि-;राज्ञः सुताकृत उरुक्षितिपालयोगः ।;तत्र स्वयम्बरगतां धृतराष्ट्रपुत्रः;कन्यां बलाज्जगृह आत्मबलातिदृप्तः ॥ १८९॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं हि राजगणने मगधाधिराजः;सङ्ख्यात इत्यतिरुषा प्रगृहीतकन्ये ।;दुर्योधने नृपतयो युयुधुः स्म तेन;भग्नाश्च कर्णसहितेन सहानुजेन ॥ १९०॥ | |||
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| verse_lines = भग्नेषु तेषु पुनरात्तशरासनेषु;कर्णो जगाद धृतराष्ट्रसुतं प्रयाहि ।;युक्तः सहोदरजनैर्गुरुभीष्ममुख्यैः;युक्तस्य ते न पुरमेत्य हि घर्षणेशाः ॥ १९१॥ | |||
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| verse_lines = एकान्ततो जयमवीक्ष्य च नानुयाति;बार्हद्रथः पुरगतस्य जये न निष्ठा ।;द्रौणिं च रुद्रतनुमेष सदा विजानन्;नो तेन युद्धमभिवाञ्छति रुद्रभक्तः ॥ १९२॥ | |||
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| verse_lines = एकोऽहमेव नृपतीन् प्रतियोधयिष्य;एतैर्मयि प्रतिजितेऽपि न तेऽस्त्यकीर्तिः ।;एकं च तेऽनुजमिमे यदि पौरुषेण;गृह्णीयुरत्र तव कीर्तिरुपैति नाशम् ॥ १९३॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मादयोऽपि नहि योधयितुं समर्था;राज्ञा ह्यनेन तत एव हि(च) बाह्लिकोऽस्य ।;भृत्यो बभूव नतु भीष्ममयं युधेऽगाद्;राजा नहीति नच तेन विरोध आसीत् ॥ १९४॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आशु स विमृश्य ययौ पुरं स्वं;कर्णोऽपि तैः प्रतियुयोध जिगाय चैनान्(चैतान्) ।;कर्णस्य वीर्यमगणय्य जरासुतोऽपि;ह्येकैकमेव नृपतिं स दिदेश योद्धुम् ॥ १९५॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेषु तेषु विजितेष्वभिजग्मिवान् स;योद्धुं बृहद्रथसुतोऽप्यमुना रथेन ।;तं चैव रामवरतो विरथं विशस्त्रं;चक्रे स चैनमथ मुष्टिभिरभ्युपेतौ ॥ १९६॥ | |||
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| verse_lines = सन्धौ यदैव जरया प्रतिसन्धितस्य;कर्णो जघान न परत्र तुतोष राजा ।;न ज्ञातमेतदपि हो हलिना तदेतत्;ज्ञातं त्वया भव ततो मम भृत्य एव ॥ १९७॥ | |||
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| verse_lines = एवंविधं सुकुशलं बहुयुद्धशौण्डं;न त्वां हनिष्य उत ते पितुरेव पूर्वम् ।;बाह्वोर्बलादभिहृतं हि मयाऽङ्गराज्यं;तत् त्वं गृहाण युधि कर्मकरश्च मे स्याः ॥ १९८॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आशु स तथैव चकार कर्णः;पूर्वं हि तस्य निजराज्यपदैकदेशः ।;दुर्योधनेन विहितो मगधाधिराजं;जित्वा वृकोदरहृतः पितुरेव दत्तः ॥ १९९॥ | |||
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| verse_lines = अङ्गाधिराज्यमुपलभ्य जरासुतस्य;स्नेहं च सूर्यसुत आशु कुरून् जगाम ।;दृष्ट्वैव तं मुमुदिरे धृतराष्ट्रपुत्रा;नानेन तुल्यमधिजग्मुरतो हरिं च ॥ २००॥ | |||
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| verse_lines = उद्वाह्य काशितनयां गिरिजाधिविष्टां(गिरिजाभिविष्टां);साक्षान्नरेषु जनितां प्रथमामलक्ष्मीम् ।;तस्यां सुतं त्वजनयत् पुर आस योऽक्षः;कन्यां पुरा प्रियतमां च षडाननस्य ॥ २०१॥ | |||
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| verse_lines = पुत्रो बभूव स तु लक्षणनामधेयः;सा लक्षणेत्यधिकरूपगुणाऽऽस कन्या ।;तस्यानुजाश्च निजयोग्यगुणा अवापुः;भार्याः पुनश्च स सुयोधन आप भार्याः(आप भार्याम्) ॥ २०२॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं सुरान्तक इति प्रथितः सुतोऽभूद्;दुःशासनस्य तदनु प्रतितप्यमानाः ।;दृष्ट्वैव पार्थबलवीर्यगुणान् समृद्धिं;तां चैव ते प्रतिययुः स्म कलिङ्गदेशम् ॥ २०३॥ | |||
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| verse_lines = आसीत् स्वयंवर उतात्र कलिङ्गराज-;पुत्र्याः सुवज्र इति यं प्रवदन्ति भूपाः ।;रौद्राद् वरादविजितस्य च तस्य कन्यां;दृप्तो बलात् स जगृहे धृतराष्ट्रसूनुः ॥ २०४॥ | |||
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| verse_lines = तत्राथ रुद्रवरतः स जरासुतेन;युक्तो बबन्ध च सुयोधनमाशु जित्वा ।;कर्णः पराद्रवदिह स्म सुतेषु पाण्डोः;यस्मात् स्पृधाऽगमदतः स पराजितोऽभूत् ॥ २०५॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनेऽनुजजनैः सह तैर्गृहीते;भीष्माम्बिकेयविदुराग्रजवाक्यनुन्नः ।;भीमो विजित्य नृपतीन् सजरासुतांस्तान्;हत्वा सुवज्रममुचद् धृतराष्ट्रपुत्रान् ॥ २०६॥ | |||
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| verse_lines = तेऽपि स्म कर्णसहिता मृतकप्रतीका;नागाह्वयं पुरमथाऽययुरप्यमीषाम् ।;दृष्ट्वा विरोधमवदन्नृपतिश्च धर्म-;पुत्रं पुरन्दरकृतस्थलमाशु याहि ॥ २०७॥ | |||
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| verse_lines = तत्रार्द्धराज्यमनुभुङ्क्ष्व सहानुजैस्त्वं;कोशार्द्धमेव च गृहाण पुरा हि शक्रः ।;तत्राभिषिक्त उत कञ्जभवादिदेवैः;तत्रस्थ एव स चकार चिरं च राज्यम् ॥ २०८॥ | |||
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| verse_lines = त्वं वीर शक्रसम एव ततस्तवैव;योग्यं पुरं तदत आश्वभिषेचयामि ।;इत्युक्त आह स युधिष्ठिर ओमिति स्म;चक्रेऽभिषेकमपि तस्य स आम्बिकेयः ॥ २०९॥ | |||
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| verse_lines = तस्याभिषेकमकरोत् प्रथमं हि कृष्णो;वासिष्ठनन्दन उरुर्भव चक्रवर्ती ।;यष्टाऽश्वमेधनिखिलात्मकराजसूय-;पूर्वैर्मखैः सततमेव च धर्मशीलः ॥ २१०॥ | |||
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| verse_lines = इत्येव पार्षतसुतासहितेऽभिषिक्ते;कृष्णोऽपि वृष्णिवृषभः स तथाऽभ्यषिञ्चत् ।;एवं च मारुतिशिरस्यभिषेकमेतौ;सञ्चक्रतुः स्म युवराजपदे सभार्यम् ॥ २११॥ | |||
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| verse_lines = भीमे च पार्षतसुतासहितेऽभिषिक्ते;ताभ्यामनन्तसुखशक्तिचिदात्मकाभ्याम् ।;अन्यैश्च विप्रवृषभैः सुकृतेऽभिषेके(सुकृताभिषेके);धर्मात्मजानु मुमुदुर्निखिलाश्च सन्तः ॥ २१२॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् महोत्सववरे दिनसप्तकानु-;वृत्ते वसिष्ठवृषभेण च वृष्णिपेन ।;कृष्णेन ते युयुरमा पृथया तया च;पाञ्चालराजसुतया स्थलमिन्द्रवासम् ॥ २१३॥ | |||
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| verse_lines = कोशस्य चार्द्धसहितास्तु यदैव पार्था;गच्छन्ति ताननुययुर्निखिलाश्च पौराः ।;ऊचुश्च हा बत सुयोधन एष पापो;दूरे चकार ननु पाण्डुसुतान् गुणाढ्यान् ॥ २१४॥ | |||
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| verse_lines = भीमप्रतापमवलम्ब्य कलिङ्गबन्धान्;मुक्तः सुतामपि हि तस्य पुरं निनाय ।;द्वेष्ट्येवमप्यतिबलान् हि सदैव पार्थान्;यामो वयं गुणिभिरद्य सहैव पार्थैः ॥ २१५॥ | |||
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| verse_lines = आज्ञापयत्यपि स भेरिरवेण पार्थान्;नैवानुगच्छत यदि व्रजथानु वोऽद्य ।;वित्तं हरिष्य इह सर्वमपीति तच्च;पापः करोतु न वयं विजहाम पार्थान् ॥ २१६॥ | |||
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| verse_lines = सद्भिर्हि सङ्गतिरिहैव सुखस्य हेतुः(सुखैकहेतुः);मोक्षैकहेतुरथ(मोक्षैकहेतुरुत) तद्विपरीतमन्यत् ।;तस्माद् व्रजेम सह पाण्डुसुतैर्हि शक्र-;प्रस्थं त्विति स्म धृतचेतस आह धार्मः(धर्मः) ॥ २१७॥ | |||
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| verse_lines = प्रीतिर्यदि स्म भवतां मयि सानुजेऽस्ति;तिष्ठध्वमत्र पितुरेव हि शासने मे ।;कीर्तिर्हि वोऽनुगमनात् पितुरत्ययेन;नश्येन्न इत्यनुसरध्वमिहाऽम्बिकेयम् ॥ २१८॥ | |||
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| verse_lines = इत्येव तैः पुरजना निखिलैर्निषिद्धाः;कृच्छ्रेण तस्थुरपि तान् मनसाऽन्वगच्छन् ।;प्राप्याथ शक्रपुरमस्मरतां च कृष्णौ;देवेशवर्धकिमथाऽगमदत्र सोऽपि ॥ २१९॥ | |||
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| verse_lines = वासिष्ठपेन यदुपेन च पाण्डवानां;रत्नोत्करं कुरु पुरं पुरुहूतपुर्याः ।;सादृश्यतस्त्विति नियुक्त उभौ प्रणम्य;सर्वेश्वरौ स कृतवांश्च पुरं तथैव ॥ २२०॥ | |||
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| verse_lines = देशं च नातिजनसंवृतमन्यदेश-;संस्थैर्जनैरभिपुपूरिर आशु पार्थाः ।;तेषां गुणैर्हरिपदानतिहेतुतश्च;राष्ट्रान्तरा इह शुभा वसतीः स्म चक्रुः ॥ २२१॥ | |||
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| verse_lines = प्रस्थाप्य दूरमनुजस्य सुतान् स राजा;चक्रेऽभिषेकमपि तत्र सुयोधनस्य ।;दुःशासनं च युवराजमसौ विधाय;मेने कृतार्थमिव च स्वमशान्तकामः ॥ २२२॥ | |||
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| verse_lines = पार्थाश्च ते मुमुदुरत्र वसिष्ठवृष्णि-;वर्योदितानखिलतत्त्वविनिर्णयांस्तु ।;शृण्वन्त एव हि सदा पृथिवीं च धर्माद्;भुञ्जन्त आश्रितरमापतिपादयुग्माः ॥ २२३॥ | |||
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<span id="gr-C20" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="विंशोऽध्यायः"></span> | |||
== विंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ यज्ञोरुदाननरदेववन्द्यताप्रश्नर्षिपूजासु युधिष्ठिरोऽभूत् ।;धर्मानुशास्तिहरितत्त्वशंसनस्वराष्ट्ररक्षादिषु भीम आसीत् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रीधर्मसंशासनभृत्यकोशरक्षाव्ययादौ गुणदोषचिन्तने ।;अन्तःपुरस्थस्य जनस्य कृष्णा त्वासीद्धरेर्धर्मनिदर्शनी च ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = बीभत्सुरासीत् परराष्ट्रमर्दने तेनानियम्यांस्तु जरासुतादीन् ।;स कीचकादींश्च ममर्द भीमस्तस्यैव ते बलतो नित्यभीताः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = राष्ट्रेषु भीमेन विमर्दितेषु जिताश्च युद्धेषु निरुद्यमास्ते ।;बभूवुरासीद्धरिधर्मनिष्ठः प्रायेण लोकश्च(लोकाश्च) तदीयशासनात् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = आजीविनां वेतनदस्तदाऽऽसीन्माद्रीसुतः प्रथमोऽथ द्वितीयः ।;सन्धानभेदादिषु धर्मराजपश्चाच्च खड्गी स बभूव रक्षन् ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नस्तत्र सेनाप्रणेता शक्रप्रस्थे नित्यमास्तेऽतिहार्दात् ।;विशेषतो भीमसखा स आसीद् राष्ट्रं चैषां सर्वकामैः सुपूर्णम् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = नावैष्णवो न दरिद्रो बभूव न धर्महानिश्च बभूव कस्यचित् ।;तेषां राष्ट्रे शासति भीमसेने न व्याधितो नापि विपर्ययान्मृतिः ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरं यान्ति हि दर्शनोत्सुकाः प्रतिग्रहायाप्यथ याजनाय ।;कार्यार्थिनो(कार्यार्थतो) नैव वृकोदरेण कार्याणि सिद्ध्यन्ति(सिद्धानि) यतोऽखिलानि ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्वविद्याधरचारणाश्च सेवन्त एतान्त्सततं समस्ताः ।;यथा सुरेन्द्रं मुनयश्च सर्व आयान्ति देवा अपि कृष्णमर्चितुम् ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = तेषां राष्ट्रे कार्तयुगा हि धर्माः प्रवर्तिता एव ततोऽधिकाश्च ।;वृद्धिश्च तस्मादधिका सुवर्णरत्नाम्बरादेरपि सस्यसम्पदाम् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = अथोपयेमे शिशुपालपुत्रीं युधिष्ठिरो देवकीं नाम पूर्वम्(पूर्वाम्) ।;स्वीयां भार्यां यत्सहजो धृष्टकेतुरनुह्लादः सवितुश्चांशयुक्तः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = तस्यां सुहोत्रो नामतः पुत्र आसीद् यश्चित्रगुप्तो नाम पूर्वं सुलेखः ।;कृष्णा सैवाऽप्यन्यरूपेण जाता काशीशपुत्री यां प्रवदन्ति कालीम् ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = सा केवला भारती नान्यदेव्यस्तत्राऽविष्टास्तत्कृते(तत्राविष्टा यत्कृते) काशिराजः ।;स्वयम्बरार्थं नृपतीनाजुहाव सर्वांस्तेऽपि ह्यत्र हर्षात् समेताः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = तेषां मध्ये भीमसेनांस एषा मालामधात् तत्र जरासुताद्याः ।;क्रुद्धा विष्णोराश्रितानाक्षिपन्त आसेदुरुच्चैः शिवमास्तुवन्तः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं वाक्यैर्वैदिकैस्तान्स भीमो जिग्ये तर्कैः साधुभिः सम्प्रयुक्तैः ।;वेदा ह्यदोषा इति पूर्वमेव संसाधयित्वैव सदागमैश्च ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = वेदाधिक्यं शैवशास्त्राणि चाऽहुर्वेदोज्झितानां बहुलां च निन्दाम् ।;तथा शाक्तेयस्कान्दसौरादिकानां तत्रैवोक्तं छन्दसां वैष्णवत्वम् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = विष्णोराधिक्यं तानि शास्त्राणि चाऽहुः शिवादिभ्यः कुत्रचिन्नैव वेदे ।;विष्णूत्कृष्टः(विष्णूत्कर्षः) कथितो बौद्धपूर्वाश्चाऽहुर्विष्णुं परमं सर्वतोऽपि ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = तेष्वागमेष्वेव परस्परं च विरुद्धता ह्यन्यपक्षेषु भूपाः ।;प्रत्यक्षतश्चात्र पश्यध्वमाशु बलं बाह्वोर्मे विष्णुपदाश्रयस्य ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं हि गङ्गा मम विष्णुपूजाविघ्नार्थमायाद् वामकरेण सा मे ।;नुन्ना परस्ताद् बहुयोजनं गता पुरे कुरूणां शिव आगतस्तदा ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = स व्याघ्ररूपी कपिलात्मिकामुमां(कपिलात्मकामुमां) परीक्षयन् मां हन्तुमिवाऽद्रवद् द्रुतम् ।;स मे युद्धे विजितो मूर्च्छितश्च गदाप्रहारादास लिङ्गान्तरस्थः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = व्याघ्रेश्वरं नाम लिङ्गं पृथिव्यां ख्यातं तदास्ते तद्वदन्यत्र युद्धे ।;तीरे गोमत्या हैमवते गिरौ हि जितस्तत्राप्यास शार्दूललिङ्गम् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = एवं प्रत्यक्षे विष्णुपदाश्रयस्य बलाधिक्ये किमु वक्तव्यमत्र ।;विष्णोराधिक्ये क्षत्रियाणां प्रमाणं बलं विप्रे ज्ञानमेवेति चाऽहुः ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = मया केदारे विप्ररूपी जितश्च रुद्रोऽविशल्लिङ्गमेवाऽशु भीतः ।;ततः परं वेदविदामगम्यताशापं प्रादाच्छङ्करो व्रीडितोऽत्र ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = एवं प्रत्यक्षे विष्णुबले प्रतीपं मनो यस्य ह्युत्तरं स ब्रवीतु ।;क्रोधोऽधिकश्चेत् क्षिप्रमायातु योद्धुमित्युक्तास्तेऽभ्याययुरात्तशस्त्राः ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = विद्राप्य(विद्राव्य) तान् बाणसङ्घैः समस्तान् जरासुतं गदया योधयित्वा(पोथयित्वा) ।;बाहुभ्यां चैनं परिगृह्याऽशु विष्णोः पादोत्थायां(पादोत्थायां) प्राक्षिपद् देवनद्याम् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = स व्रीडितः प्रययौ मागधांश्च भूपैः समेतो भीमसेनो रथं स्वम् ।;आरुह्य काशीश्वरपूजितश्च ययौ काल्या शक्रसनामकं पुरम् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = तस्यां त्रिलोकाधिकरूपसद्गुणैरासम्मितायां (आसम्मतायां) रममाणः सुतं च ।;शर्वत्रातं(शर्वत्रातः) नामाजनयत्(नाम्नाऽजनयत्) पुरा यः समानवायुर्बलवीर्ययुक्तः ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽपि गत्वा द्वारवतीं सरामः सत्यापितुर्वधकर्तारमेव ।;शतधन्वानं हन्तुमैच्छत् स चैव (याचे)ययाचेऽक्रूरं कृतवर्मानुयुक्तम् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = तावब्रूतां (सर्वलोकैकभर्तुः)सर्वलोकैककर्तुर्नाऽवां विरोधं मनसाऽपि कुर्वः ।;कृष्णस्य सर्वेशितुरित्यनूक्त(इति अनु उक्तम्) आरुह्य चाश्वीं(अश्वीं) भयतः पराद्रवत् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = अन्वेव तं कृष्णरामौ रथेन यातौ शतं योजनानां दिनेन ।;गत्वा मृतायां वडवायां पदैव स प्राद्रवत्(सम्प्राद्रवत्) कृष्ण एनं पदाऽगात् ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = छित्वा शिरस्तस्य चक्रेण कृष्णो जानन्नक्रूरे मणिमेनेन दत्तम् ।;अप्यज्ञवल्लोकविडम्बनाय परीक्ष्य वासोऽत्र नेत्याह रामम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = अविश्वासात् सतु सक्रोध एव ययौ विदेहानवसत् पञ्च चाब्दान् ।;जानन् पार्थेभ्योऽहार्यतां केशवस्य वशीकर्तुं धार्तराष्ट्रो बलं गात् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = बभूव शिष्योऽस्य तथा गदायामसन्निधानं केशवस्य प्रतीक्षन् ।;तदा ययाचे भगिनीं च तस्य स च प्रतिज्ञामकरोत् प्रदाने ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = ज्येष्ठं ह्येनं केशवो नातिवर्तेदित्येव मेने धार्तराष्ट्रः स तस्मात् ।;जग्राह हस्तं दक्षिणं सत्यहेतोर्ददौ च रामः करमस्मै हलाङ्कम् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = रूपेण तस्या मोहितो धार्तराष्ट्रो विशेषतः कृष्णरामौ भगिन्याः ।;स्नेहाद् वशं यास्यत इत्यगृह्णाद्धस्तं हलाङ्कं हलिनो रिपुघ्नम् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = जाता देवक्यां सा सुभद्रेति नाम्ना भद्रा रूपेणाऽनकदुन्दुभेस्ताम् ।;कृत्वा पुत्रीं रोहिणी स्वामरक्षत् पूर्वं तु याऽऽसीत् त्रिजटैव नाम्ना ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = सीतायाः प्राङ् नित्यशुश्रूषणात् सा बभूव विष्णोर्भगिनी प्रिया च ।;उमावेशाद् रूपगुणोपपन्ना पद्मेक्षणा चम्पकदामगौरी ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = एतत् कृत्वा धृतराष्ट्रात्मजः स ययौ कुरून् निवसत्यत्र रामे ।;कृष्णोऽक्रूरं विवसन्तं भयेन सहार्दिक्यं चाऽनयित्वा जगाद ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = आनीय रामं च समस्तसात्त्वतां यदाऽवादीत् केशवः सन्निधाने ।;मणिस्त्वय्यास्ते दर्शयेत्येव भीतस्तदाऽक्रूरोऽदर्शयद् रत्नमस्मै ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = अव्याजतामात्मनो दर्शयित्वा हलायुधे केशवस्तस्य जानन् ।;रत्नाकाङ्क्षामुग्रसेनस्य चैव मातुश्च साम्बस्य पुनर्बभाषे ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = आस्तामक्रूरे मणीरन्यैरधार्यः सदा यज्ञाद् दानपतेः स धार्यः ।;न सत्या कृष्णावाञ्छितं किञ्चिदिच्छेत् तथाऽपि तस्या योग्य इत्याह कृष्णः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = लब्ध्वा रत्नं दानपतिः सदैव सन्दीक्षितोऽभूद् यज्ञकर्मण्यतन्द्रः ।;प्रदर्श्य कृष्णो हलिने रत्नमेतच्छक्रप्रस्थं पाण्डवस्नेहतोऽगात् ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = वसन्नजस्तत्र बहूंश्च मासान् सफल्गुनोऽयान्मृगयां कदाचित् ।;हत्वा मृगान् यमुनातीरसंस्थः सोऽन्यां काळिन्दीं ददृशे तत्स्वसारम् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = सा सूर्यपुत्री यमुनानुजाता तपश्चरन्ती कृष्णपत्नीत्वकामा ।;पृष्टाऽर्जुनेनाऽह समस्तमेतत् पत्नीं च तां जगृहे वासुदेवः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = ततो गत्वा नग्नजितो गृहं च स्वयंवरे सप्त वृषान्गृह्णात्(अगृह्णत्) ।;सर्वैरग्राह्यानसुरान् वरेण शिवस्य यैर्निर्जिता भूमिपालाः ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = ततो नीलां तस्य सुतां च लेभे पूर्वं नीला गोपकन्याऽपि याऽसीत् ।;सा देहेऽस्याः प्राविशत् पूर्वमेषा यस्मादेका द्विविधा सम्प्रजाता ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = पितृष्वसुर्मित्रविन्दा सुता च कृष्णे मालामासजद् राजमध्ये ।;विन्दानुविन्दौ भ्रातरावेव तस्या न्यषेधतां धार्तराष्ट्रार्थमुग्रौ ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = जित्वाऽऽवन्त्यौ तौ नृपतींश्चैव सर्वानादाय तां प्रययौ वासुदेवः ।;पितृष्वसुस्तनयां च द्वितीयां भद्रां दत्तामग्रहीद् भ्रातृभिः सः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = विश्वेषां देवानामवतारा हि पञ्च ते कैकेया(कैकया) भ्रातरोऽस्या हरेश्च ।;भक्ता नित्यं पाण्डवानां च तातोऽप्येषां वशे शैव्यनामर्भुरग्रे ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = स्वयंवरो लक्षणायास्तथाऽऽसीद् यथा द्रौपद्या लक्ष्यवेधात्मकः(लक्षवेधात्मकः) सः ।;मद्रेषु तस्याश्च पिता पिनाकं स्वयंवरार्थं जगृहे गिरीशात् ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = लक्षं च तत् सर्वतश्छन्नमेव द्वारं शरस्याप्युपरि स्म लक्षात् ।;छिन्नेषुणा पातनीयं ह तद्धि द्रौपद्यर्थात् तदशक्यं ततोऽलम् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = तत्राऽजग्मुर्मागधाद्याश्च सर्वे पार्था अपि द्रष्टुमिहाभ्युपाययुः ।;दुर्योधनाद्याश्च ससूतपुत्रा सज्यीकर्तुं धनुरप्युत्सहन्ते ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = केचिन्निपेतुर्धनुषैव ताडिता नवै केचिच्चालयितुं च शेकुः ।;दुर्योधनो मागधः सूतपुत्रः सज्यं कृत्वा लक्ष्यवीक्षां न शेकुः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = धनञ्जयः स्वात्मबलं(धनञ्जयः सु आत्मबलं) प्रकाशयन् सज्जं कृत्वा धनुरैक्षच्च लक्ष्यम् ।;नैवाऽददे बाणमनिच्छयैव तत् प्राप्यां जानन् केशवेनैव तां च ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = भीमश्चापं लक्षमप्येतदत्र द्रष्टुं च नैवैच्छदरीन्द्रधारिणः ।;योग्ये (कर्मन्यायतश्च)कर्मण्यायतंश्चापराधी स्यादित्यञ्जः पश्यमानो महात्मा ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णस्ततश्चापमधिज्यमाशु कृत्वाऽचिन्त्यश्छिन्नबाणेन लक्ष्यम्(लक्षम्) ।;अपातयद् दुन्दुभयश्च दिव्या नेदुः प्रसूनं ववृषुः सुराश्च ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णे ब्रह्माद्यैः स्तूयमाने नरेन्द्रकन्या मालां केशवांसे निधाय ।;तस्थावुपास्याथ सर्वे नरेन्द्रा युद्धायागुः केशवं स्वात्तशस्त्राः ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = विद्राप्य(विद्राव्य) तान् मागधादीन् स कृष्णो भीमार्जुनाभ्यां सहितः पुरीं स्वाम् ।;ययावेता अष्ट महामहिष्यः कृष्णस्य दिव्या लोकसुन्दर्य इष्टाः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = रामेण तुल्या जाम्बवती प्रियत्वे कृष्णस्यान्याः किञ्चिदूनाश्च तस्याः ।;यदाऽऽवेशो बहुलः स्याद् रमायास्तदा तासु प्रीयते केशवोऽलम् ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = एवं कृष्णे द्वारकामध्यसंस्थे गिरिं भूपा रैवतकं समाययुः ।;दुर्योधनाद्याः पाण्डवाश्चैव सर्वे(पाण्डवाश्चैव तत्र) नानादेश्या ये च भूपालसङ्घाः ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = आत्मानं तान् द्रष्टुमभ्यागतान् स कृष्णो गिरौ रैवतके ददर्श ।;नमस्कृते सर्वनरेन्द्रमुख्यैः कृष्णे वैदर्भ्या सह दिव्यासनस्थे ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = एत्याऽकाशान्नारदः कृष्णमाह सर्वोत्तमस्त्वं त्वादृशो नास्ति कश्चित् ।;इत्याश्चर्यो धन्य इत्येव शब्दद्वये तूक्ते वासुदेवस्तमाह ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = दक्षिणाभिः साकमित्येव कृष्णं पप्रच्छुरेतत् किमिति स्म भूपाः ।;नारायणो मुनिमूचे वदेति शृणुध्वमित्याह स नारदोऽपि ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = कूर्मो दृष्टो विष्णुपद्यां मयोक्तस्त्वमुत्तमो नास्ति समस्तवेति(नास्त्यधिकस्तवेति) ।;ऊचे गङ्गामुत्तमां सा जलेशमुमामूचे पृथिवीनामिकां सः ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = या मादृशा देवताः सर्वशस्ता धृतास्तया प्रथितत्वात् पृथिव्या ।;शिवं शेषं गरुडं चाऽह साऽपि परावनात्(परज्ञानात्, परावानात्) पर्वतनामधेयान् ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = तैरेवाहं मत्समाश्चैव देव्यो ध्रियन्त इत्येव त ऊचिरेऽथ ।;ब्रह्माणमेवोत्तममाह सोऽपि वेदात्मिकां प्रकृतिं विष्णुपत्नीम् ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = सैका देवी बहुरूपा बभाषे युक्ता यदाऽहं ज्ञेन नारायणेन ।;यज्ञक्रियामानिनी यज्ञनाम्नी तदोत्तमा तत्प्रवेशात्(तदावेशात्) तदाख्या ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = विष्ण्वाविष्टा यज्ञनाम्नी तदङ्कस्थिता सोचे केशवो ह्युत्तमोऽलम् ।;न तत्समश्चाधिकोऽतः(न तत्समश्चाभ्यधिकः) कुतः स्यादृषे सत्यं नान्यथेति स्म भूयः(भूपाः) ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = तयोक्तोऽहं नावतारेषु कश्चिद् विशेष इत्येव यदुप्रवीरम् ।;सर्वोत्तमोऽसीत्यवदं स चाऽह न केवलं मेऽङ्कगायाः श्रियोऽहम् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = सदोत्तमः किन्तु यदा तु सा मे वामार्द्धरूपा दक्षिणानामधेया ।;यस्मात् तस्या दक्षिणतः स्थितोऽहं तस्मान्नाम्ना दक्षिणेत्येव सा स्यात् ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = सा दक्षिणामानिनी देवता च सा च स्थिता(साऽवस्थिता) बहुरूपा मदर्द्धा ।;वामार्द्धो मे तत्प्रविष्टो यतो हि ततोऽहं स्यामर्द्धनारायणाख्यः ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = तदाऽप्यस्या उत्तमोऽहं सुपूर्णो न मादृशः कश्चिदस्त्युत्तमो वा ।;इत्येवावादीद् दक्षिणाभिः सहेति सर्वोत्तमत्वं(सदोत्तमत्वं) दक्षिणानां स्मरन् सः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = ताभिश्चैताभिर्दक्षिणाभिः समेताद् वरिष्ठोऽहं जगतः सर्वदैव ।;मत्सामर्थ्यान्नैव चानन्तभागो दक्षिणानां विद्यते नारदेति ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = उक्तं कृष्णेनाप्रतिमेन भूपा अन्योत्तमत्वं दक्षिणानां च शश्वत् ।;सेयं भैष्मी दक्षिणा केशवोऽयं तस्याः श्रेष्ठः पश्यत राजसङ्घाः ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्यक्षं वो वीर्यमस्यापि कुन्त्या युद्धेऽर्थितः केशवो वीर्यमस्यै ।;अदर्शयत् पाण्डवान् धार्तराष्ट्रान् भीष्मद्रोणद्रौणिकृपान् सकर्णान् ।;निरायुधांश्चक्र एकक्षणेन(एकः क्षणेन) लोकश्रेष्ठान् दैवतैरप्यजेयान् ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = व्रतं भीमस्यास्ति नैवाभि कृष्णमियामिति स्माऽज्ञया तस्य विष्णोः ।;चक्रं रथस्याग्रहीत् स प्रणम्य कृष्णं स तं केशवोऽपाहरच्च ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = एवं क्रीडन्तोऽप्यात्मशक्त्या प्रयत्नं कुर्वन्तस्ते विजिताः केशवेन ।;ततः सर्वे नेमुरस्मै पृथा च सविस्मया वासुदेवं ननाम ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = एवं विधान्यद्भुतानीह कृष्णे दृष्टानि वः शतसाहस्रशश्च ।;तस्मादेष ह्यद्भुतोऽप्युत्तमश्चेदुक्ता(ह्यद्भुतोऽत्युत्तमः) नेमुस्तेऽखिला वासुदेवम् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = वाय्वाज्ञया वायुशिष्यः स सत्यमित्याद्युक्त्वा नारदो रुक्मिणीं च ।;स्तुत्वा पुष्पं पारिजातस्य दत्वा ययौ लोकं क्षिप्रमब्जोद्भवस्य ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = साक्षात् सत्या रुक्मिणीत्येकसंविद् द्विधाभूता नात्र भेदोऽस्ति कश्चित् ।;तथाऽपि सा प्रमदानां स्वभावप्रकाशनार्थं(स्वभावप्रदर्शनार्थं) कुपितेवाऽस सत्या ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = साकं रुक्मिण्या राजमध्ये प्रवेशात् स्तवादृषेः पुष्पदानाच्च देवीम् ।;कोपाननं दर्शयन्तीमुवाच विडम्बार्थं कामिजनस्य कृष्णः ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = दातास्म्यहं पारिजातं तरुं त इत्येव तत्राथाऽगमद् वासवोऽपि ।;सर्वैर्देवैर्भौमजितोऽप्यदित्यास्तेनैवाथो कुण्डलाभ्यां हृताभ्याम् ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = तदैवाऽगुर्मुनयस्तेन नुन्ना(तुन्नाः) बदर्यास्ते सर्व एवाऽशु कृष्णम् ।;ययाचिरे भौमवधाय नत्वा स्तुत्वा स्तोत्रैर्वैदिकैस्तान्त्रिकैश्च ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रेण देवैः सहितेन याचितो विप्रैश्च सस्मार विहङ्गराजम् ।;आगम्य नत्वा पुरतः स्थितं तमारुह्य सत्यासहितो ययौ हरिः ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = नित्यैव या प्रकृतिः स्वेच्छयैव जगच्छिक्षार्थं द्वादशीं भीमसञ्ज्ञाम् ।;उपोष्य बभ्रे कोटिधाराजलस्य विष्णोः प्रीत्यर्थं सैव हि सत्यभामा ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = तया युक्तो गरुडस्कन्धसंस्थो दूरानुयातो वज्रभृताऽप्यनुज्ञाम् ।;दत्वाऽमुष्मै प्रययौ वायुजुष्टामाशां कृष्णो भौमवधे धृतात्मा ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = भौमो ह्यासीद् ब्रह्मवरादवध्यो न शस्त्रभृज्जीयस इत्यमुष्मै ।;दत्तो वरो ब्रह्मणा तद्वदेव तस्यामात्यानां तद्वदवध्यता च ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = भौमेन जेयत्वमपि(जय्यत्वमपि) ह्यमीषां दत्तं भौमाय ब्रह्मणा क्रोडरूपात् ।;विष्णोर्जातायास्य दुर्गं च दत्तं प्राग्ज्योतिषं नाम पुरं समस्तैः ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = आसीद् बाह्ये गिरिदुर्गं तदन्तः पानीयदुर्गं मौरवं पाशदुर्गम् ।;तस्याप्यन्तः क्षुरधारोपमं तत्पाशाश्च ते षट्सहस्राः सुघोराः ।;अभेद्यत्वमरिभिरतार्यता च दत्ता दुर्गाणां ब्रह्मणाऽऽराधितेन ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = तस्यामात्याः पीठमुरौ निसुम्भहयग्रीवौ पञ्चजनश्च शूराः ।;सङ्कल्प्य तान् लोकपालानहं च ब्रह्मेत्यद्धा भाषमाणः स आस्ते ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = हन्तुम् कृष्णो नरकं तत्र गत्वा गिरिदुर्गं(गिरिं दुर्गं) गदया निर्बिभेद ।;वायव्यास्त्रेणोदकं शोषयित्वा चकर्त खड्गेन मुरस्य पाशान् ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = अथाभिपेतुर्मुरपीठौ निसुम्भहयग्रीवौ पञ्चजनश्च दैत्याः ।;ताञ्छैलशस्त्रास्त्रशिलाभिवर्षिणश्चक्रे व्यसूंश्चक्रनिकृत्तकन्धरान् ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = तेषां सुताः सप्तसप्तोरुवीर्या वरादवध्या गिरिशस्याभिपेतुः ।;तानस्त्रशस्त्राभिमुचः शरोत्तमैः समर्पयामास स मृत्यवेऽच्युतः ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = हत्वा पञ्चत्रिंशतो मन्त्रिपुत्रान् जगाम भौमस्य सकाशमाशु ।;श्रुत्वा भौमः कृष्णमायातमारादक्षोहिणी(अक्षौहिणी)त्रिंशकेनाभ्ययात् तम् ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = जघ्ने सेनां गरुडः पक्षपातैः पादं शेषां केशवः सायकौघैः ।;अथाऽससादाऽशु भौमोऽच्युतं तं (मुञ्चन् बाणान्) मुञ्चञ्छरानस्त्रसम्मन्त्रितान् द्राक् ।;विव्याध तं केशवः सायकौघैर्भौमः शतघ्नीं ब्रह्मदत्ताममुञ्चत् ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = अच्छेद्योऽभेद्यो नित्यसंवित्सुखात्मा नित्याव्ययः पूर्णशक्तिः स कृष्णः ।;निगीर्य तां देववरः शतघ्नीं नित्याश्रान्तोऽदर्शयच्छ्रान्तवत् स्वम् ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = बहून् वरान् ब्रह्मणोऽन्येष्वमोघान् मोघीकृतान् वीक्ष्य परात्परेशः ।;भवेत् कथञ्चिद् बहुमानेन युक्त(बहुमानयुक्तः) इत्येव कृष्णोऽदर्शयच्छ्रान्तवत् स्वम्(श्रान्तवच्च) ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = तदा दृप्तं नरकं वीक्ष्य देवी सत्याऽऽददे कार्मुकं शार्ङ्गसञ्ज्ञम् ।;चकार तं यतमानं च भौमं निरायुधं विरथं च क्षणेन ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = आलिङ्ग्य कृष्णः सत्यभामां पुनश्च रथान्तरे संस्थितं भौममुग्रम् ।;सृजन्तमस्त्राण्यरिणा निकृत्तकन्धं(निकृत्तकन्धरं) मृत्योरर्पयामास शीघ्रम् ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = स मन्त्रिभिर्मन्त्रिपुत्रैः समेतो जगाम कृष्णावज्ञयाऽन्धंतमश्च ।;तदाविष्टो वायुरगाच्च कृष्णमन्तःपुरं प्राविशत् सत्ययेशः ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = तदा भूमिः पञ्चभूतावरा या यस्यां जज्ञे नरकः श्रीवराहात् ।;मूलप्रकृत्यैव भूम्या नितान्तमाविष्टा या साऽगमत् कृष्णपादौ ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = साऽदित्यास्ते कुण्डले पादयोश्च निधाय पौत्रं भगदत्तसञ्ज्ञम् ।;समर्पयामास तस्याभिषेकं प्राग्ज्योतिषे कारयामास कृष्णः ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = संस्थाप्य तं सर्वकिरातराज्ये भौमाहृतं वैश्रवणाद् बलेन ।;शिवेन दत्तं धनदायातिसत्त्वं भगदत्तेऽधात्(न्यदधात् सुप्रतीकम्) सुप्रतीकं रमेशः ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = करीन्द्रमेकं तं निधायैव तस्मिन् कृत्वा प्रसादं च वसुन्धरायाः ।;चतुर्दन्तान् षट्सहस्रान् करीन्द्रान् पयोब्धिजान् प्राहिणोद् द्वारवत्यै ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = नराधिपान् देवगन्धर्वनागान् जित्वाऽऽनीतं हेमरत्नोच्चराशिम् ।;शतद्वयं योजनानां समृद्धं समन्ततः प्राहिणोत् स्वां पुरीं सः ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = महावीर्यैर्नैर्ऋतै राक्षसेन्द्रैर्भौमानीतैर्निर्ऋतिं योधयित्वा ।;स प्राहिणोत् सर्वरत्नोच्चराशिं गजांश्च नारायण आदिदेवः ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = तत्रापश्यत् कन्यका भूमिपानां भौमानीताः समरे तान् विजित्य ।;द्व्यष्टौ सहस्राणि शतं च रूपशीलोदारा अक्षताः सद्व्रतस्थाः ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = काश्चित् तत्राऽसन् देवगन्धर्वकन्यास्तासां प्रधाना त्वष्टृपुत्री कशेरुः ।;पुत्रा अग्नेः पूर्वमासंश्च तेऽथ स्त्रीत्वप्राप्त्यै चक्रुरुग्रं तपश्च ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = भार्यात्वार्थे वासुदेवस्य योषित्तनुं तासामिच्छतीनां समीरः ।;अदाद् वरं तपसाऽऽराधितः सन् स्त्रीभूतास्ते बदरीं सम्प्रजग्मुः ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = नारायणं तत्र शुश्रूषमाणाः प्राप्याप्सरस्त्वं राजकुलेषु जाताः ।;काश्चित् स्वर्गे ता निशाम्यैव(निशम्यैव) कृष्णं वव्रुः पतिं सर्वगुणाभिरामम् ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = आजानदेवैः सर्वगुणैः समास्ताः स्वभावतोऽथेन्दिरावेशतोऽतः ।;गुणाधिकास्ताः शिबिकासु कृष्ण आरोपयित्वा प्राहिणोद् द्वारवत्यै ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = समन्ततो योजनानां शते द्वे प्रवृद्धमिन्द्रस्य स रत्नपर्वतम् ।;नित्यामृतस्रावि जलेश्वरस्य च्छत्रं च दोर्भ्यां गरुडे न्यधाद्धरिः ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = स्वयं च सत्यासहितः समारुहत् स चाश्रमेणैव ययौ त्रिविष्टपम् ।;अभिप्रयातोऽखिललोकपालैर्जनार्दनः शक्रगृहं विवेश ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = सम्पूजितः सत्यभामासहायः शक्रेण शच्या सहितेन सादरम् ।;ददावदित्या अपि कुण्डले शुभे समस्तदेवैर्मुनिभिश्च वन्दितः ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = तमासुरावेशवशादजानती सत्यां च सर्वप्रभवौ जगत्प्रभू(जगत्गुरू) ।;निर्दोषसौख्यैकतनू शुभाशिषस्ताभ्यां ददौ साऽदितिरात्मपुत्रवत् ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = अथो सदानन्दचिदात्मदेहः न नन्दनोद्यानमजोऽनुरूपया ।;अनन्तशक्तिः सह सत्यभामया विवेश रन्तुं प्रिययाऽखिलेश्वरः ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = तयाऽच्युतोऽसौ कनकावदातया सुकुङ्कुमादिग्धपिशङ्गवाससा ।;पूर्णेन्दुकोट्योघजयन्मुखाब्जया रेमेऽमितात्मा जगदेकसुन्दरः ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = सर्वर्तुनित्योदितसर्ववैभवे सुरत्नचामीकरवृक्षसद्वने ।;सदैव पूर्णेन्दुविराजिते हरिश्चचार देव्या पवनानुसेविते ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = विदोषसंवित्तनुरत्र सत्तरुं ददर्श सत्याऽमृतमन्थनोद्भवम् ।;सा पारिजातं मणिकाञ्चनात्मकं समस्तकामप्रदमार्तिहारिणम् ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव तं सुस्मितचन्द्रिकास्फुरन्मुखारविन्दाऽसितलोललोचना ।;कपोलनिर्भातचलत्सुकुण्डला जगाद देवाधिपतिं पतिं सती ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = तरुर्जगज्जीवद मे गृहाङ्गणे संस्थापनीयोऽयमचिन्त्यपौरुष ।;इतीरितस्तां कलशोपमस्तनीमालिङ्ग्य देवस्तरुमुद्बबर्ह ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = स तेन वृक्षेण सहैव केशवस्तया च देव्याऽऽरुहदग्र्यपौरुषम् ।;खगेश्वरं तच्च निशम्य शच्या प्रचोदितो वासव आगमत् सुरैः ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = तानासुरावेशयुतान् हरेश्च बलप्रकाशाय समुद्यतान् सुरान् ।;न्यवारयच्छार्ङ्गशरासनच्युतैर्हरिप्रिया बाणवरैः समस्तशः ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = निरायुधं वैश्रवणं चकार चिक्षेप चाब्धौ गरुडो जलेश्वरम्(जलेशम्) ।;प्रधानवायोस्तनयं तु वायुं कोणाधिपं वह्नियमादिकानपि ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = विबोध्य शार्ङ्गोत्थरवैः स्वकां तनुमावेशितानामसुरैरगाद्धरिः ।;ते बोधितास्तेन रणं विसृज्य ययुर्विदित्वा तमनादिपूरुषम् ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = शिवं च शक्रार्थमुपागतं हरिर्व्यद्रावयच्छार्ङ्गविनिःसृतैः शरैः ।;सवाहनो दूरतरे निपातितो गरुत्मता शम्भुरगाच्छराहतः ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = विद्राविते बाणगणैश्च शौरिणा हरे हरौ वज्रमवासृजद् द्रुतम् ।;शक्रोऽग्रहीत् तं प्रहसन् जनार्दनः करेण वामेन च चापजग्मिवान् ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = अपाहसत् तं जगदेकसुन्दरी हरिप्रियाऽथो जगदेकमातरम् ।;उवाच शक्रो जगतां जनित्रे प्रदर्शयामो वयमात्मशैशवम् ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = जगाम चाथो शरणं जनार्दनं सुरैर्वृतो देवपतिः क्षमापयन् ।;शृङ्गं च दत्वा मणिपर्वतस्य प्रणम्य देव्या सहितं जगद्गुरुम् ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = ययाच एनं परिरक्षणाय शचीपतिः केशवमर्जुनस्य ।;जगाद कृष्णोऽपि धरातलस्थिते न मय्यमुं कश्चन जेष्यतीति ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = तमर्जुनार्थं वरमाप्य वासवः पुनःपुनश्चक्रधरं प्रणम्य ।;प्रसन्नदृष्ट्या हरिणाऽभिवीक्षितो ययौ महाभागवतः स्वमालयम् ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽप्यनुज्ञाप्य पुरन्दरं पुरीं निजां व्रजन्नभ्यधिकं व्यरोचत ।;किरीटधारी वरकुण्डलोल्लसन्मुखाम्बुजः पीतपटः सुकौस्तुभः ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = विरोचमानस्य सदा जगत्प्रभोर्नवै विशेषः क्वचिदच्युतस्य ।;तथाऽपि तत् स्मारयितुं वचो भवेदपेक्ष्य चाल्पज्ञमतिं पुराणगम् ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = प्रविश्य चेशः स्वपुरीं स यादवैः सुपूजितोऽन्तःपुरमेत्य चाङ्गणे ।;तरुं प्रियाया न्यदधाद् गृहस्य सहैव शृङ्गेण च रत्नसद्गिरेः ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = प्रदाय रत्नानि च सर्वसात्त्वतां यथेष्टतस्ता अपि कन्यकाः प्रभुः ।;उद्वाह्य रेमे पृथगेव रत्नप्रासादसंस्थाभिरनन्तरूपः ॥ १३८॥ | |||
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| verse_lines = पृथक्पृथक् तासु दशैव पुत्रकानधत्त(पुत्रकान् न्यधत्त) कन्यामपि सर्वशः प्रभुः ।;प्रद्युम्नसाम्बावपि भानुचारुदेष्णौ च तेषां नितरां गुणाधिकाः ॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = विवस्वतो योऽवरजोऽदितेः सुतः ख्यातश्च नाम्ना सवितेति कृष्णात् ।;जातः स सत्याजठरेऽत्र नाम्ना भानुस्तु भैष्म्या अपि चारुदेष्णः ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = स चारुदेष्णोऽपि हि विघ्नराजो येऽन्ये च कृष्णस्य सुताः समस्ताः ।;ते चैव(ते चापि) गीर्वाणगणास्तथाऽन्ये ये द्वारकायां निवसन्ति सर्वे ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = अज्ञानतस्तैरभियोधितः स जिगाय सर्वानपि वासुकिं च ।;विद्राप्य बाणैरथ रत्नसञ्चयान् समाददे नेमुरमुं ततस्ते ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = तैः पूजितः साम्बसहाय आशु मयं च मायाविनमस्त्रवर्षैः ।;विजित्य रुन्धानमनेन पूजितो ययौ रथेनाम्बरगेन नाकम् ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = तत्रैव कृष्णेन तु पारिजाते हृते जयन्तं प्रजिगाय चाऽजौ ।;संस्पर्धयाऽऽयातममुष्य(सस्पर्धयाऽऽयान्तं) चानुजं साम्बोऽजयद् वृषभं नाम शस्त्रैः ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्राणि तावस्त्रवरैर्निहत्य(तावस्त्रवर्षैर्निहत्य) तयोश्च ताभ्यां प्रतिदग्धयानौ ।;विद्राप्य तौ बाणवरैः सुरेन्द्रसम्पूजितौ ययतुर्विद्यया खे ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = स विद्यया साम्बमुदूह्य रत्या प्रदत्तया रुगक्मि(ग्मि)णिनन्दनः पुरीम् ।;ययौ ततो नारद आगमद् द्रुतं ज्ञातुं हरेर्बहुभार्यासु वृत्तिम्(प्रवृत्तिम्) ॥ १४७॥ | |||
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| verse_lines = तं द्व्यष्टसाहस्रगृहेषु दृष्ट्वा तावत्स्वरूपैर्विहरन्तमेकम् ।;सुविस्मितः प्रययौ तं प्रणम्य शक्रप्रस्थं पूजितश्चात्र पार्थैः ॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = स आज्ञया ब्रह्मण आह कृष्णां क्रमात् कर्तुं भीम एवैकसंस्थाम् ।;अन्या देवीः स्वापयित्वा शरीरे तस्या भारत्याः पूर्णभोगार्थमेव ॥ १४९॥ | |||
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| verse_lines = सुन्दोपसुन्दौ भ्रातरौ ब्रह्मवाक्यात् परस्परादन्यतो नैव वध्यौ ।;तिलोत्तमार्थे निहतौ परस्परं तयोर्वधार्थे सृष्टया(तयोर्वधार्थेऽसृष्ट या तेन) तेन दैत्यौ ॥ १५०॥ | |||
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| verse_lines = अतः पृथग् वत्सरतो भवत्सु क्रमात् कृष्णा तिष्ठतां योऽन्ययुक्ताम् ।;पश्येद् वोऽसौ वत्सरं(पश्येद् वो संवत्सरं) तीर्थयात्रां कुर्यादिति स्माथ चक्रुस्तथा ते ॥ १५१॥ | |||
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| verse_lines = ततः कदाचिद् धर्मराजेन युक्तां शस्त्रागारे विप्रगोरक्षणार्थम् ।;शस्त्रादित्सुः फल्गुनोऽद्राक् स शस्त्रैर्दस्यून् हत्वा तीर्थयात्रोन्मुखोऽभूत् ॥ १५२॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिराद्यैः सौहृदाद् वारितोऽपि ययौ सत्यार्थं स कदाचिद् द्युनद्याम् ।;कुर्वन् स्नानं मायया नागवध्वा हृतो लोकं भुजगानां क्षणेन ॥ १५३॥ | |||
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| verse_lines = तस्याः पिता गरुडेनाऽत्तपत्युः पुत्राकाङ्क्षी चोदयामास पार्थम् ।;(संवत्सरं ब्रह्मचर्यं, संवत्सरब्रह्मचर्ये) संवत्सरब्रह्मचर्यं तु पार्थैः कृष्णाहेतोः समये साधु बद्धम् ॥ १५४॥ | |||
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| verse_lines = पुनःपुनर्याच्यमानः स पार्थः पुत्रार्थमस्या भुजगेन तस्याम् ।;उत्पादयामास सुतं कुजांशं नाम्नैरावन्तं वरुणावेशयुक्तम् ॥ १५५॥ | |||
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| verse_lines = गुणाः पितुर्मातृजातिः सुतानां यस्मात् सतां प्रायशस्तेन नागः ।;बली च (पार्थात् प्रथमोद्भवत्वात्) पार्थप्रथमोद्भवत्वान्मायाविदस्त्री च सुधार्मिकश्च ॥ १५६॥ | |||
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| verse_lines = ततो ययावर्जुनस्तीर्थयात्राक्रमेण पाण्ड्यांस्तनयोऽस्य मात्रा ।;सह त्यक्तो भुजगैर्देवलोके सम्पूजितो न्यवसद् दैवतैश्च ॥ १५७॥ | |||
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| verse_lines = सत्यात्ययान्नैव दोषोऽर्जुनस्य तेजीयसश्चिन्तनीयः कथञ्चित् ।;(ज्येष्ठापराधात्) श्रेष्ठापराधान्नान्यदोषस्य लेपस्तेजीयसां निर्णयोऽयं हि शास्त्रे ॥ १५८॥ | |||
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| verse_lines = अतिस्नेहाच्चाग्रजाभ्यां तदस्य क्षान्तं सुता पाण्ड्यराजेन दत्ता ।;संवत्सरान्ते फल्गुनस्याभिरूपा चित्राङ्गदा वीरसेनेन तोषात् ॥ १५९॥ | |||
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| verse_lines = स वीरसेनस्त्वष्टुरंशो यमस्याप्यावेशयुक् सा च कन्या शची हि ।;तारादेहे सूर्यजस्याङ्गसङ्गात् स्वर्गं नागादन्तरिक्षादिहाऽसीत् ॥ १६०॥ | |||
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| verse_lines = तेनैव हेतोर्नातिसामीप्यमासीत् तस्याः पार्थे पुत्रिकापुत्रधर्मा ।;तस्यां जातो बभ्रुवाहोऽर्जुनेन पूर्वं जयन्तः कामदेवांशयुक्तः ॥ १६१॥ | |||
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| verse_lines = पुत्रं वीरं जनयित्वाऽर्जुनोऽतो गच्छन् प्रभासं शापतो ग्राहदेहाः ।;अमूमुचच्चाप्सरसः स पञ्च ताभिर्गृहीतः प्रविकृष्य तीरम् ॥ १६२॥ | |||
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| verse_lines = एवं हि तासां शापमोक्षः प्रदत्तो यदाऽखिला वो युगपत् सम्प्रकर्षेत् ।;एकस्तदा निजरूपाप्तिरेवेत्यलं तुष्टेन ब्राह्मणेनाऽनतानाम् ॥ १६३॥ | |||
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| verse_lines = विप्रापहासात् कुत्सितयोनितस्ताः कन्यातीर्थे पाण्डवः सम्प्रमुच्य ।;प्राप्तः प्रभासं वासुदेवानुजातां(वासुदेवानुजां तां) शुश्राव रामेण सुयोधनोद्यताम् ॥ १६४॥ | |||
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| verse_lines = विचिन्त्य कार्यं यतिरूपं गृहीत्वा कुशस्थलीं प्रययौ तं समीपे ।;प्राप्तं कृष्णः प्राहसत् संविजानन् सत्यासहायः शयनीयाधिरूढः ॥ १६५॥ | |||
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| verse_lines = सर्वज्ञा(सर्वज्ञाना) सा लीलया हासहेतुमपृच्छत् तं सोऽपि तस्यै बभाषे ।;लीलाभाजौ दर्शनार्थं पुनस्तावगच्छतां रैवतं शैलराजम् ॥ १६६॥ | |||
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| verse_lines = आक्रीडोऽसौ वृष्णिभोजान्धकानां तत्रापश्यत् केशवः फल्गुनं तम् ।;स्वसुर्दाने स प्रतिज्ञां रहोऽस्मै चक्रे कृष्णोऽथाऽसदत् सर्ववृष्णीन् ॥ १६७॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा गिरौ रौहिणेयो यतीन्द्रवेषं पार्थं ज्ञातियुक्तः प्रणम्य ।;चक्रे पूजां फल्गुनोऽपि प्रणामं गुणज्येष्ठोऽसीति चक्रे बलाय ॥ १६८॥ | |||
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| verse_lines = सर्वज्ञं तं वाग्मिनं वीक्ष्य रामः कन्यागारे वर्षकाले निवासम् ।;सत्कारपूर्वं कारयेत्याह कृष्णं नैवेत्यूचे केशवो दोषवादी ॥ १६९॥ | |||
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| verse_lines = युवा बली दर्शनीयोऽतिवाग्मी नायं योग्यः कन्यकागारवासम् ।;इत्युक्तवन्तं राम आहाऽप्तविद्ये नास्मिञ्छङ्केत्येव लोकाधिनाथम् ॥ १७०॥ | |||
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| verse_lines = नास्मन्मते रोचते त्वन्मतं तु सर्वेषां नः पूज्यमेवास्तु तेन ।;इत्युक्त्वा तं केशवः सोदरायै शुश्रूषस्वेत्याह सन्तं यतीन्द्रम् ॥ १७१॥ | |||
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| verse_lines = नित्याप्रमत्ता साधु सन्तोषयेति प्रोक्ता तथा साऽकरोत् सोऽपि तत्र ।;चक्रे मासान् वार्षिकान् सत्कथाभिर्वासं वाक्यं श्रद्दधानो हरेस्तत् ॥ १७२॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रे शस्त्रे तत्त्वविद्यासु चैव शिष्यः शैनेयो वासुदेवेन्द्रसून्वोः ।;तस्मादस्मै कथयामास कृष्णः स्वशिष्यत्वाद् विपृथोश्चापि सर्वम् ॥ १७४॥ | |||
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| verse_lines = अन्ये सर्वे(अन्येऽपि सर्वे) वासुदेवस्य पार्थान् प्रियान् नित्यं जानमाना अपि स्म ।;रामेणाऽदिष्टा उद्धवोऽथाऽहुकाद्या हार्दिक्याद्या नैव दित्सन्ति जिष्णोः ॥ १७५॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधने दातुमिच्छन्ति सर्वे रामप्रियार्थं जानमाना हरेस्तत् ।;अप्यप्रियं राक्षसावेशयुक्तास्तस्मात् सर्वान् वञ्चयामास कृष्णः ॥ १७६॥ | |||
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| verse_lines = प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाश्च वञ्चिता ययुस्तीर्थार्थं रामयुक्ताः समग्राः ।;पिण्डोद्धारं तत्र महोत्सवेषु आवर्तयत्सु क्वचिदूचे सुभद्रा ॥ १७७॥ | |||
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| verse_lines = यते तीर्थानाचरन् बान्धवांस्त्वमद्राक्षीर्नः कच्चिदिष्टान् स्म पार्थान् ।;कुन्तीं कृष्णां चेत्याह पृष्टः स पार्थ ओमित्येतेषामाह चानामयं सः ॥ १७८॥ | |||
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| verse_lines = भूयः साऽवादीद् भगवन्निन्द्रसूनुर्गतस्तीर्थार्थं ब्राह्मणेभ्यः श्रुतो मे ।;कच्चिद् दृष्टो भवतेत्योमिति स्म पार्थोऽप्यूचे क्वेति साऽपृच्छदेनम् ॥ १७९॥ | |||
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| verse_lines = अत्रैवेति स्मयमानं च पार्थं पुनःपुनः पर्यपृच्छच्छुभाङ्गी ।;सोऽप्याहोन्मत्ते सोऽस्मि हीति स्मयंस्तां फुल्लाक्षी तं सा ददर्शातिहृष्टा ॥ १८०॥ | |||
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| verse_lines = ततो हर्षाल्लज्जया चोत्पलाक्षी किञ्चिन्नोचे पार्थ एनामुवाच ।;कामाविष्टो मुख्यकालो ह्ययं (नावुद्वाहार्थे)नावुद्वाहार्थोऽस्त्विति सा चैनमाह(सा चैवमाह) ॥ १८१॥ | |||
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| verse_lines = मातापितृभ्यां सहितोऽथ कृष्णस्तत्रैवाऽयाद् वासवश्चाथ शच्या ।;समं मुनीन्द्रैः फल्गुनेन स्मृतः(स्मृतः स तत्रैव) संस्तत्रैवाऽगात् प्रीतियुक्तो निशायाम् ॥ १८३॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णस्ततः पुरुहूतेन साकं तयोर्विवाहं कारायामास सम्यक् ।;मातापितृभ्यां सत्यकिनाऽपि युक्तो महोत्सवेऽन्याविदिते (अन्याविदितो) मुनीन्द्रैः ॥ १८४॥ | |||
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| verse_lines = ततः कृष्णः स्यन्दनं फल्गुनार्थे निधाय स्वं प्रययौ तद्रजन्याम् ।;गते च शक्रे रथमारुरोह प्रातः पार्थः सहितो भार्ययैव ॥ १८५॥ | |||
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| verse_lines = सर्वायुधैर्युक्तरथं समास्थिते गृहीतचापे फल्गुने द्वारवत्याम् ।;आसीद् रावः किं किमेतत् त्रिदण्डी कन्यां हरत्येष कोदण्डपाणिः ॥ १८६॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु तं सतनुत्रं महेन्द्रदत्ते दिव्ये कुण्डले वाससी च ।;दिव्यानि रत्नानि च भूषणानि दृष्ट्वा बिभ्राणं रक्षिणोऽवारयन् स्म ॥ १८७॥ | |||
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| verse_lines = ततः स आबद्धतलाङ्गुलित्रः सतूणीरश्चापमायम्य(आनम्य) बाणैः ।;चक्रेऽन्तरिक्षं प्रदिशो दिशश्च निरन्तरं शिक्षया विद्यया च ॥ १८८॥ | |||
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| verse_lines = चक्रे सारथ्यं केशवेनैतदर्थे(केशवेनैतदर्थं) सुशिक्षिता तस्य सम्यक् सुभद्रा ।;तया पार्थो वारितो नैव कञ्चित् भिन्नत्वचं कृतवान् क्रीडमानः ॥ १८९॥ | |||
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| verse_lines = स शिक्षया(स्वशिक्षया, सुशिक्षयाऽत्यद्भुतया) त्वद्भुतया शरौघैर्विद्राप्य तान् भीषयित्वैव सर्वान् ।;निर्गत्य पुर्या विपृथुं ददर्श रामेण पुर्या रक्षणे सन्नियुक्तम् ॥ १९०॥ | |||
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| verse_lines = प्रियं कुर्वन्निव रामस्य सोऽपि व्याजेन पार्थं सेनयैवाऽवृणोत् तम् ।;कृष्णादेशान्नैव पार्थस्य चक्रे सम्यग्रोधं युयुधे च छलेन ॥ १९१॥ | |||
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| verse_lines = एको ह्यसौ मरुतां सौम्यनामा शुश्रूषार्थं वासुदेवस्य जातः ।;तं यादवं शरवर्षैर्ववर्ष यथा क्षतं न भवेत् सव्यसाची ॥ १९२॥ | |||
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| verse_lines = निरायुधं विरथं(निरायुधां विरथां) चैव चक्रे पार्थः सेनां तस्य नैवाहनच्च ।;दृष्ट्वा शरांस्तस्य तीक्ष्णांस्त्वचोऽपि नच्छेदकान् विपृथुः सन्तुतोष(विपृथुस्तं तुतोष) ॥ १९३॥ | |||
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| verse_lines = शिक्षां पार्थस्याधिकां मानयान उपेत्य पार्थं च शशंस सर्वाम् (सर्वम्) ।;आज्ञां विष्णोः सन्नियुद्ध्यन्निवास्मै कृत्तायुधः(कृन्तायुधः) फल्गुनेनैव पूर्वम् ॥ १९४॥ | |||
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| verse_lines = ततः पराजितवच्छीघ्रमेत्य शशंस सर्वं हलिनेऽथ सोऽपि ।;प्रद्युम्नसाम्बादियुतोऽथ कोपादायात् पुरीं हन्तुकामोऽर्जुनं च ॥ १९५॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽपि सर्वं विपृथोर्निशम्य प्राप्तः सुधर्मां विमना इवाऽसीत् ।;अवाङ्मुखस्तत्र यदुप्रवीराः प्रद्युम्नाद्या आहुरुच्चैर्नदन्तः ॥ १९६॥ | |||
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| verse_lines = मायाव्रतं तं विनिहत्य शीघ्रं वयं सुभद्रामानयामः क्षणेन ।;इत्युक्तवाक्यानवदद् बलस्तान् कृष्णाज्ञया यान्तु न स्वेच्छयैव ॥ १९७॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञातव्यमेतस्य मतं पुरस्ताद्धरेर्विरोधे न जयो भवेद् वः ।;इत्युक्तवाक्ये हलिनि स्म सर्वे पप्रच्छुरानम्य जनार्दनं तम् ॥ १९८॥ | |||
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| verse_lines = अथाब्रवीद् वासुदेवोऽमितौजाः शृण्वन्तु सर्वे वचनं मदीयम् ।;पुरैवोक्तं तन्मया कन्यकाया मायाव्रतो नार्हति सन्निधिस्थितिम् ॥ १९९॥ | |||
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| verse_lines = तां मे वाचं नाग्रहीदग्रजोऽयं बहून् दोषान् व्याहरतोऽप्यतो मया ।;अनुल्लङ्घ्यत्वादग्रजोऽनुप्रवृत्तः कन्यागृहे वासने कूटबुद्धेः ॥ २००॥ | |||
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| verse_lines = अतीतश्चायं कार्ययोगोऽसमक्षं हृता कन्याऽतो नोऽत्र का मानहानिः ।;भूयस्तरां मानिनस्तस्य सा स्याज्ज्ञाता च वो विपृथोः पार्थताऽस्य ॥ २०१॥ | |||
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| verse_lines = देया च कन्या नास्ति पार्थेन तुल्यो वरोऽस्माकं कौरवेयश्च पार्थः ।;पौत्रश्च कृष्णस्य सुपूर्णशक्तेः पैतृष्वसेयो(पितृष्वसेयः) वीरतमो गुणाढ्यः ॥ २०२॥ | |||
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| verse_lines = अर्थ्योऽस्माभिः स्वयमेवाहरत् स शक्रात्मजो नात्र नः कार्यहानिः ।;अनुद्रुत्यैनं(अनुसृत्यैनं) यदि वः स्यात् पराजयो हानिर्दृढं यशसो वो भवेत ॥ २०३॥ | |||
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| verse_lines = जित्वा यद्येनं कन्यका चाऽहृता चेत् परामृष्टां नैव कश्चिद्धि लिप्सेत्(कश्चिद् विलिप्सेत्) ।;अतो न मे रोचते वोऽनुयानमित्यूचिवानास तूष्णीं परेशः ॥ २०४॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा हली कृष्णवाक्यं बभाषे मा यात चित्तं विदितं मयाऽस्य ।;अस्यानुवृत्तिर्विजयाय नः स्याच्छुभाय शान्त्यै परतश्च मुक्त्यै ॥ २०५॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽर्जुनो यत्र तिष्ठन्(तिष्ठेत्) न कश्चित् पराजयं याति कृष्णाज्ञयैव ।;रथेन तेनैव ययौ सभार्यः शक्रप्रस्थं चाविशद् भ्रातृगुप्तम् ॥ २०६॥ | |||
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| verse_lines = सम्भावितो भ्रातृभिश्चातितुष्टैरूचेऽथ सर्वं तेषु यच्चाऽत्मवृत्तम्(आत्मवृत्तिम्) ।;शान्तेषु वाक्यादात्मनो यादवेषु कृष्णो युक्तो हलिनाऽगाच्च पार्थान् ॥ २०७॥ | |||
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| verse_lines = सार्द्धं ययौ शकटै रत्नपूर्णैः शक्रप्रस्थं पूजितस्तत्र पार्थैः ।;ददौ तेषां तानि रामेण युक्तस्तथा कृष्णायै भूषणानि स्वसुश्च ॥ २०८॥ | |||
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| verse_lines = मासानुषित्वा कतिचिद् रौहिणेयो ययौ पुरीं स्वां केशवोऽत्रावसच्च ।;बहून् वर्षान् पाण्डवैः पूज्यमानः प्रीतिं तेषामादधानोऽधिकां स्वाम् ॥ २०९॥ | |||
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| verse_lines = आसन् कृष्णायाः पञ्च सुता गुणाढ्या विश्वेदेवाः पञ्चगन्धर्वमुख्यैः ।;आविष्टास्ते चित्ररथाभिताम्रकिशोरगोपालबलैः क्रमेण ॥ २१०॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिविन्ध्यः सुतसोमः(श्रुतसोमः) श्रुताख्यकीर्तिः शतानीक उत श्रुतक्रियः ।;युधिष्ठिराद्यैः क्रमशः प्रजातास्तेषां द्वयोश्चावरजोऽभिमन्युः ॥ २११॥ | |||
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| verse_lines = चन्द्रांशयुक्तोऽतितरां(चन्द्रांशयुक्तो नितरां) बुधोऽसौ जातः सुभद्राजठरेऽर्जुनेन ।;धर्मेरशक्रांशयुतोऽश्विनोश्च तथैव कृष्णस्य स सन्निधानयुक् ॥ २१२॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेऽपि ते वीर्यवन्तः सुरूपा भक्ता विष्णोः सर्वशास्त्रेष्वभिज्ञाः ।;मोदं ययुः पाण्डवास्तैः सुतैश्च विशेषतः सात्त्वतीनन्दनेन ॥ २१३॥ | |||
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| verse_lines = ततः कदाचित् खाण्डवं कृष्णपार्थौ चिक्रीडिषू सत्यभामासुभद्रे ।;आदाय यातौ परिचारकैश्च रथेन गन्धर्वरानुगीतौ ॥ २१४॥ | |||
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| verse_lines = स्वैरं तयोस्तत्र विक्रीडतोश्च स्त्रीरत्नाभ्यां मन्दवातानुजुष्टे ।;वने प्रसूनस्तबकोरुराजिते जले च तिग्मद्युतिकन्यकायाः ॥ २१५॥ | |||
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| verse_lines = भूत्वा विप्रस्तौ ययाचेऽन्नमेत्य कुशानुरूचेऽनुमते (कुशानुरूचे च मते) रमेशितुः ।;पार्थः कीदृक् तेऽन्नमिष्टं वदेति स चावादीद् वह्निरहं वनार्थी ॥ २१६॥ | |||
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| verse_lines = प्रयाजान् देवाननुयाजांश्च शुल्कं हविर्दाने देवतानामयाचिषम् ।;बलह्रासस्तव भूयादिति स्म शप्त्वैव ते तांश्च ददुः पुरा मम ॥ २१७॥ | |||
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| verse_lines = पुनः पूर्तिः केन मे स्याद् बलस्येत्यब्जोद्भवं पृष्टवानस्मि नत्वा ।;यदा वनं खाण्डवं हि त्वमत्सि तदा बलं ते भवतीति सोऽब्रवीत् ॥ २१८॥ | |||
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| verse_lines = शक्रस्येदं खाण्डवं तेन विघ्नं करोत्यसौ तेन वां प्रार्थयामि ।;इत्युक्ते तं पार्थ ऊचे यदि स्याद् रथो धनुश्चाथ शक्रं निरोत्स्ये ॥ २१९॥ | |||
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| verse_lines = नरावेशादन्नदानप्रतिश्रवात् स्वस्यापि शक्रस्य विरोधमैच्छत् ।;पार्थः कृष्णस्य प्रेरणाच्चैव वह्निः पार्थं ययाचे शक्रविरोधशान्त्यै ॥ २२०॥ | |||
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| verse_lines = नहि स्वदत्तस्य पुनः स वैरं शक्रः कुर्यात् स्वयमिन्द्रो हि पार्थः ।;नाप्रेरितो विष्णुना तस्य रोधं पार्थः कुर्यादिति कृष्णं ययाचे ॥ २२१॥ | |||
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| verse_lines = चक्रं गोमन्ते कृष्णमापापि(कृष्णमायाद्धि) पूर्वं भक्त्या वह्निः केशवेऽदात् पुनस्तत् ।;चक्रं च विष्णोर्बहुधा व्यवस्थितं तदग्निदत्तं प्राक्तनं चैकधाऽऽसीत् ॥ २२३॥ | |||
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| verse_lines = धनुश्च गाण्डीवमथाब्जजस्य करोति येनाखिलसंहृतिं सः ।;अंशेन दत्तं तदुमापतेश्च शक्रस्य सोमस्य जलेशितुश्च ॥ २२४॥ | |||
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| verse_lines = तेनैव ते जिग्युरथो जगत्त्रयं प्रसादतस्ते(प्रसादतस्तु) क्रमशोऽब्जयोनेः ।;अनन्यधार्यं विजयावहं च भारेण लक्षस्य समं शुभावहम् ॥ २२५॥ | |||
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| verse_lines = रथं च शुभ्राश्वयुतं जयावहं तूणौ तथाचाक्षयसायकौ शुभौ ।;ध्वजं च रामस्य हनूमदङ्कमादाय सर्वं वरुणादर्जुनेऽदात् ॥ २२६॥ | |||
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| verse_lines = विशेषतो ध्वजसंस्थे हनूमत्यजेयता स्याज्जयरूपो यतोऽसौ ।;सर्वं च तद्दिव्यमभेद्यमेव विद्युत्प्रभा ज्या च गाण्डीवसंस्था ॥ २२७॥ | |||
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| verse_lines = गाण्डीवमप्यास कृष्णप्रसादाच्छक्यं धर्तुं पाण्डवस्याप्यधार्यम् ।;देवैश्च तैर्ब्रह्मवराद् धृतं तद् ब्रह्मैव साक्षात् प्रभुरस्य धारणे ॥ २२८॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रस्य दत्तश्च वरः स्वयम्भुवा तेनापि पार्थस्य बभूव धार्यम् ।;इन्द्रो ह्यसौ फल्गुनत्वेन जातस्ततः सोऽस्त्रैः शरशालां चकार ॥ २२९॥ | |||
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| verse_lines = स योजनद्वादशकाभिविस्तृतं पुरं चकाराऽशु पुरन्दरात्मजः ।;हुताशनोऽप्याशु वनं प्रगृह्य प्रभक्षयामास समुद्धतार्चिः ॥ २३०॥ | |||
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| verse_lines = प्रभक्षमाणं(प्रभक्ष्यमाणं) निजकक्षमीक्ष्य सन्धुक्षयामास तदाऽऽशुशुक्षणिम् ।;अक्षोपमाभिर्बहुलेक्षणोऽम्भसां धाराभिराक्षुब्धमनाः क्षयाय ॥ २३१॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रैस्तु वृष्टिं विनिवार्य कृष्णः पार्थश्च शक्रं सुरपूगयुक्तम् ।;अयुद्ध्यतां सोऽपि पराजितोऽभूत् प्रीतश्च दृष्ट्वा बलमात्मनस्तत् ॥ २३२॥ | |||
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| verse_lines = स्नेहं च कृष्णस्य तदर्जुने धृतं विलोक्य पार्थस्य बलं च तादृशम् ।;निवर्त्य मेघानतितुष्टचित्तः प्रणम्य कृष्णं तनयं समाश्लिषत् ॥ २३३॥ | |||
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| verse_lines = विष्णुश्च शक्रेण सहेत्य केशवं समाश्लिषन्निर्विशेषोऽप्यनन्तः ।;स केवलं क्रीडमानः सशक्रः(स शक्रः) स्थितो हि पूर्वं युयुधे न किञ्चित् ॥ २३४॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मा च शर्वश्च समेत्य कृष्णं प्रणम्य पार्थस्य च कृष्णनाम ।;सञ्चक्रतुश्चापि शिक्षाप्रकर्षाच्चक्रुः (चक्रुश्च सर्वे) सर्वे स्वास्त्रदाने प्रतिज्ञाम् ॥ २३५॥ | |||
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| verse_lines = अनुज्ञातास्ते प्रययुः केशवेन क्रीडार्थमिन्द्रो युयुधे हि तत्र ।;प्रीत्या कीर्तिं दातुमप्यर्जुनस्य ततस्तुष्टः सह देवैर्ययौ स्वः (ययौ सः) ॥ २३६॥ | |||
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| verse_lines = दैत्याश्च नागाश्च पिशाचयक्षा हताः सर्वे तद्वनस्था हि ताभ्याम् ।;ऋते चतुष्पक्षिणश्चाश्वसेनं मयं च नान्यत् किञ्चिदासात्र मुक्तम् ॥ २३७॥ | |||
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| verse_lines = अयमग्ने जरितेत्यादिमन्त्रैः स्तुत्वा वह्निं पक्षिणो नैव दग्धाः ।;अश्वसेनः पुत्रकस्तक्षकस्य मात्रा ग्रस्तः प्रातिलोम्येन कण्ठे ॥ २३८॥ | |||
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| verse_lines = छिन्नेऽर्जुनेनान्तरिक्षे पतन्त्यास्तस्याः शक्रेणावितश्छिन्नपुच्छः ।;वधान्मातुः पुच्छभङ्गाच्च रोषाद्धन्तुं पार्थं कर्णतूणीरगोऽभूत् ॥ २३९॥ | |||
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| verse_lines = मयः कृष्णेनाऽत्तचक्रेण दृष्टो ययौ पार्थं शरणं जीवनार्थी ।;पार्थार्थमेनं न जघान कृष्णः स्वभक्तश्चेत्यतिमायं परेशः ॥ २४०॥ | |||
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| verse_lines = देवारिरित्येव मयि प्रकोपः कृष्णस्य तेनाहमिमं(तेनाहममुं) पुरन्दरम् ।;पार्थात्मकं शरणं यामि तेन कृष्णप्रियः स्यामिति तस्य बुद्धिः ॥ २४१॥ | |||
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| verse_lines = प्राणोपकृत् प्रत्युपकारमाशु किं ते करोमीति स पार्थमाह ।;कृष्णप्रसादाद्धि भवान् विमुक्तस्तस्मै करोत्वित्यवदत् स पार्थः ॥ २४२॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽपि (राज्ञे)राज्ञोऽतिविचित्ररूपसभाकृतावादिशत्(सभाकृतावदिशत्) तां स चक्रे ।;अनिर्गमं प्राणिनामर्थितौ तौ हुताशनेनाथ विधाय जग्मतुः ॥ २४३॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा च तौ पाण्डवाः सर्व एव महामुदं प्रापुरेतन्निशम्य ।;कृष्णोऽपि पार्थैर्मुमुदेऽनन्तशक्तिसुखज्ञानप्रभावौदार्यवीर्यः(प्राभावौदार्यवीर्यः) ॥ २४४॥ | |||
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<span id="gr-C21" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकविंशोऽध्यायः"></span> | |||
== एकविंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ जनार्दनाज्ञया मयः समस्तकौतुकोत्तराम्(समस्तकौतुकोत्तमाम्) ।;सभां विधाय भूभृते ददौ गदां वृकोदरे ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = स वायुधारितां गदां हि यौवनाश्वभूभृता ।;प्रसादतोऽस्य लम्भितामवाप्य मोदमाप ह ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च वत्सरद्वयं समुष्य केशवो ययौ ।;समर्चितस्य पाण्डवैर्वियोजनेऽस्य चाक्षमैः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = ततो वसन् स्वपुर्यजः क्वचिद् रविग्रहे हरिः ।;सदारपुत्रबान्धवः समन्तपञ्चकं ययौ ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = पृथासुताश्च सर्वशः सदारपुत्रमातृकाः ।;क्षितीश्वराश्च सर्वशः प्रियाप्रिया(प्रियाः प्रियाः) हरेश्च ये ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = तथैव नन्दगोपकः सदारगोपगोपिकः ।;मुनीश्वराश्च सर्वतः समीयुरत्र च प्रजाः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = प्रियाश्च ये रमेशितुर्हरिं त्रिरूपमेत्य ते ।;वसिष्ठवृष्णिनन्दनौ भृगूत्तमं(भृगूद्वहं) तथाऽऽर्चयन्(आर्चयन्) ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = कृतार्थतां च ते ययू रमेशपाददर्शनात् ।;रविग्रहे समाप्लुता भृगूद्वहोत्थतीर्थके ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = अनुग्रहं विधाय स स्वकेषु केशवस्त्रिवृत् ।;अयाजयच्च शूरजं मखैः समाप्तदक्षिणैः ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = समस्तलोकसंस्थितात्मभक्तिमज्जनस्य सः ।;सुकालदर्शनात् परं(वरं व्यधात्) व्यधादनुग्रहं हरिः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = जिताः समस्तभूभृतो जरासुतादयः क्षणात् ।;वृकोदरादिभिस्तु(वृकोदरादिभिः सुतैः) तैर्हयश्च दिव्य आययौ ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = सकृष्णरामकार्ष्णिभिः (न कृष्णरामकार्ष्णिभिः) सुता नु मेऽत्र पालिताः ।;क्व तेऽत्र शक्तिरित्यमुं जगाद सोऽर्जुनं द्विजः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = वह्निं प्रवेक्ष्येऽशक्तश्चेदित्युक्त्वा सर्वयादवैः ।;ययौ न रामप्रद्युम्नावनिरुद्धं च केशवः ।;न्ययोजयत् तत्साहाय्ये (तत्सहाये) यशस्तेष्वभिरक्षितुम् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = प्रियो हि नितरां रामः कृष्णस्यानु च तं सुतः ।;अनिरुद्धः कार्ष्णिमनु प्रद्युम्नाद् योऽजनिष्ट हि ।;रुक्मिपुत्र्यां रुक्मवत्यामाहृतायां स्वयम्बरे ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = रतिरेव हि या तस्यां जातोऽसौ कामनन्दनः ।;पूर्वमप्यनिरुद्धाख्यो विष्णोस्तन्नाम्न एव च ।;आवेशयुक्तो बलवान् रूपवान् सर्वशास्त्रवित् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् तांस्त्रीनृते कृष्णः पार्थसाहाय्यकारणात् ।;न्ययोजयत् सूतिकाले ब्राह्मण्याः स च फल्गुनः ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रैश्चकार दिग्बन्धं कुमारोऽथापि तत्क्षणात् ।;अदर्शनं ययौ पार्थो विषण्णः सह यादवैः ।;अधिक्षिप्तो(अदिक्षिप्तः) ब्राह्मणेन ययौ यत्र श्रियःपतिः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = वह्निं(अग्निं) विविक्षन्तममुं निवार्य ययौ सविप्रः सहफल्गुनो हरिः ।;आशामुदीचीं बृहता रथेन क्षणेन तीर्त्वैव च सप्तवारिधीन् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = ददुश्च मार्गं गिरयोऽब्धयस्तथा विदार्य चक्रेण तमोऽन्धमीशः ।;घनोदकं चाप्यतितीर्य तत्र ददर्श धाम स्वमनन्तवीर्यः ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = संस्थाप्य दूरे सरथं सविप्रं पार्थं स्वरूपे द्विचतुष्कबाहौ ।;समस्तरत्नोज्ज्वलदिव्यभूषणे विवेश नित्योरुगुणार्णवे प्रभुः ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = सहस्रमूर्धन्युरुशेषभोग आसीनरूपेऽमितसूर्यदीधितौ ।;रमासहाये तटिदुज्ज्वलाम्बरे मुक्तैर्विरिञ्चादिभिरर्चिते सदा ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = स्थित्वैकरूपेण मुहूर्तमीश्वरो विनिर्ययौ विप्रसुतान् प्रगृह्य ।;सुनन्दनन्दादय एव पार्षदास्ते वैष्णवा भूमितले प्रजाताः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = दर्पं निहन्तुं हरिरर्जुनस्य समानयद् विप्रसुतान् परेशः ।;प्रीतिर्महत्येव यतोऽर्जुने हरेः संशिक्षयामास ततः स एनम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = अप्राकृतात् सदनाद् वासुदेवो निस्सृत्य सूर्याधिकलक्षदीधितेः ।;रथं समारुह्य सपार्थविप्र आगात् सुतांश्चैव ददौ द्विजाय ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = लोकशिक्षार्थमेवासौ प्रायश्चित्तं च चालने ।;चक्रे सार्द्धमुहूर्तेन समागम्य पुनर्मखम् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मादीनागतांश्चैव सदा स्वपरिचारकान् ।;पूजयित्वाऽभ्यनुज्ञाय ब्राह्मणानप्यपूजयत्(अभ्यपूजयत्) ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = सस्नाववभृथं कृष्णः सदारः ससुहृज्जनः ।;आयान्तं द्वारकां कृष्णं दन्तवक्रो रुरोध ह ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = जघान गदया कृष्णस्तं क्षणात् सविडूरथम् ।;विडूरथस्तमोऽगच्छद् दन्तवक्रे च योऽसुरः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = हरेः पार्षदः क्षिप्रं हरिमेव समाश्रितः ।;कृष्णे प्राप्ते स्वलोकं च निस्सृत्यास्मात् स्वरूपतः ।;एकीभावं स्वरूपेण द्वारपेण गमिष्यति ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = ततः कृष्णः पुरीमेत्य बोधयामास फल्गुनम् ।;किमेतद् दृष्टमित्येव तेन पृष्टो रमापतिः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = अयं द्वीपः सागरश्च लक्षयोजनविस्तृतौ ।;तदन्ये तु क्रमेणैव द्विगुणेनोत्तरोत्तराः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = अन्त्याध्यर्द्धस्थलं हैमं बाह्यतो वाज्रलेपिकम्(वज्रलेपितम्,वज्रलेपकम्)) ।;एतत् सर्वं लोकनाम ह्येतस्माद् द्विगुणं तमः ।;अन्धं यत्र पतन्त्युग्रा मिथ्याज्ञानपरायणाः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = घनोदकं तद्द्विगुणं तदन्ते धाम मामकम् ।;यत्तद् दृष्टं त्वया पार्थ तत्र मुक्तैरजादिभिः ।;सेव्यमानः स्थितो नित्यं सर्वैः परमपूरुषः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = लोकालोकप्रदेशस्तु पञ्चाशल्लक्षविस्तृतः ।;सपञ्चाशत्सहस्रश्च तस्यापि गणनं तथा ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = योजनानां पञ्चविंशत्कोटयो मेरुपर्वतात् ।;चतसृष्वपि दिक्षूर्ध्वमधश्चाण्डं प्रकीर्तितम् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = अबग्नीरनभोहङ्कृन्महत्तत्त्वगुणत्त्रयैः ।;क्रमाद् दशोत्तरैरेतदावृतं(क्रमाद् दशोत्तरैरैतैरावृतं) परतस्ततः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = व्याप्तोऽहं (सर्वतः)सर्वगोऽनन्तोऽनन्तरूपो निरन्तरः ।;अनन्तशीर्षोऽनन्ताक्षोऽनन्तपादकरोरुकः ।;अनन्तगुणमाहात्म्यश्चिदानन्दशरीरकः ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = मद्वशा एव सर्वेऽपि त्वं चान्ये च धनञ्जय ।;मत्प्रसादाद् बलं चैव विजयश्चाखिला गुणाः ।;तस्मान्न विस्मयः कार्यो न दर्पश्च त्वयाऽनघ ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = ‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।;मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे’ ।(भ.गी.१८-६५);इत्युक्तः प्रणिपत्यैनं क्षमस्वेत्याह फल्गुनः ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = उषित्वा कतिचिन्मासान् ययुः सर्वेऽपि पाण्डवाः ।;अनुज्ञाताः केशवेन भक्तिनम्रधियोऽच्युते ।;सम्भाविताः केशवेन सौहार्देनाधिकेन च ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = ततः कदाचित् प्रवरे सभातले धर्मात्मजो राजभिर्भ्रातृभिश्च ।;वृतो निशम्यैव(निशाम्यैव) सभाः सुराणां यथा स्थिता नारदमन्वपृच्छत् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = अन्तरिक्षं त्वया प्रोक्तं लक्षयोजनमुच्छ्रितम् ।;अर्द्धकोट्युच्छ्रितः(अर्ध कोट्युच्छ्रितः) स्वर्गो विमानावलिसङ्कुलः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = भुवः स्वर्गश्च कोट्यैव योजनानां प्रविस्तृतौ(प्रविस्तृते) ।;महर्जनस्तपश्चैव क्रमादध्यर्द्धयोजनाः ।;पञ्चाशत्कोटिविस्तारा योजनानां समस्तशः(योजनानां च सर्वशः) ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = यावन्त एते मिलितास्तत्प्रमाण उदीरितः ।;सत्याख्यो ब्रह्मलोकस्तु यत्र ब्रह्मा विराजते ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = ततश्च द्विगुणः प्रोक्तो विष्णुलोकः सनातनः ।;उत्तरोत्तरतः सर्वे सुखे शतगुणोत्तराः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तजनसम्पूर्णा(अनन्तजनसङ्कीर्णाः) अपि ते हीच्छया हरेः ।;अवकाशवन्तो दिव्यत्वात् पूर्यन्ते न कदाचन ।;सर्वकामसुखैः पूर्णा दिव्यस्त्रीपुरुषोज्ज्वलाः ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = दिव्यरत्नसमाकीर्णं तथा पातालसप्तकम् ।;अधस्ताच्छेषदेवेन बलिना समधिष्ठितम् ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = कामभोगसमायुक्ता बहुवर्षसहस्रिणः ।;सप्तद्वीपेषु पुरुषा नार्यश्चोक्ताः सुरूपिणः ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = एषां च सर्वलोकानां धाता नारायणः परः ।;विष्णुलोकस्थितो मुक्तैः सदा सर्वैरुपास्यते ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = उपास्यमानो भगवान् रामो यमसभातले ।;उक्त इन्द्रेण चोपास्यो वामनात्मा जनार्दनः ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = प्रादुर्भावाश्च निखिला ब्रह्मणोपासिताः सदा ।;वरुणस्यानुगा नागास्तत्र मत्स्याकृतिर्हरिः ।;गन्धर्वा धनदस्यापि तत्र कल्की हरिः प्रभुः ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = रुद्रस्योग्राणि भूतानि नृसिंहात्मा शिवेन च ।;उपास्यते सदा विष्णुरित्याद्युक्तं त्वयाऽनघ ।;सर्वरत्नस्थलान् दिव्यान् देवलोकान् प्रभाषता ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = एतच्छ्रुत्वा धर्मसुतो भ्रातृभिः सहितो वशी ।;अवाप्तिं राजसूयस्य मन्त्रयामास धर्मवित् ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = सुकार्यमेतदित्यलं निशम्य सोदरोदितम् ।;अयातयत् स्वसारथिं स केशवाय भूपतिः ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = तदैव केशवस्य याः स्त्रियस्तदीयतातकैः ।;सहोदरैश्च यापितः स दूत आप माधवम् ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = प्रणम्य केशवं वचः स आह मागधेन ते ।;विवाहबान्धवा रणे विजित्य रोधिता गिरौ ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = नृपायुतद्वयेन सोऽष्टविंशकैः शतैरपि ।;यियक्षुरुग्ररूपिणं त्रिलोचनं त्वयि स्थिते ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = विमोचयस्व तान् प्रभो निहत्य मागधेश्वरम् ।;अवैदिकं मुखं च तं विलुम्प धर्मगुप्तये ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितोऽथ सारथिं निशाम्य धर्मजस्य च ।;निशम्य तद् वचस्तदा जगाम पाण्डवालयम् ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = स पाण्डवैः समर्चितो मखाय धर्मजेन च ।;प्रपृष्ट आह माधवो वचो जगत्सुखावहम् ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = क्रतुर्यथाविधानतः कृतो हि पारमेष्ठ्यकम् ।;पदं नयेत तत्पदे सुयोग्यमेष नान्यथा ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = (अयोग्यकम्)अयोग्यकान्महापदे विधातुरेष हि क्रतुः ।;समानयोग्यतागणात् करोति मुक्तिगं वरम्(मुक्तिगं परम्) ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = पुरा तु मुक्तितोऽधिकं स्वजातितः करोति च ।;अतस्त्रिशङ्कुपुत्रको नृपानतीत्य वर्तते ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = सुरांशकोऽपि ते पिता विना हि राजसूयतः ।;न शक्ष्यति त्रिशङ्कुजाद् वरत्वमाप्तुमद्य तु ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = तपश्चरन् समागते शचीपतौ पिता तव ।;मरुद्गणोत्तमः पुरा नतूत्थितः शशाप सः ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = व्रजस्व मानुषीं तनुं ततो मृतः पुनर्दिवम् ।;गतोऽपि नः स्वकां तनुं प्रवेष्टुमत्र नेशसे ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = तदाऽधिकस्त्रिशङ्कुजो भविष्यतु त्वदित्यथ ।;क्षमापितश्च वासवो जगाद राजसूयतः ।;त्रिशङ्कुजाधिको भवानवाप्स्यति(अवाप्स्यसि) स्वकां तनुम् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = अतः सुकार्य एव ते युधिष्ठिर क्रतूत्तमः ।;भवद्भिरप्यवाप्यते स्वयोग्यताऽमुनाऽखिला ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = उदीर्य चैवमीश्वरः क्रतोरमुष्य योग्यता ।;वृकोदरे यतोऽखिला चतुर्मुखत्वयोग्यतः ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = ततः सुपूर्णमस्य तत् फलं विधातुमञ्जसा ।;जगाद वायुवाहनो वचो युधिष्ठिरं त्विदम् ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = क्व राजसूयमद्य ते जरासुते तु जीवति ।;जयेत् क एव तं युधा मृतो न योऽपि सीरिणा ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = विरिञ्चशर्ववाक्यतः समस्तलोकजायिनि ।;स्थिते तु ते जरासुते न सेत्स्यति क्रतूत्तमः ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते(इतिरितो) रथाङ्गिना जगाद धर्मनन्दनः ।;निवर्तितं मनः क्रतोरलं ममामुना प्रभो ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = बभूवुरेव(बभूविरे च) भूभृतो नचाऽधिराज्यमापिरे ।;यदा च चक्रवर्तिनस्तदेदृशा न शत्रवः ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितेऽमुनाऽवदत् प्रधानमारुतात्मजः ।;पदं चतुर्मुखस्य वा सुसाध्यमेव यत्नतः ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = निजानुभाववर्जिता हरेरनुग्रहोज्झिताः ।;महाप्रयत्नवर्जिता जना न जग्मुरुन्नतिम् ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = स्थिरोऽनुभाव एव मे महाननुग्रहो हरेः ।;प्रयत्नमेकमग्रतो निधाय भूतिमाप्नुमः ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितेऽमुना हरिः समुद्यमात् प्रधानतः ।;स्थिते हि यज्ञकारणे वृकोदरे जगाद ह(जगाद हि) ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = स एक एव पूरुषो जरासुतोऽद्य वर्तते ।;समस्तसद्विरोधिनां बलं कलेरनन्तरः ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = तथा सतां समाश्रयो यदुद्भवाः सतां गुणाः ।;स एक एव तादृशस्त्वया विचिन्त्य यात्यताम् ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = यदि स्म तेन मागधो निहन्यते सतां जयः ।;विपर्ययेण चासतामिति स्म विद्धि नान्यथा ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = स पारमेष्ठ्यसत्पदं प्रयात्यसंशयं युधि ।;य एव हन्ति मागधं स वेदधर्मपालकः(स एव धर्मपालकः) ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = निहन्ति शैवनायकं य एष(स एव) वैष्णवाग्रणीः ।;इति स्म भावसंयुते वदत्यजेऽबिभेन्नृपः ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरे ब्रुवत्यजं मखेन मे त्वलं त्विति ।;तमाह मारुतात्मजो निहन्मि मागधं रणे ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते तु शौरिणा जगाद धर्मनन्दनः ।;स शूरसेनमण्डलप्रहाणतो हरेस्त्रसन् ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = इमौ हि(इमौ च) भीमफल्गुनौ ममाक्षिणी सदा प्रभो ।;मनोनिभो भवान् सदा न वो विनास्म्यऽहं पुमान् (विनाऽस्म्यतः पुमान्) ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = अतो न जीवितात् प्रियानहं रिपोर्बलीयसः ।;सकाशमात्महेतुतः प्रयातयामि वो विभो ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितेऽवदत् पुनर्वृकोदरोऽरिकक्षभुक् ।;यदीयनेतृका रमाविरिञ्चशर्वपूर्वकाः ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = वशे च यस्य तद् बलं सुरासुरोरगादिनाम् ।;स एष केशवः प्रभुः क्व चास्य बार्हद्रथः ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = हनिष्य एव मागधं हरेः पुरो न संशयः ।;इतीरितेऽमुना हरिर्जगाद धर्मनन्दनम् ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः स विष्णुना विचार्य तद्गुणान् परान् ।;तथेति चाऽह ते त्रयः प्रतस्थुराशु मागधान् ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = समेत्य मागधांस्तु ते शिवोरुलिङ्गमित्यलम् ।;सुमाल्यवस्त्रभूषणैः समर्चितं गिरिं ययुः ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = स्वशीर्षतोऽपि चाऽदृतं जरासुतेन ते गिरिम् ।;न्यपातयन्त बाहुभिस्तमस्य चोत्तमाङ्गवत् ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = अद्वारतस्ते नगरं प्रविश्य माषस्य नालेन कृतास्त्रिभेरीः ।;पुष्टिप्रदा(मुष्टिप्रदानात्,मुष्टिप्रदाः) बिभिदुस्तस्य कीर्तिशास्त्रोपमा न्यक्कृतमागधेशाः ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽऽपणेभ्यो बहुमाल्यगन्धान् प्रसह्य सङ्गृह्य शुभांश्च दध्रुः ।;अद्वारतस्तस्य गृहं च सस्रुर्भोशब्दतस्तं च नृपः प्रसस्रुः ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = तान् विप्रवेषान् स निशाम्य राजा महाभुजान् स्नातकवेषयुक्तान् ।;द्वितीयवर्णान् प्रविचिन्त्य बाहून् ज्याकर्कशान् वीक्ष्य बभाष एतान् ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = के ष्ठाथ(स्थात) किंहेतुत आगताश्च कृतश्च मे पर्वतलिङ्गभेदनम् ।;कृतं भवद्भिः कुत एव दुर्नयाः कृतास्तथाऽन्ये द्विजवर्यवेषैः ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = इति ब्रुवाणं भगवानुवाच कार्यं हि शत्रोरखिलं प्रतीपम् ।;इत्युक्त ऊचे नहि(नच) विप्रशत्रुरहं कुतो वो मम शत्रुता भवेत् ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवाक्यं नृपतिं जगाद जनार्दनो नैव हि तादृशा द्विजाः ।;अहं रिपुस्तेऽस्मि हि वासुदेव इमौ च भीमार्जुननामधेयौ ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = यद् बान्धवान् नः पिशिताशिधर्मतो रौद्रे मखे कल्पयितुं पशुत्वे ।;इच्छस्यरे वेदपथं विहाय तं त्वां बलाच्छास्तुमिहाऽगता वयम् ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = विमोक्षयामः स्वजनान् यदि त्वं न मोचयस्यद्य निगृह्य च त्वाम् ।;मुञ्चाथवा तानभियाहि वाऽस्मान् रणाय मर्तुं कृतनिश्चयोऽत्र ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितोऽसौ मगधाधिपो रुषा जगाद नाहं शिव यागयुक्तान् ।;मोक्ष्ये पशून् युगपद् वा क्रमेण योत्स्ये च वोऽथापि चमूसहायात् ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = निरायुधः सायुधो वा युष्मदिष्टायुधेन वा ।;एकोऽपि सकलैर्योत्स्ये ससेनो वा ससैनिकान् ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवन्तमवददजितोरुबलो हरिः ।;एह्येकमेको वाऽस्मासु ससैन्यो वा रणे नृप ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = येन कामयसे योद्धुं तं न आसादय द्रुतम् ।;निरायुधः सायुधो वा त्वदभीष्टायुधेन वा ।;इत्याऽह भगवाञ्छत्रुं यशो भीमे विवर्धयन्(भीमेऽभिवर्धयन्) ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = घातयित्वा स्वशत्रुं च भीमसेनानुग्रहं परम् ।;भीमस्य कर्तुमिच्छंश्च भक्तिज्ञानादिवर्धनम्(भक्तिज्ञानाभिवर्धनम्) ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = तृणीकर्तुं रिपुं चैव निरायुधतयाऽगमन् ।;कृष्णभीमार्जुनास्तेन विप्रवेषाश्च तेऽभवन् ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = निरायुधः क्षत्रवेषो नैव योग्यः कथञ्चन ।;ततो जग्मुर्विप्रवेषास्तृणीकर्तुं हि मागधम् ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = मागधस्य ससैन्यस्य स्वगृहे संस्थितस्य च ।;निरायुधेन भीमेन समाह्वाने कृतेऽमितम् ।;धर्मं यशश्च भीमस्य वर्द्धयामास केशवः ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = तृतीयमर्जुनं चैव समादाय ययौ रिपुम् ।;हरिस्तस्माच्च भीमस्य महाधिक्यं प्रकाशयन् ।;मुखेन मागधस्यैव वृण्वेकं न इति ब्रुवन् ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = वृण्वेकमस्मास्विति स प्रोक्त आह जरासुतः ।;कुर्यां नैवार्जुनेनाहमबलेनैव सङ्गरम् ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = पञ्चपञ्चाशदब्दोऽद्य ह्ययमेवं च बालवत् ।;अबलत्वाद् युवाऽप्येष बाल एव मतो मम ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तोऽप्यर्जुनो नाऽह कुरु तर्हि परीक्षणम् ।;बाहुभ्यां धनुषा वेति(चेति) शङ्कमानः पराजयम् ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = अतो भीमे बलाधिक्यं सुप्रसिद्धमभून्महत् ।;एतदर्थं हि कृष्णेन सहाऽनीतः स फल्गुनः ॥ १३८॥ | |||
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| verse_lines = जानन् कृष्णे बलं घोरमविषह्यं स मागधः ।;कुत्सयन् गोप इति तं भयान्नैवाऽह्वयत् प्रभुम् ॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = आह्वयामास भीमं तु स्याद् वा मे जीवनं त्विति ।;हनिष्यत्येव मां कृष्ण इत्यासीन्नृपतेर्भयम् ।;तस्मात् तं नाह्वयामास वासुदेवं स मागधः ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = अर्जुने तु जिते कृष्णभीमौ मां निहनिष्यतः ।;त्रयाणां दुर्बलाह्वानान्नश्येत् कीर्तिश्च मे ध्रुवम् ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = इति मत्वाऽऽह्वयामास भीमसेनं स मागधः ।;कथञ्चिज्जीवितं वा स्यान्नतु नश्यति मे यशः ॥ १४२॥ | |||
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| verse_lines = इति स्म(इतीक्ष्य) भीमं प्रतियोधनाय सङ्गृह्य राजा स जरासुतो बली ।;राज्ये निजं चाऽत्मजमभ्यषिञ्चत् पुरा ख्यातं पत्रतापाख्यरुद्रम् ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = बलं भीमे मन्यमानोऽधिकं तु गदाशिक्षामात्मनि चाधिकां नृपः ।;भीतो नियुद्धेऽस्य ददौ गदां स भीमाय चान्यां स्वयमग्रहीद् बली ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = तदर्थमेवाऽशु गदां प्रगृह्य भीमो ययौ मागधसंयुतो बहिः ।;पुरात् सकृष्णार्जुन एव तत्र त्वयुद्ध्यतां केशवपार्थयोः पुरः ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = वाचाऽजयत् तं प्रथमं वृकोदरः शिवाश्रयं विष्णुगुणप्रकाशया ।;ततो गदाभ्यामभिपेततुस्तौ विचित्रमार्गानपि दर्शयन्तौ ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = तयोर्गदे तेऽशनिसन्निकाशे चूर्णिकृते देहमहादृढिम्ना ।;अन्योन्ययोर्वक्षसि पातिते रुषा यथाऽश्मनोः पांसुपिण्डौ सुमुक्तौ ॥ १४७॥ | |||
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| verse_lines = सञ्चूर्णितगदौ वीरौ जघ्नुतुर्मुष्टिभिर्मिथः ।;ब्रह्माण्डस्फोटसङ्काशैर्यथा केशवकैटभौ ॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = चचाल पृथ्वी गिरयश्च चूर्णिताः कुलाचलाश्चेलुरलं विचक्षुभुः ।;समस्तवाराम्पतयः सुरासुरा विरिञ्चशर्वादय आसदन्नभः ॥ १४९॥ | |||
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| verse_lines = सुरास्तु भीमस्य जयाभिकाङ्क्षिणस्तथाऽसुराद्या मगधाधिपस्य ।;पश्यन्ति सर्वे क्रमशो बलं स्वं समाददे मारुतनन्दनोऽपि ॥ १५०॥ | |||
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| verse_lines = स्वीकृत्य पूजां च वृकोदरस्य दृढं समाश्लिष्य च तं जनार्दनः ।;प्रीतो नितान्तं पुनरेव कृष्णं ननाम भीमः प्रणतोऽर्जुनेन ॥ १५७॥ | |||
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| verse_lines = सुतो ययौ शरणं तान् रमेशभीमार्जुनान् सहदेवोऽस्य धीमान् ।;रथं स्वसारं च ददौ स मारुतेर्ननाम कृष्णं परयैव भक्त्या ॥ १५९॥ | |||
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| verse_lines = रथो ह्यसौ वसुना वासुदेवाच्छक्रान्तराऽऽप्तो वसुवंशजत्वात् ।;जरासुतस्याऽस वृकोदरस्तं हरे रथं प्रार्पयामास तस्मै ॥ १६०॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽस्मरद् गरुडं स ध्वजेऽभूद् रथं कृष्णोऽथाऽरुहत् पाण्डवाभ्याम् ।;भीमः कन्यां सहदेवस्य हेतोः समग्रहीदनुजस्याऽत्मनः सः ॥ १६१॥ | |||
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| verse_lines = नकुलस्याऽदान्मद्रराजो हि पूर्वं स्वीयां कन्यां सा तथैषाऽप्युषा हि ।;एका पूर्वं ते अश्विनोश्चैव भार्या यमौ रेमाते यदुषा अश्विभार्या ।;ततः कृष्णायामग्रजभ्रातृभार्यावृत्तिं हि तौ चक्रतुर्माद्रिपुत्रौ ॥ १६२॥ | |||
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| verse_lines = जरासुतस्याऽत्मजः केशवादीन् रत्नैः समभ्यर्च्य ययावनुज्ञया ।;तदाज्ञया पितृकार्याणि(पितृकर्माणि) कृत्वा तदाज्ञयैवामुचत् तान् नृपांश्च ।;तैः संस्तुतः केशवो भीमपार्थयुक्तो दृष्ट्वा भक्तिनम्रैर्यथावत्(दृष्ट्वा ययौ भक्तिनम्रैः) ॥ १६३॥ | |||
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| verse_lines = सम्भावितास्ते सहदेवेन सम्यक् प्रशस्य(प्रणम्य) कृष्णं भीमसेनं च सर्वे ।;ययुर्गृहान् स्वानपतत् केशवद्विड् जरासुतोऽन्धे तमसि क्रमेण ॥ १६४॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णश्च पार्थौ च तथैकयानं समास्थिता धर्मजमभ्यगच्छन् ।;तेषां शङ्खध्वनिसम्बोधितात्मा राजा प्रीतश्चातितरां बभूव ॥ १६५॥ | |||
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| verse_lines = द्वैपायनोऽथ भगवानभिगम्य पार्थानाज्ञापयत् सकलसम्भृतिसाधनाय ।;तं राजसूयसहितं परमाश्वमेधयज्ञं(वरमश्वमेधयज्ञं) समादिशदनन्यकृतं विरिञ्चात् ॥ १६६॥ | |||
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| verse_lines = कर्ता हि तस्य परमेष्ठिपदं प्रयाति यद्यन्यसद्गुणवरैः परमेष्ठितुल्यः ।;भीमे मखस्य फलमत्यधिकं निधातुं व्यासः क्रतुं तमदिशद् गुरुरब्जजस्य ॥ १६७॥ | |||
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| verse_lines = असाधारणहेतुर्यः कर्मणो यस्य चेतनः ।;स एव तत्फलं पूर्णं भुङ्क्तेऽन्योऽल्पमिति स्थितिः ।;विना विष्णुं निर्णयोऽयं स हि कर्मफलोज्झितः ॥ १६८॥ | |||
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| verse_lines = हेतवोऽपि हि पापस्य न प्रायः फलभागिनः(फलभोगिनः) ।;देवाः पुण्यस्य दैत्याश्च मानुषास्तु विभागिनः (मानुषास्तद्विभागिनः) ॥ १६९॥ | |||
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| verse_lines = असाधारणहेतुश्च भीम एव प्रकीर्तितः ।;यज्ञस्यास्य जरासन्धवधात् कर्णजयादपि ॥ १७०॥ | |||
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| verse_lines = जयाच्च कीचाकादीनामन्यैर्जेतुमशक्यतः ।;द्वितीयः फल्गुनश्चैव तृतीयस्तु युधिष्ठिरः ॥ १७१॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् ब्रह्मपदावाप्त्यै व्यासो भीमस्य तं क्रतुम् ।;अनन्यकृतमादिश्य दिशां विजयमादिशत् ॥ १७२॥ | |||
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| verse_lines = अथाब्रवीद् धनञ्जयो धनुर्ध्वजो रथो वरः ।;ममास्ति तद् दिशां जयो ममैव वाञ्छितः प्रभो ॥ १७३॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितोऽखिलप्रभुर्जगाद सत्यमस्ति ते ।;समस्तसाधनोन्नतिर्महच्च वीर्यमस्ति ते(वीर्यमस्ति हि) ॥ १७४॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽपि कीचकादयो वृकोदरादृते वशम् ।;न यान्ति नापि ते वशं प्रयाति कर्ण एव च ॥ १७५॥ | |||
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| verse_lines = बलाधिकोऽसि कर्णतस्तथाऽपि नामृतः करम् ।;ददाति ते ह्यतिस्पृधा न वध्य एष तेऽद्य च ॥ १७६॥ | |||
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| verse_lines = सवर्मकुण्डलत्वतो न वध्य एष यत् त्वया ।;ततो वृकोदरो दिशं प्रयातु ते पितुः प्रियाम् ॥ १७७॥ | |||
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| verse_lines = जीवग्राहभयात् कर्णो ददाति करमञ्जसा ।;भीमाय नात्र सन्देहो जितोऽनेन च संयुगे ॥ १७८॥ | |||
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| verse_lines = अजेयौ शर्ववचनाद् रणे कीचकपौण्ड्रकौ ।;वशं प्रयातो भीमस्य तथाऽवध्योऽपि चेदिपः ॥ १७९॥ | |||
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| verse_lines = जीवग्राहभयं ह्येषां भीमान्मागधपातनात् ।;तस्मात् करं प्रयच्छन्ति जिता वा पूर्वमेव वा ॥ १८०॥ | |||
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| verse_lines = प्रयाहि च त्वं धनदप्रपालितां दिशं द्वीपान् सप्त चाशेषदिक्षु ।;नागांश्च दैत्यांश्च तथाऽधरस्थान् विजित्य शीघ्रं पुनरेहि चात्र ॥ १८१॥ | |||
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| verse_lines = रथो हि दिव्योऽम्बरगस्तवास्ति दिव्यानि चास्त्राणि धनुश्च दिव्यम् ।;येऽन्ये च बाणप्रमुखा अजेयाः शर्वाश्रयास्तानपि भीम एतु ॥ १८२॥ | |||
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| verse_lines = तथा सुराश्चापि(तथाऽसुराः) समस्तशोऽस्य बलिं प्रयच्छन्ति मदज्ञयेतरे ।;दिशं प्रतीचीमथ दक्षिणां च यातां यमौ क्रमशो ह्यध्वरार्थे ॥ १८३॥ | |||
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| verse_lines = यशश्च धर्मश्च तयोरपि स्यादिति स्यदिति स्म कृष्णेन सुतेन काल्याः ।;उक्ते ययुस्ते तमभिप्रणम्य दिशो यथोक्ताः परमोरुसद्गुणम् (परमोरुसद्गुणाः) ॥ १८४॥ | |||
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| verse_lines = वृकोदरोऽजयन्नृपान् विराटमाससाद ह ।;जितेऽत्र कीचके रणे समाददे करं ततः ॥ १८५॥ | |||
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| verse_lines = ततः क्रमान्नृपान् जित्वा चेदीनां विषयं गतः ।;मातृवाक्याद् भयाच्चैव शिशुपालेन पूजितः ॥ १८६॥ | |||
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| verse_lines = मातृष्वसुर्गृहे चोष्य दिवसान् कतिचित् सुखम् ।;करं सुमहदादाय ततः पूर्वां(पूर्वं) दिशं ययौ ॥ १८७॥ | |||
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| verse_lines = क्रमेण सर्वान् निर्जित्य पौण्ड्रकं च महाबलम् ।;विरथीकृत्य कर्णं च करमादाय सर्वतः ॥ १८८॥ | |||
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| verse_lines = हिमवच्छिखरे देवान् जित्वा शक्रपुरोगमान् ।;क्रीडार्थं युद्ध्यतस्तेभ्यस्तुष्टेभ्यो रत्नसञ्चयम्(सञ्चयान्) ॥ १८९॥ | |||
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| verse_lines = बाहुयुद्धेन शेषं च गरुडं च महाबलम् ।;क्रीडमानौ(क्रीडमानो) विनिर्जित्य भूषणान्याप तोषतः ।;ताभ्यां च दृढमाश्लिष्टः स्नेहविक्लिन्नया धिया ॥ १९०॥ | |||
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| verse_lines = पोप्लूयमानः स ततोऽम्बुधौ बली जगाम बाणस्य पुरं हरं च ।;रणेऽजयद् वारणरूपमास्थितं क्रीडन्तमेतेन च तोषितो हरः ॥ १९१॥ | |||
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| verse_lines = पृष्टश्च गिरिशेनासौ विस्तरं दिग्जयस्य च ।;सिंहव्याघ्रादिरूपाश्च आत्मना विजिता यथा ।;गुरुत्मच्छेषशक्राद्या देवाः सर्वे तदब्रवीत् ॥ १९२॥ | |||
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| verse_lines = निशम्य शङ्करोऽखिलं मखस्य च प्रसाधकम् ।;हरिं ततो बलेः सुताद् ददौ च रत्नसञ्चयम्(सुदिव्यरत्नसञ्चयम्) ॥ १९३॥ | |||
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| verse_lines = स बाणदैत्यतो महच्छिवेन दत्तमुत्तमम्।;प्रगृह्य रत्सञ्चयं स्वकं पुरं समाययौ॥१९४॥ | |||
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| verse_lines = सोऽभिवाद्याग्रजं(सोऽभिवन्द्याग्रजं) चैव यथावृत्तं न्यवेदयत् ।;आत्मनः कृष्णयोः सर्वं धर्मराजाग्रतो मुदा ॥ १९६॥ | |||
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| verse_lines = तपसा तोषितात् कृष्णादन्यानेवामुनाऽखिलान् ।;विजेष्यसि यदा कृष्णविरोधस्ते तदा धनुः ।;मामेष्यतीति तेनोक्तो न व्यरुध्यत केशवे ॥ २०४॥ | |||
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| verse_lines = स्वसुः स्नेहाच्च कृष्णस्य यज्ञकारयितृत्वतः ।;भीमार्जुनबलाच्चैव माद्रेयाय ददौ करम् ।;जिग्ये बलेनान्यनृपान् सहदेवः प्रतापवान् ॥ २०५॥ | |||
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| verse_lines = तथा स्मृतं समागतं घटोत्कचं विभीषणे ।;समादिशद् ययौ च सोऽपि सोऽददान्महाकरम् ॥ २०६॥ | |||
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| verse_lines = पुरा हि राघवोदितं तदस्य(यदस्य) सोऽखिलं तदा ।;विचार्य केशवं च तं बलं च भीमपार्थयोः ।;दिवौकसश्च पाण्डवानवेत्य सोऽददात् करम् ॥ २०७॥ | |||
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| verse_lines = महौघरत्नसञ्चयं स आप्य भीमसेनजः ।;ययौ च माद्रिनन्दनं स चाऽययौ स्वकं पुरम् ॥ २०८॥ | |||
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| verse_lines = नकुलः पश्चिमाशायां विजिग्येऽखिलभूभृतः ।;करमाप च वीरोऽसौ सौहार्दादेव मातुलात् ।;आययौ च महारत्नसञ्चयेन स्वकं पुरम् ॥ २०९॥ | |||
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| verse_lines = अर्जुनः कपिवरोच्छ्रितध्वजं स्यन्दनं समधिरुह्य गाण्डिवी।;यात एव दिशमुत्तरां यदा(तदा) पार्वतेयकुनृपाः समाययुः ॥ २१०॥ | |||
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| verse_lines = त्रैगर्ताः पार्वतेयाश्च सहिताः पाण्डुनन्दनम् ।;अभ्येत्य योधयामासुर्जानन्तस्तच्चिकीर्षितम् ॥ २११॥ | |||
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| verse_lines = तान् विजित्य युगपत् स पाण्डवः सञ्जयन् क्रमश एव तां दिशम् ।;प्राव्रजच्च भगदत्तमूर्जितं तेन चास्य समभून्महारणः ॥ २१२॥ | |||
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| verse_lines = सोऽभियुद्ध्य सगजो दिनाष्टकं श्रान्त आह पुरुहूतनन्दनम् ।;ब्रूहि ते समरकारणं त्विति प्राह देहि करमित्यथार्जुनः ॥ २१३॥ | |||
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| verse_lines = सोऽप्यदात् करममुष्य वासवो मद्गुरुस्तव पितेति सादरम् ।;नैव जेतुमिह शक्ष्यसि त्वमित्यावदद्धरिवरास्त्रतेजसा ॥ २१४॥ | |||
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| verse_lines = स्नेहपूर्वं प्रदत्ते तु करे नैवाऽह चोत्तरम् ।;अर्जुनो व्यर्थकलहमनिच्छन् स्नेहयन्त्रितः ॥ २१५॥ | |||
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| verse_lines = पार्थो जित्वाऽष्टवर्षाणि षड् द्वीपानपरानपि ।;अजयच्चतुर्दिशमपि सर्वशः शस्त्रतेजसा ॥ २१६॥ | |||
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| verse_lines = पाताळसप्तकं गत्वा जित्वा दैतेयदानवान् ।;बलेश्च विष्णुवचनात् करं जग्राह सामतः ॥ २१७॥ | |||
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| verse_lines = जित्वा च वासुकिं भूरि रत्नमादाय सत्वरः ।;आजगाम पुरं स्वीयं वीरो वत्सरमात्रतः ॥ २१८॥ | |||
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| verse_lines = सुवर्णरत्नगिरयश्चतुर्भिस्तैः समार्जिताः ।;चत्वारो योजनानां हि दश त्रिंशच्छतं तथा ॥ २१९॥ | |||
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| verse_lines = चतुःशतं च क्रमश उच्छ्रिता दिग्जयार्जिताः ।;प्रतीच्याद्यपसव्येन क्रमाद् दिग्भ्यः समार्जिताः ॥ २२०॥ | |||
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| verse_lines = विश्वकर्मकृतत्वात्तु पुरस्याल्पेऽपि च स्थले ।;अन्तर्गतास्ते गिरयस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २२१॥ | |||
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| verse_lines = ततो यज्ञः प्रववृते कृष्णद्वैपायनेरितः ।;ऋत्विजो मुनयोऽत्रासन् सर्वविद्यासु निष्ठिताः ।;द्वैपायनोक्तविधिना (दीक्षितं)दीक्षयाञ्चक्रिरे नृपम् ॥ २२२॥ | |||
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| verse_lines = ज्येष्ठत्वाद् याजमानं तु प्रणिधाय युधिष्ठिरे ।;भीमार्जुनादयः सर्वे सह तेन समासिरे ॥ २२३॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्माणीपदयोग्यत्वात् कृष्णैका यज्ञपत्न्यभूत् ।;पदायोग्यतया नान्याः पत्न्यस्तेषां सहाऽसिरे ॥ २२४॥ | |||
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| verse_lines = आज्ञयैव जगद्धातुर्व्यासस्यानन्ततेजसः ।;स्थलमप्यत्र सर्वं हि रत्नहेममयं त्वभूत् ।;किमु पात्रादिकं सर्वं शिबिराणि च सर्वशः ॥ २२५॥ | |||
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| verse_lines = आहूतं दिग्जये पार्थैस्तदा लोकद्विसप्तकम् ।;सर्वमत्राऽगमद् ब्रह्मशर्वशक्रादिपूर्वकम् ॥ २२६॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मो द्रोणश्च विदुरो धृतराष्ट्रः सहात्मजः ।;सस्त्रीका आययुस्तत्र बाह्लीकश्च सहात्मजः ॥ २२७॥ | |||
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| verse_lines = तथैव यादवाः सर्वे बलभद्रपुरोगमाः ।;(रुग्मिणी)रुक्मिणीसत्यभामाद्या महिष्यः केशवस्य च ॥ २२८॥ | |||
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| verse_lines = तत्र सर्वजगदेकसङ्गमे तत्त्वनिर्णयकथा बभूविरे ।;प्राश्निकोऽत्र परिपूर्णचिद्धनो व्यास एव भगवान् बभूव ह ॥ २२९॥ | |||
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| verse_lines = तत्त्वनिर्णयकथासु निर्णयो वासुदेवगुणविस्तरोऽभवत् ।;नास्ति तत्सदृश उत्तमः कुतः पार एष न ततोऽन्य इत्यपि ॥ २३०॥ | |||
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| verse_lines = बादरायणभृगूत्थरामयोः शृण्वतोः परमनिर्णये कृते ।;मोदमानजनतासमागमेऽपृच्छदत्र नृपतिर्यतव्रतम् ॥ २३१॥ | |||
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| verse_lines = जानमानोऽपि नृपतिः सर्वपूज्यतमं हरिम् ।;संशयं भूभृतां भेत्तुं भीष्मं पप्रच्छ धर्मवित् ॥ २३२॥ | |||
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| verse_lines = नास्ति नारायणसममिति वादेन निर्णये ।;कृते ब्रह्मादिभिरपि कृष्णं मर्त्यं हि मेनिरे ॥ २३३॥ | |||
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| verse_lines = नृपास्तस्मादयं कृष्णो नारायण इति स्म ह ।;सम्यग् ज्ञापयितुं धर्मसूनुर्भीष्ममपृच्छत ॥ २३४॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मादयः सुरा यस्माद् दृश्यन्ते मर्त्यवन्नृभिः ।;नचैवातितराभ्यासो नृणामस्ति मुनिष्वपि ॥ २३५॥ | |||
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| verse_lines = पितामहाग्र्यपूजार्हः कोऽत्र लोकसमागमे ।;ब्रह्मशर्वादयश्चात्र सन्ति राजान एव च ।;इति पृष्टोऽब्रवीद् भीष्मः कृष्णं पूज्यतमं प्रभुम्(हरिम्) ॥ २३७॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णाय दत्ते राजानो विवादं कुर्युरञ्जसा ।;विवादेन च कीर्तिः स्याद् वासुदेवस्य विस्तृता ।;ततः कृष्णायाग्रपूजा दत्ता पार्थैर्जगत्पुरः ॥ २४१॥ | |||
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| verse_lines = अग्र्योपहारमुपयापित एव कृष्णे कोपादनिन्ददमुमाशु च चेदिराजः ।;श्रुत्वैव तत् पवनजोऽभिययौ नृपं तं हन्तुं जगद्गुरुविनिन्दकमृद्धमन्युः ॥ २४३॥ | |||
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| verse_lines = दूरेऽपि केशवविनिन्दनकारिजिह्वामुच्छेत्स्य इत्युरुतराऽस्य सदा प्रतिज्ञा ।;भीमस्य तं तु जगृहे सरिदात्मजोऽथ सम्प्रोच्य केशववचो निजयोर्वधाय ॥ २४४॥ | |||
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| verse_lines = मयैव वध्याविति तावाह यत् केशवः पुरा ।;तच्छ्रुत्वा भीमसेनोऽपि स्थितो भीष्मकरग्रहात् ॥ २४५॥ | |||
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| verse_lines = देवसङ्घभविनां महानभूदीक्ष्य(महानभूद् वीक्ष्य) तोष इह केशवेऽधिकाम् ।;अर्चनां य इह मानुषो जनो मध्य एव स तु संस्थितोऽभवत् ॥ २४७॥ | |||
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| verse_lines = समाह्वयच्च केशवं युधे तमाशु केशवः ।;निवार्य तस्य सायकाञ्जघान चारिणा प्रभुः ॥ २४९॥ | |||
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| verse_lines = निकृत्यमानकन्धरः स भक्तिमानभूद्धरौ ।;तमाश्रितश्च योऽसुरो महत्तमः(महातमः) प्रपेदिवान् ॥ २५०॥ | |||
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| verse_lines = जयः प्रविश्य केशवं पुनश्च पार्षदोऽभवत् ।;असौ च पाण्डवक्रतुः प्रवर्तितो यथोदितः ॥ २५१॥ | |||
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| verse_lines = सुवर्णरत्नभारकान् बहून् नृपा उपानयन् ।;उपायनं(उपायने) सुयोधनं नृपोऽदिशद् ग्रहेऽस्य च ॥ २५२॥ | |||
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| verse_lines = अभोजयंस्तथा द्विजान् यथेष्टभक्ष्यभोज्यकैः ।;सुवर्णरत्नभारकान् बहूंश्च दक्षिणा ददुः ॥ २५३॥ | |||
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| verse_lines = यदिष्टमास यस्य च प्रदत्तमेव पाण्डवैः ।;समस्तमत्र सर्वशोऽथ सस्नुरुद्भृता(सस्नुरुद्धताः) मुदा ॥ २५४॥ | |||
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| verse_lines = नदत्सुरोरुदुन्दुभिप्रगीतदेवगायकाः ।;प्रनृत्तदिव्ययोषितः सुरापगां व्यगाहयन् ॥ २५५॥ | |||
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| verse_lines = समस्तराजसंयुता विगाह्य जाह्नवीजले ।;पुरं ययुः पुनश्च ते सुसद्म चागमन् सुराः ॥ २५६॥ | |||
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| verse_lines = गतेषु सर्वराजसु स्वकां(स्वकं) पुरं स्वकेषु च ।;सभीष्मकेषु सर्वशः सहाऽम्बिकेयकेषु च ॥ २५७॥ | |||
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| verse_lines = विचित्ररत्ननिर्मिते रविप्रभे सभातले ।;सकेशवो वरासने विवेश धर्मनन्दनः ॥ २५८॥ | |||
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| verse_lines = तथैव (रुग्मिणी)रुक्मिणीमुखाः परिग्रहा रमेशितुः ।;तथैव भीमफल्गुनावुपाविशन् हरेरुप ॥ २५९॥ | |||
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| verse_lines = सहैव वायुसूनुना तथैव पार्षतात्मजा ।;उपैव रुग्मिणीं शुभा तथैव सत्यभामिनीम्(तथा ससत्यभामिनीम्) ॥ २६०॥ | |||
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| verse_lines = यमौ च पार्षतादयो धनञ्जयान्तिकेऽविशन् ।;तथैव रामसात्यकी समीप एव भूभृतः ॥ २६१॥ | |||
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| verse_lines = समासतां तु सा सभा व्यरोचताधिकं तदा ।;यथा सभा स्वयम्भुवः समास्थिता च विष्णुना ॥ २६२॥ | |||
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| verse_lines = विचित्रहेममालिनः शुभाम्बराश्च तेऽधिकम् ।;स्फुरत्किरीटकुण्डला विरेजुरत्र ते नृपाः ॥ २६३॥ | |||
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| verse_lines = विशेषतो जनार्दनः सभार्यको जगत्प्रभुः ।;यथा दिवौकसां सदस्यनन्तसद्गुणार्णवः ॥ २६४॥ | |||
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| verse_lines = उपासिरे च तान् नृपाः समस्तशः सुहृद्गुणाः ।;तदाऽऽजगाम खड्गभृत् सहानुजः सुयोधनः ॥ २६५॥ | |||
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| verse_lines = द्वारं सभाया हरिनीलरश्मिव्यूढं न जानन् स विहाय भित्तम् ।;अभ्यन्तराणां दृशि नो विघातिनीं(दृशिनोऽविघातिनीं) संस्फाटिकामाशु दृढं चुचुम्बे(चुचुम्ब) ॥ २६६॥ | |||
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| verse_lines = प्रवेशयेतां च यमौ तमाशु सभां भुजौ गृह्य नृपोपदिष्टौ ।;तत्रोपविश्य क्षणमन्यतोऽगादमृष्यमाणः श्रियमेषु दिव्याम् ॥ २६७॥ | |||
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| verse_lines = तत्रेन्द्रनीलभुवि रत्नमयानि दृष्ट्वा पद्मानि नीरमनसा जगृहे स्ववस्त्रम् ।;रत्नोरुदीधितिनिगूढजलं स्थलं च मत्वा पपात सहितोऽवरजैर्जलौघे ॥ २६८॥ | |||
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| verse_lines = तं प्राहसद् भगवता क्षितिभारनाशहेतोः सुसूचित उरुस्वरतोऽत्र भीमः ।;पाञ्चालराजसुतया च समं तथाऽन्यैः स्वीयैस्तथाऽनु जहसुर्भगवन्महिष्यः ॥ २६९॥ | |||
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| verse_lines = मन्दस्मितेन विलसद्वदनेन्दुबिम्बो नारायणस्तु मुखमीक्ष्य मरुत्सुतस्य ।;नोवाच किञ्चिदथ धर्मसुतो निवार्य प्रास्थापयद् वसनमाल्यविलेपनानि ॥ २७०॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णावृकोदरगतं बहुलं निधाय क्रोधं ययौ सशकुनिर्धृतराष्ट्रपुत्रः ।;सुव्रीडितो नृपतिदत्तवराम्बरादीन्(नृपतिदत्तसदम्बरादीन्) न्यक्कृत्य मार्गगत आह स मातुलं स्वम् ॥ २७१॥ | |||
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| verse_lines = यौ मामहसतां कृष्णभीमौ कृष्णस्य सन्निधौ ।;तयोरकृत्वा सन्तापं नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ २७२॥ | |||
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| verse_lines = यदि मे शक्तिरत्र स्याद् घातयेयं वृकोदरम् ।;अग्रपूजां च कृष्णस्य विलुम्पेयं न संशयः ॥ २७३॥ | |||
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| verse_lines = ईदृशं पाण्डवैश्वर्यं दृष्ट्वा को नाम जीवितम् ।;इच्छेत करदा येषां वैश्यवत् सर्वभूमिपाः ॥ २७४॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तः शकुनिर्वैरं दृढीकर्तुं वचोऽब्रवीत् ।;किं ते वैरेण राजेन्द्र बलिभिर्भ्रातृभिः पुनः ॥ २७५॥ | |||
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| verse_lines = अनुजीवस्व तान् वीरान् गुणज्येष्ठान् बलाधिकान् ।;इतीरितोऽतिसंवृद्धकोप आह सुयोधनः ॥ २७६॥ | |||
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| verse_lines = यदि तेषां तदैश्वर्यं न मां गच्छेदशेषतः ।;सर्वथा नैव जीवेयमिति सत्यं ब्रवीमि ते ॥ २७७॥ | |||
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| verse_lines = नच बाहुबलाच्छक्ष्य आदातुं तां श्रियं क्वचित् ।;नेन्द्रोऽपि समरे शक्तस्तान् जेतुं किमु मानुषाः ॥ २७८॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः पापतम आह गान्धारको नृपः ।;पापानामखिलानां च प्रधानं(प्रधानः) चक्रवर्तिनम् ॥ २७९॥ | |||
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| verse_lines = यां यां श्रियं प्रदीप्तां त्वं पाण्डवेषु प्रपश्यसि ।;तामक्लेशत आदास्ये क्रीडन्नक्षैस्त्वदन्तिके ॥ २८०॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः प्रसन्नधीः सुयोधनो बभूव ह ।;प्रजग्मतुश्च तावुभौ विचित्रवीर्यजं नृपम् ॥ २८१॥ | |||
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| verse_lines = धृतराष्ट्रमथोवाच द्वापरांशोऽतिपापकृत् ।;नास्तिक्यरूपः शकुनिर्विवर्णं हरिणं कृशम् ॥ २८२॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनं तु तच्छ्रुत्वा कुत इत्याह दुर्मनाः ।;अब्रूतां तौ नृपायाऽशु द्वाभ्यां यन्मन्त्रितं पथि ॥ २८३॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वैव तन्नेत्यवदत् स भूपतिर्विरोधि धर्मस्य विनाशकारणम् ।;कुमन्त्रितं वो न ममैतदिष्टं स्वबाहुवीर्याप्तमहाश्रियो(स्वबाहुवीर्यात्तमहाश्रियः) हि ते ॥ २८४॥ | |||
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| verse_lines = त्वयाऽपि निर्जित्य दिशो मखाग्र्याः कार्याः स्पृधो मा गुणवत्तमैस्तैः ।;विशेषतो भ्रातृभिरग्र्यपौरुषैरित्युक्त आहाऽशु सुयोधनस्तम् ॥ २८५॥ | |||
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| verse_lines = यदि श्रियं पाण्डवानां नाक्षैराहर्तुमिच्छसि(नाक्षैराच्छेत्तुमिच्छसि) ।;मृतमेवाद्य मां विद्धि पाण्डवैस्त्वं सुखी भव ॥ २८६॥ | |||
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| verse_lines = यदि मज्जीवितार्थी त्वमानयाऽश्विह पाण्डवान् ।;सभार्यान् देवनायैव नचाधर्मोऽत्र कश्चन ॥ २८७॥ | |||
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| verse_lines = अतः स्वधर्म एवायं तवापि स्यात् फलं महत् ।;इत्युक्तो मा फलं मेऽस्तु तवैवास्त्विति सोऽब्रवीत् ॥ २८९॥ | |||
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| verse_lines = एवं ब्रुवन्नपि नृप आविष्टः कलिना स्वयम् ।;पुत्रस्नेहाच्च विदुरमादिशत् पाण्डवान् प्रति ॥ २९०॥ | |||
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| verse_lines = अतः क्षिप्रमुपानेयाः पार्था इति बलोदितः ।;ययौ स विदुरः पार्थान् द्वारकां केशवे गते ॥ २९५॥ | |||
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| verse_lines = गते हि पार्थसन्निधेः सुयोधने तु नारदः ।;शशंस धर्मसूनुना प्रचोदितोऽरिमागतम् ॥ २९६॥ | |||
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| verse_lines = क उद्यमी नृपेष्विति प्रपृष्ट आह नारदः ।;स सौभराड् वरं शिवादवाप वृष्णिनिर्जयम्(वृष्णिनिर्जये) ॥ २९७॥ | |||
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| verse_lines = पांसुमुष्टिं सकृद्ग्रासी बहूनब्दांस्तपश्चरन् ।;आजगाम हरादाप्य वरं कृष्णजये पुनः ॥ २९८॥ | |||
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| verse_lines = स श्रुत्वा मागधवधं दिशां विजयमेव च ।;राजसूयं क्रतुं चैव शिशुपालवधं तथा ॥ २९९॥ | |||
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| verse_lines = यदून् प्रत्युद्यमं तूर्णं करोतीति निशम्य तत् ।;समैक्षद् धर्मजः कृष्णमुखशीतांशुमण्डलम्(कृष्णमुखं शीतांशुमण्डलम्) ॥ ३००॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्वित्युक्त्वा स गोविन्दः प्रेषयामास यादवान् ।;प्रद्युम्नादीन् दिनैः कैश्चित् स्वयं चागात् सहाग्रजः ॥ ३०१॥ | |||
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| verse_lines = विदुरस्तु ततो गत्वा धर्मराजमथाऽह्वयत् ।;भ्रातृभिर्वार्यमाणोऽपि कृष्णया च स धर्मराट् ।;सार्धं मात्रा भ्रातृभिश्च कृष्णया च ययौ द्रुतम् ॥ ३०२॥ | |||
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| verse_lines = ज्येष्ठाज्ञयैव विदुर आह्वायन्नपि धर्मजम् ।;नाऽगन्तव्यमिति प्राह दोषानुक्त्वाऽक्षजान् बहून् ॥ ३०३॥ | |||
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| verse_lines = इतीह दोषसञ्चयस्तथापि ते पितुर्वचः ।;समीक्ष्य तद् द्वयं स्वयं कुरुष्व कार्यमात्मनः ॥ ३०४॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितोऽपि पाण्डवो ययौ कलिप्रवेशितः ।;विचित्रवीर्यजं च तं समासदत् ससैनिकः ॥ ३०५॥ | |||
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| verse_lines = कल्याविशान्नृपतिः प्रतिजज्ञे पूर्वमेव धर्मात्मा ।;आहूतो (द्यूतकरणात्) द्यूतरणान्निवर्तेयं नैव वारितोऽपीति ॥ ३०६॥ | |||
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| verse_lines = तेनाऽयात् (स सुहृद्भिः)स्वसुहृद्भिर्निवार्यमाणोऽपि नागपुरमाशु ।;नहि धर्मो द्यूतकृतो विशेषतः क्षत्रियस्य लोकगुरोः ॥ ३०७॥ | |||
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| verse_lines = वैचित्रवीर्यतनयेन तु पाण्डुपुत्राः सम्भावितास्तमुप च न्यवसन् निशायाम् ।;प्रातश्च भीष्ममुखराः सकलाश्च भूपा आसेदुराशु च सभां सह पाण्डुपुत्रैः ॥ ३०८॥ | |||
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| verse_lines = वैचित्रवीर्यनृपतिर्विदुरान्वितोऽस्य गान्धारराजसहितास्तनयाः सकर्णाः ।;प्राप्ताः सभातलमथाऽह्वयदत्र धर्मराजं सुतः सुबलकस्य स देवनाय ॥ ३०९॥ | |||
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| verse_lines = सर्वांश्च तत्र कलिराविशदेव भीमपूर्वान् विनैव चतुरः सपृथां च कृष्णाम् ।;क्षत्तारमेव च ततो नहि भीष्ममुख्यैस्ते वारिताः कुलविनाशनकर्मवृत्ताः ॥ ३१०॥ | |||
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| verse_lines = भीमादिभिः स विदुरेण च वार्यमाणो द्यूते निधाय पणमप्यखिलं स्ववित्तम् ।;गान्धारकेण विदिताक्षहृदा जितो द्राक् पाण्डोः सुतोऽथ नकुलं न्यदधात् पणाय ॥ ३११॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् जितेऽथ सहदेवमथार्जुनं च भीमं च सोमकसुतां स्वमपि क्रमेण ।;राजा निधाय विजितोऽथ सुयोधनः स्वं सूतं दिदेश पृषतात्मजपुत्रिकायाः ॥ ३१२॥ | |||
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| verse_lines = सूतो गत्वा तदन्तं समकथयदिमां द्यूतमध्ये जिताऽसि;क्षिप्रं चाऽयाहि राज्ञां समितिमुरुतरामित्यथो साऽप्यवादीत् ।;नाहं यास्ये गुरूणां(कुरूणां) समितिमिति ययौ सोऽप्यमुं भीमभीतं;ज्ञात्वा दुःशासनं सोऽप्यदिशदथ नृपो धार्तराष्ट्रोऽनुजं स्वम् ॥ ३१३॥ | |||
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| verse_lines = स पापपूरुषोत्तमः प्रगृह्य केशपक्षके ।;पुरः स्वमातुरानयत् सभामयुग्मवाससीम् ॥ ३१४॥ | |||
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| verse_lines = समाहृता रजस्वला जगाद भीष्मपूर्वकान् ।;अधर्म एष वार्यते न धर्मिभिर्भवद्विधैः ॥ ३१५॥ | |||
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| verse_lines = कथं छलात्मके द्यूते जिते धर्मजयो भवेत् ।;नहि द्यूतं धर्ममाहुः(धर्म्यमाहुः) विशेषेण तु भूभुजाम् ॥ ३१६॥ | |||
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| verse_lines = येऽधर्मं(ये धर्मं) न वदन्तीह न ते वृद्धा इतीरिताः ।;अवृद्धमण्डितां नैव सभेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ३१७॥ | |||
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| verse_lines = कथं द्यूते जिता चाहमजिते स्वपतौ स्थिते ।;समानधर्मिणीमाहुर्भार्यां यस्माद् विपश्चितः ॥ ३१८॥ | |||
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| verse_lines = सहैव कर्म कर्तव्यं पतौ दासे हि भार्यया ।;दासीत्वं न पृथङ् मे स्याज्जितेऽपि हि पतौ ततः ॥ ३१९॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्ता अपि भीष्माद्याः कल्यावेशेन मोहिताः ।;पृच्छ धर्मजमित्युक्त्वा तूष्णीमेव बभूविरे ॥ ३२०॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनप्रतीपं हि न कश्चिदशकत् तदा ।;उवाच विदुरस्तत्र न धर्मोऽयमिति स्फुटम् ॥ ३२१॥ | |||
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| verse_lines = न तस्य वाचं जग्राह धृतराष्ट्रः सहात्मजः ।;ऊर्ध्वबाहुः स चुक्रोश देवानां ख्यापयंस्तदा ॥ ३२२॥ | |||
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| verse_lines = स्वाशक्तिं द्रौपदीं चाऽह जिता नैवासि धर्मतः ।;अधर्मो हि महानेतां सभामाक्रम्य तिष्ठति ॥ ३२३॥ | |||
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| verse_lines = एवं तु विदुरेणोक्ते विकर्णः पापकोऽपि सन् ।;आह डम्भार्थमेवात्र धर्मवित्त्वं प्रकाशयन् ।;अधर्म एवायमिति कर्णोऽथैनमभर्त्सयत् ॥ ३२४॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा भीमः क्लिश्यमानां तु कृष्णां धर्मात्ययं धर्मराजे च दृष्ट्वा ।;राजा शास्यो युवराजेन धर्माच्चलन् यस्माद् वाक्यमिदं बभाषे ॥ ३२५॥ | |||
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| verse_lines = इमां न्यस्तवतो द्यूते धक्षणीयौ हि ते भुजौ ।;नैवमित्यर्जुनोऽवादीत् तमाहाथ वृकोदरः ॥ ३२६॥ | |||
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| verse_lines = वक्तव्यं नतु कर्तव्यं तस्मान्नहि मया कृतम् ।;उत्तमे वचसा शिक्षा मध्यमेऽर्थापहारणम् ।;अधमे देहदण्डश्च तस्माद् वाच्यो युधिष्ठिरः ॥ ३२७॥ | |||
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| verse_lines = अथ कर्णोऽब्रवीत् कृष्णामपतिर्ह्यसि शोभने ।;धार्तराष्ट्रगृहं याहीत्यथ दुर्योधनोऽवदत् ।;परस्परविरोधार्थं पाण्डवानामिदं वचः ॥ ३२८॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरो दुःखहेतुस्तवैको यद्येनमन्ये न गुरुर्न एषः ।;इति ब्रूयुरथवा भीमपार्थावेकोऽपिवा भीम इहोत्सृजे त्वाम् ॥ ३२९॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त ऊचे पवमानसूनुः पूज्योऽस्माकं धर्मजोऽसंशयेन ।;गुरुश्चाहं वोऽखिलानां यतो हि बलज्येष्ठं क्षत्रमाहुर्महान्तः ॥ ३३०॥ | |||
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| verse_lines = बलज्यैष्ठ्ये यदि वः संशयः स्यादुत्तिष्ठध्वं सर्व एवाद्य वीराः ।;मृद्गामि वः पादतलेन सर्वान् सहानुबन्धान् यश्च मां योद्धुकामः ॥ ३३१॥ | |||
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| verse_lines = इति ब्रुवन् समुत्थितो नदन् वृकोदरो यदा ।;विघूर्णिता सभाऽखिला भयान्नचाऽह किञ्चन(कश्चन) ॥ ३३२॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मो द्रोणो विदुराद्याः क्षमस्व सर्वं त्वयोक्तं सत्यमित्येव हस्तौ ।;गृहीत्वैनं स्थापयामासुरस्मिन् स्थिते शान्तिं चाऽपिरे धार्तराष्ट्राः ॥ ३३३॥ | |||
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| verse_lines = न चात्यवर्तत(न चातिवर्तते) ज्येष्ठं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।;तेषां पापाभिवृद्ध्यर्थं ज्येष्ठवृत्तिं च दर्शयन् ॥ ३३५॥ | |||
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| verse_lines = तवोरुमेनं गदयोरुवेगया बिभेत्स्य इत्येव पुनः सुयोधनः ।;ऊचे नान्यद् भवतामस्ति वित्तं द्यूते कृष्णं स्थापयध्वं पणाय ॥ ३३७॥ | |||
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| verse_lines = स वध्य एव मे सदा परोक्षतोऽपि यो हरिम् ।;विनिन्दयेदिति ध्रुवं प्रतिश्रुतं(प्रतिश्रवं) हि मारुतेः ॥ ३३९॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च पापवृद्धये तदैव नो जघान तम् ।;विकर्तनात्मजः पुनर्जगाद सोमकात्मजाम् ॥ ३४०॥ | |||
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| verse_lines = प्रयाहि भूभृतो हि नो गृहं न सन्ति पाण्डवाः ।;इतीरिते समुत्थितौ वृकोदरोऽनु चार्जुनः ॥ ३४१॥ | |||
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| verse_lines = उभौ च तौ युधिष्ठिरो न्यवारयत् तथाऽपरे ।;ततो विषण्णयोस्तयोः सुयोधनो वचोऽब्रवीत् ॥ ३४२॥ | |||
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| verse_lines = दुःशासनैषां वासांसि दासानां नो व्यपाकुरु ।;इत्युक्तोऽभ्यगमत् पार्थान् स्ववासांस्यथ ते ददुः ॥ ३४३॥ | |||
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| verse_lines = ते चर्मवसना(अचर्मवसना) भूत्वा तानशिष्टान् प्रकाश्य च ।;निषेदुश्च क्षमायान्ते(क्षमायां ते, सभायान्ते, क्षमाया अन्ते) क्षमामालम्ब्य विस्तृताम् ॥ ३४४॥ | |||
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| verse_lines = पुनर्दुर्योधनेनोक्तः पार्थानामथ पश्यताम् ।;चकर्ष वासो द्रौपद्यास्तदाऽवादीद् वृकोदरः ॥ ३४५॥ | |||
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| verse_lines = पापेषु पूर्वस्य तथाऽधमस्य वंशे कुरूणामुरुधर्मशीलिनाम् ।;दुःशासनस्यास्य विदार्य वक्षः पिबामि रक्तं जगतः समक्षम् ॥ ३४६॥ | |||
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| verse_lines = विकृष्यमाणे वसने तु कृष्णा सस्मार कृष्णं सुविशेषतोऽपि ।;तदाऽन्यदासीद् वसनं च तस्या दिव्यं सुसूक्ष्मं कनकावदातम् ॥ ३४७॥ | |||
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| verse_lines = पुनःपुनश्चैव विकर्षमाणे दुःशासनेऽन्यानि च तादृशानि ।;बभूवुरन्तं न जगाम पापः श्रान्तो न्यषीदत् स्विन्नगात्रः सभायाम् ॥ ३४८॥ | |||
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| verse_lines = वस्त्रोच्चये शैलनिभे प्रजाते दुर्योधनः प्राह सञ्जातकोपः ।;प्रवेशयेमां गृहमेव शीघ्रं किं नश्चिरेणेति सुमन्दबुद्धिः ॥ ३४९॥ | |||
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| verse_lines = तच्छ्रुत्वा वचनं कृष्णा प्रतिज्ञामकरोत् तदा ।;भीमो दुर्योधनं हन्ता कर्णं हन्ता धनञ्जयः ।;शकुनिं त्वक्षकितवं सहदेवो वधिष्यति ॥ ३५०॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्ते तत् तथेत्याह भीमसेनः सभातले ।;प्रतिज्ञामाददे पार्थस्तां माद्रीनन्दनस्तथा ।;नकुलः प्रतिजज्ञेऽथ शाकुनेयवधं प्रति ॥ ३५१॥ | |||
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| verse_lines = ततः सुयोधनानुजश्चकर्ष पार्षतात्मजाम् ।;गृहाय तन्निशाम्य तु क्रुधाऽऽह मारुतात्मजः ॥ ३५२॥ | |||
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| verse_lines = अर्जुनार्जुन नैवात्र क्षमा मे तात रोचते ।;पतितस्यास्य देहस्य काष्ठविष्ठासमस्य च ।;फलानि त्रीणि शिष्यन्ते विद्या कर्म सुता इति ॥ ३५३॥ | |||
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| verse_lines = इति वेदोदितं वाक्यं न सुतो दारधर्षणे ।;दुष्टदारो नचाऽप्नोति लोकानर्द्धो हि दूषितः ।;अरक्षणाद् दूषिताया(अरक्षणाद् दूषितायां, अरक्षणे दूषितायाः) न त्यागाच्च शुभं भवेत् ॥ ३५४॥ | |||
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| verse_lines = अतोऽद्य सानुबन्धकान् निहन्मि धार्तराष्ट्रकान् ।;इति ब्रुवन् व्यलोकयद् रिपून् दहन्निवौजसा ॥ ३५५॥ | |||
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| verse_lines = ददर्श च महाघोरमादातुं परिघं रुषा ।;कर्तुं व्यवसितो बुद्ध्या निश्शेषान् धृतराष्ट्रजान् ॥ ३५६॥ | |||
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| verse_lines = तदा शिवा ववाशिरे सुयोधनाग्निगेहतः ।;तथैव तत्पितुर्गृहेऽप्यभूद् भयानकं बहु ॥ ३५७॥ | |||
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| verse_lines = निमित्तान्यतिघोराणि कुपिते मारुतात्मजे ।;दृष्ट्वाऽऽम्बिकेयो विदुरं पप्रच्छैषां फलं द्रुतम् ॥ ३५८॥ | |||
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| verse_lines = आह तं विदुरो ज्येष्ठं क्षणेऽस्मिंस्तव पुत्रकाः ।;सानुबन्धा नशिष्यन्ति(न शिष्यन्ति) वृकोदरबलाहताः ॥ ३५९॥ | |||
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| verse_lines = क्रीडसेऽर्भकवत् त्वं हि किं जितं किं जितं त्विति ।;अधर्मेण जितानत्र जितान् पश्यसि पाण्डवान् ॥ ३६०॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रीषु द्यूतेषु वा दत्तं मदान्धेन नरेण वा ।;न दत्तमाहुर्विद्वांसस्तस्य बन्धुभिरेव च ॥ ३६१॥ | |||
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| verse_lines = आहार्यं पुनराहुश्च तथाऽपि नतु पाण्डवैः ।;तत् कृतं तव पुत्राणां ख्यापयद्भिरशिष्टताम् ॥ ३६२॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आहाऽम्बिकेयो निमित्तानां फलं कथम् ।;न भवेदिति स प्राह द्रुतं कृष्णा विमोच्यताम् (विमुच्यताम्) ॥ ३६३॥ | |||
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| verse_lines = तोषयस्व वरैश्चैनामन्यथा ते सुतान् मृतान् ।;विद्धि भीमेन निष्पिष्टान् माऽत्र(नात्र) ते संशयो भवेत् ॥ ३६४॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णा च पाण्डवाश्चैव तपोवृद्धिमभीप्सवः ।;तपसा नैव धक्ष्यन्ति तेन जीवन्ति ते सुताः ॥ ३६५॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽपि यदि कृष्णां त्वं न मोचयसि ते सुतान् ।;हनिष्यति न सन्देहो बलेनैव वृकोदरः ॥ ३६६॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितो विनिर्भर्त्स्य(विनिर्भत्स्य) पुत्रं दुःशासनं नृपः ।;अमोचयद् वरैश्चैनां छन्दयामास पार्षतीम् ॥ ३६७॥ | |||
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| verse_lines = छन्दिता सा वरैस्तेन धर्मे भागवते स्थिता ।;नैवाऽत्मनो वरान् वव्रे वव्रे तेषां विमोक्षणम् ॥ ३६८॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरस्य सभ्रातुः सराष्ट्रस्य विमोक्षणम् ।;ददौ नृपोऽस्या न पुनश्छन्द्यमानाऽपि साऽवृणोत् ॥ ३६९॥ | |||
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| verse_lines = भर्तुर्विष्णोश्च नान्यस्माद् वरस्वीकार इष्यते ।;एवं हि भगवद्धर्मस्तस्मात् सा नावृणोत् परम् ॥ ३७०॥ | |||
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| verse_lines = अधर्मतो हृतत्वात्तु तद् दानं न वरो भवेत् ।;इति मत्वा पाण्डवानां वव्रे कृष्णा विमोक्षणम् ॥ ३७१॥ | |||
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| verse_lines = श्वशुरादैहिकवराः क्षत्रियायास्त्रयो यतः ।;उक्ताः शतं च विप्राया धर्मे भागवते ततः ।;हेतुनाऽनेन वव्रे सा नान्यत् किञ्चिदतः परम् ॥ ३७२॥ | |||
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| verse_lines = ततो विमुक्ताः प्रययुश्च पार्था गुरून् प्रणम्य स्वपुरं सकृष्णाः ।;दुर्योधनानन्तरजो जगाद तातं निजं पापकृतां प्रधानः ॥ ३७३॥ | |||
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| verse_lines = समस्तपाण्डवश्रियं समागतामहो पुनः ।;व्यमोचयो वृकोदराद् वधश्च नो ध्रुवो भवेत् ॥ ३७४॥ | |||
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| verse_lines = अतः पुनश्च पाण्डवान् समाह्वयस्व(समानयस्व) नः कृते ।;पुनश्च देवनं भवेज्जिता वनं प्रयान्तु च ॥ ३७५॥ | |||
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| verse_lines = तेनोक्तः स तदा राजा पाण्डवान् पुनराह्वयत् ।;पुनः पित्रा समाहूतो देवनाय युधिष्ठिरः ।;भ्रातृभिर्वार्यमाणोऽपि कृष्णया चाऽगमत् सभाम् ॥ ३७६॥ | |||
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| verse_lines = एतेऽखिलाः षण्ढ(ड)तिलास्तमोऽन्धमं प्राप्ता नचैषां पुनरुत्थितिः स्यात् ।;इति ब्रुवाणोऽनुचकार भीमं तदाऽहसन् धार्तराष्ट्राश्च सर्वे ॥ ३८३॥ | |||
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| verse_lines = तदाऽकरोद् भीमसेनः प्रतिज्ञां हन्ताऽस्मि वो ह्यखिलान् सङ्गरेऽहम् ।;इतीरिते शरणं द्रोणमेव जग्मुः समस्ता धृतराष्ट्रपुत्राः ॥ ३८४॥ | |||
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| verse_lines = यत्र द्रोणस्तत्र पुत्रस्तत्र भीष्मः कृपस्तथा ।;नचात्येति गुरून् भीम इति तं शरणं ययुः ॥ ३८५॥ | |||
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| verse_lines = अब्रवीद् धार्तराष्ट्रांश्च द्रोणो विप्रोऽपि सन्नहम् ।;सपुत्रः सकृपः शस्त्रं ग्रहीष्ये भवतां कृते ॥ ३८६॥ | |||
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| verse_lines = रक्षणे भवतां चैव कुर्यां यत्नं स्वशक्तितः ।;नतु भीमाद् रक्षितुं वः शक्तः सत्यं ब्रवीम्यहम् ॥ ३८७॥ | |||
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| verse_lines = ततो ययुः पाण्डवास्ते सभाया वनाय कृष्णासहिताः सुशूराः ।;गत्याऽनुचक्रे युवसिंहखेलगतिं भीमं धार्तराष्ट्रोऽपहस्य ॥ ३८८॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा सभाया अर्द्धनिष्क्रान्तदेहो व्यावृत्य भीमः प्राह संरक्तनेत्रः ।;ऊरुं तवान्यं च रणे विभेत्स्य इत्युक्त्वाऽसौ निर्गतोऽसत्सभायाः ॥ ३८९॥ | |||
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| verse_lines = प्रयाताननु तान् कुन्ती प्रययौ पुत्रगृद्धिनी ।;रोरुद्यमानां विदुरः स्थापयामास तां गृहे ।;प्रणम्य तां ययुः पार्थाः सकृष्णाः शीघ्रगामिनः ॥ ३९०॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरोऽवाग्वदनो ययौ न क्रोधचक्षुषा ।;दहेयं कौरवान् सर्वानिति कारुणिको नृपः ॥ ३९१॥ | |||
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| verse_lines = उद्धृत्य बाहू प्रययौ बाहुषाली वृकोदरः ।;आभ्यामेवाखिलाञ्छत्रूञ्छक्तो हन्तुमहं त्विति ॥ ३९२॥ | |||
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| verse_lines = अबद्धकेशा प्रययौ द्रौपदी सा सभातलात् ।;मुक्तकेशा भविष्यन्ति धार्तराष्ट्रस्त्रियस्त्विति ॥ ३९३॥ | |||
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| verse_lines = वर्षन् पांसून् ययौ पार्थ इत्थं शत्रुषु सायकान् ।;वर्षयानीत्यभिप्रायः परमास्त्रविदां वरः ॥ ३९४॥ | |||
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| verse_lines = यमाववाङ्मुखौ यातौ नावयोः शत्रवो मुखम् ।;पश्यन्त्वस्यामवस्थायामित्येव धृतचेतसौ ॥ ३९५॥ | |||
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| verse_lines = प्रेतसंस्कारसूक्तानि पठन् धौम्योऽग्रतो ययौ ।;हतेषु धार्तराष्ट्रेषु मया कार्याः क्रिया इति ॥ ३९६॥ | |||
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| verse_lines = तानथानुययुः सूता रथैः परिचतुर्दशैः ।;सूदाः पौरोगवाश्चैव भृत्या ये त्वाप्तकारिणः ॥ ३९७॥ | |||
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| verse_lines = ततस्ते जाह्नवीतीरे वने वटमुपाश्रिताः ।;न्यषीदन्नागतान् दृष्ट्वा समस्तान् पुरवासिनः ॥ ३९८॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु ते सर्वजगन्निवासं नारायणं नित्यसमस्तसद्गुणम् ।;स्वयम्भुशर्वादिभिरर्चितं सदा भक्त्याऽस्मरन् भक्तभवापहं प्रभुम् ॥ ३९९॥ | |||
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<span id="gr-C22" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वाविंशोऽध्यायः"></span> | |||
== द्वाविंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ आगन्तुकामान् पुरवासिनस्ते संस्थाप्य कृच्छ्रेण कुरुप्रवीराः ।;रात्रौ प्रविष्टा गहनं वनं च किर्मीरमासेदुरथो नराशम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = बकानुजोऽसौ निखिलैरजेयो वराद् गिरीशस्य निहन्तुकामः ।;सदारसोदर्यमभिप्रसस्रे भीमं महावृक्षगिरीन् प्रमुञ्चन् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = स सम्प्रहारं सह तेन कृत्वा भीमो निपात्याऽशु(निहत्याऽशु) धरातले तम् ।;चक्रे मखे सङ्गरनामेधेये प्रसह्य नारायणदैवते पशुम् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = निहत्य रक्षो वनमध्यसंस्थास्तदा यतीनामयुतैः समेताः ।;अशीतिसाहस्रमुनिप्रवीरैर्दशांशयुक्तैः सहिता व्यचिन्तयन् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = विचिन्त्य तेषां भरणाय धर्मजः सम्पूज्य सूर्यस्थितमच्युतं प्रभुम् ।;दिनेऽक्षयान्नं पिठरं तदाप रत्नादिदं कामवरान्नदं च ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = बभार तेनैव युधिष्ठिरस्तान् प्रत्येकशस्त्रिंशतदासदासिकान्(त्रिंशतिदासदासिकान्) ।;सुवर्णपात्रेषु हि भुञ्जते ये गृहे तदीये बहुकोटिदासिके ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = सत्सङ्गमाकाङ्क्षिण एव तेऽवसन् पार्थैः सहान्ये च मुनीन्द्रवृन्दाः ।;शृण्वन्त एभ्यः परमार्थसाराः कथा वदन्तश्च पुरातनास्तथा ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = एवं गजानां बहुकोटिवृन्दांस्तथा रथानां च हयांश्च वृन्दशः ।;विसृज्य रत्नानि नरांश्च वृन्दशो वने विजह्रुर्दिवि देववत् सुखम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = गवां च लक्षं प्रददाति नित्यशः सुवर्णभारांश्च शतं युधिष्ठिरः ।;सभ्रातृकोऽसौ वनमाप्य शक्रवन्मुमोद विप्रैः सहितो यथासुखम् ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = पार्थेषु यातेषु किमत्र कार्यमिति स्म पृष्टो विदुरोऽग्रजेन ।;आहूय राज्यं प्रतिपादयेति प्राहैनमाहाथ रुषाऽऽम्बिकेयः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानं प्रतीपोऽसि ममाऽत्मजानां न मे त्वया कार्यमिहास्ति किञ्चित् ।;यथेष्टतस्तिष्ठ वा गच्छ वेति प्रोक्तो ययौ विदुरः पाण्डुपुत्रान् ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् गते भ्रातृवियोगकर्शितः पपात भूमौ सहसैव राजा ।;सञ्ज्ञामवाप्याऽदिशदाशु सञ्जयं जीवामि चेदाशु ममाऽनयानुजम् ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः सञ्जयः पाण्डवेयान् प्राप्याऽनयद् विदुरं शीघ्रमेव ।;सोऽप्यागतः क्षिप्रमपास्तदोषो ज्येष्ठं ववन्देऽथ स चैनमाश्लिषत् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = अङ्कं समारोप्य स मूर्ध्नि चैनमाघ्राय लेभे परमां मुदं तदा ।;क्षत्तारमायान्तमुदीक्ष्य सर्वे ससौबला धार्तराष्ट्रा अमर्षात् ।;सम्मन्त्र्य हन्तुं पाण्डवानामुतैकं छन्नोपधेनैव ससूतजा ययुः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञाय तेषां गमनं समस्तलोकान्तरात्मा परमेश्वरेश्वरः ।;व्यासोऽभिगम्यावददाम्बिकेयं निवारयाऽश्वेव सुतं तवेति ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = अवाप्य पार्थानयमद्य मृत्युं सहानुबन्धो गमिता ह्यसंशयम् ।;इतीरिते तेन निवारयेति प्रोक्तो हरिः प्राह न संवदे तैः ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = मैत्रेय आयास्यति सोऽपि वाचं शिक्षार्थमेतेष्वभिधास्यतीह ।;तां चेत् करोत्येष सुतस्तवास्य भद्रं तदा स्याच्छप्स्यति त्वन्यथा सः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = उक्त्वेति राजानमनन्तशक्तिर्व्यासो ययौ तत्र गतेषु तेषु ।;सुयोधनाद्येषु हतेषु पार्थैर्भूभारहानिर्न भवेदिति प्रभुः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = सर्वाश्च चेष्टा भगवन्नियुक्ताः सदा समस्तस्य चितोऽचितश्च ।;तथाऽपि विष्णुर्विनिवारयेत् क्वचिद् वाचा विधत्ते च जनान् विडम्बयन् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = मैत्रेय आगादथ(आयात्) भूपतिश्च पुत्रान् समाहूय सकर्णसौबलान् ।;सम्पूजयामास मुनिं स चाऽह दातुं राज्यं पाण्डवान् सम्प्रशंसन् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = विशेषतो भीमबलं शशंस किर्मीरनाशादि वदन् मुनीन्द्रः ।;श्रुत्वाऽसहंस्तद् धृतराष्ट्रपुत्र आस्फालयामास निजोरुमुग्रः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = शशाप चैनं मुनिरुग्रतेजास्तवोरुभेदाय भवेत् सुयुद्धम् ।;इत्यूचिवान् धृतराष्ट्रानतोऽपि ययौ न चेद् राज्यदस्त्वं तथेति ।;श्रुत्वा तु किर्मीरवधं स्वपित्रा पृष्टं क्षत्रोक्तं (पृष्टक्षत्रोक्तं) सोऽत्रसद् धार्तराष्ट्रः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = वने वसन्तोऽथ पृथासुतास्ते वार्तां स्वकीयां(स्वकीयां वार्तां) प्रापयामासुराशु ।;कृष्णे सोऽपि द्रुतमायात् ससत्यः सम्बन्धिनो ये च पाञ्चालमुख्याः ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = क्रुद्धं कृष्णं धार्तराष्ट्राय पार्थाः क्षमापयामासुरुच्चैर्गृणन्तः ।;गुणांस्तदीयानमितान् प्रणम्य तदा रुदन्ती द्रौपदी चाऽप पादौ ।;सा पादयोः पतिता वासुदेवमस्तौत् समस्तप्रभुमात्मतन्त्रम् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = अचिन्त्यनित्याव्ययपूर्णसद्गुणार्णवैकदेहाखिलदोषदूर ।;रमाब्जजेरेशसुरेन्द्रपूर्ववृन्दारकाणां सतताभिवन्द्य ।;समस्तचेष्टाप्रद सर्वजीव प्रभो (सर्वजीवप्रभो) विमुक्ताश्रय सर्वसार ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा समस्तं भगवान् प्रतिज्ञां चकार तेषामखिलाश्च योषाः ।;पतीन् समालिङ्ग्य विमुक्तकेशा भीमाहतान् दर्शये नान्यथेति ।;तां सान्त्वयित्वा मधुरैः सुवाक्यैर्नारायणो वाचमिमां जगाद ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = यदीहाहं स्थितो नैवं भविताऽहं त्वयोधयम् ।;साल्वराजं दुरात्मानं हतश्चासौ सुपापकृत् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = सन्निधानेऽथ वा दूरे कालव्यवहितेऽपि वा ।;स्वभावाद् वा व्यवहिते वस्तुव्यवहितेऽपि वा ।;नाशक्तिर्विद्यते विष्णोर्नित्याव्यवहितत्वतः ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽपि नरलोकस्य करोत्यनुकृतिं प्रभुः ।;दुष्टानां दोषवृद्ध्यर्थं भीमादीनां गुणोन्नतेः ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरेऽतिवृद्धं तु राजसूयादिसम्भवम् ।;धर्मं च सङ्क्रामयितुं कृष्णायामनुजेषु च ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = योग्यताक्रमतो(योग्यताक्रमशो) विष्णुरिच्छयेत्थमचीक्लृपत् ।;एधमानद्विडित्येव विष्णोर्नाम हि वैदिकम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = स्वयोग्यताया अधिकधर्मज्ञानादिजं फलम् ।;भीष्मद्रोणाम्बिकेयादेः पार्थेष्वेव निधापितुम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च पापवृद्ध्यर्थमजो दुर्योधनादिषु ।;व्यासोऽम्बिकासुतं प्राह पार्था मेऽभ्यधिकं(मे ह्यधिकं) प्रियाः ।;तेषां प्रवासनं चैव प्रियं न मम सर्वथा ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = इति दुर्योधनादीनां पापवृद्ध्यर्थमेव सः ।;प्रिया इत्येव कथनात् पाण्डवानां शुभोन्नतेः(गुणोन्नतेः) ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = गुरुत्वाद् भीमसेनस्य क्षमा द्यूतेऽर्जुनादिनाम् ।;नातिधर्मस्वरूपोऽत्र(नातिधर्मस्वरूपोऽक्षे) धर्मो भीमे निरौपधः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = द्रौपद्या अप्यतिक्लेशात् क्षमा धर्मो महानभूत् ।;सा हि भीममनो वेद न कार्यः शाप इत्यलम् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् यथायोग्यतया हरिणा धर्मवर्धनम् ।;कृतं तत्रासन्निधानकारणं केशवोऽब्रवीत् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = साल्वं श्रुत्वा समायान्तं (समायातं) रौक्मिणेयादयो मया ।;प्रस्थापिता हि भवतां सकाशे ते ययुः पुरीम् ।;तदा साल्वोऽपि सौभेन द्वारकामर्दयद् भृशम् ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = प्रद्युम्न आशु निरगादथ सर्वसैन्यै-;रन्यैश्च यादवगणैः सहितोऽनुजैश्च ।;साल्वोऽवगम्य तनयं मम तद्विमानात्;पापोऽवरुह्य रथमारुहदत्र योद्धुम् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = कृत्वा सुयुद्धममुना मम पुत्रकोऽसौ;अस्त्राणि तस्य विनिवार्य महास्त्रजालैः ।;दत्तं मया शरममोघमथाऽददे तं;हन्तुं नृपं कृतमतिस्त्वशृणोद् वचः खे ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = नारायणेन हि पुरा मनसाऽभिक्लृप्तं;कृष्णावतारमुपगम्य निहन्मि साल्वम् ।;इत्येव तेन हरिणाऽपि स भार्गवेण;विद्रावितो न निहतः स्वमनोनुसारात् ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = वध्यस्त्वया नहि ततोऽयमयं च बाणः;चक्रायुधस्य दयितो नितराममोघः ।;मा मुञ्च तेन तमिमं विनिवर्तयेऽहं;साल्वं हृदि स्थित इतीरितमीरणेन ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा वचः स पवनस्य शरं त्वमोघं;सञ्जह्र आशु स च साल्वपतिः स्वसौभम् ।;आरुह्य बालकलहेन किमत्र कार्यं;कृष्णेन सङ्गर इति प्रययौ स्वदेशम् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = प्रद्युम्नसाम्बगदसारणचारुदेष्णाः;सेनां निहत्य सह मन्त्रिगणैस्तदीयाम् ।;आह्लादिनः स्वपुरमाययुरप्यहं च;तत्रागमं सपदि तैः श्रुतवानशेषम् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = यस्मिञ्छरे करगते विजयो ध्रुवः स्यात्;मत्तेजसा तदनुसङ्ग्रहणात् सुतान्मे ।;यातं निशम्य रिपुमात्मपुरीं च भग्नां;दृष्ट्वैव तेन तदनुव्रजनं कृतं मे ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = तं सागरोपरिगसौभगतं निशाम्य;मुक्ते च तेन मयि शस्त्रमहास्त्रवर्षे ।;तं सन्निवार्य(तत्सन्निवार्य) तु मया शरपूगविद्धो;माया युयोज मयि पापतमः स साल्वः ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = ताः क्रीडया क्षणमहं समरे निशाम्य;ज्ञानास्त्रतः प्रतिविधूय बहूंश्च दैत्यान् ।;हत्वाऽऽशु तं च गिरिवर्षिणमाशु सौभं;वार्धौ न्यपातयमरीन्द्रविभिन्नबन्धम् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = तं स्यन्दनस्थितमथो विभुजं विधाय;बाणेन तद्रथवरं गदया विभिद्य ।;चक्रेण तस्य च शिरो विनिकृत्य धातृ-;शर्वादिभिः प्रतिनुतः स्वपुरीमगां च ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादिदं व्यसनमास हि विप्रकर्षात्;मे कार्यतस्त्विति निगद्य पुनश्च पार्थान् ।;कृष्णां च सान्त्वयितुमत्र दिनान्युवास;सत्या च सोमकसुतामनुसान्त्वयन्ती ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = पाण्डवानां च या भार्याः पुत्रा अपि हि(च) सर्वशः ।;अन्वेव पाण्डवान् याता वनमत्रैव स्थिताः(वनमत्रैव च संस्थिताः) ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नस्ततः कृष्णां सान्त्वयित्वैव केशवम् ।;प्रणम्य समनुज्ञातो भागिनेयैः पुरं ययौ ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टकेतुश्च भगिनीं काशिराजः सुतामपि ।;पुरं ययतुरादाय कुन्त्यैवान्याः सह स्थिताः ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = पार्वती नकुलस्याऽसीद् भार्या पूर्वं तिलोत्तमा ।;पूर्वोक्ते चैव यमयोर्भार्ये कुन्त्या हि वारिताः ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = सुभद्रामभिमन्युं च रथमारोप्य केशवः(काञ्चनम्) ।;पाण्डवानभ्यनुज्ञाय सभार्यः स्वपुरीं ययौ ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = कञ्चित् कालं द्रौपदेया उष्य पाञ्चालके पुरे ।;ययुर्द्वारवतीमेव(ययुर्द्वारावतीमेव) तत्रोषुः कृष्णलालिताः(कृष्णपालिताः) ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = ऊषुर्वने च ते पार्था मुनिशेषान्नभोजिनः ।;भुक्तवत्स्वेवानुजेषु भुङ्क्ते राजा युधिष्ठिरः ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = एवं सदा विष्णुपरायणानां तत्प्रार्पणान्नैकभुजां(तत्प्रापणान्नैकभुजां) प्रयातः ।;संवत्सरस्तत्र जगाद कृष्णा भीमाज्ञया धर्मराजं सुवेत्त्री ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = अतिमार्दवयुक्तत्वाद् धर्मराजश्चतुर्दशे ।;अपि वर्षे गुरुभयाद् राज्यं नेच्छेदिति प्रभुः ।;मारुतिः प्रेषयामास कृष्णां प्रस्तावहेतवे ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = नैव क्षमा कुजनतासु नृपस्य धर्मः;तां त्वं वृथैव धृतवानसि सार्वकालम् (सर्वकालम्, सार्वकालिकी) ।;इत्युक्त आह नृपतिः परमा क्षमैव;सर्वत्र तद्विधृतमेव जगत् समस्तम् ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = कर्ता च सर्वजगतः सुखदुःखयोर्हि;नारायणस्तदनुदत्तमिहास्य सर्वम् ।;तस्मान्न कोपविषयोऽस्ति कुतश्च कश्चित्;तस्मात् क्षमैव सकलेषु परोऽस्य धर्मः ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = वृथा यदि स्यात् पौरुषं कस्य हेतोर्विधिर्निषेधश्च समस्तवेदगः ।;विधेर्निषेधस्य च नैव गोचरः पुमान् यदि स्याद् भवतो हि तौ हरेः ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = तेनैव लेपश्च भवेदमुष्य पुण्येन पापेन च नैव चासौ ।;लिप्येत ताभ्यां परमः स्वतन्त्रः कर्ता ततः पुरुषोऽप्यस्य वश्यः ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितो धर्मजः कृष्णयैव निरुत्तरत्वं गमितस्त्वभर्त्सयत् ।;कुतर्कमाश्रित्य हरेरपि त्वमस्वातन्त्र्यं साधयसीति चोक्त्वा ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = छलेन तेन प्रतिभर्त्सिता सा क्षमापयामास नृपं यतः स्त्री ।;वाचालता नातितरां हि शोभते स्त्रीणां ततः प्राह वृकोदरस्तम् ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = राजन् विष्णुः सर्वकर्ता न चान्यस्तत्तन्त्रमेवान्यदसौ स्वतन्त्रः ।;तथाऽपि पुंसा विहितं स्वकर्म(विहितं हि कर्म) कार्यं त्याज्यं चान्यदत्यन्तयत्नात् ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्यक्षमेतत् पुरुषस्य कर्म तेनानुमेया प्रेरणा केशवस्य ।;स्वकर्म कृत्वा विहितं हि विष्णुना तत्प्रेरणेत्येव बुधोऽनुमन्यते ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = तेनैति सम्यग्गतिमस्य विष्णोर्जनोऽशुभो दैवमित्येव मत्वा ।;हित्वा स्वकं कर्म गतिं च तामसीं प्रयाति तस्मात् कार्यमेव स्वकर्म ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञातव्यं चैवास्य विष्णोर्वशत्वं कर्तव्यं चैवाऽत्मनः कार्यकर्म ।;प्रत्यक्षैषा कर्तृता जीवसंस्था तथाऽऽगमादनुमानाच्च सर्वम् ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = विष्णोर्वशे तन्न हेयं द्वयं च जानन् विद्वान् कुरुते कार्यकर्म ।;तत्प्रेरकं विष्णुमेवाभिजानन् भवेत् प्रमाणत्रितयानुगामी ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = पूर्णं प्रमाणं तत्त्रयं चाविरोधेनैकत्रस्थं तत्त्रयं चाविरोधि ।;पृथङ् मध्यं चाप्रमाणं विरोधि स्यात् तत् तस्मात् त्रयमेकत्र कार्यम् ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = अज्ञः प्रत्यक्षं त्वपहायैव दैवं मत्वा कर्तृ स्वात्मकर्म प्रजह्यात् ।;विद्वान् जीवं विष्णुवशे (विष्णुवशं) विदित्वा करोति कर्तव्यमजस्रमेव ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = स्वभावाख्या योग्यता या हठाख्या याऽनादिसिद्धा सर्वजीवेषु नित्या ।;सा कारणं प्रथमं तु द्वितीयमनादिकर्मैव तथा तृतीयः ।;जीवप्रयत्नः पौरुषाख्यस्तदेतत् त्रयं विष्णोर्वशगं सर्वदैव ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = स कस्यचिन्न वशे वासुदेवः परात् परः परमोऽसौ स्वतन्त्रः ।;हठश्चासौ तारतम्यस्थितो हि ब्रह्माणमारभ्य कलिश्च यावत् ।;हठाच्च कर्माणि भवन्ति कर्मजो यत्नो यतो हठकर्मप्रयोक्ता ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = विना यत्नं न हठो नापि कर्म फलप्रदौ वासुदेवोऽखिलस्य ।;स्वातन्त्र्यशक्तेर्विनियामको हि तथाऽप्येतान् सोऽप्यपेक्ष्यैव युञ्जेत् ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = एतानपेक्ष्यैव फलं ददानीत्यस्यैव सङ्कल्प इति स्वतन्त्रता ।;नास्यापगच्छेत् स हि सर्वशक्तिर्नाशक्तता क्वचिदस्य प्रभुत्वात् ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् कार्यं तेन क्लृप्तं स्वकर्म तत्पूजार्थं तेन तत्प्राप्तिरेव ।;अतोऽन्यथा निरयः सर्वथा स्यात् स्वकर्म विप्रस्य जपोपदेशौ ।;विष्णोर्मुखाद् विप्रजातिः प्रवृत्ता(प्रसूता) मुखोत्थितं कर्म तेनास्य सोऽदात् ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = बाह्वोर्जातः क्षत्रियस्तेन बाह्वोः कर्मास्य पापप्रतिवारणं हि ।;प्रवर्तनं साधुधर्मस्य चैव मुखस्य बाह्वोश्चातिसामीप्यतोऽस्य ।;जपोपदेशौ क्षत्रियस्यापि विष्णुश्चक्रे धर्मौ यज्ञकर्मापि विप्रे ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = वैश्यो यस्मादूरुजस्तेन तस्य प्रजावृद्धिस्तज्जकर्मैव धर्मः ।;तत्सादृश्यात् स्थावराणां च वृद्धिः करोरूर्वोः(करयोरूर्वोः) सन्निकृष्टत्वहेतोः ।;वार्तात्मकं कर्म धर्मं चकार विष्णुस्तस्यैवाङ्घ्रिजः शूद्र उक्तः ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = गतिप्रधानं कर्म शुश्रूषणाख्यं सादृश्यतो हस्तपदोस्तथैव ।;हस्तोद्भवं कर्म तस्यापि धर्मः सन्तानवृद्धिश्च समीपगत्वात् ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = भुजावुरो हृदयं यद् बलस्य ज्ञानस्य च स्थानमतो नृपाणाम् ।;बलं ज्ञानं चोभयं धर्म उक्तः पाणौ कृतीनां कौशलं केवलं हि ।;तस्मात् पाण्योरूरुपदोरुपस्थितेर्विट्छूद्रकौ कर्मणां कौशलेतौ ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = प्राधान्यतो धर्मविशेष एष सामान्यतः सर्व एवाखिलानाम् (सर्वमेवाखिलानाम्) ।;वयं हि देवास्तेन सर्वं हि कर्म प्रायेण नो धर्मतामेति शश्वत् ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = एतैर्धर्मैर्विष्णुना पूर्वक्लृप्तैः सर्वैर्वर्णैर्विष्णुरेवाभिपूज्यः ।;तद्भक्तिरेवाखिलानां च धर्मो यथायोग्यं ज्ञानमस्यापि पूजा ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = पिता गुरुः परमं दैवतं च विष्णुः सर्वेषां तेन पूज्यः स एव ।;तद्भक्तत्वाद् देवताश्चाभिपूज्या विशेषतस्तेषु येऽत्यन्तभक्ताः ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = सम्पूजितो वासुदेवः स मुक्तिं दद्यादेवापूजितो दुःखमेव ।;स्वतन्त्रत्वात् सुखदुःखप्रदोऽसौ नान्यः स्वतन्त्रस्तद्वशा यत् समस्ताः ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = स्वतन्त्रत्वात् सुखसज्ज्ञानशक्तिपूर्वैर्गुणैः पूर्ण एषोऽखिलैश्च ।;स्वतन्त्रत्वात् सर्वदोषोज्झितश्च निस्सीमशक्तिर्हि यतः स्वतन्त्रः ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = दोषास्पृष्टौ गुणपूर्तौ च शक्तिर्निस्सीमत्वाद् विद्यते तस्य यस्मात् ।;एवं गुणैरखिलैश्चापि पूर्णो नारायणः पूज्यतमः स्वधर्मैः ।;अस्माकं यत् तेन नातिक्षमैव धर्मो दुष्टानां वारणं ह्येव कार्यम् ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = हन्याद् दुष्टान् यः क्षत्रियः क्षत्रियांश्च विशेषतो युद्धगतान् स्मरन् हरिम् ।;स्वबाहुवीर्येण च तस्य बाहू चैतन्यमात्रौ भवतः सदेहौ ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = पापाधिकांश्चैव बलाधिकांश्च हत्वा मुक्तावधिकानन्दवृद्धिः ।;प्रीतिश्च विष्णोः परमैव तत्र तस्माद्धन्तव्याः पापिनः सर्वथैव ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = ये त्वक्षधूर्ता ग्रहणं गता वा पापास्तेऽन्यैर्घातनीयाः स्वदोर्भ्याम् ।;राजानं वा राजपुत्रं तथैव राजानुजं वाऽभियातं निहन्यात् ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = राज्ञः पुत्रोऽप्यकृतोद्वाहको यः स घातनीयो न स्वयं वध्य एव ।;क्रूरं चान्यद् धर्मयुक्तं परैस्तत् प्रसाधनीयं क्षत्रियैर्न स्वकार्यम् ।;एवं धर्मो विहितो वेद एव वाक्यं विष्णोः पञ्चरात्रेषु तादृक् ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = अक्षद्यूतं निकृतिः पापमेव कृतं त्वया गर्हितं सौबलेन ।;न कुत्रचिद् विधिरस्यास्ति तेन न तद् दत्तं द्यूतहृतं(द्यूतकृतं) वदन्ति ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = भीतेन दत्तं द्यूतदत्तं तथैव दत्तं कामिन्यै पुनराहार्यमेव ।;एवं धर्मः शाश्वतो वैदिको हि द्यूते स्त्रियां नाल्पमाहार्यमाहुः ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = यद्येषां वै भोग्यमल्पं(यद्येतेषां भोग्यमल्पं) तदीयं भोगेन तद्बन्धुभिस्तच्च हार्यम् ।;निवारणे पुरुषस्य त्वशक्तौस्तद् राज्यं न पुनराहार्यमेव ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = त्वं धर्मनित्य(धर्मनिष्ठः)श्चाग्रजश्चेति राजन् ऋतेऽनुज्ञां न मया तत् कृतं च ।;दातास्यनुज्ञां यदि तान् निहत्य त्वय्येव राज्यं स्थापयाम्यद्य सम्यक् ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = सत्यं पापेष्वपि कर्तुं यदीच्छा तथाऽपि मासा द्वादशः नः प्रयाताः ।;वेदप्रामाण्याद् वत्सरास्ते हि मासैः सहस्राब्दं सत्रमुक्तं नराणाम् ।;अज्ञातमेकं मासमुष्याऽथ शत्रून् निहत्य राज्यं प्रतिपादयामः (प्रतिपालयामः) ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = मा मित्राणां तापकस्त्वं भवेथास्तथाऽमित्राणां नन्दकश्चैव राजन् ।;ज्वलस्वारीणां मूर्ध्नि मित्राणि नित्यमाह्लादयन् वासुदेवं भजस्व ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = स्वतन्त्रत्वं वासुदेवस्य सम्यक् प्रत्यक्षतो दृश्यते ह्यद्य राजन् ।;यस्मात् कृष्णो (प्यजयत्) व्यजयच्छङ्करादीन् जरासुतादीन् कादिवरैरजेयान् ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मादीनां प्रकृतेस्तद्वशत्वं दृष्टं हि नो बहुशो व्यासदेहे ।;पाराशर्यो दिव्यदृष्टिं प्रदाय स्वातन्त्र्यं नोऽदर्शयत् सर्वलोके ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् राजन्नभिनिर्याहि शत्रून् हन्तुं सर्वान् भोक्तुमेवाधिराज्यम् ।;एवञ्च ते कीर्तिधर्मौ महान्तौ प्राप्यौ राजन् वासुदेवप्रसादात् ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = तुदसे चातिवाचा मां यद्येवं भीम मां वदेः(भीम मा वद) ।;तदैव मेऽत्ययः कार्यो हन्तव्याश्चैव शत्रवः ।;नैतादृशैरिदानीं तु वाक्यैर्बाधितुमर्हसि ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मद्रोणादयोऽस्त्रज्ञा निवार्याश्च कथं युधि ।;पूज्यास्ते बाहुयुद्धेन न निवार्याः कथञ्चन ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्राणि जानन्नपि हि न प्रयोजयसि क्वचित्(प्रयोजसि न क्वचित्) ।;तस्माद् तदैव गन्तव्यं विज्ञातास्त्रे धनञ्जये ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो भीमसेनस्तु स्नेहभङ्गभयात् ततः ।;नोवाच किञ्चिद् वचनं स्वाभिप्रेतमवाप्य च ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = अभिप्रायो हि भीमस्य निश्चयेन त्रयोदशे ।;युधिष्ठिरस्य राज्यार्थं गमनार्थे प्रतिश्रवः ।;अन्यथाऽतिमृदुत्वात् स न गच्छेद् भिन्नधीः परैः ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = कृतकृत्ये तथा भीमे स्थिते धर्मात्मजो हि सः ।;भीष्मद्रोणादिविजयः कथं स्यादित्यचिन्तयत् ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = निवारणं गुरूणां हि भीम इच्छति न क्वचित् ।;तस्मात् ते ह्यर्जुनेनैव निवार्या इत्यचिन्तयत् ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = आपद्येव हि भीमस्तान् निवारयति नान्यथा ।;एवं चिन्तासमाविष्टं विज्ञायैव युधिष्ठिरम् ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = सर्वज्ञः सर्वशक्तिश्च कृष्णद्वैपायनोऽगमत् ।;नृपतिं बोधयामास चिन्ताव्याकुलमानसम् ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = इमं मन्त्रं वदिष्यामि येन जेष्यति फल्गुनः ।;भीष्मद्रोणादिकान् सर्वान् तं त्वं वद धनञ्जये ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त्वैवावदन्मन्त्रं सर्वदैवतदृष्टिदम् ।;न स्वयं ह्यवदत् पार्थे फलाधिक्यं यतो भवेत् ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मद्रोणादिविजय एतावद् वीर्यमेव हि ।;अलं नातोऽधिकं कार्यमेतावद् योग्यमस्य च ।;फल्गुनस्येति भगवान् न स्वयं ह्यवदन्मनुम् ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = गते व्यासे भगवति सर्वज्ञे सर्वकर्तरि ।;धर्मराजोऽवदन्मन्त्रं(अदिशन्मन्त्रं) फल्गुनाय रहस्यमुम् ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = तमाप्य फल्गुनो मन्त्रं ययौ ज्येष्ठौ प्रणम्य च ।;यमजौ च समाश्लिष्य गिरिमेवेन्द्रकीलकम् ।;तपश्चचार तत्रस्थः शङ्करस्थं हरिं स्मरन् ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = षण्मासेऽतिगतेऽपश्यन्मूकं नामासुरं गिरौ ।;वराहरूपमायातं वधार्थं फल्गुनस्य च ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = तं ज्ञात्वा फल्गुनो वीरः सज्यं कृत्वा तु गाण्डिवम् ।;चिक्षेप वज्रसमितांस्तत्काये सायकान् बहून् ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = किरातरूपस्तमनु सभार्यश्च त्रियम्बकः ।;स ममार हतस्ताभ्यां दानवः पापचेतनः ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = तेनोक्तोऽसौ मयैवायं वराहोऽनुगतोऽद्य हि ।;तमाविध्यो यतस्त्वं हि तद् युद्ध्यस्व मया सह ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तः फल्गुनः प्राह तिष्ठ तिष्ठ न मोक्ष्यसे ।;इत्युक्त्वा तावुभौ युद्धं चक्रतुः पुरुषर्षभौ ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = तत्राखिलानि चास्त्राणि फल्गुनस्याग्रसच्छिवः ।;ततोऽर्जुनस्तु गाण्डीवं समादायाभ्यताडयत् ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = तदप्यग्रसदेवासौ प्रहसन् गिरिशस्तदा ।;बाहुयुद्धं ततस्त्वासीत् तयोः पुरुषसिंहयोः ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = पिण्डीकृत्य ततो रुद्रश्चिक्षेपाथ(ध) धनञ्जयम् ।;मूर्च्छामवाप महतीं फल्गुनो रुद्रपीडितः ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं सम्प्रार्थयामास शङ्करो गरुडध्वजम् ।;अवराणां वरं मत्तो येषां त्वं सम्प्रयच्छसि ।;अजेयत्वं प्रसादात् ते विजेयाः स्युर्मयाऽपि ते ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तः प्रददौ विष्णुरुमाधीशाय तं वरम् ।;तेनाजयच्छ्वेतवाहं गिरिशो रणमध्यगम् ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = केवलैर्वैष्णवैर्मन्त्रैः स्वदत्तैर्विजयावहैः ।;अतिवृद्धस्य(अभिवृद्धस्य) पार्थस्य दर्पः स्यादित्यचिन्तयत् ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = पार्थः सञ्ज्ञामवाप्याथ जयार्थ्याराधयच्छिवम् ।;व्यासोदितेन मन्त्रेण तानि पुष्पाणि तच्छिरः ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = आरुहन् स तु तं ज्ञात्वा रुद्र इत्येव फल्गुनः ।;नमश्चक्रे ततः प्रादादस्त्रं पाशुपतं शिवः ॥ १३८॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रं तद् विष्णुदैवत्यं साधितं शङ्करेण यत् ।;तस्मात् पाशुपतं नाम स्वान्यस्त्राण्यपरे सुराः ।;ददुस्तदैव पार्थाय सर्वे प्रत्यक्षगोचराः ॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रोऽर्जुनं समागम्य प्राह प्रीतोऽस्मि तेऽनघ ।;रुद्रदेहस्थितं ब्रह्म विष्ण्वाख्यं तोषितं त्वया ।;तेन लोकं ममाऽगच्छ प्रेषयामि रथं तव ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त्वा प्रययाविन्द्रस्तद्रथेन च मातलिः ।;आयात् पार्थस्तमारुह्य ययौ तातनिकेतनम् ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = पूजितो दैवतैः सर्वैरिन्द्रेणैव निवेशितः ।;तेन सार्द्धमुपासीदत् तस्मिन्नैन्द्रे वरासने ॥ १४२॥ | |||
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| verse_lines = प्रीत्या समाश्लिष्य कुरुप्रवीरं शक्रो द्वितीयां तनुमात्मनः सः ।;ईक्षन् मुखं तस्य मुमोद सोऽपि ह्युवास तस्मिन् वत्सरान् पञ्च लोके ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्राणि तस्मा अदिशत् स वासवो महान्ति दिव्यानि तदोर्वशी तम् ।;सम्प्राप्य भावेन तु मानुषेण माता कुलस्येति निराकृताऽभूत् ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = षण्ढो भवेत्येव तयाऽभिशप्ते पार्थे शक्रोऽनुग्रहं तस्य चादात् ।;संवत्सरं षण्ढरूपी चरस्व न षण्ढता ते भवतीति(भवितेति) धृष्णुः ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽवसत् पाण्डवेयो गान्धर्वं वेदमभ्यसन् ।;गन्धर्वाच्चित्रसेनात्तु तथाऽस्त्राणि सुरेश्वरात् ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = सुभद्रयाऽभिमन्युना सह स्वकां पुरं गतः ।;जनार्दनोऽत्र संवसन् कदाचिदित्थमैक्षत ॥ १४७॥ | |||
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| verse_lines = ‘त्वामाराध्य तथा शम्भो ग्रहीष्यामि वरं सदा ।;द्वापरादौ युगे भूत्वा कलया मानुषादिषु’ ॥ १४९॥ (पद्म पु\. ६\.७१\.१०६) | |||
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| verse_lines = इति वाक्यमृतं कर्तुमभिप्रायं विजज्ञुषी ।;प्रीत्यर्थं वासुदेवस्य रुक्मिणी वाक्यमब्रवीत्;जातेऽपि पुत्रे पुत्रार्थं सा हि वेद मनोगतम् ॥ १५१॥ | |||
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| verse_lines = पुत्रो मे बलवान् देव स्यात् सर्वास्त्रविदुत्तमः।;इत्युक्तो भगवान् देव्या सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।;ययौ सुपर्णमारुह्य स्वीयं बदरिकाश्रमम् ॥ १५२॥ | |||
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| verse_lines = रात्रौ कृष्णे मुनिमध्ये प्रविष्टे घण्टाकर्णः कर्णनामा पिशाचौ ।;समायातां गिरिशेन प्रदिष्टौ कृष्णं द्रष्टुं द्वारकां गन्तुकामौ ॥ १५७॥ | |||
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| verse_lines = तौ दृष्ट्वा मुनिमध्यस्थं केशवं तदबोधतः ।;कृत्वा स्वजातिचेष्टाश्च ध्यानेनैनमपश्यताम् ॥ १५८॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा हृदि स्थितं तं तु कौतूहलसमन्वितौ ।;स्तुत्वा भक्त्या प्रणामं च बहुशश्चक्रतुः शुभौ ॥ १५९॥ | |||
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| verse_lines = तयोः प्रसन्नो भगवान् स्पृष्ट्वा गन्धर्वसत्तमौ ।;चकार क्षणमात्रेण दिव्यरूपस्वरान्वितौ ॥ १६०॥ | |||
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| verse_lines = ताभ्यां पुनर्नृत्तगीतसंस्तवैः पूजितः प्रभुः ।;ययौ कैलासमद्रीशं चकारेव तपोऽत्र च ॥ १६१॥ | |||
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| verse_lines = स्वीयानेव गुणान् विष्णुर्भुञ्जन् (युञ्जन्) नित्येन शोचिषा ।;शार्वं तपः करोतीव मोहयामास दुर्जनान् ॥ १६२॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं तेनोदितं यत्तल्लोकान् मोहयताऽञ्जसा ।;शर्वं प्रति तवाहं तु कुर्यां द्वादशवत्सरम् ॥ १६३॥ | |||
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| verse_lines = तपोऽसुराणां मोहाय सुराः सन्तु गतज्वराः ।;इति तस्मात् तदा कृष्ण एकाहेन बृहस्पतिम् ॥ १६४॥ | |||
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| verse_lines = आज्ञया(स्वाज्ञया) चारयामास क्षिप्रं द्वादशराशिषु ।;द्वादशाब्दमभूत् तेन तदहः केशवेच्छया(केशवाज्ञया) ॥ १६५॥ | |||
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| verse_lines = एकस्मिन्नह्नि भगवान् राशिंराशिं च वत्सरम् ।;कल्पयित्वोपवासादीन् मनसा नियमानपि ॥ १६६॥ | |||
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| verse_lines = मासब्रतं सार्द्धशतश्वासकालैरकल्पयत् ।;मनसैव स्वभक्तानां द्वादशाब्दव्रताप्तये ॥ १६७॥ | |||
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| verse_lines = तत्रास्य गरुडाद्याश्च परिचर्यां स्वपार्षदाः ।;चक्रुर्होमादिकाश्चैव क्रियाश्चक्रे जनार्दनः ।;स्वात्मानं प्रति पापानां शिवायेति प्रकाशयन् ॥ १६८॥ | |||
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| verse_lines = एवं स्थितं तमरविन्ददलायताक्षं ब्रह्मेन्द्रपूर्वसुरयोगिवरप्रजेशाः ।;अभ्याययुः पितृमुनीन्द्रगणैः समेता गन्धर्वसिद्धवरयक्षविहङ्गमाद्याः ॥ १६९॥ | |||
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| verse_lines = शर्वोऽपि सर्वसुरदैवतमात्मदैवम्;आयातमात्मगृहसन्निधिमाश्ववेत्य(आयान्तमात्मगृहसन्निधिमाश्ववेत्य) ।;अभ्याययौ निजगणैः सहितः सभार्यो;भक्त्याऽतिसम्भ्रमगृहीतसमर्हणाग्र्यः ॥ १७०॥ | |||
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| verse_lines = अभ्येत्य पादयुगलं जगदेकभर्तुः;कृष्णस्य भक्तिभरितः शिरसा ननाम ।;चक्रे स्तुतिं च परमां परमस्य पूर्ण-;षाड्गुण्यविग्रहविदोषमहाविभूतेः ॥ १७१॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णोऽप्ययोग्यजनमोहनमेव वाञ्छन्;तुष्टाव रुद्रहृदिगं निजमेव रूपम् ।;रुद्रो निशम्य तदुवाच सुरान् समस्तान्;सत्यं वदामि शृणुताद्य वचो मदीयम् ॥ १७२॥ | |||
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| verse_lines = विष्णुः समस्तसुजनैः परमो ह्युपेयः;तत्प्राप्तयेऽहमनिलोऽथ रमाऽभ्युपायाः ।;एष ह्यशेषनिगमार्थविनिर्णयोऽर्थो (योत्थो);यद् विष्णुरेव परमो मम चाब्जयोनेः ॥ १७३॥ | |||
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| verse_lines = अव्यक्ततः सकलजीवगणाच्च नित्यम्;इत्येव निश्चय उतैतदनुस्मरध्वम् ।;इत्युक्तवत्यखिलदेवगणा गिरीशे;कृष्णं प्रणेमुरतिवृद्धरमेशभक्त्या ॥ १७४॥ | |||
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| verse_lines = उक्तैरन्यैश्च गिरिशवाक्यैस्तत्त्वविनिर्णयैः ।;कृष्णस्यैव गुणाख्यानैः पुनरिन्द्रादिदेवताः ।;ज्ञानाभिवृद्धिमगमन् पुराऽपि ज्ञानिनोऽधिकम् ॥ १७५॥ | |||
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| verse_lines = सर्वदेवोत्तमं तं हि जानन्त्येव सुराः सदा ।;तथाऽपि तत्प्रमाणानां बहुत्वाद् येऽत्र(यत्र) संशयाः ।;युक्तिमात्रात् (युक्तिमात्रे) तेऽपि रुद्रवाक्यादपगतास्तदा ॥ १७६॥ | |||
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| verse_lines = ततः कृष्णः सुतवरं त्वत्त आदास्य इत्यजः ।;यदुक्तवाञ्छिवं पूर्वं सत्यं कर्तुं तदब्रवीत् ॥ १७७॥ | |||
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| verse_lines = पुत्रं देहीति सोऽप्याह पूर्वमेव सुतस्तव ।;जातः प्रद्युम्ननामा यः स मद्दत्तः प्रवादतः ॥ १७८॥ | |||
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| verse_lines = पुरा दग्धो मया कामस्तदाऽयाचत मां रतिः ।;देहि कान्तं ममेत्येव तदा तामहमब्रवम् ॥ १७९॥ | |||
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| verse_lines = उत्पत्स्यते वासुदेवाद् यदा तं(त्वं) पतिमाप्स्यसि ।;इत्यतोऽसौ मया दत्त इव देव त्वदाज्ञया ॥ १८०॥ | |||
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| verse_lines = दासोऽस्मि तव देवेश पाहि मां शरणागतम् ।;इत्युक्त्वाऽभिप्रणम्यैनं पुनराह सुरान् हरः ॥ १८१॥ | |||
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| verse_lines = यदर्थमेष आयातः केशवः शृणुतामराः ।;योऽसुरो वक्रनामाऽऽसीदवध्यो ब्रह्मणो वरात् ।;तदाजाताद् वासुदेवपुत्रात् कामादृते क्वचित् ॥ १८२॥ | |||
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| verse_lines = तं हन्तुमेव पुत्रं स्वं प्रद्युम्नमुदरेऽर्प्य च ।;आयात इह तं चापि ददाह स्वोदरात् सुतम् ।;निस्सारयित्वा कक्षं च दग्धं पश्यत देवताः ॥ १८३॥ | |||
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| verse_lines = ज्वालामालाकरालेन स्वतेजोवर्द्धितेन च ।;प्रद्युम्नेनैव तं दैत्यं दग्ध्वा वनसमन्वितम् ।;पुनश्च स्वोदरे पुत्रं स्थापयामास केशवः ॥ १८४॥ | |||
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| verse_lines = सद्योगर्भं पुनस्तं च रुक्मिण्यां जनयिष्यति ।;पूर्ववत् क्षणमात्रेण युवा च स भविष्यति ॥ १८५॥ | |||
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| verse_lines = दृष्टमेतन्नारदाद्यैर्मुनिभिः सर्वमेव च ।;एवं क्रीडत्ययं देवः पूर्णैश्वर्येण केवलम् ।;इत्युक्ते केशवं नेमुर्देवाः शक्रपुरोगमाः ॥ १८६॥ | |||
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| verse_lines = ततो हरिर्ब्रह्मसुरेन्द्रमुख्यैः सुरैः स्तुतो गरुडस्कन्धसंस्थः ।;पुनःपुनः प्रणतः शङ्करेण स्तुतस्तृतीयेऽह्नि निजां पुरीमगात् ॥ १८७॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णे प्रयाते निलयं पुरद्विषो रात्रौ पौण्ड्रौ वासुदेवः समागात् ।;सहैकलव्येन निजेन मातुः पित्रा तथाऽक्षोहिणिकत्रयेण ॥ १८८॥ | |||
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| verse_lines = पुरीं प्रभञ्जन्तममुं विदित्वा सरामशैनेययदुप्रवीराः ।;संयोधयामासुरथाभ्यवर्षच्छरैर्निषादाधिप एकलव्यः ॥ १८९॥ | |||
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| verse_lines = तदस्त्रशस्त्रैः सहसा विषण्णा यदुप्रवीरा विहतप्रदीपाः(विगतप्रदीपाः) ।;सहैव रामेण शिनेश्च नप्त्रा समाविशन् स्वां पुरमेव सर्वे ॥ १९०॥ | |||
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| verse_lines = पुनः समादाय तथोरुदीपिका अग्रे समाधाय च रौहिणेयम् ।;विनिस्सृता आत्तशस्त्राः स्वपुर्याः सिंहा यथा धर्षिताः सद्गुहायाः ॥ १९१॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽससादैकलव्यं रथेन रामः शैनेयः पौण्ड्रकं वासुदेवम् ।;अयुद्ध्यतां तौ सात्यकिः पौण्ड्रकश्च तथाऽन्योन्यं विरथं चक्रतुश्च॥ १९२ ॥ | |||
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| verse_lines = ततो गदायुद्धमभूत् तयोर्द्वयोस्तथा रामश्चैकलव्यश्च वीरौ(हरिवंशे भविष्यत्पर्वणि अ.१०२) ।;कृत्वाऽन्योन्यं विरथं गदाभ्यामयुद्ध्यतां जातदर्पौ बलाग्र्यौ ॥ १९३॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् काले केशवो वैनतेयमारुह्याऽयाद् यत्र ते युद्दसंस्थाः ।;दृष्ट्वा कृष्णं हर्षसम्पूरितात्मा रामो हन्तुं चैकलव्यं समैच्छत् ॥ १९४॥ | |||
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| verse_lines = उद्यम्य दोर्भ्यां स गदां जवेनैवाभ्यापतद् रौहिणेयो निषादम् ।;बलं कोपं(रोषं) चास्य दृष्ट्वैकलव्यः पराद्रवज्जीवितेच्छुः सुदूरम् ॥ १९५॥ | |||
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| verse_lines = विद्रावयन् रौहिणेयोऽन्वयात् तं भीतोऽपतच्चैकलव्योऽम्बुधौ सः ।;वेलान्तं तं द्रावयित्वाऽत्र तस्थौ रामो गदापाणिरदीनसत्त्वः ॥ १९६॥ | |||
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| verse_lines = मदीयलिङ्गानि विसृज्य चाऽशु समागच्छेथाः शरणं मामनन्तम् ।;तद्दूतोक्तं वाक्यमेतन्निशम्य यदुप्रवीरा उच्चकैः प्राहसन् स्म ॥ २००॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णः प्रहस्याऽह तवाऽयुधानि दास्याम्यहं लिङ्गभूतानि चाऽजौ ।;इत्युक्तोऽसौ दूत एत्याऽह तस्मै स चाभ्यागाद्(स चाभ्यागात्, स चाभ्यायात्) योद्धुकामो हरिश्च ॥ २०१॥ | |||
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| verse_lines = तं शातकौम्भे गरुडे रथस्थे स्थितं चक्रादीन् कृत्रिमान् सन्दधानम् ।;श्रीवत्सार्थे दग्धवक्षस्थलं च दृष्ट्वा कृष्णः प्राहसत् पापबुद्धिम् ॥ २०२॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽस्त्रशस्त्राण्यभिवर्षमाणं विजित्य तं वासुदेवोऽरिणैव ।;चकर्त तत्कन्धरं तस्य चानु मातामहस्याच्छिनत् सायकेन ॥ २०३॥ | |||
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| verse_lines = अपातयच्चाऽशु(न्यापातयच्चाशु) शिरः स तेन;काशीश्वरस्येश्वरो वारणास्याम् ।;स च ब्रह्माहं वासुदेवोऽस्मि नित्यम्;इति ज्ञानादगमत् तत् तमोऽन्धम् ॥ २०४॥ | |||
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| verse_lines = साहाय्यकृच्चास्य च काशिराजो यथैव किर्मीरहिडिम्बसाल्वाः ।;अन्ये च दैत्या अपतंस्तमोऽन्धे तथैव सोऽप्यपतत् पापबुद्धिः ॥ २०५॥ | |||
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| verse_lines = निहत्य तौ केशवो रौग्मिणेयं पुनर्वैदर्भ्यां जनयामास सद्यः ।;स चैकलव्यो रामजितः शिवाय चक्रे तपोऽजेयतां चाऽप तस्मात् ॥ २०६॥ | |||
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| verse_lines = स शर्वदत्तेन वरेण दृप्तः पुनर्योद्धुं कृष्णमेवाऽससाद ।;तस्यास्त्रशस्त्राणि निवार्य केशवश्चक्रेण चक्रे तमपास्तकन्धरम् ।;स चाऽप पापस्तम एव घोरं कृष्णद्वेषान्नित्यदुःखात्मकं तत् ॥ २०७॥ | |||
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| verse_lines = एवं यदूनामृषभेण सूदिते पौण्ड्रे तथा काशिनृपे च पापे ।;काशीशपुत्रस्तु सुदक्षिणाख्यस्तपोऽचरच्छङ्करायोरुभक्त्या ॥ २०८॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्यक्षगं तं शिवं पापबुद्धिः कृष्णाभावं याचते दुष्टचेताः ।;कृत्यामस्मै दक्षिणाग्नौ शिवोऽपि दैत्यावेशादददादावृतात्मा ॥ २०९| | |||
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| verse_lines = स दक्षिणाग्निश्चासुरावेशयुक्तः सम्पूजितः काशिराजात्मजेन ।;वरादुमेशस्य विवृद्धशक्तिर्ययौ कृष्णो यत्र सम्पूर्णशक्तिः(यत्र चानन्तशक्तिः) ॥ २१०॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णस्तस्य प्रतिघातार्थमुग्रं समादिशच्चक्रमनन्तवीर्यः ।;जाज्वल्यमानं तदमोघवीर्यं व्यद्रावयद् वह्निमिमं सुदूरम् ॥ २११॥ | |||
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| verse_lines = कृत्यात्मको वह्निरसौ प्रधानवह्नेः पुत्रश्चक्रविद्रावितोऽथ ।;सहानुबन्धं च सुदक्षिणं तं भस्मीचकाराऽशु सपुत्रभार्याम् ॥ २१२॥ | |||
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| verse_lines = दग्ध्वा पुरीं वारणसीं सुदर्शनः पुनः पार्श्वं वासुदेवस्य चाऽगात् ।;सुदक्षिणोऽसौ तम एव जग्मिवान् कृष्णद्वेषात् सानुबन्धः सुपापः ॥ २१३॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णः क्रीडन् द्वारवत्यां सुपूर्णनित्यानन्दः(सुपूर्णो नित्यानन्दः) क्वचिदाह स्म भैष्मीम् ।;विडम्बयन् गृहिणामेव चेष्टा नित्याविरोधोऽपि तया विदोषया ॥ २१४॥ | |||
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| verse_lines = त्वया न कार्यं मम किञ्च भद्रे मयाऽरीणां मानभङ्गार्थमेव ।;समाहृताऽसीति सा चावियोगं सदा कृष्णेनाऽत्मनोऽप्येव वेत्त्री ॥ २१५॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रिया भेतव्यं भर्तुरित्येव धर्मं विज्ञापयन्ती दुःखितेवाऽस देवी ।;तां सान्त्वयामास गृहस्थधर्मं विज्ञापयन् देवदेवोऽप्यदुःखाम् ॥ २१६॥ | |||
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| verse_lines = एवं क्रीडत्यब्जनाभे रमायां कृष्णादिष्टो गोकुलं रौहिणेयः ।;प्रायाद् दृष्ट्वा तत्र नन्दं यशोदां तत्पूजितः कृष्णवार्तां च पृष्टः ॥ २१७॥ | |||
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| verse_lines = मासौ तत्र न्यवसद् गोपिकाभी रेमे क्षीबो यमुनामाह्वयच्च ।;मत्तोऽयमित्येव नदीमनागतां चकर्ष रामो लाङ्गलेनाग्र्यवीर्यः ॥ २१८॥ | |||
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| verse_lines = पुनस्तया प्रणतः संस्तुतश्च व्यसर्जयत् तामथ नन्दगोपम्(भा.पु.१०.६५.१७) ।;आपृच्छ्य जगाद द्वारकां केशवाय न्यवेदयन्नन्दगोपादिभक्तिम् ॥ २१९॥ | |||
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| verse_lines = तदैव मैन्दो विविदश्च भौमे हते सखाये (सखायौ) दानवावेशयुक्तौ ।;आनर्तराष्ट्रं वासुदेवप्रतीपौ व्यनाशयेतां वासुदेवोऽथ चोचे ॥ २२०॥ | |||
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| verse_lines = रामाय सोऽदाद् वरमब्जनाभो वध्यावेतौ भवतां तेऽप्यवध्यौ ।;वराद् विरिञ्चस्य तथाऽमृताशनात् उभौ च मैन्दो विविदो व्रजेति ॥ २२१॥ | |||
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| verse_lines = गत्वा स मैन्दं प्रथमं जघान क्रोधात् युद्धायाऽगतं रैवताग्रे ।;दिने परस्मिन् विविदं जघान शिला वर्षन्तं मुसलेनाग्र्यकर्मा ।;तयोराविष्टौ तावसुरौ तमोऽन्धं प्राप्तौ च तावश्विनौ स्वं च लोकम् ॥ २२२॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनस्याऽस पुत्री रतिर्या पूर्वं नाम्ना लक्षणा कान्तरूपा ।;स्वयंवरस्थां तां बलादेव साम्बो जग्राह सा चैनमासानुरक्ता ॥ २२३॥ | |||
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| verse_lines = बलाद् गृहीतां वीक्ष्य तां कर्णमुख्या दुर्योधनाद्या युयुधुः क्रोधदीप्ताः ।;कृच्छ्रेण तं विरथीकृत्य चैकं सर्वे समेता जगृहुर्धार्तराष्ट्राः ।;कर्णेन भूरिश्रवसा च सार्द्धं बाह्वोर्बलादेव दुर्योधनस्य ॥ २२४॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वैव तद् वृष्णयः सर्व एव समुद्यमं चक्रिरे कौरवेषु ।;निवार्य तान् बलभद्रः स्वयं ययौ सहोद्धवः कौरवेयाञ्छमार्थी ॥ २२५॥ | |||
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| verse_lines = पुरस्य बाह्योपवने स्थितः स प्रस्थापयच्चोद्धवं कौरवार्थे ।;आगत्य सर्वे कुरवोऽस्य पूजां चक्रुः स चाऽहोग्रसेनस्य चाऽज्ञाम् ॥ २२६॥ | |||
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| verse_lines = आज्ञापयद् वो नृपतिः स्म यन्नः कुमारकः प्रगृहीतो भवद्भिः ।;एकः समेतैर्बहुभिर्बान्धवार्थं क्षान्तं तन्नो मुञ्चताऽश्वेव साम्बम् ॥ २२७॥ | |||
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| verse_lines = आज्ञापयामास व उग्रसेन;इत्युक्तमेव तु निशम्य कुरुप्रवीराः ।;संश्राव्य दुष्टवचनानि बलं पुरं स्वं;क्रोधात् समाविविशुरत्र चुकोप रामः ॥ २२८॥ | |||
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| verse_lines = स लाङ्गलेन तत् पुरं विकृष्य जाह्नवीजले ।;निपातयन् निवारितः प्रणम्य सर्वकौरवैः ॥ २२९॥ (भा.पु.१०.६८.५४) | |||
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| verse_lines = सभार्यमाशु पुत्रकं सुयोधनाभिपूजितम् ।;सपारिबर्हमप्य च प्रजग्मिवान् स्वकां पुरम् ॥ २३०॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादिकर्माणि महान्ति रामस्याऽसञ्छेषस्याच्युतावेशिनोऽलम् ।;यस्याच्युतावेशविशेषकालं ज्ञात्वा भीमोऽप्यस्य नोदेति युद्धे ॥ २३१॥ | |||
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| verse_lines = क्रीडायुद्धे बहुशो रौहिणेये व्यक्तिं विष्णोर्भीमसेनो विदित्वा ।;तात्कालिकीं पीड्यमानोऽपि (विध्यमानोऽपि) तेन नैवोद्यमं कुरुते विष्णुभक्त्या ॥ २३२॥ | |||
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| verse_lines = तदा जयी प्रभवत्येष रामो नातिव्यक्तस्तत्र(नाभिव्यक्तस्तत्र) यदा जनार्दनः ।;तदा भीमो विजयी स्यात् सदैव विष्णोः केशावेशवान् यत् स रामः ॥ २३३॥ | |||
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| verse_lines = एतादृशेनैव रामेण युक्ते कृष्णे द्वार्वत्यां निवसत्यब्जनाभे ।;स्वप्नेऽनिरुद्धेन रता कदाचिद् बाणात्मजोषा चित्रलेखामुवाच ॥ २३४॥ | |||
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| verse_lines = तमानयेत्यथ सा चित्रवस्त्रे प्रदर्श्य लोकान् समदर्शयत् तम् ।;पौत्रं विदित्वा वचनाच्च तस्याः कृष्णस्य तं चाऽनयत् तत्र रात्रौ ॥ २३५॥ | |||
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| verse_lines = आगताननिरुद्धस्तान् परिघेण महाबलः ।;निहत्य द्रावयामास स्वयमायात् ततोऽसुरः ।;स तु युद्ध्वाऽतिकृच्छ्रेण नागास्त्रेण बबन्ध तम् ॥ २३८॥ | |||
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| verse_lines = तेन भस्मप्रहारेण ज्वरितं रोहिणीसुतम् ।;आश्लिष्य विज्वरं चक्रे वासुदेवो जगत्प्रभुः ॥ २४१॥ | |||
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| verse_lines = स्वयं विक्रीड्य तेनाथ कञ्चित् कालं जनार्दनः ।;निष्पिष्य मुष्टिभिश्चान्यं ससर्ज ज्वरमच्युतः ॥ २४२॥ | |||
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| verse_lines = स्वयं जित्वाऽपि गिरिशभृत्यं नालमिति प्रभुः ।;स्वभृत्येनैव जेतव्य इत्यन्यं ससृजे तदा ॥ २४३॥ | |||
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| verse_lines = ज्वरेण वैष्णवेनासौ सुभृशं पीडितस्तदा ।;ग्रासार्थमुपनीतश्च जगाम शरणं हरिम् ।;तेन स्तुतः स भगवान् मोचयामास तं विभुः ॥ २४४॥ | |||
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| verse_lines = क्रीडार्थमत्यल्पजनेष्वपि प्रभुः कथञ्चिदेव व्यजयद् व्यथां विना ।;इत्यादि मोहाय स दर्शयत्यजो नित्यस्वतन्त्रस्य कुतो व्यथादयः ॥ २४५॥ | |||
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| verse_lines = यदा ज्वराद्या अखिलाः प्रविद्रुतास्तदा स्वयं प्राप हरिं गिरीशः ।;तयोरभूद् युद्धमथैनमच्युतो विजृम्भयामास ह जृम्भणास्त्रतः ॥ २४६॥ | |||
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| verse_lines = विजृम्भिते शङ्करे निष्प्रयत्ने स्थाणूपमे संस्थिते कञ्जजातः ।;दैत्यावेशाद् वासुदेवानभिज्ञं सम्बोधयामास सदुक्तिभिर्विभुः ॥ २४७॥ | |||
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| verse_lines = प्रगृह्य शर्वं च विवेश विष्णोः स तूदरं दर्शयामास तत्र ।;शिवस्य रूपं स्तम्भितं बिल्वनाम्नि वने गिरीशेन च यत् तपः कृतम् ।;शैवं पदं प्राप्तुमेवाच्युताच्च तच्चावदत् कञ्जजः शङ्करस्य॥ २४८॥ | |||
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| verse_lines = अपेतमोहोऽथ वृषध्वजो हरिं तुष्टाव बाणोऽभिससार केशवम् ।;तस्याच्युतो बाहुसहस्रमच्छिनत् पुनश्चारिं जगृहे तच्छिरोर्थे ॥ २४९॥ | |||
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| verse_lines = तदा शिवेन प्रणतो बाणरक्षणकाम्यया ।;कृत्वा स्वभक्तं बाणं तं ररक्ष द्विभुजीकृतम् ।;मोचयित्वाऽनिरुद्धं च ययौ बाणेन पूजितः ॥ २५०॥ | |||
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| verse_lines = एवमग्नीनङ्गिरसं ज्वरं स्कन्दमुमापतिम् ।;बाणं चायत्नतो जित्वा प्रायाद् द्वारवतीं पुनः ॥ २५१॥ | |||
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| verse_lines = येनायत्नेन विजितः सर्वलोकहरो हरः ।;किं ज्वरादिजयो विष्णोस्तस्यानन्तस्य कथ्यते ॥ २५२॥ | |||
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| verse_lines = ईदृशानन्तसङ्ख्यानां शिवानां ब्रह्मणामपि ।;रमाया अपि यद्वीक्षां विना न चलितुं बलम् ॥ २५३॥ | |||
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| verse_lines = नच ज्ञानादयो भावा नचास्तित्वमपि क्वचित् ।;अनन्तशक्तेः कृष्णस्य न चित्रः(चित्रं) शूलिनो जयः ॥ २५४॥ | |||
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| verse_lines = चित्रलेखासमेतोषान्वितपौत्रसमन्वितः ।;सरामः ससुतो वीन्द्रमारुह्य द्वारकां गतः ।;रेमे तत्र चिरं कृष्णो नित्यानन्दो निजेच्छया ॥ २५५॥ | |||
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| verse_lines = एवंविधान्यगणितानि यदूत्तमस्य;कर्माण्यगण्यमहिमस्य महोत्सवस्य ।;नित्यं रमाकमलजन्मगिरीशशक्र-;सूर्यादिभिः परिनुतानि विमुक्तिदानि ॥ २५६॥ | |||
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| verse_lines = एवं वसत्यमितपौरुषवीर्यसारे;नारायणे स्वपुरि शक्रधनञ्जयोक्तः ।;सम्प्राप्य लोमशमुनिः सकलानि तीर्था-;न्याप्तुं स पाण्डुतनयेषु सहाय आसीत् ॥ २५७॥ | |||
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| verse_lines = पृथ्वीं प्रदक्षिणत एत्य समस्ततीर्थस्नानं यथाक्रमत एव विधाय पार्थाः ।;सम्पूज्य तेषु निखिलेषु हरिं सुभक्त्या कृष्णे समर्पयितुमापुरथ प्रभासम् ।;सम्भावनाय सकलैर्यदुभिः समेतस्तेषां च रामसहितो हरिराजगाम ॥ २५८॥ | |||
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| verse_lines = पार्थैः सम्पूजितस्तत्र कृष्णो यदुगणैः सह ।;पार्थान् सम्पूजयामासुर्वृष्णयश्चाऽज्ञया हरेः ॥ २५९॥ | |||
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| verse_lines = तत्र भीमं तपोवेषं दृष्ट्वाऽतिस्नेहकारणात् ।;दुर्योधनं निन्दयति रामे सात्यकिरब्रवीत् ॥ २६०॥ | |||
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| verse_lines = सर्वे वयं निहत्याद्य सकर्णान् धृतराष्ट्रजान् ।;अभिमन्युं स्थापयामो राज्ये यावत् त्रयोदशम् ॥ २६१॥ | |||
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| verse_lines = संवत्सरं समाप्यैव पुरं यास्यन्ति पाण्डवाः ।;ततो युधिष्ठिरो राजा राज्यं शासतु पूर्ववत् ॥ २६२॥ | |||
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| verse_lines = एवं वदत्येव शिनिप्रवीरे जनार्दनः पार्थमुखान्युदीक्ष्य ।;उवाच शैनेय न पाण्डुपुत्राः परेण संसाधितराज्यकामाः ॥ २६३॥ | |||
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| verse_lines = स्वबाहुवीर्येण निहत्य शत्रूनाप्स्यन्ति राज्यं त इतीरितेऽमुना ।;तथेति पार्था अवदंस्ततस्ते कृष्णं पुरस्कृत्य ययुर्दशार्हाः ॥ २६४॥ | |||
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| verse_lines = क्रमेण पार्था अपि शैशिरं गिरिं समासदंस्तत्र कृष्णां सुदुर्गे ।;विषज्जन्तीमीक्ष्य तैः सम्स्मृतोऽथ हैडिम्ब आयात् सहितो निशाचरैः ॥ २६५॥ | |||
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| verse_lines = उवाह कृष्णां स तु तस्य भृत्या ऊहुः पार्थांस्ते बदर्याश्रमं च ।;प्राप्यात्र नारायणपूजया कृतस्वकीयकार्या ययुरुत्तरां दिशम् ॥ २६६॥ | |||
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| verse_lines = अतीत्य शर्वश्वशुरं गिरिं ते सुवर्णकूटं निषधं गिरिं च ।;मेरोः प्राच्यां गन्धमादे गिरौ च प्रापुर्बदर्याश्रममुत्तमं भुवि ॥ २६७॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् मुनीन्द्रैरभिपूज्यमाना नारायणं पूजयन्तः सदैव ।;चक्रुस्तपो ज्ञानसमाधियुक्तं सुतत्त्वविद्यां(स तत्वविद्यां) प्रतिपादयन्तः ॥ २६८॥ | |||
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| verse_lines = एवं बदर्यां विहरत्सु तेषु क्वचिद् रहः कृष्णया वायुसूनौ ।;स्थिते गरुत्मानुरगं जहार महाह्रदाद् वासुदेवासनाग्र्यः ॥ २६९॥ | |||
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| verse_lines = (तत्पक्षपातेन) तत्पक्षवातेन विचालिते तु तस्मिन् गिरौ कमलं हैममग्र्यम् ।;पपात कृष्णाभीमयोः सन्निधाने उद्यद्भानोर्मण्डलाभं सुगन्धम् ॥ २७०॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वाऽतिगन्धं वरहेमकञ्जं कुतूहलाद् द्रौपदी भीमसेनम् ।;बहून्ययाचत् तादृशान्यानुभावमविषह्यं जानती देवदैत्यैः ॥ २७१॥ | |||
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| verse_lines = तयाऽर्थितः सगदस्तुङ्गमेनं गिरिं वेगादारुहद् वायुसूनुः ।;प्रशस्यमानः सुरसिद्धसङ्घैः मृत्नन् दैत्यान् सिंहशार्दूलरूपान् ॥ २७२॥ | |||
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| verse_lines = आसेदिवांस्तत्र हनूमदाख्यं निजं रूपं प्रोद्यदादित्यभासम् ।;जानन्नप्येनं स्वीयरूपं स भीमश्चिक्रीड एतेन यथा परेण ॥ २७३॥ | |||
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| verse_lines = धर्मो देवानां परमो मानुषत्वे स्वीये रूपेऽप्यन्यवदेव वृत्तिः ।;अनादानं दिव्यशक्तेर्विशेषान्नरस्वभावे सर्वदा चैव वृत्तिः ।;तस्माद् भीमो हनुमांश्चैक एव ज्यायःकनीयोवृत्तिमत्राभिपेदे ॥ २७४॥ | |||
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| verse_lines = सर्वे गुणा आवृता मानुषत्वे युगानुसारान्मूलरूपानुसारात् ।;क्रमात् सुराणां भागतोऽव्यक्तरूपा आदानतो व्यक्तिमायान्त्युरूणाम् ॥ २७५॥ | |||
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| verse_lines = नैवाव्यक्तिः काचिदस्तीह विष्णोः प्रादुर्भावेष्वतिसुव्यक्तशक्तेः ।;इच्छाव्यक्तिः प्रायशो मारुतस्य तदन्येषां व्यक्तता कारणेन ॥ २७६॥ | |||
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| verse_lines = तस्माद् भीमो धर्मवृद्ध्यर्थमेव स्वीये रूपेऽप्यन्यवद् वृत्तिमेव ।;प्रदर्शयामास तथाऽसुराणां मोहायैवाशक्तवच्छक्तिरूपः(शक्तरूपः) ॥ २७७॥ | |||
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| verse_lines = तद्रूपवृद्धिं भीमसेनोऽथ दृष्ट्वा श्रुत्वा हनूमन्मुखतः कथाश्च ।;रामस्य तच्चातुरात्म्यं च दिव्यं चातुर्युगं धर्ममप्यग्र्यमेव ॥ २७८॥ | |||
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| verse_lines = ध्वजाद् बीभत्सोर्गर्जनेनैव शत्रुपराभवे तेन दत्तेऽर्जुनस्य ।;ययौ प्रणम्यैनमाश्वेव भीमः सौगन्धिकं वनमत्यग्र्यरूपम् ॥ २७९॥ | |||
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| verse_lines = वातेन कुन्त्यां बलवान् स जातः शूरस्तपस्वी द्विषतां निहन्ता ।;सत्ये च धर्मे च रतः सदैव पराक्रमे शत्रुभिरप्रधृष्यः ॥ २८४॥ | |||
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| verse_lines = तत्रापरांश्चैव बहूनसत्यं निरीश्वरं चाप्रतिष्ठं च लोकम् ।;सिद्धोऽहमीशोऽहमिति ब्रुवाणान् गुणान् विष्णोः ख्यापयन् वादतोऽजैत् ॥ २८५॥ | |||
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| verse_lines = भिन्नं विष्णुमधिकं सर्वतश्च ब्रुवन् प्रवीरान् लक्षमेषां निजघ्ने ।;ते तस्य वीर्यं च बलं च दृष्ट्वा विद्याबलं बाहुबलं तथैव ।;अशक्नुवन्तः सहिताः समस्ता हतप्रवीराः सहसा निवृत्ताः ॥ २८६॥ | |||
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| verse_lines = विक्रम्य तान् गदयाऽसौ निहत्य विद्राप्य सर्वान् नलिनीं प्रविश्य ।;पीत्वाऽमृताम्भश्च ततोऽम्बुजानि दिव्यानि जग्राह कुरुप्रवीरः ॥ २८७॥ | |||
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| verse_lines = अथो कलहशंसीनि निमित्तानि युधिष्ठिरः ।;दृष्ट्वा कृष्णामपृच्छच्च क्व भीम इति दीनधीः ॥ २८८॥ | |||
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| verse_lines = सौगन्धिकार्थं यातं तं श्रुत्वा कृष्णामुखान्नृपः ।;आरुह्य राक्षसश्रेष्ठान् कृष्णया भ्रातृभिः सह ॥ २८९॥ | |||
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| verse_lines = ययौ वृकोदरो यत्र दृष्ट्वा चैनमवस्थितम् ।;उवाच मैवमित्येनं भीतो गिरिशकोपतः ॥ २९०॥ | |||
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| verse_lines = देवेभ्यो मरणाद् भीता राक्षसा वित्तपाज्ञया ।;तदीयां नलिनीं ते हि रक्षन्त्यस्याऽश्रयो हरः ।;जानन् वित्तेश्वरो भीममाहात्म्यं न चुकोप ह ॥ २९१॥ | |||
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| verse_lines = वसत्सु तत्र पार्थेषु पुनः कतिपयैर्दिनैः ।;उवाच भीमसेनस्य यशोधर्मादिभिवृद्धये(यशोधर्मातिवृद्धये) ॥ २९२॥ | |||
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| verse_lines = पञ्चवर्णानि पुष्पानि कृष्णा वीक्ष्याऽहृतानि तु ।;मारुतेन कुबेरस्य गृहान्नृभिरगम्यतः ॥ २९३॥ | |||
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| verse_lines = अगम्योऽयं गिरिः सर्वैः कुबेरेणाभिपालितः ।;अद्य(अथ) त्वयैव गन्तव्यो विधूयाखिलराक्षसान् ॥ २९४॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आशु सगदः सधनुः सबाणो भीमो गिरीन्द्रमजितोरुबलो विगाहे ।;प्राप्तं निशम्य (निशाम्य) बलदैवतसूनुमत्र पद्मत्रयं न्यरुणदुद्धतराक्षसानाम् ॥ २९५॥ | |||
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| verse_lines = अग्रे निधाय मणिमन्तमजेयमुग्रं शम्भोर्वराद् विविधशस्त्रमहास्त्रवृष्ट्या (महाभिवृष्ट्या) ।;तान् सर्वराक्षसगणान् मणिमत्समेतान् भीमो जघान सपदि प्रवरैः शरौघैः ॥ २९६॥ | |||
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| verse_lines = अवध्यांस्तान् क्षणेनैव हत्वा भीमो महाबलः ।;रणे क्रोधवशान् सर्वानतिष्ठद् गिरिमूर्द्धनि ॥ २९७॥ | |||
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| verse_lines = ते हता भीमसेनेन प्रापुरन्धन्धन्तमोऽखिलाः ।;हताः सौगन्धिकवने मणिमांश्च पुनः कलौ ।;जातो मिथ्यामतिं सम्यगास्तीर्याऽपस्तमोऽधिकम् ॥ २९८॥ | |||
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| verse_lines = ततो वैश्रवणो राजा महापद्मत्रये हते ।;राक्षसानामवध्यानां सखाये मणिमत्यपि ।;आरुरोह रथं दिव्यं योद्धुकामो वृकोदरम् ॥ २९९॥ | |||
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| verse_lines = असुरावेशतस्तस्य भीमे क्रोधो महानभूत् ।;स आजगाम भीमेन योद्धुं वित्तपतिः स्वयम् ॥ ३००॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् काले भीमसेनस्य घोषं श्रुत्वा राजाऽपृच्छदाशु स्म कृष्णाम् ।;क्व भीम इत्येव तयोदितं च श्रुत्वा जगामऽशु रक्षोंऽससंस्थः ॥ ३०१॥ | |||
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| verse_lines = सभ्रातृके मुनिभिः कृष्णया च गते राजन्यत्र भीमं कुबेरः ।;दृष्ट्वाऽसुरावेशतो धर्मजं च किञ्चिन्मुक्तः स्नेहयुक्तस्तथाऽऽस(तदाऽस) ॥ ३०२॥ | |||
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| verse_lines = धृतायुधं भीममीक्ष्यापि किञ्चिद् दैत्यावेशाद् बहु मेने न भीमम् ।;अगस्त्यशापं चावदत् स्वस्य पूर्वं सखायनाशे कारणं राजराजः ॥ ३०३॥ | |||
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| verse_lines = दैत्यावेशादुज्झितः शान्तभावो ददौ निजं स्थानमेषां सुतुष्टः ।;आवासार्थं तेऽवसंस्तत्र पार्थास्तथाऽन्येषां दैवतानां(देवतानां) गृहेषु ॥ ३०४॥ | |||
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| verse_lines = तत्रैव तेषां वसतां महात्मनामानन्दिनामब्दचतुष्टये गते ।;पञ्चाब्दमध्याप्य महान्ति चास्त्राणीन्द्रो गुर्वर्थं फल्गुनेनार्थितोऽभूत् ॥ ३०५॥ | |||
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| verse_lines = वधं वव्रे स्वशत्रूणामिन्द्रः पार्थात् स्वरूपतः ।;निवातकवचाख्यानां येषां(तेषां, एषां) ब्रह्मा ददौ वरम् ।;अवध्यतां (अवध्यत्वं) सुरैर्दैत्यैर्गन्धर्वैः पक्षिराक्षसैः ॥ ३०६॥ | |||
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| verse_lines = पुनरिन्द्रेणार्थितोऽदाज्जहीमान् नरदेहवान् ।;इति तेनार्जुनं शक्रः स्वात्मानं नरदेहगम् ।;जगाद तान् जहीत्येव किरीटं स्वं निबद्ध्य च ॥ ३०७॥ | |||
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| verse_lines = ऐन्द्रं स्यन्दनमारुह्य पार्थो मातलिसंयुतः ।;गाण्डीवं धनुरादाय ययौ हन्तुं महासुरान् ॥ ३०८॥ | |||
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| verse_lines = शङ्खं ददुस्तस्य देवा देवदत्तः स शङ्खराट् ।;नादयन् शङ्खघोषेण धनुर्विस्फारयन् महत् ॥ ३०९॥ | |||
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| verse_lines = दधानः कुण्डले दिव्ये शक्रदत्ते सुभास्वरे ।;आससाद पुरं दिव्यं दैत्यानामिन्द्रनन्दनः ॥ ३१०॥ | |||
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| verse_lines = तस्य शङ्खध्वनिं श्रुत्वा गाण्डीवस्य च निस्स्वनम् ।;अभिसस्रुर्महावीर्याः निवातकवचासुराः ॥ ३११॥ | |||
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| verse_lines = तिस्रः कोट्यो दानवानां स्वयम्भुवरगर्विताः ।;नानायुधैः रणे पार्थमभ्यवर्षन् सुसंहताः ॥ ३१२॥ | |||
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| verse_lines = तेषां स शस्त्राणि किरीटमाली(किरीटमौली) निवार्य गाण्डीवधनुःप्रमुक्तैः(गाण्डीवधनुःप्रयुक्तैः) ।;शरैः शिरांसि प्रचकर्त वीरो महास्त्रशिक्षाबलसम्प्रयुक्तैः ॥ ३१३॥ | |||
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| verse_lines = सर्वे हतास्तेन महारथेन ते दानवाः सोऽपि ययौ तथाऽन्यान् ।;पौलोमकालेयगणाभिधानान् षष्टिं सहस्राणि महारथानाम् ॥ ३१४॥ | |||
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| verse_lines = तानस्त्रशस्त्राण्यभिवर्षमाणान् धनञ्जयः पाशुपतास्त्रतो द्राक् ।;दग्ध्वा ययौ पुनरेवेन्द्रसद्म तं सस्वजे प्रीतियुक्तश्च शक्रः ॥ ३१५॥ | |||
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| verse_lines = ययुरन्धं(प्रापुरन्धं)तमस्तेऽपि सर्वदेवद्विषोऽसुराः ।;अथानुज्ञाप्य पितरं रथेनैन्द्रेण भास्वता ।;सोदर्याणां सकाशं स ययौ वज्रधरात्मजः ॥ ३१६॥ | |||
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| verse_lines = आयान्तमीक्ष्य बीभत्सुं मुमुदुर्भ्रातरोऽधिकम् ।;ऊषुश्च चतुरोऽब्दांस्ते(चतुरब्दांस्ते) पुनर्मेरौ प्रमोदिनः ॥ ३१७॥ | |||
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| verse_lines = कथाभिर्वासुदेवस्य ध्यानेनाभ्यर्चनेन च ।;ययौ कालः सुखेनैव तेषां विष्णुरतात्मनाम्(विष्णुपरात्मनाम्) ॥ ३१८॥ | |||
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| verse_lines = इति भीमवचः श्रुत्वा ससोदर्यो युधिष्ठिरः ।;राक्षसस्कन्धमारूढः(राक्षसस्कन्धमारुह्य) कृष्णया चाऽययौ पुनः ॥ ३२१॥ | |||
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| verse_lines = पादेषु तेषु निवसत्सु हिमाचलस्य;याम्याश्रितेषु पवमानसुतः कदाचित् ।;धन्वी मृगाननुचरन् सहसाऽऽससाद;हाऽयोः(ह्यायोः) सुतं नहुषमाजगरोरुरूपम् ॥ ३२२॥ | |||
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| verse_lines = पूर्वं हि वृत्रवधतोऽम्बुजनालतन्तु-;संस्थे शचीप्रणयिनि प्रविचिन्त्य देवाः ।;चक्रुस्त्रिलोकपतिमायुसुतं वरं च;दत्वाऽक्षिगोचरतपोऽस्य बलं च सर्वम् ॥ ३२३॥ | |||
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| verse_lines = तदा भृगुं तस्य जटासु लीनं कदाऽपि तस्याक्षिपथं न यातम्(न यान्तम्) ।;आविश्य कञ्जप्रभवः शशाप व्रजाऽशु पापाजगरत्वमेव ॥ ३२७॥ | |||
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| verse_lines = षष्ठे काले यस्त्वयाऽसादितः स्यात्;स ते वशं यातु बलाधिकोऽपि ।;यदा गृहीतं पुरुषं निहन्तुं;न शक्ष्यसे यदि स त्वद्गृहीतः ।;शक्तोऽपि नाऽत्मानमभिप्रमोचयेत्;तदाऽस्य स्यात् त्वत्तपोऽग्र्यं बलं च ॥ ३२८॥ | |||
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| verse_lines = सर्वदेवमुनीन्द्राणां (सर्वदेवमुनीनां) यत् तपस्त्वामुपाश्रितम् (समुपाश्रितम्) ।;तच्च सर्वं तमेवैति नात्र कार्या विचारणा ॥ ३२९॥ | |||
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| verse_lines = यदा प्रश्नांस्त्वदीयांश्च कश्चित् परिहरिष्यति ।;तदा गन्ताऽसि च दिवं विसृज्याऽजगरीं तनुम् ।;स्मृतिश्च मत्प्रसादेन सर्वदा ते भविष्यति ॥ ३३०॥ | |||
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| verse_lines = भृगुदेहगतेनैवं शप्तः कमलयोनिना ।;पपाताजगरो भूत्वा नहुषः क्षणमात्रतः ॥ ३३१॥ | |||
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| verse_lines = इन्द्रोऽप्यवाप स्वं स्थानमिष्ट्वा विष्णुं विपापकः ।;धर्मवृद्ध्यर्थमेवैतत् पापमासीच्छचीपतेः ॥ ३३२॥ | |||
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| verse_lines = नहि लोकावनं पापं त्रैलोक्येशस्य वज्रिणः ।;वृत्रं हत्वा महानासेत्यादि वेदपदं च यत् ॥ ३३३॥ | |||
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| verse_lines = क्वचित् पापं च पुण्यानां वृद्धये भवति स्फुटम् ।;वृत्रहत्या यथेन्द्रस्य जाता धर्मस्य वृद्धये(धर्माभिवृद्धये) ॥ ३३४॥ | |||
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| verse_lines = देवानां वा मुनीनां वा भवेदेवं नवै नृणाम् ।;पापं यत् पुण्यमेवैतदसुराणां विलोमतः ।;एवं स्कान्दे हि वचनं न पापं तच्छचीपतेः ॥ ३३५॥ | |||
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| verse_lines = नान्यस्य पदमाप्स्यन्ति तद् देवानां व्रतं परम् ।;तस्मात् तं(ते) नहुषं शक्रपदे विदधुरीश्वराः(निदधुरीश्वराः) ॥ ३३६॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन्नेवं निपतिते ब्रह्मणः शापकारणात् ।;अष्टाविंशतिमे प्राप युगे भीमस्तमुल्बणम् ।;जानन्नेव तदीयं तत् तप आदातुमिच्छया (आदातुमीप्सया) ॥ ३३७॥ | |||
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| verse_lines = यत्तत् सुराणां सर्वेषां मुनीनां च तपः स्थितम् ।;तद् गृहीतुं वशगवदिच्छयैवाऽस मारुतिः ॥ ३३८॥ | |||
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| verse_lines = देवानां हि नृजातानामल्पं व्यक्तं भवेद् बलम् ।;इच्छया व्यक्ततां याति वायोरन्येषु तच्च न ॥ ३३९॥ | |||
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| verse_lines = नित्यं व्यक्ता गुणा विष्णोरिति शास्त्रस्य निर्णयः ।;एवमन्येऽपि हि गुणा मानुषादिषु जन्मसु ॥ ३४०॥ | |||
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| verse_lines = देवानां मानुषादौ तु शक्येऽप्यव्यक्तताकृतेः ।;धर्मवृद्धिर्भवेत् तेषां प्रीतो भवति केशवः ॥ ३४१॥ | |||
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| verse_lines = तन्मानुषे बले तस्य वराद् वारितवत्(वरादावृतवत्) स्थिते ।;दैवं बलं न शक्तोऽपि व्यक्तं चक्रे न मारुतिः(नाविश्चक्रे स मारुतिः) ॥ ३४२॥ | |||
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| verse_lines = आत्ममोक्षाय न प्रश्नान् व्याजहार स चाभिभूः ।;विद्योपजीवनं धर्मो विप्राणामपि नो यतः ॥ ३४३॥ | |||
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| verse_lines = किमुत क्षत्रियस्येति जानन्नपि वृकोदरः ।;तत्प्रश्नपरिहारेण नाऽत्ममोक्षं समैच्छत ॥ ३४४॥ | |||
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| verse_lines = अयतन्तमपि ह्येनं(ह्येषो) चालनायापि नाशकत् ।;पूर्णोऽपि सर्वलोकानां बलेन नहुषस्तदा ।;वेष्टयित्वैव तं भीमं स्थितोऽसौ नाशकत् परम् ॥ ३४५॥ | |||
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| verse_lines = भ्रातृमात्रादिषु(भ्रातृमात्रादिभिः) स्नेहात् क्षिप्रमात्मविमोक्षणम् ।;इच्छन्नपि न मोक्षाय यत्नं चक्रे वृकोदरः ।;सर्ववेदमुनीन्द्राणां तप आदातुमत्रगम् ॥ ३४६॥ | |||
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| verse_lines = भ्रात्रादिषु स्नेहवशान्न स्थातव्यमिहेत्यपि ।;मन्वानः कालतो भङ्गं स्वयमेवैष यास्यति ।;आज्ञया वासुदेवस्य दार्ढ्याद् देहस्य मे तथा ॥ ३४७॥ | |||
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| verse_lines = स्रस्ताङ्गे पतिते सर्पे यास्यामीति विचिन्तयन् ।;तस्थौ भीमो हरिं ध्यायन् स्वभावान्न तदिच्छया ॥ ३४८॥ | |||
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| verse_lines = तदैव ब्रह्मवचनात् पूर्वोक्तात् केशवाज्ञया ।;बलं तपश्च सर्वस्य तत्स्थमायाद् वृकोदरम् ॥ ३४९॥ | |||
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| verse_lines = पूरिते नहुषस्थेन तपसा च बलेन च ।;भीमे स नहुषोऽथाऽसीत् स्रस्तभोगः शनैः शनैः ॥ ३५०॥ | |||
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| verse_lines = गते भीमे निमित्तानि दृष्ट्वा राजा युधिष्ठिरः ।;पप्रच्छ क्व गतो भीम इति कृष्णां चलन्मनाः ॥ ३५१॥ | |||
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| verse_lines = यातं मृगार्थं स निशम्य तस्यास्तदूरुवेगात् पतितान् नगेन्द्रान् ।;दृष्ट्वा पथा तेन ययौ स तत्र दृष्ट्वा च सर्पावृतमन्वपृच्छत् ॥ ३५२॥ | |||
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| verse_lines = स कारणं नहुषात् सर्वमेव शुश्राव तत्प्रश्नमशेषतश्च ।;भ्रातृस्नेहाद् व्याकरोद् धर्मसूनुस्तदैव सोऽप्यारुहत् स्वर्गलोकम् ॥ ३५३॥ | |||
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| verse_lines = दिव्याम्बरे कुण्डलिनि स्वपूर्वे गते विमानेन स धर्मराजः ।;भीमश्चाऽयात् स्वाश्रमायैव सर्वं युधिष्ठिरः कथयामास तत्र ॥ ३५४॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा कृष्णा भ्रातरश्चास्य सर्वे सर्वे मुनीन्द्रा भीमसेनेऽतिभक्ताः ।;व्रीडां ययुर्भीमसेनग्रहेण तथाऽब्रुवन् स्नेहतो भीमसेनम् ॥ ३५५॥ | |||
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| verse_lines = नैतादृशं साहसं तेऽनुरूपं शक्तोऽपि यत् स्वात्मनो मोक्षणाय(स्वात्मविमोक्षणाय) ।;(नैवाऽचरो) नैवाऽकरोर्यत्नमतो निजानां महद्दुःखं हृदये प्रार्पयस्त्वम् ॥ ३५६॥ | |||
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| verse_lines = मैवं पुनः कार्यमिति ब्रुवन्तः समाश्लिषन् सर्व एवैत्य भीमम् ।;ततोऽहोभिः कैश्चिदापुः कुरूणां राष्ट्रं पार्था मुनिमुख्यैः समेताः ॥ ३५७॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽमितौजा भगवानुपागमन्नारायणः सत्यभामासहायः ।;सम्पूजितः पाण्डवैस्तैः समेतश्चक्रेऽथ सौहार्दनिमित्तसत्कथाः ॥ ३५८॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णा च सत्या च परस्परं मुदा सम्भाषणं चक्रतुर्योषिदग्र्ये ।;परीक्षयन्त्या(परीक्षन्त्या) सत्यया सर्ववेत्र्या निर्दोषया चोदिता प्राह कृष्णा ॥ ३५९॥ | |||
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| verse_lines = क्रीडार्थमेव वचनं ज्ञात्वा सत्यासमीरितम् ।;तस्यानुसारिवाक्यानि(तस्यानुसारवाक्यानि) तत्प्रीत्या एव साऽब्रवीत् ॥ ३६१॥ | |||
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| verse_lines = ततः कतिपयाहानि निरुष्यात्र जनार्दनः ।;ययौ सभार्यः स्वपुरीं पाण्डवाननुमान्य च ॥ ३६२॥ | |||
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| verse_lines = ततः कदाचिन्मृगयां गतेषु पार्थेषु राजा सैन्धव आससाद ।;सकोटिकाश्यः सबलश्च तेषां वराश्रमं सोऽत्र ददर्श कृष्णाम् ॥ ३६३॥ | |||
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| verse_lines = ब्रजन् विवाहार्थमसौ निशाम्य कृष्णां कोटिं प्रेषयित्वैव काश्यम् ।;आयाहि मामित्यवदत् सुपापस्तया निरस्तो जगृहे करे च ॥ ३६४॥ | |||
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| verse_lines = तया धूतो(धुतो) निपपाताऽशु भूमौ पुनस्ससञ्ज्ञोऽभ्यगमद् विलज्जः(अभ्यपतद्विलज्जः) ।;ततोऽसहायत्वत एव कृष्णा धौम्यायोक्त्वा साग्निरन्वेहि मेति ।;समारुहत् सैन्धवस्यैव यानं सुखं न यासीति तमीरयित्वा ॥ ३६५॥ | |||
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| verse_lines = तदा निमित्तानि निशाम्य पार्थाः समाययुस्त्वरयैवाऽश्रमाय ।;श्रुत्वा दासीवचनात् सर्वमेव चक्रुः क्षिप्रं सैन्धवस्यानुयानम् ॥ ३६६॥ | |||
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| verse_lines = आक्रोशमानं भीमसेनेति धौम्यं दृष्ट्वा तस्याग्रे सैन्धवं चातिपापम् ।;चक्रुर्नादान् सिंहवत् पाण्डुपुत्रा दृष्ट्वा कृष्णा चावतरद् रथात् तदा ।;धौम्येन सार्द्धं सा ययौ(साऽऽययौ) स्वाऽश्रमाय सैन्यं पार्थास्तत्र निजघ्नुरोजसा ॥ ३६७॥ | |||
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| verse_lines = अग्रे कृष्णां योऽवदत् सिन्धुराजं याहीति तं कोटिकाश्यं सुपापम् ।;छित्वा शिरो मृत्यवे भीमसेनो निवेदयामास तमः स चागात् ॥ ३६८॥ | |||
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| verse_lines = पद्भ्यां धावन्तं भीमसेनो निगृह्य दत्वा प्रहारांश्च भृशं तमार्तम् ।;आदायाधाद् द्रौपदीपादयोश्च तं मोचयामास च धर्मसूनुः ॥ ३७०॥ | |||
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| verse_lines = दासो द्रौपद्या अहमित्येव वाक्ये तेनैवोक्ते भीमसेनोऽप्यमुञ्चत्(भीमसेनो व्यमुञ्चत्) ।;स व्रीडितोऽवाग्वदनो ययौ वनं पार्थाश्च तत्रोषुरतिप्रमोदिनः ॥ ३७१॥ | |||
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| verse_lines = मार्कण्डेयस्तदाऽऽगत्य तेषामकथयत् कथाः ।;बह्व्यश्चैव विचित्राश्च भाषात्रयसमन्विताः ॥ ३७२॥ | |||
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| verse_lines = लोकदर्शनमाश्रित्य देवाश्च मुनयस्तथा ।;ब्रूयुः कथास्तत्र शिक्षा ग्राह्या नार्थाः कथञ्चन ॥ ३७३॥ | |||
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| verse_lines = अर्थः समाधिभाषासु ग्राह्यः सर्वोऽप्यसंशयम् ।;परदर्शनभाषासु ज्ञेयं तद्दर्शनं तथा ॥ ३७४॥ | |||
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| verse_lines = ग्राह्यो नार्थो वैदिकं तु दर्शनं ग्राह्यमेव हि ।;अन्यार्थो गुह्यभाषासु ग्राह्य एवं विनिर्णयः ॥ ३७५॥ | |||
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| verse_lines = जयद्रथस्तु भीमेन तदा(यदा) पञ्चशिखीकृतः ।;तपसा शिवमाराध्य वव्रे पाण्डवरोधनम् ।;ऋतेऽर्जुनादर्जुनस्य तुष्टो हि तपसा शिवः ॥ ३७६॥ | |||
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| verse_lines = वने वसत्स्वेव च पाण्डवेषु चक्रे यज्ञं पौण्डरीकाख्यमेव ।;संस्पर्धया राजसूयस्य राजा दुर्योधनो नाप्यसौ तत्कलार्हः ॥ ३७७॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनस्याऽज्ञया पाण्डवानां दुःशासनः प्रेषयामास तत्र(दूतम्) ।;आगच्छतेत्यवमानाय तं तु भीमोऽवादीद् रणयज्ञं स्वगम्यम् ॥ ३७८॥ | |||
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| verse_lines = ततो दिनैः कैश्चन धार्तराष्ट्राः सकर्णगान्धारनृपाः कुमन्त्रतः ।;सभार्यकाः पाण्डवान् द्रौपदीं च महैश्वर्यं दर्शयित्वाऽवमन्तुम् ॥ ३७९॥ | |||
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| verse_lines = ते स्यन्दनैः काञ्चनरत्नचित्रैर्महागजैस्तुरगैः पत्तिभिश्च ।;स्वलङ्कृताश्चित्रमाल्याम्बराश्च विनिर्ययुर्द्वैतवनाय शीघ्रम् ॥ ३८०॥ | |||
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| verse_lines = गवां दृष्टिच्छद्मना निर्गतांस्तान् ज्ञात्वा शक्रस्तेजसो भङ्गकामः ।;तत्सामर्थ्यं वरमस्मै प्रदाय तद्बन्धनायादिशच्चित्रसेनम् ॥ ३८१॥ | |||
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| verse_lines = स षष्टिसाहस्रककोटियूथपैर्गन्धर्वमुख्यैः संवृतोऽगात् सरस्तत् ।;यस्मिन् स्नातुं वाञ्छति धार्तराष्ट्रस्तदाज्ञया पुरुषास्तानथोचुः ॥ ३८२॥ | |||
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| verse_lines = स्नातुं समायास्यति धार्तराष्ट्रो राजेश्वरो निस्सरध्वं तदस्मात् ।;तीर्थादाज्ञां धारयन्तश्च तस्येत्युक्ता गन्धर्वा जहसुस्तानथोच्चैः ॥ ३८३॥ | |||
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| verse_lines = ऊचुर्वयं मानयामस्तदाज्ञां त्रिलोकानां यः पतिः शक्रदेवः ।;न मानुषाणामपि चक्रवर्तिनां किम्वल्पसारस्य सुयोधनस्य ॥ ३८४॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते कुपितो धार्तराष्ट्रो जघान गन्धर्ववराञ्छरौघैः ।;जघ्नुः सकर्णा अपि तस्य सोदरा जघ्नुश्च ते धार्तराष्ट्रस्य सेनाम् ॥ ३८५॥ | |||
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| verse_lines = मुहूर्तमासीत् सममेव युद्धं तेषां तदा धार्तराष्ट्रस्य चैव ।;पुरां भिन्दोर्वरतो(पुरां भिदोर्वरतो) मायया च गन्धर्ववीरा ववृधुस्ततः स्म(ववृधुस्ततश्च) ॥ ३८६॥ | |||
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| verse_lines = तेजोभङ्गं तत्र सुयोधनस्य पार्थार्थमत्र प्रविधातुमेव च ।;बलं ददावब्जजः केशवश्च गन्धर्वाणां तेऽभ्ययुर्धार्तराष्ट्रान् ॥ ३८७॥ | |||
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| verse_lines = स चित्रसेनः प्रथमं कर्णमेव युयोध पार्थस्पर्धया तेन युद्ध्यन् ।;कर्णो नाशक्नोद् वचनाद् भार्गवस्य रामस्य नित्यामितषड्गुणस्य ॥ ३८८॥ | |||
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| verse_lines = स भग्नयानश्च(स भग्नयानोऽथ) विकर्णयानमास्थाय तस्यैव नियम्य वाजिनः ।;पराद्रवत् तेन सहैव शीघ्रं दुर्योधनश्चित्रसेनं युयोध ॥ ३८९॥ | |||
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| verse_lines = मुहूर्तमेनेन समं स युद्ध्यन्नन्यैर्गन्धर्वैर्बहुभिर्माययैव ।;भग्ने रथे भूमितले स्थितः सन् गृहीत आसीच्चित्रसेनेन सङ्ख्ये ॥ ३९०॥ | |||
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| verse_lines = महाबलो धार्तराष्ट्रोऽपि शक्रवराद् विष्णोराज्ञया चाभिवृद्धे ।;स चित्रसेनेन धृतस्तदाऽऽसीद् बद्धः पाशैर्वैद्युतैरिन्द्रदत्तैः ॥ ३९१॥ | |||
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| verse_lines = तस्यानुजाः शकुनी राजभार्याः सर्वे बद्धाः शक्रदूतैः (शक्रभृत्यैः) प्रणीताः ।;आदाय तानम्बरे(तानम्बरं) सम्प्रयातेष्वरूरुवन्(सम्प्रयातेष्वरूरुदन्) पाण्डवान् मन्त्रिणोऽस्य ॥ ३९२॥ | |||
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| verse_lines = समीपमागत्य पृथासुतानां परिभूतं वः कुलं शक्रभृत्यैः ।;धृतः(हृतः) सभार्यः सानुजो धार्तराष्ट्रस्तं मोचयध्वं भ्रातरं भारताग्र्याः ॥ ३९३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त ऊचे भीमसेनोऽग्रजं स्वं जाने राजन् यादृशोऽयं विमर्दः ।;ऐश्वर्यं स्वं दर्शयन् नः समागाद् दुर्योधनस्तेजसो भङ्गमिच्छन् ॥ ३९४॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञाय तेषां मन्त्रितं वज्रबाहुरेतच्चक्रे नात्र नः कार्यहानिः ।;दिव्यं ज्ञानं स्वात्मनो(सु आत्मनः) दर्शयन् स एतावदुक्त्वा विरराम भीमः ॥ ३९५॥ | |||
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| verse_lines = एकाहयज्ञे दीक्षितेनैव राज्ञा सम्प्रेषितो भीमसेनोऽर्जुनश्च ।;समाद्रेयौ चित्रसेनं रणे तौ विजित्य दुर्योधनमाश्वमुञ्चताम् ॥ ३९६॥ | |||
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| verse_lines = स चित्रसेनो वासवोक्तं च सर्वं कुमन्त्रितं धार्तराष्ट्रस्य चाऽह ।;पार्थस्य भीमस्य च तन्निशम्य सुव्रीडितो धृतराष्ट्रात्मजोऽभूत् ॥ ३९७॥ | |||
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| verse_lines = समाप्य यज्ञं च ततोऽभियान्तं सर्वे प्रापुर्धर्मराजं स चाऽशु ।;सम्पूज्य तूत्सृज्य च चित्रसेनमूचे गान्धारे न पुनः कार्यमीदृक् ॥ ३९८॥ | |||
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| verse_lines = स पाण्डवैर्मोचितः सानुजश्च सभार्यकः किञ्चिदतोऽपगम्य ।;सम्मेलनायोपविष्टश्च तत्र सुव्रीडितः सूतपुत्रं ददर्श ॥ ३९९॥ | |||
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| verse_lines = स चाऽह दिष्ट्या जयसि राजन्निति सुयोधनम् ।;व्रीडितो नेति तं चोक्त्वा यथावृत्तं सुयोधनः ।;उक्त्वा प्रायोपवेशं च चक्रे तत्र सुदुःखितः ॥ ४००॥ | |||
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| verse_lines = कर्णदुःशासनाभ्यां च सौबलेन च देविना ।;अन्यैश्च याच्यमानोऽपि नैवोत्तस्थौ सुयोधनः ॥ ४०१॥ | |||
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| verse_lines = ततो निशायां प्राप्तायां स्वपक्षे प्रविषीदति ।;मन्त्रयित्वाऽसुरैः कृत्या निर्मिता होमकर्मणि (होमकर्मणा) ॥ ४०२॥ | |||
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| verse_lines = शुक्रेणोत्पादिता कृत्या सा प्रसुप्तेषु मन्त्रिषु ।;धार्तराष्ट्रं समादाय ययौ पातालमाशु च ।;अथ सम्बोधयामासुर्दैत्या दुर्योधनं नृपम् ॥ ४०३॥ | |||
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| verse_lines = त्वं दिव्यः पुरुषो वीरः सृष्टोऽस्माभिः प्रतोषितात् ।;तपसा शङ्कराद् वज्रकायोऽवध्यश्च सर्वदा ।;अस्माकं पक्षभूतस्त्वं देवानां चैव पाण्डवाः ॥ ४०४॥ | |||
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| verse_lines = इदानीं सर्वदेवानां(इन्द्रादिसर्वदेवानां) वरात् त्वं विजितो रणे ।;वयं तथा करिष्यामो यथा जेष्यसि पाण्डवान् ॥ ४०५॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णेन निहतश्चैव नरकः कर्ण आस्थितः ।;स च कृष्णार्जुनाभावं करिष्यति न संशयः ॥ ४०६॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त्वा कृत्यया भूयः स्वस्थाने स्थापितो नृपः ।;उमया निर्मितात्मार्द्धमुत्तरं हरनिर्मितम् ।;ज्ञात्वैवावध्यतां चैव राज्ये बुद्धिं चकार सः ॥ ४०९॥ | |||
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| verse_lines = भृत्यैस्तवैव पार्थैर्यन्मोचितोऽसि परन्तप ।;तेन मान्योऽधिकं लोके यद् भृत्या एव तादृशाः ।;किमु त्वं राजशार्दूल तदुत्तिष्ठ स्थिरो भव ॥ ४११॥ | |||
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| verse_lines = या च तेऽर्जुनमाहात्म्ये शङ्का सा व्येतु मे शृणु ।;यावन्नैवार्जुनं हन्यां पादौ प्रक्षालये स्वयम् ॥ ४१२॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तोऽवरजैश्चैव सर्वैः शकुनिना तथा ।;याचितो रथमारुह्य ययौ नागपुरं द्रुतम् ॥ ४१३॥ | |||
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| verse_lines = सकुण्डलं सकवचमवध्यं सूर्यनन्दनम् ।;ज्ञात्वेन्द्र उभयं तस्मादैच्छदादातुमुत्तमम् ॥ ४१४॥ | |||
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| verse_lines = तद् विज्ञाय रविः कर्णं स्वप्न उक्त्वा न्यवारयत् ।;सर्वथा दास्य इत्युक्ते प्राहाऽदेयं वरायुधम् ॥ ४१५॥ | |||
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| verse_lines = ददौ चोत्कृत्य कवचं कुण्डले च शचीपतेः ।;अमोघां शक्तिमादाय ज्ञात्वेन्द्रं द्विजरूपिणम् ॥ ४१६॥ | |||
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| verse_lines = ऋतेऽर्जुनादेकमेव वधिष्यस्यनयेति सः ।;दत्वा शक्तिं ययौ शक्रः सार्द्धं कवचकुण्डलैः ॥ ४१७॥ | |||
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| verse_lines = पार्था(पार्थो) विमुच्यैव सुयोधनं तं वने वसन्तो मुदिताः सदैव ।;सहारणीभाण्डमथो मृगेण हृतं द्विजस्याऽशु निशम्य चान्वयुः(चान्वगुः) ॥ ४१८॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन्नदृश्ये तृषिता एकैकमुदकार्थिनः ।;ययुर्युधिष्ठिरमृते सुप्तास्ते धर्ममायया;अदृश्येनैव धर्मेण वारिता वारिपायिनः ॥ ४१९॥ | |||
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| verse_lines = क्षत्रधर्मस्य रक्षार्थं न तत्प्रश्नान् विदां वराः ।;व्याचक्रुः शक्तिमन्तोऽपि पानीयार्थमरिन्दमाः ॥ ४२०॥ | |||
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| verse_lines = न विप्राणां च धर्मोऽयं विद्याया उपजीवनम् ।;क्षत्रियाणां तु किमुत प्रसभं तेन ते पपुः ॥ ४२१॥ | |||
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| verse_lines = देवा अपि मनुष्येषु जाताः सुबलिनोऽपि हि ।;मानुषेणैव भावेन युक्ताः स्युः केशवादृते ।;कार्येष्वेषां क्रमेणैव व्यक्तिमायान्ति सद्गुणाः ॥ ४२२॥ | |||
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| verse_lines = अतो भीमार्जुनौ धर्मादत्युत्तमबलावपि ।;देवमायां समाश्रित्य धर्मेण स्वापितौ क्षणात् ॥ ४२३॥ | |||
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| verse_lines = मुहूर्तमेव सा माया तयोराच्छादने क्षमा ।;ततः प्रबुद्धयोर्धर्मो नैव शक्तिशतांशभाक् ॥ ४२४॥ | |||
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| verse_lines = उक्तं पाद्मपुराणे च तदेतत् सर्वमञ्जसा ।;तस्मान्नाशक्तिरनयोः सम्भाव्या भीमपार्थयोः ॥ ४२५॥ | |||
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| verse_lines = धर्मात्मजोऽथाऽजगामोदकान्तं दृष्ट्वा भ्रातॄंस्तत्र दुःखाभितप्तः ।;इच्छन् पातुं वारि संवारितश्च पित्रा(संवारितः स्वपित्रा) बकाकारमितेन नापात् ॥ ४२६॥ | |||
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| verse_lines = अर्थे भ्रातॄणामैच्छदसौ तदीयप्रश्नप्रतिव्याहरणं दयालुः ।;ततो धर्मो यक्षतनुः स भूत्वा प्रश्नांश्चक्रे व्याकरोत् तान् स पार्थः ॥ ४२७॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तुष्टो वरमस्मै ददौ स एकोत्थानं भ्रातृमध्ये स वव्रे ।;यद्येकः स्यान्नकुलोऽस्त्वित्यथाऽह तुष्टो धर्मः कथमेतत् कृतं ते ।;अतिप्रीतिर्भीमसेने तवास्ति बली चासौ राज्यहेतुस्तव स्यात् ॥ ४२८॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त ऊचे माद्रिपुत्रं विहाय कुन्तीपुत्रो न मयोत्थापनीयः ।;स एवमुक्तो नितरां प्रीयमाण उत्थापयामास च तान् समस्तान् ॥ ४२९॥ | |||
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| verse_lines = यथेष्टरूपप्राप्तिमेषां पुनश्च स्वकामतो निजरूपाप्तिमादात् ।;अज्ञातवासेऽज्ञाततां सर्वदैव ददौ तेषां प्रीत एवाऽनृशंस्यात् ।;एवं क्रीडन् पुत्र इत्यात्मनैव यशोधर्मावात्मनो(यशोधर्मानात्मनो) वर्द्धयन् सः ॥ ४३०॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरात्मनस्तस्य यशोधर्मविवृद्धये(युधिष्ठिरात्मनः स्वस्य यशोधर्माभिवृद्धये) ।;कृत्वाऽरण्यपहारादि पुनर्दत्वा च तत् स्वयम् ।;दातुं विप्राय तद्धस्ते ययौ धर्मो दिवं पुनः ॥ ४३१॥ | |||
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| verse_lines = ततो राजा भीमसेनार्जुनौ च सार्द्धं यमाभ्यामरणीं प्रदाय ।;मुदा युताः कृष्णया सार्धमेव सन्तुष्टुवुः कृष्णमनन्तमच्युतम् ॥ ४३२॥ | |||
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<span id="gr-C23" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रयोविंशोऽध्यायः"></span> | |||
== त्रयोविंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ नारायणानुग्रहतो यथावन्निस्तीर्य तान् द्वादशाब्दान् वने ते ।;विसृज्य च ब्राह्मणादीन् सधौम्यानज्ञातवासाय ततो मनो दधुः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = गत्वा विराटस्य पुरीं निधाय हेतीः शम्यां छन्नरूपा बभूवुः ।;यतिः सूदः षण्ढवेषोऽथ सूतवेषो गोपो गन्धकर्त्री च जाताः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = सर्वे विराटं ययुरत्र देववत् सम्भावितास्तेन शुभोरुलक्षणाः ।;युधिष्ठिरस्यैव(युधिष्ठिरस्येव) शुश्रूषणं ते चक्रुर्हृदा वासुदेवस्य नान्यत् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = परपाको गृहस्थस्य क्षत्रियस्य विशेषतः ।;न योग्य इति सूदस्य बभ्रे वेषं वृकोदरः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = वैदिकव्यवहारेषु ज्ञानाधिक्यप्रसिद्धितः ।;जानीयुर्भीम इत्येव सूदवेषस्ततोऽभवत् (शूद्रवेषस्ततोऽभवत्) ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = स्वीयं वेदविदां सर्वं देवेशानां च किं पुनः ।;अतस्तेऽन्याश्रयं नैव चक्रुः स्वबलसंश्रयात् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = शापादेवार्जुनः षण्ढवेषोऽभून्नकुलस्तथा ।;क्षत्रियानन्तरत्वात्तु सूतजातेस्तथाऽभवत् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = सूतस्यानन्तरत्वात्तु वैश्यजातेस्तथाऽभवत् ।;सहदेवो वैश्यजातिर्गोपालस्तेषु चोत्तमः ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = ततो गोपालतामाप यतिः पूज्योऽखिलैर्यतः;यतिरासीद् धर्मजोऽतः सोऽभ्यासार्थं सदैव च ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = अक्षासक्तोऽभवत् पश्चाद् दर्शयिष्यन् स्वशिष्टताम्;भीमसेनसधर्मार्थं शूद्रा सैरन्ध्रिकाऽभवत् ।;द्रौपदी भर्तृसाधर्म्यं स्त्रीणां धर्मो यतः सदा ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = य एष सूद आशु तं निहत्य मल्लमोजसा ।;यशस्तवाभिवर्द्धयेत् समाह्वयाद्य तं नृप ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते समाहुतो जगाद मारुतिर्वचः ।;प्रसादतो हरेरहं निषूदयेऽद्य (निसूदयेऽद्य) मल्लकम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = इति ब्रुवाणो मल्लं तमभियातो वृकोदरः ।;अनयन्मृत्युलोकाय बलाढ्यैरपि दुर्जयम् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = एवं निवसतां तत्र पाण्डवानां महात्मनाम् ।;संवत्सरे द्विमासोने विजित्य दिश आगतः ।;कीचको मत्स्यनृपतेः स्यालो बलवतां वरः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = स द्रौपदीं वीक्ष्य मनोभवार्तः(मनोमदार्तः) सम्प्रार्थयामास तया निरस्तः ।;मासे गते भगिनीं स्वां सुदेष्णां सम्प्रार्थयामास तदर्थमेव ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = तया निषिद्धोऽपि पुनःपुनस्तां यदा ययाचेऽथ सा चाह (ययाचेऽथच साऽऽह) कृष्णाम् ।;समानयाऽश्वेव सुरां मदर्थमितीरिता नेति भीताऽवदत् सा ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = बलात् तया प्रेषिता तद्गृहाय यदाऽगमत् तेन हस्ते गृहीता ।;विधूय तं प्राद्रवत् सा सभायै स्मृत्वाऽऽदित्यस्थं वासुदेवं परेशम् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = वायुस्तमाविश्य(वायुस्तदाविश्य) तु कीचकं तं न्यपातयत् तां समीक्ष्यैव भीमः ।;चुकोप वृक्षं च समीक्षमाणं तं वारयामास युधिष्ठिरोऽग्रजः ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णा रात्रौ भीमसकाशमेत्य हन्तुं पापं कीचकं प्रैरयत् तम् ।;भीमस्य बुद्ध्या निशि सा कीचकं च जगाद गन्तुं शून्यगृहं स चागात् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = तत्रैनमासाद्य तु भीमसेनो विजित्य तं बाहुयुद्धे निहत्य(निपात्य) ।;शिरो गुदे पाणिपादौ च तस्य प्रवेशयामास विमृद्य वीरः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = अवध्यं तं निहतं वीक्ष्य तस्य पञ्चोत्तरं शतमेवानुजानाम् ।;सर्वं वराच्छङ्करस्य ह्यवध्यं सहैव कृष्णां तेन दग्धुं बबन्ध ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = सा नीयमाना कीचकैः संरुराव श्रुत्वैव तं भीमसेनो महान्तम् ।;उद्धृत्य वृक्षं तेन जघान सर्वानादाय कृष्णां पुनरागात् पुरं स्वम्(गृहं स्वम्, पुरञ्च) ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = एवं यत्नात् तपसा तैरवाप्तो वरः शिवादजयत्वं(शिवादक्षयत्वं) रणेषु ।;अवध्यता चैव षडुत्तरास्ते शतं हता भीमसेनेन सङ्ख्ये ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = गन्धर्व इत्येव निहत्य सर्वान् मुमोद भीमो द्रौपदी चाथ कृष्णाम् ।;याहीत्यूचे तां सुदेष्णा भयेन त्रयोदशाहं पालयेत्याह तां सा ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्वित्येनामाह भयात् सुदेष्णा तथाऽवसन् पूर्णमब्दं च तेऽत्र;तदा(ततः) पार्थान् प्रविचिन्त्याखिलायां(प्रविचित्य) पृथ्व्यां छन्नान् धार्तराष्ट्रस्य दूताः ।;अविज्ञाय प्रययुर्धार्तराष्ट्रमूचुर्हतं कीचकं योषिदर्थे ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = तेनावदद् द्रौपदीकारणेन दुर्योधनो निहतं कीचकं तम् ।;भीमेनागुस्तत्र दुर्योधनाद्या भीष्मादिभिः सह कर्णेन चैव ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = अग्रे ययौ तत्र योद्धुं सुशर्मा स गा विराटस्य समाजहार ।;श्रुत्वा विराटोऽनुययौ ससेनस्तं पाण्डवाश्चानुययुर्विनाऽर्जुनम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = विजित्य सङ्ख्ये जगृहे विराटं तदा सुशर्मा तमयाद् वृकोदरः ।;स तस्य सेनां विनिहत्य(विनिपात्य) मात्स्यं विमोच्य जग्राह सुशर्मराजम् ।;युधिष्ठिरो मोचयामास तं च ततो रात्रौ न्यवसन् बाह्यतस्ते ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽपरदिने सर्वे भीष्मद्रोणपुरस्सराः ।;रहितं कीचकैर्मात्स्यं शक्यं मत्वाऽभिनिर्ययुः ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = कीचकस्य हिडिम्बस्य बककिर्मीरयोरपि ।;जरासन्धस्य नृपतेः कंसादीनां च सर्वशः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = न बाधनाय भीष्माद्या अपि शेकुः कथञ्चन ।;तस्मात् ते कीचकं शान्तं श्रुत्वा मात्स्यं ययुर्युधे ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = यतिष्ये रक्षितुं भीमाद् धार्तराष्ट्रानिति स्वकाम् ।;सत्यां कर्तुं प्रतिज्ञां तु ययौ द्रोणः सपुत्रकः ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = यदि युद्धाय निर्यान्ति ज्ञाताः स्युः पाण्डवास्तदा ।;न चेद् विराटमनतं नमयिष्यामहे वयम् ।;इति मत्वा विराटस्य जगृहुर्गाः समन्ततः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = तदोत्तरः सारथित्वे प्रकल्प्य पार्थं ययौ तान् निशाम्यैव भीतः ।;ततोऽर्जुनः सारथिं तं विधाय कृच्छ्रेण संस्थाप्य च तं(तान्) ययौ कुरून् ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = आदाय गाण्डीवमथ ध्वजं च हनूमदङ्कं सदरोऽग्रतो गाः ।;निवर्त्य युद्धाय ययौ कुरूंस्तान् जिग्ये सर्वान् द्वैरथेनैव सक्तान् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = एकीभूतान् पुनरेवानुयातान् सम्मोहनास्त्रेण विमोहयित्वा ।;जग्राह तेषामुत्तरीयाण्यृते तु भीष्मस्य वेदास्त्रघातं स एव ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = विधाय भीष्मं विरथं जगाम तदा श्रुत्वा मत्स्यपतिर्जितान् कुरून् ।;मुमोद पुत्रेण जिता इति स्म तदाऽऽह षण्ढेन जितान् युधिष्ठिरः ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = तदा क्रुद्धः प्राहरत् तं विराटः सोऽक्षेण तद् भीमधनञ्जयाभ्याम् ।;श्रुतं तदा कुपितौ तौ निशाम्य न्यवारयत् तावपि धर्मसूनुः ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = निजस्वरूपेण समास्थितान् नो यदि स्म नासौ प्रणिपातपूर्वकम्(पूर्वम्) ।;क्षमापयेद् वध्य इत्यात्मरूपं समास्थितास्तस्थुरथापरे(अथा परे) दिने ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = तदा विराटासनमास्थितं नृपं युधिष्ठिरं वीक्ष्य विराट आह ।;किमेतदित्यूचिवानुत्तरोऽस्मै तान् पाण्डवान् गोग्रहणे च वृत्तम् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = ततो विराटो भयकम्पिताङ्गः प्रणम्य पार्थाञ्छरणं जगाम ।;ददौ च कन्यामुत्तरां फल्गुनाय पुत्रार्थमेव प्रतिजग्राह सोऽपि ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = एवं विराटं मोचयित्वैव गाश्च तमस्यन्धे कीचकान् पातयित्वा ।;प्राप्तो धर्मः सुमहान् वायुजेन तस्यानु पार्थेन च गोविमोक्षणात् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = अयातयन् केशवायाथ दूतान् सहाभिमन्युः सोऽपि रामेण सार्द्धम् ।;आगादनन्तानन्दचिद् वासुदेवो विवाहयामासुरथाभिमन्युम् ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = आसीन्महानुत्सवस्तत्र तेषां दाशार्हवीरैः सह पाण्डवानाम् ।;स पाञ्चालानां वासुदेवेन सार्द्धमज्ञातवासं समतीत्य मोदताम् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनाद्याः सूतपुत्रेण सार्द्धं ससौबलेया युधि पार्थपीडिताः ।;भीष्मादिभिः सार्द्धमुपेत्य नागपुरं मन्त्रं मन्त्रयामासुरत्र ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = अज्ञातवासे फल्गुनो नोऽद्य दृष्टस्तस्मात् पुनर्यान्तु पार्था वनाय ।;इति ब्रुवाणानाह भीष्मोऽभ्यतीतमज्ञातवासं द्रोण आहैवमेव ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = तयोर्वाक्यं ते त्वनादृत्य पापा वनं पार्थाः पुनरेव प्रयान्तु ।;इति दूतं प्रेषयामासुरत्र जानन्ति विप्रा इति धर्मजोऽवदत् ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = सौरमासानुसारेण धार्तराष्ट्रा अपूर्णताम् ।;आहुश्चान्द्रेण मासेन पूर्णः कालोऽखिलोऽप्यसौ ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = दिनानामधिपः सूर्यः पक्षमासाधिपः शशी ।;तस्मात् सौम्याब्दमेवात्र मुख्यमाहुर्मनीषिणः ।;सौम्यं कालं ततो यज्ञे गृह्णन्ति नतु सूर्यजम् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = तदेतदविचार्यैव लोभाच्च धृतराष्ट्रजैः ।;राज्यं न दत्तं पार्थेभ्यः पार्थाः कालस्य पूर्णताम् ।;ख्यापयन्तो विप्रवरैरुपप्लाव्यमुपाययुः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = सुवासुदेवा अखिलैश्च यादवैः पाञ्चालमत्स्यैश्च युताः सभार्याः ।;उपप्लाव्ये ते कतिचिद् दिनानि वासं चक्रुः कृष्णसंशिक्षितार्थाः ॥ ५७॥ | |||
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<span id="gr-C24" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्विंशोऽध्यायः"></span> | |||
== चतुर्विंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ ततः सम्मन्त्र्यानुमते(अनुमतेः) कृष्णस्य स्वपुरोहितम् ।;द्रुपदः प्रेषयामास धृतराष्ट्राय शान्तये ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = स गत्वा धृतराष्ट्रं तं भीष्मद्रोणादिभिर्युतम् ।;उवाच न विरोधस्त उत्पाद्यो धर्मसूनुना ।;यस्य भीमार्जुनौ यौधौ नेता यस्य जनार्दनः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = श्रुतास्ते भीमनिहता जरासन्धादयोऽखिलाः ।;यथा च रुद्रवचनादवध्या राक्षसाधिपाः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = तीर्थविघ्नकराः सर्वतीर्थान्याच्छाद्य संस्थिताः ।;तिस्रः कोट्यो महावीर्या भीमेनैव निषूदिताः (निसूदिताः) ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = निवातकवचाश्चैव हताः पार्थेन ते श्रुताः ।;जानासि च हरेर्वीर्यं यस्येदमखिलं वशे ।;सब्रह्मरुद्रशक्राद्यं चेतनाचेतनात्मकम् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादेतैः पालितस्य धर्मजस्य स्वकं वसु ।;दीयतामिति तेनोक्तो धृतराष्ट्रो नचाकरोत् ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = ततः सहैव यदुभिः कृष्णं द्वारवतीं गतम् ।;युद्धसाहाय्यमिच्छन्तौ धार्तराष्ट्रधनञ्जयौ ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = युगपद् ययतुस्तत्र वेगेनाजयदर्जुनम् ।;दुर्योधनः शिरस्थान आसीनोऽभूद्धरेस्तदा ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = दर्पान्नाहं राजराज उपास्ये पादयोरिति ।;तयोरागमनं पूर्वं ज्ञात्वैव हि हरिः प्रभुः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = असुप्तः सुप्तवच्छिश्ये तत्रातिष्ठद् धनञ्जयः ।;प्रणम्य पादयोः प्रह्वो भक्त्युद्रेकात् कृताञ्जलिः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = तमैक्षत् प्रथमं देवो जानन्नपि सुयोधनम् ।;स्वागतं फल्गुनेत्युक्ते पूर्वमागामहं त्विति ।;आह दुर्योधनस्तं च स्वागतेनाभ्यपूजयत् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = तयोरागमने हेतुं श्रुत्वा प्राह जनार्दनः ।;एकः पूर्वागतोऽत्रान्यः पूर्वदृष्टो मया यतः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = समं करिष्ये युवयोरेकत्राहं निरायुधः ।;अन्यत्र दशलक्षं मे पुत्राः शूराः पदातयः ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्ते फल्गुनः कृष्णं वव्रे तद्भक्तिमान् यतः ।;अन्यस्तत्राभक्तिमत्त्वाद् वव्रे गोपान् प्रयुद्ध्यतः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = पार्थानामेव साहाय्यं करिष्यन्नपि केशवः ।;तस्याभक्तिं दर्शयितुं चक्रे समवदीश्वरः ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = ततः पार्थेन सहितः पाण्डवान् केशवो ययौ ।;दुर्योधनो ययौ रामं स भयात् केशवस्य च ।;न साहाय्यं करोमीति प्राह तत्स्नेहवानपि ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = उपप्लाव्ये सभायां हि तत्पक्षीयं वचो ब्रुवन् ।;निराकृतः सात्यकिना समक्षं केशवस्य च ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = ततो दुर्योधनं नायात् स च हार्दिक्यसंयुतः ।;जगाम हस्तिनपुरमक्षोहिण्यो दशाभवन् ।;एका च धार्तराष्ट्रस्य नानादेश्यैर्नृपैर्युताः ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = सप्त पाण्डुसुतानां च मत्स्यद्रुपदकेकयैः ।;धृष्टकेतुजरासन्धसुतकाशीनृपैर्युताः ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = पुरुजित् कुन्तिभोजश्च चेकितानश्च सात्यकिः ।;पाण्डवान् सेनया युक्ताः समीयुर्देवपक्षिणः ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = विन्दानुविन्दावावन्त्यौ जयत्सेनोऽन्यकैकयाः(अन्यकेकयाः) ।;क्षेमधूर्तिर्दण्डधारः कलिङ्गोऽम्बष्ठ एव च ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = श्रुतायुरच्युतायुश्च बृहद्बलसुदक्षिणौ ।;श्रुतायुधः सैन्धवश्च राक्षसोऽलम्बुसस्तथा ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = अलायुधोऽलम्बलश्च दैत्या दुर्योधनं ययुः ।;गत्वा दुर्योधनाहूतो भगदत्तोऽपि तं ययौ ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = सपुत्रपौत्रो बाह्लीको भीष्मद्रोणकृपा अपि ।;प्रीत्यर्थं धृतराष्ट्रस्य बभूवुस्तत्सुतानुगाः ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = पाण्ड्यश्च वीरसेनाख्यः पाण्डवानेव संश्रितः ।;शल्यं च पाण्डवानेव यान्तं ज्ञात्वा सुयोधनः ।;सुसभाः कारयामास सर्वभोगसमन्विताः ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = ता युधिष्ठिरक्लृप्ताः स मत्वा शल्योऽब्रवीदिदम् ।;य एताः(य एतत्) कारयामास तदभीष्टं करोम्यहम् ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = लीनः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रः सत्यं कुर्वित्यभाषत ।;देहि मे युद्धसाहाय्यमिति सोऽपि यशोऽर्थयन् ।;रक्षार्थमात्मवाक्यस्य तथेत्येवाभ्यभाषत ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = स पाण्डवांस्ततो गत्वा तैरनुज्ञात एव च ।;तेजोवधार्थं कर्णस्य धनञ्जयकृतेऽर्थितः ।;तथेत्युक्त्वा ययौ धर्मनन्दनं कौरवान् प्रति ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = सञ्जयं प्रेषयामास धृतराष्ट्रोऽथ शान्तये ।;पाण्डवान् प्रत्यधर्मं च युद्धं स प्रत्यपादयत् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = हठवादेऽवदद् भीमो यं धर्मं द्रौपदी तथा ।;तमेवोक्त्वा धर्मजस्तु चकार च निरुत्तरम् ।;कृष्णोऽपि तस्य धर्मस्य प्रामाण्यं प्रत्यपादयत् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = ततो निरुत्तरः कृष्णं पाण्डवांश्च प्रणम्य सः ।;धृतराष्ट्रं ययौ तं च विनिन्द्य प्रययौ गृहम् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = निन्दितः सञ्जयेनासावाहूय विदुरं निशि ।;पप्रच्छ सोऽवदद् धर्मं पार्थानां राज्यदापनम् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = ऐहिकस्य सुखस्यापि कारणं तदनिन्दितम् ।;अन्यथा सर्वपुत्राणां नाशं धर्मातिलङ्घनम् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = तत्र भावमकृत्वा स ज्ञानादिच्छन्नघक्षयम् ।;विष्णोः स्वरूपं पप्रच्छ सोऽस्मरच्च सनातनम् ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = स आगत्यावदत् तत्त्वं विष्णोर्मायाविनः शुभा ।;न गतिश्चेत्यथ प्रातः सञ्जयः पाण्डवोदितम् ।;अवदद् धृतराष्ट्राय सभायां कुरुसन्निधौ ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = तच्छ्रुत्वा स तु भीतोऽपि पुत्रस्नेहानुगो नृपः ।;राज्यं नादात् पाण्डवानां ततो धर्मसुतो नृपः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = यदुक्तवान् सञ्जयाय यदि दित्सतिः नः पिता ।;राज्यं तदा त्वमागच्छ विदुरो वा न चेन्नच ।;तावथानागतौ ज्ञात्वा मन्त्रयामास शौरिणा ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = सोऽप्याहाहं गमिष्यामि सभायामृषिसन्निधौ ।;वक्ष्ये पथ्यानि युक्तानि यदि नासौ ग्रहीष्यति ।;वध्यः सर्वस्य लोकस्य स भवेत् सर्वधर्महा ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्ते वैरमात्मोत्थं लोकमध्ये प्रहापयन् ।;लोकसङ्ग्रहणार्थाय भीमसेनोऽब्रवीद् वचः ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = वधं तेषां धर्ममेव लोके ख्यापयितुं हरिः ।;आक्षिपन्निव भीमं तं युद्धाय प्रेरयद्(प्रैरयत्,प्रेरयद्) दृढम् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = ततः कृष्णोऽर्जुनं चैव कृपालुं सन्धिकामुकम् ।;हेतुमद्भिः शुभैर्वाक्यैरनुनीय जगत्पतिः ।;उक्तो मानुषया बुद्ध्या नकुलेन सुनीतिवत्(सुनीतवत्) ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = दस्यूनां निग्रहो धर्मः क्षत्रियाणां यतः परः ।;अतो न धार्तराष्ट्रैर्नः सन्धिः स्यादिति पार्षती ।;जगाद कृष्णं सोऽप्येनां ओमित्युक्त्वा विनिर्ययौ ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = ससात्यकिः स्यन्दनवर्यसंस्थितः पृथातनूजैरखिलैः स भूमिपैः ।;अन्वागतो दूरतरं गिरा तान् संस्थाप्य विप्रप्रवरैः कुरून् ययौ ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = एकोऽपि विष्णुः स तु(च) भार्गवात्मा व्यासात्मकश्चानुगतो मुनीन्द्रैः (व्यासः सशिष्यस्तदनन्यदृश्यः) ।;ययौ तदुक्तेर्हि गुणान् प्रवेत्तुं नान्यो हि शक्तस्तमृते यतः प्रभुम् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = स वन्द्यमानोऽखिलराष्ट्रवासिभिः प्रसूनवर्षैरभिवर्षितः सुरैः ।;संस्तूयमानः प्रणतोऽब्जजादिभिर्गजाह्वयं प्राप परोऽप्रमेयः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = स भीष्ममुख्यैः सरसाभियातः सहैव तै प्रययौ राजमार्गे ।;दिदृक्षवस्तं जगदेकसुन्दरं गुणार्णवं प्राययुरत्र सर्वे ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = सभाजितस्तैः(सम्भावितस्तैः) परमादरेण विवेश गेहं नृपतेरनन्तः ।;स भीष्ममुख्यान् पुरतो निधाय वैचित्रवीर्येण समर्चितोऽजः ।;रौग्मे(रौक्मे) निषण्णः परमासने प्रभुर्बभौ स्वभासा ककुभोऽवभासयन् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = यथोचितं तेषु विधाय केशवो दौर्योधनं प्राप्य गृहं च पूजितः ।;पूजां तदीयां गुणवद्द्विडित्यसौ जग्राह नो विदुरं चाऽजगाम ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = स भीष्मपूर्वैरभियाचितोऽपि जगाम नैषां गृहमादिदेवः ।;उपेक्षिता द्रौपदीत्यप्रमेयो जगाम गेहं विदुरस्य शीघ्रम् ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = स तेन भक्त्याऽभिगतः प्रसन्नः प्रविश्य चान्तर्गृहमीश्वरोऽजः ।;भक्त्याऽभिपूर्णेन ससम्भ्रमेण सम्पूजितः सर्वसमर्पणेन ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = परे दिनेऽसौ धृतराष्ट्रसूनुना समानीतः संसदि कौरवाणाम् ।;विवेश दिव्ये मणिकाञ्चनासने सार्द्धं मुनीन्द्रैः परमार्थवेदिभिः ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = सम्पूजितो भीष्ममुख्यैः समस्तै रराज राजीवसमाननेत्रः ।;यथोचितास्तत्र विधाय वार्ता जगाद काले कलिकल्मषापहः ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = वैचित्रवीर्य स्वकुलस्य वृद्ध्यै प्रदेहि राज्यं तव सत्सुताय ।;यशश्च धर्मं परमं प्रसादं मम त्वमाप्नोषि तदैव राजन् ।;अतोऽन्यथा यशसो धर्मतश्च हीनः प्रतीपत्वमुपैषि मेऽतः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः प्राह ममातिवर्तिनं सुतं स्वयं मे प्रतिबोधयेति ।;स वासुदेवेन विबोधितोऽपि पापाभिसन्धिर्धृतराष्ट्रसूनुः ।;उत्थाय तस्मादनुजैरमात्यैर्नियन्तुमीशं कुमतिर्व्यधान्मतिम् ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = येये तदा केशवसंयमाय न्यमन्त्रयंस्ते विबुधप्रतीपाः ।;अतो विकर्णप्रमुखा अपि स्म वध्यत्वमायन्नशुभां गतिं च ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = कर्णः सुराग्र्योऽपि(सुरांशोऽपि) सुयोधनार्थे(सुयोधनार्थं) न्यमन्त्रयद् भावतो नैव दुष्टः ।;अतो गतिश्चास्य सुशोभनाऽभूद् येऽत्रानुकूलाः परमस्य ते शुभाः ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = ऋषिभिर्जामदग्न्येन व्यासेनाप्यमितौजसा ।;वासुदेवात्मकेनैव चैव त्रिरूपेणैव विष्णुना ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = मातापितृभ्यां भीष्माद्यैरनुशिष्टोऽपि दुर्मतिः ।;सुयोधनो मन्त्रयते मुकुन्दस्यानुबन्धनम् ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = सात्यकिः कृतवर्मा च तच्छुश्रुवतुरञ्जसा ।;संस्थाप्य कृतवर्माणं रहः सात्यकिरत्र च ।;अभ्येत्य केशवं प्राह दुर्योधनविनिश्चयम् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = जानन्नप्यखिलं कृष्णस्तच्छ्रुत्वा सात्यकेर्मुखात् ।;वैचित्रवीर्यमवदत् पश्य मामिति(मामपि) सर्वगम् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = अथ तेनाऽहुते पुत्रे सामात्ये पुरुषोत्तमः ।;(स्वं रूपं) स्वरूपं दर्शयामास सर्वगं पूर्णसद्गुणम् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = तत् कालसूर्यामितदीप्ति सर्वजगद्भरं शाश्वतमप्रमेयम् ।;दृष्ट्वैव चक्षूंषि सुयोधनाद्या न्यमीलयन् दीधितिवारितानि ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = पिधाय रूपं पुनरेव तद्धरिर्वैचित्रवीर्येण समर्थितः पुनः ।;कृत्वाऽन्धमेव प्रययौ सुयोधनं सहानुगं(सहानुजं) पापतमं प्रकाश्य ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = अनन्तशक्तिः पुरुषोत्तमोऽसौ शक्तोऽपि दुर्योधनचित्तनिग्रहे ।;नैव व्यधादेनमथोक्तकारिणं निपातयन्नन्धतमस्यनन्तः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च कुन्तीगृहमेत्य कृष्णस्तयोद्योगं धर्मसुतस्य शिष्टम् ।;श्रुत्वा ययौ सूर्यजमात्मयाने निधाय तस्यावददात्मजन्म ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = आयाहि पार्थानिति (पाण्डूनिति) तद्वचः स नैवाकरोन्मानितो धार्तराष्ट्रैः ।;संस्थाप्य तं भगवान् द्रौणये च रहोऽवदन्मित्रभावं पृथाजैः ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = यावत् पितुर्मरणं सोऽपि मैत्रीं वव्रे पार्थैस्तं च विसृज्य कृष्णः ।;ययौ कुरून् पूर्वमेवोद्विसृज्य पृथासुतानां स सकाशमीशः ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = सम्प्रार्थितः पृथया चैव कर्णः पार्थैर्योगं याहि सूनुर्ममासि ।;तेनाप्युक्ता वासविना विनाऽहं हन्यां सुतांस्ते न कथञ्चनेति ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = ततो ययुः कौरवाः पाण्डवाश्च कुरुक्षेत्रं योद्धुकामाः सकृष्णाः ।;चक्रुश्च ते शिबिराण्यत्र सर्वे शुभे देशे पाण्डवाः कृष्णबुद्ध्या ॥ ८०॥ | |||
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<span id="gr-C25" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चविंशोऽध्यायः"></span> | |||
== पञ्चविंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ ते सेने समरारम्भे समेते सागरोपमे ।;भीमभीष्ममुखे वीक्ष्य प्राह वासविरच्युतम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = ‘सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत’(भ.गी.१.२१) ।;इत्युक्तः स तथा चक्रे पार्थोऽपश्यच्च बान्धवान्(पार्थोऽपश्यत् स्वबान्धवान्) ।;विससर्ज धनुः पापाशङ्की तत्राऽह माधवः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = स्वधर्मो दुष्टदमनं धर्मज्ञानानुपालनम् ।;क्षत्रियस्य तमुत्सृज्य निन्दितो यात्यधो ध्रुवम् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = ‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।;स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः’ ॥ ४॥ (भ.गी.१८.४६) | |||
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| verse_lines = नच शोकस्त्वया कार्यो बन्धूनां निधनेच्छया (निधनेक्षया) ।;देहस्य सर्वथा नाशादनाशाच्चेतनस्य च ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = सृष्टिस्थित्यप्ययाज्ञानबन्धमोक्षप्रवृत्तयः ।;प्रकाशनियमौ चैव ब्रह्मेशादिक्षरस्य च ।;अक्षरप्रकृतेश्चैव मत्त एव नचान्यतः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = न मे कुतश्चित् सर्गाद्याः स्वातन्त्र्याद् गुणपूर्तितः ।;अतः समाधिकाभावान्मम मद्वशमेव च ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञात्वैषां निधनाद्यं च जीवादेरस्वतन्त्रताम् ।;अस्वातन्त्र्यान्निवृत्तौ च मामनुस्मर युद्ध्य च ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।;अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।;भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ १०॥ (भ.गी.१२.६-७) | |||
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| verse_lines = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।;मत्स्थानि सर्वभूतानि नचाहं तेष्ववस्थितः ॥ ११॥ (भ.गी.९.४) | |||
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| verse_lines = (सम्पूर्णसत्सर्व)सुपूर्णसत्सर्वगुणदेहोऽहं सर्वदा प्रभुः ।;अस्पृष्टाखिलदोषैकनित्यसत्तनुरव्ययः ।;इत्युक्तो वासविः प्राह व्याप्तं ते दर्शयेश मे(व्याप्तिं मे दर्शयस्व मे) ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = अथ दिव्यदृशं तस्य दत्वा व्याप्तं निजं वपुः ।;देशतः कालतश्चैव पूर्णं सर्वगुणैः सदा ।;दर्शयामास भगवान् यावत्यर्जुनयोग्यता ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = तत्प्रार्थितः पुनः कृष्णस्तद्रूपं लोकमानतः ।;पूर्ववद् दर्शयामास पुनश्चैनमशिक्षयत् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = अपीडयंस्ताञ्छस्त्रौघैर्धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।;ररक्ष तान् वायुसुतो विसृजञ्छरसञ्चयान् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = तत्र भीमशरैर्नुन्ना धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।;भग्नास्तानथ गाङ्गेयो दिव्यास्त्रविदधारयत्(दिव्यास्त्रं व्यदधारयत्, दिव्यास्त्रविदधारयत्)) ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = अथ द्वन्द्वानि युद्धानि बभूवुर्विजिगीषताम् ।;द्रोणपार्षतयोश्चैव शैनेयकृतवर्मणोः ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = दुःशासनेन वीरस्य माद्रेयस्य यवीयसः ।;नकुलस्य विकर्णस्य कार्ष्णेयैर्दुर्मुखादिनाम् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = वृत्ते द्वन्द्वमहायुद्धे तत्र धर्मजपक्षगाः ।;जिता विनैव शैनेयं सोऽजयद्धृदिकात्मजम् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = अथ भीष्मद्रोणमुखैर्भगदत्तादिभिस्तथा ।;विद्राप्यमाणं स्वबलं स्थापयामास मारुतिः ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणं च भगदत्तं च कृपं दुर्योधनं तथा ।;केवलं बाहुवीर्येण व्यजयद् भीमविक्रमः ।;हत्वोत्तरं मद्रराजो व्यद्रावयदनीकिनीम् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = अथ भीष्ममुदीर्णास्त्रं द्रावयन्तं वरूथिनीम् ।;ससौमदत्तिं सौभद्रसहायोऽर्जुन आसदत् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = सौभद्रं तत्र विक्रान्तमतीत्य द्युसरित्सुतः ।;द्रावयामास पाञ्चालान् पश्यतः सव्यसाचिनः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = तस्य विक्रममालक्ष्य पार्थं तद्गौरवानुगम् ।;दृष्ट्वा युधिष्ठिरो राजा क्रुद्धः सेनामपाहरत् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = रात्रौ युधिष्ठिरश्चिन्तामाप्य पार्थं व्यगर्हयत् ।;स कृष्णाद्यैः सान्त्वितश्च पुनर्युद्धाय निर्ययौ ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = एवं भीष्मो दशाहानि सेनापत्यं चकार ह ।;कृत्वाऽपि पाण्डवैर्युद्धं तत् कर्तुमकृतोपमम् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = कर्णोऽर्द्धरथ इत्युक्त्वा तावद् युद्धात् प्रयापितः(प्रहापितः) ।;यावत् त्वं योत्स्यसे तावन्न योत्स्यामीति निर्गते ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = कर्णेऽयुतरथानां(कर्णोऽयुतरथानां च) स नित्यशो वधमाहवे ।;प्रतिजज्ञेऽकरोत् तच्च पुनश्चास्त्रविदां वरः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = सुसमर्थावपि वधे तस्य भीमधनञ्जयौ ।;स्नेहेन यन्त्रितौ तस्य गौरवाच्चान्ववर्तताम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = बभूवुस्तत्र युद्धानि चित्राणि सुबहूनि च ।;तान्यम्बरे विमानस्था ब्रह्मरुद्रपुरस्सराः ।;अपश्यन् देवताः सर्वा गन्धर्वाप्सरसोऽसुराः ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नो महेष्वासः प्रतिव्यूह्याऽपगासुतम् ।;चक्रे युद्धानि सुबहून्यजेयः शत्रुभी रणे ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = तत्रोद्दधार कृष्णोऽपि फल्गुनं मृदुयोधिनम् ।;दृष्ट्वा चक्रं तथोद्यम्य बाहुं भीष्माय जग्मिवान् ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = तेन स्तुतो गृहीतश्च फल्गुनेन प्रणम्य च ।;प्रार्थितो रथमारूढः पुनः शङ्खमपूरयत् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = ततो भीष्मोऽर्जुनश्चैव शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् ।;अयत्नेन जितश्चैव फल्गुनेनाऽपगासुतः ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = अयुतानि बहून्याजौ रथानां निजघान च ।;जिताः सेनापहारं च चक्रुर्भीष्ममुखास्ततः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = कदाचिदग्रगो भीमो भीष्मद्रोणौ विसारथी ।;कृत्वा विद्राप्य तानश्वान् भित्वा व्यूहं विवेश ह ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = पुनः संस्थापितरथौ विजित्यायत्नतो बली ।;यतमानौ महेष्वासौ धार्तराष्ट्रान् जघान ह ।;पञ्चविंशद्धतास्तत्र धार्तराष्ट्रा महाबलाः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = भगदत्तद्रौणिकृपशल्यदुर्योधनादयः ।;सर्वे जिता द्राविताश्च सेना च बहुला हता ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = विरथो व्यायुधश्चैव दृढवेधविमूर्च्छितः ।;कृतो दुर्योधनः सर्वराज्ञां भीमेन पश्यताम् ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽपहारं सैन्यस्य जिताश्चक्रुश्च कौरवाः ।;दुर्योधनो निशायां च ययौ यत्र नदीसुतः ।;पीडितो भीमबाणैश्च क्षरद्गात्रो ननाम तम् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = उवाच हेतुना केन वयं जीवाम (क्षीयाम, जीयाम) सर्वदा ।;पाण्डवाश्च जयं नित्यं लब्ध्वा हर्षमवाप्नुवन् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = तमाह भीष्मस्तेऽजेया देवास्ते धरणीं गताः ।;विशेषतः केशवेन पालितास्तत्प्रियाः सदा ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = मानसोत्तरशैले हि पुरा ब्रह्मपुरस्सराः ।;स्थिता देवास्तदाऽपश्यद् ब्रह्मैको हरिमम्बरे ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = स्तुत्वा सम्पूज्य भूमेः स भारावतरणाय तम् ।;प्रार्थयामास तेनोक्तं देवानामवदद् विभुः ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = अयं नारायणो देवः पुर्णानन्तगुणार्णवः ।;आज्ञापयति वः सर्वान् प्रादुर्भावाय भूतले ।;स्वयं च देवकीपुत्रो भविष्यति जगत्पतिः(जगत्प्रभुः) ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = एवं तेन समादिष्टा धर्मवाय्वादयोऽखिलाः ।;अभवन् पाण्डवाद्यास्ते सेन्द्राः सह मरुद्गणाः ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = स च नारायणो देवो देवकीनन्दनोऽभवत् ।;तेनैते पालिताः पार्था अजेया देवसर्गिणः ।;तस्मात् तैः सन्धिमन्विच्छ यदीच्छस्यपराभवम् ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो डम्भबुद्ध्यैव नत्वा विष्णुं ततो ययौ ।;प्रातर्निर्यातयामास सेनां युद्धाय दुर्मतिः ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = दिव्यौषधेन भीष्मस्य भूत्वा च निरुजस्ततः ।;भीष्ममग्रे निधायैव ययौ युद्धाय दंशितः (दंसितः) ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नस्तत्र भीमानुयायी दुर्योधनस्यावरजैः प्रयुद्ध्यन् ।;सम्मोहनास्त्रेण विमोहयित्वा विकर्णपूर्वानहनच्च सेनाम् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = ततो द्रोणस्तान् समुत्थाप्य सर्वान् विज्ञानास्त्रेणाऽसदत् पार्षतं च ।;तं भीमसेनः सूतहीनं विधाय व्यद्रावयच्छत्रुगणाञ्छरौघैः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽसदत् कृतवर्मा रथेन धृष्टद्युम्नं सोऽभ्ययात् तावुभौ च ।;ववर्षतुः शरवर्षैरथोग्रैस्तत्राकरोद् विरथं द्रौपदिस्तम् ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् जिते रथवीरे स्वयं तं दुर्योधनः पार्षतमाससाद ।;तं भीमसेनो विरथायुधं च कृत्वा बाणेनाहनज्जत्रुदेशे ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = विमूर्च्छितं तं रुधिरौघमुच्चैर्वमन्तमाशु स्वरथे निधाय ।;कृपो ययौ मारुतिर्धार्तराष्ट्रीं व्यद्रावयत् पृतनां बाणपूगैः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = अथेन्द्रसूनुः केशवप्रेरितेन रथेन शत्रून् विधमञ्छरौघैः ।;रथान् रणे पञ्चविंशत्सहस्रान् निनाय वैवस्वतसादनाय ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = तमन्वगाद् (तमन्वयात्) युयुधानः सुधन्वा विद्रावयन् धार्तराष्ट्रस्य सेनाम् ।;तमभ्ययात् सौमदत्तिस्तयोश्च सुयुद्धमासीदतिभैरवास्त्रम् ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = सुयोधनः सौमदत्तिं स्वकीयरथे व्यवस्थाप्य च भीमसेनात् ।;अपाद्रवद् वासविर्भीष्ममाजौ समाससादाऽशु महेन्द्रकल्पः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = उभौ च तावस्त्रविदां प्रबर्हौ शरैर्महाशीविषसन्निकाशैः ।;ततक्षतुर्नाकसदां समक्षं महाबलौ संयति जातदर्पौ ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = स्वबाहुवीर्येण जितः स भीष्मः किरीटिना लोकमहारथेन ।;सेनामपाहृत्य ययौ निशायामासादितायामथ पाण्डवाश्च ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = ततः परेद्युः पुनरेव भीमभीष्मौ पुरस्कृत्य समीयतुस्ते ।;सेने तदा सारथिहीनमाशु भीष्मं कृत्वा मारुतिरभ्ययात् परान् ।;निपातितास्तेन रथेभवाजिनः प्रदुद्रुवुश्चावशिष्टाः समस्ताः ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनाद्येषु पराजितेषु भीष्मद्रोणद्रौणिपुरस्सरेषु ।;महागजस्थो भगदत्त आगादायन् बाणं भीमसेनेऽमुचच्च(भीमसेने मुमोच) ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = तेनातिविद्धे भीमसेनेऽस्य पुत्र उद्यच्छमानं पितरं निवार्य ।;घटोत्कचोऽभ्यद्रवदाशु वीरः स्वमायया हस्तिचतुष्टयस्थः ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = स वैष्णवास्त्रं भगदत्तसंस्थं विज्ञाय विष्णोर्वरतो विशेषतः ।;अमोघमन्यत्र हरेर्मरुत्सुतः पुत्रे याते न स्वयमभ्यधावत् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = अनुग्रहादभ्यधिकादवध्यं जानन्नपि स्वं वासुदेवस्य नित्यम् ।;तद्भक्तिवैशेष्यत एव तस्य सत्यं वाक्यं कर्तुमरिं नचायात् ।;यदा स्वपुत्रेण जितो भवेत् स किम्वात्मनेत्येव तदा प्रवेत्तुम् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = स विस्मृतास्त्रस्तु यदा भवेत तदा भीमो भगदत्तं प्रयाति ।;ऋते भीमं वाऽर्जुनं नास्त्रमेष प्रमुञ्चतीत्येव हि वेद भीमः ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = चतुर्गजात्मोपरिगात्मकश्च घटोत्कचः सुप्रतीकं च तं च ।;नानाप्रहारैर्वितुदंश्चकार सन्दिग्धजीवौ जगतां समक्षम् ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = गजार्तनादं तु निशम्य भीष्ममुखाः समापेतुरमुं च दृष्ट्वा ।;महाकायं भीमममुष्य पृष्ठगोपं च वाय्वात्मजमत्रसन् भृशम् ।;ते भीतभीताः पृतनापहारं कृत्वाऽपजग्मुः शिबिराय शीघ्रम् ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = दिने परे चैव पुनः समेताः परस्परं पाण्डवाः कौरवास्ते ।;तत्राऽसदन्नागसुतासमुद्भवः पार्थात्मजः शाकुनेयान् षडेकः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = तैः प्रासहस्तैः क्षतकायोऽतिरूढकोपः स खड्गेन चकर्त तेषाम् ।;शिरांसि वीरो बलवानिरावान् भयं दधद् धार्तराष्ट्रेषु चोग्रम् ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा तमुग्रं धृतराष्ट्रपुत्रो दिदेश रक्षोऽलम्बुसनामधेयम् ।;जह्यार्जुनिं क्षिप्रमिति स्म तच्च समासदन्नागसुतातनूजम्(नागसुतासमुद्भवम्) ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = तयोरभूद् युद्धमतीव दारुणं मायायुजोर्वीर्यवतोर्महाद्भुतम् ।;ससादिनोऽश्वान् स तु राक्षसोऽसृजत् ते पार्थपुत्रस्य च सादिनोऽहनन्(अहनत्) ।;ततस्त्वनन्ताकृतिमाप्तमार्जुनिं सुपर्णरूपोऽहनदाशु राक्षसः ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = हतं निशम्याऽर्जुनिमुग्रपौरुषो ननाद कोपेन वृकोदरात्मजः ।;चचाल भूर्नानदतोऽस्य रावतः ससागरागेन्द्रनगा भृशं तदा ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = अलम्बुसस्तं प्रसमीक्ष्य मारुतेः सुतं बलाढ्यं भयतः पराद्रवत् ।;पराद्रवन् धार्तराष्ट्रस्य सेनाः सर्वास्तमाराथ सुयोधनो नृपः ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = स भीमपुत्रस्य जघान मन्त्रिणो महाबलांश्चतुरोऽन्यांस्तथैव ।;हतावशेषेषु च विद्रवत्सु घटोत्कचोऽभ्याहनदाशु तं नृपम् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = स पीड्यमानो युधि तेन रक्षसा प्रवेशयामास शरं घटोत्कचे ।;दृढाहतस्तेन तदा बलीयसा घटोत्कचः प्रव्यथितेन्द्रियो भृशम् ।;तस्थौ कथञ्चिद् भुवि पात्यमानः पुनः शरानप्यसृजत् सुयोधने ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = चिरं प्रयुद्धौ नृपराक्षसाधिपौ परस्पराजेयतमौ रणाजिरे ।;द्रोणादयो वीक्ष्य रिरक्षिषन्तः सुयोधनं प्रापुरमित्रसाहाः ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = स द्रोणशल्यौ गुरुपुत्रगौतमौ भूरिश्रवःकृतवर्मादिकांश्च ।;ववर्ष बाणैर्गगनं समाश्रितो घटोत्कचः स्थूलतमै सुवेगैः ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = तमेकग्र्यै रथिभिः परिष्कृतं निरीक्ष्य भीमोऽभ्यगमत् समस्तान् ।;द्रोणोऽत्र भीमप्रहितैः शरोत्तमैः सुपीडितः प्राप्तमूर्च्छः पपात ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = द्रौणिं कृपाद्यान् ससुयोधनांश्च चकार भीमो विरथान् क्षणेन ।;निवार्यमाणांस्तु वृकोदरेण घटोत्कचस्तान् प्रववर्ष सायकैः ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = तेनाम्बरस्थेन तरुप्रमाणैरभ्यर्दिताः कुरवः सायकौघैः ।;भूमौ च भीमेन शरौघपीडिताः पेतुर्नेदुः प्राद्रवंश्चातिभीताः ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = सर्वांश्च ताञ्छिबिरं प्रापयित्वा विना भीष्मं कौरवान् भीमसेनः ।;घटोत्कचश्चानदतां महास्वनौ नादेन लोकानभिपूरयन्तौ ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनोऽथ स्वजनैः समेतः पुनः प्रायाद् रणभूमिं स भीष्मम् ।;जयोपायं भैमसेनेरपृच्छत् स्वस्यैव स प्राह न तं व्रजेति ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = प्राग्ज्योतिषं चैव घटोत्कचाय सम्प्रेषयामास सुरापगासुतः ।;स प्राप्य हैडिम्बमयोधयद् बली स चार्दयामास सकुञ्जरं तम् ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = तेनाहतः (तेनार्दितः) प्राहिणोच्छूलमस्मै वियत्यवप्लुत्य तदा घटोत्कचः ।;प्रगृह्य शूलं प्रबभञ्ज जानुमारोप्य देवा जहृषुस्तदीक्ष्य ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = तदा स तस्यैव पदानुगान् नृपो जघान तं मारुतिरभ्ययाद् रणे ।;स प्राहिणोद् भीमसेनाय वीरो गजं तमस्तम्भयदाशु सायकैः ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = संस्तम्भिते बाणवरैस्तु नागे भीमस्याश्वान् सायकैरर्दयत्(आर्दयत्) सः ।;सोऽभ्यर्दिताश्वोऽथ गदां प्रगृह्य हन्तुं नृपं तं सगजं समासदत् ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = स हन्तुकामेन रुषाऽभिपन्नो भीमेन राजा पुरतः पृष्ठतश्च ।;कृष्णेनास्त्रं वैष्णवं तद् गृहीतुं(ग्रहीतुं) सहार्जुनेनापययौ स भीतः ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् गते भीमसेनार्जुनाभ्यां विद्राविते राजसङ्घे समस्ते ।;भीष्मः सेनामपहृत्यापयातो दुर्योधनस्तं निशि चोपजग्मिवान् ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = संश्रावितः क्रूरवचः स तेन चक्रे सत्यं मृत्युभयं विहाय ।;शक्त्या हनिष्यामि परानिति स्म चक्रे च तत् कर्म तथा परेद्युः ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = तं शक्तितो जुगुपुर्धार्तराष्ट्रास्तेनार्दिताश्चेदिपाञ्चालमुख्याः ।;पराद्रवन् भीष्मबाणोरुभीताः सिंहार्दिताः क्षुद्रमृगा इवाऽर्ताः ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = संस्थाप्य तान् भीष्ममभिप्रयान्तमलम्बुसोऽवारयत् पार्थसूनुम् ।;विजित्य तं केशवभागिनेयो ययौ भीष्मं धार्तराष्ट्रोऽमुमार ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = तद् युद्धमासीन्नृपपार्थपुत्रयोर्विचित्रमत्यद्भुतमुग्ररूपम् ।;समं चिरं तत्र धनुश्चकर्त ध्वजं च राजा सहसाऽभिमन्योः ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = अथैनमुग्रैश्च शरैर्ववर्ष सूतं च तस्याऽशु जघान वीरः ।;तदाऽऽसदद् भीमसेनो नृपं तं जघान चाश्वान् धृतराष्ट्रजस्य ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणो द्रौणिर्भगदत्तः कृपश्च सचित्रसेना अभ्ययुर्भीमसेनम् ।;सर्वांश्च तान् विमुखीकृत्य भीमः स चित्रसेनाय गदां समाददे ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = तामुद्यतां वीक्ष्य(तामुद्यतामीक्ष्य) पराद्रवंस्ते स चित्रसेनश्च रथादवप्लुतः ।;सञ्चूर्णितो गदया तद्रथश्च तज्जीवनेनोद्धृषिताश्च कौरवाः ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणो विराटस्य पुरो निहत्य शङ्खं सुतं तस्य विजित्य तं च ।;विद्राव्य सेनामपि पाण्डवानां ययौ नदीजेन सहैव हृष्टः ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = भीमार्जुनावपि शत्रून् निहत्य विद्राप्य सर्वांश्च युधि प्रवीरान् ।;युधिष्ठिरेणापहृते(युधिष्ठिरेणापि हृते) स्वसैन्ये भीतेन भीष्माच्छिबिरं प्रजग्मतुः ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरो भीष्मपराक्रमेण भीतो भीष्मं स्ववधोपायमेव ।;प्रष्टुं ययौ निशि कृष्णोऽनुजाश्च तस्यान्वयुस्तं स पितामहो यत् ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = भीमार्जुनौ शक्नुवन्तावपि स्म नर्तेऽनुज्ञां हन्तुमिमं समैच्छताम् ।;पूज्यो यतो भीष्म उदारकर्मा कृष्णोऽप्ययात्(कृष्णोऽप्यायात्) तेन हि पाण्डवार्थे ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = प्राप्यानुज्ञां भीष्मतस्ते वधाय शिखण्डिनं तद्वचसाऽग्रयायिनम् ।;कृत्वा परेद्युर्युधये विनिर्गता भीष्मं पुरस्कृत्य तथा परेऽपि(तथाऽपरेऽपि) ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = शिखण्डिनो रक्षकः फल्गुनोऽभूद् भीष्मस्य दुःशासन आस चाग्रे ।;अन्ये च सर्वे जुगुपुर्भीष्ममेव न्यवारयन् भीमसेनादयस्तान् ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = भीष्माय यान्तं युयुधानमाजौ न्यवारयद् राक्षसोऽलम्बुसोऽथ ।;तं वज्रकल्पैरतुदद् वृष्णिवीरः शरैः स मायामसृजत् तदोग्राम् ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रेण मायामपनुद्य वीरो व्यद्रावयद् राक्षसं सात्यकिस्तम् ।;तस्मिन् गते युयुधानो रथेन ययौ भीष्मं पार्थमन्वेव धन्वी ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणो द्रौणिर्धार्तराष्ट्रश्च राजा भूरिश्रवा भगदत्तः कृपश्च ।;शल्यो बाह्लीकः कृतवर्मा सुशर्मा सर्वाश्च सेना वारिता वायुजेन ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = स तान् मुहुर्विरथीकृत्य वीरः प्राग्ज्योतिषं सगजं द्रावयित्वा ।;न्यवारयत् फल्गुनं योद्धुकामं पार्थश्च देवव्रतमाससाद ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरं भीष्ममभिप्रयान्तं माद्रीसुताभ्यां सहितं नृवीरम् ।;न्यवारयच्छकुनिः सादिनां च युतोऽयुतेनैव वराश्वगेन ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = तान् सादिनोऽश्वांश्च निहत्य सर्वान् विजित्य तं शकुनिं पाण्डवास्ते ।;प्रापुर्भीष्मं द्रौपदेयाश्च सर्वे तथा विराटद्रुपदौ कुन्तिभोजः ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नं भीष्ममभिप्रयान्तं न्यवारयत् सैन्धवस्तं स बाणैः ।;हत्वाश्वसूतं (हताश्वसूतं) सगणं द्रावयित्वा समासदद् भीष्ममेवाऽशु वीरः ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = गुप्तोऽथ पार्थेन रणे शिखण्डी भीष्मं समासाद्य शरैरताडयत् ।;भीष्मः स्त्रीत्वं तस्य जानन् न तस्मै मुमोच बाणान् स तु तं तुतोद ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = शिखण्डिनं वारयामास बाणैर्दुर्मर्षणोऽमर्षणविह्वलेक्षणः ।;नात्येतुमेनमशकच्छिखण्डी दुःशासनः पार्थमवारयत् तदा ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = स लोकवीरोऽपि दुरात्मनाऽमुना रुद्धोऽशकन्नैनमतीत्य यातुम् ।;भीष्मं पार्थः सायकाश्चास्य तस्मिन् ससज्जिरे पर्वतेष्वप्यसक्ताः(पर्वतेष्वप्यमुक्ताः) ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = अमर्षयुक्तौ चिरमेव वीरावयुद्ध्यतामर्जुनधार्तराष्ट्रौ ।;समं तदासीन्महदद्भुतं च दिवौकसां पश्यतां भूभृतां च ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = तदा विराटद्रुपदौ कुन्तिभोजं कृष्णासुतान् केकयांश्चेकितानम् ।;भूरिश्रवाः (भूरिः शलः) सोमदत्तो विकर्णः सकैकया (सकेकया) वारयामासुरुच्चैः ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = जित्वैव तांस्तेऽभिययुश्च भीष्मं (तदा)ततोऽर्जुनोऽतीत्य दुःशासनं च ।;भीष्मं शरैरार्च्छदरिप्रमाथिभिः शिखण्डिनं धार्तराष्ट्राद् विमुच्य ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = स तैः समस्तैर्बहुभिश्शस्त्रपूगैर्भृशं मर्मस्वर्दितश्चापमुक्तैः ।;शरैः समस्तान् विरथांश्चकार शैनैयपाञ्चालयुधिष्ठिराद्यान् ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = स चेदिपाञ्चालकरूशमुख्यान् रथोदारान् पञ्चविंशत्सहस्रान् ।;सम्प्रेषयामास यमाय बाणैर्युगान्तकालेऽग्निरिव प्रवृद्धः ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = निरीक्ष्य तं सूर्यमिवाऽतपन्तं सञ्चोदितो वासुदेवेन पार्थः ।;चिच्छेद तत्कार्मुकं लोकवीरो रणेऽर्द्धचन्द्रेण स चान्यदाददे ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = चिच्छेद तच्चैवमष्टौ धनूंषि शक्तिं च चर्मासिवरं पराणि ।;धनूंषि दत्तानि नृभिर्नृपस्य सर्वाणि चिच्छेद स पाकशासनिः ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = ततः शरैः सूर्यकरप्रकाशैर्विव्याध सर्वे च युधिष्ठिराद्याः ।;तैरर्दितो न्यपतद् भूतले स प्राणान् दधारापि तथोत्तरायणात् ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = निपापितेऽस्मिन् मारुतिर्द्रोणमुख्यान् विद्राप्य तत्राऽगमदाशु तेऽपि ।;तदायुधानि प्रणिधाय वीराः पार्थाः परे चैनमुपासदन् स्म ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = प्रणम्य तं तद्वचनात् समीयुस्तस्मिन् दिने शिबिराण्येव सर्वे ।;परे दिने सर्व एवोपतस्थुर्भीष्मं यदूनाम्पतिना सहैव ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = स पूर्वदिवसे पार्थदत्तबाणोपबर्हणः ।;तदाऽपि तृट्परीतात्मा योग्यं(योग्य) पेयमयाचत ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = धार्तराष्ट्रैरविज्ञातं तदभिज्ञाय(तदाभिज्ञाय) वासविः ।;वारुणास्त्रेण भित्त्वा स भूमिं वारि सुगन्धि च ।;ऊर्ध्वधारमदादास्ये(ऊर्ध्वधारामदादास्ये) तर्पितोऽनेन सोऽवदत् ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = यादृश्यस्त्रज्ञता पार्थे दृष्टाऽत्र कुरुनन्दनाः ।;यादृग् बाह्वोर्बलं भीमे संयुगेषु पुनः पुनः ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = यादृशं चैव माहात्म्यमनन्तमजरं हरेः ।;विज्ञातं सर्वलोकस्य सभायां दृष्टमेव च ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = उपारमत तद् युद्धं सुखिनः सन्तु भूमिपाः ।;यथोचितं विभक्तां च भुङ्ग्ध्वं भूपाः सदा भुवम् ।;इत्युक्तः प्रययौ तूष्णीं धार्तराष्ट्रः स्वकं गृहम् ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = व्यासदत्तोरुविज्ञानात् सञ्जयादखिलं पिता ।;श्रुत्वा तदा पर्यतप्यत् पाण्डवाः कृष्णदेवताः ।;मुमुदुः शिबिरं प्राप्य सर्वे कृष्णानुमोदिताः ॥ १३६॥ | |||
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== षड्विंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = औं ॥ अथाखिलानां पृथिवीपतीनामाचार्यमग्र्यं रथिनां सुविद्यम् ।;रामस्य विश्वाधिपतेः सुशिष्यं चक्रे चमूपं धृतराष्ट्रपुत्रः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = कर्णोऽपि भीष्मानुमतो धनुष्मान् युद्धोद्यतोऽभूत् तदसत्कृतः पुरा ।;तस्मिन् स्थितेऽनात्तधनुस्तदैव(अनात्तधनुस्तथैव) रथं समास्थाय गुरुं समन्वयात् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणो वृतो धार्तराष्ट्रेण धर्मसुतग्रहे तेन कृते प्रतिश्रवे ।;ज्ञात्वा यत्ताः पाण्डवास्तं समीयुर्युद्धाय तत्राभवदुग्रयुद्धम् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = पतत्रिभिस्तत्र दुधाव शात्रवान् द्रोणो धनुर्मण्डलमन्त्रनिस्सृतैः ।;तमाससादाऽशु वृकोदरो नदंस्तमासदन्(नदन् समासदन्) द्रौणिकृपौ च मद्रराट् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = स तान् विधूयाभ्यपतद् रणेऽग्रणीर्द्रोणं तमन्वार्जुनिरभ्ययात् परान् ।;ववार तं मद्रपतिस्तयोरभूद् रणो महांस्तत्र गदां समाददे ।;शल्योऽथ भीमोऽभिययौ गदाधरस्तमेतयोरत्र(गदाधरः समेतयोः) बभूव सङ्गरः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = उभावजेयौ गदिनामनुत्तमावतुल्यवीर्यौ प्रवरौ बलीयसाम् ।;विचेरतुश्चित्रतमं प्रपश्यतां मनोहरं तावभिनर्दमानौ ।;गदाप्रपाताङ्कितवज्रगात्रौ ददर्श लोकोऽखिल एव तौ रणे ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = गदाभिघातेन वृकोदरस्य विचेतनः प्रापतदत्र मद्रराट् ।;भीमोऽपि कोपात् प्रचलत्पदः क्षितौ निधाय जानुं सहसोत्थितः क्षणात् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = विचेतनं पतितं मद्रराजं विलोक्य भीमं च तमाह्वयन्तम् ।;रथं समारोप्य जनस्य पश्यतः पुरश्च भीमस्य कृपोऽपजग्मिवान् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = विजित्य मद्राधिपमोजसाऽरिहा नदन् रथं प्राप्य निजं स मारुतिः ।;व्यद्रावयद् बाणगणैः परेषामनीकिनीं द्रोणसमक्षमेव ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = विद्रावयत्याशु कुरून् वृकोदरे विधूय सौभद्रमुखान् ससात्यकीन् ।;द्रोणोऽभिपेदे नृपतिं गृहीतुं तमाससादाऽशु धनञ्जयो रथी ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = स वासुदेवप्रयते रथे स्थितः शरैः शरीरान्तकरैः समन्ततः ।;निहत्य नागाश्वरथान् प्रवर्तयन्नदृश्यताऽश्वेव च शोणितापगाः ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = निहन्यमानासु किरीटिना चमूष्वारक्षिते धर्मसुते तथाऽपदः ।;चमूं च भीमार्जुनबाणभग्नां द्रोणोऽपहृत्यापययौ निशागमे ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = स धार्तराष्ट्रेण युधिष्ठिराग्रहात् संश्रावितः क्रूरवचो निशायाम् ।;जगाद दूरं समराद् विनीयतां पार्थस्ततो धर्मसुतं ग्रहीष्ये ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = ततः सुशर्मा सहितो महारथैः संशप्तकैर्दूरतरं प्रणेतुम् ।;युद्धाय भीमानुजमाशु क्लृप्तो दुर्योधनेनोमिति सोऽप्यवादीत् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = समाह्वयामासुरथार्जुनं ते प्रातर्हुताशस्य दिशं रणाय ।;अयोधयत् तान् स च तत्र गत्वा भीमो गजानीकमथात्र चावधीत् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = निहन्यमानेषु गजेषु (सङ्घशो)सर्वशो विद्राप्यमाणेष्वखिलेषु राजसु ।;प्राग्ज्योतिषो धार्तराष्ट्रार्थितस्तं समासदत् सुप्रतीकेन धन्वी ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = विभीषिताः सुप्रतीकेन भीमहया न तस्थुस्तदनु स्म सात्यकिः ।;सौभद्रमुख्याश्च गजं तमभ्ययुश्चिक्षेप तेषां स रथानथाम्बरे ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = शैनेयपूर्वेषु रथोज्झितेषु भूमाववप्लुत्य कथञ्चिदेव ।;स्थितेषु भीमे च विभीषिताश्वान् संयम्य युद्ध्यत्यपि कृष्ण ऐक्षत् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = सङ्क्लेशितो वैष्णवास्त्रं (विमुञ्चेत्) प्रमुञ्चेत् प्राग्ज्योतिषो भीमसेने ततोऽहम् ।;याम्यार्जुनेनैव तदस्त्रमात्मनः स्वीकर्तुमन्येन वरादधार्यम् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = इति स्म सञ्चिन्त्य सहार्जुनेन तत्राऽययावथ पार्थं त्रिगर्ताः ।;न्यवारयंस्त्वाष्ट्रमस्त्रं स तेषु व्यवासृजन्मोहनायाऽशु वीरः ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = तदस्त्रवीर्येण विमोहितास्ते परस्परं कृष्णपार्थाविति स्म ।;जघ्नुस्तदा वासविस्तान् विसृज्य प्राग्ज्योतिषं हन्तुमिहाभ्यगाद् द्रुतम् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = विसृज्यं भीमं स च पार्थमेव ययौ गजस्कन्धगतो गजं तम् ।;सञ्चोदयामास (सम्बोधयामास, प्रचोदयामास) रथाय तस्य चक्रेऽपसव्यं हरिरेनमाशु ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = मनोजवेनैव रथे परेण(वरेण) सम्भ्राम्यमाणे नतु तं गजः सः ।;प्राप्तुं शशाकाथ शरैः सुतीक्ष्णैरभ्यर्दयामास नृपं स वासविः ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रैश्च शस्त्रैः सुचिरं नृवीरावयुद्ध्यतां तौ बलिनां प्रबर्हौ ।;अथो चकर्तास्य धनुः स पार्थः स वैष्णवास्त्रं च तदाऽङ्कुशेऽकरोत् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन्नस्त्रे तेन तदा प्रमुक्ते(प्रयुक्ते, प्रदत्ते) दधार तद् वासुदेवोऽमितौजाः ।;तदंसदेशस्य तु वैजयन्ती बभूव मालाऽखिललोकभर्तुः ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव तद् धारितमच्युतेन पार्थः किमर्थं विधृतं त्वयेति ।;ऊचे तमाहाऽशु जगन्निवासो मयाऽखिलं धार्यते सर्वदैव ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = न मादृशोऽन्योऽस्ति कुतः परो मत् सोऽहं चतुर्धा जगतो हिताय ।;स्थितोऽस्मि मोक्षप्रलयस्थितीनां सृष्टेश्च कर्ता क्रमशः स्वमूर्तिभिः ।;स वासुदेवादिचतुःस्वरूपः स्थितोऽनिरुद्धो हृदि चाखिलस्य ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = स एव च क्रोडतनुः पुराऽहं भूमिप्रियार्थं नरकाय चादाम् ।;अस्त्रं मदीयं वरमस्य चादामवध्यतां यावदस्त्रं ससूनोः(स्वसूनोः, अस्त्रं च सूनोः) ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रस्य चान्यो नतु कश्चिदस्ति योऽवध्य एतस्य कुतश्च मत्तः ।;इति स्म तेनैव मया धृतं तदस्त्रं तदेनं जहि चास्त्रहीनम् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तमाकर्ण्य स केशवेन सम्मन्त्र्य बाणं हृदये मुमोच ।;प्राग्ज्योतिषस्यापरमुत्तमं शरं गजेन्द्रकुम्भस्थल आश्वमज्जयत् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = उभौ च तौ पेततुरद्रिसन्निभौ महेन्द्रवज्राभिहताविवाऽशु ।;निहत्य तौ वासविरुग्रपौरुषो मुमोद साधु स्वजनाभिपूजितः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = अथाचलं वृषकं चैव हत्वा कनीयसौ शकुनेस्तं च बाणैः ।;विव्याध मायामसृजत् स तां च विज्ञानास्त्रेणाऽशु नाशाय चक्रे ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = स नष्टमायः प्राद्रवत् पापकर्मा ततः पार्थः शरपूगैश्चमूं ताम् ।;विद्रावयामास तदा गुरोः सुतो माहिष्मतीपतिमाजौ जघान ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = तदा भीमस्तस्य निहत्य वाहान् व्यद्रावयद् धार्तराष्ट्रीं चमूं च ।;भीमार्जुनाभ्यां हन्यमानां चमूं तां दृष्ट्वा द्रोणः क्षिप्रमपाजहार ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = प्राग्ज्योतिषे निहतेऽथाग्रहाच्च युधिष्ठिरस्यातिविषण्णरूपः ।;दुर्योधनोऽश्रावयद् दीनवाक्यान्यत्र द्रोणं सोऽपि नृपं जगाद ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = पार्थे गते श्वो नृपतिं ग्रहीष्ये निहन्मि वा तत्सदृशं तदीयम् ।;इति प्रतिज्ञां स विधाय भूयः प्रातर्ययौ युद्धमाकाङ्क्षमाणः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = पद्मव्यूहं व्यूह्य परैरभेद्यं वराद् विष्णोस्तस्य मन्त्रं ह्यजप्त्वा(जपित्वा) ।;पार्थाश्च तं प्रापुर्ऋतेऽर्जुनेन संशप्तकैर्युयुधे सोऽपि वीरः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = स एवमुक्तो रथिनां प्रबर्हो विवेश भित्त्वा द्विषतां चमूं ताम् ।;अन्वेव तं वायुसुतादयश्च विविक्षवः सैन्धवेनैव रुद्धाः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = जयद्रथस्थेन वृषध्वजेन प्रयुद्ध्यमानेषु वृकोदरादिषु ।;प्रविश्य वीरः स धनञ्जयात्मजो विलोलयामास परोरुसेनाम् ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = स द्रोणदुर्योधनकर्णशल्यैर्द्रोण्यग्रणीभिः कृतवर्मयुक्तैः ।;रुद्धश्चचारारिबलेष्वभीतः शिरांसि कृन्तंस्तदनुव्रतानाम् ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = स लक्षणं राजसुतं प्रसह्य(प्रगृह्य) पितुः समीपेऽनयदाशु मृत्यवे ।;बृहद्बलं चोत्तमवीर्यकर्मा वरं रथानामयुतं च पत्रिभिः ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणादयस्तं हरिकोपभीताः प्रत्यक्षतो हन्तुमशक्नुवन्तः ।;सम्मन्त्र्य कर्णं पुरतो निधाय चक्रुर्विचापाश्वरथं क्षणेन ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = कर्णो धनुस्तस्य कृपश्च सारथिं द्रोणो हयानाशु विधूय सायकैः ।;सञ्चर्मखड्गं रथचक्रमस्य प्रणुद्य हस्तस्थितमेव तस्थुः(चक्रुः) ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = निशम्य पुत्रस्य वधं भृशार्तः प्रतिश्रवं सोऽथ चकार वीरः ।;जयद्रथस्यैव वधे निशायां स्वप्नेऽनयत् तं गिरिशान्तिकं हरिः ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = स्वयमेवाखिलजगद्रक्षाद्यमितशक्तिमान् ।;अप्यच्युतो गुरुद्वारा प्रसादकृदहं त्विति ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञापयन् फल्गुनस्यास्त्रगुरुं गिरिशमञ्जसा ।;प्रापयित्वैनमेवैतत्प्रसादादस्त्रमुल्बणम् ।;चक्रे तदर्थमेवास्य रक्षां चक्रे तदात्मिकाम् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = सान्त्वयित्वा सुभद्रां च गत्वोपप्लाव्यमच्युतः ।;योजयित्वा रथं प्रातः सोऽर्जुनो युद्धमभ्ययात् ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा प्रतिज्ञां पुरुहूतसूनोर्दुर्योधनेनार्थितः सिन्धुराजम् ।;त्रातास्म्यहं सर्वथेति प्रतिज्ञां कृत्वा द्रोणो व्यूहमभेद्यमातनोत् ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = स दिव्यमग्र्यं शकटाब्जचक्रं कृत्वा स्वयं व्यूहमुखे व्यवस्थितः ।;पृष्ठे कर्णद्रौणिकृपैः सशल्यैर्जयद्रथं गुप्तमधात् परैश्च ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = अथार्जुनो दिव्यरथोपरिस्थितः सुरक्षितः(संरक्षितः) केशवेनाव्ययेन ।;विजित्य दुर्मर्षणमग्रतोऽभ्ययाद्(दुर्मर्षणमग्रतो ययौ) द्रोणं सुधन्वा गुरुमुग्रपौरुषः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = प्रदक्षिणीकृत्य तमाश्वगात् ततः कालात्ययं त्वेव विशङ्कमानः ।;रथं मनोवेगमथानयद्धरिर्यथा शराः पेतुरमुष्य पृष्ठतः ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = विजित्य हार्दिक्यमथाप्रयत्नः स इन्द्रसूनुः प्रविवेश तद् बलम् ।;विलोलयामास च सायकोत्तमैर्यथा गजेन्द्रो नलिनीं बलोद्धतः ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = स उच्चकाशेऽतिरथो रथोत्तमे सवासुदेवो हरिणा यथेन्द्रः ।;चकर्त चोग्रो द्विषतां शिरांसि शरैः शरीरान्तकरैः समन्ततः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = दृढायुमच्युतायुं च हत्वा विन्दानुविन्दकौ ।;शराभ्यां प्रेषयामास(प्रापयामास) यमाय विजयो युधि ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = सुदक्षिणं च काम्बोजं(काम्भोजं) निहत्याम्बष्ठमेव च ।;श्रुतायुधं नदीजातं वरुणादाससाद ह ।;यस्यादाद् वरुणो दिव्याममोघां महतीं गदाम् ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = स तु तेन शरैस्तीक्ष्णैरर्पितो विरथं क्षणात् ।;चकार पार्थस्य रथमारुह्यारिधराय ताम् ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = गदां चिक्षेप सा तस्य वारुणेः शिर एव तु ।;बिभेद(चिच्छेद) शतधा शीर्णमस्तिष्कः(शीर्णमस्तकः) सोऽपतद् भुवि ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = अयुद्ध्यन्तं स्वगदया यदि ताडयसि स्वयम् ।;तया विशीर्णमस्तिष्को मरिष्यसि न संशयः ।;अमोघा चान्यथा सेयं गदा तव भविष्यति ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = इत्यब्रवीत् तं वरुणः पुरा तेन स केशवे ।;अयुद्ध्यति गदाक्षेपात् तया शीर्णशिरा अभूत् ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = हतेषु वीरेषु निजेषु सङ्घशो विद्रावितेष्वालुलिते च सैन्ये ।;दुर्योधनो द्रोणमुपेत्य दीनमुवाच(दीन उवाच) हा पार्थ उपेक्षितस्त्वया ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितेऽभेद्यममुष्य वर्म बद्ध्वा महामन्त्रबलात् स विप्रः ।;जगाद येनैव बलेन पार्थैर्विरुद्ध्यसे तेन हि याहि फल्गुनम् ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितो धार्तराष्ट्रः स चापमादाय सौवर्णरथोपरिस्थः ।;जगाम पार्थं तमवारयच्च शरैरनेकैरनलप्रकाशैः ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = विव्याध पार्थोऽपि तमुग्रवेगैः शरैर्न ते तस्य च वर्मभेदम् (वर्मभेदनम्)।;चक्रुस्ततो वासविर्दिव्यमस्त्रं तद्वर्मभेदाय समाददे रुषा ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = सन्धीयमानं तु गुरोः सुतस्तच्चिच्छेद पार्थोऽथ सुयोधनाश्वान् ।;हत्वा तलेऽविद्ध्यदथैनमुग्रैर्द्रौणिः शरैः पार्थमवारयद् युधि ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = स द्रौणिकर्णप्रमुखैर्धनञ्जयो युयोध ते चैनमवारयञ्छरैः ।;बभूव युद्धं तदतुल्यमद्भुतं जयद्रथार्थेऽद्भुतवीर्यकर्मणाम् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = पार्थे प्रविष्टे कुरुसैन्यमध्यं द्रोणोऽविशत् पाण्डवसैन्यमाशु ।;स तद्रथानीकमुदारवेगैः शरैर्विधूय न्यहनच्च वीरान् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = स वीरवर्यः स्थविरोऽपि यूनां युवेव मध्ये प्रचचार धन्विनाम् ।;प्रपातयन् वीरशिरांसि बाणैर्युधिष्ठिरं चाऽसददुग्रवीर्यः ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = नृपग्रहेच्छुं तमवेत्य सत्यजिन्न्यवारयद् द्रौपदिराशु वीर्यवान् ।;निवारितस्तेन शिरः शरेण चकर्त पाञ्चालसुतस्य विप्रः ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = निहत्य तं वीरतमं रणोत्कटं युधिष्ठिरं बाणगणैः समर्दयत् ।;स शक्तिस्तेन विधाय सङ्गरं निरायुधो व्यश्वरथः कृतः क्षणात् ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = स ऊर्ध्वबाहुर्भुवि संस्थितोऽपि गृहीतुमाजौ गुरुणाऽभिपन्नः ।;माद्रीसुतस्यावरजस्य यानमारुह्य वेगादपजग्मिवांस्ततः ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणं ततः शैशुपालिः सपुत्रो जारासन्धिः काशिराजः सशैव्यः ।;समासदन् कैकयाश्चैव पञ्च समार्दयन् बाणगणैश्च सर्वशः ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = स तान् क्रमेणैव निकृत्तकन्धराञ्छरोत्तमैस्तत्र विधाय विप्रः ।;निनाय लोकं परमर्कमण्डलं व्रजन्ति निर्भिद्य यमूर्ध्वरेतसः ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = विधूयमाने गुरुणोरुसैन्ये पृथासुतानां पृतनाः परेषाम् ।;प्रायो रणे मारुतसूनुनैव हतप्रवीरा मृदिताः पराद्रवन् ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = अलम्बुसो नाम तदैव राक्षसः समासदन्मारुतिमुग्रपौरुषम् ।;स पीडितस्तेन शरैः सुतेजनैः(सुतैजसैः) क्षणाददृश्यत्वमवाप मायया ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = सोऽदृश्यरूपोऽनुचरानपीडयद् भीमस्य तद् वीक्ष्य चुकोप मारुतिः ।;अस्त्रज्ञतामात्मनिकेशवाज्ञया सन्दर्शयन्नागतधर्मसङ्कटः ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = त्वाष्ट्रास्त्रमादत्त स काम्यकर्महीनोऽपि भीमस्तत उत्थिताः शराः ।;ते बाणवर्यास्तददृश्यवेधिनो रक्षो विदार्याऽविविशुर्धरातलम् ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = तद्धन्यमानं प्रविहाय भीममपाद्रवद् दूरतरं सुभीतम् ।;ततस्तु भीमो द्विषतां वरूथिनीं विद्रावयामास शरैः सुमुक्तैः ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = तदैव कृष्णातनयाः समेता जघ्नुः शलं संयति सौमदत्तिम् ।;अलम्बुसं प्राप तदा घटोत्कचः परस्परं तौ रथिनावयुद्ध्यताम् ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = घटोत्कचस्तं विरथं विधाय खस्थं ख एवाभियुयोध संस्थितः ।;ततस्तु तं भीमसुतो निगृह्य निपात्य भूमौ प्रददौ प्रहारम् ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = पदा शिरस्येव स पिष्टमस्तको ममार मध्ये पृथिवीपतीनाम् ।;तस्मिन् हते भैमसेनिः कुरूणां व्यद्रावयद् रथवृन्दं समन्तात् ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = तदाऽऽसदत् कृतवर्मा रथेन सेनां पाण्डूनां शरवर्षं प्रमुञ्चन् ।;ददौ वरं तस्य हि पूर्वमच्युतः प्रीतः स्तुत्या सर्वजयं मुहूर्ते ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = स तेन पाञ्चालगणान् विजिग्ये यमौ च भीमस्य पुरोऽथ तं च ।;विव्याध बाणेन स वासुदेववरं विजानन् न तदा समभ्ययात् ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = विनैव वृष्णीन् विजये वरो यदमुष्य तेनास्य हयान् स सात्यकिः ।;निहत्य बाणैरतुदत् स यानमन्यत् समास्थाय ततोऽपजग्मिवान् ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = स पाञ्चजन्योऽच्युतवक्त्रवायुना भृशं सुपूर्णोदरनिस्सृतध्वनिः ।;जगद् विरिञ्चेशसुरेन्द्रपूर्वकं प्रकम्पयामास युगात्यये यथा ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = गाण्डीवघोषे च तदाऽभिभूते युधिष्ठिरो भीतभीतस्तदैत्य ।;शैनेयमूचे परसैन्यमग्ने पार्थे स्वयं युद्ध्यति केशवः स्म ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = न श्रूयते गाण्डीवस्याद्य घोषः संश्रूयते पाञ्चजन्यस्य घोषः ।;तद् याहि जानीहि तमद्य पार्थं यदि स्म जीवत्यसहाय एषः ॥ ९३॥(हृषीकेशतीर्थीये तु `गाण्डीवस्य' इति पठ्यते ।;छन्दःस्वारस्यात् % `गाण्डिवस्य' इत्येव पाठः स्यादिति सम्भाव्यते -- इति ब. गोविन्दाचार्यः) | |||
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| verse_lines = इतीरितः सात्यकिरत्र विप्रान् सम्पूज्य वित्तैः परमाशिषश्च ।;जयाय तेभ्यः प्रतिगृह्य सेनामुखं ययौ भीमसेनानुयातः ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = भीमस्तु सेनामुखमाशु भित्त्वा प्रावेशयद् युयुधानं चमूं ताम् ।;स युद्ध्यमानो गुरुणाऽभ्युपेक्षितः सूतं निहत्य द्रावयामास चाश्वान् ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = बलं विवृद्धं च तदाऽस्य सात्यकेर्विप्राशीर्भिः कृष्णवरादपि स्म ।;बलस्य वृद्धिर्हि पुराऽस्य दत्ता कृष्णेन तुष्टेन दिने हि तस्मिन् ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = तदा (ततो) विवृद्धोरुबलात् स सात्यकिः संस्थाप्य भीमं प्रययौ रथेन ।;तं बाणवर्षैः पृतनां समन्तान्निघ्नन्तमाजौ हृदिकात्मजोऽभ्ययात् ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = तयोरभूद् युद्धमतीव दारुणं तत्राकरोत् तं विरथं स सात्यकिः ।;विजित्य तं सात्यकिरुग्रधन्वा ययावतीत्यैव शिरांसि यूनाम् ।;कृन्तन् शरैस्तं जलसन्ध आगमद् रणे गजस्कन्धगतोऽभियोद्धुम् ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = निवारयन्तं तमसह्यविक्रमं निहत्य बाणैः समरे स सात्यकिः ।;विलोडयामास(विलोलयामास) बलं कुरूणां निघ्नन् गजस्यन्दनवाजिपत्तिनः ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = स पार्वतेयांश्च(स पार्वतीयांश्च) शिलाभिवर्षिणो निहत्य विद्राव्य च सर्वसैनिकान् ।;समासदत् केशवफल्गुनौ च बली तमाराऽशु च यूपकेतुः ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = तयोरभूद् युद्धमतीव घोरं चिरं विचित्रं च महद् विभीषणम् ।;परस्परं तौ तुरगान् निहत्य निपात्य सूतौ धनुषी निकृत्य ।;समीयतुश्चर्मवरासिधारिणौ (समीयतुश्चर्ममहासिधारिणौ) विचित्रमार्गानपि दर्शयन्तौ ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = स सौमदत्तिर्भुवि सात्यकिं रणे निपात्य केशेषु च सम्प्रगृह्य ।;पदाऽस्य वक्षस्यधिरुह्य खड्गमुदग्रहीदाशु शिरोऽपहर्तुम् ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = तद् वासुदेवस्तु निरीक्ष्य विश्वतश्चक्षुर्जगादाऽशु धनञ्जयं रणे ।;त्रायस्व शैनेयमिति स्म सोऽपि भल्लेन चिच्छेद भुजं परस्य ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = स तेन चोत्कृत्तसखड्गबाहुर्विनिन्द्य पार्थं निषसाद भूमौ ।;प्रायोपविष्टः शरसंस्तरे हरिं ध्यायन् विनिन्दन्नसुरप्रवेशात् ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = गतेऽसुरावेश उतातिभक्त्या ध्यायत्यमुष्मिन् गरुडध्वजं तम् ।;शैनेय उत्थाय निवार्यमाणः कृष्णार्जुनाद्यैरहरच्छिरोऽस्य ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = तदा स्वकीयं रथमेतदर्थं क्लृप्तं ददौ सात्यकये ससूतम् ।;कृष्णोऽथ पार्थस्य हयास्तृषाऽर्दितास्तदाऽसृजद् वारुणास्त्रं स पार्थः ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = तेनैव तीर्थं परमं चकार तथाऽश्वशालामपि बाणरूपाम् ।;ततो विमुच्यात्र हयानपाययद्धरिस्तदा वासविरर्दयत् परान् ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = युयोज कृष्णस्तुरगान् रथे पुनर्गतश्रमानुद्धृतसायकान् प्रभुः ।;प्रचोदिते तेन रथे स्थितः पुनस्तथैव बीभत्सुररीनयोधयत् ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = शिनिप्रवीरे तु गते युधिष्ठिरः पुनश्च चिन्ताकुलितो बभूव ह ।;जगाद भीमं च न गाण्डिवध्वनिः संश्रूयते पाञ्चजन्यस्य रावः ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = मया नियुक्तश्च गतः स सात्यकिर्भारं च तस्याधिकमेव मन्ये ।;तत् पाहि पार्थं युयुधानमेव च त्वं भीम गत्वा यदि जीवतस्तौ ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः प्राह वृकोदरस्तं न रक्षितं वासुदेवेन पार्थम् ।;ब्रह्मेशानावपि जेतुं समर्थौ किं द्रौणिकर्णादिधनुर्भृतोऽत्र ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = अतो भयं नास्ति धनञ्जयस्य न सात्यकेश्चैव हरेः प्रसादात् ।;रक्ष्यस्त्वमेवात्र मतो मयाद्य (ममाद्य) द्रोणो ह्ययं यतते त्वां ग्रहीतुम् ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः प्राह युधिष्ठिरस्तं न जीवमाने युधि मां घटोत्कचे ।;धृष्टद्युम्ने चास्त्रविदां वरिष्ठे द्रोणो वशं नेतुमिह प्रभुः क्वचित् ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = यदि प्रियं कर्तुमिहेच्छसि त्वं मम प्रयाह्याशु च पार्थसात्यकी ।;रक्षस्व सञ्ज्ञामपि सिंहनादात् कुरुष्व मे पार्थशैनेयदृष्टौ ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = तथा हते चैव जयद्रथे मे कुरुष्व सञ्ज्ञामिति तेन भीमः ।;उक्तस्तु हैडिम्बममुष्य रक्षणे व्यधाच्च सेनापतिमेव सम्यक् ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = स चाऽह सेनापतिरत्र भीमं प्रयाहि तौ यत्र च केशवार्जुनौ ।;न जीवमाने मयि धर्षितुं क्षमो द्रोणो नृपं मृत्युरहं च तस्य ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = इति ब्रुवाणं (ब्रुवाणे) प्रणिधाय भीमः पुनः पुनस्तं नृपतिं गदाधरः ।;ययौ परानीकमधिज्यधन्वा निरन्तरं प्रवमन्(प्रपतन्) बाणपूगान् ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = न्यवारयत् तं शरवर्षधारो द्रोणो वचश्चेदमुवाच भीमम् ।;शिष्यस्नेहाद् वासविः सात्यकिश्च मया प्रमुक्तो भृशमानतौ मयि ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = स्वीया प्रतिज्ञाऽपि हि सैन्धवस्य गुप्तौ मया पार्थकृते विसृष्टा ।;दास्ये न ते मार्गमहं कथञ्चित् पश्यास्त्रवीर्यं मम दिव्यमद्भुतम् ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवाक्यः स गदां समाददे चिक्षेप तां द्रोणरथाय भीमः ।;उवाच चाहं पितृवन्मानये त्वां सदा मृदुस्त्वां प्रति नान्यथा क्वचित् ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = अमार्दवे पश्य च यादृशं बलं ममेति तस्याऽशु विचूर्णितो रथः ।;गदाभिघातेन वृकोदरस्य ससूतवाजिध्वजयन्त्रकूबरः ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणो गदामापततीं निरीक्ष्य त्ववप्लुतो लाघवतो धरातले ।;तदैव दुर्योधनयापितं रथं परं समास्थाय शरान् ववर्ष ह ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = शरैस्तदीयैः परमास्त्रमन्त्रितैः प्रवृष्यमाणो जगदीरणात्मजः ।;शिरो निधायाऽशु पुरो वृषो यथा तमभ्ययादेव रथादवप्लुतः ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = मनोजवादेव तमाप्य भीमो रथं गृहीत्वाऽम्बर आक्षिपत् क्षणात् ।;शक्तोऽप्यहं त्वां न निहन्मि गौरवादित्येव सुज्ञापयितुं(विज्ञापयितुं) तदस्य ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = सवाजिसूतः स रथः क्षितौ (पतद्विचूर्णितः)पतन् विचूर्णितोऽस्माद् गुरुरप्यवप्लुतः ।;तदा विशोकोऽस्य रथं समानयत् तमारुहद् भीम उदारविक्रमः ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = द्रोणोऽपि दुर्योधनदत्तमन्यद् रथं समास्थाय युधिष्ठिरं ययौ ।;गृहीतुकामं नृपतिं प्रयान्तं न्यवारयत् संयति वाहिनीपतिः ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = विदारितां द्रोणशरैः स्वसेनां संस्थाप्य(संस्थाप्य भीमो) भूयो द्रुपदात्मजः शरैः ।;द्रोणं निवार्यैव चमूं परेषां विद्रावयामास च तस्य पश्यतः ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = ततः प्रायाद् भीमसेनोऽमितौजा मृत्नञ्छरैः कौरवराजसेनाम् ।;विन्दानुविन्दप्रमुखा धार्तराष्ट्रास्तमासेदुर्द्वादश वीरमुख्याः ।;विद्धः शरैस्तैर्बहुभिर्वृकोदरः शिरांसि तेषां युगपच्चकर्त ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = हतेषु तेषु प्रवरेषु धन्विनां सत्यव्रतः पुरमित्रो जयश्च ।;वृन्दारकः पौरवश्चेत्यमात्याः समासेदुर्धार्तराष्ट्रस्य भीमम् ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = स तैः पृषत्कैरवकीर्यमाणः शितान् विपाठान्(सितान् विपाटान्) युगपत् समाददे ।;जहार तैरेव शिरांसि तेषां हतेषु तेष्वेव परे प्रदुद्रुवुः ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = स सिंहवत् क्षुद्रमृगान् समन्ततो विद्राप्य शत्रून् हृदिकात्मजं रणे ।;अभ्यागमत् तेन निवारितः शरैः क्षणेन चक्रे विरथाश्वसूतम् ।;स गाढविद्धस्तु वृकोदरेण रणं विसृज्यापययौ क्षणेन ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = विजित्य हार्दिक्यमथाऽशु भीमो विद्रावयामास वरूथिनीं ताम् ।;सम्प्रेषयन् सर्वनराश्वकुञ्जरान् (सर्वनरांश्च कुञ्जरान्) यमाय यातो हरिपार्थपार्श्वम् ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव कृष्णविजयौ परमप्रहृष्टस्ताभ्यां निरीक्षित उत प्रतिभाषितश्च ।;सञ्ज्ञां नृपस्य स ददावपि सिंहनादान् श्रुत्वा परां मुदमवाप स चाग्र्यबुद्धिः ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = भीमस्य नानदत एव महास्वनेन विण्मूत्रशोणितमथो मृतिमापुरेके ।;भीतेषु सर्वनृपतिष्वमुमाप तूर्णं कर्णो विकर्णमुखरा अपि धार्तराष्ट्राः ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = हत्वा विकर्णमुत तत्र च चित्रसेनं सञ्चूर्णितं प्रविदधे (सञ्चूर्णितं च विदधे) रथमर्कसूनोः ।;घोरैः शरैः पुनरपि स्म समर्द्यमानः कर्णोऽपयानमकरोद् द्रुतमेव भीमात् ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = आश्वास्य चैव सुचिरं पुनरेव भीमं युद्धाय याति धृतराष्ट्रसुतैस्तथाऽन्यैः ।;तांश्चैव तत्र विनिहत्य तथैव कर्णो व्यश्वायुधः कृत उतापययौ क्षणेन ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = विकर्णचित्रसेनाद्या एवं वीरतमाः सुताः ।;कर्णस्य पश्यतो भीमबाणकृत्तशिरोधराः ॥ १३८॥ | |||
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| verse_lines = निपेतुर्धृतराष्ट्रस्य रथेभ्यः पृथिवीतले ।;त्रयोविंशतिरेवात्र कर्णसाहाय्यकारिणः ॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = एकविंशतिवारं च व्यश्वसूतरथध्वजः ।;गाढमभ्यर्द्दितस्तीक्ष्णैः शरैर्भीमेन संयुगे ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = प्राणसंशयमापन्नः सर्वलोकस्य पश्यतः ।;रणं त्यक्त्वा प्रदुद्राव रुदन् दुःखात् पुनः पुनः ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = द्वाविंशतिमयुद्धे तु रामदत्तं सुभास्वरम् ।;अभेद्यं रथमारुह्य विजयं धनुरेव च ॥ १४२॥ | |||
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| verse_lines = तद्दत्तमेव सङ्गृह्य तूणौ (तूणी) चाक्षयसायकौ ।;आससाद रणे भीमं कर्णो वैकर्तनो वृषा(रुषा) ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = सुघोर आसीत् स तयोर्विमर्दो भीमस्य कर्णस्य च दीर्घकालम् ।;आकाशमाच्छादयतोः शरौघैः परस्परं चैव सुरक्तनेत्रयोः ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = ततो भीमो महाबाहुः सहजाभ्यां च संयुतम् ।;त्वां तु कुण्डलवर्मभ्यां शक्नुयां हन्तुमञ्जसा ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = इति ज्ञापयितुं तस्य कुण्डले कवचं तथा ।;शरैरुत्कृत्य समरे पातयामास भूतले ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = एवं तान्यपकृष्याहं हन्यां त्वामिति वेदयन् ।;पुनश्च बहुभिस्तीक्ष्णैः शरैरेनं समर्दयत् ॥ १४७॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु भीमस्य बभूव बुद्धिरस्पर्धिनः सर्वजयो हि दत्तः ।;अमुष्य रामेण न च स्पृधाऽयं कर्णो मया युद्ध्यति कृच्छ्रगो ह्ययम् ॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽपि मे भगवानत्यनुग्रहाज्जयं ददात्यात्मवचो विहाय (वचोऽपहाय) ।;मया तु मान्यं वचनं हरेः सदा तस्माद् दास्ये विवरं त्वद्य शत्रोः ॥ १४९॥ | |||
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| verse_lines = एवं स्मृत्वा तेन रन्ध्रे प्रदत्ते कर्णोऽस्त्रवीर्येण धनुर्न्यकृन्तत् ।;रश्मीन् हयानां च ततो रथं स तत्याज नैजं बलमेव वेदयन् ॥ १५०॥ | |||
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| verse_lines = न मे रथाद्यैर्धनुषाऽपि कार्यमित्येव सञ्ज्ञापयितुं (स ख्यापयितुं) वृकोदरः ।;खमुत्पपातोत्तमवीर्यतेजा रथं च कर्णस्य समास्थितः क्षणात् ॥ १५१॥ | |||
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| verse_lines = भीतस्तु(भीमस्तु) कर्णो रथकूबरे तदा व्यलीयताधः (व्यलीयतातः) स वृकोदरो रथात् ।;अवप्लुतो ज्ञापयितुं स्वशक्तिं निरायुधत्वेऽप्यरिनिग्रहादौ ॥ १५२॥ | |||
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| verse_lines = नैच्छद् गृहीतुं(ग्रहीतुं) विनिहन्तुमेव वा रथं धनुर्वाऽस्य रणेऽपहर्तुम् ।;द्रोणस्य यद्वत् पूर्वमतीव(द्रोणस्य यत्पूर्वमतीव) शक्तोऽप्यमानयद् रामवचोऽस्य भक्त्या ॥ १५३॥ | |||
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| verse_lines = सत्यां कर्तुं वासवेश्च प्रतिज्ञां सम्मानयन् वैष्णवत्वाच्च कर्णम् ।;दातुं रन्ध्रं सूर्यजस्य प्रयातः शरक्षेपार्थं दुरमतिष्ठदत्र ॥ १५४॥ | |||
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| verse_lines = ततः कर्णो दूरगतं वृकोदरं सम्मानयन्तं रामवाक्यं विजानन् ।;शरैरविध्यत् स च तानवारयद् गजैर्मृतैस्तांश्च चकर्त कर्णः ॥ १५५॥ | |||
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| verse_lines = व्यसून् गजान् प्रक्षिपन्तं समेत्य संस्पृश्य चापेन वचश्च दुष्टम् ।;संश्रावयामास सुयोधनस्य प्रीत्यै प्रजानन्नपि तस्य वीर्यम् ॥ १५६॥ | |||
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| verse_lines = संश्रावयन्तं वचनानि रूक्षाण्यपाहनद् बाणवरैस्तदाऽर्जुनः(बाणगणैस्तदा) ।;स वर्महीनः पार्थबाणाभितप्तो व्यपागमद् भीम आपाऽत्मयानम् ॥ १५७॥ | |||
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| verse_lines = कर्णो भीमे वासवीं नैव शक्तिं विमोक्तुमैच्छन्नैव बीभत्सुतोऽन्यान् ।;हन्यामिति प्राह यतः स कुन्त्यै यद्यप्यवध्यः स तयाऽपि भीमः ॥ १५८॥ | |||
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| verse_lines = नारायणास्त्रं शिरसि प्रपातितं न यस्य लोमाप्यदहच्चिरस्थितम्(लोमाप्यदहरच्छिरःस्थितम्) ।;किं तस्य शक्तिः प्रकरोति वासवी तथाऽन्यदप्यस्त्रशस्त्रं महच्च ॥ १५९॥ | |||
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| verse_lines = भीमः कर्णरथं प्राप्तः शक्तिं नाऽदातुमैच्छत ।;अभिप्रायं केशवस्य जानन् हैडिम्बमृत्यवे ।;ततः कर्णोऽन्यमास्थाय रथमर्जुनमभ्ययात् ॥ १६०॥ | |||
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| verse_lines = दिव्यं रथं धनुश्चैव कृष्णबुद्ध्योऽर्जुनो हरेत् ।;इति भीतस्तु तां शक्तिमादायार्जुनमृत्यवे ।;युद्धायायाद् रथं चापं शक्तिं चैकत्र नाकरोत् ॥ १६१॥ | |||
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| verse_lines = एकं हृतं चेदन्यत् स्यादिति मत्वा भयाकुलः ।;बिभेति सर्वदा नीतेः कृष्णस्यामिततेजसः ॥ १६२॥ | |||
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| verse_lines = निश्चितो मरणायैव मृतिकाले तु तं रथम् ।;आरुह्यागाद्धि पूर्वं तु न कालं मन्यते मृतेः ॥ १६३॥ | |||
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| verse_lines = शक्तिं तु तद्रथगतां प्रसमीक्ष्य कृष्णः संस्थाप्य पार्थमपि सात्यकिमेव योद्धुम् ।;दत्त्वा स्वकीयरथमेव विरोचनस्य(विकर्तनस्य) पुत्रेण सोऽदिशदमुष्य बलं प्रदाय ॥ १६४॥ | |||
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| verse_lines = शिष्यं त्वशक्तमिह मे प्रतियोधनाय पार्थो ह्यदादिति स सात्यकिमीक्षमाणः ।;संस्पर्धयैव युयुधे विरथं चकार तेनैव सात्यकिरमुं हरियानसंस्थः ॥ १६५॥ | |||
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| verse_lines = न केशवरथे कश्चित् स्थितो याति पराजयम् ।;अतश्च सात्यकिर्नाप कर्णेनात्र पराजयम् ॥ १६६॥ | |||
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| verse_lines = शस्त्रसङ्ग्रहकाले तु कुमाराणां व्रतं भवेत् ।;इत्युक्तं जामदग्न्येन धनुर्विद्यापुराकृता ॥ १६७॥ | |||
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| verse_lines = तच्छत्रुवधरूपं च पूर्वासिद्धं च गूहितम् ।;अविरुद्धं च धर्मस्य कार्यं रामस्य तुष्टिदम् ॥ १६८॥ | |||
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| verse_lines = अनुपद्रवाय (अनुपद्रवं च) लोकस्येत्यतो भीमो व्रतं त्विदम् ।;चकार तूबरेत्युक्ते हन्यामिति रहः प्रभुः ॥ १६९॥ | |||
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| verse_lines = अनुपद्रवाय लोकस्य सुव्यञ्जच्श्मश्रुमण्डलः(सुव्यक्तश्मश्रुमण्डलः) ।;सुश्मश्रुं मां न कश्चिद्धि तथा ब्रूयादिति स्फुटम् ।;तदर्जुनो विजानाति स्नेहाद् भीमोदितं रहः ॥ १७०॥ | |||
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| verse_lines = अर्जुनस्यापि गाण्डीवं देहीत्युक्तो(देहीत्युक्ते) निहन्म्यहम्(निहन्मितम्) ।;इति तच्च विजानाति भीम एको नचापरः ।;गाण्डीवस्याऽगमं पूर्वं जानात्येव हि नारदात् ॥ १७१॥ | |||
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| verse_lines = जानासि मत्प्रतिज्ञां त्वं त्वत्प्रतिज्ञामहं तथा ।;तत्र हन्तव्यतां प्राप्तो मम वैकर्तनोऽत्रहि ॥ १७४॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिज्ञातो वधश्चास्य त्वयाऽपि मदनुज्ञया ।;अतस्त्वया मयैवाऽयं (मया वाऽयं) हन्तव्यः सूतनन्दनः ॥ १७५॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो वासविः प्राह हन्तव्योऽयं मयैव हि ।;त्वदीयोऽहं यतस्तेन मत्कृतं त्वत्कृतं भवेत् ॥ १७६॥ | |||
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| verse_lines = न त्वत्कृतं मत्कृतं स्याद् गुरुर्मम यतो भवान् ।;अतो मयैव हन्तव्य इत्युक्त्वा कर्णमब्रवीत् ॥ १७७॥ | |||
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| verse_lines = रूक्षा वाचः श्रावितोऽयं भीमः कृष्णस्य शृण्वतः ।;यच्चाभिमन्युर्युष्माभिरेकः सम्भूय पातितः ॥ १७८॥ | |||
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| verse_lines = अतस्त्वां निहनिष्यामि त्वत्पुत्रं च तवाग्रतः ।;इत्युक्तोऽन्यं रथं प्राप्य कर्ण आवीज्जयद्रथम् ॥ १७९॥ | |||
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| verse_lines = द्रौणिकर्णाभिगुप्तं तं नाशकद्धन्तुमर्जुनः ।;तत्र वेगं परं चक्रे द्रौणिः पार्थनिवारणे ॥ १८०॥ | |||
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| verse_lines = नचैनमशकत् तर्तुं यत्नवानपि फल्गुनः ।;तयोरासीच्चिरं युद्धं चित्रं लघु च सुष्ठु च ॥ १८१॥ | |||
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| verse_lines = तद् दृष्ट्वा भगवान् कृष्णो लोहितायति भास्करे ।;अजिते द्रोणतनये त्वहते च जयद्रथे ।;अर्जुनस्य जयाकाङ्क्षी ससर्ज तम ऊर्जितम् ॥ १८२॥ | |||
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| verse_lines = तमोव्याप्ते गगने सूर्यमस्तं गतं मत्वा द्रौणिपूर्वाः समस्ताः ।;विशश्रमुः सैन्धवश्चार्जुनस्य हतप्रतिज्ञस्य मुखं समैक्षत ॥ १८३॥ | |||
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| verse_lines = तदा हरेराज्ञया शक्रसूनुश्चकर्त बाणेन जयद्रथस्य ।;वह्निं (अग्निं) विविक्षन्निव दर्शितः शिरस्तदा वचः प्राह जनार्दनस्तम् ॥ १८४॥ | |||
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| verse_lines = नैतच्छिरः पातय भूतले त्वमितीरितः पाशुपतास्त्रतेजसा ।;दधार बाणैरनुपुङ्खपुङ्खैः पुनस्तमूचे गरुडध्वजो वचः ॥ १८५॥ | |||
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| verse_lines = इदं पितुस्तस्य करे निपात्यतां वरोऽस्य दत्तो हि पुराऽमुनाऽयम्(यत्) ।;शिरो निकृत्तं भुवि पातयेद् यस्तवास्य भूयाच्च शिरः सहस्रधा ॥ १८६॥ | |||
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| verse_lines = इति स्म वध्यः स पिताऽपि(वध्योऽस्य पिताऽपि) तेनेत्युदीरिते तस्य सन्ध्याक्रियस्य ।;अङ्के व्यधात् तच्छिर आशु वासविः स सम्भ्रमात् तद् भुवि च न्यपातयत् ॥ १८७॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽभवत् तस्य शिरः सहस्रधा हरिश्च चक्रे तमसो लयं पुनः ।;तदैव सूर्ये सकलैश्च दृष्टे हाहेति वादः सुमहानथाऽसीत् ॥ १८८॥ | |||
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| verse_lines = भीमस्तदा शल्यसुयोधनादीन् कृपं च जित्वा व्यनदत् सुभैरवम् ।;कुर्वन् साहाय्यं फल्गुनस्यैव तुष्टो बभूव शैनेय उतो हते रिपौ ॥ १८९॥ | |||
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| verse_lines = अपूरयत् पाञ्चजन्यं च कृष्णो मुदा तदा देवदत्तं च पार्थः ।;भीमस्य नादं सहपाञ्चजन्यघोषं श्रुत्वा निहतं सिन्धुराजम् ।;ज्ञात्वा राजा धर्मसुतो मुमोद दुर्योधनश्चाऽस सुदुःखितस्तदा ॥ १९०॥ | |||
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| verse_lines = ततो द्रौणिमुखां(द्रौणिमुखान्) सेनां सर्वां भीमोऽभ्यवर्तत।;पार्थः कर्णमुखाञ्छिष्टान् ततोऽभज्यत तद् बलम् ॥ १९१॥ | |||
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| verse_lines = शीर्णां सेनां प्रविविशुर्धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।;ततस्तं देशमापुस्ते यत्र भीमधनञ्जयौ ॥ १९२॥ | |||
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| verse_lines = तत एकीकृताः सर्वे पाण्डवाः सहसोमकाः ।;परान् विद्रावयामासुस्ते भीताः प्राद्रवन् दिशः ॥ १९३॥ | |||
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| verse_lines = विद्राप्यमाणं सैन्यं तं दृष्ट्वा दुर्योधनो नृपः ।;जयद्रथवधाच्चैव कुपितोऽभ्यद्रवत् परान् ॥ १९४॥ | |||
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| verse_lines = स भीमसेनं च धनञ्जयं च युधिष्ठिरं माद्रवतीसुतौ च ।;धृष्टद्युम्नं सात्यकिं द्रौपदेयान् सर्वानेकः शरवर्षैर्ववर्ष ॥ १९५॥ | |||
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| verse_lines = ते विव्यधुस्तं बहुभिः शिलीमुखैः(शिलीमुखान्) स ताननादृत्य चकर्त बाणैः ।;धनूंषि चित्राणि महारथानां चकार सङ्ख्ये(युद्धे) विरथौ यमौ च ॥ १९६॥ | |||
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| verse_lines = आदाय चापानि पराणि तेऽपि दुर्योधनं ववृषुः सायकौघैः ।;अचिन्तयित्वैव शरान्स एको न्यवारयत् तानखिलांश्च बाणैः ॥ १९७॥ | |||
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| verse_lines = तं गाहमानं द्विषतां बहूनां मध्ये द्रोणद्रौणिकृपप्रधानाः ।;दृष्ट्वा सर्वे जुगुपुः स्वात्तचापा अनारतं बाणगणान् सृजन्तः ॥ १९८॥ | |||
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| verse_lines = सुयोधनः कर्णमाह जहि भीममिमं युधि ।;स आह नैष शक्यो हि जेतुं देवैः सवासवैः ॥ १९९॥ | |||
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| verse_lines = दैवाज्जीवाम्यहं राजन् युध्यंस्तेनातिपीडितः ।;अतो घटामहे शक्त्या जयो दैवसमाहितः ॥ २००॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनो द्रोणमाह सैन्धवस्त्वदुपेक्षया ।;पार्थेन निहतो भीमसात्यकिभ्यां च मे बलम् ॥ २०१॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिज्ञा च परित्यक्ता पाण्डवस्नेहतस्त्वया ।;इत्युक्तः कुपितो द्रोणः प्रतिज्ञामकरोत् ततः ॥ २०२॥ | |||
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| verse_lines = इतः परं नैव रणाद् रात्रावहनि वा क्वचित् ।;गच्छेयं नैव (नच) मोक्ष्यामि वर्म बद्धं कथञ्चन ॥ २०३॥ | |||
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| verse_lines = मत्पुत्रश्च त्वया वाच्यः पाञ्चालान् नैव शेषय (शेषयेत्, शेषयेः) ।;सदौहित्रानितीत्युक्त्वा(सदौहित्रानिति प्रोक्त्वा) विजगाहे निशागमे ॥ २०४॥ | |||
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| verse_lines = चमूं परेषामभ्यागाद् धृष्टद्युम्नस्तमाशु च ।;द्रौणिदुर्योधनौ तत्र विरथीकृत्य मारुतिः ।;द्रावयामास तत् सैन्यं पश्यतां सर्वभूभृताम् ॥ २०५॥ | |||
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| verse_lines = अक्षोहिण्यस्तु सप्तैव सेनयोरुभयोरपि ।;हतास्तासां च भीमेन तिस्रो द्वे फल्गुनेन च ॥ २०६॥ | |||
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| verse_lines = सौभद्रसात्यकिमुखैस्तन्मध्ये षोडशांशकः(षोडशांसकैः) ।;हैडिम्बपार्षतमुखैस्त्रयाच्च दशमांशकः(दशमांशतः) ॥ २०७॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मद्रोणद्रौणिभिश्च द्वे समं निहते तदा ।;तदन्यैर्मिलितैः सर्वैस्तच्चतुर्थांश एव च ॥ २०८॥ | |||
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| verse_lines = ततो रात्रौ पञ्चभिश्च पार्थाः षड्भिश्च कौरवाः ।;अक्षोहिणीभिः संव्यूह्य युद्धं चक्रुः सुदारुणम् ।;भीमं सेनां द्रावयन्तं पुनः कर्णः समासदत् ॥ २०९॥ | |||
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| verse_lines = स कर्णपुरतो भीमो दुष्कर्णं कर्णमेव च ।;दुर्योधनस्यावरजौ निष्पिपेष पदा क्षणात् ।;रथाश्वध्वजसूतैश्च सहितौ न व्यदृश्यताम्(न व्यदृश्यत) ॥ २१०॥ | |||
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| verse_lines = इति कर्णस्य तौ भीमः सञ्ज्ञया ज्ञापयन् भुवि ।;पदा पिपेष कालिङ्गं मुष्टिनैव जघान ह ॥ २१२॥ | |||
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| verse_lines = मुष्टिना त्वद्वधायाहं समर्थ इति किं वदे ।;तस्मान्मया रक्षितस्त्वमिति ज्ञापयितुं प्रभुः ।;साश्वसूतध्वजरथः कालिङ्गो मुष्टिचूर्णितः ॥ २१३॥ | |||
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| verse_lines = केतुमांश्च पिता तस्य शक्रदेवः श्रुतायुधः ।;अक्षोहिण्या सेनया च सह भीमेन पातिताः ।;खड्गयुद्धे पुरा भीष्मे सेनापत्यं प्रकुर्वति ॥ २१४॥ | |||
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| verse_lines = कर्णानुजान् ध्रुवाद्यांश्च बहून् जघ्ने स वै निशि ।;सञ्ज्ञां भीमकृतां ज्ञात्वा शक्तिं चिक्षेप चापराम् ।;कर्णः शक्तिर्मया दिव्या न मुक्ता तेन जीवसि ॥ २१५॥ | |||
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| verse_lines = मुक्ता दक्षभुजे सा च(सोऽथ) विदार्य धरणीं तथा(तदा) ।;भित्त्वा विवेश कर्णस्य दर्शयन्ती निदर्शनम् ॥ २१८॥ | |||
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| verse_lines = ततो भीमः पुनः स्वं तु रथमास्थाय चापभृत् ।;कर्णस्य पुरतः शत्रून् द्रावयामास सर्वतः ॥ २१९॥ | |||
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| verse_lines = तं कर्णो वारयामास शरैः सन्नतपर्वभिः ।;भीमः कर्णरथायैव गदां चिक्षेप वेगतः(वेगितः) ॥ २२०॥ | |||
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| verse_lines = स तद्गदाविघाताय स्थूणाकर्णास्त्रमासृजत् ।;तेनास्त्रेण प्रतिहता सा गदा भीममाव्रजत् ॥ २२१॥ | |||
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| verse_lines = भीमो गदां समादाय कर्णस्य रथमारुहत् ।;तया सञ्चूर्णयामास कर्णस्य रथकूबरम् ॥ २२२॥ | |||
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| verse_lines = एवं त्वच्चूर्णने शक्तो मत्कामात् त्वं हि जीवसि ।;एवं निदर्शयित्वैव पुनः स्वं रथमाव्रजत् ॥ २२३॥ | |||
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| verse_lines = पुनः कर्णपुरः सेनां जघान बहुशो रणे ।;कर्णस्तु तं परित्यज्य सहदेवमुपाद्रवत् ॥ २२४॥ | |||
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| verse_lines = स तु तं विरथीकृत्य धनुः कण्ठेऽवसज्य च ।;कुत्सयामास बहुशः स तु निर्वेदमागमत् ॥ २२५॥ | |||
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| verse_lines = न हन्तुमैच्छत् तं कर्णः पृथायै स्वं वचः स्मरन् ।;तं विजित्य(विसृज्य) रणे कर्णो जघ्ने पार्थवरूथिनीम् ॥ २२६॥ | |||
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| verse_lines = ततो द्रौणिर्विविधैर्बाणसङ्घैर्जघान पार्थस्य चमूं समन्ततः ।;सा हन्यमाना रणकोविदेन न शं (नाशं) लेभे मृत्युनाऽऽर्ता प्रजेव(आर्तप्रजेव) ॥ २२७॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा सेनां द्रौणिबलाभिभूतां तमाह्वयामास घटोत्कचो युधे(युधि) ।;द्रौणिस्तमाहाऽलमलं न वत्स पुत्रस्तातं योधयस्वाद्य मां त्वम् ॥ २२८॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त ऊचे न पिता मम त्वं सखा पितुर्यद्यपि शत्रुसंश्रयात् ।;अरिश्च मेऽसीति तमाह यद्यरिं मां मन्यसे तद्वदहं करोमि ते ॥ २२९॥ | |||
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| verse_lines = इत्यूचिवाञ्छक्रधनुःप्रकाशं विष्फार्य चापं प्रकिरञ्छरौघान् ।;अभ्यागमद् राक्षसमुग्रवेगः स्वसेनया सोऽपि तमभ्यवर्तत ॥ २३०॥ | |||
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| verse_lines = स रक्षसां लक्षसमावृतो बली नृभिश्च वीरैर्बहुभिः सुशिक्षितैः ।;अक्षोहिणीमात्रबलेन राक्षसः सङ्क्षोभयामास गुरोः सुतं शरैः ॥ २३१॥ | |||
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| verse_lines = स तेन बाणैर्बहुभिः सुपीडितो विभिन्नगात्रः क्षतजाप्लुताङ्गः(क्षतजाभिप्लुताङ्गः) ।;व्यावृत्य नेत्रे कुपितो महद् धनुर्विष्फार्य बाणै रजनीं चकार ॥ २३२॥ | |||
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| verse_lines = सोऽक्षौहिणीं तां(अक्षौहिणीं तां) क्षणमात्रतः क्षरन् महाशरांस्तानपि राक्षसान् क्षयम् ।;निनाय पुत्रं च घटोत्कचस्य निष्ट्यं(निष्ठ्यं) पुरा योऽञ्जनवर्मनामकः ॥ २३३॥ | |||
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| verse_lines = निरीक्ष्य सेनां स्वसुतं च पातितं घटोत्कचो द्रोणसुतं शरेण ।;विव्याध गाढं स तु विह्वलो ध्वजं समाश्रितश्चाऽशु ससञ्ज्ञकोऽभवत् ॥ २३४॥ | |||
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| verse_lines = उत्थाय बाणं यमदण्डकल्पं सन्धाय चापे प्रविकृष्य राक्षसे ।;मुमोच तेनाभिहतः पपात विनष्टसञ्ज्ञः स्वरथे घटोत्कचः ॥ २३५॥ | |||
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| verse_lines = विमूर्च्छितं सारथिरस्य दूरं निनाय युद्धाज्जगतो विपश्यतः ।;द्रौणिश्च सेनां निशि तैः शरोत्तमैर्व्यद्रावयत् पाण्डवसोमकानाम् ॥ २३६॥ | |||
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| verse_lines = सञ्ज्ञामवाप्याथ घटोत्कचोऽपि क्रुद्धोऽविशत् कौरवसैन्यमाशु ।;विद्रावयामास स बाणवर्षैः प्रकम्पयामास महारथांस्तथा ॥ २३७॥ | |||
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| verse_lines = तदैव पार्थं प्रति योद्धुमागतं वैकर्तनं वीक्ष्य जगत्पतिर्हरिः ।;घटोत्कचं प्राहिणोच्छक्तिमुग्रां तस्मिन् मोक्तुं पार्थरक्षार्थमेव ॥ २३८॥ | |||
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| verse_lines = स कर्णमाहूय युयोध तेन तस्यानु दुर्योधनपूर्वकाश्च ये ।;द्रोणेन चैतान् समरे स एको निवारयामास ममर्द चाधिकम् ॥ २३९॥ | |||
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| verse_lines = ते बाध्यमाना बहुशो बलीयसा कर्णं पुरोधाय तमभ्ययोधयन् ।;न विव्यथे तत्र रणे स कर्णः स्ववीर्यमास्थाय महास्त्रवेत्ता ॥ २४०॥ | |||
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| verse_lines = निवारयामास गुरोः सुतं तदा भीमस्त्रिगर्ताञ्छतमन्युनन्दनः ।;अलम्बलो नाम तदैव राक्षसः समागमद्(समासदत्) भीमसुतं निहन्तुम् ॥ २४१॥ | |||
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| verse_lines = युद्ध्वा प्रगृह्यैनमथो निपात्य घटोत्कचो भूमितलेऽसिनाऽस्य ।;उत्कृत्य शीर्षं तु सुयोधनेऽक्षिपद् विषेदुरत्राखिलभूमिपालाः ॥ २४२॥ | |||
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| verse_lines = अलायुधोऽथाऽगमदुग्रवीर्यो नराशनस्तं स घटोत्कचोऽभ्ययात् ।;युद्ध्वा मुहूर्तं स तु तेन भूमौ निपात्य तं यज्ञपशुं चकार ॥ २४३॥ | |||
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| verse_lines = अथास्य शिर उद्धृत्य क्रोधाद् दुर्योधनोरसि ।;चिक्षेप तेन सम्भ्रान्ताः सर्वे दुर्योधनादयः ॥ २४४॥ | |||
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| verse_lines = घटोत्कचबलख्यात्यै समर्थेनापि यो रणे ।;न हतो भीमसेनेन हतेऽस्मिन् भैमसेनिना ॥ २४५॥ | |||
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| verse_lines = सर्वे सञ्चोदयामासुः(सम्बोधयामासुः) कर्णं शक्तिविमोक्षणे ।;अस्मिन् हते हतं सर्वं किं नः पार्थः करिष्यति ॥ २४६॥ | |||
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| verse_lines = एवं सञ्चोद्यमानः(सम्बोध्यमानः) स धार्तराष्ट्रैः पुनः पुनः ।;हैडिम्बेनार्द्यमानैस्तु(च) स्वयं च भृशपीडितः ।;आदत्त शक्तिं विपुलां पाकशासनसम्मताम् ॥ २४७॥ | |||
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| verse_lines = तामम्बरस्थाय घटोत्कचाय शैलोपमायातुलविक्रमाय ।;चिक्षेप मृत्यो रसनोपमामलं प्रकाशयन्तीं प्रदिशो दिशश्च ॥ २४८॥ | |||
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| verse_lines = निर्भिण्णवक्षाः(निर्भिन्नवक्षाः) स तया पपात व्यचूर्णयञ्छत्रुबलं हतोऽपि ।;तस्मिन् हते जहृषुधार्तराष्ट्रा उच्चुक्रुशुर्दुधुवुश्चाम्बराणि ॥ २४९॥ | |||
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| verse_lines = तदा ननर्त केशवः समाश्लिषच्च फल्गुनम् ।;ननाद शङ्खमाधमज्जहास(शङ्खमदमञ्जहास) चोरुनिस्वनः ॥ २५०॥ | |||
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| verse_lines = तमपृच्छद् गुडाकेशः किमेतदिति दुर्मनाः ।;हते सुतेऽग्रजेऽस्माकं वीरे किं नन्दसि प्रभो ॥ २५१॥ | |||
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| verse_lines = तमाह भगवान् कृष्णो दिष्ट्या जीवसि फल्गुन ।;त्वदर्थं निहिता शक्तिर्विमुक्ताऽस्मिन् हि राक्षसे ॥ २५२॥ | |||
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| verse_lines = ततो युधिष्ठिरो दुःखादमर्षाच्चाभ्यवर्तत ।;कर्णं प्रति तमाहाथ कृष्णद्वैपायनः प्रभुः ॥ २५३॥ | |||
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| verse_lines = ययाऽर्जुनो निहन्तव्यस्तयाऽसौ राक्षसो हतः ।;तन्मा शुचस्त्वं राजेन्द्र दिष्ट्या जीवति फल्गुनः ।;इत्युक्त्वा प्रययौ व्यासस्ततो युद्धमवर्तत ॥ २५४॥ | |||
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| verse_lines = भीमार्जुनाभ्यामिह हन्यमाने बले कुरूणामितरैश्च पाण्डवैः ।;प्रदीपहस्ता अथ योधकाश्च सर्वेऽपि निद्रावशगा बभूवुः ॥ २५५॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव तानाह धनञ्जयस्तदा स्वप्स्यन्तु यावच्छशिनः प्रकाशः ।;इतीरिता आशिषः फल्गुनाय प्रयुज्य सर्वे सुषुपुर्यथास्थिताः ॥ २५६॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च चन्द्रेऽभ्युदिते युधे ते समाययुः शस्त्रमहास्त्रवर्षाः ।;तत्राऽयातः सात्यकिं सोमदत्तो भूरिश्च ताभ्यां युयुधे स एकः ॥ २५७॥ | |||
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| verse_lines = हतौ च तौ पेततुस्तेन भूमौ बाह्लीक एनं समरे त्वयोधयत् ।;स सात्यकिं विरथीकृत्य बाणं वधाय तस्याऽशु मुमोच वीरः ॥ २५८॥ | |||
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| verse_lines = चिच्छेद तं भीमसेनस्त्रिधैव तस्मै(तस्मिञ्छतघ्नीं) शतघ्नीं प्रजहार बाह्लिकः ।;तया हतो विह्वलितो वृकोदरो जघान तं गदया सोऽपतच्च ॥ २५९॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आह तं भीमो नितरां व्यथितस्तदा ।;हन्यां नैवान्यथा युद्धे तत् ते शुश्रूषणं भवेत् ।;इति तेन हतस्तत्र भीमसेनेन बाह्लिकः ॥ २६१॥ | |||
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| verse_lines = हते बाह्लीके कौरवा भीमसेनमभ्याजग्मुः कर्णदुर्योधनाद्याः(कर्णसुयोधनाद्याः) ।;द्रौणिं पुरस्कृत्य गुरुं च पार्षतः सभ्रातृकः सात्यकिना समभ्ययात् ॥ २६२॥ | |||
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| verse_lines = संशप्तकैरेव पार्थो युयोध तद् युद्धमासीदतिरौद्रमद्भुतम् ।;अक्षोहिणी तत्र भीमार्जुनाभ्यां निषूदिता (निसूदिता) रात्रियुद्धे समस्ता(समन्तात्) ॥ २६३॥ | |||
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| verse_lines = ततः सूर्यश्चाभ्युदितस्तदाऽतिघोरं द्रोणः कर्म युद्धे चकार ।;स पाञ्चालानां रथवृन्दं प्रविश्य जघान हस्त्यश्वरथान् नरांश्च ॥ २६४॥ | |||
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| verse_lines = विद्रावितास्तेन महारथाश्च नैवाविन्दञ्छर्म बाणान्धकारे ।;युवेव वृद्धोऽपि चचार युद्धे स उग्रधन्वा परमास्त्रवेत्ता ॥ २६५॥ | |||
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| verse_lines = रथार्बुदं तेन हतं च तत्र ततः सहस्रं(तथा सहस्रं) गुणितं नराणाम् ।;ततो दशांशो निहतो हयानां गजार्बुदं चैव रणोत्कटेन ॥ २६६॥ | |||
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| verse_lines = तथा विराटद्रुपदौ शराभ्यां निनाय लोकं परमाजिमध्ये ।;ततो विजित्यैव गुरोः सुतादीन् धृष्टद्युम्नं भीमसेनो जुगोप ॥ २६७॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नो भीमसेनाभिगुप्तो द्रोणं हन्तुं यत्नमुच्चैश्चकार ।;निवारयामास गुरुः शरौघैर्धृष्टद्युम्नं सोऽपि तं सायकेन ।;विव्याध तेनाभिहतः स मूर्च्छामवाप विप्रो निषसाद चाऽशु ॥ २६८॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नः सत्वरं खड्गचर्मणी आदाय तस्याऽरुरुहे रथोत्तमम् ।;सञ्ज्ञामवाप्याथ गुरुः शरौघैः प्रादेशमात्रैर्व्यथयामास तं च ॥ २६९॥ | |||
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| verse_lines = स तैरतिव्यथितस्तद्रथाच्च परावृत्तः स्वं रथं चारुरोह ।;सुसंरब्धौ तौ पुनरेव युद्धं सञ्चक्रतुर्वृष्टशराम्बुधारौ ॥ २७०॥ | |||
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| verse_lines = निवार्य शत्रुं स शरैर्ब्रह्मास्त्रमसृजद् द्विजः ।;तेन सन्दाहयामास पाञ्चालान् सुबहून् रणे ।;पुरुजित् कुन्तिभोजश्च तेनान्येऽपि हतास्तदा ॥ २७१॥ | |||
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| verse_lines = भीमोऽर्जुनः सात्यकिश्च पर्यायेण गुरोः सुतम् ।;दूरतो वारयामासुर्महत्या सेनया सह ॥ २७२॥ | |||
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| verse_lines = कर्णदुर्योधनादींश्च शल्यं भोजं कृपं तथा ।;भीमार्जुनौ शरौघेण वारयामासतू रणे ॥ २७३॥ | |||
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| verse_lines = तत्र भीमो गजानीकं जयत्सेनं च मागधम् ।;जघान सुबहूंश्चैव मागधानां रथव्रजान् ॥ २७४॥ | |||
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| verse_lines = अथ मालवराजस्य त्वश्वत्थामाभिधं गजम् ।;भीमसेनहतं दृष्ट्वा वासुदेवप्रचोदितः ।;अश्वत्थामा हत इति प्राह राजा युधिष्ठिरः ॥ २७५॥ | |||
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| verse_lines = अश्वत्थामवधं श्रुत्वा नाहं योत्स्य इति स्वयम् ।;पुरोक्तं धर्मजायैव तेन द्रोणो युधिष्ठिरम् ॥ २७६॥ | |||
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| verse_lines = ब्रूहि सत्यमिति प्राह सत्यमित्येव सोऽब्रवीत् ।;उपांशु कुञ्जरश्चेति द्रोणोऽतो व्यथितोऽभवत् ॥ २७७॥ | |||
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| verse_lines = तस्य भीमो रथेषां(रथेषुं) च गृहीत्वा न तवेदृशम् ।;योग्यं गुणवतो नित्यं परधर्मोपजीवनम् ॥ २७८॥ | |||
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| verse_lines = इत्याह खस्था मुनयश्चालमेहीति तं तदा ।;ऊचुस्तदखिलं ज्ञात्वा द्रोणः शस्त्रमवासृजत् ॥ २७९॥ | |||
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| verse_lines = सन्यस्य कर्माणि तदाऽखिलानि योगारूढः परमं वासुदेवम् ।;सर्वेश्वरं नित्यनिरस्तदोषं ध्यायन् मुक्त्वा देहमगात् स्वधाम ।;तं केशवः पाण्डवा गौतमश्च यान्तं स्वलोकं ददृशुर्विहायसा ॥ २८०॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नः पाण्डवैर्वार्यमाणोऽप्यगात् खड्गं चर्म चाऽदाय तत्र ।;छित्वाऽसिना तस्य शिरः पुनश्च रथं स्वकीयं त्वरया समास्थितः ।;दृष्ट्वा कृपस्तं सुभृशं भयार्दितः सम्प्राद्रवद् वाजिनमेकमास्थितः ॥ २८१॥ | |||
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| verse_lines = सञ्छिन्ने द्रोणशिरसि गर्हयामास वासविः ।;युधिष्ठिरं च(युधिष्ठिरश्च) पाञ्चाल्यं सात्यकिश्चापि कोपितः ॥ २८२॥ | |||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नस्तु तावाह कथं भूरिश्रवा हतः ।;इति तं सात्यकिः क्रुद्धो गदापाणिः समभ्ययात् ।;आह्वयामास पाञ्चाल्यस्तं धृतासिरविस्मयः ॥ २८३॥ | |||
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| verse_lines = तदा जग्राह शैनेयं भीमः कृष्णप्रचोदितः ।;शमयामास पार्थं च पाञ्चाल्यस्नेहयन्त्रितः ॥ २८४॥ | |||
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| verse_lines = ते वासुदेवेन तदा सुशिक्षिताः (तदाऽनुशिक्षिताः) स्नेहं पुनः पूर्ववदापुरुत्तमम् ।;यत्ताश्च युद्धाय समुद्यताश्च(समुत्थिताश्च) तदाऽऽगमद् द्रौणिरप्यात्तधन्वा ॥ २८५॥ | |||
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| verse_lines = आश्रुत्य तातं निहतं प्रतिज्ञां चकार निःशेषरिपुप्रमाथने ।;नारायणास्त्रं विससर्ज कोपात् तदा भीता भीममृते समस्ताः ॥ २८६॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरः प्राह विषण्णचेतनः शैनेयपूर्वाः प्रतियान्तु सर्वे ।;सभ्रातृकोऽहं द्रौणिवरास्त्रमग्नो(भग्नो) भवेयमित्यत्र जगाद केशवः ॥ २८७॥ | |||
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| verse_lines = नमध्वमस्त्रस्य ततो विमोक्ष्यथेत्यथ प्रणेमुश्च धनञ्जयादिकाः ।;सर्वे न भीमस्तदमुष्य मूर्ध्नि पपात सोऽग्नाविव संस्थितोऽग्निः ॥ २८८॥ | |||
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| verse_lines = अदह्यमाने भीमेऽपि वह्नौ वह्निरिव स्थिते ।;अवेष्टयद् वारुणेन पार्थोऽत्राऽत्मप्रपत्तये ॥ २८९॥ | |||
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| verse_lines = न देहे पतितास्त्रस्य बहिर्वेष्टनतः फलम् ।;तथाऽपि स्नेहवशगो वेष्टयामास फल्गुनः ॥ २९०॥ | |||
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| verse_lines = अमोघत्वं निजास्त्रस्य भीमस्यावध्यतामपि ।;साधयन् सार्जुनः कृष्णो भीमस्य रथमारुहत् ॥ २९१॥ | |||
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| verse_lines = तदस्त्रं नादहत् ताभ्यां स्वरथादवरोपिते ।;भीम आच्छिन्नहेतौ च तदस्त्रं शान्तिमागमत् ॥ २९३॥ | |||
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| verse_lines = शुद्धक्षत्रियधर्मेषु निरतो यद् वृकोदरः ।;वाहनादवतीर्यान्यैः प्रणतेऽपि निरायुधैः ।;सायुधः सरथोऽयुद्ध्यदविषह्यमपीश्वरैः ॥ २९४॥ | |||
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| verse_lines = पुनः प्रयोक्तुमस्त्रं तत् (प्रयोक्तमस्त्रं तं) धार्तराष्ट्रोऽभ्यचोदयत्(अभ्ययाचत) ।;द्रौणिर्न शक्यमित्युक्त्वा धृष्टद्युम्नं समभ्ययात् ॥ ३००॥ | |||
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| verse_lines = आयान्तमीक्ष्यैव गुरोः सुतं तं धृष्टद्युम्नं सात्यकिरन्वयाद् रणे ।;उभौ च तौ सायकाभ्यामविध्यन्निपेततुस्तौ च विमूर्च्छितौ रणे ॥ ३०१॥ | |||
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| verse_lines = अक्षोहिणी निहता चात्र सेना पार्थं सयानं हरिरुज्जहार ।;जीवन्तमालोक्य सुरेन्द्रनन्दनं द्रौणिः कोपात् कार्मुकं चापहाय ।;ययौ तमागत्य जगाद कृष्णो वेदान्तकृत् पूर्णषाड्गुण्यदेहः ॥ ३०४॥ | |||
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| verse_lines = मा याहि साक्षाद् गिरिशः सुराणां कार्याय भूमौ बलवानजायथाः ।;महच्च कार्यं पुनरस्ति दृष्टं तवाऽशु तच्च प्रतिपादयेति ॥ ३०५॥ | |||
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| verse_lines = तथोदितः प्रातरिति ब्रुवाणो ययौ प्रणम्याखिलवेदयोनिम् ।;ययुस्तमन्वेव सुयोधनादयो दुःखानतास्ते शिबिराय भीताः ॥ ३०६॥ | |||
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| verse_lines = पार्थाश्च सर्वे मुदिता जनार्दनं परं स्तुवन्तः शिबिराय जग्मुः ।;तत्रापि रात्रावमितान् हरेर्गुणाननुस्मरन्तो मुमुदुः समेताः ॥ ३०७॥ | |||
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<span id="gr-C27" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तविंशोऽध्यायः"></span> | |||
== सप्तविंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = ओं ॥ अथानुज्ञामुपादाय द्रौणेर्दुर्योधनो नृपः ।;कर्णं सेनापतिं चक्रे सोऽगाद् युद्धाय दंशितः (दंसितः) ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = तत्राभवद् युद्धमतीव दारुणं पाण्डोः सुतानां धृतराष्ट्रजैर्गजे ।;तत्रोदयाद्रिप्रतिमे प्रदृश्यते भीमो यथोद्यन् सविताऽतिनिर्मलः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = तं कालयन्तं नृपतीन् क्षेमधूर्तिरभ्यागमत् तस्य गजं जघान च ।;तं वीर्यमत्तं प्रतिलभ्य भीमो निनाय मृत्योः सदनाय शीघ्रम् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = निहत्य तं मारुतिरभ्यकृन्तच्छिरांसि यूनां परपक्षपातिनाम् ।;विक्षोभयामास च शत्रुसैन्यं सिंहो यथैव श्वसृगालयूथम् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = सङ्क्षोभ्यमाणं तदनीकमीक्ष्य द्रौणी रथेन प्रतिजग्मिवांस्तम् ।;तद् युद्धमासीदतिरौद्रमद्भुतं (अतिघोरमद्भुतं) पुरा यथा नाऽस च कस्यचित् क्वचित् ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव तद् देवगन्धर्वविप्रा ऊचुर्नेदृग् दृष्टपूर्वं सुयुद्धम् ।;न चोत्तरं वाऽपि भविष्यतीदृक् कलां च सर्वाणि न षोडशीमियुः(षोडशीमयुः) ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = नैतादृशी ज्ञानसम्पद् बलं वा द्वयं कुतो वायुमृते शिवं तथा ।;द्वयोः समाहार इह द्वयोरपि ज्ञानस्य बाह्वोश्च बलस्य सूर्जितः ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = इतीर्यमाणे विबुधैर्नरोत्तमौ दिशः समस्ता गगनं च पत्रिभिः ।;निरन्तरं चक्रतुरुत्तमोजसौ दृष्ट्वैव तद् (प्रीतिमगुः)भीतिमगुर्महारथाः ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = शरासने मारुतिना निराकृतो द्रौणिर्महास्त्राणि मुमोच तस्मिन् ।;(तान्यस्त्रवर्षैः)तान्यस्त्रवर्यैर्बलवानविस्मयः संशामयामास सुतोऽनिलस्य ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = पुनः शरैरेव परस्परं तावयुद्ध्यतां चित्रमलं च सुष्ठु ।;तदा तु भीमस्य शरैर्भृशार्दितो द्रौणिः पपाताऽशु दृढं विचेतनः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = भीमश्च विह्वलतनुः स तु किञ्चिदेव पूर्वं गते गुरुसुते प्रययौ क्षणेन ।;निर्धूतयुद्धश्रम आत्तधन्वा योद्धुं गजौघं प्रति नादिताशः(प्रतिनादिताशः) ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् गजान् मर्दयति धार्तराष्ट्रो युधिष्ठिरम् ।;अगाद् युद्धाय तौ युद्धं राजानौ चक्रतुश्चिरम् ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = तत्र तं विरथं चक्रे सहसैव युधिष्ठिरः ।;स गदामाददे गुर्वीं तं भीमोऽभ्यपतद् गदी ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा कृपस्तं स्वरथमारोप्यापययौ ततः ।;तदैव कर्णनकुलौ भृशं बाणैरयुद्ध्यताम् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = नकुलं विरथं कृत्वा कर्णोऽथ प्रपलायिनम्(प्रपलायितम्) ।;अनुद्रुत्य च वेगेन कण्ठे धनुरवासृजत् ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = उक्त्वा च पुरुषा(उवाच परुषा) वाचः कुन्त्या वचनगौरवात् ।;जघान नैव नकुलं विसृज्य च ययौ परान् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = विन्दानुविन्दावथ कैकयौ रणे समासदत् सात्यकिरुग्रविक्रमः ।;तयोरमुष्याभवदुग्रवैशसं प्रवर्षतोरुत्तमसायकान् बहून् ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = ताभ्यां निरुद्धः सहसा जहार तत्रानुविन्दस्य शिरोऽथ विन्दः ।;युयोध शैनेयमथारथावुभौ परस्परं चक्रतुरुत्तमाहवे ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = ततश्च चर्मासिधरौ प्रचेरतुः श्येनौ यथाऽकाशतले कृतश्रमौ ।;निकृत्य चान्योन्यमुभौ च चर्मणी वरासिपाणी युगपत् समीयतुः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = तत्रापहस्तेन शिरः सकुण्डलं जहार विन्दस्य मृधे स सात्यकिः ।;निहत्य तौ बन्धुजनैः सुपूजितो जगाम शत्रूनपरान् प्रकम्पयन् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = कृपमायान्तमीक्ष्यैव तपसां मां प्रपीडयेत् ।;इति मत्वा पार्षतस्तु भीमं शरणमेयिवान् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = कर्णं समन्तात् प्रतिकालयन्तं वरूथिनीमिन्द्रसुतः समभ्ययात् ।;क्षणात् तमाजौ विरथं च चक्रे ततोऽपहारं स चकार चम्वाः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = पराजितः संयति सूर्यसूनुः सुतेन शक्रस्य स धार्तराष्ट्रम् ।;जगाद बाहुं प्रतिगृह्य पार्थो जिगाय मामन्यमनस्कमाजौ ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = कामं रथो मे धनुरप्यभेद्यं दत्तं भृगूणामधिपेन दिव्यम् ।;यन्ता न तादृङ् मम यादृशो हरिः शल्यो यदि स्यात् त्वदरिं निहन्याम् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते सौत्यकृते स शल्यं प्रोवाच स क्रुद्ध इवाभवत् तदा ।;दुर्योधनो रथिनः सारथेस्तु व्यावर्णयन्नुत्तमतामशामयत् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = बुद्ध्या बलेन ज्ञानेन धैर्याद्यैरपि योऽधिकः ।;रथिनः सारथिः स स्यादर्जुनस्य यथा हरिः ।;यथा शिवस्य ब्रह्माऽभूद् दहतस्त्रिपुरं पुरा ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादिवाक्यैः संशान्त इव शल्योऽस्य सारथिः ।;बभूव तेन सहितः सेनां व्यूह्य रवेः सुतः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = इति ब्रुवन्तं बहुशः प्राह शल्यः प्रहस्य च ।;निवातकवचा येन हता दग्धं च खाण्डवम् ।;को नाम तं जयेन्मर्त्यो दृष्टो वोऽपि स गोग्रहे ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = काकगोमायुधर्मा त्वं हंससिंहोपमं रणे ।;मा याहि पार्थं मा याहि हतोऽनेन यमक्षयम् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्ते रविजो मद्रान् नितरां पर्यकुत्सयत् ।;शल्योऽपि सर्वदेशेषु नीचमध्योत्तमा नराः ।;सन्तीत्युक्त्वाऽस्य सारथ्यं चक्रे पार्थहितेप्सया(पार्थहितेच्छया) ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = कर्णोऽथ शल्यनियतेन रथेन पार्थसेनामवाप्य विदुधाव शरैः समन्तात् ।;संरक्षितो युधि सुयोधनगौतमाद्यैराचार्यजेन च महास्त्रविदां वरेण ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = तं भीमपार्षतशिनिप्रवराभिगुप्ता सा पाण्डवेयपृतनाऽभिववर्ष बाणैः ।;तां सूर्यसूनुरथ बाणवरैर्विदार्य सम्प्राद्रवच्छितशरैरपि (सम्प्रार्दयच्छितशरैरपि) धर्मसूनुम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = कृत्वा तमाशु विरथं धनुरस्य कण्ठे सज्यं निधाय परुषा गिर आह चोच्चैः ।;दृष्ट्वैव मारुतिरमुं भृशमातुतोद दुर्योधनं (विगतकार्मुकं)विरथकार्मुकमत्र कृत्वा ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = तं प्राणसंशयगतं नृपतिं निरीक्ष्य कर्णं जगाद युधि मद्रपतिः प्रदर्श्य ।;यस्यार्थ एष(यस्यार्थमेव) समरस्त्वमियं च सेनां तं त्वं यमस्य सदनं प्रयियासुमद्य ।;भीमेन पीडितममुं परिपाहि शीघ्रं किं ते युधिष्ठिरमिमं हि मुधाऽभिपीड्य(वृथाऽभिपीड्य) ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = राजावनाय शिनिपुङ्गवपार्षतौ च सन्दिश्य कर्णमभिगच्छत आस रूपम् ।;अन्ते कृतान्तनरसिंहतनोर्यथैव विष्णोर्हरं ग्रसत आत्तसमस्तविश्वम् ।;तद्वेगतः प्रतिचचाल धरा समस्ता विद्राविता च सकला प्रतिवीरसेना ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = वैकर्तनेन शरसञ्चयताडितः स बाणं च वज्रसदृशं प्रमुमोच तस्मिन् ।;तेनाऽहतो मृतकवत् स पपात कर्णो भीमः क्षुरं च जगृहेऽभिययौ(जगृहे प्रययौ) च पद्भ्याम् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = निन्दां हरेस्तु(हरेश्च) विदधाति परोक्षगोऽपि(परोक्षतोऽपि) यस्तं प्रगृह्य करवाणि विजिह्वमेव ।;एवं हि वायुतनयस्य सदा प्रतिज्ञा छेत्तुं स तेन रविजस्य ससार जिह्वाम् ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = आयान्तमन्तिकममुं प्रसमीक्ष्य शल्यो नेत्याह हेतुभिरहो न मृषा प्रतिज्ञा ।;कार्या त्वयैव पुरुहूतसुतस्य जिह्वां मा तेन पातय मरुत्सुत सूतसूनोः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त्वा प्रमुखात्(इत्युक्त्वाऽभिमुखात्) तस्य रथेनैव तु मद्रराट् ।;वैकर्तनमपोवाह सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = जित्वा सूर्यसुतं भीमः कौरवाणामनीकिनीम् ।;सर्वां विद्रावयामास द्रौणिदुर्योधनावृताम् ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = अक्षोहिणीत्रयं तेन तदा विलुलितं क्षणात् ।;तदैव गुरुपुत्रोऽयात् पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = विमृद्य सकलां सेनां कृत्वा च विरथं नृपम् ।;धृष्टद्युम्नं यमौ चैव सात्यकिं द्रौपदीसुतान् ।;क्षणेन विरथीकृत्य सर्वांश्चक्रे निरायुधान् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = तान् भग्नदर्पान् रणतोऽपयातानन्वेव बाणावृतमन्तरिक्षम् ।;कुर्वन् ययौ धर्मराजस्तमाह किं नः स्वधर्मे निरतान् विहंसि ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = क्षत्रियान् परधर्मस्थो मा हिंसीरिति चोदितः ।;प्रहस्य तान् विहायैव ययौ यत्राच्युतार्जुनौ ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = संशप्तकैस्तत्र संयुद्ध्यमानं समाह्वयामास सुरेशसूनुम् ।;स बाणयुक्तं भुजगेन्द्रकल्पमुन्नम्य बाहुं युधये सुशूरम् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = पार्थः संशप्तकगणैः संसृष्टः समरार्थिभिः ।;आहूतो द्रौणिना चैव कार्यं कृष्णमपृच्छत ।;चोदयामास च हयान् कृष्णो द्रौणिरथं प्रति ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = उभौ च तावस्त्रविदां प्रधानौ महाबलौ संयति जातदर्पौ ।;शरैः समस्ताः प्रदिशो दिशश्च द्रोणेन्द्रसूनू तिमिराः प्रचक्रतुः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = द्रौणिस्तदा स्यन्दनवाजिरोमस्वरोमकूपध्वजकार्मुकेभ्यः ।;शरानमोघान् सततं सृजानो बबन्ध पार्थं शरपञ्जरेण ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् निबद्धे हरिरप्रमेयो विबोधयामास सुरेन्द्रसूनुम् ।;आलिङ्गनेनास्य ददौ बलं च स उत्थितोऽस्त्राण्यमुचन्महान्ति ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = निवार्य तान्यस्त्रवरैर्गुरोः सुतश्चिच्छेद च ज्यां युधि गाण्डिवस्य ।;ववर्ष पार्थं च शरैरथाऽन्या ज्याऽऽसीत् तया गाण्डिवं सोऽप्ययुङ्क्त ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = ततः शरेण कुपितः शितेन द्रौणिसारथेः ।;शिरो जहार कौन्तेयः सारथ्यं सोऽकरोत् स्वयम् ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = शरान् विसृजता तेन सारथ्यमपि कुर्वता ।;शरकूटेन पार्थः स पुनर्बद्धो द्विजन्मना ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = पुनरालिङ्ग्य कृष्णस्तमधाच्छत्रुविघातकम् ।;बलमस्मिंस्ततः पार्थः उत्तस्थौ शरचापभृत् ।;ववर्ष च शरान् भूयो द्रोणपुत्रेऽरिमर्दनः ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = पुनस्तस्य तुतोद(नुनोद) ज्यां द्रौणिः सन्धाय तां पुनः ।;पार्थो द्रोणसुतस्याश्वरश्मींश्चिच्छेद सायकैः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = विरश्मयो हया द्रौणेः पुनः पार्थशराहताः ।;अपोहुर्दूरमेतस्मात् सोऽपि संस्थाप्य तान् पुनः ।;चिन्तयामास नैतस्मादधिकं शक्यतेऽर्जुने ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = सारथित्वात् केशवस्य ध्वजस्थत्वाद्धनूमतः ।;गाण्डिवत्वात् कार्मुकस्य चेषुध्योरक्षयत्वतः ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = अवध्यत्वात् तथाऽश्वानामभेद्यत्वाद् रथस्य च ।;अतो योद्धुं समर्थोऽपि नाद्य यामि धनञ्जयम् ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = एवं स मत्वा प्रविवेश सेनां पाण्डोः सुतानामथ तं समभ्ययात् ।;पाण्ड्यस्तयोरास सुयुद्धमद्भुतं प्रवर्षतोः सायकपूगमुग्रम् ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = अष्टावष्टशतान्यूहुः(अष्टावष्टगवान्यूहुः) शकटानि यदायुधम् ।;अह्नस्तदष्टभागेन द्रौणिश्चिक्षेप तत्र ह ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = अथ तं विरथं कृत्वा छित्वा कार्मुकमाहवे ।;सकुण्डलं शिरो द्रौणिर्जहार मुकुटोज्ज्वलम्(मकुटोज्ज्वलम्) ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = अथ विद्रावयामास पृतनां पाण्डवीं शरैः ।;तदा जघान पार्थोऽपि दण्डधाराख्यमागधम् ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = विद्राप्यमाणां पृतनां निरीक्ष्य गुरोः सुतेनाभ्यगमत् त्वरावान् ।;धृष्टद्युम्नस्तं स ऊचे सुपापं हनिष्ये त्वामद्य युद्धे गुरुघ्नम् ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो दर्शयामास पार्षतः खड्गमुत्तमम् ।;अयं तव पितुर्हन्ता वदिष्यति तवोत्तरम् ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त्वा धनुरादाय ववर्ष च शरान् बहून् ।;तयोः समभवद् युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = स तत्र पार्षतं द्रौणिः क्षणेन विरथायुधम् ।;कृत्वाऽन्ताय शरांस्तीक्ष्णान् मुमोच न च तस्य ते ।;त्वचं च चिच्छिदुर्द्रौणिः खड्गहस्तोऽभिजग्मिवान् ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = खड्गेन सोऽस्त्रैशस्त्रैरप्यनिर्भिन्नत्वचं तदा ।;मौर्व्या ममन्थ धनुषः पातयित्वा धरातले ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = स ताभ्यां वज्रसमितैः(वज्रसन्निभैः) शरैरभिहतो भृशम् ।;विसृज्य पार्षतं स्वीयमारुरोह रथं पुनः ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = जगाम च ततोऽन्यत्र पाञ्चाल्योऽपि रथं पुनः ।;आरुह्यान्यं स्वात्तधन्वा कृतवर्माणमभ्ययात् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = तयोरासीत् सुतुमुलं युद्धमद्भुतदर्शनम् ।;तत्र नातिप्रयत्नेन पाञ्चाल्यो विरथायुधम् ।;चकार कृतवर्माणं तमपोवाह गौतमः ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = अथ दुर्योधनो राजा माद्रेयावभ्ययाद् रथी ।;ताभ्यां तस्याभवद् घोरं युद्धमद्भुतदर्शनम् ।;तत्र नातिप्रयत्नेन तेन तौ विरथीकृतौ ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = स्वयं युधिष्ठिरो राजा तदा तं समवारयत् ।;व्यश्वसूतध्वजं चक्रे तं च दुर्योधनो रणे ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽगतं सूर्यसुतं पुनश्च जगाम भीमो रभसो(रभसा) रथेन ।;दुर्योधनं चास्य समक्षमेव चकार वीरो विरथं क्षणेन ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = निवार्य कर्णं च शरैरमुष्य सूनोः सुषेणस्य शिरश्चकर्त ।;पपात भूमौ स पितुः समीपे यथा हतः सत्यसेनोऽमुनैव ।;यथैव कर्णावरजौ पुरैव निशायुद्धे कर्णपुरः प्रपातितौ ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = हतं तमीक्ष्यैव विकर्तनात्मजः क्रोधान्वितो भीमसेनं विहाय ।;ययौ प्रमृद्यैव चमूं युधिष्ठिरं रथेऽपरे स्वश्वयुते व्यवस्थितम् ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = न्यवारयेतां शिनिपौत्रपार्षतौ कृष्णासुताः सोमकसङ्घयुक्ताः ।;स तान् समस्तान् विरथान् विधाय युधिष्ठिरं प्राप युतं यमाभ्याम् ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = निहत्य सोऽश्वान् युधि धर्मसूनोर्निरायुधौ तौ च यमौ चकार ।;तानेकयानोपगतान् पुनश्च ममर्द बाणैश्च वचोभिरुग्रैः ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = तदैव मोक्षाय नृपस्य भीमो दुर्योधनं विरथं संविधाय ।;विव्याध मर्मस्वतितीक्ष्णसायकैस्तं दर्शयामास रवेः सुताय ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = शल्यस्तदा धर्मसुतं विहाय कर्णो ययौ तत्र युधिष्ठिरोऽपि ।;गत्वा शनैः शिबिरं तत्र शिश्ये कर्णो यदा राजगृध्नी जगाम ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = द्रौणिः कृपश्चात्र तदैव जग्मतुस्तदा भीमो द्रौणिकर्णौ जगाम ।;कृपो नृपं रथमारोपयच्च विद्धं शरैर्भीमबाहुप्रमुक्तैः ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = नृपं समादाय कृपेऽपयाते भीमार्दितौ द्रौणिकर्णौ शरौघैः ।;विहाय तं जग्मतुः सोमकानां चमूं शरौघैरभिपातयन्तौ ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = अथात्र राजानमचक्षमाणो धनञ्जयो वासुदेवप्रणुन्नः ।;अभ्याययौ पार्षतः स्वां तु सेनां कर्णाहतां वीक्ष्य कुरूनपीडयत् ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = न्यवारयत् समायान्तं कपिप्रवरकेतनम् ।;द्रौणिर्दुःशासनश्चैव धृष्टद्युम्नमवारयत् ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = उभावतिरथौ तौ तु शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् ।;दुःशासनः पार्षतश्च कुर्वन्तौ बाणजं तमः ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = तत्र दुःशासनेनाऽजौ स्तम्भितो द्रुपदात्मजः ।;यतमानोऽपि निर्यत्नः कृतो युद्धे निरायुधः ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = तदाऽभवद् युद्धमतीव दारुणं द्रौणेस्तनूजेन तु वज्रपाणेः ।;तत्रापि बद्धः शरपञ्जरेण पार्थोऽपनुत्ताऽपि हि गाण्डिवज्या ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = पार्थोऽथ कृष्णेधितबाहुवीर्यो(कृष्णैधितबाहुवीर्यो) निहत्य सूतं गुरुपुत्रकस्य ।;छित्वा च रश्मींस्तुरगानमुष्य विद्रावयामास शरैः सुदूरम् ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = अतीत्य पुत्रं तु गुरोः समागते पार्थे कर्णो द्रावयामास सेनाम् ।;पाण्डोः सुतानां शरवर्षधारो दुर्योधनश्चानु ययौ तमेव ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = कर्णमायान्तमालोक्य द्रावयन्तं निजां चमूम् ।;धनुरन्यत् समादाय धृष्टद्युम्नो न्यवारयत् ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = तयोरासीन्महद् युद्धं चिरं सममविश्रमम् ।;तदैव सात्यकिर्वीरो दुर्योधनमवारयत् ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = निवारितः सात्यकिना रणे दुर्योधनो नृपः ।;निहत्य सात्यकेरश्वान् द्रौपदेश्चापमच्छिनत् ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = तदन्तरैव कर्णोऽपि पार्षताश्वानपातयत्(अश्वानघातयत्) ।;तयोर्विरथयोरेव भग्नं तत् पाण्डवं बलम् ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = बलं स्वकीयं बहुधा विभिन्नं(विभग्नं) समीक्ष्य भीमो मृगराजकेतुः ।;कृत्वा धराकम्पकमुग्रनादं रणेऽभ्ययात् कौरवराजसैन्यम् ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = नादेन बाणैश्च वृकोदरेण भग्नं तदा कौरवसैन्यमाशु ।;दिशो विदुद्राव सुयोधनोऽपि कृतो रणे तेन विवाहनायुधः ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव तत् पाण्डवानां च सेना समावृत्ता क्षिप्रमवार्यविक्रमा (समागता क्षिप्रमवार्यवेगा) ।;तया पुनः कौरवाणां बलं तद् भग्नं दूराद् दूरतरं प्रदुद्रुवे ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = हन्यमानं दिशो यातं (पाञ्चाल्यैः)पाञ्चालैर्भीमसंश्रयात् ।;दुर्योधनबलं (सुयोधनबलं) दृष्ट्वा जज्वालाऽधिरथिः(अधिरथः) क्रुधा ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = सोऽमोघं रामदेवत्यमस्त्रं भार्गवसञ्ज्ञितम् ।;सर्वास्त्रनाशकं दिव्यमप्रतिद्वन्द्वमाददे;तच्च भीमपुरोगेषु सैन्येष्वमुचदुब्लणम् ।॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = तदस्त्रं वर्जयामास भीमं रामप्रसादतः ।;अन्ये तु दुद्रुवुः केचिच्छिष्टाः प्रापुर्यमक्षयम् ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = न ह्यस्त्रं द्रवमाणांस्तद्धन्ति तेन सपार्षताः ।;पाञ्चाला द्रौपदेयाश्च शैनेयाद्याश्च सर्वशः ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = पलायनेनोर्वरिता अर्जुनोऽप्यस्त्रमुद्यतम् ।;वीक्ष्य प्रत्यस्त्रहीनं तदप्राप्यैव रवेः सुतम् ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = वासुदेवमिदं प्राह वर्जयित्वैव सूतजम् ।;अन्यत्र यामि नैवास्मादस्त्राज्जीवनमन्यथा ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = इत्यूचिवांसं पार्थं तं कृष्णोऽप्राप्यैव सूतजम् ।;अन्येनैव पथा भीमं प्रापयामास विश्वकृत् ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = तत्रार्जुनोऽवदद् भीमं याहि द्रष्टुं युधिष्ठिरम् ।;प्रवृत्तिं विद्धि भूपस्य मां तु संशप्तका युधे ।;आह्वयन्ति (हतोच्छिष्टाः)हतोच्छेषास्तानहं यामि तद् युधे ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = इत्यूचिवांसं तमुवाच भीमो जानन् स्वबाह्वोर्बलमप्रमेयम् ।;संशप्तकान् सूतजं कौरवंश्च योत्स्येऽहमेकस्त्वमुपैहि भूपम् ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = त्यक्त्वा रणं नाहमितो व्रजेयं न मां वदेत् कश्चन युद्धभीतम् ।;इति ब्रुवाणं तमनन्तशक्तिः प्रीतः कृष्णः प्रशशंसाधिकेष्टम् ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = ययौ युधिष्ठिरं द्रष्टुं शिबिरं सार्जुनो हरिः ।;दृष्ट्वा तौ नृपतिः कर्णं हतं मत्वाऽऽशशंस ह(मत्वा शशंस ह) ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = अभिवाद्य हनिष्यामीत्युक्तः पार्थेन सा क्रुधा ।;भृशं विनिन्द्य बीभत्सुमाह कृष्णाय गाण्डिवम् ।;देहि पुत्रं स राधाया हनिष्यति न संशयः ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = अथवा भीम एवैनं निवृत्ते त्वयि पातयेत् ।;त्वं तु कुन्त्या वृथा सूतः क्लीबो मिथ्याप्रतिश्रवः ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = अहं हि सूतपुत्रेण क्लिष्टो मारुतितेजसा ।;जीवामीत्यग्रजेनोक्त उद्बबर्हासिमुत्तमम् ।;वासुदेवस्तदाऽऽहेदं(वासुदेवस्तमाहेदं) किमेतदिति सर्ववित् ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = तमाह गाण्डिवं दातुं यो वदेत् तद्वधो मया ।;प्रतिज्ञातस्ततो हन्मि नृपमित्याह तं हरिः ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् ।;यत्सतां हितमत्यन्तं तत् सत्यमिति निश्चयः ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = धर्मस्य चरणं(धर्मस्याचरणं) श्रेयो धर्मज्ञानं तु दुष्करम्(सुदुष्करम्) ।;यः सतां धारको नित्यं स धर्म इति निश्चयः ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = कौशिकाख्यो ब्राह्मणो हि लीनं ग्रामजनं क्वचित् ।;तस्करेष्वभिधायैव निरयं प्रत्यपद्यत ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = कश्चिद् व्याधो मृगं हत्वा मातापितृनिमित्ततः ।;भक्षार्थमभ्यगात् स्वर्गमसुरोऽसौ(आसुरोऽसौ) मृगो यतः ।;उपद्रवाय लोकस्य तपश्चरति दुर्मतिः ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् सद्धारको धर्म इति कृत्वा विनिश्चयम् ।;मा नृपं जहि सत्यां त्वङ्कुरु वाचं तिरस्कुरु ।;इत्युक्तो बहुधाऽनिन्दत् क्रोधादेवार्जुनो नृपम् ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = त्वं नृशंसोऽकृतघ्नश्च निर्वीर्यः पुरुषंवदः ।;त्वत्तः सुखं नास्ति किञ्चिन्न मां गर्हितुमर्हसि ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = भीमो मां गर्हितुं योग्यो यो ह्यस्माकं सदा गतिः ।;यो युद्ध्यते सर्ववीरैरद्यापि त्वं तु निन्दकः ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = इत्याद्युक्त्वाऽऽत्मनाशाय विकोशं चकृवानसिम् ।;पुनः कृष्णेन पृष्टः स (पृष्टः सन्) स्वाभिप्रायमुवाच सः ।;तच्छ्रुत्वा गर्हयित्वैनं पुनराह जनार्दनः ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = मतिपूर्वं देहहानात्(देहनाशात्) पापं महदवाप्यते ।;धर्मार्थकाममोक्षाणां साधनं देहतोऽस्ति यत् ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = अतो मा त्यज देहं तु कुरु चाऽत्मप्रशंसनम्(कुरुष्वात्मप्रशंसनम्) ।;वधो गुरूणां त्वङ्कारः स्वप्रशंसैव चात्मनः ।;इत्युक्तः स त्वहङ्काराच्छशंस स्वगुणानलम् ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = इति भावं समुत्पाद्य दोषान् नाशयितुं हरिः ।;कारयामास तत् सर्वमर्जुनेन जगत्पतिः ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = तत एवदविज्ञानात् कुपितो नृपतिर्भृशम् ।;आहास्तु राजा भीमस्त्वं युवा मां जहि च स्वयम् ।;वनं वा विफलो यामीत्युक्त्वोत्तस्थौ स्वतल्पतः ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = तं वासुदेवः प्रतिगृह्य हेतुमुक्त्वा सर्वं शमयामास नेता ।;पार्थश्च भूपस्य पपात पादयोः क्षमापयन् सोऽपि सुप्रीतिमाप ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = तौ भ्रातरौ वासुदेवप्रसादान्महापदो मुक्तिमाप्यातिहृष्टौ ।;भक्त्या समस्ताधिपतिं शशंसतुस्त्वया समः को नु हरे हितो नः ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = ततः प्रणम्य बीभत्सुरग्रजं परिरम्भितः ।;तेनाभिनन्दितः प्रीत्या चाऽशीर्भिः प्रययौ युधे ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = तं शङ्कितं कर्णजये स्विन्नगात्रं हरिस्तदा ।;सङ्कीर्त्य पूर्वकर्माणि नरावेशं विशेषतः ।;व्यञ्जयामास धैर्यं च तस्याऽसीत् तेन सुस्थिरम् ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = भीमस्तदा शत्रुबलं समस्तं विद्रावयामास जघान चाऽजौ ।;वीरान् रणायाभिमुखान् स्वयन्त्रा कुर्वंश्च वार्ता(कुर्वन् स्ववार्ता) रममाण एव ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = तदाऽऽसदत् तं शकुनिः ससैन्यो दुर्योधनस्यावरजैरुपेतः ।;तं भीमसेनो विरथं निरायुधं विधाय बाणैर्भुवि च न्यपातयत् ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = न जघ्निवांस्तं सहदेवभागं प्रकल्पितं स्वेन तदाऽक्षगोष्ठ्या(तदाऽक्षगोष्ठ्याम्) ।;तं मूर्च्छितं श्वासमात्रावशेषं(श्वासमात्रावशिष्टं) दुर्योधनः स्वरथेनापनिन्ये ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनस्यावरजा दशात्र प्रदुद्रुवुर्भीमसेनं विहाय ।;तदाऽर्जुनं वासुदेवं च दृष्ट्वा प्रीतः श्रुत्वा धर्मराजप्रवृत्तिम् ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च निघ्नन्तमरिप्रवीरान् विद्रावयन्तं च निजां वरूथिनीम् ।;ससार दुःशासन आत्तधन्वा भीमोऽपि तं सिंह इवाभिपेदिवान् ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = तं रूक्षवाचो मुहुरर्पयन्तं विधाय भीमो विरथं क्षणेन ।;प्रगृह्य भूमौ विनिपात्य वक्षो विदारयामास गदाप्रहारतः ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = आक्रम्य कण्ठं च पदोदरेऽस्य निविश्य पश्यन् मुखमात्तरोषः(मुखमाप्तरोषः) ।;विकोशमाकाशनिभं विधाय महासिमस्योरसि सञ्चखान ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = कृत्वाऽस्य वक्षस्युरुसत्तटाकं पपौ निकामं तृषितोऽमृतोपमम् ।;तच्छोणिताम्भो भ्रमदक्षमेनं संस्मारयामास पुरा कृतानि ॥ १३८॥ | |||
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| verse_lines = वाक्सायकांश्चास्य पुरा समर्पितान् संस्मारयामास पुनः पुनर्भृशम् ।;दन्तान्तरं न प्रविवेश तस्य रक्तं ह्यपेयं पुरुषस्य जानतः ॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽपि शत्रुप्रतिभीषणाय पपाविवाऽस्वाद्य पुनःपुनर्भृशम् ।;स्मरन् नृसिंहं भगवन्तमीश्वरं स मन्युसूक्तं च ददर्श भक्त्या ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = ‘यस्ते मन्यो'’ (ऋ.१०.८३.१) इत्यतो नारसिंहं सोमं तस्मै चाऽर्पयच्छोणिताख्यम्(प्रार्पयच्छोणिताख्यम्)।;युद्धाख्ययज्ञे सोमबुद्ध्याऽरिवक्ष ईहेति साम्ना गदया विभिन्दन् ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = उवाच वाचं पुरुषप्रवीरः सत्यां प्रतिज्ञां लोकमध्ये विधाय ।;याः सपतयस्ता अपतयो हि जाता यासाऽपतिः(याऽऽसाऽपतिः सा) सा सपतिश्च जाता ॥ १४२॥ | |||
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| verse_lines = पश्यन्तु चित्रां परमस्य शक्तिं ये वै तिलाः षण्ढतिला बभूवुः ।;एनं गृहीतं च(हि) मया यदीह कश्चित् पुमान् मोचयतु स्ववीर्यात् ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = इति ब्रुवाणः पुनरेव रक्तं पपौ सुधां देववरो यथा दिवि ।;पुनश्च सप्राणममुं(सप्राणमेनं) विसृज्य नदन् ननर्तारिबले निरायुधः ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्यनृत्यन् येऽस्मान् पुनर्गौरिति गौरिति ।;तान् वयं प्रतिनृत्यामः पुनर्गौरिति गौरिति ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = इति ब्रुवन् नृत्यमानोऽरिमध्य आस्फोटयञ्छत्रुगणानजोहवीत् ।;शशाक च द्रष्टुममुं न कश्चिद् वैकर्तनद्रौणिसुयोधनादिषु ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = भयाच्च कर्णस्य पपात कार्मुकं निमीलयामास तदाऽक्षिणी च ।;सम्बोधितो मद्रराजेन युद्धे स्थितः कथञ्चित् स तु पार्थभागः ॥ १४७॥ | |||
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| verse_lines = द्रौणिर्विहायैनमपाजगाम(विहायैतमपाजगाम) दूरं तदा भीमसेनो जगाद ।;पीतः सोमो युद्धयज्ञे मयाऽद्य वध्यः पशुर्मे हरये सुयोधनः ॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = इति ब्रुवन् मृतमुत्सृज्य शत्रुं दुर्योधनं चाऽशु रुषाऽभिदुद्रुवे ।;आयान्तमीक्ष्यैव तमुग्रपौरुषं दुद्राव भीतः स सुयोधनो भृशम् ॥ १४९॥ | |||
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| verse_lines = बलद्वयं चापययौ विहाय भयाद् भीमं कृष्णपार्थौ विनैव ।;आयोधनं शून्यमभून्मुहूर्तं ननर्त भीमो व्याघ्रपदेन हर्षात् ॥ १५०॥ | |||
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| verse_lines = सङ्कल्प्य शत्रून् गोवदेवाऽजिमध्ये शार्दूलवत् तच्चरितं निशाम्य ।;जहास कृष्णश्च धनञ्जयश्च शशंसतुश्चैनमतिप्रहृष्टौ ॥ १५१॥ | |||
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| verse_lines = यदा स रङ्गः पवमानसूनुना शून्यः कृतस्तत्र महूर्तमात्रात् ।;दुर्योधनस्यावरजाः शरौघैरवीवृषन् भीममुदारसत्त्वम् ॥ १५२॥ | |||
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| verse_lines = तान् मारुतिर्बाणवरैर्निकृत्तशीर्षान् यमायानयदाशु वीरः ।;तस्मिन् दिने विंशतिर्धार्तराष्ट्र हतास्तदन्ये समरात् प्रदुद्रुवुः ॥ १५३॥ | |||
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| verse_lines = कर्माण्यनन्यौपयिकानि(कर्माण्यनन्यौपधिकानि) भीमे कुर्वत्येवं (भीमभीते)भीतभीतेऽरिसङ्घे ।;निमीलिताक्षे च भयेन कर्णे कर्णात्मजो नकुलं प्रत्यधावत् ॥ १५४॥ | |||
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| verse_lines = माद्रीसुतो वृषसेनं शरौघैरवारयत् तं विरथं चकार ।;कर्णात्मजः सोऽप्यसिचर्मपाणिस्तस्यानुगांस्त्रिसहस्रं जघान ॥ १५५॥ | |||
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| verse_lines = पक्षग्रहास्तत्र सुरासुरास्तयोरन्ये च जीवा गगनं समाश्रिताः ।;महान् विवादोऽप्यभवत् तयोः कृते तदा गिरीशोऽवददब्जयोनिम् ॥ १५८॥ | |||
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| verse_lines = सुरासुराणां भीमदुर्योधनौ द्वौ समाश्रयौ तत्प्रियौ कर्णपार्थौ ।;प्राणोपमौ तेन चैतत्कृते ते सुरासुराः कर्तुमिच्छन्ति युद्धम् ।;तदा विनाशो जगतां महान् स्यात् तेनानयोः(तेनैतयोः) सममेवास्तु युद्धम् ॥ १५९॥ | |||
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| verse_lines = इतीरिते वासवः पद्मयोनिं जगाद कृष्णो यत्र जयश्च तत्र ।;कामो न कृष्णस्य मृषा भवेद्धि कामोऽस्य पार्थस्य जयं प्रदातुम् ॥ १६०॥ | |||
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| verse_lines = इत्यूचिवान् वासवः फल्गुनस्य जयोऽस्तु कर्णस्य वधस्तथेति ।;उक्त्वाऽनमत् कञ्जभवं तथेति प्राहासुरान् देवताश्चाऽबभाषे ॥ १६१॥ | |||
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| verse_lines = न कर्णार्जुनयोरर्थे विरोधं कुरुत क्वचित् ।;भीमदुर्योधनार्थे वा पश्यन्त्वेव च सङ्गरम् (संयुगम्) ।;इत्युक्ते शान्तिमापन्ना ददृशुः सङ्गरं तयोः ॥ १६२॥ | |||
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| verse_lines = ववर्षतुस्तौ च महास्त्रशस्त्रैर्भीमो रथस्थोऽवरजं जुगोप ।;शैनेयपाञ्चालमुखाश्च पार्थमावार्य तस्थुः प्रसभं नदन्तः ॥ १६३॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनो द्रौणिमुखाश्च कर्णं ररक्षुरावार्य तदाऽऽस युद्धम् ।;तत्रार्जुनं बाणवरैः(बाणगणैः) स कर्णः सम्मर्दयामास(समर्दयामास) विशेषयन् रणे ॥ १६४॥ | |||
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| verse_lines = तदा नदन् भीमसेनो जगाद गदां समादाय समात्तरोषः ।;अहं वैनं गदया पोथयामि त्वं वा जहीमं समुपात्तवीर्यः ।;कृष्णोऽपि तं बोधयामास सम्यङ् नरावेशं व्यञ्जयन् भूय एव ॥ १६५॥ | |||
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| verse_lines = समृद्धवीर्यः स तदा धनञ्जयः सुयोधनद्रौणिकृपान् सभोजान् ।;साकं च बाणैर्विरथांश्चकार विव्याध तानप्यरिहा सुपुङ्खैः ॥ १६६॥ | |||
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| verse_lines = ते किञ्चिद् दूरतस्थुः पश्यन्तो युद्धमुत्तमम् ।;अमानुषं तत् पार्थस्य दृष्ट्वा कर्म गुरोः सुतः ।;गृहीत्वा पाणिना पाणिं दुर्योधनमभाषत ॥ १६७॥ | |||
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| verse_lines = दृष्टं हि भीमस्य बलं त्वयाऽद्य तथैव पार्थस्य यथा जिता वयम् ।;अलं विरोधेन समेत्य पाण्डवैः प्रशाधि राज्यं च मया समेतः ॥ १६८॥ | |||
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| verse_lines = धनञ्जयस्तिष्ठति वारितो मया जनार्दनो नैव विरोधमिच्छति ।;वृकोदरस्तद्वचने स्थितः सदा युधिष्ठिरः शान्तमनास्तथा यमौ ॥ १६९॥ | |||
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| verse_lines = हितार्थमेतत् तव वाक्यमीरितं गृहाण मे नैव भयादुदीरितम् ।;अहं ह्यवध्यो मम चैव मातुलो न शङ्कितुं मे वचनं त्वमर्हसि ॥ १७०॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः प्राह सुयोधनस्तं दुःशासनस्याद्य पपौ हि शोणितम् ।;शार्दूलचेष्टामकरोच्च भीमो न मे कथञ्चित् तदनेन सन्धिः ॥ १७१॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो द्रौणिरासीत् स तूष्णीं कर्णधनञ्जयौ ।;महास्त्रशस्त्रवर्षेण चक्रतुः खं निरन्तरम् ॥ १७२॥ | |||
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| verse_lines = आग्नेयवारुणैन्द्रादीन्येतान्यन्योन्यमृत्यवे ।;ब्रह्मास्त्रमप्युभौ तत्र प्रयुज्याऽनदतां रणे ।;अन्योन्यास्त्रप्रतीघातं कृत्वोभौ च विरेजतुः ॥ १७३॥ | |||
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| verse_lines = क्रमेण वृद्धोरुबलेन तत्र सुरेन्द्रपुत्रेण विरोचनात्मजः ।;निराकृतो नागमयं शरोत्तमं ब्रह्मास्त्रयुक्तं विससर्ज वासवौ ॥ १७४॥ | |||
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| verse_lines = तं वासुदेवो रथमानमय्य मोघं चकारार्जुनतः किरीटम् ।;चूर्णीकृतं तेन सुरेन्द्रसूनोर्दिव्यं ययौ(दिवं ययौ) बाणगतश्च नागः ॥ १७५॥ | |||
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| verse_lines = नमिते(नमितं) वासुदेवेन रथे पञ्चाङ्गुलं भुवि ।;अपाङ्गदेशमुद्दिश्य मुक्ते नागे किरीटिनः ॥ १७६॥ | |||
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| verse_lines = भङ्क्त्वा किरीटं वियति गच्छति प्रभुणोदितः ।;बाणैस्तक्षकपुत्रं तं वासविः पूर्ववैरिणम् ।;हत्वा निपातयामास भूमौ कर्णस्य पश्यतः॥ १७७॥ | |||
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| verse_lines = पुनश्च पार्थेन महास्त्रयुद्धं प्रकुर्वतः सूर्यसुतस्य चक्रम् ।;रथस्य भूमिर्ग्रसति स्म शापादस्त्राणि दिव्यानि च विस्मृतिं ययुः ॥ १७९॥ | |||
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| verse_lines = उद्धर्तुकामो रथचक्रमेव पार्थं ययाचेऽवसरं प्रदातुम् ।;नेत्याह कृष्णोऽञ्जलिकं सुघोरं त्रिनेत्रदत्तं जगृहे च पार्थः ॥ १८०॥ | |||
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| verse_lines = सत्येन धर्मेण च सन्नियोज्य मुमोच कर्णस्य वधाय बाणम् ।;चिच्छेद तेनैव च तस्य शीर्षं सन्धित्सतो बाणवरं सुघोरम् ॥ १८१॥ | |||
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| verse_lines = अपराह्णेऽपराह्णस्य सूतजस्येन्द्रसूनुना ।;छिन्नमञ्जलिकेनाऽजौ सोत्सेधमपतच्छिरः ॥ १८२॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् हते दीनमुखः सुयोधनो ययौ समाहृत्य(समागत्य) बलं सशल्यः ।;युधिष्ठिरः कर्णवधं निशम्य तदा समागत्य ददर्श तत्तनुम् ॥ १८३॥ | |||
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| verse_lines = शशंस कृष्णं च धनञ्जयं च भीमं च येऽन्येऽपि युधि प्रवीराः ।;गत्वा च ते शिबिरं मोदमाना ऊषुः सकृष्णास्तदनुव्रताः सदा ॥ १८४॥ | |||
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<span id="gr-C28" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टाविंशोऽध्यायः"></span> | |||
== अष्टाविंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = ओं ॥ प्रभातायां तु शर्वर्यां गुरुपुत्रानुमोदितः ।;शल्यं सेनापतिं कृत्वा योद्धुं दुर्योधनोऽभ्ययात् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = तमभ्ययुः पाण्डवाश्च हृष्टा युद्धाय दंशिताः (दंसिताः) ।;तत्राऽसीत् सुमहद् युद्धं पाण्डवानां परैः सह ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = अग्रे भीमः पाण्डवानां मध्ये राजा युधिष्ठिरः ।;पृष्ठे गाण्डीवधन्वाऽऽसीद् वासुदेवाभिरक्षितः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = चक्ररक्षौ यमौ राज्ञो धृष्टद्युम्नश्च सात्यकिः ।;नृपस्य पार्श्वयोरास्तामग्रेऽन्येषां गुरोः सुतः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = मध्ये शल्यः पृष्ठतोऽभूद् भ्रातृभिश्च सुयोधनः ।;चक्ररक्षौ तु शल्यस्य(तस्यास्तां) शकुनिस्तत्सुतस्तथा ।;कृपश्च कृतवर्मा च पार्श्वयोः समवस्थितौ(समुपस्थितौ) ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = तत्रभवन्महद् युद्धं भीमस्य द्रौणिना सह ।;राज्ञः शल्येन च तथा घोररूपं भयानकम् ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = तत्र नातिप्रयत्नेन द्रौणिर्भीमेन सायकैः ।;विरथीकृतस्तथा धर्मसूनुः शल्येन तत्क्षणात् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = आससाद तदा शल्यं कपिप्रवरकेतनः ।;तयोरासीन्महद् युद्धमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = रथमन्यं समास्थाय द्रौणिर्भीमं समभ्ययात् ।;दुर्योधनश्च भीमस्य शरैरवारयद् दिशः ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = तावुभौ शरवर्षेण वारयामास मारुतिः ।;ताभ्यां तस्याभवद् युद्धं सुघोरमतिमानुषम् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनस्यावरजान् द्रौपदेया युयुत्सुना ।;शिखण्ड्याद्यैर्मातुलैश्च सह सर्वान् न्यवारयन् ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = सहदेवस्तु शकुनिमुलूकं नकुलस्तदा(तथा) ।;धृष्टद्युम्नश्च हार्दिक्यं सात्यकिः कृपमेव च ।;तेषां तदभवद्(तदाऽभवत्) युद्धं चित्रं(चिरं) लघु च सुष्ठु च ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = शल्यस्तु शरसङ्घातैः पार्थस्यावारयद् दिशः ।;सोऽपि विव्याध विशिखैः शल्यमाहवशोभिनम् ।;तयोः सुसममेवाऽसीच्चिरं देवासुरोपमम् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = ततः शरं वज्रनिभं मद्रराजः समाददे ।;तेन विव्याध बीभत्सुं हृदये स मुमोह च ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = उपलभ्य पुनः सञ्ज्ञां वासविः शत्रुतापनः ।;चिच्छेद कार्मुकं सङ्खे मद्रराजस्य धीमतः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = सोऽन्यत् कार्मुकमादाय मुमोचास्त्राणि फल्गुने ।;सौरं याम्यं च पार्जन्यं तान्यैन्द्रेण जघान सः ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = पुनर्न्यकृन्तत् तच्चापमिन्द्रसूनुरमर्षितः ।;शल्यो गदां समाधाय चिक्षेपार्जुनवक्षसि ।;तदा मुमोह बीभत्सुस्तत उच्चुक्रुशुः परे ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = प्राप्य सञ्ज्ञां पुनः पार्थः शल्यं विव्याध वक्षसि ।;स विह्वलितसर्वाङ्गः शिश्रिये ध्वजमुत्तमम् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = समाश्वस्तः पुनर्बाणं यमदण्डनिभं(यमदण्डोपमं) रणे ।;मुमोच पार्थस्य स च निर्बिभेद स्तनान्तरम् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = तेन विह्वलितः पार्थो ध्वजयष्टिं समाश्रितः ।;समाश्वस्तः प्रचिच्छेद मद्रराजस्य कार्मुकम् ।;छत्रं ध्वजं च तरसा सारथिं च न्यपातयत् ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = निहत्याश्वान् सात्यकेश्च धृष्टद्युम्नस्य चाभिभूः ।;चापे च्छित्त्वा च यमयोर्दध्मौ शङ्खं महास्वनम् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु शल्यं समुदीर्यमाणं दृष्ट्वा रणे भीमसेनस्तरस्वी(भीमसेनस्तपस्वी) ।;न्यवारयद् बाणवरैरनेकैश्चकार चैनं विरथं क्षणेन ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = आत्तान्यात्तान्यायुधान्यस्य भीमः सर्वाणि चिच्छेद बिभेद चास्य ।;मर्माणि बाणैर्नितरां पुनश्च स मुष्टिमुद्यम्य जगाम धर्मजम् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = तं भीमभिन्नमर्माणं विवर्माणं निरायुधम् ।;श्वासमात्रावशिष्टं च मरणायैव केवलम् ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = आत्मानमभिगच्छन्तं दृष्ट्वाऽन्यं रथमास्थितः ।;हन्तुकामो रणे वीरममोघां शक्तिमाददे ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = दिव्यास्त्रैरपि संयोज्य तां तदा धर्मनन्दनः ।;सत्यधर्मफलैश्चैव चिक्षेपास्य हृदि त्वरन् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = स भिन्नहृदयो भूमौ पपाताभिमुखो नृपम् ।;सत्यधर्मरतः शल्य इन्द्रस्यातिथितामगात् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = मद्रराजे हते वीरे सुशर्माऽर्जुनमभ्ययात् ।;संशप्तकावशिष्टैस्तमनयन्मृत्यवेऽर्जुनः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनस्यावरजानवशिष्टान् वृकोदरः ।;सर्वान् जघान सेनां च निश्शेषमकरोद् रणे ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = उलूकं सहदेवोऽथ शकुनिं चातिपापिनम् ।;जघान द्रौणिहार्दिक्यकृपान् भीमार्जुनौ ततः ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = बहुशो विरथीकृत्य पीडयित्वा पुनःपुनः ।;द्रावयामासतुस्ते तु भीषिता विविशुर्वनम् ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = शैनेयेन गृहीतोऽथ सञ्जयोऽनन्तशक्तिना ।;व्यासेन मोचितोऽथैकः पार्थान् दुर्योधनोऽभ्ययात् (दुर्योधनोऽभ्यगात्)॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = तेषामभूत् तस्य च घोररूपं युद्धं स बाणैर्बहुशोऽर्जुनं च ।;चकार मूर्च्छाभिगतं युधिष्ठिरं यमावयत्नाद् विरथांश्चकार ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = तं भीमसेनो विरथं चकार गजं समारुह्य पुनः समभ्ययात् ।;पुनश्च शैनेयशिखण्डिपार्षतान् यमौ नृपं च व्यदधान्निरायुधान् ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = गजे च भीमेन शरैर्निपातिते समारुहद् वाजिवरं सुनिर्भयः ।;स तेन च प्रासकरो रणेऽरिहा चचार शैनैयमताडयच्च ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = मुमोह तेनाभिहतः स सात्यकिर्यमावपि प्रासनिपीडितौ रथे ।;निषीदतुर्धर्मसुतं प्रयान्तं समीक्ष्य भीमोऽस्य जघान वाजिनम् ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = प्रासे निकृत्ते च वृकोदरेण विवाहनः सोऽपि(सोऽप ययौ) ययौ सुयोधनः ।;आदाय गुर्वीं च गदां प्रयातो द्वैपायनस्योरुसरो विवेश ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = एवमक्षोहिणीषट्कं भीमेन निहतं रणे ।;पञ्च पार्थेन निहता अर्द्धं कालिङ्गकानृते ।;एकादशाक्षोहिणीभ्यः(अक्षौहिणीभ्यः) शिष्टमन्यैर्निसूदितम् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = अक्षौहिणीचतुष्कं च पार्थानां द्रौणिना हतम् ।;अन्यैरन्याः समस्तैश्च द्रोणकर्णमहाव्रताः ।;दुर्योधनो भौमसूनुः प्रायः सेनाहनः क्रमात् ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = जयं लब्ध्वा तदत्सूच्चैः पाण्डवेषु महात्मसु ।;दुर्योधनो जलस्तम्भं कृत्वा मन्त्रान् जजाप ह ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = मन्त्रा दुर्वाससा दत्ता मृतसञ्जीवनप्रदाः ।;जले स्थित्वा जपन् सप्तदिनैः सर्वान् मृतानपि ।;उद्धरेद् धार्तराष्ट्रोऽयं स्युरवध्याश्च ते पुनः ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = इति विद्याबलं तस्य ज्ञात्वा पाण्डुसुतास्ततः ।;अन्विष्यन्तः (अन्वेषन्तः) शुश्रुवुश्च व्याधेभ्यस्तं जले स्थितम् ।;आगच्छंश्च ततस्तत्र पुरस्कृत्य जनार्दनम् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = तदा जलात् समुन्मज्ज्य त्रिभिर्द्रौणिपुरस्सरैः ।;मन्त्रयन्तं(मन्त्रयन्तः) स्म ददृशुस्तान् दृष्ट्वा ते प्रदुद्रुवुः ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = दुर्योधनोऽविशत् तोयं दृष्ट्वा तं केशवाज्ञया ।;युधिष्ठिरः सुपरुषैर्वाक्यैरेनमथाऽह्वयत् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = अमर्षितोऽसौ धृतराष्ट्रपुत्रः श्वसंस्तदा दण्डहतो यथाऽहिः ।;उवाच शाठ्यात् तपसे वनाय यायां भवाञ्छासतु सर्वपृथ्वीम् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = तमाह धर्मजो राजा यस्त्वं कृष्णे समागते ।;सूच्यग्रवेध्यां पृथिवीं दातुं नैच्छः कथं पुनः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = घातयित्वा सर्वपृथ्वीं भीष्मद्रोणमुखानपि ।;दातुमिच्छसि सर्वान् त्वं पृथ्वीं नाद्य वयं पुनः ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = अहत्वा प्रतिगृह्णामि एहि युद्धे स्थिरो भव ।;न कुरूणां कुले जातो ह्यस्त्वं भीतो ह्यपोऽविशः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादि रूक्षवचनं श्रुत्वा दुर्योधनो रुषा ।;जलस्तम्भात् समुत्तस्थौ श्वसन्नाशीविषो यथा ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = उवाच एक एवाहमकिरीटो विवर्मकः ।;भवन्तो बहवो वर्मशिरस्त्राणयुता अपि ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = यद्येवमपि मे युद्धं भवद्भिर्मन्यसे समम् ।;सर्वैरेकेन वा युद्धं करिष्ये न च भीर्मम ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आह धर्मात्मा वर्माद्यं च ददामि ते ।;वृणीष्व प्रतिवीरं च पञ्चानां यं त्वमिच्छसि ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = हत्वैकं त्वं भुङ्क्ष्व राज्यमन्ये याम वयं वनम् ।;हते वा त्वयि तेनैव भुञ्जीमश्चाखिलां भुवम् ।;आदत्स्व(आधत्स्व) चाऽयुधं येन जेतुमिच्छसि शात्रवान् ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त ऊचे नहि दुर्बलैरहं योत्स्ये चतुर्भिर्भवदर्जुनादिभिः ।;भीमेन योत्स्ये गदया सदा हि मे प्रिया गदा नान्यदथाऽयुधं स्पृशे ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽस्य वाक्यं रभसो(रभसा) वृकोदरो गदां तदाऽध्यर्द्धभराधिकां(तदध्यर्धभराधिकां) मुदा ।;राज्ञो गदायाः परिगृह्य(प्रतिगृह्य) वीरः समुत्थितो युद्धमनाः समुन्नदन् ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह नारायण आदिदेवो युधिष्ठिरं कष्टमिदं कृतं त्वया ।;नह्येष राजा गदया रणे चरन् शक्यो विजेतुं निखिलैः सुरासुरैः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = स निश्चयाद् वश्चतुरो निहन्यात् सहार्जुनान् भीमसेनः कथञ्चित् ।;हन्तैनमाजौ नहि भीमतुल्यो बले क्वचिद् धार्तराष्ट्रः कृती च ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = अधर्म इति तत् कृष्णो लोकनिन्दानिवृत्तये ।;आपद्धर्मं दर्शयितुं किञ्चिद्व्याजेन संयुतः ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = भीमो हन्याद् धार्तराष्ट्रमित्यूचे यद्यपि स्फुटम् ।;अव्याजेनापि शक्तोऽसौ बलं निस्सीममाह च ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = ततो भीमः सर्वलोकस्य धर्मं प्रकाशयन् वाक्यमिदं जगाद ।;ऊरू तवाहं (हि) च यथाप्रतिज्ञं(यथा प्रतिज्ञा) भेत्स्यामि नैवात्र विचारणीयम् ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवन्तं(इति ब्रुवन्तं) प्रससार चाऽजौ दुर्योधनस्तत्र बभूव युद्धम् ।;भीमस्तदाऽग्र्यप्रकृतिं विधित्सुर्मन्दः स आजौ व्यचरज्जनार्थे ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = वारितावपि तेनोभौ नैव युद्धं प्रमुञ्चताम्(व्यमुञ्चताम्) ।;ततो ददर्श तद् युद्धं मानितः कृष्णपूर्वकैः ।;तौ शिक्षाबलसंयुक्तौ मण्डलानि विचेरतुः ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = ततो(तत्र) भीमं वञ्चयितुं धार्तराष्ट्रः शिरः क्षितौ ।;(व्यधाद्) न्यधादुच्छ्रितसक्थीकस्तदा कृष्णाभ्यनुज्ञया ।;पृष्ठमूलेऽहनद् भीमो भिन्नसक्थिश्च सोऽपतत् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिज्ञापालनार्थाय नाभेर्नोपर्यधस्तदा ।;गदायुद्धस्य मर्यादां यशश्चाप्यभिरक्षितुम् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = नाधस्तान्मध्य एवासौ निजघ्ने तं वृकोदरः ।;एवं प्रतिज्ञायुग्मार्थं भग्नं(भिन्न) सक्थियुगं रणे ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णं द्यूते निधेहीति यदवादीत्(यदवादि) सुयोधनः ।;तत्प्रतिज्ञानुसारेण भीमो मूर्द्धानमक्रमीत् ।;‘ऋषभम् मा समानानां’ (ऋग्वेद १०.१६६.१) इति सूक्तं ददर्श च(ह) ॥ ७४॥ (ऋषभम् मा समानानां सपत्नानां विषासहिम् ।;हन्तारं शत्रूणां कृधि विराजं गोपतिं गवाम् ॥) | |||
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| verse_lines = तेषां पुण्यानि विद्याश्च समादायैव सर्वशः ।;तांश्चकार तमोगन्तॄंस्तस्य मूर्ध्नि पदाऽऽक्रमन् ॥ ७५॥ (योगक्षेमं व आदायाहम् भूयासम् उत्तम आ वो मूर्धानम् अक्रमीम् । ऋग्वेद १०.१६६.५) | |||
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| verse_lines = स्मारयामास कर्माणि यानि तस्य कृतानि च ।;कृष्णबन्धे कृतो मन्त्र इति मूर्ध्नि पदाऽहनत् ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = पुनःपुनश्च तद् वीक्ष्य चुक्रोध मुसलायुधः ।;चुक्रोश नैव धर्मोऽयमित्यसावूर्ध्वबाहुकः ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = पुनः क्रोधाभिताम्राक्ष(क्रोधातिताम्राक्षः) आदाय मुसलं हलम् ।;अभिदुद्राव भीमं तं न चचाल वृकोदरः ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = अभये संस्थिते भीमे रामं जग्राह केशवः ।;आह धर्मेण निहतो भीमेनायं सुयोधनः ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = न मण्डलेऽभिसारे वा नापसारे च नाभितः ।;अधो हन्याद् वञ्चयन्तमधो हत्वा न दुष्यति ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = कृता प्रतिज्ञा च वृकोदरेण भेत्स्ये तवोरू इति युक्तिपूर्वम्(पूर्वकम्) ।;संश्रावयानेन तदेष धर्मतो जघान दुर्योधनमग्र्यकर्मा ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = वासुदेववचः श्रुत्वा धर्मच्छलमिति ब्रुवन् ।;रौहिणेयो जगामाऽशु स्वपुरीमेव सानुगः ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् गते वासुदेवं समपृच्छद् युधिष्ठिरः ।;धर्मोऽयमथवाऽधर्म इति तं प्राह केशवः ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = न साक्षाद् धर्मतो वध्या ये तु पापतमा नराः ।;देवैर्हि वञ्चयित्वैव हताः पूर्वं सुरारयः ।;अतोऽयमप्यधर्मेण हतो नात्रास्ति दूषणम् ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मद्रोणौ च कर्णश्च यदैवोपधिना(यथैवोपाधिना) हताः ।;को नु दुर्योधने पापे हते दोषः कथञ्चन ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = प्रतिज्ञापालनायापि विभेदोरू वृकोदरः ।;धर्मतश्च प्रतिज्ञेयं कृतानेनानुरूपतः (तेनानुरूपतः) ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = लोकतोऽपि न धर्मस्य हानिरत्र कथञ्चन ।;ये भीमस्याप्रभावज्ञा आपद्धर्मं च मन्वते ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = अवध्यत्वे शिववराद् गदाशिक्षाबलादपि ।;जरासन्धोपमो यस्माद् धार्तराष्ट्रः सुविश्रुतः(धृतराष्ट्र इति श्रुतः) ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् सद्धर्म एवायं भीमचीर्ण इति ब्रुवन् ।;अपि संशयिनं चक्रे धर्मराजं जगत्पतिः ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = भूभारक्षतिजो धर्मो मच्छुश्रूषात्मकश्च यः ।;भीमस्यैव भवेत् सम्यगिति बुद्ध्या परः प्रभुः ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = स्वेनैव बलभद्राय जनाय च पुनःपुनः ।;श्रुत्वाऽप्युक्तं न तत्याज संशयं धर्मजो यतः ।;ततोऽप्यसंशयं कृष्णो न चकार युधिष्ठिरम् ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = मुख्यं धर्मं(मुख्यधर्मं) हि भगवान् बलायाऽह जनाय च ।;धर्मेणैव हतो राजा धार्तराष्ट्रः सुयोधनः ।;इति यद् वक्ष्यति पुनर्निश्चयार्थेऽर्जुनाय च ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = पुनःपुनर्धर्मत एव भीमो जघान राजानमिति ब्रुवन्तम् ।;जगाद कृष्णं स्फुरिताधरोष्ठः क्रोधात् सुपापो धृतराष्ट्रसूनुः ।;त्वयैव पापे निहिता हि पार्थाः पापाधिकस्त्वं हि सदैक एव ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = इत्यूचिवांसं प्रजगाद कृष्णो न त्वत्समः पापतमः कदाचित् ।;भीष्मादिहत्याऽपि तवैव पापं यदन्वयुस्त्वामतिपापनिश्चयम् ।;पापं च पापानुगतं(पापानुचरं) च हत्वा कथञ्चनाप्यस्ति नचैव पापम् ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = न पाण्डवेष्वस्ति ततो हि किञ्चित् पापं प्रयत्नाच्च निसर्गतोऽपि ।;गुणाधिकास्ते मदुपाश्रयाच्च को नाम तेष्वण्वपि पापमाह ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = निसर्गतः पापतमस्त्वमन्यान् धर्मस्थितान् पापपथे निधाय ।;स्वयं च पापे निरतः सदैव पापात् सुपापां गतिमेव यासि ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = इति ब्रुवन्तं पुनराह कृष्णं दुर्योधनः पापकृतां प्रधानः ।;स्वन्तोत्तमो(गुणोत्तमो) नाम क एव मत्तः को नाम दोषोऽस्ति मया कृतोऽत्र ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = इष्टं च यज्ञैश्चरितं च पूर्तैः पदं रिपूणां निहितं च मूर्ध्नि(मूर्धनि) ।;मृत्युश्च सङ्ग्रामशिरस्यवाप्तो रणोन्मुखेनैव मया किमन्यत् ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = इष्टा भोगा मया भुक्ताः प्राप्ता च परमा गतिः ।;दुःखिनो दुःखमाप्स्यन्ति पार्थास्ते कूटयोधिनः ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = चन्द्रसूर्यनिभैः(चन्द्रार्कसन्निभैः) शूरैर्धार्मिकैः सद्भिरुज्झिता ।;केवला रत्नहीनेयं पाण्डवैर्भुज्यतां मही ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवत्येव नृपे सुरेशैः प्रसूनवृष्टिर्विहिता पपात ।;तामेव बुद्धिं धृतराष्ट्रसूनोः कृत्वा दृढां पातयितुं तमोऽन्धे ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = यदैकैकमलं तत्र दुःखाधिक्यं समुच्चयात् ।;इति तत् कारयित्वेश आह मोघं तवाखिलम् ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = वदन् पुनःपुनरिदं धर्मतो हत इत्यपि ।;ख्यापयामास भगवान् जने निजजनेष्टदः ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = प्रख्यापिते वासुदेवेन धर्मे सतां सर्वेषां हृद्यमासीत् समस्तम् ।;हतं च धर्मेण नृपं व्यजानन् पापोऽयमित्येव विनिश्चितार्थाः ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरोऽपापदर्शी (अपायदर्शी) सदैव ससंशयोऽभूत् सुमनोऽभिवृष्ट्या ।;स्नेहाद् द्रौणिः सञ्जयो रौहिणेयो दौर्योधनात् पापमित्येव चोचुः ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = ततः कृष्णः पाण्डुपाञ्चालकैस्तैर्भृशं नदद्भिर्हृषितैः समेतः ।;ययौ विरिञ्चेशसुरेन्द्रमुख्यैः सम्पूजितस्तैश्च रणाङ्गणात् स्मयन् ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = ततः श्रुत्वा सञ्जयाद् दुःखतप्तं सम्बोधयिष्यन् पितरं युयुत्सुः ।;कृष्णस्य राज्ञश्च मतेऽनुयातो(मतेन यातः) जगाम चान्वेव जनार्दनश्च ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = धर्मयुक्तैश्च तत्त्वार्थैर्लोकवृत्तानुदर्शकैः ।;वाक्यै राजानमाश्वास्य प्रायात् पार्थान् पुनर्हरिः ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = तदैव हार्दिक्यकृपान्वितोऽयात् सुयोधनं द्रौणिरमुं शयानम् ।;प्रभग्नसक्थिं श्वसृगालभूतैः सम्भक्ष्यमाणं ददृशे श्वसन्तम् ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = स दुःखशोकाभिहतो विनिन्द्य पार्थान् मया भूप किमत्र कार्यम् ।;इत्याह निष्पाण्डवतां कुरुष्वेत्यमुं व्यधात् पांस्वभिषेकिणं नृपः ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = उच्छिद्य सन्ततिं पाण्डोः कृत्वा स्वक्षेत्रसन्ततिम् ।;तया भूरक्षणहृदा सोऽभिषिक्तस्तथेत्यगात् ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = स कृष्णभीमपार्थानां भयादेव पुनर्वनम् ।;कृपसात्वतसंयुक्तो विवेश गहनं रथी ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = तस्य चिन्तयतो द्रोणवधं दुर्योधनस्य च ।;नाऽगान्निद्रा निशीथे च ध्वाङ्क्षान् न्यग्रोधवासिनः ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = हतान् सुबहुसाहस्रानेकेनातिबलेन तु ।;कौशिकेन निरीक्ष्यैव प्राह तौ कृपसात्वतौ ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = निदर्शनेन ह्येतेन(ह्येनेन) प्रेरितः परमात्मना ।;यामि पाण्डुसुतान् हन्तुमित्युक्त्वाऽऽरुरुहे रथम् ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = निवारितोऽपि ताभ्यां स प्राद्रवच्छिबिरं प्रति ।;अनुजग्मतुस्तावपि तं शिबिरद्वारि चैक्षत ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = उग्ररूपधरं रुद्रं स्वकीयां तनुमेव सः ।;परीतं वासुदेवेन बहुकोटिस्वरूपिणा ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव वासुदेवं तमत्रसद् गौतमीसुतः ।;वासुदेवाज्ञयैवात्र स्वात्मनाऽपि सदाशिवः ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = अयुद्ध्यदग्रसच्चाऽशु द्रौणेः सर्वायुधान्यपि ।;अचिन्त्या हरिशक्तिर्यद्(हरिशक्तिर्हि) दृश्यन्तेऽऽत्महनोऽपि हि ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = अतस्तया प्रेरितेन स्वात्मनैवाखिलेष्वपि ।;आयुधेषु निगीर्णेषु द्रौणिर्यज्ञं तु मानसम् ।;चक्रेऽऽत्मानं पशुं कृत्वा स्वात्मस्थायैव विष्णवे ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = यज्ञतुष्टेन(यज्ञे तुष्टेन) हरिणा प्रेरितः शङ्करः स्वयम् ।;आत्मने द्रोणपुत्राय ददौ सर्वायुधानि च ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = उवाच चाहमादिष्टो विष्णुना प्रभविष्णुना ।;अरक्षं पार्थशिबिरमियन्तं कालमेव तु ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = तदिच्छयैव निर्दिष्टो दास्ये मार्गं तवाद्य च ।;आयुधानि च सर्वाणि हन्तुं(जहि) सर्वानिमान् जनान् ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = इत्युदीर्य प्रदायाऽशु सर्वा हेतीर्वृषध्वजः ।;तत्रैवान्तर्दधे सोऽपि प्रोवाच कृपसात्वतौ ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = ये निर्यास्यन्ति शिबिराज्जहितं तांस्तु सर्वशः ।;इत्युक्त्वा प्रविवेशान्तर्धन्वी खड्गी कृतान्तवत् ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = पारावताश्वं स तदा शयानमुपेत्य पद्भ्यां समताडयच्च ।;वक्षस्यसाववदद् वीतनिद्रो जाने भवन्तं हि गुरोस्तनूजम् ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = समुत्थितं मां जहि शस्त्रपाणिं शस्त्रेण वीरोऽसि स वीरधर्मः ।;लोकाश्च मे सन्त्वथ शस्त्रपूता इति ब्रुवाणं स रुषा जगाद ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = न सन्ति हि ब्रह्महणां सुलोका विशेषतश्चैव गुरुद्रुहां पुनः ।;न धर्मयुद्धेन वधार्हकाश्च ये त्वद्विधाः पापतमाः(पापमनाः) सुपाप ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = अवश्यं भाविनं(अवश्यभाविनं) मृत्युं धृष्टद्युम्नो विचिन्त्य तम् ।;तूष्णीं बभूव स्वप्नेऽपि नित्यं पश्यति तां मृतिम् ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = द्रौणिं च कालरात्रिं च द्रोणपातादनन्तरम् ।;विशसन्तं कृषन्तीं(कृषन्तं) च स्वप्ने पश्यति (स्वप्नेऽपश्यद्धि) पार्षतः ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = समाक्षिपद् द्रोणसुतोऽस्य कण्ठे निबद्ध्य मौर्वीं धनुषोप्युरस्थः ।;ममन्थ कृच्छ्रेण विहाय देहं ययौ निजस्थानमसौ च वह्निः ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = ततः शिखण्डिनं हत्वा युधामन्यूत्तमोजसौ ।;जनमेजयं च पाञ्चालीसुतानभिययौ ज्वलन् ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = तैरुत्थितैरस्यमानः शरैः खड्गेन जघ्निवान् ।;सर्वान् सव्यापसव्येन तथाऽन्यान् पाण्डवात्मजान् ।;ऋत एकं भैमसेनिं काशिराजात्मजात्मजम् ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = तं तदाऽन्तर्हितः(अन्तर्हितं) शर्वः कैलासमनयत् क्षणात् ।;स शर्वत्रातनामाऽऽसीदतस्तत्रैव सोऽवसत् ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = पुराऽर्थितः स्वदौहित्रस्यामरत्वाय शङ्करः ।;काशिराजेन तेनासौ जुगोपैनं कृपायुतः ॥ १३८॥ | |||
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| verse_lines = वासुदेवमतं ज्ञात्वा साम्राज्याय परीक्षितः ।;वारयामास भूलोकं नैव याहीत्यमुं शिवः ॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = सामान्यतोऽपाण्डवाय द्रौणिनाऽप्यभिसन्धितम् ।;तद्रूपेणैव रुद्रेण विनैनमिति चिन्तितम् ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैनं न जघानैक्यतस्तयोः ।;चेकितानादिकांश्चैव जघानान्यान् स सर्वशः(जघानान्यांश्च सर्वशः) ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = स चेदिपाञ्चालकरूशकाशीनन्यांश्च सर्वान् विनिहत्य वीरः ।;शिशून् स्त्रियश्चैव निहन्तुमुग्रः प्रज्वालयत् तच्छिबिरं समन्तात् ॥ १४२॥ | |||
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| verse_lines = जीजीविषूंस्तत्र पलायमानान् द्वारि स्थितौ गौतमः सात्वतश्च ।;निजघ्नतुः सर्वतः पार्षतस्य सूतस्त्वेकः शेषितो दैवयोगात् ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = खड्गेन प्रहृतं दृष्ट्वा हार्दिक्येन पपात ह ।;भूमौ प्रागेव संस्पर्शान्न ज्ञातस्तमसाऽमुना ।;अन्यासक्ते समुत्थाय प्राद्रवद् यत्र पार्षती ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = तस्या अकथयत् सर्वं सा भीमायाऽह दुःखिता ।;प्राद्रवद् रथमारुह्य स धन्वी गौतमीसुतम् ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = तदन्तरे द्रौणिरपि प्रयातः कृष्णासुतानां मुदितः शिरांसि ।;आदाय हार्दिक्यकृपानुयातो दुर्योधनं सन्निकृष्टप्रयाणम् ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = दृष्ट्वा तदुक्तं च निशम्य पापस्तुष्टोऽत्यजत् साध्विति देहमाशु ।;भीमार्जुनाभ्यामथ केशवाच्च भीताः पृथग् द्रौणिमुखाः प्रयाताः ॥ १४७॥ | |||
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| verse_lines = तत्रैकलं द्रोणसुतं रथेन यान्तं रथी मारुतिरन्वधावत् ।;तमाद्रवन्तं प्रसमीक्ष्य भीतः पराद्रवद् द्रौणिरभिद्रुताश्वैः (द्रौणिरतिद्रुताश्वैः) ॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो धर्मजेनार्जुनेन च ।;तत्राऽगमत् तदस्त्रं च भीमं चाव्यर्थतां नयन् ।;अवध्यो भीमसेनस्तदस्त्रं चामोघमेव यत् ॥ १५०॥ | |||
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| verse_lines = विष्णुनैवोभयं यस्मात् कृतं (क्लृप्तं) भीमोऽस्त्रमेव तत् ।;गायत्री तत्र मन्त्रो यद् ब्रह्मा तद्ध्यानदेवता ।;ध्येयो नारायणो देवो जगत्प्रसविता स्वयम् ॥ १५१॥ | |||
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| verse_lines = ऊचे च पार्थयोः कृष्णो यत् कृतं द्रौणिना पुरा ।;स्वायुधानां याचनं चाप्यशक्तेन तदुद्धृतौ ॥ १५२॥ | |||
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| verse_lines = पृष्टेनोक्तं त्वया हीनां कृत्वा दुर्योधनाय गाम् ।;दातुं त्वदायुधं मेऽद्येत्येवमुक्तेऽत्मनोदितम् ।;मैवं कार्षीः पुनरिति द्ध्यायताऽब्धेस्तटे स्वमु ॥ १५३॥ | |||
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| verse_lines = तदस्त्रं प्रज्वलद् दृष्ट्वाऽपाण्डवत्वविधित्सया ।;धरायां द्रौणिना मुक्तं कृष्णेन प्रेरितोऽर्जुनः ॥ १५४॥ | |||
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| verse_lines = संस्थाप्यास्त्रद्वयं दूरे तावाह पुरुषोत्तमः ।;सन्ति ह्यस्त्रविदः पूर्वं प्रायश्चैतन्न तैः कृतम् ।;लोकोपद्रवकृत् कर्म सन्तः कुर्युः कथं क्वचित् ॥ १५९॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्ते फल्गुनः प्राह मया मुक्तं महापदि ।;शान्त्यर्थमेव च विभो क्षन्तव्यं भवता ततः ॥ १६०॥ | |||
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| verse_lines = द्रौणिरप्येवमेवाऽह तौ वेदपतिरब्रवीत् ।;निवर्त्यतामस्त्रमिति शक्रसूनुस्तथाऽकरोत् ।;निवर्तनाप्रभुं द्रौणिं वासुदेवोऽभ्यभाषत ॥ १६१॥ | |||
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| verse_lines = क्षत्रतेजा ब्रह्मचारी कौमारादपि पाण्डवः ।;निवर्तने ततः शक्तो नायं द्रोणात्मजोऽपि सन् ।;अब्रह्मचर्यादित्युक्ते व्यासो द्रौणिमभाषत ॥ १६२॥ | |||
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| verse_lines = निवर्तनासमर्थस्त्वं देहि नैसर्गिकं मणिम् ।;जितः प्रागेव भीमेन भीमायैव महाप्रभम् ।;अपि केवलया वाचा पार्थेभ्योऽस्त्रं निवर्तय ॥ १६३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो मूर्धजं रत्नं जरामरणनाशनम् ।;क्षुत्तृट्श्रमापहं दिव्यगन्धं ध्वान्तहरं(दिव्यं गन्धध्वान्तहरं) शुभम् ॥ १६४॥ | |||
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| verse_lines = उत्कृत्य भीमाय ददौ मुक्ताः पञ्चैव पाण्डवाः ।;अस्त्रादिति ततो वेदभर्ता वासविमब्रवीत् ॥ १६५॥ | |||
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| verse_lines = तात मुक्तं द्रौणिनाऽपि त्वमेवास्त्रं निवर्तय ।;इत्युक्तस्तं प्रणम्याऽशु सञ्जहारार्जुनोऽपि तत् ॥ १६६॥ | |||
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| verse_lines = यादवेशोऽथ गौतम्याः सुतमाहैकसन्ततेः ।;वाचा निवर्तयास्त्रं त्वमित्युक्तो द्रौणिरब्रवीत् ॥ १६७॥ | |||
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| verse_lines = पक्षपातादिच्छसि त्वं भागिनेयस्य सन्ततिम् ।;तत्रैव पातयाम्यस्त्रमुत्तरागर्भकृन्तने ॥ १६८॥ | |||
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| verse_lines = वासुदेवः पुनः प्राह यदि हन्तव्य एव ते ।;गर्भस्तथाऽपि नैवास्त्रं पातयास्मिन् कथञ्चन ॥ १६९॥ | |||
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| verse_lines = अभिमन्योर्मृतस्यैव देहे पातय मानद ।;एवं त्वदस्त्रनिहतं गर्भमुज्जीवयाम्यहम् ॥ १७०॥ | |||
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| verse_lines = पातये गर्भ एवाहमित्यूचे गौतमीसुतः ।;अथाऽह वासुदेवस्तमीषत्क्रुद्ध इव प्रभुः ॥ १७१॥ | |||
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| verse_lines = दुर्मते पश्य मे वीर्यं यत् ते शक्यं कुरुष्व तत् ।;उज्जीवयाम्यहं गर्भं यततः शक्तितोऽपि ते ॥ १७२॥ | |||
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| verse_lines = सन्ततिर्वर्षसाहस्रं पाण्डवानां भवेद् भुवि ।;मत्पालितां न कश्चित् तां तावद्धन्तुं क्षमः क्वचित् ॥ १७३॥ | |||
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| verse_lines = जानामि ते मतिं दुष्टां जिघांसोः पार्थसन्ततिम् ।;चिकीर्षोर्धार्तराष्ट्रस्य तन्तुं भूयः सुदुष्करम् ॥ १७४॥ | |||
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| verse_lines = मदाज्ञया सा विफला भवित्री वाञ्छा मुमुक्षा विमुखस्य(मुमुक्षोर्विमुखस्य) विष्णोः ।;यथैव तेनैव नराधिरूढो गम्यस्तव स्यान्नच भूमिभागः ॥ १७५॥ | |||
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| verse_lines = दुर्गन्धयुक्तो व्रणसञ्चिताङ्गः सदा चरः स्या विपिनेषु मन्दः ।;यावद् भुवि स्यादिह पार्थतन्तुर्व्यासोऽपि तं प्राह तथेति देवः ॥ १७६॥ | |||
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| verse_lines = रूपद्वयेनापि हरेस्तथोक्तो जगाद कालीतनयं स कृष्णम् ।;त्वया सह स्यान्मम सङ्गमो विभो यथेष्टतः स्यान्नच मेऽत्र विघ्नः ॥ १७७॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त ओमिति प्राह भगवान् बादरायणः ।;तं प्रणम्य ययौ सोऽपि स्वप्नदृष्टमनुस्मरन् ॥ १७८॥ | |||
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| verse_lines = स्वप्ने हि द्रौपदेयानां वधो दृष्टोऽत्मना निशि ।;अर्जुनेन प्रतिज्ञानं द्रौपद्यै स्ववधं प्रति ॥ १७९॥ | |||
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| verse_lines = निबध्याऽनयनं चैव तेनैव शिबिरं प्रति ।;मुञ्चेति द्रौपदीवाक्यं नेति भीमवचस्तथा ।;कृष्णवाक्यान्मणिं हृत्वा देशान्निर्यापणं (निर्यातनं) तथा ॥ १८०॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादि स्वप्नदृष्टं यत् प्रायः सत्यमभूदिति ।;चिन्तयन् प्रययौ देवं (दावं) द्रौणिः शस्त्रभृतां वरः ॥ १८१॥ | |||
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| verse_lines = स कृष्णोक्तमपि प्राप्य बादरायणशिष्यताम् ।;प्राप्योत्तरद्वापरे च वेदान् संविभजिष्यति ॥ १८२॥ | |||
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| verse_lines = ततः सप्तर्षिर्भूत्वा पाराशर्यप्रसादतः ।;एकीभावं स्वरूपेण यास्यत्यच्युतनिष्ठया ॥ १८३॥ | |||
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| verse_lines = कृपोऽथ पाण्डवान् प्राप्य गौरवात् पूजितश्च तैः ।;अभूदाचार्य एवासौ राज्ञां तत्तन्तुभाविनाम् ॥ १८४॥ | |||
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| verse_lines = बादरायणशिष्यत्वं पुनः प्राप्य भजन्नमुम् ।;साकं स्वभागिनेयेन भाव्येको मुनिसप्तके ।;कृतवर्मा द्वारवतीं ययौ कृष्णानुमोदितः ॥ १८५॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णायै तं मणिं(तन्मणिं) दत्वा भीमस्तां पर्यसान्त्वयत् ।;विकोपा भीमवाक्येन राज्ञे सा च मणिं ददौ ॥ १८६॥ | |||
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| verse_lines = राजार्हे हि मणौ दत्ते मह्यं भीमेन लौकिकाः ।;स्त्रीपक्षपातं राजा च शङ्केयुर्मारुतेरिति ॥ १८७॥ | |||
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| verse_lines = मणिं राज्ञे ददौ कृष्णा भर्तृप्रियहिते रता ।;सोऽप्याबध्य मणिं मूर्ध्नि रेजे राजा गवामिव ॥ १८८॥ | |||
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| verse_lines = वेदेश्वरेणापि यदूत्तमेन कृष्णेन युक्तास्तत आशु पार्थाः ।;ययुः सभार्या निजराजधानीं हत्वैव सन्तोऽन्तररीन् स्वराज्यम् ॥ १८९॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरस्यानु विचित्रवीर्यसुतस्य पादावभिवन्दमानम् ।;आकृष्य भीमं परमेश्वरोऽयो मयाकृतिं धात् पुरतो नृपस्य ॥ १९०॥ | |||
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| verse_lines = भीमाकृतिं तां स सुयोधनेन कारापितामभ्यसने गदायाः ।;आश्लिष्य चूर्णीकृतवानसृग् वमन् हा तात भीमेति वदन् पपात ॥ १९१॥ | |||
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| verse_lines = तमाह कृष्णो न हतोऽद्य भीमो नच त्वयाऽन्यैरपि शक्यतेऽसौ ।;हन्तुं स्वबुद्धिः प्रथिता त्वयाऽद्य पापा हि ते बुद्धिरद्यापि राजन् ॥ १९२॥ | |||
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| verse_lines = स्वबुद्धिदोषादतिपापशीलपुत्राख्यपापानि विवर्द्धयित्वा ।;नीतो वशं तैः फलमद्य भुञ्जन् न क्रोधितुं चार्हसि भीमसेने ॥ १९३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्ते शान्तबुद्ध्यैव राज्ञाऽऽहूतो वृकोदरः ।;अभ्यवन्दत तत्पादावनुजाद्याश्च तस्य ये ॥ १९४॥ | |||
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| verse_lines = वज्राच्च दृढदेहत्वादविकारे वृकोदरे ।;न दोषो विवृतोऽस्य स्यादिति कृष्णेन वञ्चितः(चिन्तितम्) ।;सर्वानाश्लिष्य च प्रेम्णा युयोज नृप आशिषः ॥ १९५॥ | |||
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| verse_lines = कुलनाशकरः पापः शापयोग्यस्तव ह्यहम् ।;इत्युक्त्वैव प्रणमतो गान्धारी सुपदाङ्गुलीः ॥ १९६॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तेऽस्याः (इत्युक्तोऽस्याः) शमयितुं क्रोधमग्रे वृकोदरः ।;प्राह न प्राणसन्देहे पापं स्यात् पापिनो वधे ॥ १९९॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त्वा तां पुनः प्राह प्रतिज्ञाहानिमन्तरा ।;न मेऽस्ति प्राणसन्देह इति जानन् वृकोदरः ॥ २००॥ | |||
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| verse_lines = ‘पापा न शुद्धधर्मेण हन्तव्या’ इति च श्रुतिः ।;‘अन्यवत् पापहननं पापयेत्याह’ इति श्रुतिः ।;अतोऽसुरान् नैकृतिकान् निकृत्या घ्नन्ति देवताः ॥ २०२॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्ता तं पुनः प्राह कथं ते नरशोणितम् ।;पीतं नरेणैव सता न पीतमिति सोऽब्रवीत् ॥ २०४॥ | |||
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| verse_lines = दन्तान्तरं न मे प्राप शोणितं तत् सुतस्य ते ।;प्रतिज्ञापालनायापि प्रतिकर्तुं च तत् कृतम् ॥ २०५॥ | |||
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| verse_lines = भीषणाय च शत्रूणां पीतवच्च प्रदर्शितम् ।;(वेददृष्टः स्वधर्मोऽयं) वेददृष्टश्च धर्मोऽयमितिपापजनं प्रति ॥ २०६॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तोवाच नैवान्धद्वयस्यास्य वृकोदर ।;घ्नता पुत्रशतं यष्टिमात्रं चोर्वरितं त्वया ॥ २०७॥ | |||
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| verse_lines = तामाह भीमः पापिष्ठा वधयोग्यापराधिनः ।;सर्वे हता इति पुनः साऽऽह येनाकृतस्तव ।;अपराधः स एकोऽपि किं नास्तीत्यवदत् स ताम् ॥ २०८॥ | |||
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| verse_lines = सर्वैः समेतैः कृष्णस्य बन्धनाय विनिश्चितम्(विनिश्चतः) ।;अन्यानि च सुपापानि कृतान्यत्र पुराऽपिच ॥ २०९॥ | |||
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| verse_lines = वासुदेवं सभासंस्थं ब्रुवाणं धर्मसंहितम्(धर्मसंहिताम्) ।;पुनःपुनरवज्ञाय यान्तं दुर्योधनं बहिः ।;सर्वेऽन्वगच्छन्नित्यादीन्यभिप्रेत्य वृकोदरः ॥ २१०॥ | |||
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| verse_lines = नैकोऽप्यनपराधी मे स्वयं ताननुशिक्षितुम् ।;असमर्था मयि क्रोधं किं करोषि निरर्थकम् ॥ २११॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्ता साऽभवत् तूष्णीं क्रमात् सर्वैश्च पाण्डवैः ।;वन्दिता व्यासवाक्याच्च किञ्चिच्छान्ताऽथ साऽभवत् ॥ २१२॥ | |||
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| verse_lines = तस्या याश्च स्नुषाः सर्वास्ताभिः सह पुरस्कृताम् ।;कृत्वा तं धृतराष्ट्रं च विदुरादींश्च सर्वशः ॥ २१३॥ | |||
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| verse_lines = पाण्डवाः प्रधनस्थानं सभार्याः पृथया सह ।;कृष्णाभ्यां च ययुस्तत्र गान्धार्यास्तपसो बलम् ॥ २१४॥ | |||
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| verse_lines = जानन् पाण्डवरक्षार्थं चिकीर्षुस्तत्तपोव्ययम् ।;वेदेश्वरो ददौ दिव्यं चक्षुः सत्यवतीसुतः ॥ २१५॥ | |||
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| verse_lines = तेन दृष्ट्वा प्रेतदेहान् सर्वांस्तत्र समाकुला(समाकुलान्) ।;शशाप यादवेशानं त्वयाऽस्मत्कुलनाशनम् ।;यत् कृतं तत् तव कुलं गच्छत्वन्योन्यतः क्षयम्(अन्योन्यसङ्क्षयम्) ॥ २१६॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो भगवान् कृष्णः स्वचिकीर्षितमेव तत् ।;अस्त्वेवमित्याह विभुरीश्वरोऽप्यन्यथा कृतौ ॥ २१७॥ | |||
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| verse_lines = तेन तस्यास्तपो नष्टं हीना साऽतो हि भर्तृतः ।;नाशयेद्धि स्वयं विष्णुः स्वयोग्यादधिकान् गुणान् ॥ २१८॥ | |||
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| verse_lines = तत आश्लिष्य भर्तॄणां देहान् प्ररुदतीः स्त्रियः ।;सर्वा दुर्योधनादीनां दर्शयामास केशवः ।;कृष्णायै सा च तं देवमस्तुवत् पूर्णषड्गुणम् ॥ २१९॥ | |||
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| verse_lines = ततो देहान् प्रसिद्धानां पार्थाः समदहन् सताम् ।;अन्येषां धृतराष्ट्रादीन् पुरस्कृत्यैव कांश्चन ।;सूतैः पञ्चभिरेव स्वैः सरस्वत्यां प्रचिक्षिपुः(विचिक्षिपुः) ॥ २२०॥ | |||
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| verse_lines = स्नेहान्नृपो यमौ च स्वान् नाऽजौ तस्मिन् न्ययोजयन् (ह्ययोजयन्) ।;शवाः प्रायो बहुत्वेन तत्रतत्रैव संस्थिताः ॥ २२१॥ | |||
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| verse_lines = ततो ददत्सु पानीयं गङ्गायां स्वजनस्य तु ।;पृथा कर्णाय दत्तेति पार्थानाहाग्रजं च तम् ॥ २२२॥ | |||
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| verse_lines = ततो हाहेति विलपन् राजा परमदुःखितः ।;शशाप सर्वनारीणां गुह्यं हृदि न तिष्ठतु ॥ २२३॥ | |||
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| verse_lines = हा मातस्तव धृत्यैव वयं सर्वे भृशं हताः ।;ज्येष्ठं पितृसमं हत्वा प्रतिपत्स्याम कां गतिम् ॥ २२४॥ | |||
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| verse_lines = एवं वदन्तं कौन्तेयं वासुदेवः सनारदः ।;शमयामास सद्वाक्यैर्गुणान् कर्णस्य चाब्रवीत् ॥ २२५॥ | |||
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| verse_lines = ततस्ते प्रेतकार्याणि चक्रुः सर्वेऽपि सर्वशः ।;सर्वेषामधिराज्ये च स्थितोऽभूत् पाण्डवाग्रजः ॥ २२६॥ | |||
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<span id="gr-C29" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकोनत्रिंशोऽध्यायः"></span> | |||
== एकोनत्रिंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = ओं ॥ यदैव कृष्णौ सकलाधिराज्ये युधिष्ठिरं यौवराज्ये च भीमम् ।;विप्रैर्युतावभिषिच्याऽशिषश्च युक्ता दत्वा हर्षयामासतुस्तौ ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = तदैव चार्वाक इति प्रसिद्धं रक्षस्त्रिदण्डी यतिरेव भूत्वा ।;युधिष्ठिरं गर्हयामास विप्रास्त्वां गर्हयन्तीति सुपापशीलः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वैव तद् दुःखितमाशु धर्मजं दृष्ट्वा विप्राः शेपुरमुं भृशार्ताः ।;अगर्हितं नित्यमस्माभिरेनं यतोऽवोचो गर्हितमद्य पाप ।;भस्मीभवाऽश्वेव ततस्त्वितीरिते क्षणादभूत् पापतमः स भस्मसात् ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = भस्मीकृतेऽस्मिन् यतिवेषधारिणि युधिष्ठिरं दुःखितं वृष्णिसिंहः ।;प्रोवाच नायं यतिरुग्रकर्मा सुयोधनस्यैव सखा सुपापः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = रक्षोऽधमोऽयं निहतोऽद्य विप्रैस्तमा शुचः कृतकार्योऽसि राजन् ।;इतीरितः शान्तमनाः स विप्रान् सन्तर्पयामास धनैश्च भक्त्या ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = असान्त्वयच्च बान्धवान् स्वपौरसंश्रयादिकान् ।;ददौ यथेष्टतो धनं ररक्ष चानु पुर्ववत्(पुत्रवत्,चानुपूर्ववत्)) ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = स भीष्मद्रोणकर्णानां वधाद् दुर्योधनस्य च ।;पापाशङ्की तप्यमानो राज्यत्यागे मनो दधे ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = सोऽनुजैः कृष्णया विप्रैरप्युक्तो धर्मशासनम्(धर्मसाधनम्) ।;भीमं सम्प्रार्थयित्वैव(सम्प्रार्थयित्वैनं) न वेत्सीत्याह फल्गुनम् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = तस्मिन् क्रुद्धे नृपं प्राहुर्विप्रास्त्वत्तोऽपि तत्त्ववित् ।;शक्रोऽर्जुन इति श्रुत्वाऽप्येतद्धर्मे स संशयम्(ससंशयम्) ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = मत्स्नेहादेव सर्वेऽपि धर्मोऽयमिति वादिनः ।;इत्येवं शङ्कमानं तमूचतुर्विप्रयादवौ ।;कृष्णौ धर्मोऽयमित्येव शास्त्रयुक्त्या पुनः पुनः ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = नातिनिश्चितबुद्धिं तं तदाऽपि पुरुषोत्तमौ ।;हतपक्षगतत्वेन त्वच्छङ्काया अगोचरः ।;यतो भीष्मस्ततो याहि तमित्यूचतुरव्ययौ ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = स ताभ्यां भ्रातृभिश्चैव मुनिभिश्च समन्वितः ।;भीष्मं ययौ लज्जितेऽस्मिंस्तं भीष्मायाऽह केशवः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = पृच्छेत्युक्तः स भीष्मेण पप्रच्छाखिलमञ्जसा ।;तत्रोवाचाखिलान् धर्मान् कृष्णो भीष्मशरीरगः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मो ह्याह हरिं पार्था बोधनीयास्त्वयैव हि ।;का शक्तिर्मम देवेशपार्थान्(देवेश पार्थान्) बोधयितुं प्रभो ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो भगवानाह त्वत्कीर्त्यै त्वयि संस्थितः ।;प्रवक्ष्याम्यखिलान् धर्मान् सूक्ष्मं तत्त्वमपीति ह ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = राज्ञः प्रथमतो धर्मो भगवद्धर्मपालनम् ।;तदर्थं कण्टकोद्धारो धर्मा भागवता अपि ।;मनोवाक्कर्मभिर्विष्णोरच्छिद्रत्वेन(विष्णोरच्छिन्नत्वेन) चार्चनम् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = पूर्णाशेषगुणो विष्णुः स्वतन्त्रश्चैक एव तु ।;तद्वशं सर्वमन्यच्च सर्वदेति विनिश्चयः ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = वृथा कर्माकृतिः क्वापि निराशीस्त्वं सदैव च(सदैव तु) ।;विष्णोर्भागवतानां च प्रतीपस्याकृतिः सदा ।;परस्परविरोधे तु विशिष्टस्यानुकूलता ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = तत्त्वविज्ञापनं धर्मो विप्रस्य तु विशेषतः ।;शारीरदण्डसन्त्यागः पुत्रभार्यादिकानृते ।;तत्रापि नाङ्गहानिः स्याद् वेदना वा चिरं न तु ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = न चार्थदण्डः कर्तव्यो विप्रवैश्यादिभिः क्वचित् ।;शारीरदण्डविषये वैश्यादीनां च विप्रवत् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = यथालब्धेन वर्तेत भिक्षया वा द्विजोत्तमः ।;शिष्ययाज्योपलब्धैर्वा क्षत्रधर्मेण वाऽऽपदि ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = महापदि विशां धर्मैः क्षत्रियः सुरविप्रयोः ।;अन्यत्र सर्ववित्तेन वर्तेतैतांश्च पालयन् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = विरोधिनः क्षत्रियाच्च प्रसह्यैव हरेद् धनम् ।;सामादिक्रमतो धर्मान् वर्तयेद् दण्डतोऽन्ततः ।;अपलायी सदा युद्धेऽसतां कार्यमृते भवेत् ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = कृषिवाणिज्यगोरक्षाकुसीदं वैश्यजीवनम् ।;परिचर्यैव शूद्रस्य वृत्तिरन्ये स्वपूर्ववत् ।;वर्तेयुर्ब्राह्मणाद्याश्च क्रमात् पूज्या हरिप्रियाः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = हरिभक्तावनुच्चस्तु वर्णोच्चो नातिपूज्यते ।;विना प्रणामं पूज्यस्तु वर्णहीनो हरिप्रियः ।;आदरस्तत्र कर्तव्यो यत्र भक्तिर्हरेर्वरा ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञापनं क्षत्रियाणां च धर्मो विप्राभ्यनुज्ञया ।;तदभावे तु वैश्यानां शूद्रस्य परमापदि ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = वर्णेष्वज्ञेष्ववर्णस्तु न ज्ञानी स्यात् कथञ्चन ।;इति श्रुतेरवर्णस्य ज्ञापनप्राप्तिरेव न ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञेयं सर्वं त्रिवर्णस्थः स्त्रीभिर्वेदान् विनाऽखिलम् ।;स्वीयपुन्नियतिः स्त्रीणां स्वदारनियतिर्नृणाम् ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = धर्मो गुणोत्तमानां तु स्मृत्यैवान्धं तमो व्रजेत् ।;गुणसर्वस्वहानिः स्यादुत्तरोत्तरतोऽत्र च;अधोऽधोऽधिकदोषः स्यात् स्त्रीणामन्यत्र मध्यतः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = वेदा अप्युत्तमस्त्रीभिः कृष्णाद्याभिरिवाखिलाः;देव्यो मुनिस्त्रियश्चैव नरादिकुलजा अपि ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = उत्तमा इति विज्ञेयास्तच्छूद्रैरप्यवैदिकम् ।;ज्ञेयमन्यैर्हरेर्नाम निजकर्तव्यमेव च ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = सर्वथाऽन्धं तमो याति वरं सदृशमेव वा(सदृशमेव च) ।;यो विष्णोर्मन्यते किञ्चिद् गुणैः कैश्चिदपि क्वचित् ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मेशानादिकमपि भेदं यो वा न मन्यते ।;भेददृक् तद्गुणादौ च प्रादुर्भावगतेऽपि यः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = प्राकृतं देहमथवा(देहमथ वा) दुःखाज्ञानश्रमादिकम् ।;मन्यते तारतम्यं वा तद्भक्तेष्वन्यथैव यः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = मनोवाक्तनुभिर्यो वा तस्मिन्स्तद्भक्त एव वा ।;विरोधकृद् विष्ण्वधीनादन्यत् किञ्चिदपि स्मरन् ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = अन्याधीनत्वविच्चास्य सर्वपूर्त्यविदेव च ।;भक्तिहीनश्च ते सर्वे तमोऽन्धं यान्त्यसंशयम् ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = तत्त्वे संशययुक्ता ये सर्वे ते निरयोपगाः ।;दोषेभ्यस्ते गुणाधिक्ये नैव यान्त्यधमां गतिम् ।;गुणदोषसाम्ये मानुष्यं सर्वदैव पुनःपुनः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = यावद् दोषक्षयश्चोर्ध्वा गतिः(दोषक्षयश्चोर्ध्वगतिः) क्रमश एव तु ।;सर्वदोषक्षये मुक्तिरात्मयोग्यानुसारतः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = भक्तिज्ञानोन्नतावेव स्वर्गश्च शुभकर्मणः ।;विष्णुवैष्णववाक्येन हानिः पापस्य कर्मणः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादि धर्मसर्वस्वं भीष्मस्थेनैव विष्णुना ।;पार्थानां गदितं तच्च श्रुत्वा धर्मसुतोऽनुजान् ।;पप्रच्छ विदुरं चैव सारं धर्मादिषु त्रिषु ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = आह क्षत्ता धर्ममेव सारमर्थं च मध्यमम् ।;नीचं कामं निष्फलत्वादर्थमेवार्जुनोऽब्रवीत् ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = सारं स द्विविधो ज्ञेयो दैवो मानुष एव च ।;दैवो विद्या हिरण्यादिर्मानुषः परिकीर्तितः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = मध्यमो धर्म एवात्र साध्यं साधनमेव च ।;विद्याह्वयोऽर्थो धर्मस्य विद्ययैव च मुच्यते ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = मानुषोऽर्थोऽपि विद्यायाः कारणं सुप्रयोजितः ।;तुष्टोऽर्थेन गुरुर्यस्मात् कैवल्यं दातुमप्यलम् ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = धर्मार्थतां विनाऽप्यर्थैस्तुष्येयुर्गुरुदेवताः ।;यद्यनुद्देशितो धर्मोऽप्यर्थमेवानुसंव्रजेत् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = गुरुताऽर्थगतैव स्यात् कामोऽधस्ताद्धि निष्फलः ।;यमावत्र विदां श्रेष्ठावर्जुनोक्तमनूचतुः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽह भीमः प्रवरः सुतत्त्वदृशां समस्तानभिभाष्य हर्षात् ।;स्मयन् न कामादतिरिक्तमस्ति किञ्चिच्छुभं क्कावरतां स यायात् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = काम्यं हि कामाभिधमाहुरार्याः काम्याः पुमर्थाः सह साधनैर्यत् ।;अकाम्यतां यात्यपुमर्थ एव पुमर्थितत्वाद्धि पुमर्थ उक्तः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञानभक्त्यादिकमप्यतीव सत्साधनं कामबहिष्कृतं चेत् ।;न साधनं स्यात् परमोऽपि मोक्षो न साध्यतां याति विना हि कामात् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = परात्परोऽप्यादिपुमान् हरिश्च स्वस्येतरेषामपि काम्य एव ।;अकामितोऽवाग्गतिमेव दद्यात् कामः पुमर्थोऽखिल एव तेन ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = इच्छैव कामोऽस्तु तथाऽपि नैतामृते हि चित्त्वं घटकुड्यवत् स्यात् ।;सारस्ततः सैव चिदात्मकाऽपि सा चेतना गूढतनुः सदैव ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = न प्रश्नयोग्यः पृथगेव कामस्तेनैष राजन् यदि तारतम्यम् ।;इच्छस्ययं ते त्रिविधो हि वेद्यो धर्मार्थयुक्तः परमो मतोऽत्र ।;एकाविरोधी यदि मध्यमोऽसौ द्वयोर्विरोधी तु स एव नीचः ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = तस्मात् स्वबुद्धिप्रमदाभिरेव(सुबुद्धिप्रमदाभिरेव) कामं रमेथा अनुरूपकामः ।;राजन् न कामादपरं शुभं हि परो हि कामो हरिरेव येन(तेन) ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = प्राज्ञः सुहृच्चन्दनसारलिप्तो विचित्रमाल्याभरणैरुपेतः ।;इदं वचो व्याससमासयुक्तं सम्प्रोच्य भीमो वरराम वीरः ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = प्रशस्य भीममन्यांश्च राजा मोक्षमथास्तुवत् ।;स्वयुक्तेरप्रतीपत्वान्निराचक्रे न मारुतिः ॥ ५८॥ | |||
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<span id="gr-C30" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रिंशोऽध्यायः"></span> | |||
== त्रिंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = ओं ॥ अथ कृष्णमनुस्मृत्य भीष्मे स्वां वसुतां गते ।;कृत्वा कार्याणि सर्वाणि गङ्गामाश्वास्य दुःखिताम् ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = आश्वासितश्च कृष्णाभ्यां धर्मजो दुःखितः पुनः ।;पराशरसुतेनोक्तः कृष्णेनानन्तराधसा ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = अपापे पापशङ्कित्वादश्वमेधैर्यजाच्युतम् ।;कुरु राज्यं च धर्मेण पालयापालकाः प्रजाः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तः स तथा चक्रे त्यक्त्वा भोगांश्च कृत्स्नशः ।;गोव्रतादिव्रतैर्युक्तः पालयामास मेदिनीम् ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = ददौ देयानि मुख्यानि यथाकाममखण्डितम् ।;नैवार्थी विमुखः कश्चिदभूद् योग्यः कदाचन(कथञ्चन) ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = रराज राजावरजस्तया स द्विरूपया सोमककाशिजातया ।;श्रिया भुवा चैव यथाऽब्जनाभो निहत्य सर्वान् दितिजान् पयोब्धौ ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = सर्वोत्तुङ्गो नामतः प्राणवायोरंशो निशायां गुरुपुत्रसूदितः ।;माताऽस्य देवीति च रौहिणेयी भीमप्रियाऽऽसीद् या पुराऽस्यैव राका ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = अन्याश्चाऽसुर्वासुदेव्यो दिशो या आपश्च पूर्वं विंशतिरग्र्यरूपाः ।;ताभिर्युतो(युक्तो) दैवतैरप्यलभ्यानभुङ्क्त भोगान् विबुधानुगार्चितः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = ररक्ष धर्मानखिलान् हरेः स निधाय विप्राननुशास्य युक्तान् ।;सद्वैष्णवान् विदुषः पञ्चपञ्च सवेतनान् ग्राममनु स्वकीयान् ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = दधार दण्डं तदवर्तिषु स्वयं जग्राह चान्वेव मुदाऽथ तद्गतान् ।;तद्वृत्तमन्यैरपि विप्रवर्यैः संशोधयन् सर्वमसौ यथा व्यधात् ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = नावैष्णवः कश्चिदभूत् कुतश्चिन्नैवान्यनिष्ठो नच धर्महन्ता ।;न विध्यवर्ती नच दुःखितोऽभून्नापूर्णवित्तश्च तदीयराष्ट्रे ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = वासिष्ठवृष्णिप्रवरौ प्रपश्यतां ताभ्यां च भीमेन मुनीश्वरैश्च ।;संशिक्षितानां प्रथमाद् युगाच्च गुणाधिकः कलिरासीत् प्रजानाम् ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = शुभं महत् स्वल्पफलं कृते हि विपर्ययेणाशुभमेषु दोषः ।;तद्धीनमप्युच्चशुभं कृताद् युगाच्चक्रे कलिं मारुतिरच्युताश्रयात् ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = धनञ्जयः प्रोद्यतदण्ड आसीत् सदाऽन्यचक्रेषु निजाग्रजेरितः ।;विभीषयित्वा नृपतीन् सरत्नान् पदोर्नृपस्याग्रभुवो न्यपातयत् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = सदैव कृष्णस्य मुखारविन्दाद् विनिस्सृतं तत्त्वविनिर्णयामृतम् ।;पिबन् सुताद्याधिमसौ क्रमेण त्यजंश्च रेमेऽविरतातिभोगः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = दुःशासनस्याऽवसथं(अवसथे) सुभद्राचित्राङ्गदासहितोऽध्यावसंश्च ।;(स)सचन्द्रिकाकान्तिरनूनबिम्बो नभस्थितश्चन्द्र इवात्यरोचत ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = समस्तभृत्याश्रितवेतनानां माद्रेय आसीत् प्रथमः प्रदाता ।;स दुर्मुखस्याऽवसथेऽवसच्च स मद्रराजात्मजयाऽग्र्यवर्ती ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = सन्धानभेदानुगतप्रवृत्तिस्तिष्ठंश्च दुर्मर्षणशुभ्रसद्मनि ।;नृपाङ्गरक्षः प्रगृहीतखड्गस्तस्यानुजो मागधकन्ययाऽऽसीत् ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = सेनापतिः कृप आसीद् युयुत्सुः ससञ्जयो विदुरश्चाऽम्बिकेयम् ।;पार्थेरिताः पर्यचरन् स्वयं च सर्वे यथा दैवतमादरेण ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = द्विरूपकृष्णप्रहितेषु पाण्डुषु क्षितिं प्रशासत्सु न कश्चनाऽतुरः ।;नचाक्रमान्मृत्युरभून्न नार्यो विभर्तृका नो विधुरा नराश्च ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = शब्दादयश्चाऽसुरतीव हृद्या निकामवर्षी च सुरेश्वरोऽभूत् ।;प्रजा अनास्पृष्टसमस्ततापा अनन्यभक्त्याऽच्युतमर्चयन्ति ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = पृथ्वी च गावः ससरस्वतीका निकामदोहा अभवन् सदैव ।;अब्दाब्धिनद्यो गिरिवृक्षजङ्गमाः सर्वेऽपि रत्नप्रभवा(रत्नप्रसवा) बभूवुः ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णाश्रयात् सर्वमिदं वशे ते विधाय सम्यक् परिपालयन्तः ।;दिवीव देवा मुमुदुः सदैव मुनीन्द्रगन्धर्वनृपादिभिर्वृताः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = समुज्ज्वला पाण्डवकीर्तिनारी पदं (विधाय)विधायासुरपक्षमूर्धसु(मूर्धनि) ।;वराभये चैव सतां कराभ्यां कृष्णप्रसूता जगदण्डमावृणोत् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = पातालपादां पृथिवीनितम्बामाकाशमध्यां करसन्तताशाम् ।;ग्रहर्क्षताराभरनद्युवक्षसं विरिञ्चलोकस्थलसन्मुखाम्बुजाम् ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = विकुण्ठनाथाभयहस्तमादरान् मूर्ध्ना वहन्तीं(मूर्ध्नाऽऽवहन्तीं) वरभारताख्याम् ।;निशम्य तामीक्ष्य समस्तलोकाः पवित्रिता वेदिभवामिवान्याम् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = प्रपालयत्स्वेव धरां सकृष्णेष्वद्धैव पार्थेषु कलिर्बलिश्च ।;सुपापदैत्यौ क्वच राष्ट्रविप्लवं सञ्चक्रतुस्तच्छ्रुतमाशु पार्थैः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = नृपेण कृष्णेन च साधु चोदितो भीमस्तदा तौ सगणौ विजित्य ।;बलिं प्रविद्राव्य कलिं निबद्ध्य समानयत् कृष्णनृपेन्द्रयोः(कृष्णनरेन्द्रयोः) पुरः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = पप्रच्छ तं कृष्णपुरो युधिष्ठिर उदारधीः ।;कले किमिति मे राष्ट्रं विप्लावयसि दुर्मते ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आह कालोऽयं दुर्योधननिपातनम् ।;आरभ्य मम तत्र त्वं बलादाक्रम्य तिष्ठसि ।;ततो मया कृतो राष्ट्रविप्लवस्ते नराधिप ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = तमाह राजा राज्ञां हि बलाद् राज्यं प्रवर्तते ।;अपि कालभवं राष्ट्रं त्वदीयं मादृशैर्नृपैः ।;ह्रियते बलवद्भिर्हि राज्याशा ते कुतस्तदा ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् ।;इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम् ॥ ३६॥ (महा.१२.७०.६) | |||
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| verse_lines = तमुवाच कलिः काले मदीये त्वादृशः कुतः ।;राजानं पूर्वमाविश्य विप्रांश्च स्यामहं नृप ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = वासुदेवसहायेषु तेजो युष्मासु मे नहि ।;क्व राजाऽसावृते युष्मान् यो मया नाभिभूयते ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = मदीयकाले भूपाल विप्रदेव(वेद)विरोधिनि ।;मद्दृष्टिपाते(याते) क्व गुणाः क्व वेदाः क्व सुयुक्तयः(क्व च सूक्तयः) ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = जगाद नृपतिः सत्यं कले वक्ष्यनृतोऽपि सन् ।;मोचये त्वार्तवचनाद् यदाऽस्मत्सन्ततेः परम् ।;विलुम्पस्यखिलान् धर्मान् करं तत्रापि नोऽर्पय ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = सीमाधिर्बहुवाक्यं च तुलामाने च मे करः ।;नैवातिक्रममेतेषां कुरु सर्वात्मना क्वचित् ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो वासुदेवेन मोचितो धर्मजेन च ।;तान् प्रणम्य ययौ पारे समुद्रस्याऽश्रयद् गुहाम् ।;पार्थाश्च कृष्णसहिता रक्षन्तः क्ष्मां मुदं ययुः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = एवं पार्थान् प्रतिष्ठाप्य शक्रप्रस्थे तु सार्जुनः ।;क्रीडन् दिव्याः कथाः प्राह पुत्रशोकापनुत्तये ।;गीतोक्तं विस्मृतं चास्मै पुनर्विस्तरतोऽवदत् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = वाणी प्राणो वासुदेव इत्येतैरखिलं ततम् ।;सर्वोत्तमत्वमेतेषां सर्वमेतद्वशे जगत् ।;उत्तरोत्तरमेतेऽपि गुणोच्चास्तद्वशेऽपरे ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = इत्थं हरेर्वशे सर्वं गुणपूर्णश्च(सर्वगुणपूर्णश्च) स प्रभुः ।;एक एव नचान्योऽस्ति प्राणोच्चा तदधो रमा ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = स हुताश इति प्रोक्तो(हुताशन इति प्रोक्तो) हुतमत्त्यखिलं यतः ।;वाक्प्राणमध्यगो नित्यं धारयत्यखिलं जगत् ।;स ईशो ब्रह्मरुद्राद्या जीवा एव प्रकीर्तिताः ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = मिश्रा मध्या इति ज्ञेयाः संसारपरिवर्तिनः ।;एवं जीवास्त्रिधा प्रोक्ता भवन्त्येते नचान्यथा ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = विष्णोस्तदनुगानां च प्रीतिकृद् धर्म ईरितः ।;अधर्मोऽन्य इयं निष्ठा प्रलापः किं करिष्यति ।;एवमाद्यनुशास्याजः पार्थं पार्थैः सुसत्कृतः॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = कथञ्चित् तानवस्थाप्य सुदूरानुगतान् प्रभुः ।;सुभद्रासहितः प्रायाद् यानेन द्वारकां पुरीम् ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = समाधिविरतोदङ्कपरिपृष्टः पथि प्रभुः ।;हतं दुर्योधनं प्राह सभ्रातृसुतसैनिकम् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = तं शिष्यवधकोपेन शप्तुमात्मानमुद्यतम् ।;केशवोऽशमयद् वाक्यैर्विश्वरूपं प्रदर्श्य च ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = मद्भक्तो नितरामेष मदाराधनतत्परः ।;मामवज्ञाय निरयं माऽनुत्थानं व्रजेदिति ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = कृपया वासुदेवेन बोधितः शान्तमानसः ।;पश्चात्तापाभितप्तात्मा तमेव शरणं ययौ ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = तस्मै देवोऽभयं दत्त्वा प्रेषयिष्येऽमृतं तव ।;दातुं शक्रमिति प्रोक्त्वा ययौ द्वारवतीं प्रभुः ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽदिदेश देवेशं वासुदेवोऽमृतं मुनेः ।;देहीति वञ्चयिष्यामीत्याह सोऽपि क्षमापयन् ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = ओमित्युक्तो भगवता तत्स्नेहात् स शचीपतिः ।;सुजुगुप्सितमातङ्गवेषो भूत्वा मुनिं ययौ ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = मूत्रस्रोतसि सौधञ्च निधाय कलशं वशी ।;मूत्रयन्निव तं प्राह वासुदेवः सुधामिमाम् ।;महर्षे प्रेषयामास तवार्थे तत् पिबेति च ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = स मूत्रमिति मत्वा तं याहीत्येवाऽह भत्सयन् ।;वञ्चयित्वैव तं शक्रो ययौ प्रीतः स्वमालयम् ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = असाधारणमन्नं हि देवानाममृतं सदा ।;अन्यपीतिस्ततस्तस्य देवानां परमाप्रिया ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = आत्मदत्तप्रसादाच्च स्वापराधात् प्रचालिते ।;उदङ्के वासुदेवस्तु युक्तिमित्येव मन्यते ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = स्वपुरीं प्राप्य यदुभिः पूजितः शूरसूनवे ।;वृत्तान्तं कथयामास केशवो यदुसंसदि ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = वधमन्तरितं सूनोः सात्वतेशेन सात्वती ।;प्रणम्य कथयेत्यूचे तत आह जनार्दनः ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = ततः सुदुःखिताः शूरपुत्राद्या अभिमन्यवे ।;श्राद्धदानानि बहुशश्चक्रुः केशवसंयुताः ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = निवसत्यत्र विश्वेशे धर्मपुत्रः क्रतूत्तमम् ।;अश्वमेधमनुष्ठातुं नाविन्दद् वित्तमञ्जसा ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = हतशेषात् क्षत्रसङ्घात् करं नैच्छद् दयापरः ।;नच मध्यमकल्पेन यष्टुं तस्य मनो गतम् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = विज्ञाय नित्यविज्ञातनिखिलो बादरायणः ।;आविर्भूतो हिमवतः शृङ्गं यत्राभिसङ्गतम् ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = मेरुशृङ्गेण यत्रैव विष्णुः स्वात्मानमव्ययम् ।;लोकस्य सङ्ग्रहायेजे कर्मबन्धोज्झितोऽपि सन् ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = शङ्कराद्याः सुरा यत्र मरुत्तश्चेजिरे हरिम् ।;दानवो वृषपर्वा च तत्रास्ति धनमक्षयम् ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = तच्छङ्करशरीरस्थं जामदग्न्यं हरिं परम् ।;इष्ट्वैवानुज्ञया तस्य स्वीकृत्य यज तेन च ।;इत्याह व्यासवाक्यानु भीमोऽप्याह नृपोत्तमम् ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = धनस्य देवता विष्णुर्जामदग्न्योऽखिलेश्वरः ।;स शङ्करशरीरस्थो यज्ञोच्छिष्टधनाधिपः ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = तेनैव विष्णुना दत्तमर्जुनायास्त्रमुत्तमम् ।;कार्याण्यन्यानि चास्माकं कृतान्येतेन विष्णुना ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = स ब्रह्मरुद्रशक्रादिपददाताऽखिलप्रदः ।;स्वतन्त्रः परतन्त्रांस्तानावर्तयति चेच्छया ॥ ७७॥ | |||
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| verse_lines = प्रियोऽस्माकं प्रियास्तस्य सर्वदैव वयं नृप ।;अतस्तदभ्यनुज्ञातधनेनैव यजामहे ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = सोऽयं पितामहोऽस्माकं व्यासस्तन्नः प्रदास्यति ।;इत्युक्त्वा तं पुरस्कृत्य कृष्णद्वैपायनं ययुः ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = धनं कृष्णः समादाय(स आदाय) समन्ताच्छतयोजनम् ।;ददौ तेषां तेऽपि चोहुर्हस्त्यश्वोष्ट्रनरादिभिः ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = युधिष्ठिरमृते सर्वे भीमसेनपुरोगमाः ।;यज्ञार्थमूहिरे भूरि स्वर्णमुद्यद्रविप्रभम् ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = तदैव वासुदेवोऽपि सभार्यः स सुभद्रया ।;आगच्छन् हस्तिनपुरं पथ्युदङ्केन पूजितः ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = तत्कामवर्षिणो मेघांस्तस्य दत्वोदकार्थिनः ।;सफलं स्ववरं कृत्वा जगाम गजसाह्वयम् ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = आसन्नेष्वेव पार्थेषु व्यासे च पुरुषोत्तमे ।;प्रविवेश पुरं कृष्णस्तदाऽसूतोत्तरा मृतम् ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = द्रौण्यस्त्रसूदितं बालं दृष्ट्वा कुन्त्यादिकाः स्त्रियः ।;शरण्यं शरणं जग्मुर्वासुदेवं जगत्पतिम् ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = प्रत्यक्षमात्मना गर्भे रक्षितं प्रसवे हतम् ।;पुनरुज्जीवयामास केशवः पार्थतन्तवे ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = तदैव विविशुः पार्था सकृष्णाः सधनोच्चयाः(सधनोच्छ्रयाः) ।;सर्वे मुमुदिरे दृष्ट्वा पौत्रं केशवरक्षितम् ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = ततः कृष्णाभ्यनुज्ञाता पाराशर्यसदस्यकाः ।;आरेभिरेऽश्वमेधं ते मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = स जित्वा रुन्धतः सर्वान् नृपतीञ्छस्त्रतेजसा ।;चारयामास सर्वेषु राष्ट्रेष्वविजितोऽरिभिः ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = योद्धुकामोऽर्घ्यमादाय त्वयाऽद्याभिगतो ह्यहम् ।;न प्रीये पौरुषं धिक् ते यन्मेध्याश्वो न वारितः ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = तदाऽपि(तथाऽपि) पितृभक्त्यैनमयुद्ध्यन्तमुलूपिका ।;प्राह युद्ध्यस्व यत् प्रीत्यै(तत् प्रीत्यै) गुरोः कार्यमसंशयम् ।;प्रीणनायैव युद्ध्यस्व पित्रे सन्धर्शयन् बलम् ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = स तु सर्वायुधक्षेपेऽप्यविकारं धनञ्जयम् ।;दृष्ट्वा बाल्यात् परीक्षायै मन्त्रपूतं महाशरम् ।;चिक्षेप पित्रे दैवेन तेनैनं मोह आविशत् ॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = मूर्च्छितं तं गुरुं दृष्ट्वा तद्भक्त्या भृशदुःखितः ।;प्रायोपविष्टस्तन्माता विललापातिदुःखिता ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = विजगर्ह तदोलूपीं धिग् जगत्त्रयपूजितम् ।;अजीघनो मे भर्तारं पुत्रेणैवाविजानता ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = लोकवीरं पतिं हित्वा(हत्वा) न मे कार्यं सुतेन च ।;पतिलोकमहं यास्ये तृप्ता भव कलिप्रिये ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त्वा मरणायैव तां विनिश्चितमानसाम् ।;धरायां विलुठन्तीं च दृष्ट्वा भुजगनन्दिनी ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = नागलोकात् समादाय विशल्यकरणीं क्षणात् ।;उत्थापयामास पतिं त्रिलोकातिरथं तया ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = प्रहस्योवाच च तदा श्रुतं वाक्यं पुरा मया ।;सुरलोके सुरैः प्रोक्तं भीष्माद्या नातिधर्मतः ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = यद्धतास्तेन दोषेण पार्थस्तेनातिवेदनाम् ।;रणे व्रजेदिति न तत् परतः स्यादिति ह्यहम् ।;वचनादेव देवानां युद्ध्येत्यात्मजमब्रवम् ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = देवानामेव सङ्कल्पान्मूर्च्छितश्चार्जुनोऽभवत् ।;भुक्तदोषफलश्चायं पुनर्भोक्ष्यति नान्यतः ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = अन्येन पातितस्त्यास्य यशो नश्येत् त्रिलोकगम् ।;नार्जुनस्य यशो नश्येदिति दैवैरिदं कृतम् ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तः प्रीतिमापेदे पुत्रभार्यायुतोऽर्जुनः ।;यज्ञार्थं तावथाऽहूय पूजितः प्रययौ ततः ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = द्वारकायाः समीपस्थं प्रद्युम्नाद्याः सुता हरेः ।;प्रसह्याश्वमपाजह्रुराह्वयन्तोऽर्जुनं युधे ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = सुभद्राहरणं मार्ष्टुं नीतेऽश्वे तैर्धनञ्जयः ।;गौरवाद् वासुदेवस्य मातुलस्य च केवलम् ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = मातुलायाब्रवीदश्वं हृतं पौत्रैरबन्धुवत् ।;स निर्भत्स्य कुमारांस्तान् मेध्यमश्वममोचयत् ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = मातुलं स प्रणम्याथ यज्ञार्थं तान् निमन्त्र्य च ।;गच्छन् गजाह्वयं दूतमग्रतोऽयापयन्नृपे(यातयन्नृपे) ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = सकृष्णः सहसोदर्यः श्रुत्वाऽसौ प्राप्तमर्जुनम् ।;प्रीतो बाष्पाभिपूर्णाक्षो(बाष्पातिपूर्णाक्षो) भ्रातृस्नेहादभाषत ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = वासुदेव न पश्यामि दुर्लक्षणमथार्जुने ।;केन दुर्लक्षणेनायं बहुदुःखी प्रवासगः ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = पृष्टस्तं केशवः प्राह भ्राता ते दीर्घपिण्डकः(पिण्डिकः) ।;तेनायं दुःखबहुल इत्युक्त्वा पुनरेव च ।;वदन्तमेव पाञ्चाली कटाक्षेण न्यवारयत् ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = समस्तलक्षणाभिज्ञाः कृष्णः सत्या वृकोदरः ।;कृष्णा च पञ्चमो नास्ति विद्या शुद्धेयमञ्जसा ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = प्रसङ्गात् प्राप्तुमिच्छेत् तां विद्याशीलो युधिष्ठिरः ।;इति लोभात् तु पाञ्चाली वासुदेवं न्यवारयत् ॥ ११९॥ | |||
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| verse_lines = तद्गौरवाद् वासुदेवो नोत्तरं प्रत्यभाषत ।;विस्मारयामास च तं पब्रुवाणः कथान्तरम् ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = उदरस्य किञ्चिदाधिक्यं वृषणाधिक्यमेव च ।;सव्यबाहोस्तथाऽऽधिक्यं दुर्लक्षणमथार्जुने(अतोऽर्जुने,अथोऽर्जुने) ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = नैवोक्तं वासुदेवेन दृश्यमानमपि स्फुटम् ।;ज्ञानानन्दह्रासकरा ह्येते दोषाः सनातनाः (सदातनाः) ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = समस्तजीवराशौ यद् दुर्लक्षणविवर्जितौ ।;पूर्णचित्सुखशक्त्यादेर्योग्यौ कृष्णा च मारुतिः ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = अनादिदुःखहीनत्वे सुखाधिक्ये च लक्षणम् ।;रुग्मिणीसत्यभामादिरूपायाः श्रिय एव तु ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = मुख्यं ततोऽपि(ततोऽति) मुख्यं तु स्वान्तन्त्र्यादेरशेषतः ।;गुणराशेः परं लिङ्गं नित्यं व्यासादिरूपिणः ।;विष्णोरेव नचान्यस्य स ह्येकः पूर्णसद्गुणः ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = साश्वेऽर्जुने यज्ञवाटं प्रविष्टेऽस्य सहोदराः ।;पूजिताः पूजयामासुर्मुदिताः सहकेशवाः ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = ततः स यज्ञो यदुवीररक्षितो व्यासोपदिष्टो मुनिभिः प्रवर्तितः ।;अशोभतालं सकलैर्नृपैश्च समागतैर्विप्रवरैश्च जुष्टः ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = स कृष्णयुग्मेन च भार्गवेण त्रिधा विभक्तेन परेण पुंसा ।;अधिष्ठितोऽशोभत विश्वमेतद् विश्वादिरूपेण यथैव तेन ॥ १२८॥ | |||
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| verse_lines = यथा विरिञ्चस्य पुराऽऽस यज्ञो यथैव शक्रस्य शतक्रतुत्वे ।;तथैव सोऽभूद् विधिशर्वशक्रपूर्वैः सुरैराविरलङ्कृतोऽधिकम् ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = न देवगन्धर्वमुनिस्वधर्ममर्त्यादिकेष्वास स योऽत्र नाऽस(सम्भ्रमः) ।;स्वलङ्कृतैर्नाकिजनैः सकान्तैररूरुचन्नाकवदेतदोकः(दोघः) ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = तत्रैव तत्त्वानि ससंशयानि निस्संशयान्यासुरलं विवादे ।;परस्परोत्थे हरिणा त्रिरूपिणा संस्थापितान्यग्र्यवचोभिरुच्चैः ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = प्रगीतगन्धर्ववरः प्रनृत्तसदप्सराः सन्ततवादिविप्रः ।;विवेचयद्देवनृपौघ एको रराज राजाऽखिलसत्क्रतूनाम् ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = समस्तदेव्यः सहवासुदेव्यः स्वलङ्कृताः फुल्लमुखारविन्दाः ।;विचेरुरत्रैव(विरेजुरत्रैव) सहाप्सरोभिर्निषेदुरप्यच्युतसत्कथारमाः ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = न वै मुमुक्षुर्न बभूषुरत्र न वै विवित्सुश्च कुतो बुभुक्षुः ।;असत्यकामा अभवन् कुतश्चित् प्रदातरि प्राज्ञवरेऽनिलात्मजे ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = दिनेदिने तत्र महान्नपर्वताः सभक्षसारा रसवन्त ऊर्जिताः ।;नद्यः पयः सर्पिरजस्रपूर्णाः समाक्षिकाद्या अपि पायसह्रदाः ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = ह्रदा महान्तस्त्रिदशादियोग्याः सुयोगयुक्ता हरिचन्दनादेः ।;तथाऽञ्जनालक्तकमुख्यमण्डनद्रव्याग्र्यवाप्यो मणिकाञ्चनोद्भवाः ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = यथेष्टपानाशनभोगशिष्टाः सहस्रशो मारुतिना तु कारिताः ।;गन्धा रसाद्याश्च समस्तभोगा दिवीव तत्राऽसुरतीव हृद्याः ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = नैतादृशः कश्चन भूतपूर्वो मखो विना रामविरिञ्चवज्रिणाम् ।;मखानिति प्रोचुरशेषलोका दृष्ट्वा मखं तं पुरुषोत्तमेरितम् ॥ १३८॥ | |||
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| verse_lines = स एवमद्धा हरिदैवतः क्रतुः पञ्चाश्वमेधात्मक उच्चकल्पः ।;दिनेदिने स्वृद्धगुणो बभूव मुदावहो वत्सरपञ्चकत्रयम् ॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = यज्ञावसाने निखिलाश्च पाण्डवाः कृष्णा च पृथ्वीमखिलां सवित्ताम् ।;माङ्गल्यमात्रं दयिताशरीरे निधाय सर्वाभरणानि चैव ।;समर्पयामासुरजे वरेण्ये व्यासे विभागाय यथोक्तमृत्विजाम् ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = प्रियो विभागो यदमुष्य विष्णोरतो विभागार्थमिवाऽर्पयंस्ते ।;हृदा समस्तं हरयेऽर्पितं तैः स हि द्विजस्थोऽपि समस्तकर्ता ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = देहेन्द्रियप्राणमनांसि चेतनैः सहैव तस्मा अतिसृज्य नेमुः ।;त्वदीयमेतन्निखिलं वयं च नास्त्यस्मदीयं(न त्वस्मदीयं) क्वच किञ्चनेश ।;स्वन्त्र एकोऽसि न कश्चिदन्यः सर्वत्र पूर्णोऽसि सदेति हृष्टाः ॥ १४२॥ | |||
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| verse_lines = ततो विभक्ते मुनयोऽवदंस्ते प्रत्यर्पयामो वयमेषु राज्यम् ।;पूर्णा हिरण्येन वयं धरायाः प्रपालने योग्यतमा इमे हि ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = पार्थाः सभार्या द्विजवाक्यमेतन्निशम्य कृष्णाय पुनः प्रणम्य ।;ऊचुस्तपो नोऽस्तु वनेऽर्पयित्वा राज्यं मखान्ते त्वयि धर्मलब्धम् ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितः प्राह स बादरायणो मुनीश्वरैरप्यभियाचितः प्रभुः ।;हिरण्यमेव स्वमिदं मुनीनां मदाज्ञया भूङ्ग्ध्वमशेषराज्यम् ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = समर्पितं मे फलवच्च तत् स्यात् पुनर्ग्रहो नैव च दोषकारी ।;पितामहोऽहं भवतां विशेषतो गुरुः पतिश्चैव ततो मदर्हथ ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितास्ते प्रतिपद्य राज्यं ददुर्हिरण्यं निखिलं च तस्मै ।;विभज्य विप्रान् स निजं तु भागमदात् पृथायै निखिलम् प्रसन्नः ॥ १४७॥ | |||
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| verse_lines = सभार्यकाणां वररत्नभूषणान्यशेषतः पुत्रभुवां प्रदाय ।;पृथक्पृथग् योग्यवरांस्तथैभ्यः प्रादात् प्रभुस्ते मुदिताः प्रणेमुः ॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = तद् यज्ञपञ्चकमजस्त्रिगुणां स एभ्यः सद्दक्षिणां क्रतुपतिर्निखिलामवाप्य ।;चक्रेऽश्वमेधत्रयमेकमेकं तेषां हरिर्बहुसुवर्णकनामधेयम् ॥ १४९॥ | |||
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| verse_lines = सकृष्णेष्वथ पार्थेषु सुस्नातावभृथेष्वलम् ।;पञ्चेन्द्रवद् विराजत्सु स्तूयमानेष्वृषीश्वरैः ॥ १५०॥ | |||
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| verse_lines = स्तूयमाने च तद्यज्ञे क्रोधो नकुलतां गतः ।;कृत्वोग्रगर्जनं यज्ञं तांश्च यज्ञकृतोऽखिलान् ॥ १५१॥ | |||
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| verse_lines = गर्हयन्नूचिवानित्थं भार्यापुत्रस्नुषायुतः ।;सक्तुप्रस्थमदाद् विप्र उञ्छवृत्तिः सुभक्तितः ॥ १५२॥ | |||
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| verse_lines = धर्मायातिथये तस्य कलां नार्हति षोडशीम् ।;यज्ञोऽयमिति हेतुं च विप्रैः पृष्टोऽभ्यभाषत ॥ १५३॥ | |||
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| verse_lines = अतिथेस्तस्य पादोदक्लिन्नः पार्श्वो हिरण्मयः ।;एको ममाभूदपरः सर्वतीर्थादिकेष्वपि ॥ १५४॥ | |||
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| verse_lines = मज्जतोऽवभृथेष्वद्धा यज्ञानामत्र चाऽदरात् ।;नाभूदित्यथ तत्तत्त्ववेदिभिर्मुनिपुङ्गवैः ॥ १५५॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णेन च तमोऽन्धं तं प्रापयद्भिः स्मिते कृते ।;अदर्शनं जगामाऽशु तमः प्राप च कालतः ।;तदर्थमेव हैरण्यः पार्श्वस्तस्याभवत् पुरा ॥ १५६॥ | |||
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| verse_lines = कृष्णस्य पाण्डवानां च मखादेश्च गुणान् बहून् ।;वदन्तो भर्त्सयाञ्चक्रुस्तन्मतज्ञा(तं मतज्ञाः) मधुद्विषः ॥ १५७॥ | |||
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| verse_lines = श्राद्धार्थं हि पयः पूर्वं (जामदग्नेः)जमदग्नेरदूषयत् ।;नाकुलेनैव रूपेण क्रोधस्तं पितरोऽशपन् ॥ १५८॥ | |||
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| verse_lines = भव त्वं नकुलस्तावद् यावद् धर्मादिकान् सुरान् ।;क्षेप्स्यसीति तमो घोरं भूयः पापेन यात्वयम् ।;इत्यभिप्रेत्यः तैः शप्तस्तथा कृत्वा तमोऽभ्ययात् ॥ १५९॥ | |||
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| verse_lines = यद्यप्यल्पधनत्यक्तं वित्तं बहुफलं भवेत् ।;तथाऽप्यनन्तफलदाः कर्तुरेव महागुणाः ॥ १६०॥ | |||
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| verse_lines = सतां प्रीतिश्च तत्रापि सद्वरो हरिरेव हि ।;पार्थेभ्योऽभ्यधिकः कर्ता समो वा को गुणैर्भवेत् ॥ १६१॥ | |||
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| verse_lines = सतां च प्रवरो विष्णुः सद्भिर्मुनिवरैर्युतः ।;प्रत्यक्षतः कारयति पार्थैः प्रियतमैश्च तैः ।;यं मखप्रवरं तस्य समं किं शुभसाधनम्(शुभसाधनैः) ॥ १६२॥ | |||
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| verse_lines = पठन्ति पैङ्गिनश्चैतान् मन्त्रानन्वर्थकानिह ।;अवैष्णवकृतं कर्म सर्वमन्तवदुच्यते ।;अनन्तं वैष्णवकृतं तत्र वर्णक्रमात् परम् ॥ १६३॥ | |||
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| verse_lines = वैष्णवेष्वपि मर्त्यैर्यत् कृतं शतगुणं ततः ।;गान्धर्वं कर्म तस्माच्च मुनिभिः पितृभिस्ततः ॥ १६४॥ | |||
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| verse_lines = देवशक्रशिवब्रह्मकृतं तस्मात् क्रमेण च ।;शतोत्तरमिति ज्ञेयं नान्यद् ब्रह्मकृतोपमम् ॥ १६५॥ | |||
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| verse_lines = वैष्णवत्वं क्रमात् वृद्धं (क्रमोद्वृद्धं) ब्रह्मान्तं जीवराशिषु ।;फलाधिक्यं कर्मणां हि विष्णोः प्रीत्यैव नान्यथा ॥ १६६॥ | |||
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| verse_lines = इति तेन न पार्थानां कर्मणाऽन्यत् समं क्वचित् ।;गुणैर्ज्ञानादिभिर्वाऽपि तस्मात् क्रोधः स तामसः ।;विनिन्द्य तान् सुसत्त्वस्थांस्तमोऽन्धमुपजग्मिवान् ॥ १६७॥ | |||
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| verse_lines = अथ पृष्टो वासुदेवः सुरविप्रादिसंसदि ।;युधिष्ठिरेण संहृष्टो जगादाशेषतः प्रभुः ॥ १६८॥ | |||
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| verse_lines = ते च श्रुत्वाऽखिलान् धर्मान् भक्त्या परमया युताः ।;पूजयन्तो जगन्नाथमापुश्च परमां मुदम् ॥ १६९॥ | |||
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<span id="gr-C31" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकत्रिंशोऽध्यायः"></span> | |||
== एकत्रिंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = ओं ॥ यज्ञेश्वरेणाभियुतेषु भक्त्या महीं प्रशासत्सु पृथासुतेषु ।;यियक्षुरागान्निशि विप्रवर्यो युधिष्ठिरं वित्तमभीप्समानः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = प्रातर्ददानीति नृपस्य वाक्यं निशम्य विप्रस्त्वरितो मखार्थे ।;भीमं ययाचे स नृपोक्तमाशु निशम्य चादान्निजहस्तभूषणम् ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = अनर्घमग्निप्रतिमं(अनर्घ्यमग्निप्रतिमं) विचित्ररत्नान्वितं(रत्नाञ्चितं) विप्रवरस्तदाप्य ।;ययौ कृतार्थोऽथ च (नन्दिरावं)नन्दिघोषमकारयद् वायुसूनुस्तदैव ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = अकालजं तं तु निशम्य राजा पप्रच्छ दूतैस्तमुवाच भीमः ।;यन्मर्त्यदेहोऽपि विनिश्चितायुरभून्नृपस्तेन ममाऽस हर्षः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितोऽसौ नृपतिस्त्वरेत धर्मार्थमित्यस्य मतं प्रपूजयन् ।;जगाद साध्वित्यथ भूय एव धर्मे त्वरावानपि सम्बभूव ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = अथाम्बिकेयं विषयेषु सक्तं दुस्सङ्गदुष्टं कृतभूरिदोषम् ।;समस्तराजाप्ययहेतुभूतं विचार्य (निचाय्य) तं मारुतिरन्वकम्पत ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = अकुर्वतस्तीक्ष्णतपः कुतश्चिन्नैवास्य(कुतश्चिन्नैव स्वलोकाप्ति)लोकाप्तिरमुष्य भूयात् ।;रागाधिकोऽयं न तपश्च कुर्यादित्यस्य वैराग्यकराणि चक्रे ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = आज्ञां परैरस्य निहन्ति सोदरैर्वधूजनैरप्यतिपूजितेऽस्मिन् ।;स निष्टनत्येवमपीतरैः स्वैः सुपूजितो(सम्पूजितो) नाऽस तदा विरागः ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = सर्वे हि पार्थास्तमृते सभार्या वैचित्रवीर्यं परमादरेण ।;पर्येव चक्रुः सततं सभार्यं कृष्णा च न स्यात् तनयार्तिमानिति ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = स प्रीयमाणो नितरां च तेषु नैवाधिकं प्रीयते भीमसेने ।;स्मरन् सुतांस्तेन हतान् समस्तानपि प्रभावं परमस्य जानन् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = तस्यापनेतुं विषयेषु सक्तिं द्वेषं तथैवाऽत्मनि भीमसेनः ।;जगाद माद्रीसुतयोः समक्षमास्फोट्य संशृण्वत एव तस्य ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = ताविमौ मे भुजौ वृत्तौ पीनौ चन्दनरूषितौ ।;ययोरन्तरमासाद्य जरढस्य सुता हताः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = नचापराधो भीमस्य ब्रुवतस्त्वामिदं वचः ।;अग्निर्निसृष्टो दत्तश्च गरो दाराश्च दूषिताः ।;हृतं क्षेत्रं धनं यस्य किं भीमेन कृतं त्वयि ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = विमुच्य द्वेषकामौ त्वं वने तीर्थनिषेवकः ।;तपसाऽऽराधय हरिं ततः पूतो भविष्यसि ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो द्वेषमुत्सृज्य भीमे निर्वेदमागतः ।;अनुज्ञां तपसे प्राप्तुमुपवासपरोऽभवत् ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = अनश्नन्तं चतुर्थेऽह्नि धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः ।;ज्ञात्वा सम्प्रार्थयामास भोजनार्थं पुनःपुनः ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = अनुज्ञां वनवासाय त्वत्तः प्राप्यैव सर्वथा ।;भोक्ष्येऽन्यथा नेति वदन् धृतराष्ट्रः श्रमान्वितः ।;उपवासकृशो भार्यां शिश्रिये मूर्च्छितः क्षणात् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = शन्तमेन(श्रान्तमेनं) करेणाथ धर्मजस्तं मृदु स्पृशन् ।;शनैः सञ्ज्ञामगमयदब्रवीच्च सुदुःखितः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = पुरस्कृत्य युयुत्सुं त्वं कुरु राज्यमकण्टकम् ।;वयमेव त्वदर्थाय कुर्मः सर्वे तपो वने ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = नेत्याह धृतराष्ट्रस्तं कुलधर्मो हि नो वने ।;अन्ते देहपरित्यागस्तन्माऽनुज्ञातुमर्हसि ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = तयोर्विवदतोरेवं कृष्णद्वैपायनः प्रभुः ।;सर्वज्ञः सर्वकर्तेश आविर्भूतोऽब्रवीन्नृपम् ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = तपसाऽशेषदोषाणां क्षयकाममिमं नृपम् ।;अनुजानीहि नैवास्य धर्मविघ्नकरो भव ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = काले निर्वेदमापन्नस्तपसा दग्धकिल्बिषः ।;शुभ्रां गतिमयं यायादन्यथा न कथञ्चन ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो धर्मराजस्तमनुजज्ञे स चाशितः ।;शिक्षयामास सद्धर्मान् नीतिं च विदुषेऽप्यलम् ।;केवलस्नेहतो(केवलं स्नेहतो) राज्ञे शुश्राव विनयात् स च ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = अनुज्ञाय गृहं प्राप्ते धर्मजे विदुरं पुनः ।;श्राद्धाय वित्तमाकाङ्क्षन् प्रेषयामास तद्वचः ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा युधिष्ठिरो भीममाह दातव्यमद्य नः ।;पुत्रपौत्राप्तबन्धूनां श्राद्धेच्छोर्वित्तमञ्जसा ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = तमाह भीमः पापानां विमुखानां मधुद्विषः ।;पारलौकिकसाहाय्यं न कार्यमितरार्थतः ।;दत्तेनापि हि वित्तेन पुत्रश्राद्धं करिष्यति ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = तज्ज्ञात्वा ददतां दोषो भवेदिति विचिन्तयन् ।;कष्टात् कष्टतरं यान्तु सर्वे दुर्योधनादयः ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = भीष्मादीनां वयं श्राद्धकर्तारस्तेन किं ततः ।;कानीनत्वात्तु कर्णस्य सहास्माभिः पृथैव हि ।;श्राद्धकर्मण्यधिकृता किं तस्मै दीयते धनम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तवन्तं नृपतिरर्जुनश्चोचतुः पुनः ।;यियासोर्याचमानाय निजबाहुबलार्जितम् ।;देहि वित्तं परमतः किं त्वामेषोऽभियाचते ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तमपि नेत्येव ब्रुवाणं शुद्धधार्मिकम् ।;अप्रीत्या जोषमास्वेति प्रोच्योवाच युधिष्ठिरः ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = कोशतो यद् बहिर्वित्तं दानभोगादिकारणम् ।;मम सन्निहितं सर्वं तत् पित्रे चार्पितं (पित्रेऽद्यार्पितं) मया ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = एवमेवार्जुनोऽप्याह विदुरं पुनरूचतुः ।;मुख्यधर्मरते भीमे न पिता क्रोद्धुमर्हति ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तो वित्तमादाय गत्वा क्षत्ताऽग्रजेऽब्रवीत्।;युधिष्ठिरार्जुनौ भक्तिं नितरां त्वयि चक्रतुः ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = नातिहृष्टस्त्वदाज्ञायां भीमस्तन्मा क्रुधोऽत्र च।;शुद्धे क्षत्रियधर्मे हि(शुद्धक्षत्रियधर्मेषु) नितरोऽयं वृकोदरः ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = नृपार्जुनौ धर्मरतावपि लोककृपापरौ।;अजातकोपस्तच्छ्रुत्वा धृतराष्ट्रः प्रशान्तधीः ॥ ४०॥ | |||
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| verse_lines = कृत्वा श्राद्धानि सर्वेषां महादानान्यनारतम् ।;दशरात्रं ददौ शुद्धमनसा निर्ऋणत्वधीः ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_lines = सर्वं समर्प्य गोविन्दे पार्थेभ्योऽन्येभ्य एव च ।;स्वजनेभ्यः समादाय स्रवन्नेत्रेभ्य उच्चधीः ।;अनुज्ञां निर्गतः प्राह पौरजानपदान् नृपः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = धर्मतो रक्षिता यूयमस्मत्पूर्वैर्महात्मभिः ।;नचाहं परमस्नेहाद् युष्माभिः सुकृपालुभिः ।;अरक्षितेति कथितः प्रमादादपि सज्जनाः ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = इष्टं च यज्ञैः पूर्तैश्च चरितं युष्मदाश्रयात् ।;पुत्रस्तु मम पापात्मा सर्वक्षत्रविनाशकः ।;सर्वातिशङ्की मूढश्च वृद्धानां शासनातिगः ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = सौभ्रात्रं येन सन्त्यज्य पाण्डवेषु महात्मसु ।;कृतं विरूपं सुमहत् कुर्याद् यन्नापरः क्वचित् ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = अप्रियाणि च कृष्णस्य सुबहून्याचरत् कुधीः ।;प्रायस्तेनापि मन्देन न युष्मास्वप्यप्रियं(युष्मास्वप्यशिवं,न युष्मास्वशिवं,न युष्मासु शिवं) कृतम् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = भ्रातरोऽस्य च सर्वेऽपि तच्छीलमनुवर्तिनः ।;हताश्च स्वेन पापेन ससुतामात्यबान्धवाः ॥ ४7॥ | |||
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| verse_lines = सोऽहं वयोगतश्चैव पुत्राधिभिरभिप्लुतः(पुत्रादिभिरभिप्लुतः) ।;तत्सम्बन्धकृतं(तत्सम्बन्धात्कृतं) पापं स्वकृतं चाप्यपेशलम्(चात्यपेशलम्) ।;पाण्डवेषु सकृष्णेषु तपसा मार्ष्टुमुद्यतः ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = तत्र मामनुजानीध्वं कृपया मित्रवत्सलाः ।;मत्प्रियार्थमपि स्नेहः पाण्डवेषु महात्मसु ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = क्रियमाणोऽपि कर्तव्यो भूय एव सदाऽचलः ।;ते हि मे पुत्रकाः सन्त इहामुत्र च सौख्यदाः ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्तैः स्वगुणानुच्चैः कीर्तयद्भिः सुदुःखितैः ।;पर्यश्रुनयनैः कृच्छ्रात् पौरजानपदैश्चिरात् ।;अनुज्ञातो ययौ पार्थैरनुयातः सुदूरतः ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = सञ्जयो विदुरश्चैनं सभार्यमनुजग्मतुः ।;अनुवव्राज तं कुन्ती वनाय कृतनिश्चया ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = वार्यमाणाऽपि तनयैः सभार्यैर्भृशदुःखितैः ।;संस्थाप्य तान् सुकृच्छ्रेण ययौ साऽन्वेव तं नृपम् ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = संन्दर्शितपथो राजा कुन्तीविदुरसञ्जयैः ।;गान्धारीसहितः प्राप कुरुक्षेत्रं जगद्गुरोः ।;क्रमेणैवाऽश्रमं व्यासदेवस्य सुरपूजितम् ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = त्रिवत्सरेणास्य (त्रिवत्सरादस्य) निजस्य लोकस्याऽप्तिं सभार्यस्य जगाद तत्र ।;ब्रह्माङ्कजस्तेन भृशं प्रतीतो व्यासोपदिष्टं व्यचरत् तपोऽग्र्यम् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = सक्षत्तृगान्धारिपृथे ससञ्जये तपोभिराराधयति प्रभुं हरिम् ।;वैचित्रवीर्येऽत्र सदारबन्धुभृत्यास्तु पार्था दृशये समाययुः ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = क्षत्तैकतामत्र युधिष्ठिरेण प्राप्तोऽथ भार्यासहितं ससञ्जयम् ।;उपासमानेषु विचित्रवीर्यपुत्रं पृथां चैव पृथासुतेषु ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = प्रादुर्बभूवामितशक्ति(प्रादुर्बभूवामृतशक्ति)तेजोज्ञानाद्भुतैश्वर्यसुखादिरूपः ।;व्यासो हरिस्तत्र समीक्ष्य सर्वे सम्पूजयामासुरुदग्र्यभक्त्या(सम्पूजयामासुरुदग्रभक्त्या) ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = तैः पूजितस्तत्र निषण्ण आह यद्यद् यदिष्टं प्रवदन्तु तत्तत् ।;दास्यामि तस्याद्य तदित्यमुष्मिन् भक्त्युच्छ्रयः पाण्डुसुतैः सदारैः ।;वृतोऽत्र कुन्ती रविसूनुजन्ममृत्यूत्थदोषापगमं ययाचे ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = ऊषुश्च रात्रिं परमाज्ञयैव सर्वे स्वभार्यासहिता(सर्वेऽपि भार्यासहिता) यथा पुरा ।;तृप्तः(तृप्ताः) सदारो नृपतिश्च तत्र सर्वेऽपि दृष्ट्वा महदद्भुतं(परमाद्भुतं) तत् ॥ ६२॥ | |||
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| verse_text = अथाऽज्ञयैवास्य परस्य सर्वाः स्त्रियो निजेशैः सहिता ययुः स्वः (स्वम्) । | |||
| verse_lines = अथाऽज्ञयैवास्य परस्य सर्वाः स्त्रियो निजेशैः सहिता ययुः स्वः (स्वम्) ।;विनोत्तरां तां तु कथां निशम्य पारीक्षितोऽयाचत तातदृष्टिम् ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = तं चाऽनयामास तदैव कृष्णो ह्यचिन्त्यशक्तिः स विकुण्ठलोकात् ।;दृष्ट्वा स पारीक्षित आप तुष्टिं स्वतातमीशेन समाहृतं पुनः ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = सम्पूज्य तं कृष्णमपीशवन्द्यं क्षमापयामास परीक्षिदात्मजः ।;चक्रे च विस्रम्भमतीव भारते पुनश्च तत्रस्थजनैः(तत्रत्यजनैः) समेतः ॥ ६५॥ | |||
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| verse_text = पार्थाः पुनः प्राप्य पुरं स्वकीयं धर्मेण पृथ्वीं परिपालयन्तः । | |||
| verse_lines = पार्थाः पुनः प्राप्य पुरं स्वकीयं धर्मेण पृथ्वीं परिपालयन्तः ।;भोगानरागा अजुषन्त(भोगानारागादषुजन्त) योग्यान् युक्ता जगद्धातरि वासुदेवे ॥ ६६॥ | |||
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| verse_text = वर्षत्रयान्ते त्मसमाहिताग्निं (त्यक्त्वाऽग्निभिः)त्यक्ताग्निभिस्तैर्वनमालिहद्भिः । | |||
| verse_lines = वर्षत्रयान्ते त्मसमाहिताग्निं (त्यक्त्वाऽग्निभिः)त्यक्ताग्निभिस्तैर्वनमालिहद्भिः ।;ते शुश्रुवुर्धृतराष्ट्रं सभार्यं सहैव कुन्त्या परिदग्धदेहम् ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = वीटामुखं(व्रीळामुखा,व्रीडामुखं, व्रीडामुखान्) ध्यानपरा निशम्य स्वर्यातमात्मीयपितृव्यमाशु ।;समेत्य भर्त्रा प्रतिपूज्यमानां कुन्तीं च तप्ता विदधुः क्रियाश्च ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = ते विष्णुभक्त्या परिपूतकर्मभिर्ज्ञानेन चान्ते तमनुस्मरन्तः ।;पार्थैः सुपुत्रैः (कुकृतौर्ध्वकर्मभिः)सुकृतोर्ध्वकर्मभिर्वृद्धिं सुखस्याऽपुरनप्ययां(अनव्ययाम्) शुभाः(शुभाम्) ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = (गावल्गणिः)गावद्गणिर्व्याससकाशमेत्य शुश्रूषया तस्य पुनर्निजां गतिम् ।;प्रपेदिवान् पाण्डुसुताश्च कृष्णं प्रतीक्षमाणाः पृथिवीमशासन् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = अष्टादशाब्दाः पृथिवीं समस्तां प्रशासतामेवमगुर्महात्मनाम् ।;अरिक्तधर्मार्थसुखोत्तमानामनुज्झितानन्तपदस्मृतीनाम् ॥ ७१॥ | |||
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<span id="gr-C32" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वात्रिंशोऽध्यायः"></span> | |||
== द्वात्रिंशोऽध्यायः == | |||
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| verse_lines = OM ॥ ततः कुरुक्षेत्रमवाप्य कृष्णो दीक्षां प्रपेदे द्विषडब्दसत्रे ।;स एव च व्यासभृगूद्वहात्मा चक्रेऽत्र सादस्यमजोऽप्रमेयः ॥ १॥ | |||
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| verse_lines = तत्रर्त्विजो दक्षभृगुप्रधानाः पार्था यदूनां प्रवरैः समेताः ।;ब्रह्मेशशक्रप्रमुखाः सुराश्च चक्रुः सुसाचिव्यमनन्तदासाः ॥ २॥ | |||
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| verse_lines = सर्वे च जीवा वसुधातलस्था येऽन्येऽन्तरिक्षद्युमुखोत्तरेषु ।;वसन्ति नारायणपादसंश्रयास्ते चात्र सर्वे मुमुदुः सनागाः ॥ ३॥ | |||
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| verse_lines = सुनिर्णयस्तत्त्वविनिर्णयार्थिनां तत्त्वस्य चाभूदिह वादशीलिनाम् ।;मिथो विवादात् सुरभूसुराणां वाक्याद्धरेर्व्यासभृगूद्वहात्मनः ॥ ४॥ | |||
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| verse_lines = धर्मार्थकामानखिलानवापुस्तदर्थिनो मुक्तिमपीह कृष्णात् ।;यथेष्टपानाशनवाससो जना विचेरुरत्रा(विरेजुरत्रा)मरमानवादयः ॥ ५॥ | |||
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| verse_lines = क्षेत्रं तदासीद्धरिलोकसम्मितं(तदाऽसीद्धरिलोकसम्मितं) यदीयुरत्राखिलसज्जना युतिम् ।;नानाप्तकामाश्च ततो बभूवुर्निर्यत्नदृश्यश्च यतोऽत्र केशवः ॥ ६॥ | |||
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| verse_lines = द्वादशाब्दं महासत्रमेवमेतादृशं हरिः ।;समाप्यावभृथस्नातः पूजयित्वाऽखिलान् जनान् ॥ ७॥ | |||
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| verse_lines = अनुजज्ञे क्रमेणैव वत्सरेण समागतान् ।;स्वकुलं सञ्जिहीर्षुः(सञ्जहीर्षुः) स विप्रशापमजीजनत् ॥ ८॥ | |||
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| verse_lines = उपदिश्य परं ज्ञानमुद्धवायामुमाश्रमम् ।;बदर्याख्यं प्रापयित्वा सप्तमाब्दं शतोत्तरम् ।;प्रतीक्षन् पालयामास पार्थैः सह भुवं प्रभुः ॥ ९॥ | |||
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| verse_lines = समारब्धं कलियुगं यदा दुर्योधनोऽपतत् ।;षट्त्रिंशाब्दं पुनः कृष्णः कृतमेवान्ववर्तयत् ॥ १०॥ | |||
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| verse_lines = कृतादपि विशेषोऽयं यत् पुण्यस्याधिकं फलम् ।;अल्पमेव च पापस्य कालात् कृष्णाज्ञया तथा ॥ ११॥ | |||
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| verse_lines = एवं सुधार्मिके लोके हरिभक्तिपरायणे ।;नष्टेषु कलिलिङ्गेषु युगवृत्तिमभीप्सवः ॥ १२॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मरुद्रादयो देवाः स्तुत्वा केशवमव्ययम् ।;व्यज्ञापयन् स्वलोकाप्तिमोमित्याह स चाच्युतः ॥ १३॥ | |||
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| verse_lines = प्राचुर्ये सज्जनस्य स्यान्न कलेर्वृद्धिरञ्जसा ।;इति स्वकुलसंहृत्यै प्रभासमनयत् प्रभुः ॥ १४॥ | |||
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| verse_lines = पुण्यक्षेत्रेऽपि न मृतिः स्वगृहे त्वतिधर्मदा(स्वगृहेऽप्यतिधर्मदा) ।;गत्यैवाल्पमपि क्षेत्रं स्यान्महत्फलमित्यजः ॥ १५॥ | |||
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| verse_lines = प्रकाशयितुमेवैनान् प्रभासाय कुशस्थलात् ।;नीत्वा दानादि(दानादिसद्धर्मान्)सद्धर्मांस्तैरकारयदच्युतः ॥ १६॥ | |||
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| verse_lines = ते ततः शापदोषेण कृष्णेनैव विमोहिताः ।;मैरेयमत्ता अन्योन्यं निपात्य स्वां तनुं गताः ।;तद् दृष्ट्वा बलदेवोऽपि योगेन स्वतनुं जहौ ॥ १७॥ | |||
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| verse_lines = ततः परेशोऽगणितानुभावः स्वसारथिं पाण्डवानां सकाशम् ।;स्वलोकयानप्रतिबोधनाय(स्वलोकयानप्रतिवेदनाय) स्वस्यानु चैषां त्वरयाऽभ्ययातयत् ॥ १८॥ | |||
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| verse_lines = अथाऽसतः पिप्पलमूल ईशितुरूरुस्थितं पादतलं सुताम्रम् ।;दृष्ट्वा जरा नाम ससर्ज शल्यं भक्तोऽप्यलं रोहितं शङ्कमानः ॥ १९॥ | |||
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| verse_lines = अच्छेद्याभेद्यदेहस्य शल्ये पादमुपस्थिते ।;समीपमागतो व्याधो दृष्ट्वा भीतोऽपतद् भुवि ॥ २०॥ | |||
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| verse_lines = विप्रवाक्यं मानयानः कारयित्वाऽमुना हरिः ।;पापं मां जहि देवेति याचन्तमनयद् दिवम् ॥ २१॥ | |||
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| verse_lines = पादप्रहारदोषेण तं भृगुं व्याधतां गतम् ।;पश्चात्तापेन भक्त्या च सुप्रीतस्तच्छरीरिणम् ।;स्वाज्ञाप्राप्तविमानेन दिवं निन्ये जनार्दनः ॥ २२॥ | |||
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| verse_lines = नीचा योनिर्नीचनीच(नीचां योनिं नीचनीचकर्मा) कर्माऽप्तं नीचकर्मतः ।;अदुष्टत्वात्तु मनसो भक्तिलोपो नचाप्यभूत् ।;भृगोरत्राबुद्धिपूर्वं नातिदोषकृदप्यभूत् ॥ २३॥ | |||
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| verse_lines = ततो विरिञ्चेशपुरन्दराद्याः पुनः स्तुवन्तोऽभिययुः प्रणम्य ।;कृष्णं स चाऽश्वेव ययौ स्वलोकं स्वतेजसा सर्वमिदं प्रकाशयन् ॥ २४॥ | |||
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| verse_lines = गोपालमन्त्रं भजतां फलप्रदस्त्वेकेन रूपेण स भुव्यदृश्यः ।;तस्थौ द्वितीयेन च सूर्यमण्डले तृतीयमासीच्छिवपूजितं वपुः ॥ २५॥ | |||
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| verse_lines = सम्पूजितं ब्रह्मलोके चतुर्थं कञ्जोद्भवेनाथ परं स्वधाम ।;समाप्नुवानं वपुरस्य पञ्चमं भक्त्याऽन्वयुर्देववराः स्वशक्त्या ॥ २६॥ | |||
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| verse_lines = तत्तेजसा ते प्रतिमुष्टदृष्टयः पुरुष्टुताद्या अमितोरुदीधितेः ।;यावत् स्वगम्यं त्वनुगम्य तस्थुर्निमीलिताक्षा विहतोर्ध्वचाराः ॥ २७॥ | |||
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| verse_lines = वीन्द्रेशशेषानुगतः स्वयम्भूर्धाम प्रविष्टं तमजं प्रणम्य ।;वीन्द्रादिकैरप्ययुतः स्वपित्राऽऽश्लिष्टो रहश्चाकथयत् तथाऽस्तौत् ॥ २८॥ | |||
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| verse_lines = स पूर्वरूपेण समाप्य चैक्यं विभज्य चेच्छानुसृतोऽथ रेमे ।;हरिः श्रिया ब्रह्ममुखैश्च मुक्तैः सम्पूज्यमानोऽमितसद्गुणात्मा ॥ २९॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्माऽपि शर्वादियुतः स्वलोकं प्राप्तः पुनस्तत्र गतं च कृष्णम् ।;रेमेऽभिपश्यन् प्रतिपूजयंस्तं सुराश्च सर्वे रविबिम्बसंस्थम् ॥ ३०॥ | |||
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| verse_lines = यतो न दर्शिता भ्रान्तिः प्रादुर्भावेष्वपि क्वचित् ।;देहत्यागानुसारेण (देहेत्यागानुकारेण) हरिणा तदिहाच्युतः ॥ ३१॥ | |||
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| verse_lines = मोहयित्वाऽसुरानन्धं तमः प्रापयितुं प्रभुः ।;चिदानन्दैकदेहोऽपि त्यक्तं देहमिवापरम् ।;सृष्ट्वा स्वदेहोपमितं शयानं भुव्यगाद् दिवम् ॥ ३२॥ | |||
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| verse_lines = दारुकोक्त्या समायातः पार्थस्तमदहत् तदा ।;रौहिणेयादिकानां च शरीराणि प्रधानतः ।;दारुको विष्णुलोकं तु पुनराप यथागतम् ॥ ३३॥ | |||
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| verse_lines = तथैव जनमोहाय प्राप्य वह्नावदृश्यताम् ।;रुक्मिण्यगाद्धरेः पार्श्वं सत्या कृत्वा तपस्तथा ॥ ३४॥ | |||
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| verse_lines = चिदानन्दैकदेहे हि(चिदानन्दैकदेहेऽपि) द्विरूपे इव ते यतः ।;एकैवातः कृष्णवत् ते दुष्टान् मोहयतस्तथा ॥ ३५॥ | |||
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| verse_lines = अन्या महामहिष्यस्तु त्यक्त्वा देहं हुताशने ।;काश्चित् काश्चित्तु तपसा(काश्चित् काश्चित् तपस्तप्त्वा) त्यक्तदेहा हरिं ययुः ॥ ३६॥ | |||
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| verse_lines = रौहिणेयादिकानां च भार्या वह्निमुखे तनुम् ।;त्यक्त्वा स्वभर्तॄनेवाऽपुः सर्वा एव पतिव्रताः ॥ ३७॥ | |||
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| verse_lines = वसुदेवः पार्थमुखाच्छ्रुत्वा तद्योगमास्थितः ।;त्यक्त्वा देहं कश्यपत्वं प्राप कृष्णानुरागतः ॥ ३८॥ | |||
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| verse_lines = तस्यार्जुनोऽश्वमेधाग्नावन्त्यकर्माकरोत् तदा ।;त्यक्तदेहास्तस्य भार्या वह्नौ प्रापुस्तमेव च ॥ ३९॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रियो बालांस्तथाऽऽदाय धनं चैव धनञ्जयः ।;विनिर्ययौ द्वारवत्यास्तां जग्रास(जग्राह) च सागरः ॥ ४० ॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रीबालसहिते पार्थ एकस्मिन् पथि गच्छति ।;शापात् सुपापा आभीराः स्त्रीजनान् जह्रुरुद्धताः ॥ ४१॥ | |||
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| verse_lines = यास्ताः षोडशसाहस्रवनिताः शतसंयुताः ।;कृष्णशापान्म्लेच्छवशं ययुर्दर्पनिमित्ततः ॥ ४२॥ | |||
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| verse_lines = ह्रियमाणे धने चैव वनितासु च वासविः ।;युयुत्सुर्गाण्डिवं सज्यं(सज्जं) कृच्छ्रेणैव चकार ह ॥ ४३॥ | |||
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| verse_lines = क्षीणास्तस्य शरा दैवान्नास्त्राणि स्मृतिमाययुः ।;स तद् दैवकृतं ज्ञात्वा संस्मरन् पुरुषोत्तमम् ।;निघ्नञ्छत्रून् गाण्डिवेन शेषं रक्षन् कुरून् ययौ(कुरूनगात्) ॥ ४४॥ | |||
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| verse_lines = तदा कुरुक्षेत्रगतं जगद्गुरुं सुपूर्णविज्ञानबलाब्धिसत्सुखम्(बलर्द्धिसत्सुखम्) ।;तमेव वासिष्ठकुलोद्भवं हरिं निरीक्ष्य दुःखेन पपात पादयोः ॥ ४५॥ | |||
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| verse_lines = स तेन पुंसां प्रवरेण हेतुभिः सम्बोधितोऽज्ञानतमोंऽशुमालिना ।;संस्थाप्य चेतः पुनरेव तस्मिन् जहौ शुचः प्रायश एव धैर्यात् ॥ ४६॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रियो म्लेच्छहृताः कृष्णप्रेषिताद्(कृष्णप्रेरिताद्) दाल्भ्यतः पुनः ।;गोविन्दैकादशीं श्रुत्वा कृत्वा सारस्वते जले ।;निमज्ज्य वायोर्वचनात् त्यक्तदेहा दिवं ययुः ॥ ४७॥ | |||
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| verse_lines = अर्जुनस्तु कुरुक्षेत्रे हार्दिक्ययुयुधानयोः ।;सुतौ सारस्वते चैव देशे राज्येऽभ्यषेचयत् ॥ ४८॥ | |||
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| verse_lines = अनिरुद्धसुतं वज्रं प्रियं कृष्णस्य सद्गुणम् ।;सशूरसेनेन्द्रप्रस्थराजानमकरोद् वशी ॥ ४९॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रीबालांश्च धनं चैव तस्मिन् संस्थाप्य फल्गुनः ।;ययौ भ्रातॄनशेषं च वृत्तं तेषामवर्णयत् ॥ ५०॥ | |||
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| verse_lines = ते चावियोगसमयं स्मरन्तो मुरवैरिणः(मुरवैरिणा) ।;अभ्यषिञ्चन् भागवतं माहाराज्ये परीक्षितम् ॥ ५१॥ | |||
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| verse_lines = स्त्रीहारिणां च म्लेच्छानां वधायैनमयोजयन् ।;कृतं च तेन तत् कर्म वोढ्रा पैतामहीं(पैतामहं) धुरम् ।;समयं परिरक्षद्भिर्न पार्थैरेव यत् कृतम् ॥ ५२॥ | |||
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| verse_lines = वासुदेवपदा स्पृष्टभूकण्टकसमुद्धृतिः(समुद्धतिः) ।;समयः पाण्डवानां हि तस्यैवानुगतिः परम् ॥ ५३॥ | |||
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| verse_lines = अनुव्रजद्भिर्विश्वेशं नास्माभिर्भूस्तदुज्झिता ।;भोज्या रक्ष्याऽपि वा तेषामित्येव समयः पुरा ॥ ५४॥ | |||
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| verse_lines = तत्र काली भीमभार्या वैष्णवं योगमास्थिता ।;कृष्णयैकत्वमापन्ना त्यक्त्वा देहं तु मानुषम् ॥ ५५॥ | |||
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| verse_lines = सुभद्राद्यास्तु या भार्याः पार्थानां तु तदाज्ञया ।;युयुत्सुश्चात्र शिक्षार्थं पौत्रस्यैवावसत् (पौत्रस्यैवावसन्) पुरे ॥ ५६॥ | |||
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| verse_lines = सन्त्यज्य राजचिह्नानि (राज्यचिह्नानि) वैष्णवं योगमास्थिताः ।;वीराध्वानं ययुः सर्वे कृष्णया सह पाण्डवाः ॥ ५७॥ | |||
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| verse_lines = प्रागुदीचीं दिशं पूर्वं ययुस्तत्रार्जुनो धनुः ।;नात्यजल्लोभतस्तं तु(लोभतस्तत्तु) समुद्रमुप पावकः ।;दृष्ट्वा ययाचे राजानं तदुक्तः प्रास्यदम्बुधौ ॥ ५८॥ | |||
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| verse_lines = प्रातिभाव्यं तु वरुणे निस्तीर्याग्निरदृश्यताम् ।;ययौ तेऽपि ययुः क्षिप्रं प्लवन्तः सप्तवारिधीन् ॥ ५९॥ | |||
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| verse_lines = अहोभिः सप्तभिर्योगं समारूढाः प्रदक्षिणम् ।;कृत्वा क्वचिदसज्जन्त आसेदुर्गन्धमादनम् ।;अत्र नारायणक्षेत्रे तेषां तन्वोऽपतन् क्रमात् ॥ ६०॥ | |||
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| verse_lines = द्रौपदीसहदेवादिपञ्चानां तत्र मारुतिः ।;सदेहनाकानिच्छुत्वाद् देहप्रपतनं हि तत् ॥ ६१॥ | |||
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| verse_lines = तेषामिहेति याथार्थ्यं जानन् पप्रच्छ धर्मजम् ।;केनकेनापतद् देहो दोषेण न इति क्रमात् ॥ ६२॥ | |||
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| verse_lines = मृतिकाले हि यो यस्य दोषं वक्त्यृणमोचनम् ।;तस्मात् स्यादुक्तदोषस्येत्याह यच्छ्रुतिरेव तत् ।;ऋणमोक्षाय सर्वेषां भीमो दोषानवादयत् ॥ ६३॥ | |||
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| verse_lines = सोऽपीच्छापतितान् देहानजानञ्छुद्धकर्मणाम् ।;अपश्यन् कारणं प्राह दोषान् स्यादेवमित्यपि ।;राजा (सम्भावनामात्रान्न (सम्भावनामात्रं) नहि कार्यमकारणम् ॥ ६४॥ | |||
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| verse_lines = स्वच्छन्दमृत्यवो योगाद् देहानुत्सृज्य पाण्डवाः ।;कृष्णा चाऽपुः परं स्थानं यन्न यान्त्यपि देवताः ।;इति श्रुतेर्न ते पापाद् देहांस्तत्यजुरूर्जिताः ॥ ६५॥ | |||
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| verse_lines = ऋणान्युन्मुच्य(ऋणात् प्रमुच्य) दोषोक्त्या स्वानां भीमः स्वकां तनुम् ।;तत्याज परमं ध्यायन्नाप च स्थानमुत्तमम् ।;इति स्कान्दपुराणोक्तं व्यासवाक्यमृषीन् प्रति ॥ ६६॥ | |||
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| verse_lines = भीमादृते हि चतुर्षु पक्षपातस्तु वासवौ ।;योग्य एवेति कृष्णाया न दोषः स्यात् कथञ्चन ॥ ६७॥ | |||
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| verse_lines = नीतिरूपे वीर्यबले महान्त्येषां यतः क्रमात् ।;प्राणत्वाद् भोगशक्तिश्च नहि दोषाय मारुतेः ॥ ६८॥ | |||
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| verse_lines = यथास्वरूपविज्ञानमात्मन्यपि न दोषकृत् ।;इति व्यासस्मृतेरेषामुक्तदोषोद्भवः कथम् ॥ ६९॥ | |||
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| verse_lines = कदाचिदतिमानोऽपि त्रयाणामेषु जायते ।;तथाऽपि तत्फलं नैतत् तारतम्यं हि मुक्तिगम्(तारतम्यं विमुक्तिगम्) ।;गुणदोषाधिकाल्पत्वादत्रस्थमपि हि श्रुतम् ॥ ७०॥ | |||
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| verse_lines = प्रारब्धकर्मनाशे (आरब्धकर्मनाशे) हि पतेद् देहोऽप्यपापिनः ।;युधिष्ठिरोऽपि हि स्वर्गं बुभुजे नैव तत्तनुः ॥ ७१॥ | |||
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| verse_lines = अतिमानादयो दोषाः कुत एव हि मारुतेः ।;अनादिकालतः सर्वदोषहीना गुणाधिकाः ॥ ७२॥ | |||
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| verse_lines = सर्वजीवगणेभ्यो ये ते हि(समस्तजीवराशिभ्यस्ते हि) वायुत्वमाप्नुयुः ।;ऋजवो नाम ये देवा देवानामपि देवताः ॥ ७३॥ | |||
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| verse_lines = अभावं ह्यतिमानादेर्भीमस्याऽह च केशवः ।;यत्किञ्चाऽत्मनि कल्याणं सम्भावयसि पाण्डव ।;सहस्रगुणमप्येतत् त्वयि सम्भावयाम्यहम् ॥ ७४॥ | |||
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| verse_lines = इति तस्माद् यथा युद्धे धर्महानिममन्यत ।;एवमत्राप्यधर्मेण देहपातं नृपोऽब्रवीत् ॥ ७५॥ | |||
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| verse_lines = पूज्येभ्यः(पूर्वेभ्यः) पूर्वमेवैषां देहपातमभीप्सताम् ।;तत्क्रमाद् (तत्कामाद्) देहपातोऽभून्न पापान्मुच्यतां यथा ॥ ७६॥ | |||
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| verse_lines = तेषु स्वलोकान् प्राप्तेषु धर्मजः श्वाऽत्मना सह(स्वात्मना सह) ।;ययौ पुरो देवरथस्तदाऽस्यावततार ह ॥ ७८॥ | |||
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| verse_lines = रथमारुहेति कथितो रथिना पुरतः शुनः ।;आरोहमब्रवीन्नैतद् युक्तमित्याह सोऽपि तम् ॥ ७९॥ | |||
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| verse_lines = नाऽरुहेयं विना श्वानमिति तेन स्थिरोदिते ।;स्वरूपं दर्शयामास धर्मो ह्याप्तः स्वरूपताम् (श्वरूपताम्) ॥ ८०॥ | |||
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| verse_lines = आनृशंस्यपरत्वेन कीर्तिमेवाऽत्मनो वृषः ।;ख्यापयामास कौन्तेयरूपिणो धर्मसूक्तिभिः ॥ ८१॥ | |||
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| verse_lines = ततः(यतः) स रथमारुह्य लोकानामुत्तरोत्तरम् ।;अतिक्रम्याखिलान् राज्ञो जगाम श्रीपतिप्रियः ॥ ८२॥ | |||
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| verse_lines = सर्वेषामुत्तरं लोकमैन्द्रं प्राप्येदमेव ते ।;स्थानमित्युदितो देवैर्दुर्योधनमवैक्षत ॥ ८३॥ | |||
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| verse_lines = सभ्रातृकं ज्वलन्तं च सर्वेषामुपरि स्थितम् ।;तं दृष्ट्वा परमक्रुद्धो निमील्य नयने शुभे ॥ ८४॥ | |||
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| verse_lines = भ्रातरो मे क्व कृष्णा च सकर्णाः(कर्णाद्याः) क्व च बान्धवाः ।;धृष्टद्युम्नादयः पुत्रा हैडिम्बाद्याश्च सर्वशः ॥ ८५॥ | |||
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| verse_lines = यादवश्चेति पप्रच्छ देवांस्ते च तमब्रुवन् ।;किं ते तैः स्वकृतं कर्म भुज्यतेऽत्र नचापरैः ॥ ८६॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आह पापोऽयं पृथिवीक्षयकारकः ।;सर्वातिशङ्की मित्रध्रुङ् नारायणपराङ्मुखः ॥ ८७॥ | |||
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| verse_lines = नास्तिकोऽतिशठः क्रूरो द्वेष्टा विष्णोश्च तद्भुवाम् ।;कथं दुर्योधनः स्थानं सर्वोत्तममवाप्तवान् ॥ ८८॥ | |||
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| verse_lines = कथं च सर्वधर्मज्ञा नारायणपरायणाः ।;संस्थिताः परमे धर्मे दृश्यन्तेऽत्र न मत्प्रियाः ॥ ८९॥ | |||
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| verse_lines = यत्र सन्तस्तु ते सन्ति तत्र स्थातव्यमेव मे ।;निरयेऽपि नचात्रापि नानेन सह पापिना ॥ ९०॥ | |||
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| verse_lines = अस्य वीरतमस्येदं धार्तराष्ट्रस्य युज्यते ।;इत्युक्त्वा देवता दूतं स्वानां सन्दर्शनार्थिनः ।;राज्ञः सम्प्रेषयामासुस्तत्सन्दर्शितवर्त्मना ॥ ९१॥ | |||
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| verse_lines = दुर्गन्धेन सुकृच्छ्रेण तमसा प्रावृतेन च ।;गत्वैव कियतीं भूमिं तद्दुर्गन्धासहो नृपः ।;इच्छन् निवर्तन तत्र स्वानां वाच इवाशृणोत् ॥ ९२॥ | |||
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| verse_lines = क्षणं तिष्ठ महाराज सन्निधानबलात् तव ।;वेदना नो न महतीत्येतच्छ्रुत्वा युधिष्ठिरः ॥ ९३॥ | |||
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| verse_lines = के यूयमिति पप्रच्छ दीनध्वनिविशङ्कितः ।;भीमोऽहमर्जुनः कर्ण इत्याद्युक्तमिवाशृणोत् ॥ ९४॥ | |||
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| verse_lines = श्रुत्वा तत् कृपयाऽऽविष्टः शोकामर्षसमन्वितः ।;आह दूतं यथेष्टं त्वं गच्छ नाहमितो व्रजे ॥ ९५॥ | |||
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| verse_lines = नच स्वर्गेण मे कार्यं त्यक्त्वा स्वजनमीदृशम् ।;इत्युक्तः प्रययौ दूतस्तस्थावत्र युधिष्ठिरः ॥ ९६॥ | |||
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| verse_lines = ततोऽत्र देवाः पुरुहूतपूर्वकाः समाययुः स्नेहवशाद् युधिष्ठिरे ।;तेष्वागतेष्वेव न तत्र वाचो दीना न दुर्गन्धतमोऽप्यपश्यत्(दुर्गन्धतमोऽप्यदृश्यत) ।;स्वर्गोत्तमं देशमपश्यदेतदभ्रान्तचेताः स युधिष्ठिरस्तदा ॥ ९७॥ | |||
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| verse_lines = आहात्र धर्मः पुनरात्मसद्यशः(परमात्मसद्यशः) प्रकाशयन् पाण्डुसुताभिधं स्वम् ।;धर्माद् विशिष्टा हि सदाऽनृशंसता दृष्टा च सा त्वय्यधिका त्रिशो मया ॥ ९८॥ | |||
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| verse_lines = शक्रोऽप्युवाचैनमिदं मृषा ते प्रदर्शितं द्रोणकृते मृषागिरः ।;कृच्छ्रादिदं ते कथितं न चातिविस्रम्भ आसीत् तव कृष्णवाक्ये ।;नह्याज्ञया वासुदेवस्य किञ्चित् पापं भवेत् सर्वविधर्मिणोऽपि ॥ ९९॥ | |||
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| verse_lines = ब्रह्मापरोक्ष्येऽपि विकर्म सूचकं प्रारब्धपापस्य विषाशनं यथा ।;पश्यात्र भीमप्रमुखान् सुखस्थान् सम्पूज्यमानांस्त्रिदशैः सुरूपान्॥ १००॥ | |||
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| verse_lines = कुतः परब्रह्मदृशां सुशुद्धसत्कर्मणां कृष्णपरायणानाम् ।;परेण योगेन विसृष्टतन्वां दुःखं भवेद् देववराधिपानाम् ॥ १०१॥ | |||
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| verse_lines = एते हि देवप्रवराः पृथिव्यां जाता भुवो भारजिहीर्षुमीशम् ।;प्रतोष्य तद्भावितबुद्धिकर्मभिः पुनश्च तेनैव सहाऽपिरे दिवम् ॥ १०२॥ | |||
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| verse_lines = न ते नृपाद्यापि हि मानुषो गतो भावस्ततो द्वेष्टि सुयोधनादीन् ।;निमज्ज्य तद् विष्णुपदोदकेऽत्र विसृज्य देहं भज देवभावम् ॥ १०३॥ | |||
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| verse_lines = सुयोधनाद्या(दुर्योधनाद्या) यदिमे सुपापा आरब्धकर्मक्षयमाप्य नित्ये ।;निःशेषसौख्योज्झितनित्यदुःखेऽवशाः(नित्यदुःखे वशाः) पतिष्यन्त्यपुनर्निवृत्ताः ॥ १०४॥ | |||
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| verse_lines = देवांशजा ये तु समस्तशस्ते स्वमूलरूपं समवाप्य काले ।;स्वतारतम्यानुसृतां विमुक्तिं प्राप्स्यन्ति नात्रापि विचार्यमस्ति ॥ १०५॥ | |||
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| verse_lines = इत्युक्त आश्वेव निमज्ज्य गङ्गां धर्मात्मजस्तत्र विसृज्य(धर्मात्मजस्तं प्रविसृज्य) देहम् ।;सद्यो बभौ दैवमवाप्य(दैवतमाप्य) कायं विसृष्टरोषादिसमस्तदोषः ॥ १०६॥ | |||
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| verse_lines = स तु प्रपश्यन् स्वजनं समस्तं स्वमूलरूपातिसमीपसंस्थम् ।;ददर्श भीमं च मरुत्समीपे मध्ये ज्वलन्तं मरुतां गणस्य ॥ १०७॥ | |||
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| verse_lines = ददर्श कृष्णामपि तत्समीपे श्रिया ज्वलन्तीं समतीत्य चान्याः ।;स्प्रष्टुं च संस्कारवशादियेष निषिध्य तं प्राह सुराधिराजः ॥ १०८॥ | |||
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| verse_lines = एषा हि साक्षाज्जगतां प्रियस्य प्राणात्मनो जीववरेश्वरस्य ।;प्राणप्रिया श्रीरिति नाम यस्याः शमात्मकेऽस्मिन् रमते सदैषा ॥ १०९॥ | |||
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| verse_lines = युष्मच्चतुर्देहगतस्य वायोर्वायुप्रिया भीमतनोस्तथैव ।;भोगाय सृष्टा पुरुषोत्तमेन युष्मत्प्रियार्थं भवतां च दारैः ॥ ११०॥ | |||
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| verse_lines = प्रीतिस्ततो ह्यभ्यधिका(ह्यत्यधिका) बभूव भीमस्य चास्यास्तदनु स्म पार्थे ।;ततो भवत्स्वेव यथाक्रमेण गुणानुसारेण समीरणस्य ॥ १११॥ | |||
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| verse_lines = इयं(इदा,एषा) हि सा शुद्धतनुः प्रजाता शच्यादियोगापगताग्र्यदेहा ।;यूयं च सर्वे मरुतो विशेषसंयोगहीनाः स्वशरीरसंस्थाः ॥ ११२॥ | |||
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| verse_lines = स्पर्शेऽपि नास्याः पवमानपत्न्याः सुपूतताऽलं भवतामिदानीम् ।;नचोत्तरत्रापि भवेत् कथञ्चिद् दिवौकसां मानुषदेहिनो(जन्मनो) यथा ॥ ११३॥ | |||
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| verse_lines = इतीरितं तं प्रतिसन्निवृत्तं विनाशयन् मानुषवासनां स्वयम् ।;समाश्लिषच्छुद्धतनुः स्तनोत्थो धर्मो हरेः सोऽभवदाशु तत्समः ॥ ११४॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु पार्था अखिलाः स्वमूलरूपैः सहैवाऽविविशुर्मुदाऽन्विताः ।;स्वीयानि धामानि(सद्मानि) ततोऽप्यनूनभोगाः सदारा न्यवसंश्च तत्र ॥ ११५॥ | |||
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| verse_lines = तत्रापि कृष्णेन समागमोऽभूत् पुरेव तेषामतितत्पराणाम् ।;चिक्रीड एभिः सहितस्तथैव कृष्णोऽपि तद्वत् सरथोऽर्जुनेन ॥ ११६॥ | |||
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| verse_lines = अन्ये च(तु) देवांशभवाः समस्ताः स्वमूलरूपैक्यमवापुराशु ।;कर्मक्षयादेव सुरेतरास्तु(सुरेतरास्ते) पुण्यक्षयं प्राप्य भुवि प्रजाताः ॥ ११७॥ | |||
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| verse_lines = चतुःसहस्रं त्रिशतोत्तरं ते(त्रिशतोत्तरं गते) संवत्सराणामनुभूय दिव्यान् ।;भोगान् नरत्वेऽपि सदेश्वरोऽहमसज्जगच्चेति धियाऽऽप्नुवंस्तमः ॥ ११८॥ | |||
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| verse_lines = केचित् पिशाचासुरराक्षसत्वमवाप्य विष्णोरपि तत्पराणाम् ।;द्वेषात् तमोऽन्धं त्वरया समाप्नुयुर्देवाः स्वकाले निजयोग्यमुक्तिम् ॥ १२०॥ | |||
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| verse_lines = चतुःसहस्रे त्रिशतोत्तरे गते संवत्सराणां तु कलौ पृथिव्याम् ।;जातः पुनर्विप्रतनुः स भीमो दैत्यैर्निगूढं हरितत्त्वमाह ॥ १२१॥ | |||
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| verse_lines = तदैव कृष्णाऽपि भुवि प्रजाता प्रीत्यै हरेरन्धतमस्यपातयत् ।;महासुरान् विष्णुपरार्जुनाद्या कृते प्रजाता हरितोषणाय ।;पुनश्च ते स्थानमवाप्य(पुनश्च तत्स्थानमवाप्य) सर्वे (स्वीयं)स्वीयां परान्ते तु विमुक्तिमाप्नुयुः ॥ १२२॥ | |||
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| verse_lines = वायुत्वमाप्तः स हनूमदंशो ब्राह्मं पदं प्राप्य वृकोदरश्च ।;वागीश्वरीत्वं (वागीश्वरत्वं) गतयैव कृष्णया सहैव मुक्तिं गमिताऽखिलोत्तमाम् ॥ १२३॥ | |||
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| verse_lines = भुवि द्युलोके च विरिञ्चतायां मुक्तौ च ताभ्यामधिकं समस्तात् ।;सन्तोष्यते पूर्णगुणो रमेशः सदैव नित्योर्जिततद्रतिभ्याम्(नित्योदितसद्रतिभ्याम्) ॥ १२४॥ | |||
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| verse_lines = ‘भूषन् न योऽधि बभ्रूषु नम्नते’(ऋग्वेद १.१४०.६)(भुषन्न योऽधि बभ्रूषु नम्नते) ‘बळित्था तद्वपुषे धायि दर्शतं’(१.१४१.१) ।;‘तां सु ते कीर्तिम् मघवन् महित्वा’(१०.५४.१) इत्यादिसूक्तानि च तत्प्रमाणम् ॥ १२५॥ | |||
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| verse_lines = अन्यानि वाक्यानि च वैदिकानि सपञ्चरात्रोक्तिपुराणकानि ।;पृष्टश्च भीष्मोऽत्र युधिष्ठिरेणैतन्मोक्षधर्मेष्वपि किञ्चिदाह ॥ १२६॥ | |||
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| verse_lines = एवं प्रयातेषु सकेशवेषु स्वानेव लोकान् यदुपाण्डवेषु ।;परीक्षिदाद्यास्तु तदन्वयोत्था व्यासानुशिष्टाः पृथिवीमरक्षन् ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = तैः क्षेमकान्तैरिह भारतादिशास्त्राणि शृण्वद्भिरशेषविद्भिः ।;व्यासप्रभावाच्च कलौ च धर्मो ज्ञानं च सुत्रातमगान्न(सूत्रार्थमगान्न) नाशम् ॥ १२७॥ | |||
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| verse_lines = संवत्सराणां तु सहस्रके गते प्राप्तेषु विद्यामखिलेषु सत्सु ।;दग्धा पुरा ये त्रिपुरं घ्नतैव(त्रिपुरघ्नतैव) रुद्रेण जाताः पृथिवीतले ते ॥ १२९॥ | |||
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| verse_lines = अदर्शनं सर्वमुनीन्द्रवृन्दैः सहैव सज्ज्ञानमहानिधाने (निदाने) ।;व्यासे प्रयातेऽपि सुतत्त्वविद्या तत्सम्प्रदायादपि तैरवाप्ता ॥ १३०॥ | |||
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| verse_lines = उत्सादितत्वात्तु दुरागमानां तत्सम्प्रदायस्य च नाशितत्वात् ।;प्रसारितत्वाच्च सदागमानां पापा अपि ज्ञानमवापुरेतत् ॥ १३१॥ | |||
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| verse_lines = शुना पुरोडाशमिवावलीढं वेदश्रुतिं चा(वा)ऽन्त्यजनैरवाप्ताम् ।;अनन्तदुःखाप्तिसुयोग्यदैत्यैर्विद्यामवाप्तां तु न सेहिरे सुराः ॥ १३२॥ | |||
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| verse_lines = नावाग्गतिः क्वापि सुवेदिनां भवेत् प्राप्यं सुखं नित्यमवश्यमेभिः ।;प्राप्यं तमोऽन्धं त्वसुरैर्न मुक्तिः कदाचिदाप्या तदचिन्तयन् सुराः ॥ १३३॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञानप्रदानाय सतां तदन्यज्ञानप्रणाशाय च विष्णुनैते ।;क्लृप्तास्ततस्ते सविरिञ्चशर्वा विज्ञापयामासुरुपेत्य विष्णुम् ॥ १३४॥ | |||
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| verse_lines = क्षीरोदधेरुत्तरतीरनिष्ठितै(विष्ठितै)रभिष्टुतः सुष्टुतिभिः पुरुष्टुतः ।;प्रदाय तेषामभयं रमापतिः क्षणादभूच्चारुतराकृतिः (तमाकृतिः) शिशुः ॥ १३५॥ | |||
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| verse_lines = यस्त्रैपुराणां प्रथमोऽत्र जातः शुद्धोदनेत्येव जिनेति चोक्तः ।;क्षेत्रे गयाख्येऽस्य शिशुं प्रजातं सम्प्रास्य दूरेऽत्र बभूव विष्णुः ।;अजानमानाः स्वशिशुं गतं तं शिशुं हरिं वीक्ष्य निजं स्म मेनिरे ॥ १३६॥ | |||
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| verse_lines = तेषां तदा वैदिककर्म वीक्ष्य सम्प्राहसत् तद्वपुषैव केशवः ।;तं जातमात्रं प्रहसन्तमीक्ष्य सुविस्मितैः पृष्ट उवाच विष्णुः ।;बुद्धोऽहमित्येव सुनित्यबोधाज्जगाद(स नित्यबोधाज्जगाद) चैषामथ बुद्धदर्शनम् ॥ १३७॥ | |||
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| verse_lines = तथाऽप्यविश्वासमवेक्ष्य तेषां सस्मार देवानखिलान् जनार्दनः ।;विज्ञाय ते तस्य मनोगतं निजान् प्रचिक्षिपुर्हेतिगणानमुष्मिन् ॥ १३८॥ | |||
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| verse_lines = स जातमात्रः शिवपूर्वकाणां शूलादिहेतीरखिला निगीर्य ।;दैत्यातिमोहाय निजं च चक्रं स्वमुक्तमाश्वेव समग्रहीद्वशी॥ १३९॥ | |||
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| verse_lines = तदासनत्वेन विधाय तस्मिन् समास्थितं देवगणाः प्रणम्य ।;जग्मुः स्वधामानि वचांसि तस्य (चास्य) स्वीचक्रुराश्वेव जिनादिदैत्याः ॥ १४०॥ | |||
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| verse_lines = ते ज्ञानधर्मावपहाय पापा विमोहिता देववरेण(दैववरेण) सर्वे ।;जग्मुस्तमोऽन्धं क्षणिकं समस्तं ज्ञानं नसच्चेति दृढं स्मरन्तः ॥ १४१॥ | |||
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| verse_lines = नारायणोऽप्याप्य(नारायणः प्राप्य) सुरेन्द्रवृन्दं वृत्तं च तेषामखिलं(तेषां निखिलं) निगद्य ।;पृष्टश्च तैराह निजं हृदिस्थं बौद्धागमार्थं सृतिबन्धमोचनम् ॥ १४२॥ | |||
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| verse_lines = क्षणादयं क्षणिकास्तद्विशेषा यतः प्रयान्त्येव निसर्गतोऽखिलाः ।;ततः स्थिरत्वेऽपि विशेषसंश्रयादुक्तं क्षणस्थायि मया समस्तम् ॥ १४३॥ | |||
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| verse_lines = तद्वान् विशेषश्च यतो न भिन्नो सदा स्वनिर्वाहकशक्तियुक्तौ ।;अतः क्षणस्थायि समस्तमेतत् स्थिरात्मकं चेति हि नास्ति भेदः ॥ १४४॥ | |||
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| verse_lines = ज्ञोऽहं सदैकः परमो मयैतत् सदाऽननीयं हि यतोऽस्वतन्त्रम् ।;ज्ञानात्मकं विश्वमतो मयोक्तं जडस्वरूपं च किमु स्म चेतनम् ॥ १४५॥ | |||
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| verse_lines = शंशीलकोऽहं यत एव चोच्चः शूनामकस्तद्धि मया निधेयम्(विधेयम्) ।;शून्याभिधं दोषविरुद्धरूपो दोषोज्झितोऽन्यस्त्वखिलादनामा ।;एनैव साद्यं त्वसदेव नामतस्त्वभाव एनैव भवेद् यतस्तत् ॥ १४६॥ | |||
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| verse_lines = इत्यादि बोद्धव्यमिदं समस्तं मयोदितं क्वापि न हेयमस्ति ।;इत्यादि देवान् प्रतिबोधयंश्च देवैः सहोवास स बुद्धदेवः ।;गत्वा स्वधामाप्यपरेण रूपेणाऽस्ते पृथक् चैकतनुर्यथेष्टम् ॥ १४७॥ | |||
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| verse_lines = ततस्तु बुद्धोदितपक्षसंस्थो जिनोऽपि चक्रे मतमन्यदेव ।;बौद्धेन जैनेन मतेन चैव दैत्यांशकाः प्रीतिमगुः समस्ताः ॥ १४८॥ | |||
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| verse_lines = प्रशान्तविद्येत्यभिधं तथाऽन्यद् बुद्धोक्तशास्त्रं त्रिदशा अवाप्य ।;तोषं ययुर्वेदसमस्तसारं यामाश्रितानामचिरेण मुक्तिः ॥ १४९॥ | |||
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| verse_lines = अन्ये मनुष्या अपि भारताद्यं सत्सम्प्रदायं परिगृह्य विष्णुम् ।;यजन्त आपुः परमां गतिं तन्न सेहिरे क्रोधवशादिदैत्याः ॥ १५०॥ | |||
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| verse_lines = शैवं तपस्ते विपुलं विधाय जगद्विमोहोर्जितशक्तिमस्मात् ।;प्राप्य प्रजाता भुवि मोहनं च चक्रुः कुतर्कैरभिदां वदन्तः ॥ १५१॥ | |||
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| verse_lines = तेषां प्रपाताय सतां च मुक्त्यै(विमुक्त्यै) जन्माऽस भीमस्य यदुक्तमत्र ।;दुर्गा पुनर्विप्रकुलेऽवतीर्णा हनिष्यति व्रातमथासुराणाम् ॥ १५२॥ | |||
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| verse_lines = ततः कलेरन्तमवाप्य धर्मज्ञानादिकल्याणगुणप्रहीने ।;लोके विरिञ्चत्रिपुरघ्नशक्रपूर्वाः पयोब्धिं त्रिदशाः प्रजग्मुः ॥ १५३॥ | |||
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| verse_lines = नारायणस्तैः स्तुतिपूर्वमर्थितो भवाय लोकस्य स शम्भलाख्ये ।;ग्रामे मुनेर्विष्णुयशोऽभिधस्य गृहे बभूवाऽविरचिन्त्यशक्तिः ॥ १५४॥ | |||
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| verse_lines = कलेस्तु कात्कारत(काल्कारत) एव कल्की ज्ञानं कलं कं सुखमेव तद्वान् ।;कल्कीति वा तेन समस्तदस्युविनाशनं तेन दिनाद् व्यधायि ॥ १५५॥ | |||
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| verse_lines = अधर्मवृत्तं विमुखं हरेश्च निहत्य निःशेषजनं तुरङ्गी ।;संस्थापयामास स धर्मकेतुं(सेतुं) ज्ञानं स्वभक्तिं च निजप्रजासु ॥ १५६॥ | |||
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| verse_lines = इत्याद्यनन्तानि हरेरुदारकर्माणि रूपाणि च सद्गुणाश्च ।;नित्यव्यपेताखिलदोषकस्य ब्रह्मेत्यनन्तेति च नाम येन ॥ १५७॥ | |||
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| verse_lines = विनिर्णयो नास्त्यमुना विना यद् विप्रस्थितानामिव सर्ववाचाम् ।;तद् ब्रह्मसूत्राणि चकार कृष्णो व्याख्या तथैषामयथा (व्याख्याऽथ तेषामयथा)कृताऽन्यैः ॥ १६१ ॥ | |||
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| verse_lines = निगूहितं यत् पुरुषोत्तमत्वं सूत्रोक्तमप्यत्र महासुरेन्द्रैः ।;जीवेश्वरैक्यं प्रवदद्भिरुग्रैर्व्याख्याय सूत्राणि चकार चाऽविः ॥ १६२॥ | |||
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| verse_lines = व्यासाज्ञया भाष्यवरं विधाय पृथक्पृथक् चोपनिषत्सुभाष्यम् ।;कृत्वाऽखिलान्यं पुरुषोत्तमं च हरिं वदन्तीति समर्थयित्वा ॥ १६३॥ | |||
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| verse_lines = तनुस्तृतीया पवनस्य सेयं सद्भारतार्थप्रतिदीपनाय ।;ग्रन्थं चकारेममुदीर्णविद्या यस्मिन् रमन्ते हरिपादभक्ताः ॥ १६४॥ | |||
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| verse_lines = तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः ।;निर्यदीं बुध्नान् महिषस्य वर्पस ईशानासः शवसा क्रन्त सूरयः ।;यदीमनु प्रदिवो मध्व आधवे गुहासन्तं मातरिश्वा मथायति ॥ १६५॥(ऋ.१.१४१.२-३) | |||
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| verse_lines = इत्यादिवाक्योक्तमिदं समस्तं तथा पुराणेषु च पञ्चरात्रे ।;अत्रोदिता याश्च कथाः समस्ता वेदेतिहासादिविनिर्णयोक्ताः(समस्तवेदेतिहासदिविनिर्णयोक्ताः) ॥ १६६॥ | |||
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| verse_lines = तस्मादयं ग्रन्थवरोऽखिलोरुधर्मादिमोक्षान्तपुमर्थहेतुः ।;किं चो(वो)दितैरस्य गुणैस्ततोऽन्यैर्नारायणः प्रीतिमुपैत्यतोऽलम्(प्रीतिमुपैत्यतोऽयम्) ॥ १६७॥ | |||
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| verse_lines = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं;बट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।;वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः;मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे ॥ १६८॥ | |||
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| verse_lines = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः ।;प्रीयतां प्रीत एवालं विष्णुर्मे परमः सुहृत् ॥ १६९॥ | |||
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