Mahabharatatatparyanirnaya/Moola: Difference between revisions
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| verse_text = नारायणाय परिपूर्णगुणार्णवाय विश्वोदयस्थितिलयोन्नियति प्रदाय। | | verse_text = नारायणाय परिपूर्णगुणार्णवाय विश्वोदयस्थितिलयोन्नियति प्रदाय। | ||
| verse_lines = नारायणाय परिपूर्णगुणार्णवाय विश्वोदयस्थितिलयोन्नियति | | verse_lines = नारायणाय परिपूर्णगुणार्णवाय विश्वोदयस्थितिलयोन्नियति प्रदाय।¦ज्ञानप्रदाय विबुधासुरसौख्यदुःखसत्कारणाय वितताय नमो नमस्ते ॥ १॥ | ||
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| verse_text = आसीदुदारगुणवारिधिरप्रमेयो नारायणः परतमः परमात् स एकः। | | verse_text = आसीदुदारगुणवारिधिरप्रमेयो नारायणः परतमः परमात् स एकः। | ||
| verse_lines = आसीदुदारगुणवारिधिरप्रमेयो नारायणः परतमः परमात् स | | verse_lines = आसीदुदारगुणवारिधिरप्रमेयो नारायणः परतमः परमात् स एकः।¦संशान्तसंविदखिलं जठरे निधाय लक्ष्मीभुजान्तरगतः स्वरतोऽपि चाग्रे ॥ २॥ | ||
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| verse_text = तस्योदरस्थजगतः सदमन्दसान्द्रस्वानन्दतुष्टवपुषोऽपि रमारमस्य। | | verse_text = तस्योदरस्थजगतः सदमन्दसान्द्रस्वानन्दतुष्टवपुषोऽपि रमारमस्य। | ||
| verse_lines = तस्योदरस्थजगतः सदमन्दसान्द्रस्वानन्दतुष्टवपुषोऽपि | | verse_lines = तस्योदरस्थजगतः सदमन्दसान्द्रस्वानन्दतुष्टवपुषोऽपि रमारमस्य।¦भूत्यै निजाश्रितजनस्य हि सृज्यसृष्टावीक्षा बभूव परनामनिमेषकान्ते ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वा स चेतनगणान् जठरे शयानान् आनन्दमात्रवपुषः सृतिविप्रमुक्तान्। | | verse_text = दृष्ट्वा स चेतनगणान् जठरे शयानान् आनन्दमात्रवपुषः सृतिविप्रमुक्तान्। | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा स चेतनगणान् जठरे शयानान् आनन्दमात्रवपुषः | | verse_lines = दृष्ट्वा स चेतनगणान् जठरे शयानान् आनन्दमात्रवपुषः सृतिविप्रमुक्तान्।¦ध्यानं गतान् सृतिगतांश्च सुषुप्तिसंस्थान् ब्रह्मादिकान् कलिपरान् मनुजांस्तथैक्षत् ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = स्रक्ष्ये हि चेतनगणान् सुखदुःखमध्यसम्प्राप्तये तनुभृतां विहृतिं ममेच्छन्। | | verse_text = स्रक्ष्ये हि चेतनगणान् सुखदुःखमध्यसम्प्राप्तये तनुभृतां विहृतिं ममेच्छन्। | ||
| verse_lines = स्रक्ष्ये हि चेतनगणान् सुखदुःखमध्यसम्प्राप्तये तनुभृतां विहृतिं | | verse_lines = स्रक्ष्ये हि चेतनगणान् सुखदुःखमध्यसम्प्राप्तये तनुभृतां विहृतिं ममेच्छन्।¦सोऽयं विहार इह मे तनुभृत् स्वभावसम्भूतये भवति भूतिकृदेव भूत्याः ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = इत्थं विचिन्त्य परमः स तु वासुदेवनामा बभूव निजमुक्तिपदप्रदाता। | | verse_text = इत्थं विचिन्त्य परमः स तु वासुदेवनामा बभूव निजमुक्तिपदप्रदाता। | ||
| verse_lines = इत्थं विचिन्त्य परमः स तु वासुदेवनामा बभूव | | verse_lines = इत्थं विचिन्त्य परमः स तु वासुदेवनामा बभूव निजमुक्तिपदप्रदाता।¦तस्याज्ञयैव नियताऽथ रमाऽपि रूपं बभ्रे द्वितीयमपि यत् प्रवदन्ति मायाम् ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = सङ्कर्षणश्च स बभूव पुनः सुनित्यः संहारकारणवपुस्तदनुज्ञयैव। | | verse_text = सङ्कर्षणश्च स बभूव पुनः सुनित्यः संहारकारणवपुस्तदनुज्ञयैव। | ||
| verse_lines = सङ्कर्षणश्च स बभूव पुनः सुनित्यः | | verse_lines = सङ्कर्षणश्च स बभूव पुनः सुनित्यः संहारकारणवपुस्तदनुज्ञयैव।¦देवी जयेत्यनु बभूव स सृष्टिहेतोः प्रद्युम्नतामुपगतः कृतितां च देवी ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = स्थित्यै पुनः स भगवाननिरुद्धनामा देवी च शान्तिरभवच्छरदां सहस्रम्। | | verse_text = स्थित्यै पुनः स भगवाननिरुद्धनामा देवी च शान्तिरभवच्छरदां सहस्रम्। | ||
| verse_lines = स्थित्यै पुनः स भगवाननिरुद्धनामा देवी च शान्तिरभवच्छरदां | | verse_lines = स्थित्यै पुनः स भगवाननिरुद्धनामा देवी च शान्तिरभवच्छरदां सहस्रम्।¦स्थित्वा स्वमूर्तिभिरमूभिरचिन्त्यशक्तिः प्रद्युम्नरूपक इमांश्चरमात्मनेऽदात् ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = निर्देहकान् स भगवाननिरुद्धनामा जीवान् स्वकर्मसहितान् उदरे निवेश्य । | | verse_text = निर्देहकान् स भगवाननिरुद्धनामा जीवान् स्वकर्मसहितान् उदरे निवेश्य । | ||
| verse_lines = निर्देहकान् स भगवाननिरुद्धनामा जीवान् स्वकर्मसहितान् उदरे निवेश्य | | verse_lines = निर्देहकान् स भगवाननिरुद्धनामा जीवान् स्वकर्मसहितान् उदरे निवेश्य ।¦चक्रेऽथ देहसहितान् क्रमशः स्वयम्भुप्राणात्मशेषगरुडेशमुखान् समग्रान् ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = पञ्चात्मकः स भगवान् द्विषडात्मकोऽभूत् पञ्चद्वयी शतसहस्रपरोऽमितश्च। | | verse_text = पञ्चात्मकः स भगवान् द्विषडात्मकोऽभूत् पञ्चद्वयी शतसहस्रपरोऽमितश्च। | ||
| verse_lines = पञ्चात्मकः स भगवान् द्विषडात्मकोऽभूत् पञ्चद्वयी | | verse_lines = पञ्चात्मकः स भगवान् द्विषडात्मकोऽभूत् पञ्चद्वयी शतसहस्रपरोऽमितश्च।¦एकः समोऽप्यखिलदोषसमुज्झितोऽपि सर्वत्र पूर्णगुणकोऽपि बहूपमोऽभूत् ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आत्मतन्त्रो निश्चेतनात्मकशरीरगुणैश्च हीनः। | | verse_text = निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आत्मतन्त्रो निश्चेतनात्मकशरीरगुणैश्च हीनः। | ||
| verse_lines = निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आत्मतन्त्रो निश्चेतनात्मकशरीरगुणैश्च | | verse_lines = निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आत्मतन्त्रो निश्चेतनात्मकशरीरगुणैश्च हीनः।¦आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादिः सर्वत्र च स्वगतभेदविवर्जितात्मा ॥ ११॥ | ||
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| verse_text = कालाच्च देशगुणतोऽस्य न चाऽदिरन्तो वृद्धिक्षयौ न तु परस्य सदातनस्य। | | verse_text = कालाच्च देशगुणतोऽस्य न चाऽदिरन्तो वृद्धिक्षयौ न तु परस्य सदातनस्य। | ||
| verse_lines = कालाच्च देशगुणतोऽस्य न चाऽदिरन्तो वृद्धिक्षयौ न तु परस्य | | verse_lines = कालाच्च देशगुणतोऽस्य न चाऽदिरन्तो वृद्धिक्षयौ न तु परस्य सदातनस्य।¦नैतादृशः क्व च बभूव न चैव भाव्यो नास्त्युत्तरः किमु परात् परमस्य विष्णोः ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = सर्वज्ञ ईश्वरतमः स च सर्वशक्तिः पूर्णाव्ययात्मबलचित्-सुखवीर्यसारः। | | verse_text = सर्वज्ञ ईश्वरतमः स च सर्वशक्तिः पूर्णाव्ययात्मबलचित्-सुखवीर्यसारः। | ||
| verse_lines = सर्वज्ञ ईश्वरतमः स च सर्वशक्तिः पूर्णाव्ययात्मबलचित्- | | verse_lines = सर्वज्ञ ईश्वरतमः स च सर्वशक्तिः पूर्णाव्ययात्मबलचित्-सुखवीर्यसारः।¦यस्याऽज्ञया रहितमिन्दिरया समेतं ब्रह्मेशपूर्वकमिदं न तु कस्य चेशम् ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = आभासकोऽस्य पवनः पवनस्य रुद्रः शेषात्मको गरुड एव च शक्रकामौ। | | verse_text = आभासकोऽस्य पवनः पवनस्य रुद्रः शेषात्मको गरुड एव च शक्रकामौ। | ||
| verse_lines = आभासकोऽस्य पवनः पवनस्य रुद्रः शेषात्मको गरुड एव च | | verse_lines = आभासकोऽस्य पवनः पवनस्य रुद्रः शेषात्मको गरुड एव च शक्रकामौ।¦वीन्द्रेशयोस्तदपरे त्वनयोश्च तेषां ऋष्यादयः क्रमश ऊनगुणाः शतांशाः ॥ १४॥ | ||
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| verse_text = आभासका त्वथ रमाऽस्य मरुत्स्वरूपाच्छ्रेष्ठाऽप्यजात् तदनु गीः शिवतो वरिष्ठा। | | verse_text = आभासका त्वथ रमाऽस्य मरुत्स्वरूपाच्छ्रेष्ठाऽप्यजात् तदनु गीः शिवतो वरिष्ठा। | ||
| verse_lines = आभासका त्वथ रमाऽस्य मरुत्स्वरूपाच्छ्रेष्ठाऽप्यजात् तदनु गीः शिवतो | | verse_lines = आभासका त्वथ रमाऽस्य मरुत्स्वरूपाच्छ्रेष्ठाऽप्यजात् तदनु गीः शिवतो वरिष्ठा।¦तस्या उमा विपतिनी च गिरस्तयोऽस्तु शच्यादिकाः क्रमश एव यथा पुमांसः ॥ १५॥ | ||
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| verse_lines = ताभ्यश्च ते शतगुणैर्दशतो वरिष्ठाः पञ्चोत्तरैरपि यथाक्रमतः | | verse_lines = ताभ्यश्च ते शतगुणैर्दशतो वरिष्ठाः पञ्चोत्तरैरपि यथाक्रमतः श्रुतिस्थाः।¦शब्दो बहुत्ववचनः शतमित्यतश्च श्रुत्यन्तरेषु बहुधोक्तिविरुद्धता न ॥ १६॥ | ||
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| verse_lines = तेषां स्वरूपमिदमेव यतोऽथ मुक्तावप्येवमेव | | verse_lines = तेषां स्वरूपमिदमेव यतोऽथ मुक्तावप्येवमेव सततोच्चविनीचरूपाः।¦शब्दः शतं दशसहस्रमिति स्म यस्मात् तस्मान्न हीनवचनोऽथ ततोऽग्र्यरूपाः ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = एवं नरोत्तमपरास्तु विमुक्तियोग्या अन्ये च संसृतिपरा असुरास्तमोगाः। | | verse_text = एवं नरोत्तमपरास्तु विमुक्तियोग्या अन्ये च संसृतिपरा असुरास्तमोगाः। | ||
| verse_lines = एवं नरोत्तमपरास्तु विमुक्तियोग्या अन्ये च संसृतिपरा | | verse_lines = एवं नरोत्तमपरास्तु विमुक्तियोग्या अन्ये च संसृतिपरा असुरास्तमोगाः।¦एवं सदैव नियमः क्वचिदन्यथा न यावन्न पूर्तिरुत संसृतिगाः समस्ताः ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = पूर्तिश्च नैव नियमाद् भविता हि यस्मात् तस्मात् समाप्तिमपि यान्ति न जीवसङ्घाः। | | verse_text = पूर्तिश्च नैव नियमाद् भविता हि यस्मात् तस्मात् समाप्तिमपि यान्ति न जीवसङ्घाः। | ||
| verse_lines = पूर्तिश्च नैव नियमाद् भविता हि यस्मात् तस्मात् समाप्तिमपि यान्ति न | | verse_lines = पूर्तिश्च नैव नियमाद् भविता हि यस्मात् तस्मात् समाप्तिमपि यान्ति न जीवसङ्घाः।¦आनन्त्यमेव गणशोऽस्ति यतो हि तेषां इत्थं ततः सकलकालगता प्रवृत्तिः ॥ १९॥ | ||
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| verse_text = एतैः सुरादिभिरतिप्रतिभादियुक्तैर्युक्तैः सहैव सततं प्रविचिन्तयद्भिः। | | verse_text = एतैः सुरादिभिरतिप्रतिभादियुक्तैर्युक्तैः सहैव सततं प्रविचिन्तयद्भिः। | ||
| verse_lines = एतैः सुरादिभिरतिप्रतिभादियुक्तैर्युक्तैः सहैव सततं | | verse_lines = एतैः सुरादिभिरतिप्रतिभादियुक्तैर्युक्तैः सहैव सततं प्रविचिन्तयद्भिः।¦पूर्तेरचिन्त्यमहिमः परमः परात्मा नारायणोऽस्य गुणविस्तृतिरन्यगा क्व ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = साम्यं न चास्य परमस्य च केन चाऽप्यं मुक्तेन च क्वचिदतस्त्वभिदा कुतोऽस्य। | | verse_text = साम्यं न चास्य परमस्य च केन चाऽप्यं मुक्तेन च क्वचिदतस्त्वभिदा कुतोऽस्य। | ||
| verse_lines = साम्यं न चास्य परमस्य च केन चाऽप्यं मुक्तेन च क्वचिदतस्त्वभिदा | | verse_lines = साम्यं न चास्य परमस्य च केन चाऽप्यं मुक्तेन च क्वचिदतस्त्वभिदा कुतोऽस्य।¦प्राप्येत चेतनगणैः सततास्वतन्त्रैः नित्यस्वतन्त्रवपुषः परमात् परस्य ॥ २१॥ | ||
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| verse_text = अर्थोऽयमेव निखिलैरपि वेदवाक्यै रामायणैः सहितभारतपञ्चरात्रैः। | | verse_text = अर्थोऽयमेव निखिलैरपि वेदवाक्यै रामायणैः सहितभारतपञ्चरात्रैः। | ||
| verse_lines = अर्थोऽयमेव निखिलैरपि वेदवाक्यै रामायणैः | | verse_lines = अर्थोऽयमेव निखिलैरपि वेदवाक्यै रामायणैः सहितभारतपञ्चरात्रैः।¦अन्यैश्च शास्त्रवचनैः सहतत्त्वसूत्रैः निर्णीयते सहृदयं हरिणा सदैव ॥ २२॥ | ||
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| verse_lines = नारायणस्य न समः | | verse_lines = नारायणस्य न समः पुरुषोत्तमोऽहं¦जीवाक्षरे ह्यतिगतोऽस्मि ततो <span class="gr-reference gr-ref-Brihadaranyakopanishat-id">‘ऽन्यदार्तम्’ (बृ.उ. ५.५.१)</span> ।¦<span class="gr-reference gr-ref-Brahmasutra-id">‘मुक्तोऽपसृप्य’ (ब्र.सू. १.३.२)</span> इह नास्ति कुतश्च कश्चित्¦<span class="gr-reference gr-ref-kathopanishat-id">‘नानेव’ (क.उ. २.१.११)</span> धर्मपृथगात्मदृगेत्यधो हि॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = एतेषु विष्णोराधिक्यमुच्यतेऽन्यस्य न | | verse_lines = एतेषु विष्णोराधिक्यमुच्यतेऽन्यस्य न क्वचित्।¦अतस्तदेव मन्तव्यं नान्यथा तु कथञ्चन ॥ ३३॥ | ||
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| verse_text = मोहार्थान्यन्यशास्त्राणि कृतान्येवाऽज्ञया हरेः। | | verse_text = मोहार्थान्यन्यशास्त्राणि कृतान्येवाऽज्ञया हरेः। | ||
| verse_lines = मोहार्थान्यन्यशास्त्राणि कृतान्येवाऽज्ञया | | verse_lines = मोहार्थान्यन्यशास्त्राणि कृतान्येवाऽज्ञया हरेः।¦अतस्तेषूक्तमग्राह्यम् असुराणां तमोगतेः ॥ ३४॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = यस्मात् कृतानि तानीह विष्णुनोक्तैः शिवादिभिः। | | verse_text = यस्मात् कृतानि तानीह विष्णुनोक्तैः शिवादिभिः। | ||
| verse_lines = यस्मात् कृतानि तानीह विष्णुनोक्तैः | | verse_lines = यस्मात् कृतानि तानीह विष्णुनोक्तैः शिवादिभिः।¦एषां यन्न विरोधि स्यात् तत्रोक्तं तन्न वार्यते ॥ ३५॥ | ||
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| verse_text = विष्ण्वाधिक्यविरोधीनि यानि वेदवचांस्यपि। | | verse_text = विष्ण्वाधिक्यविरोधीनि यानि वेदवचांस्यपि। | ||
| verse_lines = विष्ण्वाधिक्यविरोधीनि यानि | | verse_lines = विष्ण्वाधिक्यविरोधीनि यानि वेदवचांस्यपि।¦तानि योज्यान्यानुकूल्याद् विष्ण्वाधिक्यस्य सर्वशः ॥ ३६॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = अवतारेषु यत् किञ्चिद् दर्शयेन्नरवद्धरिः। | | verse_text = अवतारेषु यत् किञ्चिद् दर्शयेन्नरवद्धरिः। | ||
| verse_lines = अवतारेषु यत् किञ्चिद् | | verse_lines = अवतारेषु यत् किञ्चिद् दर्शयेन्नरवद्धरिः।¦तच्चासुराणां मोहाय दोषा विष्णोर्नहि क्वचित् ॥ ३७॥ | ||
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| verse_text = अज्ञत्वं पारवश्यं वा (छे)वेधभेदादिकं तथा। | | verse_text = अज्ञत्वं पारवश्यं वा (छे)वेधभेदादिकं तथा। | ||
| verse_lines = अज्ञत्वं पारवश्यं वा (छे)वेधभेदादिकं | | verse_lines = अज्ञत्वं पारवश्यं वा (छे)वेधभेदादिकं तथा।¦तथा प्राकृतदेहत्वं देहत्यागादिकं तथा ॥ ३८॥ | ||
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| verse_text = अनीशत्वं च दुःखित्वं साम्यमन्यैश्च हीनताम्। | | verse_text = अनीशत्वं च दुःखित्वं साम्यमन्यैश्च हीनताम्। | ||
| verse_lines = अनीशत्वं च दुःखित्वं साम्यमन्यैश्च | | verse_lines = अनीशत्वं च दुःखित्वं साम्यमन्यैश्च हीनताम्।¦प्रदर्शयति मोहाय दैत्यादीनां हरिः स्वयम् ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = न तस्य कश्चिद् दोषोऽस्ति पूर्णाखिलगुणो ह्यसौ। | | verse_text = न तस्य कश्चिद् दोषोऽस्ति पूर्णाखिलगुणो ह्यसौ। | ||
| verse_lines = न तस्य कश्चिद् दोषोऽस्ति पूर्णाखिलगुणो | | verse_lines = न तस्य कश्चिद् दोषोऽस्ति पूर्णाखिलगुणो ह्यसौ।¦सर्वदेहस्थरूपेषु प्रादुर्भावेषु चेश्वरः ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = ब्रह्माद्यभेदः साम्यं वा कुतस्तस्य महात्मनः। | | verse_text = ब्रह्माद्यभेदः साम्यं वा कुतस्तस्य महात्मनः। | ||
| verse_lines = ब्रह्माद्यभेदः साम्यं वा कुतस्तस्य | | verse_lines = ब्रह्माद्यभेदः साम्यं वा कुतस्तस्य महात्मनः।¦यदेवं वाचकं शास्त्रं तद्धि शास्त्रं परं मतम् ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = निर्णयायैव यत् प्रोक्तं ब्रह्मसूत्रं तु विष्णुना। | | verse_text = निर्णयायैव यत् प्रोक्तं ब्रह्मसूत्रं तु विष्णुना। | ||
| verse_lines = निर्णयायैव यत् प्रोक्तं ब्रह्मसूत्रं तु | | verse_lines = निर्णयायैव यत् प्रोक्तं ब्रह्मसूत्रं तु विष्णुना।¦व्यासरूपेण तद् ग्राह्यं तत्रोक्ताः सर्वनिर्णयाः ॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = यथार्थवचनानां च मोहार्थानां च संशयम्। | | verse_text = यथार्थवचनानां च मोहार्थानां च संशयम्। | ||
| verse_lines = यथार्थवचनानां च मोहार्थानां च | | verse_lines = यथार्थवचनानां च मोहार्थानां च संशयम्।¦अपनेतुं हि भगवान् ब्रह्मसूत्रमचीक्लृपत् ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = तस्मात् सूत्रार्थमागृह्य कर्तव्यः सर्वनिर्णयः। | | verse_text = तस्मात् सूत्रार्थमागृह्य कर्तव्यः सर्वनिर्णयः। | ||
| verse_lines = तस्मात् सूत्रार्थमागृह्य कर्तव्यः | | verse_lines = तस्मात् सूत्रार्थमागृह्य कर्तव्यः सर्वनिर्णयः।¦सर्वदोषविहीनत्वं गुणैः सर्वैरुदीर्णता ॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = अभेदः सर्वरूपेषु जीवभेदः सदैव च। | | verse_text = अभेदः सर्वरूपेषु जीवभेदः सदैव च। | ||
| verse_lines = अभेदः सर्वरूपेषु जीवभेदः सदैव | | verse_lines = अभेदः सर्वरूपेषु जीवभेदः सदैव च।¦विष्णोरुक्तानि सूत्रेषु सर्ववेदेड्यता तथा ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = तारतम्यं च मुक्तानां विमुक्तिर्विद्यया तथा। | | verse_text = तारतम्यं च मुक्तानां विमुक्तिर्विद्यया तथा। | ||
| verse_lines = तारतम्यं च मुक्तानां विमुक्तिर्विद्यया | | verse_lines = तारतम्यं च मुक्तानां विमुक्तिर्विद्यया तथा।¦तस्मादेतद्विरुद्धं यन्मोहाय तदुदाहृतम् ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = तस्माद् ‘ये ये गुणा विष्णोर्ग्राह्यास्ते सर्व एव तु’। | | verse_text = तस्माद् ‘ये ये गुणा विष्णोर्ग्राह्यास्ते सर्व एव तु’। | ||
| verse_lines = तस्माद् ‘ये ये गुणा विष्णोर्ग्राह्यास्ते सर्व एव | | verse_lines = तस्माद् ‘ये ये गुणा विष्णोर्ग्राह्यास्ते सर्व एव तु’।¦इत्याद्युक्तं भगवता भविष्यत्पर्वणि स्फुटम् ॥ ४७॥ | ||
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| verse_lines = ‘एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् | | verse_lines = ‘एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति।¦त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय ॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = अतत्थ्यानि वितत्थ्यानि दर्शयस्व महाभुज। | | verse_text = अतत्थ्यानि वितत्थ्यानि दर्शयस्व महाभुज। | ||
| verse_lines = अतत्थ्यानि वितत्थ्यानि दर्शयस्व | | verse_lines = अतत्थ्यानि वितत्थ्यानि दर्शयस्व महाभुज।¦प्रकाशं कुरु चाऽत्मानम् अप्रकाशं च मां कुरु’ ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = इति वाराहवचनं ब्रह्माण्डोक्तं तथाऽपरम् । | | verse_text = इति वाराहवचनं ब्रह्माण्डोक्तं तथाऽपरम् । | ||
| verse_lines = इति वाराहवचनं ब्रह्माण्डोक्तं तथाऽपरम् | | verse_lines = इति वाराहवचनं ब्रह्माण्डोक्तं तथाऽपरम् ।¦‘अमोहाय गुणा विष्णोराकारश्चिच्छरीरता ॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = निर्दोषत्वं तारतम्यं मुक्तानामपि चोच्यते | | verse_lines = निर्दोषत्वं तारतम्यं मुक्तानामपि चोच्यते ।¦एतद्विरुद्धं यत् सर्वं तन्मोहायेति निर्णयः’ ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = स्कान्देऽप्युक्तं शिवेनैव षण्मुखायैव सादरम् | | verse_lines = स्कान्देऽप्युक्तं शिवेनैव षण्मुखायैव सादरम् ।¦शिवशास्त्रेऽपि तद् ग्राह्यं भगवच्छास्त्रयोगि यत् ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = ‘परमो विष्णुरेवैकस्तज्ज्ञानं मोक्षसाधनम् | | verse_lines = ‘परमो विष्णुरेवैकस्तज्ज्ञानं मोक्षसाधनम् ।¦शास्त्राणां निर्णयस्त्वेष तदन्यन्मोहनाय हि ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = ज्ञानं विना तु या मुक्तिः साम्यं च मम विष्णुना | | verse_lines = ज्ञानं विना तु या मुक्तिः साम्यं च मम विष्णुना ।¦तीर्थाऽदिमात्रतो ज्ञानं ममाऽधिक्यं च विष्णुतः ॥ ५४॥ | ||
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| verse_lines = अभेदश्चास्मदादीनां मुक्तानां हरिणा तथा | | verse_lines = अभेदश्चास्मदादीनां मुक्तानां हरिणा तथा ।¦इत्यादि सर्वं मोहाय कथ्यते पुत्र नान्यथा’ ॥ ५५॥ | ||
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| verse_lines = उक्तं (पा)पद्मपुराणे च शैव एव शिवेन तु | | verse_lines = उक्तं (पा)पद्मपुराणे च शैव एव शिवेन तु ।¦यदुक्तं हरिणा पूर्वं उमायै प्राह तद्धरः ॥ ५६॥ | ||
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| verse_lines = ‘त्वामाराध्य तथा शम्भो ग्रहीष्यामि वरं सदा | | verse_lines = ‘त्वामाराध्य तथा शम्भो ग्रहीष्यामि वरं सदा ।¦द्वापराऽदौ युगे भूत्वा कलया मानुषाऽदिषु ॥ ५७॥ | ||
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| verse_lines = स्वाऽगमैः कल्पितैस्त्वं च जनान् मद्विमुखान् कुरु | | verse_lines = स्वाऽगमैः कल्पितैस्त्वं च जनान् मद्विमुखान् कुरु ।¦मां च गोपाय येन स्यात् सृष्टिरेषोत्तराधरा’(पद्म पु. ६.७१.१०६-१०७) ॥ ५८॥ | ||
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| verse_lines = न च वैष्णवशास्त्रेषु वेदेष्वपि हरेः परः | | verse_lines = न च वैष्णवशास्त्रेषु वेदेष्वपि हरेः परः ।¦क्वचिदुक्तोऽन्यशास्त्रेषु परमो विष्णुरीरितः ॥ ५९॥ | ||
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| verse_lines = निर्दोषत्वाच्च वेदानां वेदोक्तं ग्राह्यमेव हि | | verse_lines = निर्दोषत्वाच्च वेदानां वेदोक्तं ग्राह्यमेव हि ।¦वेदेषु च परो विष्णुः सर्वस्मादुच्यते सदा ॥ ६०॥ | ||
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| verse_lines = ‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः | | verse_lines = ‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।¦विदे हि रुद्रो रुद्रियम् महित्वं यासिष्टं वर्तिरश्विनाविरावत्’(ऋग्वेद ७.४०.५) ॥ ६१॥ | ||
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| verse_lines = ‘स्तुहि श्रुतं गर्तसदं युवानं मृगं न भीममुपहत्नुमुग्रम्’ | | verse_lines = ‘स्तुहि श्रुतं गर्तसदं युवानं मृगं न भीममुपहत्नुमुग्रम्’ ।¦‘यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्’ ॥ ६२॥ | ||
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| verse_lines = ‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् | | verse_lines = ‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।¦तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति’(मु. उ.५.३(३.१.३)) ॥ ६४॥ | ||
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| verse_lines = ‘यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् | | verse_lines = ‘यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।¦सोऽश्नुते सर्वान् कामान्त्सह ब्रह्मणा विपश्चिता’(तै. उ.२.१) ॥ ६५॥ | ||
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| verse_lines = ‘प्र घा न्वस्य महतो महानि सत्या सत्यस्य करणानि वोचम्’ | | verse_lines = ‘प्र घा न्वस्य महतो महानि सत्या सत्यस्य करणानि वोचम्’ ।¦‘सत्यमेनमनु विश्वे मदन्ति रातिं देवस्य गृणतो मघोनः’(ऋग्वेद २.१५.१, ४.१७.५) ॥ ६६॥ | ||
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| verse_lines = ‘यच्चिकेत सत्यमिइत् तन्न मोघं वसु स्पार्हम् उत जेतोत दाता’ | | verse_lines = ‘यच्चिकेत सत्यमिइत् तन्न मोघं वसु स्पार्हम् उत जेतोत दाता’ ।¦‘सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये’(ऋ.१०.५५.६, ८.३.४) ॥ ६७॥ | ||
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| verse_text = रुद्रः सरस्वती वायुर्मुक्ताः शतगुणोत्तराः । | | verse_text = रुद्रः सरस्वती वायुर्मुक्ताः शतगुणोत्तराः । | ||
| verse_lines = रुद्रः सरस्वती वायुर्मुक्ताः शतगुणोत्तराः | | verse_lines = रुद्रः सरस्वती वायुर्मुक्ताः शतगुणोत्तराः ।¦एको ब्रह्मा च वायुश्च वीन्द्रो रुद्रसमस्तथा ।¦एको रुद्रस्तथा शेषो न कश्चिद्वायुना समः ॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = मुक्तेषु श्रीस्तथा वायोः सहस्रगुणिता गुणैः । | | verse_text = मुक्तेषु श्रीस्तथा वायोः सहस्रगुणिता गुणैः । | ||
| verse_lines = मुक्तेषु श्रीस्तथा वायोः सहस्रगुणिता गुणैः | | verse_lines = मुक्तेषु श्रीस्तथा वायोः सहस्रगुणिता गुणैः ।¦ततोऽनन्तगुणो विष्णुर्न कश्चित् तत्समः सदा’ ॥ ७४॥ | ||
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| verse_text = इत्यादि वेदवाक्यं विष्णोरुत्कर्षमेव वक्त्युच्चैः । | | verse_text = इत्यादि वेदवाक्यं विष्णोरुत्कर्षमेव वक्त्युच्चैः । | ||
| verse_lines = इत्यादि वेदवाक्यं विष्णोरुत्कर्षमेव वक्त्युच्चैः | | verse_lines = इत्यादि वेदवाक्यं विष्णोरुत्कर्षमेव वक्त्युच्चैः ।¦तात्पर्यं महदत्रेत्युक्तं ‘यो माम्’ (भ.गी.१५.१९) इति स्वयं तेन ॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = ‘भूम्नो ज्यायस्त्वम्’(‘भूम्नःक्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति’ ब्र.सू.३.३.५९) इति ह्युक्तं सूत्रेषु निर्णयात् तेन । | | verse_text = ‘भूम्नो ज्यायस्त्वम्’(‘भूम्नःक्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति’ ब्र.सू.३.३.५९) इति ह्युक्तं सूत्रेषु निर्णयात् तेन । | ||
| verse_lines = ‘भूम्नो ज्यायस्त्वम्’(‘भूम्नःक्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति’ ब्र.सू.३.३.५९) इति ह्युक्तं सूत्रेषु निर्णयात् तेन | | verse_lines = ‘भूम्नो ज्यायस्त्वम्’(‘भूम्नःक्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति’ ब्र.सू.३.३.५९) इति ह्युक्तं सूत्रेषु निर्णयात् तेन ।¦तत्प्रीत्यैव च मोक्षः प्राप्यस्तेनैव नान्येन ॥ ७६॥ | ||
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| verse_text = ‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । | | verse_text = ‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । | ||
| verse_lines = ‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन | | verse_lines = ‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।¦यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं(नू) स्वाम्’ (क.उ.१.२.२३; मु.उ.३.२.३) ॥ ७७॥ | ||
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| verse_text = ‘विष्णुर्हि दाता मोक्षस्य वायुश्च तदनुज्ञया । | | verse_text = ‘विष्णुर्हि दाता मोक्षस्य वायुश्च तदनुज्ञया । | ||
| verse_lines = ‘विष्णुर्हि दाता मोक्षस्य वायुश्च तदनुज्ञया | | verse_lines = ‘विष्णुर्हि दाता मोक्षस्य वायुश्च तदनुज्ञया ।¦मोक्षो ज्ञानं च क्रमशो मुक्तिगो भोग एव च ॥ ७८॥ | ||
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| verse_text = उत्तरेषां प्रसादेन नीचानां नान्यथा भवेत् । | | verse_text = उत्तरेषां प्रसादेन नीचानां नान्यथा भवेत् । | ||
| verse_lines = उत्तरेषां प्रसादेन नीचानां नान्यथा भवेत् | | verse_lines = उत्तरेषां प्रसादेन नीचानां नान्यथा भवेत् ।¦सर्वेषां च हरिर्नित्यं नियन्ता तद्वशाः परे ॥ ७९॥ | ||
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| verse_text = तारतम्यं ततो ज्ञेयं सर्वोच्चत्वं हरेस्तथा । | | verse_text = तारतम्यं ततो ज्ञेयं सर्वोच्चत्वं हरेस्तथा । | ||
| verse_lines = तारतम्यं ततो ज्ञेयं सर्वोच्चत्वं हरेस्तथा | | verse_lines = तारतम्यं ततो ज्ञेयं सर्वोच्चत्वं हरेस्तथा ।¦एतद्विना न कस्यापि विमुक्तिः स्यात् कथञ्चन ॥ ८०॥ | ||
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| verse_text = पञ्चभेदांश्च विज्ञाय विष्णोः स्वाभेदमेव च । | | verse_text = पञ्चभेदांश्च विज्ञाय विष्णोः स्वाभेदमेव च । | ||
| verse_lines = पञ्चभेदांश्च विज्ञाय विष्णोः स्वाभेदमेव च | | verse_lines = पञ्चभेदांश्च विज्ञाय विष्णोः स्वाभेदमेव च ।¦निर्दोषत्वं गुणोद्रेकं ज्ञात्वा मुक्तिर्नचान्यथा ॥ ८१॥ | ||
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| verse_text = अवतारान् हरेर्ज्ञात्वा नावतारा हरेश्च ये । | | verse_text = अवतारान् हरेर्ज्ञात्वा नावतारा हरेश्च ये । | ||
| verse_lines = अवतारान् हरेर्ज्ञात्वा नावतारा हरेश्च ये | | verse_lines = अवतारान् हरेर्ज्ञात्वा नावतारा हरेश्च ये ।¦तदावेशांस्तथा सम्यग् ज्ञात्वा मुक्तिर्नचान्यथा ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = सृष्टिरक्षाऽहृतिज्ञाननियत्यज्ञानबन्धनान् | | verse_lines = सृष्टिरक्षाऽहृतिज्ञाननियत्यज्ञानबन्धनान् ।¦मोक्षं च विष्णुतस्त्वेव ज्ञात्वा मुक्तिर्नचान्यथा ॥ ८३॥ | ||
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| verse_lines = वेदांश्च पञ्चरात्राणि सेतिहासपुराणकान् | | verse_lines = वेदांश्च पञ्चरात्राणि सेतिहासपुराणकान् ।¦ज्ञात्वा विष्णुपरानेव मुच्यते नान्यथा क्वचित् ॥ ८४॥ | ||
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| verse_lines = माहात्म्यज्ञानपूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोऽधिकः | | verse_lines = माहात्म्यज्ञानपूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोऽधिकः ।¦स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तः तया मुक्तिर्नचान्यथा ॥ ८५॥ | ||
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| verse_lines = त्रिविधा जीवसङ्घास्तु देवमानुषदानवाः | | verse_lines = त्रिविधा जीवसङ्घास्तु देवमानुषदानवाः ।¦तत्र देवा मुक्तियोग्या मानुषेषूत्तमास्तथा ॥ ८६॥ | ||
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| verse_lines = मध्यमा मानुषा ये तु सृतियोग्याः सदैव हि | | verse_lines = मध्यमा मानुषा ये तु सृतियोग्याः सदैव हि ।¦अधमा निरयायैव दानवास्तु तमोलयाः ॥ ८७॥ | ||
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| verse_lines = मुक्तिर्नित्या तमश्चैव नाऽवृत्तिः पुनरेतयोः | | verse_lines = मुक्तिर्नित्या तमश्चैव नाऽवृत्तिः पुनरेतयोः ।¦देवानां निरयो नास्ति तमश्चापि कथञ्चन ॥ ८८॥ | ||
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| verse_lines = नासुराणां तथा मुक्तिः कदाचित् केनचित् क्वचित् | | verse_lines = नासुराणां तथा मुक्तिः कदाचित् केनचित् क्वचित् ।¦मानुषाणां मध्यमानां नैवैतद्द्वयमाप्यते ॥ ८९॥ | ||
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| verse_text = असुराणां तमःप्राप्तिस्तदा नियमतो भवेत् । | | verse_text = असुराणां तमःप्राप्तिस्तदा नियमतो भवेत् । | ||
| verse_lines = असुराणां तमःप्राप्तिस्तदा नियमतो भवेत् | | verse_lines = असुराणां तमःप्राप्तिस्तदा नियमतो भवेत् ।¦यदा तु ज्ञानिसद्भावे नैव गृह्णन्ति तत्परम् ॥ ९०॥ | ||
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| verse_lines = तदा मुक्तिश्च देवानां यदा प्रत्यक्षगो हरिः | | verse_lines = तदा मुक्तिश्च देवानां यदा प्रत्यक्षगो हरिः ।¦स्वयोग्ययोपासनया तन्वा तद्योग्यया तथा ॥ ९१॥ | ||
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| verse_lines = सर्वैर्गुणैर्ब्रह्मणा तु समुपास्यो हरिः सदा | | verse_lines = सर्वैर्गुणैर्ब्रह्मणा तु समुपास्यो हरिः सदा ।¦आनन्दो ज्ञः सदात्मेति ह्युपास्यो मानुषैर्हरिः ॥ ९२॥ | ||
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| verse_lines = यथाक्रमं गुणोद्रेकात् तदन्यैराविरिञ्चतः | | verse_lines = यथाक्रमं गुणोद्रेकात् तदन्यैराविरिञ्चतः ।¦ब्रह्मत्वयोग्या ऋजवो नाम देवाः पृथग्गणाः ॥ ९३॥ | ||
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| verse_lines = तैरेवाप्यं पदं तत्तु नैवान्यैः साधनैरपि | | verse_lines = तैरेवाप्यं पदं तत्तु नैवान्यैः साधनैरपि ।¦एवं सर्वपदानां तु योग्याः सन्ति पृथग् गणाः ॥ ९४॥ | ||
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| verse_lines = तस्मादनाद्यनन्तं हि तारतम्यं चिदात्मनाम् | | verse_lines = तस्मादनाद्यनन्तं हि तारतम्यं चिदात्मनाम् ।¦तच्च नैवान्यथा कर्तुं शक्यं केनापि कुत्रचित् ॥ ९५॥ | ||
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| verse_lines = अयोग्यमिच्छन् पुरुषः पतत्येव न संशयः | | verse_lines = अयोग्यमिच्छन् पुरुषः पतत्येव न संशयः ।¦तस्माद् योग्यानुसारेण सेव्यो विष्णुः सदैव हि ॥ ९६॥ | ||
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| verse_lines = अच्छिद्रसेवनाच्चैव निष्कामत्वाच्च योग्यतः | | verse_lines = अच्छिद्रसेवनाच्चैव निष्कामत्वाच्च योग्यतः ।¦द्रष्टुं शक्यो हरिः सर्वैर्नान्यथा तु कथञ्चन ॥ ९७॥ | ||
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| verse_lines = नियमोऽयं हरेर्यस्मान्नोल्लङ्घ्यः सर्वचेतनैः | | verse_lines = नियमोऽयं हरेर्यस्मान्नोल्लङ्घ्यः सर्वचेतनैः ।¦सत्यसङ्कल्पतो विष्णुर्नान्यथा च करिष्यति ॥ ९८॥ | ||
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| verse_lines = दानतीर्थतपोयज्ञपूर्वाः सर्वेऽपि सर्वदा | | verse_lines = दानतीर्थतपोयज्ञपूर्वाः सर्वेऽपि सर्वदा ।¦अङ्गानि हरिसेवायां भक्तिस्त्वेका विमुक्तये’ ॥¦भविष्यत्पर्ववचनमित्येतदखिलं परम् ॥ ९९॥ | ||
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| verse_lines = ‘शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमायन् अन्यमन्यमतिनेनीयमानः | | verse_lines = ‘शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमायन् अन्यमन्यमतिनेनीयमानः ।¦एधमानद्विळुभयस्य राजा चोष्कूयते विश इन्द्रो मनुष्यान् ॥ १००॥ \\ | ||
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| verse_lines = परा पूर्वेषां सख्या वृणक्ति वितर्तुराणो अपरेभिरेति | | verse_lines = परा पूर्वेषां सख्या वृणक्ति वितर्तुराणो अपरेभिरेति ।¦अनानुभूतीरवधून्वानः पूर्वीरिन्द्रः शरदस्तर्तरीति’(ऋग्वेद ६.४७.१६-१७) ॥ १०१॥ | ||
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| verse_lines = ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै. आ. ३.१२.१७, श्वे. उ. ३.८) | | verse_lines = ‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै. आ. ३.१२.१७, श्वे. उ. ३.८) ।¦‘तमेव विदित्वाऽति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’ ॥ १०२॥ | ||
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| verse_lines = जीवाभेदो निर्गुणत्वं अपूर्णगुणता तथा | | verse_lines = जीवाभेदो निर्गुणत्वं अपूर्णगुणता तथा ।¦साम्याधिक्ये तदन्येषां भेदस्तद्गत एव च ॥ १११॥ | ||
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| verse_text = प्रादुर्भावविपर्यासस्तद्भक्तद्वेष एव च । | | verse_text = प्रादुर्भावविपर्यासस्तद्भक्तद्वेष एव च । | ||
| verse_lines = प्रादुर्भावविपर्यासस्तद्भक्तद्वेष एव च | | verse_lines = प्रादुर्भावविपर्यासस्तद्भक्तद्वेष एव च ।¦तत्प्रमाणस्य निन्दा च द्वेषा एतेऽखिला मताः ॥ ११२॥ | ||
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| verse_text = एतैर्विहीना या भक्तिः सा भक्तिरिति निश्चिता । | | verse_text = एतैर्विहीना या भक्तिः सा भक्तिरिति निश्चिता । | ||
| verse_lines = एतैर्विहीना या भक्तिः सा भक्तिरिति निश्चिता | | verse_lines = एतैर्विहीना या भक्तिः सा भक्तिरिति निश्चिता ।¦अनादिभक्तिर्देवानां क्रमाद् वृद्धिं गतैव सा ॥ ११३॥ | ||
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| verse_text = अपरोक्षदृशेर्हेतुर्मुक्तिहेतुश्च सा पुनः । | | verse_text = अपरोक्षदृशेर्हेतुर्मुक्तिहेतुश्च सा पुनः । | ||
| verse_lines = अपरोक्षदृशेर्हेतुर्मुक्तिहेतुश्च सा पुनः | | verse_lines = अपरोक्षदृशेर्हेतुर्मुक्तिहेतुश्च सा पुनः ।¦सैवाऽनन्दस्वरूपेण नित्या मुक्तेषु तिष्ठति ॥ ११४॥ | ||
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| verse_text = यथा शौक्ल्यादिकं रूपं गोर्भवत्येव सर्वदा । | | verse_text = यथा शौक्ल्यादिकं रूपं गोर्भवत्येव सर्वदा । | ||
| verse_lines = यथा शौक्ल्यादिकं रूपं गोर्भवत्येव सर्वदा | | verse_lines = यथा शौक्ल्यादिकं रूपं गोर्भवत्येव सर्वदा ।¦सुखज्ञानादिकं रूपं एवं भक्तेर्न चान्यथा ॥ ११५॥ | ||
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| verse_text = भक्त्यैव तुष्टिमभ्येति विष्णुर्नान्येन केनचित् । | | verse_text = भक्त्यैव तुष्टिमभ्येति विष्णुर्नान्येन केनचित् । | ||
| verse_lines = भक्त्यैव तुष्टिमभ्येति विष्णुर्नान्येन केनचित् | | verse_lines = भक्त्यैव तुष्टिमभ्येति विष्णुर्नान्येन केनचित् ।¦स एव मुक्तिदाता च भक्तिस्तत्रैककारणम् ॥ ११६॥ | ||
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| verse_text = ब्रह्मादीनां च मुक्तानां तारतम्ये तु कारणम् । | | verse_text = ब्रह्मादीनां च मुक्तानां तारतम्ये तु कारणम् । | ||
| verse_lines = ब्रह्मादीनां च मुक्तानां तारतम्ये तु कारणम् | | verse_lines = ब्रह्मादीनां च मुक्तानां तारतम्ये तु कारणम् ।¦तारतम्यस्थिताऽनादिर्नित्या भक्तिर्न चेतरत् ॥ ११७॥ | ||
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| verse_text = मानुषेष्वधमाः किञ्चिद् द्वेषयुक्ताः सदा हरौ । | | verse_text = मानुषेष्वधमाः किञ्चिद् द्वेषयुक्ताः सदा हरौ । | ||
| verse_lines = मानुषेष्वधमाः किञ्चिद् द्वेषयुक्ताः सदा हरौ | | verse_lines = मानुषेष्वधमाः किञ्चिद् द्वेषयुक्ताः सदा हरौ ।¦दुःखनिष्ठास्ततस्तेऽपि नित्यमेव न संशयः ॥ ११८॥ | ||
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| verse_text = मध्यमा मिश्रभूतत्वान्नित्यं मिश्रफलाः स्मृताः । | | verse_text = मध्यमा मिश्रभूतत्वान्नित्यं मिश्रफलाः स्मृताः । | ||
| verse_lines = मध्यमा मिश्रभूतत्वान्नित्यं मिश्रफलाः स्मृताः | | verse_lines = मध्यमा मिश्रभूतत्वान्नित्यं मिश्रफलाः स्मृताः ।¦किञ्चिद्भक्तियुता नित्यं उत्तमास्तेन मोक्षिणः ॥ ११९॥ | ||
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| verse_text = ब्रह्मणः परमा भक्तिः सर्वेभ्यः परमस्ततः’ । | | verse_text = ब्रह्मणः परमा भक्तिः सर्वेभ्यः परमस्ततः’ । | ||
| verse_lines = ब्रह्मणः परमा भक्तिः सर्वेभ्यः परमस्ततः’ | | verse_lines = ब्रह्मणः परमा भक्तिः सर्वेभ्यः परमस्ततः’ ।¦इत्यादीनि च वाक्यानि पुराणेषु पृथक् पृथक् ॥ १२०॥ | ||
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| verse_lines = ‘षण्णवत्यङ्गुलो यस्तु न्यग्रोधपरिमण्डलः | | verse_lines = ‘षण्णवत्यङ्गुलो यस्तु न्यग्रोधपरिमण्डलः ।¦सप्तपादश्चतुर्हस्तो द्वात्रिंशल्लक्षणैर्युतः ॥¦असंशयः संशयच्छिद् गुरुरुक्तो मनीषिभिः ॥ १२१॥ | ||
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| verse_lines = तस्माद् ब्रह्मा गुरुर्मुख्यः सर्वेषामेव सर्वदा | | verse_lines = तस्माद् ब्रह्मा गुरुर्मुख्यः सर्वेषामेव सर्वदा ।¦अन्येऽपि स्वात्मनो मुख्याः क्रमाद् गुरव ईरिताः ॥ १२२॥ | ||
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| verse_text = क्रमाल्लक्षणहीनाश्च लक्षणालक्षणैः समाः । | | verse_text = क्रमाल्लक्षणहीनाश्च लक्षणालक्षणैः समाः । | ||
| verse_lines = क्रमाल्लक्षणहीनाश्च लक्षणालक्षणैः समाः | | verse_lines = क्रमाल्लक्षणहीनाश्च लक्षणालक्षणैः समाः ।¦मानुषा मध्यमाः सम्यग् दुर्लक्षणयुतः कलिः ॥ १२३॥ | ||
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| verse_text = सम्यग्लक्षणसम्पन्नो यद् दद्यात् सुप्रसन्नधीः । | | verse_text = सम्यग्लक्षणसम्पन्नो यद् दद्यात् सुप्रसन्नधीः । | ||
| verse_lines = सम्यग्लक्षणसम्पन्नो यद् दद्यात् सुप्रसन्नधीः | | verse_lines = सम्यग्लक्षणसम्पन्नो यद् दद्यात् सुप्रसन्नधीः ।¦शिष्याय सत्यं भवति तत्सर्वं नात्र संशयः ॥ १२४॥ | ||
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| verse_lines = अगम्यत्वाद्धरिस्तस्मिन्नाविष्टो मुक्तिदो भवेत् | | verse_lines = अगम्यत्वाद्धरिस्तस्मिन्नाविष्टो मुक्तिदो भवेत् ।¦नातिप्रसन्नहृदयो यद् दद्याद् गुरुरप्यसौ ॥¦न तत् सत्यं भवेत् तस्माद् अर्चनीयो गुरुः सदा ॥ १२५॥ | ||
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| verse_lines = स्वावराणां गुरुत्वं तु भवेत् कारणतः क्वचित् | | verse_lines = स्वावराणां गुरुत्वं तु भवेत् कारणतः क्वचित् ।¦मर्यादार्थं तेऽपि पूज्या न तु यद्वत् परो गुरुः’ ॥¦इत्येतत् पञ्चरात्रोक्तं पुराणेष्वनुमोदितम् ॥ १२६॥ | ||
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| verse_lines = ‘यदा मुक्तिप्रदानाय स्वयोग्यं पश्यति ध्रुवम् | | verse_lines = ‘यदा मुक्तिप्रदानाय स्वयोग्यं पश्यति ध्रुवम् ।¦रूपं हरेस्तदा तस्य सर्वपापानि भस्मसात् ॥ १२७॥ | ||
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| verse_lines = यान्ति पूर्वाण्युत्तराणि न श्लेषं यान्ति कानिचित् | | verse_lines = यान्ति पूर्वाण्युत्तराणि न श्लेषं यान्ति कानिचित् ।¦मोक्षश्च नियतस्तस्मात् स्वयोग्यहरिदर्शने’ ॥ १२८॥ | ||
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| verse_lines = भविष्यत्पर्ववचनमित्येतत् सूत्रगं तथा | | verse_lines = भविष्यत्पर्ववचनमित्येतत् सूत्रगं तथा ।¦श्रुतिश्च तत्परा तद्वत् ' तद्यथे' (छा. उ. ४.१४.३)त्यवदत् स्फुटम् ॥ १२९॥ | ||
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| verse_lines = ‘मुक्तास्तु मानुषा देवान् देवा इन्द्रं स शङ्करम् | | verse_lines = ‘मुक्तास्तु मानुषा देवान् देवा इन्द्रं स शङ्करम् ।¦स ब्रह्माणं क्रमेणैव तेन यान्त्यखिला हरिम् ॥ १३०॥ | ||
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| verse_lines = उत्तरोत्तरवश्याश्च मुक्ता रुद्रपुरस्सराः | | verse_lines = उत्तरोत्तरवश्याश्च मुक्ता रुद्रपुरस्सराः ।¦निर्दोषा नित्यसुखिनः पुनरावृत्तिवर्जिताः ।¦स्वेच्छयैव रमन्तेऽत्र नानिष्टं तेषु किञ्चन ॥ १३१॥ | ||
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| verse_lines = असुराः कलिपर्यन्ता एवं दुःखोत्तरोत्तराः | | verse_lines = असुराः कलिपर्यन्ता एवं दुःखोत्तरोत्तराः ।¦कलिर्दुःखाधिकस्तेषु तेऽप्येवं ब्रह्मवद् गणाः ॥ १३२॥ | ||
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| verse_lines = तथाऽन्येऽप्यसुराः सर्वे गणा योग्यतया सदा | | verse_lines = तथाऽन्येऽप्यसुराः सर्वे गणा योग्यतया सदा ।¦ब्रह्मैवं सर्वजीवेभ्यः सदा सर्वगुणाधिकः ॥ १३३॥ | ||
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| verse_lines = मुक्तोऽपि सर्वमुक्तानां आधिपत्ये स्थितः सदा | | verse_lines = मुक्तोऽपि सर्वमुक्तानां आधिपत्ये स्थितः सदा ।¦आश्रयस्तस्य भगवान् सदा नारायणः प्रभुः’ ॥ १३४॥ | ||
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| verse_lines = इत्यृग्यजुःसामाथर्वपञ्चरात्रेतिहासतः | | verse_lines = इत्यृग्यजुःसामाथर्वपञ्चरात्रेतिहासतः ।¦पुराणेभ्यस्तथाऽन्येभ्यः शास्त्रेभ्यो निर्णयः कृतः ॥ १३५॥ | ||
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| verse_lines = विष्ण्वाज्ञयैव विदुषा तत्प्रसादबलोन्नतेः | | verse_lines = विष्ण्वाज्ञयैव विदुषा तत्प्रसादबलोन्नतेः ।¦आनन्दतीर्थमुनिना पूर्णप्रज्ञाभिधायुजा ॥ १३६॥ | ||
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| verse_lines = तात्पर्यं शास्त्राणां सर्वेषामुत्तमं मया प्रोक्तम् | | verse_lines = तात्पर्यं शास्त्राणां सर्वेषामुत्तमं मया प्रोक्तम् ।¦प्राप्यानुज्ञां विष्णोरेतज्ज्ञात्वैव विष्णुराप्योऽसौ ॥ १३७॥ | ||
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<span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C2" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वितीयोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ जयति हरिरचिन्त्यः सर्वदेवैकवन्द्यः परमगुरुरभीष्टावाप्तिदः सज्जनानाम् । | | verse_text = औं ॥ जयति हरिरचिन्त्यः सर्वदेवैकवन्द्यः परमगुरुरभीष्टावाप्तिदः सज्जनानाम् । | ||
| verse_lines = औं ॥ जयति हरिरचिन्त्यः सर्वदेवैकवन्द्यः परमगुरुरभीष्टावाप्तिदः सज्जनानाम् | | verse_lines = औं ॥ जयति हरिरचिन्त्यः सर्वदेवैकवन्द्यः परमगुरुरभीष्टावाप्तिदः सज्जनानाम् ।¦निखिलगुणगणार्णो नित्यनिर्मुक्तदोषः सरसिजनयनोऽसौ श्रीपतिर्मानदो नः ॥१॥ | ||
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| verse_lines = उक्तः पूर्वेऽध्याये शास्त्राणां निर्णयः परो दिव्यः | | verse_lines = उक्तः पूर्वेऽध्याये शास्त्राणां निर्णयः परो दिव्यः ।¦श्रीमद्भारतवाक्यान्येतैरेवाध्यवस्यन्ते ॥२॥ | ||
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| verse_lines = क्वचिद् ग्रन्थान् प्रक्षिपन्ति क्वचिदन्तरितानपि | | verse_lines = क्वचिद् ग्रन्थान् प्रक्षिपन्ति क्वचिदन्तरितानपि ।¦कुर्युः क्वचिच्च व्यत्यासं प्रमादात् क्वचिदन्यथा ॥३॥ | ||
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| verse_lines = देशे देशे तथा ग्रन्थान् दृष्ट्वा चैव पृथग्विधान् | | verse_lines = देशे देशे तथा ग्रन्थान् दृष्ट्वा चैव पृथग्विधान् ।¦यथा स भगवान् व्यासः साक्षान्नारायणः प्रभुः ॥७॥ | ||
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| verse_text = यस्माद्व्यासात्मना तेषां भारते यश ऊचिवान् । | | verse_text = यस्माद्व्यासात्मना तेषां भारते यश ऊचिवान् । | ||
| verse_lines = यस्माद्व्यासात्मना तेषां भारते यश ऊचिवान् | | verse_lines = यस्माद्व्यासात्मना तेषां भारते यश ऊचिवान् ।¦ज्ञानदश्च शुकादीनां ब्रह्मरुद्रादिरूपिणाम् ॥१४॥ | ||
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| verse_text = ब्रह्माधिकश्च देवेभ्यः शेषाद्रुद्रादपीरितः । | | verse_text = ब्रह्माधिकश्च देवेभ्यः शेषाद्रुद्रादपीरितः । | ||
| verse_lines = ब्रह्माधिकश्च देवेभ्यः शेषाद्रुद्रादपीरितः | | verse_lines = ब्रह्माधिकश्च देवेभ्यः शेषाद्रुद्रादपीरितः ।¦प्रियश्च विष्णोः सर्वेभ्य इति भीमनिदर्शनात् ॥१५॥ | ||
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| verse_text = भूभारहारिणो विष्णोः प्रधानाङ्गं हि मारुतिः । | | verse_text = भूभारहारिणो विष्णोः प्रधानाङ्गं हि मारुतिः । | ||
| verse_lines = भूभारहारिणो विष्णोः प्रधानाङ्गं हि मारुतिः | | verse_lines = भूभारहारिणो विष्णोः प्रधानाङ्गं हि मारुतिः ।¦मागधादिवधादेव दुर्योधनवधादपि ॥१६॥ | ||
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| verse_text = यो य एव बलज्येष्ठः क्षत्रियेषु स उत्तमः । | | verse_text = यो य एव बलज्येष्ठः क्षत्रियेषु स उत्तमः । | ||
| verse_lines = यो य एव बलज्येष्ठः क्षत्रियेषु स उत्तमः | | verse_lines = यो य एव बलज्येष्ठः क्षत्रियेषु स उत्तमः ।¦अङ्गं चेद्विष्णुकार्येषु तद्भक्त्यैव न चान्यथा ॥१७॥ | ||
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| verse_text = बलं नैसर्गिकं तच्चेद्वरास्त्रादेस्तदन्यथा । | | verse_text = बलं नैसर्गिकं तच्चेद्वरास्त्रादेस्तदन्यथा । | ||
| verse_lines = बलं नैसर्गिकं तच्चेद्वरास्त्रादेस्तदन्यथा | | verse_lines = बलं नैसर्गिकं तच्चेद्वरास्त्रादेस्तदन्यथा ।¦अन्यावेशनिमित्तं चेद् बलमन्यात्मकं हि तत् ॥१८॥ | ||
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| verse_text = देवेषु बलिनामेव भक्तिज्ञाने न चान्यथा । | | verse_text = देवेषु बलिनामेव भक्तिज्ञाने न चान्यथा । | ||
| verse_lines = देवेषु बलिनामेव भक्तिज्ञाने न चान्यथा | | verse_lines = देवेषु बलिनामेव भक्तिज्ञाने न चान्यथा ।¦स एव च प्रियो विष्णोर्नान्यथा तु कथञ्चन ॥१९॥ | ||
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| verse_text = तस्माद्यो यो बलज्येष्ठः स गुणज्येष्ठ एव च । | | verse_text = तस्माद्यो यो बलज्येष्ठः स गुणज्येष्ठ एव च । | ||
| verse_lines = तस्माद्यो यो बलज्येष्ठः स गुणज्येष्ठ एव च | | verse_lines = तस्माद्यो यो बलज्येष्ठः स गुणज्येष्ठ एव च ।¦बलं हि क्षत्रिये व्यक्तं ज्ञायते स्थूलदृष्टिभिः ॥२०॥ | ||
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| verse_text = ज्ञानादयो गुणा यस्माज्ज्ञायन्ते सूक्ष्मदृष्टिभिः । | | verse_text = ज्ञानादयो गुणा यस्माज्ज्ञायन्ते सूक्ष्मदृष्टिभिः । | ||
| verse_lines = ज्ञानादयो गुणा यस्माज्ज्ञायन्ते सूक्ष्मदृष्टिभिः | | verse_lines = ज्ञानादयो गुणा यस्माज्ज्ञायन्ते सूक्ष्मदृष्टिभिः ।¦तस्माद्यत्र बलं तत्र विज्ञातव्या गुणाः परे ॥२१॥ | ||
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| verse_text = देवेष्वेव न चान्येषु वासुदेवप्रतीपतः । | | verse_text = देवेष्वेव न चान्येषु वासुदेवप्रतीपतः । | ||
| verse_lines = देवेष्वेव न चान्येषु वासुदेवप्रतीपतः | | verse_lines = देवेष्वेव न चान्येषु वासुदेवप्रतीपतः ।¦क्षत्रादन्येष्वपि बलं प्रमाणं यत्र केशवः ॥ २२॥ | ||
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| verse_lines = प्रवृत्तो दुष्टनिधने ज्ञानकार्ये तथैव च | | verse_lines = प्रवृत्तो दुष्टनिधने ज्ञानकार्ये तथैव च ।¦अन्यत्र ब्राह्मणानां तु प्रमाणं ज्ञानमेव हि ।¦क्षत्रियाणां बलं चैव सर्वेषां विष्णुकार्यता ॥२३॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णरामादिरूपेषु बलकार्यो जनार्दनः | | verse_lines = कृष्णरामादिरूपेषु बलकार्यो जनार्दनः ।¦दत्तव्यासादिरूपेषु ज्ञानकार्यस्तथा प्रभुः ॥२४॥ | ||
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| verse_lines = मत्स्यकूर्मवराहाश्च सिंहवामनभार्गवाः | | verse_lines = मत्स्यकूर्मवराहाश्च सिंहवामनभार्गवाः ।¦राघवः कृष्णबुद्धौ च कृष्णद्वैपायनस्तथा ॥२५॥ | ||
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| verse_lines = कपिलो दत्त ऋषभौ शिंशुमारो रुचेः सुतः | | verse_lines = कपिलो दत्त ऋषभौ शिंशुमारो रुचेः सुतः ।¦नारायणो हरिः कृष्णस्तापसो मनुरेव च ॥२६॥ | ||
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| verse_lines = महिदासस्तथा हंसः स्त्रीरूपो हयशीर्षवान् | | verse_lines = महिदासस्तथा हंसः स्त्रीरूपो हयशीर्षवान् ।¦तथैव वडवावक्त्रः कल्की धन्वन्तरिः प्रभुः ॥२७॥ | ||
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| verse_lines = इत्याद्याः केवलो विष्णुर्नैषां भेदः कथञ्चन | | verse_lines = इत्याद्याः केवलो विष्णुर्नैषां भेदः कथञ्चन ।¦न विशेषो गुणैः सर्वैर्बलज्ञानादिभिः क्वचित् ॥२८॥ | ||
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| verse_lines = श्रीब्रह्मरुद्रशेषाश्च वीन्द्रेन्द्रौ काम एव च | | verse_lines = श्रीब्रह्मरुद्रशेषाश्च वीन्द्रेन्द्रौ काम एव च ।¦कामपुत्रोऽनिरुद्धश्च सूर्यश्चन्द्रो बृहस्पतिः ॥२९॥ | ||
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| verse_lines = धर्म एषां तथा भार्या दक्षाद्या मनवस्तथा | | verse_lines = धर्म एषां तथा भार्या दक्षाद्या मनवस्तथा ।¦मनुपुत्राश्च ऋषयो नारदः पर्वतस्तथा ॥३०॥ | ||
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| verse_lines = कश्यपः सनकाद्याश्च वह्न्याद्याश्चैव देवताः | | verse_lines = कश्यपः सनकाद्याश्च वह्न्याद्याश्चैव देवताः ।¦भरतः कार्तवीर्यश्च वैन्याद्याश्चक्रवर्तिनः ॥३१॥ | ||
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| verse_lines = गयश्च लक्ष्मणाद्याश्च त्रयो रोहिणिनन्दनः | | verse_lines = गयश्च लक्ष्मणाद्याश्च त्रयो रोहिणिनन्दनः ।¦प्रद्युम्नो रौक्मिणेयश्च तत्पुत्रश्चानिरुद्धकः ॥३२ ॥ | ||
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| verse_lines = नरः फल्गुन इत्याद्या विशेषावेशिनो हरेः | | verse_lines = नरः फल्गुन इत्याद्या विशेषावेशिनो हरेः ।¦वालि साम्बादयश्चैव किञ्चिदावेशिनो हरेः ॥३३॥ | ||
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| verse_lines = तस्माद्बलप्रवृत्तस्य रामकृष्णात्मनो हरेः | | verse_lines = तस्माद्बलप्रवृत्तस्य रामकृष्णात्मनो हरेः ।¦अन्तरङ्गं हनूमांश्च भीमस्तत्कार्यसाधकौ ॥३४॥ | ||
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| verse_lines = ब्रह्मात्मको यतो वायुः पदं ब्राह्ममगात् पुरा | | verse_lines = ब्रह्मात्मको यतो वायुः पदं ब्राह्ममगात् पुरा ।¦वायोरन्यस्य न ब्राह्मं पदं तस्मात् स एव सः ॥३५॥ | ||
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| verse_lines = यत्र रूपं तत्र गुणाः भक्त्याद्यास्त्रीषु नित्यशः | | verse_lines = यत्र रूपं तत्र गुणाः भक्त्याद्यास्त्रीषु नित्यशः ।¦रूपं हि स्थूलदृष्टीनां दृश्यं व्यक्तं ततो हि तत् ॥३६॥ | ||
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| verse_lines = प्रायो वेत्तुं न शक्यन्ते भक्त्याद्यास्त्रीषु यत् ततः | | verse_lines = प्रायो वेत्तुं न शक्यन्ते भक्त्याद्यास्त्रीषु यत् ततः ।¦यासां रूपं गुणास्तासां भक्त्याद्या इति निश्चयः ॥३७॥ | ||
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| verse_lines = तच्च नैसर्गिकं रूपं द्वात्रिंशल्लक्षणैर्युतम् | | verse_lines = तच्च नैसर्गिकं रूपं द्वात्रिंशल्लक्षणैर्युतम् ।¦नालक्षणं वपुर्मात्रं गुणहेतुः कथञ्चन ॥३८॥ | ||
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| verse_lines = आसुरीणां वरादेस्तु वपुर्मात्रं भविष्यति | | verse_lines = आसुरीणां वरादेस्तु वपुर्मात्रं भविष्यति ।¦न लक्षणान्यतस्तासां नैव भक्तिः कथञ्चन ॥३९॥ | ||
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| verse_lines = तस्माद् रूपगुणोदारा जानकी रुग्मिणी तथा | | verse_lines = तस्माद् रूपगुणोदारा जानकी रुग्मिणी तथा ।¦सत्यभामेत्यादिरूपा श्रीः सर्वपरमा मता ॥४०॥ | ||
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| verse_lines = ततः पश्चाद् द्रौपदी च सर्वाभ्यो रूपतो वरा | | verse_lines = ततः पश्चाद् द्रौपदी च सर्वाभ्यो रूपतो वरा ।¦भूभारक्षपणे साक्षादङ्गं भीमवदीशितुः ॥४१॥ | ||
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| verse_lines = हन्ता च वैरहेतुश्च भीमः पापजनस्य तु | | verse_lines = हन्ता च वैरहेतुश्च भीमः पापजनस्य तु ।¦द्रौपदी वैरहेतुः सा तस्माद् भीमादनन्तरा ॥४२॥ | ||
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| verse_lines = बलदेवस्ततः पश्चात् ततः पश्चाच्च फल्गुनः | | verse_lines = बलदेवस्ततः पश्चात् ततः पश्चाच्च फल्गुनः ।¦नरावेशादन्यथा तु द्रौणिः पश्चात् ततोऽपरे ॥४३॥ | ||
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| verse_lines = रामवज्जाम्बवत्याद्याः षट् ततो रेवती तथा | | verse_lines = रामवज्जाम्बवत्याद्याः षट् ततो रेवती तथा ।¦लक्ष्मणो हनुमत्पश्चात् ततो भरतवालिनौ ।¦शत्रुघ्नस्तु ततः पश्चात् सुग्रीवाद्यास्ततोऽवराः ॥४४॥ | ||
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| verse_lines = रामकार्यं तु यैः सम्यक् स्वयोग्यं न कृतं पुरा | | verse_lines = रामकार्यं तु यैः सम्यक् स्वयोग्यं न कृतं पुरा ।¦तैः पूरितं तत् कृष्णाय बीभत्स्वाद्यैः समन्ततः ॥४५॥ | ||
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| verse_lines = अधिकं यैः कृतं तत्र तैरूनं कृतमत्र तत् | | verse_lines = अधिकं यैः कृतं तत्र तैरूनं कृतमत्र तत् ।¦कर्णाद्यैरधिकं यैस्तु प्रादुर्भावद्वये कृतम् ।¦विविदाद्यैर्हि तैः पश्चाद् विप्रतीपं कृतं हरेः ॥४६॥ | ||
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| verse_lines = प्रादुर्भावद्वये ह्यस्मिन् सर्वेषां निर्णयः कृतः | | verse_lines = प्रादुर्भावद्वये ह्यस्मिन् सर्वेषां निर्णयः कृतः ।¦नैतयोरकृतं किञ्चिच्छुभं वा यदि वाऽशुभम् ।¦अन्यत्र पूर्यते क्वापि तस्मादत्रैव निर्णयः ॥४७॥ | ||
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| verse_lines = पश्चात्तनत्वात् कृष्णस्य वैशेष्यात् तत्र निर्णयः | | verse_lines = पश्चात्तनत्वात् कृष्णस्य वैशेष्यात् तत्र निर्णयः ।¦प्रादुर्भावमिमं यस्माद् गृहीत्वा भारतं कृतम् ॥४८॥ | ||
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| verse_lines = उक्ता रामकथाऽप्यस्मिन् मार्कण्डेयसमाख्य(स्य)या | | verse_lines = उक्ता रामकथाऽप्यस्मिन् मार्कण्डेयसमाख्य(स्य)या ।¦तस्माद् यद् भारते नोक्तं तद्धि नैवास्ति कुत्रचित् ।¦॥४९॥ | ||
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| verse_lines = अत्रोक्तं सर्वशास्त्रेषु नहि सम्यगुदाहृतम्' | | verse_lines = अत्रोक्तं सर्वशास्त्रेषु नहि सम्यगुदाहृतम्'।¦इत्यादि कथितं सर्वं ब्रह्माण्डे हरिणा स्वयम् ॥५०॥ | ||
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| verse_lines = मार्कण्डेयेऽपि कथितं भारतस्य प्रशंसनम् | | verse_lines = मार्कण्डेयेऽपि कथितं भारतस्य प्रशंसनम् ।¦‘देवतानां यथा व्यासो द्विपदां ब्राह्मणो वरः ॥५१॥ | ||
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| verse_text = वायुप्रोक्तेऽपि तत् प्रोक्तं भारतस्य प्रशंसनम् । | | verse_text = वायुप्रोक्तेऽपि तत् प्रोक्तं भारतस्य प्रशंसनम् । | ||
| verse_lines = वायुप्रोक्तेऽपि तत् प्रोक्तं भारतस्य प्रशंसनम् | | verse_lines = वायुप्रोक्तेऽपि तत् प्रोक्तं भारतस्य प्रशंसनम् ।¦‘कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं प्रभुम् ।¦को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत्’ ॥५३॥(पद्म पु. १.१.४३-४४; विष्णु पु. ३.४-५; महा. १२.३३४.९(१२.३५६.११)) | ||
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| verse_text = एवं हि सर्वशास्त्रेषु पृथक् पृथगुदीरितम् । | | verse_text = एवं हि सर्वशास्त्रेषु पृथक् पृथगुदीरितम् । | ||
| verse_lines = एवं हि सर्वशास्त्रेषु पृथक् पृथगुदीरितम् | | verse_lines = एवं हि सर्वशास्त्रेषु पृथक् पृथगुदीरितम् ।¦उक्तोऽर्थः सर्व एवायं माहात्म्यक्रमपूर्वकः ॥५४॥ | ||
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| verse_text = भारतेऽपि यथा प्रोक्तो निर्णयोऽयं क्रमेण तु । | | verse_text = भारतेऽपि यथा प्रोक्तो निर्णयोऽयं क्रमेण तु । | ||
| verse_lines = भारतेऽपि यथा प्रोक्तो निर्णयोऽयं क्रमेण तु | | verse_lines = भारतेऽपि यथा प्रोक्तो निर्णयोऽयं क्रमेण तु ।¦तथा प्रदर्शयिष्यामस्तद्वाक्यैरेव सर्वशः ॥५५॥ | ||
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| verse_text = ‘नारायणं सुरगुरुं जगदेकनाथं भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च । | | verse_text = ‘नारायणं सुरगुरुं जगदेकनाथं भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च । | ||
| verse_lines = ‘नारायणं सुरगुरुं जगदेकनाथं भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च | | verse_lines = ‘नारायणं सुरगुरुं जगदेकनाथं भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च ।¦त्रैगुण्यवर्जितमजं विभुमाद्यमीशं वन्दे भवघ्नममरासुरसिद्धवन्द्यम्’ ॥५६॥ | ||
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| verse_text = ज्ञानप्रदः स भगवान् कमलाविरिञ्चशर्वादिपूर्वजगतो निखिलाद्वरिष्ठः । | | verse_text = ज्ञानप्रदः स भगवान् कमलाविरिञ्चशर्वादिपूर्वजगतो निखिलाद्वरिष्ठः । | ||
| verse_lines = ज्ञानप्रदः स भगवान् कमलाविरिञ्चशर्वादिपूर्वजगतो निखिलाद्वरिष्ठः | | verse_lines = ज्ञानप्रदः स भगवान् कमलाविरिञ्चशर्वादिपूर्वजगतो निखिलाद्वरिष्ठः ।¦भक्त्यैव तुष्यति हरिप्रवणत्वमेव सर्वस्य धर्म इति पूर्वविभागसंस्थः ॥५७॥ | ||
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| verse_text = निर्दोषकः सृतिविहीन उदारपूर्णसंविद्गुणः प्रथमकृत् सकलात्मशक्तिः । | | verse_text = निर्दोषकः सृतिविहीन उदारपूर्णसंविद्गुणः प्रथमकृत् सकलात्मशक्तिः । | ||
| verse_lines = निर्दोषकः सृतिविहीन उदारपूर्णसंविद्गुणः प्रथमकृत् सकलात्मशक्तिः | | verse_lines = निर्दोषकः सृतिविहीन उदारपूर्णसंविद्गुणः प्रथमकृत् सकलात्मशक्तिः ।¦मोक्षैकहेतुरसुरूपसुरैश्च मुक्तैर्वन्द्यः स एक इति चोक्तमथोत्तरार्धे ॥५८॥ | ||
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| verse_text = नम्यत्वमुक्तमुभयत्र यतस्ततोऽस्य मुक्तैरमुक्तिगगणैश्च विनम्यतोक्ता । | | verse_text = नम्यत्वमुक्तमुभयत्र यतस्ततोऽस्य मुक्तैरमुक्तिगगणैश्च विनम्यतोक्ता । | ||
| verse_lines = नम्यत्वमुक्तमुभयत्र यतस्ततोऽस्य मुक्तैरमुक्तिगगणैश्च विनम्यतोक्ता | | verse_lines = नम्यत्वमुक्तमुभयत्र यतस्ततोऽस्य मुक्तैरमुक्तिगगणैश्च विनम्यतोक्ता ।¦इत्थं हि सर्वगुणपूर्तिरमुष्य विष्णोः प्रस्ताविता प्रथमतः प्रतिजानतैव ॥५९॥ | ||
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| verse_text = ‘कृष्णो यज्ञैरिज्यते सोमपूतैः कृष्णो वीरैरिज्यते विक्रमद्भिः । | | verse_text = ‘कृष्णो यज्ञैरिज्यते सोमपूतैः कृष्णो वीरैरिज्यते विक्रमद्भिः । | ||
| verse_lines = ‘कृष्णो यज्ञैरिज्यते सोमपूतैः कृष्णो वीरैरिज्यते विक्रमद्भिः | | verse_lines = ‘कृष्णो यज्ञैरिज्यते सोमपूतैः कृष्णो वीरैरिज्यते विक्रमद्भिः ।¦कृष्णो वन्यैरिज्यते सम्मृशानैः कृष्णो मुक्तैरिज्यते वीतमोहैः’ ॥६०॥ | ||
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| verse_text = सृष्टा ब्रह्मादयो देवा निहता येन दानवाः । | | verse_text = सृष्टा ब्रह्मादयो देवा निहता येन दानवाः । | ||
| verse_lines = सृष्टा ब्रह्मादयो देवा निहता येन दानवाः | | verse_lines = सृष्टा ब्रह्मादयो देवा निहता येन दानवाः ।¦तस्मै देवादिदेवाय नमस्ते शार्ङ्गधारिणे ॥६१॥ | ||
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| verse_text = स्रष्टृत्वं देवानां मुक्तिस्रष्टृत्वमुच्यते नान्यत् । | | verse_text = स्रष्टृत्वं देवानां मुक्तिस्रष्टृत्वमुच्यते नान्यत् । | ||
| verse_lines = स्रष्टृत्वं देवानां मुक्तिस्रष्टृत्वमुच्यते नान्यत् | | verse_lines = स्रष्टृत्वं देवानां मुक्तिस्रष्टृत्वमुच्यते नान्यत् ।¦उत्पत्तिर्दैत्यानामपि यस्मात् सम्मिता विशेषोऽयम् ॥६२॥ | ||
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| verse_text = अथ च दैत्यहतिस्तमसि स्थिरा नियतसंस्थितिरेव न चान्यथा । | | verse_text = अथ च दैत्यहतिस्तमसि स्थिरा नियतसंस्थितिरेव न चान्यथा । | ||
| verse_lines = अथ च दैत्यहतिस्तमसि स्थिरा नियतसंस्थितिरेव न चान्यथा | | verse_lines = अथ च दैत्यहतिस्तमसि स्थिरा नियतसंस्थितिरेव न चान्यथा ।¦तनुविभागकृतिः सकलेष्वियं नहि विशेषकृता सुरदैत्यगा ॥६३॥ | ||
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| verse_text = तमिममेव सुरासुरसञ्चये हरिकृतं प्रविशेषमुदीक्षितुम् । | | verse_text = तमिममेव सुरासुरसञ्चये हरिकृतं प्रविशेषमुदीक्षितुम् । | ||
| verse_lines = तमिममेव सुरासुरसञ्चये हरिकृतं प्रविशेषमुदीक्षितुम् | | verse_lines = तमिममेव सुरासुरसञ्चये हरिकृतं प्रविशेषमुदीक्षितुम् ।¦प्रतिविभज्य च भीमसुयोधनौ स्वपरपक्षभिदा कथिता कथा ॥६४॥ | ||
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| verse_lines = ‘नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे | | verse_lines = ‘नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे ।¦यस्य प्रसादाद् वक्ष्यामि नारायणकथामिमाम् ॥६५॥ | ||
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| verse_text = वासुदेवस्तु भगवान् कीर्तितोऽत्र सनातनः । | | verse_text = वासुदेवस्तु भगवान् कीर्तितोऽत्र सनातनः । | ||
| verse_lines = वासुदेवस्तु भगवान् कीर्तितोऽत्र सनातनः | | verse_lines = वासुदेवस्तु भगवान् कीर्तितोऽत्र सनातनः ।¦प्रतिबिम्बमिवाऽदर्शे यं पश्यन्त्यात्मनि स्थितम् ॥६६॥ | ||
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| verse_text = नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । | | verse_text = नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति । | ||
| verse_lines = नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति | | verse_lines = नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति ।¦एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान् साधयाम्यहम्' ॥६७॥ | ||
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| verse_lines = आद्यन्तयोरित्यवदत् स यस्माद् व्यासात्मको विष्णुरुदारशक्तिः | | verse_lines = आद्यन्तयोरित्यवदत् स यस्माद् व्यासात्मको विष्णुरुदारशक्तिः ।¦तस्मात् समस्ता हरिसद्गुणानां निर्णीयते(तये) भारतगा कथैषा ॥६८॥ | ||
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| verse_lines = ‘सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते | | verse_lines = ‘सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते ।¦वेदशास्त्रात् परं नास्ति न दैवं केशवात् परम्’ ॥६९॥ | ||
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| verse_lines = ‘आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः | | verse_lines = ‘आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।¦इदमेकं सुनिष्पन्नं ध्येयो नारायणः सदा’(अनुषासपर्वणि.१८६.११,गरुडपुाणे आचारकाण्डे.२३०.१) ॥७०॥ | ||
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| verse_lines = ‘स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित् | | verse_lines = ‘स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित् ।¦सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतयोरेव किङ्कराः’(पाद्मे.उत्तरखण्डे.७१.१००) ॥७१॥ | ||
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| verse_lines = ‘को हि तं वेदितुं शक्तो यो न स्यात् तद्विधोऽपरः(तद्वधः परः) | | verse_lines = ‘को हि तं वेदितुं शक्तो यो न स्यात् तद्विधोऽपरः(तद्वधः परः) ।¦तद्विधश्चापरो नास्ति तस्मात् तं वेद सः स्वयम् ॥७२॥ | ||
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| verse_lines = को हि तं वेदितुं शक्तो नारायणमनामयम् | | verse_lines = को हि तं वेदितुं शक्तो नारायणमनामयम् ।¦ऋते सत्यवतीसूनोः कृष्णाद् वा देवकीसुतात् (म.भा.सभा.प.६१.३१) ॥७३॥ | ||
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| verse_lines = अप्रमेयोऽनियोज्यश्च स्वयं कामगमो वशी | | verse_lines = अप्रमेयोऽनियोज्यश्च स्वयं कामगमो वशी ।¦मोदत्येष सदा भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव ॥७४॥ | ||
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| verse_lines = न प्रमातुं महाबाहुः शक्योऽयं मधुसूदनः | | verse_lines = न प्रमातुं महाबाहुः शक्योऽयं मधुसूदनः ।¦परमात् परमेतस्माद् विश्वरूपान्न विद्यते ॥७५॥ | ||
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| verse_lines = वसुदेवसुतो नायं नायं गर्भेऽवसत् प्रभुः | | verse_lines = वसुदेवसुतो नायं नायं गर्भेऽवसत् प्रभुः ।¦नायं दशरथाज्जातो न चापि जमदग्नितः ॥७६॥ | ||
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| verse_lines = जायते नैव कुत्रापि म्रियते कुत एव तु | | verse_lines = जायते नैव कुत्रापि म्रियते कुत एव तु ।¦न(म) वेध्यो मुह्यते नायं बद्ध्यते नैव केनचित् ।¦कुतो दुःखं स्वतन्त्रस्य नित्यानन्दैकरूपिणः ॥७७॥ | ||
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| verse_lines = ईशन्नपि हि देवेशः सर्वस्य जगतो हरिः | | verse_lines = ईशन्नपि हि देवेशः सर्वस्य जगतो हरिः ।¦कर्माणि कुरुते नित्यं कीनाश इव दुर्बलः (म.भा.उद्योग.६७.१४)॥७८॥ | ||
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| verse_lines = नाऽत्मानं वेद मुग्धोऽयं दुःखी सीतां च मार्गते | | verse_lines = नाऽत्मानं वेद मुग्धोऽयं दुःखी सीतां च मार्गते ।¦बद्धः शक्रजितेत्यादि लीलैषाऽसुरमोहिनी ॥७९॥ | ||
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| verse_lines = मुह्यते शस्त्रपातेन भिन्नत्वग्रुधिरस्रवः | | verse_lines = मुह्यते शस्त्रपातेन भिन्नत्वग्रुधिरस्रवः ।¦अजानन् पृच्छति स्मान्यांस्तनुं त्यक्त्वा दिवं गतः ॥८०॥ | ||
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| verse_lines = इत्याद्यसुरमोहाय दर्शयामास नाट्यवत् | | verse_lines = इत्याद्यसुरमोहाय दर्शयामास नाट्यवत् ।¦अविद्यमानमेवेशः कुहकं तद्विदुः सुराः ॥८१॥ | ||
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| verse_lines = दुष्टानां मोहनार्थाय सतामपि तु(च) कुत्रचित् | | verse_lines = दुष्टानां मोहनार्थाय सतामपि तु(च) कुत्रचित् ।¦यथायोग्यफलप्राप्त्यै लीलैषा परमात्मनः’ ॥८३॥ | ||
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| verse_lines = ‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः | | verse_lines = ‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।¦यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते’(भ. गी. ७.२) ॥८४॥ | ||
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| verse_lines = ‘पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् | | verse_lines = ‘पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।¦न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव’(भ. गी. ११.४३) ॥८९॥ | ||
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| verse_text = ‘परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । | | verse_text = ‘परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । | ||
| verse_lines = ‘परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् | | verse_lines = ‘परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।¦यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः’(भ. गी. १४.१) ॥९०॥ | ||
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| verse_lines = ‘ममयोनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् | | verse_lines = ‘ममयोनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।¦सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत’(भ. गी. १४.३) ॥९१॥ | ||
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| verse_text = ‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । | | verse_text = ‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । | ||
| verse_lines = ‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च | | verse_lines = ‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।¦क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥९२॥ | ||
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| verse_text = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । | | verse_text = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । | ||
| verse_lines = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः | | verse_lines = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।¦यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥९३॥ | ||
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| verse_lines = यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः | | verse_lines = यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।¦अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥९४॥ | ||
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| verse_text = यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । | | verse_text = यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । | ||
| verse_lines = यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् | | verse_lines = यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।¦स सर्वविद् भजति मां सर्वभावेन भारत ॥९५॥ (इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।¦सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥) | ||
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| verse_lines = (इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः | | verse_lines = (इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।¦सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥(भ.गी.१४.२))इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ ।¦एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत’(भ. गी. १५.१६-२०) ॥९६॥ | ||
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| verse_lines = ‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्’ | | verse_lines = ‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्’ ।¦अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्॥(भ. गी. १६.८) ’॥९८॥ | ||
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| verse_text = एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः । | | verse_text = एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः । | ||
| verse_lines = एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः | | verse_lines = एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।¦प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोहिताः॥’ (भ. गी. १६.९)॥९९ ॥ | ||
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| verse_text = ‘मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः’(भ. गी. १६.१८)। | | verse_text = ‘मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः’(भ. गी. १६.१८)। | ||
| verse_lines = ‘मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः’(भ. गी. १६.१८) | | verse_lines = ‘मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः’(भ. गी. १६.१८)।¦‘ तानहं द्विषतः क्रूरान् संसारेषु नराधमान् ।¦क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु’(भ. गी. १६.१९) ॥१०१॥ | ||
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| verse_text = ‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । | | verse_text = ‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । | ||
| verse_lines = ‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि | | verse_lines = ‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।¦मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्’(भ. गी. १६.२०) ॥१०२॥ | ||
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| verse_text = ‘सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । | | verse_text = ‘सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते । | ||
| verse_lines = ‘सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते | | verse_lines = ‘सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।¦अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्विकम्’(भ. गी. १८.२०) ॥१०३॥ | ||
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| verse_text = ‘सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । | | verse_text = ‘सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । | ||
| verse_lines = ‘सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः | | verse_lines = ‘सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।¦इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्’(भ. गी. १८.६४) ॥१०४॥ | ||
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| verse_text = ‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । | | verse_text = ‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । | ||
| verse_lines = ‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | | verse_lines = ‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।¦मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे’(भ. गी. १८.६५) ॥१०५॥ | ||
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| verse_lines = ‘पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता नारायणः स्वयम् | | verse_lines = ‘पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता नारायणः स्वयम् ।¦सर्वेष्वेतेषु राजेन्द्र ज्ञानेष्वेतद् विशिष्यते’(महा. १२.३३७.६३(२५९.६८)) ॥१०६॥ | ||
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| verse_lines = ‘ज्ञानेष्वेतेषु राजेन्द्र साङ्ख्यपाशुपतादिषु | | verse_lines = ‘ज्ञानेष्वेतेषु राजेन्द्र साङ्ख्यपाशुपतादिषु ।¦यथायोगं यथान्यायं निष्ठा नारायणः परः’(महा. १२.३३७.६४ \३५९.६९) ॥१०७॥ | ||
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| verse_lines = ‘पञ्चरात्रविदो मुख्या यथाक्रमपरा नृप | | verse_lines = ‘पञ्चरात्रविदो मुख्या यथाक्रमपरा नृप ।¦एकान्तभावोपगता वासुदेवं विशन्ति ते’(महा. १२.३३७.६७ \३५९.७२) ॥१०८॥ | ||
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| verse_lines = \ (जनमेजय उवाच) | | verse_lines = \ (जनमेजय उवाच)¦‘बहवः पुरुषा ब्रह्मन्नुताहो एक एव तु ।¦को ह्यत्र पुरुषश्रेष्ठस्तं भवान् वक्तुमर्हति’(महा. १२.३३८.१ \३६०.१) ॥१०९॥ | ||
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| verse_lines = (वैशम्पायन उवाच)‘ नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह | | verse_lines = (वैशम्पायन उवाच)‘ नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ।¦बहूनां पुरुषाणां हि यथैका योनिरुच्यते ।¦तथा तं पुरुषं विश्वमाख्यास्यामि गुणाधिकम्’(महा. १२.३३८.२\३६०.३ ) ॥११०॥ | ||
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| verse_lines = ‘आह ब्रह्मैतमेवार्थं महादेवाय पृच्छते | | verse_lines = ‘आह ब्रह्मैतमेवार्थं महादेवाय पृच्छते ।¦तस्यैकस्य ममत्वं हि स चैकः पुरुषो विराट्’(महा.१२.३६१.९ ) ॥१११॥ | ||
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| verse_lines = ‘अहं ब्रह्मा चाऽद्य ईशः प्रजानां तस्माज्जातस्त्वं च मत्तः प्रसूतः | | verse_lines = ‘अहं ब्रह्मा चाऽद्य ईशः प्रजानां तस्माज्जातस्त्वं च मत्तः प्रसूतः ।¦मत्तो जगत् स्थावरं जङ्गमं च सर्वे वेदा सरहस्याश्च पुत्र’(महा.१२.३६१.२०-२१ ) ॥११२॥ | ||
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| verse_lines = तथैव भीमवचनं धर्मजं प्रत्युदीरितम् | | verse_lines = तथैव भीमवचनं धर्मजं प्रत्युदीरितम् ।¦‘ब्रह्मेशानादिभिः सर्वैः समेतैर्यद्गुणांशकः ।¦नावसाययितुं शक्यो व्याचक्षाणैश्च सर्वदा ॥११३॥ | ||
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| verse_lines = स एष भगवान् कृष्णो नैव केवलमानुषः | | verse_lines = स एष भगवान् कृष्णो नैव केवलमानुषः ।¦यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रश्च क्रोधसम्भवः’(महा.१२.३५०.१२ ) ॥११४॥ | ||
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| verse_lines = वचनं चैव कृष्णस्य ज्येष्ठं कुन्तीसुतं प्रति | | verse_lines = वचनं चैव कृष्णस्य ज्येष्ठं कुन्तीसुतं प्रति ।¦‘रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ।¦ब्रह्मा मामाश्रितो नित्यं नाहं (कि)कञ्चिदुपाश्रितः (म.भा.१४.११८.३७)॥११५॥ | ||
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| verse_lines = यथाऽऽश्रितानि ज्योतींषि ज्योतिःश्रेष्ठं दिवाकरम् | | verse_lines = यथाऽऽश्रितानि ज्योतींषि ज्योतिःश्रेष्ठं दिवाकरम् ।¦एवं मुक्तगणाः सर्वे वासुदेवमुपाश्रिताः’ ॥११६॥ | ||
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| verse_lines = भविष्यत्पर्वगं चापि वचो व्यासस्य सादरम् | | verse_lines = भविष्यत्पर्वगं चापि वचो व्यासस्य सादरम् ।¦‘वासुदेवस्य महिमा भारते निर्णयोदितः ॥११७॥ | ||
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| verse_lines = तदर्थास्तु कथाः सर्वा नान्यार्थं वैष्णवं यशः | | verse_lines = तदर्थास्तु कथाः सर्वा नान्यार्थं वैष्णवं यशः ।¦तत्प्रतीपं तु यद् दृश्येन्न तन्मम मनीषितम् ॥११८॥ | ||
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| verse_lines = भाषास्तु त्रिविधास्तत्र मया वै सम्प्रदर्शिताः | | verse_lines = भाषास्तु त्रिविधास्तत्र मया वै सम्प्रदर्शिताः ।¦उक्तो यो महिमा विष्णोः स तूक्तो हि समाधिना ॥११९॥ | ||
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| verse_lines = अविरुद्धं समाधेस्तु दर्शनोक्तं च गृह्यते | | verse_lines = अविरुद्धं समाधेस्तु दर्शनोक्तं च गृह्यते ।¦आद्यन्तयोर्विरुद्धं यद् दर्शनं तदुदाहृतम् ॥१२१॥ | ||
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| verse_lines = तस्याङ्गं प्रथमं वायुः प्रादुर्भावत्रयान्वितः | | verse_lines = तस्याङ्गं प्रथमं वायुः प्रादुर्भावत्रयान्वितः ।¦प्रथमो हनुमान् नाम द्वितीयो भीम एव च ।¦पूर्णप्रज्ञस्तृतीयस्तु भगवत्कार्यसाधकः ॥१२३॥ | ||
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| verse_lines = शंरूपे तु रतेर्वायौ श्रीरित्येव च कीर्त्यते | | verse_lines = शंरूपे तु रतेर्वायौ श्रीरित्येव च कीर्त्यते ।¦सैव च द्रौपदी नाम काळी चन्द्रेति चोच्यते ॥१२५॥ | ||
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| verse_text = प्रद्युम्नाद्यास्ततो विष्णोरङ्गभूताः क्रमेण तु । | | verse_text = प्रद्युम्नाद्यास्ततो विष्णोरङ्गभूताः क्रमेण तु । | ||
| verse_lines = प्रद्युम्नाद्यास्ततो विष्णोरङ्गभूताः क्रमेण तु | | verse_lines = प्रद्युम्नाद्यास्ततो विष्णोरङ्गभूताः क्रमेण तु ।¦चरितं वैष्णवानां (च)तद् विष्णूद्रेकाय कथ्यते’ ॥१२८॥ | ||
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| verse_text = तथा भागवतेऽप्युक्तं हनूमद्वचनं परम् । | | verse_text = तथा भागवतेऽप्युक्तं हनूमद्वचनं परम् । | ||
| verse_lines = तथा भागवतेऽप्युक्तं हनूमद्वचनं परम् | | verse_lines = तथा भागवतेऽप्युक्तं हनूमद्वचनं परम् ।¦‘मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ।¦कुतोऽन्यथा स्यू(स्य हि स्यू) रमतः स्व आत्मन् सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ॥१२९॥ | ||
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| verse_text = न वै स आत्माऽऽत्मवतामधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः । | | verse_text = न वै स आत्माऽऽत्मवतामधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः । | ||
| verse_lines = न वै स आत्माऽऽत्मवतामधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः | | verse_lines = न वै स आत्माऽऽत्मवतामधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः ।¦न स्त्रीकृतं कश्मलमश्नुवीत न लक्ष्मणं चापि जहाति कर्हिचित्’(भा.पु. ५.१९.५-६) ॥१३०॥ | ||
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| verse_text = यत्पादपङ्कजपरागनिषेवकाणां दुःखानि सर्वाणि लयं प्रयान्ति । | | verse_text = यत्पादपङ्कजपरागनिषेवकाणां दुःखानि सर्वाणि लयं प्रयान्ति । | ||
| verse_lines = यत्पादपङ्कजपरागनिषेवकाणां दुःखानि सर्वाणि लयं प्रयान्ति | | verse_lines = यत्पादपङ्कजपरागनिषेवकाणां दुःखानि सर्वाणि लयं प्रयान्ति ।¦स ब्रह्मवन्द्यचरणो जनमोहनाय स्त्रीसङ्गिनामिति रतिं प्रथयंश्चचार ॥१३१॥ | ||
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| verse_text = ‘क्वचिच्छिवं क्वचिदृषीन् क्वचिद् देवान् क्वचिन्नरान् । | | verse_text = ‘क्वचिच्छिवं क्वचिदृषीन् क्वचिद् देवान् क्वचिन्नरान् । | ||
| verse_lines = ‘क्वचिच्छिवं क्वचिदृषीन् क्वचिद् देवान् क्वचिन्नरान् | | verse_lines = ‘क्वचिच्छिवं क्वचिदृषीन् क्वचिद् देवान् क्वचिन्नरान् ।¦नमत्यर्चयति स्तौति वरानर्थयतेऽपि च ॥१३२॥ | ||
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| verse_text = लिङ्गं प्रतिष्ठापयति वृणोत्यसुरतो वरान् । | | verse_text = लिङ्गं प्रतिष्ठापयति वृणोत्यसुरतो वरान् । | ||
| verse_lines = लिङ्गं प्रतिष्ठापयति वृणोत्यसुरतो वरान् | | verse_lines = लिङ्गं प्रतिष्ठापयति वृणोत्यसुरतो वरान् ।¦सर्वेश्वरः स्वतन्त्रोऽपि सर्वशक्तिश्च सर्वदा ।¦सर्वज्ञोऽपि विमोहाय जनानां पुरुषोत्तमः’ ॥१३३॥ | ||
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| verse_text = तस्माद् यो महिमा विष्णोः सर्वशास्त्रोदितः स हि । | | verse_text = तस्माद् यो महिमा विष्णोः सर्वशास्त्रोदितः स हि । | ||
| verse_lines = तस्माद् यो महिमा विष्णोः सर्वशास्त्रोदितः स हि | | verse_lines = तस्माद् यो महिमा विष्णोः सर्वशास्त्रोदितः स हि ।¦नान्यदित्येष शास्त्राणां निर्णयः समुदाहृतः॥१३४॥ | ||
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| verse_lines = भारतार्थस्त्रिधा प्रोक्तः स्वयं भगवतैव हि | | verse_lines = भारतार्थस्त्रिधा प्रोक्तः स्वयं भगवतैव हि ।¦‘मन्वादि केचिद् ब्रुवते ह्यास्तीकादि तथा परे ।¦तथोपरिचराद्यन्ये भारतं परिचक्षते’(महा. १.१.५०) ॥१३५॥ | ||
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| verse_text = ‘सकृष्णान् पाण्डवान् गृह्य योऽयमर्थः प्रवर्तते । | | verse_text = ‘सकृष्णान् पाण्डवान् गृह्य योऽयमर्थः प्रवर्तते । | ||
| verse_lines = ‘सकृष्णान् पाण्डवान् गृह्य योऽयमर्थः प्रवर्तते | | verse_lines = ‘सकृष्णान् पाण्डवान् गृह्य योऽयमर्थः प्रवर्तते ।¦प्रातिलोम्यादिवैचित्र्यात् तमास्तीकं प्रचक्षते ॥१३६॥ | ||
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| verse_text = धर्मो भक्त्यादिदशकः श्रुतादिः शीलवैनयौ । | | verse_text = धर्मो भक्त्यादिदशकः श्रुतादिः शीलवैनयौ । | ||
| verse_lines = धर्मो भक्त्यादिदशकः श्रुतादिः शीलवैनयौ | | verse_lines = धर्मो भक्त्यादिदशकः श्रुतादिः शीलवैनयौ ।¦सब्रह्मकास्तु ते यत्र मन्वादिं तं विदुर्बुधाः ॥१३७॥ | ||
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| verse_lines = नारायणस्य नामानि सर्वाणि वचनानि तु | | verse_lines = नारायणस्य नामानि सर्वाणि वचनानि तु ।¦तत्सामर्थ्याभिधायीनि तमौपरिचरं विदुः ॥१३८॥ | ||
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| verse_lines = भक्तिर्ज्ञानं सवैराग्यं प्रज्ञा मेधा धृतिः स्थितिः | | verse_lines = भक्तिर्ज्ञानं सवैराग्यं प्रज्ञा मेधा धृतिः स्थितिः ।¦योगः प्राणो बलं चैव वृकोदर इति स्मृतः ॥१३७॥ | ||
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| verse_lines = एतद्दशात्मको वायुस्तस्माद् भीमस्तदात्मकः | | verse_lines = एतद्दशात्मको वायुस्तस्माद् भीमस्तदात्मकः ।¦सर्वविद्या द्रौपदी तु यस्मात् सैव सरस्वती ॥१३५॥ | ||
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| verse_lines = अज्ञानादिस्वरूपस्तु कलिर्दुर्योधनः स्मृतः | | verse_lines = अज्ञानादिस्वरूपस्तु कलिर्दुर्योधनः स्मृतः ।¦विपरीतं तु यज्ज्ञानं दुःशासन इतीरितः ॥१४१॥ | ||
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| verse_lines = नास्तिक्यं शकुनिर्नाम सर्वदोषात्मकाः परे | | verse_lines = नास्तिक्यं शकुनिर्नाम सर्वदोषात्मकाः परे ।¦धार्तराष्ट्रास्त्वहङ्कारो द्रौणी रुद्रात्मको यतः ॥१४२॥ | ||
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| verse_lines = द्रोणाद्या इन्द्रियाण्येव पापान्यन्ये तु सैनिकाः | | verse_lines = द्रोणाद्या इन्द्रियाण्येव पापान्यन्ये तु सैनिकाः ।¦पाण्डवेयाश्च पुण्यानि तेषां विष्णुर्नियोजकः ॥१४३॥ | ||
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| verse_lines = एवमध्यात्मनिष्ठं हि भारतं सर्वमुच्यते | | verse_lines = एवमध्यात्मनिष्ठं हि भारतं सर्वमुच्यते ।¦दुर्विज्ञेयमतः सर्वैर्भारतं तु सुरैरपि ॥१४४॥ | ||
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| verse_lines = स्वयं व्यासो हि तद् वेद ब्रह्मा वा तत्प्रसादतः | | verse_lines = स्वयं व्यासो हि तद् वेद ब्रह्मा वा तत्प्रसादतः ।¦तथाऽपि विष्णुपरता भारते सारसङ्ग्रहः’ ॥१४५॥ | ||
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| verse_lines = इत्यादिव्यासवाक्यैस्तु विष्णूत्कर्षोऽवगम्यते | | verse_lines = इत्यादिव्यासवाक्यैस्तु विष्णूत्कर्षोऽवगम्यते ।¦वाय्वादीनां क्रमश्चैव तद्वाक्यैरेव चिन्त्यते ॥१४६॥ | ||
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| verse_lines = ‘वायुर्हि ब्रह्मतामेति तस्माद् ब्रह्मैव स स्मृतः | | verse_lines = ‘वायुर्हि ब्रह्मतामेति तस्माद् ब्रह्मैव स स्मृतः ।¦न ब्रह्मसदृशः कश्चिच्छिवादिषु कथञ्चन’ ॥१४७॥ | ||
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| verse_lines = ‘ज्ञाने विरागे हरिभक्तिभावे धृतिस्थितिप्राणबलेषु योगे | | verse_lines = ‘ज्ञाने विरागे हरिभक्तिभावे धृतिस्थितिप्राणबलेषु योगे ।¦बुद्धौ च नान्यो हनुमत्समानः पुमान् कदाचित् क्व च कश्चनैव’ ॥१४८॥ | ||
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| verse_lines = ‘बळित्था तद् वपुषे धायि दर्शतं देवस्य भर्गः सहसो यतो जनि | | verse_lines = ‘बळित्था तद् वपुषे धायि दर्शतं देवस्य भर्गः सहसो यतो जनि ।¦यदीमुप ह्वरते साधते मतिर्ऋतस्य धेना अनयन्त सस्रुतः ॥१४९॥ | ||
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| verse_lines = पृक्षो वपुः पितुमान् नित्य आ शये द्वितीयमा सप्तशिवासु मातृषु | | verse_lines = पृक्षो वपुः पितुमान् नित्य आ शये द्वितीयमा सप्तशिवासु मातृषु ।¦तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः ॥१५०॥ | ||
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| verse_lines = निर्यदीं बुध्नान्महिषस्य वर्पस ईशानासः शवसा क्रन्त सूरयः | | verse_lines = निर्यदीं बुध्नान्महिषस्य वर्पस ईशानासः शवसा क्रन्त सूरयः ।¦यदीमनु प्रदिवो मध्व आधवे गुहा सन्तम् मातरिश्वा मथायति ॥१५१॥ | ||
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| verse_lines = प्र यत्पितुः परमान्नीयते पर्या पृक्षुधो वीरुधो दंसु रोहति | | verse_lines = प्र यत्पितुः परमान्नीयते पर्या पृक्षुधो वीरुधो दंसु रोहति ।¦उभा यदस्य जनुषं यदिन्वत आदिद् यविष्ठो अभवद् घृणा शुचिः ॥१५२॥ | ||
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| verse_lines = आदिन् मात्रॄराविशद्यास्वा शुचिरहिंस्यमान उर्विया वि वावृधे | | verse_lines = आदिन् मात्रॄराविशद्यास्वा शुचिरहिंस्यमान उर्विया वि वावृधे ।¦अनु यत्पूर्वा अरुहत् सनाजुवो नि नव्यसीष्ववरासु धावते’(ऋग्वेद १.१४१.१-५) ॥१५३॥ | ||
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| verse_lines = ‘अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिःश्रेष्ठो दिवाकरः | | verse_lines = ‘अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिःश्रेष्ठो दिवाकरः ।¦ब्राह्मणो द्विपदां श्रेष्ठो देवश्रेष्ठस्तु मारुतः’(म.भा.१.१२९.४६) ॥१५४॥ | ||
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| verse_lines = ‘वायुर्भीमो भीमनादो महौजाः सर्वेषां च प्राणिनां प्राणभूतः | | verse_lines = ‘वायुर्भीमो भीमनादो महौजाः सर्वेषां च प्राणिनां प्राणभूतः ।¦अनावृत्तिर्देहिनां देहपाते तस्माद् वायुर्देवदेवो विशिष्टः’(म.भा.१२.२६४.४१) ॥१५६॥ | ||
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| verse_lines = तथा युधिष्ठिरेणापि भीमं प्रति समीरितम् | | verse_lines = तथा युधिष्ठिरेणापि भीमं प्रति समीरितम् ।¦‘ धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चैव यशो ध्रुवम् ।¦त्वय्यायत्तमिदं सर्वं सर्वलोकस्य भारत’ ॥१५९॥ | ||
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| verse_lines = विराटपर्वगं चापि वचो दुर्योधनस्य हि | | verse_lines = विराटपर्वगं चापि वचो दुर्योधनस्य हि ।¦‘वीराणां शास्त्रविदुषां कृतिनां तत्त्वनिर्णये ।¦सत्त्वे बाहुबले धैर्ये प्राणे शारीरसम्भवे’(म.भा.४.३२.१६) ॥१६०॥ | ||
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| verse_lines = भीमश्च बलभद्रश्च मद्रराजश्च वीर्यवान् | | verse_lines = भीमश्च बलभद्रश्च मद्रराजश्च वीर्यवान् ।¦चतुर्थः कीचकस्तेषां पञ्चमं नानुशुश्रुमः ॥(म.भा.४.३२.१८)¦अन्योन्यानन्तरबलाः क्रमादेव प्रकीर्तिताः’(म.भा.४.३२.१९) ॥१६२॥ | ||
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| verse_lines = वचनं वासुदेवस्य तथोद्योगगतं परम् | | verse_lines = वचनं वासुदेवस्य तथोद्योगगतं परम् ।¦‘यत् किञ्चाऽऽत्मनि कल्याणं सम्भावयसि पाण्डव ।¦सहस्रगुणमप्येतत् त्वयि सम्भावयाम्यहम्(म.भा.५.७६.३) ॥१६३॥ | ||
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| verse_lines = यादृशे च कुले जातः सर्वराजाभिपूजिते | | verse_lines = यादृशे च कुले जातः सर्वराजाभिपूजिते ।¦यादृशानि च कर्माणि भीम त्वमसि तादृशः’(महा. ५.७६.४) ॥१६४॥ | ||
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| verse_text = ‘अस्मिन् युद्धे भीमसेन त्वयि भारः समाहितः । | | verse_text = ‘अस्मिन् युद्धे भीमसेन त्वयि भारः समाहितः । | ||
| verse_lines = ‘अस्मिन् युद्धे भीमसेन त्वयि भारः समाहितः | | verse_lines = ‘अस्मिन् युद्धे भीमसेन त्वयि भारः समाहितः ।¦धूरर्जुनेन वोढव्या वोढव्य इतरो जनः’ (महा. ५.७६.१८ )॥१६५॥ | ||
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| verse_text = उक्तं पुराणे ब्रह्माण्डे ब्रह्मणा नारदाय च । | | verse_text = उक्तं पुराणे ब्रह्माण्डे ब्रह्मणा नारदाय च । | ||
| verse_lines = उक्तं पुराणे ब्रह्माण्डे ब्रह्मणा नारदाय च | | verse_lines = उक्तं पुराणे ब्रह्माण्डे ब्रह्मणा नारदाय च ।¦‘यस्याः प्रसादात् परमं विदन्ति शेषः सुपर्णो गिरिशः सुरेन्द्रः ।¦माता च यैषां प्रथमैव भारती सा द्रौपदी नाम बभूव भूमौ ॥१६६॥ | ||
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| verse_text = या मारुताद् गर्भमधत्त पूर्वं शेषं सुपर्णं गिरीशं सुरेन्द्रम् । | | verse_text = या मारुताद् गर्भमधत्त पूर्वं शेषं सुपर्णं गिरीशं सुरेन्द्रम् । | ||
| verse_lines = या मारुताद् गर्भमधत्त पूर्वं शेषं सुपर्णं गिरीशं सुरेन्द्रम् | | verse_lines = या मारुताद् गर्भमधत्त पूर्वं शेषं सुपर्णं गिरीशं सुरेन्द्रम् ।¦चतुर्मुखाभांश्चतुरः कुमारान् सा द्रौपदी नाम बभूव भूमौ’ ॥१६७॥ | ||
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| verse_text = ‘यस्याधिको बले नास्ति भीमसेनमृते(भीममेकमृते) क्वचित् । | | verse_text = ‘यस्याधिको बले नास्ति भीमसेनमृते(भीममेकमृते) क्वचित् । | ||
| verse_lines = ‘यस्याधिको बले नास्ति भीमसेनमृते(भीममेकमृते) क्वचित् | | verse_lines = ‘यस्याधिको बले नास्ति भीमसेनमृते(भीममेकमृते) क्वचित् ।¦न विज्ञाने न च ज्ञान एष रामः स लाङ्गली’ ॥१६८॥ | ||
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| verse_text = ‘यस्य न प्रतियोद्धाऽस्ति भीमेमेकमृते क्वचित् । | | verse_text = ‘यस्य न प्रतियोद्धाऽस्ति भीमेमेकमृते क्वचित् । | ||
| verse_lines = ‘यस्य न प्रतियोद्धाऽस्ति भीमेमेकमृते क्वचित् | | verse_lines = ‘यस्य न प्रतियोद्धाऽस्ति भीमेमेकमृते क्वचित् ।¦अन्विष्यापि त्रिलोकेषु स एष मुसलायुधः’ ॥१६९॥ | ||
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| verse_text = तथा युधिष्ठिरेणैव भीमाय समुदीरितम् । | | verse_text = तथा युधिष्ठिरेणैव भीमाय समुदीरितम् । | ||
| verse_lines = तथा युधिष्ठिरेणैव भीमाय समुदीरितम् | | verse_lines = तथा युधिष्ठिरेणैव भीमाय समुदीरितम् ।¦‘अनुज्ञातो रौहिणेयात् त्वया चैवापराजित । सर्वविद्यासु बीभत्सुः कृष्णेन च महात्मना ॥१७०॥ | ||
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| verse_lines = अन्वेष रौहिणेयं च त्वां च भीमापराजितम् | | verse_lines = अन्वेष रौहिणेयं च त्वां च भीमापराजितम् ।¦वीर्ये शौर्येऽपि वा नान्यस्तृतीयः फल्गुनादृते’ ॥१७१॥ | ||
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| verse_lines = तथैव द्रौपदीवाक्यं वासुदेवं प्रतीरितम् | | verse_lines = तथैव द्रौपदीवाक्यं वासुदेवं प्रतीरितम् ।¦‘अधिज्यमपि यत् कर्तुं शक्यते नैव गाण्डिवम् ।¦अन्यत्र भीमपार्थाभ्यां भवतश्च जनार्दन’ ॥१७२॥ | ||
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| verse_lines = तथैवान्यत्र वचनं कृष्णद्वैपायनेरितम् | | verse_lines = तथैवान्यत्र वचनं कृष्णद्वैपायनेरितम् ।¦‘द्वावेव पुरुषौ लोके वासुदेवादनन्तरौ ।¦भीमस्तु प्रथमस्तत्र द्वितीयो द्रौणिरेव च ॥१६८॥ | ||
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| verse_text = अक्षयाविषुधी दिव्ये ध्वजो वानरलक्षणः । | | verse_text = अक्षयाविषुधी दिव्ये ध्वजो वानरलक्षणः । | ||
| verse_lines = अक्षयाविषुधी दिव्ये ध्वजो वानरलक्षणः | | verse_lines = अक्षयाविषुधी दिव्ये ध्वजो वानरलक्षणः ।¦गाण्डीवं धनुषां श्रेष्ठं तेन द्रौणेर्वरोऽर्जुनः’ ॥१७४॥ | ||
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| verse_text = इत्याद्यनन्तवाक्यानि सन्त्येवार्थे विवक्षिते । | | verse_text = इत्याद्यनन्तवाक्यानि सन्त्येवार्थे विवक्षिते । | ||
| verse_lines = इत्याद्यनन्तवाक्यानि सन्त्येवार्थे विवक्षिते | | verse_lines = इत्याद्यनन्तवाक्यानि सन्त्येवार्थे विवक्षिते ।¦कानिचिद् दर्शितान्यत्र दिङ्मात्रप्रतिपत्तये ॥१७५॥ | ||
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| verse_lines = तस्मादुक्तक्रमेणैव पुरुषोत्तमता हरेः | | verse_lines = तस्मादुक्तक्रमेणैव पुरुषोत्तमता हरेः ।¦अनौपचारिकी सिद्धा ब्रह्मता च विनिर्णयात् ॥१७६॥ | ||
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| verse_text = औं ॥ जयत्यजोऽखण्डगुणोरुमण्डलः सदोदितो ज्ञानमरीचिमाली । | | verse_text = औं ॥ जयत्यजोऽखण्डगुणोरुमण्डलः सदोदितो ज्ञानमरीचिमाली । | ||
| verse_lines = औं ॥ जयत्यजोऽखण्डगुणोरुमण्डलः सदोदितो ज्ञानमरीचिमाली | | verse_lines = औं ॥ जयत्यजोऽखण्डगुणोरुमण्डलः सदोदितो ज्ञानमरीचिमाली ।¦स्वभक्तहार्दोच्चतमोनिहन्ता व्यासावतारो हरिरात्मभास्करः ॥ १॥ | ||
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| verse_lines = जयत्यजोऽक्षीणसुखात्मबिम्बः स्वैश्वर्यकान्तिप्रततः सदोदितः | | verse_lines = जयत्यजोऽक्षीणसुखात्मबिम्बः स्वैश्वर्यकान्तिप्रततः सदोदितः ।¦स्वभक्तसन्तापदुरिष्टहन्ता रामावतारो हरिरीशचन्द्रमाः ॥ २॥ | ||
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| verse_lines = जयत्यसङ्ख्योरुबलाम्बुपूरो गुणोच्चरत्नाकर आत्मवैभवः | | verse_lines = जयत्यसङ्ख्योरुबलाम्बुपूरो गुणोच्चरत्नाकर आत्मवैभवः ।¦सदा सदात्मज्ञनदीभिराप्यः कृष्णावतारो हरिरेकसागरः ॥ ३॥ | ||
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| verse_lines = ‘नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् | | verse_lines = ‘नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।¦देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरये’ ॥ ४॥ | ||
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| verse_lines = जयो नामेतिहासोऽयं कृष्णद्वैपायनेरितः | | verse_lines = जयो नामेतिहासोऽयं कृष्णद्वैपायनेरितः ।¦वायुर्नरोत्तमो नाम देवीति श्रीरुदीरिता ॥ ५॥ | ||
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| verse_lines = नारायणो व्यास इति वाच्यवक्तृस्वरूपकः | | verse_lines = नारायणो व्यास इति वाच्यवक्तृस्वरूपकः ।¦एकः स भगवानुक्तः साधकेशो नरोत्तमः ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = उपसाधको नरश्चोक्तो देवी भाग्यात्मिका नृणाम् । | | verse_text = उपसाधको नरश्चोक्तो देवी भाग्यात्मिका नृणाम् । | ||
| verse_lines = उपसाधको नरश्चोक्तो देवी भाग्यात्मिका नृणाम् | | verse_lines = उपसाधको नरश्चोक्तो देवी भाग्यात्मिका नृणाम् ।¦सरस्वती वाक्यरूपा तस्मान्नम्या हि तेऽखिलाः ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = सर्वस्य निर्णयसुवाक्यसमुद्धृती तु स्वाध्याययोर्हरिपदस्मरणेन कृत्वा । | | verse_text = सर्वस्य निर्णयसुवाक्यसमुद्धृती तु स्वाध्याययोर्हरिपदस्मरणेन कृत्वा । | ||
| verse_lines = सर्वस्य निर्णयसुवाक्यसमुद्धृती तु स्वाध्याययोर्हरिपदस्मरणेन कृत्वा | | verse_lines = सर्वस्य निर्णयसुवाक्यसमुद्धृती तु स्वाध्याययोर्हरिपदस्मरणेन कृत्वा ।¦आनन्दतीर्थवरनामवती तृतीया (भौ) भैमी तनुर्मरुत आह कथाः परस्य ॥ ९॥ | ||
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| verse_lines = व्यूढश्चतुर्धा भगवान् स एको मायां श्रियं सृष्टिविधित्सयाऽऽर | | verse_lines = व्यूढश्चतुर्धा भगवान् स एको मायां श्रियं सृष्टिविधित्सयाऽऽर ।¦रूपेण पूर्वेण स वासुदेवनाम्ना विरिञ्चं सुषुवे च साऽतः ॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = सङ्कर्षणाच्चापि जयातनूजो बभूव साक्षाद्बलसंविदात्मा | | verse_lines = सङ्कर्षणाच्चापि जयातनूजो बभूव साक्षाद्बलसंविदात्मा ।¦वायुर्य एवाथ विरिञ्चनामा भविष्य आद्यो न परस्ततो हि ॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = सूत्रं स वायुः पुरुषो विरिञ्चः प्रद्युम्नतश्चाथ कृतौ स्त्रियौ द्वे | | verse_lines = सूत्रं स वायुः पुरुषो विरिञ्चः प्रद्युम्नतश्चाथ कृतौ स्त्रियौ द्वे ।¦प्रजज्ञतुर्यमळे तत्र पूर्वा प्रधानसञ्ज्ञा प्रकृतिर्जनित्री ॥ १२॥ | ||
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| verse_lines = श्रद्धा द्वितीयाऽथ तयोश्च योगो बभूव पुंसैव च सूत्रनाम्ना | | verse_lines = श्रद्धा द्वितीयाऽथ तयोश्च योगो बभूव पुंसैव च सूत्रनाम्ना ।¦हरेर्नियोगादथ सम्प्रसूतौ शेषः सुपर्णश्च तयोः सहैव ॥ १३॥ | ||
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| verse_lines = शेषस्तयोरेव हि जीवनामा कालात्मकः सोऽथ सुपर्ण आसीत् | | verse_lines = शेषस्तयोरेव हि जीवनामा कालात्मकः सोऽथ सुपर्ण आसीत् ।¦तौ वाहनं शयनं चैव विष्णोः काला जयाद्याश्च तत प्रसूताः ॥ १४॥ | ||
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| verse_lines = काला जयाद्या अपि विष्णुपार्षदा यस्मादण्डात् परतः सम्प्रसूताः | | verse_lines = काला जयाद्या अपि विष्णुपार्षदा यस्मादण्डात् परतः सम्प्रसूताः ।¦नीचाः सुरेभ्यस्तत एव तेऽखिला विष्वक्सेनो वायुजः खेन तुल्यः ॥ १५॥ | ||
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| verse_lines = ततो महत्तत्त्वतनुर्विरिञ्चः स्थूलात्मनैवाजनि वाक् च देवी | | verse_lines = ततो महत्तत्त्वतनुर्विरिञ्चः स्थूलात्मनैवाजनि वाक् च देवी ।¦तस्यामहङ्कारतनुं स रुद्रं ससर्ज बुद्धिं च तदर्द्धदेहाम् ॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = पुनश्च माया त्रिविधा बभूव सत्त्वादिरूपैरथ वासुदेवात् | | verse_lines = पुनश्च माया त्रिविधा बभूव सत्त्वादिरूपैरथ वासुदेवात् ।¦सत्त्वात्मिकायां स बभूव तस्मात् स विष्णुनामैव निरन्तरोऽपि ।¦रजस्तनौ चैव विरिञ्च आसीत् तमस्तनौ शर्व इति त्रयोऽस्मात् ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = तस्मात् पुनः सर्वसुराः प्रसूतास्ते जायमाना अपि निर्णयाय । | | verse_text = तस्मात् पुनः सर्वसुराः प्रसूतास्ते जायमाना अपि निर्णयाय । | ||
| verse_lines = तस्मात् पुनः सर्वसुराः प्रसूतास्ते जायमाना अपि निर्णयाय | | verse_lines = तस्मात् पुनः सर्वसुराः प्रसूतास्ते जायमाना अपि निर्णयाय ।¦निस्सृत्य कायादुत पद्मयोनेः सम्प्राविशन् क्रमशो मारुतान्ताः ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = पपात वायोर्गमनाच्छरीरं तस्यैव चावेशत उत्थितं पुनः । | | verse_text = पपात वायोर्गमनाच्छरीरं तस्यैव चावेशत उत्थितं पुनः । | ||
| verse_lines = पपात वायोर्गमनाच्छरीरं तस्यैव चावेशत उत्थितं पुनः | | verse_lines = पपात वायोर्गमनाच्छरीरं तस्यैव चावेशत उत्थितं पुनः ।¦तस्मात् स एको विबुधप्रधान इत्याश्रिता देवगणास्तमेव । ॥ २५॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = हरेर्विरिञ्चस्य च मध्यसंस्थितेस्तदन्यदेवाधिपतिः स मारुतः । | | verse_text = हरेर्विरिञ्चस्य च मध्यसंस्थितेस्तदन्यदेवाधिपतिः स मारुतः । | ||
| verse_lines = हरेर्विरिञ्चस्य च मध्यसंस्थितेस्तदन्यदेवाधिपतिः स मारुतः | | verse_lines = हरेर्विरिञ्चस्य च मध्यसंस्थितेस्तदन्यदेवाधिपतिः स मारुतः ।¦ततो विरिञ्चो भुवनानि सप्त ससप्तकान्याशु चकार सोऽब्जात् ॥ २६॥ | ||
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| verse_text = अग्रे शिवोऽहं भव एव बुद्धेरुमा मनोजौ सह शक्रकामौ । | | verse_text = अग्रे शिवोऽहं भव एव बुद्धेरुमा मनोजौ सह शक्रकामौ । | ||
| verse_lines = अग्रे शिवोऽहं भव एव बुद्धेरुमा मनोजौ सह शक्रकामौ | | verse_lines = अग्रे शिवोऽहं भव एव बुद्धेरुमा मनोजौ सह शक्रकामौ ।¦गुरुर्मनुर्दक्ष उतानिरुद्धः सहैव (पश्चान्) शच्या मनसः प्रसूताः ॥ २८ ॥ | ||
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| verse_text = चक्षुःश्रुतिभ्यां स्पर्शात्सहैव रविः शशी धर्म इमे प्रसूताः । | | verse_text = चक्षुःश्रुतिभ्यां स्पर्शात्सहैव रविः शशी धर्म इमे प्रसूताः । | ||
| verse_lines = चक्षुःश्रुतिभ्यां स्पर्शात्सहैव रविः शशी धर्म इमे प्रसूताः | | verse_lines = चक्षुःश्रुतिभ्यां स्पर्शात्सहैव रविः शशी धर्म इमे प्रसूताः ।¦जिह्वाभवो वारिपतिर्नसोश्च नासत्यदस्रौ क्रमशः प्रसूताः ।¦ततः सनाद्याश्च मरीचिमुख्या देवाश्च सर्वे क्रमशः प्रसूताः ॥ २९ ॥ | ||
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| verse_text = उक्तक्रमात् पूर्वभवस्तु यो यः श्रेष्ठः स स ह्यासुरकानृते च । | | verse_text = उक्तक्रमात् पूर्वभवस्तु यो यः श्रेष्ठः स स ह्यासुरकानृते च । | ||
| verse_lines = उक्तक्रमात् पूर्वभवस्तु यो यः श्रेष्ठः स स ह्यासुरकानृते च | | verse_lines = उक्तक्रमात् पूर्वभवस्तु यो यः श्रेष्ठः स स ह्यासुरकानृते च ।¦पूर्वश्च (पूर्वस्तु) पश्चात् पुनरेव जातो नाश्रेष्ठतामेति कथञ्चिदस्य ।¦गुणास्तु कालात् पितृमातृदोषात् स्वकर्मतो वाऽभिभवं प्रयान्ति ॥ ३१॥ | ||
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| verse_text = लयो भवेद् व्युत्क्रमतो हि तेषां ततो हरिः प्रलये श्रीसहायः । | | verse_text = लयो भवेद् व्युत्क्रमतो हि तेषां ततो हरिः प्रलये श्रीसहायः । | ||
| verse_lines = लयो भवेद् व्युत्क्रमतो हि तेषां ततो हरिः प्रलये श्रीसहायः | | verse_lines = लयो भवेद् व्युत्क्रमतो हि तेषां ततो हरिः प्रलये श्रीसहायः ।¦शेते निजानन्दममन्दसान्द्रसन्दोहमेकोऽनुभवन्ननन्तः ॥ ३२॥ | ||
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| verse_text = अनन्तशीर्षास्यकरोरुपादः सोऽनन्तमूर्तिः स्वगुणाननन्तान् । | | verse_text = अनन्तशीर्षास्यकरोरुपादः सोऽनन्तमूर्तिः स्वगुणाननन्तान् । | ||
| verse_lines = अनन्तशीर्षास्यकरोरुपादः सोऽनन्तमूर्तिः स्वगुणाननन्तान् | | verse_lines = अनन्तशीर्षास्यकरोरुपादः सोऽनन्तमूर्तिः स्वगुणाननन्तान् ।¦अनन्तशक्तिः परिपूर्णभोगो भुञ्जन्नजस्रं निजरूप आस्ते ॥ ३३॥ | ||
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| verse_text = एवं पुनः सृजते सर्वमेतदनाद्यनन्तो हि जगत्प्रवाहः । | | verse_text = एवं पुनः सृजते सर्वमेतदनाद्यनन्तो हि जगत्प्रवाहः । | ||
| verse_lines = एवं पुनः सृजते सर्वमेतदनाद्यनन्तो हि जगत्प्रवाहः | | verse_lines = एवं पुनः सृजते सर्वमेतदनाद्यनन्तो हि जगत्प्रवाहः ।¦नित्या हि (श्च) जीवाः प्रकृतिश्च नित्या कालश्च नित्यः किमु देवदेवः ॥ ३४॥ | ||
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| verse_text = यथा समुद्रात् सरितः प्रजाताः पुनस्तमेव प्रविशन्ति शश्वत् । | | verse_text = यथा समुद्रात् सरितः प्रजाताः पुनस्तमेव प्रविशन्ति शश्वत् । | ||
| verse_lines = यथा समुद्रात् सरितः प्रजाताः पुनस्तमेव प्रविशन्ति शश्वत् | | verse_lines = यथा समुद्रात् सरितः प्रजाताः पुनस्तमेव प्रविशन्ति शश्वत् ।¦एवं हरेर्नित्यजगत्प्रवाहस्तमेव चासौ प्रविशत्यजस्रम् ॥ ३५॥ | ||
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| verse_text = एवं विदुर्ये परमामनन्तामजस्य शक्तिं पुरुषोत्तमस्य । | | verse_text = एवं विदुर्ये परमामनन्तामजस्य शक्तिं पुरुषोत्तमस्य । | ||
| verse_lines = एवं विदुर्ये परमामनन्तामजस्य शक्तिं पुरुषोत्तमस्य | | verse_lines = एवं विदुर्ये परमामनन्तामजस्य शक्तिं पुरुषोत्तमस्य ।¦तस्य प्रसादादथ दग्धदोषास्तमाप्नुवन्त्याशु परं सुरेशम् ॥ ३६॥ | ||
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| verse_text = देवानिमान् मुक्तसमस्तदोषान् स्वसन्निधाने विनिवेश्य देवः । | | verse_text = देवानिमान् मुक्तसमस्तदोषान् स्वसन्निधाने विनिवेश्य देवः । | ||
| verse_lines = देवानिमान् मुक्तसमस्तदोषान् स्वसन्निधाने विनिवेश्य देवः | | verse_lines = देवानिमान् मुक्तसमस्तदोषान् स्वसन्निधाने विनिवेश्य देवः ।¦पुनस्तदन्यानधिकारयोग्यांस्तत्तद्गणानेव पदे नियुङ्क्ते ॥ ३७॥ | ||
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| verse_text = पुनश्च मारीचत एव देवाः जाता आदित्यामसुराश्च दित्याम् । | | verse_text = पुनश्च मारीचत एव देवाः जाता आदित्यामसुराश्च दित्याम् । | ||
| verse_lines = पुनश्च मारीचत एव देवाः जाता आदित्यामसुराश्च दित्याम् | | verse_lines = पुनश्च मारीचत एव देवाः जाता आदित्यामसुराश्च दित्याम् ।¦गावो मृगाः पक्ष्युरगादिसत्त्वा दाक्षायणीष्वेव समस्तशोऽपि ॥ ३८॥ | ||
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| verse_text = ततः स मग्नामलयो लयोदधौ महीं विलोक्याशु हरिर्वराहः । | | verse_text = ततः स मग्नामलयो लयोदधौ महीं विलोक्याशु हरिर्वराहः । | ||
| verse_lines = ततः स मग्नामलयो लयोदधौ महीं विलोक्याशु हरिर्वराहः | | verse_lines = ततः स मग्नामलयो लयोदधौ महीं विलोक्याशु हरिर्वराहः ।¦भूत्वा विरिञ्चार्थमिमां सशैलामुद्धृत्य वारामुपरि न्यधात् स्थिरम् ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = अथाब्जनाभप्रतिहारपालौ शापात् त्रिशो भूमितले प्रजातौ । | | verse_text = अथाब्जनाभप्रतिहारपालौ शापात् त्रिशो भूमितले प्रजातौ । | ||
| verse_lines = अथाब्जनाभप्रतिहारपालौ शापात् त्रिशो भूमितले प्रजातौ | | verse_lines = अथाब्जनाभप्रतिहारपालौ शापात् त्रिशो भूमितले प्रजातौ ।¦दित्यां हिरण्यावथ राक्षसौ च पैतृष्वसेयौ च हरेः परस्तात् ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = (हतो) ततो हिरण्याक्ष उदारविक्रमो दितेः सुतो योऽवरजः सुरार्थे । | | verse_text = (हतो) ततो हिरण्याक्ष उदारविक्रमो दितेः सुतो योऽवरजः सुरार्थे । | ||
| verse_lines = (हतो) ततो हिरण्याक्ष उदारविक्रमो दितेः सुतो योऽवरजः सुरार्थे | | verse_lines = (हतो) ततो हिरण्याक्ष उदारविक्रमो दितेः सुतो योऽवरजः सुरार्थे ।¦धात्रार्थितेनैव वराहरूपिणा धरोद्धृतौ पूर्वहतोऽब्जजोद्भवः ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = अथो विधातुर्मुखतो विनिःसृतान् वेदान् हयास्यो जगृहेऽसुरेन्द्रः । | | verse_text = अथो विधातुर्मुखतो विनिःसृतान् वेदान् हयास्यो जगृहेऽसुरेन्द्रः । | ||
| verse_lines = अथो विधातुर्मुखतो विनिःसृतान् वेदान् हयास्यो जगृहेऽसुरेन्द्रः | | verse_lines = अथो विधातुर्मुखतो विनिःसृतान् वेदान् हयास्यो जगृहेऽसुरेन्द्रः ।¦निहत्य तं मत्स्यवपुर्जुगोप मनुं मुनींस्तांश्च ददौ विधातुः ॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = मन्वन्तरप्रलये मत्स्यरूपो विद्यामदान्मनवे देवदेवः । | | verse_text = मन्वन्तरप्रलये मत्स्यरूपो विद्यामदान्मनवे देवदेवः । | ||
| verse_lines = मन्वन्तरप्रलये मत्स्यरूपो विद्यामदान्मनवे देवदेवः | | verse_lines = मन्वन्तरप्रलये मत्स्यरूपो विद्यामदान्मनवे देवदेवः ।¦वैवस्वतायोत्तमसंविदात्मा विष्णोः स्वरूपप्रतिपत्तिरूपाम् ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = अथो दितेर्ज्येष्ठसुतेन शश्वत् प्रपीडिता ब्रह्मवरात् सुरेशाः । | | verse_text = अथो दितेर्ज्येष्ठसुतेन शश्वत् प्रपीडिता ब्रह्मवरात् सुरेशाः । | ||
| verse_lines = अथो दितेर्ज्येष्ठसुतेन शश्वत् प्रपीडिता ब्रह्मवरात् सुरेशाः | | verse_lines = अथो दितेर्ज्येष्ठसुतेन शश्वत् प्रपीडिता ब्रह्मवरात् सुरेशाः ।¦हरिं विरिञ्चेन सहोपजग्मुर्दौरात्म्यमस्यापि शशंसुरस्मै ॥ ४४॥ | ||
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| verse_lines = अभिष्टुतस्तैर्हरिरुग्रवीर्यो नृसिंहरूपेण स आविरासीत् | | verse_lines = अभिष्टुतस्तैर्हरिरुग्रवीर्यो नृसिंहरूपेण स आविरासीत् ।¦हत्वा हिरण्यं च सुताय तस्य दत्वाऽभयं देवगणानतोषयत् ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = सुरासुराणामुदधिं विमथ्नतां दधार पृष्ठेन गिरिं स मन्दरम् । | | verse_text = सुरासुराणामुदधिं विमथ्नतां दधार पृष्ठेन गिरिं स मन्दरम् । | ||
| verse_lines = सुरासुराणामुदधिं विमथ्नतां दधार पृष्ठेन गिरिं स मन्दरम् | | verse_lines = सुरासुराणामुदधिं विमथ्नतां दधार पृष्ठेन गिरिं स मन्दरम् ।¦वरप्रदानादपरैरधार्यं हरस्य कूर्मो बृहदण्डवोढा ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = वरादजेयत्वमवाप दैत्यराट् चतुर्मुखस्यैव बलिर्यदा तदा । | | verse_text = वरादजेयत्वमवाप दैत्यराट् चतुर्मुखस्यैव बलिर्यदा तदा । | ||
| verse_lines = वरादजेयत्वमवाप दैत्यराट् चतुर्मुखस्यैव बलिर्यदा तदा | | verse_lines = वरादजेयत्वमवाप दैत्यराट् चतुर्मुखस्यैव बलिर्यदा तदा ।¦अजायतेन्द्रावरजोऽदितेः सुतो महानजोऽप्यब्जभवादिसंस्तुतः ॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = ‘स वामनात्माऽसुरभूभृतोऽध्वरं जगाम गां सन्नमयन् पदे पदे । | | verse_text = ‘स वामनात्माऽसुरभूभृतोऽध्वरं जगाम गां सन्नमयन् पदे पदे । | ||
| verse_lines = ‘स वामनात्माऽसुरभूभृतोऽध्वरं जगाम गां सन्नमयन् पदे पदे | | verse_lines = ‘स वामनात्माऽसुरभूभृतोऽध्वरं जगाम गां सन्नमयन् पदे पदे ।¦जहार चास्माच्छलतस्त्रिविष्टपं त्रिभिः क्रमैस्तच्च ददौ निजाग्रजे’ ॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = पितामहेनास्य पुरा हि (भि) याचितो बलेः कृते केशव आह यद्वचः । | | verse_text = पितामहेनास्य पुरा हि (भि) याचितो बलेः कृते केशव आह यद्वचः । | ||
| verse_lines = पितामहेनास्य पुरा हि (भि) याचितो बलेः कृते केशव आह यद्वचः | | verse_lines = पितामहेनास्य पुरा हि (भि) याचितो बलेः कृते केशव आह यद्वचः ।¦नायाञ्चयाऽहं प्रतिहन्मि तं बलिं शुभाननेत्येव ततोऽभ्ययाचत ॥ ४९॥ | ||
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| verse_lines = बभूविरे चन्द्रललामतो वरात् पुरा ह्यजेया असुरा धरातले | | verse_lines = बभूविरे चन्द्रललामतो वरात् पुरा ह्यजेया असुरा धरातले ।¦तैरर्दिता वासवनायकाः सुराः पुरो निधायाब्जजमस्तुवन् हरिम् ॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = विरिञ्चसृष्टैर्नितरामवध्यौ वराद् विधातुर्दितिजौ हिरण्यकौ | | verse_lines = विरिञ्चसृष्टैर्नितरामवध्यौ वराद् विधातुर्दितिजौ हिरण्यकौ ।¦तथा हयग्रीव उदारविक्रमस्त्वया हता ब्रह्मपुरातनेन ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = स चासुरान् रुद्रवरादवध्यानिमान् समस्तैरपि देवदेव | | verse_lines = स चासुरान् रुद्रवरादवध्यानिमान् समस्तैरपि देवदेव ।¦निःसीमशक्त्यैव निहत्य सर्वान् हृदम्बुजे नो निवसाथ शश्वत् ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = इत्यादरोक्तस्त्रिदशैरजेयः स शार्ङ्गधन्वाऽथ भृगूद्वहोऽभूत् | | verse_lines = इत्यादरोक्तस्त्रिदशैरजेयः स शार्ङ्गधन्वाऽथ भृगूद्वहोऽभूत् ।¦रामो निहत्यासुरपूगमुग्रं (न) ह्रदाननादिर्विदधेऽसृजैव ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = ततः पुलस्त्यस्य कुले प्रसूतौ तावादिदैत्यौ जगदेकशत्रू | | verse_lines = ततः पुलस्त्यस्य कुले प्रसूतौ तावादिदैत्यौ जगदेकशत्रू ।¦परैरवध्यौ वरतः पुरा हरेः सुरैरजेयौ च वराद्विधातुः ॥ ५४॥ | ||
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| verse_lines = सर्वैरजेयः स च कुम्भकर्णः पुरातने जन्मनि धातुरेव | | verse_lines = सर्वैरजेयः स च कुम्भकर्णः पुरातने जन्मनि धातुरेव ।¦वरान्नरादीनृत एव रावणस्तदातनात्तौ त्रिदशानबाधताम् ॥ ५५॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = त्वया पुरा कर्णपुटाद्विनिर्मितौ महासुरौ तौ मधुकैटभाख्यौ । | | verse_text = त्वया पुरा कर्णपुटाद्विनिर्मितौ महासुरौ तौ मधुकैटभाख्यौ । | ||
| verse_lines = त्वया पुरा कर्णपुटाद्विनिर्मितौ महासुरौ तौ मधुकैटभाख्यौ | | verse_lines = त्वया पुरा कर्णपुटाद्विनिर्मितौ महासुरौ तौ मधुकैटभाख्यौ ।¦प्रभञ्जनावेशवशात् (तवाऽज्ञया) त्वदाज्ञया बलोद्धतावाशु जलेऽभ्यवर्धताम् (व्यवर्धताम्)॥ ६०॥ | ||
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| verse_text = त्वदाज्ञया ब्रह्मवरादवध्यौ चिक्रीडिषासम्भवया (मुखोद्गतान्) मुखोद्गतौ । | | verse_text = त्वदाज्ञया ब्रह्मवरादवध्यौ चिक्रीडिषासम्भवया (मुखोद्गतान्) मुखोद्गतौ । | ||
| verse_lines = त्वदाज्ञया ब्रह्मवरादवध्यौ चिक्रीडिषासम्भवया (मुखोद्गतान्) मुखोद्गतौ | | verse_lines = त्वदाज्ञया ब्रह्मवरादवध्यौ चिक्रीडिषासम्भवया (मुखोद्गतान्) मुखोद्गतौ ।¦स्वयम्भुवो वेदगणानहार्षतां तदाऽभवस्त्वं हयशीर्ष ईश्वरः ॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = आहृत्य वेदानखिलान् प्रदाय स्वयम्भुवे तौ च जघन्थ दस्यू । | | verse_text = आहृत्य वेदानखिलान् प्रदाय स्वयम्भुवे तौ च जघन्थ दस्यू । | ||
| verse_lines = आहृत्य वेदानखिलान् प्रदाय स्वयम्भुवे तौ च जघन्थ दस्यू | | verse_lines = आहृत्य वेदानखिलान् प्रदाय स्वयम्भुवे तौ च जघन्थ दस्यू ।¦निष्पीड्य तावूरुतळे कराभ्यां तन्मेदसैवाऽशु चकर्थ मेदिनीम् ॥ ६२॥ | ||
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| verse_text = एवं सुराणां च निसर्गजं बलं तथाऽसुराणां वरदानसम्भवम् । | | verse_text = एवं सुराणां च निसर्गजं बलं तथाऽसुराणां वरदानसम्भवम् । | ||
| verse_lines = एवं सुराणां च निसर्गजं बलं तथाऽसुराणां वरदानसम्भवम् | | verse_lines = एवं सुराणां च निसर्गजं बलं तथाऽसुराणां वरदानसम्भवम् ।¦वशे तवैतद्द्वयमप्यतो वयं निवेदयामः पितुरेव तेऽखिलम् ॥ ६३॥ | ||
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| verse_text = इमौ च रक्षोऽधिपती विरोद्धतौ जहि स्ववीर्येण नृषु प्रभूतः । | | verse_text = इमौ च रक्षोऽधिपती विरोद्धतौ जहि स्ववीर्येण नृषु प्रभूतः । | ||
| verse_lines = इमौ च रक्षोऽधिपती विरोद्धतौ जहि स्ववीर्येण नृषु प्रभूतः | | verse_lines = इमौ च रक्षोऽधिपती विरोद्धतौ जहि स्ववीर्येण नृषु प्रभूतः ।¦इतीरिते तैरखिलैः सुरेश्वरैर्बभूव रामो जगतीपतिः प्रभुः ॥ ६४॥ | ||
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| verse_text = स कश्यपस्यादितिगर्भजन्मनो विवस्वतस्तन्तुभवस्य भूभृतः । | | verse_text = स कश्यपस्यादितिगर्भजन्मनो विवस्वतस्तन्तुभवस्य भूभृतः । | ||
| verse_lines = स कश्यपस्यादितिगर्भजन्मनो विवस्वतस्तन्तुभवस्य भूभृतः | | verse_lines = स कश्यपस्यादितिगर्भजन्मनो विवस्वतस्तन्तुभवस्य भूभृतः ।¦गृहे दशस्यन्दननामिनोऽभूत् कौसल्यकानाम्नि तदर्थिनेष्टः ॥ ६५ ॥ | ||
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| verse_text = तदाज्ञया देवगणा बभूविरे पुरैव पश्चादपि तस्य भूम्नः । | | verse_text = तदाज्ञया देवगणा बभूविरे पुरैव पश्चादपि तस्य भूम्नः । | ||
| verse_lines = तदाज्ञया देवगणा बभूविरे पुरैव पश्चादपि तस्य भूम्नः | | verse_lines = तदाज्ञया देवगणा बभूविरे पुरैव पश्चादपि तस्य भूम्नः ।¦निषेवणायोरुगुणस्य वानरेष्वथो नरेष्वेव च पश्चिमोद्भवाः ॥ ६६ ॥ | ||
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| verse_text = स देवतानां प्रथमो गुणाधिको बभूव नाम्ना हनुमान् प्रभञ्जनः । | | verse_text = स देवतानां प्रथमो गुणाधिको बभूव नाम्ना हनुमान् प्रभञ्जनः । | ||
| verse_lines = स देवतानां प्रथमो गुणाधिको बभूव नाम्ना हनुमान् प्रभञ्जनः | | verse_lines = स देवतानां प्रथमो गुणाधिको बभूव नाम्ना हनुमान् प्रभञ्जनः ।¦स्वसम्भवः केसरिणो गृहे प्रभुर्बभूव वाली स्वत एव वासवः ॥ ६७॥ | ||
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| verse_text = सुग्रीव आसीत् परमेष्ठितेजसा युतो रविः स्वात्मत एव जाम्बवान् । | | verse_text = सुग्रीव आसीत् परमेष्ठितेजसा युतो रविः स्वात्मत एव जाम्बवान् । | ||
| verse_lines = सुग्रीव आसीत् परमेष्ठितेजसा युतो रविः स्वात्मत एव जाम्बवान् | | verse_lines = सुग्रीव आसीत् परमेष्ठितेजसा युतो रविः स्वात्मत एव जाम्बवान् ।¦य एव पूर्वं परमेष्ठिवक्षसस्त्वगुद्भवो धर्म इहाऽस्यतोऽभवत् ॥ ६८॥ | ||
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| verse_text = य एव सूर्यात् पुनरेव संज्ञया नाम्ना यमो दक्षिणदिक्प आसीत् । | | verse_text = य एव सूर्यात् पुनरेव संज्ञया नाम्ना यमो दक्षिणदिक्प आसीत् । | ||
| verse_lines = य एव सूर्यात् पुनरेव संज्ञया नाम्ना यमो दक्षिणदिक्प आसीत् | | verse_lines = य एव सूर्यात् पुनरेव संज्ञया नाम्ना यमो दक्षिणदिक्प आसीत् ।¦स जाम्बवान् दैवतकार्यदर्शिना पुरैव सृष्टो मुखतः स्वयम्भुवा ॥ ६९॥ | ||
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| verse_text = ब्रह्मोद्भवः सोम उतास्य सूनोरत्रेरभूत् सोऽङ्गद एव जातः । | | verse_text = ब्रह्मोद्भवः सोम उतास्य सूनोरत्रेरभूत् सोऽङ्गद एव जातः । | ||
| verse_lines = ब्रह्मोद्भवः सोम उतास्य सूनोरत्रेरभूत् सोऽङ्गद एव जातः | | verse_lines = ब्रह्मोद्भवः सोम उतास्य सूनोरत्रेरभूत् सोऽङ्गद एव जातः ।¦बृहस्पतिस्तार उतो शची च शक्रस्य भार्यैव बभूव तारा ॥ ७०॥ | ||
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| verse_lines = बृहस्पतिर्ब्रह्मसुतोऽपि पूर्वं सहैव शच्या मनसोऽभिजातः | | verse_lines = बृहस्पतिर्ब्रह्मसुतोऽपि पूर्वं सहैव शच्या मनसोऽभिजातः ।¦ब्रह्मोद्भवस्याङ्गिरसः सुतोऽभून्मारीचजस्यैव शची पुलोम्नः ॥ ७१॥ | ||
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| verse_text = स एव शच्या सह वानरोऽभूत् स्वयम्भुवो देवगुरुर्बृहस्पतिः । | | verse_text = स एव शच्या सह वानरोऽभूत् स्वयम्भुवो देवगुरुर्बृहस्पतिः । | ||
| verse_lines = स एव शच्या सह वानरोऽभूत् स्वयम्भुवो देवगुरुर्बृहस्पतिः | | verse_lines = स एव शच्या सह वानरोऽभूत् स्वयम्भुवो देवगुरुर्बृहस्पतिः ।¦अभूत् सुषेणो वरुणोऽश्विनौ च बभूवतुस्तौ विविदश्च मैन्दः ॥ ७२॥ | ||
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| verse_text = ब्रह्मोद्भवौ तौ पुनरेव सूर्याद् बभूवतुस्तत्र कनीयसस्तु । | | verse_text = ब्रह्मोद्भवौ तौ पुनरेव सूर्याद् बभूवतुस्तत्र कनीयसस्तु । | ||
| verse_lines = ब्रह्मोद्भवौ तौ पुनरेव सूर्याद् बभूवतुस्तत्र कनीयसस्तु | | verse_lines = ब्रह्मोद्भवौ तौ पुनरेव सूर्याद् बभूवतुस्तत्र कनीयसस्तु ।¦आवेश ऐन्द्रो वरदानतोऽभूत् ततो बलीयान् विविदो हि मैन्दात् ॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = नीलोऽग्निरासीत् कमलोद्भवोत्थः कामः पुनः श्रीरमणाद् रमायाम् । | | verse_text = नीलोऽग्निरासीत् कमलोद्भवोत्थः कामः पुनः श्रीरमणाद् रमायाम् । | ||
| verse_lines = नीलोऽग्निरासीत् कमलोद्भवोत्थः कामः पुनः श्रीरमणाद् रमायाम् | | verse_lines = नीलोऽग्निरासीत् कमलोद्भवोत्थः कामः पुनः श्रीरमणाद् रमायाम् ।¦प्रद्युम्ननामाऽभवदेवमीशात् स स्कन्दतामाप स चक्रतां च ॥ ७४॥ | ||
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| verse_text = पूर्वं हरेश्चक्रमभूद्धि दुर्गा तमःस्थिता श्रीरिति यां वदन्ति । | | verse_text = पूर्वं हरेश्चक्रमभूद्धि दुर्गा तमःस्थिता श्रीरिति यां वदन्ति । | ||
| verse_lines = पूर्वं हरेश्चक्रमभूद्धि दुर्गा तमःस्थिता श्रीरिति यां वदन्ति | | verse_lines = पूर्वं हरेश्चक्रमभूद्धि दुर्गा तमःस्थिता श्रीरिति यां वदन्ति ।¦सत्त्वात्मिका शङ्खमथो रजस्था भूर्नामिका पद्ममभूद्धरेर्हि ॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा शार्ङ्गं च विद्येति रमैव खड्गः । | | verse_text = गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा शार्ङ्गं च विद्येति रमैव खड्गः । | ||
| verse_lines = गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा शार्ङ्गं च विद्येति रमैव खड्गः | | verse_lines = गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा शार्ङ्गं च विद्येति रमैव खड्गः ।¦दुर्गात्मिका सैव च चर्मनाम्नी पञ्चात्मको मारुत एव बाणाः ॥ ७६॥ | ||
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| verse_lines = एवं स्थितेष्वेव पुरातनेषु वराद् रथाङ्गत्वमवाप कामः | | verse_lines = एवं स्थितेष्वेव पुरातनेषु वराद् रथाङ्गत्वमवाप कामः ।¦तत्सूनुतामाप च सोऽनिरुद्धो ब्रह्मोद्भवः शङ्खतनुः पुमात्मा ॥ ७७॥ | ||
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| verse_lines = तावेव जातौ भरतश्च नाम्ना शत्रुघ्न इत्येष च रामतोऽनु | | verse_lines = तावेव जातौ भरतश्च नाम्ना शत्रुघ्न इत्येष च रामतोऽनु ।¦पूर्वं सुमित्रातनयश्च शेषः स लक्ष्मणो नाम रघूत्तमादनु ॥ ७८॥ | ||
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| verse_lines = कौसल्यकापुत्र उरुक्रमोऽसावेकस्तथैको भरतस्य मातुः | | verse_lines = कौसल्यकापुत्र उरुक्रमोऽसावेकस्तथैको भरतस्य मातुः ।¦उभौ सुमित्रातनयौ नृपस्य चत्वार एते ह्यमरोत्तमाः सुताः ॥ ७९॥ | ||
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| verse_text = सङ्कर्षणाद्यैस्त्रिभिरेव रूपैराविष्ट आसीत् त्रिषु तेषु विष्णुः । | | verse_text = सङ्कर्षणाद्यैस्त्रिभिरेव रूपैराविष्ट आसीत् त्रिषु तेषु विष्णुः । | ||
| verse_lines = सङ्कर्षणाद्यैस्त्रिभिरेव रूपैराविष्ट आसीत् त्रिषु तेषु विष्णुः | | verse_lines = सङ्कर्षणाद्यैस्त्रिभिरेव रूपैराविष्ट आसीत् त्रिषु तेषु विष्णुः ।¦इन्द्रोऽङ्गदे चैव ततोऽङ्गदो हि बली नितान्तं स बभूव शश्वत् ॥ ८०॥ | ||
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| verse_text = येऽन्ये च भूपाः कृतवीर्यजाद्याः बलाधिकाः सन्ति सहस्रशोऽपि । | | verse_text = येऽन्ये च भूपाः कृतवीर्यजाद्याः बलाधिकाः सन्ति सहस्रशोऽपि । | ||
| verse_lines = येऽन्ये च भूपाः कृतवीर्यजाद्याः बलाधिकाः सन्ति सहस्रशोऽपि | | verse_lines = येऽन्ये च भूपाः कृतवीर्यजाद्याः बलाधिकाः सन्ति सहस्रशोऽपि ।¦सर्वे हरेः सन्निधिभावयुक्ताः धर्मप्रधानाश्च गुणप्रधानाः ॥ ८१॥ | ||
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| verse_lines = स्वयं रमा सीरत एव जाता सीतेति रामार्थमनूपमा या | | verse_lines = स्वयं रमा सीरत एव जाता सीतेति रामार्थमनूपमा या ।¦विदेहराजस्य हि यज्ञभूमौ सुतेति तस्यैव ततस्तु साऽभूत् ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = इत्यादिकल्पोत्थित एष सर्गो मया समस्तागमनिर्णयात्मकः | | verse_lines = इत्यादिकल्पोत्थित एष सर्गो मया समस्तागमनिर्णयात्मकः ।¦सहानुसर्गः कथितोऽत्र पूर्वो यो यो गुणैर्नित्यमसौ वरो हि ॥ ८३॥ | ||
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| verse_text = पाश्चात्त्यकल्पेष्वपि सर्गभेदाः श्रुतौ पुराणेष्वपि चान्यथोक्ताः । | | verse_text = पाश्चात्त्यकल्पेष्वपि सर्गभेदाः श्रुतौ पुराणेष्वपि चान्यथोक्ताः । | ||
| verse_lines = पाश्चात्त्यकल्पेष्वपि सर्गभेदाः श्रुतौ पुराणेष्वपि चान्यथोक्ताः | | verse_lines = पाश्चात्त्यकल्पेष्वपि सर्गभेदाः श्रुतौ पुराणेष्वपि चान्यथोक्ताः ।¦नोत्कर्षहेतुः प्रथमत्वमेषु विशेषवाक्यैरवगम्यमेतत् ॥ ८४॥ | ||
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<span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C4" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्थोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ अथाभ्यवर्धंश्चतुराः कुमारा नृपस्य गेहे पुरुषोत्तमाद्याः । | | verse_text = औं ॥ अथाभ्यवर्धंश्चतुराः कुमारा नृपस्य गेहे पुरुषोत्तमाद्याः । | ||
| verse_lines = औं ॥ अथाभ्यवर्धंश्चतुराः कुमारा नृपस्य गेहे पुरुषोत्तमाद्याः | | verse_lines = औं ॥ अथाभ्यवर्धंश्चतुराः कुमारा नृपस्य गेहे पुरुषोत्तमाद्याः ।¦नित्यप्रवृद्धस्य च तस्य वृद्धिरपेक्ष्य लोकस्य हि मन्ददृष्टिम् ॥ १॥ | ||
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| verse_text = निरीक्ष्य नित्यं चतुरः कुमारान् पिता मुदं सन्ततमाप चोच्चम् । | | verse_text = निरीक्ष्य नित्यं चतुरः कुमारान् पिता मुदं सन्ततमाप चोच्चम् । | ||
| verse_lines = निरीक्ष्य नित्यं चतुरः कुमारान् पिता मुदं सन्ततमाप चोच्चम् | | verse_lines = निरीक्ष्य नित्यं चतुरः कुमारान् पिता मुदं सन्ततमाप चोच्चम् ।¦विशेषतो राममुखेन्दुबिम्बमवेक्ष्य राजा कृतकृत्य आसीत् ॥ २॥ | ||
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| verse_text = तन्मातरः पौरजना अमात्या अन्तःपुरा वैषयिकाश्च सर्वे । | | verse_text = तन्मातरः पौरजना अमात्या अन्तःपुरा वैषयिकाश्च सर्वे । | ||
| verse_lines = तन्मातरः पौरजना अमात्या अन्तःपुरा वैषयिकाश्च सर्वे | | verse_lines = तन्मातरः पौरजना अमात्या अन्तःपुरा वैषयिकाश्च सर्वे ।¦अवेक्षमाणाः परमं पुमांसं स्वानन्दतृप्ता इव सम्बभूवुः ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = ततः सुवंशे शशिनः प्रसूतो गाधीति शक्रस्तनुजोऽस्य चाऽसीत् । | | verse_text = ततः सुवंशे शशिनः प्रसूतो गाधीति शक्रस्तनुजोऽस्य चाऽसीत् । | ||
| verse_lines = ततः सुवंशे शशिनः प्रसूतो गाधीति शक्रस्तनुजोऽस्य चाऽसीत् | | verse_lines = ततः सुवंशे शशिनः प्रसूतो गाधीति शक्रस्तनुजोऽस्य चाऽसीत् ।¦वरेण विप्रत्वमवाप योऽसौ विश्वस्य मित्रं स इहाऽजगाम ॥ ४॥ | ||
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| verse_lines = तेनार्थितो यज्ञरिरक्षयैव कृच्छ्रेण पित्राऽस्य भयाद्विसृष्टः | | verse_lines = तेनार्थितो यज्ञरिरक्षयैव कृच्छ्रेण पित्राऽस्य भयाद्विसृष्टः ।¦जगाम रामः सह लक्ष्मणेन सिद्धाश्रमं सिद्धजनाभिवन्द्यः ॥ ५॥ | ||
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| verse_lines = अनुग्रहार्थं स ऋषेरवाप सलक्ष्मणोऽस्त्रं मुनितो हि केवलम् | | verse_lines = अनुग्रहार्थं स ऋषेरवाप सलक्ष्मणोऽस्त्रं मुनितो हि केवलम् ।¦ववन्दिरे ब्रह्ममुखाः सुरेशास्तमस्त्ररूपाः प्रकटाः समेत्य ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = तदा विदेहेन सुतास्वयंवरो विघोषितो दिक्षु विदिक्षु सर्वशः । | | verse_text = तदा विदेहेन सुतास्वयंवरो विघोषितो दिक्षु विदिक्षु सर्वशः । | ||
| verse_lines = तदा विदेहेन सुतास्वयंवरो विघोषितो दिक्षु विदिक्षु सर्वशः | | verse_lines = तदा विदेहेन सुतास्वयंवरो विघोषितो दिक्षु विदिक्षु सर्वशः ।¦निधार्य तद् गाधिसुतानुयायी ययौ विदेहाननुजानुयातः ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = अथो अहल्यां पतिनाऽभिशप्तां प्रधर्षणादिन्द्रकृताच्छिलीकृताम् । | | verse_text = अथो अहल्यां पतिनाऽभिशप्तां प्रधर्षणादिन्द्रकृताच्छिलीकृताम् । | ||
| verse_lines = अथो अहल्यां पतिनाऽभिशप्तां प्रधर्षणादिन्द्रकृताच्छिलीकृताम् | | verse_lines = अथो अहल्यां पतिनाऽभिशप्तां प्रधर्षणादिन्द्रकृताच्छिलीकृताम् ।¦स्वदर्शनान्मानुषतामुपेतां सुयोजयामास स गौतमेन ॥ १०॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = बलं स्वभक्तेरधिकं प्रकाशयन्ननुग्रहं च त्रिदशेष्वतुल्यम् । | | verse_text = बलं स्वभक्तेरधिकं प्रकाशयन्ननुग्रहं च त्रिदशेष्वतुल्यम् । | ||
| verse_lines = बलं स्वभक्तेरधिकं प्रकाशयन्ननुग्रहं च त्रिदशेष्वतुल्यम् | | verse_lines = बलं स्वभक्तेरधिकं प्रकाशयन्ननुग्रहं च त्रिदशेष्वतुल्यम् ।¦अनन्यभक्तां च सुरेशकाङ्क्षया विधाय नारीं प्रययौ तयाऽर्चितः ॥ ११॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = श्यामावदाते जगदेकसारे स्वनन्तचन्द्राधिककान्तिकान्ते । | | verse_text = श्यामावदाते जगदेकसारे स्वनन्तचन्द्राधिककान्तिकान्ते । | ||
| verse_lines = श्यामावदाते जगदेकसारे स्वनन्तचन्द्राधिककान्तिकान्ते | | verse_lines = श्यामावदाते जगदेकसारे स्वनन्तचन्द्राधिककान्तिकान्ते ।¦सहानुजे कार्मुकबाणपाणौ पुरीं प्रविष्टे तुतुषुर्विदेहजाः ॥ १२॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = पपुर्नितान्तं सरसाक्षिभृङ्गैर्वराननाब्जं पुरुषोत्तमस्य । | | verse_text = पपुर्नितान्तं सरसाक्षिभृङ्गैर्वराननाब्जं पुरुषोत्तमस्य । | ||
| verse_lines = पपुर्नितान्तं सरसाक्षिभृङ्गैर्वराननाब्जं पुरुषोत्तमस्य | | verse_lines = पपुर्नितान्तं सरसाक्षिभृङ्गैर्वराननाब्जं पुरुषोत्तमस्य ।¦विदेहनारीनरवर्यसङ्घा यथा महापौरुषिकास्तदङ्घ्रिम् (महापूरुषिकास्तदङ्घ्रिम्) ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = तथा विदेहः प्रतिलभ्य रामं सहस्रनेत्रावरजं गविष्ठम् । | | verse_text = तथा विदेहः प्रतिलभ्य रामं सहस्रनेत्रावरजं गविष्ठम् । | ||
| verse_lines = तथा विदेहः प्रतिलभ्य रामं सहस्रनेत्रावरजं गविष्ठम् | | verse_lines = तथा विदेहः प्रतिलभ्य रामं सहस्रनेत्रावरजं गविष्ठम् ।¦समर्चयामास सहानुजं तमृषिं च साक्षाज्ज्वलनप्रकाशम् ॥ १४॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = मेने च जामातरमात्मकन्यागुणोचितं रूपनवावतारम् । | | verse_text = मेने च जामातरमात्मकन्यागुणोचितं रूपनवावतारम् । | ||
| verse_lines = मेने च जामातरमात्मकन्यागुणोचितं रूपनवावतारम् | | verse_lines = मेने च जामातरमात्मकन्यागुणोचितं रूपनवावतारम् ।¦उवाच चास्मै ऋषिरुग्रतेजाः कुरुष्व जामातरमेनमाश्विति ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = स आह चैनं परमं वचस्ते करोमि नात्रास्ति विचारणा मे । | | verse_text = स आह चैनं परमं वचस्ते करोमि नात्रास्ति विचारणा मे । | ||
| verse_lines = स आह चैनं परमं वचस्ते करोमि नात्रास्ति विचारणा मे | | verse_lines = स आह चैनं परमं वचस्ते करोमि नात्रास्ति विचारणा मे ।¦शृणुष्व मेऽथापि यथा प्रतिज्ञा सुताप्रदानाय कृता पुरस्तात् ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = तपो मया चीर्णमुमापतेः पुरा वरायुधावाप्तिधृतेन चेतसा । | | verse_text = तपो मया चीर्णमुमापतेः पुरा वरायुधावाप्तिधृतेन चेतसा । | ||
| verse_lines = तपो मया चीर्णमुमापतेः पुरा वरायुधावाप्तिधृतेन चेतसा | | verse_lines = तपो मया चीर्णमुमापतेः पुरा वरायुधावाप्तिधृतेन चेतसा ।¦स मे ददौ दिव्यमिदं धनुस्तदा कथञ्चनाचाल्यमृते पिनाकिनम् ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = न देवदैत्योरगदेवगायका अलं धनुश्चालयितुं सवासवाः । | | verse_text = न देवदैत्योरगदेवगायका अलं धनुश्चालयितुं सवासवाः । | ||
| verse_lines = न देवदैत्योरगदेवगायका अलं धनुश्चालयितुं सवासवाः | | verse_lines = न देवदैत्योरगदेवगायका अलं धनुश्चालयितुं सवासवाः ।¦कुतो नरास्तद्वरतो हि किङ्कराः सहानसैवात्र कृषन्ति कृच्छ्रतः ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = अधार्यमेतद्धनुराप्य शङ्करादहं नृणां वीर्यपरीक्षणे धृतः । | | verse_text = अधार्यमेतद्धनुराप्य शङ्करादहं नृणां वीर्यपरीक्षणे धृतः । | ||
| verse_lines = अधार्यमेतद्धनुराप्य शङ्करादहं नृणां वीर्यपरीक्षणे धृतः | | verse_lines = अधार्यमेतद्धनुराप्य शङ्करादहं नृणां वीर्यपरीक्षणे धृतः ।¦सुतार्थमेतां चकर प्रतिज्ञां ददामि कन्यां य इदं हि पूरयेत् ॥ १९॥ | ||
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| verse_text = इतीरितां मे गिरमभ्यवेत्य दितेः सुता दानवयक्षराक्षसाः । | | verse_text = इतीरितां मे गिरमभ्यवेत्य दितेः सुता दानवयक्षराक्षसाः । | ||
| verse_lines = इतीरितां मे गिरमभ्यवेत्य दितेः सुता दानवयक्षराक्षसाः | | verse_lines = इतीरितां मे गिरमभ्यवेत्य दितेः सुता दानवयक्षराक्षसाः ।¦समेत्य भूपाश्च समीपमाशु प्रगृह्य तच्चालयितुं न शेकुः ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = संस्विन्नगात्राः परिवृत्तनेत्राः दशाननाद्याः पतिता विमूर्छिताः । | | verse_text = संस्विन्नगात्राः परिवृत्तनेत्राः दशाननाद्याः पतिता विमूर्छिताः । | ||
| verse_lines = संस्विन्नगात्राः परिवृत्तनेत्राः दशाननाद्याः पतिता विमूर्छिताः | | verse_lines = संस्विन्नगात्राः परिवृत्तनेत्राः दशाननाद्याः पतिता विमूर्छिताः ।¦तथाऽपि मां धर्षयितुं न शेकुः सुताकृते ते वचनात्स्वयम्भुवः ॥ २१॥ | ||
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| verse_text = पुरा हि मेऽदात् प्रभुरब्जजो वरं प्रसादितो मे तपसा कथञ्चन । | | verse_text = पुरा हि मेऽदात् प्रभुरब्जजो वरं प्रसादितो मे तपसा कथञ्चन । | ||
| verse_lines = पुरा हि मेऽदात् प्रभुरब्जजो वरं प्रसादितो मे तपसा कथञ्चन | | verse_lines = पुरा हि मेऽदात् प्रभुरब्जजो वरं प्रसादितो मे तपसा कथञ्चन ।¦बलान्न ते कश्चिदुपैति कन्यकां तदिच्छुभिस्ते न च धर्षणेति ॥ २२॥ | ||
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| verse_text = ततस्तु ते नष्टमदा इतो गताः समस्तशो ह्यस्तन एव पार्थिवाः । | | verse_text = ततस्तु ते नष्टमदा इतो गताः समस्तशो ह्यस्तन एव पार्थिवाः । | ||
| verse_lines = ततस्तु ते नष्टमदा इतो गताः समस्तशो ह्यस्तन एव पार्थिवाः | | verse_lines = ततस्तु ते नष्टमदा इतो गताः समस्तशो ह्यस्तन एव पार्थिवाः ।¦ततो ममायं प्रतिपूर्य मानसं वृणोतु कन्यामयमेव मेऽर्थितः ॥ २३॥ | ||
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| verse_text = तथेति चोक्ते मुनिना स किङ्करैरनन्तभोगोपममाश्वथाऽनयत् । | | verse_text = तथेति चोक्ते मुनिना स किङ्करैरनन्तभोगोपममाश्वथाऽनयत् । | ||
| verse_lines = तथेति चोक्ते मुनिना स किङ्करैरनन्तभोगोपममाश्वथाऽनयत् | | verse_lines = तथेति चोक्ते मुनिना स किङ्करैरनन्तभोगोपममाश्वथाऽनयत् ।¦समीक्ष्य तद्वामकरेण राघवः सलीलमुद्धृत्य हसन्नपूरयत् ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = विकृष्यमाणं तदनन्तराधसा परेण निःसीमबलेन लीलया । | | verse_text = विकृष्यमाणं तदनन्तराधसा परेण निःसीमबलेन लीलया । | ||
| verse_lines = विकृष्यमाणं तदनन्तराधसा परेण निःसीमबलेन लीलया | | verse_lines = विकृष्यमाणं तदनन्तराधसा परेण निःसीमबलेन लीलया ।¦अभज्यतासह्यममुष्य तद्बलं प्रसोढुमीशं कुत एव तद्भवेत् ॥ २५॥ | ||
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| verse_lines = स मध्यतस्तत् प्रविभज्य लीलया यथेक्षुदण्डं शतमन्युकुञ्जरः | | verse_lines = स मध्यतस्तत् प्रविभज्य लीलया यथेक्षुदण्डं शतमन्युकुञ्जरः ।¦विलोकयन् वक्त्रमृषेरवस्थितः सलक्ष्मणः पूर्णतनुर्यथा शशी ॥ २६॥ | ||
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| verse_lines = तमब्जनेत्रं पृथुतुङ्गवक्षसं श्यामावदातं चलकुण्डलोज्ज्वलम् | | verse_lines = तमब्जनेत्रं पृथुतुङ्गवक्षसं श्यामावदातं चलकुण्डलोज्ज्वलम् ।¦शशक्षतोत्थोपमचन्दनोक्षितं ददर्श विद्युद्वसनं नृपात्मजा ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = अथो कराभ्यां प्रतिगृह्य मालामम्लानपद्मां जलजायताक्षी | | verse_lines = अथो कराभ्यां प्रतिगृह्य मालामम्लानपद्मां जलजायताक्षी ।¦उपेत्य मन्दं ललितैः पदैस्तां तदंस आसज्य च पार्श्वतोऽभवत्(पार्श्वतोऽभूत्) ॥ २८॥ | ||
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| verse_lines = ततः प्रमोदो नितरां जनानां विदेहपुर्यामभवत् समन्तात् | | verse_lines = ततः प्रमोदो नितरां जनानां विदेहपुर्यामभवत् समन्तात् ।¦रामं समालोक्य नरेन्द्रपुत्र्या समेतमानन्दनिधिं परेशम् ॥ २९॥ | ||
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| verse_lines = लक्ष्म्या समेते प्रकटं रमेशे सम्प्रेषयामास तदाऽऽशु पित्रे | | verse_lines = लक्ष्म्या समेते प्रकटं रमेशे सम्प्रेषयामास तदाऽऽशु पित्रे ।¦‘विदेहराजो दशदिग्रथाय स तन्निशम्याऽशु तुतोष भूमिपः’ ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = अथाऽत्मजाभ्यां सहितः सभार्यो ययौ गजस्यन्दनपत्तियुक्तया | | verse_lines = अथाऽत्मजाभ्यां सहितः सभार्यो ययौ गजस्यन्दनपत्तियुक्तया ।¦स्वसेनयाऽग्रे प्रणिधाय धातृजं वसिष्ठमाश्वेव स यत्र मैथिलः ॥ ३१॥(भा\.पु\. ७\.८\.३६) | ||
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| verse_lines = स मैथिलेनातितरां समर्चितो विवाहयामास सुतं मुदम्भरः | | verse_lines = स मैथिलेनातितरां समर्चितो विवाहयामास सुतं मुदम्भरः ।¦पुरोहितो गाधिसुतानुमोदितो जुहाव वह्निं विधिना वसिष्ठः ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = तदा विमानावलिभिर्नभस्तलं दिदृक्षतां सङ्कुलमास नाकिनाम् | | verse_lines = तदा विमानावलिभिर्नभस्तलं दिदृक्षतां सङ्कुलमास नाकिनाम् ।¦सुरानका दुन्दभयो विनेदिरे जगुश्व गन्धर्ववराः सहस्रशः ॥ ३३॥ | ||
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| verse_lines = विजानमाना जगतां हि मातरं पुराऽर्थितुं नाऽययुरत्र देवताः | | verse_lines = विजानमाना जगतां हि मातरं पुराऽर्थितुं नाऽययुरत्र देवताः ।¦तदा तु रामं रमया युतं प्रभुं दिदृक्षवश्चक्रुरलं नभस्तलम् ॥ ३४॥ | ||
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| verse_lines = प्रगृह्य पाणिं च नृपात्मजाया रराज राजीवसमाननेत्रः | | verse_lines = प्रगृह्य पाणिं च नृपात्मजाया रराज राजीवसमाननेत्रः ।¦यथा पुरा सागरजासमेतः सुरासुराणाममृताब्धिमन्थने ॥ ३६॥ | ||
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| verse_lines = प्रियाणि वस्त्राणि रथान् सकुञ्जरान् परार्द्ध्यरत्नान्यखिलस्य चेशितुः | | verse_lines = प्रियाणि वस्त्राणि रथान् सकुञ्जरान् परार्द्ध्यरत्नान्यखिलस्य चेशितुः ।¦ददौ च कन्यात्रयमुत्तमं मुदा तदा स रामावरजेभ्य एव च ॥ ३८॥ | ||
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| verse_text = न मे सुतं हन्तुमिहार्हसि प्रभो वयोगतस्येत्युदितः स भार्गवः । | | verse_text = न मे सुतं हन्तुमिहार्हसि प्रभो वयोगतस्येत्युदितः स भार्गवः । | ||
| verse_lines = न मे सुतं हन्तुमिहार्हसि प्रभो वयोगतस्येत्युदितः स भार्गवः | | verse_lines = न मे सुतं हन्तुमिहार्हसि प्रभो वयोगतस्येत्युदितः स भार्गवः ।¦सुतत्रयं ते प्रददामि राघवं रणे स्थितं द्रष्टुमिहाऽऽगतोऽस्म्यहम् ॥ ४२॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = स इत्थमुक्त्वा नृपतिं रघूत्तमं भृगूत्तमः प्राह निजां तनुं हरिः । | | verse_text = स इत्थमुक्त्वा नृपतिं रघूत्तमं भृगूत्तमः प्राह निजां तनुं हरिः । | ||
| verse_lines = स इत्थमुक्त्वा नृपतिं रघूत्तमं भृगूत्तमः प्राह निजां तनुं हरिः | | verse_lines = स इत्थमुक्त्वा नृपतिं रघूत्तमं भृगूत्तमः प्राह निजां तनुं हरिः ।¦अभेदमज्ञेष्वपि दर्शयन् परं पुरातनोऽहं हरिरेष इत्यपि ॥ ४३॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = शृणुष्व राम त्वमिहोदितं मया धनुर्द्वयं पूर्वमभून्महाद्भुतम् । | | verse_text = शृणुष्व राम त्वमिहोदितं मया धनुर्द्वयं पूर्वमभून्महाद्भुतम् । | ||
| verse_lines = शृणुष्व राम त्वमिहोदितं मया धनुर्द्वयं पूर्वमभून्महाद्भुतम् | | verse_lines = शृणुष्व राम त्वमिहोदितं मया धनुर्द्वयं पूर्वमभून्महाद्भुतम् ।¦उमापतिस्त्वेकमधारयत् ततो रमापतिश्चापरमुत्तमोत्तमम् ॥ ४४॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 3,560: | Line 3,560: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = तदा तु लोकस्य निदर्शनार्थिभिः समर्थितौ तौ हरिशङ्करौ सुरैः । | | verse_text = तदा तु लोकस्य निदर्शनार्थिभिः समर्थितौ तौ हरिशङ्करौ सुरैः । | ||
| verse_lines = तदा तु लोकस्य निदर्शनार्थिभिः समर्थितौ तौ हरिशङ्करौ सुरैः | | verse_lines = तदा तु लोकस्य निदर्शनार्थिभिः समर्थितौ तौ हरिशङ्करौ सुरैः ।¦रणस्थितौ वां प्रसमीक्षितुं वयं समर्थयामोऽत्र निदर्शनार्थिनः ॥ ४५॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = ततो हि युद्धाय रमेशशङ्करौ व्यवस्थितौ तौ धनुषी प्रगृह्य । | | verse_text = ततो हि युद्धाय रमेशशङ्करौ व्यवस्थितौ तौ धनुषी प्रगृह्य । | ||
| verse_lines = ततो हि युद्धाय रमेशशङ्करौ व्यवस्थितौ तौ धनुषी प्रगृह्य | | verse_lines = ततो हि युद्धाय रमेशशङ्करौ व्यवस्थितौ तौ धनुषी प्रगृह्य ।¦यतोऽन्तरस्यैष नियामको हरिस्ततो हरोऽग्रेऽस्य शिलोपमोऽभूत् ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = शशाक नैवाथ यदाऽभिवीक्षितुं प्रस्पन्दितुं वा कुत एव योद्धुम् । | | verse_text = शशाक नैवाथ यदाऽभिवीक्षितुं प्रस्पन्दितुं वा कुत एव योद्धुम् । | ||
| verse_lines = शशाक नैवाथ यदाऽभिवीक्षितुं प्रस्पन्दितुं वा कुत एव योद्धुम् | | verse_lines = शशाक नैवाथ यदाऽभिवीक्षितुं प्रस्पन्दितुं वा कुत एव योद्धुम् ।¦शिवस्तदा देवगणास्समस्ताः शशंसुरुच्चैर्जगतो हरेर्बलम् ॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = यदीरणेनैव विनैष शङ्करः शशाक न प्रश्वसितुं च केवलम् । | | verse_text = यदीरणेनैव विनैष शङ्करः शशाक न प्रश्वसितुं च केवलम् । | ||
| verse_lines = यदीरणेनैव विनैष शङ्करः शशाक न प्रश्वसितुं च केवलम् | | verse_lines = यदीरणेनैव विनैष शङ्करः शशाक न प्रश्वसितुं च केवलम् ।¦किमत्र वक्तव्यमतो हरेर्बलं हरात् परं सर्वत एव चेति ॥ ४८॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = ततः प्रणम्याऽऽशु जनार्दनं हरः प्रसन्नदृष्ट्या हरिणाऽभिवीक्षितः । | | verse_text = ततः प्रणम्याऽऽशु जनार्दनं हरः प्रसन्नदृष्ट्या हरिणाऽभिवीक्षितः । | ||
| verse_lines = ततः प्रणम्याऽऽशु जनार्दनं हरः प्रसन्नदृष्ट्या हरिणाऽभिवीक्षितः | | verse_lines = ततः प्रणम्याऽऽशु जनार्दनं हरः प्रसन्नदृष्ट्या हरिणाऽभिवीक्षितः ।¦जगाम कैलासममुष्य तद्धनुस्त्वया प्रभग्नं किल लोकसन्निधौ ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = धनुर्यदन्यद्धरिहस्तयोग्यं तत्कार्मुकात् कोटिगुणं पुनश्च । | | verse_text = धनुर्यदन्यद्धरिहस्तयोग्यं तत्कार्मुकात् कोटिगुणं पुनश्च । | ||
| verse_lines = धनुर्यदन्यद्धरिहस्तयोग्यं तत्कार्मुकात् कोटिगुणं पुनश्च | | verse_lines = धनुर्यदन्यद्धरिहस्तयोग्यं तत्कार्मुकात् कोटिगुणं पुनश्च ।¦वरं हि हस्ते तदिदं गृहीतं मया गृहाणैतदतो हि वैष्णवम् ॥ ५०॥ | ||
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| verse_text = यदीदमागृह्य विकर्षसि त्वं तदा हरिर्नात्र विचार्यमस्ति । | | verse_text = यदीदमागृह्य विकर्षसि त्वं तदा हरिर्नात्र विचार्यमस्ति । | ||
| verse_lines = यदीदमागृह्य विकर्षसि त्वं तदा हरिर्नात्र विचार्यमस्ति | | verse_lines = यदीदमागृह्य विकर्षसि त्वं तदा हरिर्नात्र विचार्यमस्ति ।¦इति ब्रुवाणः प्रददौ धनुर्वरं प्रदर्शयत् विष्णुबलं हराद्वरम् ॥ ५१॥ | ||
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| verse_text = प्रगृह्य तच्चापवरं स राघवश्चकार सज्यं निमिषेण लीलया । | | verse_text = प्रगृह्य तच्चापवरं स राघवश्चकार सज्यं निमिषेण लीलया । | ||
| verse_lines = प्रगृह्य तच्चापवरं स राघवश्चकार सज्यं निमिषेण लीलया | | verse_lines = प्रगृह्य तच्चापवरं स राघवश्चकार सज्यं निमिषेण लीलया ।¦चकर्ष सन्धाय शरं च पश्यतः समस्तलोकस्य च संशयं नुदन् ॥ ५२॥ | ||
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| verse_text = प्रदर्शिते विष्णुबले समस्ततो हराच्च निःसङ्ख्यतया महाधिके । | | verse_text = प्रदर्शिते विष्णुबले समस्ततो हराच्च निःसङ्ख्यतया महाधिके । | ||
| verse_lines = प्रदर्शिते विष्णुबले समस्ततो हराच्च निःसङ्ख्यतया महाधिके | | verse_lines = प्रदर्शिते विष्णुबले समस्ततो हराच्च निःसङ्ख्यतया महाधिके ।¦जगाद मेघौघगभीरया गिरा स राघवं भार्गव आदिपूरुषः ॥ ५३॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = अलं बलं ते जगतोऽखिलाद्वरं परोऽसि नारायण एव नान्यथा । | | verse_text = अलं बलं ते जगतोऽखिलाद्वरं परोऽसि नारायण एव नान्यथा । | ||
| verse_lines = अलं बलं ते जगतोऽखिलाद्वरं परोऽसि नारायण एव नान्यथा | | verse_lines = अलं बलं ते जगतोऽखिलाद्वरं परोऽसि नारायण एव नान्यथा ।¦विसर्जयस्वेह शरं तपोमये महासुरे लोकमये वराद्विभोः ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = पुरोऽतुलो नाम महासुरोऽभवद् वरात् स तु ब्रह्मण आप लोकताम् । | | verse_text = पुरोऽतुलो नाम महासुरोऽभवद् वरात् स तु ब्रह्मण आप लोकताम् । | ||
| verse_lines = पुरोऽतुलो नाम महासुरोऽभवद् वरात् स तु ब्रह्मण आप लोकताम् | | verse_lines = पुरोऽतुलो नाम महासुरोऽभवद् वरात् स तु ब्रह्मण आप लोकताम् ।¦पुनश्च तं प्राह जगद्गुरुर्यदा हरिर्जितः स्याद्धि तदैव वध्यसे ॥ ५५॥ | ||
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| verse_text = अतो वधार्थं जगदन्तकस्य सर्वाजितोऽहं जितवद् व्यवस्थितः । | | verse_text = अतो वधार्थं जगदन्तकस्य सर्वाजितोऽहं जितवद् व्यवस्थितः । | ||
| verse_lines = अतो वधार्थं जगदन्तकस्य सर्वाजितोऽहं जितवद् व्यवस्थितः | | verse_lines = अतो वधार्थं जगदन्तकस्य सर्वाजितोऽहं जितवद् व्यवस्थितः ।¦इतीरिते लोकमये स राघवो मुमोच बाणं जगदन्तकेऽसुरे ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = पुरा वरोऽनेन शिवोपलम्भितो मुमुक्षया विष्णुतनुप्रवेशनम् । | | verse_text = पुरा वरोऽनेन शिवोपलम्भितो मुमुक्षया विष्णुतनुप्रवेशनम् । | ||
| verse_lines = पुरा वरोऽनेन शिवोपलम्भितो मुमुक्षया विष्णुतनुप्रवेशनम् | | verse_lines = पुरा वरोऽनेन शिवोपलम्भितो मुमुक्षया विष्णुतनुप्रवेशनम् ।¦स तेन रामोदरगो बहिर्गतस्तदाज्ञयैवाऽऽशु बभूव भस्मसात् ॥ ५७॥ | ||
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| verse_text = इतीव रामाय स राघवः शरं विकर्षमाणो विनिहत्य चासुरम् । | | verse_text = इतीव रामाय स राघवः शरं विकर्षमाणो विनिहत्य चासुरम् । | ||
| verse_lines = इतीव रामाय स राघवः शरं विकर्षमाणो विनिहत्य चासुरम् | | verse_lines = इतीव रामाय स राघवः शरं विकर्षमाणो विनिहत्य चासुरम् ।¦तपस्तदीयं प्रवदन् मुमोद तदीयमेव ह्यभवत् समस्तम् ॥ ५८॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = निरन्तरानन्तविबोधसारः स जानमानोऽखिलमादिपूरुषः । | | verse_text = निरन्तरानन्तविबोधसारः स जानमानोऽखिलमादिपूरुषः । | ||
| verse_lines = निरन्तरानन्तविबोधसारः स जानमानोऽखिलमादिपूरुषः | | verse_lines = निरन्तरानन्तविबोधसारः स जानमानोऽखिलमादिपूरुषः ।¦वदञ्छृणोतीव विनोदतो हरिः स एक एव द्वितनुर्मुमोद ॥ ५९॥ | ||
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| verse_text = स चेष्टितं चैव निजाश्रयस्य जनस्य सत्तत्त्वविबोधकारणम् । | | verse_text = स चेष्टितं चैव निजाश्रयस्य जनस्य सत्तत्त्वविबोधकारणम् । | ||
| verse_lines = स चेष्टितं चैव निजाश्रयस्य जनस्य सत्तत्त्वविबोधकारणम् | | verse_lines = स चेष्टितं चैव निजाश्रयस्य जनस्य सत्तत्त्वविबोधकारणम् ।¦विमोहकं चान्यतमस्य कुर्वन् चिक्रीड एकोऽपि नरान्तरे यथा ॥ ६०॥ | ||
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| verse_text = ततः स कारुण्यनिधिर्निजे जने नितान्तमैक्यं स्वगतं प्रकाशयन् । | | verse_text = ततः स कारुण्यनिधिर्निजे जने नितान्तमैक्यं स्वगतं प्रकाशयन् । | ||
| verse_lines = ततः स कारुण्यनिधिर्निजे जने नितान्तमैक्यं स्वगतं प्रकाशयन् | | verse_lines = ततः स कारुण्यनिधिर्निजे जने नितान्तमैक्यं स्वगतं प्रकाशयन् ।¦द्विधेव भूत्वा भृगुवर्य आत्मना रघूत्तमेनैक्यमगात् समक्षम् ॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = समेत्य चैक्यं जगतोऽभिपश्यतः प्रणुद्य शङ्कामखिलां जनस्य । | | verse_text = समेत्य चैक्यं जगतोऽभिपश्यतः प्रणुद्य शङ्कामखिलां जनस्य । | ||
| verse_lines = समेत्य चैक्यं जगतोऽभिपश्यतः प्रणुद्य शङ्कामखिलां जनस्य | | verse_lines = समेत्य चैक्यं जगतोऽभिपश्यतः प्रणुद्य शङ्कामखिलां जनस्य ।¦प्रदाय रामाय धनुर्वरं तदा जगाम रामानुमतो रमापतिः ॥ ६२॥ | ||
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| verse_text = ततो नृपोऽत्यर्थमुदाऽभिपूरितः सुतैः समस्तैः स्वपुरीमवाप ह । | | verse_text = ततो नृपोऽत्यर्थमुदाऽभिपूरितः सुतैः समस्तैः स्वपुरीमवाप ह । | ||
| verse_lines = ततो नृपोऽत्यर्थमुदाऽभिपूरितः सुतैः समस्तैः स्वपुरीमवाप ह | | verse_lines = ततो नृपोऽत्यर्थमुदाऽभिपूरितः सुतैः समस्तैः स्वपुरीमवाप ह ।¦रेमेऽथ रामोऽपि रमास्वरूपया तयैव राजात्मजया हि सीतया ॥ ६३॥ | ||
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| verse_text = यथा पुरा श्रीरमणः श्रिया तया रतो नितान्तं हि पयोब्धिमध्ये । | | verse_text = यथा पुरा श्रीरमणः श्रिया तया रतो नितान्तं हि पयोब्धिमध्ये । | ||
| verse_lines = यथा पुरा श्रीरमणः श्रिया तया रतो नितान्तं हि पयोब्धिमध्ये | | verse_lines = यथा पुरा श्रीरमणः श्रिया तया रतो नितान्तं हि पयोब्धिमध्ये ।¦तथा त्वयोध्यापुरिगो रघूत्तमोऽप्युवास कालं सुचिरं रतस्तया ॥ ६४॥ | ||
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| verse_text = इमानि कर्माणि रघूत्तमस्य हरेर्विचित्राण्यपि नाद्भुतानि । | | verse_text = इमानि कर्माणि रघूत्तमस्य हरेर्विचित्राण्यपि नाद्भुतानि । | ||
| verse_lines = इमानि कर्माणि रघूत्तमस्य हरेर्विचित्राण्यपि नाद्भुतानि | | verse_lines = इमानि कर्माणि रघूत्तमस्य हरेर्विचित्राण्यपि नाद्भुतानि ।¦दुरन्तशक्तेरथ चास्य वैभवं स्वकीयकर्तव्यतयाऽनुवर्ण्यते ॥ ६५॥ | ||
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<span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C5" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चमोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ इत्थं विश्वेश्वरेऽस्मिन्नखिलजगदवस्थाप्य सीतासहाये भूमिष्ठे सर्वलोकास्तुतुषुरनुदिनं वृद्धभक्त्यानितान्तम् । | | verse_text = औं ॥ इत्थं विश्वेश्वरेऽस्मिन्नखिलजगदवस्थाप्य सीतासहाये भूमिष्ठे सर्वलोकास्तुतुषुरनुदिनं वृद्धभक्त्यानितान्तम् । | ||
| verse_lines = औं ॥ इत्थं विश्वेश्वरेऽस्मिन्नखिलजगदवस्थाप्य सीतासहाये भूमिष्ठे सर्वलोकास्तुतुषुरनुदिनं वृद्धभक्त्यानितान्तम् | | verse_lines = औं ॥ इत्थं विश्वेश्वरेऽस्मिन्नखिलजगदवस्थाप्य सीतासहाये भूमिष्ठे सर्वलोकास्तुतुषुरनुदिनं वृद्धभक्त्यानितान्तम् ।¦राजा राज्याभिषेके प्रकृतिजनवचो मानयन्नात्मनोऽर्थ्यं दध्रे तन्मन्थरायाः श्रुतिपथमगमद् भूमिगाया अलक्ष्म्याः ॥ १॥ | ||
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| verse_text = पूर्वं क्षीराब्धिजाता कथमपि तपसैवाप्सरस्त्वं प्रयाता तां नेतुं तत्तमोऽन्धं कमलजनिरुवाचाऽऽशु रामाभिषेकम् । | | verse_text = पूर्वं क्षीराब्धिजाता कथमपि तपसैवाप्सरस्त्वं प्रयाता तां नेतुं तत्तमोऽन्धं कमलजनिरुवाचाऽऽशु रामाभिषेकम् । | ||
| verse_lines = पूर्वं क्षीराब्धिजाता कथमपि तपसैवाप्सरस्त्वं प्रयाता तां नेतुं तत्तमोऽन्धं कमलजनिरुवाचाऽऽशु रामाभिषेकम् | | verse_lines = पूर्वं क्षीराब्धिजाता कथमपि तपसैवाप्सरस्त्वं प्रयाता तां नेतुं तत्तमोऽन्धं कमलजनिरुवाचाऽऽशु रामाभिषेकम् ।¦भूत्वा दासी विलुम्प स्वगतिमपि ततः कर्मणा प्राप्स्यसे त्वं सेत्युक्ता मन्थराऽऽसीत् तदनु कृतवत्येव चैतत् कुकर्म ॥ २॥ | ||
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| verse_text = तद्वाक्यात् कैकयी सा पतिगवरबलादाजहारैव राज्यं रामस्तद्गौरवेण त्रिदशमुनिकृतेऽरण्यमेवाऽविवेश । | | verse_text = तद्वाक्यात् कैकयी सा पतिगवरबलादाजहारैव राज्यं रामस्तद्गौरवेण त्रिदशमुनिकृतेऽरण्यमेवाऽविवेश । | ||
| verse_lines = तद्वाक्यात् कैकयी सा पतिगवरबलादाजहारैव राज्यं रामस्तद्गौरवेण त्रिदशमुनिकृतेऽरण्यमेवाऽविवेश | | verse_lines = तद्वाक्यात् कैकयी सा पतिगवरबलादाजहारैव राज्यं रामस्तद्गौरवेण त्रिदशमुनिकृतेऽरण्यमेवाऽविवेश ।¦सीतायुक्तोऽनुजेन प्रतिदिनसुविवृद्धोरुभक्त्या समेतः संस्थाप्याशेषजन्तून् स्वविरहजशुचा त्यक्तसर्वेषणार्थान् ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = वृक्षान् पक्षीभकीटान् पितरमथ सखीन् मातृपूर्वान् विसृज्य प्रोत्थां गङ्गांस्वपादाद्धर इव गुहेनार्चितः सोऽथ तीर्त्वा । | | verse_text = वृक्षान् पक्षीभकीटान् पितरमथ सखीन् मातृपूर्वान् विसृज्य प्रोत्थां गङ्गांस्वपादाद्धर इव गुहेनार्चितः सोऽथ तीर्त्वा । | ||
| verse_lines = वृक्षान् पक्षीभकीटान् पितरमथ सखीन् मातृपूर्वान् विसृज्य प्रोत्थां गङ्गांस्वपादाद्धर इव गुहेनार्चितः सोऽथ तीर्त्वा | | verse_lines = वृक्षान् पक्षीभकीटान् पितरमथ सखीन् मातृपूर्वान् विसृज्य प्रोत्थां गङ्गांस्वपादाद्धर इव गुहेनार्चितः सोऽथ तीर्त्वा ।¦देवार्च्यस्यापि पुत्रादृषिगणसहितात् प्राप्य पूजां प्रयातः शैलेशं चित्रकूटं कतिपयदिवसान्यत्र मोदन्नुवास ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = एतस्मिन्नेव काले दशरथनृपतिः स्वर्गतोऽभूद्वियोगाद् रामस्यैवाथ पुत्रौ विधिसुतसहितैर्मन्त्रिभिः केकयेभ्यः । | | verse_text = एतस्मिन्नेव काले दशरथनृपतिः स्वर्गतोऽभूद्वियोगाद् रामस्यैवाथ पुत्रौ विधिसुतसहितैर्मन्त्रिभिः केकयेभ्यः । | ||
| verse_lines = एतस्मिन्नेव काले दशरथनृपतिः स्वर्गतोऽभूद्वियोगाद् रामस्यैवाथ पुत्रौ विधिसुतसहितैर्मन्त्रिभिः केकयेभ्यः | | verse_lines = एतस्मिन्नेव काले दशरथनृपतिः स्वर्गतोऽभूद्वियोगाद् रामस्यैवाथ पुत्रौ विधिसुतसहितैर्मन्त्रिभिः केकयेभ्यः ।¦आनीतौ तस्य कृत्वा श्रुतिगणविहितप्रेतकार्याणि सद्यः शोचन्तौ राममार्गं पुरजनसहितौ जग्मतुर्मातृभिश्च ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = धिक्कुर्वन्तौ नितान्तं सकलदुरितगां मन्थरां कैकयीं च प्राप्तौ रामस्य पादौ मुनिगणसहितौ तत्र चोवाच नत्वा । | | verse_text = धिक्कुर्वन्तौ नितान्तं सकलदुरितगां मन्थरां कैकयीं च प्राप्तौ रामस्य पादौ मुनिगणसहितौ तत्र चोवाच नत्वा । | ||
| verse_lines = धिक्कुर्वन्तौ नितान्तं सकलदुरितगां मन्थरां कैकयीं च प्राप्तौ रामस्य पादौ मुनिगणसहितौ तत्र चोवाच नत्वा | | verse_lines = धिक्कुर्वन्तौ नितान्तं सकलदुरितगां मन्थरां कैकयीं च प्राप्तौ रामस्य पादौ मुनिगणसहितौ तत्र चोवाच नत्वा ।¦रामं राजीवनेत्रं भरत इह पुनः प्रीतयेऽस्माकमीश प्राप्याऽऽशु स्वामयोध्यामवरजसहितः पालयेमां धरित्रीम् ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तः कर्तुमीशः सकलसुरगणाप्यायनं रामदेवः सत्यां कर्तुं च वाणीमवददतितरां नेति सद्भक्तिनम्रम् । | | verse_text = इत्युक्तः कर्तुमीशः सकलसुरगणाप्यायनं रामदेवः सत्यां कर्तुं च वाणीमवददतितरां नेति सद्भक्तिनम्रम् । | ||
| verse_lines = इत्युक्तः कर्तुमीशः सकलसुरगणाप्यायनं रामदेवः सत्यां कर्तुं च वाणीमवददतितरां नेति सद्भक्तिनम्रम् | | verse_lines = इत्युक्तः कर्तुमीशः सकलसुरगणाप्यायनं रामदेवः सत्यां कर्तुं च वाणीमवददतितरां नेति सद्भक्तिनम्रम् ।¦भूयोभूयोऽर्थयन्तं द्विगुणितशरदां सप्तके त्वभ्यतीते कर्तैतत्ते वचोऽहं सुदृढमृतमिदं मे वचो नात्र शङ्का ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वैतद्रामवाक्यं हुतभुजि पतने स प्रतिज्ञां च कृत्वा रामोक्तस्यान्यथात्वे न तु परमभिवेक्ष्येऽहमित्येव तावत् । | | verse_text = श्रुत्वैतद्रामवाक्यं हुतभुजि पतने स प्रतिज्ञां च कृत्वा रामोक्तस्यान्यथात्वे न तु परमभिवेक्ष्येऽहमित्येव तावत् । | ||
| verse_lines = श्रुत्वैतद्रामवाक्यं हुतभुजि पतने स प्रतिज्ञां च कृत्वा रामोक्तस्यान्यथात्वे न तु परमभिवेक्ष्येऽहमित्येव तावत् | | verse_lines = श्रुत्वैतद्रामवाक्यं हुतभुजि पतने स प्रतिज्ञां च कृत्वा रामोक्तस्यान्यथात्वे न तु परमभिवेक्ष्येऽहमित्येव तावत् ।¦कृत्वाऽन्यां स प्रतिज्ञामवसदथ बहिर्ग्रामके नन्दिनाम्नि श्रीशस्यैवास्य कृत्वा शिरसि परमकं पौरटं पादपीठम् ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = समस्तपौरानुगतेऽनुजे गते स चित्रकूटे भगवानुवास ह । | | verse_text = समस्तपौरानुगतेऽनुजे गते स चित्रकूटे भगवानुवास ह । | ||
| verse_lines = समस्तपौरानुगतेऽनुजे गते स चित्रकूटे भगवानुवास ह | | verse_lines = समस्तपौरानुगतेऽनुजे गते स चित्रकूटे भगवानुवास ह ।¦अथाऽजगामेन्द्रसुतोऽपि वायसो महासुरेणाऽत्मगतेन चोदितः ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = स चासुरावेशवशाद्रमास्तने यदा व्यधात्तुण्डमथाभिवीक्षितः । | | verse_text = स चासुरावेशवशाद्रमास्तने यदा व्यधात्तुण्डमथाभिवीक्षितः । | ||
| verse_lines = स चासुरावेशवशाद्रमास्तने यदा व्यधात्तुण्डमथाभिवीक्षितः | | verse_lines = स चासुरावेशवशाद्रमास्तने यदा व्यधात्तुण्डमथाभिवीक्षितः ।¦जनार्दनेनाऽऽशु तृणे प्रयोजिते चचार तेन ज्वलताऽनुयातः ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = स्वयम्भुशर्वेन्द्रमुखान्सुरेश्वरान् जिजीविषुस्ताञ्छरणं गतोऽपि । | | verse_text = स्वयम्भुशर्वेन्द्रमुखान्सुरेश्वरान् जिजीविषुस्ताञ्छरणं गतोऽपि । | ||
| verse_lines = स्वयम्भुशर्वेन्द्रमुखान्सुरेश्वरान् जिजीविषुस्ताञ्छरणं गतोऽपि | | verse_lines = स्वयम्भुशर्वेन्द्रमुखान्सुरेश्वरान् जिजीविषुस्ताञ्छरणं गतोऽपि ।¦बहिष्कृतस्तैर्हरिभक्तिभावतो ह्यलङ्घ्यशक्त्या परमस्य चाक्षमैः ॥ ११॥ | ||
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| verse_text = पुनः प्रयातः शरणं रघूत्तमं विसर्जितस्तेन निहत्य चासुरम् । | | verse_text = पुनः प्रयातः शरणं रघूत्तमं विसर्जितस्तेन निहत्य चासुरम् । | ||
| verse_lines = पुनः प्रयातः शरणं रघूत्तमं विसर्जितस्तेन निहत्य चासुरम् | | verse_lines = पुनः प्रयातः शरणं रघूत्तमं विसर्जितस्तेन निहत्य चासुरम् ।¦तदक्षिगं साक्षिकमप्यवध्यं प्रसादतश्चन्द्रविभूषणस्य ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = स वायसानामसुरोऽखिलानां वरादुमेशस्य बभूव चाक्षिगः । | | verse_text = स वायसानामसुरोऽखिलानां वरादुमेशस्य बभूव चाक्षिगः । | ||
| verse_lines = स वायसानामसुरोऽखिलानां वरादुमेशस्य बभूव चाक्षिगः | | verse_lines = स वायसानामसुरोऽखिलानां वरादुमेशस्य बभूव चाक्षिगः ।¦निपातितोऽसौ सह वायसाक्षिभिस्तृणेन रामस्य बभूव भस्मसात् ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = ददुर्हि तस्मै विवरं बलार्थिनो यद्वायसास्तेन तदक्षिपातनम् । | | verse_text = ददुर्हि तस्मै विवरं बलार्थिनो यद्वायसास्तेन तदक्षिपातनम् । | ||
| verse_lines = ददुर्हि तस्मै विवरं बलार्थिनो यद्वायसास्तेन तदक्षिपातनम् | | verse_lines = ददुर्हि तस्मै विवरं बलार्थिनो यद्वायसास्तेन तदक्षिपातनम् ।¦कृतं रमेशेन तदेकनेत्रा बभूवुरन्येऽपि तु वायसास्तदा ॥ १४॥ | ||
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| verse_text = भविष्यतामप्यथ यावदेव द्विनेत्रता काककुलोद्भवानाम् । | | verse_text = भविष्यतामप्यथ यावदेव द्विनेत्रता काककुलोद्भवानाम् । | ||
| verse_lines = भविष्यतामप्यथ यावदेव द्विनेत्रता काककुलोद्भवानाम् | | verse_lines = भविष्यतामप्यथ यावदेव द्विनेत्रता काककुलोद्भवानाम् ।¦तावत्तदक्ष्यस्य कुरङ्गनाम्नः शिवेन दत्तं दितिजस्य चाक्षयम् ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = अतः पुनर्भावममुष्य हिन्वन् भविष्यतश्चैकदृशश्चकार । | | verse_text = अतः पुनर्भावममुष्य हिन्वन् भविष्यतश्चैकदृशश्चकार । | ||
| verse_lines = अतः पुनर्भावममुष्य हिन्वन् भविष्यतश्चैकदृशश्चकार | | verse_lines = अतः पुनर्भावममुष्य हिन्वन् भविष्यतश्चैकदृशश्चकार ।¦स वायसान् राघव आदिपूरुषस्ततो ययौ शक्रसुतस्तदाज्ञया ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = रामोऽथ दण्डकवनं मुनिवर्यनीतो लोकाननेकश उदारबलैर्निरस्तान् । | | verse_text = रामोऽथ दण्डकवनं मुनिवर्यनीतो लोकाननेकश उदारबलैर्निरस्तान् । | ||
| verse_lines = रामोऽथ दण्डकवनं मुनिवर्यनीतो लोकाननेकश उदारबलैर्निरस्तान् | | verse_lines = रामोऽथ दण्डकवनं मुनिवर्यनीतो लोकाननेकश उदारबलैर्निरस्तान् ।¦श्रुत्वा खरप्रभृतिभिर्वरतो हरस्य सर्वैरवध्यतनुभिः प्रययौ सभार्यः ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = आसीच्च तत्र शरभङ्ग इति स्म जीर्णो लोकं हरेर्जिगमिषुर्मुनिरुग्रतेजाः । | | verse_text = आसीच्च तत्र शरभङ्ग इति स्म जीर्णो लोकं हरेर्जिगमिषुर्मुनिरुग्रतेजाः । | ||
| verse_lines = आसीच्च तत्र शरभङ्ग इति स्म जीर्णो लोकं हरेर्जिगमिषुर्मुनिरुग्रतेजाः | | verse_lines = आसीच्च तत्र शरभङ्ग इति स्म जीर्णो लोकं हरेर्जिगमिषुर्मुनिरुग्रतेजाः ।¦तेनाऽदरोपहृतसार्ध्यसपर्यया स प्रीतो ददौ निजपदं परमं रमेशः ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = धर्मो यतोऽस्य वनगस्य नितान्तशक्तिह्रासे स्वधर्मकरणस्य हुताशनादौ । | | verse_text = धर्मो यतोऽस्य वनगस्य नितान्तशक्तिह्रासे स्वधर्मकरणस्य हुताशनादौ । | ||
| verse_lines = धर्मो यतोऽस्य वनगस्य नितान्तशक्तिह्रासे स्वधर्मकरणस्य हुताशनादौ | | verse_lines = धर्मो यतोऽस्य वनगस्य नितान्तशक्तिह्रासे स्वधर्मकरणस्य हुताशनादौ ।¦देहात्ययः स तत एव तनुं निजाग्नौ सन्त्यज्य रामपुरतः प्रययौ परेशम् ॥ १९॥ | ||
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| verse_text = रामोऽपि तत्र ददृशे धनदस्य शापाद् गन्धर्वमुर्वशिरतेरथ यातुधानीम् । | | verse_text = रामोऽपि तत्र ददृशे धनदस्य शापाद् गन्धर्वमुर्वशिरतेरथ यातुधानीम् । | ||
| verse_lines = रामोऽपि तत्र ददृशे धनदस्य शापाद् गन्धर्वमुर्वशिरतेरथ यातुधानीम् | | verse_lines = रामोऽपि तत्र ददृशे धनदस्य शापाद् गन्धर्वमुर्वशिरतेरथ यातुधानीम् ।¦प्राप्तं दशां सपदि तुम्बुरुनामधेयं नाम्ना विराधमपि शर्ववरादवध्यम् ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = भङ्क्त्वाऽस्य बाहुयुगलं बिलगं चकार सम्मानयन् वचनमम्बुजजन्मनोऽसौ । | | verse_text = भङ्क्त्वाऽस्य बाहुयुगलं बिलगं चकार सम्मानयन् वचनमम्बुजजन्मनोऽसौ । | ||
| verse_lines = भङ्क्त्वाऽस्य बाहुयुगलं बिलगं चकार सम्मानयन् वचनमम्बुजजन्मनोऽसौ | | verse_lines = भङ्क्त्वाऽस्य बाहुयुगलं बिलगं चकार सम्मानयन् वचनमम्बुजजन्मनोऽसौ ।¦प्रादाच्च तस्य सुगतिं निजगायकस्य भक्षार्थमंसकमितोऽपि सहानुजेन ॥ २१॥ | ||
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| verse_text = प्रीतिं विधित्सुरगमद्भवनं निजस्य कुम्भोद्भवस्य परमादरतोऽमुना च । | | verse_text = प्रीतिं विधित्सुरगमद्भवनं निजस्य कुम्भोद्भवस्य परमादरतोऽमुना च । | ||
| verse_lines = प्रीतिं विधित्सुरगमद्भवनं निजस्य कुम्भोद्भवस्य परमादरतोऽमुना च | | verse_lines = प्रीतिं विधित्सुरगमद्भवनं निजस्य कुम्भोद्भवस्य परमादरतोऽमुना च ।¦सम्पूजितो धनुरनेन गृहीतमिन्द्राच्छार्ङ्गं तदादिपुरुषो निजमाजहार ॥ २२॥ | ||
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| verse_text = आत्मार्थमेव हि पुरा हरिणा प्रदत्तमिन्द्रे तदिन्द्र उत रामकरार्थमेव । | | verse_text = आत्मार्थमेव हि पुरा हरिणा प्रदत्तमिन्द्रे तदिन्द्र उत रामकरार्थमेव । | ||
| verse_lines = आत्मार्थमेव हि पुरा हरिणा प्रदत्तमिन्द्रे तदिन्द्र उत रामकरार्थमेव | | verse_lines = आत्मार्थमेव हि पुरा हरिणा प्रदत्तमिन्द्रे तदिन्द्र उत रामकरार्थमेव ।¦प्रादादगस्त्यमुनये तदवाप्य रामो रक्षन् ऋषीनवसदेव स दण्डकेषु ॥ २३॥ | ||
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| verse_text = काले तदैव खरदूषणयोर्बलेन रक्षःस्वसा पतिनिमार्गणतत्पराऽऽसीत् । | | verse_text = काले तदैव खरदूषणयोर्बलेन रक्षःस्वसा पतिनिमार्गणतत्पराऽऽसीत् । | ||
| verse_lines = काले तदैव खरदूषणयोर्बलेन रक्षःस्वसा पतिनिमार्गणतत्पराऽऽसीत् | | verse_lines = काले तदैव खरदूषणयोर्बलेन रक्षःस्वसा पतिनिमार्गणतत्पराऽऽसीत् ।¦व्यापादिते निजपतौ हि दशाननेन प्रामादिकेन विधिनाऽभिससार रामम् ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = साऽनुज्ञयैव रजनीचरभर्तुरुग्रा भ्रातृद्वयेन सहिता वनमावसन्ती । | | verse_text = साऽनुज्ञयैव रजनीचरभर्तुरुग्रा भ्रातृद्वयेन सहिता वनमावसन्ती । | ||
| verse_lines = साऽनुज्ञयैव रजनीचरभर्तुरुग्रा भ्रातृद्वयेन सहिता वनमावसन्ती | | verse_lines = साऽनुज्ञयैव रजनीचरभर्तुरुग्रा भ्रातृद्वयेन सहिता वनमावसन्ती ।¦रामं समेत्य भव मे पतिरित्यवोचद्भानुं यथा तम उपेत्य सुयोगकामम् ॥ २५॥ | ||
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| verse_text = तां तत्र हास्यकथया जनकासुताग्रे गच्छानुजं म इह मेति वचः स उक्त्वा । | | verse_text = तां तत्र हास्यकथया जनकासुताग्रे गच्छानुजं म इह मेति वचः स उक्त्वा । | ||
| verse_lines = तां तत्र हास्यकथया जनकासुताग्रे गच्छानुजं म इह मेति वचः स उक्त्वा | | verse_lines = तां तत्र हास्यकथया जनकासुताग्रे गच्छानुजं म इह मेति वचः स उक्त्वा ।¦तेनैव दुष्टचरितां हि विकर्णनासां चक्रे समस्तरजनीचरनाशहेतोः ॥ २६॥ | ||
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| verse_text = तत्प्रेरितान् सपदि भीमबलान् प्रयातांस्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् । | | verse_text = तत्प्रेरितान् सपदि भीमबलान् प्रयातांस्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् । | ||
| verse_lines = तत्प्रेरितान् सपदि भीमबलान् प्रयातांस्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् | | verse_lines = तत्प्रेरितान् सपदि भीमबलान् प्रयातांस्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् ।¦जघ्ने चतुर्दशसहस्रमवारणीयकोदण्डपाणिरखिलस्य सुखं विधातुम् ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = दत्तेऽभये रघुवरेण महामुनीनां दत्ते भये च रजनीचरमण्डलस्य | | verse_lines = दत्तेऽभये रघुवरेण महामुनीनां दत्ते भये च रजनीचरमण्डलस्य ।¦रक्षःपतिः स्वसृमुखादविकम्पनाच्च श्रुत्वा बलं रघुपतेः परमाप चिन्ताम् ॥ २८॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वाऽऽशु कार्यमवमृश्य जगाम तीरे क्षेत्रं नदीनदपतेः श्रवणं धरित्र्याः । | | verse_text = श्रुत्वाऽऽशु कार्यमवमृश्य जगाम तीरे क्षेत्रं नदीनदपतेः श्रवणं धरित्र्याः । | ||
| verse_lines = श्रुत्वाऽऽशु कार्यमवमृश्य जगाम तीरे क्षेत्रं नदीनदपतेः श्रवणं धरित्र्याः | | verse_lines = श्रुत्वाऽऽशु कार्यमवमृश्य जगाम तीरे क्षेत्रं नदीनदपतेः श्रवणं धरित्र्याः ।¦मारीचमत्र तपसि प्रतिवर्तमानं भीतं शराद्रघुपतेर्नितरां ददर्श ॥ २९॥ | ||
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| verse_lines = तेनार्थितः सपदि राघववञ्चनार्थे मारीच आह शरवेगममुष्य जानन् | | verse_lines = तेनार्थितः सपदि राघववञ्चनार्थे मारीच आह शरवेगममुष्य जानन् ।¦शक्यो न ते रघुवरेण हि विग्रहोऽत्र जानामि संस्पर्शमस्य शरस्य पूर्वम् ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तवन्तमथ रावण आह खड्गं निष्कृष्य हन्मि यदि मे न करोषि वाक्यम् | | verse_lines = इत्युक्तवन्तमथ रावण आह खड्गं निष्कृष्य हन्मि यदि मे न करोषि वाक्यम् ।¦तच्छुश्रुवान् भययुतोऽथ निसर्गतश्च पापो जगाम रघुवर्यसकाशमाशु ॥ ३१॥ | ||
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| verse_text = मार्गे व्रजन्तमभियाय ततो हनूमान् संवारितो रविसुतेन च जानमानः । | | verse_text = मार्गे व्रजन्तमभियाय ततो हनूमान् संवारितो रविसुतेन च जानमानः । | ||
| verse_lines = मार्गे व्रजन्तमभियाय ततो हनूमान् संवारितो रविसुतेन च जानमानः | | verse_lines = मार्गे व्रजन्तमभियाय ततो हनूमान् संवारितो रविसुतेन च जानमानः ।¦दैवं तु कार्यमथ कीर्तिमभीप्समानो रामस्य नैनमहनद्वचनाद्धरेश्व ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = प्राप्यैव राक्षस उताऽऽत्मपुरीं स तत्र सीताकृतिं प्रतिनिधाय ररक्ष चाथ । | | verse_text = प्राप्यैव राक्षस उताऽऽत्मपुरीं स तत्र सीताकृतिं प्रतिनिधाय ररक्ष चाथ । | ||
| verse_lines = प्राप्यैव राक्षस उताऽऽत्मपुरीं स तत्र सीताकृतिं प्रतिनिधाय ररक्ष चाथ | | verse_lines = प्राप्यैव राक्षस उताऽऽत्मपुरीं स तत्र सीताकृतिं प्रतिनिधाय ररक्ष चाथ ।¦रामोऽपि तत्तु विनिहत्य सुदुष्टरक्षः प्राप्याऽश्रमं स्वदयितां नहि पश्यतीव ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = अन्वेषमाण इव तं च ददर्श गृध्रं सीतां रिरक्षिषुमथो रिपुणा विशस्तम् । | | verse_text = अन्वेषमाण इव तं च ददर्श गृध्रं सीतां रिरक्षिषुमथो रिपुणा विशस्तम् । | ||
| verse_lines = अन्वेषमाण इव तं च ददर्श गृध्रं सीतां रिरक्षिषुमथो रिपुणा विशस्तम् | | verse_lines = अन्वेषमाण इव तं च ददर्श गृध्रं सीतां रिरक्षिषुमथो रिपुणा विशस्तम् ।¦मन्दात्मचेष्टममुनोक्तमरेश्च कर्म श्रुत्वा मृतं तमदहत् स्वगतिं तथाऽदात् ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = अन्यत्र चैव विचरन् सहितोऽनुजेन प्राप्तः करौ स सहसाऽथ कबन्धनाम्नः । | | verse_text = अन्यत्र चैव विचरन् सहितोऽनुजेन प्राप्तः करौ स सहसाऽथ कबन्धनाम्नः । | ||
| verse_lines = अन्यत्र चैव विचरन् सहितोऽनुजेन प्राप्तः करौ स सहसाऽथ कबन्धनाम्नः | | verse_lines = अन्यत्र चैव विचरन् सहितोऽनुजेन प्राप्तः करौ स सहसाऽथ कबन्धनाम्नः ।¦धातुर्वरादखिलजायिन उज्झितस्य मृत्योश्च वज्रपतनादतिकुञ्चितस्य ॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = छित्वाऽस्य बाहुयुगलं सहितोऽनुजेन तं पूर्ववत् प्रतिविधाय सुरेन्द्रभृत्यम् । | | verse_text = छित्वाऽस्य बाहुयुगलं सहितोऽनुजेन तं पूर्ववत् प्रतिविधाय सुरेन्द्रभृत्यम् । | ||
| verse_lines = छित्वाऽस्य बाहुयुगलं सहितोऽनुजेन तं पूर्ववत् प्रतिविधाय सुरेन्द्रभृत्यम् | | verse_lines = छित्वाऽस्य बाहुयुगलं सहितोऽनुजेन तं पूर्ववत् प्रतिविधाय सुरेन्द्रभृत्यम् ।¦नाम्ना दनुं त्रिजटयैव पुराऽभिजातं गन्धर्वमाशु च ततोऽपि तदर्चितोऽगात् ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वा तमेव शबरी परमं हरिं च ज्ञात्वा विवेश दहनं पुरतोऽस्य तस्यै । | | verse_text = दृष्ट्वा तमेव शबरी परमं हरिं च ज्ञात्वा विवेश दहनं पुरतोऽस्य तस्यै । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा तमेव शबरी परमं हरिं च ज्ञात्वा विवेश दहनं पुरतोऽस्य तस्यै | | verse_lines = दृष्ट्वा तमेव शबरी परमं हरिं च ज्ञात्वा विवेश दहनं पुरतोऽस्य तस्यै ।¦प्रादात् स्वलोकमिममेव हि सा प्रतीक्ष्य पूर्वं मतङ्गवचनेन वनेऽत्र साऽभूत् ॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = शापाद् वराप्सरसमेव हि तां विमुच्य शच्या कृतात् पतिपुरस्त्वतिदर्पहेतोः । | | verse_text = शापाद् वराप्सरसमेव हि तां विमुच्य शच्या कृतात् पतिपुरस्त्वतिदर्पहेतोः । | ||
| verse_lines = शापाद् वराप्सरसमेव हि तां विमुच्य शच्या कृतात् पतिपुरस्त्वतिदर्पहेतोः | | verse_lines = शापाद् वराप्सरसमेव हि तां विमुच्य शच्या कृतात् पतिपुरस्त्वतिदर्पहेतोः ।¦गत्वा ददर्श पवनात्मजमृश्यमूके स ह्येक एनमवगच्छति सम्यगीशम् ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = देहेऽपि यत्र पवनोऽत्र हरिर्यतोऽसौ तत्रैव वायुरिति वेदवचः प्रसिद्धम् । | | verse_text = देहेऽपि यत्र पवनोऽत्र हरिर्यतोऽसौ तत्रैव वायुरिति वेदवचः प्रसिद्धम् । | ||
| verse_lines = देहेऽपि यत्र पवनोऽत्र हरिर्यतोऽसौ तत्रैव वायुरिति वेदवचः प्रसिद्धम् | | verse_lines = देहेऽपि यत्र पवनोऽत्र हरिर्यतोऽसौ तत्रैव वायुरिति वेदवचः प्रसिद्धम् ।¦‘कस्मिन् न्वहं’ त्विति तथैव हि सोऽवतारे तस्मात् स मारुतिकृते रविजं ररक्ष ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = एवं स कृष्णतनुरर्जुनमप्यरक्षद् भीमार्थमेव तदरिं रविजं निहत्य । | | verse_text = एवं स कृष्णतनुरर्जुनमप्यरक्षद् भीमार्थमेव तदरिं रविजं निहत्य । | ||
| verse_lines = एवं स कृष्णतनुरर्जुनमप्यरक्षद् भीमार्थमेव तदरिं रविजं निहत्य | | verse_lines = एवं स कृष्णतनुरर्जुनमप्यरक्षद् भीमार्थमेव तदरिं रविजं निहत्य ।¦पूर्वं हि मारुतिमवाप रवेः सुतोऽयं तेनास्य वालिनमहन् रघुपः प्रतीपम् ॥ ४७॥ | ||
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| verse_lines = एवं सुराश्च पवनस्य वशे यतोऽतः सुग्रीवमत्र तु परत्र च शक्रसूनुम् | | verse_lines = एवं सुराश्च पवनस्य वशे यतोऽतः सुग्रीवमत्र तु परत्र च शक्रसूनुम् ।¦सर्वे श्रिता हनुमतस्तदनुग्रहाय तत्रागमद् रघुपतिः सह लक्ष्मणेन ॥ ४८॥ | ||
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| verse_lines = ‘यत्पादपङ्कजरजः शिरसा विभर्ति श्रीरब्जजश्च गिरिशः सह लोकपालैः’ | | verse_lines = ‘यत्पादपङ्कजरजः शिरसा विभर्ति श्रीरब्जजश्च गिरिशः सह लोकपालैः’ ।¦सर्वेश्वरस्य परमस्य हि सर्वशक्तेः किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः ॥ ४९॥ | ||
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| verse_lines = समागते तु राघवे प्लवङ्गमाः ससूर्यजाः | | verse_lines = समागते तु राघवे प्लवङ्गमाः ससूर्यजाः ।¦विपुप्लुवुर्भयार्दिता न्यवारयच्च मारुतिः (भा\.पु\. १०\.५८\.३८)॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = संस्थाप्याऽशु हरीन्द्रान् जानन् विष्णोर्गुणाननन्तान् सः | | verse_lines = संस्थाप्याऽशु हरीन्द्रान् जानन् विष्णोर्गुणाननन्तान् सः ।¦साक्षाद् ब्रह्मपिताऽसावित्येतेनास्य पादयोः पेते ॥ ५१॥ | ||
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<span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C6" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षष्ठोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ उत्थाप्य चैनमरविन्ददलायताक्षश्चक्राङ्कितेन वरदेन कराम्बुजेन । | | verse_text = औं ॥ उत्थाप्य चैनमरविन्ददलायताक्षश्चक्राङ्कितेन वरदेन कराम्बुजेन । | ||
| verse_lines = औं ॥ उत्थाप्य चैनमरविन्ददलायताक्षश्चक्राङ्कितेन वरदेन कराम्बुजेन | | verse_lines = औं ॥ उत्थाप्य चैनमरविन्ददलायताक्षश्चक्राङ्कितेन वरदेन कराम्बुजेन ।¦कृत्वा च संविदमनेन नुतोऽस्य चांसं प्रीत्याऽऽरुरोह स हसन् सह लक्ष्मणेन ॥ १॥ | ||
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| verse_text = आरोप्य चांसयुगळं भगवन्तमेनं तस्यानुजं च हनुमान् प्रययौ कपीन्द्रम् । | | verse_text = आरोप्य चांसयुगळं भगवन्तमेनं तस्यानुजं च हनुमान् प्रययौ कपीन्द्रम् । | ||
| verse_lines = आरोप्य चांसयुगळं भगवन्तमेनं तस्यानुजं च हनुमान् प्रययौ कपीन्द्रम् | | verse_lines = आरोप्य चांसयुगळं भगवन्तमेनं तस्यानुजं च हनुमान् प्रययौ कपीन्द्रम् ।¦सख्यं चकार हुतभुक्प्रमुखे च तस्य रामेण शाश्वतनिजार्तिहरेण शीघ्रम् ॥ २॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वाऽस्य दुःखमथ देववरः प्रतिज्ञां चक्रे स वालिनिधनाय हरीश्वरोऽपि । | | verse_text = श्रुत्वाऽस्य दुःखमथ देववरः प्रतिज्ञां चक्रे स वालिनिधनाय हरीश्वरोऽपि । | ||
| verse_lines = श्रुत्वाऽस्य दुःखमथ देववरः प्रतिज्ञां चक्रे स वालिनिधनाय हरीश्वरोऽपि | | verse_lines = श्रुत्वाऽस्य दुःखमथ देववरः प्रतिज्ञां चक्रे स वालिनिधनाय हरीश्वरोऽपि ।¦सीतानुमार्गणकृतेऽथ स वालिनैव क्षिप्तां हि दुन्दुभितनुं समदर्शयच्च ॥ ३॥ | ||
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| verse_lines = वीक्ष्यैव तां निपतितामथ रामदेवः सोऽङ्गुष्ठमात्रचलनादतिलीलयैव | | verse_lines = वीक्ष्यैव तां निपतितामथ रामदेवः सोऽङ्गुष्ठमात्रचलनादतिलीलयैव ।¦सम्प्रास्य योजनशतेऽथ तयैव चोर्वीं सर्वान् विदार्य दितिजानहनद्रसास्थान् ॥ ४॥ | ||
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| verse_lines = शर्वप्रसादजबलाद्दितिजानवध्यान् सर्वान् निहत्य कुणपेन पुनश्च सख्या | | verse_lines = शर्वप्रसादजबलाद्दितिजानवध्यान् सर्वान् निहत्य कुणपेन पुनश्च सख्या ।¦भीतेन वालिबलतः कथितः स्म सप्तसालान् प्रदर्श्य दितिजान् सुदृढांश्च वज्रात् ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = एकैकमेषु स विकम्पयितुं समर्थः पत्राणि लोप्तुमपि तूत्सहते न शक्तः । | | verse_text = एकैकमेषु स विकम्पयितुं समर्थः पत्राणि लोप्तुमपि तूत्सहते न शक्तः । | ||
| verse_lines = एकैकमेषु स विकम्पयितुं समर्थः पत्राणि लोप्तुमपि तूत्सहते न शक्तः | | verse_lines = एकैकमेषु स विकम्पयितुं समर्थः पत्राणि लोप्तुमपि तूत्सहते न शक्तः ।¦विष्वक्स्थितान् यदि भवान् प्रतिभेत्स्यतीमानेकेषुणा तर्हि वालिवधे समर्थः ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = जेतुं चतुर्गुणबलो हि पुमान् प्रभुः स्याद्धन्तुं शताधिकबलोऽतिबलं सुशक्तः । | | verse_text = जेतुं चतुर्गुणबलो हि पुमान् प्रभुः स्याद्धन्तुं शताधिकबलोऽतिबलं सुशक्तः । | ||
| verse_lines = जेतुं चतुर्गुणबलो हि पुमान् प्रभुः स्याद्धन्तुं शताधिकबलोऽतिबलं सुशक्तः | | verse_lines = जेतुं चतुर्गुणबलो हि पुमान् प्रभुः स्याद्धन्तुं शताधिकबलोऽतिबलं सुशक्तः ।¦तस्मादिमान् हरिहयात्मजबाह्वलोप्यपत्रान् विभिद्य मम संशयमाशु भिन्धि ॥ ७॥ | ||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽस्य वाक्यमवमृश्य दितेः सुतांस्तान् धातुर्वरादखिलपुम्भिरभेद्यरूपान् | | verse_lines = श्रुत्वाऽस्य वाक्यमवमृश्य दितेः सुतांस्तान् धातुर्वरादखिलपुम्भिरभेद्यरूपान् ।¦ब्रह्मत्वमाप्तुमचलं तपसि प्रवृत्तानेकेषुणा सपदि तान् प्रबिभेद रामः ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = सन्धाय कार्मुकवरे निशिते तु बाणेऽथाऽकृष्य दक्षिणभुजेन तदा प्रमुक्ते । | | verse_text = सन्धाय कार्मुकवरे निशिते तु बाणेऽथाऽकृष्य दक्षिणभुजेन तदा प्रमुक्ते । | ||
| verse_lines = सन्धाय कार्मुकवरे निशिते तु बाणेऽथाऽकृष्य दक्षिणभुजेन तदा प्रमुक्ते | | verse_lines = सन्धाय कार्मुकवरे निशिते तु बाणेऽथाऽकृष्य दक्षिणभुजेन तदा प्रमुक्ते ।¦रामेण सत्वरमनन्तबलेन सर्वे चूर्णीकृताः सपदि ते तरवो रवेण ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = रामाज्ञयैव लतया रविजे विभक्ते वायोः सुतेन रघुपेण शरे च मुक्ते । | | verse_text = रामाज्ञयैव लतया रविजे विभक्ते वायोः सुतेन रघुपेण शरे च मुक्ते । | ||
| verse_lines = रामाज्ञयैव लतया रविजे विभक्ते वायोः सुतेन रघुपेण शरे च मुक्ते | | verse_lines = रामाज्ञयैव लतया रविजे विभक्ते वायोः सुतेन रघुपेण शरे च मुक्ते ।¦श्रुत्वाऽस्य शब्दमतुलं हृदि तेन विद्ध इन्द्रात्मजो गिरिरिवापतदाशु सन्नः ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = भक्तो ममैष यदि मामभिपश्यतीह पादौ ध्रुवं मम समेष्यति निर्विचारः । | | verse_text = भक्तो ममैष यदि मामभिपश्यतीह पादौ ध्रुवं मम समेष्यति निर्विचारः । | ||
| verse_lines = भक्तो ममैष यदि मामभिपश्यतीह पादौ ध्रुवं मम समेष्यति निर्विचारः | | verse_lines = भक्तो ममैष यदि मामभिपश्यतीह पादौ ध्रुवं मम समेष्यति निर्विचारः ।¦योग्यो वधो नहि जनस्य पदानतस्य राज्यार्थिना रविसुतेन वधोऽर्थितश्च ॥ १९॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = कार्यं ह्यभीष्टमपि तत् प्रणतस्य पूर्वं शस्तो वधो न पदयोः प्रणतस्य चैव । | | verse_text = कार्यं ह्यभीष्टमपि तत् प्रणतस्य पूर्वं शस्तो वधो न पदयोः प्रणतस्य चैव । | ||
| verse_lines = कार्यं ह्यभीष्टमपि तत् प्रणतस्य पूर्वं शस्तो वधो न पदयोः प्रणतस्य चैव | | verse_lines = कार्यं ह्यभीष्टमपि तत् प्रणतस्य पूर्वं शस्तो वधो न पदयोः प्रणतस्य चैव ।¦तस्माददृश्यतनुरेव निहन्मि शक्रपुत्रं त्वितिस्म तमदृष्टतया जघान ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = यः प्रेरकः सकललोकबलस्य नित्यं पूर्णाव्ययोच्चबलवीर्यतनुः स्वतन्त्रः । | | verse_text = यः प्रेरकः सकललोकबलस्य नित्यं पूर्णाव्ययोच्चबलवीर्यतनुः स्वतन्त्रः । | ||
| verse_lines = यः प्रेरकः सकललोकबलस्य नित्यं पूर्णाव्ययोच्चबलवीर्यतनुः स्वतन्त्रः | | verse_lines = यः प्रेरकः सकललोकबलस्य नित्यं पूर्णाव्ययोच्चबलवीर्यतनुः स्वतन्त्रः ।¦किं तस्य दृष्टिपथगस्य च वानरोऽयं कर्तैशचापमपि येन पुरा प्रभग्नम् ॥ २१॥ | ||
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| verse_text = सन्नेऽथ वालिनि जगाम च तस्य पार्श्वं प्राहैनमार्द्रवचसा यदि वाञ्छसि त्वम् । | | verse_text = सन्नेऽथ वालिनि जगाम च तस्य पार्श्वं प्राहैनमार्द्रवचसा यदि वाञ्छसि त्वम् । | ||
| verse_lines = सन्नेऽथ वालिनि जगाम च तस्य पार्श्वं प्राहैनमार्द्रवचसा यदि वाञ्छसि त्वम् | | verse_lines = सन्नेऽथ वालिनि जगाम च तस्य पार्श्वं प्राहैनमार्द्रवचसा यदि वाञ्छसि त्वम् ।¦उज्जीवयिष्य इति नैच्छदसौ त्वदग्रे को नाम नेच्छति मृतिं पुरुषोत्तमेति ॥ २२॥ | ||
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| verse_text = कार्याणि तस्य चरमाणि विधाय पुत्रं त्वग्रे निधाय रविजः कपिराज्य आसीत् । | | verse_text = कार्याणि तस्य चरमाणि विधाय पुत्रं त्वग्रे निधाय रविजः कपिराज्य आसीत् । | ||
| verse_lines = कार्याणि तस्य चरमाणि विधाय पुत्रं त्वग्रे निधाय रविजः कपिराज्य आसीत् | | verse_lines = कार्याणि तस्य चरमाणि विधाय पुत्रं त्वग्रे निधाय रविजः कपिराज्य आसीत् ।¦रामोऽपि तद्गिरिवरे चतुरोऽथ मासान् दृष्ट्वा घनागममुवास सलक्ष्मणोऽसौ ॥ २३॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = अथातिसक्ते क्षितिपे कपीनां प्रविस्मृते रामकृतोपकारे । | | verse_text = अथातिसक्ते क्षितिपे कपीनां प्रविस्मृते रामकृतोपकारे । | ||
| verse_lines = अथातिसक्ते क्षितिपे कपीनां प्रविस्मृते रामकृतोपकारे | | verse_lines = अथातिसक्ते क्षितिपे कपीनां प्रविस्मृते रामकृतोपकारे ।¦प्रसह्य तं बुद्धिमतां वरिष्ठो रामाङ्घ्रिभक्तो हनुमानुवाच ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = न विस्मृतिस्ते रघुवर्यकार्ये कार्या कथञ्चित् स हि नोऽभिपूज्यः । | | verse_text = न विस्मृतिस्ते रघुवर्यकार्ये कार्या कथञ्चित् स हि नोऽभिपूज्यः । | ||
| verse_lines = न विस्मृतिस्ते रघुवर्यकार्ये कार्या कथञ्चित् स हि नोऽभिपूज्यः | | verse_lines = न विस्मृतिस्ते रघुवर्यकार्ये कार्या कथञ्चित् स हि नोऽभिपूज्यः ।¦न चेत् स्वयं कर्तुमभीष्टमद्य ते ध्रुवं बलेनापि हि कारयामि ॥ २५॥ | ||
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| verse_text = स एवमुक्त्वा हरिराजसन्निधौ द्वीपेषु सप्तस्वपि वानरान् प्रति । | | verse_text = स एवमुक्त्वा हरिराजसन्निधौ द्वीपेषु सप्तस्वपि वानरान् प्रति । | ||
| verse_lines = स एवमुक्त्वा हरिराजसन्निधौ द्वीपेषु सप्तस्वपि वानरान् प्रति | | verse_lines = स एवमुक्त्वा हरिराजसन्निधौ द्वीपेषु सप्तस्वपि वानरान् प्रति ।¦सम्मेलनायाऽशुगतीन् स्म वानरान् प्रस्थापयामास समस्तशः प्रभुः ॥ २६॥ | ||
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| verse_text = हरीश्वराज्ञाप्रणिधानपूर्वकं हनूमता ते प्रहिता हि वानराः । | | verse_text = हरीश्वराज्ञाप्रणिधानपूर्वकं हनूमता ते प्रहिता हि वानराः । | ||
| verse_lines = हरीश्वराज्ञाप्रणिधानपूर्वकं हनूमता ते प्रहिता हि वानराः | | verse_lines = हरीश्वराज्ञाप्रणिधानपूर्वकं हनूमता ते प्रहिता हि वानराः ।¦समस्तशैलद्रुमषण्डसंस्थितान् हरीन् समादाय तदाऽभिजग्मुः ॥ २७॥ | ||
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| verse_text = तदैव रामोऽपि हि भोगसक्तं प्रमत्तमालक्ष्य कपीश्वरं प्रभुः । | | verse_text = तदैव रामोऽपि हि भोगसक्तं प्रमत्तमालक्ष्य कपीश्वरं प्रभुः । | ||
| verse_lines = तदैव रामोऽपि हि भोगसक्तं प्रमत्तमालक्ष्य कपीश्वरं प्रभुः | | verse_lines = तदैव रामोऽपि हि भोगसक्तं प्रमत्तमालक्ष्य कपीश्वरं प्रभुः ।¦जगाद सौमित्रिमिदं वचो मे प्लवङ्गमेशाय वदाऽशु याहि ॥ २८॥ | ||
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| verse_text = यदि प्रमत्तोऽसि मदीयकार्ये नयाम्यहं त्वेन्द्रसुतस्य मार्गम् । | | verse_text = यदि प्रमत्तोऽसि मदीयकार्ये नयाम्यहं त्वेन्द्रसुतस्य मार्गम् । | ||
| verse_lines = यदि प्रमत्तोऽसि मदीयकार्ये नयाम्यहं त्वेन्द्रसुतस्य मार्गम् | | verse_lines = यदि प्रमत्तोऽसि मदीयकार्ये नयाम्यहं त्वेन्द्रसुतस्य मार्गम् ।¦प्रायः स्वकार्ये प्रतिपादिते हि मदोद्धता न प्रतिकर्तुमीशते ॥ २९॥ | ||
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| verse_text = इतीड्यरामेण समीरिते तदा ययौ सबाणः सधनुः स लक्ष्मणः । | | verse_text = इतीड्यरामेण समीरिते तदा ययौ सबाणः सधनुः स लक्ष्मणः । | ||
| verse_lines = इतीड्यरामेण समीरिते तदा ययौ सबाणः सधनुः स लक्ष्मणः | | verse_lines = इतीड्यरामेण समीरिते तदा ययौ सबाणः सधनुः स लक्ष्मणः ।¦दृष्ट्वैव तं तेन सहैव तापनिर्भयाद्ययौ रामपदान्तिकं त्वरन् ॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = हनूमतः साधुवचोभिराशु प्रसन्नचेतस्यधिपे कपीनाम् । | | verse_text = हनूमतः साधुवचोभिराशु प्रसन्नचेतस्यधिपे कपीनाम् । | ||
| verse_lines = हनूमतः साधुवचोभिराशु प्रसन्नचेतस्यधिपे कपीनाम् | | verse_lines = हनूमतः साधुवचोभिराशु प्रसन्नचेतस्यधिपे कपीनाम् ।¦समागते सर्वहरिप्रवीरैः सहैव तं वीक्ष्य ननन्द राघवः ॥ ३१॥ | ||
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| verse_text = ससम्भ्रमं तं पतितं पदाब्जयोस्त्वरन् समुत्थाप्य समाश्लिषत् प्रभुः । | | verse_text = ससम्भ्रमं तं पतितं पदाब्जयोस्त्वरन् समुत्थाप्य समाश्लिषत् प्रभुः । | ||
| verse_lines = ससम्भ्रमं तं पतितं पदाब्जयोस्त्वरन् समुत्थाप्य समाश्लिषत् प्रभुः | | verse_lines = ससम्भ्रमं तं पतितं पदाब्जयोस्त्वरन् समुत्थाप्य समाश्लिषत् प्रभुः ।¦स चोपविष्टो जगदीशसन्निधौ तदाज्ञयैवाऽऽदिशदाशु वानरान् ॥ ३२॥ | ||
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| verse_text = समस्तदिक्षु प्रहितेषु तेन प्रभुर्हनूमन्तमिदं बभाषे । | | verse_text = समस्तदिक्षु प्रहितेषु तेन प्रभुर्हनूमन्तमिदं बभाषे । | ||
| verse_lines = समस्तदिक्षु प्रहितेषु तेन प्रभुर्हनूमन्तमिदं बभाषे | | verse_lines = समस्तदिक्षु प्रहितेषु तेन प्रभुर्हनूमन्तमिदं बभाषे ।¦न कश्चिदीशस्त्वदृतेऽस्ति साधने समस्तकार्यप्रवरस्य मेऽस्य ॥ ३३॥ | ||
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| verse_lines = अतस्त्वमेव प्रतियाहि दक्षिणां दिशं समादाय मदङ्गुलीयकम् | | verse_lines = अतस्त्वमेव प्रतियाहि दक्षिणां दिशं समादाय मदङ्गुलीयकम् ।¦इतीरितोऽसौ पुरुषोत्तमेन ययौ दिशं तां युवराजयुक्तः ॥ ३४॥ | ||
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| verse_text = समस्तदिक्षु प्रतियापिता हि ते हरीश्वराज्ञामुपधार्य मासतः । | | verse_text = समस्तदिक्षु प्रतियापिता हि ते हरीश्वराज्ञामुपधार्य मासतः । | ||
| verse_lines = समस्तदिक्षु प्रतियापिता हि ते हरीश्वराज्ञामुपधार्य मासतः | | verse_lines = समस्तदिक्षु प्रतियापिता हि ते हरीश्वराज्ञामुपधार्य मासतः ।¦समाययुस्तेऽङ्गदजाम्बवन्मुखाः सुतेन वायोः सहिता न चाययुः ॥ ३५॥ | ||
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| verse_text = समस्तदुर्गप्रवरं दुरासदं विमार्गतां विन्ध्यगिरिं महात्मनाम् । | | verse_text = समस्तदुर्गप्रवरं दुरासदं विमार्गतां विन्ध्यगिरिं महात्मनाम् । | ||
| verse_lines = समस्तदुर्गप्रवरं दुरासदं विमार्गतां विन्ध्यगिरिं महात्मनाम् | | verse_lines = समस्तदुर्गप्रवरं दुरासदं विमार्गतां विन्ध्यगिरिं महात्मनाम् ।¦गतः स कालो हरिराडुदीरितः समासदंश्चाथ बिलं महाद्भुतम् ॥ ३६॥ | ||
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| verse_text = कृतं मयेनातिविचित्रमुत्तमं समीक्ष्य तत्तार उवाच चाङ्गदम् । | | verse_text = कृतं मयेनातिविचित्रमुत्तमं समीक्ष्य तत्तार उवाच चाङ्गदम् । | ||
| verse_lines = कृतं मयेनातिविचित्रमुत्तमं समीक्ष्य तत्तार उवाच चाङ्गदम् | | verse_lines = कृतं मयेनातिविचित्रमुत्तमं समीक्ष्य तत्तार उवाच चाङ्गदम् ।¦वयं न यामो हरिराजसन्निधिं विलङ्घितो नः समयो यतोऽस्य ॥ ३७॥ | ||
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| verse_text = दुरासदोऽसावतिचण्डशासनो हनिष्यति त्वामपि किं मदादिकान् । | | verse_text = दुरासदोऽसावतिचण्डशासनो हनिष्यति त्वामपि किं मदादिकान् । | ||
| verse_lines = दुरासदोऽसावतिचण्डशासनो हनिष्यति त्वामपि किं मदादिकान् | | verse_lines = दुरासदोऽसावतिचण्डशासनो हनिष्यति त्वामपि किं मदादिकान् ।¦अगम्यमेतद् बिलमाप्य तत् सुखं वसाम सर्वे किमसाविहाऽऽचरेत् ॥ ३८॥ | ||
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| verse_text = न चैव रामेण सलक्ष्मणेन प्रयोजनं नो वनचारिणां सदा । | | verse_text = न चैव रामेण सलक्ष्मणेन प्रयोजनं नो वनचारिणां सदा । | ||
| verse_lines = न चैव रामेण सलक्ष्मणेन प्रयोजनं नो वनचारिणां सदा | | verse_lines = न चैव रामेण सलक्ष्मणेन प्रयोजनं नो वनचारिणां सदा ।¦न चेह नः पीडयितुं स च क्षमस्ततो ममेयं सुविनिश्चिता मतिः ॥ ३९॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितं मातुलवाक्यमाशु स आददे वालिसुतोऽपि सादरम् | | verse_lines = इतीरितं मातुलवाक्यमाशु स आददे वालिसुतोऽपि सादरम् ।¦उवाच वाक्यं च न नो हरीश्वरः क्षमी भवेल्लङ्घितशासनानाम् ॥ ४०॥ | ||
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| verse_lines = राज्यार्थिना येन हि घातितोऽग्रजो हृताश्च दाराः सुनृशंसकेन | | verse_lines = राज्यार्थिना येन हि घातितोऽग्रजो हृताश्च दाराः सुनृशंसकेन ।¦स नः कथं रक्षति शासनातिगान् निराश्रयान् दुर्बलकान् बले स्थितः ॥ ४१॥ | ||
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| verse_lines = इतीरिते शक्रसुतात्मजेन तथेति होचुः सह जाम्बवन्मुखाः | | verse_lines = इतीरिते शक्रसुतात्मजेन तथेति होचुः सह जाम्बवन्मुखाः ।¦सर्वेऽपि तेषामथ चैकमत्यं दृष्ट्वा हनूमानिदमाबभाषे ॥ ४२॥ | ||
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| verse_lines = विज्ञातमेतद्धि मयाऽङ्गदस्य राज्याय ताराभिहितं हि वाक्यम् | | verse_lines = विज्ञातमेतद्धि मयाऽङ्गदस्य राज्याय ताराभिहितं हि वाक्यम् ।¦साध्यं न चैतन्नहि वायुसूनू रामप्रतीपं वचनं सहेत ॥ ४३॥ | ||
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| verse_lines = न चाहमाक्रष्टुमुपायतोऽपि शक्यः कथञ्चित् सकलैः समेतैः | | verse_lines = न चाहमाक्रष्टुमुपायतोऽपि शक्यः कथञ्चित् सकलैः समेतैः ।¦सन्मार्गतो नैव च राघवस्य दुरन्तशक्तेर्बिलमप्रधृष्यम् ॥ ४४॥ | ||
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| verse_lines = वचो ममैतद्यदि चाऽऽदरेण ग्राह्यं भवेद्वस्तदतिप्रियं मे | | verse_lines = वचो ममैतद्यदि चाऽऽदरेण ग्राह्यं भवेद्वस्तदतिप्रियं मे ।¦न चेद् बलादप्यनये प्रवृत्तान् प्रशास्य सन्मार्गगतान् करोमि ॥ ४५॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितं तत् पवनात्मजस्य श्रुत्वाऽतिभीता धृतमूकभावाः | | verse_lines = इतीरितं तत् पवनात्मजस्य श्रुत्वाऽतिभीता धृतमूकभावाः ।¦सर्वेऽनुजग्मुस्तमथाद्रिमुख्यं महेन्द्रमासेदुरगाधबोधाः ॥ ४६॥ | ||
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| verse_lines = निरीक्ष्य ते सागरमप्रधृष्यमपारमेयं सहसा विषण्णाः | | verse_lines = निरीक्ष्य ते सागरमप्रधृष्यमपारमेयं सहसा विषण्णाः ।¦दृढं निराशाश्च मतिं हि दध्रुः प्रायोपवेशाय तथा च चक्रुः ॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = स रावणस्याथ गतिं सुतोक्तां निवेद्य दृष्ट्वा जनकात्मजाकृतिम् । | | verse_text = स रावणस्याथ गतिं सुतोक्तां निवेद्य दृष्ट्वा जनकात्मजाकृतिम् । | ||
| verse_lines = स रावणस्याथ गतिं सुतोक्तां निवेद्य दृष्ट्वा जनकात्मजाकृतिम् | | verse_lines = स रावणस्याथ गतिं सुतोक्तां निवेद्य दृष्ट्वा जनकात्मजाकृतिम् ।¦स्वयं तथाऽशोकवने निषण्णामवोचदेभ्यो हरिपुङ्गवेभ्यः ॥ ५१॥ | ||
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| verse_text = ततस्तु ते ब्रह्मसुतेन पृष्टा न्यवेदयन्नात्मबलं पृथक् पृथक् । | | verse_text = ततस्तु ते ब्रह्मसुतेन पृष्टा न्यवेदयन्नात्मबलं पृथक् पृथक् । | ||
| verse_lines = ततस्तु ते ब्रह्मसुतेन पृष्टा न्यवेदयन्नात्मबलं पृथक् पृथक् | | verse_lines = ततस्तु ते ब्रह्मसुतेन पृष्टा न्यवेदयन्नात्मबलं पृथक् पृथक् ।¦दशैव चाऽरभ्य दशोत्तरस्य क्रमात् पथो योजनतोऽभियाने ॥ ५२॥ | ||
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| verse_text = सनीलमैन्दद्विविदाः सताराः सर्वेऽप्यशीत्याः परतो न शक्ताः । | | verse_text = सनीलमैन्दद्विविदाः सताराः सर्वेऽप्यशीत्याः परतो न शक्ताः । | ||
| verse_lines = सनीलमैन्दद्विविदाः सताराः सर्वेऽप्यशीत्याः परतो न शक्ताः | | verse_lines = सनीलमैन्दद्विविदाः सताराः सर्वेऽप्यशीत्याः परतो न शक्ताः ।¦गन्तुं यदाऽऽथाऽत्मबलं स जाम्बवान् जगाद तस्मात् पुनरष्टमांशम् ॥ ५३॥ | ||
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| verse_text = बलेर्यदा विष्णुरवाप लोकांस्त्रिभिः क्रमैर्नन्दिरवं प्रकुर्वता । | | verse_text = बलेर्यदा विष्णुरवाप लोकांस्त्रिभिः क्रमैर्नन्दिरवं प्रकुर्वता । | ||
| verse_lines = बलेर्यदा विष्णुरवाप लोकांस्त्रिभिः क्रमैर्नन्दिरवं प्रकुर्वता | | verse_lines = बलेर्यदा विष्णुरवाप लोकांस्त्रिभिः क्रमैर्नन्दिरवं प्रकुर्वता ।¦तदा मया भ्रान्तमिदं जगत्त्रयं सवेदनं जानु ममाऽऽस मेरुतः ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = अतो जवो मे न हि पूर्वसम्मितः पुरा त्वहं षण्णवतिप्लवोऽस्मि । | | verse_text = अतो जवो मे न हि पूर्वसम्मितः पुरा त्वहं षण्णवतिप्लवोऽस्मि । | ||
| verse_lines = अतो जवो मे न हि पूर्वसम्मितः पुरा त्वहं षण्णवतिप्लवोऽस्मि | | verse_lines = अतो जवो मे न हि पूर्वसम्मितः पुरा त्वहं षण्णवतिप्लवोऽस्मि ।¦ततः कुमारोऽङ्गद आह चास्माच्छतं प्लवेयं न ततोऽभिजाने ॥ ५५॥ | ||
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| verse_text = अपूरिते तैः सकलैः शतस्य गमागमे शत्रुबलं च वीक्ष्य । | | verse_text = अपूरिते तैः सकलैः शतस्य गमागमे शत्रुबलं च वीक्ष्य । | ||
| verse_lines = अपूरिते तैः सकलैः शतस्य गमागमे शत्रुबलं च वीक्ष्य | | verse_lines = अपूरिते तैः सकलैः शतस्य गमागमे शत्रुबलं च वीक्ष्य ।¦सुदुर्गमत्वं च निशाचरेशपुर्याः स धातुः सुत आबभाषे ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = अयं हि गृध्रः शतयोजनं गिरिं त्रिकूटमाहेत उतात्र विघ्नाः । | | verse_text = अयं हि गृध्रः शतयोजनं गिरिं त्रिकूटमाहेत उतात्र विघ्नाः । | ||
| verse_lines = अयं हि गृध्रः शतयोजनं गिरिं त्रिकूटमाहेत उतात्र विघ्नाः | | verse_lines = अयं हि गृध्रः शतयोजनं गिरिं त्रिकूटमाहेत उतात्र विघ्नाः ।¦भवेयुरन्येऽपि ततो हनूमानेकः समर्थो न परोऽस्ति कश्चित् ॥ ५७॥ | ||
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| verse_text = उक्त्वा स इत्थं पुनराह सूनुं प्राणस्य निःसीमबलं प्रशंसयन् । | | verse_text = उक्त्वा स इत्थं पुनराह सूनुं प्राणस्य निःसीमबलं प्रशंसयन् । | ||
| verse_lines = उक्त्वा स इत्थं पुनराह सूनुं प्राणस्य निःसीमबलं प्रशंसयन् | | verse_lines = उक्त्वा स इत्थं पुनराह सूनुं प्राणस्य निःसीमबलं प्रशंसयन् ।¦त्वमेक एवात्र परं समर्थः कुरुष्व चैतत् परिपाहि वानरान् ॥ ५८॥ | ||
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| verse_text = इतीरितोऽसौ हनुमान् निजेप्सितं तेषामशक्तिं प्रकटां विधाय । | | verse_text = इतीरितोऽसौ हनुमान् निजेप्सितं तेषामशक्तिं प्रकटां विधाय । | ||
| verse_lines = इतीरितोऽसौ हनुमान् निजेप्सितं तेषामशक्तिं प्रकटां विधाय | | verse_lines = इतीरितोऽसौ हनुमान् निजेप्सितं तेषामशक्तिं प्रकटां विधाय ।¦अवर्धताऽऽशु प्रविचिन्त्य रामं सुपूर्णशक्तिं चरितोस्तदाज्ञाम् ॥ ५९॥ | ||
}} | }} | ||
<span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C7" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तमोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ रामाय शाश्वतसुविस्तृतषड्गुणाय सर्वेश्वराय सुखसारमहार्णवाय। | | verse_text = औं ॥ रामाय शाश्वतसुविस्तृतषड्गुणाय सर्वेश्वराय सुखसारमहार्णवाय। | ||
| verse_lines = औं ॥ रामाय शाश्वतसुविस्तृतषड्गुणाय सर्वेश्वराय | | verse_lines = औं ॥ रामाय शाश्वतसुविस्तृतषड्गुणाय सर्वेश्वराय सुखसारमहार्णवाय।¦नत्वा लिलङ्घयिषुरर्णवमुत्पपात निष्पीड्य तं गिरिवरं पवनस्य सूनुः ॥ १॥ | ||
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| verse_text = चुक्षोभ वारिधिरनुप्रययौ च शीघ्रं यादोगणैः सह तदीयबलाभिकृष्टः । | | verse_text = चुक्षोभ वारिधिरनुप्रययौ च शीघ्रं यादोगणैः सह तदीयबलाभिकृष्टः । | ||
| verse_lines = चुक्षोभ वारिधिरनुप्रययौ च शीघ्रं यादोगणैः सह तदीयबलाभिकृष्टः | | verse_lines = चुक्षोभ वारिधिरनुप्रययौ च शीघ्रं यादोगणैः सह तदीयबलाभिकृष्टः ।¦वृक्षाश्च पर्वतगताः पवनेन पूर्वं क्षिप्तोऽर्णवे गिरिरुदागमदस्य हेतोः ॥ २॥ | ||
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| verse_text = श्यालो हरस्य गिरिपक्षविनाशकाले क्षिप्तोऽर्णवे स मरुतोर्वरितात्मपक्षः । | | verse_text = श्यालो हरस्य गिरिपक्षविनाशकाले क्षिप्तोऽर्णवे स मरुतोर्वरितात्मपक्षः । | ||
| verse_lines = श्यालो हरस्य गिरिपक्षविनाशकाले क्षिप्तोऽर्णवे स मरुतोर्वरितात्मपक्षः | | verse_lines = श्यालो हरस्य गिरिपक्षविनाशकाले क्षिप्तोऽर्णवे स मरुतोर्वरितात्मपक्षः ।¦हैमो गिरिः पवनजस्य तु विश्रमार्थमुद्भिद्य वारिधिमवर्द्धदनेकसानुः ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = नैवात्र विश्रमणमैच्छत निःश्रमोऽसौ निःसीमपौरुषगुणस्य कुतः श्रमोऽस्य । | | verse_text = नैवात्र विश्रमणमैच्छत निःश्रमोऽसौ निःसीमपौरुषगुणस्य कुतः श्रमोऽस्य । | ||
| verse_lines = नैवात्र विश्रमणमैच्छत निःश्रमोऽसौ निःसीमपौरुषगुणस्य कुतः श्रमोऽस्य | | verse_lines = नैवात्र विश्रमणमैच्छत निःश्रमोऽसौ निःसीमपौरुषगुणस्य कुतः श्रमोऽस्य ।¦आश्लिष्य पर्वतवरं स ददर्श गच्छन् देवैस्तु नागजननीं प्रहितां वरेण ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = जिज्ञासुभिर्निजबलं तव भक्षमेतु यद्यत् त्वमिच्छसि तदित्यमरोदितायाः । | | verse_text = जिज्ञासुभिर्निजबलं तव भक्षमेतु यद्यत् त्वमिच्छसि तदित्यमरोदितायाः । | ||
| verse_lines = जिज्ञासुभिर्निजबलं तव भक्षमेतु यद्यत् त्वमिच्छसि तदित्यमरोदितायाः | | verse_lines = जिज्ञासुभिर्निजबलं तव भक्षमेतु यद्यत् त्वमिच्छसि तदित्यमरोदितायाः ।¦आस्यं प्रविश्य सपदि प्रविनिस्सृतोऽस्माद् देवाननन्दयदुत स्वृतमेषु रक्षन् ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वा सुरप्रणयितां बलमस्य चोग्रं देवाः प्रतुष्टुवुरमुं सुमनोभिवृष्ट्या । | | verse_text = दृष्ट्वा सुरप्रणयितां बलमस्य चोग्रं देवाः प्रतुष्टुवुरमुं सुमनोभिवृष्ट्या । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा सुरप्रणयितां बलमस्य चोग्रं देवाः प्रतुष्टुवुरमुं सुमनोभिवृष्ट्या | | verse_lines = दृष्ट्वा सुरप्रणयितां बलमस्य चोग्रं देवाः प्रतुष्टुवुरमुं सुमनोभिवृष्ट्या ।¦तैरादृतः पुनरसौ वियतैव गच्छन् छायाग्रहं प्रतिददर्श च सिंहिकाख्यम् ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = लङ्कावनाय सकलस्य च निग्रहेऽस्याः सामर्थ्यमप्रतिहतं प्रददौ विधाता । | | verse_text = लङ्कावनाय सकलस्य च निग्रहेऽस्याः सामर्थ्यमप्रतिहतं प्रददौ विधाता । | ||
| verse_lines = लङ्कावनाय सकलस्य च निग्रहेऽस्याः सामर्थ्यमप्रतिहतं प्रददौ विधाता | | verse_lines = लङ्कावनाय सकलस्य च निग्रहेऽस्याः सामर्थ्यमप्रतिहतं प्रददौ विधाता ।¦छायामवाक्षिपदसौ पवनात्मजस्य सोऽस्याः शरीरमनुविश्य बिभेद चाऽशु ॥ ७॥ | ||
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| verse_lines = निस्सीममात्मबलमित्यनुदर्शयानो हत्वैव तामपि विधातृवराभिगुप्ताम् | | verse_lines = निस्सीममात्मबलमित्यनुदर्शयानो हत्वैव तामपि विधातृवराभिगुप्ताम् ।¦लम्बे स लम्बशिखरे निपपात लङ्काप्राकाररूपकगिरावथ सञ्चुकोच ॥ ८॥ | ||
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| verse_lines = भूत्वा बिडालसमितो निशि तां पुरीं च प्राप्स्यन् ददर्श निजरूपवतीं स लङ्काम् | | verse_lines = भूत्वा बिडालसमितो निशि तां पुरीं च प्राप्स्यन् ददर्श निजरूपवतीं स लङ्काम् ।¦रुद्धोऽनयाऽऽश्वथ विजित्य च तां स्वमुष्टिपिष्टां तयाऽनुमत एव विवेश लङ्काम् ॥ ९॥ | ||
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| verse_lines = मार्गमाणो बहिश्चान्तः सोऽशोकवनिकातले | | verse_lines = मार्गमाणो बहिश्चान्तः सोऽशोकवनिकातले ।¦ददर्श शिंशपावृक्षमूलस्थितरमाकृतिम् ॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = नरलोकविडम्बस्य जानन् रामस्य हृद्गतम् | | verse_lines = नरलोकविडम्बस्य जानन् रामस्य हृद्गतम् ।¦तस्य चेष्टानुसारेण कृत्वा चेष्टाश्च संविदः ॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = तादृक्चेष्टासमेताया अङ्गुलीयमदात् ततः | | verse_lines = तादृक्चेष्टासमेताया अङ्गुलीयमदात् ततः ।¦सीताया यानि चैवाऽऽसन्नाकृतेस्तानि सर्वशः ॥ १२॥ | ||
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| verse_lines = भूषणानि द्विधा भूत्वा तान्येवाऽसन् तथैव च | | verse_lines = भूषणानि द्विधा भूत्वा तान्येवाऽसन् तथैव च ।¦अथ चूडामणिं दिव्यं दातुं रामाय सा ददौ ॥ १३॥ | ||
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| verse_lines = यद्यप्येतन्न पश्यन्ति निशाचरगणास्तु ते | | verse_lines = यद्यप्येतन्न पश्यन्ति निशाचरगणास्तु ते ।¦द्युलोकचारिणः सर्वं पश्यन्त्यृषय एव च ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_lines = तेषां विडम्बनायैव दैत्यानां वञ्चनाय च | | verse_lines = तेषां विडम्बनायैव दैत्यानां वञ्चनाय च ।¦पश्यतां कलिमुख्यानां विडम्बोऽयं कृतो भवेत् ॥ १५॥ | ||
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| verse_lines = कृत्वा कार्यमिदं सर्वं विशङ्कः पवनात्मजः | | verse_lines = कृत्वा कार्यमिदं सर्वं विशङ्कः पवनात्मजः ।¦आत्माविष्करणे चित्तं चक्रे मतिमतां वरः ॥ १६॥ | ||
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| verse_lines = अथ वनमखिलं तद् रावणस्यावलुम्प्य क्षितिरुहमिममेकं वर्जयित्वाऽऽशु वीरः | | verse_lines = अथ वनमखिलं तद् रावणस्यावलुम्प्य क्षितिरुहमिममेकं वर्जयित्वाऽऽशु वीरः ।¦रजनिचरविनाशं काङ्क्षमाणोऽतिवेलं मुहुरतिरवनादी तोरणं चाऽऽरुरोह ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = निधार्य एव रावणः स राघवस्य नान्यथा । | | verse_text = निधार्य एव रावणः स राघवस्य नान्यथा । | ||
| verse_lines = निधार्य एव रावणः स राघवस्य नान्यथा | | verse_lines = निधार्य एव रावणः स राघवस्य नान्यथा ।¦यदीन्द्रजिन्मया हतो न चास्य शक्तिरीक्ष्यते ॥ २७॥ | ||
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| verse_text = अतस्तयोः समो मया तृतीय एष हन्यते । | | verse_text = अतस्तयोः समो मया तृतीय एष हन्यते । | ||
| verse_lines = अतस्तयोः समो मया तृतीय एष हन्यते | | verse_lines = अतस्तयोः समो मया तृतीय एष हन्यते ।¦विचार्य चैवमाशु तं पदोः प्रगृह्य पुप्लुवे ॥ २८॥ | ||
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| verse_text = स चक्रवद् भ्रमातुरं विधाय रावणात्मजम् । | | verse_text = स चक्रवद् भ्रमातुरं विधाय रावणात्मजम् । | ||
| verse_lines = स चक्रवद् भ्रमातुरं विधाय रावणात्मजम् | | verse_lines = स चक्रवद् भ्रमातुरं विधाय रावणात्मजम् ।¦अपोथयद् धरातले क्षणेन मारुतीतनुः ॥ २९॥ | ||
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| verse_text = विचूर्णिते धरातले निजे सुते स रावणः । | | verse_text = विचूर्णिते धरातले निजे सुते स रावणः । | ||
| verse_lines = विचूर्णिते धरातले निजे सुते स रावणः | | verse_lines = विचूर्णिते धरातले निजे सुते स रावणः ।¦निशम्य शोकतापितस्तदग्रजं समादिशत् ॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = अथेन्द्रजिन्महाशरैर्वरास्त्रसम्प्रयोजितैः । | | verse_text = अथेन्द्रजिन्महाशरैर्वरास्त्रसम्प्रयोजितैः । | ||
| verse_lines = अथेन्द्रजिन्महाशरैर्वरास्त्रसम्प्रयोजितैः | | verse_lines = अथेन्द्रजिन्महाशरैर्वरास्त्रसम्प्रयोजितैः ।¦ततक्ष वानरोत्तमं न चाशकद् विचालने ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = अथास्त्रमुत्तमं विधेर्युयोज सर्वदुस्सहम् | | verse_lines = अथास्त्रमुत्तमं विधेर्युयोज सर्वदुस्सहम् ।¦स तेन ताडितो हरिर्व्यचिन्तयन्निराकुलः ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = मया वरा विलङ्घिता ह्यनेकशः स्वयम्भुवः | | verse_lines = मया वरा विलङ्घिता ह्यनेकशः स्वयम्भुवः ।¦स माननीय एव मे ततोऽत्र मानयाम्यहम् ॥ ३३॥ | ||
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| verse_text = इमे च कुर्युरत्र किं प्रहृष्टरक्षसां गणाः । | | verse_text = इमे च कुर्युरत्र किं प्रहृष्टरक्षसां गणाः । | ||
| verse_lines = इमे च कुर्युरत्र किं प्रहृष्टरक्षसां गणाः | | verse_lines = इमे च कुर्युरत्र किं प्रहृष्टरक्षसां गणाः ।¦इतीह लक्ष्यमेव मे स रावणश्च दृश्यते ॥ ३४॥ | ||
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| verse_lines = इदं समीक्ष्य बद्धवत् स्थितं कपीन्द्रमाशु ते | | verse_lines = इदं समीक्ष्य बद्धवत् स्थितं कपीन्द्रमाशु ते ।¦बबन्धुरन्यपाशकैर्जगाम चास्त्रमस्य तत् ॥ ३५॥ | ||
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| verse_lines = अथ प्रगृह्य तं कपिं समीपमानयंश्च ते | | verse_lines = अथ प्रगृह्य तं कपिं समीपमानयंश्च ते ।¦निशाचरेश्वरस्य तं स पृष्टवांश्च रावणः ॥ ३६॥ | ||
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| verse_text = कपे कुतोऽसि कस्य वा किमर्थमीदृशं कृतम् । | | verse_text = कपे कुतोऽसि कस्य वा किमर्थमीदृशं कृतम् । | ||
| verse_lines = कपे कुतोऽसि कस्य वा किमर्थमीदृशं कृतम् | | verse_lines = कपे कुतोऽसि कस्य वा किमर्थमीदृशं कृतम् ।¦इतीरितः स चावदत् प्रणम्य राममीश्वरम् ॥ ३७॥ | ||
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| verse_text = अवैहि दूतमागतं दुरन्तविक्रमस्य माम् । | | verse_text = अवैहि दूतमागतं दुरन्तविक्रमस्य माम् । | ||
| verse_lines = अवैहि दूतमागतं दुरन्तविक्रमस्य माम् | | verse_lines = अवैहि दूतमागतं दुरन्तविक्रमस्य माम् ।¦रघूत्तमस्य मारुतिं कुलक्षये तवेश्वरम् ॥ ३८॥ | ||
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| verse_text = न चेत् प्रदास्यसि त्वरन् रघूत्तमप्रियां तदा । | | verse_text = न चेत् प्रदास्यसि त्वरन् रघूत्तमप्रियां तदा । | ||
| verse_lines = न चेत् प्रदास्यसि त्वरन् रघूत्तमप्रियां तदा | | verse_lines = न चेत् प्रदास्यसि त्वरन् रघूत्तमप्रियां तदा ।¦सपुत्रमित्रबान्धवो विनाशमाशु यास्यसि ॥ ३९॥ | ||
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| verse_lines = न रामबाणधारणे क्षमाः सुरेश्वरा अपि | | verse_lines = न रामबाणधारणे क्षमाः सुरेश्वरा अपि ।¦विरिञ्चिशर्वपूर्वकाः किमु त्वमल्पसारकः ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = प्रकोपितस्य तस्य कः पुरस्थितौ क्षमो भवेत् । | | verse_text = प्रकोपितस्य तस्य कः पुरस्थितौ क्षमो भवेत् । | ||
| verse_lines = प्रकोपितस्य तस्य कः पुरस्थितौ क्षमो भवेत् | | verse_lines = प्रकोपितस्य तस्य कः पुरस्थितौ क्षमो भवेत् ।¦सुरासुरोरगादिके जगत्यचिन्त्यकर्मणः ॥ ४१॥ | ||
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| verse_lines = इतीरिते वधोद्यतं न्यवारयद् विभीषणः | | verse_lines = इतीरिते वधोद्यतं न्यवारयद् विभीषणः ।¦स पुच्छदाहकर्मणि न्ययोजयन्निशाचरान् ॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = अथास्य वस्त्रसञ्चयैः पिधाय पुच्छमग्नये । | | verse_text = अथास्य वस्त्रसञ्चयैः पिधाय पुच्छमग्नये । | ||
| verse_lines = अथास्य वस्त्रसञ्चयैः पिधाय पुच्छमग्नये | | verse_lines = अथास्य वस्त्रसञ्चयैः पिधाय पुच्छमग्नये ।¦दुदुर्ददाह नास्य तन्मरुत्सखो हुताशनः ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = ममर्ष सर्वचेष्टितं स रक्षसां निरामयः । | | verse_text = ममर्ष सर्वचेष्टितं स रक्षसां निरामयः । | ||
| verse_lines = ममर्ष सर्वचेष्टितं स रक्षसां निरामयः | | verse_lines = ममर्ष सर्वचेष्टितं स रक्षसां निरामयः ।¦बलोद्धतश्च कौतुकात् प्रदग्धुमेव तां पुरीम् ॥ ४४॥ | ||
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| verse_lines = ददाह चाखिलं पुरं स्वपुच्छगेन वह्निना | | verse_lines = ददाह चाखिलं पुरं स्वपुच्छगेन वह्निना ।¦कृतस्तु विश्वकर्मणोऽप्यदह्यतास्य तेजसा ॥ ४५॥ | ||
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| verse_lines = सुवर्णरत्नकारितां स राक्षसोत्तमैः सह | | verse_lines = सुवर्णरत्नकारितां स राक्षसोत्तमैः सह ।¦प्रदह्य सर्वशः पुरीं मुदाऽन्वितो जगर्ज च ॥ ४६॥ | ||
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| verse_lines = स रावणं सपुत्रकं तृणोपमं विधाय च | | verse_lines = स रावणं सपुत्रकं तृणोपमं विधाय च ।¦तयोः प्रपश्यतोः पुरं विधाय भस्मसाद्ययौ ॥ ४७॥ | ||
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| verse_lines = विलङ्घ्य चार्णवं पुनः स्वजातिभिः प्रपूजितः | | verse_lines = विलङ्घ्य चार्णवं पुनः स्वजातिभिः प्रपूजितः ।¦प्रभक्ष्य वानरेशितुर्मधु प्रभुं समेयिवान् ॥ ४८॥ | ||
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| verse_lines = रामं सुरेश्वरमगण्यगुणाभिरामं सम्प्राप्य सर्वकपिवीरवरैः समेतः | | verse_lines = रामं सुरेश्वरमगण्यगुणाभिरामं सम्प्राप्य सर्वकपिवीरवरैः समेतः ।¦चूडामणिं पवनजः पदयोर्निधाय सर्वाङ्गकैः प्रणतिमस्य चकार भक्त्या ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = रामोऽपि नान्यदनुदातुममुष्य योग्यमत्यन्तभक्तिभरितस्य विलक्ष्य किञ्चित् । | | verse_text = रामोऽपि नान्यदनुदातुममुष्य योग्यमत्यन्तभक्तिभरितस्य विलक्ष्य किञ्चित् । | ||
| verse_lines = रामोऽपि नान्यदनुदातुममुष्य योग्यमत्यन्तभक्तिभरितस्य विलक्ष्य किञ्चित् | | verse_lines = रामोऽपि नान्यदनुदातुममुष्य योग्यमत्यन्तभक्तिभरितस्य विलक्ष्य किञ्चित् ।¦स्वात्मप्रदानमधिकं पवनात्मजस्य कुर्वन् समाश्लिषदमुं परमाभितुष्टः ॥ ५०॥ | ||
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<span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C8" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टमोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ श्रुत्वा हनूमदुदितं कृतमस्य सर्वं प्रीतः प्रयाणमभिरोचयते स रामः । | | verse_text = औं ॥ श्रुत्वा हनूमदुदितं कृतमस्य सर्वं प्रीतः प्रयाणमभिरोचयते स रामः । | ||
| verse_lines = औं ॥ श्रुत्वा हनूमदुदितं कृतमस्य सर्वं प्रीतः प्रयाणमभिरोचयते स रामः | | verse_lines = औं ॥ श्रुत्वा हनूमदुदितं कृतमस्य सर्वं प्रीतः प्रयाणमभिरोचयते स रामः ।¦आरुह्य वायुसुतमङ्गदगेन युक्तः सौमित्रिणा सरविजः सह सेनयाऽगात् ॥ १॥ | ||
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| verse_text = सम्प्राप्य दक्षिणमपान्निधिमत्र देवः शिश्ये जगद्गुरुतमोऽप्यविषह्यशक्तिः (विचिन्त्यशक्तिः) । | | verse_text = सम्प्राप्य दक्षिणमपान्निधिमत्र देवः शिश्ये जगद्गुरुतमोऽप्यविषह्यशक्तिः (विचिन्त्यशक्तिः) । | ||
| verse_lines = सम्प्राप्य दक्षिणमपान्निधिमत्र देवः शिश्ये जगद्गुरुतमोऽप्यविषह्यशक्तिः (विचिन्त्यशक्तिः) | | verse_lines = सम्प्राप्य दक्षिणमपान्निधिमत्र देवः शिश्ये जगद्गुरुतमोऽप्यविषह्यशक्तिः (विचिन्त्यशक्तिः) ।¦अग्रे हि मार्दवमनुप्रथयन् स धर्मं पन्थानमर्थितुमपाम्पतितः प्रतीतः ॥ २॥ | ||
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| verse_text = ब्रह्मात्मजेन रविजेन बलप्रणेत्रा नीलेन मैन्दविविदाङ्गदतारपूर्वैः । | | verse_text = ब्रह्मात्मजेन रविजेन बलप्रणेत्रा नीलेन मैन्दविविदाङ्गदतारपूर्वैः । | ||
| verse_lines = ब्रह्मात्मजेन रविजेन बलप्रणेत्रा नीलेन मैन्दविविदाङ्गदतारपूर्वैः | | verse_lines = ब्रह्मात्मजेन रविजेन बलप्रणेत्रा नीलेन मैन्दविविदाङ्गदतारपूर्वैः ।¦सर्वैश्च शत्रुसदनादुपयात एष भ्राताऽस्य न ग्रहणयोग्य इति स्थिरोक्तः ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तवन्तममुमाश्वनुगृह्य बाणं तस्मै धृतं दितिसुतात्मसु चान्त्यजेषु ।(भा\.पु\. ९\.१०\.१३\-१५) | | verse_text = इत्युक्तवन्तममुमाश्वनुगृह्य बाणं तस्मै धृतं दितिसुतात्मसु चान्त्यजेषु ।(भा\.पु\. ९\.१०\.१३\-१५) | ||
| verse_lines = इत्युक्तवन्तममुमाश्वनुगृह्य बाणं तस्मै धृतं दितिसुतात्मसु चान्त्यजेषु ।(भा\.पु\. ९\.१०\.१३\-१५) | | verse_lines = इत्युक्तवन्तममुमाश्वनुगृह्य बाणं तस्मै धृतं दितिसुतात्मसु चान्त्यजेषु ।(भा\.पु\. ९\.१०\.१३\-१५)¦शार्वाद्वराद्विगतमृत्युषु दुर्जयेषु निःसङ्ख्यकेष्वमुचदाशु ददाह सर्वान् ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = कृत्वेरिणं तदथ मूलफलानि चात्र सम्यग्विधाय भवशत्रुरमोघचेष्टः । | | verse_text = कृत्वेरिणं तदथ मूलफलानि चात्र सम्यग्विधाय भवशत्रुरमोघचेष्टः । | ||
| verse_lines = कृत्वेरिणं तदथ मूलफलानि चात्र सम्यग्विधाय भवशत्रुरमोघचेष्टः | | verse_lines = कृत्वेरिणं तदथ मूलफलानि चात्र सम्यग्विधाय भवशत्रुरमोघचेष्टः ।¦बद्धुं दिदेश सुरवर्धकिणोऽवतारं तज्जं नलं हरिवरानपरांश्च सेतुम् ॥ १४॥ | ||
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| verse_text = बध्वोदधौ रघुपतिर्विविधाद्रिकूटैः सेतुं कपीन्द्रकरकम्पितभूरुहाङ्गैः । | | verse_text = बध्वोदधौ रघुपतिर्विविधाद्रिकूटैः सेतुं कपीन्द्रकरकम्पितभूरुहाङ्गैः । | ||
| verse_lines = बध्वोदधौ रघुपतिर्विविधाद्रिकूटैः सेतुं कपीन्द्रकरकम्पितभूरुहाङ्गैः | | verse_lines = बध्वोदधौ रघुपतिर्विविधाद्रिकूटैः सेतुं कपीन्द्रकरकम्पितभूरुहाङ्गैः ।¦सुग्रीवनीलहनुमत्प्रमुखैरनेकैर्लङ्कां विभीषणदृशाऽविशदाशु दग्धाम् ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = प्राप्तं निशम्य परमं भुवनैकसारं निःसीमपौरुषमनन्तमसौ दशास्यः । | | verse_text = प्राप्तं निशम्य परमं भुवनैकसारं निःसीमपौरुषमनन्तमसौ दशास्यः । | ||
| verse_lines = प्राप्तं निशम्य परमं भुवनैकसारं निःसीमपौरुषमनन्तमसौ दशास्यः | | verse_lines = प्राप्तं निशम्य परमं भुवनैकसारं निःसीमपौरुषमनन्तमसौ दशास्यः ।¦त्रासाद्विषण्णहृदयो नितरां बभूव कर्तव्यकर्मविषये च विमूढचेताः ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = प्रस्थाप्य वालिसुतमेव च राजनीत्यै रामस्तदुक्तवचनेऽप्यमुनाऽगृहीते । | | verse_text = प्रस्थाप्य वालिसुतमेव च राजनीत्यै रामस्तदुक्तवचनेऽप्यमुनाऽगृहीते । | ||
| verse_lines = प्रस्थाप्य वालिसुतमेव च राजनीत्यै रामस्तदुक्तवचनेऽप्यमुनाऽगृहीते | | verse_lines = प्रस्थाप्य वालिसुतमेव च राजनीत्यै रामस्तदुक्तवचनेऽप्यमुनाऽगृहीते ।¦द्वारो रुरोध स च तत्र उदीर्णसैन्यो रक्षःपतेः पुर उदारगुणः परेशः ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = द्वारां निरोधसमये स दिदेश पुत्रं वाराम्पतेर्दिशि सुरेश्वरशत्रुमुग्रम् । | | verse_text = द्वारां निरोधसमये स दिदेश पुत्रं वाराम्पतेर्दिशि सुरेश्वरशत्रुमुग्रम् । | ||
| verse_lines = द्वारां निरोधसमये स दिदेश पुत्रं वाराम्पतेर्दिशि सुरेश्वरशत्रुमुग्रम् | | verse_lines = द्वारां निरोधसमये स दिदेश पुत्रं वाराम्पतेर्दिशि सुरेश्वरशत्रुमुग्रम् ।¦प्राच्यां प्रहस्तमदिशद्दिशि वज्रदंष्ट्रं प्रेताधिपस्य शशिनः स्वयमेव चागात् ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = विज्ञाय तत् स भगवान् हनुमन्तमेव देवेन्द्रशत्रुविजयाय दिदेश चाऽऽशु । | | verse_text = विज्ञाय तत् स भगवान् हनुमन्तमेव देवेन्द्रशत्रुविजयाय दिदेश चाऽऽशु । | ||
| verse_lines = विज्ञाय तत् स भगवान् हनुमन्तमेव देवेन्द्रशत्रुविजयाय दिदेश चाऽऽशु | | verse_lines = विज्ञाय तत् स भगवान् हनुमन्तमेव देवेन्द्रशत्रुविजयाय दिदेश चाऽऽशु ।¦नीलं प्रहस्तनिधनाय च वज्रदंष्ट्रं हन्तुं सुरेन्द्रसुतसूनुमथाऽऽदिदेश ॥ १९॥ | ||
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| verse_text = मध्ये हरीश्वरमधिज्य धनुर्नियुज्य यस्यां स राक्षसपतिस्स्वयमेव तां हि । | | verse_text = मध्ये हरीश्वरमधिज्य धनुर्नियुज्य यस्यां स राक्षसपतिस्स्वयमेव तां हि । | ||
| verse_lines = मध्ये हरीश्वरमधिज्य धनुर्नियुज्य यस्यां स राक्षसपतिस्स्वयमेव तां हि | | verse_lines = मध्ये हरीश्वरमधिज्य धनुर्नियुज्य यस्यां स राक्षसपतिस्स्वयमेव तां हि ।¦उद्दिश्य संस्थित उपात्तशरः सखड्गो देदीप्यमानवपुरुत्तमपूरुषोऽसौ ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = विद्रावितो हनुमतेन्द्रजिदाशु हस्तं तस्य प्रपन्न इव वीर्यममुष्य जानन् । | | verse_text = विद्रावितो हनुमतेन्द्रजिदाशु हस्तं तस्य प्रपन्न इव वीर्यममुष्य जानन् । | ||
| verse_lines = विद्रावितो हनुमतेन्द्रजिदाशु हस्तं तस्य प्रपन्न इव वीर्यममुष्य जानन् | | verse_lines = विद्रावितो हनुमतेन्द्रजिदाशु हस्तं तस्य प्रपन्न इव वीर्यममुष्य जानन् ।¦नीलो विभीषण उभौ शिलया च शक्त्या सञ्चक्रतुर्यमवशं गमितं प्रहस्तम् ॥ २१॥ | ||
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| verse_lines = नीलस्य नैव वशमेति स इत्यमोघशक्त्या विभीषण इमं प्रजहार साकम् | | verse_lines = नीलस्य नैव वशमेति स इत्यमोघशक्त्या विभीषण इमं प्रजहार साकम् ।¦तस्मिन् हतेऽङ्गद उपेत्य जघान वज्रदंष्ट्रं निपात्य भुवि शीर्षममुष्य (मृत्नन्) मृद्गन् ॥ २२॥ | ||
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| verse_lines = सर्वेषु तेषु निहतेषु दिदेश धूम्रनेत्रं स राक्षसपतिः स च पश्चिमेन | | verse_lines = सर्वेषु तेषु निहतेषु दिदेश धूम्रनेत्रं स राक्षसपतिः स च पश्चिमेन ।¦द्वारेण मारुतसुतं समुपेत्य दग्धो गुप्तोऽपि शूलिवचनेन दुरन्तशक्तिम् ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = अकम्पनोऽपि राक्षसो निशाचरेशचोदितः | | verse_lines = अकम्पनोऽपि राक्षसो निशाचरेशचोदितः ।¦उमापतेर्वरोद्धतः क्षणाद्धतो हनूमता ॥ २४॥ | ||
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| verse_lines = अथास्त्रसम्प्रदीपितैः समस्तशो महोल्मुकैः | | verse_lines = अथास्त्रसम्प्रदीपितैः समस्तशो महोल्मुकैः ।¦रघुप्रवीरचोदिताः पुरं निशि स्वदाहयन् ॥ २५॥ | ||
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| verse_lines = ततस्तौ निकुम्भोऽथ कुम्भश्च कोपात् प्रदिष्टौ दशास्येन कुम्भश्रुतेर्हि | | verse_lines = ततस्तौ निकुम्भोऽथ कुम्भश्च कोपात् प्रदिष्टौ दशास्येन कुम्भश्रुतेर्हि ।¦सुतौ सुप्रहृष्टौ रणायाभियातौ कपींस्तान् बहिः सर्वशो यातयित्वा ॥ २६॥ | ||
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| verse_lines = स कुम्भो विधातुः सुतं तारनीलौ नलं चाश्विपुत्रौ जिगायाङ्गदं च | | verse_lines = स कुम्भो विधातुः सुतं तारनीलौ नलं चाश्विपुत्रौ जिगायाङ्गदं च ।¦सुयुद्धं च कृत्वा दिनेशात्मजेन प्रणीतो यमस्याऽशु लोकं सुपापः ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = ततो निकुम्भोऽद्रिवरप्रदारणं महान्तमुग्रं परिघं प्रगृह्य | | verse_lines = ततो निकुम्भोऽद्रिवरप्रदारणं महान्तमुग्रं परिघं प्रगृह्य ।¦ससार सूर्यात्मजमाशु भीतः स पुप्लुवे पश्चिमतो धनुःशतम् ॥ २८॥ | ||
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| verse_lines = तं भ्रामयत्याशु भुजेन वीरे भ्रान्ता दिशो द्यौश्च (सचन्द्रसूर्या) सचन्द्रसूर्याः | | verse_lines = तं भ्रामयत्याशु भुजेन वीरे भ्रान्ता दिशो द्यौश्च (सचन्द्रसूर्या) सचन्द्रसूर्याः ।¦सुराश्च तस्योरुबलं वरं च शर्वोद्भवं वीक्ष्य विषेदुरीषत् ॥ २९॥ | ||
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| verse_lines = अनन्यसाध्यं तमथो निरीक्ष्य समुत्पपाताऽशु पुरोऽस्य मारुतिः | | verse_lines = अनन्यसाध्यं तमथो निरीक्ष्य समुत्पपाताऽशु पुरोऽस्य मारुतिः ।¦प्रकाश्य बाह्वन्तरमाह चैनं किमेभिरत्र प्रहराऽयुधं ते ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितस्तेन स राक्षसोत्तमो वरादमोघं प्रजहार वक्षसि | | verse_lines = इतीरितस्तेन स राक्षसोत्तमो वरादमोघं प्रजहार वक्षसि ।¦विचूर्णितोऽसौ तदुरस्यभेद्ये यथैव वज्रो विपतौ वृथाऽभवत् ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = विचूर्णिते निजायुधे निकुम्भ एत्य मारुतिम् | | verse_lines = विचूर्णिते निजायुधे निकुम्भ एत्य मारुतिम् ।¦प्रगृह्य चात्मनोंऽसके निधाय जग्मिवान् द्रुतम् ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = प्रगृह्य कण्ठमस्य स प्रधानमारुतात्मजः | | verse_lines = प्रगृह्य कण्ठमस्य स प्रधानमारुतात्मजः ।¦स्वमाशु मोचयंस्ततो न्यपातयद् धरातले ॥ ३३॥ | ||
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| verse_lines = चकार तं रणात्मके मखे रमेशदैवते | | verse_lines = चकार तं रणात्मके मखे रमेशदैवते ।¦पशुं प्रभञ्जनात्मजो विनेदुरत्र देवताः ॥ ३४॥ | ||
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| verse_lines = सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च शकुनिर्देवतापनः | | verse_lines = सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च शकुनिर्देवतापनः ।¦विद्युज्जिह्वः प्रमाथी च शुकसारणसंयुताः ॥ ३५॥ | ||
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| verse_lines = रावणप्रेरिताः सर्वान् मथ्नन्तः कपिकुञ्जरान् | | verse_lines = रावणप्रेरिताः सर्वान् मथ्नन्तः कपिकुञ्जरान् ।¦अवध्या ब्रह्मवरतो निहता रामसायकैः ॥ ३६॥ | ||
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| verse_lines = युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च देवान्तकनरान्तकौ | | verse_lines = युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च देवान्तकनरान्तकौ ।¦त्रिशिरा अतिकायश्च निर्ययू रावणाज्ञया ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = नरान्तको रावणजो हयवर्योपरि स्थितः | | verse_lines = नरान्तको रावणजो हयवर्योपरि स्थितः ।¦अभीः ससार समरे प्रासोद्यतकरो हरीन् ॥ ३८॥ | ||
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| verse_lines = अथास्य हयमाश्वेव निजघान मुखे कपिः | | verse_lines = अथास्य हयमाश्वेव निजघान मुखे कपिः ।¦पेततुश्चाक्षिणी तस्य स पपात ममार च ॥ ४१॥ | ||
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| verse_lines = स खड्गवरमादाय प्रससार रणे कपिम् | | verse_lines = स खड्गवरमादाय प्रससार रणे कपिम् ।¦आच्छिद्य खड्गमस्यैव निहतो वालिसूनुना ॥ ४२॥ | ||
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| verse_lines = स तमाकर्णमाकृष्य यमदण्डोपमं शरम् | | verse_lines = स तमाकर्णमाकृष्य यमदण्डोपमं शरम् ।¦अविद्ध्यद्धृदये राज्ञः कपीनां स पपात ह ॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = बलमप्रतिमं वीक्ष्य सुरशत्रोस्तु मारुतिः । | | verse_text = बलमप्रतिमं वीक्ष्य सुरशत्रोस्तु मारुतिः । | ||
| verse_lines = बलमप्रतिमं वीक्ष्य सुरशत्रोस्तु मारुतिः | | verse_lines = बलमप्रतिमं वीक्ष्य सुरशत्रोस्तु मारुतिः ।¦आह्वयामास युद्धाय केशवः कैटभं यथा ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = तमापतन्तमालोक्य रथं सहयसारथिम् । | | verse_text = तमापतन्तमालोक्य रथं सहयसारथिम् । | ||
| verse_lines = तमापतन्तमालोक्य रथं सहयसारथिम् | | verse_lines = तमापतन्तमालोक्य रथं सहयसारथिम् ।¦चूर्णयित्वा धनुश्चास्य समाच्छिद्य बभञ्ज ह ॥ ५०॥ | ||
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| verse_text = अथ खड्गं समादाय पुर आपततो रिपोः । | | verse_text = अथ खड्गं समादाय पुर आपततो रिपोः । | ||
| verse_lines = अथ खड्गं समादाय पुर आपततो रिपोः | | verse_lines = अथ खड्गं समादाय पुर आपततो रिपोः ।¦हरिः प्रगृह्य केशेषु पातयित्वैनमाहवे ।¦शिरो ममर्द तरसा पवमानात्मजः पदा ॥ ५१॥ | ||
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| verse_text = वरदानादवध्यं तं निहत्य पवनात्मजः । | | verse_text = वरदानादवध्यं तं निहत्य पवनात्मजः । | ||
| verse_lines = वरदानादवध्यं तं निहत्य पवनात्मजः | | verse_lines = वरदानादवध्यं तं निहत्य पवनात्मजः ।¦समीडितः सुरवरैः प्लवगैर्वीक्षितो मुदा ॥ ५२॥ | ||
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| verse_text = विद्राविताखिलकपिं वरात् त्रिशिरसं विभोः । | | verse_text = विद्राविताखिलकपिं वरात् त्रिशिरसं विभोः । | ||
| verse_lines = विद्राविताखिलकपिं वरात् त्रिशिरसं विभोः | | verse_lines = विद्राविताखिलकपिं वरात् त्रिशिरसं विभोः ।¦भङ्क्त्वा रथं धनुः खड्गमाच्छिद्याशिरसं व्यधात् ॥ ५३॥ | ||
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| verse_text = युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च पार्वतीवरदर्पितौ । | | verse_text = युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च पार्वतीवरदर्पितौ । | ||
| verse_lines = युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च पार्वतीवरदर्पितौ | | verse_lines = युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च पार्वतीवरदर्पितौ ।¦प्रमथ्नन्तौ कपीन् सर्वान् हतौ मारुतिमुष्टिना ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = ततोऽतिकायोऽतिरथो रथेन स्वयम्भुदत्तेन हरीन् (प्रमृद्गन्) प्रमृत्नन्। | | verse_text = ततोऽतिकायोऽतिरथो रथेन स्वयम्भुदत्तेन हरीन् (प्रमृद्गन्) प्रमृत्नन्। | ||
| verse_lines = ततोऽतिकायोऽतिरथो रथेन स्वयम्भुदत्तेन हरीन् (प्रमृद्गन्) | | verse_lines = ततोऽतिकायोऽतिरथो रथेन स्वयम्भुदत्तेन हरीन् (प्रमृद्गन्) प्रमृत्नन्।¦चचार कालानलसन्निकाशो गन्धर्विकायां जनितो दशास्यात् ॥ ५५॥ | ||
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| verse_text = बृहत्तनुः कुम्भवदेव कर्णावस्येत्यतो नाम च कुम्भकर्णः । | | verse_text = बृहत्तनुः कुम्भवदेव कर्णावस्येत्यतो नाम च कुम्भकर्णः । | ||
| verse_lines = बृहत्तनुः कुम्भवदेव कर्णावस्येत्यतो नाम च कुम्भकर्णः | | verse_lines = बृहत्तनुः कुम्भवदेव कर्णावस्येत्यतो नाम च कुम्भकर्णः ।¦इत्यस्य सोऽर्कात्मजपूर्वकान् कपीन् जिगाय रामं सहसाऽभ्यधावत् ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = तमापतन्तं शरवर्षधारं महाघनाभं स्तनयित्नुघोषम् । | | verse_text = तमापतन्तं शरवर्षधारं महाघनाभं स्तनयित्नुघोषम् । | ||
| verse_lines = तमापतन्तं शरवर्षधारं महाघनाभं स्तनयित्नुघोषम् | | verse_lines = तमापतन्तं शरवर्षधारं महाघनाभं स्तनयित्नुघोषम् ।¦निवारयामास यथा समीरः सौमित्रिरात्तेष्वसनः शरौघैः ॥ ५७॥ | ||
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| verse_text = ववर्षतुस्तावतिमात्रवीर्यौ शरान् सुरेशाशनितुल्यवेगान् । | | verse_text = ववर्षतुस्तावतिमात्रवीर्यौ शरान् सुरेशाशनितुल्यवेगान् । | ||
| verse_lines = ववर्षतुस्तावतिमात्रवीर्यौ शरान् सुरेशाशनितुल्यवेगान् | | verse_lines = ववर्षतुस्तावतिमात्रवीर्यौ शरान् सुरेशाशनितुल्यवेगान् ।¦तमोमयं चक्रतुरन्तरिक्षं स्वशिक्षया क्षिप्रतरास्त्रबाणैः ॥ ५८॥ | ||
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| verse_text = शरैः शरानस्य निवार्य वीरः सौमित्रिरस्त्राणि महास्त्रजालैः । | | verse_text = शरैः शरानस्य निवार्य वीरः सौमित्रिरस्त्राणि महास्त्रजालैः । | ||
| verse_lines = शरैः शरानस्य निवार्य वीरः सौमित्रिरस्त्राणि महास्त्रजालैः | | verse_lines = शरैः शरानस्य निवार्य वीरः सौमित्रिरस्त्राणि महास्त्रजालैः ।¦चिच्छेद बाहू शिरसा सहैव चतुर्भुजोऽभूत् स पुनर्द्विशीर्षः ॥ ५९॥ | ||
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| verse_text = छिन्नेषु तेषु द्विगुणास्यबाहुः पुनःपुनः सोऽथ बभूव वीरः । | | verse_text = छिन्नेषु तेषु द्विगुणास्यबाहुः पुनःपुनः सोऽथ बभूव वीरः । | ||
| verse_lines = छिन्नेषु तेषु द्विगुणास्यबाहुः पुनःपुनः सोऽथ बभूव वीरः | | verse_lines = छिन्नेषु तेषु द्विगुणास्यबाहुः पुनःपुनः सोऽथ बभूव वीरः ।¦उवाच सौमित्रिमथान्तरात्मा समस्तलोकस्य मरुद् विषण्णम् ॥ ६०॥ | ||
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| verse_text = ब्रह्मास्त्रतोऽन्येन न वध्य एष वराद् विधातुः सुमुखेत्यदृश्यः । | | verse_text = ब्रह्मास्त्रतोऽन्येन न वध्य एष वराद् विधातुः सुमुखेत्यदृश्यः । | ||
| verse_lines = ब्रह्मास्त्रतोऽन्येन न वध्य एष वराद् विधातुः सुमुखेत्यदृश्यः | | verse_lines = ब्रह्मास्त्रतोऽन्येन न वध्य एष वराद् विधातुः सुमुखेत्यदृश्यः ।¦रक्षःसुतस्याश्रवणीयमित्थमुक्त्वा समीरोऽरुहदन्तरिक्षम् ॥ ६१॥ | ||
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| verse_lines = अथानुजो देवतमस्य सोऽस्त्रं ब्राह्मं तनूजे दशकन्धरस्य | | verse_lines = अथानुजो देवतमस्य सोऽस्त्रं ब्राह्मं तनूजे दशकन्धरस्य ।¦मुमोच दग्धः सरथाश्वसूतस्तेनातिकायः प्रवरोऽस्त्रवित्सु ॥ ६२॥ | ||
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| verse_text = हतेषु पुत्रेषु स राक्षसेशः स्वयं प्रयाणं समरार्थमैच्छत् । | | verse_text = हतेषु पुत्रेषु स राक्षसेशः स्वयं प्रयाणं समरार्थमैच्छत् । | ||
| verse_lines = हतेषु पुत्रेषु स राक्षसेशः स्वयं प्रयाणं समरार्थमैच्छत् | | verse_lines = हतेषु पुत्रेषु स राक्षसेशः स्वयं प्रयाणं समरार्थमैच्छत् ।¦सज्जीभवत्येव निशाचरेशे खरात्मजः प्राह धनुर्धरोत्तमः ॥ ६३॥ | ||
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| verse_text = नियुङ्क्ष्व मां मे पितुरन्तकस्य वधाय राजन् सहलक्ष्मणं तम् । | | verse_text = नियुङ्क्ष्व मां मे पितुरन्तकस्य वधाय राजन् सहलक्ष्मणं तम् । | ||
| verse_lines = नियुङ्क्ष्व मां मे पितुरन्तकस्य वधाय राजन् सहलक्ष्मणं तम् | | verse_lines = नियुङ्क्ष्व मां मे पितुरन्तकस्य वधाय राजन् सहलक्ष्मणं तम् ।¦कपिप्रवीरांश्च निहत्य सर्वान् प्रतोषये त्वामहमद्य सुष्ठु ॥ ६४॥ | ||
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| verse_lines = इतीरिते तेन नियोजितः स जगाम वीरो मकराक्षनामा | | verse_lines = इतीरिते तेन नियोजितः स जगाम वीरो मकराक्षनामा ।¦विधूय सर्वांश्च हरिप्रवीरान् सहाङ्गदान् सूर्यसुतेन साकम् ॥ ६५॥ | ||
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| verse_lines = अचिन्तयन् लक्ष्मणबाणसङ्घानवज्ञया राममथाऽह्वयद् रणे | | verse_lines = अचिन्तयन् लक्ष्मणबाणसङ्घानवज्ञया राममथाऽह्वयद् रणे ।¦उवाच रामं रजनीचरोऽसौ हतो जनस्थानगतः पिता त्वया ॥ ६६॥ | ||
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| verse_lines = केनाप्युपायेन धनुर्धराणां वरः फलं तस्य ददामि तेऽद्य | | verse_lines = केनाप्युपायेन धनुर्धराणां वरः फलं तस्य ददामि तेऽद्य ।¦इति ब्रुवाणः स सरोजयोनेर्वरादवध्योऽमुचदस्त्रसङ्घान् ॥ ६७॥ | ||
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| verse_lines = प्रहस्य रामोऽस्य निवार्य चास्त्रैरस्त्राण्यमेयोऽशनिसन्निभेन | | verse_lines = प्रहस्य रामोऽस्य निवार्य चास्त्रैरस्त्राण्यमेयोऽशनिसन्निभेन ।¦शिरः शरेणोत्तमकुण्डलोज्ज्वलं खरात्मजस्याथ समुन्ममाथ ॥ ६८॥ | ||
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| verse_text = विदुद्रुवुस्तस्य तु येऽनुयायिनः कपिप्रवीरैर्निहतावशेषिताः । | | verse_text = विदुद्रुवुस्तस्य तु येऽनुयायिनः कपिप्रवीरैर्निहतावशेषिताः । | ||
| verse_lines = विदुद्रुवुस्तस्य तु येऽनुयायिनः कपिप्रवीरैर्निहतावशेषिताः | | verse_lines = विदुद्रुवुस्तस्य तु येऽनुयायिनः कपिप्रवीरैर्निहतावशेषिताः ।¦यथैव धूम्राक्षमुखेषु पूर्वं हतेषु पृथ्वीरुहशैलधारिभिः ॥ ६९॥ | ||
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| verse_lines = ततः स सज्जीकृतमात्तधन्वा रथं समास्थाय निशाचरेश्वरः | | verse_lines = ततः स सज्जीकृतमात्तधन्वा रथं समास्थाय निशाचरेश्वरः ।¦वृतः सहस्रायुतकोट्यनीकपैर्निशाचरैराशु ययौ रणाय ॥ ७०॥ | ||
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| verse_lines = बलैस्तु तस्याथ बलं कपीनां नैकप्रकारायुधपूगभग्नम् | | verse_lines = बलैस्तु तस्याथ बलं कपीनां नैकप्रकारायुधपूगभग्नम् ।¦दिशः प्रदुद्राव हरीन्द्रमुख्याः समार्दयन्नाशु निशाचरांस्तदा ॥ ७१॥ | ||
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| verse_lines = गजो गवाक्षो गवयो वृषश्च सगन्धमादा धनदेन जाताः | | verse_lines = गजो गवाक्षो गवयो वृषश्च सगन्धमादा धनदेन जाताः ।¦प्राणादयः पञ्च मरुत्प्रवीराः स कत्थनो वित्तपतिश्च जघ्नुः ॥ ७२॥ | ||
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| verse_lines = शरैस्तु तान् षड्भिरमोघवेगैर्निपातयामास दशाननो द्राक् | | verse_lines = शरैस्तु तान् षड्भिरमोघवेगैर्निपातयामास दशाननो द्राक् ।¦अथाश्विपुत्रौ (च) सहजाम्बवन्तौ प्रजह्रतुः शैलवरैस्त्रिभिस्तम् ॥ ७३॥ | ||
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| verse_lines = गिरीन् विदार्याऽशु शरैरथान्याञ्छरान् दशास्योऽमुचदाशु तेषु | | verse_lines = गिरीन् विदार्याऽशु शरैरथान्याञ्छरान् दशास्योऽमुचदाशु तेषु ।¦एकैकमेभिर्विनिपातितास्ते ससार तं शक्रसुतात्मजोऽथ ॥ ७४॥ | ||
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| verse_lines = शिलां समादाय तमापतन्तं विभेद रक्षो हृदये शरेण | | verse_lines = शिलां समादाय तमापतन्तं विभेद रक्षो हृदये शरेण ।¦दृढाहतः सोऽप्यगमद् धरातलं रवेः सुतोऽथैनमभिप्रजग्मिवान् ॥ ७५॥ | ||
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| verse_lines = तद्धस्तगं भूरुहमाशु बाणैर्दशाननः खण्डश एव कृत्वा | | verse_lines = तद्धस्तगं भूरुहमाशु बाणैर्दशाननः खण्डश एव कृत्वा ।¦ग्रीवाप्रदेशेऽस्य मुमोच बाणं भृशाहतः सोऽपि पपात भूमौ ॥ ७६॥ | ||
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| verse_lines = स लब्धसञ्ज्ञः प्रशशंस मारुतिं त्वया समो नास्ति पुमान् हि कश्चित् | | verse_lines = स लब्धसञ्ज्ञः प्रशशंस मारुतिं त्वया समो नास्ति पुमान् हि कश्चित् ।¦कः प्रापयेदन्य इमां दशां मामितीरितो मारुतिराह तं पुनः ॥ ७८॥ | ||
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| verse_text = ततो ययौ राघवमेव रावणो निवारयामास तमाशु लक्ष्मणः । | | verse_text = ततो ययौ राघवमेव रावणो निवारयामास तमाशु लक्ष्मणः । | ||
| verse_lines = ततो ययौ राघवमेव रावणो निवारयामास तमाशु लक्ष्मणः | | verse_lines = ततो ययौ राघवमेव रावणो निवारयामास तमाशु लक्ष्मणः ।¦ततक्षतुस्तावधिकौ धनुर्भृतां शरैः शरीरावरणावदारणैः ॥ ८३॥ | ||
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| verse_text = निवारितस्तेन स रावणो (दशाननो) भृशं रुषाऽन्वितो बाणममोघमुग्रम् । | | verse_text = निवारितस्तेन स रावणो (दशाननो) भृशं रुषाऽन्वितो बाणममोघमुग्रम् । | ||
| verse_lines = निवारितस्तेन स रावणो (दशाननो) भृशं रुषाऽन्वितो बाणममोघमुग्रम् | | verse_lines = निवारितस्तेन स रावणो (दशाननो) भृशं रुषाऽन्वितो बाणममोघमुग्रम् ।¦स्वयम्भुदत्तं प्रविकृष्य चाऽशु ललाटमध्ये प्रमुमोच तस्य ॥ ८४॥ | ||
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| verse_text = भृशाहतस्तेन मुमोह लक्ष्मणो रथादवप्लुत्य दशाननोऽपि । | | verse_text = भृशाहतस्तेन मुमोह लक्ष्मणो रथादवप्लुत्य दशाननोऽपि । | ||
| verse_lines = भृशाहतस्तेन मुमोह लक्ष्मणो रथादवप्लुत्य दशाननोऽपि | | verse_lines = भृशाहतस्तेन मुमोह लक्ष्मणो रथादवप्लुत्य दशाननोऽपि ।¦क्षणादभिद्रुत्य बलात् प्रगृह्य स्वबाहुभिर्नेतुमिमं समैच्छत् ॥ ८५॥ | ||
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| verse_text = सम्प्राप्य सञ्ज्ञां स सुविह्वलोऽपि सस्मार रूपं निजमेव लक्ष्मणः । | | verse_text = सम्प्राप्य सञ्ज्ञां स सुविह्वलोऽपि सस्मार रूपं निजमेव लक्ष्मणः । | ||
| verse_lines = सम्प्राप्य सञ्ज्ञां स सुविह्वलोऽपि सस्मार रूपं निजमेव लक्ष्मणः | | verse_lines = सम्प्राप्य सञ्ज्ञां स सुविह्वलोऽपि सस्मार रूपं निजमेव लक्ष्मणः ।¦शेषं हरेरंशयुतं नचास्य स चालनायापि शशाक रावणः ॥ ८६॥ | ||
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| verse_text = बलात् स्वदोर्भिः प्रतिगृह्य चाखिलैर्यदा स वीरं प्रचकर्ष रावणः । | | verse_text = बलात् स्वदोर्भिः प्रतिगृह्य चाखिलैर्यदा स वीरं प्रचकर्ष रावणः । | ||
| verse_lines = बलात् स्वदोर्भिः प्रतिगृह्य चाखिलैर्यदा स वीरं प्रचकर्ष रावणः | | verse_lines = बलात् स्वदोर्भिः प्रतिगृह्य चाखिलैर्यदा स वीरं प्रचकर्ष रावणः ।¦चचाल पृथ्वी सहमेरुमन्दरा ससागरा नैव चचाल लक्ष्मणः ॥ ८७॥ | ||
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| verse_text = सहस्रमूर्ध्नोऽस्य बतैकमूर्ध्नि ससप्तपाता(ल)ळगिरीन्द्रसागरा । | | verse_text = सहस्रमूर्ध्नोऽस्य बतैकमूर्ध्नि ससप्तपाता(ल)ळगिरीन्द्रसागरा । | ||
| verse_lines = सहस्रमूर्ध्नोऽस्य बतैकमूर्ध्नि ससप्तपाता(ल)ळगिरीन्द्रसागरा | | verse_lines = सहस्रमूर्ध्नोऽस्य बतैकमूर्ध्नि ससप्तपाता(ल)ळगिरीन्द्रसागरा ।¦धराऽखिलेयं ननु सर्षपायति प्रसह्य को नाम हरेत् तमेनम् ॥ ८८॥ | ||
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| verse_text = प्रकर्षति त्वेव निशाचरेश्वरे तथैव रामावरजं त्वरान्वितः । | | verse_text = प्रकर्षति त्वेव निशाचरेश्वरे तथैव रामावरजं त्वरान्वितः । | ||
| verse_lines = प्रकर्षति त्वेव निशाचरेश्वरे तथैव रामावरजं त्वरान्वितः | | verse_lines = प्रकर्षति त्वेव निशाचरेश्वरे तथैव रामावरजं त्वरान्वितः ।¦समस्तजीवाधिपतेः परा तनुः समुत्पपातास्य पुरो हनूमान् ॥ ८९॥ | ||
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| verse_text = स मुष्टिमावृत्य (आवर्त्य) च वज्रकल्पं जघान तेनैव च रावणं रुषा । | | verse_text = स मुष्टिमावृत्य (आवर्त्य) च वज्रकल्पं जघान तेनैव च रावणं रुषा । | ||
| verse_lines = स मुष्टिमावृत्य (आवर्त्य) च वज्रकल्पं जघान तेनैव च रावणं रुषा | | verse_lines = स मुष्टिमावृत्य (आवर्त्य) च वज्रकल्पं जघान तेनैव च रावणं रुषा ।¦प्रसार्य बाहूनखिलैर्मुखैर्वमन् स रक्तमुष्णं व्यसुवत् पपात ॥ ९०॥ | ||
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| verse_text = निपात्य रक्षोधिपतिं स मारुतिः प्रगृह्य सौमित्रिमुरङ्गशायिनः । | | verse_text = निपात्य रक्षोधिपतिं स मारुतिः प्रगृह्य सौमित्रिमुरङ्गशायिनः । | ||
| verse_lines = निपात्य रक्षोधिपतिं स मारुतिः प्रगृह्य सौमित्रिमुरङ्गशायिनः | | verse_lines = निपात्य रक्षोधिपतिं स मारुतिः प्रगृह्य सौमित्रिमुरङ्गशायिनः ।¦जगाम रामाख्यतनोः समीपं सौमित्रिमुद्धर्तुमलं ह्यसौ कपिः ॥ ९१॥ | ||
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| verse_text = स रामसंस्पर्शनिवारितक्लमः समुत्थितस्तेन समुद्धृते शरे । | | verse_text = स रामसंस्पर्शनिवारितक्लमः समुत्थितस्तेन समुद्धृते शरे । | ||
| verse_lines = स रामसंस्पर्शनिवारितक्लमः समुत्थितस्तेन समुद्धृते शरे | | verse_lines = स रामसंस्पर्शनिवारितक्लमः समुत्थितस्तेन समुद्धृते शरे ।¦बभौ यथा राहुमुखात् प्रमुक्तः शशी सुपूर्णो (विचकत्स्वरश्मिभिः)विकचस्वरश्मिभिः ॥ ९२॥ | ||
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| verse_text = स शेषभोगाभमथो जनार्दनः प्रगृह्य चापं सशरं पुनश्च । | | verse_text = स शेषभोगाभमथो जनार्दनः प्रगृह्य चापं सशरं पुनश्च । | ||
| verse_lines = स शेषभोगाभमथो जनार्दनः प्रगृह्य चापं सशरं पुनश्च | | verse_lines = स शेषभोगाभमथो जनार्दनः प्रगृह्य चापं सशरं पुनश्च ।¦सुलब्धसञ्ज्ञं रजनीचरेशं जगाद सज्जीभव रावणेति ॥ ९३॥ | ||
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| verse_text = रथं समारुह्य पुनः सकार्मुकः समार्गणो रावण आशु रामम् । | | verse_text = रथं समारुह्य पुनः सकार्मुकः समार्गणो रावण आशु रामम् । | ||
| verse_lines = रथं समारुह्य पुनः सकार्मुकः समार्गणो रावण आशु रामम् | | verse_lines = रथं समारुह्य पुनः सकार्मुकः समार्गणो रावण आशु रामम् ।¦अभ्येत्य सर्वाश्च दिशश्चकार शरान्धकाराः परमास्त्रवेत्ता ॥ ९४॥ | ||
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| verse_text = रथस्थितेऽस्मिन् रजनीचरेशे न मे पतिर्भूमितळे(ले) स्थितः स्यात् । | | verse_text = रथस्थितेऽस्मिन् रजनीचरेशे न मे पतिर्भूमितळे(ले) स्थितः स्यात् । | ||
| verse_lines = रथस्थितेऽस्मिन् रजनीचरेशे न मे पतिर्भूमितळे(ले) स्थितः स्यात् | | verse_lines = रथस्थितेऽस्मिन् रजनीचरेशे न मे पतिर्भूमितळे(ले) स्थितः स्यात् ।¦इति स्म पुत्रः पवनस्य रामं स्कन्धं समारोप्य ययौ च राक्षसम् ॥ ९५॥ | ||
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| verse_text = प्रहस्य रामोऽस्य हयान् निहत्य सूतं च कृत्वा तिलशो ध्वजं रथम् । | | verse_text = प्रहस्य रामोऽस्य हयान् निहत्य सूतं च कृत्वा तिलशो ध्वजं रथम् । | ||
| verse_lines = प्रहस्य रामोऽस्य हयान् निहत्य सूतं च कृत्वा तिलशो ध्वजं रथम् | | verse_lines = प्रहस्य रामोऽस्य हयान् निहत्य सूतं च कृत्वा तिलशो ध्वजं रथम् ।¦धनूंषि खड्गं सकलायुधानि छत्रं च सञ्छिद्य चकर्त मौलिम् ॥ ९६॥ | ||
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| verse_text = कर्तव्यमूढं तमवेक्ष्य रामः पुनर्जगादाऽशु गृहं प्रयाहि । | | verse_text = कर्तव्यमूढं तमवेक्ष्य रामः पुनर्जगादाऽशु गृहं प्रयाहि । | ||
| verse_lines = कर्तव्यमूढं तमवेक्ष्य रामः पुनर्जगादाऽशु गृहं प्रयाहि | | verse_lines = कर्तव्यमूढं तमवेक्ष्य रामः पुनर्जगादाऽशु गृहं प्रयाहि ।¦समस्तभोगाननुभूय शीघ्रं प्रतोष्य बन्धून् पुनरेहि मर्तुम् ॥ ९७॥ | ||
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| verse_text = इतीरितोऽवाग्वदनो ययौ गृहं विचार्य कार्यं सह मन्त्रिभिः स्वकैः । | | verse_text = इतीरितोऽवाग्वदनो ययौ गृहं विचार्य कार्यं सह मन्त्रिभिः स्वकैः । | ||
| verse_lines = इतीरितोऽवाग्वदनो ययौ गृहं विचार्य कार्यं सह मन्त्रिभिः स्वकैः | | verse_lines = इतीरितोऽवाग्वदनो ययौ गृहं विचार्य कार्यं सह मन्त्रिभिः स्वकैः ।¦हतावशेषैरथ कुम्भकर्णप्रबोधनायाऽशु मतिं चकार ॥ ९८॥ | ||
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| verse_lines = सशैलशृङ्गासिपरश्वधायुधैर्निशाचराणामयुतैरनेकैः | | verse_lines = सशैलशृङ्गासिपरश्वधायुधैर्निशाचराणामयुतैरनेकैः ।¦तच्छ्वासवेगाभिहतैः कथञ्चिद् गतैः समीपं कथमप्यबोधयत् ॥ ९९॥ | ||
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| verse_text = शैलोपमानस्य च मांसराशीन् विधाय (भक्षान्) भक्ष्यानपि शोणितह्रदान् । | | verse_text = शैलोपमानस्य च मांसराशीन् विधाय (भक्षान्) भक्ष्यानपि शोणितह्रदान् । | ||
| verse_lines = शैलोपमानस्य च मांसराशीन् विधाय (भक्षान्) भक्ष्यानपि शोणितह्रदान् | | verse_lines = शैलोपमानस्य च मांसराशीन् विधाय (भक्षान्) भक्ष्यानपि शोणितह्रदान् ।¦सुतृप्तमेनं परमादरेण समाह्वयामास सभातला(ळा)य ॥ १००॥ | ||
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| verse_text = उवाच चैनं रजनीचरेन्द्रः पराजितोऽस्म्यद्य हि जीवति त्वयि । | | verse_text = उवाच चैनं रजनीचरेन्द्रः पराजितोऽस्म्यद्य हि जीवति त्वयि । | ||
| verse_lines = उवाच चैनं रजनीचरेन्द्रः पराजितोऽस्म्यद्य हि जीवति त्वयि | | verse_lines = उवाच चैनं रजनीचरेन्द्रः पराजितोऽस्म्यद्य हि जीवति त्वयि ।¦रणे नरेणैव च (हि) रामनाम्ना कुरुष्व मे प्रीतिममुं निहत्य ॥ १०१॥ | ||
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| verse_text = इतीरितः कारणमप्यशेषं श्रुत्वा जगर्हाग्रजमेव वीरः । | | verse_text = इतीरितः कारणमप्यशेषं श्रुत्वा जगर्हाग्रजमेव वीरः । | ||
| verse_lines = इतीरितः कारणमप्यशेषं श्रुत्वा जगर्हाग्रजमेव वीरः | | verse_lines = इतीरितः कारणमप्यशेषं श्रुत्वा जगर्हाग्रजमेव वीरः ।¦अमोघवीर्येण हि राघवेण त्वया विरोधश्चरितो बताद्य ॥ १०२॥ | ||
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| verse_lines = प्रशस्यते नो बलिभिर्विरोधः कथञ्चिदेषोऽतिबलो मतो मम | | verse_lines = प्रशस्यते नो बलिभिर्विरोधः कथञ्चिदेषोऽतिबलो मतो मम ।¦इतीरितो रावण आह दुर्नयोऽप्यहं त्वयाऽव्यो हि किमन्यथा त्वया ॥ १०३॥ | ||
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| verse_lines = चरन्ति राजान उताक्रमं क्वचित् त्वयोपमान् बन्धुजनान् बलाधिकान् | | verse_lines = चरन्ति राजान उताक्रमं क्वचित् त्वयोपमान् बन्धुजनान् बलाधिकान् ।¦समीक्ष्य हीत्थं गदितोऽग्रजेन स कुम्भकर्णः प्रययौ रणाय ॥ १०४॥ | ||
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| verse_lines = प्राकारमुल्लङ्घ्य(मालङ्घ्य) स पञ्चयोजनं यदा ययौ शूलवरायुधो रणम् | | verse_lines = प्राकारमुल्लङ्घ्य(मालङ्घ्य) स पञ्चयोजनं यदा ययौ शूलवरायुधो रणम् ।¦कपिप्रवीरा अखिलाः प्रदुद्रुवुर्भयादतीत्यैव च सेतुमाशु ॥ १०५॥ | ||
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| verse_text = शतवलिपनसाख्यौ तत्र वस्वंशभूतौ पवनगणवरांशौ श्वेतसम्पातिनौ च । | | verse_text = शतवलिपनसाख्यौ तत्र वस्वंशभूतौ पवनगणवरांशौ श्वेतसम्पातिनौ च । | ||
| verse_lines = शतवलिपनसाख्यौ तत्र वस्वंशभूतौ पवनगणवरांशौ श्वेतसम्पातिनौ च | | verse_lines = शतवलिपनसाख्यौ तत्र वस्वंशभूतौ पवनगणवरांशौ श्वेतसम्पातिनौ च ।¦निर्ऋतितनुमथोग्रं दुर्मुखं केसरीति प्रवरमथ मरुत्सु प्रास्यदेतान् मुखे सः ॥ १०६॥ | ||
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| verse_lines = रजनिचरवरोऽसौ कुम्भकर्णः प्रतापी कुमुदमपि जयन्तं पाणिना सम्पिपेष | | verse_lines = रजनिचरवरोऽसौ कुम्भकर्णः प्रतापी कुमुदमपि जयन्तं पाणिना सम्पिपेष ।¦नळ(ल)मथ च गजादीन् पञ्च नीलं सतारं गिरिवरतरुहस्तान् मुष्टिनाऽपातयच्च ॥ १०७॥ | ||
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| verse_lines = अथाङ्गदश्च जाम्बवानिनात्मजश्च वानरैः | | verse_lines = अथाङ्गदश्च जाम्बवानिनात्मजश्च वानरैः ।¦निजघ्निरे निशाचरं सवृक्षशैलसानुभिः ॥ १०८॥ | ||
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| verse_lines = विचूर्णिताश्च पर्वतास्तनौ निशाचरस्य ते | | verse_lines = विचूर्णिताश्च पर्वतास्तनौ निशाचरस्य ते ।¦बभूव काचन व्यथा नचास्य बाहुषालि(ळि)नः ॥ १०९॥ | ||
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| verse_lines = अथापरं महाचलं प्रगृह्य भास्करात्मजः | | verse_lines = अथापरं महाचलं प्रगृह्य भास्करात्मजः ।¦मुमोच राक्षसेऽथ तं प्रगृह्य तं जघान सः ॥ ११०॥ | ||
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| verse_lines = अथ प्रगृह्य भास्करिं ययौ स राक्षसो बली | | verse_lines = अथ प्रगृह्य भास्करिं ययौ स राक्षसो बली ।¦जगाम चानु मारुतिः सुसूक्ष्ममक्षिकोपमः ॥ ११२॥ | ||
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| verse_text = कराभ्यामस्य कर्णौ च नासिकां दशनैरपि । | | verse_text = कराभ्यामस्य कर्णौ च नासिकां दशनैरपि । | ||
| verse_lines = कराभ्यामस्य कर्णौ च नासिकां दशनैरपि | | verse_lines = कराभ्यामस्य कर्णौ च नासिकां दशनैरपि ।¦सञ्छिद्य क्षिप्रमेवासावुत्पपात हरीश्वरः ॥ ११६॥ | ||
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| verse_text = तळेन चैनं निजघान राक्षसः पिपेष भूमौ पतितं ततोऽपि । | | verse_text = तळेन चैनं निजघान राक्षसः पिपेष भूमौ पतितं ततोऽपि । | ||
| verse_lines = तळेन चैनं निजघान राक्षसः पिपेष भूमौ पतितं ततोऽपि | | verse_lines = तळेन चैनं निजघान राक्षसः पिपेष भूमौ पतितं ततोऽपि ।¦समुद्गतोऽसौ विवरेऽङ्गुलीनां जघान शूलेन पुनः स राक्षसः ॥ ११७॥ | ||
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| verse_text = अमोघशूलं प्रपतन् (प्रपतत्)तमीक्ष्य(तदीक्ष्य) रवेः सुतस्योपरि मारुतात्मजः । | | verse_text = अमोघशूलं प्रपतन् (प्रपतत्)तमीक्ष्य(तदीक्ष्य) रवेः सुतस्योपरि मारुतात्मजः । | ||
| verse_lines = अमोघशूलं प्रपतन् (प्रपतत्)तमीक्ष्य(तदीक्ष्य) रवेः सुतस्योपरि मारुतात्मजः | | verse_lines = अमोघशूलं प्रपतन् (प्रपतत्)तमीक्ष्य(तदीक्ष्य) रवेः सुतस्योपरि मारुतात्मजः ।¦प्रगृह्य जानौ प्रणिधाय शीघ्रं बभञ्ज तं प्रेक्ष्य ननाद चोच्चैः ॥ ११८॥ | ||
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| verse_text = अथैनमावृत्य जघान मुष्टिना स राक्षसो वायुसुतं स्तनान्तरे । | | verse_text = अथैनमावृत्य जघान मुष्टिना स राक्षसो वायुसुतं स्तनान्तरे । | ||
| verse_lines = अथैनमावृत्य जघान मुष्टिना स राक्षसो वायुसुतं स्तनान्तरे | | verse_lines = अथैनमावृत्य जघान मुष्टिना स राक्षसो वायुसुतं स्तनान्तरे ।¦जगर्ज तेनाभिहतो हनूमानचिन्तयंस्तत् प्रजहार चैनम् ॥ ११९॥ | ||
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| verse_text = तले(ळे)न वक्षस्यभिताडितो रुषा हनूमता मोहमवाप राक्षसः । | | verse_text = तले(ळे)न वक्षस्यभिताडितो रुषा हनूमता मोहमवाप राक्षसः । | ||
| verse_lines = तले(ळे)न वक्षस्यभिताडितो रुषा हनूमता मोहमवाप राक्षसः | | verse_lines = तले(ळे)न वक्षस्यभिताडितो रुषा हनूमता मोहमवाप राक्षसः ।¦पुनश्च सञ्ज्ञां समवाप्य शीघ्रं ययौ स यत्रैव रघुप्रवीरः ॥ १२०॥ | ||
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| verse_text = विचिन्तयामास ततो हनूमान् मयैव हन्तुं समरे हि शक्यः । | | verse_text = विचिन्तयामास ततो हनूमान् मयैव हन्तुं समरे हि शक्यः । | ||
| verse_lines = विचिन्तयामास ततो हनूमान् मयैव हन्तुं समरे हि शक्यः | | verse_lines = विचिन्तयामास ततो हनूमान् मयैव हन्तुं समरे हि शक्यः ।¦असौ तथाऽप्येनमहं न हन्मि यशो हि रामस्य दृढं प्रकाशयन् ॥ १२१॥ | ||
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| verse_text = अनन्यवध्यं तमिमं निहत्य स्वयं स रामो यश आहरेत । | | verse_text = अनन्यवध्यं तमिमं निहत्य स्वयं स रामो यश आहरेत । | ||
| verse_lines = अनन्यवध्यं तमिमं निहत्य स्वयं स रामो यश आहरेत | | verse_lines = अनन्यवध्यं तमिमं निहत्य स्वयं स रामो यश आहरेत ।¦दत्तो वरो द्वारपयोः स्वयं च जनार्दनेनैव पुरातनश्च ॥ १२२॥ | ||
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| verse_text = मयैव वध्यौ भवतं त्रिजन्मसु प्रवृद्धवीर्याविति केशवेन । | | verse_text = मयैव वध्यौ भवतं त्रिजन्मसु प्रवृद्धवीर्याविति केशवेन । | ||
| verse_lines = मयैव वध्यौ भवतं त्रिजन्मसु प्रवृद्धवीर्याविति केशवेन | | verse_lines = मयैव वध्यौ भवतं त्रिजन्मसु प्रवृद्धवीर्याविति केशवेन ।¦उक्तं ममैवैष यदप्यनुग्रहं वधेऽस्य कुर्यान्नतु मे स धर्मः ॥ १२३॥ | ||
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| verse_text = इति स्म सञ्चिन्त्य कपीशयुक्तो जगाम यत्रैव कपिप्रवीराः । | | verse_text = इति स्म सञ्चिन्त्य कपीशयुक्तो जगाम यत्रैव कपिप्रवीराः । | ||
| verse_lines = इति स्म सञ्चिन्त्य कपीशयुक्तो जगाम यत्रैव कपिप्रवीराः | | verse_lines = इति स्म सञ्चिन्त्य कपीशयुक्तो जगाम यत्रैव कपिप्रवीराः ।¦स कुम्भकर्णोऽखिलवानरांस्तु प्रभक्षयन् राममुपाजगाम ॥ १२४॥ | ||
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| verse_text = ते भक्षितास्तेन कपिप्रवीराः सर्वे विनिर्जग्मुरमुष्य देहात् । | | verse_text = ते भक्षितास्तेन कपिप्रवीराः सर्वे विनिर्जग्मुरमुष्य देहात् । | ||
| verse_lines = ते भक्षितास्तेन कपिप्रवीराः सर्वे विनिर्जग्मुरमुष्य देहात् | | verse_lines = ते भक्षितास्तेन कपिप्रवीराः सर्वे विनिर्जग्मुरमुष्य देहात् ।¦स्रोतोभिरेवाथ च रोमकूपैः केचित् तमेवाऽरुरुहुर्यथा गिरिम् ॥ १२५॥ | ||
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| verse_text = स तान् विधूयाऽशु यथा महागजो जगाम रामं समरार्थमेकः । | | verse_text = स तान् विधूयाऽशु यथा महागजो जगाम रामं समरार्थमेकः । | ||
| verse_lines = स तान् विधूयाऽशु यथा महागजो जगाम रामं समरार्थमेकः | | verse_lines = स तान् विधूयाऽशु यथा महागजो जगाम रामं समरार्थमेकः ।¦प्रभक्षयन् स्वानपरांश्च सर्वशो मत्तः समाघ्राय च शोणितं पिबन् ॥ १२६॥ | ||
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| verse_lines = न्यवारयत् तं शरवर्षधारया स लक्ष्मणो नैनमचिन्तयत् सः | | verse_lines = न्यवारयत् तं शरवर्षधारया स लक्ष्मणो नैनमचिन्तयत् सः ।¦जगाम रामं गिरिशृङ्गधारी समाह्वयत् तं समराय चाऽशु ॥ १२७॥ | ||
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| verse_text = अथो समादाय धनुः सुघोरं शरान्सुरेशाशनितुल्यवेगान् । | | verse_text = अथो समादाय धनुः सुघोरं शरान्सुरेशाशनितुल्यवेगान् । | ||
| verse_lines = अथो समादाय धनुः सुघोरं शरान्सुरेशाशनितुल्यवेगान् | | verse_lines = अथो समादाय धनुः सुघोरं शरान्सुरेशाशनितुल्यवेगान् ।¦प्रवेशयामास निशाचरे प्रभुः स राघवः पूर्वहतेषु यद्वत् ॥ १२८॥ | ||
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| verse_text = यावद्बलेन न्यहनत् खरादिकान् न तावतैव न्यपतत् स राक्षसः । | | verse_text = यावद्बलेन न्यहनत् खरादिकान् न तावतैव न्यपतत् स राक्षसः । | ||
| verse_lines = यावद्बलेन न्यहनत् खरादिकान् न तावतैव न्यपतत् स राक्षसः | | verse_lines = यावद्बलेन न्यहनत् खरादिकान् न तावतैव न्यपतत् स राक्षसः ।¦अथ प्रहस्याऽत्मबलैकदेशं प्रदर्शयन् बाणवरान् मुमोच ॥ १२९॥ | ||
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| verse_text = द्वाभ्यां स बाहू निचकर्त तस्य पदद्वयं चैव तथा शराभ्याम् । | | verse_text = द्वाभ्यां स बाहू निचकर्त तस्य पदद्वयं चैव तथा शराभ्याम् । | ||
| verse_lines = द्वाभ्यां स बाहू निचकर्त तस्य पदद्वयं चैव तथा शराभ्याम् | | verse_lines = द्वाभ्यां स बाहू निचकर्त तस्य पदद्वयं चैव तथा शराभ्याम् ।¦अथापरेणास्य शिरो निकृत्य सम्प्राक्षिपत् सागरतोय आशु ॥ १३०॥ | ||
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| verse_lines = अवर्धताब्धिः पतितेऽस्य काये महाचलाभे क्षणदाचरस्य | | verse_lines = अवर्धताब्धिः पतितेऽस्य काये महाचलाभे क्षणदाचरस्य ।¦सुराश्च सर्वे ववृषुः प्रसूनैर्मुदा स्तुवन्तो रघुवर्यमूर्ध्नि ॥ १३१॥ | ||
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| verse_lines = योजनानां त्रिलक्षं हि कुम्भकर्णोऽभ्यवर्धत | | verse_lines = योजनानां त्रिलक्षं हि कुम्भकर्णोऽभ्यवर्धत ।¦पूर्वं पश्चात् सञ्चुकोच लङ्कायामुषितुं स्वयम् ॥ १३२॥ | ||
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| verse_text = स तु स्वभावमापन्नो म्रियमाणोऽभ्यवर्धत । | | verse_text = स तु स्वभावमापन्नो म्रियमाणोऽभ्यवर्धत । | ||
| verse_lines = स तु स्वभावमापन्नो म्रियमाणोऽभ्यवर्धत | | verse_lines = स तु स्वभावमापन्नो म्रियमाणोऽभ्यवर्धत ।¦तेनास्मिन् पतिते त्वब्धिरवर्धदधिकं तदा ॥ १३३॥ | ||
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| verse_lines = अथापरे ये रजनीचरास्तदा कपिप्रवीरैर्निहताश्च सर्वशः | | verse_lines = अथापरे ये रजनीचरास्तदा कपिप्रवीरैर्निहताश्च सर्वशः ।¦हतावशिष्टास्त्वरिताः प्रदुद्रुवुर्भ्रातुर्वधं चोचुरुपेत्य रावणम् ॥ १३४॥ | ||
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| verse_text = स दुःखतप्तो निपपात मूर्छितो निराशकश्चाभवदात्मजीविते । | | verse_text = स दुःखतप्तो निपपात मूर्छितो निराशकश्चाभवदात्मजीविते । | ||
| verse_lines = स दुःखतप्तो निपपात मूर्छितो निराशकश्चाभवदात्मजीविते | | verse_lines = स दुःखतप्तो निपपात मूर्छितो निराशकश्चाभवदात्मजीविते ।¦तमाह पुत्रस्त्रिदशेशशत्रुर्नियुङ्क्ष्व मां शत्रुवधाय माचिरम् ॥ १३५॥ | ||
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| verse_lines = मया गृहीतस्त्रिदशेश्वरः पुरा विषीदसे किं नरराजपुत्रतः | | verse_lines = मया गृहीतस्त्रिदशेश्वरः पुरा विषीदसे किं नरराजपुत्रतः ।¦स एवमुक्त्वा प्रजुहाव पावकं शिवं समभ्यर्च्य समारुहद्रथम् ॥ १३६॥ | ||
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| verse_text = स आत्तधन्वा सशरो रथेन वियत्समारुह्य ययावदर्शनम् । | | verse_text = स आत्तधन्वा सशरो रथेन वियत्समारुह्य ययावदर्शनम् । | ||
| verse_lines = स आत्तधन्वा सशरो रथेन वियत्समारुह्य ययावदर्शनम् | | verse_lines = स आत्तधन्वा सशरो रथेन वियत्समारुह्य ययावदर्शनम् ।¦स नागपाशैर्वरतः शिवस्य बबन्ध सर्वान् कपिवीरसङ्घान् ॥ १३७॥ | ||
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| verse_lines = पुराऽवताराय यदा स विष्णुर्दिदेश सर्वांस्त्रिदशांस्तदैव | | verse_lines = पुराऽवताराय यदा स विष्णुर्दिदेश सर्वांस्त्रिदशांस्तदैव ।¦ममापि सेवा भवता(भवते) प्रयोज्येत्येवं गरुत्मानवदद् वृषाकपिम् ॥ १३८॥ | ||
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| verse_lines = तमाह विष्णुर्न भुवि प्रजातिमुपैहि सेवां तव चान्यथाऽहम् | | verse_lines = तमाह विष्णुर्न भुवि प्रजातिमुपैहि सेवां तव चान्यथाऽहम् ।¦आदास्य एवात्र यथा यशः स्याद् धर्मश्च कर्तव्यकृदेव च स्याः ॥ १३९॥ | ||
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| verse_lines = वरेण शर्वस्य हि रावणात्मजो यदा निबध्नाति कपीन् सलक्ष्मणान् | | verse_lines = वरेण शर्वस्य हि रावणात्मजो यदा निबध्नाति कपीन् सलक्ष्मणान् ।¦उरङ्गपाशेन तदा त्वमेव समेत्य सर्वानपि मोचयस्व ॥ १४०॥ | ||
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| verse_lines = अहं समर्थोऽपि स लक्ष्मणश्च तथा हनूमान् न विमोचयामः | | verse_lines = अहं समर्थोऽपि स लक्ष्मणश्च तथा हनूमान् न विमोचयामः ।¦तव प्रियार्थं गरुडैष एव कृतस्तवाऽदेश इमं कुरुष्व ॥ १४१॥ | ||
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| verse_lines = तदेतदुक्तं हि पुराऽऽत्मना यत् ततो हि रामो न मुमोच कञ्चन | | verse_lines = तदेतदुक्तं हि पुराऽऽत्मना यत् ततो हि रामो न मुमोच कञ्चन ।¦(स) न लक्ष्मणो नैव च मारुतात्मजः स चैव जानाति हि देवगुह्यम् ॥ १४२॥ | ||
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| verse_lines = अथो निबद्ध्याऽशु हरीन् सलक्ष्मणान् जगाम रक्षः स्वपितुः सकाशम् | | verse_lines = अथो निबद्ध्याऽशु हरीन् सलक्ष्मणान् जगाम रक्षः स्वपितुः सकाशम् ।¦ननन्द चासौ पिशिताशनेश्वरः शशंस पुत्रं च कृतात्मकार्यम् ॥ १४३॥ | ||
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| verse_lines = स पक्षिराजोऽथ हरेर्निदेशं स्मरंस्त्वरावानिह चाऽजगाम | | verse_lines = स पक्षिराजोऽथ हरेर्निदेशं स्मरंस्त्वरावानिह चाऽजगाम ।¦तत्पक्षवातस्पर्शेन केवलं विनष्ट एषां स उरङ्गबन्धः ॥ १४४॥ | ||
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| verse_lines = स राममानम्य परात्मदैवतं ययौ सुमाल्याभरणानुलेपनः | | verse_lines = स राममानम्य परात्मदैवतं ययौ सुमाल्याभरणानुलेपनः ।¦कपिप्रवीराश्च तरूञ्छिलाश्च प्रगृह्य नेदुर्बलिनः प्रहृष्टाः ॥ १४५॥ | ||
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| verse_text = स तं समादाय ययौ विधातृजं विमूर्च्छितं चोदकसेकतस्तम् । | | verse_text = स तं समादाय ययौ विधातृजं विमूर्च्छितं चोदकसेकतस्तम् । | ||
| verse_lines = स तं समादाय ययौ विधातृजं विमूर्च्छितं चोदकसेकतस्तम् | | verse_lines = स तं समादाय ययौ विधातृजं विमूर्च्छितं चोदकसेकतस्तम् ।¦आश्वास्य किं जीवसि हीत्युवाच तथेति स प्राह च मन्दवाक्यः ॥ १५०॥ | ||
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| verse_text = ऊचे पुनर्जीवति किं हनूमान् जीवाम सर्वेऽपि हि जीवमाने । | | verse_text = ऊचे पुनर्जीवति किं हनूमान् जीवाम सर्वेऽपि हि जीवमाने । | ||
| verse_lines = ऊचे पुनर्जीवति किं हनूमान् जीवाम सर्वेऽपि हि जीवमाने | | verse_lines = ऊचे पुनर्जीवति किं हनूमान् जीवाम सर्वेऽपि हि जीवमाने ।¦तस्मिन् हते निहताश्चैव सर्व इतीरितेऽस्मीत्यवदत् स मारुतिः ॥ १५१॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तो जाम्बवानाह हनूमन्तमनन्तरम् । | | verse_text = इत्युक्तो जाम्बवानाह हनूमन्तमनन्तरम् । | ||
| verse_lines = इत्युक्तो जाम्बवानाह हनूमन्तमनन्तरम् | | verse_lines = इत्युक्तो जाम्बवानाह हनूमन्तमनन्तरम् ।¦योऽसौ मेरोः समीपस्थो गन्धमादनसञ्ज्ञितः(संज्ञकः) ।¦गिरिस्तस्मात् समाहार्यं त्वयौषधि(ध)चतुष्टयम् ॥ १५२॥ | ||
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| verse_text = मृतसञ्जीवनी मुख्या सन्धानकरणी परा । | | verse_text = मृतसञ्जीवनी मुख्या सन्धानकरणी परा । | ||
| verse_lines = मृतसञ्जीवनी मुख्या सन्धानकरणी परा | | verse_lines = मृतसञ्जीवनी मुख्या सन्धानकरणी परा ।¦सवर्णकरणी चैव विशल्यकरणीति च ॥ १५३॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = इत्युक्तः स क्षणेनैव प्रापतद् गन्धमादनम् । | | verse_text = इत्युक्तः स क्षणेनैव प्रापतद् गन्धमादनम् । | ||
| verse_lines = इत्युक्तः स क्षणेनैव प्रापतद् गन्धमादनम् | | verse_lines = इत्युक्तः स क्षणेनैव प्रापतद् गन्धमादनम् ।¦अवाप चाम्बरचरो राममुक्तः शरो यथा ॥ १५४॥ | ||
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| verse_text = अन्तर्हिताश्चौषधीस्तु तदा विज्ञाय मारुतिः । | | verse_text = अन्तर्हिताश्चौषधीस्तु तदा विज्ञाय मारुतिः । | ||
| verse_lines = अन्तर्हिताश्चौषधीस्तु तदा विज्ञाय मारुतिः | | verse_lines = अन्तर्हिताश्चौषधीस्तु तदा विज्ञाय मारुतिः ।¦उद्बबर्ह गिरिं क्रोधाच्छतयोजनमण्डलम् ॥ १५५॥ | ||
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| verse_text = स तं समुत्पाट्य गिरिं करेण प्रतोल(ळ)यित्वा बलदेवसूनुः । | | verse_text = स तं समुत्पाट्य गिरिं करेण प्रतोल(ळ)यित्वा बलदेवसूनुः । | ||
| verse_lines = स तं समुत्पाट्य गिरिं करेण प्रतोल(ळ)यित्वा बलदेवसूनुः | | verse_lines = स तं समुत्पाट्य गिरिं करेण प्रतोल(ळ)यित्वा बलदेवसूनुः ।¦समुत्पपाताम्बरमुग्रवेगो यथा हरिश्चक्रधरस्त्रिविक्रमे ॥ १५६॥ | ||
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| verse_text = अवाप चाक्ष्णोः स निमेषमात्रतो निपातिता यत्र कपिप्रवीराः । | | verse_text = अवाप चाक्ष्णोः स निमेषमात्रतो निपातिता यत्र कपिप्रवीराः । | ||
| verse_lines = अवाप चाक्ष्णोः स निमेषमात्रतो निपातिता यत्र कपिप्रवीराः | | verse_lines = अवाप चाक्ष्णोः स निमेषमात्रतो निपातिता यत्र कपिप्रवीराः ।¦तच्छैलवातस्पर्शात् समुत्थिताः समस्तशो वानरयूथपाः क्षणात् ॥ १५७॥ | ||
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| verse_text = अपूजयन् मारुतिमुग्रपौरुषं रघूत्तमोऽस्यानुजनिस्तथाऽपरे । | | verse_text = अपूजयन् मारुतिमुग्रपौरुषं रघूत्तमोऽस्यानुजनिस्तथाऽपरे । | ||
| verse_lines = अपूजयन् मारुतिमुग्रपौरुषं रघूत्तमोऽस्यानुजनिस्तथाऽपरे | | verse_lines = अपूजयन् मारुतिमुग्रपौरुषं रघूत्तमोऽस्यानुजनिस्तथाऽपरे ।¦पपात मूर्ध्न्यस्य च पुष्पसन्ततिः प्रमोदितैर्देववरैर्विसर्जिता ॥ १५८॥ | ||
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| verse_text = स देवगन्धर्वमहर्षिसत्तमैरभिष्टुतो रामकरोप(करेण)गूहितः । | | verse_text = स देवगन्धर्वमहर्षिसत्तमैरभिष्टुतो रामकरोप(करेण)गूहितः । | ||
| verse_lines = स देवगन्धर्वमहर्षिसत्तमैरभिष्टुतो रामकरोप(करेण)गूहितः | | verse_lines = स देवगन्धर्वमहर्षिसत्तमैरभिष्टुतो रामकरोप(करेण)गूहितः ।¦पुनर्गिरिं तं शतयोजनोच्छ्रितं न्यपातयत् संस्थित एव तत्र (च) ॥ १५९॥ | ||
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| verse_lines = स पूर्ववन्मारुतिवेगचोदितो निरन्तरं श्लिष्टतरोऽत्र चाभवत् | | verse_lines = स पूर्ववन्मारुतिवेगचोदितो निरन्तरं श्लिष्टतरोऽत्र चाभवत् ।¦पुनश्च सर्वे तरुशैलहस्ता रणाय चोत्तस्थुरलं नदन्तः ॥ १६०॥ | ||
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| verse_text = पुनश्च तान् प्रेक्ष्य समुत्थितान् कपीन् भयं महच्छक्रजितं विवेश । | | verse_text = पुनश्च तान् प्रेक्ष्य समुत्थितान् कपीन् भयं महच्छक्रजितं विवेश । | ||
| verse_lines = पुनश्च तान् प्रेक्ष्य समुत्थितान् कपीन् भयं महच्छक्रजितं विवेश | | verse_lines = पुनश्च तान् प्रेक्ष्य समुत्थितान् कपीन् भयं महच्छक्रजितं विवेश ।¦स पूर्ववद्धव्यवहे समर्च्य शिवं तथाऽदर्शनमेव जग्मिवान् ॥ १६१॥ | ||
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| verse_text = वराश्रयेणाजगिरीशयोस्तथा पुनर्महास्त्रैः स बबन्ध तान् कपीन् । | | verse_text = वराश्रयेणाजगिरीशयोस्तथा पुनर्महास्त्रैः स बबन्ध तान् कपीन् । | ||
| verse_lines = वराश्रयेणाजगिरीशयोस्तथा पुनर्महास्त्रैः स बबन्ध तान् कपीन् | | verse_lines = वराश्रयेणाजगिरीशयोस्तथा पुनर्महास्त्रैः स बबन्ध तान् कपीन् ।¦अथाऽह रामस्य मनोऽनुसारतः पुराऽस्त्रमेवानुसरन् स लक्ष्मणः ॥ १६२॥ | ||
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| verse_text = पितामहास्त्रेण निहन्मि दुर्मतिं तवाऽज्ञया शक्रजितं सबान्धवम् । | | verse_text = पितामहास्त्रेण निहन्मि दुर्मतिं तवाऽज्ञया शक्रजितं सबान्धवम् । | ||
| verse_lines = पितामहास्त्रेण निहन्मि दुर्मतिं तवाऽज्ञया शक्रजितं सबान्धवम् | | verse_lines = पितामहास्त्रेण निहन्मि दुर्मतिं तवाऽज्ञया शक्रजितं सबान्धवम् ।¦इतीरिते तेन स चाऽह राघवो भयाददृश्ये न विमोक्तुमर्हसि ॥ १६३॥ | ||
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| verse_lines = न सोढुमीशोऽसि यदि त्वमेतदस्त्रं तदाऽहं शरमात्रकेण | | verse_lines = न सोढुमीशोऽसि यदि त्वमेतदस्त्रं तदाऽहं शरमात्रकेण ।¦अदृश्यमप्याशु निहन्मि सन्तं रसातले(ळे)ऽथापि हि सत्यलोके ॥ १६४॥ | ||
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| verse_text = इति स्म वीन्द्रस्य हनूमतश्च बलप्रकाशाय पुरा प्रभुः स्वयम् । | | verse_text = इति स्म वीन्द्रस्य हनूमतश्च बलप्रकाशाय पुरा प्रभुः स्वयम् । | ||
| verse_lines = इति स्म वीन्द्रस्य हनूमतश्च बलप्रकाशाय पुरा प्रभुः स्वयम् | | verse_lines = इति स्म वीन्द्रस्य हनूमतश्च बलप्रकाशाय पुरा प्रभुः स्वयम् ।¦सम्मानयित्वाऽस्त्रममुष्य रामो दुरन्तशक्तिः शरमाददेऽथ ॥ १६५॥ | ||
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| verse_lines = अनेन दृष्टोऽहमिति स्म दुष्टो विज्ञाय बाह्वोर्बलमस्य चोग्रम् | | verse_lines = अनेन दृष्टोऽहमिति स्म दुष्टो विज्ञाय बाह्वोर्बलमस्य चोग्रम् ।¦विनिश्चयं देवतमस्य पश्यन् प्रदुद्रुवे प्राणपरीप्सुराशु ॥ १६६॥ | ||
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| verse_lines = हाहाकृते प्रद्रुत इन्द्रशत्रौ रघूत्तमः शत्रुविभीषणत्वात् | | verse_lines = हाहाकृते प्रद्रुत इन्द्रशत्रौ रघूत्तमः शत्रुविभीषणत्वात् ।¦विभीषणेत्येव सुरैरभिष्टुतो विज्ञानमस्त्रं त्वमुचत् स्वसैन्ये ॥ १६७॥ | ||
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| verse_lines = निशाचरास्त्रं ह्यगमत् क्षणेन रामास्त्रवीर्याद्धरयो नदन्तः | | verse_lines = निशाचरास्त्रं ह्यगमत् क्षणेन रामास्त्रवीर्याद्धरयो नदन्तः ।¦उत्तस्थुरुच्चोरुगिरीन् प्रगृह्य प्रशंसमाना रघुवीरमुच्चैः ॥ १६८॥ | ||
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| verse_lines = सुरैश्च पुष्पं वर्षद्भिरीडितस्तस्थौ धनुष्पाणिरनन्तवीर्यः | | verse_lines = सुरैश्च पुष्पं वर्षद्भिरीडितस्तस्थौ धनुष्पाणिरनन्तवीर्यः ।¦स रावणस्याथ सुतो निकुम्भिलां पुनः समासाद्य जुहाव पावकम् ॥ १६९॥ | ||
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| verse_lines = विभीषणोऽथाऽह रघूत्तमं प्रभुं नियोजयाद्यैव वधाय दुर्मतेः | | verse_lines = विभीषणोऽथाऽह रघूत्तमं प्रभुं नियोजयाद्यैव वधाय दुर्मतेः ।¦कृताग्निपूजो नहि वध्य एष वरो विधातुः प्रथितोऽस्य तादृशः ॥ १७०॥ | ||
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| verse_text = न वै वधं राम इयेष तस्य पलायितस्याऽत्मसमीक्षणात् पुनः । | | verse_text = न वै वधं राम इयेष तस्य पलायितस्याऽत्मसमीक्षणात् पुनः । | ||
| verse_lines = न वै वधं राम इयेष तस्य पलायितस्याऽत्मसमीक्षणात् पुनः | | verse_lines = न वै वधं राम इयेष तस्य पलायितस्याऽत्मसमीक्षणात् पुनः ।¦सत्त्वोज्झितोऽसावपि कूटयोधी न मे वधार्होऽयमिति स्म स प्रभुः ॥ १७१॥ | ||
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| verse_lines = स आदिदेशावरजं जनार्दनो हनूमता चैव विभीषणेन | | verse_lines = स आदिदेशावरजं जनार्दनो हनूमता चैव विभीषणेन ।¦सहैव सर्वैरपि वानरेन्द्रैर्ययौ महात्मा स च तद्वधाय ॥ १७२॥ | ||
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| verse_text = स जुह्वतस्तस्य चकार विघ्नं प्लवङ्गमैः सोऽथ युयुत्सया रथम् । | | verse_text = स जुह्वतस्तस्य चकार विघ्नं प्लवङ्गमैः सोऽथ युयुत्सया रथम् । | ||
| verse_lines = स जुह्वतस्तस्य चकार विघ्नं प्लवङ्गमैः सोऽथ युयुत्सया रथम् | | verse_lines = स जुह्वतस्तस्य चकार विघ्नं प्लवङ्गमैः सोऽथ युयुत्सया रथम् ।¦समास्थितः कार्मुकबाणपाणिः प्रत्युद्ययौ लक्ष्मणमाशु गर्जन् ॥ १७३॥ | ||
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| verse_lines = उभौ च तावस्त्रविदां वरिष्ठौ शरैः शरीरान्तकरैस्ततक्षतुः | | verse_lines = उभौ च तावस्त्रविदां वरिष्ठौ शरैः शरीरान्तकरैस्ततक्षतुः ।¦दिशश्च सर्वाः प्रदिशः शरोत्तमैर्विधाय शिक्षास्त्रबलैर्निरन्तराः ॥ १७४॥ | ||
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| verse_lines = अस्त्राणि तस्यास्त्रवरैः स लक्ष्मणो निवार्य शत्रोश्चलकुण्डलोज्ज्वलम् | | verse_lines = अस्त्राणि तस्यास्त्रवरैः स लक्ष्मणो निवार्य शत्रोश्चलकुण्डलोज्ज्वलम् ।¦शिरः शरेणाऽशु समुन्ममाथ सुरैः प्रसूनैरथ चाभिवृष्टः ॥ १७५॥ | ||
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| verse_lines = त्रिंशत् सहस्राणि महौघकानामक्षोहिणीनां (अपि) सह षट्सहस्रम् | | verse_lines = त्रिंशत् सहस्राणि महौघकानामक्षोहिणीनां (अपि) सह षट्सहस्रम् ।¦श्रमेण संयोजयताऽशु रामं सज्जो भवामीति दिदेश रावणः ॥ १७९॥ | ||
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| verse_text = क्षणेन सर्वांश्च निहत्य राघवः प्लवङ्गमानामृषभैः स पूजितः । | | verse_text = क्षणेन सर्वांश्च निहत्य राघवः प्लवङ्गमानामृषभैः स पूजितः । | ||
| verse_lines = क्षणेन सर्वांश्च निहत्य राघवः प्लवङ्गमानामृषभैः स पूजितः | | verse_lines = क्षणेन सर्वांश्च निहत्य राघवः प्लवङ्गमानामृषभैः स पूजितः ।¦अभिष्टुतः सर्वसुरोत्तमैर्मुदा भृशं प्रसूनोत्करवर्षिभिः प्रभुः ॥ १८४॥ | ||
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| verse_text = अथाऽययौ सर्वनिशाचरेश्वरो हतावशिष्टेन बलेन संवृतः । | | verse_text = अथाऽययौ सर्वनिशाचरेश्वरो हतावशिष्टेन बलेन संवृतः । | ||
| verse_lines = अथाऽययौ सर्वनिशाचरेश्वरो हतावशिष्टेन बलेन संवृतः | | verse_lines = अथाऽययौ सर्वनिशाचरेश्वरो हतावशिष्टेन बलेन संवृतः ।¦विमानमारुह्य च पुष्पकं त्वरन् शरीरनाशाय महायुधोद्धतः ॥ १८५॥ | ||
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| verse_text = विरूपनेत्रोऽथच यूपनेत्रस्तथा महापार्श्वमहोदरौ च । | | verse_text = विरूपनेत्रोऽथच यूपनेत्रस्तथा महापार्श्वमहोदरौ च । | ||
| verse_lines = विरूपनेत्रोऽथच यूपनेत्रस्तथा महापार्श्वमहोदरौ च | | verse_lines = विरूपनेत्रोऽथच यूपनेत्रस्तथा महापार्श्वमहोदरौ च ।¦ययुस्तमावृत्य सहैव मन्त्रिणो मृतिं पुरोधाय रणाय यान्तम् ॥ १८६॥ | ||
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| verse_text = अथास्य सैन्यानि निजघ्नुरोजसा समन्ततः शैलशिलाभिवृष्टिभिः । | | verse_text = अथास्य सैन्यानि निजघ्नुरोजसा समन्ततः शैलशिलाभिवृष्टिभिः । | ||
| verse_lines = अथास्य सैन्यानि निजघ्नुरोजसा समन्ततः शैलशिलाभिवृष्टिभिः | | verse_lines = अथास्य सैन्यानि निजघ्नुरोजसा समन्ततः शैलशिलाभिवृष्टिभिः ।¦प्लवङ्गमास्तानभिवीक्ष्य वीर्यवान् ससार वेगेन महोदरो रुषा ॥ १८७॥ | ||
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| verse_text = वीक्ष्यातिकायं तमभिद्रवन्तं स कुम्भकर्णोऽयमिति ब्रुवन्तः । | | verse_text = वीक्ष्यातिकायं तमभिद्रवन्तं स कुम्भकर्णोऽयमिति ब्रुवन्तः । | ||
| verse_lines = वीक्ष्यातिकायं तमभिद्रवन्तं स कुम्भकर्णोऽयमिति ब्रुवन्तः | | verse_lines = वीक्ष्यातिकायं तमभिद्रवन्तं स कुम्भकर्णोऽयमिति ब्रुवन्तः ।¦प्रदुद्रुवुर्वानरवीरसङ्घास्तमाससादाऽशु सुतोऽथ वालिनः ॥ १८८॥ | ||
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| verse_text = वदन् स तिष्ठध्वमिति स्म वीरो विभीषिकामात्रमिदं न यात । | | verse_text = वदन् स तिष्ठध्वमिति स्म वीरो विभीषिकामात्रमिदं न यात । | ||
| verse_lines = वदन् स तिष्ठध्वमिति स्म वीरो विभीषिकामात्रमिदं न यात | | verse_lines = वदन् स तिष्ठध्वमिति स्म वीरो विभीषिकामात्रमिदं न यात ।¦इतीरयन्नग्रत एष पुप्लुवे महोदरस्येन्द्रसुतात्मजो बली ॥ १८९॥ | ||
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| verse_text = अथो शरानाशु विमुञ्चमानं शिरः परामृश्य निपात्य भूतळे । | | verse_text = अथो शरानाशु विमुञ्चमानं शिरः परामृश्य निपात्य भूतळे । | ||
| verse_lines = अथो शरानाशु विमुञ्चमानं शिरः परामृश्य निपात्य भूतळे | | verse_lines = अथो शरानाशु विमुञ्चमानं शिरः परामृश्य निपात्य भूतळे ।¦ममर्द पद्भ्यामभवद् गतासुर्महोदरो वालिसुतेन चूर्णितः ॥ १९०॥ | ||
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| verse_text = अथो महापार्श्व उपाजगाम प्रवर्षमाणोऽस्य शराम्बुधाराः । | | verse_text = अथो महापार्श्व उपाजगाम प्रवर्षमाणोऽस्य शराम्बुधाराः । | ||
| verse_lines = अथो महापार्श्व उपाजगाम प्रवर्षमाणोऽस्य शराम्बुधाराः | | verse_lines = अथो महापार्श्व उपाजगाम प्रवर्षमाणोऽस्य शराम्बुधाराः ।¦प्रसह्य चाऽच्छिद्य धनुः करस्थं समाददे खड्गममुष्य सोऽङ्गदः ॥ १९१॥ | ||
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| verse_text = निगृह्य केशेषु निपात्य भूतले(ळे) चकर्त वामांसत औदरं परम् । | | verse_text = निगृह्य केशेषु निपात्य भूतले(ळे) चकर्त वामांसत औदरं परम् । | ||
| verse_lines = निगृह्य केशेषु निपात्य भूतले(ळे) चकर्त वामांसत औदरं परम् | | verse_lines = निगृह्य केशेषु निपात्य भूतले(ळे) चकर्त वामांसत औदरं परम् ।¦यथोपवीतं स तथा द्विधाकृतो ममार मन्त्री रजनीचरेशितुः ॥ १९२॥ | ||
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| verse_lines = अथैनमाजग्मतुरुद्यतायुधौ विरूपनेत्रोऽप्यथ यूपनेत्रः | | verse_lines = अथैनमाजग्मतुरुद्यतायुधौ विरूपनेत्रोऽप्यथ यूपनेत्रः ।¦यथैव मेघौ दिवि तिग्मरश्मिं तथा समाच्छादयतां शरौघैः ॥ १९३॥ | ||
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| verse_lines = ताभ्यां स बद्धः शरपञ्जरेण विचेष्टितुं नाशकदत्र वीरः | | verse_lines = ताभ्यां स बद्धः शरपञ्जरेण विचेष्टितुं नाशकदत्र वीरः ।¦हरीश्वरः शैलमतिप्रमाणमुत्पाट्य चिक्षेप तयोः शरीरे ॥ १९४॥ | ||
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| verse_lines = उभौ च तौ तेन विचूर्णितौ रणे रवेः सुतस्योरुबलेरितेन | | verse_lines = उभौ च तौ तेन विचूर्णितौ रणे रवेः सुतस्योरुबलेरितेन ।¦निशाचरेशोऽथ शरेण सूर्यजं बिभेद वक्षस्यपि सोऽपतद् भुवि ॥ १९५॥ | ||
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| verse_lines = ततस्तु सर्वांश्च हरिप्रवीरान् विधूय बाणैर्बलवान् दशाननः | | verse_lines = ततस्तु सर्वांश्च हरिप्रवीरान् विधूय बाणैर्बलवान् दशाननः ।¦जगाम रामाभिमुखस्तदैनं रुरोध रामावरजः शरौघैः ॥ १९६॥ | ||
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| verse_lines = तदा दशास्योऽन्तकदण्डकल्पां मयाय दत्तां कमलोद्भवेन | | verse_lines = तदा दशास्योऽन्तकदण्डकल्पां मयाय दत्तां कमलोद्भवेन ।¦मयाद्गृहीतां च विवाहकाले प्रगृह्य शक्तिं विससर्ज लक्ष्मणे ॥ १९७॥ | ||
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| verse_lines = तया स वीरः सुविदारितोराः पपात भूमौ सुभृशं विमूर्च्छितः | | verse_lines = तया स वीरः सुविदारितोराः पपात भूमौ सुभृशं विमूर्च्छितः ।¦मरुत्सुतः शैलमतिप्रमाणं चिक्षेप रक्षःपतिवक्षसि द्रुतम् ॥ १९८॥ | ||
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| verse_lines = तेनातिगाढं व्यथितो दशाननो मुखैर्वमञ्छोणितपूरमाशु | | verse_lines = तेनातिगाढं व्यथितो दशाननो मुखैर्वमञ्छोणितपूरमाशु ।¦तदन्तरेण प्रतिगृह्य लक्ष्मणं जगाम शक्त्या सह रामसन्निधिम् ॥ १९९॥ | ||
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| verse_lines = समुद्बबर्हाथ च तां स राघवो दिदेश च प्राणवरात्मजं पुनः | | verse_lines = समुद्बबर्हाथ च तां स राघवो दिदेश च प्राणवरात्मजं पुनः ।¦प्रभुः समानेतुमथो वरौषधीः स चाऽनिनायाऽशु गिरिं पुनस्तम् ॥ २००॥ | ||
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| verse_lines = तद्गन्धमात्रेण समुत्थितोऽसौ सौमित्रिरात्तोरुबलश्च पूर्ववत् | | verse_lines = तद्गन्धमात्रेण समुत्थितोऽसौ सौमित्रिरात्तोरुबलश्च पूर्ववत् ।¦शशंस चाश्लिष्य मरुत्सुतं प्रभुः स राघवोऽगण्यगुणार्णवः स्मयन् ॥ २०१॥ | ||
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| verse_lines = प्राक्षिपत् तं गिरिवरं लङ्कास्थः सन् स मारुतिः | | verse_lines = प्राक्षिपत् तं गिरिवरं लङ्कास्थः सन् स मारुतिः ।¦अर्धलक्षे योजनानां यत्रासौ पूर्वसंस्थितः ॥ २०२॥ | ||
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| verse_lines = तद्बाहुवेगात् संश्लेषं प्राप पूर्ववदेव सः | | verse_lines = तद्बाहुवेगात् संश्लेषं प्राप पूर्ववदेव सः ।¦मृताश्च ये प्लवङ्गास्तु तद्गन्धात् तेऽपि जीविताः ॥ २०३॥ | ||
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| verse_lines = रामाज्ञयैव रक्षांसि हरयोऽब्धाववाक्षिपन् | | verse_lines = रामाज्ञयैव रक्षांसि हरयोऽब्धाववाक्षिपन् ।¦नोज्जीवितास्ततस्ते तु वानरा निरुजोऽभवन् ॥ २०४॥ | ||
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| verse_lines = छिन्नप्ररोहिणश्चैव विशल्याः पूर्ववर्णिनः | | verse_lines = छिन्नप्ररोहिणश्चैव विशल्याः पूर्ववर्णिनः ।¦औषधीनां प्रभावेन सर्वेऽपि हरयोऽभवन् ॥ २०५॥ | ||
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| verse_lines = अथाऽससादोत्तमपूरुषं प्रभुं विमानगो रावण आयुधौघान् | | verse_lines = अथाऽससादोत्तमपूरुषं प्रभुं विमानगो रावण आयुधौघान् ।¦प्रवर्षमाणो रघुवंशनाथं तमात्तधन्वाऽभिययौ च रामः(राघवः) ॥ २०६॥ | ||
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| verse_lines = सम्मानयन् राघवमादिपूरुषं निर्यातयामास रथं पुरन्दरः | | verse_lines = सम्मानयन् राघवमादिपूरुषं निर्यातयामास रथं पुरन्दरः ।¦सहायुधं मातलिसङ्गृहीतं समारुरोहाऽशु स लक्ष्मणाग्रजः ॥ २०७॥ | ||
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| verse_lines = आरुह्य तं रथवरं जगदेकनाथो लोकाभयाय रजनीचरनाथमाशु | | verse_lines = आरुह्य तं रथवरं जगदेकनाथो लोकाभयाय रजनीचरनाथमाशु ।¦अभ्युद्ययौ दशशतांशुरिवान्धकारं लोकानशेषत इमान् निगिरन्तमुद्यन् ॥ २०८॥ | ||
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| verse_lines = आयान्तमीक्ष्य रजनीचरलोकनाथः शस्त्राण्यथास्त्रसहितानि मुमोच रामे | | verse_lines = आयान्तमीक्ष्य रजनीचरलोकनाथः शस्त्राण्यथास्त्रसहितानि मुमोच रामे ।¦रामस्तु तानि विनिकृत्य(विनिवार्य) निजैर्महास्त्रैस्तस्योत्तमाङ्गदशकं युगपन्न्यकृन्तत् ॥ २०९॥ | ||
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| verse_lines = कृत्तानि तानि पुनरेव समुत्थितानि दृष्ट्वा वराच्छतधृतेर्हृदयं विभेद | | verse_lines = कृत्तानि तानि पुनरेव समुत्थितानि दृष्ट्वा वराच्छतधृतेर्हृदयं विभेद ।¦बाणेन वज्रसदृशेन स भिन्नहृत्को रक्तं वमन् न्यपतदाशु महाविमानात् ॥ २१०॥ | ||
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| verse_lines = तस्मिन् हते त्रिजगतां परमप्रतीपे ब्रह्मा शिवेन सहितः सह लोकपालैः | | verse_lines = तस्मिन् हते त्रिजगतां परमप्रतीपे ब्रह्मा शिवेन सहितः सह लोकपालैः ।¦अभ्येत्य पादयुगळं जगदेकभर्तू रामस्य भक्तिभरितः शिरसा ननाम ॥ २११॥ | ||
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| verse_lines = त्वमेक ईशोऽस्य नचाऽदिरन्तस्तवेड्य कालेन तथैव देशतः | | verse_lines = त्वमेक ईशोऽस्य नचाऽदिरन्तस्तवेड्य कालेन तथैव देशतः ।¦गुणा ह्यगण्यास्तव तेप्यनन्ताः प्रत्येकशश्चाऽदिविनाशवर्जिताः ॥ २१३॥ | ||
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| verse_text = इतीरिते त्वब्जभवेन शूली समाह्वयद् राघवमाहवाय । | | verse_text = इतीरिते त्वब्जभवेन शूली समाह्वयद् राघवमाहवाय । | ||
| verse_lines = इतीरिते त्वब्जभवेन शूली समाह्वयद् राघवमाहवाय | | verse_lines = इतीरिते त्वब्जभवेन शूली समाह्वयद् राघवमाहवाय ।¦वरं मदीयं त्वगणय्य रक्षो हतं त्वया तेन रणाय मेहि (मैहि)॥ २१८॥ | ||
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| verse_text = इतीरितेऽस्त्वित्यभिधाय राघवो धनुः प्रगृह्याऽशु शरं च सन्दधे । | | verse_text = इतीरितेऽस्त्वित्यभिधाय राघवो धनुः प्रगृह्याऽशु शरं च सन्दधे । | ||
| verse_lines = इतीरितेऽस्त्वित्यभिधाय राघवो धनुः प्रगृह्याऽशु शरं च सन्दधे | | verse_lines = इतीरितेऽस्त्वित्यभिधाय राघवो धनुः प्रगृह्याऽशु शरं च सन्दधे ।¦विकृष्यमाणे चलिता वसुन्धरा पपात रुद्रोऽपि धराप्रकम्पतः ॥ २१९॥ | ||
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| verse_text = अथोत्थितश्चाऽसुरभाववर्जितः क्षमस्व देवेति ननाम पादयोः । | | verse_text = अथोत्थितश्चाऽसुरभाववर्जितः क्षमस्व देवेति ननाम पादयोः । | ||
| verse_lines = अथोत्थितश्चाऽसुरभाववर्जितः क्षमस्व देवेति ननाम पादयोः | | verse_lines = अथोत्थितश्चाऽसुरभाववर्जितः क्षमस्व देवेति ननाम पादयोः ।¦उवाच च त्वद्वशगोऽस्मि सर्वदा प्रसीद मे त्वद्विषयं मनः कुरु ॥ २२०॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = अथेन्द्रमुख्याश्च तमूचिरे सुरास्त्वयाऽविताः स्मोऽद्य निशाचराद् वयम् । | | verse_text = अथेन्द्रमुख्याश्च तमूचिरे सुरास्त्वयाऽविताः स्मोऽद्य निशाचराद् वयम् । | ||
| verse_lines = अथेन्द्रमुख्याश्च तमूचिरे सुरास्त्वयाऽविताः स्मोऽद्य निशाचराद् वयम् | | verse_lines = अथेन्द्रमुख्याश्च तमूचिरे सुरास्त्वयाऽविताः स्मोऽद्य निशाचराद् वयम् ।¦तथैव सर्वापद एव नस्त्वं प्रपाहि सर्वे भवदीयकाः स्म ॥ २२१॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = सीताकृतिं तामथ तत्र चाऽगतां दिव्यच्छलेन प्रणिधाय पावके । | | verse_text = सीताकृतिं तामथ तत्र चाऽगतां दिव्यच्छलेन प्रणिधाय पावके । | ||
| verse_lines = सीताकृतिं तामथ तत्र चाऽगतां दिव्यच्छलेन प्रणिधाय पावके | | verse_lines = सीताकृतिं तामथ तत्र चाऽगतां दिव्यच्छलेन प्रणिधाय पावके ।¦कैलासतस्तां पुनरेव चाऽगतां सीतामगृह्णाद्धुतभुक्समर्पिताम् ॥ २२२॥ | ||
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| verse_text = जानन् गिरीशालयगां स सीतां समग्रहीत् पावकसम्प्रदत्ताम् । | | verse_text = जानन् गिरीशालयगां स सीतां समग्रहीत् पावकसम्प्रदत्ताम् । | ||
| verse_lines = जानन् गिरीशालयगां स सीतां समग्रहीत् पावकसम्प्रदत्ताम् | | verse_lines = जानन् गिरीशालयगां स सीतां समग्रहीत् पावकसम्प्रदत्ताम् ।¦मुमोद सम्प्राप्य च तां स रामः सा चैव देवी भगवन्तमाप्य ॥ २२३॥ | ||
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| verse_text = अथो गिरेरानयनात् परस्ताद् ये वानरा रावणबाणपीडिताः । | | verse_text = अथो गिरेरानयनात् परस्ताद् ये वानरा रावणबाणपीडिताः । | ||
| verse_lines = अथो गिरेरानयनात् परस्ताद् ये वानरा रावणबाणपीडिताः | | verse_lines = अथो गिरेरानयनात् परस्ताद् ये वानरा रावणबाणपीडिताः ।¦तारापिता तान् निरुजश्चकार सुषेणनामा भिषजां वरिष्ठः ॥ २२४॥ | ||
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| verse_text = तदा मृतान् राघव आनिनाय यमक्षयाद् देवगणांश्च सर्वशः । | | verse_text = तदा मृतान् राघव आनिनाय यमक्षयाद् देवगणांश्च सर्वशः । | ||
| verse_lines = तदा मृतान् राघव आनिनाय यमक्षयाद् देवगणांश्च सर्वशः | | verse_lines = तदा मृतान् राघव आनिनाय यमक्षयाद् देवगणांश्च सर्वशः ।¦समन्वजानात् पितरं च तत्र समागतं गन्तुमियेष चाथ ॥ २२५॥ | ||
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| verse_text = विभीषणेनार्पितमारुरोह स पुष्पकं तत्सहितः सवानरः । | | verse_text = विभीषणेनार्पितमारुरोह स पुष्पकं तत्सहितः सवानरः । | ||
| verse_lines = विभीषणेनार्पितमारुरोह स पुष्पकं तत्सहितः सवानरः | | verse_lines = विभीषणेनार्पितमारुरोह स पुष्पकं तत्सहितः सवानरः ।¦पुरीं जगामाऽशु निजामयोध्यां पुरो हनूमन्तमथ न्ययोजयत् ॥ २२६॥ | ||
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| verse_text = ददर्श चासौ भरतं हुताशनं प्रवेष्टुकामं जगदीश्वरस्य । | | verse_text = ददर्श चासौ भरतं हुताशनं प्रवेष्टुकामं जगदीश्वरस्य । | ||
| verse_lines = ददर्श चासौ भरतं हुताशनं प्रवेष्टुकामं जगदीश्वरस्य | | verse_lines = ददर्श चासौ भरतं हुताशनं प्रवेष्टुकामं जगदीश्वरस्य ।¦अदर्शनात् तं विनिवार्य रामं समागतं चास्य शशंस मारुतिः ॥ २२७॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वा प्रमोदोरुभरः स तेन सहैव पौरैः सहितः समातृकः । | | verse_text = श्रुत्वा प्रमोदोरुभरः स तेन सहैव पौरैः सहितः समातृकः । | ||
| verse_lines = श्रुत्वा प्रमोदोरुभरः स तेन सहैव पौरैः सहितः समातृकः | | verse_lines = श्रुत्वा प्रमोदोरुभरः स तेन सहैव पौरैः सहितः समातृकः ।¦शत्रुघ्नयुक्तोऽभिसमेत्य राघवं ननाम बाष्पाकुललोचनाननः ॥ २२८॥ | ||
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| verse_text = उत्थाप्य तं रघुपतिः सस्वजे प्रणयान्वितः । | | verse_text = उत्थाप्य तं रघुपतिः सस्वजे प्रणयान्वितः । | ||
| verse_lines = उत्थाप्य तं रघुपतिः सस्वजे प्रणयान्वितः | | verse_lines = उत्थाप्य तं रघुपतिः सस्वजे प्रणयान्वितः ।¦शत्रुघ्नं च तदन्येषु प्रतिपेदे यथावयः ॥ २२९॥ | ||
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| verse_text = पुरीं प्रविश्य मुनिभिः साम्राज्ये चाभिषेचितः । | | verse_text = पुरीं प्रविश्य मुनिभिः साम्राज्ये चाभिषेचितः । | ||
| verse_lines = पुरीं प्रविश्य मुनिभिः साम्राज्ये चाभिषेचितः | | verse_lines = पुरीं प्रविश्य मुनिभिः साम्राज्ये चाभिषेचितः ।¦यथोचितं च सम्मान्य सर्वानाहेदमीश्वरः ॥ २३०॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = सर्वैर्भवद्भिः सुकृतं विधाय देहं मनोवाक्सहितं मदीयम् । | | verse_text = सर्वैर्भवद्भिः सुकृतं विधाय देहं मनोवाक्सहितं मदीयम् । | ||
| verse_lines = सर्वैर्भवद्भिः सुकृतं विधाय देहं मनोवाक्सहितं मदीयम् | | verse_lines = सर्वैर्भवद्भिः सुकृतं विधाय देहं मनोवाक्सहितं मदीयम् ।¦एतावदेवाखिलसद्विधेयं यत् कायवाक्चित्तभवं मदर्चनम् ॥ २३१॥ | ||
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| verse_text = मुक्तिप्रदानात् प्रतिकर्तृता मे सर्वस्य चाथो भवतां भवेत (त्)। | | verse_text = मुक्तिप्रदानात् प्रतिकर्तृता मे सर्वस्य चाथो भवतां भवेत (त्)। | ||
| verse_lines = मुक्तिप्रदानात् प्रतिकर्तृता मे सर्वस्य चाथो भवतां भवेत (त्) | | verse_lines = मुक्तिप्रदानात् प्रतिकर्तृता मे सर्वस्य चाथो भवतां भवेत (त्)।¦हनूमतो न प्रतिकर्तृता स्यात् स्वभावभक्तस्य निरौपधं मे ॥ २३२॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_lines = मद्भक्तौ ज्ञानपूर्तावनुपधिकबलप्रोन्नतिस्थैर्यधैर्यस्वाभाव्याधिक्यतेजःसुमतिदमशमेष्वस्य तुल्यो न कश्चित् | | verse_lines = मद्भक्तौ ज्ञानपूर्तावनुपधिकबलप्रोन्नतिस्थैर्यधैर्यस्वाभाव्याधिक्यतेजःसुमतिदमशमेष्वस्य तुल्यो न कश्चित् ।¦शेषो रुद्रः सुपर्णोऽप्युरुगुणसमितौ नो सहस्रांशतुल्या अस्येत्यस्मान् (अस्मिन्) मदैशं (मदंशं) पदमहममुना सार्धमेवोपभोक्ष्ये ॥ २३३॥ | ||
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| verse_lines = पूर्वं जिगाय भुवनं दशकन्धरोऽसावब्जोद्भवस्य वरतो नतु तं कदाचित् | | verse_lines = पूर्वं जिगाय भुवनं दशकन्धरोऽसावब्जोद्भवस्य वरतो नतु तं कदाचित् ।¦कश्चिज्जिगाय पुरुहूतसुतः कपित्वाद् विष्णोर्वरादजयदर्जुन एव चैनम् ॥ २३४॥ | ||
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| verse_text = दत्तो वरो न मनुजान् प्रति वानरांश्च धात्राऽस्य तेन विजितो युधि वालिनैषः । | | verse_text = दत्तो वरो न मनुजान् प्रति वानरांश्च धात्राऽस्य तेन विजितो युधि वालिनैषः । | ||
| verse_lines = दत्तो वरो न मनुजान् प्रति वानरांश्च धात्राऽस्य तेन विजितो युधि वालिनैषः | | verse_lines = दत्तो वरो न मनुजान् प्रति वानरांश्च धात्राऽस्य तेन विजितो युधि वालिनैषः ।¦अब्जोद्भवस्य वरमाश्वभिभूय रक्षो जिग्ये त्वहं रणमुखे बलिमाह्वयन्तम् ॥ २३५॥ | ||
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| verse_lines = बलेर्द्वारस्थोऽहं वरमस्मै सम्प्रदाय पूर्वं तु | | verse_lines = बलेर्द्वारस्थोऽहं वरमस्मै सम्प्रदाय पूर्वं तु ।¦तेन मया रक्षोऽस्तं योजनमयुतं पदाङ्गुल्या ॥ २३६॥ | ||
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| verse_text = पुनश्च युद्धाय समाह्वयन्तं न्यपातयं रावणमेकमुष्टिना । | | verse_text = पुनश्च युद्धाय समाह्वयन्तं न्यपातयं रावणमेकमुष्टिना । | ||
| verse_lines = पुनश्च युद्धाय समाह्वयन्तं न्यपातयं रावणमेकमुष्टिना | | verse_lines = पुनश्च युद्धाय समाह्वयन्तं न्यपातयं रावणमेकमुष्टिना ।¦महाबलोऽहं कपिलाख्यरूपस्त्रिकोटिरूपः पवनश्च मे सुतः ॥ २३७॥ | ||
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| verse_lines = आवां स्वशक्त्या जयिनाविति स्म शिवो वरान्मेऽजयदेनमेवम् | | verse_lines = आवां स्वशक्त्या जयिनाविति स्म शिवो वरान्मेऽजयदेनमेवम् ।¦ज्ञात्वा सुराजेयमिमं हि वव्रे हरो जयेयाहममुं दशाननम् ॥ २३८॥ | ||
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| verse_lines = अतः स्वभावाज्जयिनावहं च वायुश्च वायुर्हनुमान् स एषः | | verse_lines = अतः स्वभावाज्जयिनावहं च वायुश्च वायुर्हनुमान् स एषः ।¦अमुष्य हेतोस्तु पुरा हि वायुना शिवेन्द्रपूर्वा अपि काष्ठवत् कृताः ॥ २३९॥ | ||
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| verse_lines = अतो हनूमान् पदमेतु धातुर्मदाज्ञया सृष्ट्यवनादि कर्म | | verse_lines = अतो हनूमान् पदमेतु धातुर्मदाज्ञया सृष्ट्यवनादि कर्म ।¦मोक्षं च लोकस्य सदैव कुर्वन् मुक्तश्च मुक्तान् सुखयन् प्रवर्तताम् ॥ २४०॥ | ||
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| verse_lines = भोगाश्च ये यानि च कर्मजातान्यनाद्यनन्तानि ममेह सन्ति | | verse_lines = भोगाश्च ये यानि च कर्मजातान्यनाद्यनन्तानि ममेह सन्ति ।¦मदाज्ञया तान्यखिलानि सन्ति धातुः पदे तत् सहभोगनाम ॥ २४१॥ | ||
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| verse_lines = एतादृशं मे सहभोजनं ते मया प्रदत्तं हनुमन् सदैव | | verse_lines = एतादृशं मे सहभोजनं ते मया प्रदत्तं हनुमन् सदैव ।¦इतीरितस्तं हनुमान् प्रणम्य जगाद वाक्यं स्थिरभक्तिनम्रः ॥ २४२॥ | ||
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| verse_lines = को न्वीश ते पादसरोजभाजां सुदुर्लभोऽर्थेषु चतुर्ष्वपीह | | verse_lines = को न्वीश ते पादसरोजभाजां सुदुर्लभोऽर्थेषु चतुर्ष्वपीह ।¦तथाऽपि नाहं प्रवृणोमि भूमन् भवत्पदाम्भोजनिषेवणादृते ॥ २४३॥ | ||
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| verse_lines = त्वमेव साक्षात् परमस्वतन्त्रस्त्वमेव साक्षादखिलोरुशक्तिः | | verse_lines = त्वमेव साक्षात् परमस्वतन्त्रस्त्वमेव साक्षादखिलोरुशक्तिः ।¦त्वमेव चागण्यगुणार्णवः सदा रमाविरिञ्चादिभिरप्यशेषैः ॥ २४४॥ | ||
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| verse_lines = समेत्य सर्वेऽपि सदा वदन्तोऽप्यनन्तकालाच्च नवै समाप्नुयुः | | verse_lines = समेत्य सर्वेऽपि सदा वदन्तोऽप्यनन्तकालाच्च नवै समाप्नुयुः ।¦गुणांस्त्वदीयान् परिपूर्णसौख्यज्ञानात्मकस्त्वं हि सदाऽतिशुद्धः ॥ २४५॥ | ||
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| verse_lines = यस्ते कथासेवक एव सर्वदा सदारतिस्त्वय्यचलैकभक्तिः | | verse_lines = यस्ते कथासेवक एव सर्वदा सदारतिस्त्वय्यचलैकभक्तिः ।¦स जीवमानो न परः कथञ्चित् तज्जीवनं मेऽस्त्वधिकं समस्तात् ॥ २४६॥ | ||
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| verse_lines = प्रवर्द्धतां भक्तिरलं क्षणेक्षणे त्वयीश मे ह्रासविवर्जिता सदा | | verse_lines = प्रवर्द्धतां भक्तिरलं क्षणेक्षणे त्वयीश मे ह्रासविवर्जिता सदा ।¦अनुग्रहस्ते मयि चैवमेव निरौपधौ तौ मम सर्वकामः ॥ २४७॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितस्तस्य ददौ स तद्द्वयं पदं विधातुं सकलैश्च शोभनम् | | verse_lines = इतीरितस्तस्य ददौ स तद्द्वयं पदं विधातुं सकलैश्च शोभनम् ।¦समाश्लिषच्चैनमथाऽर्द्रया धिया यथोचितं सर्वजनानपूजयत् ॥ २४८॥ | ||
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| verse_text = औं ॥ अथाऽप्तराज्यो भगवान् स लक्ष्मणं जगाद राजा तरुणो भवाऽशु । | | verse_text = औं ॥ अथाऽप्तराज्यो भगवान् स लक्ष्मणं जगाद राजा तरुणो भवाऽशु । | ||
| verse_lines = औं ॥ अथाऽप्तराज्यो भगवान् स लक्ष्मणं जगाद राजा तरुणो भवाऽशु | | verse_lines = औं ॥ अथाऽप्तराज्यो भगवान् स लक्ष्मणं जगाद राजा तरुणो भवाऽशु ।¦इतीरितस्त्वाह स लक्ष्मणो गुरुं भवत्पदाब्जान्न परं वृणोम्यहम् ॥ १॥ | ||
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| verse_text = न मां भवत्पादनिषेवणैकस्पृहं तदन्यत्र नियोक्तुमर्हति । | | verse_text = न मां भवत्पादनिषेवणैकस्पृहं तदन्यत्र नियोक्तुमर्हति । | ||
| verse_lines = न मां भवत्पादनिषेवणैकस्पृहं तदन्यत्र नियोक्तुमर्हति | | verse_lines = न मां भवत्पादनिषेवणैकस्पृहं तदन्यत्र नियोक्तुमर्हति ।¦नहीदृशः कश्चिदनुग्रहः क्वचित् तदेव मे देहि ततः सदैव ॥ २॥ | ||
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| verse_text = इतीरितस्तस्य तदेव दत्त्वा दृढं समाश्लिष्य च राघवः प्रभुः । | | verse_text = इतीरितस्तस्य तदेव दत्त्वा दृढं समाश्लिष्य च राघवः प्रभुः । | ||
| verse_lines = इतीरितस्तस्य तदेव दत्त्वा दृढं समाश्लिष्य च राघवः प्रभुः | | verse_lines = इतीरितस्तस्य तदेव दत्त्वा दृढं समाश्लिष्य च राघवः प्रभुः ।¦स यौवराज्यं भरते निधाय जुगोप लोकानखिलान् सधर्मकान् ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = प्रशासतीशे पृथिवी बभूव विरिञ्चलोकस्य समा गुणोन्नतौ । | | verse_text = प्रशासतीशे पृथिवी बभूव विरिञ्चलोकस्य समा गुणोन्नतौ । | ||
| verse_lines = प्रशासतीशे पृथिवी बभूव विरिञ्चलोकस्य समा गुणोन्नतौ | | verse_lines = प्रशासतीशे पृथिवी बभूव विरिञ्चलोकस्य समा गुणोन्नतौ ।¦जनोऽखिलो विष्णुपरो बभूव न धर्महानिश्च बभूव कस्यचित् ॥ ४॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = गुणैश्च सर्वैरुदिताश्च सर्वे यथायथा योग्यतयोच्चनीचाः । | | verse_text = गुणैश्च सर्वैरुदिताश्च सर्वे यथायथा योग्यतयोच्चनीचाः । | ||
| verse_lines = गुणैश्च सर्वैरुदिताश्च सर्वे यथायथा योग्यतयोच्चनीचाः | | verse_lines = गुणैश्च सर्वैरुदिताश्च सर्वे यथायथा योग्यतयोच्चनीचाः ।¦समस्तरोगादिभिरुज्झिताश्च सर्वे सहस्रायुष ऊर्जिता धनैः ॥ ५॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = सर्वेऽजरा नित्यबलोपपन्ना यथेष्टसिद्ध्या च सदोपपन्नाः । | | verse_text = सर्वेऽजरा नित्यबलोपपन्ना यथेष्टसिद्ध्या च सदोपपन्नाः । | ||
| verse_lines = सर्वेऽजरा नित्यबलोपपन्ना यथेष्टसिद्ध्या च सदोपपन्नाः | | verse_lines = सर्वेऽजरा नित्यबलोपपन्ना यथेष्टसिद्ध्या च सदोपपन्नाः ।¦समस्तदोषैश्च सदा विहीनाः सर्वे सुरूपाश्च सदा महोत्सवाः ॥ ६॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = सर्वे मनोवाक्तनुभिः सदैव विष्णुं यजन्ते नतु कञ्चिदन्यम् । | | verse_text = सर्वे मनोवाक्तनुभिः सदैव विष्णुं यजन्ते नतु कञ्चिदन्यम् । | ||
| verse_lines = सर्वे मनोवाक्तनुभिः सदैव विष्णुं यजन्ते नतु कञ्चिदन्यम् | | verse_lines = सर्वे मनोवाक्तनुभिः सदैव विष्णुं यजन्ते नतु कञ्चिदन्यम् ।¦समस्तरत्नोद्भरिता च पृथ्वी यथेष्टधान्या बहुदुग्धगोमती ॥ ७॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = समस्तगन्धाश्च सदाऽतिहृद्या रसा मनोहारिण एव तत्र । | | verse_text = समस्तगन्धाश्च सदाऽतिहृद्या रसा मनोहारिण एव तत्र । | ||
| verse_lines = समस्तगन्धाश्च सदाऽतिहृद्या रसा मनोहारिण एव तत्र | | verse_lines = समस्तगन्धाश्च सदाऽतिहृद्या रसा मनोहारिण एव तत्र ।¦शब्दाश्च सर्वे श्रवणातिहारिणः स्पर्शाश्च सर्वे स्पर्शेन्द्रियप्रियाः ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = न कस्यचिद् दुःखमभूत् कथञ्चिन्न वित्तहीनश्च बभूव कस्यचित् (कश्चन) । | | verse_text = न कस्यचिद् दुःखमभूत् कथञ्चिन्न वित्तहीनश्च बभूव कस्यचित् (कश्चन) । | ||
| verse_lines = न कस्यचिद् दुःखमभूत् कथञ्चिन्न वित्तहीनश्च बभूव कस्यचित् (कश्चन) | | verse_lines = न कस्यचिद् दुःखमभूत् कथञ्चिन्न वित्तहीनश्च बभूव कस्यचित् (कश्चन) ।¦नाधर्मशीलो न च कश्चनाप्रजो न दुष्प्रजो नैव कुभार्यकश्च ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = स्त्रियो नचाऽसन् विधवाः कथञ्चिन्न वै पुमांसो विधुरा बभूवुः । | | verse_text = स्त्रियो नचाऽसन् विधवाः कथञ्चिन्न वै पुमांसो विधुरा बभूवुः । | ||
| verse_lines = स्त्रियो नचाऽसन् विधवाः कथञ्चिन्न वै पुमांसो विधुरा बभूवुः | | verse_lines = स्त्रियो नचाऽसन् विधवाः कथञ्चिन्न वै पुमांसो विधुरा बभूवुः ।¦नानिष्टयोगश्च बभूव कस्यचिन्नचेष्टहानिर्नच पूर्वमृत्युः ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = यथेष्टमाल्याभरणानुलेपना यथेष्टपानाशनवाससोऽखिलाः । | | verse_text = यथेष्टमाल्याभरणानुलेपना यथेष्टपानाशनवाससोऽखिलाः । | ||
| verse_lines = यथेष्टमाल्याभरणानुलेपना यथेष्टपानाशनवाससोऽखिलाः | | verse_lines = यथेष्टमाल्याभरणानुलेपना यथेष्टपानाशनवाससोऽखिलाः ।¦बभूवुरीशे जगतां प्रशासति प्रकृष्टधर्मेण जनार्दने नृपे ॥ ११॥ | ||
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| verse_text = स ब्रह्मरुद्रमरुदश्विदिवाकरादिमूर्द्धन्यरत्नपरिघट्टितपादपीठः । | | verse_text = स ब्रह्मरुद्रमरुदश्विदिवाकरादिमूर्द्धन्यरत्नपरिघट्टितपादपीठः । | ||
| verse_lines = स ब्रह्मरुद्रमरुदश्विदिवाकरादिमूर्द्धन्यरत्नपरिघट्टितपादपीठः | | verse_lines = स ब्रह्मरुद्रमरुदश्विदिवाकरादिमूर्द्धन्यरत्नपरिघट्टितपादपीठः ।¦नित्यं सुरैः सह नरैरथ वानरैश्च सम्पूज्यमानचरणो रमते रमेशः ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = तस्याखिलेशितुरनाद्यनुगैव लक्ष्मीः सीताभिधा त्वरमयत् स्वरतं सुरेशम् । | | verse_text = तस्याखिलेशितुरनाद्यनुगैव लक्ष्मीः सीताभिधा त्वरमयत् स्वरतं सुरेशम् । | ||
| verse_lines = तस्याखिलेशितुरनाद्यनुगैव लक्ष्मीः सीताभिधा त्वरमयत् स्वरतं सुरेशम् | | verse_lines = तस्याखिलेशितुरनाद्यनुगैव लक्ष्मीः सीताभिधा त्वरमयत् स्वरतं सुरेशम् ।¦नित्यावियोगिपरमोच्चनिजस्वभावा सौन्दर्यविभ्रमसुलक्षणपूर्वभावा ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = रेमे तया स परमः स्वरतोऽपि नित्यं नित्योन्नतप्रमदभारभृतस्वभावः । | | verse_text = रेमे तया स परमः स्वरतोऽपि नित्यं नित्योन्नतप्रमदभारभृतस्वभावः । | ||
| verse_lines = रेमे तया स परमः स्वरतोऽपि नित्यं नित्योन्नतप्रमदभारभृतस्वभावः | | verse_lines = रेमे तया स परमः स्वरतोऽपि नित्यं नित्योन्नतप्रमदभारभृतस्वभावः ।¦पूर्णोडुराजसुविराजितसन्निशासु दीप्यन्नशोकवनिकासु सुपुष्पितासु ॥ १४॥ | ||
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| verse_text = गायन्ति चैनमनुरक्तधियः सुकण्ठा गन्धर्वचारणगणाः सह चाप्सरोभिः । | | verse_text = गायन्ति चैनमनुरक्तधियः सुकण्ठा गन्धर्वचारणगणाः सह चाप्सरोभिः । | ||
| verse_lines = गायन्ति चैनमनुरक्तधियः सुकण्ठा गन्धर्वचारणगणाः सह चाप्सरोभिः | | verse_lines = गायन्ति चैनमनुरक्तधियः सुकण्ठा गन्धर्वचारणगणाः सह चाप्सरोभिः ।¦तं तुष्टुवुर्मुनिगणाः सहिताः सुरेशै राजान एनमनुयान्ति सदाऽप्रमत्ताः ॥ १५॥ | ||
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| verse_lines = एवं त्रयोदशसहस्रमसौ समास्तु पृथ्वीं ररक्ष विजितारिरमोघवीर्यः | | verse_lines = एवं त्रयोदशसहस्रमसौ समास्तु पृथ्वीं ररक्ष विजितारिरमोघवीर्यः ।¦आनन्दमिन्दुरिव सन्दधदिन्दिरेशो लोकस्य सान्द्रसुखवारिधिरप्रमेयः ॥ १६॥ | ||
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| verse_lines = देव्यां स चाजनयदिन्द्रहुताशनौ द्वौ पुत्रौ यमौ कुशलवौ बलिनौ गुणाढ्यौ | | verse_lines = देव्यां स चाजनयदिन्द्रहुताशनौ द्वौ पुत्रौ यमौ कुशलवौ बलिनौ गुणाढ्यौ ।¦शत्रुघ्नतो लवणमुद्बणबाणदग्धं कृत्वा चकार मधुरां पुरमुग्रवीर्यः ॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = कोटित्रयं स निजघान तथाऽसुराणां गन्धर्वजन्म भरतेन सतां च धर्मम् | | verse_lines = कोटित्रयं स निजघान तथाऽसुराणां गन्धर्वजन्म भरतेन सतां च धर्मम् ।¦संशिक्षयन्नयजदुत्तमकल्पकैः स्वं यज्ञैर्भवाजमुखसत्सचिवाश्च यत्र ॥ १८॥ | ||
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| verse_lines = अथ शूद्रतपश्चर्यानिहतं विप्रपुत्रकम् | | verse_lines = अथ शूद्रतपश्चर्यानिहतं विप्रपुत्रकम् ।¦उज्जीवयामास विभुर्हत्वा तं शूद्रतापसम् ॥ १९॥ | ||
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| verse_lines = जङ्घनामाऽसुरः पूर्वं गिरिजावरदानतः | | verse_lines = जङ्घनामाऽसुरः पूर्वं गिरिजावरदानतः ।¦बभूव शूद्रः कल्पायुः स लोकक्षयकाम्यया ।¦तपश्चचार दुर्बुद्धिरिच्छन् माहेश्वरं पदम् ॥ २०॥ | ||
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| verse_lines = अनन्यवध्यं तं तस्माज्जघान पुरुषोत्तमः | | verse_lines = अनन्यवध्यं तं तस्माज्जघान पुरुषोत्तमः ।¦श्वेतदत्तां तथा मालामगस्त्यादाप राघवः ॥ २१॥ | ||
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| verse_lines = अनन्नयज्ञकृच्छ्वेतो राजा क्षुद्विनिवर्तनम् | | verse_lines = अनन्नयज्ञकृच्छ्वेतो राजा क्षुद्विनिवर्तनम् ।¦कुर्वन् स्वमांसैर्धात्रोक्तो मालां रामार्थमर्पयत् ।¦अगस्त्याय न साक्षात्तु रामे दद्यादयं नृपः ॥ २२॥ | ||
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| verse_lines = क्षुदभावमात्रफलदं न साक्षाद् राघवेऽर्पितम् | | verse_lines = क्षुदभावमात्रफलदं न साक्षाद् राघवेऽर्पितम् ।¦क्षुदभावमात्रमाकाङ्क्षन् मामसौ परिपृच्छति ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = व्यवधानतस्ततो रामे दद्याच्छ्वेत इति प्रभुः | | verse_lines = व्यवधानतस्ततो रामे दद्याच्छ्वेत इति प्रभुः ।¦मत्वा ब्रह्माऽदिशन्मालां प्रदातुं कुम्भयोनये ॥ २४॥ | ||
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| verse_lines = तामगस्त्यकरपल्लवार्पितां भक्त एष मम कुम्भसम्भवः | | verse_lines = तामगस्त्यकरपल्लवार्पितां भक्त एष मम कुम्भसम्भवः ।¦इत्यवेत्य जगृहे जनार्दनस्तेन संस्तुत उपागमत् पुरम् ॥ २५॥ | ||
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| verse_lines = अथ केचिदासुरसुराः सुराणका इत्युरुप्रथितपौरुषाः पुरा | | verse_lines = अथ केचिदासुरसुराः सुराणका इत्युरुप्रथितपौरुषाः पुरा ।¦ते तपः सुमहदास्थिता विभुं पद्मसम्भवमवेत्य (अवेक्ष्य) चोचिरे ॥ २६॥ | ||
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| verse_lines = भूरिपापकृतिनोऽपि निश्चयान्मुक्तिमाप्नुम उदारसद्गुण | | verse_lines = भूरिपापकृतिनोऽपि निश्चयान्मुक्तिमाप्नुम उदारसद्गुण ।¦इत्युदीरितमजोऽवधार्य तत् प्राह च प्रहसिताननः प्रभुः ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = यावदेव रमया रमेश्वरं नो वियोजयथ सद्गुणार्णवम् | | verse_lines = यावदेव रमया रमेश्वरं नो वियोजयथ सद्गुणार्णवम् ।¦तावदुच्चमपि दुष्कृतं भवन्मोक्षमार्गपरिपन्थि नो भवेत् ॥ २८॥ | ||
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| verse_lines = इत्युदीरितमवेत्य तेऽसुराः क्षिप्रमोक्षगमनोत्सुकाः क्षितौ | | verse_lines = इत्युदीरितमवेत्य तेऽसुराः क्षिप्रमोक्षगमनोत्सुकाः क्षितौ ।¦साधनोपचयकाङ्क्षिणो हरौ शासति क्षितिमशेषतोऽभवन् ॥ २९॥ | ||
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| verse_lines = ताननादिकृतदोषसञ्चयैर्मोक्षमार्गगतियोग्यतोज्झितान् | | verse_lines = ताननादिकृतदोषसञ्चयैर्मोक्षमार्गगतियोग्यतोज्झितान् ।¦मैथिलस्य तनया व्यचालयन्मायया स्वतनुवा स्वमार्गतः ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = आज्ञयैव हि हरेस्तु मायया मोहितास्तु दितिजा व्यनिन्दयन् | | verse_lines = आज्ञयैव हि हरेस्तु मायया मोहितास्तु दितिजा व्यनिन्दयन् ।¦राघवो निशिचराहृतां पुनर्जानकीं जगृह इत्यनेकशः ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = ब्रह्मवाक्यमृतमेव कारयन् पातयंस्तमसि चान्ध आसुरान् | | verse_lines = ब्रह्मवाक्यमृतमेव कारयन् पातयंस्तमसि चान्ध आसुरान् ।¦नित्यमेव सहितोऽपि सीतया सोऽज्ञसाक्षिकमभूद् वियुक्तवत् ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = तेन चान्धतम ईयुरासुरा यज्ञमाह्वयदसौ च मैथिलीम् | | verse_lines = तेन चान्धतम ईयुरासुरा यज्ञमाह्वयदसौ च मैथिलीम् ।¦तत्र भूमिशपथच्छलान्नृणां दृष्टिमार्गमपहाय सा स्थिता ॥ ३३॥ | ||
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| verse_lines = गुरुं हि जगतो विष्णुर्ब्रह्माणमसृजत् स्वयम् | | verse_lines = गुरुं हि जगतो विष्णुर्ब्रह्माणमसृजत् स्वयम् ।¦तेन तद्वचनं सत्सु नानृतं कुरुते क्वचित् ॥ ३४॥ | ||
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| verse_text = नान्यः कश्चित् तद्वराणां शापानामप्यतिक्रमी । | | verse_text = नान्यः कश्चित् तद्वराणां शापानामप्यतिक्रमी । | ||
| verse_lines = नान्यः कश्चित् तद्वराणां शापानामप्यतिक्रमी | | verse_lines = नान्यः कश्चित् तद्वराणां शापानामप्यतिक्रमी ।¦अयोग्येषु तु रुद्रादिवाक्यं तौ कुरुतो मृषा ।¦एकदेशेन सत्यं तु योग्येष्वपि कदाचन ॥ ३७॥ | ||
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| verse_text = न विष्णोर्वचनं क्वापि मृषा भवति कस्यचित् । | | verse_text = न विष्णोर्वचनं क्वापि मृषा भवति कस्यचित् । | ||
| verse_lines = न विष्णोर्वचनं क्वापि मृषा भवति कस्यचित् | | verse_lines = न विष्णोर्वचनं क्वापि मृषा भवति कस्यचित् ।¦एतदर्थोऽवतारश्च विष्णोर्भवति सर्वदा ॥ ३८॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = प्रविश्य भूमौ सा देवी लोकदृष्ट्यनुसारतः । | | verse_text = प्रविश्य भूमौ सा देवी लोकदृष्ट्यनुसारतः । | ||
| verse_lines = प्रविश्य भूमौ सा देवी लोकदृष्ट्यनुसारतः | | verse_lines = प्रविश्य भूमौ सा देवी लोकदृष्ट्यनुसारतः ।¦रेमे रामेणावियुक्ता भास्करेण प्रभा यथा ॥ ३९॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = एवं रमालाळितपादपल्लवः पुनः स यज्ञैरयजत्स्वमेव । | | verse_text = एवं रमालाळितपादपल्लवः पुनः स यज्ञैरयजत्स्वमेव । | ||
| verse_lines = एवं रमालाळितपादपल्लवः पुनः स यज्ञैरयजत्स्वमेव | | verse_lines = एवं रमालाळितपादपल्लवः पुनः स यज्ञैरयजत्स्वमेव ।¦वराश्वमेधादिभिराप्तकामो रेमेऽभिरामो नृपतीन् विशिक्षयन् ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = रामस्य दृश्या त्वन्येषामदृश्या जनकात्मजा । | | verse_text = रामस्य दृश्या त्वन्येषामदृश्या जनकात्मजा । | ||
| verse_lines = रामस्य दृश्या त्वन्येषामदृश्या जनकात्मजा | | verse_lines = रामस्य दृश्या त्वन्येषामदृश्या जनकात्मजा ।¦भूमिप्रवेशादूर्ध्वं सा रेमे सप्तशतं समाः ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = एवं विधान्यगणितानि जनार्दनस्य रामावतारचरितानि तदन्यपुम्भिः । | | verse_text = एवं विधान्यगणितानि जनार्दनस्य रामावतारचरितानि तदन्यपुम्भिः । | ||
| verse_lines = एवं विधान्यगणितानि जनार्दनस्य रामावतारचरितानि तदन्यपुम्भिः | | verse_lines = एवं विधान्यगणितानि जनार्दनस्य रामावतारचरितानि तदन्यपुम्भिः ।¦शक्यानि नैव मनसाऽपि हि तानि कर्तुं ब्रह्मेशशेषपुरुहूतमुखैः सुरैश्च ॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = तस्यैवमब्जभवलोकसमामिमां क्ष्मां कृत्वाऽनुशासत उदीक्ष्य गुणान् धरायाः । | | verse_text = तस्यैवमब्जभवलोकसमामिमां क्ष्मां कृत्वाऽनुशासत उदीक्ष्य गुणान् धरायाः । | ||
| verse_lines = तस्यैवमब्जभवलोकसमामिमां क्ष्मां कृत्वाऽनुशासत उदीक्ष्य गुणान् धरायाः | | verse_lines = तस्यैवमब्जभवलोकसमामिमां क्ष्मां कृत्वाऽनुशासत उदीक्ष्य गुणान् धरायाः ।¦वैशेष्यमात्मसदनस्य हि काङ्क्षमाणा वृन्दारकाः कमलजं प्रति तच्छशंसुः ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = आमन्त्र्य तैः सह विभुर्भगवत्प्रयाणं स्वीयाय सद्मन इयेष दिदेश चाशु । | | verse_text = आमन्त्र्य तैः सह विभुर्भगवत्प्रयाणं स्वीयाय सद्मन इयेष दिदेश चाशु । | ||
| verse_lines = आमन्त्र्य तैः सह विभुर्भगवत्प्रयाणं स्वीयाय सद्मन इयेष दिदेश चाशु | | verse_lines = आमन्त्र्य तैः सह विभुर्भगवत्प्रयाणं स्वीयाय सद्मन इयेष दिदेश चाशु ।¦रुद्रं स्वलोकगमनाय रघूत्तमस्य सम्प्रार्थने स च समेत्य विभुं ययाचे ॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = एकान्तमेत्य रघुपेण समस्तकालो रुद्रो जगाद वचनं जगतो विधातुः । | | verse_text = एकान्तमेत्य रघुपेण समस्तकालो रुद्रो जगाद वचनं जगतो विधातुः । | ||
| verse_lines = एकान्तमेत्य रघुपेण समस्तकालो रुद्रो जगाद वचनं जगतो विधातुः | | verse_lines = एकान्तमेत्य रघुपेण समस्तकालो रुद्रो जगाद वचनं जगतो विधातुः ।¦वैशेष्यमात्मभवनस्य हि काङ्क्षमाणास्त्वामर्थयन्ति विबुधाः सहिता विधात्रा ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = पुत्रस्तवेश कमलप्रभवस्तथाऽहं पौत्रस्तु पौत्रकवचो यदपि ह्ययोग्यम् । | | verse_text = पुत्रस्तवेश कमलप्रभवस्तथाऽहं पौत्रस्तु पौत्रकवचो यदपि ह्ययोग्यम् । | ||
| verse_lines = पुत्रस्तवेश कमलप्रभवस्तथाऽहं पौत्रस्तु पौत्रकवचो यदपि ह्ययोग्यम् | | verse_lines = पुत्रस्तवेश कमलप्रभवस्तथाऽहं पौत्रस्तु पौत्रकवचो यदपि ह्ययोग्यम् ।¦सम्भावयन्ति गुणिनस्तदहं ययाचे गन्तुं स्वसद्म नतिपूर्वमितो भवन्तम् ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = यत्कार्यसाधनकृते विबुधार्थितस्त्वं प्रादुश्चकर्थ निजरूपमशेषमेव । | | verse_text = यत्कार्यसाधनकृते विबुधार्थितस्त्वं प्रादुश्चकर्थ निजरूपमशेषमेव । | ||
| verse_lines = यत्कार्यसाधनकृते विबुधार्थितस्त्वं प्रादुश्चकर्थ निजरूपमशेषमेव | | verse_lines = यत्कार्यसाधनकृते विबुधार्थितस्त्वं प्रादुश्चकर्थ निजरूपमशेषमेव ।¦तत् साधितं हि भवता तदितः स्वधाम क्षिप्रं प्रयाहि हर्षं विबुधेषु कुर्वन् ॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = ओम् इत्युवाच भगवांस्तदशेषमेव श्रुत्वा रहस्यथ तनुस्त्वपरा हरस्य । | | verse_text = ओम् इत्युवाच भगवांस्तदशेषमेव श्रुत्वा रहस्यथ तनुस्त्वपरा हरस्य । | ||
| verse_lines = ओम् इत्युवाच भगवांस्तदशेषमेव श्रुत्वा रहस्यथ तनुस्त्वपरा हरस्य | | verse_lines = ओम् इत्युवाच भगवांस्तदशेषमेव श्रुत्वा रहस्यथ तनुस्त्वपरा हरस्य ।¦दुर्वासनामयुगिहाऽगमदाशु राम मां भोजय क्षुधितमित्यसकृद् ब्रुवाणः ॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = सिद्धं न देयमथ साध्यमपीति वाचं श्रुत्वाऽस्य वाक्समयजातमुरु स्वहस्तात् । | | verse_text = सिद्धं न देयमथ साध्यमपीति वाचं श्रुत्वाऽस्य वाक्समयजातमुरु स्वहस्तात् । | ||
| verse_lines = सिद्धं न देयमथ साध्यमपीति वाचं श्रुत्वाऽस्य वाक्समयजातमुरु स्वहस्तात् | | verse_lines = सिद्धं न देयमथ साध्यमपीति वाचं श्रुत्वाऽस्य वाक्समयजातमुरु स्वहस्तात् ।¦अन्नं चतुर्गुणमदादमृतोपमानं रामस्तदाप्य बुभुजेऽथ मुनिः सुतुष्टः ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = तृप्तो ययौ च सकलान् प्रति कोपयानः कश्चिन्न मेऽर्थितवरं प्रतिदातुमीशः । | | verse_text = तृप्तो ययौ च सकलान् प्रति कोपयानः कश्चिन्न मेऽर्थितवरं प्रतिदातुमीशः । | ||
| verse_lines = तृप्तो ययौ च सकलान् प्रति कोपयानः कश्चिन्न मेऽर्थितवरं प्रतिदातुमीशः | | verse_lines = तृप्तो ययौ च सकलान् प्रति कोपयानः कश्चिन्न मेऽर्थितवरं प्रतिदातुमीशः ।¦एवम्प्रतिज्ञक ऋषिः स हि तत्प्रतिज्ञां मोघां चकार भगवान् नतु कश्चिदन्यः ॥ ५०॥ | ||
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| verse_text = कुन्ती तु तस्य हि मुनेर्वरतोऽजयत् तु रामः स कृष्णतनुवा स्वबलाज्जिगाय । | | verse_text = कुन्ती तु तस्य हि मुनेर्वरतोऽजयत् तु रामः स कृष्णतनुवा स्वबलाज्जिगाय । | ||
| verse_lines = कुन्ती तु तस्य हि मुनेर्वरतोऽजयत् तु रामः स कृष्णतनुवा स्वबलाज्जिगाय | | verse_lines = कुन्ती तु तस्य हि मुनेर्वरतोऽजयत् तु रामः स कृष्णतनुवा स्वबलाज्जिगाय ।¦तस्मिञ्छिवे प्रतिगते मुनिरूपके च याहीति लक्ष्मणमुवाच रमापतिः सः ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = एकान्ते तु यदा रामश्चक्रे रुद्रेण संविदम् | | verse_lines = एकान्ते तु यदा रामश्चक्रे रुद्रेण संविदम् ।¦द्वारपालं स कृतवांस्तदा लक्ष्मणमेव सः ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = यद्यत्र प्रविशेत् कश्चिद्धन्मि त्वेति वचो ब्रुवन् | | verse_lines = यद्यत्र प्रविशेत् कश्चिद्धन्मि त्वेति वचो ब्रुवन् ।¦तदन्तराऽऽगतमृषिं दृष्ट्वाऽमन्यत लक्ष्मणः ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = दुर्वाससः प्रतिज्ञा तु रामं प्राप्यैव भज्यताम् | | verse_lines = दुर्वाससः प्रतिज्ञा तु रामं प्राप्यैव भज्यताम् ।¦अन्यथा त्वयशो रामे करोत्येष मुनिर्ध्रुवम् ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = राघवो घ्नन्नपि तु मां करोत्येव दयां मयि । | | verse_text = राघवो घ्नन्नपि तु मां करोत्येव दयां मयि । | ||
| verse_lines = राघवो घ्नन्नपि तु मां करोत्येव दयां मयि | | verse_lines = राघवो घ्नन्नपि तु मां करोत्येव दयां मयि ।¦इति मत्वा ददौ मार्गं स तु दुर्वाससे तदा ॥ ५५॥ | ||
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| verse_lines = स्वलोकगमनाकाङ्क्षी स्वयमेव तु राघवः | | verse_lines = स्वलोकगमनाकाङ्क्षी स्वयमेव तु राघवः ।¦इयं प्रतिज्ञा हेतुः स्यादिति हन्मीति सोऽकरोत् ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = अत्यन्तबन्धुनिधनं त्याग एवेति चिन्तयन् । | | verse_text = अत्यन्तबन्धुनिधनं त्याग एवेति चिन्तयन् । | ||
| verse_lines = अत्यन्तबन्धुनिधनं त्याग एवेति चिन्तयन् | | verse_lines = अत्यन्तबन्धुनिधनं त्याग एवेति चिन्तयन् ।¦याहि स्वलोकमचिरादित्युवाच स लक्ष्मणम् ॥ ५७॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तः स ययौ जगद्भवभयध्वान्तच्छिदं राघवं ध्यायन्नाप च तत्पदं दशशतैर्युक्तो मुखाम्भोरुहैः । | | verse_text = इत्युक्तः स ययौ जगद्भवभयध्वान्तच्छिदं राघवं ध्यायन्नाप च तत्पदं दशशतैर्युक्तो मुखाम्भोरुहैः । | ||
| verse_lines = इत्युक्तः स ययौ जगद्भवभयध्वान्तच्छिदं राघवं ध्यायन्नाप च तत्पदं दशशतैर्युक्तो मुखाम्भोरुहैः | | verse_lines = इत्युक्तः स ययौ जगद्भवभयध्वान्तच्छिदं राघवं ध्यायन्नाप च तत्पदं दशशतैर्युक्तो मुखाम्भोरुहैः ।¦आसिच्छेषमहाफणी मुसलभृद् दिव्याकृतिर्लाङ्गली पर्यङ्कत्वमवाप यो जलनिधौ विष्णोः शयानस्य च ॥ ५८॥ | ||
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| verse_text = अथ राघवः स्वभवनोपगतौ विदधे मतिं सह जनैरखिलैः । | | verse_text = अथ राघवः स्वभवनोपगतौ विदधे मतिं सह जनैरखिलैः । | ||
| verse_lines = अथ राघवः स्वभवनोपगतौ विदधे मतिं सह जनैरखिलैः | | verse_lines = अथ राघवः स्वभवनोपगतौ विदधे मतिं सह जनैरखिलैः ।¦समघोषयच्च य इहेच्छति तत् पदमक्षयं सपदि मैत्वितिसः ॥ ५९॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वा तु तद् य इह मोक्षपदेच्छवस्ते सर्वे समाययुरथाऽतृणमापिपीलम् । | | verse_text = श्रुत्वा तु तद् य इह मोक्षपदेच्छवस्ते सर्वे समाययुरथाऽतृणमापिपीलम् । | ||
| verse_lines = श्रुत्वा तु तद् य इह मोक्षपदेच्छवस्ते सर्वे समाययुरथाऽतृणमापिपीलम् | | verse_lines = श्रुत्वा तु तद् य इह मोक्षपदेच्छवस्ते सर्वे समाययुरथाऽतृणमापिपीलम् ।¦रामाज्ञया गमनशक्तिरभूत् तृणादेर्ये तत्र दीर्घभविनो नहि ते तदैच्छन् ॥ ६०॥ | ||
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| verse_text = संस्थापयामास कुशं स्वराज्ये तैः साकमेव च लवं युवराजमीशः । | | verse_text = संस्थापयामास कुशं स्वराज्ये तैः साकमेव च लवं युवराजमीशः । | ||
| verse_lines = संस्थापयामास कुशं स्वराज्ये तैः साकमेव च लवं युवराजमीशः | | verse_lines = संस्थापयामास कुशं स्वराज्ये तैः साकमेव च लवं युवराजमीशः ।¦संस्थाप्य वालितनयं कपिराज्य आशु सूर्यात्मजोऽपि रघुवीरसमीपमायात् ॥ ६१॥ | ||
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| verse_lines = अथाऽह वायुनन्दनं स राघवः समाश्लिषन् | | verse_lines = अथाऽह वायुनन्दनं स राघवः समाश्लिषन् ।¦तवाहमक्षगोचरः सदा भवामि नान्यथा ॥ ६२॥ | ||
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| verse_lines = त्वया सदा महत् तपः सुकार्यमुत्तमोत्तमम् | | verse_lines = त्वया सदा महत् तपः सुकार्यमुत्तमोत्तमम् ।¦तदेव मे महत् प्रियं चिरं तपस्त्वया कृतम् ॥ ६३॥ | ||
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| verse_lines = तवेप्सितं न किञ्चन क्वचित् कदाचिदेव (कुतश्चिदेव) वा | | verse_lines = तवेप्सितं न किञ्चन क्वचित् कदाचिदेव (कुतश्चिदेव) वा ।¦मृषा भवेत् प्रियश्च मे पुनःपुनर्भविष्यसि ॥ ६७॥ | ||
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| verse_text = सदैव रामभावनात् (रामभावनाः) सदा सुतत्त्ववेदिनः । | | verse_text = सदैव रामभावनात् (रामभावनाः) सदा सुतत्त्ववेदिनः । | ||
| verse_lines = सदैव रामभावनात् (रामभावनाः) सदा सुतत्त्ववेदिनः | | verse_lines = सदैव रामभावनात् (रामभावनाः) सदा सुतत्त्ववेदिनः ।¦यतोऽभवंस्ततस्तु ते ययुः पदं हरेस्तदा ॥ ७३॥ | ||
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| verse_lines = ‘स तैः समावृतो विभुर्ययौ दिशं तदोत्तराम् | | verse_lines = ‘स तैः समावृतो विभुर्ययौ दिशं तदोत्तराम् ।¦अनन्तसूर्यदीधितिर्दुरन्तसद्गुणार्णवः’(भा\.पु\. ५\.९\.१८) ॥ ७४॥ | ||
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| verse_lines = सहस्रसूर्यमण्डलज्वलत्किरीटमूर्द्धजः | | verse_lines = सहस्रसूर्यमण्डलज्वलत्किरीटमूर्द्धजः ।¦सुनीलकुन्तला(ळा)वृतामितेन्दुकान्तसन्मुखः ॥ ७५॥ | ||
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| verse_lines = सुरक्तपद्मलोचनः सुविद्युदाभकुण्डलः | | verse_lines = सुरक्तपद्मलोचनः सुविद्युदाभकुण्डलः ।¦सुहासविद्रुमाधरः समस्तवेदवाग्रसः ॥ ७६॥ | ||
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| verse_lines = दिवाकरौघकौस्तुभप्रभासकोरुकन्धरः | | verse_lines = दिवाकरौघकौस्तुभप्रभासकोरुकन्धरः ।¦सुपीवरोन्नतोरुसज्जगद्भरांसयुग्मकः ॥ ७७॥ | ||
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| verse_lines = सुवृत्तदीर्घपीवरोल्लसद्भुजद्वयाङ्कितः | | verse_lines = सुवृत्तदीर्घपीवरोल्लसद्भुजद्वयाङ्कितः ।¦जगद् विमथ्य सम्भृतः शरोऽस्य दक्षिणे करे ॥ ७८॥ | ||
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| verse_text = स्वयं स तेन निर्मितो हतौ मधुश्च कैटभः । | | verse_text = स्वयं स तेन निर्मितो हतौ मधुश्च कैटभः । | ||
| verse_lines = स्वयं स तेन निर्मितो हतौ मधुश्च कैटभः | | verse_lines = स्वयं स तेन निर्मितो हतौ मधुश्च कैटभः ।¦शरेण तेन विष्णुना ददौ च लक्ष्मणानुजे ॥ ७९॥ | ||
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| verse_lines = स शत्रुसूदनोऽवधीन्मधोः सुतं रसाह्वयम् | | verse_lines = स शत्रुसूदनोऽवधीन्मधोः सुतं रसाह्वयम् ।¦शरेण येन चाकरोत् पुरीं च माधुराभिधाम् ॥ ८०॥ | ||
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| verse_lines = समस्तसारसम्भवं शरं दधार तं करे | | verse_lines = समस्तसारसम्भवं शरं दधार तं करे ।¦स वामबाहुना धनुर्दधार शार्ङ्गसञ्ज्ञितम् ॥ ८१॥ | ||
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| verse_lines = उदारबाहुभूषणः शुभाङ्गदः सकङ्कणः | | verse_lines = उदारबाहुभूषणः शुभाङ्गदः सकङ्कणः ।¦महाङ्गुलीयभूषितः सुरक्तसत्कराम्बुजः ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = अनर्घ्यरत्नमालया वनाख्यया च मालया | | verse_lines = अनर्घ्यरत्नमालया वनाख्यया च मालया ।¦विलासिविस्तृतोरसा बभार च श्रियं प्रभुः ॥ ८३॥ | ||
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| verse_lines = स भूतिवत्सभूषणस्तनूदरे वलित्रयी | | verse_lines = स भूतिवत्सभूषणस्तनूदरे वलित्रयी ।¦उदारमध्यभूषणोल्लसत्तडित्प्रभाम्बरः ॥ ८४॥ | ||
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| verse_lines = करीन्द्रसत्करोरुयुक् सुवृत्तजानुमण्डलः | | verse_lines = करीन्द्रसत्करोरुयुक् सुवृत्तजानुमण्डलः ।¦क्रमाल्पवृत्तजङ्घकः सुरक्तपादपल्लवः ॥ ८५॥ | ||
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| verse_lines = लसद्धरिन्मणिद्युती रराज राघवोऽधिकम् | | verse_lines = लसद्धरिन्मणिद्युती रराज राघवोऽधिकम् ।¦असङ्ख्यसत्सुखार्णवः समस्तशक्तिसत्तनुः ॥ ८६॥ | ||
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| verse_lines = ज्ञानं नेत्राब्जयुग्मान्मुखवरकमलात् सर्ववेदार्थसारान्स्तन्वा ब्रह्माण्डबाह्यान्तरमधिकरुचा भासयन् भासुरास्यः | | verse_lines = ज्ञानं नेत्राब्जयुग्मान्मुखवरकमलात् सर्ववेदार्थसारान्स्तन्वा ब्रह्माण्डबाह्यान्तरमधिकरुचा भासयन् भासुरास्यः ।¦सर्वाभीष्टाभये च स्वकरवरयुगेनार्थिनामादधानः प्रायाद् देवाधिदेवः स्वपदमभिमुखश्चोत्तराशां विशोकाम् ॥ ८७॥ | ||
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| verse_lines = दघ्रे च्छत्रं हनूमान् स्रवदमृतमयं पूर्णचन्द्रायुताभं सीता सैवाखिलाक्ष्णां विषयमुपगता श्रीरिति ह्रीरथैका | | verse_lines = दघ्रे च्छत्रं हनूमान् स्रवदमृतमयं पूर्णचन्द्रायुताभं सीता सैवाखिलाक्ष्णां विषयमुपगता श्रीरिति ह्रीरथैका ।¦द्वेधा भूत्वा दधार व्यजनमुभयतः पूर्णचन्द्रांशुगौरं प्रोद्यद्भास्वत्प्रभाभा सकलगुणतनुर्भूषिता भूषणैः स्वैः ॥ ८८॥ | ||
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| verse_lines = साक्षाच्चक्रतनुस्तथैव भरतश्चक्रं दधद् दक्षिणेनाऽयात् सव्यत एव शङ्खवरभृच्छङ्खात्मकः शत्रुहा | | verse_lines = साक्षाच्चक्रतनुस्तथैव भरतश्चक्रं दधद् दक्षिणेनाऽयात् सव्यत एव शङ्खवरभृच्छङ्खात्मकः शत्रुहा ।¦अग्रे ब्रह्मपुरोगमाः सुरगणा वेदाश्च सोङ्कारकाः पश्चात् सर्वजगज्जगाम रघुपं यान्तं निजं धाम तम् ॥ ८९॥ | ||
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| verse_lines = तस्य सूर्यसुतपूर्ववानरा दक्षिणेन मनुजास्तु सव्यतः | | verse_lines = तस्य सूर्यसुतपूर्ववानरा दक्षिणेन मनुजास्तु सव्यतः ।¦रामजन्मचरितानि तस्य ते कीर्तयन्त उचथैर्द्रुतं ययुः ॥ ९०॥ | ||
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| verse_lines = गन्धर्वैर्गीयमानो विबुधमुनिगणैरब्जसम्भूतिपूर्वैर्वेदोदारार्थवाग्भिः प्रणिहितसुमनः सर्वदा स्तूयमानः | | verse_lines = गन्धर्वैर्गीयमानो विबुधमुनिगणैरब्जसम्भूतिपूर्वैर्वेदोदारार्थवाग्भिः प्रणिहितसुमनः सर्वदा स्तूयमानः ।¦सर्वैर्भूतैश्च भक्त्या स्वनिमिषनयनैः कौतुकाद् वीक्ष्यमाणः प्रायाच्छेषगरुत्मदादिकनिजैः संसेवितः स्वं पदम् ॥ ९१॥ | ||
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| verse_lines = ब्रह्मरुद्रगरुडैः सशेषकैः प्रोच्यमानसुगुणोरुविस्तरः | | verse_lines = ब्रह्मरुद्रगरुडैः सशेषकैः प्रोच्यमानसुगुणोरुविस्तरः ।¦आरुरोह विभुरम्बरं शनैस्ते च दिव्यवपुषोऽभवंस्तदा ॥ ९२॥ | ||
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| verse_lines = अथ ब्रह्मा हरिं स्तुत्वा जगादेदं वचो विभुम् | | verse_lines = अथ ब्रह्मा हरिं स्तुत्वा जगादेदं वचो विभुम् ।¦त्वदाज्ञया मया दत्तं स्थानं दशरथस्य हि ॥ ९३॥ | ||
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| verse_lines = मातॄणां चापि तल्लोकस्त्वयुताब्दादितोऽग्रतः | | verse_lines = मातॄणां चापि तल्लोकस्त्वयुताब्दादितोऽग्रतः ।¦अनर्हायास्त्वयाऽऽज्ञप्ता कैकेय्या अपि सद्गतिः ।¦सूत्वा तु भरतं नैषा गच्छेत निरयानिति ॥ ९४॥ | ||
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| verse_lines = तथाऽपि सा यदावेशाच्चकार त्वय्यशोभनम् | | verse_lines = तथाऽपि सा यदावेशाच्चकार त्वय्यशोभनम् ।¦निकृतिर्नाम सा क्षिप्ता मया तमसि शाश्वते ॥ ९५॥ | ||
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| verse_lines = कैकयी तु चलान् लोकान् प्राप्ता नैवाचलान् क्वचित् | | verse_lines = कैकयी तु चलान् लोकान् प्राप्ता नैवाचलान् क्वचित् ।¦पश्चाद् भक्तिमती यस्मात् त्वयि सा युक्तमेव तत् ॥ ९६॥ | ||
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| verse_lines = मन्थरा तु तमस्यन्धे पातिता दुष्टचारिणी | | verse_lines = मन्थरा तु तमस्यन्धे पातिता दुष्टचारिणी ।¦सीतार्थं येऽप्यनिन्दंस्त्वां तेऽपि याता महत् तमः ॥ ९७॥ | ||
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| verse_lines = प्रायशो राक्षसाश्चैव त्वयि कृष्णत्वमागते | | verse_lines = प्रायशो राक्षसाश्चैव त्वयि कृष्णत्वमागते ।¦शेषा यास्यन्ति तच्छेषा अष्टाविंशे कलौ युगे ।¦गते चतुस्सहस्राब्दे तमोगास्त्रिशतोत्तरे ॥ ९८॥ | ||
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| verse_lines = अथ ये त्वत्पदाम्भोजमकरन्दैकलिप्सवः | | verse_lines = अथ ये त्वत्पदाम्भोजमकरन्दैकलिप्सवः ।¦त्वया सहाऽगतास्तेषां विधेहि स्थानमुत्तमम् ॥ ९९॥ | ||
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| verse_text = अङ्गदः कालतस्त्यक्त्वा देहमाप निजां तनुम् । | | verse_text = अङ्गदः कालतस्त्यक्त्वा देहमाप निजां तनुम् । | ||
| verse_lines = अङ्गदः कालतस्त्यक्त्वा देहमाप निजां तनुम् | | verse_lines = अङ्गदः कालतस्त्यक्त्वा देहमाप निजां तनुम् ।¦रामाज्ञयैव कुर्वाणो राज्यं कुशसमन्वितः ॥ ११०॥ | ||
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| verse_text = विभीषणश्च धर्मात्मा राघवाज्ञापुरस्कृतः । | | verse_text = विभीषणश्च धर्मात्मा राघवाज्ञापुरस्कृतः । | ||
| verse_lines = विभीषणश्च धर्मात्मा राघवाज्ञापुरस्कृतः | | verse_lines = विभीषणश्च धर्मात्मा राघवाज्ञापुरस्कृतः ।¦सेनापतिर्धनेशस्य कल्पमावीत् स राक्षसान् ॥ १११॥ | ||
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| verse_text = रामाज्ञया जाम्बवांश्च न्यवसत् पृथिवीतले(ळे) । | | verse_text = रामाज्ञया जाम्बवांश्च न्यवसत् पृथिवीतले(ळे) । | ||
| verse_lines = रामाज्ञया जाम्बवांश्च न्यवसत् पृथिवीतले(ळे) | | verse_lines = रामाज्ञया जाम्बवांश्च न्यवसत् पृथिवीतले(ळे) ।¦उत्पत्त्यर्थं जाम्बवत्यास्तदर्थं सुतपश्चरन् ॥ ११२॥ | ||
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| verse_text = अथो रघूणां प्रवरः सुरार्चितः स्वयैकतन्वा न्यवसत् सुरालये । | | verse_text = अथो रघूणां प्रवरः सुरार्चितः स्वयैकतन्वा न्यवसत् सुरालये । | ||
| verse_lines = अथो रघूणां प्रवरः सुरार्चितः स्वयैकतन्वा न्यवसत् सुरालये | | verse_lines = अथो रघूणां प्रवरः सुरार्चितः स्वयैकतन्वा न्यवसत् सुरालये ।¦द्वितीयया ब्रह्मसदस्यधीश्वरस्तेनार्चितोऽथापरया निजालये ॥ ११३॥ | ||
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| verse_text = तृतीयरूपेण निजं पदं प्रभुं व्रजन्तमुच्चैरनुगम्य देवताः । | | verse_text = तृतीयरूपेण निजं पदं प्रभुं व्रजन्तमुच्चैरनुगम्य देवताः । | ||
| verse_lines = तृतीयरूपेण निजं पदं प्रभुं व्रजन्तमुच्चैरनुगम्य देवताः | | verse_lines = तृतीयरूपेण निजं पदं प्रभुं व्रजन्तमुच्चैरनुगम्य देवताः ।¦अगम्यमर्यादमुपेत्य च क्रमाद् विलोकयन्तोऽतिविदूरतोऽस्तुवन् ॥ ११४॥ | ||
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| verse_text = ब्रह्मा मरुन्मारुतसूनुरीशः शेषो गरुत्मान् हरिजः शक्रकाद्याः । | | verse_text = ब्रह्मा मरुन्मारुतसूनुरीशः शेषो गरुत्मान् हरिजः शक्रकाद्याः । | ||
| verse_lines = ब्रह्मा मरुन्मारुतसूनुरीशः शेषो गरुत्मान् हरिजः शक्रकाद्याः | | verse_lines = ब्रह्मा मरुन्मारुतसूनुरीशः शेषो गरुत्मान् हरिजः शक्रकाद्याः ।¦क्रमादनुव्रज्य तु राघवस्य शिरस्यथाऽज्ञां प्रणिधाय निर्ययुः ॥ ११५॥ | ||
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| verse_text = स्वं स्वं च सर्वे सदनं सुरा ययुः पुरन्दराद्याश्च विरिञ्चपूर्वकाः । | | verse_text = स्वं स्वं च सर्वे सदनं सुरा ययुः पुरन्दराद्याश्च विरिञ्चपूर्वकाः । | ||
| verse_lines = स्वं स्वं च सर्वे सदनं सुरा ययुः पुरन्दराद्याश्च विरिञ्चपूर्वकाः | | verse_lines = स्वं स्वं च सर्वे सदनं सुरा ययुः पुरन्दराद्याश्च विरिञ्चपूर्वकाः ।¦मरुत्सुतोऽथो बदरीमवाप्य नारायणस्यैव पदं सिषेवे ॥ ११६॥ | ||
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| verse_text = समस्तशास्त्रोद्भरितं हरेर्वचो मुदा तदा श्रोत्रपुटेन सम्भरन् । | | verse_text = समस्तशास्त्रोद्भरितं हरेर्वचो मुदा तदा श्रोत्रपुटेन सम्भरन् । | ||
| verse_lines = समस्तशास्त्रोद्भरितं हरेर्वचो मुदा तदा श्रोत्रपुटेन सम्भरन् | | verse_lines = समस्तशास्त्रोद्भरितं हरेर्वचो मुदा तदा श्रोत्रपुटेन सम्भरन् ।¦वदंश्च तत्त्वं विबुधर्षभाणां सदा मुनीनां च सुखं ह्युवास ॥ ११७॥ | ||
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| verse_text = रामाज्ञया किम्पुरुषेषु राज्यं चकार रूपेण तथाऽपरेण । | | verse_text = रामाज्ञया किम्पुरुषेषु राज्यं चकार रूपेण तथाऽपरेण । | ||
| verse_lines = रामाज्ञया किम्पुरुषेषु राज्यं चकार रूपेण तथाऽपरेण | | verse_lines = रामाज्ञया किम्पुरुषेषु राज्यं चकार रूपेण तथाऽपरेण ।¦रूपैस्तथाऽन्यैश्च समस्तसद्मन्युवास विष्णोः सततं यथेष्टम् ॥ ११८॥ | ||
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| verse_text = इत्थं स गायञ्छतकोटिविस्तरं रामायणं भारतपञ्चरात्रम् । | | verse_text = इत्थं स गायञ्छतकोटिविस्तरं रामायणं भारतपञ्चरात्रम् । | ||
| verse_lines = इत्थं स गायञ्छतकोटिविस्तरं रामायणं भारतपञ्चरात्रम् | | verse_lines = इत्थं स गायञ्छतकोटिविस्तरं रामायणं भारतपञ्चरात्रम् ।¦वेदांश्च सर्वान् सहितब्रह्मसूत्रान् व्याचक्षाणो नित्यसुखोद्भरोऽभूत् ॥ ११९॥ | ||
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| verse_text = रामोऽपि सार्द्धं पवमानात्मजेन ससीतया लक्ष्मणपूर्वकैश्च । | | verse_text = रामोऽपि सार्द्धं पवमानात्मजेन ससीतया लक्ष्मणपूर्वकैश्च । | ||
| verse_lines = रामोऽपि सार्द्धं पवमानात्मजेन ससीतया लक्ष्मणपूर्वकैश्च | | verse_lines = रामोऽपि सार्द्धं पवमानात्मजेन ससीतया लक्ष्मणपूर्वकैश्च ।¦तथा गरुत्मत्प्रमुखैश्च पार्षदैः संसेव्यमानो न्यवसत् पयोब्धौ ॥ १२०॥ | ||
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| verse_text = कदाचिदीशः सकलावतारानेकं विधायाहिपतौ च शेते । | | verse_text = कदाचिदीशः सकलावतारानेकं विधायाहिपतौ च शेते । | ||
| verse_lines = कदाचिदीशः सकलावतारानेकं विधायाहिपतौ च शेते | | verse_lines = कदाचिदीशः सकलावतारानेकं विधायाहिपतौ च शेते ।¦पृथक् च संव्यूह्य कदाचिदिच्छया रेमे रमेशोऽमितसद्गुणार्णवः ॥ १२१॥ | ||
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| verse_text = इत्यशेषपुराणेभ्यः पञ्चरात्रेभ्य एव च । | | verse_text = इत्यशेषपुराणेभ्यः पञ्चरात्रेभ्य एव च । | ||
| verse_lines = इत्यशेषपुराणेभ्यः पञ्चरात्रेभ्य एव च | | verse_lines = इत्यशेषपुराणेभ्यः पञ्चरात्रेभ्य एव च ।¦भारताच्चैव वेदेभ्यो महारामायणादपि ॥ १२२॥ | ||
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| verse_text = परस्परविरोधस्य हानान्निर्णीय तत्त्वतः । | | verse_text = परस्परविरोधस्य हानान्निर्णीय तत्त्वतः । | ||
| verse_lines = परस्परविरोधस्य हानान्निर्णीय तत्त्वतः | | verse_lines = परस्परविरोधस्य हानान्निर्णीय तत्त्वतः ।¦युक्त्या बुद्धिबलाच्चैव विष्णोरेव प्रसादतः ॥ १२३॥ | ||
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| verse_text = बहुकल्पानुसारेण मयेयं सत्कथोदिता । | | verse_text = बहुकल्पानुसारेण मयेयं सत्कथोदिता । | ||
| verse_lines = बहुकल्पानुसारेण मयेयं सत्कथोदिता | | verse_lines = बहुकल्पानुसारेण मयेयं सत्कथोदिता ।¦नैकग्रन्थाश्रयात् तस्मान्नाऽशङ्क्याऽत्र विरुद्धता ॥ १२४॥ | ||
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| verse_text = क्वचिन्मोहायासुराणां व्यत्यासः प्रतिलोमता । | | verse_text = क्वचिन्मोहायासुराणां व्यत्यासः प्रतिलोमता । | ||
| verse_lines = क्वचिन्मोहायासुराणां व्यत्यासः प्रतिलोमता | | verse_lines = क्वचिन्मोहायासुराणां व्यत्यासः प्रतिलोमता ।¦उक्ता ग्रन्थेषु तस्माद्धि निर्णयोऽयं कृतो मया ॥ १२५॥ | ||
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| verse_text = एवं च वक्ष्यमाणेषु नैवाऽशङ्क्या विरुद्धता । | | verse_text = एवं च वक्ष्यमाणेषु नैवाऽशङ्क्या विरुद्धता । | ||
| verse_lines = एवं च वक्ष्यमाणेषु नैवाऽशङ्क्या विरुद्धता | | verse_lines = एवं च वक्ष्यमाणेषु नैवाऽशङ्क्या विरुद्धता ।¦सर्वकल्पसमश्चायं पारम्पर्यक्रमः सदा ॥ १२६॥ | ||
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| verse_text = पुंव्यत्यासेन चोक्तिः स्यात् पुराणादिषु कुत्रचित् । | | verse_text = पुंव्यत्यासेन चोक्तिः स्यात् पुराणादिषु कुत्रचित् । | ||
| verse_lines = पुंव्यत्यासेन चोक्तिः स्यात् पुराणादिषु कुत्रचित् | | verse_lines = पुंव्यत्यासेन चोक्तिः स्यात् पुराणादिषु कुत्रचित् ।¦कृष्णामाह यथा कृष्णो धनञ्जयशरैर्हतान् ।¦शतं दुर्योधनादींस्ते दर्शयिष्य इति प्रभुः ॥ १२७॥ | ||
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| verse_lines = भीमसेनहतास्ते हि ज्ञायन्ते बहुवाक्यतः | | verse_lines = भीमसेनहतास्ते हि ज्ञायन्ते बहुवाक्यतः ।¦विस्तारे भीमनिहताः सङ्क्षेपेऽर्जुनपातिताः ।¦उच्यन्ते बहवश्चान्ये पुंव्यत्याससमाश्रयात् ॥ १२८॥ | ||
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| verse_lines = विस्तारे कृष्णनिहता बलभद्रहता इति | | verse_lines = विस्तारे कृष्णनिहता बलभद्रहता इति ।¦उच्यन्ते च क्वचित् कालव्यत्यासोऽपि क्वचिद् भवेत् ॥ १२९॥ | ||
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| verse_lines = यथा सुयोधनं भीमः प्राहसत् कृष्णसन्निधौ | | verse_lines = यथा सुयोधनं भीमः प्राहसत् कृष्णसन्निधौ ।¦इति वाक्येषु बहुषु ज्ञायते(ज्ञायन्ते) निर्णयादपि ।¦अनिर्णये तु कृष्णस्य पूर्वमुक्ता गतिस्ततः ॥ १३०॥ | ||
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| verse_lines = व्यत्यासास्त्वेवमाद्याश्च प्रातिलोम्यादयस्तथा | | verse_lines = व्यत्यासास्त्वेवमाद्याश्च प्रातिलोम्यादयस्तथा ।¦दृश्यन्ते भारताद्येषु लक्षणग्रन्थतश्च ते ।¦ज्ञायन्ते बहुभिर्वाक्यैर्निर्णयग्रन्थतस्तथा ॥ १३१॥ | ||
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| verse_lines = तस्माद् विनिर्णयग्रन्थानाश्रित्यैव च लक्षणम् | | verse_lines = तस्माद् विनिर्णयग्रन्थानाश्रित्यैव च लक्षणम् ।¦बहुवाक्यानुसारेण निर्णयोऽयं मया कृतः ॥ १३२॥ | ||
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| verse_lines = उक्तं लक्षणशास्त्रे च कृष्णद्वैपायनोदिते | | verse_lines = उक्तं लक्षणशास्त्रे च कृष्णद्वैपायनोदिते ।¦त्रिभाषा यो न जानाति रीतीनां शतमेव च ॥ १३३॥ | ||
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| verse_lines = व्यत्यासादीन् सप्तभेदान् वेदाद्यर्थं तथा वदेत् | | verse_lines = व्यत्यासादीन् सप्तभेदान् वेदाद्यर्थं तथा वदेत् ।¦स याति निरयं घोरमन्यथाज्ञानसम्भवम् ।¦इत्यन्येषु च शास्त्रेषु तत्र तत्रोदितं बहु ॥ १३४॥ | ||
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| verse_lines = ‘व्यत्यासः प्रातिलोम्यं च गोमूत्री प्रघसस्तथा | | verse_lines = ‘व्यत्यासः प्रातिलोम्यं च गोमूत्री प्रघसस्तथा ।¦उक्षणः सुधुरः साधु सप्त भेदाः प्रकीर्तिताः’ ॥ १३५॥ | ||
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| verse_lines = इत्यादिलक्षणान्यत्र नोच्यन्तेऽन्यप्रसङ्गतः | | verse_lines = इत्यादिलक्षणान्यत्र नोच्यन्तेऽन्यप्रसङ्गतः ।¦अनुसारेण तेषां तु निर्णयः क्रियते मया ।¦तस्मान्निर्णयशास्त्रत्वाद् ग्राह्यमेतद् बुभूषुभिः ॥ १३६॥ | ||
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| verse_lines = इतीरिता रामकथा परा मया समस्तशास्त्रानुसृतेर्भवापहा | | verse_lines = इतीरिता रामकथा परा मया समस्तशास्त्रानुसृतेर्भवापहा ।¦पठेदिमां यः शृणुयादथापि वा विमुक्तबन्धश्चरणं हरेर्व्रजेत् ॥ १३७॥ | ||
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<span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C10" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="दशमोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_lines = ओं ॥ द्वापरेऽथ युगे प्राप्ते त्वष्टाविंशतिमे पुनः | | verse_lines = ओं ॥ द्वापरेऽथ युगे प्राप्ते त्वष्टाविंशतिमे पुनः ।¦स्वयम्भुशर्वशक्राद्या दुग्धाब्धेस्तीरमाययुः ॥ १॥ | ||
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| verse_lines = पयोब्धेरुत्तरं तीरमासाद्य विबुधर्षभाः | | verse_lines = पयोब्धेरुत्तरं तीरमासाद्य विबुधर्षभाः ।¦तुष्टुवुः पुण्डरीकाक्षमक्षयं पुरुषोत्तमम् ॥ २॥ | ||
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| verse_lines = नमोनमोऽगण्यगुणैकधाम्ने समस्तविज्ञानमरीचिमालिने | | verse_lines = नमोनमोऽगण्यगुणैकधाम्ने समस्तविज्ञानमरीचिमालिने ।¦अनाद्यविज्ञानतमोनिहन्त्रे परामृतानन्दपदप्रदायिने ॥ ३॥ | ||
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| verse_lines = स्वदत्तमालाभुविपातकोपतो दुर्वाससः शापत आशु हि श्रिया | | verse_lines = स्वदत्तमालाभुविपातकोपतो दुर्वाससः शापत आशु हि श्रिया ।¦शक्रे विहीने दितिजैः पराजिते पुरा वयं त्वां शरणं गता स्म ॥ ४॥ | ||
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| verse_lines = त्वदाज्ञया बलिना सन्दधाना वराद् गिरीशस्य परैरचाल्यम् | | verse_lines = त्वदाज्ञया बलिना सन्दधाना वराद् गिरीशस्य परैरचाल्यम् ।¦वृन्दारका मन्दरमेत्य बाहुभिर्न शेकुरुद्धर्तुमिमे समेताः ॥ ५॥ | ||
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| verse_lines = पुनः परीक्षद्भिरसौ गिरिः सुरैः सहासुरैरुन्नमितस्तदंसतः | | verse_lines = पुनः परीक्षद्भिरसौ गिरिः सुरैः सहासुरैरुन्नमितस्तदंसतः ।¦व्यचूर्णयत् तानखिलान् पुनश्च ते त्वदीक्षया पूर्ववदुत्थिताः प्रभो ॥ ७॥ | ||
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| verse_lines = पुनश्च वामेन करेण वीश्वरे निधाय तं स्कन्धगतस्त्वमस्य | | verse_lines = पुनश्च वामेन करेण वीश्वरे निधाय तं स्कन्धगतस्त्वमस्य ।¦अगाः पयोब्धिं सहितः सुरासुरैर्मथ्ना च तेनाब्धिमथाप्यमथ्नाः ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = कृतश्च कद्रो(द्र्वा)स्तनयोऽत्र वासुकिर्नेत्रं त्वया कश्यपजः स नागराट् । | | verse_text = कृतश्च कद्रो(द्र्वा)स्तनयोऽत्र वासुकिर्नेत्रं त्वया कश्यपजः स नागराट् । | ||
| verse_lines = कृतश्च कद्रो(द्र्वा)स्तनयोऽत्र वासुकिर्नेत्रं त्वया कश्यपजः स नागराट् | | verse_lines = कृतश्च कद्रो(द्र्वा)स्तनयोऽत्र वासुकिर्नेत्रं त्वया कश्यपजः स नागराट् ।¦ममन्थुरब्धिं सहितास्त्वया सुराः सहासुरा दिव्यपयो घृताधिकम् ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = नैच्छन्त पुच्छं दितिजा अमङ्गलं(ळं) तदित्यथाग्रं जगृहुर्विषोल्बणम् । | | verse_text = नैच्छन्त पुच्छं दितिजा अमङ्गलं(ळं) तदित्यथाग्रं जगृहुर्विषोल्बणम् । | ||
| verse_lines = नैच्छन्त पुच्छं दितिजा अमङ्गलं(ळं) तदित्यथाग्रं जगृहुर्विषोल्बणम् | | verse_lines = नैच्छन्त पुच्छं दितिजा अमङ्गलं(ळं) तदित्यथाग्रं जगृहुर्विषोल्बणम् ।¦श्रान्ताश्च तेऽतो विबुधास्तु पुच्छं त्वया समेता जगृहुस्त्वदाश्रयाः ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = अथातिभारादविशत् सुकाञ्चनो गिरिः स पाताल(ळ)मथ त्वमेव । | | verse_text = अथातिभारादविशत् सुकाञ्चनो गिरिः स पाताल(ळ)मथ त्वमेव । | ||
| verse_lines = अथातिभारादविशत् सुकाञ्चनो गिरिः स पाताल(ळ)मथ त्वमेव | | verse_lines = अथातिभारादविशत् सुकाञ्चनो गिरिः स पाताल(ळ)मथ त्वमेव ।¦तं कच्छपात्मा त्वभरः स्वपृष्ठे ह्यनन्यधार्यं पुरुलीलयैव ॥ ११॥ | ||
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| verse_text = उपर्यधश्चाऽत्मनि नेत्रगोत्रयोस्त्वया परेणाऽविशता समेधिताः । | | verse_text = उपर्यधश्चाऽत्मनि नेत्रगोत्रयोस्त्वया परेणाऽविशता समेधिताः । | ||
| verse_lines = उपर्यधश्चाऽत्मनि नेत्रगोत्रयोस्त्वया परेणाऽविशता समेधिताः | | verse_lines = उपर्यधश्चाऽत्मनि नेत्रगोत्रयोस्त्वया परेणाऽविशता समेधिताः ।¦ममन्थुरब्धिं तरसा मदोत्कटाः सुरासुराः क्षोभितनक्रचक्रम्(भाग. ८.७.१३) ॥ १२॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = श्रान्तेषु तेष्वेक उरुक्रम त्वं सुधारसाप्त्यै मुदितो ह्यमथ्नाः । | | verse_text = श्रान्तेषु तेष्वेक उरुक्रम त्वं सुधारसाप्त्यै मुदितो ह्यमथ्नाः । | ||
| verse_lines = श्रान्तेषु तेष्वेक उरुक्रम त्वं सुधारसाप्त्यै मुदितो ह्यमथ्नाः | | verse_lines = श्रान्तेषु तेष्वेक उरुक्रम त्वं सुधारसाप्त्यै मुदितो ह्यमथ्नाः ।¦तदा जगद्ग्रासि विषं समुत्थितं त्वदाज्ञया वायुरधात् करे निजे ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = कलेः स्वरूपं तदतीव दुष्षहं वराद् विधातुः सकलैश्च दुःस्पृशम् । | | verse_text = कलेः स्वरूपं तदतीव दुष्षहं वराद् विधातुः सकलैश्च दुःस्पृशम् । | ||
| verse_lines = कलेः स्वरूपं तदतीव दुष्षहं वराद् विधातुः सकलैश्च दुःस्पृशम् | | verse_lines = कलेः स्वरूपं तदतीव दुष्षहं वराद् विधातुः सकलैश्च दुःस्पृशम् ।¦करे विमथ्यास्तबलं विधाय ददौ स किञ्चिद् गिरिशाय वायुः ॥ १४॥ | ||
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| verse_text = स तत् पिबत्(पिबन्) कण्ठगतेन तेन निपातितो मूर्च्छित आशु रुद्रः । | | verse_text = स तत् पिबत्(पिबन्) कण्ठगतेन तेन निपातितो मूर्च्छित आशु रुद्रः । | ||
| verse_lines = स तत् पिबत्(पिबन्) कण्ठगतेन तेन निपातितो मूर्च्छित आशु रुद्रः | | verse_lines = स तत् पिबत्(पिबन्) कण्ठगतेन तेन निपातितो मूर्च्छित आशु रुद्रः ।¦हरेः करस्पर्शबलात् स सञ्ज्ञामवाप नीलोऽस्य गल(ळ)स्तदाऽऽसीत् ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = अथ त्वदाज्ञां पुरतो निधाय निधाय पात्रे तपनीयरूपे । | | verse_text = अथ त्वदाज्ञां पुरतो निधाय निधाय पात्रे तपनीयरूपे । | ||
| verse_lines = अथ त्वदाज्ञां पुरतो निधाय निधाय पात्रे तपनीयरूपे | | verse_lines = अथ त्वदाज्ञां पुरतो निधाय निधाय पात्रे तपनीयरूपे ।¦स्वयं च निर्मथ्य बलोपपन्नं पपौ स वायुस्तदु चास्य जीर्णम् ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = अत्यल्पपानाच्च बभूव शूला शिवस्य शीर्ष्ण्यस्य करावशिष्टम् । | | verse_text = अत्यल्पपानाच्च बभूव शूला शिवस्य शीर्ष्ण्यस्य करावशिष्टम् । | ||
| verse_lines = अत्यल्पपानाच्च बभूव शूला शिवस्य शीर्ष्ण्यस्य करावशिष्टम् | | verse_lines = अत्यल्पपानाच्च बभूव शूला शिवस्य शीर्ष्ण्यस्य करावशिष्टम् ।¦अभूत् कलिः सर्वजगत्सु पूर्णं पीत्वा विकारो न बभूव वायोः ।¦कलेः शरीरादभवन् कुनागाः सवृश्चिकाः श्वापदयातुधानाः ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = अथ त्वयाऽब्धौ तु विमथ्यमाने सुराऽभवत् तामसुरा अवापुः । | | verse_text = अथ त्वयाऽब्धौ तु विमथ्यमाने सुराऽभवत् तामसुरा अवापुः । | ||
| verse_lines = अथ त्वयाऽब्धौ तु विमथ्यमाने सुराऽभवत् तामसुरा अवापुः | | verse_lines = अथ त्वयाऽब्धौ तु विमथ्यमाने सुराऽभवत् तामसुरा अवापुः ।¦उच्चैःश्रवा नाम तुरङ्गमोऽथ करी तथैरावतनामधेयः ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = अन्ये च दिक्पालगजा बभूवुर्वरं तथैवाप्सरसां सहस्रम् । | | verse_text = अन्ये च दिक्पालगजा बभूवुर्वरं तथैवाप्सरसां सहस्रम् । | ||
| verse_lines = अन्ये च दिक्पालगजा बभूवुर्वरं तथैवाप्सरसां सहस्रम् | | verse_lines = अन्ये च दिक्पालगजा बभूवुर्वरं तथैवाप्सरसां सहस्रम् ।¦तथाऽऽयुधान्याभरणानि चैव दिवौकसां पारिजातस्तरुश्च ॥ १९॥ | ||
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| verse_text = तथैव साक्षात् सुरभिर्निशेशो बभूव तत् कौस्तुभं लोकसारम् । | | verse_text = तथैव साक्षात् सुरभिर्निशेशो बभूव तत् कौस्तुभं लोकसारम् । | ||
| verse_lines = तथैव साक्षात् सुरभिर्निशेशो बभूव तत् कौस्तुभं लोकसारम् | | verse_lines = तथैव साक्षात् सुरभिर्निशेशो बभूव तत् कौस्तुभं लोकसारम् ।¦अथेन्दिरा यद्यपि नित्यदेहा बभूव तत्रापरया स्वतन्वा ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = ततो भवान् दक्षिणबाहुना सुधाकमण्डलुं कलशं चापरेण । | | verse_text = ततो भवान् दक्षिणबाहुना सुधाकमण्डलुं कलशं चापरेण । | ||
| verse_lines = ततो भवान् दक्षिणबाहुना सुधाकमण्डलुं कलशं चापरेण | | verse_lines = ततो भवान् दक्षिणबाहुना सुधाकमण्डलुं कलशं चापरेण ।¦प्रगृह्य तस्मान्निरगात् समुद्राद् धन्वन्तरिर्नाम हरिन्मणिद्युतिः ॥ २१॥ | ||
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| verse_text = ततो भवद्धस्तगतं दितेः सुताः सुधाभरं कलशं चापजह्रुः । | | verse_text = ततो भवद्धस्तगतं दितेः सुताः सुधाभरं कलशं चापजह्रुः । | ||
| verse_lines = ततो भवद्धस्तगतं दितेः सुताः सुधाभरं कलशं चापजह्रुः | | verse_lines = ततो भवद्धस्तगतं दितेः सुताः सुधाभरं कलशं चापजह्रुः ।¦मुक्तं त्वया शक्तिमताऽपि दैत्यान् सत्यच्युतान् कारयितुं वधाय ॥ २२॥ | ||
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| verse_lines = ततो भवाननुपममुत्तमं वपुर्बभूव दिव्यप्रमदात्मकं त्वरन् | | verse_lines = ततो भवाननुपममुत्तमं वपुर्बभूव दिव्यप्रमदात्मकं त्वरन् ।¦श्यामं नितम्बार्पितरत्नमेखलं जाम्बूनदाभाम्बरभृत् सुमध्यमम् ॥ २३॥ | ||
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| verse_text = बृहन्नितम्बं कलशोपमस्तनं सत्पुण्डरीकायतनेत्रमुज्ज्वलम् । | | verse_text = बृहन्नितम्बं कलशोपमस्तनं सत्पुण्डरीकायतनेत्रमुज्ज्वलम् । | ||
| verse_lines = बृहन्नितम्बं कलशोपमस्तनं सत्पुण्डरीकायतनेत्रमुज्ज्वलम् | | verse_lines = बृहन्नितम्बं कलशोपमस्तनं सत्पुण्डरीकायतनेत्रमुज्ज्वलम् ।¦समस्तसारं परिपूर्णसद्गुणं दृष्ट्वैव तत् सम्मुमुहुः सुरारयः ॥ २४॥ | ||
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| verse_lines = परस्परं तेऽमृतहेतुतोऽखिला विरुद्ध्यमानाः प्रददुः स्म ते करे | | verse_lines = परस्परं तेऽमृतहेतुतोऽखिला विरुद्ध्यमानाः प्रददुः स्म ते करे ।¦समं सुधायाः कलशं विभज्य निपाययास्मानिति वञ्चितास्त्वया ॥ २५॥ | ||
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| verse_text = धर्मच्छलं पापजनेषु धर्म इति त्वया ज्ञापयितुं तदोक्तम् । | | verse_text = धर्मच्छलं पापजनेषु धर्म इति त्वया ज्ञापयितुं तदोक्तम् । | ||
| verse_lines = धर्मच्छलं पापजनेषु धर्म इति त्वया ज्ञापयितुं तदोक्तम् | | verse_lines = धर्मच्छलं पापजनेषु धर्म इति त्वया ज्ञापयितुं तदोक्तम् ।¦यद्यत् कृतं मे भवतां यदीह संवाद एवोद्विभजे सुधामिमाम् ॥ २६॥ | ||
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| verse_text = यथेष्टतोऽहं विभजामि सर्वथा न विश्वसध्वं(अविश्वसध्वं) मयि केनचित् क्वचित् । | | verse_text = यथेष्टतोऽहं विभजामि सर्वथा न विश्वसध्वं(अविश्वसध्वं) मयि केनचित् क्वचित् । | ||
| verse_lines = यथेष्टतोऽहं विभजामि सर्वथा न विश्वसध्वं(अविश्वसध्वं) मयि केनचित् क्वचित् | | verse_lines = यथेष्टतोऽहं विभजामि सर्वथा न विश्वसध्वं(अविश्वसध्वं) मयि केनचित् क्वचित् ।¦इति प्रहस्याभिहितं निशम्य स्त्रीभावमुग्धास्तु तथेति तेऽवदन् ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = ततश्च संस्थाप्य पृथक् सुरासुरांस्तवातिरूपोच्चलितान् सुरेतरान् | | verse_lines = ततश्च संस्थाप्य पृथक् सुरासुरांस्तवातिरूपोच्चलितान् सुरेतरान् ।¦सर्वान् भवद्दर्शिन ईक्ष्य लज्जिताऽस्म्यहं दृशो मीलयतेत्यवोचः ॥ २८॥ | ||
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| verse_text = निमीलिताक्षेष्वसुरेषु देवता न्यपाययः साध्वमृतं ततः पुमान् । | | verse_text = निमीलिताक्षेष्वसुरेषु देवता न्यपाययः साध्वमृतं ततः पुमान् । | ||
| verse_lines = निमीलिताक्षेष्वसुरेषु देवता न्यपाययः साध्वमृतं ततः पुमान् | | verse_lines = निमीलिताक्षेष्वसुरेषु देवता न्यपाययः साध्वमृतं ततः पुमान् ।¦क्षणेन भूत्वा पिबतः सुधां शिरो राहोर्न्यकृन्तश्च सुदर्शनेन ॥ २९॥ | ||
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| verse_text = तेनामृतार्थं हि सहस्रजन्मसु प्रतप्य भूयस्तप आरितो वरः । | | verse_text = तेनामृतार्थं हि सहस्रजन्मसु प्रतप्य भूयस्तप आरितो वरः । | ||
| verse_lines = तेनामृतार्थं हि सहस्रजन्मसु प्रतप्य भूयस्तप आरितो वरः | | verse_lines = तेनामृतार्थं हि सहस्रजन्मसु प्रतप्य भूयस्तप आरितो वरः ।¦स्वयम्भुवस्तेन भवान् करेऽस्य बिन्दुं सुधां प्रास्य शिरो जहार ॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = शिरस्तु तस्य ग्रहतामवाप सुरैः समाविष्टमथो सबाहुः । | | verse_text = शिरस्तु तस्य ग्रहतामवाप सुरैः समाविष्टमथो सबाहुः । | ||
| verse_lines = शिरस्तु तस्य ग्रहतामवाप सुरैः समाविष्टमथो सबाहुः | | verse_lines = शिरस्तु तस्य ग्रहतामवाप सुरैः समाविष्टमथो सबाहुः ।¦क्षिप्तः कबन्धोऽस्य शुभोदसागरे त्वया स्थितोऽद्यापि हि तत्र सामृतः ॥ ३१॥ | ||
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| verse_text = अथासुराः प्रत्यपतन्नुदायुधाः समस्तशस्ते च हतास्त्वया रणे । | | verse_text = अथासुराः प्रत्यपतन्नुदायुधाः समस्तशस्ते च हतास्त्वया रणे । | ||
| verse_lines = अथासुराः प्रत्यपतन्नुदायुधाः समस्तशस्ते च हतास्त्वया रणे | | verse_lines = अथासुराः प्रत्यपतन्नुदायुधाः समस्तशस्ते च हतास्त्वया रणे ।¦कलिस्तु स ब्रह्मवरादजेयो ऋते भवन्तं पुरुषेषु संस्थितः ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = तस्यार्द्धदेहात् समभूदलक्ष्मीस्तत्पुत्रका दोषगणाश्च सर्वशः | | verse_lines = तस्यार्द्धदेहात् समभूदलक्ष्मीस्तत्पुत्रका दोषगणाश्च सर्वशः ।¦अथेन्दिरा वक्षसि ते समास्थिता त्वत्कण्ठगं कौस्तुभमास धाता ॥ ३३॥ | ||
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| verse_lines = यथाविभागं च सुरेषु दत्तास्त्वया तथाऽन्येऽपि हि तत्र जाताः | | verse_lines = यथाविभागं च सुरेषु दत्तास्त्वया तथाऽन्येऽपि हि तत्र जाताः ।¦इत्थं त्वया साध्वमृतं सुरेषु दत्तं हि मोक्षस्य निदर्शनाय ॥ ३४॥ | ||
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| verse_text = भवेद्धि मोक्षो नियतं सुराणां नैवासुराणां स कथञ्चन स्यात् । | | verse_text = भवेद्धि मोक्षो नियतं सुराणां नैवासुराणां स कथञ्चन स्यात् । | ||
| verse_lines = भवेद्धि मोक्षो नियतं सुराणां नैवासुराणां स कथञ्चन स्यात् | | verse_lines = भवेद्धि मोक्षो नियतं सुराणां नैवासुराणां स कथञ्चन स्यात् ।¦उत्साहयुक्तस्य च तत् प्रतीपं भवेद्धि राहोरिव दुःखरूपम् ॥ ३५॥ | ||
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| verse_text = कलिस्त्वयं ब्रह्मवरादिदानीं विबाधतेऽस्मान् सकलान् प्रजाश्च । | | verse_text = कलिस्त्वयं ब्रह्मवरादिदानीं विबाधतेऽस्मान् सकलान् प्रजाश्च । | ||
| verse_lines = कलिस्त्वयं ब्रह्मवरादिदानीं विबाधतेऽस्मान् सकलान् प्रजाश्च | | verse_lines = कलिस्त्वयं ब्रह्मवरादिदानीं विबाधतेऽस्मान् सकलान् प्रजाश्च ।¦अज्ञानमिथ्यामतिरूपतोऽसौ प्रविश्य सज्ज्ञानविरुद्धरूपः ॥ ३६॥ | ||
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| verse_lines = त्वदाज्ञया तस्य वरोऽब्जजेन दत्तः स आविश्य शिवं चकार | | verse_lines = त्वदाज्ञया तस्य वरोऽब्जजेन दत्तः स आविश्य शिवं चकार ।¦कदागमांस्तस्य कुयुक्तिबाधाम् नहि त्वदन्यश्चरितुं(चलितुं) समर्थः ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = ऋते भवन्तं नहि तं निहन्ता(तन्निहन्ता) त्वमेक एवाखिलशक्तिपूर्णः | | verse_lines = ऋते भवन्तं नहि तं निहन्ता(तन्निहन्ता) त्वमेक एवाखिलशक्तिपूर्णः ।¦ततो भवन्तं शरणं गता वयं तमोनिहत्यै निजबोधविग्रहम् ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = वसिष्ठनामा कमलोद्भवात्मजः सुतोऽस्य शक्तिस्तनयः पराशरः । | | verse_text = वसिष्ठनामा कमलोद्भवात्मजः सुतोऽस्य शक्तिस्तनयः पराशरः । | ||
| verse_lines = वसिष्ठनामा कमलोद्भवात्मजः सुतोऽस्य शक्तिस्तनयः पराशरः | | verse_lines = वसिष्ठनामा कमलोद्भवात्मजः सुतोऽस्य शक्तिस्तनयः पराशरः ।¦तस्योत्तमं सोऽपि तपोऽचरद्धरिः सुतो मम स्यादिति तद्धरिर्ददौ ॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = उवाच चैनं भगवान् सुतोषितो वसोर्मदीयस्य सुताऽस्ति शोभना । | | verse_text = उवाच चैनं भगवान् सुतोषितो वसोर्मदीयस्य सुताऽस्ति शोभना । | ||
| verse_lines = उवाच चैनं भगवान् सुतोषितो वसोर्मदीयस्य सुताऽस्ति शोभना | | verse_lines = उवाच चैनं भगवान् सुतोषितो वसोर्मदीयस्य सुताऽस्ति शोभना ।¦वने मृगार्थं चरतोऽस्य वीर्यं पपात भार्यां मनसा गतस्य ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = तच्छ्येनहस्ते प्रददौ स तस्यै दातुं तदन्येन तु युद्ध्यतोऽपतत् । | | verse_text = तच्छ्येनहस्ते प्रददौ स तस्यै दातुं तदन्येन तु युद्ध्यतोऽपतत् । | ||
| verse_lines = तच्छ्येनहस्ते प्रददौ स तस्यै दातुं तदन्येन तु युद्ध्यतोऽपतत् | | verse_lines = तच्छ्येनहस्ते प्रददौ स तस्यै दातुं तदन्येन तु युद्ध्यतोऽपतत् ।¦जग्रास तन्मत्स्यवधूर्यमस्वसुर्जलस्थमेनां जगृहुस्म (श्च) दाशाः ॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = तद्गर्भतोऽभून्मिथुनं स्वराज्ञे न्यवेदयन् सोऽपि वसोः समर्पयत् । | | verse_text = तद्गर्भतोऽभून्मिथुनं स्वराज्ञे न्यवेदयन् सोऽपि वसोः समर्पयत् । | ||
| verse_lines = तद्गर्भतोऽभून्मिथुनं स्वराज्ञे न्यवेदयन् सोऽपि वसोः समर्पयत् | | verse_lines = तद्गर्भतोऽभून्मिथुनं स्वराज्ञे न्यवेदयन् सोऽपि वसोः समर्पयत् ।¦पुत्रं समादाय सुतां स तस्मै ददौ सुतोऽभूदथ मत्स्यराजः ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = कन्या तु सा दाशराजस्य सद्मन्यवर्द्धतातीव सुरूपयुक्ता । | | verse_text = कन्या तु सा दाशराजस्य सद्मन्यवर्द्धतातीव सुरूपयुक्ता । | ||
| verse_lines = कन्या तु सा दाशराजस्य सद्मन्यवर्द्धतातीव सुरूपयुक्ता | | verse_lines = कन्या तु सा दाशराजस्य सद्मन्यवर्द्धतातीव सुरूपयुक्ता ।¦नाम्ना च सा सत्यवतीति तस्यां तवाऽत्मजोऽहं भविताऽस्म्यजोऽपि ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = इतीरितश्चक्रधरेण तां मुनिर्जगाम मार्ताण्डसुतां समुद्रगाम् । | | verse_text = इतीरितश्चक्रधरेण तां मुनिर्जगाम मार्ताण्डसुतां समुद्रगाम् । | ||
| verse_lines = इतीरितश्चक्रधरेण तां मुनिर्जगाम मार्ताण्डसुतां समुद्रगाम् | | verse_lines = इतीरितश्चक्रधरेण तां मुनिर्जगाम मार्ताण्डसुतां समुद्रगाम् ।¦उत्तारयन्तीमथ तत्र विष्णुः प्रादुर्बभूवाऽशु विशुद्धचिद्घनः ॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = विदोषविज्ञानसुखैकरूपोऽप्यजो जनान् मोहयितुं मृषैव । | | verse_text = विदोषविज्ञानसुखैकरूपोऽप्यजो जनान् मोहयितुं मृषैव । | ||
| verse_lines = विदोषविज्ञानसुखैकरूपोऽप्यजो जनान् मोहयितुं मृषैव | | verse_lines = विदोषविज्ञानसुखैकरूपोऽप्यजो जनान् मोहयितुं मृषैव ।¦योषित्सु पुंसो ह्यजनीव दृश्यते न जायते क्वापि बलादिविग्रहः ॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = यथा नृसिंहाकृतिराविरासीत् स्तम्भात् तथा नित्यतनुत्वतो विभुः । | | verse_text = यथा नृसिंहाकृतिराविरासीत् स्तम्भात् तथा नित्यतनुत्वतो विभुः । | ||
| verse_lines = यथा नृसिंहाकृतिराविरासीत् स्तम्भात् तथा नित्यतनुत्वतो विभुः | | verse_lines = यथा नृसिंहाकृतिराविरासीत् स्तम्भात् तथा नित्यतनुत्वतो विभुः ।¦आविर्भवेद् योषिति नो मलोत्थस्तथाऽपि मोहाय निदर्शयेत् तथा ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = स्त्रीपुम्प्रसङ्गात् परतो यतो हरिः प्रादुर्भवत्येष विमोहयन् जनम् । | | verse_text = स्त्रीपुम्प्रसङ्गात् परतो यतो हरिः प्रादुर्भवत्येष विमोहयन् जनम् । | ||
| verse_lines = स्त्रीपुम्प्रसङ्गात् परतो यतो हरिः प्रादुर्भवत्येष विमोहयन् जनम् | | verse_lines = स्त्रीपुम्प्रसङ्गात् परतो यतो हरिः प्रादुर्भवत्येष विमोहयन् जनम् ।¦अतो मलोत्थोऽयमिति स्म मन्यते जनोऽशुभः पूर्णगुणैकविग्रहम् ॥ ५०॥ | ||
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| verse_text = द्वीपे भगिन्याः स(तु/च) यमस्य विश्वकृत् प्रकाशते ज्ञानमरीचिमण्डलः । | | verse_text = द्वीपे भगिन्याः स(तु/च) यमस्य विश्वकृत् प्रकाशते ज्ञानमरीचिमण्डलः । | ||
| verse_lines = द्वीपे भगिन्याः स(तु/च) यमस्य विश्वकृत् प्रकाशते ज्ञानमरीचिमण्डलः | | verse_lines = द्वीपे भगिन्याः स(तु/च) यमस्य विश्वकृत् प्रकाशते ज्ञानमरीचिमण्डलः ।¦प्रभासयन्नण्डबहिस्तथाऽन्तः सहस्रलक्षामितसूर्य(भानु)दीधितिः ॥ ५१॥ | ||
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| verse_text = अगण्यदिव्योरुगुणार्णवः प्रभुः समस्तविद्याधिपतिर्जगद्गुरुः । | | verse_text = अगण्यदिव्योरुगुणार्णवः प्रभुः समस्तविद्याधिपतिर्जगद्गुरुः । | ||
| verse_lines = अगण्यदिव्योरुगुणार्णवः प्रभुः समस्तविद्याधिपतिर्जगद्गुरुः | | verse_lines = अगण्यदिव्योरुगुणार्णवः प्रभुः समस्तविद्याधिपतिर्जगद्गुरुः ।¦अनन्तशक्तिर्जगदीश्वरः समस्तदोषातिविदूरविग्रहः ॥ ५२॥ | ||
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| verse_text = शुभमरतकवर्णो रक्तपादाब्जनेत्राधरकरनखरसनाग्रश्चक्रशङ्खाब्जरेखः । | | verse_text = शुभमरतकवर्णो रक्तपादाब्जनेत्राधरकरनखरसनाग्रश्चक्रशङ्खाब्जरेखः । | ||
| verse_lines = शुभमरतकवर्णो रक्तपादाब्जनेत्राधरकरनखरसनाग्रश्चक्रशङ्खाब्जरेखः | | verse_lines = शुभमरतकवर्णो रक्तपादाब्जनेत्राधरकरनखरसनाग्रश्चक्रशङ्खाब्जरेखः ।¦रविकरवरगौरं चर्म चैणं वसानस्तटिदमलजटासन्दीप्तजूटं दधानः ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = विस्तीर्णवक्षाः कमलायताक्षो बृहद्भुजः कम्बुसमानकण्ठः | | verse_lines = विस्तीर्णवक्षाः कमलायताक्षो बृहद्भुजः कम्बुसमानकण्ठः ।¦समस्तवेदान् मुखतः समुद्गिरन्ननन्तचन्द्राधिककान्तसन्मुखः ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = प्रबोधमुद्राभयदोर्द्वयान्वि(ङ्कि)तो यज्ञोपवीताजिनमेखलोल्लसन् । | | verse_text = प्रबोधमुद्राभयदोर्द्वयान्वि(ङ्कि)तो यज्ञोपवीताजिनमेखलोल्लसन् । | ||
| verse_lines = प्रबोधमुद्राभयदोर्द्वयान्वि(ङ्कि)तो यज्ञोपवीताजिनमेखलोल्लसन् | | verse_lines = प्रबोधमुद्राभयदोर्द्वयान्वि(ङ्कि)तो यज्ञोपवीताजिनमेखलोल्लसन् ।¦दृशा महाज्ञानभुजङ्गदष्टमुज्जीवयानो जगदत्यरोचत ॥ ५५॥ | ||
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| verse_text = स लोकधर्माभिरिरक्षया पितुर्द्विजत्वमाप्याऽशु पितुर्ददौ निजम् । | | verse_text = स लोकधर्माभिरिरक्षया पितुर्द्विजत्वमाप्याऽशु पितुर्ददौ निजम् । | ||
| verse_lines = स लोकधर्माभिरिरक्षया पितुर्द्विजत्वमाप्याऽशु पितुर्ददौ निजम् | | verse_lines = स लोकधर्माभिरिरक्षया पितुर्द्विजत्वमाप्याऽशु पितुर्ददौ निजम् ।¦ज्ञानं तयोः संस्मृतिमात्रतः सदा प्रत्यक्षभावं परमात्मनो ददौ ॥ ५६॥ | ||
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| verse_lines = द्वैपायनः सोऽथ जगाम मेरुं चतुर्मुखाद्यैरनुगम्यमानः | | verse_lines = द्वैपायनः सोऽथ जगाम मेरुं चतुर्मुखाद्यैरनुगम्यमानः ।¦उद्धृत्य वेदानखिलान् सुरेभ्यो ददौ मुनिभ्यश्च यथाऽऽदिसृष्टौ ॥ ५७॥ | ||
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| verse_text = सर्वाणि शास्त्राणि तथैव कृत्वा विनिर्णयं ब्रह्मसूत्रं चकार । | | verse_text = सर्वाणि शास्त्राणि तथैव कृत्वा विनिर्णयं ब्रह्मसूत्रं चकार । | ||
| verse_lines = सर्वाणि शास्त्राणि तथैव कृत्वा विनिर्णयं ब्रह्मसूत्रं चकार | | verse_lines = सर्वाणि शास्त्राणि तथैव कृत्वा विनिर्णयं ब्रह्मसूत्रं चकार ।¦तच्छुश्रुवुर्ब्रह्मगिरीशमुख्याः सुरा मुनीनां प्रवराश्च तस्मात् ॥ ५८॥ | ||
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| verse_lines = समस्तशास्त्रार्थनिदर्शनात्मकं चक्रे महाभारतनामधेयम् | | verse_lines = समस्तशास्त्रार्थनिदर्शनात्मकं चक्रे महाभारतनामधेयम् ।¦वेदोत्तमं तच्च विधातृशङ्करप्रधानकैस्तन्मुखतः सुरैः श्रुतम् ॥ ५९॥ | ||
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| verse_text = अथो गिरीशादिमनोनुशायी कलिर्ममाराऽशु सुवाङ्मयैः शरैः । | | verse_text = अथो गिरीशादिमनोनुशायी कलिर्ममाराऽशु सुवाङ्मयैः शरैः । | ||
| verse_lines = अथो गिरीशादिमनोनुशायी कलिर्ममाराऽशु सुवाङ्मयैः शरैः | | verse_lines = अथो गिरीशादिमनोनुशायी कलिर्ममाराऽशु सुवाङ्मयैः शरैः ।¦निकृत्तशीर्षो भगवन्मुखेरितैः सुराश्च सज्ज्ञानसुधारसं पपुः ॥ ६०॥ | ||
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| verse_lines = अथो मनुष्येषु तथाऽसुरेषु रूपान्तरैः कलिरेवावशिष्टः | | verse_lines = अथो मनुष्येषु तथाऽसुरेषु रूपान्तरैः कलिरेवावशिष्टः ।¦ततो मनुष्येषु च सत्सु संस्थितो विनाश्य इत्येव(ष) हरिर्व्यचिन्तयत् ॥ ६१॥ | ||
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| verse_lines = ततो नृणां कालबलात् सुमन्दमायुर्मतिं कर्म च वीक्ष्य कृष्णः | | verse_lines = ततो नृणां कालबलात् सुमन्दमायुर्मतिं कर्म च वीक्ष्य कृष्णः ।¦विव्यास वेदान् स विभुश्चतुर्धा चक्रे तथा भागवतं पुराणम् ॥ ६२॥ | ||
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| verse_lines = येये च सन्तस्तमसाऽनुविष्टास्तांस्तान् सुवाक्यैस्तमसो विमुञ्चन् | | verse_lines = येये च सन्तस्तमसाऽनुविष्टास्तांस्तान् सुवाक्यैस्तमसो विमुञ्चन् ।¦चचार लोकान् स पथि प्रयान्तं कीटं व्यपश्यत् तमुवाच कृष्णः ॥ ६३॥ | ||
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| verse_lines = भवस्व राजा कुशरीरमेतत् त्यक्त्वेति नैच्छत् तदसौ ततस्तम् | | verse_lines = भवस्व राजा कुशरीरमेतत् त्यक्त्वेति नैच्छत् तदसौ ततस्तम् ।¦अत्यक्तदेहं नृपतिं चकार पुरा स्वभक्तं वृषलं सुलुब्धम् ॥ ६४॥ | ||
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| verse_lines = लोभात् स कीटत्वमुपेत्य कृष्णप्रसादतश्चाऽशु बभूव राजा | | verse_lines = लोभात् स कीटत्वमुपेत्य कृष्णप्रसादतश्चाऽशु बभूव राजा ।¦तदैव तं सर्वनृपाः प्रणेमुर्ददुः करं चास्य यथैव वैश्याः ॥ ६५॥ | ||
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| verse_lines = उवाच तं भगवान् मुक्तिमस्मिंस्तव क्षणे दातुमहं समर्थः | | verse_lines = उवाच तं भगवान् मुक्तिमस्मिंस्तव क्षणे दातुमहं समर्थः ।¦तथाऽपि सीमार्थमवाप्य विप्रतनुं विमुक्तो भव मत्प्रसादात् ॥ ६६॥ | ||
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| verse_text = एवं बहून् संसृतिबन्धतः स व्यमोचयद् व्यासतनुर्जनार्दनः । | | verse_text = एवं बहून् संसृतिबन्धतः स व्यमोचयद् व्यासतनुर्जनार्दनः । | ||
| verse_lines = एवं बहून् संसृतिबन्धतः स व्यमोचयद् व्यासतनुर्जनार्दनः | | verse_lines = एवं बहून् संसृतिबन्धतः स व्यमोचयद् व्यासतनुर्जनार्दनः ।¦बहून्यचिन्त्यानि च तस्य कर्माण्यशेषदेवेशसदोदितानि ॥ ६८॥ | ||
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| verse_lines = अथास्य पुत्रत्वमवाप्तुमिच्छंश्चचार रुद्रः सुतपस्तदीयम् | | verse_lines = अथास्य पुत्रत्वमवाप्तुमिच्छंश्चचार रुद्रः सुतपस्तदीयम् ।¦ददौ च तस्मै भगवान् वरं तं स्वयं च तप्त्वेव तपो विमोहयन् ॥ ६९॥ | ||
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| verse_lines = विमोहनायासुरसर्गिणां प्रभुः स्वयं करोतीव तपः प्रदर्शयेत् | | verse_lines = विमोहनायासुरसर्गिणां प्रभुः स्वयं करोतीव तपः प्रदर्शयेत् ।¦कामादिदोषांश्च मृषैव दर्शयेन्न(दर्शयन्) तावता तस्य हि सन्ति कुत्रचित् ॥ ७०॥ | ||
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| verse_lines = शेषोऽथ पैलं मुनिमाविशत् तदा वीशः सुमन्तुमपि वारुणिं(वारुणं) मुनिम् | | verse_lines = शेषोऽथ पैलं मुनिमाविशत् तदा वीशः सुमन्तुमपि वारुणिं(वारुणं) मुनिम् ।¦ब्रह्माऽविशत् तमुत वैशम्पायनं शक्रश्च जैमिनिमथाऽविशद् विभुः ॥ ७४॥ | ||
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| verse_text = कृष्णस्य पादपरिसेवनोत्सुकाः सुरेश्वरा विविशुराशु तान् मुनीन् । | | verse_text = कृष्णस्य पादपरिसेवनोत्सुकाः सुरेश्वरा विविशुराशु तान् मुनीन् । | ||
| verse_lines = कृष्णस्य पादपरिसेवनोत्सुकाः सुरेश्वरा विविशुराशु तान् मुनीन् | | verse_lines = कृष्णस्य पादपरिसेवनोत्सुकाः सुरेश्वरा विविशुराशु तान् मुनीन् ।¦समस्तविद्याः प्रतिपाद्य तेष्वसौ प्रवर्तकांस्तान् विदधे हरिः पुनः ॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = ऋचां प्रवर्तकं पैलं यजुषां च प्रवर्तकम् । | | verse_text = ऋचां प्रवर्तकं पैलं यजुषां च प्रवर्तकम् । | ||
| verse_lines = ऋचां प्रवर्तकं पैलं यजुषां च प्रवर्तकम् | | verse_lines = ऋचां प्रवर्तकं पैलं यजुषां च प्रवर्तकम् ।¦वैशम्पायनमेवैकं द्वितीयं सूर्यमेव च ॥ ७६॥ | ||
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| verse_text = चक्रेऽथ जैमिनिं साम्नामथर्वाङ्गिरसामपि । | | verse_text = चक्रेऽथ जैमिनिं साम्नामथर्वाङ्गिरसामपि । | ||
| verse_lines = चक्रेऽथ जैमिनिं साम्नामथर्वाङ्गिरसामपि | | verse_lines = चक्रेऽथ जैमिनिं साम्नामथर्वाङ्गिरसामपि ।¦सुमन्तुं भारतस्यापि वैशम्पायनमादिशत् ।¦प्रवर्तने मानुषेषु गन्धर्वादिषु चाऽत्मजम् ॥ ७७॥ | ||
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| verse_text = नारदं पाठयित्वा च देवलोकप्रवृत्तये । | | verse_text = नारदं पाठयित्वा च देवलोकप्रवृत्तये । | ||
| verse_lines = नारदं पाठयित्वा च देवलोकप्रवृत्तये | | verse_lines = नारदं पाठयित्वा च देवलोकप्रवृत्तये ।¦आदिशत् ससृजे सोऽथ रोमाञ्चाद् रोमहर्षणम् ॥ ७८॥ | ||
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| verse_text = तं भारतपुराणानां महारामायणस्य च । | | verse_text = तं भारतपुराणानां महारामायणस्य च । | ||
| verse_lines = तं भारतपुराणानां महारामायणस्य च | | verse_lines = तं भारतपुराणानां महारामायणस्य च ।¦पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य प्रवृत्त्यर्थमथाऽदिशत् ॥ ७९॥ | ||
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| verse_text = तमाविशत् कामदेवः कृष्णसेवासमुत्सुकः । | | verse_text = तमाविशत् कामदेवः कृष्णसेवासमुत्सुकः । | ||
| verse_lines = तमाविशत् कामदेवः कृष्णसेवासमुत्सुकः | | verse_lines = तमाविशत् कामदेवः कृष्णसेवासमुत्सुकः ।¦स तस्मै ज्ञानमखिलं ददौ द्वैपायनः प्रभुः ॥ ८०॥ | ||
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| verse_text = सनत्कुमारप्रमुखांश्चक्रे योगप्रवर्तकान् । | | verse_text = सनत्कुमारप्रमुखांश्चक्रे योगप्रवर्तकान् । | ||
| verse_lines = सनत्कुमारप्रमुखांश्चक्रे योगप्रवर्तकान् | | verse_lines = सनत्कुमारप्रमुखांश्चक्रे योगप्रवर्तकान् ।¦भृग्वादीन् कर्मयोगस्य ज्ञानं दत्वाऽमलं शुभम् ॥ ८१॥ | ||
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| verse_lines = जैमिनिं कर्ममीमांसाकर्तारमकरोत् प्रभुः | | verse_lines = जैमिनिं कर्ममीमांसाकर्तारमकरोत् प्रभुः ।¦देवमीमांसि(स)काद्यन्तं कृत्वा पैलमथाऽदिशत् ।¦शेषं च मध्यकरणे पुराणान्यथ चाकरोत् ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = शैवान् (पाशुपतान्) पाशुपताच्चक्रे संशयार्थं सुरद्विषाम् | | verse_lines = शैवान् (पाशुपतान्) पाशुपताच्चक्रे संशयार्थं सुरद्विषाम् ।¦वैष्णवान् पञ्चरात्राच्च यथार्थज्ञानसिद्धये ।¦ब्राह्मांश्च वेदतश्चक्रे पुराणग्रन्थसङ्ग्रहान् ॥ ८३॥ | ||
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| verse_text = एवं ज्ञानं पुनः प्रापुर्देवाश्च ऋषयस्तथा । | | verse_text = एवं ज्ञानं पुनः प्रापुर्देवाश्च ऋषयस्तथा । | ||
| verse_lines = एवं ज्ञानं पुनः प्रापुर्देवाश्च ऋषयस्तथा | | verse_lines = एवं ज्ञानं पुनः प्रापुर्देवाश्च ऋषयस्तथा ।¦सनत्कुमारप्रमुखा योगिनो मानुषास्तथा ।¦कृष्णद्वैपायनात् प्राप्य ज्ञानं ते मुमुदुः सदा ॥ ८४॥ | ||
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| verse_text = समस्तविज्ञानगभस्तिचक्रं विताय विज्ञानमहादिवाकरः । | | verse_text = समस्तविज्ञानगभस्तिचक्रं विताय विज्ञानमहादिवाकरः । | ||
| verse_lines = समस्तविज्ञानगभस्तिचक्रं विताय विज्ञानमहादिवाकरः | | verse_lines = समस्तविज्ञानगभस्तिचक्रं विताय विज्ञानमहादिवाकरः ।¦निरस्य(निपीय) चाज्ञानतमो जगत्ततं प्रभासते भानुरिवावभासयन् ॥ ८५॥ | ||
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| verse_lines = चतुर्मुखेशानसुरेन्द्रपूर्वकैः सदा सुरैः सेवितपादपल्लवः | | verse_lines = चतुर्मुखेशानसुरेन्द्रपूर्वकैः सदा सुरैः सेवितपादपल्लवः ।¦प्रकाशयंस्तेषु सदाऽऽत्मगुह्यं मुमोद मेरौ च तथा बदर्याम् ॥ ८६॥ | ||
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<span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C11" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकादशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ शशाङ्कपुत्रादभवत् पुरूरवास्तस्याऽयुरायोर्नहुषो ययातिः । | | verse_text = औं ॥ शशाङ्कपुत्रादभवत् पुरूरवास्तस्याऽयुरायोर्नहुषो ययातिः । | ||
| verse_lines = औं ॥ शशाङ्कपुत्रादभवत् पुरूरवास्तस्याऽयुरायोर्नहुषो ययातिः | | verse_lines = औं ॥ शशाङ्कपुत्रादभवत् पुरूरवास्तस्याऽयुरायोर्नहुषो ययातिः ।¦तस्याऽस पत्नीयुगलं सुताश्च पञ्चाऽभवन् विष्णुपदैकभक्ताः ॥ १॥ | ||
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| verse_lines = यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत | | verse_lines = यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।¦द्रुह्यं चाऽनुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥।¦२॥ | ||
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| verse_lines = यदोर्वंशे चक्रवर्ती कार्तवीर्यार्जुनोऽभवत् | | verse_lines = यदोर्वंशे चक्रवर्ती कार्तवीर्यार्जुनोऽभवत् ।¦विष्णोर्दत्तात्रेयनाम्नः प्रसादाद् योगवीर्यवान् ।¦तस्यान्ववाये यदवो बभूवुर्विष्णुसंश्रयाः ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = पूरोर्वंशे तु भरतश्चक्रवर्ती हरिप्रियः । | | verse_text = पूरोर्वंशे तु भरतश्चक्रवर्ती हरिप्रियः । | ||
| verse_lines = पूरोर्वंशे तु भरतश्चक्रवर्ती हरिप्रियः | | verse_lines = पूरोर्वंशे तु भरतश्चक्रवर्ती हरिप्रियः ।¦तद्वंशजः कुरुर्नाम प्रतीपोऽभूत् तदन्वये ॥।¦४॥ | ||
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| verse_lines = प्रतीपस्याभवन् पुत्रास्त्रयस्त्रेताग्निवर्चसः | | verse_lines = प्रतीपस्याभवन् पुत्रास्त्रयस्त्रेताग्निवर्चसः ।¦देवापिरथ बाह्लीको गुणज्येष्ठश्च शन्तनुः ॥ ५॥ | ||
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| verse_lines = त्वग्दोषयुक्तो देवापिर्जगाम तपसे वनम् | | verse_lines = त्वग्दोषयुक्तो देवापिर्जगाम तपसे वनम् ।¦‘विष्णोः प्रसादात् स कृते युगे राजा भविष्यति’ ॥ ६॥ (भा\.पु\. १२\.२\.३७) | ||
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| verse_lines = पुत्रिकापुत्रतां यातो बाह्लीको राजसत्तमः | | verse_lines = पुत्रिकापुत्रतां यातो बाह्लीको राजसत्तमः ।¦हिरण्यकशिपोः पुत्रः प्रह्लादो भगवत्प्रियः (भगवत्परः) ॥ ७॥ | ||
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| verse_lines = वायुना च समाविष्टो महाबलसमन्वितः | | verse_lines = वायुना च समाविष्टो महाबलसमन्वितः ।¦येनैव जायमानेन तरसा भूर्विदारिता ॥ ८॥ | ||
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| verse_lines = भूभारक्षपणे विष्णोरङ्गतामाप्तुमेव सः | | verse_lines = भूभारक्षपणे विष्णोरङ्गतामाप्तुमेव सः ।¦प्रतीपपुत्रतामाप्य बाह्लीकेष्वभवत् पतिः ।¦रुद्रेषु पत्रतापाख्यः सोमदत्तोऽस्य चाऽत्मजः ॥ ९॥ | ||
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| verse_lines = अजैकपादहिर्बुध्निर्विरूपाक्ष इति त्रयः | | verse_lines = अजैकपादहिर्बुध्निर्विरूपाक्ष इति त्रयः ।¦रुद्राणां सोमदत्तस्य बभूवुः प्रथिताः सुताः ।¦विष्णोरेवाङ्गतामाप्तुं भूरिभूरिश्रवाः (भूरिर्भूरिश्रवाः) शलः ॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = शिवादिसर्वरुद्राणामावेशाद् वरतस्तथा | | verse_lines = शिवादिसर्वरुद्राणामावेशाद् वरतस्तथा ।¦भूरिश्रवा अतिबलस्तत्राऽसीत् परमास्त्रवित् ॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = तदर्थं हि तपश्चीर्णं सोमदत्तेन शम्भवे | | verse_lines = तदर्थं हि तपश्चीर्णं सोमदत्तेन शम्भवे ।¦दत्तो वरश्च तेनास्य त्वत्प्रतीपाभिभूतिकृत् ।¦बलवीर्यगुणोपेतो नाम्ना भूरिश्रवाः सुतः ॥ १२॥ | ||
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| verse_lines = भविष्यति मयाऽऽविष्टो यज्ञशील इति स्म ह | | verse_lines = भविष्यति मयाऽऽविष्टो यज्ञशील इति स्म ह ।¦तेन भूरिश्रवा जातः सोमदत्तसुतो बली ॥ १३॥ | ||
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| verse_lines = पूर्वोदधेस्तीरगतेऽब्जसम्भवे गङ्गायुतः पर्वणि घूर्णितोऽब्धिः | | verse_lines = पूर्वोदधेस्तीरगतेऽब्जसम्भवे गङ्गायुतः पर्वणि घूर्णितोऽब्धिः ।¦अवाक्षिपत् तस्य तनौ निजोदबिन्दुं शशापैनमथाब्जयोनिः ॥ १४॥ | ||
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| verse_lines = महाभिषङ् नाम नरेश्वरस्त्वं भूत्वा पुनः शन्तनुनामधेयः | | verse_lines = महाभिषङ् नाम नरेश्वरस्त्वं भूत्वा पुनः शन्तनुनामधेयः ।¦जनिष्यसे विष्णुपदी तथैषा तत्रापि भार्या भवतो भविष्यति ॥ १५॥ | ||
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| verse_lines = शान्तो भवत्येव मयोदितस्त्वं तनुत्वमाप्तोऽसि(आप्नोषि) ततश्च शन्तनुः | | verse_lines = शान्तो भवत्येव मयोदितस्त्वं तनुत्वमाप्तोऽसि(आप्नोषि) ततश्च शन्तनुः ।¦इतीरितः सोऽथ नृपो बभूव महाभिषङ् नाम हरेःपदाश्रयः ॥ १६॥ | ||
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| verse_lines = स तत्र भुक्त्वा चिरकालमुर्वीं तनुं विहायाऽप सदो विधातुः | | verse_lines = स तत्र भुक्त्वा चिरकालमुर्वीं तनुं विहायाऽप सदो विधातुः ।¦तत्रापि तिष्ठन् सुरवृन्दसन्निधौ ददर्श गङ्गां श्लथिताम्बरां स्वकाम् ॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = अवाङ्मुखेषु द्युसदस्सु रागान्निरीक्षमाणं पुनरात्मसम्भवः | | verse_lines = अवाङ्मुखेषु द्युसदस्सु रागान्निरीक्षमाणं पुनरात्मसम्भवः ।¦उवाच भूमौ नृपतिर्भवाऽशु शप्तो यथा त्वं हि पुरा मयैव ॥ १८॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितस्तत्क्षणतः प्रतीपाद् बभूव नाम्ना नृपतिश्च (नृपतिः) स शन्तनुः | | verse_lines = इतीरितस्तत्क्षणतः प्रतीपाद् बभूव नाम्ना नृपतिश्च (नृपतिः) स शन्तनुः ।¦अवाप्य गङ्गां दयितां स्वकीयां तया मुमोदाब्दगणान् बहूंश्च ॥ १९॥ | ||
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| verse_lines = अधर्मवृत्ताः प्रतियात मानुषीं योनिं द्रुतं यत्कृते सर्व एव | | verse_lines = अधर्मवृत्ताः प्रतियात मानुषीं योनिं द्रुतं यत्कृते सर्व एव ।¦धर्माच्च्युताः स तथाऽष्टायुराप्यतामन्ये पुनः क्षिप्रमतो विमोक्ष्यथ ॥ २३॥ | ||
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| verse_text = प्रचोदयामास च या कुमार्गे पतिं हि साऽम्बेति नरेषु जाता । | | verse_text = प्रचोदयामास च या कुमार्गे पतिं हि साऽम्बेति नरेषु जाता । | ||
| verse_lines = प्रचोदयामास च या कुमार्गे पतिं हि साऽम्बेति नरेषु जाता | | verse_lines = प्रचोदयामास च या कुमार्गे पतिं हि साऽम्बेति नरेषु जाता ।¦अभर्तृका पुंस्त्वसमाश्रयेण पत्युर्मृतौ कारणत्वं व्रजेत ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = भवत्वसौ ब्रह्मचर्यैकनिष्ठो महान् विरोधश्च तयोर्भवेत । | | verse_text = भवत्वसौ ब्रह्मचर्यैकनिष्ठो महान् विरोधश्च तयोर्भवेत । | ||
| verse_lines = भवत्वसौ ब्रह्मचर्यैकनिष्ठो महान् विरोधश्च तयोर्भवेत | | verse_lines = भवत्वसौ ब्रह्मचर्यैकनिष्ठो महान् विरोधश्च तयोर्भवेत ।¦स गर्भवासाष्टकदुःखमेव समाप्नुतां शरतल्पे शयानः ॥ २५॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = मृत्यष्टकोत्थामपि वेदनां सः प्राप्नोतु शस्त्रैर्बहुधा निकृत्तः । | | verse_text = मृत्यष्टकोत्थामपि वेदनां सः प्राप्नोतु शस्त्रैर्बहुधा निकृत्तः । | ||
| verse_lines = मृत्यष्टकोत्थामपि वेदनां सः प्राप्नोतु शस्त्रैर्बहुधा निकृत्तः | | verse_lines = मृत्यष्टकोत्थामपि वेदनां सः प्राप्नोतु शस्त्रैर्बहुधा निकृत्तः ।¦इतीरितास्ते कमलोद्भवं तं ज्ञात्वा समुत्सृज्य च गां प्रणेमुः ॥ २६॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = न मानुषं (मानुषीं) गर्भमवाप्नुमो वयं भवत्वयं सर्ववित् कीर्तिमांश्च । | | verse_text = न मानुषं (मानुषीं) गर्भमवाप्नुमो वयं भवत्वयं सर्ववित् कीर्तिमांश्च । | ||
| verse_lines = न मानुषं (मानुषीं) गर्भमवाप्नुमो वयं भवत्वयं सर्ववित् कीर्तिमांश्च | | verse_lines = न मानुषं (मानुषीं) गर्भमवाप्नुमो वयं भवत्वयं सर्ववित् कीर्तिमांश्च ।¦महास्त्रवेत्ता भवदंशयुक्तस्तथा बलं नोऽखिलानामुपैतु ॥ २७॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = इतीरितेऽस्त्वित्युदिताः स्वयम्भुवा वसिष्ठसंस्थेन सुरापगां ययुः । | | verse_text = इतीरितेऽस्त्वित्युदिताः स्वयम्भुवा वसिष्ठसंस्थेन सुरापगां ययुः । | ||
| verse_lines = इतीरितेऽस्त्वित्युदिताः स्वयम्भुवा वसिष्ठसंस्थेन सुरापगां ययुः | | verse_lines = इतीरितेऽस्त्वित्युदिताः स्वयम्भुवा वसिष्ठसंस्थेन सुरापगां ययुः ।¦ऊचुस्तथैनामुदरे वयं ते जायेमहि क्षिप्रमस्मान् हन त्वम् ॥ २८॥ | ||
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| verse_text = इतीरिता सा वरमाशु वव्रे तेभ्योऽप्यपापत्वमथ प्रयत्वम् । | | verse_text = इतीरिता सा वरमाशु वव्रे तेभ्योऽप्यपापत्वमथ प्रयत्वम् । | ||
| verse_lines = इतीरिता सा वरमाशु वव्रे तेभ्योऽप्यपापत्वमथ प्रयत्वम् | | verse_lines = इतीरिता सा वरमाशु वव्रे तेभ्योऽप्यपापत्वमथ प्रयत्वम् ।¦तेषां सदैवाऽत्मन एकमेषां दीर्घायुषं तान् सुषुवेऽथ शन्तनोः ॥ २९॥ | ||
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| verse_text = अविघ्नतस्तान् विनिहन्तुमेव पुरा प्रतीपस्य हि दक्षिणोरुम् । | | verse_text = अविघ्नतस्तान् विनिहन्तुमेव पुरा प्रतीपस्य हि दक्षिणोरुम् । | ||
| verse_lines = अविघ्नतस्तान् विनिहन्तुमेव पुरा प्रतीपस्य हि दक्षिणोरुम् | | verse_lines = अविघ्नतस्तान् विनिहन्तुमेव पुरा प्रतीपस्य हि दक्षिणोरुम् ।¦समाश्रिता कामिनीवत्त्वकामा तत्पुत्रभार्या भवितुं विडम्बात् ॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = तेनैव चोक्ता भव मे सुतस्य भार्या यतो दक्षिणोरुस्थिताऽसि । | | verse_text = तेनैव चोक्ता भव मे सुतस्य भार्या यतो दक्षिणोरुस्थिताऽसि । | ||
| verse_lines = तेनैव चोक्ता भव मे सुतस्य भार्या यतो दक्षिणोरुस्थिताऽसि | | verse_lines = तेनैव चोक्ता भव मे सुतस्य भार्या यतो दक्षिणोरुस्थिताऽसि ।¦भागो हि दक्षो दुहितुः स्नुषाया भार्याभागो वाम इति प्रसिद्धः ॥ ३१॥ | ||
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| verse_text = उवाच सा तं नतु मां सुतस्ते काऽसीति पृच्छेन्न तु मां निवारयेत् । | | verse_text = उवाच सा तं नतु मां सुतस्ते काऽसीति पृच्छेन्न तु मां निवारयेत् । | ||
| verse_lines = उवाच सा तं नतु मां सुतस्ते काऽसीति पृच्छेन्न तु मां निवारयेत् | | verse_lines = उवाच सा तं नतु मां सुतस्ते काऽसीति पृच्छेन्न तु मां निवारयेत् ।¦अयोग्यकर्त्रीमपि कारणं च मत्कर्मणो नैव पृच्छेत् कदाचित् ॥ ३२॥ | ||
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| verse_text = यदा त्रयाणामपि चैकमेष करोति गच्छेयमहं विसृज्य । | | verse_text = यदा त्रयाणामपि चैकमेष करोति गच्छेयमहं विसृज्य । | ||
| verse_lines = यदा त्रयाणामपि चैकमेष करोति गच्छेयमहं विसृज्य | | verse_lines = यदा त्रयाणामपि चैकमेष करोति गच्छेयमहं विसृज्य ।¦तदा त्वदीयं सुतमित्युदीरिते तथेति राजाऽप्यवदत् प्रतीपः ॥ ३३॥ | ||
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| verse_text = तथैव पुत्राय च तेन तद्वचो वधूक्तमुक्तं वचनाद् द्युनद्याः । | | verse_text = तथैव पुत्राय च तेन तद्वचो वधूक्तमुक्तं वचनाद् द्युनद्याः । | ||
| verse_lines = तथैव पुत्राय च तेन तद्वचो वधूक्तमुक्तं वचनाद् द्युनद्याः | | verse_lines = तथैव पुत्राय च तेन तद्वचो वधूक्तमुक्तं वचनाद् द्युनद्याः ।¦कनीयसे सा ह्यवदत् सुतस्ते नान्यः पतिः शन्तनुरेव मे वृतः ॥ ३४॥ | ||
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| verse_text = ततस्तु सा शन्तनुतोऽष्टपुत्रानवाप्य सप्त न्यहनत् तथाऽष्टमम् । | | verse_text = ततस्तु सा शन्तनुतोऽष्टपुत्रानवाप्य सप्त न्यहनत् तथाऽष्टमम् । | ||
| verse_lines = ततस्तु सा शन्तनुतोऽष्टपुत्रानवाप्य सप्त न्यहनत् तथाऽष्टमम् | | verse_lines = ततस्तु सा शन्तनुतोऽष्टपुत्रानवाप्य सप्त न्यहनत् तथाऽष्टमम् ।¦गन्तुं ततो मतिमाधाय हन्तुमिवोद्योगं सा हि मृषा चकार ॥ ३५॥ | ||
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| verse_text = अवस्थितिर्नातिसुखाय मानुषे यतः सुराणामत एव गन्तुम् । | | verse_text = अवस्थितिर्नातिसुखाय मानुषे यतः सुराणामत एव गन्तुम् । | ||
| verse_lines = अवस्थितिर्नातिसुखाय मानुषे यतः सुराणामत एव गन्तुम् | | verse_lines = अवस्थितिर्नातिसुखाय मानुषे यतः सुराणामत एव गन्तुम् ।¦ऐच्छन्न तस्या हि बभूव मानुषो देहो नरोत्थो हि (तथा)तदाऽऽस शन्तनोः ॥ ३६॥ | ||
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| verse_text = तां पुत्रनिधनोद्युक्तां न्यवारयत शन्तनुः । | | verse_text = तां पुत्रनिधनोद्युक्तां न्यवारयत शन्तनुः । | ||
| verse_lines = तां पुत्रनिधनोद्युक्तां न्यवारयत शन्तनुः | | verse_lines = तां पुत्रनिधनोद्युक्तां न्यवारयत शन्तनुः ।¦काऽसि त्वं हेतुना केन हंसि पुत्रान् नृशंसवत् ॥ ३७॥ | ||
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| verse_text = रूपं सुरवरस्त्रीणां तव तेन न पापकम् (पातकम्)। | | verse_text = रूपं सुरवरस्त्रीणां तव तेन न पापकम् (पातकम्)। | ||
| verse_lines = रूपं सुरवरस्त्रीणां तव तेन न पापकम् (पातकम्) | | verse_lines = रूपं सुरवरस्त्रीणां तव तेन न पापकम् (पातकम्)।¦भवेत् कर्म त्वदीयं तन्महत् कारणमत्र हि ॥ ३८॥ | ||
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| verse_text = तत् कारणं वद शुभे यदि मच्छ्रोत्रमर्हति । | | verse_text = तत् कारणं वद शुभे यदि मच्छ्रोत्रमर्हति । | ||
| verse_lines = तत् कारणं वद शुभे यदि मच्छ्रोत्रमर्हति | | verse_lines = तत् कारणं वद शुभे यदि मच्छ्रोत्रमर्हति ।¦इतीरिताऽवदत् सर्वं प्रययौ च सुरापगा ॥ ३९॥ | ||
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| verse_lines = न धर्मो देवतानां हि ज्ञातवासश्चिरं नृषु | | verse_lines = न धर्मो देवतानां हि ज्ञातवासश्चिरं नृषु ।¦कारणादेव हि सुरा नृषु वासं प्रकुर्वते ।¦कारणापगमे यान्ति धर्मोऽप्येषां तथाविधः ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = अदृश्यत्वमसंस्पर्शो ह्यसम्भाषणमेव च । | | verse_text = अदृश्यत्वमसंस्पर्शो ह्यसम्भाषणमेव च । | ||
| verse_lines = अदृश्यत्वमसंस्पर्शो ह्यसम्भाषणमेव च | | verse_lines = अदृश्यत्वमसंस्पर्शो ह्यसम्भाषणमेव च ।¦सुरैरपि नृजातैस्तु गुह्यधर्मो दिवौकसाम् ॥ ४१॥ | ||
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| verse_lines = अतः सा वरुणं देवं पूर्वभर्तारमप्यमुम् | | verse_lines = अतः सा वरुणं देवं पूर्वभर्तारमप्यमुम् ।¦नृजातं शन्तनुं त्यक्त्वा प्रययौ वरुणालयम् ॥ ४२॥ | ||
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| verse_lines = सुतमष्टममादाय भर्तुरेवाप्यनुज्ञया | | verse_lines = सुतमष्टममादाय भर्तुरेवाप्यनुज्ञया ।¦वधोद्योगान्निवृत्ता सा ददौ पुत्रं बृहस्पतौ ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = देवव्रतोऽसावनुशासनाय मात्रा दत्तो देवगुरौ शतार्द्धम् । | | verse_text = देवव्रतोऽसावनुशासनाय मात्रा दत्तो देवगुरौ शतार्द्धम् । | ||
| verse_lines = देवव्रतोऽसावनुशासनाय मात्रा दत्तो देवगुरौ शतार्द्धम् | | verse_lines = देवव्रतोऽसावनुशासनाय मात्रा दत्तो देवगुरौ शतार्द्धम् ।¦संवत्सराणामखिलांश्च वेदान् समभ्यसत् तद्वशगान्तरात्मा ॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = ततश्च मात्रा जगतां गरीयस्यनन्तपारेऽखिलसद्गुणार्णवे । | | verse_text = ततश्च मात्रा जगतां गरीयस्यनन्तपारेऽखिलसद्गुणार्णवे । | ||
| verse_lines = ततश्च मात्रा जगतां गरीयस्यनन्तपारेऽखिलसद्गुणार्णवे | | verse_lines = ततश्च मात्रा जगतां गरीयस्यनन्तपारेऽखिलसद्गुणार्णवे ।¦रामे भृगूणामधिपे प्रदत्तः शुश्राव तत्त्वं च शतार्द्धवर्षम् ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = स पञ्चविंशत् पुनरब्दकानामस्त्राणि चाऽभ्यस्य पतेर्भृगूणाम् । | | verse_text = स पञ्चविंशत् पुनरब्दकानामस्त्राणि चाऽभ्यस्य पतेर्भृगूणाम् । | ||
| verse_lines = स पञ्चविंशत् पुनरब्दकानामस्त्राणि चाऽभ्यस्य पतेर्भृगूणाम् | | verse_lines = स पञ्चविंशत् पुनरब्दकानामस्त्राणि चाऽभ्यस्य पतेर्भृगूणाम् ।¦मात्रा समानीय निजे तटे तु संस्थापितः प्रार्पयितुं स्वपित्रे ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = स तत्र बद्ध्वा शरपञ्जरेण गङ्गां विजह्रेऽस्य पिता तदैव । | | verse_text = स तत्र बद्ध्वा शरपञ्जरेण गङ्गां विजह्रेऽस्य पिता तदैव । | ||
| verse_lines = स तत्र बद्ध्वा शरपञ्जरेण गङ्गां विजह्रेऽस्य पिता तदैव | | verse_lines = स तत्र बद्ध्वा शरपञ्जरेण गङ्गां विजह्रेऽस्य पिता तदैव ।¦व्रजन् मृगार्थी तृषितो विलोकयन् गङ्गामतोयामभवत् सुविस्मितः ॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = स मार्गयामास ततोऽस्य हेतुं ज्ञप्त्यै तदा स्वं च ददर्श सूनुम् । | | verse_text = स मार्गयामास ततोऽस्य हेतुं ज्ञप्त्यै तदा स्वं च ददर्श सूनुम् । | ||
| verse_lines = स मार्गयामास ततोऽस्य हेतुं ज्ञप्त्यै तदा स्वं च ददर्श सूनुम् | | verse_lines = स मार्गयामास ततोऽस्य हेतुं ज्ञप्त्यै तदा स्वं च ददर्श सूनुम् ।¦क्रीडन्तमस्त्रेण बभूव सोऽपि क्षणाददृश्यः पितृदर्शनादनु ॥ ४८॥ | ||
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| verse_lines = मीमांसमानं तमवाप गङ्गा सुतं समादाय पतिं जगाद च | | verse_lines = मीमांसमानं तमवाप गङ्गा सुतं समादाय पतिं जगाद च ।¦अयं सुतस्ते परमास्त्रवेत्ता समर्पितो वीर्यबलोपपन्नः ॥ ४९॥ | ||
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| verse_lines = अस्याग्रजाः स्वां स्थितिमेव याता हरेः पदाम्भोजसुपाविते जले | | verse_lines = अस्याग्रजाः स्वां स्थितिमेव याता हरेः पदाम्भोजसुपाविते जले ।¦तनूर्मदीये प्रणिधाय तत् त्वं तान् मा शुचोऽनेन च मोदमानः ॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = इति प्रदायामुमदृश्यतामगाद् गङ्गा तमादाय ययौ स्वकं गृहम् | | verse_lines = इति प्रदायामुमदृश्यतामगाद् गङ्गा तमादाय ययौ स्वकं गृहम् ।¦राजाऽभिषिच्याथ च यौवराज्ये मुमोद तत्सद्गुणतर्पितो भृशम् ॥ ५१॥ | ||
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| verse_text = पुनः स पित्राऽनुमतो बृहस्पतेरवाप वेदान् पुरुषायुषोऽर्द्धतः । | | verse_text = पुनः स पित्राऽनुमतो बृहस्पतेरवाप वेदान् पुरुषायुषोऽर्द्धतः । | ||
| verse_lines = पुनः स पित्राऽनुमतो बृहस्पतेरवाप वेदान् पुरुषायुषोऽर्द्धतः | | verse_lines = पुनः स पित्राऽनुमतो बृहस्पतेरवाप वेदान् पुरुषायुषोऽर्द्धतः ।¦रामात् तथाऽस्त्राणि पुनस्त्ववाप तावद्भिरब्दैस्त्रिशतैश्च तत्त्वम् ॥ ५२॥ | ||
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| verse_text = स सर्ववित्त्वं समवाप्य रामात् समस्तविद्याधिपतेर्गुणार्णवात् । | | verse_text = स सर्ववित्त्वं समवाप्य रामात् समस्तविद्याधिपतेर्गुणार्णवात् । | ||
| verse_lines = स सर्ववित्त्वं समवाप्य रामात् समस्तविद्याधिपतेर्गुणार्णवात् | | verse_lines = स सर्ववित्त्वं समवाप्य रामात् समस्तविद्याधिपतेर्गुणार्णवात् ।¦पितुं समीपं समवाप्य तं च शुश्रूषमाणः प्रमुमोद वीरः ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = तस्य प्रीतस्तदा विष्णुः सर्वलोकेश्वरेश्वरः | | verse_lines = तस्य प्रीतस्तदा विष्णुः सर्वलोकेश्वरेश्वरः ।¦प्रादादेष्यत्सप्तर्षित्वमायुः कल्पान्तमेव च ।¦स शन्तनुगृहे तिष्ठन् देवव्रतसखाऽभवत् ॥ ५८॥ | ||
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| verse_text = पुत्रवच्छन्तनोश्चाऽसीत् स च पुत्रवदेव तत् । | | verse_text = पुत्रवच्छन्तनोश्चाऽसीत् स च पुत्रवदेव तत् । | ||
| verse_lines = पुत्रवच्छन्तनोश्चाऽसीत् स च पुत्रवदेव तत् | | verse_lines = पुत्रवच्छन्तनोश्चाऽसीत् स च पुत्रवदेव तत् ।¦मिथुनं पालयामास स कृपोऽस्त्राण्यवाप च ॥ ५९॥ | ||
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| verse_text = सर्ववेदानधिजगौ सर्वशास्त्राणि कौशिकात् । | | verse_text = सर्ववेदानधिजगौ सर्वशास्त्राणि कौशिकात् । | ||
| verse_lines = सर्ववेदानधिजगौ सर्वशास्त्राणि कौशिकात् | | verse_lines = सर्ववेदानधिजगौ सर्वशास्त्राणि कौशिकात् ।¦तत्त्वज्ञानं तथा व्यासादाप्य सर्वज्ञतां गतः ॥ ६०॥ | ||
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| verse_text = यदा हि जातः स कृपस्तदैव बृहस्पतेः सूनुरगाच्च गङ्गाम् । | | verse_text = यदा हि जातः स कृपस्तदैव बृहस्पतेः सूनुरगाच्च गङ्गाम् । | ||
| verse_lines = यदा हि जातः स कृपस्तदैव बृहस्पतेः सूनुरगाच्च गङ्गाम् | | verse_lines = यदा हि जातः स कृपस्तदैव बृहस्पतेः सूनुरगाच्च गङ्गाम् ।¦स्नातुं घृताचीं स ददर्श तत्र श्लथद्दुकूलां सुरवर्यकामिनीम् ॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = तद्दर्शनात् स्कन्नमथेन्द्रियं स द्रोणे दधाराऽशु ततोऽभवत् स्वयम् । | | verse_text = तद्दर्शनात् स्कन्नमथेन्द्रियं स द्रोणे दधाराऽशु ततोऽभवत् स्वयम् । | ||
| verse_lines = तद्दर्शनात् स्कन्नमथेन्द्रियं स द्रोणे दधाराऽशु ततोऽभवत् स्वयम् | | verse_lines = तद्दर्शनात् स्कन्नमथेन्द्रियं स द्रोणे दधाराऽशु ततोऽभवत् स्वयम् ।¦अम्भोजजावेशयुतो बृहस्पतिः कर्तुं हरेः कर्म भुवो भरोद्धृतौ ॥ ६२॥ | ||
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| verse_text = द्रोणेतिनामास्य चकार तातो मुनिर्भरद्वाज उतास्य वेदान् । | | verse_text = द्रोणेतिनामास्य चकार तातो मुनिर्भरद्वाज उतास्य वेदान् । | ||
| verse_lines = द्रोणेतिनामास्य चकार तातो मुनिर्भरद्वाज उतास्य वेदान् | | verse_lines = द्रोणेतिनामास्य चकार तातो मुनिर्भरद्वाज उतास्य वेदान् ।¦अध्यापयामास सशास्त्रसङ्घान् सर्वज्ञतामाप च सोऽचिरेण ॥ ६३॥ | ||
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| verse_text = काले च तस्मिन् पृषतोऽनपत्यो वने तु पाञ्चालपतिश्चचार । | | verse_text = काले च तस्मिन् पृषतोऽनपत्यो वने तु पाञ्चालपतिश्चचार । | ||
| verse_lines = काले च तस्मिन् पृषतोऽनपत्यो वने तु पाञ्चालपतिश्चचार | | verse_lines = काले च तस्मिन् पृषतोऽनपत्यो वने तु पाञ्चालपतिश्चचार ।¦तपो महत् तस्य तथा वराप्सरावलोकनात् स्कन्दितमाशु रेतः ॥ ६४॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = स तद् विलज्जावशतः पदेन समाक्रमत् तस्य बभूव सूनुः । | | verse_text = स तद् विलज्जावशतः पदेन समाक्रमत् तस्य बभूव सूनुः । | ||
| verse_lines = स तद् विलज्जावशतः पदेन समाक्रमत् तस्य बभूव सूनुः | | verse_lines = स तद् विलज्जावशतः पदेन समाक्रमत् तस्य बभूव सूनुः ।¦हूहूस्तु तु नाम्ना स विरिञ्चगायको नाम्नाऽऽवहो यो मरुतां तदंशयुक् ॥ ६५॥ | ||
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| verse_text = स द्रोणतातात् समवाप वेदानस्त्राणि विद्याश्च तथा समस्ताः । | | verse_text = स द्रोणतातात् समवाप वेदानस्त्राणि विद्याश्च तथा समस्ताः । | ||
| verse_lines = स द्रोणतातात् समवाप वेदानस्त्राणि विद्याश्च तथा समस्ताः | | verse_lines = स द्रोणतातात् समवाप वेदानस्त्राणि विद्याश्च तथा समस्ताः ।¦द्रोणेन युक्तः स तदा गुरोः सुतं सहैव नौ राज्यमिति ह्यवादीत् ॥ ६६॥ | ||
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| verse_text = पदे द्रुतत्वाद् द्रुपदाभिधेयः स राज्यमापाथ निजां कृपीं सः । | | verse_text = पदे द्रुतत्वाद् द्रुपदाभिधेयः स राज्यमापाथ निजां कृपीं सः । | ||
| verse_lines = पदे द्रुतत्वाद् द्रुपदाभिधेयः स राज्यमापाथ निजां कृपीं सः | | verse_lines = पदे द्रुतत्वाद् द्रुपदाभिधेयः स राज्यमापाथ निजां कृपीं सः ।¦द्रोणोऽपि भार्यां समवाप्य सर्वप्रतिग्रहोज्झश्च पुरेऽवसत् सुखी ॥ ६७॥ | ||
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| verse_text = सिलोञ्छवृत्त्यैव हि वर्तयन् स धर्मं महान्तं विरजं जुषाणः । | | verse_text = सिलोञ्छवृत्त्यैव हि वर्तयन् स धर्मं महान्तं विरजं जुषाणः । | ||
| verse_lines = सिलोञ्छवृत्त्यैव हि वर्तयन् स धर्मं महान्तं विरजं जुषाणः | | verse_lines = सिलोञ्छवृत्त्यैव हि वर्तयन् स धर्मं महान्तं विरजं जुषाणः ।¦उवास नागाख्यपुरे सखा स देवव्रतस्याथ कृपस्य चैव ॥ ६८॥ | ||
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| verse_text = तेषां समानो वयसा विराटस्त्वभूद्धहा नाम विधातृगायकः । | | verse_text = तेषां समानो वयसा विराटस्त्वभूद्धहा नाम विधातृगायकः । | ||
| verse_lines = तेषां समानो वयसा विराटस्त्वभूद्धहा नाम विधातृगायकः | | verse_lines = तेषां समानो वयसा विराटस्त्वभूद्धहा नाम विधातृगायकः ।¦मरुत्सु यो विवहो नाम तस्याप्यंशेन युक्तो निजधर्मवर्ती ॥ ६९॥ | ||
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| verse_text = ततः कदाचिन्मृगयां गतः स ददर्श कन्याप्रवरां तु शन्तनुः । | | verse_text = ततः कदाचिन्मृगयां गतः स ददर्श कन्याप्रवरां तु शन्तनुः । | ||
| verse_lines = ततः कदाचिन्मृगयां गतः स ददर्श कन्याप्रवरां तु शन्तनुः | | verse_lines = ततः कदाचिन्मृगयां गतः स ददर्श कन्याप्रवरां तु शन्तनुः ।¦या पूर्वसर्गे पितृपुत्रिका सती चचार विष्णोस्तप उत्तमं चिरम् ॥ ७०॥ | ||
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| verse_text = यस्यै वरं विष्णुरदात् पुराऽहं सुतस्तव स्यामिति या वसोः सुता । | | verse_text = यस्यै वरं विष्णुरदात् पुराऽहं सुतस्तव स्यामिति या वसोः सुता । | ||
| verse_lines = यस्यै वरं विष्णुरदात् पुराऽहं सुतस्तव स्यामिति या वसोः सुता | | verse_lines = यस्यै वरं विष्णुरदात् पुराऽहं सुतस्तव स्यामिति या वसोः सुता ।¦जाता पुनर्दाशगृहे विवर्द्धिता व्यासात्मना विष्णुरभूच्च यस्याम् ॥ ७१॥ | ||
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| verse_text = तद्दर्शनान्नृपतिर्जातहृच्छ्रयो(च्छयः) वव्रे प्रदानाय च दाशराजम् । | | verse_text = तद्दर्शनान्नृपतिर्जातहृच्छ्रयो(च्छयः) वव्रे प्रदानाय च दाशराजम् । | ||
| verse_lines = तद्दर्शनान्नृपतिर्जातहृच्छ्रयो(च्छयः) वव्रे प्रदानाय च दाशराजम् | | verse_lines = तद्दर्शनान्नृपतिर्जातहृच्छ्रयो(च्छयः) वव्रे प्रदानाय च दाशराजम् ।¦ऋते स तस्यास्तनयस्य राज्यं नैच्छद् दातुं तामथाऽयाद् गृहं स्वम् ॥ ७२॥ | ||
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| verse_text = तच्चिन्तया म्लानमुखं(ग्लानमुखं) जनित्रं दृष्ट्वैव देवव्रत आश्वपृच्छत् । | | verse_text = तच्चिन्तया म्लानमुखं(ग्लानमुखं) जनित्रं दृष्ट्वैव देवव्रत आश्वपृच्छत् । | ||
| verse_lines = तच्चिन्तया म्लानमुखं(ग्लानमुखं) जनित्रं दृष्ट्वैव देवव्रत आश्वपृच्छत् | | verse_lines = तच्चिन्तया म्लानमुखं(ग्लानमुखं) जनित्रं दृष्ट्वैव देवव्रत आश्वपृच्छत् ।¦तत्कारणं सारथिमस्य तस्माच्छ्रुत्वाऽखिलं दाशगृहं जगाम ॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = स तस्य विश्वासकृते प्रतिज्ञां चकार नाहं करवाणि राज्यम् । | | verse_text = स तस्य विश्वासकृते प्रतिज्ञां चकार नाहं करवाणि राज्यम् । | ||
| verse_lines = स तस्य विश्वासकृते प्रतिज्ञां चकार नाहं करवाणि राज्यम् | | verse_lines = स तस्य विश्वासकृते प्रतिज्ञां चकार नाहं करवाणि राज्यम् ।¦तथैव मे सन्ततितो भयं ते व्यैतूर्ध्वरेताः सततं भवानि ॥ ७४॥ | ||
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| verse_text = भीमव्रतत्वाद्धि तदाऽस्य नाम कृत्वा देवा भीष्म इति ह्यचीक्लृपन् । | | verse_text = भीमव्रतत्वाद्धि तदाऽस्य नाम कृत्वा देवा भीष्म इति ह्यचीक्लृपन् । | ||
| verse_lines = भीमव्रतत्वाद्धि तदाऽस्य नाम कृत्वा देवा भीष्म इति ह्यचीक्लृपन् | | verse_lines = भीमव्रतत्वाद्धि तदाऽस्य नाम कृत्वा देवा भीष्म इति ह्यचीक्लृपन् ।¦प्रसूनवृष्टिं स च दाशदत्तां कालीं समादाय पितुः समर्पयत् ॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = ज्ञात्वा तु तां राजपुत्रीं गुणाढ्यां सत्यस्य विष्णोर्मातरं नामतस्तत् । | | verse_text = ज्ञात्वा तु तां राजपुत्रीं गुणाढ्यां सत्यस्य विष्णोर्मातरं नामतस्तत् । | ||
| verse_lines = ज्ञात्वा तु तां राजपुत्रीं गुणाढ्यां सत्यस्य विष्णोर्मातरं नामतस्तत् | | verse_lines = ज्ञात्वा तु तां राजपुत्रीं गुणाढ्यां सत्यस्य विष्णोर्मातरं नामतस्तत् ।¦लोके प्रसिद्धां सत्यवतीत्युदारां विवाहयामास पितुः स भीष्मः ॥ ७६॥ | ||
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| verse_text = प्रायः सतां न मनः पापमार्गे गच्छेदिति ह्यात्ममनश्च सक्तम् । | | verse_text = प्रायः सतां न मनः पापमार्गे गच्छेदिति ह्यात्ममनश्च सक्तम् । | ||
| verse_lines = प्रायः सतां न मनः पापमार्गे गच्छेदिति ह्यात्ममनश्च सक्तम् | | verse_lines = प्रायः सतां न मनः पापमार्गे गच्छेदिति ह्यात्ममनश्च सक्तम् ।¦ज्ञात्वाऽपि तां दाशगृहे विवर्द्धितां जग्राह सद्धर्मरतश्च शन्तनुः ॥ ७७॥ | ||
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| verse_lines = स्वच्छन्दमृत्युत्ववरं प्रदाय तथाऽप्यजेयत्वमधृष्यतां च | | verse_lines = स्वच्छन्दमृत्युत्ववरं प्रदाय तथाऽप्यजेयत्वमधृष्यतां च ।¦युद्धेषु भीष्मस्य नृपोत्तमः स रेमे तयैवाब्दगणान् बहूंश्च ॥ ७८॥ | ||
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| verse_lines = लेभे स चित्राङ्गदमत्र पुत्रं तथा द्वितीयं च विचित्रवीर्यम् | | verse_lines = लेभे स चित्राङ्गदमत्र पुत्रं तथा द्वितीयं च विचित्रवीर्यम् ।¦तयोश्च बाल्ये व्यसृजच्छरीरं जीर्णेन देहेन हि किं ममेति ॥ ७९॥ | ||
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| verse_lines = स्वेच्छया वरुणत्वं स प्राप नानिच्छया तनुः | | verse_lines = स्वेच्छया वरुणत्वं स प्राप नानिच्छया तनुः ।¦तस्मिन् काले त्यज्यते हि बलवद्भिर्वधं विना ॥ ८०॥ | ||
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| verse_text = अतिसक्तास्तपोहीनाः कथञ्चिन्मृतिमाप्नुयुः । | | verse_text = अतिसक्तास्तपोहीनाः कथञ्चिन्मृतिमाप्नुयुः । | ||
| verse_lines = अतिसक्तास्तपोहीनाः कथञ्चिन्मृतिमाप्नुयुः | | verse_lines = अतिसक्तास्तपोहीनाः कथञ्चिन्मृतिमाप्नुयुः ।¦अनिच्छयाऽपि हि यथा मृतश्चित्राङ्गदानुजः ॥ ८१॥ | ||
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| verse_lines = अथौर्ध्वदैहिकं कृत्वा पितुर्भीष्मोऽभ्यषेचयत् | | verse_lines = अथौर्ध्वदैहिकं कृत्वा पितुर्भीष्मोऽभ्यषेचयत् ।¦राज्ये चित्राङ्गदं वीरं यौवराज्येऽस्य चानुजम् ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = चित्राङ्गदेन निहतो नाम स्वं त्वपरित्यजन् | | verse_lines = चित्राङ्गदेन निहतो नाम स्वं त्वपरित्यजन् ।¦चित्राङ्गदोऽकृतोद्वाहो गन्धर्वेण महारणे ।¦विचित्रवीर्यं राजानं कृत्वा भीष्मोऽन्वपालयत् ॥ ८३॥ | ||
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| verse_lines = अथ काशिसुतास्तिस्रस्तदर्थं भीष्म आहरत् | | verse_lines = अथ काशिसुतास्तिस्रस्तदर्थं भीष्म आहरत् ।¦अम्बामप्यम्बिकानाम्नीं तथैवाम्बालिकां पराम् ॥ ८४॥ | ||
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| verse_lines = पाणिग्रहणकाले तु ब्रह्मदत्तस्य वीर्यवान् | | verse_lines = पाणिग्रहणकाले तु ब्रह्मदत्तस्य वीर्यवान् ।¦विजित्य तं साल्वराजं समेतान् क्षत्रियानपि ॥ ८५॥ | ||
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| verse_lines = तेनापि सम्परित्यक्ता परामृष्टेति सा पुनः | | verse_lines = तेनापि सम्परित्यक्ता परामृष्टेति सा पुनः ।¦भीष्ममाप स नागृह्णात् प्रययौ साऽपि भार्गवम् ॥ ८८॥ | ||
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| verse_lines = अनन्तशक्तिरपि स न भीष्मं निजघान ह | | verse_lines = अनन्तशक्तिरपि स न भीष्मं निजघान ह ।¦नचाम्बां ग्राहयामास भीष्मकारुण्ययन्त्रितः ॥ ९०॥ | ||
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| verse_text = अनन्तरं शिखण्डित्वात् तदा सा शाङ्करं तपः । | | verse_text = अनन्तरं शिखण्डित्वात् तदा सा शाङ्करं तपः । | ||
| verse_lines = अनन्तरं शिखण्डित्वात् तदा सा शाङ्करं तपः | | verse_lines = अनन्तरं शिखण्डित्वात् तदा सा शाङ्करं तपः ।¦भीष्मस्य निधनार्थाय पुंस्त्वार्थं च चकार ह ॥ ९५॥ | ||
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| verse_text = भीष्मो यथा त्वां गृह्णीयात् तथा कुर्यामितीरितम् । | | verse_text = भीष्मो यथा त्वां गृह्णीयात् तथा कुर्यामितीरितम् । | ||
| verse_lines = भीष्मो यथा त्वां गृह्णीयात् तथा कुर्यामितीरितम् | | verse_lines = भीष्मो यथा त्वां गृह्णीयात् तथा कुर्यामितीरितम् ।¦रामेण सत्यं तच्चक्रे भीष्मे देहान्तरं गते ॥ ९६॥ | ||
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| verse_text = रुद्रस्तु तस्यास्तपसा तुष्टः प्रादाद् वरं तदा । | | verse_text = रुद्रस्तु तस्यास्तपसा तुष्टः प्रादाद् वरं तदा । | ||
| verse_lines = रुद्रस्तु तस्यास्तपसा तुष्टः प्रादाद् वरं तदा | | verse_lines = रुद्रस्तु तस्यास्तपसा तुष्टः प्रादाद् वरं तदा ।¦भीष्मस्य मृतिहेतुत्वं कालात् पुन्देहसम्भवम् ॥ ९७॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = मालां च य इमां मालां गृह्णीयात् स हनिष्यति । | | verse_text = मालां च य इमां मालां गृह्णीयात् स हनिष्यति । | ||
| verse_lines = मालां च य इमां मालां गृह्णीयात् स हनिष्यति | | verse_lines = मालां च य इमां मालां गृह्णीयात् स हनिष्यति ।¦भीष्ममित्येव तां मालां गृहीत्वा सा नृपान् ययौ ॥ ९८॥ | ||
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| verse_text = तां न भीष्मभयात् केऽपि जगृहुस्तां हि सा ततः । | | verse_text = तां न भीष्मभयात् केऽपि जगृहुस्तां हि सा ततः । | ||
| verse_lines = तां न भीष्मभयात् केऽपि जगृहुस्तां हि सा ततः | | verse_lines = तां न भीष्मभयात् केऽपि जगृहुस्तां हि सा ततः ।¦द्रुपदस्य गृहद्वारि न्यस्य योगात् तनुं जहौ ॥ ९९॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = एतस्मिन्नेव काले तु सुतार्थं द्रुपदस्तपः । | | verse_text = एतस्मिन्नेव काले तु सुतार्थं द्रुपदस्तपः । | ||
| verse_lines = एतस्मिन्नेव काले तु सुतार्थं द्रुपदस्तपः | | verse_lines = एतस्मिन्नेव काले तु सुतार्थं द्रुपदस्तपः ।¦चकार शम्भवे चैनं सोऽब्रवीत् कन्यका तव ॥ १००॥ | ||
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| verse_text = भूत्वा भविष्यति पुमानिति साम्बा ततोऽजनि । | | verse_text = भूत्वा भविष्यति पुमानिति साम्बा ततोऽजनि । | ||
| verse_lines = भूत्वा भविष्यति पुमानिति साम्बा ततोऽजनि | | verse_lines = भूत्वा भविष्यति पुमानिति साम्बा ततोऽजनि ।¦नाम्ना शिखण्डिनी तस्याः पुंवत् कर्माणि चाकरोत् ॥ १०१॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = तस्यै पाञ्चालराजः स दशार्णाधिपतेः सुताम् । | | verse_text = तस्यै पाञ्चालराजः स दशार्णाधिपतेः सुताम् । | ||
| verse_lines = तस्यै पाञ्चालराजः स दशार्णाधिपतेः सुताम् | | verse_lines = तस्यै पाञ्चालराजः स दशार्णाधिपतेः सुताम् ।¦उद्वाहयामास सा तां पुंवेषेणैव गूहिताम् ।¦अन्यत्र मातापित्रोस्तु न विज्ञातां बुबोध ह ॥ १०२॥ | ||
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| verse_text = धात्र्यै न्यवेदयत् साऽथ तत्पित्रे सा न्यवेदयत् । | | verse_text = धात्र्यै न्यवेदयत् साऽथ तत्पित्रे सा न्यवेदयत् । | ||
| verse_lines = धात्र्यै न्यवेदयत् साऽथ तत्पित्रे सा न्यवेदयत् | | verse_lines = धात्र्यै न्यवेदयत् साऽथ तत्पित्रे सा न्यवेदयत् ।¦स क्रुद्धः प्रेषयामास निहन्मि त्वां सबान्धवम् ।¦इति पाञ्चालराजाय निर्जगाम च सेनया ॥ १०३॥ | ||
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| verse_text = विश्वस्य वाक्यं रुद्रस्य पुमानेवेति पार्षतः । | | verse_text = विश्वस्य वाक्यं रुद्रस्य पुमानेवेति पार्षतः । | ||
| verse_lines = विश्वस्य वाक्यं रुद्रस्य पुमानेवेति पार्षतः | | verse_lines = विश्वस्य वाक्यं रुद्रस्य पुमानेवेति पार्षतः ।¦प्रेषयामास धिग् बुद्धिर्भिन्ना ते बालवाक्यतः ।¦अपरीक्षकस्य ते राष्ट्रं कथमित्येव नर्मकृत् ॥ १०४॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = अथ भार्यासमेतं तं पितरं चिन्तयाऽऽकुलम् । | | verse_text = अथ भार्यासमेतं तं पितरं चिन्तयाऽऽकुलम् । | ||
| verse_lines = अथ भार्यासमेतं तं पितरं चिन्तयाऽऽकुलम् | | verse_lines = अथ भार्यासमेतं तं पितरं चिन्तयाऽऽकुलम् ।¦दृष्ट्वा शिखण्डिनी दुःखान्मन्निमित्तान्न नश्यतु ॥ १०५॥ | ||
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| verse_lines = इति मत्वा वनायैव ययौ तत्र च तुम्बुरुः | | verse_lines = इति मत्वा वनायैव ययौ तत्र च तुम्बुरुः ।¦स्थूणाकर्णाभिधेयस्तामपश्यद् दृढकर्णतः ॥ १०६॥ | ||
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| verse_text = स तस्या अखिलं श्रुत्वा कृपां चक्रे महामनाः । | | verse_text = स तस्या अखिलं श्रुत्वा कृपां चक्रे महामनाः । | ||
| verse_lines = स तस्या अखिलं श्रुत्वा कृपां चक्रे महामनाः | | verse_lines = स तस्या अखिलं श्रुत्वा कृपां चक्रे महामनाः ।¦स तस्यै स्वं वपुः प्रादात् तदीयं जगृहे तथा ।¦अंशेन पुंस्वभावार्थं पूर्वदेहे समास्थितः ॥ १०७॥ | ||
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| verse_lines = पुंसां स्त्रीत्वं भवेत् क्वापि तथाऽप्यन्ते पुमान् भवेत् | | verse_lines = पुंसां स्त्रीत्वं भवेत् क्वापि तथाऽप्यन्ते पुमान् भवेत् ।¦स्त्रीणां नैव हि पुंस्त्वं स्याद् बलवत्कारणैरपि ॥ १०८॥ | ||
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| verse_text = अतः शिववरेऽप्येषां जज्ञे योषैव नान्यथा । | | verse_text = अतः शिववरेऽप्येषां जज्ञे योषैव नान्यथा । | ||
| verse_lines = अतः शिववरेऽप्येषां जज्ञे योषैव नान्यथा | | verse_lines = अतः शिववरेऽप्येषां जज्ञे योषैव नान्यथा ।¦पश्चात् पुन्देहमपि सा प्रविवेशैव पुंयुतम् ॥ १०९॥ | ||
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| verse_text = नास्या देहः पुंस्त्वमाप नच पुंसाऽनधिष्ठिते । | | verse_text = नास्या देहः पुंस्त्वमाप नच पुंसाऽनधिष्ठिते । | ||
| verse_lines = नास्या देहः पुंस्त्वमाप नच पुंसाऽनधिष्ठिते | | verse_lines = नास्या देहः पुंस्त्वमाप नच पुंसाऽनधिष्ठिते ।¦पुंदेहे न्यवसत् साऽथ गन्धर्वेण त्वधिष्ठितम् ।¦गान्धर्वं देहमाविश्य स्वकीयं भवनं ययौ ॥ ११०॥ | ||
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| verse_lines = तस्यास्तद्देहसादृश्यं गन्धर्वस्य प्रसादतः | | verse_lines = तस्यास्तद्देहसादृश्यं गन्धर्वस्य प्रसादतः ।¦प्राप गन्धर्वदेहोऽपि तया पश्चादधिष्ठितः ॥ १११॥ | ||
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| verse_lines = श्वो देहि मम देहं मे स्वं च देहं समाविश | | verse_lines = श्वो देहि मम देहं मे स्वं च देहं समाविश ।¦इत्युक्त्वा स तु गन्धर्वः कन्यादेहं समास्थितः ।¦उवासैव वने तस्मिन् धनदस्तत्र चाऽगमत् ॥ ११२॥ | ||
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| verse_lines = अप्रत्युत्थायिनं तन्तुलीयमानं विलज्जया | | verse_lines = अप्रत्युत्थायिनं तन्तुलीयमानं विलज्जया ।¦शशाप धनदो देवश्चिरमित्थं भवेति तम् ॥ ११३॥ | ||
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| verse_lines = यदा युद्धे मृतिं याति सा कन्या पुन्तनुस्थिता | | verse_lines = यदा युद्धे मृतिं याति सा कन्या पुन्तनुस्थिता ।¦तदा पुंस्त्वं पुनर्यासि चपलत्वादितीरितः ॥ ११४॥ | ||
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| verse_lines = तथाऽवसत् स गन्धर्वः कन्या पित्रोरशेषतः | | verse_lines = तथाऽवसत् स गन्धर्वः कन्या पित्रोरशेषतः ।¦कथयामासानुभूतं तौ भृशं मुदमापतुः ॥ ११५॥ | ||
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| verse_lines = परीक्ष्य तामुपायैश्च श्वशुरो लज्जितो ययौ | | verse_lines = परीक्ष्य तामुपायैश्च श्वशुरो लज्जितो ययौ ।¦श्वोभूते सा तु गन्धर्वं प्राप्य तद्वचनात् पुनः ॥ ११६॥ | ||
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| verse_lines = ययौ तेनैव देहेन पुंस्त्वमेव समाश्रिता | | verse_lines = ययौ तेनैव देहेन पुंस्त्वमेव समाश्रिता ।¦स शिखण्डी नामतोऽभूदस्त्रशस्त्रप्रतापवान् ॥ ११७॥ | ||
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| verse_lines = विचित्रवीर्यः प्रमदाद्वयं तत् सम्प्राप्य रेमेऽब्दगणान् सुसक्तः | | verse_lines = विचित्रवीर्यः प्रमदाद्वयं तत् सम्प्राप्य रेमेऽब्दगणान् सुसक्तः ।¦तत्याज देहं च स यक्ष्मणाऽर्दितस्ततोऽस्य माताऽस्मरदाशु कृष्णम् ॥ ११८॥ | ||
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| verse_lines = आविर्बभूवाऽशु जगज्जनित्रो जनार्दनो जन्मजराभयापहः | | verse_lines = आविर्बभूवाऽशु जगज्जनित्रो जनार्दनो जन्मजराभयापहः ।¦समस्तविज्ञानतनुः सुखार्णवः सम्पूजयामास च तं जनित्री ॥ ११९॥ | ||
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| verse_lines = तं भीष्मपूर्वैः परमादरार्चितं स्वभिष्टुतं चावददस्य माता | | verse_lines = तं भीष्मपूर्वैः परमादरार्चितं स्वभिष्टुतं चावददस्य माता ।¦पुत्रौ मृतौ मे नतु राज्यमैच्छद् भीष्मो मया नितरामर्थितोऽपि ॥ १२०॥ | ||
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| verse_lines = क्षेत्रे ततो भ्रातुरपत्यमुत्तममुत्पादयास्मत्परमादरार्थितः | | verse_lines = क्षेत्रे ततो भ्रातुरपत्यमुत्तममुत्पादयास्मत्परमादरार्थितः ।¦इतीरितः प्रणतश्चाप्यभिष्टुतो भीष्मादिभिश्चाऽह जगद्गुरुर्वचः ॥ १२१॥ | ||
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| verse_lines = ऋते रमां जातु (ममाङ्गयोगयोग्या)ममाङ्गसङ्गयोग्याऽङ्गना नैव सुरालयेऽपि | | verse_lines = ऋते रमां जातु (ममाङ्गयोगयोग्या)ममाङ्गसङ्गयोग्याऽङ्गना नैव सुरालयेऽपि ।¦तथाऽपि ते वाक्यमहं करिष्ये सांवत्सरं सा चरतु व्रतं मे ॥ १२२॥ | ||
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| verse_lines = सा पूतदेहाऽथ च वैष्णवव्रतान्मत्तः समाप्नोतु सुतं वरिष्ठम् | | verse_lines = सा पूतदेहाऽथ च वैष्णवव्रतान्मत्तः समाप्नोतु सुतं वरिष्ठम् ।¦इतीरिते राष्ट्रमुपैति नाशमिति ब्रुवन्तीं पुनराह वाक्यम् ॥ १२३॥ | ||
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| verse_lines = सौम्यस्वरूपोऽप्यतिभीषणं मृषा तच्चक्षुषो रूपमहं प्रदर्शये | | verse_lines = सौम्यस्वरूपोऽप्यतिभीषणं मृषा तच्चक्षुषो रूपमहं प्रदर्शये ।¦सहेत सा तद् यदि पुत्रकोऽस्या भवेद् गुणाढ्यो बलवीर्ययुक्तः ॥ १२४॥ | ||
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| verse_text = उक्त्वेति कृष्णं पुनरेव च स्नुषामाह त्वयाऽक्ष्णोर्हि निमीलनं पुरा । | | verse_text = उक्त्वेति कृष्णं पुनरेव च स्नुषामाह त्वयाऽक्ष्णोर्हि निमीलनं पुरा । | ||
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| verse_text = इतीरिताऽप्यस्य हि मायया सा भीता भुजिष्यां कुमतिर्न्ययोजयत् । | | verse_text = इतीरिताऽप्यस्य हि मायया सा भीता भुजिष्यां कुमतिर्न्ययोजयत् । | ||
| verse_lines = इतीरिताऽप्यस्य हि मायया सा भीता भुजिष्यां कुमतिर्न्ययोजयत् | | verse_lines = इतीरिताऽप्यस्य हि मायया सा भीता भुजिष्यां कुमतिर्न्ययोजयत् ।¦सा तं परानन्दतनुं गुणार्णवं सम्प्राप्य भक्त्या परयैव रेमे ॥ १३१॥ | ||
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| verse_text = तस्यां स देवोऽजनि धर्मराजो माण्डव्यशापाद् य उवाह शूद्रताम् । | | verse_text = तस्यां स देवोऽजनि धर्मराजो माण्डव्यशापाद् य उवाह शूद्रताम् । | ||
| verse_lines = तस्यां स देवोऽजनि धर्मराजो माण्डव्यशापाद् य उवाह शूद्रताम् | | verse_lines = तस्यां स देवोऽजनि धर्मराजो माण्डव्यशापाद् य उवाह शूद्रताम् ।¦वसिष्ठसाम्यं समभीप्समानं प्रच्यावयन्निच्छया शापमाप ॥ १३२॥ | ||
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| verse_text = अयोग्यसम्प्राप्तिकृतप्रयत्नदोषात् समारोपितमेव शूले । | | verse_text = अयोग्यसम्प्राप्तिकृतप्रयत्नदोषात् समारोपितमेव शूले । | ||
| verse_lines = अयोग्यसम्प्राप्तिकृतप्रयत्नदोषात् समारोपितमेव शूले | | verse_lines = अयोग्यसम्प्राप्तिकृतप्रयत्नदोषात् समारोपितमेव शूले ।¦चोरैर्हृतेऽर्थेऽपितु चोरबुद्ध्या मक्षीवधादित्यवदद् यमस्तम् ॥ १३३॥ | ||
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| verse_text = नासत्यता तस्य च तत्र हेतुतः शापं गृहीतुं स तथैव चोक्त्वा । | | verse_text = नासत्यता तस्य च तत्र हेतुतः शापं गृहीतुं स तथैव चोक्त्वा । | ||
| verse_lines = नासत्यता तस्य च तत्र हेतुतः शापं गृहीतुं स तथैव चोक्त्वा | | verse_lines = नासत्यता तस्य च तत्र हेतुतः शापं गृहीतुं स तथैव चोक्त्वा ।¦अवाप शूद्रत्वमथास्य नाम चक्रे कृष्णः सर्ववित्त्वं तथाऽदात् ॥ १३४॥ | ||
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| verse_text = विद्यारतेर्विदुरो नाम चायं भविष्यति ज्ञानबलोपपन्नः । | | verse_text = विद्यारतेर्विदुरो नाम चायं भविष्यति ज्ञानबलोपपन्नः । | ||
| verse_lines = विद्यारतेर्विदुरो नाम चायं भविष्यति ज्ञानबलोपपन्नः | | verse_lines = विद्यारतेर्विदुरो नाम चायं भविष्यति ज्ञानबलोपपन्नः ।¦महाधनुर्बाहुबलाधिकश्च सुनीतिमानित्यवदत् स कृष्णः ॥ १३५॥ | ||
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| verse_text = ज्ञात्वाऽस्य शूद्रत्वमथास्य माता पुनश्च कृष्णं प्रणता ययाचे । | | verse_text = ज्ञात्वाऽस्य शूद्रत्वमथास्य माता पुनश्च कृष्णं प्रणता ययाचे । | ||
| verse_lines = ज्ञात्वाऽस्य शूद्रत्वमथास्य माता पुनश्च कृष्णं प्रणता ययाचे | | verse_lines = ज्ञात्वाऽस्य शूद्रत्वमथास्य माता पुनश्च कृष्णं प्रणता ययाचे ।¦अम्बालिकायां जनयान्यमित्यथो नैच्छत् स कृष्णोऽभवदप्यदृश्यः ॥ १३६॥ | ||
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| verse_text = योग्यानि कर्माणि ततस्तु तेषां चकार भीष्मो मुनिभिर्यथावत् । | | verse_text = योग्यानि कर्माणि ततस्तु तेषां चकार भीष्मो मुनिभिर्यथावत् । | ||
| verse_lines = योग्यानि कर्माणि ततस्तु तेषां चकार भीष्मो मुनिभिर्यथावत् | | verse_lines = योग्यानि कर्माणि ततस्तु तेषां चकार भीष्मो मुनिभिर्यथावत् ।¦विद्याः समस्ता अददाच्च कृष्णस्तेषां पाण्डोरस्त्रशस्त्राणि भीष्मः ॥ १३७॥ | ||
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| verse_text = ते सर्वविद्याप्रवरा बभूवुर्विशेषतो विदुरः सर्ववेत्ता । | | verse_text = ते सर्वविद्याप्रवरा बभूवुर्विशेषतो विदुरः सर्ववेत्ता । | ||
| verse_lines = ते सर्वविद्याप्रवरा बभूवुर्विशेषतो विदुरः सर्ववेत्ता | | verse_lines = ते सर्वविद्याप्रवरा बभूवुर्विशेषतो विदुरः सर्ववेत्ता ।¦पाण्डुः समस्तास्त्रविदेकवीरो जिगाय पृथ्वीमखिलां धनुर्धरः ॥ १३८॥ | ||
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| verse_text = गवद्गणादास तथैव सूतात् समस्तगन्धर्वपतिः स तुम्बुरुः । | | verse_text = गवद्गणादास तथैव सूतात् समस्तगन्धर्वपतिः स तुम्बुरुः । | ||
| verse_lines = गवद्गणादास तथैव सूतात् समस्तगन्धर्वपतिः स तुम्बुरुः | | verse_lines = गवद्गणादास तथैव सूतात् समस्तगन्धर्वपतिः स तुम्बुरुः ।¦य उद्वहो नाम मरुत् तदंशयुक्तो वशी सञ्जयनामधेयः ॥ १३९॥ | ||
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| verse_text = विचित्रवीर्यस्य स सूतपुत्रः सखा च तेषामभवत् प्रियश्च । | | verse_text = विचित्रवीर्यस्य स सूतपुत्रः सखा च तेषामभवत् प्रियश्च । | ||
| verse_lines = विचित्रवीर्यस्य स सूतपुत्रः सखा च तेषामभवत् प्रियश्च | | verse_lines = विचित्रवीर्यस्य स सूतपुत्रः सखा च तेषामभवत् प्रियश्च ।¦समस्तविन्मतिमान् व्यासशिष्यो विशेषतो धृतराष्ट्रानुवर्ती ॥ १४०॥ | ||
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| verse_text = गान्धारराजस्य सुतामुवाह गान्धारिनाम्नीं सुबलस्य राजा । | | verse_text = गान्धारराजस्य सुतामुवाह गान्धारिनाम्नीं सुबलस्य राजा । | ||
| verse_lines = गान्धारराजस्य सुतामुवाह गान्धारिनाम्नीं सुबलस्य राजा | | verse_lines = गान्धारराजस्य सुतामुवाह गान्धारिनाम्नीं सुबलस्य राजा ।¦ज्येष्ठो ज्येष्ठां शकुनेर्द्वापरस्य नास्तिक्यरूपस्य कुकर्महेतोः ॥ १४१॥ | ||
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| verse_text = शूरस्य पुत्री गुणशीलरूपयुक्ता दत्ता सख्युरेव स्वपित्रा । | | verse_text = शूरस्य पुत्री गुणशीलरूपयुक्ता दत्ता सख्युरेव स्वपित्रा । | ||
| verse_lines = शूरस्य पुत्री गुणशीलरूपयुक्ता दत्ता सख्युरेव स्वपित्रा | | verse_lines = शूरस्य पुत्री गुणशीलरूपयुक्ता दत्ता सख्युरेव स्वपित्रा ।¦नाम्ना पृथा कुन्तिभोजस्य तेन कुन्ती भार्या पूर्वदेहेऽपि पाण्डोः ॥ १४२॥ | ||
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| verse_text = कूर्मश्च नाम्ना मरुदेव कुन्तिभोजोऽथैनां वर्द्धयामास सम्यक् । | | verse_text = कूर्मश्च नाम्ना मरुदेव कुन्तिभोजोऽथैनां वर्द्धयामास सम्यक् । | ||
| verse_lines = कूर्मश्च नाम्ना मरुदेव कुन्तिभोजोऽथैनां वर्द्धयामास सम्यक् | | verse_lines = कूर्मश्च नाम्ना मरुदेव कुन्तिभोजोऽथैनां वर्द्धयामास सम्यक् ।¦तत्राऽगमच्छङ्करांशोऽतिकोपो दुर्वासास्तं प्राह मां वासयेति ॥ १४३॥ | ||
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| verse_text = तमाह राजा यदि कन्यकायाः क्षमिष्यसे शक्तितः कर्म कर्त्र्याः । | | verse_text = तमाह राजा यदि कन्यकायाः क्षमिष्यसे शक्तितः कर्म कर्त्र्याः । | ||
| verse_lines = तमाह राजा यदि कन्यकायाः क्षमिष्यसे शक्तितः कर्म कर्त्र्याः | | verse_lines = तमाह राजा यदि कन्यकायाः क्षमिष्यसे शक्तितः कर्म कर्त्र्याः ।¦सुखं वसेत्योमिति तेन चोक्तः शुश्रूषणायाऽदिशदाशु कुन्तीम् ॥ १४४॥ | ||
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| verse_text = चकार कर्म सा पृथा मुनेः सुकोपनस्य हि । | | verse_text = चकार कर्म सा पृथा मुनेः सुकोपनस्य हि । | ||
| verse_lines = चकार कर्म सा पृथा मुनेः सुकोपनस्य हि | | verse_lines = चकार कर्म सा पृथा मुनेः सुकोपनस्य हि ।¦यथा न शक्यते परैः शरीरवाङ्मनोनुगा ॥ १४५॥ | ||
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| verse_lines = स वत्सरत्रयोदशं तया यथावदर्चितः | | verse_lines = स वत्सरत्रयोदशं तया यथावदर्चितः ।¦उपादिशत् परं मनुं समस्तदेववश्यदम् ॥ १४६॥ | ||
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| verse_text = ऋतौ तु सा समाप्लुता परीक्षणाय तन्मनोः । | | verse_text = ऋतौ तु सा समाप्लुता परीक्षणाय तन्मनोः । | ||
| verse_lines = ऋतौ तु सा समाप्लुता परीक्षणाय तन्मनोः | | verse_lines = ऋतौ तु सा समाप्लुता परीक्षणाय तन्मनोः ।¦समाह्वयद् दिवाकरं स चाऽजगाम तत्क्षणात् ॥ १४७॥ | ||
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| verse_lines = ततो न सा विसर्जितुं शशाक तं विना रतिम् | | verse_lines = ततो न सा विसर्जितुं शशाक तं विना रतिम् ।¦सुवाक्प्रयत्नतोऽपि(षि) तामथाऽससाद भास्करः ॥ १४८॥ | ||
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| verse_lines = स तत्र जज्ञिवान् स्वयं द्वितीयरूपको विभुः | | verse_lines = स तत्र जज्ञिवान् स्वयं द्वितीयरूपको विभुः ।¦सवर्मदिव्यकुण्डलो ज्वलन्निव स्वतेजसा ॥ १४९॥ | ||
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| verse_lines = पुरा स वालिमारणप्रभूतदोषकारणात् | | verse_lines = पुरा स वालिमारणप्रभूतदोषकारणात् ।¦सहस्रवर्मनामिनाऽसुरेण वेष्टितोऽजनि ॥ १५०॥ | ||
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| verse_lines = यथा ग्रहैर्विदूष्यते मतिर्नृणां तथैव हि | | verse_lines = यथा ग्रहैर्विदूष्यते मतिर्नृणां तथैव हि ।¦अभूच्च दैत्यदूषिता मतिर्दिवाकरात्मनः ॥ १५१॥ | ||
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| verse_lines = तथाऽपि रामसेवनाद्धरेश्च सन्निधानयुक् | | verse_lines = तथाऽपि रामसेवनाद्धरेश्च सन्निधानयुक् ।¦सुदर्शनीयकर्णतः स कर्णनामकोऽभवत् ॥ १५२॥ | ||
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| verse_lines = स रत्नपूर्णमञ्जुषागतो विसर्जितो जले | | verse_lines = स रत्नपूर्णमञ्जुषागतो विसर्जितो जले ।¦जनापवादभीतितस्तया यमस्वसुर्द्रुतम् ॥ १५३॥ | ||
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| verse_lines = नदीप्रवाहतो गतं ददर्श सूतनन्दनः | | verse_lines = नदीप्रवाहतो गतं ददर्श सूतनन्दनः ।¦तमग्रहीत् सरत्नकं चकार पुत्रकं निजम् ॥ १५४॥ | ||
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| verse_lines = सूतेनाधिरथेन लालिततनुस्तद्भार्यया राधया | | verse_lines = सूतेनाधिरथेन लालिततनुस्तद्भार्यया राधया ।¦संवृद्धो निखिलाः श्रुतीरधिजगौ शास्त्राणि सर्वाणि च ।¦बाल्यादेव महाबलो निजगुणैः सम्भासमानोऽवसन्नाम्नाऽसौ वसुषेण(वसुसेन)तामगमदस्याऽसीद्ध्यमा तद् वसु ॥ १५५॥ | ||
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| verse_lines = अथ कुन्ती दत्ता सा पाण्डोः सोऽप्येतया चिरं रेमे | | verse_lines = अथ कुन्ती दत्ता सा पाण्डोः सोऽप्येतया चिरं रेमे ।¦शूराच्छूद्र्यां जातां विदुरोऽवहदारुणीं गुणाढ्यां च ॥ १५६॥ | ||
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| verse_lines = अथ चर्तायननामा मद्रेशः शक्रतुल्यपुत्रार्थी | | verse_lines = अथ चर्तायननामा मद्रेशः शक्रतुल्यपुत्रार्थी ।¦कन्यारत्नं चेच्छंश्चक्रे ब्राह्मं तपो वरं चाऽप ॥ १५७॥ | ||
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| verse_lines = प्रह्लादावरजो यः सह्लादो नामतो हरेर्भक्तः | | verse_lines = प्रह्लादावरजो यः सह्लादो नामतो हरेर्भक्तः ।¦सोऽभूद् ब्रह्मवरान्ते वायोरावेशयुक् सुतो राज्ञः ॥ १५८॥ | ||
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| verse_lines = स मारुतावेशवशात् पृथिव्यां बलाधिकोऽभूद् वरतश्च धातुः | | verse_lines = स मारुतावेशवशात् पृथिव्यां बलाधिकोऽभूद् वरतश्च धातुः ।¦शल्यश्च नाम्नाऽखिलशत्रुशल्यो बभूव कन्याऽस्य च माद्रिनाम्नी ॥ १५९॥ | ||
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| verse_lines = सा पाण्डुभार्यैव च पूर्वजन्मन्यभूत् पुनश्च प्रतिपादिताऽस्मै | | verse_lines = सा पाण्डुभार्यैव च पूर्वजन्मन्यभूत् पुनश्च प्रतिपादिताऽस्मै ।¦शल्यश्च राज्यं पितृदत्तमञ्जो जुगोप धर्मेण समस्तशास्त्रवित् ॥ १६०॥ | ||
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| verse_lines = अथाङ्गनारत्नमवाप्य तद् द्वयं पाण्डुस्तु भोगान् बुभुजे यथेष्टतः | | verse_lines = अथाङ्गनारत्नमवाप्य तद् द्वयं पाण्डुस्तु भोगान् बुभुजे यथेष्टतः ।¦अपीपलद् धर्मसमाश्रयो महीं ज्येष्ठापचायी विदुरोक्तमार्गतः ॥ १६१॥ | ||
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| verse_lines = भीष्मो हि राष्ट्रे धृतराष्ट्रमेव संस्थाप्य पाण्डुं युवराजमेव | | verse_lines = भीष्मो हि राष्ट्रे धृतराष्ट्रमेव संस्थाप्य पाण्डुं युवराजमेव ।¦चक्रे तथाऽप्यन्ध इति स्म राज्यं चकार नासावकरोच्च पाण्डुः ॥ १६२॥ | ||
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| verse_text = अम्बालिकाऽपि क्रमयोगतोऽगात् परां गतिं नैव तथाऽम्बिका ययौ । | | verse_text = अम्बालिकाऽपि क्रमयोगतोऽगात् परां गतिं नैव तथाऽम्बिका ययौ । | ||
| verse_lines = अम्बालिकाऽपि क्रमयोगतोऽगात् परां गतिं नैव तथाऽम्बिका ययौ | | verse_lines = अम्बालिकाऽपि क्रमयोगतोऽगात् परां गतिं नैव तथाऽम्बिका ययौ ।¦यथायथा विष्णुपरश्चिदात्मा तथातथा ह्यस्य गतिः परत्र ॥ १६७॥ | ||
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| verse_text = पाण्डुस्ततो राज्यभरं निधाय ज्येष्ठेऽनुजे चैव वनं जगाम । | | verse_text = पाण्डुस्ततो राज्यभरं निधाय ज्येष्ठेऽनुजे चैव वनं जगाम । | ||
| verse_lines = पाण्डुस्ततो राज्यभरं निधाय ज्येष्ठेऽनुजे चैव वनं जगाम | | verse_lines = पाण्डुस्ततो राज्यभरं निधाय ज्येष्ठेऽनुजे चैव वनं जगाम ।¦पत्नीद्वयेनानुगतो बदर्यामुवास नारायणपालितायाम् ॥ १६८॥ | ||
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| verse_text = गृहाश्रमेणैव वने निवासं कुर्वन् स भोगान् बभुजे तपश्च । | | verse_text = गृहाश्रमेणैव वने निवासं कुर्वन् स भोगान् बभुजे तपश्च । | ||
| verse_lines = गृहाश्रमेणैव वने निवासं कुर्वन् स भोगान् बभुजे तपश्च | | verse_lines = गृहाश्रमेणैव वने निवासं कुर्वन् स भोगान् बभुजे तपश्च ।¦चक्रे मुनीन्द्रैः सहितो जगत्पतिं रमापतिं भक्तियुतोऽभिपूजयन् ॥ १६९॥ | ||
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| verse_text = स कामतो हरिणत्वं प्रपन्नं दैवादृषिं ग्राम्यकर्मानुषक्तम् । | | verse_text = स कामतो हरिणत्वं प्रपन्नं दैवादृषिं ग्राम्यकर्मानुषक्तम् । | ||
| verse_lines = स कामतो हरिणत्वं प्रपन्नं दैवादृषिं ग्राम्यकर्मानुषक्तम् | | verse_lines = स कामतो हरिणत्वं प्रपन्नं दैवादृषिं ग्राम्यकर्मानुषक्तम् ।¦विद्ध्वा शापं प्राप तस्मात् स्त्रिया युङ् मरिष्यसीत्येव बभूव चाऽर्तः ॥ १७०॥ | ||
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| verse_text = न्यसिष्णुरुक्तः पृथया स नेति प्रणामपूर्वं न्यवसत् तथैव । | | verse_text = न्यसिष्णुरुक्तः पृथया स नेति प्रणामपूर्वं न्यवसत् तथैव । | ||
| verse_lines = न्यसिष्णुरुक्तः पृथया स नेति प्रणामपूर्वं न्यवसत् तथैव | | verse_lines = न्यसिष्णुरुक्तः पृथया स नेति प्रणामपूर्वं न्यवसत् तथैव ।¦ताभ्यां समेतः शतशृङ्गपर्वते नारायणस्याऽश्रममध्यगे पुरः ॥ १७१॥ | ||
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| verse_text = तपो नितान्तं स चचार ताभ्यां समन्वितः कृष्णपदाम्बुजाश्रयः । | | verse_text = तपो नितान्तं स चचार ताभ्यां समन्वितः कृष्णपदाम्बुजाश्रयः । | ||
| verse_lines = तपो नितान्तं स चचार ताभ्यां समन्वितः कृष्णपदाम्बुजाश्रयः | | verse_lines = तपो नितान्तं स चचार ताभ्यां समन्वितः कृष्णपदाम्बुजाश्रयः ।¦तत्सङ्गपूतद्युसरिद्वराम्भःसदावगाहातिपवित्रिताङ्गः ॥ १७२॥ | ||
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| verse_text = एतस्मिन्नेव काले कमलभवशिवाग्रेसराः शक्रपूर्वा । | | verse_text = एतस्मिन्नेव काले कमलभवशिवाग्रेसराः शक्रपूर्वा । | ||
| verse_lines = एतस्मिन्नेव काले कमलभवशिवाग्रेसराः शक्रपूर्वा | | verse_lines = एतस्मिन्नेव काले कमलभवशिवाग्रेसराः शक्रपूर्वा ।¦भूम्या पापात्मदैत्यैर्भुवि कृतनिलयैराक्रमं चासहन्त्या ।¦ईयुर्देवादिदेवं शरणमजमुरुं पूर्णषाड्गुण्यमूर्तिं क्षीराब्धौ नागभोगे शयितमनुपमानन्दसन्दोहदेहम् ॥ १७३॥ | ||
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| verse_lines = ऊचुः परं पुरुषमेनमनन्तशक्तिं सूक्तेन तेऽब्जजमुखा अपि पौरुषेण | | verse_lines = ऊचुः परं पुरुषमेनमनन्तशक्तिं सूक्तेन तेऽब्जजमुखा अपि पौरुषेण ।¦स्तुत्वा धराऽसुरवराक्रमणात् परेश खिन्ना यतो हि विमुखास्तव तेऽतिपापाः ॥ १७४॥ | ||
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| verse_text = दुस्सङ्गतिर्भवति भारवदेव देव नित्यं सतामपि हि नः शृणु वाक्यमीश । | | verse_text = दुस्सङ्गतिर्भवति भारवदेव देव नित्यं सतामपि हि नः शृणु वाक्यमीश । | ||
| verse_lines = दुस्सङ्गतिर्भवति भारवदेव देव नित्यं सतामपि हि नः शृणु वाक्यमीश | | verse_lines = दुस्सङ्गतिर्भवति भारवदेव देव नित्यं सतामपि हि नः शृणु वाक्यमीश ।¦पूर्वं हता दितिसुता भवता रणेषु ह्यस्मत्प्रियार्थमधुना भुवि तेऽभिजाताः ॥ १७५॥ | ||
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| verse_text = आसीत् पुरा दितिसुतैरमरोत्तमानां सङ्ग्राम उत्तमगजाश्वरथद्विपद्भिः । | | verse_text = आसीत् पुरा दितिसुतैरमरोत्तमानां सङ्ग्राम उत्तमगजाश्वरथद्विपद्भिः । | ||
| verse_lines = आसीत् पुरा दितिसुतैरमरोत्तमानां सङ्ग्राम उत्तमगजाश्वरथद्विपद्भिः | | verse_lines = आसीत् पुरा दितिसुतैरमरोत्तमानां सङ्ग्राम उत्तमगजाश्वरथद्विपद्भिः ।¦अक्षोहिणी शतमहौघमहौघमेव सैन्यं सुरात्मकमभूत् परमास्त्रयुक्तम् ।¦तस्मान्महौघगुणमास महासुराणां सैन्यं शिलागिरिमहास्त्रधरं सुघोरम् ॥ १७६॥ | ||
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| verse_lines = तेषां रथाश्च बहुनल्वपरिप्रमाणा देवासुरप्रवरकार्मुकबाणपूर्णाः | | verse_lines = तेषां रथाश्च बहुनल्वपरिप्रमाणा देवासुरप्रवरकार्मुकबाणपूर्णाः ।¦नानाम्बराभरणवेषवरायुधाढ्या देवासुराः ससृपुराशु परस्परं ते ॥ १७७॥ | ||
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| verse_text = जघ्नुर्गिरीन्द्रतलमुष्टिमहास्त्रशस्त्रैश्चक्रुर्नदीश्च रुधिरौघवहा महौघम् । | | verse_text = जघ्नुर्गिरीन्द्रतलमुष्टिमहास्त्रशस्त्रैश्चक्रुर्नदीश्च रुधिरौघवहा महौघम् । | ||
| verse_lines = जघ्नुर्गिरीन्द्रतलमुष्टिमहास्त्रशस्त्रैश्चक्रुर्नदीश्च रुधिरौघवहा महौघम् | | verse_lines = जघ्नुर्गिरीन्द्रतलमुष्टिमहास्त्रशस्त्रैश्चक्रुर्नदीश्च रुधिरौघवहा महौघम् ।¦तत्र स्म देववृषभैरसुरेशचमम्वा युद्धे निसूदित उतौघबलैः शतांशः ॥ १७८॥ | ||
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| verse_lines = अथाऽत्मसेनामवमृद्यमानां वीक्ष्यासुरः शम्बरनामधेयः | | verse_lines = अथाऽत्मसेनामवमृद्यमानां वीक्ष्यासुरः शम्बरनामधेयः ।¦ससार मायाविदसह्यमायो वरादुमेशस्य सुरान् विमोहयन् ॥ १७९॥ | ||
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| verse_text = मायासहस्रेण सुराः समर्दिता(विमर्दिताः) रणे विषेदुः शशिसूर्यमुख्याः । | | verse_text = मायासहस्रेण सुराः समर्दिता(विमर्दिताः) रणे विषेदुः शशिसूर्यमुख्याः । | ||
| verse_lines = मायासहस्रेण सुराः समर्दिता(विमर्दिताः) रणे विषेदुः शशिसूर्यमुख्याः | | verse_lines = मायासहस्रेण सुराः समर्दिता(विमर्दिताः) रणे विषेदुः शशिसूर्यमुख्याः ।¦तान् वीक्ष्य वज्री परमां तु विद्यां स्वयम्भुदत्तां प्रयुयोज वैष्णवीम् ॥ १८०॥ | ||
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| verse_lines = समस्तमायापहया तयैव वराद् रमेशस्य सदाऽप्यसह्यया | | verse_lines = समस्तमायापहया तयैव वराद् रमेशस्य सदाऽप्यसह्यया ।¦माया विनेशुर्दितिजेन्द्रसृष्टा वारीशवह्नीन्द्र(इन्दु)मुखाश्च मोचिताः ॥ १८१॥ | ||
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| verse_lines = यमेन्दुसूर्यादिसुरास्ततोऽसुरान् निजघ्नुराप्यायितविक्रमास्तदा | | verse_lines = यमेन्दुसूर्यादिसुरास्ततोऽसुरान् निजघ्नुराप्यायितविक्रमास्तदा ।¦सुरेश्वरेणोर्जितपौरुषा बहून् वज्रेण वज्री निजघान शम्बरम् ॥ १८२॥ | ||
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| verse_lines = तस्मिन् हते दानवलोकपाले दितेः सुता दुद्रुवुरिन्द्रभीषिताः | | verse_lines = तस्मिन् हते दानवलोकपाले दितेः सुता दुद्रुवुरिन्द्रभीषिताः ।¦तान् विप्रचित्तिर्विनिवार्य धन्वी ससार शक्रप्रमुखान् सुरोत्तमान् ॥ १८३॥ | ||
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| verse_lines = वरादजेयेन विधातुरेव सुरोत्तमांस्तेन शरैर्निपातितान् | | verse_lines = वरादजेयेन विधातुरेव सुरोत्तमांस्तेन शरैर्निपातितान् ।¦निरीक्ष्य शक्रं च विमोहितं द्रुतं न्यवारयत् तं पवनः शरौघैः ॥ १८४॥ | ||
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| verse_lines = अस्त्राणि तस्यास्त्रवरैर्निवार्य चिक्षेप तस्योरसि काञ्चनीं गदाम् | | verse_lines = अस्त्राणि तस्यास्त्रवरैर्निवार्य चिक्षेप तस्योरसि काञ्चनीं गदाम् ।¦विचूर्णितोऽसौ निपपात मेरौ महाबलो वायुबलाभिनुन्नः ॥ १८५॥ | ||
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| verse_lines = अथाऽससादाऽशु स कालनेमिस्त्वदाज्ञया यस्य वरं ददौ पुरा | | verse_lines = अथाऽससादाऽशु स कालनेमिस्त्वदाज्ञया यस्य वरं ददौ पुरा ।¦सर्वैरजेयत्वमजोऽसुरः(स्य) ससहस्रशीर्षो द्विसहस्रबाहुयुक् ॥ १८६॥ | ||
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| verse_lines = तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य मारुतस्त्वदाज्ञया दत्तवरस्त्वयैव | | verse_lines = तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य मारुतस्त्वदाज्ञया दत्तवरस्त्वयैव ।¦हन्तव्य इत्यस्मरदाशु हि त्वां तदाऽऽविरासीस्त्वमनन्तपौरुषः ॥ १८७॥ | ||
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| verse_lines = ततोऽसुरास्ते निहता अशेषास्त्वया त्रिभागा निहताश्चतुर्थम् | | verse_lines = ततोऽसुरास्ते निहता अशेषास्त्वया त्रिभागा निहताश्चतुर्थम् ।¦जघान वायुः पुनरेव जातास्ते भूतले धर्मबलोपपन्नाः ॥ १८९॥ | ||
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| verse_lines = राज्ञां महावंशसुजन्मनां तु तेषामभूद् धर्ममतिर्विपापा | | verse_lines = राज्ञां महावंशसुजन्मनां तु तेषामभूद् धर्ममतिर्विपापा ।¦शिक्षामवाप्य द्विजपुङ्गवानां त्वद्भक्तिरप्येषु हि काचन स्यात् ॥ १९०॥ | ||
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| verse_lines = त्वद्भक्तिलेशाभियुतः सुकर्मा व्रजेन्न पापां तु गतिं कथञ्चित् | | verse_lines = त्वद्भक्तिलेशाभियुतः सुकर्मा व्रजेन्न पापां तु गतिं कथञ्चित् ।¦दैत्येश्वराणां च तमोऽन्धमेव त्वयैव क्लृप्तं ननु सत्यकाम ॥ १९१॥ | ||
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| verse_lines = धर्मस्य मिथ्यात्वभयाद् वयं त्वामथापिवा दैत्यशुभाप्तिभीषा | | verse_lines = धर्मस्य मिथ्यात्वभयाद् वयं त्वामथापिवा दैत्यशुभाप्तिभीषा ।¦सम्प्रार्थयामो दितिजान् सुकर्मणस्त्वद्भक्तितश्च्यावयितुं च शीघ्रम् ॥ १९२॥ | ||
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| verse_lines = य उग्रसेनः सुरगायकः स जातो यदुष्वेष तथाऽभिधेयः | | verse_lines = य उग्रसेनः सुरगायकः स जातो यदुष्वेष तथाऽभिधेयः ।¦तवैव सेवार्थममुष्य पुत्रो जातोऽसुरः कालनेमिः स ईश ॥ १९३॥ | ||
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| verse_text = यस्त्वत्प्रियार्थं न हतो हि वायुना भवत्प्रसादात् परमीशिताऽपि । | | verse_text = यस्त्वत्प्रियार्थं न हतो हि वायुना भवत्प्रसादात् परमीशिताऽपि । | ||
| verse_lines = यस्त्वत्प्रियार्थं न हतो हि वायुना भवत्प्रसादात् परमीशिताऽपि | | verse_lines = यस्त्वत्प्रियार्थं न हतो हि वायुना भवत्प्रसादात् परमीशिताऽपि ।¦स एष भोजेषु पुनश्च जातो वरादुमेशस्य परैरजेयः ॥ १९४॥ | ||
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| verse_lines = स औग्रसेने जनितोऽसुरेण क्षेत्रे हि तद्रूपधरेण मायया | | verse_lines = स औग्रसेने जनितोऽसुरेण क्षेत्रे हि तद्रूपधरेण मायया ।¦गन्धर्विजेन द्रमिलेन नाम्ना कंसो जितो येन वराच्छचीपतिः ॥ १९५॥ | ||
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| verse_lines = जित्वा जलेशं च हृतानि येन रत्नानि यक्षाश्च जिताः शिवस्य | | verse_lines = जित्वा जलेशं च हृतानि येन रत्नानि यक्षाश्च जिताः शिवस्य ।¦कन्यावनार्थं मगधाधिपेन प्रयोजितास्ते च हृते बलेन ॥ १९६॥ | ||
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| verse_text = हतौ पुरा यौ मधुकैटभाख्यौ त्वयैव हंसो डिभकश्च जातौ । | | verse_text = हतौ पुरा यौ मधुकैटभाख्यौ त्वयैव हंसो डिभकश्च जातौ । | ||
| verse_lines = हतौ पुरा यौ मधुकैटभाख्यौ त्वयैव हंसो डिभकश्च जातौ | | verse_lines = हतौ पुरा यौ मधुकैटभाख्यौ त्वयैव हंसो डिभकश्च जातौ ।¦वरादजेयौ गिरिशस्य वीरौ भक्तौ जरासन्धमनु स्म तौ शिवे ॥ १९९॥ | ||
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| verse_text = अन्येऽपि भूमावसुराः प्रजातास्त्वया हता ये सुरदैत्यसङ्गरे । | | verse_text = अन्येऽपि भूमावसुराः प्रजातास्त्वया हता ये सुरदैत्यसङ्गरे । | ||
| verse_lines = अन्येऽपि भूमावसुराः प्रजातास्त्वया हता ये सुरदैत्यसङ्गरे | | verse_lines = अन्येऽपि भूमावसुराः प्रजातास्त्वया हता ये सुरदैत्यसङ्गरे ।¦अन्ये तथैवान्धतमः प्रपेदिरे कार्या तथैषां च तमोगतिस्त्वया ॥ २००॥ | ||
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| verse_text = व्यासावतारे निहतस्त्वयायः कलिः सुशास्त्रोक्तिभिरेव चाद्य । | | verse_text = व्यासावतारे निहतस्त्वयायः कलिः सुशास्त्रोक्तिभिरेव चाद्य । | ||
| verse_lines = व्यासावतारे निहतस्त्वयायः कलिः सुशास्त्रोक्तिभिरेव चाद्य | | verse_lines = व्यासावतारे निहतस्त्वयायः कलिः सुशास्त्रोक्तिभिरेव चाद्य ।¦श्रुत्वा त्वदुक्तीः पुरुषेषु तिष्ठन्नीषच्चकारेव मनस्त्वयीश ॥ २०१॥ | ||
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| verse_text = रामात्मना(रामावतारे) ये निहताश्च राक्षसा दृष्ट्वा बलं तेऽपि तदा तवाद्य । | | verse_text = रामात्मना(रामावतारे) ये निहताश्च राक्षसा दृष्ट्वा बलं तेऽपि तदा तवाद्य । | ||
| verse_lines = रामात्मना(रामावतारे) ये निहताश्च राक्षसा दृष्ट्वा बलं तेऽपि तदा तवाद्य | | verse_lines = रामात्मना(रामावतारे) ये निहताश्च राक्षसा दृष्ट्वा बलं तेऽपि तदा तवाद्य ।¦समं तवान्यं नहि चिन्तयन्ति सुपापिनोऽपीश तथा हनूमतः ॥ २०२॥ | ||
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| verse_text = ये केशव त्वद्बहुमानयुक्तास्तथैव वायौ नहि ते तमोऽन्धम् । | | verse_text = ये केशव त्वद्बहुमानयुक्तास्तथैव वायौ नहि ते तमोऽन्धम् । | ||
| verse_lines = ये केशव त्वद्बहुमानयुक्तास्तथैव वायौ नहि ते तमोऽन्धम् | | verse_lines = ये केशव त्वद्बहुमानयुक्तास्तथैव वायौ नहि ते तमोऽन्धम् ।¦योग्याः प्रवेष्टुं तदतो हि मार्गाच्चाल्यास्त्वया जनयित्वैव भूमौ ॥ २०३॥ | ||
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| verse_text = नितान्तमुत्पाद्य भवद्विरोधं तथाच (तथैव) वायौ बहुभिः प्रकारैः । | | verse_text = नितान्तमुत्पाद्य भवद्विरोधं तथाच (तथैव) वायौ बहुभिः प्रकारैः । | ||
| verse_lines = नितान्तमुत्पाद्य भवद्विरोधं तथाच (तथैव) वायौ बहुभिः प्रकारैः | | verse_lines = नितान्तमुत्पाद्य भवद्विरोधं तथाच (तथैव) वायौ बहुभिः प्रकारैः ।¦सर्वेषु देवेषु च पातनीयास्तमस्यथान्धे कलिपूर्वकासुराः ॥ २०४॥ | ||
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| verse_text = हतौ च यौ रावणकुम्भकर्णौ त्वया त्वदीयौ प्रतिहारपालौ । | | verse_text = हतौ च यौ रावणकुम्भकर्णौ त्वया त्वदीयौ प्रतिहारपालौ । | ||
| verse_lines = हतौ च यौ रावणकुम्भकर्णौ त्वया त्वदीयौ प्रतिहारपालौ | | verse_lines = हतौ च यौ रावणकुम्भकर्णौ त्वया त्वदीयौ प्रतिहारपालौ ।¦महासुरावेशयुतौ हि शापात् त्वयैव तावद्य विमोचनीयौ ॥ २०५॥ | ||
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| verse_text = यौ तौ तवारी ह तयोः प्रविष्टौ दैत्यौ तु तावन्धतमः प्रवेश्यौ । | | verse_text = यौ तौ तवारी ह तयोः प्रविष्टौ दैत्यौ तु तावन्धतमः प्रवेश्यौ । | ||
| verse_lines = यौ तौ तवारी ह तयोः प्रविष्टौ दैत्यौ तु तावन्धतमः प्रवेश्यौ | | verse_lines = यौ तौ तवारी ह तयोः प्रविष्टौ दैत्यौ तु तावन्धतमः प्रवेश्यौ ।¦यौ तौ त्वदीयौ भवदीयवेश्म त्वया पुनः प्रापणीयौ परेश ॥ २०६॥ | ||
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| verse_text = आविश्य यो बलिमञ्जश्चकार प्रतीपमस्मासु तथा त्वयीश । | | verse_text = आविश्य यो बलिमञ्जश्चकार प्रतीपमस्मासु तथा त्वयीश । | ||
| verse_lines = आविश्य यो बलिमञ्जश्चकार प्रतीपमस्मासु तथा त्वयीश | | verse_lines = आविश्य यो बलिमञ्जश्चकार प्रतीपमस्मासु तथा त्वयीश ।¦स चासुरो बलिनामैव भूमौ साल्वो नाम्ना ब्रह्मदत्तस्य जातः ॥ २०७॥ | ||
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| verse_text = मायामयं तेन विमानमग्र्यमभेद्यमाप्तं सकलैर्गिरीशात् । | | verse_text = मायामयं तेन विमानमग्र्यमभेद्यमाप्तं सकलैर्गिरीशात् । | ||
| verse_lines = मायामयं तेन विमानमग्र्यमभेद्यमाप्तं सकलैर्गिरीशात् | | verse_lines = मायामयं तेन विमानमग्र्यमभेद्यमाप्तं सकलैर्गिरीशात् ।¦विद्रावितो यो बहुशस्त्वयैव रामस्वरूपेण भृगूद्वहेन ॥ २०८॥ | ||
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| verse_text = नासौ हतः शक्तिमताऽपि तत्र कृष्णावतारे स मयैव वध्यः । | | verse_text = नासौ हतः शक्तिमताऽपि तत्र कृष्णावतारे स मयैव वध्यः । | ||
| verse_lines = नासौ हतः शक्तिमताऽपि तत्र कृष्णावतारे स मयैव वध्यः | | verse_lines = नासौ हतः शक्तिमताऽपि तत्र कृष्णावतारे स मयैव वध्यः ।¦इत्यात्मसङ्कल्पमृतं विधातुं स चात्र वध्यो भवताऽतिपापी ॥ २०९॥ | ||
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| verse_text = यदीयमारुह्य विमानमस्य पिताऽभवत् सौभपतिश्च नाम्ना । | | verse_text = यदीयमारुह्य विमानमस्य पिताऽभवत् सौभपतिश्च नाम्ना । | ||
| verse_lines = यदीयमारुह्य विमानमस्य पिताऽभवत् सौभपतिश्च नाम्ना | | verse_lines = यदीयमारुह्य विमानमस्य पिताऽभवत् सौभपतिश्च नाम्ना ।¦यदा स भीष्मेण जितः पिताऽस्य तदा स साल्वस्तपसि स्थितोऽभूत् ॥ २१०॥ | ||
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| verse_text = स चाद्य तस्मात् तपसो निवृत्तो जरासुतस्यानुमते स्थितो हि । | | verse_text = स चाद्य तस्मात् तपसो निवृत्तो जरासुतस्यानुमते स्थितो हि । | ||
| verse_lines = स चाद्य तस्मात् तपसो निवृत्तो जरासुतस्यानुमते स्थितो हि | | verse_lines = स चाद्य तस्मात् तपसो निवृत्तो जरासुतस्यानुमते स्थितो हि ।¦अनन्यवध्यो भवताऽद्य वध्यः स प्रापणीयश्च तमस्यथोग्रे ॥ २११॥ | ||
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| verse_text = यो बाणमाविश्य महासुरोऽभूत् स्थितः स नाम्ना(सनाम्ना) प्रथितोऽपि बाणः । | | verse_text = यो बाणमाविश्य महासुरोऽभूत् स्थितः स नाम्ना(सनाम्ना) प्रथितोऽपि बाणः । | ||
| verse_lines = यो बाणमाविश्य महासुरोऽभूत् स्थितः स नाम्ना(सनाम्ना) प्रथितोऽपि बाणः | | verse_lines = यो बाणमाविश्य महासुरोऽभूत् स्थितः स नाम्ना(सनाम्ना) प्रथितोऽपि बाणः ।¦स कीचको नाम बभूव रुद्रवरादवध्यः स तमः प्रवेश्यः ॥ २१२॥ | ||
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| verse_text = अतस्त्वया भुव्यवतीर्य देवकार्याणि कार्याण्यखिलानि देव । | | verse_text = अतस्त्वया भुव्यवतीर्य देवकार्याणि कार्याण्यखिलानि देव । | ||
| verse_lines = अतस्त्वया भुव्यवतीर्य देवकार्याणि कार्याण्यखिलानि देव | | verse_lines = अतस्त्वया भुव्यवतीर्य देवकार्याणि कार्याण्यखिलानि देव ।¦त्वमेव देवेश गतिः सुराणां ब्रह्मेशशक्रेन्दुयमादिकानाम् ॥ २१३॥ | ||
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| verse_text = त्वमेव नित्योदितपूर्णशक्तिस्त्वमेव नित्योदितपूर्णचिद्धनः । | | verse_text = त्वमेव नित्योदितपूर्णशक्तिस्त्वमेव नित्योदितपूर्णचिद्धनः । | ||
| verse_lines = त्वमेव नित्योदितपूर्णशक्तिस्त्वमेव नित्योदितपूर्णचिद्धनः | | verse_lines = त्वमेव नित्योदितपूर्णशक्तिस्त्वमेव नित्योदितपूर्णचिद्धनः ।¦त्वमेव नित्योदितपूर्णसत्सुखस्त्वाद्दृङ् न कश्चित् कुत एव तेऽधिकः ॥ २१४॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितो देववरैरुदारगुणार्णवोऽक्षोभ्यतमामृताकृतिः | | verse_lines = इतीरितो देववरैरुदारगुणार्णवोऽक्षोभ्यतमामृताकृतिः ।¦उत्थाय तस्मात् प्रययावनन्तसोमार्ककान्तिद्युतिरन्वितोऽमरैः ॥ २१५॥ | ||
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| verse_text = स मेरुमाप्याऽह चतुर्मुखं प्रभुर्यत्र त्वयोक्तोऽस्मि हि तत्र सर्वथा । | | verse_text = स मेरुमाप्याऽह चतुर्मुखं प्रभुर्यत्र त्वयोक्तोऽस्मि हि तत्र सर्वथा । | ||
| verse_lines = स मेरुमाप्याऽह चतुर्मुखं प्रभुर्यत्र त्वयोक्तोऽस्मि हि तत्र सर्वथा | | verse_lines = स मेरुमाप्याऽह चतुर्मुखं प्रभुर्यत्र त्वयोक्तोऽस्मि हि तत्र सर्वथा ।¦प्रादुर्भविष्ये भवतो हि भक्त्या वशस्त्विवाहं स्ववशोऽपि चेच्छया ॥ २१६॥ | ||
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| verse_lines = ब्रह्मा प्रणम्याऽह तमात्मकारणं प्रादां पुराऽहं वरुणाय गाः शुभाः | | verse_lines = ब्रह्मा प्रणम्याऽह तमात्मकारणं प्रादां पुराऽहं वरुणाय गाः शुभाः ।¦जहार तास्तस्य पिताऽमृतस्रवाः स कश्यपो द्राक् सहसाऽतिगर्वितः ॥ २१७॥ | ||
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| verse_lines = मात्रा त्वदित्या च तथा सुरभ्या प्रचोदितेनैव हृतासु तासु | | verse_lines = मात्रा त्वदित्या च तथा सुरभ्या प्रचोदितेनैव हृतासु तासु ।¦श्रुत्वा जलेशात् स मया तु(भि) शप्तः क्षत्रेषु(क्षेत्रेषु) गोजीवनको भवेति ॥ २१८॥ | ||
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| verse_lines = शूरात् स जातो बहुगोधनाढ्यो भूमौ यमाहुर्वसुदेव इत्यपि | | verse_lines = शूरात् स जातो बहुगोधनाढ्यो भूमौ यमाहुर्वसुदेव इत्यपि ।¦तस्यैव भार्या त्वदितिश्च देवकी बभूव चान्या सुरभिश्च रोहिणी ॥ २१९॥ | ||
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| verse_lines = तत् त्वं भवस्वाऽशु च देवकीसुतस्तथैव यो द्रोणनामा वसुः सः | | verse_lines = तत् त्वं भवस्वाऽशु च देवकीसुतस्तथैव यो द्रोणनामा वसुः सः ।¦स्वभार्यया धरया त्वत्पितृत्वं प्राप्तुं तपस्तेप उदारमानसः ॥ २२०॥ | ||
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| verse_lines = तस्मै वरः स मया सन्निसृष्टः स चाऽस नन्दाख्य उतास्य भार्या | | verse_lines = तस्मै वरः स मया सन्निसृष्टः स चाऽस नन्दाख्य उतास्य भार्या ।¦नाम्ना यशोदा स च शूरतातसुतस्य वैश्याप्रभवोऽथ गोपः ॥ २२१॥ | ||
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| verse_lines = तौ देवकीवसुदेवौ च तेपतुस्तपस्त्वदीयं सुतमिच्छमानौ | | verse_lines = तौ देवकीवसुदेवौ च तेपतुस्तपस्त्वदीयं सुतमिच्छमानौ ।¦त्वामेव(त्वमेव) तस्मात् प्रथमं प्रदर्श्य तत्र स्वरूपं हि ततो व्रजं व्रज ॥ २२२॥ | ||
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| verse_lines = इतीरिते सोऽब्जभवेन केशवस्तथेति चोक्त्वा पुनराह देवताः | | verse_lines = इतीरिते सोऽब्जभवेन केशवस्तथेति चोक्त्वा पुनराह देवताः ।¦सर्वे भवन्तो भवताऽशु मानुषे कार्यानुसारेण यथानुरूपतः ॥ २२३॥ | ||
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| verse_lines = अथावतीर्णाः सकलाश्च देवता यथायथैवाऽह हरिस्तथातथा | | verse_lines = अथावतीर्णाः सकलाश्च देवता यथायथैवाऽह हरिस्तथातथा ।¦वित्तेश्वरः पूर्वमभूद्धि भौमाद्धरेः सुतत्वेऽपि तदिच्छयाऽसुरात् ॥ २२४॥ | ||
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| verse_lines = पापेन तेनापहृतो हि हस्ती शिवप्रदत्तः सुप्रतीकाभिधानः | | verse_lines = पापेन तेनापहृतो हि हस्ती शिवप्रदत्तः सुप्रतीकाभिधानः ।¦तदर्थमेवास्य सुतोऽभिजातो धनेश्वरो भगदत्ताभिधानः ॥ २२५॥ | ||
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| verse_lines = महासुरस्यांशयुतः स एव रुद्रावेशाद् बलवानस्त्रवांश्च | | verse_lines = महासुरस्यांशयुतः स एव रुद्रावेशाद् बलवानस्त्रवांश्च ।¦शिष्यो महेन्द्रस्य हते बभूव ताते स्वधर्माभिरतश्च नित्यम् ॥ २२६॥ | ||
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| verse_text = लिङ्गं सुराणां हि परैव भक्तिर्विष्णौ तदन्येषु च तत्प्रतीपता । | | verse_text = लिङ्गं सुराणां हि परैव भक्तिर्विष्णौ तदन्येषु च तत्प्रतीपता । | ||
| verse_lines = लिङ्गं सुराणां हि परैव भक्तिर्विष्णौ तदन्येषु च तत्प्रतीपता | | verse_lines = लिङ्गं सुराणां हि परैव भक्तिर्विष्णौ तदन्येषु च तत्प्रतीपता ।¦अतोऽत्र येये हरिभक्तितत्परास्तेते सुरास्तद्भरिता विशेषतः ॥ २३१॥ | ||
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| verse_text = औं ॥ बभूव गन्धर्वमुनिस्तु देवकः स आस सेवार्थमथाऽहुकाद्धरेः । | | verse_text = औं ॥ बभूव गन्धर्वमुनिस्तु देवकः स आस सेवार्थमथाऽहुकाद्धरेः । | ||
| verse_lines = औं ॥ बभूव गन्धर्वमुनिस्तु देवकः स आस सेवार्थमथाऽहुकाद्धरेः | | verse_lines = औं ॥ बभूव गन्धर्वमुनिस्तु देवकः स आस सेवार्थमथाऽहुकाद्धरेः ।¦स उग्रसेनावरजस्तथैव नामास्य तस्मादजनि स्म देवकी ॥ १॥ | ||
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| verse_text = अन्याश्च याः काश्यपस्यैव भार्या ज्येष्ठां तु तामाहुक आत्मपुत्रीम् । | | verse_text = अन्याश्च याः काश्यपस्यैव भार्या ज्येष्ठां तु तामाहुक आत्मपुत्रीम् । | ||
| verse_lines = अन्याश्च याः काश्यपस्यैव भार्या ज्येष्ठां तु तामाहुक आत्मपुत्रीम् | | verse_lines = अन्याश्च याः काश्यपस्यैव भार्या ज्येष्ठां तु तामाहुक आत्मपुत्रीम् ।¦चकार तस्माद्धि पितृष्वसा सा स्वसा च कंसस्य बभूव देवकी ॥ २॥ | ||
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| verse_text = सैवादितिर्वसुदेवस्य दत्ता तस्या रथं माङ्गलं (मङ्गलं) कंस एव । | | verse_text = सैवादितिर्वसुदेवस्य दत्ता तस्या रथं माङ्गलं (मङ्गलं) कंस एव । | ||
| verse_lines = सैवादितिर्वसुदेवस्य दत्ता तस्या रथं माङ्गलं (मङ्गलं) कंस एव | | verse_lines = सैवादितिर्वसुदेवस्य दत्ता तस्या रथं माङ्गलं (मङ्गलं) कंस एव ।¦संयापयामास तदा हि वायुर्जगाद वाक्यं गगनस्थितोऽमुम् ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = (विनाऽपराधं न) विनापराधाद्धि ततो गरीयसो न मातुलो वध्यतामेति विष्णोः । | | verse_text = (विनाऽपराधं न) विनापराधाद्धि ततो गरीयसो न मातुलो वध्यतामेति विष्णोः । | ||
| verse_lines = (विनाऽपराधं न) विनापराधाद्धि ततो गरीयसो न मातुलो वध्यतामेति विष्णोः | | verse_lines = (विनाऽपराधं न) विनापराधाद्धि ततो गरीयसो न मातुलो वध्यतामेति विष्णोः ।¦लोकस्य धर्माननुवर्ततोऽतः पित्रोर्विरोधार्थमुवाच वायुः ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = मृत्युस्तवास्या भविताऽष्टमः सुतो मूढेति चोक्तो जगृहे कृपाणाम् । | | verse_text = मृत्युस्तवास्या भविताऽष्टमः सुतो मूढेति चोक्तो जगृहे कृपाणाम् । | ||
| verse_lines = मृत्युस्तवास्या भविताऽष्टमः सुतो मूढेति चोक्तो जगृहे कृपाणाम् | | verse_lines = मृत्युस्तवास्या भविताऽष्टमः सुतो मूढेति चोक्तो जगृहे कृपाणाम् ।¦पुत्रान् समर्प्यास्य च शूरसूनुर्विमोच्य तां तत्सहितो गृहं ययौ ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = षट् कन्यकाश्चावरजा गृहीतास्तेनैव ताभिश्च मुमोद शूरजः । | | verse_text = षट् कन्यकाश्चावरजा गृहीतास्तेनैव ताभिश्च मुमोद शूरजः । | ||
| verse_lines = षट् कन्यकाश्चावरजा गृहीतास्तेनैव ताभिश्च मुमोद शूरजः | | verse_lines = षट् कन्यकाश्चावरजा गृहीतास्तेनैव ताभिश्च मुमोद शूरजः ।¦बाह्लीकपुत्री च पुरा गृहीता पुराऽस्य भार्या सुरभिस्तु रोहिणी ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = राज्ञश्च काशिप्रभवस्य कन्यां स पुत्रिकापुत्रकधर्मतोऽवहत् । | | verse_text = राज्ञश्च काशिप्रभवस्य कन्यां स पुत्रिकापुत्रकधर्मतोऽवहत् । | ||
| verse_lines = राज्ञश्च काशिप्रभवस्य कन्यां स पुत्रिकापुत्रकधर्मतोऽवहत् | | verse_lines = राज्ञश्च काशिप्रभवस्य कन्यां स पुत्रिकापुत्रकधर्मतोऽवहत् ।¦कन्यां तथा करवीरेश्वरस्य धर्मेण तेनैव दितिं दनुं पुरा ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = यो मन्यते विष्णुरेवाहमित्यसौ पापो वेनः पौण्ड्रको वासुदेवः । | | verse_text = यो मन्यते विष्णुरेवाहमित्यसौ पापो वेनः पौण्ड्रको वासुदेवः । | ||
| verse_lines = यो मन्यते विष्णुरेवाहमित्यसौ पापो वेनः पौण्ड्रको वासुदेवः | | verse_lines = यो मन्यते विष्णुरेवाहमित्यसौ पापो वेनः पौण्ड्रको वासुदेवः ।¦जातः पुनः शूरजात् काशिजायां नान्यो मत्तो विष्णुरस्तीति वादी ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = धुन्धुर्हतो यो हरिणा मधोः सुत आसीत् सुतायां करवीरेश्वरस्य । | | verse_text = धुन्धुर्हतो यो हरिणा मधोः सुत आसीत् सुतायां करवीरेश्वरस्य । | ||
| verse_lines = धुन्धुर्हतो यो हरिणा मधोः सुत आसीत् सुतायां करवीरेश्वरस्य | | verse_lines = धुन्धुर्हतो यो हरिणा मधोः सुत आसीत् सुतायां करवीरेश्वरस्य ।¦सृगालनामा वासुदेवोऽथ देवकीमुदूह्य शौरिर्न ययावुभे ते ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = ततस्तु तौ वृष्णिशत्रू बभूवतुर्ज्येष्ठौ सुतौ शूरसुतस्य नित्यम् । | | verse_text = ततस्तु तौ वृष्णिशत्रू बभूवतुर्ज्येष्ठौ सुतौ शूरसुतस्य नित्यम् । | ||
| verse_lines = ततस्तु तौ वृष्णिशत्रू बभूवतुर्ज्येष्ठौ सुतौ शूरसुतस्य नित्यम् | | verse_lines = ततस्तु तौ वृष्णिशत्रू बभूवतुर्ज्येष्ठौ सुतौ शूरसुतस्य नित्यम् ।¦अन्यासु च प्राप सुतानुदारान् देवावतारान् वसुदेवोऽखिलज्ञः ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = येये हि देवाः पृथिवीं गतास्ते सर्वे शिष्याः सत्यवतीसुतस्य । | | verse_text = येये हि देवाः पृथिवीं गतास्ते सर्वे शिष्याः सत्यवतीसुतस्य । | ||
| verse_lines = येये हि देवाः पृथिवीं गतास्ते सर्वे शिष्याः सत्यवतीसुतस्य | | verse_lines = येये हि देवाः पृथिवीं गतास्ते सर्वे शिष्याः सत्यवतीसुतस्य ।¦विष्णुज्ञानं (विष्णोः ज्ञानम्) प्राप्य सर्वेऽखिलज्ञास्तस्माद् यथायोग्यतया बभूवुः ॥ ११॥ | ||
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| verse_text = मरीचिजाः षण् मुनयो बभूवुस्ते देवलं प्राहसन् कार्श्यहेतोः । | | verse_text = मरीचिजाः षण् मुनयो बभूवुस्ते देवलं प्राहसन् कार्श्यहेतोः । | ||
| verse_lines = मरीचिजाः षण् मुनयो बभूवुस्ते देवलं प्राहसन् कार्श्यहेतोः | | verse_lines = मरीचिजाः षण् मुनयो बभूवुस्ते देवलं प्राहसन् कार्श्यहेतोः ।¦तच्छापतः कालनेमिप्रसूता अवध्यतार्थं तप एव चक्रुः ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = धाता प्रादाद् वरमेषां तथैव शशाप तान् क्ष्मातले सम्भवध्वम् । | | verse_text = धाता प्रादाद् वरमेषां तथैव शशाप तान् क्ष्मातले सम्भवध्वम् । | ||
| verse_lines = धाता प्रादाद् वरमेषां तथैव शशाप तान् क्ष्मातले सम्भवध्वम् | | verse_lines = धाता प्रादाद् वरमेषां तथैव शशाप तान् क्ष्मातले सम्भवध्वम् ।¦तत्र स्वतातो भवतां निहन्तेत्यात्मान्यतो वरलिप्सून् हिरण्यः ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = दुर्गा तदा तान् भगवत्प्रचोदिता प्रस्वापयित्वा प्रचकर्ष कायात् । | | verse_text = दुर्गा तदा तान् भगवत्प्रचोदिता प्रस्वापयित्वा प्रचकर्ष कायात् । | ||
| verse_lines = दुर्गा तदा तान् भगवत्प्रचोदिता प्रस्वापयित्वा प्रचकर्ष कायात् | | verse_lines = दुर्गा तदा तान् भगवत्प्रचोदिता प्रस्वापयित्वा प्रचकर्ष कायात् ।¦क्रमात् समावेशयदाशु देवकीगर्भाशये तान् न्यहनच्च कंसः ॥ १४॥ | ||
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| verse_lines = तदा मुनीन्द्रसंयुतः सदो विधातुरुत्तमम् | | verse_lines = तदा मुनीन्द्रसंयुतः सदो विधातुरुत्तमम् ।¦स पाण्डुराप्तुमैच्छत न्यवारयंश्च ते तदा ॥ १५॥ | ||
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| verse_lines = यधर्थमेव जायते पुमान् हि तस्य सोऽकृतेः | | verse_lines = यधर्थमेव जायते पुमान् हि तस्य सोऽकृतेः ।¦शुभां गतिं नतु व्रजेद् ध्रुवम् ततो न्यवारयन् ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = प्रधानदेवताजनौ (प्रधानदेवताजने) नियोक्तुमात्मनः प्रियाम् । | | verse_text = प्रधानदेवताजनौ (प्रधानदेवताजने) नियोक्तुमात्मनः प्रियाम् । | ||
| verse_lines = प्रधानदेवताजनौ (प्रधानदेवताजने) नियोक्तुमात्मनः प्रियाम् | | verse_lines = प्रधानदेवताजनौ (प्रधानदेवताजने) नियोक्तुमात्मनः प्रियाम् ।¦बभूव पाण्डुरेष तद् विना न तस्य सद्गतिः ॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = अतोऽन्यथा सुतानृते व्रजन्ति सद्गतिं नराः | | verse_lines = अतोऽन्यथा सुतानृते व्रजन्ति सद्गतिं नराः ।¦यथैव धर्मभूषणो जगाम सन्ध्यकासुतः ॥ १८॥ | ||
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| verse_lines = तदा कलिश्च राक्षसा बभूवुरिन्द्रजिन्मुखाः | | verse_lines = तदा कलिश्च राक्षसा बभूवुरिन्द्रजिन्मुखाः ।¦विचित्रवीर्यनन्दनप्रियोदरे हि गर्भगाः ॥ १९॥ | ||
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| verse_lines = तदस्य(तदास्य) सोऽनुजोऽशृणोन्मुनीन्द्रदूषितं च तत् | | verse_lines = तदस्य(तदास्य) सोऽनुजोऽशृणोन्मुनीन्द्रदूषितं च तत् ।¦विचार्य तु प्रियामिदं जगाद वासुदेवधीः ॥ २०॥ | ||
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| verse_lines = य एव मद्गुणाधिकस्ततः सुतं समाप्नुहि | | verse_lines = य एव मद्गुणाधिकस्ततः सुतं समाप्नुहि ।¦सुतं विना न नो गतिं शुभां वदन्ति साधवः ॥ २१॥ | ||
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| verse_lines = तदस्य कृच्छ्रतो वचः पृथाऽग्रहीज्जगाद च | | verse_lines = तदस्य कृच्छ्रतो वचः पृथाऽग्रहीज्जगाद च ।¦ममास्ति देववश्यदो मनूत्तमः सुताप्तिदः ॥ २२॥ | ||
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| verse_lines = न ते सुरानृते समः सुरेषु केचिदेव च | | verse_lines = न ते सुरानृते समः सुरेषु केचिदेव च ।¦अतस्तवाधिकं सुरं कमाह्वये त्वदाज्ञया ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = वरं समाश्रिता पतिं व्रजेत या ततोऽधमम् | | verse_lines = वरं समाश्रिता पतिं व्रजेत या ततोऽधमम् ।¦न काचिदस्ति निष्कृतिर्न भर्तृलोकमृच्छति ॥ २४॥ | ||
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| verse_lines = कृते पुरा सुरास्तथा सुराङ्गनाश्च केवलम् | | verse_lines = कृते पुरा सुरास्तथा सुराङ्गनाश्च केवलम् ।¦निमित्ततोऽपि ताः क्वचिन्न तान् विहाय रेमिरे ॥ २५॥ | ||
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| verse_lines = मनोवचःशरीरतो यतो हि ताः पतिव्रताः | | verse_lines = मनोवचःशरीरतो यतो हि ताः पतिव्रताः ।¦अनादिकालतोऽभवंस्ततः सभर्तृकाः सदा ॥ २६॥ | ||
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| verse_lines = स्वभर्तृभिर्विमुक्तिगाः सहैव ता भवन्ति हि | | verse_lines = स्वभर्तृभिर्विमुक्तिगाः सहैव ता भवन्ति हि ।¦कृतान्तमाप्य चाप्सरःस्त्रियो बभूवुरूर्जिताः ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = अयुक्तमुक्तवांस्ततो भवांस्तथाऽपि ते वचः | | verse_lines = अयुक्तमुक्तवांस्ततो भवांस्तथाऽपि ते वचः ।¦अलङ्घ्यमेव मे (मतो) ततो वदस्व पुत्रदं सुरम् ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितोऽब्रवीन्नृपो न धर्मतो विना भुवः | | verse_lines = इतीरितोऽब्रवीन्नृपो न धर्मतो विना भुवः ।¦नृपोऽभिरक्षिता भवेत् तदाह्वयाऽशु तं विभुम् ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = कलिः सुयोधनोऽजनि प्रभूतबाहुवीर्ययुक् | | verse_lines = कलिः सुयोधनोऽजनि प्रभूतबाहुवीर्ययुक् ।¦प्रधानवायुसन्निधेर्बलाधिकत्वमस्य तत् ॥ ३८॥ | ||
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| verse_text = पुरा हि मेरुमूर्धनि त्रिविष्टपौकसां वचः । | | verse_text = पुरा हि मेरुमूर्धनि त्रिविष्टपौकसां वचः । | ||
| verse_lines = पुरा हि मेरुमूर्धनि त्रिविष्टपौकसां वचः | | verse_lines = पुरा हि मेरुमूर्धनि त्रिविष्टपौकसां वचः ।¦वसुन्धरातलोद्भवोन्मुखं श्रुतं दितेः सुतैः ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = ततस्तु ते त्रिलोचनं तपोबलादतोषयन् । | | verse_text = ततस्तु ते त्रिलोचनं तपोबलादतोषयन् । | ||
| verse_lines = ततस्तु ते त्रिलोचनं तपोबलादतोषयन् | | verse_lines = ततस्तु ते त्रिलोचनं तपोबलादतोषयन् ।¦वृतश्च देवकण्टको ह्यवध्य एव सर्वतः ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = वरादुमापतेस्ततः कलिः स देवकण्टकः । | | verse_text = वरादुमापतेस्ततः कलिः स देवकण्टकः । | ||
| verse_lines = वरादुमापतेस्ततः कलिः स देवकण्टकः | | verse_lines = वरादुमापतेस्ततः कलिः स देवकण्टकः ।¦बभूव वज्रकाययुक् सुयोधनो महाबलः ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = अवध्य एव सर्वतः सुयोधने समुत्थिते । | | verse_text = अवध्य एव सर्वतः सुयोधने समुत्थिते । | ||
| verse_lines = अवध्य एव सर्वतः सुयोधने समुत्थिते | | verse_lines = अवध्य एव सर्वतः सुयोधने समुत्थिते ।¦घृताभिपूर्णकुम्भतः स इन्द्रजित् समुत्थितः ॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = स दुःखशासनोऽभवत् ततोऽतिकायसम्भवः । | | verse_text = स दुःखशासनोऽभवत् ततोऽतिकायसम्भवः । | ||
| verse_lines = स दुःखशासनोऽभवत् ततोऽतिकायसम्भवः | | verse_lines = स दुःखशासनोऽभवत् ततोऽतिकायसम्भवः ।¦स वै विकर्ण उच्यते ततः खरोऽभवद् बली ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = स चित्रसेननामकस्तथाऽपरे च राक्षसाः । | | verse_text = स चित्रसेननामकस्तथाऽपरे च राक्षसाः । | ||
| verse_lines = स चित्रसेननामकस्तथाऽपरे च राक्षसाः | | verse_lines = स चित्रसेननामकस्तथाऽपरे च राक्षसाः ।¦बभूवुरुग्रपौरुषा विचित्रवीर्यजात्मजाः ॥ ४४॥ | ||
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| verse_lines = समस्तदोषरूपिणः शरीरिणो हि तेऽभवन् | | verse_lines = समस्तदोषरूपिणः शरीरिणो हि तेऽभवन् ।¦मृषेति नामतो हि या बभूव दुःशलाऽऽसुरी ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = कुहूप्रवेशसंयुता ययाऽऽर्जुनेर्वधाय हि । | | verse_text = कुहूप्रवेशसंयुता ययाऽऽर्जुनेर्वधाय हि । | ||
| verse_lines = कुहूप्रवेशसंयुता ययाऽऽर्जुनेर्वधाय हि | | verse_lines = कुहूप्रवेशसंयुता ययाऽऽर्जुनेर्वधाय हि ।¦तपः कृतं त्रिशूलिने ततो हि साऽत्र जज्ञुषी ॥ ४६॥ | ||
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| verse_lines = तयोदितो हि सैन्धवो बभूव कारणं वधे | | verse_lines = तयोदितो हि सैन्धवो बभूव कारणं वधे ।¦स कालकेयदानवस्तदर्थमास भूतळे ॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = तथाऽऽस निर्ऋथाभिधोऽनुजः स निर्ऋतेरभूत् । | | verse_text = तथाऽऽस निर्ऋथाभिधोऽनुजः स निर्ऋतेरभूत् । | ||
| verse_lines = तथाऽऽस निर्ऋथाभिधोऽनुजः स निर्ऋतेरभूत् | | verse_lines = तथाऽऽस निर्ऋथाभिधोऽनुजः स निर्ऋतेरभूत् ।¦स नासिकामरुद्युतो युयुत्सुनामकः कृती ॥ ४८॥ | ||
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| verse_lines = स चाऽम्बिकेयवीर्यजः सुयोधनादनन्तरः | | verse_lines = स चाऽम्बिकेयवीर्यजः सुयोधनादनन्तरः ।¦बभूव वैश्यकन्यकोदरोद्भवो हरिप्रियः ॥ ४९॥ | ||
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| verse_lines = युधिष्ठिरे जात उवाच पाण्डुर्बाह्वोर्बलाज्ज्ञानबलाच्च धर्मः | | verse_lines = युधिष्ठिरे जात उवाच पाण्डुर्बाह्वोर्बलाज्ज्ञानबलाच्च धर्मः ।¦रक्ष्योऽन्यथा नाशमुपैति तस्माद् बलद्वयाढ्यं (जनय)प्रसुवाऽशु पुत्रम् ॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = यज्ञाधिको ह्यश्वमेधो मनुष्यदृश्येषु तेजस्स्वधिको हि भास्करः | | verse_lines = यज्ञाधिको ह्यश्वमेधो मनुष्यदृश्येषु तेजस्स्वधिको हि भास्करः ।¦वर्णेषु विप्रः सकलैर्गुणैर्वरो देवेषु वायुः पुरुषोत्तमादृते ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = विशेषतोऽप्येष पितैव मे प्रभुर्व्यासात्मना विष्णुरनन्तपौरुषः | | verse_lines = विशेषतोऽप्येष पितैव मे प्रभुर्व्यासात्मना विष्णुरनन्तपौरुषः ।¦अतश्च ते श्वशुरो नैव योग्यो दातुं पुत्रं वायुमुपैहि तं प्रभुम् ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = इतीरिते पृथयाऽऽहूतवायुसंस्पर्शमात्रादभवद् बलद्वये | | verse_lines = इतीरिते पृथयाऽऽहूतवायुसंस्पर्शमात्रादभवद् बलद्वये ।¦समो जगत्यस्ति न यस्य कश्चिद् भक्तौ च विष्णोर्भगवद्वशः सुतः ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = स वायुरेवाभवदत्र भीमनामा भृता माः सकला हि यस्मिन् | | verse_lines = स वायुरेवाभवदत्र भीमनामा भृता माः सकला हि यस्मिन् ।¦स विष्णुनेशेन युतः सदैव नाम्ना सेनो भीमसेनस्ततोऽसौ ॥ ५४॥ | ||
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| verse_lines = तज्जन्ममात्रेण धरा विदारिता शार्दूलभीताज्जननीकराद् यदा | | verse_lines = तज्जन्ममात्रेण धरा विदारिता शार्दूलभीताज्जननीकराद् यदा ।¦पपात सञ्चूर्णित एव पर्वतस्तेनाखिलोऽसौ शतशृङ्गनामा ॥ ५५॥ | ||
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| verse_lines = तस्मिन् प्रजाते रुधिरं प्रसुस्रुवुर्महासुरा वाहनसैन्यसंयुताः | | verse_lines = तस्मिन् प्रजाते रुधिरं प्रसुस्रुवुर्महासुरा वाहनसैन्यसंयुताः ।¦नृपाश्च तत्पक्षभवाः समस्तास्तदा भीता असुरा राक्षसाश्च ॥ ५६॥ | ||
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| verse_lines = अवर्द्धतात्रैव वृकोदरो वने मुदं सुराणामभितः प्रवर्द्धयन् | | verse_lines = अवर्द्धतात्रैव वृकोदरो वने मुदं सुराणामभितः प्रवर्द्धयन् ।¦तदैव शेषो हरिणोदितोऽविशद् गर्भं सुताया अपि देवकस्य ॥ ५७॥ | ||
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| verse_lines = स तत्र मासत्रयमुष्य दुर्गयाऽपवाहितो रोहिणीगर्भमाशु | | verse_lines = स तत्र मासत्रयमुष्य दुर्गयाऽपवाहितो रोहिणीगर्भमाशु ।¦नियुक्तया केशवेनाथ तत्र स्थित्वा मासान् सप्त जातः पृथिव्याम् ॥ ५८॥ | ||
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| verse_lines = स नामतो बलदेवो बलाढ्यो बभूव तस्यानु जनार्दनः प्रभुः | | verse_lines = स नामतो बलदेवो बलाढ्यो बभूव तस्यानु जनार्दनः प्रभुः ।¦आविर्बभूवाखिलसद्गुणैकपूर्णः(जातः) सुतायामिह देवकस्य ॥ ५९॥ | ||
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| verse_lines = यः सत्सुखज्ञानबलैकदेहः समस्तदोषस्पर्शोज्झितः सदा | | verse_lines = यः सत्सुखज्ञानबलैकदेहः समस्तदोषस्पर्शोज्झितः सदा ।¦अव्यक्ततत्कार्यमयो न यस्य देहः कुतश्चित् क्वच स ह्यजो हरिः ॥ ६०॥ | ||
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| verse_lines = न शुक्लरक्तप्रभवोऽस्य कायस्तथाऽपि तत्पुत्रतयोच्यते मृषा | | verse_lines = न शुक्लरक्तप्रभवोऽस्य कायस्तथाऽपि तत्पुत्रतयोच्यते मृषा ।¦जनस्य मोहाय शरीरतोऽस्या यदाविरासीदमलस्वरूपः ॥ ६१॥ | ||
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| verse_lines = आविश्य पूर्वं वसुदेवमेव विवेश तस्मादृतुकाल एव | | verse_lines = आविश्य पूर्वं वसुदेवमेव विवेश तस्मादृतुकाल एव ।¦देवीमुवासात्र च सप्त मासान् सार्धांस्ततश्चाऽविरभूदजोऽपि ॥ ६२॥ | ||
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| verse_lines = यथा पुरा स्तम्भत आविरासीदशुक्लरक्तोऽपि नृसिंहरूपः | | verse_lines = यथा पुरा स्तम्भत आविरासीदशुक्लरक्तोऽपि नृसिंहरूपः ।¦तथैव कृष्णोऽपि तथाऽपि मातापितृक्रमादेव विमोहयत्यजः ॥ ६३॥ | ||
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| verse_lines = पितृक्रमं मोहनार्थं समेति न तावता शुक्लतो रक्ततश्च | | verse_lines = पितृक्रमं मोहनार्थं समेति न तावता शुक्लतो रक्ततश्च ।¦जातोऽस्य देहस्त्विति दर्शनाय सशङ्खचक्राब्जगदः स दृष्टः ॥ ६४॥ | ||
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| verse_lines = अनेकसूर्याभकिरीटयुक्तो विद्युत्प्रभे कुण्डले धारयंश्च | | verse_lines = अनेकसूर्याभकिरीटयुक्तो विद्युत्प्रभे कुण्डले धारयंश्च ।¦पीताम्बरो वनमाली स्वनन्तसूर्योरुदीप्तिर्ददृशे गुणार्णवः ॥ ६५॥ | ||
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| verse_lines = स कञ्जयोनिप्रमुखैः सुरैः स्तुतः पित्रा च मात्रा च जगाद शूरजम् | | verse_lines = स कञ्जयोनिप्रमुखैः सुरैः स्तुतः पित्रा च मात्रा च जगाद शूरजम् ।¦नयस्व मां नन्दगृहानिति स्म ततो बभूव द्विभुजो जनार्दनः ॥ ६६॥ | ||
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| verse_lines = तदैव जाता च हरेरनुज्ञया दुर्गाभिधा श्रीरनु नन्दपत्न्याम् | | verse_lines = तदैव जाता च हरेरनुज्ञया दुर्गाभिधा श्रीरनु नन्दपत्न्याम् ।¦ततस्तमादाय हरिं ययौ स शूरात्मजो नन्दगृहान् निशीथे ॥ ६७॥ | ||
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| verse_lines = सा तद्धस्तात् क्षिप्रमुत्पत्य देवी खेऽदृश्यतैवाष्टभुजा समग्रा | | verse_lines = सा तद्धस्तात् क्षिप्रमुत्पत्य देवी खेऽदृश्यतैवाष्टभुजा समग्रा ।¦ब्रह्मादिभिः पूज्यमाना समग्रैरत्यद्भुताकारवती हरिप्रिया ॥ ७०॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वा तयोक्तं तु तदैव कंसः पश्चात्तापाद् वसुदेवं सभार्यम् । | | verse_text = श्रुत्वा तयोक्तं तु तदैव कंसः पश्चात्तापाद् वसुदेवं सभार्यम् । | ||
| verse_lines = श्रुत्वा तयोक्तं तु तदैव कंसः पश्चात्तापाद् वसुदेवं सभार्यम् | | verse_lines = श्रुत्वा तयोक्तं तु तदैव कंसः पश्चात्तापाद् वसुदेवं सभार्यम् ।¦प्रसादयामास पुनःपुनश्च विहाय कोपं च तमूचतुस्तौ ।¦सुखस्य दुःखस्य च राजसिंह नान्यः कर्ता वासुदेवादिति स्म ॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = आनीय कंसोऽथ गृहे स्वमन्त्रिणः प्रोवाच कन्यावचनं समस्तम् । | | verse_text = आनीय कंसोऽथ गृहे स्वमन्त्रिणः प्रोवाच कन्यावचनं समस्तम् । | ||
| verse_lines = आनीय कंसोऽथ गृहे स्वमन्त्रिणः प्रोवाच कन्यावचनं समस्तम् | | verse_lines = आनीय कंसोऽथ गृहे स्वमन्त्रिणः प्रोवाच कन्यावचनं समस्तम् ।¦श्रुत्वा च ते प्रोचुरत्यन्तपापाः कार्यं बालानां निधनं सर्वशोऽपि ॥ ७४॥ | ||
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| verse_text = तथेति तांस्तत्र नियुज्य कंसो गृहं स्वकीयं प्रविवेश पापः । | | verse_text = तथेति तांस्तत्र नियुज्य कंसो गृहं स्वकीयं प्रविवेश पापः । | ||
| verse_lines = तथेति तांस्तत्र नियुज्य कंसो गृहं स्वकीयं प्रविवेश पापः | | verse_lines = तथेति तांस्तत्र नियुज्य कंसो गृहं स्वकीयं प्रविवेश पापः ।¦चेरुश्च ते बालवधे सदोद्यता हिंसाविहाराः सततं स्वभावतः ॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = अथ प्रभाते शयने शयानमपश्यतामब्जदलायताक्षम् । | | verse_text = अथ प्रभाते शयने शयानमपश्यतामब्जदलायताक्षम् । | ||
| verse_lines = अथ प्रभाते शयने शयानमपश्यतामब्जदलायताक्षम् | | verse_lines = अथ प्रभाते शयने शयानमपश्यतामब्जदलायताक्षम् ।¦कृष्णं यशोदा च तथैव नन्द आनन्दसान्द्राकृतिमप्रमेयम् ॥ ७६॥ | ||
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| verse_text = मेनात एतौ निजपुत्रमेनं स्रष्टारमब्जप्रभवस्य चेशम् । | | verse_text = मेनात एतौ निजपुत्रमेनं स्रष्टारमब्जप्रभवस्य चेशम् । | ||
| verse_lines = मेनात एतौ निजपुत्रमेनं स्रष्टारमब्जप्रभवस्य चेशम् | | verse_lines = मेनात एतौ निजपुत्रमेनं स्रष्टारमब्जप्रभवस्य चेशम् ।¦महोत्सवात् पूर्णमनाश्च नन्दो विप्रेभ्योऽदाल्लक्षमितास्तदा(तथा) गाः ॥ ७७॥ | ||
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| verse_text = सुवर्णरत्नाम्बरभूषणानां बहूनि गोजीविगणाधिनाथः । | | verse_text = सुवर्णरत्नाम्बरभूषणानां बहूनि गोजीविगणाधिनाथः । | ||
| verse_lines = सुवर्णरत्नाम्बरभूषणानां बहूनि गोजीविगणाधिनाथः | | verse_lines = सुवर्णरत्नाम्बरभूषणानां बहूनि गोजीविगणाधिनाथः ।¦प्रादादथोपायनपाणयस्तं गोपा यशोदां च मुदा स्त्रियोऽगमन् ॥ ७८॥ | ||
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| verse_text = गतेषु तत्रैव दिनेषु केषुचिज्जगाम कंसस्य गृहं स नन्दः । | | verse_text = गतेषु तत्रैव दिनेषु केषुचिज्जगाम कंसस्य गृहं स नन्दः । | ||
| verse_lines = गतेषु तत्रैव दिनेषु केषुचिज्जगाम कंसस्य गृहं स नन्दः | | verse_lines = गतेषु तत्रैव दिनेषु केषुचिज्जगाम कंसस्य गृहं स नन्दः ।¦पूर्वं हि नन्दः स करं हि दातुं बृहद्वनान्निस्सृतः प्राप कृष्णाम् ॥ ७९॥ | ||
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| verse_text = सहाऽगता तेन तदा यशोदा सुषाव दुर्गामथ तत्र शौरिः । | | verse_text = सहाऽगता तेन तदा यशोदा सुषाव दुर्गामथ तत्र शौरिः । | ||
| verse_lines = सहाऽगता तेन तदा यशोदा सुषाव दुर्गामथ तत्र शौरिः | | verse_lines = सहाऽगता तेन तदा यशोदा सुषाव दुर्गामथ तत्र शौरिः ।¦निधाय कृष्णं प्रतिगृह्य कन्यकां गृहं ययौ नन्द उवास तत्र ॥ ८०॥ | ||
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| verse_text = निरुष्य तस्मिन् यमुनातटे स मासं ययौ द्रष्टुकामो नरेन्द्रम् । | | verse_text = निरुष्य तस्मिन् यमुनातटे स मासं ययौ द्रष्टुकामो नरेन्द्रम् । | ||
| verse_lines = निरुष्य तस्मिन् यमुनातटे स मासं ययौ द्रष्टुकामो नरेन्द्रम् | | verse_lines = निरुष्य तस्मिन् यमुनातटे स मासं ययौ द्रष्टुकामो नरेन्द्रम् ।¦राज्ञेऽथ तं दत्तकरं ददर्श शूरात्मजो वाक्यमुवाच चैनम् ॥ ८१॥ | ||
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| verse_text = याह्युत्पाताः सन्ति तत्रेत्युदीरितो जगाम शीघ्रं यमुनां स नन्दः । | | verse_text = याह्युत्पाताः सन्ति तत्रेत्युदीरितो जगाम शीघ्रं यमुनां स नन्दः । | ||
| verse_lines = याह्युत्पाताः सन्ति तत्रेत्युदीरितो जगाम शीघ्रं यमुनां स नन्दः | | verse_lines = याह्युत्पाताः सन्ति तत्रेत्युदीरितो जगाम शीघ्रं यमुनां स नन्दः ।¦रात्रावेवाऽगच्छमाने तु नन्दे कंसस्य धात्री तु जगाम गोष्ठम् ॥ ८२॥ | ||
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| verse_text = सा पूतना नाम निजस्वरूपमाच्छाद्य रात्रौ शुभरूपवच्च । | | verse_text = सा पूतना नाम निजस्वरूपमाच्छाद्य रात्रौ शुभरूपवच्च । | ||
| verse_lines = सा पूतना नाम निजस्वरूपमाच्छाद्य रात्रौ शुभरूपवच्च | | verse_lines = सा पूतना नाम निजस्वरूपमाच्छाद्य रात्रौ शुभरूपवच्च ।¦विवेश नन्दस्य गृहं बृहद्वनप्रान्ते हि मार्गे रचितं प्रयाणे ॥ ८३॥ | ||
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| verse_text = तीरे भगिन्यास्तु यमस्य वस्त्रगृहे शयानं पुरुषोत्तमं तम् । | | verse_text = तीरे भगिन्यास्तु यमस्य वस्त्रगृहे शयानं पुरुषोत्तमं तम् । | ||
| verse_lines = तीरे भगिन्यास्तु यमस्य वस्त्रगृहे शयानं पुरुषोत्तमं तम् | | verse_lines = तीरे भगिन्यास्तु यमस्य वस्त्रगृहे शयानं पुरुषोत्तमं तम् ।¦जग्राह मात्रा तु यशोदया तया निद्रायुजा प्रेक्ष्यमाणा शुभेव ॥ ८४॥ | ||
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| verse_text = तन्मायया धर्षिता निद्रया च न्यवारयन्नैव हि नन्दजाया । | | verse_text = तन्मायया धर्षिता निद्रया च न्यवारयन्नैव हि नन्दजाया । | ||
| verse_lines = तन्मायया धर्षिता निद्रया च न्यवारयन्नैव हि नन्दजाया | | verse_lines = तन्मायया धर्षिता निद्रया च न्यवारयन्नैव हि नन्दजाया ।¦तया प्रदत्तं स्तनमीशिताऽसुभिः पपौ सहैवाऽशु जनार्दनः प्रभुः ॥ ८५॥ | ||
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| verse_text = मृता स्वरूपेण सुभीषणेन पपात सा व्याप्य वनं समस्तम् । | | verse_text = मृता स्वरूपेण सुभीषणेन पपात सा व्याप्य वनं समस्तम् । | ||
| verse_lines = मृता स्वरूपेण सुभीषणेन पपात सा व्याप्य वनं समस्तम् | | verse_lines = मृता स्वरूपेण सुभीषणेन पपात सा व्याप्य वनं समस्तम् ।¦तदाऽऽगमन्नन्दगोपोऽपि तत्र दृष्ट्वा च सर्वेऽप्यभवन् सुविस्मिताः ॥ ८६॥ | ||
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| verse_text = सा ताटका चोर्वशिसम्प्रविष्टा कृष्णावध्यानान्निरयं जगाम । | | verse_text = सा ताटका चोर्वशिसम्प्रविष्टा कृष्णावध्यानान्निरयं जगाम । | ||
| verse_lines = सा ताटका चोर्वशिसम्प्रविष्टा कृष्णावध्यानान्निरयं जगाम | | verse_lines = सा ताटका चोर्वशिसम्प्रविष्टा कृष्णावध्यानान्निरयं जगाम ।¦सा तूर्वशी कृष्णभुक्तस्तनेन पूता स्वर्गं प्रययौ तत्क्षणेन ॥ ८७॥ | ||
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| verse_text = सा तुम्बुरोः सङ्गत आविवेश रक्षस्तनुं शापतो वित्तपस्य । | | verse_text = सा तुम्बुरोः सङ्गत आविवेश रक्षस्तनुं शापतो वित्तपस्य । | ||
| verse_lines = सा तुम्बुरोः सङ्गत आविवेश रक्षस्तनुं शापतो वित्तपस्य | | verse_lines = सा तुम्बुरोः सङ्गत आविवेश रक्षस्तनुं शापतो वित्तपस्य ।¦कृष्णस्पर्शाच्छुद्धरूपा पुनर्दिवं ययौ तुष्टे किमलभ्यं रमेशे ॥ ८८॥ | ||
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| verse_lines = यदाऽऽप देवश्चतुरः स मासांस्तदोपनिष्क्रामणमस्य चाऽसीत् | | verse_lines = यदाऽऽप देवश्चतुरः स मासांस्तदोपनिष्क्रामणमस्य चाऽसीत् ।¦जन्मर्क्षमस्मिन् दिन एव चाऽसीत् प्रातः किञ्चित् तत्र महोत्सवोऽभूत् ॥ ८९॥ | ||
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| verse_text = तदा शयानः शकटस्य सोऽधः पदाऽक्षिपत् तं दितिजं निहन्तुम् । | | verse_text = तदा शयानः शकटस्य सोऽधः पदाऽक्षिपत् तं दितिजं निहन्तुम् । | ||
| verse_lines = तदा शयानः शकटस्य सोऽधः पदाऽक्षिपत् तं दितिजं निहन्तुम् | | verse_lines = तदा शयानः शकटस्य सोऽधः पदाऽक्षिपत् तं दितिजं निहन्तुम् ।¦अनः समाविश्य दितेः सुतोऽसौ स्थितः प्रतीपाय हरेः सुपापः ॥ ९०॥ | ||
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| verse_lines = क्षिप्तोऽनसिस्थः शकटाक्षनामा स विष्णुनेत्वा सहितः पपात | | verse_lines = क्षिप्तोऽनसिस्थः शकटाक्षनामा स विष्णुनेत्वा सहितः पपात ।¦ममार चाऽशु प्रतिभग्नगात्रो व्यत्यस्तचक्राक्षमभूदनश्च ॥ ९१॥ | ||
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| verse_text = ससम्भ्रमात् तं प्रतिगृह्य शङ्क्या कृष्णं यशोदा द्विजवर्यसूक्तिभिः । | | verse_text = ससम्भ्रमात् तं प्रतिगृह्य शङ्क्या कृष्णं यशोदा द्विजवर्यसूक्तिभिः । | ||
| verse_lines = ससम्भ्रमात् तं प्रतिगृह्य शङ्क्या कृष्णं यशोदा द्विजवर्यसूक्तिभिः | | verse_lines = ससम्भ्रमात् तं प्रतिगृह्य शङ्क्या कृष्णं यशोदा द्विजवर्यसूक्तिभिः ।¦सा स्नापयामास नदीतटात् तदा समागता नन्दवचोऽभितर्जिता ॥ ९२॥ | ||
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| verse_text = हत्वा तु तं कंसभृत्यं स कृष्णः शिश्ये पुनः शिशुवत् सर्वशास्ता । | | verse_text = हत्वा तु तं कंसभृत्यं स कृष्णः शिश्ये पुनः शिशुवत् सर्वशास्ता । | ||
| verse_lines = हत्वा तु तं कंसभृत्यं स कृष्णः शिश्ये पुनः शिशुवत् सर्वशास्ता | | verse_lines = हत्वा तु तं कंसभृत्यं स कृष्णः शिश्ये पुनः शिशुवत् सर्वशास्ता ।¦एवं गोपान् प्रीणयन् बालकेलीविनोदतो न्यवसत् तत्र देवः ॥ ९३॥ | ||
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| verse_text = विवर्द्धमाने लोकदृष्ट्यैव कृष्णे पाण्डुः पुनः प्राह पृथामिदं वचः । | | verse_text = विवर्द्धमाने लोकदृष्ट्यैव कृष्णे पाण्डुः पुनः प्राह पृथामिदं वचः । | ||
| verse_lines = विवर्द्धमाने लोकदृष्ट्यैव कृष्णे पाण्डुः पुनः प्राह पृथामिदं वचः | | verse_lines = विवर्द्धमाने लोकदृष्ट्यैव कृष्णे पाण्डुः पुनः प्राह पृथामिदं वचः ।¦धर्मिष्ठो नौ सूनुरग्रे बभूव बलद्वयज्येष्ठ उतापरश्च ॥ ९४॥ | ||
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| verse_text = यदैक एवातिबलोपपन्नो भवेत् तदा तेन परावमर्दे । | | verse_text = यदैक एवातिबलोपपन्नो भवेत् तदा तेन परावमर्दे । | ||
| verse_lines = यदैक एवातिबलोपपन्नो भवेत् तदा तेन परावमर्दे | | verse_lines = यदैक एवातिबलोपपन्नो भवेत् तदा तेन परावमर्दे ।¦प्रवर्त्यमाने स्वपुरं हरेयुश्चौर्यात् परे तद् द्वयमत्र योग्यम् ॥ ९५॥ | ||
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| verse_text = शस्त्रास्त्रविद् वीर्यवान् नौ सुतोऽन्यो भवेद् देवं तादृशमाह्वयातः । | | verse_text = शस्त्रास्त्रविद् वीर्यवान् नौ सुतोऽन्यो भवेद् देवं तादृशमाह्वयातः । | ||
| verse_lines = शस्त्रास्त्रविद् वीर्यवान् नौ सुतोऽन्यो भवेद् देवं तादृशमाह्वयातः | | verse_lines = शस्त्रास्त्रविद् वीर्यवान् नौ सुतोऽन्यो भवेद् देवं तादृशमाह्वयातः ।¦शेषस्तव भ्रातृसुतोऽभिजातस्तस्मान्नासौ सुतदानाय योग्यः ॥ ९६॥ | ||
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| verse_lines = नवै सुपर्णः सुतदो नरेषु प्रजायते वाऽस्य यतस्तथाऽऽज्ञा | | verse_lines = नवै सुपर्णः सुतदो नरेषु प्रजायते वाऽस्य यतस्तथाऽऽज्ञा ।¦कृता पुरा हरिणा शङ्करस्तु क्रोधात्मकः पालने नैव योग्यः ॥ ९७॥ | ||
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| verse_lines = अतो महेन्द्रो बलवाननन्तरस्तेषां समाह्वानमिहार्हति स्वराट् | | verse_lines = अतो महेन्द्रो बलवाननन्तरस्तेषां समाह्वानमिहार्हति स्वराट् ।¦इतीरिता साऽऽह्वयदाशु वासवं ततः प्रजज्ञे स्वयमेव शक्रः ॥ ९८॥ | ||
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| verse_lines = स चार्जुनो नाम नरांशयुक्तो विष्ण्वावेशी बलवानस्त्रवेत्ता | | verse_lines = स चार्जुनो नाम नरांशयुक्तो विष्ण्वावेशी बलवानस्त्रवेत्ता ।¦रूप्यन्यः स्यात् सूनुरित्युच्यमाना भर्त्रा कुन्ती नेति तं प्राह धर्मात् ॥ ९९॥ | ||
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| verse_lines = बृहस्पतिः पूर्वमभूद्धरेः पदं संसेवितुं पवनावेशयुक्तः | | verse_lines = बृहस्पतिः पूर्वमभूद्धरेः पदं संसेवितुं पवनावेशयुक्तः ।¦स उद्धवो नाम यदुप्रवीराज्जातो विद्वानुपगवनामधेयात् ॥ १००॥ | ||
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| verse_lines = बृहस्पतेरेव स सर्वविद्या अवाप मन्त्री निपुणः सर्ववेत्ता | | verse_lines = बृहस्पतेरेव स सर्वविद्या अवाप मन्त्री निपुणः सर्ववेत्ता ।¦वर्षत्रये तत्परतः स सात्यकिर्जज्ञे दिने चेकितानश्च तस्मिन् ॥ १०२॥ | ||
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| verse_text = यदा हि पुत्रान् विनिहन्तुमेतौ सहैव बद्धौ गतिशृङ्खलायाम् । | | verse_text = यदा हि पुत्रान् विनिहन्तुमेतौ सहैव बद्धौ गतिशृङ्खलायाम् । | ||
| verse_lines = यदा हि पुत्रान् विनिहन्तुमेतौ सहैव बद्धौ गतिशृङ्खलायाम् | | verse_lines = यदा हि पुत्रान् विनिहन्तुमेतौ सहैव बद्धौ गतिशृङ्खलायाम् ।¦कंसेनापापौ देवकीशूरपुत्रौ वियोजिताः शौरिभार्याः पराश्च ॥ १०७॥ | ||
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| verse_text = विनिश्चयार्थं देवकीगर्भजानामन्या भार्या धृतगर्भाः स कंसः । | | verse_text = विनिश्चयार्थं देवकीगर्भजानामन्या भार्या धृतगर्भाः स कंसः । | ||
| verse_lines = विनिश्चयार्थं देवकीगर्भजानामन्या भार्या धृतगर्भाः स कंसः | | verse_lines = विनिश्चयार्थं देवकीगर्भजानामन्या भार्या धृतगर्भाः स कंसः ।¦स्थानान्तरे प्रसवो यावदासां संस्थापयामास सुपापबुद्धिः ॥ १०८॥ | ||
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| Line 11,504: | Line 11,504: | ||
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| verse_text = हेतोरेतस्माद् रोहिणी नन्दगेहे प्रसूत्यर्थं स्थापिता तेन देवी । | | verse_text = हेतोरेतस्माद् रोहिणी नन्दगेहे प्रसूत्यर्थं स्थापिता तेन देवी । | ||
| verse_lines = हेतोरेतस्माद् रोहिणी नन्दगेहे प्रसूत्यर्थं स्थापिता तेन देवी | | verse_lines = हेतोरेतस्माद् रोहिणी नन्दगेहे प्रसूत्यर्थं स्थापिता तेन देवी ।¦लेभे पुत्रं गोकुले पूर्णचन्द्रकान्ताननं बलभद्रं सुशुभ्रम् ॥ १०९॥ | ||
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| verse_text = यदा त्रिमासः स बभूव देवस्तदाऽऽविरासीत् पुरुषोत्तमोऽजः । | | verse_text = यदा त्रिमासः स बभूव देवस्तदाऽऽविरासीत् पुरुषोत्तमोऽजः । | ||
| verse_lines = यदा त्रिमासः स बभूव देवस्तदाऽऽविरासीत् पुरुषोत्तमोऽजः | | verse_lines = यदा त्रिमासः स बभूव देवस्तदाऽऽविरासीत् पुरुषोत्तमोऽजः ।¦तौ कृष्णशेषावाप्तुकामौ सुतौ हि तपश्चक्राते देवकीशूरपुत्रौ ॥ ११०॥ | ||
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| verse_text = विष्ण्वावेशी बलवान् यो गुणाधिकः स मे सुतः स्यादिति रोहिणी च । | | verse_text = विष्ण्वावेशी बलवान् यो गुणाधिकः स मे सुतः स्यादिति रोहिणी च । | ||
| verse_lines = विष्ण्वावेशी बलवान् यो गुणाधिकः स मे सुतः स्यादिति रोहिणी च | | verse_lines = विष्ण्वावेशी बलवान् यो गुणाधिकः स मे सुतः स्यादिति रोहिणी च ।¦तेपे तपोऽतो हरिशुक्लकेशयुतः शेषो देवकीरोहिणीजः ॥ १११॥ | ||
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| verse_text = अवर्द्धतासौ हरिशुक्लकेशसमावेशी गोकुले रौहिणेयः । | | verse_text = अवर्द्धतासौ हरिशुक्लकेशसमावेशी गोकुले रौहिणेयः । | ||
| verse_lines = अवर्द्धतासौ हरिशुक्लकेशसमावेशी गोकुले रौहिणेयः | | verse_lines = अवर्द्धतासौ हरिशुक्लकेशसमावेशी गोकुले रौहिणेयः ।¦कृष्णोऽपि लीला ललिताः प्रदर्शयन् बलद्वितीयो रमयामास गोष्ठम् ॥ ११२॥ | ||
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| verse_text = स प्राकृतं शिशुमात्मनमुच्चैर्विजानन्त्या मातुरादर्शनाय । | | verse_text = स प्राकृतं शिशुमात्मनमुच्चैर्विजानन्त्या मातुरादर्शनाय । | ||
| verse_lines = स प्राकृतं शिशुमात्मनमुच्चैर्विजानन्त्या मातुरादर्शनाय | | verse_lines = स प्राकृतं शिशुमात्मनमुच्चैर्विजानन्त्या मातुरादर्शनाय ।¦विजृम्भमाणोऽखिलमात्मसंस्थं प्रदर्शयामास कदाचिदीशः ॥ ११३॥ | ||
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| verse_text = साऽण्डं महाभूतमनोऽभिमानमहत्प्रकृत्यावृतमब्जजादिभिः । | | verse_text = साऽण्डं महाभूतमनोऽभिमानमहत्प्रकृत्यावृतमब्जजादिभिः । | ||
| verse_lines = साऽण्डं महाभूतमनोऽभिमानमहत्प्रकृत्यावृतमब्जजादिभिः | | verse_lines = साऽण्डं महाभूतमनोऽभिमानमहत्प्रकृत्यावृतमब्जजादिभिः ।¦सुरैः शिवेतैर्नरदैत्यसङ्घैर्युतं ददर्शास्य तनौ यशोदा ॥ ११४॥ | ||
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| verse_text = न्यमीलयच्चाक्षिणी भीतभीता जुगूह चाऽत्मानमथो रमेशः । | | verse_text = न्यमीलयच्चाक्षिणी भीतभीता जुगूह चाऽत्मानमथो रमेशः । | ||
| verse_lines = न्यमीलयच्चाक्षिणी भीतभीता जुगूह चाऽत्मानमथो रमेशः | | verse_lines = न्यमीलयच्चाक्षिणी भीतभीता जुगूह चाऽत्मानमथो रमेशः ।¦वपुः स्वकीयं सुखचित्स्वरूपं पूर्णं सत्सु ज्ञापयंस्तद्ध्यदर्शयत् ॥ ११५॥ | ||
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| verse_text = कदाचित् तं लालयन्ती यशोदा वोढुं नाशक्नोद् भूरिभाराधिकार्ता । | | verse_text = कदाचित् तं लालयन्ती यशोदा वोढुं नाशक्नोद् भूरिभाराधिकार्ता । | ||
| verse_lines = कदाचित् तं लालयन्ती यशोदा वोढुं नाशक्नोद् भूरिभाराधिकार्ता | | verse_lines = कदाचित् तं लालयन्ती यशोदा वोढुं नाशक्नोद् भूरिभाराधिकार्ता ।¦निधाय तं भूमितले स्वकर्म यदा चक्रे दैत्य आगात् सुघोरः ॥ ११६॥ | ||
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| verse_text = तृणावर्तो नामतः कंसभृत्यः सृष्ट्वाऽत्युग्रं चक्रवातं शिशुं तम् । | | verse_text = तृणावर्तो नामतः कंसभृत्यः सृष्ट्वाऽत्युग्रं चक्रवातं शिशुं तम् । | ||
| verse_lines = तृणावर्तो नामतः कंसभृत्यः सृष्ट्वाऽत्युग्रं चक्रवातं शिशुं तम् | | verse_lines = तृणावर्तो नामतः कंसभृत्यः सृष्ट्वाऽत्युग्रं चक्रवातं शिशुं तम् ।¦आदायाऽगा(या)दन्तरिक्षं स तेन शस्तः कण्ठग्राहसंरुद्धवायुः ॥ ११७॥ | ||
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| verse_text = पपात कृष्णेन हतः शिलातळे तृणावर्तः पर्वतोदग्रदेहः । | | verse_text = पपात कृष्णेन हतः शिलातळे तृणावर्तः पर्वतोदग्रदेहः । | ||
| verse_lines = पपात कृष्णेन हतः शिलातळे तृणावर्तः पर्वतोदग्रदेहः | | verse_lines = पपात कृष्णेन हतः शिलातळे तृणावर्तः पर्वतोदग्रदेहः ।¦सुविस्मयं चाऽपुरथो जनास्ते तृणावर्तं वीक्ष्य सञ्चूर्णिताङ्गम् ॥ ११८॥ | ||
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| verse_text = अक्रुद्ध्यतां केशवोऽनुग्रहाय शुभं स्वयोग्यादधिकं निहन्तुम् । | | verse_text = अक्रुद्ध्यतां केशवोऽनुग्रहाय शुभं स्वयोग्यादधिकं निहन्तुम् । | ||
| verse_lines = अक्रुद्ध्यतां केशवोऽनुग्रहाय शुभं स्वयोग्यादधिकं निहन्तुम् | | verse_lines = अक्रुद्ध्यतां केशवोऽनुग्रहाय शुभं स्वयोग्यादधिकं निहन्तुम् ।¦स क्रुद्ध्यतां नवनीतादि मृष्णंश्चचार देवो निजसत्सुखाम्बुधिः ॥ ११९॥ | ||
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| verse_text = यस्मिन्नब्दे भाद्रपदे स मासे सिंहस्थयोर्गुरुरव्योः परेशः । | | verse_text = यस्मिन्नब्दे भाद्रपदे स मासे सिंहस्थयोर्गुरुरव्योः परेशः । | ||
| verse_lines = यस्मिन्नब्दे भाद्रपदे स मासे सिंहस्थयोर्गुरुरव्योः परेशः | | verse_lines = यस्मिन्नब्दे भाद्रपदे स मासे सिंहस्थयोर्गुरुरव्योः परेशः ।¦उदैत् ततः फाल्गुने फल्गुनोऽभूद् गते ततो माद्रवती बभाषे ॥ १२०॥ | ||
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| verse_lines = जाताः सुतास्ते प्रवराः पृथायामेकाऽनपत्याऽहमतः प्रसादात् | | verse_lines = जाताः सुतास्ते प्रवराः पृथायामेकाऽनपत्याऽहमतः प्रसादात् ।¦तवैव भूयासमहं सुतेता विधत्स्व कुन्तीं मम मन्त्रदात्रीम् ॥ १२१॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितः प्राह पृथां स माद्र्यै दिशस्व मन्त्रं सुतदं वरिष्ठम् | | verse_lines = इतीरितः प्राह पृथां स माद्र्यै दिशस्व मन्त्रं सुतदं वरिष्ठम् ।¦इत्यूचिवांसं पतिमाह यादवी दद्यां त्वदर्थे तु सकृत्फलाय ॥ १२२॥ | ||
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| verse_lines = उवाच माद्र्यै सुतदं मनुं च पुनः फलं ते न भविष्यतीति | | verse_lines = उवाच माद्र्यै सुतदं मनुं च पुनः फलं ते न भविष्यतीति ।¦मन्त्रं समादाय च मद्रपुत्री व्यचिन्तयत् स्यां नु कथं द्विपुत्रा ॥ १२३॥ | ||
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| verse_lines = सदाऽवियोगो दिविजेषु दस्रौ नचैतयोर्नामभेदः | | verse_lines = सदाऽवियोगो दिविजेषु दस्रौ नचैतयोर्नामभेदः क्वचिद्धि।¦एका भार्या सैतयोरप्युषा हि तदाऽऽयातः सकृदावर्तनाद् द्वौ ॥ १२४॥ | ||
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| verse_lines = इतीक्षन्त्याऽऽकारितावश्विनौ तौ शीघ्रं प्राप्तौ पुत्रकौ तत्प्रसूतौ | | verse_lines = इतीक्षन्त्याऽऽकारितावश्विनौ तौ शीघ्रं प्राप्तौ पुत्रकौ तत्प्रसूतौ ।¦तावेव देवौ नकुलः पूर्वजातः सहदेवोऽभूत् पश्चिमस्तौ यमौ हि (च) ॥ १२५॥ | ||
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| verse_lines = पुनर्मनोः फलवत्त्वाय माद्री सम्प्रार्थयामास पतिं तदुक्ता | | verse_lines = पुनर्मनोः फलवत्त्वाय माद्री सम्प्रार्थयामास पतिं तदुक्ता ।¦पृथाऽवादीत् कुटिलैषा मदाज्ञामृते देवावाह्वयामास दस्रौ ॥ १२६॥ | ||
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| verse_lines = अतो विरोधं च मदात्मजानां कुर्यादेषेत्येव भीतां न मां त्वम् | | verse_lines = अतो विरोधं च मदात्मजानां कुर्यादेषेत्येव भीतां न मां त्वम् ।¦नियोक्तुमर्हः पुनरेव राजन्नितीरितोऽसौ विरराम क्षितीशः ॥ १२७॥ | ||
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| verse_lines = विशेषनाम्नैव समाहुताः सुरा (सुतान्) दद्युः सुरा इत्यविशेषितं ययोः | | verse_lines = विशेषनाम्नैव समाहुताः सुरा (सुतान्) दद्युः सुरा इत्यविशेषितं ययोः ।¦विशेषनामापि समाह्वयत् तौ मन्त्रावृत्तिर्नामभेदेऽस्य चोक्ता ॥ १२८॥ | ||
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| verse_lines = युधिष्ठिराद्येषु चतुर्षु वायुः समाविष्टः फल्गुनेऽथो विशेषात् | | verse_lines = युधिष्ठिराद्येषु चतुर्षु वायुः समाविष्टः फल्गुनेऽथो विशेषात् ।¦युधिष्ठिरे सौम्यरूपेण विष्टो वीरेण रूपेण धनञ्जयेऽसौ ॥ १२९॥ | ||
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| verse_lines = शृङ्गाररूपं केवलं दर्शयानो विवेश वायुर्यमजौ प्रधानः | | verse_lines = शृङ्गाररूपं केवलं दर्शयानो विवेश वायुर्यमजौ प्रधानः ।¦शृङ्गारकैवल्यमभीप्समानः पाण्डुर्हि पुत्रं चकमे चतुर्थम् ॥ १३०॥ | ||
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| verse_lines = शृङ्गाररूपो नकुले विशेषात् सुनीतिरूपः सहदेवं विवेश | | verse_lines = शृङ्गाररूपो नकुले विशेषात् सुनीतिरूपः सहदेवं विवेश ।¦गुणैः समस्तैः स्वयमेव वायुर्बभूव भीमो जगदान्तरात्मा ॥ १३१॥ | ||
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| verse_lines = सुपुल्लवाकारतनुर्हि कोमळः प्रायो जनैः प्रोच्यते रूपशाली | | verse_lines = सुपुल्लवाकारतनुर्हि कोमळः प्रायो जनैः प्रोच्यते रूपशाली ।¦ततः सुजातं वरवज्रकायौ भीमार्जुनावप्यृते पाण्डुरैच्छत् ॥ १३२॥ | ||
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| verse_lines = अप्राकृतानां तु मनोहरं यद् रूपं द्वात्रिंशल्लक्षणोपेतमग्र्यम् | | verse_lines = अप्राकृतानां तु मनोहरं यद् रूपं द्वात्रिंशल्लक्षणोपेतमग्र्यम् ।¦तन्मारुतो नकुले कोमलाभ एवं वायुः पञ्चरूपोऽत्र चाऽसीत् ॥ १३३॥ | ||
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<span id="gr-C13" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रयोदशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C13" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रयोदशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ गर्गः शूरसुतोक्त्या व्रजमायात् सात्त्वतां पुरोधास्सः । | | verse_text = औं ॥ गर्गः शूरसुतोक्त्या व्रजमायात् सात्त्वतां पुरोधास्सः । | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = स कदाचिच्छिशुभावं कुर्वन्त्या मातुरात्मनो भूयः । | | verse_text = स कदाचिच्छिशुभावं कुर्वन्त्या मातुरात्मनो भूयः । | ||
| verse_lines = स कदाचिच्छिशुभावं कुर्वन्त्या मातुरात्मनो भूयः | | verse_lines = स कदाचिच्छिशुभावं कुर्वन्त्या मातुरात्मनो भूयः ।¦अपनेतुं परमेशो मृदं जघासेक्षतां वयस्यानाम् ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = मात्रोपालब्ध ईशो मुखविवृतिमकर्नाम्ब मृद्भक्षिताऽहं । | | verse_text = मात्रोपालब्ध ईशो मुखविवृतिमकर्नाम्ब मृद्भक्षिताऽहं । | ||
| verse_lines = मात्रोपालब्ध ईशो मुखविवृतिमकर्नाम्ब मृद्भक्षिताऽहं | | verse_lines = मात्रोपालब्ध ईशो मुखविवृतिमकर्नाम्ब मृद्भक्षिताऽहं ।¦पश्येत्यास्यान्तरे तु प्रकृतिविकृतियुक् सा जगत् पर्यपश्यत् ।¦इत्थं देवोऽत्यचिन्त्यामपरदुरधिगां शक्तिमुच्चां प्रदर्श्य प्रायो ज्ञातात्मतत्त्वां पुनरपि भगवानावृणोदात्मशक्त्या ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = इति प्रभुः स लीलया हरिर्जगद् विडम्बयन् । | | verse_text = इति प्रभुः स लीलया हरिर्जगद् विडम्बयन् । | ||
| verse_lines = इति प्रभुः स लीलया हरिर्जगद् विडम्बयन् | | verse_lines = इति प्रभुः स लीलया हरिर्जगद् विडम्बयन् ।¦चचार गोष्ठमण्डलेऽप्यनन्तसौख्यचिद्धनः ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = कदाचिदीश्वरः स्तनं पिबन् यशोदया पयः । | | verse_text = कदाचिदीश्वरः स्तनं पिबन् यशोदया पयः । | ||
| verse_lines = कदाचिदीश्वरः स्तनं पिबन् यशोदया पयः | | verse_lines = कदाचिदीश्वरः स्तनं पिबन् यशोदया पयः ।¦सृतं (शृतं) निधातुमुज्झितो बभञ्ज दध्यमत्रकम् ॥ ७॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = (स) प्रमथ्यमानदध्युरुप्रजातमिन्दुसन्निभम् । | | verse_text = (स) प्रमथ्यमानदध्युरुप्रजातमिन्दुसन्निभम् । | ||
| verse_lines = (स) प्रमथ्यमानदध्युरुप्रजातमिन्दुसन्निभम् | | verse_lines = (स) प्रमथ्यमानदध्युरुप्रजातमिन्दुसन्निभम् ।¦नवं हि नीतमाददे रहो जघास चेशिता ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = प्रजायते हि यत्कुले यथा युगं यथा वयः । | | verse_text = प्रजायते हि यत्कुले यथा युगं यथा वयः । | ||
| verse_lines = प्रजायते हि यत्कुले यथा युगं यथा वयः | | verse_lines = प्रजायते हि यत्कुले यथा युगं यथा वयः ।¦तथा प्रवर्तनं भवेद् दिवौकसां समुद्भवे ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = इति स्वधर्ममुत्तमं दिवौकसां प्रदर्शयन् । | | verse_text = इति स्वधर्ममुत्तमं दिवौकसां प्रदर्शयन् । | ||
| verse_lines = इति स्वधर्ममुत्तमं दिवौकसां प्रदर्शयन् | | verse_lines = इति स्वधर्ममुत्तमं दिवौकसां प्रदर्शयन् ।¦अधर्मपावकोऽपि सन् विडम्बते जनार्दनः ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = नृतिर्यगादिरूपकः स बाल्ययौवनादि यत् । | | verse_text = नृतिर्यगादिरूपकः स बाल्ययौवनादि यत् । | ||
| verse_lines = नृतिर्यगादिरूपकः स बाल्ययौवनादि यत् | | verse_lines = नृतिर्यगादिरूपकः स बाल्ययौवनादि यत् ।¦क्रियाश्च तत्तदुद्भवाः करोति शाश्वतोऽपि सन् ॥ ११॥ | ||
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| verse_text = स विप्रराजगोपकस्वरूपकस्तदुद्भवाः । | | verse_text = स विप्रराजगोपकस्वरूपकस्तदुद्भवाः । | ||
| verse_lines = स विप्रराजगोपकस्वरूपकस्तदुद्भवाः | | verse_lines = स विप्रराजगोपकस्वरूपकस्तदुद्भवाः ।¦तदा तदा विचेष्टते क्रियाः सुरान् विशिक्षयन् ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = तथाऽप्यनन्यदेवतासमं निजं बलं प्रभुः । | | verse_text = तथाऽप्यनन्यदेवतासमं निजं बलं प्रभुः । | ||
| verse_lines = तथाऽप्यनन्यदेवतासमं निजं बलं प्रभुः | | verse_lines = तथाऽप्यनन्यदेवतासमं निजं बलं प्रभुः ।¦प्रकाशयन् पुनः पुनः प्रदर्शयत्यजो गुणान् ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = अथाऽत्तयष्टिमीक्ष्य तां स्वमातरं जगद्गुरुः । | | verse_text = अथाऽत्तयष्टिमीक्ष्य तां स्वमातरं जगद्गुरुः । | ||
| verse_lines = अथाऽत्तयष्टिमीक्ष्य तां स्वमातरं जगद्गुरुः | | verse_lines = अथाऽत्तयष्टिमीक्ष्य तां स्वमातरं जगद्गुरुः ।¦प्रपुप्लुवे तमन्वयान्मनोविदूरमङ्गना ॥ १४॥ | ||
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| verse_lines = पुनः समीक्ष्य तच्छ्रमं जगाम तत्करग्रहम् | | verse_lines = पुनः समीक्ष्य तच्छ्रमं जगाम तत्करग्रहम् ।¦प्रभुः स्वभक्तवश्यतां प्रकाशयन्नुरुक्रमः ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = सदा विमुक्तमीश्वरं निबद्धुमञ्जसाऽऽददे । | | verse_text = सदा विमुक्तमीश्वरं निबद्धुमञ्जसाऽऽददे । | ||
| verse_lines = सदा विमुक्तमीश्वरं निबद्धुमञ्जसाऽऽददे | | verse_lines = सदा विमुक्तमीश्वरं निबद्धुमञ्जसाऽऽददे ।¦यदैव दाम गोपिका न तत् पुपूर तं प्रति ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = समस्तदामसञ्चयः सुसन्धितोऽप्यपूर्णताम् । | | verse_text = समस्तदामसञ्चयः सुसन्धितोऽप्यपूर्णताम् । | ||
| verse_lines = समस्तदामसञ्चयः सुसन्धितोऽप्यपूर्णताम् | | verse_lines = समस्तदामसञ्चयः सुसन्धितोऽप्यपूर्णताम् ।¦ययावनन्तविग्रहे शिशुत्वसम्प्रदर्शके ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = अबन्धयोग्यतां प्रभुः प्रदर्श्य लीलया पुनः । | | verse_text = अबन्धयोग्यतां प्रभुः प्रदर्श्य लीलया पुनः । | ||
| verse_lines = अबन्धयोग्यतां प्रभुः प्रदर्श्य लीलया पुनः | | verse_lines = अबन्धयोग्यतां प्रभुः प्रदर्श्य लीलया पुनः ।¦स एकवत्सपाशकान्तरं गतोऽखिलम्भरः ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = सुतस्य मातृवश्यतां प्रदर्श्य धर्ममीश्वरः । | | verse_text = सुतस्य मातृवश्यतां प्रदर्श्य धर्ममीश्वरः । | ||
| verse_lines = सुतस्य मातृवश्यतां प्रदर्श्य धर्ममीश्वरः | | verse_lines = सुतस्य मातृवश्यतां प्रदर्श्य धर्ममीश्वरः ।¦बभञ्ज तौ दिविस्पृशौ यमार्जुनौ सुरात्मजौ ॥ १९॥ | ||
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| verse_lines = पुरा धुनिश्चमुस्तथाऽपि पूतनासमन्वितौ | | verse_lines = पुरा धुनिश्चमुस्तथाऽपि पूतनासमन्वितौ ।¦अनोक्षसंयुतौ तपः प्रचक्रतुः शिवां प्रति ।¦तया वरोऽप्यवध्यता चतुर्षु च प्रयोजितः ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = अनन्तरं तृणोद्भृमिस्तपोऽचरद् वरं च तम् । | | verse_text = अनन्तरं तृणोद्भृमिस्तपोऽचरद् वरं च तम् । | ||
| verse_lines = अनन्तरं तृणोद्भृमिस्तपोऽचरद् वरं च तम् | | verse_lines = अनन्तरं तृणोद्भृमिस्तपोऽचरद् वरं च तम् ।¦अवाप ते त्रयो हताः शिशुस्वरूपविष्णुना ॥ २१॥ | ||
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| verse_lines = धुनिश्चमुश्च तौ तरू समाश्रितौ निषूदितौ | | verse_lines = धुनिश्चमुश्च तौ तरू समाश्रितौ निषूदितौ ।¦तरुप्रभङ्गतोऽमुना तरू च शापसम्भवौ ॥ २२॥ | ||
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| verse_lines = पुरा हि नारदान्तिके दिगम्बरौ शशाप सः | | verse_lines = पुरा हि नारदान्तिके दिगम्बरौ शशाप सः ।¦धनेशपुत्रकौ द्रुतं तरुत्वमाप्नुतं त्विति ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = ततो हि तौ निजां तनुं हरेः प्रसादतः शुभौ | | verse_lines = ततो हि तौ निजां तनुं हरेः प्रसादतः शुभौ ।¦अवापतुः स्तुतिं प्रभोर्विधाय जग्मतुर्गृहम् ॥ २४॥ | ||
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| verse_lines = नलकूबरमणिग्रीवौ मोचयित्वा तु शापतः | | verse_lines = नलकूबरमणिग्रीवौ मोचयित्वा तु शापतः ।¦वासुदेवोऽथ गोपालैर्विस्मितैरभिवीक्षितः ॥ २५॥ | ||
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| verse_lines = वृन्दावनयियासुः स नन्दसूनुर्बृहद्वने | | verse_lines = वृन्दावनयियासुः स नन्दसूनुर्बृहद्वने ।¦ससर्ज रोमकूपेभ्यो वृकान् व्याघ्रसमान् बले ॥ २६॥ | ||
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| verse_lines = अनेककोटिसङ्घैस्तैः पीड्यमाना व्रजालयाः | | verse_lines = अनेककोटिसङ्घैस्तैः पीड्यमाना व्रजालयाः ।¦युयुर्वृन्दावनं नित्यानन्दमादाय नन्दजम् ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = इन्दिरापतिरानन्दपूर्णो वृन्दावने प्रभुः | | verse_lines = इन्दिरापतिरानन्दपूर्णो वृन्दावने प्रभुः ।¦नन्दयामास नन्दादीनुद्दामतरचेष्टितैः ॥ २८॥ | ||
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| verse_lines = स चन्द्रतो हसत्कान्तवदनेनेन्दुवर्चसा | | verse_lines = स चन्द्रतो हसत्कान्तवदनेनेन्दुवर्चसा ।¦संयुतो रौहिणेयेन वत्सपालो बभूव ह ॥ २९॥ | ||
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| verse_text = दैत्यं स वत्सतनुमप्रमयः प्रगृह्य कंसानुगं हरवरादपरैरवध्यम् । | | verse_text = दैत्यं स वत्सतनुमप्रमयः प्रगृह्य कंसानुगं हरवरादपरैरवध्यम् । | ||
| verse_lines = दैत्यं स वत्सतनुमप्रमयः प्रगृह्य कंसानुगं हरवरादपरैरवध्यम् | | verse_lines = दैत्यं स वत्सतनुमप्रमयः प्रगृह्य कंसानुगं हरवरादपरैरवध्यम् ।¦प्रक्षिप्य वृक्षशिरसि न्यहनद् बकोऽपि कंसानुगोऽथ विभुमच्युतमाससाद ॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = स्कन्दप्रसादकवचः स मुखे चकार गोविन्दमग्निवदमुं प्रदहन्तमुच्चैः । | | verse_text = स्कन्दप्रसादकवचः स मुखे चकार गोविन्दमग्निवदमुं प्रदहन्तमुच्चैः । | ||
| verse_lines = स्कन्दप्रसादकवचः स मुखे चकार गोविन्दमग्निवदमुं प्रदहन्तमुच्चैः | | verse_lines = स्कन्दप्रसादकवचः स मुखे चकार गोविन्दमग्निवदमुं प्रदहन्तमुच्चैः ।¦चच्छर्द तुण्डशिरसैव निहन्तुमेतमायान्तमीक्ष्य जगृहेऽस्य स तुण्डमीशः ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = तुण्डद्वयं यदुपतिः करपल्लवाभ्यां सङ्गृह्य चाऽशु विददार ह पक्षिदैत्यम् | | verse_lines = तुण्डद्वयं यदुपतिः करपल्लवाभ्यां सङ्गृह्य चाऽशु विददार ह पक्षिदैत्यम् ।¦ब्रह्मादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः सायं ययौ व्रजभुवं सहितोऽग्रजेन ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = एवं स देववरवन्दितपादपद्मो गोपालकेषु विहरन् भुवि षष्ठमब्दम् | | verse_lines = एवं स देववरवन्दितपादपद्मो गोपालकेषु विहरन् भुवि षष्ठमब्दम् ।¦प्राप्तो गवामखिलपोऽपि स पालकोऽभूद् वृन्दावनान्तरगसान्द्रलताविताने ॥ ३३॥ | ||
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| verse_text = ज्येष्ठं विहाय स कदाचिदचिन्त्यशक्तिर्गोगोपगोगणयुतो यमुनातटेषु (जलेषु) । | | verse_text = ज्येष्ठं विहाय स कदाचिदचिन्त्यशक्तिर्गोगोपगोगणयुतो यमुनातटेषु (जलेषु) । | ||
| verse_lines = ज्येष्ठं विहाय स कदाचिदचिन्त्यशक्तिर्गोगोपगोगणयुतो यमुनातटेषु (जलेषु) | | verse_lines = ज्येष्ठं विहाय स कदाचिदचिन्त्यशक्तिर्गोगोपगोगणयुतो यमुनातटेषु (जलेषु) ।¦रेमे भविष्यदनुवीक्ष्य हि गोपदुःखं तद्बोधनाय निजमग्रजमेषु सोऽधात् ॥ ३४॥ | ||
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| verse_text = (स) तं ब्रह्मणो वरबलादुरगं त्ववध्यं सर्वैरवार्यविषवीर्यमृते सुपर्णात् । | | verse_text = (स) तं ब्रह्मणो वरबलादुरगं त्ववध्यं सर्वैरवार्यविषवीर्यमृते सुपर्णात् । | ||
| verse_lines = (स) तं ब्रह्मणो वरबलादुरगं त्ववध्यं सर्वैरवार्यविषवीर्यमृते सुपर्णात् | | verse_lines = (स) तं ब्रह्मणो वरबलादुरगं त्ववध्यं सर्वैरवार्यविषवीर्यमृते सुपर्णात् ।¦विज्ञाय तद्विषविदूषितवारिपानसन्नान् पशूनपि वयस्यजनान् स आवीत् ॥ ३५॥ | ||
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| verse_text = तद्दृष्टिदिव्यसुधया सहसाऽभिवृष्टाः सर्वेऽपि जीवितमवापुरथोच्छशाखम् । | | verse_text = तद्दृष्टिदिव्यसुधया सहसाऽभिवृष्टाः सर्वेऽपि जीवितमवापुरथोच्छशाखम् । | ||
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| verse_text = तं यामुनह्रदविलोलकमाप्य नागः काल्यो निजैः समदशत् सह वासुदेवम्(भा\.पु\. १०\.१६\.६\-७) । | | verse_text = तं यामुनह्रदविलोलकमाप्य नागः काल्यो निजैः समदशत् सह वासुदेवम्(भा\.पु\. १०\.१६\.६\-७) । | ||
| verse_lines = तं यामुनह्रदविलोलकमाप्य नागः काल्यो निजैः समदशत् सह वासुदेवम्(भा\.पु\. १०\.१६\.६\-७) | | verse_lines = तं यामुनह्रदविलोलकमाप्य नागः काल्यो निजैः समदशत् सह वासुदेवम्(भा\.पु\. १०\.१६\.६\-७) ।¦भोगैर्बबन्ध च निजेश्वरमेनमज्ञः सेहे तमीश उत भक्तिमतोऽपराधम् ॥ ३८॥ | ||
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| verse_text = उत्पातमीक्ष्य तु तदाऽखिलगोपसङ्घस्तत्राऽजगाम हलिना प्रतिबोधितोऽपि । | | verse_text = उत्पातमीक्ष्य तु तदाऽखिलगोपसङ्घस्तत्राऽजगाम हलिना प्रतिबोधितोऽपि । | ||
| verse_lines = उत्पातमीक्ष्य तु तदाऽखिलगोपसङ्घस्तत्राऽजगाम हलिना प्रतिबोधितोऽपि | | verse_lines = उत्पातमीक्ष्य तु तदाऽखिलगोपसङ्घस्तत्राऽजगाम हलिना प्रतिबोधितोऽपि ।¦दृष्ट्वा निजाश्रयजनस्य बहोः सुदुःखं कृष्णः स्वभक्तमपि नागममुं ममर्द ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = तस्योन्नतेषु स फणेषु ननर्त कृष्णो ब्रह्मादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः । | | verse_text = तस्योन्नतेषु स फणेषु ननर्त कृष्णो ब्रह्मादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः । | ||
| verse_lines = तस्योन्नतेषु स फणेषु ननर्त कृष्णो ब्रह्मादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः | | verse_lines = तस्योन्नतेषु स फणेषु ननर्त कृष्णो ब्रह्मादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः ।¦आर्तो मुखैरुरु वमन् रुधिरं स नागो नारायणं तमरणं मनसा जगाम ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = तच्चित्रताण्डवविरुग्णफणातपत्रं रक्तं वमन्तमुरु सन्नधियं नितान्तम् । | | verse_text = तच्चित्रताण्डवविरुग्णफणातपत्रं रक्तं वमन्तमुरु सन्नधियं नितान्तम् । | ||
| verse_lines = तच्चित्रताण्डवविरुग्णफणातपत्रं रक्तं वमन्तमुरु सन्नधियं नितान्तम् | | verse_lines = तच्चित्रताण्डवविरुग्णफणातपत्रं रक्तं वमन्तमुरु सन्नधियं नितान्तम् ।¦दृष्ट्वाऽहिराजमुपसेदुरमुष्य पत्न्यो नेमुश्च सर्वजगदादिगुरुं भुवीशम् ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = ताभिः स्तुतः स भगवानमुना च तस्मै दत्त्वाऽभयं यमसहोदरवारितोऽमुम् । | | verse_text = ताभिः स्तुतः स भगवानमुना च तस्मै दत्त्वाऽभयं यमसहोदरवारितोऽमुम् । | ||
| verse_lines = ताभिः स्तुतः स भगवानमुना च तस्मै दत्त्वाऽभयं यमसहोदरवारितोऽमुम् | | verse_lines = ताभिः स्तुतः स भगवानमुना च तस्मै दत्त्वाऽभयं यमसहोदरवारितोऽमुम् ।¦उत्सृज्य निर्विषजलां यमुनां चकार संस्तूयमानचरितः सुरसिद्धसाध्यैः ॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = गोपैर्बलादिभिरुदीर्णतरप्रमोदैः सार्द्धं समेत्य भगवानरविन्दनेत्रः । | | verse_text = गोपैर्बलादिभिरुदीर्णतरप्रमोदैः सार्द्धं समेत्य भगवानरविन्दनेत्रः । | ||
| verse_lines = गोपैर्बलादिभिरुदीर्णतरप्रमोदैः सार्द्धं समेत्य भगवानरविन्दनेत्रः | | verse_lines = गोपैर्बलादिभिरुदीर्णतरप्रमोदैः सार्द्धं समेत्य भगवानरविन्दनेत्रः ।¦तां रात्रिमत्र निवसन् यमुनातटे स दावाग्निमुद्धतबलं च पपौ व्रजार्थे ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = इत्थं सुरासुरगणैरविचिन्त्यदिव्यकर्माणि गोकुलगतेऽगणितोरुशक्तौ । | | verse_text = इत्थं सुरासुरगणैरविचिन्त्यदिव्यकर्माणि गोकुलगतेऽगणितोरुशक्तौ । | ||
| verse_lines = इत्थं सुरासुरगणैरविचिन्त्यदिव्यकर्माणि गोकुलगतेऽगणितोरुशक्तौ | | verse_lines = इत्थं सुरासुरगणैरविचिन्त्यदिव्यकर्माणि गोकुलगतेऽगणितोरुशक्तौ ।¦कुर्वत्यजे व्रजभुवामभवद् विनाश उग्राभिधादसुरतस्तरुरूपतोऽलम् ॥ ४४॥ | ||
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| verse_lines = तद्गन्धतो नृपशुमुख्यसमस्तभूतान्यापुर्मृतिं बहुलरोगनिपीडितानि | | verse_lines = तद्गन्धतो नृपशुमुख्यसमस्तभूतान्यापुर्मृतिं बहुलरोगनिपीडितानि ।¦धातुर्वराज्जगदभावकृतैकबुद्धिर्वद्ध्यो न केनचिदसौ तरुरूपदैत्यः ॥ ४५॥ | ||
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| verse_lines = सङ्कर्षणेऽपि तदुदारविषानुविष्टे कृष्णो निजस्पर्शतस्तमपेतरोगम् | | verse_lines = सङ्कर्षणेऽपि तदुदारविषानुविष्टे कृष्णो निजस्पर्शतस्तमपेतरोगम् ।¦कृत्वा बभञ्ज विषवृक्षममुं बलेन तस्यानुगैः सह तदाकृतिभिः समस्तैः ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = दैत्यांश्च गोवपुष आत्तवरान् विरिञ्चान्मृत्यूज्झितानपि निपात्य ददाह वृक्षान् । | | verse_text = दैत्यांश्च गोवपुष आत्तवरान् विरिञ्चान्मृत्यूज्झितानपि निपात्य ददाह वृक्षान् । | ||
| verse_lines = दैत्यांश्च गोवपुष आत्तवरान् विरिञ्चान्मृत्यूज्झितानपि निपात्य ददाह वृक्षान् | | verse_lines = दैत्यांश्च गोवपुष आत्तवरान् विरिञ्चान्मृत्यूज्झितानपि निपात्य ददाह वृक्षान् ।¦विक्रीड्य रामसहितो यमुनाजले स नीरोगमाशु कृतवान् व्रजमब्जनाभः ॥ ४७॥ | ||
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| verse_lines = सप्तोक्षणोऽतिबलवीर्ययुतानदम्यान् सर्वैर्गिरीशवरतो दितिजप्रधानान् | | verse_lines = सप्तोक्षणोऽतिबलवीर्ययुतानदम्यान् सर्वैर्गिरीशवरतो दितिजप्रधानान् ।¦हत्वा सुतामलभदाशु विभुर्यशोदाभ्रातुः स कुम्भकसमाह्वयिनोऽपि नीलाम् ॥ ४८॥ | ||
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| verse_lines = या पूर्वजन्मनि तपः प्रथमैव भार्या भूयासमित्यचरदस्य हि सङ्गमो मे | | verse_lines = या पूर्वजन्मनि तपः प्रथमैव भार्या भूयासमित्यचरदस्य हि सङ्गमो मे ।¦स्यात् कृष्णजन्मनि समस्तवराङ्गनाभ्यः पूर्वं त्विति स्म तदिमां प्रथमं स आप ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = अग्रे द्विजत्वत उपावहदेष नीलां गोपाङ्गना अपि पुरा वरमापिरे यत् । | | verse_text = अग्रे द्विजत्वत उपावहदेष नीलां गोपाङ्गना अपि पुरा वरमापिरे यत् । | ||
| verse_lines = अग्रे द्विजत्वत उपावहदेष नीलां गोपाङ्गना अपि पुरा वरमापिरे यत् | | verse_lines = अग्रे द्विजत्वत उपावहदेष नीलां गोपाङ्गना अपि पुरा वरमापिरे यत् ।¦संस्कारतः प्रथममेव सुसङ्गमो नो भूयात् तवेति परमाप्सरसः पुरा याः ॥ ५०॥ | ||
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| verse_text = तत्राथ कृष्णमवदन् सबलं वयस्याः पक्वानि तालसुफलान्यनुभोजयेति । | | verse_text = तत्राथ कृष्णमवदन् सबलं वयस्याः पक्वानि तालसुफलान्यनुभोजयेति । | ||
| verse_lines = तत्राथ कृष्णमवदन् सबलं वयस्याः पक्वानि तालसुफलान्यनुभोजयेति | | verse_lines = तत्राथ कृष्णमवदन् सबलं वयस्याः पक्वानि तालसुफलान्यनुभोजयेति ।¦इत्यर्थितः सबल आप स तालवृन्दं गोपैर्दुरासदमतीव हि धेनुकेन ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = विघ्नेशतो वरमवाप्य (स) सुदुष्टदैत्यो दीर्घायुरुत्तमबलः कदनप्रियोऽभूत् | | verse_lines = विघ्नेशतो वरमवाप्य (स) सुदुष्टदैत्यो दीर्घायुरुत्तमबलः कदनप्रियोऽभूत् ।¦नित्योद्धतः स उत राममवेक्ष्य तालवृन्तात् फलानि गलयन्तमथाभ्यधावत् ।¦तस्य प्रहारमभिकाङ्क्षत आशु पृष्ठपादौ प्रगृह्य तृणराजशिरोऽहरत् सः ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = तस्मिन् हते खरतरे खररूपदैत्ये सर्वे खराश्च खरतालवनान्तरस्थाः | | verse_lines = तस्मिन् हते खरतरे खररूपदैत्ये सर्वे खराश्च खरतालवनान्तरस्थाः ।¦प्रापुः खरस्वरतराः खरराक्षसारिं कृष्णं बलेन सहितं निहताश्च तेन ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = सर्वान् निहत्य खररूपधरान् स दैत्यान् विघ्नेश्वरस्य वरतोऽन्यजनैरवध्यान् | | verse_lines = सर्वान् निहत्य खररूपधरान् स दैत्यान् विघ्नेश्वरस्य वरतोऽन्यजनैरवध्यान् ।¦पक्वानि तालसुफलानि निजेषु चादाद् दुर्वारपौरुषगुणोद्भरितो रमेशः ॥ ५४॥ | ||
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| verse_lines = पक्षद्वयेन विहरत्स्वथ गोपकेषु दैत्यः प्रलम्ब इति कंसविसृष्ट आगात् | | verse_lines = पक्षद्वयेन विहरत्स्वथ गोपकेषु दैत्यः प्रलम्ब इति कंसविसृष्ट आगात् ।¦कृष्णस्य पक्षिषु जयत्स्वथ राममेत्य पापः पराजित उवाह तमुग्ररूपः ॥ ५५॥ | ||
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| verse_lines = भीतेन रोहिणिसुतेन हरिः स्तुतोऽसौ स्वाविष्टतामुपदिदेश बलाभिपूर्त्यै | | verse_lines = भीतेन रोहिणिसुतेन हरिः स्तुतोऽसौ स्वाविष्टतामुपदिदेश बलाभिपूर्त्यै ।¦तेनैव पूरितबलोऽम्बरचारिणं तं पापं प्रलम्बमुरुमुष्टिहतं चकार ॥ ५६॥ | ||
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| verse_lines = तस्मिन् हते सुरगणा बलदेवनाम रामस्य चक्रुरतितृप्तियुता हरिश्च | | verse_lines = तस्मिन् हते सुरगणा बलदेवनाम रामस्य चक्रुरतितृप्तियुता हरिश्च ।¦वह्निं पपौ पुनरपि प्रदहन्तमुच्चैर्गोपांश्च गोगणमगण्यगुणार्णवोऽपात् ॥ ५७॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णं कदाचिदतिदूरगतं वयस्या ऊचुः क्षुधाऽर्दिततरा वयमित्युदारम् | | verse_lines = कृष्णं कदाचिदतिदूरगतं वयस्या ऊचुः क्षुधाऽर्दिततरा वयमित्युदारम् ।¦सोऽप्याह सत्रमिह विप्रगणाश्चरन्ति तान् याचतेति परिपूर्णसमस्तकामः ॥ ५८॥ | ||
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| verse_lines = तान् प्राप्य काममनवाप्य पुनश्च गोपाः कृष्णं समापुरथ तानवदत् स देवः | | verse_lines = तान् प्राप्य काममनवाप्य पुनश्च गोपाः कृष्णं समापुरथ तानवदत् स देवः ।¦पत्नीः समर्थयत मद्वचनादिति स्म चक्रुश्च ते तदपि ता भगवन्तमापुः ॥ ५९॥ | ||
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| verse_text = ताः षड्विधान्नपरिपूर्णकराः समेताः प्राप्ता विसृज्य पतिपुत्रसमस्तबन्धून् । | | verse_text = ताः षड्विधान्नपरिपूर्णकराः समेताः प्राप्ता विसृज्य पतिपुत्रसमस्तबन्धून् । | ||
| verse_lines = ताः षड्विधान्नपरिपूर्णकराः समेताः प्राप्ता विसृज्य पतिपुत्रसमस्तबन्धून् | | verse_lines = ताः षड्विधान्नपरिपूर्णकराः समेताः प्राप्ता विसृज्य पतिपुत्रसमस्तबन्धून् ।¦आत्मार्चनैकपरमा विससर्ज देहं एका पतिप्रविधुता पदमाप विष्णोः ॥ ६०॥ | ||
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| verse_lines = भुक्त्वाऽथ गोपसहितो भगवांस्तदन्नं रेमे च गोकुलमवाप्य समस्तनाथः | | verse_lines = भुक्त्वाऽथ गोपसहितो भगवांस्तदन्नं रेमे च गोकुलमवाप्य समस्तनाथः ।¦आज्ञातिलङ्घनकृतेः स्वकृतापराधात् पश्चात् सुतप्तमनसोऽप्यभवन् स्म विप्राः ॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = क्षन्तव्यमेव भवता मम बाल्यमीश त्वत्संश्रयोऽस्मि हि सदेत्यभिवन्दितोऽजः । | | verse_text = क्षन्तव्यमेव भवता मम बाल्यमीश त्वत्संश्रयोऽस्मि हि सदेत्यभिवन्दितोऽजः । | ||
| verse_lines = क्षन्तव्यमेव भवता मम बाल्यमीश त्वत्संश्रयोऽस्मि हि सदेत्यभिवन्दितोऽजः | | verse_lines = क्षन्तव्यमेव भवता मम बाल्यमीश त्वत्संश्रयोऽस्मि हि सदेत्यभिवन्दितोऽजः ।¦क्षान्तं सदैव भवतस्तव शिक्षणाय पूजापहारविधिरित्यवदद् रमेशः ॥ ६९॥ | ||
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| verse_text = गोविन्दमेनमभिषिच्य स गोगणेशो गोभिर्जगाम गुणपूर्णममुं प्रणम्य । | | verse_text = गोविन्दमेनमभिषिच्य स गोगणेशो गोभिर्जगाम गुणपूर्णममुं प्रणम्य । | ||
| verse_lines = गोविन्दमेनमभिषिच्य स गोगणेशो गोभिर्जगाम गुणपूर्णममुं प्रणम्य | | verse_lines = गोविन्दमेनमभिषिच्य स गोगणेशो गोभिर्जगाम गुणपूर्णममुं प्रणम्य ।¦गोपैर्गिराम्पतिरपि प्रणतोऽभिगम्य गोवर्द्धनोद्धरणसङ्गतसंशयैः सः ॥ ७०॥ | ||
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| verse_text = कृष्णं ततः प्रभृति गोपगणा व्यजानन् नारायणोऽयमिति गर्गवचश्च नन्दात् । | | verse_text = कृष्णं ततः प्रभृति गोपगणा व्यजानन् नारायणोऽयमिति गर्गवचश्च नन्दात् । | ||
| verse_lines = कृष्णं ततः प्रभृति गोपगणा व्यजानन् नारायणोऽयमिति गर्गवचश्च नन्दात् | | verse_lines = कृष्णं ततः प्रभृति गोपगणा व्यजानन् नारायणोऽयमिति गर्गवचश्च नन्दात् ।¦नारायणस्य सम इत्युदितं निशम्य पूजां च चक्रुरधिकामरविन्दनेत्रे ॥ ७१॥ | ||
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| verse_text = स्कन्दादुपात्तवरतो मरणादपेतं दृष्ट्वा च रामनिहतं बलिनं प्रलम्बम् । | | verse_text = स्कन्दादुपात्तवरतो मरणादपेतं दृष्ट्वा च रामनिहतं बलिनं प्रलम्बम् । | ||
| verse_lines = स्कन्दादुपात्तवरतो मरणादपेतं दृष्ट्वा च रामनिहतं बलिनं प्रलम्बम् | | verse_lines = स्कन्दादुपात्तवरतो मरणादपेतं दृष्ट्वा च रामनिहतं बलिनं प्रलम्बम् ।¦चक्रुर्विनिश्चयममुष्य सुराधिकत्वे गोपा अथास्य विदधुः परमां च पूजाम् ॥ ७२॥ | ||
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| verse_text = कात्यायनीव्रतपराः स्वपतित्वहेतोः कन्या उवाह भगवानपराश्च गोपीः । | | verse_text = कात्यायनीव्रतपराः स्वपतित्वहेतोः कन्या उवाह भगवानपराश्च गोपीः । | ||
| verse_lines = कात्यायनीव्रतपराः स्वपतित्वहेतोः कन्या उवाह भगवानपराश्च गोपीः | | verse_lines = कात्यायनीव्रतपराः स्वपतित्वहेतोः कन्या उवाह भगवानपराश्च गोपीः ।¦अन्यैर्धृता अयुगबाणशराभिनुन्नाः प्राप्ता निशास्वरमयच्छशिराजितासु ॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = तास्वत्र तेन जनिता दशलक्षपुत्रा नारायणाह्वययुता बलिनश्च गोपाः । | | verse_text = तास्वत्र तेन जनिता दशलक्षपुत्रा नारायणाह्वययुता बलिनश्च गोपाः । | ||
| verse_lines = तास्वत्र तेन जनिता दशलक्षपुत्रा नारायणाह्वययुता बलिनश्च गोपाः | | verse_lines = तास्वत्र तेन जनिता दशलक्षपुत्रा नारायणाह्वययुता बलिनश्च गोपाः ।¦सर्वेऽपि दैवतगणा भगवत्सुतत्वमाप्तुं धरातलगता हरिभक्तिहेतोः ॥ ७४॥ | ||
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| verse_text = तास्तत्र पूर्ववरदानकृते रमेशो रामाद्(रामा) द्विजत्वगमनादपि पूर्वमेव । | | verse_text = तास्तत्र पूर्ववरदानकृते रमेशो रामाद्(रामा) द्विजत्वगमनादपि पूर्वमेव । | ||
| verse_lines = तास्तत्र पूर्ववरदानकृते रमेशो रामाद्(रामा) द्विजत्वगमनादपि पूर्वमेव | | verse_lines = तास्तत्र पूर्ववरदानकृते रमेशो रामाद्(रामा) द्विजत्वगमनादपि पूर्वमेव ।¦सर्वा निशास्वरमयत् समभीष्टसिद्धिचिन्तामणिर्हि भगवानशुभैरलिप्तः ॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = सम्पूर्णचन्द्रकरराजितसद्रजन्यां वृन्दावने कुमुदकुन्दसुगन्धवाते । | | verse_text = सम्पूर्णचन्द्रकरराजितसद्रजन्यां वृन्दावने कुमुदकुन्दसुगन्धवाते । | ||
| verse_lines = सम्पूर्णचन्द्रकरराजितसद्रजन्यां वृन्दावने कुमुदकुन्दसुगन्धवाते | | verse_lines = सम्पूर्णचन्द्रकरराजितसद्रजन्यां वृन्दावने कुमुदकुन्दसुगन्धवाते ।¦श्रुत्वा मुकुन्दमुखनिस्सृतगीतसारं गोपाङ्गना मुमुहुरत्र ससार यक्षः ॥ ७६॥ | ||
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| verse_text = रुद्रप्रसादकृतरक्ष उतास्य सख्युर्भृत्यो बली खलतरोऽपिच शङ्खचूडः । | | verse_text = रुद्रप्रसादकृतरक्ष उतास्य सख्युर्भृत्यो बली खलतरोऽपिच शङ्खचूडः । | ||
| verse_lines = रुद्रप्रसादकृतरक्ष उतास्य सख्युर्भृत्यो बली खलतरोऽपिच शङ्खचूडः | | verse_lines = रुद्रप्रसादकृतरक्ष उतास्य सख्युर्भृत्यो बली खलतरोऽपिच शङ्खचूडः ।¦ताः कालयन् भगवतस्तलताडनेन मृत्युं जगाम मणिमस्य जहार कृष्णः ॥ ७७॥ | ||
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| verse_text = नाम्नाऽप्यरिष्ट उरुगायविलोमचेष्टो गोष्ठं जगाम वृषभाकृतिरप्यवध्यः । | | verse_text = नाम्नाऽप्यरिष्ट उरुगायविलोमचेष्टो गोष्ठं जगाम वृषभाकृतिरप्यवध्यः । | ||
| verse_lines = नाम्नाऽप्यरिष्ट उरुगायविलोमचेष्टो गोष्ठं जगाम वृषभाकृतिरप्यवध्यः | | verse_lines = नाम्नाऽप्यरिष्ट उरुगायविलोमचेष्टो गोष्ठं जगाम वृषभाकृतिरप्यवध्यः ।¦शम्भोर्वरादनुगतश्च सदैव कंसं गां भीषयन्तममुमाह्वयदाशु कृष्णः ॥ ७८॥ | ||
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| verse_text = सोऽप्याससाद हरिमुग्रविषाणकोटिमग्रे निधाय जगृहेऽस्य विषाणमीशः । | | verse_text = सोऽप्याससाद हरिमुग्रविषाणकोटिमग्रे निधाय जगृहेऽस्य विषाणमीशः । | ||
| verse_lines = सोऽप्याससाद हरिमुग्रविषाणकोटिमग्रे निधाय जगृहेऽस्य विषाणमीशः | | verse_lines = सोऽप्याससाद हरिमुग्रविषाणकोटिमग्रे निधाय जगृहेऽस्य विषाणमीशः ।¦भूमौ निपात्य च वृषासुरमुग्रवीर्यं यज्ञे यथा पशुममारयदग्र्यशक्तिः ॥ ७९॥ | ||
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| verse_text = केशी (च) तु कंसविहितस्तुरगस्वरूपो गिर्यात्मजावरमवाप्य सदा विमृत्युः । | | verse_text = केशी (च) तु कंसविहितस्तुरगस्वरूपो गिर्यात्मजावरमवाप्य सदा विमृत्युः । | ||
| verse_lines = केशी (च) तु कंसविहितस्तुरगस्वरूपो गिर्यात्मजावरमवाप्य सदा विमृत्युः | | verse_lines = केशी (च) तु कंसविहितस्तुरगस्वरूपो गिर्यात्मजावरमवाप्य सदा विमृत्युः ।¦पापः स केशवमवाप मुखेऽस्य बाहुं प्रावेशयत् स भगवान् ववृधेऽथ देहे ॥ ८०॥ | ||
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| verse_lines = तत्खादनाय कुमतिः स कृतप्रयासः शीर्णास्यदन्तदशनच्छदरुद्धवायुः | | verse_lines = तत्खादनाय कुमतिः स कृतप्रयासः शीर्णास्यदन्तदशनच्छदरुद्धवायुः ।¦(दीर्णः) शीर्णः पपात च मृतो हरिरप्यशेषैर्ब्रह्मेशशक्रदिनकृत्प्रमुखैः स्तुतोऽभूत् ॥ ८१॥ | ||
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| verse_lines = व्योमश्च नाम मयसूनुरजप्रसादाल्लब्धायुतायुरखिलान् विदधे बिले सः | | verse_lines = व्योमश्च नाम मयसूनुरजप्रसादाल्लब्धायुतायुरखिलान् विदधे बिले सः ।¦तं श्रीपतिः सुरपतिः पशुवद् विशस्य निःसारितान् बिलमुखादखिलांश्चकार ॥ ८२॥ | ||
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| verse_text = कुर्वत्यनन्यविषयाणि दुरन्तशक्तौ कर्माणि गोकुलगतेऽखिललोकनाथे । | | verse_text = कुर्वत्यनन्यविषयाणि दुरन्तशक्तौ कर्माणि गोकुलगतेऽखिललोकनाथे । | ||
| verse_lines = कुर्वत्यनन्यविषयाणि दुरन्तशक्तौ कर्माणि गोकुलगतेऽखिललोकनाथे | | verse_lines = कुर्वत्यनन्यविषयाणि दुरन्तशक्तौ कर्माणि गोकुलगतेऽखिललोकनाथे ।¦कंसाय सर्वमवदत् सुरकार्यहेतोर्ब्रह्माङ्कजो मुनिरकारि यदीशपित्रा ॥ ८३॥ | ||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽतिकोपरभसोच्चलितः स कंसो बद्ध्वा सभार्यमथ शूरजमुग्रकर्मा | | verse_lines = श्रुत्वाऽतिकोपरभसोच्चलितः स कंसो बद्ध्वा सभार्यमथ शूरजमुग्रकर्मा ।¦अक्रूरमाश्वदिशदानयनाय विष्णो रामान्वितस्य सह गोपगणै रथेन ॥ ८४॥ | ||
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| verse_lines = सोऽक्रूर इत्यभवदुत्तमपूज्यकर्मा वृष्णिष्वथाऽस स हि भोजपतेश्च मन्त्री | | verse_lines = सोऽक्रूर इत्यभवदुत्तमपूज्यकर्मा वृष्णिष्वथाऽस स हि भोजपतेश्च मन्त्री ।¦आदिष्ट एव जगदीश्वरदृष्टिहेतोरानन्दपूर्णसुमना अभवत् कृतार्थः ॥ ८६॥ | ||
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| verse_lines = आरुह्य तद्रथवरं भगवत्पदाब्जमब्जोद्भवप्रणतमन्तरमन्तरेण | | verse_lines = आरुह्य तद्रथवरं भगवत्पदाब्जमब्जोद्भवप्रणतमन्तरमन्तरेण ।¦सञ्चिन्तयन् पथि जगाम स गोष्ठमाराद् दृष्ट्वा पदाङ्कितभुवं मुमुदे परस्य ॥ ८७॥ | ||
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| verse_lines = सोऽपश्यताथ जगदेकगुरुं समेतमग्रोद्भवेन भुवि गा अपि दोहयन्तम् | | verse_lines = सोऽपश्यताथ जगदेकगुरुं समेतमग्रोद्भवेन भुवि गा अपि दोहयन्तम् ।¦आनन्दसान्द्रतनुमक्षयमेनमीक्ष्य हृष्टः पपात पदयोः पुरुषोत्तमस्य ॥ ८९॥ | ||
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| verse_text = संस्थाप्य तौ रथवरे जगताऽभिवन्द्यौ श्वाफल्किराश्ववततार यमस्वसारम् । | | verse_text = संस्थाप्य तौ रथवरे जगताऽभिवन्द्यौ श्वाफल्किराश्ववततार यमस्वसारम् । | ||
| verse_lines = संस्थाप्य तौ रथवरे जगताऽभिवन्द्यौ श्वाफल्किराश्ववततार यमस्वसारम् | | verse_lines = संस्थाप्य तौ रथवरे जगताऽभिवन्द्यौ श्वाफल्किराश्ववततार यमस्वसारम् ।¦स्नात्वा स तत्र विधिनैव कृताघमर्षः शेषासनं परमपूरुषमत्र चैक्षत् ॥ ९२॥ | ||
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| verse_text = ग्राह्याऽपहेयरहितैकचिदात्मसान्द्रस्वानन्दपूर्णवपुरप्ययशोषहीनः । | | verse_text = ग्राह्याऽपहेयरहितैकचिदात्मसान्द्रस्वानन्दपूर्णवपुरप्ययशोषहीनः । | ||
| verse_lines = ग्राह्याऽपहेयरहितैकचिदात्मसान्द्रस्वानन्दपूर्णवपुरप्ययशोषहीनः | | verse_lines = ग्राह्याऽपहेयरहितैकचिदात्मसान्द्रस्वानन्दपूर्णवपुरप्ययशोषहीनः ।¦लोकान् विडम्ब्य नरवत् समलक्तकाद्यैर्वप्त्रा विभूषित इवाभवदप्रमेयः ॥ ९९॥ | ||
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| verse_text = मालामवाप्य च सुदामत आत्मतन्त्रस्तावक्षयोऽनुजगृहे निजपार्षदौ हि । | | verse_text = मालामवाप्य च सुदामत आत्मतन्त्रस्तावक्षयोऽनुजगृहे निजपार्षदौ हि । | ||
| verse_lines = मालामवाप्य च सुदामत आत्मतन्त्रस्तावक्षयोऽनुजगृहे निजपार्षदौ हि | | verse_lines = मालामवाप्य च सुदामत आत्मतन्त्रस्तावक्षयोऽनुजगृहे निजपार्षदौ हि ।¦पूर्वं विकुण्ठसदनाद्धरिसेवनाय प्राप्तौ भुवं मृजनपुष्पकरौ पुराऽपि ॥ १००॥ | ||
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| verse_text = सर्वेष्टपुष्टिमिह तत्र सरूपतां च कृष्णस्तयोर्वरमदादथ राजमार्गे । | | verse_text = सर्वेष्टपुष्टिमिह तत्र सरूपतां च कृष्णस्तयोर्वरमदादथ राजमार्गे । | ||
| verse_lines = सर्वेष्टपुष्टिमिह तत्र सरूपतां च कृष्णस्तयोर्वरमदादथ राजमार्गे | | verse_lines = सर्वेष्टपुष्टिमिह तत्र सरूपतां च कृष्णस्तयोर्वरमदादथ राजमार्गे ।¦गच्छन् ददर्श वनितां नरदेवयोग्यमादाय गन्धमधिकं कुटिलां व्रजन्तीम् ॥ १०१॥ | ||
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| verse_text = तेनार्थिता सपदि गन्धमदात् त्रिवक्रा तेनाग्रजेन सहितो भगवान् लिलिम्पे । | | verse_text = तेनार्थिता सपदि गन्धमदात् त्रिवक्रा तेनाग्रजेन सहितो भगवान् लिलिम्पे । | ||
| verse_lines = तेनार्थिता सपदि गन्धमदात् त्रिवक्रा तेनाग्रजेन सहितो भगवान् लिलिम्पे | | verse_lines = तेनार्थिता सपदि गन्धमदात् त्रिवक्रा तेनाग्रजेन सहितो भगवान् लिलिम्पे ।¦तां चाऽश्वृजुत्वमनयत् स तयाऽर्थितोऽलमायामि कालत इति प्रहसन्नमुञ्चत् ॥ १०२॥ | ||
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| verse_text = पूर्णेन्दुवृन्दनिवहाधिककान्तिकान्तसूर्यामितोरुपरमद्युतिसौख्यदेहः । | | verse_text = पूर्णेन्दुवृन्दनिवहाधिककान्तिकान्तसूर्यामितोरुपरमद्युतिसौख्यदेहः । | ||
| verse_lines = पूर्णेन्दुवृन्दनिवहाधिककान्तिकान्तसूर्यामितोरुपरमद्युतिसौख्यदेहः | | verse_lines = पूर्णेन्दुवृन्दनिवहाधिककान्तिकान्तसूर्यामितोरुपरमद्युतिसौख्यदेहः ।¦पीताम्बरः कनकभासुरगन्धमाल्यः शृङ्गारवारिधिरगण्यगुणार्णवोऽगात् ॥ १०३॥ | ||
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| verse_text = प्राप्याथ चाऽयुधगृहं धनुरीशदत्तं कृष्णः प्रसह्य जगृहे सकलैरभेद्यम् । | | verse_text = प्राप्याथ चाऽयुधगृहं धनुरीशदत्तं कृष्णः प्रसह्य जगृहे सकलैरभेद्यम् । | ||
| verse_lines = प्राप्याथ चाऽयुधगृहं धनुरीशदत्तं कृष्णः प्रसह्य जगृहे सकलैरभेद्यम् | | verse_lines = प्राप्याथ चाऽयुधगृहं धनुरीशदत्तं कृष्णः प्रसह्य जगृहे सकलैरभेद्यम् ।¦कांसं स नित्यपरिपूर्णसमस्तशक्तिरारोप्य चैनमनुकृष्य बभञ्ज मध्ये ॥ १०४॥ | ||
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| verse_text = तस्मिन् सुरासुरगणैरखिलैरभेद्ये भग्ने बभूव जगदण्डविभेदभीमः । | | verse_text = तस्मिन् सुरासुरगणैरखिलैरभेद्ये भग्ने बभूव जगदण्डविभेदभीमः । | ||
| verse_lines = तस्मिन् सुरासुरगणैरखिलैरभेद्ये भग्ने बभूव जगदण्डविभेदभीमः | | verse_lines = तस्मिन् सुरासुरगणैरखिलैरभेद्ये भग्ने बभूव जगदण्डविभेदभीमः ।¦शब्दः स येन निपपात भुवि प्रभग्नसारोऽसुरो धृतियुतोऽपि तदैव कंसः ॥ १०५॥ | ||
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| verse_text = आदिष्टमप्युरुबलं भगवान् स तेन सर्वं निहत्य सबलः प्रययौ पुनश्च । | | verse_text = आदिष्टमप्युरुबलं भगवान् स तेन सर्वं निहत्य सबलः प्रययौ पुनश्च । | ||
| verse_lines = आदिष्टमप्युरुबलं भगवान् स तेन सर्वं निहत्य सबलः प्रययौ पुनश्च | | verse_lines = आदिष्टमप्युरुबलं भगवान् स तेन सर्वं निहत्य सबलः प्रययौ पुनश्च ।¦नन्दादिगोपसमितिं हरिरत्र रात्रौ भुक्त्वा पयोऽन्वितशुभान्नमुवास कामम् ॥ १०६॥ | ||
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| verse_text = कंसोऽप्यतीव भयकम्पितहृत्सरोजः प्रातर्नरेन्द्रगणमध्यगतोऽधिकोच्चम् । | | verse_text = कंसोऽप्यतीव भयकम्पितहृत्सरोजः प्रातर्नरेन्द्रगणमध्यगतोऽधिकोच्चम् । | ||
| verse_lines = कंसोऽप्यतीव भयकम्पितहृत्सरोजः प्रातर्नरेन्द्रगणमध्यगतोऽधिकोच्चम् | | verse_lines = कंसोऽप्यतीव भयकम्पितहृत्सरोजः प्रातर्नरेन्द्रगणमध्यगतोऽधिकोच्चम् ।¦मञ्चं विवेश सह जानपदैश्च पौरैर्नानाऽनुमञ्चकगतैर्युवतीसमेतैः ॥ १०७॥ | ||
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| verse_text = संस्थाप्य नागमुरुरङ्गमुखे कुवल्यापीडं गिरीन्द्रसदृशं करिसादियुक्तम् । | | verse_text = संस्थाप्य नागमुरुरङ्गमुखे कुवल्यापीडं गिरीन्द्रसदृशं करिसादियुक्तम् । | ||
| verse_lines = संस्थाप्य नागमुरुरङ्गमुखे कुवल्यापीडं गिरीन्द्रसदृशं करिसादियुक्तम् | | verse_lines = संस्थाप्य नागमुरुरङ्गमुखे कुवल्यापीडं गिरीन्द्रसदृशं करिसादियुक्तम् ।¦चाणूरमुष्टिकमुखानपि मल्लवीरान् रङ्गे निधाय हरिसंयमनं किलैच्छत् ॥ १०८॥ | ||
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| verse_lines = अक्षोहिणी गणितमस्य बलं च विंशदासीदसह्यमुरुवीर्यमनन्यवध्यम् | | verse_lines = अक्षोहिणी गणितमस्य बलं च विंशदासीदसह्यमुरुवीर्यमनन्यवध्यम् ।¦शम्भोर्वरादपि च तस्य सुनीथनामा यः पूर्वमास वृक इत्यसुरोऽनुजोऽभूत् ॥ १०९॥ | ||
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| verse_text = सप्तानुजा अपि हि तस्य पुरातना ये सर्वेऽपि कंसपृतनासहिताः स्म रङ्गे । | | verse_text = सप्तानुजा अपि हि तस्य पुरातना ये सर्वेऽपि कंसपृतनासहिताः स्म रङ्गे । | ||
| verse_lines = सप्तानुजा अपि हि तस्य पुरातना ये सर्वेऽपि कंसपृतनासहिताः स्म रङ्गे | | verse_lines = सप्तानुजा अपि हि तस्य पुरातना ये सर्वेऽपि कंसपृतनासहिताः स्म रङ्गे ।¦तस्थुः सराममभियान्तमुदीक्ष्य कृष्णमात्तायुधा युधि विजेतुमजं सुपापाः ॥ ११०॥ | ||
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| verse_text = कृष्णोऽपि सूर उदिते सबलो वयस्यैः सार्द्धं जगाम वररङ्गमुखं सुरेशैः । | | verse_text = कृष्णोऽपि सूर उदिते सबलो वयस्यैः सार्द्धं जगाम वररङ्गमुखं सुरेशैः । | ||
| verse_lines = कृष्णोऽपि सूर उदिते सबलो वयस्यैः सार्द्धं जगाम वररङ्गमुखं सुरेशैः | | verse_lines = कृष्णोऽपि सूर उदिते सबलो वयस्यैः सार्द्धं जगाम वररङ्गमुखं सुरेशैः ।¦संस्तूयमान उरुविक्रम आसुराणां निर्मूलनाय सकळाचलितोरुशक्तिः ॥ १११॥ | ||
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| verse_lines = आयन् जगद्गुरुतमो बलिनं गजेन्द्रं रुद्रप्रसादपरिरक्षितमाश्वपश्यत् | | verse_lines = आयन् जगद्गुरुतमो बलिनं गजेन्द्रं रुद्रप्रसादपरिरक्षितमाश्वपश्यत् ।¦(दुष्टोरुरङ्ग) दृष्ट्वोरुरङ्गमुखसंस्थितमीक्ष्य चैभ्यं पापापयाहि नचिरादिति वाचमूचे ॥ ११२॥ | ||
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| verse_lines = क्षिप्तः स ईश्वरतमेन गिरीशलब्धाद् दृप्तो वराज्जगति सर्वजनैरवध्यः | | verse_lines = क्षिप्तः स ईश्वरतमेन गिरीशलब्धाद् दृप्तो वराज्जगति सर्वजनैरवध्यः ।¦नागं त्ववध्यमभियापयते ततोऽग्रे पापो दुरन्तमहिमं प्रति वासुदेवम् ॥ ११३॥ | ||
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| verse_lines = विक्रीड्य तेन करिणा भगवान् स किञ्चिद्धस्ते प्रगृह्य विनिकृष्य निपात्य भूमौ | | verse_lines = विक्रीड्य तेन करिणा भगवान् स किञ्चिद्धस्ते प्रगृह्य विनिकृष्य निपात्य भूमौ ।¦कुम्भे पदं प्रतिनिधाय विषाणयुग्ममुत्कृष्य हस्तिपमहन् निपपात सोऽपि ॥ ११४॥ | ||
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| verse_text = नागं ससादिनमवध्यमसौ निहत्य स्कन्धे विषाणमवसज्य सहाग्रजेन । | | verse_text = नागं ससादिनमवध्यमसौ निहत्य स्कन्धे विषाणमवसज्य सहाग्रजेन । | ||
| verse_lines = नागं ससादिनमवध्यमसौ निहत्य स्कन्धे विषाणमवसज्य सहाग्रजेन | | verse_lines = नागं ससादिनमवध्यमसौ निहत्य स्कन्धे विषाणमवसज्य सहाग्रजेन ।¦नागेन्द्रसान्द्रमदबिन्दुभिरञ्चिताङ्गः पूर्णात्मशक्तिरमलः प्रविवेश रङ्गम् ॥ ११५॥ | ||
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| verse_lines = विष्टे जगद्गुरुतमे बलवीर्यमूर्तौ रङ्गं मुमोद च शुशोष जनोऽखिलोऽत्र | | verse_lines = विष्टे जगद्गुरुतमे बलवीर्यमूर्तौ रङ्गं मुमोद च शुशोष जनोऽखिलोऽत्र ।¦कञ्जं तथाऽपि कुमुदं च यथैव सूर्य उद्यत्यजेऽनुभविनो विपरीतकाश्च ॥ ११६॥ | ||
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| verse_lines = रङ्गप्रविष्टमभिवीक्ष्य जगाद मल्लः कंसप्रियार्थमभिभाष्य जगन्निवासम् | | verse_lines = रङ्गप्रविष्टमभिवीक्ष्य जगाद मल्लः कंसप्रियार्थमभिभाष्य जगन्निवासम् ।¦चाणूर इत्यभिहितो जगतामवध्यः शम्भुप्रसादत इदं शृणु माधवेति ॥ ११७॥ | ||
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| verse_lines = राजैव दैवतमिति प्रवदन्ति विप्रा राज्ञः प्रियं कृतवतः परमा हि सिद्धिः | | verse_lines = राजैव दैवतमिति प्रवदन्ति विप्रा राज्ञः प्रियं कृतवतः परमा हि सिद्धिः ।¦योत्स्याव तेन नृपतिप्रियकाम्यया वां रामोऽभियुद्ध्यतु बली सह मुष्टिकेन ॥ ११८॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्त आह भगवान् (अपहासपूर्वं) परिहासपूर्वमेवं भवत्विति स तेन तदाऽभियातः | | verse_lines = इत्युक्त आह भगवान् (अपहासपूर्वं) परिहासपूर्वमेवं भवत्विति स तेन तदाऽभियातः ।¦सन्दर्श्य दैवतपतिर्युधि मल्ललीलां मौहूर्तिकीमथ पदोर्जगृहे स्वशत्रुम् ॥ ११९॥ | ||
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| verse_text = सञ्चालितेन मुकुटेन विकुण्डलेन कर्णद्वयेन विगताभरणोरसा च । | | verse_text = सञ्चालितेन मुकुटेन विकुण्डलेन कर्णद्वयेन विगताभरणोरसा च । | ||
| verse_lines = सञ्चालितेन मुकुटेन विकुण्डलेन कर्णद्वयेन विगताभरणोरसा च | | verse_lines = सञ्चालितेन मुकुटेन विकुण्डलेन कर्णद्वयेन विगताभरणोरसा च ।¦स्रस्ताम्बरेण जघनेन सुशोच्यरूपः कंसो बभूव नरसिंहकराग्रसंस्थः ॥ १२९॥ | ||
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| verse_text = उत्कृष्य तं सुरपतिः परमोच्चमञ्चादन्यैरजेयमतिवीर्यबलोपपन्नम् । | | verse_text = उत्कृष्य तं सुरपतिः परमोच्चमञ्चादन्यैरजेयमतिवीर्यबलोपपन्नम् । | ||
| verse_lines = उत्कृष्य तं सुरपतिः परमोच्चमञ्चादन्यैरजेयमतिवीर्यबलोपपन्नम् | | verse_lines = उत्कृष्य तं सुरपतिः परमोच्चमञ्चादन्यैरजेयमतिवीर्यबलोपपन्नम् ।¦अब्जोद्भवेशवरगुप्तमनन्तशक्तिर्भूमौ निपात्य स ददौ पदयोः प्रहारम् ॥ १३०॥ | ||
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| verse_text = देहे तु योऽभवदमुष्य रमेशबन्धुर्वायुः स कृष्णतनुमाश्रयदन्यपापम् । | | verse_text = देहे तु योऽभवदमुष्य रमेशबन्धुर्वायुः स कृष्णतनुमाश्रयदन्यपापम् । | ||
| verse_lines = देहे तु योऽभवदमुष्य रमेशबन्धुर्वायुः स कृष्णतनुमाश्रयदन्यपापम् | | verse_lines = देहे तु योऽभवदमुष्य रमेशबन्धुर्वायुः स कृष्णतनुमाश्रयदन्यपापम् ।¦दैत्यं चकर्ष हरिरत्र शरीरसंस्थं पश्यत्सु कञ्जजमुखेषु सुरेष्वनन्तः ॥ १३१॥ | ||
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| verse_text = द्वेषात् स सर्वजगदेकगुरोः स्वकीयैः पूर्वप्रमापितजनैः सहितः समस्तैः । | | verse_text = द्वेषात् स सर्वजगदेकगुरोः स्वकीयैः पूर्वप्रमापितजनैः सहितः समस्तैः । | ||
| verse_lines = द्वेषात् स सर्वजगदेकगुरोः स्वकीयैः पूर्वप्रमापितजनैः सहितः समस्तैः | | verse_lines = द्वेषात् स सर्वजगदेकगुरोः स्वकीयैः पूर्वप्रमापितजनैः सहितः समस्तैः ।¦धात्र्यादिभिः प्रतिययौ कुमतिस्तमोऽन्धमन्येऽपि चैवमुपयान्ति हरावभक्ताः ॥ १३२॥ | ||
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| verse_text = नित्यातिदुःखमनिवृत्ति सुखव्यपेतमन्धं तमो नियतमेति हरावभक्तः । | | verse_text = नित्यातिदुःखमनिवृत्ति सुखव्यपेतमन्धं तमो नियतमेति हरावभक्तः । | ||
| verse_lines = नित्यातिदुःखमनिवृत्ति सुखव्यपेतमन्धं तमो नियतमेति हरावभक्तः | | verse_lines = नित्यातिदुःखमनिवृत्ति सुखव्यपेतमन्धं तमो नियतमेति हरावभक्तः ।¦भक्तोऽपि कञ्जजगिरीशमुखेषु सर्वधर्मार्णवोऽपि निखिलागमनिर्णयेन ॥ १३३॥ | ||
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| verse_text = यो वेत्ति निश्चितमतिर्हरिमब्जजेशपूर्वाखिलस्य जगतः सकलेऽपि काले । | | verse_text = यो वेत्ति निश्चितमतिर्हरिमब्जजेशपूर्वाखिलस्य जगतः सकलेऽपि काले । | ||
| verse_lines = यो वेत्ति निश्चितमतिर्हरिमब्जजेशपूर्वाखिलस्य जगतः सकलेऽपि काले | | verse_lines = यो वेत्ति निश्चितमतिर्हरिमब्जजेशपूर्वाखिलस्य जगतः सकलेऽपि काले ।¦सृष्टिस्थितिप्रळयमोक्षदमात्मतन्त्रं लक्ष्म्या अपीशमतिभक्तियुतः स मुच्येत् ॥ १३४॥ | ||
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| verse_text = तस्मादनन्तगुणपूर्णममुं रमेशं निश्चित्य दोषरहितं परयैव भक्त्या । | | verse_text = तस्मादनन्तगुणपूर्णममुं रमेशं निश्चित्य दोषरहितं परयैव भक्त्या । | ||
| verse_lines = तस्मादनन्तगुणपूर्णममुं रमेशं निश्चित्य दोषरहितं परयैव भक्त्या | | verse_lines = तस्मादनन्तगुणपूर्णममुं रमेशं निश्चित्य दोषरहितं परयैव भक्त्या ।¦विज्ञाय दैवतगणांश्च यथाक्रमेण भक्ता हरेरिति सदैव भजेत धीरः ॥ १३५॥ | ||
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| verse_lines = निहत्य कंसमोजसा विधातृशम्भुपूर्वकैः | | verse_lines = निहत्य कंसमोजसा विधातृशम्भुपूर्वकैः ।¦स्तुतः प्रसूनवर्षिभिर्मुमोद केशवोऽधिकम् ॥ १३६॥ | ||
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| verse_text = सदैव मोदरूपिणो मुदोक्तिरस्य लौकिकी । | | verse_text = सदैव मोदरूपिणो मुदोक्तिरस्य लौकिकी । | ||
| verse_lines = सदैव मोदरूपिणो मुदोक्तिरस्य लौकिकी | | verse_lines = सदैव मोदरूपिणो मुदोक्तिरस्य लौकिकी ।¦यथोदयो रवेर्भवेत् सदोदितस्य लोकतः ॥ १३७॥ | ||
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| verse_lines = अनन्तचित्सुखार्णवः सदोदितैकरूपकः | | verse_lines = अनन्तचित्सुखार्णवः सदोदितैकरूपकः ।¦समस्तदोषवर्जितो हरिर्गुणात्मकः सदा ॥ १३८॥ | ||
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<span id="gr-C14" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्दशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C14" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्दशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ कृष्णो विमोच्य पितरावभिवन्द्य सर्ववन्द्योऽपि रामसहितः प्रतिपालनाय । | | verse_text = औं ॥ कृष्णो विमोच्य पितरावभिवन्द्य सर्ववन्द्योऽपि रामसहितः प्रतिपालनाय । | ||
| verse_lines = औं ॥ कृष्णो विमोच्य पितरावभिवन्द्य सर्ववन्द्योऽपि रामसहितः प्रतिपालनाय | | verse_lines = औं ॥ कृष्णो विमोच्य पितरावभिवन्द्य सर्ववन्द्योऽपि रामसहितः प्रतिपालनाय ।¦धर्मस्य राज्यपदवीं प्रणिधाय चोग्रसेने द्विजत्वमुपगम्य मुमोच नन्दम् ॥ १॥ | ||
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| verse_text = नन्दोऽपि सान्त्ववचनैरनुनीय मुक्तः कृष्णेन तच्चरणपङ्कजमात्मसंस्थम् । | | verse_text = नन्दोऽपि सान्त्ववचनैरनुनीय मुक्तः कृष्णेन तच्चरणपङ्कजमात्मसंस्थम् । | ||
| verse_lines = नन्दोऽपि सान्त्ववचनैरनुनीय मुक्तः कृष्णेन तच्चरणपङ्कजमात्मसंस्थम् | | verse_lines = नन्दोऽपि सान्त्ववचनैरनुनीय मुक्तः कृष्णेन तच्चरणपङ्कजमात्मसंस्थम् ।¦कृत्वा जगाम सह गोपगणेन कृच्छ्राद् ध्यायन् जनार्दनमुवास वने सभार्यः ॥ २॥ | ||
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| verse_text = कृष्णोऽप्यवन्तिपुरवासिनमेत्य विप्रं सान्दीपनिं सह बलेन ततोऽध्यगीष्ट । | | verse_text = कृष्णोऽप्यवन्तिपुरवासिनमेत्य विप्रं सान्दीपनिं सह बलेन ततोऽध्यगीष्ट । | ||
| verse_lines = कृष्णोऽप्यवन्तिपुरवासिनमेत्य विप्रं सान्दीपनिं सह बलेन ततोऽध्यगीष्ट | | verse_lines = कृष्णोऽप्यवन्तिपुरवासिनमेत्य विप्रं सान्दीपनिं सह बलेन ततोऽध्यगीष्ट ।¦वेदान् सकृन्निगदितान् निखिलाश्च विद्याः सम्पूर्णसंविदपि दैवतशिक्षणाय ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = धर्मो हि सर्वविदुषामपि दैवतानां प्राप्ते नरेषु जनने नरवत् प्रवृत्तिः । | | verse_text = धर्मो हि सर्वविदुषामपि दैवतानां प्राप्ते नरेषु जनने नरवत् प्रवृत्तिः । | ||
| verse_lines = धर्मो हि सर्वविदुषामपि दैवतानां प्राप्ते नरेषु जनने नरवत् प्रवृत्तिः | | verse_lines = धर्मो हि सर्वविदुषामपि दैवतानां प्राप्ते नरेषु जनने नरवत् प्रवृत्तिः ।¦ज्ञानादिगूहनमुताध्ययनादिरत्र तज्ज्ञापनार्थमवसद् भगवान् गुरौ च ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = गुर्वर्थमेष मृतपुत्रमदात् पुनश्च रामेण सार्द्धमगमन्मधुरां रमेशः । | | verse_text = गुर्वर्थमेष मृतपुत्रमदात् पुनश्च रामेण सार्द्धमगमन्मधुरां रमेशः । | ||
| verse_lines = गुर्वर्थमेष मृतपुत्रमदात् पुनश्च रामेण सार्द्धमगमन्मधुरां रमेशः | | verse_lines = गुर्वर्थमेष मृतपुत्रमदात् पुनश्च रामेण सार्द्धमगमन्मधुरां रमेशः ।¦पौरैः सजानपदमबन्धुजनैरजस्रमभ्यर्चितो न्यवसदिष्टकृदात्मपित्रोः ॥ ५॥ | ||
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| verse_lines = सर्वेऽपि ते पतिमवाप्य हरिं पुराऽभितप्ता हि भोजपतिना मुमुदुर्नितान्तम् | | verse_lines = सर्वेऽपि ते पतिमवाप्य हरिं पुराऽभितप्ता हि भोजपतिना मुमुदुर्नितान्तम् ।¦किं वाच्यमत्र सुतमाप्य हरिं स्वपित्रोर्यत्राखिलस्य सुजनस्य बभूव मोदः ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = कृष्णाश्रयो वसति यत्र जनोऽपि तत्र वृद्धिर्भवेत् किमु रमाधिपतेर्निवासे । | | verse_text = कृष्णाश्रयो वसति यत्र जनोऽपि तत्र वृद्धिर्भवेत् किमु रमाधिपतेर्निवासे । | ||
| verse_lines = कृष्णाश्रयो वसति यत्र जनोऽपि तत्र वृद्धिर्भवेत् किमु रमाधिपतेर्निवासे | | verse_lines = कृष्णाश्रयो वसति यत्र जनोऽपि तत्र वृद्धिर्भवेत् किमु रमाधिपतेर्निवासे ।¦वृन्दावनं यदधिवासत आस सध्र्यङ् माहेन्द्रसद्मसदृशं किमु तत्र पुर्याम् ॥ ७॥ | ||
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| verse_lines = येनाधिवासमृषभो जगतां विधत्ते विष्णुस्ततो हि वरता सदने विधातुः | | verse_lines = येनाधिवासमृषभो जगतां विधत्ते विष्णुस्ततो हि वरता सदने विधातुः ।¦तस्मात् प्रभोर्निवसनान्मधुरा पुरी सा शश्वत् समृद्धजनसङ्कुलिता बभूव ॥ ८॥ | ||
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| verse_lines = रक्षत्यजे त्रिजगतां परिरक्षकेऽस्मिन् सर्वान् यदून् मगधराजसुते स्वभर्तुः | | verse_lines = रक्षत्यजे त्रिजगतां परिरक्षकेऽस्मिन् सर्वान् यदून् मगधराजसुते स्वभर्तुः ।¦कृष्णान्मृतिं पितुरवाप्य समीपमस्तिप्रास्ती शशंसतुरतीव च दूःखितेऽस्मै ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वैव तन्मगधराज उरुप्ररूढबाह्वोर्बलेन नजितो युधि सर्वलोकैः । | | verse_text = श्रुत्वैव तन्मगधराज उरुप्ररूढबाह्वोर्बलेन नजितो युधि सर्वलोकैः । | ||
| verse_lines = श्रुत्वैव तन्मगधराज उरुप्ररूढबाह्वोर्बलेन नजितो युधि सर्वलोकैः | | verse_lines = श्रुत्वैव तन्मगधराज उरुप्ररूढबाह्वोर्बलेन नजितो युधि सर्वलोकैः ।¦ब्रह्मेशचण्डमुनिदत्तवरैरजेयो मृत्यूज्झितश्च विजयी जगतश्चुकोप ॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = क्षुब्धोऽतिकोपवशतः स्वगदाममोघां दत्तां शिवेन जगृहे शिवभक्तवन्द्यः | | verse_lines = क्षुब्धोऽतिकोपवशतः स्वगदाममोघां दत्तां शिवेन जगृहे शिवभक्तवन्द्यः ।¦शैवागमाखिलविदत्र च सुस्थिरोऽसौ चिक्षेप योजनशतं स तु तां परस्मै ॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = अर्वाक् पपात च गदा मधुराप्रदेशात् सा योजनेन यदिमं प्रजगाद पृष्टः | | verse_lines = अर्वाक् पपात च गदा मधुराप्रदेशात् सा योजनेन यदिमं प्रजगाद पृष्टः ।¦एकोत्तरामपि शताच्छतयोजनेति देवर्षिरत्र मधुरां भगवत्प्रियार्थे ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = शक्तस्य चापि हि गदाप्रविघातने तु शुश्रूषणं मदुचितं त्विति चिन्तयानः । | | verse_text = शक्तस्य चापि हि गदाप्रविघातने तु शुश्रूषणं मदुचितं त्विति चिन्तयानः । | ||
| verse_lines = शक्तस्य चापि हि गदाप्रविघातने तु शुश्रूषणं मदुचितं त्विति चिन्तयानः | | verse_lines = शक्तस्य चापि हि गदाप्रविघातने तु शुश्रूषणं मदुचितं त्विति चिन्तयानः ।¦विष्णोर्मुनिः स निजगाद ह योजनोनं मार्गं पुरो भगवतो मगधेशपृष्टः ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = आरुह्य भूमयरथं प्रतियुक्तमश्वैर्वेदात्मकैर्धनुरधिज्यमथ प्रगृह्य । | | verse_text = आरुह्य भूमयरथं प्रतियुक्तमश्वैर्वेदात्मकैर्धनुरधिज्यमथ प्रगृह्य । | ||
| verse_lines = आरुह्य भूमयरथं प्रतियुक्तमश्वैर्वेदात्मकैर्धनुरधिज्यमथ प्रगृह्य | | verse_lines = आरुह्य भूमयरथं प्रतियुक्तमश्वैर्वेदात्मकैर्धनुरधिज्यमथ प्रगृह्य ।¦शार्ङ्गं शरांश्च निशितान् मगधाधिराजमुग्रं नृपेन्द्रसहितं प्रययौ जवेन ॥ २२॥ | ||
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| verse_text = रामः प्रगृह्य मुसलं स हलं च यानमास्थाय सायकशरासनतूणयुक्तः । | | verse_text = रामः प्रगृह्य मुसलं स हलं च यानमास्थाय सायकशरासनतूणयुक्तः । | ||
| verse_lines = रामः प्रगृह्य मुसलं स हलं च यानमास्थाय सायकशरासनतूणयुक्तः | | verse_lines = रामः प्रगृह्य मुसलं स हलं च यानमास्थाय सायकशरासनतूणयुक्तः ।¦सैन्यं जरासुतसुरक्षितमभ्यधावद्धर्षान्नदन्नुरुबलोऽरिबलैरधृष्यः ॥ २३॥ | ||
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| verse_text = उद्वीक्ष्य कृष्णमभियान्तमनन्तशक्तिं राजेन्द्रवृन्दसहितो मगधाधिराजः । | | verse_text = उद्वीक्ष्य कृष्णमभियान्तमनन्तशक्तिं राजेन्द्रवृन्दसहितो मगधाधिराजः । | ||
| verse_lines = उद्वीक्ष्य कृष्णमभियान्तमनन्तशक्तिं राजेन्द्रवृन्दसहितो मगधाधिराजः | | verse_lines = उद्वीक्ष्य कृष्णमभियान्तमनन्तशक्तिं राजेन्द्रवृन्दसहितो मगधाधिराजः ।¦उद्वेलसागरवदाश्वभियाय कोपान्नानाविधायुधवरैरभिवर्षमाणः ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = तं वै चुकोपयिषुरग्रत उग्रसेनं कृष्णो निधाय समगात् स्वयमस्य पश्चात् । | | verse_text = तं वै चुकोपयिषुरग्रत उग्रसेनं कृष्णो निधाय समगात् स्वयमस्य पश्चात् । | ||
| verse_lines = तं वै चुकोपयिषुरग्रत उग्रसेनं कृष्णो निधाय समगात् स्वयमस्य पश्चात् | | verse_lines = तं वै चुकोपयिषुरग्रत उग्रसेनं कृष्णो निधाय समगात् स्वयमस्य पश्चात् ।¦दृष्ट्वाऽग्रतो मगधराट् स्थितमुग्रसेनं कोपाच्चलत्तनुरिदं वचनं बभाषे ॥ २५॥ | ||
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| verse_text = पापापयाहि पुरतो मम राज्यकाम निर्लज्ज पुत्रवधकारण शत्रुपक्ष । | | verse_text = पापापयाहि पुरतो मम राज्यकाम निर्लज्ज पुत्रवधकारण शत्रुपक्ष । | ||
| verse_lines = पापापयाहि पुरतो मम राज्यकाम निर्लज्ज पुत्रवधकारण शत्रुपक्ष | | verse_lines = पापापयाहि पुरतो मम राज्यकाम निर्लज्ज पुत्रवधकारण शत्रुपक्ष ।¦त्वं जीर्णबस्तसदृशो न मयेह वध्यः सिंहो हि सिंहमभियाति न वै सृगालम् ॥ २६॥ | ||
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| verse_text = आक्षिप्त इत्थममुनाऽथ स भोजराजस्तूणात् प्रगृह्य निशितं शरमाशु तेन । | | verse_text = आक्षिप्त इत्थममुनाऽथ स भोजराजस्तूणात् प्रगृह्य निशितं शरमाशु तेन । | ||
| verse_lines = आक्षिप्त इत्थममुनाऽथ स भोजराजस्तूणात् प्रगृह्य निशितं शरमाशु तेन | | verse_lines = आक्षिप्त इत्थममुनाऽथ स भोजराजस्तूणात् प्रगृह्य निशितं शरमाशु तेन ।¦छित्वा जरासुतधनुर्बलवन्ननाद विव्याध सायकगणैश्च पुनस्तमुग्रैः ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = अन्यच्छरासनवरं प्रतिगृह्य कोपसंरक्तनेत्रमभियान्तमुदीक्ष्य कृष्णः | | verse_lines = अन्यच्छरासनवरं प्रतिगृह्य कोपसंरक्तनेत्रमभियान्तमुदीक्ष्य कृष्णः ।¦भोजाधिराजवधकाङ्क्षिणमुग्रवेगं बार्हद्रथं प्रतिययौ परमो रथेन ॥ २८॥ | ||
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| verse_lines = आयान्तमीक्ष्य भगवन्तमनन्तवीर्यं चेदीशपौण्ड्रमुखराजगणैः समेतः | | verse_lines = आयान्तमीक्ष्य भगवन्तमनन्तवीर्यं चेदीशपौण्ड्रमुखराजगणैः समेतः ।¦नानाविधास्त्रवरशस्त्रगणैर्ववर्ष मेरुं यथा घन उदीर्णरवो जलौघैः ॥ २९॥ | ||
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| verse_text = शस्त्रास्त्रवृष्टिमभितो भगवान् विवृश्च्य शार्ङ्गोत्थसायकगणैर्विरथाश्वसूतम् । | | verse_text = शस्त्रास्त्रवृष्टिमभितो भगवान् विवृश्च्य शार्ङ्गोत्थसायकगणैर्विरथाश्वसूतम् । | ||
| verse_lines = शस्त्रास्त्रवृष्टिमभितो भगवान् विवृश्च्य शार्ङ्गोत्थसायकगणैर्विरथाश्वसूतम् | | verse_lines = शस्त्रास्त्रवृष्टिमभितो भगवान् विवृश्च्य शार्ङ्गोत्थसायकगणैर्विरथाश्वसूतम् ।¦चक्रे निरायुधमसौ मगधेन्द्रमाशु च्छिन्नातपत्रवरकेतुमचिन्त्यशक्तिः ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = नैनं जघान भगवान् सुशकं च भीमे भक्तिं निजां प्रथयितुं यश उच्चधर्मम् | | verse_lines = नैनं जघान भगवान् सुशकं च भीमे भक्तिं निजां प्रथयितुं यश उच्चधर्मम् ।¦चेदीशपौण्ड्रकसकीचकमद्रराजसाल्वैकलव्यकमुखान् विरथांश्चकार ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = ये चापि हंसडिभकद्रुमरुग्मिमुख्या बाह्लीकभौमसुतमैन्दपुरस्सराश्च | | verse_lines = ये चापि हंसडिभकद्रुमरुग्मिमुख्या बाह्लीकभौमसुतमैन्दपुरस्सराश्च ।¦सर्वे प्रदुद्रुवुरजस्य शरैर्विभिन्ना अन्ये च भूमिपतयो य इहाऽसुरुर्व्याम् ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = छिन्नायुधध्वजपताकरथाश्वसूतवर्माण उग्रशरताडितभिन्नगात्राः | | verse_lines = छिन्नायुधध्वजपताकरथाश्वसूतवर्माण उग्रशरताडितभिन्नगात्राः ।¦स्रस्ताम्बराभरणमूर्धजमाल्यहीना रक्तं वमन्त उरु दुद्रुवुराशु भीताः ॥ ३३॥ | ||
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| verse_text = शोच्यां दशामुपगतेषु नृपेषु (सर्वेष्वस्तायुधेषु) सर्वेष्वात्तायुधेषु हरिणा युधि विद्रवत्सु । | | verse_text = शोच्यां दशामुपगतेषु नृपेषु (सर्वेष्वस्तायुधेषु) सर्वेष्वात्तायुधेषु हरिणा युधि विद्रवत्सु । | ||
| verse_lines = शोच्यां दशामुपगतेषु नृपेषु (सर्वेष्वस्तायुधेषु) सर्वेष्वात्तायुधेषु हरिणा युधि विद्रवत्सु | | verse_lines = शोच्यां दशामुपगतेषु नृपेषु (सर्वेष्वस्तायुधेषु) सर्वेष्वात्तायुधेषु हरिणा युधि विद्रवत्सु ।¦नानायुधाढ्यमपरं रथमुग्रवीर्यम् आस्थाय मागधपतिः प्रससार रामम् ॥ ३४॥ | ||
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| verse_lines = आधावतोऽस्य मुसलेन रथं बभञ्ज रामो गदामुरुतरोरसि सोऽपि तस्य | | verse_lines = आधावतोऽस्य मुसलेन रथं बभञ्ज रामो गदामुरुतरोरसि सोऽपि तस्य ।¦चिक्षेप तं च मुसलेन तताड रामस्तावुत्तमौ बलवतां युयुधात उग्रम् ॥ ३५॥ | ||
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| verse_lines = तौ चक्रतुः पुरु नियुद्धमपि स्म तत्र सञ्चूर्ण्य सर्वगिरिवृक्षशिलासमूहान् | | verse_lines = तौ चक्रतुः पुरु नियुद्धमपि स्म तत्र सञ्चूर्ण्य सर्वगिरिवृक्षशिलासमूहान् ।¦दीर्घं नियुद्धमभवत् सममेतयोस्तद् वज्राद् दृढाङ्गतमयोर्बलिनोर्नितान्तम् ॥ ३६॥ | ||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽथ शङ्खरवमम्बुजलोचनस्य विद्रावितानपि नृपानभिवीक्ष्य रामः | | verse_lines = श्रुत्वाऽथ शङ्खरवमम्बुजलोचनस्य विद्रावितानपि नृपानभिवीक्ष्य रामः ।¦युद्ध्यन्तमीक्ष्य च रिपुं ववृधे बलेन त्यक्त्वा रिपुं मुसलमादद आश्वमोघम् ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = तेनाऽहतः शिरसि सम्मुमुहेऽतिवेलं बार्हद्रथो जगृह एनमथो हली सः | | verse_lines = तेनाऽहतः शिरसि सम्मुमुहेऽतिवेलं बार्हद्रथो जगृह एनमथो हली सः ।¦तत्रैकलव्य उत कृष्णशरैः पलायन्नस्त्राणि रामशिरसि प्रमुमोच शीघ्रम् ॥ ३८॥ | ||
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| verse_lines = भीतेन तेन समरं भगवाननिच्छन् प्रद्युम्नमाश्वसृजदात्मसुतं मनोजम् | | verse_lines = भीतेन तेन समरं भगवाननिच्छन् प्रद्युम्नमाश्वसृजदात्मसुतं मनोजम् ।¦प्रद्युम्न एनमभियाय महास्त्रजालै रामस्तु मागधमथाऽत्मरथं निनाय ॥ ३९॥ | ||
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| verse_lines = युद्ध्वा चिरं रणमुखे भगवत्सुतोऽसौ चक्रे निरायुधममुं स्थिरमेकलव्यम् | | verse_lines = युद्ध्वा चिरं रणमुखे भगवत्सुतोऽसौ चक्रे निरायुधममुं स्थिरमेकलव्यम् ।¦अंशेन यो भुवमगान्मणिमानिति स्म स क्रोधतन्त्रकगणेष्वधिपो निषादः ॥ ४०॥ | ||
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| verse_lines = प्रद्युम्नमात्मनि निधाय पुनः स कृष्णः संहृत्य मागधबलं निखिलं शरौघैः | | verse_lines = प्रद्युम्नमात्मनि निधाय पुनः स कृष्णः संहृत्य मागधबलं निखिलं शरौघैः ।¦भूयश्चमूमभिविनेतुमुदारकर्मा बार्हद्रथं त्वमुचदक्षयपौरुषाऽजः ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = ते सन्निवार्य तु पृथामथ माद्रवत्या भर्तुः सहानुगमनं बहु चार्थयन्त्याः । | | verse_text = ते सन्निवार्य तु पृथामथ माद्रवत्या भर्तुः सहानुगमनं बहु चार्थयन्त्याः । | ||
| verse_lines = ते सन्निवार्य तु पृथामथ माद्रवत्या भर्तुः सहानुगमनं बहु चार्थयन्त्याः | | verse_lines = ते सन्निवार्य तु पृथामथ माद्रवत्या भर्तुः सहानुगमनं बहु चार्थयन्त्याः ।¦संवादमेव निजदोषमवेक्ष्य तस्याश्चक्रुः सदाऽवगतभागवतोच्चधर्माः ॥ ५१॥ | ||
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| verse_text = भर्तुर्गुणैरनधिकौ तनयार्थमेव माद्र्या कृतौ (आकृतौ) सुरवरावधिकौ स्वतोऽपि । | | verse_text = भर्तुर्गुणैरनधिकौ तनयार्थमेव माद्र्या कृतौ (आकृतौ) सुरवरावधिकौ स्वतोऽपि । | ||
| verse_lines = भर्तुर्गुणैरनधिकौ तनयार्थमेव माद्र्या कृतौ (आकृतौ) सुरवरावधिकौ स्वतोऽपि | | verse_lines = भर्तुर्गुणैरनधिकौ तनयार्थमेव माद्र्या कृतौ (आकृतौ) सुरवरावधिकौ स्वतोऽपि ।¦तेनैव भर्तृमृतिहेतुरभूत् समस्तलोकैश्च नातिमहिता सुगुणाऽपि माद्री ॥ ५२॥ | ||
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| verse_text = पाण्डोः सुता मुनिगणैः पितृमेधमत्र चक्रुर्यथावदथ तेन सहैव माद्री । | | verse_text = पाण्डोः सुता मुनिगणैः पितृमेधमत्र चक्रुर्यथावदथ तेन सहैव माद्री । | ||
| verse_lines = पाण्डोः सुता मुनिगणैः पितृमेधमत्र चक्रुर्यथावदथ तेन सहैव माद्री | | verse_lines = पाण्डोः सुता मुनिगणैः पितृमेधमत्र चक्रुर्यथावदथ तेन सहैव माद्री ।¦हुत्वाऽऽत्मदेहमुरु पापमदः कृतं च सम्मार्ज्य लोकमगमन्निजभर्तुरेव ॥ ५३॥ | ||
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| verse_text = पाण्डुश्च पुत्रकगुणैः स्वगुणैश्च साक्षात् कृष्णात्मजः सततमस्य पदैकभक्तः । | | verse_text = पाण्डुश्च पुत्रकगुणैः स्वगुणैश्च साक्षात् कृष्णात्मजः सततमस्य पदैकभक्तः । | ||
| verse_lines = पाण्डुश्च पुत्रकगुणैः स्वगुणैश्च साक्षात् कृष्णात्मजः सततमस्य पदैकभक्तः | | verse_lines = पाण्डुश्च पुत्रकगुणैः स्वगुणैश्च साक्षात् कृष्णात्मजः सततमस्य पदैकभक्तः ।¦लोकानवाप विमलान् महितान् महद्भिः किं चित्रमत्र हरिपादविनम्रचित्ते ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = पाण्डोः सुताश्च पृथया सहिता मुनीन्द्रैर्नारायणाश्रमत आशु पुरं स्वकीयम् । | | verse_text = पाण्डोः सुताश्च पृथया सहिता मुनीन्द्रैर्नारायणाश्रमत आशु पुरं स्वकीयम् । | ||
| verse_lines = पाण्डोः सुताश्च पृथया सहिता मुनीन्द्रैर्नारायणाश्रमत आशु पुरं स्वकीयम् | | verse_lines = पाण्डोः सुताश्च पृथया सहिता मुनीन्द्रैर्नारायणाश्रमत आशु पुरं स्वकीयम् ।¦जग्मुस्तथैव धृतराष्ट्रपुरो मुनीन्द्राः वृत्तं समस्तमवदन्ननुजं मृतं च ॥ ५५॥ | ||
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| verse_text = तूष्णीं स्थिते तु नृपतौ तनुजे द्युनद्याः क्षत्तर्युतात्त उरुमोदमतीव पापाः । | | verse_text = तूष्णीं स्थिते तु नृपतौ तनुजे द्युनद्याः क्षत्तर्युतात्त उरुमोदमतीव पापाः । | ||
| verse_lines = तूष्णीं स्थिते तु नृपतौ तनुजे द्युनद्याः क्षत्तर्युतात्त उरुमोदमतीव पापाः | | verse_lines = तूष्णीं स्थिते तु नृपतौ तनुजे द्युनद्याः क्षत्तर्युतात्त उरुमोदमतीव पापाः ।¦ऊचुः सुयोधनमुखाः सह सौबलेन पाण्डोर्मृतिः किल पुरा तनयाः क्व तस्य ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = न क्षेत्रजा अपि मृते पितरि स्वकीयैः सम्यङ् नियोगमनवाप्य भवाय योग्याः । | | verse_text = न क्षेत्रजा अपि मृते पितरि स्वकीयैः सम्यङ् नियोगमनवाप्य भवाय योग्याः । | ||
| verse_lines = न क्षेत्रजा अपि मृते पितरि स्वकीयैः सम्यङ् नियोगमनवाप्य भवाय योग्याः | | verse_lines = न क्षेत्रजा अपि मृते पितरि स्वकीयैः सम्यङ् नियोगमनवाप्य भवाय योग्याः ।¦तेषामितीरितवचोऽनु जगाद वायुराभाष्य कौरवगणान् गगनस्थ एव ॥ ५७॥ | ||
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| verse_text = एते हि धर्ममरुदिन्द्रभिषग्वरेभ्यो जाताः प्रजीवति पितर्युरुधामसाराः । | | verse_text = एते हि धर्ममरुदिन्द्रभिषग्वरेभ्यो जाताः प्रजीवति पितर्युरुधामसाराः । | ||
| verse_lines = एते हि धर्ममरुदिन्द्रभिषग्वरेभ्यो जाताः प्रजीवति पितर्युरुधामसाराः | | verse_lines = एते हि धर्ममरुदिन्द्रभिषग्वरेभ्यो जाताः प्रजीवति पितर्युरुधामसाराः ।¦शक्याश्च नैव भवतां क्वचिदग्रहाय नारायणेन सततं परिरक्षिता यत् ॥ ५८॥ | ||
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| verse_text = वायोरदृश्यवचनं परिशङ्कमानेष्वाविर्बभूव भगवान् स्वयमब्जनाभः । | | verse_text = वायोरदृश्यवचनं परिशङ्कमानेष्वाविर्बभूव भगवान् स्वयमब्जनाभः । | ||
| verse_lines = वायोरदृश्यवचनं परिशङ्कमानेष्वाविर्बभूव भगवान् स्वयमब्जनाभः | | verse_lines = वायोरदृश्यवचनं परिशङ्कमानेष्वाविर्बभूव भगवान् स्वयमब्जनाभः ।¦व्यासस्वरूप उरुसर्वगुणैकदेह आदाय तानगमदाशु च पाण्डुगेहम् ॥ ५९॥ | ||
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| verse_text = तत्स्वीकृतेषु सकला अपि भीष्ममुख्या वैचित्रवीर्यसहिताः परिपूज्य सर्वान् । | | verse_text = तत्स्वीकृतेषु सकला अपि भीष्ममुख्या वैचित्रवीर्यसहिताः परिपूज्य सर्वान् । | ||
| verse_lines = तत्स्वीकृतेषु सकला अपि भीष्ममुख्या वैचित्रवीर्यसहिताः परिपूज्य सर्वान् | | verse_lines = तत्स्वीकृतेषु सकला अपि भीष्ममुख्या वैचित्रवीर्यसहिताः परिपूज्य सर्वान् ।¦कुन्त्या सहैव जगृहुः सुभृशं तदाऽऽर्ता वैचित्रवीर्यतनयाः सह सौबलेन ॥ ६०॥ | ||
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| verse_lines = वैचित्रवीर्यतनयाः कृपतो महास्त्राण्यापुश्च पाण्डुतनयैः सह सर्वराज्ञाम् | | verse_lines = वैचित्रवीर्यतनयाः कृपतो महास्त्राण्यापुश्च पाण्डुतनयैः सह सर्वराज्ञाम् ।¦पुत्राश्च तत्र विविधा अपि बालचेष्टाः कुर्वत्सु वायुतनयेन जिताः समस्ताः ॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = पक्वोरुभोज्यफलसन्नयनाय वृक्षेष्वारूढराजतनयानभिवीक्ष्य भीमः । | | verse_text = पक्वोरुभोज्यफलसन्नयनाय वृक्षेष्वारूढराजतनयानभिवीक्ष्य भीमः । | ||
| verse_lines = पक्वोरुभोज्यफलसन्नयनाय वृक्षेष्वारूढराजतनयानभिवीक्ष्य भीमः | | verse_lines = पक्वोरुभोज्यफलसन्नयनाय वृक्षेष्वारूढराजतनयानभिवीक्ष्य भीमः ।¦पादप्रहारमुरुवृक्षतले प्रदाय साकं फलैर्विनिपतत्सु फलान्यभुङ्क्त ॥ ६२॥ | ||
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| verse_text = युद्धे नियुद्ध उत धावन उत्प्लवे च वारिप्लवे च सहितान् निखिलान् कुमारान् । | | verse_text = युद्धे नियुद्ध उत धावन उत्प्लवे च वारिप्लवे च सहितान् निखिलान् कुमारान् । | ||
| verse_lines = युद्धे नियुद्ध उत धावन उत्प्लवे च वारिप्लवे च सहितान् निखिलान् कुमारान् | | verse_lines = युद्धे नियुद्ध उत धावन उत्प्लवे च वारिप्लवे च सहितान् निखिलान् कुमारान् ।¦एको जिगाय तरसा परमार्यकर्मा विष्णोः सुपूर्णसदनुग्रहतः सुनित्यात् ॥ ६३॥ | ||
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| verse_text = सर्वान् प्रगृह्य विनिमज्जति वारिमध्ये श्रान्तान् विसृज्य हसति स्म स विष्णुपद्याम् । | | verse_text = सर्वान् प्रगृह्य विनिमज्जति वारिमध्ये श्रान्तान् विसृज्य हसति स्म स विष्णुपद्याम् । | ||
| verse_lines = सर्वान् प्रगृह्य विनिमज्जति वारिमध्ये श्रान्तान् विसृज्य हसति स्म स विष्णुपद्याम् | | verse_lines = सर्वान् प्रगृह्य विनिमज्जति वारिमध्ये श्रान्तान् विसृज्य हसति स्म स विष्णुपद्याम् ।¦सर्वानुदूह्य च कदाचिदुरुप्रवाहां गङ्गां सुतारयति सारसुपूर्णपौंस्यः ॥ ६४॥ | ||
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| verse_text = द्वेषं ह्यृते नहि हरौ तमसि प्रवेशः प्राणे च तेन जगतीमनु तौ प्रपन्नौ । | | verse_text = द्वेषं ह्यृते नहि हरौ तमसि प्रवेशः प्राणे च तेन जगतीमनु तौ प्रपन्नौ । | ||
| verse_lines = द्वेषं ह्यृते नहि हरौ तमसि प्रवेशः प्राणे च तेन जगतीमनु तौ प्रपन्नौ | | verse_lines = द्वेषं ह्यृते नहि हरौ तमसि प्रवेशः प्राणे च तेन जगतीमनु तौ प्रपन्नौ ।¦तत्कारणान्यकुरुतां परमौ करांसि देवद्विषां सततविस्तृतसाधुपौंस्यौ ॥ ६५॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वाऽमितान्यथ करांसि मरुत्सुतेन नित्यं कृतानि तनया निखिलाश्च राज्ञाम् । | | verse_text = दृष्ट्वाऽमितान्यथ करांसि मरुत्सुतेन नित्यं कृतानि तनया निखिलाश्च राज्ञाम् । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वाऽमितान्यथ करांसि मरुत्सुतेन नित्यं कृतानि तनया निखिलाश्च राज्ञाम् | | verse_lines = दृष्ट्वाऽमितान्यथ करांसि मरुत्सुतेन नित्यं कृतानि तनया निखिलाश्च राज्ञाम् ।¦तस्यामितं बलमुदीक्ष्य सदोरुवृद्धद्वेषा बभूवुरथ मन्त्रममन्त्रयंश्च ॥ ६६॥ | ||
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| verse_text = येये हि तत्र नरदेवसुताः सुरांशाः प्रीतिं परां पवनजे निखिला अकुर्वन् । | | verse_text = येये हि तत्र नरदेवसुताः सुरांशाः प्रीतिं परां पवनजे निखिला अकुर्वन् । | ||
| verse_lines = येये हि तत्र नरदेवसुताः सुरांशाः प्रीतिं परां पवनजे निखिला अकुर्वन् | | verse_lines = येये हि तत्र नरदेवसुताः सुरांशाः प्रीतिं परां पवनजे निखिला अकुर्वन् ।¦तांस्तान् विहाय दितिजा नरदेववंशजाता विचार्य वधनिश्चयमस्य चक्रुः ॥ ६७॥ | ||
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| verse_lines = अस्मिन् हते विनिहता अखिलाश्च पार्थाः शक्यो बलाच्च न निहन्तुमयं बलाढ्यः | | verse_lines = अस्मिन् हते विनिहता अखिलाश्च पार्थाः शक्यो बलाच्च न निहन्तुमयं बलाढ्यः ।¦छद्मप्रयोगत इमं विनिहत्य वीर्यात् पार्थं निहत्य निगडे च विदध्महेऽन्यान् ॥ ६८॥ | ||
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| verse_lines = एवं कृते निहतकण्टकमस्य राज्यं दुर्योधनस्य हि भवेन्न ततोऽन्यथा स्यात् | | verse_lines = एवं कृते निहतकण्टकमस्य राज्यं दुर्योधनस्य हि भवेन्न ततोऽन्यथा स्यात् ।¦अस्मिन् हते निपतिते च सुरेन्द्रसूनौ शेषा भवेयुरपि सौबलिपुत्रदासाः ॥ ६९॥ | ||
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| verse_lines = एवं विचार्य विषमुल्बणमन्तकाभं क्षीरोदधेर्मथनजं तपसा गिरीशात् | | verse_lines = एवं विचार्य विषमुल्बणमन्तकाभं क्षीरोदधेर्मथनजं तपसा गिरीशात् ।¦शुक्रेण लब्धममुतः सुबलात्मजेन प्राप्तं प्रतोष्य मरुतस्तनयाय चादुः ॥ ७०॥ | ||
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| verse_lines = सम्मन्त्र्य राजतनयैर्धृतराष्ट्रजैस्तद् दत्तं स्वसूदमुखतोऽखिलभक्ष्यभोज्ये | | verse_lines = सम्मन्त्र्य राजतनयैर्धृतराष्ट्रजैस्तद् दत्तं स्वसूदमुखतोऽखिलभक्ष्यभोज्ये ।¦ज्ञात्वा युयुत्सुगदितं बलवान् स भीमो विष्णोरनुग्रहबलाज्जरयाञ्चकार ॥ ७१॥ | ||
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| verse_text = जीर्णे विषे कुमतयः परमाभितप्ताः प्रासादमाशु विदधुर्हरिपादतोये । | | verse_text = जीर्णे विषे कुमतयः परमाभितप्ताः प्रासादमाशु विदधुर्हरिपादतोये । | ||
| verse_lines = जीर्णे विषे कुमतयः परमाभितप्ताः प्रासादमाशु विदधुर्हरिपादतोये | | verse_lines = जीर्णे विषे कुमतयः परमाभितप्ताः प्रासादमाशु विदधुर्हरिपादतोये ।¦ज्ञात्वा युयुत्सुमुखतः स्वयमत्र चान्ते सुष्वाप मारुतिरमा धृतराष्ट्रपुत्रैः ॥ ७२॥ | ||
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| verse_text = दोषान् प्रकाशयितुमेव विचित्रवीर्यपुत्रात्मजेषु नृवरं प्रतिसुप्तमीक्ष्य । | | verse_text = दोषान् प्रकाशयितुमेव विचित्रवीर्यपुत्रात्मजेषु नृवरं प्रतिसुप्तमीक्ष्य । | ||
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| verse_text = तत् कोटियोजनगभीरमुदं विगाह्य भीमो विजृम्भणत एव विवृश्च्य पाशान् । | | verse_text = तत् कोटियोजनगभीरमुदं विगाह्य भीमो विजृम्भणत एव विवृश्च्य पाशान् । | ||
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| verse_text = स्वात्मावनार्थमधिकां स्तुतिमेव कृत्वा विष्णोः स दैत्यतनयो हरिणाऽवितोऽभूत् । | | verse_text = स्वात्मावनार्थमधिकां स्तुतिमेव कृत्वा विष्णोः स दैत्यतनयो हरिणाऽवितोऽभूत् । | ||
| verse_lines = स्वात्मावनार्थमधिकां स्तुतिमेव कृत्वा विष्णोः स दैत्यतनयो हरिणाऽवितोऽभूत् | | verse_lines = स्वात्मावनार्थमधिकां स्तुतिमेव कृत्वा विष्णोः स दैत्यतनयो हरिणाऽवितोऽभूत् ।¦नत्वौरसं बलममुष्य स कृष्यते हि भृत्यैर्बलात् स पितुरौरसमस्य वीर्यम् ॥ ८०॥ | ||
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| verse_text = नैसर्गिकं प्रियमिमं प्रवदन्ति विप्रा विष्णोर्नितान्तमपि सत्यमिदं ध्रुवं हि । | | verse_text = नैसर्गिकं प्रियमिमं प्रवदन्ति विप्रा विष्णोर्नितान्तमपि सत्यमिदं ध्रुवं हि । | ||
| verse_lines = नैसर्गिकं प्रियमिमं प्रवदन्ति विप्रा विष्णोर्नितान्तमपि सत्यमिदं ध्रुवं हि | | verse_lines = नैसर्गिकं प्रियमिमं प्रवदन्ति विप्रा विष्णोर्नितान्तमपि सत्यमिदं ध्रुवं हि ।¦नैवान्यथौरसबलं भवतीदृशं तदुत्साद्य एष हरिणैव सहैष नोऽर्थः ॥ ८१॥ | ||
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| verse_text = कृष्णः किलैष च हरिर्यदुषु प्रजातः सोऽस्याऽश्रयः कुरुत तस्य बहु प्रतीपम् । | | verse_text = कृष्णः किलैष च हरिर्यदुषु प्रजातः सोऽस्याऽश्रयः कुरुत तस्य बहु प्रतीपम् । | ||
| verse_lines = कृष्णः किलैष च हरिर्यदुषु प्रजातः सोऽस्याऽश्रयः कुरुत तस्य बहु प्रतीपम् | | verse_lines = कृष्णः किलैष च हरिर्यदुषु प्रजातः सोऽस्याऽश्रयः कुरुत तस्य बहु प्रतीपम् ।¦सम्मन्त्र्य चैवमतिपापतमा नरेन्द्रपुत्रा हरेश्च बहु चक्रुरथ प्रतीपम् ॥ ८२॥ | ||
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| verse_text = तैः प्रेरिता नृपतयः पितरश्च तेषां साकं बृहद्रथसुतेन हरेः सकाशम् । | | verse_text = तैः प्रेरिता नृपतयः पितरश्च तेषां साकं बृहद्रथसुतेन हरेः सकाशम् । | ||
| verse_lines = तैः प्रेरिता नृपतयः पितरश्च तेषां साकं बृहद्रथसुतेन हरेः सकाशम् | | verse_lines = तैः प्रेरिता नृपतयः पितरश्च तेषां साकं बृहद्रथसुतेन हरेः सकाशम् ।¦युद्धाय जग्मुरमुनाऽष्टदशेषु युद्धेष्वत्यन्तभग्नबलदर्पमदा निवृत्ताः ॥ ८३॥ | ||
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| verse_text = तेनाऽगृहीतगजवाजिगजा नितान्तं शस्त्रैः परिक्षततनूभिरलं वमन्तः । | | verse_text = तेनाऽगृहीतगजवाजिगजा नितान्तं शस्त्रैः परिक्षततनूभिरलं वमन्तः । | ||
| verse_lines = तेनाऽगृहीतगजवाजिगजा नितान्तं शस्त्रैः परिक्षततनूभिरलं वमन्तः | | verse_lines = तेनाऽगृहीतगजवाजिगजा नितान्तं शस्त्रैः परिक्षततनूभिरलं वमन्तः ।¦रक्तं विशस्त्रकवचध्वजवाजिसूताः स्रस्ताम्बराः श्लथितमूर्द्धजिनो निवृत्ताः ॥ ८४॥ | ||
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| verse_text = एवं बृहद्रथसुतोऽपि सुशोच्यरूप आर्तो ययौ बहुश एव पुरं स्वकीयम् । | | verse_text = एवं बृहद्रथसुतोऽपि सुशोच्यरूप आर्तो ययौ बहुश एव पुरं स्वकीयम् । | ||
| verse_lines = एवं बृहद्रथसुतोऽपि सुशोच्यरूप आर्तो ययौ बहुश एव पुरं स्वकीयम् | | verse_lines = एवं बृहद्रथसुतोऽपि सुशोच्यरूप आर्तो ययौ बहुश एव पुरं स्वकीयम् ।¦कृष्णेन पूर्णबलवीर्यगुणेन मुक्तो जीवेत्यतीव विजितः श्वसितावशेषः ॥ ८५॥ | ||
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| verse_text = एवं गतेषु बहुशो नतकन्धरेषु राजस्वजोऽपि मधुरां स्वपुरीं प्रविश्य । | | verse_text = एवं गतेषु बहुशो नतकन्धरेषु राजस्वजोऽपि मधुरां स्वपुरीं प्रविश्य । | ||
| verse_lines = एवं गतेषु बहुशो नतकन्धरेषु राजस्वजोऽपि मधुरां स्वपुरीं प्रविश्य | | verse_lines = एवं गतेषु बहुशो नतकन्धरेषु राजस्वजोऽपि मधुरां स्वपुरीं प्रविश्य ।¦रामेण सार्धमखिलैर्यदुभिः समेतो रेमे रमापतिरचिन्त्यबलो जयश्रीः ॥ ८६॥ | ||
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| verse_text = व्यर्थोद्यमाः पुनरपि स्म सधार्तराष्ट्रा भीमं निहन्तुमुरुयत्नमकुर्वताज्ञाः । | | verse_text = व्यर्थोद्यमाः पुनरपि स्म सधार्तराष्ट्रा भीमं निहन्तुमुरुयत्नमकुर्वताज्ञाः । | ||
| verse_lines = व्यर्थोद्यमाः पुनरपि स्म सधार्तराष्ट्रा भीमं निहन्तुमुरुयत्नमकुर्वताज्ञाः | | verse_lines = व्यर्थोद्यमाः पुनरपि स्म सधार्तराष्ट्रा भीमं निहन्तुमुरुयत्नमकुर्वताज्ञाः ।¦राज्ञां सुतास्तमखिलं स मृषैव कृत्वा चक्रे जयाय च दिशां बलवान् प्रयत्नम् ॥ ८७॥ | ||
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| verse_text = प्राचीं दिशं प्रथममेव जिगाय पश्चाद् याम्यां जलेशपरिपालितया सहान्याम् । | | verse_text = प्राचीं दिशं प्रथममेव जिगाय पश्चाद् याम्यां जलेशपरिपालितया सहान्याम् । | ||
| verse_lines = प्राचीं दिशं प्रथममेव जिगाय पश्चाद् याम्यां जलेशपरिपालितया सहान्याम् | | verse_lines = प्राचीं दिशं प्रथममेव जिगाय पश्चाद् याम्यां जलेशपरिपालितया सहान्याम् ।¦यौ तौ पुरातनदशाननकुम्भकर्णौ मातृष्वसातनयतां च गतौ जिगाय ॥ ८८॥ | ||
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| verse_text = पूर्वस्तयोर्हि दमघोषसुतः प्रजातः प्राहुश्च यं नृपतयः शिशुपालनाम्ना । | | verse_text = पूर्वस्तयोर्हि दमघोषसुतः प्रजातः प्राहुश्च यं नृपतयः शिशुपालनाम्ना । | ||
| verse_lines = पूर्वस्तयोर्हि दमघोषसुतः प्रजातः प्राहुश्च यं नृपतयः शिशुपालनाम्ना | | verse_lines = पूर्वस्तयोर्हि दमघोषसुतः प्रजातः प्राहुश्च यं नृपतयः शिशुपालनाम्ना ।¦अन्यं वदन्ति च करूशनृपं तथाऽन्यमातृष्वसातनयमेव च दन्तवक्रम् ॥ ८९॥ | ||
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| verse_text = जित्वैव तावपि जिगाय च पौण्ड्रकाख्यं शौरैः सुतं सुतमजैदथ भीष्मकस्य । | | verse_text = जित्वैव तावपि जिगाय च पौण्ड्रकाख्यं शौरैः सुतं सुतमजैदथ भीष्मकस्य । | ||
| verse_lines = जित्वैव तावपि जिगाय च पौण्ड्रकाख्यं शौरैः सुतं सुतमजैदथ भीष्मकस्य | | verse_lines = जित्वैव तावपि जिगाय च पौण्ड्रकाख्यं शौरैः सुतं सुतमजैदथ भीष्मकस्य ।¦यः पूर्वमास दितिजो नरहेल्वलाख्यो रुग्मीति नाम च बभूव स कुण्डिनेशः ॥ ९०॥ | ||
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| verse_text = भागेत एव तनयस्य स एव वह्नेर्नाम्ना शुचेः स तु पिताऽस्य हि मित्रभागः । | | verse_text = भागेत एव तनयस्य स एव वह्नेर्नाम्ना शुचेः स तु पिताऽस्य हि मित्रभागः । | ||
| verse_lines = भागेत एव तनयस्य स एव वह्नेर्नाम्ना शुचेः स तु पिताऽस्य हि मित्रभागः | | verse_lines = भागेत एव तनयस्य स एव वह्नेर्नाम्ना शुचेः स तु पिताऽस्य हि मित्रभागः ।¦राह्वंशयुक् तदनुजौ क्रथकैशिकाख्यौ भागौ तथाऽग्निसुतयोः पवमानशुन्ध्योः ॥ ९१॥ | ||
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| verse_text = बन्धोर्निजस्य तु बलं सुपरीक्षमाणः शल्योऽपि तेन युयुधे विजितस्तथैव । | | verse_text = बन्धोर्निजस्य तु बलं सुपरीक्षमाणः शल्योऽपि तेन युयुधे विजितस्तथैव । | ||
| verse_lines = बन्धोर्निजस्य तु बलं सुपरीक्षमाणः शल्योऽपि तेन युयुधे विजितस्तथैव | | verse_lines = बन्धोर्निजस्य तु बलं सुपरीक्षमाणः शल्योऽपि तेन युयुधे विजितस्तथैव ।¦भीमो जिगाय युधि वीरमथैकलव्यं सर्वे नृपाश्च विजिता अमुनैवमेव ॥ ९२॥ | ||
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| verse_text = तद्बाहुवीर्यपरिपालित इन्द्रसूनुः शेषान् नृपांश्च समजैद् बलवानयत्नात् । | | verse_text = तद्बाहुवीर्यपरिपालित इन्द्रसूनुः शेषान् नृपांश्च समजैद् बलवानयत्नात् । | ||
| verse_lines = तद्बाहुवीर्यपरिपालित इन्द्रसूनुः शेषान् नृपांश्च समजैद् बलवानयत्नात् | | verse_lines = तद्बाहुवीर्यपरिपालित इन्द्रसूनुः शेषान् नृपांश्च समजैद् बलवानयत्नात् ।¦साल्वं च हंसडिभकौ च विजित्य भीमो नागाह्वयं पुरमगात् सहितोऽर्जुनेन ॥ ९३॥ | ||
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| verse_lines = तद्बाहुवीर्यमथ वीक्ष्य मुमोद धर्मसूनुः समातृयमजो विदुरः सभीष्मः | | verse_lines = तद्बाहुवीर्यमथ वीक्ष्य मुमोद धर्मसूनुः समातृयमजो विदुरः सभीष्मः ।¦अन्ये च सज्जनगणाः सहपौरराष्ट्राः श्रुत्वैव सर्वयदवो जहृषुर्नितान्तम् ॥ ९४॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णः सुयोधनमुखाक्रममाम्बिकेयं जानन् स्वपुत्रवशवर्तिनमेव गत्वा | | verse_lines = कृष्णः सुयोधनमुखाक्रममाम्बिकेयं जानन् स्वपुत्रवशवर्तिनमेव गत्वा ।¦श्वाफल्किनो गृहममुं धृतराष्ट्रशान्त्यै गन्तुं दिदेश गजनाम पुरं रमेशः ॥ ९५॥ | ||
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| verse_lines = सोऽयाद् गजाह्वयममुत्र विचित्रवीर्यपुत्रेण भीष्मसहितैः कुरुभिः समस्तैः | | verse_lines = सोऽयाद् गजाह्वयममुत्र विचित्रवीर्यपुत्रेण भीष्मसहितैः कुरुभिः समस्तैः ।¦सम्पूजितः कतिपयानवसच्च मासान् ज्ञातुं हि पाण्डुषु मनःप्रसृतिं कुरूणाम् ॥ ९६॥ | ||
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| verse_lines = ज्ञात्वा स कुन्तिविदुरोक्तित आत्मना च मित्रारिमध्यमजनांस्तनयेषु पाण्डोः | | verse_lines = ज्ञात्वा स कुन्तिविदुरोक्तित आत्मना च मित्रारिमध्यमजनांस्तनयेषु पाण्डोः ।¦विज्ञाय पुत्रवशगं धृतराष्ट्रमञ्जः साम्नैव भेदसहितेन जगाद विद्वान् ॥ ९७॥ | ||
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| verse_lines = पुत्रेषु पाण्डुतनयेषु च साम्यवृत्तिः कीर्तिं च धर्ममुरुमेषि तथाऽर्थकामौ | | verse_lines = पुत्रेषु पाण्डुतनयेषु च साम्यवृत्तिः कीर्तिं च धर्ममुरुमेषि तथाऽर्थकामौ ।¦प्रीतिं परां त्वयि करिष्यति वासुदेवः साकं समस्तयदुभिः सहितः सुराद्यैः ॥ ९८॥ | ||
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| verse_text = धर्मार्थकामसहितां च विमुक्तिमेषि तत्प्रीतितः सुनियतं विपरीतवृत्तिः । | | verse_text = धर्मार्थकामसहितां च विमुक्तिमेषि तत्प्रीतितः सुनियतं विपरीतवृत्तिः । | ||
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| verse_lines = इत्थं समस्तकुरुमध्य उपात्तवाक्यो राजाऽपि पुत्रवशगो वचनं जगाद | | verse_lines = इत्थं समस्तकुरुमध्य उपात्तवाक्यो राजाऽपि पुत्रवशगो वचनं जगाद ।¦सर्वं वशे भगवतो न वयं स्वतन्त्रा भूभारसंहृतिकृते स इहावतीर्णः ॥ १००॥ | ||
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| verse_text = नायं नरो हरिरयं परमः परेभ्यो विश्वेश्वरः सकलकारण आत्मतन्त्रः । | | verse_text = नायं नरो हरिरयं परमः परेभ्यो विश्वेश्वरः सकलकारण आत्मतन्त्रः । | ||
| verse_lines = नायं नरो हरिरयं परमः परेभ्यो विश्वेश्वरः सकलकारण आत्मतन्त्रः | | verse_lines = नायं नरो हरिरयं परमः परेभ्यो विश्वेश्वरः सकलकारण आत्मतन्त्रः ।¦विज्ञाय चैनमुरुसंसृतितो विमुक्ता यान्त्यस्य पादयुगलं मुनयो विरागाः ॥ १०९॥ | ||
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| verse_text = नन्दं यदा च जगृहे वरुणस्य दूतस्तत्रापि मां जलपतेर्गृहमाशु यान्तम् । | | verse_text = नन्दं यदा च जगृहे वरुणस्य दूतस्तत्रापि मां जलपतेर्गृहमाशु यान्तम् । | ||
| verse_lines = नन्दं यदा च जगृहे वरुणस्य दूतस्तत्रापि मां जलपतेर्गृहमाशु यान्तम् | | verse_lines = नन्दं यदा च जगृहे वरुणस्य दूतस्तत्रापि मां जलपतेर्गृहमाशु यान्तम् ।¦सम्पूज्य वारिपतिराह विमुच्य नन्दं नायं सुतस्तव पुमान् परमः स एषः ॥ ११०॥ | ||
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| verse_text = सन्दर्शितो ननु मयैव विकुण्ठलोको गोजीविनां स्थितिरपि प्रवरा मदीया । | | verse_text = सन्दर्शितो ननु मयैव विकुण्ठलोको गोजीविनां स्थितिरपि प्रवरा मदीया । | ||
| verse_lines = सन्दर्शितो ननु मयैव विकुण्ठलोको गोजीविनां स्थितिरपि प्रवरा मदीया | | verse_lines = सन्दर्शितो ननु मयैव विकुण्ठलोको गोजीविनां स्थितिरपि प्रवरा मदीया ।¦मानुष्यबुद्धिमपनेतुमजे मयि स्म तस्मान्मयि स्थितिमवाप्य शमं प्रयान्तु ॥ १११॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वोद्धवो निगदितं परमस्य पुंसो वृन्दावनं प्रति ययौ वचनैश्च तस्य । | | verse_text = श्रुत्वोद्धवो निगदितं परमस्य पुंसो वृन्दावनं प्रति ययौ वचनैश्च तस्य । | ||
| verse_lines = श्रुत्वोद्धवो निगदितं परमस्य पुंसो वृन्दावनं प्रति ययौ वचनैश्च तस्य | | verse_lines = श्रुत्वोद्धवो निगदितं परमस्य पुंसो वृन्दावनं प्रति ययौ वचनैश्च तस्य ।¦दुःखं व्यपोह्य निखिलं पशुजीवनानामायात् पुनश्चरणसन्निधिमेव विष्णोः ॥ ११२॥ | ||
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<span id="gr-C15" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चदशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C15" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चदशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ एवं प्रशासति जगत् पुरुषोत्तमेऽस्मिन् भीमार्जुनौ तु सहदेवयुतावनुज्ञाम् । | | verse_text = औं ॥ एवं प्रशासति जगत् पुरुषोत्तमेऽस्मिन् भीमार्जुनौ तु सहदेवयुतावनुज्ञाम् । | ||
| verse_lines = औं ॥ एवं प्रशासति जगत् पुरुषोत्तमेऽस्मिन् भीमार्जुनौ तु सहदेवयुतावनुज्ञाम् | | verse_lines = औं ॥ एवं प्रशासति जगत् पुरुषोत्तमेऽस्मिन् भीमार्जुनौ तु सहदेवयुतावनुज्ञाम् ।¦कृष्णादवाप्य वर्षत्रितयात् पुरं स्वमाजग्मतुर्हरिसुतेन विशोकनाम्ना ॥ १॥ | ||
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| verse_text = सैरन्ध्रिकोदरभवः स तु नारदस्य शिष्यो वृकोदररथस्य बभूव यन्ता । | | verse_text = सैरन्ध्रिकोदरभवः स तु नारदस्य शिष्यो वृकोदररथस्य बभूव यन्ता । | ||
| verse_lines = सैरन्ध्रिकोदरभवः स तु नारदस्य शिष्यो वृकोदररथस्य बभूव यन्ता | | verse_lines = सैरन्ध्रिकोदरभवः स तु नारदस्य शिष्यो वृकोदररथस्य बभूव यन्ता ।¦या पिङ्गलाऽन्यभव आत्मनि संस्थितं तं संस्मृत्य कान्तमुरुगायमभूत् त्रिवक्रा ॥ २॥ | ||
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| verse_text = तं पञ्चरात्रविदमाप्य सुसारथिं स भीमो मुमोद पुनराप परात्मविद्याम् । | | verse_text = तं पञ्चरात्रविदमाप्य सुसारथिं स भीमो मुमोद पुनराप परात्मविद्याम् । | ||
| verse_lines = तं पञ्चरात्रविदमाप्य सुसारथिं स भीमो मुमोद पुनराप परात्मविद्याम् | | verse_lines = तं पञ्चरात्रविदमाप्य सुसारथिं स भीमो मुमोद पुनराप परात्मविद्याम् ।¦व्यासात् परात्मत उवाच च फल्गुनादिदैवेषु(फल्गुणादिदैवेषु) सर्वविजयी परविद्ययैषः ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = सर्वानभागवतशास्त्रपथान् विधूय मार्गं चकार स तु वैष्णवमेव शुभ्रम् । | | verse_text = सर्वानभागवतशास्त्रपथान् विधूय मार्गं चकार स तु वैष्णवमेव शुभ्रम् । | ||
| verse_lines = सर्वानभागवतशास्त्रपथान् विधूय मार्गं चकार स तु वैष्णवमेव शुभ्रम् | | verse_lines = सर्वानभागवतशास्त्रपथान् विधूय मार्गं चकार स तु वैष्णवमेव शुभ्रम् ।¦क्रीडार्थमेव विजिगाय तथोभयात्मयुद्धे बलं च करवाक्प्रभवेऽमितात्मा ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = नित्यप्रभूतसुशुभप्रतिभोऽपि विष्णोः श्रुत्वा परां पुनरपि प्रतिभामवाप । | | verse_text = नित्यप्रभूतसुशुभप्रतिभोऽपि विष्णोः श्रुत्वा परां पुनरपि प्रतिभामवाप । | ||
| verse_lines = नित्यप्रभूतसुशुभप्रतिभोऽपि विष्णोः श्रुत्वा परां पुनरपि प्रतिभामवाप | | verse_lines = नित्यप्रभूतसुशुभप्रतिभोऽपि विष्णोः श्रुत्वा परां पुनरपि प्रतिभामवाप ।¦को नाम विष्ण्वनुपजीवक आस यस्य नित्याश्रयादभिहिताऽपि रमा सदा श्रीः ॥ ५॥ | ||
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| verse_lines = व्यासादवाप परमात्मसतत्त्वविद्यां धर्मात्मजोऽपि सततं भगवत्प्रपन्नाः | | verse_lines = व्यासादवाप परमात्मसतत्त्वविद्यां धर्मात्मजोऽपि सततं भगवत्प्रपन्नाः ।¦ते पञ्च पाण्डुतनया मुमुदुर्नितान्तं सद्धर्मचारिण उरुक्रमशिक्षितार्थाः ॥ ६॥ | ||
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| verse_lines = यदा भरद्वाजसुतस्त्वसञ्चयी प्रतिग्रहोज्झो निजधर्मवर्ती | | verse_lines = यदा भरद्वाजसुतस्त्वसञ्चयी प्रतिग्रहोज्झो निजधर्मवर्ती ।¦द्रौणिस्तदा धार्तराष्ट्रैः समेत्य क्रीडन् पयः पातुमुपैति सद्म ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = तस्मै माता पिष्टमालोड्य पातुं ददाति पीत्वैति तदेष नित्यम् । | | verse_text = तस्मै माता पिष्टमालोड्य पातुं ददाति पीत्वैति तदेष नित्यम् । | ||
| verse_lines = तस्मै माता पिष्टमालोड्य पातुं ददाति पीत्वैति तदेष नित्यम् | | verse_lines = तस्मै माता पिष्टमालोड्य पातुं ददाति पीत्वैति तदेष नित्यम् ।¦पीतक्षीरान् धार्तराष्ट्रान् समेत्य मया पीतं क्षीरमित्याह नित्यम् ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = नृत्यन्तमेनं पाययामासुरेते पयः कदाचिद् रसमस्य सोऽवैत् । | | verse_text = नृत्यन्तमेनं पाययामासुरेते पयः कदाचिद् रसमस्य सोऽवैत् । | ||
| verse_lines = नृत्यन्तमेनं पाययामासुरेते पयः कदाचिद् रसमस्य सोऽवैत् | | verse_lines = नृत्यन्तमेनं पाययामासुरेते पयः कदाचिद् रसमस्य सोऽवैत् ।¦पुनः कदाचित् स तु मातृदत्ते पिष्टे नेदं क्षीरमित्यारुराव ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वा रुवन्तं(रुदन्तं) सुतमात्मजस्य स्नेहान्नियत्यैव जनार्दनस्य । | | verse_text = दृष्ट्वा रुवन्तं(रुदन्तं) सुतमात्मजस्य स्नेहान्नियत्यैव जनार्दनस्य । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा रुवन्तं(रुदन्तं) सुतमात्मजस्य स्नेहान्नियत्यैव जनार्दनस्य | | verse_lines = दृष्ट्वा रुवन्तं(रुदन्तं) सुतमात्मजस्य स्नेहान्नियत्यैव जनार्दनस्य ।¦सम्प्रेरितः कृपया चाऽर्तरूपो द्रोणो ययावार्जयितुं तदा गाम् ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तः स रामं ययौ न विष्णोर्हि भवेत् प्रतिग्रहः । | | verse_text = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तः स रामं ययौ न विष्णोर्हि भवेत् प्रतिग्रहः । | ||
| verse_lines = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तः स रामं ययौ न विष्णोर्हि भवेत् प्रतिग्रहः | | verse_lines = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तः स रामं ययौ न विष्णोर्हि भवेत् प्रतिग्रहः ।¦दोषाय यस्मात् स पिताऽखिलस्य स्वामी गुरुः परमं दैवतं च ॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = दृष्ट्वैवैनं जामदग्न्योऽप्यचिन्तयद् द्रोणं कर्तुं क्षितिभारापनोदे | | verse_lines = दृष्ट्वैवैनं जामदग्न्योऽप्यचिन्तयद् द्रोणं कर्तुं क्षितिभारापनोदे ।¦हेतुं सुराणां नरयोनिजानां हन्ता चायं स्यात् सह पुत्रेण चेति ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = तेषां वृद्धिः स्यात् पाण्डवार्थे हतानां मोक्षेऽपि सौख्यस्य न सन्ततिश्च । | | verse_text = तेषां वृद्धिः स्यात् पाण्डवार्थे हतानां मोक्षेऽपि सौख्यस्य न सन्ततिश्च । | ||
| verse_lines = तेषां वृद्धिः स्यात् पाण्डवार्थे हतानां मोक्षेऽपि सौख्यस्य न सन्ततिश्च | | verse_lines = तेषां वृद्धिः स्यात् पाण्डवार्थे हतानां मोक्षेऽपि सौख्यस्य न सन्ततिश्च ।¦योग्या सुराणां कलिजा सुपापाः प्रायो यस्मात् कलिजाः सम्भवन्ति ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = न देवानामाशतं पूरुषा हि सन्तानजाः प्रायशः पापयोग्याः । | | verse_text = न देवानामाशतं पूरुषा हि सन्तानजाः प्रायशः पापयोग्याः । | ||
| verse_lines = न देवानामाशतं पूरुषा हि सन्तानजाः प्रायशः पापयोग्याः | | verse_lines = न देवानामाशतं पूरुषा हि सन्तानजाः प्रायशः पापयोग्याः ।¦नाकारणात् सन्ततेरप्यभावो योग्यः सुराणां सदमोघरेतसाम् ॥ १४॥ | ||
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| verse_lines = अव्युच्छिन्ने सकलानां सुराणां तन्तौ कलिर्नो भविता कथञ्चित् | | verse_lines = अव्युच्छिन्ने सकलानां सुराणां तन्तौ कलिर्नो भविता कथञ्चित् ।¦तस्मादुत्साद्याः सर्व एते सुरांशा एतेन साकं तनयेन वीराः ॥ १५॥ | ||
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| verse_lines = एवं विचिन्त्याप्रतिमः स भार्गवो बभाष ईषत्स्मितशोचिषा गिरा | | verse_lines = एवं विचिन्त्याप्रतिमः स भार्गवो बभाष ईषत्स्मितशोचिषा गिरा ।¦अनन्तशक्तिः सकलेश्वरोऽपि त्यक्तं सर्वं नाद्य वित्तं ममास्ति ॥ १६॥ | ||
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| verse_lines = आत्मा विद्या शस्त्रमेतावदस्ति तेषां मध्ये रुचितं त्वं गृहाण | | verse_lines = आत्मा विद्या शस्त्रमेतावदस्ति तेषां मध्ये रुचितं त्वं गृहाण ।¦उक्तः स इत्थं प्रविचिन्त्य विप्रो जगाद कस्त्वद्ग्रहणे समर्थः ॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = सर्वेशिता सर्वपरः स्वतन्त्रस्त्वमेव कोऽन्यः सदृशस्तवेश | | verse_lines = सर्वेशिता सर्वपरः स्वतन्त्रस्त्वमेव कोऽन्यः सदृशस्तवेश ।¦स्वाम्यं तवेच्छन् प्रतियात्यधो हि यस्मान्न चोत्थातुमलं कदाचित् ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = सर्वोत्तमस्येश तवोच्चशस्त्रैः कार्यं किमस्माकमनुद्बलानाम् (अतद्बलानाम्)। | | verse_text = सर्वोत्तमस्येश तवोच्चशस्त्रैः कार्यं किमस्माकमनुद्बलानाम् (अतद्बलानाम्)। | ||
| verse_lines = सर्वोत्तमस्येश तवोच्चशस्त्रैः कार्यं किमस्माकमनुद्बलानाम् (अतद्बलानाम्) | | verse_lines = सर्वोत्तमस्येश तवोच्चशस्त्रैः कार्यं किमस्माकमनुद्बलानाम् (अतद्बलानाम्)।¦विद्यैव देया भवता ततोऽज सर्वप्रकाशिन्यचला सुसूक्ष्मा ॥ १९॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितस्तत्त्वविद्यादिकाः स विद्याः सर्वाः प्रददौ सास्त्रशस्त्राः | | verse_lines = इतीरितस्तत्त्वविद्यादिकाः स विद्याः सर्वाः प्रददौ सास्त्रशस्त्राः ।¦अब्दद्विषट्केन समाप्य ताः स ययौ सखायं द्रुपदं महात्मा ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = न निर्धनो राजसखो भवेत यथेष्टतो गच्छ विप्रेति दैवात् । | | verse_text = न निर्धनो राजसखो भवेत यथेष्टतो गच्छ विप्रेति दैवात् । | ||
| verse_lines = न निर्धनो राजसखो भवेत यथेष्टतो गच्छ विप्रेति दैवात् | | verse_lines = न निर्धनो राजसखो भवेत यथेष्टतो गच्छ विप्रेति दैवात् ।¦इतीरितस्याऽशु बभूव कोपो जितेन्द्रियस्यापि मुनेर्हरीच्छया ॥ २२॥ | ||
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| verse_text = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तेन सोऽयं मया प्राप्तो मत्पितुः शिष्यकत्वात् । | | verse_text = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तेन सोऽयं मया प्राप्तो मत्पितुः शिष्यकत्वात् । | ||
| verse_lines = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तेन सोऽयं मया प्राप्तो मत्पितुः शिष्यकत्वात् | | verse_lines = प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तेन सोऽयं मया प्राप्तो मत्पितुः शिष्यकत्वात् ।¦पितुः शिष्यो ह्यात्मशिष्यो भवेत शिष्यस्यार्थः स्वीय एवेति मत्वा ॥ २३॥ | ||
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| verse_text = सोऽयं पापो मामवज्ञाय मूढो दुष्टं वचोऽश्रावयदस्य दर्पम् । | | verse_text = सोऽयं पापो मामवज्ञाय मूढो दुष्टं वचोऽश्रावयदस्य दर्पम् । | ||
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| verse_lines = प्रतिग्रहाद् विनिवृत्तस्य चार्थः स्याच्छिष्येभ्यः कौरवेभ्यो ममात्र | | verse_lines = प्रतिग्रहाद् विनिवृत्तस्य चार्थः स्याच्छिष्येभ्यः कौरवेभ्यो ममात्र ।¦एवं मन्वानः क्रीडतः पाण्डवेयान् सधार्तराष्ट्रान् पुरबाह्यतोऽख्यत् ॥ २५॥ | ||
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| verse_text = तदा कुमारानवदत् स विप्रो धिगस्त्रबाह्यां भवतां प्रवृत्तिम् । | | verse_text = तदा कुमारानवदत् स विप्रो धिगस्त्रबाह्यां भवतां प्रवृत्तिम् । | ||
| verse_lines = तदा कुमारानवदत् स विप्रो धिगस्त्रबाह्यां भवतां प्रवृत्तिम् | | verse_lines = तदा कुमारानवदत् स विप्रो धिगस्त्रबाह्यां भवतां प्रवृत्तिम् ।¦जाताः कुले भरतानां न वित्थ दिव्यानि चास्त्राणि सुरार्चितानि ॥ २८॥ | ||
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| verse_text = इतीरिता अस्त्रविदं कुमारा विज्ञाय विप्रं सुरपूज्यपौत्रम्(सुरपूज्यपौत्रात्) । | | verse_text = इतीरिता अस्त्रविदं कुमारा विज्ञाय विप्रं सुरपूज्यपौत्रम्(सुरपूज्यपौत्रात्) । | ||
| verse_lines = इतीरिता अस्त्रविदं कुमारा विज्ञाय विप्रं सुरपूज्यपौत्रम्(सुरपूज्यपौत्रात्) | | verse_lines = इतीरिता अस्त्रविदं कुमारा विज्ञाय विप्रं सुरपूज्यपौत्रम्(सुरपूज्यपौत्रात्) ।¦सम्प्रार्थयामासुरथोद्धृतिं प्रति प्रधानमुद्रायुतकन्दुकस्य ॥ २९॥ | ||
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| verse_text = स चाऽश्विषीकाभिरथोत्तरोत्तरं सम्प्रास्य दिव्यास्त्रबलेन कन्दुकम् । | | verse_text = स चाऽश्विषीकाभिरथोत्तरोत्तरं सम्प्रास्य दिव्यास्त्रबलेन कन्दुकम् । | ||
| verse_lines = स चाऽश्विषीकाभिरथोत्तरोत्तरं सम्प्रास्य दिव्यास्त्रबलेन कन्दुकम् | | verse_lines = स चाऽश्विषीकाभिरथोत्तरोत्तरं सम्प्रास्य दिव्यास्त्रबलेन कन्दुकम् ।¦उद्धृत्य मुद्रोद्धरणार्थिनः पुनर्जगाद भुक्तिर्मम कल्प्यतामिति ॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = यथेष्टवित्ताशनपानमस्य धर्मात्मजः प्रतिजज्ञे सुशीघ्रम् । | | verse_text = यथेष्टवित्ताशनपानमस्य धर्मात्मजः प्रतिजज्ञे सुशीघ्रम् । | ||
| verse_lines = यथेष्टवित्ताशनपानमस्य धर्मात्मजः प्रतिजज्ञे सुशीघ्रम् | | verse_lines = यथेष्टवित्ताशनपानमस्य धर्मात्मजः प्रतिजज्ञे सुशीघ्रम् ।¦तथैव तेनोद्धृतमङ्गुलीयं त्रिवर्गमुख्यात्मजवाक्यतोऽनु ॥ ३१॥ | ||
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| verse_text = पप्रच्छुरेनं सहिताः कुमाराः कोऽसीति सोऽप्याह पितामहो वः । | | verse_text = पप्रच्छुरेनं सहिताः कुमाराः कोऽसीति सोऽप्याह पितामहो वः । | ||
| verse_lines = पप्रच्छुरेनं सहिताः कुमाराः कोऽसीति सोऽप्याह पितामहो वः | | verse_lines = पप्रच्छुरेनं सहिताः कुमाराः कोऽसीति सोऽप्याह पितामहो वः ।¦वक्तेति ते दुद्रुवुराशु भीष्मं द्रोणोऽयमित्येव स तांस्तदोचे ॥ ३२॥ | ||
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| verse_text = न राजगेहं स कदाचिदेति तेनादृष्टः स कुमारैः पुराऽतः । | | verse_text = न राजगेहं स कदाचिदेति तेनादृष्टः स कुमारैः पुराऽतः । | ||
| verse_lines = न राजगेहं स कदाचिदेति तेनादृष्टः स कुमारैः पुराऽतः | | verse_lines = न राजगेहं स कदाचिदेति तेनादृष्टः स कुमारैः पुराऽतः ।¦भीष्मो विद्यास्तेन सहैव चिन्तयन्नस्त्रप्राप्तिं तस्य शुश्राव रामात् ॥ ३३॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वा वृद्धं कृष्णवर्णं द्विजं तं महास्त्रविद्यामपि तां महामतिः । | | verse_text = श्रुत्वा वृद्धं कृष्णवर्णं द्विजं तं महास्त्रविद्यामपि तां महामतिः । | ||
| verse_lines = श्रुत्वा वृद्धं कृष्णवर्णं द्विजं तं महास्त्रविद्यामपि तां महामतिः | | verse_lines = श्रुत्वा वृद्धं कृष्णवर्णं द्विजं तं महास्त्रविद्यामपि तां महामतिः ।¦द्रोणं ज्ञात्वा तस्य शिष्यत्व एतान् ददौ कुमारांस्तत्र गत्वा स्वयं च ॥ ३४॥ | ||
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| verse_text = द्रोणोऽथ तानवदद् यो मदिष्टं कर्तुं प्रतिज्ञां प्रथमं करोति । | | verse_text = द्रोणोऽथ तानवदद् यो मदिष्टं कर्तुं प्रतिज्ञां प्रथमं करोति । | ||
| verse_lines = द्रोणोऽथ तानवदद् यो मदिष्टं कर्तुं प्रतिज्ञां प्रथमं करोति | | verse_lines = द्रोणोऽथ तानवदद् यो मदिष्टं कर्तुं प्रतिज्ञां प्रथमं करोति ।¦तं धन्विनां प्रवरं साधयिष्य इत्यर्जुनस्तामकरोत् प्रतिज्ञाम् ॥ ३५॥ | ||
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| verse_lines = उन्मादनादीनि स वेद कृष्णादस्त्राण्यनापत्सु न तानि मुञ्चेत् | | verse_lines = उन्मादनादीनि स वेद कृष्णादस्त्राण्यनापत्सु न तानि मुञ्चेत् ।¦इत्याज्ञया केशवस्यापराणि प्रयोगयोग्यानि सदेच्छति स्म ॥ ३६॥ | ||
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| verse_lines = भीष्मादिभिर्भविता सङ्गरो नस्तदा नाहं गुरुभिर्नित्ययोद्धा | | verse_lines = भीष्मादिभिर्भविता सङ्गरो नस्तदा नाहं गुरुभिर्नित्ययोद्धा ।¦भवेयमेकः फल्गुनोऽस्त्रज्ञ एषां निवारकश्चेन्मम धर्मलाभः ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = न बुद्धिपूर्वं वर इन्दिरापतेरन्यत्र मे ग्राह्य इतश्च जिष्णुः | | verse_lines = न बुद्धिपूर्वं वर इन्दिरापतेरन्यत्र मे ग्राह्य इतश्च जिष्णुः ।¦करोतु गुर्वर्थमिति स्म चिन्तयन् भीमः प्रतिज्ञां न चकार तत्र ॥ ३८॥ | ||
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| verse_lines = तत्प्रेरितेनार्जुनेन प्रतिज्ञा कृता यदा विप्रवरस्ततः परम् | | verse_lines = तत्प्रेरितेनार्जुनेन प्रतिज्ञा कृता यदा विप्रवरस्ततः परम् ।¦स्नेहं नितान्तं सुरराजसूनौ कृत्वा महास्त्राणि ददौ स तस्य ॥ ३९॥ | ||
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| verse_lines = स पक्षपातं च चकार तस्मिन् करोति चास्योरुतरां प्रशंसाम् | | verse_lines = स पक्षपातं च चकार तस्मिन् करोति चास्योरुतरां प्रशंसाम् ।¦रहस्यविद्याश्च ददाति तस्य नान्यस्य कस्यापि तथा कथञ्चित् ॥ ४०॥ | ||
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| verse_lines = भीमः समस्तं प्रतिभाबलेन जानन् स्नेहं त्वद्वितीयं कनिष्ठे | | verse_lines = भीमः समस्तं प्रतिभाबलेन जानन् स्नेहं त्वद्वितीयं कनिष्ठे ।¦द्रोणस्य कृत्वा सकलास्त्रवेदिनं कर्तुं पार्थं नार्जुनवच्चकार ॥ ४१॥ | ||
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| verse_lines = नैवातियत्नेन ददर्श लक्षं शुश्रूषायां पार्थमग्रे करोति | | verse_lines = नैवातियत्नेन ददर्श लक्षं शुश्रूषायां पार्थमग्रे करोति ।¦स्वबाहुवीर्याद् भगवत्प्रसादान्निहन्मि शत्रून् किमनेन चेति ॥ ४२॥ | ||
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| verse_lines = तदा समीयुः सकलाः क्षितीशपुत्रा द्रोणात् सकलास्त्राण्यवाप्तुम् | | verse_lines = तदा समीयुः सकलाः क्षितीशपुत्रा द्रोणात् सकलास्त्राण्यवाप्तुम् ।¦ददौ स तेषां परमास्त्राणि विप्रो रामादवाप्तान्यगतानि चान्यैः ॥ ४३॥ | ||
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| verse_lines = अस्त्राणि चित्राणि महान्ति दिव्यान्यन्यैर्नृपैर्मनसाऽप्यस्मृतानि | | verse_lines = अस्त्राणि चित्राणि महान्ति दिव्यान्यन्यैर्नृपैर्मनसाऽप्यस्मृतानि ।¦अवाप्य सर्वे तनया नृपाणां शक्ता बभूवुर्न यथैव पूर्वे ॥ ४४॥ | ||
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| verse_lines = नैतादृशाः पूर्वमासन् नरेन्द्रा अस्त्रे बले सर्वविद्यासु चैव | | verse_lines = नैतादृशाः पूर्वमासन् नरेन्द्रा अस्त्रे बले सर्वविद्यासु चैव ।¦दौष्यन्तिमान्धातृमरुत्तपूर्वाश्चैतत्समानाः नासुरदारवीर्याः ॥ ४५॥ | ||
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| verse_lines = तदा कर्णोऽथैकलव्यश्च दिव्यान्यस्त्राण्याप्तुं द्रोणसमीपमीयतुः | | verse_lines = तदा कर्णोऽथैकलव्यश्च दिव्यान्यस्त्राण्याप्तुं द्रोणसमीपमीयतुः ।¦सूतो निषाद इति नैतयोरदादस्त्राणि विप्रः स तु रामशिष्यः ॥ ४६॥ | ||
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| verse_lines = कर्णोऽनवाप्य निजमीप्सितमुच्चमानो यस्मादवाप पुरुषोत्तमतोऽस्त्रवृन्दम् | | verse_lines = कर्णोऽनवाप्य निजमीप्सितमुच्चमानो यस्मादवाप पुरुषोत्तमतोऽस्त्रवृन्दम् ।¦विप्रोऽप्ययं तमजमेमि भृगोः कुलोत्थमित्थं विचिन्त्य स ययौ भृगुपाश्रमाय ॥ ४७॥ | ||
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| verse_lines = स सर्ववेत्तुश्च विभोर्भयेन विप्रोऽहमित्यवददस्त्रवरातिलोभात् | | verse_lines = स सर्ववेत्तुश्च विभोर्भयेन विप्रोऽहमित्यवददस्त्रवरातिलोभात् ।¦जानन्नपि प्रददावस्य रामो दिव्यान्यस्त्राण्यखिलान्यव्ययात्मा(अव्यथात्मा) ॥ ४८॥ | ||
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| verse_lines = अस्त्रज्ञचूळामणिमिन्द्रसूनुं विश्वस्य हन्तुं धृतराष्ट्रपुत्रः | | verse_lines = अस्त्रज्ञचूळामणिमिन्द्रसूनुं विश्वस्य हन्तुं धृतराष्ट्रपुत्रः ।¦एनं समाश्रित्य दृढो भवेतेत्यदाज्ज्ञात्वैवास्त्रमस्मै रमेशः ॥ ४९॥ | ||
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| verse_lines = ज्ञानं च भागवतमप्यपराश्च विद्या रामादवाप्य विजयं धनुरग्र्ययानम् | | verse_lines = ज्ञानं च भागवतमप्यपराश्च विद्या रामादवाप्य विजयं धनुरग्र्ययानम् ।¦अब्दैश्चतुर्भिरथ च न्यवसत् तदन्ते हातुं न शक्त उरुगायमिमं स कर्णः ॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = अङ्के निधाय स कदाचिदमुष्य रामः शिश्ये शिरो विगतनिद्र उदारबोधः | | verse_lines = अङ्के निधाय स कदाचिदमुष्य रामः शिश्ये शिरो विगतनिद्र उदारबोधः ।¦संसुप्तवत् सुरवरः सुरकार्यहेतोर्दातुं च वालिनिधनस्य फलं तदस्य ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = तत्राऽस राक्षसवरः स तु हेतिनामा काले महेन्द्रमनुपास्य हि शापतोऽस्य | | verse_lines = तत्राऽस राक्षसवरः स तु हेतिनामा काले महेन्द्रमनुपास्य हि शापतोऽस्य ।¦कीटस्तमिन्द्र उत तत्र समाविवेश कर्णस्य शापमुपपादयितुं सुतार्थे ॥ ५२॥ | ||
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| verse_text = कर्णः स कीटतनुगेन किरीटिनैव ह्यूरोरधस्तनत (ओपरिगात्वचः)औपरिगात्वचश्च । | | verse_text = कर्णः स कीटतनुगेन किरीटिनैव ह्यूरोरधस्तनत (ओपरिगात्वचः)औपरिगात्वचश्च । | ||
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| verse_text = ततः कदाचिद् धृतराष्ट्रपुत्रैः पाण्डोः सुता मृगयां सम्प्रयाताः । | | verse_text = ततः कदाचिद् धृतराष्ट्रपुत्रैः पाण्डोः सुता मृगयां सम्प्रयाताः । | ||
| verse_lines = ततः कदाचिद् धृतराष्ट्रपुत्रैः पाण्डोः सुता मृगयां सम्प्रयाताः | | verse_lines = ततः कदाचिद् धृतराष्ट्रपुत्रैः पाण्डोः सुता मृगयां सम्प्रयाताः ।¦अग्रे गच्छन् सारमेयो रुराव धर्मात्मजस्यात्र वने मृगार्थी ॥ ६०॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वा रावं सारमेयस्य दूराच्छरैर्मुखं शब्दवेधी पुपूरे । | | verse_text = श्रुत्वा रावं सारमेयस्य दूराच्छरैर्मुखं शब्दवेधी पुपूरे । | ||
| verse_lines = श्रुत्वा रावं सारमेयस्य दूराच्छरैर्मुखं शब्दवेधी पुपूरे | | verse_lines = श्रुत्वा रावं सारमेयस्य दूराच्छरैर्मुखं शब्दवेधी पुपूरे ।¦स एकलव्यो व्रणमस्य नाकरोच्छ्वा पूरितास्यः पाण्डवानभ्ययात् सः ॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वा चित्रं कुरवः पाण्डवाश्च द्रष्टुं कर्तारं मार्गयामासुरत्र । | | verse_text = दृष्ट्वा चित्रं कुरवः पाण्डवाश्च द्रष्टुं कर्तारं मार्गयामासुरत्र । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा चित्रं कुरवः पाण्डवाश्च द्रष्टुं कर्तारं मार्गयामासुरत्र | | verse_lines = दृष्ट्वा चित्रं कुरवः पाण्डवाश्च द्रष्टुं कर्तारं मार्गयामासुरत्र ।¦द्रोणाकृतिं मार्त्तिकीं पूजयन्तं ददृशुश्चैनं धनुरेवाभ्यसन्तम् ॥ ६२॥ | ||
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| verse_text = पैशाचमेवैष पिशाचकेभ्यः पूर्वं विवेदास्त्रवृन्दं निषादः । | | verse_text = पैशाचमेवैष पिशाचकेभ्यः पूर्वं विवेदास्त्रवृन्दं निषादः । | ||
| verse_lines = पैशाचमेवैष पिशाचकेभ्यः पूर्वं विवेदास्त्रवृन्दं निषादः | | verse_lines = पैशाचमेवैष पिशाचकेभ्यः पूर्वं विवेदास्त्रवृन्दं निषादः ।¦दिव्यान्यस्त्राण्याप्तुमेतां च शिक्षां द्रोणं सदा पूजयति स्म भक्त्या ॥ ६३॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वा विशेषं तममुष्य पार्थो द्रोणायोचे त्वद्वरो मे मृषाऽऽसीत् । | | verse_text = दृष्ट्वा विशेषं तममुष्य पार्थो द्रोणायोचे त्वद्वरो मे मृषाऽऽसीत् । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा विशेषं तममुष्य पार्थो द्रोणायोचे त्वद्वरो मे मृषाऽऽसीत् | | verse_lines = दृष्ट्वा विशेषं तममुष्य पार्थो द्रोणायोचे त्वद्वरो मे मृषाऽऽसीत् ।¦इत्युक्त एनं त्वभिगम्य दक्षिणां विप्रो ययाचे दक्षिणाङ्गुष्ठमेव ॥ ६४॥ | ||
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| verse_text = तस्य प्रसादोपचितोरुशिक्षो निषादोऽदाद् दक्षिणाङ्गुष्ठमस्मै । | | verse_text = तस्य प्रसादोपचितोरुशिक्षो निषादोऽदाद् दक्षिणाङ्गुष्ठमस्मै । | ||
| verse_lines = तस्य प्रसादोपचितोरुशिक्षो निषादोऽदाद् दक्षिणाङ्गुष्ठमस्मै | | verse_lines = तस्य प्रसादोपचितोरुशिक्षो निषादोऽदाद् दक्षिणाङ्गुष्ठमस्मै ।¦ततः परं नास्य बभूव शिक्षा सन्मुष्टिहीनस्य समाऽर्जुनेन ॥ ६५॥ | ||
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| verse_text = पुनः कृपालू रैवतपर्वते तं द्रोणः प्राप्याऽदादस्त्रवराणि तस्मै । | | verse_text = पुनः कृपालू रैवतपर्वते तं द्रोणः प्राप्याऽदादस्त्रवराणि तस्मै । | ||
| verse_lines = पुनः कृपालू रैवतपर्वते तं द्रोणः प्राप्याऽदादस्त्रवराणि तस्मै | | verse_lines = पुनः कृपालू रैवतपर्वते तं द्रोणः प्राप्याऽदादस्त्रवराणि तस्मै ।¦एकान्त एवास्य भक्त्या सुतुष्टो धन्विश्रेष्ठं कृतवानर्जुनं च ॥ ६६॥ | ||
}} | }} | ||
<span id="gr-C16" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षोडशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C16" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षोडशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ काले त्वेतस्मिन् भूय एवाखिलैश्च नृपैर्युक्तो मागधो योद्धुकामः । | | verse_text = औं ॥ काले त्वेतस्मिन् भूय एवाखिलैश्च नृपैर्युक्तो मागधो योद्धुकामः । | ||
| verse_lines = औं ॥ काले त्वेतस्मिन् भूय एवाखिलैश्च नृपैर्युक्तो मागधो योद्धुकामः | | verse_lines = औं ॥ काले त्वेतस्मिन् भूय एवाखिलैश्च नृपैर्युक्तो मागधो योद्धुकामः ।¦प्रायाद् यदूंस्तत्र नित्याव्ययातिबलैश्वर्योऽपीच्छयाऽगात् स कृष्णः ॥ १॥ | ||
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| verse_text = सन्दर्शयन् बलिनामल्पसेनाद्युपस्कराणां बहलोपस्करैश्च । | | verse_text = सन्दर्शयन् बलिनामल्पसेनाद्युपस्कराणां बहलोपस्करैश्च । | ||
| verse_lines = सन्दर्शयन् बलिनामल्पसेनाद्युपस्कराणां बहलोपस्करैश्च | | verse_lines = सन्दर्शयन् बलिनामल्पसेनाद्युपस्कराणां बहलोपस्करैश्च ।¦प्राप्ते विरोधे बलिभिर्नीतिमग्र्यां ययौ सरामो दक्षिणाशां रमेशः ॥ २॥ | ||
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| verse_text = सोऽनन्तवीर्यः परमोऽभयोऽपि नीत्यै गच्छन् जामदग्न्यं ददर्श । | | verse_text = सोऽनन्तवीर्यः परमोऽभयोऽपि नीत्यै गच्छन् जामदग्न्यं ददर्श । | ||
| verse_lines = सोऽनन्तवीर्यः परमोऽभयोऽपि नीत्यै गच्छन् जामदग्न्यं ददर्श | | verse_lines = सोऽनन्तवीर्यः परमोऽभयोऽपि नीत्यै गच्छन् जामदग्न्यं ददर्श ।¦क्रीडार्थमेकोऽपि ततोऽतिदुर्गं श्रुत्वा गोमन्तं तत्र ययौ सहाग्रजः ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = तदा दुग्धाब्धौ संसृतिस्थैः सुराद्यैः पूजां प्राप्तुं स्थानमेषां च योग्यम् । | | verse_text = तदा दुग्धाब्धौ संसृतिस्थैः सुराद्यैः पूजां प्राप्तुं स्थानमेषां च योग्यम् । | ||
| verse_lines = तदा दुग्धाब्धौ संसृतिस्थैः सुराद्यैः पूजां प्राप्तुं स्थानमेषां च योग्यम् | | verse_lines = तदा दुग्धाब्धौ संसृतिस्थैः सुराद्यैः पूजां प्राप्तुं स्थानमेषां च योग्यम् ।¦मुक्तस्थानादाप नारायणोऽजो बलिश्चाऽगात् तत्र सन्द्रष्टुमीशम् ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = तत्रासुरावेशममुष्य विष्णुः सन्दर्शयन् सुप्तिहीनोऽपि नित्यम् । | | verse_text = तत्रासुरावेशममुष्य विष्णुः सन्दर्शयन् सुप्तिहीनोऽपि नित्यम् । | ||
| verse_lines = तत्रासुरावेशममुष्य विष्णुः सन्दर्शयन् सुप्तिहीनोऽपि नित्यम् | | verse_lines = तत्रासुरावेशममुष्य विष्णुः सन्दर्शयन् सुप्तिहीनोऽपि नित्यम् ।¦संसुप्तविच्छश्य उदारकर्मा सञ्ज्ञायै देवानां मुखमीक्ष्याप्रमेयः ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = देवाश्च तद्भावविदोऽखिलाश्च निमीलिताक्षाः शयनेषु शिश्यरे । | | verse_text = देवाश्च तद्भावविदोऽखिलाश्च निमीलिताक्षाः शयनेषु शिश्यरे । | ||
| verse_lines = देवाश्च तद्भावविदोऽखिलाश्च निमीलिताक्षाः शयनेषु शिश्यरे | | verse_lines = देवाश्च तद्भावविदोऽखिलाश्च निमीलिताक्षाः शयनेषु शिश्यरे ।¦तदा बलिस्तस्य विष्णोः किरीटमादायागाज्जहसुः सर्वदेवाः ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = नारायणे सर्वदेवैः समेते ब्रह्मादिभिर्हासमाने सुपर्णः । | | verse_text = नारायणे सर्वदेवैः समेते ब्रह्मादिभिर्हासमाने सुपर्णः । | ||
| verse_lines = नारायणे सर्वदेवैः समेते ब्रह्मादिभिर्हासमाने सुपर्णः | | verse_lines = नारायणे सर्वदेवैः समेते ब्रह्मादिभिर्हासमाने सुपर्णः ।¦गत्वा पातालं युधि जित्वा बलिं च किरीटमादायाभ्ययाद् यत्र कृष्णः ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = तत् तस्य शीर्ष्णि प्रतिमुच्य नत्वा खगः स्तुत्वा देवदेवं रमेशम् । | | verse_text = तत् तस्य शीर्ष्णि प्रतिमुच्य नत्वा खगः स्तुत्वा देवदेवं रमेशम् । | ||
| verse_lines = तत् तस्य शीर्ष्णि प्रतिमुच्य नत्वा खगः स्तुत्वा देवदेवं रमेशम् | | verse_lines = तत् तस्य शीर्ष्णि प्रतिमुच्य नत्वा खगः स्तुत्वा देवदेवं रमेशम् ।¦स्मृत आगच्छेत्येव विसर्जितोऽमुना ययौ दुग्धाब्धिं यत्र नारायणोऽसौ ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = किरीटं तत् कृष्णमूर्ध्नि प्रविष्टं तत्तुल्यमासीत् तस्य रूपेष्वभेदात् । | | verse_text = किरीटं तत् कृष्णमूर्ध्नि प्रविष्टं तत्तुल्यमासीत् तस्य रूपेष्वभेदात् । | ||
| verse_lines = किरीटं तत् कृष्णमूर्ध्नि प्रविष्टं तत्तुल्यमासीत् तस्य रूपेष्वभेदात् | | verse_lines = किरीटं तत् कृष्णमूर्ध्नि प्रविष्टं तत्तुल्यमासीत् तस्य रूपेष्वभेदात् ।¦तदिच्छया चैव नारायणस्य शीर्ष्ण्यप्यासीद् युगपद् दुग्धवार्धौ ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = पूर्वं प्राप्तान्येव दिव्यायुधानि पुनर्वैकुण्ठं लोकमितानि भूयः । | | verse_text = पूर्वं प्राप्तान्येव दिव्यायुधानि पुनर्वैकुण्ठं लोकमितानि भूयः । | ||
| verse_lines = पूर्वं प्राप्तान्येव दिव्यायुधानि पुनर्वैकुण्ठं लोकमितानि भूयः | | verse_lines = पूर्वं प्राप्तान्येव दिव्यायुधानि पुनर्वैकुण्ठं लोकमितानि भूयः ।¦तदाऽवतेरू रौहिणेयस्य चैवं भार्याऽप्यायाद् वारुणी नाम पूर्वा ॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = सैवापरं रूपमास्थाय चाऽगाच्छ्रीरित्याख्यं सेन्दिरावेशमग्र्यम् | | verse_lines = सैवापरं रूपमास्थाय चाऽगाच्छ्रीरित्याख्यं सेन्दिरावेशमग्र्यम् ।¦कान्तिश्चाऽगात् तस्य सोमस्य चान्या भार्या द्वयोः पूर्वतना सुरूपा ॥ ११॥ | ||
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| verse_text = ताभी रामो मुमुदे तत्र तिष्ठञ्छशाङ्कपूगोद्रिक्तकान्तिः सुधामा । | | verse_text = ताभी रामो मुमुदे तत्र तिष्ठञ्छशाङ्कपूगोद्रिक्तकान्तिः सुधामा । | ||
| verse_lines = ताभी रामो मुमुदे तत्र तिष्ठञ्छशाङ्कपूगोद्रिक्तकान्तिः सुधामा | | verse_lines = ताभी रामो मुमुदे तत्र तिष्ठञ्छशाङ्कपूगोद्रिक्तकान्तिः सुधामा ।¦तस्या वारुण्याः प्रतिमा पेयरूपा कादम्बरी वारुणी(वारुणीं) तां पपौ सः ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = एवं तयोः क्रीडतोः स्वैरमत्र राजन्यवृन्दानुगतो जरासुतः । | | verse_text = एवं तयोः क्रीडतोः स्वैरमत्र राजन्यवृन्दानुगतो जरासुतः । | ||
| verse_lines = एवं तयोः क्रीडतोः स्वैरमत्र राजन्यवृन्दानुगतो जरासुतः | | verse_lines = एवं तयोः क्रीडतोः स्वैरमत्र राजन्यवृन्दानुगतो जरासुतः ।¦गिरिं गोमन्तं परिवार्यादहत् तं दृष्ट्वा देवौ पुप्लुवतुर्बलाढ्यौ ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = गिरिस्ताभ्यां पीडितः सन् निमग्नो भूमौ पद्भ्यां योजनैकादशं सः । | | verse_text = गिरिस्ताभ्यां पीडितः सन् निमग्नो भूमौ पद्भ्यां योजनैकादशं सः । | ||
| verse_lines = गिरिस्ताभ्यां पीडितः सन् निमग्नो भूमौ पद्भ्यां योजनैकादशं सः | | verse_lines = गिरिस्ताभ्यां पीडितः सन् निमग्नो भूमौ पद्भ्यां योजनैकादशं सः ।¦निष्पीडिताज्जलधारोद्गताऽस्माद् वह्निं व्याप्तं शमयामास सर्वम् ॥ १४॥ | ||
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| verse_lines = सेनां प्रविष्टौ सर्वराजन्यवृन्दं व्यमथ्नतां देववरौ स्वशस्त्रैः | | verse_lines = सेनां प्रविष्टौ सर्वराजन्यवृन्दं व्यमथ्नतां देववरौ स्वशस्त्रैः ।¦तत्र हंसो डिभिकश्चैकलव्यः (स कीचक)सकीचकस्तौ शिशुपालपौण्ड्रकौ ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = भौमात्मजो दन्तवक्रश्च रुग्मी सौभाधिपो मैन्दमैन्दानुजौ च । | | verse_text = भौमात्मजो दन्तवक्रश्च रुग्मी सौभाधिपो मैन्दमैन्दानुजौ च । | ||
| verse_lines = भौमात्मजो दन्तवक्रश्च रुग्मी सौभाधिपो मैन्दमैन्दानुजौ च | | verse_lines = भौमात्मजो दन्तवक्रश्च रुग्मी सौभाधिपो मैन्दमैन्दानुजौ च ।¦अन्ये च ये पार्थिवाः सर्व एव क्रोधात् कृष्णं परिवार्याभ्यवर्षन् ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = शस्त्रैरस्त्रैर्द्रुमपूगैः शिलाभिर्भक्ताश्च ये शल्यबाह्लीकमुख्याः । | | verse_text = शस्त्रैरस्त्रैर्द्रुमपूगैः शिलाभिर्भक्ताश्च ये शल्यबाह्लीकमुख्याः । | ||
| verse_lines = शस्त्रैरस्त्रैर्द्रुमपूगैः शिलाभिर्भक्ताश्च ये शल्यबाह्लीकमुख्याः | | verse_lines = शस्त्रैरस्त्रैर्द्रुमपूगैः शिलाभिर्भक्ताश्च ये शल्यबाह्लीकमुख्याः ।¦ससोमदत्ताः सौमदत्तिर्विराटः पाञ्चालराजश्च जरासुतस्य ।¦भयात् कृष्णं शस्त्रवर्षैरवर्षन् कारागृहे वासिता मागधेन ॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = सर्वानेताञ्छरवर्षेण कृष्णो विसूतवाजिध्वजशस्त्रवर्मणः | | verse_lines = सर्वानेताञ्छरवर्षेण कृष्णो विसूतवाजिध्वजशस्त्रवर्मणः ।¦कृत्वा वमच्छोणितानार्तरूपान् विद्रावयामास हरिर्यथा मृगान् ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = अन्यो हन्ता बलवानस्य चेति श्रुत्वा ययौ बलभद्रो विमुच्य । | | verse_text = अन्यो हन्ता बलवानस्य चेति श्रुत्वा ययौ बलभद्रो विमुच्य । | ||
| verse_lines = अन्यो हन्ता बलवानस्य चेति श्रुत्वा ययौ बलभद्रो विमुच्य | | verse_lines = अन्यो हन्ता बलवानस्य चेति श्रुत्वा ययौ बलभद्रो विमुच्य ।¦जरासुतं पुनरुद्यच्छमानं जघान कृष्णो गदया स्वयैव ॥ २५॥ | ||
}} | }} | ||
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| Line 14,464: | Line 14,464: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = तेनाऽहतः स्रस्तसमस्तगात्रः पपात मूर्च्छाभिगतः स राजा । | | verse_text = तेनाऽहतः स्रस्तसमस्तगात्रः पपात मूर्च्छाभिगतः स राजा । | ||
| verse_lines = तेनाऽहतः स्रस्तसमस्तगात्रः पपात मूर्च्छाभिगतः स राजा | | verse_lines = तेनाऽहतः स्रस्तसमस्तगात्रः पपात मूर्च्छाभिगतः स राजा ।¦चिरात् सञ्ज्ञां प्राप्य चान्तर्हितोऽसौ सम्प्राद्रवद् भीतभीतः सलज्जः ॥ २६॥ | ||
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{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
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| verse_text = ययौ शिष्टै राजभिः संयुतश्च पुरं जीवेत्येव कृष्णेन मुक्तः । | | verse_text = ययौ शिष्टै राजभिः संयुतश्च पुरं जीवेत्येव कृष्णेन मुक्तः । | ||
| verse_lines = ययौ शिष्टै राजभिः संयुतश्च पुरं जीवेत्येव कृष्णेन मुक्तः | | verse_lines = ययौ शिष्टै राजभिः संयुतश्च पुरं जीवेत्येव कृष्णेन मुक्तः ।¦पुनर्युद्धं बहुशः केशवेन कृत्वा जितो राजगणैः समेतः ॥ २७॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = कृष्णो जित्वा मागधं रौहिणेययुक्तो ययौ दमघोषेण सार्द्धम् । | | verse_text = कृष्णो जित्वा मागधं रौहिणेययुक्तो ययौ दमघोषेण सार्द्धम् । | ||
| verse_lines = कृष्णो जित्वा मागधं रौहिणेययुक्तो ययौ दमघोषेण सार्द्धम् | | verse_lines = कृष्णो जित्वा मागधं रौहिणेययुक्तो ययौ दमघोषेण सार्द्धम् ।¦पितृष्वसायाः पतिना तेन चोक्तः पूर्वं जितेनापि युधि स्म बान्धवात् ॥ २८॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = यामः पुरं करिवीराख्यमेव महालक्ष्म्याः क्षेत्रसन्दर्शनाय । | | verse_text = यामः पुरं करिवीराख्यमेव महालक्ष्म्याः क्षेत्रसन्दर्शनाय । | ||
| verse_lines = यामः पुरं करिवीराख्यमेव महालक्ष्म्याः क्षेत्रसन्दर्शनाय | | verse_lines = यामः पुरं करिवीराख्यमेव महालक्ष्म्याः क्षेत्रसन्दर्शनाय ।¦श्रुत्वा वाक्यं तस्य युद्धे जितस्य भीत्या(प्रीत्या) युक्तस्याऽत्मना तद्युतोऽगात् ॥ २९॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = गन्धर्वोऽसौ दनुनामा नरोऽभूत् तस्मात् कृष्णे भक्तिमांश्चाऽस राजा । | | verse_text = गन्धर्वोऽसौ दनुनामा नरोऽभूत् तस्मात् कृष्णे भक्तिमांश्चाऽस राजा । | ||
| verse_lines = गन्धर्वोऽसौ दनुनामा नरोऽभूत् तस्मात् कृष्णे भक्तिमांश्चाऽस राजा | | verse_lines = गन्धर्वोऽसौ दनुनामा नरोऽभूत् तस्मात् कृष्णे भक्तिमांश्चाऽस राजा ।¦पुरप्राप्तांस्तान् स विज्ञाय पापः सृगालाख्यो वासुदेवः क्रुधाऽऽगात् ॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = सूर्यप्रदत्तं रथमारुह्य दिव्यं वरादवध्यस्तिग्मरुचेः स कृष्णम् । | | verse_text = सूर्यप्रदत्तं रथमारुह्य दिव्यं वरादवध्यस्तिग्मरुचेः स कृष्णम् । | ||
| verse_lines = सूर्यप्रदत्तं रथमारुह्य दिव्यं वरादवध्यस्तिग्मरुचेः स कृष्णम् | | verse_lines = सूर्यप्रदत्तं रथमारुह्य दिव्यं वरादवध्यस्तिग्मरुचेः स कृष्णम् ।¦योद्धुं ययावमुचच्चास्त्रसङ्घाञ्छिरस्तस्याथाऽशु जहार कृष्णः ॥ ३१॥ | ||
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| verse_text = द्विधा कृत्वा देहमस्यारिणा च पुत्रं भक्तं तस्य राज्येऽभिषिच्य । | | verse_text = द्विधा कृत्वा देहमस्यारिणा च पुत्रं भक्तं तस्य राज्येऽभिषिच्य । | ||
| verse_lines = द्विधा कृत्वा देहमस्यारिणा च पुत्रं भक्तं तस्य राज्येऽभिषिच्य | | verse_lines = द्विधा कृत्वा देहमस्यारिणा च पुत्रं भक्तं तस्य राज्येऽभिषिच्य ।¦स शक्रदेवं माणिभद्रः पुरा यो ययौ पुरीं स्वां सहितोऽग्रजेन ॥ ३२॥ | ||
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| verse_text = नीतिं बलिष्ठस्य विहाय सेनां दूराद् युद्धं युद्धं दर्शयित्वैव गुप्त्यै । | | verse_text = नीतिं बलिष्ठस्य विहाय सेनां दूराद् युद्धं युद्धं दर्शयित्वैव गुप्त्यै । | ||
| verse_lines = नीतिं बलिष्ठस्य विहाय सेनां दूराद् युद्धं युद्धं दर्शयित्वैव गुप्त्यै | | verse_lines = नीतिं बलिष्ठस्य विहाय सेनां दूराद् युद्धं युद्धं दर्शयित्वैव गुप्त्यै ।¦स्वसेनायाः सर्वपूर्णात्मशक्तिः पुनः पुरीं प्राप्य स पूजितोऽवसत् ॥ ३३॥ | ||
}} | }} | ||
<span id="gr-C17" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तदशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C17" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तदशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ गतेऽथ चेदिपे स्वकं पुरं जनार्दनोऽशृणोत् । | | verse_text = औं ॥ गतेऽथ चेदिपे स्वकं पुरं जनार्दनोऽशृणोत् । | ||
| verse_lines = औं ॥ गतेऽथ चेदिपे स्वकं पुरं जनार्दनोऽशृणोत् | | verse_lines = औं ॥ गतेऽथ चेदिपे स्वकं पुरं जनार्दनोऽशृणोत् ।¦रमैव रुग्मिणीति योद्यतां स्वयम्बराय ताम् ॥ १॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = स रुक्मिनामकोऽग्रजः श्रियो(श्रिया) द्विषन् रमापतिम् । | | verse_text = स रुक्मिनामकोऽग्रजः श्रियो(श्रिया) द्विषन् रमापतिम् । | ||
| verse_lines = स रुक्मिनामकोऽग्रजः श्रियो(श्रिया) द्विषन् रमापतिम् | | verse_lines = स रुक्मिनामकोऽग्रजः श्रियो(श्रिया) द्विषन् रमापतिम् ।¦हरेः प्रदातुमुद्यतां(उद्यतान्) न्यवारयद्धरिप्रियाम् ॥ २॥ | ||
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| verse_text = प्रघोषिते स्वयंवरेऽथ तेन मागधादयः । | | verse_text = प्रघोषिते स्वयंवरेऽथ तेन मागधादयः । | ||
| verse_lines = प्रघोषिते स्वयंवरेऽथ तेन मागधादयः | | verse_lines = प्रघोषिते स्वयंवरेऽथ तेन मागधादयः ।¦समीयुरुग्रपौरुषाः ससाल्वपौण्ड्रचेदिपाः ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = तदा जगाम केशवो जवेन कुण्डिनं पुरम् । | | verse_text = तदा जगाम केशवो जवेन कुण्डिनं पुरम् । | ||
| verse_lines = तदा जगाम केशवो जवेन कुण्डिनं पुरम् | | verse_lines = तदा जगाम केशवो जवेन कुण्डिनं पुरम् ।¦स्मृतोऽथ तेन पक्षिराट् समाजगाम केशवम् ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = पतत्रवायुनाऽस्य ते नरेश्वराः प्रपातिताः । | | verse_text = पतत्रवायुनाऽस्य ते नरेश्वराः प्रपातिताः । | ||
| verse_lines = पतत्रवायुनाऽस्य ते नरेश्वराः प्रपातिताः | | verse_lines = पतत्रवायुनाऽस्य ते नरेश्वराः प्रपातिताः ।¦यदेदृशं(यदीदृशं) पतत्रिणो बलं हरेः किमुच्यते ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = किमत्र नः कृतं भवेत् सुखाय हीति तेऽब्रुवन् । | | verse_text = किमत्र नः कृतं भवेत् सुखाय हीति तेऽब्रुवन् । | ||
| verse_lines = किमत्र नः कृतं भवेत् सुखाय हीति तेऽब्रुवन् | | verse_lines = किमत्र नः कृतं भवेत् सुखाय हीति तेऽब्रुवन् ।¦अथाब्रवीज्जरासुतो जयी पयोब्धिमन्दिरः ।¦किलैष पक्षिवाहनो यतश्च नान्यथा भवेत् ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = जिता वयं च सर्वशोऽमुनैकलेन संयुगे । | | verse_text = जिता वयं च सर्वशोऽमुनैकलेन संयुगे । | ||
| verse_lines = जिता वयं च सर्वशोऽमुनैकलेन संयुगे | | verse_lines = जिता वयं च सर्वशोऽमुनैकलेन संयुगे ।¦अनेकशो न सङ्गतैर्जितः कदाचिदेष हि ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = अमुष्य चाग्रजः पुरा निहन्तुमुद्यतो हि माम् । | | verse_text = अमुष्य चाग्रजः पुरा निहन्तुमुद्यतो हि माम् । | ||
| verse_lines = अमुष्य चाग्रजः पुरा निहन्तुमुद्यतो हि माम् | | verse_lines = अमुष्य चाग्रजः पुरा निहन्तुमुद्यतो हि माम् ।¦अदृश्यवाक्यतोऽत्यजत् प्रताडनात् सुपीडितम् ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = किमस्य (चोच्यते)तूच्यते बलं वयं तृणोपमाः कृताः । | | verse_text = किमस्य (चोच्यते)तूच्यते बलं वयं तृणोपमाः कृताः । | ||
| verse_lines = किमस्य (चोच्यते)तूच्यते बलं वयं तृणोपमाः कृताः | | verse_lines = किमस्य (चोच्यते)तूच्यते बलं वयं तृणोपमाः कृताः ।¦समस्तशो मृधेमृधे हि येन चाक्षतेन हा ॥ ९॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_lines = किमत्र कुर्वतां सुखं भवेदुदीर्णसङ्कटे | | verse_lines = किमत्र कुर्वतां सुखं भवेदुदीर्णसङ्कटे ।¦इति ब्रुवन्नवाङ्मुखं नृपश्चकार विच्छविः ॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = अथाऽह चेदिभूपतिः सदन्तवक्रको वचः | | verse_lines = अथाऽह चेदिभूपतिः सदन्तवक्रको वचः ।¦पुरा हरेर्हि पार्षदः प्रसन्नबुद्धिरेकदा ॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = शृणुष्व राजसत्तम प्रभुं शिवस्वयम्भुवोः | | verse_lines = शृणुष्व राजसत्तम प्रभुं शिवस्वयम्भुवोः ।¦हरिं वदन्ति केचिदप्यदो भवेन्न वै मृषा ॥ १२॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_lines = तथाऽऽवयोश्च दर्शने भवेत् कदाचिदूर्जिता | | verse_lines = तथाऽऽवयोश्च दर्शने भवेत् कदाचिदूर्जिता ।¦अमुष्य भक्तिरन्यथा पुनश्च जायते क्रुधा ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = न कारणं च विद्महे न संशयः परो हरिः । | | verse_text = न कारणं च विद्महे न संशयः परो हरिः । | ||
| verse_lines = न कारणं च विद्महे न संशयः परो हरिः | | verse_lines = न कारणं च विद्महे न संशयः परो हरिः ।¦व्रजाम तं सुखार्थिनो वयं विहाय शत्रुताम् ॥ १४॥ | ||
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| verse_lines = इदं हि नः शुभप्रदं नचान्यथा शुभं क्वचित् | | verse_lines = इदं हि नः शुभप्रदं नचान्यथा शुभं क्वचित् ।¦इतीरितो जरासुतो ददर्श तौ दहन्निव ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = अथ प्रहस्य सौभराड् वचो जगाद मागधम् । | | verse_text = अथ प्रहस्य सौभराड् वचो जगाद मागधम् । | ||
| verse_lines = अथ प्रहस्य सौभराड् वचो जगाद मागधम् | | verse_lines = अथ प्रहस्य सौभराड् वचो जगाद मागधम् ।¦विनिन्द्य तौ क्रुधा स्फुरन् क्रुधा स्फुरन्तमीक्ष्य च ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = न तन्मृषा हरिः स्वयं जनार्दनो वधाय नः । | | verse_text = न तन्मृषा हरिः स्वयं जनार्दनो वधाय नः । | ||
| verse_lines = न तन्मृषा हरिः स्वयं जनार्दनो वधाय नः | | verse_lines = न तन्मृषा हरिः स्वयं जनार्दनो वधाय नः ।¦प्रजात एष यादवो वयं च दानवेश्वराः ॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = स्वधर्म एष नः सदा दृढप्रतीपता हरौ | | verse_lines = स्वधर्म एष नः सदा दृढप्रतीपता हरौ ।¦स्वधर्मिणो हता अपि प्रयाम सद्गतिं ध्रुवम् ॥ १८॥ | ||
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| verse_lines = शिवश्च नः परा गतिर्गुरुर्भवानरिर्हरेः | | verse_lines = शिवश्च नः परा गतिर्गुरुर्भवानरिर्हरेः ।¦इतीरितः स मागधो जगाद साधु साध्विति ॥ १९॥ | ||
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| verse_lines = तथैव रुक्मिपूर्वकाः करूशचेदिपौ च तौ | | verse_lines = तथैव रुक्मिपूर्वकाः करूशचेदिपौ च तौ ।¦विनिश्चयं कुबुद्धयो युधे च चक्रुरूर्जितम् ॥ २०॥ | ||
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| verse_lines = सदा प्रतीपकारिणौ भवाव कृष्ण इत्यपि | | verse_lines = सदा प्रतीपकारिणौ भवाव कृष्ण इत्यपि ।¦गुरोः प्रसादमाप्नुतां करूशचेदिभूभृतौ ॥ २१॥ | ||
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| verse_lines = पुनश्च ते त्वमन्त्रयन् सहैव पापबुद्धयः | | verse_lines = पुनश्च ते त्वमन्त्रयन् सहैव पापबुद्धयः ।¦ध्रुवं समागतो हरिर्लभेत रुक्मिणीमिमाम् ॥ २२॥ | ||
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| verse_lines = अयं त्रिलोकसुन्दरोऽनुरूपिणी च रुक्मिणी | | verse_lines = अयं त्रिलोकसुन्दरोऽनुरूपिणी च रुक्मिणी ।¦मुखेन बाहुनाऽप्ययं समस्तलोकजिद् वशी ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = वयं च मानसङ्क्षयं नितान्तमाप्नुमस्तदा | | verse_lines = वयं च मानसङ्क्षयं नितान्तमाप्नुमस्तदा ।¦न शक्नुमो निवारितुं शरैरमुं कथञ्चन ॥ २५॥ | ||
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| verse_text = इति स्म सर्वभूभृतां विनिश्चयं सकैशिकः । | | verse_text = इति स्म सर्वभूभृतां विनिश्चयं सकैशिकः । | ||
| verse_lines = इति स्म सर्वभूभृतां विनिश्चयं सकैशिकः | | verse_lines = इति स्म सर्वभूभृतां विनिश्चयं सकैशिकः ।¦क्रथोऽवगम्य भीष्मकानुजोऽभ्ययाद्धरिं द्रुतम् ॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = प्रणम्य पादपद्मयोर्निजं गृहं प्रवेश्य च । | | verse_text = प्रणम्य पादपद्मयोर्निजं गृहं प्रवेश्य च । | ||
| verse_lines = प्रणम्य पादपद्मयोर्निजं गृहं प्रवेश्य च | | verse_lines = प्रणम्य पादपद्मयोर्निजं गृहं प्रवेश्य च ।¦महासनं प्रदाय तौ प्रचक्रतुर्वरार्चनम् ॥ ३१॥ | ||
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| verse_text = अथाऽगमच्छतक्रतोर्वचः प्रगृह्य भूभुजः । | | verse_text = अथाऽगमच्छतक्रतोर्वचः प्रगृह्य भूभुजः । | ||
| verse_lines = अथाऽगमच्छतक्रतोर्वचः प्रगृह्य भूभुजः | | verse_lines = अथाऽगमच्छतक्रतोर्वचः प्रगृह्य भूभुजः ।¦जरासुतादिकान् पुमानुवाच चार्थवद् वचः ॥ ३२॥ | ||
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| verse_text = अहं प्रियः शचीपतेः सदाऽस्य चाक्षिगोचरः । | | verse_text = अहं प्रियः शचीपतेः सदाऽस्य चाक्षिगोचरः । | ||
| verse_lines = अहं प्रियः शचीपतेः सदाऽस्य चाक्षिगोचरः | | verse_lines = अहं प्रियः शचीपतेः सदाऽस्य चाक्षिगोचरः ।¦सुरेन्द्र आज्ञयाऽवदन्नृपान् व ईश्वरो हि सः ॥ ३३॥ | ||
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| verse_text = समस्तराजसत्पतिर्हरिर्न चान्य इत्यपि । | | verse_text = समस्तराजसत्पतिर्हरिर्न चान्य इत्यपि । | ||
| verse_lines = समस्तराजसत्पतिर्हरिर्न चान्य इत्यपि | | verse_lines = समस्तराजसत्पतिर्हरिर्न चान्य इत्यपि ।¦वराभिषेकमीशितुः कुरुध्वमाश्वसंशयम् ॥ ३४॥ | ||
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| verse_text = अतोऽन्यथा शिरस्यहं निपातयामि वोऽशनिम् । | | verse_text = अतोऽन्यथा शिरस्यहं निपातयामि वोऽशनिम् । | ||
| verse_lines = अतोऽन्यथा शिरस्यहं निपातयामि वोऽशनिम् | | verse_lines = अतोऽन्यथा शिरस्यहं निपातयामि वोऽशनिम् ।¦इतीदमिन्द्रशासनं कुरुध्वमित्यसौ ययौ ॥ ३५॥ | ||
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| verse_text = तदीरितं निशम्य ते पुनः सुतप्तचेतसः । | | verse_text = तदीरितं निशम्य ते पुनः सुतप्तचेतसः । | ||
| verse_lines = तदीरितं निशम्य ते पुनः सुतप्तचेतसः | | verse_lines = तदीरितं निशम्य ते पुनः सुतप्तचेतसः ।¦बभूवुरूचिरे वचः सुगर्वितो हि वासवः ॥ ३६॥ | ||
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| verse_text = पुरा बिभेति नः सदा प्रतिप्रति स्म वासवः । | | verse_text = पुरा बिभेति नः सदा प्रतिप्रति स्म वासवः । | ||
| verse_lines = पुरा बिभेति नः सदा प्रतिप्रति स्म वासवः | | verse_lines = पुरा बिभेति नः सदा प्रतिप्रति स्म वासवः ।¦उताद्य कृष्णसंश्रयाद् दृढं विभीषयत्यसौ ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = अदृश्य एव देवराड् यदि स्म वज्रमुत्सृजेत् | | verse_lines = अदृश्य एव देवराड् यदि स्म वज्रमुत्सृजेत् ।¦भवेम पीडिता वयं वरादमृत्यवोऽपि हि ॥ ३८॥ | ||
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| verse_text = पुरा दिविस्थितस्य च प्रमर्दने वयं क्षमाः । | | verse_text = पुरा दिविस्थितस्य च प्रमर्दने वयं क्षमाः । | ||
| verse_lines = पुरा दिविस्थितस्य च प्रमर्दने वयं क्षमाः | | verse_lines = पुरा दिविस्थितस्य च प्रमर्दने वयं क्षमाः ।¦उताद्य यद्यमुं वयं व्रजेम कृष्ण एष्यति ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = अतोऽभिषेचनाद् यदीह शार्ङ्गिणः शचीपतिः । | | verse_text = अतोऽभिषेचनाद् यदीह शार्ङ्गिणः शचीपतिः । | ||
| verse_lines = अतोऽभिषेचनाद् यदीह शार्ङ्गिणः शचीपतिः | | verse_lines = अतोऽभिषेचनाद् यदीह शार्ङ्गिणः शचीपतिः ।¦न वज्रमुत्सृजेत् तदाऽभिषेचयाम तं वयम् ॥ ४०॥ | ||
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| verse_lines = अतोऽन्यथा दनुर्यथा वरादमृत्युकोऽपि सन् | | verse_lines = अतोऽन्यथा दनुर्यथा वरादमृत्युकोऽपि सन् ।¦सुरेन्द्रवज्रताडितो बभूव कुक्षिगास्ययुक् ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = तथैव कृष्णसंश्रयात् स नः शचीपतिर्नयेत् । | | verse_text = तथैव कृष्णसंश्रयात् स नः शचीपतिर्नयेत् । | ||
| verse_lines = तथैव कृष्णसंश्रयात् स नः शचीपतिर्नयेत् | | verse_lines = तथैव कृष्णसंश्रयात् स नः शचीपतिर्नयेत् ।¦इति स्म निश्चिता नृपानयातयन्त शौरये ॥ ४२॥ | ||
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| verse_lines = समस्तशो जरासुतादिभिः कृतेऽभिषेचने | | verse_lines = समस्तशो जरासुतादिभिः कृतेऽभिषेचने ।¦अतीव भग्नमानकान् न चानुयाति कश्चन ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = समाश्रयं च केशवं तदैव जीवनार्थिनः । | | verse_text = समाश्रयं च केशवं तदैव जीवनार्थिनः । | ||
| verse_lines = समाश्रयं च केशवं तदैव जीवनार्थिनः | | verse_lines = समाश्रयं च केशवं तदैव जीवनार्थिनः ।¦प्रकुर्युरासुरा अपीति देवकार्यसङ्क्षयः(देवकार्यसञ्चयम्) ॥ ४४॥ | ||
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| verse_lines = इतीक्ष्य (उदीक्ष्य) पाकशासनोऽवदज्जरासुतादिकान् | | verse_lines = इतीक्ष्य (उदीक्ष्य) पाकशासनोऽवदज्जरासुतादिकान् ।¦सरुक्मिसाल्वचेदिपो न यातु मागधो हरिम् ॥ ४५॥ | ||
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| verse_lines = ततस्तु तान् विनाऽपरेऽधिराजराज इत्यमुम् | | verse_lines = ततस्तु तान् विनाऽपरेऽधिराजराज इत्यमुम् ।¦तदाऽभिषेक्तुमुद्यता नृपाः सुरेशशासनात् ॥ ४६॥ | ||
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| verse_lines = अतः शचीपतिर्निजं वरासनं हरेरदात् | | verse_lines = अतः शचीपतिर्निजं वरासनं हरेरदात् ।¦विवेश तत्र केशवो नभस्तलावतारिते ॥ ४७॥ | ||
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| verse_lines = करे प्रगृह्य केशवो न्यवेशयत् सहाऽसने | | verse_lines = करे प्रगृह्य केशवो न्यवेशयत् सहाऽसने ।¦पतत्रिपुङ्गवं च तौ स भीष्मकानुजौ प्रभुः ॥ ४८॥ | ||
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| verse_lines = अथाखिला नरेश्वरा मुनीन्द्रसंयुता हरिम् | | verse_lines = अथाखिला नरेश्वरा मुनीन्द्रसंयुता हरिम् ।¦सुशातकौम्भकुम्भकैः प्रचक्रुराभिषेकिणम् ॥ ४९॥ | ||
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| verse_lines = विरिञ्चशर्वपूर्वकैरभिष्टुतः सुरादिभिः | | verse_lines = विरिञ्चशर्वपूर्वकैरभिष्टुतः सुरादिभिः ।¦समस्तदेवगायकैः प्रगीत आस केशवः ॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = अथाऽह भीष्मकं प्रभुः स्वयंवरः किल त्वया | | verse_lines = अथाऽह भीष्मकं प्रभुः स्वयंवरः किल त्वया ।¦अभीप्सितः सुताकृते शुभाय ते भवेन्न सः ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = इयं रमा तवाऽत्मजा बभूव तां (हरेर्नच) हरेर्न चेत् | | verse_lines = इयं रमा तवाऽत्मजा बभूव तां (हरेर्नच) हरेर्न चेत् ।¦ददाति चेत् तदा पिता निरिन्दिरो व्रजेदधः ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = हिताय चैतदीरितं तवान्यथा न चिन्तय | | verse_lines = हिताय चैतदीरितं तवान्यथा न चिन्तय ।¦न योषिदिच्छया त्वहं ब्रवीमि पश्य यादृशः ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = उदीर्य चैवमीश्वरश्चकार हाऽविरात्मनः | | verse_lines = उदीर्य चैवमीश्वरश्चकार हाऽविरात्मनः ।¦स विश्वरूपमुत्तमं विसङ्ख्यशीर्षबाहुकम् ॥ ५४॥ | ||
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| verse_lines = अनन्ततेज(अनेकतेज) आततं विसङ्ख्यरूपसंयुतम् | | verse_lines = अनन्ततेज(अनेकतेज) आततं विसङ्ख्यरूपसंयुतम् ।¦विचित्रमौलिकुण्डलाङ्गदोरुहारनूपुरम् ॥ ५५॥ | ||
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| verse_lines = ज्वलत्सुकौस्तुभप्रभाऽभिभासकं शुभाम्बरम् | | verse_lines = ज्वलत्सुकौस्तुभप्रभाऽभिभासकं शुभाम्बरम् ।¦प्रपश्य यादृशाः स्त्रियो ममेत्यदर्शयच्छ्रियम् ॥ ५६॥ | ||
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| verse_lines = अनन्तरूपिणीं परां मनुष्यदृष्टितोऽधिकाम् | | verse_lines = अनन्तरूपिणीं परां मनुष्यदृष्टितोऽधिकाम् ।¦स्वरुक्मिणीतनोरपि व्यदर्शयच्च देवताः ॥ ५७॥ | ||
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| verse_lines = तदद्भुतं समीक्ष्य तु प्रभीत आशु भीष्मकः | | verse_lines = तदद्भुतं समीक्ष्य तु प्रभीत आशु भीष्मकः ।¦पपात पादयोर्विभोः(प्रभोः) करोमि तत् तथेति च ॥ ५८॥ | ||
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| verse_lines = पुनश्च विश्वरूपतां पिधाय पद्मलोचनः | | verse_lines = पुनश्च विश्वरूपतां पिधाय पद्मलोचनः ।¦जगाम पक्षिवाहनः पुरीं स्वबाहुपालिताम् ॥ ५९॥ | ||
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| verse_lines = अपाम्पतिश्च मैथिलः स्वयंवरं कृतावपि | | verse_lines = अपाम्पतिश्च मैथिलः स्वयंवरं कृतावपि ।¦हरिं विनिश्चयादियं व्रजेदिति स्म चक्रतुः ॥ ६०॥ | ||
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| verse_lines = अतो हरौ प्रबोध्य तं गते कृपालुसत्तमे | | verse_lines = अतो हरौ प्रबोध्य तं गते कृपालुसत्तमे ।¦वशीकृते च भीष्मके नृपास्त्वमन्त्रयन् पुनः ॥ ६२॥ | ||
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| verse_lines = यशश्च धर्ममुत्तमं विधित्सता वृकोदरे | | verse_lines = यशश्च धर्ममुत्तमं विधित्सता वृकोदरे ।¦न केशवेन सूदितो जरासुतो हि मन्यते ॥ ६३॥ | ||
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| verse_lines = वराच्छिवस्य मामयं न हन्तुमीष्ट उत्तमात् | | verse_lines = वराच्छिवस्य मामयं न हन्तुमीष्ट उत्तमात् ।¦अतः शिवप्रसादतो जितोऽपि जेष्य उत्तरम् ॥ ६४॥ | ||
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| verse_text = अयं हि दत्तपुत्रको म औरसाद् विशिष्यते । | | verse_text = अयं हि दत्तपुत्रको म औरसाद् विशिष्यते । | ||
| verse_lines = अयं हि दत्तपुत्रको म औरसाद् विशिष्यते | | verse_lines = अयं हि दत्तपुत्रको म औरसाद् विशिष्यते ।¦अतो निवेश्य एष मे सुरूपिणी च रुग्मिणी ॥ ७०॥ | ||
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| verse_text = शिवागमेषु शिष्यकाः सरुक्मिसाल्वपौण्ड्रकाः । | | verse_text = शिवागमेषु शिष्यकाः सरुक्मिसाल्वपौण्ड्रकाः । | ||
| verse_lines = शिवागमेषु शिष्यकाः सरुक्मिसाल्वपौण्ड्रकाः | | verse_lines = शिवागमेषु शिष्यकाः सरुक्मिसाल्वपौण्ड्रकाः ।¦ममाखिला नृपास्ततः कुरुध्वमेतदेव मे ॥ ७१॥ | ||
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| verse_text = इतीरिते तु सौभराड् जगाद रुक्मिसंविदा । | | verse_text = इतीरिते तु सौभराड् जगाद रुक्मिसंविदा । | ||
| verse_lines = इतीरिते तु सौभराड् जगाद रुक्मिसंविदा | | verse_lines = इतीरिते तु सौभराड् जगाद रुक्मिसंविदा ।¦स्वयंवरो निवर्तितः स्वसारमेष दास्यति ॥ ७२॥ | ||
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| verse_text = नचातिवर्तितुं क्षमः पिताऽस्य चेदिपाय ताम् । | | verse_text = नचातिवर्तितुं क्षमः पिताऽस्य चेदिपाय ताम् । | ||
| verse_lines = नचातिवर्तितुं क्षमः पिताऽस्य चेदिपाय ताम् | | verse_lines = नचातिवर्तितुं क्षमः पिताऽस्य चेदिपाय ताम् ।¦प्रदातुकाममात्मजं वयोगतस्तथाऽबलः ॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = स्वयं तु कृष्ण एत्य नो विजित्य कन्यकां हरेत् । | | verse_text = स्वयं तु कृष्ण एत्य नो विजित्य कन्यकां हरेत् । | ||
| verse_lines = स्वयं तु कृष्ण एत्य नो विजित्य कन्यकां हरेत् | | verse_lines = स्वयं तु कृष्ण एत्य नो विजित्य कन्यकां हरेत् ।¦ततोऽस्य पूर्वमेव नो ह्यभावता कृता शुभा ॥ ७४॥ | ||
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| verse_text = उपाय एष चिन्तितो मयाऽत्र मागधेश्वर । | | verse_text = उपाय एष चिन्तितो मयाऽत्र मागधेश्वर । | ||
| verse_lines = उपाय एष चिन्तितो मयाऽत्र मागधेश्वर | | verse_lines = उपाय एष चिन्तितो मयाऽत्र मागधेश्वर ।¦मुनिं हि गर्गनामकं ह्यमुष्य स्याल(शाल) आक्षिपत् ॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = यदाऽस्य षण्ढतोदिता मुनेः पुरो हि तस्य च । | | verse_text = यदाऽस्य षण्ढतोदिता मुनेः पुरो हि तस्य च । | ||
| verse_lines = यदाऽस्य षण्ढतोदिता मुनेः पुरो हि तस्य च | | verse_lines = यदाऽस्य षण्ढतोदिता मुनेः पुरो हि तस्य च ।¦परेण वृष्णयोऽहसंश्चुकोप गर्ग एषु ह ॥ ७६॥ | ||
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| verse_lines = चकार हि प्रतिश्रवं समार्जये सुतं द्रुतम् | | verse_lines = चकार हि प्रतिश्रवं समार्जये सुतं द्रुतम् ।¦अकृष्णतां य आनयेद् भुवोऽपि वृष्णिनाशकः ॥ ७७॥ | ||
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| verse_lines = यतो हि कृष्णसंश्रयाद् बतापहासिता वयम् | | verse_lines = यतो हि कृष्णसंश्रयाद् बतापहासिता वयम् ।¦इति ब्रुवन् वनं ययौ तपश्च शैवमाचरत् ॥ ७८॥ | ||
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| verse_lines = स चूर्णमायसं त्वदन् ददर्श चाब्दतः शिवम् | | verse_lines = स चूर्णमायसं त्वदन् ददर्श चाब्दतः शिवम् ।¦वरं ततोऽभिपेदिवान् सुतं हरेरभावदम् ॥ ७९॥ | ||
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| verse_lines = स विष्णुदैवतोऽपि सन् प्रविष्ट उल्बणासुरैः | | verse_lines = स विष्णुदैवतोऽपि सन् प्रविष्ट उल्बणासुरैः ।¦व्यधाद्धरेः प्रतीपकं व्रतं च नैष्ठिकं जहौ ॥ ८०॥ | ||
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| verse_lines = तमार चाऽसुराप्सरा बलिष्ठपुत्रकाम्यया | | verse_lines = तमार चाऽसुराप्सरा बलिष्ठपुत्रकाम्यया ।¦प्रविश्य गोपिकाङ्गनासमूहमध्यमुल्बणा ॥ ८१॥ | ||
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| verse_lines = स यावनेन भूभृता हि गोपिकाभिरर्चितः | | verse_lines = स यावनेन भूभृता हि गोपिकाभिरर्चितः ।¦अपुत्रकेण जानता मुनेर्मनोऽनुचिन्तितम् ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = स चाप्सरस्तनौ सुतं निषिच्य यावनाय च | | verse_lines = स चाप्सरस्तनौ सुतं निषिच्य यावनाय च ।¦ददौ विमोहितः क्रुधा किमेतदीशवैरिणः ॥ ८३॥ | ||
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| verse_lines = स आश्रमाच्च नैष्ठिकाद् विदूषितः प्रतीपकृत् | | verse_lines = स आश्रमाच्च नैष्ठिकाद् विदूषितः प्रतीपकृत् ।¦हरेश्च तापमेयिवान् जगर्ह चाऽत्मशेमुषीम् ॥ ८४॥ | ||
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| verse_lines = जगाम चारणं हरिं प्रपाहि मां सुपापिनम् | | verse_lines = जगाम चारणं हरिं प्रपाहि मां सुपापिनम् ।¦इति स्म विष्ण्वनुज्ञया चकार वैष्णवं तपः ॥ ८५॥ | ||
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| verse_lines = कुतो हि भाग्यमापतेन्मुनेः शिवार्चने सदा | | verse_lines = कुतो हि भाग्यमापतेन्मुनेः शिवार्चने सदा ।¦भवादृशा हि दानवाः स्थिराः शिवार्चने सदा(असदा) ॥ ८६॥ | ||
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| verse_lines = सुतोऽस्य कालनामको बभूव कृष्णमर्दितुम् | | verse_lines = सुतोऽस्य कालनामको बभूव कृष्णमर्दितुम् ।¦सदैव कालकाङ्क्षणात् स यावनाभिषेचितः ॥ ८७॥ | ||
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| verse_lines = तवैव शिष्य एष चातिभक्तिमान् हि शङ्करे | | verse_lines = तवैव शिष्य एष चातिभक्तिमान् हि शङ्करे ।¦प्रभूतसेनया युतो बलोद्धतश्च सर्वदा ॥ ८८॥ | ||
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| verse_lines = तमेष यामि शासनात् तवोपनीय सत्वरम् | | verse_lines = तमेष यामि शासनात् तवोपनीय सत्वरम् ।¦विकृष्णकं क्षितेस्तलं विधाय संरमामहे ॥ ८९॥ | ||
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| verse_lines = ततश्च रुक्मिणीं वयं प्रदापयाम चेदिपे | | verse_lines = ततश्च रुक्मिणीं वयं प्रदापयाम चेदिपे ।¦विनाश्य देवपक्षिणो यथेष्टमास्म सर्वदा ॥ ९०॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितो जरासुतो बभूव दुर्मना भृशम् | | verse_lines = इतीरितो जरासुतो बभूव दुर्मना भृशम् ।¦किरीटमण्डितं शिरश्चकार चाऽश्ववाग् भृशम् ॥ ९१॥ | ||
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| verse_lines = करं करेण पीडयन् निशाम्य चाऽत्मनो भुजौ | | verse_lines = करं करेण पीडयन् निशाम्य चाऽत्मनो भुजौ ।¦जगाद कार्यसिद्धये कथं प्रयाचये परम् ॥ ९२॥ | ||
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| verse_lines = सुदुर्गकार्यसन्ततिं ह्यगुः स्म मद्भुजाश्रयाः | | verse_lines = सुदुर्गकार्यसन्ततिं ह्यगुः स्म मद्भुजाश्रयाः ।¦समस्तभूतळे नृपाः स चाहमेष मागधः ॥ ९३॥ | ||
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| verse_lines = कदाऽप्यचीर्णमद्य तत् कथं करोमि केवलम् | | verse_lines = कदाऽप्यचीर्णमद्य तत् कथं करोमि केवलम् ।¦गिरीशपादसंश्रयः प्रभुः समस्तभूभृताम् ॥ ९४॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितः स सौभराड् जगाद वाक्यमुत्तमम् | | verse_lines = इतीरितः स सौभराड् जगाद वाक्यमुत्तमम् ।¦भवानपि स्म मुह्यते किमस्मदादयः प्रभो ॥ ९५॥ | ||
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| verse_lines = स्वशिष्यकैः कृतं तु यत् किमन्यसाधितं भवेत् | | verse_lines = स्वशिष्यकैः कृतं तु यत् किमन्यसाधितं भवेत् ।¦स्वशिष्यदासवर्गकैः समर्थयन्ति भूभुजः ॥ ९६॥ | ||
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| verse_lines = अपि स्म ते बलाश्रयप्रवृत्तयोऽस्मदादयः | | verse_lines = अपि स्म ते बलाश्रयप्रवृत्तयोऽस्मदादयः ।¦पुमान् कुठारसङ्ग्रहादशक्त ईर्यते हि किम् ॥ ९७॥ | ||
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| verse_lines = वरो हि कृष्णमर्दने वृतोऽस्य केवलः शिवात् | | verse_lines = वरो हि कृष्णमर्दने वृतोऽस्य केवलः शिवात् ।¦तदन्यशत्रुपीडनात् त्वमेव तस्य रक्षकः ॥ ९९॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितेऽप्यतृप्तवत् स्थिते तु बार्हद्रथे | | verse_lines = इतीरितेऽप्यतृप्तवत् स्थिते तु बार्हद्रथे ।¦जगाम सौभमास्थितः स सौभराट् च यावनम् ॥ १०१॥ | ||
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| verse_lines = निराशकोऽद्य यादवानपि स्म पीडयिष्यति | | verse_lines = निराशकोऽद्य यादवानपि स्म पीडयिष्यति ।¦अतः समुद्रमध्यगापुरीविधानमद्य मे ।¦प्ररोचते निधानमप्यमुत्र सर्वसात्त्वताम् ॥ ११०॥ | ||
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| verse_text = उदीर्य चैवमीश्वरोऽस्मरत् सुरेशवर्धकिम् । | | verse_text = उदीर्य चैवमीश्वरोऽस्मरत् सुरेशवर्धकिम् । | ||
| verse_lines = उदीर्य चैवमीश्वरोऽस्मरत् सुरेशवर्धकिम् | | verse_lines = उदीर्य चैवमीश्वरोऽस्मरत् सुरेशवर्धकिम् ।¦स भौवनः समागतः कुशस्थलीं विनिर्ममे ॥ १११॥ | ||
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| verse_text = निरम्बुके तु सागरे जनार्दनाज्ञया कृते । | | verse_text = निरम्बुके तु सागरे जनार्दनाज्ञया कृते । | ||
| verse_lines = निरम्बुके तु सागरे जनार्दनाज्ञया कृते | | verse_lines = निरम्बुके तु सागरे जनार्दनाज्ञया कृते ।¦महोदकस्य मध्यतश्चकार तां पुरीं शुभाम् ।¦द्विषट्कयोजनायतां पयोब्धिमध्यगोपमाम् ॥ ११२॥ | ||
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| verse_text = चकार लावणोदकं जनार्दनोऽमृतोपमम् । | | verse_text = चकार लावणोदकं जनार्दनोऽमृतोपमम् । | ||
| verse_lines = चकार लावणोदकं जनार्दनोऽमृतोपमम् | | verse_lines = चकार लावणोदकं जनार्दनोऽमृतोपमम् ।¦सभां सुधर्मनामकां ददौ समीरणोऽस्य च ॥ ११३॥ | ||
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| verse_text = शतक्रतोः सभां तु तां प्रदाय केशवाय सः । | | verse_text = शतक्रतोः सभां तु तां प्रदाय केशवाय सः । | ||
| verse_lines = शतक्रतोः सभां तु तां प्रदाय केशवाय सः | | verse_lines = शतक्रतोः सभां तु तां प्रदाय केशवाय सः ।¦निधीन् समर्प्य सर्वशो ययौ प्रणम्य तं प्रभुम् ॥ ११४॥ | ||
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| verse_text = समस्तदेवतागणाः स्वकीयमर्पयन् हरौ । | | verse_text = समस्तदेवतागणाः स्वकीयमर्पयन् हरौ । | ||
| verse_lines = समस्तदेवतागणाः स्वकीयमर्पयन् हरौ | | verse_lines = समस्तदेवतागणाः स्वकीयमर्पयन् हरौ ।¦विमुच्य पक्षिपुङ्गवं स योद्धुमैच्छदच्युतः ॥ ११५॥ | ||
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| verse_text = सम्स्तमाधुरान् प्रभुः कुशस्थलीस्थितान् क्षणात् । | | verse_text = सम्स्तमाधुरान् प्रभुः कुशस्थलीस्थितान् क्षणात् । | ||
| verse_lines = सम्स्तमाधुरान् प्रभुः कुशस्थलीस्थितान् क्षणात् | | verse_lines = सम्स्तमाधुरान् प्रभुः कुशस्थलीस्थितान् क्षणात् ।¦विधाय बाहुयोधकः स यावनं समभ्ययात् ॥ ११६॥ | ||
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| verse_text = अनन्तशक्तिरप्यजः सुनीतिदृष्टये नृणाम् । | | verse_text = अनन्तशक्तिरप्यजः सुनीतिदृष्टये नृणाम् । | ||
| verse_lines = अनन्तशक्तिरप्यजः सुनीतिदृष्टये नृणाम् | | verse_lines = अनन्तशक्तिरप्यजः सुनीतिदृष्टये नृणाम् ।¦व्यवासयन्निजान् जनान् स लीलयैव केवलम् ॥ ११७॥ | ||
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| verse_lines = अनाद्यनन्तकालकं समस्तलोकमण्डलम् | | verse_lines = अनाद्यनन्तकालकं समस्तलोकमण्डलम् ।¦यदीक्षयैव रक्ष्यते किमस्य वृष्णिरक्षणम् ॥ ११८॥ | ||
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| verse_text = निरायुधं च मामयं वराच्छिवस्य न क्षमः । | | verse_text = निरायुधं च मामयं वराच्छिवस्य न क्षमः । | ||
| verse_lines = निरायुधं च मामयं वराच्छिवस्य न क्षमः | | verse_lines = निरायुधं च मामयं वराच्छिवस्य न क्षमः ।¦समस्तसेनया युतोऽपि योद्धुमित्यदर्शयत् ॥ ११९॥ | ||
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| verse_lines = स कृष्णपन्नगं घटे निधाय केशवोऽर्पयत् | | verse_lines = स कृष्णपन्नगं घटे निधाय केशवोऽर्पयत् ।¦निरायुधोऽप्यहं क्षमो निहन्तुमप्रियानिति ॥ १२०॥ | ||
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| verse_text = घटं पिपीलिकागणैः प्रपूर्य यावनोऽस्य च । | | verse_text = घटं पिपीलिकागणैः प्रपूर्य यावनोऽस्य च । | ||
| verse_lines = घटं पिपीलिकागणैः प्रपूर्य यावनोऽस्य च | | verse_lines = घटं पिपीलिकागणैः प्रपूर्य यावनोऽस्य च ।¦बहुत्वतो विजेष्य इत्यहिं मृतं व्यदर्शयत् ॥ १२१॥ | ||
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| verse_lines = किमत्र सत्यमित्यहं प्रदर्शयिष्य इत्यजः | | verse_lines = किमत्र सत्यमित्यहं प्रदर्शयिष्य इत्यजः ।¦उदीर्य दूतमभ्ययात् स यावनं प्रबाधितुम् ॥ १२२॥ | ||
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| verse_lines = स बाहुनैव केशवो विजित्य यावनं प्रभुः | | verse_lines = स बाहुनैव केशवो विजित्य यावनं प्रभुः ।¦निहत्य सर्वसैनिकान् स्वमस्य यापयत् पुरीम् ॥ १२३॥ | ||
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| verse_lines = सहास्त्रशस्त्रसञ्चयान् सृजन्तमाशु यावनम् | | verse_lines = सहास्त्रशस्त्रसञ्चयान् सृजन्तमाशु यावनम् ।¦न्यपातयद् रथोत्तमात् तलेन केशवोऽरिहा ॥ १२४॥ | ||
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| verse_lines = विवाहनं निरायुधं विधाय बाहुना क्षणात् | | verse_lines = विवाहनं निरायुधं विधाय बाहुना क्षणात् ।¦विमूर्च्छितं नचाहनत् सुरार्थितं स्मरन् हरिः ॥ १२५॥ | ||
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| verse_lines = पुरा हि यौवनाश्वजे वरप्रदाः सुरेश्वराः | | verse_lines = पुरा हि यौवनाश्वजे वरप्रदाः सुरेश्वराः ।¦ययाचिरे जनार्दनं वरं वरप्रदेश्वरम् ॥ १२६॥ | ||
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| verse_lines = अनर्थको वरोऽमुना वृतोऽपि सार्थको भवेत् | | verse_lines = अनर्थको वरोऽमुना वृतोऽपि सार्थको भवेत् ।¦अरिं भविष्ययावनं दहत्वयं तवेश्वर ॥ १२७॥ | ||
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| verse_lines = तथाऽस्त्विति प्रभाषितं स्ववाक्यमेव केशवः | | verse_lines = तथाऽस्त्विति प्रभाषितं स्ववाक्यमेव केशवः ।¦ऋतं विधातुमभ्ययात् स यौवनाश्वजान्तिकम् ॥ १२८॥ | ||
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| verse_lines = ससञ्ज्ञकोऽथ यावनो धरातलात् समुत्थितः | | verse_lines = ससञ्ज्ञकोऽथ यावनो धरातलात् समुत्थितः ।¦निपात्य यान्तमीश्वरं स पृष्ठतोऽन्वयात् क्रुधा ॥ १२९॥ | ||
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| verse_lines = हरिर्गुहां नृपस्य तु प्रविश्य संव्यवस्थितः | | verse_lines = हरिर्गुहां नृपस्य तु प्रविश्य संव्यवस्थितः ।¦स यावनः पदाऽहनन्नृपं स तं ददर्श ह ॥ १३०॥ | ||
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| verse_lines = स तस्य दृष्टिमात्रतो बभूव भस्मसात् क्षणात् | | verse_lines = स तस्य दृष्टिमात्रतो बभूव भस्मसात् क्षणात् ।¦स एव विष्णुरव्ययो ददाह तं हि वह्निवत् ॥ १३१॥ | ||
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| verse_lines = वराच्छिवस्य दैवतैरवध्यदानवान् पुरा | | verse_lines = वराच्छिवस्य दैवतैरवध्यदानवान् पुरा ।¦हरेर्वरान्निहत्य स प्रपेद आश्विमं वरम् ॥ १३२॥ | ||
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| verse_lines = सुदीर्घसुप्तिमात्मनः प्रसुप्तिभङ्गकृत्क्षयम् | | verse_lines = सुदीर्घसुप्तिमात्मनः प्रसुप्तिभङ्गकृत्क्षयम् ।¦स्वदृष्टिमात्रतस्ततो हतः स यावनस्तदा ॥ १३३॥ | ||
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| verse_lines = अतश्च पुण्यमाप्तवान् सुरप्रसादतोऽक्षयम् | | verse_lines = अतश्च पुण्यमाप्तवान् सुरप्रसादतोऽक्षयम् ।¦स यौवनाश्वजो नृपो न देवतोषणं वृथा ॥ १३४॥ | ||
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| verse_lines = ततो हरिं निरीक्ष्य स स्तुतिं विधाय चोत्तमाम् | | verse_lines = ततो हरिं निरीक्ष्य स स्तुतिं विधाय चोत्तमाम् ।¦हरेरनुज्ञया तपश्चचार मुक्तिमाप च ॥ १३५॥ | ||
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| verse_lines = ततो गुहामुखाद्धरिर्विनिस्सृतो जरासुतम् | | verse_lines = ततो गुहामुखाद्धरिर्विनिस्सृतो जरासुतम् ।¦समस्तभूपसंवृतं(संयुतं) जिगाय बाहुनेश्वरः ॥ १३६॥ | ||
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| verse_lines = तलेन मुष्टिभिस्तथा महीरुहैश्च चूर्णिताः | | verse_lines = तलेन मुष्टिभिस्तथा महीरुहैश्च चूर्णिताः ।¦निपेतुरस्य सैनिकाः स्वयं च मूर्च्छितोऽपतत् ॥ १३७॥ | ||
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| verse_lines = ससाल्वपौण्ड्रचेदिपान् निपात्य सर्वभूभुजः | | verse_lines = ससाल्वपौण्ड्रचेदिपान् निपात्य सर्वभूभुजः ।¦स पुप्लुवे जनार्दनः क्षणेन तां कुशस्थलीम् ॥ १३८॥ | ||
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| verse_lines = ससञ्ज्ञकाः समुत्थितास्ततो नृपाः पुनर्ययुः | | verse_lines = ससञ्ज्ञकाः समुत्थितास्ततो नृपाः पुनर्ययुः ।¦जिगीषवोऽथ रुक्मिणीं विधाय(प्रदाय) चेदिपे हरिम् ॥ १३९॥ | ||
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| verse_lines = समस्तराजमण्डले विनिश्चयादुपागते | | verse_lines = समस्तराजमण्डले विनिश्चयादुपागते ।¦सभीष्मके च रुक्मिणि प्रदातुमुद्यते मुदा(तदा) ॥ १४०॥ | ||
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| verse_lines = समस्तराजमण्डलं प्रयान्तमीक्ष्य केशवम् | | verse_lines = समस्तराजमण्डलं प्रयान्तमीक्ष्य केशवम् ।¦सुयत्तमात्तकार्मुकं बभूव कन्यकावने ॥ १४३॥ | ||
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| verse_lines = पुरा प्रदानतः सुरेक्षणच्छलाद् बहिर्गताम् | | verse_lines = पुरा प्रदानतः सुरेक्षणच्छलाद् बहिर्गताम् ।¦रथे न्यवेशयद्धरिः प्रपश्यतां च भूभृताम् ॥ १४४॥ | ||
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| verse_text = चिरं प्रयुद्ध्य तावुभौ वरास्त्रशस्त्रवर्षिणौ । | | verse_text = चिरं प्रयुद्ध्य तावुभौ वरास्त्रशस्त्रवर्षिणौ । | ||
| verse_lines = चिरं प्रयुद्ध्य तावुभौ वरास्त्रशस्त्रवर्षिणौ | | verse_lines = चिरं प्रयुद्ध्य तावुभौ वरास्त्रशस्त्रवर्षिणौ ।¦क्रुधा निरीक्ष्य तस्थतुः परस्परं स्फुरत्तनू ॥ १५०॥ | ||
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| verse_text = समानभावमक्षमी शिनेः सुतात्मजः शरम् । | | verse_text = समानभावमक्षमी शिनेः सुतात्मजः शरम् । | ||
| verse_lines = समानभावमक्षमी शिनेः सुतात्मजः शरम् | | verse_lines = समानभावमक्षमी शिनेः सुतात्मजः शरम् ।¦अथोद्बबर्ह तत्क्षणाद् बलान्मुमोच वक्षसि ॥ १५१॥ | ||
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| verse_text = स तेन ताडितोऽपतद् विसञ्ज्ञको नृपात्मजः । | | verse_text = स तेन ताडितोऽपतद् विसञ्ज्ञको नृपात्मजः । | ||
| verse_lines = स तेन ताडितोऽपतद् विसञ्ज्ञको नृपात्मजः | | verse_lines = स तेन ताडितोऽपतद् विसञ्ज्ञको नृपात्मजः ।¦विजित्य तं स सात्यकिर्ययौ प्रहृष्टमानसः ॥ १५२॥ | ||
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| verse_text = अथापरे च यादवा विजित्य तद्बलं ययुः । | | verse_text = अथापरे च यादवा विजित्य तद्बलं ययुः । | ||
| verse_lines = अथापरे च यादवा विजित्य तद्बलं ययुः | | verse_lines = अथापरे च यादवा विजित्य तद्बलं ययुः ।¦पुरैव रुक्मिपूर्वकाः प्रजग्मुरच्युतं प्रति ॥ १५३॥ | ||
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| verse_text = सहैकलव्यपूर्वकैः समेत्य भीष्मकात्मजः । | | verse_text = सहैकलव्यपूर्वकैः समेत्य भीष्मकात्मजः । | ||
| verse_lines = सहैकलव्यपूर्वकैः समेत्य भीष्मकात्मजः | | verse_lines = सहैकलव्यपूर्वकैः समेत्य भीष्मकात्मजः ।¦हरिं ववर्ष सायकैः स सिंहवन्न्यवर्तत ॥ १५४॥ | ||
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| verse_text = अक्षोहिणीत्रयं हरिस्तदा निहत्य सायकैः । | | verse_text = अक्षोहिणीत्रयं हरिस्तदा निहत्य सायकैः । | ||
| verse_lines = अक्षोहिणीत्रयं हरिस्तदा निहत्य सायकैः | | verse_lines = अक्षोहिणीत्रयं हरिस्तदा निहत्य सायकैः ।¦अवाहनायुधं व्यधान्निषादपं शरैः क्षणात् ॥ १५५॥ | ||
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| verse_text = शरं शरीरनाशकं समाददानमीश्वरम् । | | verse_text = शरं शरीरनाशकं समाददानमीश्वरम् । | ||
| verse_lines = शरं शरीरनाशकं समाददानमीश्वरम् | | verse_lines = शरं शरीरनाशकं समाददानमीश्वरम् ।¦स एकलव्य आशु तं विहाय दुद्रुवे भयात् ॥ १५६॥ | ||
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| verse_text = धनुर्भृतां वरे गते रणं विहाय भूभृतः । | | verse_text = धनुर्भृतां वरे गते रणं विहाय भूभृतः । | ||
| verse_lines = धनुर्भृतां वरे गते रणं विहाय भूभृतः | | verse_lines = धनुर्भृतां वरे गते रणं विहाय भूभृतः ।¦करूशराजपूर्वकाः क्षणात् प्रदुद्रुवुर्भयात् ॥ १५७॥ | ||
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| verse_text = अथाऽससाद केशवं रुषा स भीष्मकात्मजः । | | verse_text = अथाऽससाद केशवं रुषा स भीष्मकात्मजः । | ||
| verse_lines = अथाऽससाद केशवं रुषा स भीष्मकात्मजः | | verse_lines = अथाऽससाद केशवं रुषा स भीष्मकात्मजः ।¦शराम्बुधार आशु तं विवाहनं व्यधाद्धरिः ॥ १५८॥ | ||
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| verse_text = चकर्त कार्मुकं पुनः स खड्गचर्मभृद्धरेः । | | verse_text = चकर्त कार्मुकं पुनः स खड्गचर्मभृद्धरेः । | ||
| verse_lines = चकर्त कार्मुकं पुनः स खड्गचर्मभृद्धरेः | | verse_lines = चकर्त कार्मुकं पुनः स खड्गचर्मभृद्धरेः ।¦रथं समारुहच्छरैश्चकर्त खड्गमीश्वरः ॥ १५९॥ | ||
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| verse_text = शरैर्वितस्तिमात्रकैर्विधाय तं निरायुधम् । | | verse_text = शरैर्वितस्तिमात्रकैर्विधाय तं निरायुधम् । | ||
| verse_lines = शरैर्वितस्तिमात्रकैर्विधाय तं निरायुधम् | | verse_lines = शरैर्वितस्तिमात्रकैर्विधाय तं निरायुधम् ।¦प्रियावचः प्रपालयन् जघान नैनमच्युतः ॥ १६०॥ | ||
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| verse_text = निबद्ध्य पञ्चचूडिनं विधाय तं व्यसर्जयत् । | | verse_text = निबद्ध्य पञ्चचूडिनं विधाय तं व्यसर्जयत् । | ||
| verse_lines = निबद्ध्य पञ्चचूडिनं विधाय तं व्यसर्जयत् | | verse_lines = निबद्ध्य पञ्चचूडिनं विधाय तं व्यसर्जयत् ।¦जगज्जनित्रयोरिदं विडम्बनं रमेशयोः ॥ १६१॥ | ||
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| verse_lines = सदैकमानसावपि स्वधर्मशासकौ नृणाम् | | verse_lines = सदैकमानसावपि स्वधर्मशासकौ नृणाम् ।¦रमा हरिश्च तत्र तौ विजह्रतुर्हि रुक्मिणा ॥ १६२॥ | ||
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| verse_lines = अथाऽससाद सौभराड् हरिं शराम्बुवर्षणः | | verse_lines = अथाऽससाद सौभराड् हरिं शराम्बुवर्षणः ।¦हरिः शरं यमोपमं मुमोच तस्य वक्षसि ॥ १६३॥ | ||
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| verse_lines = शरेण तेन पीडितः पपात मन्दचेष्टितः | | verse_lines = शरेण तेन पीडितः पपात मन्दचेष्टितः ।¦चिरात्तसञ्ज्ञकोऽगमत् त्रिनेत्रतोषणेच्छया ॥ १६४॥ | ||
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| verse_lines = समस्तराजसन्निधावयादवीं महीमहम् | | verse_lines = समस्तराजसन्निधावयादवीं महीमहम् ।¦करिष्य इत्युदीर्य स व्यधात् तपोऽतिदुश्चरम् ॥ १६५॥ | ||
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| verse_lines = अथो विवेश केशवः पुरीं कुशस्थलीं विभुः | | verse_lines = अथो विवेश केशवः पुरीं कुशस्थलीं विभुः ।¦प्रियायुतोऽब्जजादिभिः समीडितः सुरेश्वरैः ॥ १६६॥ | ||
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| verse_lines = पुरा ततो हलायुधः प्रियां निजां पुराऽपि हि | | verse_lines = पुरा ततो हलायुधः प्रियां निजां पुराऽपि हि ।¦स वारुणीसमाह्वयामवाप रैवतीं विभुः ॥ १६७॥ | ||
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| verse_lines = पतिं यथाऽनुरूपिणं तदीयमेव पूर्वकम् | | verse_lines = पतिं यथाऽनुरूपिणं तदीयमेव पूर्वकम् ।¦पिता तदीय ऐच्छत प्रवेत्तुमब्जसम्भवात् ॥ १६८॥ | ||
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| verse_lines = स तत्सदो गतो वरात् तदीयतः प्रगीतिकाम् | | verse_lines = स तत्सदो गतो वरात् तदीयतः प्रगीतिकाम् ।¦निशम्य नाविदद् गतं युगोरुकालपर्ययम् ॥ १६९॥ | ||
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| verse_lines = नरानयोग्यगीतिका विमोहयेत् ततो नृपः | | verse_lines = नरानयोग्यगीतिका विमोहयेत् ततो नृपः ।¦सुमूढबुद्धिरन्ततोऽल्पकाल इत्यमन्यत ॥ १७०॥ | ||
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| verse_lines = स मूर्च्छितः प्रबोधितोऽब्जजेन तं त्वपृच्छत | | verse_lines = स मूर्च्छितः प्रबोधितोऽब्जजेन तं त्वपृच्छत ।¦सुतापतिं बलं च सोऽब्रवीद् युगात्यये बहौ ॥ १७१॥ | ||
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| verse_lines = स रैवतो बलाय तां प्रदाय गन्धमादनम् | | verse_lines = स रैवतो बलाय तां प्रदाय गन्धमादनम् ।¦गतोऽत्र चीर्णसत्तपा अवाप केशवान्तिकम् ॥ १७२॥ | ||
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| verse_lines = बलोऽपि तां पुरातनप्रमाणसम्मितां विभुः | | verse_lines = बलोऽपि तां पुरातनप्रमाणसम्मितां विभुः ।¦हलेन चाऽज्ञया समां चकार सत्यवाञ्छितः ॥ १७३॥ | ||
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| verse_lines = तया रतः सुतावुभौ शठोल्मुकाभिधावधात् | | verse_lines = तया रतः सुतावुभौ शठोल्मुकाभिधावधात् ।¦पुराऽर्यमांशकौ सुरावुदारचेष्टितो बलः ॥ १७४॥ | ||
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| verse_lines = जनार्दनश्च रुग्मिणीकरं शुभे दिनेऽग्रहीत् | | verse_lines = जनार्दनश्च रुग्मिणीकरं शुभे दिनेऽग्रहीत् ।¦महोत्सवस्तदाऽभवत् कुशस्थलीनिवासिनाम् ॥ १७५॥ | ||
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| verse_lines = चतुर्मुखेशपूर्वकाः सुरा वियत्यवस्थिताः | | verse_lines = चतुर्मुखेशपूर्वकाः सुरा वियत्यवस्थिताः ।¦प्रतुष्टुवुर्जनार्दनं रमासमेतमव्ययम् ॥ १७६॥ | ||
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| verse_lines = मुनीन्द्रदेवगायनादयोऽपि यादवैः सह | | verse_lines = मुनीन्द्रदेवगायनादयोऽपि यादवैः सह ।¦विचेरुरुत्तमोत्सवे रमारमेशयोगिनि ॥ १७७॥ | ||
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| verse_lines = सुरांशकाश्च ये नृपाः समाहुता महोत्सवे | | verse_lines = सुरांशकाश्च ये नृपाः समाहुता महोत्सवे ।¦सपाण्डवाः समाययुर्हरिं रमासमायुतम् ॥ १७८॥ | ||
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| verse_lines = समस्तलोकसुन्दरौ युतौ रमारमेश्वरौ | | verse_lines = समस्तलोकसुन्दरौ युतौ रमारमेश्वरौ ।¦समीक्ष्य मोदमाययुः समस्तलोकसज्जनाः ॥ १७९॥ | ||
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| verse_lines = तया रमन् जनार्दनो वियोगशून्यया सदा | | verse_lines = तया रमन् जनार्दनो वियोगशून्यया सदा ।¦अधत्त पुत्रमुत्तमं मनोभवं पुरातनम् ॥ १८०॥ | ||
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| verse_text = पतिं सुपूर्णयौवनं निरीक्ष्य तां विषज्जतीम् । | | verse_text = पतिं सुपूर्णयौवनं निरीक्ष्य तां विषज्जतीम् । | ||
| verse_lines = पतिं सुपूर्णयौवनं निरीक्ष्य तां विषज्जतीम् | | verse_lines = पतिं सुपूर्णयौवनं निरीक्ष्य तां विषज्जतीम् ।¦उवाच कार्ष्णिरम्ब ते कुचेष्टितं कथं न्विति ॥ १९१॥ | ||
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| verse_text = जगाद साऽखिलं पतौ तदस्य(तदास्य) जन्म चाऽगतिम् । | | verse_text = जगाद साऽखिलं पतौ तदस्य(तदास्य) जन्म चाऽगतिम् । | ||
| verse_lines = जगाद साऽखिलं पतौ तदस्य(तदास्य) जन्म चाऽगतिम् | | verse_lines = जगाद साऽखिलं पतौ तदस्य(तदास्य) जन्म चाऽगतिम् ।¦ततोऽग्रहीत् स तां प्रियां रतिं रमापतेः सुतः ॥ १९२॥ | ||
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| verse_text = ददौ च मन्त्रमुत्तमं समस्तमायिनाशकम् । | | verse_text = ददौ च मन्त्रमुत्तमं समस्तमायिनाशकम् । | ||
| verse_lines = ददौ च मन्त्रमुत्तमं समस्तमायिनाशकम् | | verse_lines = ददौ च मन्त्रमुत्तमं समस्तमायिनाशकम् ।¦भृगूत्थरामदैवतं रतिर्हरेः सुताय सा ॥ १९३॥ | ||
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| verse_text = ततः स्वदारधर्षकं समाह्वयद् युधेऽङ्गजः । | | verse_text = ततः स्वदारधर्षकं समाह्वयद् युधेऽङ्गजः । | ||
| verse_lines = ततः स्वदारधर्षकं समाह्वयद् युधेऽङ्गजः | | verse_lines = ततः स्वदारधर्षकं समाह्वयद् युधेऽङ्गजः ।¦स शम्बरं स चैत्य तं युयोध शक्तितो बली ॥ १९४॥ | ||
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| verse_text = स चर्मखड्गधारिणं वरास्त्रशस्त्रपादपैः । | | verse_text = स चर्मखड्गधारिणं वरास्त्रशस्त्रपादपैः । | ||
| verse_lines = स चर्मखड्गधारिणं वरास्त्रशस्त्रपादपैः | | verse_lines = स चर्मखड्गधारिणं वरास्त्रशस्त्रपादपैः ।¦यदा न योद्धुमाशकद्धरेः सुतं न दृश्यते ॥ १९५॥ | ||
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| verse_text = सहस्रमायमुल्बणं त्वदृश्यमम्बराद् गिरीन् । | | verse_text = सहस्रमायमुल्बणं त्वदृश्यमम्बराद् गिरीन् । | ||
| verse_lines = सहस्रमायमुल्बणं त्वदृश्यमम्बराद् गिरीन् | | verse_lines = सहस्रमायमुल्बणं त्वदृश्यमम्बराद् गिरीन् ।¦सृजन्तमेत्य विद्यया जघान कृष्णनन्दनः ॥ १९६॥ | ||
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| verse_text = स विद्यया विनाशितोरुमाय आशु शम्बरः । | | verse_text = स विद्यया विनाशितोरुमाय आशु शम्बरः । | ||
| verse_lines = स विद्यया विनाशितोरुमाय आशु शम्बरः | | verse_lines = स विद्यया विनाशितोरुमाय आशु शम्बरः ।¦निकृत्तकन्धरोऽपतद् वरासिनाऽमुना क्षणात् ॥ १९७॥ | ||
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| verse_lines = निहत्य तं हरेः सुतस्तयैव विद्ययाऽम्बरम् | | verse_lines = निहत्य तं हरेः सुतस्तयैव विद्ययाऽम्बरम् ।¦समास्थितः स्वभार्यया समं कुशस्थलीं ययौ ॥ १९८॥ | ||
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| verse_lines = समस्तवेदिनोर्मुनिर्नरान् विडम्बमानयोः | | verse_lines = समस्तवेदिनोर्मुनिर्नरान् विडम्बमानयोः ।¦रमारमेशयोः सुतं जगाद तं स्म नारदः ॥ १९९॥ | ||
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| verse_lines = स रुग्मिणीजनार्दनादिभिः सरामयादवैः | | verse_lines = स रुग्मिणीजनार्दनादिभिः सरामयादवैः ।¦पितामहेन चाऽदरात् सुलालितोऽवसत् सुखम् ॥ २००॥ | ||
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| verse_lines = ततः पुरा स्यमन्तकं ह्यवाप सूर्यमण्डले | | verse_lines = ततः पुरा स्यमन्तकं ह्यवाप सूर्यमण्डले ।¦स्थिताद्धरेः स सत्रजित् सदाऽत्र केशवार्चकः ॥ २०१॥ | ||
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| verse_lines = सदाऽस्य विष्णुभाविनोऽप्यतीव लोभमान्तरम् | | verse_lines = सदाऽस्य विष्णुभाविनोऽप्यतीव लोभमान्तरम् ।¦प्रकाशयन् रमापतिर्ययाच ईश्वरो मणिम् ॥ २०२॥ | ||
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| verse_lines = स तं न दत्तवांस्ततोऽनुजो निबद्ध्य तं मणिम् | | verse_lines = स तं न दत्तवांस्ततोऽनुजो निबद्ध्य तं मणिम् ।¦वनं गतः प्रसेनको मृगाधिपेन पातितः ॥ २०३॥ | ||
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| verse_lines = तदा स सत्रजिद्धरिं शशंस सोदरान्तकम् | | verse_lines = तदा स सत्रजिद्धरिं शशंस सोदरान्तकम् ।¦उपांशु वर्त्मना ततो हरिः सयादवो ययौ ॥ २०४॥ | ||
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| verse_lines = वने स सिंहसूदितं पदैः प्रदर्श्य वृष्णिनाम् | | verse_lines = वने स सिंहसूदितं पदैः प्रदर्श्य वृष्णिनाम् ।¦प्रसेनमृक्षपातितं स सिंहमप्यदर्शयत् ॥ २०५॥ | ||
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| verse_lines = ततो निधाय तान् बिलं स जाम्बवत्परिग्रहम् | | verse_lines = ततो निधाय तान् बिलं स जाम्बवत्परिग्रहम् ।¦विवेश तत्र संयुगं बभूव तेन चेशितुः ॥ २०६॥ | ||
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| verse_lines = युयोध मन्दमेव स प्रभुः स्वभक्त इत्यजः | | verse_lines = युयोध मन्दमेव स प्रभुः स्वभक्त इत्यजः ।¦चकार चोग्रमन्ततः प्रकाशयन् स्वमस्य हि ॥ २०७॥ | ||
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| verse_lines = स मुष्टिपिष्टविग्रहो नितान्तमापदं गतः | | verse_lines = स मुष्टिपिष्टविग्रहो नितान्तमापदं गतः ।¦जगाम चेतसाऽरणं रघूत्तमं निजं पतिम् ॥ २०८॥ | ||
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| verse_lines = स्मृतिं गते तु राघवे तदाकृतिं यदूत्तमे | | verse_lines = स्मृतिं गते तु राघवे तदाकृतिं यदूत्तमे ।¦समस्तभेदवर्जितां समीक्ष्य सोऽयमित्यवैत् ॥ २०९॥ | ||
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| verse_lines = ततः क्षमापयन् सुतां प्रदाय रोहिणीं शुभाम् | | verse_lines = ततः क्षमापयन् सुतां प्रदाय रोहिणीं शुभाम् ।¦मणिं च तं नुनाव(ननाम) स प्रपन्न आशु पादयोः ॥ २१०॥ | ||
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| verse_lines = विधाय चक्रदारितं सुजीर्णदेहमस्य सः | | verse_lines = विधाय चक्रदारितं सुजीर्णदेहमस्य सः ।¦युवानमाशु केशवश्चकार वेदनां विना ॥ २११॥ | ||
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| verse_lines = विधाय भक्तवाञ्छितं प्रियासहाय ईश्वरः | | verse_lines = विधाय भक्तवाञ्छितं प्रियासहाय ईश्वरः ।¦प्रगृह्य तं महामणिं विनिर्ययौ गुहामुखात् ॥ २१२॥ | ||
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| verse_lines = गुहाप्रविष्टमीश्वरं बहून्यहान्यनिर्गतम् | | verse_lines = गुहाप्रविष्टमीश्वरं बहून्यहान्यनिर्गतम् ।¦प्रतीक्ष्य यादवास्तु ये गता गृहं तदाऽहृषुः ॥ २१३॥ | ||
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| verse_lines = समस्तवृष्णिसन्निधौ यदूत्तमः स्यमन्तकम् | | verse_lines = समस्तवृष्णिसन्निधौ यदूत्तमः स्यमन्तकम् ।¦ददौ च सत्रजित्करे स विच्छविर्बभूव ह ॥ २१४॥ | ||
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| verse_lines = स दुर्यशो रमापतावनूच्य मिथ्यया तपन् | | verse_lines = स दुर्यशो रमापतावनूच्य मिथ्यया तपन् ।¦स्वपापहान(नि)काङ्क्षया ददौ सुतां जनार्दने ॥ २१५॥ | ||
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| verse_lines = मणिं च तं प्रदाय तं ननाम ह क्षमापयन् | | verse_lines = मणिं च तं प्रदाय तं ननाम ह क्षमापयन् ।¦मणिं पुनर्ददौ हरिर्मुमोद सत्यभामया ॥ २१६॥ | ||
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| verse_lines = ततो हि सा च रुगक्मिणी प्रिये प्रियासु तेऽधिकम् | | verse_lines = ततो हि सा च रुगक्मिणी प्रिये प्रियासु तेऽधिकम् ।¦जनार्दनस्य ते हरेः सदाऽवियोगिनी यतः ॥ २१८॥ | ||
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| verse_lines = जनार्दनः स नामतो रमेशपादसंश्रयः | | verse_lines = जनार्दनः स नामतो रमेशपादसंश्रयः ।¦स मानितश्च विष्णुना प्रणम्य वाक्यमब्रवीत् ॥ २२१॥ | ||
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| verse_lines = अजेयतामवध्यतां (अजेयवध्यतां) च तौ शिवाद् वरं समापतुः | | verse_lines = अजेयतामवध्यतां (अजेयवध्यतां) च तौ शिवाद् वरं समापतुः ।¦जरासुतस्य शिष्यकौ तपोबलेन केवलम् ॥ २२५॥ | ||
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| verse_lines = तयोः सहाय एव तौ वराच्छिवस्य भूतकौ | | verse_lines = तयोः सहाय एव तौ वराच्छिवस्य भूतकौ ।¦अजेयतामवापतुर्न चान्यथाऽमरावपि ॥ २२७॥ | ||
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| verse_text = इमौ पितुर्यशोऽर्थिनौ पराभवाय ते तथा । | | verse_text = इमौ पितुर्यशोऽर्थिनौ पराभवाय ते तथा । | ||
| verse_lines = इमौ पितुर्यशोऽर्थिनौ पराभवाय ते तथा | | verse_lines = इमौ पितुर्यशोऽर्थिनौ पराभवाय ते तथा ।¦समिच्छतोऽद्य(समिच्छतोऽच्युतक्रतुं) तं क्रतुं भवन्तमूचतुश्च तौ ॥ २३१॥ | ||
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| verse_text = समुद्रसंश्रयो भवान् बहून् प्रगृह्य लावणान् । | | verse_text = समुद्रसंश्रयो भवान् बहून् प्रगृह्य लावणान् । | ||
| verse_lines = समुद्रसंश्रयो भवान् बहून् प्रगृह्य लावणान् | | verse_lines = समुद्रसंश्रयो भवान् बहून् प्रगृह्य लावणान् ।¦सुभारकानुपैहि नाविति क्षमस्व मे वचः ॥ २३२॥ | ||
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| verse_text = इतीर्य तं ननाम स प्र चाहसन् स्म यादवाः । | | verse_text = इतीर्य तं ननाम स प्र चाहसन् स्म यादवाः । | ||
| verse_lines = इतीर्य तं ननाम स प्र चाहसन् स्म यादवाः | | verse_lines = इतीर्य तं ननाम स प्र चाहसन् स्म यादवाः ।¦हरिस्तु सात्यकिं वचो जगाद मेघनिस्वनः ॥ २३३॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = प्रयाहि सात्यके वचो ब्रवीहि मे नृपाधमौ । | | verse_text = प्रयाहि सात्यके वचो ब्रवीहि मे नृपाधमौ । | ||
| verse_lines = प्रयाहि सात्यके वचो ब्रवीहि मे नृपाधमौ | | verse_lines = प्रयाहि सात्यके वचो ब्रवीहि मे नृपाधमौ ।¦समेत्य वां वरायुधैः करं ददान्यसंशयम् ॥ २३४॥ | ||
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| verse_text = उपैतमाशु संयुगार्थिनौ च पुष्करं प्रति । | | verse_text = उपैतमाशु संयुगार्थिनौ च पुष्करं प्रति । | ||
| verse_lines = उपैतमाशु संयुगार्थिनौ च पुष्करं प्रति | | verse_lines = उपैतमाशु संयुगार्थिनौ च पुष्करं प्रति ।¦इतीरितः शिनेः सुतो जगाम विप्रसंयुतः ॥ २३५॥ | ||
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| verse_text = उपेत्य तौ हरेर्वचो जगाद सात्यकिर्बली । | | verse_text = उपेत्य तौ हरेर्वचो जगाद सात्यकिर्बली । | ||
| verse_lines = उपेत्य तौ हरेर्वचो जगाद सात्यकिर्बली | | verse_lines = उपेत्य तौ हरेर्वचो जगाद सात्यकिर्बली ।¦विधाय तौ तृणोपमौ गिरा जगाम केशवम् ॥ २३६॥ | ||
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| verse_text = ततः पुरैव तावुभौ द्विजं हरस्वरूपिणम् । | | verse_text = ततः पुरैव तावुभौ द्विजं हरस्वरूपिणम् । | ||
| verse_lines = ततः पुरैव तावुभौ द्विजं हरस्वरूपिणम् | | verse_lines = ततः पुरैव तावुभौ द्विजं हरस्वरूपिणम् ।¦सुदुःखवासनामकं प्रचक्रतुस्तृणोपमम् ॥ २३७॥ | ||
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| verse_text = दशत्रिकैः शतैर्वृतो यतीश्वरैः स सर्ववित् । | | verse_text = दशत्रिकैः शतैर्वृतो यतीश्वरैः स सर्ववित् । | ||
| verse_lines = दशत्रिकैः शतैर्वृतो यतीश्वरैः स सर्ववित् | | verse_lines = दशत्रिकैः शतैर्वृतो यतीश्वरैः स सर्ववित् ।¦विपाटितात्मकौपिनादिसर्वमात्रकोऽभवत् ॥ २३८॥ | ||
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| verse_text = वरात् स्वसम्भवादसौ न शापशक्तिमानभूत् । | | verse_text = वरात् स्वसम्भवादसौ न शापशक्तिमानभूत् । | ||
| verse_lines = वरात् स्वसम्भवादसौ न शापशक्तिमानभूत् | | verse_lines = वरात् स्वसम्भवादसौ न शापशक्तिमानभूत् ।¦ततः समस्तभञ्जनोरुशक्तिमाप केशवम् ॥ २३९॥ | ||
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| verse_text = स तान् समर्च्य माधवः प्रदाय चोरुमात्रकाः । | | verse_text = स तान् समर्च्य माधवः प्रदाय चोरुमात्रकाः । | ||
| verse_lines = स तान् समर्च्य माधवः प्रदाय चोरुमात्रकाः | | verse_lines = स तान् समर्च्य माधवः प्रदाय चोरुमात्रकाः ।¦ययौ च तैः समन्वितो वधाय साल्वपुत्रयोः ॥ २४०॥ | ||
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| verse_lines = तमत्रिजं हरात्मकं यतो हि वेद मागधः | | verse_lines = तमत्रिजं हरात्मकं यतो हि वेद मागधः ।¦ततोऽत्यजत् स्वशिष्यकौ निशम्य तत्प्रतीपकौ ॥ २४१॥ | ||
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| verse_lines = हरौ तु पुष्करं गते मुनीश्वरैः समर्चिते | | verse_lines = हरौ तु पुष्करं गते मुनीश्वरैः समर्चिते ।¦समीयतुश्च तावुभावथात्र हंसडीभकौ ॥ २४२॥ | ||
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| verse_lines = स ब्रह्मदत्तनामकोऽत्र तत्पिताऽप्युपाययौ | | verse_lines = स ब्रह्मदत्तनामकोऽत्र तत्पिताऽप्युपाययौ ।¦समागतौ च भूतकौ शिवस्य यौ पुरस्सरौ ॥ २४३॥ | ||
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| verse_lines = विचक्रनामकोऽसुरः पुरा विरिञ्चतो वरम् | | verse_lines = विचक्रनामकोऽसुरः पुरा विरिञ्चतो वरम् ।¦अवध्यतामजेयतामवाप्य बाधते सुरान् ॥ २४४॥ | ||
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| verse_lines = स चाभवत् तयोः सखा सहायकाम्ययाऽगमत् | | verse_lines = स चाभवत् तयोः सखा सहायकाम्ययाऽगमत् ।¦हिडिम्बराक्षसोऽपि यः पुराऽऽप शङ्कराद् वरम् ॥ २४५॥ | ||
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| verse_text = न जीयसे न वध्यसे कुतश्चनेति तोषितात् (तोषणात्)। | | verse_text = न जीयसे न वध्यसे कुतश्चनेति तोषितात् (तोषणात्)। | ||
| verse_lines = न जीयसे न वध्यसे कुतश्चनेति तोषितात् (तोषणात्) | | verse_lines = न जीयसे न वध्यसे कुतश्चनेति तोषितात् (तोषणात्)।¦स चैतयोः सखाऽभवत् समाजगाम तत्र च ॥ २४६॥ | ||
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| verse_lines = अक्षोहिणीदशात्मकं बलं तयोर्बभूव ह | | verse_lines = अक्षोहिणीदशात्मकं बलं तयोर्बभूव ह ।¦विचक्रगं षडात्मकं तथैकमेव राक्षसम् ॥ २४७॥ | ||
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| verse_lines = द्विरष्टसेनया युतौ सहैकयैव तौ नृपौ | | verse_lines = द्विरष्टसेनया युतौ सहैकयैव तौ नृपौ ।¦समीयतुर्युधे हरिं हरिश्च तौ ससार ह ॥ २४८॥ | ||
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| verse_lines = अथ द्वयोर्द्वयोरभूद् रणो भयानको महान् | | verse_lines = अथ द्वयोर्द्वयोरभूद् रणो भयानको महान् ।¦हरिर्विचक्रमेयिवान् बलश्च हंसमुद्धतम् ॥ २४९॥ | ||
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| verse_lines = तदाऽस्य चानुजं ययौ शिनिप्रवीर आयुधी | | verse_lines = तदाऽस्य चानुजं ययौ शिनिप्रवीर आयुधी ।¦गदश्च नामतोऽनुजो हरेः स रोहिणीसुतः ॥ २५०॥ | ||
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| verse_lines = पुरा स चण्डको गणो हरेर्निवेदिताशनः | | verse_lines = पुरा स चण्डको गणो हरेर्निवेदिताशनः ।¦समाह्वयद् रणाय वै तयोः स तातमेव हि ॥ २५१॥ | ||
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| verse_lines = अक्षोहिणीत्रयान्विताः समस्तयादवास्तदा | | verse_lines = अक्षोहिणीत्रयान्विताः समस्तयादवास्तदा ।¦त्रिलोचनानुगौ च तौ न्यवारयन् सराक्षसौ ॥ २५२॥ | ||
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| verse_lines = हरिर्विचक्रमोजसा महास्त्रशस्त्रवर्षिणम् | | verse_lines = हरिर्विचक्रमोजसा महास्त्रशस्त्रवर्षिणम् ।¦विवाहनं निरायुधं क्षणाच्चकार सायकैः ॥ २५३॥ | ||
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| verse_lines = पुनश्च पादपान् गिरीन् प्रमुञ्चतोऽरिणाऽरिहा | | verse_lines = पुनश्च पादपान् गिरीन् प्रमुञ्चतोऽरिणाऽरिहा ।¦शिरो जहार देवता विनेदुरत्र हर्षिताः ॥ २५४॥ | ||
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| verse_lines = प्रसूनवर्षिभिः स्तुतश्चतुर्मुखादिभिः प्रभुः | | verse_lines = प्रसूनवर्षिभिः स्तुतश्चतुर्मुखादिभिः प्रभुः ।¦ससार तौ हरानुगौ प्रभक्षकौ(प्रभञ्जकौ) स सात्त्वताम् ॥ २५५॥ | ||
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| verse_lines = समस्तयादवान् रणे विधूय तौ जनार्दनम् | | verse_lines = समस्तयादवान् रणे विधूय तौ जनार्दनम् ।¦उपेत्य चांसगौ हरेरदंशतां सुकर्णकौ ॥ २५६॥ | ||
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| verse_lines = स तौ भुजप्रवेगतो विधूय शङ्करालये | | verse_lines = स तौ भुजप्रवेगतो विधूय शङ्करालये ।¦न्यपातयद् बलार्णवोऽमितस्य किं तदुच्यते ॥ २५७॥ | ||
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| verse_lines = प्रभक्षयन्तमोजसा हिडिम्बमुद्धतं बलम् | | verse_lines = प्रभक्षयन्तमोजसा हिडिम्बमुद्धतं बलम् ।¦सहोग्रसेनको ययौ पिता हरेः शरान् क्षिपन् ॥ २५८॥ | ||
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| verse_lines = तयो रथौ सहायुधौ प्रभक्ष्य राक्षसो बली | | verse_lines = तयो रथौ सहायुधौ प्रभक्ष्य राक्षसो बली ।¦प्रगृह्य तावभाषत प्रयातमाशु मे मुखम् ॥ २५९॥ | ||
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| verse_lines = तदा गदावरायुधः सहैव हंसभूभृता | | verse_lines = तदा गदावरायुधः सहैव हंसभूभृता ।¦प्रयुद्ध्यमान आययौ विहाय तं हलायुधः ॥ २६०॥ | ||
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| verse_lines = तमागतं समीक्ष्य तौ विहाय राक्षसाधिपः | | verse_lines = तमागतं समीक्ष्य तौ विहाय राक्षसाधिपः ।¦उपेत्य मुष्टिनाऽहनद् बलं स वक्षसि क्रुधा ॥ २६१॥ | ||
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| verse_lines = अथैनमुद्धृतं बलाद् बलः स दूरमाक्षिपत् | | verse_lines = अथैनमुद्धृतं बलाद् बलः स दूरमाक्षिपत् ।¦पपात पादयोजने स नाऽजगाम तं पुनः ॥ २६३॥ | ||
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| verse_lines = गदस्तु साल्वभूभृता वयोगतेन योधयन् | | verse_lines = गदस्तु साल्वभूभृता वयोगतेन योधयन् ।¦विवाहनं निरायुधं चकार सोऽप्यपाद्रवत् ॥ २६५॥ | ||
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| verse_lines = चिरं प्रयुद्ध्य सात्यकिः स हंसकन्यसा बली | | verse_lines = चिरं प्रयुद्ध्य सात्यकिः स हंसकन्यसा बली ।¦शतं सपञ्चकं रणे चकर्त तस्य धन्विनाम् ॥ २६७॥ | ||
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| verse_lines = स खड्गचर्मभृद् रणेऽभ्ययात् सुतात्मजं शिनेः | | verse_lines = स खड्गचर्मभृद् रणेऽभ्ययात् सुतात्मजं शिनेः ।¦स चैनमभ्ययात् तथा वरासिचर्मभृद् विभीः ॥ २६८॥ | ||
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| verse_lines = द्विषोडशप्रभेदकं वरासियुद्धमश्रमौ | | verse_lines = द्विषोडशप्रभेदकं वरासियुद्धमश्रमौ ।¦प्रदर्श्य निर्विशेषकावुभौ व्यवस्थितौ चिरम् ॥ २६९॥ | ||
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| verse_lines = परस्परान्तरैषिणौ(अन्तरेषिणौ) नचान्तरं व्यपश्यताम् | | verse_lines = परस्परान्तरैषिणौ(अन्तरेषिणौ) नचान्तरं व्यपश्यताम् ।¦ततो विहाय सङ्गरं गतौ निरर्थकं त्विति ॥ २७०॥ | ||
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| verse_text = ततः स हंससंयुतो जगाम योद्धुमच्युतम् । | | verse_text = ततः स हंससंयुतो जगाम योद्धुमच्युतम् । | ||
| verse_lines = ततः स हंससंयुतो जगाम योद्धुमच्युतम् | | verse_lines = ततः स हंससंयुतो जगाम योद्धुमच्युतम् ।¦क्षणेन तौ निरायुधौ चकार केशवः शरैः ॥ २७१॥ | ||
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| verse_text = हतं च सैन्यमेतयोश्चतुर्थभागशेषितम् । | | verse_text = हतं च सैन्यमेतयोश्चतुर्थभागशेषितम् । | ||
| verse_lines = हतं च सैन्यमेतयोश्चतुर्थभागशेषितम् | | verse_lines = हतं च सैन्यमेतयोश्चतुर्थभागशेषितम् ।¦क्षणेन केशवेन तद्भयादपेयतुश्च तौ ॥ २७२॥ | ||
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| verse_text = स पुष्करेक्षणस्तदा सुरैर्नुतोऽथ पुष्करे । | | verse_text = स पुष्करेक्षणस्तदा सुरैर्नुतोऽथ पुष्करे । | ||
| verse_lines = स पुष्करेक्षणस्तदा सुरैर्नुतोऽथ पुष्करे | | verse_lines = स पुष्करेक्षणस्तदा सुरैर्नुतोऽथ पुष्करे ।¦उवास तां निशां प्रभुः सयादवोऽमितप्रभः ॥ २७३॥ | ||
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| verse_text = परे दिने जनार्दनो नृपात्मजौ प्रविद्रुतौ । | | verse_text = परे दिने जनार्दनो नृपात्मजौ प्रविद्रुतौ । | ||
| verse_lines = परे दिने जनार्दनो नृपात्मजौ प्रविद्रुतौ | | verse_lines = परे दिने जनार्दनो नृपात्मजौ प्रविद्रुतौ ।¦यमस्वसुस्तटे प्रभुः समाससाद पृष्ठतः ॥ २७४॥ | ||
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| verse_text = स रौहिणेयसंयुतः समन्वितश्च सेनया । | | verse_text = स रौहिणेयसंयुतः समन्वितश्च सेनया । | ||
| verse_lines = स रौहिणेयसंयुतः समन्वितश्च सेनया | | verse_lines = स रौहिणेयसंयुतः समन्वितश्च सेनया ।¦स्वशिष्टसेनया वृतौ पलायिनाववारयत् ॥ २७५॥ | ||
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| verse_text = निवृत्य तौ स्वसेनया शरोत्तमैर्ववर्षतुः । | | verse_text = निवृत्य तौ स्वसेनया शरोत्तमैर्ववर्षतुः । | ||
| verse_lines = निवृत्य तौ स्वसेनया शरोत्तमैर्ववर्षतुः | | verse_lines = निवृत्य तौ स्वसेनया शरोत्तमैर्ववर्षतुः ।¦सुकोपितौ समस्तशो यदूनवार्यपौरुषौ ॥ २७६॥ | ||
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| verse_text = अथाऽससाद हंसको हलायुधं महाधनुः । | | verse_text = अथाऽससाद हंसको हलायुधं महाधनुः । | ||
| verse_lines = अथाऽससाद हंसको हलायुधं महाधनुः | | verse_lines = अथाऽससाद हंसको हलायुधं महाधनुः ।¦अनन्तरोऽस्य सात्यकिं गदं च सर्वसैनिकान् ॥ २७७॥ | ||
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| verse_lines = स सात्यकिं निरायुधं विवाहनं विवर्मकम् | | verse_lines = स सात्यकिं निरायुधं विवाहनं विवर्मकम् ।¦व्यधाद् गदं च तौ रणं विहाय हापजग्मतुः ॥ २७८॥ | ||
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| verse_text = विधूय सैनिकांश्च स प्रगृह्य चापमाततम् । | | verse_text = विधूय सैनिकांश्च स प्रगृह्य चापमाततम् । | ||
| verse_lines = विधूय सैनिकांश्च स प्रगृह्य चापमाततम् | | verse_lines = विधूय सैनिकांश्च स प्रगृह्य चापमाततम् ।¦हरिं जगाम चोन्नदन् महास्त्रशस्त्रवर्षणः ॥ २७९॥ | ||
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| verse_lines = तमाशु केशवोऽरिहा समस्तसाधनोज्झितम् | | verse_lines = तमाशु केशवोऽरिहा समस्तसाधनोज्झितम् ।¦क्षणाच्चकार सोऽप्यगाद् विसृज्य तं हलायुधम् ॥ २८०॥ | ||
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| verse_lines = हलायुधो निरायुधं विधाय हंसमोजसा | | verse_lines = हलायुधो निरायुधं विधाय हंसमोजसा ।¦विकृष्टचाप आगतं ददर्श तस्य चानुजम् ॥ २८१॥ | ||
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| verse_lines = स हंस आशु कार्मुकं पुनः प्रगृह्य तं बलम् | | verse_lines = स हंस आशु कार्मुकं पुनः प्रगृह्य तं बलम् ।¦यदाऽऽससाद केशवो न्यवारयत् तमोजसा ॥ २८२॥ | ||
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| verse_lines = शिनेः सुतात्मजोऽप्यसौ विहाय हंसकानुजम् | | verse_lines = शिनेः सुतात्मजोऽप्यसौ विहाय हंसकानुजम् ।¦रथान्तरं समास्थितो जगाम तातमस्य च ॥ २८३॥ | ||
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| verse_text = वयोगतः पिता तयोर्युयोध तेन वृष्णिना । | | verse_text = वयोगतः पिता तयोर्युयोध तेन वृष्णिना । | ||
| verse_lines = वयोगतः पिता तयोर्युयोध तेन वृष्णिना | | verse_lines = वयोगतः पिता तयोर्युयोध तेन वृष्णिना ।¦शरं च कण्ठकूबरे व्यसर्जयत् स सात्यकेः ॥ २८४॥ | ||
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| verse_lines = स सात्यकिर्दृढाहतो जगाम मोहमाशु च | | verse_lines = स सात्यकिर्दृढाहतो जगाम मोहमाशु च ।¦सुलब्धसञ्ज्ञ उत्थितः समाददेऽर्द्धचन्द्रकम् ॥ २८५॥ | ||
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| verse_lines = स तेन तच्छिरो बली चकर्त शुक्लमूर्द्धजम् | | verse_lines = स तेन तच्छिरो बली चकर्त शुक्लमूर्द्धजम् ।¦यदम्बयाऽभिकामितं पुरा पपात तत् क्षितौ ॥ २८६॥ | ||
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| verse_lines = नदंश्च सात्यकिर्हरेर्जगाम पार्श्वमुद्धतः | | verse_lines = नदंश्च सात्यकिर्हरेर्जगाम पार्श्वमुद्धतः ।¦बलोऽपि हंसकानुजं युयोध सेनया युतम् ॥ २८७॥ | ||
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| verse_lines = हरिस्तु हंसमुल्बणैः शरैः समर्दयन् बलम् | | verse_lines = हरिस्तु हंसमुल्बणैः शरैः समर्दयन् बलम् ।¦जघान तस्य सर्वशो न कश्चिदत्र शेषितः ॥ २८८॥ | ||
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| verse_text = स एक एव केशवं महास्त्रमुक् ससार ह । | | verse_text = स एक एव केशवं महास्त्रमुक् ससार ह । | ||
| verse_lines = स एक एव केशवं महास्त्रमुक् ससार ह | | verse_lines = स एक एव केशवं महास्त्रमुक् ससार ह ।¦निवार्य तानि सर्वशो हरिर्निजास्त्रमाददे ॥ २८९॥ | ||
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| verse_lines = स वैष्णवास्त्रमुद्यतं निरीक्ष्य यानतो महीम् | | verse_lines = स वैष्णवास्त्रमुद्यतं निरीक्ष्य यानतो महीम् ।¦गतः पराद्रवद् भयात् पपात यामुनोदके ॥ २९०॥ | ||
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| verse_lines = वरास्त्रपाणिरीश्वरः पदाऽहनिच्छरस्यमुम् | | verse_lines = वरास्त्रपाणिरीश्वरः पदाऽहनिच्छरस्यमुम् ।¦स मूर्छितो मुखेऽपतन्महाभुजङ्गमस्य ह ॥ २९१॥ | ||
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| verse_lines = स धार्तराष्ट्रकोदरे यथा तमोऽन्धमेयिवान् | | verse_lines = स धार्तराष्ट्रकोदरे यथा तमोऽन्धमेयिवान् ।¦तथा सुदुःखसंयुतो वसन् मनोः परं म्रियेत् ॥ २९२॥ | ||
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| verse_text = ततोऽन्धमेव तत् तमो हरेर्द्विडेति निश्चयात् । | | verse_text = ततोऽन्धमेव तत् तमो हरेर्द्विडेति निश्चयात् । | ||
| verse_lines = ततोऽन्धमेव तत् तमो हरेर्द्विडेति निश्चयात् | | verse_lines = ततोऽन्धमेव तत् तमो हरेर्द्विडेति निश्चयात् ।¦तदाऽस्य चानुजोऽग्रजं विमार्गयन् जलेऽपतत् ॥ २९३॥ | ||
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| verse_lines = विहाय रोहिणीसुतं जले निमज्ज्य मार्गयन् | | verse_lines = विहाय रोहिणीसुतं जले निमज्ज्य मार्गयन् ।¦अपश्यमान आत्मनो व्यपाटयच्च काकुदम् ॥ २९४॥ | ||
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| verse_lines = विहाय देहमुल्बणं तमोऽवतीर्य चाग्रजम् | | verse_lines = विहाय देहमुल्बणं तमोऽवतीर्य चाग्रजम् ।¦प्रतीक्षमाण उल्बणं समत्ति तत् सुखेतरम् ॥ २९५॥ | ||
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| verse_lines = ततो हरिर्बलैर्युतो बलान्वितो मुनीश्वरैः | | verse_lines = ततो हरिर्बलैर्युतो बलान्वितो मुनीश्वरैः ।¦समं कुशस्थलीं ययौ स्तुतः कशङ्करादिभिः ॥ २९६॥ | ||
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| verse_text = स्वकीयपादपल्लवाश्रयं जनं प्रहर्षयन् । | | verse_text = स्वकीयपादपल्लवाश्रयं जनं प्रहर्षयन् । | ||
| verse_lines = स्वकीयपादपल्लवाश्रयं जनं प्रहर्षयन् | | verse_lines = स्वकीयपादपल्लवाश्रयं जनं प्रहर्षयन् ।¦उवास नित्यसत्सुखार्णवो रमापतिर्गृहे ॥ २९७॥ | ||
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<span id="gr-C18" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टादशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C18" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टादशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ यदा रामादवाप्तानि दिव्यास्त्राणि प्रपेदिरे । | | verse_text = औं ॥ यदा रामादवाप्तानि दिव्यास्त्राणि प्रपेदिरे । | ||
| verse_lines = औं ॥ यदा रामादवाप्तानि दिव्यास्त्राणि प्रपेदिरे | | verse_lines = औं ॥ यदा रामादवाप्तानि दिव्यास्त्राणि प्रपेदिरे ।¦द्रोणात् कुमारास्तेष्वासीत् सर्वेष्वप्यधिकोऽर्जुनः ॥ १॥ | ||
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| verse_text = निजप्रतिभया जानन् सर्वास्त्राणि ततोऽधिकम् । | | verse_text = निजप्रतिभया जानन् सर्वास्त्राणि ततोऽधिकम् । | ||
| verse_lines = निजप्रतिभया जानन् सर्वास्त्राणि ततोऽधिकम् | | verse_lines = निजप्रतिभया जानन् सर्वास्त्राणि ततोऽधिकम् ।¦नास्त्रयुद्धं क्वचिद् भीमो मन्यते धर्ममञ्जसा ॥ २॥ | ||
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| verse_text = न हि भागवतो धर्मो देवताभ्युपयाचनम् । | | verse_text = न हि भागवतो धर्मो देवताभ्युपयाचनम् । | ||
| verse_lines = न हि भागवतो धर्मो देवताभ्युपयाचनम् | | verse_lines = न हि भागवतो धर्मो देवताभ्युपयाचनम् ।¦ज्ञानभक्ती हरेस्तृप्तिं विना विष्णोरपि क्वचित् ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = नाऽकाङ्क्ष्यं किमुतान्येभ्यो ह्यस्त्रं काम्यफलप्रदम् । | | verse_text = नाऽकाङ्क्ष्यं किमुतान्येभ्यो ह्यस्त्रं काम्यफलप्रदम् । | ||
| verse_lines = नाऽकाङ्क्ष्यं किमुतान्येभ्यो ह्यस्त्रं काम्यफलप्रदम् | | verse_lines = नाऽकाङ्क्ष्यं किमुतान्येभ्यो ह्यस्त्रं काम्यफलप्रदम् ।¦शुद्धे भागवते धर्मे निरतो यद् वृकोदरः ॥ ४॥ | ||
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| verse_lines = न काम्यकर्मकृत् तस्मान्नायाचद् देवमानुषान्(दैवमानुषान्) | | verse_lines = न काम्यकर्मकृत् तस्मान्नायाचद् देवमानुषान्(दैवमानुषान्) ।¦न हरिश्चार्थितस्तेन कदाचित् कामलिप्सया(काम्यलिप्सया) ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = भिक्षामटंश्च हुङ्कारात् करवद् वैश्यतोऽग्रहीत् । | | verse_text = भिक्षामटंश्च हुङ्कारात् करवद् वैश्यतोऽग्रहीत् । | ||
| verse_lines = भिक्षामटंश्च हुङ्कारात् करवद् वैश्यतोऽग्रहीत् | | verse_lines = भिक्षामटंश्च हुङ्कारात् करवद् वैश्यतोऽग्रहीत् ।¦नान्यदेवा नतास्तेन वासुदेवान्न पूजिताः ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = न प्रतीपं हरेः क्वापि स करोति कथञ्चन । | | verse_text = न प्रतीपं हरेः क्वापि स करोति कथञ्चन । | ||
| verse_lines = न प्रतीपं हरेः क्वापि स करोति कथञ्चन | | verse_lines = न प्रतीपं हरेः क्वापि स करोति कथञ्चन ।¦अनुपस्करिणो युद्धे नाभियाति ह्युपस्करी ।¦नापयाति युधः क्वापि न क्वचिच्छद्म चाऽचरेत् ॥ ७॥ | ||
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| verse_lines = (न चौर्ध्वदैहिकानुज्ञां) नैवोर्ध्वदैहिकानुज्ञामवैष्णवकृतेऽकरोत् | | verse_lines = (न चौर्ध्वदैहिकानुज्ञां) नैवोर्ध्वदैहिकानुज्ञामवैष्णवकृतेऽकरोत् ।¦न करोति स्वयं नैषां प्रियमप्याचरेत् क्वचित् ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = सख्यं नावैष्णवैश्चक्रे प्रतीपं वैष्णवेन च(तु) । | | verse_text = सख्यं नावैष्णवैश्चक्रे प्रतीपं वैष्णवेन च(तु) । | ||
| verse_lines = सख्यं नावैष्णवैश्चक्रे प्रतीपं वैष्णवेन च(तु) | | verse_lines = सख्यं नावैष्णवैश्चक्रे प्रतीपं वैष्णवेन च(तु) ।¦परोक्षेऽपि हरेर्निन्दाकृतो जिह्वां छिनत्ति च ॥ ९॥ | ||
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| verse_lines = प्रतीपकारिणो हन्ति विष्णोर्वैतानजीघनत्(विष्णोर्वै तान्) | | verse_lines = प्रतीपकारिणो हन्ति विष्णोर्वैतानजीघनत्(विष्णोर्वै तान्) ।¦न संशयं कदाऽप्येष धर्मे ज्ञानेऽपि वाऽकरोत् ॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = आज्ञयैव हरेर्द्रौणेरस्त्राण्यस्त्रैरशामयत् | | verse_lines = आज्ञयैव हरेर्द्रौणेरस्त्राण्यस्त्रैरशामयत् ।¦अदृश्योऽलम्बुसो भग्नो नान्यत्र तु कथञ्चन ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = नह्यस्त्रयुद्धे सदृशो द्रौणेरस्त्यर्जुनादृते । | | verse_text = नह्यस्त्रयुद्धे सदृशो द्रौणेरस्त्यर्जुनादृते । | ||
| verse_lines = नह्यस्त्रयुद्धे सदृशो द्रौणेरस्त्यर्जुनादृते | | verse_lines = नह्यस्त्रयुद्धे सदृशो द्रौणेरस्त्यर्जुनादृते ।¦सर्ववित्त्वं ततो भीमे प्रदर्शयितुमीश्वरः ।¦अदादाज्ञामस्त्रयुद्धे तथैवालम्बुसं प्रति ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = प्रत्यक्षीभूतदेवेषु बन्धुज्येष्ठेषु वा नतिम् । | | verse_text = प्रत्यक्षीभूतदेवेषु बन्धुज्येष्ठेषु वा नतिम् । | ||
| verse_lines = प्रत्यक्षीभूतदेवेषु बन्धुज्येष्ठेषु वा नतिम् | | verse_lines = प्रत्यक्षीभूतदेवेषु बन्धुज्येष्ठेषु वा नतिम् ।¦मर्यादास्थितयेऽशासद् भगवान् पुरुषोत्तमः ॥ १४॥ | ||
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| verse_text = तत्रापि विष्णुमेवासौ नमेन्नान्यं कथञ्चन । | | verse_text = तत्रापि विष्णुमेवासौ नमेन्नान्यं कथञ्चन । | ||
| verse_lines = तत्रापि विष्णुमेवासौ नमेन्नान्यं कथञ्चन | | verse_lines = तत्रापि विष्णुमेवासौ नमेन्नान्यं कथञ्चन ।¦आज्ञयैवास्त्रदेवांश्च प्रेरयामास(प्रेषयामास) नार्थनात् ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = अन्वेनमेव तद्धर्मे कृष्णैका संस्थिता सदा । | | verse_text = अन्वेनमेव तद्धर्मे कृष्णैका संस्थिता सदा । | ||
| verse_lines = अन्वेनमेव तद्धर्मे कृष्णैका संस्थिता सदा | | verse_lines = अन्वेनमेव तद्धर्मे कृष्णैका संस्थिता सदा ।¦धृतराष्ट्रादपि वरं ततो नाऽत्मार्थमग्रहीत् ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = नाशपद् धार्तराष्ट्रांश्च महापद्यपि सा ततः । | | verse_text = नाशपद् धार्तराष्ट्रांश्च महापद्यपि सा ततः । | ||
| verse_lines = नाशपद् धार्तराष्ट्रांश्च महापद्यपि सा ततः | | verse_lines = नाशपद् धार्तराष्ट्रांश्च महापद्यपि सा ततः ।¦न वाचा मनसा वाऽपि प्रतीपं केशवेऽचरत् ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = अन्ये भागवतत्वेऽपि छिन्नधर्माः क्वचित्क्वचित् । | | verse_text = अन्ये भागवतत्वेऽपि छिन्नधर्माः क्वचित्क्वचित् । | ||
| verse_lines = अन्ये भागवतत्वेऽपि छिन्नधर्माः क्वचित्क्वचित् | | verse_lines = अन्ये भागवतत्वेऽपि छिन्नधर्माः क्वचित्क्वचित् ।¦स्यमन्तकार्थे रामोऽपि कृष्णस्य विमनाऽभवत् ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = अवमेनेऽर्जुनः कृष्णं विप्रस्य शिशुरक्षणे । | | verse_text = अवमेनेऽर्जुनः कृष्णं विप्रस्य शिशुरक्षणे । | ||
| verse_lines = अवमेनेऽर्जुनः कृष्णं विप्रस्य शिशुरक्षणे | | verse_lines = अवमेनेऽर्जुनः कृष्णं विप्रस्य शिशुरक्षणे ।¦प्रद्युम्न उद्धवः साम्बोऽनिरुद्धाद्याश्च सर्वशः ॥ १९॥ | ||
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| verse_text = हरेरिष्टं सुभद्रायाः फल्गुने दानमञ्जसा । | | verse_text = हरेरिष्टं सुभद्रायाः फल्गुने दानमञ्जसा । | ||
| verse_lines = हरेरिष्टं सुभद्रायाः फल्गुने दानमञ्जसा | | verse_lines = हरेरिष्टं सुभद्रायाः फल्गुने दानमञ्जसा ।¦ज्ञात्वाऽपि रुरुधुः सम्यक् सात्यकिः कृष्णसम्मितम् ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = कदाचिन्मन्यते पार्थं धर्मजोऽपि नरं हरिम् । | | verse_text = कदाचिन्मन्यते पार्थं धर्मजोऽपि नरं हरिम् । | ||
| verse_lines = कदाचिन्मन्यते पार्थं धर्मजोऽपि नरं हरिम् | | verse_lines = कदाचिन्मन्यते पार्थं धर्मजोऽपि नरं हरिम् ।¦मत्वाऽबिभेज्जरासन्धवधे कृष्णमुदीरितुम् ॥ २१॥ | ||
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| verse_lines = बन्धनं शङ्कमानो हि कृष्णस्य विदुरोऽपितु | | verse_lines = बन्धनं शङ्कमानो हि कृष्णस्य विदुरोऽपितु ।¦कौरवेयसभामध्ये नावतारमरोचयत् ॥ २२॥ | ||
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| verse_lines = नकुलः करदानाय प्रेषयामास केशवे | | verse_lines = नकुलः करदानाय प्रेषयामास केशवे ।¦अवमेने हरेर्बुद्धिं सहदेवः कुलक्षयात् ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = देवकीवसुदेवाद्या मेनिरे मानुषं हरिम् | | verse_lines = देवकीवसुदेवाद्या मेनिरे मानुषं हरिम् ।¦भीष्मस्तु भार्गवं राममवमेने युयोध च ॥ २४॥ | ||
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| verse_lines = द्रोणकर्णद्रौणिकृपाः कृष्णाभावे मनो दधुः | | verse_lines = द्रोणकर्णद्रौणिकृपाः कृष्णाभावे मनो दधुः ।¦देवाः शिवाद्या अपितु विरोधं चक्रिरे क्वचित् ॥ २५॥ | ||
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| verse_lines = ऋषिमानुषगन्धर्वा वक्तव्याः किमतः परम् (परे) | | verse_lines = ऋषिमानुषगन्धर्वा वक्तव्याः किमतः परम् (परे)।¦जन्मजन्मान्तरेऽज्ञानादवजानन्ति यत् सदा ॥ २६॥ | ||
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| verse_text = तस्मादेको वायुरेव धर्मे भागवते स्थिरः । | | verse_text = तस्मादेको वायुरेव धर्मे भागवते स्थिरः । | ||
| verse_lines = तस्मादेको वायुरेव धर्मे भागवते स्थिरः | | verse_lines = तस्मादेको वायुरेव धर्मे भागवते स्थिरः ।¦लक्ष्मीः सरस्वती चेति परशुक्लत्रयं श्रुतम् (स्मृतम्) ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = सर्वमेतच्च कथितं तत्रतत्रामितात्मना | | verse_lines = सर्वमेतच्च कथितं तत्रतत्रामितात्मना ।¦व्यासेनैव पुराणेषु भारते च स्वसंविदा ॥ २८॥ | ||
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| verse_text = यदा ते सर्वशस्त्रास्त्रवेदिनो राजपुत्रकाः । | | verse_text = यदा ते सर्वशस्त्रास्त्रवेदिनो राजपुत्रकाः । | ||
| verse_lines = यदा ते सर्वशस्त्रास्त्रवेदिनो राजपुत्रकाः | | verse_lines = यदा ते सर्वशस्त्रास्त्रवेदिनो राजपुत्रकाः ।¦बभूवू रङ्गमध्ये तान् भारद्वाजोऽप्यदर्शयत् (व्यदर्शयत्)॥ २९॥ | ||
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| verse_lines = रक्तचन्दनसत्पुष्पवस्त्रशस्त्रगुडोदनैः | | verse_lines = रक्तचन्दनसत्पुष्पवस्त्रशस्त्रगुडोदनैः ।¦सम्पूज्य भार्गवं राममनुजज्ञे कुमारकान् ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = ते भीष्मद्रोणविदुरगान्धारीधृतराष्ट्रकान् | | verse_lines = ते भीष्मद्रोणविदुरगान्धारीधृतराष्ट्रकान् ।¦सराजमण्डलान् नत्वा कुन्तीं चादर्शयञ्छ्रमम् ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = सर्वैः प्रदर्शितेऽस्त्रे तु द्रोणादात्तमहास्त्रवित् | | verse_lines = सर्वैः प्रदर्शितेऽस्त्रे तु द्रोणादात्तमहास्त्रवित् ।¦द्रौणिरस्त्राण्यमेयानि दर्शयामास चाधिकम् ॥ ३२॥ | ||
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| verse_text = ततोऽप्यतितरां पार्थो दिव्यास्त्राणि व्यदर्शयत् (दिव्यास्त्राण्यप्यदर्शयत्)। | | verse_text = ततोऽप्यतितरां पार्थो दिव्यास्त्राणि व्यदर्शयत् (दिव्यास्त्राण्यप्यदर्शयत्)। | ||
| verse_lines = ततोऽप्यतितरां पार्थो दिव्यास्त्राणि व्यदर्शयत् (दिव्यास्त्राण्यप्यदर्शयत्) | | verse_lines = ततोऽप्यतितरां पार्थो दिव्यास्त्राणि व्यदर्शयत् (दिव्यास्त्राण्यप्यदर्शयत्)।¦अविध्यन्माशके पादे पक्षिणः पक्ष्म एव च(पक्ष्ममेव च) ।¦एवमादीनि चित्राणि बहून्येष व्यदर्शयत् ॥ ३३॥ | ||
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| verse_lines = तदैव कर्ण आगत्य रामोपात्तास्त्रसम्पदम् | | verse_lines = तदैव कर्ण आगत्य रामोपात्तास्त्रसम्पदम् ।¦दर्शयन्नधिकः पार्थादभूद् राजन्यसंसदि ॥ ३४॥ | ||
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| verse_lines = कुन्ती निजं सुतं(निजसुतं) ज्ञात्वा लज्जया नावदच्च तम् | | verse_lines = कुन्ती निजं सुतं(निजसुतं) ज्ञात्वा लज्जया नावदच्च तम् ।¦पार्थोऽसहंस्तं युद्धायैवाऽह्वयामास संसदि ॥ ३५॥ | ||
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| verse_lines = रणायाक्षत्रियाह्वानं जानन् धर्मप्रतीपकम् | | verse_lines = रणायाक्षत्रियाह्वानं जानन् धर्मप्रतीपकम् ।¦भीमो निवार्य बीभत्सुं कर्णायादात् प्रतोदकम् ॥ ३६॥ | ||
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| verse_lines = अक्षत्रसंस्कारयुतो जातोऽपि क्षत्रिये कुले | | verse_lines = अक्षत्रसंस्कारयुतो जातोऽपि क्षत्रिये कुले ।¦न क्षत्रियो हि भवति यथा व्रात्यो द्विजोत्तमः ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = निरुत्तरे कृते कर्णे भीमेनैव सुयोधनः | | verse_lines = निरुत्तरे कृते कर्णे भीमेनैव सुयोधनः ।¦अभ्यषेचयदङ्गेषु राजानं पित्रनुज्ञया ।¦धृतराष्ट्रः पक्षपातात् पुत्रस्यानुवशोऽभवत् ॥ ३८॥ | ||
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| verse_lines = अभिषिक्ते तदा कर्णे प्रायादधिरथः पिता | | verse_lines = अभिषिक्ते तदा कर्णे प्रायादधिरथः पिता ।¦सर्वराजसदोमध्ये(सभामध्ये) ववन्दे तं वृषा तदा ।¦तुतुषुः कर्मणा तस्य सन्तः सर्वे समागताः ॥ ३९॥ | ||
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| verse_lines = भीमदुर्योधनौ तत्र शिक्षासन्दर्शनच्छलात् | | verse_lines = भीमदुर्योधनौ तत्र शिक्षासन्दर्शनच्छलात् ।¦समादाय गदे गुर्वी संरम्भादभ्युदीयतुः ॥ ४०॥ | ||
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| verse_lines = देवासुरमनुष्यादि जगदेतच्चराचरम् | | verse_lines = देवासुरमनुष्यादि जगदेतच्चराचरम् ।¦सर्वं तदा द्विधा भूतं भीमदुर्योधनाश्रयात् ॥ ४१॥ | ||
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| verse_lines = देवा देवानुकूलाश्च भीममेव समाश्रिताः | | verse_lines = देवा देवानुकूलाश्च भीममेव समाश्रिताः ।¦असुरा आसुराश्चैव दुर्योधनसमाश्रयाः ।¦द्विधाभूता मानुषाश्च(मनुष्याश्च) देवासुरविभेदतः ॥ ४२॥ | ||
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| verse_lines = जय भीम महाबाहो जय दुर्योधनेति च | | verse_lines = जय भीम महाबाहो जय दुर्योधनेति च ।¦हुङ्कारांश्चैव फट्कारांश्चक्रुर्देवासुरा अपि ॥ ४३॥ | ||
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| verse_lines = दृष्ट्वा जगत् सुसंरब्धं द्रोणोऽथ द्विजसत्तमः | | verse_lines = दृष्ट्वा जगत् सुसंरब्धं द्रोणोऽथ द्विजसत्तमः ।¦नेदं जगद् विनश्येत भीमदुर्योधनाश्रयात् ।¦इति पुत्रेण तौ वीरौ न्यवारयदरिन्दमौ ॥ ४४॥ | ||
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| verse_lines = स्वकीयायां स्वकीयायां योग्यतायां नतु क्वचित् | | verse_lines = स्वकीयायां स्वकीयायां योग्यतायां नतु क्वचित् ।¦युवयोः सम इत्युक्त्वा द्रौणिरेतौ न्यवारयत् ।¦द्रोणाज्ञया वारितौ तौ ययतुः स्वं स्वमालयम् ॥ ४५॥ | ||
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| verse_lines = तथोत्कर्षे फल्गुनस्य यशसो निजयस्य च | | verse_lines = तथोत्कर्षे फल्गुनस्य यशसो निजयस्य च ।¦उद्योग आसीद् भीमस्य धार्तराष्ट्रस्य चान्यथा ॥ ४९॥ | ||
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| verse_lines = भीमार्थं केशवोऽन्ये च देवाः फल्गुनपक्षिणः | | verse_lines = भीमार्थं केशवोऽन्ये च देवाः फल्गुनपक्षिणः ।¦आसन् यथैव रामाद्याः सङ्ग्रहेण हनूमतः ।¦सुराः सुग्रीवपक्षस्थाः पूर्वमासंस्तथैव हि ॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = तदर्थमेव भीमस्य ह्यनुजत्वं सुरेश्वरः | | verse_lines = तदर्थमेव भीमस्य ह्यनुजत्वं सुरेश्वरः ।¦आप पूर्वानुतापेन तेन भीमस्तथाऽकरोत् ॥ ५१॥ | ||
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| verse_text = दुर्योधनार्थं कर्णस्य पक्षिणो दैत्यदानवाः । | | verse_text = दुर्योधनार्थं कर्णस्य पक्षिणो दैत्यदानवाः । | ||
| verse_lines = दुर्योधनार्थं कर्णस्य पक्षिणो दैत्यदानवाः | | verse_lines = दुर्योधनार्थं कर्णस्य पक्षिणो दैत्यदानवाः ।¦आसुः सर्वे ग्लहावेतावासतुः कर्णफल्गुनौ ॥ ५२॥ | ||
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| verse_text = अथ पृष्टो दक्षिणार्थं(दक्षिणायां) द्रोण आह कुमारकान् । | | verse_text = अथ पृष्टो दक्षिणार्थं(दक्षिणायां) द्रोण आह कुमारकान् । | ||
| verse_lines = अथ पृष्टो दक्षिणार्थं(दक्षिणायां) द्रोण आह कुमारकान् | | verse_lines = अथ पृष्टो दक्षिणार्थं(दक्षिणायां) द्रोण आह कुमारकान् ।¦बद्ध्वा पाञ्चालराजानं दत्तेत्यूचुस्तथेति ते ॥ ५३॥ | ||
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| verse_text = ते धार्तराष्ट्राः कर्णेन सहिताः पाण्डवा अपि । | | verse_text = ते धार्तराष्ट्राः कर्णेन सहिताः पाण्डवा अपि । | ||
| verse_lines = ते धार्तराष्ट्राः कर्णेन सहिताः पाण्डवा अपि | | verse_lines = ते धार्तराष्ट्राः कर्णेन सहिताः पाण्डवा अपि ।¦ययुर्द्रोणेन सहिताः पाञ्चालनगरं प्रति ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = अथाऽह भीमः सामर्थ्यविवेकाभीप्सया गुरुम् । | | verse_text = अथाऽह भीमः सामर्थ्यविवेकाभीप्सया गुरुम् । | ||
| verse_lines = अथाऽह भीमः सामर्थ्यविवेकाभीप्सया गुरुम् | | verse_lines = अथाऽह भीमः सामर्थ्यविवेकाभीप्सया गुरुम् ।¦गर्व एष कुमाराणामनिवार्यो द्विजोत्तम ।¦गच्छन्त्वेतेऽग्रतो नैषां वशगो द्रुपदो भवेत् ॥ ५५॥ | ||
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| verse_text = निवृत्तेष्वकृतार्थेषु वयं बद्ध्वा रिपुं तव । | | verse_text = निवृत्तेष्वकृतार्थेषु वयं बद्ध्वा रिपुं तव । | ||
| verse_lines = निवृत्तेष्वकृतार्थेषु वयं बद्ध्वा रिपुं तव | | verse_lines = निवृत्तेष्वकृतार्थेषु वयं बद्ध्वा रिपुं तव ।¦आनयाम न सन्देह इति तस्थौ ससोदरः ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = सद्रोणकेषु पार्थेषु स्थितेष्वन्ये ससूतजाः । | | verse_text = सद्रोणकेषु पार्थेषु स्थितेष्वन्ये ससूतजाः । | ||
| verse_lines = सद्रोणकेषु पार्थेषु स्थितेष्वन्ये ससूतजाः | | verse_lines = सद्रोणकेषु पार्थेषु स्थितेष्वन्ये ससूतजाः ।¦ययुरात्तप्रहरणाः पाञ्चालान्तःपुरं द्रुतम् ॥ ५७॥ | ||
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| verse_text = कुमारान् ग्रहणेप्सूंस्तानुपयातानुदीक्ष्य सः । | | verse_text = कुमारान् ग्रहणेप्सूंस्तानुपयातानुदीक्ष्य सः । | ||
| verse_lines = कुमारान् ग्रहणेप्सूंस्तानुपयातानुदीक्ष्य सः | | verse_lines = कुमारान् ग्रहणेप्सूंस्तानुपयातानुदीक्ष्य सः ।¦अक्षोहिणीत्रितययुङ् निस्सृतो द्रुपदो गृहात् ॥ ५८॥ | ||
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| verse_text = ते शरैरभिवर्षन्तः परिवार्य कुमारकान् । | | verse_text = ते शरैरभिवर्षन्तः परिवार्य कुमारकान् । | ||
| verse_lines = ते शरैरभिवर्षन्तः परिवार्य कुमारकान् | | verse_lines = ते शरैरभिवर्षन्तः परिवार्य कुमारकान् ।¦अर्दयामासुरुद्द्वृत्तान् स्त्रियो बालाश्च सर्वशः ॥ ५९॥ | ||
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| verse_lines = हर्म्यसंस्थाः स्त्रियो बाला ग्रावभिर्मुसलैरपि | | verse_lines = हर्म्यसंस्थाः स्त्रियो बाला ग्रावभिर्मुसलैरपि ।¦अत्यर्थमर्दयामासुः कुमारान् सुसुखेधितान् ॥ ६०॥ | ||
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| verse_lines = द्रुपदस्य वरो ह्यस्ति सूर्यदत्तस्तपोबलात् | | verse_lines = द्रुपदस्य वरो ह्यस्ति सूर्यदत्तस्तपोबलात् ।¦आ योजनात् पुरमुप न त्वा जेष्यति कश्चन ॥ ६१॥ | ||
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| verse_lines = इति तेन वरेणैव सुखसंवर्द्धिताश्च ते | | verse_lines = इति तेन वरेणैव सुखसंवर्द्धिताश्च ते ।¦भग्नाः कुमारा आवृत्य दुद्रुवुर्यत्र पाण्डवाः ॥ ६२॥ | ||
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| verse_lines = स्त्रीबालवृद्धसहितैः पाञ्चालैरप्यनुद्रुताः | | verse_lines = स्त्रीबालवृद्धसहितैः पाञ्चालैरप्यनुद्रुताः ।¦भीमार्जुनेति वाशन्तो ययुर्यत्र स्म पाण्डवाः ॥ ६३॥ | ||
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| verse_lines = तान् प्रभग्नान् समालोक्य भीमः प्रहरतां वरः | | verse_lines = तान् प्रभग्नान् समालोक्य भीमः प्रहरतां वरः ।¦आरुरोह रथं वीरः पुर आत्तशरासनः ॥ ६४॥ | ||
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| verse_lines = तमन्वयादिन्द्रसूनुः यमौ तस्यैव चक्रयोः | | verse_lines = तमन्वयादिन्द्रसूनुः यमौ तस्यैव चक्रयोः ।¦युधिष्ठिरस्तु द्रोणेन सह तस्थौ निरीक्षकः ॥ ६५॥ | ||
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| verse_lines = आयान्तमग्रतो दृष्ट्वा भीममात्तशरासनम् | | verse_lines = आयान्तमग्रतो दृष्ट्वा भीममात्तशरासनम् ।¦दुद्रुवुः सर्वपाञ्चालाः विविशुः पुरमेव च ॥ ६६॥ | ||
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| verse_lines = द्रुपदस्त्वभ्ययाद् भीमं सपुत्रः सारसेनया | | verse_lines = द्रुपदस्त्वभ्ययाद् भीमं सपुत्रः सारसेनया ।¦चक्ररक्षौ तु तस्याऽस्तां युधामन्यूत्तमौजसौ ॥ ६७॥ | ||
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| verse_lines = धात्रर्यमावेशयुतौ विश्वावसुपरावसू | | verse_lines = धात्रर्यमावेशयुतौ विश्वावसुपरावसू ।¦सुतौ तस्य महावीर्यौ सत्यजित् पृष्ठतोऽभवत् ।¦स मित्रांशयुतो वीरश्चित्रसेनो महारथः ॥ ६८॥ | ||
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| verse_lines = अग्रतस्तु शिखण्ड्यागाद् रथोदारः शरान् क्षिपन् | | verse_lines = अग्रतस्तु शिखण्ड्यागाद् रथोदारः शरान् क्षिपन् ।¦जनमेजयस्तमन्वेव पूर्वं चित्ररथो हि यः ।¦त्वष्टुरावेशसंयुक्तः स शरानभ्यवर्षत ॥ ६९॥ | ||
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| verse_lines = तावुभौ विरथौ कृत्वा विचापौ च विवर्मकौ | | verse_lines = तावुभौ विरथौ कृत्वा विचापौ च विवर्मकौ ।¦भीमो जघान तां सेनां सवाजिरथकुञ्जराम् ॥ ७०॥ | ||
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| verse_lines = अथैनं शरवर्षेण युधामन्यूत्तमौजसौ | | verse_lines = अथैनं शरवर्षेण युधामन्यूत्तमौजसौ ।¦अभीयतुस्तौ विरथौ चक्रे भीमो निरायुधौ ॥ ७१॥ | ||
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| verse_lines = हस्तप्राप्तं च पाञ्चालं नाग्रहीत् स वृकोदरः | | verse_lines = हस्तप्राप्तं च पाञ्चालं नाग्रहीत् स वृकोदरः ।¦गुर्वर्थामर्जुनस्योर्वीं प्रतिज्ञां कर्तुमप्यृताम् ।¦मानभङ्गाय कर्णस्य पार्थमेव न्ययोजयत् ॥ ७२॥ | ||
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| verse_lines = स शरान् क्षिपतस्तस्य पाञ्चालस्यार्जुनो द्रुतम् | | verse_lines = स शरान् क्षिपतस्तस्य पाञ्चालस्यार्जुनो द्रुतम् ।¦पुप्लुवे स्यन्दने चापं छित्वा तं चाग्रहीत् क्षणात् ।¦सिंहो मृगमिवाऽदाय स्वरथं नाभिपेदिवान् (स्वरथे चाभिपेतिवान्) ॥ ७३॥ | ||
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| verse_lines = अथ प्रकुपितं सैन्यं फल्गुनं पर्यवारयत् | | verse_lines = अथ प्रकुपितं सैन्यं फल्गुनं पर्यवारयत् ।¦जघान भीमस्तरसा तत् सैन्यं शरवृष्टिभिः ॥ ७४॥ | ||
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| verse_lines = अथ सत्यजिदभ्यागात् पार्थं मुञ्चञ्छरान् बहून् | | verse_lines = अथ सत्यजिदभ्यागात् पार्थं मुञ्चञ्छरान् बहून् ।¦तमर्जुनः क्षणेनैव चक्रे विरथकार्मुकम् ॥ ७५॥ | ||
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| verse_lines = घ्नन्तं भीमं पुनः सैन्यमर्जुनः प्राह मा भवान् | | verse_lines = घ्नन्तं भीमं पुनः सैन्यमर्जुनः प्राह मा भवान् ।¦सेनामर्हति राज्ञोऽस्य वीर हन्तुमशेषतः ॥ ७६॥ | ||
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| verse_lines = सम्बन्धयोग्यस्तातस्य सखाऽयं न सुधार्मिकः | | verse_lines = सम्बन्धयोग्यस्तातस्य सखाऽयं न सुधार्मिकः ।¦नेष्याम एनमेवातो गुरोर्वचनगौरवात् ॥ ७७॥ | ||
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| verse_lines = स्नेहपाशं ततश्चक्रे बीभत्सौ द्रुपदोऽधिकम् | | verse_lines = स्नेहपाशं ततश्चक्रे बीभत्सौ द्रुपदोऽधिकम् ।¦ततः सेनां विहायैव भीमो बीभत्सुमन्वयात् ॥ ७८॥ | ||
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| verse_lines = मुक्ता कथञ्चिद् भीमास्यात् सा सेना दुद्रुवे भयात् | | verse_lines = मुक्ता कथञ्चिद् भीमास्यात् सा सेना दुद्रुवे भयात् ।¦द्रुपदं स्थापयामासाथार्जुनो द्रोणसन्निधौ ॥ ७९॥ | ||
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| verse_lines = पप्रच्छैनं तदा द्रोणसख्यमस्त्युत नेति वा | | verse_lines = पप्रच्छैनं तदा द्रोणसख्यमस्त्युत नेति वा ।¦अस्तीदानीमिति प्राह द्रुपदोऽङ्गिरसां वरम् ॥ ८०॥ | ||
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| verse_lines = न विप्रधर्मो यद् युद्धमतस्त्वं न मया धृतः | | verse_lines = न विप्रधर्मो यद् युद्धमतस्त्वं न मया धृतः ।¦शिष्यैरेतत् कारितं मे तव सख्यमभीप्सता ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = अतः सख्यार्थमेवाद्य त्वद्राज्यार्धो हृतो मया | | verse_lines = अतः सख्यार्थमेवाद्य त्वद्राज्यार्धो हृतो मया ।¦गङ्गाया दक्षिणे कूले त्वं राजैवोत्तरे त्वहम् ।¦न ह्यराजत्व एकस्य सख्यं स्यादावयोः सखे ॥ ८३॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्त्वोन्मुच्य तं द्रोणो राज्यार्धं गृह्य चामुतः | | verse_lines = इत्युक्त्वोन्मुच्य तं द्रोणो राज्यार्धं गृह्य चामुतः ।¦ययौ शिष्यैर्नागपुरं न्यवसत् सुखमत्र च ।¦ब्राह्मण्यत्यागभीरुः स नागृह्णन् धनुरप्यसौ ॥ ८४॥ | ||
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| verse_lines = धार्तराष्ट्रैस्तु भीमस्य भयात् पादौ प्रणम्य च | | verse_lines = धार्तराष्ट्रैस्तु भीमस्य भयात् पादौ प्रणम्य च ।¦शरणार्थं याचितत्वात् सपुत्रो युयुधे परैः ।¦एवं हरीच्छयैवासौ क्षात्रं(क्षत्रधर्मम्) धर्ममुपेयिवान् ॥ ८५॥ | ||
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| verse_lines = सम्बन्धीत्यर्जुनवचश्चिकीर्षुः सत्यमेव च | | verse_lines = सम्बन्धीत्यर्जुनवचश्चिकीर्षुः सत्यमेव च ।¦मार्दवं चार्जुने दृष्ट्वा सुतामैच्छत् तदर्थतः ।¦पुत्रं च द्रोणहन्तारमिच्छन् विप्रवरौ ययौ ॥ ८७॥ | ||
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| verse_lines = याजोपयाजावानीयाथार्बुदेन गवां नृपः | | verse_lines = याजोपयाजावानीयाथार्बुदेन गवां नृपः ।¦चकारेष्टिं तु तद्भार्या द्विजाभ्यामत्र चाऽहुता ।¦द्रुपदात् सुतलब्ध्यर्थं साऽहङ्काराद्(सालङ्कारात्) व्यलम्बयत् ॥ ८८॥ | ||
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| verse_text = किमेतयेत्यवज्ञाय तावुभौ विप्रसत्तमौ । | | verse_text = किमेतयेत्यवज्ञाय तावुभौ विप्रसत्तमौ । | ||
| verse_lines = किमेतयेत्यवज्ञाय तावुभौ विप्रसत्तमौ | | verse_lines = किमेतयेत्यवज्ञाय तावुभौ विप्रसत्तमौ ।¦अजुह्वतां तत् पुत्रार्थं पत्न्या प्राश्यं हविस्तदा ॥ ८९॥ | ||
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| verse_text = हुते हविषि मन्त्राभ्यां वैष्णवाभ्यां तदैव हि । | | verse_text = हुते हविषि मन्त्राभ्यां वैष्णवाभ्यां तदैव हि । | ||
| verse_lines = हुते हविषि मन्त्राभ्यां वैष्णवाभ्यां तदैव हि | | verse_lines = हुते हविषि मन्त्राभ्यां वैष्णवाभ्यां तदैव हि ।¦दीप्ताङ्गारनिभो वह्निः कुण्डमद्ध्यात् समुत्थितः ॥ ९०॥ | ||
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| verse_text = किरीटी कुण्डली दीप्तौ हेममाली वरासिमान् । | | verse_text = किरीटी कुण्डली दीप्तौ हेममाली वरासिमान् । | ||
| verse_lines = किरीटी कुण्डली दीप्तौ हेममाली वरासिमान् | | verse_lines = किरीटी कुण्डली दीप्तौ हेममाली वरासिमान् ।¦रथेनाऽदित्यवर्णेन नदन् द्रुपदमभ्ययात्(द्रुपदमाद्रवत्) ॥ ९१॥ | ||
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| verse_text = धृष्टत्वाद् द्योतनत्वाच्च धृष्टद्युम्न इतीरितः । | | verse_text = धृष्टत्वाद् द्योतनत्वाच्च धृष्टद्युम्न इतीरितः । | ||
| verse_lines = धृष्टत्वाद् द्योतनत्वाच्च धृष्टद्युम्न इतीरितः | | verse_lines = धृष्टत्वाद् द्योतनत्वाच्च धृष्टद्युम्न इतीरितः ।¦मुनिभिर्द्रुपदेनापि सर्ववेदार्थतत्त्ववित् ॥ ९२॥ | ||
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| verse_text = अन्वेनं भारती साक्षाद् वेदिमद्ध्यात् समुत्थिता । | | verse_text = अन्वेनं भारती साक्षाद् वेदिमद्ध्यात् समुत्थिता । | ||
| verse_lines = अन्वेनं भारती साक्षाद् वेदिमद्ध्यात् समुत्थिता | | verse_lines = अन्वेनं भारती साक्षाद् वेदिमद्ध्यात् समुत्थिता ।¦प्राणो हि भरतो नाम सर्वस्य भरणाच्छ्रुतः ॥ ९३॥ | ||
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| verse_text = तद्भार्या भारती नाम वेदरूपा सरस्वती । | | verse_text = तद्भार्या भारती नाम वेदरूपा सरस्वती । | ||
| verse_lines = तद्भार्या भारती नाम वेदरूपा सरस्वती | | verse_lines = तद्भार्या भारती नाम वेदरूपा सरस्वती ।¦शंरूपमाश्रिता वायुं श्रीरित्येव च कीर्तिता ॥ ९४॥ | ||
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| verse_text = आवेशयुक्ता शच्याश्च श्यामलायास्तथोषसः । | | verse_text = आवेशयुक्ता शच्याश्च श्यामलायास्तथोषसः । | ||
| verse_lines = आवेशयुक्ता शच्याश्च श्यामलायास्तथोषसः | | verse_lines = आवेशयुक्ता शच्याश्च श्यामलायास्तथोषसः ।¦ताश्चेन्द्रधर्मनासत्यसंश्रयाच्छ्रिय ईरिताः ॥ ९५॥ | ||
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| verse_text = सा कृष्णा नामतश्चाऽसीदुत्कृष्टत्वाद्धि योषिताम् । | | verse_text = सा कृष्णा नामतश्चाऽसीदुत्कृष्टत्वाद्धि योषिताम् । | ||
| verse_lines = सा कृष्णा नामतश्चाऽसीदुत्कृष्टत्वाद्धि योषिताम् | | verse_lines = सा कृष्णा नामतश्चाऽसीदुत्कृष्टत्वाद्धि योषिताम् ।¦कृष्णा सा वर्णतश्चाऽसीदुत्कृष्टानन्दिनी च सा ॥ ९६॥ | ||
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| verse_text = उत्पत्तितश्च सर्वज्ञा सर्वाभरणभूषिता । | | verse_text = उत्पत्तितश्च सर्वज्ञा सर्वाभरणभूषिता । | ||
| verse_lines = उत्पत्तितश्च सर्वज्ञा सर्वाभरणभूषिता | | verse_lines = उत्पत्तितश्च सर्वज्ञा सर्वाभरणभूषिता ।¦सम्प्राप्तयौवनैवाऽसीदजरा लोकसुन्दरी ।¦उमांशयुक्ताऽतितरां सर्वलक्षणसंयुता ॥ ९७॥ | ||
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| verse_text = पूर्वं ह्युमा च देव्यस्ताः कदाचिद् भर्तृभिर्युताः । | | verse_text = पूर्वं ह्युमा च देव्यस्ताः कदाचिद् भर्तृभिर्युताः । | ||
| verse_lines = पूर्वं ह्युमा च देव्यस्ताः कदाचिद् भर्तृभिर्युताः | | verse_lines = पूर्वं ह्युमा च देव्यस्ताः कदाचिद् भर्तृभिर्युताः ।¦विलासं दर्शयामासुर्ब्रह्मणः पश्यतोऽधिकम् ॥ ९८॥ | ||
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| verse_text = शशाप तास्तदा ब्रह्मा मानुषीं योनिमाप्स्यथ । | | verse_text = शशाप तास्तदा ब्रह्मा मानुषीं योनिमाप्स्यथ । | ||
| verse_lines = शशाप तास्तदा ब्रह्मा मानुषीं योनिमाप्स्यथ | | verse_lines = शशाप तास्तदा ब्रह्मा मानुषीं योनिमाप्स्यथ ।¦तत्रान्यगाश्च भवतेत्येवं शप्ताः सुराङ्गनाः ॥ ९९॥ | ||
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| verse_lines = विचार्य भारतीमेत्य सर्वमस्यै निवेद्य च | | verse_lines = विचार्य भारतीमेत्य सर्वमस्यै निवेद्य च ।¦सहस्रवत्सरं चैनां शुश्रूषित्वा बभाषिरे ॥ १००॥ | ||
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| verse_lines = देवि नो मानुषं प्राप्यमन्यगात्वं च सर्वथा | | verse_lines = देवि नो मानुषं प्राप्यमन्यगात्वं च सर्वथा ।¦तथाऽपि(तत्रापि) मारुतादन्यं न स्पृशेम कथञ्चन ॥ १०१॥ | ||
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| verse_lines = ब्रह्मणैव च(हि) शप्ताः स्म पूर्वं चान्यत्र लीलया | | verse_lines = ब्रह्मणैव च(हि) शप्ताः स्म पूर्वं चान्यत्र लीलया ।¦एकदेहत्वमाप्यैनं यदा वञ्चयितुं गताः ॥ १०२॥ | ||
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| verse_lines = एकदेहा मानुषत्वमाप्स्यथ त्रिश उद्धताः | | verse_lines = एकदेहा मानुषत्वमाप्स्यथ त्रिश उद्धताः ।¦त्रिशो मद्वञ्चनायेता इति तेनोदिता वयम् ॥ १०३॥ | ||
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| verse_lines = अतस्त्वयैकदेहत्वमिच्छामो देवि जन्मसु | | verse_lines = अतस्त्वयैकदेहत्वमिच्छामो देवि जन्मसु ।¦चतुर्ष्वपि यतोऽस्माकं शापद्वयनिमित्ततः ।¦॥ १०४॥ | ||
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| verse_lines = चतुर्जन्म भवेद् भूमौ त्वां नान्यो मारुताद् व्रजेत् | | verse_lines = चतुर्जन्म भवेद् भूमौ त्वां नान्यो मारुताद् व्रजेत् ।¦नियमोऽयं हरेर्यस्मादनादिर्नित्य एव च ।¦अतस्त्वयैकदेहान्नो नान्य आप्नोति मारुतात् ॥ १०५॥ | ||
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| verse_lines = इतीरिते तथेत्युक्त्वा पार्वत्यादियुतैव सा | | verse_lines = इतीरिते तथेत्युक्त्वा पार्वत्यादियुतैव सा ।¦विप्रकन्याऽभवत् तत्र चतस्रः पार्वतीयुताः ।¦एकदेहस्थिताश्चक्रुर्गिरीशाय तपो महत् ॥ १०६॥ | ||
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| verse_lines = तद्देहस्था भारती तु रुद्रदेहस्थितं हरिम् | | verse_lines = तद्देहस्था भारती तु रुद्रदेहस्थितं हरिम् ।¦तोषयामास तपसा कर्मैक्यार्थं धृतव्रता ॥ १०७॥ | ||
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| verse_lines = तस्यै स रुद्रदेहस्थो हरिः प्रादाद् वरं प्रभुः | | verse_lines = तस्यै स रुद्रदेहस्थो हरिः प्रादाद् वरं प्रभुः ।¦अनन्ततोषणं विष्णोः स्वभर्त्रा सह जन्मसु ॥ १०८॥ | ||
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| verse_lines = सर्वेष्वपीति चान्यासां ददौ शङ्कर एव च | | verse_lines = सर्वेष्वपीति चान्यासां ददौ शङ्कर एव च ।¦वरं स्वभर्तृसंयोगं मानुषेष्वपि जन्मसु ॥ १०९॥ | ||
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| verse_lines = ततस्तदैव देहं ता विसृज्य नलनन्दिनी | | verse_lines = ततस्तदैव देहं ता विसृज्य नलनन्दिनी ।¦बभूवुरिन्द्रसेनेति देहैक्येन सुसङ्गताः ॥ ११०॥ | ||
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| verse_lines = तदाऽऽसीन्मुद्गलो नाम मुनिस्तपसि संस्थितः | | verse_lines = तदाऽऽसीन्मुद्गलो नाम मुनिस्तपसि संस्थितः ।¦चकमे पुत्रिकां ब्रह्मेत्यशृणोत् स कथान्तरे ॥ १११॥ | ||
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| verse_lines = अपाहसत् सोऽब्जयोनिं शशापैनं चतुर्मुखः | | verse_lines = अपाहसत् सोऽब्जयोनिं शशापैनं चतुर्मुखः ।¦भारत्याद्याः पञ्च देवीर्गच्छ मानिन्नभूतये(मानिन् न भूतये) ॥ ११२॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितस्तं तपसा तोषयामास मुद्गलः | | verse_lines = इतीरितस्तं तपसा तोषयामास मुद्गलः ।¦शापानुग्रहमस्याथ चक्रे कञ्जसमुद्भवः ॥ ११३॥ | ||
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| verse_lines = न त्वं यास्यसि ता देवी मारुतस्त्वच्छरीरगः | | verse_lines = न त्वं यास्यसि ता देवी मारुतस्त्वच्छरीरगः ।¦यास्यति त्वं सदा मूर्छां गतो नैव विबुद्ध्यसे ॥ ११४॥ | ||
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| verse_lines = नच पापं ततस्ते स्यादित्युक्ते चैनमाविशत् | | verse_lines = नच पापं ततस्ते स्यादित्युक्ते चैनमाविशत् ।¦मारुतोऽथेन्द्रसेनां च गृहीत्वाऽथाभवद् गृही ॥ ११५॥ | ||
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| verse_lines = रेमे च स तया सार्द्धं दीर्घकालं जगत्प्रभुः | | verse_lines = रेमे च स तया सार्द्धं दीर्घकालं जगत्प्रभुः ।¦ततो मुद्गलमुद्बोध्य ययौ च स्वं निकेतनम् ॥ ११६॥ | ||
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| verse_lines = तद्देहगा भारती तु केशवं शङ्करे स्थितम् | | verse_lines = तद्देहगा भारती तु केशवं शङ्करे स्थितम् ।¦तोषयामास तपसा कर्मैक्यार्थं हि पूर्ववत् ।¦उमाद्या रौद्रमेवात्र तपश्चक्रुर्यथा पुरा ॥ ११८॥ | ||
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| verse_lines = प्रत्यक्षे च शिवे जाते तद्देहस्थे च केशवे | | verse_lines = प्रत्यक्षे च शिवे जाते तद्देहस्थे च केशवे ।¦पृथक्पृथक् स्वभर्त्राप्त्यै ताः पञ्चाप्येकदेहगाः ।¦प्रार्थयामासुरभवत् पञ्चकृत्वो वचो हि तत् ॥ ११९॥ | ||
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| verse_lines = शिवदेहस्थितो विष्णुर्भारत्यै तु ददौ पतिम् | | verse_lines = शिवदेहस्थितो विष्णुर्भारत्यै तु ददौ पतिम् ।¦अन्यासां शिव एवाथ प्रददौ चतुरः पतीन् ॥ १२०॥ | ||
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| verse_lines = देव्यश्चतस्रस्तु तदा दत्तमात्रे वरेऽमुना | | verse_lines = देव्यश्चतस्रस्तु तदा दत्तमात्रे वरेऽमुना ।¦देवानामवतारार्थं पञ्च देव्यः स्म इत्यथ ।¦नाजानन्नेकदेहत्वाच्चिद्योगात् क्षीरनीरवत् ॥ १२१॥ | ||
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| verse_lines = ताः श्रुत्वा स्वपतिं देवि नचिरात् प्राप्स्यसीति च | | verse_lines = ताः श्रुत्वा स्वपतिं देवि नचिरात् प्राप्स्यसीति च ।¦विष्णूक्तं शङ्करोक्तं च चत्वारः पतयः पृथक् ॥ १२२॥ | ||
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| verse_lines = अथाभ्यागान्महेन्द्रोऽत्र सोऽब्रवीत् तां वरस्त्रियम् | | verse_lines = अथाभ्यागान्महेन्द्रोऽत्र सोऽब्रवीत् तां वरस्त्रियम् ।¦किमर्थं रोदिषीत्येव साऽब्रवीद् वटुरूपिणम् ॥ १२४॥ | ||
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| verse_text = पश्यात्र मदवज्ञानात् पतितांस्त्वादृशान् सुरान् । | | verse_text = पश्यात्र मदवज्ञानात् पतितांस्त्वादृशान् सुरान् । | ||
| verse_lines = पश्यात्र मदवज्ञानात् पतितांस्त्वादृशान् सुरान् | | verse_lines = पश्यात्र मदवज्ञानात् पतितांस्त्वादृशान् सुरान् ।¦गिरेरधस्तादस्यैवेत्युक्तोऽसौ पाकशासनः ॥ १२८॥ | ||
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| verse_text = उद्बबर्ह गिरिं तं तु ददर्शात्र च तान् सुरान् । | | verse_text = उद्बबर्ह गिरिं तं तु ददर्शात्र च तान् सुरान् । | ||
| verse_lines = उद्बबर्ह गिरिं तं तु ददर्शात्र च तान् सुरान् | | verse_lines = उद्बबर्ह गिरिं तं तु ददर्शात्र च तान् सुरान् ।¦पूर्वेन्द्रान् मारुतवृषनासत्यांश्चतुरः स्थितान् ।¦मानुषेष्ववताराय मन्त्रं रहसि कुर्वतः ॥ १२९॥ | ||
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| verse_text = ततो वरेण्यं वरदं विष्णुं प्राप्य स वासवः । | | verse_text = ततो वरेण्यं वरदं विष्णुं प्राप्य स वासवः । | ||
| verse_lines = ततो वरेण्यं वरदं विष्णुं प्राप्य स वासवः | | verse_lines = ततो वरेण्यं वरदं विष्णुं प्राप्य स वासवः ।¦तत्प्रसादान्नरांशेन युक्तो भूमावजायत ॥ १३०॥ | ||
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| verse_text = मदवज्ञानिमित्तेन पतिता इति तान् सुरान् । | | verse_text = मदवज्ञानिमित्तेन पतिता इति तान् सुरान् । | ||
| verse_lines = मदवज्ञानिमित्तेन पतिता इति तान् सुरान् | | verse_lines = मदवज्ञानिमित्तेन पतिता इति तान् सुरान् ।¦मारुतादीन् मृषाऽवादीरिति ब्रह्मा शिवं तदा ॥ १३१॥ | ||
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| verse_text = शशाप मानुषेषु त्वं क्षिप्रं जातः पराभवम् । | | verse_text = शशाप मानुषेषु त्वं क्षिप्रं जातः पराभवम् । | ||
| verse_lines = शशाप मानुषेषु त्वं क्षिप्रं जातः पराभवम् | | verse_lines = शशाप मानुषेषु त्वं क्षिप्रं जातः पराभवम् ।¦शक्रान्नरतनोर्यासि यस्मै त्वं तु मृषाऽवदः ॥ १३२॥ | ||
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| verse_text = मच्छप्तानां च देवीनामविचार्य मया यतः । | | verse_text = मच्छप्तानां च देवीनामविचार्य मया यतः । | ||
| verse_lines = मच्छप्तानां च देवीनामविचार्य मया यतः | | verse_lines = मच्छप्तानां च देवीनामविचार्य मया यतः ।¦पतियोगवरं प्रादा नावाप्स्यसि ततः प्रियाम् ॥ १३३॥ | ||
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| verse_text = मानुषेषु ततः पश्चाद् भारतीदेहनिर्गताम् । | | verse_text = मानुषेषु ततः पश्चाद् भारतीदेहनिर्गताम् । | ||
| verse_lines = मानुषेषु ततः पश्चाद् भारतीदेहनिर्गताम् | | verse_lines = मानुषेषु ततः पश्चाद् भारतीदेहनिर्गताम् ।¦स्वलोके प्राप्स्यसि स्वार्थे वरोऽयं ते मृषा भवेत् ॥ १३४॥ | ||
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| verse_text = एषा सा द्रौपदी नाम पञ्चदेवीतनुर्भवेत् । | | verse_text = एषा सा द्रौपदी नाम पञ्चदेवीतनुर्भवेत् । | ||
| verse_lines = एषा सा द्रौपदी नाम पञ्चदेवीतनुर्भवेत् | | verse_lines = एषा सा द्रौपदी नाम पञ्चदेवीतनुर्भवेत् ।¦मृषा वाग् येषु ते प्रोक्ता मारुताद्यास्तु तेऽखिलाः ॥ १३५॥ | ||
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| verse_text = तासां पतित्वमाप्स्यन्ति भारत्यैव तु पार्वती । | | verse_text = तासां पतित्वमाप्स्यन्ति भारत्यैव तु पार्वती । | ||
| verse_lines = तासां पतित्वमाप्स्यन्ति भारत्यैव तु पार्वती | | verse_lines = तासां पतित्वमाप्स्यन्ति भारत्यैव तु पार्वती ।¦संयुक्ता व्यवहारेषु प्रवर्तेत नचान्यथा ॥ १३६॥ | ||
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| verse_text = एते हि मारुताद्यास्ते देवकार्यार्थगौरवात् । | | verse_text = एते हि मारुताद्यास्ते देवकार्यार्थगौरवात् । | ||
| verse_lines = एते हि मारुताद्यास्ते देवकार्यार्थगौरवात् | | verse_lines = एते हि मारुताद्यास्ते देवकार्यार्थगौरवात् ।¦जाता इति श्रुतिस्तत्र नावज्ञा तेऽत्र कारणम् ।¦दीर्घकालं मनुष्येषु ततस्त्वं स्थितिमाप्स्यसि ॥ १३७॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्त्वा प्रययौ ब्रह्मा सोऽश्वत्थामा शिवोऽभवत् | | verse_lines = इत्युक्त्वा प्रययौ ब्रह्मा सोऽश्वत्थामा शिवोऽभवत् ।¦पञ्चदेवीतनुस्त्वेषा द्रौपदी नाम चाभवत् ॥ १३८॥ | ||
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| verse_lines = वेदेषु सपुराणेषु भारते चावगम्यते | | verse_lines = वेदेषु सपुराणेषु भारते चावगम्यते ।¦उक्तोऽर्थः सर्व एवायं तथा पूर्वोदिताश्च ये ॥ १३९॥ | ||
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| verse_lines = मुमुदुः सर्वपाञ्चाला जातयोः सुतयोस्तयोः | | verse_lines = मुमुदुः सर्वपाञ्चाला जातयोः सुतयोस्तयोः ।¦मानुषान्नोपभोगेन संसर्गान्मानुषेषु च ॥ १४०॥ | ||
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| verse_lines = मनुष्यपुत्रतायाश्च भावो मानुष एतयोः | | verse_lines = मनुष्यपुत्रतायाश्च भावो मानुष एतयोः ।¦अभून्नातितरामासीत् तदयोनित्वहेतुतः ॥ १४१॥ | ||
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| verse_lines = याजोपयाजौ तावेव दयिता द्रुपदस्य सा | | verse_lines = याजोपयाजौ तावेव दयिता द्रुपदस्य सा ।¦मातृस्नेहार्थमनयोर्ययाचे ददतुश्च तौ ॥ १४२॥ | ||
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| verse_lines = जातमात्मनिहन्तारं भारद्वाजो निशम्य तम् | | verse_lines = जातमात्मनिहन्तारं भारद्वाजो निशम्य तम् ।¦यशोर्थमस्त्राणि ददावग्रहीत् सोऽपि लोभतः ।¦रामास्त्राणां दुर्लभत्वात् त्रिदशेष्वपि वीर्यवान् ॥ १४३॥ | ||
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| verse_text = भीमार्जुनाभ्यां बद्धं तं श्रुत्वा पाञ्चालभूपतिम् । | | verse_text = भीमार्जुनाभ्यां बद्धं तं श्रुत्वा पाञ्चालभूपतिम् । | ||
| verse_lines = भीमार्जुनाभ्यां बद्धं तं श्रुत्वा पाञ्चालभूपतिम् | | verse_lines = भीमार्जुनाभ्यां बद्धं तं श्रुत्वा पाञ्चालभूपतिम् ।¦प्राहिणोत् कृतवर्माणं पाण्डवानां जनार्दनः ।¦पाण्डवेष्वतुलां प्रीतिं लोके ख्यापयितुं प्रभुः ॥ १४४॥ | ||
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| verse_lines = सन्मान्य(सम्मान्य) पाण्डवान् सोऽपि शूरानुजसुतासुतः | | verse_lines = सन्मान्य(सम्मान्य) पाण्डवान् सोऽपि शूरानुजसुतासुतः ।¦तैर्मानितः कृष्णभक्त्या भ्रातृत्वाच्च हरिं ययौ ॥ १४५॥ | ||
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| verse_lines = ततः प्रभृति सन्त्यज्य देवपक्षा जरासुतम् | | verse_lines = ततः प्रभृति सन्त्यज्य देवपक्षा जरासुतम् ।¦पाण्डवानाश्रिता भूपा ज्ञात्वा भैमार्जुनं बलम् ॥ १४६॥ | ||
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| verse_lines = विशेषतश्च कृष्णस्य विज्ञाय स्नेहमेषु हि | | verse_lines = विशेषतश्च कृष्णस्य विज्ञाय स्नेहमेषु हि ।¦पराजिताश्च बहुशः कृष्णेनाचिन्त्यकर्मणा ॥ १४७॥ | ||
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| verse_lines = प्रतापाद्ध्येव ते पूर्वं जरासन्धवशं गताः | | verse_lines = प्रतापाद्ध्येव ते पूर्वं जरासन्धवशं गताः ।¦न स्नेहात् तद् बलं ज्ञात्वा पार्थानां केशवस्य च ॥ १४८॥ | ||
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| verse_lines = जन्मान्तराभ्यासवशात् स्निग्धाः कृष्णे च पाण्डुषु | | verse_lines = जन्मान्तराभ्यासवशात् स्निग्धाः कृष्णे च पाण्डुषु ।¦जरासन्धभयं त्यक्त्वा तानेव च समाश्रिताः ॥ १४९॥ | ||
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| verse_lines = अपि तं बहुशः कृष्णविजितं नैव तत्यजुः | | verse_lines = अपि तं बहुशः कृष्णविजितं नैव तत्यजुः ।¦आसुराः पूर्वसंस्कारात् संस्कारो बलवान् यतः ॥ १५०॥ | ||
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| verse_lines = देवा हि कारणादन्यानाश्रयन्तोऽपि नाऽन्तरम् | | verse_lines = देवा हि कारणादन्यानाश्रयन्तोऽपि नाऽन्तरम् ।¦स्नेहं त्यजन्ति दैवेषु तथाऽन्येऽन्येष्वपि स्फुटम् ॥ १५१॥ | ||
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| verse_lines = धृतराष्ट्रो बलं दृष्ट्वा (ज्ञात्वा) बहुशो भीमपार्थयोः | | verse_lines = धृतराष्ट्रो बलं दृष्ट्वा (ज्ञात्वा) बहुशो भीमपार्थयोः ।¦दैवत्वाच्च स्वभावेन ज्येष्ठत्वाद् धर्मजस्य च ।¦सुप्रीत एव तं चक्रे यौवराज्याभिषेकिणम्(यौवराज्येऽभिषेकिणम्) ॥ १५२॥ | ||
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| verse_lines = भीमार्जुनावथो जित्वा सर्वदिक्षु च भूपतीन् | | verse_lines = भीमार्जुनावथो जित्वा सर्वदिक्षु च भूपतीन् ।¦चक्रतुः करदान् सर्वान् धृतराष्ट्रस्य दुर्जयौ ॥ १५३॥ | ||
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<span id="gr-C19" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकोनविंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C19" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकोनविंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_lines = औं ॥ एवं शुभोच्चगुणवत्सु | | verse_lines = औं ॥ एवं शुभोच्चगुणवत्सु जनार्दनेन¦युक्तेषु पाण्डुषु चरत्स्वधिकं शुभानि ।¦नास्तिक्यनीतिमखिलां(नास्तिक्यनीतिमतुलां) गुरुदेवतादि¦सत्स्वञ्जसैव जगृहुर्धृतराष्ट्रपुत्राः ॥ १॥ | ||
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| verse_lines = नाम्ना कणिङ्क इति चासुरको | | verse_lines = नाम्ना कणिङ्क इति चासुरको द्विजोऽभूत्¦शिष्यः सुरेतरगुरोः शकुनेर्गुरुः सः ।¦नीतिं स कुत्सिततमां(सुकुत्सिततमाम्) धृतराष्ट्रपुत्रेषु¦अधाद् रहो वचनतः शकुनेः समस्ताम् ॥ २॥ | ||
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| verse_lines = छद्मैव यत्र परमं न सुराश्च | | verse_lines = छद्मैव यत्र परमं न सुराश्च पूज्याः¦स्वार्थेन वञ्चनकृते जगतोऽखिलं च ।¦धर्मादिकार्यमपि यस्य महोपाधिः स्याचत्¦श्रेष्ठः स एव निखिलासुरदैत्यसङ्घात्(निखिलात् सुरदैत्यसङ्घात्) ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = इत्यादि कुत्सिततमां(कल्पिततमाम्) जगृहुः स्म विद्याम् | | verse_text = इत्यादि कुत्सिततमां(कल्पिततमाम्) जगृहुः स्म विद्याम् | ||
| verse_lines = इत्यादि कुत्सिततमां(कल्पिततमाम्) जगृहुः स्म | | verse_lines = इत्यादि कुत्सिततमां(कल्पिततमाम्) जगृहुः स्म विद्याम्¦अज्ञात एव धृतराष्ट्रमुखैः समस्तैः ।¦तेषां स्वभावबलतो रुचिता च सैव¦विस्तारिता च निजबुद्धिबलादतोऽपि ॥ ४॥ | ||
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| verse_lines = सम्पूर्णदुर्मतिरथो | | verse_lines = सम्पूर्णदुर्मतिरथो धृतराष्ट्रसूनुः¦तातप्यमानहृदयो निखिलान्यहानि ।¦दृष्ट्वा श्रियं परमिकां विजयं च पार्थेषु¦आहेदमेत्य पितरं सह सौबलेन ॥ ५॥ | ||
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| verse_lines = ज्येष्ठस्य तेऽपि हि वयं | | verse_lines = ज्येष्ठस्य तेऽपि हि वयं हृदयप्रजाता¦नार्हत्वमेव गमिता भवतैव राज्ये ।¦भ्रातुः कनीयस उतापि हि दारजाता¦अन्यैश्च राज्यपदवीं भवतैव नीताः ॥ ६॥ | ||
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| verse_lines = राज्यं महच्च समवाप्स्यति | | verse_lines = राज्यं महच्च समवाप्स्यति धर्मसूनुः¦त्वत्तोऽथवाऽनुजबलात्(अथ चानुजबलात्) प्रसभं वयं तु ।¦दासा भवेम निजतन्तुभिरेव साकं¦कुन्तीसुतस्य परतोऽपि तदन्वयस्य ॥ ७॥ | ||
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| verse_lines = नाऽत्मार्थमस्ति मम | | verse_lines = नाऽत्मार्थमस्ति मम दुःखमथातिशुद्ध¦लोकप्रसिद्धयशसस्तव कीर्तिनाशः ।¦अस्मन्निमित्त इति दुःखमतो हि सर्वेऽपि¦इच्छाम मर्तुमथ नः कुरु चाप्यनुज्ञाम् ॥ ८॥ | ||
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| verse_lines = एवं स्वपुत्रवचनं स निशम्य | | verse_lines = एवं स्वपुत्रवचनं स निशम्य राजा¦प्रोवाच नानुगुणमेतदहो मनस्ते ।¦को नाम पाण्डुतनयेषु गुणोत्तमेषु¦प्रीतिं न याति निजवीर्यभवोच्चयेषु(निजवीर्यभवोच्छ्रयेषु) ॥ ९॥ | ||
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| verse_lines = ते हि | | verse_lines = ते हि स्वबाहुबलतोऽखिलभूपभूतिं¦मय्याकृषन्ति नच वः प्रतिषेधकास्ते ।¦तस्माच्छमं व्रज शुभाय कुलस्य तात¦क्षेमाय नो भवति वो बलवद्विरोधः ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = एवं ब्रुवत्यपि नृपे पुनराह पाप | | verse_text = एवं ब्रुवत्यपि नृपे पुनराह पाप | ||
| verse_lines = एवं ब्रुवत्यपि नृपे पुनराह | | verse_lines = एवं ब्रुवत्यपि नृपे पुनराह पाप¦आश्रित्य सौबलमतं यदि नैव पार्थान् ।¦अन्यत्र यापयसि(प्रापयसि) नागपुरात् परेतान्¦दृष्ट्वाऽखिलानपि हि नो मुदमेहि पार्थैः ॥ ११॥ | ||
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| verse_text = एवं निशम्य गदितं सुतहार्दपाशैः आकृष्यताऽशु स नृपोऽरिधरेच्छयैव । | | verse_text = एवं निशम्य गदितं सुतहार्दपाशैः आकृष्यताऽशु स नृपोऽरिधरेच्छयैव । | ||
| verse_lines = एवं निशम्य गदितं सुतहार्दपाशैः आकृष्यताऽशु स नृपोऽरिधरेच्छयैव | | verse_lines = एवं निशम्य गदितं सुतहार्दपाशैः आकृष्यताऽशु स नृपोऽरिधरेच्छयैव ।¦प्रोवाच पुत्रमपि ते बलिनो न पार्थाः¦शक्याः पुरात् तनय यापयितुं कथञ्चित् ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्त आह पितरं(नृपतिम्) शकुनिं निरीक्ष्य | | verse_text = इत्युक्त आह पितरं(नृपतिम्) शकुनिं निरीक्ष्य | ||
| verse_lines = इत्युक्त आह पितरं(नृपतिम्) शकुनिं | | verse_lines = इत्युक्त आह पितरं(नृपतिम्) शकुनिं निरीक्ष्य¦सृष्टो मया विधिरिहाद्य शृणुष्व तं च ।¦आसंस्त्रयोदश समा नगरं प्रविष्टे-¦ष्वेतेषु तावदयमेव विधिर्मयेष्टः ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = द्रौणेर्हि नास्ति सदृशो बलवान् प्रतापी | | verse_text = द्रौणेर्हि नास्ति सदृशो बलवान् प्रतापी | ||
| verse_lines = द्रौणेर्हि नास्ति सदृशो बलवान् | | verse_lines = द्रौणेर्हि नास्ति सदृशो बलवान् प्रतापी¦सोऽयं मया बहुविधैः परमैरुपायैः ।¦नीतो वशं वशगतोऽस्य च मातुलेन¦साकं पिता तमनु चैष नदीप्रसूतः ॥ १४॥ | ||
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| verse_text = एवं हि सैनिकगणा अपि दानमानैः | | verse_text = एवं हि सैनिकगणा अपि दानमानैः | ||
| verse_lines = एवं हि सैनिकगणा अपि | | verse_lines = एवं हि सैनिकगणा अपि दानमानैः¦प्रायो वशं मम गता अपि चैष कर्णः ।¦अस्त्रे बलेऽप्यधिक एव सुरेन्द्रसूनोः¦जेष्ये च मन्त्रबलतस्त्वहमेव भीमम् ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = त्रिंशच्छतं परमकाः सुरदुर्लभाश्च | | verse_text = त्रिंशच्छतं परमकाः सुरदुर्लभाश्च | ||
| verse_lines = त्रिंशच्छतं परमकाः | | verse_lines = त्रिंशच्छतं परमकाः सुरदुर्लभाश्च¦दुर्वाससो हि मनवोऽद्य मया गृहीताः ।¦अन्यत्र ते प्रविहिता नहि वीर्यवन्तः¦स्युर्भीम इत्यहममून् न नियोजयामि ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = ते वीर्यदा विजयदा अपि वारिवह्नि | | verse_text = ते वीर्यदा विजयदा अपि वारिवह्नि | ||
| verse_lines = ते वीर्यदा विजयदा अपि | | verse_lines = ते वीर्यदा विजयदा अपि वारिवह्नि¦स्तम्भादिदाः सकलदेवनिकायरोधाः ।¦वृष्ट्याद्यभीप्सितसमस्तकरा अमूभिः¦जेष्यामि भीमममुमेकमयातयामैः ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = सौहार्दमेषु यदिवाऽतितरां(यदि वा नितराम्) करोषि | | verse_text = सौहार्दमेषु यदिवाऽतितरां(यदि वा नितराम्) करोषि | ||
| verse_lines = सौहार्दमेषु यदिवाऽतितरां(यदि वा नितराम्) | | verse_lines = सौहार्दमेषु यदिवाऽतितरां(यदि वा नितराम्) करोषि¦तत्रापि नैव हि मया क्रियते विरोधः ।¦वत्स्यन्तु वारणवते भवतु स्म राष्ट्रं¦तेषां तदेव मम नागपुरं त्वदर्थे ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = एवं स्वपुत्रपरिपालनतो यशस्ते | | verse_text = एवं स्वपुत्रपरिपालनतो यशस्ते | ||
| verse_lines = एवं स्वपुत्रपरिपालनतो | | verse_lines = एवं स्वपुत्रपरिपालनतो यशस्ते¦भूयाद् विनश्यति परप्रसवातिपुष्टौ ।¦जाते बले तव विरोधकृतश्च ते स्युः¦स्वार्थं हि तावदनुयान्त्यपि केवलं त्वाम् ॥ १९॥ | ||
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| verse_text = क्षत्तैक एव सततं परिपोषकोऽलं | | verse_text = क्षत्तैक एव सततं परिपोषकोऽलं | ||
| verse_lines = क्षत्तैक एव सततं | | verse_lines = क्षत्तैक एव सततं परिपोषकोऽलं¦तेषां मम द्विडथ मन्त्रबलादमुष्य ।¦पौराश्च जानपदकाः(जानपदिकाः) सततं द्विषन्ति¦मां तेष्वतीव दृढसौहृदचेतसश्च ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = ते तेषु(एतेषु) दूरगमितेषु निराश्रयत्वात् | | verse_text = ते तेषु(एतेषु) दूरगमितेषु निराश्रयत्वात् | ||
| verse_lines = ते तेषु(एतेषु) दूरगमितेषु | | verse_lines = ते तेषु(एतेषु) दूरगमितेषु निराश्रयत्वात्¦मामेव दुर्बलतया परितः श्रयन्ते ।¦भीष्मादयश्च नहि तन्निकटे विरोधं¦कुर्युर्विनश्यति गतेषु हि सौहृदं तत् ॥ २१॥ | ||
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| verse_text = भेदः कुलस्य भविता कुलनाशहेतु | | verse_text = भेदः कुलस्य भविता कुलनाशहेतु | ||
| verse_lines = भेदः कुलस्य भविता | | verse_lines = भेदः कुलस्य भविता कुलनाशहेतु¦अस्माभिरेषु सहितेषु पुरे वसत्सु ।¦तस्मादुपायबलतः प्रतियापनीयाः¦ते वारणावतमितो विहितोऽप्युपायः ॥ २२॥ | ||
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| verse_text = विष्णुर्जयन्त इति शम्भुसहाय आस्ते | | verse_text = विष्णुर्जयन्त इति शम्भुसहाय आस्ते | ||
| verse_lines = विष्णुर्जयन्त इति शम्भुसहाय | | verse_lines = विष्णुर्जयन्त इति शम्भुसहाय आस्ते¦देवोत्सवश्च सुमहान् भविताऽत्र सुष्ठु ।¦भक्ताश्च ते हि नितरामरिशङ्खपाणौ¦त्वच्चोदिताः समुपयान्ति तमुत्सवं द्राक् ॥ २३॥ | ||
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| verse_text = अज्ञाप्य मत्पुरुषतां पुरुषैर्मदीयैः | | verse_text = अज्ञाप्य मत्पुरुषतां पुरुषैर्मदीयैः | ||
| verse_lines = अज्ञाप्य मत्पुरुषतां | | verse_lines = अज्ञाप्य मत्पुरुषतां पुरुषैर्मदीयैः¦मध्यस्थवद् बहुगुणा उदिताश्च तत्र ।¦तेषां पुरोऽत्र गमनाभिरुचिश्च जाता¦द्रष्टुं पुरं बहुगुणं ननु पाण्डवानाम् ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तवत्यथ सुते स तथेत्युवाच | | verse_text = इत्युक्तवत्यथ सुते स तथेत्युवाच | ||
| verse_lines = इत्युक्तवत्यथ सुते स | | verse_lines = इत्युक्तवत्यथ सुते स तथेत्युवाच¦प्राप्तेषु पाण्डुतनयेषु तथैव चोचे ।¦ज्ञात्वैव तेऽपि नृपतेर्हृदयं समस्तं¦जग्मुः पितेति पृथया सह नीतिहेतोः ॥ २५॥ | ||
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| verse_text = भीमस्तदा ह(तदाऽऽह/तदैव) भविताऽत्र हि भैक्षचार | | verse_text = भीमस्तदा ह(तदाऽऽह/तदैव) भविताऽत्र हि भैक्षचार | ||
| verse_lines = भीमस्तदा ह(तदाऽऽह/तदैव) भविताऽत्र हि | | verse_lines = भीमस्तदा ह(तदाऽऽह/तदैव) भविताऽत्र हि भैक्षचार¦इत्येव सम्यगनुविद्य निजं न कर्म ।¦त्याज्यं त्विति प्रतिजगाद निजाग्रजाय¦यामो वयं नतु गृहात् स हि नः स्वधर्मः ॥ २६॥ | ||
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| verse_lines = निष्कालयन्ति यदि नो | | verse_lines = निष्कालयन्ति यदि नो निजधर्मसंस्थान्¦योत्स्यामहेऽत्र नहि दस्युवधोऽप्यधर्मः ।¦इत्यूचिवांसममुमाह च धर्मसूनुः¦कीर्तिर्विनश्यति हि नो गुरुभिर्विरोधे ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तवाक्यममुमग्रजमन्वगात् | | verse_lines = इत्युक्तवाक्यममुमग्रजमन्वगात् स¦भीमः प्रदर्श्य निजधर्ममथानुवृत्त्यै ।¦दोषो भवेदुभयतो यत एव तेन¦वाच्यः स्वधर्म उत न स्थितिरत्र कार्या ॥ २८॥ | ||
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| verse_lines = कीर्त्यर्थमेव | | verse_lines = कीर्त्यर्थमेव निजधर्मपरिप्रहाणे¦प्राप्तेऽग्रजस्य वचनात् प्रविहातुमेव(प्रतिहातुं, प्रतिहन्तुम्) ।¦भीमस्य दोषमुभयं प्रतिहन्तुमीशो¦ज्येष्ठं चकार हरिरत्र सुतं वृषस्य ॥ २९॥ | ||
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| verse_lines = हन्तव्यतामुपगतेषु सुयोधनादि- | | verse_lines = हन्तव्यतामुपगतेषु सुयोधनादि-¦ष्वन्योवधान्नहि भवेन्निजधर्म एव ।¦पूर्वं वधे नहि समस्तश एव दोषाः¦तेषां प्रयान्ति विवृतिं च तदर्थतोऽपि ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = क्षत्ताऽथ चाऽह | | verse_lines = क्षत्ताऽथ चाऽह सुवचोऽन्त्यजभाषयैव¦धर्मात्मजं विषहुताशभयात् प्रतीताः ।¦आध्वं त्विति स्म स तथेति वचोऽप्युदीर्य¦प्रायाच्च वारणवतं पृथयाऽनुजैश्च ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = तान् हन्तुमेव च तदा | | verse_lines = तान् हन्तुमेव च तदा धृतराष्ट्रसूनुः¦लाक्षागृहं सपदि काञ्चनरत्नगूढम् ।¦कृत्वाऽभ्ययातयदमुत्र हि(च) विष्णुपद्या(विष्णुपद्यां)¦स्वामात्यमेव च पुरोचननामधेयम् ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = पूर्वं प्रहस्त इति यस्त्वभवत् | | verse_lines = पूर्वं प्रहस्त इति यस्त्वभवत् सुपापः¦सोऽभ्येत्य पाण्डुतनयानभवच्च मन्त्री ।¦दुर्योधनं प्रतिविहाय भवत्सकाशम्¦आयात इत्यवददेषु स कूटवाक्यम् ॥ ३३॥ | ||
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| verse_lines = दिव्यं गृहं च भवतां हि | | verse_lines = दिव्यं गृहं च भवतां हि मयोपनीतं¦प्रीत्यैव पापमनुयातुमहं न शक्तः ।¦युष्मासु धर्मधृतिमत्सु सदा निवत्स्य¦इत्यूचिवांसममुमाहुरहो सुभद्रम् ॥ ३४॥ | ||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव जातुषगृहं वसया | | verse_lines = दृष्ट्वैव जातुषगृहं वसया समेतं¦तद्गन्धतो वृषसुतः पवमानजातम् ।¦तं चातिपापमवदत् सुमुखैष पापो¦हन्तुं न इच्छति सदा भव च प्रतीतः ॥ ३५॥ | ||
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| verse_lines = क्षत्ताऽथ | | verse_lines = क्षत्ताऽथ नीतिबलतोऽखिललोकवृत्तं¦जानन् स्वचारमुखतः खनकाय चोचे ।¦उक्त्वैव धर्मतनयाय मदीयवाक्यं¦पूर्वोक्तमाशु कुरु तत्र बिलं सुदूरम् ॥ ३६॥ | ||
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| verse_lines = चक्रे स चैवमथ वर्त्म | | verse_lines = चक्रे स चैवमथ वर्त्म वृतिच्छलेन¦द्वारं च तस्य स पिधाय ययौ गृहं स्वम् ।¦भीमः पुरोचन उभावपि तौ वधाय¦च्छिद्रार्थिनौ मिथ उतोषतुरब्दकार्द्धम् ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = तं भागिनेयसहितं भगिनीं च | | verse_lines = तं भागिनेयसहितं भगिनीं च तस्य¦पापां ददाह सगृहां पवमानसूनुः ।¦साऽप्यागता हि गरलेन निहन्तुमेतान्¦भीमस्य पूर्वभुजितो न शशाक चैतत् ॥ ३९॥ | ||
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| verse_lines = तप्तं तया ससुतया च तपो | | verse_lines = तप्तं तया ससुतया च तपो नितान्तं¦स्यां सूनुभिः सह बलाददितिस्तथाऽब्दात् ।¦तस्या अदाच्च गिरिशो यदि पुत्रकैस्त्वं¦युक्ता न यासि मृतिमेष वरस्तवेति ॥ ४०॥ | ||
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| verse_lines = जानन्निदं सकलमेव स(च) | | verse_lines = जानन्निदं सकलमेव स(च) भीमसेनो¦हत्वा सुतैः सह कुबुद्धिमिमां हि तं च ।¦भ्रातॄंश्च मातरमुदूह्य ययौ बिलात् स¦निर्गत्य भीतिवशतोऽबलतां प्रयातान् ॥ ४१॥ | ||
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| verse_lines = ज्ञात्वा पुरोचनवधं यदि | | verse_lines = ज्ञात्वा पुरोचनवधं यदि भीष्ममुख्यैः¦वैचित्रवीर्यतनया अभियोधयेयुः ।¦किं नो भवेदिति भयं सुमहद् विवेश¦भीमं त्वृते च तनयान् सकलान् पृथायाः ॥ ४२॥ | ||
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| verse_lines = भीमोऽभयोऽपि गुरुभिः स्वमुखेन | | verse_lines = भीमोऽभयोऽपि गुरुभिः स्वमुखेन युद्धम्¦अप्रीयमाण उत धर्मजवाक्यहेतोः ।¦ऊह्यैव तानपि(तान् उरु) ययौ द्युनदीं च तीर्त्वा¦क्षत्त्राऽतिसृष्टमधिरुह्य(क्षत्ता निसृष्टमधिरुह्य) जलप्रयाणम् ॥ ४३॥ | ||
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| verse_lines = भीमोऽप्युदूह्य वनमाप | | verse_lines = भीमोऽप्युदूह्य वनमाप हिडिम्बकस्य¦भ्रातॄन् पृथां च तृषितैरभियाचितश्च ।¦पानीयमुत्तरपटेऽम्बुजपत्रनद्धं¦दूरादुदूह्य ददृशे स्वपतोऽथ तांश्च ॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = रक्षार्थमेव परिजाग्रति भीमसेने | | verse_text = रक्षार्थमेव परिजाग्रति भीमसेने | ||
| verse_lines = रक्षार्थमेव परिजाग्रति | | verse_lines = रक्षार्थमेव परिजाग्रति भीमसेने¦रक्षः स्वसारमभियापयते हिडिम्बीम् ।¦सा रूपमेत्य शुभमेव ददर्श भीमं¦साक्षात् समस्तशुभलक्षणसारभूतम् ॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = सा राक्षसीतनुमवाप सुरेन्द्रलोक | | verse_text = सा राक्षसीतनुमवाप सुरेन्द्रलोक | ||
| verse_lines = सा राक्षसीतनुमवाप | | verse_lines = सा राक्षसीतनुमवाप सुरेन्द्रलोक¦श्रीरेव शक्रदयिता त्वपरैव शच्याः ।¦शापात् स्पृधा पतिमवाप्य च मारुतिं (मारुतं) सा¦प्राप्तुं निजां तनुमयाचत भीमसेनम् ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = तां भीम आह कमनीयतनुं न पूर्वं | | verse_text = तां भीम आह कमनीयतनुं न पूर्वं | ||
| verse_lines = तां भीम आह कमनीयतनुं न | | verse_lines = तां भीम आह कमनीयतनुं न पूर्वं¦ज्येष्ठादुपैमि वनितां नहि धर्म एषः ।¦सा चाऽह कामवशगा पुनरेतदेव¦स्वावेशयुग्धि मरुदग्र्यपरिग्रहस्य ॥ ५०॥ | ||
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| verse_text = सा भारती वरमिमं प्रददावमुष्यै | | verse_text = सा भारती वरमिमं प्रददावमुष्यै | ||
| verse_lines = सा भारती वरमिमं | | verse_lines = सा भारती वरमिमं प्रददावमुष्यै¦स्वावेशमात्मदयितस्य च सङ्गमेन ।¦शापाद् विमुक्तिमतितीव्रतपःप्रसन्ना¦तेनाऽह(तेनाऽप) सा निजतनुं पवमानसूनोः ॥ ५१॥ | ||
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| verse_text = ज्ञानं च नैजमभिदर्शयितुं पुनश्च | | verse_text = ज्ञानं च नैजमभिदर्शयितुं पुनश्च | ||
| verse_lines = ज्ञानं च नैजमभिदर्शयितुं | | verse_lines = ज्ञानं च नैजमभिदर्शयितुं पुनश्च¦प्राहेश्वरोऽखिलजगद्गुरुरिन्दिरेशः ।¦व्यासस्वरूप इह चेत्य परश्व एव¦मां ते प्रदास्यति तदा प्रकरोषि मेऽर्थ्यम् ॥ ५२॥ | ||
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| verse_text = काले तदैव कुपितः प्रययौ हिडिम्बो | | verse_text = काले तदैव कुपितः प्रययौ हिडिम्बो | ||
| verse_lines = काले तदैव कुपितः प्रययौ | | verse_lines = काले तदैव कुपितः प्रययौ हिडिम्बो¦भीमं निहन्तुमपि तां च निजस्वसारम् ।¦भक्षार्थमेव हि पुरा स तु तां न्ययुङ्क्त¦नेतुं च तानथ समासददाशु भीमम् ॥ ५३॥ | ||
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| verse_text = सा भीममेव शरणं प्रजगाम तां च | | verse_text = सा भीममेव शरणं प्रजगाम तां च | ||
| verse_lines = सा भीममेव शरणं प्रजगाम तां | | verse_lines = सा भीममेव शरणं प्रजगाम तां च¦भ्रातॄंश्च मातरमथावितुमभ्ययात् तम् ।¦भीमः सुदूरमपकृष्य सहोदराणां¦निद्राप्रभङ्गभयतो युयुधेऽमुना च ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = तौ मुष्टिभिस्तरुभिरश्मभिरद्रिभिश्च | | verse_text = तौ मुष्टिभिस्तरुभिरश्मभिरद्रिभिश्च | ||
| verse_lines = तौ | | verse_lines = तौ मुष्टिभिस्तरुभिरश्मभिरद्रिभिश्च¦युद्ध्वा नितान्तरवतः प्रतिबोधितांस्तान् ।¦सञ्चक्रतुस्तदनु सोदरसम्भ्रमं तं¦दृष्ट्वैव मारुतिरहन्नुरसि स्म रक्षः ॥ ५५॥ | ||
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| verse_text = तद् भीमबाहुबलताडितमीशवाक्यात् | | verse_text = तद् भीमबाहुबलताडितमीशवाक्यात् | ||
| verse_lines = तद् | | verse_lines = तद् भीमबाहुबलताडितमीशवाक्यात्¦सर्वैरजेयमपि भूमितले पपात ।¦वक्त्रस्रवद्बहुलशोणितमाप मृत्युं¦प्रायात् तमोऽन्धमपि नित्यमथ क्रमेण ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = हत्वैव शर्ववररक्षितराक्षसं तं | | verse_text = हत्वैव शर्ववररक्षितराक्षसं तं | ||
| verse_lines = हत्वैव शर्ववररक्षितराक्षसं | | verse_lines = हत्वैव शर्ववररक्षितराक्षसं तं¦सर्वैरवध्यमपि सोदरमातृयुक्तः ।¦भीमो ययौ तमनु सा प्रययौ हिडिम्बी¦कुन्ती युधिष्ठिरमथास्य कृते ययाचे ॥ ५७॥ | ||
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| verse_text = ताभ्यामनूक्तमपि यन्न करोति भीमः | | verse_text = ताभ्यामनूक्तमपि यन्न करोति भीमः | ||
| verse_lines = ताभ्यामनूक्तमपि यन्न करोति | | verse_lines = ताभ्यामनूक्तमपि यन्न करोति भीमः¦प्रादुर्बभूव निखिलोरुगुणाभिपूर्णः ।¦व्यासात्मको हरिरनन्तसुखाम्बुराशिः(अनन्तसुखाब्धिराशिः)¦विद्यामरीचिविततः सकलोत्तमोऽलम् ॥ ५८॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वैव तं परममोदिन आशु पार्था | | verse_text = दृष्ट्वैव तं परममोदिन आशु पार्था | ||
| verse_lines = दृष्ट्वैव तं परममोदिन आशु | | verse_lines = दृष्ट्वैव तं परममोदिन आशु पार्था¦मात्रा सहैव परिपूज्य गुरुं विरिञ्चेः ।¦सल्लालिताश्च (उल्लालिताश्च) हरिणा परमातिहार्द¦प्रोत्फुल्लपद्मनयनेन सदोपविष्टाः ॥ ५९॥ | ||
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| verse_text = तान् भक्तिनम्रशिरसः समुदीक्ष्य कृष्णो | | verse_text = तान् भक्तिनम्रशिरसः समुदीक्ष्य कृष्णो | ||
| verse_lines = तान् भक्तिनम्रशिरसः समुदीक्ष्य | | verse_lines = तान् भक्तिनम्रशिरसः समुदीक्ष्य कृष्णो¦भीमं जगाद नत आशु हिडिम्बया च ।¦एतां गृहाण युवतीं सुरसद्मशोभां¦जाते सुते सहसुता प्रतियातु चैषा ॥ ६०॥ | ||
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| verse_text = एवं ब्रुवत्यगणितोरुगुणे रमेश | | verse_text = एवं ब्रुवत्यगणितोरुगुणे रमेश | ||
| verse_lines = एवं ब्रुवत्यगणितोरुगुणे | | verse_lines = एवं ब्रुवत्यगणितोरुगुणे रमेश¦ओमित्युदीर्य कृतवांश्च तथैव भीमः ।¦स्कन्धेन चोह्य विबुधाचरितप्रदेशान्¦भीमं प्रयात्युदय एव रवेर्हिडिम्बी ॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = सा नन्दनादिषु वनेषु विहृत्य तेन | | verse_text = सा नन्दनादिषु वनेषु विहृत्य तेन | ||
| verse_lines = सा नन्दनादिषु वनेषु विहृत्य | | verse_lines = सा नन्दनादिषु वनेषु विहृत्य तेन¦सायं प्रयाति पृथया सहितांश्च पार्थान् ।¦एवं ययावपि तयोरिह वत्सरार्द्धो¦जातश्च सूनुरतिवीर्यबलोपपन्नः ॥ ६२॥ | ||
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| verse_text = देवोऽपि राक्षसतनुर्निर्हृतिः पुरा य | | verse_text = देवोऽपि राक्षसतनुर्निर्हृतिः पुरा य | ||
| verse_lines = देवोऽपि राक्षसतनुर्निर्हृतिः पुरा | | verse_lines = देवोऽपि राक्षसतनुर्निर्हृतिः पुरा य¦आवेशयुक् च गिरिशस्य घटोत्कचाख्यः ।¦पूर्वं घटोपमममुष्य शिरो बभूव¦केशा निमेषत उदासुरतो हि नाम ॥ ६३॥ | ||
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| verse_text = जाते सुते समयतो भगवत्कृतात् स | | verse_text = जाते सुते समयतो भगवत्कृतात् स | ||
| verse_lines = जाते सुते समयतो भगवत्कृतात् | | verse_lines = जाते सुते समयतो भगवत्कृतात् स¦भीमो जगाद ससुतां गमनाय तां च ।¦स्मृत्याऽभियान उभयोरपि सा प्रतिज्ञां¦तेषां विधाय च ययौ सुरलोकमेव ॥ ६४॥ | ||
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| verse_text = व्यासोऽपि पाण्डुतनयैः सहितो बकस्य | | verse_text = व्यासोऽपि पाण्डुतनयैः सहितो बकस्य | ||
| verse_lines = व्यासोऽपि पाण्डुतनयैः सहितो | | verse_lines = व्यासोऽपि पाण्डुतनयैः सहितो बकस्य¦रौद्राद् वराज्जयवधापगतस्य नित्यम् ।¦यातो वधाय परमागणितोरुधामा¦पूर्णाक्षयोरुसुख आशु तदैकचक्राम् ॥ ६५॥ | ||
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| verse_text = तान् ब्राह्मणस्य च गृहे प्रणिधाय कृष्णः | | verse_text = तान् ब्राह्मणस्य च गृहे प्रणिधाय कृष्णः | ||
| verse_lines = तान् ब्राह्मणस्य च गृहे प्रणिधाय | | verse_lines = तान् ब्राह्मणस्य च गृहे प्रणिधाय कृष्णः¦शिष्या ममैत इति विप्रकुमाररूपान् ।¦आयामि काल इति ताननुशास्य चायात्¦ते तत्र वासमथ चक्रुरनूच्य वेदान् ॥ ६६॥ | ||
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| verse_lines = भिक्षामटत्सु सततं | | verse_lines = भिक्षामटत्सु सततं प्रतिहुङ्कृतेन¦भीमे विशां सदन एव गृहप्रमाणम् ।¦भाण्डं कुलालविहितं प्रतिगृह्य गच्छ-¦त्याशङ्कयाऽवगमनस्य तमाह धार्मः ॥ ६७॥ | ||
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| verse_text = स्थूलं हि सद्म पृथिवीसहितं त्वरक्ष | | verse_text = स्थूलं हि सद्म पृथिवीसहितं त्वरक्ष | ||
| verse_lines = स्थूलं हि सद्म पृथिवीसहितं | | verse_lines = स्थूलं हि सद्म पृथिवीसहितं त्वरक्ष¦उद्धृत्य वह्निमुखतस्तदु(तदुतैकदोष्णा) चैकदोष्णा ।¦भाण्डं तदर्थमुरु कुम्भकरेण दत्तं¦भिक्षां च तेन चरसि प्रतिहुङ्कृतेन ॥ ६८॥ | ||
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| verse_lines = धर्मस्य ते सुनियतेर्बलश्च | | verse_lines = धर्मस्य ते सुनियतेर्बलश्च बोधो¦भूयात् सुयोधनजनस्य ततो भयं मे ।¦मात्रा सहैव वस फल्गुनपूर्वकैस्त्वम्¦आनीतमेव परिभुङ्क्ष्व नतु व्रजेथाः ॥ ६९॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्त आशु स चकार तथैव | | verse_lines = इत्युक्त आशु स चकार तथैव भीमः¦तेऽपि स्वधर्मपरिरक्षणहेतुमौनाः ।¦भिक्षां चरन्त्यथ चतुर्ष्वपि तेषु याते-¦ष्वेकत्र मातृसहितः स कदाचिदास्ते ॥ ७०॥ | ||
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| verse_lines = तत्काल एव रुदितं | | verse_lines = तत्काल एव रुदितं निजवासहेतोः¦विप्रस्य दारसहितस्य निशम्य भीमः ।¦स्त्रीबालसंयुतगृहे शिशुलालनादौ (शिशुपालनादौ)¦लज्जेदिति स्म जननीमवदन्नचागात् ॥ ७१॥ | ||
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| verse_lines = जानीहि विप्ररुदितं कुत | | verse_lines = जानीहि विप्ररुदितं कुत इत्यतश्च¦योग्यं विधास्य इति सा प्रययौ च शीघ्रम् ।¦सा संवृतैव सकलं वचनं गृहेऽस्य¦शुश्राव विप्रवर आह तदा प्रियां सः ॥ ७२॥ | ||
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| verse_lines = दातव्य एव हि करोऽद्य च | | verse_lines = दातव्य एव हि करोऽद्य च रक्षसस्य¦साक्षाद् बकस्य गिरिसन्निभभक्ष्यभोज्यः(गिरिसन्निभभक्षभोज्यः) ।¦पुंसाऽनसा च सहितानडुहा पुमांस्तु¦नैवास्ति नोऽप्रददतां(नो प्रददतां) च समस्तनाशः ॥ ७३॥ | ||
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| verse_lines = अन्यत्र याम इति पूर्वमुदाहृतं | | verse_lines = अन्यत्र याम इति पूर्वमुदाहृतं मे¦नैतत् प्रिये तव मनोगतमास तेन ।¦यास्यामि राक्षसमुखं स्वयमेव मर्तुं¦भार्यैनमाह न भवानहमत्र यामि ॥ ७४॥ | ||
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| verse_lines = अर्थे तवाद्य तनुसन्त्यजनादहं | | verse_lines = अर्थे तवाद्य तनुसन्त्यजनादहं स्यां¦लोके सतीप्रचरिते(सती प्रचलिते) तदृते त्वधश्च ।¦कन्याऽऽह चैनमहमेव(चैनमहमेवि) न कन्ययाऽर्थ¦इत्युक्त आह धिगिति स्म स विप्रवर्यः ॥ ७५॥ | ||
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| verse_lines = कन्योदिता बत | | verse_lines = कन्योदिता बत कुलद्वयतारिणीति¦जाया सखेति वचनं श्रुतिगं सुतश्च ।¦आत्मैव तेन नतु जीवनहेतुतोऽहं¦धीपूर्वकं न्रशनके(नृशनके) प्रतिपादयामि ॥ ७६॥ | ||
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| verse_lines = एवं रुदत्सु सहितेषु | | verse_lines = एवं रुदत्सु सहितेषु कुमारकोऽस्य¦प्राह स्वहस्तगतृणं प्रतिदर्श्य चैषाम् ।¦एतेन राक्षसमहं निहनिष्य एवे-¦त्युक्ते सुवाक्यमनु सा प्रविवेश कुन्ती ॥ ७७॥ | ||
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| verse_lines = पृष्टस्तयाऽऽह स तु विप्रवरो | | verse_lines = पृष्टस्तयाऽऽह स तु विप्रवरो बकस्य¦वीर्यं बलं च दितिजारिभिरप्यसह्यम् ।¦संवत्सरत्रययुते दशके करं च¦प्रातिस्विकं दशमुखस्य च मातुलस्य ॥ ७८॥ | ||
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| verse_lines = श्रुत्वा | | verse_lines = श्रुत्वा तमुग्रबलमत्युरुवीर्यमेव¦रामायणे रघुवरोरुशरातिभीतम् ।¦विष्टं बिलेष्वथ नृपान् वशमाशु कृत्वा¦भीत्यैव तैस्तदनु दत्तकरं ननन्द ॥ ७९॥ | ||
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| verse_lines = एवं बलाढ्यममुमाशु निहत्य | | verse_lines = एवं बलाढ्यममुमाशु निहत्य भीमः¦कीर्तिं च धर्ममधिकं प्रतियास्यतीह ।¦सर्वे वयं च तमनु प्रगृहीतधर्मा(प्र गृहीतधर्मा)¦यास्याम इत्यवददाशु धरासुरं तम् ॥ ८०॥ | ||
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| verse_lines = सन्ति स्म विप्रवर पञ्च सुता | | verse_lines = सन्ति स्म विप्रवर पञ्च सुता ममाद्य¦तेष्वेक एव नरवैरिमुखाय यातु ।¦इत्युक्त आह स न ते सुतवध्ययाऽहं¦पापो भवानि(भवामि)तव हन्त मनोऽतिधीरम् ॥ ८१॥ | ||
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| verse_lines = उक्तैवमाह च पृथा तनये | | verse_lines = उक्तैवमाह च पृथा तनये मदीये¦विद्याऽस्ति दिक्पतिभिरप्यविषह्यरूपा ।¦उक्तोऽपि नो गुरुभिरेष नियुङ्क्त एतां¦वध्यस्तथाऽपि न सुरासुरपालकैश्च ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = मातः किमेष मुदितोऽतितरामिति स्म(मुदितो नितराम्) | | verse_lines = मातः किमेष मुदितोऽतितरामिति स्म(मुदितो नितराम्)¦तस्मै च सा निखिलमाह स चाब्रवीत् ताम् ।¦कष्टं त्वया कृतमहो बलमेव यस्य¦सर्वे श्रिता वयममुं च निहंसि (विहंसि) भीमम् ॥ ८४॥ | ||
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| verse_text = यद्बाहुवीर्यपरमाश्रयतो हि राज्यम् | | verse_text = यद्बाहुवीर्यपरमाश्रयतो हि राज्यम् | ||
| verse_lines = यद्बाहुवीर्यपरमाश्रयतो हि | | verse_lines = यद्बाहुवीर्यपरमाश्रयतो हि राज्यम्¦इच्छाम एव निखिलारिवधं स्वधर्मम् ।¦सोऽयं त्वयाऽद्य निशिचारिमुखाय(निशिचारमुखाय)मातः¦प्रस्थाप्यते वद ममाऽशु कयैव बुद्ध्या ॥ ८५॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तवन्तममुमाह सुधीरबुद्धिः | | verse_text = इत्युक्तवन्तममुमाह सुधीरबुद्धिः | ||
| verse_lines = इत्युक्तवन्तममुमाह | | verse_lines = इत्युक्तवन्तममुमाह सुधीरबुद्धिः¦कुन्ती न पुत्रक निहन्तुमयं हि शक्यः ।¦सर्वैः सुरैरसुरयोगिभिरप्यनेन¦चूर्णीकृतो हि शतशृङ्गगिरिः प्रसूत्याम् ॥ ८६॥ | ||
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| verse_text = एष स्वयं हि मरुदेव नरात्मकोऽभूत् | | verse_text = एष स्वयं हि मरुदेव नरात्मकोऽभूत् | ||
| verse_lines = एष स्वयं हि मरुदेव | | verse_lines = एष स्वयं हि मरुदेव नरात्मकोऽभूत्¦को नाम हन्तुमिममाप्तबलो जगत्सु ।¦इत्येवमस्त्विति स तामवदत् परेद्युः¦भीमो जगाम शकटेन कृतोरुभोगः ॥ ८७॥ | ||
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| verse_text = गत्वा त्वरन् बकवनाय सकाशमाशु | | verse_text = गत्वा त्वरन् बकवनाय सकाशमाशु | ||
| verse_lines = गत्वा त्वरन् बकवनाय | | verse_lines = गत्वा त्वरन् बकवनाय सकाशमाशु¦भीमः सपायससुभक्ष्यपयोघटाद्यैः ।¦युक्तं च शैलनिभमुत्तममन्नराशिं¦स्पर्शात् पुरैव नरभक्षितुरत्तुमैच्छत् ॥ ८८॥ | ||
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| verse_text = तेनैव चान्नसमितौ परिभुज्यमान | | verse_text = तेनैव चान्नसमितौ परिभुज्यमान | ||
| verse_lines = तेनैव चान्नसमितौ | | verse_lines = तेनैव चान्नसमितौ परिभुज्यमान¦उत्पाट्य वृक्षममुमाद्रवदाशु रक्षः ।¦वामेन मारुतिरपोह्य तदा प्रहारान्¦हस्तेन भोज्यमखिलं सहभक्ष्यमादत् ॥ ८९॥ | ||
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| verse_text = पीत्वा पयो त्वरित एनमवेक्षमाण(अवेक्ष्यमाण) | | verse_text = पीत्वा पयो त्वरित एनमवेक्षमाण(अवेक्ष्यमाण) | ||
| verse_lines = पीत्वा पयो त्वरित एनमवेक्षमाण(अवेक्ष्यमाण) | | verse_lines = पीत्वा पयो त्वरित एनमवेक्षमाण(अवेक्ष्यमाण)¦आचम्य तेन युयुधे गुरुवृक्षशैलैः ।¦तेनाऽहतोऽथ बहुभिर्गिरिभिर्बलेन¦जग्राह चैनमथ भूमितले पिपेष ॥ ९०॥ | ||
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| verse_text = आक्रम्य पादमपि पादतलेन तस्य | | verse_text = आक्रम्य पादमपि पादतलेन तस्य | ||
| verse_lines = आक्रम्य पादमपि पादतलेन | | verse_lines = आक्रम्य पादमपि पादतलेन तस्य¦दोर्भ्यां प्रगृह्य च परं विददार भीमः ।¦मृत्वा स चोरु तम एव जगाम पापो¦विष्णुद्विडेव हि शनैरनिवृत्ति चोग्रम् ॥ ९१॥ | ||
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| verse_text = हत्वा तमक्षतबलो जगदन्तकं स | | verse_text = हत्वा तमक्षतबलो जगदन्तकं स | ||
| verse_lines = हत्वा तमक्षतबलो जगदन्तकं | | verse_lines = हत्वा तमक्षतबलो जगदन्तकं स¦यो राक्षसो न वश आस जरासुतस्य ।¦भौमस्य पूर्वमपि नो भरतस्य राज्ञो¦भीमो न्यधापयदमुष्य शरीरमग्रे ॥ ९२॥ | ||
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| verse_lines = द्वार्येव तत् प्रतिनिधाय पुनः स | | verse_lines = द्वार्येव तत् प्रतिनिधाय पुनः स भीमः¦स्नात्वा जगाम निजसोदरपार्श्वमेव ।¦श्रुत्वाऽस्य कर्म परमं तुतुषुः समेता¦मात्रा च ते तदनुभीतियुताः पुरस्थाः(भीतियुताश्च जाताः) ॥ ९३॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वैव राक्षसशरीरमुरु प्रभीता | | verse_text = दृष्ट्वैव राक्षसशरीरमुरु प्रभीता | ||
| verse_lines = दृष्ट्वैव राक्षसशरीरमुरु | | verse_lines = दृष्ट्वैव राक्षसशरीरमुरु प्रभीता¦ज्ञात्वैव हेतुभिरथ क्रमशो मृतं च ।¦विप्रस्य तस्य वचनादपि भीमसेन-¦भग्नं निशम्य परमं तुतुषुश्च तस्मै ॥ ९४॥ | ||
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| verse_text = अन्नात्मकं करममुष्य च सम्प्रचक्रुः | | verse_text = अन्नात्मकं करममुष्य च सम्प्रचक्रुः | ||
| verse_lines = अन्नात्मकं करममुष्य च | | verse_lines = अन्नात्मकं करममुष्य च सम्प्रचक्रुः¦सोऽप्येनमाशु(सोऽप्येतमाशु) नरसिंहवपुर्धरस्य ।¦चक्रे हरेस्तदनु सत्यवतीसुतस्य¦विष्णोर्हि वाक्प्रमुदिताः(वाक्प्रचुदिताः) प्रययुस्ततश्च ॥ ९५॥ | ||
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| verse_text = उत्पत्तिपूर्वककथां द्रुपदात्मजाया | | verse_text = उत्पत्तिपूर्वककथां द्रुपदात्मजाया | ||
| verse_lines = उत्पत्तिपूर्वककथां | | verse_lines = उत्पत्तिपूर्वककथां द्रुपदात्मजाया¦व्यासो ह्यनूच्य जगतां गुरुरीश्वरेशः(गुरुरीश्वरश्च) ।¦यातेत्यचोदयदथाप्यपरे द्विजाग्र्याः¦तान् ब्राह्मणा इति भुजिर्भवतेति चोचुः(भवतीति चोचुः) ॥ ९६॥ | ||
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| verse_text = पूर्वं हि पार्षत इमान् जतुगेहदग्धान् | | verse_text = पूर्वं हि पार्षत इमान् जतुगेहदग्धान् | ||
| verse_lines = पूर्वं हि पार्षत इमान् | | verse_lines = पूर्वं हि पार्षत इमान् जतुगेहदग्धान्¦श्रुत्वाऽतिदुःखितमनाः पुनरेव(पुनरेष) मन्त्रः ।¦याजोपयाजमुखनिस्सृत एवमेष¦नासत्यतार्ह इति जीवनमेषु मेने ॥ ९७॥ | ||
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| verse_text = यत्रक्वचित् प्रतिवसन्ति निलीनरूपाः | | verse_text = यत्रक्वचित् प्रतिवसन्ति निलीनरूपाः | ||
| verse_lines = यत्रक्वचित् प्रतिवसन्ति | | verse_lines = यत्रक्वचित् प्रतिवसन्ति निलीनरूपाः¦पार्था इति स्म स तु फल्गुनकारणेन ।¦चक्रे स्वयम्बरविघोषणमाशु राजा¦स्वन्यैरधार्यधनुरीशवराच्च चक्रे ॥ ९८॥ | ||
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| verse_lines = तत्काल एव वसुदेवसुतोऽपि | | verse_lines = तत्काल एव वसुदेवसुतोऽपि कृष्णः¦सम्पूर्णनैजपरिबोधत एव सर्वम् ।¦जानन्नपि स्म हलिना सहितो जगाम¦पार्थान् निशम्य च मृतानथ कुल्यहेतोः ॥ ९९॥ | ||
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| verse_text = स प्राप्य(सम्प्राप्य) हस्तिनपुरं धृतराष्ट्रपुत्रान् | | verse_text = स प्राप्य(सम्प्राप्य) हस्तिनपुरं धृतराष्ट्रपुत्रान् | ||
| verse_lines = स प्राप्य(सम्प्राप्य) हस्तिनपुरं | | verse_lines = स प्राप्य(सम्प्राप्य) हस्तिनपुरं धृतराष्ट्रपुत्रान्¦संवञ्चयंस्तदनुसारिकथाश्च कृत्वा(श्रुत्वा) ।¦भीष्मादिभिः परिगतो(परिगताप्रियवत्,परिवृतोऽप्रियवत्)ऽप्रियवज्जगाम द्वारावतीमुदितपूर्णसुनित्यसौख्यः ॥ १००॥ | ||
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| verse_lines = तस्यान्तरे हृदिकसूनुरनन्तरं | | verse_lines = तस्यान्तरे हृदिकसूनुरनन्तरं स्वं¦श्वाफल्किबुद्धिबलमाश्रित इत्युवाच ।¦सत्राजिदेष हि पुरा प्रतिजज्ञ एनाम्¦अस्मत्कृते स्वतनयां मणिना सहैव ॥ १०१॥ | ||
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| verse_lines = सर्वांश्च नः पुनरसाववमत्य कृष्णा- | | verse_lines = सर्वांश्च नः पुनरसाववमत्य कृष्णा-¦यादात् सुतां जहि च तं निशि पापबुद्धिम् ।¦आदाय रत्नमुपयाहि च नौ विरोधे¦कृष्णस्य दानपतिना सह साह्यमेमि ॥ १०२॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्त आशु कुमतिः स तु(स हि) | | verse_lines = इत्युक्त आशु कुमतिः स तु(स हि) पूर्वदेहे¦दैत्यो यतस्तदकरोदथ सत्यभामा ।¦आनन्दसंविदपि लोकविडम्बनाय¦तद्देहमस्य तिलजे पतिमभ्युपागात् ॥ १०३॥ | ||
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| verse_lines = श्रुत्वा तदीयवचनं भगवान् पुरीं | | verse_lines = श्रुत्वा तदीयवचनं भगवान् पुरीं स्वाम्¦आयात एव तु निशम्य महोत्सवं तम् ।¦पाञ्चालराजपुरुषोदितमाशु वृष्णि-¦वर्यैरगान्मुसलिना सह तत्पुरीं च ॥ १०४॥ | ||
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| verse_lines = भीमोऽपि रुद्रवररक्षितराक्षसं | | verse_lines = भीमोऽपि रुद्रवररक्षितराक्षसं तं¦हत्वा तृणोपमतया हरिभक्ति(क्त)वन्द्यः ।¦उष्याथ तत्र कतिचिद्दिनमच्युतस्य¦व्यासात्मनो वचनतः प्रययौ निजैश्च ॥ १०५॥ | ||
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| verse_lines = मङ्गल्यमेतदतुलं प्रतियात | | verse_lines = मङ्गल्यमेतदतुलं प्रतियात शीघ्रं¦पाञ्चालकान् परमभोजनमत्र सिद्ध्येत् ।¦विप्रैरितस्तत इतीरितवाक्यमेते¦शृण्वन्त एव परिचक्रमुरुत्तराशाम् ॥ १०६॥ | ||
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| verse_lines = षण्णां च मध्यगमुदीर्णभुजं विशाल- | | verse_lines = षण्णां च मध्यगमुदीर्णभुजं विशाल-¦वक्षस्थलं बहुलपौरुषलक्षणं च ।¦दृष्ट्वैव मारुतिमसावुपलप्स्यतीह¦कृष्णामिति स्म च वचः प्रवदन्ति विप्राः ॥ १०७॥ | ||
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| verse_lines = रात्रौ दिवा च सततं पथि | | verse_lines = रात्रौ दिवा च सततं पथि गच्छमानाः¦प्रापुः कदाचिदथ विष्णुपदीं निशायाम् ।¦सर्वस्य रक्षितुमगादिह पृष्ठतस्तु¦भीमोऽग्र एव शतमन्युसुतोऽन्तरेऽन्ये ॥ १०८॥ | ||
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| verse_lines = प्राप्ते तदोल्मुकधरेऽर्जुन एव | | verse_lines = प्राप्ते तदोल्मुकधरेऽर्जुन एव गङ्गां¦गन्धर्वराज इह चित्ररथोऽर्द्धरात्रे ।¦दृष्ट्वैव विप्ररहितानुदकान्तरस्थः¦क्षत्रात्मजा इति ह धर्षयितुं स चाऽगात् ॥ १०९॥ | ||
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| verse_lines = हन्ताऽस्मि वो | | verse_lines = हन्ताऽस्मि वो ह्युपगतानुदकान्तमस्या¦नद्याश्च मर्त्यचरणाय निषिद्धकाले ।¦इत्थं वदन्तममुमाह सुरेन्द्रसूनुः¦गन्धर्व नास्त्रविदुषां भयमस्ति तेऽद्य ॥ ११०॥ | ||
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| verse_lines = सर्वं हि फेनवदिदं बहुलं बलं | | verse_lines = सर्वं हि फेनवदिदं बहुलं बलं ते¦नार्थप्रदं भवति चास्त्रविदि प्रयुक्तम् ।¦इत्युक्तवन्तममुमुत्तमयानसंस्थो¦बाणान् क्षिपन्नभिससार सुरेशभृत्यः ॥ १११॥ | ||
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| verse_lines = आग्नेयमस्त्रमभिमन्त्र्य तदोल्मुके | | verse_lines = आग्नेयमस्त्रमभिमन्त्र्य तदोल्मुके स¦चिक्षेप शक्रतनयोऽस्य रथश्च दग्धः ।¦तं चाग्निना परिगृहीतमभिप्रगृह्य¦केशेषु सञ्चकर्षाऽशु सुरेन्द्रसूनुः ॥ ११२॥ | ||
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| verse_lines = पार्थेन सन्धर्षितः शरणं | | verse_lines = पार्थेन सन्धर्षितः शरणं जगाम¦धर्मात्मजं तमपि सोऽथ निजास्त्रमुग्रम् ।¦सञ्जह्र एव तत आस च नामतोऽसौ¦अङ्गारवर्ण इति वर्णविपर्ययेण ॥ ११३॥ | ||
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| verse_lines = गन्धर्व उल्बणसुरक्ततनुः स | | verse_lines = गन्धर्व उल्बणसुरक्ततनुः स भूत्वा¦स्वर्णावदात उत पूर्वमुपेत्य सख्यम् ।¦पार्थेन दुर्लभमहास्त्रमिदं ययाचे¦जानन्नपि स्म नहि तादृशमेष वेद ॥ ११४॥ | ||
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| verse_lines = विद्या सुशिक्षिततमा हि | | verse_lines = विद्या सुशिक्षिततमा हि सुरेशसूनौ¦तामस्य चावददसावपि कालतोऽस्मै ।¦गन्धर्वगामवददन्वगदृश्यविद्यां¦पश्चादिति स्म पुरुहूतसुतस्य वाक्यात् ॥ ११५॥ | ||
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| verse_lines = आधिक्यतः स्वगतसंविद एव | | verse_lines = आधिक्यतः स्वगतसंविद एव साम्ये¦नैवेच्छति स्म निमयं स धनञ्जयोऽत्र ।¦धर्मार्थमेव स तु तां परिदाय तस्मै¦कालेन संविदममुष्य च धर्मतोऽयात् ॥ ११६॥ | ||
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| verse_lines = पार्थेन सोऽपि बहुलाश्च कथाः | | verse_lines = पार्थेन सोऽपि बहुलाश्च कथाः कथित्वा¦धौम्यस्य सङ्ग्रहणमाह पुरोहितत्वे ।¦दास्यामि दिव्यतुरगानिति सोऽर्जुनाय¦वाचं निगद्य दिवमारुहदप्यगुस्ते ॥ ११७॥ | ||
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| verse_lines = ते धौम्यमाप्य च | | verse_lines = ते धौम्यमाप्य च पुरोधसमुत्तमज्ञं¦विप्रात्मजोपमतया विविशुः पुरं च ।¦पाञ्चालकस्य निखिलां ददृशुश्च तत्र¦मूर्धाभिषिक्तसमितिं समलङ्कृतां च ॥ ११८॥ | ||
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| verse_lines = तांश्च प्रदर्श्य सकलान्(निखिलान्) स | | verse_lines = तांश्च प्रदर्श्य सकलान्(निखिलान्) स हुताशनांशः¦चापं च तत् प्रतिनिधाय सपञ्चबाणम् ।¦आहाभिभाष्य सकलान् नृपतीनथोच्चैः¦दीप्यद्धुताशनवपुर्घनतुल्यघोषः ॥ १२०॥ | ||
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| verse_text = इत्यस्य वाक्यमनु सर्वनरेन्द्रपुत्रा | | verse_text = इत्यस्य वाक्यमनु सर्वनरेन्द्रपुत्रा | ||
| verse_lines = इत्यस्य वाक्यमनु | | verse_lines = इत्यस्य वाक्यमनु सर्वनरेन्द्रपुत्रा¦उत्तस्थुरुद्धतमदाश्चलकुण्डलास्याः ।¦अस्त्रं बलं च बहु नैजमभीक्षमाणाः¦स्पर्धन्त एव च मिथः समलङ्कृताङ्गाः ॥ १२२॥ | ||
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| verse_text = केचिन्निरीक्ष्य धनुरेत्य न मे सुशक्यम् | | verse_text = केचिन्निरीक्ष्य धनुरेत्य न मे सुशक्यम् | ||
| verse_lines = केचिन्निरीक्ष्य धनुरेत्य न मे | | verse_lines = केचिन्निरीक्ष्य धनुरेत्य न मे सुशक्यम्¦इत्येव चापययुरन्य उत प्रचाल्य ।¦तत्राऽससाद शिशुपाल उरुप्रतापः¦सङ्गृह्य तत् समधिरोपणयत्न(समनुरोपणयत्न) आसीत् ॥ १२३॥ | ||
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| verse_text = माषान्तराय स चकर्ष यदैव कोट्या | | verse_text = माषान्तराय स चकर्ष यदैव कोट्या | ||
| verse_lines = माषान्तराय स चकर्ष यदैव | | verse_lines = माषान्तराय स चकर्ष यदैव कोट्या¦उन्नम्य तत् प्रतिजघान तमेव चाऽशु ।¦अन्यत्र फल्गुनत एतदशक्यमेवे-¦त्यञ्जो गिरीशवरतः स ययौ च भग्नः ॥ १२४॥ | ||
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| verse_text = मद्रेश एत्य चकृषे स्थविरोऽपि वीर्यात् | | verse_text = मद्रेश एत्य चकृषे स्थविरोऽपि वीर्यात् | ||
| verse_lines = मद्रेश एत्य चकृषे स्थविरोऽपि | | verse_lines = मद्रेश एत्य चकृषे स्थविरोऽपि वीर्यात्¦चेदीशतोऽप्यधिकमेव स मुद्गमात्रे ।¦शिष्टे(शिष्ये)ऽमुना प्रतिहतः स ययावशक्यं¦मत्वाऽऽत्मनस्तदनु भूपतयो विषण्णाः ॥ १२५॥ | ||
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| verse_text = सन्नेषु भूपतिषु मागध आससाद | | verse_text = सन्नेषु भूपतिषु मागध आससाद | ||
| verse_lines = सन्नेषु भूपतिषु मागध | | verse_lines = सन्नेषु भूपतिषु मागध आससाद¦सोऽवज्ञयैव बलवीर्यमदेन दृप्तः ।¦चापं चकर्ष चलपादतलो बलेन¦शिष्टे स सर्षपमितेऽभिहतोऽमुनैव ॥ १२६॥ | ||
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| verse_text = जानुन्यमुष्य धरणीं ययतुस्तदैव | | verse_text = जानुन्यमुष्य धरणीं ययतुस्तदैव | ||
| verse_lines = जानुन्यमुष्य धरणीं | | verse_lines = जानुन्यमुष्य धरणीं ययतुस्तदैव¦दर्पेण चास्थिरपदस्थितिमात्रहेतोः (चास्थिरपदः स्थितिमात्रहेतोः) ।¦रौद्राद् वरात् स जडतां गमितोऽथ राजा¦राज्ञां मुखान्यभिवीक्ष्य ययौ स्वराष्ट्रम् ॥ १२७॥ | ||
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| verse_text = प्रायो गतास्तमनु(गतास्तदनु) भूपतयोऽथ कर्णो | | verse_text = प्रायो गतास्तमनु(गतास्तदनु) भूपतयोऽथ कर्णो | ||
| verse_lines = प्रायो गतास्तमनु(गतास्तदनु) भूपतयोऽथ | | verse_lines = प्रायो गतास्तमनु(गतास्तदनु) भूपतयोऽथ कर्णो¦दुर्योधनार्थमनुगृह्य धनुश्चकर्ष ।¦रामादुपात्तशुभशिक्षितमात्रतोऽसौ¦रोमावशिष्टमकरोद् धनुषोऽन्तमाशु ॥ १२८॥ | ||
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| verse_text = तस्मिंश्च तेन विहते(निहते) प्रतिसन्निवृत्ते | | verse_text = तस्मिंश्च तेन विहते(निहते) प्रतिसन्निवृत्ते | ||
| verse_lines = तस्मिंश्च तेन विहते(निहते) | | verse_lines = तस्मिंश्च तेन विहते(निहते) प्रतिसन्निवृत्ते¦भीमार्जुनौ द्विजसदस्युपसन्निविष्टौ ।¦उत्तस्थतू रविशशिप्रतिमानरूपौ¦विप्रेषु तत्र च भिया विनिवारयत्सु ॥ १२९॥ | ||
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| verse_text = विप्राश्च केचिदतियुक्तमिमौ हि वीरौ | | verse_text = विप्राश्च केचिदतियुक्तमिमौ हि वीरौ | ||
| verse_lines = विप्राश्च केचिदतियुक्तमिमौ हि | | verse_lines = विप्राश्च केचिदतियुक्तमिमौ हि वीरौ¦देवोपमाविति वचो जगदुस्ततस्तौ ।¦दृष्ट्वैव कृष्णमुखपङ्कजमाशु चाप¦सान्निध्यमाययतुरुत्तमवीर्यसारौ ॥ १३०॥ | ||
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| verse_lines = तत्रार्जुनः पवनजात् प्रियतोऽप्यनुज्ञाम्(अभ्यनुज्ञाम्) | | verse_lines = तत्रार्जुनः पवनजात् प्रियतोऽप्यनुज्ञाम्(अभ्यनुज्ञाम्)¦आदाय केशवमजं मनसा प्रणम्य ।¦कृत्वा गुणान्वितमदो(मथो) धनुरश्रमेण¦यन्त्रान्तरेण स शरैरधुनोच्च लक्षम् ॥ १३१॥ | ||
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| verse_text = कृष्णा तदाऽस्य विदधे नवकञ्जमालां | | verse_text = कृष्णा तदाऽस्य विदधे नवकञ्जमालां | ||
| verse_lines = कृष्णा तदाऽस्य विदधे | | verse_lines = कृष्णा तदाऽस्य विदधे नवकञ्जमालां¦मध्ये च तां प्रतिविधाय(प्रतिनिधाय) नरेन्द्रपुत्रौ ।¦भीमार्जुनौ ययतुरच्युतमाभिनम्य¦क्षुब्धं तदा नृपवराब्धिरिमावधावत् ॥ १३२॥ | ||
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| verse_lines = द्रष्टुं हि केवलगतिर्नतु | | verse_lines = द्रष्टुं हि केवलगतिर्नतु कन्यकाया¦अर्थे न चापमिह वृष्णिवराः स्पृशन्तु ।¦इत्याज्ञयैव वरचक्रधरस्य लिप्साम्¦अन्यत्र(अप्यत्र) चक्रुरिह नैव यदुप्रवीराः ॥ १३३॥ | ||
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| verse_text = भीमस्तु राजसमितिं प्रतिसम्प्रयातां | | verse_text = भीमस्तु राजसमितिं प्रतिसम्प्रयातां | ||
| verse_lines = भीमस्तु राजसमितिं | | verse_lines = भीमस्तु राजसमितिं प्रतिसम्प्रयातां¦दृष्ट्वैव योजनदशोच्छ्रयमाशु वृक्षम् ।¦आरुज्य(आगृह्य) सर्वनृपतीनभितोऽप्यतिष्ठद्¦दृष्ट्वा पलायनपराश्च बभूवुरेते ॥ १३४॥ | ||
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| verse_lines = भीमोऽयमेष पुरुहूतसुतोऽन्य | | verse_lines = भीमोऽयमेष पुरुहूतसुतोऽन्य एते¦पार्था इति स्म हलिने हरिरभ्यवोचत् ।¦दृष्ट्वैव सोऽपि मुदमाप शिनेश्च पौत्रः¦खड्गं प्रगृह्य हर्षात् परिपुप्लुवेऽत्र ॥ १३५॥ | ||
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| verse_lines = प्रीतेषु सर्वयदुषु | | verse_lines = प्रीतेषु सर्वयदुषु प्रपलायितेषु¦दुर्योधनादिनृपतिष्वखिलेषु भीमात् ।¦कर्णोऽभ्ययाद्धरिहयात्मजमाशु मद्र-¦राजो जगाम पवनात्मजमेव वीरः ॥ १३६॥ | ||
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| verse_lines = विप्रेषु | | verse_lines = विप्रेषु दण्डपटदर्भमहाजिनानि¦कोपात् क्षिपत्सु न विनाशनमत्र भूयात् ।¦क्षत्रस्य वैरत इति द्रुपदे च कृष्णं¦विप्रांश्च याचति स मारुतिरार शल्यम् ॥ १३७॥ | ||
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| verse_text = वृक्षं त्वसौ प्रतिनिधाय च मद्रराजं | | verse_text = वृक्षं त्वसौ प्रतिनिधाय च मद्रराजं | ||
| verse_lines = वृक्षं त्वसौ प्रतिनिधाय च | | verse_lines = वृक्षं त्वसौ प्रतिनिधाय च मद्रराजं¦दोर्भ्यां प्रगृह्य जवतो गगने निधाय ।¦बन्धुत्वतो भुवि शनैरदधात् स तस्य¦विज्ञाय वीर्यमगमन्निजराजधानीम् ॥ १३८॥ | ||
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| verse_lines = पार्थोऽपि तेन धनुषा युयुधे स्म | | verse_lines = पार्थोऽपि तेन धनुषा युयुधे स्म कर्णं¦सोऽप्यस्त्रबाहुबलमाविरमुत्र चक्रे ।¦तौ धन्विनामनुपमौ चिरमस्यतां च¦सूर्यात्मजोऽत्र वचनं व्यथितो बभाषे ॥ १३९॥ | ||
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| verse_text = त्वं फल्गुनो हरिहयो द्विजसत्तमो(सत्तपो) वा | | verse_text = त्वं फल्गुनो हरिहयो द्विजसत्तमो(सत्तपो) वा | ||
| verse_lines = त्वं फल्गुनो हरिहयो द्विजसत्तमो(सत्तपो) | | verse_lines = त्वं फल्गुनो हरिहयो द्विजसत्तमो(सत्तपो) वा¦मूर्तं(मर्त्यः) न मे प्रमुखतः स्थितिमन्य ईष्टे ।¦यो वाऽस्मि कोऽपि यदि ते क्षममद्य बाणान्¦मुञ्चान्यथैहि(यथेहि) रणतस्त्विति पार्थ आह ॥ १४०॥ | ||
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| verse_lines = कार्यं न मे द्विजवरैः प्रतियोधनेने- | | verse_lines = कार्यं न मे द्विजवरैः प्रतियोधनेने-¦त्युक्त्वा ययौ रविसुतः स सुयोधनाद्यैः ।¦नागाह्वयं पुरमथ द्रुपदात्मजां ताम्¦आदाय चार्जुनयुतः प्रययौ स भीमः ॥ १४१॥ | ||
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| verse_lines = अग्रेऽश्विपुत्रसहितः स तु | | verse_lines = अग्रेऽश्विपुत्रसहितः स तु धर्मसूनुः¦प्रायात् कुलालगृहमन्वपि भीमपार्थौ ।¦भिक्षेति तैरभिहिते प्रजगाद कुन्ती¦भुङ्ग्ध्वं समस्तश इति प्रददर्श कन्याम् ॥ १४२॥ | ||
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| verse_lines = प्रामादिकं च वचनं न मृषा | | verse_lines = प्रामादिकं च वचनं न मृषा तयोक्तं¦प्रायो हि तेन कथमेतदिति स्म चिन्ता ।¦तेषां बभूव वसुदेवसुतो हरिश्च¦तत्राऽजगाम परमेण हि सौहृदेन ॥ १४३॥ | ||
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| verse_lines = सम्भाष्य तैः स | | verse_lines = सम्भाष्य तैः स भगवानमितात्मशक्तिः¦प्रायान्निजां पुरममा यदुभिः समस्तैः ।¦ज्ञातुं च तान् निशि स तु द्रुपदः स्वपुत्रं¦प्रास्थापयत् स च विलीनं इमानपश्यत्(विलीन इमामपश्यत्) ॥ १४४॥ | ||
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| verse_lines = भिक्षान्नभोजिन उतो भगिनीं निजां च(इमां भगिनीं) | | verse_lines = भिक्षान्नभोजिन उतो भगिनीं निजां च(इमां भगिनीं)¦तत्रातितृप्तहृदयामथ युद्धवार्ताम् ।¦तेषां निशम्य नदतां धनवद् गभीरं¦क्षत्रोत्तमा इति मतिं स चकार वीरः ॥ १४५॥ | ||
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| verse_lines = प्रातस्तु तस्य जनितुर्वचसा | | verse_lines = प्रातस्तु तस्य जनितुर्वचसा पुरोधाः¦तान् प्राप्य मन्त्रविधिना मरुदात्मजेन ।¦सम्पूजितोऽतिविदुषा प्रतिगृह्य तांश्च¦प्रावेशयन्नृपतिगेहममैव मात्रा ॥ १४६॥ | ||
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| verse_lines = तानागतान् समभिपूज्य निजात्मजां | | verse_lines = तानागतान् समभिपूज्य निजात्मजां च¦विप्रादियोग्यपृथगुक्तपदार्थजातैः ।¦पूर्णान् गृहांश्चतुर एव दिदेश राजा¦तत्राऽयुधादिपरिपूर्णगृहं च तेऽगुः ॥ १४७॥ | ||
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| verse_lines = चेष्टास्वराकृतिविवक्षितवीर्यशौर्य- | | verse_lines = चेष्टास्वराकृतिविवक्षितवीर्यशौर्य-¦प्रागल्भ्यपूर्वकगुणैः क्षितिभर्तृपुत्रान् ।¦विज्ञाय तान् द्रुपद एत्य च धर्मसूनुं¦पप्रच्छ कोऽसि नरवर्य वदस्व सत्यम्(मह्यम्) ॥ १४८॥ | ||
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| verse_lines = स प्राह मन्दहसितः किमिहाद्य | | verse_lines = स प्राह मन्दहसितः किमिहाद्य राजन्¦पूर्वं हि वर्णविषये न विशेष उक्तः ।¦पुत्रीकृते तव सुतेन तु लक्ष्य(लक्ष)वेध¦उक्तो नरेन्द्रसमितौ स कृतोऽप्यनेन ॥ १४९॥ | ||
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| verse_lines = एवं ब्रुवाणमथ तं पृथया | | verse_lines = एवं ब्रुवाणमथ तं पृथया सहैव¦राजा वदेति पुनरेव ययाच एषः ।¦सर्वं पृथाऽप्यवदतां स च तेन तुष्टो¦वाचं जगाद कृतकृत्य इहाऽसमद्य ॥ १५०॥ | ||
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| verse_lines = व्यासं तमीक्ष्य (भगवन्तमगम्यपूर्ण)भगवन्तमगण्यपूर्ण- | | verse_lines = व्यासं तमीक्ष्य (भगवन्तमगम्यपूर्ण)भगवन्तमगण्यपूर्ण-¦नित्याव्ययात्मगुणमाशु समस्त एव ।¦नत्वाऽभिपूज्य वरपीठगतस्य चाऽज्ञाम्¦आदाय चोपविविशुः सहितास्तदन्ते ॥ १५३॥ | ||
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| verse_lines = दत्वाऽभयं स भगवान् द्रुपदस्य | | verse_lines = दत्वाऽभयं स भगवान् द्रुपदस्य कार्ये¦तेनोमिति स्म कथिते स्वयमेव सर्वाम् ।¦वैवाहिकीं कृतिमथ(विधिमथ) व्यदधाच्च धौम्य-¦युक्तः क्रमेण जगृहुर्निखिलाश्च पाणिम् ॥ १५८॥ | ||
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| verse_text = पाञ्चालकेषु च महोत्सव आस राजा | | verse_text = पाञ्चालकेषु च महोत्सव आस राजा | ||
| verse_lines = पाञ्चालकेषु च महोत्सव आस | | verse_lines = पाञ्चालकेषु च महोत्सव आस राजा¦तुष्टोऽभवत् सह सुतैः स्वजनैश्च सर्वैः(सुतैश्च निजैश्च सर्वैः) ।¦पौरैश्च जानपदिकैश्च यथैव रामे¦दत्वा सुतां जनक आप मुदं ततोऽनु ॥ १५९॥ | ||
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| verse_text = उद्बाह्य तत्र निवसत्सु च पाण्डवेषु | | verse_text = उद्बाह्य तत्र निवसत्सु च पाण्डवेषु | ||
| verse_lines = उद्बाह्य तत्र निवसत्सु च | | verse_lines = उद्बाह्य तत्र निवसत्सु च पाण्डवेषु¦श्रुत्वैव रामसहितः सह यादवैश्च ।¦आदाय पारिबर्हं बहुलं स कृष्ण¦आयान्मुदैव पृथया सहितांश्च पार्थान् ॥ १६०॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वैव तं मुमुदुराशु कुरुप्रवीरा | | verse_text = दृष्ट्वैव तं मुमुदुराशु कुरुप्रवीरा | ||
| verse_lines = दृष्ट्वैव तं मुमुदुराशु | | verse_lines = दृष्ट्वैव तं मुमुदुराशु कुरुप्रवीरा¦आश्लिष्य कृष्णमथ नेमुरसौ च कृष्णाम् ।¦दृष्ट्वा प्रदाय गृहयोग्यसमस्तभाण्डं¦सौवर्णमेभ्य उरु भूषणमच्युतोऽदात् ॥ १६१॥ | ||
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| verse_text = देवाङ्गयोग्यशुभकुण्डलहारमौलि- | | verse_text = देवाङ्गयोग्यशुभकुण्डलहारमौलि- | ||
| verse_lines = देवाङ्गयोग्यशुभकुण्डलहारमौलि- | | verse_lines = देवाङ्गयोग्यशुभकुण्डलहारमौलि-¦केयूरवस्त्रसहितान्युरुभूषणानि ।¦षण्णां पृथक्पृथगदात् पृथगेव योग्या-¦न्यन्यद् ददावथ पितृष्वसुरात्मयोग्यम् ॥ १६२॥ | ||
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| verse_text = रत्नानि गोगजतुरङ्गरथान् सुवर्ण- | | verse_text = रत्नानि गोगजतुरङ्गरथान् सुवर्ण- | ||
| verse_lines = रत्नानि गोगजतुरङ्गरथान् सुवर्ण- | | verse_lines = रत्नानि गोगजतुरङ्गरथान् सुवर्ण-¦भारान् बहूनपि ददावथ चाऽशिषोऽग्र्याः ।¦व्यासोऽप्यदादिह परत्र च(परत्र स) पार्षतोऽपि¦भूषारथाश्वगजरत्नसुकाञ्चनानि ॥ १६३॥ | ||
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| verse_text = दासीश्च दाससहिताः शुभरूपवेषाः | | verse_text = दासीश्च दाससहिताः शुभरूपवेषाः | ||
| verse_lines = दासीश्च दाससहिताः | | verse_lines = दासीश्च दाससहिताः शुभरूपवेषाः¦सहस्रशो ददतुरत्र हरिर्नृपश्च ।¦तासां विचित्रवसनान्युरुरत्नमालाः¦प्रत्येकशो ददतुरप्युरुभूषणानाम् ॥ १६४॥ | ||
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| verse_text = मासान् बहूनिह विहृत्य सहैव पार्थैः | | verse_text = मासान् बहूनिह विहृत्य सहैव पार्थैः | ||
| verse_lines = मासान् बहूनिह विहृत्य सहैव | | verse_lines = मासान् बहूनिह विहृत्य सहैव पार्थैः¦कृष्णो ययौ यदुपुरीं सहितोऽग्रजेन ।¦अन्तर्हिते भगवति प्रततोरुशक्तौ¦व्यासे च वत्सरमिहोषुरिमे तु पार्थाः ॥ १६५॥ | ||
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| verse_text = वैचित्रवीर्यतनयाः सह सौबलेन | | verse_text = वैचित्रवीर्यतनयाः सह सौबलेन | ||
| verse_lines = वैचित्रवीर्यतनयाः सह | | verse_lines = वैचित्रवीर्यतनयाः सह सौबलेन¦कर्णेन सिन्धुपतिना रथहस्तियौधैः ।¦भूरिश्रवः प्रभृतिभिश्च सहैव हन्तुं¦पाञ्चालराजमगुरेत्य पुरीं पुनस्ते ॥ १६६॥ | ||
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| verse_text = तैरर्दिते स्वपुर आशु स सोमकानां | | verse_text = तैरर्दिते स्वपुर आशु स सोमकानां | ||
| verse_lines = तैरर्दिते स्वपुर आशु स | | verse_lines = तैरर्दिते स्वपुर आशु स सोमकानां¦राजा सुतैः सह ससैनिक उद्गतोऽभूत् ।¦तेषां च तस्य च बभूव महान् विमर्दः¦पुत्रौ च तस्य निहतौ विधुताश्च सेनाः ॥ १६७॥ | ||
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| verse_text = चित्रे हते समर आशु सचित्रकेतौ | | verse_text = चित्रे हते समर आशु सचित्रकेतौ | ||
| verse_lines = चित्रे हते समर आशु | | verse_lines = चित्रे हते समर आशु सचित्रकेतौ¦धावत्सु सैनिकवरेषु च पार्षतस्य ।¦पार्था रथैरभिययुर्धृतचापबाणा¦वैचित्रवीर्यतनयान् रविसूनुयुक्तान् ॥ १६८॥ | ||
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| verse_lines = तैस्तेषु पञ्चसु समं | | verse_lines = तैस्तेषु पञ्चसु समं प्रतियोधयत्सु¦भूरिश्रवाः सरविजो विरथं चकार ।¦शक्रात्मजं तदनु पर्वतसन्निकाशं¦दोर्भ्यां तु मारुतिरुरुं तरुमुद्बबर्ह ॥ १६९॥ | ||
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| verse_text = आयान्तमीक्ष्य तरुहस्तमिमं समीर- | | verse_text = आयान्तमीक्ष्य तरुहस्तमिमं समीर- | ||
| verse_lines = आयान्तमीक्ष्य तरुहस्तमिमं समीर- | | verse_lines = आयान्तमीक्ष्य तरुहस्तमिमं समीर-¦सूनुं सुयोधनमुखा निखिलाः सकर्णाः ।¦भूरिश्रवाः शकुनिभूरिजयद्रथाश्च¦सर्वेऽपि दुद्रुवुरथो विविशुः पुरं स्वम् ॥ १७०॥ | ||
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| verse_lines = ज्ञात्वा समस्तमपि तद् विदुरोऽग्रजं | | verse_lines = ज्ञात्वा समस्तमपि तद् विदुरोऽग्रजं स्वं¦वर्द्धन्त एव तनया भवतो नरेन्द्र ।¦इत्याह सोऽपि मुदितः स्वसुतेन कृष्णा¦प्राप्तेति भूषणवराण्यदिशच्च वासः ॥ १७१॥ | ||
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| verse_lines = पार्था इति स्म विदुरोऽवददाशु | | verse_lines = पार्था इति स्म विदुरोऽवददाशु सोऽपि¦स्वाकारगूहनपरो यदि तर्ह्यतीव ।¦भद्रं मृता नहि पृथासहिताः स्म पार्थाः¦तेषां प्रवृत्तिमपि मे वद सर्वशस्त्वम् ॥ १७२॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्त आह विदुरः स हिडिम्बवध्या- | | verse_lines = इत्युक्त आह विदुरः स हिडिम्बवध्या-¦पूर्वां प्रवृत्तिमखिलामपि लक्ष्यवेधम्(लक्षवेधम्) ।¦उद्बाहमप्यथ नदीजमुखाश्च सर्वे¦तुष्टा बभूवुरपि वत्सरमूषुरेवम् ॥ १७३॥ | ||
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| verse_lines = श्रुत्वाऽथ कृष्णमुपयातमुरु | | verse_lines = श्रुत्वाऽथ कृष्णमुपयातमुरु प्रदाय¦रत्नं च पाण्डुतनयेषु गतं पुनश्च ।¦तातप्यमानहृदयास्तु सुयोधनाद्या¦मन्त्रं प्रचक्रुरथ कर्णमुखा युयुश्च ॥ १७४॥ | ||
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| verse_lines = युद्धाय तेषु पुनरेव रथैः प्रयाते- | | verse_lines = युद्धाय तेषु पुनरेव रथैः प्रयाते-¦ष्वाहाग्रजं स विदुरोऽपि नदीजमुख्यान् ।¦एते हि पापतमचेतस एत्य पार्थान्¦युद्धाय मृत्युमुपयान्ति न संशयोऽत्र ॥ १७५॥ | ||
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| verse_lines = भीमार्जुनौ विषहितुं नहि | | verse_lines = भीमार्जुनौ विषहितुं नहि कश्चनास्ति¦सामर्थ्ययुक् सुरवरेष्वपि वर्द्धितास्ते ।¦ज्ञात्वैव वत्सरत एव महानधर्मः¦तेषामुपेक्षणकृतस्तदलं नियुङ्क्ष्व ॥ १७६॥ | ||
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| verse_lines = आनीतये च विनियुज्य | | verse_lines = आनीतये च विनियुज्य सुसान्त्वपूर्वम्¦आनीय योजय नृपेषु(नृपैषु) तथाऽर्द्धराज्यम् ।¦एवं कृते(कृतं) तव भवेत् कुलवृद्धये हि¦धर्माय चोभयविनाशकरोऽन्यथा स्याः ॥ १७७॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तवत्यनु | | verse_lines = इत्युक्तवत्यनु तथेत्यवदन्नदीजो¦द्रोणः कृपश्च विदुरं स नृपोऽप्युवाच ।¦याह्यानयेति स च वेगवता रथेन¦तत्रागमत् तदनु तैरभिपूजितश्च ॥ १७८॥ | ||
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| verse_lines = तत्काल एव वसुदेवसुतश्च | | verse_lines = तत्काल एव वसुदेवसुतश्च कृष्णो¦व्यासश्च तानुपसमेत्य दुरन्तशक्ती ।¦आदाय कुन्तिसहितान् विदुरेण युक्तौ¦नागाह्वयं पुरमितां सह भार्ययैव ॥ १७९॥ | ||
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| verse_lines = तेष्वागतेषु सुमहानभवत् | | verse_lines = तेष्वागतेषु सुमहानभवत् प्रहर्षः¦पौरस्य जानपदिकस्य जनस्य चोच्चैः ।¦भीष्मादिकाश्च मुदिताः प्रतिपूज्य गेहम्¦आवेशयन् सह नृपेण महोत्सवेन ॥ १८०॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णामपूजयदतीव च सौबली | | verse_lines = कृष्णामपूजयदतीव च सौबली सा¦दुर्योधनस्य दयितासहिताऽत्र तेऽपि ।¦ऊषुस्ततश्च निजपुत्रकदुर्विनीत्या¦कृष्णानिमित्तमुरुभीतित आह भीमात् ॥ १८१॥ | ||
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| verse_lines = कुन्ति प्रयाहि सहिता स्नुषया गृहं | | verse_lines = कुन्ति प्रयाहि सहिता स्नुषया गृहं स्वं¦भीमाद् बिभेमि निजपुत्रकदुर्विनीत्या ।¦कृष्णा त्रिलोकवनिताधिकरूपसारा¦यस्मादिति स्म ससुता प्रययौ गृहं सा ॥ १८२॥ | ||
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| verse_lines = ऊषुस्तथैव परिवत्सरपञ्चकं | | verse_lines = ऊषुस्तथैव परिवत्सरपञ्चकं ते¦पाण्डोर्गृहे सुसुखिनोऽखिलभोगयुक्ताः ।¦कृष्णा च तेषु पृथगेव चतुःस्वरूपा¦रेमे तथैकतनुरप्यभिमानिभेदात् ॥ १८३॥ | ||
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| verse_lines = कन्यैव साऽभवदतः प्रतिवासरं | | verse_lines = कन्यैव साऽभवदतः प्रतिवासरं च¦जन्माभवद्ध्यभिमतेः पृथगेव नाशात् ।¦प्रायो हि नाभिमतिनाशमवाप वाणी¦तस्मान्मरुच्च सकलेष्वभिविष्ट(सकलेष्वनुविष्ट) आसीत् ॥ १८४॥ | ||
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| verse_lines = धर्मात्मजादिषु मरुत् प्रतिविष्ट | | verse_lines = धर्मात्मजादिषु मरुत् प्रतिविष्ट एषां¦बुद्धिं विमोह्य(विपोह्य) रमते सततं तया यत् ।¦शुद्धैव सा हि तत एव दिनेदिने च¦सम्मोहतो मरणवद् भवतीह कन्या ॥ १८५॥ | ||
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| verse_lines = नो सुप्तिवत्(सुप्तवत्) त्विदमतोऽन्यवशत्वतो | | verse_lines = नो सुप्तिवत्(सुप्तवत्) त्विदमतोऽन्यवशत्वतो हि¦देहस्य संस्मृतित एव हरेर्न मोहः ।¦नाऽवेशवच्च तत एव मृतेः स्वरूपम्¦एतत् त्वतः प्रतिदिनं जननाद्धि कन्या ॥ १८६॥ | ||
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| verse_lines = एवं स वायुरनुविष्टयुधिष्ठिरादि- | | verse_lines = एवं स वायुरनुविष्टयुधिष्ठिरादि-¦भीमात्मनैव रमते सततं तयैकः ।¦अन्यादृशा(अन्यादृशी) हि सुरभुक्तिरतोऽन्यरूपा¦मानुष्यभुक्तिरिति नात्र विचार्यमस्ति ॥ १८७॥ | ||
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| verse_lines = पूर्वं हि तेषु वनगेषु बभूव काशि- | | verse_lines = पूर्वं हि तेषु वनगेषु बभूव काशि-¦राज्ञः सुताकृत उरुक्षितिपालयोगः ।¦तत्र स्वयम्बरगतां धृतराष्ट्रपुत्रः¦कन्यां बलाज्जगृह आत्मबलातिदृप्तः ॥ १८९॥ | ||
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| verse_lines = पूर्वं हि राजगणने | | verse_lines = पूर्वं हि राजगणने मगधाधिराजः¦सङ्ख्यात इत्यतिरुषा प्रगृहीतकन्ये ।¦दुर्योधने नृपतयो युयुधुः स्म तेन¦भग्नाश्च कर्णसहितेन सहानुजेन ॥ १९०॥ | ||
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| verse_lines = एकोऽहमेव नृपतीन् | | verse_lines = एकोऽहमेव नृपतीन् प्रतियोधयिष्य¦एतैर्मयि प्रतिजितेऽपि न तेऽस्त्यकीर्तिः ।¦एकं च तेऽनुजमिमे यदि पौरुषेण¦गृह्णीयुरत्र तव कीर्तिरुपैति नाशम् ॥ १९३॥ | ||
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| verse_lines = भीष्मादयोऽपि नहि योधयितुं | | verse_lines = भीष्मादयोऽपि नहि योधयितुं समर्था¦राज्ञा ह्यनेन तत एव हि(च) बाह्लिकोऽस्य ।¦भृत्यो बभूव नतु भीष्ममयं युधेऽगाद्¦राजा नहीति नच तेन विरोध आसीत् ॥ १९४॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्त आशु स विमृश्य ययौ पुरं स्वं | | verse_text = इत्युक्त आशु स विमृश्य ययौ पुरं स्वं | ||
| verse_lines = इत्युक्त आशु स विमृश्य ययौ पुरं | | verse_lines = इत्युक्त आशु स विमृश्य ययौ पुरं स्वं¦कर्णोऽपि तैः प्रतियुयोध जिगाय चैनान्(चैतान्) ।¦कर्णस्य वीर्यमगणय्य जरासुतोऽपि¦ह्येकैकमेव नृपतिं स दिदेश योद्धुम् ॥ १९५॥ | ||
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| verse_text = सर्वेषु तेषु विजितेष्वभिजग्मिवान् स | | verse_text = सर्वेषु तेषु विजितेष्वभिजग्मिवान् स | ||
| verse_lines = सर्वेषु तेषु विजितेष्वभिजग्मिवान् | | verse_lines = सर्वेषु तेषु विजितेष्वभिजग्मिवान् स¦योद्धुं बृहद्रथसुतोऽप्यमुना रथेन ।¦तं चैव रामवरतो विरथं विशस्त्रं¦चक्रे स चैनमथ मुष्टिभिरभ्युपेतौ ॥ १९६॥ | ||
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| verse_text = सन्धौ यदैव जरया प्रतिसन्धितस्य | | verse_text = सन्धौ यदैव जरया प्रतिसन्धितस्य | ||
| verse_lines = सन्धौ यदैव जरया | | verse_lines = सन्धौ यदैव जरया प्रतिसन्धितस्य¦कर्णो जघान न परत्र तुतोष राजा ।¦न ज्ञातमेतदपि हो हलिना तदेतत्¦ज्ञातं त्वया भव ततो मम भृत्य एव ॥ १९७॥ | ||
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| verse_text = एवंविधं सुकुशलं बहुयुद्धशौण्डं | | verse_text = एवंविधं सुकुशलं बहुयुद्धशौण्डं | ||
| verse_lines = एवंविधं सुकुशलं | | verse_lines = एवंविधं सुकुशलं बहुयुद्धशौण्डं¦न त्वां हनिष्य उत ते पितुरेव पूर्वम् ।¦बाह्वोर्बलादभिहृतं हि मयाऽङ्गराज्यं¦तत् त्वं गृहाण युधि कर्मकरश्च मे स्याः ॥ १९८॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्त आशु स तथैव चकार कर्णः | | verse_text = इत्युक्त आशु स तथैव चकार कर्णः | ||
| verse_lines = इत्युक्त आशु स तथैव चकार | | verse_lines = इत्युक्त आशु स तथैव चकार कर्णः¦पूर्वं हि तस्य निजराज्यपदैकदेशः ।¦दुर्योधनेन विहितो मगधाधिराजं¦जित्वा वृकोदरहृतः पितुरेव दत्तः ॥ १९९॥ | ||
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| verse_lines = अङ्गाधिराज्यमुपलभ्य | | verse_lines = अङ्गाधिराज्यमुपलभ्य जरासुतस्य¦स्नेहं च सूर्यसुत आशु कुरून् जगाम ।¦दृष्ट्वैव तं मुमुदिरे धृतराष्ट्रपुत्रा¦नानेन तुल्यमधिजग्मुरतो हरिं च ॥ २००॥ | ||
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| verse_text = उद्वाह्य काशितनयां गिरिजाधिविष्टां(गिरिजाभिविष्टां) | | verse_text = उद्वाह्य काशितनयां गिरिजाधिविष्टां(गिरिजाभिविष्टां) | ||
| verse_lines = उद्वाह्य काशितनयां गिरिजाधिविष्टां(गिरिजाभिविष्टां) | | verse_lines = उद्वाह्य काशितनयां गिरिजाधिविष्टां(गिरिजाभिविष्टां)¦साक्षान्नरेषु जनितां प्रथमामलक्ष्मीम् ।¦तस्यां सुतं त्वजनयत् पुर आस योऽक्षः¦कन्यां पुरा प्रियतमां च षडाननस्य ॥ २०१॥ | ||
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| verse_text = पुत्रो बभूव स तु लक्षणनामधेयः | | verse_text = पुत्रो बभूव स तु लक्षणनामधेयः | ||
| verse_lines = पुत्रो बभूव स तु | | verse_lines = पुत्रो बभूव स तु लक्षणनामधेयः¦सा लक्षणेत्यधिकरूपगुणाऽऽस कन्या ।¦तस्यानुजाश्च निजयोग्यगुणा अवापुः¦भार्याः पुनश्च स सुयोधन आप भार्याः(आप भार्याम्) ॥ २०२॥ | ||
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| verse_text = पूर्वं सुरान्तक इति प्रथितः सुतोऽभूद् | | verse_text = पूर्वं सुरान्तक इति प्रथितः सुतोऽभूद् | ||
| verse_lines = पूर्वं सुरान्तक इति प्रथितः | | verse_lines = पूर्वं सुरान्तक इति प्रथितः सुतोऽभूद्¦दुःशासनस्य तदनु प्रतितप्यमानाः ।¦दृष्ट्वैव पार्थबलवीर्यगुणान् समृद्धिं¦तां चैव ते प्रतिययुः स्म कलिङ्गदेशम् ॥ २०३॥ | ||
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| verse_text = आसीत् स्वयंवर उतात्र कलिङ्गराज- | | verse_text = आसीत् स्वयंवर उतात्र कलिङ्गराज- | ||
| verse_lines = आसीत् स्वयंवर उतात्र कलिङ्गराज- | | verse_lines = आसीत् स्वयंवर उतात्र कलिङ्गराज-¦पुत्र्याः सुवज्र इति यं प्रवदन्ति भूपाः ।¦रौद्राद् वरादविजितस्य च तस्य कन्यां¦दृप्तो बलात् स जगृहे धृतराष्ट्रसूनुः ॥ २०४॥ | ||
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| verse_lines = तत्राथ रुद्रवरतः स | | verse_lines = तत्राथ रुद्रवरतः स जरासुतेन¦युक्तो बबन्ध च सुयोधनमाशु जित्वा ।¦कर्णः पराद्रवदिह स्म सुतेषु पाण्डोः¦यस्मात् स्पृधाऽगमदतः स पराजितोऽभूत् ॥ २०५॥ | ||
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| verse_lines = दुर्योधनेऽनुजजनैः सह | | verse_lines = दुर्योधनेऽनुजजनैः सह तैर्गृहीते¦भीष्माम्बिकेयविदुराग्रजवाक्यनुन्नः ।¦भीमो विजित्य नृपतीन् सजरासुतांस्तान्¦हत्वा सुवज्रममुचद् धृतराष्ट्रपुत्रान् ॥ २०६॥ | ||
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| verse_lines = तेऽपि स्म कर्णसहिता | | verse_lines = तेऽपि स्म कर्णसहिता मृतकप्रतीका¦नागाह्वयं पुरमथाऽययुरप्यमीषाम् ।¦दृष्ट्वा विरोधमवदन्नृपतिश्च धर्म-¦पुत्रं पुरन्दरकृतस्थलमाशु याहि ॥ २०७॥ | ||
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| verse_lines = तत्रार्द्धराज्यमनुभुङ्क्ष्व | | verse_lines = तत्रार्द्धराज्यमनुभुङ्क्ष्व सहानुजैस्त्वं¦कोशार्द्धमेव च गृहाण पुरा हि शक्रः ।¦तत्राभिषिक्त उत कञ्जभवादिदेवैः¦तत्रस्थ एव स चकार चिरं च राज्यम् ॥ २०८॥ | ||
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| verse_lines = त्वं वीर शक्रसम एव | | verse_lines = त्वं वीर शक्रसम एव ततस्तवैव¦योग्यं पुरं तदत आश्वभिषेचयामि ।¦इत्युक्त आह स युधिष्ठिर ओमिति स्म¦चक्रेऽभिषेकमपि तस्य स आम्बिकेयः ॥ २०९॥ | ||
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| verse_lines = तस्याभिषेकमकरोत् प्रथमं हि | | verse_lines = तस्याभिषेकमकरोत् प्रथमं हि कृष्णो¦वासिष्ठनन्दन उरुर्भव चक्रवर्ती ।¦यष्टाऽश्वमेधनिखिलात्मकराजसूय-¦पूर्वैर्मखैः सततमेव च धर्मशीलः ॥ २१०॥ | ||
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| verse_lines = इत्येव | | verse_lines = इत्येव पार्षतसुतासहितेऽभिषिक्ते¦कृष्णोऽपि वृष्णिवृषभः स तथाऽभ्यषिञ्चत् ।¦एवं च मारुतिशिरस्यभिषेकमेतौ¦सञ्चक्रतुः स्म युवराजपदे सभार्यम् ॥ २११॥ | ||
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| verse_lines = भीमे च | | verse_lines = भीमे च पार्षतसुतासहितेऽभिषिक्ते¦ताभ्यामनन्तसुखशक्तिचिदात्मकाभ्याम् ।¦अन्यैश्च विप्रवृषभैः सुकृतेऽभिषेके(सुकृताभिषेके)¦धर्मात्मजानु मुमुदुर्निखिलाश्च सन्तः ॥ २१२॥ | ||
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| verse_lines = तस्मिन् महोत्सववरे दिनसप्तकानु- | | verse_lines = तस्मिन् महोत्सववरे दिनसप्तकानु-¦वृत्ते वसिष्ठवृषभेण च वृष्णिपेन ।¦कृष्णेन ते युयुरमा पृथया तया च¦पाञ्चालराजसुतया स्थलमिन्द्रवासम् ॥ २१३॥ | ||
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| verse_lines = कोशस्य चार्द्धसहितास्तु यदैव | | verse_lines = कोशस्य चार्द्धसहितास्तु यदैव पार्था¦गच्छन्ति ताननुययुर्निखिलाश्च पौराः ।¦ऊचुश्च हा बत सुयोधन एष पापो¦दूरे चकार ननु पाण्डुसुतान् गुणाढ्यान् ॥ २१४॥ | ||
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| verse_lines = भीमप्रतापमवलम्ब्य | | verse_lines = भीमप्रतापमवलम्ब्य कलिङ्गबन्धान्¦मुक्तः सुतामपि हि तस्य पुरं निनाय ।¦द्वेष्ट्येवमप्यतिबलान् हि सदैव पार्थान्¦यामो वयं गुणिभिरद्य सहैव पार्थैः ॥ २१५॥ | ||
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| verse_lines = आज्ञापयत्यपि स भेरिरवेण | | verse_lines = आज्ञापयत्यपि स भेरिरवेण पार्थान्¦नैवानुगच्छत यदि व्रजथानु वोऽद्य ।¦वित्तं हरिष्य इह सर्वमपीति तच्च¦पापः करोतु न वयं विजहाम पार्थान् ॥ २१६॥ | ||
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| verse_lines = सद्भिर्हि सङ्गतिरिहैव सुखस्य हेतुः(सुखैकहेतुः) | | verse_lines = सद्भिर्हि सङ्गतिरिहैव सुखस्य हेतुः(सुखैकहेतुः)¦मोक्षैकहेतुरथ(मोक्षैकहेतुरुत) तद्विपरीतमन्यत् ।¦तस्माद् व्रजेम सह पाण्डुसुतैर्हि शक्र-¦प्रस्थं त्विति स्म धृतचेतस आह धार्मः(धर्मः) ॥ २१७॥ | ||
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| verse_lines = प्रीतिर्यदि स्म भवतां मयि | | verse_lines = प्रीतिर्यदि स्म भवतां मयि सानुजेऽस्ति¦तिष्ठध्वमत्र पितुरेव हि शासने मे ।¦कीर्तिर्हि वोऽनुगमनात् पितुरत्ययेन¦नश्येन्न इत्यनुसरध्वमिहाऽम्बिकेयम् ॥ २१८॥ | ||
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| verse_lines = इत्येव तैः पुरजना | | verse_lines = इत्येव तैः पुरजना निखिलैर्निषिद्धाः¦कृच्छ्रेण तस्थुरपि तान् मनसाऽन्वगच्छन् ।¦प्राप्याथ शक्रपुरमस्मरतां च कृष्णौ¦देवेशवर्धकिमथाऽगमदत्र सोऽपि ॥ २१९॥ | ||
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| verse_lines = वासिष्ठपेन यदुपेन च | | verse_lines = वासिष्ठपेन यदुपेन च पाण्डवानां¦रत्नोत्करं कुरु पुरं पुरुहूतपुर्याः ।¦सादृश्यतस्त्विति नियुक्त उभौ प्रणम्य¦सर्वेश्वरौ स कृतवांश्च पुरं तथैव ॥ २२०॥ | ||
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| verse_lines = देशं च नातिजनसंवृतमन्यदेश- | | verse_lines = देशं च नातिजनसंवृतमन्यदेश-¦संस्थैर्जनैरभिपुपूरिर आशु पार्थाः ।¦तेषां गुणैर्हरिपदानतिहेतुतश्च¦राष्ट्रान्तरा इह शुभा वसतीः स्म चक्रुः ॥ २२१॥ | ||
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| verse_lines = प्रस्थाप्य दूरमनुजस्य सुतान् स | | verse_lines = प्रस्थाप्य दूरमनुजस्य सुतान् स राजा¦चक्रेऽभिषेकमपि तत्र सुयोधनस्य ।¦दुःशासनं च युवराजमसौ विधाय¦मेने कृतार्थमिव च स्वमशान्तकामः ॥ २२२॥ | ||
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| verse_lines = पार्थाश्च ते मुमुदुरत्र वसिष्ठवृष्णि- | | verse_lines = पार्थाश्च ते मुमुदुरत्र वसिष्ठवृष्णि-¦वर्योदितानखिलतत्त्वविनिर्णयांस्तु ।¦शृण्वन्त एव हि सदा पृथिवीं च धर्माद्¦भुञ्जन्त आश्रितरमापतिपादयुग्माः ॥ २२३॥ | ||
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<span id="gr-C20" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="विंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C20" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="विंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ यज्ञोरुदाननरदेववन्द्यताप्रश्नर्षिपूजासु युधिष्ठिरोऽभूत् । | | verse_text = औं ॥ यज्ञोरुदाननरदेववन्द्यताप्रश्नर्षिपूजासु युधिष्ठिरोऽभूत् । | ||
| verse_lines = औं ॥ यज्ञोरुदाननरदेववन्द्यताप्रश्नर्षिपूजासु युधिष्ठिरोऽभूत् | | verse_lines = औं ॥ यज्ञोरुदाननरदेववन्द्यताप्रश्नर्षिपूजासु युधिष्ठिरोऽभूत् ।¦धर्मानुशास्तिहरितत्त्वशंसनस्वराष्ट्ररक्षादिषु भीम आसीत् ॥ १॥ | ||
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| verse_text = नावैष्णवो न दरिद्रो बभूव न धर्महानिश्च बभूव कस्यचित् । | | verse_text = नावैष्णवो न दरिद्रो बभूव न धर्महानिश्च बभूव कस्यचित् । | ||
| verse_lines = नावैष्णवो न दरिद्रो बभूव न धर्महानिश्च बभूव कस्यचित् | | verse_lines = नावैष्णवो न दरिद्रो बभूव न धर्महानिश्च बभूव कस्यचित् ।¦तेषां राष्ट्रे शासति भीमसेने न व्याधितो नापि विपर्ययान्मृतिः ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = युधिष्ठिरं यान्ति हि दर्शनोत्सुकाः प्रतिग्रहायाप्यथ याजनाय । | | verse_text = युधिष्ठिरं यान्ति हि दर्शनोत्सुकाः प्रतिग्रहायाप्यथ याजनाय । | ||
| verse_lines = युधिष्ठिरं यान्ति हि दर्शनोत्सुकाः प्रतिग्रहायाप्यथ याजनाय | | verse_lines = युधिष्ठिरं यान्ति हि दर्शनोत्सुकाः प्रतिग्रहायाप्यथ याजनाय ।¦कार्यार्थिनो(कार्यार्थतो) नैव वृकोदरेण कार्याणि सिद्ध्यन्ति(सिद्धानि) यतोऽखिलानि ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = गन्धर्वविद्याधरचारणाश्च सेवन्त एतान्त्सततं समस्ताः । | | verse_text = गन्धर्वविद्याधरचारणाश्च सेवन्त एतान्त्सततं समस्ताः । | ||
| verse_lines = गन्धर्वविद्याधरचारणाश्च सेवन्त एतान्त्सततं समस्ताः | | verse_lines = गन्धर्वविद्याधरचारणाश्च सेवन्त एतान्त्सततं समस्ताः ।¦यथा सुरेन्द्रं मुनयश्च सर्व आयान्ति देवा अपि कृष्णमर्चितुम् ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = तेषां राष्ट्रे कार्तयुगा हि धर्माः प्रवर्तिता एव ततोऽधिकाश्च । | | verse_text = तेषां राष्ट्रे कार्तयुगा हि धर्माः प्रवर्तिता एव ततोऽधिकाश्च । | ||
| verse_lines = तेषां राष्ट्रे कार्तयुगा हि धर्माः प्रवर्तिता एव ततोऽधिकाश्च | | verse_lines = तेषां राष्ट्रे कार्तयुगा हि धर्माः प्रवर्तिता एव ततोऽधिकाश्च ।¦वृद्धिश्च तस्मादधिका सुवर्णरत्नाम्बरादेरपि सस्यसम्पदाम् ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = अथोपयेमे शिशुपालपुत्रीं युधिष्ठिरो देवकीं नाम पूर्वम्(पूर्वाम्) । | | verse_text = अथोपयेमे शिशुपालपुत्रीं युधिष्ठिरो देवकीं नाम पूर्वम्(पूर्वाम्) । | ||
| verse_lines = अथोपयेमे शिशुपालपुत्रीं युधिष्ठिरो देवकीं नाम पूर्वम्(पूर्वाम्) | | verse_lines = अथोपयेमे शिशुपालपुत्रीं युधिष्ठिरो देवकीं नाम पूर्वम्(पूर्वाम्) ।¦स्वीयां भार्यां यत्सहजो धृष्टकेतुरनुह्लादः सवितुश्चांशयुक्तः ॥ ११॥ | ||
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| verse_text = तस्यां सुहोत्रो नामतः पुत्र आसीद् यश्चित्रगुप्तो नाम पूर्वं सुलेखः । | | verse_text = तस्यां सुहोत्रो नामतः पुत्र आसीद् यश्चित्रगुप्तो नाम पूर्वं सुलेखः । | ||
| verse_lines = तस्यां सुहोत्रो नामतः पुत्र आसीद् यश्चित्रगुप्तो नाम पूर्वं सुलेखः | | verse_lines = तस्यां सुहोत्रो नामतः पुत्र आसीद् यश्चित्रगुप्तो नाम पूर्वं सुलेखः ।¦कृष्णा सैवाऽप्यन्यरूपेण जाता काशीशपुत्री यां प्रवदन्ति कालीम् ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = सा केवला भारती नान्यदेव्यस्तत्राऽविष्टास्तत्कृते(तत्राविष्टा यत्कृते) काशिराजः । | | verse_text = सा केवला भारती नान्यदेव्यस्तत्राऽविष्टास्तत्कृते(तत्राविष्टा यत्कृते) काशिराजः । | ||
| verse_lines = सा केवला भारती नान्यदेव्यस्तत्राऽविष्टास्तत्कृते(तत्राविष्टा यत्कृते) काशिराजः | | verse_lines = सा केवला भारती नान्यदेव्यस्तत्राऽविष्टास्तत्कृते(तत्राविष्टा यत्कृते) काशिराजः ।¦स्वयम्बरार्थं नृपतीनाजुहाव सर्वांस्तेऽपि ह्यत्र हर्षात् समेताः ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = तेषां मध्ये भीमसेनांस एषा मालामधात् तत्र जरासुताद्याः । | | verse_text = तेषां मध्ये भीमसेनांस एषा मालामधात् तत्र जरासुताद्याः । | ||
| verse_lines = तेषां मध्ये भीमसेनांस एषा मालामधात् तत्र जरासुताद्याः | | verse_lines = तेषां मध्ये भीमसेनांस एषा मालामधात् तत्र जरासुताद्याः ।¦क्रुद्धा विष्णोराश्रितानाक्षिपन्त आसेदुरुच्चैः शिवमास्तुवन्तः ॥ १४॥ | ||
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| verse_text = पूर्वं वाक्यैर्वैदिकैस्तान्स भीमो जिग्ये तर्कैः साधुभिः सम्प्रयुक्तैः । | | verse_text = पूर्वं वाक्यैर्वैदिकैस्तान्स भीमो जिग्ये तर्कैः साधुभिः सम्प्रयुक्तैः । | ||
| verse_lines = पूर्वं वाक्यैर्वैदिकैस्तान्स भीमो जिग्ये तर्कैः साधुभिः सम्प्रयुक्तैः | | verse_lines = पूर्वं वाक्यैर्वैदिकैस्तान्स भीमो जिग्ये तर्कैः साधुभिः सम्प्रयुक्तैः ।¦वेदा ह्यदोषा इति पूर्वमेव संसाधयित्वैव सदागमैश्च ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = वेदाधिक्यं शैवशास्त्राणि चाऽहुर्वेदोज्झितानां बहुलां च निन्दाम् । | | verse_text = वेदाधिक्यं शैवशास्त्राणि चाऽहुर्वेदोज्झितानां बहुलां च निन्दाम् । | ||
| verse_lines = वेदाधिक्यं शैवशास्त्राणि चाऽहुर्वेदोज्झितानां बहुलां च निन्दाम् | | verse_lines = वेदाधिक्यं शैवशास्त्राणि चाऽहुर्वेदोज्झितानां बहुलां च निन्दाम् ।¦तथा शाक्तेयस्कान्दसौरादिकानां तत्रैवोक्तं छन्दसां वैष्णवत्वम् ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = विष्णोराधिक्यं तानि शास्त्राणि चाऽहुः शिवादिभ्यः कुत्रचिन्नैव वेदे । | | verse_text = विष्णोराधिक्यं तानि शास्त्राणि चाऽहुः शिवादिभ्यः कुत्रचिन्नैव वेदे । | ||
| verse_lines = विष्णोराधिक्यं तानि शास्त्राणि चाऽहुः शिवादिभ्यः कुत्रचिन्नैव वेदे | | verse_lines = विष्णोराधिक्यं तानि शास्त्राणि चाऽहुः शिवादिभ्यः कुत्रचिन्नैव वेदे ।¦विष्णूत्कृष्टः(विष्णूत्कर्षः) कथितो बौद्धपूर्वाश्चाऽहुर्विष्णुं परमं सर्वतोऽपि ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = लोकायताश्च क्वचिदाहुरग्र्यं विष्णुं गुरुं सर्ववरं बृहस्पतेः । | | verse_text = लोकायताश्च क्वचिदाहुरग्र्यं विष्णुं गुरुं सर्ववरं बृहस्पतेः । | ||
| verse_lines = लोकायताश्च क्वचिदाहुरग्र्यं विष्णुं गुरुं सर्ववरं बृहस्पतेः | | verse_lines = लोकायताश्च क्वचिदाहुरग्र्यं विष्णुं गुरुं सर्ववरं बृहस्पतेः ।¦सर्वागमेषु प्रथितोऽत एव विष्णुः समस्ताधिक एव मुक्तिदः ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = तेष्वागमेष्वेव परस्परं च विरुद्धता ह्यन्यपक्षेषु भूपाः । | | verse_text = तेष्वागमेष्वेव परस्परं च विरुद्धता ह्यन्यपक्षेषु भूपाः । | ||
| verse_lines = तेष्वागमेष्वेव परस्परं च विरुद्धता ह्यन्यपक्षेषु भूपाः | | verse_lines = तेष्वागमेष्वेव परस्परं च विरुद्धता ह्यन्यपक्षेषु भूपाः ।¦प्रत्यक्षतश्चात्र पश्यध्वमाशु बलं बाह्वोर्मे विष्णुपदाश्रयस्य ॥ १९॥ | ||
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| verse_text = पूर्वं हि गङ्गा मम विष्णुपूजाविघ्नार्थमायाद् वामकरेण सा मे । | | verse_text = पूर्वं हि गङ्गा मम विष्णुपूजाविघ्नार्थमायाद् वामकरेण सा मे । | ||
| verse_lines = पूर्वं हि गङ्गा मम विष्णुपूजाविघ्नार्थमायाद् वामकरेण सा मे | | verse_lines = पूर्वं हि गङ्गा मम विष्णुपूजाविघ्नार्थमायाद् वामकरेण सा मे ।¦नुन्ना परस्ताद् बहुयोजनं गता पुरे कुरूणां शिव आगतस्तदा ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = स व्याघ्ररूपी कपिलात्मिकामुमां(कपिलात्मकामुमां) परीक्षयन् मां हन्तुमिवाऽद्रवद् द्रुतम् । | | verse_text = स व्याघ्ररूपी कपिलात्मिकामुमां(कपिलात्मकामुमां) परीक्षयन् मां हन्तुमिवाऽद्रवद् द्रुतम् । | ||
| verse_lines = स व्याघ्ररूपी कपिलात्मिकामुमां(कपिलात्मकामुमां) परीक्षयन् मां हन्तुमिवाऽद्रवद् द्रुतम् | | verse_lines = स व्याघ्ररूपी कपिलात्मिकामुमां(कपिलात्मकामुमां) परीक्षयन् मां हन्तुमिवाऽद्रवद् द्रुतम् ।¦स मे युद्धे विजितो मूर्च्छितश्च गदाप्रहारादास लिङ्गान्तरस्थः ॥ २१॥ | ||
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| verse_text = व्याघ्रेश्वरं नाम लिङ्गं पृथिव्यां ख्यातं तदास्ते तद्वदन्यत्र युद्धे । | | verse_text = व्याघ्रेश्वरं नाम लिङ्गं पृथिव्यां ख्यातं तदास्ते तद्वदन्यत्र युद्धे । | ||
| verse_lines = व्याघ्रेश्वरं नाम लिङ्गं पृथिव्यां ख्यातं तदास्ते तद्वदन्यत्र युद्धे | | verse_lines = व्याघ्रेश्वरं नाम लिङ्गं पृथिव्यां ख्यातं तदास्ते तद्वदन्यत्र युद्धे ।¦तीरे गोमत्या हैमवते गिरौ हि जितस्तत्राप्यास शार्दूललिङ्गम् ॥ २२॥ | ||
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| verse_text = एवं प्रत्यक्षे विष्णुपदाश्रयस्य बलाधिक्ये किमु वक्तव्यमत्र । | | verse_text = एवं प्रत्यक्षे विष्णुपदाश्रयस्य बलाधिक्ये किमु वक्तव्यमत्र । | ||
| verse_lines = एवं प्रत्यक्षे विष्णुपदाश्रयस्य बलाधिक्ये किमु वक्तव्यमत्र | | verse_lines = एवं प्रत्यक्षे विष्णुपदाश्रयस्य बलाधिक्ये किमु वक्तव्यमत्र ।¦विष्णोराधिक्ये क्षत्रियाणां प्रमाणं बलं विप्रे ज्ञानमेवेति चाऽहुः ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = मया केदारे विप्ररूपी जितश्च रुद्रोऽविशल्लिङ्गमेवाऽशु भीतः | | verse_lines = मया केदारे विप्ररूपी जितश्च रुद्रोऽविशल्लिङ्गमेवाऽशु भीतः ।¦ततः परं वेदविदामगम्यताशापं प्रादाच्छङ्करो व्रीडितोऽत्र ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = एवं प्रत्यक्षे विष्णुबले प्रतीपं मनो यस्य ह्युत्तरं स ब्रवीतु । | | verse_text = एवं प्रत्यक्षे विष्णुबले प्रतीपं मनो यस्य ह्युत्तरं स ब्रवीतु । | ||
| verse_lines = एवं प्रत्यक्षे विष्णुबले प्रतीपं मनो यस्य ह्युत्तरं स ब्रवीतु | | verse_lines = एवं प्रत्यक्षे विष्णुबले प्रतीपं मनो यस्य ह्युत्तरं स ब्रवीतु ।¦क्रोधोऽधिकश्चेत् क्षिप्रमायातु योद्धुमित्युक्तास्तेऽभ्याययुरात्तशस्त्राः ॥ २५॥ | ||
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| verse_lines = विद्राप्य(विद्राव्य) तान् बाणसङ्घैः समस्तान् जरासुतं गदया योधयित्वा(पोथयित्वा) | | verse_lines = विद्राप्य(विद्राव्य) तान् बाणसङ्घैः समस्तान् जरासुतं गदया योधयित्वा(पोथयित्वा) ।¦बाहुभ्यां चैनं परिगृह्याऽशु विष्णोः पादोत्थायां(पादोत्थायां) प्राक्षिपद् देवनद्याम् ॥ २६॥ | ||
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| verse_lines = स व्रीडितः प्रययौ मागधांश्च भूपैः समेतो भीमसेनो रथं स्वम् | | verse_lines = स व्रीडितः प्रययौ मागधांश्च भूपैः समेतो भीमसेनो रथं स्वम् ।¦आरुह्य काशीश्वरपूजितश्च ययौ काल्या शक्रसनामकं पुरम् ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = तस्यां त्रिलोकाधिकरूपसद्गुणैरासम्मितायां (आसम्मतायां) रममाणः सुतं च | | verse_lines = तस्यां त्रिलोकाधिकरूपसद्गुणैरासम्मितायां (आसम्मतायां) रममाणः सुतं च ।¦शर्वत्रातं(शर्वत्रातः) नामाजनयत्(नाम्नाऽजनयत्) पुरा यः समानवायुर्बलवीर्ययुक्तः ॥ २८॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णोऽपि गत्वा द्वारवतीं सरामः सत्यापितुर्वधकर्तारमेव | | verse_lines = कृष्णोऽपि गत्वा द्वारवतीं सरामः सत्यापितुर्वधकर्तारमेव ।¦शतधन्वानं हन्तुमैच्छत् स चैव (याचे)ययाचेऽक्रूरं कृतवर्मानुयुक्तम् ॥ २९॥ | ||
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| verse_lines = तावब्रूतां (सर्वलोकैकभर्तुः)सर्वलोकैककर्तुर्नाऽवां विरोधं मनसाऽपि कुर्वः | | verse_lines = तावब्रूतां (सर्वलोकैकभर्तुः)सर्वलोकैककर्तुर्नाऽवां विरोधं मनसाऽपि कुर्वः ।¦कृष्णस्य सर्वेशितुरित्यनूक्त(इति अनु उक्तम्) आरुह्य चाश्वीं(अश्वीं) भयतः पराद्रवत् ॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = अन्वेव तं कृष्णरामौ रथेन यातौ शतं योजनानां दिनेन । | | verse_text = अन्वेव तं कृष्णरामौ रथेन यातौ शतं योजनानां दिनेन । | ||
| verse_lines = अन्वेव तं कृष्णरामौ रथेन यातौ शतं योजनानां दिनेन | | verse_lines = अन्वेव तं कृष्णरामौ रथेन यातौ शतं योजनानां दिनेन ।¦गत्वा मृतायां वडवायां पदैव स प्राद्रवत्(सम्प्राद्रवत्) कृष्ण एनं पदाऽगात् ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = छित्वा शिरस्तस्य चक्रेण कृष्णो जानन्नक्रूरे मणिमेनेन दत्तम् | | verse_lines = छित्वा शिरस्तस्य चक्रेण कृष्णो जानन्नक्रूरे मणिमेनेन दत्तम् ।¦अप्यज्ञवल्लोकविडम्बनाय परीक्ष्य वासोऽत्र नेत्याह रामम् ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = अविश्वासात् सतु सक्रोध एव ययौ विदेहानवसत् पञ्च चाब्दान् | | verse_lines = अविश्वासात् सतु सक्रोध एव ययौ विदेहानवसत् पञ्च चाब्दान् ।¦जानन् पार्थेभ्योऽहार्यतां केशवस्य वशीकर्तुं धार्तराष्ट्रो बलं गात् ॥ ३३॥ | ||
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| verse_text = एतत् कृत्वा धृतराष्ट्रात्मजः स ययौ कुरून् निवसत्यत्र रामे । | | verse_text = एतत् कृत्वा धृतराष्ट्रात्मजः स ययौ कुरून् निवसत्यत्र रामे । | ||
| verse_lines = एतत् कृत्वा धृतराष्ट्रात्मजः स ययौ कुरून् निवसत्यत्र रामे | | verse_lines = एतत् कृत्वा धृतराष्ट्रात्मजः स ययौ कुरून् निवसत्यत्र रामे ।¦कृष्णोऽक्रूरं विवसन्तं भयेन सहार्दिक्यं चाऽनयित्वा जगाद ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = आनीय रामं च समस्तसात्त्वतां यदाऽवादीत् केशवः सन्निधाने । | | verse_text = आनीय रामं च समस्तसात्त्वतां यदाऽवादीत् केशवः सन्निधाने । | ||
| verse_lines = आनीय रामं च समस्तसात्त्वतां यदाऽवादीत् केशवः सन्निधाने | | verse_lines = आनीय रामं च समस्तसात्त्वतां यदाऽवादीत् केशवः सन्निधाने ।¦मणिस्त्वय्यास्ते दर्शयेत्येव भीतस्तदाऽक्रूरोऽदर्शयद् रत्नमस्मै ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = अव्याजतामात्मनो दर्शयित्वा हलायुधे केशवस्तस्य जानन् । | | verse_text = अव्याजतामात्मनो दर्शयित्वा हलायुधे केशवस्तस्य जानन् । | ||
| verse_lines = अव्याजतामात्मनो दर्शयित्वा हलायुधे केशवस्तस्य जानन् | | verse_lines = अव्याजतामात्मनो दर्शयित्वा हलायुधे केशवस्तस्य जानन् ।¦रत्नाकाङ्क्षामुग्रसेनस्य चैव मातुश्च साम्बस्य पुनर्बभाषे ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = आस्तामक्रूरे मणीरन्यैरधार्यः सदा यज्ञाद् दानपतेः स धार्यः । | | verse_text = आस्तामक्रूरे मणीरन्यैरधार्यः सदा यज्ञाद् दानपतेः स धार्यः । | ||
| verse_lines = आस्तामक्रूरे मणीरन्यैरधार्यः सदा यज्ञाद् दानपतेः स धार्यः | | verse_lines = आस्तामक्रूरे मणीरन्यैरधार्यः सदा यज्ञाद् दानपतेः स धार्यः ।¦न सत्या कृष्णावाञ्छितं किञ्चिदिच्छेत् तथाऽपि तस्या योग्य इत्याह कृष्णः ॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = लब्ध्वा रत्नं दानपतिः सदैव सन्दीक्षितोऽभूद् यज्ञकर्मण्यतन्द्रः । | | verse_text = लब्ध्वा रत्नं दानपतिः सदैव सन्दीक्षितोऽभूद् यज्ञकर्मण्यतन्द्रः । | ||
| verse_lines = लब्ध्वा रत्नं दानपतिः सदैव सन्दीक्षितोऽभूद् यज्ञकर्मण्यतन्द्रः | | verse_lines = लब्ध्वा रत्नं दानपतिः सदैव सन्दीक्षितोऽभूद् यज्ञकर्मण्यतन्द्रः ।¦प्रदर्श्य कृष्णो हलिने रत्नमेतच्छक्रप्रस्थं पाण्डवस्नेहतोऽगात् ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = वसन्नजस्तत्र बहूंश्च मासान् सफल्गुनोऽयान्मृगयां कदाचित् । | | verse_text = वसन्नजस्तत्र बहूंश्च मासान् सफल्गुनोऽयान्मृगयां कदाचित् । | ||
| verse_lines = वसन्नजस्तत्र बहूंश्च मासान् सफल्गुनोऽयान्मृगयां कदाचित् | | verse_lines = वसन्नजस्तत्र बहूंश्च मासान् सफल्गुनोऽयान्मृगयां कदाचित् ।¦हत्वा मृगान् यमुनातीरसंस्थः सोऽन्यां काळिन्दीं ददृशे तत्स्वसारम् ॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = सा सूर्यपुत्री यमुनानुजाता तपश्चरन्ती कृष्णपत्नीत्वकामा । | | verse_text = सा सूर्यपुत्री यमुनानुजाता तपश्चरन्ती कृष्णपत्नीत्वकामा । | ||
| verse_lines = सा सूर्यपुत्री यमुनानुजाता तपश्चरन्ती कृष्णपत्नीत्वकामा | | verse_lines = सा सूर्यपुत्री यमुनानुजाता तपश्चरन्ती कृष्णपत्नीत्वकामा ।¦पृष्टाऽर्जुनेनाऽह समस्तमेतत् पत्नीं च तां जगृहे वासुदेवः ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = ततो गत्वा नग्नजितो गृहं च स्वयंवरे सप्त वृषान्गृह्णात्(अगृह्णत्) । | | verse_text = ततो गत्वा नग्नजितो गृहं च स्वयंवरे सप्त वृषान्गृह्णात्(अगृह्णत्) । | ||
| verse_lines = ततो गत्वा नग्नजितो गृहं च स्वयंवरे सप्त वृषान्गृह्णात्(अगृह्णत्) | | verse_lines = ततो गत्वा नग्नजितो गृहं च स्वयंवरे सप्त वृषान्गृह्णात्(अगृह्णत्) ।¦सर्वैरग्राह्यानसुरान् वरेण शिवस्य यैर्निर्जिता भूमिपालाः ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = ततो नीलां तस्य सुतां च लेभे पूर्वं नीला गोपकन्याऽपि याऽसीत् । | | verse_text = ततो नीलां तस्य सुतां च लेभे पूर्वं नीला गोपकन्याऽपि याऽसीत् । | ||
| verse_lines = ततो नीलां तस्य सुतां च लेभे पूर्वं नीला गोपकन्याऽपि याऽसीत् | | verse_lines = ततो नीलां तस्य सुतां च लेभे पूर्वं नीला गोपकन्याऽपि याऽसीत् ।¦सा देहेऽस्याः प्राविशत् पूर्वमेषा यस्मादेका द्विविधा सम्प्रजाता ॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = पितृष्वसुर्मित्रविन्दा सुता च कृष्णे मालामासजद् राजमध्ये । | | verse_text = पितृष्वसुर्मित्रविन्दा सुता च कृष्णे मालामासजद् राजमध्ये । | ||
| verse_lines = पितृष्वसुर्मित्रविन्दा सुता च कृष्णे मालामासजद् राजमध्ये | | verse_lines = पितृष्वसुर्मित्रविन्दा सुता च कृष्णे मालामासजद् राजमध्ये ।¦विन्दानुविन्दौ भ्रातरावेव तस्या न्यषेधतां धार्तराष्ट्रार्थमुग्रौ ॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = जित्वाऽऽवन्त्यौ तौ नृपतींश्चैव सर्वानादाय तां प्रययौ वासुदेवः । | | verse_text = जित्वाऽऽवन्त्यौ तौ नृपतींश्चैव सर्वानादाय तां प्रययौ वासुदेवः । | ||
| verse_lines = जित्वाऽऽवन्त्यौ तौ नृपतींश्चैव सर्वानादाय तां प्रययौ वासुदेवः | | verse_lines = जित्वाऽऽवन्त्यौ तौ नृपतींश्चैव सर्वानादाय तां प्रययौ वासुदेवः ।¦पितृष्वसुस्तनयां च द्वितीयां भद्रां दत्तामग्रहीद् भ्रातृभिः सः ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = विश्वेषां देवानामवतारा हि पञ्च ते कैकेया(कैकया) भ्रातरोऽस्या हरेश्च । | | verse_text = विश्वेषां देवानामवतारा हि पञ्च ते कैकेया(कैकया) भ्रातरोऽस्या हरेश्च । | ||
| verse_lines = विश्वेषां देवानामवतारा हि पञ्च ते कैकेया(कैकया) भ्रातरोऽस्या हरेश्च | | verse_lines = विश्वेषां देवानामवतारा हि पञ्च ते कैकेया(कैकया) भ्रातरोऽस्या हरेश्च ।¦भक्ता नित्यं पाण्डवानां च तातोऽप्येषां वशे शैव्यनामर्भुरग्रे ॥ ५०॥ | ||
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| verse_text = स्वयंवरो लक्षणायास्तथाऽऽसीद् यथा द्रौपद्या लक्ष्यवेधात्मकः(लक्षवेधात्मकः) सः । | | verse_text = स्वयंवरो लक्षणायास्तथाऽऽसीद् यथा द्रौपद्या लक्ष्यवेधात्मकः(लक्षवेधात्मकः) सः । | ||
| verse_lines = स्वयंवरो लक्षणायास्तथाऽऽसीद् यथा द्रौपद्या लक्ष्यवेधात्मकः(लक्षवेधात्मकः) सः | | verse_lines = स्वयंवरो लक्षणायास्तथाऽऽसीद् यथा द्रौपद्या लक्ष्यवेधात्मकः(लक्षवेधात्मकः) सः ।¦मद्रेषु तस्याश्च पिता पिनाकं स्वयंवरार्थं जगृहे गिरीशात् ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = लक्षं च तत् सर्वतश्छन्नमेव द्वारं शरस्याप्युपरि स्म लक्षात् | | verse_lines = लक्षं च तत् सर्वतश्छन्नमेव द्वारं शरस्याप्युपरि स्म लक्षात् ।¦छिन्नेषुणा पातनीयं ह तद्धि द्रौपद्यर्थात् तदशक्यं ततोऽलम् ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = तत्राऽजग्मुर्मागधाद्याश्च सर्वे पार्था अपि द्रष्टुमिहाभ्युपाययुः | | verse_lines = तत्राऽजग्मुर्मागधाद्याश्च सर्वे पार्था अपि द्रष्टुमिहाभ्युपाययुः ।¦दुर्योधनाद्याश्च ससूतपुत्रा सज्यीकर्तुं धनुरप्युत्सहन्ते ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = केचिन्निपेतुर्धनुषैव ताडिता नवै केचिच्चालयितुं च शेकुः | | verse_lines = केचिन्निपेतुर्धनुषैव ताडिता नवै केचिच्चालयितुं च शेकुः ।¦दुर्योधनो मागधः सूतपुत्रः सज्यं कृत्वा लक्ष्यवीक्षां न शेकुः ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = धनञ्जयः स्वात्मबलं(धनञ्जयः सु आत्मबलं) प्रकाशयन् सज्जं कृत्वा धनुरैक्षच्च लक्ष्यम् । | | verse_text = धनञ्जयः स्वात्मबलं(धनञ्जयः सु आत्मबलं) प्रकाशयन् सज्जं कृत्वा धनुरैक्षच्च लक्ष्यम् । | ||
| verse_lines = धनञ्जयः स्वात्मबलं(धनञ्जयः सु आत्मबलं) प्रकाशयन् सज्जं कृत्वा धनुरैक्षच्च लक्ष्यम् | | verse_lines = धनञ्जयः स्वात्मबलं(धनञ्जयः सु आत्मबलं) प्रकाशयन् सज्जं कृत्वा धनुरैक्षच्च लक्ष्यम् ।¦नैवाऽददे बाणमनिच्छयैव तत् प्राप्यां जानन् केशवेनैव तां च ॥ ५५॥ | ||
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| verse_lines = भीमश्चापं लक्षमप्येतदत्र द्रष्टुं च नैवैच्छदरीन्द्रधारिणः | | verse_lines = भीमश्चापं लक्षमप्येतदत्र द्रष्टुं च नैवैच्छदरीन्द्रधारिणः ।¦योग्ये (कर्मन्यायतश्च)कर्मण्यायतंश्चापराधी स्यादित्यञ्जः पश्यमानो महात्मा ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = कृष्णस्ततश्चापमधिज्यमाशु कृत्वाऽचिन्त्यश्छिन्नबाणेन लक्ष्यम्(लक्षम्) । | | verse_text = कृष्णस्ततश्चापमधिज्यमाशु कृत्वाऽचिन्त्यश्छिन्नबाणेन लक्ष्यम्(लक्षम्) । | ||
| verse_lines = कृष्णस्ततश्चापमधिज्यमाशु कृत्वाऽचिन्त्यश्छिन्नबाणेन लक्ष्यम्(लक्षम्) | | verse_lines = कृष्णस्ततश्चापमधिज्यमाशु कृत्वाऽचिन्त्यश्छिन्नबाणेन लक्ष्यम्(लक्षम्) ।¦अपातयद् दुन्दुभयश्च दिव्या नेदुः प्रसूनं ववृषुः सुराश्च ॥ ५७॥ | ||
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| verse_text = कृष्णे ब्रह्माद्यैः स्तूयमाने नरेन्द्रकन्या मालां केशवांसे निधाय । | | verse_text = कृष्णे ब्रह्माद्यैः स्तूयमाने नरेन्द्रकन्या मालां केशवांसे निधाय । | ||
| verse_lines = कृष्णे ब्रह्माद्यैः स्तूयमाने नरेन्द्रकन्या मालां केशवांसे निधाय | | verse_lines = कृष्णे ब्रह्माद्यैः स्तूयमाने नरेन्द्रकन्या मालां केशवांसे निधाय ।¦तस्थावुपास्याथ सर्वे नरेन्द्रा युद्धायागुः केशवं स्वात्तशस्त्राः ॥ ५८॥ | ||
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| verse_text = विद्राप्य(विद्राव्य) तान् मागधादीन् स कृष्णो भीमार्जुनाभ्यां सहितः पुरीं स्वाम् । | | verse_text = विद्राप्य(विद्राव्य) तान् मागधादीन् स कृष्णो भीमार्जुनाभ्यां सहितः पुरीं स्वाम् । | ||
| verse_lines = विद्राप्य(विद्राव्य) तान् मागधादीन् स कृष्णो भीमार्जुनाभ्यां सहितः पुरीं स्वाम् | | verse_lines = विद्राप्य(विद्राव्य) तान् मागधादीन् स कृष्णो भीमार्जुनाभ्यां सहितः पुरीं स्वाम् ।¦ययावेता अष्ट महामहिष्यः कृष्णस्य दिव्या लोकसुन्दर्य इष्टाः ॥ ५९॥ | ||
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| verse_text = भैष्मी सत्या चैकतनुर्द्विधैव जाता भूमौ प्रकृतिर्मूलभूता । | | verse_text = भैष्मी सत्या चैकतनुर्द्विधैव जाता भूमौ प्रकृतिर्मूलभूता । | ||
| verse_lines = भैष्मी सत्या चैकतनुर्द्विधैव जाता भूमौ प्रकृतिर्मूलभूता | | verse_lines = भैष्मी सत्या चैकतनुर्द्विधैव जाता भूमौ प्रकृतिर्मूलभूता ।¦तयैवान्याः सर्वदाऽनुप्रविष्टास्तासां मध्ये जाम्बवती प्रधाना ॥ ६०॥ | ||
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| verse_text = रामेण तुल्या जाम्बवती प्रियत्वे कृष्णस्यान्याः किञ्चिदूनाश्च तस्याः । | | verse_text = रामेण तुल्या जाम्बवती प्रियत्वे कृष्णस्यान्याः किञ्चिदूनाश्च तस्याः । | ||
| verse_lines = रामेण तुल्या जाम्बवती प्रियत्वे कृष्णस्यान्याः किञ्चिदूनाश्च तस्याः | | verse_lines = रामेण तुल्या जाम्बवती प्रियत्वे कृष्णस्यान्याः किञ्चिदूनाश्च तस्याः ।¦यदाऽऽवेशो बहुलः स्याद् रमायास्तदा तासु प्रीयते केशवोऽलम् ॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = यदाऽऽवेशो ह्रासमुपैति तत्र प्रद्युम्नतो विंशगुणाधिकाः स्युः । | | verse_text = यदाऽऽवेशो ह्रासमुपैति तत्र प्रद्युम्नतो विंशगुणाधिकाः स्युः । | ||
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| verse_text = सैका देवी बहुरूपा बभाषे युक्ता यदाऽहं ज्ञेन नारायणेन । | | verse_text = सैका देवी बहुरूपा बभाषे युक्ता यदाऽहं ज्ञेन नारायणेन । | ||
| verse_lines = सैका देवी बहुरूपा बभाषे युक्ता यदाऽहं ज्ञेन नारायणेन | | verse_lines = सैका देवी बहुरूपा बभाषे युक्ता यदाऽहं ज्ञेन नारायणेन ।¦यज्ञक्रियामानिनी यज्ञनाम्नी तदोत्तमा तत्प्रवेशात्(तदावेशात्) तदाख्या ॥ ७०॥ | ||
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| verse_text = विष्ण्वाविष्टा यज्ञनाम्नी तदङ्कस्थिता सोचे केशवो ह्युत्तमोऽलम् । | | verse_text = विष्ण्वाविष्टा यज्ञनाम्नी तदङ्कस्थिता सोचे केशवो ह्युत्तमोऽलम् । | ||
| verse_lines = विष्ण्वाविष्टा यज्ञनाम्नी तदङ्कस्थिता सोचे केशवो ह्युत्तमोऽलम् | | verse_lines = विष्ण्वाविष्टा यज्ञनाम्नी तदङ्कस्थिता सोचे केशवो ह्युत्तमोऽलम् ।¦न तत्समश्चाधिकोऽतः(न तत्समश्चाभ्यधिकः) कुतः स्यादृषे सत्यं नान्यथेति स्म भूयः(भूपाः) ॥ ७१॥ | ||
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| verse_text = तयोक्तोऽहं नावतारेषु कश्चिद् विशेष इत्येव यदुप्रवीरम् । | | verse_text = तयोक्तोऽहं नावतारेषु कश्चिद् विशेष इत्येव यदुप्रवीरम् । | ||
| verse_lines = तयोक्तोऽहं नावतारेषु कश्चिद् विशेष इत्येव यदुप्रवीरम् | | verse_lines = तयोक्तोऽहं नावतारेषु कश्चिद् विशेष इत्येव यदुप्रवीरम् ।¦सर्वोत्तमोऽसीत्यवदं स चाऽह न केवलं मेऽङ्कगायाः श्रियोऽहम् ॥ ७२॥ | ||
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| verse_text = सदोत्तमः किन्तु यदा तु सा मे वामार्द्धरूपा दक्षिणानामधेया । | | verse_text = सदोत्तमः किन्तु यदा तु सा मे वामार्द्धरूपा दक्षिणानामधेया । | ||
| verse_lines = सदोत्तमः किन्तु यदा तु सा मे वामार्द्धरूपा दक्षिणानामधेया | | verse_lines = सदोत्तमः किन्तु यदा तु सा मे वामार्द्धरूपा दक्षिणानामधेया ।¦यस्मात् तस्या दक्षिणतः स्थितोऽहं तस्मान्नाम्ना दक्षिणेत्येव सा स्यात् ॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = सा दक्षिणामानिनी देवता च सा च स्थिता(साऽवस्थिता) बहुरूपा मदर्द्धा । | | verse_text = सा दक्षिणामानिनी देवता च सा च स्थिता(साऽवस्थिता) बहुरूपा मदर्द्धा । | ||
| verse_lines = सा दक्षिणामानिनी देवता च सा च स्थिता(साऽवस्थिता) बहुरूपा मदर्द्धा | | verse_lines = सा दक्षिणामानिनी देवता च सा च स्थिता(साऽवस्थिता) बहुरूपा मदर्द्धा ।¦वामार्द्धो मे तत्प्रविष्टो यतो हि ततोऽहं स्यामर्द्धनारायणाख्यः ॥ ७४॥ | ||
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| verse_lines = तदाऽप्यस्या उत्तमोऽहं सुपूर्णो न मादृशः कश्चिदस्त्युत्तमो वा | | verse_lines = तदाऽप्यस्या उत्तमोऽहं सुपूर्णो न मादृशः कश्चिदस्त्युत्तमो वा ।¦इत्येवावादीद् दक्षिणाभिः सहेति सर्वोत्तमत्वं(सदोत्तमत्वं) दक्षिणानां स्मरन् सः ॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = ताभिश्चैताभिर्दक्षिणाभिः समेताद् वरिष्ठोऽहं जगतः सर्वदैव । | | verse_text = ताभिश्चैताभिर्दक्षिणाभिः समेताद् वरिष्ठोऽहं जगतः सर्वदैव । | ||
| verse_lines = ताभिश्चैताभिर्दक्षिणाभिः समेताद् वरिष्ठोऽहं जगतः सर्वदैव | | verse_lines = ताभिश्चैताभिर्दक्षिणाभिः समेताद् वरिष्ठोऽहं जगतः सर्वदैव ।¦मत्सामर्थ्यान्नैव चानन्तभागो दक्षिणानां विद्यते नारदेति ॥ ७६॥ | ||
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| verse_text = उक्तं कृष्णेनाप्रतिमेन भूपा अन्योत्तमत्वं दक्षिणानां च शश्वत् । | | verse_text = उक्तं कृष्णेनाप्रतिमेन भूपा अन्योत्तमत्वं दक्षिणानां च शश्वत् । | ||
| verse_lines = उक्तं कृष्णेनाप्रतिमेन भूपा अन्योत्तमत्वं दक्षिणानां च शश्वत् | | verse_lines = उक्तं कृष्णेनाप्रतिमेन भूपा अन्योत्तमत्वं दक्षिणानां च शश्वत् ।¦सेयं भैष्मी दक्षिणा केशवोऽयं तस्याः श्रेष्ठः पश्यत राजसङ्घाः ॥ ७७॥ | ||
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| verse_text = प्रत्यक्षं वो वीर्यमस्यापि कुन्त्या युद्धेऽर्थितः केशवो वीर्यमस्यै । | | verse_text = प्रत्यक्षं वो वीर्यमस्यापि कुन्त्या युद्धेऽर्थितः केशवो वीर्यमस्यै । | ||
| verse_lines = प्रत्यक्षं वो वीर्यमस्यापि कुन्त्या युद्धेऽर्थितः केशवो वीर्यमस्यै | | verse_lines = प्रत्यक्षं वो वीर्यमस्यापि कुन्त्या युद्धेऽर्थितः केशवो वीर्यमस्यै ।¦अदर्शयत् पाण्डवान् धार्तराष्ट्रान् भीष्मद्रोणद्रौणिकृपान् सकर्णान् ।¦निरायुधांश्चक्र एकक्षणेन(एकः क्षणेन) लोकश्रेष्ठान् दैवतैरप्यजेयान् ॥ ७८॥ | ||
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| verse_text = व्रतं भीमस्यास्ति नैवाभि कृष्णमियामिति स्माऽज्ञया तस्य विष्णोः । | | verse_text = व्रतं भीमस्यास्ति नैवाभि कृष्णमियामिति स्माऽज्ञया तस्य विष्णोः । | ||
| verse_lines = व्रतं भीमस्यास्ति नैवाभि कृष्णमियामिति स्माऽज्ञया तस्य विष्णोः | | verse_lines = व्रतं भीमस्यास्ति नैवाभि कृष्णमियामिति स्माऽज्ञया तस्य विष्णोः ।¦चक्रं रथस्याग्रहीत् स प्रणम्य कृष्णं स तं केशवोऽपाहरच्च ॥ ७९॥ | ||
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| verse_text = एवं क्रीडन्तोऽप्यात्मशक्त्या प्रयत्नं कुर्वन्तस्ते विजिताः केशवेन । | | verse_text = एवं क्रीडन्तोऽप्यात्मशक्त्या प्रयत्नं कुर्वन्तस्ते विजिताः केशवेन । | ||
| verse_lines = एवं क्रीडन्तोऽप्यात्मशक्त्या प्रयत्नं कुर्वन्तस्ते विजिताः केशवेन | | verse_lines = एवं क्रीडन्तोऽप्यात्मशक्त्या प्रयत्नं कुर्वन्तस्ते विजिताः केशवेन ।¦ततः सर्वे नेमुरस्मै पृथा च सविस्मया वासुदेवं ननाम ॥ ८०॥ | ||
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| verse_text = एवं विधान्यद्भुतानीह कृष्णे दृष्टानि वः शतसाहस्रशश्च । | | verse_text = एवं विधान्यद्भुतानीह कृष्णे दृष्टानि वः शतसाहस्रशश्च । | ||
| verse_lines = एवं विधान्यद्भुतानीह कृष्णे दृष्टानि वः शतसाहस्रशश्च | | verse_lines = एवं विधान्यद्भुतानीह कृष्णे दृष्टानि वः शतसाहस्रशश्च ।¦तस्मादेष ह्यद्भुतोऽप्युत्तमश्चेदुक्ता(ह्यद्भुतोऽत्युत्तमः) नेमुस्तेऽखिला वासुदेवम् ॥ ८१॥ | ||
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| verse_text = वाय्वाज्ञया वायुशिष्यः स सत्यमित्याद्युक्त्वा नारदो रुक्मिणीं च । | | verse_text = वाय्वाज्ञया वायुशिष्यः स सत्यमित्याद्युक्त्वा नारदो रुक्मिणीं च । | ||
| verse_lines = वाय्वाज्ञया वायुशिष्यः स सत्यमित्याद्युक्त्वा नारदो रुक्मिणीं च | | verse_lines = वाय्वाज्ञया वायुशिष्यः स सत्यमित्याद्युक्त्वा नारदो रुक्मिणीं च ।¦स्तुत्वा पुष्पं पारिजातस्य दत्वा ययौ लोकं क्षिप्रमब्जोद्भवस्य ॥ ८२॥ | ||
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| verse_text = साक्षात् सत्या रुक्मिणीत्येकसंविद् द्विधाभूता नात्र भेदोऽस्ति कश्चित् । | | verse_text = साक्षात् सत्या रुक्मिणीत्येकसंविद् द्विधाभूता नात्र भेदोऽस्ति कश्चित् । | ||
| verse_lines = साक्षात् सत्या रुक्मिणीत्येकसंविद् द्विधाभूता नात्र भेदोऽस्ति कश्चित् | | verse_lines = साक्षात् सत्या रुक्मिणीत्येकसंविद् द्विधाभूता नात्र भेदोऽस्ति कश्चित् ।¦तथाऽपि सा प्रमदानां स्वभावप्रकाशनार्थं(स्वभावप्रदर्शनार्थं) कुपितेवाऽस सत्या ॥ ८३॥ | ||
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| verse_text = साकं रुक्मिण्या राजमध्ये प्रवेशात् स्तवादृषेः पुष्पदानाच्च देवीम् । | | verse_text = साकं रुक्मिण्या राजमध्ये प्रवेशात् स्तवादृषेः पुष्पदानाच्च देवीम् । | ||
| verse_lines = साकं रुक्मिण्या राजमध्ये प्रवेशात् स्तवादृषेः पुष्पदानाच्च देवीम् | | verse_lines = साकं रुक्मिण्या राजमध्ये प्रवेशात् स्तवादृषेः पुष्पदानाच्च देवीम् ।¦कोपाननं दर्शयन्तीमुवाच विडम्बार्थं कामिजनस्य कृष्णः ॥ ८४॥ | ||
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| verse_lines = दातास्म्यहं पारिजातं तरुं त इत्येव तत्राथाऽगमद् वासवोऽपि | | verse_lines = दातास्म्यहं पारिजातं तरुं त इत्येव तत्राथाऽगमद् वासवोऽपि ।¦सर्वैर्देवैर्भौमजितोऽप्यदित्यास्तेनैवाथो कुण्डलाभ्यां हृताभ्याम् ॥ ८५॥ | ||
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| verse_lines = तदैवाऽगुर्मुनयस्तेन नुन्ना(तुन्नाः) बदर्यास्ते सर्व एवाऽशु कृष्णम् | | verse_lines = तदैवाऽगुर्मुनयस्तेन नुन्ना(तुन्नाः) बदर्यास्ते सर्व एवाऽशु कृष्णम् ।¦ययाचिरे भौमवधाय नत्वा स्तुत्वा स्तोत्रैर्वैदिकैस्तान्त्रिकैश्च ॥ ८६॥ | ||
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| verse_text = इन्द्रेण देवैः सहितेन याचितो विप्रैश्च सस्मार विहङ्गराजम् । | | verse_text = इन्द्रेण देवैः सहितेन याचितो विप्रैश्च सस्मार विहङ्गराजम् । | ||
| verse_lines = इन्द्रेण देवैः सहितेन याचितो विप्रैश्च सस्मार विहङ्गराजम् | | verse_lines = इन्द्रेण देवैः सहितेन याचितो विप्रैश्च सस्मार विहङ्गराजम् ।¦आगम्य नत्वा पुरतः स्थितं तमारुह्य सत्यासहितो ययौ हरिः ॥ ८७॥ | ||
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| verse_lines = नित्यैव या प्रकृतिः स्वेच्छयैव जगच्छिक्षार्थं द्वादशीं भीमसञ्ज्ञाम् | | verse_lines = नित्यैव या प्रकृतिः स्वेच्छयैव जगच्छिक्षार्थं द्वादशीं भीमसञ्ज्ञाम् ।¦उपोष्य बभ्रे कोटिधाराजलस्य विष्णोः प्रीत्यर्थं सैव हि सत्यभामा ॥ ८८॥ | ||
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| verse_lines = तया युक्तो गरुडस्कन्धसंस्थो दूरानुयातो वज्रभृताऽप्यनुज्ञाम् | | verse_lines = तया युक्तो गरुडस्कन्धसंस्थो दूरानुयातो वज्रभृताऽप्यनुज्ञाम् ।¦दत्वाऽमुष्मै प्रययौ वायुजुष्टामाशां कृष्णो भौमवधे धृतात्मा ॥ ८९॥ | ||
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| verse_lines = भौमो ह्यासीद् ब्रह्मवरादवध्यो न शस्त्रभृज्जीयस इत्यमुष्मै | | verse_lines = भौमो ह्यासीद् ब्रह्मवरादवध्यो न शस्त्रभृज्जीयस इत्यमुष्मै ।¦दत्तो वरो ब्रह्मणा तद्वदेव तस्यामात्यानां तद्वदवध्यता च ॥ ९०॥ | ||
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| verse_lines = भौमेन जेयत्वमपि(जय्यत्वमपि) ह्यमीषां दत्तं भौमाय ब्रह्मणा क्रोडरूपात् | | verse_lines = भौमेन जेयत्वमपि(जय्यत्वमपि) ह्यमीषां दत्तं भौमाय ब्रह्मणा क्रोडरूपात् ।¦विष्णोर्जातायास्य दुर्गं च दत्तं प्राग्ज्योतिषं नाम पुरं समस्तैः ॥ ९१॥ | ||
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| verse_lines = आसीद् बाह्ये गिरिदुर्गं तदन्तः पानीयदुर्गं मौरवं पाशदुर्गम् | | verse_lines = आसीद् बाह्ये गिरिदुर्गं तदन्तः पानीयदुर्गं मौरवं पाशदुर्गम् ।¦तस्याप्यन्तः क्षुरधारोपमं तत्पाशाश्च ते षट्सहस्राः सुघोराः ।¦अभेद्यत्वमरिभिरतार्यता च दत्ता दुर्गाणां ब्रह्मणाऽऽराधितेन ॥ ९२॥ | ||
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| verse_lines = हन्तुम् कृष्णो नरकं तत्र गत्वा गिरिदुर्गं(गिरिं दुर्गं) गदया निर्बिभेद | | verse_lines = हन्तुम् कृष्णो नरकं तत्र गत्वा गिरिदुर्गं(गिरिं दुर्गं) गदया निर्बिभेद ।¦वायव्यास्त्रेणोदकं शोषयित्वा चकर्त खड्गेन मुरस्य पाशान् ॥ ९४॥ | ||
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| verse_text = तदा दृप्तं नरकं वीक्ष्य देवी सत्याऽऽददे कार्मुकं शार्ङ्गसञ्ज्ञम् । | | verse_text = तदा दृप्तं नरकं वीक्ष्य देवी सत्याऽऽददे कार्मुकं शार्ङ्गसञ्ज्ञम् । | ||
| verse_lines = तदा दृप्तं नरकं वीक्ष्य देवी सत्याऽऽददे कार्मुकं शार्ङ्गसञ्ज्ञम् | | verse_lines = तदा दृप्तं नरकं वीक्ष्य देवी सत्याऽऽददे कार्मुकं शार्ङ्गसञ्ज्ञम् ।¦चकार तं यतमानं च भौमं निरायुधं विरथं च क्षणेन ॥ १०१॥ | ||
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| verse_text = आलिङ्ग्य कृष्णः सत्यभामां पुनश्च रथान्तरे संस्थितं भौममुग्रम् । | | verse_text = आलिङ्ग्य कृष्णः सत्यभामां पुनश्च रथान्तरे संस्थितं भौममुग्रम् । | ||
| verse_lines = आलिङ्ग्य कृष्णः सत्यभामां पुनश्च रथान्तरे संस्थितं भौममुग्रम् | | verse_lines = आलिङ्ग्य कृष्णः सत्यभामां पुनश्च रथान्तरे संस्थितं भौममुग्रम् ।¦सृजन्तमस्त्राण्यरिणा निकृत्तकन्धं(निकृत्तकन्धरं) मृत्योरर्पयामास शीघ्रम् ॥ १०२॥ | ||
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| verse_text = स मन्त्रिभिर्मन्त्रिपुत्रैः समेतो जगाम कृष्णावज्ञयाऽन्धंतमश्च । | | verse_text = स मन्त्रिभिर्मन्त्रिपुत्रैः समेतो जगाम कृष्णावज्ञयाऽन्धंतमश्च । | ||
| verse_lines = स मन्त्रिभिर्मन्त्रिपुत्रैः समेतो जगाम कृष्णावज्ञयाऽन्धंतमश्च | | verse_lines = स मन्त्रिभिर्मन्त्रिपुत्रैः समेतो जगाम कृष्णावज्ञयाऽन्धंतमश्च ।¦तदाविष्टो वायुरगाच्च कृष्णमन्तःपुरं प्राविशत् सत्ययेशः ॥ १०३॥ | ||
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| verse_text = तदा भूमिः पञ्चभूतावरा या यस्यां जज्ञे नरकः श्रीवराहात् । | | verse_text = तदा भूमिः पञ्चभूतावरा या यस्यां जज्ञे नरकः श्रीवराहात् । | ||
| verse_lines = तदा भूमिः पञ्चभूतावरा या यस्यां जज्ञे नरकः श्रीवराहात् | | verse_lines = तदा भूमिः पञ्चभूतावरा या यस्यां जज्ञे नरकः श्रीवराहात् ।¦मूलप्रकृत्यैव भूम्या नितान्तमाविष्टा या साऽगमत् कृष्णपादौ ॥ १०४॥ | ||
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| verse_text = साऽदित्यास्ते कुण्डले पादयोश्च निधाय पौत्रं भगदत्तसञ्ज्ञम् । | | verse_text = साऽदित्यास्ते कुण्डले पादयोश्च निधाय पौत्रं भगदत्तसञ्ज्ञम् । | ||
| verse_lines = साऽदित्यास्ते कुण्डले पादयोश्च निधाय पौत्रं भगदत्तसञ्ज्ञम् | | verse_lines = साऽदित्यास्ते कुण्डले पादयोश्च निधाय पौत्रं भगदत्तसञ्ज्ञम् ।¦समर्पयामास तस्याभिषेकं प्राग्ज्योतिषे कारयामास कृष्णः ॥ १०५॥ | ||
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| verse_text = संस्थाप्य तं सर्वकिरातराज्ये भौमाहृतं वैश्रवणाद् बलेन । | | verse_text = संस्थाप्य तं सर्वकिरातराज्ये भौमाहृतं वैश्रवणाद् बलेन । | ||
| verse_lines = संस्थाप्य तं सर्वकिरातराज्ये भौमाहृतं वैश्रवणाद् बलेन | | verse_lines = संस्थाप्य तं सर्वकिरातराज्ये भौमाहृतं वैश्रवणाद् बलेन ।¦शिवेन दत्तं धनदायातिसत्त्वं भगदत्तेऽधात्(न्यदधात् सुप्रतीकम्) सुप्रतीकं रमेशः ॥ १०६॥ | ||
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| verse_text = करीन्द्रमेकं तं निधायैव तस्मिन् कृत्वा प्रसादं च वसुन्धरायाः । | | verse_text = करीन्द्रमेकं तं निधायैव तस्मिन् कृत्वा प्रसादं च वसुन्धरायाः । | ||
| verse_lines = करीन्द्रमेकं तं निधायैव तस्मिन् कृत्वा प्रसादं च वसुन्धरायाः | | verse_lines = करीन्द्रमेकं तं निधायैव तस्मिन् कृत्वा प्रसादं च वसुन्धरायाः ।¦चतुर्दन्तान् षट्सहस्रान् करीन्द्रान् पयोब्धिजान् प्राहिणोद् द्वारवत्यै ॥ १०७॥ | ||
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| verse_text = नराधिपान् देवगन्धर्वनागान् जित्वाऽऽनीतं हेमरत्नोच्चराशिम् । | | verse_text = नराधिपान् देवगन्धर्वनागान् जित्वाऽऽनीतं हेमरत्नोच्चराशिम् । | ||
| verse_lines = नराधिपान् देवगन्धर्वनागान् जित्वाऽऽनीतं हेमरत्नोच्चराशिम् | | verse_lines = नराधिपान् देवगन्धर्वनागान् जित्वाऽऽनीतं हेमरत्नोच्चराशिम् ।¦शतद्वयं योजनानां समृद्धं समन्ततः प्राहिणोत् स्वां पुरीं सः ॥ १०८॥ | ||
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| verse_text = महावीर्यैर्नैर्ऋतै राक्षसेन्द्रैर्भौमानीतैर्निर्ऋतिं योधयित्वा । | | verse_text = महावीर्यैर्नैर्ऋतै राक्षसेन्द्रैर्भौमानीतैर्निर्ऋतिं योधयित्वा । | ||
| verse_lines = महावीर्यैर्नैर्ऋतै राक्षसेन्द्रैर्भौमानीतैर्निर्ऋतिं योधयित्वा | | verse_lines = महावीर्यैर्नैर्ऋतै राक्षसेन्द्रैर्भौमानीतैर्निर्ऋतिं योधयित्वा ।¦स प्राहिणोत् सर्वरत्नोच्चराशिं गजांश्च नारायण आदिदेवः ॥ १०९॥ | ||
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| verse_lines = तत्रापश्यत् कन्यका भूमिपानां भौमानीताः समरे तान् विजित्य | | verse_lines = तत्रापश्यत् कन्यका भूमिपानां भौमानीताः समरे तान् विजित्य ।¦द्व्यष्टौ सहस्राणि शतं च रूपशीलोदारा अक्षताः सद्व्रतस्थाः ॥ ११०॥ | ||
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| verse_lines = काश्चित् तत्राऽसन् देवगन्धर्वकन्यास्तासां प्रधाना त्वष्टृपुत्री कशेरुः | | verse_lines = काश्चित् तत्राऽसन् देवगन्धर्वकन्यास्तासां प्रधाना त्वष्टृपुत्री कशेरुः ।¦पुत्रा अग्नेः पूर्वमासंश्च तेऽथ स्त्रीत्वप्राप्त्यै चक्रुरुग्रं तपश्च ॥ १११॥ | ||
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| verse_text = भार्यात्वार्थे वासुदेवस्य योषित्तनुं तासामिच्छतीनां समीरः । | | verse_text = भार्यात्वार्थे वासुदेवस्य योषित्तनुं तासामिच्छतीनां समीरः । | ||
| verse_lines = भार्यात्वार्थे वासुदेवस्य योषित्तनुं तासामिच्छतीनां समीरः | | verse_lines = भार्यात्वार्थे वासुदेवस्य योषित्तनुं तासामिच्छतीनां समीरः ।¦अदाद् वरं तपसाऽऽराधितः सन् स्त्रीभूतास्ते बदरीं सम्प्रजग्मुः ॥ ११२॥ | ||
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| verse_text = नारायणं तत्र शुश्रूषमाणाः प्राप्याप्सरस्त्वं राजकुलेषु जाताः । | | verse_text = नारायणं तत्र शुश्रूषमाणाः प्राप्याप्सरस्त्वं राजकुलेषु जाताः । | ||
| verse_lines = नारायणं तत्र शुश्रूषमाणाः प्राप्याप्सरस्त्वं राजकुलेषु जाताः | | verse_lines = नारायणं तत्र शुश्रूषमाणाः प्राप्याप्सरस्त्वं राजकुलेषु जाताः ।¦काश्चित् स्वर्गे ता निशाम्यैव(निशम्यैव) कृष्णं वव्रुः पतिं सर्वगुणाभिरामम् ॥ ११३॥ | ||
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| verse_lines = आजानदेवैः सर्वगुणैः समास्ताः स्वभावतोऽथेन्दिरावेशतोऽतः | | verse_lines = आजानदेवैः सर्वगुणैः समास्ताः स्वभावतोऽथेन्दिरावेशतोऽतः ।¦गुणाधिकास्ताः शिबिकासु कृष्ण आरोपयित्वा प्राहिणोद् द्वारवत्यै ॥ ११४॥ | ||
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| verse_lines = समन्ततो योजनानां शते द्वे प्रवृद्धमिन्द्रस्य स रत्नपर्वतम् | | verse_lines = समन्ततो योजनानां शते द्वे प्रवृद्धमिन्द्रस्य स रत्नपर्वतम् ।¦नित्यामृतस्रावि जलेश्वरस्य च्छत्रं च दोर्भ्यां गरुडे न्यधाद्धरिः ॥ ११५॥ | ||
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| verse_lines = स्वयं च सत्यासहितः समारुहत् स चाश्रमेणैव ययौ त्रिविष्टपम् | | verse_lines = स्वयं च सत्यासहितः समारुहत् स चाश्रमेणैव ययौ त्रिविष्टपम् ।¦अभिप्रयातोऽखिललोकपालैर्जनार्दनः शक्रगृहं विवेश ॥ ११६॥ | ||
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| verse_lines = सम्पूजितः सत्यभामासहायः शक्रेण शच्या सहितेन सादरम् | | verse_lines = सम्पूजितः सत्यभामासहायः शक्रेण शच्या सहितेन सादरम् ।¦ददावदित्या अपि कुण्डले शुभे समस्तदेवैर्मुनिभिश्च वन्दितः ॥ ११७॥ | ||
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| verse_lines = तमासुरावेशवशादजानती सत्यां च सर्वप्रभवौ जगत्प्रभू(जगत्गुरू) | | verse_lines = तमासुरावेशवशादजानती सत्यां च सर्वप्रभवौ जगत्प्रभू(जगत्गुरू) ।¦निर्दोषसौख्यैकतनू शुभाशिषस्ताभ्यां ददौ साऽदितिरात्मपुत्रवत् ॥ ११८॥ | ||
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| verse_text = अथो सदानन्दचिदात्मदेहः न नन्दनोद्यानमजोऽनुरूपया । | | verse_text = अथो सदानन्दचिदात्मदेहः न नन्दनोद्यानमजोऽनुरूपया । | ||
| verse_lines = अथो सदानन्दचिदात्मदेहः न नन्दनोद्यानमजोऽनुरूपया | | verse_lines = अथो सदानन्दचिदात्मदेहः न नन्दनोद्यानमजोऽनुरूपया ।¦अनन्तशक्तिः सह सत्यभामया विवेश रन्तुं प्रिययाऽखिलेश्वरः ॥ ११९॥ | ||
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| verse_lines = तयाऽच्युतोऽसौ कनकावदातया सुकुङ्कुमादिग्धपिशङ्गवाससा | | verse_lines = तयाऽच्युतोऽसौ कनकावदातया सुकुङ्कुमादिग्धपिशङ्गवाससा ।¦पूर्णेन्दुकोट्योघजयन्मुखाब्जया रेमेऽमितात्मा जगदेकसुन्दरः ॥ १२०॥ | ||
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| verse_lines = सर्वर्तुनित्योदितसर्ववैभवे सुरत्नचामीकरवृक्षसद्वने | | verse_lines = सर्वर्तुनित्योदितसर्ववैभवे सुरत्नचामीकरवृक्षसद्वने ।¦सदैव पूर्णेन्दुविराजिते हरिश्चचार देव्या पवनानुसेविते ॥ १२१॥ | ||
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| verse_lines = विदोषसंवित्तनुरत्र सत्तरुं ददर्श सत्याऽमृतमन्थनोद्भवम् | | verse_lines = विदोषसंवित्तनुरत्र सत्तरुं ददर्श सत्याऽमृतमन्थनोद्भवम् ।¦सा पारिजातं मणिकाञ्चनात्मकं समस्तकामप्रदमार्तिहारिणम् ॥ १२२॥ | ||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव तं सुस्मितचन्द्रिकास्फुरन्मुखारविन्दाऽसितलोललोचना | | verse_lines = दृष्ट्वैव तं सुस्मितचन्द्रिकास्फुरन्मुखारविन्दाऽसितलोललोचना ।¦कपोलनिर्भातचलत्सुकुण्डला जगाद देवाधिपतिं पतिं सती ॥ १२३॥ | ||
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| verse_lines = तरुर्जगज्जीवद मे गृहाङ्गणे संस्थापनीयोऽयमचिन्त्यपौरुष | | verse_lines = तरुर्जगज्जीवद मे गृहाङ्गणे संस्थापनीयोऽयमचिन्त्यपौरुष ।¦इतीरितस्तां कलशोपमस्तनीमालिङ्ग्य देवस्तरुमुद्बबर्ह ॥ १२४॥ | ||
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| verse_lines = स तेन वृक्षेण सहैव केशवस्तया च देव्याऽऽरुहदग्र्यपौरुषम् | | verse_lines = स तेन वृक्षेण सहैव केशवस्तया च देव्याऽऽरुहदग्र्यपौरुषम् ।¦खगेश्वरं तच्च निशम्य शच्या प्रचोदितो वासव आगमत् सुरैः ॥ १२५॥ | ||
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| verse_text = तानासुरावेशयुतान् हरेश्च बलप्रकाशाय समुद्यतान् सुरान् । | | verse_text = तानासुरावेशयुतान् हरेश्च बलप्रकाशाय समुद्यतान् सुरान् । | ||
| verse_lines = तानासुरावेशयुतान् हरेश्च बलप्रकाशाय समुद्यतान् सुरान् | | verse_lines = तानासुरावेशयुतान् हरेश्च बलप्रकाशाय समुद्यतान् सुरान् ।¦न्यवारयच्छार्ङ्गशरासनच्युतैर्हरिप्रिया बाणवरैः समस्तशः ॥ १२६॥ | ||
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| verse_text = निरायुधं वैश्रवणं चकार चिक्षेप चाब्धौ गरुडो जलेश्वरम्(जलेशम्) । | | verse_text = निरायुधं वैश्रवणं चकार चिक्षेप चाब्धौ गरुडो जलेश्वरम्(जलेशम्) । | ||
| verse_lines = निरायुधं वैश्रवणं चकार चिक्षेप चाब्धौ गरुडो जलेश्वरम्(जलेशम्) | | verse_lines = निरायुधं वैश्रवणं चकार चिक्षेप चाब्धौ गरुडो जलेश्वरम्(जलेशम्) ।¦प्रधानवायोस्तनयं तु वायुं कोणाधिपं वह्नियमादिकानपि ॥ १२७॥ | ||
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| verse_text = विबोध्य शार्ङ्गोत्थरवैः स्वकां तनुमावेशितानामसुरैरगाद्धरिः । | | verse_text = विबोध्य शार्ङ्गोत्थरवैः स्वकां तनुमावेशितानामसुरैरगाद्धरिः । | ||
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| verse_text = ययाच एनं परिरक्षणाय शचीपतिः केशवमर्जुनस्य । | | verse_text = ययाच एनं परिरक्षणाय शचीपतिः केशवमर्जुनस्य । | ||
| verse_lines = ययाच एनं परिरक्षणाय शचीपतिः केशवमर्जुनस्य | | verse_lines = ययाच एनं परिरक्षणाय शचीपतिः केशवमर्जुनस्य ।¦जगाद कृष्णोऽपि धरातलस्थिते न मय्यमुं कश्चन जेष्यतीति ॥ १३३॥ | ||
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| verse_text = तमर्जुनार्थं वरमाप्य वासवः पुनःपुनश्चक्रधरं प्रणम्य । | | verse_text = तमर्जुनार्थं वरमाप्य वासवः पुनःपुनश्चक्रधरं प्रणम्य । | ||
| verse_lines = तमर्जुनार्थं वरमाप्य वासवः पुनःपुनश्चक्रधरं प्रणम्य | | verse_lines = तमर्जुनार्थं वरमाप्य वासवः पुनःपुनश्चक्रधरं प्रणम्य ।¦प्रसन्नदृष्ट्या हरिणाऽभिवीक्षितो ययौ महाभागवतः स्वमालयम् ॥ १३४॥ | ||
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| verse_text = कृष्णोऽप्यनुज्ञाप्य पुरन्दरं पुरीं निजां व्रजन्नभ्यधिकं व्यरोचत । | | verse_text = कृष्णोऽप्यनुज्ञाप्य पुरन्दरं पुरीं निजां व्रजन्नभ्यधिकं व्यरोचत । | ||
| verse_lines = कृष्णोऽप्यनुज्ञाप्य पुरन्दरं पुरीं निजां व्रजन्नभ्यधिकं व्यरोचत | | verse_lines = कृष्णोऽप्यनुज्ञाप्य पुरन्दरं पुरीं निजां व्रजन्नभ्यधिकं व्यरोचत ।¦किरीटधारी वरकुण्डलोल्लसन्मुखाम्बुजः पीतपटः सुकौस्तुभः ॥ १३५॥ | ||
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| verse_text = विरोचमानस्य सदा जगत्प्रभोर्नवै विशेषः क्वचिदच्युतस्य । | | verse_text = विरोचमानस्य सदा जगत्प्रभोर्नवै विशेषः क्वचिदच्युतस्य । | ||
| verse_lines = विरोचमानस्य सदा जगत्प्रभोर्नवै विशेषः क्वचिदच्युतस्य | | verse_lines = विरोचमानस्य सदा जगत्प्रभोर्नवै विशेषः क्वचिदच्युतस्य ।¦तथाऽपि तत् स्मारयितुं वचो भवेदपेक्ष्य चाल्पज्ञमतिं पुराणगम् ॥ १३६॥ | ||
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| verse_text = प्रविश्य चेशः स्वपुरीं स यादवैः सुपूजितोऽन्तःपुरमेत्य चाङ्गणे । | | verse_text = प्रविश्य चेशः स्वपुरीं स यादवैः सुपूजितोऽन्तःपुरमेत्य चाङ्गणे । | ||
| verse_lines = प्रविश्य चेशः स्वपुरीं स यादवैः सुपूजितोऽन्तःपुरमेत्य चाङ्गणे | | verse_lines = प्रविश्य चेशः स्वपुरीं स यादवैः सुपूजितोऽन्तःपुरमेत्य चाङ्गणे ।¦तरुं प्रियाया न्यदधाद् गृहस्य सहैव शृङ्गेण च रत्नसद्गिरेः ॥ १३७॥ | ||
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| verse_text = प्रदाय रत्नानि च सर्वसात्त्वतां यथेष्टतस्ता अपि कन्यकाः प्रभुः । | | verse_text = प्रदाय रत्नानि च सर्वसात्त्वतां यथेष्टतस्ता अपि कन्यकाः प्रभुः । | ||
| verse_lines = प्रदाय रत्नानि च सर्वसात्त्वतां यथेष्टतस्ता अपि कन्यकाः प्रभुः | | verse_lines = प्रदाय रत्नानि च सर्वसात्त्वतां यथेष्टतस्ता अपि कन्यकाः प्रभुः ।¦उद्वाह्य रेमे पृथगेव रत्नप्रासादसंस्थाभिरनन्तरूपः ॥ १३८॥ | ||
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| verse_text = पृथक्पृथक् तासु दशैव पुत्रकानधत्त(पुत्रकान् न्यधत्त) कन्यामपि सर्वशः प्रभुः । | | verse_text = पृथक्पृथक् तासु दशैव पुत्रकानधत्त(पुत्रकान् न्यधत्त) कन्यामपि सर्वशः प्रभुः । | ||
| verse_lines = पृथक्पृथक् तासु दशैव पुत्रकानधत्त(पुत्रकान् न्यधत्त) कन्यामपि सर्वशः प्रभुः | | verse_lines = पृथक्पृथक् तासु दशैव पुत्रकानधत्त(पुत्रकान् न्यधत्त) कन्यामपि सर्वशः प्रभुः ।¦प्रद्युम्नसाम्बावपि भानुचारुदेष्णौ च तेषां नितरां गुणाधिकाः ॥ १३९॥ | ||
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| verse_text = विवस्वतो योऽवरजोऽदितेः सुतः ख्यातश्च नाम्ना सवितेति कृष्णात् । | | verse_text = विवस्वतो योऽवरजोऽदितेः सुतः ख्यातश्च नाम्ना सवितेति कृष्णात् । | ||
| verse_lines = विवस्वतो योऽवरजोऽदितेः सुतः ख्यातश्च नाम्ना सवितेति कृष्णात् | | verse_lines = विवस्वतो योऽवरजोऽदितेः सुतः ख्यातश्च नाम्ना सवितेति कृष्णात् ।¦जातः स सत्याजठरेऽत्र नाम्ना भानुस्तु भैष्म्या अपि चारुदेष्णः ॥ १४०॥ | ||
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| verse_text = स चारुदेष्णोऽपि हि विघ्नराजो येऽन्ये च कृष्णस्य सुताः समस्ताः । | | verse_text = स चारुदेष्णोऽपि हि विघ्नराजो येऽन्ये च कृष्णस्य सुताः समस्ताः । | ||
| verse_lines = स चारुदेष्णोऽपि हि विघ्नराजो येऽन्ये च कृष्णस्य सुताः समस्ताः | | verse_lines = स चारुदेष्णोऽपि हि विघ्नराजो येऽन्ये च कृष्णस्य सुताः समस्ताः ।¦ते चैव(ते चापि) गीर्वाणगणास्तथाऽन्ये ये द्वारकायां निवसन्ति सर्वे ॥ १४१॥ | ||
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| verse_text = तस्यां समस्तैरभिपूज्यमाने देवे स्वपुर्यां निवसत्यनन्ते । | | verse_text = तस्यां समस्तैरभिपूज्यमाने देवे स्वपुर्यां निवसत्यनन्ते । | ||
| verse_lines = तस्यां समस्तैरभिपूज्यमाने देवे स्वपुर्यां निवसत्यनन्ते | | verse_lines = तस्यां समस्तैरभिपूज्यमाने देवे स्वपुर्यां निवसत्यनन्ते ।¦ययौ कदाचित् स तु रौक्मिणेयः(रौग्मिणेयः) साम्बेन सार्धं भुजगेन्द्रलोकम् ॥ १४२॥ | ||
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| verse_text = अज्ञानतस्तैरभियोधितः स जिगाय सर्वानपि वासुकिं च । | | verse_text = अज्ञानतस्तैरभियोधितः स जिगाय सर्वानपि वासुकिं च । | ||
| verse_lines = अज्ञानतस्तैरभियोधितः स जिगाय सर्वानपि वासुकिं च | | verse_lines = अज्ञानतस्तैरभियोधितः स जिगाय सर्वानपि वासुकिं च ।¦विद्राप्य बाणैरथ रत्नसञ्चयान् समाददे नेमुरमुं ततस्ते ॥ १४३॥ | ||
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| verse_text = तैः पूजितः साम्बसहाय आशु मयं च मायाविनमस्त्रवर्षैः । | | verse_text = तैः पूजितः साम्बसहाय आशु मयं च मायाविनमस्त्रवर्षैः । | ||
| verse_lines = तैः पूजितः साम्बसहाय आशु मयं च मायाविनमस्त्रवर्षैः | | verse_lines = तैः पूजितः साम्बसहाय आशु मयं च मायाविनमस्त्रवर्षैः ।¦विजित्य रुन्धानमनेन पूजितो ययौ रथेनाम्बरगेन नाकम् ॥ १४४॥ | ||
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| verse_lines = तत्रैव कृष्णेन तु पारिजाते हृते जयन्तं प्रजिगाय चाऽजौ | | verse_lines = तत्रैव कृष्णेन तु पारिजाते हृते जयन्तं प्रजिगाय चाऽजौ ।¦संस्पर्धयाऽऽयातममुष्य(सस्पर्धयाऽऽयान्तं) चानुजं साम्बोऽजयद् वृषभं नाम शस्त्रैः ॥ १४५॥ | ||
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| verse_text = अस्त्राणि तावस्त्रवरैर्निहत्य(तावस्त्रवर्षैर्निहत्य) तयोश्च ताभ्यां प्रतिदग्धयानौ । | | verse_text = अस्त्राणि तावस्त्रवरैर्निहत्य(तावस्त्रवर्षैर्निहत्य) तयोश्च ताभ्यां प्रतिदग्धयानौ । | ||
| verse_lines = अस्त्राणि तावस्त्रवरैर्निहत्य(तावस्त्रवर्षैर्निहत्य) तयोश्च ताभ्यां प्रतिदग्धयानौ | | verse_lines = अस्त्राणि तावस्त्रवरैर्निहत्य(तावस्त्रवर्षैर्निहत्य) तयोश्च ताभ्यां प्रतिदग्धयानौ ।¦विद्राप्य तौ बाणवरैः सुरेन्द्रसम्पूजितौ ययतुर्विद्यया खे ॥ १४६॥ | ||
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| verse_text = स विद्यया साम्बमुदूह्य रत्या प्रदत्तया रुगक्मि(ग्मि)णिनन्दनः पुरीम् । | | verse_text = स विद्यया साम्बमुदूह्य रत्या प्रदत्तया रुगक्मि(ग्मि)णिनन्दनः पुरीम् । | ||
| verse_lines = स विद्यया साम्बमुदूह्य रत्या प्रदत्तया रुगक्मि(ग्मि)णिनन्दनः पुरीम् | | verse_lines = स विद्यया साम्बमुदूह्य रत्या प्रदत्तया रुगक्मि(ग्मि)णिनन्दनः पुरीम् ।¦ययौ ततो नारद आगमद् द्रुतं ज्ञातुं हरेर्बहुभार्यासु वृत्तिम्(प्रवृत्तिम्) ॥ १४७॥ | ||
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| verse_lines = तं द्व्यष्टसाहस्रगृहेषु दृष्ट्वा तावत्स्वरूपैर्विहरन्तमेकम् | | verse_lines = तं द्व्यष्टसाहस्रगृहेषु दृष्ट्वा तावत्स्वरूपैर्विहरन्तमेकम् ।¦सुविस्मितः प्रययौ तं प्रणम्य शक्रप्रस्थं पूजितश्चात्र पार्थैः ॥ १४८॥ | ||
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| verse_text = स आज्ञया ब्रह्मण आह कृष्णां क्रमात् कर्तुं भीम एवैकसंस्थाम् । | | verse_text = स आज्ञया ब्रह्मण आह कृष्णां क्रमात् कर्तुं भीम एवैकसंस्थाम् । | ||
| verse_lines = स आज्ञया ब्रह्मण आह कृष्णां क्रमात् कर्तुं भीम एवैकसंस्थाम् | | verse_lines = स आज्ञया ब्रह्मण आह कृष्णां क्रमात् कर्तुं भीम एवैकसंस्थाम् ।¦अन्या देवीः स्वापयित्वा शरीरे तस्या भारत्याः पूर्णभोगार्थमेव ॥ १४९॥ | ||
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| verse_text = सुन्दोपसुन्दौ भ्रातरौ ब्रह्मवाक्यात् परस्परादन्यतो नैव वध्यौ । | | verse_text = सुन्दोपसुन्दौ भ्रातरौ ब्रह्मवाक्यात् परस्परादन्यतो नैव वध्यौ । | ||
| verse_lines = सुन्दोपसुन्दौ भ्रातरौ ब्रह्मवाक्यात् परस्परादन्यतो नैव वध्यौ | | verse_lines = सुन्दोपसुन्दौ भ्रातरौ ब्रह्मवाक्यात् परस्परादन्यतो नैव वध्यौ ।¦तिलोत्तमार्थे निहतौ परस्परं तयोर्वधार्थे सृष्टया(तयोर्वधार्थेऽसृष्ट या तेन) तेन दैत्यौ ॥ १५०॥ | ||
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| verse_text = अतः पृथग् वत्सरतो भवत्सु क्रमात् कृष्णा तिष्ठतां योऽन्ययुक्ताम् । | | verse_text = अतः पृथग् वत्सरतो भवत्सु क्रमात् कृष्णा तिष्ठतां योऽन्ययुक्ताम् । | ||
| verse_lines = अतः पृथग् वत्सरतो भवत्सु क्रमात् कृष्णा तिष्ठतां योऽन्ययुक्ताम् | | verse_lines = अतः पृथग् वत्सरतो भवत्सु क्रमात् कृष्णा तिष्ठतां योऽन्ययुक्ताम् ।¦पश्येद् वोऽसौ वत्सरं(पश्येद् वो संवत्सरं) तीर्थयात्रां कुर्यादिति स्माथ चक्रुस्तथा ते ॥ १५१॥ | ||
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| verse_lines = ततः कदाचिद् धर्मराजेन युक्तां शस्त्रागारे विप्रगोरक्षणार्थम् | | verse_lines = ततः कदाचिद् धर्मराजेन युक्तां शस्त्रागारे विप्रगोरक्षणार्थम् ।¦शस्त्रादित्सुः फल्गुनोऽद्राक् स शस्त्रैर्दस्यून् हत्वा तीर्थयात्रोन्मुखोऽभूत् ॥ १५२॥ | ||
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| verse_lines = युधिष्ठिराद्यैः सौहृदाद् वारितोऽपि ययौ सत्यार्थं स कदाचिद् द्युनद्याम् | | verse_lines = युधिष्ठिराद्यैः सौहृदाद् वारितोऽपि ययौ सत्यार्थं स कदाचिद् द्युनद्याम् ।¦कुर्वन् स्नानं मायया नागवध्वा हृतो लोकं भुजगानां क्षणेन ॥ १५३॥ | ||
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| verse_lines = तस्याः पिता गरुडेनाऽत्तपत्युः पुत्राकाङ्क्षी चोदयामास पार्थम् | | verse_lines = तस्याः पिता गरुडेनाऽत्तपत्युः पुत्राकाङ्क्षी चोदयामास पार्थम् ।¦(संवत्सरं ब्रह्मचर्यं, संवत्सरब्रह्मचर्ये) संवत्सरब्रह्मचर्यं तु पार्थैः कृष्णाहेतोः समये साधु बद्धम् ॥ १५४॥ | ||
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| verse_lines = विप्रापहासात् कुत्सितयोनितस्ताः कन्यातीर्थे पाण्डवः सम्प्रमुच्य | | verse_lines = विप्रापहासात् कुत्सितयोनितस्ताः कन्यातीर्थे पाण्डवः सम्प्रमुच्य ।¦प्राप्तः प्रभासं वासुदेवानुजातां(वासुदेवानुजां तां) शुश्राव रामेण सुयोधनोद्यताम् ॥ १६४॥ | ||
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| verse_text = विचिन्त्य कार्यं यतिरूपं गृहीत्वा कुशस्थलीं प्रययौ तं समीपे । | | verse_text = विचिन्त्य कार्यं यतिरूपं गृहीत्वा कुशस्थलीं प्रययौ तं समीपे । | ||
| verse_lines = विचिन्त्य कार्यं यतिरूपं गृहीत्वा कुशस्थलीं प्रययौ तं समीपे | | verse_lines = विचिन्त्य कार्यं यतिरूपं गृहीत्वा कुशस्थलीं प्रययौ तं समीपे ।¦प्राप्तं कृष्णः प्राहसत् संविजानन् सत्यासहायः शयनीयाधिरूढः ॥ १६५॥ | ||
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| verse_text = सर्वज्ञा(सर्वज्ञाना) सा लीलया हासहेतुमपृच्छत् तं सोऽपि तस्यै बभाषे । | | verse_text = सर्वज्ञा(सर्वज्ञाना) सा लीलया हासहेतुमपृच्छत् तं सोऽपि तस्यै बभाषे । | ||
| verse_lines = सर्वज्ञा(सर्वज्ञाना) सा लीलया हासहेतुमपृच्छत् तं सोऽपि तस्यै बभाषे | | verse_lines = सर्वज्ञा(सर्वज्ञाना) सा लीलया हासहेतुमपृच्छत् तं सोऽपि तस्यै बभाषे ।¦लीलाभाजौ दर्शनार्थं पुनस्तावगच्छतां रैवतं शैलराजम् ॥ १६६॥ | ||
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| verse_text = आक्रीडोऽसौ वृष्णिभोजान्धकानां तत्रापश्यत् केशवः फल्गुनं तम् । | | verse_text = आक्रीडोऽसौ वृष्णिभोजान्धकानां तत्रापश्यत् केशवः फल्गुनं तम् । | ||
| verse_lines = आक्रीडोऽसौ वृष्णिभोजान्धकानां तत्रापश्यत् केशवः फल्गुनं तम् | | verse_lines = आक्रीडोऽसौ वृष्णिभोजान्धकानां तत्रापश्यत् केशवः फल्गुनं तम् ।¦स्वसुर्दाने स प्रतिज्ञां रहोऽस्मै चक्रे कृष्णोऽथाऽसदत् सर्ववृष्णीन् ॥ १६७॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वा गिरौ रौहिणेयो यतीन्द्रवेषं पार्थं ज्ञातियुक्तः प्रणम्य । | | verse_text = दृष्ट्वा गिरौ रौहिणेयो यतीन्द्रवेषं पार्थं ज्ञातियुक्तः प्रणम्य । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा गिरौ रौहिणेयो यतीन्द्रवेषं पार्थं ज्ञातियुक्तः प्रणम्य | | verse_lines = दृष्ट्वा गिरौ रौहिणेयो यतीन्द्रवेषं पार्थं ज्ञातियुक्तः प्रणम्य ।¦चक्रे पूजां फल्गुनोऽपि प्रणामं गुणज्येष्ठोऽसीति चक्रे बलाय ॥ १६८॥ | ||
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| verse_text = सर्वज्ञं तं वाग्मिनं वीक्ष्य रामः कन्यागारे वर्षकाले निवासम् । | | verse_text = सर्वज्ञं तं वाग्मिनं वीक्ष्य रामः कन्यागारे वर्षकाले निवासम् । | ||
| verse_lines = सर्वज्ञं तं वाग्मिनं वीक्ष्य रामः कन्यागारे वर्षकाले निवासम् | | verse_lines = सर्वज्ञं तं वाग्मिनं वीक्ष्य रामः कन्यागारे वर्षकाले निवासम् ।¦सत्कारपूर्वं कारयेत्याह कृष्णं नैवेत्यूचे केशवो दोषवादी ॥ १६९॥ | ||
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| verse_text = युवा बली दर्शनीयोऽतिवाग्मी नायं योग्यः कन्यकागारवासम् । | | verse_text = युवा बली दर्शनीयोऽतिवाग्मी नायं योग्यः कन्यकागारवासम् । | ||
| verse_lines = युवा बली दर्शनीयोऽतिवाग्मी नायं योग्यः कन्यकागारवासम् | | verse_lines = युवा बली दर्शनीयोऽतिवाग्मी नायं योग्यः कन्यकागारवासम् ।¦इत्युक्तवन्तं राम आहाऽप्तविद्ये नास्मिञ्छङ्केत्येव लोकाधिनाथम् ॥ १७०॥ | ||
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| verse_text = नास्मन्मते रोचते त्वन्मतं तु सर्वेषां नः पूज्यमेवास्तु तेन । | | verse_text = नास्मन्मते रोचते त्वन्मतं तु सर्वेषां नः पूज्यमेवास्तु तेन । | ||
| verse_lines = नास्मन्मते रोचते त्वन्मतं तु सर्वेषां नः पूज्यमेवास्तु तेन | | verse_lines = नास्मन्मते रोचते त्वन्मतं तु सर्वेषां नः पूज्यमेवास्तु तेन ।¦इत्युक्त्वा तं केशवः सोदरायै शुश्रूषस्वेत्याह सन्तं यतीन्द्रम् ॥ १७१॥ | ||
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| verse_text = नित्याप्रमत्ता साधु सन्तोषयेति प्रोक्ता तथा साऽकरोत् सोऽपि तत्र । | | verse_text = नित्याप्रमत्ता साधु सन्तोषयेति प्रोक्ता तथा साऽकरोत् सोऽपि तत्र । | ||
| verse_lines = नित्याप्रमत्ता साधु सन्तोषयेति प्रोक्ता तथा साऽकरोत् सोऽपि तत्र | | verse_lines = नित्याप्रमत्ता साधु सन्तोषयेति प्रोक्ता तथा साऽकरोत् सोऽपि तत्र ।¦चक्रे मासान् वार्षिकान् सत्कथाभिर्वासं वाक्यं श्रद्दधानो हरेस्तत् ॥ १७२॥ | ||
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| verse_text = संयाचितः फल्गुनेनाऽह वाक्यं यद् वासुदेवस्तन्न जानाति कश्चित् । | | verse_text = संयाचितः फल्गुनेनाऽह वाक्यं यद् वासुदेवस्तन्न जानाति कश्चित् । | ||
| verse_lines = संयाचितः फल्गुनेनाऽह वाक्यं यद् वासुदेवस्तन्न जानाति कश्चित् | | verse_lines = संयाचितः फल्गुनेनाऽह वाक्यं यद् वासुदेवस्तन्न जानाति कश्चित् ।¦ऋते पित्रोर्विपृथोः सात्यकेर्वा सुभद्रां ते प्रददानीति सत्यम् ॥ १७३॥ | ||
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| verse_text = अस्त्रे शस्त्रे तत्त्वविद्यासु चैव शिष्यः शैनेयो वासुदेवेन्द्रसून्वोः । | | verse_text = अस्त्रे शस्त्रे तत्त्वविद्यासु चैव शिष्यः शैनेयो वासुदेवेन्द्रसून्वोः । | ||
| verse_lines = अस्त्रे शस्त्रे तत्त्वविद्यासु चैव शिष्यः शैनेयो वासुदेवेन्द्रसून्वोः | | verse_lines = अस्त्रे शस्त्रे तत्त्वविद्यासु चैव शिष्यः शैनेयो वासुदेवेन्द्रसून्वोः ।¦तस्मादस्मै कथयामास कृष्णः स्वशिष्यत्वाद् विपृथोश्चापि सर्वम् ॥ १७४॥ | ||
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| verse_text = अन्ये सर्वे(अन्येऽपि सर्वे) वासुदेवस्य पार्थान् प्रियान् नित्यं जानमाना अपि स्म । | | verse_text = अन्ये सर्वे(अन्येऽपि सर्वे) वासुदेवस्य पार्थान् प्रियान् नित्यं जानमाना अपि स्म । | ||
| verse_lines = अन्ये सर्वे(अन्येऽपि सर्वे) वासुदेवस्य पार्थान् प्रियान् नित्यं जानमाना अपि स्म | | verse_lines = अन्ये सर्वे(अन्येऽपि सर्वे) वासुदेवस्य पार्थान् प्रियान् नित्यं जानमाना अपि स्म ।¦रामेणाऽदिष्टा उद्धवोऽथाऽहुकाद्या हार्दिक्याद्या नैव दित्सन्ति जिष्णोः ॥ १७५॥ | ||
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| verse_text = दुर्योधने दातुमिच्छन्ति सर्वे रामप्रियार्थं जानमाना हरेस्तत् । | | verse_text = दुर्योधने दातुमिच्छन्ति सर्वे रामप्रियार्थं जानमाना हरेस्तत् । | ||
| verse_lines = दुर्योधने दातुमिच्छन्ति सर्वे रामप्रियार्थं जानमाना हरेस्तत् | | verse_lines = दुर्योधने दातुमिच्छन्ति सर्वे रामप्रियार्थं जानमाना हरेस्तत् ।¦अप्यप्रियं राक्षसावेशयुक्तास्तस्मात् सर्वान् वञ्चयामास कृष्णः ॥ १७६॥ | ||
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| verse_text = प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाश्च वञ्चिता ययुस्तीर्थार्थं रामयुक्ताः समग्राः । | | verse_text = प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाश्च वञ्चिता ययुस्तीर्थार्थं रामयुक्ताः समग्राः । | ||
| verse_lines = प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाश्च वञ्चिता ययुस्तीर्थार्थं रामयुक्ताः समग्राः | | verse_lines = प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाश्च वञ्चिता ययुस्तीर्थार्थं रामयुक्ताः समग्राः ।¦पिण्डोद्धारं तत्र महोत्सवेषु आवर्तयत्सु क्वचिदूचे सुभद्रा ॥ १७७॥ | ||
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| verse_lines = यते तीर्थानाचरन् बान्धवांस्त्वमद्राक्षीर्नः कच्चिदिष्टान् स्म पार्थान् | | verse_lines = यते तीर्थानाचरन् बान्धवांस्त्वमद्राक्षीर्नः कच्चिदिष्टान् स्म पार्थान् ।¦कुन्तीं कृष्णां चेत्याह पृष्टः स पार्थ ओमित्येतेषामाह चानामयं सः ॥ १७८॥ | ||
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| verse_text = भूयः साऽवादीद् भगवन्निन्द्रसूनुर्गतस्तीर्थार्थं ब्राह्मणेभ्यः श्रुतो मे । | | verse_text = भूयः साऽवादीद् भगवन्निन्द्रसूनुर्गतस्तीर्थार्थं ब्राह्मणेभ्यः श्रुतो मे । | ||
| verse_lines = भूयः साऽवादीद् भगवन्निन्द्रसूनुर्गतस्तीर्थार्थं ब्राह्मणेभ्यः श्रुतो मे | | verse_lines = भूयः साऽवादीद् भगवन्निन्द्रसूनुर्गतस्तीर्थार्थं ब्राह्मणेभ्यः श्रुतो मे ।¦कच्चिद् दृष्टो भवतेत्योमिति स्म पार्थोऽप्यूचे क्वेति साऽपृच्छदेनम् ॥ १७९॥ | ||
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| verse_lines = अत्रैवेति स्मयमानं च पार्थं पुनःपुनः पर्यपृच्छच्छुभाङ्गी | | verse_lines = अत्रैवेति स्मयमानं च पार्थं पुनःपुनः पर्यपृच्छच्छुभाङ्गी ।¦सोऽप्याहोन्मत्ते सोऽस्मि हीति स्मयंस्तां फुल्लाक्षी तं सा ददर्शातिहृष्टा ॥ १८०॥ | ||
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| verse_lines = ततो हर्षाल्लज्जया चोत्पलाक्षी किञ्चिन्नोचे पार्थ एनामुवाच | | verse_lines = ततो हर्षाल्लज्जया चोत्पलाक्षी किञ्चिन्नोचे पार्थ एनामुवाच ।¦कामाविष्टो मुख्यकालो ह्ययं (नावुद्वाहार्थे)नावुद्वाहार्थोऽस्त्विति सा चैनमाह(सा चैवमाह) ॥ १८१॥ | ||
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| verse_lines = नातिक्रमो वासुदेवस्य युक्तस्तस्मात् तेन स्वपितृभ्यां च दत्ताम् | | verse_lines = नातिक्रमो वासुदेवस्य युक्तस्तस्मात् तेन स्वपितृभ्यां च दत्ताम् ।¦युक्तो निजैर्बन्धुभिश्चोत्सवे मां समुद्वहेत्यथ कृष्णं स दध्यौ ॥ १८२॥ | ||
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| verse_lines = मातापितृभ्यां सहितोऽथ कृष्णस्तत्रैवाऽयाद् वासवश्चाथ शच्या | | verse_lines = मातापितृभ्यां सहितोऽथ कृष्णस्तत्रैवाऽयाद् वासवश्चाथ शच्या ।¦समं मुनीन्द्रैः फल्गुनेन स्मृतः(स्मृतः स तत्रैव) संस्तत्रैवाऽगात् प्रीतियुक्तो निशायाम् ॥ १८३॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णस्ततः पुरुहूतेन साकं तयोर्विवाहं कारायामास सम्यक् | | verse_lines = कृष्णस्ततः पुरुहूतेन साकं तयोर्विवाहं कारायामास सम्यक् ।¦मातापितृभ्यां सत्यकिनाऽपि युक्तो महोत्सवेऽन्याविदिते (अन्याविदितो) मुनीन्द्रैः ॥ १८४॥ | ||
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| verse_lines = ततः कृष्णः स्यन्दनं फल्गुनार्थे निधाय स्वं प्रययौ तद्रजन्याम् | | verse_lines = ततः कृष्णः स्यन्दनं फल्गुनार्थे निधाय स्वं प्रययौ तद्रजन्याम् ।¦गते च शक्रे रथमारुरोह प्रातः पार्थः सहितो भार्ययैव ॥ १८५॥ | ||
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| verse_lines = सर्वायुधैर्युक्तरथं समास्थिते गृहीतचापे फल्गुने द्वारवत्याम् | | verse_lines = सर्वायुधैर्युक्तरथं समास्थिते गृहीतचापे फल्गुने द्वारवत्याम् ।¦आसीद् रावः किं किमेतत् त्रिदण्डी कन्यां हरत्येष कोदण्डपाणिः ॥ १८६॥ | ||
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| verse_text = स शिक्षया(स्वशिक्षया, सुशिक्षयाऽत्यद्भुतया) त्वद्भुतया शरौघैर्विद्राप्य तान् भीषयित्वैव सर्वान् । | | verse_text = स शिक्षया(स्वशिक्षया, सुशिक्षयाऽत्यद्भुतया) त्वद्भुतया शरौघैर्विद्राप्य तान् भीषयित्वैव सर्वान् । | ||
| verse_lines = स शिक्षया(स्वशिक्षया, सुशिक्षयाऽत्यद्भुतया) त्वद्भुतया शरौघैर्विद्राप्य तान् भीषयित्वैव सर्वान् | | verse_lines = स शिक्षया(स्वशिक्षया, सुशिक्षयाऽत्यद्भुतया) त्वद्भुतया शरौघैर्विद्राप्य तान् भीषयित्वैव सर्वान् ।¦निर्गत्य पुर्या विपृथुं ददर्श रामेण पुर्या रक्षणे सन्नियुक्तम् ॥ १९०॥ | ||
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| verse_text = प्रियं कुर्वन्निव रामस्य सोऽपि व्याजेन पार्थं सेनयैवाऽवृणोत् तम् । | | verse_text = प्रियं कुर्वन्निव रामस्य सोऽपि व्याजेन पार्थं सेनयैवाऽवृणोत् तम् । | ||
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| verse_text = एको ह्यसौ मरुतां सौम्यनामा शुश्रूषार्थं वासुदेवस्य जातः । | | verse_text = एको ह्यसौ मरुतां सौम्यनामा शुश्रूषार्थं वासुदेवस्य जातः । | ||
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| verse_text = निरायुधं विरथं(निरायुधां विरथां) चैव चक्रे पार्थः सेनां तस्य नैवाहनच्च । | | verse_text = निरायुधं विरथं(निरायुधां विरथां) चैव चक्रे पार्थः सेनां तस्य नैवाहनच्च । | ||
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| verse_text = कृष्णोऽपि सर्वं विपृथोर्निशम्य प्राप्तः सुधर्मां विमना इवाऽसीत् । | | verse_text = कृष्णोऽपि सर्वं विपृथोर्निशम्य प्राप्तः सुधर्मां विमना इवाऽसीत् । | ||
| verse_lines = कृष्णोऽपि सर्वं विपृथोर्निशम्य प्राप्तः सुधर्मां विमना इवाऽसीत् | | verse_lines = कृष्णोऽपि सर्वं विपृथोर्निशम्य प्राप्तः सुधर्मां विमना इवाऽसीत् ।¦अवाङ्मुखस्तत्र यदुप्रवीराः प्रद्युम्नाद्या आहुरुच्चैर्नदन्तः ॥ १९६॥ | ||
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| verse_text = मायाव्रतं तं विनिहत्य शीघ्रं वयं सुभद्रामानयामः क्षणेन । | | verse_text = मायाव्रतं तं विनिहत्य शीघ्रं वयं सुभद्रामानयामः क्षणेन । | ||
| verse_lines = मायाव्रतं तं विनिहत्य शीघ्रं वयं सुभद्रामानयामः क्षणेन | | verse_lines = मायाव्रतं तं विनिहत्य शीघ्रं वयं सुभद्रामानयामः क्षणेन ।¦इत्युक्तवाक्यानवदद् बलस्तान् कृष्णाज्ञया यान्तु न स्वेच्छयैव ॥ १९७॥ | ||
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| verse_text = ज्ञातव्यमेतस्य मतं पुरस्ताद्धरेर्विरोधे न जयो भवेद् वः । | | verse_text = ज्ञातव्यमेतस्य मतं पुरस्ताद्धरेर्विरोधे न जयो भवेद् वः । | ||
| verse_lines = ज्ञातव्यमेतस्य मतं पुरस्ताद्धरेर्विरोधे न जयो भवेद् वः | | verse_lines = ज्ञातव्यमेतस्य मतं पुरस्ताद्धरेर्विरोधे न जयो भवेद् वः ।¦इत्युक्तवाक्ये हलिनि स्म सर्वे पप्रच्छुरानम्य जनार्दनं तम् ॥ १९८॥ | ||
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| verse_text = अथाब्रवीद् वासुदेवोऽमितौजाः शृण्वन्तु सर्वे वचनं मदीयम् । | | verse_text = अथाब्रवीद् वासुदेवोऽमितौजाः शृण्वन्तु सर्वे वचनं मदीयम् । | ||
| verse_lines = अथाब्रवीद् वासुदेवोऽमितौजाः शृण्वन्तु सर्वे वचनं मदीयम् | | verse_lines = अथाब्रवीद् वासुदेवोऽमितौजाः शृण्वन्तु सर्वे वचनं मदीयम् ।¦पुरैवोक्तं तन्मया कन्यकाया मायाव्रतो नार्हति सन्निधिस्थितिम् ॥ १९९॥ | ||
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| verse_text = तां मे वाचं नाग्रहीदग्रजोऽयं बहून् दोषान् व्याहरतोऽप्यतो मया । | | verse_text = तां मे वाचं नाग्रहीदग्रजोऽयं बहून् दोषान् व्याहरतोऽप्यतो मया । | ||
| verse_lines = तां मे वाचं नाग्रहीदग्रजोऽयं बहून् दोषान् व्याहरतोऽप्यतो मया | | verse_lines = तां मे वाचं नाग्रहीदग्रजोऽयं बहून् दोषान् व्याहरतोऽप्यतो मया ।¦अनुल्लङ्घ्यत्वादग्रजोऽनुप्रवृत्तः कन्यागृहे वासने कूटबुद्धेः ॥ २००॥ | ||
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| verse_text = अतीतश्चायं कार्ययोगोऽसमक्षं हृता कन्याऽतो नोऽत्र का मानहानिः । | | verse_text = अतीतश्चायं कार्ययोगोऽसमक्षं हृता कन्याऽतो नोऽत्र का मानहानिः । | ||
| verse_lines = अतीतश्चायं कार्ययोगोऽसमक्षं हृता कन्याऽतो नोऽत्र का मानहानिः | | verse_lines = अतीतश्चायं कार्ययोगोऽसमक्षं हृता कन्याऽतो नोऽत्र का मानहानिः ।¦भूयस्तरां मानिनस्तस्य सा स्याज्ज्ञाता च वो विपृथोः पार्थताऽस्य ॥ २०१॥ | ||
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| verse_text = देया च कन्या नास्ति पार्थेन तुल्यो वरोऽस्माकं कौरवेयश्च पार्थः । | | verse_text = देया च कन्या नास्ति पार्थेन तुल्यो वरोऽस्माकं कौरवेयश्च पार्थः । | ||
| verse_lines = देया च कन्या नास्ति पार्थेन तुल्यो वरोऽस्माकं कौरवेयश्च पार्थः | | verse_lines = देया च कन्या नास्ति पार्थेन तुल्यो वरोऽस्माकं कौरवेयश्च पार्थः ।¦पौत्रश्च कृष्णस्य सुपूर्णशक्तेः पैतृष्वसेयो(पितृष्वसेयः) वीरतमो गुणाढ्यः ॥ २०२॥ | ||
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| verse_text = अर्थ्योऽस्माभिः स्वयमेवाहरत् स शक्रात्मजो नात्र नः कार्यहानिः । | | verse_text = अर्थ्योऽस्माभिः स्वयमेवाहरत् स शक्रात्मजो नात्र नः कार्यहानिः । | ||
| verse_lines = अर्थ्योऽस्माभिः स्वयमेवाहरत् स शक्रात्मजो नात्र नः कार्यहानिः | | verse_lines = अर्थ्योऽस्माभिः स्वयमेवाहरत् स शक्रात्मजो नात्र नः कार्यहानिः ।¦अनुद्रुत्यैनं(अनुसृत्यैनं) यदि वः स्यात् पराजयो हानिर्दृढं यशसो वो भवेत ॥ २०३॥ | ||
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| verse_text = जित्वा यद्येनं कन्यका चाऽहृता चेत् परामृष्टां नैव कश्चिद्धि लिप्सेत्(कश्चिद् विलिप्सेत्) । | | verse_text = जित्वा यद्येनं कन्यका चाऽहृता चेत् परामृष्टां नैव कश्चिद्धि लिप्सेत्(कश्चिद् विलिप्सेत्) । | ||
| verse_lines = जित्वा यद्येनं कन्यका चाऽहृता चेत् परामृष्टां नैव कश्चिद्धि लिप्सेत्(कश्चिद् विलिप्सेत्) | | verse_lines = जित्वा यद्येनं कन्यका चाऽहृता चेत् परामृष्टां नैव कश्चिद्धि लिप्सेत्(कश्चिद् विलिप्सेत्) ।¦अतो न मे रोचते वोऽनुयानमित्यूचिवानास तूष्णीं परेशः ॥ २०४॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वा हली कृष्णवाक्यं बभाषे मा यात चित्तं विदितं मयाऽस्य । | | verse_text = श्रुत्वा हली कृष्णवाक्यं बभाषे मा यात चित्तं विदितं मयाऽस्य । | ||
| verse_lines = श्रुत्वा हली कृष्णवाक्यं बभाषे मा यात चित्तं विदितं मयाऽस्य | | verse_lines = श्रुत्वा हली कृष्णवाक्यं बभाषे मा यात चित्तं विदितं मयाऽस्य ।¦अस्यानुवृत्तिर्विजयाय नः स्याच्छुभाय शान्त्यै परतश्च मुक्त्यै ॥ २०५॥ | ||
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| verse_text = ततोऽर्जुनो यत्र तिष्ठन्(तिष्ठेत्) न कश्चित् पराजयं याति कृष्णाज्ञयैव । | | verse_text = ततोऽर्जुनो यत्र तिष्ठन्(तिष्ठेत्) न कश्चित् पराजयं याति कृष्णाज्ञयैव । | ||
| verse_lines = ततोऽर्जुनो यत्र तिष्ठन्(तिष्ठेत्) न कश्चित् पराजयं याति कृष्णाज्ञयैव | | verse_lines = ततोऽर्जुनो यत्र तिष्ठन्(तिष्ठेत्) न कश्चित् पराजयं याति कृष्णाज्ञयैव ।¦रथेन तेनैव ययौ सभार्यः शक्रप्रस्थं चाविशद् भ्रातृगुप्तम् ॥ २०६॥ | ||
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| verse_text = सम्भावितो भ्रातृभिश्चातितुष्टैरूचेऽथ सर्वं तेषु यच्चाऽत्मवृत्तम्(आत्मवृत्तिम्) । | | verse_text = सम्भावितो भ्रातृभिश्चातितुष्टैरूचेऽथ सर्वं तेषु यच्चाऽत्मवृत्तम्(आत्मवृत्तिम्) । | ||
| verse_lines = सम्भावितो भ्रातृभिश्चातितुष्टैरूचेऽथ सर्वं तेषु यच्चाऽत्मवृत्तम्(आत्मवृत्तिम्) | | verse_lines = सम्भावितो भ्रातृभिश्चातितुष्टैरूचेऽथ सर्वं तेषु यच्चाऽत्मवृत्तम्(आत्मवृत्तिम्) ।¦शान्तेषु वाक्यादात्मनो यादवेषु कृष्णो युक्तो हलिनाऽगाच्च पार्थान् ॥ २०७॥ | ||
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| verse_text = सार्द्धं ययौ शकटै रत्नपूर्णैः शक्रप्रस्थं पूजितस्तत्र पार्थैः । | | verse_text = सार्द्धं ययौ शकटै रत्नपूर्णैः शक्रप्रस्थं पूजितस्तत्र पार्थैः । | ||
| verse_lines = सार्द्धं ययौ शकटै रत्नपूर्णैः शक्रप्रस्थं पूजितस्तत्र पार्थैः | | verse_lines = सार्द्धं ययौ शकटै रत्नपूर्णैः शक्रप्रस्थं पूजितस्तत्र पार्थैः ।¦ददौ तेषां तानि रामेण युक्तस्तथा कृष्णायै भूषणानि स्वसुश्च ॥ २०८॥ | ||
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| verse_lines = मासानुषित्वा कतिचिद् रौहिणेयो ययौ पुरीं स्वां केशवोऽत्रावसच्च | | verse_lines = मासानुषित्वा कतिचिद् रौहिणेयो ययौ पुरीं स्वां केशवोऽत्रावसच्च ।¦बहून् वर्षान् पाण्डवैः पूज्यमानः प्रीतिं तेषामादधानोऽधिकां स्वाम् ॥ २०९॥ | ||
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| verse_lines = आसन् कृष्णायाः पञ्च सुता गुणाढ्या विश्वेदेवाः पञ्चगन्धर्वमुख्यैः | | verse_lines = आसन् कृष्णायाः पञ्च सुता गुणाढ्या विश्वेदेवाः पञ्चगन्धर्वमुख्यैः ।¦आविष्टास्ते चित्ररथाभिताम्रकिशोरगोपालबलैः क्रमेण ॥ २१०॥ | ||
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| verse_lines = प्रतिविन्ध्यः सुतसोमः(श्रुतसोमः) श्रुताख्यकीर्तिः शतानीक उत श्रुतक्रियः | | verse_lines = प्रतिविन्ध्यः सुतसोमः(श्रुतसोमः) श्रुताख्यकीर्तिः शतानीक उत श्रुतक्रियः ।¦युधिष्ठिराद्यैः क्रमशः प्रजातास्तेषां द्वयोश्चावरजोऽभिमन्युः ॥ २११॥ | ||
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| verse_lines = चन्द्रांशयुक्तोऽतितरां(चन्द्रांशयुक्तो नितरां) बुधोऽसौ जातः सुभद्राजठरेऽर्जुनेन | | verse_lines = चन्द्रांशयुक्तोऽतितरां(चन्द्रांशयुक्तो नितरां) बुधोऽसौ जातः सुभद्राजठरेऽर्जुनेन ।¦धर्मेरशक्रांशयुतोऽश्विनोश्च तथैव कृष्णस्य स सन्निधानयुक् ॥ २१२॥ | ||
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| verse_text = सर्वेऽपि ते वीर्यवन्तः सुरूपा भक्ता विष्णोः सर्वशास्त्रेष्वभिज्ञाः । | | verse_text = सर्वेऽपि ते वीर्यवन्तः सुरूपा भक्ता विष्णोः सर्वशास्त्रेष्वभिज्ञाः । | ||
| verse_lines = सर्वेऽपि ते वीर्यवन्तः सुरूपा भक्ता विष्णोः सर्वशास्त्रेष्वभिज्ञाः | | verse_lines = सर्वेऽपि ते वीर्यवन्तः सुरूपा भक्ता विष्णोः सर्वशास्त्रेष्वभिज्ञाः ।¦मोदं ययुः पाण्डवास्तैः सुतैश्च विशेषतः सात्त्वतीनन्दनेन ॥ २१३॥ | ||
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| verse_text = ततः कदाचित् खाण्डवं कृष्णपार्थौ चिक्रीडिषू सत्यभामासुभद्रे । | | verse_text = ततः कदाचित् खाण्डवं कृष्णपार्थौ चिक्रीडिषू सत्यभामासुभद्रे । | ||
| verse_lines = ततः कदाचित् खाण्डवं कृष्णपार्थौ चिक्रीडिषू सत्यभामासुभद्रे | | verse_lines = ततः कदाचित् खाण्डवं कृष्णपार्थौ चिक्रीडिषू सत्यभामासुभद्रे ।¦आदाय यातौ परिचारकैश्च रथेन गन्धर्वरानुगीतौ ॥ २१४॥ | ||
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| verse_lines = स्वैरं तयोस्तत्र विक्रीडतोश्च स्त्रीरत्नाभ्यां मन्दवातानुजुष्टे | | verse_lines = स्वैरं तयोस्तत्र विक्रीडतोश्च स्त्रीरत्नाभ्यां मन्दवातानुजुष्टे ।¦वने प्रसूनस्तबकोरुराजिते जले च तिग्मद्युतिकन्यकायाः ॥ २१५॥ | ||
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| verse_lines = भूत्वा विप्रस्तौ ययाचेऽन्नमेत्य कुशानुरूचेऽनुमते (कुशानुरूचे च मते) रमेशितुः | | verse_lines = भूत्वा विप्रस्तौ ययाचेऽन्नमेत्य कुशानुरूचेऽनुमते (कुशानुरूचे च मते) रमेशितुः ।¦पार्थः कीदृक् तेऽन्नमिष्टं वदेति स चावादीद् वह्निरहं वनार्थी ॥ २१६॥ | ||
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| verse_lines = प्रयाजान् देवाननुयाजांश्च शुल्कं हविर्दाने देवतानामयाचिषम् | | verse_lines = प्रयाजान् देवाननुयाजांश्च शुल्कं हविर्दाने देवतानामयाचिषम् ।¦बलह्रासस्तव भूयादिति स्म शप्त्वैव ते तांश्च ददुः पुरा मम ॥ २१७॥ | ||
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| verse_lines = पुनः पूर्तिः केन मे स्याद् बलस्येत्यब्जोद्भवं पृष्टवानस्मि नत्वा | | verse_lines = पुनः पूर्तिः केन मे स्याद् बलस्येत्यब्जोद्भवं पृष्टवानस्मि नत्वा ।¦यदा वनं खाण्डवं हि त्वमत्सि तदा बलं ते भवतीति सोऽब्रवीत् ॥ २१८॥ | ||
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| verse_lines = शक्रस्येदं खाण्डवं तेन विघ्नं करोत्यसौ तेन वां प्रार्थयामि | | verse_lines = शक्रस्येदं खाण्डवं तेन विघ्नं करोत्यसौ तेन वां प्रार्थयामि ।¦इत्युक्ते तं पार्थ ऊचे यदि स्याद् रथो धनुश्चाथ शक्रं निरोत्स्ये ॥ २१९॥ | ||
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| verse_lines = नरावेशादन्नदानप्रतिश्रवात् स्वस्यापि शक्रस्य विरोधमैच्छत् | | verse_lines = नरावेशादन्नदानप्रतिश्रवात् स्वस्यापि शक्रस्य विरोधमैच्छत् ।¦पार्थः कृष्णस्य प्रेरणाच्चैव वह्निः पार्थं ययाचे शक्रविरोधशान्त्यै ॥ २२०॥ | ||
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| verse_text = चक्रं गोमन्ते कृष्णमापापि(कृष्णमायाद्धि) पूर्वं भक्त्या वह्निः केशवेऽदात् पुनस्तत् । | | verse_text = चक्रं गोमन्ते कृष्णमापापि(कृष्णमायाद्धि) पूर्वं भक्त्या वह्निः केशवेऽदात् पुनस्तत् । | ||
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| verse_text = विशेषतो ध्वजसंस्थे हनूमत्यजेयता स्याज्जयरूपो यतोऽसौ । | | verse_text = विशेषतो ध्वजसंस्थे हनूमत्यजेयता स्याज्जयरूपो यतोऽसौ । | ||
| verse_lines = विशेषतो ध्वजसंस्थे हनूमत्यजेयता स्याज्जयरूपो यतोऽसौ | | verse_lines = विशेषतो ध्वजसंस्थे हनूमत्यजेयता स्याज्जयरूपो यतोऽसौ ।¦सर्वं च तद्दिव्यमभेद्यमेव विद्युत्प्रभा ज्या च गाण्डीवसंस्था ॥ २२७॥ | ||
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| verse_text = गाण्डीवमप्यास कृष्णप्रसादाच्छक्यं धर्तुं पाण्डवस्याप्यधार्यम् । | | verse_text = गाण्डीवमप्यास कृष्णप्रसादाच्छक्यं धर्तुं पाण्डवस्याप्यधार्यम् । | ||
| verse_lines = गाण्डीवमप्यास कृष्णप्रसादाच्छक्यं धर्तुं पाण्डवस्याप्यधार्यम् | | verse_lines = गाण्डीवमप्यास कृष्णप्रसादाच्छक्यं धर्तुं पाण्डवस्याप्यधार्यम् ।¦देवैश्च तैर्ब्रह्मवराद् धृतं तद् ब्रह्मैव साक्षात् प्रभुरस्य धारणे ॥ २२८॥ | ||
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| verse_text = इन्द्रस्य दत्तश्च वरः स्वयम्भुवा तेनापि पार्थस्य बभूव धार्यम् । | | verse_text = इन्द्रस्य दत्तश्च वरः स्वयम्भुवा तेनापि पार्थस्य बभूव धार्यम् । | ||
| verse_lines = इन्द्रस्य दत्तश्च वरः स्वयम्भुवा तेनापि पार्थस्य बभूव धार्यम् | | verse_lines = इन्द्रस्य दत्तश्च वरः स्वयम्भुवा तेनापि पार्थस्य बभूव धार्यम् ।¦इन्द्रो ह्यसौ फल्गुनत्वेन जातस्ततः सोऽस्त्रैः शरशालां चकार ॥ २२९॥ | ||
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| verse_text = स योजनद्वादशकाभिविस्तृतं पुरं चकाराऽशु पुरन्दरात्मजः । | | verse_text = स योजनद्वादशकाभिविस्तृतं पुरं चकाराऽशु पुरन्दरात्मजः । | ||
| verse_lines = स योजनद्वादशकाभिविस्तृतं पुरं चकाराऽशु पुरन्दरात्मजः | | verse_lines = स योजनद्वादशकाभिविस्तृतं पुरं चकाराऽशु पुरन्दरात्मजः ।¦हुताशनोऽप्याशु वनं प्रगृह्य प्रभक्षयामास समुद्धतार्चिः ॥ २३०॥ | ||
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| verse_text = प्रभक्षमाणं(प्रभक्ष्यमाणं) निजकक्षमीक्ष्य सन्धुक्षयामास तदाऽऽशुशुक्षणिम् । | | verse_text = प्रभक्षमाणं(प्रभक्ष्यमाणं) निजकक्षमीक्ष्य सन्धुक्षयामास तदाऽऽशुशुक्षणिम् । | ||
| verse_lines = प्रभक्षमाणं(प्रभक्ष्यमाणं) निजकक्षमीक्ष्य सन्धुक्षयामास तदाऽऽशुशुक्षणिम् | | verse_lines = प्रभक्षमाणं(प्रभक्ष्यमाणं) निजकक्षमीक्ष्य सन्धुक्षयामास तदाऽऽशुशुक्षणिम् ।¦अक्षोपमाभिर्बहुलेक्षणोऽम्भसां धाराभिराक्षुब्धमनाः क्षयाय ॥ २३१॥ | ||
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| verse_text = अस्त्रैस्तु वृष्टिं विनिवार्य कृष्णः पार्थश्च शक्रं सुरपूगयुक्तम् । | | verse_text = अस्त्रैस्तु वृष्टिं विनिवार्य कृष्णः पार्थश्च शक्रं सुरपूगयुक्तम् । | ||
| verse_lines = अस्त्रैस्तु वृष्टिं विनिवार्य कृष्णः पार्थश्च शक्रं सुरपूगयुक्तम् | | verse_lines = अस्त्रैस्तु वृष्टिं विनिवार्य कृष्णः पार्थश्च शक्रं सुरपूगयुक्तम् ।¦अयुद्ध्यतां सोऽपि पराजितोऽभूत् प्रीतश्च दृष्ट्वा बलमात्मनस्तत् ॥ २३२॥ | ||
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| verse_text = स्नेहं च कृष्णस्य तदर्जुने धृतं विलोक्य पार्थस्य बलं च तादृशम् । | | verse_text = स्नेहं च कृष्णस्य तदर्जुने धृतं विलोक्य पार्थस्य बलं च तादृशम् । | ||
| verse_lines = स्नेहं च कृष्णस्य तदर्जुने धृतं विलोक्य पार्थस्य बलं च तादृशम् | | verse_lines = स्नेहं च कृष्णस्य तदर्जुने धृतं विलोक्य पार्थस्य बलं च तादृशम् ।¦निवर्त्य मेघानतितुष्टचित्तः प्रणम्य कृष्णं तनयं समाश्लिषत् ॥ २३३॥ | ||
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| verse_text = विष्णुश्च शक्रेण सहेत्य केशवं समाश्लिषन्निर्विशेषोऽप्यनन्तः । | | verse_text = विष्णुश्च शक्रेण सहेत्य केशवं समाश्लिषन्निर्विशेषोऽप्यनन्तः । | ||
| verse_lines = विष्णुश्च शक्रेण सहेत्य केशवं समाश्लिषन्निर्विशेषोऽप्यनन्तः | | verse_lines = विष्णुश्च शक्रेण सहेत्य केशवं समाश्लिषन्निर्विशेषोऽप्यनन्तः ।¦स केवलं क्रीडमानः सशक्रः(स शक्रः) स्थितो हि पूर्वं युयुधे न किञ्चित् ॥ २३४॥ | ||
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| verse_text = ब्रह्मा च शर्वश्च समेत्य कृष्णं प्रणम्य पार्थस्य च कृष्णनाम । | | verse_text = ब्रह्मा च शर्वश्च समेत्य कृष्णं प्रणम्य पार्थस्य च कृष्णनाम । | ||
| verse_lines = ब्रह्मा च शर्वश्च समेत्य कृष्णं प्रणम्य पार्थस्य च कृष्णनाम | | verse_lines = ब्रह्मा च शर्वश्च समेत्य कृष्णं प्रणम्य पार्थस्य च कृष्णनाम ।¦सञ्चक्रतुश्चापि शिक्षाप्रकर्षाच्चक्रुः (चक्रुश्च सर्वे) सर्वे स्वास्त्रदाने प्रतिज्ञाम् ॥ २३५॥ | ||
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| verse_text = अनुज्ञातास्ते प्रययुः केशवेन क्रीडार्थमिन्द्रो युयुधे हि तत्र । | | verse_text = अनुज्ञातास्ते प्रययुः केशवेन क्रीडार्थमिन्द्रो युयुधे हि तत्र । | ||
| verse_lines = अनुज्ञातास्ते प्रययुः केशवेन क्रीडार्थमिन्द्रो युयुधे हि तत्र | | verse_lines = अनुज्ञातास्ते प्रययुः केशवेन क्रीडार्थमिन्द्रो युयुधे हि तत्र ।¦प्रीत्या कीर्तिं दातुमप्यर्जुनस्य ततस्तुष्टः सह देवैर्ययौ स्वः (ययौ सः) ॥ २३६॥ | ||
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| verse_text = दैत्याश्च नागाश्च पिशाचयक्षा हताः सर्वे तद्वनस्था हि ताभ्याम् । | | verse_text = दैत्याश्च नागाश्च पिशाचयक्षा हताः सर्वे तद्वनस्था हि ताभ्याम् । | ||
| verse_lines = दैत्याश्च नागाश्च पिशाचयक्षा हताः सर्वे तद्वनस्था हि ताभ्याम् | | verse_lines = दैत्याश्च नागाश्च पिशाचयक्षा हताः सर्वे तद्वनस्था हि ताभ्याम् ।¦ऋते चतुष्पक्षिणश्चाश्वसेनं मयं च नान्यत् किञ्चिदासात्र मुक्तम् ॥ २३७॥ | ||
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| verse_text = अयमग्ने जरितेत्यादिमन्त्रैः स्तुत्वा वह्निं पक्षिणो नैव दग्धाः । | | verse_text = अयमग्ने जरितेत्यादिमन्त्रैः स्तुत्वा वह्निं पक्षिणो नैव दग्धाः । | ||
| verse_lines = अयमग्ने जरितेत्यादिमन्त्रैः स्तुत्वा वह्निं पक्षिणो नैव दग्धाः | | verse_lines = अयमग्ने जरितेत्यादिमन्त्रैः स्तुत्वा वह्निं पक्षिणो नैव दग्धाः ।¦अश्वसेनः पुत्रकस्तक्षकस्य मात्रा ग्रस्तः प्रातिलोम्येन कण्ठे ॥ २३८॥ | ||
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| verse_text = छिन्नेऽर्जुनेनान्तरिक्षे पतन्त्यास्तस्याः शक्रेणावितश्छिन्नपुच्छः । | | verse_text = छिन्नेऽर्जुनेनान्तरिक्षे पतन्त्यास्तस्याः शक्रेणावितश्छिन्नपुच्छः । | ||
| verse_lines = छिन्नेऽर्जुनेनान्तरिक्षे पतन्त्यास्तस्याः शक्रेणावितश्छिन्नपुच्छः | | verse_lines = छिन्नेऽर्जुनेनान्तरिक्षे पतन्त्यास्तस्याः शक्रेणावितश्छिन्नपुच्छः ।¦वधान्मातुः पुच्छभङ्गाच्च रोषाद्धन्तुं पार्थं कर्णतूणीरगोऽभूत् ॥ २३९॥ | ||
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| verse_lines = मयः कृष्णेनाऽत्तचक्रेण दृष्टो ययौ पार्थं शरणं जीवनार्थी | | verse_lines = मयः कृष्णेनाऽत्तचक्रेण दृष्टो ययौ पार्थं शरणं जीवनार्थी ।¦पार्थार्थमेनं न जघान कृष्णः स्वभक्तश्चेत्यतिमायं परेशः ॥ २४०॥ | ||
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| verse_lines = देवारिरित्येव मयि प्रकोपः कृष्णस्य तेनाहमिमं(तेनाहममुं) पुरन्दरम् | | verse_lines = देवारिरित्येव मयि प्रकोपः कृष्णस्य तेनाहमिमं(तेनाहममुं) पुरन्दरम् ।¦पार्थात्मकं शरणं यामि तेन कृष्णप्रियः स्यामिति तस्य बुद्धिः ॥ २४१॥ | ||
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| verse_text = प्राणोपकृत् प्रत्युपकारमाशु किं ते करोमीति स पार्थमाह । | | verse_text = प्राणोपकृत् प्रत्युपकारमाशु किं ते करोमीति स पार्थमाह । | ||
| verse_lines = प्राणोपकृत् प्रत्युपकारमाशु किं ते करोमीति स पार्थमाह | | verse_lines = प्राणोपकृत् प्रत्युपकारमाशु किं ते करोमीति स पार्थमाह ।¦कृष्णप्रसादाद्धि भवान् विमुक्तस्तस्मै करोत्वित्यवदत् स पार्थः ॥ २४२॥ | ||
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| verse_text = कृष्णोऽपि (राज्ञे)राज्ञोऽतिविचित्ररूपसभाकृतावादिशत्(सभाकृतावदिशत्) तां स चक्रे । | | verse_text = कृष्णोऽपि (राज्ञे)राज्ञोऽतिविचित्ररूपसभाकृतावादिशत्(सभाकृतावदिशत्) तां स चक्रे । | ||
| verse_lines = कृष्णोऽपि (राज्ञे)राज्ञोऽतिविचित्ररूपसभाकृतावादिशत्(सभाकृतावदिशत्) तां स चक्रे | | verse_lines = कृष्णोऽपि (राज्ञे)राज्ञोऽतिविचित्ररूपसभाकृतावादिशत्(सभाकृतावदिशत्) तां स चक्रे ।¦अनिर्गमं प्राणिनामर्थितौ तौ हुताशनेनाथ विधाय जग्मतुः ॥ २४३॥ | ||
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| verse_lines = दृष्ट्वा च तौ पाण्डवाः सर्व एव महामुदं प्रापुरेतन्निशम्य | | verse_lines = दृष्ट्वा च तौ पाण्डवाः सर्व एव महामुदं प्रापुरेतन्निशम्य ।¦कृष्णोऽपि पार्थैर्मुमुदेऽनन्तशक्तिसुखज्ञानप्रभावौदार्यवीर्यः(प्राभावौदार्यवीर्यः) ॥ २४४॥ | ||
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<span id="gr-C21" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकविंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C21" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकविंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ जनार्दनाज्ञया मयः समस्तकौतुकोत्तराम्(समस्तकौतुकोत्तमाम्) । | | verse_text = औं ॥ जनार्दनाज्ञया मयः समस्तकौतुकोत्तराम्(समस्तकौतुकोत्तमाम्) । | ||
| verse_lines = औं ॥ जनार्दनाज्ञया मयः समस्तकौतुकोत्तराम्(समस्तकौतुकोत्तमाम्) | | verse_lines = औं ॥ जनार्दनाज्ञया मयः समस्तकौतुकोत्तराम्(समस्तकौतुकोत्तमाम्) ।¦सभां विधाय भूभृते ददौ गदां वृकोदरे ॥ १॥ | ||
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| verse_text = स वायुधारितां गदां हि यौवनाश्वभूभृता । | | verse_text = स वायुधारितां गदां हि यौवनाश्वभूभृता । | ||
| verse_lines = स वायुधारितां गदां हि यौवनाश्वभूभृता | | verse_lines = स वायुधारितां गदां हि यौवनाश्वभूभृता ।¦प्रसादतोऽस्य लम्भितामवाप्य मोदमाप ह ॥ २॥ | ||
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| verse_lines = पुनश्च वत्सरद्वयं समुष्य केशवो ययौ | | verse_lines = पुनश्च वत्सरद्वयं समुष्य केशवो ययौ ।¦समर्चितस्य पाण्डवैर्वियोजनेऽस्य चाक्षमैः ॥ ३॥ | ||
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| verse_lines = ततो वसन् स्वपुर्यजः क्वचिद् रविग्रहे हरिः | | verse_lines = ततो वसन् स्वपुर्यजः क्वचिद् रविग्रहे हरिः ।¦सदारपुत्रबान्धवः समन्तपञ्चकं ययौ ॥ ४॥ | ||
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| verse_lines = पृथासुताश्च सर्वशः सदारपुत्रमातृकाः | | verse_lines = पृथासुताश्च सर्वशः सदारपुत्रमातृकाः ।¦क्षितीश्वराश्च सर्वशः प्रियाप्रिया(प्रियाः प्रियाः) हरेश्च ये ॥ ५॥ | ||
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| verse_lines = तथैव नन्दगोपकः सदारगोपगोपिकः | | verse_lines = तथैव नन्दगोपकः सदारगोपगोपिकः ।¦मुनीश्वराश्च सर्वतः समीयुरत्र च प्रजाः ॥ ६॥ | ||
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| verse_lines = प्रियाश्च ये रमेशितुर्हरिं त्रिरूपमेत्य ते | | verse_lines = प्रियाश्च ये रमेशितुर्हरिं त्रिरूपमेत्य ते ।¦वसिष्ठवृष्णिनन्दनौ भृगूत्तमं(भृगूद्वहं) तथाऽऽर्चयन्(आर्चयन्) ॥ ७॥ | ||
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| verse_lines = कृतार्थतां च ते ययू रमेशपाददर्शनात् | | verse_lines = कृतार्थतां च ते ययू रमेशपाददर्शनात् ।¦रविग्रहे समाप्लुता भृगूद्वहोत्थतीर्थके ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = अनुग्रहं विधाय स स्वकेषु केशवस्त्रिवृत् । | | verse_text = अनुग्रहं विधाय स स्वकेषु केशवस्त्रिवृत् । | ||
| verse_lines = अनुग्रहं विधाय स स्वकेषु केशवस्त्रिवृत् | | verse_lines = अनुग्रहं विधाय स स्वकेषु केशवस्त्रिवृत् ।¦अयाजयच्च शूरजं मखैः समाप्तदक्षिणैः ॥ ९॥ | ||
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| verse_lines = समस्तलोकसंस्थितात्मभक्तिमज्जनस्य सः | | verse_lines = समस्तलोकसंस्थितात्मभक्तिमज्जनस्य सः ।¦सुकालदर्शनात् परं(वरं व्यधात्) व्यधादनुग्रहं हरिः ॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = ततो ययौ स्वकां पुरीं पृथासुतैः सहाच्युतः | | verse_lines = ततो ययौ स्वकां पुरीं पृथासुतैः सहाच्युतः ।¦चकार तत्र चाऽह्निकं क्रतुं महाश्वमेधिकम् ॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = हयं सभीमफल्गुना हरे रथं समास्थिताः | | verse_lines = हयं सभीमफल्गुना हरे रथं समास्थिताः ।¦व्यचारयन् हरेः सुता दिनस्य पादमात्रतः ॥ १२॥ | ||
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| verse_lines = जिताः समस्तभूभृतो जरासुतादयः क्षणात् | | verse_lines = जिताः समस्तभूभृतो जरासुतादयः क्षणात् ।¦वृकोदरादिभिस्तु(वृकोदरादिभिः सुतैः) तैर्हयश्च दिव्य आययौ ॥ १३॥ | ||
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| verse_lines = सकृष्णरामकार्ष्णिभिः (न कृष्णरामकार्ष्णिभिः) सुता नु मेऽत्र पालिताः | | verse_lines = सकृष्णरामकार्ष्णिभिः (न कृष्णरामकार्ष्णिभिः) सुता नु मेऽत्र पालिताः ।¦क्व तेऽत्र शक्तिरित्यमुं जगाद सोऽर्जुनं द्विजः ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = तदा जगाद फल्गुनोऽसुरैर्विदूषितात्मना । | | verse_text = तदा जगाद फल्गुनोऽसुरैर्विदूषितात्मना । | ||
| verse_lines = तदा जगाद फल्गुनोऽसुरैर्विदूषितात्मना | | verse_lines = तदा जगाद फल्गुनोऽसुरैर्विदूषितात्मना ।¦न विप्र तादृशोऽस्म्यहं यथैव केशवादयः ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = मया जिता हि खाण्डवे सुरास्तथाऽसुरानहम् । | | verse_text = मया जिता हि खाण्डवे सुरास्तथाऽसुरानहम् । | ||
| verse_lines = मया जिता हि खाण्डवे सुरास्तथाऽसुरानहम् | | verse_lines = मया जिता हि खाण्डवे सुरास्तथाऽसुरानहम् ।¦निवातवर्मनमकान् विजेष्य उत्तरत्र हि ॥ १९॥ | ||
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| verse_text = उदीर्य चेति केशवं स ऊचिवान् व्रजाम्यहम् । | | verse_text = उदीर्य चेति केशवं स ऊचिवान् व्रजाम्यहम् । | ||
| verse_lines = उदीर्य चेति केशवं स ऊचिवान् व्रजाम्यहम् | | verse_lines = उदीर्य चेति केशवं स ऊचिवान् व्रजाम्यहम् ।¦इतीरितोऽवदद्धरिस्तवात्र शक्यते नु किम् ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = विलज्जमानमीक्ष्य तं जगाद केशवोऽरिहा । | | verse_text = विलज्जमानमीक्ष्य तं जगाद केशवोऽरिहा । | ||
| verse_lines = विलज्जमानमीक्ष्य तं जगाद केशवोऽरिहा | | verse_lines = विलज्जमानमीक्ष्य तं जगाद केशवोऽरिहा ।¦व्रजेति स प्रतिश्रवं चकार हाप्यरक्षणे(चकार हास्य रक्षणे) ॥ २१॥ | ||
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| verse_text = वह्निं प्रवेक्ष्येऽशक्तश्चेदित्युक्त्वा सर्वयादवैः । | | verse_text = वह्निं प्रवेक्ष्येऽशक्तश्चेदित्युक्त्वा सर्वयादवैः । | ||
| verse_lines = वह्निं प्रवेक्ष्येऽशक्तश्चेदित्युक्त्वा सर्वयादवैः | | verse_lines = वह्निं प्रवेक्ष्येऽशक्तश्चेदित्युक्त्वा सर्वयादवैः ।¦ययौ न रामप्रद्युम्नावनिरुद्धं च केशवः ।¦न्ययोजयत् तत्साहाय्ये (तत्सहाये) यशस्तेष्वभिरक्षितुम् ॥ २२॥ | ||
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| verse_lines = प्रियो हि नितरां रामः कृष्णस्यानु च तं सुतः | | verse_lines = प्रियो हि नितरां रामः कृष्णस्यानु च तं सुतः ।¦अनिरुद्धः कार्ष्णिमनु प्रद्युम्नाद् योऽजनिष्ट हि ।¦रुक्मिपुत्र्यां रुक्मवत्यामाहृतायां स्वयम्बरे ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = रतिरेव हि या तस्यां जातोऽसौ कामनन्दनः | | verse_lines = रतिरेव हि या तस्यां जातोऽसौ कामनन्दनः ।¦पूर्वमप्यनिरुद्धाख्यो विष्णोस्तन्नाम्न एव च ।¦आवेशयुक्तो बलवान् रूपवान् सर्वशास्त्रवित् ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = तस्मात् तांस्त्रीनृते कृष्णः पार्थसाहाय्यकारणात् । | | verse_text = तस्मात् तांस्त्रीनृते कृष्णः पार्थसाहाय्यकारणात् । | ||
| verse_lines = तस्मात् तांस्त्रीनृते कृष्णः पार्थसाहाय्यकारणात् | | verse_lines = तस्मात् तांस्त्रीनृते कृष्णः पार्थसाहाय्यकारणात् ।¦न्ययोजयत् सूतिकाले ब्राह्मण्याः स च फल्गुनः ॥ २५॥ | ||
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| verse_text = अस्त्रैश्चकार दिग्बन्धं कुमारोऽथापि तत्क्षणात् । | | verse_text = अस्त्रैश्चकार दिग्बन्धं कुमारोऽथापि तत्क्षणात् । | ||
| verse_lines = अस्त्रैश्चकार दिग्बन्धं कुमारोऽथापि तत्क्षणात् | | verse_lines = अस्त्रैश्चकार दिग्बन्धं कुमारोऽथापि तत्क्षणात् ।¦अदर्शनं ययौ पार्थो विषण्णः सह यादवैः ।¦अधिक्षिप्तो(अदिक्षिप्तः) ब्राह्मणेन ययौ यत्र श्रियःपतिः ॥ २६॥ | ||
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| verse_text = वह्निं(अग्निं) विविक्षन्तममुं निवार्य ययौ सविप्रः सहफल्गुनो हरिः । | | verse_text = वह्निं(अग्निं) विविक्षन्तममुं निवार्य ययौ सविप्रः सहफल्गुनो हरिः । | ||
| verse_lines = वह्निं(अग्निं) विविक्षन्तममुं निवार्य ययौ सविप्रः सहफल्गुनो हरिः | | verse_lines = वह्निं(अग्निं) विविक्षन्तममुं निवार्य ययौ सविप्रः सहफल्गुनो हरिः ।¦आशामुदीचीं बृहता रथेन क्षणेन तीर्त्वैव च सप्तवारिधीन् ॥ २७॥ | ||
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| verse_text = ददुश्च मार्गं गिरयोऽब्धयस्तथा विदार्य चक्रेण तमोऽन्धमीशः । | | verse_text = ददुश्च मार्गं गिरयोऽब्धयस्तथा विदार्य चक्रेण तमोऽन्धमीशः । | ||
| verse_lines = ददुश्च मार्गं गिरयोऽब्धयस्तथा विदार्य चक्रेण तमोऽन्धमीशः | | verse_lines = ददुश्च मार्गं गिरयोऽब्धयस्तथा विदार्य चक्रेण तमोऽन्धमीशः ।¦घनोदकं चाप्यतितीर्य तत्र ददर्श धाम स्वमनन्तवीर्यः ॥ २८॥ | ||
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| verse_lines = संस्थाप्य दूरे सरथं सविप्रं पार्थं स्वरूपे द्विचतुष्कबाहौ | | verse_lines = संस्थाप्य दूरे सरथं सविप्रं पार्थं स्वरूपे द्विचतुष्कबाहौ ।¦समस्तरत्नोज्ज्वलदिव्यभूषणे विवेश नित्योरुगुणार्णवे प्रभुः ॥ २९॥ | ||
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| verse_text = सहस्रमूर्धन्युरुशेषभोग आसीनरूपेऽमितसूर्यदीधितौ । | | verse_text = सहस्रमूर्धन्युरुशेषभोग आसीनरूपेऽमितसूर्यदीधितौ । | ||
| verse_lines = सहस्रमूर्धन्युरुशेषभोग आसीनरूपेऽमितसूर्यदीधितौ | | verse_lines = सहस्रमूर्धन्युरुशेषभोग आसीनरूपेऽमितसूर्यदीधितौ ।¦रमासहाये तटिदुज्ज्वलाम्बरे मुक्तैर्विरिञ्चादिभिरर्चिते सदा ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = स्थित्वैकरूपेण मुहूर्तमीश्वरो विनिर्ययौ विप्रसुतान् प्रगृह्य | | verse_lines = स्थित्वैकरूपेण मुहूर्तमीश्वरो विनिर्ययौ विप्रसुतान् प्रगृह्य ।¦सुनन्दनन्दादय एव पार्षदास्ते वैष्णवा भूमितले प्रजाताः ॥ ३१॥ | ||
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| verse_text = दर्पं निहन्तुं हरिरर्जुनस्य समानयद् विप्रसुतान् परेशः । | | verse_text = दर्पं निहन्तुं हरिरर्जुनस्य समानयद् विप्रसुतान् परेशः । | ||
| verse_lines = दर्पं निहन्तुं हरिरर्जुनस्य समानयद् विप्रसुतान् परेशः | | verse_lines = दर्पं निहन्तुं हरिरर्जुनस्य समानयद् विप्रसुतान् परेशः ।¦प्रीतिर्महत्येव यतोऽर्जुने हरेः संशिक्षयामास ततः स एनम् ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = अप्राकृतात् सदनाद् वासुदेवो निस्सृत्य सूर्याधिकलक्षदीधितेः | | verse_lines = अप्राकृतात् सदनाद् वासुदेवो निस्सृत्य सूर्याधिकलक्षदीधितेः ।¦रथं समारुह्य सपार्थविप्र आगात् सुतांश्चैव ददौ द्विजाय ॥ ३३॥ | ||
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| verse_lines = लोकशिक्षार्थमेवासौ प्रायश्चित्तं च चालने | | verse_lines = लोकशिक्षार्थमेवासौ प्रायश्चित्तं च चालने ।¦चक्रे सार्द्धमुहूर्तेन समागम्य पुनर्मखम् ॥ ३४॥ | ||
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| verse_lines = ब्रह्मादीनागतांश्चैव सदा स्वपरिचारकान् | | verse_lines = ब्रह्मादीनागतांश्चैव सदा स्वपरिचारकान् ।¦पूजयित्वाऽभ्यनुज्ञाय ब्राह्मणानप्यपूजयत्(अभ्यपूजयत्) ॥ ३५॥ | ||
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| verse_lines = सस्नाववभृथं कृष्णः सदारः ससुहृज्जनः | | verse_lines = सस्नाववभृथं कृष्णः सदारः ससुहृज्जनः ।¦आयान्तं द्वारकां कृष्णं दन्तवक्रो रुरोध ह ॥ ३६॥ | ||
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| verse_lines = जघान गदया कृष्णस्तं क्षणात् सविडूरथम् | | verse_lines = जघान गदया कृष्णस्तं क्षणात् सविडूरथम् ।¦विडूरथस्तमोऽगच्छद् दन्तवक्रे च योऽसुरः ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = हरेः पार्षदः क्षिप्रं हरिमेव समाश्रितः | | verse_lines = हरेः पार्षदः क्षिप्रं हरिमेव समाश्रितः ।¦कृष्णे प्राप्ते स्वलोकं च निस्सृत्यास्मात् स्वरूपतः ।¦एकीभावं स्वरूपेण द्वारपेण गमिष्यति ॥ ३८॥ | ||
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| verse_lines = ततः कृष्णः पुरीमेत्य बोधयामास फल्गुनम् | | verse_lines = ततः कृष्णः पुरीमेत्य बोधयामास फल्गुनम् ।¦किमेतद् दृष्टमित्येव तेन पृष्टो रमापतिः ॥ ३९॥ | ||
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| verse_lines = अयं द्वीपः सागरश्च लक्षयोजनविस्तृतौ | | verse_lines = अयं द्वीपः सागरश्च लक्षयोजनविस्तृतौ ।¦तदन्ये तु क्रमेणैव द्विगुणेनोत्तरोत्तराः ॥ ४०॥ | ||
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| verse_lines = अन्त्याध्यर्द्धस्थलं हैमं बाह्यतो वाज्रलेपिकम्(वज्रलेपितम्,वज्रलेपकम्)) | | verse_lines = अन्त्याध्यर्द्धस्थलं हैमं बाह्यतो वाज्रलेपिकम्(वज्रलेपितम्,वज्रलेपकम्)) ।¦एतत् सर्वं लोकनाम ह्येतस्माद् द्विगुणं तमः ।¦अन्धं यत्र पतन्त्युग्रा मिथ्याज्ञानपरायणाः ॥ ४१॥ | ||
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| verse_lines = घनोदकं तद्द्विगुणं तदन्ते धाम मामकम् | | verse_lines = घनोदकं तद्द्विगुणं तदन्ते धाम मामकम् ।¦यत्तद् दृष्टं त्वया पार्थ तत्र मुक्तैरजादिभिः ।¦सेव्यमानः स्थितो नित्यं सर्वैः परमपूरुषः ॥ ४२॥ | ||
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| verse_lines = लोकालोकप्रदेशस्तु पञ्चाशल्लक्षविस्तृतः | | verse_lines = लोकालोकप्रदेशस्तु पञ्चाशल्लक्षविस्तृतः ।¦सपञ्चाशत्सहस्रश्च तस्यापि गणनं तथा ॥ ४३॥ | ||
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| verse_lines = योजनानां पञ्चविंशत्कोटयो मेरुपर्वतात् | | verse_lines = योजनानां पञ्चविंशत्कोटयो मेरुपर्वतात् ।¦चतसृष्वपि दिक्षूर्ध्वमधश्चाण्डं प्रकीर्तितम् ॥ ४४॥ | ||
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| verse_lines = अबग्नीरनभोहङ्कृन्महत्तत्त्वगुणत्त्रयैः | | verse_lines = अबग्नीरनभोहङ्कृन्महत्तत्त्वगुणत्त्रयैः ।¦क्रमाद् दशोत्तरैरेतदावृतं(क्रमाद् दशोत्तरैरैतैरावृतं) परतस्ततः ॥ ४५॥ | ||
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| verse_lines = व्याप्तोऽहं (सर्वतः)सर्वगोऽनन्तोऽनन्तरूपो निरन्तरः | | verse_lines = व्याप्तोऽहं (सर्वतः)सर्वगोऽनन्तोऽनन्तरूपो निरन्तरः ।¦अनन्तशीर्षोऽनन्ताक्षोऽनन्तपादकरोरुकः ।¦अनन्तगुणमाहात्म्यश्चिदानन्दशरीरकः ॥ ४६॥ | ||
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| verse_lines = मद्वशा एव सर्वेऽपि त्वं चान्ये च धनञ्जय | | verse_lines = मद्वशा एव सर्वेऽपि त्वं चान्ये च धनञ्जय ।¦मत्प्रसादाद् बलं चैव विजयश्चाखिला गुणाः ।¦तस्मान्न विस्मयः कार्यो न दर्पश्च त्वयाऽनघ ॥ ४७॥ | ||
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| verse_lines = ‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | | verse_lines = ‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।¦मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे’ ।(भ.गी.१८-६५)¦इत्युक्तः प्रणिपत्यैनं क्षमस्वेत्याह फल्गुनः ॥ ४८॥ | ||
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| verse_lines = उषित्वा कतिचिन्मासान् ययुः सर्वेऽपि पाण्डवाः | | verse_lines = उषित्वा कतिचिन्मासान् ययुः सर्वेऽपि पाण्डवाः ।¦अनुज्ञाताः केशवेन भक्तिनम्रधियोऽच्युते ।¦सम्भाविताः केशवेन सौहार्देनाधिकेन च ॥ ४९॥ | ||
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| verse_lines = ततः कदाचित् प्रवरे सभातले धर्मात्मजो राजभिर्भ्रातृभिश्च | | verse_lines = ततः कदाचित् प्रवरे सभातले धर्मात्मजो राजभिर्भ्रातृभिश्च ।¦वृतो निशम्यैव(निशाम्यैव) सभाः सुराणां यथा स्थिता नारदमन्वपृच्छत् ॥ ५०॥ | ||
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| verse_text = ततश्च द्विगुणः प्रोक्तो विष्णुलोकः सनातनः । | | verse_text = ततश्च द्विगुणः प्रोक्तो विष्णुलोकः सनातनः । | ||
| verse_lines = ततश्च द्विगुणः प्रोक्तो विष्णुलोकः सनातनः | | verse_lines = ततश्च द्विगुणः प्रोक्तो विष्णुलोकः सनातनः ।¦उत्तरोत्तरतः सर्वे सुखे शतगुणोत्तराः ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = अनन्तजनसम्पूर्णा(अनन्तजनसङ्कीर्णाः) अपि ते हीच्छया हरेः । | | verse_text = अनन्तजनसम्पूर्णा(अनन्तजनसङ्कीर्णाः) अपि ते हीच्छया हरेः । | ||
| verse_lines = अनन्तजनसम्पूर्णा(अनन्तजनसङ्कीर्णाः) अपि ते हीच्छया हरेः | | verse_lines = अनन्तजनसम्पूर्णा(अनन्तजनसङ्कीर्णाः) अपि ते हीच्छया हरेः ।¦अवकाशवन्तो दिव्यत्वात् पूर्यन्ते न कदाचन ।¦सर्वकामसुखैः पूर्णा दिव्यस्त्रीपुरुषोज्ज्वलाः ॥ ५५॥ | ||
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| verse_lines = दिव्यरत्नसमाकीर्णं तथा पातालसप्तकम् | | verse_lines = दिव्यरत्नसमाकीर्णं तथा पातालसप्तकम् ।¦अधस्ताच्छेषदेवेन बलिना समधिष्ठितम् ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = कामभोगसमायुक्ता बहुवर्षसहस्रिणः । | | verse_text = कामभोगसमायुक्ता बहुवर्षसहस्रिणः । | ||
| verse_lines = कामभोगसमायुक्ता बहुवर्षसहस्रिणः | | verse_lines = कामभोगसमायुक्ता बहुवर्षसहस्रिणः ।¦सप्तद्वीपेषु पुरुषा नार्यश्चोक्ताः सुरूपिणः ॥ ५७॥ | ||
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| verse_text = एषां च सर्वलोकानां धाता नारायणः परः । | | verse_text = एषां च सर्वलोकानां धाता नारायणः परः । | ||
| verse_lines = एषां च सर्वलोकानां धाता नारायणः परः | | verse_lines = एषां च सर्वलोकानां धाता नारायणः परः ।¦विष्णुलोकस्थितो मुक्तैः सदा सर्वैरुपास्यते ॥ ५८॥ | ||
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| verse_lines = सेवका ब्रह्मणश्चैव देवा वेदाश्च सर्वशः | | verse_lines = सेवका ब्रह्मणश्चैव देवा वेदाश्च सर्वशः ।¦शक्रस्य मुनयः सर्वे हरिश्चन्द्रश्च भूमिपः ॥ ५९॥ | ||
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| verse_text = अखिला अपि राजानः पाण्डुश्चास्मत्पिता मुने । | | verse_text = अखिला अपि राजानः पाण्डुश्चास्मत्पिता मुने । | ||
| verse_lines = अखिला अपि राजानः पाण्डुश्चास्मत्पिता मुने | | verse_lines = अखिला अपि राजानः पाण्डुश्चास्मत्पिता मुने ।¦यमस्यैवानुगाः प्रोक्ता राजभिस्तैर्यमेन च ॥ ६०॥ | ||
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| verse_lines = उपास्यमानो भगवान् रामो यमसभातले | | verse_lines = उपास्यमानो भगवान् रामो यमसभातले ।¦उक्त इन्द्रेण चोपास्यो वामनात्मा जनार्दनः ॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = प्रादुर्भावाश्च निखिला ब्रह्मणोपासिताः सदा । | | verse_text = प्रादुर्भावाश्च निखिला ब्रह्मणोपासिताः सदा । | ||
| verse_lines = प्रादुर्भावाश्च निखिला ब्रह्मणोपासिताः सदा | | verse_lines = प्रादुर्भावाश्च निखिला ब्रह्मणोपासिताः सदा ।¦वरुणस्यानुगा नागास्तत्र मत्स्याकृतिर्हरिः ।¦गन्धर्वा धनदस्यापि तत्र कल्की हरिः प्रभुः ॥ ६२॥ | ||
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| verse_text = रुद्रस्योग्राणि भूतानि नृसिंहात्मा शिवेन च । | | verse_text = रुद्रस्योग्राणि भूतानि नृसिंहात्मा शिवेन च । | ||
| verse_lines = रुद्रस्योग्राणि भूतानि नृसिंहात्मा शिवेन च | | verse_lines = रुद्रस्योग्राणि भूतानि नृसिंहात्मा शिवेन च ।¦उपास्यते सदा विष्णुरित्याद्युक्तं त्वयाऽनघ ।¦सर्वरत्नस्थलान् दिव्यान् देवलोकान् प्रभाषता ॥ ६३॥ | ||
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| verse_lines = तत्र मे संशयो भूयान् हरिश्चन्द्रः कथं नृपः | | verse_lines = तत्र मे संशयो भूयान् हरिश्चन्द्रः कथं नृपः ।¦ऐन्द्रं सभातलं प्राप्तः पाण्डुर्नास्मत्पिता मुने ॥ ६४॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तो नारदः प्राह राजसूयकृतोन्नतिम् | | verse_lines = इत्युक्तो नारदः प्राह राजसूयकृतोन्नतिम् ।¦हरिश्चन्द्रस्य तां(तं) दृष्ट्वा पिता यमसभातले ।¦स्थितस्त्वामवदत् पाण्डू रामद्वयसुदैवते(रामद्वयसुदैवतम्) ॥ ६५॥ | ||
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| verse_lines = करोतु राजसूयं मे पुत्रोऽजेयानुजार्चितः | | verse_lines = करोतु राजसूयं मे पुत्रोऽजेयानुजार्चितः ।¦पालितो वासुदेवेन किं तस्यासाध्यमत्र हि ॥ ६६॥ | ||
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| verse_lines = एतच्छ्रुत्वा धर्मसुतो भ्रातृभिः सहितो वशी | | verse_lines = एतच्छ्रुत्वा धर्मसुतो भ्रातृभिः सहितो वशी ।¦अवाप्तिं राजसूयस्य मन्त्रयामास धर्मवित् ॥ ६७॥ | ||
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| verse_lines = सुकार्यमेतदित्यलं निशम्य सोदरोदितम् | | verse_lines = सुकार्यमेतदित्यलं निशम्य सोदरोदितम् ।¦अयातयत् स्वसारथिं स केशवाय भूपतिः ॥ ६८॥ | ||
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| verse_lines = तदैव केशवस्य याः स्त्रियस्तदीयतातकैः | | verse_lines = तदैव केशवस्य याः स्त्रियस्तदीयतातकैः ।¦सहोदरैश्च यापितः स दूत आप माधवम् ॥ ६९॥ | ||
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| verse_lines = प्रणम्य केशवं वचः स आह मागधेन ते | | verse_lines = प्रणम्य केशवं वचः स आह मागधेन ते ।¦विवाहबान्धवा रणे विजित्य रोधिता गिरौ ॥ ७०॥ | ||
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| verse_lines = नृपायुतद्वयेन सोऽष्टविंशकैः शतैरपि | | verse_lines = नृपायुतद्वयेन सोऽष्टविंशकैः शतैरपि ।¦यियक्षुरुग्ररूपिणं त्रिलोचनं त्वयि स्थिते ॥ ७१॥ | ||
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| verse_lines = विमोचयस्व तान् प्रभो निहत्य मागधेश्वरम् | | verse_lines = विमोचयस्व तान् प्रभो निहत्य मागधेश्वरम् ।¦अवैदिकं मुखं च तं विलुम्प धर्मगुप्तये ॥ ७२॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितोऽथ सारथिं निशाम्य धर्मजस्य च | | verse_lines = इतीरितोऽथ सारथिं निशाम्य धर्मजस्य च ।¦निशम्य तद् वचस्तदा जगाम पाण्डवालयम् ॥ ७३॥ | ||
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| verse_lines = स पाण्डवैः समर्चितो मखाय धर्मजेन च | | verse_lines = स पाण्डवैः समर्चितो मखाय धर्मजेन च ।¦प्रपृष्ट आह माधवो वचो जगत्सुखावहम् ॥ ७४॥ | ||
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| verse_lines = क्रतुर्यथाविधानतः कृतो हि पारमेष्ठ्यकम् | | verse_lines = क्रतुर्यथाविधानतः कृतो हि पारमेष्ठ्यकम् ।¦पदं नयेत तत्पदे सुयोग्यमेष नान्यथा ॥ ७५॥ | ||
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| verse_lines = (अयोग्यकम्)अयोग्यकान्महापदे विधातुरेष हि क्रतुः | | verse_lines = (अयोग्यकम्)अयोग्यकान्महापदे विधातुरेष हि क्रतुः ।¦समानयोग्यतागणात् करोति मुक्तिगं वरम्(मुक्तिगं परम्) ॥ ७६॥ | ||
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| verse_lines = पुरा तु मुक्तितोऽधिकं स्वजातितः करोति च | | verse_lines = पुरा तु मुक्तितोऽधिकं स्वजातितः करोति च ।¦अतस्त्रिशङ्कुपुत्रको नृपानतीत्य वर्तते ॥ ७७॥ | ||
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| verse_lines = सुरांशकोऽपि ते पिता विना हि राजसूयतः | | verse_lines = सुरांशकोऽपि ते पिता विना हि राजसूयतः ।¦न शक्ष्यति त्रिशङ्कुजाद् वरत्वमाप्तुमद्य तु ॥ ७८॥ | ||
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| verse_lines = तपश्चरन् समागते शचीपतौ पिता तव | | verse_lines = तपश्चरन् समागते शचीपतौ पिता तव ।¦मरुद्गणोत्तमः पुरा नतूत्थितः शशाप सः ॥ ७९॥ | ||
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| verse_lines = अतः सुकार्य एव ते युधिष्ठिर क्रतूत्तमः | | verse_lines = अतः सुकार्य एव ते युधिष्ठिर क्रतूत्तमः ।¦भवद्भिरप्यवाप्यते स्वयोग्यताऽमुनाऽखिला ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = उदीर्य चैवमीश्वरः क्रतोरमुष्य योग्यता | | verse_lines = उदीर्य चैवमीश्वरः क्रतोरमुष्य योग्यता ।¦वृकोदरे यतोऽखिला चतुर्मुखत्वयोग्यतः ॥ ८३॥ | ||
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| verse_text = तथा सतां समाश्रयो यदुद्भवाः सतां गुणाः । | | verse_text = तथा सतां समाश्रयो यदुद्भवाः सतां गुणाः । | ||
| verse_lines = तथा सतां समाश्रयो यदुद्भवाः सतां गुणाः | | verse_lines = तथा सतां समाश्रयो यदुद्भवाः सतां गुणाः ।¦स एक एव तादृशस्त्वया विचिन्त्य यात्यताम् ॥ ९४॥ | ||
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| verse_text = यदि स्म तेन मागधो निहन्यते सतां जयः । | | verse_text = यदि स्म तेन मागधो निहन्यते सतां जयः । | ||
| verse_lines = यदि स्म तेन मागधो निहन्यते सतां जयः | | verse_lines = यदि स्म तेन मागधो निहन्यते सतां जयः ।¦विपर्ययेण चासतामिति स्म विद्धि नान्यथा ॥ ९५॥ | ||
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| verse_text = स पारमेष्ठ्यसत्पदं प्रयात्यसंशयं युधि । | | verse_text = स पारमेष्ठ्यसत्पदं प्रयात्यसंशयं युधि । | ||
| verse_lines = स पारमेष्ठ्यसत्पदं प्रयात्यसंशयं युधि | | verse_lines = स पारमेष्ठ्यसत्पदं प्रयात्यसंशयं युधि ।¦य एव हन्ति मागधं स वेदधर्मपालकः(स एव धर्मपालकः) ॥ ९६॥ | ||
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| verse_text = निहन्ति मागधेश्वरं य एष वैष्णवं जगत् । | | verse_text = निहन्ति मागधेश्वरं य एष वैष्णवं जगत् । | ||
| verse_lines = निहन्ति मागधेश्वरं य एष वैष्णवं जगत् | | verse_lines = निहन्ति मागधेश्वरं य एष वैष्णवं जगत् ।¦करोति शर्वपालितो यतः स बार्हद्रथः ॥ ९७॥ | ||
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| verse_text = निहन्ति शैवनायकं य एष(स एव) वैष्णवाग्रणीः । | | verse_text = निहन्ति शैवनायकं य एष(स एव) वैष्णवाग्रणीः । | ||
| verse_lines = निहन्ति शैवनायकं य एष(स एव) वैष्णवाग्रणीः | | verse_lines = निहन्ति शैवनायकं य एष(स एव) वैष्णवाग्रणीः ।¦इति स्म भावसंयुते वदत्यजेऽबिभेन्नृपः ॥ ९८॥ | ||
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| verse_text = युधिष्ठिरे ब्रुवत्यजं मखेन मे त्वलं त्विति । | | verse_text = युधिष्ठिरे ब्रुवत्यजं मखेन मे त्वलं त्विति । | ||
| verse_lines = युधिष्ठिरे ब्रुवत्यजं मखेन मे त्वलं त्विति | | verse_lines = युधिष्ठिरे ब्रुवत्यजं मखेन मे त्वलं त्विति ।¦तमाह मारुतात्मजो निहन्मि मागधं रणे ॥ ९९॥ | ||
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| verse_text = इतीरितेऽवदद्धरिर्व्रजामहे वयं त्रयः । | | verse_text = इतीरितेऽवदद्धरिर्व्रजामहे वयं त्रयः । | ||
| verse_lines = इतीरितेऽवदद्धरिर्व्रजामहे वयं त्रयः | | verse_lines = इतीरितेऽवदद्धरिर्व्रजामहे वयं त्रयः ।¦अहं च भीमफल्गुनौ निहन्तुमेव मागधम् ॥ १००॥ | ||
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| verse_text = वृकोदरेण हन्यते यदि स्म मागधाधिपः । | | verse_text = वृकोदरेण हन्यते यदि स्म मागधाधिपः । | ||
| verse_lines = वृकोदरेण हन्यते यदि स्म मागधाधिपः | | verse_lines = वृकोदरेण हन्यते यदि स्म मागधाधिपः ।¦मखश्च सेत्स्यते ध्रुवं जगच्च ते वशे भवेत् ॥ १०१॥ | ||
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| verse_lines = इतीरिते तु शौरिणा जगाद धर्मनन्दनः | | verse_lines = इतीरिते तु शौरिणा जगाद धर्मनन्दनः ।¦स शूरसेनमण्डलप्रहाणतो हरेस्त्रसन् ॥ १०२॥ | ||
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| verse_text = भयाद्धि यस्य माधुरं विहाय मण्डलं गताः । | | verse_text = भयाद्धि यस्य माधुरं विहाय मण्डलं गताः । | ||
| verse_lines = भयाद्धि यस्य माधुरं विहाय मण्डलं गताः | | verse_lines = भयाद्धि यस्य माधुरं विहाय मण्डलं गताः ।¦भवन्त एव सागरं ततो बिभेम्यहं रिपोः ॥ १०३॥ | ||
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| verse_text = इमौ हि(इमौ च) भीमफल्गुनौ ममाक्षिणी सदा प्रभो । | | verse_text = इमौ हि(इमौ च) भीमफल्गुनौ ममाक्षिणी सदा प्रभो । | ||
| verse_lines = इमौ हि(इमौ च) भीमफल्गुनौ ममाक्षिणी सदा प्रभो | | verse_lines = इमौ हि(इमौ च) भीमफल्गुनौ ममाक्षिणी सदा प्रभो ।¦मनोनिभो भवान् सदा न वो विनास्म्यऽहं पुमान् (विनाऽस्म्यतः पुमान्) ॥ १०४॥ | ||
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| verse_text = अतो न जीवितात् प्रियानहं रिपोर्बलीयसः । | | verse_text = अतो न जीवितात् प्रियानहं रिपोर्बलीयसः । | ||
| verse_lines = अतो न जीवितात् प्रियानहं रिपोर्बलीयसः | | verse_lines = अतो न जीवितात् प्रियानहं रिपोर्बलीयसः ।¦सकाशमात्महेतुतः प्रयातयामि वो विभो ॥ १०५॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितेऽवदत् पुनर्वृकोदरोऽरिकक्षभुक् | | verse_lines = इतीरितेऽवदत् पुनर्वृकोदरोऽरिकक्षभुक् ।¦यदीयनेतृका रमाविरिञ्चशर्वपूर्वकाः ॥ १०६॥ | ||
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| verse_text = वशे च यस्य तद् बलं सुरासुरोरगादिनाम् । | | verse_text = वशे च यस्य तद् बलं सुरासुरोरगादिनाम् । | ||
| verse_lines = वशे च यस्य तद् बलं सुरासुरोरगादिनाम् | | verse_lines = वशे च यस्य तद् बलं सुरासुरोरगादिनाम् ।¦स एष केशवः प्रभुः क्व चास्य बार्हद्रथः ॥ १०७॥ | ||
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| verse_lines = अधृष्यमस्ति मे बलं हरिः प्रणायकोऽस्य च | | verse_lines = अधृष्यमस्ति मे बलं हरिः प्रणायकोऽस्य च ।¦समस्तलोकनेतरि प्रभौ हि सर्वशक्तिता ॥ १०८॥ | ||
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| verse_lines = अजेयता तथाऽर्जुने हरेर्वरोद्भवाऽस्ति हि | | verse_lines = अजेयता तथाऽर्जुने हरेर्वरोद्भवाऽस्ति हि ।¦अतो वयं त्रयोऽद्य तं प्रयाम मागधं रिपुम् ॥ १०९॥ | ||
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| verse_lines = हनिष्य एव मागधं हरेः पुरो न संशयः | | verse_lines = हनिष्य एव मागधं हरेः पुरो न संशयः ।¦इतीरितेऽमुना हरिर्जगाद धर्मनन्दनम् ॥ ११०॥ | ||
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| verse_lines = वयं त्रयः समेत्य तं प्रयातयाम मृत्यवे | | verse_lines = वयं त्रयः समेत्य तं प्रयातयाम मृत्यवे ।¦हनिष्यति स्फुटं रणे वृकोदरो जरासुतम् ॥ १११॥ | ||
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| verse_lines = भयं न कार्यमेव ते मया हतः स नेति ह | | verse_lines = भयं न कार्यमेव ते मया हतः स नेति ह ।¦मया हि(न) नीतिहेतुतः स्वयं न हन्यते(निहन्यते) रिपुः ॥ ११२॥ | ||
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| verse_text = स शर्वसंश्रयाग्रणीर्मदाश्रयोत्तमेन तु । | | verse_text = स शर्वसंश्रयाग्रणीर्मदाश्रयोत्तमेन तु । | ||
| verse_lines = स शर्वसंश्रयाग्रणीर्मदाश्रयोत्तमेन तु | | verse_lines = स शर्वसंश्रयाग्रणीर्मदाश्रयोत्तमेन तु ।¦निहन्यते यदा तदा प्रकाशितं हि मे बलम् ॥ ११३॥ | ||
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| verse_text = अतो न शङ्कितं मनः कुरुष्व भूपते(भूपतिं) क्वचित् । | | verse_text = अतो न शङ्कितं मनः कुरुष्व भूपते(भूपतिं) क्वचित् । | ||
| verse_lines = अतो न शङ्कितं मनः कुरुष्व भूपते(भूपतिं) क्वचित् | | verse_lines = अतो न शङ्कितं मनः कुरुष्व भूपते(भूपतिं) क्वचित् ।¦प्रदर्शयामि तेऽनुजौ निहत्य मागधेश्वरम् ॥ ११४॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितः स विष्णुना विचार्य तद्गुणान् परान् | | verse_lines = इतीरितः स विष्णुना विचार्य तद्गुणान् परान् ।¦तथेति चाऽह ते त्रयः प्रतस्थुराशु मागधान् ॥ ११५॥ | ||
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| verse_lines = समेत्य मागधांस्तु ते शिवोरुलिङ्गमित्यलम् | | verse_lines = समेत्य मागधांस्तु ते शिवोरुलिङ्गमित्यलम् ।¦सुमाल्यवस्त्रभूषणैः समर्चितं गिरिं ययुः ॥ ११६॥ | ||
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| verse_lines = स्वशीर्षतोऽपि चाऽदृतं जरासुतेन ते गिरिम् | | verse_lines = स्वशीर्षतोऽपि चाऽदृतं जरासुतेन ते गिरिम् ।¦न्यपातयन्त बाहुभिस्तमस्य चोत्तमाङ्गवत् ॥ ११७॥ | ||
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| verse_text = अद्वारतस्ते नगरं प्रविश्य माषस्य नालेन कृतास्त्रिभेरीः । | | verse_text = अद्वारतस्ते नगरं प्रविश्य माषस्य नालेन कृतास्त्रिभेरीः । | ||
| verse_lines = अद्वारतस्ते नगरं प्रविश्य माषस्य नालेन कृतास्त्रिभेरीः | | verse_lines = अद्वारतस्ते नगरं प्रविश्य माषस्य नालेन कृतास्त्रिभेरीः ।¦पुष्टिप्रदा(मुष्टिप्रदानात्,मुष्टिप्रदाः) बिभिदुस्तस्य कीर्तिशास्त्रोपमा न्यक्कृतमागधेशाः ॥ ११८॥ | ||
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| verse_text = तथाऽऽपणेभ्यो बहुमाल्यगन्धान् प्रसह्य सङ्गृह्य शुभांश्च दध्रुः । | | verse_text = तथाऽऽपणेभ्यो बहुमाल्यगन्धान् प्रसह्य सङ्गृह्य शुभांश्च दध्रुः । | ||
| verse_lines = तथाऽऽपणेभ्यो बहुमाल्यगन्धान् प्रसह्य सङ्गृह्य शुभांश्च दध्रुः | | verse_lines = तथाऽऽपणेभ्यो बहुमाल्यगन्धान् प्रसह्य सङ्गृह्य शुभांश्च दध्रुः ।¦अद्वारतस्तस्य गृहं च सस्रुर्भोशब्दतस्तं च नृपः प्रसस्रुः ॥ ११९॥ | ||
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| verse_text = तान् विप्रवेषान् स निशाम्य राजा महाभुजान् स्नातकवेषयुक्तान् । | | verse_text = तान् विप्रवेषान् स निशाम्य राजा महाभुजान् स्नातकवेषयुक्तान् । | ||
| verse_lines = तान् विप्रवेषान् स निशाम्य राजा महाभुजान् स्नातकवेषयुक्तान् | | verse_lines = तान् विप्रवेषान् स निशाम्य राजा महाभुजान् स्नातकवेषयुक्तान् ।¦द्वितीयवर्णान् प्रविचिन्त्य बाहून् ज्याकर्कशान् वीक्ष्य बभाष एतान् ॥ १२०॥ | ||
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| verse_text = के ष्ठाथ(स्थात) किंहेतुत आगताश्च कृतश्च मे पर्वतलिङ्गभेदनम् । | | verse_text = के ष्ठाथ(स्थात) किंहेतुत आगताश्च कृतश्च मे पर्वतलिङ्गभेदनम् । | ||
| verse_lines = के ष्ठाथ(स्थात) किंहेतुत आगताश्च कृतश्च मे पर्वतलिङ्गभेदनम् | | verse_lines = के ष्ठाथ(स्थात) किंहेतुत आगताश्च कृतश्च मे पर्वतलिङ्गभेदनम् ।¦कृतं भवद्भिः कुत एव दुर्नयाः कृतास्तथाऽन्ये द्विजवर्यवेषैः ॥ १२१॥ | ||
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| verse_text = इति ब्रुवाणं भगवानुवाच कार्यं हि शत्रोरखिलं प्रतीपम् । | | verse_text = इति ब्रुवाणं भगवानुवाच कार्यं हि शत्रोरखिलं प्रतीपम् । | ||
| verse_lines = इति ब्रुवाणं भगवानुवाच कार्यं हि शत्रोरखिलं प्रतीपम् | | verse_lines = इति ब्रुवाणं भगवानुवाच कार्यं हि शत्रोरखिलं प्रतीपम् ।¦इत्युक्त ऊचे नहि(नच) विप्रशत्रुरहं कुतो वो मम शत्रुता भवेत् ॥ १२२॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तवाक्यं नृपतिं जगाद जनार्दनो नैव हि तादृशा द्विजाः | | verse_lines = इत्युक्तवाक्यं नृपतिं जगाद जनार्दनो नैव हि तादृशा द्विजाः ।¦अहं रिपुस्तेऽस्मि हि वासुदेव इमौ च भीमार्जुननामधेयौ ॥ १२३॥ | ||
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| verse_text = यद् बान्धवान् नः पिशिताशिधर्मतो रौद्रे मखे कल्पयितुं पशुत्वे । | | verse_text = यद् बान्धवान् नः पिशिताशिधर्मतो रौद्रे मखे कल्पयितुं पशुत्वे । | ||
| verse_lines = यद् बान्धवान् नः पिशिताशिधर्मतो रौद्रे मखे कल्पयितुं पशुत्वे | | verse_lines = यद् बान्धवान् नः पिशिताशिधर्मतो रौद्रे मखे कल्पयितुं पशुत्वे ।¦इच्छस्यरे वेदपथं विहाय तं त्वां बलाच्छास्तुमिहाऽगता वयम् ॥ १२४॥ | ||
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| verse_lines = विमोक्षयामः स्वजनान् यदि त्वं न मोचयस्यद्य निगृह्य च त्वाम् | | verse_lines = विमोक्षयामः स्वजनान् यदि त्वं न मोचयस्यद्य निगृह्य च त्वाम् ।¦मुञ्चाथवा तानभियाहि वाऽस्मान् रणाय मर्तुं कृतनिश्चयोऽत्र ॥ १२५॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितोऽसौ मगधाधिपो रुषा जगाद नाहं शिव यागयुक्तान् | | verse_lines = इतीरितोऽसौ मगधाधिपो रुषा जगाद नाहं शिव यागयुक्तान् ।¦मोक्ष्ये पशून् युगपद् वा क्रमेण योत्स्ये च वोऽथापि चमूसहायात् ॥ १२६॥ | ||
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| verse_lines = येन कामयसे योद्धुं तं न आसादय द्रुतम् | | verse_lines = येन कामयसे योद्धुं तं न आसादय द्रुतम् ।¦निरायुधः सायुधो वा त्वदभीष्टायुधेन वा ।¦इत्याऽह भगवाञ्छत्रुं यशो भीमे विवर्धयन्(भीमेऽभिवर्धयन्) ॥ १२९॥ | ||
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| verse_lines = घातयित्वा स्वशत्रुं च भीमसेनानुग्रहं परम् | | verse_lines = घातयित्वा स्वशत्रुं च भीमसेनानुग्रहं परम् ।¦भीमस्य कर्तुमिच्छंश्च भक्तिज्ञानादिवर्धनम्(भक्तिज्ञानाभिवर्धनम्) ॥ १३०॥ | ||
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| verse_text = तृणीकर्तुं रिपुं चैव निरायुधतयाऽगमन् । | | verse_text = तृणीकर्तुं रिपुं चैव निरायुधतयाऽगमन् । | ||
| verse_lines = तृणीकर्तुं रिपुं चैव निरायुधतयाऽगमन् | | verse_lines = तृणीकर्तुं रिपुं चैव निरायुधतयाऽगमन् ।¦कृष्णभीमार्जुनास्तेन विप्रवेषाश्च तेऽभवन् ॥ १३१॥ | ||
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| verse_text = निरायुधः क्षत्रवेषो नैव योग्यः कथञ्चन । | | verse_text = निरायुधः क्षत्रवेषो नैव योग्यः कथञ्चन । | ||
| verse_lines = निरायुधः क्षत्रवेषो नैव योग्यः कथञ्चन | | verse_lines = निरायुधः क्षत्रवेषो नैव योग्यः कथञ्चन ।¦ततो जग्मुर्विप्रवेषास्तृणीकर्तुं हि मागधम् ॥ १३२॥ | ||
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| verse_text = मागधस्य ससैन्यस्य स्वगृहे संस्थितस्य च । | | verse_text = मागधस्य ससैन्यस्य स्वगृहे संस्थितस्य च । | ||
| verse_lines = मागधस्य ससैन्यस्य स्वगृहे संस्थितस्य च | | verse_lines = मागधस्य ससैन्यस्य स्वगृहे संस्थितस्य च ।¦निरायुधेन भीमेन समाह्वाने कृतेऽमितम् ।¦धर्मं यशश्च भीमस्य वर्द्धयामास केशवः ॥ १३३॥ | ||
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| verse_text = तृतीयमर्जुनं चैव समादाय ययौ रिपुम् । | | verse_text = तृतीयमर्जुनं चैव समादाय ययौ रिपुम् । | ||
| verse_lines = तृतीयमर्जुनं चैव समादाय ययौ रिपुम् | | verse_lines = तृतीयमर्जुनं चैव समादाय ययौ रिपुम् ।¦हरिस्तस्माच्च भीमस्य महाधिक्यं प्रकाशयन् ।¦मुखेन मागधस्यैव वृण्वेकं न इति ब्रुवन् ॥ १३४॥ | ||
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| verse_text = वृण्वेकमस्मास्विति स प्रोक्त आह जरासुतः । | | verse_text = वृण्वेकमस्मास्विति स प्रोक्त आह जरासुतः । | ||
| verse_lines = वृण्वेकमस्मास्विति स प्रोक्त आह जरासुतः | | verse_lines = वृण्वेकमस्मास्विति स प्रोक्त आह जरासुतः ।¦कुर्यां नैवार्जुनेनाहमबलेनैव सङ्गरम् ॥ १३५॥ | ||
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| verse_text = पञ्चपञ्चाशदब्दोऽद्य ह्ययमेवं च बालवत् । | | verse_text = पञ्चपञ्चाशदब्दोऽद्य ह्ययमेवं च बालवत् । | ||
| verse_lines = पञ्चपञ्चाशदब्दोऽद्य ह्ययमेवं च बालवत् | | verse_lines = पञ्चपञ्चाशदब्दोऽद्य ह्ययमेवं च बालवत् ।¦अबलत्वाद् युवाऽप्येष बाल एव मतो मम ॥ १३६॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तोऽप्यर्जुनो नाऽह कुरु तर्हि परीक्षणम् । | | verse_text = इत्युक्तोऽप्यर्जुनो नाऽह कुरु तर्हि परीक्षणम् । | ||
| verse_lines = इत्युक्तोऽप्यर्जुनो नाऽह कुरु तर्हि परीक्षणम् | | verse_lines = इत्युक्तोऽप्यर्जुनो नाऽह कुरु तर्हि परीक्षणम् ।¦बाहुभ्यां धनुषा वेति(चेति) शङ्कमानः पराजयम् ॥ १३७॥ | ||
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| verse_lines = अतो भीमे बलाधिक्यं सुप्रसिद्धमभून्महत् | | verse_lines = अतो भीमे बलाधिक्यं सुप्रसिद्धमभून्महत् ।¦एतदर्थं हि कृष्णेन सहाऽनीतः स फल्गुनः ॥ १३८॥ | ||
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| verse_text = जानन् कृष्णे बलं घोरमविषह्यं स मागधः । | | verse_text = जानन् कृष्णे बलं घोरमविषह्यं स मागधः । | ||
| verse_lines = जानन् कृष्णे बलं घोरमविषह्यं स मागधः | | verse_lines = जानन् कृष्णे बलं घोरमविषह्यं स मागधः ।¦कुत्सयन् गोप इति तं भयान्नैवाऽह्वयत् प्रभुम् ॥ १३९॥ | ||
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| verse_text = आह्वयामास भीमं तु स्याद् वा मे जीवनं त्विति । | | verse_text = आह्वयामास भीमं तु स्याद् वा मे जीवनं त्विति । | ||
| verse_lines = आह्वयामास भीमं तु स्याद् वा मे जीवनं त्विति | | verse_lines = आह्वयामास भीमं तु स्याद् वा मे जीवनं त्विति ।¦हनिष्यत्येव मां कृष्ण इत्यासीन्नृपतेर्भयम् ।¦तस्मात् तं नाह्वयामास वासुदेवं स मागधः ॥ १४०॥ | ||
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| verse_text = अर्जुने तु जिते कृष्णभीमौ मां निहनिष्यतः । | | verse_text = अर्जुने तु जिते कृष्णभीमौ मां निहनिष्यतः । | ||
| verse_lines = अर्जुने तु जिते कृष्णभीमौ मां निहनिष्यतः | | verse_lines = अर्जुने तु जिते कृष्णभीमौ मां निहनिष्यतः ।¦त्रयाणां दुर्बलाह्वानान्नश्येत् कीर्तिश्च मे ध्रुवम् ॥ १४१॥ | ||
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| verse_lines = इति मत्वाऽऽह्वयामास भीमसेनं स मागधः | | verse_lines = इति मत्वाऽऽह्वयामास भीमसेनं स मागधः ।¦कथञ्चिज्जीवितं वा स्यान्नतु नश्यति मे यशः ॥ १४२॥ | ||
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| verse_lines = इति स्म(इतीक्ष्य) भीमं प्रतियोधनाय सङ्गृह्य राजा स जरासुतो बली | | verse_lines = इति स्म(इतीक्ष्य) भीमं प्रतियोधनाय सङ्गृह्य राजा स जरासुतो बली ।¦राज्ये निजं चाऽत्मजमभ्यषिञ्चत् पुरा ख्यातं पत्रतापाख्यरुद्रम् ॥ १४३॥ | ||
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| verse_lines = बलं भीमे मन्यमानोऽधिकं तु गदाशिक्षामात्मनि चाधिकां नृपः | | verse_lines = बलं भीमे मन्यमानोऽधिकं तु गदाशिक्षामात्मनि चाधिकां नृपः ।¦भीतो नियुद्धेऽस्य ददौ गदां स भीमाय चान्यां स्वयमग्रहीद् बली ॥ १४४॥ | ||
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| verse_lines = तदर्थमेवाऽशु गदां प्रगृह्य भीमो ययौ मागधसंयुतो बहिः | | verse_lines = तदर्थमेवाऽशु गदां प्रगृह्य भीमो ययौ मागधसंयुतो बहिः ।¦पुरात् सकृष्णार्जुन एव तत्र त्वयुद्ध्यतां केशवपार्थयोः पुरः ॥ १४५॥ | ||
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| verse_lines = वाचाऽजयत् तं प्रथमं वृकोदरः शिवाश्रयं विष्णुगुणप्रकाशया | | verse_lines = वाचाऽजयत् तं प्रथमं वृकोदरः शिवाश्रयं विष्णुगुणप्रकाशया ।¦ततो गदाभ्यामभिपेततुस्तौ विचित्रमार्गानपि दर्शयन्तौ ॥ १४६॥ | ||
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| verse_lines = तयोर्गदे तेऽशनिसन्निकाशे चूर्णिकृते देहमहादृढिम्ना | | verse_lines = तयोर्गदे तेऽशनिसन्निकाशे चूर्णिकृते देहमहादृढिम्ना ।¦अन्योन्ययोर्वक्षसि पातिते रुषा यथाऽश्मनोः पांसुपिण्डौ सुमुक्तौ ॥ १४७॥ | ||
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| verse_lines = सञ्चूर्णितगदौ वीरौ जघ्नुतुर्मुष्टिभिर्मिथः | | verse_lines = सञ्चूर्णितगदौ वीरौ जघ्नुतुर्मुष्टिभिर्मिथः ।¦ब्रह्माण्डस्फोटसङ्काशैर्यथा केशवकैटभौ ॥ १४८॥ | ||
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| verse_lines = चचाल पृथ्वी गिरयश्च चूर्णिताः कुलाचलाश्चेलुरलं विचक्षुभुः | | verse_lines = चचाल पृथ्वी गिरयश्च चूर्णिताः कुलाचलाश्चेलुरलं विचक्षुभुः ।¦समस्तवाराम्पतयः सुरासुरा विरिञ्चशर्वादय आसदन्नभः ॥ १४९॥ | ||
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| verse_lines = सुरास्तु भीमस्य जयाभिकाङ्क्षिणस्तथाऽसुराद्या मगधाधिपस्य | | verse_lines = सुरास्तु भीमस्य जयाभिकाङ्क्षिणस्तथाऽसुराद्या मगधाधिपस्य ।¦पश्यन्ति सर्वे क्रमशो बलं स्वं समाददे मारुतनन्दनोऽपि ॥ १५०॥ | ||
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| verse_lines = मानयित्वा वरं धातुर्दिवसान् दश पञ्च च | | verse_lines = मानयित्वा वरं धातुर्दिवसान् दश पञ्च च ।¦वासुदेवाज्ञया भीमः शत्रुं हन्तुं मनो दधे ॥ १५१॥ | ||
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| verse_lines = स प्रणम्य हृषीकेशं हर्षादाश्लिष्य फल्गुनम् | | verse_lines = स प्रणम्य हृषीकेशं हर्षादाश्लिष्य फल्गुनम् ।¦रिपुं जग्राह मकुटे(मकुटे) वारणं मृगराडिव ॥ १५२॥ | ||
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| verse_text = पृष्ठेऽस्य जानुमाधाय कूर्मदेशं बभञ्ज ह । | | verse_text = पृष्ठेऽस्य जानुमाधाय कूर्मदेशं बभञ्ज ह । | ||
| verse_lines = पृष्ठेऽस्य जानुमाधाय कूर्मदेशं बभञ्ज ह | | verse_lines = पृष्ठेऽस्य जानुमाधाय कूर्मदेशं बभञ्ज ह ।¦मृतिकाले पुनर्देहं विददार यथा पुरा ॥ १५३॥ | ||
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| verse_lines = मर्मण्येव न हन्तव्यो मयाऽयमिति मारुतिः | | verse_lines = मर्मण्येव न हन्तव्यो मयाऽयमिति मारुतिः ।¦स्वपुरुषप्रकाशाय बभञ्जैनं न मर्मणि ॥ १५४॥ | ||
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| verse_lines = भज्यमाने शरीरेऽस्य ब्रह्माण्डस्फोटसन्निभः | | verse_lines = भज्यमाने शरीरेऽस्य ब्रह्माण्डस्फोटसन्निभः ।¦बभूव रावो येनैव त्रस्तमेतज्जगत्त्रयम् ॥ १५५॥ | ||
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| verse_lines = निहत्य कृष्णस्य रिपुं स भीमः समर्पयामास तदर्चनं हरेः | | verse_lines = निहत्य कृष्णस्य रिपुं स भीमः समर्पयामास तदर्चनं हरेः ।¦कृतां हि भीमेन समर्चनां तां समक्षमादातुमिहाऽगतो ह्यजः ॥ १५६॥ | ||
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| verse_lines = स्वीकृत्य पूजां च वृकोदरस्य दृढं समाश्लिष्य च तं जनार्दनः | | verse_lines = स्वीकृत्य पूजां च वृकोदरस्य दृढं समाश्लिष्य च तं जनार्दनः ।¦प्रीतो नितान्तं पुनरेव कृष्णं ननाम भीमः प्रणतोऽर्जुनेन ॥ १५७॥ | ||
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| verse_lines = जग्मुः सुराश्चातितरां प्रहृष्टा ब्रह्मादयो दीनतराश्च दैत्याः | | verse_lines = जग्मुः सुराश्चातितरां प्रहृष्टा ब्रह्मादयो दीनतराश्च दैत्याः ।¦बलादुमेशस्य वरे प्रभग्ने वृकोदरेणाच्युतसंश्रयेण ॥ १५८॥ | ||
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| verse_lines = नकुलस्याऽदान्मद्रराजो हि पूर्वं स्वीयां कन्यां सा तथैषाऽप्युषा हि | | verse_lines = नकुलस्याऽदान्मद्रराजो हि पूर्वं स्वीयां कन्यां सा तथैषाऽप्युषा हि ।¦एका पूर्वं ते अश्विनोश्चैव भार्या यमौ रेमाते यदुषा अश्विभार्या ।¦ततः कृष्णायामग्रजभ्रातृभार्यावृत्तिं हि तौ चक्रतुर्माद्रिपुत्रौ ॥ १६२॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णश्च पार्थौ च तथैकयानं समास्थिता धर्मजमभ्यगच्छन् | | verse_lines = कृष्णश्च पार्थौ च तथैकयानं समास्थिता धर्मजमभ्यगच्छन् ।¦तेषां शङ्खध्वनिसम्बोधितात्मा राजा प्रीतश्चातितरां बभूव ॥ १६५॥ | ||
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| verse_text = द्वैपायनोऽथ भगवानभिगम्य पार्थानाज्ञापयत् सकलसम्भृतिसाधनाय । | | verse_text = द्वैपायनोऽथ भगवानभिगम्य पार्थानाज्ञापयत् सकलसम्भृतिसाधनाय । | ||
| verse_lines = द्वैपायनोऽथ भगवानभिगम्य पार्थानाज्ञापयत् सकलसम्भृतिसाधनाय | | verse_lines = द्वैपायनोऽथ भगवानभिगम्य पार्थानाज्ञापयत् सकलसम्भृतिसाधनाय ।¦तं राजसूयसहितं परमाश्वमेधयज्ञं(वरमश्वमेधयज्ञं) समादिशदनन्यकृतं विरिञ्चात् ॥ १६६॥ | ||
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| verse_text = कर्ता हि तस्य परमेष्ठिपदं प्रयाति यद्यन्यसद्गुणवरैः परमेष्ठितुल्यः । | | verse_text = कर्ता हि तस्य परमेष्ठिपदं प्रयाति यद्यन्यसद्गुणवरैः परमेष्ठितुल्यः । | ||
| verse_lines = कर्ता हि तस्य परमेष्ठिपदं प्रयाति यद्यन्यसद्गुणवरैः परमेष्ठितुल्यः | | verse_lines = कर्ता हि तस्य परमेष्ठिपदं प्रयाति यद्यन्यसद्गुणवरैः परमेष्ठितुल्यः ।¦भीमे मखस्य फलमत्यधिकं निधातुं व्यासः क्रतुं तमदिशद् गुरुरब्जजस्य ॥ १६७॥ | ||
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| verse_text = असाधारणहेतुर्यः कर्मणो यस्य चेतनः । | | verse_text = असाधारणहेतुर्यः कर्मणो यस्य चेतनः । | ||
| verse_lines = असाधारणहेतुर्यः कर्मणो यस्य चेतनः | | verse_lines = असाधारणहेतुर्यः कर्मणो यस्य चेतनः ।¦स एव तत्फलं पूर्णं भुङ्क्तेऽन्योऽल्पमिति स्थितिः ।¦विना विष्णुं निर्णयोऽयं स हि कर्मफलोज्झितः ॥ १६८॥ | ||
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| verse_text = हेतवोऽपि हि पापस्य न प्रायः फलभागिनः(फलभोगिनः) । | | verse_text = हेतवोऽपि हि पापस्य न प्रायः फलभागिनः(फलभोगिनः) । | ||
| verse_lines = हेतवोऽपि हि पापस्य न प्रायः फलभागिनः(फलभोगिनः) | | verse_lines = हेतवोऽपि हि पापस्य न प्रायः फलभागिनः(फलभोगिनः) ।¦देवाः पुण्यस्य दैत्याश्च मानुषास्तु विभागिनः (मानुषास्तद्विभागिनः) ॥ १६९॥ | ||
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| verse_lines = असाधारणहेतुश्च भीम एव प्रकीर्तितः | | verse_lines = असाधारणहेतुश्च भीम एव प्रकीर्तितः ।¦यज्ञस्यास्य जरासन्धवधात् कर्णजयादपि ॥ १७०॥ | ||
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| verse_text = जयाच्च कीचाकादीनामन्यैर्जेतुमशक्यतः । | | verse_text = जयाच्च कीचाकादीनामन्यैर्जेतुमशक्यतः । | ||
| verse_lines = जयाच्च कीचाकादीनामन्यैर्जेतुमशक्यतः | | verse_lines = जयाच्च कीचाकादीनामन्यैर्जेतुमशक्यतः ।¦द्वितीयः फल्गुनश्चैव तृतीयस्तु युधिष्ठिरः ॥ १७१॥ | ||
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| verse_text = तस्माद् ब्रह्मपदावाप्त्यै व्यासो भीमस्य तं क्रतुम् । | | verse_text = तस्माद् ब्रह्मपदावाप्त्यै व्यासो भीमस्य तं क्रतुम् । | ||
| verse_lines = तस्माद् ब्रह्मपदावाप्त्यै व्यासो भीमस्य तं क्रतुम् | | verse_lines = तस्माद् ब्रह्मपदावाप्त्यै व्यासो भीमस्य तं क्रतुम् ।¦अनन्यकृतमादिश्य दिशां विजयमादिशत् ॥ १७२॥ | ||
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| verse_text = अथाब्रवीद् धनञ्जयो धनुर्ध्वजो रथो वरः । | | verse_text = अथाब्रवीद् धनञ्जयो धनुर्ध्वजो रथो वरः । | ||
| verse_lines = अथाब्रवीद् धनञ्जयो धनुर्ध्वजो रथो वरः | | verse_lines = अथाब्रवीद् धनञ्जयो धनुर्ध्वजो रथो वरः ।¦ममास्ति तद् दिशां जयो ममैव वाञ्छितः प्रभो ॥ १७३॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितोऽखिलप्रभुर्जगाद सत्यमस्ति ते | | verse_lines = इतीरितोऽखिलप्रभुर्जगाद सत्यमस्ति ते ।¦समस्तसाधनोन्नतिर्महच्च वीर्यमस्ति ते(वीर्यमस्ति हि) ॥ १७४॥ | ||
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| verse_lines = तथाऽपि कीचकादयो वृकोदरादृते वशम् | | verse_lines = तथाऽपि कीचकादयो वृकोदरादृते वशम् ।¦न यान्ति नापि ते वशं प्रयाति कर्ण एव च ॥ १७५॥ | ||
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| verse_lines = बलाधिकोऽसि कर्णतस्तथाऽपि नामृतः करम् | | verse_lines = बलाधिकोऽसि कर्णतस्तथाऽपि नामृतः करम् ।¦ददाति ते ह्यतिस्पृधा न वध्य एष तेऽद्य च ॥ १७६॥ | ||
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| verse_lines = सवर्मकुण्डलत्वतो न वध्य एष यत् त्वया | | verse_lines = सवर्मकुण्डलत्वतो न वध्य एष यत् त्वया ।¦ततो वृकोदरो दिशं प्रयातु ते पितुः प्रियाम् ॥ १७७॥ | ||
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| verse_lines = जीवग्राहभयात् कर्णो ददाति करमञ्जसा | | verse_lines = जीवग्राहभयात् कर्णो ददाति करमञ्जसा ।¦भीमाय नात्र सन्देहो जितोऽनेन च संयुगे ॥ १७८॥ | ||
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| verse_lines = अजेयौ शर्ववचनाद् रणे कीचकपौण्ड्रकौ | | verse_lines = अजेयौ शर्ववचनाद् रणे कीचकपौण्ड्रकौ ।¦वशं प्रयातो भीमस्य तथाऽवध्योऽपि चेदिपः ॥ १७९॥ | ||
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| verse_lines = जीवग्राहभयं ह्येषां भीमान्मागधपातनात् | | verse_lines = जीवग्राहभयं ह्येषां भीमान्मागधपातनात् ।¦तस्मात् करं प्रयच्छन्ति जिता वा पूर्वमेव वा ॥ १८०॥ | ||
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| verse_lines = प्रयाहि च त्वं धनदप्रपालितां दिशं द्वीपान् सप्त चाशेषदिक्षु | | verse_lines = प्रयाहि च त्वं धनदप्रपालितां दिशं द्वीपान् सप्त चाशेषदिक्षु ।¦नागांश्च दैत्यांश्च तथाऽधरस्थान् विजित्य शीघ्रं पुनरेहि चात्र ॥ १८१॥ | ||
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| verse_lines = रथो हि दिव्योऽम्बरगस्तवास्ति दिव्यानि चास्त्राणि धनुश्च दिव्यम् | | verse_lines = रथो हि दिव्योऽम्बरगस्तवास्ति दिव्यानि चास्त्राणि धनुश्च दिव्यम् ।¦येऽन्ये च बाणप्रमुखा अजेयाः शर्वाश्रयास्तानपि भीम एतु ॥ १८२॥ | ||
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| verse_text = तथा सुराश्चापि(तथाऽसुराः) समस्तशोऽस्य बलिं प्रयच्छन्ति मदज्ञयेतरे । | | verse_text = तथा सुराश्चापि(तथाऽसुराः) समस्तशोऽस्य बलिं प्रयच्छन्ति मदज्ञयेतरे । | ||
| verse_lines = तथा सुराश्चापि(तथाऽसुराः) समस्तशोऽस्य बलिं प्रयच्छन्ति मदज्ञयेतरे | | verse_lines = तथा सुराश्चापि(तथाऽसुराः) समस्तशोऽस्य बलिं प्रयच्छन्ति मदज्ञयेतरे ।¦दिशं प्रतीचीमथ दक्षिणां च यातां यमौ क्रमशो ह्यध्वरार्थे ॥ १८३॥ | ||
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| verse_lines = यशश्च धर्मश्च तयोरपि स्यादिति स्यदिति स्म कृष्णेन सुतेन काल्याः | | verse_lines = यशश्च धर्मश्च तयोरपि स्यादिति स्यदिति स्म कृष्णेन सुतेन काल्याः ।¦उक्ते ययुस्ते तमभिप्रणम्य दिशो यथोक्ताः परमोरुसद्गुणम् (परमोरुसद्गुणाः) ॥ १८४॥ | ||
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| verse_lines = वृकोदरोऽजयन्नृपान् विराटमाससाद ह | | verse_lines = वृकोदरोऽजयन्नृपान् विराटमाससाद ह ।¦जितेऽत्र कीचके रणे समाददे करं ततः ॥ १८५॥ | ||
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| verse_lines = ततः क्रमान्नृपान् जित्वा चेदीनां विषयं गतः | | verse_lines = ततः क्रमान्नृपान् जित्वा चेदीनां विषयं गतः ।¦मातृवाक्याद् भयाच्चैव शिशुपालेन पूजितः ॥ १८६॥ | ||
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| verse_lines = मातृष्वसुर्गृहे चोष्य दिवसान् कतिचित् सुखम् | | verse_lines = मातृष्वसुर्गृहे चोष्य दिवसान् कतिचित् सुखम् ।¦करं सुमहदादाय ततः पूर्वां(पूर्वं) दिशं ययौ ॥ १८७॥ | ||
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| verse_lines = क्रमेण सर्वान् निर्जित्य पौण्ड्रकं च महाबलम् | | verse_lines = क्रमेण सर्वान् निर्जित्य पौण्ड्रकं च महाबलम् ।¦विरथीकृत्य कर्णं च करमादाय सर्वतः ॥ १८८॥ | ||
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| verse_lines = हिमवच्छिखरे देवान् जित्वा शक्रपुरोगमान् | | verse_lines = हिमवच्छिखरे देवान् जित्वा शक्रपुरोगमान् ।¦क्रीडार्थं युद्ध्यतस्तेभ्यस्तुष्टेभ्यो रत्नसञ्चयम्(सञ्चयान्) ॥ १८९॥ | ||
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| verse_lines = बाहुयुद्धेन शेषं च गरुडं च महाबलम् | | verse_lines = बाहुयुद्धेन शेषं च गरुडं च महाबलम् ।¦क्रीडमानौ(क्रीडमानो) विनिर्जित्य भूषणान्याप तोषतः ।¦ताभ्यां च दृढमाश्लिष्टः स्नेहविक्लिन्नया धिया ॥ १९०॥ | ||
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| verse_lines = पोप्लूयमानः स ततोऽम्बुधौ बली जगाम बाणस्य पुरं हरं च | | verse_lines = पोप्लूयमानः स ततोऽम्बुधौ बली जगाम बाणस्य पुरं हरं च ।¦रणेऽजयद् वारणरूपमास्थितं क्रीडन्तमेतेन च तोषितो हरः ॥ १९१॥ | ||
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| verse_lines = पृष्टश्च गिरिशेनासौ विस्तरं दिग्जयस्य च | | verse_lines = पृष्टश्च गिरिशेनासौ विस्तरं दिग्जयस्य च ।¦सिंहव्याघ्रादिरूपाश्च आत्मना विजिता यथा ।¦गुरुत्मच्छेषशक्राद्या देवाः सर्वे तदब्रवीत् ॥ १९२॥ | ||
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| verse_lines = निशम्य शङ्करोऽखिलं मखस्य च प्रसाधकम् | | verse_lines = निशम्य शङ्करोऽखिलं मखस्य च प्रसाधकम् ।¦हरिं ततो बलेः सुताद् ददौ च रत्नसञ्चयम्(सुदिव्यरत्नसञ्चयम्) ॥ १९३॥ | ||
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| verse_lines = स बाणदैत्यतो महच्छिवेन | | verse_lines = स बाणदैत्यतो महच्छिवेन दत्तमुत्तमम्।¦प्रगृह्य रत्सञ्चयं स्वकं पुरं समाययौ॥१९४॥ | ||
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| verse_lines = स विप्रयादवेश्वरं द्विधास्थितं जनार्दनम् | | verse_lines = स विप्रयादवेश्वरं द्विधास्थितं जनार्दनम् ।¦पुरो निधाय तद् वसु प्रभूतमानमत् तदा ॥ १९५॥ | ||
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| verse_lines = सोऽभिवाद्याग्रजं(सोऽभिवन्द्याग्रजं) चैव यथावृत्तं न्यवेदयत् | | verse_lines = सोऽभिवाद्याग्रजं(सोऽभिवन्द्याग्रजं) चैव यथावृत्तं न्यवेदयत् ।¦आत्मनः कृष्णयोः सर्वं धर्मराजाग्रतो मुदा ॥ १९६॥ | ||
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| verse_lines = यथा जिताः कीचकाद्या एकलव्यसहायवान् | | verse_lines = यथा जिताः कीचकाद्या एकलव्यसहायवान् ।¦यथा जितः पौण्ड्रकश्च कर्णाद्याश्च तथाऽपरे ॥ १९७॥ | ||
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| verse_text = तपसा तोषितात् कृष्णादन्यानेवामुनाऽखिलान् । | | verse_text = तपसा तोषितात् कृष्णादन्यानेवामुनाऽखिलान् । | ||
| verse_lines = तपसा तोषितात् कृष्णादन्यानेवामुनाऽखिलान् | | verse_lines = तपसा तोषितात् कृष्णादन्यानेवामुनाऽखिलान् ।¦विजेष्यसि यदा कृष्णविरोधस्ते तदा धनुः ।¦मामेष्यतीति तेनोक्तो न व्यरुध्यत केशवे ॥ २०४॥ | ||
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| verse_text = स्वसुः स्नेहाच्च कृष्णस्य यज्ञकारयितृत्वतः । | | verse_text = स्वसुः स्नेहाच्च कृष्णस्य यज्ञकारयितृत्वतः । | ||
| verse_lines = स्वसुः स्नेहाच्च कृष्णस्य यज्ञकारयितृत्वतः | | verse_lines = स्वसुः स्नेहाच्च कृष्णस्य यज्ञकारयितृत्वतः ।¦भीमार्जुनबलाच्चैव माद्रेयाय ददौ करम् ।¦जिग्ये बलेनान्यनृपान् सहदेवः प्रतापवान् ॥ २०५॥ | ||
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| verse_text = तथा स्मृतं समागतं घटोत्कचं विभीषणे । | | verse_text = तथा स्मृतं समागतं घटोत्कचं विभीषणे । | ||
| verse_lines = तथा स्मृतं समागतं घटोत्कचं विभीषणे | | verse_lines = तथा स्मृतं समागतं घटोत्कचं विभीषणे ।¦समादिशद् ययौ च सोऽपि सोऽददान्महाकरम् ॥ २०६॥ | ||
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| verse_text = पुरा हि राघवोदितं तदस्य(यदस्य) सोऽखिलं तदा । | | verse_text = पुरा हि राघवोदितं तदस्य(यदस्य) सोऽखिलं तदा । | ||
| verse_lines = पुरा हि राघवोदितं तदस्य(यदस्य) सोऽखिलं तदा | | verse_lines = पुरा हि राघवोदितं तदस्य(यदस्य) सोऽखिलं तदा ।¦विचार्य केशवं च तं बलं च भीमपार्थयोः ।¦दिवौकसश्च पाण्डवानवेत्य सोऽददात् करम् ॥ २०७॥ | ||
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| verse_text = महौघरत्नसञ्चयं स आप्य भीमसेनजः । | | verse_text = महौघरत्नसञ्चयं स आप्य भीमसेनजः । | ||
| verse_lines = महौघरत्नसञ्चयं स आप्य भीमसेनजः | | verse_lines = महौघरत्नसञ्चयं स आप्य भीमसेनजः ।¦ययौ च माद्रिनन्दनं स चाऽययौ स्वकं पुरम् ॥ २०८॥ | ||
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| verse_text = नकुलः पश्चिमाशायां विजिग्येऽखिलभूभृतः । | | verse_text = नकुलः पश्चिमाशायां विजिग्येऽखिलभूभृतः । | ||
| verse_lines = नकुलः पश्चिमाशायां विजिग्येऽखिलभूभृतः | | verse_lines = नकुलः पश्चिमाशायां विजिग्येऽखिलभूभृतः ।¦करमाप च वीरोऽसौ सौहार्दादेव मातुलात् ।¦आययौ च महारत्नसञ्चयेन स्वकं पुरम् ॥ २०९॥ | ||
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| verse_text = अर्जुनः कपिवरोच्छ्रितध्वजं स्यन्दनं समधिरुह्य गाण्डिवी। | | verse_text = अर्जुनः कपिवरोच्छ्रितध्वजं स्यन्दनं समधिरुह्य गाण्डिवी। | ||
| verse_lines = अर्जुनः कपिवरोच्छ्रितध्वजं स्यन्दनं समधिरुह्य | | verse_lines = अर्जुनः कपिवरोच्छ्रितध्वजं स्यन्दनं समधिरुह्य गाण्डिवी।¦यात एव दिशमुत्तरां यदा(तदा) पार्वतेयकुनृपाः समाययुः ॥ २१०॥ | ||
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| verse_text = त्रैगर्ताः पार्वतेयाश्च सहिताः पाण्डुनन्दनम् । | | verse_text = त्रैगर्ताः पार्वतेयाश्च सहिताः पाण्डुनन्दनम् । | ||
| verse_lines = त्रैगर्ताः पार्वतेयाश्च सहिताः पाण्डुनन्दनम् | | verse_lines = त्रैगर्ताः पार्वतेयाश्च सहिताः पाण्डुनन्दनम् ।¦अभ्येत्य योधयामासुर्जानन्तस्तच्चिकीर्षितम् ॥ २११॥ | ||
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| verse_text = तान् विजित्य युगपत् स पाण्डवः सञ्जयन् क्रमश एव तां दिशम् । | | verse_text = तान् विजित्य युगपत् स पाण्डवः सञ्जयन् क्रमश एव तां दिशम् । | ||
| verse_lines = तान् विजित्य युगपत् स पाण्डवः सञ्जयन् क्रमश एव तां दिशम् | | verse_lines = तान् विजित्य युगपत् स पाण्डवः सञ्जयन् क्रमश एव तां दिशम् ।¦प्राव्रजच्च भगदत्तमूर्जितं तेन चास्य समभून्महारणः ॥ २१२॥ | ||
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| verse_text = सोऽभियुद्ध्य सगजो दिनाष्टकं श्रान्त आह पुरुहूतनन्दनम् । | | verse_text = सोऽभियुद्ध्य सगजो दिनाष्टकं श्रान्त आह पुरुहूतनन्दनम् । | ||
| verse_lines = सोऽभियुद्ध्य सगजो दिनाष्टकं श्रान्त आह पुरुहूतनन्दनम् | | verse_lines = सोऽभियुद्ध्य सगजो दिनाष्टकं श्रान्त आह पुरुहूतनन्दनम् ।¦ब्रूहि ते समरकारणं त्विति प्राह देहि करमित्यथार्जुनः ॥ २१३॥ | ||
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| verse_text = सोऽप्यदात् करममुष्य वासवो मद्गुरुस्तव पितेति सादरम् । | | verse_text = सोऽप्यदात् करममुष्य वासवो मद्गुरुस्तव पितेति सादरम् । | ||
| verse_lines = सोऽप्यदात् करममुष्य वासवो मद्गुरुस्तव पितेति सादरम् | | verse_lines = सोऽप्यदात् करममुष्य वासवो मद्गुरुस्तव पितेति सादरम् ।¦नैव जेतुमिह शक्ष्यसि त्वमित्यावदद्धरिवरास्त्रतेजसा ॥ २१४॥ | ||
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| verse_text = स्नेहपूर्वं प्रदत्ते तु करे नैवाऽह चोत्तरम् । | | verse_text = स्नेहपूर्वं प्रदत्ते तु करे नैवाऽह चोत्तरम् । | ||
| verse_lines = स्नेहपूर्वं प्रदत्ते तु करे नैवाऽह चोत्तरम् | | verse_lines = स्नेहपूर्वं प्रदत्ते तु करे नैवाऽह चोत्तरम् ।¦अर्जुनो व्यर्थकलहमनिच्छन् स्नेहयन्त्रितः ॥ २१५॥ | ||
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| verse_text = पार्थो जित्वाऽष्टवर्षाणि षड् द्वीपानपरानपि । | | verse_text = पार्थो जित्वाऽष्टवर्षाणि षड् द्वीपानपरानपि । | ||
| verse_lines = पार्थो जित्वाऽष्टवर्षाणि षड् द्वीपानपरानपि | | verse_lines = पार्थो जित्वाऽष्टवर्षाणि षड् द्वीपानपरानपि ।¦अजयच्चतुर्दिशमपि सर्वशः शस्त्रतेजसा ॥ २१६॥ | ||
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| verse_text = पाताळसप्तकं गत्वा जित्वा दैतेयदानवान् । | | verse_text = पाताळसप्तकं गत्वा जित्वा दैतेयदानवान् । | ||
| verse_lines = पाताळसप्तकं गत्वा जित्वा दैतेयदानवान् | | verse_lines = पाताळसप्तकं गत्वा जित्वा दैतेयदानवान् ।¦बलेश्च विष्णुवचनात् करं जग्राह सामतः ॥ २१७॥ | ||
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| verse_text = जित्वा च वासुकिं भूरि रत्नमादाय सत्वरः । | | verse_text = जित्वा च वासुकिं भूरि रत्नमादाय सत्वरः । | ||
| verse_lines = जित्वा च वासुकिं भूरि रत्नमादाय सत्वरः | | verse_lines = जित्वा च वासुकिं भूरि रत्नमादाय सत्वरः ।¦आजगाम पुरं स्वीयं वीरो वत्सरमात्रतः ॥ २१८॥ | ||
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| verse_text = सुवर्णरत्नगिरयश्चतुर्भिस्तैः समार्जिताः । | | verse_text = सुवर्णरत्नगिरयश्चतुर्भिस्तैः समार्जिताः । | ||
| verse_lines = सुवर्णरत्नगिरयश्चतुर्भिस्तैः समार्जिताः | | verse_lines = सुवर्णरत्नगिरयश्चतुर्भिस्तैः समार्जिताः ।¦चत्वारो योजनानां हि दश त्रिंशच्छतं तथा ॥ २१९॥ | ||
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| verse_lines = चतुःशतं च क्रमश उच्छ्रिता दिग्जयार्जिताः | | verse_lines = चतुःशतं च क्रमश उच्छ्रिता दिग्जयार्जिताः ।¦प्रतीच्याद्यपसव्येन क्रमाद् दिग्भ्यः समार्जिताः ॥ २२०॥ | ||
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| verse_text = विश्वकर्मकृतत्वात्तु पुरस्याल्पेऽपि च स्थले । | | verse_text = विश्वकर्मकृतत्वात्तु पुरस्याल्पेऽपि च स्थले । | ||
| verse_lines = विश्वकर्मकृतत्वात्तु पुरस्याल्पेऽपि च स्थले | | verse_lines = विश्वकर्मकृतत्वात्तु पुरस्याल्पेऽपि च स्थले ।¦अन्तर्गतास्ते गिरयस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २२१॥ | ||
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| verse_text = ततो यज्ञः प्रववृते कृष्णद्वैपायनेरितः । | | verse_text = ततो यज्ञः प्रववृते कृष्णद्वैपायनेरितः । | ||
| verse_lines = ततो यज्ञः प्रववृते कृष्णद्वैपायनेरितः | | verse_lines = ततो यज्ञः प्रववृते कृष्णद्वैपायनेरितः ।¦ऋत्विजो मुनयोऽत्रासन् सर्वविद्यासु निष्ठिताः ।¦द्वैपायनोक्तविधिना (दीक्षितं)दीक्षयाञ्चक्रिरे नृपम् ॥ २२२॥ | ||
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| verse_text = ज्येष्ठत्वाद् याजमानं तु प्रणिधाय युधिष्ठिरे । | | verse_text = ज्येष्ठत्वाद् याजमानं तु प्रणिधाय युधिष्ठिरे । | ||
| verse_lines = ज्येष्ठत्वाद् याजमानं तु प्रणिधाय युधिष्ठिरे | | verse_lines = ज्येष्ठत्वाद् याजमानं तु प्रणिधाय युधिष्ठिरे ।¦भीमार्जुनादयः सर्वे सह तेन समासिरे ॥ २२३॥ | ||
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| verse_lines = ब्रह्माणीपदयोग्यत्वात् कृष्णैका यज्ञपत्न्यभूत् | | verse_lines = ब्रह्माणीपदयोग्यत्वात् कृष्णैका यज्ञपत्न्यभूत् ।¦पदायोग्यतया नान्याः पत्न्यस्तेषां सहाऽसिरे ॥ २२४॥ | ||
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| verse_lines = आज्ञयैव जगद्धातुर्व्यासस्यानन्ततेजसः | | verse_lines = आज्ञयैव जगद्धातुर्व्यासस्यानन्ततेजसः ।¦स्थलमप्यत्र सर्वं हि रत्नहेममयं त्वभूत् ।¦किमु पात्रादिकं सर्वं शिबिराणि च सर्वशः ॥ २२५॥ | ||
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| verse_lines = आहूतं दिग्जये पार्थैस्तदा लोकद्विसप्तकम् | | verse_lines = आहूतं दिग्जये पार्थैस्तदा लोकद्विसप्तकम् ।¦सर्वमत्राऽगमद् ब्रह्मशर्वशक्रादिपूर्वकम् ॥ २२६॥ | ||
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| verse_lines = भीष्मो द्रोणश्च विदुरो धृतराष्ट्रः सहात्मजः | | verse_lines = भीष्मो द्रोणश्च विदुरो धृतराष्ट्रः सहात्मजः ।¦सस्त्रीका आययुस्तत्र बाह्लीकश्च सहात्मजः ॥ २२७॥ | ||
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| verse_lines = तथैव यादवाः सर्वे बलभद्रपुरोगमाः | | verse_lines = तथैव यादवाः सर्वे बलभद्रपुरोगमाः ।¦(रुग्मिणी)रुक्मिणीसत्यभामाद्या महिष्यः केशवस्य च ॥ २२८॥ | ||
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| verse_lines = तत्र सर्वजगदेकसङ्गमे तत्त्वनिर्णयकथा बभूविरे | | verse_lines = तत्र सर्वजगदेकसङ्गमे तत्त्वनिर्णयकथा बभूविरे ।¦प्राश्निकोऽत्र परिपूर्णचिद्धनो व्यास एव भगवान् बभूव ह ॥ २२९॥ | ||
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| verse_lines = तत्त्वनिर्णयकथासु निर्णयो वासुदेवगुणविस्तरोऽभवत् | | verse_lines = तत्त्वनिर्णयकथासु निर्णयो वासुदेवगुणविस्तरोऽभवत् ।¦नास्ति तत्सदृश उत्तमः कुतः पार एष न ततोऽन्य इत्यपि ॥ २३०॥ | ||
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| verse_lines = बादरायणभृगूत्थरामयोः शृण्वतोः परमनिर्णये कृते | | verse_lines = बादरायणभृगूत्थरामयोः शृण्वतोः परमनिर्णये कृते ।¦मोदमानजनतासमागमेऽपृच्छदत्र नृपतिर्यतव्रतम् ॥ २३१॥ | ||
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| verse_lines = जानमानोऽपि नृपतिः सर्वपूज्यतमं हरिम् | | verse_lines = जानमानोऽपि नृपतिः सर्वपूज्यतमं हरिम् ।¦संशयं भूभृतां भेत्तुं भीष्मं पप्रच्छ धर्मवित् ॥ २३२॥ | ||
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| verse_lines = नास्ति नारायणसममिति वादेन निर्णये | | verse_lines = नास्ति नारायणसममिति वादेन निर्णये ।¦कृते ब्रह्मादिभिरपि कृष्णं मर्त्यं हि मेनिरे ॥ २३३॥ | ||
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| verse_lines = ब्रह्मादयः सुरा यस्माद् दृश्यन्ते मर्त्यवन्नृभिः | | verse_lines = ब्रह्मादयः सुरा यस्माद् दृश्यन्ते मर्त्यवन्नृभिः ।¦नचैवातितराभ्यासो नृणामस्ति मुनिष्वपि ॥ २३५॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णाय दत्ते राजानो विवादं कुर्युरञ्जसा | | verse_lines = कृष्णाय दत्ते राजानो विवादं कुर्युरञ्जसा ।¦विवादेन च कीर्तिः स्याद् वासुदेवस्य विस्तृता ।¦ततः कृष्णायाग्रपूजा दत्ता पार्थैर्जगत्पुरः ॥ २४१॥ | ||
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| verse_text = व्यासभार्गवयोः साक्षात् तदैक्यात् तदनन्तरम् । | | verse_text = व्यासभार्गवयोः साक्षात् तदैक्यात् तदनन्तरम् । | ||
| verse_lines = व्यासभार्गवयोः साक्षात् तदैक्यात् तदनन्तरम् | | verse_lines = व्यासभार्गवयोः साक्षात् तदैक्यात् तदनन्तरम् ।¦अग्र्यां पूजां दुदुश्चान्यान् यथायोग्यमपूजयन् ॥ २४२॥ | ||
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| verse_text = अग्र्योपहारमुपयापित एव कृष्णे कोपादनिन्ददमुमाशु च चेदिराजः । | | verse_text = अग्र्योपहारमुपयापित एव कृष्णे कोपादनिन्ददमुमाशु च चेदिराजः । | ||
| verse_lines = अग्र्योपहारमुपयापित एव कृष्णे कोपादनिन्ददमुमाशु च चेदिराजः | | verse_lines = अग्र्योपहारमुपयापित एव कृष्णे कोपादनिन्ददमुमाशु च चेदिराजः ।¦श्रुत्वैव तत् पवनजोऽभिययौ नृपं तं हन्तुं जगद्गुरुविनिन्दकमृद्धमन्युः ॥ २४३॥ | ||
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| verse_text = दूरेऽपि केशवविनिन्दनकारिजिह्वामुच्छेत्स्य इत्युरुतराऽस्य सदा प्रतिज्ञा । | | verse_text = दूरेऽपि केशवविनिन्दनकारिजिह्वामुच्छेत्स्य इत्युरुतराऽस्य सदा प्रतिज्ञा । | ||
| verse_lines = दूरेऽपि केशवविनिन्दनकारिजिह्वामुच्छेत्स्य इत्युरुतराऽस्य सदा प्रतिज्ञा | | verse_lines = दूरेऽपि केशवविनिन्दनकारिजिह्वामुच्छेत्स्य इत्युरुतराऽस्य सदा प्रतिज्ञा ।¦भीमस्य तं तु जगृहे सरिदात्मजोऽथ सम्प्रोच्य केशववचो निजयोर्वधाय ॥ २४४॥ | ||
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| verse_text = मयैव वध्याविति तावाह यत् केशवः पुरा । | | verse_text = मयैव वध्याविति तावाह यत् केशवः पुरा । | ||
| verse_lines = मयैव वध्याविति तावाह यत् केशवः पुरा | | verse_lines = मयैव वध्याविति तावाह यत् केशवः पुरा ।¦तच्छ्रुत्वा भीमसेनोऽपि स्थितो भीष्मकरग्रहात् ॥ २४५॥ | ||
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| verse_text = जानन्नपि हरेरिष्टं स्वकर्तव्यतयोत्थितः । | | verse_text = जानन्नपि हरेरिष्टं स्वकर्तव्यतयोत्थितः । | ||
| verse_lines = जानन्नपि हरेरिष्टं स्वकर्तव्यतयोत्थितः | | verse_lines = जानन्नपि हरेरिष्टं स्वकर्तव्यतयोत्थितः ।¦भीम एतावदुचितमिति मत्वा स्थितः पुनः ॥ २४६॥ | ||
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| verse_text = देवसङ्घभविनां महानभूदीक्ष्य(महानभूद् वीक्ष्य) तोष इह केशवेऽधिकाम् । | | verse_text = देवसङ्घभविनां महानभूदीक्ष्य(महानभूद् वीक्ष्य) तोष इह केशवेऽधिकाम् । | ||
| verse_lines = देवसङ्घभविनां महानभूदीक्ष्य(महानभूद् वीक्ष्य) तोष इह केशवेऽधिकाम् | | verse_lines = देवसङ्घभविनां महानभूदीक्ष्य(महानभूद् वीक्ष्य) तोष इह केशवेऽधिकाम् ।¦अर्चनां य इह मानुषो जनो मध्य एव स तु संस्थितोऽभवत् ॥ २४७॥ | ||
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| verse_text = आसुरा इह सुयोधनादयस्तत्र ते विमनसो बभूविरे । | | verse_text = आसुरा इह सुयोधनादयस्तत्र ते विमनसो बभूविरे । | ||
| verse_lines = आसुरा इह सुयोधनादयस्तत्र ते विमनसो बभूविरे | | verse_lines = आसुरा इह सुयोधनादयस्तत्र ते विमनसो बभूविरे ।¦दुर्वचोभिरधिकं च चेदिपः कृष्णमार्च्छदुरुसद्गुणार्णवम् ॥ २४८॥ | ||
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| verse_text = समाह्वयच्च केशवं युधे तमाशु केशवः । | | verse_text = समाह्वयच्च केशवं युधे तमाशु केशवः । | ||
| verse_lines = समाह्वयच्च केशवं युधे तमाशु केशवः | | verse_lines = समाह्वयच्च केशवं युधे तमाशु केशवः ।¦निवार्य तस्य सायकाञ्जघान चारिणा प्रभुः ॥ २४९॥ | ||
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| verse_text = निकृत्यमानकन्धरः स भक्तिमानभूद्धरौ । | | verse_text = निकृत्यमानकन्धरः स भक्तिमानभूद्धरौ । | ||
| verse_lines = निकृत्यमानकन्धरः स भक्तिमानभूद्धरौ | | verse_lines = निकृत्यमानकन्धरः स भक्तिमानभूद्धरौ ।¦तमाश्रितश्च योऽसुरो महत्तमः(महातमः) प्रपेदिवान् ॥ २५०॥ | ||
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| verse_text = जयः प्रविश्य केशवं पुनश्च पार्षदोऽभवत् । | | verse_text = जयः प्रविश्य केशवं पुनश्च पार्षदोऽभवत् । | ||
| verse_lines = जयः प्रविश्य केशवं पुनश्च पार्षदोऽभवत् | | verse_lines = जयः प्रविश्य केशवं पुनश्च पार्षदोऽभवत् ।¦असौ च पाण्डवक्रतुः प्रवर्तितो यथोदितः ॥ २५१॥ | ||
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| verse_text = सुवर्णरत्नभारकान् बहून् नृपा उपानयन् । | | verse_text = सुवर्णरत्नभारकान् बहून् नृपा उपानयन् । | ||
| verse_lines = सुवर्णरत्नभारकान् बहून् नृपा उपानयन् | | verse_lines = सुवर्णरत्नभारकान् बहून् नृपा उपानयन् ।¦उपायनं(उपायने) सुयोधनं नृपोऽदिशद् ग्रहेऽस्य च ॥ २५२॥ | ||
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| verse_text = अभोजयंस्तथा द्विजान् यथेष्टभक्ष्यभोज्यकैः । | | verse_text = अभोजयंस्तथा द्विजान् यथेष्टभक्ष्यभोज्यकैः । | ||
| verse_lines = अभोजयंस्तथा द्विजान् यथेष्टभक्ष्यभोज्यकैः | | verse_lines = अभोजयंस्तथा द्विजान् यथेष्टभक्ष्यभोज्यकैः ।¦सुवर्णरत्नभारकान् बहूंश्च दक्षिणा ददुः ॥ २५३॥ | ||
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| verse_text = यदिष्टमास यस्य च प्रदत्तमेव पाण्डवैः । | | verse_text = यदिष्टमास यस्य च प्रदत्तमेव पाण्डवैः । | ||
| verse_lines = यदिष्टमास यस्य च प्रदत्तमेव पाण्डवैः | | verse_lines = यदिष्टमास यस्य च प्रदत्तमेव पाण्डवैः ।¦समस्तमत्र सर्वशोऽथ सस्नुरुद्भृता(सस्नुरुद्धताः) मुदा ॥ २५४॥ | ||
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| verse_lines = नदत्सुरोरुदुन्दुभिप्रगीतदेवगायकाः | | verse_lines = नदत्सुरोरुदुन्दुभिप्रगीतदेवगायकाः ।¦प्रनृत्तदिव्ययोषितः सुरापगां व्यगाहयन् ॥ २५५॥ | ||
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| verse_lines = समस्तराजसंयुता विगाह्य जाह्नवीजले | | verse_lines = समस्तराजसंयुता विगाह्य जाह्नवीजले ।¦पुरं ययुः पुनश्च ते सुसद्म चागमन् सुराः ॥ २५६॥ | ||
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| verse_text = गतेषु सर्वराजसु स्वकां(स्वकं) पुरं स्वकेषु च । | | verse_text = गतेषु सर्वराजसु स्वकां(स्वकं) पुरं स्वकेषु च । | ||
| verse_lines = गतेषु सर्वराजसु स्वकां(स्वकं) पुरं स्वकेषु च | | verse_lines = गतेषु सर्वराजसु स्वकां(स्वकं) पुरं स्वकेषु च ।¦सभीष्मकेषु सर्वशः सहाऽम्बिकेयकेषु च ॥ २५७॥ | ||
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| verse_text = विचित्ररत्ननिर्मिते रविप्रभे सभातले । | | verse_text = विचित्ररत्ननिर्मिते रविप्रभे सभातले । | ||
| verse_lines = विचित्ररत्ननिर्मिते रविप्रभे सभातले | | verse_lines = विचित्ररत्ननिर्मिते रविप्रभे सभातले ।¦सकेशवो वरासने विवेश धर्मनन्दनः ॥ २५८॥ | ||
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| verse_text = तथैव (रुग्मिणी)रुक्मिणीमुखाः परिग्रहा रमेशितुः । | | verse_text = तथैव (रुग्मिणी)रुक्मिणीमुखाः परिग्रहा रमेशितुः । | ||
| verse_lines = तथैव (रुग्मिणी)रुक्मिणीमुखाः परिग्रहा रमेशितुः | | verse_lines = तथैव (रुग्मिणी)रुक्मिणीमुखाः परिग्रहा रमेशितुः ।¦तथैव भीमफल्गुनावुपाविशन् हरेरुप ॥ २५९॥ | ||
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| verse_lines = सहैव वायुसूनुना तथैव पार्षतात्मजा | | verse_lines = सहैव वायुसूनुना तथैव पार्षतात्मजा ।¦उपैव रुग्मिणीं शुभा तथैव सत्यभामिनीम्(तथा ससत्यभामिनीम्) ॥ २६०॥ | ||
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| verse_lines = यमौ च पार्षतादयो धनञ्जयान्तिकेऽविशन् | | verse_lines = यमौ च पार्षतादयो धनञ्जयान्तिकेऽविशन् ।¦तथैव रामसात्यकी समीप एव भूभृतः ॥ २६१॥ | ||
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| verse_lines = समासतां तु सा सभा व्यरोचताधिकं तदा | | verse_lines = समासतां तु सा सभा व्यरोचताधिकं तदा ।¦यथा सभा स्वयम्भुवः समास्थिता च विष्णुना ॥ २६२॥ | ||
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| verse_lines = विचित्रहेममालिनः शुभाम्बराश्च तेऽधिकम् | | verse_lines = विचित्रहेममालिनः शुभाम्बराश्च तेऽधिकम् ।¦स्फुरत्किरीटकुण्डला विरेजुरत्र ते नृपाः ॥ २६३॥ | ||
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| verse_text = विशेषतो जनार्दनः सभार्यको जगत्प्रभुः । | | verse_text = विशेषतो जनार्दनः सभार्यको जगत्प्रभुः । | ||
| verse_lines = विशेषतो जनार्दनः सभार्यको जगत्प्रभुः | | verse_lines = विशेषतो जनार्दनः सभार्यको जगत्प्रभुः ।¦यथा दिवौकसां सदस्यनन्तसद्गुणार्णवः ॥ २६४॥ | ||
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| verse_lines = उपासिरे च तान् नृपाः समस्तशः सुहृद्गुणाः | | verse_lines = उपासिरे च तान् नृपाः समस्तशः सुहृद्गुणाः ।¦तदाऽऽजगाम खड्गभृत् सहानुजः सुयोधनः ॥ २६५॥ | ||
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| verse_text = द्वारं सभाया हरिनीलरश्मिव्यूढं न जानन् स विहाय भित्तम् । | | verse_text = द्वारं सभाया हरिनीलरश्मिव्यूढं न जानन् स विहाय भित्तम् । | ||
| verse_lines = द्वारं सभाया हरिनीलरश्मिव्यूढं न जानन् स विहाय भित्तम् | | verse_lines = द्वारं सभाया हरिनीलरश्मिव्यूढं न जानन् स विहाय भित्तम् ।¦अभ्यन्तराणां दृशि नो विघातिनीं(दृशिनोऽविघातिनीं) संस्फाटिकामाशु दृढं चुचुम्बे(चुचुम्ब) ॥ २६६॥ | ||
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| verse_lines = प्रवेशयेतां च यमौ तमाशु सभां भुजौ गृह्य नृपोपदिष्टौ | | verse_lines = प्रवेशयेतां च यमौ तमाशु सभां भुजौ गृह्य नृपोपदिष्टौ ।¦तत्रोपविश्य क्षणमन्यतोऽगादमृष्यमाणः श्रियमेषु दिव्याम् ॥ २६७॥ | ||
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| verse_text = तत्रेन्द्रनीलभुवि रत्नमयानि दृष्ट्वा पद्मानि नीरमनसा जगृहे स्ववस्त्रम् । | | verse_text = तत्रेन्द्रनीलभुवि रत्नमयानि दृष्ट्वा पद्मानि नीरमनसा जगृहे स्ववस्त्रम् । | ||
| verse_lines = तत्रेन्द्रनीलभुवि रत्नमयानि दृष्ट्वा पद्मानि नीरमनसा जगृहे स्ववस्त्रम् | | verse_lines = तत्रेन्द्रनीलभुवि रत्नमयानि दृष्ट्वा पद्मानि नीरमनसा जगृहे स्ववस्त्रम् ।¦रत्नोरुदीधितिनिगूढजलं स्थलं च मत्वा पपात सहितोऽवरजैर्जलौघे ॥ २६८॥ | ||
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| verse_lines = तं प्राहसद् भगवता क्षितिभारनाशहेतोः सुसूचित उरुस्वरतोऽत्र भीमः | | verse_lines = तं प्राहसद् भगवता क्षितिभारनाशहेतोः सुसूचित उरुस्वरतोऽत्र भीमः ।¦पाञ्चालराजसुतया च समं तथाऽन्यैः स्वीयैस्तथाऽनु जहसुर्भगवन्महिष्यः ॥ २६९॥ | ||
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| verse_text = मन्दस्मितेन विलसद्वदनेन्दुबिम्बो नारायणस्तु मुखमीक्ष्य मरुत्सुतस्य । | | verse_text = मन्दस्मितेन विलसद्वदनेन्दुबिम्बो नारायणस्तु मुखमीक्ष्य मरुत्सुतस्य । | ||
| verse_lines = मन्दस्मितेन विलसद्वदनेन्दुबिम्बो नारायणस्तु मुखमीक्ष्य मरुत्सुतस्य | | verse_lines = मन्दस्मितेन विलसद्वदनेन्दुबिम्बो नारायणस्तु मुखमीक्ष्य मरुत्सुतस्य ।¦नोवाच किञ्चिदथ धर्मसुतो निवार्य प्रास्थापयद् वसनमाल्यविलेपनानि ॥ २७०॥ | ||
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| verse_text = कृष्णावृकोदरगतं बहुलं निधाय क्रोधं ययौ सशकुनिर्धृतराष्ट्रपुत्रः । | | verse_text = कृष्णावृकोदरगतं बहुलं निधाय क्रोधं ययौ सशकुनिर्धृतराष्ट्रपुत्रः । | ||
| verse_lines = कृष्णावृकोदरगतं बहुलं निधाय क्रोधं ययौ सशकुनिर्धृतराष्ट्रपुत्रः | | verse_lines = कृष्णावृकोदरगतं बहुलं निधाय क्रोधं ययौ सशकुनिर्धृतराष्ट्रपुत्रः ।¦सुव्रीडितो नृपतिदत्तवराम्बरादीन्(नृपतिदत्तसदम्बरादीन्) न्यक्कृत्य मार्गगत आह स मातुलं स्वम् ॥ २७१॥ | ||
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| verse_lines = यदि मे शक्तिरत्र स्याद् घातयेयं वृकोदरम् | | verse_lines = यदि मे शक्तिरत्र स्याद् घातयेयं वृकोदरम् ।¦अग्रपूजां च कृष्णस्य विलुम्पेयं न संशयः ॥ २७३॥ | ||
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| verse_lines = यदि तेषां तदैश्वर्यं न मां गच्छेदशेषतः | | verse_lines = यदि तेषां तदैश्वर्यं न मां गच्छेदशेषतः ।¦सर्वथा नैव जीवेयमिति सत्यं ब्रवीमि ते ॥ २७७॥ | ||
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| verse_lines = नच बाहुबलाच्छक्ष्य आदातुं तां श्रियं क्वचित् | | verse_lines = नच बाहुबलाच्छक्ष्य आदातुं तां श्रियं क्वचित् ।¦नेन्द्रोऽपि समरे शक्तस्तान् जेतुं किमु मानुषाः ॥ २७८॥ | ||
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| verse_text = इतीरितः पापतम आह गान्धारको नृपः । | | verse_text = इतीरितः पापतम आह गान्धारको नृपः । | ||
| verse_lines = इतीरितः पापतम आह गान्धारको नृपः | | verse_lines = इतीरितः पापतम आह गान्धारको नृपः ।¦पापानामखिलानां च प्रधानं(प्रधानः) चक्रवर्तिनम् ॥ २७९॥ | ||
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| verse_text = यां यां श्रियं प्रदीप्तां त्वं पाण्डवेषु प्रपश्यसि । | | verse_text = यां यां श्रियं प्रदीप्तां त्वं पाण्डवेषु प्रपश्यसि । | ||
| verse_lines = यां यां श्रियं प्रदीप्तां त्वं पाण्डवेषु प्रपश्यसि | | verse_lines = यां यां श्रियं प्रदीप्तां त्वं पाण्डवेषु प्रपश्यसि ।¦तामक्लेशत आदास्ये क्रीडन्नक्षैस्त्वदन्तिके ॥ २८०॥ | ||
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| verse_text = इतीरितः प्रसन्नधीः सुयोधनो बभूव ह । | | verse_text = इतीरितः प्रसन्नधीः सुयोधनो बभूव ह । | ||
| verse_lines = इतीरितः प्रसन्नधीः सुयोधनो बभूव ह | | verse_lines = इतीरितः प्रसन्नधीः सुयोधनो बभूव ह ।¦प्रजग्मतुश्च तावुभौ विचित्रवीर्यजं नृपम् ॥ २८१॥ | ||
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| verse_text = धृतराष्ट्रमथोवाच द्वापरांशोऽतिपापकृत् । | | verse_text = धृतराष्ट्रमथोवाच द्वापरांशोऽतिपापकृत् । | ||
| verse_lines = धृतराष्ट्रमथोवाच द्वापरांशोऽतिपापकृत् | | verse_lines = धृतराष्ट्रमथोवाच द्वापरांशोऽतिपापकृत् ।¦नास्तिक्यरूपः शकुनिर्विवर्णं हरिणं कृशम् ॥ २८२॥ | ||
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| verse_text = दुर्योधनं तु तच्छ्रुत्वा कुत इत्याह दुर्मनाः । | | verse_text = दुर्योधनं तु तच्छ्रुत्वा कुत इत्याह दुर्मनाः । | ||
| verse_lines = दुर्योधनं तु तच्छ्रुत्वा कुत इत्याह दुर्मनाः | | verse_lines = दुर्योधनं तु तच्छ्रुत्वा कुत इत्याह दुर्मनाः ।¦अब्रूतां तौ नृपायाऽशु द्वाभ्यां यन्मन्त्रितं पथि ॥ २८३॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वैव तन्नेत्यवदत् स भूपतिर्विरोधि धर्मस्य विनाशकारणम् । | | verse_text = श्रुत्वैव तन्नेत्यवदत् स भूपतिर्विरोधि धर्मस्य विनाशकारणम् । | ||
| verse_lines = श्रुत्वैव तन्नेत्यवदत् स भूपतिर्विरोधि धर्मस्य विनाशकारणम् | | verse_lines = श्रुत्वैव तन्नेत्यवदत् स भूपतिर्विरोधि धर्मस्य विनाशकारणम् ।¦कुमन्त्रितं वो न ममैतदिष्टं स्वबाहुवीर्याप्तमहाश्रियो(स्वबाहुवीर्यात्तमहाश्रियः) हि ते ॥ २८४॥ | ||
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| verse_text = त्वयाऽपि निर्जित्य दिशो मखाग्र्याः कार्याः स्पृधो मा गुणवत्तमैस्तैः । | | verse_text = त्वयाऽपि निर्जित्य दिशो मखाग्र्याः कार्याः स्पृधो मा गुणवत्तमैस्तैः । | ||
| verse_lines = त्वयाऽपि निर्जित्य दिशो मखाग्र्याः कार्याः स्पृधो मा गुणवत्तमैस्तैः | | verse_lines = त्वयाऽपि निर्जित्य दिशो मखाग्र्याः कार्याः स्पृधो मा गुणवत्तमैस्तैः ।¦विशेषतो भ्रातृभिरग्र्यपौरुषैरित्युक्त आहाऽशु सुयोधनस्तम् ॥ २८५॥ | ||
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| verse_text = यदि श्रियं पाण्डवानां नाक्षैराहर्तुमिच्छसि(नाक्षैराच्छेत्तुमिच्छसि) । | | verse_text = यदि श्रियं पाण्डवानां नाक्षैराहर्तुमिच्छसि(नाक्षैराच्छेत्तुमिच्छसि) । | ||
| verse_lines = यदि श्रियं पाण्डवानां नाक्षैराहर्तुमिच्छसि(नाक्षैराच्छेत्तुमिच्छसि) | | verse_lines = यदि श्रियं पाण्डवानां नाक्षैराहर्तुमिच्छसि(नाक्षैराच्छेत्तुमिच्छसि) ।¦मृतमेवाद्य मां विद्धि पाण्डवैस्त्वं सुखी भव ॥ २८६॥ | ||
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| verse_text = यदि मज्जीवितार्थी त्वमानयाऽश्विह पाण्डवान् । | | verse_text = यदि मज्जीवितार्थी त्वमानयाऽश्विह पाण्डवान् । | ||
| verse_lines = यदि मज्जीवितार्थी त्वमानयाऽश्विह पाण्डवान् | | verse_lines = यदि मज्जीवितार्थी त्वमानयाऽश्विह पाण्डवान् ।¦सभार्यान् देवनायैव नचाधर्मोऽत्र कश्चन ॥ २८७॥ | ||
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| verse_text = वेदानुजीविनो विप्राः क्षत्रियाः शस्त्रजीविनः । | | verse_text = वेदानुजीविनो विप्राः क्षत्रियाः शस्त्रजीविनः । | ||
| verse_lines = वेदानुजीविनो विप्राः क्षत्रियाः शस्त्रजीविनः | | verse_lines = वेदानुजीविनो विप्राः क्षत्रियाः शस्त्रजीविनः ।¦त्रुट्यते येन शत्रुश्च तच्छस्त्रं नैव चेतरत् ॥ २८८॥ | ||
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| verse_text = अतः स्वधर्म एवायं तवापि स्यात् फलं महत् । | | verse_text = अतः स्वधर्म एवायं तवापि स्यात् फलं महत् । | ||
| verse_lines = अतः स्वधर्म एवायं तवापि स्यात् फलं महत् | | verse_lines = अतः स्वधर्म एवायं तवापि स्यात् फलं महत् ।¦इत्युक्तो मा फलं मेऽस्तु तवैवास्त्विति सोऽब्रवीत् ॥ २८९॥ | ||
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| verse_text = एवं ब्रुवन्नपि नृप आविष्टः कलिना स्वयम् । | | verse_text = एवं ब्रुवन्नपि नृप आविष्टः कलिना स्वयम् । | ||
| verse_lines = एवं ब्रुवन्नपि नृप आविष्टः कलिना स्वयम् | | verse_lines = एवं ब्रुवन्नपि नृप आविष्टः कलिना स्वयम् ।¦पुत्रस्नेहाच्च विदुरमादिशत् पाण्डवान् प्रति ॥ २९०॥ | ||
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| verse_text = आविवेश कलिस्तं हि यदा पुत्रत्वसिद्धये । | | verse_text = आविवेश कलिस्तं हि यदा पुत्रत्वसिद्धये । | ||
| verse_lines = आविवेश कलिस्तं हि यदा पुत्रत्वसिद्धये | | verse_lines = आविवेश कलिस्तं हि यदा पुत्रत्वसिद्धये ।¦अंशेन तत आरभ्य नैवास्मादपजग्मिवान् ॥ २९१॥ | ||
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| verse_text = यावत् पुरं परित्यज्य वनमेव विवेश ह । | | verse_text = यावत् पुरं परित्यज्य वनमेव विवेश ह । | ||
| verse_lines = यावत् पुरं परित्यज्य वनमेव विवेश ह | | verse_lines = यावत् पुरं परित्यज्य वनमेव विवेश ह ।¦तदन्तरा ततस्तस्य पापयुक्तं मनोऽभवत् ॥ २९२॥ | ||
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| verse_text = न्यवारयत् तं विदुरो महत् ते पापं कुलस्यापि विनाशकोऽयम् । | | verse_text = न्यवारयत् तं विदुरो महत् ते पापं कुलस्यापि विनाशकोऽयम् । | ||
| verse_lines = न्यवारयत् तं विदुरो महत् ते पापं कुलस्यापि विनाशकोऽयम् | | verse_lines = न्यवारयत् तं विदुरो महत् ते पापं कुलस्यापि विनाशकोऽयम् ।¦समुद्यमो नात्र विचार्यमस्ति कृथा न तस्मादयशश्च ते स्यात् ॥ २९३॥ | ||
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| verse_lines = इति ब्रुवाणं कलहोऽत्र न स्यान्निवारयामो वयमेव यस्मात् | | verse_lines = इति ब्रुवाणं कलहोऽत्र न स्यान्निवारयामो वयमेव यस्मात् ।¦द्रष्टुं सुतान् क्रीडत एकसंस्थानिच्छामि पार्थांश्च सुयोधनादीन् ॥ २९४॥ | ||
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| verse_text = अतः क्षिप्रमुपानेयाः पार्था इति बलोदितः । | | verse_text = अतः क्षिप्रमुपानेयाः पार्था इति बलोदितः । | ||
| verse_lines = अतः क्षिप्रमुपानेयाः पार्था इति बलोदितः | | verse_lines = अतः क्षिप्रमुपानेयाः पार्था इति बलोदितः ।¦ययौ स विदुरः पार्थान् द्वारकां केशवे गते ॥ २९५॥ | ||
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| verse_lines = गते हि पार्थसन्निधेः सुयोधने तु नारदः | | verse_lines = गते हि पार्थसन्निधेः सुयोधने तु नारदः ।¦शशंस धर्मसूनुना प्रचोदितोऽरिमागतम् ॥ २९६॥ | ||
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| verse_text = क उद्यमी नृपेष्विति प्रपृष्ट आह नारदः । | | verse_text = क उद्यमी नृपेष्विति प्रपृष्ट आह नारदः । | ||
| verse_lines = क उद्यमी नृपेष्विति प्रपृष्ट आह नारदः | | verse_lines = क उद्यमी नृपेष्विति प्रपृष्ट आह नारदः ।¦स सौभराड् वरं शिवादवाप वृष्णिनिर्जयम्(वृष्णिनिर्जये) ॥ २९७॥ | ||
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| verse_lines = पांसुमुष्टिं सकृद्ग्रासी बहूनब्दांस्तपश्चरन् | | verse_lines = पांसुमुष्टिं सकृद्ग्रासी बहूनब्दांस्तपश्चरन् ।¦आजगाम हरादाप्य वरं कृष्णजये पुनः ॥ २९८॥ | ||
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| verse_lines = स श्रुत्वा मागधवधं दिशां विजयमेव च | | verse_lines = स श्रुत्वा मागधवधं दिशां विजयमेव च ।¦राजसूयं क्रतुं चैव शिशुपालवधं तथा ॥ २९९॥ | ||
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| verse_text = यदून् प्रत्युद्यमं तूर्णं करोतीति निशम्य तत् । | | verse_text = यदून् प्रत्युद्यमं तूर्णं करोतीति निशम्य तत् । | ||
| verse_lines = यदून् प्रत्युद्यमं तूर्णं करोतीति निशम्य तत् | | verse_lines = यदून् प्रत्युद्यमं तूर्णं करोतीति निशम्य तत् ।¦समैक्षद् धर्मजः कृष्णमुखशीतांशुमण्डलम्(कृष्णमुखं शीतांशुमण्डलम्) ॥ ३००॥ | ||
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| verse_text = अस्त्वित्युक्त्वा स गोविन्दः प्रेषयामास यादवान् । | | verse_text = अस्त्वित्युक्त्वा स गोविन्दः प्रेषयामास यादवान् । | ||
| verse_lines = अस्त्वित्युक्त्वा स गोविन्दः प्रेषयामास यादवान् | | verse_lines = अस्त्वित्युक्त्वा स गोविन्दः प्रेषयामास यादवान् ।¦प्रद्युम्नादीन् दिनैः कैश्चित् स्वयं चागात् सहाग्रजः ॥ ३०१॥ | ||
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| verse_lines = विदुरस्तु ततो गत्वा धर्मराजमथाऽह्वयत् | | verse_lines = विदुरस्तु ततो गत्वा धर्मराजमथाऽह्वयत् ।¦भ्रातृभिर्वार्यमाणोऽपि कृष्णया च स धर्मराट् ।¦सार्धं मात्रा भ्रातृभिश्च कृष्णया च ययौ द्रुतम् ॥ ३०२॥ | ||
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| verse_lines = ज्येष्ठाज्ञयैव विदुर आह्वायन्नपि धर्मजम् | | verse_lines = ज्येष्ठाज्ञयैव विदुर आह्वायन्नपि धर्मजम् ।¦नाऽगन्तव्यमिति प्राह दोषानुक्त्वाऽक्षजान् बहून् ॥ ३०३॥ | ||
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| verse_lines = इतीह दोषसञ्चयस्तथापि ते पितुर्वचः | | verse_lines = इतीह दोषसञ्चयस्तथापि ते पितुर्वचः ।¦समीक्ष्य तद् द्वयं स्वयं कुरुष्व कार्यमात्मनः ॥ ३०४॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितोऽपि पाण्डवो ययौ कलिप्रवेशितः | | verse_lines = इतीरितोऽपि पाण्डवो ययौ कलिप्रवेशितः ।¦विचित्रवीर्यजं च तं समासदत् ससैनिकः ॥ ३०५॥ | ||
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| verse_text = कल्याविशान्नृपतिः प्रतिजज्ञे पूर्वमेव धर्मात्मा । | | verse_text = कल्याविशान्नृपतिः प्रतिजज्ञे पूर्वमेव धर्मात्मा । | ||
| verse_lines = कल्याविशान्नृपतिः प्रतिजज्ञे पूर्वमेव धर्मात्मा | | verse_lines = कल्याविशान्नृपतिः प्रतिजज्ञे पूर्वमेव धर्मात्मा ।¦आहूतो (द्यूतकरणात्) द्यूतरणान्निवर्तेयं नैव वारितोऽपीति ॥ ३०६॥ | ||
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| verse_text = तेनाऽयात् (स सुहृद्भिः)स्वसुहृद्भिर्निवार्यमाणोऽपि नागपुरमाशु । | | verse_text = तेनाऽयात् (स सुहृद्भिः)स्वसुहृद्भिर्निवार्यमाणोऽपि नागपुरमाशु । | ||
| verse_lines = तेनाऽयात् (स सुहृद्भिः)स्वसुहृद्भिर्निवार्यमाणोऽपि नागपुरमाशु | | verse_lines = तेनाऽयात् (स सुहृद्भिः)स्वसुहृद्भिर्निवार्यमाणोऽपि नागपुरमाशु ।¦नहि धर्मो द्यूतकृतो विशेषतः क्षत्रियस्य लोकगुरोः ॥ ३०७॥ | ||
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| verse_text = वैचित्रवीर्यतनयेन तु पाण्डुपुत्राः सम्भावितास्तमुप च न्यवसन् निशायाम् । | | verse_text = वैचित्रवीर्यतनयेन तु पाण्डुपुत्राः सम्भावितास्तमुप च न्यवसन् निशायाम् । | ||
| verse_lines = वैचित्रवीर्यतनयेन तु पाण्डुपुत्राः सम्भावितास्तमुप च न्यवसन् निशायाम् | | verse_lines = वैचित्रवीर्यतनयेन तु पाण्डुपुत्राः सम्भावितास्तमुप च न्यवसन् निशायाम् ।¦प्रातश्च भीष्ममुखराः सकलाश्च भूपा आसेदुराशु च सभां सह पाण्डुपुत्रैः ॥ ३०८॥ | ||
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| verse_text = भीमादिभिः स विदुरेण च वार्यमाणो द्यूते निधाय पणमप्यखिलं स्ववित्तम् । | | verse_text = भीमादिभिः स विदुरेण च वार्यमाणो द्यूते निधाय पणमप्यखिलं स्ववित्तम् । | ||
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| verse_text = स पापपूरुषोत्तमः प्रगृह्य केशपक्षके । | | verse_text = स पापपूरुषोत्तमः प्रगृह्य केशपक्षके । | ||
| verse_lines = स पापपूरुषोत्तमः प्रगृह्य केशपक्षके | | verse_lines = स पापपूरुषोत्तमः प्रगृह्य केशपक्षके ।¦पुरः स्वमातुरानयत् सभामयुग्मवाससीम् ॥ ३१४॥ | ||
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| verse_text = समाहृता रजस्वला जगाद भीष्मपूर्वकान् । | | verse_text = समाहृता रजस्वला जगाद भीष्मपूर्वकान् । | ||
| verse_lines = समाहृता रजस्वला जगाद भीष्मपूर्वकान् | | verse_lines = समाहृता रजस्वला जगाद भीष्मपूर्वकान् ।¦अधर्म एष वार्यते न धर्मिभिर्भवद्विधैः ॥ ३१५॥ | ||
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| verse_text = कथं छलात्मके द्यूते जिते धर्मजयो भवेत् । | | verse_text = कथं छलात्मके द्यूते जिते धर्मजयो भवेत् । | ||
| verse_lines = कथं छलात्मके द्यूते जिते धर्मजयो भवेत् | | verse_lines = कथं छलात्मके द्यूते जिते धर्मजयो भवेत् ।¦नहि द्यूतं धर्ममाहुः(धर्म्यमाहुः) विशेषेण तु भूभुजाम् ॥ ३१६॥ | ||
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| verse_text = येऽधर्मं(ये धर्मं) न वदन्तीह न ते वृद्धा इतीरिताः । | | verse_text = येऽधर्मं(ये धर्मं) न वदन्तीह न ते वृद्धा इतीरिताः । | ||
| verse_lines = येऽधर्मं(ये धर्मं) न वदन्तीह न ते वृद्धा इतीरिताः | | verse_lines = येऽधर्मं(ये धर्मं) न वदन्तीह न ते वृद्धा इतीरिताः ।¦अवृद्धमण्डितां नैव सभेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ३१७॥ | ||
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| verse_text = कथं द्यूते जिता चाहमजिते स्वपतौ स्थिते । | | verse_text = कथं द्यूते जिता चाहमजिते स्वपतौ स्थिते । | ||
| verse_lines = कथं द्यूते जिता चाहमजिते स्वपतौ स्थिते | | verse_lines = कथं द्यूते जिता चाहमजिते स्वपतौ स्थिते ।¦समानधर्मिणीमाहुर्भार्यां यस्माद् विपश्चितः ॥ ३१८॥ | ||
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| verse_text = सहैव कर्म कर्तव्यं पतौ दासे हि भार्यया । | | verse_text = सहैव कर्म कर्तव्यं पतौ दासे हि भार्यया । | ||
| verse_lines = सहैव कर्म कर्तव्यं पतौ दासे हि भार्यया | | verse_lines = सहैव कर्म कर्तव्यं पतौ दासे हि भार्यया ।¦दासीत्वं न पृथङ् मे स्याज्जितेऽपि हि पतौ ततः ॥ ३१९॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्ता अपि भीष्माद्याः कल्यावेशेन मोहिताः । | | verse_text = इत्युक्ता अपि भीष्माद्याः कल्यावेशेन मोहिताः । | ||
| verse_lines = इत्युक्ता अपि भीष्माद्याः कल्यावेशेन मोहिताः | | verse_lines = इत्युक्ता अपि भीष्माद्याः कल्यावेशेन मोहिताः ।¦पृच्छ धर्मजमित्युक्त्वा तूष्णीमेव बभूविरे ॥ ३२०॥ | ||
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| verse_text = दुर्योधनप्रतीपं हि न कश्चिदशकत् तदा । | | verse_text = दुर्योधनप्रतीपं हि न कश्चिदशकत् तदा । | ||
| verse_lines = दुर्योधनप्रतीपं हि न कश्चिदशकत् तदा | | verse_lines = दुर्योधनप्रतीपं हि न कश्चिदशकत् तदा ।¦उवाच विदुरस्तत्र न धर्मोऽयमिति स्फुटम् ॥ ३२१॥ | ||
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| verse_text = न तस्य वाचं जग्राह धृतराष्ट्रः सहात्मजः । | | verse_text = न तस्य वाचं जग्राह धृतराष्ट्रः सहात्मजः । | ||
| verse_lines = न तस्य वाचं जग्राह धृतराष्ट्रः सहात्मजः | | verse_lines = न तस्य वाचं जग्राह धृतराष्ट्रः सहात्मजः ।¦ऊर्ध्वबाहुः स चुक्रोश देवानां ख्यापयंस्तदा ॥ ३२२॥ | ||
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| verse_lines = स्वाशक्तिं द्रौपदीं चाऽह जिता नैवासि धर्मतः | | verse_lines = स्वाशक्तिं द्रौपदीं चाऽह जिता नैवासि धर्मतः ।¦अधर्मो हि महानेतां सभामाक्रम्य तिष्ठति ॥ ३२३॥ | ||
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| verse_text = एवं तु विदुरेणोक्ते विकर्णः पापकोऽपि सन् । | | verse_text = एवं तु विदुरेणोक्ते विकर्णः पापकोऽपि सन् । | ||
| verse_lines = एवं तु विदुरेणोक्ते विकर्णः पापकोऽपि सन् | | verse_lines = एवं तु विदुरेणोक्ते विकर्णः पापकोऽपि सन् ।¦आह डम्भार्थमेवात्र धर्मवित्त्वं प्रकाशयन् ।¦अधर्म एवायमिति कर्णोऽथैनमभर्त्सयत् ॥ ३२४॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वा भीमः क्लिश्यमानां तु कृष्णां धर्मात्ययं धर्मराजे च दृष्ट्वा । | | verse_text = दृष्ट्वा भीमः क्लिश्यमानां तु कृष्णां धर्मात्ययं धर्मराजे च दृष्ट्वा । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा भीमः क्लिश्यमानां तु कृष्णां धर्मात्ययं धर्मराजे च दृष्ट्वा | | verse_lines = दृष्ट्वा भीमः क्लिश्यमानां तु कृष्णां धर्मात्ययं धर्मराजे च दृष्ट्वा ।¦राजा शास्यो युवराजेन धर्माच्चलन् यस्माद् वाक्यमिदं बभाषे ॥ ३२५॥ | ||
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| verse_lines = इमां न्यस्तवतो द्यूते धक्षणीयौ हि ते भुजौ | | verse_lines = इमां न्यस्तवतो द्यूते धक्षणीयौ हि ते भुजौ ।¦नैवमित्यर्जुनोऽवादीत् तमाहाथ वृकोदरः ॥ ३२६॥ | ||
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| verse_lines = वक्तव्यं नतु कर्तव्यं तस्मान्नहि मया कृतम् | | verse_lines = वक्तव्यं नतु कर्तव्यं तस्मान्नहि मया कृतम् ।¦उत्तमे वचसा शिक्षा मध्यमेऽर्थापहारणम् ।¦अधमे देहदण्डश्च तस्माद् वाच्यो युधिष्ठिरः ॥ ३२७॥ | ||
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| verse_lines = अथ कर्णोऽब्रवीत् कृष्णामपतिर्ह्यसि शोभने | | verse_lines = अथ कर्णोऽब्रवीत् कृष्णामपतिर्ह्यसि शोभने ।¦धार्तराष्ट्रगृहं याहीत्यथ दुर्योधनोऽवदत् ।¦परस्परविरोधार्थं पाण्डवानामिदं वचः ॥ ३२८॥ | ||
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| verse_lines = युधिष्ठिरो दुःखहेतुस्तवैको यद्येनमन्ये न गुरुर्न एषः | | verse_lines = युधिष्ठिरो दुःखहेतुस्तवैको यद्येनमन्ये न गुरुर्न एषः ।¦इति ब्रूयुरथवा भीमपार्थावेकोऽपिवा भीम इहोत्सृजे त्वाम् ॥ ३२९॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्त ऊचे पवमानसूनुः पूज्योऽस्माकं धर्मजोऽसंशयेन | | verse_lines = इत्युक्त ऊचे पवमानसूनुः पूज्योऽस्माकं धर्मजोऽसंशयेन ।¦गुरुश्चाहं वोऽखिलानां यतो हि बलज्येष्ठं क्षत्रमाहुर्महान्तः ॥ ३३०॥ | ||
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| verse_lines = बलज्यैष्ठ्ये यदि वः संशयः स्यादुत्तिष्ठध्वं सर्व एवाद्य वीराः | | verse_lines = बलज्यैष्ठ्ये यदि वः संशयः स्यादुत्तिष्ठध्वं सर्व एवाद्य वीराः ।¦मृद्गामि वः पादतलेन सर्वान् सहानुबन्धान् यश्च मां योद्धुकामः ॥ ३३१॥ | ||
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| verse_lines = इति ब्रुवन् समुत्थितो नदन् वृकोदरो यदा | | verse_lines = इति ब्रुवन् समुत्थितो नदन् वृकोदरो यदा ।¦विघूर्णिता सभाऽखिला भयान्नचाऽह किञ्चन(कश्चन) ॥ ३३२॥ | ||
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| verse_lines = भीष्मो द्रोणो विदुराद्याः क्षमस्व सर्वं त्वयोक्तं सत्यमित्येव हस्तौ | | verse_lines = भीष्मो द्रोणो विदुराद्याः क्षमस्व सर्वं त्वयोक्तं सत्यमित्येव हस्तौ ।¦गृहीत्वैनं स्थापयामासुरस्मिन् स्थिते शान्तिं चाऽपिरे धार्तराष्ट्राः ॥ ३३३॥ | ||
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| verse_lines = निवारितो धर्मजेन गुरुभिश्चापरैस्तदा | | verse_lines = निवारितो धर्मजेन गुरुभिश्चापरैस्तदा ।¦माननार्थं गुरूणां तु न भीमस्तान् जघान ह ॥ ३३४॥ | ||
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| verse_lines = न चात्यवर्तत(न चातिवर्तते) ज्येष्ठं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् | | verse_lines = न चात्यवर्तत(न चातिवर्तते) ज्येष्ठं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।¦तेषां पापाभिवृद्ध्यर्थं ज्येष्ठवृत्तिं च दर्शयन् ॥ ३३५॥ | ||
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| verse_lines = अथ दुर्योधनः पापो भीमसेनस्य पश्यतः | | verse_lines = अथ दुर्योधनः पापो भीमसेनस्य पश्यतः ।¦ऊरुं सन्दर्शयामास कृष्णायै भीम आह तम् ॥ ३३६॥ | ||
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| verse_lines = तवोरुमेनं गदयोरुवेगया बिभेत्स्य इत्येव पुनः सुयोधनः | | verse_lines = तवोरुमेनं गदयोरुवेगया बिभेत्स्य इत्येव पुनः सुयोधनः ।¦ऊचे नान्यद् भवतामस्ति वित्तं द्यूते कृष्णं स्थापयध्वं पणाय ॥ ३३७॥ | ||
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| verse_lines = अथाब्रवीद् वृकोदरः कृतेऽवमानने हरेः | | verse_lines = अथाब्रवीद् वृकोदरः कृतेऽवमानने हरेः ।¦निपात्य भूतले हि ते शिरो मृदिष्य इत्यलम् ॥ ३३८॥ | ||
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| verse_lines = स वध्य एव मे सदा परोक्षतोऽपि यो हरिम् | | verse_lines = स वध्य एव मे सदा परोक्षतोऽपि यो हरिम् ।¦विनिन्दयेदिति ध्रुवं प्रतिश्रुतं(प्रतिश्रवं) हि मारुतेः ॥ ३३९॥ | ||
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| verse_lines = पुनश्च पापवृद्धये तदैव नो जघान तम् | | verse_lines = पुनश्च पापवृद्धये तदैव नो जघान तम् ।¦विकर्तनात्मजः पुनर्जगाद सोमकात्मजाम् ॥ ३४०॥ | ||
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| verse_lines = प्रयाहि भूभृतो हि नो गृहं न सन्ति पाण्डवाः | | verse_lines = प्रयाहि भूभृतो हि नो गृहं न सन्ति पाण्डवाः ।¦इतीरिते समुत्थितौ वृकोदरोऽनु चार्जुनः ॥ ३४१॥ | ||
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| verse_lines = उभौ च तौ युधिष्ठिरो न्यवारयत् तथाऽपरे | | verse_lines = उभौ च तौ युधिष्ठिरो न्यवारयत् तथाऽपरे ।¦ततो विषण्णयोस्तयोः सुयोधनो वचोऽब्रवीत् ॥ ३४२॥ | ||
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| verse_lines = दुःशासनैषां वासांसि दासानां नो व्यपाकुरु | | verse_lines = दुःशासनैषां वासांसि दासानां नो व्यपाकुरु ।¦इत्युक्तोऽभ्यगमत् पार्थान् स्ववासांस्यथ ते ददुः ॥ ३४३॥ | ||
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| verse_lines = ते चर्मवसना(अचर्मवसना) भूत्वा तानशिष्टान् प्रकाश्य च | | verse_lines = ते चर्मवसना(अचर्मवसना) भूत्वा तानशिष्टान् प्रकाश्य च ।¦निषेदुश्च क्षमायान्ते(क्षमायां ते, सभायान्ते, क्षमाया अन्ते) क्षमामालम्ब्य विस्तृताम् ॥ ३४४॥ | ||
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| verse_lines = पापेषु पूर्वस्य तथाऽधमस्य वंशे कुरूणामुरुधर्मशीलिनाम् | | verse_lines = पापेषु पूर्वस्य तथाऽधमस्य वंशे कुरूणामुरुधर्मशीलिनाम् ।¦दुःशासनस्यास्य विदार्य वक्षः पिबामि रक्तं जगतः समक्षम् ॥ ३४६॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = इत्युक्ते तत् तथेत्याह भीमसेनः सभातले । | | verse_text = इत्युक्ते तत् तथेत्याह भीमसेनः सभातले । | ||
| verse_lines = इत्युक्ते तत् तथेत्याह भीमसेनः सभातले | | verse_lines = इत्युक्ते तत् तथेत्याह भीमसेनः सभातले ।¦प्रतिज्ञामाददे पार्थस्तां माद्रीनन्दनस्तथा ।¦नकुलः प्रतिजज्ञेऽथ शाकुनेयवधं प्रति ॥ ३५१॥ | ||
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| verse_text = ततः सुयोधनानुजश्चकर्ष पार्षतात्मजाम् । | | verse_text = ततः सुयोधनानुजश्चकर्ष पार्षतात्मजाम् । | ||
| verse_lines = ततः सुयोधनानुजश्चकर्ष पार्षतात्मजाम् | | verse_lines = ततः सुयोधनानुजश्चकर्ष पार्षतात्मजाम् ।¦गृहाय तन्निशाम्य तु क्रुधाऽऽह मारुतात्मजः ॥ ३५२॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = अर्जुनार्जुन नैवात्र क्षमा मे तात रोचते । | | verse_text = अर्जुनार्जुन नैवात्र क्षमा मे तात रोचते । | ||
| verse_lines = अर्जुनार्जुन नैवात्र क्षमा मे तात रोचते | | verse_lines = अर्जुनार्जुन नैवात्र क्षमा मे तात रोचते ।¦पतितस्यास्य देहस्य काष्ठविष्ठासमस्य च ।¦फलानि त्रीणि शिष्यन्ते विद्या कर्म सुता इति ॥ ३५३॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = इति वेदोदितं वाक्यं न सुतो दारधर्षणे । | | verse_text = इति वेदोदितं वाक्यं न सुतो दारधर्षणे । | ||
| verse_lines = इति वेदोदितं वाक्यं न सुतो दारधर्षणे | | verse_lines = इति वेदोदितं वाक्यं न सुतो दारधर्षणे ।¦दुष्टदारो नचाऽप्नोति लोकानर्द्धो हि दूषितः ।¦अरक्षणाद् दूषिताया(अरक्षणाद् दूषितायां, अरक्षणे दूषितायाः) न त्यागाच्च शुभं भवेत् ॥ ३५४॥ | ||
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| verse_text = अतोऽद्य सानुबन्धकान् निहन्मि धार्तराष्ट्रकान् । | | verse_text = अतोऽद्य सानुबन्धकान् निहन्मि धार्तराष्ट्रकान् । | ||
| verse_lines = अतोऽद्य सानुबन्धकान् निहन्मि धार्तराष्ट्रकान् | | verse_lines = अतोऽद्य सानुबन्धकान् निहन्मि धार्तराष्ट्रकान् ।¦इति ब्रुवन् व्यलोकयद् रिपून् दहन्निवौजसा ॥ ३५५॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = ददर्श च महाघोरमादातुं परिघं रुषा । | | verse_text = ददर्श च महाघोरमादातुं परिघं रुषा । | ||
| verse_lines = ददर्श च महाघोरमादातुं परिघं रुषा | | verse_lines = ददर्श च महाघोरमादातुं परिघं रुषा ।¦कर्तुं व्यवसितो बुद्ध्या निश्शेषान् धृतराष्ट्रजान् ॥ ३५६॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = तदा शिवा ववाशिरे सुयोधनाग्निगेहतः । | | verse_text = तदा शिवा ववाशिरे सुयोधनाग्निगेहतः । | ||
| verse_lines = तदा शिवा ववाशिरे सुयोधनाग्निगेहतः | | verse_lines = तदा शिवा ववाशिरे सुयोधनाग्निगेहतः ।¦तथैव तत्पितुर्गृहेऽप्यभूद् भयानकं बहु ॥ ३५७॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = निमित्तान्यतिघोराणि कुपिते मारुतात्मजे । | | verse_text = निमित्तान्यतिघोराणि कुपिते मारुतात्मजे । | ||
| verse_lines = निमित्तान्यतिघोराणि कुपिते मारुतात्मजे | | verse_lines = निमित्तान्यतिघोराणि कुपिते मारुतात्मजे ।¦दृष्ट्वाऽऽम्बिकेयो विदुरं पप्रच्छैषां फलं द्रुतम् ॥ ३५८॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = आह तं विदुरो ज्येष्ठं क्षणेऽस्मिंस्तव पुत्रकाः । | | verse_text = आह तं विदुरो ज्येष्ठं क्षणेऽस्मिंस्तव पुत्रकाः । | ||
| verse_lines = आह तं विदुरो ज्येष्ठं क्षणेऽस्मिंस्तव पुत्रकाः | | verse_lines = आह तं विदुरो ज्येष्ठं क्षणेऽस्मिंस्तव पुत्रकाः ।¦सानुबन्धा नशिष्यन्ति(न शिष्यन्ति) वृकोदरबलाहताः ॥ ३५९॥ | ||
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| verse_text = क्रीडसेऽर्भकवत् त्वं हि किं जितं किं जितं त्विति । | | verse_text = क्रीडसेऽर्भकवत् त्वं हि किं जितं किं जितं त्विति । | ||
| verse_lines = क्रीडसेऽर्भकवत् त्वं हि किं जितं किं जितं त्विति | | verse_lines = क्रीडसेऽर्भकवत् त्वं हि किं जितं किं जितं त्विति ।¦अधर्मेण जितानत्र जितान् पश्यसि पाण्डवान् ॥ ३६०॥ | ||
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| verse_text = स्त्रीषु द्यूतेषु वा दत्तं मदान्धेन नरेण वा । | | verse_text = स्त्रीषु द्यूतेषु वा दत्तं मदान्धेन नरेण वा । | ||
| verse_lines = स्त्रीषु द्यूतेषु वा दत्तं मदान्धेन नरेण वा | | verse_lines = स्त्रीषु द्यूतेषु वा दत्तं मदान्धेन नरेण वा ।¦न दत्तमाहुर्विद्वांसस्तस्य बन्धुभिरेव च ॥ ३६१॥ | ||
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| verse_text = आहार्यं पुनराहुश्च तथाऽपि नतु पाण्डवैः । | | verse_text = आहार्यं पुनराहुश्च तथाऽपि नतु पाण्डवैः । | ||
| verse_lines = आहार्यं पुनराहुश्च तथाऽपि नतु पाण्डवैः | | verse_lines = आहार्यं पुनराहुश्च तथाऽपि नतु पाण्डवैः ।¦तत् कृतं तव पुत्राणां ख्यापयद्भिरशिष्टताम् ॥ ३६२॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्त आहाऽम्बिकेयो निमित्तानां फलं कथम् । | | verse_text = इत्युक्त आहाऽम्बिकेयो निमित्तानां फलं कथम् । | ||
| verse_lines = इत्युक्त आहाऽम्बिकेयो निमित्तानां फलं कथम् | | verse_lines = इत्युक्त आहाऽम्बिकेयो निमित्तानां फलं कथम् ।¦न भवेदिति स प्राह द्रुतं कृष्णा विमोच्यताम् (विमुच्यताम्) ॥ ३६३॥ | ||
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| verse_text = तोषयस्व वरैश्चैनामन्यथा ते सुतान् मृतान् । | | verse_text = तोषयस्व वरैश्चैनामन्यथा ते सुतान् मृतान् । | ||
| verse_lines = तोषयस्व वरैश्चैनामन्यथा ते सुतान् मृतान् | | verse_lines = तोषयस्व वरैश्चैनामन्यथा ते सुतान् मृतान् ।¦विद्धि भीमेन निष्पिष्टान् माऽत्र(नात्र) ते संशयो भवेत् ॥ ३६४॥ | ||
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| verse_text = कृष्णा च पाण्डवाश्चैव तपोवृद्धिमभीप्सवः । | | verse_text = कृष्णा च पाण्डवाश्चैव तपोवृद्धिमभीप्सवः । | ||
| verse_lines = कृष्णा च पाण्डवाश्चैव तपोवृद्धिमभीप्सवः | | verse_lines = कृष्णा च पाण्डवाश्चैव तपोवृद्धिमभीप्सवः ।¦तपसा नैव धक्ष्यन्ति तेन जीवन्ति ते सुताः ॥ ३६५॥ | ||
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| verse_lines = तथाऽपि यदि कृष्णां त्वं न मोचयसि ते सुतान् | | verse_lines = तथाऽपि यदि कृष्णां त्वं न मोचयसि ते सुतान् ।¦हनिष्यति न सन्देहो बलेनैव वृकोदरः ॥ ३६६॥ | ||
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| verse_text = इतीरितो विनिर्भर्त्स्य(विनिर्भत्स्य) पुत्रं दुःशासनं नृपः । | | verse_text = इतीरितो विनिर्भर्त्स्य(विनिर्भत्स्य) पुत्रं दुःशासनं नृपः । | ||
| verse_lines = इतीरितो विनिर्भर्त्स्य(विनिर्भत्स्य) पुत्रं दुःशासनं नृपः | | verse_lines = इतीरितो विनिर्भर्त्स्य(विनिर्भत्स्य) पुत्रं दुःशासनं नृपः ।¦अमोचयद् वरैश्चैनां छन्दयामास पार्षतीम् ॥ ३६७॥ | ||
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| verse_text = छन्दिता सा वरैस्तेन धर्मे भागवते स्थिता । | | verse_text = छन्दिता सा वरैस्तेन धर्मे भागवते स्थिता । | ||
| verse_lines = छन्दिता सा वरैस्तेन धर्मे भागवते स्थिता | | verse_lines = छन्दिता सा वरैस्तेन धर्मे भागवते स्थिता ।¦नैवाऽत्मनो वरान् वव्रे वव्रे तेषां विमोक्षणम् ॥ ३६८॥ | ||
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| verse_lines = युधिष्ठिरस्य सभ्रातुः सराष्ट्रस्य विमोक्षणम् | | verse_lines = युधिष्ठिरस्य सभ्रातुः सराष्ट्रस्य विमोक्षणम् ।¦ददौ नृपोऽस्या न पुनश्छन्द्यमानाऽपि साऽवृणोत् ॥ ३६९॥ | ||
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| verse_lines = भर्तुर्विष्णोश्च नान्यस्माद् वरस्वीकार इष्यते | | verse_lines = भर्तुर्विष्णोश्च नान्यस्माद् वरस्वीकार इष्यते ।¦एवं हि भगवद्धर्मस्तस्मात् सा नावृणोत् परम् ॥ ३७०॥ | ||
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| verse_lines = अधर्मतो हृतत्वात्तु तद् दानं न वरो भवेत् | | verse_lines = अधर्मतो हृतत्वात्तु तद् दानं न वरो भवेत् ।¦इति मत्वा पाण्डवानां वव्रे कृष्णा विमोक्षणम् ॥ ३७१॥ | ||
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| verse_lines = श्वशुरादैहिकवराः क्षत्रियायास्त्रयो यतः | | verse_lines = श्वशुरादैहिकवराः क्षत्रियायास्त्रयो यतः ।¦उक्ताः शतं च विप्राया धर्मे भागवते ततः ।¦हेतुनाऽनेन वव्रे सा नान्यत् किञ्चिदतः परम् ॥ ३७२॥ | ||
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| verse_text = ततो विमुक्ताः प्रययुश्च पार्था गुरून् प्रणम्य स्वपुरं सकृष्णाः । | | verse_text = ततो विमुक्ताः प्रययुश्च पार्था गुरून् प्रणम्य स्वपुरं सकृष्णाः । | ||
| verse_lines = ततो विमुक्ताः प्रययुश्च पार्था गुरून् प्रणम्य स्वपुरं सकृष्णाः | | verse_lines = ततो विमुक्ताः प्रययुश्च पार्था गुरून् प्रणम्य स्वपुरं सकृष्णाः ।¦दुर्योधनानन्तरजो जगाद तातं निजं पापकृतां प्रधानः ॥ ३७३॥ | ||
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| verse_lines = समस्तपाण्डवश्रियं समागतामहो पुनः | | verse_lines = समस्तपाण्डवश्रियं समागतामहो पुनः ।¦व्यमोचयो वृकोदराद् वधश्च नो ध्रुवो भवेत् ॥ ३७४॥ | ||
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| verse_lines = अतः पुनश्च पाण्डवान् समाह्वयस्व(समानयस्व) नः कृते | | verse_lines = अतः पुनश्च पाण्डवान् समाह्वयस्व(समानयस्व) नः कृते ।¦पुनश्च देवनं भवेज्जिता वनं प्रयान्तु च ॥ ३७५॥ | ||
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| verse_lines = तेनोक्तः स तदा राजा पाण्डवान् पुनराह्वयत् | | verse_lines = तेनोक्तः स तदा राजा पाण्डवान् पुनराह्वयत् ।¦पुनः पित्रा समाहूतो देवनाय युधिष्ठिरः ।¦भ्रातृभिर्वार्यमाणोऽपि कृष्णया चाऽगमत् सभाम् ॥ ३७६॥ | ||
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| verse_lines = द्वादशाब्दं वने वासमज्ञातत्वेन वत्सरम् | | verse_lines = द्वादशाब्दं वने वासमज्ञातत्वेन वत्सरम् ।¦वासं प्रसिद्धनृपतेः पुरे नैवातिदूरतः ॥ ३७७॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णायाः पाण्डवानां वा दर्शनेऽज्ञातवासिनाम् | | verse_lines = कृष्णायाः पाण्डवानां वा दर्शनेऽज्ञातवासिनाम् ।¦एकस्यापि समस्तानां द्वादशाब्दं पुनर्वनम् ॥ ३७८॥ | ||
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| verse_lines = वत्सराज्ञातवासं च त्यागेऽप्युक्तविधेस्तथा | | verse_lines = वत्सराज्ञातवासं च त्यागेऽप्युक्तविधेस्तथा ।¦दुर्योधनः पणं चक्रे बुद्ध्या दुःशासनोक्तया ॥ ३७९॥ | ||
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| verse_lines = गान्धारेण पुनश्चाक्षहृदयज्ञेन धर्मजः | | verse_lines = गान्धारेण पुनश्चाक्षहृदयज्ञेन धर्मजः ।¦पराजितो वनं यातुमैच्छत् सभ्रातृको यदा ॥ ३८०॥ | ||
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| verse_lines = तदा ननर्त पापकृत् सुयोधनानुजो हसन् | | verse_lines = तदा ननर्त पापकृत् सुयोधनानुजो हसन् ।¦वदंश्च मारुतात्मजं पुनःपुनश्च गौरिति ॥ ३८१॥ | ||
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| verse_lines = उवाच च(स) पुनः कृष्णां नृत्यन्नेव सभातले | | verse_lines = उवाच च(स) पुनः कृष्णां नृत्यन्नेव सभातले ।¦अपतिर्ह्यसि कल्याणि गच्छ दुर्योधनालयम् ॥ ३८२॥ | ||
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| verse_lines = एतेऽखिलाः षण्ढ(ड)तिलास्तमोऽन्धमं प्राप्ता नचैषां पुनरुत्थितिः स्यात् | | verse_lines = एतेऽखिलाः षण्ढ(ड)तिलास्तमोऽन्धमं प्राप्ता नचैषां पुनरुत्थितिः स्यात् ।¦इति ब्रुवाणोऽनुचकार भीमं तदाऽहसन् धार्तराष्ट्राश्च सर्वे ॥ ३८३॥ | ||
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| verse_lines = तदाऽकरोद् भीमसेनः प्रतिज्ञां हन्ताऽस्मि वो ह्यखिलान् सङ्गरेऽहम् | | verse_lines = तदाऽकरोद् भीमसेनः प्रतिज्ञां हन्ताऽस्मि वो ह्यखिलान् सङ्गरेऽहम् ।¦इतीरिते शरणं द्रोणमेव जग्मुः समस्ता धृतराष्ट्रपुत्राः ॥ ३८४॥ | ||
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| verse_lines = अब्रवीद् धार्तराष्ट्रांश्च द्रोणो विप्रोऽपि सन्नहम् | | verse_lines = अब्रवीद् धार्तराष्ट्रांश्च द्रोणो विप्रोऽपि सन्नहम् ।¦सपुत्रः सकृपः शस्त्रं ग्रहीष्ये भवतां कृते ॥ ३८६॥ | ||
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| verse_text = ततो ययुः पाण्डवास्ते सभाया वनाय कृष्णासहिताः सुशूराः । | | verse_text = ततो ययुः पाण्डवास्ते सभाया वनाय कृष्णासहिताः सुशूराः । | ||
| verse_lines = ततो ययुः पाण्डवास्ते सभाया वनाय कृष्णासहिताः सुशूराः | | verse_lines = ततो ययुः पाण्डवास्ते सभाया वनाय कृष्णासहिताः सुशूराः ।¦गत्याऽनुचक्रे युवसिंहखेलगतिं भीमं धार्तराष्ट्रोऽपहस्य ॥ ३८८॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वा सभाया अर्द्धनिष्क्रान्तदेहो व्यावृत्य भीमः प्राह संरक्तनेत्रः । | | verse_text = दृष्ट्वा सभाया अर्द्धनिष्क्रान्तदेहो व्यावृत्य भीमः प्राह संरक्तनेत्रः । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा सभाया अर्द्धनिष्क्रान्तदेहो व्यावृत्य भीमः प्राह संरक्तनेत्रः | | verse_lines = दृष्ट्वा सभाया अर्द्धनिष्क्रान्तदेहो व्यावृत्य भीमः प्राह संरक्तनेत्रः ।¦ऊरुं तवान्यं च रणे विभेत्स्य इत्युक्त्वाऽसौ निर्गतोऽसत्सभायाः ॥ ३८९॥ | ||
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| verse_text = प्रयाताननु तान् कुन्ती प्रययौ पुत्रगृद्धिनी । | | verse_text = प्रयाताननु तान् कुन्ती प्रययौ पुत्रगृद्धिनी । | ||
| verse_lines = प्रयाताननु तान् कुन्ती प्रययौ पुत्रगृद्धिनी | | verse_lines = प्रयाताननु तान् कुन्ती प्रययौ पुत्रगृद्धिनी ।¦रोरुद्यमानां विदुरः स्थापयामास तां गृहे ।¦प्रणम्य तां ययुः पार्थाः सकृष्णाः शीघ्रगामिनः ॥ ३९०॥ | ||
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| verse_text = युधिष्ठिरोऽवाग्वदनो ययौ न क्रोधचक्षुषा । | | verse_text = युधिष्ठिरोऽवाग्वदनो ययौ न क्रोधचक्षुषा । | ||
| verse_lines = युधिष्ठिरोऽवाग्वदनो ययौ न क्रोधचक्षुषा | | verse_lines = युधिष्ठिरोऽवाग्वदनो ययौ न क्रोधचक्षुषा ।¦दहेयं कौरवान् सर्वानिति कारुणिको नृपः ॥ ३९१॥ | ||
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| verse_text = उद्धृत्य बाहू प्रययौ बाहुषाली वृकोदरः । | | verse_text = उद्धृत्य बाहू प्रययौ बाहुषाली वृकोदरः । | ||
| verse_lines = उद्धृत्य बाहू प्रययौ बाहुषाली वृकोदरः | | verse_lines = उद्धृत्य बाहू प्रययौ बाहुषाली वृकोदरः ।¦आभ्यामेवाखिलाञ्छत्रूञ्छक्तो हन्तुमहं त्विति ॥ ३९२॥ | ||
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| verse_text = अबद्धकेशा प्रययौ द्रौपदी सा सभातलात् । | | verse_text = अबद्धकेशा प्रययौ द्रौपदी सा सभातलात् । | ||
| verse_lines = अबद्धकेशा प्रययौ द्रौपदी सा सभातलात् | | verse_lines = अबद्धकेशा प्रययौ द्रौपदी सा सभातलात् ।¦मुक्तकेशा भविष्यन्ति धार्तराष्ट्रस्त्रियस्त्विति ॥ ३९३॥ | ||
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| verse_text = वर्षन् पांसून् ययौ पार्थ इत्थं शत्रुषु सायकान् । | | verse_text = वर्षन् पांसून् ययौ पार्थ इत्थं शत्रुषु सायकान् । | ||
| verse_lines = वर्षन् पांसून् ययौ पार्थ इत्थं शत्रुषु सायकान् | | verse_lines = वर्षन् पांसून् ययौ पार्थ इत्थं शत्रुषु सायकान् ।¦वर्षयानीत्यभिप्रायः परमास्त्रविदां वरः ॥ ३९४॥ | ||
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| verse_text = यमाववाङ्मुखौ यातौ नावयोः शत्रवो मुखम् । | | verse_text = यमाववाङ्मुखौ यातौ नावयोः शत्रवो मुखम् । | ||
| verse_lines = यमाववाङ्मुखौ यातौ नावयोः शत्रवो मुखम् | | verse_lines = यमाववाङ्मुखौ यातौ नावयोः शत्रवो मुखम् ।¦पश्यन्त्वस्यामवस्थायामित्येव धृतचेतसौ ॥ ३९५॥ | ||
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| verse_text = प्रेतसंस्कारसूक्तानि पठन् धौम्योऽग्रतो ययौ । | | verse_text = प्रेतसंस्कारसूक्तानि पठन् धौम्योऽग्रतो ययौ । | ||
| verse_lines = प्रेतसंस्कारसूक्तानि पठन् धौम्योऽग्रतो ययौ | | verse_lines = प्रेतसंस्कारसूक्तानि पठन् धौम्योऽग्रतो ययौ ।¦हतेषु धार्तराष्ट्रेषु मया कार्याः क्रिया इति ॥ ३९६॥ | ||
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| verse_text = तानथानुययुः सूता रथैः परिचतुर्दशैः । | | verse_text = तानथानुययुः सूता रथैः परिचतुर्दशैः । | ||
| verse_lines = तानथानुययुः सूता रथैः परिचतुर्दशैः | | verse_lines = तानथानुययुः सूता रथैः परिचतुर्दशैः ।¦सूदाः पौरोगवाश्चैव भृत्या ये त्वाप्तकारिणः ॥ ३९७॥ | ||
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| verse_lines = ततस्ते जाह्नवीतीरे वने वटमुपाश्रिताः | | verse_lines = ततस्ते जाह्नवीतीरे वने वटमुपाश्रिताः ।¦न्यषीदन्नागतान् दृष्ट्वा समस्तान् पुरवासिनः ॥ ३९८॥ | ||
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| verse_text = ततस्तु ते सर्वजगन्निवासं नारायणं नित्यसमस्तसद्गुणम् । | | verse_text = ततस्तु ते सर्वजगन्निवासं नारायणं नित्यसमस्तसद्गुणम् । | ||
| verse_lines = ततस्तु ते सर्वजगन्निवासं नारायणं नित्यसमस्तसद्गुणम् | | verse_lines = ततस्तु ते सर्वजगन्निवासं नारायणं नित्यसमस्तसद्गुणम् ।¦स्वयम्भुशर्वादिभिरर्चितं सदा भक्त्याऽस्मरन् भक्तभवापहं प्रभुम् ॥ ३९९॥ | ||
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<span id="gr-C22" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वाविंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C22" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वाविंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ आगन्तुकामान् पुरवासिनस्ते संस्थाप्य कृच्छ्रेण कुरुप्रवीराः । | | verse_text = औं ॥ आगन्तुकामान् पुरवासिनस्ते संस्थाप्य कृच्छ्रेण कुरुप्रवीराः । | ||
| verse_lines = औं ॥ आगन्तुकामान् पुरवासिनस्ते संस्थाप्य कृच्छ्रेण कुरुप्रवीराः | | verse_lines = औं ॥ आगन्तुकामान् पुरवासिनस्ते संस्थाप्य कृच्छ्रेण कुरुप्रवीराः ।¦रात्रौ प्रविष्टा गहनं वनं च किर्मीरमासेदुरथो नराशम् ॥ १॥ | ||
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| verse_text = बकानुजोऽसौ निखिलैरजेयो वराद् गिरीशस्य निहन्तुकामः । | | verse_text = बकानुजोऽसौ निखिलैरजेयो वराद् गिरीशस्य निहन्तुकामः । | ||
| verse_lines = बकानुजोऽसौ निखिलैरजेयो वराद् गिरीशस्य निहन्तुकामः | | verse_lines = बकानुजोऽसौ निखिलैरजेयो वराद् गिरीशस्य निहन्तुकामः ।¦सदारसोदर्यमभिप्रसस्रे भीमं महावृक्षगिरीन् प्रमुञ्चन् ॥ २॥ | ||
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| verse_text = स सम्प्रहारं सह तेन कृत्वा भीमो निपात्याऽशु(निहत्याऽशु) धरातले तम् । | | verse_text = स सम्प्रहारं सह तेन कृत्वा भीमो निपात्याऽशु(निहत्याऽशु) धरातले तम् । | ||
| verse_lines = स सम्प्रहारं सह तेन कृत्वा भीमो निपात्याऽशु(निहत्याऽशु) धरातले तम् | | verse_lines = स सम्प्रहारं सह तेन कृत्वा भीमो निपात्याऽशु(निहत्याऽशु) धरातले तम् ।¦चक्रे मखे सङ्गरनामेधेये प्रसह्य नारायणदैवते पशुम् ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = निहत्य रक्षो वनमध्यसंस्थास्तदा यतीनामयुतैः समेताः । | | verse_text = निहत्य रक्षो वनमध्यसंस्थास्तदा यतीनामयुतैः समेताः । | ||
| verse_lines = निहत्य रक्षो वनमध्यसंस्थास्तदा यतीनामयुतैः समेताः | | verse_lines = निहत्य रक्षो वनमध्यसंस्थास्तदा यतीनामयुतैः समेताः ।¦अशीतिसाहस्रमुनिप्रवीरैर्दशांशयुक्तैः सहिता व्यचिन्तयन् ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = विचिन्त्य तेषां भरणाय धर्मजः सम्पूज्य सूर्यस्थितमच्युतं प्रभुम् । | | verse_text = विचिन्त्य तेषां भरणाय धर्मजः सम्पूज्य सूर्यस्थितमच्युतं प्रभुम् । | ||
| verse_lines = विचिन्त्य तेषां भरणाय धर्मजः सम्पूज्य सूर्यस्थितमच्युतं प्रभुम् | | verse_lines = विचिन्त्य तेषां भरणाय धर्मजः सम्पूज्य सूर्यस्थितमच्युतं प्रभुम् ।¦दिनेऽक्षयान्नं पिठरं तदाप रत्नादिदं कामवरान्नदं च ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = बभार तेनैव युधिष्ठिरस्तान् प्रत्येकशस्त्रिंशतदासदासिकान्(त्रिंशतिदासदासिकान्) । | | verse_text = बभार तेनैव युधिष्ठिरस्तान् प्रत्येकशस्त्रिंशतदासदासिकान्(त्रिंशतिदासदासिकान्) । | ||
| verse_lines = बभार तेनैव युधिष्ठिरस्तान् प्रत्येकशस्त्रिंशतदासदासिकान्(त्रिंशतिदासदासिकान्) | | verse_lines = बभार तेनैव युधिष्ठिरस्तान् प्रत्येकशस्त्रिंशतदासदासिकान्(त्रिंशतिदासदासिकान्) ।¦सुवर्णपात्रेषु हि भुञ्जते ये गृहे तदीये बहुकोटिदासिके ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = सत्सङ्गमाकाङ्क्षिण एव तेऽवसन् पार्थैः सहान्ये च मुनीन्द्रवृन्दाः । | | verse_text = सत्सङ्गमाकाङ्क्षिण एव तेऽवसन् पार्थैः सहान्ये च मुनीन्द्रवृन्दाः । | ||
| verse_lines = सत्सङ्गमाकाङ्क्षिण एव तेऽवसन् पार्थैः सहान्ये च मुनीन्द्रवृन्दाः | | verse_lines = सत्सङ्गमाकाङ्क्षिण एव तेऽवसन् पार्थैः सहान्ये च मुनीन्द्रवृन्दाः ।¦शृण्वन्त एभ्यः परमार्थसाराः कथा वदन्तश्च पुरातनास्तथा ॥ ७॥ | ||
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| verse_lines = एवं गजानां बहुकोटिवृन्दांस्तथा रथानां च हयांश्च वृन्दशः | | verse_lines = एवं गजानां बहुकोटिवृन्दांस्तथा रथानां च हयांश्च वृन्दशः ।¦विसृज्य रत्नानि नरांश्च वृन्दशो वने विजह्रुर्दिवि देववत् सुखम् ॥ ८॥ | ||
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| verse_lines = गवां च लक्षं प्रददाति नित्यशः सुवर्णभारांश्च शतं युधिष्ठिरः | | verse_lines = गवां च लक्षं प्रददाति नित्यशः सुवर्णभारांश्च शतं युधिष्ठिरः ।¦सभ्रातृकोऽसौ वनमाप्य शक्रवन्मुमोद विप्रैः सहितो यथासुखम् ॥ ९॥ | ||
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| verse_lines = पार्थेषु यातेषु किमत्र कार्यमिति स्म पृष्टो विदुरोऽग्रजेन | | verse_lines = पार्थेषु यातेषु किमत्र कार्यमिति स्म पृष्टो विदुरोऽग्रजेन ।¦आहूय राज्यं प्रतिपादयेति प्राहैनमाहाथ रुषाऽऽम्बिकेयः ॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = ज्ञानं प्रतीपोऽसि ममाऽत्मजानां न मे त्वया कार्यमिहास्ति किञ्चित् | | verse_lines = ज्ञानं प्रतीपोऽसि ममाऽत्मजानां न मे त्वया कार्यमिहास्ति किञ्चित् ।¦यथेष्टतस्तिष्ठ वा गच्छ वेति प्रोक्तो ययौ विदुरः पाण्डुपुत्रान् ॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = तस्मिन् गते भ्रातृवियोगकर्शितः पपात भूमौ सहसैव राजा | | verse_lines = तस्मिन् गते भ्रातृवियोगकर्शितः पपात भूमौ सहसैव राजा ।¦सञ्ज्ञामवाप्याऽदिशदाशु सञ्जयं जीवामि चेदाशु ममाऽनयानुजम् ॥ १२॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितः सञ्जयः पाण्डवेयान् प्राप्याऽनयद् विदुरं शीघ्रमेव | | verse_lines = इतीरितः सञ्जयः पाण्डवेयान् प्राप्याऽनयद् विदुरं शीघ्रमेव ।¦सोऽप्यागतः क्षिप्रमपास्तदोषो ज्येष्ठं ववन्देऽथ स चैनमाश्लिषत् ॥ १३॥ | ||
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| verse_lines = अङ्कं समारोप्य स मूर्ध्नि चैनमाघ्राय लेभे परमां मुदं तदा | | verse_lines = अङ्कं समारोप्य स मूर्ध्नि चैनमाघ्राय लेभे परमां मुदं तदा ।¦क्षत्तारमायान्तमुदीक्ष्य सर्वे ससौबला धार्तराष्ट्रा अमर्षात् ।¦सम्मन्त्र्य हन्तुं पाण्डवानामुतैकं छन्नोपधेनैव ससूतजा ययुः ॥ १४॥ | ||
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| verse_lines = मैत्रेय आयास्यति सोऽपि वाचं शिक्षार्थमेतेष्वभिधास्यतीह | | verse_lines = मैत्रेय आयास्यति सोऽपि वाचं शिक्षार्थमेतेष्वभिधास्यतीह ।¦तां चेत् करोत्येष सुतस्तवास्य भद्रं तदा स्याच्छप्स्यति त्वन्यथा सः ॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = उक्त्वेति राजानमनन्तशक्तिर्व्यासो ययौ तत्र गतेषु तेषु | | verse_lines = उक्त्वेति राजानमनन्तशक्तिर्व्यासो ययौ तत्र गतेषु तेषु ।¦सुयोधनाद्येषु हतेषु पार्थैर्भूभारहानिर्न भवेदिति प्रभुः ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = वने वसन्तोऽथ पृथासुतास्ते वार्तां स्वकीयां(स्वकीयां वार्तां) प्रापयामासुराशु । | | verse_text = वने वसन्तोऽथ पृथासुतास्ते वार्तां स्वकीयां(स्वकीयां वार्तां) प्रापयामासुराशु । | ||
| verse_lines = वने वसन्तोऽथ पृथासुतास्ते वार्तां स्वकीयां(स्वकीयां वार्तां) प्रापयामासुराशु | | verse_lines = वने वसन्तोऽथ पृथासुतास्ते वार्तां स्वकीयां(स्वकीयां वार्तां) प्रापयामासुराशु ।¦कृष्णे सोऽपि द्रुतमायात् ससत्यः सम्बन्धिनो ये च पाञ्चालमुख्याः ॥ २३॥ | ||
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| verse_text = क्रुद्धं कृष्णं धार्तराष्ट्राय पार्थाः क्षमापयामासुरुच्चैर्गृणन्तः । | | verse_text = क्रुद्धं कृष्णं धार्तराष्ट्राय पार्थाः क्षमापयामासुरुच्चैर्गृणन्तः । | ||
| verse_lines = क्रुद्धं कृष्णं धार्तराष्ट्राय पार्थाः क्षमापयामासुरुच्चैर्गृणन्तः | | verse_lines = क्रुद्धं कृष्णं धार्तराष्ट्राय पार्थाः क्षमापयामासुरुच्चैर्गृणन्तः ।¦गुणांस्तदीयानमितान् प्रणम्य तदा रुदन्ती द्रौपदी चाऽप पादौ ।¦सा पादयोः पतिता वासुदेवमस्तौत् समस्तप्रभुमात्मतन्त्रम् ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = अचिन्त्यनित्याव्ययपूर्णसद्गुणार्णवैकदेहाखिलदोषदूर । | | verse_text = अचिन्त्यनित्याव्ययपूर्णसद्गुणार्णवैकदेहाखिलदोषदूर । | ||
| verse_lines = अचिन्त्यनित्याव्ययपूर्णसद्गुणार्णवैकदेहाखिलदोषदूर | | verse_lines = अचिन्त्यनित्याव्ययपूर्णसद्गुणार्णवैकदेहाखिलदोषदूर ।¦रमाब्जजेरेशसुरेन्द्रपूर्ववृन्दारकाणां सतताभिवन्द्य ।¦समस्तचेष्टाप्रद सर्वजीव प्रभो (सर्वजीवप्रभो) विमुक्ताश्रय सर्वसार ॥ २५॥ | ||
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| verse_text = इति ब्रुवन्ती सकलानुभूतं जगाद सर्वेशितुरच्युतस्य । | | verse_text = इति ब्रुवन्ती सकलानुभूतं जगाद सर्वेशितुरच्युतस्य । | ||
| verse_lines = इति ब्रुवन्ती सकलानुभूतं जगाद सर्वेशितुरच्युतस्य | | verse_lines = इति ब्रुवन्ती सकलानुभूतं जगाद सर्वेशितुरच्युतस्य ।¦यस्याधिकानुग्रहपात्रभूता स्वयं हि शेषेशविपादिकेभ्यः ॥ २६॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वा समस्तं भगवान् प्रतिज्ञां चकार तेषामखिलाश्च योषाः । | | verse_text = श्रुत्वा समस्तं भगवान् प्रतिज्ञां चकार तेषामखिलाश्च योषाः । | ||
| verse_lines = श्रुत्वा समस्तं भगवान् प्रतिज्ञां चकार तेषामखिलाश्च योषाः | | verse_lines = श्रुत्वा समस्तं भगवान् प्रतिज्ञां चकार तेषामखिलाश्च योषाः ।¦पतीन् समालिङ्ग्य विमुक्तकेशा भीमाहतान् दर्शये नान्यथेति ।¦तां सान्त्वयित्वा मधुरैः सुवाक्यैर्नारायणो वाचमिमां जगाद ॥ २७॥ | ||
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| verse_text = यदीहाहं स्थितो नैवं भविताऽहं त्वयोधयम् । | | verse_text = यदीहाहं स्थितो नैवं भविताऽहं त्वयोधयम् । | ||
| verse_lines = यदीहाहं स्थितो नैवं भविताऽहं त्वयोधयम् | | verse_lines = यदीहाहं स्थितो नैवं भविताऽहं त्वयोधयम् ।¦साल्वराजं दुरात्मानं हतश्चासौ सुपापकृत् ॥ २८॥ | ||
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| verse_text = सन्निधानेऽथ वा दूरे कालव्यवहितेऽपि वा । | | verse_text = सन्निधानेऽथ वा दूरे कालव्यवहितेऽपि वा । | ||
| verse_lines = सन्निधानेऽथ वा दूरे कालव्यवहितेऽपि वा | | verse_lines = सन्निधानेऽथ वा दूरे कालव्यवहितेऽपि वा ।¦स्वभावाद् वा व्यवहिते वस्तुव्यवहितेऽपि वा ।¦नाशक्तिर्विद्यते विष्णोर्नित्याव्यवहितत्वतः ॥ २९॥ | ||
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| verse_text = तथाऽपि नरलोकस्य करोत्यनुकृतिं प्रभुः । | | verse_text = तथाऽपि नरलोकस्य करोत्यनुकृतिं प्रभुः । | ||
| verse_lines = तथाऽपि नरलोकस्य करोत्यनुकृतिं प्रभुः | | verse_lines = तथाऽपि नरलोकस्य करोत्यनुकृतिं प्रभुः ।¦दुष्टानां दोषवृद्ध्यर्थं भीमादीनां गुणोन्नतेः ॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = युधिष्ठिरेऽतिवृद्धं तु राजसूयादिसम्भवम् । | | verse_text = युधिष्ठिरेऽतिवृद्धं तु राजसूयादिसम्भवम् । | ||
| verse_lines = युधिष्ठिरेऽतिवृद्धं तु राजसूयादिसम्भवम् | | verse_lines = युधिष्ठिरेऽतिवृद्धं तु राजसूयादिसम्भवम् ।¦धर्मं च सङ्क्रामयितुं कृष्णायामनुजेषु च ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = योग्यताक्रमतो(योग्यताक्रमशो) विष्णुरिच्छयेत्थमचीक्लृपत् | | verse_lines = योग्यताक्रमतो(योग्यताक्रमशो) विष्णुरिच्छयेत्थमचीक्लृपत् ।¦एधमानद्विडित्येव विष्णोर्नाम हि वैदिकम् ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = स्वयोग्यताया अधिकधर्मज्ञानादिजं फलम् | | verse_lines = स्वयोग्यताया अधिकधर्मज्ञानादिजं फलम् ।¦भीष्मद्रोणाम्बिकेयादेः पार्थेष्वेव निधापितुम् ॥ ३३॥ | ||
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| verse_text = पुनश्च पापवृद्ध्यर्थमजो दुर्योधनादिषु । | | verse_text = पुनश्च पापवृद्ध्यर्थमजो दुर्योधनादिषु । | ||
| verse_lines = पुनश्च पापवृद्ध्यर्थमजो दुर्योधनादिषु | | verse_lines = पुनश्च पापवृद्ध्यर्थमजो दुर्योधनादिषु ।¦व्यासोऽम्बिकासुतं प्राह पार्था मेऽभ्यधिकं(मे ह्यधिकं) प्रियाः ।¦तेषां प्रवासनं चैव प्रियं न मम सर्वथा ॥ ३४॥ | ||
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| verse_lines = इति दुर्योधनादीनां पापवृद्ध्यर्थमेव सः | | verse_lines = इति दुर्योधनादीनां पापवृद्ध्यर्थमेव सः ।¦प्रिया इत्येव कथनात् पाण्डवानां शुभोन्नतेः(गुणोन्नतेः) ॥ ३५॥ | ||
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| verse_text = गुरुत्वाद् भीमसेनस्य क्षमा द्यूतेऽर्जुनादिनाम् । | | verse_text = गुरुत्वाद् भीमसेनस्य क्षमा द्यूतेऽर्जुनादिनाम् । | ||
| verse_lines = गुरुत्वाद् भीमसेनस्य क्षमा द्यूतेऽर्जुनादिनाम् | | verse_lines = गुरुत्वाद् भीमसेनस्य क्षमा द्यूतेऽर्जुनादिनाम् ।¦नातिधर्मस्वरूपोऽत्र(नातिधर्मस्वरूपोऽक्षे) धर्मो भीमे निरौपधः ॥ ३६॥ | ||
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| verse_lines = द्रौपद्या अप्यतिक्लेशात् क्षमा धर्मो महानभूत् | | verse_lines = द्रौपद्या अप्यतिक्लेशात् क्षमा धर्मो महानभूत् ।¦सा हि भीममनो वेद न कार्यः शाप इत्यलम् ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = तस्माद् यथायोग्यतया हरिणा धर्मवर्धनम् | | verse_lines = तस्माद् यथायोग्यतया हरिणा धर्मवर्धनम् ।¦कृतं तत्रासन्निधानकारणं केशवोऽब्रवीत् ॥ ३८॥ | ||
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| verse_lines = साल्वं श्रुत्वा समायान्तं (समायातं) रौक्मिणेयादयो मया | | verse_lines = साल्वं श्रुत्वा समायान्तं (समायातं) रौक्मिणेयादयो मया ।¦प्रस्थापिता हि भवतां सकाशे ते ययुः पुरीम् ।¦तदा साल्वोऽपि सौभेन द्वारकामर्दयद् भृशम् ॥ ३९॥ | ||
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| verse_lines = प्रद्युम्न आशु निरगादथ सर्वसैन्यै- | | verse_lines = प्रद्युम्न आशु निरगादथ सर्वसैन्यै-¦रन्यैश्च यादवगणैः सहितोऽनुजैश्च ।¦साल्वोऽवगम्य तनयं मम तद्विमानात्¦पापोऽवरुह्य रथमारुहदत्र योद्धुम् ॥ ४०॥ | ||
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| verse_lines = कृत्वा सुयुद्धममुना मम | | verse_lines = कृत्वा सुयुद्धममुना मम पुत्रकोऽसौ¦अस्त्राणि तस्य विनिवार्य महास्त्रजालैः ।¦दत्तं मया शरममोघमथाऽददे तं¦हन्तुं नृपं कृतमतिस्त्वशृणोद् वचः खे ॥ ४१॥ | ||
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| verse_lines = नारायणेन हि पुरा | | verse_lines = नारायणेन हि पुरा मनसाऽभिक्लृप्तं¦कृष्णावतारमुपगम्य निहन्मि साल्वम् ।¦इत्येव तेन हरिणाऽपि स भार्गवेण¦विद्रावितो न निहतः स्वमनोनुसारात् ॥ ४२॥ | ||
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| verse_lines = वध्यस्त्वया नहि ततोऽयमयं च | | verse_lines = वध्यस्त्वया नहि ततोऽयमयं च बाणः¦चक्रायुधस्य दयितो नितराममोघः ।¦मा मुञ्च तेन तमिमं विनिवर्तयेऽहं¦साल्वं हृदि स्थित इतीरितमीरणेन ॥ ४३॥ | ||
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| verse_lines = श्रुत्वा वचः स पवनस्य शरं | | verse_lines = श्रुत्वा वचः स पवनस्य शरं त्वमोघं¦सञ्जह्र आशु स च साल्वपतिः स्वसौभम् ।¦आरुह्य बालकलहेन किमत्र कार्यं¦कृष्णेन सङ्गर इति प्रययौ स्वदेशम् ॥ ४४॥ | ||
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| verse_lines = | | verse_lines = प्रद्युम्नसाम्बगदसारणचारुदेष्णाः¦सेनां निहत्य सह मन्त्रिगणैस्तदीयाम् ।¦आह्लादिनः स्वपुरमाययुरप्यहं च¦तत्रागमं सपदि तैः श्रुतवानशेषम् ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = यस्मिञ्छरे करगते विजयो ध्रुवः स्यात् | | verse_text = यस्मिञ्छरे करगते विजयो ध्रुवः स्यात् | ||
| verse_lines = यस्मिञ्छरे करगते विजयो ध्रुवः | | verse_lines = यस्मिञ्छरे करगते विजयो ध्रुवः स्यात्¦मत्तेजसा तदनुसङ्ग्रहणात् सुतान्मे ।¦यातं निशम्य रिपुमात्मपुरीं च भग्नां¦दृष्ट्वैव तेन तदनुव्रजनं कृतं मे ॥ ४६॥ | ||
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| verse_lines = तं सागरोपरिगसौभगतं | | verse_lines = तं सागरोपरिगसौभगतं निशाम्य¦मुक्ते च तेन मयि शस्त्रमहास्त्रवर्षे ।¦तं सन्निवार्य(तत्सन्निवार्य) तु मया शरपूगविद्धो¦माया युयोज मयि पापतमः स साल्वः ॥ ४७॥ | ||
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| verse_lines = ताः क्रीडया क्षणमहं समरे | | verse_lines = ताः क्रीडया क्षणमहं समरे निशाम्य¦ज्ञानास्त्रतः प्रतिविधूय बहूंश्च दैत्यान् ।¦हत्वाऽऽशु तं च गिरिवर्षिणमाशु सौभं¦वार्धौ न्यपातयमरीन्द्रविभिन्नबन्धम् ॥ ४८॥ | ||
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| verse_lines = तं स्यन्दनस्थितमथो विभुजं | | verse_lines = तं स्यन्दनस्थितमथो विभुजं विधाय¦बाणेन तद्रथवरं गदया विभिद्य ।¦चक्रेण तस्य च शिरो विनिकृत्य धातृ-¦शर्वादिभिः प्रतिनुतः स्वपुरीमगां च ॥ ४९॥ | ||
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| verse_lines = तस्मादिदं व्यसनमास हि | | verse_lines = तस्मादिदं व्यसनमास हि विप्रकर्षात्¦मे कार्यतस्त्विति निगद्य पुनश्च पार्थान् ।¦कृष्णां च सान्त्वयितुमत्र दिनान्युवास¦सत्या च सोमकसुतामनुसान्त्वयन्ती ॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = पाण्डवानां च या भार्याः पुत्रा अपि हि(च) सर्वशः | | verse_lines = पाण्डवानां च या भार्याः पुत्रा अपि हि(च) सर्वशः ।¦अन्वेव पाण्डवान् याता वनमत्रैव स्थिताः(वनमत्रैव च संस्थिताः) ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नस्ततः कृष्णां सान्त्वयित्वैव केशवम् | | verse_lines = धृष्टद्युम्नस्ततः कृष्णां सान्त्वयित्वैव केशवम् ।¦प्रणम्य समनुज्ञातो भागिनेयैः पुरं ययौ ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = धृष्टकेतुश्च भगिनीं काशिराजः सुतामपि | | verse_lines = धृष्टकेतुश्च भगिनीं काशिराजः सुतामपि ।¦पुरं ययतुरादाय कुन्त्यैवान्याः सह स्थिताः ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = सुभद्रामभिमन्युं च रथमारोप्य केशवः(काञ्चनम्) | | verse_lines = सुभद्रामभिमन्युं च रथमारोप्य केशवः(काञ्चनम्) ।¦पाण्डवानभ्यनुज्ञाय सभार्यः स्वपुरीं ययौ ॥ ५५॥ | ||
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| verse_lines = कञ्चित् कालं द्रौपदेया उष्य पाञ्चालके पुरे | | verse_lines = कञ्चित् कालं द्रौपदेया उष्य पाञ्चालके पुरे ।¦ययुर्द्वारवतीमेव(ययुर्द्वारावतीमेव) तत्रोषुः कृष्णलालिताः(कृष्णपालिताः) ॥ ५६॥ | ||
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| verse_lines = ऊषुर्वने च ते पार्था मुनिशेषान्नभोजिनः | | verse_lines = ऊषुर्वने च ते पार्था मुनिशेषान्नभोजिनः ।¦भुक्तवत्स्वेवानुजेषु भुङ्क्ते राजा युधिष्ठिरः ॥ ५८॥ | ||
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| verse_lines = अलङ्घ्यत्वात् तदाज्ञाया अनुजाः पूर्वभोजिनः | | verse_lines = अलङ्घ्यत्वात् तदाज्ञाया अनुजाः पूर्वभोजिनः ।¦तस्यानन्तरमेवैका भुङ्क्ते सा पार्षतात्मजा ॥ ५९॥ | ||
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| verse_text = एवं सदा विष्णुपरायणानां तत्प्रार्पणान्नैकभुजां(तत्प्रापणान्नैकभुजां) प्रयातः । | | verse_text = एवं सदा विष्णुपरायणानां तत्प्रार्पणान्नैकभुजां(तत्प्रापणान्नैकभुजां) प्रयातः । | ||
| verse_lines = एवं सदा विष्णुपरायणानां तत्प्रार्पणान्नैकभुजां(तत्प्रापणान्नैकभुजां) प्रयातः | | verse_lines = एवं सदा विष्णुपरायणानां तत्प्रार्पणान्नैकभुजां(तत्प्रापणान्नैकभुजां) प्रयातः ।¦संवत्सरस्तत्र जगाद कृष्णा भीमाज्ञया धर्मराजं सुवेत्त्री ॥ ६०॥ | ||
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| verse_text = अतिमार्दवयुक्तत्वाद् धर्मराजश्चतुर्दशे । | | verse_text = अतिमार्दवयुक्तत्वाद् धर्मराजश्चतुर्दशे । | ||
| verse_lines = अतिमार्दवयुक्तत्वाद् धर्मराजश्चतुर्दशे | | verse_lines = अतिमार्दवयुक्तत्वाद् धर्मराजश्चतुर्दशे ।¦अपि वर्षे गुरुभयाद् राज्यं नेच्छेदिति प्रभुः ।¦मारुतिः प्रेषयामास कृष्णां प्रस्तावहेतवे ॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = क्षमा सर्वत्र धर्मो न पापहेतुश्च दुर्जने । | | verse_text = क्षमा सर्वत्र धर्मो न पापहेतुश्च दुर्जने । | ||
| verse_lines = क्षमा सर्वत्र धर्मो न पापहेतुश्च दुर्जने | | verse_lines = क्षमा सर्वत्र धर्मो न पापहेतुश्च दुर्जने ।¦राज्ञां सामर्थ्ययुक्तानामिति संस्थाप्य शास्त्रतः ॥ ६२॥ | ||
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| verse_text = हत्वा चतुर्दशे वर्षे धार्तराष्ट्रानराज्यदान् । | | verse_text = हत्वा चतुर्दशे वर्षे धार्तराष्ट्रानराज्यदान् । | ||
| verse_lines = हत्वा चतुर्दशे वर्षे धार्तराष्ट्रानराज्यदान् | | verse_lines = हत्वा चतुर्दशे वर्षे धार्तराष्ट्रानराज्यदान् ।¦कर्तुं राज्यं पुरो गन्ता भवानीत्यग्रजेन ह ॥ ६३॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = कारयन् सत्यशपथं विवादस्य क्रमेच्छया । | | verse_text = कारयन् सत्यशपथं विवादस्य क्रमेच्छया । | ||
| verse_lines = कारयन् सत्यशपथं विवादस्य क्रमेच्छया | | verse_lines = कारयन् सत्यशपथं विवादस्य क्रमेच्छया ।¦आदिशत् प्रथमं कृष्णां भीमः सा नृपमब्रवीत् ॥ ६४॥ | ||
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| verse_text = नैव क्षमा कुजनतासु नृपस्य धर्मः | | verse_text = नैव क्षमा कुजनतासु नृपस्य धर्मः | ||
| verse_lines = नैव क्षमा कुजनतासु नृपस्य | | verse_lines = नैव क्षमा कुजनतासु नृपस्य धर्मः¦तां त्वं वृथैव धृतवानसि सार्वकालम् (सर्वकालम्, सार्वकालिकी) ।¦इत्युक्त आह नृपतिः परमा क्षमैव¦सर्वत्र तद्विधृतमेव जगत् समस्तम् ॥ ६५॥ | ||
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| verse_text = कर्ता च सर्वजगतः सुखदुःखयोर्हि | | verse_text = कर्ता च सर्वजगतः सुखदुःखयोर्हि | ||
| verse_lines = कर्ता च सर्वजगतः | | verse_lines = कर्ता च सर्वजगतः सुखदुःखयोर्हि¦नारायणस्तदनुदत्तमिहास्य सर्वम् ।¦तस्मान्न कोपविषयोऽस्ति कुतश्च कश्चित्¦तस्मात् क्षमैव सकलेषु परोऽस्य धर्मः ॥ ६६॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तवन्तं नृपमाह पार्षती यदि क्षमा सर्वनरेषु धर्मः । | | verse_text = इत्युक्तवन्तं नृपमाह पार्षती यदि क्षमा सर्वनरेषु धर्मः । | ||
| verse_lines = इत्युक्तवन्तं नृपमाह पार्षती यदि क्षमा सर्वनरेषु धर्मः | | verse_lines = इत्युक्तवन्तं नृपमाह पार्षती यदि क्षमा सर्वनरेषु धर्मः ।¦राज्ञा न कृत्यं न च लोकयात्रा भवेज्जगत् कापुरुषैर्विनश्येत् ॥ ६७॥ | ||
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| verse_text = सत्यं च विष्णुः सकलप्रवर्तको रमाविरिञ्चेशपुरस्सराश्च । | | verse_text = सत्यं च विष्णुः सकलप्रवर्तको रमाविरिञ्चेशपुरस्सराश्च । | ||
| verse_lines = सत्यं च विष्णुः सकलप्रवर्तको रमाविरिञ्चेशपुरस्सराश्च | | verse_lines = सत्यं च विष्णुः सकलप्रवर्तको रमाविरिञ्चेशपुरस्सराश्च ।¦काष्ठादिवत् तद्वशगाः समस्तास्तथाऽपि न व्यर्थता पौरुषस्य ॥ ६८॥ | ||
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| verse_lines = तदाज्ञया पुरुषश्चेष्टमानश्चेष्टानुसारेण शुभाशुभस्य | | verse_lines = तदाज्ञया पुरुषश्चेष्टमानश्चेष्टानुसारेण शुभाशुभस्य ।¦भोक्ता न तच्चेष्टितमन्यथा भवेत् कर्ता तस्मात् पुरुषोऽप्यस्य वश्यः ॥ ६९॥ | ||
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| verse_lines = वृथा यदि स्यात् पौरुषं कस्य हेतोर्विधिर्निषेधश्च समस्तवेदगः | | verse_lines = वृथा यदि स्यात् पौरुषं कस्य हेतोर्विधिर्निषेधश्च समस्तवेदगः ।¦विधेर्निषेधस्य च नैव गोचरः पुमान् यदि स्याद् भवतो हि तौ हरेः ॥ ७०॥ | ||
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| verse_lines = तेनैव लेपश्च भवेदमुष्य पुण्येन पापेन च नैव चासौ | | verse_lines = तेनैव लेपश्च भवेदमुष्य पुण्येन पापेन च नैव चासौ ।¦लिप्येत ताभ्यां परमः स्वतन्त्रः कर्ता ततः पुरुषोऽप्यस्य वश्यः ॥ ७१॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितो धर्मजः कृष्णयैव निरुत्तरत्वं गमितस्त्वभर्त्सयत् | | verse_lines = इतीरितो धर्मजः कृष्णयैव निरुत्तरत्वं गमितस्त्वभर्त्सयत् ।¦कुतर्कमाश्रित्य हरेरपि त्वमस्वातन्त्र्यं साधयसीति चोक्त्वा ॥ ७२॥ | ||
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| verse_text = छलेन तेन प्रतिभर्त्सिता सा क्षमापयामास नृपं यतः स्त्री । | | verse_text = छलेन तेन प्रतिभर्त्सिता सा क्षमापयामास नृपं यतः स्त्री । | ||
| verse_lines = छलेन तेन प्रतिभर्त्सिता सा क्षमापयामास नृपं यतः स्त्री | | verse_lines = छलेन तेन प्रतिभर्त्सिता सा क्षमापयामास नृपं यतः स्त्री ।¦वाचालता नातितरां हि शोभते स्त्रीणां ततः प्राह वृकोदरस्तम् ॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = राजन् विष्णुः सर्वकर्ता न चान्यस्तत्तन्त्रमेवान्यदसौ स्वतन्त्रः । | | verse_text = राजन् विष्णुः सर्वकर्ता न चान्यस्तत्तन्त्रमेवान्यदसौ स्वतन्त्रः । | ||
| verse_lines = राजन् विष्णुः सर्वकर्ता न चान्यस्तत्तन्त्रमेवान्यदसौ स्वतन्त्रः | | verse_lines = राजन् विष्णुः सर्वकर्ता न चान्यस्तत्तन्त्रमेवान्यदसौ स्वतन्त्रः ।¦तथाऽपि पुंसा विहितं स्वकर्म(विहितं हि कर्म) कार्यं त्याज्यं चान्यदत्यन्तयत्नात् ॥ ७४॥ | ||
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| verse_text = प्रत्यक्षमेतत् पुरुषस्य कर्म तेनानुमेया प्रेरणा केशवस्य । | | verse_text = प्रत्यक्षमेतत् पुरुषस्य कर्म तेनानुमेया प्रेरणा केशवस्य । | ||
| verse_lines = प्रत्यक्षमेतत् पुरुषस्य कर्म तेनानुमेया प्रेरणा केशवस्य | | verse_lines = प्रत्यक्षमेतत् पुरुषस्य कर्म तेनानुमेया प्रेरणा केशवस्य ।¦स्वकर्म कृत्वा विहितं हि विष्णुना तत्प्रेरणेत्येव बुधोऽनुमन्यते ॥ ७५॥ | ||
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| verse_lines = तेनैति सम्यग्गतिमस्य विष्णोर्जनोऽशुभो दैवमित्येव मत्वा | | verse_lines = तेनैति सम्यग्गतिमस्य विष्णोर्जनोऽशुभो दैवमित्येव मत्वा ।¦हित्वा स्वकं कर्म गतिं च तामसीं प्रयाति तस्मात् कार्यमेव स्वकर्म ॥ ७६॥ | ||
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| verse_lines = ज्ञातव्यं चैवास्य विष्णोर्वशत्वं कर्तव्यं चैवाऽत्मनः कार्यकर्म | | verse_lines = ज्ञातव्यं चैवास्य विष्णोर्वशत्वं कर्तव्यं चैवाऽत्मनः कार्यकर्म ।¦प्रत्यक्षैषा कर्तृता जीवसंस्था तथाऽऽगमादनुमानाच्च सर्वम् ॥ ७७॥ | ||
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| verse_lines = विष्णोर्वशे तन्न हेयं द्वयं च जानन् विद्वान् कुरुते कार्यकर्म | | verse_lines = विष्णोर्वशे तन्न हेयं द्वयं च जानन् विद्वान् कुरुते कार्यकर्म ।¦तत्प्रेरकं विष्णुमेवाभिजानन् भवेत् प्रमाणत्रितयानुगामी ॥ ७८॥ | ||
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| verse_lines = पूर्णं प्रमाणं तत्त्रयं चाविरोधेनैकत्रस्थं तत्त्रयं चाविरोधि | | verse_lines = पूर्णं प्रमाणं तत्त्रयं चाविरोधेनैकत्रस्थं तत्त्रयं चाविरोधि ।¦पृथङ् मध्यं चाप्रमाणं विरोधि स्यात् तत् तस्मात् त्रयमेकत्र कार्यम् ॥ ७९॥ | ||
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| verse_lines = अज्ञः प्रत्यक्षं त्वपहायैव दैवं मत्वा कर्तृ स्वात्मकर्म प्रजह्यात् | | verse_lines = अज्ञः प्रत्यक्षं त्वपहायैव दैवं मत्वा कर्तृ स्वात्मकर्म प्रजह्यात् ।¦विद्वान् जीवं विष्णुवशे (विष्णुवशं) विदित्वा करोति कर्तव्यमजस्रमेव ॥ ८०॥ | ||
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| verse_lines = स्वभावाख्या योग्यता या हठाख्या याऽनादिसिद्धा सर्वजीवेषु नित्या | | verse_lines = स्वभावाख्या योग्यता या हठाख्या याऽनादिसिद्धा सर्वजीवेषु नित्या ।¦सा कारणं प्रथमं तु द्वितीयमनादिकर्मैव तथा तृतीयः ।¦जीवप्रयत्नः पौरुषाख्यस्तदेतत् त्रयं विष्णोर्वशगं सर्वदैव ॥ ८१॥ | ||
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| verse_lines = स कस्यचिन्न वशे वासुदेवः परात् परः परमोऽसौ स्वतन्त्रः | | verse_lines = स कस्यचिन्न वशे वासुदेवः परात् परः परमोऽसौ स्वतन्त्रः ।¦हठश्चासौ तारतम्यस्थितो हि ब्रह्माणमारभ्य कलिश्च यावत् ।¦हठाच्च कर्माणि भवन्ति कर्मजो यत्नो यतो हठकर्मप्रयोक्ता ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = विना यत्नं न हठो नापि कर्म फलप्रदौ वासुदेवोऽखिलस्य | | verse_lines = विना यत्नं न हठो नापि कर्म फलप्रदौ वासुदेवोऽखिलस्य ।¦स्वातन्त्र्यशक्तेर्विनियामको हि तथाऽप्येतान् सोऽप्यपेक्ष्यैव युञ्जेत् ॥ ८३॥ | ||
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| verse_lines = एतानपेक्ष्यैव फलं ददानीत्यस्यैव सङ्कल्प इति स्वतन्त्रता | | verse_lines = एतानपेक्ष्यैव फलं ददानीत्यस्यैव सङ्कल्प इति स्वतन्त्रता ।¦नास्यापगच्छेत् स हि सर्वशक्तिर्नाशक्तता क्वचिदस्य प्रभुत्वात् ॥ ८४॥ | ||
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| verse_lines = तस्मात् कार्यं तेन क्लृप्तं स्वकर्म तत्पूजार्थं तेन तत्प्राप्तिरेव | | verse_lines = तस्मात् कार्यं तेन क्लृप्तं स्वकर्म तत्पूजार्थं तेन तत्प्राप्तिरेव ।¦अतोऽन्यथा निरयः सर्वथा स्यात् स्वकर्म विप्रस्य जपोपदेशौ ।¦विष्णोर्मुखाद् विप्रजातिः प्रवृत्ता(प्रसूता) मुखोत्थितं कर्म तेनास्य सोऽदात् ॥ ८५॥ | ||
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| verse_lines = बाह्वोर्जातः क्षत्रियस्तेन बाह्वोः कर्मास्य पापप्रतिवारणं हि | | verse_lines = बाह्वोर्जातः क्षत्रियस्तेन बाह्वोः कर्मास्य पापप्रतिवारणं हि ।¦प्रवर्तनं साधुधर्मस्य चैव मुखस्य बाह्वोश्चातिसामीप्यतोऽस्य ।¦जपोपदेशौ क्षत्रियस्यापि विष्णुश्चक्रे धर्मौ यज्ञकर्मापि विप्रे ॥ ८६॥ | ||
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| verse_lines = वैश्यो यस्मादूरुजस्तेन तस्य प्रजावृद्धिस्तज्जकर्मैव धर्मः | | verse_lines = वैश्यो यस्मादूरुजस्तेन तस्य प्रजावृद्धिस्तज्जकर्मैव धर्मः ।¦तत्सादृश्यात् स्थावराणां च वृद्धिः करोरूर्वोः(करयोरूर्वोः) सन्निकृष्टत्वहेतोः ।¦वार्तात्मकं कर्म धर्मं चकार विष्णुस्तस्यैवाङ्घ्रिजः शूद्र उक्तः ॥ ८७॥ | ||
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| verse_text = गतिप्रधानं कर्म शुश्रूषणाख्यं सादृश्यतो हस्तपदोस्तथैव । | | verse_text = गतिप्रधानं कर्म शुश्रूषणाख्यं सादृश्यतो हस्तपदोस्तथैव । | ||
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| verse_lines = भुजावुरो हृदयं यद् बलस्य ज्ञानस्य च स्थानमतो नृपाणाम् | | verse_lines = भुजावुरो हृदयं यद् बलस्य ज्ञानस्य च स्थानमतो नृपाणाम् ।¦बलं ज्ञानं चोभयं धर्म उक्तः पाणौ कृतीनां कौशलं केवलं हि ।¦तस्मात् पाण्योरूरुपदोरुपस्थितेर्विट्छूद्रकौ कर्मणां कौशलेतौ ॥ ८९॥ | ||
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| verse_text = पिता गुरुः परमं दैवतं च विष्णुः सर्वेषां तेन पूज्यः स एव । | | verse_text = पिता गुरुः परमं दैवतं च विष्णुः सर्वेषां तेन पूज्यः स एव । | ||
| verse_lines = पिता गुरुः परमं दैवतं च विष्णुः सर्वेषां तेन पूज्यः स एव | | verse_lines = पिता गुरुः परमं दैवतं च विष्णुः सर्वेषां तेन पूज्यः स एव ।¦तद्भक्तत्वाद् देवताश्चाभिपूज्या विशेषतस्तेषु येऽत्यन्तभक्ताः ॥ ९२॥ | ||
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| verse_text = सम्पूजितो वासुदेवः स मुक्तिं दद्यादेवापूजितो दुःखमेव । | | verse_text = सम्पूजितो वासुदेवः स मुक्तिं दद्यादेवापूजितो दुःखमेव । | ||
| verse_lines = सम्पूजितो वासुदेवः स मुक्तिं दद्यादेवापूजितो दुःखमेव | | verse_lines = सम्पूजितो वासुदेवः स मुक्तिं दद्यादेवापूजितो दुःखमेव ।¦स्वतन्त्रत्वात् सुखदुःखप्रदोऽसौ नान्यः स्वतन्त्रस्तद्वशा यत् समस्ताः ॥ ९३॥ | ||
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| verse_text = स्वतन्त्रत्वात् सुखसज्ज्ञानशक्तिपूर्वैर्गुणैः पूर्ण एषोऽखिलैश्च । | | verse_text = स्वतन्त्रत्वात् सुखसज्ज्ञानशक्तिपूर्वैर्गुणैः पूर्ण एषोऽखिलैश्च । | ||
| verse_lines = स्वतन्त्रत्वात् सुखसज्ज्ञानशक्तिपूर्वैर्गुणैः पूर्ण एषोऽखिलैश्च | | verse_lines = स्वतन्त्रत्वात् सुखसज्ज्ञानशक्तिपूर्वैर्गुणैः पूर्ण एषोऽखिलैश्च ।¦स्वतन्त्रत्वात् सर्वदोषोज्झितश्च निस्सीमशक्तिर्हि यतः स्वतन्त्रः ॥ ९४॥ | ||
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| verse_text = दोषास्पृष्टौ गुणपूर्तौ च शक्तिर्निस्सीमत्वाद् विद्यते तस्य यस्मात् । | | verse_text = दोषास्पृष्टौ गुणपूर्तौ च शक्तिर्निस्सीमत्वाद् विद्यते तस्य यस्मात् । | ||
| verse_lines = दोषास्पृष्टौ गुणपूर्तौ च शक्तिर्निस्सीमत्वाद् विद्यते तस्य यस्मात् | | verse_lines = दोषास्पृष्टौ गुणपूर्तौ च शक्तिर्निस्सीमत्वाद् विद्यते तस्य यस्मात् ।¦एवं गुणैरखिलैश्चापि पूर्णो नारायणः पूज्यतमः स्वधर्मैः ।¦अस्माकं यत् तेन नातिक्षमैव धर्मो दुष्टानां वारणं ह्येव कार्यम् ॥ ९५॥ | ||
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| verse_text = हन्याद् दुष्टान् यः क्षत्रियः क्षत्रियांश्च विशेषतो युद्धगतान् स्मरन् हरिम् । | | verse_text = हन्याद् दुष्टान् यः क्षत्रियः क्षत्रियांश्च विशेषतो युद्धगतान् स्मरन् हरिम् । | ||
| verse_lines = हन्याद् दुष्टान् यः क्षत्रियः क्षत्रियांश्च विशेषतो युद्धगतान् स्मरन् हरिम् | | verse_lines = हन्याद् दुष्टान् यः क्षत्रियः क्षत्रियांश्च विशेषतो युद्धगतान् स्मरन् हरिम् ।¦स्वबाहुवीर्येण च तस्य बाहू चैतन्यमात्रौ भवतः सदेहौ ॥ ९६॥ | ||
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| verse_text = पापाधिकांश्चैव बलाधिकांश्च हत्वा मुक्तावधिकानन्दवृद्धिः । | | verse_text = पापाधिकांश्चैव बलाधिकांश्च हत्वा मुक्तावधिकानन्दवृद्धिः । | ||
| verse_lines = पापाधिकांश्चैव बलाधिकांश्च हत्वा मुक्तावधिकानन्दवृद्धिः | | verse_lines = पापाधिकांश्चैव बलाधिकांश्च हत्वा मुक्तावधिकानन्दवृद्धिः ।¦प्रीतिश्च विष्णोः परमैव तत्र तस्माद्धन्तव्याः पापिनः सर्वथैव ॥ ९७॥ | ||
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| verse_text = ये त्वक्षधूर्ता ग्रहणं गता वा पापास्तेऽन्यैर्घातनीयाः स्वदोर्भ्याम् । | | verse_text = ये त्वक्षधूर्ता ग्रहणं गता वा पापास्तेऽन्यैर्घातनीयाः स्वदोर्भ्याम् । | ||
| verse_lines = ये त्वक्षधूर्ता ग्रहणं गता वा पापास्तेऽन्यैर्घातनीयाः स्वदोर्भ्याम् | | verse_lines = ये त्वक्षधूर्ता ग्रहणं गता वा पापास्तेऽन्यैर्घातनीयाः स्वदोर्भ्याम् ।¦राजानं वा राजपुत्रं तथैव राजानुजं वाऽभियातं निहन्यात् ॥ ९८॥ | ||
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| verse_text = राज्ञः पुत्रोऽप्यकृतोद्वाहको यः स घातनीयो न स्वयं वध्य एव । | | verse_text = राज्ञः पुत्रोऽप्यकृतोद्वाहको यः स घातनीयो न स्वयं वध्य एव । | ||
| verse_lines = राज्ञः पुत्रोऽप्यकृतोद्वाहको यः स घातनीयो न स्वयं वध्य एव | | verse_lines = राज्ञः पुत्रोऽप्यकृतोद्वाहको यः स घातनीयो न स्वयं वध्य एव ।¦क्रूरं चान्यद् धर्मयुक्तं परैस्तत् प्रसाधनीयं क्षत्रियैर्न स्वकार्यम् ।¦एवं धर्मो विहितो वेद एव वाक्यं विष्णोः पञ्चरात्रेषु तादृक् ॥ ९९॥ | ||
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| verse_text = अक्षद्यूतं निकृतिः पापमेव कृतं त्वया गर्हितं सौबलेन । | | verse_text = अक्षद्यूतं निकृतिः पापमेव कृतं त्वया गर्हितं सौबलेन । | ||
| verse_lines = अक्षद्यूतं निकृतिः पापमेव कृतं त्वया गर्हितं सौबलेन | | verse_lines = अक्षद्यूतं निकृतिः पापमेव कृतं त्वया गर्हितं सौबलेन ।¦न कुत्रचिद् विधिरस्यास्ति तेन न तद् दत्तं द्यूतहृतं(द्यूतकृतं) वदन्ति ॥ १००॥ | ||
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| verse_text = भीतेन दत्तं द्यूतदत्तं तथैव दत्तं कामिन्यै पुनराहार्यमेव । | | verse_text = भीतेन दत्तं द्यूतदत्तं तथैव दत्तं कामिन्यै पुनराहार्यमेव । | ||
| verse_lines = भीतेन दत्तं द्यूतदत्तं तथैव दत्तं कामिन्यै पुनराहार्यमेव | | verse_lines = भीतेन दत्तं द्यूतदत्तं तथैव दत्तं कामिन्यै पुनराहार्यमेव ।¦एवं धर्मः शाश्वतो वैदिको हि द्यूते स्त्रियां नाल्पमाहार्यमाहुः ॥ १०१॥ | ||
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| verse_text = यद्येषां वै भोग्यमल्पं(यद्येतेषां भोग्यमल्पं) तदीयं भोगेन तद्बन्धुभिस्तच्च हार्यम् । | | verse_text = यद्येषां वै भोग्यमल्पं(यद्येतेषां भोग्यमल्पं) तदीयं भोगेन तद्बन्धुभिस्तच्च हार्यम् । | ||
| verse_lines = यद्येषां वै भोग्यमल्पं(यद्येतेषां भोग्यमल्पं) तदीयं भोगेन तद्बन्धुभिस्तच्च हार्यम् | | verse_lines = यद्येषां वै भोग्यमल्पं(यद्येतेषां भोग्यमल्पं) तदीयं भोगेन तद्बन्धुभिस्तच्च हार्यम् ।¦निवारणे पुरुषस्य त्वशक्तौस्तद् राज्यं न पुनराहार्यमेव ॥ १०२॥ | ||
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| verse_text = त्वं धर्मनित्य(धर्मनिष्ठः)श्चाग्रजश्चेति राजन् ऋतेऽनुज्ञां न मया तत् कृतं च । | | verse_text = त्वं धर्मनित्य(धर्मनिष्ठः)श्चाग्रजश्चेति राजन् ऋतेऽनुज्ञां न मया तत् कृतं च । | ||
| verse_lines = त्वं धर्मनित्य(धर्मनिष्ठः)श्चाग्रजश्चेति राजन् ऋतेऽनुज्ञां न मया तत् कृतं च | | verse_lines = त्वं धर्मनित्य(धर्मनिष्ठः)श्चाग्रजश्चेति राजन् ऋतेऽनुज्ञां न मया तत् कृतं च ।¦दातास्यनुज्ञां यदि तान् निहत्य त्वय्येव राज्यं स्थापयाम्यद्य सम्यक् ॥ १०३॥ | ||
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| verse_lines = सत्यं पापेष्वपि कर्तुं यदीच्छा तथाऽपि मासा द्वादशः नः प्रयाताः | | verse_lines = सत्यं पापेष्वपि कर्तुं यदीच्छा तथाऽपि मासा द्वादशः नः प्रयाताः ।¦वेदप्रामाण्याद् वत्सरास्ते हि मासैः सहस्राब्दं सत्रमुक्तं नराणाम् ।¦अज्ञातमेकं मासमुष्याऽथ शत्रून् निहत्य राज्यं प्रतिपादयामः (प्रतिपालयामः) ॥ १०४॥ | ||
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| verse_lines = मा मित्राणां तापकस्त्वं भवेथास्तथाऽमित्राणां नन्दकश्चैव राजन् | | verse_lines = मा मित्राणां तापकस्त्वं भवेथास्तथाऽमित्राणां नन्दकश्चैव राजन् ।¦ज्वलस्वारीणां मूर्ध्नि मित्राणि नित्यमाह्लादयन् वासुदेवं भजस्व ॥ १०५॥ | ||
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| verse_text = स्वतन्त्रत्वं वासुदेवस्य सम्यक् प्रत्यक्षतो दृश्यते ह्यद्य राजन् । | | verse_text = स्वतन्त्रत्वं वासुदेवस्य सम्यक् प्रत्यक्षतो दृश्यते ह्यद्य राजन् । | ||
| verse_lines = स्वतन्त्रत्वं वासुदेवस्य सम्यक् प्रत्यक्षतो दृश्यते ह्यद्य राजन् | | verse_lines = स्वतन्त्रत्वं वासुदेवस्य सम्यक् प्रत्यक्षतो दृश्यते ह्यद्य राजन् ।¦यस्मात् कृष्णो (प्यजयत्) व्यजयच्छङ्करादीन् जरासुतादीन् कादिवरैरजेयान् ॥ १०६॥ | ||
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| verse_text = ब्रह्मादीनां प्रकृतेस्तद्वशत्वं दृष्टं हि नो बहुशो व्यासदेहे । | | verse_text = ब्रह्मादीनां प्रकृतेस्तद्वशत्वं दृष्टं हि नो बहुशो व्यासदेहे । | ||
| verse_lines = ब्रह्मादीनां प्रकृतेस्तद्वशत्वं दृष्टं हि नो बहुशो व्यासदेहे | | verse_lines = ब्रह्मादीनां प्रकृतेस्तद्वशत्वं दृष्टं हि नो बहुशो व्यासदेहे ।¦पाराशर्यो दिव्यदृष्टिं प्रदाय स्वातन्त्र्यं नोऽदर्शयत् सर्वलोके ॥ १०७॥ | ||
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| verse_lines = तस्माद् राजन्नभिनिर्याहि शत्रून् हन्तुं सर्वान् भोक्तुमेवाधिराज्यम् | | verse_lines = तस्माद् राजन्नभिनिर्याहि शत्रून् हन्तुं सर्वान् भोक्तुमेवाधिराज्यम् ।¦एवञ्च ते कीर्तिधर्मौ महान्तौ प्राप्यौ राजन् वासुदेवप्रसादात् ॥ १०८॥ | ||
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| verse_lines = एवमुक्तोऽब्रवीद् भीमं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः | | verse_lines = एवमुक्तोऽब्रवीद् भीमं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।¦त्रयोदशाब्दस्यान्तेऽहं कुर्यामेव त्वदीरितम् ॥ १०९॥ | ||
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| verse_lines = सत्यमेतन्न सन्देहः सत्येनाऽत्मानमालभे | | verse_lines = सत्यमेतन्न सन्देहः सत्येनाऽत्मानमालभे ।¦लोकापवादभीरुं मां नातोऽन्यद् वक्तुमर्हसि ॥ ११०॥ | ||
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| verse_lines = तुदसे चातिवाचा मां यद्येवं भीम मां वदेः(भीम मा वद) | | verse_lines = तुदसे चातिवाचा मां यद्येवं भीम मां वदेः(भीम मा वद) ।¦तदैव मेऽत्ययः कार्यो हन्तव्याश्चैव शत्रवः ।¦नैतादृशैरिदानीं तु वाक्यैर्बाधितुमर्हसि ॥ १११॥ | ||
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| verse_lines = भीष्मद्रोणादयोऽस्त्रज्ञा निवार्याश्च कथं युधि | | verse_lines = भीष्मद्रोणादयोऽस्त्रज्ञा निवार्याश्च कथं युधि ।¦पूज्यास्ते बाहुयुद्धेन न निवार्याः कथञ्चन ॥ ११२॥ | ||
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| verse_lines = अस्त्राणि जानन्नपि हि न प्रयोजयसि क्वचित्(प्रयोजसि न क्वचित्) | | verse_lines = अस्त्राणि जानन्नपि हि न प्रयोजयसि क्वचित्(प्रयोजसि न क्वचित्) ।¦तस्माद् तदैव गन्तव्यं विज्ञातास्त्रे धनञ्जये ॥ ११३॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तो भीमसेनस्तु स्नेहभङ्गभयात् ततः | | verse_lines = इत्युक्तो भीमसेनस्तु स्नेहभङ्गभयात् ततः ।¦नोवाच किञ्चिद् वचनं स्वाभिप्रेतमवाप्य च ॥ ११४॥ | ||
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| verse_lines = अभिप्रायो हि भीमस्य निश्चयेन त्रयोदशे | | verse_lines = अभिप्रायो हि भीमस्य निश्चयेन त्रयोदशे ।¦युधिष्ठिरस्य राज्यार्थं गमनार्थे प्रतिश्रवः ।¦अन्यथाऽतिमृदुत्वात् स न गच्छेद् भिन्नधीः परैः ॥ ११५॥ | ||
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| verse_lines = कृतकृत्ये तथा भीमे स्थिते धर्मात्मजो हि सः | | verse_lines = कृतकृत्ये तथा भीमे स्थिते धर्मात्मजो हि सः ।¦भीष्मद्रोणादिविजयः कथं स्यादित्यचिन्तयत् ॥ ११६॥ | ||
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| verse_lines = निवारणं गुरूणां हि भीम इच्छति न क्वचित् | | verse_lines = निवारणं गुरूणां हि भीम इच्छति न क्वचित् ।¦तस्मात् ते ह्यर्जुनेनैव निवार्या इत्यचिन्तयत् ॥ ११७॥ | ||
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| verse_lines = आपद्येव हि भीमस्तान् निवारयति नान्यथा | | verse_lines = आपद्येव हि भीमस्तान् निवारयति नान्यथा ।¦एवं चिन्तासमाविष्टं विज्ञायैव युधिष्ठिरम् ॥ ११८॥ | ||
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| verse_lines = सर्वज्ञः सर्वशक्तिश्च कृष्णद्वैपायनोऽगमत् | | verse_lines = सर्वज्ञः सर्वशक्तिश्च कृष्णद्वैपायनोऽगमत् ।¦नृपतिं बोधयामास चिन्ताव्याकुलमानसम् ॥ ११९॥ | ||
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| verse_lines = इमं मन्त्रं वदिष्यामि येन जेष्यति फल्गुनः | | verse_lines = इमं मन्त्रं वदिष्यामि येन जेष्यति फल्गुनः ।¦भीष्मद्रोणादिकान् सर्वान् तं त्वं वद धनञ्जये ॥ १२०॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्त्वैवावदन्मन्त्रं सर्वदैवतदृष्टिदम् | | verse_lines = इत्युक्त्वैवावदन्मन्त्रं सर्वदैवतदृष्टिदम् ।¦न स्वयं ह्यवदत् पार्थे फलाधिक्यं यतो भवेत् ॥ १२१॥ | ||
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| verse_lines = भीष्मद्रोणादिविजय एतावद् वीर्यमेव हि | | verse_lines = भीष्मद्रोणादिविजय एतावद् वीर्यमेव हि ।¦अलं नातोऽधिकं कार्यमेतावद् योग्यमस्य च ।¦फल्गुनस्येति भगवान् न स्वयं ह्यवदन्मनुम् ॥ १२२॥ | ||
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| verse_lines = गते व्यासे भगवति सर्वज्ञे सर्वकर्तरि | | verse_lines = गते व्यासे भगवति सर्वज्ञे सर्वकर्तरि ।¦धर्मराजोऽवदन्मन्त्रं(अदिशन्मन्त्रं) फल्गुनाय रहस्यमुम् ॥ १२३॥ | ||
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| verse_lines = तमाप्य फल्गुनो मन्त्रं ययौ ज्येष्ठौ प्रणम्य च | | verse_lines = तमाप्य फल्गुनो मन्त्रं ययौ ज्येष्ठौ प्रणम्य च ।¦यमजौ च समाश्लिष्य गिरिमेवेन्द्रकीलकम् ।¦तपश्चचार तत्रस्थः शङ्करस्थं हरिं स्मरन् ॥ १२४॥ | ||
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| verse_text = तं ज्ञात्वा फल्गुनो वीरः सज्यं कृत्वा तु गाण्डिवम् । | | verse_text = तं ज्ञात्वा फल्गुनो वीरः सज्यं कृत्वा तु गाण्डिवम् । | ||
| verse_lines = तं ज्ञात्वा फल्गुनो वीरः सज्यं कृत्वा तु गाण्डिवम् | | verse_lines = तं ज्ञात्वा फल्गुनो वीरः सज्यं कृत्वा तु गाण्डिवम् ।¦चिक्षेप वज्रसमितांस्तत्काये सायकान् बहून् ॥ १२६॥ | ||
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| verse_text = किरातरूपस्तमनु सभार्यश्च त्रियम्बकः । | | verse_text = किरातरूपस्तमनु सभार्यश्च त्रियम्बकः । | ||
| verse_lines = किरातरूपस्तमनु सभार्यश्च त्रियम्बकः | | verse_lines = किरातरूपस्तमनु सभार्यश्च त्रियम्बकः ।¦स ममार हतस्ताभ्यां दानवः पापचेतनः ॥ १२७॥ | ||
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| verse_text = तेनोक्तोऽसौ मयैवायं वराहोऽनुगतोऽद्य हि । | | verse_text = तेनोक्तोऽसौ मयैवायं वराहोऽनुगतोऽद्य हि । | ||
| verse_lines = तेनोक्तोऽसौ मयैवायं वराहोऽनुगतोऽद्य हि | | verse_lines = तेनोक्तोऽसौ मयैवायं वराहोऽनुगतोऽद्य हि ।¦तमाविध्यो यतस्त्वं हि तद् युद्ध्यस्व मया सह ॥ १२८॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तः फल्गुनः प्राह तिष्ठ तिष्ठ न मोक्ष्यसे । | | verse_text = इत्युक्तः फल्गुनः प्राह तिष्ठ तिष्ठ न मोक्ष्यसे । | ||
| verse_lines = इत्युक्तः फल्गुनः प्राह तिष्ठ तिष्ठ न मोक्ष्यसे | | verse_lines = इत्युक्तः फल्गुनः प्राह तिष्ठ तिष्ठ न मोक्ष्यसे ।¦इत्युक्त्वा तावुभौ युद्धं चक्रतुः पुरुषर्षभौ ॥ १२९॥ | ||
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| verse_text = तत्राखिलानि चास्त्राणि फल्गुनस्याग्रसच्छिवः । | | verse_text = तत्राखिलानि चास्त्राणि फल्गुनस्याग्रसच्छिवः । | ||
| verse_lines = तत्राखिलानि चास्त्राणि फल्गुनस्याग्रसच्छिवः | | verse_lines = तत्राखिलानि चास्त्राणि फल्गुनस्याग्रसच्छिवः ।¦ततोऽर्जुनस्तु गाण्डीवं समादायाभ्यताडयत् ॥ १३०॥ | ||
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| verse_lines = तदप्यग्रसदेवासौ प्रहसन् गिरिशस्तदा | | verse_lines = तदप्यग्रसदेवासौ प्रहसन् गिरिशस्तदा ।¦बाहुयुद्धं ततस्त्वासीत् तयोः पुरुषसिंहयोः ॥ १३१॥ | ||
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| verse_text = पिण्डीकृत्य ततो रुद्रश्चिक्षेपाथ(ध) धनञ्जयम् । | | verse_text = पिण्डीकृत्य ततो रुद्रश्चिक्षेपाथ(ध) धनञ्जयम् । | ||
| verse_lines = पिण्डीकृत्य ततो रुद्रश्चिक्षेपाथ(ध) धनञ्जयम् | | verse_lines = पिण्डीकृत्य ततो रुद्रश्चिक्षेपाथ(ध) धनञ्जयम् ।¦मूर्च्छामवाप महतीं फल्गुनो रुद्रपीडितः ॥ १३२॥ | ||
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| verse_text = पूर्वं सम्प्रार्थयामास शङ्करो गरुडध्वजम् । | | verse_text = पूर्वं सम्प्रार्थयामास शङ्करो गरुडध्वजम् । | ||
| verse_lines = पूर्वं सम्प्रार्थयामास शङ्करो गरुडध्वजम् | | verse_lines = पूर्वं सम्प्रार्थयामास शङ्करो गरुडध्वजम् ।¦अवराणां वरं मत्तो येषां त्वं सम्प्रयच्छसि ।¦अजेयत्वं प्रसादात् ते विजेयाः स्युर्मयाऽपि ते ॥ १३३॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तः प्रददौ विष्णुरुमाधीशाय तं वरम् | | verse_lines = इत्युक्तः प्रददौ विष्णुरुमाधीशाय तं वरम् ।¦तेनाजयच्छ्वेतवाहं गिरिशो रणमध्यगम् ॥ १३४॥ | ||
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| verse_text = केवलान् वैष्णवान् मन्त्रान् व्यासः पार्थाय नो ददौ । | | verse_text = केवलान् वैष्णवान् मन्त्रान् व्यासः पार्थाय नो ददौ । | ||
| verse_lines = केवलान् वैष्णवान् मन्त्रान् व्यासः पार्थाय नो ददौ | | verse_lines = केवलान् वैष्णवान् मन्त्रान् व्यासः पार्थाय नो ददौ ।¦एतावताऽलं भीष्मादेर्जयार्थमिति चिद्धनः ॥ १३५॥ | ||
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| verse_lines = केवलैर्वैष्णवैर्मन्त्रैः स्वदत्तैर्विजयावहैः | | verse_lines = केवलैर्वैष्णवैर्मन्त्रैः स्वदत्तैर्विजयावहैः ।¦अतिवृद्धस्य(अभिवृद्धस्य) पार्थस्य दर्पः स्यादित्यचिन्तयत् ॥ १३६॥ | ||
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| verse_lines = पार्थः सञ्ज्ञामवाप्याथ जयार्थ्याराधयच्छिवम् | | verse_lines = पार्थः सञ्ज्ञामवाप्याथ जयार्थ्याराधयच्छिवम् ।¦व्यासोदितेन मन्त्रेण तानि पुष्पाणि तच्छिरः ॥ १३७॥ | ||
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| verse_lines = आरुहन् स तु तं ज्ञात्वा रुद्र इत्येव फल्गुनः | | verse_lines = आरुहन् स तु तं ज्ञात्वा रुद्र इत्येव फल्गुनः ।¦नमश्चक्रे ततः प्रादादस्त्रं पाशुपतं शिवः ॥ १३८॥ | ||
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| verse_lines = अस्त्रं तद् विष्णुदैवत्यं साधितं शङ्करेण यत् | | verse_lines = अस्त्रं तद् विष्णुदैवत्यं साधितं शङ्करेण यत् ।¦तस्मात् पाशुपतं नाम स्वान्यस्त्राण्यपरे सुराः ।¦ददुस्तदैव पार्थाय सर्वे प्रत्यक्षगोचराः ॥ १३९॥ | ||
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| verse_lines = इन्द्रोऽर्जुनं समागम्य प्राह प्रीतोऽस्मि तेऽनघ | | verse_lines = इन्द्रोऽर्जुनं समागम्य प्राह प्रीतोऽस्मि तेऽनघ ।¦रुद्रदेहस्थितं ब्रह्म विष्ण्वाख्यं तोषितं त्वया ।¦तेन लोकं ममाऽगच्छ प्रेषयामि रथं तव ॥ १४०॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्त्वा प्रययाविन्द्रस्तद्रथेन च मातलिः | | verse_lines = इत्युक्त्वा प्रययाविन्द्रस्तद्रथेन च मातलिः ।¦आयात् पार्थस्तमारुह्य ययौ तातनिकेतनम् ॥ १४१॥ | ||
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| verse_text = पूजितो दैवतैः सर्वैरिन्द्रेणैव निवेशितः । | | verse_text = पूजितो दैवतैः सर्वैरिन्द्रेणैव निवेशितः । | ||
| verse_lines = पूजितो दैवतैः सर्वैरिन्द्रेणैव निवेशितः | | verse_lines = पूजितो दैवतैः सर्वैरिन्द्रेणैव निवेशितः ।¦तेन सार्द्धमुपासीदत् तस्मिन्नैन्द्रे वरासने ॥ १४२॥ | ||
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| verse_lines = प्रीत्या समाश्लिष्य कुरुप्रवीरं शक्रो द्वितीयां तनुमात्मनः सः | | verse_lines = प्रीत्या समाश्लिष्य कुरुप्रवीरं शक्रो द्वितीयां तनुमात्मनः सः ।¦ईक्षन् मुखं तस्य मुमोद सोऽपि ह्युवास तस्मिन् वत्सरान् पञ्च लोके ॥ १४३॥ | ||
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| verse_lines = अस्त्राणि तस्मा अदिशत् स वासवो महान्ति दिव्यानि तदोर्वशी तम् | | verse_lines = अस्त्राणि तस्मा अदिशत् स वासवो महान्ति दिव्यानि तदोर्वशी तम् ।¦सम्प्राप्य भावेन तु मानुषेण माता कुलस्येति निराकृताऽभूत् ॥ १४४॥ | ||
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| verse_lines = षण्ढो भवेत्येव तयाऽभिशप्ते पार्थे शक्रोऽनुग्रहं तस्य चादात् | | verse_lines = षण्ढो भवेत्येव तयाऽभिशप्ते पार्थे शक्रोऽनुग्रहं तस्य चादात् ।¦संवत्सरं षण्ढरूपी चरस्व न षण्ढता ते भवतीति(भवितेति) धृष्णुः ॥ १४५॥ | ||
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| verse_lines = ततोऽवसत् पाण्डवेयो गान्धर्वं वेदमभ्यसन् | | verse_lines = ततोऽवसत् पाण्डवेयो गान्धर्वं वेदमभ्यसन् ।¦गन्धर्वाच्चित्रसेनात्तु तथाऽस्त्राणि सुरेश्वरात् ॥ १४६॥ | ||
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| verse_lines = सुभद्रयाऽभिमन्युना सह स्वकां पुरं गतः | | verse_lines = सुभद्रयाऽभिमन्युना सह स्वकां पुरं गतः ।¦जनार्दनोऽत्र संवसन् कदाचिदित्थमैक्षत ॥ १४७॥ | ||
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| verse_lines = मया वरो हि शम्भवे प्रदत्त आस पूर्वतः | | verse_lines = मया वरो हि शम्भवे प्रदत्त आस पूर्वतः ।¦वरं ग्रहीष्य एव ते सकाशतो विमोहयन् ॥ १४८॥ | ||
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| verse_lines = ‘त्वामाराध्य तथा शम्भो ग्रहीष्यामि वरं सदा | | verse_lines = ‘त्वामाराध्य तथा शम्भो ग्रहीष्यामि वरं सदा ।¦द्वापरादौ युगे भूत्वा कलया मानुषादिषु’ ॥ १४९॥ (पद्म पु\. ६\.७१\.१०६) | ||
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| verse_lines = स्वागमैः कल्पितैस्त्वञ्च जनान् मद्विमुखान् कुरु | | verse_lines = स्वागमैः कल्पितैस्त्वञ्च जनान् मद्विमुखान् कुरु ।¦मां च गोपय येन स्यात् सृष्टिरेषोत्तराधरा ॥ १५०॥ | ||
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| verse_lines = इति वाक्यमृतं कर्तुमभिप्रायं विजज्ञुषी | | verse_lines = इति वाक्यमृतं कर्तुमभिप्रायं विजज्ञुषी ।¦प्रीत्यर्थं वासुदेवस्य रुक्मिणी वाक्यमब्रवीत्¦जातेऽपि पुत्रे पुत्रार्थं सा हि वेद मनोगतम् ॥ १५१॥ | ||
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| verse_lines = पुत्रो मे बलवान् देव स्यात् | | verse_lines = पुत्रो मे बलवान् देव स्यात् सर्वास्त्रविदुत्तमः।¦इत्युक्तो भगवान् देव्या सम्मोहाय सुरद्विषाम् ।¦ययौ सुपर्णमारुह्य स्वीयं बदरिकाश्रमम् ॥ १५२॥ | ||
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| verse_lines = एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति | | verse_lines = एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति ।¦त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय ॥ १५३॥ | ||
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| verse_lines = पूर्वं तेनोदितं यत्तल्लोकान् मोहयताऽञ्जसा | | verse_lines = पूर्वं तेनोदितं यत्तल्लोकान् मोहयताऽञ्जसा ।¦शर्वं प्रति तवाहं तु कुर्यां द्वादशवत्सरम् ॥ १६३॥ | ||
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| verse_text = तपोऽसुराणां मोहाय सुराः सन्तु गतज्वराः । | | verse_text = तपोऽसुराणां मोहाय सुराः सन्तु गतज्वराः । | ||
| verse_lines = तपोऽसुराणां मोहाय सुराः सन्तु गतज्वराः | | verse_lines = तपोऽसुराणां मोहाय सुराः सन्तु गतज्वराः ।¦इति तस्मात् तदा कृष्ण एकाहेन बृहस्पतिम् ॥ १६४॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = आज्ञया(स्वाज्ञया) चारयामास क्षिप्रं द्वादशराशिषु । | | verse_text = आज्ञया(स्वाज्ञया) चारयामास क्षिप्रं द्वादशराशिषु । | ||
| verse_lines = आज्ञया(स्वाज्ञया) चारयामास क्षिप्रं द्वादशराशिषु | | verse_lines = आज्ञया(स्वाज्ञया) चारयामास क्षिप्रं द्वादशराशिषु ।¦द्वादशाब्दमभूत् तेन तदहः केशवेच्छया(केशवाज्ञया) ॥ १६५॥ | ||
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| verse_text = एकस्मिन्नह्नि भगवान् राशिंराशिं च वत्सरम् । | | verse_text = एकस्मिन्नह्नि भगवान् राशिंराशिं च वत्सरम् । | ||
| verse_lines = एकस्मिन्नह्नि भगवान् राशिंराशिं च वत्सरम् | | verse_lines = एकस्मिन्नह्नि भगवान् राशिंराशिं च वत्सरम् ।¦कल्पयित्वोपवासादीन् मनसा नियमानपि ॥ १६६॥ | ||
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| verse_text = मासब्रतं सार्द्धशतश्वासकालैरकल्पयत् । | | verse_text = मासब्रतं सार्द्धशतश्वासकालैरकल्पयत् । | ||
| verse_lines = मासब्रतं सार्द्धशतश्वासकालैरकल्पयत् | | verse_lines = मासब्रतं सार्द्धशतश्वासकालैरकल्पयत् ।¦मनसैव स्वभक्तानां द्वादशाब्दव्रताप्तये ॥ १६७॥ | ||
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| verse_text = तत्रास्य गरुडाद्याश्च परिचर्यां स्वपार्षदाः । | | verse_text = तत्रास्य गरुडाद्याश्च परिचर्यां स्वपार्षदाः । | ||
| verse_lines = तत्रास्य गरुडाद्याश्च परिचर्यां स्वपार्षदाः | | verse_lines = तत्रास्य गरुडाद्याश्च परिचर्यां स्वपार्षदाः ।¦चक्रुर्होमादिकाश्चैव क्रियाश्चक्रे जनार्दनः ।¦स्वात्मानं प्रति पापानां शिवायेति प्रकाशयन् ॥ १६८॥ | ||
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| verse_text = एवं स्थितं तमरविन्ददलायताक्षं ब्रह्मेन्द्रपूर्वसुरयोगिवरप्रजेशाः । | | verse_text = एवं स्थितं तमरविन्ददलायताक्षं ब्रह्मेन्द्रपूर्वसुरयोगिवरप्रजेशाः । | ||
| verse_lines = एवं स्थितं तमरविन्ददलायताक्षं ब्रह्मेन्द्रपूर्वसुरयोगिवरप्रजेशाः | | verse_lines = एवं स्थितं तमरविन्ददलायताक्षं ब्रह्मेन्द्रपूर्वसुरयोगिवरप्रजेशाः ।¦अभ्याययुः पितृमुनीन्द्रगणैः समेता गन्धर्वसिद्धवरयक्षविहङ्गमाद्याः ॥ १६९॥ | ||
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| verse_text = शर्वोऽपि सर्वसुरदैवतमात्मदैवम् | | verse_text = शर्वोऽपि सर्वसुरदैवतमात्मदैवम् | ||
| verse_lines = शर्वोऽपि | | verse_lines = शर्वोऽपि सर्वसुरदैवतमात्मदैवम्¦आयातमात्मगृहसन्निधिमाश्ववेत्य(आयान्तमात्मगृहसन्निधिमाश्ववेत्य) ।¦अभ्याययौ निजगणैः सहितः सभार्यो¦भक्त्याऽतिसम्भ्रमगृहीतसमर्हणाग्र्यः ॥ १७०॥ | ||
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| verse_text = अभ्येत्य पादयुगलं जगदेकभर्तुः | | verse_text = अभ्येत्य पादयुगलं जगदेकभर्तुः | ||
| verse_lines = अभ्येत्य पादयुगलं | | verse_lines = अभ्येत्य पादयुगलं जगदेकभर्तुः¦कृष्णस्य भक्तिभरितः शिरसा ननाम ।¦चक्रे स्तुतिं च परमां परमस्य पूर्ण-¦षाड्गुण्यविग्रहविदोषमहाविभूतेः ॥ १७१॥ | ||
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| verse_text = कृष्णोऽप्ययोग्यजनमोहनमेव वाञ्छन् | | verse_text = कृष्णोऽप्ययोग्यजनमोहनमेव वाञ्छन् | ||
| verse_lines = कृष्णोऽप्ययोग्यजनमोहनमेव | | verse_lines = कृष्णोऽप्ययोग्यजनमोहनमेव वाञ्छन्¦तुष्टाव रुद्रहृदिगं निजमेव रूपम् ।¦रुद्रो निशम्य तदुवाच सुरान् समस्तान्¦सत्यं वदामि शृणुताद्य वचो मदीयम् ॥ १७२॥ | ||
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| verse_text = विष्णुः समस्तसुजनैः परमो ह्युपेयः | | verse_text = विष्णुः समस्तसुजनैः परमो ह्युपेयः | ||
| verse_lines = विष्णुः समस्तसुजनैः परमो | | verse_lines = विष्णुः समस्तसुजनैः परमो ह्युपेयः¦तत्प्राप्तयेऽहमनिलोऽथ रमाऽभ्युपायाः ।¦एष ह्यशेषनिगमार्थविनिर्णयोऽर्थो (योत्थो)¦यद् विष्णुरेव परमो मम चाब्जयोनेः ॥ १७३॥ | ||
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| verse_text = अव्यक्ततः सकलजीवगणाच्च नित्यम् | | verse_text = अव्यक्ततः सकलजीवगणाच्च नित्यम् | ||
| verse_lines = अव्यक्ततः सकलजीवगणाच्च | | verse_lines = अव्यक्ततः सकलजीवगणाच्च नित्यम्¦इत्येव निश्चय उतैतदनुस्मरध्वम् ।¦इत्युक्तवत्यखिलदेवगणा गिरीशे¦कृष्णं प्रणेमुरतिवृद्धरमेशभक्त्या ॥ १७४॥ | ||
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| verse_text = उक्तैरन्यैश्च गिरिशवाक्यैस्तत्त्वविनिर्णयैः । | | verse_text = उक्तैरन्यैश्च गिरिशवाक्यैस्तत्त्वविनिर्णयैः । | ||
| verse_lines = उक्तैरन्यैश्च गिरिशवाक्यैस्तत्त्वविनिर्णयैः | | verse_lines = उक्तैरन्यैश्च गिरिशवाक्यैस्तत्त्वविनिर्णयैः ।¦कृष्णस्यैव गुणाख्यानैः पुनरिन्द्रादिदेवताः ।¦ज्ञानाभिवृद्धिमगमन् पुराऽपि ज्ञानिनोऽधिकम् ॥ १७५॥ | ||
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| verse_text = सर्वदेवोत्तमं तं हि जानन्त्येव सुराः सदा । | | verse_text = सर्वदेवोत्तमं तं हि जानन्त्येव सुराः सदा । | ||
| verse_lines = सर्वदेवोत्तमं तं हि जानन्त्येव सुराः सदा | | verse_lines = सर्वदेवोत्तमं तं हि जानन्त्येव सुराः सदा ।¦तथाऽपि तत्प्रमाणानां बहुत्वाद् येऽत्र(यत्र) संशयाः ।¦युक्तिमात्रात् (युक्तिमात्रे) तेऽपि रुद्रवाक्यादपगतास्तदा ॥ १७६॥ | ||
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| verse_text = ततः कृष्णः सुतवरं त्वत्त आदास्य इत्यजः । | | verse_text = ततः कृष्णः सुतवरं त्वत्त आदास्य इत्यजः । | ||
| verse_lines = ततः कृष्णः सुतवरं त्वत्त आदास्य इत्यजः | | verse_lines = ततः कृष्णः सुतवरं त्वत्त आदास्य इत्यजः ।¦यदुक्तवाञ्छिवं पूर्वं सत्यं कर्तुं तदब्रवीत् ॥ १७७॥ | ||
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| verse_text = पुत्रं देहीति सोऽप्याह पूर्वमेव सुतस्तव । | | verse_text = पुत्रं देहीति सोऽप्याह पूर्वमेव सुतस्तव । | ||
| verse_lines = पुत्रं देहीति सोऽप्याह पूर्वमेव सुतस्तव | | verse_lines = पुत्रं देहीति सोऽप्याह पूर्वमेव सुतस्तव ।¦जातः प्रद्युम्ननामा यः स मद्दत्तः प्रवादतः ॥ १७८॥ | ||
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| verse_text = पुरा दग्धो मया कामस्तदाऽयाचत मां रतिः । | | verse_text = पुरा दग्धो मया कामस्तदाऽयाचत मां रतिः । | ||
| verse_lines = पुरा दग्धो मया कामस्तदाऽयाचत मां रतिः | | verse_lines = पुरा दग्धो मया कामस्तदाऽयाचत मां रतिः ।¦देहि कान्तं ममेत्येव तदा तामहमब्रवम् ॥ १७९॥ | ||
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| verse_text = उत्पत्स्यते वासुदेवाद् यदा तं(त्वं) पतिमाप्स्यसि । | | verse_text = उत्पत्स्यते वासुदेवाद् यदा तं(त्वं) पतिमाप्स्यसि । | ||
| verse_lines = उत्पत्स्यते वासुदेवाद् यदा तं(त्वं) पतिमाप्स्यसि | | verse_lines = उत्पत्स्यते वासुदेवाद् यदा तं(त्वं) पतिमाप्स्यसि ।¦इत्यतोऽसौ मया दत्त इव देव त्वदाज्ञया ॥ १८०॥ | ||
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| verse_text = दासोऽस्मि तव देवेश पाहि मां शरणागतम् । | | verse_text = दासोऽस्मि तव देवेश पाहि मां शरणागतम् । | ||
| verse_lines = दासोऽस्मि तव देवेश पाहि मां शरणागतम् | | verse_lines = दासोऽस्मि तव देवेश पाहि मां शरणागतम् ।¦इत्युक्त्वाऽभिप्रणम्यैनं पुनराह सुरान् हरः ॥ १८१॥ | ||
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| verse_text = यदर्थमेष आयातः केशवः शृणुतामराः । | | verse_text = यदर्थमेष आयातः केशवः शृणुतामराः । | ||
| verse_lines = यदर्थमेष आयातः केशवः शृणुतामराः | | verse_lines = यदर्थमेष आयातः केशवः शृणुतामराः ।¦योऽसुरो वक्रनामाऽऽसीदवध्यो ब्रह्मणो वरात् ।¦तदाजाताद् वासुदेवपुत्रात् कामादृते क्वचित् ॥ १८२॥ | ||
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| verse_lines = तं हन्तुमेव पुत्रं स्वं प्रद्युम्नमुदरेऽर्प्य च | | verse_lines = तं हन्तुमेव पुत्रं स्वं प्रद्युम्नमुदरेऽर्प्य च ।¦आयात इह तं चापि ददाह स्वोदरात् सुतम् ।¦निस्सारयित्वा कक्षं च दग्धं पश्यत देवताः ॥ १८३॥ | ||
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| verse_lines = ज्वालामालाकरालेन स्वतेजोवर्द्धितेन च | | verse_lines = ज्वालामालाकरालेन स्वतेजोवर्द्धितेन च ।¦प्रद्युम्नेनैव तं दैत्यं दग्ध्वा वनसमन्वितम् ।¦पुनश्च स्वोदरे पुत्रं स्थापयामास केशवः ॥ १८४॥ | ||
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| verse_text = सद्योगर्भं पुनस्तं च रुक्मिण्यां जनयिष्यति । | | verse_text = सद्योगर्भं पुनस्तं च रुक्मिण्यां जनयिष्यति । | ||
| verse_lines = सद्योगर्भं पुनस्तं च रुक्मिण्यां जनयिष्यति | | verse_lines = सद्योगर्भं पुनस्तं च रुक्मिण्यां जनयिष्यति ।¦पूर्ववत् क्षणमात्रेण युवा च स भविष्यति ॥ १८५॥ | ||
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| verse_lines = दृष्टमेतन्नारदाद्यैर्मुनिभिः सर्वमेव च | | verse_lines = दृष्टमेतन्नारदाद्यैर्मुनिभिः सर्वमेव च ।¦एवं क्रीडत्ययं देवः पूर्णैश्वर्येण केवलम् ।¦इत्युक्ते केशवं नेमुर्देवाः शक्रपुरोगमाः ॥ १८६॥ | ||
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| verse_text = ततो हरिर्ब्रह्मसुरेन्द्रमुख्यैः सुरैः स्तुतो गरुडस्कन्धसंस्थः । | | verse_text = ततो हरिर्ब्रह्मसुरेन्द्रमुख्यैः सुरैः स्तुतो गरुडस्कन्धसंस्थः । | ||
| verse_lines = ततो हरिर्ब्रह्मसुरेन्द्रमुख्यैः सुरैः स्तुतो गरुडस्कन्धसंस्थः | | verse_lines = ततो हरिर्ब्रह्मसुरेन्द्रमुख्यैः सुरैः स्तुतो गरुडस्कन्धसंस्थः ।¦पुनःपुनः प्रणतः शङ्करेण स्तुतस्तृतीयेऽह्नि निजां पुरीमगात् ॥ १८७॥ | ||
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| verse_text = कृष्णे प्रयाते निलयं पुरद्विषो रात्रौ पौण्ड्रौ वासुदेवः समागात् । | | verse_text = कृष्णे प्रयाते निलयं पुरद्विषो रात्रौ पौण्ड्रौ वासुदेवः समागात् । | ||
| verse_lines = कृष्णे प्रयाते निलयं पुरद्विषो रात्रौ पौण्ड्रौ वासुदेवः समागात् | | verse_lines = कृष्णे प्रयाते निलयं पुरद्विषो रात्रौ पौण्ड्रौ वासुदेवः समागात् ।¦सहैकलव्येन निजेन मातुः पित्रा तथाऽक्षोहिणिकत्रयेण ॥ १८८॥ | ||
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| verse_text = पुरीं प्रभञ्जन्तममुं विदित्वा सरामशैनेययदुप्रवीराः । | | verse_text = पुरीं प्रभञ्जन्तममुं विदित्वा सरामशैनेययदुप्रवीराः । | ||
| verse_lines = पुरीं प्रभञ्जन्तममुं विदित्वा सरामशैनेययदुप्रवीराः | | verse_lines = पुरीं प्रभञ्जन्तममुं विदित्वा सरामशैनेययदुप्रवीराः ।¦संयोधयामासुरथाभ्यवर्षच्छरैर्निषादाधिप एकलव्यः ॥ १८९॥ | ||
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| verse_text = तदस्त्रशस्त्रैः सहसा विषण्णा यदुप्रवीरा विहतप्रदीपाः(विगतप्रदीपाः) । | | verse_text = तदस्त्रशस्त्रैः सहसा विषण्णा यदुप्रवीरा विहतप्रदीपाः(विगतप्रदीपाः) । | ||
| verse_lines = तदस्त्रशस्त्रैः सहसा विषण्णा यदुप्रवीरा विहतप्रदीपाः(विगतप्रदीपाः) | | verse_lines = तदस्त्रशस्त्रैः सहसा विषण्णा यदुप्रवीरा विहतप्रदीपाः(विगतप्रदीपाः) ।¦सहैव रामेण शिनेश्च नप्त्रा समाविशन् स्वां पुरमेव सर्वे ॥ १९०॥ | ||
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| verse_text = पुनः समादाय तथोरुदीपिका अग्रे समाधाय च रौहिणेयम् । | | verse_text = पुनः समादाय तथोरुदीपिका अग्रे समाधाय च रौहिणेयम् । | ||
| verse_lines = पुनः समादाय तथोरुदीपिका अग्रे समाधाय च रौहिणेयम् | | verse_lines = पुनः समादाय तथोरुदीपिका अग्रे समाधाय च रौहिणेयम् ।¦विनिस्सृता आत्तशस्त्राः स्वपुर्याः सिंहा यथा धर्षिताः सद्गुहायाः ॥ १९१॥ | ||
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| verse_lines = अथाऽससादैकलव्यं रथेन रामः शैनेयः पौण्ड्रकं वासुदेवम् | | verse_lines = अथाऽससादैकलव्यं रथेन रामः शैनेयः पौण्ड्रकं वासुदेवम् ।¦अयुद्ध्यतां तौ सात्यकिः पौण्ड्रकश्च तथाऽन्योन्यं विरथं चक्रतुश्च॥ १९२ ॥ | ||
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| verse_lines = ततो गदायुद्धमभूत् तयोर्द्वयोस्तथा रामश्चैकलव्यश्च वीरौ(हरिवंशे भविष्यत्पर्वणि अ.१०२) | | verse_lines = ततो गदायुद्धमभूत् तयोर्द्वयोस्तथा रामश्चैकलव्यश्च वीरौ(हरिवंशे भविष्यत्पर्वणि अ.१०२) ।¦कृत्वाऽन्योन्यं विरथं गदाभ्यामयुद्ध्यतां जातदर्पौ बलाग्र्यौ ॥ १९३॥ | ||
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| verse_text = सुपापोऽसावेकलव्यः सुभीतो रामं मत्वैवानुयान्तं पुनश्च । | | verse_text = सुपापोऽसावेकलव्यः सुभीतो रामं मत्वैवानुयान्तं पुनश्च । | ||
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| verse_text = रामो विजित्यातिबलं रणे रिपुं मुदैव दामोदरमाससाद । | | verse_text = रामो विजित्यातिबलं रणे रिपुं मुदैव दामोदरमाससाद । | ||
| verse_lines = रामो विजित्यातिबलं रणे रिपुं मुदैव दामोदरमाससाद | | verse_lines = रामो विजित्यातिबलं रणे रिपुं मुदैव दामोदरमाससाद ।¦पौण्ड्रस्त्ववज्ञाय शिनिप्रवीरं निवार्यमाणोऽपि(भिययौ) ययौ जनार्दनम् ॥ १९८॥ | ||
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| verse_text = तं केशवो विरथं व्यायुधं च क्षणेन चक्रे स ययौ निजां पुरीम् । | | verse_text = तं केशवो विरथं व्यायुधं च क्षणेन चक्रे स ययौ निजां पुरीम् । | ||
| verse_lines = तं केशवो विरथं व्यायुधं च क्षणेन चक्रे स ययौ निजां पुरीम् | | verse_lines = तं केशवो विरथं व्यायुधं च क्षणेन चक्रे स ययौ निजां पुरीम् ।¦प्रस्थापयामास पुनश्च दूतं कृष्णायैको वासुदेवोऽहमस्मि ॥ १९९॥ | ||
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| verse_text = मदीयलिङ्गानि विसृज्य चाऽशु समागच्छेथाः शरणं मामनन्तम् । | | verse_text = मदीयलिङ्गानि विसृज्य चाऽशु समागच्छेथाः शरणं मामनन्तम् । | ||
| verse_lines = मदीयलिङ्गानि विसृज्य चाऽशु समागच्छेथाः शरणं मामनन्तम् | | verse_lines = मदीयलिङ्गानि विसृज्य चाऽशु समागच्छेथाः शरणं मामनन्तम् ।¦तद्दूतोक्तं वाक्यमेतन्निशम्य यदुप्रवीरा उच्चकैः प्राहसन् स्म ॥ २००॥ | ||
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| verse_text = कृष्णः प्रहस्याऽह तवाऽयुधानि दास्याम्यहं लिङ्गभूतानि चाऽजौ । | | verse_text = कृष्णः प्रहस्याऽह तवाऽयुधानि दास्याम्यहं लिङ्गभूतानि चाऽजौ । | ||
| verse_lines = कृष्णः प्रहस्याऽह तवाऽयुधानि दास्याम्यहं लिङ्गभूतानि चाऽजौ | | verse_lines = कृष्णः प्रहस्याऽह तवाऽयुधानि दास्याम्यहं लिङ्गभूतानि चाऽजौ ।¦इत्युक्तोऽसौ दूत एत्याऽह तस्मै स चाभ्यागाद्(स चाभ्यागात्, स चाभ्यायात्) योद्धुकामो हरिश्च ॥ २०१॥ | ||
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| verse_text = तं शातकौम्भे गरुडे रथस्थे स्थितं चक्रादीन् कृत्रिमान् सन्दधानम् । | | verse_text = तं शातकौम्भे गरुडे रथस्थे स्थितं चक्रादीन् कृत्रिमान् सन्दधानम् । | ||
| verse_lines = तं शातकौम्भे गरुडे रथस्थे स्थितं चक्रादीन् कृत्रिमान् सन्दधानम् | | verse_lines = तं शातकौम्भे गरुडे रथस्थे स्थितं चक्रादीन् कृत्रिमान् सन्दधानम् ।¦श्रीवत्सार्थे दग्धवक्षस्थलं च दृष्ट्वा कृष्णः प्राहसत् पापबुद्धिम् ॥ २०२॥ | ||
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| verse_lines = ततोऽस्त्रशस्त्राण्यभिवर्षमाणं विजित्य तं वासुदेवोऽरिणैव | | verse_lines = ततोऽस्त्रशस्त्राण्यभिवर्षमाणं विजित्य तं वासुदेवोऽरिणैव ।¦चकर्त तत्कन्धरं तस्य चानु मातामहस्याच्छिनत् सायकेन ॥ २०३॥ | ||
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| verse_text = अपातयच्चाऽशु(न्यापातयच्चाशु) शिरः स तेन | | verse_text = अपातयच्चाऽशु(न्यापातयच्चाशु) शिरः स तेन | ||
| verse_lines = अपातयच्चाऽशु(न्यापातयच्चाशु) शिरः स | | verse_lines = अपातयच्चाऽशु(न्यापातयच्चाशु) शिरः स तेन¦काशीश्वरस्येश्वरो वारणास्याम् ।¦स च ब्रह्माहं वासुदेवोऽस्मि नित्यम्¦इति ज्ञानादगमत् तत् तमोऽन्धम् ॥ २०४॥ | ||
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| verse_text = साहाय्यकृच्चास्य च काशिराजो यथैव किर्मीरहिडिम्बसाल्वाः । | | verse_text = साहाय्यकृच्चास्य च काशिराजो यथैव किर्मीरहिडिम्बसाल्वाः । | ||
| verse_lines = साहाय्यकृच्चास्य च काशिराजो यथैव किर्मीरहिडिम्बसाल्वाः | | verse_lines = साहाय्यकृच्चास्य च काशिराजो यथैव किर्मीरहिडिम्बसाल्वाः ।¦अन्ये च दैत्या अपतंस्तमोऽन्धे तथैव सोऽप्यपतत् पापबुद्धिः ॥ २०५॥ | ||
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| verse_text = निहत्य तौ केशवो रौग्मिणेयं पुनर्वैदर्भ्यां जनयामास सद्यः । | | verse_text = निहत्य तौ केशवो रौग्मिणेयं पुनर्वैदर्भ्यां जनयामास सद्यः । | ||
| verse_lines = निहत्य तौ केशवो रौग्मिणेयं पुनर्वैदर्भ्यां जनयामास सद्यः | | verse_lines = निहत्य तौ केशवो रौग्मिणेयं पुनर्वैदर्भ्यां जनयामास सद्यः ।¦स चैकलव्यो रामजितः शिवाय चक्रे तपोऽजेयतां चाऽप तस्मात् ॥ २०६॥ | ||
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| verse_lines = स शर्वदत्तेन वरेण दृप्तः पुनर्योद्धुं कृष्णमेवाऽससाद | | verse_lines = स शर्वदत्तेन वरेण दृप्तः पुनर्योद्धुं कृष्णमेवाऽससाद ।¦तस्यास्त्रशस्त्राणि निवार्य केशवश्चक्रेण चक्रे तमपास्तकन्धरम् ।¦स चाऽप पापस्तम एव घोरं कृष्णद्वेषान्नित्यदुःखात्मकं तत् ॥ २०७॥ | ||
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| verse_lines = एवं यदूनामृषभेण सूदिते पौण्ड्रे तथा काशिनृपे च पापे | | verse_lines = एवं यदूनामृषभेण सूदिते पौण्ड्रे तथा काशिनृपे च पापे ।¦काशीशपुत्रस्तु सुदक्षिणाख्यस्तपोऽचरच्छङ्करायोरुभक्त्या ॥ २०८॥ | ||
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| verse_lines = प्रत्यक्षगं तं शिवं पापबुद्धिः कृष्णाभावं याचते दुष्टचेताः | | verse_lines = प्रत्यक्षगं तं शिवं पापबुद्धिः कृष्णाभावं याचते दुष्टचेताः ।¦कृत्यामस्मै दक्षिणाग्नौ शिवोऽपि दैत्यावेशादददादावृतात्मा ॥ २०९| | ||
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| verse_lines = स दक्षिणाग्निश्चासुरावेशयुक्तः सम्पूजितः काशिराजात्मजेन | | verse_lines = स दक्षिणाग्निश्चासुरावेशयुक्तः सम्पूजितः काशिराजात्मजेन ।¦वरादुमेशस्य विवृद्धशक्तिर्ययौ कृष्णो यत्र सम्पूर्णशक्तिः(यत्र चानन्तशक्तिः) ॥ २१०॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णस्तस्य प्रतिघातार्थमुग्रं समादिशच्चक्रमनन्तवीर्यः | | verse_lines = कृष्णस्तस्य प्रतिघातार्थमुग्रं समादिशच्चक्रमनन्तवीर्यः ।¦जाज्वल्यमानं तदमोघवीर्यं व्यद्रावयद् वह्निमिमं सुदूरम् ॥ २११॥ | ||
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| verse_lines = कृत्यात्मको वह्निरसौ प्रधानवह्नेः पुत्रश्चक्रविद्रावितोऽथ | | verse_lines = कृत्यात्मको वह्निरसौ प्रधानवह्नेः पुत्रश्चक्रविद्रावितोऽथ ।¦सहानुबन्धं च सुदक्षिणं तं भस्मीचकाराऽशु सपुत्रभार्याम् ॥ २१२॥ | ||
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| verse_lines = दग्ध्वा पुरीं वारणसीं सुदर्शनः पुनः पार्श्वं वासुदेवस्य चाऽगात् | | verse_lines = दग्ध्वा पुरीं वारणसीं सुदर्शनः पुनः पार्श्वं वासुदेवस्य चाऽगात् ।¦सुदक्षिणोऽसौ तम एव जग्मिवान् कृष्णद्वेषात् सानुबन्धः सुपापः ॥ २१३॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णः क्रीडन् द्वारवत्यां सुपूर्णनित्यानन्दः(सुपूर्णो नित्यानन्दः) क्वचिदाह स्म भैष्मीम् | | verse_lines = कृष्णः क्रीडन् द्वारवत्यां सुपूर्णनित्यानन्दः(सुपूर्णो नित्यानन्दः) क्वचिदाह स्म भैष्मीम् ।¦विडम्बयन् गृहिणामेव चेष्टा नित्याविरोधोऽपि तया विदोषया ॥ २१४॥ | ||
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| verse_lines = त्वया न कार्यं मम किञ्च भद्रे मयाऽरीणां मानभङ्गार्थमेव | | verse_lines = त्वया न कार्यं मम किञ्च भद्रे मयाऽरीणां मानभङ्गार्थमेव ।¦समाहृताऽसीति सा चावियोगं सदा कृष्णेनाऽत्मनोऽप्येव वेत्त्री ॥ २१५॥ | ||
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| verse_lines = स्त्रिया भेतव्यं भर्तुरित्येव धर्मं विज्ञापयन्ती दुःखितेवाऽस देवी | | verse_lines = स्त्रिया भेतव्यं भर्तुरित्येव धर्मं विज्ञापयन्ती दुःखितेवाऽस देवी ।¦तां सान्त्वयामास गृहस्थधर्मं विज्ञापयन् देवदेवोऽप्यदुःखाम् ॥ २१६॥ | ||
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| verse_lines = एवं क्रीडत्यब्जनाभे रमायां कृष्णादिष्टो गोकुलं रौहिणेयः | | verse_lines = एवं क्रीडत्यब्जनाभे रमायां कृष्णादिष्टो गोकुलं रौहिणेयः ।¦प्रायाद् दृष्ट्वा तत्र नन्दं यशोदां तत्पूजितः कृष्णवार्तां च पृष्टः ॥ २१७॥ | ||
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| verse_lines = मासौ तत्र न्यवसद् गोपिकाभी रेमे क्षीबो यमुनामाह्वयच्च | | verse_lines = मासौ तत्र न्यवसद् गोपिकाभी रेमे क्षीबो यमुनामाह्वयच्च ।¦मत्तोऽयमित्येव नदीमनागतां चकर्ष रामो लाङ्गलेनाग्र्यवीर्यः ॥ २१८॥ | ||
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| verse_lines = पुनस्तया प्रणतः संस्तुतश्च व्यसर्जयत् तामथ नन्दगोपम्(भा.पु.१०.६५.१७) | | verse_lines = पुनस्तया प्रणतः संस्तुतश्च व्यसर्जयत् तामथ नन्दगोपम्(भा.पु.१०.६५.१७) ।¦आपृच्छ्य जगाद द्वारकां केशवाय न्यवेदयन्नन्दगोपादिभक्तिम् ॥ २१९॥ | ||
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| verse_lines = तदैव मैन्दो विविदश्च भौमे हते सखाये (सखायौ) दानवावेशयुक्तौ | | verse_lines = तदैव मैन्दो विविदश्च भौमे हते सखाये (सखायौ) दानवावेशयुक्तौ ।¦आनर्तराष्ट्रं वासुदेवप्रतीपौ व्यनाशयेतां वासुदेवोऽथ चोचे ॥ २२०॥ | ||
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| verse_lines = रामाय सोऽदाद् वरमब्जनाभो वध्यावेतौ भवतां तेऽप्यवध्यौ | | verse_lines = रामाय सोऽदाद् वरमब्जनाभो वध्यावेतौ भवतां तेऽप्यवध्यौ ।¦वराद् विरिञ्चस्य तथाऽमृताशनात् उभौ च मैन्दो विविदो व्रजेति ॥ २२१॥ | ||
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| verse_lines = दुर्योधनस्याऽस पुत्री रतिर्या पूर्वं नाम्ना लक्षणा कान्तरूपा | | verse_lines = दुर्योधनस्याऽस पुत्री रतिर्या पूर्वं नाम्ना लक्षणा कान्तरूपा ।¦स्वयंवरस्थां तां बलादेव साम्बो जग्राह सा चैनमासानुरक्ता ॥ २२३॥ | ||
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| verse_lines = श्रुत्वैव तद् वृष्णयः सर्व एव समुद्यमं चक्रिरे कौरवेषु | | verse_lines = श्रुत्वैव तद् वृष्णयः सर्व एव समुद्यमं चक्रिरे कौरवेषु ।¦निवार्य तान् बलभद्रः स्वयं ययौ सहोद्धवः कौरवेयाञ्छमार्थी ॥ २२५॥ | ||
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| verse_lines = पुरस्य बाह्योपवने स्थितः स प्रस्थापयच्चोद्धवं कौरवार्थे | | verse_lines = पुरस्य बाह्योपवने स्थितः स प्रस्थापयच्चोद्धवं कौरवार्थे ।¦आगत्य सर्वे कुरवोऽस्य पूजां चक्रुः स चाऽहोग्रसेनस्य चाऽज्ञाम् ॥ २२६॥ | ||
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| verse_text = सभार्यमाशु पुत्रकं सुयोधनाभिपूजितम् । | | verse_text = सभार्यमाशु पुत्रकं सुयोधनाभिपूजितम् । | ||
| verse_lines = सभार्यमाशु पुत्रकं सुयोधनाभिपूजितम् | | verse_lines = सभार्यमाशु पुत्रकं सुयोधनाभिपूजितम् ।¦सपारिबर्हमप्य च प्रजग्मिवान् स्वकां पुरम् ॥ २३०॥ | ||
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| verse_text = इत्यादिकर्माणि महान्ति रामस्याऽसञ्छेषस्याच्युतावेशिनोऽलम् । | | verse_text = इत्यादिकर्माणि महान्ति रामस्याऽसञ्छेषस्याच्युतावेशिनोऽलम् । | ||
| verse_lines = इत्यादिकर्माणि महान्ति रामस्याऽसञ्छेषस्याच्युतावेशिनोऽलम् | | verse_lines = इत्यादिकर्माणि महान्ति रामस्याऽसञ्छेषस्याच्युतावेशिनोऽलम् ।¦यस्याच्युतावेशविशेषकालं ज्ञात्वा भीमोऽप्यस्य नोदेति युद्धे ॥ २३१॥ | ||
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| verse_text = क्रीडायुद्धे बहुशो रौहिणेये व्यक्तिं विष्णोर्भीमसेनो विदित्वा । | | verse_text = क्रीडायुद्धे बहुशो रौहिणेये व्यक्तिं विष्णोर्भीमसेनो विदित्वा । | ||
| verse_lines = क्रीडायुद्धे बहुशो रौहिणेये व्यक्तिं विष्णोर्भीमसेनो विदित्वा | | verse_lines = क्रीडायुद्धे बहुशो रौहिणेये व्यक्तिं विष्णोर्भीमसेनो विदित्वा ।¦तात्कालिकीं पीड्यमानोऽपि (विध्यमानोऽपि) तेन नैवोद्यमं कुरुते विष्णुभक्त्या ॥ २३२॥ | ||
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| verse_text = तदा जयी प्रभवत्येष रामो नातिव्यक्तस्तत्र(नाभिव्यक्तस्तत्र) यदा जनार्दनः । | | verse_text = तदा जयी प्रभवत्येष रामो नातिव्यक्तस्तत्र(नाभिव्यक्तस्तत्र) यदा जनार्दनः । | ||
| verse_lines = तदा जयी प्रभवत्येष रामो नातिव्यक्तस्तत्र(नाभिव्यक्तस्तत्र) यदा जनार्दनः | | verse_lines = तदा जयी प्रभवत्येष रामो नातिव्यक्तस्तत्र(नाभिव्यक्तस्तत्र) यदा जनार्दनः ।¦तदा भीमो विजयी स्यात् सदैव विष्णोः केशावेशवान् यत् स रामः ॥ २३३॥ | ||
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| verse_text = एतादृशेनैव रामेण युक्ते कृष्णे द्वार्वत्यां निवसत्यब्जनाभे । | | verse_text = एतादृशेनैव रामेण युक्ते कृष्णे द्वार्वत्यां निवसत्यब्जनाभे । | ||
| verse_lines = एतादृशेनैव रामेण युक्ते कृष्णे द्वार्वत्यां निवसत्यब्जनाभे | | verse_lines = एतादृशेनैव रामेण युक्ते कृष्णे द्वार्वत्यां निवसत्यब्जनाभे ।¦स्वप्नेऽनिरुद्धेन रता कदाचिद् बाणात्मजोषा चित्रलेखामुवाच ॥ २३४॥ | ||
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| verse_text = तमानयेत्यथ सा चित्रवस्त्रे प्रदर्श्य लोकान् समदर्शयत् तम् । | | verse_text = तमानयेत्यथ सा चित्रवस्त्रे प्रदर्श्य लोकान् समदर्शयत् तम् । | ||
| verse_lines = तमानयेत्यथ सा चित्रवस्त्रे प्रदर्श्य लोकान् समदर्शयत् तम् | | verse_lines = तमानयेत्यथ सा चित्रवस्त्रे प्रदर्श्य लोकान् समदर्शयत् तम् ।¦पौत्रं विदित्वा वचनाच्च तस्याः कृष्णस्य तं चाऽनयत् तत्र रात्रौ ॥ २३५॥ | ||
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| verse_text = अनिरुद्धं गुणोदारमानीतं चित्रलेखया । | | verse_text = अनिरुद्धं गुणोदारमानीतं चित्रलेखया । | ||
| verse_lines = अनिरुद्धं गुणोदारमानीतं चित्रलेखया | | verse_lines = अनिरुद्धं गुणोदारमानीतं चित्रलेखया ।¦प्राप्य रेमे बाणसुता दिवसान् सुबहूनपि ॥ २३६॥ | ||
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| verse_text = गूढं कन्यागृहे तं तु ज्ञात्वा कन्याभिरक्षिणः । | | verse_text = गूढं कन्यागृहे तं तु ज्ञात्वा कन्याभिरक्षिणः । | ||
| verse_lines = गूढं कन्यागृहे तं तु ज्ञात्वा कन्याभिरक्षिणः | | verse_lines = गूढं कन्यागृहे तं तु ज्ञात्वा कन्याभिरक्षिणः ।¦ऊचुर्बाणायादिशच्च किङ्करान् ग्रहणेऽस्य सः ॥ २३७॥ | ||
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| verse_text = आगताननिरुद्धस्तान् परिघेण महाबलः । | | verse_text = आगताननिरुद्धस्तान् परिघेण महाबलः । | ||
| verse_lines = आगताननिरुद्धस्तान् परिघेण महाबलः | | verse_lines = आगताननिरुद्धस्तान् परिघेण महाबलः ।¦निहत्य द्रावयामास स्वयमायात् ततोऽसुरः ।¦स तु युद्ध्वाऽतिकृच्छ्रेण नागास्त्रेण बबन्ध तम् ॥ २३८॥ | ||
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| verse_text = अथ कृष्णः समारुह्य गरुडं रामसंयुतः । | | verse_text = अथ कृष्णः समारुह्य गरुडं रामसंयुतः । | ||
| verse_lines = अथ कृष्णः समारुह्य गरुडं रामसंयुतः | | verse_lines = अथ कृष्णः समारुह्य गरुडं रामसंयुतः ।¦प्रद्युम्नेन च तत्रागात् प्रथमं तत्र वह्निभिः ॥ २३९॥ | ||
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| verse_text = युद्ध्वैवाङ्गिरसा चैव क्षणाद् विद्राप्य तान् हरिः । | | verse_text = युद्ध्वैवाङ्गिरसा चैव क्षणाद् विद्राप्य तान् हरिः । | ||
| verse_lines = युद्ध्वैवाङ्गिरसा चैव क्षणाद् विद्राप्य तान् हरिः | | verse_lines = युद्ध्वैवाङ्गिरसा चैव क्षणाद् विद्राप्य तान् हरिः ।¦विद्राप्य शर्वप्रमथानाससाद ज्वरं ततः ॥ २४०॥ | ||
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| verse_lines = तेन भस्मप्रहारेण ज्वरितं रोहिणीसुतम् | | verse_lines = तेन भस्मप्रहारेण ज्वरितं रोहिणीसुतम् ।¦आश्लिष्य विज्वरं चक्रे वासुदेवो जगत्प्रभुः ॥ २४१॥ | ||
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| verse_lines = स्वयं विक्रीड्य तेनाथ कञ्चित् कालं जनार्दनः | | verse_lines = स्वयं विक्रीड्य तेनाथ कञ्चित् कालं जनार्दनः ।¦निष्पिष्य मुष्टिभिश्चान्यं ससर्ज ज्वरमच्युतः ॥ २४२॥ | ||
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| verse_lines = स्वयं जित्वाऽपि गिरिशभृत्यं नालमिति प्रभुः | | verse_lines = स्वयं जित्वाऽपि गिरिशभृत्यं नालमिति प्रभुः ।¦स्वभृत्येनैव जेतव्य इत्यन्यं ससृजे तदा ॥ २४३॥ | ||
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| verse_text = ज्वरेण वैष्णवेनासौ सुभृशं पीडितस्तदा । | | verse_text = ज्वरेण वैष्णवेनासौ सुभृशं पीडितस्तदा । | ||
| verse_lines = ज्वरेण वैष्णवेनासौ सुभृशं पीडितस्तदा | | verse_lines = ज्वरेण वैष्णवेनासौ सुभृशं पीडितस्तदा ।¦ग्रासार्थमुपनीतश्च जगाम शरणं हरिम् ।¦तेन स्तुतः स भगवान् मोचयामास तं विभुः ॥ २४४॥ | ||
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| verse_text = क्रीडार्थमत्यल्पजनेष्वपि प्रभुः कथञ्चिदेव व्यजयद् व्यथां विना । | | verse_text = क्रीडार्थमत्यल्पजनेष्वपि प्रभुः कथञ्चिदेव व्यजयद् व्यथां विना । | ||
| verse_lines = क्रीडार्थमत्यल्पजनेष्वपि प्रभुः कथञ्चिदेव व्यजयद् व्यथां विना | | verse_lines = क्रीडार्थमत्यल्पजनेष्वपि प्रभुः कथञ्चिदेव व्यजयद् व्यथां विना ।¦इत्यादि मोहाय स दर्शयत्यजो नित्यस्वतन्त्रस्य कुतो व्यथादयः ॥ २४५॥ | ||
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| verse_lines = यदा ज्वराद्या अखिलाः प्रविद्रुतास्तदा स्वयं प्राप हरिं गिरीशः | | verse_lines = यदा ज्वराद्या अखिलाः प्रविद्रुतास्तदा स्वयं प्राप हरिं गिरीशः ।¦तयोरभूद् युद्धमथैनमच्युतो विजृम्भयामास ह जृम्भणास्त्रतः ॥ २४६॥ | ||
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| verse_lines = विजृम्भिते शङ्करे निष्प्रयत्ने स्थाणूपमे संस्थिते कञ्जजातः | | verse_lines = विजृम्भिते शङ्करे निष्प्रयत्ने स्थाणूपमे संस्थिते कञ्जजातः ।¦दैत्यावेशाद् वासुदेवानभिज्ञं सम्बोधयामास सदुक्तिभिर्विभुः ॥ २४७॥ | ||
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| verse_lines = प्रगृह्य शर्वं च विवेश विष्णोः स तूदरं दर्शयामास तत्र | | verse_lines = प्रगृह्य शर्वं च विवेश विष्णोः स तूदरं दर्शयामास तत्र ।¦शिवस्य रूपं स्तम्भितं बिल्वनाम्नि वने गिरीशेन च यत् तपः कृतम् ।¦शैवं पदं प्राप्तुमेवाच्युताच्च तच्चावदत् कञ्जजः शङ्करस्य॥ २४८॥ | ||
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| verse_lines = अपेतमोहोऽथ वृषध्वजो हरिं तुष्टाव बाणोऽभिससार केशवम् | | verse_lines = अपेतमोहोऽथ वृषध्वजो हरिं तुष्टाव बाणोऽभिससार केशवम् ।¦तस्याच्युतो बाहुसहस्रमच्छिनत् पुनश्चारिं जगृहे तच्छिरोर्थे ॥ २४९॥ | ||
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| verse_lines = तदा शिवेन प्रणतो बाणरक्षणकाम्यया | | verse_lines = तदा शिवेन प्रणतो बाणरक्षणकाम्यया ।¦कृत्वा स्वभक्तं बाणं तं ररक्ष द्विभुजीकृतम् ।¦मोचयित्वाऽनिरुद्धं च ययौ बाणेन पूजितः ॥ २५०॥ | ||
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| verse_lines = एवमग्नीनङ्गिरसं ज्वरं स्कन्दमुमापतिम् | | verse_lines = एवमग्नीनङ्गिरसं ज्वरं स्कन्दमुमापतिम् ।¦बाणं चायत्नतो जित्वा प्रायाद् द्वारवतीं पुनः ॥ २५१॥ | ||
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| verse_lines = येनायत्नेन विजितः सर्वलोकहरो हरः | | verse_lines = येनायत्नेन विजितः सर्वलोकहरो हरः ।¦किं ज्वरादिजयो विष्णोस्तस्यानन्तस्य कथ्यते ॥ २५२॥ | ||
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| verse_lines = ईदृशानन्तसङ्ख्यानां शिवानां ब्रह्मणामपि | | verse_lines = ईदृशानन्तसङ्ख्यानां शिवानां ब्रह्मणामपि ।¦रमाया अपि यद्वीक्षां विना न चलितुं बलम् ॥ २५३॥ | ||
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| verse_lines = नच ज्ञानादयो भावा नचास्तित्वमपि क्वचित् | | verse_lines = नच ज्ञानादयो भावा नचास्तित्वमपि क्वचित् ।¦अनन्तशक्तेः कृष्णस्य न चित्रः(चित्रं) शूलिनो जयः ॥ २५४॥ | ||
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| verse_lines = चित्रलेखासमेतोषान्वितपौत्रसमन्वितः | | verse_lines = चित्रलेखासमेतोषान्वितपौत्रसमन्वितः ।¦सरामः ससुतो वीन्द्रमारुह्य द्वारकां गतः ।¦रेमे तत्र चिरं कृष्णो नित्यानन्दो निजेच्छया ॥ २५५॥ | ||
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| verse_lines = एवंविधान्यगणितानि | | verse_lines = एवंविधान्यगणितानि यदूत्तमस्य¦कर्माण्यगण्यमहिमस्य महोत्सवस्य ।¦नित्यं रमाकमलजन्मगिरीशशक्र-¦सूर्यादिभिः परिनुतानि विमुक्तिदानि ॥ २५६॥ | ||
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| verse_lines = एवं | | verse_lines = एवं वसत्यमितपौरुषवीर्यसारे¦नारायणे स्वपुरि शक्रधनञ्जयोक्तः ।¦सम्प्राप्य लोमशमुनिः सकलानि तीर्था-¦न्याप्तुं स पाण्डुतनयेषु सहाय आसीत् ॥ २५७॥ | ||
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| verse_lines = पृथ्वीं प्रदक्षिणत एत्य समस्ततीर्थस्नानं यथाक्रमत एव विधाय पार्थाः | | verse_lines = पृथ्वीं प्रदक्षिणत एत्य समस्ततीर्थस्नानं यथाक्रमत एव विधाय पार्थाः ।¦सम्पूज्य तेषु निखिलेषु हरिं सुभक्त्या कृष्णे समर्पयितुमापुरथ प्रभासम् ।¦सम्भावनाय सकलैर्यदुभिः समेतस्तेषां च रामसहितो हरिराजगाम ॥ २५८॥ | ||
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| verse_lines = तत्र भीमं तपोवेषं दृष्ट्वाऽतिस्नेहकारणात् | | verse_lines = तत्र भीमं तपोवेषं दृष्ट्वाऽतिस्नेहकारणात् ।¦दुर्योधनं निन्दयति रामे सात्यकिरब्रवीत् ॥ २६०॥ | ||
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| verse_lines = सर्वे वयं निहत्याद्य सकर्णान् धृतराष्ट्रजान् | | verse_lines = सर्वे वयं निहत्याद्य सकर्णान् धृतराष्ट्रजान् ।¦अभिमन्युं स्थापयामो राज्ये यावत् त्रयोदशम् ॥ २६१॥ | ||
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| verse_lines = एवं वदत्येव शिनिप्रवीरे जनार्दनः पार्थमुखान्युदीक्ष्य | | verse_lines = एवं वदत्येव शिनिप्रवीरे जनार्दनः पार्थमुखान्युदीक्ष्य ।¦उवाच शैनेय न पाण्डुपुत्राः परेण संसाधितराज्यकामाः ॥ २६३॥ | ||
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| verse_lines = स्वबाहुवीर्येण निहत्य शत्रूनाप्स्यन्ति राज्यं त इतीरितेऽमुना | | verse_lines = स्वबाहुवीर्येण निहत्य शत्रूनाप्स्यन्ति राज्यं त इतीरितेऽमुना ।¦तथेति पार्था अवदंस्ततस्ते कृष्णं पुरस्कृत्य ययुर्दशार्हाः ॥ २६४॥ | ||
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| verse_lines = क्रमेण पार्था अपि शैशिरं गिरिं समासदंस्तत्र कृष्णां सुदुर्गे | | verse_lines = क्रमेण पार्था अपि शैशिरं गिरिं समासदंस्तत्र कृष्णां सुदुर्गे ।¦विषज्जन्तीमीक्ष्य तैः सम्स्मृतोऽथ हैडिम्ब आयात् सहितो निशाचरैः ॥ २६५॥ | ||
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| verse_text = उवाह कृष्णां स तु तस्य भृत्या ऊहुः पार्थांस्ते बदर्याश्रमं च । | | verse_text = उवाह कृष्णां स तु तस्य भृत्या ऊहुः पार्थांस्ते बदर्याश्रमं च । | ||
| verse_lines = उवाह कृष्णां स तु तस्य भृत्या ऊहुः पार्थांस्ते बदर्याश्रमं च | | verse_lines = उवाह कृष्णां स तु तस्य भृत्या ऊहुः पार्थांस्ते बदर्याश्रमं च ।¦प्राप्यात्र नारायणपूजया कृतस्वकीयकार्या ययुरुत्तरां दिशम् ॥ २६६॥ | ||
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| verse_text = अतीत्य शर्वश्वशुरं गिरिं ते सुवर्णकूटं निषधं गिरिं च । | | verse_text = अतीत्य शर्वश्वशुरं गिरिं ते सुवर्णकूटं निषधं गिरिं च । | ||
| verse_lines = अतीत्य शर्वश्वशुरं गिरिं ते सुवर्णकूटं निषधं गिरिं च | | verse_lines = अतीत्य शर्वश्वशुरं गिरिं ते सुवर्णकूटं निषधं गिरिं च ।¦मेरोः प्राच्यां गन्धमादे गिरौ च प्रापुर्बदर्याश्रममुत्तमं भुवि ॥ २६७॥ | ||
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| verse_text = तस्मिन् मुनीन्द्रैरभिपूज्यमाना नारायणं पूजयन्तः सदैव । | | verse_text = तस्मिन् मुनीन्द्रैरभिपूज्यमाना नारायणं पूजयन्तः सदैव । | ||
| verse_lines = तस्मिन् मुनीन्द्रैरभिपूज्यमाना नारायणं पूजयन्तः सदैव | | verse_lines = तस्मिन् मुनीन्द्रैरभिपूज्यमाना नारायणं पूजयन्तः सदैव ।¦चक्रुस्तपो ज्ञानसमाधियुक्तं सुतत्त्वविद्यां(स तत्वविद्यां) प्रतिपादयन्तः ॥ २६८॥ | ||
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| verse_text = एवं बदर्यां विहरत्सु तेषु क्वचिद् रहः कृष्णया वायुसूनौ । | | verse_text = एवं बदर्यां विहरत्सु तेषु क्वचिद् रहः कृष्णया वायुसूनौ । | ||
| verse_lines = एवं बदर्यां विहरत्सु तेषु क्वचिद् रहः कृष्णया वायुसूनौ | | verse_lines = एवं बदर्यां विहरत्सु तेषु क्वचिद् रहः कृष्णया वायुसूनौ ।¦स्थिते गरुत्मानुरगं जहार महाह्रदाद् वासुदेवासनाग्र्यः ॥ २६९॥ | ||
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| verse_text = (तत्पक्षपातेन) तत्पक्षवातेन विचालिते तु तस्मिन् गिरौ कमलं हैममग्र्यम् । | | verse_text = (तत्पक्षपातेन) तत्पक्षवातेन विचालिते तु तस्मिन् गिरौ कमलं हैममग्र्यम् । | ||
| verse_lines = (तत्पक्षपातेन) तत्पक्षवातेन विचालिते तु तस्मिन् गिरौ कमलं हैममग्र्यम् | | verse_lines = (तत्पक्षपातेन) तत्पक्षवातेन विचालिते तु तस्मिन् गिरौ कमलं हैममग्र्यम् ।¦पपात कृष्णाभीमयोः सन्निधाने उद्यद्भानोर्मण्डलाभं सुगन्धम् ॥ २७०॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वाऽतिगन्धं वरहेमकञ्जं कुतूहलाद् द्रौपदी भीमसेनम् । | | verse_text = दृष्ट्वाऽतिगन्धं वरहेमकञ्जं कुतूहलाद् द्रौपदी भीमसेनम् । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वाऽतिगन्धं वरहेमकञ्जं कुतूहलाद् द्रौपदी भीमसेनम् | | verse_lines = दृष्ट्वाऽतिगन्धं वरहेमकञ्जं कुतूहलाद् द्रौपदी भीमसेनम् ।¦बहून्ययाचत् तादृशान्यानुभावमविषह्यं जानती देवदैत्यैः ॥ २७१॥ | ||
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| verse_text = तयाऽर्थितः सगदस्तुङ्गमेनं गिरिं वेगादारुहद् वायुसूनुः । | | verse_text = तयाऽर्थितः सगदस्तुङ्गमेनं गिरिं वेगादारुहद् वायुसूनुः । | ||
| verse_lines = तयाऽर्थितः सगदस्तुङ्गमेनं गिरिं वेगादारुहद् वायुसूनुः | | verse_lines = तयाऽर्थितः सगदस्तुङ्गमेनं गिरिं वेगादारुहद् वायुसूनुः ।¦प्रशस्यमानः सुरसिद्धसङ्घैः मृत्नन् दैत्यान् सिंहशार्दूलरूपान् ॥ २७२॥ | ||
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| verse_text = आसेदिवांस्तत्र हनूमदाख्यं निजं रूपं प्रोद्यदादित्यभासम् । | | verse_text = आसेदिवांस्तत्र हनूमदाख्यं निजं रूपं प्रोद्यदादित्यभासम् । | ||
| verse_lines = आसेदिवांस्तत्र हनूमदाख्यं निजं रूपं प्रोद्यदादित्यभासम् | | verse_lines = आसेदिवांस्तत्र हनूमदाख्यं निजं रूपं प्रोद्यदादित्यभासम् ।¦जानन्नप्येनं स्वीयरूपं स भीमश्चिक्रीड एतेन यथा परेण ॥ २७३॥ | ||
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| verse_text = धर्मो देवानां परमो मानुषत्वे स्वीये रूपेऽप्यन्यवदेव वृत्तिः । | | verse_text = धर्मो देवानां परमो मानुषत्वे स्वीये रूपेऽप्यन्यवदेव वृत्तिः । | ||
| verse_lines = धर्मो देवानां परमो मानुषत्वे स्वीये रूपेऽप्यन्यवदेव वृत्तिः | | verse_lines = धर्मो देवानां परमो मानुषत्वे स्वीये रूपेऽप्यन्यवदेव वृत्तिः ।¦अनादानं दिव्यशक्तेर्विशेषान्नरस्वभावे सर्वदा चैव वृत्तिः ।¦तस्माद् भीमो हनुमांश्चैक एव ज्यायःकनीयोवृत्तिमत्राभिपेदे ॥ २७४॥ | ||
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| verse_text = सर्वे गुणा आवृता मानुषत्वे युगानुसारान्मूलरूपानुसारात् । | | verse_text = सर्वे गुणा आवृता मानुषत्वे युगानुसारान्मूलरूपानुसारात् । | ||
| verse_lines = सर्वे गुणा आवृता मानुषत्वे युगानुसारान्मूलरूपानुसारात् | | verse_lines = सर्वे गुणा आवृता मानुषत्वे युगानुसारान्मूलरूपानुसारात् ।¦क्रमात् सुराणां भागतोऽव्यक्तरूपा आदानतो व्यक्तिमायान्त्युरूणाम् ॥ २७५॥ | ||
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| verse_text = नैवाव्यक्तिः काचिदस्तीह विष्णोः प्रादुर्भावेष्वतिसुव्यक्तशक्तेः । | | verse_text = नैवाव्यक्तिः काचिदस्तीह विष्णोः प्रादुर्भावेष्वतिसुव्यक्तशक्तेः । | ||
| verse_lines = नैवाव्यक्तिः काचिदस्तीह विष्णोः प्रादुर्भावेष्वतिसुव्यक्तशक्तेः | | verse_lines = नैवाव्यक्तिः काचिदस्तीह विष्णोः प्रादुर्भावेष्वतिसुव्यक्तशक्तेः ।¦इच्छाव्यक्तिः प्रायशो मारुतस्य तदन्येषां व्यक्तता कारणेन ॥ २७६॥ | ||
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| verse_text = तस्माद् भीमो धर्मवृद्ध्यर्थमेव स्वीये रूपेऽप्यन्यवद् वृत्तिमेव । | | verse_text = तस्माद् भीमो धर्मवृद्ध्यर्थमेव स्वीये रूपेऽप्यन्यवद् वृत्तिमेव । | ||
| verse_lines = तस्माद् भीमो धर्मवृद्ध्यर्थमेव स्वीये रूपेऽप्यन्यवद् वृत्तिमेव | | verse_lines = तस्माद् भीमो धर्मवृद्ध्यर्थमेव स्वीये रूपेऽप्यन्यवद् वृत्तिमेव ।¦प्रदर्शयामास तथाऽसुराणां मोहायैवाशक्तवच्छक्तिरूपः(शक्तरूपः) ॥ २७७॥ | ||
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| verse_lines = तद्रूपवृद्धिं भीमसेनोऽथ दृष्ट्वा श्रुत्वा हनूमन्मुखतः कथाश्च | | verse_lines = तद्रूपवृद्धिं भीमसेनोऽथ दृष्ट्वा श्रुत्वा हनूमन्मुखतः कथाश्च ।¦रामस्य तच्चातुरात्म्यं च दिव्यं चातुर्युगं धर्ममप्यग्र्यमेव ॥ २७८॥ | ||
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| verse_text = ध्वजाद् बीभत्सोर्गर्जनेनैव शत्रुपराभवे तेन दत्तेऽर्जुनस्य । | | verse_text = ध्वजाद् बीभत्सोर्गर्जनेनैव शत्रुपराभवे तेन दत्तेऽर्जुनस्य । | ||
| verse_lines = ध्वजाद् बीभत्सोर्गर्जनेनैव शत्रुपराभवे तेन दत्तेऽर्जुनस्य | | verse_lines = ध्वजाद् बीभत्सोर्गर्जनेनैव शत्रुपराभवे तेन दत्तेऽर्जुनस्य ।¦ययौ प्रणम्यैनमाश्वेव भीमः सौगन्धिकं वनमत्यग्र्यरूपम् ॥ २७९॥ | ||
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| verse_lines = नरागम्यां नलिनीमेत्य तत्र दृष्ट्वा पद्मान्यद्भुताकारवन्ति | | verse_lines = नरागम्यां नलिनीमेत्य तत्र दृष्ट्वा पद्मान्यद्भुताकारवन्ति ।¦हैमानि दिव्यान्यतिगन्धवन्ति सामासदद् वार्यमाणो नराशैः ॥ २८०॥ | ||
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| verse_lines = ते भीममात्तायुधमुग्ररूपं महाबलं रूपनवावतारम् | | verse_lines = ते भीममात्तायुधमुग्ररूपं महाबलं रूपनवावतारम् ।¦न्यवारयन् क्रोधवशा समेताः शतं सहस्राण्ययुतानि सङ्ख्ये ॥ २८१॥ | ||
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| verse_lines = वराच्छिवस्यैव परैरजेयाः शस्त्रास्त्रवृष्टिं मुमुचुः सुभीमाम्(सुभीमाः) | | verse_lines = वराच्छिवस्यैव परैरजेयाः शस्त्रास्त्रवृष्टिं मुमुचुः सुभीमाम्(सुभीमाः) ।¦भीमेऽखिलज्ञे तपसां निधाने बलोदधौ शैवशास्त्रं वदन्तः ॥ २८२॥ | ||
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| verse_text = तान् वैष्णवैरेव शास्त्रैः स भीमो विजित्य पूर्वं वाङ्मये सङ्गरे तु । | | verse_text = तान् वैष्णवैरेव शास्त्रैः स भीमो विजित्य पूर्वं वाङ्मये सङ्गरे तु । | ||
| verse_lines = तान् वैष्णवैरेव शास्त्रैः स भीमो विजित्य पूर्वं वाङ्मये सङ्गरे तु | | verse_lines = तान् वैष्णवैरेव शास्त्रैः स भीमो विजित्य पूर्वं वाङ्मये सङ्गरे तु ।¦शास्त्रास्त्रवर्षस्य कुर्वन् प्रतीपं जघ्नेऽखिलान् गदया तेषु वीरान् ॥ २८३॥ | ||
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| verse_text = वातेन कुन्त्यां बलवान् स जातः शूरस्तपस्वी द्विषतां निहन्ता । | | verse_text = वातेन कुन्त्यां बलवान् स जातः शूरस्तपस्वी द्विषतां निहन्ता । | ||
| verse_lines = वातेन कुन्त्यां बलवान् स जातः शूरस्तपस्वी द्विषतां निहन्ता | | verse_lines = वातेन कुन्त्यां बलवान् स जातः शूरस्तपस्वी द्विषतां निहन्ता ।¦सत्ये च धर्मे च रतः सदैव पराक्रमे शत्रुभिरप्रधृष्यः ॥ २८४॥ | ||
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| verse_lines = तत्रापरांश्चैव बहूनसत्यं निरीश्वरं चाप्रतिष्ठं च लोकम् | | verse_lines = तत्रापरांश्चैव बहूनसत्यं निरीश्वरं चाप्रतिष्ठं च लोकम् ।¦सिद्धोऽहमीशोऽहमिति ब्रुवाणान् गुणान् विष्णोः ख्यापयन् वादतोऽजैत् ॥ २८५॥ | ||
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| verse_lines = भिन्नं विष्णुमधिकं सर्वतश्च ब्रुवन् प्रवीरान् लक्षमेषां निजघ्ने | | verse_lines = भिन्नं विष्णुमधिकं सर्वतश्च ब्रुवन् प्रवीरान् लक्षमेषां निजघ्ने ।¦ते तस्य वीर्यं च बलं च दृष्ट्वा विद्याबलं बाहुबलं तथैव ।¦अशक्नुवन्तः सहिताः समस्ता हतप्रवीराः सहसा निवृत्ताः ॥ २८६॥ | ||
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| verse_lines = विक्रम्य तान् गदयाऽसौ निहत्य विद्राप्य सर्वान् नलिनीं प्रविश्य | | verse_lines = विक्रम्य तान् गदयाऽसौ निहत्य विद्राप्य सर्वान् नलिनीं प्रविश्य ।¦पीत्वाऽमृताम्भश्च ततोऽम्बुजानि दिव्यानि जग्राह कुरुप्रवीरः ॥ २८७॥ | ||
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| verse_lines = अथो कलहशंसीनि निमित्तानि युधिष्ठिरः | | verse_lines = अथो कलहशंसीनि निमित्तानि युधिष्ठिरः ।¦दृष्ट्वा कृष्णामपृच्छच्च क्व भीम इति दीनधीः ॥ २८८॥ | ||
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| verse_text = सौगन्धिकार्थं यातं तं श्रुत्वा कृष्णामुखान्नृपः । | | verse_text = सौगन्धिकार्थं यातं तं श्रुत्वा कृष्णामुखान्नृपः । | ||
| verse_lines = सौगन्धिकार्थं यातं तं श्रुत्वा कृष्णामुखान्नृपः | | verse_lines = सौगन्धिकार्थं यातं तं श्रुत्वा कृष्णामुखान्नृपः ।¦आरुह्य राक्षसश्रेष्ठान् कृष्णया भ्रातृभिः सह ॥ २८९॥ | ||
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| verse_lines = ययौ वृकोदरो यत्र दृष्ट्वा चैनमवस्थितम् | | verse_lines = ययौ वृकोदरो यत्र दृष्ट्वा चैनमवस्थितम् ।¦उवाच मैवमित्येनं भीतो गिरिशकोपतः ॥ २९०॥ | ||
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| verse_lines = देवेभ्यो मरणाद् भीता राक्षसा वित्तपाज्ञया | | verse_lines = देवेभ्यो मरणाद् भीता राक्षसा वित्तपाज्ञया ।¦तदीयां नलिनीं ते हि रक्षन्त्यस्याऽश्रयो हरः ।¦जानन् वित्तेश्वरो भीममाहात्म्यं न चुकोप ह ॥ २९१॥ | ||
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| verse_lines = वसत्सु तत्र पार्थेषु पुनः कतिपयैर्दिनैः | | verse_lines = वसत्सु तत्र पार्थेषु पुनः कतिपयैर्दिनैः ।¦उवाच भीमसेनस्य यशोधर्मादिभिवृद्धये(यशोधर्मातिवृद्धये) ॥ २९२॥ | ||
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| verse_lines = पञ्चवर्णानि पुष्पानि कृष्णा वीक्ष्याऽहृतानि तु | | verse_lines = पञ्चवर्णानि पुष्पानि कृष्णा वीक्ष्याऽहृतानि तु ।¦मारुतेन कुबेरस्य गृहान्नृभिरगम्यतः ॥ २९३॥ | ||
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| verse_lines = अगम्योऽयं गिरिः सर्वैः कुबेरेणाभिपालितः | | verse_lines = अगम्योऽयं गिरिः सर्वैः कुबेरेणाभिपालितः ।¦अद्य(अथ) त्वयैव गन्तव्यो विधूयाखिलराक्षसान् ॥ २९४॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्त आशु सगदः सधनुः सबाणो भीमो गिरीन्द्रमजितोरुबलो विगाहे । | | verse_text = इत्युक्त आशु सगदः सधनुः सबाणो भीमो गिरीन्द्रमजितोरुबलो विगाहे । | ||
| verse_lines = इत्युक्त आशु सगदः सधनुः सबाणो भीमो गिरीन्द्रमजितोरुबलो विगाहे | | verse_lines = इत्युक्त आशु सगदः सधनुः सबाणो भीमो गिरीन्द्रमजितोरुबलो विगाहे ।¦प्राप्तं निशम्य (निशाम्य) बलदैवतसूनुमत्र पद्मत्रयं न्यरुणदुद्धतराक्षसानाम् ॥ २९५॥ | ||
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| verse_text = अग्रे निधाय मणिमन्तमजेयमुग्रं शम्भोर्वराद् विविधशस्त्रमहास्त्रवृष्ट्या (महाभिवृष्ट्या) । | | verse_text = अग्रे निधाय मणिमन्तमजेयमुग्रं शम्भोर्वराद् विविधशस्त्रमहास्त्रवृष्ट्या (महाभिवृष्ट्या) । | ||
| verse_lines = अग्रे निधाय मणिमन्तमजेयमुग्रं शम्भोर्वराद् विविधशस्त्रमहास्त्रवृष्ट्या (महाभिवृष्ट्या) | | verse_lines = अग्रे निधाय मणिमन्तमजेयमुग्रं शम्भोर्वराद् विविधशस्त्रमहास्त्रवृष्ट्या (महाभिवृष्ट्या) ।¦तान् सर्वराक्षसगणान् मणिमत्समेतान् भीमो जघान सपदि प्रवरैः शरौघैः ॥ २९६॥ | ||
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| verse_lines = ते हता भीमसेनेन प्रापुरन्धन्धन्तमोऽखिलाः | | verse_lines = ते हता भीमसेनेन प्रापुरन्धन्धन्तमोऽखिलाः ।¦हताः सौगन्धिकवने मणिमांश्च पुनः कलौ ।¦जातो मिथ्यामतिं सम्यगास्तीर्याऽपस्तमोऽधिकम् ॥ २९८॥ | ||
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| verse_text = ततो वैश्रवणो राजा महापद्मत्रये हते । | | verse_text = ततो वैश्रवणो राजा महापद्मत्रये हते । | ||
| verse_lines = ततो वैश्रवणो राजा महापद्मत्रये हते | | verse_lines = ततो वैश्रवणो राजा महापद्मत्रये हते ।¦राक्षसानामवध्यानां सखाये मणिमत्यपि ।¦आरुरोह रथं दिव्यं योद्धुकामो वृकोदरम् ॥ २९९॥ | ||
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| verse_text = असुरावेशतस्तस्य भीमे क्रोधो महानभूत् । | | verse_text = असुरावेशतस्तस्य भीमे क्रोधो महानभूत् । | ||
| verse_lines = असुरावेशतस्तस्य भीमे क्रोधो महानभूत् | | verse_lines = असुरावेशतस्तस्य भीमे क्रोधो महानभूत् ।¦स आजगाम भीमेन योद्धुं वित्तपतिः स्वयम् ॥ ३००॥ | ||
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| verse_text = तस्मिन् काले भीमसेनस्य घोषं श्रुत्वा राजाऽपृच्छदाशु स्म कृष्णाम् । | | verse_text = तस्मिन् काले भीमसेनस्य घोषं श्रुत्वा राजाऽपृच्छदाशु स्म कृष्णाम् । | ||
| verse_lines = तस्मिन् काले भीमसेनस्य घोषं श्रुत्वा राजाऽपृच्छदाशु स्म कृष्णाम् | | verse_lines = तस्मिन् काले भीमसेनस्य घोषं श्रुत्वा राजाऽपृच्छदाशु स्म कृष्णाम् ।¦क्व भीम इत्येव तयोदितं च श्रुत्वा जगामऽशु रक्षोंऽससंस्थः ॥ ३०१॥ | ||
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| verse_text = सभ्रातृके मुनिभिः कृष्णया च गते राजन्यत्र भीमं कुबेरः । | | verse_text = सभ्रातृके मुनिभिः कृष्णया च गते राजन्यत्र भीमं कुबेरः । | ||
| verse_lines = सभ्रातृके मुनिभिः कृष्णया च गते राजन्यत्र भीमं कुबेरः | | verse_lines = सभ्रातृके मुनिभिः कृष्णया च गते राजन्यत्र भीमं कुबेरः ।¦दृष्ट्वाऽसुरावेशतो धर्मजं च किञ्चिन्मुक्तः स्नेहयुक्तस्तथाऽऽस(तदाऽस) ॥ ३०२॥ | ||
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| verse_text = धृतायुधं भीममीक्ष्यापि किञ्चिद् दैत्यावेशाद् बहु मेने न भीमम् । | | verse_text = धृतायुधं भीममीक्ष्यापि किञ्चिद् दैत्यावेशाद् बहु मेने न भीमम् । | ||
| verse_lines = धृतायुधं भीममीक्ष्यापि किञ्चिद् दैत्यावेशाद् बहु मेने न भीमम् | | verse_lines = धृतायुधं भीममीक्ष्यापि किञ्चिद् दैत्यावेशाद् बहु मेने न भीमम् ।¦अगस्त्यशापं चावदत् स्वस्य पूर्वं सखायनाशे कारणं राजराजः ॥ ३०३॥ | ||
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| verse_text = दैत्यावेशादुज्झितः शान्तभावो ददौ निजं स्थानमेषां सुतुष्टः । | | verse_text = दैत्यावेशादुज्झितः शान्तभावो ददौ निजं स्थानमेषां सुतुष्टः । | ||
| verse_lines = दैत्यावेशादुज्झितः शान्तभावो ददौ निजं स्थानमेषां सुतुष्टः | | verse_lines = दैत्यावेशादुज्झितः शान्तभावो ददौ निजं स्थानमेषां सुतुष्टः ।¦आवासार्थं तेऽवसंस्तत्र पार्थास्तथाऽन्येषां दैवतानां(देवतानां) गृहेषु ॥ ३०४॥ | ||
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| verse_text = तत्रैव तेषां वसतां महात्मनामानन्दिनामब्दचतुष्टये गते । | | verse_text = तत्रैव तेषां वसतां महात्मनामानन्दिनामब्दचतुष्टये गते । | ||
| verse_lines = तत्रैव तेषां वसतां महात्मनामानन्दिनामब्दचतुष्टये गते | | verse_lines = तत्रैव तेषां वसतां महात्मनामानन्दिनामब्दचतुष्टये गते ।¦पञ्चाब्दमध्याप्य महान्ति चास्त्राणीन्द्रो गुर्वर्थं फल्गुनेनार्थितोऽभूत् ॥ ३०५॥ | ||
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| verse_text = वधं वव्रे स्वशत्रूणामिन्द्रः पार्थात् स्वरूपतः । | | verse_text = वधं वव्रे स्वशत्रूणामिन्द्रः पार्थात् स्वरूपतः । | ||
| verse_lines = वधं वव्रे स्वशत्रूणामिन्द्रः पार्थात् स्वरूपतः | | verse_lines = वधं वव्रे स्वशत्रूणामिन्द्रः पार्थात् स्वरूपतः ।¦निवातकवचाख्यानां येषां(तेषां, एषां) ब्रह्मा ददौ वरम् ।¦अवध्यतां (अवध्यत्वं) सुरैर्दैत्यैर्गन्धर्वैः पक्षिराक्षसैः ॥ ३०६॥ | ||
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| verse_text = पुनरिन्द्रेणार्थितोऽदाज्जहीमान् नरदेहवान् । | | verse_text = पुनरिन्द्रेणार्थितोऽदाज्जहीमान् नरदेहवान् । | ||
| verse_lines = पुनरिन्द्रेणार्थितोऽदाज्जहीमान् नरदेहवान् | | verse_lines = पुनरिन्द्रेणार्थितोऽदाज्जहीमान् नरदेहवान् ।¦इति तेनार्जुनं शक्रः स्वात्मानं नरदेहगम् ।¦जगाद तान् जहीत्येव किरीटं स्वं निबद्ध्य च ॥ ३०७॥ | ||
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| verse_text = ऐन्द्रं स्यन्दनमारुह्य पार्थो मातलिसंयुतः । | | verse_text = ऐन्द्रं स्यन्दनमारुह्य पार्थो मातलिसंयुतः । | ||
| verse_lines = ऐन्द्रं स्यन्दनमारुह्य पार्थो मातलिसंयुतः | | verse_lines = ऐन्द्रं स्यन्दनमारुह्य पार्थो मातलिसंयुतः ।¦गाण्डीवं धनुरादाय ययौ हन्तुं महासुरान् ॥ ३०८॥ | ||
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| verse_lines = शङ्खं ददुस्तस्य देवा देवदत्तः स शङ्खराट् | | verse_lines = शङ्खं ददुस्तस्य देवा देवदत्तः स शङ्खराट् ।¦नादयन् शङ्खघोषेण धनुर्विस्फारयन् महत् ॥ ३०९॥ | ||
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| verse_text = दधानः कुण्डले दिव्ये शक्रदत्ते सुभास्वरे । | | verse_text = दधानः कुण्डले दिव्ये शक्रदत्ते सुभास्वरे । | ||
| verse_lines = दधानः कुण्डले दिव्ये शक्रदत्ते सुभास्वरे | | verse_lines = दधानः कुण्डले दिव्ये शक्रदत्ते सुभास्वरे ।¦आससाद पुरं दिव्यं दैत्यानामिन्द्रनन्दनः ॥ ३१०॥ | ||
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| verse_text = तस्य शङ्खध्वनिं श्रुत्वा गाण्डीवस्य च निस्स्वनम् । | | verse_text = तस्य शङ्खध्वनिं श्रुत्वा गाण्डीवस्य च निस्स्वनम् । | ||
| verse_lines = तस्य शङ्खध्वनिं श्रुत्वा गाण्डीवस्य च निस्स्वनम् | | verse_lines = तस्य शङ्खध्वनिं श्रुत्वा गाण्डीवस्य च निस्स्वनम् ।¦अभिसस्रुर्महावीर्याः निवातकवचासुराः ॥ ३११॥ | ||
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| verse_lines = तिस्रः कोट्यो दानवानां स्वयम्भुवरगर्विताः | | verse_lines = तिस्रः कोट्यो दानवानां स्वयम्भुवरगर्विताः ।¦नानायुधैः रणे पार्थमभ्यवर्षन् सुसंहताः ॥ ३१२॥ | ||
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| verse_text = तेषां स शस्त्राणि किरीटमाली(किरीटमौली) निवार्य गाण्डीवधनुःप्रमुक्तैः(गाण्डीवधनुःप्रयुक्तैः) । | | verse_text = तेषां स शस्त्राणि किरीटमाली(किरीटमौली) निवार्य गाण्डीवधनुःप्रमुक्तैः(गाण्डीवधनुःप्रयुक्तैः) । | ||
| verse_lines = तेषां स शस्त्राणि किरीटमाली(किरीटमौली) निवार्य गाण्डीवधनुःप्रमुक्तैः(गाण्डीवधनुःप्रयुक्तैः) | | verse_lines = तेषां स शस्त्राणि किरीटमाली(किरीटमौली) निवार्य गाण्डीवधनुःप्रमुक्तैः(गाण्डीवधनुःप्रयुक्तैः) ।¦शरैः शिरांसि प्रचकर्त वीरो महास्त्रशिक्षाबलसम्प्रयुक्तैः ॥ ३१३॥ | ||
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| verse_lines = सर्वे हतास्तेन महारथेन ते दानवाः सोऽपि ययौ तथाऽन्यान् | | verse_lines = सर्वे हतास्तेन महारथेन ते दानवाः सोऽपि ययौ तथाऽन्यान् ।¦पौलोमकालेयगणाभिधानान् षष्टिं सहस्राणि महारथानाम् ॥ ३१४॥ | ||
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| verse_lines = तानस्त्रशस्त्राण्यभिवर्षमाणान् धनञ्जयः पाशुपतास्त्रतो द्राक् | | verse_lines = तानस्त्रशस्त्राण्यभिवर्षमाणान् धनञ्जयः पाशुपतास्त्रतो द्राक् ।¦दग्ध्वा ययौ पुनरेवेन्द्रसद्म तं सस्वजे प्रीतियुक्तश्च शक्रः ॥ ३१५॥ | ||
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| verse_lines = ययुरन्धं(प्रापुरन्धं)तमस्तेऽपि सर्वदेवद्विषोऽसुराः | | verse_lines = ययुरन्धं(प्रापुरन्धं)तमस्तेऽपि सर्वदेवद्विषोऽसुराः ।¦अथानुज्ञाप्य पितरं रथेनैन्द्रेण भास्वता ।¦सोदर्याणां सकाशं स ययौ वज्रधरात्मजः ॥ ३१६॥ | ||
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| verse_lines = आयान्तमीक्ष्य बीभत्सुं मुमुदुर्भ्रातरोऽधिकम् | | verse_lines = आयान्तमीक्ष्य बीभत्सुं मुमुदुर्भ्रातरोऽधिकम् ।¦ऊषुश्च चतुरोऽब्दांस्ते(चतुरब्दांस्ते) पुनर्मेरौ प्रमोदिनः ॥ ३१७॥ | ||
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| verse_lines = कथाभिर्वासुदेवस्य ध्यानेनाभ्यर्चनेन च | | verse_lines = कथाभिर्वासुदेवस्य ध्यानेनाभ्यर्चनेन च ।¦ययौ कालः सुखेनैव तेषां विष्णुरतात्मनाम्(विष्णुपरात्मनाम्) ॥ ३१८॥ | ||
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| verse_lines = नैव शत्रूननुत्साद्य नानादाय महद्यशः | | verse_lines = नैव शत्रूननुत्साद्य नानादाय महद्यशः ।¦नाकृत्वा वासुदेवाज्ञां राज्ञां मुख्यगतिर्भवेत् ॥ ३१९॥ | ||
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| verse_lines = तदन्येषां तु वर्णानां क्षमा बाह्येषु शत्रुषु | | verse_lines = तदन्येषां तु वर्णानां क्षमा बाह्येषु शत्रुषु ।¦प्रायो धर्म इति प्रोक्तो हरेराज्ञाऽखिलस्य च ॥ ३२०॥ | ||
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| verse_lines = इति भीमवचः श्रुत्वा ससोदर्यो युधिष्ठिरः | | verse_lines = इति भीमवचः श्रुत्वा ससोदर्यो युधिष्ठिरः ।¦राक्षसस्कन्धमारूढः(राक्षसस्कन्धमारुह्य) कृष्णया चाऽययौ पुनः ॥ ३२१॥ | ||
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| verse_lines = पादेषु तेषु निवसत्सु | | verse_lines = पादेषु तेषु निवसत्सु हिमाचलस्य¦याम्याश्रितेषु पवमानसुतः कदाचित् ।¦धन्वी मृगाननुचरन् सहसाऽऽससाद¦हाऽयोः(ह्यायोः) सुतं नहुषमाजगरोरुरूपम् ॥ ३२२॥ | ||
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| verse_lines = पूर्वं हि वृत्रवधतोऽम्बुजनालतन्तु- | | verse_lines = पूर्वं हि वृत्रवधतोऽम्बुजनालतन्तु-¦संस्थे शचीप्रणयिनि प्रविचिन्त्य देवाः ।¦चक्रुस्त्रिलोकपतिमायुसुतं वरं च¦दत्वाऽक्षिगोचरतपोऽस्य बलं च सर्वम् ॥ ३२३॥ | ||
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| verse_lines = स सर्वसुरविप्रेन्द्रतपश्च बलमक्षयम् | | verse_lines = स सर्वसुरविप्रेन्द्रतपश्च बलमक्षयम् ।¦अवाप्य ववृधे नित्यं दर्पादैच्छच्छचीमपि ॥ ३२४॥ | ||
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| verse_lines = स (सुरेन्द्रवचनात्)इन्द्रवचनाच्छच्या महर्षिगणवाहने | | verse_lines = स (सुरेन्द्रवचनात्)इन्द्रवचनाच्छच्या महर्षिगणवाहने ।¦नियुक्तो वञ्चनायैव वाहयामास तानृषीन् ॥ ३२५॥ | ||
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| verse_lines = स शचीप्रतिषेधार्थमगस्त्येन महात्मना | | verse_lines = स शचीप्रतिषेधार्थमगस्त्येन महात्मना ।¦वेदप्रामाण्यविषये पृष्टो नेत्याह मूढधीः ।¦प्रमाणमिति तेनोक्तः शिरस्येनं पदाऽहनत् ॥ ३२६॥ | ||
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| verse_lines = तदा भृगुं तस्य जटासु लीनं कदाऽपि तस्याक्षिपथं न यातम्(न यान्तम्) | | verse_lines = तदा भृगुं तस्य जटासु लीनं कदाऽपि तस्याक्षिपथं न यातम्(न यान्तम्) ।¦आविश्य कञ्जप्रभवः शशाप व्रजाऽशु पापाजगरत्वमेव ॥ ३२७॥ | ||
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| verse_lines = सर्वदेवमुनीन्द्राणां (सर्वदेवमुनीनां) यत् तपस्त्वामुपाश्रितम् (समुपाश्रितम्) | | verse_lines = सर्वदेवमुनीन्द्राणां (सर्वदेवमुनीनां) यत् तपस्त्वामुपाश्रितम् (समुपाश्रितम्) ।¦तच्च सर्वं तमेवैति नात्र कार्या विचारणा ॥ ३२९॥ | ||
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| verse_lines = यदा प्रश्नांस्त्वदीयांश्च कश्चित् परिहरिष्यति | | verse_lines = यदा प्रश्नांस्त्वदीयांश्च कश्चित् परिहरिष्यति ।¦तदा गन्ताऽसि च दिवं विसृज्याऽजगरीं तनुम् ।¦स्मृतिश्च मत्प्रसादेन सर्वदा ते भविष्यति ॥ ३३०॥ | ||
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| verse_lines = क्वचित् पापं च पुण्यानां वृद्धये भवति स्फुटम् | | verse_lines = क्वचित् पापं च पुण्यानां वृद्धये भवति स्फुटम् ।¦वृत्रहत्या यथेन्द्रस्य जाता धर्मस्य वृद्धये(धर्माभिवृद्धये) ॥ ३३४॥ | ||
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| verse_text = देवानां वा मुनीनां वा भवेदेवं नवै नृणाम् । | | verse_text = देवानां वा मुनीनां वा भवेदेवं नवै नृणाम् । | ||
| verse_lines = देवानां वा मुनीनां वा भवेदेवं नवै नृणाम् | | verse_lines = देवानां वा मुनीनां वा भवेदेवं नवै नृणाम् ।¦पापं यत् पुण्यमेवैतदसुराणां विलोमतः ।¦एवं स्कान्दे हि वचनं न पापं तच्छचीपतेः ॥ ३३५॥ | ||
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| verse_text = नान्यस्य पदमाप्स्यन्ति तद् देवानां व्रतं परम् । | | verse_text = नान्यस्य पदमाप्स्यन्ति तद् देवानां व्रतं परम् । | ||
| verse_lines = नान्यस्य पदमाप्स्यन्ति तद् देवानां व्रतं परम् | | verse_lines = नान्यस्य पदमाप्स्यन्ति तद् देवानां व्रतं परम् ।¦तस्मात् तं(ते) नहुषं शक्रपदे विदधुरीश्वराः(निदधुरीश्वराः) ॥ ३३६॥ | ||
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| verse_text = तस्मिन्नेवं निपतिते ब्रह्मणः शापकारणात् । | | verse_text = तस्मिन्नेवं निपतिते ब्रह्मणः शापकारणात् । | ||
| verse_lines = तस्मिन्नेवं निपतिते ब्रह्मणः शापकारणात् | | verse_lines = तस्मिन्नेवं निपतिते ब्रह्मणः शापकारणात् ।¦अष्टाविंशतिमे प्राप युगे भीमस्तमुल्बणम् ।¦जानन्नेव तदीयं तत् तप आदातुमिच्छया (आदातुमीप्सया) ॥ ३३७॥ | ||
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| verse_text = यत्तत् सुराणां सर्वेषां मुनीनां च तपः स्थितम् । | | verse_text = यत्तत् सुराणां सर्वेषां मुनीनां च तपः स्थितम् । | ||
| verse_lines = यत्तत् सुराणां सर्वेषां मुनीनां च तपः स्थितम् | | verse_lines = यत्तत् सुराणां सर्वेषां मुनीनां च तपः स्थितम् ।¦तद् गृहीतुं वशगवदिच्छयैवाऽस मारुतिः ॥ ३३८॥ | ||
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| verse_text = देवानां हि नृजातानामल्पं व्यक्तं भवेद् बलम् । | | verse_text = देवानां हि नृजातानामल्पं व्यक्तं भवेद् बलम् । | ||
| verse_lines = देवानां हि नृजातानामल्पं व्यक्तं भवेद् बलम् | | verse_lines = देवानां हि नृजातानामल्पं व्यक्तं भवेद् बलम् ।¦इच्छया व्यक्ततां याति वायोरन्येषु तच्च न ॥ ३३९॥ | ||
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| verse_text = नित्यं व्यक्ता गुणा विष्णोरिति शास्त्रस्य निर्णयः । | | verse_text = नित्यं व्यक्ता गुणा विष्णोरिति शास्त्रस्य निर्णयः । | ||
| verse_lines = नित्यं व्यक्ता गुणा विष्णोरिति शास्त्रस्य निर्णयः | | verse_lines = नित्यं व्यक्ता गुणा विष्णोरिति शास्त्रस्य निर्णयः ।¦एवमन्येऽपि हि गुणा मानुषादिषु जन्मसु ॥ ३४०॥ | ||
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| verse_text = देवानां मानुषादौ तु शक्येऽप्यव्यक्तताकृतेः । | | verse_text = देवानां मानुषादौ तु शक्येऽप्यव्यक्तताकृतेः । | ||
| verse_lines = देवानां मानुषादौ तु शक्येऽप्यव्यक्तताकृतेः | | verse_lines = देवानां मानुषादौ तु शक्येऽप्यव्यक्तताकृतेः ।¦धर्मवृद्धिर्भवेत् तेषां प्रीतो भवति केशवः ॥ ३४१॥ | ||
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| verse_text = तन्मानुषे बले तस्य वराद् वारितवत्(वरादावृतवत्) स्थिते । | | verse_text = तन्मानुषे बले तस्य वराद् वारितवत्(वरादावृतवत्) स्थिते । | ||
| verse_lines = तन्मानुषे बले तस्य वराद् वारितवत्(वरादावृतवत्) स्थिते | | verse_lines = तन्मानुषे बले तस्य वराद् वारितवत्(वरादावृतवत्) स्थिते ।¦दैवं बलं न शक्तोऽपि व्यक्तं चक्रे न मारुतिः(नाविश्चक्रे स मारुतिः) ॥ ३४२॥ | ||
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| verse_text = आत्ममोक्षाय न प्रश्नान् व्याजहार स चाभिभूः । | | verse_text = आत्ममोक्षाय न प्रश्नान् व्याजहार स चाभिभूः । | ||
| verse_lines = आत्ममोक्षाय न प्रश्नान् व्याजहार स चाभिभूः | | verse_lines = आत्ममोक्षाय न प्रश्नान् व्याजहार स चाभिभूः ।¦विद्योपजीवनं धर्मो विप्राणामपि नो यतः ॥ ३४३॥ | ||
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| verse_lines = किमुत क्षत्रियस्येति जानन्नपि वृकोदरः | | verse_lines = किमुत क्षत्रियस्येति जानन्नपि वृकोदरः ।¦तत्प्रश्नपरिहारेण नाऽत्ममोक्षं समैच्छत ॥ ३४४॥ | ||
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| verse_text = अयतन्तमपि ह्येनं(ह्येषो) चालनायापि नाशकत् । | | verse_text = अयतन्तमपि ह्येनं(ह्येषो) चालनायापि नाशकत् । | ||
| verse_lines = अयतन्तमपि ह्येनं(ह्येषो) चालनायापि नाशकत् | | verse_lines = अयतन्तमपि ह्येनं(ह्येषो) चालनायापि नाशकत् ।¦पूर्णोऽपि सर्वलोकानां बलेन नहुषस्तदा ।¦वेष्टयित्वैव तं भीमं स्थितोऽसौ नाशकत् परम् ॥ ३४५॥ | ||
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| verse_lines = भ्रातृमात्रादिषु(भ्रातृमात्रादिभिः) स्नेहात् क्षिप्रमात्मविमोक्षणम् | | verse_lines = भ्रातृमात्रादिषु(भ्रातृमात्रादिभिः) स्नेहात् क्षिप्रमात्मविमोक्षणम् ।¦इच्छन्नपि न मोक्षाय यत्नं चक्रे वृकोदरः ।¦सर्ववेदमुनीन्द्राणां तप आदातुमत्रगम् ॥ ३४६॥ | ||
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| verse_text = भ्रात्रादिषु स्नेहवशान्न स्थातव्यमिहेत्यपि । | | verse_text = भ्रात्रादिषु स्नेहवशान्न स्थातव्यमिहेत्यपि । | ||
| verse_lines = भ्रात्रादिषु स्नेहवशान्न स्थातव्यमिहेत्यपि | | verse_lines = भ्रात्रादिषु स्नेहवशान्न स्थातव्यमिहेत्यपि ।¦मन्वानः कालतो भङ्गं स्वयमेवैष यास्यति ।¦आज्ञया वासुदेवस्य दार्ढ्याद् देहस्य मे तथा ॥ ३४७॥ | ||
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| verse_text = स्रस्ताङ्गे पतिते सर्पे यास्यामीति विचिन्तयन् । | | verse_text = स्रस्ताङ्गे पतिते सर्पे यास्यामीति विचिन्तयन् । | ||
| verse_lines = स्रस्ताङ्गे पतिते सर्पे यास्यामीति विचिन्तयन् | | verse_lines = स्रस्ताङ्गे पतिते सर्पे यास्यामीति विचिन्तयन् ।¦तस्थौ भीमो हरिं ध्यायन् स्वभावान्न तदिच्छया ॥ ३४८॥ | ||
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| verse_text = तदैव ब्रह्मवचनात् पूर्वोक्तात् केशवाज्ञया । | | verse_text = तदैव ब्रह्मवचनात् पूर्वोक्तात् केशवाज्ञया । | ||
| verse_lines = तदैव ब्रह्मवचनात् पूर्वोक्तात् केशवाज्ञया | | verse_lines = तदैव ब्रह्मवचनात् पूर्वोक्तात् केशवाज्ञया ।¦बलं तपश्च सर्वस्य तत्स्थमायाद् वृकोदरम् ॥ ३४९॥ | ||
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| verse_lines = पूरिते नहुषस्थेन तपसा च बलेन च | | verse_lines = पूरिते नहुषस्थेन तपसा च बलेन च ।¦भीमे स नहुषोऽथाऽसीत् स्रस्तभोगः शनैः शनैः ॥ ३५०॥ | ||
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| verse_lines = गते भीमे निमित्तानि दृष्ट्वा राजा युधिष्ठिरः | | verse_lines = गते भीमे निमित्तानि दृष्ट्वा राजा युधिष्ठिरः ।¦पप्रच्छ क्व गतो भीम इति कृष्णां चलन्मनाः ॥ ३५१॥ | ||
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| verse_lines = यातं मृगार्थं स निशम्य तस्यास्तदूरुवेगात् पतितान् नगेन्द्रान् | | verse_lines = यातं मृगार्थं स निशम्य तस्यास्तदूरुवेगात् पतितान् नगेन्द्रान् ।¦दृष्ट्वा पथा तेन ययौ स तत्र दृष्ट्वा च सर्पावृतमन्वपृच्छत् ॥ ३५२॥ | ||
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| verse_lines = स कारणं नहुषात् सर्वमेव शुश्राव तत्प्रश्नमशेषतश्च | | verse_lines = स कारणं नहुषात् सर्वमेव शुश्राव तत्प्रश्नमशेषतश्च ।¦भ्रातृस्नेहाद् व्याकरोद् धर्मसूनुस्तदैव सोऽप्यारुहत् स्वर्गलोकम् ॥ ३५३॥ | ||
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| verse_text = दिव्याम्बरे कुण्डलिनि स्वपूर्वे गते विमानेन स धर्मराजः । | | verse_text = दिव्याम्बरे कुण्डलिनि स्वपूर्वे गते विमानेन स धर्मराजः । | ||
| verse_lines = दिव्याम्बरे कुण्डलिनि स्वपूर्वे गते विमानेन स धर्मराजः | | verse_lines = दिव्याम्बरे कुण्डलिनि स्वपूर्वे गते विमानेन स धर्मराजः ।¦भीमश्चाऽयात् स्वाश्रमायैव सर्वं युधिष्ठिरः कथयामास तत्र ॥ ३५४॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वा कृष्णा भ्रातरश्चास्य सर्वे सर्वे मुनीन्द्रा भीमसेनेऽतिभक्ताः । | | verse_text = श्रुत्वा कृष्णा भ्रातरश्चास्य सर्वे सर्वे मुनीन्द्रा भीमसेनेऽतिभक्ताः । | ||
| verse_lines = श्रुत्वा कृष्णा भ्रातरश्चास्य सर्वे सर्वे मुनीन्द्रा भीमसेनेऽतिभक्ताः | | verse_lines = श्रुत्वा कृष्णा भ्रातरश्चास्य सर्वे सर्वे मुनीन्द्रा भीमसेनेऽतिभक्ताः ।¦व्रीडां ययुर्भीमसेनग्रहेण तथाऽब्रुवन् स्नेहतो भीमसेनम् ॥ ३५५॥ | ||
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| verse_text = नैतादृशं साहसं तेऽनुरूपं शक्तोऽपि यत् स्वात्मनो मोक्षणाय(स्वात्मविमोक्षणाय) । | | verse_text = नैतादृशं साहसं तेऽनुरूपं शक्तोऽपि यत् स्वात्मनो मोक्षणाय(स्वात्मविमोक्षणाय) । | ||
| verse_lines = नैतादृशं साहसं तेऽनुरूपं शक्तोऽपि यत् स्वात्मनो मोक्षणाय(स्वात्मविमोक्षणाय) | | verse_lines = नैतादृशं साहसं तेऽनुरूपं शक्तोऽपि यत् स्वात्मनो मोक्षणाय(स्वात्मविमोक्षणाय) ।¦(नैवाऽचरो) नैवाऽकरोर्यत्नमतो निजानां महद्दुःखं हृदये प्रार्पयस्त्वम् ॥ ३५६॥ | ||
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| verse_text = मैवं पुनः कार्यमिति ब्रुवन्तः समाश्लिषन् सर्व एवैत्य भीमम् । | | verse_text = मैवं पुनः कार्यमिति ब्रुवन्तः समाश्लिषन् सर्व एवैत्य भीमम् । | ||
| verse_lines = मैवं पुनः कार्यमिति ब्रुवन्तः समाश्लिषन् सर्व एवैत्य भीमम् | | verse_lines = मैवं पुनः कार्यमिति ब्रुवन्तः समाश्लिषन् सर्व एवैत्य भीमम् ।¦ततोऽहोभिः कैश्चिदापुः कुरूणां राष्ट्रं पार्था मुनिमुख्यैः समेताः ॥ ३५७॥ | ||
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| verse_text = ततोऽमितौजा भगवानुपागमन्नारायणः सत्यभामासहायः । | | verse_text = ततोऽमितौजा भगवानुपागमन्नारायणः सत्यभामासहायः । | ||
| verse_lines = ततोऽमितौजा भगवानुपागमन्नारायणः सत्यभामासहायः | | verse_lines = ततोऽमितौजा भगवानुपागमन्नारायणः सत्यभामासहायः ।¦सम्पूजितः पाण्डवैस्तैः समेतश्चक्रेऽथ सौहार्दनिमित्तसत्कथाः ॥ ३५८॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णा च सत्या च परस्परं मुदा सम्भाषणं चक्रतुर्योषिदग्र्ये | | verse_lines = कृष्णा च सत्या च परस्परं मुदा सम्भाषणं चक्रतुर्योषिदग्र्ये ।¦परीक्षयन्त्या(परीक्षन्त्या) सत्यया सर्ववेत्र्या निर्दोषया चोदिता प्राह कृष्णा ॥ ३५९॥ | ||
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| verse_lines = ततः कतिपयाहानि निरुष्यात्र जनार्दनः | | verse_lines = ततः कतिपयाहानि निरुष्यात्र जनार्दनः ।¦ययौ सभार्यः स्वपुरीं पाण्डवाननुमान्य च ॥ ३६२॥ | ||
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| verse_lines = ततः कदाचिन्मृगयां गतेषु पार्थेषु राजा सैन्धव आससाद | | verse_lines = ततः कदाचिन्मृगयां गतेषु पार्थेषु राजा सैन्धव आससाद ।¦सकोटिकाश्यः सबलश्च तेषां वराश्रमं सोऽत्र ददर्श कृष्णाम् ॥ ३६३॥ | ||
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| verse_lines = ब्रजन् विवाहार्थमसौ निशाम्य कृष्णां कोटिं प्रेषयित्वैव काश्यम् | | verse_lines = ब्रजन् विवाहार्थमसौ निशाम्य कृष्णां कोटिं प्रेषयित्वैव काश्यम् ।¦आयाहि मामित्यवदत् सुपापस्तया निरस्तो जगृहे करे च ॥ ३६४॥ | ||
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| verse_text = अग्रे कृष्णां योऽवदत् सिन्धुराजं याहीति तं कोटिकाश्यं सुपापम् । | | verse_text = अग्रे कृष्णां योऽवदत् सिन्धुराजं याहीति तं कोटिकाश्यं सुपापम् । | ||
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| verse_text = हत्वा सेनामखिलां सैन्धवस्य भीमार्जुनौ सयमं धर्मराजम् । | | verse_text = हत्वा सेनामखिलां सैन्धवस्य भीमार्जुनौ सयमं धर्मराजम् । | ||
| verse_lines = हत्वा सेनामखिलां सैन्धवस्य भीमार्जुनौ सयमं धर्मराजम् | | verse_lines = हत्वा सेनामखिलां सैन्धवस्य भीमार्जुनौ सयमं धर्मराजम् ।¦विसृज्य धावन्तमथानुजग्मतुर्जयद्रथं विरथं फल्गुनोऽकः ॥ ३६९॥ | ||
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| verse_text = पद्भ्यां धावन्तं भीमसेनो निगृह्य दत्वा प्रहारांश्च भृशं तमार्तम् । | | verse_text = पद्भ्यां धावन्तं भीमसेनो निगृह्य दत्वा प्रहारांश्च भृशं तमार्तम् । | ||
| verse_lines = पद्भ्यां धावन्तं भीमसेनो निगृह्य दत्वा प्रहारांश्च भृशं तमार्तम् | | verse_lines = पद्भ्यां धावन्तं भीमसेनो निगृह्य दत्वा प्रहारांश्च भृशं तमार्तम् ।¦आदायाधाद् द्रौपदीपादयोश्च तं मोचयामास च धर्मसूनुः ॥ ३७०॥ | ||
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| verse_text = दासो द्रौपद्या अहमित्येव वाक्ये तेनैवोक्ते भीमसेनोऽप्यमुञ्चत्(भीमसेनो व्यमुञ्चत्) । | | verse_text = दासो द्रौपद्या अहमित्येव वाक्ये तेनैवोक्ते भीमसेनोऽप्यमुञ्चत्(भीमसेनो व्यमुञ्चत्) । | ||
| verse_lines = दासो द्रौपद्या अहमित्येव वाक्ये तेनैवोक्ते भीमसेनोऽप्यमुञ्चत्(भीमसेनो व्यमुञ्चत्) | | verse_lines = दासो द्रौपद्या अहमित्येव वाक्ये तेनैवोक्ते भीमसेनोऽप्यमुञ्चत्(भीमसेनो व्यमुञ्चत्) ।¦स व्रीडितोऽवाग्वदनो ययौ वनं पार्थाश्च तत्रोषुरतिप्रमोदिनः ॥ ३७१॥ | ||
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| verse_text = मार्कण्डेयस्तदाऽऽगत्य तेषामकथयत् कथाः । | | verse_text = मार्कण्डेयस्तदाऽऽगत्य तेषामकथयत् कथाः । | ||
| verse_lines = मार्कण्डेयस्तदाऽऽगत्य तेषामकथयत् कथाः | | verse_lines = मार्कण्डेयस्तदाऽऽगत्य तेषामकथयत् कथाः ।¦बह्व्यश्चैव विचित्राश्च भाषात्रयसमन्विताः ॥ ३७२॥ | ||
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| verse_text = लोकदर्शनमाश्रित्य देवाश्च मुनयस्तथा । | | verse_text = लोकदर्शनमाश्रित्य देवाश्च मुनयस्तथा । | ||
| verse_lines = लोकदर्शनमाश्रित्य देवाश्च मुनयस्तथा | | verse_lines = लोकदर्शनमाश्रित्य देवाश्च मुनयस्तथा ।¦ब्रूयुः कथास्तत्र शिक्षा ग्राह्या नार्थाः कथञ्चन ॥ ३७३॥ | ||
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| verse_text = अर्थः समाधिभाषासु ग्राह्यः सर्वोऽप्यसंशयम् । | | verse_text = अर्थः समाधिभाषासु ग्राह्यः सर्वोऽप्यसंशयम् । | ||
| verse_lines = अर्थः समाधिभाषासु ग्राह्यः सर्वोऽप्यसंशयम् | | verse_lines = अर्थः समाधिभाषासु ग्राह्यः सर्वोऽप्यसंशयम् ।¦परदर्शनभाषासु ज्ञेयं तद्दर्शनं तथा ॥ ३७४॥ | ||
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| verse_text = ग्राह्यो नार्थो वैदिकं तु दर्शनं ग्राह्यमेव हि । | | verse_text = ग्राह्यो नार्थो वैदिकं तु दर्शनं ग्राह्यमेव हि । | ||
| verse_lines = ग्राह्यो नार्थो वैदिकं तु दर्शनं ग्राह्यमेव हि | | verse_lines = ग्राह्यो नार्थो वैदिकं तु दर्शनं ग्राह्यमेव हि ।¦अन्यार्थो गुह्यभाषासु ग्राह्य एवं विनिर्णयः ॥ ३७५॥ | ||
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| verse_text = जयद्रथस्तु भीमेन तदा(यदा) पञ्चशिखीकृतः । | | verse_text = जयद्रथस्तु भीमेन तदा(यदा) पञ्चशिखीकृतः । | ||
| verse_lines = जयद्रथस्तु भीमेन तदा(यदा) पञ्चशिखीकृतः | | verse_lines = जयद्रथस्तु भीमेन तदा(यदा) पञ्चशिखीकृतः ।¦तपसा शिवमाराध्य वव्रे पाण्डवरोधनम् ।¦ऋतेऽर्जुनादर्जुनस्य तुष्टो हि तपसा शिवः ॥ ३७६॥ | ||
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| verse_text = वने वसत्स्वेव च पाण्डवेषु चक्रे यज्ञं पौण्डरीकाख्यमेव । | | verse_text = वने वसत्स्वेव च पाण्डवेषु चक्रे यज्ञं पौण्डरीकाख्यमेव । | ||
| verse_lines = वने वसत्स्वेव च पाण्डवेषु चक्रे यज्ञं पौण्डरीकाख्यमेव | | verse_lines = वने वसत्स्वेव च पाण्डवेषु चक्रे यज्ञं पौण्डरीकाख्यमेव ।¦संस्पर्धया राजसूयस्य राजा दुर्योधनो नाप्यसौ तत्कलार्हः ॥ ३७७॥ | ||
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| verse_text = दुर्योधनस्याऽज्ञया पाण्डवानां दुःशासनः प्रेषयामास तत्र(दूतम्) । | | verse_text = दुर्योधनस्याऽज्ञया पाण्डवानां दुःशासनः प्रेषयामास तत्र(दूतम्) । | ||
| verse_lines = दुर्योधनस्याऽज्ञया पाण्डवानां दुःशासनः प्रेषयामास तत्र(दूतम्) | | verse_lines = दुर्योधनस्याऽज्ञया पाण्डवानां दुःशासनः प्रेषयामास तत्र(दूतम्) ।¦आगच्छतेत्यवमानाय तं तु भीमोऽवादीद् रणयज्ञं स्वगम्यम् ॥ ३७८॥ | ||
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| verse_text = ततो दिनैः कैश्चन धार्तराष्ट्राः सकर्णगान्धारनृपाः कुमन्त्रतः । | | verse_text = ततो दिनैः कैश्चन धार्तराष्ट्राः सकर्णगान्धारनृपाः कुमन्त्रतः । | ||
| verse_lines = ततो दिनैः कैश्चन धार्तराष्ट्राः सकर्णगान्धारनृपाः कुमन्त्रतः | | verse_lines = ततो दिनैः कैश्चन धार्तराष्ट्राः सकर्णगान्धारनृपाः कुमन्त्रतः ।¦सभार्यकाः पाण्डवान् द्रौपदीं च महैश्वर्यं दर्शयित्वाऽवमन्तुम् ॥ ३७९॥ | ||
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| verse_text = ते स्यन्दनैः काञ्चनरत्नचित्रैर्महागजैस्तुरगैः पत्तिभिश्च । | | verse_text = ते स्यन्दनैः काञ्चनरत्नचित्रैर्महागजैस्तुरगैः पत्तिभिश्च । | ||
| verse_lines = ते स्यन्दनैः काञ्चनरत्नचित्रैर्महागजैस्तुरगैः पत्तिभिश्च | | verse_lines = ते स्यन्दनैः काञ्चनरत्नचित्रैर्महागजैस्तुरगैः पत्तिभिश्च ।¦स्वलङ्कृताश्चित्रमाल्याम्बराश्च विनिर्ययुर्द्वैतवनाय शीघ्रम् ॥ ३८०॥ | ||
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| verse_text = गवां दृष्टिच्छद्मना निर्गतांस्तान् ज्ञात्वा शक्रस्तेजसो भङ्गकामः । | | verse_text = गवां दृष्टिच्छद्मना निर्गतांस्तान् ज्ञात्वा शक्रस्तेजसो भङ्गकामः । | ||
| verse_lines = गवां दृष्टिच्छद्मना निर्गतांस्तान् ज्ञात्वा शक्रस्तेजसो भङ्गकामः | | verse_lines = गवां दृष्टिच्छद्मना निर्गतांस्तान् ज्ञात्वा शक्रस्तेजसो भङ्गकामः ।¦तत्सामर्थ्यं वरमस्मै प्रदाय तद्बन्धनायादिशच्चित्रसेनम् ॥ ३८१॥ | ||
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| verse_text = स षष्टिसाहस्रककोटियूथपैर्गन्धर्वमुख्यैः संवृतोऽगात् सरस्तत् । | | verse_text = स षष्टिसाहस्रककोटियूथपैर्गन्धर्वमुख्यैः संवृतोऽगात् सरस्तत् । | ||
| verse_lines = स षष्टिसाहस्रककोटियूथपैर्गन्धर्वमुख्यैः संवृतोऽगात् सरस्तत् | | verse_lines = स षष्टिसाहस्रककोटियूथपैर्गन्धर्वमुख्यैः संवृतोऽगात् सरस्तत् ।¦यस्मिन् स्नातुं वाञ्छति धार्तराष्ट्रस्तदाज्ञया पुरुषास्तानथोचुः ॥ ३८२॥ | ||
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| verse_lines = स्नातुं समायास्यति धार्तराष्ट्रो राजेश्वरो निस्सरध्वं तदस्मात् | | verse_lines = स्नातुं समायास्यति धार्तराष्ट्रो राजेश्वरो निस्सरध्वं तदस्मात् ।¦तीर्थादाज्ञां धारयन्तश्च तस्येत्युक्ता गन्धर्वा जहसुस्तानथोच्चैः ॥ ३८३॥ | ||
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| verse_lines = ऊचुर्वयं मानयामस्तदाज्ञां त्रिलोकानां यः पतिः शक्रदेवः | | verse_lines = ऊचुर्वयं मानयामस्तदाज्ञां त्रिलोकानां यः पतिः शक्रदेवः ।¦न मानुषाणामपि चक्रवर्तिनां किम्वल्पसारस्य सुयोधनस्य ॥ ३८४॥ | ||
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| verse_lines = इतीरिते कुपितो धार्तराष्ट्रो जघान गन्धर्ववराञ्छरौघैः | | verse_lines = इतीरिते कुपितो धार्तराष्ट्रो जघान गन्धर्ववराञ्छरौघैः ।¦जघ्नुः सकर्णा अपि तस्य सोदरा जघ्नुश्च ते धार्तराष्ट्रस्य सेनाम् ॥ ३८५॥ | ||
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| verse_lines = मुहूर्तमासीत् सममेव युद्धं तेषां तदा धार्तराष्ट्रस्य चैव | | verse_lines = मुहूर्तमासीत् सममेव युद्धं तेषां तदा धार्तराष्ट्रस्य चैव ।¦पुरां भिन्दोर्वरतो(पुरां भिदोर्वरतो) मायया च गन्धर्ववीरा ववृधुस्ततः स्म(ववृधुस्ततश्च) ॥ ३८६॥ | ||
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| verse_lines = तेजोभङ्गं तत्र सुयोधनस्य पार्थार्थमत्र प्रविधातुमेव च | | verse_lines = तेजोभङ्गं तत्र सुयोधनस्य पार्थार्थमत्र प्रविधातुमेव च ।¦बलं ददावब्जजः केशवश्च गन्धर्वाणां तेऽभ्ययुर्धार्तराष्ट्रान् ॥ ३८७॥ | ||
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| verse_lines = स चित्रसेनः प्रथमं कर्णमेव युयोध पार्थस्पर्धया तेन युद्ध्यन् | | verse_lines = स चित्रसेनः प्रथमं कर्णमेव युयोध पार्थस्पर्धया तेन युद्ध्यन् ।¦कर्णो नाशक्नोद् वचनाद् भार्गवस्य रामस्य नित्यामितषड्गुणस्य ॥ ३८८॥ | ||
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| verse_lines = स भग्नयानश्च(स भग्नयानोऽथ) विकर्णयानमास्थाय तस्यैव नियम्य वाजिनः | | verse_lines = स भग्नयानश्च(स भग्नयानोऽथ) विकर्णयानमास्थाय तस्यैव नियम्य वाजिनः ।¦पराद्रवत् तेन सहैव शीघ्रं दुर्योधनश्चित्रसेनं युयोध ॥ ३८९॥ | ||
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| verse_lines = तस्यानुजाः शकुनी राजभार्याः सर्वे बद्धाः शक्रदूतैः (शक्रभृत्यैः) प्रणीताः | | verse_lines = तस्यानुजाः शकुनी राजभार्याः सर्वे बद्धाः शक्रदूतैः (शक्रभृत्यैः) प्रणीताः ।¦आदाय तानम्बरे(तानम्बरं) सम्प्रयातेष्वरूरुवन्(सम्प्रयातेष्वरूरुदन्) पाण्डवान् मन्त्रिणोऽस्य ॥ ३९२॥ | ||
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| verse_lines = समीपमागत्य पृथासुतानां परिभूतं वः कुलं शक्रभृत्यैः | | verse_lines = समीपमागत्य पृथासुतानां परिभूतं वः कुलं शक्रभृत्यैः ।¦धृतः(हृतः) सभार्यः सानुजो धार्तराष्ट्रस्तं मोचयध्वं भ्रातरं भारताग्र्याः ॥ ३९३॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्त ऊचे भीमसेनोऽग्रजं स्वं जाने राजन् यादृशोऽयं विमर्दः | | verse_lines = इत्युक्त ऊचे भीमसेनोऽग्रजं स्वं जाने राजन् यादृशोऽयं विमर्दः ।¦ऐश्वर्यं स्वं दर्शयन् नः समागाद् दुर्योधनस्तेजसो भङ्गमिच्छन् ॥ ३९४॥ | ||
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| verse_lines = विज्ञाय तेषां मन्त्रितं वज्रबाहुरेतच्चक्रे नात्र नः कार्यहानिः | | verse_lines = विज्ञाय तेषां मन्त्रितं वज्रबाहुरेतच्चक्रे नात्र नः कार्यहानिः ।¦दिव्यं ज्ञानं स्वात्मनो(सु आत्मनः) दर्शयन् स एतावदुक्त्वा विरराम भीमः ॥ ३९५॥ | ||
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| verse_lines = समाप्य यज्ञं च ततोऽभियान्तं सर्वे प्रापुर्धर्मराजं स चाऽशु | | verse_lines = समाप्य यज्ञं च ततोऽभियान्तं सर्वे प्रापुर्धर्मराजं स चाऽशु ।¦सम्पूज्य तूत्सृज्य च चित्रसेनमूचे गान्धारे न पुनः कार्यमीदृक् ॥ ३९८॥ | ||
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| verse_text = ततो निशायां प्राप्तायां स्वपक्षे प्रविषीदति । | | verse_text = ततो निशायां प्राप्तायां स्वपक्षे प्रविषीदति । | ||
| verse_lines = ततो निशायां प्राप्तायां स्वपक्षे प्रविषीदति | | verse_lines = ततो निशायां प्राप्तायां स्वपक्षे प्रविषीदति ।¦मन्त्रयित्वाऽसुरैः कृत्या निर्मिता होमकर्मणि (होमकर्मणा) ॥ ४०२॥ | ||
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| Line 28,292: | Line 28,292: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = शुक्रेणोत्पादिता कृत्या सा प्रसुप्तेषु मन्त्रिषु । | | verse_text = शुक्रेणोत्पादिता कृत्या सा प्रसुप्तेषु मन्त्रिषु । | ||
| verse_lines = शुक्रेणोत्पादिता कृत्या सा प्रसुप्तेषु मन्त्रिषु | | verse_lines = शुक्रेणोत्पादिता कृत्या सा प्रसुप्तेषु मन्त्रिषु ।¦धार्तराष्ट्रं समादाय ययौ पातालमाशु च ।¦अथ सम्बोधयामासुर्दैत्या दुर्योधनं नृपम् ॥ ४०३॥ | ||
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| verse_text = त्वं दिव्यः पुरुषो वीरः सृष्टोऽस्माभिः प्रतोषितात् । | | verse_text = त्वं दिव्यः पुरुषो वीरः सृष्टोऽस्माभिः प्रतोषितात् । | ||
| verse_lines = त्वं दिव्यः पुरुषो वीरः सृष्टोऽस्माभिः प्रतोषितात् | | verse_lines = त्वं दिव्यः पुरुषो वीरः सृष्टोऽस्माभिः प्रतोषितात् ।¦तपसा शङ्कराद् वज्रकायोऽवध्यश्च सर्वदा ।¦अस्माकं पक्षभूतस्त्वं देवानां चैव पाण्डवाः ॥ ४०४॥ | ||
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| verse_text = इदानीं सर्वदेवानां(इन्द्रादिसर्वदेवानां) वरात् त्वं विजितो रणे । | | verse_text = इदानीं सर्वदेवानां(इन्द्रादिसर्वदेवानां) वरात् त्वं विजितो रणे । | ||
| verse_lines = इदानीं सर्वदेवानां(इन्द्रादिसर्वदेवानां) वरात् त्वं विजितो रणे | | verse_lines = इदानीं सर्वदेवानां(इन्द्रादिसर्वदेवानां) वरात् त्वं विजितो रणे ।¦वयं तथा करिष्यामो यथा जेष्यसि पाण्डवान् ॥ ४०५॥ | ||
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| verse_text = कृष्णेन निहतश्चैव नरकः कर्ण आस्थितः । | | verse_text = कृष्णेन निहतश्चैव नरकः कर्ण आस्थितः । | ||
| verse_lines = कृष्णेन निहतश्चैव नरकः कर्ण आस्थितः | | verse_lines = कृष्णेन निहतश्चैव नरकः कर्ण आस्थितः ।¦स च कृष्णार्जुनाभावं करिष्यति न संशयः ॥ ४०६॥ | ||
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| verse_text = भीष्मादींश्च वयं सर्वानाविशाम(प्रविशाम) जयाय ते । | | verse_text = भीष्मादींश्च वयं सर्वानाविशाम(प्रविशाम) जयाय ते । | ||
| verse_lines = भीष्मादींश्च वयं सर्वानाविशाम(प्रविशाम) जयाय ते | | verse_lines = भीष्मादींश्च वयं सर्वानाविशाम(प्रविशाम) जयाय ते ।¦तपसा वर्द्धयिष्यामस्त्वां कर्णादींश्च सर्वशः ॥ ४०७॥ | ||
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| verse_text = तस्माद् गत्वा पालयस्व राज्यं राजन्नपेतभीः । | | verse_text = तस्माद् गत्वा पालयस्व राज्यं राजन्नपेतभीः । | ||
| verse_lines = तस्माद् गत्वा पालयस्व राज्यं राजन्नपेतभीः | | verse_lines = तस्माद् गत्वा पालयस्व राज्यं राजन्नपेतभीः ।¦इदं कस्यापि नाऽख्येयं सुगुप्तं भूतिवर्द्धनम् ॥ ४०८॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्त्वा कृत्यया भूयः स्वस्थाने स्थापितो नृपः । | | verse_text = इत्युक्त्वा कृत्यया भूयः स्वस्थाने स्थापितो नृपः । | ||
| verse_lines = इत्युक्त्वा कृत्यया भूयः स्वस्थाने स्थापितो नृपः | | verse_lines = इत्युक्त्वा कृत्यया भूयः स्वस्थाने स्थापितो नृपः ।¦उमया निर्मितात्मार्द्धमुत्तरं हरनिर्मितम् ।¦ज्ञात्वैवावध्यतां चैव राज्ये बुद्धिं चकार सः ॥ ४०९॥ | ||
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| verse_text = नोवाच कस्यचित् तेषु स्वानुभूतं सुयोधनः । | | verse_text = नोवाच कस्यचित् तेषु स्वानुभूतं सुयोधनः । | ||
| verse_lines = नोवाच कस्यचित् तेषु स्वानुभूतं सुयोधनः | | verse_lines = नोवाच कस्यचित् तेषु स्वानुभूतं सुयोधनः ।¦प्रभातायां तु शर्वर्यां पुनः कर्णो वचोऽब्रवीत् ॥ ४१०॥ | ||
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| verse_text = भृत्यैस्तवैव पार्थैर्यन्मोचितोऽसि परन्तप । | | verse_text = भृत्यैस्तवैव पार्थैर्यन्मोचितोऽसि परन्तप । | ||
| verse_lines = भृत्यैस्तवैव पार्थैर्यन्मोचितोऽसि परन्तप | | verse_lines = भृत्यैस्तवैव पार्थैर्यन्मोचितोऽसि परन्तप ।¦तेन मान्योऽधिकं लोके यद् भृत्या एव तादृशाः ।¦किमु त्वं राजशार्दूल तदुत्तिष्ठ स्थिरो भव ॥ ४११॥ | ||
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| verse_text = या च तेऽर्जुनमाहात्म्ये शङ्का सा व्येतु मे शृणु । | | verse_text = या च तेऽर्जुनमाहात्म्ये शङ्का सा व्येतु मे शृणु । | ||
| verse_lines = या च तेऽर्जुनमाहात्म्ये शङ्का सा व्येतु मे शृणु | | verse_lines = या च तेऽर्जुनमाहात्म्ये शङ्का सा व्येतु मे शृणु ।¦यावन्नैवार्जुनं हन्यां पादौ प्रक्षालये स्वयम् ॥ ४१२॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तोऽवरजैश्चैव सर्वैः शकुनिना तथा | | verse_lines = इत्युक्तोऽवरजैश्चैव सर्वैः शकुनिना तथा ।¦याचितो रथमारुह्य ययौ नागपुरं द्रुतम् ॥ ४१३॥ | ||
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| verse_lines = सकुण्डलं सकवचमवध्यं सूर्यनन्दनम् | | verse_lines = सकुण्डलं सकवचमवध्यं सूर्यनन्दनम् ।¦ज्ञात्वेन्द्र उभयं तस्मादैच्छदादातुमुत्तमम् ॥ ४१४॥ | ||
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| verse_lines = तद् विज्ञाय रविः कर्णं स्वप्न उक्त्वा न्यवारयत् | | verse_lines = तद् विज्ञाय रविः कर्णं स्वप्न उक्त्वा न्यवारयत् ।¦सर्वथा दास्य इत्युक्ते प्राहाऽदेयं वरायुधम् ॥ ४१५॥ | ||
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| verse_lines = ददौ चोत्कृत्य कवचं कुण्डले च शचीपतेः | | verse_lines = ददौ चोत्कृत्य कवचं कुण्डले च शचीपतेः ।¦अमोघां शक्तिमादाय ज्ञात्वेन्द्रं द्विजरूपिणम् ॥ ४१६॥ | ||
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| verse_lines = ऋतेऽर्जुनादेकमेव वधिष्यस्यनयेति सः | | verse_lines = ऋतेऽर्जुनादेकमेव वधिष्यस्यनयेति सः ।¦दत्वा शक्तिं ययौ शक्रः सार्द्धं कवचकुण्डलैः ॥ ४१७॥ | ||
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| verse_text = पार्था(पार्थो) विमुच्यैव सुयोधनं तं वने वसन्तो मुदिताः सदैव । | | verse_text = पार्था(पार्थो) विमुच्यैव सुयोधनं तं वने वसन्तो मुदिताः सदैव । | ||
| verse_lines = पार्था(पार्थो) विमुच्यैव सुयोधनं तं वने वसन्तो मुदिताः सदैव | | verse_lines = पार्था(पार्थो) विमुच्यैव सुयोधनं तं वने वसन्तो मुदिताः सदैव ।¦सहारणीभाण्डमथो मृगेण हृतं द्विजस्याऽशु निशम्य चान्वयुः(चान्वगुः) ॥ ४१८॥ | ||
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| verse_lines = तस्मिन्नदृश्ये तृषिता एकैकमुदकार्थिनः | | verse_lines = तस्मिन्नदृश्ये तृषिता एकैकमुदकार्थिनः ।¦ययुर्युधिष्ठिरमृते सुप्तास्ते धर्ममायया¦अदृश्येनैव धर्मेण वारिता वारिपायिनः ॥ ४१९॥ | ||
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| verse_lines = क्षत्रधर्मस्य रक्षार्थं न तत्प्रश्नान् विदां वराः | | verse_lines = क्षत्रधर्मस्य रक्षार्थं न तत्प्रश्नान् विदां वराः ।¦व्याचक्रुः शक्तिमन्तोऽपि पानीयार्थमरिन्दमाः ॥ ४२०॥ | ||
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| verse_lines = न विप्राणां च धर्मोऽयं विद्याया उपजीवनम् | | verse_lines = न विप्राणां च धर्मोऽयं विद्याया उपजीवनम् ।¦क्षत्रियाणां तु किमुत प्रसभं तेन ते पपुः ॥ ४२१॥ | ||
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| verse_lines = देवा अपि मनुष्येषु जाताः सुबलिनोऽपि हि | | verse_lines = देवा अपि मनुष्येषु जाताः सुबलिनोऽपि हि ।¦मानुषेणैव भावेन युक्ताः स्युः केशवादृते ।¦कार्येष्वेषां क्रमेणैव व्यक्तिमायान्ति सद्गुणाः ॥ ४२२॥ | ||
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| verse_lines = अतो भीमार्जुनौ धर्मादत्युत्तमबलावपि | | verse_lines = अतो भीमार्जुनौ धर्मादत्युत्तमबलावपि ।¦देवमायां समाश्रित्य धर्मेण स्वापितौ क्षणात् ॥ ४२३॥ | ||
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| verse_lines = मुहूर्तमेव सा माया तयोराच्छादने क्षमा | | verse_lines = मुहूर्तमेव सा माया तयोराच्छादने क्षमा ।¦ततः प्रबुद्धयोर्धर्मो नैव शक्तिशतांशभाक् ॥ ४२४॥ | ||
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| verse_lines = उक्तं पाद्मपुराणे च तदेतत् सर्वमञ्जसा | | verse_lines = उक्तं पाद्मपुराणे च तदेतत् सर्वमञ्जसा ।¦तस्मान्नाशक्तिरनयोः सम्भाव्या भीमपार्थयोः ॥ ४२५॥ | ||
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| verse_lines = धर्मात्मजोऽथाऽजगामोदकान्तं दृष्ट्वा भ्रातॄंस्तत्र दुःखाभितप्तः | | verse_lines = धर्मात्मजोऽथाऽजगामोदकान्तं दृष्ट्वा भ्रातॄंस्तत्र दुःखाभितप्तः ।¦इच्छन् पातुं वारि संवारितश्च पित्रा(संवारितः स्वपित्रा) बकाकारमितेन नापात् ॥ ४२६॥ | ||
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| verse_lines = अर्थे भ्रातॄणामैच्छदसौ तदीयप्रश्नप्रतिव्याहरणं दयालुः | | verse_lines = अर्थे भ्रातॄणामैच्छदसौ तदीयप्रश्नप्रतिव्याहरणं दयालुः ।¦ततो धर्मो यक्षतनुः स भूत्वा प्रश्नांश्चक्रे व्याकरोत् तान् स पार्थः ॥ ४२७॥ | ||
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| verse_lines = ततस्तुष्टो वरमस्मै ददौ स एकोत्थानं भ्रातृमध्ये स वव्रे | | verse_lines = ततस्तुष्टो वरमस्मै ददौ स एकोत्थानं भ्रातृमध्ये स वव्रे ।¦यद्येकः स्यान्नकुलोऽस्त्वित्यथाऽह तुष्टो धर्मः कथमेतत् कृतं ते ।¦अतिप्रीतिर्भीमसेने तवास्ति बली चासौ राज्यहेतुस्तव स्यात् ॥ ४२८॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्त ऊचे माद्रिपुत्रं विहाय कुन्तीपुत्रो न मयोत्थापनीयः | | verse_lines = इत्युक्त ऊचे माद्रिपुत्रं विहाय कुन्तीपुत्रो न मयोत्थापनीयः ।¦स एवमुक्तो नितरां प्रीयमाण उत्थापयामास च तान् समस्तान् ॥ ४२९॥ | ||
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| verse_lines = यथेष्टरूपप्राप्तिमेषां पुनश्च स्वकामतो निजरूपाप्तिमादात् | | verse_lines = यथेष्टरूपप्राप्तिमेषां पुनश्च स्वकामतो निजरूपाप्तिमादात् ।¦अज्ञातवासेऽज्ञाततां सर्वदैव ददौ तेषां प्रीत एवाऽनृशंस्यात् ।¦एवं क्रीडन् पुत्र इत्यात्मनैव यशोधर्मावात्मनो(यशोधर्मानात्मनो) वर्द्धयन् सः ॥ ४३०॥ | ||
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| verse_lines = युधिष्ठिरात्मनस्तस्य यशोधर्मविवृद्धये(युधिष्ठिरात्मनः स्वस्य यशोधर्माभिवृद्धये) | | verse_lines = युधिष्ठिरात्मनस्तस्य यशोधर्मविवृद्धये(युधिष्ठिरात्मनः स्वस्य यशोधर्माभिवृद्धये) ।¦कृत्वाऽरण्यपहारादि पुनर्दत्वा च तत् स्वयम् ।¦दातुं विप्राय तद्धस्ते ययौ धर्मो दिवं पुनः ॥ ४३१॥ | ||
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| verse_lines = ततो राजा भीमसेनार्जुनौ च सार्द्धं यमाभ्यामरणीं प्रदाय | | verse_lines = ततो राजा भीमसेनार्जुनौ च सार्द्धं यमाभ्यामरणीं प्रदाय ।¦मुदा युताः कृष्णया सार्धमेव सन्तुष्टुवुः कृष्णमनन्तमच्युतम् ॥ ४३२॥ | ||
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<span id="gr-C23" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रयोविंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C23" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रयोविंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ नारायणानुग्रहतो यथावन्निस्तीर्य तान् द्वादशाब्दान् वने ते । | | verse_text = औं ॥ नारायणानुग्रहतो यथावन्निस्तीर्य तान् द्वादशाब्दान् वने ते । | ||
| verse_lines = औं ॥ नारायणानुग्रहतो यथावन्निस्तीर्य तान् द्वादशाब्दान् वने ते | | verse_lines = औं ॥ नारायणानुग्रहतो यथावन्निस्तीर्य तान् द्वादशाब्दान् वने ते ।¦विसृज्य च ब्राह्मणादीन् सधौम्यानज्ञातवासाय ततो मनो दधुः ॥ १॥ | ||
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| verse_text = वैदिकव्यवहारेषु ज्ञानाधिक्यप्रसिद्धितः । | | verse_text = वैदिकव्यवहारेषु ज्ञानाधिक्यप्रसिद्धितः । | ||
| verse_lines = वैदिकव्यवहारेषु ज्ञानाधिक्यप्रसिद्धितः | | verse_lines = वैदिकव्यवहारेषु ज्ञानाधिक्यप्रसिद्धितः ।¦जानीयुर्भीम इत्येव सूदवेषस्ततोऽभवत् (शूद्रवेषस्ततोऽभवत्) ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = स्वीयं वेदविदां सर्वं देवेशानां च किं पुनः । | | verse_text = स्वीयं वेदविदां सर्वं देवेशानां च किं पुनः । | ||
| verse_lines = स्वीयं वेदविदां सर्वं देवेशानां च किं पुनः | | verse_lines = स्वीयं वेदविदां सर्वं देवेशानां च किं पुनः ।¦अतस्तेऽन्याश्रयं नैव चक्रुः स्वबलसंश्रयात् ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = शापादेवार्जुनः षण्ढवेषोऽभून्नकुलस्तथा । | | verse_text = शापादेवार्जुनः षण्ढवेषोऽभून्नकुलस्तथा । | ||
| verse_lines = शापादेवार्जुनः षण्ढवेषोऽभून्नकुलस्तथा | | verse_lines = शापादेवार्जुनः षण्ढवेषोऽभून्नकुलस्तथा ।¦क्षत्रियानन्तरत्वात्तु सूतजातेस्तथाऽभवत् ॥ ७॥ | ||
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| verse_lines = सूतस्यानन्तरत्वात्तु वैश्यजातेस्तथाऽभवत् | | verse_lines = सूतस्यानन्तरत्वात्तु वैश्यजातेस्तथाऽभवत् ।¦सहदेवो वैश्यजातिर्गोपालस्तेषु चोत्तमः ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = ततो गोपालतामाप यतिः पूज्योऽखिलैर्यतः | | verse_text = ततो गोपालतामाप यतिः पूज्योऽखिलैर्यतः | ||
| verse_lines = ततो गोपालतामाप यतिः | | verse_lines = ततो गोपालतामाप यतिः पूज्योऽखिलैर्यतः¦यतिरासीद् धर्मजोऽतः सोऽभ्यासार्थं सदैव च ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = अक्षासक्तोऽभवत् पश्चाद् दर्शयिष्यन् स्वशिष्टताम् | | verse_text = अक्षासक्तोऽभवत् पश्चाद् दर्शयिष्यन् स्वशिष्टताम् | ||
| verse_lines = अक्षासक्तोऽभवत् पश्चाद् दर्शयिष्यन् | | verse_lines = अक्षासक्तोऽभवत् पश्चाद् दर्शयिष्यन् स्वशिष्टताम्¦भीमसेनसधर्मार्थं शूद्रा सैरन्ध्रिकाऽभवत् ।¦द्रौपदी भर्तृसाधर्म्यं स्त्रीणां धर्मो यतः सदा ॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = अथाऽजगाम मल्लकः समस्तभूमिमण्डले | | verse_lines = अथाऽजगाम मल्लकः समस्तभूमिमण्डले ।¦वरेण योऽजितो जयी शिवस्य सञ्जगर्ज च ॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = तमीक्ष्य सर्वमल्लका विराटराजसंश्रयाः | | verse_lines = तमीक्ष्य सर्वमल्लका विराटराजसंश्रयाः ।¦प्रदुद्रुवुर्भयार्दितास्तदाऽवदद् युधिष्ठिरः ॥ १२॥ | ||
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| verse_lines = य एष सूद आशु तं निहत्य मल्लमोजसा | | verse_lines = य एष सूद आशु तं निहत्य मल्लमोजसा ।¦यशस्तवाभिवर्द्धयेत् समाह्वयाद्य तं नृप ॥ १३॥ | ||
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| verse_lines = इतीरिते समाहुतो जगाद मारुतिर्वचः | | verse_lines = इतीरिते समाहुतो जगाद मारुतिर्वचः ।¦प्रसादतो हरेरहं निषूदयेऽद्य (निसूदयेऽद्य) मल्लकम् ॥ १४॥ | ||
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| verse_lines = समस्तदेववृन्दतो महान् य एव केशवः | | verse_lines = समस्तदेववृन्दतो महान् य एव केशवः ।¦(समस्तदेवनामधा) समस्तदेवनामवांस्तदीयभक्तितो बलम् ॥ १५॥ | ||
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| verse_lines = य एव देवनामधा इति श्रुतिर्जगाद हि | | verse_lines = य एव देवनामधा इति श्रुतिर्जगाद हि ।¦महांश्च देव एष तत् स मे जयं विधास्यति ॥ १६॥ | ||
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| verse_lines = युधिष्ठिराभिधश्च यो युधिष्ठिरे स्थितः सदा | | verse_lines = युधिष्ठिराभिधश्च यो युधिष्ठिरे स्थितः सदा ।¦त्वयि स्थितस्त्वमित्यसौ सदाऽभिधीयते हरिः ॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = इति ब्रुवाणो मल्लं तमभियातो वृकोदरः | | verse_lines = इति ब्रुवाणो मल्लं तमभियातो वृकोदरः ।¦अनयन्मृत्युलोकाय बलाढ्यैरपि दुर्जयम् ॥ १८॥ | ||
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| verse_lines = एवं निवसतां तत्र पाण्डवानां महात्मनाम् | | verse_lines = एवं निवसतां तत्र पाण्डवानां महात्मनाम् ।¦संवत्सरे द्विमासोने विजित्य दिश आगतः ।¦कीचको मत्स्यनृपतेः स्यालो बलवतां वरः ॥ १९॥ | ||
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| verse_lines = स द्रौपदीं वीक्ष्य मनोभवार्तः(मनोमदार्तः) सम्प्रार्थयामास तया निरस्तः | | verse_lines = स द्रौपदीं वीक्ष्य मनोभवार्तः(मनोमदार्तः) सम्प्रार्थयामास तया निरस्तः ।¦मासे गते भगिनीं स्वां सुदेष्णां सम्प्रार्थयामास तदर्थमेव ॥ २०॥ | ||
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| verse_lines = तया निषिद्धोऽपि पुनःपुनस्तां यदा ययाचेऽथ सा चाह (ययाचेऽथच साऽऽह) कृष्णाम् | | verse_lines = तया निषिद्धोऽपि पुनःपुनस्तां यदा ययाचेऽथ सा चाह (ययाचेऽथच साऽऽह) कृष्णाम् ।¦समानयाऽश्वेव सुरां मदर्थमितीरिता नेति भीताऽवदत् सा ॥ २१॥ | ||
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| verse_text = बलात् तया प्रेषिता तद्गृहाय यदाऽगमत् तेन हस्ते गृहीता । | | verse_text = बलात् तया प्रेषिता तद्गृहाय यदाऽगमत् तेन हस्ते गृहीता । | ||
| verse_lines = बलात् तया प्रेषिता तद्गृहाय यदाऽगमत् तेन हस्ते गृहीता | | verse_lines = बलात् तया प्रेषिता तद्गृहाय यदाऽगमत् तेन हस्ते गृहीता ।¦विधूय तं प्राद्रवत् सा सभायै स्मृत्वाऽऽदित्यस्थं वासुदेवं परेशम् ॥ २२॥ | ||
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| verse_text = अनुद्रुत्यैतां पातयित्वा पदा स सन्ताडयामास तदा रविस्थितः । | | verse_text = अनुद्रुत्यैतां पातयित्वा पदा स सन्ताडयामास तदा रविस्थितः । | ||
| verse_lines = अनुद्रुत्यैतां पातयित्वा पदा स सन्ताडयामास तदा रविस्थितः | | verse_lines = अनुद्रुत्यैतां पातयित्वा पदा स सन्ताडयामास तदा रविस्थितः ।¦नारायणो हेतिनामैव रक्षो न्ययोजयत् तददृश्यं समागात् ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = वायुस्तमाविश्य(वायुस्तदाविश्य) तु कीचकं तं न्यपातयत् तां समीक्ष्यैव भीमः | | verse_lines = वायुस्तमाविश्य(वायुस्तदाविश्य) तु कीचकं तं न्यपातयत् तां समीक्ष्यैव भीमः ।¦चुकोप वृक्षं च समीक्षमाणं तं वारयामास युधिष्ठिरोऽग्रजः ॥ २४॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णा रात्रौ भीमसकाशमेत्य हन्तुं पापं कीचकं प्रैरयत् तम् | | verse_lines = कृष्णा रात्रौ भीमसकाशमेत्य हन्तुं पापं कीचकं प्रैरयत् तम् ।¦भीमस्य बुद्ध्या निशि सा कीचकं च जगाद गन्तुं शून्यगृहं स चागात् ॥ २५॥ | ||
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| verse_lines = तत्रैनमासाद्य तु भीमसेनो विजित्य तं बाहुयुद्धे निहत्य(निपात्य) | | verse_lines = तत्रैनमासाद्य तु भीमसेनो विजित्य तं बाहुयुद्धे निहत्य(निपात्य) ।¦शिरो गुदे पाणिपादौ च तस्य प्रवेशयामास विमृद्य वीरः ॥ २६॥ | ||
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| verse_lines = अवध्यं तं निहतं वीक्ष्य तस्य पञ्चोत्तरं शतमेवानुजानाम् | | verse_lines = अवध्यं तं निहतं वीक्ष्य तस्य पञ्चोत्तरं शतमेवानुजानाम् ।¦सर्वं वराच्छङ्करस्य ह्यवध्यं सहैव कृष्णां तेन दग्धुं बबन्ध ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = सा नीयमाना कीचकैः संरुराव श्रुत्वैव तं भीमसेनो महान्तम् | | verse_lines = सा नीयमाना कीचकैः संरुराव श्रुत्वैव तं भीमसेनो महान्तम् ।¦उद्धृत्य वृक्षं तेन जघान सर्वानादाय कृष्णां पुनरागात् पुरं स्वम्(गृहं स्वम्, पुरञ्च) ॥ २८॥ | ||
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| verse_text = एवं यत्नात् तपसा तैरवाप्तो वरः शिवादजयत्वं(शिवादक्षयत्वं) रणेषु । | | verse_text = एवं यत्नात् तपसा तैरवाप्तो वरः शिवादजयत्वं(शिवादक्षयत्वं) रणेषु । | ||
| verse_lines = एवं यत्नात् तपसा तैरवाप्तो वरः शिवादजयत्वं(शिवादक्षयत्वं) रणेषु | | verse_lines = एवं यत्नात् तपसा तैरवाप्तो वरः शिवादजयत्वं(शिवादक्षयत्वं) रणेषु ।¦अवध्यता चैव षडुत्तरास्ते शतं हता भीमसेनेन सङ्ख्ये ॥ २९॥ | ||
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| verse_lines = गन्धर्व इत्येव निहत्य सर्वान् मुमोद भीमो द्रौपदी चाथ कृष्णाम् | | verse_lines = गन्धर्व इत्येव निहत्य सर्वान् मुमोद भीमो द्रौपदी चाथ कृष्णाम् ।¦याहीत्यूचे तां सुदेष्णा भयेन त्रयोदशाहं पालयेत्याह तां सा ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = तेनावदद् द्रौपदीकारणेन दुर्योधनो निहतं कीचकं तम् | | verse_lines = तेनावदद् द्रौपदीकारणेन दुर्योधनो निहतं कीचकं तम् ।¦भीमेनागुस्तत्र दुर्योधनाद्या भीष्मादिभिः सह कर्णेन चैव ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = विजित्य सङ्ख्ये जगृहे विराटं तदा सुशर्मा तमयाद् वृकोदरः | | verse_lines = विजित्य सङ्ख्ये जगृहे विराटं तदा सुशर्मा तमयाद् वृकोदरः ।¦स तस्य सेनां विनिहत्य(विनिपात्य) मात्स्यं विमोच्य जग्राह सुशर्मराजम् ।¦युधिष्ठिरो मोचयामास तं च ततो रात्रौ न्यवसन् बाह्यतस्ते ॥ ३४॥ | ||
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| verse_lines = ततोऽपरदिने सर्वे भीष्मद्रोणपुरस्सराः | | verse_lines = ततोऽपरदिने सर्वे भीष्मद्रोणपुरस्सराः ।¦रहितं कीचकैर्मात्स्यं शक्यं मत्वाऽभिनिर्ययुः ॥ ३५॥ | ||
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| verse_lines = कीचकस्य हिडिम्बस्य बककिर्मीरयोरपि | | verse_lines = कीचकस्य हिडिम्बस्य बककिर्मीरयोरपि ।¦जरासन्धस्य नृपतेः कंसादीनां च सर्वशः ॥ ३६॥ | ||
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| verse_lines = न बाधनाय भीष्माद्या अपि शेकुः कथञ्चन | | verse_lines = न बाधनाय भीष्माद्या अपि शेकुः कथञ्चन ।¦तस्मात् ते कीचकं शान्तं श्रुत्वा मात्स्यं ययुर्युधे ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = यतिष्ये रक्षितुं भीमाद् धार्तराष्ट्रानिति स्वकाम् | | verse_lines = यतिष्ये रक्षितुं भीमाद् धार्तराष्ट्रानिति स्वकाम् ।¦सत्यां कर्तुं प्रतिज्ञां तु ययौ द्रोणः सपुत्रकः ॥ ३८॥ | ||
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| verse_lines = यदि युद्धाय निर्यान्ति ज्ञाताः स्युः पाण्डवास्तदा | | verse_lines = यदि युद्धाय निर्यान्ति ज्ञाताः स्युः पाण्डवास्तदा ।¦न चेद् विराटमनतं नमयिष्यामहे वयम् ।¦इति मत्वा विराटस्य जगृहुर्गाः समन्ततः ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = तदोत्तरः सारथित्वे प्रकल्प्य पार्थं ययौ तान् निशाम्यैव भीतः । | | verse_text = तदोत्तरः सारथित्वे प्रकल्प्य पार्थं ययौ तान् निशाम्यैव भीतः । | ||
| verse_lines = तदोत्तरः सारथित्वे प्रकल्प्य पार्थं ययौ तान् निशाम्यैव भीतः | | verse_lines = तदोत्तरः सारथित्वे प्रकल्प्य पार्थं ययौ तान् निशाम्यैव भीतः ।¦ततोऽर्जुनः सारथिं तं विधाय कृच्छ्रेण संस्थाप्य च तं(तान्) ययौ कुरून् ॥ ४०॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = आदाय गाण्डीवमथ ध्वजं च हनूमदङ्कं सदरोऽग्रतो गाः । | | verse_text = आदाय गाण्डीवमथ ध्वजं च हनूमदङ्कं सदरोऽग्रतो गाः । | ||
| verse_lines = आदाय गाण्डीवमथ ध्वजं च हनूमदङ्कं सदरोऽग्रतो गाः | | verse_lines = आदाय गाण्डीवमथ ध्वजं च हनूमदङ्कं सदरोऽग्रतो गाः ।¦निवर्त्य युद्धाय ययौ कुरूंस्तान् जिग्ये सर्वान् द्वैरथेनैव सक्तान् ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = एकीभूतान् पुनरेवानुयातान् सम्मोहनास्त्रेण विमोहयित्वा । | | verse_text = एकीभूतान् पुनरेवानुयातान् सम्मोहनास्त्रेण विमोहयित्वा । | ||
| verse_lines = एकीभूतान् पुनरेवानुयातान् सम्मोहनास्त्रेण विमोहयित्वा | | verse_lines = एकीभूतान् पुनरेवानुयातान् सम्मोहनास्त्रेण विमोहयित्वा ।¦जग्राह तेषामुत्तरीयाण्यृते तु भीष्मस्य वेदास्त्रघातं स एव ॥ ४२॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = विधाय भीष्मं विरथं जगाम तदा श्रुत्वा मत्स्यपतिर्जितान् कुरून् । | | verse_text = विधाय भीष्मं विरथं जगाम तदा श्रुत्वा मत्स्यपतिर्जितान् कुरून् । | ||
| verse_lines = विधाय भीष्मं विरथं जगाम तदा श्रुत्वा मत्स्यपतिर्जितान् कुरून् | | verse_lines = विधाय भीष्मं विरथं जगाम तदा श्रुत्वा मत्स्यपतिर्जितान् कुरून् ।¦मुमोद पुत्रेण जिता इति स्म तदाऽऽह षण्ढेन जितान् युधिष्ठिरः ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = तदा क्रुद्धः प्राहरत् तं विराटः सोऽक्षेण तद् भीमधनञ्जयाभ्याम् । | | verse_text = तदा क्रुद्धः प्राहरत् तं विराटः सोऽक्षेण तद् भीमधनञ्जयाभ्याम् । | ||
| verse_lines = तदा क्रुद्धः प्राहरत् तं विराटः सोऽक्षेण तद् भीमधनञ्जयाभ्याम् | | verse_lines = तदा क्रुद्धः प्राहरत् तं विराटः सोऽक्षेण तद् भीमधनञ्जयाभ्याम् ।¦श्रुतं तदा कुपितौ तौ निशाम्य न्यवारयत् तावपि धर्मसूनुः ॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = निजस्वरूपेण समास्थितान् नो यदि स्म नासौ प्रणिपातपूर्वकम्(पूर्वम्) । | | verse_text = निजस्वरूपेण समास्थितान् नो यदि स्म नासौ प्रणिपातपूर्वकम्(पूर्वम्) । | ||
| verse_lines = निजस्वरूपेण समास्थितान् नो यदि स्म नासौ प्रणिपातपूर्वकम्(पूर्वम्) | | verse_lines = निजस्वरूपेण समास्थितान् नो यदि स्म नासौ प्रणिपातपूर्वकम्(पूर्वम्) ।¦क्षमापयेद् वध्य इत्यात्मरूपं समास्थितास्तस्थुरथापरे(अथा परे) दिने ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = तदा विराटासनमास्थितं नृपं युधिष्ठिरं वीक्ष्य विराट आह । | | verse_text = तदा विराटासनमास्थितं नृपं युधिष्ठिरं वीक्ष्य विराट आह । | ||
| verse_lines = तदा विराटासनमास्थितं नृपं युधिष्ठिरं वीक्ष्य विराट आह | | verse_lines = तदा विराटासनमास्थितं नृपं युधिष्ठिरं वीक्ष्य विराट आह ।¦किमेतदित्यूचिवानुत्तरोऽस्मै तान् पाण्डवान् गोग्रहणे च वृत्तम् ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = ततो विराटो भयकम्पिताङ्गः प्रणम्य पार्थाञ्छरणं जगाम । | | verse_text = ततो विराटो भयकम्पिताङ्गः प्रणम्य पार्थाञ्छरणं जगाम । | ||
| verse_lines = ततो विराटो भयकम्पिताङ्गः प्रणम्य पार्थाञ्छरणं जगाम | | verse_lines = ततो विराटो भयकम्पिताङ्गः प्रणम्य पार्थाञ्छरणं जगाम ।¦ददौ च कन्यामुत्तरां फल्गुनाय पुत्रार्थमेव प्रतिजग्राह सोऽपि ॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = एवं विराटं मोचयित्वैव गाश्च तमस्यन्धे कीचकान् पातयित्वा । | | verse_text = एवं विराटं मोचयित्वैव गाश्च तमस्यन्धे कीचकान् पातयित्वा । | ||
| verse_lines = एवं विराटं मोचयित्वैव गाश्च तमस्यन्धे कीचकान् पातयित्वा | | verse_lines = एवं विराटं मोचयित्वैव गाश्च तमस्यन्धे कीचकान् पातयित्वा ।¦प्राप्तो धर्मः सुमहान् वायुजेन तस्यानु पार्थेन च गोविमोक्षणात् ॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = अयातयन् केशवायाथ दूतान् सहाभिमन्युः सोऽपि रामेण सार्द्धम् । | | verse_text = अयातयन् केशवायाथ दूतान् सहाभिमन्युः सोऽपि रामेण सार्द्धम् । | ||
| verse_lines = अयातयन् केशवायाथ दूतान् सहाभिमन्युः सोऽपि रामेण सार्द्धम् | | verse_lines = अयातयन् केशवायाथ दूतान् सहाभिमन्युः सोऽपि रामेण सार्द्धम् ।¦आगादनन्तानन्दचिद् वासुदेवो विवाहयामासुरथाभिमन्युम् ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = आसीन्महानुत्सवस्तत्र तेषां दाशार्हवीरैः सह पाण्डवानाम् । | | verse_text = आसीन्महानुत्सवस्तत्र तेषां दाशार्हवीरैः सह पाण्डवानाम् । | ||
| verse_lines = आसीन्महानुत्सवस्तत्र तेषां दाशार्हवीरैः सह पाण्डवानाम् | | verse_lines = आसीन्महानुत्सवस्तत्र तेषां दाशार्हवीरैः सह पाण्डवानाम् ।¦स पाञ्चालानां वासुदेवेन सार्द्धमज्ञातवासं समतीत्य मोदताम् ॥ ५०॥ | ||
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| verse_text = दुर्योधनाद्याः सूतपुत्रेण सार्द्धं ससौबलेया युधि पार्थपीडिताः । | | verse_text = दुर्योधनाद्याः सूतपुत्रेण सार्द्धं ससौबलेया युधि पार्थपीडिताः । | ||
| verse_lines = दुर्योधनाद्याः सूतपुत्रेण सार्द्धं ससौबलेया युधि पार्थपीडिताः | | verse_lines = दुर्योधनाद्याः सूतपुत्रेण सार्द्धं ससौबलेया युधि पार्थपीडिताः ।¦भीष्मादिभिः सार्द्धमुपेत्य नागपुरं मन्त्रं मन्त्रयामासुरत्र ॥ ५१॥ | ||
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| verse_text = अज्ञातवासे फल्गुनो नोऽद्य दृष्टस्तस्मात् पुनर्यान्तु पार्था वनाय । | | verse_text = अज्ञातवासे फल्गुनो नोऽद्य दृष्टस्तस्मात् पुनर्यान्तु पार्था वनाय । | ||
| verse_lines = अज्ञातवासे फल्गुनो नोऽद्य दृष्टस्तस्मात् पुनर्यान्तु पार्था वनाय | | verse_lines = अज्ञातवासे फल्गुनो नोऽद्य दृष्टस्तस्मात् पुनर्यान्तु पार्था वनाय ।¦इति ब्रुवाणानाह भीष्मोऽभ्यतीतमज्ञातवासं द्रोण आहैवमेव ॥ ५२॥ | ||
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| verse_text = तयोर्वाक्यं ते त्वनादृत्य पापा वनं पार्थाः पुनरेव प्रयान्तु । | | verse_text = तयोर्वाक्यं ते त्वनादृत्य पापा वनं पार्थाः पुनरेव प्रयान्तु । | ||
| verse_lines = तयोर्वाक्यं ते त्वनादृत्य पापा वनं पार्थाः पुनरेव प्रयान्तु | | verse_lines = तयोर्वाक्यं ते त्वनादृत्य पापा वनं पार्थाः पुनरेव प्रयान्तु ।¦इति दूतं प्रेषयामासुरत्र जानन्ति विप्रा इति धर्मजोऽवदत् ॥ ५३॥ | ||
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| verse_text = सौरमासानुसारेण धार्तराष्ट्रा अपूर्णताम् । | | verse_text = सौरमासानुसारेण धार्तराष्ट्रा अपूर्णताम् । | ||
| verse_lines = सौरमासानुसारेण धार्तराष्ट्रा अपूर्णताम् | | verse_lines = सौरमासानुसारेण धार्तराष्ट्रा अपूर्णताम् ।¦आहुश्चान्द्रेण मासेन पूर्णः कालोऽखिलोऽप्यसौ ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = दिनानामधिपः सूर्यः पक्षमासाधिपः शशी । | | verse_text = दिनानामधिपः सूर्यः पक्षमासाधिपः शशी । | ||
| verse_lines = दिनानामधिपः सूर्यः पक्षमासाधिपः शशी | | verse_lines = दिनानामधिपः सूर्यः पक्षमासाधिपः शशी ।¦तस्मात् सौम्याब्दमेवात्र मुख्यमाहुर्मनीषिणः ।¦सौम्यं कालं ततो यज्ञे गृह्णन्ति नतु सूर्यजम् ॥ ५५॥ | ||
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| verse_text = तदेतदविचार्यैव लोभाच्च धृतराष्ट्रजैः । | | verse_text = तदेतदविचार्यैव लोभाच्च धृतराष्ट्रजैः । | ||
| verse_lines = तदेतदविचार्यैव लोभाच्च धृतराष्ट्रजैः | | verse_lines = तदेतदविचार्यैव लोभाच्च धृतराष्ट्रजैः ।¦राज्यं न दत्तं पार्थेभ्यः पार्थाः कालस्य पूर्णताम् ।¦ख्यापयन्तो विप्रवरैरुपप्लाव्यमुपाययुः ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = सुवासुदेवा अखिलैश्च यादवैः पाञ्चालमत्स्यैश्च युताः सभार्याः । | | verse_text = सुवासुदेवा अखिलैश्च यादवैः पाञ्चालमत्स्यैश्च युताः सभार्याः । | ||
| verse_lines = सुवासुदेवा अखिलैश्च यादवैः पाञ्चालमत्स्यैश्च युताः सभार्याः | | verse_lines = सुवासुदेवा अखिलैश्च यादवैः पाञ्चालमत्स्यैश्च युताः सभार्याः ।¦उपप्लाव्ये ते कतिचिद् दिनानि वासं चक्रुः कृष्णसंशिक्षितार्थाः ॥ ५७॥ | ||
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<span id="gr-C24" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्विंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C24" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="चतुर्विंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ ततः सम्मन्त्र्यानुमते(अनुमतेः) कृष्णस्य स्वपुरोहितम् । | | verse_text = औं ॥ ततः सम्मन्त्र्यानुमते(अनुमतेः) कृष्णस्य स्वपुरोहितम् । | ||
| verse_lines = औं ॥ ततः सम्मन्त्र्यानुमते(अनुमतेः) कृष्णस्य स्वपुरोहितम् | | verse_lines = औं ॥ ततः सम्मन्त्र्यानुमते(अनुमतेः) कृष्णस्य स्वपुरोहितम् ।¦द्रुपदः प्रेषयामास धृतराष्ट्राय शान्तये ॥ १॥ | ||
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| verse_text = स गत्वा धृतराष्ट्रं तं भीष्मद्रोणादिभिर्युतम् । | | verse_text = स गत्वा धृतराष्ट्रं तं भीष्मद्रोणादिभिर्युतम् । | ||
| verse_lines = स गत्वा धृतराष्ट्रं तं भीष्मद्रोणादिभिर्युतम् | | verse_lines = स गत्वा धृतराष्ट्रं तं भीष्मद्रोणादिभिर्युतम् ।¦उवाच न विरोधस्त उत्पाद्यो धर्मसूनुना ।¦यस्य भीमार्जुनौ यौधौ नेता यस्य जनार्दनः ॥ २॥ | ||
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| verse_lines = श्रुतास्ते भीमनिहता जरासन्धादयोऽखिलाः | | verse_lines = श्रुतास्ते भीमनिहता जरासन्धादयोऽखिलाः ।¦यथा च रुद्रवचनादवध्या राक्षसाधिपाः ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = तीर्थविघ्नकराः सर्वतीर्थान्याच्छाद्य संस्थिताः । | | verse_text = तीर्थविघ्नकराः सर्वतीर्थान्याच्छाद्य संस्थिताः । | ||
| verse_lines = तीर्थविघ्नकराः सर्वतीर्थान्याच्छाद्य संस्थिताः | | verse_lines = तीर्थविघ्नकराः सर्वतीर्थान्याच्छाद्य संस्थिताः ।¦तिस्रः कोट्यो महावीर्या भीमेनैव निषूदिताः (निसूदिताः) ॥ ४॥ | ||
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| verse_lines = भ्रातॄणां ब्राह्मणानां च लोकानां च हितैषिणा | | verse_lines = भ्रातॄणां ब्राह्मणानां च लोकानां च हितैषिणा ।¦ततो हि सर्वतीर्थानि गम्यान्यासन् नृणां क्षितौ ॥ ५॥ | ||
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| verse_lines = यथा जटासुरः पापः शर्वाणीवरसंश्रयात् | | verse_lines = यथा जटासुरः पापः शर्वाणीवरसंश्रयात् ।¦अवध्यो विप्ररूपेण वञ्चयन्नेव पाण्डवान् ॥ ६॥ | ||
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| verse_lines = ज्ञात्वाऽपि भीमसेनेन विप्ररूपस्य नो वधः | | verse_lines = ज्ञात्वाऽपि भीमसेनेन विप्ररूपस्य नो वधः ।¦योग्य इत्यहतो भीमे मृगयार्थं गते क्वचित् ॥ ७॥ | ||
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| verse_lines = यमौ युधिष्ठिरं कृष्णां चाऽदायैव पराद्रवत् | | verse_lines = यमौ युधिष्ठिरं कृष्णां चाऽदायैव पराद्रवत् ।¦दृष्टो भीमेन तांस्त्यक्त्वा संसक्तस्तेन सङ्गरे ॥ ८॥ | ||
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| verse_lines = निपात्य भूमौ पादेन सञ्चूर्णितशिरास्तमः | | verse_lines = निपात्य भूमौ पादेन सञ्चूर्णितशिरास्तमः ।¦जगाम किमु ते पुत्राः शक्या हन्तुमिति स्म ह ॥ ९॥ | ||
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| verse_lines = निवातकवचाश्चैव हताः पार्थेन ते श्रुताः | | verse_lines = निवातकवचाश्चैव हताः पार्थेन ते श्रुताः ।¦जानासि च हरेर्वीर्यं यस्येदमखिलं वशे ।¦सब्रह्मरुद्रशक्राद्यं चेतनाचेतनात्मकम् ॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = तस्मादेतैः पालितस्य धर्मजस्य स्वकं वसु | | verse_lines = तस्मादेतैः पालितस्य धर्मजस्य स्वकं वसु ।¦दीयतामिति तेनोक्तो धृतराष्ट्रो नचाकरोत् ॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = ततः सहैव यदुभिः कृष्णं द्वारवतीं गतम् | | verse_lines = ततः सहैव यदुभिः कृष्णं द्वारवतीं गतम् ।¦युद्धसाहाय्यमिच्छन्तौ धार्तराष्ट्रधनञ्जयौ ॥ १२॥ | ||
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| verse_lines = दर्पान्नाहं राजराज उपास्ये पादयोरिति | | verse_lines = दर्पान्नाहं राजराज उपास्ये पादयोरिति ।¦तयोरागमनं पूर्वं ज्ञात्वैव हि हरिः प्रभुः ॥ १४॥ | ||
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| verse_lines = तमैक्षत् प्रथमं देवो जानन्नपि सुयोधनम् | | verse_lines = तमैक्षत् प्रथमं देवो जानन्नपि सुयोधनम् ।¦स्वागतं फल्गुनेत्युक्ते पूर्वमागामहं त्विति ।¦आह दुर्योधनस्तं च स्वागतेनाभ्यपूजयत् ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = समं करिष्ये युवयोरेकत्राहं निरायुधः । | | verse_text = समं करिष्ये युवयोरेकत्राहं निरायुधः । | ||
| verse_lines = समं करिष्ये युवयोरेकत्राहं निरायुधः | | verse_lines = समं करिष्ये युवयोरेकत्राहं निरायुधः ।¦अन्यत्र दशलक्षं मे पुत्राः शूराः पदातयः ॥ १८॥ | ||
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| Line 29,136: | Line 29,136: | ||
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| verse_text = इत्युक्ते फल्गुनः कृष्णं वव्रे तद्भक्तिमान् यतः । | | verse_text = इत्युक्ते फल्गुनः कृष्णं वव्रे तद्भक्तिमान् यतः । | ||
| verse_lines = इत्युक्ते फल्गुनः कृष्णं वव्रे तद्भक्तिमान् यतः | | verse_lines = इत्युक्ते फल्गुनः कृष्णं वव्रे तद्भक्तिमान् यतः ।¦अन्यस्तत्राभक्तिमत्त्वाद् वव्रे गोपान् प्रयुद्ध्यतः ॥ १९॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = पार्थानामेव साहाय्यं करिष्यन्नपि केशवः । | | verse_text = पार्थानामेव साहाय्यं करिष्यन्नपि केशवः । | ||
| verse_lines = पार्थानामेव साहाय्यं करिष्यन्नपि केशवः | | verse_lines = पार्थानामेव साहाय्यं करिष्यन्नपि केशवः ।¦तस्याभक्तिं दर्शयितुं चक्रे समवदीश्वरः ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = ततः पार्थेन सहितः पाण्डवान् केशवो ययौ । | | verse_text = ततः पार्थेन सहितः पाण्डवान् केशवो ययौ । | ||
| verse_lines = ततः पार्थेन सहितः पाण्डवान् केशवो ययौ | | verse_lines = ततः पार्थेन सहितः पाण्डवान् केशवो ययौ ।¦दुर्योधनो ययौ रामं स भयात् केशवस्य च ।¦न साहाय्यं करोमीति प्राह तत्स्नेहवानपि ॥ २१॥ | ||
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| verse_text = उपप्लाव्ये सभायां हि तत्पक्षीयं वचो ब्रुवन् । | | verse_text = उपप्लाव्ये सभायां हि तत्पक्षीयं वचो ब्रुवन् । | ||
| verse_lines = उपप्लाव्ये सभायां हि तत्पक्षीयं वचो ब्रुवन् | | verse_lines = उपप्लाव्ये सभायां हि तत्पक्षीयं वचो ब्रुवन् ।¦निराकृतः सात्यकिना समक्षं केशवस्य च ॥ २२॥ | ||
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| verse_text = ततो दुर्योधनं नायात् स च हार्दिक्यसंयुतः । | | verse_text = ततो दुर्योधनं नायात् स च हार्दिक्यसंयुतः । | ||
| verse_lines = ततो दुर्योधनं नायात् स च हार्दिक्यसंयुतः | | verse_lines = ततो दुर्योधनं नायात् स च हार्दिक्यसंयुतः ।¦जगाम हस्तिनपुरमक्षोहिण्यो दशाभवन् ।¦एका च धार्तराष्ट्रस्य नानादेश्यैर्नृपैर्युताः ॥ २३॥ | ||
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| verse_text = सप्त पाण्डुसुतानां च मत्स्यद्रुपदकेकयैः । | | verse_text = सप्त पाण्डुसुतानां च मत्स्यद्रुपदकेकयैः । | ||
| verse_lines = सप्त पाण्डुसुतानां च मत्स्यद्रुपदकेकयैः | | verse_lines = सप्त पाण्डुसुतानां च मत्स्यद्रुपदकेकयैः ।¦धृष्टकेतुजरासन्धसुतकाशीनृपैर्युताः ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = पुरुजित् कुन्तिभोजश्च चेकितानश्च सात्यकिः । | | verse_text = पुरुजित् कुन्तिभोजश्च चेकितानश्च सात्यकिः । | ||
| verse_lines = पुरुजित् कुन्तिभोजश्च चेकितानश्च सात्यकिः | | verse_lines = पुरुजित् कुन्तिभोजश्च चेकितानश्च सात्यकिः ।¦पाण्डवान् सेनया युक्ताः समीयुर्देवपक्षिणः ॥ २५॥ | ||
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| verse_text = विन्दानुविन्दावावन्त्यौ जयत्सेनोऽन्यकैकयाः(अन्यकेकयाः) । | | verse_text = विन्दानुविन्दावावन्त्यौ जयत्सेनोऽन्यकैकयाः(अन्यकेकयाः) । | ||
| verse_lines = विन्दानुविन्दावावन्त्यौ जयत्सेनोऽन्यकैकयाः(अन्यकेकयाः) | | verse_lines = विन्दानुविन्दावावन्त्यौ जयत्सेनोऽन्यकैकयाः(अन्यकेकयाः) ।¦क्षेमधूर्तिर्दण्डधारः कलिङ्गोऽम्बष्ठ एव च ॥ २६॥ | ||
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| verse_text = श्रुतायुरच्युतायुश्च बृहद्बलसुदक्षिणौ । | | verse_text = श्रुतायुरच्युतायुश्च बृहद्बलसुदक्षिणौ । | ||
| verse_lines = श्रुतायुरच्युतायुश्च बृहद्बलसुदक्षिणौ | | verse_lines = श्रुतायुरच्युतायुश्च बृहद्बलसुदक्षिणौ ।¦श्रुतायुधः सैन्धवश्च राक्षसोऽलम्बुसस्तथा ॥ २७॥ | ||
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| verse_text = अलायुधोऽलम्बलश्च दैत्या दुर्योधनं ययुः । | | verse_text = अलायुधोऽलम्बलश्च दैत्या दुर्योधनं ययुः । | ||
| verse_lines = अलायुधोऽलम्बलश्च दैत्या दुर्योधनं ययुः | | verse_lines = अलायुधोऽलम्बलश्च दैत्या दुर्योधनं ययुः ।¦गत्वा दुर्योधनाहूतो भगदत्तोऽपि तं ययौ ॥ २८॥ | ||
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| verse_text = सपुत्रपौत्रो बाह्लीको भीष्मद्रोणकृपा अपि । | | verse_text = सपुत्रपौत्रो बाह्लीको भीष्मद्रोणकृपा अपि । | ||
| verse_lines = सपुत्रपौत्रो बाह्लीको भीष्मद्रोणकृपा अपि | | verse_lines = सपुत्रपौत्रो बाह्लीको भीष्मद्रोणकृपा अपि ।¦प्रीत्यर्थं धृतराष्ट्रस्य बभूवुस्तत्सुतानुगाः ॥ २९॥ | ||
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| verse_text = पाण्ड्यश्च वीरसेनाख्यः पाण्डवानेव संश्रितः । | | verse_text = पाण्ड्यश्च वीरसेनाख्यः पाण्डवानेव संश्रितः । | ||
| verse_lines = पाण्ड्यश्च वीरसेनाख्यः पाण्डवानेव संश्रितः | | verse_lines = पाण्ड्यश्च वीरसेनाख्यः पाण्डवानेव संश्रितः ।¦शल्यं च पाण्डवानेव यान्तं ज्ञात्वा सुयोधनः ।¦सुसभाः कारयामास सर्वभोगसमन्विताः ॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = ता युधिष्ठिरक्लृप्ताः स मत्वा शल्योऽब्रवीदिदम् । | | verse_text = ता युधिष्ठिरक्लृप्ताः स मत्वा शल्योऽब्रवीदिदम् । | ||
| verse_lines = ता युधिष्ठिरक्लृप्ताः स मत्वा शल्योऽब्रवीदिदम् | | verse_lines = ता युधिष्ठिरक्लृप्ताः स मत्वा शल्योऽब्रवीदिदम् ।¦य एताः(य एतत्) कारयामास तदभीष्टं करोम्यहम् ॥ ३१॥ | ||
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| verse_text = लीनः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रः सत्यं कुर्वित्यभाषत । | | verse_text = लीनः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रः सत्यं कुर्वित्यभाषत । | ||
| verse_lines = लीनः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रः सत्यं कुर्वित्यभाषत | | verse_lines = लीनः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रः सत्यं कुर्वित्यभाषत ।¦देहि मे युद्धसाहाय्यमिति सोऽपि यशोऽर्थयन् ।¦रक्षार्थमात्मवाक्यस्य तथेत्येवाभ्यभाषत ॥ ३२॥ | ||
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| verse_text = स पाण्डवांस्ततो गत्वा तैरनुज्ञात एव च । | | verse_text = स पाण्डवांस्ततो गत्वा तैरनुज्ञात एव च । | ||
| verse_lines = स पाण्डवांस्ततो गत्वा तैरनुज्ञात एव च | | verse_lines = स पाण्डवांस्ततो गत्वा तैरनुज्ञात एव च ।¦तेजोवधार्थं कर्णस्य धनञ्जयकृतेऽर्थितः ।¦तथेत्युक्त्वा ययौ धर्मनन्दनं कौरवान् प्रति ॥ ३३॥ | ||
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| verse_lines = सञ्जयं प्रेषयामास धृतराष्ट्रोऽथ शान्तये | | verse_lines = सञ्जयं प्रेषयामास धृतराष्ट्रोऽथ शान्तये ।¦पाण्डवान् प्रत्यधर्मं च युद्धं स प्रत्यपादयत् ॥ ३४॥ | ||
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| verse_lines = हठवादेऽवदद् भीमो यं धर्मं द्रौपदी तथा | | verse_lines = हठवादेऽवदद् भीमो यं धर्मं द्रौपदी तथा ।¦तमेवोक्त्वा धर्मजस्तु चकार च निरुत्तरम् ।¦कृष्णोऽपि तस्य धर्मस्य प्रामाण्यं प्रत्यपादयत् ॥ ३५॥ | ||
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| verse_lines = ततो निरुत्तरः कृष्णं पाण्डवांश्च प्रणम्य सः | | verse_lines = ततो निरुत्तरः कृष्णं पाण्डवांश्च प्रणम्य सः ।¦धृतराष्ट्रं ययौ तं च विनिन्द्य प्रययौ गृहम् ॥ ३६॥ | ||
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| verse_lines = निन्दितः सञ्जयेनासावाहूय विदुरं निशि | | verse_lines = निन्दितः सञ्जयेनासावाहूय विदुरं निशि ।¦पप्रच्छ सोऽवदद् धर्मं पार्थानां राज्यदापनम् ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = ऐहिकस्य सुखस्यापि कारणं तदनिन्दितम् | | verse_lines = ऐहिकस्य सुखस्यापि कारणं तदनिन्दितम् ।¦अन्यथा सर्वपुत्राणां नाशं धर्मातिलङ्घनम् ॥ ३८॥ | ||
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| verse_lines = तत्र भावमकृत्वा स ज्ञानादिच्छन्नघक्षयम् | | verse_lines = तत्र भावमकृत्वा स ज्ञानादिच्छन्नघक्षयम् ।¦विष्णोः स्वरूपं पप्रच्छ सोऽस्मरच्च सनातनम् ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = स आगत्यावदत् तत्त्वं विष्णोर्मायाविनः शुभा । | | verse_text = स आगत्यावदत् तत्त्वं विष्णोर्मायाविनः शुभा । | ||
| verse_lines = स आगत्यावदत् तत्त्वं विष्णोर्मायाविनः शुभा | | verse_lines = स आगत्यावदत् तत्त्वं विष्णोर्मायाविनः शुभा ।¦न गतिश्चेत्यथ प्रातः सञ्जयः पाण्डवोदितम् ।¦अवदद् धृतराष्ट्राय सभायां कुरुसन्निधौ ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = तच्छ्रुत्वा स तु भीतोऽपि पुत्रस्नेहानुगो नृपः । | | verse_text = तच्छ्रुत्वा स तु भीतोऽपि पुत्रस्नेहानुगो नृपः । | ||
| verse_lines = तच्छ्रुत्वा स तु भीतोऽपि पुत्रस्नेहानुगो नृपः | | verse_lines = तच्छ्रुत्वा स तु भीतोऽपि पुत्रस्नेहानुगो नृपः ।¦राज्यं नादात् पाण्डवानां ततो धर्मसुतो नृपः ॥ ४१॥ | ||
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| verse_lines = यदुक्तवान् सञ्जयाय यदि दित्सतिः नः पिता | | verse_lines = यदुक्तवान् सञ्जयाय यदि दित्सतिः नः पिता ।¦राज्यं तदा त्वमागच्छ विदुरो वा न चेन्नच ।¦तावथानागतौ ज्ञात्वा मन्त्रयामास शौरिणा ॥ ४२॥ | ||
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| verse_lines = सोऽप्याहाहं गमिष्यामि सभायामृषिसन्निधौ | | verse_lines = सोऽप्याहाहं गमिष्यामि सभायामृषिसन्निधौ ।¦वक्ष्ये पथ्यानि युक्तानि यदि नासौ ग्रहीष्यति ।¦वध्यः सर्वस्य लोकस्य स भवेत् सर्वधर्महा ॥ ४३॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्ते वैरमात्मोत्थं लोकमध्ये प्रहापयन् | | verse_lines = इत्युक्ते वैरमात्मोत्थं लोकमध्ये प्रहापयन् ।¦लोकसङ्ग्रहणार्थाय भीमसेनोऽब्रवीद् वचः ॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = नास्मन्निमित्तनाशः स्यात् कुलस्यापि वयं कुलम् । | | verse_text = नास्मन्निमित्तनाशः स्यात् कुलस्यापि वयं कुलम् । | ||
| verse_lines = नास्मन्निमित्तनाशः स्यात् कुलस्यापि वयं कुलम् | | verse_lines = नास्मन्निमित्तनाशः स्यात् कुलस्यापि वयं कुलम् ।¦रक्षितुं धार्तराष्ट्रस्य भवेमाधश्चरा इति ॥ ४५॥ | ||
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| verse_lines = इच्छताऽप्यखिलान् हन्तुं धार्तराष्ट्रान् दृढात्मना | | verse_lines = इच्छताऽप्यखिलान् हन्तुं धार्तराष्ट्रान् दृढात्मना ।¦भीमेनोक्तो वासुदेवो लोकसङ्ग्रहणेच्छया ॥ ४६॥ | ||
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| verse_lines = वधं तेषां धर्ममेव लोके ख्यापयितुं हरिः | | verse_lines = वधं तेषां धर्ममेव लोके ख्यापयितुं हरिः ।¦आक्षिपन्निव भीमं तं युद्धाय प्रेरयद्(प्रैरयत्,प्रेरयद्) दृढम् ॥ ४७॥ | ||
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| verse_lines = अभिप्रायं केशवस्य जानन् भीमो निजं बलम् | | verse_lines = अभिप्रायं केशवस्य जानन् भीमो निजं बलम् ।¦राज्ञां मध्येऽवदत् तच्च कृष्णोऽभ्यधिकमेव हि ॥ ४८॥ | ||
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| verse_lines = नित्यमेकमनस्कौ तावपि केशवमारुती | | verse_lines = नित्यमेकमनस्कौ तावपि केशवमारुती ।¦एवं लोकस्य संवादहेतोः संवादमक्रताम् ॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = ततः कृष्णोऽर्जुनं चैव कृपालुं सन्धिकामुकम् | | verse_lines = ततः कृष्णोऽर्जुनं चैव कृपालुं सन्धिकामुकम् ।¦हेतुमद्भिः शुभैर्वाक्यैरनुनीय जगत्पतिः ।¦उक्तो मानुषया बुद्ध्या नकुलेन सुनीतिवत्(सुनीतवत्) ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = ससात्यकिः स्यन्दनवर्यसंस्थितः पृथातनूजैरखिलैः स भूमिपैः | | verse_lines = ससात्यकिः स्यन्दनवर्यसंस्थितः पृथातनूजैरखिलैः स भूमिपैः ।¦अन्वागतो दूरतरं गिरा तान् संस्थाप्य विप्रप्रवरैः कुरून् ययौ ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = एकोऽपि विष्णुः स तु(च) भार्गवात्मा व्यासात्मकश्चानुगतो मुनीन्द्रैः (व्यासः सशिष्यस्तदनन्यदृश्यः) । | | verse_text = एकोऽपि विष्णुः स तु(च) भार्गवात्मा व्यासात्मकश्चानुगतो मुनीन्द्रैः (व्यासः सशिष्यस्तदनन्यदृश्यः) । | ||
| verse_lines = एकोऽपि विष्णुः स तु(च) भार्गवात्मा व्यासात्मकश्चानुगतो मुनीन्द्रैः (व्यासः सशिष्यस्तदनन्यदृश्यः) | | verse_lines = एकोऽपि विष्णुः स तु(च) भार्गवात्मा व्यासात्मकश्चानुगतो मुनीन्द्रैः (व्यासः सशिष्यस्तदनन्यदृश्यः) ।¦ययौ तदुक्तेर्हि गुणान् प्रवेत्तुं नान्यो हि शक्तस्तमृते यतः प्रभुम् ॥ ५५॥ | ||
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| verse_text = स वन्द्यमानोऽखिलराष्ट्रवासिभिः प्रसूनवर्षैरभिवर्षितः सुरैः । | | verse_text = स वन्द्यमानोऽखिलराष्ट्रवासिभिः प्रसूनवर्षैरभिवर्षितः सुरैः । | ||
| verse_lines = स वन्द्यमानोऽखिलराष्ट्रवासिभिः प्रसूनवर्षैरभिवर्षितः सुरैः | | verse_lines = स वन्द्यमानोऽखिलराष्ट्रवासिभिः प्रसूनवर्षैरभिवर्षितः सुरैः ।¦संस्तूयमानः प्रणतोऽब्जजादिभिर्गजाह्वयं प्राप परोऽप्रमेयः ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = स भीष्ममुख्यैः सरसाभियातः सहैव तै प्रययौ राजमार्गे । | | verse_text = स भीष्ममुख्यैः सरसाभियातः सहैव तै प्रययौ राजमार्गे । | ||
| verse_lines = स भीष्ममुख्यैः सरसाभियातः सहैव तै प्रययौ राजमार्गे | | verse_lines = स भीष्ममुख्यैः सरसाभियातः सहैव तै प्रययौ राजमार्गे ।¦दिदृक्षवस्तं जगदेकसुन्दरं गुणार्णवं प्राययुरत्र सर्वे ॥ ५७॥ | ||
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| verse_text = सभाजितस्तैः(सम्भावितस्तैः) परमादरेण विवेश गेहं नृपतेरनन्तः । | | verse_text = सभाजितस्तैः(सम्भावितस्तैः) परमादरेण विवेश गेहं नृपतेरनन्तः । | ||
| verse_lines = सभाजितस्तैः(सम्भावितस्तैः) परमादरेण विवेश गेहं नृपतेरनन्तः | | verse_lines = सभाजितस्तैः(सम्भावितस्तैः) परमादरेण विवेश गेहं नृपतेरनन्तः ।¦स भीष्ममुख्यान् पुरतो निधाय वैचित्रवीर्येण समर्चितोऽजः ।¦रौग्मे(रौक्मे) निषण्णः परमासने प्रभुर्बभौ स्वभासा ककुभोऽवभासयन् ॥ ५८॥ | ||
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| verse_text = यथोचितं तेषु विधाय केशवो दौर्योधनं प्राप्य गृहं च पूजितः । | | verse_text = यथोचितं तेषु विधाय केशवो दौर्योधनं प्राप्य गृहं च पूजितः । | ||
| verse_lines = यथोचितं तेषु विधाय केशवो दौर्योधनं प्राप्य गृहं च पूजितः | | verse_lines = यथोचितं तेषु विधाय केशवो दौर्योधनं प्राप्य गृहं च पूजितः ।¦पूजां तदीयां गुणवद्द्विडित्यसौ जग्राह नो विदुरं चाऽजगाम ॥ ५९॥ | ||
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| verse_text = स भीष्मपूर्वैरभियाचितोऽपि जगाम नैषां गृहमादिदेवः । | | verse_text = स भीष्मपूर्वैरभियाचितोऽपि जगाम नैषां गृहमादिदेवः । | ||
| verse_lines = स भीष्मपूर्वैरभियाचितोऽपि जगाम नैषां गृहमादिदेवः | | verse_lines = स भीष्मपूर्वैरभियाचितोऽपि जगाम नैषां गृहमादिदेवः ।¦उपेक्षिता द्रौपदीत्यप्रमेयो जगाम गेहं विदुरस्य शीघ्रम् ॥ ६०॥ | ||
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| verse_text = स तेन भक्त्याऽभिगतः प्रसन्नः प्रविश्य चान्तर्गृहमीश्वरोऽजः । | | verse_text = स तेन भक्त्याऽभिगतः प्रसन्नः प्रविश्य चान्तर्गृहमीश्वरोऽजः । | ||
| verse_lines = स तेन भक्त्याऽभिगतः प्रसन्नः प्रविश्य चान्तर्गृहमीश्वरोऽजः | | verse_lines = स तेन भक्त्याऽभिगतः प्रसन्नः प्रविश्य चान्तर्गृहमीश्वरोऽजः ।¦भक्त्याऽभिपूर्णेन ससम्भ्रमेण सम्पूजितः सर्वसमर्पणेन ॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = परे दिनेऽसौ धृतराष्ट्रसूनुना समानीतः संसदि कौरवाणाम् । | | verse_text = परे दिनेऽसौ धृतराष्ट्रसूनुना समानीतः संसदि कौरवाणाम् । | ||
| verse_lines = परे दिनेऽसौ धृतराष्ट्रसूनुना समानीतः संसदि कौरवाणाम् | | verse_lines = परे दिनेऽसौ धृतराष्ट्रसूनुना समानीतः संसदि कौरवाणाम् ।¦विवेश दिव्ये मणिकाञ्चनासने सार्द्धं मुनीन्द्रैः परमार्थवेदिभिः ॥ ६२॥ | ||
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| verse_text = सम्पूजितो भीष्ममुख्यैः समस्तै रराज राजीवसमाननेत्रः । | | verse_text = सम्पूजितो भीष्ममुख्यैः समस्तै रराज राजीवसमाननेत्रः । | ||
| verse_lines = सम्पूजितो भीष्ममुख्यैः समस्तै रराज राजीवसमाननेत्रः | | verse_lines = सम्पूजितो भीष्ममुख्यैः समस्तै रराज राजीवसमाननेत्रः ।¦यथोचितास्तत्र विधाय वार्ता जगाद काले कलिकल्मषापहः ॥ ६३॥ | ||
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| verse_text = वैचित्रवीर्य स्वकुलस्य वृद्ध्यै प्रदेहि राज्यं तव सत्सुताय । | | verse_text = वैचित्रवीर्य स्वकुलस्य वृद्ध्यै प्रदेहि राज्यं तव सत्सुताय । | ||
| verse_lines = वैचित्रवीर्य स्वकुलस्य वृद्ध्यै प्रदेहि राज्यं तव सत्सुताय | | verse_lines = वैचित्रवीर्य स्वकुलस्य वृद्ध्यै प्रदेहि राज्यं तव सत्सुताय ।¦यशश्च धर्मं परमं प्रसादं मम त्वमाप्नोषि तदैव राजन् ।¦अतोऽन्यथा यशसो धर्मतश्च हीनः प्रतीपत्वमुपैषि मेऽतः ॥ ६४॥ | ||
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| verse_text = इतीरितः प्राह ममातिवर्तिनं सुतं स्वयं मे प्रतिबोधयेति । | | verse_text = इतीरितः प्राह ममातिवर्तिनं सुतं स्वयं मे प्रतिबोधयेति । | ||
| verse_lines = इतीरितः प्राह ममातिवर्तिनं सुतं स्वयं मे प्रतिबोधयेति | | verse_lines = इतीरितः प्राह ममातिवर्तिनं सुतं स्वयं मे प्रतिबोधयेति ।¦स वासुदेवेन विबोधितोऽपि पापाभिसन्धिर्धृतराष्ट्रसूनुः ।¦उत्थाय तस्मादनुजैरमात्यैर्नियन्तुमीशं कुमतिर्व्यधान्मतिम् ॥ ६५॥ | ||
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| verse_text = येये तदा केशवसंयमाय न्यमन्त्रयंस्ते विबुधप्रतीपाः । | | verse_text = येये तदा केशवसंयमाय न्यमन्त्रयंस्ते विबुधप्रतीपाः । | ||
| verse_lines = येये तदा केशवसंयमाय न्यमन्त्रयंस्ते विबुधप्रतीपाः | | verse_lines = येये तदा केशवसंयमाय न्यमन्त्रयंस्ते विबुधप्रतीपाः ।¦अतो विकर्णप्रमुखा अपि स्म वध्यत्वमायन्नशुभां गतिं च ॥ ६६॥ | ||
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| verse_lines = कर्णः सुराग्र्योऽपि(सुरांशोऽपि) सुयोधनार्थे(सुयोधनार्थं) न्यमन्त्रयद् भावतो नैव दुष्टः | | verse_lines = कर्णः सुराग्र्योऽपि(सुरांशोऽपि) सुयोधनार्थे(सुयोधनार्थं) न्यमन्त्रयद् भावतो नैव दुष्टः ।¦अतो गतिश्चास्य सुशोभनाऽभूद् येऽत्रानुकूलाः परमस्य ते शुभाः ॥ ६७॥ | ||
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| verse_lines = ऋषिभिर्जामदग्न्येन व्यासेनाप्यमितौजसा | | verse_lines = ऋषिभिर्जामदग्न्येन व्यासेनाप्यमितौजसा ।¦वासुदेवात्मकेनैव चैव त्रिरूपेणैव विष्णुना ॥ ६८॥ | ||
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| verse_lines = मातापितृभ्यां भीष्माद्यैरनुशिष्टोऽपि दुर्मतिः | | verse_lines = मातापितृभ्यां भीष्माद्यैरनुशिष्टोऽपि दुर्मतिः ।¦सुयोधनो मन्त्रयते मुकुन्दस्यानुबन्धनम् ॥ ६९॥ | ||
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| verse_lines = सात्यकिः कृतवर्मा च तच्छुश्रुवतुरञ्जसा | | verse_lines = सात्यकिः कृतवर्मा च तच्छुश्रुवतुरञ्जसा ।¦संस्थाप्य कृतवर्माणं रहः सात्यकिरत्र च ।¦अभ्येत्य केशवं प्राह दुर्योधनविनिश्चयम् ॥ ७०॥ | ||
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| verse_lines = जानन्नप्यखिलं कृष्णस्तच्छ्रुत्वा सात्यकेर्मुखात् | | verse_lines = जानन्नप्यखिलं कृष्णस्तच्छ्रुत्वा सात्यकेर्मुखात् ।¦वैचित्रवीर्यमवदत् पश्य मामिति(मामपि) सर्वगम् ॥ ७१॥ | ||
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| verse_lines = अथ तेनाऽहुते पुत्रे सामात्ये पुरुषोत्तमः | | verse_lines = अथ तेनाऽहुते पुत्रे सामात्ये पुरुषोत्तमः ।¦(स्वं रूपं) स्वरूपं दर्शयामास सर्वगं पूर्णसद्गुणम् ॥ ७२॥ | ||
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| verse_lines = तत् कालसूर्यामितदीप्ति सर्वजगद्भरं शाश्वतमप्रमेयम् | | verse_lines = तत् कालसूर्यामितदीप्ति सर्वजगद्भरं शाश्वतमप्रमेयम् ।¦दृष्ट्वैव चक्षूंषि सुयोधनाद्या न्यमीलयन् दीधितिवारितानि ॥ ७३॥ | ||
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| verse_lines = पिधाय रूपं पुनरेव तद्धरिर्वैचित्रवीर्येण समर्थितः पुनः | | verse_lines = पिधाय रूपं पुनरेव तद्धरिर्वैचित्रवीर्येण समर्थितः पुनः ।¦कृत्वाऽन्धमेव प्रययौ सुयोधनं सहानुगं(सहानुजं) पापतमं प्रकाश्य ॥ ७४॥ | ||
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| verse_lines = अनन्तशक्तिः पुरुषोत्तमोऽसौ शक्तोऽपि दुर्योधनचित्तनिग्रहे | | verse_lines = अनन्तशक्तिः पुरुषोत्तमोऽसौ शक्तोऽपि दुर्योधनचित्तनिग्रहे ।¦नैव व्यधादेनमथोक्तकारिणं निपातयन्नन्धतमस्यनन्तः ॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = पुनश्च कुन्तीगृहमेत्य कृष्णस्तयोद्योगं धर्मसुतस्य शिष्टम् । | | verse_text = पुनश्च कुन्तीगृहमेत्य कृष्णस्तयोद्योगं धर्मसुतस्य शिष्टम् । | ||
| verse_lines = पुनश्च कुन्तीगृहमेत्य कृष्णस्तयोद्योगं धर्मसुतस्य शिष्टम् | | verse_lines = पुनश्च कुन्तीगृहमेत्य कृष्णस्तयोद्योगं धर्मसुतस्य शिष्टम् ।¦श्रुत्वा ययौ सूर्यजमात्मयाने निधाय तस्यावददात्मजन्म ॥ ७६॥ | ||
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| verse_lines = आयाहि पार्थानिति (पाण्डूनिति) तद्वचः स नैवाकरोन्मानितो धार्तराष्ट्रैः | | verse_lines = आयाहि पार्थानिति (पाण्डूनिति) तद्वचः स नैवाकरोन्मानितो धार्तराष्ट्रैः ।¦संस्थाप्य तं भगवान् द्रौणये च रहोऽवदन्मित्रभावं पृथाजैः ॥ ७७॥ | ||
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| verse_text = यावत् पितुर्मरणं सोऽपि मैत्रीं वव्रे पार्थैस्तं च विसृज्य कृष्णः । | | verse_text = यावत् पितुर्मरणं सोऽपि मैत्रीं वव्रे पार्थैस्तं च विसृज्य कृष्णः । | ||
| verse_lines = यावत् पितुर्मरणं सोऽपि मैत्रीं वव्रे पार्थैस्तं च विसृज्य कृष्णः | | verse_lines = यावत् पितुर्मरणं सोऽपि मैत्रीं वव्रे पार्थैस्तं च विसृज्य कृष्णः ।¦ययौ कुरून् पूर्वमेवोद्विसृज्य पृथासुतानां स सकाशमीशः ॥ ७८॥ | ||
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| verse_lines = सम्प्रार्थितः पृथया चैव कर्णः पार्थैर्योगं याहि सूनुर्ममासि | | verse_lines = सम्प्रार्थितः पृथया चैव कर्णः पार्थैर्योगं याहि सूनुर्ममासि ।¦तेनाप्युक्ता वासविना विनाऽहं हन्यां सुतांस्ते न कथञ्चनेति ॥ ७९॥ | ||
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| verse_lines = ततो ययुः कौरवाः पाण्डवाश्च कुरुक्षेत्रं योद्धुकामाः सकृष्णाः | | verse_lines = ततो ययुः कौरवाः पाण्डवाश्च कुरुक्षेत्रं योद्धुकामाः सकृष्णाः ।¦चक्रुश्च ते शिबिराण्यत्र सर्वे शुभे देशे पाण्डवाः कृष्णबुद्ध्या ॥ ८०॥ | ||
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<span id="gr-C25" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चविंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C25" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="पञ्चविंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ ते सेने समरारम्भे समेते सागरोपमे । | | verse_text = औं ॥ ते सेने समरारम्भे समेते सागरोपमे । | ||
| verse_lines = औं ॥ ते सेने समरारम्भे समेते सागरोपमे | | verse_lines = औं ॥ ते सेने समरारम्भे समेते सागरोपमे ।¦भीमभीष्ममुखे वीक्ष्य प्राह वासविरच्युतम् ॥ १॥ | ||
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| verse_lines = ‘सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत’(भ.गी.१.२१) | | verse_lines = ‘सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत’(भ.गी.१.२१) ।¦इत्युक्तः स तथा चक्रे पार्थोऽपश्यच्च बान्धवान्(पार्थोऽपश्यत् स्वबान्धवान्) ।¦विससर्ज धनुः पापाशङ्की तत्राऽह माधवः ॥ २॥ | ||
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| verse_lines = ‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् | | verse_lines = ‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।¦स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः’ ॥ ४॥ (भ.गी.१८.४६) | ||
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| verse_lines = नच शोकस्त्वया कार्यो बन्धूनां निधनेच्छया (निधनेक्षया) | | verse_lines = नच शोकस्त्वया कार्यो बन्धूनां निधनेच्छया (निधनेक्षया) ।¦देहस्य सर्वथा नाशादनाशाच्चेतनस्य च ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = ज्ञात्वैषां निधनाद्यं च जीवादेरस्वतन्त्रताम् । | | verse_text = ज्ञात्वैषां निधनाद्यं च जीवादेरस्वतन्त्रताम् । | ||
| verse_lines = ज्ञात्वैषां निधनाद्यं च जीवादेरस्वतन्त्रताम् | | verse_lines = ज्ञात्वैषां निधनाद्यं च जीवादेरस्वतन्त्रताम् ।¦अस्वातन्त्र्यान्निवृत्तौ च मामनुस्मर युद्ध्य च ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । | | verse_text = ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः । | ||
| verse_lines = ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः | | verse_lines = ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।¦अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । | | verse_text = तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् । | ||
| verse_lines = तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् | | verse_lines = तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।¦भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ १०॥ (भ.गी.१२.६-७) | ||
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| verse_text = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । | | verse_text = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । | ||
| verse_lines = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना | | verse_lines = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।¦मत्स्थानि सर्वभूतानि नचाहं तेष्ववस्थितः ॥ ११॥ (भ.गी.९.४) | ||
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| verse_text = (सम्पूर्णसत्सर्व)सुपूर्णसत्सर्वगुणदेहोऽहं सर्वदा प्रभुः । | | verse_text = (सम्पूर्णसत्सर्व)सुपूर्णसत्सर्वगुणदेहोऽहं सर्वदा प्रभुः । | ||
| verse_lines = (सम्पूर्णसत्सर्व)सुपूर्णसत्सर्वगुणदेहोऽहं सर्वदा प्रभुः | | verse_lines = (सम्पूर्णसत्सर्व)सुपूर्णसत्सर्वगुणदेहोऽहं सर्वदा प्रभुः ।¦अस्पृष्टाखिलदोषैकनित्यसत्तनुरव्ययः ।¦इत्युक्तो वासविः प्राह व्याप्तं ते दर्शयेश मे(व्याप्तिं मे दर्शयस्व मे) ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = अथ दिव्यदृशं तस्य दत्वा व्याप्तं निजं वपुः । | | verse_text = अथ दिव्यदृशं तस्य दत्वा व्याप्तं निजं वपुः । | ||
| verse_lines = अथ दिव्यदृशं तस्य दत्वा व्याप्तं निजं वपुः | | verse_lines = अथ दिव्यदृशं तस्य दत्वा व्याप्तं निजं वपुः ।¦देशतः कालतश्चैव पूर्णं सर्वगुणैः सदा ।¦दर्शयामास भगवान् यावत्यर्जुनयोग्यता ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = तत्प्रार्थितः पुनः कृष्णस्तद्रूपं लोकमानतः । | | verse_text = तत्प्रार्थितः पुनः कृष्णस्तद्रूपं लोकमानतः । | ||
| verse_lines = तत्प्रार्थितः पुनः कृष्णस्तद्रूपं लोकमानतः | | verse_lines = तत्प्रार्थितः पुनः कृष्णस्तद्रूपं लोकमानतः ।¦पूर्ववद् दर्शयामास पुनश्चैनमशिक्षयत् ॥ १४॥ | ||
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| verse_text = ज्ञानं ज्ञेयं प्रकृत्यादि(ज्ञानज्ञेयप्रकृत्यादि) ज्ञापयन् पुरुषोत्तमः । | | verse_text = ज्ञानं ज्ञेयं प्रकृत्यादि(ज्ञानज्ञेयप्रकृत्यादि) ज्ञापयन् पुरुषोत्तमः । | ||
| verse_lines = ज्ञानं ज्ञेयं प्रकृत्यादि(ज्ञानज्ञेयप्रकृत्यादि) ज्ञापयन् पुरुषोत्तमः | | verse_lines = ज्ञानं ज्ञेयं प्रकृत्यादि(ज्ञानज्ञेयप्रकृत्यादि) ज्ञापयन् पुरुषोत्तमः ।¦तेनानुशिष्टः पार्थस्तु सशरं धनुराददे ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = अथ व्यूढेष्वनीकेषु नदन् वायुसुतोऽभ्ययात् । | | verse_text = अथ व्यूढेष्वनीकेषु नदन् वायुसुतोऽभ्ययात् । | ||
| verse_lines = अथ व्यूढेष्वनीकेषु नदन् वायुसुतोऽभ्ययात् | | verse_lines = अथ व्यूढेष्वनीकेषु नदन् वायुसुतोऽभ्ययात् ।¦समितिं धार्तराष्ट्राणां ते तं सर्वे न्यवारयन् ।¦ससृजुः शरवृष्टिं च भीमसेनस्य मूर्धनि ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = क्षिप्रं नैव प्रहर्तव्यं ज्ञातिषु प्रहरत्स्वपि । | | verse_text = क्षिप्रं नैव प्रहर्तव्यं ज्ञातिषु प्रहरत्स्वपि । | ||
| verse_lines = क्षिप्रं नैव प्रहर्तव्यं ज्ञातिषु प्रहरत्स्वपि | | verse_lines = क्षिप्रं नैव प्रहर्तव्यं ज्ञातिषु प्रहरत्स्वपि ।¦इत्येवाप्रहरत्यस्मिन् शत्रुभिः शरविक्षते ॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = अमुचन् धार्तराष्ट्रेषु शस्त्रवृष्टिं दुरासदाम् | | verse_lines = अमुचन् धार्तराष्ट्रेषु शस्त्रवृष्टिं दुरासदाम् ।¦सौभद्रप्रमुखा वीराः सर्वे पाण्डुसुतात्मजाः ॥ १८॥ | ||
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| verse_lines = अपीडयंस्ताञ्छस्त्रौघैर्धार्तराष्ट्राः समन्ततः | | verse_lines = अपीडयंस्ताञ्छस्त्रौघैर्धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।¦ररक्ष तान् वायुसुतो विसृजञ्छरसञ्चयान् ॥ १९॥ | ||
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| verse_lines = तत्र भीमशरैर्नुन्ना धार्तराष्ट्राः समन्ततः | | verse_lines = तत्र भीमशरैर्नुन्ना धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।¦भग्नास्तानथ गाङ्गेयो दिव्यास्त्रविदधारयत्(दिव्यास्त्रं व्यदधारयत्, दिव्यास्त्रविदधारयत्)) ॥ २०॥ | ||
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| verse_lines = अथ द्वन्द्वानि युद्धानि बभूवुर्विजिगीषताम् | | verse_lines = अथ द्वन्द्वानि युद्धानि बभूवुर्विजिगीषताम् ।¦द्रोणपार्षतयोश्चैव शैनेयकृतवर्मणोः ॥ २१॥ | ||
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| verse_text = दुःशासनेन वीरस्य माद्रेयस्य यवीयसः । | | verse_text = दुःशासनेन वीरस्य माद्रेयस्य यवीयसः । | ||
| verse_lines = दुःशासनेन वीरस्य माद्रेयस्य यवीयसः | | verse_lines = दुःशासनेन वीरस्य माद्रेयस्य यवीयसः ।¦नकुलस्य विकर्णस्य कार्ष्णेयैर्दुर्मुखादिनाम् ॥ २२॥ | ||
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| verse_text = वृत्ते द्वन्द्वमहायुद्धे तत्र धर्मजपक्षगाः । | | verse_text = वृत्ते द्वन्द्वमहायुद्धे तत्र धर्मजपक्षगाः । | ||
| verse_lines = वृत्ते द्वन्द्वमहायुद्धे तत्र धर्मजपक्षगाः | | verse_lines = वृत्ते द्वन्द्वमहायुद्धे तत्र धर्मजपक्षगाः ।¦जिता विनैव शैनेयं सोऽजयद्धृदिकात्मजम् ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = अथ भीष्मद्रोणमुखैर्भगदत्तादिभिस्तथा | | verse_lines = अथ भीष्मद्रोणमुखैर्भगदत्तादिभिस्तथा ।¦विद्राप्यमाणं स्वबलं स्थापयामास मारुतिः ॥ २४॥ | ||
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| verse_lines = द्रोणं च भगदत्तं च कृपं दुर्योधनं तथा | | verse_lines = द्रोणं च भगदत्तं च कृपं दुर्योधनं तथा ।¦केवलं बाहुवीर्येण व्यजयद् भीमविक्रमः ।¦हत्वोत्तरं मद्रराजो व्यद्रावयदनीकिनीम् ॥ २५॥ | ||
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| verse_lines = अथ भीष्ममुदीर्णास्त्रं द्रावयन्तं वरूथिनीम् | | verse_lines = अथ भीष्ममुदीर्णास्त्रं द्रावयन्तं वरूथिनीम् ।¦ससौमदत्तिं सौभद्रसहायोऽर्जुन आसदत् ॥ २६॥ | ||
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| verse_lines = सौभद्रं तत्र विक्रान्तमतीत्य द्युसरित्सुतः | | verse_lines = सौभद्रं तत्र विक्रान्तमतीत्य द्युसरित्सुतः ।¦द्रावयामास पाञ्चालान् पश्यतः सव्यसाचिनः ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = तस्य विक्रममालक्ष्य पार्थं तद्गौरवानुगम् | | verse_lines = तस्य विक्रममालक्ष्य पार्थं तद्गौरवानुगम् ।¦दृष्ट्वा युधिष्ठिरो राजा क्रुद्धः सेनामपाहरत् ॥ २८॥ | ||
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| verse_lines = रात्रौ युधिष्ठिरश्चिन्तामाप्य पार्थं व्यगर्हयत् | | verse_lines = रात्रौ युधिष्ठिरश्चिन्तामाप्य पार्थं व्यगर्हयत् ।¦स कृष्णाद्यैः सान्त्वितश्च पुनर्युद्धाय निर्ययौ ॥ २९॥ | ||
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| verse_text = एवं भीष्मो दशाहानि सेनापत्यं चकार ह । | | verse_text = एवं भीष्मो दशाहानि सेनापत्यं चकार ह । | ||
| verse_lines = एवं भीष्मो दशाहानि सेनापत्यं चकार ह | | verse_lines = एवं भीष्मो दशाहानि सेनापत्यं चकार ह ।¦कृत्वाऽपि पाण्डवैर्युद्धं तत् कर्तुमकृतोपमम् ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = कर्णोऽर्द्धरथ इत्युक्त्वा तावद् युद्धात् प्रयापितः(प्रहापितः) | | verse_lines = कर्णोऽर्द्धरथ इत्युक्त्वा तावद् युद्धात् प्रयापितः(प्रहापितः) ।¦यावत् त्वं योत्स्यसे तावन्न योत्स्यामीति निर्गते ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = कर्णेऽयुतरथानां(कर्णोऽयुतरथानां च) स नित्यशो वधमाहवे | | verse_lines = कर्णेऽयुतरथानां(कर्णोऽयुतरथानां च) स नित्यशो वधमाहवे ।¦प्रतिजज्ञेऽकरोत् तच्च पुनश्चास्त्रविदां वरः ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = सुसमर्थावपि वधे तस्य भीमधनञ्जयौ | | verse_lines = सुसमर्थावपि वधे तस्य भीमधनञ्जयौ ।¦स्नेहेन यन्त्रितौ तस्य गौरवाच्चान्ववर्तताम् ॥ ३३॥ | ||
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| verse_lines = बभूवुस्तत्र युद्धानि चित्राणि सुबहूनि च | | verse_lines = बभूवुस्तत्र युद्धानि चित्राणि सुबहूनि च ।¦तान्यम्बरे विमानस्था ब्रह्मरुद्रपुरस्सराः ।¦अपश्यन् देवताः सर्वा गन्धर्वाप्सरसोऽसुराः ॥ ३४॥ | ||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नो महेष्वासः प्रतिव्यूह्याऽपगासुतम् | | verse_lines = धृष्टद्युम्नो महेष्वासः प्रतिव्यूह्याऽपगासुतम् ।¦चक्रे युद्धानि सुबहून्यजेयः शत्रुभी रणे ॥ ३५॥ | ||
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| verse_lines = तत्रोद्दधार कृष्णोऽपि फल्गुनं मृदुयोधिनम् | | verse_lines = तत्रोद्दधार कृष्णोऽपि फल्गुनं मृदुयोधिनम् ।¦दृष्ट्वा चक्रं तथोद्यम्य बाहुं भीष्माय जग्मिवान् ॥ ३६॥ | ||
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| verse_lines = तेन स्तुतो गृहीतश्च फल्गुनेन प्रणम्य च | | verse_lines = तेन स्तुतो गृहीतश्च फल्गुनेन प्रणम्य च ।¦प्रार्थितो रथमारूढः पुनः शङ्खमपूरयत् ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = ततो भीष्मोऽर्जुनश्चैव शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् | | verse_lines = ततो भीष्मोऽर्जुनश्चैव शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् ।¦अयत्नेन जितश्चैव फल्गुनेनाऽपगासुतः ॥ ३८॥ | ||
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| verse_lines = पुनः संस्थापितरथौ विजित्यायत्नतो बली | | verse_lines = पुनः संस्थापितरथौ विजित्यायत्नतो बली ।¦यतमानौ महेष्वासौ धार्तराष्ट्रान् जघान ह ।¦पञ्चविंशद्धतास्तत्र धार्तराष्ट्रा महाबलाः ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = तमाह भीष्मस्तेऽजेया देवास्ते धरणीं गताः । | | verse_text = तमाह भीष्मस्तेऽजेया देवास्ते धरणीं गताः । | ||
| verse_lines = तमाह भीष्मस्तेऽजेया देवास्ते धरणीं गताः | | verse_lines = तमाह भीष्मस्तेऽजेया देवास्ते धरणीं गताः ।¦विशेषतः केशवेन पालितास्तत्प्रियाः सदा ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = मानसोत्तरशैले हि पुरा ब्रह्मपुरस्सराः । | | verse_text = मानसोत्तरशैले हि पुरा ब्रह्मपुरस्सराः । | ||
| verse_lines = मानसोत्तरशैले हि पुरा ब्रह्मपुरस्सराः | | verse_lines = मानसोत्तरशैले हि पुरा ब्रह्मपुरस्सराः ।¦स्थिता देवास्तदाऽपश्यद् ब्रह्मैको हरिमम्बरे ॥ ४७॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = स्तुत्वा सम्पूज्य भूमेः स भारावतरणाय तम् । | | verse_text = स्तुत्वा सम्पूज्य भूमेः स भारावतरणाय तम् । | ||
| verse_lines = स्तुत्वा सम्पूज्य भूमेः स भारावतरणाय तम् | | verse_lines = स्तुत्वा सम्पूज्य भूमेः स भारावतरणाय तम् ।¦प्रार्थयामास तेनोक्तं देवानामवदद् विभुः ॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = अयं नारायणो देवः पुर्णानन्तगुणार्णवः । | | verse_text = अयं नारायणो देवः पुर्णानन्तगुणार्णवः । | ||
| verse_lines = अयं नारायणो देवः पुर्णानन्तगुणार्णवः | | verse_lines = अयं नारायणो देवः पुर्णानन्तगुणार्णवः ।¦आज्ञापयति वः सर्वान् प्रादुर्भावाय भूतले ।¦स्वयं च देवकीपुत्रो भविष्यति जगत्पतिः(जगत्प्रभुः) ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = एवं तेन समादिष्टा धर्मवाय्वादयोऽखिलाः । | | verse_text = एवं तेन समादिष्टा धर्मवाय्वादयोऽखिलाः । | ||
| verse_lines = एवं तेन समादिष्टा धर्मवाय्वादयोऽखिलाः | | verse_lines = एवं तेन समादिष्टा धर्मवाय्वादयोऽखिलाः ।¦अभवन् पाण्डवाद्यास्ते सेन्द्राः सह मरुद्गणाः ॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = स च नारायणो देवो देवकीनन्दनोऽभवत् | | verse_lines = स च नारायणो देवो देवकीनन्दनोऽभवत् ।¦तेनैते पालिताः पार्था अजेया देवसर्गिणः ।¦तस्मात् तैः सन्धिमन्विच्छ यदीच्छस्यपराभवम् ॥ ५१॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तो डम्भबुद्ध्यैव नत्वा विष्णुं ततो ययौ । | | verse_text = इत्युक्तो डम्भबुद्ध्यैव नत्वा विष्णुं ततो ययौ । | ||
| verse_lines = इत्युक्तो डम्भबुद्ध्यैव नत्वा विष्णुं ततो ययौ | | verse_lines = इत्युक्तो डम्भबुद्ध्यैव नत्वा विष्णुं ततो ययौ ।¦प्रातर्निर्यातयामास सेनां युद्धाय दुर्मतिः ॥ ५२॥ | ||
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| verse_text = दिव्यौषधेन भीष्मस्य भूत्वा च निरुजस्ततः । | | verse_text = दिव्यौषधेन भीष्मस्य भूत्वा च निरुजस्ततः । | ||
| verse_lines = दिव्यौषधेन भीष्मस्य भूत्वा च निरुजस्ततः | | verse_lines = दिव्यौषधेन भीष्मस्य भूत्वा च निरुजस्ततः ।¦भीष्ममग्रे निधायैव ययौ युद्धाय दंशितः (दंसितः) ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = तत्राऽसीद् युद्धमतुलं भीमभीष्मानुयायिनाम् | | verse_lines = तत्राऽसीद् युद्धमतुलं भीमभीष्मानुयायिनाम् ।¦पाण्डवानां कुरूणां च शूराणामनिवर्तिनाम् ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = धृष्टद्युम्नस्तत्र भीमानुयायी दुर्योधनस्यावरजैः प्रयुद्ध्यन् । | | verse_text = धृष्टद्युम्नस्तत्र भीमानुयायी दुर्योधनस्यावरजैः प्रयुद्ध्यन् । | ||
| verse_lines = धृष्टद्युम्नस्तत्र भीमानुयायी दुर्योधनस्यावरजैः प्रयुद्ध्यन् | | verse_lines = धृष्टद्युम्नस्तत्र भीमानुयायी दुर्योधनस्यावरजैः प्रयुद्ध्यन् ।¦सम्मोहनास्त्रेण विमोहयित्वा विकर्णपूर्वानहनच्च सेनाम् ॥ ५५॥ | ||
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| verse_text = ततो द्रोणस्तान् समुत्थाप्य सर्वान् विज्ञानास्त्रेणाऽसदत् पार्षतं च । | | verse_text = ततो द्रोणस्तान् समुत्थाप्य सर्वान् विज्ञानास्त्रेणाऽसदत् पार्षतं च । | ||
| verse_lines = ततो द्रोणस्तान् समुत्थाप्य सर्वान् विज्ञानास्त्रेणाऽसदत् पार्षतं च | | verse_lines = ततो द्रोणस्तान् समुत्थाप्य सर्वान् विज्ञानास्त्रेणाऽसदत् पार्षतं च ।¦तं भीमसेनः सूतहीनं विधाय व्यद्रावयच्छत्रुगणाञ्छरौघैः ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = अथाऽसदत् कृतवर्मा रथेन धृष्टद्युम्नं सोऽभ्ययात् तावुभौ च । | | verse_text = अथाऽसदत् कृतवर्मा रथेन धृष्टद्युम्नं सोऽभ्ययात् तावुभौ च । | ||
| verse_lines = अथाऽसदत् कृतवर्मा रथेन धृष्टद्युम्नं सोऽभ्ययात् तावुभौ च | | verse_lines = अथाऽसदत् कृतवर्मा रथेन धृष्टद्युम्नं सोऽभ्ययात् तावुभौ च ।¦ववर्षतुः शरवर्षैरथोग्रैस्तत्राकरोद् विरथं द्रौपदिस्तम् ॥ ५७॥ | ||
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| verse_lines = तस्मिन् जिते रथवीरे स्वयं तं दुर्योधनः पार्षतमाससाद | | verse_lines = तस्मिन् जिते रथवीरे स्वयं तं दुर्योधनः पार्षतमाससाद ।¦तं भीमसेनो विरथायुधं च कृत्वा बाणेनाहनज्जत्रुदेशे ॥ ५८॥ | ||
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| verse_lines = विमूर्च्छितं तं रुधिरौघमुच्चैर्वमन्तमाशु स्वरथे निधाय | | verse_lines = विमूर्च्छितं तं रुधिरौघमुच्चैर्वमन्तमाशु स्वरथे निधाय ।¦कृपो ययौ मारुतिर्धार्तराष्ट्रीं व्यद्रावयत् पृतनां बाणपूगैः ॥ ५९॥ | ||
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| verse_lines = अथेन्द्रसूनुः केशवप्रेरितेन रथेन शत्रून् विधमञ्छरौघैः | | verse_lines = अथेन्द्रसूनुः केशवप्रेरितेन रथेन शत्रून् विधमञ्छरौघैः ।¦रथान् रणे पञ्चविंशत्सहस्रान् निनाय वैवस्वतसादनाय ॥ ६०॥ | ||
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| verse_lines = तमन्वगाद् (तमन्वयात्) युयुधानः सुधन्वा विद्रावयन् धार्तराष्ट्रस्य सेनाम् | | verse_lines = तमन्वगाद् (तमन्वयात्) युयुधानः सुधन्वा विद्रावयन् धार्तराष्ट्रस्य सेनाम् ।¦तमभ्ययात् सौमदत्तिस्तयोश्च सुयुद्धमासीदतिभैरवास्त्रम् ॥ ६१॥ | ||
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| verse_lines = पुत्रान् दशास्याऽशु निहत्य वीरः स सात्यकेः सौमदत्तिः सकाशे | | verse_lines = पुत्रान् दशास्याऽशु निहत्य वीरः स सात्यकेः सौमदत्तिः सकाशे ।¦समर्पयामास शरीरदारणैः शरैरुभौ तौ विरथौ च चक्रतुः ॥ ६२॥ | ||
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| verse_lines = अथासिपाणिं युयुधानमाशु महासिहस्तेन च सौमदत्तिना | | verse_lines = अथासिपाणिं युयुधानमाशु महासिहस्तेन च सौमदत्तिना ।¦आसादितं वीक्ष्य रथं स्वकीयमारोपयामास सुतोऽनिलस्य ॥ ६३॥ | ||
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| verse_lines = सुयोधनः सौमदत्तिं स्वकीयरथे व्यवस्थाप्य च भीमसेनात् | | verse_lines = सुयोधनः सौमदत्तिं स्वकीयरथे व्यवस्थाप्य च भीमसेनात् ।¦अपाद्रवद् वासविर्भीष्ममाजौ समाससादाऽशु महेन्द्रकल्पः ॥ ६४॥ | ||
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| verse_lines = उभौ च तावस्त्रविदां प्रबर्हौ शरैर्महाशीविषसन्निकाशैः | | verse_lines = उभौ च तावस्त्रविदां प्रबर्हौ शरैर्महाशीविषसन्निकाशैः ।¦ततक्षतुर्नाकसदां समक्षं महाबलौ संयति जातदर्पौ ॥ ६५॥ | ||
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| verse_lines = स्वबाहुवीर्येण जितः स भीष्मः किरीटिना लोकमहारथेन | | verse_lines = स्वबाहुवीर्येण जितः स भीष्मः किरीटिना लोकमहारथेन ।¦सेनामपाहृत्य ययौ निशायामासादितायामथ पाण्डवाश्च ॥ ६६॥ | ||
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| verse_lines = ततः परेद्युः पुनरेव भीमभीष्मौ पुरस्कृत्य समीयतुस्ते | | verse_lines = ततः परेद्युः पुनरेव भीमभीष्मौ पुरस्कृत्य समीयतुस्ते ।¦सेने तदा सारथिहीनमाशु भीष्मं कृत्वा मारुतिरभ्ययात् परान् ।¦निपातितास्तेन रथेभवाजिनः प्रदुद्रुवुश्चावशिष्टाः समस्ताः ॥ ६७॥ | ||
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| verse_lines = दुर्योधनाद्येषु पराजितेषु भीष्मद्रोणद्रौणिपुरस्सरेषु | | verse_lines = दुर्योधनाद्येषु पराजितेषु भीष्मद्रोणद्रौणिपुरस्सरेषु ।¦महागजस्थो भगदत्त आगादायन् बाणं भीमसेनेऽमुचच्च(भीमसेने मुमोच) ॥ ६८॥ | ||
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| verse_lines = तेनातिविद्धे भीमसेनेऽस्य पुत्र उद्यच्छमानं पितरं निवार्य | | verse_lines = तेनातिविद्धे भीमसेनेऽस्य पुत्र उद्यच्छमानं पितरं निवार्य ।¦घटोत्कचोऽभ्यद्रवदाशु वीरः स्वमायया हस्तिचतुष्टयस्थः ॥ ६९॥ | ||
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| verse_lines = स वैष्णवास्त्रं भगदत्तसंस्थं विज्ञाय विष्णोर्वरतो विशेषतः | | verse_lines = स वैष्णवास्त्रं भगदत्तसंस्थं विज्ञाय विष्णोर्वरतो विशेषतः ।¦अमोघमन्यत्र हरेर्मरुत्सुतः पुत्रे याते न स्वयमभ्यधावत् ॥ ७०॥ | ||
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| verse_lines = अनुग्रहादभ्यधिकादवध्यं जानन्नपि स्वं वासुदेवस्य नित्यम् | | verse_lines = अनुग्रहादभ्यधिकादवध्यं जानन्नपि स्वं वासुदेवस्य नित्यम् ।¦तद्भक्तिवैशेष्यत एव तस्य सत्यं वाक्यं कर्तुमरिं नचायात् ।¦यदा स्वपुत्रेण जितो भवेत् स किम्वात्मनेत्येव तदा प्रवेत्तुम् ॥ ७१॥ | ||
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| verse_lines = स विस्मृतास्त्रस्तु यदा भवेत तदा भीमो भगदत्तं प्रयाति | | verse_lines = स विस्मृतास्त्रस्तु यदा भवेत तदा भीमो भगदत्तं प्रयाति ।¦ऋते भीमं वाऽर्जुनं नास्त्रमेष प्रमुञ्चतीत्येव हि वेद भीमः ॥ ७२॥ | ||
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| verse_lines = चतुर्गजात्मोपरिगात्मकश्च घटोत्कचः सुप्रतीकं च तं च | | verse_lines = चतुर्गजात्मोपरिगात्मकश्च घटोत्कचः सुप्रतीकं च तं च ।¦नानाप्रहारैर्वितुदंश्चकार सन्दिग्धजीवौ जगतां समक्षम् ॥ ७३॥ | ||
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| verse_lines = गजार्तनादं तु निशम्य भीष्ममुखाः समापेतुरमुं च दृष्ट्वा | | verse_lines = गजार्तनादं तु निशम्य भीष्ममुखाः समापेतुरमुं च दृष्ट्वा ।¦महाकायं भीमममुष्य पृष्ठगोपं च वाय्वात्मजमत्रसन् भृशम् ।¦ते भीतभीताः पृतनापहारं कृत्वाऽपजग्मुः शिबिराय शीघ्रम् ॥ ७४॥ | ||
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| verse_lines = दिने परे चैव पुनः समेताः परस्परं पाण्डवाः कौरवास्ते | | verse_lines = दिने परे चैव पुनः समेताः परस्परं पाण्डवाः कौरवास्ते ।¦तत्राऽसदन्नागसुतासमुद्भवः पार्थात्मजः शाकुनेयान् षडेकः ॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = अलम्बुसस्तं प्रसमीक्ष्य मारुतेः सुतं बलाढ्यं भयतः पराद्रवत् । | | verse_text = अलम्बुसस्तं प्रसमीक्ष्य मारुतेः सुतं बलाढ्यं भयतः पराद्रवत् । | ||
| verse_lines = अलम्बुसस्तं प्रसमीक्ष्य मारुतेः सुतं बलाढ्यं भयतः पराद्रवत् | | verse_lines = अलम्बुसस्तं प्रसमीक्ष्य मारुतेः सुतं बलाढ्यं भयतः पराद्रवत् ।¦पराद्रवन् धार्तराष्ट्रस्य सेनाः सर्वास्तमाराथ सुयोधनो नृपः ॥ ८०॥ | ||
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| verse_text = स भीमपुत्रस्य जघान मन्त्रिणो महाबलांश्चतुरोऽन्यांस्तथैव । | | verse_text = स भीमपुत्रस्य जघान मन्त्रिणो महाबलांश्चतुरोऽन्यांस्तथैव । | ||
| verse_lines = स भीमपुत्रस्य जघान मन्त्रिणो महाबलांश्चतुरोऽन्यांस्तथैव | | verse_lines = स भीमपुत्रस्य जघान मन्त्रिणो महाबलांश्चतुरोऽन्यांस्तथैव ।¦हतावशेषेषु च विद्रवत्सु घटोत्कचोऽभ्याहनदाशु तं नृपम् ॥ ८१॥ | ||
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| verse_text = स पीड्यमानो युधि तेन रक्षसा प्रवेशयामास शरं घटोत्कचे । | | verse_text = स पीड्यमानो युधि तेन रक्षसा प्रवेशयामास शरं घटोत्कचे । | ||
| verse_lines = स पीड्यमानो युधि तेन रक्षसा प्रवेशयामास शरं घटोत्कचे | | verse_lines = स पीड्यमानो युधि तेन रक्षसा प्रवेशयामास शरं घटोत्कचे ।¦दृढाहतस्तेन तदा बलीयसा घटोत्कचः प्रव्यथितेन्द्रियो भृशम् ।¦तस्थौ कथञ्चिद् भुवि पात्यमानः पुनः शरानप्यसृजत् सुयोधने ॥ ८२॥ | ||
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| verse_text = चिरं प्रयुद्धौ नृपराक्षसाधिपौ परस्पराजेयतमौ रणाजिरे । | | verse_text = चिरं प्रयुद्धौ नृपराक्षसाधिपौ परस्पराजेयतमौ रणाजिरे । | ||
| verse_lines = चिरं प्रयुद्धौ नृपराक्षसाधिपौ परस्पराजेयतमौ रणाजिरे | | verse_lines = चिरं प्रयुद्धौ नृपराक्षसाधिपौ परस्पराजेयतमौ रणाजिरे ।¦द्रोणादयो वीक्ष्य रिरक्षिषन्तः सुयोधनं प्रापुरमित्रसाहाः ॥ ८३॥ | ||
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| verse_text = स द्रोणशल्यौ गुरुपुत्रगौतमौ भूरिश्रवःकृतवर्मादिकांश्च । | | verse_text = स द्रोणशल्यौ गुरुपुत्रगौतमौ भूरिश्रवःकृतवर्मादिकांश्च । | ||
| verse_lines = स द्रोणशल्यौ गुरुपुत्रगौतमौ भूरिश्रवःकृतवर्मादिकांश्च | | verse_lines = स द्रोणशल्यौ गुरुपुत्रगौतमौ भूरिश्रवःकृतवर्मादिकांश्च ।¦ववर्ष बाणैर्गगनं समाश्रितो घटोत्कचः स्थूलतमै सुवेगैः ॥ ८४॥ | ||
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| verse_text = तमेकग्र्यै रथिभिः परिष्कृतं निरीक्ष्य भीमोऽभ्यगमत् समस्तान् । | | verse_text = तमेकग्र्यै रथिभिः परिष्कृतं निरीक्ष्य भीमोऽभ्यगमत् समस्तान् । | ||
| verse_lines = तमेकग्र्यै रथिभिः परिष्कृतं निरीक्ष्य भीमोऽभ्यगमत् समस्तान् | | verse_lines = तमेकग्र्यै रथिभिः परिष्कृतं निरीक्ष्य भीमोऽभ्यगमत् समस्तान् ।¦द्रोणोऽत्र भीमप्रहितैः शरोत्तमैः सुपीडितः प्राप्तमूर्च्छः पपात ॥ ८५॥ | ||
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| verse_text = द्रौणिं कृपाद्यान् ससुयोधनांश्च चकार भीमो विरथान् क्षणेन । | | verse_text = द्रौणिं कृपाद्यान् ससुयोधनांश्च चकार भीमो विरथान् क्षणेन । | ||
| verse_lines = द्रौणिं कृपाद्यान् ससुयोधनांश्च चकार भीमो विरथान् क्षणेन | | verse_lines = द्रौणिं कृपाद्यान् ससुयोधनांश्च चकार भीमो विरथान् क्षणेन ।¦निवार्यमाणांस्तु वृकोदरेण घटोत्कचस्तान् प्रववर्ष सायकैः ॥ ८६॥ | ||
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| verse_text = तेनाम्बरस्थेन तरुप्रमाणैरभ्यर्दिताः कुरवः सायकौघैः । | | verse_text = तेनाम्बरस्थेन तरुप्रमाणैरभ्यर्दिताः कुरवः सायकौघैः । | ||
| verse_lines = तेनाम्बरस्थेन तरुप्रमाणैरभ्यर्दिताः कुरवः सायकौघैः | | verse_lines = तेनाम्बरस्थेन तरुप्रमाणैरभ्यर्दिताः कुरवः सायकौघैः ।¦भूमौ च भीमेन शरौघपीडिताः पेतुर्नेदुः प्राद्रवंश्चातिभीताः ॥ ८७॥ | ||
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| verse_text = सर्वांश्च ताञ्छिबिरं प्रापयित्वा विना भीष्मं कौरवान् भीमसेनः । | | verse_text = सर्वांश्च ताञ्छिबिरं प्रापयित्वा विना भीष्मं कौरवान् भीमसेनः । | ||
| verse_lines = सर्वांश्च ताञ्छिबिरं प्रापयित्वा विना भीष्मं कौरवान् भीमसेनः | | verse_lines = सर्वांश्च ताञ्छिबिरं प्रापयित्वा विना भीष्मं कौरवान् भीमसेनः ।¦घटोत्कचश्चानदतां महास्वनौ नादेन लोकानभिपूरयन्तौ ॥ ८८॥ | ||
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| verse_lines = दुर्योधनोऽथ स्वजनैः समेतः पुनः प्रायाद् रणभूमिं स भीष्मम् | | verse_lines = दुर्योधनोऽथ स्वजनैः समेतः पुनः प्रायाद् रणभूमिं स भीष्मम् ।¦जयोपायं भैमसेनेरपृच्छत् स्वस्यैव स प्राह न तं व्रजेति ॥ ८९॥ | ||
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| verse_lines = प्राग्ज्योतिषं चैव घटोत्कचाय सम्प्रेषयामास सुरापगासुतः | | verse_lines = प्राग्ज्योतिषं चैव घटोत्कचाय सम्प्रेषयामास सुरापगासुतः ।¦स प्राप्य हैडिम्बमयोधयद् बली स चार्दयामास सकुञ्जरं तम् ॥ ९०॥ | ||
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| verse_text = तेनाहतः (तेनार्दितः) प्राहिणोच्छूलमस्मै वियत्यवप्लुत्य तदा घटोत्कचः । | | verse_text = तेनाहतः (तेनार्दितः) प्राहिणोच्छूलमस्मै वियत्यवप्लुत्य तदा घटोत्कचः । | ||
| verse_lines = तेनाहतः (तेनार्दितः) प्राहिणोच्छूलमस्मै वियत्यवप्लुत्य तदा घटोत्कचः | | verse_lines = तेनाहतः (तेनार्दितः) प्राहिणोच्छूलमस्मै वियत्यवप्लुत्य तदा घटोत्कचः ।¦प्रगृह्य शूलं प्रबभञ्ज जानुमारोप्य देवा जहृषुस्तदीक्ष्य ॥ ९१॥ | ||
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| verse_text = तदा स तस्यैव पदानुगान् नृपो जघान तं मारुतिरभ्ययाद् रणे । | | verse_text = तदा स तस्यैव पदानुगान् नृपो जघान तं मारुतिरभ्ययाद् रणे । | ||
| verse_lines = तदा स तस्यैव पदानुगान् नृपो जघान तं मारुतिरभ्ययाद् रणे | | verse_lines = तदा स तस्यैव पदानुगान् नृपो जघान तं मारुतिरभ्ययाद् रणे ।¦स प्राहिणोद् भीमसेनाय वीरो गजं तमस्तम्भयदाशु सायकैः ॥ ९२॥ | ||
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| verse_text = संस्तम्भिते बाणवरैस्तु नागे भीमस्याश्वान् सायकैरर्दयत्(आर्दयत्) सः । | | verse_text = संस्तम्भिते बाणवरैस्तु नागे भीमस्याश्वान् सायकैरर्दयत्(आर्दयत्) सः । | ||
| verse_lines = संस्तम्भिते बाणवरैस्तु नागे भीमस्याश्वान् सायकैरर्दयत्(आर्दयत्) सः | | verse_lines = संस्तम्भिते बाणवरैस्तु नागे भीमस्याश्वान् सायकैरर्दयत्(आर्दयत्) सः ।¦सोऽभ्यर्दिताश्वोऽथ गदां प्रगृह्य हन्तुं नृपं तं सगजं समासदत् ॥ ९३॥ | ||
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| verse_lines = स हन्तुकामेन रुषाऽभिपन्नो भीमेन राजा पुरतः पृष्ठतश्च | | verse_lines = स हन्तुकामेन रुषाऽभिपन्नो भीमेन राजा पुरतः पृष्ठतश्च ।¦कृष्णेनास्त्रं वैष्णवं तद् गृहीतुं(ग्रहीतुं) सहार्जुनेनापययौ स भीतः ॥ ९४॥ | ||
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| verse_lines = तस्मिन् गते भीमसेनार्जुनाभ्यां विद्राविते राजसङ्घे समस्ते | | verse_lines = तस्मिन् गते भीमसेनार्जुनाभ्यां विद्राविते राजसङ्घे समस्ते ।¦भीष्मः सेनामपहृत्यापयातो दुर्योधनस्तं निशि चोपजग्मिवान् ॥ ९५॥ | ||
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| verse_lines = संश्रावितः क्रूरवचः स तेन चक्रे सत्यं मृत्युभयं विहाय | | verse_lines = संश्रावितः क्रूरवचः स तेन चक्रे सत्यं मृत्युभयं विहाय ।¦शक्त्या हनिष्यामि परानिति स्म चक्रे च तत् कर्म तथा परेद्युः ॥ ९६॥ | ||
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| verse_lines = तं शक्तितो जुगुपुर्धार्तराष्ट्रास्तेनार्दिताश्चेदिपाञ्चालमुख्याः | | verse_lines = तं शक्तितो जुगुपुर्धार्तराष्ट्रास्तेनार्दिताश्चेदिपाञ्चालमुख्याः ।¦पराद्रवन् भीष्मबाणोरुभीताः सिंहार्दिताः क्षुद्रमृगा इवाऽर्ताः ॥ ९७॥ | ||
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| verse_lines = संस्थाप्य तान् भीष्ममभिप्रयान्तमलम्बुसोऽवारयत् पार्थसूनुम् | | verse_lines = संस्थाप्य तान् भीष्ममभिप्रयान्तमलम्बुसोऽवारयत् पार्थसूनुम् ।¦विजित्य तं केशवभागिनेयो ययौ भीष्मं धार्तराष्ट्रोऽमुमार ॥ ९८॥ | ||
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| verse_lines = तद् युद्धमासीन्नृपपार्थपुत्रयोर्विचित्रमत्यद्भुतमुग्ररूपम् | | verse_lines = तद् युद्धमासीन्नृपपार्थपुत्रयोर्विचित्रमत्यद्भुतमुग्ररूपम् ।¦समं चिरं तत्र धनुश्चकर्त ध्वजं च राजा सहसाऽभिमन्योः ॥ ९९॥ | ||
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| verse_lines = अथैनमुग्रैश्च शरैर्ववर्ष सूतं च तस्याऽशु जघान वीरः | | verse_lines = अथैनमुग्रैश्च शरैर्ववर्ष सूतं च तस्याऽशु जघान वीरः ।¦तदाऽऽसदद् भीमसेनो नृपं तं जघान चाश्वान् धृतराष्ट्रजस्य ॥ १००॥ | ||
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| verse_lines = तामुद्यतां वीक्ष्य(तामुद्यतामीक्ष्य) पराद्रवंस्ते स चित्रसेनश्च रथादवप्लुतः | | verse_lines = तामुद्यतां वीक्ष्य(तामुद्यतामीक्ष्य) पराद्रवंस्ते स चित्रसेनश्च रथादवप्लुतः ।¦सञ्चूर्णितो गदया तद्रथश्च तज्जीवनेनोद्धृषिताश्च कौरवाः ॥ १०२॥ | ||
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| verse_text = अस्त्रेण मायामपनुद्य वीरो व्यद्रावयद् राक्षसं सात्यकिस्तम् । | | verse_text = अस्त्रेण मायामपनुद्य वीरो व्यद्रावयद् राक्षसं सात्यकिस्तम् । | ||
| verse_lines = अस्त्रेण मायामपनुद्य वीरो व्यद्रावयद् राक्षसं सात्यकिस्तम् | | verse_lines = अस्त्रेण मायामपनुद्य वीरो व्यद्रावयद् राक्षसं सात्यकिस्तम् ।¦तस्मिन् गते युयुधानो रथेन ययौ भीष्मं पार्थमन्वेव धन्वी ॥ ११२॥ | ||
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| verse_text = द्रोणो द्रौणिर्धार्तराष्ट्रश्च राजा भूरिश्रवा भगदत्तः कृपश्च । | | verse_text = द्रोणो द्रौणिर्धार्तराष्ट्रश्च राजा भूरिश्रवा भगदत्तः कृपश्च । | ||
| verse_lines = द्रोणो द्रौणिर्धार्तराष्ट्रश्च राजा भूरिश्रवा भगदत्तः कृपश्च | | verse_lines = द्रोणो द्रौणिर्धार्तराष्ट्रश्च राजा भूरिश्रवा भगदत्तः कृपश्च ।¦शल्यो बाह्लीकः कृतवर्मा सुशर्मा सर्वाश्च सेना वारिता वायुजेन ॥ ११३॥ | ||
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| verse_text = स तान् मुहुर्विरथीकृत्य वीरः प्राग्ज्योतिषं सगजं द्रावयित्वा । | | verse_text = स तान् मुहुर्विरथीकृत्य वीरः प्राग्ज्योतिषं सगजं द्रावयित्वा । | ||
| verse_lines = स तान् मुहुर्विरथीकृत्य वीरः प्राग्ज्योतिषं सगजं द्रावयित्वा | | verse_lines = स तान् मुहुर्विरथीकृत्य वीरः प्राग्ज्योतिषं सगजं द्रावयित्वा ।¦न्यवारयत् फल्गुनं योद्धुकामं पार्थश्च देवव्रतमाससाद ॥ ११४॥ | ||
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| verse_text = युधिष्ठिरं भीष्ममभिप्रयान्तं माद्रीसुताभ्यां सहितं नृवीरम् । | | verse_text = युधिष्ठिरं भीष्ममभिप्रयान्तं माद्रीसुताभ्यां सहितं नृवीरम् । | ||
| verse_lines = युधिष्ठिरं भीष्ममभिप्रयान्तं माद्रीसुताभ्यां सहितं नृवीरम् | | verse_lines = युधिष्ठिरं भीष्ममभिप्रयान्तं माद्रीसुताभ्यां सहितं नृवीरम् ।¦न्यवारयच्छकुनिः सादिनां च युतोऽयुतेनैव वराश्वगेन ॥ ११५॥ | ||
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| verse_text = तान् सादिनोऽश्वांश्च निहत्य सर्वान् विजित्य तं शकुनिं पाण्डवास्ते । | | verse_text = तान् सादिनोऽश्वांश्च निहत्य सर्वान् विजित्य तं शकुनिं पाण्डवास्ते । | ||
| verse_lines = तान् सादिनोऽश्वांश्च निहत्य सर्वान् विजित्य तं शकुनिं पाण्डवास्ते | | verse_lines = तान् सादिनोऽश्वांश्च निहत्य सर्वान् विजित्य तं शकुनिं पाण्डवास्ते ।¦प्रापुर्भीष्मं द्रौपदेयाश्च सर्वे तथा विराटद्रुपदौ कुन्तिभोजः ॥ ११६॥ | ||
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| verse_text = धृष्टद्युम्नं भीष्ममभिप्रयान्तं न्यवारयत् सैन्धवस्तं स बाणैः । | | verse_text = धृष्टद्युम्नं भीष्ममभिप्रयान्तं न्यवारयत् सैन्धवस्तं स बाणैः । | ||
| verse_lines = धृष्टद्युम्नं भीष्ममभिप्रयान्तं न्यवारयत् सैन्धवस्तं स बाणैः | | verse_lines = धृष्टद्युम्नं भीष्ममभिप्रयान्तं न्यवारयत् सैन्धवस्तं स बाणैः ।¦हत्वाश्वसूतं (हताश्वसूतं) सगणं द्रावयित्वा समासदद् भीष्ममेवाऽशु वीरः ॥ ११७॥ | ||
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| verse_text = गुप्तोऽथ पार्थेन रणे शिखण्डी भीष्मं समासाद्य शरैरताडयत् । | | verse_text = गुप्तोऽथ पार्थेन रणे शिखण्डी भीष्मं समासाद्य शरैरताडयत् । | ||
| verse_lines = गुप्तोऽथ पार्थेन रणे शिखण्डी भीष्मं समासाद्य शरैरताडयत् | | verse_lines = गुप्तोऽथ पार्थेन रणे शिखण्डी भीष्मं समासाद्य शरैरताडयत् ।¦भीष्मः स्त्रीत्वं तस्य जानन् न तस्मै मुमोच बाणान् स तु तं तुतोद ॥ ११८॥ | ||
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| verse_lines = शिखण्डिनं वारयामास बाणैर्दुर्मर्षणोऽमर्षणविह्वलेक्षणः | | verse_lines = शिखण्डिनं वारयामास बाणैर्दुर्मर्षणोऽमर्षणविह्वलेक्षणः ।¦नात्येतुमेनमशकच्छिखण्डी दुःशासनः पार्थमवारयत् तदा ॥ ११९॥ | ||
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| verse_text = स लोकवीरोऽपि दुरात्मनाऽमुना रुद्धोऽशकन्नैनमतीत्य यातुम् । | | verse_text = स लोकवीरोऽपि दुरात्मनाऽमुना रुद्धोऽशकन्नैनमतीत्य यातुम् । | ||
| verse_lines = स लोकवीरोऽपि दुरात्मनाऽमुना रुद्धोऽशकन्नैनमतीत्य यातुम् | | verse_lines = स लोकवीरोऽपि दुरात्मनाऽमुना रुद्धोऽशकन्नैनमतीत्य यातुम् ।¦भीष्मं पार्थः सायकाश्चास्य तस्मिन् ससज्जिरे पर्वतेष्वप्यसक्ताः(पर्वतेष्वप्यमुक्ताः) ॥ १२०॥ | ||
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| verse_text = अमर्षयुक्तौ चिरमेव वीरावयुद्ध्यतामर्जुनधार्तराष्ट्रौ । | | verse_text = अमर्षयुक्तौ चिरमेव वीरावयुद्ध्यतामर्जुनधार्तराष्ट्रौ । | ||
| verse_lines = अमर्षयुक्तौ चिरमेव वीरावयुद्ध्यतामर्जुनधार्तराष्ट्रौ | | verse_lines = अमर्षयुक्तौ चिरमेव वीरावयुद्ध्यतामर्जुनधार्तराष्ट्रौ ।¦समं तदासीन्महदद्भुतं च दिवौकसां पश्यतां भूभृतां च ॥ १२१॥ | ||
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| verse_lines = तदा विराटद्रुपदौ कुन्तिभोजं कृष्णासुतान् केकयांश्चेकितानम् | | verse_lines = तदा विराटद्रुपदौ कुन्तिभोजं कृष्णासुतान् केकयांश्चेकितानम् ।¦भूरिश्रवाः (भूरिः शलः) सोमदत्तो विकर्णः सकैकया (सकेकया) वारयामासुरुच्चैः ॥ १२२॥ | ||
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| verse_text = जित्वैव तांस्तेऽभिययुश्च भीष्मं (तदा)ततोऽर्जुनोऽतीत्य दुःशासनं च । | | verse_text = जित्वैव तांस्तेऽभिययुश्च भीष्मं (तदा)ततोऽर्जुनोऽतीत्य दुःशासनं च । | ||
| verse_lines = जित्वैव तांस्तेऽभिययुश्च भीष्मं (तदा)ततोऽर्जुनोऽतीत्य दुःशासनं च | | verse_lines = जित्वैव तांस्तेऽभिययुश्च भीष्मं (तदा)ततोऽर्जुनोऽतीत्य दुःशासनं च ।¦भीष्मं शरैरार्च्छदरिप्रमाथिभिः शिखण्डिनं धार्तराष्ट्राद् विमुच्य ॥ १२३॥ | ||
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| verse_text = स तैः समस्तैर्बहुभिश्शस्त्रपूगैर्भृशं मर्मस्वर्दितश्चापमुक्तैः । | | verse_text = स तैः समस्तैर्बहुभिश्शस्त्रपूगैर्भृशं मर्मस्वर्दितश्चापमुक्तैः । | ||
| verse_lines = स तैः समस्तैर्बहुभिश्शस्त्रपूगैर्भृशं मर्मस्वर्दितश्चापमुक्तैः | | verse_lines = स तैः समस्तैर्बहुभिश्शस्त्रपूगैर्भृशं मर्मस्वर्दितश्चापमुक्तैः ।¦शरैः समस्तान् विरथांश्चकार शैनैयपाञ्चालयुधिष्ठिराद्यान् ॥ १२४॥ | ||
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| verse_text = स चेदिपाञ्चालकरूशमुख्यान् रथोदारान् पञ्चविंशत्सहस्रान् । | | verse_text = स चेदिपाञ्चालकरूशमुख्यान् रथोदारान् पञ्चविंशत्सहस्रान् । | ||
| verse_lines = स चेदिपाञ्चालकरूशमुख्यान् रथोदारान् पञ्चविंशत्सहस्रान् | | verse_lines = स चेदिपाञ्चालकरूशमुख्यान् रथोदारान् पञ्चविंशत्सहस्रान् ।¦सम्प्रेषयामास यमाय बाणैर्युगान्तकालेऽग्निरिव प्रवृद्धः ॥ १२५॥ | ||
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| verse_lines = निरीक्ष्य तं सूर्यमिवाऽतपन्तं सञ्चोदितो वासुदेवेन पार्थः | | verse_lines = निरीक्ष्य तं सूर्यमिवाऽतपन्तं सञ्चोदितो वासुदेवेन पार्थः ।¦चिच्छेद तत्कार्मुकं लोकवीरो रणेऽर्द्धचन्द्रेण स चान्यदाददे ॥ १२६॥ | ||
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| verse_lines = चिच्छेद तच्चैवमष्टौ धनूंषि शक्तिं च चर्मासिवरं पराणि | | verse_lines = चिच्छेद तच्चैवमष्टौ धनूंषि शक्तिं च चर्मासिवरं पराणि ।¦धनूंषि दत्तानि नृभिर्नृपस्य सर्वाणि चिच्छेद स पाकशासनिः ॥ १२७॥ | ||
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| verse_lines = ततः शरैः सूर्यकरप्रकाशैर्विव्याध सर्वे च युधिष्ठिराद्याः | | verse_lines = ततः शरैः सूर्यकरप्रकाशैर्विव्याध सर्वे च युधिष्ठिराद्याः ।¦तैरर्दितो न्यपतद् भूतले स प्राणान् दधारापि तथोत्तरायणात् ॥ १२८॥ | ||
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| verse_lines = निपापितेऽस्मिन् मारुतिर्द्रोणमुख्यान् विद्राप्य तत्राऽगमदाशु तेऽपि | | verse_lines = निपापितेऽस्मिन् मारुतिर्द्रोणमुख्यान् विद्राप्य तत्राऽगमदाशु तेऽपि ।¦तदायुधानि प्रणिधाय वीराः पार्थाः परे चैनमुपासदन् स्म ॥ १२९॥ | ||
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| verse_lines = प्रणम्य तं तद्वचनात् समीयुस्तस्मिन् दिने शिबिराण्येव सर्वे | | verse_lines = प्रणम्य तं तद्वचनात् समीयुस्तस्मिन् दिने शिबिराण्येव सर्वे ।¦परे दिने सर्व एवोपतस्थुर्भीष्मं यदूनाम्पतिना सहैव ॥ १३०॥ | ||
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| verse_lines = स पूर्वदिवसे पार्थदत्तबाणोपबर्हणः | | verse_lines = स पूर्वदिवसे पार्थदत्तबाणोपबर्हणः ।¦तदाऽपि तृट्परीतात्मा योग्यं(योग्य) पेयमयाचत ॥ १३१॥ | ||
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| verse_lines = धार्तराष्ट्रैरविज्ञातं तदभिज्ञाय(तदाभिज्ञाय) वासविः | | verse_lines = धार्तराष्ट्रैरविज्ञातं तदभिज्ञाय(तदाभिज्ञाय) वासविः ।¦वारुणास्त्रेण भित्त्वा स भूमिं वारि सुगन्धि च ।¦ऊर्ध्वधारमदादास्ये(ऊर्ध्वधारामदादास्ये) तर्पितोऽनेन सोऽवदत् ॥ १३२॥ | ||
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| verse_lines = यादृश्यस्त्रज्ञता पार्थे दृष्टाऽत्र कुरुनन्दनाः | | verse_lines = यादृश्यस्त्रज्ञता पार्थे दृष्टाऽत्र कुरुनन्दनाः ।¦यादृग् बाह्वोर्बलं भीमे संयुगेषु पुनः पुनः ॥ १३३॥ | ||
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| verse_lines = यादृशं चैव माहात्म्यमनन्तमजरं हरेः | | verse_lines = यादृशं चैव माहात्म्यमनन्तमजरं हरेः ।¦विज्ञातं सर्वलोकस्य सभायां दृष्टमेव च ॥ १३४॥ | ||
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| verse_lines = उपारमत तद् युद्धं सुखिनः सन्तु भूमिपाः | | verse_lines = उपारमत तद् युद्धं सुखिनः सन्तु भूमिपाः ।¦यथोचितं विभक्तां च भुङ्ग्ध्वं भूपाः सदा भुवम् ।¦इत्युक्तः प्रययौ तूष्णीं धार्तराष्ट्रः स्वकं गृहम् ॥ १३५॥ | ||
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<span id="gr-C26" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षड्विंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C26" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="षड्विंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = औं ॥ अथाखिलानां पृथिवीपतीनामाचार्यमग्र्यं रथिनां सुविद्यम् । | | verse_text = औं ॥ अथाखिलानां पृथिवीपतीनामाचार्यमग्र्यं रथिनां सुविद्यम् । | ||
| verse_lines = औं ॥ अथाखिलानां पृथिवीपतीनामाचार्यमग्र्यं रथिनां सुविद्यम् | | verse_lines = औं ॥ अथाखिलानां पृथिवीपतीनामाचार्यमग्र्यं रथिनां सुविद्यम् ।¦रामस्य विश्वाधिपतेः सुशिष्यं चक्रे चमूपं धृतराष्ट्रपुत्रः ॥ १॥ | ||
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| verse_lines = गदाभिघातेन वृकोदरस्य विचेतनः प्रापतदत्र मद्रराट् | | verse_lines = गदाभिघातेन वृकोदरस्य विचेतनः प्रापतदत्र मद्रराट् ।¦भीमोऽपि कोपात् प्रचलत्पदः क्षितौ निधाय जानुं सहसोत्थितः क्षणात् ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = विचेतनं पतितं मद्रराजं विलोक्य भीमं च तमाह्वयन्तम् । | | verse_text = विचेतनं पतितं मद्रराजं विलोक्य भीमं च तमाह्वयन्तम् । | ||
| verse_lines = विचेतनं पतितं मद्रराजं विलोक्य भीमं च तमाह्वयन्तम् | | verse_lines = विचेतनं पतितं मद्रराजं विलोक्य भीमं च तमाह्वयन्तम् ।¦रथं समारोप्य जनस्य पश्यतः पुरश्च भीमस्य कृपोऽपजग्मिवान् ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = विजित्य मद्राधिपमोजसाऽरिहा नदन् रथं प्राप्य निजं स मारुतिः । | | verse_text = विजित्य मद्राधिपमोजसाऽरिहा नदन् रथं प्राप्य निजं स मारुतिः । | ||
| verse_lines = विजित्य मद्राधिपमोजसाऽरिहा नदन् रथं प्राप्य निजं स मारुतिः | | verse_lines = विजित्य मद्राधिपमोजसाऽरिहा नदन् रथं प्राप्य निजं स मारुतिः ।¦व्यद्रावयद् बाणगणैः परेषामनीकिनीं द्रोणसमक्षमेव ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = विद्रावयत्याशु कुरून् वृकोदरे विधूय सौभद्रमुखान् ससात्यकीन् । | | verse_text = विद्रावयत्याशु कुरून् वृकोदरे विधूय सौभद्रमुखान् ससात्यकीन् । | ||
| verse_lines = विद्रावयत्याशु कुरून् वृकोदरे विधूय सौभद्रमुखान् ससात्यकीन् | | verse_lines = विद्रावयत्याशु कुरून् वृकोदरे विधूय सौभद्रमुखान् ससात्यकीन् ।¦द्रोणोऽभिपेदे नृपतिं गृहीतुं तमाससादाऽशु धनञ्जयो रथी ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = स वासुदेवप्रयते रथे स्थितः शरैः शरीरान्तकरैः समन्ततः । | | verse_text = स वासुदेवप्रयते रथे स्थितः शरैः शरीरान्तकरैः समन्ततः । | ||
| verse_lines = स वासुदेवप्रयते रथे स्थितः शरैः शरीरान्तकरैः समन्ततः | | verse_lines = स वासुदेवप्रयते रथे स्थितः शरैः शरीरान्तकरैः समन्ततः ।¦निहत्य नागाश्वरथान् प्रवर्तयन्नदृश्यताऽश्वेव च शोणितापगाः ॥ ११॥ | ||
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| verse_text = निहन्यमानासु किरीटिना चमूष्वारक्षिते धर्मसुते तथाऽपदः । | | verse_text = निहन्यमानासु किरीटिना चमूष्वारक्षिते धर्मसुते तथाऽपदः । | ||
| verse_lines = निहन्यमानासु किरीटिना चमूष्वारक्षिते धर्मसुते तथाऽपदः | | verse_lines = निहन्यमानासु किरीटिना चमूष्वारक्षिते धर्मसुते तथाऽपदः ।¦चमूं च भीमार्जुनबाणभग्नां द्रोणोऽपहृत्यापययौ निशागमे ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = स धार्तराष्ट्रेण युधिष्ठिराग्रहात् संश्रावितः क्रूरवचो निशायाम् । | | verse_text = स धार्तराष्ट्रेण युधिष्ठिराग्रहात् संश्रावितः क्रूरवचो निशायाम् । | ||
| verse_lines = स धार्तराष्ट्रेण युधिष्ठिराग्रहात् संश्रावितः क्रूरवचो निशायाम् | | verse_lines = स धार्तराष्ट्रेण युधिष्ठिराग्रहात् संश्रावितः क्रूरवचो निशायाम् ।¦जगाद दूरं समराद् विनीयतां पार्थस्ततो धर्मसुतं ग्रहीष्ये ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = ततः सुशर्मा सहितो महारथैः संशप्तकैर्दूरतरं प्रणेतुम् । | | verse_text = ततः सुशर्मा सहितो महारथैः संशप्तकैर्दूरतरं प्रणेतुम् । | ||
| verse_lines = ततः सुशर्मा सहितो महारथैः संशप्तकैर्दूरतरं प्रणेतुम् | | verse_lines = ततः सुशर्मा सहितो महारथैः संशप्तकैर्दूरतरं प्रणेतुम् ।¦युद्धाय भीमानुजमाशु क्लृप्तो दुर्योधनेनोमिति सोऽप्यवादीत् ॥ १४॥ | ||
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| verse_text = समाह्वयामासुरथार्जुनं ते प्रातर्हुताशस्य दिशं रणाय । | | verse_text = समाह्वयामासुरथार्जुनं ते प्रातर्हुताशस्य दिशं रणाय । | ||
| verse_lines = समाह्वयामासुरथार्जुनं ते प्रातर्हुताशस्य दिशं रणाय | | verse_lines = समाह्वयामासुरथार्जुनं ते प्रातर्हुताशस्य दिशं रणाय ।¦अयोधयत् तान् स च तत्र गत्वा भीमो गजानीकमथात्र चावधीत् ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = निहन्यमानेषु गजेषु (सङ्घशो)सर्वशो विद्राप्यमाणेष्वखिलेषु राजसु । | | verse_text = निहन्यमानेषु गजेषु (सङ्घशो)सर्वशो विद्राप्यमाणेष्वखिलेषु राजसु । | ||
| verse_lines = निहन्यमानेषु गजेषु (सङ्घशो)सर्वशो विद्राप्यमाणेष्वखिलेषु राजसु | | verse_lines = निहन्यमानेषु गजेषु (सङ्घशो)सर्वशो विद्राप्यमाणेष्वखिलेषु राजसु ।¦प्राग्ज्योतिषो धार्तराष्ट्रार्थितस्तं समासदत् सुप्रतीकेन धन्वी ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = विभीषिताः सुप्रतीकेन भीमहया न तस्थुस्तदनु स्म सात्यकिः । | | verse_text = विभीषिताः सुप्रतीकेन भीमहया न तस्थुस्तदनु स्म सात्यकिः । | ||
| verse_lines = विभीषिताः सुप्रतीकेन भीमहया न तस्थुस्तदनु स्म सात्यकिः | | verse_lines = विभीषिताः सुप्रतीकेन भीमहया न तस्थुस्तदनु स्म सात्यकिः ।¦सौभद्रमुख्याश्च गजं तमभ्ययुश्चिक्षेप तेषां स रथानथाम्बरे ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = शैनेयपूर्वेषु रथोज्झितेषु भूमाववप्लुत्य कथञ्चिदेव । | | verse_text = शैनेयपूर्वेषु रथोज्झितेषु भूमाववप्लुत्य कथञ्चिदेव । | ||
| verse_lines = शैनेयपूर्वेषु रथोज्झितेषु भूमाववप्लुत्य कथञ्चिदेव | | verse_lines = शैनेयपूर्वेषु रथोज्झितेषु भूमाववप्लुत्य कथञ्चिदेव ।¦स्थितेषु भीमे च विभीषिताश्वान् संयम्य युद्ध्यत्यपि कृष्ण ऐक्षत् ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = सङ्क्लेशितो वैष्णवास्त्रं (विमुञ्चेत्) प्रमुञ्चेत् प्राग्ज्योतिषो भीमसेने ततोऽहम् । | | verse_text = सङ्क्लेशितो वैष्णवास्त्रं (विमुञ्चेत्) प्रमुञ्चेत् प्राग्ज्योतिषो भीमसेने ततोऽहम् । | ||
| verse_lines = सङ्क्लेशितो वैष्णवास्त्रं (विमुञ्चेत्) प्रमुञ्चेत् प्राग्ज्योतिषो भीमसेने ततोऽहम् | | verse_lines = सङ्क्लेशितो वैष्णवास्त्रं (विमुञ्चेत्) प्रमुञ्चेत् प्राग्ज्योतिषो भीमसेने ततोऽहम् ।¦याम्यार्जुनेनैव तदस्त्रमात्मनः स्वीकर्तुमन्येन वरादधार्यम् ॥ १९॥ | ||
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| verse_text = इति स्म सञ्चिन्त्य सहार्जुनेन तत्राऽययावथ पार्थं त्रिगर्ताः । | | verse_text = इति स्म सञ्चिन्त्य सहार्जुनेन तत्राऽययावथ पार्थं त्रिगर्ताः । | ||
| verse_lines = इति स्म सञ्चिन्त्य सहार्जुनेन तत्राऽययावथ पार्थं त्रिगर्ताः | | verse_lines = इति स्म सञ्चिन्त्य सहार्जुनेन तत्राऽययावथ पार्थं त्रिगर्ताः ।¦न्यवारयंस्त्वाष्ट्रमस्त्रं स तेषु व्यवासृजन्मोहनायाऽशु वीरः ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = तदस्त्रवीर्येण विमोहितास्ते परस्परं कृष्णपार्थाविति स्म । | | verse_text = तदस्त्रवीर्येण विमोहितास्ते परस्परं कृष्णपार्थाविति स्म । | ||
| verse_lines = तदस्त्रवीर्येण विमोहितास्ते परस्परं कृष्णपार्थाविति स्म | | verse_lines = तदस्त्रवीर्येण विमोहितास्ते परस्परं कृष्णपार्थाविति स्म ।¦जघ्नुस्तदा वासविस्तान् विसृज्य प्राग्ज्योतिषं हन्तुमिहाभ्यगाद् द्रुतम् ॥ २१॥ | ||
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| verse_lines = विसृज्यं भीमं स च पार्थमेव ययौ गजस्कन्धगतो गजं तम् | | verse_lines = विसृज्यं भीमं स च पार्थमेव ययौ गजस्कन्धगतो गजं तम् ।¦सञ्चोदयामास (सम्बोधयामास, प्रचोदयामास) रथाय तस्य चक्रेऽपसव्यं हरिरेनमाशु ॥ २२॥ | ||
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| verse_text = मनोजवेनैव रथे परेण(वरेण) सम्भ्राम्यमाणे नतु तं गजः सः । | | verse_text = मनोजवेनैव रथे परेण(वरेण) सम्भ्राम्यमाणे नतु तं गजः सः । | ||
| verse_lines = मनोजवेनैव रथे परेण(वरेण) सम्भ्राम्यमाणे नतु तं गजः सः | | verse_lines = मनोजवेनैव रथे परेण(वरेण) सम्भ्राम्यमाणे नतु तं गजः सः ।¦प्राप्तुं शशाकाथ शरैः सुतीक्ष्णैरभ्यर्दयामास नृपं स वासविः ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = अस्त्रैश्च शस्त्रैः सुचिरं नृवीरावयुद्ध्यतां तौ बलिनां प्रबर्हौ | | verse_lines = अस्त्रैश्च शस्त्रैः सुचिरं नृवीरावयुद्ध्यतां तौ बलिनां प्रबर्हौ ।¦अथो चकर्तास्य धनुः स पार्थः स वैष्णवास्त्रं च तदाऽङ्कुशेऽकरोत् ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = तस्मिन्नस्त्रे तेन तदा प्रमुक्ते(प्रयुक्ते, प्रदत्ते) दधार तद् वासुदेवोऽमितौजाः । | | verse_text = तस्मिन्नस्त्रे तेन तदा प्रमुक्ते(प्रयुक्ते, प्रदत्ते) दधार तद् वासुदेवोऽमितौजाः । | ||
| verse_lines = तस्मिन्नस्त्रे तेन तदा प्रमुक्ते(प्रयुक्ते, प्रदत्ते) दधार तद् वासुदेवोऽमितौजाः | | verse_lines = तस्मिन्नस्त्रे तेन तदा प्रमुक्ते(प्रयुक्ते, प्रदत्ते) दधार तद् वासुदेवोऽमितौजाः ।¦तदंसदेशस्य तु वैजयन्ती बभूव मालाऽखिललोकभर्तुः ॥ २५॥ | ||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव तद् धारितमच्युतेन पार्थः किमर्थं विधृतं त्वयेति | | verse_lines = दृष्ट्वैव तद् धारितमच्युतेन पार्थः किमर्थं विधृतं त्वयेति ।¦ऊचे तमाहाऽशु जगन्निवासो मयाऽखिलं धार्यते सर्वदैव ॥ २६॥ | ||
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| verse_lines = न मादृशोऽन्योऽस्ति कुतः परो मत् सोऽहं चतुर्धा जगतो हिताय | | verse_lines = न मादृशोऽन्योऽस्ति कुतः परो मत् सोऽहं चतुर्धा जगतो हिताय ।¦स्थितोऽस्मि मोक्षप्रलयस्थितीनां सृष्टेश्च कर्ता क्रमशः स्वमूर्तिभिः ।¦स वासुदेवादिचतुःस्वरूपः स्थितोऽनिरुद्धो हृदि चाखिलस्य ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = स एव च क्रोडतनुः पुराऽहं भूमिप्रियार्थं नरकाय चादाम् | | verse_lines = स एव च क्रोडतनुः पुराऽहं भूमिप्रियार्थं नरकाय चादाम् ।¦अस्त्रं मदीयं वरमस्य चादामवध्यतां यावदस्त्रं ससूनोः(स्वसूनोः, अस्त्रं च सूनोः) ॥ २८॥ | ||
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| verse_lines = अस्त्रस्य चान्यो नतु कश्चिदस्ति योऽवध्य एतस्य कुतश्च मत्तः | | verse_lines = अस्त्रस्य चान्यो नतु कश्चिदस्ति योऽवध्य एतस्य कुतश्च मत्तः ।¦इति स्म तेनैव मया धृतं तदस्त्रं तदेनं जहि चास्त्रहीनम् ॥ २९॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तमाकर्ण्य स केशवेन सम्मन्त्र्य बाणं हृदये मुमोच | | verse_lines = इत्युक्तमाकर्ण्य स केशवेन सम्मन्त्र्य बाणं हृदये मुमोच ।¦प्राग्ज्योतिषस्यापरमुत्तमं शरं गजेन्द्रकुम्भस्थल आश्वमज्जयत् ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = उभौ च तौ पेततुरद्रिसन्निभौ महेन्द्रवज्राभिहताविवाऽशु | | verse_lines = उभौ च तौ पेततुरद्रिसन्निभौ महेन्द्रवज्राभिहताविवाऽशु ।¦निहत्य तौ वासविरुग्रपौरुषो मुमोद साधु स्वजनाभिपूजितः ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = अथाचलं वृषकं चैव हत्वा कनीयसौ शकुनेस्तं च बाणैः | | verse_lines = अथाचलं वृषकं चैव हत्वा कनीयसौ शकुनेस्तं च बाणैः ।¦विव्याध मायामसृजत् स तां च विज्ञानास्त्रेणाऽशु नाशाय चक्रे ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = स नष्टमायः प्राद्रवत् पापकर्मा ततः पार्थः शरपूगैश्चमूं ताम् | | verse_lines = स नष्टमायः प्राद्रवत् पापकर्मा ततः पार्थः शरपूगैश्चमूं ताम् ।¦विद्रावयामास तदा गुरोः सुतो माहिष्मतीपतिमाजौ जघान ॥ ३३॥ | ||
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| verse_lines = भीमो युधिष्ठिरस्तत्र तज्ज्ञं सौभद्रमब्रवीत् | | verse_lines = भीमो युधिष्ठिरस्तत्र तज्ज्ञं सौभद्रमब्रवीत् ।¦भिन्धि व्यूहमिमं तात वयं त्वामनुयामहे ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = स एवमुक्तो रथिनां प्रबर्हो विवेश भित्त्वा द्विषतां चमूं ताम् । | | verse_text = स एवमुक्तो रथिनां प्रबर्हो विवेश भित्त्वा द्विषतां चमूं ताम् । | ||
| verse_lines = स एवमुक्तो रथिनां प्रबर्हो विवेश भित्त्वा द्विषतां चमूं ताम् | | verse_lines = स एवमुक्तो रथिनां प्रबर्हो विवेश भित्त्वा द्विषतां चमूं ताम् ।¦अन्वेव तं वायुसुतादयश्च विविक्षवः सैन्धवेनैव रुद्धाः ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = वरेण रुद्रस्य निरुद्ध्यमानो जयद्रथेनात्र वृकोदरस्तु । | | verse_text = वरेण रुद्रस्य निरुद्ध्यमानो जयद्रथेनात्र वृकोदरस्तु । | ||
| verse_lines = वरेण रुद्रस्य निरुद्ध्यमानो जयद्रथेनात्र वृकोदरस्तु | | verse_lines = वरेण रुद्रस्य निरुद्ध्यमानो जयद्रथेनात्र वृकोदरस्तु ।¦विष्णोरभीष्टं वधमार्जुनेस्तदा विज्ञाय शक्तोऽपि नचात्यवर्तत ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = जयद्रथस्थेन वृषध्वजेन प्रयुद्ध्यमानेषु वृकोदरादिषु । | | verse_text = जयद्रथस्थेन वृषध्वजेन प्रयुद्ध्यमानेषु वृकोदरादिषु । | ||
| verse_lines = जयद्रथस्थेन वृषध्वजेन प्रयुद्ध्यमानेषु वृकोदरादिषु | | verse_lines = जयद्रथस्थेन वृषध्वजेन प्रयुद्ध्यमानेषु वृकोदरादिषु ।¦प्रविश्य वीरः स धनञ्जयात्मजो विलोलयामास परोरुसेनाम् ॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = स द्रोणदुर्योधनकर्णशल्यैर्द्रोण्यग्रणीभिः कृतवर्मयुक्तैः । | | verse_text = स द्रोणदुर्योधनकर्णशल्यैर्द्रोण्यग्रणीभिः कृतवर्मयुक्तैः । | ||
| verse_lines = स द्रोणदुर्योधनकर्णशल्यैर्द्रोण्यग्रणीभिः कृतवर्मयुक्तैः | | verse_lines = स द्रोणदुर्योधनकर्णशल्यैर्द्रोण्यग्रणीभिः कृतवर्मयुक्तैः ।¦रुद्धश्चचारारिबलेष्वभीतः शिरांसि कृन्तंस्तदनुव्रतानाम् ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = स लक्षणं राजसुतं प्रसह्य(प्रगृह्य) पितुः समीपेऽनयदाशु मृत्यवे । | | verse_text = स लक्षणं राजसुतं प्रसह्य(प्रगृह्य) पितुः समीपेऽनयदाशु मृत्यवे । | ||
| verse_lines = स लक्षणं राजसुतं प्रसह्य(प्रगृह्य) पितुः समीपेऽनयदाशु मृत्यवे | | verse_lines = स लक्षणं राजसुतं प्रसह्य(प्रगृह्य) पितुः समीपेऽनयदाशु मृत्यवे ।¦बृहद्बलं चोत्तमवीर्यकर्मा वरं रथानामयुतं च पत्रिभिः ॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = द्रोणादयस्तं हरिकोपभीताः प्रत्यक्षतो हन्तुमशक्नुवन्तः । | | verse_text = द्रोणादयस्तं हरिकोपभीताः प्रत्यक्षतो हन्तुमशक्नुवन्तः । | ||
| verse_lines = द्रोणादयस्तं हरिकोपभीताः प्रत्यक्षतो हन्तुमशक्नुवन्तः | | verse_lines = द्रोणादयस्तं हरिकोपभीताः प्रत्यक्षतो हन्तुमशक्नुवन्तः ।¦सम्मन्त्र्य कर्णं पुरतो निधाय चक्रुर्विचापाश्वरथं क्षणेन ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = कर्णो धनुस्तस्य कृपश्च सारथिं द्रोणो हयानाशु विधूय सायकैः । | | verse_text = कर्णो धनुस्तस्य कृपश्च सारथिं द्रोणो हयानाशु विधूय सायकैः । | ||
| verse_lines = कर्णो धनुस्तस्य कृपश्च सारथिं द्रोणो हयानाशु विधूय सायकैः | | verse_lines = कर्णो धनुस्तस्य कृपश्च सारथिं द्रोणो हयानाशु विधूय सायकैः ।¦सञ्चर्मखड्गं रथचक्रमस्य प्रणुद्य हस्तस्थितमेव तस्थुः(चक्रुः) ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = भीतेषु कृष्णादथ तद्वधाय तेष्वाससादाऽशु गदायुधं गदी । | | verse_text = भीतेषु कृष्णादथ तद्वधाय तेष्वाससादाऽशु गदायुधं गदी । | ||
| verse_lines = भीतेषु कृष्णादथ तद्वधाय तेष्वाससादाऽशु गदायुधं गदी | | verse_lines = भीतेषु कृष्णादथ तद्वधाय तेष्वाससादाऽशु गदायुधं गदी ।¦दौःशासनिस्तौ युगपच्च मम्रतुर्गदाभिघातेन मिथोऽतिपौरुषौ ॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = तस्मिन् हते शत्रुरवं निशम्य हर्षोद्भवं मारुतिरुग्रविक्रमः । | | verse_text = तस्मिन् हते शत्रुरवं निशम्य हर्षोद्भवं मारुतिरुग्रविक्रमः । | ||
| verse_lines = तस्मिन् हते शत्रुरवं निशम्य हर्षोद्भवं मारुतिरुग्रविक्रमः | | verse_lines = तस्मिन् हते शत्रुरवं निशम्य हर्षोद्भवं मारुतिरुग्रविक्रमः ।¦विजित्य सर्वानपि सैन्धवादीन् युधिष्ठिरस्यानुमते न्यषीदत् ॥ ४८॥ | ||
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| verse_lines = व्यासस्तदा तानमितात्मवैभवो युधिष्ठिरादीन् ग्लपितानबोधयत् | | verse_lines = व्यासस्तदा तानमितात्मवैभवो युधिष्ठिरादीन् ग्लपितानबोधयत् ।¦विजित्य संशप्तकपूगमुग्रो निशागमे वासविराप साच्युतः ॥ ४९॥ | ||
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| verse_lines = निशम्य पुत्रस्य वधं भृशार्तः प्रतिश्रवं सोऽथ चकार वीरः | | verse_lines = निशम्य पुत्रस्य वधं भृशार्तः प्रतिश्रवं सोऽथ चकार वीरः ।¦जयद्रथस्यैव वधे निशायां स्वप्नेऽनयत् तं गिरिशान्तिकं हरिः ॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = स्वयमेवाखिलजगद्रक्षाद्यमितशक्तिमान् | | verse_lines = स्वयमेवाखिलजगद्रक्षाद्यमितशक्तिमान् ।¦अप्यच्युतो गुरुद्वारा प्रसादकृदहं त्विति ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = ज्ञापयन् फल्गुनस्यास्त्रगुरुं गिरिशमञ्जसा | | verse_lines = ज्ञापयन् फल्गुनस्यास्त्रगुरुं गिरिशमञ्जसा ।¦प्रापयित्वैनमेवैतत्प्रसादादस्त्रमुल्बणम् ।¦चक्रे तदर्थमेवास्य रक्षां चक्रे तदात्मिकाम् ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = सान्त्वयित्वा सुभद्रां च गत्वोपप्लाव्यमच्युतः | | verse_lines = सान्त्वयित्वा सुभद्रां च गत्वोपप्लाव्यमच्युतः ।¦योजयित्वा रथं प्रातः सोऽर्जुनो युद्धमभ्ययात् ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = श्रुत्वा प्रतिज्ञां पुरुहूतसूनोर्दुर्योधनेनार्थितः सिन्धुराजम् | | verse_lines = श्रुत्वा प्रतिज्ञां पुरुहूतसूनोर्दुर्योधनेनार्थितः सिन्धुराजम् ।¦त्रातास्म्यहं सर्वथेति प्रतिज्ञां कृत्वा द्रोणो व्यूहमभेद्यमातनोत् ॥ ५४॥ | ||
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| verse_lines = स दिव्यमग्र्यं शकटाब्जचक्रं कृत्वा स्वयं व्यूहमुखे व्यवस्थितः | | verse_lines = स दिव्यमग्र्यं शकटाब्जचक्रं कृत्वा स्वयं व्यूहमुखे व्यवस्थितः ।¦पृष्ठे कर्णद्रौणिकृपैः सशल्यैर्जयद्रथं गुप्तमधात् परैश्च ॥ ५५॥ | ||
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| verse_lines = अथार्जुनो दिव्यरथोपरिस्थितः सुरक्षितः(संरक्षितः) केशवेनाव्ययेन | | verse_lines = अथार्जुनो दिव्यरथोपरिस्थितः सुरक्षितः(संरक्षितः) केशवेनाव्ययेन ।¦विजित्य दुर्मर्षणमग्रतोऽभ्ययाद्(दुर्मर्षणमग्रतो ययौ) द्रोणं सुधन्वा गुरुमुग्रपौरुषः ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = प्रदक्षिणीकृत्य तमाश्वगात् ततः कालात्ययं त्वेव विशङ्कमानः । | | verse_text = प्रदक्षिणीकृत्य तमाश्वगात् ततः कालात्ययं त्वेव विशङ्कमानः । | ||
| verse_lines = प्रदक्षिणीकृत्य तमाश्वगात् ततः कालात्ययं त्वेव विशङ्कमानः | | verse_lines = प्रदक्षिणीकृत्य तमाश्वगात् ततः कालात्ययं त्वेव विशङ्कमानः ।¦रथं मनोवेगमथानयद्धरिर्यथा शराः पेतुरमुष्य पृष्ठतः ॥ ५७॥ | ||
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| verse_lines = विजित्य हार्दिक्यमथाप्रयत्नः स इन्द्रसूनुः प्रविवेश तद् बलम् | | verse_lines = विजित्य हार्दिक्यमथाप्रयत्नः स इन्द्रसूनुः प्रविवेश तद् बलम् ।¦विलोलयामास च सायकोत्तमैर्यथा गजेन्द्रो नलिनीं बलोद्धतः ॥ ५८॥ | ||
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| verse_lines = स उच्चकाशेऽतिरथो रथोत्तमे सवासुदेवो हरिणा यथेन्द्रः | | verse_lines = स उच्चकाशेऽतिरथो रथोत्तमे सवासुदेवो हरिणा यथेन्द्रः ।¦चकर्त चोग्रो द्विषतां शिरांसि शरैः शरीरान्तकरैः समन्ततः ॥ ५९॥ | ||
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| verse_lines = दृढायुमच्युतायुं च हत्वा विन्दानुविन्दकौ | | verse_lines = दृढायुमच्युतायुं च हत्वा विन्दानुविन्दकौ ।¦शराभ्यां प्रेषयामास(प्रापयामास) यमाय विजयो युधि ॥ ६०॥ | ||
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| verse_lines = सुदक्षिणं च काम्बोजं(काम्भोजं) निहत्याम्बष्ठमेव च | | verse_lines = सुदक्षिणं च काम्बोजं(काम्भोजं) निहत्याम्बष्ठमेव च ।¦श्रुतायुधं नदीजातं वरुणादाससाद ह ।¦यस्यादाद् वरुणो दिव्याममोघां महतीं गदाम् ॥ ६१॥ | ||
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| verse_lines = स तु तेन शरैस्तीक्ष्णैरर्पितो विरथं क्षणात् | | verse_lines = स तु तेन शरैस्तीक्ष्णैरर्पितो विरथं क्षणात् ।¦चकार पार्थस्य रथमारुह्यारिधराय ताम् ॥ ६२॥ | ||
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| verse_lines = गदां चिक्षेप सा तस्य वारुणेः शिर एव तु | | verse_lines = गदां चिक्षेप सा तस्य वारुणेः शिर एव तु ।¦बिभेद(चिच्छेद) शतधा शीर्णमस्तिष्कः(शीर्णमस्तकः) सोऽपतद् भुवि ॥ ६३॥ | ||
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| verse_lines = अयुद्ध्यन्तं स्वगदया यदि ताडयसि स्वयम् | | verse_lines = अयुद्ध्यन्तं स्वगदया यदि ताडयसि स्वयम् ।¦तया विशीर्णमस्तिष्को मरिष्यसि न संशयः ।¦अमोघा चान्यथा सेयं गदा तव भविष्यति ॥ ६४॥ | ||
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| verse_lines = इत्यब्रवीत् तं वरुणः पुरा तेन स केशवे | | verse_lines = इत्यब्रवीत् तं वरुणः पुरा तेन स केशवे ।¦अयुद्ध्यति गदाक्षेपात् तया शीर्णशिरा अभूत् ॥ ६५॥ | ||
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| verse_lines = हतेषु वीरेषु निजेषु सङ्घशो विद्रावितेष्वालुलिते च सैन्ये | | verse_lines = हतेषु वीरेषु निजेषु सङ्घशो विद्रावितेष्वालुलिते च सैन्ये ।¦दुर्योधनो द्रोणमुपेत्य दीनमुवाच(दीन उवाच) हा पार्थ उपेक्षितस्त्वया ॥ ६६॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितेऽभेद्यममुष्य वर्म बद्ध्वा महामन्त्रबलात् स विप्रः | | verse_lines = इतीरितेऽभेद्यममुष्य वर्म बद्ध्वा महामन्त्रबलात् स विप्रः ।¦जगाद येनैव बलेन पार्थैर्विरुद्ध्यसे तेन हि याहि फल्गुनम् ॥ ६७॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितो धार्तराष्ट्रः स चापमादाय सौवर्णरथोपरिस्थः | | verse_lines = इतीरितो धार्तराष्ट्रः स चापमादाय सौवर्णरथोपरिस्थः ।¦जगाम पार्थं तमवारयच्च शरैरनेकैरनलप्रकाशैः ॥ ६८॥ | ||
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| verse_text = स वीरवर्यः स्थविरोऽपि यूनां युवेव मध्ये प्रचचार धन्विनाम् । | | verse_text = स वीरवर्यः स्थविरोऽपि यूनां युवेव मध्ये प्रचचार धन्विनाम् । | ||
| verse_lines = स वीरवर्यः स्थविरोऽपि यूनां युवेव मध्ये प्रचचार धन्विनाम् | | verse_lines = स वीरवर्यः स्थविरोऽपि यूनां युवेव मध्ये प्रचचार धन्विनाम् ।¦प्रपातयन् वीरशिरांसि बाणैर्युधिष्ठिरं चाऽसददुग्रवीर्यः ॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = नृपग्रहेच्छुं तमवेत्य सत्यजिन्न्यवारयद् द्रौपदिराशु वीर्यवान् । | | verse_text = नृपग्रहेच्छुं तमवेत्य सत्यजिन्न्यवारयद् द्रौपदिराशु वीर्यवान् । | ||
| verse_lines = नृपग्रहेच्छुं तमवेत्य सत्यजिन्न्यवारयद् द्रौपदिराशु वीर्यवान् | | verse_lines = नृपग्रहेच्छुं तमवेत्य सत्यजिन्न्यवारयद् द्रौपदिराशु वीर्यवान् ।¦निवारितस्तेन शिरः शरेण चकर्त पाञ्चालसुतस्य विप्रः ॥ ७४॥ | ||
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| verse_text = निहत्य तं वीरतमं रणोत्कटं युधिष्ठिरं बाणगणैः समर्दयत् । | | verse_text = निहत्य तं वीरतमं रणोत्कटं युधिष्ठिरं बाणगणैः समर्दयत् । | ||
| verse_lines = निहत्य तं वीरतमं रणोत्कटं युधिष्ठिरं बाणगणैः समर्दयत् | | verse_lines = निहत्य तं वीरतमं रणोत्कटं युधिष्ठिरं बाणगणैः समर्दयत् ।¦स शक्तिस्तेन विधाय सङ्गरं निरायुधो व्यश्वरथः कृतः क्षणात् ॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = स ऊर्ध्वबाहुर्भुवि संस्थितोऽपि गृहीतुमाजौ गुरुणाऽभिपन्नः । | | verse_text = स ऊर्ध्वबाहुर्भुवि संस्थितोऽपि गृहीतुमाजौ गुरुणाऽभिपन्नः । | ||
| verse_lines = स ऊर्ध्वबाहुर्भुवि संस्थितोऽपि गृहीतुमाजौ गुरुणाऽभिपन्नः | | verse_lines = स ऊर्ध्वबाहुर्भुवि संस्थितोऽपि गृहीतुमाजौ गुरुणाऽभिपन्नः ।¦माद्रीसुतस्यावरजस्य यानमारुह्य वेगादपजग्मिवांस्ततः ॥ ७६॥ | ||
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| verse_text = द्रोणं ततः शैशुपालिः सपुत्रो जारासन्धिः काशिराजः सशैव्यः । | | verse_text = द्रोणं ततः शैशुपालिः सपुत्रो जारासन्धिः काशिराजः सशैव्यः । | ||
| verse_lines = द्रोणं ततः शैशुपालिः सपुत्रो जारासन्धिः काशिराजः सशैव्यः | | verse_lines = द्रोणं ततः शैशुपालिः सपुत्रो जारासन्धिः काशिराजः सशैव्यः ।¦समासदन् कैकयाश्चैव पञ्च समार्दयन् बाणगणैश्च सर्वशः ॥ ७७॥ | ||
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| verse_lines = स तान् क्रमेणैव निकृत्तकन्धराञ्छरोत्तमैस्तत्र विधाय विप्रः | | verse_lines = स तान् क्रमेणैव निकृत्तकन्धराञ्छरोत्तमैस्तत्र विधाय विप्रः ।¦निनाय लोकं परमर्कमण्डलं व्रजन्ति निर्भिद्य यमूर्ध्वरेतसः ॥ ७८॥ | ||
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| verse_lines = विधूयमाने गुरुणोरुसैन्ये पृथासुतानां पृतनाः परेषाम् | | verse_lines = विधूयमाने गुरुणोरुसैन्ये पृथासुतानां पृतनाः परेषाम् ।¦प्रायो रणे मारुतसूनुनैव हतप्रवीरा मृदिताः पराद्रवन् ॥ ७९॥ | ||
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| verse_text = अलम्बुसो नाम तदैव राक्षसः समासदन्मारुतिमुग्रपौरुषम् । | | verse_text = अलम्बुसो नाम तदैव राक्षसः समासदन्मारुतिमुग्रपौरुषम् । | ||
| verse_lines = अलम्बुसो नाम तदैव राक्षसः समासदन्मारुतिमुग्रपौरुषम् | | verse_lines = अलम्बुसो नाम तदैव राक्षसः समासदन्मारुतिमुग्रपौरुषम् ।¦स पीडितस्तेन शरैः सुतेजनैः(सुतैजसैः) क्षणाददृश्यत्वमवाप मायया ॥ ८०॥ | ||
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| verse_lines = सोऽदृश्यरूपोऽनुचरानपीडयद् भीमस्य तद् वीक्ष्य चुकोप मारुतिः | | verse_lines = सोऽदृश्यरूपोऽनुचरानपीडयद् भीमस्य तद् वीक्ष्य चुकोप मारुतिः ।¦अस्त्रज्ञतामात्मनिकेशवाज्ञया सन्दर्शयन्नागतधर्मसङ्कटः ॥ ८१॥ | ||
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| verse_lines = त्वाष्ट्रास्त्रमादत्त स काम्यकर्महीनोऽपि भीमस्तत उत्थिताः शराः | | verse_lines = त्वाष्ट्रास्त्रमादत्त स काम्यकर्महीनोऽपि भीमस्तत उत्थिताः शराः ।¦ते बाणवर्यास्तददृश्यवेधिनो रक्षो विदार्याऽविविशुर्धरातलम् ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = तद्धन्यमानं प्रविहाय भीममपाद्रवद् दूरतरं सुभीतम् | | verse_lines = तद्धन्यमानं प्रविहाय भीममपाद्रवद् दूरतरं सुभीतम् ।¦ततस्तु भीमो द्विषतां वरूथिनीं विद्रावयामास शरैः सुमुक्तैः ॥ ८३॥ | ||
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| verse_text = तदैव कृष्णातनयाः समेता जघ्नुः शलं संयति सौमदत्तिम् । | | verse_text = तदैव कृष्णातनयाः समेता जघ्नुः शलं संयति सौमदत्तिम् । | ||
| verse_lines = तदैव कृष्णातनयाः समेता जघ्नुः शलं संयति सौमदत्तिम् | | verse_lines = तदैव कृष्णातनयाः समेता जघ्नुः शलं संयति सौमदत्तिम् ।¦अलम्बुसं प्राप तदा घटोत्कचः परस्परं तौ रथिनावयुद्ध्यताम् ॥ ८४॥ | ||
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| verse_lines = घटोत्कचस्तं विरथं विधाय खस्थं ख एवाभियुयोध संस्थितः | | verse_lines = घटोत्कचस्तं विरथं विधाय खस्थं ख एवाभियुयोध संस्थितः ।¦ततस्तु तं भीमसुतो निगृह्य निपात्य भूमौ प्रददौ प्रहारम् ॥ ८५॥ | ||
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| verse_text = पदा शिरस्येव स पिष्टमस्तको ममार मध्ये पृथिवीपतीनाम् । | | verse_text = पदा शिरस्येव स पिष्टमस्तको ममार मध्ये पृथिवीपतीनाम् । | ||
| verse_lines = पदा शिरस्येव स पिष्टमस्तको ममार मध्ये पृथिवीपतीनाम् | | verse_lines = पदा शिरस्येव स पिष्टमस्तको ममार मध्ये पृथिवीपतीनाम् ।¦तस्मिन् हते भैमसेनिः कुरूणां व्यद्रावयद् रथवृन्दं समन्तात् ॥ ८६॥ | ||
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| verse_lines = तदाऽऽसदत् कृतवर्मा रथेन सेनां पाण्डूनां शरवर्षं प्रमुञ्चन् | | verse_lines = तदाऽऽसदत् कृतवर्मा रथेन सेनां पाण्डूनां शरवर्षं प्रमुञ्चन् ।¦ददौ वरं तस्य हि पूर्वमच्युतः प्रीतः स्तुत्या सर्वजयं मुहूर्ते ॥ ८७॥ | ||
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| verse_lines = स तेन पाञ्चालगणान् विजिग्ये यमौ च भीमस्य पुरोऽथ तं च | | verse_lines = स तेन पाञ्चालगणान् विजिग्ये यमौ च भीमस्य पुरोऽथ तं च ।¦विव्याध बाणेन स वासुदेववरं विजानन् न तदा समभ्ययात् ॥ ८८॥ | ||
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| verse_text = विनैव वृष्णीन् विजये वरो यदमुष्य तेनास्य हयान् स सात्यकिः । | | verse_text = विनैव वृष्णीन् विजये वरो यदमुष्य तेनास्य हयान् स सात्यकिः । | ||
| verse_lines = विनैव वृष्णीन् विजये वरो यदमुष्य तेनास्य हयान् स सात्यकिः | | verse_lines = विनैव वृष्णीन् विजये वरो यदमुष्य तेनास्य हयान् स सात्यकिः ।¦निहत्य बाणैरतुदत् स यानमन्यत् समास्थाय ततोऽपजग्मिवान् ॥ ८९॥ | ||
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| verse_lines = तदा हरिः पाञ्चजन्यं सुघोषमापूरयामास जयेऽभियुद्ध्यति | | verse_lines = तदा हरिः पाञ्चजन्यं सुघोषमापूरयामास जयेऽभियुद्ध्यति ।¦कर्णादिभिर्द्रौणिमुखै रिपूणां बलप्रहाणाय परः परेभ्यः ॥ ९०॥ | ||
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| verse_text = स पाञ्चजन्योऽच्युतवक्त्रवायुना भृशं सुपूर्णोदरनिस्सृतध्वनिः । | | verse_text = स पाञ्चजन्योऽच्युतवक्त्रवायुना भृशं सुपूर्णोदरनिस्सृतध्वनिः । | ||
| verse_lines = स पाञ्चजन्योऽच्युतवक्त्रवायुना भृशं सुपूर्णोदरनिस्सृतध्वनिः | | verse_lines = स पाञ्चजन्योऽच्युतवक्त्रवायुना भृशं सुपूर्णोदरनिस्सृतध्वनिः ।¦जगद् विरिञ्चेशसुरेन्द्रपूर्वकं प्रकम्पयामास युगात्यये यथा ॥ ९१॥ | ||
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| verse_text = गाण्डीवघोषे च तदाऽभिभूते युधिष्ठिरो भीतभीतस्तदैत्य । | | verse_text = गाण्डीवघोषे च तदाऽभिभूते युधिष्ठिरो भीतभीतस्तदैत्य । | ||
| verse_lines = गाण्डीवघोषे च तदाऽभिभूते युधिष्ठिरो भीतभीतस्तदैत्य | | verse_lines = गाण्डीवघोषे च तदाऽभिभूते युधिष्ठिरो भीतभीतस्तदैत्य ।¦शैनेयमूचे परसैन्यमग्ने पार्थे स्वयं युद्ध्यति केशवः स्म ॥ ९२॥ | ||
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| verse_text = न श्रूयते गाण्डीवस्याद्य घोषः संश्रूयते पाञ्चजन्यस्य घोषः । | | verse_text = न श्रूयते गाण्डीवस्याद्य घोषः संश्रूयते पाञ्चजन्यस्य घोषः । | ||
| verse_lines = न श्रूयते गाण्डीवस्याद्य घोषः संश्रूयते पाञ्चजन्यस्य घोषः | | verse_lines = न श्रूयते गाण्डीवस्याद्य घोषः संश्रूयते पाञ्चजन्यस्य घोषः ।¦तद् याहि जानीहि तमद्य पार्थं यदि स्म जीवत्यसहाय एषः ॥ ९३॥(हृषीकेशतीर्थीये तु `गाण्डीवस्य' इति पठ्यते ।¦छन्दःस्वारस्यात् % `गाण्डिवस्य' इत्येव पाठः स्यादिति सम्भाव्यते -- इति ब. गोविन्दाचार्यः) | ||
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| verse_lines = इतीरितः सात्यकिरत्र विप्रान् सम्पूज्य वित्तैः परमाशिषश्च | | verse_lines = इतीरितः सात्यकिरत्र विप्रान् सम्पूज्य वित्तैः परमाशिषश्च ।¦जयाय तेभ्यः प्रतिगृह्य सेनामुखं ययौ भीमसेनानुयातः ॥ ९४॥ | ||
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| verse_text = भीमस्तु सेनामुखमाशु भित्त्वा प्रावेशयद् युयुधानं चमूं ताम् । | | verse_text = भीमस्तु सेनामुखमाशु भित्त्वा प्रावेशयद् युयुधानं चमूं ताम् । | ||
| verse_lines = भीमस्तु सेनामुखमाशु भित्त्वा प्रावेशयद् युयुधानं चमूं ताम् | | verse_lines = भीमस्तु सेनामुखमाशु भित्त्वा प्रावेशयद् युयुधानं चमूं ताम् ।¦स युद्ध्यमानो गुरुणाऽभ्युपेक्षितः सूतं निहत्य द्रावयामास चाश्वान् ॥ ९५॥ | ||
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| verse_lines = बलं विवृद्धं च तदाऽस्य सात्यकेर्विप्राशीर्भिः कृष्णवरादपि स्म | | verse_lines = बलं विवृद्धं च तदाऽस्य सात्यकेर्विप्राशीर्भिः कृष्णवरादपि स्म ।¦बलस्य वृद्धिर्हि पुराऽस्य दत्ता कृष्णेन तुष्टेन दिने हि तस्मिन् ॥ ९६॥ | ||
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| verse_lines = तदा (ततो) विवृद्धोरुबलात् स सात्यकिः संस्थाप्य भीमं प्रययौ रथेन | | verse_lines = तदा (ततो) विवृद्धोरुबलात् स सात्यकिः संस्थाप्य भीमं प्रययौ रथेन ।¦तं बाणवर्षैः पृतनां समन्तान्निघ्नन्तमाजौ हृदिकात्मजोऽभ्ययात् ॥ ९७॥ | ||
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| verse_lines = स पार्वतेयांश्च(स पार्वतीयांश्च) शिलाभिवर्षिणो निहत्य विद्राव्य च सर्वसैनिकान् | | verse_lines = स पार्वतेयांश्च(स पार्वतीयांश्च) शिलाभिवर्षिणो निहत्य विद्राव्य च सर्वसैनिकान् ।¦समासदत् केशवफल्गुनौ च बली तमाराऽशु च यूपकेतुः ॥ १००॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = गतेऽसुरावेश उतातिभक्त्या ध्यायत्यमुष्मिन् गरुडध्वजं तम् । | | verse_text = गतेऽसुरावेश उतातिभक्त्या ध्यायत्यमुष्मिन् गरुडध्वजं तम् । | ||
| verse_lines = गतेऽसुरावेश उतातिभक्त्या ध्यायत्यमुष्मिन् गरुडध्वजं तम् | | verse_lines = गतेऽसुरावेश उतातिभक्त्या ध्यायत्यमुष्मिन् गरुडध्वजं तम् ।¦शैनेय उत्थाय निवार्यमाणः कृष्णार्जुनाद्यैरहरच्छिरोऽस्य ॥ १०५॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = तदा स्वकीयं रथमेतदर्थं क्लृप्तं ददौ सात्यकये ससूतम् । | | verse_text = तदा स्वकीयं रथमेतदर्थं क्लृप्तं ददौ सात्यकये ससूतम् । | ||
| verse_lines = तदा स्वकीयं रथमेतदर्थं क्लृप्तं ददौ सात्यकये ससूतम् | | verse_lines = तदा स्वकीयं रथमेतदर्थं क्लृप्तं ददौ सात्यकये ससूतम् ।¦कृष्णोऽथ पार्थस्य हयास्तृषाऽर्दितास्तदाऽसृजद् वारुणास्त्रं स पार्थः ॥ १०६॥ | ||
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| verse_text = तेनैव तीर्थं परमं चकार तथाऽश्वशालामपि बाणरूपाम् । | | verse_text = तेनैव तीर्थं परमं चकार तथाऽश्वशालामपि बाणरूपाम् । | ||
| verse_lines = तेनैव तीर्थं परमं चकार तथाऽश्वशालामपि बाणरूपाम् | | verse_lines = तेनैव तीर्थं परमं चकार तथाऽश्वशालामपि बाणरूपाम् ।¦ततो विमुच्यात्र हयानपाययद्धरिस्तदा वासविरर्दयत् परान् ॥ १०७॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = युयोज कृष्णस्तुरगान् रथे पुनर्गतश्रमानुद्धृतसायकान् प्रभुः । | | verse_text = युयोज कृष्णस्तुरगान् रथे पुनर्गतश्रमानुद्धृतसायकान् प्रभुः । | ||
| verse_lines = युयोज कृष्णस्तुरगान् रथे पुनर्गतश्रमानुद्धृतसायकान् प्रभुः | | verse_lines = युयोज कृष्णस्तुरगान् रथे पुनर्गतश्रमानुद्धृतसायकान् प्रभुः ।¦प्रचोदिते तेन रथे स्थितः पुनस्तथैव बीभत्सुररीनयोधयत् ॥ १०८॥ | ||
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| verse_text = शिनिप्रवीरे तु गते युधिष्ठिरः पुनश्च चिन्ताकुलितो बभूव ह । | | verse_text = शिनिप्रवीरे तु गते युधिष्ठिरः पुनश्च चिन्ताकुलितो बभूव ह । | ||
| verse_lines = शिनिप्रवीरे तु गते युधिष्ठिरः पुनश्च चिन्ताकुलितो बभूव ह | | verse_lines = शिनिप्रवीरे तु गते युधिष्ठिरः पुनश्च चिन्ताकुलितो बभूव ह ।¦जगाद भीमं च न गाण्डिवध्वनिः संश्रूयते पाञ्चजन्यस्य रावः ॥ १०९॥ | ||
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| verse_text = मया नियुक्तश्च गतः स सात्यकिर्भारं च तस्याधिकमेव मन्ये । | | verse_text = मया नियुक्तश्च गतः स सात्यकिर्भारं च तस्याधिकमेव मन्ये । | ||
| verse_lines = मया नियुक्तश्च गतः स सात्यकिर्भारं च तस्याधिकमेव मन्ये | | verse_lines = मया नियुक्तश्च गतः स सात्यकिर्भारं च तस्याधिकमेव मन्ये ।¦तत् पाहि पार्थं युयुधानमेव च त्वं भीम गत्वा यदि जीवतस्तौ ॥ ११०॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = इतीरितः प्राह वृकोदरस्तं न रक्षितं वासुदेवेन पार्थम् । | | verse_text = इतीरितः प्राह वृकोदरस्तं न रक्षितं वासुदेवेन पार्थम् । | ||
| verse_lines = इतीरितः प्राह वृकोदरस्तं न रक्षितं वासुदेवेन पार्थम् | | verse_lines = इतीरितः प्राह वृकोदरस्तं न रक्षितं वासुदेवेन पार्थम् ।¦ब्रह्मेशानावपि जेतुं समर्थौ किं द्रौणिकर्णादिधनुर्भृतोऽत्र ॥ १११॥ | ||
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| verse_text = अतो भयं नास्ति धनञ्जयस्य न सात्यकेश्चैव हरेः प्रसादात् । | | verse_text = अतो भयं नास्ति धनञ्जयस्य न सात्यकेश्चैव हरेः प्रसादात् । | ||
| verse_lines = अतो भयं नास्ति धनञ्जयस्य न सात्यकेश्चैव हरेः प्रसादात् | | verse_lines = अतो भयं नास्ति धनञ्जयस्य न सात्यकेश्चैव हरेः प्रसादात् ।¦रक्ष्यस्त्वमेवात्र मतो मयाद्य (ममाद्य) द्रोणो ह्ययं यतते त्वां ग्रहीतुम् ॥ ११२॥ | ||
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| verse_text = इतीरितः प्राह युधिष्ठिरस्तं न जीवमाने युधि मां घटोत्कचे । | | verse_text = इतीरितः प्राह युधिष्ठिरस्तं न जीवमाने युधि मां घटोत्कचे । | ||
| verse_lines = इतीरितः प्राह युधिष्ठिरस्तं न जीवमाने युधि मां घटोत्कचे | | verse_lines = इतीरितः प्राह युधिष्ठिरस्तं न जीवमाने युधि मां घटोत्कचे ।¦धृष्टद्युम्ने चास्त्रविदां वरिष्ठे द्रोणो वशं नेतुमिह प्रभुः क्वचित् ॥ ११३॥ | ||
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| verse_text = यदि प्रियं कर्तुमिहेच्छसि त्वं मम प्रयाह्याशु च पार्थसात्यकी । | | verse_text = यदि प्रियं कर्तुमिहेच्छसि त्वं मम प्रयाह्याशु च पार्थसात्यकी । | ||
| verse_lines = यदि प्रियं कर्तुमिहेच्छसि त्वं मम प्रयाह्याशु च पार्थसात्यकी | | verse_lines = यदि प्रियं कर्तुमिहेच्छसि त्वं मम प्रयाह्याशु च पार्थसात्यकी ।¦रक्षस्व सञ्ज्ञामपि सिंहनादात् कुरुष्व मे पार्थशैनेयदृष्टौ ॥ ११४॥ | ||
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| verse_text = तथा हते चैव जयद्रथे मे कुरुष्व सञ्ज्ञामिति तेन भीमः । | | verse_text = तथा हते चैव जयद्रथे मे कुरुष्व सञ्ज्ञामिति तेन भीमः । | ||
| verse_lines = तथा हते चैव जयद्रथे मे कुरुष्व सञ्ज्ञामिति तेन भीमः | | verse_lines = तथा हते चैव जयद्रथे मे कुरुष्व सञ्ज्ञामिति तेन भीमः ।¦उक्तस्तु हैडिम्बममुष्य रक्षणे व्यधाच्च सेनापतिमेव सम्यक् ॥ ११५॥ | ||
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| verse_text = स चाऽह सेनापतिरत्र भीमं प्रयाहि तौ यत्र च केशवार्जुनौ । | | verse_text = स चाऽह सेनापतिरत्र भीमं प्रयाहि तौ यत्र च केशवार्जुनौ । | ||
| verse_lines = स चाऽह सेनापतिरत्र भीमं प्रयाहि तौ यत्र च केशवार्जुनौ | | verse_lines = स चाऽह सेनापतिरत्र भीमं प्रयाहि तौ यत्र च केशवार्जुनौ ।¦न जीवमाने मयि धर्षितुं क्षमो द्रोणो नृपं मृत्युरहं च तस्य ॥ ११६॥ | ||
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| verse_text = इति ब्रुवाणं (ब्रुवाणे) प्रणिधाय भीमः पुनः पुनस्तं नृपतिं गदाधरः । | | verse_text = इति ब्रुवाणं (ब्रुवाणे) प्रणिधाय भीमः पुनः पुनस्तं नृपतिं गदाधरः । | ||
| verse_lines = इति ब्रुवाणं (ब्रुवाणे) प्रणिधाय भीमः पुनः पुनस्तं नृपतिं गदाधरः | | verse_lines = इति ब्रुवाणं (ब्रुवाणे) प्रणिधाय भीमः पुनः पुनस्तं नृपतिं गदाधरः ।¦ययौ परानीकमधिज्यधन्वा निरन्तरं प्रवमन्(प्रपतन्) बाणपूगान् ॥ ११७॥ | ||
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| verse_lines = न्यवारयत् तं शरवर्षधारो द्रोणो वचश्चेदमुवाच भीमम् | | verse_lines = न्यवारयत् तं शरवर्षधारो द्रोणो वचश्चेदमुवाच भीमम् ।¦शिष्यस्नेहाद् वासविः सात्यकिश्च मया प्रमुक्तो भृशमानतौ मयि ॥ ११८॥ | ||
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| verse_text = स्वीया प्रतिज्ञाऽपि हि सैन्धवस्य गुप्तौ मया पार्थकृते विसृष्टा । | | verse_text = स्वीया प्रतिज्ञाऽपि हि सैन्धवस्य गुप्तौ मया पार्थकृते विसृष्टा । | ||
| verse_lines = स्वीया प्रतिज्ञाऽपि हि सैन्धवस्य गुप्तौ मया पार्थकृते विसृष्टा | | verse_lines = स्वीया प्रतिज्ञाऽपि हि सैन्धवस्य गुप्तौ मया पार्थकृते विसृष्टा ।¦दास्ये न ते मार्गमहं कथञ्चित् पश्यास्त्रवीर्यं मम दिव्यमद्भुतम् ॥ ११९॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तवाक्यः स गदां समाददे चिक्षेप तां द्रोणरथाय भीमः | | verse_lines = इत्युक्तवाक्यः स गदां समाददे चिक्षेप तां द्रोणरथाय भीमः ।¦उवाच चाहं पितृवन्मानये त्वां सदा मृदुस्त्वां प्रति नान्यथा क्वचित् ॥ १२०॥ | ||
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| verse_text = अमार्दवे पश्य च यादृशं बलं ममेति तस्याऽशु विचूर्णितो रथः । | | verse_text = अमार्दवे पश्य च यादृशं बलं ममेति तस्याऽशु विचूर्णितो रथः । | ||
| verse_lines = अमार्दवे पश्य च यादृशं बलं ममेति तस्याऽशु विचूर्णितो रथः | | verse_lines = अमार्दवे पश्य च यादृशं बलं ममेति तस्याऽशु विचूर्णितो रथः ।¦गदाभिघातेन वृकोदरस्य ससूतवाजिध्वजयन्त्रकूबरः ॥ १२१॥ | ||
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| verse_text = द्रोणो गदामापततीं निरीक्ष्य त्ववप्लुतो लाघवतो धरातले । | | verse_text = द्रोणो गदामापततीं निरीक्ष्य त्ववप्लुतो लाघवतो धरातले । | ||
| verse_lines = द्रोणो गदामापततीं निरीक्ष्य त्ववप्लुतो लाघवतो धरातले | | verse_lines = द्रोणो गदामापततीं निरीक्ष्य त्ववप्लुतो लाघवतो धरातले ।¦तदैव दुर्योधनयापितं रथं परं समास्थाय शरान् ववर्ष ह ॥ १२२॥ | ||
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| verse_lines = शरैस्तदीयैः परमास्त्रमन्त्रितैः प्रवृष्यमाणो जगदीरणात्मजः | | verse_lines = शरैस्तदीयैः परमास्त्रमन्त्रितैः प्रवृष्यमाणो जगदीरणात्मजः ।¦शिरो निधायाऽशु पुरो वृषो यथा तमभ्ययादेव रथादवप्लुतः ॥ १२३॥ | ||
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| verse_lines = मनोजवादेव तमाप्य भीमो रथं गृहीत्वाऽम्बर आक्षिपत् क्षणात् | | verse_lines = मनोजवादेव तमाप्य भीमो रथं गृहीत्वाऽम्बर आक्षिपत् क्षणात् ।¦शक्तोऽप्यहं त्वां न निहन्मि गौरवादित्येव सुज्ञापयितुं(विज्ञापयितुं) तदस्य ॥ १२४॥ | ||
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| verse_text = सवाजिसूतः स रथः क्षितौ (पतद्विचूर्णितः)पतन् विचूर्णितोऽस्माद् गुरुरप्यवप्लुतः । | | verse_text = सवाजिसूतः स रथः क्षितौ (पतद्विचूर्णितः)पतन् विचूर्णितोऽस्माद् गुरुरप्यवप्लुतः । | ||
| verse_lines = सवाजिसूतः स रथः क्षितौ (पतद्विचूर्णितः)पतन् विचूर्णितोऽस्माद् गुरुरप्यवप्लुतः | | verse_lines = सवाजिसूतः स रथः क्षितौ (पतद्विचूर्णितः)पतन् विचूर्णितोऽस्माद् गुरुरप्यवप्लुतः ।¦तदा विशोकोऽस्य रथं समानयत् तमारुहद् भीम उदारविक्रमः ॥ १२५॥ | ||
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| verse_lines = द्रोणोऽपि दुर्योधनदत्तमन्यद् रथं समास्थाय युधिष्ठिरं ययौ | | verse_lines = द्रोणोऽपि दुर्योधनदत्तमन्यद् रथं समास्थाय युधिष्ठिरं ययौ ।¦गृहीतुकामं नृपतिं प्रयान्तं न्यवारयत् संयति वाहिनीपतिः ॥ १२६॥ | ||
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| verse_text = विदारितां द्रोणशरैः स्वसेनां संस्थाप्य(संस्थाप्य भीमो) भूयो द्रुपदात्मजः शरैः । | | verse_text = विदारितां द्रोणशरैः स्वसेनां संस्थाप्य(संस्थाप्य भीमो) भूयो द्रुपदात्मजः शरैः । | ||
| verse_lines = विदारितां द्रोणशरैः स्वसेनां संस्थाप्य(संस्थाप्य भीमो) भूयो द्रुपदात्मजः शरैः | | verse_lines = विदारितां द्रोणशरैः स्वसेनां संस्थाप्य(संस्थाप्य भीमो) भूयो द्रुपदात्मजः शरैः ।¦द्रोणं निवार्यैव चमूं परेषां विद्रावयामास च तस्य पश्यतः ॥ १२७॥ | ||
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| verse_lines = तयोरभूद् युद्धमतीव रौद्रं जयैषिणोः पाण्डवधार्तराष्ट्रयोः | | verse_lines = तयोरभूद् युद्धमतीव रौद्रं जयैषिणोः पाण्डवधार्तराष्ट्रयोः ।¦अत्यद्भुतं सन्ततबाणवर्षतमनारतं सुचिरं निर्विशेषम् ॥ १२८॥ | ||
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| verse_lines = हतेषु तेषु प्रवरेषु धन्विनां सत्यव्रतः पुरमित्रो जयश्च | | verse_lines = हतेषु तेषु प्रवरेषु धन्विनां सत्यव्रतः पुरमित्रो जयश्च ।¦वृन्दारकः पौरवश्चेत्यमात्याः समासेदुर्धार्तराष्ट्रस्य भीमम् ॥ १३०॥ | ||
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| verse_text = स तैः पृषत्कैरवकीर्यमाणः शितान् विपाठान्(सितान् विपाटान्) युगपत् समाददे । | | verse_text = स तैः पृषत्कैरवकीर्यमाणः शितान् विपाठान्(सितान् विपाटान्) युगपत् समाददे । | ||
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| verse_text = स सिंहवत् क्षुद्रमृगान् समन्ततो विद्राप्य शत्रून् हृदिकात्मजं रणे । | | verse_text = स सिंहवत् क्षुद्रमृगान् समन्ततो विद्राप्य शत्रून् हृदिकात्मजं रणे । | ||
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| verse_lines = भीमस्य नानदत एव महास्वनेन विण्मूत्रशोणितमथो मृतिमापुरेके | | verse_lines = भीमस्य नानदत एव महास्वनेन विण्मूत्रशोणितमथो मृतिमापुरेके ।¦भीतेषु सर्वनृपतिष्वमुमाप तूर्णं कर्णो विकर्णमुखरा अपि धार्तराष्ट्राः ॥ १३५॥ | ||
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| verse_text = हत्वा विकर्णमुत तत्र च चित्रसेनं सञ्चूर्णितं प्रविदधे (सञ्चूर्णितं च विदधे) रथमर्कसूनोः । | | verse_text = हत्वा विकर्णमुत तत्र च चित्रसेनं सञ्चूर्णितं प्रविदधे (सञ्चूर्णितं च विदधे) रथमर्कसूनोः । | ||
| verse_lines = हत्वा विकर्णमुत तत्र च चित्रसेनं सञ्चूर्णितं प्रविदधे (सञ्चूर्णितं च विदधे) रथमर्कसूनोः | | verse_lines = हत्वा विकर्णमुत तत्र च चित्रसेनं सञ्चूर्णितं प्रविदधे (सञ्चूर्णितं च विदधे) रथमर्कसूनोः ।¦घोरैः शरैः पुनरपि स्म समर्द्यमानः कर्णोऽपयानमकरोद् द्रुतमेव भीमात् ॥ १३६॥ | ||
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| verse_text = आश्वास्य चैव सुचिरं पुनरेव भीमं युद्धाय याति धृतराष्ट्रसुतैस्तथाऽन्यैः । | | verse_text = आश्वास्य चैव सुचिरं पुनरेव भीमं युद्धाय याति धृतराष्ट्रसुतैस्तथाऽन्यैः । | ||
| verse_lines = आश्वास्य चैव सुचिरं पुनरेव भीमं युद्धाय याति धृतराष्ट्रसुतैस्तथाऽन्यैः | | verse_lines = आश्वास्य चैव सुचिरं पुनरेव भीमं युद्धाय याति धृतराष्ट्रसुतैस्तथाऽन्यैः ।¦तांश्चैव तत्र विनिहत्य तथैव कर्णो व्यश्वायुधः कृत उतापययौ क्षणेन ॥ १३७॥ | ||
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| verse_text = विकर्णचित्रसेनाद्या एवं वीरतमाः सुताः । | | verse_text = विकर्णचित्रसेनाद्या एवं वीरतमाः सुताः । | ||
| verse_lines = विकर्णचित्रसेनाद्या एवं वीरतमाः सुताः | | verse_lines = विकर्णचित्रसेनाद्या एवं वीरतमाः सुताः ।¦कर्णस्य पश्यतो भीमबाणकृत्तशिरोधराः ॥ १३८॥ | ||
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| verse_text = निपेतुर्धृतराष्ट्रस्य रथेभ्यः पृथिवीतले । | | verse_text = निपेतुर्धृतराष्ट्रस्य रथेभ्यः पृथिवीतले । | ||
| verse_lines = निपेतुर्धृतराष्ट्रस्य रथेभ्यः पृथिवीतले | | verse_lines = निपेतुर्धृतराष्ट्रस्य रथेभ्यः पृथिवीतले ।¦त्रयोविंशतिरेवात्र कर्णसाहाय्यकारिणः ॥ १३९॥ | ||
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| verse_text = एकविंशतिवारं च व्यश्वसूतरथध्वजः । | | verse_text = एकविंशतिवारं च व्यश्वसूतरथध्वजः । | ||
| verse_lines = एकविंशतिवारं च व्यश्वसूतरथध्वजः | | verse_lines = एकविंशतिवारं च व्यश्वसूतरथध्वजः ।¦गाढमभ्यर्द्दितस्तीक्ष्णैः शरैर्भीमेन संयुगे ॥ १४०॥ | ||
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| verse_text = प्राणसंशयमापन्नः सर्वलोकस्य पश्यतः । | | verse_text = प्राणसंशयमापन्नः सर्वलोकस्य पश्यतः । | ||
| verse_lines = प्राणसंशयमापन्नः सर्वलोकस्य पश्यतः | | verse_lines = प्राणसंशयमापन्नः सर्वलोकस्य पश्यतः ।¦रणं त्यक्त्वा प्रदुद्राव रुदन् दुःखात् पुनः पुनः ॥ १४१॥ | ||
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| verse_text = द्वाविंशतिमयुद्धे तु रामदत्तं सुभास्वरम् । | | verse_text = द्वाविंशतिमयुद्धे तु रामदत्तं सुभास्वरम् । | ||
| verse_lines = द्वाविंशतिमयुद्धे तु रामदत्तं सुभास्वरम् | | verse_lines = द्वाविंशतिमयुद्धे तु रामदत्तं सुभास्वरम् ।¦अभेद्यं रथमारुह्य विजयं धनुरेव च ॥ १४२॥ | ||
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| verse_text = तद्दत्तमेव सङ्गृह्य तूणौ (तूणी) चाक्षयसायकौ । | | verse_text = तद्दत्तमेव सङ्गृह्य तूणौ (तूणी) चाक्षयसायकौ । | ||
| verse_lines = तद्दत्तमेव सङ्गृह्य तूणौ (तूणी) चाक्षयसायकौ | | verse_lines = तद्दत्तमेव सङ्गृह्य तूणौ (तूणी) चाक्षयसायकौ ।¦आससाद रणे भीमं कर्णो वैकर्तनो वृषा(रुषा) ॥ १४३॥ | ||
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| verse_lines = सुघोर आसीत् स तयोर्विमर्दो भीमस्य कर्णस्य च दीर्घकालम् | | verse_lines = सुघोर आसीत् स तयोर्विमर्दो भीमस्य कर्णस्य च दीर्घकालम् ।¦आकाशमाच्छादयतोः शरौघैः परस्परं चैव सुरक्तनेत्रयोः ॥ १४४॥ | ||
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| verse_lines = ततो भीमो महाबाहुः सहजाभ्यां च संयुतम् | | verse_lines = ततो भीमो महाबाहुः सहजाभ्यां च संयुतम् ।¦त्वां तु कुण्डलवर्मभ्यां शक्नुयां हन्तुमञ्जसा ॥ १४५॥ | ||
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| verse_lines = इति ज्ञापयितुं तस्य कुण्डले कवचं तथा | | verse_lines = इति ज्ञापयितुं तस्य कुण्डले कवचं तथा ।¦शरैरुत्कृत्य समरे पातयामास भूतले ॥ १४६॥ | ||
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| verse_text = एवं तान्यपकृष्याहं हन्यां त्वामिति वेदयन् । | | verse_text = एवं तान्यपकृष्याहं हन्यां त्वामिति वेदयन् । | ||
| verse_lines = एवं तान्यपकृष्याहं हन्यां त्वामिति वेदयन् | | verse_lines = एवं तान्यपकृष्याहं हन्यां त्वामिति वेदयन् ।¦पुनश्च बहुभिस्तीक्ष्णैः शरैरेनं समर्दयत् ॥ १४७॥ | ||
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| verse_text = ततस्तु भीमस्य बभूव बुद्धिरस्पर्धिनः सर्वजयो हि दत्तः । | | verse_text = ततस्तु भीमस्य बभूव बुद्धिरस्पर्धिनः सर्वजयो हि दत्तः । | ||
| verse_lines = ततस्तु भीमस्य बभूव बुद्धिरस्पर्धिनः सर्वजयो हि दत्तः | | verse_lines = ततस्तु भीमस्य बभूव बुद्धिरस्पर्धिनः सर्वजयो हि दत्तः ।¦अमुष्य रामेण न च स्पृधाऽयं कर्णो मया युद्ध्यति कृच्छ्रगो ह्ययम् ॥ १४८॥ | ||
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| verse_text = तथाऽपि मे भगवानत्यनुग्रहाज्जयं ददात्यात्मवचो विहाय (वचोऽपहाय) । | | verse_text = तथाऽपि मे भगवानत्यनुग्रहाज्जयं ददात्यात्मवचो विहाय (वचोऽपहाय) । | ||
| verse_lines = तथाऽपि मे भगवानत्यनुग्रहाज्जयं ददात्यात्मवचो विहाय (वचोऽपहाय) | | verse_lines = तथाऽपि मे भगवानत्यनुग्रहाज्जयं ददात्यात्मवचो विहाय (वचोऽपहाय) ।¦मया तु मान्यं वचनं हरेः सदा तस्माद् दास्ये विवरं त्वद्य शत्रोः ॥ १४९॥ | ||
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| verse_lines = एवं स्मृत्वा तेन रन्ध्रे प्रदत्ते कर्णोऽस्त्रवीर्येण धनुर्न्यकृन्तत् | | verse_lines = एवं स्मृत्वा तेन रन्ध्रे प्रदत्ते कर्णोऽस्त्रवीर्येण धनुर्न्यकृन्तत् ।¦रश्मीन् हयानां च ततो रथं स तत्याज नैजं बलमेव वेदयन् ॥ १५०॥ | ||
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| verse_text = न मे रथाद्यैर्धनुषाऽपि कार्यमित्येव सञ्ज्ञापयितुं (स ख्यापयितुं) वृकोदरः । | | verse_text = न मे रथाद्यैर्धनुषाऽपि कार्यमित्येव सञ्ज्ञापयितुं (स ख्यापयितुं) वृकोदरः । | ||
| verse_lines = न मे रथाद्यैर्धनुषाऽपि कार्यमित्येव सञ्ज्ञापयितुं (स ख्यापयितुं) वृकोदरः | | verse_lines = न मे रथाद्यैर्धनुषाऽपि कार्यमित्येव सञ्ज्ञापयितुं (स ख्यापयितुं) वृकोदरः ।¦खमुत्पपातोत्तमवीर्यतेजा रथं च कर्णस्य समास्थितः क्षणात् ॥ १५१॥ | ||
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| verse_text = भीतस्तु(भीमस्तु) कर्णो रथकूबरे तदा व्यलीयताधः (व्यलीयतातः) स वृकोदरो रथात् । | | verse_text = भीतस्तु(भीमस्तु) कर्णो रथकूबरे तदा व्यलीयताधः (व्यलीयतातः) स वृकोदरो रथात् । | ||
| verse_lines = भीतस्तु(भीमस्तु) कर्णो रथकूबरे तदा व्यलीयताधः (व्यलीयतातः) स वृकोदरो रथात् | | verse_lines = भीतस्तु(भीमस्तु) कर्णो रथकूबरे तदा व्यलीयताधः (व्यलीयतातः) स वृकोदरो रथात् ।¦अवप्लुतो ज्ञापयितुं स्वशक्तिं निरायुधत्वेऽप्यरिनिग्रहादौ ॥ १५२॥ | ||
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| verse_lines = नैच्छद् गृहीतुं(ग्रहीतुं) विनिहन्तुमेव वा रथं धनुर्वाऽस्य रणेऽपहर्तुम् | | verse_lines = नैच्छद् गृहीतुं(ग्रहीतुं) विनिहन्तुमेव वा रथं धनुर्वाऽस्य रणेऽपहर्तुम् ।¦द्रोणस्य यद्वत् पूर्वमतीव(द्रोणस्य यत्पूर्वमतीव) शक्तोऽप्यमानयद् रामवचोऽस्य भक्त्या ॥ १५३॥ | ||
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| verse_text = सत्यां कर्तुं वासवेश्च प्रतिज्ञां सम्मानयन् वैष्णवत्वाच्च कर्णम् । | | verse_text = सत्यां कर्तुं वासवेश्च प्रतिज्ञां सम्मानयन् वैष्णवत्वाच्च कर्णम् । | ||
| verse_lines = सत्यां कर्तुं वासवेश्च प्रतिज्ञां सम्मानयन् वैष्णवत्वाच्च कर्णम् | | verse_lines = सत्यां कर्तुं वासवेश्च प्रतिज्ञां सम्मानयन् वैष्णवत्वाच्च कर्णम् ।¦दातुं रन्ध्रं सूर्यजस्य प्रयातः शरक्षेपार्थं दुरमतिष्ठदत्र ॥ १५४॥ | ||
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| verse_lines = ततः कर्णो दूरगतं वृकोदरं सम्मानयन्तं रामवाक्यं विजानन् | | verse_lines = ततः कर्णो दूरगतं वृकोदरं सम्मानयन्तं रामवाक्यं विजानन् ।¦शरैरविध्यत् स च तानवारयद् गजैर्मृतैस्तांश्च चकर्त कर्णः ॥ १५५॥ | ||
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| verse_lines = व्यसून् गजान् प्रक्षिपन्तं समेत्य संस्पृश्य चापेन वचश्च दुष्टम् | | verse_lines = व्यसून् गजान् प्रक्षिपन्तं समेत्य संस्पृश्य चापेन वचश्च दुष्टम् ।¦संश्रावयामास सुयोधनस्य प्रीत्यै प्रजानन्नपि तस्य वीर्यम् ॥ १५६॥ | ||
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| verse_text = संश्रावयन्तं वचनानि रूक्षाण्यपाहनद् बाणवरैस्तदाऽर्जुनः(बाणगणैस्तदा) । | | verse_text = संश्रावयन्तं वचनानि रूक्षाण्यपाहनद् बाणवरैस्तदाऽर्जुनः(बाणगणैस्तदा) । | ||
| verse_lines = संश्रावयन्तं वचनानि रूक्षाण्यपाहनद् बाणवरैस्तदाऽर्जुनः(बाणगणैस्तदा) | | verse_lines = संश्रावयन्तं वचनानि रूक्षाण्यपाहनद् बाणवरैस्तदाऽर्जुनः(बाणगणैस्तदा) ।¦स वर्महीनः पार्थबाणाभितप्तो व्यपागमद् भीम आपाऽत्मयानम् ॥ १५७॥ | ||
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| verse_lines = कर्णो भीमे वासवीं नैव शक्तिं विमोक्तुमैच्छन्नैव बीभत्सुतोऽन्यान् | | verse_lines = कर्णो भीमे वासवीं नैव शक्तिं विमोक्तुमैच्छन्नैव बीभत्सुतोऽन्यान् ।¦हन्यामिति प्राह यतः स कुन्त्यै यद्यप्यवध्यः स तयाऽपि भीमः ॥ १५८॥ | ||
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| verse_lines = नारायणास्त्रं शिरसि प्रपातितं न यस्य लोमाप्यदहच्चिरस्थितम्(लोमाप्यदहरच्छिरःस्थितम्) | | verse_lines = नारायणास्त्रं शिरसि प्रपातितं न यस्य लोमाप्यदहच्चिरस्थितम्(लोमाप्यदहरच्छिरःस्थितम्) ।¦किं तस्य शक्तिः प्रकरोति वासवी तथाऽन्यदप्यस्त्रशस्त्रं महच्च ॥ १५९॥ | ||
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| verse_lines = भीमः कर्णरथं प्राप्तः शक्तिं नाऽदातुमैच्छत | | verse_lines = भीमः कर्णरथं प्राप्तः शक्तिं नाऽदातुमैच्छत ।¦अभिप्रायं केशवस्य जानन् हैडिम्बमृत्यवे ।¦ततः कर्णोऽन्यमास्थाय रथमर्जुनमभ्ययात् ॥ १६०॥ | ||
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| verse_lines = दिव्यं रथं धनुश्चैव कृष्णबुद्ध्योऽर्जुनो हरेत् | | verse_lines = दिव्यं रथं धनुश्चैव कृष्णबुद्ध्योऽर्जुनो हरेत् ।¦इति भीतस्तु तां शक्तिमादायार्जुनमृत्यवे ।¦युद्धायायाद् रथं चापं शक्तिं चैकत्र नाकरोत् ॥ १६१॥ | ||
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| verse_lines = एकं हृतं चेदन्यत् स्यादिति मत्वा भयाकुलः | | verse_lines = एकं हृतं चेदन्यत् स्यादिति मत्वा भयाकुलः ।¦बिभेति सर्वदा नीतेः कृष्णस्यामिततेजसः ॥ १६२॥ | ||
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| verse_lines = निश्चितो मरणायैव मृतिकाले तु तं रथम् | | verse_lines = निश्चितो मरणायैव मृतिकाले तु तं रथम् ।¦आरुह्यागाद्धि पूर्वं तु न कालं मन्यते मृतेः ॥ १६३॥ | ||
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| verse_lines = शक्तिं तु तद्रथगतां प्रसमीक्ष्य कृष्णः संस्थाप्य पार्थमपि सात्यकिमेव योद्धुम् | | verse_lines = शक्तिं तु तद्रथगतां प्रसमीक्ष्य कृष्णः संस्थाप्य पार्थमपि सात्यकिमेव योद्धुम् ।¦दत्त्वा स्वकीयरथमेव विरोचनस्य(विकर्तनस्य) पुत्रेण सोऽदिशदमुष्य बलं प्रदाय ॥ १६४॥ | ||
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| verse_lines = न केशवरथे कश्चित् स्थितो याति पराजयम् | | verse_lines = न केशवरथे कश्चित् स्थितो याति पराजयम् ।¦अतश्च सात्यकिर्नाप कर्णेनात्र पराजयम् ॥ १६६॥ | ||
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| verse_lines = तच्छत्रुवधरूपं च पूर्वासिद्धं च गूहितम् | | verse_lines = तच्छत्रुवधरूपं च पूर्वासिद्धं च गूहितम् ।¦अविरुद्धं च धर्मस्य कार्यं रामस्य तुष्टिदम् ॥ १६८॥ | ||
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| verse_text = अनुपद्रवाय लोकस्य सुव्यञ्जच्श्मश्रुमण्डलः(सुव्यक्तश्मश्रुमण्डलः) । | | verse_text = अनुपद्रवाय लोकस्य सुव्यञ्जच्श्मश्रुमण्डलः(सुव्यक्तश्मश्रुमण्डलः) । | ||
| verse_lines = अनुपद्रवाय लोकस्य सुव्यञ्जच्श्मश्रुमण्डलः(सुव्यक्तश्मश्रुमण्डलः) | | verse_lines = अनुपद्रवाय लोकस्य सुव्यञ्जच्श्मश्रुमण्डलः(सुव्यक्तश्मश्रुमण्डलः) ।¦सुश्मश्रुं मां न कश्चिद्धि तथा ब्रूयादिति स्फुटम् ।¦तदर्जुनो विजानाति स्नेहाद् भीमोदितं रहः ॥ १७०॥ | ||
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| verse_text = अर्जुनस्यापि गाण्डीवं देहीत्युक्तो(देहीत्युक्ते) निहन्म्यहम्(निहन्मितम्) । | | verse_text = अर्जुनस्यापि गाण्डीवं देहीत्युक्तो(देहीत्युक्ते) निहन्म्यहम्(निहन्मितम्) । | ||
| verse_lines = अर्जुनस्यापि गाण्डीवं देहीत्युक्तो(देहीत्युक्ते) निहन्म्यहम्(निहन्मितम्) | | verse_lines = अर्जुनस्यापि गाण्डीवं देहीत्युक्तो(देहीत्युक्ते) निहन्म्यहम्(निहन्मितम्) ।¦इति तच्च विजानाति भीम एको नचापरः ।¦गाण्डीवस्याऽगमं पूर्वं जानात्येव हि नारदात् ॥ १७१॥ | ||
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| verse_text = प्रतिज्ञां भीमसेनस्य ब्रुवतः फल्गुने(फाल्गुने) रहः । | | verse_text = प्रतिज्ञां भीमसेनस्य ब्रुवतः फल्गुने(फाल्गुने) रहः । | ||
| verse_lines = प्रतिज्ञां भीमसेनस्य ब्रुवतः फल्गुने(फाल्गुने) रहः | | verse_lines = प्रतिज्ञां भीमसेनस्य ब्रुवतः फल्गुने(फाल्गुने) रहः ।¦दुर्योधनस्तु शुश्राव तां च कर्णाय सोऽब्रवीत् ॥ १७२॥ | ||
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| verse_text = अतूबरोऽपि तेनासौ तस्मात् तूबर इत्यलम् । | | verse_text = अतूबरोऽपि तेनासौ तस्मात् तूबर इत्यलम् । | ||
| verse_lines = अतूबरोऽपि तेनासौ तस्मात् तूबर इत्यलम् | | verse_lines = अतूबरोऽपि तेनासौ तस्मात् तूबर इत्यलम् ।¦उक्तः प्रकोपनायैव तस्मादर्जुनमब्रवीत् ॥ १७३॥ | ||
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| verse_text = जानासि मत्प्रतिज्ञां त्वं त्वत्प्रतिज्ञामहं तथा । | | verse_text = जानासि मत्प्रतिज्ञां त्वं त्वत्प्रतिज्ञामहं तथा । | ||
| verse_lines = जानासि मत्प्रतिज्ञां त्वं त्वत्प्रतिज्ञामहं तथा | | verse_lines = जानासि मत्प्रतिज्ञां त्वं त्वत्प्रतिज्ञामहं तथा ।¦तत्र हन्तव्यतां प्राप्तो मम वैकर्तनोऽत्रहि ॥ १७४॥ | ||
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| verse_text = प्रतिज्ञातो वधश्चास्य त्वयाऽपि मदनुज्ञया । | | verse_text = प्रतिज्ञातो वधश्चास्य त्वयाऽपि मदनुज्ञया । | ||
| verse_lines = प्रतिज्ञातो वधश्चास्य त्वयाऽपि मदनुज्ञया | | verse_lines = प्रतिज्ञातो वधश्चास्य त्वयाऽपि मदनुज्ञया ।¦अतस्त्वया मयैवाऽयं (मया वाऽयं) हन्तव्यः सूतनन्दनः ॥ १७५॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तो वासविः प्राह हन्तव्योऽयं मयैव हि । | | verse_text = इत्युक्तो वासविः प्राह हन्तव्योऽयं मयैव हि । | ||
| verse_lines = इत्युक्तो वासविः प्राह हन्तव्योऽयं मयैव हि | | verse_lines = इत्युक्तो वासविः प्राह हन्तव्योऽयं मयैव हि ।¦त्वदीयोऽहं यतस्तेन मत्कृतं त्वत्कृतं भवेत् ॥ १७६॥ | ||
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| verse_text = न त्वत्कृतं मत्कृतं स्याद् गुरुर्मम यतो भवान् । | | verse_text = न त्वत्कृतं मत्कृतं स्याद् गुरुर्मम यतो भवान् । | ||
| verse_lines = न त्वत्कृतं मत्कृतं स्याद् गुरुर्मम यतो भवान् | | verse_lines = न त्वत्कृतं मत्कृतं स्याद् गुरुर्मम यतो भवान् ।¦अतो मयैव हन्तव्य इत्युक्त्वा कर्णमब्रवीत् ॥ १७७॥ | ||
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| verse_text = रूक्षा वाचः श्रावितोऽयं भीमः कृष्णस्य शृण्वतः । | | verse_text = रूक्षा वाचः श्रावितोऽयं भीमः कृष्णस्य शृण्वतः । | ||
| verse_lines = रूक्षा वाचः श्रावितोऽयं भीमः कृष्णस्य शृण्वतः | | verse_lines = रूक्षा वाचः श्रावितोऽयं भीमः कृष्णस्य शृण्वतः ।¦यच्चाभिमन्युर्युष्माभिरेकः सम्भूय पातितः ॥ १७८॥ | ||
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| verse_text = अतस्त्वां निहनिष्यामि त्वत्पुत्रं च तवाग्रतः । | | verse_text = अतस्त्वां निहनिष्यामि त्वत्पुत्रं च तवाग्रतः । | ||
| verse_lines = अतस्त्वां निहनिष्यामि त्वत्पुत्रं च तवाग्रतः | | verse_lines = अतस्त्वां निहनिष्यामि त्वत्पुत्रं च तवाग्रतः ।¦इत्युक्तोऽन्यं रथं प्राप्य कर्ण आवीज्जयद्रथम् ॥ १७९॥ | ||
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| verse_text = द्रौणिकर्णाभिगुप्तं तं नाशकद्धन्तुमर्जुनः । | | verse_text = द्रौणिकर्णाभिगुप्तं तं नाशकद्धन्तुमर्जुनः । | ||
| verse_lines = द्रौणिकर्णाभिगुप्तं तं नाशकद्धन्तुमर्जुनः | | verse_lines = द्रौणिकर्णाभिगुप्तं तं नाशकद्धन्तुमर्जुनः ।¦तत्र वेगं परं चक्रे द्रौणिः पार्थनिवारणे ॥ १८०॥ | ||
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| verse_text = नचैनमशकत् तर्तुं यत्नवानपि फल्गुनः । | | verse_text = नचैनमशकत् तर्तुं यत्नवानपि फल्गुनः । | ||
| verse_lines = नचैनमशकत् तर्तुं यत्नवानपि फल्गुनः | | verse_lines = नचैनमशकत् तर्तुं यत्नवानपि फल्गुनः ।¦तयोरासीच्चिरं युद्धं चित्रं लघु च सुष्ठु च ॥ १८१॥ | ||
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| verse_text = तद् दृष्ट्वा भगवान् कृष्णो लोहितायति भास्करे । | | verse_text = तद् दृष्ट्वा भगवान् कृष्णो लोहितायति भास्करे । | ||
| verse_lines = तद् दृष्ट्वा भगवान् कृष्णो लोहितायति भास्करे | | verse_lines = तद् दृष्ट्वा भगवान् कृष्णो लोहितायति भास्करे ।¦अजिते द्रोणतनये त्वहते च जयद्रथे ।¦अर्जुनस्य जयाकाङ्क्षी ससर्ज तम ऊर्जितम् ॥ १८२॥ | ||
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| verse_lines = तमोव्याप्ते गगने सूर्यमस्तं गतं मत्वा द्रौणिपूर्वाः समस्ताः | | verse_lines = तमोव्याप्ते गगने सूर्यमस्तं गतं मत्वा द्रौणिपूर्वाः समस्ताः ।¦विशश्रमुः सैन्धवश्चार्जुनस्य हतप्रतिज्ञस्य मुखं समैक्षत ॥ १८३॥ | ||
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| verse_text = तदा हरेराज्ञया शक्रसूनुश्चकर्त बाणेन जयद्रथस्य । | | verse_text = तदा हरेराज्ञया शक्रसूनुश्चकर्त बाणेन जयद्रथस्य । | ||
| verse_lines = तदा हरेराज्ञया शक्रसूनुश्चकर्त बाणेन जयद्रथस्य | | verse_lines = तदा हरेराज्ञया शक्रसूनुश्चकर्त बाणेन जयद्रथस्य ।¦वह्निं (अग्निं) विविक्षन्निव दर्शितः शिरस्तदा वचः प्राह जनार्दनस्तम् ॥ १८४॥ | ||
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| verse_lines = नैतच्छिरः पातय भूतले त्वमितीरितः पाशुपतास्त्रतेजसा | | verse_lines = नैतच्छिरः पातय भूतले त्वमितीरितः पाशुपतास्त्रतेजसा ।¦दधार बाणैरनुपुङ्खपुङ्खैः पुनस्तमूचे गरुडध्वजो वचः ॥ १८५॥ | ||
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| verse_text = इदं पितुस्तस्य करे निपात्यतां वरोऽस्य दत्तो हि पुराऽमुनाऽयम्(यत्) । | | verse_text = इदं पितुस्तस्य करे निपात्यतां वरोऽस्य दत्तो हि पुराऽमुनाऽयम्(यत्) । | ||
| verse_lines = इदं पितुस्तस्य करे निपात्यतां वरोऽस्य दत्तो हि पुराऽमुनाऽयम्(यत्) | | verse_lines = इदं पितुस्तस्य करे निपात्यतां वरोऽस्य दत्तो हि पुराऽमुनाऽयम्(यत्) ।¦शिरो निकृत्तं भुवि पातयेद् यस्तवास्य भूयाच्च शिरः सहस्रधा ॥ १८६॥ | ||
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| verse_text = इति स्म वध्यः स पिताऽपि(वध्योऽस्य पिताऽपि) तेनेत्युदीरिते तस्य सन्ध्याक्रियस्य । | | verse_text = इति स्म वध्यः स पिताऽपि(वध्योऽस्य पिताऽपि) तेनेत्युदीरिते तस्य सन्ध्याक्रियस्य । | ||
| verse_lines = इति स्म वध्यः स पिताऽपि(वध्योऽस्य पिताऽपि) तेनेत्युदीरिते तस्य सन्ध्याक्रियस्य | | verse_lines = इति स्म वध्यः स पिताऽपि(वध्योऽस्य पिताऽपि) तेनेत्युदीरिते तस्य सन्ध्याक्रियस्य ।¦अङ्के व्यधात् तच्छिर आशु वासविः स सम्भ्रमात् तद् भुवि च न्यपातयत् ॥ १८७॥ | ||
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| verse_lines = ततोऽभवत् तस्य शिरः सहस्रधा हरिश्च चक्रे तमसो लयं पुनः | | verse_lines = ततोऽभवत् तस्य शिरः सहस्रधा हरिश्च चक्रे तमसो लयं पुनः ।¦तदैव सूर्ये सकलैश्च दृष्टे हाहेति वादः सुमहानथाऽसीत् ॥ १८८॥ | ||
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| verse_lines = भीमस्तदा शल्यसुयोधनादीन् कृपं च जित्वा व्यनदत् सुभैरवम् | | verse_lines = भीमस्तदा शल्यसुयोधनादीन् कृपं च जित्वा व्यनदत् सुभैरवम् ।¦कुर्वन् साहाय्यं फल्गुनस्यैव तुष्टो बभूव शैनेय उतो हते रिपौ ॥ १८९॥ | ||
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| verse_lines = अपूरयत् पाञ्चजन्यं च कृष्णो मुदा तदा देवदत्तं च पार्थः | | verse_lines = अपूरयत् पाञ्चजन्यं च कृष्णो मुदा तदा देवदत्तं च पार्थः ।¦भीमस्य नादं सहपाञ्चजन्यघोषं श्रुत्वा निहतं सिन्धुराजम् ।¦ज्ञात्वा राजा धर्मसुतो मुमोद दुर्योधनश्चाऽस सुदुःखितस्तदा ॥ १९०॥ | ||
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| verse_lines = ततो द्रौणिमुखां(द्रौणिमुखान्) सेनां सर्वां | | verse_lines = ततो द्रौणिमुखां(द्रौणिमुखान्) सेनां सर्वां भीमोऽभ्यवर्तत।¦पार्थः कर्णमुखाञ्छिष्टान् ततोऽभज्यत तद् बलम् ॥ १९१॥ | ||
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| verse_lines = शीर्णां सेनां प्रविविशुर्धृष्टद्युम्नपुरोगमाः | | verse_lines = शीर्णां सेनां प्रविविशुर्धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।¦ततस्तं देशमापुस्ते यत्र भीमधनञ्जयौ ॥ १९२॥ | ||
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| verse_lines = तत एकीकृताः सर्वे पाण्डवाः सहसोमकाः | | verse_lines = तत एकीकृताः सर्वे पाण्डवाः सहसोमकाः ।¦परान् विद्रावयामासुस्ते भीताः प्राद्रवन् दिशः ॥ १९३॥ | ||
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| verse_lines = विद्राप्यमाणं सैन्यं तं दृष्ट्वा दुर्योधनो नृपः | | verse_lines = विद्राप्यमाणं सैन्यं तं दृष्ट्वा दुर्योधनो नृपः ।¦जयद्रथवधाच्चैव कुपितोऽभ्यद्रवत् परान् ॥ १९४॥ | ||
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| verse_lines = स भीमसेनं च धनञ्जयं च युधिष्ठिरं माद्रवतीसुतौ च | | verse_lines = स भीमसेनं च धनञ्जयं च युधिष्ठिरं माद्रवतीसुतौ च ।¦धृष्टद्युम्नं सात्यकिं द्रौपदेयान् सर्वानेकः शरवर्षैर्ववर्ष ॥ १९५॥ | ||
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| verse_lines = ते विव्यधुस्तं बहुभिः शिलीमुखैः(शिलीमुखान्) स ताननादृत्य चकर्त बाणैः | | verse_lines = ते विव्यधुस्तं बहुभिः शिलीमुखैः(शिलीमुखान्) स ताननादृत्य चकर्त बाणैः ।¦धनूंषि चित्राणि महारथानां चकार सङ्ख्ये(युद्धे) विरथौ यमौ च ॥ १९६॥ | ||
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| verse_lines = आदाय चापानि पराणि तेऽपि दुर्योधनं ववृषुः सायकौघैः | | verse_lines = आदाय चापानि पराणि तेऽपि दुर्योधनं ववृषुः सायकौघैः ।¦अचिन्तयित्वैव शरान्स एको न्यवारयत् तानखिलांश्च बाणैः ॥ १९७॥ | ||
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| verse_lines = तं गाहमानं द्विषतां बहूनां मध्ये द्रोणद्रौणिकृपप्रधानाः | | verse_lines = तं गाहमानं द्विषतां बहूनां मध्ये द्रोणद्रौणिकृपप्रधानाः ।¦दृष्ट्वा सर्वे जुगुपुः स्वात्तचापा अनारतं बाणगणान् सृजन्तः ॥ १९८॥ | ||
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| verse_lines = दैवाज्जीवाम्यहं राजन् युध्यंस्तेनातिपीडितः | | verse_lines = दैवाज्जीवाम्यहं राजन् युध्यंस्तेनातिपीडितः ।¦अतो घटामहे शक्त्या जयो दैवसमाहितः ॥ २००॥ | ||
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| verse_text = चमूं परेषामभ्यागाद् धृष्टद्युम्नस्तमाशु च । | | verse_text = चमूं परेषामभ्यागाद् धृष्टद्युम्नस्तमाशु च । | ||
| verse_lines = चमूं परेषामभ्यागाद् धृष्टद्युम्नस्तमाशु च | | verse_lines = चमूं परेषामभ्यागाद् धृष्टद्युम्नस्तमाशु च ।¦द्रौणिदुर्योधनौ तत्र विरथीकृत्य मारुतिः ।¦द्रावयामास तत् सैन्यं पश्यतां सर्वभूभृताम् ॥ २०५॥ | ||
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| verse_text = अक्षोहिण्यस्तु सप्तैव सेनयोरुभयोरपि । | | verse_text = अक्षोहिण्यस्तु सप्तैव सेनयोरुभयोरपि । | ||
| verse_lines = अक्षोहिण्यस्तु सप्तैव सेनयोरुभयोरपि | | verse_lines = अक्षोहिण्यस्तु सप्तैव सेनयोरुभयोरपि ।¦हतास्तासां च भीमेन तिस्रो द्वे फल्गुनेन च ॥ २०६॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = सौभद्रसात्यकिमुखैस्तन्मध्ये षोडशांशकः(षोडशांसकैः) । | | verse_text = सौभद्रसात्यकिमुखैस्तन्मध्ये षोडशांशकः(षोडशांसकैः) । | ||
| verse_lines = सौभद्रसात्यकिमुखैस्तन्मध्ये षोडशांशकः(षोडशांसकैः) | | verse_lines = सौभद्रसात्यकिमुखैस्तन्मध्ये षोडशांशकः(षोडशांसकैः) ।¦हैडिम्बपार्षतमुखैस्त्रयाच्च दशमांशकः(दशमांशतः) ॥ २०७॥ | ||
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| verse_text = भीष्मद्रोणद्रौणिभिश्च द्वे समं निहते तदा । | | verse_text = भीष्मद्रोणद्रौणिभिश्च द्वे समं निहते तदा । | ||
| verse_lines = भीष्मद्रोणद्रौणिभिश्च द्वे समं निहते तदा | | verse_lines = भीष्मद्रोणद्रौणिभिश्च द्वे समं निहते तदा ।¦तदन्यैर्मिलितैः सर्वैस्तच्चतुर्थांश एव च ॥ २०८॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = ततो रात्रौ पञ्चभिश्च पार्थाः षड्भिश्च कौरवाः । | | verse_text = ततो रात्रौ पञ्चभिश्च पार्थाः षड्भिश्च कौरवाः । | ||
| verse_lines = ततो रात्रौ पञ्चभिश्च पार्थाः षड्भिश्च कौरवाः | | verse_lines = ततो रात्रौ पञ्चभिश्च पार्थाः षड्भिश्च कौरवाः ।¦अक्षोहिणीभिः संव्यूह्य युद्धं चक्रुः सुदारुणम् ।¦भीमं सेनां द्रावयन्तं पुनः कर्णः समासदत् ॥ २०९॥ | ||
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| verse_text = स कर्णपुरतो भीमो दुष्कर्णं कर्णमेव च । | | verse_text = स कर्णपुरतो भीमो दुष्कर्णं कर्णमेव च । | ||
| verse_lines = स कर्णपुरतो भीमो दुष्कर्णं कर्णमेव च | | verse_lines = स कर्णपुरतो भीमो दुष्कर्णं कर्णमेव च ।¦दुर्योधनस्यावरजौ निष्पिपेष पदा क्षणात् ।¦रथाश्वध्वजसूतैश्च सहितौ न व्यदृश्यताम्(न व्यदृश्यत) ॥ २१०॥ | ||
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| verse_text = निरायुधोऽहमिति मां त्वमात्थ पुरुषं वचः । | | verse_text = निरायुधोऽहमिति मां त्वमात्थ पुरुषं वचः । | ||
| verse_lines = निरायुधोऽहमिति मां त्वमात्थ पुरुषं वचः | | verse_lines = निरायुधोऽहमिति मां त्वमात्थ पुरुषं वचः ।¦निरायुधः पदैवाहं त्वां हन्तुमशकं तदा ॥ २११॥ | ||
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| verse_text = इति कर्णस्य तौ भीमः सञ्ज्ञया ज्ञापयन् भुवि । | | verse_text = इति कर्णस्य तौ भीमः सञ्ज्ञया ज्ञापयन् भुवि । | ||
| verse_lines = इति कर्णस्य तौ भीमः सञ्ज्ञया ज्ञापयन् भुवि | | verse_lines = इति कर्णस्य तौ भीमः सञ्ज्ञया ज्ञापयन् भुवि ।¦पदा पिपेष कालिङ्गं मुष्टिनैव जघान ह ॥ २१२॥ | ||
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| verse_text = मुष्टिना त्वद्वधायाहं समर्थ इति किं वदे । | | verse_text = मुष्टिना त्वद्वधायाहं समर्थ इति किं वदे । | ||
| verse_lines = मुष्टिना त्वद्वधायाहं समर्थ इति किं वदे | | verse_lines = मुष्टिना त्वद्वधायाहं समर्थ इति किं वदे ।¦तस्मान्मया रक्षितस्त्वमिति ज्ञापयितुं प्रभुः ।¦साश्वसूतध्वजरथः कालिङ्गो मुष्टिचूर्णितः ॥ २१३॥ | ||
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| verse_text = केतुमांश्च पिता तस्य शक्रदेवः श्रुतायुधः । | | verse_text = केतुमांश्च पिता तस्य शक्रदेवः श्रुतायुधः । | ||
| verse_lines = केतुमांश्च पिता तस्य शक्रदेवः श्रुतायुधः | | verse_lines = केतुमांश्च पिता तस्य शक्रदेवः श्रुतायुधः ।¦अक्षोहिण्या सेनया च सह भीमेन पातिताः ।¦खड्गयुद्धे पुरा भीष्मे सेनापत्यं प्रकुर्वति ॥ २१४॥ | ||
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| verse_text = कर्णानुजान् ध्रुवाद्यांश्च बहून् जघ्ने स वै निशि । | | verse_text = कर्णानुजान् ध्रुवाद्यांश्च बहून् जघ्ने स वै निशि । | ||
| verse_lines = कर्णानुजान् ध्रुवाद्यांश्च बहून् जघ्ने स वै निशि | | verse_lines = कर्णानुजान् ध्रुवाद्यांश्च बहून् जघ्ने स वै निशि ।¦सञ्ज्ञां भीमकृतां ज्ञात्वा शक्तिं चिक्षेप चापराम् ।¦कर्णः शक्तिर्मया दिव्या न मुक्ता तेन जीवसि ॥ २१५॥ | ||
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| verse_text = इति ज्ञापयितुं तां तु ज्ञात्वा भीमः क्षणात् तदा । | | verse_text = इति ज्ञापयितुं तां तु ज्ञात्वा भीमः क्षणात् तदा । | ||
| verse_lines = इति ज्ञापयितुं तां तु ज्ञात्वा भीमः क्षणात् तदा | | verse_lines = इति ज्ञापयितुं तां तु ज्ञात्वा भीमः क्षणात् तदा ।¦खमुत्पत्य गृहीत्वा च कर्णे चिक्षेप सत्वरः ॥ २१६॥ | ||
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| verse_text = यदि त्वया तदा मुक्ता शक्तिस्त्वां सा हनिष्यति । | | verse_text = यदि त्वया तदा मुक्ता शक्तिस्त्वां सा हनिष्यति । | ||
| verse_lines = यदि त्वया तदा मुक्ता शक्तिस्त्वां सा हनिष्यति | | verse_lines = यदि त्वया तदा मुक्ता शक्तिस्त्वां सा हनिष्यति ।¦इति ज्ञापयितुं सा च कर्णरक्षणकाङ्क्षिणा ॥ २१७॥ | ||
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| verse_text = मुक्ता दक्षभुजे सा च(सोऽथ) विदार्य धरणीं तथा(तदा) । | | verse_text = मुक्ता दक्षभुजे सा च(सोऽथ) विदार्य धरणीं तथा(तदा) । | ||
| verse_lines = मुक्ता दक्षभुजे सा च(सोऽथ) विदार्य धरणीं तथा(तदा) | | verse_lines = मुक्ता दक्षभुजे सा च(सोऽथ) विदार्य धरणीं तथा(तदा) ।¦भित्त्वा विवेश कर्णस्य दर्शयन्ती निदर्शनम् ॥ २१८॥ | ||
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| verse_text = ततो भीमः पुनः स्वं तु रथमास्थाय चापभृत् । | | verse_text = ततो भीमः पुनः स्वं तु रथमास्थाय चापभृत् । | ||
| verse_lines = ततो भीमः पुनः स्वं तु रथमास्थाय चापभृत् | | verse_lines = ततो भीमः पुनः स्वं तु रथमास्थाय चापभृत् ।¦कर्णस्य पुरतः शत्रून् द्रावयामास सर्वतः ॥ २१९॥ | ||
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| verse_lines = तं कर्णो वारयामास शरैः सन्नतपर्वभिः | | verse_lines = तं कर्णो वारयामास शरैः सन्नतपर्वभिः ।¦भीमः कर्णरथायैव गदां चिक्षेप वेगतः(वेगितः) ॥ २२०॥ | ||
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| verse_lines = स तद्गदाविघाताय स्थूणाकर्णास्त्रमासृजत् | | verse_lines = स तद्गदाविघाताय स्थूणाकर्णास्त्रमासृजत् ।¦तेनास्त्रेण प्रतिहता सा गदा भीममाव्रजत् ॥ २२१॥ | ||
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| verse_lines = भीमो गदां समादाय कर्णस्य रथमारुहत् | | verse_lines = भीमो गदां समादाय कर्णस्य रथमारुहत् ।¦तया सञ्चूर्णयामास कर्णस्य रथकूबरम् ॥ २२२॥ | ||
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| verse_text = एवं त्वच्चूर्णने शक्तो मत्कामात् त्वं हि जीवसि । | | verse_text = एवं त्वच्चूर्णने शक्तो मत्कामात् त्वं हि जीवसि । | ||
| verse_lines = एवं त्वच्चूर्णने शक्तो मत्कामात् त्वं हि जीवसि | | verse_lines = एवं त्वच्चूर्णने शक्तो मत्कामात् त्वं हि जीवसि ।¦एवं निदर्शयित्वैव पुनः स्वं रथमाव्रजत् ॥ २२३॥ | ||
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| verse_lines = पुनः कर्णपुरः सेनां जघान बहुशो रणे | | verse_lines = पुनः कर्णपुरः सेनां जघान बहुशो रणे ।¦कर्णस्तु तं परित्यज्य सहदेवमुपाद्रवत् ॥ २२४॥ | ||
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| verse_lines = स तु तं विरथीकृत्य धनुः कण्ठेऽवसज्य च | | verse_lines = स तु तं विरथीकृत्य धनुः कण्ठेऽवसज्य च ।¦कुत्सयामास बहुशः स तु निर्वेदमागमत् ॥ २२५॥ | ||
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| verse_lines = न हन्तुमैच्छत् तं कर्णः पृथायै स्वं वचः स्मरन् | | verse_lines = न हन्तुमैच्छत् तं कर्णः पृथायै स्वं वचः स्मरन् ।¦तं विजित्य(विसृज्य) रणे कर्णो जघ्ने पार्थवरूथिनीम् ॥ २२६॥ | ||
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| verse_text = ततो द्रौणिर्विविधैर्बाणसङ्घैर्जघान पार्थस्य चमूं समन्ततः । | | verse_text = ततो द्रौणिर्विविधैर्बाणसङ्घैर्जघान पार्थस्य चमूं समन्ततः । | ||
| verse_lines = ततो द्रौणिर्विविधैर्बाणसङ्घैर्जघान पार्थस्य चमूं समन्ततः | | verse_lines = ततो द्रौणिर्विविधैर्बाणसङ्घैर्जघान पार्थस्य चमूं समन्ततः ।¦सा हन्यमाना रणकोविदेन न शं (नाशं) लेभे मृत्युनाऽऽर्ता प्रजेव(आर्तप्रजेव) ॥ २२७॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वा सेनां द्रौणिबलाभिभूतां तमाह्वयामास घटोत्कचो युधे(युधि) । | | verse_text = दृष्ट्वा सेनां द्रौणिबलाभिभूतां तमाह्वयामास घटोत्कचो युधे(युधि) । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वा सेनां द्रौणिबलाभिभूतां तमाह्वयामास घटोत्कचो युधे(युधि) | | verse_lines = दृष्ट्वा सेनां द्रौणिबलाभिभूतां तमाह्वयामास घटोत्कचो युधे(युधि) ।¦द्रौणिस्तमाहाऽलमलं न वत्स पुत्रस्तातं योधयस्वाद्य मां त्वम् ॥ २२८॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्त ऊचे न पिता मम त्वं सखा पितुर्यद्यपि शत्रुसंश्रयात् । | | verse_text = इत्युक्त ऊचे न पिता मम त्वं सखा पितुर्यद्यपि शत्रुसंश्रयात् । | ||
| verse_lines = इत्युक्त ऊचे न पिता मम त्वं सखा पितुर्यद्यपि शत्रुसंश्रयात् | | verse_lines = इत्युक्त ऊचे न पिता मम त्वं सखा पितुर्यद्यपि शत्रुसंश्रयात् ।¦अरिश्च मेऽसीति तमाह यद्यरिं मां मन्यसे तद्वदहं करोमि ते ॥ २२९॥ | ||
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| verse_lines = इत्यूचिवाञ्छक्रधनुःप्रकाशं विष्फार्य चापं प्रकिरञ्छरौघान् | | verse_lines = इत्यूचिवाञ्छक्रधनुःप्रकाशं विष्फार्य चापं प्रकिरञ्छरौघान् ।¦अभ्यागमद् राक्षसमुग्रवेगः स्वसेनया सोऽपि तमभ्यवर्तत ॥ २३०॥ | ||
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| verse_text = स रक्षसां लक्षसमावृतो बली नृभिश्च वीरैर्बहुभिः सुशिक्षितैः । | | verse_text = स रक्षसां लक्षसमावृतो बली नृभिश्च वीरैर्बहुभिः सुशिक्षितैः । | ||
| verse_lines = स रक्षसां लक्षसमावृतो बली नृभिश्च वीरैर्बहुभिः सुशिक्षितैः | | verse_lines = स रक्षसां लक्षसमावृतो बली नृभिश्च वीरैर्बहुभिः सुशिक्षितैः ।¦अक्षोहिणीमात्रबलेन राक्षसः सङ्क्षोभयामास गुरोः सुतं शरैः ॥ २३१॥ | ||
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| verse_lines = उत्थाय बाणं यमदण्डकल्पं सन्धाय चापे प्रविकृष्य राक्षसे | | verse_lines = उत्थाय बाणं यमदण्डकल्पं सन्धाय चापे प्रविकृष्य राक्षसे ।¦मुमोच तेनाभिहतः पपात विनष्टसञ्ज्ञः स्वरथे घटोत्कचः ॥ २३५॥ | ||
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| verse_text = स कर्णमाहूय युयोध तेन तस्यानु दुर्योधनपूर्वकाश्च ये । | | verse_text = स कर्णमाहूय युयोध तेन तस्यानु दुर्योधनपूर्वकाश्च ये । | ||
| verse_lines = स कर्णमाहूय युयोध तेन तस्यानु दुर्योधनपूर्वकाश्च ये | | verse_lines = स कर्णमाहूय युयोध तेन तस्यानु दुर्योधनपूर्वकाश्च ये ।¦द्रोणेन चैतान् समरे स एको निवारयामास ममर्द चाधिकम् ॥ २३९॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = ते बाध्यमाना बहुशो बलीयसा कर्णं पुरोधाय तमभ्ययोधयन् । | | verse_text = ते बाध्यमाना बहुशो बलीयसा कर्णं पुरोधाय तमभ्ययोधयन् । | ||
| verse_lines = ते बाध्यमाना बहुशो बलीयसा कर्णं पुरोधाय तमभ्ययोधयन् | | verse_lines = ते बाध्यमाना बहुशो बलीयसा कर्णं पुरोधाय तमभ्ययोधयन् ।¦न विव्यथे तत्र रणे स कर्णः स्ववीर्यमास्थाय महास्त्रवेत्ता ॥ २४०॥ | ||
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| verse_text = निवारयामास गुरोः सुतं तदा भीमस्त्रिगर्ताञ्छतमन्युनन्दनः । | | verse_text = निवारयामास गुरोः सुतं तदा भीमस्त्रिगर्ताञ्छतमन्युनन्दनः । | ||
| verse_lines = निवारयामास गुरोः सुतं तदा भीमस्त्रिगर्ताञ्छतमन्युनन्दनः | | verse_lines = निवारयामास गुरोः सुतं तदा भीमस्त्रिगर्ताञ्छतमन्युनन्दनः ।¦अलम्बलो नाम तदैव राक्षसः समागमद्(समासदत्) भीमसुतं निहन्तुम् ॥ २४१॥ | ||
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| Line 32,652: | Line 32,652: | ||
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| verse_text = युद्ध्वा प्रगृह्यैनमथो निपात्य घटोत्कचो भूमितलेऽसिनाऽस्य । | | verse_text = युद्ध्वा प्रगृह्यैनमथो निपात्य घटोत्कचो भूमितलेऽसिनाऽस्य । | ||
| verse_lines = युद्ध्वा प्रगृह्यैनमथो निपात्य घटोत्कचो भूमितलेऽसिनाऽस्य | | verse_lines = युद्ध्वा प्रगृह्यैनमथो निपात्य घटोत्कचो भूमितलेऽसिनाऽस्य ।¦उत्कृत्य शीर्षं तु सुयोधनेऽक्षिपद् विषेदुरत्राखिलभूमिपालाः ॥ २४२॥ | ||
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| verse_text = अलायुधोऽथाऽगमदुग्रवीर्यो नराशनस्तं स घटोत्कचोऽभ्ययात् । | | verse_text = अलायुधोऽथाऽगमदुग्रवीर्यो नराशनस्तं स घटोत्कचोऽभ्ययात् । | ||
| verse_lines = अलायुधोऽथाऽगमदुग्रवीर्यो नराशनस्तं स घटोत्कचोऽभ्ययात् | | verse_lines = अलायुधोऽथाऽगमदुग्रवीर्यो नराशनस्तं स घटोत्कचोऽभ्ययात् ।¦युद्ध्वा मुहूर्तं स तु तेन भूमौ निपात्य तं यज्ञपशुं चकार ॥ २४३॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = अथास्य शिर उद्धृत्य क्रोधाद् दुर्योधनोरसि । | | verse_text = अथास्य शिर उद्धृत्य क्रोधाद् दुर्योधनोरसि । | ||
| verse_lines = अथास्य शिर उद्धृत्य क्रोधाद् दुर्योधनोरसि | | verse_lines = अथास्य शिर उद्धृत्य क्रोधाद् दुर्योधनोरसि ।¦चिक्षेप तेन सम्भ्रान्ताः सर्वे दुर्योधनादयः ॥ २४४॥ | ||
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| verse_text = घटोत्कचबलख्यात्यै समर्थेनापि यो रणे । | | verse_text = घटोत्कचबलख्यात्यै समर्थेनापि यो रणे । | ||
| verse_lines = घटोत्कचबलख्यात्यै समर्थेनापि यो रणे | | verse_lines = घटोत्कचबलख्यात्यै समर्थेनापि यो रणे ।¦न हतो भीमसेनेन हतेऽस्मिन् भैमसेनिना ॥ २४५॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = सर्वे सञ्चोदयामासुः(सम्बोधयामासुः) कर्णं शक्तिविमोक्षणे । | | verse_text = सर्वे सञ्चोदयामासुः(सम्बोधयामासुः) कर्णं शक्तिविमोक्षणे । | ||
| verse_lines = सर्वे सञ्चोदयामासुः(सम्बोधयामासुः) कर्णं शक्तिविमोक्षणे | | verse_lines = सर्वे सञ्चोदयामासुः(सम्बोधयामासुः) कर्णं शक्तिविमोक्षणे ।¦अस्मिन् हते हतं सर्वं किं नः पार्थः करिष्यति ॥ २४६॥ | ||
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| verse_text = एवं सञ्चोद्यमानः(सम्बोध्यमानः) स धार्तराष्ट्रैः पुनः पुनः । | | verse_text = एवं सञ्चोद्यमानः(सम्बोध्यमानः) स धार्तराष्ट्रैः पुनः पुनः । | ||
| verse_lines = एवं सञ्चोद्यमानः(सम्बोध्यमानः) स धार्तराष्ट्रैः पुनः पुनः | | verse_lines = एवं सञ्चोद्यमानः(सम्बोध्यमानः) स धार्तराष्ट्रैः पुनः पुनः ।¦हैडिम्बेनार्द्यमानैस्तु(च) स्वयं च भृशपीडितः ।¦आदत्त शक्तिं विपुलां पाकशासनसम्मताम् ॥ २४७॥ | ||
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| verse_text = तामम्बरस्थाय घटोत्कचाय शैलोपमायातुलविक्रमाय । | | verse_text = तामम्बरस्थाय घटोत्कचाय शैलोपमायातुलविक्रमाय । | ||
| verse_lines = तामम्बरस्थाय घटोत्कचाय शैलोपमायातुलविक्रमाय | | verse_lines = तामम्बरस्थाय घटोत्कचाय शैलोपमायातुलविक्रमाय ।¦चिक्षेप मृत्यो रसनोपमामलं प्रकाशयन्तीं प्रदिशो दिशश्च ॥ २४८॥ | ||
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| verse_text = निर्भिण्णवक्षाः(निर्भिन्नवक्षाः) स तया पपात व्यचूर्णयञ्छत्रुबलं हतोऽपि । | | verse_text = निर्भिण्णवक्षाः(निर्भिन्नवक्षाः) स तया पपात व्यचूर्णयञ्छत्रुबलं हतोऽपि । | ||
| verse_lines = निर्भिण्णवक्षाः(निर्भिन्नवक्षाः) स तया पपात व्यचूर्णयञ्छत्रुबलं हतोऽपि | | verse_lines = निर्भिण्णवक्षाः(निर्भिन्नवक्षाः) स तया पपात व्यचूर्णयञ्छत्रुबलं हतोऽपि ।¦तस्मिन् हते जहृषुधार्तराष्ट्रा उच्चुक्रुशुर्दुधुवुश्चाम्बराणि ॥ २४९॥ | ||
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| verse_text = तदा ननर्त केशवः समाश्लिषच्च फल्गुनम् । | | verse_text = तदा ननर्त केशवः समाश्लिषच्च फल्गुनम् । | ||
| verse_lines = तदा ननर्त केशवः समाश्लिषच्च फल्गुनम् | | verse_lines = तदा ननर्त केशवः समाश्लिषच्च फल्गुनम् ।¦ननाद शङ्खमाधमज्जहास(शङ्खमदमञ्जहास) चोरुनिस्वनः ॥ २५०॥ | ||
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| verse_text = तमपृच्छद् गुडाकेशः किमेतदिति दुर्मनाः । | | verse_text = तमपृच्छद् गुडाकेशः किमेतदिति दुर्मनाः । | ||
| verse_lines = तमपृच्छद् गुडाकेशः किमेतदिति दुर्मनाः | | verse_lines = तमपृच्छद् गुडाकेशः किमेतदिति दुर्मनाः ।¦हते सुतेऽग्रजेऽस्माकं वीरे किं नन्दसि प्रभो ॥ २५१॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = तमाह भगवान् कृष्णो दिष्ट्या जीवसि फल्गुन । | | verse_text = तमाह भगवान् कृष्णो दिष्ट्या जीवसि फल्गुन । | ||
| verse_lines = तमाह भगवान् कृष्णो दिष्ट्या जीवसि फल्गुन | | verse_lines = तमाह भगवान् कृष्णो दिष्ट्या जीवसि फल्गुन ।¦त्वदर्थं निहिता शक्तिर्विमुक्ताऽस्मिन् हि राक्षसे ॥ २५२॥ | ||
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| verse_text = ततो युधिष्ठिरो दुःखादमर्षाच्चाभ्यवर्तत । | | verse_text = ततो युधिष्ठिरो दुःखादमर्षाच्चाभ्यवर्तत । | ||
| verse_lines = ततो युधिष्ठिरो दुःखादमर्षाच्चाभ्यवर्तत | | verse_lines = ततो युधिष्ठिरो दुःखादमर्षाच्चाभ्यवर्तत ।¦कर्णं प्रति तमाहाथ कृष्णद्वैपायनः प्रभुः ॥ २५३॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = ययाऽर्जुनो निहन्तव्यस्तयाऽसौ राक्षसो हतः । | | verse_text = ययाऽर्जुनो निहन्तव्यस्तयाऽसौ राक्षसो हतः । | ||
| verse_lines = ययाऽर्जुनो निहन्तव्यस्तयाऽसौ राक्षसो हतः | | verse_lines = ययाऽर्जुनो निहन्तव्यस्तयाऽसौ राक्षसो हतः ।¦तन्मा शुचस्त्वं राजेन्द्र दिष्ट्या जीवति फल्गुनः ।¦इत्युक्त्वा प्रययौ व्यासस्ततो युद्धमवर्तत ॥ २५४॥ | ||
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| verse_text = भीमार्जुनाभ्यामिह हन्यमाने बले कुरूणामितरैश्च पाण्डवैः । | | verse_text = भीमार्जुनाभ्यामिह हन्यमाने बले कुरूणामितरैश्च पाण्डवैः । | ||
| verse_lines = भीमार्जुनाभ्यामिह हन्यमाने बले कुरूणामितरैश्च पाण्डवैः | | verse_lines = भीमार्जुनाभ्यामिह हन्यमाने बले कुरूणामितरैश्च पाण्डवैः ।¦प्रदीपहस्ता अथ योधकाश्च सर्वेऽपि निद्रावशगा बभूवुः ॥ २५५॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वैव तानाह धनञ्जयस्तदा स्वप्स्यन्तु यावच्छशिनः प्रकाशः । | | verse_text = दृष्ट्वैव तानाह धनञ्जयस्तदा स्वप्स्यन्तु यावच्छशिनः प्रकाशः । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वैव तानाह धनञ्जयस्तदा स्वप्स्यन्तु यावच्छशिनः प्रकाशः | | verse_lines = दृष्ट्वैव तानाह धनञ्जयस्तदा स्वप्स्यन्तु यावच्छशिनः प्रकाशः ।¦इतीरिता आशिषः फल्गुनाय प्रयुज्य सर्वे सुषुपुर्यथास्थिताः ॥ २५६॥ | ||
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| verse_lines = पुनश्च चन्द्रेऽभ्युदिते युधे ते समाययुः शस्त्रमहास्त्रवर्षाः | | verse_lines = पुनश्च चन्द्रेऽभ्युदिते युधे ते समाययुः शस्त्रमहास्त्रवर्षाः ।¦तत्राऽयातः सात्यकिं सोमदत्तो भूरिश्च ताभ्यां युयुधे स एकः ॥ २५७॥ | ||
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| verse_text = हतौ च तौ पेततुस्तेन भूमौ बाह्लीक एनं समरे त्वयोधयत् । | | verse_text = हतौ च तौ पेततुस्तेन भूमौ बाह्लीक एनं समरे त्वयोधयत् । | ||
| verse_lines = हतौ च तौ पेततुस्तेन भूमौ बाह्लीक एनं समरे त्वयोधयत् | | verse_lines = हतौ च तौ पेततुस्तेन भूमौ बाह्लीक एनं समरे त्वयोधयत् ।¦स सात्यकिं विरथीकृत्य बाणं वधाय तस्याऽशु मुमोच वीरः ॥ २५८॥ | ||
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| verse_text = चिच्छेद तं भीमसेनस्त्रिधैव तस्मै(तस्मिञ्छतघ्नीं) शतघ्नीं प्रजहार बाह्लिकः । | | verse_text = चिच्छेद तं भीमसेनस्त्रिधैव तस्मै(तस्मिञ्छतघ्नीं) शतघ्नीं प्रजहार बाह्लिकः । | ||
| verse_lines = चिच्छेद तं भीमसेनस्त्रिधैव तस्मै(तस्मिञ्छतघ्नीं) शतघ्नीं प्रजहार बाह्लिकः | | verse_lines = चिच्छेद तं भीमसेनस्त्रिधैव तस्मै(तस्मिञ्छतघ्नीं) शतघ्नीं प्रजहार बाह्लिकः ।¦तया हतो विह्वलितो वृकोदरो जघान तं गदया सोऽपतच्च ॥ २५९॥ | ||
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| verse_text = बाह्लीकः प्रार्थयामास पूर्वं स्नेहपुरस्सरम् । | | verse_text = बाह्लीकः प्रार्थयामास पूर्वं स्नेहपुरस्सरम् । | ||
| verse_lines = बाह्लीकः प्रार्थयामास पूर्वं स्नेहपुरस्सरम् | | verse_lines = बाह्लीकः प्रार्थयामास पूर्वं स्नेहपुरस्सरम् ।¦भीम त्वयैव हन्तव्यो रणेऽहं प्रीतिमिच्छता ।¦तदा यशश्च धर्मं च लोकं च प्राप्नुयामहम् ॥ २६०॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्त आह तं भीमो नितरां व्यथितस्तदा । | | verse_text = इत्युक्त आह तं भीमो नितरां व्यथितस्तदा । | ||
| verse_lines = इत्युक्त आह तं भीमो नितरां व्यथितस्तदा | | verse_lines = इत्युक्त आह तं भीमो नितरां व्यथितस्तदा ।¦हन्यां नैवान्यथा युद्धे तत् ते शुश्रूषणं भवेत् ।¦इति तेन हतस्तत्र भीमसेनेन बाह्लिकः ॥ २६१॥ | ||
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| verse_text = हते बाह्लीके कौरवा भीमसेनमभ्याजग्मुः कर्णदुर्योधनाद्याः(कर्णसुयोधनाद्याः) । | | verse_text = हते बाह्लीके कौरवा भीमसेनमभ्याजग्मुः कर्णदुर्योधनाद्याः(कर्णसुयोधनाद्याः) । | ||
| verse_lines = हते बाह्लीके कौरवा भीमसेनमभ्याजग्मुः कर्णदुर्योधनाद्याः(कर्णसुयोधनाद्याः) | | verse_lines = हते बाह्लीके कौरवा भीमसेनमभ्याजग्मुः कर्णदुर्योधनाद्याः(कर्णसुयोधनाद्याः) ।¦द्रौणिं पुरस्कृत्य गुरुं च पार्षतः सभ्रातृकः सात्यकिना समभ्ययात् ॥ २६२॥ | ||
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| verse_lines = संशप्तकैरेव पार्थो युयोध तद् युद्धमासीदतिरौद्रमद्भुतम् | | verse_lines = संशप्तकैरेव पार्थो युयोध तद् युद्धमासीदतिरौद्रमद्भुतम् ।¦अक्षोहिणी तत्र भीमार्जुनाभ्यां निषूदिता (निसूदिता) रात्रियुद्धे समस्ता(समन्तात्) ॥ २६३॥ | ||
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| verse_lines = ततः सूर्यश्चाभ्युदितस्तदाऽतिघोरं द्रोणः कर्म युद्धे चकार | | verse_lines = ततः सूर्यश्चाभ्युदितस्तदाऽतिघोरं द्रोणः कर्म युद्धे चकार ।¦स पाञ्चालानां रथवृन्दं प्रविश्य जघान हस्त्यश्वरथान् नरांश्च ॥ २६४॥ | ||
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| verse_lines = विद्रावितास्तेन महारथाश्च नैवाविन्दञ्छर्म बाणान्धकारे | | verse_lines = विद्रावितास्तेन महारथाश्च नैवाविन्दञ्छर्म बाणान्धकारे ।¦युवेव वृद्धोऽपि चचार युद्धे स उग्रधन्वा परमास्त्रवेत्ता ॥ २६५॥ | ||
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| verse_text = रथार्बुदं तेन हतं च तत्र ततः सहस्रं(तथा सहस्रं) गुणितं नराणाम् । | | verse_text = रथार्बुदं तेन हतं च तत्र ततः सहस्रं(तथा सहस्रं) गुणितं नराणाम् । | ||
| verse_lines = रथार्बुदं तेन हतं च तत्र ततः सहस्रं(तथा सहस्रं) गुणितं नराणाम् | | verse_lines = रथार्बुदं तेन हतं च तत्र ततः सहस्रं(तथा सहस्रं) गुणितं नराणाम् ।¦ततो दशांशो निहतो हयानां गजार्बुदं चैव रणोत्कटेन ॥ २६६॥ | ||
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| verse_text = तथा विराटद्रुपदौ शराभ्यां निनाय लोकं परमाजिमध्ये । | | verse_text = तथा विराटद्रुपदौ शराभ्यां निनाय लोकं परमाजिमध्ये । | ||
| verse_lines = तथा विराटद्रुपदौ शराभ्यां निनाय लोकं परमाजिमध्ये | | verse_lines = तथा विराटद्रुपदौ शराभ्यां निनाय लोकं परमाजिमध्ये ।¦ततो विजित्यैव गुरोः सुतादीन् धृष्टद्युम्नं भीमसेनो जुगोप ॥ २६७॥ | ||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नो भीमसेनाभिगुप्तो द्रोणं हन्तुं यत्नमुच्चैश्चकार | | verse_lines = धृष्टद्युम्नो भीमसेनाभिगुप्तो द्रोणं हन्तुं यत्नमुच्चैश्चकार ।¦निवारयामास गुरुः शरौघैर्धृष्टद्युम्नं सोऽपि तं सायकेन ।¦विव्याध तेनाभिहतः स मूर्च्छामवाप विप्रो निषसाद चाऽशु ॥ २६८॥ | ||
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| verse_lines = स तैरतिव्यथितस्तद्रथाच्च परावृत्तः स्वं रथं चारुरोह | | verse_lines = स तैरतिव्यथितस्तद्रथाच्च परावृत्तः स्वं रथं चारुरोह ।¦सुसंरब्धौ तौ पुनरेव युद्धं सञ्चक्रतुर्वृष्टशराम्बुधारौ ॥ २७०॥ | ||
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| verse_text = कर्णदुर्योधनादींश्च शल्यं भोजं कृपं तथा । | | verse_text = कर्णदुर्योधनादींश्च शल्यं भोजं कृपं तथा । | ||
| verse_lines = कर्णदुर्योधनादींश्च शल्यं भोजं कृपं तथा | | verse_lines = कर्णदुर्योधनादींश्च शल्यं भोजं कृपं तथा ।¦भीमार्जुनौ शरौघेण वारयामासतू रणे ॥ २७३॥ | ||
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| verse_text = तत्र भीमो गजानीकं जयत्सेनं च मागधम् । | | verse_text = तत्र भीमो गजानीकं जयत्सेनं च मागधम् । | ||
| verse_lines = तत्र भीमो गजानीकं जयत्सेनं च मागधम् | | verse_lines = तत्र भीमो गजानीकं जयत्सेनं च मागधम् ।¦जघान सुबहूंश्चैव मागधानां रथव्रजान् ॥ २७४॥ | ||
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| verse_text = अथ मालवराजस्य त्वश्वत्थामाभिधं गजम् । | | verse_text = अथ मालवराजस्य त्वश्वत्थामाभिधं गजम् । | ||
| verse_lines = अथ मालवराजस्य त्वश्वत्थामाभिधं गजम् | | verse_lines = अथ मालवराजस्य त्वश्वत्थामाभिधं गजम् ।¦भीमसेनहतं दृष्ट्वा वासुदेवप्रचोदितः ।¦अश्वत्थामा हत इति प्राह राजा युधिष्ठिरः ॥ २७५॥ | ||
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| verse_text = अश्वत्थामवधं श्रुत्वा नाहं योत्स्य इति स्वयम् । | | verse_text = अश्वत्थामवधं श्रुत्वा नाहं योत्स्य इति स्वयम् । | ||
| verse_lines = अश्वत्थामवधं श्रुत्वा नाहं योत्स्य इति स्वयम् | | verse_lines = अश्वत्थामवधं श्रुत्वा नाहं योत्स्य इति स्वयम् ।¦पुरोक्तं धर्मजायैव तेन द्रोणो युधिष्ठिरम् ॥ २७६॥ | ||
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| verse_text = ब्रूहि सत्यमिति प्राह सत्यमित्येव सोऽब्रवीत् । | | verse_text = ब्रूहि सत्यमिति प्राह सत्यमित्येव सोऽब्रवीत् । | ||
| verse_lines = ब्रूहि सत्यमिति प्राह सत्यमित्येव सोऽब्रवीत् | | verse_lines = ब्रूहि सत्यमिति प्राह सत्यमित्येव सोऽब्रवीत् ।¦उपांशु कुञ्जरश्चेति द्रोणोऽतो व्यथितोऽभवत् ॥ २७७॥ | ||
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| verse_text = तस्य भीमो रथेषां(रथेषुं) च गृहीत्वा न तवेदृशम् । | | verse_text = तस्य भीमो रथेषां(रथेषुं) च गृहीत्वा न तवेदृशम् । | ||
| verse_lines = तस्य भीमो रथेषां(रथेषुं) च गृहीत्वा न तवेदृशम् | | verse_lines = तस्य भीमो रथेषां(रथेषुं) च गृहीत्वा न तवेदृशम् ।¦योग्यं गुणवतो नित्यं परधर्मोपजीवनम् ॥ २७८॥ | ||
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| verse_text = इत्याह खस्था मुनयश्चालमेहीति तं तदा । | | verse_text = इत्याह खस्था मुनयश्चालमेहीति तं तदा । | ||
| verse_lines = इत्याह खस्था मुनयश्चालमेहीति तं तदा | | verse_lines = इत्याह खस्था मुनयश्चालमेहीति तं तदा ।¦ऊचुस्तदखिलं ज्ञात्वा द्रोणः शस्त्रमवासृजत् ॥ २७९॥ | ||
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| verse_text = सन्यस्य कर्माणि तदाऽखिलानि योगारूढः परमं वासुदेवम् । | | verse_text = सन्यस्य कर्माणि तदाऽखिलानि योगारूढः परमं वासुदेवम् । | ||
| verse_lines = सन्यस्य कर्माणि तदाऽखिलानि योगारूढः परमं वासुदेवम् | | verse_lines = सन्यस्य कर्माणि तदाऽखिलानि योगारूढः परमं वासुदेवम् ।¦सर्वेश्वरं नित्यनिरस्तदोषं ध्यायन् मुक्त्वा देहमगात् स्वधाम ।¦तं केशवः पाण्डवा गौतमश्च यान्तं स्वलोकं ददृशुर्विहायसा ॥ २८०॥ | ||
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| verse_text = धृष्टद्युम्नः पाण्डवैर्वार्यमाणोऽप्यगात् खड्गं चर्म चाऽदाय तत्र । | | verse_text = धृष्टद्युम्नः पाण्डवैर्वार्यमाणोऽप्यगात् खड्गं चर्म चाऽदाय तत्र । | ||
| verse_lines = धृष्टद्युम्नः पाण्डवैर्वार्यमाणोऽप्यगात् खड्गं चर्म चाऽदाय तत्र | | verse_lines = धृष्टद्युम्नः पाण्डवैर्वार्यमाणोऽप्यगात् खड्गं चर्म चाऽदाय तत्र ।¦छित्वाऽसिना तस्य शिरः पुनश्च रथं स्वकीयं त्वरया समास्थितः ।¦दृष्ट्वा कृपस्तं सुभृशं भयार्दितः सम्प्राद्रवद् वाजिनमेकमास्थितः ॥ २८१॥ | ||
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| verse_lines = सञ्छिन्ने द्रोणशिरसि गर्हयामास वासविः | | verse_lines = सञ्छिन्ने द्रोणशिरसि गर्हयामास वासविः ।¦युधिष्ठिरं च(युधिष्ठिरश्च) पाञ्चाल्यं सात्यकिश्चापि कोपितः ॥ २८२॥ | ||
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| verse_lines = धृष्टद्युम्नस्तु तावाह कथं भूरिश्रवा हतः | | verse_lines = धृष्टद्युम्नस्तु तावाह कथं भूरिश्रवा हतः ।¦इति तं सात्यकिः क्रुद्धो गदापाणिः समभ्ययात् ।¦आह्वयामास पाञ्चाल्यस्तं धृतासिरविस्मयः ॥ २८३॥ | ||
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| verse_lines = तदा जग्राह शैनेयं भीमः कृष्णप्रचोदितः | | verse_lines = तदा जग्राह शैनेयं भीमः कृष्णप्रचोदितः ।¦शमयामास पार्थं च पाञ्चाल्यस्नेहयन्त्रितः ॥ २८४॥ | ||
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| verse_text = ते वासुदेवेन तदा सुशिक्षिताः (तदाऽनुशिक्षिताः) स्नेहं पुनः पूर्ववदापुरुत्तमम् । | | verse_text = ते वासुदेवेन तदा सुशिक्षिताः (तदाऽनुशिक्षिताः) स्नेहं पुनः पूर्ववदापुरुत्तमम् । | ||
| verse_lines = ते वासुदेवेन तदा सुशिक्षिताः (तदाऽनुशिक्षिताः) स्नेहं पुनः पूर्ववदापुरुत्तमम् | | verse_lines = ते वासुदेवेन तदा सुशिक्षिताः (तदाऽनुशिक्षिताः) स्नेहं पुनः पूर्ववदापुरुत्तमम् ।¦यत्ताश्च युद्धाय समुद्यताश्च(समुत्थिताश्च) तदाऽऽगमद् द्रौणिरप्यात्तधन्वा ॥ २८५॥ | ||
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| verse_text = आश्रुत्य तातं निहतं प्रतिज्ञां चकार निःशेषरिपुप्रमाथने । | | verse_text = आश्रुत्य तातं निहतं प्रतिज्ञां चकार निःशेषरिपुप्रमाथने । | ||
| verse_lines = आश्रुत्य तातं निहतं प्रतिज्ञां चकार निःशेषरिपुप्रमाथने | | verse_lines = आश्रुत्य तातं निहतं प्रतिज्ञां चकार निःशेषरिपुप्रमाथने ।¦नारायणास्त्रं विससर्ज कोपात् तदा भीता भीममृते समस्ताः ॥ २८६॥ | ||
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| verse_text = युधिष्ठिरः प्राह विषण्णचेतनः शैनेयपूर्वाः प्रतियान्तु सर्वे । | | verse_text = युधिष्ठिरः प्राह विषण्णचेतनः शैनेयपूर्वाः प्रतियान्तु सर्वे । | ||
| verse_lines = युधिष्ठिरः प्राह विषण्णचेतनः शैनेयपूर्वाः प्रतियान्तु सर्वे | | verse_lines = युधिष्ठिरः प्राह विषण्णचेतनः शैनेयपूर्वाः प्रतियान्तु सर्वे ।¦सभ्रातृकोऽहं द्रौणिवरास्त्रमग्नो(भग्नो) भवेयमित्यत्र जगाद केशवः ॥ २८७॥ | ||
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| verse_lines = नमध्वमस्त्रस्य ततो विमोक्ष्यथेत्यथ प्रणेमुश्च धनञ्जयादिकाः | | verse_lines = नमध्वमस्त्रस्य ततो विमोक्ष्यथेत्यथ प्रणेमुश्च धनञ्जयादिकाः ।¦सर्वे न भीमस्तदमुष्य मूर्ध्नि पपात सोऽग्नाविव संस्थितोऽग्निः ॥ २८८॥ | ||
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| verse_lines = अदह्यमाने भीमेऽपि वह्नौ वह्निरिव स्थिते | | verse_lines = अदह्यमाने भीमेऽपि वह्नौ वह्निरिव स्थिते ।¦अवेष्टयद् वारुणेन पार्थोऽत्राऽत्मप्रपत्तये ॥ २८९॥ | ||
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| verse_text = न देहे पतितास्त्रस्य बहिर्वेष्टनतः फलम् । | | verse_text = न देहे पतितास्त्रस्य बहिर्वेष्टनतः फलम् । | ||
| verse_lines = न देहे पतितास्त्रस्य बहिर्वेष्टनतः फलम् | | verse_lines = न देहे पतितास्त्रस्य बहिर्वेष्टनतः फलम् ।¦तथाऽपि स्नेहवशगो वेष्टयामास फल्गुनः ॥ २९०॥ | ||
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| verse_lines = अमोघत्वं निजास्त्रस्य भीमस्यावध्यतामपि | | verse_lines = अमोघत्वं निजास्त्रस्य भीमस्यावध्यतामपि ।¦साधयन् सार्जुनः कृष्णो भीमस्य रथमारुहत् ॥ २९१॥ | ||
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| verse_lines = वेष्टितं वारुणास्त्रेण प्रविष्टं बाह्यतस्तदा | | verse_lines = वेष्टितं वारुणास्त्रेण प्रविष्टं बाह्यतस्तदा ।¦सहितत्वात् केशवेन नरत्वादथ फल्गुनम् ॥ २९२॥ | ||
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| verse_lines = तदस्त्रं नादहत् ताभ्यां स्वरथादवरोपिते | | verse_lines = तदस्त्रं नादहत् ताभ्यां स्वरथादवरोपिते ।¦भीम आच्छिन्नहेतौ च तदस्त्रं शान्तिमागमत् ॥ २९३॥ | ||
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| verse_text = शुद्धक्षत्रियधर्मेषु निरतो यद् वृकोदरः । | | verse_text = शुद्धक्षत्रियधर्मेषु निरतो यद् वृकोदरः । | ||
| verse_lines = शुद्धक्षत्रियधर्मेषु निरतो यद् वृकोदरः | | verse_lines = शुद्धक्षत्रियधर्मेषु निरतो यद् वृकोदरः ।¦वाहनादवतीर्यान्यैः प्रणतेऽपि निरायुधैः ।¦सायुधः सरथोऽयुद्ध्यदविषह्यमपीश्वरैः ॥ २९४॥ | ||
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| verse_lines = स्वधर्महानौ मित्राणां कर्तव्यं यन्निषेधनम् | | verse_lines = स्वधर्महानौ मित्राणां कर्तव्यं यन्निषेधनम् ।¦अतः सोऽन्यानपि प्राह मा गमध्वमिति स्वयम् ॥ २९५॥ | ||
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| verse_lines = नमस्कार्यमपि ह्यस्त्रं न नम्यं जीवनेच्छया | | verse_lines = नमस्कार्यमपि ह्यस्त्रं न नम्यं जीवनेच्छया ।¦समरे शत्रुणा मुक्तं तस्मात् तन्न चकार सः ॥ २९६॥ | ||
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| verse_lines = अस्त्राभिमानी वायुर्हि देवताऽस्य हरिः स्वयम् | | verse_lines = अस्त्राभिमानी वायुर्हि देवताऽस्य हरिः स्वयम् ।¦तस्माद् भीमं स्वरूपत्वान्नादहच्चाग्निमग्निवत् ॥ २९७॥ | ||
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| verse_lines = मनसैवाऽदरं चक्रे भीमोऽस्त्रे च हरौ तदा | | verse_lines = मनसैवाऽदरं चक्रे भीमोऽस्त्रे च हरौ तदा ।¦क्षत्रधर्मानुसारेण न ननाम च बाह्यतः ॥ २९८॥ | ||
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| verse_lines = वासुदेवः स्वकीयास्त्रं भीमं चामोघमेव तु | | verse_lines = वासुदेवः स्वकीयास्त्रं भीमं चामोघमेव तु ।¦साधयित्वाऽनन्तशक्तिः पुनरश्वानचोदयत् ॥ २९९॥ | ||
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| verse_text = पुनः प्रयोक्तुमस्त्रं तत् (प्रयोक्तमस्त्रं तं) धार्तराष्ट्रोऽभ्यचोदयत्(अभ्ययाचत) । | | verse_text = पुनः प्रयोक्तुमस्त्रं तत् (प्रयोक्तमस्त्रं तं) धार्तराष्ट्रोऽभ्यचोदयत्(अभ्ययाचत) । | ||
| verse_lines = पुनः प्रयोक्तुमस्त्रं तत् (प्रयोक्तमस्त्रं तं) धार्तराष्ट्रोऽभ्यचोदयत्(अभ्ययाचत) | | verse_lines = पुनः प्रयोक्तुमस्त्रं तत् (प्रयोक्तमस्त्रं तं) धार्तराष्ट्रोऽभ्यचोदयत्(अभ्ययाचत) ।¦द्रौणिर्न शक्यमित्युक्त्वा धृष्टद्युम्नं समभ्ययात् ॥ ३००॥ | ||
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| verse_text = आयान्तमीक्ष्यैव गुरोः सुतं तं धृष्टद्युम्नं सात्यकिरन्वयाद् रणे । | | verse_text = आयान्तमीक्ष्यैव गुरोः सुतं तं धृष्टद्युम्नं सात्यकिरन्वयाद् रणे । | ||
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| verse_lines = भीमस्याभ्यागतस्याश्वान् द्रौणिर्व्यद्रावयद् रणे | | verse_lines = भीमस्याभ्यागतस्याश्वान् द्रौणिर्व्यद्रावयद् रणे ।¦संस्थापयति तान् भीमे ददर्श द्रौणिमर्जुनः ॥ ३०२॥ | ||
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| verse_lines = ततोऽर्जुनस्तं प्रतियोद्धुमागमद् रुक्षा वाचः श्रावयन् क्रुद्धरूपः | | verse_lines = ततोऽर्जुनस्तं प्रतियोद्धुमागमद् रुक्षा वाचः श्रावयन् क्रुद्धरूपः ।¦तत्राऽग्नेयं द्रौणिरमुञ्चदस्त्रं तेन व्याप्ता पृतना पाण्डवानाम् ॥ ३०३॥ | ||
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| verse_lines = अक्षोहिणी निहता चात्र सेना पार्थं सयानं हरिरुज्जहार | | verse_lines = अक्षोहिणी निहता चात्र सेना पार्थं सयानं हरिरुज्जहार ।¦जीवन्तमालोक्य सुरेन्द्रनन्दनं द्रौणिः कोपात् कार्मुकं चापहाय ।¦ययौ तमागत्य जगाद कृष्णो वेदान्तकृत् पूर्णषाड्गुण्यदेहः ॥ ३०४॥ | ||
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| verse_lines = मा याहि साक्षाद् गिरिशः सुराणां कार्याय भूमौ बलवानजायथाः | | verse_lines = मा याहि साक्षाद् गिरिशः सुराणां कार्याय भूमौ बलवानजायथाः ।¦महच्च कार्यं पुनरस्ति दृष्टं तवाऽशु तच्च प्रतिपादयेति ॥ ३०५॥ | ||
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| verse_text = पार्थाश्च सर्वे मुदिता जनार्दनं परं स्तुवन्तः शिबिराय जग्मुः । | | verse_text = पार्थाश्च सर्वे मुदिता जनार्दनं परं स्तुवन्तः शिबिराय जग्मुः । | ||
| verse_lines = पार्थाश्च सर्वे मुदिता जनार्दनं परं स्तुवन्तः शिबिराय जग्मुः | | verse_lines = पार्थाश्च सर्वे मुदिता जनार्दनं परं स्तुवन्तः शिबिराय जग्मुः ।¦तत्रापि रात्रावमितान् हरेर्गुणाननुस्मरन्तो मुमुदुः समेताः ॥ ३०७॥ | ||
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<span id="gr-C27" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तविंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C27" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="सप्तविंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = ओं ॥ अथानुज्ञामुपादाय द्रौणेर्दुर्योधनो नृपः । | | verse_text = ओं ॥ अथानुज्ञामुपादाय द्रौणेर्दुर्योधनो नृपः । | ||
| verse_lines = ओं ॥ अथानुज्ञामुपादाय द्रौणेर्दुर्योधनो नृपः | | verse_lines = ओं ॥ अथानुज्ञामुपादाय द्रौणेर्दुर्योधनो नृपः ।¦कर्णं सेनापतिं चक्रे सोऽगाद् युद्धाय दंशितः (दंसितः) ॥ १॥ | ||
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| verse_text = तत्राभवद् युद्धमतीव दारुणं पाण्डोः सुतानां धृतराष्ट्रजैर्गजे । | | verse_text = तत्राभवद् युद्धमतीव दारुणं पाण्डोः सुतानां धृतराष्ट्रजैर्गजे । | ||
| verse_lines = तत्राभवद् युद्धमतीव दारुणं पाण्डोः सुतानां धृतराष्ट्रजैर्गजे | | verse_lines = तत्राभवद् युद्धमतीव दारुणं पाण्डोः सुतानां धृतराष्ट्रजैर्गजे ।¦तत्रोदयाद्रिप्रतिमे प्रदृश्यते भीमो यथोद्यन् सविताऽतिनिर्मलः ॥ २॥ | ||
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| verse_text = तं कालयन्तं नृपतीन् क्षेमधूर्तिरभ्यागमत् तस्य गजं जघान च । | | verse_text = तं कालयन्तं नृपतीन् क्षेमधूर्तिरभ्यागमत् तस्य गजं जघान च । | ||
| verse_lines = तं कालयन्तं नृपतीन् क्षेमधूर्तिरभ्यागमत् तस्य गजं जघान च | | verse_lines = तं कालयन्तं नृपतीन् क्षेमधूर्तिरभ्यागमत् तस्य गजं जघान च ।¦तं वीर्यमत्तं प्रतिलभ्य भीमो निनाय मृत्योः सदनाय शीघ्रम् ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = निहत्य तं मारुतिरभ्यकृन्तच्छिरांसि यूनां परपक्षपातिनाम् । | | verse_text = निहत्य तं मारुतिरभ्यकृन्तच्छिरांसि यूनां परपक्षपातिनाम् । | ||
| verse_lines = निहत्य तं मारुतिरभ्यकृन्तच्छिरांसि यूनां परपक्षपातिनाम् | | verse_lines = निहत्य तं मारुतिरभ्यकृन्तच्छिरांसि यूनां परपक्षपातिनाम् ।¦विक्षोभयामास च शत्रुसैन्यं सिंहो यथैव श्वसृगालयूथम् ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = सङ्क्षोभ्यमाणं तदनीकमीक्ष्य द्रौणी रथेन प्रतिजग्मिवांस्तम् । | | verse_text = सङ्क्षोभ्यमाणं तदनीकमीक्ष्य द्रौणी रथेन प्रतिजग्मिवांस्तम् । | ||
| verse_lines = सङ्क्षोभ्यमाणं तदनीकमीक्ष्य द्रौणी रथेन प्रतिजग्मिवांस्तम् | | verse_lines = सङ्क्षोभ्यमाणं तदनीकमीक्ष्य द्रौणी रथेन प्रतिजग्मिवांस्तम् ।¦तद् युद्धमासीदतिरौद्रमद्भुतं (अतिघोरमद्भुतं) पुरा यथा नाऽस च कस्यचित् क्वचित् ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = दृष्ट्वैव तद् देवगन्धर्वविप्रा ऊचुर्नेदृग् दृष्टपूर्वं सुयुद्धम् । | | verse_text = दृष्ट्वैव तद् देवगन्धर्वविप्रा ऊचुर्नेदृग् दृष्टपूर्वं सुयुद्धम् । | ||
| verse_lines = दृष्ट्वैव तद् देवगन्धर्वविप्रा ऊचुर्नेदृग् दृष्टपूर्वं सुयुद्धम् | | verse_lines = दृष्ट्वैव तद् देवगन्धर्वविप्रा ऊचुर्नेदृग् दृष्टपूर्वं सुयुद्धम् ।¦न चोत्तरं वाऽपि भविष्यतीदृक् कलां च सर्वाणि न षोडशीमियुः(षोडशीमयुः) ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = नैतादृशी ज्ञानसम्पद् बलं वा द्वयं कुतो वायुमृते शिवं तथा । | | verse_text = नैतादृशी ज्ञानसम्पद् बलं वा द्वयं कुतो वायुमृते शिवं तथा । | ||
| verse_lines = नैतादृशी ज्ञानसम्पद् बलं वा द्वयं कुतो वायुमृते शिवं तथा | | verse_lines = नैतादृशी ज्ञानसम्पद् बलं वा द्वयं कुतो वायुमृते शिवं तथा ।¦द्वयोः समाहार इह द्वयोरपि ज्ञानस्य बाह्वोश्च बलस्य सूर्जितः ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = इतीर्यमाणे विबुधैर्नरोत्तमौ दिशः समस्ता गगनं च पत्रिभिः । | | verse_text = इतीर्यमाणे विबुधैर्नरोत्तमौ दिशः समस्ता गगनं च पत्रिभिः । | ||
| verse_lines = इतीर्यमाणे विबुधैर्नरोत्तमौ दिशः समस्ता गगनं च पत्रिभिः | | verse_lines = इतीर्यमाणे विबुधैर्नरोत्तमौ दिशः समस्ता गगनं च पत्रिभिः ।¦निरन्तरं चक्रतुरुत्तमोजसौ दृष्ट्वैव तद् (प्रीतिमगुः)भीतिमगुर्महारथाः ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = शरासने मारुतिना निराकृतो द्रौणिर्महास्त्राणि मुमोच तस्मिन् । | | verse_text = शरासने मारुतिना निराकृतो द्रौणिर्महास्त्राणि मुमोच तस्मिन् । | ||
| verse_lines = शरासने मारुतिना निराकृतो द्रौणिर्महास्त्राणि मुमोच तस्मिन् | | verse_lines = शरासने मारुतिना निराकृतो द्रौणिर्महास्त्राणि मुमोच तस्मिन् ।¦(तान्यस्त्रवर्षैः)तान्यस्त्रवर्यैर्बलवानविस्मयः संशामयामास सुतोऽनिलस्य ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = पुनः शरैरेव परस्परं तावयुद्ध्यतां चित्रमलं च सुष्ठु । | | verse_text = पुनः शरैरेव परस्परं तावयुद्ध्यतां चित्रमलं च सुष्ठु । | ||
| verse_lines = पुनः शरैरेव परस्परं तावयुद्ध्यतां चित्रमलं च सुष्ठु | | verse_lines = पुनः शरैरेव परस्परं तावयुद्ध्यतां चित्रमलं च सुष्ठु ।¦तदा तु भीमस्य शरैर्भृशार्दितो द्रौणिः पपाताऽशु दृढं विचेतनः ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = भीमश्च विह्वलतनुः स तु किञ्चिदेव पूर्वं गते गुरुसुते प्रययौ क्षणेन । | | verse_text = भीमश्च विह्वलतनुः स तु किञ्चिदेव पूर्वं गते गुरुसुते प्रययौ क्षणेन । | ||
| verse_lines = भीमश्च विह्वलतनुः स तु किञ्चिदेव पूर्वं गते गुरुसुते प्रययौ क्षणेन | | verse_lines = भीमश्च विह्वलतनुः स तु किञ्चिदेव पूर्वं गते गुरुसुते प्रययौ क्षणेन ।¦निर्धूतयुद्धश्रम आत्तधन्वा योद्धुं गजौघं प्रति नादिताशः(प्रतिनादिताशः) ॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = तस्मिन् गजान् मर्दयति धार्तराष्ट्रो युधिष्ठिरम् | | verse_lines = तस्मिन् गजान् मर्दयति धार्तराष्ट्रो युधिष्ठिरम् ।¦अगाद् युद्धाय तौ युद्धं राजानौ चक्रतुश्चिरम् ॥ १२॥ | ||
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| verse_lines = तत्र तं विरथं चक्रे सहसैव युधिष्ठिरः | | verse_lines = तत्र तं विरथं चक्रे सहसैव युधिष्ठिरः ।¦स गदामाददे गुर्वीं तं भीमोऽभ्यपतद् गदी ॥ १३॥ | ||
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| verse_lines = दृष्ट्वा कृपस्तं स्वरथमारोप्यापययौ ततः | | verse_lines = दृष्ट्वा कृपस्तं स्वरथमारोप्यापययौ ततः ।¦तदैव कर्णनकुलौ भृशं बाणैरयुद्ध्यताम् ॥ १४॥ | ||
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| verse_lines = नकुलं विरथं कृत्वा कर्णोऽथ प्रपलायिनम्(प्रपलायितम्) | | verse_lines = नकुलं विरथं कृत्वा कर्णोऽथ प्रपलायिनम्(प्रपलायितम्) ।¦अनुद्रुत्य च वेगेन कण्ठे धनुरवासृजत् ॥ १५॥ | ||
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| verse_lines = उक्त्वा च पुरुषा(उवाच परुषा) वाचः कुन्त्या वचनगौरवात् | | verse_lines = उक्त्वा च पुरुषा(उवाच परुषा) वाचः कुन्त्या वचनगौरवात् ।¦जघान नैव नकुलं विसृज्य च ययौ परान् ॥ १६॥ | ||
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| verse_lines = विन्दानुविन्दावथ कैकयौ रणे समासदत् सात्यकिरुग्रविक्रमः | | verse_lines = विन्दानुविन्दावथ कैकयौ रणे समासदत् सात्यकिरुग्रविक्रमः ।¦तयोरमुष्याभवदुग्रवैशसं प्रवर्षतोरुत्तमसायकान् बहून् ॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = ताभ्यां निरुद्धः सहसा जहार तत्रानुविन्दस्य शिरोऽथ विन्दः | | verse_lines = ताभ्यां निरुद्धः सहसा जहार तत्रानुविन्दस्य शिरोऽथ विन्दः ।¦युयोध शैनेयमथारथावुभौ परस्परं चक्रतुरुत्तमाहवे ॥ १८॥ | ||
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| verse_lines = ततश्च चर्मासिधरौ प्रचेरतुः श्येनौ यथाऽकाशतले कृतश्रमौ | | verse_lines = ततश्च चर्मासिधरौ प्रचेरतुः श्येनौ यथाऽकाशतले कृतश्रमौ ।¦निकृत्य चान्योन्यमुभौ च चर्मणी वरासिपाणी युगपत् समीयतुः ॥ १९॥ | ||
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| verse_lines = तत्रापहस्तेन शिरः सकुण्डलं जहार विन्दस्य मृधे स सात्यकिः | | verse_lines = तत्रापहस्तेन शिरः सकुण्डलं जहार विन्दस्य मृधे स सात्यकिः ।¦निहत्य तौ बन्धुजनैः सुपूजितो जगाम शत्रूनपरान् प्रकम्पयन् ॥ २०॥ | ||
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| verse_lines = कृपमायान्तमीक्ष्यैव तपसां मां प्रपीडयेत् | | verse_lines = कृपमायान्तमीक्ष्यैव तपसां मां प्रपीडयेत् ।¦इति मत्वा पार्षतस्तु भीमं शरणमेयिवान् ॥ २१॥ | ||
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| verse_lines = कर्णं समन्तात् प्रतिकालयन्तं वरूथिनीमिन्द्रसुतः समभ्ययात् | | verse_lines = कर्णं समन्तात् प्रतिकालयन्तं वरूथिनीमिन्द्रसुतः समभ्ययात् ।¦क्षणात् तमाजौ विरथं च चक्रे ततोऽपहारं स चकार चम्वाः ॥ २२॥ | ||
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| verse_lines = पराजितः संयति सूर्यसूनुः सुतेन शक्रस्य स धार्तराष्ट्रम् | | verse_lines = पराजितः संयति सूर्यसूनुः सुतेन शक्रस्य स धार्तराष्ट्रम् ।¦जगाद बाहुं प्रतिगृह्य पार्थो जिगाय मामन्यमनस्कमाजौ ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = कामं रथो मे धनुरप्यभेद्यं दत्तं भृगूणामधिपेन दिव्यम् | | verse_lines = कामं रथो मे धनुरप्यभेद्यं दत्तं भृगूणामधिपेन दिव्यम् ।¦यन्ता न तादृङ् मम यादृशो हरिः शल्यो यदि स्यात् त्वदरिं निहन्याम् ॥ २४॥ | ||
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| verse_lines = बुद्ध्या बलेन ज्ञानेन धैर्याद्यैरपि योऽधिकः | | verse_lines = बुद्ध्या बलेन ज्ञानेन धैर्याद्यैरपि योऽधिकः ।¦रथिनः सारथिः स स्यादर्जुनस्य यथा हरिः ।¦यथा शिवस्य ब्रह्माऽभूद् दहतस्त्रिपुरं पुरा ॥ २६॥ | ||
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| verse_text = कृत्वा तमाशु विरथं धनुरस्य कण्ठे सज्यं निधाय परुषा गिर आह चोच्चैः । | | verse_text = कृत्वा तमाशु विरथं धनुरस्य कण्ठे सज्यं निधाय परुषा गिर आह चोच्चैः । | ||
| verse_lines = कृत्वा तमाशु विरथं धनुरस्य कण्ठे सज्यं निधाय परुषा गिर आह चोच्चैः | | verse_lines = कृत्वा तमाशु विरथं धनुरस्य कण्ठे सज्यं निधाय परुषा गिर आह चोच्चैः ।¦दृष्ट्वैव मारुतिरमुं भृशमातुतोद दुर्योधनं (विगतकार्मुकं)विरथकार्मुकमत्र कृत्वा ॥ ३४॥ | ||
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| verse_text = तं प्राणसंशयगतं नृपतिं निरीक्ष्य कर्णं जगाद युधि मद्रपतिः प्रदर्श्य । | | verse_text = तं प्राणसंशयगतं नृपतिं निरीक्ष्य कर्णं जगाद युधि मद्रपतिः प्रदर्श्य । | ||
| verse_lines = तं प्राणसंशयगतं नृपतिं निरीक्ष्य कर्णं जगाद युधि मद्रपतिः प्रदर्श्य | | verse_lines = तं प्राणसंशयगतं नृपतिं निरीक्ष्य कर्णं जगाद युधि मद्रपतिः प्रदर्श्य ।¦यस्यार्थ एष(यस्यार्थमेव) समरस्त्वमियं च सेनां तं त्वं यमस्य सदनं प्रयियासुमद्य ।¦भीमेन पीडितममुं परिपाहि शीघ्रं किं ते युधिष्ठिरमिमं हि मुधाऽभिपीड्य(वृथाऽभिपीड्य) ॥ ३५॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वाऽस्य वाक्यमतिहाय(वाक्यमपहाय) युधिष्ठिरं तं कर्णो ययौ नृपतिरक्षणतत्परोऽलम् । | | verse_text = श्रुत्वाऽस्य वाक्यमतिहाय(वाक्यमपहाय) युधिष्ठिरं तं कर्णो ययौ नृपतिरक्षणतत्परोऽलम् । | ||
| verse_lines = श्रुत्वाऽस्य वाक्यमतिहाय(वाक्यमपहाय) युधिष्ठिरं तं कर्णो ययौ नृपतिरक्षणतत्परोऽलम् | | verse_lines = श्रुत्वाऽस्य वाक्यमतिहाय(वाक्यमपहाय) युधिष्ठिरं तं कर्णो ययौ नृपतिरक्षणतत्परोऽलम् ।¦दृष्ट्वैव तं पवनसूनुरभि त्वियाय क्रोधाद् दिधक्षुरिव कर्णममेयधामा ॥ ३६॥ | ||
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| verse_text = राजावनाय शिनिपुङ्गवपार्षतौ च सन्दिश्य कर्णमभिगच्छत आस रूपम् । | | verse_text = राजावनाय शिनिपुङ्गवपार्षतौ च सन्दिश्य कर्णमभिगच्छत आस रूपम् । | ||
| verse_lines = राजावनाय शिनिपुङ्गवपार्षतौ च सन्दिश्य कर्णमभिगच्छत आस रूपम् | | verse_lines = राजावनाय शिनिपुङ्गवपार्षतौ च सन्दिश्य कर्णमभिगच्छत आस रूपम् ।¦अन्ते कृतान्तनरसिंहतनोर्यथैव विष्णोर्हरं ग्रसत आत्तसमस्तविश्वम् ।¦तद्वेगतः प्रतिचचाल धरा समस्ता विद्राविता च सकला प्रतिवीरसेना ॥ ३७॥ | ||
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| verse_text = वैकर्तनेन शरसञ्चयताडितः स बाणं च वज्रसदृशं प्रमुमोच तस्मिन् । | | verse_text = वैकर्तनेन शरसञ्चयताडितः स बाणं च वज्रसदृशं प्रमुमोच तस्मिन् । | ||
| verse_lines = वैकर्तनेन शरसञ्चयताडितः स बाणं च वज्रसदृशं प्रमुमोच तस्मिन् | | verse_lines = वैकर्तनेन शरसञ्चयताडितः स बाणं च वज्रसदृशं प्रमुमोच तस्मिन् ।¦तेनाऽहतो मृतकवत् स पपात कर्णो भीमः क्षुरं च जगृहेऽभिययौ(जगृहे प्रययौ) च पद्भ्याम् ॥ ३८॥ | ||
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| verse_text = निन्दां हरेस्तु(हरेश्च) विदधाति परोक्षगोऽपि(परोक्षतोऽपि) यस्तं प्रगृह्य करवाणि विजिह्वमेव । | | verse_text = निन्दां हरेस्तु(हरेश्च) विदधाति परोक्षगोऽपि(परोक्षतोऽपि) यस्तं प्रगृह्य करवाणि विजिह्वमेव । | ||
| verse_lines = निन्दां हरेस्तु(हरेश्च) विदधाति परोक्षगोऽपि(परोक्षतोऽपि) यस्तं प्रगृह्य करवाणि विजिह्वमेव | | verse_lines = निन्दां हरेस्तु(हरेश्च) विदधाति परोक्षगोऽपि(परोक्षतोऽपि) यस्तं प्रगृह्य करवाणि विजिह्वमेव ।¦एवं हि वायुतनयस्य सदा प्रतिज्ञा छेत्तुं स तेन रविजस्य ससार जिह्वाम् ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = आयान्तमन्तिकममुं प्रसमीक्ष्य शल्यो नेत्याह हेतुभिरहो न मृषा प्रतिज्ञा । | | verse_text = आयान्तमन्तिकममुं प्रसमीक्ष्य शल्यो नेत्याह हेतुभिरहो न मृषा प्रतिज्ञा । | ||
| verse_lines = आयान्तमन्तिकममुं प्रसमीक्ष्य शल्यो नेत्याह हेतुभिरहो न मृषा प्रतिज्ञा | | verse_lines = आयान्तमन्तिकममुं प्रसमीक्ष्य शल्यो नेत्याह हेतुभिरहो न मृषा प्रतिज्ञा ।¦कार्या त्वयैव पुरुहूतसुतस्य जिह्वां मा तेन पातय मरुत्सुत सूतसूनोः ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्त्वा प्रमुखात्(इत्युक्त्वाऽभिमुखात्) तस्य रथेनैव तु मद्रराट् । | | verse_text = इत्युक्त्वा प्रमुखात्(इत्युक्त्वाऽभिमुखात्) तस्य रथेनैव तु मद्रराट् । | ||
| verse_lines = इत्युक्त्वा प्रमुखात्(इत्युक्त्वाऽभिमुखात्) तस्य रथेनैव तु मद्रराट् | | verse_lines = इत्युक्त्वा प्रमुखात्(इत्युक्त्वाऽभिमुखात्) तस्य रथेनैव तु मद्रराट् ।¦वैकर्तनमपोवाह सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = जित्वा सूर्यसुतं भीमः कौरवाणामनीकिनीम् । | | verse_text = जित्वा सूर्यसुतं भीमः कौरवाणामनीकिनीम् । | ||
| verse_lines = जित्वा सूर्यसुतं भीमः कौरवाणामनीकिनीम् | | verse_lines = जित्वा सूर्यसुतं भीमः कौरवाणामनीकिनीम् ।¦सर्वां विद्रावयामास द्रौणिदुर्योधनावृताम् ॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = अक्षोहिणीत्रयं तेन तदा विलुलितं क्षणात् । | | verse_text = अक्षोहिणीत्रयं तेन तदा विलुलितं क्षणात् । | ||
| verse_lines = अक्षोहिणीत्रयं तेन तदा विलुलितं क्षणात् | | verse_lines = अक्षोहिणीत्रयं तेन तदा विलुलितं क्षणात् ।¦तदैव गुरुपुत्रोऽयात् पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = विमृद्य सकलां सेनां कृत्वा च विरथं नृपम् । | | verse_text = विमृद्य सकलां सेनां कृत्वा च विरथं नृपम् । | ||
| verse_lines = विमृद्य सकलां सेनां कृत्वा च विरथं नृपम् | | verse_lines = विमृद्य सकलां सेनां कृत्वा च विरथं नृपम् ।¦धृष्टद्युम्नं यमौ चैव सात्यकिं द्रौपदीसुतान् ।¦क्षणेन विरथीकृत्य सर्वांश्चक्रे निरायुधान् ॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = तान् भग्नदर्पान् रणतोऽपयातानन्वेव बाणावृतमन्तरिक्षम् । | | verse_text = तान् भग्नदर्पान् रणतोऽपयातानन्वेव बाणावृतमन्तरिक्षम् । | ||
| verse_lines = तान् भग्नदर्पान् रणतोऽपयातानन्वेव बाणावृतमन्तरिक्षम् | | verse_lines = तान् भग्नदर्पान् रणतोऽपयातानन्वेव बाणावृतमन्तरिक्षम् ।¦कुर्वन् ययौ धर्मराजस्तमाह किं नः स्वधर्मे निरतान् विहंसि ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = क्षत्रियान् परधर्मस्थो मा हिंसीरिति चोदितः । | | verse_text = क्षत्रियान् परधर्मस्थो मा हिंसीरिति चोदितः । | ||
| verse_lines = क्षत्रियान् परधर्मस्थो मा हिंसीरिति चोदितः | | verse_lines = क्षत्रियान् परधर्मस्थो मा हिंसीरिति चोदितः ।¦प्रहस्य तान् विहायैव ययौ यत्राच्युतार्जुनौ ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = संशप्तकैस्तत्र संयुद्ध्यमानं समाह्वयामास सुरेशसूनुम् । | | verse_text = संशप्तकैस्तत्र संयुद्ध्यमानं समाह्वयामास सुरेशसूनुम् । | ||
| verse_lines = संशप्तकैस्तत्र संयुद्ध्यमानं समाह्वयामास सुरेशसूनुम् | | verse_lines = संशप्तकैस्तत्र संयुद्ध्यमानं समाह्वयामास सुरेशसूनुम् ।¦स बाणयुक्तं भुजगेन्द्रकल्पमुन्नम्य बाहुं युधये सुशूरम् ॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = पार्थः संशप्तकगणैः संसृष्टः समरार्थिभिः । | | verse_text = पार्थः संशप्तकगणैः संसृष्टः समरार्थिभिः । | ||
| verse_lines = पार्थः संशप्तकगणैः संसृष्टः समरार्थिभिः | | verse_lines = पार्थः संशप्तकगणैः संसृष्टः समरार्थिभिः ।¦आहूतो द्रौणिना चैव कार्यं कृष्णमपृच्छत ।¦चोदयामास च हयान् कृष्णो द्रौणिरथं प्रति ॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = उभौ च तावस्त्रविदां प्रधानौ महाबलौ संयति जातदर्पौ । | | verse_text = उभौ च तावस्त्रविदां प्रधानौ महाबलौ संयति जातदर्पौ । | ||
| verse_lines = उभौ च तावस्त्रविदां प्रधानौ महाबलौ संयति जातदर्पौ | | verse_lines = उभौ च तावस्त्रविदां प्रधानौ महाबलौ संयति जातदर्पौ ।¦शरैः समस्ताः प्रदिशो दिशश्च द्रोणेन्द्रसूनू तिमिराः प्रचक्रतुः ॥ ४९॥ | ||
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| verse_lines = द्रौणिस्तदा स्यन्दनवाजिरोमस्वरोमकूपध्वजकार्मुकेभ्यः | | verse_lines = द्रौणिस्तदा स्यन्दनवाजिरोमस्वरोमकूपध्वजकार्मुकेभ्यः ।¦शरानमोघान् सततं सृजानो बबन्ध पार्थं शरपञ्जरेण ॥ ५०॥ | ||
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| verse_text = तस्मिन् निबद्धे हरिरप्रमेयो विबोधयामास सुरेन्द्रसूनुम् । | | verse_text = तस्मिन् निबद्धे हरिरप्रमेयो विबोधयामास सुरेन्द्रसूनुम् । | ||
| verse_lines = तस्मिन् निबद्धे हरिरप्रमेयो विबोधयामास सुरेन्द्रसूनुम् | | verse_lines = तस्मिन् निबद्धे हरिरप्रमेयो विबोधयामास सुरेन्द्रसूनुम् ।¦आलिङ्गनेनास्य ददौ बलं च स उत्थितोऽस्त्राण्यमुचन्महान्ति ॥ ५१॥ | ||
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| verse_text = निवार्य तान्यस्त्रवरैर्गुरोः सुतश्चिच्छेद च ज्यां युधि गाण्डिवस्य । | | verse_text = निवार्य तान्यस्त्रवरैर्गुरोः सुतश्चिच्छेद च ज्यां युधि गाण्डिवस्य । | ||
| verse_lines = निवार्य तान्यस्त्रवरैर्गुरोः सुतश्चिच्छेद च ज्यां युधि गाण्डिवस्य | | verse_lines = निवार्य तान्यस्त्रवरैर्गुरोः सुतश्चिच्छेद च ज्यां युधि गाण्डिवस्य ।¦ववर्ष पार्थं च शरैरथाऽन्या ज्याऽऽसीत् तया गाण्डिवं सोऽप्ययुङ्क्त ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = ततः शरेण कुपितः शितेन द्रौणिसारथेः | | verse_lines = ततः शरेण कुपितः शितेन द्रौणिसारथेः ।¦शिरो जहार कौन्तेयः सारथ्यं सोऽकरोत् स्वयम् ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = शरान् विसृजता तेन सारथ्यमपि कुर्वता | | verse_lines = शरान् विसृजता तेन सारथ्यमपि कुर्वता ।¦शरकूटेन पार्थः स पुनर्बद्धो द्विजन्मना ॥ ५४॥ | ||
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| verse_lines = पुनरालिङ्ग्य कृष्णस्तमधाच्छत्रुविघातकम् | | verse_lines = पुनरालिङ्ग्य कृष्णस्तमधाच्छत्रुविघातकम् ।¦बलमस्मिंस्ततः पार्थः उत्तस्थौ शरचापभृत् ।¦ववर्ष च शरान् भूयो द्रोणपुत्रेऽरिमर्दनः ॥ ५५॥ | ||
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| verse_lines = पुनस्तस्य तुतोद(नुनोद) ज्यां द्रौणिः सन्धाय तां पुनः | | verse_lines = पुनस्तस्य तुतोद(नुनोद) ज्यां द्रौणिः सन्धाय तां पुनः ।¦पार्थो द्रोणसुतस्याश्वरश्मींश्चिच्छेद सायकैः ॥ ५६॥ | ||
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| verse_lines = विरश्मयो हया द्रौणेः पुनः पार्थशराहताः | | verse_lines = विरश्मयो हया द्रौणेः पुनः पार्थशराहताः ।¦अपोहुर्दूरमेतस्मात् सोऽपि संस्थाप्य तान् पुनः ।¦चिन्तयामास नैतस्मादधिकं शक्यतेऽर्जुने ॥ ५७॥ | ||
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| verse_lines = एवं स मत्वा प्रविवेश सेनां पाण्डोः सुतानामथ तं समभ्ययात् | | verse_lines = एवं स मत्वा प्रविवेश सेनां पाण्डोः सुतानामथ तं समभ्ययात् ।¦पाण्ड्यस्तयोरास सुयुद्धमद्भुतं प्रवर्षतोः सायकपूगमुग्रम् ॥ ६०॥ | ||
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| verse_text = खड्गेन सोऽस्त्रैशस्त्रैरप्यनिर्भिन्नत्वचं तदा । | | verse_text = खड्गेन सोऽस्त्रैशस्त्रैरप्यनिर्भिन्नत्वचं तदा । | ||
| verse_lines = खड्गेन सोऽस्त्रैशस्त्रैरप्यनिर्भिन्नत्वचं तदा | | verse_lines = खड्गेन सोऽस्त्रैशस्त्रैरप्यनिर्भिन्नत्वचं तदा ।¦मौर्व्या ममन्थ धनुषः पातयित्वा धरातले ॥ ६८॥ | ||
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| verse_text = आकृष्यमाणं पार्षतं दृष्ट्वा कृष्णप्रचोदितः । | | verse_text = आकृष्यमाणं पार्षतं दृष्ट्वा कृष्णप्रचोदितः । | ||
| verse_lines = आकृष्यमाणं पार्षतं दृष्ट्वा कृष्णप्रचोदितः | | verse_lines = आकृष्यमाणं पार्षतं दृष्ट्वा कृष्णप्रचोदितः ।¦पार्थो भीमश्चोभयतः शरैरभिनिजघ्नतुः ॥ ६९॥ | ||
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| verse_text = स ताभ्यां वज्रसमितैः(वज्रसन्निभैः) शरैरभिहतो भृशम् । | | verse_text = स ताभ्यां वज्रसमितैः(वज्रसन्निभैः) शरैरभिहतो भृशम् । | ||
| verse_lines = स ताभ्यां वज्रसमितैः(वज्रसन्निभैः) शरैरभिहतो भृशम् | | verse_lines = स ताभ्यां वज्रसमितैः(वज्रसन्निभैः) शरैरभिहतो भृशम् ।¦विसृज्य पार्षतं स्वीयमारुरोह रथं पुनः ॥ ७०॥ | ||
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| verse_text = जगाम च ततोऽन्यत्र पाञ्चाल्योऽपि रथं पुनः । | | verse_text = जगाम च ततोऽन्यत्र पाञ्चाल्योऽपि रथं पुनः । | ||
| verse_lines = जगाम च ततोऽन्यत्र पाञ्चाल्योऽपि रथं पुनः | | verse_lines = जगाम च ततोऽन्यत्र पाञ्चाल्योऽपि रथं पुनः ।¦आरुह्यान्यं स्वात्तधन्वा कृतवर्माणमभ्ययात् ॥ ७१॥ | ||
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| verse_lines = तयोरासीत् सुतुमुलं युद्धमद्भुतदर्शनम् | | verse_lines = तयोरासीत् सुतुमुलं युद्धमद्भुतदर्शनम् ।¦तत्र नातिप्रयत्नेन पाञ्चाल्यो विरथायुधम् ।¦चकार कृतवर्माणं तमपोवाह गौतमः ॥ ७२॥ | ||
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| verse_text = अथ दुर्योधनो राजा माद्रेयावभ्ययाद् रथी । | | verse_text = अथ दुर्योधनो राजा माद्रेयावभ्ययाद् रथी । | ||
| verse_lines = अथ दुर्योधनो राजा माद्रेयावभ्ययाद् रथी | | verse_lines = अथ दुर्योधनो राजा माद्रेयावभ्ययाद् रथी ।¦ताभ्यां तस्याभवद् घोरं युद्धमद्भुतदर्शनम् ।¦तत्र नातिप्रयत्नेन तेन तौ विरथीकृतौ ॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = स्वयं युधिष्ठिरो राजा तदा तं समवारयत् । | | verse_text = स्वयं युधिष्ठिरो राजा तदा तं समवारयत् । | ||
| verse_lines = स्वयं युधिष्ठिरो राजा तदा तं समवारयत् | | verse_lines = स्वयं युधिष्ठिरो राजा तदा तं समवारयत् ।¦व्यश्वसूतध्वजं चक्रे तं च दुर्योधनो रणे ॥ ७४॥ | ||
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| verse_text = अथाऽगतं सूर्यसुतं पुनश्च जगाम भीमो रभसो(रभसा) रथेन । | | verse_text = अथाऽगतं सूर्यसुतं पुनश्च जगाम भीमो रभसो(रभसा) रथेन । | ||
| verse_lines = अथाऽगतं सूर्यसुतं पुनश्च जगाम भीमो रभसो(रभसा) रथेन | | verse_lines = अथाऽगतं सूर्यसुतं पुनश्च जगाम भीमो रभसो(रभसा) रथेन ।¦दुर्योधनं चास्य समक्षमेव चकार वीरो विरथं क्षणेन ॥ ७५॥ | ||
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| verse_lines = निवार्य कर्णं च शरैरमुष्य सूनोः सुषेणस्य शिरश्चकर्त | | verse_lines = निवार्य कर्णं च शरैरमुष्य सूनोः सुषेणस्य शिरश्चकर्त ।¦पपात भूमौ स पितुः समीपे यथा हतः सत्यसेनोऽमुनैव ।¦यथैव कर्णावरजौ पुरैव निशायुद्धे कर्णपुरः प्रपातितौ ॥ ७६॥ | ||
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| verse_lines = हतं तमीक्ष्यैव विकर्तनात्मजः क्रोधान्वितो भीमसेनं विहाय | | verse_lines = हतं तमीक्ष्यैव विकर्तनात्मजः क्रोधान्वितो भीमसेनं विहाय ।¦ययौ प्रमृद्यैव चमूं युधिष्ठिरं रथेऽपरे स्वश्वयुते व्यवस्थितम् ॥ ७७॥ | ||
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| verse_text = न्यवारयेतां शिनिपौत्रपार्षतौ कृष्णासुताः सोमकसङ्घयुक्ताः । | | verse_text = न्यवारयेतां शिनिपौत्रपार्षतौ कृष्णासुताः सोमकसङ्घयुक्ताः । | ||
| verse_lines = न्यवारयेतां शिनिपौत्रपार्षतौ कृष्णासुताः सोमकसङ्घयुक्ताः | | verse_lines = न्यवारयेतां शिनिपौत्रपार्षतौ कृष्णासुताः सोमकसङ्घयुक्ताः ।¦स तान् समस्तान् विरथान् विधाय युधिष्ठिरं प्राप युतं यमाभ्याम् ॥ ७८॥ | ||
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| verse_text = निहत्य सोऽश्वान् युधि धर्मसूनोर्निरायुधौ तौ च यमौ चकार । | | verse_text = निहत्य सोऽश्वान् युधि धर्मसूनोर्निरायुधौ तौ च यमौ चकार । | ||
| verse_lines = निहत्य सोऽश्वान् युधि धर्मसूनोर्निरायुधौ तौ च यमौ चकार | | verse_lines = निहत्य सोऽश्वान् युधि धर्मसूनोर्निरायुधौ तौ च यमौ चकार ।¦तानेकयानोपगतान् पुनश्च ममर्द बाणैश्च वचोभिरुग्रैः ॥ ७९॥ | ||
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| verse_lines = तदैव मोक्षाय नृपस्य भीमो दुर्योधनं विरथं संविधाय | | verse_lines = तदैव मोक्षाय नृपस्य भीमो दुर्योधनं विरथं संविधाय ।¦विव्याध मर्मस्वतितीक्ष्णसायकैस्तं दर्शयामास रवेः सुताय ॥ ८०॥ | ||
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| verse_text = शल्यस्तदा धर्मसुतं विहाय कर्णो ययौ तत्र युधिष्ठिरोऽपि । | | verse_text = शल्यस्तदा धर्मसुतं विहाय कर्णो ययौ तत्र युधिष्ठिरोऽपि । | ||
| verse_lines = शल्यस्तदा धर्मसुतं विहाय कर्णो ययौ तत्र युधिष्ठिरोऽपि | | verse_lines = शल्यस्तदा धर्मसुतं विहाय कर्णो ययौ तत्र युधिष्ठिरोऽपि ।¦गत्वा शनैः शिबिरं तत्र शिश्ये कर्णो यदा राजगृध्नी जगाम ॥ ८१॥ | ||
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| verse_lines = द्रौणिः कृपश्चात्र तदैव जग्मतुस्तदा भीमो द्रौणिकर्णौ जगाम | | verse_lines = द्रौणिः कृपश्चात्र तदैव जग्मतुस्तदा भीमो द्रौणिकर्णौ जगाम ।¦कृपो नृपं रथमारोपयच्च विद्धं शरैर्भीमबाहुप्रमुक्तैः ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = नृपं समादाय कृपेऽपयाते भीमार्दितौ द्रौणिकर्णौ शरौघैः | | verse_lines = नृपं समादाय कृपेऽपयाते भीमार्दितौ द्रौणिकर्णौ शरौघैः ।¦विहाय तं जग्मतुः सोमकानां चमूं शरौघैरभिपातयन्तौ ॥ ८३॥ | ||
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| verse_lines = अथात्र राजानमचक्षमाणो धनञ्जयो वासुदेवप्रणुन्नः | | verse_lines = अथात्र राजानमचक्षमाणो धनञ्जयो वासुदेवप्रणुन्नः ।¦अभ्याययौ पार्षतः स्वां तु सेनां कर्णाहतां वीक्ष्य कुरूनपीडयत् ॥ ८४॥ | ||
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| verse_lines = न्यवारयत् समायान्तं कपिप्रवरकेतनम् | | verse_lines = न्यवारयत् समायान्तं कपिप्रवरकेतनम् ।¦द्रौणिर्दुःशासनश्चैव धृष्टद्युम्नमवारयत् ॥ ८५॥ | ||
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| verse_lines = उभावतिरथौ तौ तु शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् | | verse_lines = उभावतिरथौ तौ तु शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् ।¦दुःशासनः पार्षतश्च कुर्वन्तौ बाणजं तमः ॥ ८६॥ | ||
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| verse_lines = तदाऽभवद् युद्धमतीव दारुणं द्रौणेस्तनूजेन तु वज्रपाणेः | | verse_lines = तदाऽभवद् युद्धमतीव दारुणं द्रौणेस्तनूजेन तु वज्रपाणेः ।¦तत्रापि बद्धः शरपञ्जरेण पार्थोऽपनुत्ताऽपि हि गाण्डिवज्या ॥ ८८॥ | ||
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| verse_lines = पार्थोऽथ कृष्णेधितबाहुवीर्यो(कृष्णैधितबाहुवीर्यो) निहत्य सूतं गुरुपुत्रकस्य | | verse_lines = पार्थोऽथ कृष्णेधितबाहुवीर्यो(कृष्णैधितबाहुवीर्यो) निहत्य सूतं गुरुपुत्रकस्य ।¦छित्वा च रश्मींस्तुरगानमुष्य विद्रावयामास शरैः सुदूरम् ॥ ८९॥ | ||
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| verse_lines = अतीत्य पुत्रं तु गुरोः समागते पार्थे कर्णो द्रावयामास सेनाम् | | verse_lines = अतीत्य पुत्रं तु गुरोः समागते पार्थे कर्णो द्रावयामास सेनाम् ।¦पाण्डोः सुतानां शरवर्षधारो दुर्योधनश्चानु ययौ तमेव ॥ ९०॥ | ||
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| verse_lines = बलं स्वकीयं बहुधा विभिन्नं(विभग्नं) समीक्ष्य भीमो मृगराजकेतुः | | verse_lines = बलं स्वकीयं बहुधा विभिन्नं(विभग्नं) समीक्ष्य भीमो मृगराजकेतुः ।¦कृत्वा धराकम्पकमुग्रनादं रणेऽभ्ययात् कौरवराजसैन्यम् ॥ ९५॥ | ||
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| verse_lines = नादेन बाणैश्च वृकोदरेण भग्नं तदा कौरवसैन्यमाशु | | verse_lines = नादेन बाणैश्च वृकोदरेण भग्नं तदा कौरवसैन्यमाशु ।¦दिशो विदुद्राव सुयोधनोऽपि कृतो रणे तेन विवाहनायुधः ॥ ९६॥ | ||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव तत् पाण्डवानां च सेना समावृत्ता क्षिप्रमवार्यविक्रमा (समागता क्षिप्रमवार्यवेगा) | | verse_lines = दृष्ट्वैव तत् पाण्डवानां च सेना समावृत्ता क्षिप्रमवार्यविक्रमा (समागता क्षिप्रमवार्यवेगा) ।¦तया पुनः कौरवाणां बलं तद् भग्नं दूराद् दूरतरं प्रदुद्रुवे ॥ ९७॥ | ||
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| verse_text = वासुदेवमिदं प्राह वर्जयित्वैव सूतजम् । | | verse_text = वासुदेवमिदं प्राह वर्जयित्वैव सूतजम् । | ||
| verse_lines = वासुदेवमिदं प्राह वर्जयित्वैव सूतजम् | | verse_lines = वासुदेवमिदं प्राह वर्जयित्वैव सूतजम् ।¦अन्यत्र यामि नैवास्मादस्त्राज्जीवनमन्यथा ॥ १०३॥ | ||
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| verse_text = इत्यूचिवांसं पार्थं तं कृष्णोऽप्राप्यैव सूतजम् । | | verse_text = इत्यूचिवांसं पार्थं तं कृष्णोऽप्राप्यैव सूतजम् । | ||
| verse_lines = इत्यूचिवांसं पार्थं तं कृष्णोऽप्राप्यैव सूतजम् | | verse_lines = इत्यूचिवांसं पार्थं तं कृष्णोऽप्राप्यैव सूतजम् ।¦अन्येनैव पथा भीमं प्रापयामास विश्वकृत् ॥ १०४॥ | ||
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| verse_text = तत्रार्जुनोऽवदद् भीमं याहि द्रष्टुं युधिष्ठिरम् । | | verse_text = तत्रार्जुनोऽवदद् भीमं याहि द्रष्टुं युधिष्ठिरम् । | ||
| verse_lines = तत्रार्जुनोऽवदद् भीमं याहि द्रष्टुं युधिष्ठिरम् | | verse_lines = तत्रार्जुनोऽवदद् भीमं याहि द्रष्टुं युधिष्ठिरम् ।¦प्रवृत्तिं विद्धि भूपस्य मां तु संशप्तका युधे ।¦आह्वयन्ति (हतोच्छिष्टाः)हतोच्छेषास्तानहं यामि तद् युधे ॥ १०५॥ | ||
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| verse_text = इत्यूचिवांसं तमुवाच भीमो जानन् स्वबाह्वोर्बलमप्रमेयम् । | | verse_text = इत्यूचिवांसं तमुवाच भीमो जानन् स्वबाह्वोर्बलमप्रमेयम् । | ||
| verse_lines = इत्यूचिवांसं तमुवाच भीमो जानन् स्वबाह्वोर्बलमप्रमेयम् | | verse_lines = इत्यूचिवांसं तमुवाच भीमो जानन् स्वबाह्वोर्बलमप्रमेयम् ।¦संशप्तकान् सूतजं कौरवंश्च योत्स्येऽहमेकस्त्वमुपैहि भूपम् ॥ १०६॥ | ||
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| verse_text = त्यक्त्वा रणं नाहमितो व्रजेयं न मां वदेत् कश्चन युद्धभीतम् । | | verse_text = त्यक्त्वा रणं नाहमितो व्रजेयं न मां वदेत् कश्चन युद्धभीतम् । | ||
| verse_lines = त्यक्त्वा रणं नाहमितो व्रजेयं न मां वदेत् कश्चन युद्धभीतम् | | verse_lines = त्यक्त्वा रणं नाहमितो व्रजेयं न मां वदेत् कश्चन युद्धभीतम् ।¦इति ब्रुवाणं तमनन्तशक्तिः प्रीतः कृष्णः प्रशशंसाधिकेष्टम् ॥ १०७॥ | ||
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| verse_text = ययौ युधिष्ठिरं द्रष्टुं शिबिरं सार्जुनो हरिः । | | verse_text = ययौ युधिष्ठिरं द्रष्टुं शिबिरं सार्जुनो हरिः । | ||
| verse_lines = ययौ युधिष्ठिरं द्रष्टुं शिबिरं सार्जुनो हरिः | | verse_lines = ययौ युधिष्ठिरं द्रष्टुं शिबिरं सार्जुनो हरिः ।¦दृष्ट्वा तौ नृपतिः कर्णं हतं मत्वाऽऽशशंस ह(मत्वा शशंस ह) ॥ १०८॥ | ||
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| verse_text = अभिवाद्य हनिष्यामीत्युक्तः पार्थेन सा क्रुधा । | | verse_text = अभिवाद्य हनिष्यामीत्युक्तः पार्थेन सा क्रुधा । | ||
| verse_lines = अभिवाद्य हनिष्यामीत्युक्तः पार्थेन सा क्रुधा | | verse_lines = अभिवाद्य हनिष्यामीत्युक्तः पार्थेन सा क्रुधा ।¦भृशं विनिन्द्य बीभत्सुमाह कृष्णाय गाण्डिवम् ।¦देहि पुत्रं स राधाया हनिष्यति न संशयः ॥ १०९॥ | ||
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| verse_text = अथवा भीम एवैनं निवृत्ते त्वयि पातयेत् । | | verse_text = अथवा भीम एवैनं निवृत्ते त्वयि पातयेत् । | ||
| verse_lines = अथवा भीम एवैनं निवृत्ते त्वयि पातयेत् | | verse_lines = अथवा भीम एवैनं निवृत्ते त्वयि पातयेत् ।¦त्वं तु कुन्त्या वृथा सूतः क्लीबो मिथ्याप्रतिश्रवः ॥ ११०॥ | ||
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| verse_text = अहं हि सूतपुत्रेण क्लिष्टो मारुतितेजसा । | | verse_text = अहं हि सूतपुत्रेण क्लिष्टो मारुतितेजसा । | ||
| verse_lines = अहं हि सूतपुत्रेण क्लिष्टो मारुतितेजसा | | verse_lines = अहं हि सूतपुत्रेण क्लिष्टो मारुतितेजसा ।¦जीवामीत्यग्रजेनोक्त उद्बबर्हासिमुत्तमम् ।¦वासुदेवस्तदाऽऽहेदं(वासुदेवस्तमाहेदं) किमेतदिति सर्ववित् ॥ १११॥ | ||
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| verse_text = तमाह गाण्डिवं दातुं यो वदेत् तद्वधो मया । | | verse_text = तमाह गाण्डिवं दातुं यो वदेत् तद्वधो मया । | ||
| verse_lines = तमाह गाण्डिवं दातुं यो वदेत् तद्वधो मया | | verse_lines = तमाह गाण्डिवं दातुं यो वदेत् तद्वधो मया ।¦प्रतिज्ञातस्ततो हन्मि नृपमित्याह तं हरिः ॥ ११२॥ | ||
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| verse_text = सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् । | | verse_text = सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् । | ||
| verse_lines = सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् | | verse_lines = सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् ।¦यत्सतां हितमत्यन्तं तत् सत्यमिति निश्चयः ॥ ११३॥ | ||
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| verse_text = धर्मस्य चरणं(धर्मस्याचरणं) श्रेयो धर्मज्ञानं तु दुष्करम्(सुदुष्करम्) । | | verse_text = धर्मस्य चरणं(धर्मस्याचरणं) श्रेयो धर्मज्ञानं तु दुष्करम्(सुदुष्करम्) । | ||
| verse_lines = धर्मस्य चरणं(धर्मस्याचरणं) श्रेयो धर्मज्ञानं तु दुष्करम्(सुदुष्करम्) | | verse_lines = धर्मस्य चरणं(धर्मस्याचरणं) श्रेयो धर्मज्ञानं तु दुष्करम्(सुदुष्करम्) ।¦यः सतां धारको नित्यं स धर्म इति निश्चयः ॥ ११४॥ | ||
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| verse_text = कौशिकाख्यो ब्राह्मणो हि लीनं ग्रामजनं क्वचित् । | | verse_text = कौशिकाख्यो ब्राह्मणो हि लीनं ग्रामजनं क्वचित् । | ||
| verse_lines = कौशिकाख्यो ब्राह्मणो हि लीनं ग्रामजनं क्वचित् | | verse_lines = कौशिकाख्यो ब्राह्मणो हि लीनं ग्रामजनं क्वचित् ।¦तस्करेष्वभिधायैव निरयं प्रत्यपद्यत ॥ ११५॥ | ||
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| verse_text = कश्चिद् व्याधो मृगं हत्वा मातापितृनिमित्ततः । | | verse_text = कश्चिद् व्याधो मृगं हत्वा मातापितृनिमित्ततः । | ||
| verse_lines = कश्चिद् व्याधो मृगं हत्वा मातापितृनिमित्ततः | | verse_lines = कश्चिद् व्याधो मृगं हत्वा मातापितृनिमित्ततः ।¦भक्षार्थमभ्यगात् स्वर्गमसुरोऽसौ(आसुरोऽसौ) मृगो यतः ।¦उपद्रवाय लोकस्य तपश्चरति दुर्मतिः ॥ ११६॥ | ||
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| verse_text = तस्मात् सद्धारको धर्म इति कृत्वा विनिश्चयम् । | | verse_text = तस्मात् सद्धारको धर्म इति कृत्वा विनिश्चयम् । | ||
| verse_lines = तस्मात् सद्धारको धर्म इति कृत्वा विनिश्चयम् | | verse_lines = तस्मात् सद्धारको धर्म इति कृत्वा विनिश्चयम् ।¦मा नृपं जहि सत्यां त्वङ्कुरु वाचं तिरस्कुरु ।¦इत्युक्तो बहुधाऽनिन्दत् क्रोधादेवार्जुनो नृपम् ॥ ११७॥ | ||
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| verse_text = त्वं नृशंसोऽकृतघ्नश्च निर्वीर्यः पुरुषंवदः । | | verse_text = त्वं नृशंसोऽकृतघ्नश्च निर्वीर्यः पुरुषंवदः । | ||
| verse_lines = त्वं नृशंसोऽकृतघ्नश्च निर्वीर्यः पुरुषंवदः | | verse_lines = त्वं नृशंसोऽकृतघ्नश्च निर्वीर्यः पुरुषंवदः ।¦त्वत्तः सुखं नास्ति किञ्चिन्न मां गर्हितुमर्हसि ॥ ११८॥ | ||
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| verse_text = भीमो मां गर्हितुं योग्यो यो ह्यस्माकं सदा गतिः । | | verse_text = भीमो मां गर्हितुं योग्यो यो ह्यस्माकं सदा गतिः । | ||
| verse_lines = भीमो मां गर्हितुं योग्यो यो ह्यस्माकं सदा गतिः | | verse_lines = भीमो मां गर्हितुं योग्यो यो ह्यस्माकं सदा गतिः ।¦यो युद्ध्यते सर्ववीरैरद्यापि त्वं तु निन्दकः ॥ ११९॥ | ||
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| verse_text = इत्याद्युक्त्वाऽऽत्मनाशाय विकोशं चकृवानसिम् । | | verse_text = इत्याद्युक्त्वाऽऽत्मनाशाय विकोशं चकृवानसिम् । | ||
| verse_lines = इत्याद्युक्त्वाऽऽत्मनाशाय विकोशं चकृवानसिम् | | verse_lines = इत्याद्युक्त्वाऽऽत्मनाशाय विकोशं चकृवानसिम् ।¦पुनः कृष्णेन पृष्टः स (पृष्टः सन्) स्वाभिप्रायमुवाच सः ।¦तच्छ्रुत्वा गर्हयित्वैनं पुनराह जनार्दनः ॥ १२०॥ | ||
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| verse_text = मतिपूर्वं देहहानात्(देहनाशात्) पापं महदवाप्यते । | | verse_text = मतिपूर्वं देहहानात्(देहनाशात्) पापं महदवाप्यते । | ||
| verse_lines = मतिपूर्वं देहहानात्(देहनाशात्) पापं महदवाप्यते | | verse_lines = मतिपूर्वं देहहानात्(देहनाशात्) पापं महदवाप्यते ।¦धर्मार्थकाममोक्षाणां साधनं देहतोऽस्ति यत् ॥ १२१॥ | ||
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| verse_lines = अतो मा त्यज देहं तु कुरु चाऽत्मप्रशंसनम्(कुरुष्वात्मप्रशंसनम्) | | verse_lines = अतो मा त्यज देहं तु कुरु चाऽत्मप्रशंसनम्(कुरुष्वात्मप्रशंसनम्) ।¦वधो गुरूणां त्वङ्कारः स्वप्रशंसैव चात्मनः ।¦इत्युक्तः स त्वहङ्काराच्छशंस स्वगुणानलम् ॥ १२२॥ | ||
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| verse_lines = गुरुनिन्दाऽऽत्मपूजा च न धर्माय भवेत् क्वचित् | | verse_lines = गुरुनिन्दाऽऽत्मपूजा च न धर्माय भवेत् क्वचित् ।¦तथाऽप्यर्जुनहार्दं तत् सम्प्रकाश्य जनार्दनः ॥ १२३॥ | ||
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| verse_lines = तस्य लज्जां समुत्पाद्य नाशयित्वा च तं मदम् | | verse_lines = तस्य लज्जां समुत्पाद्य नाशयित्वा च तं मदम् ।¦नाहं वेद परं धर्मं कृष्ण एव गतिर्मम ॥ १२४॥ | ||
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| verse_lines = इति भावं समुत्पाद्य दोषान् नाशयितुं हरिः | | verse_lines = इति भावं समुत्पाद्य दोषान् नाशयितुं हरिः ।¦कारयामास तत् सर्वमर्जुनेन जगत्पतिः ॥ १२५॥ | ||
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| verse_lines = तत एवदविज्ञानात् कुपितो नृपतिर्भृशम् | | verse_lines = तत एवदविज्ञानात् कुपितो नृपतिर्भृशम् ।¦आहास्तु राजा भीमस्त्वं युवा मां जहि च स्वयम् ।¦वनं वा विफलो यामीत्युक्त्वोत्तस्थौ स्वतल्पतः ॥ १२६॥ | ||
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| verse_text = तं वासुदेवः प्रतिगृह्य हेतुमुक्त्वा सर्वं शमयामास नेता । | | verse_text = तं वासुदेवः प्रतिगृह्य हेतुमुक्त्वा सर्वं शमयामास नेता । | ||
| verse_lines = तं वासुदेवः प्रतिगृह्य हेतुमुक्त्वा सर्वं शमयामास नेता | | verse_lines = तं वासुदेवः प्रतिगृह्य हेतुमुक्त्वा सर्वं शमयामास नेता ।¦पार्थश्च भूपस्य पपात पादयोः क्षमापयन् सोऽपि सुप्रीतिमाप ॥ १२७॥ | ||
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| verse_text = तौ भ्रातरौ वासुदेवप्रसादान्महापदो मुक्तिमाप्यातिहृष्टौ । | | verse_text = तौ भ्रातरौ वासुदेवप्रसादान्महापदो मुक्तिमाप्यातिहृष्टौ । | ||
| verse_lines = तौ भ्रातरौ वासुदेवप्रसादान्महापदो मुक्तिमाप्यातिहृष्टौ | | verse_lines = तौ भ्रातरौ वासुदेवप्रसादान्महापदो मुक्तिमाप्यातिहृष्टौ ।¦भक्त्या समस्ताधिपतिं शशंसतुस्त्वया समः को नु हरे हितो नः ॥ १२८॥ | ||
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| verse_lines = ततः प्रणम्य बीभत्सुरग्रजं परिरम्भितः | | verse_lines = ततः प्रणम्य बीभत्सुरग्रजं परिरम्भितः ।¦तेनाभिनन्दितः प्रीत्या चाऽशीर्भिः प्रययौ युधे ॥ १२९॥ | ||
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| verse_lines = तं शङ्कितं कर्णजये स्विन्नगात्रं हरिस्तदा | | verse_lines = तं शङ्कितं कर्णजये स्विन्नगात्रं हरिस्तदा ।¦सङ्कीर्त्य पूर्वकर्माणि नरावेशं विशेषतः ।¦व्यञ्जयामास धैर्यं च तस्याऽसीत् तेन सुस्थिरम् ॥ १३०॥ | ||
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| verse_lines = भीमस्तदा शत्रुबलं समस्तं विद्रावयामास जघान चाऽजौ | | verse_lines = भीमस्तदा शत्रुबलं समस्तं विद्रावयामास जघान चाऽजौ ।¦वीरान् रणायाभिमुखान् स्वयन्त्रा कुर्वंश्च वार्ता(कुर्वन् स्ववार्ता) रममाण एव ॥ १३१॥ | ||
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| verse_lines = तदाऽऽसदत् तं शकुनिः ससैन्यो दुर्योधनस्यावरजैरुपेतः | | verse_lines = तदाऽऽसदत् तं शकुनिः ससैन्यो दुर्योधनस्यावरजैरुपेतः ।¦तं भीमसेनो विरथं निरायुधं विधाय बाणैर्भुवि च न्यपातयत् ॥ १३२॥ | ||
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| verse_text = न जघ्निवांस्तं सहदेवभागं प्रकल्पितं स्वेन तदाऽक्षगोष्ठ्या(तदाऽक्षगोष्ठ्याम्) । | | verse_text = न जघ्निवांस्तं सहदेवभागं प्रकल्पितं स्वेन तदाऽक्षगोष्ठ्या(तदाऽक्षगोष्ठ्याम्) । | ||
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| verse_lines = दुर्योधनस्यावरजा दशात्र प्रदुद्रुवुर्भीमसेनं विहाय | | verse_lines = दुर्योधनस्यावरजा दशात्र प्रदुद्रुवुर्भीमसेनं विहाय ।¦तदाऽर्जुनं वासुदेवं च दृष्ट्वा प्रीतः श्रुत्वा धर्मराजप्रवृत्तिम् ॥ १३४॥ | ||
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| verse_lines = पुनश्च निघ्नन्तमरिप्रवीरान् विद्रावयन्तं च निजां वरूथिनीम् | | verse_lines = पुनश्च निघ्नन्तमरिप्रवीरान् विद्रावयन्तं च निजां वरूथिनीम् ।¦ससार दुःशासन आत्तधन्वा भीमोऽपि तं सिंह इवाभिपेदिवान् ॥ १३५॥ | ||
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| verse_lines = तं रूक्षवाचो मुहुरर्पयन्तं विधाय भीमो विरथं क्षणेन | | verse_lines = तं रूक्षवाचो मुहुरर्पयन्तं विधाय भीमो विरथं क्षणेन ।¦प्रगृह्य भूमौ विनिपात्य वक्षो विदारयामास गदाप्रहारतः ॥ १३६॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = कृत्वाऽस्य वक्षस्युरुसत्तटाकं पपौ निकामं तृषितोऽमृतोपमम् । | | verse_text = कृत्वाऽस्य वक्षस्युरुसत्तटाकं पपौ निकामं तृषितोऽमृतोपमम् । | ||
| verse_lines = कृत्वाऽस्य वक्षस्युरुसत्तटाकं पपौ निकामं तृषितोऽमृतोपमम् | | verse_lines = कृत्वाऽस्य वक्षस्युरुसत्तटाकं पपौ निकामं तृषितोऽमृतोपमम् ।¦तच्छोणिताम्भो भ्रमदक्षमेनं संस्मारयामास पुरा कृतानि ॥ १३८॥ | ||
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| verse_text = वाक्सायकांश्चास्य पुरा समर्पितान् संस्मारयामास पुनः पुनर्भृशम् । | | verse_text = वाक्सायकांश्चास्य पुरा समर्पितान् संस्मारयामास पुनः पुनर्भृशम् । | ||
| verse_lines = वाक्सायकांश्चास्य पुरा समर्पितान् संस्मारयामास पुनः पुनर्भृशम् | | verse_lines = वाक्सायकांश्चास्य पुरा समर्पितान् संस्मारयामास पुनः पुनर्भृशम् ।¦दन्तान्तरं न प्रविवेश तस्य रक्तं ह्यपेयं पुरुषस्य जानतः ॥ १३९॥ | ||
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| verse_text = तथाऽपि शत्रुप्रतिभीषणाय पपाविवाऽस्वाद्य पुनःपुनर्भृशम् । | | verse_text = तथाऽपि शत्रुप्रतिभीषणाय पपाविवाऽस्वाद्य पुनःपुनर्भृशम् । | ||
| verse_lines = तथाऽपि शत्रुप्रतिभीषणाय पपाविवाऽस्वाद्य पुनःपुनर्भृशम् | | verse_lines = तथाऽपि शत्रुप्रतिभीषणाय पपाविवाऽस्वाद्य पुनःपुनर्भृशम् ।¦स्मरन् नृसिंहं भगवन्तमीश्वरं स मन्युसूक्तं च ददर्श भक्त्या ॥ १४०॥ | ||
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| verse_text = ‘यस्ते मन्यो'’ (ऋ.१०.८३.१) इत्यतो नारसिंहं सोमं तस्मै चाऽर्पयच्छोणिताख्यम्(प्रार्पयच्छोणिताख्यम्)। | | verse_text = ‘यस्ते मन्यो'’ (ऋ.१०.८३.१) इत्यतो नारसिंहं सोमं तस्मै चाऽर्पयच्छोणिताख्यम्(प्रार्पयच्छोणिताख्यम्)। | ||
| verse_lines = ‘यस्ते मन्यो'’ (ऋ.१०.८३.१) इत्यतो नारसिंहं सोमं तस्मै चाऽर्पयच्छोणिताख्यम्(प्रार्पयच्छोणिताख्यम्) | | verse_lines = ‘यस्ते मन्यो'’ (ऋ.१०.८३.१) इत्यतो नारसिंहं सोमं तस्मै चाऽर्पयच्छोणिताख्यम्(प्रार्पयच्छोणिताख्यम्)।¦युद्धाख्ययज्ञे सोमबुद्ध्याऽरिवक्ष ईहेति साम्ना गदया विभिन्दन् ॥ १४१॥ | ||
}} | }} | ||
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| Line 34,310: | Line 34,310: | ||
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| verse_text = उवाच वाचं पुरुषप्रवीरः सत्यां प्रतिज्ञां लोकमध्ये विधाय । | | verse_text = उवाच वाचं पुरुषप्रवीरः सत्यां प्रतिज्ञां लोकमध्ये विधाय । | ||
| verse_lines = उवाच वाचं पुरुषप्रवीरः सत्यां प्रतिज्ञां लोकमध्ये विधाय | | verse_lines = उवाच वाचं पुरुषप्रवीरः सत्यां प्रतिज्ञां लोकमध्ये विधाय ।¦याः सपतयस्ता अपतयो हि जाता यासाऽपतिः(याऽऽसाऽपतिः सा) सा सपतिश्च जाता ॥ १४२॥ | ||
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| verse_text = पश्यन्तु चित्रां परमस्य शक्तिं ये वै तिलाः षण्ढतिला बभूवुः । | | verse_text = पश्यन्तु चित्रां परमस्य शक्तिं ये वै तिलाः षण्ढतिला बभूवुः । | ||
| verse_lines = पश्यन्तु चित्रां परमस्य शक्तिं ये वै तिलाः षण्ढतिला बभूवुः | | verse_lines = पश्यन्तु चित्रां परमस्य शक्तिं ये वै तिलाः षण्ढतिला बभूवुः ।¦एनं गृहीतं च(हि) मया यदीह कश्चित् पुमान् मोचयतु स्ववीर्यात् ॥ १४३॥ | ||
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| verse_text = इति ब्रुवाणः पुनरेव रक्तं पपौ सुधां देववरो यथा दिवि । | | verse_text = इति ब्रुवाणः पुनरेव रक्तं पपौ सुधां देववरो यथा दिवि । | ||
| verse_lines = इति ब्रुवाणः पुनरेव रक्तं पपौ सुधां देववरो यथा दिवि | | verse_lines = इति ब्रुवाणः पुनरेव रक्तं पपौ सुधां देववरो यथा दिवि ।¦पुनश्च सप्राणममुं(सप्राणमेनं) विसृज्य नदन् ननर्तारिबले निरायुधः ॥ १४४॥ | ||
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| verse_text = प्रत्यनृत्यन् येऽस्मान् पुनर्गौरिति गौरिति । | | verse_text = प्रत्यनृत्यन् येऽस्मान् पुनर्गौरिति गौरिति । | ||
| verse_lines = प्रत्यनृत्यन् येऽस्मान् पुनर्गौरिति गौरिति | | verse_lines = प्रत्यनृत्यन् येऽस्मान् पुनर्गौरिति गौरिति ।¦तान् वयं प्रतिनृत्यामः पुनर्गौरिति गौरिति ॥ १४५॥ | ||
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| verse_text = इति ब्रुवन् नृत्यमानोऽरिमध्य आस्फोटयञ्छत्रुगणानजोहवीत् । | | verse_text = इति ब्रुवन् नृत्यमानोऽरिमध्य आस्फोटयञ्छत्रुगणानजोहवीत् । | ||
| verse_lines = इति ब्रुवन् नृत्यमानोऽरिमध्य आस्फोटयञ्छत्रुगणानजोहवीत् | | verse_lines = इति ब्रुवन् नृत्यमानोऽरिमध्य आस्फोटयञ्छत्रुगणानजोहवीत् ।¦शशाक च द्रष्टुममुं न कश्चिद् वैकर्तनद्रौणिसुयोधनादिषु ॥ १४६॥ | ||
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| verse_text = भयाच्च कर्णस्य पपात कार्मुकं निमीलयामास तदाऽक्षिणी च । | | verse_text = भयाच्च कर्णस्य पपात कार्मुकं निमीलयामास तदाऽक्षिणी च । | ||
| verse_lines = भयाच्च कर्णस्य पपात कार्मुकं निमीलयामास तदाऽक्षिणी च | | verse_lines = भयाच्च कर्णस्य पपात कार्मुकं निमीलयामास तदाऽक्षिणी च ।¦सम्बोधितो मद्रराजेन युद्धे स्थितः कथञ्चित् स तु पार्थभागः ॥ १४७॥ | ||
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| verse_text = द्रौणिर्विहायैनमपाजगाम(विहायैतमपाजगाम) दूरं तदा भीमसेनो जगाद । | | verse_text = द्रौणिर्विहायैनमपाजगाम(विहायैतमपाजगाम) दूरं तदा भीमसेनो जगाद । | ||
| verse_lines = द्रौणिर्विहायैनमपाजगाम(विहायैतमपाजगाम) दूरं तदा भीमसेनो जगाद | | verse_lines = द्रौणिर्विहायैनमपाजगाम(विहायैतमपाजगाम) दूरं तदा भीमसेनो जगाद ।¦पीतः सोमो युद्धयज्ञे मयाऽद्य वध्यः पशुर्मे हरये सुयोधनः ॥ १४८॥ | ||
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| verse_text = इति ब्रुवन् मृतमुत्सृज्य शत्रुं दुर्योधनं चाऽशु रुषाऽभिदुद्रुवे । | | verse_text = इति ब्रुवन् मृतमुत्सृज्य शत्रुं दुर्योधनं चाऽशु रुषाऽभिदुद्रुवे । | ||
| verse_lines = इति ब्रुवन् मृतमुत्सृज्य शत्रुं दुर्योधनं चाऽशु रुषाऽभिदुद्रुवे | | verse_lines = इति ब्रुवन् मृतमुत्सृज्य शत्रुं दुर्योधनं चाऽशु रुषाऽभिदुद्रुवे ।¦आयान्तमीक्ष्यैव तमुग्रपौरुषं दुद्राव भीतः स सुयोधनो भृशम् ॥ १४९॥ | ||
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| verse_text = बलद्वयं चापययौ विहाय भयाद् भीमं कृष्णपार्थौ विनैव । | | verse_text = बलद्वयं चापययौ विहाय भयाद् भीमं कृष्णपार्थौ विनैव । | ||
| verse_lines = बलद्वयं चापययौ विहाय भयाद् भीमं कृष्णपार्थौ विनैव | | verse_lines = बलद्वयं चापययौ विहाय भयाद् भीमं कृष्णपार्थौ विनैव ।¦आयोधनं शून्यमभून्मुहूर्तं ननर्त भीमो व्याघ्रपदेन हर्षात् ॥ १५०॥ | ||
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| verse_text = सङ्कल्प्य शत्रून् गोवदेवाऽजिमध्ये शार्दूलवत् तच्चरितं निशाम्य । | | verse_text = सङ्कल्प्य शत्रून् गोवदेवाऽजिमध्ये शार्दूलवत् तच्चरितं निशाम्य । | ||
| verse_lines = सङ्कल्प्य शत्रून् गोवदेवाऽजिमध्ये शार्दूलवत् तच्चरितं निशाम्य | | verse_lines = सङ्कल्प्य शत्रून् गोवदेवाऽजिमध्ये शार्दूलवत् तच्चरितं निशाम्य ।¦जहास कृष्णश्च धनञ्जयश्च शशंसतुश्चैनमतिप्रहृष्टौ ॥ १५१॥ | ||
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| verse_lines = यदा स रङ्गः पवमानसूनुना शून्यः कृतस्तत्र महूर्तमात्रात् | | verse_lines = यदा स रङ्गः पवमानसूनुना शून्यः कृतस्तत्र महूर्तमात्रात् ।¦दुर्योधनस्यावरजाः शरौघैरवीवृषन् भीममुदारसत्त्वम् ॥ १५२॥ | ||
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| verse_lines = तान् मारुतिर्बाणवरैर्निकृत्तशीर्षान् यमायानयदाशु वीरः | | verse_lines = तान् मारुतिर्बाणवरैर्निकृत्तशीर्षान् यमायानयदाशु वीरः ।¦तस्मिन् दिने विंशतिर्धार्तराष्ट्र हतास्तदन्ये समरात् प्रदुद्रुवुः ॥ १५३॥ | ||
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| verse_lines = कर्माण्यनन्यौपयिकानि(कर्माण्यनन्यौपधिकानि) भीमे कुर्वत्येवं (भीमभीते)भीतभीतेऽरिसङ्घे | | verse_lines = कर्माण्यनन्यौपयिकानि(कर्माण्यनन्यौपधिकानि) भीमे कुर्वत्येवं (भीमभीते)भीतभीतेऽरिसङ्घे ।¦निमीलिताक्षे च भयेन कर्णे कर्णात्मजो नकुलं प्रत्यधावत् ॥ १५४॥ | ||
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| verse_lines = माद्रीसुतो वृषसेनं शरौघैरवारयत् तं विरथं चकार | | verse_lines = माद्रीसुतो वृषसेनं शरौघैरवारयत् तं विरथं चकार ।¦कर्णात्मजः सोऽप्यसिचर्मपाणिस्तस्यानुगांस्त्रिसहस्रं जघान ॥ १५५॥ | ||
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| verse_lines = कर्णात्मजस्तस्य सञ्छिद्य चर्म भीमार्जुनादीनपि बाणसङ्घैः | | verse_lines = कर्णात्मजस्तस्य सञ्छिद्य चर्म भीमार्जुनादीनपि बाणसङ्घैः ।¦अवीवृषत् तस्य पार्थः शरेण ग्रीवाबाहूरून् युगपच्चकर्त ॥ १५६॥ | ||
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| verse_lines = एकेन बाणेन सुते हते स्वे वैकर्तनो वासविमभ्यधावत् | | verse_lines = एकेन बाणेन सुते हते स्वे वैकर्तनो वासविमभ्यधावत् ।¦तयोरभूद् द्वैरथयुद्धमद्भुतं सर्वास्त्रविद्वरयोरुग्ररूपम् ॥ १५७॥ | ||
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| verse_lines = पक्षग्रहास्तत्र सुरासुरास्तयोरन्ये च जीवा गगनं समाश्रिताः | | verse_lines = पक्षग्रहास्तत्र सुरासुरास्तयोरन्ये च जीवा गगनं समाश्रिताः ।¦महान् विवादोऽप्यभवत् तयोः कृते तदा गिरीशोऽवददब्जयोनिम् ॥ १५८॥ | ||
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| verse_lines = सुरासुराणां भीमदुर्योधनौ द्वौ समाश्रयौ तत्प्रियौ कर्णपार्थौ | | verse_lines = सुरासुराणां भीमदुर्योधनौ द्वौ समाश्रयौ तत्प्रियौ कर्णपार्थौ ।¦प्राणोपमौ तेन चैतत्कृते ते सुरासुराः कर्तुमिच्छन्ति युद्धम् ।¦तदा विनाशो जगतां महान् स्यात् तेनानयोः(तेनैतयोः) सममेवास्तु युद्धम् ॥ १५९॥ | ||
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| verse_lines = इतीरिते वासवः पद्मयोनिं जगाद कृष्णो यत्र जयश्च तत्र | | verse_lines = इतीरिते वासवः पद्मयोनिं जगाद कृष्णो यत्र जयश्च तत्र ।¦कामो न कृष्णस्य मृषा भवेद्धि कामोऽस्य पार्थस्य जयं प्रदातुम् ॥ १६०॥ | ||
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| verse_lines = इत्यूचिवान् वासवः फल्गुनस्य जयोऽस्तु कर्णस्य वधस्तथेति | | verse_lines = इत्यूचिवान् वासवः फल्गुनस्य जयोऽस्तु कर्णस्य वधस्तथेति ।¦उक्त्वाऽनमत् कञ्जभवं तथेति प्राहासुरान् देवताश्चाऽबभाषे ॥ १६१॥ | ||
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| verse_lines = न कर्णार्जुनयोरर्थे विरोधं कुरुत क्वचित् | | verse_lines = न कर्णार्जुनयोरर्थे विरोधं कुरुत क्वचित् ।¦भीमदुर्योधनार्थे वा पश्यन्त्वेव च सङ्गरम् (संयुगम्) ।¦इत्युक्ते शान्तिमापन्ना ददृशुः सङ्गरं तयोः ॥ १६२॥ | ||
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| verse_text = ववर्षतुस्तौ च महास्त्रशस्त्रैर्भीमो रथस्थोऽवरजं जुगोप । | | verse_text = ववर्षतुस्तौ च महास्त्रशस्त्रैर्भीमो रथस्थोऽवरजं जुगोप । | ||
| verse_lines = ववर्षतुस्तौ च महास्त्रशस्त्रैर्भीमो रथस्थोऽवरजं जुगोप | | verse_lines = ववर्षतुस्तौ च महास्त्रशस्त्रैर्भीमो रथस्थोऽवरजं जुगोप ।¦शैनेयपाञ्चालमुखाश्च पार्थमावार्य तस्थुः प्रसभं नदन्तः ॥ १६३॥ | ||
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| verse_lines = दुर्योधनो द्रौणिमुखाश्च कर्णं ररक्षुरावार्य तदाऽऽस युद्धम् | | verse_lines = दुर्योधनो द्रौणिमुखाश्च कर्णं ररक्षुरावार्य तदाऽऽस युद्धम् ।¦तत्रार्जुनं बाणवरैः(बाणगणैः) स कर्णः सम्मर्दयामास(समर्दयामास) विशेषयन् रणे ॥ १६४॥ | ||
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| verse_lines = तदा नदन् भीमसेनो जगाद गदां समादाय समात्तरोषः | | verse_lines = तदा नदन् भीमसेनो जगाद गदां समादाय समात्तरोषः ।¦अहं वैनं गदया पोथयामि त्वं वा जहीमं समुपात्तवीर्यः ।¦कृष्णोऽपि तं बोधयामास सम्यङ् नरावेशं व्यञ्जयन् भूय एव ॥ १६५॥ | ||
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| verse_lines = समृद्धवीर्यः स तदा धनञ्जयः सुयोधनद्रौणिकृपान् सभोजान् | | verse_lines = समृद्धवीर्यः स तदा धनञ्जयः सुयोधनद्रौणिकृपान् सभोजान् ।¦साकं च बाणैर्विरथांश्चकार विव्याध तानप्यरिहा सुपुङ्खैः ॥ १६६॥ | ||
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| verse_lines = ते किञ्चिद् दूरतस्थुः पश्यन्तो युद्धमुत्तमम् | | verse_lines = ते किञ्चिद् दूरतस्थुः पश्यन्तो युद्धमुत्तमम् ।¦अमानुषं तत् पार्थस्य दृष्ट्वा कर्म गुरोः सुतः ।¦गृहीत्वा पाणिना पाणिं दुर्योधनमभाषत ॥ १६७॥ | ||
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| verse_text = धनञ्जयस्तिष्ठति वारितो मया जनार्दनो नैव विरोधमिच्छति । | | verse_text = धनञ्जयस्तिष्ठति वारितो मया जनार्दनो नैव विरोधमिच्छति । | ||
| verse_lines = धनञ्जयस्तिष्ठति वारितो मया जनार्दनो नैव विरोधमिच्छति | | verse_lines = धनञ्जयस्तिष्ठति वारितो मया जनार्दनो नैव विरोधमिच्छति ।¦वृकोदरस्तद्वचने स्थितः सदा युधिष्ठिरः शान्तमनास्तथा यमौ ॥ १६९॥ | ||
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| verse_text = हितार्थमेतत् तव वाक्यमीरितं गृहाण मे नैव भयादुदीरितम् । | | verse_text = हितार्थमेतत् तव वाक्यमीरितं गृहाण मे नैव भयादुदीरितम् । | ||
| verse_lines = हितार्थमेतत् तव वाक्यमीरितं गृहाण मे नैव भयादुदीरितम् | | verse_lines = हितार्थमेतत् तव वाक्यमीरितं गृहाण मे नैव भयादुदीरितम् ।¦अहं ह्यवध्यो मम चैव मातुलो न शङ्कितुं मे वचनं त्वमर्हसि ॥ १७०॥ | ||
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| verse_text = इतीरितः प्राह सुयोधनस्तं दुःशासनस्याद्य पपौ हि शोणितम् । | | verse_text = इतीरितः प्राह सुयोधनस्तं दुःशासनस्याद्य पपौ हि शोणितम् । | ||
| verse_lines = इतीरितः प्राह सुयोधनस्तं दुःशासनस्याद्य पपौ हि शोणितम् | | verse_lines = इतीरितः प्राह सुयोधनस्तं दुःशासनस्याद्य पपौ हि शोणितम् ।¦शार्दूलचेष्टामकरोच्च भीमो न मे कथञ्चित् तदनेन सन्धिः ॥ १७१॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तो द्रौणिरासीत् स तूष्णीं कर्णधनञ्जयौ । | | verse_text = इत्युक्तो द्रौणिरासीत् स तूष्णीं कर्णधनञ्जयौ । | ||
| verse_lines = इत्युक्तो द्रौणिरासीत् स तूष्णीं कर्णधनञ्जयौ | | verse_lines = इत्युक्तो द्रौणिरासीत् स तूष्णीं कर्णधनञ्जयौ ।¦महास्त्रशस्त्रवर्षेण चक्रतुः खं निरन्तरम् ॥ १७२॥ | ||
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| verse_text = आग्नेयवारुणैन्द्रादीन्येतान्यन्योन्यमृत्यवे । | | verse_text = आग्नेयवारुणैन्द्रादीन्येतान्यन्योन्यमृत्यवे । | ||
| verse_lines = आग्नेयवारुणैन्द्रादीन्येतान्यन्योन्यमृत्यवे | | verse_lines = आग्नेयवारुणैन्द्रादीन्येतान्यन्योन्यमृत्यवे ।¦ब्रह्मास्त्रमप्युभौ तत्र प्रयुज्याऽनदतां रणे ।¦अन्योन्यास्त्रप्रतीघातं कृत्वोभौ च विरेजतुः ॥ १७३॥ | ||
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| verse_text = क्रमेण वृद्धोरुबलेन तत्र सुरेन्द्रपुत्रेण विरोचनात्मजः । | | verse_text = क्रमेण वृद्धोरुबलेन तत्र सुरेन्द्रपुत्रेण विरोचनात्मजः । | ||
| verse_lines = क्रमेण वृद्धोरुबलेन तत्र सुरेन्द्रपुत्रेण विरोचनात्मजः | | verse_lines = क्रमेण वृद्धोरुबलेन तत्र सुरेन्द्रपुत्रेण विरोचनात्मजः ।¦निराकृतो नागमयं शरोत्तमं ब्रह्मास्त्रयुक्तं विससर्ज वासवौ ॥ १७४॥ | ||
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| verse_text = तं वासुदेवो रथमानमय्य मोघं चकारार्जुनतः किरीटम् । | | verse_text = तं वासुदेवो रथमानमय्य मोघं चकारार्जुनतः किरीटम् । | ||
| verse_lines = तं वासुदेवो रथमानमय्य मोघं चकारार्जुनतः किरीटम् | | verse_lines = तं वासुदेवो रथमानमय्य मोघं चकारार्जुनतः किरीटम् ।¦चूर्णीकृतं तेन सुरेन्द्रसूनोर्दिव्यं ययौ(दिवं ययौ) बाणगतश्च नागः ॥ १७५॥ | ||
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| verse_text = नमिते(नमितं) वासुदेवेन रथे पञ्चाङ्गुलं भुवि । | | verse_text = नमिते(नमितं) वासुदेवेन रथे पञ्चाङ्गुलं भुवि । | ||
| verse_lines = नमिते(नमितं) वासुदेवेन रथे पञ्चाङ्गुलं भुवि | | verse_lines = नमिते(नमितं) वासुदेवेन रथे पञ्चाङ्गुलं भुवि ।¦अपाङ्गदेशमुद्दिश्य मुक्ते नागे किरीटिनः ॥ १७६॥ | ||
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| verse_text = भङ्क्त्वा किरीटं वियति गच्छति प्रभुणोदितः । | | verse_text = भङ्क्त्वा किरीटं वियति गच्छति प्रभुणोदितः । | ||
| verse_lines = भङ्क्त्वा किरीटं वियति गच्छति प्रभुणोदितः | | verse_lines = भङ्क्त्वा किरीटं वियति गच्छति प्रभुणोदितः ।¦बाणैस्तक्षकपुत्रं तं वासविः पूर्ववैरिणम् ।¦हत्वा निपातयामास भूमौ कर्णस्य पश्यतः॥ १७७॥ | ||
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| verse_text = पुनश्च पार्थेन महास्त्रयुद्धं प्रकुर्वतः सूर्यसुतस्य चक्रम् । | | verse_text = पुनश्च पार्थेन महास्त्रयुद्धं प्रकुर्वतः सूर्यसुतस्य चक्रम् । | ||
| verse_lines = पुनश्च पार्थेन महास्त्रयुद्धं प्रकुर्वतः सूर्यसुतस्य चक्रम् | | verse_lines = पुनश्च पार्थेन महास्त्रयुद्धं प्रकुर्वतः सूर्यसुतस्य चक्रम् ।¦रथस्य भूमिर्ग्रसति स्म शापादस्त्राणि दिव्यानि च विस्मृतिं ययुः ॥ १७९॥ | ||
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| verse_text = उद्धर्तुकामो रथचक्रमेव पार्थं ययाचेऽवसरं प्रदातुम् । | | verse_text = उद्धर्तुकामो रथचक्रमेव पार्थं ययाचेऽवसरं प्रदातुम् । | ||
| verse_lines = उद्धर्तुकामो रथचक्रमेव पार्थं ययाचेऽवसरं प्रदातुम् | | verse_lines = उद्धर्तुकामो रथचक्रमेव पार्थं ययाचेऽवसरं प्रदातुम् ।¦नेत्याह कृष्णोऽञ्जलिकं सुघोरं त्रिनेत्रदत्तं जगृहे च पार्थः ॥ १८०॥ | ||
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| verse_text = सत्येन धर्मेण च सन्नियोज्य मुमोच कर्णस्य वधाय बाणम् । | | verse_text = सत्येन धर्मेण च सन्नियोज्य मुमोच कर्णस्य वधाय बाणम् । | ||
| verse_lines = सत्येन धर्मेण च सन्नियोज्य मुमोच कर्णस्य वधाय बाणम् | | verse_lines = सत्येन धर्मेण च सन्नियोज्य मुमोच कर्णस्य वधाय बाणम् ।¦चिच्छेद तेनैव च तस्य शीर्षं सन्धित्सतो बाणवरं सुघोरम् ॥ १८१॥ | ||
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| verse_text = अपराह्णेऽपराह्णस्य सूतजस्येन्द्रसूनुना । | | verse_text = अपराह्णेऽपराह्णस्य सूतजस्येन्द्रसूनुना । | ||
| verse_lines = अपराह्णेऽपराह्णस्य सूतजस्येन्द्रसूनुना | | verse_lines = अपराह्णेऽपराह्णस्य सूतजस्येन्द्रसूनुना ।¦छिन्नमञ्जलिकेनाऽजौ सोत्सेधमपतच्छिरः ॥ १८२॥ | ||
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| verse_text = तस्मिन् हते दीनमुखः सुयोधनो ययौ समाहृत्य(समागत्य) बलं सशल्यः । | | verse_text = तस्मिन् हते दीनमुखः सुयोधनो ययौ समाहृत्य(समागत्य) बलं सशल्यः । | ||
| verse_lines = तस्मिन् हते दीनमुखः सुयोधनो ययौ समाहृत्य(समागत्य) बलं सशल्यः | | verse_lines = तस्मिन् हते दीनमुखः सुयोधनो ययौ समाहृत्य(समागत्य) बलं सशल्यः ।¦युधिष्ठिरः कर्णवधं निशम्य तदा समागत्य ददर्श तत्तनुम् ॥ १८३॥ | ||
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| verse_text = शशंस कृष्णं च धनञ्जयं च भीमं च येऽन्येऽपि युधि प्रवीराः । | | verse_text = शशंस कृष्णं च धनञ्जयं च भीमं च येऽन्येऽपि युधि प्रवीराः । | ||
| verse_lines = शशंस कृष्णं च धनञ्जयं च भीमं च येऽन्येऽपि युधि प्रवीराः | | verse_lines = शशंस कृष्णं च धनञ्जयं च भीमं च येऽन्येऽपि युधि प्रवीराः ।¦गत्वा च ते शिबिरं मोदमाना ऊषुः सकृष्णास्तदनुव्रताः सदा ॥ १८४॥ | ||
}} | }} | ||
<span id="gr-C28" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टाविंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C28" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="अष्टाविंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = ओं ॥ प्रभातायां तु शर्वर्यां गुरुपुत्रानुमोदितः । | | verse_text = ओं ॥ प्रभातायां तु शर्वर्यां गुरुपुत्रानुमोदितः । | ||
| verse_lines = ओं ॥ प्रभातायां तु शर्वर्यां गुरुपुत्रानुमोदितः | | verse_lines = ओं ॥ प्रभातायां तु शर्वर्यां गुरुपुत्रानुमोदितः ।¦शल्यं सेनापतिं कृत्वा योद्धुं दुर्योधनोऽभ्ययात् ॥ १॥ | ||
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| verse_lines = तमभ्ययुः पाण्डवाश्च हृष्टा युद्धाय दंशिताः (दंसिताः) | | verse_lines = तमभ्ययुः पाण्डवाश्च हृष्टा युद्धाय दंशिताः (दंसिताः) ।¦तत्राऽसीत् सुमहद् युद्धं पाण्डवानां परैः सह ॥ २॥ | ||
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| verse_lines = अग्रे भीमः पाण्डवानां मध्ये राजा युधिष्ठिरः | | verse_lines = अग्रे भीमः पाण्डवानां मध्ये राजा युधिष्ठिरः ।¦पृष्ठे गाण्डीवधन्वाऽऽसीद् वासुदेवाभिरक्षितः ॥ ३॥ | ||
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| verse_lines = चक्ररक्षौ यमौ राज्ञो धृष्टद्युम्नश्च सात्यकिः | | verse_lines = चक्ररक्षौ यमौ राज्ञो धृष्टद्युम्नश्च सात्यकिः ।¦नृपस्य पार्श्वयोरास्तामग्रेऽन्येषां गुरोः सुतः ॥ ४॥ | ||
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| verse_lines = मध्ये शल्यः पृष्ठतोऽभूद् भ्रातृभिश्च सुयोधनः | | verse_lines = मध्ये शल्यः पृष्ठतोऽभूद् भ्रातृभिश्च सुयोधनः ।¦चक्ररक्षौ तु शल्यस्य(तस्यास्तां) शकुनिस्तत्सुतस्तथा ।¦कृपश्च कृतवर्मा च पार्श्वयोः समवस्थितौ(समुपस्थितौ) ॥ ५॥ | ||
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| verse_lines = तत्रभवन्महद् युद्धं भीमस्य द्रौणिना सह | | verse_lines = तत्रभवन्महद् युद्धं भीमस्य द्रौणिना सह ।¦राज्ञः शल्येन च तथा घोररूपं भयानकम् ॥ ६॥ | ||
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| verse_lines = तत्र नातिप्रयत्नेन द्रौणिर्भीमेन सायकैः | | verse_lines = तत्र नातिप्रयत्नेन द्रौणिर्भीमेन सायकैः ।¦विरथीकृतस्तथा धर्मसूनुः शल्येन तत्क्षणात् ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = आससाद तदा शल्यं कपिप्रवरकेतनः । | | verse_text = आससाद तदा शल्यं कपिप्रवरकेतनः । | ||
| verse_lines = आससाद तदा शल्यं कपिप्रवरकेतनः | | verse_lines = आससाद तदा शल्यं कपिप्रवरकेतनः ।¦तयोरासीन्महद् युद्धमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ८॥ | ||
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| verse_lines = रथमन्यं समास्थाय द्रौणिर्भीमं समभ्ययात् | | verse_lines = रथमन्यं समास्थाय द्रौणिर्भीमं समभ्ययात् ।¦दुर्योधनश्च भीमस्य शरैरवारयद् दिशः ॥ ९॥ | ||
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| verse_lines = तावुभौ शरवर्षेण वारयामास मारुतिः | | verse_lines = तावुभौ शरवर्षेण वारयामास मारुतिः ।¦ताभ्यां तस्याभवद् युद्धं सुघोरमतिमानुषम् ॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = सहदेवस्तु शकुनिमुलूकं नकुलस्तदा(तथा) | | verse_lines = सहदेवस्तु शकुनिमुलूकं नकुलस्तदा(तथा) ।¦धृष्टद्युम्नश्च हार्दिक्यं सात्यकिः कृपमेव च ।¦तेषां तदभवद्(तदाऽभवत्) युद्धं चित्रं(चिरं) लघु च सुष्ठु च ॥ १२॥ | ||
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| verse_lines = शल्यस्तु शरसङ्घातैः पार्थस्यावारयद् दिशः | | verse_lines = शल्यस्तु शरसङ्घातैः पार्थस्यावारयद् दिशः ।¦सोऽपि विव्याध विशिखैः शल्यमाहवशोभिनम् ।¦तयोः सुसममेवाऽसीच्चिरं देवासुरोपमम् ॥ १३॥ | ||
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| verse_lines = पुनर्न्यकृन्तत् तच्चापमिन्द्रसूनुरमर्षितः | | verse_lines = पुनर्न्यकृन्तत् तच्चापमिन्द्रसूनुरमर्षितः ।¦शल्यो गदां समाधाय चिक्षेपार्जुनवक्षसि ।¦तदा मुमोह बीभत्सुस्तत उच्चुक्रुशुः परे ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = निहत्याश्वान् सात्यकेश्च धृष्टद्युम्नस्य चाभिभूः । | | verse_text = निहत्याश्वान् सात्यकेश्च धृष्टद्युम्नस्य चाभिभूः । | ||
| verse_lines = निहत्याश्वान् सात्यकेश्च धृष्टद्युम्नस्य चाभिभूः | | verse_lines = निहत्याश्वान् सात्यकेश्च धृष्टद्युम्नस्य चाभिभूः ।¦चापे च्छित्त्वा च यमयोर्दध्मौ शङ्खं महास्वनम् ॥ २३॥ | ||
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| verse_text = ततस्तु शल्यं समुदीर्यमाणं दृष्ट्वा रणे भीमसेनस्तरस्वी(भीमसेनस्तपस्वी) । | | verse_text = ततस्तु शल्यं समुदीर्यमाणं दृष्ट्वा रणे भीमसेनस्तरस्वी(भीमसेनस्तपस्वी) । | ||
| verse_lines = ततस्तु शल्यं समुदीर्यमाणं दृष्ट्वा रणे भीमसेनस्तरस्वी(भीमसेनस्तपस्वी) | | verse_lines = ततस्तु शल्यं समुदीर्यमाणं दृष्ट्वा रणे भीमसेनस्तरस्वी(भीमसेनस्तपस्वी) ।¦न्यवारयद् बाणवरैरनेकैश्चकार चैनं विरथं क्षणेन ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = आस्थाय चान्यं रथमापतन्तं पुनश्च शल्यं भृशमेव मर्मसु । | | verse_text = आस्थाय चान्यं रथमापतन्तं पुनश्च शल्यं भृशमेव मर्मसु । | ||
| verse_lines = आस्थाय चान्यं रथमापतन्तं पुनश्च शल्यं भृशमेव मर्मसु | | verse_lines = आस्थाय चान्यं रथमापतन्तं पुनश्च शल्यं भृशमेव मर्मसु ।¦निर्भिद्य बाणैर्विरथं चकार पुनस्तृतीयं रथमारुरोज(आरुरोह) ॥ २५॥ | ||
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| verse_text = आत्तान्यात्तान्यायुधान्यस्य भीमः सर्वाणि चिच्छेद बिभेद चास्य । | | verse_text = आत्तान्यात्तान्यायुधान्यस्य भीमः सर्वाणि चिच्छेद बिभेद चास्य । | ||
| verse_lines = आत्तान्यात्तान्यायुधान्यस्य भीमः सर्वाणि चिच्छेद बिभेद चास्य | | verse_lines = आत्तान्यात्तान्यायुधान्यस्य भीमः सर्वाणि चिच्छेद बिभेद चास्य ।¦मर्माणि बाणैर्नितरां पुनश्च स मुष्टिमुद्यम्य जगाम धर्मजम् ॥ २६॥ | ||
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| verse_text = तं भीमभिन्नमर्माणं विवर्माणं निरायुधम् । | | verse_text = तं भीमभिन्नमर्माणं विवर्माणं निरायुधम् । | ||
| verse_lines = तं भीमभिन्नमर्माणं विवर्माणं निरायुधम् | | verse_lines = तं भीमभिन्नमर्माणं विवर्माणं निरायुधम् ।¦श्वासमात्रावशिष्टं च मरणायैव केवलम् ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = आत्मानमभिगच्छन्तं दृष्ट्वाऽन्यं रथमास्थितः | | verse_lines = आत्मानमभिगच्छन्तं दृष्ट्वाऽन्यं रथमास्थितः ।¦हन्तुकामो रणे वीरममोघां शक्तिमाददे ॥ २८॥ | ||
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| verse_text = दिव्यास्त्रैरपि संयोज्य तां तदा धर्मनन्दनः । | | verse_text = दिव्यास्त्रैरपि संयोज्य तां तदा धर्मनन्दनः । | ||
| verse_lines = दिव्यास्त्रैरपि संयोज्य तां तदा धर्मनन्दनः | | verse_lines = दिव्यास्त्रैरपि संयोज्य तां तदा धर्मनन्दनः ।¦सत्यधर्मफलैश्चैव चिक्षेपास्य हृदि त्वरन् ॥ २९॥ | ||
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| verse_text = स भिन्नहृदयो भूमौ पपाताभिमुखो नृपम् । | | verse_text = स भिन्नहृदयो भूमौ पपाताभिमुखो नृपम् । | ||
| verse_lines = स भिन्नहृदयो भूमौ पपाताभिमुखो नृपम् | | verse_lines = स भिन्नहृदयो भूमौ पपाताभिमुखो नृपम् ।¦सत्यधर्मरतः शल्य इन्द्रस्यातिथितामगात् ॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = मद्रराजे हते वीरे सुशर्माऽर्जुनमभ्ययात् । | | verse_text = मद्रराजे हते वीरे सुशर्माऽर्जुनमभ्ययात् । | ||
| verse_lines = मद्रराजे हते वीरे सुशर्माऽर्जुनमभ्ययात् | | verse_lines = मद्रराजे हते वीरे सुशर्माऽर्जुनमभ्ययात् ।¦संशप्तकावशिष्टैस्तमनयन्मृत्यवेऽर्जुनः ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = दुर्योधनस्यावरजानवशिष्टान् वृकोदरः | | verse_lines = दुर्योधनस्यावरजानवशिष्टान् वृकोदरः ।¦सर्वान् जघान सेनां च निश्शेषमकरोद् रणे ॥ ३२॥ | ||
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| verse_text = उलूकं सहदेवोऽथ शकुनिं चातिपापिनम् । | | verse_text = उलूकं सहदेवोऽथ शकुनिं चातिपापिनम् । | ||
| verse_lines = उलूकं सहदेवोऽथ शकुनिं चातिपापिनम् | | verse_lines = उलूकं सहदेवोऽथ शकुनिं चातिपापिनम् ।¦जघान द्रौणिहार्दिक्यकृपान् भीमार्जुनौ ततः ॥ ३३॥ | ||
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| verse_text = बहुशो विरथीकृत्य पीडयित्वा पुनःपुनः । | | verse_text = बहुशो विरथीकृत्य पीडयित्वा पुनःपुनः । | ||
| verse_lines = बहुशो विरथीकृत्य पीडयित्वा पुनःपुनः | | verse_lines = बहुशो विरथीकृत्य पीडयित्वा पुनःपुनः ।¦द्रावयामासतुस्ते तु भीषिता विविशुर्वनम् ॥ ३४॥ | ||
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| verse_lines = शैनेयेन गृहीतोऽथ सञ्जयोऽनन्तशक्तिना | | verse_lines = शैनेयेन गृहीतोऽथ सञ्जयोऽनन्तशक्तिना ।¦व्यासेन मोचितोऽथैकः पार्थान् दुर्योधनोऽभ्ययात् (दुर्योधनोऽभ्यगात्)॥ ३५॥ | ||
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| verse_text = तेषामभूत् तस्य च घोररूपं युद्धं स बाणैर्बहुशोऽर्जुनं च । | | verse_text = तेषामभूत् तस्य च घोररूपं युद्धं स बाणैर्बहुशोऽर्जुनं च । | ||
| verse_lines = तेषामभूत् तस्य च घोररूपं युद्धं स बाणैर्बहुशोऽर्जुनं च | | verse_lines = तेषामभूत् तस्य च घोररूपं युद्धं स बाणैर्बहुशोऽर्जुनं च ।¦चकार मूर्च्छाभिगतं युधिष्ठिरं यमावयत्नाद् विरथांश्चकार ॥ ३६॥ | ||
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| verse_lines = तं भीमसेनो विरथं चकार गजं समारुह्य पुनः समभ्ययात् | | verse_lines = तं भीमसेनो विरथं चकार गजं समारुह्य पुनः समभ्ययात् ।¦पुनश्च शैनेयशिखण्डिपार्षतान् यमौ नृपं च व्यदधान्निरायुधान् ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = गजे च भीमेन शरैर्निपातिते समारुहद् वाजिवरं सुनिर्भयः | | verse_lines = गजे च भीमेन शरैर्निपातिते समारुहद् वाजिवरं सुनिर्भयः ।¦स तेन च प्रासकरो रणेऽरिहा चचार शैनैयमताडयच्च ॥ ३८॥ | ||
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| verse_text = मुमोह तेनाभिहतः स सात्यकिर्यमावपि प्रासनिपीडितौ रथे । | | verse_text = मुमोह तेनाभिहतः स सात्यकिर्यमावपि प्रासनिपीडितौ रथे । | ||
| verse_lines = मुमोह तेनाभिहतः स सात्यकिर्यमावपि प्रासनिपीडितौ रथे | | verse_lines = मुमोह तेनाभिहतः स सात्यकिर्यमावपि प्रासनिपीडितौ रथे ।¦निषीदतुर्धर्मसुतं प्रयान्तं समीक्ष्य भीमोऽस्य जघान वाजिनम् ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = प्रासे निकृत्ते च वृकोदरेण विवाहनः सोऽपि(सोऽप ययौ) ययौ सुयोधनः । | | verse_text = प्रासे निकृत्ते च वृकोदरेण विवाहनः सोऽपि(सोऽप ययौ) ययौ सुयोधनः । | ||
| verse_lines = प्रासे निकृत्ते च वृकोदरेण विवाहनः सोऽपि(सोऽप ययौ) ययौ सुयोधनः | | verse_lines = प्रासे निकृत्ते च वृकोदरेण विवाहनः सोऽपि(सोऽप ययौ) ययौ सुयोधनः ।¦आदाय गुर्वीं च गदां प्रयातो द्वैपायनस्योरुसरो विवेश ॥ ४०॥ | ||
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| verse_lines = एवमक्षोहिणीषट्कं भीमेन निहतं रणे | | verse_lines = एवमक्षोहिणीषट्कं भीमेन निहतं रणे ।¦पञ्च पार्थेन निहता अर्द्धं कालिङ्गकानृते ।¦एकादशाक्षोहिणीभ्यः(अक्षौहिणीभ्यः) शिष्टमन्यैर्निसूदितम् ॥ ४१॥ | ||
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| verse_lines = अक्षौहिणीचतुष्कं च पार्थानां द्रौणिना हतम् | | verse_lines = अक्षौहिणीचतुष्कं च पार्थानां द्रौणिना हतम् ।¦अन्यैरन्याः समस्तैश्च द्रोणकर्णमहाव्रताः ।¦दुर्योधनो भौमसूनुः प्रायः सेनाहनः क्रमात् ॥ ४२॥ | ||
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| verse_lines = जयं लब्ध्वा तदत्सूच्चैः पाण्डवेषु महात्मसु | | verse_lines = जयं लब्ध्वा तदत्सूच्चैः पाण्डवेषु महात्मसु ।¦दुर्योधनो जलस्तम्भं कृत्वा मन्त्रान् जजाप ह ॥ ४३॥ | ||
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| verse_lines = मन्त्रा दुर्वाससा दत्ता मृतसञ्जीवनप्रदाः | | verse_lines = मन्त्रा दुर्वाससा दत्ता मृतसञ्जीवनप्रदाः ।¦जले स्थित्वा जपन् सप्तदिनैः सर्वान् मृतानपि ।¦उद्धरेद् धार्तराष्ट्रोऽयं स्युरवध्याश्च ते पुनः ॥ ४४॥ | ||
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| verse_lines = इति विद्याबलं तस्य ज्ञात्वा पाण्डुसुतास्ततः | | verse_lines = इति विद्याबलं तस्य ज्ञात्वा पाण्डुसुतास्ततः ।¦अन्विष्यन्तः (अन्वेषन्तः) शुश्रुवुश्च व्याधेभ्यस्तं जले स्थितम् ।¦आगच्छंश्च ततस्तत्र पुरस्कृत्य जनार्दनम् ॥ ४५॥ | ||
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| verse_lines = तदा जलात् समुन्मज्ज्य त्रिभिर्द्रौणिपुरस्सरैः | | verse_lines = तदा जलात् समुन्मज्ज्य त्रिभिर्द्रौणिपुरस्सरैः ।¦मन्त्रयन्तं(मन्त्रयन्तः) स्म ददृशुस्तान् दृष्ट्वा ते प्रदुद्रुवुः ॥ ४६॥ | ||
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| verse_lines = दुर्योधनोऽविशत् तोयं दृष्ट्वा तं केशवाज्ञया | | verse_lines = दुर्योधनोऽविशत् तोयं दृष्ट्वा तं केशवाज्ञया ।¦युधिष्ठिरः सुपरुषैर्वाक्यैरेनमथाऽह्वयत् ॥ ४७॥ | ||
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| verse_lines = अमर्षितोऽसौ धृतराष्ट्रपुत्रः श्वसंस्तदा दण्डहतो यथाऽहिः | | verse_lines = अमर्षितोऽसौ धृतराष्ट्रपुत्रः श्वसंस्तदा दण्डहतो यथाऽहिः ।¦उवाच शाठ्यात् तपसे वनाय यायां भवाञ्छासतु सर्वपृथ्वीम् ॥ ४८॥ | ||
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| verse_lines = तमाह धर्मजो राजा यस्त्वं कृष्णे समागते | | verse_lines = तमाह धर्मजो राजा यस्त्वं कृष्णे समागते ।¦सूच्यग्रवेध्यां पृथिवीं दातुं नैच्छः कथं पुनः ॥ ४९॥ | ||
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| verse_lines = घातयित्वा सर्वपृथ्वीं भीष्मद्रोणमुखानपि | | verse_lines = घातयित्वा सर्वपृथ्वीं भीष्मद्रोणमुखानपि ।¦दातुमिच्छसि सर्वान् त्वं पृथ्वीं नाद्य वयं पुनः ॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = अहत्वा प्रतिगृह्णामि एहि युद्धे स्थिरो भव | | verse_lines = अहत्वा प्रतिगृह्णामि एहि युद्धे स्थिरो भव ।¦न कुरूणां कुले जातो ह्यस्त्वं भीतो ह्यपोऽविशः ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = इत्यादि रूक्षवचनं श्रुत्वा दुर्योधनो रुषा | | verse_lines = इत्यादि रूक्षवचनं श्रुत्वा दुर्योधनो रुषा ।¦जलस्तम्भात् समुत्तस्थौ श्वसन्नाशीविषो यथा ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = उवाच एक एवाहमकिरीटो विवर्मकः | | verse_lines = उवाच एक एवाहमकिरीटो विवर्मकः ।¦भवन्तो बहवो वर्मशिरस्त्राणयुता अपि ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = यद्येवमपि मे युद्धं भवद्भिर्मन्यसे समम् | | verse_lines = यद्येवमपि मे युद्धं भवद्भिर्मन्यसे समम् ।¦सर्वैरेकेन वा युद्धं करिष्ये न च भीर्मम ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = श्रुत्वाऽस्य वाक्यं रभसो(रभसा) वृकोदरो गदां तदाऽध्यर्द्धभराधिकां(तदध्यर्धभराधिकां) मुदा । | | verse_text = श्रुत्वाऽस्य वाक्यं रभसो(रभसा) वृकोदरो गदां तदाऽध्यर्द्धभराधिकां(तदध्यर्धभराधिकां) मुदा । | ||
| verse_lines = श्रुत्वाऽस्य वाक्यं रभसो(रभसा) वृकोदरो गदां तदाऽध्यर्द्धभराधिकां(तदध्यर्धभराधिकां) मुदा | | verse_lines = श्रुत्वाऽस्य वाक्यं रभसो(रभसा) वृकोदरो गदां तदाऽध्यर्द्धभराधिकां(तदध्यर्धभराधिकां) मुदा ।¦राज्ञो गदायाः परिगृह्य(प्रतिगृह्य) वीरः समुत्थितो युद्धमनाः समुन्नदन् ॥ ५८॥ | ||
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| verse_text = अथाऽह नारायण आदिदेवो युधिष्ठिरं कष्टमिदं कृतं त्वया । | | verse_text = अथाऽह नारायण आदिदेवो युधिष्ठिरं कष्टमिदं कृतं त्वया । | ||
| verse_lines = अथाऽह नारायण आदिदेवो युधिष्ठिरं कष्टमिदं कृतं त्वया | | verse_lines = अथाऽह नारायण आदिदेवो युधिष्ठिरं कष्टमिदं कृतं त्वया ।¦नह्येष राजा गदया रणे चरन् शक्यो विजेतुं निखिलैः सुरासुरैः ॥ ५९॥ | ||
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| verse_text = स निश्चयाद् वश्चतुरो निहन्यात् सहार्जुनान् भीमसेनः कथञ्चित् । | | verse_text = स निश्चयाद् वश्चतुरो निहन्यात् सहार्जुनान् भीमसेनः कथञ्चित् । | ||
| verse_lines = स निश्चयाद् वश्चतुरो निहन्यात् सहार्जुनान् भीमसेनः कथञ्चित् | | verse_lines = स निश्चयाद् वश्चतुरो निहन्यात् सहार्जुनान् भीमसेनः कथञ्चित् ।¦हन्तैनमाजौ नहि भीमतुल्यो बले क्वचिद् धार्तराष्ट्रः कृती च ॥ ६०॥ | ||
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| verse_text = ऊरू भीमेन भेत्तव्यौ प्रतिज्ञां रक्षता रिपोः । | | verse_text = ऊरू भीमेन भेत्तव्यौ प्रतिज्ञां रक्षता रिपोः । | ||
| verse_lines = ऊरू भीमेन भेत्तव्यौ प्रतिज्ञां रक्षता रिपोः | | verse_lines = ऊरू भीमेन भेत्तव्यौ प्रतिज्ञां रक्षता रिपोः ।¦नाभेरधस्ताद्धननं जना आहुर्गदामृधे ॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = अधर्म इति तत् कृष्णो लोकनिन्दानिवृत्तये । | | verse_text = अधर्म इति तत् कृष्णो लोकनिन्दानिवृत्तये । | ||
| verse_lines = अधर्म इति तत् कृष्णो लोकनिन्दानिवृत्तये | | verse_lines = अधर्म इति तत् कृष्णो लोकनिन्दानिवृत्तये ।¦आपद्धर्मं दर्शयितुं किञ्चिद्व्याजेन संयुतः ॥ ६२॥ | ||
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| verse_text = भीमो हन्याद् धार्तराष्ट्रमित्यूचे यद्यपि स्फुटम् । | | verse_text = भीमो हन्याद् धार्तराष्ट्रमित्यूचे यद्यपि स्फुटम् । | ||
| verse_lines = भीमो हन्याद् धार्तराष्ट्रमित्यूचे यद्यपि स्फुटम् | | verse_lines = भीमो हन्याद् धार्तराष्ट्रमित्यूचे यद्यपि स्फुटम् ।¦अव्याजेनापि शक्तोऽसौ बलं निस्सीममाह च ॥ ६३॥ | ||
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| verse_text = आह शिक्षामप्यनूनां यत्नं दुर्योधनेऽधिकम् । | | verse_text = आह शिक्षामप्यनूनां यत्नं दुर्योधनेऽधिकम् । | ||
| verse_lines = आह शिक्षामप्यनूनां यत्नं दुर्योधनेऽधिकम् | | verse_lines = आह शिक्षामप्यनूनां यत्नं दुर्योधनेऽधिकम् ।¦नहि भीमोऽतिप्रयत्नं कुर्यादिति गुणो ह्ययम् ॥ ६४॥ | ||
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| verse_text = प्रतिज्ञापालनं धर्मो दुष्टेषु तु विशेषतः । | | verse_text = प्रतिज्ञापालनं धर्मो दुष्टेषु तु विशेषतः । | ||
| verse_lines = प्रतिज्ञापालनं धर्मो दुष्टेषु तु विशेषतः | | verse_lines = प्रतिज्ञापालनं धर्मो दुष्टेषु तु विशेषतः ।¦इति धर्मरहस्यं तु वित्तः कृष्णवृकोदरौ ॥ ६५॥ | ||
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| verse_text = नान्यस्ततो लोकनिन्दां व्यपनेतुमुभावपि । | | verse_text = नान्यस्ततो लोकनिन्दां व्यपनेतुमुभावपि । | ||
| verse_lines = नान्यस्ततो लोकनिन्दां व्यपनेतुमुभावपि | | verse_lines = नान्यस्ततो लोकनिन्दां व्यपनेतुमुभावपि ।¦अनापद्यापदिव च दर्शयेतां जनस्य तु ॥ ६६॥ | ||
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| verse_text = ततो भीमः सर्वलोकस्य धर्मं प्रकाशयन् वाक्यमिदं जगाद । | | verse_text = ततो भीमः सर्वलोकस्य धर्मं प्रकाशयन् वाक्यमिदं जगाद । | ||
| verse_lines = ततो भीमः सर्वलोकस्य धर्मं प्रकाशयन् वाक्यमिदं जगाद | | verse_lines = ततो भीमः सर्वलोकस्य धर्मं प्रकाशयन् वाक्यमिदं जगाद ।¦ऊरू तवाहं (हि) च यथाप्रतिज्ञं(यथा प्रतिज्ञा) भेत्स्यामि नैवात्र विचारणीयम् ॥ ६७॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तवन्तं(इति ब्रुवन्तं) प्रससार चाऽजौ दुर्योधनस्तत्र बभूव युद्धम् | | verse_lines = इत्युक्तवन्तं(इति ब्रुवन्तं) प्रससार चाऽजौ दुर्योधनस्तत्र बभूव युद्धम् ।¦भीमस्तदाऽग्र्यप्रकृतिं विधित्सुर्मन्दः स आजौ व्यचरज्जनार्थे ॥ ६८॥ | ||
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| verse_lines = दर्शयन्तौ गदामार्गं चित्रं तौ प्रविचेरतुः (चित्रं परिविचेरतुः) | | verse_lines = दर्शयन्तौ गदामार्गं चित्रं तौ प्रविचेरतुः (चित्रं परिविचेरतुः)।¦बलभद्रोऽप्याजगाम तदा तौ प्रतिवारितुम् ॥ ६९॥ | ||
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| verse_lines = वारितावपि तेनोभौ नैव युद्धं प्रमुञ्चताम्(व्यमुञ्चताम्) | | verse_lines = वारितावपि तेनोभौ नैव युद्धं प्रमुञ्चताम्(व्यमुञ्चताम्) ।¦ततो ददर्श तद् युद्धं मानितः कृष्णपूर्वकैः ।¦तौ शिक्षाबलसंयुक्तौ मण्डलानि विचेरतुः ॥ ७०॥ | ||
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| verse_lines = ततो(तत्र) भीमं वञ्चयितुं धार्तराष्ट्रः शिरः क्षितौ | | verse_lines = ततो(तत्र) भीमं वञ्चयितुं धार्तराष्ट्रः शिरः क्षितौ ।¦(व्यधाद्) न्यधादुच्छ्रितसक्थीकस्तदा कृष्णाभ्यनुज्ञया ।¦पृष्ठमूलेऽहनद् भीमो भिन्नसक्थिश्च सोऽपतत् ॥ ७१॥ | ||
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| verse_text = प्रतिज्ञापालनार्थाय नाभेर्नोपर्यधस्तदा । | | verse_text = प्रतिज्ञापालनार्थाय नाभेर्नोपर्यधस्तदा । | ||
| verse_lines = प्रतिज्ञापालनार्थाय नाभेर्नोपर्यधस्तदा | | verse_lines = प्रतिज्ञापालनार्थाय नाभेर्नोपर्यधस्तदा ।¦गदायुद्धस्य मर्यादां यशश्चाप्यभिरक्षितुम् ॥ ७२॥ | ||
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| verse_lines = नाधस्तान्मध्य एवासौ निजघ्ने तं वृकोदरः | | verse_lines = नाधस्तान्मध्य एवासौ निजघ्ने तं वृकोदरः ।¦एवं प्रतिज्ञायुग्मार्थं भग्नं(भिन्न) सक्थियुगं रणे ॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = कृष्णं द्यूते निधेहीति यदवादीत्(यदवादि) सुयोधनः । | | verse_text = कृष्णं द्यूते निधेहीति यदवादीत्(यदवादि) सुयोधनः । | ||
| verse_lines = कृष्णं द्यूते निधेहीति यदवादीत्(यदवादि) सुयोधनः | | verse_lines = कृष्णं द्यूते निधेहीति यदवादीत्(यदवादि) सुयोधनः ।¦तत्प्रतिज्ञानुसारेण भीमो मूर्द्धानमक्रमीत् ।¦‘ऋषभम् मा समानानां’ (ऋग्वेद १०.१६६.१) इति सूक्तं ददर्श च(ह) ॥ ७४॥ (ऋषभम् मा समानानां सपत्नानां विषासहिम् ।¦हन्तारं शत्रूणां कृधि विराजं गोपतिं गवाम् ॥) | ||
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| verse_lines = तेषां पुण्यानि विद्याश्च समादायैव सर्वशः | | verse_lines = तेषां पुण्यानि विद्याश्च समादायैव सर्वशः ।¦तांश्चकार तमोगन्तॄंस्तस्य मूर्ध्नि पदाऽऽक्रमन् ॥ ७५॥ (योगक्षेमं व आदायाहम् भूयासम् उत्तम आ वो मूर्धानम् अक्रमीम् । ऋग्वेद १०.१६६.५) | ||
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| verse_text = स्मारयामास कर्माणि यानि तस्य कृतानि च । | | verse_text = स्मारयामास कर्माणि यानि तस्य कृतानि च । | ||
| verse_lines = स्मारयामास कर्माणि यानि तस्य कृतानि च | | verse_lines = स्मारयामास कर्माणि यानि तस्य कृतानि च ।¦कृष्णबन्धे कृतो मन्त्र इति मूर्ध्नि पदाऽहनत् ॥ ७६॥ | ||
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| verse_lines = पुनःपुनश्च तद् वीक्ष्य चुक्रोध मुसलायुधः | | verse_lines = पुनःपुनश्च तद् वीक्ष्य चुक्रोध मुसलायुधः ।¦चुक्रोश नैव धर्मोऽयमित्यसावूर्ध्वबाहुकः ॥ ७७॥ | ||
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| verse_text = पुनः क्रोधाभिताम्राक्ष(क्रोधातिताम्राक्षः) आदाय मुसलं हलम् । | | verse_text = पुनः क्रोधाभिताम्राक्ष(क्रोधातिताम्राक्षः) आदाय मुसलं हलम् । | ||
| verse_lines = पुनः क्रोधाभिताम्राक्ष(क्रोधातिताम्राक्षः) आदाय मुसलं हलम् | | verse_lines = पुनः क्रोधाभिताम्राक्ष(क्रोधातिताम्राक्षः) आदाय मुसलं हलम् ।¦अभिदुद्राव भीमं तं न चचाल वृकोदरः ॥ ७८॥ | ||
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| verse_lines = अभये संस्थिते भीमे रामं जग्राह केशवः | | verse_lines = अभये संस्थिते भीमे रामं जग्राह केशवः ।¦आह धर्मेण निहतो भीमेनायं सुयोधनः ॥ ७९॥ | ||
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| verse_lines = न मण्डलेऽभिसारे वा नापसारे च नाभितः | | verse_lines = न मण्डलेऽभिसारे वा नापसारे च नाभितः ।¦अधो हन्याद् वञ्चयन्तमधो हत्वा न दुष्यति ॥ ८०॥ | ||
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| verse_lines = कृता प्रतिज्ञा च वृकोदरेण भेत्स्ये तवोरू इति युक्तिपूर्वम्(पूर्वकम्) | | verse_lines = कृता प्रतिज्ञा च वृकोदरेण भेत्स्ये तवोरू इति युक्तिपूर्वम्(पूर्वकम्) ।¦संश्रावयानेन तदेष धर्मतो जघान दुर्योधनमग्र्यकर्मा ॥ ८१॥ | ||
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| verse_lines = वासुदेववचः श्रुत्वा धर्मच्छलमिति ब्रुवन् | | verse_lines = वासुदेववचः श्रुत्वा धर्मच्छलमिति ब्रुवन् ।¦रौहिणेयो जगामाऽशु स्वपुरीमेव सानुगः ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = तस्मिन् गते वासुदेवं समपृच्छद् युधिष्ठिरः | | verse_lines = तस्मिन् गते वासुदेवं समपृच्छद् युधिष्ठिरः ।¦धर्मोऽयमथवाऽधर्म इति तं प्राह केशवः ॥ ८३॥ | ||
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| verse_lines = न साक्षाद् धर्मतो वध्या ये तु पापतमा नराः | | verse_lines = न साक्षाद् धर्मतो वध्या ये तु पापतमा नराः ।¦देवैर्हि वञ्चयित्वैव हताः पूर्वं सुरारयः ।¦अतोऽयमप्यधर्मेण हतो नात्रास्ति दूषणम् ॥ ८४॥ | ||
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| verse_lines = भीष्मद्रोणौ च कर्णश्च यदैवोपधिना(यथैवोपाधिना) हताः | | verse_lines = भीष्मद्रोणौ च कर्णश्च यदैवोपधिना(यथैवोपाधिना) हताः ।¦को नु दुर्योधने पापे हते दोषः कथञ्चन ॥ ८५॥ | ||
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| verse_lines = प्रतिज्ञापालनायापि विभेदोरू वृकोदरः | | verse_lines = प्रतिज्ञापालनायापि विभेदोरू वृकोदरः ।¦धर्मतश्च प्रतिज्ञेयं कृतानेनानुरूपतः (तेनानुरूपतः) ॥ ८६॥ | ||
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| verse_lines = लोकतोऽपि न धर्मस्य हानिरत्र कथञ्चन | | verse_lines = लोकतोऽपि न धर्मस्य हानिरत्र कथञ्चन ।¦ये भीमस्याप्रभावज्ञा आपद्धर्मं च मन्वते ॥ ८७॥ | ||
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| verse_lines = अवध्यत्वे शिववराद् गदाशिक्षाबलादपि | | verse_lines = अवध्यत्वे शिववराद् गदाशिक्षाबलादपि ।¦जरासन्धोपमो यस्माद् धार्तराष्ट्रः सुविश्रुतः(धृतराष्ट्र इति श्रुतः) ॥ ८८॥ | ||
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| verse_lines = तस्मात् सद्धर्म एवायं भीमचीर्ण इति ब्रुवन् | | verse_lines = तस्मात् सद्धर्म एवायं भीमचीर्ण इति ब्रुवन् ।¦अपि संशयिनं चक्रे धर्मराजं जगत्पतिः ॥ ८९॥ | ||
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| verse_lines = भूभारक्षतिजो धर्मो मच्छुश्रूषात्मकश्च यः | | verse_lines = भूभारक्षतिजो धर्मो मच्छुश्रूषात्मकश्च यः ।¦भीमस्यैव भवेत् सम्यगिति बुद्ध्या परः प्रभुः ॥ ९०॥ | ||
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| verse_lines = स्वेनैव बलभद्राय जनाय च पुनःपुनः | | verse_lines = स्वेनैव बलभद्राय जनाय च पुनःपुनः ।¦श्रुत्वाऽप्युक्तं न तत्याज संशयं धर्मजो यतः ।¦ततोऽप्यसंशयं कृष्णो न चकार युधिष्ठिरम् ॥ ९१॥ | ||
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| verse_lines = पुनःपुनर्धर्मत एव भीमो जघान राजानमिति ब्रुवन्तम् | | verse_lines = पुनःपुनर्धर्मत एव भीमो जघान राजानमिति ब्रुवन्तम् ।¦जगाद कृष्णं स्फुरिताधरोष्ठः क्रोधात् सुपापो धृतराष्ट्रसूनुः ।¦त्वयैव पापे निहिता हि पार्थाः पापाधिकस्त्वं हि सदैक एव ॥ ९३॥ | ||
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| verse_text = इत्यूचिवांसं प्रजगाद कृष्णो न त्वत्समः पापतमः कदाचित् । | | verse_text = इत्यूचिवांसं प्रजगाद कृष्णो न त्वत्समः पापतमः कदाचित् । | ||
| verse_lines = इत्यूचिवांसं प्रजगाद कृष्णो न त्वत्समः पापतमः कदाचित् | | verse_lines = इत्यूचिवांसं प्रजगाद कृष्णो न त्वत्समः पापतमः कदाचित् ।¦भीष्मादिहत्याऽपि तवैव पापं यदन्वयुस्त्वामतिपापनिश्चयम् ।¦पापं च पापानुगतं(पापानुचरं) च हत्वा कथञ्चनाप्यस्ति नचैव पापम् ॥ ९४॥ | ||
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| verse_text = न पाण्डवेष्वस्ति ततो हि किञ्चित् पापं प्रयत्नाच्च निसर्गतोऽपि । | | verse_text = न पाण्डवेष्वस्ति ततो हि किञ्चित् पापं प्रयत्नाच्च निसर्गतोऽपि । | ||
| verse_lines = न पाण्डवेष्वस्ति ततो हि किञ्चित् पापं प्रयत्नाच्च निसर्गतोऽपि | | verse_lines = न पाण्डवेष्वस्ति ततो हि किञ्चित् पापं प्रयत्नाच्च निसर्गतोऽपि ।¦गुणाधिकास्ते मदुपाश्रयाच्च को नाम तेष्वण्वपि पापमाह ॥ ९५॥ | ||
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| verse_text = निसर्गतः पापतमस्त्वमन्यान् धर्मस्थितान् पापपथे निधाय । | | verse_text = निसर्गतः पापतमस्त्वमन्यान् धर्मस्थितान् पापपथे निधाय । | ||
| verse_lines = निसर्गतः पापतमस्त्वमन्यान् धर्मस्थितान् पापपथे निधाय | | verse_lines = निसर्गतः पापतमस्त्वमन्यान् धर्मस्थितान् पापपथे निधाय ।¦स्वयं च पापे निरतः सदैव पापात् सुपापां गतिमेव यासि ॥ ९६॥ | ||
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| verse_text = इति ब्रुवन्तं पुनराह कृष्णं दुर्योधनः पापकृतां प्रधानः । | | verse_text = इति ब्रुवन्तं पुनराह कृष्णं दुर्योधनः पापकृतां प्रधानः । | ||
| verse_lines = इति ब्रुवन्तं पुनराह कृष्णं दुर्योधनः पापकृतां प्रधानः | | verse_lines = इति ब्रुवन्तं पुनराह कृष्णं दुर्योधनः पापकृतां प्रधानः ।¦स्वन्तोत्तमो(गुणोत्तमो) नाम क एव मत्तः को नाम दोषोऽस्ति मया कृतोऽत्र ॥ ९७॥ | ||
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| verse_text = इष्टं च यज्ञैश्चरितं च पूर्तैः पदं रिपूणां निहितं च मूर्ध्नि(मूर्धनि) । | | verse_text = इष्टं च यज्ञैश्चरितं च पूर्तैः पदं रिपूणां निहितं च मूर्ध्नि(मूर्धनि) । | ||
| verse_lines = इष्टं च यज्ञैश्चरितं च पूर्तैः पदं रिपूणां निहितं च मूर्ध्नि(मूर्धनि) | | verse_lines = इष्टं च यज्ञैश्चरितं च पूर्तैः पदं रिपूणां निहितं च मूर्ध्नि(मूर्धनि) ।¦मृत्युश्च सङ्ग्रामशिरस्यवाप्तो रणोन्मुखेनैव मया किमन्यत् ॥ ९८॥ | ||
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| verse_text = इष्टा भोगा मया भुक्ताः प्राप्ता च परमा गतिः । | | verse_text = इष्टा भोगा मया भुक्ताः प्राप्ता च परमा गतिः । | ||
| verse_lines = इष्टा भोगा मया भुक्ताः प्राप्ता च परमा गतिः | | verse_lines = इष्टा भोगा मया भुक्ताः प्राप्ता च परमा गतिः ।¦दुःखिनो दुःखमाप्स्यन्ति पार्थास्ते कूटयोधिनः ॥ ९९॥ | ||
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| verse_text = चन्द्रसूर्यनिभैः(चन्द्रार्कसन्निभैः) शूरैर्धार्मिकैः सद्भिरुज्झिता । | | verse_text = चन्द्रसूर्यनिभैः(चन्द्रार्कसन्निभैः) शूरैर्धार्मिकैः सद्भिरुज्झिता । | ||
| verse_lines = चन्द्रसूर्यनिभैः(चन्द्रार्कसन्निभैः) शूरैर्धार्मिकैः सद्भिरुज्झिता | | verse_lines = चन्द्रसूर्यनिभैः(चन्द्रार्कसन्निभैः) शूरैर्धार्मिकैः सद्भिरुज्झिता ।¦केवला रत्नहीनेयं पाण्डवैर्भुज्यतां मही ॥ १००॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तवत्येव नृपे सुरेशैः प्रसूनवृष्टिर्विहिता पपात । | | verse_text = इत्युक्तवत्येव नृपे सुरेशैः प्रसूनवृष्टिर्विहिता पपात । | ||
| verse_lines = इत्युक्तवत्येव नृपे सुरेशैः प्रसूनवृष्टिर्विहिता पपात | | verse_lines = इत्युक्तवत्येव नृपे सुरेशैः प्रसूनवृष्टिर्विहिता पपात ।¦तामेव बुद्धिं धृतराष्ट्रसूनोः कृत्वा दृढां पातयितुं तमोऽन्धे ॥ १०१॥ | ||
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| verse_text = सम्भावयत आत्मानं वासुदेवं विनिन्दतः । | | verse_text = सम्भावयत आत्मानं वासुदेवं विनिन्दतः । | ||
| verse_lines = सम्भावयत आत्मानं वासुदेवं विनिन्दतः | | verse_lines = सम्भावयत आत्मानं वासुदेवं विनिन्दतः ।¦तत्परांश्च कथं न स्यात् तमोऽन्ते च विशेषतः ॥ १०२॥ | ||
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| verse_text = यदैकैकमलं तत्र दुःखाधिक्यं समुच्चयात् । | | verse_text = यदैकैकमलं तत्र दुःखाधिक्यं समुच्चयात् । | ||
| verse_lines = यदैकैकमलं तत्र दुःखाधिक्यं समुच्चयात् | | verse_lines = यदैकैकमलं तत्र दुःखाधिक्यं समुच्चयात् ।¦इति तत् कारयित्वेश आह मोघं तवाखिलम् ॥ १०३॥ | ||
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| verse_lines = नृशंसस्य कृतघ्नस्य गुणवद्द्वेषिणः सदा | | verse_lines = नृशंसस्य कृतघ्नस्य गुणवद्द्वेषिणः सदा ।¦यदि धर्मफलं ध्वान्तं सूर्यवत् स्यात् प्रकाशकम् ॥ १०४॥ | ||
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| verse_lines = वदन् पुनःपुनरिदं धर्मतो हत इत्यपि | | verse_lines = वदन् पुनःपुनरिदं धर्मतो हत इत्यपि ।¦ख्यापयामास भगवान् जने निजजनेष्टदः ॥ १०५॥ | ||
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| verse_lines = प्रख्यापिते वासुदेवेन धर्मे सतां सर्वेषां हृद्यमासीत् समस्तम् | | verse_lines = प्रख्यापिते वासुदेवेन धर्मे सतां सर्वेषां हृद्यमासीत् समस्तम् ।¦हतं च धर्मेण नृपं व्यजानन् पापोऽयमित्येव विनिश्चितार्थाः ॥ १०६॥ | ||
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| verse_text = युधिष्ठिरोऽपापदर्शी (अपायदर्शी) सदैव ससंशयोऽभूत् सुमनोऽभिवृष्ट्या । | | verse_text = युधिष्ठिरोऽपापदर्शी (अपायदर्शी) सदैव ससंशयोऽभूत् सुमनोऽभिवृष्ट्या । | ||
| verse_lines = युधिष्ठिरोऽपापदर्शी (अपायदर्शी) सदैव ससंशयोऽभूत् सुमनोऽभिवृष्ट्या | | verse_lines = युधिष्ठिरोऽपापदर्शी (अपायदर्शी) सदैव ससंशयोऽभूत् सुमनोऽभिवृष्ट्या ।¦स्नेहाद् द्रौणिः सञ्जयो रौहिणेयो दौर्योधनात् पापमित्येव चोचुः ॥ १०७॥ | ||
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| verse_lines = ततः कृष्णः पाण्डुपाञ्चालकैस्तैर्भृशं नदद्भिर्हृषितैः समेतः | | verse_lines = ततः कृष्णः पाण्डुपाञ्चालकैस्तैर्भृशं नदद्भिर्हृषितैः समेतः ।¦ययौ विरिञ्चेशसुरेन्द्रमुख्यैः सम्पूजितस्तैश्च रणाङ्गणात् स्मयन् ॥ १०८॥ | ||
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| verse_lines = ततः श्रुत्वा सञ्जयाद् दुःखतप्तं सम्बोधयिष्यन् पितरं युयुत्सुः | | verse_lines = ततः श्रुत्वा सञ्जयाद् दुःखतप्तं सम्बोधयिष्यन् पितरं युयुत्सुः ।¦कृष्णस्य राज्ञश्च मतेऽनुयातो(मतेन यातः) जगाम चान्वेव जनार्दनश्च ॥ १०९॥ | ||
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| verse_lines = धर्मयुक्तैश्च तत्त्वार्थैर्लोकवृत्तानुदर्शकैः | | verse_lines = धर्मयुक्तैश्च तत्त्वार्थैर्लोकवृत्तानुदर्शकैः ।¦वाक्यै राजानमाश्वास्य प्रायात् पार्थान् पुनर्हरिः ॥ ११०॥ | ||
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| verse_lines = कालानुसारतो दैवांश्चोपसंहर्तुमच्युतः | | verse_lines = कालानुसारतो दैवांश्चोपसंहर्तुमच्युतः ।¦ययौ सपार्थशैनेयः कुरूणां शिबिरं निशि ॥ १११॥ | ||
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| verse_text = तदैव हार्दिक्यकृपान्वितोऽयात् सुयोधनं द्रौणिरमुं शयानम् । | | verse_text = तदैव हार्दिक्यकृपान्वितोऽयात् सुयोधनं द्रौणिरमुं शयानम् । | ||
| verse_lines = तदैव हार्दिक्यकृपान्वितोऽयात् सुयोधनं द्रौणिरमुं शयानम् | | verse_lines = तदैव हार्दिक्यकृपान्वितोऽयात् सुयोधनं द्रौणिरमुं शयानम् ।¦प्रभग्नसक्थिं श्वसृगालभूतैः सम्भक्ष्यमाणं ददृशे श्वसन्तम् ॥ ११२॥ | ||
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| verse_lines = स दुःखशोकाभिहतो विनिन्द्य पार्थान् मया भूप किमत्र कार्यम् | | verse_lines = स दुःखशोकाभिहतो विनिन्द्य पार्थान् मया भूप किमत्र कार्यम् ।¦इत्याह निष्पाण्डवतां कुरुष्वेत्यमुं व्यधात् पांस्वभिषेकिणं नृपः ॥ ११३॥ | ||
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| verse_lines = उच्छिद्य सन्ततिं पाण्डोः कृत्वा स्वक्षेत्रसन्ततिम् | | verse_lines = उच्छिद्य सन्ततिं पाण्डोः कृत्वा स्वक्षेत्रसन्ततिम् ।¦तया भूरक्षणहृदा सोऽभिषिक्तस्तथेत्यगात् ॥ ११४॥ | ||
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| verse_lines = स कृष्णभीमपार्थानां भयादेव पुनर्वनम् | | verse_lines = स कृष्णभीमपार्थानां भयादेव पुनर्वनम् ।¦कृपसात्वतसंयुक्तो विवेश गहनं रथी ॥ ११५॥ | ||
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| verse_lines = तस्य चिन्तयतो द्रोणवधं दुर्योधनस्य च | | verse_lines = तस्य चिन्तयतो द्रोणवधं दुर्योधनस्य च ।¦नाऽगान्निद्रा निशीथे च ध्वाङ्क्षान् न्यग्रोधवासिनः ॥ ११६॥ | ||
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| verse_lines = हतान् सुबहुसाहस्रानेकेनातिबलेन तु | | verse_lines = हतान् सुबहुसाहस्रानेकेनातिबलेन तु ।¦कौशिकेन निरीक्ष्यैव प्राह तौ कृपसात्वतौ ॥ ११७॥ | ||
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| verse_text = निदर्शनेन ह्येतेन(ह्येनेन) प्रेरितः परमात्मना । | | verse_text = निदर्शनेन ह्येतेन(ह्येनेन) प्रेरितः परमात्मना । | ||
| verse_lines = निदर्शनेन ह्येतेन(ह्येनेन) प्रेरितः परमात्मना | | verse_lines = निदर्शनेन ह्येतेन(ह्येनेन) प्रेरितः परमात्मना ।¦यामि पाण्डुसुतान् हन्तुमित्युक्त्वाऽऽरुरुहे रथम् ॥ ११८॥ | ||
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| verse_lines = निवारितोऽपि ताभ्यां स प्राद्रवच्छिबिरं प्रति | | verse_lines = निवारितोऽपि ताभ्यां स प्राद्रवच्छिबिरं प्रति ।¦अनुजग्मतुस्तावपि तं शिबिरद्वारि चैक्षत ॥ ११९॥ | ||
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| verse_lines = उग्ररूपधरं रुद्रं स्वकीयां तनुमेव सः | | verse_lines = उग्ररूपधरं रुद्रं स्वकीयां तनुमेव सः ।¦परीतं वासुदेवेन बहुकोटिस्वरूपिणा ॥ १२०॥ | ||
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| verse_lines = दृष्ट्वैव वासुदेवं तमत्रसद् गौतमीसुतः | | verse_lines = दृष्ट्वैव वासुदेवं तमत्रसद् गौतमीसुतः ।¦वासुदेवाज्ञयैवात्र स्वात्मनाऽपि सदाशिवः ॥ १२१॥ | ||
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| verse_lines = पारावताश्वं स तदा शयानमुपेत्य पद्भ्यां समताडयच्च | | verse_lines = पारावताश्वं स तदा शयानमुपेत्य पद्भ्यां समताडयच्च ।¦वक्षस्यसाववदद् वीतनिद्रो जाने भवन्तं हि गुरोस्तनूजम् ॥ १२९॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = समुत्थितं मां जहि शस्त्रपाणिं शस्त्रेण वीरोऽसि स वीरधर्मः । | | verse_text = समुत्थितं मां जहि शस्त्रपाणिं शस्त्रेण वीरोऽसि स वीरधर्मः । | ||
| verse_lines = समुत्थितं मां जहि शस्त्रपाणिं शस्त्रेण वीरोऽसि स वीरधर्मः | | verse_lines = समुत्थितं मां जहि शस्त्रपाणिं शस्त्रेण वीरोऽसि स वीरधर्मः ।¦लोकाश्च मे सन्त्वथ शस्त्रपूता इति ब्रुवाणं स रुषा जगाद ॥ १३०॥ | ||
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| verse_text = न सन्ति हि ब्रह्महणां सुलोका विशेषतश्चैव गुरुद्रुहां पुनः । | | verse_text = न सन्ति हि ब्रह्महणां सुलोका विशेषतश्चैव गुरुद्रुहां पुनः । | ||
| verse_lines = न सन्ति हि ब्रह्महणां सुलोका विशेषतश्चैव गुरुद्रुहां पुनः | | verse_lines = न सन्ति हि ब्रह्महणां सुलोका विशेषतश्चैव गुरुद्रुहां पुनः ।¦न धर्मयुद्धेन वधार्हकाश्च ये त्वद्विधाः पापतमाः(पापमनाः) सुपाप ॥ १३१॥ | ||
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| verse_text = अवश्यं भाविनं(अवश्यभाविनं) मृत्युं धृष्टद्युम्नो विचिन्त्य तम् । | | verse_text = अवश्यं भाविनं(अवश्यभाविनं) मृत्युं धृष्टद्युम्नो विचिन्त्य तम् । | ||
| verse_lines = अवश्यं भाविनं(अवश्यभाविनं) मृत्युं धृष्टद्युम्नो विचिन्त्य तम् | | verse_lines = अवश्यं भाविनं(अवश्यभाविनं) मृत्युं धृष्टद्युम्नो विचिन्त्य तम् ।¦तूष्णीं बभूव स्वप्नेऽपि नित्यं पश्यति तां मृतिम् ॥ १३२॥ | ||
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| verse_text = द्रौणिं च कालरात्रिं च द्रोणपातादनन्तरम् । | | verse_text = द्रौणिं च कालरात्रिं च द्रोणपातादनन्तरम् । | ||
| verse_lines = द्रौणिं च कालरात्रिं च द्रोणपातादनन्तरम् | | verse_lines = द्रौणिं च कालरात्रिं च द्रोणपातादनन्तरम् ।¦विशसन्तं कृषन्तीं(कृषन्तं) च स्वप्ने पश्यति (स्वप्नेऽपश्यद्धि) पार्षतः ॥ १३३॥ | ||
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| verse_text = समाक्षिपद् द्रोणसुतोऽस्य कण्ठे निबद्ध्य मौर्वीं धनुषोप्युरस्थः । | | verse_text = समाक्षिपद् द्रोणसुतोऽस्य कण्ठे निबद्ध्य मौर्वीं धनुषोप्युरस्थः । | ||
| verse_lines = समाक्षिपद् द्रोणसुतोऽस्य कण्ठे निबद्ध्य मौर्वीं धनुषोप्युरस्थः | | verse_lines = समाक्षिपद् द्रोणसुतोऽस्य कण्ठे निबद्ध्य मौर्वीं धनुषोप्युरस्थः ।¦ममन्थ कृच्छ्रेण विहाय देहं ययौ निजस्थानमसौ च वह्निः ॥ १३४॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = ततः शिखण्डिनं हत्वा युधामन्यूत्तमोजसौ । | | verse_text = ततः शिखण्डिनं हत्वा युधामन्यूत्तमोजसौ । | ||
| verse_lines = ततः शिखण्डिनं हत्वा युधामन्यूत्तमोजसौ | | verse_lines = ततः शिखण्डिनं हत्वा युधामन्यूत्तमोजसौ ।¦जनमेजयं च पाञ्चालीसुतानभिययौ ज्वलन् ॥ १३५॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = तैरुत्थितैरस्यमानः शरैः खड्गेन जघ्निवान् । | | verse_text = तैरुत्थितैरस्यमानः शरैः खड्गेन जघ्निवान् । | ||
| verse_lines = तैरुत्थितैरस्यमानः शरैः खड्गेन जघ्निवान् | | verse_lines = तैरुत्थितैरस्यमानः शरैः खड्गेन जघ्निवान् ।¦सर्वान् सव्यापसव्येन तथाऽन्यान् पाण्डवात्मजान् ।¦ऋत एकं भैमसेनिं काशिराजात्मजात्मजम् ॥ १३६॥ | ||
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| verse_text = तं तदाऽन्तर्हितः(अन्तर्हितं) शर्वः कैलासमनयत् क्षणात् । | | verse_text = तं तदाऽन्तर्हितः(अन्तर्हितं) शर्वः कैलासमनयत् क्षणात् । | ||
| verse_lines = तं तदाऽन्तर्हितः(अन्तर्हितं) शर्वः कैलासमनयत् क्षणात् | | verse_lines = तं तदाऽन्तर्हितः(अन्तर्हितं) शर्वः कैलासमनयत् क्षणात् ।¦स शर्वत्रातनामाऽऽसीदतस्तत्रैव सोऽवसत् ॥ १३७॥ | ||
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| verse_lines = पुराऽर्थितः स्वदौहित्रस्यामरत्वाय शङ्करः | | verse_lines = पुराऽर्थितः स्वदौहित्रस्यामरत्वाय शङ्करः ।¦काशिराजेन तेनासौ जुगोपैनं कृपायुतः ॥ १३८॥ | ||
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| verse_text = वासुदेवमतं ज्ञात्वा साम्राज्याय परीक्षितः । | | verse_text = वासुदेवमतं ज्ञात्वा साम्राज्याय परीक्षितः । | ||
| verse_lines = वासुदेवमतं ज्ञात्वा साम्राज्याय परीक्षितः | | verse_lines = वासुदेवमतं ज्ञात्वा साम्राज्याय परीक्षितः ।¦वारयामास भूलोकं नैव याहीत्यमुं शिवः ॥ १३९॥ | ||
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| verse_text = सामान्यतोऽपाण्डवाय द्रौणिनाऽप्यभिसन्धितम् । | | verse_text = सामान्यतोऽपाण्डवाय द्रौणिनाऽप्यभिसन्धितम् । | ||
| verse_lines = सामान्यतोऽपाण्डवाय द्रौणिनाऽप्यभिसन्धितम् | | verse_lines = सामान्यतोऽपाण्डवाय द्रौणिनाऽप्यभिसन्धितम् ।¦तद्रूपेणैव रुद्रेण विनैनमिति चिन्तितम् ॥ १४०॥ | ||
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| verse_text = अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैनं न जघानैक्यतस्तयोः । | | verse_text = अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैनं न जघानैक्यतस्तयोः । | ||
| verse_lines = अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैनं न जघानैक्यतस्तयोः | | verse_lines = अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैनं न जघानैक्यतस्तयोः ।¦चेकितानादिकांश्चैव जघानान्यान् स सर्वशः(जघानान्यांश्च सर्वशः) ॥ १४१॥ | ||
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| verse_text = स चेदिपाञ्चालकरूशकाशीनन्यांश्च सर्वान् विनिहत्य वीरः । | | verse_text = स चेदिपाञ्चालकरूशकाशीनन्यांश्च सर्वान् विनिहत्य वीरः । | ||
| verse_lines = स चेदिपाञ्चालकरूशकाशीनन्यांश्च सर्वान् विनिहत्य वीरः | | verse_lines = स चेदिपाञ्चालकरूशकाशीनन्यांश्च सर्वान् विनिहत्य वीरः ।¦शिशून् स्त्रियश्चैव निहन्तुमुग्रः प्रज्वालयत् तच्छिबिरं समन्तात् ॥ १४२॥ | ||
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| verse_text = जीजीविषूंस्तत्र पलायमानान् द्वारि स्थितौ गौतमः सात्वतश्च । | | verse_text = जीजीविषूंस्तत्र पलायमानान् द्वारि स्थितौ गौतमः सात्वतश्च । | ||
| verse_lines = जीजीविषूंस्तत्र पलायमानान् द्वारि स्थितौ गौतमः सात्वतश्च | | verse_lines = जीजीविषूंस्तत्र पलायमानान् द्वारि स्थितौ गौतमः सात्वतश्च ।¦निजघ्नतुः सर्वतः पार्षतस्य सूतस्त्वेकः शेषितो दैवयोगात् ॥ १४३॥ | ||
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| verse_lines = खड्गेन प्रहृतं दृष्ट्वा हार्दिक्येन पपात ह | | verse_lines = खड्गेन प्रहृतं दृष्ट्वा हार्दिक्येन पपात ह ।¦भूमौ प्रागेव संस्पर्शान्न ज्ञातस्तमसाऽमुना ।¦अन्यासक्ते समुत्थाय प्राद्रवद् यत्र पार्षती ॥ १४४॥ | ||
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| verse_lines = तस्या अकथयत् सर्वं सा भीमायाऽह दुःखिता | | verse_lines = तस्या अकथयत् सर्वं सा भीमायाऽह दुःखिता ।¦प्राद्रवद् रथमारुह्य स धन्वी गौतमीसुतम् ॥ १४५॥ | ||
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| verse_lines = तदन्तरे द्रौणिरपि प्रयातः कृष्णासुतानां मुदितः शिरांसि | | verse_lines = तदन्तरे द्रौणिरपि प्रयातः कृष्णासुतानां मुदितः शिरांसि ।¦आदाय हार्दिक्यकृपानुयातो दुर्योधनं सन्निकृष्टप्रयाणम् ॥ १४६॥ | ||
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| verse_lines = दृष्ट्वा तदुक्तं च निशम्य पापस्तुष्टोऽत्यजत् साध्विति देहमाशु | | verse_lines = दृष्ट्वा तदुक्तं च निशम्य पापस्तुष्टोऽत्यजत् साध्विति देहमाशु ।¦भीमार्जुनाभ्यामथ केशवाच्च भीताः पृथग् द्रौणिमुखाः प्रयाताः ॥ १४७॥ | ||
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| verse_lines = तत्रैकलं द्रोणसुतं रथेन यान्तं रथी मारुतिरन्वधावत् | | verse_lines = तत्रैकलं द्रोणसुतं रथेन यान्तं रथी मारुतिरन्वधावत् ।¦तमाद्रवन्तं प्रसमीक्ष्य भीतः पराद्रवद् द्रौणिरभिद्रुताश्वैः (द्रौणिरतिद्रुताश्वैः) ॥ १४८॥ | ||
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| verse_lines = आद्रवन्तं पुनर्दृष्ट्वा भीमं द्रोणात्मजो रुषा | | verse_lines = आद्रवन्तं पुनर्दृष्ट्वा भीमं द्रोणात्मजो रुषा ।¦आवृत्य युद्ध्यन् विजितोऽस्त्रं ब्रह्मशिर आददे ॥ १४९॥ | ||
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| verse_lines = एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो धर्मजेनार्जुनेन च | | verse_lines = एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो धर्मजेनार्जुनेन च ।¦तत्राऽगमत् तदस्त्रं च भीमं चाव्यर्थतां नयन् ।¦अवध्यो भीमसेनस्तदस्त्रं चामोघमेव यत् ॥ १५०॥ | ||
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| verse_lines = विष्णुनैवोभयं यस्मात् कृतं (क्लृप्तं) भीमोऽस्त्रमेव तत् | | verse_lines = विष्णुनैवोभयं यस्मात् कृतं (क्लृप्तं) भीमोऽस्त्रमेव तत् ।¦गायत्री तत्र मन्त्रो यद् ब्रह्मा तद्ध्यानदेवता ।¦ध्येयो नारायणो देवो जगत्प्रसविता स्वयम् ॥ १५१॥ | ||
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| verse_lines = ऊचे च पार्थयोः कृष्णो यत् कृतं द्रौणिना पुरा | | verse_lines = ऊचे च पार्थयोः कृष्णो यत् कृतं द्रौणिना पुरा ।¦स्वायुधानां याचनं चाप्यशक्तेन तदुद्धृतौ ॥ १५२॥ | ||
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| verse_lines = पृष्टेनोक्तं त्वया हीनां कृत्वा दुर्योधनाय गाम् | | verse_lines = पृष्टेनोक्तं त्वया हीनां कृत्वा दुर्योधनाय गाम् ।¦दातुं त्वदायुधं मेऽद्येत्येवमुक्तेऽत्मनोदितम् ।¦मैवं कार्षीः पुनरिति द्ध्यायताऽब्धेस्तटे स्वमु ॥ १५३॥ | ||
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| verse_lines = तदस्त्रं प्रज्वलद् दृष्ट्वाऽपाण्डवत्वविधित्सया | | verse_lines = तदस्त्रं प्रज्वलद् दृष्ट्वाऽपाण्डवत्वविधित्सया ।¦धरायां द्रौणिना मुक्तं कृष्णेन प्रेरितोऽर्जुनः ॥ १५४॥ | ||
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| verse_lines = स्वस्त्यस्तु द्रोणपुत्राय भूतेभ्यो मह्यमेव च | | verse_lines = स्वस्त्यस्तु द्रोणपुत्राय भूतेभ्यो मह्यमेव च ।¦इति ब्रुवंस्तदेवास्त्रमस्त्रशान्त्यै व्यसर्जयत् ॥ १५५॥ | ||
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| verse_lines = अनस्त्रज्ञेषु मुक्तं तद्धन्यादस्त्रमुचं यतः | | verse_lines = अनस्त्रज्ञेषु मुक्तं तद्धन्यादस्त्रमुचं यतः ।¦गुरुभक्त्या ततो द्रौणेः स्वस्त्यस्त्वित्याह वासविः ॥ १५६॥ | ||
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| verse_lines = तदाऽस्त्रयोस्तु संयोगे भूतानां संहृतिर्भवेत् | | verse_lines = तदाऽस्त्रयोस्तु संयोगे भूतानां संहृतिर्भवेत् ।¦भूतानां स्वस्तिरप्यत्र काङ्क्षिता करुणात्मना ॥ १५७॥ | ||
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| verse_lines = तथाऽप्यस्त्रद्वयं युक्तं भूतानां नाशकृद् ध्रुवम् | | verse_lines = तथाऽप्यस्त्रद्वयं युक्तं भूतानां नाशकृद् ध्रुवम् ।¦तस्मान्निवारयन् योगं तयोर्मध्येऽभवत् क्षणात् ।¦निस्सीमशक्तिः परमः कृष्णः सत्यवतीसुतः ॥ १५८॥ | ||
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| verse_lines = संस्थाप्यास्त्रद्वयं दूरे तावाह पुरुषोत्तमः | | verse_lines = संस्थाप्यास्त्रद्वयं दूरे तावाह पुरुषोत्तमः ।¦सन्ति ह्यस्त्रविदः पूर्वं प्रायश्चैतन्न तैः कृतम् ।¦लोकोपद्रवकृत् कर्म सन्तः कुर्युः कथं क्वचित् ॥ १५९॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्ते फल्गुनः प्राह मया मुक्तं महापदि | | verse_lines = इत्युक्ते फल्गुनः प्राह मया मुक्तं महापदि ।¦शान्त्यर्थमेव च विभो क्षन्तव्यं भवता ततः ॥ १६०॥ | ||
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| verse_lines = द्रौणिरप्येवमेवाऽह तौ वेदपतिरब्रवीत् | | verse_lines = द्रौणिरप्येवमेवाऽह तौ वेदपतिरब्रवीत् ।¦निवर्त्यतामस्त्रमिति शक्रसूनुस्तथाऽकरोत् ।¦निवर्तनाप्रभुं द्रौणिं वासुदेवोऽभ्यभाषत ॥ १६१॥ | ||
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| verse_lines = क्षत्रतेजा ब्रह्मचारी कौमारादपि पाण्डवः | | verse_lines = क्षत्रतेजा ब्रह्मचारी कौमारादपि पाण्डवः ।¦निवर्तने ततः शक्तो नायं द्रोणात्मजोऽपि सन् ।¦अब्रह्मचर्यादित्युक्ते व्यासो द्रौणिमभाषत ॥ १६२॥ | ||
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| verse_lines = निवर्तनासमर्थस्त्वं देहि नैसर्गिकं मणिम् | | verse_lines = निवर्तनासमर्थस्त्वं देहि नैसर्गिकं मणिम् ।¦जितः प्रागेव भीमेन भीमायैव महाप्रभम् ।¦अपि केवलया वाचा पार्थेभ्योऽस्त्रं निवर्तय ॥ १६३॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तो मूर्धजं रत्नं जरामरणनाशनम् | | verse_lines = इत्युक्तो मूर्धजं रत्नं जरामरणनाशनम् ।¦क्षुत्तृट्श्रमापहं दिव्यगन्धं ध्वान्तहरं(दिव्यं गन्धध्वान्तहरं) शुभम् ॥ १६४॥ | ||
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| verse_text = उत्कृत्य भीमाय ददौ मुक्ताः पञ्चैव पाण्डवाः । | | verse_text = उत्कृत्य भीमाय ददौ मुक्ताः पञ्चैव पाण्डवाः । | ||
| verse_lines = उत्कृत्य भीमाय ददौ मुक्ताः पञ्चैव पाण्डवाः | | verse_lines = उत्कृत्य भीमाय ददौ मुक्ताः पञ्चैव पाण्डवाः ।¦अस्त्रादिति ततो वेदभर्ता वासविमब्रवीत् ॥ १६५॥ | ||
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| verse_text = तात मुक्तं द्रौणिनाऽपि त्वमेवास्त्रं निवर्तय । | | verse_text = तात मुक्तं द्रौणिनाऽपि त्वमेवास्त्रं निवर्तय । | ||
| verse_lines = तात मुक्तं द्रौणिनाऽपि त्वमेवास्त्रं निवर्तय | | verse_lines = तात मुक्तं द्रौणिनाऽपि त्वमेवास्त्रं निवर्तय ।¦इत्युक्तस्तं प्रणम्याऽशु सञ्जहारार्जुनोऽपि तत् ॥ १६६॥ | ||
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| verse_text = यादवेशोऽथ गौतम्याः सुतमाहैकसन्ततेः । | | verse_text = यादवेशोऽथ गौतम्याः सुतमाहैकसन्ततेः । | ||
| verse_lines = यादवेशोऽथ गौतम्याः सुतमाहैकसन्ततेः | | verse_lines = यादवेशोऽथ गौतम्याः सुतमाहैकसन्ततेः ।¦वाचा निवर्तयास्त्रं त्वमित्युक्तो द्रौणिरब्रवीत् ॥ १६७॥ | ||
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| verse_text = पक्षपातादिच्छसि त्वं भागिनेयस्य सन्ततिम् । | | verse_text = पक्षपातादिच्छसि त्वं भागिनेयस्य सन्ततिम् । | ||
| verse_lines = पक्षपातादिच्छसि त्वं भागिनेयस्य सन्ततिम् | | verse_lines = पक्षपातादिच्छसि त्वं भागिनेयस्य सन्ततिम् ।¦तत्रैव पातयाम्यस्त्रमुत्तरागर्भकृन्तने ॥ १६८॥ | ||
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| verse_text = वासुदेवः पुनः प्राह यदि हन्तव्य एव ते । | | verse_text = वासुदेवः पुनः प्राह यदि हन्तव्य एव ते । | ||
| verse_lines = वासुदेवः पुनः प्राह यदि हन्तव्य एव ते | | verse_lines = वासुदेवः पुनः प्राह यदि हन्तव्य एव ते ।¦गर्भस्तथाऽपि नैवास्त्रं पातयास्मिन् कथञ्चन ॥ १६९॥ | ||
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| verse_text = अभिमन्योर्मृतस्यैव देहे पातय मानद । | | verse_text = अभिमन्योर्मृतस्यैव देहे पातय मानद । | ||
| verse_lines = अभिमन्योर्मृतस्यैव देहे पातय मानद | | verse_lines = अभिमन्योर्मृतस्यैव देहे पातय मानद ।¦एवं त्वदस्त्रनिहतं गर्भमुज्जीवयाम्यहम् ॥ १७०॥ | ||
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| verse_text = पातये गर्भ एवाहमित्यूचे गौतमीसुतः । | | verse_text = पातये गर्भ एवाहमित्यूचे गौतमीसुतः । | ||
| verse_lines = पातये गर्भ एवाहमित्यूचे गौतमीसुतः | | verse_lines = पातये गर्भ एवाहमित्यूचे गौतमीसुतः ।¦अथाऽह वासुदेवस्तमीषत्क्रुद्ध इव प्रभुः ॥ १७१॥ | ||
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| verse_text = दुर्मते पश्य मे वीर्यं यत् ते शक्यं कुरुष्व तत् । | | verse_text = दुर्मते पश्य मे वीर्यं यत् ते शक्यं कुरुष्व तत् । | ||
| verse_lines = दुर्मते पश्य मे वीर्यं यत् ते शक्यं कुरुष्व तत् | | verse_lines = दुर्मते पश्य मे वीर्यं यत् ते शक्यं कुरुष्व तत् ।¦उज्जीवयाम्यहं गर्भं यततः शक्तितोऽपि ते ॥ १७२॥ | ||
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| verse_text = सन्ततिर्वर्षसाहस्रं पाण्डवानां भवेद् भुवि । | | verse_text = सन्ततिर्वर्षसाहस्रं पाण्डवानां भवेद् भुवि । | ||
| verse_lines = सन्ततिर्वर्षसाहस्रं पाण्डवानां भवेद् भुवि | | verse_lines = सन्ततिर्वर्षसाहस्रं पाण्डवानां भवेद् भुवि ।¦मत्पालितां न कश्चित् तां तावद्धन्तुं क्षमः क्वचित् ॥ १७३॥ | ||
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| verse_text = जानामि ते मतिं दुष्टां जिघांसोः पार्थसन्ततिम् । | | verse_text = जानामि ते मतिं दुष्टां जिघांसोः पार्थसन्ततिम् । | ||
| verse_lines = जानामि ते मतिं दुष्टां जिघांसोः पार्थसन्ततिम् | | verse_lines = जानामि ते मतिं दुष्टां जिघांसोः पार्थसन्ततिम् ।¦चिकीर्षोर्धार्तराष्ट्रस्य तन्तुं भूयः सुदुष्करम् ॥ १७४॥ | ||
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| verse_text = मदाज्ञया सा विफला भवित्री वाञ्छा मुमुक्षा विमुखस्य(मुमुक्षोर्विमुखस्य) विष्णोः । | | verse_text = मदाज्ञया सा विफला भवित्री वाञ्छा मुमुक्षा विमुखस्य(मुमुक्षोर्विमुखस्य) विष्णोः । | ||
| verse_lines = मदाज्ञया सा विफला भवित्री वाञ्छा मुमुक्षा विमुखस्य(मुमुक्षोर्विमुखस्य) विष्णोः | | verse_lines = मदाज्ञया सा विफला भवित्री वाञ्छा मुमुक्षा विमुखस्य(मुमुक्षोर्विमुखस्य) विष्णोः ।¦यथैव तेनैव नराधिरूढो गम्यस्तव स्यान्नच भूमिभागः ॥ १७५॥ | ||
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| verse_text = दुर्गन्धयुक्तो व्रणसञ्चिताङ्गः सदा चरः स्या विपिनेषु मन्दः । | | verse_text = दुर्गन्धयुक्तो व्रणसञ्चिताङ्गः सदा चरः स्या विपिनेषु मन्दः । | ||
| verse_lines = दुर्गन्धयुक्तो व्रणसञ्चिताङ्गः सदा चरः स्या विपिनेषु मन्दः | | verse_lines = दुर्गन्धयुक्तो व्रणसञ्चिताङ्गः सदा चरः स्या विपिनेषु मन्दः ।¦यावद् भुवि स्यादिह पार्थतन्तुर्व्यासोऽपि तं प्राह तथेति देवः ॥ १७६॥ | ||
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| verse_text = रूपद्वयेनापि हरेस्तथोक्तो जगाद कालीतनयं स कृष्णम् । | | verse_text = रूपद्वयेनापि हरेस्तथोक्तो जगाद कालीतनयं स कृष्णम् । | ||
| verse_lines = रूपद्वयेनापि हरेस्तथोक्तो जगाद कालीतनयं स कृष्णम् | | verse_lines = रूपद्वयेनापि हरेस्तथोक्तो जगाद कालीतनयं स कृष्णम् ।¦त्वया सह स्यान्मम सङ्गमो विभो यथेष्टतः स्यान्नच मेऽत्र विघ्नः ॥ १७७॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्त ओमिति प्राह भगवान् बादरायणः | | verse_lines = इत्युक्त ओमिति प्राह भगवान् बादरायणः ।¦तं प्रणम्य ययौ सोऽपि स्वप्नदृष्टमनुस्मरन् ॥ १७८॥ | ||
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| verse_text = स्वप्ने हि द्रौपदेयानां वधो दृष्टोऽत्मना निशि । | | verse_text = स्वप्ने हि द्रौपदेयानां वधो दृष्टोऽत्मना निशि । | ||
| verse_lines = स्वप्ने हि द्रौपदेयानां वधो दृष्टोऽत्मना निशि | | verse_lines = स्वप्ने हि द्रौपदेयानां वधो दृष्टोऽत्मना निशि ।¦अर्जुनेन प्रतिज्ञानं द्रौपद्यै स्ववधं प्रति ॥ १७९॥ | ||
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| verse_text = निबध्याऽनयनं चैव तेनैव शिबिरं प्रति । | | verse_text = निबध्याऽनयनं चैव तेनैव शिबिरं प्रति । | ||
| verse_lines = निबध्याऽनयनं चैव तेनैव शिबिरं प्रति | | verse_lines = निबध्याऽनयनं चैव तेनैव शिबिरं प्रति ।¦मुञ्चेति द्रौपदीवाक्यं नेति भीमवचस्तथा ।¦कृष्णवाक्यान्मणिं हृत्वा देशान्निर्यापणं (निर्यातनं) तथा ॥ १८०॥ | ||
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| verse_text = इत्यादि स्वप्नदृष्टं यत् प्रायः सत्यमभूदिति । | | verse_text = इत्यादि स्वप्नदृष्टं यत् प्रायः सत्यमभूदिति । | ||
| verse_lines = इत्यादि स्वप्नदृष्टं यत् प्रायः सत्यमभूदिति | | verse_lines = इत्यादि स्वप्नदृष्टं यत् प्रायः सत्यमभूदिति ।¦चिन्तयन् प्रययौ देवं (दावं) द्रौणिः शस्त्रभृतां वरः ॥ १८१॥ | ||
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| verse_lines = स कृष्णोक्तमपि प्राप्य बादरायणशिष्यताम् | | verse_lines = स कृष्णोक्तमपि प्राप्य बादरायणशिष्यताम् ।¦प्राप्योत्तरद्वापरे च वेदान् संविभजिष्यति ॥ १८२॥ | ||
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| verse_lines = ततः सप्तर्षिर्भूत्वा पाराशर्यप्रसादतः | | verse_lines = ततः सप्तर्षिर्भूत्वा पाराशर्यप्रसादतः ।¦एकीभावं स्वरूपेण यास्यत्यच्युतनिष्ठया ॥ १८३॥ | ||
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| verse_lines = कृपोऽथ पाण्डवान् प्राप्य गौरवात् पूजितश्च तैः | | verse_lines = कृपोऽथ पाण्डवान् प्राप्य गौरवात् पूजितश्च तैः ।¦अभूदाचार्य एवासौ राज्ञां तत्तन्तुभाविनाम् ॥ १८४॥ | ||
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| verse_lines = बादरायणशिष्यत्वं पुनः प्राप्य भजन्नमुम् | | verse_lines = बादरायणशिष्यत्वं पुनः प्राप्य भजन्नमुम् ।¦साकं स्वभागिनेयेन भाव्येको मुनिसप्तके ।¦कृतवर्मा द्वारवतीं ययौ कृष्णानुमोदितः ॥ १८५॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णायै तं मणिं(तन्मणिं) दत्वा भीमस्तां पर्यसान्त्वयत् | | verse_lines = कृष्णायै तं मणिं(तन्मणिं) दत्वा भीमस्तां पर्यसान्त्वयत् ।¦विकोपा भीमवाक्येन राज्ञे सा च मणिं ददौ ॥ १८६॥ | ||
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| verse_lines = राजार्हे हि मणौ दत्ते मह्यं भीमेन लौकिकाः | | verse_lines = राजार्हे हि मणौ दत्ते मह्यं भीमेन लौकिकाः ।¦स्त्रीपक्षपातं राजा च शङ्केयुर्मारुतेरिति ॥ १८७॥ | ||
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| verse_lines = मणिं राज्ञे ददौ कृष्णा भर्तृप्रियहिते रता | | verse_lines = मणिं राज्ञे ददौ कृष्णा भर्तृप्रियहिते रता ।¦सोऽप्याबध्य मणिं मूर्ध्नि रेजे राजा गवामिव ॥ १८८॥ | ||
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| verse_lines = वेदेश्वरेणापि यदूत्तमेन कृष्णेन युक्तास्तत आशु पार्थाः | | verse_lines = वेदेश्वरेणापि यदूत्तमेन कृष्णेन युक्तास्तत आशु पार्थाः ।¦ययुः सभार्या निजराजधानीं हत्वैव सन्तोऽन्तररीन् स्वराज्यम् ॥ १८९॥ | ||
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| verse_lines = युधिष्ठिरस्यानु विचित्रवीर्यसुतस्य पादावभिवन्दमानम् | | verse_lines = युधिष्ठिरस्यानु विचित्रवीर्यसुतस्य पादावभिवन्दमानम् ।¦आकृष्य भीमं परमेश्वरोऽयो मयाकृतिं धात् पुरतो नृपस्य ॥ १९०॥ | ||
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| verse_text = भीमाकृतिं तां स सुयोधनेन कारापितामभ्यसने गदायाः । | | verse_text = भीमाकृतिं तां स सुयोधनेन कारापितामभ्यसने गदायाः । | ||
| verse_lines = भीमाकृतिं तां स सुयोधनेन कारापितामभ्यसने गदायाः | | verse_lines = भीमाकृतिं तां स सुयोधनेन कारापितामभ्यसने गदायाः ।¦आश्लिष्य चूर्णीकृतवानसृग् वमन् हा तात भीमेति वदन् पपात ॥ १९१॥ | ||
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| verse_text = तमाह कृष्णो न हतोऽद्य भीमो नच त्वयाऽन्यैरपि शक्यतेऽसौ । | | verse_text = तमाह कृष्णो न हतोऽद्य भीमो नच त्वयाऽन्यैरपि शक्यतेऽसौ । | ||
| verse_lines = तमाह कृष्णो न हतोऽद्य भीमो नच त्वयाऽन्यैरपि शक्यतेऽसौ | | verse_lines = तमाह कृष्णो न हतोऽद्य भीमो नच त्वयाऽन्यैरपि शक्यतेऽसौ ।¦हन्तुं स्वबुद्धिः प्रथिता त्वयाऽद्य पापा हि ते बुद्धिरद्यापि राजन् ॥ १९२॥ | ||
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| verse_lines = स्वबुद्धिदोषादतिपापशीलपुत्राख्यपापानि विवर्द्धयित्वा | | verse_lines = स्वबुद्धिदोषादतिपापशीलपुत्राख्यपापानि विवर्द्धयित्वा ।¦नीतो वशं तैः फलमद्य भुञ्जन् न क्रोधितुं चार्हसि भीमसेने ॥ १९३॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्ते शान्तबुद्ध्यैव राज्ञाऽऽहूतो वृकोदरः | | verse_lines = इत्युक्ते शान्तबुद्ध्यैव राज्ञाऽऽहूतो वृकोदरः ।¦अभ्यवन्दत तत्पादावनुजाद्याश्च तस्य ये ॥ १९४॥ | ||
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| verse_lines = वज्राच्च दृढदेहत्वादविकारे वृकोदरे | | verse_lines = वज्राच्च दृढदेहत्वादविकारे वृकोदरे ।¦न दोषो विवृतोऽस्य स्यादिति कृष्णेन वञ्चितः(चिन्तितम्) ।¦सर्वानाश्लिष्य च प्रेम्णा युयोज नृप आशिषः ॥ १९५॥ | ||
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| verse_lines = कुलनाशकरः पापः शापयोग्यस्तव ह्यहम् | | verse_lines = कुलनाशकरः पापः शापयोग्यस्तव ह्यहम् ।¦इत्युक्त्वैव प्रणमतो गान्धारी सुपदाङ्गुलीः ॥ १९६॥ | ||
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| verse_lines = ददर्श धर्मराजस्य पटान्तेन(पट्टान्तेन) प्रकोपिता | | verse_lines = ददर्श धर्मराजस्य पटान्तेन(पट्टान्तेन) प्रकोपिता ।¦तस्याः क्रोधाग्निनिर्दग्धनखः स कुनखोऽभवत् ॥ १९७॥ | ||
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| verse_lines = वन्दमानं पुनर्भीममाह सा क्रोधविह्वला | | verse_lines = वन्दमानं पुनर्भीममाह सा क्रोधविह्वला ।¦अधर्मतः कथं भीम सुतं मे त्वं निजघ्निवान् ॥ १९८॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तेऽस्याः (इत्युक्तोऽस्याः) शमयितुं क्रोधमग्रे वृकोदरः | | verse_lines = इत्युक्तेऽस्याः (इत्युक्तोऽस्याः) शमयितुं क्रोधमग्रे वृकोदरः ।¦प्राह न प्राणसन्देहे पापं स्यात् पापिनो वधे ॥ १९९॥ | ||
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| verse_lines = यथाप्रतिज्ञं भ्रातृव्यान् रणे मम निजघ्नुषः | | verse_lines = यथाप्रतिज्ञं भ्रातृव्यान् रणे मम निजघ्नुषः ।¦क्वाधर्मः क्षत्रजातेस्तु तद्धानौ जीवनं नहि ॥ २०१॥ | ||
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| verse_text = ‘पापा न शुद्धधर्मेण हन्तव्या’ इति च श्रुतिः । | | verse_text = ‘पापा न शुद्धधर्मेण हन्तव्या’ इति च श्रुतिः । | ||
| verse_lines = ‘पापा न शुद्धधर्मेण हन्तव्या’ इति च श्रुतिः | | verse_lines = ‘पापा न शुद्धधर्मेण हन्तव्या’ इति च श्रुतिः ।¦‘अन्यवत् पापहननं पापयेत्याह’ इति श्रुतिः ।¦अतोऽसुरान् नैकृतिकान् निकृत्या घ्नन्ति देवताः ॥ २०२॥ | ||
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| verse_text = निकृत्या निकृतिं हन्यान्निकृत्या नैव धार्मिकान्(धार्मिकम्) । | | verse_text = निकृत्या निकृतिं हन्यान्निकृत्या नैव धार्मिकान्(धार्मिकम्) । | ||
| verse_lines = निकृत्या निकृतिं हन्यान्निकृत्या नैव धार्मिकान्(धार्मिकम्) | | verse_lines = निकृत्या निकृतिं हन्यान्निकृत्या नैव धार्मिकान्(धार्मिकम्) ।¦इति श्रुतिर्हि परमा पठ्यते पैङ्गिभिः सदा ॥ २०३॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्ता तं पुनः प्राह कथं ते नरशोणितम् । | | verse_text = इत्युक्ता तं पुनः प्राह कथं ते नरशोणितम् । | ||
| verse_lines = इत्युक्ता तं पुनः प्राह कथं ते नरशोणितम् | | verse_lines = इत्युक्ता तं पुनः प्राह कथं ते नरशोणितम् ।¦पीतं नरेणैव सता न पीतमिति सोऽब्रवीत् ॥ २०४॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = दन्तान्तरं न मे प्राप शोणितं तत् सुतस्य ते । | | verse_text = दन्तान्तरं न मे प्राप शोणितं तत् सुतस्य ते । | ||
| verse_lines = दन्तान्तरं न मे प्राप शोणितं तत् सुतस्य ते | | verse_lines = दन्तान्तरं न मे प्राप शोणितं तत् सुतस्य ते ।¦प्रतिज्ञापालनायापि प्रतिकर्तुं च तत् कृतम् ॥ २०५॥ | ||
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| verse_text = भीषणाय च शत्रूणां पीतवच्च प्रदर्शितम् । | | verse_text = भीषणाय च शत्रूणां पीतवच्च प्रदर्शितम् । | ||
| verse_lines = भीषणाय च शत्रूणां पीतवच्च प्रदर्शितम् | | verse_lines = भीषणाय च शत्रूणां पीतवच्च प्रदर्शितम् ।¦(वेददृष्टः स्वधर्मोऽयं) वेददृष्टश्च धर्मोऽयमितिपापजनं प्रति ॥ २०६॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तोवाच नैवान्धद्वयस्यास्य वृकोदर । | | verse_text = इत्युक्तोवाच नैवान्धद्वयस्यास्य वृकोदर । | ||
| verse_lines = इत्युक्तोवाच नैवान्धद्वयस्यास्य वृकोदर | | verse_lines = इत्युक्तोवाच नैवान्धद्वयस्यास्य वृकोदर ।¦घ्नता पुत्रशतं यष्टिमात्रं चोर्वरितं त्वया ॥ २०७॥ | ||
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| verse_text = तामाह भीमः पापिष्ठा वधयोग्यापराधिनः । | | verse_text = तामाह भीमः पापिष्ठा वधयोग्यापराधिनः । | ||
| verse_lines = तामाह भीमः पापिष्ठा वधयोग्यापराधिनः | | verse_lines = तामाह भीमः पापिष्ठा वधयोग्यापराधिनः ।¦सर्वे हता इति पुनः साऽऽह येनाकृतस्तव ।¦अपराधः स एकोऽपि किं नास्तीत्यवदत् स ताम् ॥ २०८॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = सर्वैः समेतैः कृष्णस्य बन्धनाय विनिश्चितम्(विनिश्चतः) । | | verse_text = सर्वैः समेतैः कृष्णस्य बन्धनाय विनिश्चितम्(विनिश्चतः) । | ||
| verse_lines = सर्वैः समेतैः कृष्णस्य बन्धनाय विनिश्चितम्(विनिश्चतः) | | verse_lines = सर्वैः समेतैः कृष्णस्य बन्धनाय विनिश्चितम्(विनिश्चतः) ।¦अन्यानि च सुपापानि कृतान्यत्र पुराऽपिच ॥ २०९॥ | ||
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| verse_text = वासुदेवं सभासंस्थं ब्रुवाणं धर्मसंहितम्(धर्मसंहिताम्) । | | verse_text = वासुदेवं सभासंस्थं ब्रुवाणं धर्मसंहितम्(धर्मसंहिताम्) । | ||
| verse_lines = वासुदेवं सभासंस्थं ब्रुवाणं धर्मसंहितम्(धर्मसंहिताम्) | | verse_lines = वासुदेवं सभासंस्थं ब्रुवाणं धर्मसंहितम्(धर्मसंहिताम्) ।¦पुनःपुनरवज्ञाय यान्तं दुर्योधनं बहिः ।¦सर्वेऽन्वगच्छन्नित्यादीन्यभिप्रेत्य वृकोदरः ॥ २१०॥ | ||
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| verse_text = नैकोऽप्यनपराधी मे स्वयं ताननुशिक्षितुम् । | | verse_text = नैकोऽप्यनपराधी मे स्वयं ताननुशिक्षितुम् । | ||
| verse_lines = नैकोऽप्यनपराधी मे स्वयं ताननुशिक्षितुम् | | verse_lines = नैकोऽप्यनपराधी मे स्वयं ताननुशिक्षितुम् ।¦असमर्था मयि क्रोधं किं करोषि निरर्थकम् ॥ २११॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्ता साऽभवत् तूष्णीं क्रमात् सर्वैश्च पाण्डवैः । | | verse_text = इत्युक्ता साऽभवत् तूष्णीं क्रमात् सर्वैश्च पाण्डवैः । | ||
| verse_lines = इत्युक्ता साऽभवत् तूष्णीं क्रमात् सर्वैश्च पाण्डवैः | | verse_lines = इत्युक्ता साऽभवत् तूष्णीं क्रमात् सर्वैश्च पाण्डवैः ।¦वन्दिता व्यासवाक्याच्च किञ्चिच्छान्ताऽथ साऽभवत् ॥ २१२॥ | ||
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| verse_text = तस्या याश्च स्नुषाः सर्वास्ताभिः सह पुरस्कृताम् । | | verse_text = तस्या याश्च स्नुषाः सर्वास्ताभिः सह पुरस्कृताम् । | ||
| verse_lines = तस्या याश्च स्नुषाः सर्वास्ताभिः सह पुरस्कृताम् | | verse_lines = तस्या याश्च स्नुषाः सर्वास्ताभिः सह पुरस्कृताम् ।¦कृत्वा तं धृतराष्ट्रं च विदुरादींश्च सर्वशः ॥ २१३॥ | ||
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| verse_text = पाण्डवाः प्रधनस्थानं सभार्याः पृथया सह । | | verse_text = पाण्डवाः प्रधनस्थानं सभार्याः पृथया सह । | ||
| verse_lines = पाण्डवाः प्रधनस्थानं सभार्याः पृथया सह | | verse_lines = पाण्डवाः प्रधनस्थानं सभार्याः पृथया सह ।¦कृष्णाभ्यां च ययुस्तत्र गान्धार्यास्तपसो बलम् ॥ २१४॥ | ||
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| verse_text = जानन् पाण्डवरक्षार्थं चिकीर्षुस्तत्तपोव्ययम् । | | verse_text = जानन् पाण्डवरक्षार्थं चिकीर्षुस्तत्तपोव्ययम् । | ||
| verse_lines = जानन् पाण्डवरक्षार्थं चिकीर्षुस्तत्तपोव्ययम् | | verse_lines = जानन् पाण्डवरक्षार्थं चिकीर्षुस्तत्तपोव्ययम् ।¦वेदेश्वरो ददौ दिव्यं चक्षुः सत्यवतीसुतः ॥ २१५॥ | ||
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| verse_text = तेन दृष्ट्वा प्रेतदेहान् सर्वांस्तत्र समाकुला(समाकुलान्) । | | verse_text = तेन दृष्ट्वा प्रेतदेहान् सर्वांस्तत्र समाकुला(समाकुलान्) । | ||
| verse_lines = तेन दृष्ट्वा प्रेतदेहान् सर्वांस्तत्र समाकुला(समाकुलान्) | | verse_lines = तेन दृष्ट्वा प्रेतदेहान् सर्वांस्तत्र समाकुला(समाकुलान्) ।¦शशाप यादवेशानं त्वयाऽस्मत्कुलनाशनम् ।¦यत् कृतं तत् तव कुलं गच्छत्वन्योन्यतः क्षयम्(अन्योन्यसङ्क्षयम्) ॥ २१६॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तो भगवान् कृष्णः स्वचिकीर्षितमेव तत् । | | verse_text = इत्युक्तो भगवान् कृष्णः स्वचिकीर्षितमेव तत् । | ||
| verse_lines = इत्युक्तो भगवान् कृष्णः स्वचिकीर्षितमेव तत् | | verse_lines = इत्युक्तो भगवान् कृष्णः स्वचिकीर्षितमेव तत् ।¦अस्त्वेवमित्याह विभुरीश्वरोऽप्यन्यथा कृतौ ॥ २१७॥ | ||
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| verse_text = तेन तस्यास्तपो नष्टं हीना साऽतो हि भर्तृतः । | | verse_text = तेन तस्यास्तपो नष्टं हीना साऽतो हि भर्तृतः । | ||
| verse_lines = तेन तस्यास्तपो नष्टं हीना साऽतो हि भर्तृतः | | verse_lines = तेन तस्यास्तपो नष्टं हीना साऽतो हि भर्तृतः ।¦नाशयेद्धि स्वयं विष्णुः स्वयोग्यादधिकान् गुणान् ॥ २१८॥ | ||
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| verse_text = तत आश्लिष्य भर्तॄणां देहान् प्ररुदतीः स्त्रियः । | | verse_text = तत आश्लिष्य भर्तॄणां देहान् प्ररुदतीः स्त्रियः । | ||
| verse_lines = तत आश्लिष्य भर्तॄणां देहान् प्ररुदतीः स्त्रियः | | verse_lines = तत आश्लिष्य भर्तॄणां देहान् प्ररुदतीः स्त्रियः ।¦सर्वा दुर्योधनादीनां दर्शयामास केशवः ।¦कृष्णायै सा च तं देवमस्तुवत् पूर्णषड्गुणम् ॥ २१९॥ | ||
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| verse_lines = ततो देहान् प्रसिद्धानां पार्थाः समदहन् सताम् | | verse_lines = ततो देहान् प्रसिद्धानां पार्थाः समदहन् सताम् ।¦अन्येषां धृतराष्ट्रादीन् पुरस्कृत्यैव कांश्चन ।¦सूतैः पञ्चभिरेव स्वैः सरस्वत्यां प्रचिक्षिपुः(विचिक्षिपुः) ॥ २२०॥ | ||
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| verse_text = स्नेहान्नृपो यमौ च स्वान् नाऽजौ तस्मिन् न्ययोजयन् (ह्ययोजयन्) । | | verse_text = स्नेहान्नृपो यमौ च स्वान् नाऽजौ तस्मिन् न्ययोजयन् (ह्ययोजयन्) । | ||
| verse_lines = स्नेहान्नृपो यमौ च स्वान् नाऽजौ तस्मिन् न्ययोजयन् (ह्ययोजयन्) | | verse_lines = स्नेहान्नृपो यमौ च स्वान् नाऽजौ तस्मिन् न्ययोजयन् (ह्ययोजयन्) ।¦शवाः प्रायो बहुत्वेन तत्रतत्रैव संस्थिताः ॥ २२१॥ | ||
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| verse_lines = ततो ददत्सु पानीयं गङ्गायां स्वजनस्य तु | | verse_lines = ततो ददत्सु पानीयं गङ्गायां स्वजनस्य तु ।¦पृथा कर्णाय दत्तेति पार्थानाहाग्रजं च तम् ॥ २२२॥ | ||
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| verse_lines = ततो हाहेति विलपन् राजा परमदुःखितः | | verse_lines = ततो हाहेति विलपन् राजा परमदुःखितः ।¦शशाप सर्वनारीणां गुह्यं हृदि न तिष्ठतु ॥ २२३॥ | ||
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| verse_lines = हा मातस्तव धृत्यैव वयं सर्वे भृशं हताः | | verse_lines = हा मातस्तव धृत्यैव वयं सर्वे भृशं हताः ।¦ज्येष्ठं पितृसमं हत्वा प्रतिपत्स्याम कां गतिम् ॥ २२४॥ | ||
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| verse_text = एवं वदन्तं कौन्तेयं वासुदेवः सनारदः । | | verse_text = एवं वदन्तं कौन्तेयं वासुदेवः सनारदः । | ||
| verse_lines = एवं वदन्तं कौन्तेयं वासुदेवः सनारदः | | verse_lines = एवं वदन्तं कौन्तेयं वासुदेवः सनारदः ।¦शमयामास सद्वाक्यैर्गुणान् कर्णस्य चाब्रवीत् ॥ २२५॥ | ||
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| verse_lines = ततस्ते प्रेतकार्याणि चक्रुः सर्वेऽपि सर्वशः | | verse_lines = ततस्ते प्रेतकार्याणि चक्रुः सर्वेऽपि सर्वशः ।¦सर्वेषामधिराज्ये च स्थितोऽभूत् पाण्डवाग्रजः ॥ २२६॥ | ||
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<span id="gr-C29" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकोनत्रिंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C29" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकोनत्रिंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = ओं ॥ यदैव कृष्णौ सकलाधिराज्ये युधिष्ठिरं यौवराज्ये च भीमम् । | | verse_text = ओं ॥ यदैव कृष्णौ सकलाधिराज्ये युधिष्ठिरं यौवराज्ये च भीमम् । | ||
| verse_lines = ओं ॥ यदैव कृष्णौ सकलाधिराज्ये युधिष्ठिरं यौवराज्ये च भीमम् | | verse_lines = ओं ॥ यदैव कृष्णौ सकलाधिराज्ये युधिष्ठिरं यौवराज्ये च भीमम् ।¦विप्रैर्युतावभिषिच्याऽशिषश्च युक्ता दत्वा हर्षयामासतुस्तौ ॥ १॥ | ||
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| verse_lines = तदैव चार्वाक इति प्रसिद्धं रक्षस्त्रिदण्डी यतिरेव भूत्वा | | verse_lines = तदैव चार्वाक इति प्रसिद्धं रक्षस्त्रिदण्डी यतिरेव भूत्वा ।¦युधिष्ठिरं गर्हयामास विप्रास्त्वां गर्हयन्तीति सुपापशीलः ॥ २॥ | ||
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| verse_lines = श्रुत्वैव तद् दुःखितमाशु धर्मजं दृष्ट्वा विप्राः शेपुरमुं भृशार्ताः | | verse_lines = श्रुत्वैव तद् दुःखितमाशु धर्मजं दृष्ट्वा विप्राः शेपुरमुं भृशार्ताः ।¦अगर्हितं नित्यमस्माभिरेनं यतोऽवोचो गर्हितमद्य पाप ।¦भस्मीभवाऽश्वेव ततस्त्वितीरिते क्षणादभूत् पापतमः स भस्मसात् ॥ ३॥ | ||
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| verse_lines = रक्षोऽधमोऽयं निहतोऽद्य विप्रैस्तमा शुचः कृतकार्योऽसि राजन् | | verse_lines = रक्षोऽधमोऽयं निहतोऽद्य विप्रैस्तमा शुचः कृतकार्योऽसि राजन् ।¦इतीरितः शान्तमनाः स विप्रान् सन्तर्पयामास धनैश्च भक्त्या ॥ ५॥ | ||
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| verse_lines = असान्त्वयच्च बान्धवान् स्वपौरसंश्रयादिकान् | | verse_lines = असान्त्वयच्च बान्धवान् स्वपौरसंश्रयादिकान् ।¦ददौ यथेष्टतो धनं ररक्ष चानु पुर्ववत्(पुत्रवत्,चानुपूर्ववत्)) ॥ ६॥ | ||
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| verse_lines = स भीष्मद्रोणकर्णानां वधाद् दुर्योधनस्य च | | verse_lines = स भीष्मद्रोणकर्णानां वधाद् दुर्योधनस्य च ।¦पापाशङ्की तप्यमानो राज्यत्यागे मनो दधे ॥ ७॥ | ||
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| verse_lines = तस्मिन् क्रुद्धे नृपं प्राहुर्विप्रास्त्वत्तोऽपि तत्त्ववित् | | verse_lines = तस्मिन् क्रुद्धे नृपं प्राहुर्विप्रास्त्वत्तोऽपि तत्त्ववित् ।¦शक्रोऽर्जुन इति श्रुत्वाऽप्येतद्धर्मे स संशयम्(ससंशयम्) ॥ ९॥ | ||
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| verse_lines = मत्स्नेहादेव सर्वेऽपि धर्मोऽयमिति वादिनः | | verse_lines = मत्स्नेहादेव सर्वेऽपि धर्मोऽयमिति वादिनः ।¦इत्येवं शङ्कमानं तमूचतुर्विप्रयादवौ ।¦कृष्णौ धर्मोऽयमित्येव शास्त्रयुक्त्या पुनः पुनः ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = नातिनिश्चितबुद्धिं तं तदाऽपि पुरुषोत्तमौ । | | verse_text = नातिनिश्चितबुद्धिं तं तदाऽपि पुरुषोत्तमौ । | ||
| verse_lines = नातिनिश्चितबुद्धिं तं तदाऽपि पुरुषोत्तमौ | | verse_lines = नातिनिश्चितबुद्धिं तं तदाऽपि पुरुषोत्तमौ ।¦हतपक्षगतत्वेन त्वच्छङ्काया अगोचरः ।¦यतो भीष्मस्ततो याहि तमित्यूचतुरव्ययौ ॥ ११॥ | ||
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| verse_text = स ताभ्यां भ्रातृभिश्चैव मुनिभिश्च समन्वितः । | | verse_text = स ताभ्यां भ्रातृभिश्चैव मुनिभिश्च समन्वितः । | ||
| verse_lines = स ताभ्यां भ्रातृभिश्चैव मुनिभिश्च समन्वितः | | verse_lines = स ताभ्यां भ्रातृभिश्चैव मुनिभिश्च समन्वितः ।¦भीष्मं ययौ लज्जितेऽस्मिंस्तं भीष्मायाऽह केशवः ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = पृच्छेत्युक्तः स भीष्मेण पप्रच्छाखिलमञ्जसा । | | verse_text = पृच्छेत्युक्तः स भीष्मेण पप्रच्छाखिलमञ्जसा । | ||
| verse_lines = पृच्छेत्युक्तः स भीष्मेण पप्रच्छाखिलमञ्जसा | | verse_lines = पृच्छेत्युक्तः स भीष्मेण पप्रच्छाखिलमञ्जसा ।¦तत्रोवाचाखिलान् धर्मान् कृष्णो भीष्मशरीरगः ॥ १३॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = भीष्मो ह्याह हरिं पार्था बोधनीयास्त्वयैव हि । | | verse_text = भीष्मो ह्याह हरिं पार्था बोधनीयास्त्वयैव हि । | ||
| verse_lines = भीष्मो ह्याह हरिं पार्था बोधनीयास्त्वयैव हि | | verse_lines = भीष्मो ह्याह हरिं पार्था बोधनीयास्त्वयैव हि ।¦का शक्तिर्मम देवेशपार्थान्(देवेश पार्थान्) बोधयितुं प्रभो ॥ १४॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = इत्युक्तो भगवानाह त्वत्कीर्त्यै त्वयि संस्थितः । | | verse_text = इत्युक्तो भगवानाह त्वत्कीर्त्यै त्वयि संस्थितः । | ||
| verse_lines = इत्युक्तो भगवानाह त्वत्कीर्त्यै त्वयि संस्थितः | | verse_lines = इत्युक्तो भगवानाह त्वत्कीर्त्यै त्वयि संस्थितः ।¦प्रवक्ष्याम्यखिलान् धर्मान् सूक्ष्मं तत्त्वमपीति ह ॥ १५॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = राज्ञः प्रथमतो धर्मो भगवद्धर्मपालनम् । | | verse_text = राज्ञः प्रथमतो धर्मो भगवद्धर्मपालनम् । | ||
| verse_lines = राज्ञः प्रथमतो धर्मो भगवद्धर्मपालनम् | | verse_lines = राज्ञः प्रथमतो धर्मो भगवद्धर्मपालनम् ।¦तदर्थं कण्टकोद्धारो धर्मा भागवता अपि ।¦मनोवाक्कर्मभिर्विष्णोरच्छिद्रत्वेन(विष्णोरच्छिन्नत्वेन) चार्चनम् ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = पूर्णाशेषगुणो विष्णुः स्वतन्त्रश्चैक एव तु । | | verse_text = पूर्णाशेषगुणो विष्णुः स्वतन्त्रश्चैक एव तु । | ||
| verse_lines = पूर्णाशेषगुणो विष्णुः स्वतन्त्रश्चैक एव तु | | verse_lines = पूर्णाशेषगुणो विष्णुः स्वतन्त्रश्चैक एव तु ।¦तद्वशं सर्वमन्यच्च सर्वदेति विनिश्चयः ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = देवताक्रमविज्ञानमपूजाऽन्यस्य वै हरेः । | | verse_text = देवताक्रमविज्ञानमपूजाऽन्यस्य वै हरेः । | ||
| verse_lines = देवताक्रमविज्ञानमपूजाऽन्यस्य वै हरेः | | verse_lines = देवताक्रमविज्ञानमपूजाऽन्यस्य वै हरेः ।¦पूजा भागवतत्वेन देवादीनां च सर्वशः ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = वृथा कर्माकृतिः क्वापि निराशीस्त्वं सदैव च(सदैव तु) । | | verse_text = वृथा कर्माकृतिः क्वापि निराशीस्त्वं सदैव च(सदैव तु) । | ||
| verse_lines = वृथा कर्माकृतिः क्वापि निराशीस्त्वं सदैव च(सदैव तु) | | verse_lines = वृथा कर्माकृतिः क्वापि निराशीस्त्वं सदैव च(सदैव तु) ।¦विष्णोर्भागवतानां च प्रतीपस्याकृतिः सदा ।¦परस्परविरोधे तु विशिष्टस्यानुकूलता ॥ १९॥ | ||
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| verse_text = प्रियं विष्णोस्तदीयानामपि सर्वं समाचरेत् । | | verse_text = प्रियं विष्णोस्तदीयानामपि सर्वं समाचरेत् । | ||
| verse_lines = प्रियं विष्णोस्तदीयानामपि सर्वं समाचरेत् | | verse_lines = प्रियं विष्णोस्तदीयानामपि सर्वं समाचरेत् ।¦धर्ममप्यप्रियं तेषां नैव किञ्चित् समाचरेत् ॥ २०॥ | ||
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| verse_text = साम्ये विरोधे च बहूननुवर्तेत वैष्णवान् । | | verse_text = साम्ये विरोधे च बहूननुवर्तेत वैष्णवान् । | ||
| verse_lines = साम्ये विरोधे च बहूननुवर्तेत वैष्णवान् | | verse_lines = साम्ये विरोधे च बहूननुवर्तेत वैष्णवान् ।¦एते साधारणा धर्मा ज्ञेया भागवता इति ॥ २१॥ | ||
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| verse_text = तत्त्वविज्ञापनं धर्मो विप्रस्य तु विशेषतः । | | verse_text = तत्त्वविज्ञापनं धर्मो विप्रस्य तु विशेषतः । | ||
| verse_lines = तत्त्वविज्ञापनं धर्मो विप्रस्य तु विशेषतः | | verse_lines = तत्त्वविज्ञापनं धर्मो विप्रस्य तु विशेषतः ।¦शारीरदण्डसन्त्यागः पुत्रभार्यादिकानृते ।¦तत्रापि नाङ्गहानिः स्याद् वेदना वा चिरं न तु ॥ २२॥ | ||
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| verse_text = न चार्थदण्डः कर्तव्यो विप्रवैश्यादिभिः क्वचित् । | | verse_text = न चार्थदण्डः कर्तव्यो विप्रवैश्यादिभिः क्वचित् । | ||
| verse_lines = न चार्थदण्डः कर्तव्यो विप्रवैश्यादिभिः क्वचित् | | verse_lines = न चार्थदण्डः कर्तव्यो विप्रवैश्यादिभिः क्वचित् ।¦शारीरदण्डविषये वैश्यादीनां च विप्रवत् ॥ २३॥ | ||
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| verse_text = यथालब्धेन वर्तेत भिक्षया वा द्विजोत्तमः । | | verse_text = यथालब्धेन वर्तेत भिक्षया वा द्विजोत्तमः । | ||
| verse_lines = यथालब्धेन वर्तेत भिक्षया वा द्विजोत्तमः | | verse_lines = यथालब्धेन वर्तेत भिक्षया वा द्विजोत्तमः ।¦शिष्ययाज्योपलब्धैर्वा क्षत्रधर्मेण वाऽऽपदि ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = महापदि विशां धर्मैः क्षत्रियः सुरविप्रयोः । | | verse_text = महापदि विशां धर्मैः क्षत्रियः सुरविप्रयोः । | ||
| verse_lines = महापदि विशां धर्मैः क्षत्रियः सुरविप्रयोः | | verse_lines = महापदि विशां धर्मैः क्षत्रियः सुरविप्रयोः ।¦अन्यत्र सर्ववित्तेन वर्तेतैतांश्च पालयन् ॥ २५॥ | ||
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| verse_text = विरोधिनः क्षत्रियाच्च प्रसह्यैव हरेद् धनम् । | | verse_text = विरोधिनः क्षत्रियाच्च प्रसह्यैव हरेद् धनम् । | ||
| verse_lines = विरोधिनः क्षत्रियाच्च प्रसह्यैव हरेद् धनम् | | verse_lines = विरोधिनः क्षत्रियाच्च प्रसह्यैव हरेद् धनम् ।¦सामादिक्रमतो धर्मान् वर्तयेद् दण्डतोऽन्ततः ।¦अपलायी सदा युद्धेऽसतां कार्यमृते भवेत् ॥ २६॥ | ||
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| verse_text = कृषिवाणिज्यगोरक्षाकुसीदं वैश्यजीवनम् । | | verse_text = कृषिवाणिज्यगोरक्षाकुसीदं वैश्यजीवनम् । | ||
| verse_lines = कृषिवाणिज्यगोरक्षाकुसीदं वैश्यजीवनम् | | verse_lines = कृषिवाणिज्यगोरक्षाकुसीदं वैश्यजीवनम् ।¦परिचर्यैव शूद्रस्य वृत्तिरन्ये स्वपूर्ववत् ।¦वर्तेयुर्ब्राह्मणाद्याश्च क्रमात् पूज्या हरिप्रियाः ॥ २७॥ | ||
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| verse_text = हरिभक्तावनुच्चस्तु वर्णोच्चो नातिपूज्यते । | | verse_text = हरिभक्तावनुच्चस्तु वर्णोच्चो नातिपूज्यते । | ||
| verse_lines = हरिभक्तावनुच्चस्तु वर्णोच्चो नातिपूज्यते | | verse_lines = हरिभक्तावनुच्चस्तु वर्णोच्चो नातिपूज्यते ।¦विना प्रणामं पूज्यस्तु वर्णहीनो हरिप्रियः ।¦आदरस्तत्र कर्तव्यो यत्र भक्तिर्हरेर्वरा ॥ २८॥ | ||
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| verse_text = ज्ञापनं क्षत्रियाणां च धर्मो विप्राभ्यनुज्ञया । | | verse_text = ज्ञापनं क्षत्रियाणां च धर्मो विप्राभ्यनुज्ञया । | ||
| verse_lines = ज्ञापनं क्षत्रियाणां च धर्मो विप्राभ्यनुज्ञया | | verse_lines = ज्ञापनं क्षत्रियाणां च धर्मो विप्राभ्यनुज्ञया ।¦तदभावे तु वैश्यानां शूद्रस्य परमापदि ॥ २९॥ | ||
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| verse_text = वर्णेष्वज्ञेष्ववर्णस्तु न ज्ञानी स्यात् कथञ्चन । | | verse_text = वर्णेष्वज्ञेष्ववर्णस्तु न ज्ञानी स्यात् कथञ्चन । | ||
| verse_lines = वर्णेष्वज्ञेष्ववर्णस्तु न ज्ञानी स्यात् कथञ्चन | | verse_lines = वर्णेष्वज्ञेष्ववर्णस्तु न ज्ञानी स्यात् कथञ्चन ।¦इति श्रुतेरवर्णस्य ज्ञापनप्राप्तिरेव न ॥ ३०॥ | ||
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| verse_text = ज्ञेयं सर्वं त्रिवर्णस्थः स्त्रीभिर्वेदान् विनाऽखिलम् । | | verse_text = ज्ञेयं सर्वं त्रिवर्णस्थः स्त्रीभिर्वेदान् विनाऽखिलम् । | ||
| verse_lines = ज्ञेयं सर्वं त्रिवर्णस्थः स्त्रीभिर्वेदान् विनाऽखिलम् | | verse_lines = ज्ञेयं सर्वं त्रिवर्णस्थः स्त्रीभिर्वेदान् विनाऽखिलम् ।¦स्वीयपुन्नियतिः स्त्रीणां स्वदारनियतिर्नृणाम् ॥ ३१॥ | ||
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| verse_text = धर्मो गुणोत्तमानां तु स्मृत्यैवान्धं तमो व्रजेत् । | | verse_text = धर्मो गुणोत्तमानां तु स्मृत्यैवान्धं तमो व्रजेत् । | ||
| verse_lines = धर्मो गुणोत्तमानां तु स्मृत्यैवान्धं तमो व्रजेत् | | verse_lines = धर्मो गुणोत्तमानां तु स्मृत्यैवान्धं तमो व्रजेत् ।¦गुणसर्वस्वहानिः स्यादुत्तरोत्तरतोऽत्र च¦अधोऽधोऽधिकदोषः स्यात् स्त्रीणामन्यत्र मध्यतः ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = वेदा अप्युत्तमस्त्रीभिः | | verse_lines = वेदा अप्युत्तमस्त्रीभिः कृष्णाद्याभिरिवाखिलाः¦देव्यो मुनिस्त्रियश्चैव नरादिकुलजा अपि ॥ ३३॥ | ||
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| verse_lines = उत्तमा इति विज्ञेयास्तच्छूद्रैरप्यवैदिकम् | | verse_lines = उत्तमा इति विज्ञेयास्तच्छूद्रैरप्यवैदिकम् ।¦ज्ञेयमन्यैर्हरेर्नाम निजकर्तव्यमेव च ॥ ३४॥ | ||
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| verse_lines = सर्वथाऽन्धं तमो याति वरं सदृशमेव वा(सदृशमेव च) | | verse_lines = सर्वथाऽन्धं तमो याति वरं सदृशमेव वा(सदृशमेव च) ।¦यो विष्णोर्मन्यते किञ्चिद् गुणैः कैश्चिदपि क्वचित् ॥ ३५॥ | ||
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| verse_lines = ब्रह्मेशानादिकमपि भेदं यो वा न मन्यते | | verse_lines = ब्रह्मेशानादिकमपि भेदं यो वा न मन्यते ।¦भेददृक् तद्गुणादौ च प्रादुर्भावगतेऽपि यः ॥ ३६॥ | ||
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| verse_text = प्राकृतं देहमथवा(देहमथ वा) दुःखाज्ञानश्रमादिकम् । | | verse_text = प्राकृतं देहमथवा(देहमथ वा) दुःखाज्ञानश्रमादिकम् । | ||
| verse_lines = प्राकृतं देहमथवा(देहमथ वा) दुःखाज्ञानश्रमादिकम् | | verse_lines = प्राकृतं देहमथवा(देहमथ वा) दुःखाज्ञानश्रमादिकम् ।¦मन्यते तारतम्यं वा तद्भक्तेष्वन्यथैव यः ॥ ३७॥ | ||
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| verse_lines = मनोवाक्तनुभिर्यो वा तस्मिन्स्तद्भक्त एव वा | | verse_lines = मनोवाक्तनुभिर्यो वा तस्मिन्स्तद्भक्त एव वा ।¦विरोधकृद् विष्ण्वधीनादन्यत् किञ्चिदपि स्मरन् ॥ ३८॥ | ||
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| verse_lines = अन्याधीनत्वविच्चास्य सर्वपूर्त्यविदेव च | | verse_lines = अन्याधीनत्वविच्चास्य सर्वपूर्त्यविदेव च ।¦भक्तिहीनश्च ते सर्वे तमोऽन्धं यान्त्यसंशयम् ॥ ३९॥ | ||
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| verse_lines = तत्त्वे संशययुक्ता ये सर्वे ते निरयोपगाः | | verse_lines = तत्त्वे संशययुक्ता ये सर्वे ते निरयोपगाः ।¦दोषेभ्यस्ते गुणाधिक्ये नैव यान्त्यधमां गतिम् ।¦गुणदोषसाम्ये मानुष्यं सर्वदैव पुनःपुनः ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = यावद् दोषक्षयश्चोर्ध्वा गतिः(दोषक्षयश्चोर्ध्वगतिः) क्रमश एव तु । | | verse_text = यावद् दोषक्षयश्चोर्ध्वा गतिः(दोषक्षयश्चोर्ध्वगतिः) क्रमश एव तु । | ||
| verse_lines = यावद् दोषक्षयश्चोर्ध्वा गतिः(दोषक्षयश्चोर्ध्वगतिः) क्रमश एव तु | | verse_lines = यावद् दोषक्षयश्चोर्ध्वा गतिः(दोषक्षयश्चोर्ध्वगतिः) क्रमश एव तु ।¦सर्वदोषक्षये मुक्तिरात्मयोग्यानुसारतः ॥ ४१॥ | ||
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| verse_lines = भक्तिज्ञानोन्नतावेव स्वर्गश्च शुभकर्मणः | | verse_lines = भक्तिज्ञानोन्नतावेव स्वर्गश्च शुभकर्मणः ।¦विष्णुवैष्णववाक्येन हानिः पापस्य कर्मणः ॥ ४२॥ | ||
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| verse_lines = इत्यादि धर्मसर्वस्वं भीष्मस्थेनैव विष्णुना | | verse_lines = इत्यादि धर्मसर्वस्वं भीष्मस्थेनैव विष्णुना ।¦पार्थानां गदितं तच्च श्रुत्वा धर्मसुतोऽनुजान् ।¦पप्रच्छ विदुरं चैव सारं धर्मादिषु त्रिषु ॥ ४३॥ | ||
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| verse_lines = आह क्षत्ता धर्ममेव सारमर्थं च मध्यमम् | | verse_lines = आह क्षत्ता धर्ममेव सारमर्थं च मध्यमम् ।¦नीचं कामं निष्फलत्वादर्थमेवार्जुनोऽब्रवीत् ॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = अथाऽह भीमः प्रवरः सुतत्त्वदृशां समस्तानभिभाष्य हर्षात् । | | verse_text = अथाऽह भीमः प्रवरः सुतत्त्वदृशां समस्तानभिभाष्य हर्षात् । | ||
| verse_lines = अथाऽह भीमः प्रवरः सुतत्त्वदृशां समस्तानभिभाष्य हर्षात् | | verse_lines = अथाऽह भीमः प्रवरः सुतत्त्वदृशां समस्तानभिभाष्य हर्षात् ।¦स्मयन् न कामादतिरिक्तमस्ति किञ्चिच्छुभं क्कावरतां स यायात् ॥ ५०॥ | ||
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| verse_text = काम्यं हि कामाभिधमाहुरार्याः काम्याः पुमर्थाः सह साधनैर्यत् । | | verse_text = काम्यं हि कामाभिधमाहुरार्याः काम्याः पुमर्थाः सह साधनैर्यत् । | ||
| verse_lines = काम्यं हि कामाभिधमाहुरार्याः काम्याः पुमर्थाः सह साधनैर्यत् | | verse_lines = काम्यं हि कामाभिधमाहुरार्याः काम्याः पुमर्थाः सह साधनैर्यत् ।¦अकाम्यतां यात्यपुमर्थ एव पुमर्थितत्वाद्धि पुमर्थ उक्तः ॥ ५१॥ | ||
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| verse_text = विज्ञानभक्त्यादिकमप्यतीव सत्साधनं कामबहिष्कृतं चेत् । | | verse_text = विज्ञानभक्त्यादिकमप्यतीव सत्साधनं कामबहिष्कृतं चेत् । | ||
| verse_lines = विज्ञानभक्त्यादिकमप्यतीव सत्साधनं कामबहिष्कृतं चेत् | | verse_lines = विज्ञानभक्त्यादिकमप्यतीव सत्साधनं कामबहिष्कृतं चेत् ।¦न साधनं स्यात् परमोऽपि मोक्षो न साध्यतां याति विना हि कामात् ॥ ५२॥ | ||
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| verse_text = परात्परोऽप्यादिपुमान् हरिश्च स्वस्येतरेषामपि काम्य एव । | | verse_text = परात्परोऽप्यादिपुमान् हरिश्च स्वस्येतरेषामपि काम्य एव । | ||
| verse_lines = परात्परोऽप्यादिपुमान् हरिश्च स्वस्येतरेषामपि काम्य एव | | verse_lines = परात्परोऽप्यादिपुमान् हरिश्च स्वस्येतरेषामपि काम्य एव ।¦अकामितोऽवाग्गतिमेव दद्यात् कामः पुमर्थोऽखिल एव तेन ॥ ५३॥ | ||
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| verse_text = इच्छैव कामोऽस्तु तथाऽपि नैतामृते हि चित्त्वं घटकुड्यवत् स्यात् । | | verse_text = इच्छैव कामोऽस्तु तथाऽपि नैतामृते हि चित्त्वं घटकुड्यवत् स्यात् । | ||
| verse_lines = इच्छैव कामोऽस्तु तथाऽपि नैतामृते हि चित्त्वं घटकुड्यवत् स्यात् | | verse_lines = इच्छैव कामोऽस्तु तथाऽपि नैतामृते हि चित्त्वं घटकुड्यवत् स्यात् ।¦सारस्ततः सैव चिदात्मकाऽपि सा चेतना गूढतनुः सदैव ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = न प्रश्नयोग्यः पृथगेव कामस्तेनैष राजन् यदि तारतम्यम् । | | verse_text = न प्रश्नयोग्यः पृथगेव कामस्तेनैष राजन् यदि तारतम्यम् । | ||
| verse_lines = न प्रश्नयोग्यः पृथगेव कामस्तेनैष राजन् यदि तारतम्यम् | | verse_lines = न प्रश्नयोग्यः पृथगेव कामस्तेनैष राजन् यदि तारतम्यम् ।¦इच्छस्ययं ते त्रिविधो हि वेद्यो धर्मार्थयुक्तः परमो मतोऽत्र ।¦एकाविरोधी यदि मध्यमोऽसौ द्वयोर्विरोधी तु स एव नीचः ॥ ५५॥ | ||
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| verse_text = तस्मात् स्वबुद्धिप्रमदाभिरेव(सुबुद्धिप्रमदाभिरेव) कामं रमेथा अनुरूपकामः । | | verse_text = तस्मात् स्वबुद्धिप्रमदाभिरेव(सुबुद्धिप्रमदाभिरेव) कामं रमेथा अनुरूपकामः । | ||
| verse_lines = तस्मात् स्वबुद्धिप्रमदाभिरेव(सुबुद्धिप्रमदाभिरेव) कामं रमेथा अनुरूपकामः | | verse_lines = तस्मात् स्वबुद्धिप्रमदाभिरेव(सुबुद्धिप्रमदाभिरेव) कामं रमेथा अनुरूपकामः ।¦राजन् न कामादपरं शुभं हि परो हि कामो हरिरेव येन(तेन) ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = प्राज्ञः सुहृच्चन्दनसारलिप्तो विचित्रमाल्याभरणैरुपेतः । | | verse_text = प्राज्ञः सुहृच्चन्दनसारलिप्तो विचित्रमाल्याभरणैरुपेतः । | ||
| verse_lines = प्राज्ञः सुहृच्चन्दनसारलिप्तो विचित्रमाल्याभरणैरुपेतः | | verse_lines = प्राज्ञः सुहृच्चन्दनसारलिप्तो विचित्रमाल्याभरणैरुपेतः ।¦इदं वचो व्याससमासयुक्तं सम्प्रोच्य भीमो वरराम वीरः ॥ ५७॥ | ||
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| verse_text = प्रशस्य भीममन्यांश्च राजा मोक्षमथास्तुवत् । | | verse_text = प्रशस्य भीममन्यांश्च राजा मोक्षमथास्तुवत् । | ||
| verse_lines = प्रशस्य भीममन्यांश्च राजा मोक्षमथास्तुवत् | | verse_lines = प्रशस्य भीममन्यांश्च राजा मोक्षमथास्तुवत् ।¦स्वयुक्तेरप्रतीपत्वान्निराचक्रे न मारुतिः ॥ ५८॥ | ||
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<span id="gr-C30" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रिंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C30" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="त्रिंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = ओं ॥ अथ कृष्णमनुस्मृत्य भीष्मे स्वां वसुतां गते । | | verse_text = ओं ॥ अथ कृष्णमनुस्मृत्य भीष्मे स्वां वसुतां गते । | ||
| verse_lines = ओं ॥ अथ कृष्णमनुस्मृत्य भीष्मे स्वां वसुतां गते | | verse_lines = ओं ॥ अथ कृष्णमनुस्मृत्य भीष्मे स्वां वसुतां गते ।¦कृत्वा कार्याणि सर्वाणि गङ्गामाश्वास्य दुःखिताम् ॥ १॥ | ||
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| verse_text = आश्वासितश्च कृष्णाभ्यां धर्मजो दुःखितः पुनः । | | verse_text = आश्वासितश्च कृष्णाभ्यां धर्मजो दुःखितः पुनः । | ||
| verse_lines = आश्वासितश्च कृष्णाभ्यां धर्मजो दुःखितः पुनः | | verse_lines = आश्वासितश्च कृष्णाभ्यां धर्मजो दुःखितः पुनः ।¦पराशरसुतेनोक्तः कृष्णेनानन्तराधसा ॥ २॥ | ||
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| verse_text = अपापे पापशङ्कित्वादश्वमेधैर्यजाच्युतम् । | | verse_text = अपापे पापशङ्कित्वादश्वमेधैर्यजाच्युतम् । | ||
| verse_lines = अपापे पापशङ्कित्वादश्वमेधैर्यजाच्युतम् | | verse_lines = अपापे पापशङ्कित्वादश्वमेधैर्यजाच्युतम् ।¦कुरु राज्यं च धर्मेण पालयापालकाः प्रजाः ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तः स तथा चक्रे त्यक्त्वा भोगांश्च कृत्स्नशः । | | verse_text = इत्युक्तः स तथा चक्रे त्यक्त्वा भोगांश्च कृत्स्नशः । | ||
| verse_lines = इत्युक्तः स तथा चक्रे त्यक्त्वा भोगांश्च कृत्स्नशः | | verse_lines = इत्युक्तः स तथा चक्रे त्यक्त्वा भोगांश्च कृत्स्नशः ।¦गोव्रतादिव्रतैर्युक्तः पालयामास मेदिनीम् ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = ददौ देयानि मुख्यानि यथाकाममखण्डितम् । | | verse_text = ददौ देयानि मुख्यानि यथाकाममखण्डितम् । | ||
| verse_lines = ददौ देयानि मुख्यानि यथाकाममखण्डितम् | | verse_lines = ददौ देयानि मुख्यानि यथाकाममखण्डितम् ।¦नैवार्थी विमुखः कश्चिदभूद् योग्यः कदाचन(कथञ्चन) ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = प्रष्टा च दाताऽखिलराजनम्यो यष्टा च धर्मात्मज एव तत्र । | | verse_text = प्रष्टा च दाताऽखिलराजनम्यो यष्टा च धर्मात्मज एव तत्र । | ||
| verse_lines = प्रष्टा च दाताऽखिलराजनम्यो यष्टा च धर्मात्मज एव तत्र | | verse_lines = प्रष्टा च दाताऽखिलराजनम्यो यष्टा च धर्मात्मज एव तत्र ।¦बभूव पाण्डोर्गृहमावसंश्च राजाधिराजो वनितानिवृत्तः ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = भीमस्तु दौर्योधनमेव सद्म प्रपेदिवानूर्जितवीर्यलब्धम् । | | verse_text = भीमस्तु दौर्योधनमेव सद्म प्रपेदिवानूर्जितवीर्यलब्धम् । | ||
| verse_lines = भीमस्तु दौर्योधनमेव सद्म प्रपेदिवानूर्जितवीर्यलब्धम् | | verse_lines = भीमस्तु दौर्योधनमेव सद्म प्रपेदिवानूर्जितवीर्यलब्धम् ।¦कृष्णासहायः सुरराजयोग्यान् अभुङ्क्त भोगान् युवराज एव ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = कृष्णा च पार्थांश्चतुरो विहाय सुव्यक्तसारस्वतशुद्धभावा । | | verse_text = कृष्णा च पार्थांश्चतुरो विहाय सुव्यक्तसारस्वतशुद्धभावा । | ||
| verse_lines = कृष्णा च पार्थांश्चतुरो विहाय सुव्यक्तसारस्वतशुद्धभावा | | verse_lines = कृष्णा च पार्थांश्चतुरो विहाय सुव्यक्तसारस्वतशुद्धभावा ।¦रराज राजावरजेन नित्यमनन्ययोगेन शिखेव वह्नेः ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = प्रीत्यैव विज्ञानयुजाऽन्यपार्थैः संवादतः परिहृता गतभाविकाले । | | verse_text = प्रीत्यैव विज्ञानयुजाऽन्यपार्थैः संवादतः परिहृता गतभाविकाले । | ||
| verse_lines = प्रीत्यैव विज्ञानयुजाऽन्यपार्थैः संवादतः परिहृता गतभाविकाले | | verse_lines = प्रीत्यैव विज्ञानयुजाऽन्यपार्थैः संवादतः परिहृता गतभाविकाले ।¦अपि स्वकीयं पतिमेव भीममवाप्य सा पर्यचरन्मुदैव ॥ ९॥ | ||
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| verse_lines = रराज राजावरजस्तया स द्विरूपया सोमककाशिजातया | | verse_lines = रराज राजावरजस्तया स द्विरूपया सोमककाशिजातया ।¦श्रिया भुवा चैव यथाऽब्जनाभो निहत्य सर्वान् दितिजान् पयोब्धौ ॥ १०॥ | ||
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| verse_lines = सर्वोत्तुङ्गो नामतः प्राणवायोरंशो निशायां गुरुपुत्रसूदितः | | verse_lines = सर्वोत्तुङ्गो नामतः प्राणवायोरंशो निशायां गुरुपुत्रसूदितः ।¦माताऽस्य देवीति च रौहिणेयी भीमप्रियाऽऽसीद् या पुराऽस्यैव राका ॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = अन्याश्चाऽसुर्वासुदेव्यो दिशो या आपश्च पूर्वं विंशतिरग्र्यरूपाः | | verse_lines = अन्याश्चाऽसुर्वासुदेव्यो दिशो या आपश्च पूर्वं विंशतिरग्र्यरूपाः ।¦ताभिर्युतो(युक्तो) दैवतैरप्यलभ्यानभुङ्क्त भोगान् विबुधानुगार्चितः ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = ररक्ष धर्मानखिलान् हरेः स निधाय विप्राननुशास्य युक्तान् । | | verse_text = ररक्ष धर्मानखिलान् हरेः स निधाय विप्राननुशास्य युक्तान् । | ||
| verse_lines = ररक्ष धर्मानखिलान् हरेः स निधाय विप्राननुशास्य युक्तान् | | verse_lines = ररक्ष धर्मानखिलान् हरेः स निधाय विप्राननुशास्य युक्तान् ।¦सद्वैष्णवान् विदुषः पञ्चपञ्च सवेतनान् ग्राममनु स्वकीयान् ॥ १३॥ | ||
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| verse_lines = दधार दण्डं तदवर्तिषु स्वयं जग्राह चान्वेव मुदाऽथ तद्गतान् | | verse_lines = दधार दण्डं तदवर्तिषु स्वयं जग्राह चान्वेव मुदाऽथ तद्गतान् ।¦तद्वृत्तमन्यैरपि विप्रवर्यैः संशोधयन् सर्वमसौ यथा व्यधात् ॥ १४॥ | ||
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| verse_text = नावैष्णवः कश्चिदभूत् कुतश्चिन्नैवान्यनिष्ठो नच धर्महन्ता । | | verse_text = नावैष्णवः कश्चिदभूत् कुतश्चिन्नैवान्यनिष्ठो नच धर्महन्ता । | ||
| verse_lines = नावैष्णवः कश्चिदभूत् कुतश्चिन्नैवान्यनिष्ठो नच धर्महन्ता | | verse_lines = नावैष्णवः कश्चिदभूत् कुतश्चिन्नैवान्यनिष्ठो नच धर्महन्ता ।¦न विध्यवर्ती नच दुःखितोऽभून्नापूर्णवित्तश्च तदीयराष्ट्रे ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = वासिष्ठवृष्णिप्रवरौ प्रपश्यतां ताभ्यां च भीमेन मुनीश्वरैश्च । | | verse_text = वासिष्ठवृष्णिप्रवरौ प्रपश्यतां ताभ्यां च भीमेन मुनीश्वरैश्च । | ||
| verse_lines = वासिष्ठवृष्णिप्रवरौ प्रपश्यतां ताभ्यां च भीमेन मुनीश्वरैश्च | | verse_lines = वासिष्ठवृष्णिप्रवरौ प्रपश्यतां ताभ्यां च भीमेन मुनीश्वरैश्च ।¦संशिक्षितानां प्रथमाद् युगाच्च गुणाधिकः कलिरासीत् प्रजानाम् ॥ १६॥ | ||
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| verse_text = शुभं महत् स्वल्पफलं कृते हि विपर्ययेणाशुभमेषु दोषः । | | verse_text = शुभं महत् स्वल्पफलं कृते हि विपर्ययेणाशुभमेषु दोषः । | ||
| verse_lines = शुभं महत् स्वल्पफलं कृते हि विपर्ययेणाशुभमेषु दोषः | | verse_lines = शुभं महत् स्वल्पफलं कृते हि विपर्ययेणाशुभमेषु दोषः ।¦तद्धीनमप्युच्चशुभं कृताद् युगाच्चक्रे कलिं मारुतिरच्युताश्रयात् ॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = धनञ्जयः प्रोद्यतदण्ड आसीत् सदाऽन्यचक्रेषु निजाग्रजेरितः | | verse_lines = धनञ्जयः प्रोद्यतदण्ड आसीत् सदाऽन्यचक्रेषु निजाग्रजेरितः ।¦विभीषयित्वा नृपतीन् सरत्नान् पदोर्नृपस्याग्रभुवो न्यपातयत् ॥ १८॥ | ||
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| verse_lines = सदैव कृष्णस्य मुखारविन्दाद् विनिस्सृतं तत्त्वविनिर्णयामृतम् | | verse_lines = सदैव कृष्णस्य मुखारविन्दाद् विनिस्सृतं तत्त्वविनिर्णयामृतम् ।¦पिबन् सुताद्याधिमसौ क्रमेण त्यजंश्च रेमेऽविरतातिभोगः ॥ १९॥ | ||
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| verse_lines = द्विरूपकृष्णप्रहितेषु पाण्डुषु क्षितिं प्रशासत्सु न कश्चनाऽतुरः | | verse_lines = द्विरूपकृष्णप्रहितेषु पाण्डुषु क्षितिं प्रशासत्सु न कश्चनाऽतुरः ।¦नचाक्रमान्मृत्युरभून्न नार्यो विभर्तृका नो विधुरा नराश्च ॥ २४॥ | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = पृथ्वी च गावः ससरस्वतीका निकामदोहा अभवन् सदैव । | | verse_text = पृथ्वी च गावः ससरस्वतीका निकामदोहा अभवन् सदैव । | ||
| verse_lines = पृथ्वी च गावः ससरस्वतीका निकामदोहा अभवन् सदैव | | verse_lines = पृथ्वी च गावः ससरस्वतीका निकामदोहा अभवन् सदैव ।¦अब्दाब्धिनद्यो गिरिवृक्षजङ्गमाः सर्वेऽपि रत्नप्रभवा(रत्नप्रसवा) बभूवुः ॥ २६॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseBlock | {{VerseBlock | ||
| Line 37,140: | Line 37,140: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_text = कृष्णाश्रयात् सर्वमिदं वशे ते विधाय सम्यक् परिपालयन्तः । | | verse_text = कृष्णाश्रयात् सर्वमिदं वशे ते विधाय सम्यक् परिपालयन्तः । | ||
| verse_lines = कृष्णाश्रयात् सर्वमिदं वशे ते विधाय सम्यक् परिपालयन्तः | | verse_lines = कृष्णाश्रयात् सर्वमिदं वशे ते विधाय सम्यक् परिपालयन्तः ।¦दिवीव देवा मुमुदुः सदैव मुनीन्द्रगन्धर्वनृपादिभिर्वृताः ॥ २७॥ | ||
}} | }} | ||
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| Line 37,148: | Line 37,148: | ||
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| verse_text = समुज्ज्वला पाण्डवकीर्तिनारी पदं (विधाय)विधायासुरपक्षमूर्धसु(मूर्धनि) । | | verse_text = समुज्ज्वला पाण्डवकीर्तिनारी पदं (विधाय)विधायासुरपक्षमूर्धसु(मूर्धनि) । | ||
| verse_lines = समुज्ज्वला पाण्डवकीर्तिनारी पदं (विधाय)विधायासुरपक्षमूर्धसु(मूर्धनि) | | verse_lines = समुज्ज्वला पाण्डवकीर्तिनारी पदं (विधाय)विधायासुरपक्षमूर्धसु(मूर्धनि) ।¦वराभये चैव सतां कराभ्यां कृष्णप्रसूता जगदण्डमावृणोत् ॥ २८॥ | ||
}} | }} | ||
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| Line 37,156: | Line 37,156: | ||
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| verse_text = पातालपादां पृथिवीनितम्बामाकाशमध्यां करसन्तताशाम् । | | verse_text = पातालपादां पृथिवीनितम्बामाकाशमध्यां करसन्तताशाम् । | ||
| verse_lines = पातालपादां पृथिवीनितम्बामाकाशमध्यां करसन्तताशाम् | | verse_lines = पातालपादां पृथिवीनितम्बामाकाशमध्यां करसन्तताशाम् ।¦ग्रहर्क्षताराभरनद्युवक्षसं विरिञ्चलोकस्थलसन्मुखाम्बुजाम् ॥ २९॥ | ||
}} | }} | ||
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| Line 37,164: | Line 37,164: | ||
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| verse_text = विकुण्ठनाथाभयहस्तमादरान् मूर्ध्ना वहन्तीं(मूर्ध्नाऽऽवहन्तीं) वरभारताख्याम् । | | verse_text = विकुण्ठनाथाभयहस्तमादरान् मूर्ध्ना वहन्तीं(मूर्ध्नाऽऽवहन्तीं) वरभारताख्याम् । | ||
| verse_lines = विकुण्ठनाथाभयहस्तमादरान् मूर्ध्ना वहन्तीं(मूर्ध्नाऽऽवहन्तीं) वरभारताख्याम् | | verse_lines = विकुण्ठनाथाभयहस्तमादरान् मूर्ध्ना वहन्तीं(मूर्ध्नाऽऽवहन्तीं) वरभारताख्याम् ।¦निशम्य तामीक्ष्य समस्तलोकाः पवित्रिता वेदिभवामिवान्याम् ॥ ३०॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = प्रपालयत्स्वेव धरां सकृष्णेष्वद्धैव पार्थेषु कलिर्बलिश्च । | | verse_text = प्रपालयत्स्वेव धरां सकृष्णेष्वद्धैव पार्थेषु कलिर्बलिश्च । | ||
| verse_lines = प्रपालयत्स्वेव धरां सकृष्णेष्वद्धैव पार्थेषु कलिर्बलिश्च | | verse_lines = प्रपालयत्स्वेव धरां सकृष्णेष्वद्धैव पार्थेषु कलिर्बलिश्च ।¦सुपापदैत्यौ क्वच राष्ट्रविप्लवं सञ्चक्रतुस्तच्छ्रुतमाशु पार्थैः ॥ ३१॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = नृपेण कृष्णेन च साधु चोदितो भीमस्तदा तौ सगणौ विजित्य । | | verse_text = नृपेण कृष्णेन च साधु चोदितो भीमस्तदा तौ सगणौ विजित्य । | ||
| verse_lines = नृपेण कृष्णेन च साधु चोदितो भीमस्तदा तौ सगणौ विजित्य | | verse_lines = नृपेण कृष्णेन च साधु चोदितो भीमस्तदा तौ सगणौ विजित्य ।¦बलिं प्रविद्राव्य कलिं निबद्ध्य समानयत् कृष्णनृपेन्द्रयोः(कृष्णनरेन्द्रयोः) पुरः ॥ ३२॥ | ||
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| verse_text = पप्रच्छ तं कृष्णपुरो युधिष्ठिर उदारधीः । | | verse_text = पप्रच्छ तं कृष्णपुरो युधिष्ठिर उदारधीः । | ||
| verse_lines = पप्रच्छ तं कृष्णपुरो युधिष्ठिर उदारधीः | | verse_lines = पप्रच्छ तं कृष्णपुरो युधिष्ठिर उदारधीः ।¦कले किमिति मे राष्ट्रं विप्लावयसि दुर्मते ॥ ३३॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = इत्युक्त आह कालोऽयं दुर्योधननिपातनम् । | | verse_text = इत्युक्त आह कालोऽयं दुर्योधननिपातनम् । | ||
| verse_lines = इत्युक्त आह कालोऽयं दुर्योधननिपातनम् | | verse_lines = इत्युक्त आह कालोऽयं दुर्योधननिपातनम् ।¦आरभ्य मम तत्र त्वं बलादाक्रम्य तिष्ठसि ।¦ततो मया कृतो राष्ट्रविप्लवस्ते नराधिप ॥ ३४॥ | ||
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| verse_text = तमाह राजा राज्ञां हि बलाद् राज्यं प्रवर्तते । | | verse_text = तमाह राजा राज्ञां हि बलाद् राज्यं प्रवर्तते । | ||
| verse_lines = तमाह राजा राज्ञां हि बलाद् राज्यं प्रवर्तते | | verse_lines = तमाह राजा राज्ञां हि बलाद् राज्यं प्रवर्तते ।¦अपि कालभवं राष्ट्रं त्वदीयं मादृशैर्नृपैः ।¦ह्रियते बलवद्भिर्हि राज्याशा ते कुतस्तदा ॥ ३५॥ | ||
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| verse_lines = कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् | | verse_lines = कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् ।¦इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम् ॥ ३६॥ (महा.१२.७०.६) | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = तमुवाच कलिः काले मदीये त्वादृशः कुतः । | | verse_text = तमुवाच कलिः काले मदीये त्वादृशः कुतः । | ||
| verse_lines = तमुवाच कलिः काले मदीये त्वादृशः कुतः | | verse_lines = तमुवाच कलिः काले मदीये त्वादृशः कुतः ।¦राजानं पूर्वमाविश्य विप्रांश्च स्यामहं नृप ॥ ३७॥ | ||
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| verse_text = वासुदेवसहायेषु तेजो युष्मासु मे नहि । | | verse_text = वासुदेवसहायेषु तेजो युष्मासु मे नहि । | ||
| verse_lines = वासुदेवसहायेषु तेजो युष्मासु मे नहि | | verse_lines = वासुदेवसहायेषु तेजो युष्मासु मे नहि ।¦क्व राजाऽसावृते युष्मान् यो मया नाभिभूयते ॥ ३८॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = मदीयकाले भूपाल विप्रदेव(वेद)विरोधिनि । | | verse_text = मदीयकाले भूपाल विप्रदेव(वेद)विरोधिनि । | ||
| verse_lines = मदीयकाले भूपाल विप्रदेव(वेद)विरोधिनि | | verse_lines = मदीयकाले भूपाल विप्रदेव(वेद)विरोधिनि ।¦मद्दृष्टिपाते(याते) क्व गुणाः क्व वेदाः क्व सुयुक्तयः(क्व च सूक्तयः) ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = जगाद नृपतिः सत्यं कले वक्ष्यनृतोऽपि सन् । | | verse_text = जगाद नृपतिः सत्यं कले वक्ष्यनृतोऽपि सन् । | ||
| verse_lines = जगाद नृपतिः सत्यं कले वक्ष्यनृतोऽपि सन् | | verse_lines = जगाद नृपतिः सत्यं कले वक्ष्यनृतोऽपि सन् ।¦मोचये त्वार्तवचनाद् यदाऽस्मत्सन्ततेः परम् ।¦विलुम्पस्यखिलान् धर्मान् करं तत्रापि नोऽर्पय ॥ ४०॥ | ||
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| verse_lines = सीमाधिर्बहुवाक्यं च तुलामाने च मे करः | | verse_lines = सीमाधिर्बहुवाक्यं च तुलामाने च मे करः ।¦नैवातिक्रममेतेषां कुरु सर्वात्मना क्वचित् ॥ ४१॥ | ||
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| verse_lines = तमाह भगवान् कृष्णो यावत् पाण्डवसन्ततिः | | verse_lines = तमाह भगवान् कृष्णो यावत् पाण्डवसन्ततिः ।¦तावन्न ते भवेच्छक्तिः प्रवृत्तस्यापि भूतले ॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = पाण्डवेभ्यः परं यावत् क्षेमकः क्रमवर्द्धिता । | | verse_text = पाण्डवेभ्यः परं यावत् क्षेमकः क्रमवर्द्धिता । | ||
| verse_lines = पाण्डवेभ्यः परं यावत् क्षेमकः क्रमवर्द्धिता | | verse_lines = पाण्डवेभ्यः परं यावत् क्षेमकः क्रमवर्द्धिता ।¦क्षेमकात् परतः पूर्तिं शक्तिस्ते यास्यति ध्रुवम् ॥ ४३॥ | ||
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| verse_lines = न द्रष्टव्यं भूतलं ते कुत एव स्पृशेर्भुवम् | | verse_lines = न द्रष्टव्यं भूतलं ते कुत एव स्पृशेर्भुवम् ।¦यावत् पार्था अहं चात्र ततो भुवि पदं कुरु ॥ ४४॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तो वासुदेवेन मोचितो धर्मजेन च | | verse_lines = इत्युक्तो वासुदेवेन मोचितो धर्मजेन च ।¦तान् प्रणम्य ययौ पारे समुद्रस्याऽश्रयद् गुहाम् ।¦पार्थाश्च कृष्णसहिता रक्षन्तः क्ष्मां मुदं ययुः ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = एवं पार्थान् प्रतिष्ठाप्य शक्रप्रस्थे तु सार्जुनः । | | verse_text = एवं पार्थान् प्रतिष्ठाप्य शक्रप्रस्थे तु सार्जुनः । | ||
| verse_lines = एवं पार्थान् प्रतिष्ठाप्य शक्रप्रस्थे तु सार्जुनः | | verse_lines = एवं पार्थान् प्रतिष्ठाप्य शक्रप्रस्थे तु सार्जुनः ।¦क्रीडन् दिव्याः कथाः प्राह पुत्रशोकापनुत्तये ।¦गीतोक्तं विस्मृतं चास्मै पुनर्विस्तरतोऽवदत् ॥ ४६॥ | ||
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| verse_lines = वाणी प्राणो वासुदेव इत्येतैरखिलं ततम् | | verse_lines = वाणी प्राणो वासुदेव इत्येतैरखिलं ततम् ।¦सर्वोत्तमत्वमेतेषां सर्वमेतद्वशे जगत् ।¦उत्तरोत्तरमेतेऽपि गुणोच्चास्तद्वशेऽपरे ॥ ४७॥ | ||
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| verse_text = इत्थं हरेर्वशे सर्वं गुणपूर्णश्च(सर्वगुणपूर्णश्च) स प्रभुः । | | verse_text = इत्थं हरेर्वशे सर्वं गुणपूर्णश्च(सर्वगुणपूर्णश्च) स प्रभुः । | ||
| verse_lines = इत्थं हरेर्वशे सर्वं गुणपूर्णश्च(सर्वगुणपूर्णश्च) स प्रभुः | | verse_lines = इत्थं हरेर्वशे सर्वं गुणपूर्णश्च(सर्वगुणपूर्णश्च) स प्रभुः ।¦एक एव नचान्योऽस्ति प्राणोच्चा तदधो रमा ॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = स हुताश इति प्रोक्तो(हुताशन इति प्रोक्तो) हुतमत्त्यखिलं यतः । | | verse_text = स हुताश इति प्रोक्तो(हुताशन इति प्रोक्तो) हुतमत्त्यखिलं यतः । | ||
| verse_lines = स हुताश इति प्रोक्तो(हुताशन इति प्रोक्तो) हुतमत्त्यखिलं यतः | | verse_lines = स हुताश इति प्रोक्तो(हुताशन इति प्रोक्तो) हुतमत्त्यखिलं यतः ।¦वाक्प्राणमध्यगो नित्यं धारयत्यखिलं जगत् ।¦स ईशो ब्रह्मरुद्राद्या जीवा एव प्रकीर्तिताः ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = एतस्यानादिसद्भक्ता मुक्तियोग्या हि ते स्मृताः । | | verse_text = एतस्यानादिसद्भक्ता मुक्तियोग्या हि ते स्मृताः । | ||
| verse_lines = एतस्यानादिसद्भक्ता मुक्तियोग्या हि ते स्मृताः | | verse_lines = एतस्यानादिसद्भक्ता मुक्तियोग्या हि ते स्मृताः ।¦अनादिद्वेषिणो येऽस्मिन्स्तमोयोग्याः सुपापिनः ॥ ५०॥ | ||
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| verse_text = मिश्रा मध्या इति ज्ञेयाः संसारपरिवर्तिनः । | | verse_text = मिश्रा मध्या इति ज्ञेयाः संसारपरिवर्तिनः । | ||
| verse_lines = मिश्रा मध्या इति ज्ञेयाः संसारपरिवर्तिनः | | verse_lines = मिश्रा मध्या इति ज्ञेयाः संसारपरिवर्तिनः ।¦एवं जीवास्त्रिधा प्रोक्ता भवन्त्येते नचान्यथा ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = तारतम्यं च विज्ञेयं लिङ्गैर्दैहिकमानसैः | | verse_lines = तारतम्यं च विज्ञेयं लिङ्गैर्दैहिकमानसैः ।¦विष्णोर्लिङ्गानुसारित्वत् तारतम्यात् तदीक्षणम् ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = विष्णोस्तदनुगानां च प्रीतिकृद् धर्म ईरितः | | verse_lines = विष्णोस्तदनुगानां च प्रीतिकृद् धर्म ईरितः ।¦अधर्मोऽन्य इयं निष्ठा प्रलापः किं करिष्यति ।¦एवमाद्यनुशास्याजः पार्थं पार्थैः सुसत्कृतः॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = कथञ्चित् तानवस्थाप्य सुदूरानुगतान् प्रभुः | | verse_lines = कथञ्चित् तानवस्थाप्य सुदूरानुगतान् प्रभुः ।¦सुभद्रासहितः प्रायाद् यानेन द्वारकां पुरीम् ॥ ५४॥ | ||
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| verse_lines = समाधिविरतोदङ्कपरिपृष्टः पथि प्रभुः | | verse_lines = समाधिविरतोदङ्कपरिपृष्टः पथि प्रभुः ।¦हतं दुर्योधनं प्राह सभ्रातृसुतसैनिकम् ॥ ५५॥ | ||
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| verse_lines = तं शिष्यवधकोपेन शप्तुमात्मानमुद्यतम् | | verse_lines = तं शिष्यवधकोपेन शप्तुमात्मानमुद्यतम् ।¦केशवोऽशमयद् वाक्यैर्विश्वरूपं प्रदर्श्य च ॥ ५६॥ | ||
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| verse_lines = मद्भक्तो नितरामेष मदाराधनतत्परः | | verse_lines = मद्भक्तो नितरामेष मदाराधनतत्परः ।¦मामवज्ञाय निरयं माऽनुत्थानं व्रजेदिति ॥ ५७॥ | ||
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| verse_lines = कृपया वासुदेवेन बोधितः शान्तमानसः | | verse_lines = कृपया वासुदेवेन बोधितः शान्तमानसः ।¦पश्चात्तापाभितप्तात्मा तमेव शरणं ययौ ॥ ५८॥ | ||
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| verse_text = स मूत्रमिति मत्वा तं याहीत्येवाऽह भत्सयन् । | | verse_text = स मूत्रमिति मत्वा तं याहीत्येवाऽह भत्सयन् । | ||
| verse_lines = स मूत्रमिति मत्वा तं याहीत्येवाऽह भत्सयन् | | verse_lines = स मूत्रमिति मत्वा तं याहीत्येवाऽह भत्सयन् ।¦वञ्चयित्वैव तं शक्रो ययौ प्रीतः स्वमालयम् ॥ ६३॥ | ||
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| verse_text = असाधारणमन्नं हि देवानाममृतं सदा । | | verse_text = असाधारणमन्नं हि देवानाममृतं सदा । | ||
| verse_lines = असाधारणमन्नं हि देवानाममृतं सदा | | verse_lines = असाधारणमन्नं हि देवानाममृतं सदा ।¦अन्यपीतिस्ततस्तस्य देवानां परमाप्रिया ॥ ६४॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = आत्मदत्तप्रसादाच्च स्वापराधात् प्रचालिते । | | verse_text = आत्मदत्तप्रसादाच्च स्वापराधात् प्रचालिते । | ||
| verse_lines = आत्मदत्तप्रसादाच्च स्वापराधात् प्रचालिते | | verse_lines = आत्मदत्तप्रसादाच्च स्वापराधात् प्रचालिते ।¦उदङ्के वासुदेवस्तु युक्तिमित्येव मन्यते ॥ ६५॥ | ||
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| verse_text = स्वपुरीं प्राप्य यदुभिः पूजितः शूरसूनवे । | | verse_text = स्वपुरीं प्राप्य यदुभिः पूजितः शूरसूनवे । | ||
| verse_lines = स्वपुरीं प्राप्य यदुभिः पूजितः शूरसूनवे | | verse_lines = स्वपुरीं प्राप्य यदुभिः पूजितः शूरसूनवे ।¦वृत्तान्तं कथयामास केशवो यदुसंसदि ॥ ६६॥ | ||
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| verse_text = वधमन्तरितं सूनोः सात्वतेशेन सात्वती । | | verse_text = वधमन्तरितं सूनोः सात्वतेशेन सात्वती । | ||
| verse_lines = वधमन्तरितं सूनोः सात्वतेशेन सात्वती | | verse_lines = वधमन्तरितं सूनोः सात्वतेशेन सात्वती ।¦प्रणम्य कथयेत्यूचे तत आह जनार्दनः ॥ ६७॥ | ||
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| verse_text = ततः सुदुःखिताः शूरपुत्राद्या अभिमन्यवे । | | verse_text = ततः सुदुःखिताः शूरपुत्राद्या अभिमन्यवे । | ||
| verse_lines = ततः सुदुःखिताः शूरपुत्राद्या अभिमन्यवे | | verse_lines = ततः सुदुःखिताः शूरपुत्राद्या अभिमन्यवे ।¦श्राद्धदानानि बहुशश्चक्रुः केशवसंयुताः ॥ ६८॥ | ||
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| verse_text = निवसत्यत्र विश्वेशे धर्मपुत्रः क्रतूत्तमम् । | | verse_text = निवसत्यत्र विश्वेशे धर्मपुत्रः क्रतूत्तमम् । | ||
| verse_lines = निवसत्यत्र विश्वेशे धर्मपुत्रः क्रतूत्तमम् | | verse_lines = निवसत्यत्र विश्वेशे धर्मपुत्रः क्रतूत्तमम् ।¦अश्वमेधमनुष्ठातुं नाविन्दद् वित्तमञ्जसा ॥ ६९॥ | ||
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| verse_text = हतशेषात् क्षत्रसङ्घात् करं नैच्छद् दयापरः । | | verse_text = हतशेषात् क्षत्रसङ्घात् करं नैच्छद् दयापरः । | ||
| verse_lines = हतशेषात् क्षत्रसङ्घात् करं नैच्छद् दयापरः | | verse_lines = हतशेषात् क्षत्रसङ्घात् करं नैच्छद् दयापरः ।¦नच मध्यमकल्पेन यष्टुं तस्य मनो गतम् ॥ ७०॥ | ||
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| verse_text = विज्ञाय नित्यविज्ञातनिखिलो बादरायणः । | | verse_text = विज्ञाय नित्यविज्ञातनिखिलो बादरायणः । | ||
| verse_lines = विज्ञाय नित्यविज्ञातनिखिलो बादरायणः | | verse_lines = विज्ञाय नित्यविज्ञातनिखिलो बादरायणः ।¦आविर्भूतो हिमवतः शृङ्गं यत्राभिसङ्गतम् ॥ ७१॥ | ||
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| verse_text = मेरुशृङ्गेण यत्रैव विष्णुः स्वात्मानमव्ययम् । | | verse_text = मेरुशृङ्गेण यत्रैव विष्णुः स्वात्मानमव्ययम् । | ||
| verse_lines = मेरुशृङ्गेण यत्रैव विष्णुः स्वात्मानमव्ययम् | | verse_lines = मेरुशृङ्गेण यत्रैव विष्णुः स्वात्मानमव्ययम् ।¦लोकस्य सङ्ग्रहायेजे कर्मबन्धोज्झितोऽपि सन् ॥ ७२॥ | ||
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| verse_text = शङ्कराद्याः सुरा यत्र मरुत्तश्चेजिरे हरिम् । | | verse_text = शङ्कराद्याः सुरा यत्र मरुत्तश्चेजिरे हरिम् । | ||
| verse_lines = शङ्कराद्याः सुरा यत्र मरुत्तश्चेजिरे हरिम् | | verse_lines = शङ्कराद्याः सुरा यत्र मरुत्तश्चेजिरे हरिम् ।¦दानवो वृषपर्वा च तत्रास्ति धनमक्षयम् ॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = तच्छङ्करशरीरस्थं जामदग्न्यं हरिं परम् । | | verse_text = तच्छङ्करशरीरस्थं जामदग्न्यं हरिं परम् । | ||
| verse_lines = तच्छङ्करशरीरस्थं जामदग्न्यं हरिं परम् | | verse_lines = तच्छङ्करशरीरस्थं जामदग्न्यं हरिं परम् ।¦इष्ट्वैवानुज्ञया तस्य स्वीकृत्य यज तेन च ।¦इत्याह व्यासवाक्यानु भीमोऽप्याह नृपोत्तमम् ॥ ७४॥ | ||
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| verse_text = धनस्य देवता विष्णुर्जामदग्न्योऽखिलेश्वरः । | | verse_text = धनस्य देवता विष्णुर्जामदग्न्योऽखिलेश्वरः । | ||
| verse_lines = धनस्य देवता विष्णुर्जामदग्न्योऽखिलेश्वरः | | verse_lines = धनस्य देवता विष्णुर्जामदग्न्योऽखिलेश्वरः ।¦स शङ्करशरीरस्थो यज्ञोच्छिष्टधनाधिपः ॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = तेनैव विष्णुना दत्तमर्जुनायास्त्रमुत्तमम् । | | verse_text = तेनैव विष्णुना दत्तमर्जुनायास्त्रमुत्तमम् । | ||
| verse_lines = तेनैव विष्णुना दत्तमर्जुनायास्त्रमुत्तमम् | | verse_lines = तेनैव विष्णुना दत्तमर्जुनायास्त्रमुत्तमम् ।¦कार्याण्यन्यानि चास्माकं कृतान्येतेन विष्णुना ॥ ७६॥ | ||
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| verse_lines = स ब्रह्मरुद्रशक्रादिपददाताऽखिलप्रदः | | verse_lines = स ब्रह्मरुद्रशक्रादिपददाताऽखिलप्रदः ।¦स्वतन्त्रः परतन्त्रांस्तानावर्तयति चेच्छया ॥ ७७॥ | ||
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| verse_text = प्रियोऽस्माकं प्रियास्तस्य सर्वदैव वयं नृप । | | verse_text = प्रियोऽस्माकं प्रियास्तस्य सर्वदैव वयं नृप । | ||
| verse_lines = प्रियोऽस्माकं प्रियास्तस्य सर्वदैव वयं नृप | | verse_lines = प्रियोऽस्माकं प्रियास्तस्य सर्वदैव वयं नृप ।¦अतस्तदभ्यनुज्ञातधनेनैव यजामहे ॥ ७८॥ | ||
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| verse_text = सोऽयं पितामहोऽस्माकं व्यासस्तन्नः प्रदास्यति । | | verse_text = सोऽयं पितामहोऽस्माकं व्यासस्तन्नः प्रदास्यति । | ||
| verse_lines = सोऽयं पितामहोऽस्माकं व्यासस्तन्नः प्रदास्यति | | verse_lines = सोऽयं पितामहोऽस्माकं व्यासस्तन्नः प्रदास्यति ।¦इत्युक्त्वा तं पुरस्कृत्य कृष्णद्वैपायनं ययुः ॥ ७९॥ | ||
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| verse_text = धनं कृष्णः समादाय(स आदाय) समन्ताच्छतयोजनम् । | | verse_text = धनं कृष्णः समादाय(स आदाय) समन्ताच्छतयोजनम् । | ||
| verse_lines = धनं कृष्णः समादाय(स आदाय) समन्ताच्छतयोजनम् | | verse_lines = धनं कृष्णः समादाय(स आदाय) समन्ताच्छतयोजनम् ।¦ददौ तेषां तेऽपि चोहुर्हस्त्यश्वोष्ट्रनरादिभिः ॥ ८०॥ | ||
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| verse_lines = युधिष्ठिरमृते सर्वे भीमसेनपुरोगमाः | | verse_lines = युधिष्ठिरमृते सर्वे भीमसेनपुरोगमाः ।¦यज्ञार्थमूहिरे भूरि स्वर्णमुद्यद्रविप्रभम् ॥ ८१॥ | ||
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| verse_text = तदैव वासुदेवोऽपि सभार्यः स सुभद्रया । | | verse_text = तदैव वासुदेवोऽपि सभार्यः स सुभद्रया । | ||
| verse_lines = तदैव वासुदेवोऽपि सभार्यः स सुभद्रया | | verse_lines = तदैव वासुदेवोऽपि सभार्यः स सुभद्रया ।¦आगच्छन् हस्तिनपुरं पथ्युदङ्केन पूजितः ॥ ८२॥ | ||
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| verse_lines = तत्कामवर्षिणो मेघांस्तस्य दत्वोदकार्थिनः | | verse_lines = तत्कामवर्षिणो मेघांस्तस्य दत्वोदकार्थिनः ।¦सफलं स्ववरं कृत्वा जगाम गजसाह्वयम् ॥ ८३॥ | ||
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| verse_lines = आसन्नेष्वेव पार्थेषु व्यासे च पुरुषोत्तमे | | verse_lines = आसन्नेष्वेव पार्थेषु व्यासे च पुरुषोत्तमे ।¦प्रविवेश पुरं कृष्णस्तदाऽसूतोत्तरा मृतम् ॥ ८४॥ | ||
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| verse_lines = द्रौण्यस्त्रसूदितं बालं दृष्ट्वा कुन्त्यादिकाः स्त्रियः | | verse_lines = द्रौण्यस्त्रसूदितं बालं दृष्ट्वा कुन्त्यादिकाः स्त्रियः ।¦शरण्यं शरणं जग्मुर्वासुदेवं जगत्पतिम् ॥ ८५॥ | ||
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| verse_lines = प्रत्यक्षमात्मना गर्भे रक्षितं प्रसवे हतम् | | verse_lines = प्रत्यक्षमात्मना गर्भे रक्षितं प्रसवे हतम् ।¦पुनरुज्जीवयामास केशवः पार्थतन्तवे ॥ ८६॥ | ||
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| verse_lines = तदैव विविशुः पार्था सकृष्णाः सधनोच्चयाः(सधनोच्छ्रयाः) | | verse_lines = तदैव विविशुः पार्था सकृष्णाः सधनोच्चयाः(सधनोच्छ्रयाः) ।¦सर्वे मुमुदिरे दृष्ट्वा पौत्रं केशवरक्षितम् ॥ ८७॥ | ||
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| verse_lines = ददौ दानानि बहुशो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः | | verse_lines = ददौ दानानि बहुशो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।¦पौत्रजन्मनि हृष्टात्मा वासुदेवं ननाम च ॥ ८८॥ | ||
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| verse_lines = कुन्तीकृष्णासुभद्राभिर्वैराट्याऽन्याभिरेव च | | verse_lines = कुन्तीकृष्णासुभद्राभिर्वैराट्याऽन्याभिरेव च ।¦पाण्डवैः पुरुषैश्चान्यैः संस्तुतः प्रणतो हरिः ॥ ८९॥ | ||
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| verse_lines = ततः कृष्णाभ्यनुज्ञाता पाराशर्यसदस्यकाः | | verse_lines = ततः कृष्णाभ्यनुज्ञाता पाराशर्यसदस्यकाः ।¦आरेभिरेऽश्वमेधं ते मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥ ९०॥ | ||
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| verse_lines = साधनानि तु सर्वाणि शालां चैव हिरण्मयीम् | | verse_lines = साधनानि तु सर्वाणि शालां चैव हिरण्मयीम् ।¦पवमानसुतश्चक्रे कृष्णद्वैपायनेरितः ॥ ९२॥ | ||
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| verse_lines = अथानुमन्त्रितोत्सृष्टं पुरोहितपुरस्कृतम् | | verse_lines = अथानुमन्त्रितोत्सृष्टं पुरोहितपुरस्कृतम् ।¦तुरङ्गं (तुरगं) कृष्णसारङ्गमनुवव्राज वासविः ॥ ९३॥ | ||
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| verse_lines = स जित्वा रुन्धतः सर्वान् नृपतीञ्छस्त्रतेजसा | | verse_lines = स जित्वा रुन्धतः सर्वान् नृपतीञ्छस्त्रतेजसा ।¦चारयामास सर्वेषु राष्ट्रेष्वविजितोऽरिभिः ॥ ९४॥ | ||
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| verse_lines = युधिष्ठिराज्ञया तेन न कश्चिन्निहतस्तदा | | verse_lines = युधिष्ठिराज्ञया तेन न कश्चिन्निहतस्तदा ।¦आहूताश्च नृपास्तेन यज्ञार्थं प्रीयताऽखिलाः ॥ ९५॥ | ||
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| verse_lines = मळलूरं (मणलूरं) क्रमात् प्राप्तस्तत्रैनं बभ्रुवाहनः | | verse_lines = मळलूरं (मणलूरं) क्रमात् प्राप्तस्तत्रैनं बभ्रुवाहनः ।¦अभ्ययादर्घ्यपाद्याद्यैस्तमाह विजयः सुतम् ॥ ९६॥ | ||
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| verse_lines = तदाऽपि(तथाऽपि) पितृभक्त्यैनमयुद्ध्यन्तमुलूपिका | | verse_lines = तदाऽपि(तथाऽपि) पितृभक्त्यैनमयुद्ध्यन्तमुलूपिका ।¦प्राह युद्ध्यस्व यत् प्रीत्यै(तत् प्रीत्यै) गुरोः कार्यमसंशयम् ।¦प्रीणनायैव युद्ध्यस्व पित्रे सन्धर्शयन् बलम् ॥ ९८॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तो युयुधे पित्रा बलं सर्वं प्रदर्शयन् | | verse_lines = इत्युक्तो युयुधे पित्रा बलं सर्वं प्रदर्शयन् ।¦अर्जुनस्तु सुतस्नेहान्मन्दं योधयति स्मयन् ॥ ९९॥ | ||
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| verse_lines = स तु सर्वायुधक्षेपेऽप्यविकारं धनञ्जयम् | | verse_lines = स तु सर्वायुधक्षेपेऽप्यविकारं धनञ्जयम् ।¦दृष्ट्वा बाल्यात् परीक्षायै मन्त्रपूतं महाशरम् ।¦चिक्षेप पित्रे दैवेन तेनैनं मोह आविशत् ॥ १००॥ | ||
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| verse_lines = मूर्च्छितं तं गुरुं दृष्ट्वा तद्भक्त्या भृशदुःखितः | | verse_lines = मूर्च्छितं तं गुरुं दृष्ट्वा तद्भक्त्या भृशदुःखितः ।¦प्रायोपविष्टस्तन्माता विललापातिदुःखिता ॥ १०१॥ | ||
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| verse_text = विजगर्ह तदोलूपीं धिग् जगत्त्रयपूजितम् । | | verse_text = विजगर्ह तदोलूपीं धिग् जगत्त्रयपूजितम् । | ||
| verse_lines = विजगर्ह तदोलूपीं धिग् जगत्त्रयपूजितम् | | verse_lines = विजगर्ह तदोलूपीं धिग् जगत्त्रयपूजितम् ।¦अजीघनो मे भर्तारं पुत्रेणैवाविजानता ॥ १०२॥ | ||
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| verse_text = लोकवीरं पतिं हित्वा(हत्वा) न मे कार्यं सुतेन च । | | verse_text = लोकवीरं पतिं हित्वा(हत्वा) न मे कार्यं सुतेन च । | ||
| verse_lines = लोकवीरं पतिं हित्वा(हत्वा) न मे कार्यं सुतेन च | | verse_lines = लोकवीरं पतिं हित्वा(हत्वा) न मे कार्यं सुतेन च ।¦पतिलोकमहं यास्ये तृप्ता भव कलिप्रिये ॥ १०३॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्त्वा मरणायैव तां विनिश्चितमानसाम् । | | verse_text = इत्युक्त्वा मरणायैव तां विनिश्चितमानसाम् । | ||
| verse_lines = इत्युक्त्वा मरणायैव तां विनिश्चितमानसाम् | | verse_lines = इत्युक्त्वा मरणायैव तां विनिश्चितमानसाम् ।¦धरायां विलुठन्तीं च दृष्ट्वा भुजगनन्दिनी ॥ १०४॥ | ||
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| verse_text = नागलोकात् समादाय विशल्यकरणीं क्षणात् । | | verse_text = नागलोकात् समादाय विशल्यकरणीं क्षणात् । | ||
| verse_lines = नागलोकात् समादाय विशल्यकरणीं क्षणात् | | verse_lines = नागलोकात् समादाय विशल्यकरणीं क्षणात् ।¦उत्थापयामास पतिं त्रिलोकातिरथं तया ॥ १०५॥ | ||
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| verse_text = प्रहस्योवाच च तदा श्रुतं वाक्यं पुरा मया । | | verse_text = प्रहस्योवाच च तदा श्रुतं वाक्यं पुरा मया । | ||
| verse_lines = प्रहस्योवाच च तदा श्रुतं वाक्यं पुरा मया | | verse_lines = प्रहस्योवाच च तदा श्रुतं वाक्यं पुरा मया ।¦सुरलोके सुरैः प्रोक्तं भीष्माद्या नातिधर्मतः ॥ १०६॥ | ||
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| verse_text = यद्धतास्तेन दोषेण पार्थस्तेनातिवेदनाम् । | | verse_text = यद्धतास्तेन दोषेण पार्थस्तेनातिवेदनाम् । | ||
| verse_lines = यद्धतास्तेन दोषेण पार्थस्तेनातिवेदनाम् | | verse_lines = यद्धतास्तेन दोषेण पार्थस्तेनातिवेदनाम् ।¦रणे व्रजेदिति न तत् परतः स्यादिति ह्यहम् ।¦वचनादेव देवानां युद्ध्येत्यात्मजमब्रवम् ॥ १०७॥ | ||
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| verse_text = देवानामेव सङ्कल्पान्मूर्च्छितश्चार्जुनोऽभवत् । | | verse_text = देवानामेव सङ्कल्पान्मूर्च्छितश्चार्जुनोऽभवत् । | ||
| verse_lines = देवानामेव सङ्कल्पान्मूर्च्छितश्चार्जुनोऽभवत् | | verse_lines = देवानामेव सङ्कल्पान्मूर्च्छितश्चार्जुनोऽभवत् ।¦भुक्तदोषफलश्चायं पुनर्भोक्ष्यति नान्यतः ॥ १०८॥ | ||
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| verse_text = अन्येन पातितस्त्यास्य यशो नश्येत् त्रिलोकगम् । | | verse_text = अन्येन पातितस्त्यास्य यशो नश्येत् त्रिलोकगम् । | ||
| verse_lines = अन्येन पातितस्त्यास्य यशो नश्येत् त्रिलोकगम् | | verse_lines = अन्येन पातितस्त्यास्य यशो नश्येत् त्रिलोकगम् ।¦नार्जुनस्य यशो नश्येदिति दैवैरिदं कृतम् ॥ १०९॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तः प्रीतिमापेदे पुत्रभार्यायुतोऽर्जुनः | | verse_lines = इत्युक्तः प्रीतिमापेदे पुत्रभार्यायुतोऽर्जुनः ।¦यज्ञार्थं तावथाऽहूय पूजितः प्रययौ ततः ॥ ११०॥ | ||
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| verse_text = द्वारकायाः समीपस्थं प्रद्युम्नाद्याः सुता हरेः । | | verse_text = द्वारकायाः समीपस्थं प्रद्युम्नाद्याः सुता हरेः । | ||
| verse_lines = द्वारकायाः समीपस्थं प्रद्युम्नाद्याः सुता हरेः | | verse_lines = द्वारकायाः समीपस्थं प्रद्युम्नाद्याः सुता हरेः ।¦प्रसह्याश्वमपाजह्रुराह्वयन्तोऽर्जुनं युधे ॥ १११॥ | ||
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| verse_lines = सुभद्राहरणं मार्ष्टुं नीतेऽश्वे तैर्धनञ्जयः | | verse_lines = सुभद्राहरणं मार्ष्टुं नीतेऽश्वे तैर्धनञ्जयः ।¦गौरवाद् वासुदेवस्य मातुलस्य च केवलम् ॥ ११२॥ | ||
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| verse_lines = मातुलायाब्रवीदश्वं हृतं पौत्रैरबन्धुवत् | | verse_lines = मातुलायाब्रवीदश्वं हृतं पौत्रैरबन्धुवत् ।¦स निर्भत्स्य कुमारांस्तान् मेध्यमश्वममोचयत् ॥ ११३॥ | ||
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| verse_lines = मातुलं स प्रणम्याथ यज्ञार्थं तान् निमन्त्र्य च | | verse_lines = मातुलं स प्रणम्याथ यज्ञार्थं तान् निमन्त्र्य च ।¦गच्छन् गजाह्वयं दूतमग्रतोऽयापयन्नृपे(यातयन्नृपे) ॥ ११४॥ | ||
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| verse_text = सकृष्णः सहसोदर्यः श्रुत्वाऽसौ प्राप्तमर्जुनम् । | | verse_text = सकृष्णः सहसोदर्यः श्रुत्वाऽसौ प्राप्तमर्जुनम् । | ||
| verse_lines = सकृष्णः सहसोदर्यः श्रुत्वाऽसौ प्राप्तमर्जुनम् | | verse_lines = सकृष्णः सहसोदर्यः श्रुत्वाऽसौ प्राप्तमर्जुनम् ।¦प्रीतो बाष्पाभिपूर्णाक्षो(बाष्पातिपूर्णाक्षो) भ्रातृस्नेहादभाषत ॥ ११५॥ | ||
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| verse_text = वासुदेव न पश्यामि दुर्लक्षणमथार्जुने । | | verse_text = वासुदेव न पश्यामि दुर्लक्षणमथार्जुने । | ||
| verse_lines = वासुदेव न पश्यामि दुर्लक्षणमथार्जुने | | verse_lines = वासुदेव न पश्यामि दुर्लक्षणमथार्जुने ।¦केन दुर्लक्षणेनायं बहुदुःखी प्रवासगः ॥ ११६॥ | ||
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| verse_text = पृष्टस्तं केशवः प्राह भ्राता ते दीर्घपिण्डकः(पिण्डिकः) । | | verse_text = पृष्टस्तं केशवः प्राह भ्राता ते दीर्घपिण्डकः(पिण्डिकः) । | ||
| verse_lines = पृष्टस्तं केशवः प्राह भ्राता ते दीर्घपिण्डकः(पिण्डिकः) | | verse_lines = पृष्टस्तं केशवः प्राह भ्राता ते दीर्घपिण्डकः(पिण्डिकः) ।¦तेनायं दुःखबहुल इत्युक्त्वा पुनरेव च ।¦वदन्तमेव पाञ्चाली कटाक्षेण न्यवारयत् ॥ ११७॥ | ||
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| verse_text = समस्तलक्षणाभिज्ञाः कृष्णः सत्या वृकोदरः । | | verse_text = समस्तलक्षणाभिज्ञाः कृष्णः सत्या वृकोदरः । | ||
| verse_lines = समस्तलक्षणाभिज्ञाः कृष्णः सत्या वृकोदरः | | verse_lines = समस्तलक्षणाभिज्ञाः कृष्णः सत्या वृकोदरः ।¦कृष्णा च पञ्चमो नास्ति विद्या शुद्धेयमञ्जसा ॥ ११८॥ | ||
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| verse_text = प्रसङ्गात् प्राप्तुमिच्छेत् तां विद्याशीलो युधिष्ठिरः । | | verse_text = प्रसङ्गात् प्राप्तुमिच्छेत् तां विद्याशीलो युधिष्ठिरः । | ||
| verse_lines = प्रसङ्गात् प्राप्तुमिच्छेत् तां विद्याशीलो युधिष्ठिरः | | verse_lines = प्रसङ्गात् प्राप्तुमिच्छेत् तां विद्याशीलो युधिष्ठिरः ।¦इति लोभात् तु पाञ्चाली वासुदेवं न्यवारयत् ॥ ११९॥ | ||
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| verse_lines = तद्गौरवाद् वासुदेवो नोत्तरं प्रत्यभाषत | | verse_lines = तद्गौरवाद् वासुदेवो नोत्तरं प्रत्यभाषत ।¦विस्मारयामास च तं पब्रुवाणः कथान्तरम् ॥ १२०॥ | ||
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| verse_lines = उदरस्य किञ्चिदाधिक्यं वृषणाधिक्यमेव च | | verse_lines = उदरस्य किञ्चिदाधिक्यं वृषणाधिक्यमेव च ।¦सव्यबाहोस्तथाऽऽधिक्यं दुर्लक्षणमथार्जुने(अतोऽर्जुने,अथोऽर्जुने) ॥ १२१॥ | ||
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| verse_lines = नैवोक्तं वासुदेवेन दृश्यमानमपि स्फुटम् | | verse_lines = नैवोक्तं वासुदेवेन दृश्यमानमपि स्फुटम् ।¦ज्ञानानन्दह्रासकरा ह्येते दोषाः सनातनाः (सदातनाः) ॥ १२२॥ | ||
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| verse_lines = समस्तजीवराशौ यद् दुर्लक्षणविवर्जितौ | | verse_lines = समस्तजीवराशौ यद् दुर्लक्षणविवर्जितौ ।¦पूर्णचित्सुखशक्त्यादेर्योग्यौ कृष्णा च मारुतिः ॥ १२३॥ | ||
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| verse_lines = अनादिदुःखहीनत्वे सुखाधिक्ये च लक्षणम् | | verse_lines = अनादिदुःखहीनत्वे सुखाधिक्ये च लक्षणम् ।¦रुग्मिणीसत्यभामादिरूपायाः श्रिय एव तु ॥ १२४॥ | ||
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| verse_lines = मुख्यं ततोऽपि(ततोऽति) मुख्यं तु स्वान्तन्त्र्यादेरशेषतः | | verse_lines = मुख्यं ततोऽपि(ततोऽति) मुख्यं तु स्वान्तन्त्र्यादेरशेषतः ।¦गुणराशेः परं लिङ्गं नित्यं व्यासादिरूपिणः ।¦विष्णोरेव नचान्यस्य स ह्येकः पूर्णसद्गुणः ॥ १२५॥ | ||
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| verse_lines = साश्वेऽर्जुने यज्ञवाटं प्रविष्टेऽस्य सहोदराः | | verse_lines = साश्वेऽर्जुने यज्ञवाटं प्रविष्टेऽस्य सहोदराः ।¦पूजिताः पूजयामासुर्मुदिताः सहकेशवाः ॥ १२६॥ | ||
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| verse_lines = ततः स यज्ञो यदुवीररक्षितो व्यासोपदिष्टो मुनिभिः प्रवर्तितः | | verse_lines = ततः स यज्ञो यदुवीररक्षितो व्यासोपदिष्टो मुनिभिः प्रवर्तितः ।¦अशोभतालं सकलैर्नृपैश्च समागतैर्विप्रवरैश्च जुष्टः ॥ १२७॥ | ||
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| verse_text = स कृष्णयुग्मेन च भार्गवेण त्रिधा विभक्तेन परेण पुंसा । | | verse_text = स कृष्णयुग्मेन च भार्गवेण त्रिधा विभक्तेन परेण पुंसा । | ||
| verse_lines = स कृष्णयुग्मेन च भार्गवेण त्रिधा विभक्तेन परेण पुंसा | | verse_lines = स कृष्णयुग्मेन च भार्गवेण त्रिधा विभक्तेन परेण पुंसा ।¦अधिष्ठितोऽशोभत विश्वमेतद् विश्वादिरूपेण यथैव तेन ॥ १२८॥ | ||
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| verse_lines = यथा विरिञ्चस्य पुराऽऽस यज्ञो यथैव शक्रस्य शतक्रतुत्वे | | verse_lines = यथा विरिञ्चस्य पुराऽऽस यज्ञो यथैव शक्रस्य शतक्रतुत्वे ।¦तथैव सोऽभूद् विधिशर्वशक्रपूर्वैः सुरैराविरलङ्कृतोऽधिकम् ॥ १२९॥ | ||
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| verse_text = न देवगन्धर्वमुनिस्वधर्ममर्त्यादिकेष्वास स योऽत्र नाऽस(सम्भ्रमः) । | | verse_text = न देवगन्धर्वमुनिस्वधर्ममर्त्यादिकेष्वास स योऽत्र नाऽस(सम्भ्रमः) । | ||
| verse_lines = न देवगन्धर्वमुनिस्वधर्ममर्त्यादिकेष्वास स योऽत्र नाऽस(सम्भ्रमः) | | verse_lines = न देवगन्धर्वमुनिस्वधर्ममर्त्यादिकेष्वास स योऽत्र नाऽस(सम्भ्रमः) ।¦स्वलङ्कृतैर्नाकिजनैः सकान्तैररूरुचन्नाकवदेतदोकः(दोघः) ॥ १३०॥ | ||
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| verse_lines = तत्रैव तत्त्वानि ससंशयानि निस्संशयान्यासुरलं विवादे | | verse_lines = तत्रैव तत्त्वानि ससंशयानि निस्संशयान्यासुरलं विवादे ।¦परस्परोत्थे हरिणा त्रिरूपिणा संस्थापितान्यग्र्यवचोभिरुच्चैः ॥ १३१॥ | ||
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| verse_lines = प्रगीतगन्धर्ववरः प्रनृत्तसदप्सराः सन्ततवादिविप्रः | | verse_lines = प्रगीतगन्धर्ववरः प्रनृत्तसदप्सराः सन्ततवादिविप्रः ।¦विवेचयद्देवनृपौघ एको रराज राजाऽखिलसत्क्रतूनाम् ॥ १३२॥ | ||
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| verse_lines = समस्तदेव्यः सहवासुदेव्यः स्वलङ्कृताः फुल्लमुखारविन्दाः | | verse_lines = समस्तदेव्यः सहवासुदेव्यः स्वलङ्कृताः फुल्लमुखारविन्दाः ।¦विचेरुरत्रैव(विरेजुरत्रैव) सहाप्सरोभिर्निषेदुरप्यच्युतसत्कथारमाः ॥ १३३॥ | ||
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| verse_text = न वै मुमुक्षुर्न बभूषुरत्र न वै विवित्सुश्च कुतो बुभुक्षुः । | | verse_text = न वै मुमुक्षुर्न बभूषुरत्र न वै विवित्सुश्च कुतो बुभुक्षुः । | ||
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| verse_lines = यथेष्टपानाशनभोगशिष्टाः सहस्रशो मारुतिना तु कारिताः | | verse_lines = यथेष्टपानाशनभोगशिष्टाः सहस्रशो मारुतिना तु कारिताः ।¦गन्धा रसाद्याश्च समस्तभोगा दिवीव तत्राऽसुरतीव हृद्याः ॥ १३७॥ | ||
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| verse_text = नैतादृशः कश्चन भूतपूर्वो मखो विना रामविरिञ्चवज्रिणाम् । | | verse_text = नैतादृशः कश्चन भूतपूर्वो मखो विना रामविरिञ्चवज्रिणाम् । | ||
| verse_lines = नैतादृशः कश्चन भूतपूर्वो मखो विना रामविरिञ्चवज्रिणाम् | | verse_lines = नैतादृशः कश्चन भूतपूर्वो मखो विना रामविरिञ्चवज्रिणाम् ।¦मखानिति प्रोचुरशेषलोका दृष्ट्वा मखं तं पुरुषोत्तमेरितम् ॥ १३८॥ | ||
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| verse_text = स एवमद्धा हरिदैवतः क्रतुः पञ्चाश्वमेधात्मक उच्चकल्पः । | | verse_text = स एवमद्धा हरिदैवतः क्रतुः पञ्चाश्वमेधात्मक उच्चकल्पः । | ||
| verse_lines = स एवमद्धा हरिदैवतः क्रतुः पञ्चाश्वमेधात्मक उच्चकल्पः | | verse_lines = स एवमद्धा हरिदैवतः क्रतुः पञ्चाश्वमेधात्मक उच्चकल्पः ।¦दिनेदिने स्वृद्धगुणो बभूव मुदावहो वत्सरपञ्चकत्रयम् ॥ १३९॥ | ||
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| verse_text = यज्ञावसाने निखिलाश्च पाण्डवाः कृष्णा च पृथ्वीमखिलां सवित्ताम् । | | verse_text = यज्ञावसाने निखिलाश्च पाण्डवाः कृष्णा च पृथ्वीमखिलां सवित्ताम् । | ||
| verse_lines = यज्ञावसाने निखिलाश्च पाण्डवाः कृष्णा च पृथ्वीमखिलां सवित्ताम् | | verse_lines = यज्ञावसाने निखिलाश्च पाण्डवाः कृष्णा च पृथ्वीमखिलां सवित्ताम् ।¦माङ्गल्यमात्रं दयिताशरीरे निधाय सर्वाभरणानि चैव ।¦समर्पयामासुरजे वरेण्ये व्यासे विभागाय यथोक्तमृत्विजाम् ॥ १४०॥ | ||
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| verse_text = प्रियो विभागो यदमुष्य विष्णोरतो विभागार्थमिवाऽर्पयंस्ते । | | verse_text = प्रियो विभागो यदमुष्य विष्णोरतो विभागार्थमिवाऽर्पयंस्ते । | ||
| verse_lines = प्रियो विभागो यदमुष्य विष्णोरतो विभागार्थमिवाऽर्पयंस्ते | | verse_lines = प्रियो विभागो यदमुष्य विष्णोरतो विभागार्थमिवाऽर्पयंस्ते ।¦हृदा समस्तं हरयेऽर्पितं तैः स हि द्विजस्थोऽपि समस्तकर्ता ॥ १४१॥ | ||
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| verse_text = देहेन्द्रियप्राणमनांसि चेतनैः सहैव तस्मा अतिसृज्य नेमुः । | | verse_text = देहेन्द्रियप्राणमनांसि चेतनैः सहैव तस्मा अतिसृज्य नेमुः । | ||
| verse_lines = देहेन्द्रियप्राणमनांसि चेतनैः सहैव तस्मा अतिसृज्य नेमुः | | verse_lines = देहेन्द्रियप्राणमनांसि चेतनैः सहैव तस्मा अतिसृज्य नेमुः ।¦त्वदीयमेतन्निखिलं वयं च नास्त्यस्मदीयं(न त्वस्मदीयं) क्वच किञ्चनेश ।¦स्वन्त्र एकोऽसि न कश्चिदन्यः सर्वत्र पूर्णोऽसि सदेति हृष्टाः ॥ १४२॥ | ||
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| verse_text = ततो विभक्ते मुनयोऽवदंस्ते प्रत्यर्पयामो वयमेषु राज्यम् । | | verse_text = ततो विभक्ते मुनयोऽवदंस्ते प्रत्यर्पयामो वयमेषु राज्यम् । | ||
| verse_lines = ततो विभक्ते मुनयोऽवदंस्ते प्रत्यर्पयामो वयमेषु राज्यम् | | verse_lines = ततो विभक्ते मुनयोऽवदंस्ते प्रत्यर्पयामो वयमेषु राज्यम् ।¦पूर्णा हिरण्येन वयं धरायाः प्रपालने योग्यतमा इमे हि ॥ १४३॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = पार्थाः सभार्या द्विजवाक्यमेतन्निशम्य कृष्णाय पुनः प्रणम्य । | | verse_text = पार्थाः सभार्या द्विजवाक्यमेतन्निशम्य कृष्णाय पुनः प्रणम्य । | ||
| verse_lines = पार्थाः सभार्या द्विजवाक्यमेतन्निशम्य कृष्णाय पुनः प्रणम्य | | verse_lines = पार्थाः सभार्या द्विजवाक्यमेतन्निशम्य कृष्णाय पुनः प्रणम्य ।¦ऊचुस्तपो नोऽस्तु वनेऽर्पयित्वा राज्यं मखान्ते त्वयि धर्मलब्धम् ॥ १४४॥ | ||
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| verse_text = इतीरितः प्राह स बादरायणो मुनीश्वरैरप्यभियाचितः प्रभुः । | | verse_text = इतीरितः प्राह स बादरायणो मुनीश्वरैरप्यभियाचितः प्रभुः । | ||
| verse_lines = इतीरितः प्राह स बादरायणो मुनीश्वरैरप्यभियाचितः प्रभुः | | verse_lines = इतीरितः प्राह स बादरायणो मुनीश्वरैरप्यभियाचितः प्रभुः ।¦हिरण्यमेव स्वमिदं मुनीनां मदाज्ञया भूङ्ग्ध्वमशेषराज्यम् ॥ १४५॥ | ||
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| verse_text = समर्पितं मे फलवच्च तत् स्यात् पुनर्ग्रहो नैव च दोषकारी । | | verse_text = समर्पितं मे फलवच्च तत् स्यात् पुनर्ग्रहो नैव च दोषकारी । | ||
| verse_lines = समर्पितं मे फलवच्च तत् स्यात् पुनर्ग्रहो नैव च दोषकारी | | verse_lines = समर्पितं मे फलवच्च तत् स्यात् पुनर्ग्रहो नैव च दोषकारी ।¦पितामहोऽहं भवतां विशेषतो गुरुः पतिश्चैव ततो मदर्हथ ॥ १४६॥ | ||
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| verse_lines = इतीरितास्ते प्रतिपद्य राज्यं ददुर्हिरण्यं निखिलं च तस्मै | | verse_lines = इतीरितास्ते प्रतिपद्य राज्यं ददुर्हिरण्यं निखिलं च तस्मै ।¦विभज्य विप्रान् स निजं तु भागमदात् पृथायै निखिलम् प्रसन्नः ॥ १४७॥ | ||
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| verse_lines = सभार्यकाणां वररत्नभूषणान्यशेषतः पुत्रभुवां प्रदाय | | verse_lines = सभार्यकाणां वररत्नभूषणान्यशेषतः पुत्रभुवां प्रदाय ।¦पृथक्पृथग् योग्यवरांस्तथैभ्यः प्रादात् प्रभुस्ते मुदिताः प्रणेमुः ॥ १४८॥ | ||
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| verse_lines = तद् यज्ञपञ्चकमजस्त्रिगुणां स एभ्यः सद्दक्षिणां क्रतुपतिर्निखिलामवाप्य | | verse_lines = तद् यज्ञपञ्चकमजस्त्रिगुणां स एभ्यः सद्दक्षिणां क्रतुपतिर्निखिलामवाप्य ।¦चक्रेऽश्वमेधत्रयमेकमेकं तेषां हरिर्बहुसुवर्णकनामधेयम् ॥ १४९॥ | ||
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| verse_lines = सकृष्णेष्वथ पार्थेषु सुस्नातावभृथेष्वलम् | | verse_lines = सकृष्णेष्वथ पार्थेषु सुस्नातावभृथेष्वलम् ।¦पञ्चेन्द्रवद् विराजत्सु स्तूयमानेष्वृषीश्वरैः ॥ १५०॥ | ||
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| verse_lines = स्तूयमाने च तद्यज्ञे क्रोधो नकुलतां गतः | | verse_lines = स्तूयमाने च तद्यज्ञे क्रोधो नकुलतां गतः ।¦कृत्वोग्रगर्जनं यज्ञं तांश्च यज्ञकृतोऽखिलान् ॥ १५१॥ | ||
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| verse_lines = गर्हयन्नूचिवानित्थं भार्यापुत्रस्नुषायुतः | | verse_lines = गर्हयन्नूचिवानित्थं भार्यापुत्रस्नुषायुतः ।¦सक्तुप्रस्थमदाद् विप्र उञ्छवृत्तिः सुभक्तितः ॥ १५२॥ | ||
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| verse_lines = धर्मायातिथये तस्य कलां नार्हति षोडशीम् | | verse_lines = धर्मायातिथये तस्य कलां नार्हति षोडशीम् ।¦यज्ञोऽयमिति हेतुं च विप्रैः पृष्टोऽभ्यभाषत ॥ १५३॥ | ||
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| verse_lines = अतिथेस्तस्य पादोदक्लिन्नः पार्श्वो हिरण्मयः | | verse_lines = अतिथेस्तस्य पादोदक्लिन्नः पार्श्वो हिरण्मयः ।¦एको ममाभूदपरः सर्वतीर्थादिकेष्वपि ॥ १५४॥ | ||
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| verse_lines = मज्जतोऽवभृथेष्वद्धा यज्ञानामत्र चाऽदरात् | | verse_lines = मज्जतोऽवभृथेष्वद्धा यज्ञानामत्र चाऽदरात् ।¦नाभूदित्यथ तत्तत्त्ववेदिभिर्मुनिपुङ्गवैः ॥ १५५॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णेन च तमोऽन्धं तं प्रापयद्भिः स्मिते कृते | | verse_lines = कृष्णेन च तमोऽन्धं तं प्रापयद्भिः स्मिते कृते ।¦अदर्शनं जगामाऽशु तमः प्राप च कालतः ।¦तदर्थमेव हैरण्यः पार्श्वस्तस्याभवत् पुरा ॥ १५६॥ | ||
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| verse_lines = कृष्णस्य पाण्डवानां च मखादेश्च गुणान् बहून् | | verse_lines = कृष्णस्य पाण्डवानां च मखादेश्च गुणान् बहून् ।¦वदन्तो भर्त्सयाञ्चक्रुस्तन्मतज्ञा(तं मतज्ञाः) मधुद्विषः ॥ १५७॥ | ||
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| verse_lines = श्राद्धार्थं हि पयः पूर्वं (जामदग्नेः)जमदग्नेरदूषयत् | | verse_lines = श्राद्धार्थं हि पयः पूर्वं (जामदग्नेः)जमदग्नेरदूषयत् ।¦नाकुलेनैव रूपेण क्रोधस्तं पितरोऽशपन् ॥ १५८॥ | ||
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| verse_lines = भव त्वं नकुलस्तावद् यावद् धर्मादिकान् सुरान् | | verse_lines = भव त्वं नकुलस्तावद् यावद् धर्मादिकान् सुरान् ।¦क्षेप्स्यसीति तमो घोरं भूयः पापेन यात्वयम् ।¦इत्यभिप्रेत्यः तैः शप्तस्तथा कृत्वा तमोऽभ्ययात् ॥ १५९॥ | ||
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| verse_lines = यद्यप्यल्पधनत्यक्तं वित्तं बहुफलं भवेत् | | verse_lines = यद्यप्यल्पधनत्यक्तं वित्तं बहुफलं भवेत् ।¦तथाऽप्यनन्तफलदाः कर्तुरेव महागुणाः ॥ १६०॥ | ||
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| verse_lines = सतां प्रीतिश्च तत्रापि सद्वरो हरिरेव हि | | verse_lines = सतां प्रीतिश्च तत्रापि सद्वरो हरिरेव हि ।¦पार्थेभ्योऽभ्यधिकः कर्ता समो वा को गुणैर्भवेत् ॥ १६१॥ | ||
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| verse_lines = सतां च प्रवरो विष्णुः सद्भिर्मुनिवरैर्युतः | | verse_lines = सतां च प्रवरो विष्णुः सद्भिर्मुनिवरैर्युतः ।¦प्रत्यक्षतः कारयति पार्थैः प्रियतमैश्च तैः ।¦यं मखप्रवरं तस्य समं किं शुभसाधनम्(शुभसाधनैः) ॥ १६२॥ | ||
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| verse_lines = पठन्ति पैङ्गिनश्चैतान् मन्त्रानन्वर्थकानिह | | verse_lines = पठन्ति पैङ्गिनश्चैतान् मन्त्रानन्वर्थकानिह ।¦अवैष्णवकृतं कर्म सर्वमन्तवदुच्यते ।¦अनन्तं वैष्णवकृतं तत्र वर्णक्रमात् परम् ॥ १६३॥ | ||
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| verse_lines = वैष्णवत्वं क्रमात् वृद्धं (क्रमोद्वृद्धं) ब्रह्मान्तं जीवराशिषु | | verse_lines = वैष्णवत्वं क्रमात् वृद्धं (क्रमोद्वृद्धं) ब्रह्मान्तं जीवराशिषु ।¦फलाधिक्यं कर्मणां हि विष्णोः प्रीत्यैव नान्यथा ॥ १६६॥ | ||
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| verse_lines = इति तेन न पार्थानां कर्मणाऽन्यत् समं क्वचित् | | verse_lines = इति तेन न पार्थानां कर्मणाऽन्यत् समं क्वचित् ।¦गुणैर्ज्ञानादिभिर्वाऽपि तस्मात् क्रोधः स तामसः ।¦विनिन्द्य तान् सुसत्त्वस्थांस्तमोऽन्धमुपजग्मिवान् ॥ १६७॥ | ||
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| verse_lines = ते च श्रुत्वाऽखिलान् धर्मान् भक्त्या परमया युताः | | verse_lines = ते च श्रुत्वाऽखिलान् धर्मान् भक्त्या परमया युताः ।¦पूजयन्तो जगन्नाथमापुश्च परमां मुदम् ॥ १६९॥ | ||
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<span id="gr-C31" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकत्रिंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C31" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="एकत्रिंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = ओं ॥ यज्ञेश्वरेणाभियुतेषु भक्त्या महीं प्रशासत्सु पृथासुतेषु । | | verse_text = ओं ॥ यज्ञेश्वरेणाभियुतेषु भक्त्या महीं प्रशासत्सु पृथासुतेषु । | ||
| verse_lines = ओं ॥ यज्ञेश्वरेणाभियुतेषु भक्त्या महीं प्रशासत्सु पृथासुतेषु | | verse_lines = ओं ॥ यज्ञेश्वरेणाभियुतेषु भक्त्या महीं प्रशासत्सु पृथासुतेषु ।¦यियक्षुरागान्निशि विप्रवर्यो युधिष्ठिरं वित्तमभीप्समानः ॥ १॥ | ||
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| verse_text = प्रातर्ददानीति नृपस्य वाक्यं निशम्य विप्रस्त्वरितो मखार्थे । | | verse_text = प्रातर्ददानीति नृपस्य वाक्यं निशम्य विप्रस्त्वरितो मखार्थे । | ||
| verse_lines = प्रातर्ददानीति नृपस्य वाक्यं निशम्य विप्रस्त्वरितो मखार्थे | | verse_lines = प्रातर्ददानीति नृपस्य वाक्यं निशम्य विप्रस्त्वरितो मखार्थे ।¦भीमं ययाचे स नृपोक्तमाशु निशम्य चादान्निजहस्तभूषणम् ॥ २॥ | ||
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| verse_text = अनर्घमग्निप्रतिमं(अनर्घ्यमग्निप्रतिमं) विचित्ररत्नान्वितं(रत्नाञ्चितं) विप्रवरस्तदाप्य । | | verse_text = अनर्घमग्निप्रतिमं(अनर्घ्यमग्निप्रतिमं) विचित्ररत्नान्वितं(रत्नाञ्चितं) विप्रवरस्तदाप्य । | ||
| verse_lines = अनर्घमग्निप्रतिमं(अनर्घ्यमग्निप्रतिमं) विचित्ररत्नान्वितं(रत्नाञ्चितं) विप्रवरस्तदाप्य | | verse_lines = अनर्घमग्निप्रतिमं(अनर्घ्यमग्निप्रतिमं) विचित्ररत्नान्वितं(रत्नाञ्चितं) विप्रवरस्तदाप्य ।¦ययौ कृतार्थोऽथ च (नन्दिरावं)नन्दिघोषमकारयद् वायुसूनुस्तदैव ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = अकालजं तं तु निशम्य राजा पप्रच्छ दूतैस्तमुवाच भीमः । | | verse_text = अकालजं तं तु निशम्य राजा पप्रच्छ दूतैस्तमुवाच भीमः । | ||
| verse_lines = अकालजं तं तु निशम्य राजा पप्रच्छ दूतैस्तमुवाच भीमः | | verse_lines = अकालजं तं तु निशम्य राजा पप्रच्छ दूतैस्तमुवाच भीमः ।¦यन्मर्त्यदेहोऽपि विनिश्चितायुरभून्नृपस्तेन ममाऽस हर्षः ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = इतीरितोऽसौ नृपतिस्त्वरेत धर्मार्थमित्यस्य मतं प्रपूजयन् । | | verse_text = इतीरितोऽसौ नृपतिस्त्वरेत धर्मार्थमित्यस्य मतं प्रपूजयन् । | ||
| verse_lines = इतीरितोऽसौ नृपतिस्त्वरेत धर्मार्थमित्यस्य मतं प्रपूजयन् | | verse_lines = इतीरितोऽसौ नृपतिस्त्वरेत धर्मार्थमित्यस्य मतं प्रपूजयन् ।¦जगाद साध्वित्यथ भूय एव धर्मे त्वरावानपि सम्बभूव ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = अथाम्बिकेयं विषयेषु सक्तं दुस्सङ्गदुष्टं कृतभूरिदोषम् । | | verse_text = अथाम्बिकेयं विषयेषु सक्तं दुस्सङ्गदुष्टं कृतभूरिदोषम् । | ||
| verse_lines = अथाम्बिकेयं विषयेषु सक्तं दुस्सङ्गदुष्टं कृतभूरिदोषम् | | verse_lines = अथाम्बिकेयं विषयेषु सक्तं दुस्सङ्गदुष्टं कृतभूरिदोषम् ।¦समस्तराजाप्ययहेतुभूतं विचार्य (निचाय्य) तं मारुतिरन्वकम्पत ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = अकुर्वतस्तीक्ष्णतपः कुतश्चिन्नैवास्य(कुतश्चिन्नैव स्वलोकाप्ति)लोकाप्तिरमुष्य भूयात् । | | verse_text = अकुर्वतस्तीक्ष्णतपः कुतश्चिन्नैवास्य(कुतश्चिन्नैव स्वलोकाप्ति)लोकाप्तिरमुष्य भूयात् । | ||
| verse_lines = अकुर्वतस्तीक्ष्णतपः कुतश्चिन्नैवास्य(कुतश्चिन्नैव स्वलोकाप्ति)लोकाप्तिरमुष्य भूयात् | | verse_lines = अकुर्वतस्तीक्ष्णतपः कुतश्चिन्नैवास्य(कुतश्चिन्नैव स्वलोकाप्ति)लोकाप्तिरमुष्य भूयात् ।¦रागाधिकोऽयं न तपश्च कुर्यादित्यस्य वैराग्यकराणि चक्रे ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = आज्ञां परैरस्य निहन्ति सोदरैर्वधूजनैरप्यतिपूजितेऽस्मिन् । | | verse_text = आज्ञां परैरस्य निहन्ति सोदरैर्वधूजनैरप्यतिपूजितेऽस्मिन् । | ||
| verse_lines = आज्ञां परैरस्य निहन्ति सोदरैर्वधूजनैरप्यतिपूजितेऽस्मिन् | | verse_lines = आज्ञां परैरस्य निहन्ति सोदरैर्वधूजनैरप्यतिपूजितेऽस्मिन् ।¦स निष्टनत्येवमपीतरैः स्वैः सुपूजितो(सम्पूजितो) नाऽस तदा विरागः ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = सर्वे हि पार्थास्तमृते सभार्या वैचित्रवीर्यं परमादरेण । | | verse_text = सर्वे हि पार्थास्तमृते सभार्या वैचित्रवीर्यं परमादरेण । | ||
| verse_lines = सर्वे हि पार्थास्तमृते सभार्या वैचित्रवीर्यं परमादरेण | | verse_lines = सर्वे हि पार्थास्तमृते सभार्या वैचित्रवीर्यं परमादरेण ।¦पर्येव चक्रुः सततं सभार्यं कृष्णा च न स्यात् तनयार्तिमानिति ॥ ९॥ | ||
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| verse_text = स प्रीयमाणो नितरां च तेषु नैवाधिकं प्रीयते भीमसेने । | | verse_text = स प्रीयमाणो नितरां च तेषु नैवाधिकं प्रीयते भीमसेने । | ||
| verse_lines = स प्रीयमाणो नितरां च तेषु नैवाधिकं प्रीयते भीमसेने | | verse_lines = स प्रीयमाणो नितरां च तेषु नैवाधिकं प्रीयते भीमसेने ।¦स्मरन् सुतांस्तेन हतान् समस्तानपि प्रभावं परमस्य जानन् ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = तस्यापनेतुं विषयेषु सक्तिं द्वेषं तथैवाऽत्मनि भीमसेनः । | | verse_text = तस्यापनेतुं विषयेषु सक्तिं द्वेषं तथैवाऽत्मनि भीमसेनः । | ||
| verse_lines = तस्यापनेतुं विषयेषु सक्तिं द्वेषं तथैवाऽत्मनि भीमसेनः | | verse_lines = तस्यापनेतुं विषयेषु सक्तिं द्वेषं तथैवाऽत्मनि भीमसेनः ।¦जगाद माद्रीसुतयोः समक्षमास्फोट्य संशृण्वत एव तस्य ॥ ११॥ | ||
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| verse_text = ताविमौ मे भुजौ वृत्तौ पीनौ चन्दनरूषितौ । | | verse_text = ताविमौ मे भुजौ वृत्तौ पीनौ चन्दनरूषितौ । | ||
| verse_lines = ताविमौ मे भुजौ वृत्तौ पीनौ चन्दनरूषितौ | | verse_lines = ताविमौ मे भुजौ वृत्तौ पीनौ चन्दनरूषितौ ।¦ययोरन्तरमासाद्य जरढस्य सुता हताः ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = यमौ तदन्वमोदेतां तत्स्नेहाद् गौरवादपि । | | verse_text = यमौ तदन्वमोदेतां तत्स्नेहाद् गौरवादपि । | ||
| verse_lines = यमौ तदन्वमोदेतां तत्स्नेहाद् गौरवादपि | | verse_lines = यमौ तदन्वमोदेतां तत्स्नेहाद् गौरवादपि ।¦नैव तत् कृष्णया ज्ञातं पृथया च सपुत्रया ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = तच्छ्रुत्वोत्पन्ननिर्वेदं क्षत्ता ज्येष्ठस्य वर्द्धयन् । | | verse_text = तच्छ्रुत्वोत्पन्ननिर्वेदं क्षत्ता ज्येष्ठस्य वर्द्धयन् । | ||
| verse_lines = तच्छ्रुत्वोत्पन्ननिर्वेदं क्षत्ता ज्येष्ठस्य वर्द्धयन् | | verse_lines = तच्छ्रुत्वोत्पन्ननिर्वेदं क्षत्ता ज्येष्ठस्य वर्द्धयन् ।¦उवाच जीविताशा ते ननु राजन् गरीयसी (महीयसी) ॥ १४॥ | ||
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| verse_lines = अहो महीयसी(गरीयसी) जन्तोर्जीविताशा यथा(यया) | | verse_lines = अहो महीयसी(गरीयसी) जन्तोर्जीविताशा यथा(यया) भवान्।¦भीमापवर्जितं पिण्डमादत्से गृहपालवत् ॥ १५॥ | ||
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| verse_text = नचापराधो भीमस्य ब्रुवतस्त्वामिदं वचः । | | verse_text = नचापराधो भीमस्य ब्रुवतस्त्वामिदं वचः । | ||
| verse_lines = नचापराधो भीमस्य ब्रुवतस्त्वामिदं वचः | | verse_lines = नचापराधो भीमस्य ब्रुवतस्त्वामिदं वचः ।¦अग्निर्निसृष्टो दत्तश्च गरो दाराश्च दूषिताः ।¦हृतं क्षेत्रं धनं यस्य किं भीमेन कृतं त्वयि ॥ १६॥ | ||
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| verse_lines = अलमासज्जतस्तेऽद्य निर्वेदकरमीरितम् | | verse_lines = अलमासज्जतस्तेऽद्य निर्वेदकरमीरितम् ।¦उपकाराय भीमेन तव द्वेषं त्यजात्र तत् ॥ १७॥ | ||
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| verse_text = विमुच्य द्वेषकामौ त्वं वने तीर्थनिषेवकः । | | verse_text = विमुच्य द्वेषकामौ त्वं वने तीर्थनिषेवकः । | ||
| verse_lines = विमुच्य द्वेषकामौ त्वं वने तीर्थनिषेवकः | | verse_lines = विमुच्य द्वेषकामौ त्वं वने तीर्थनिषेवकः ।¦तपसाऽऽराधय हरिं ततः पूतो भविष्यसि ॥ १८॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्तो द्वेषमुत्सृज्य भीमे निर्वेदमागतः । | | verse_text = इत्युक्तो द्वेषमुत्सृज्य भीमे निर्वेदमागतः । | ||
| verse_lines = इत्युक्तो द्वेषमुत्सृज्य भीमे निर्वेदमागतः | | verse_lines = इत्युक्तो द्वेषमुत्सृज्य भीमे निर्वेदमागतः ।¦अनुज्ञां तपसे प्राप्तुमुपवासपरोऽभवत् ॥ १९॥ | ||
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| verse_lines = अनश्नन्तं चतुर्थेऽह्नि धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः | | verse_lines = अनश्नन्तं चतुर्थेऽह्नि धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः ।¦ज्ञात्वा सम्प्रार्थयामास भोजनार्थं पुनःपुनः ॥ २०॥ | ||
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| verse_lines = अनुज्ञां वनवासाय त्वत्तः प्राप्यैव सर्वथा | | verse_lines = अनुज्ञां वनवासाय त्वत्तः प्राप्यैव सर्वथा ।¦भोक्ष्येऽन्यथा नेति वदन् धृतराष्ट्रः श्रमान्वितः ।¦उपवासकृशो भार्यां शिश्रिये मूर्च्छितः क्षणात् ॥ २१॥ | ||
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| verse_lines = शन्तमेन(श्रान्तमेनं) करेणाथ धर्मजस्तं मृदु स्पृशन् | | verse_lines = शन्तमेन(श्रान्तमेनं) करेणाथ धर्मजस्तं मृदु स्पृशन् ।¦शनैः सञ्ज्ञामगमयदब्रवीच्च सुदुःखितः ॥ २२॥ | ||
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| verse_lines = पुरस्कृत्य युयुत्सुं त्वं कुरु राज्यमकण्टकम् | | verse_lines = पुरस्कृत्य युयुत्सुं त्वं कुरु राज्यमकण्टकम् ।¦वयमेव त्वदर्थाय कुर्मः सर्वे तपो वने ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = नेत्याह धृतराष्ट्रस्तं कुलधर्मो हि नो वने | | verse_lines = नेत्याह धृतराष्ट्रस्तं कुलधर्मो हि नो वने ।¦अन्ते देहपरित्यागस्तन्माऽनुज्ञातुमर्हसि ॥ २४॥ | ||
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| verse_lines = तयोर्विवदतोरेवं कृष्णद्वैपायनः प्रभुः | | verse_lines = तयोर्विवदतोरेवं कृष्णद्वैपायनः प्रभुः ।¦सर्वज्ञः सर्वकर्तेश आविर्भूतोऽब्रवीन्नृपम् ॥ २५॥ | ||
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| verse_lines = तपसाऽशेषदोषाणां क्षयकाममिमं नृपम् | | verse_lines = तपसाऽशेषदोषाणां क्षयकाममिमं नृपम् ।¦अनुजानीहि नैवास्य धर्मविघ्नकरो भव ॥ २६॥ | ||
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| verse_lines = काले निर्वेदमापन्नस्तपसा दग्धकिल्बिषः | | verse_lines = काले निर्वेदमापन्नस्तपसा दग्धकिल्बिषः ।¦शुभ्रां गतिमयं यायादन्यथा न कथञ्चन ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तो धर्मराजस्तमनुजज्ञे स चाशितः | | verse_lines = इत्युक्तो धर्मराजस्तमनुजज्ञे स चाशितः ।¦शिक्षयामास सद्धर्मान् नीतिं च विदुषेऽप्यलम् ।¦केवलस्नेहतो(केवलं स्नेहतो) राज्ञे शुश्राव विनयात् स च ॥ २८॥ | ||
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| verse_lines = अनुज्ञाय गृहं प्राप्ते धर्मजे विदुरं पुनः | | verse_lines = अनुज्ञाय गृहं प्राप्ते धर्मजे विदुरं पुनः ।¦श्राद्धाय वित्तमाकाङ्क्षन् प्रेषयामास तद्वचः ॥ २९॥ | ||
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| verse_lines = श्रुत्वा युधिष्ठिरो भीममाह दातव्यमद्य नः | | verse_lines = श्रुत्वा युधिष्ठिरो भीममाह दातव्यमद्य नः ।¦पुत्रपौत्राप्तबन्धूनां श्राद्धेच्छोर्वित्तमञ्जसा ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = तमाह भीमः पापानां विमुखानां मधुद्विषः | | verse_lines = तमाह भीमः पापानां विमुखानां मधुद्विषः ।¦पारलौकिकसाहाय्यं न कार्यमितरार्थतः ।¦दत्तेनापि हि वित्तेन पुत्रश्राद्धं करिष्यति ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = तज्ज्ञात्वा ददतां दोषो भवेदिति विचिन्तयन् | | verse_lines = तज्ज्ञात्वा ददतां दोषो भवेदिति विचिन्तयन् ।¦कष्टात् कष्टतरं यान्तु सर्वे दुर्योधनादयः ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = भीष्मादीनां वयं श्राद्धकर्तारस्तेन किं ततः | | verse_lines = भीष्मादीनां वयं श्राद्धकर्तारस्तेन किं ततः ।¦कानीनत्वात्तु कर्णस्य सहास्माभिः पृथैव हि ।¦श्राद्धकर्मण्यधिकृता किं तस्मै दीयते धनम् ॥ ३३॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तवन्तं नृपतिरर्जुनश्चोचतुः पुनः | | verse_lines = इत्युक्तवन्तं नृपतिरर्जुनश्चोचतुः पुनः ।¦यियासोर्याचमानाय निजबाहुबलार्जितम् ।¦देहि वित्तं परमतः किं त्वामेषोऽभियाचते ॥ ३४॥ | ||
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| verse_text = नातिहृष्टस्त्वदाज्ञायां भीमस्तन्मा क्रुधोऽत्र च। | | verse_text = नातिहृष्टस्त्वदाज्ञायां भीमस्तन्मा क्रुधोऽत्र च। | ||
| verse_lines = नातिहृष्टस्त्वदाज्ञायां भीमस्तन्मा क्रुधोऽत्र | | verse_lines = नातिहृष्टस्त्वदाज्ञायां भीमस्तन्मा क्रुधोऽत्र च।¦शुद्धे क्षत्रियधर्मे हि(शुद्धक्षत्रियधर्मेषु) नितरोऽयं वृकोदरः ॥ ३९॥ | ||
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| verse_text = नृपार्जुनौ धर्मरतावपि लोककृपापरौ। | | verse_text = नृपार्जुनौ धर्मरतावपि लोककृपापरौ। | ||
| verse_lines = नृपार्जुनौ धर्मरतावपि | | verse_lines = नृपार्जुनौ धर्मरतावपि लोककृपापरौ।¦अजातकोपस्तच्छ्रुत्वा धृतराष्ट्रः प्रशान्तधीः ॥ ४०॥ | ||
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| verse_text = कृत्वा श्राद्धानि सर्वेषां महादानान्यनारतम् । | | verse_text = कृत्वा श्राद्धानि सर्वेषां महादानान्यनारतम् । | ||
| verse_lines = कृत्वा श्राद्धानि सर्वेषां महादानान्यनारतम् | | verse_lines = कृत्वा श्राद्धानि सर्वेषां महादानान्यनारतम् ।¦दशरात्रं ददौ शुद्धमनसा निर्ऋणत्वधीः ॥ ४१ ॥ | ||
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| verse_text = सर्वं समर्प्य गोविन्दे पार्थेभ्योऽन्येभ्य एव च । | | verse_text = सर्वं समर्प्य गोविन्दे पार्थेभ्योऽन्येभ्य एव च । | ||
| verse_lines = सर्वं समर्प्य गोविन्दे पार्थेभ्योऽन्येभ्य एव च | | verse_lines = सर्वं समर्प्य गोविन्दे पार्थेभ्योऽन्येभ्य एव च ।¦स्वजनेभ्यः समादाय स्रवन्नेत्रेभ्य उच्चधीः ।¦अनुज्ञां निर्गतः प्राह पौरजानपदान् नृपः ॥ ४२॥ | ||
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| verse_text = धर्मतो रक्षिता यूयमस्मत्पूर्वैर्महात्मभिः । | | verse_text = धर्मतो रक्षिता यूयमस्मत्पूर्वैर्महात्मभिः । | ||
| verse_lines = धर्मतो रक्षिता यूयमस्मत्पूर्वैर्महात्मभिः | | verse_lines = धर्मतो रक्षिता यूयमस्मत्पूर्वैर्महात्मभिः ।¦नचाहं परमस्नेहाद् युष्माभिः सुकृपालुभिः ।¦अरक्षितेति कथितः प्रमादादपि सज्जनाः ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = इष्टं च यज्ञैः पूर्तैश्च चरितं युष्मदाश्रयात् । | | verse_text = इष्टं च यज्ञैः पूर्तैश्च चरितं युष्मदाश्रयात् । | ||
| verse_lines = इष्टं च यज्ञैः पूर्तैश्च चरितं युष्मदाश्रयात् | | verse_lines = इष्टं च यज्ञैः पूर्तैश्च चरितं युष्मदाश्रयात् ।¦पुत्रस्तु मम पापात्मा सर्वक्षत्रविनाशकः ।¦सर्वातिशङ्की मूढश्च वृद्धानां शासनातिगः ॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = सौभ्रात्रं येन सन्त्यज्य पाण्डवेषु महात्मसु । | | verse_text = सौभ्रात्रं येन सन्त्यज्य पाण्डवेषु महात्मसु । | ||
| verse_lines = सौभ्रात्रं येन सन्त्यज्य पाण्डवेषु महात्मसु | | verse_lines = सौभ्रात्रं येन सन्त्यज्य पाण्डवेषु महात्मसु ।¦कृतं विरूपं सुमहत् कुर्याद् यन्नापरः क्वचित् ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = अप्रियाणि च कृष्णस्य सुबहून्याचरत् कुधीः । | | verse_text = अप्रियाणि च कृष्णस्य सुबहून्याचरत् कुधीः । | ||
| verse_lines = अप्रियाणि च कृष्णस्य सुबहून्याचरत् कुधीः | | verse_lines = अप्रियाणि च कृष्णस्य सुबहून्याचरत् कुधीः ।¦प्रायस्तेनापि मन्देन न युष्मास्वप्यप्रियं(युष्मास्वप्यशिवं,न युष्मास्वशिवं,न युष्मासु शिवं) कृतम् ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = भ्रातरोऽस्य च सर्वेऽपि तच्छीलमनुवर्तिनः । | | verse_text = भ्रातरोऽस्य च सर्वेऽपि तच्छीलमनुवर्तिनः । | ||
| verse_lines = भ्रातरोऽस्य च सर्वेऽपि तच्छीलमनुवर्तिनः | | verse_lines = भ्रातरोऽस्य च सर्वेऽपि तच्छीलमनुवर्तिनः ।¦हताश्च स्वेन पापेन ससुतामात्यबान्धवाः ॥ ४7॥ | ||
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| verse_text = सोऽहं वयोगतश्चैव पुत्राधिभिरभिप्लुतः(पुत्रादिभिरभिप्लुतः) । | | verse_text = सोऽहं वयोगतश्चैव पुत्राधिभिरभिप्लुतः(पुत्रादिभिरभिप्लुतः) । | ||
| verse_lines = सोऽहं वयोगतश्चैव पुत्राधिभिरभिप्लुतः(पुत्रादिभिरभिप्लुतः) | | verse_lines = सोऽहं वयोगतश्चैव पुत्राधिभिरभिप्लुतः(पुत्रादिभिरभिप्लुतः) ।¦तत्सम्बन्धकृतं(तत्सम्बन्धात्कृतं) पापं स्वकृतं चाप्यपेशलम्(चात्यपेशलम्) ।¦पाण्डवेषु सकृष्णेषु तपसा मार्ष्टुमुद्यतः ॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = तत्र मामनुजानीध्वं कृपया मित्रवत्सलाः । | | verse_text = तत्र मामनुजानीध्वं कृपया मित्रवत्सलाः । | ||
| verse_lines = तत्र मामनुजानीध्वं कृपया मित्रवत्सलाः | | verse_lines = तत्र मामनुजानीध्वं कृपया मित्रवत्सलाः ।¦मत्प्रियार्थमपि स्नेहः पाण्डवेषु महात्मसु ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = क्रियमाणोऽपि कर्तव्यो भूय एव सदाऽचलः । | | verse_text = क्रियमाणोऽपि कर्तव्यो भूय एव सदाऽचलः । | ||
| verse_lines = क्रियमाणोऽपि कर्तव्यो भूय एव सदाऽचलः | | verse_lines = क्रियमाणोऽपि कर्तव्यो भूय एव सदाऽचलः ।¦ते हि मे पुत्रकाः सन्त इहामुत्र च सौख्यदाः ॥ ५०॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्तैः स्वगुणानुच्चैः कीर्तयद्भिः सुदुःखितैः | | verse_lines = इत्युक्तैः स्वगुणानुच्चैः कीर्तयद्भिः सुदुःखितैः ।¦पर्यश्रुनयनैः कृच्छ्रात् पौरजानपदैश्चिरात् ।¦अनुज्ञातो ययौ पार्थैरनुयातः सुदूरतः ॥ ५१॥ | ||
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| verse_lines = सञ्जयो विदुरश्चैनं सभार्यमनुजग्मतुः | | verse_lines = सञ्जयो विदुरश्चैनं सभार्यमनुजग्मतुः ।¦अनुवव्राज तं कुन्ती वनाय कृतनिश्चया ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = वार्यमाणाऽपि तनयैः सभार्यैर्भृशदुःखितैः | | verse_lines = वार्यमाणाऽपि तनयैः सभार्यैर्भृशदुःखितैः ।¦संस्थाप्य तान् सुकृच्छ्रेण ययौ साऽन्वेव तं नृपम् ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = संन्दर्शितपथो राजा कुन्तीविदुरसञ्जयैः | | verse_lines = संन्दर्शितपथो राजा कुन्तीविदुरसञ्जयैः ।¦गान्धारीसहितः प्राप कुरुक्षेत्रं जगद्गुरोः ।¦क्रमेणैवाऽश्रमं व्यासदेवस्य सुरपूजितम् ॥ ५४॥ | ||
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| verse_text = त्रिवत्सरेणास्य (त्रिवत्सरादस्य) निजस्य लोकस्याऽप्तिं सभार्यस्य जगाद तत्र । | | verse_text = त्रिवत्सरेणास्य (त्रिवत्सरादस्य) निजस्य लोकस्याऽप्तिं सभार्यस्य जगाद तत्र । | ||
| verse_lines = त्रिवत्सरेणास्य (त्रिवत्सरादस्य) निजस्य लोकस्याऽप्तिं सभार्यस्य जगाद तत्र | | verse_lines = त्रिवत्सरेणास्य (त्रिवत्सरादस्य) निजस्य लोकस्याऽप्तिं सभार्यस्य जगाद तत्र ।¦ब्रह्माङ्कजस्तेन भृशं प्रतीतो व्यासोपदिष्टं व्यचरत् तपोऽग्र्यम् ॥ ५५॥ | ||
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| verse_text = सक्षत्तृगान्धारिपृथे ससञ्जये तपोभिराराधयति प्रभुं हरिम् । | | verse_text = सक्षत्तृगान्धारिपृथे ससञ्जये तपोभिराराधयति प्रभुं हरिम् । | ||
| verse_lines = सक्षत्तृगान्धारिपृथे ससञ्जये तपोभिराराधयति प्रभुं हरिम् | | verse_lines = सक्षत्तृगान्धारिपृथे ससञ्जये तपोभिराराधयति प्रभुं हरिम् ।¦वैचित्रवीर्येऽत्र सदारबन्धुभृत्यास्तु पार्था दृशये समाययुः ॥ ५६॥ | ||
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| verse_text = क्षत्तैकतामत्र युधिष्ठिरेण प्राप्तोऽथ भार्यासहितं ससञ्जयम् । | | verse_text = क्षत्तैकतामत्र युधिष्ठिरेण प्राप्तोऽथ भार्यासहितं ससञ्जयम् । | ||
| verse_lines = क्षत्तैकतामत्र युधिष्ठिरेण प्राप्तोऽथ भार्यासहितं ससञ्जयम् | | verse_lines = क्षत्तैकतामत्र युधिष्ठिरेण प्राप्तोऽथ भार्यासहितं ससञ्जयम् ।¦उपासमानेषु विचित्रवीर्यपुत्रं पृथां चैव पृथासुतेषु ॥ ५७॥ | ||
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| verse_text = प्रादुर्बभूवामितशक्ति(प्रादुर्बभूवामृतशक्ति)तेजोज्ञानाद्भुतैश्वर्यसुखादिरूपः । | | verse_text = प्रादुर्बभूवामितशक्ति(प्रादुर्बभूवामृतशक्ति)तेजोज्ञानाद्भुतैश्वर्यसुखादिरूपः । | ||
| verse_lines = प्रादुर्बभूवामितशक्ति(प्रादुर्बभूवामृतशक्ति)तेजोज्ञानाद्भुतैश्वर्यसुखादिरूपः | | verse_lines = प्रादुर्बभूवामितशक्ति(प्रादुर्बभूवामृतशक्ति)तेजोज्ञानाद्भुतैश्वर्यसुखादिरूपः ।¦व्यासो हरिस्तत्र समीक्ष्य सर्वे सम्पूजयामासुरुदग्र्यभक्त्या(सम्पूजयामासुरुदग्रभक्त्या) ॥ ५८॥ | ||
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| verse_text = तैः पूजितस्तत्र निषण्ण आह यद्यद् यदिष्टं प्रवदन्तु तत्तत् । | | verse_text = तैः पूजितस्तत्र निषण्ण आह यद्यद् यदिष्टं प्रवदन्तु तत्तत् । | ||
| verse_lines = तैः पूजितस्तत्र निषण्ण आह यद्यद् यदिष्टं प्रवदन्तु तत्तत् | | verse_lines = तैः पूजितस्तत्र निषण्ण आह यद्यद् यदिष्टं प्रवदन्तु तत्तत् ।¦दास्यामि तस्याद्य तदित्यमुष्मिन् भक्त्युच्छ्रयः पाण्डुसुतैः सदारैः ।¦वृतोऽत्र कुन्ती रविसूनुजन्ममृत्यूत्थदोषापगमं ययाचे ॥ ५९॥ | ||
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| verse_lines = तेषां प्रदत्तेष्वभिवाञ्छितेषु वैचित्रवीर्यः सह भार्ययैव | | verse_lines = तेषां प्रदत्तेष्वभिवाञ्छितेषु वैचित्रवीर्यः सह भार्ययैव ।¦सम्मन्त्र्य निःशेषरणेहतानां सन्दर्शनं प्रार्थितवांस्तमीशम् ॥ ६०॥ | ||
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| verse_text = ततस्तु ते सत्यवतीसुतस्य सर्वेश्वरस्याऽज्ञया सर्व एव । | | verse_text = ततस्तु ते सत्यवतीसुतस्य सर्वेश्वरस्याऽज्ञया सर्व एव । | ||
| verse_lines = ततस्तु ते सत्यवतीसुतस्य सर्वेश्वरस्याऽज्ञया सर्व एव | | verse_lines = ततस्तु ते सत्यवतीसुतस्य सर्वेश्वरस्याऽज्ञया सर्व एव ।¦समागताः स्वर्गलोकात् क्षणेन दत्ता च दिव्या दृगमुष्य राज्ञः ॥ ६१॥ | ||
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| verse_text = ऊषुश्च रात्रिं परमाज्ञयैव सर्वे स्वभार्यासहिता(सर्वेऽपि भार्यासहिता) यथा पुरा । | | verse_text = ऊषुश्च रात्रिं परमाज्ञयैव सर्वे स्वभार्यासहिता(सर्वेऽपि भार्यासहिता) यथा पुरा । | ||
| verse_lines = ऊषुश्च रात्रिं परमाज्ञयैव सर्वे स्वभार्यासहिता(सर्वेऽपि भार्यासहिता) यथा पुरा | | verse_lines = ऊषुश्च रात्रिं परमाज्ञयैव सर्वे स्वभार्यासहिता(सर्वेऽपि भार्यासहिता) यथा पुरा ।¦तृप्तः(तृप्ताः) सदारो नृपतिश्च तत्र सर्वेऽपि दृष्ट्वा महदद्भुतं(परमाद्भुतं) तत् ॥ ६२॥ | ||
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| verse_text = अथाऽज्ञयैवास्य परस्य सर्वाः स्त्रियो निजेशैः सहिता ययुः स्वः (स्वम्) । | | verse_text = अथाऽज्ञयैवास्य परस्य सर्वाः स्त्रियो निजेशैः सहिता ययुः स्वः (स्वम्) । | ||
| verse_lines = अथाऽज्ञयैवास्य परस्य सर्वाः स्त्रियो निजेशैः सहिता ययुः स्वः (स्वम्) | | verse_lines = अथाऽज्ञयैवास्य परस्य सर्वाः स्त्रियो निजेशैः सहिता ययुः स्वः (स्वम्) ।¦विनोत्तरां तां तु कथां निशम्य पारीक्षितोऽयाचत तातदृष्टिम् ॥ ६३॥ | ||
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| verse_lines = सम्पूज्य तं कृष्णमपीशवन्द्यं क्षमापयामास परीक्षिदात्मजः | | verse_lines = सम्पूज्य तं कृष्णमपीशवन्द्यं क्षमापयामास परीक्षिदात्मजः ।¦चक्रे च विस्रम्भमतीव भारते पुनश्च तत्रस्थजनैः(तत्रत्यजनैः) समेतः ॥ ६५॥ | ||
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<span id="gr-C32" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वात्रिंशोऽध्यायः"></span> | <span id="gr-C32" class="gr-toc-anchor" data-level="1" data-title="द्वात्रिंशोऽध्यायः"></span> | ||
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| verse_text = OM ॥ ततः कुरुक्षेत्रमवाप्य कृष्णो दीक्षां प्रपेदे द्विषडब्दसत्रे । | | verse_text = OM ॥ ततः कुरुक्षेत्रमवाप्य कृष्णो दीक्षां प्रपेदे द्विषडब्दसत्रे । | ||
| verse_lines = OM ॥ ततः कुरुक्षेत्रमवाप्य कृष्णो दीक्षां प्रपेदे द्विषडब्दसत्रे | | verse_lines = OM ॥ ततः कुरुक्षेत्रमवाप्य कृष्णो दीक्षां प्रपेदे द्विषडब्दसत्रे ।¦स एव च व्यासभृगूद्वहात्मा चक्रेऽत्र सादस्यमजोऽप्रमेयः ॥ १॥ | ||
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| verse_text = तत्रर्त्विजो दक्षभृगुप्रधानाः पार्था यदूनां प्रवरैः समेताः । | | verse_text = तत्रर्त्विजो दक्षभृगुप्रधानाः पार्था यदूनां प्रवरैः समेताः । | ||
| verse_lines = तत्रर्त्विजो दक्षभृगुप्रधानाः पार्था यदूनां प्रवरैः समेताः | | verse_lines = तत्रर्त्विजो दक्षभृगुप्रधानाः पार्था यदूनां प्रवरैः समेताः ।¦ब्रह्मेशशक्रप्रमुखाः सुराश्च चक्रुः सुसाचिव्यमनन्तदासाः ॥ २॥ | ||
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| verse_text = सर्वे च जीवा वसुधातलस्था येऽन्येऽन्तरिक्षद्युमुखोत्तरेषु । | | verse_text = सर्वे च जीवा वसुधातलस्था येऽन्येऽन्तरिक्षद्युमुखोत्तरेषु । | ||
| verse_lines = सर्वे च जीवा वसुधातलस्था येऽन्येऽन्तरिक्षद्युमुखोत्तरेषु | | verse_lines = सर्वे च जीवा वसुधातलस्था येऽन्येऽन्तरिक्षद्युमुखोत्तरेषु ।¦वसन्ति नारायणपादसंश्रयास्ते चात्र सर्वे मुमुदुः सनागाः ॥ ३॥ | ||
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| verse_text = सुनिर्णयस्तत्त्वविनिर्णयार्थिनां तत्त्वस्य चाभूदिह वादशीलिनाम् । | | verse_text = सुनिर्णयस्तत्त्वविनिर्णयार्थिनां तत्त्वस्य चाभूदिह वादशीलिनाम् । | ||
| verse_lines = सुनिर्णयस्तत्त्वविनिर्णयार्थिनां तत्त्वस्य चाभूदिह वादशीलिनाम् | | verse_lines = सुनिर्णयस्तत्त्वविनिर्णयार्थिनां तत्त्वस्य चाभूदिह वादशीलिनाम् ।¦मिथो विवादात् सुरभूसुराणां वाक्याद्धरेर्व्यासभृगूद्वहात्मनः ॥ ४॥ | ||
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| verse_text = धर्मार्थकामानखिलानवापुस्तदर्थिनो मुक्तिमपीह कृष्णात् । | | verse_text = धर्मार्थकामानखिलानवापुस्तदर्थिनो मुक्तिमपीह कृष्णात् । | ||
| verse_lines = धर्मार्थकामानखिलानवापुस्तदर्थिनो मुक्तिमपीह कृष्णात् | | verse_lines = धर्मार्थकामानखिलानवापुस्तदर्थिनो मुक्तिमपीह कृष्णात् ।¦यथेष्टपानाशनवाससो जना विचेरुरत्रा(विरेजुरत्रा)मरमानवादयः ॥ ५॥ | ||
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| verse_text = क्षेत्रं तदासीद्धरिलोकसम्मितं(तदाऽसीद्धरिलोकसम्मितं) यदीयुरत्राखिलसज्जना युतिम् । | | verse_text = क्षेत्रं तदासीद्धरिलोकसम्मितं(तदाऽसीद्धरिलोकसम्मितं) यदीयुरत्राखिलसज्जना युतिम् । | ||
| verse_lines = क्षेत्रं तदासीद्धरिलोकसम्मितं(तदाऽसीद्धरिलोकसम्मितं) यदीयुरत्राखिलसज्जना युतिम् | | verse_lines = क्षेत्रं तदासीद्धरिलोकसम्मितं(तदाऽसीद्धरिलोकसम्मितं) यदीयुरत्राखिलसज्जना युतिम् ।¦नानाप्तकामाश्च ततो बभूवुर्निर्यत्नदृश्यश्च यतोऽत्र केशवः ॥ ६॥ | ||
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| verse_text = द्वादशाब्दं महासत्रमेवमेतादृशं हरिः । | | verse_text = द्वादशाब्दं महासत्रमेवमेतादृशं हरिः । | ||
| verse_lines = द्वादशाब्दं महासत्रमेवमेतादृशं हरिः | | verse_lines = द्वादशाब्दं महासत्रमेवमेतादृशं हरिः ।¦समाप्यावभृथस्नातः पूजयित्वाऽखिलान् जनान् ॥ ७॥ | ||
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| verse_text = अनुजज्ञे क्रमेणैव वत्सरेण समागतान् । | | verse_text = अनुजज्ञे क्रमेणैव वत्सरेण समागतान् । | ||
| verse_lines = अनुजज्ञे क्रमेणैव वत्सरेण समागतान् | | verse_lines = अनुजज्ञे क्रमेणैव वत्सरेण समागतान् ।¦स्वकुलं सञ्जिहीर्षुः(सञ्जहीर्षुः) स विप्रशापमजीजनत् ॥ ८॥ | ||
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| verse_text = उपदिश्य परं ज्ञानमुद्धवायामुमाश्रमम् । | | verse_text = उपदिश्य परं ज्ञानमुद्धवायामुमाश्रमम् । | ||
| verse_lines = उपदिश्य परं ज्ञानमुद्धवायामुमाश्रमम् | | verse_lines = उपदिश्य परं ज्ञानमुद्धवायामुमाश्रमम् ।¦बदर्याख्यं प्रापयित्वा सप्तमाब्दं शतोत्तरम् ।¦प्रतीक्षन् पालयामास पार्थैः सह भुवं प्रभुः ॥ ९॥ | ||
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| verse_lines = समारब्धं कलियुगं यदा दुर्योधनोऽपतत् | | verse_lines = समारब्धं कलियुगं यदा दुर्योधनोऽपतत् ।¦षट्त्रिंशाब्दं पुनः कृष्णः कृतमेवान्ववर्तयत् ॥ १०॥ | ||
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| verse_text = कृतादपि विशेषोऽयं यत् पुण्यस्याधिकं फलम् । | | verse_text = कृतादपि विशेषोऽयं यत् पुण्यस्याधिकं फलम् । | ||
| verse_lines = कृतादपि विशेषोऽयं यत् पुण्यस्याधिकं फलम् | | verse_lines = कृतादपि विशेषोऽयं यत् पुण्यस्याधिकं फलम् ।¦अल्पमेव च पापस्य कालात् कृष्णाज्ञया तथा ॥ ११॥ | ||
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| verse_lines = एवं सुधार्मिके लोके हरिभक्तिपरायणे | | verse_lines = एवं सुधार्मिके लोके हरिभक्तिपरायणे ।¦नष्टेषु कलिलिङ्गेषु युगवृत्तिमभीप्सवः ॥ १२॥ | ||
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| verse_text = ब्रह्मरुद्रादयो देवाः स्तुत्वा केशवमव्ययम् । | | verse_text = ब्रह्मरुद्रादयो देवाः स्तुत्वा केशवमव्ययम् । | ||
| verse_lines = ब्रह्मरुद्रादयो देवाः स्तुत्वा केशवमव्ययम् | | verse_lines = ब्रह्मरुद्रादयो देवाः स्तुत्वा केशवमव्ययम् ।¦व्यज्ञापयन् स्वलोकाप्तिमोमित्याह स चाच्युतः ॥ १३॥ | ||
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| verse_text = प्राचुर्ये सज्जनस्य स्यान्न कलेर्वृद्धिरञ्जसा । | | verse_text = प्राचुर्ये सज्जनस्य स्यान्न कलेर्वृद्धिरञ्जसा । | ||
| verse_lines = प्राचुर्ये सज्जनस्य स्यान्न कलेर्वृद्धिरञ्जसा | | verse_lines = प्राचुर्ये सज्जनस्य स्यान्न कलेर्वृद्धिरञ्जसा ।¦इति स्वकुलसंहृत्यै प्रभासमनयत् प्रभुः ॥ १४॥ | ||
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| verse_lines = पुण्यक्षेत्रेऽपि न मृतिः स्वगृहे त्वतिधर्मदा(स्वगृहेऽप्यतिधर्मदा) | | verse_lines = पुण्यक्षेत्रेऽपि न मृतिः स्वगृहे त्वतिधर्मदा(स्वगृहेऽप्यतिधर्मदा) ।¦गत्यैवाल्पमपि क्षेत्रं स्यान्महत्फलमित्यजः ॥ १५॥ | ||
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| verse_lines = प्रकाशयितुमेवैनान् प्रभासाय कुशस्थलात् | | verse_lines = प्रकाशयितुमेवैनान् प्रभासाय कुशस्थलात् ।¦नीत्वा दानादि(दानादिसद्धर्मान्)सद्धर्मांस्तैरकारयदच्युतः ॥ १६॥ | ||
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| verse_lines = ते ततः शापदोषेण कृष्णेनैव विमोहिताः | | verse_lines = ते ततः शापदोषेण कृष्णेनैव विमोहिताः ।¦मैरेयमत्ता अन्योन्यं निपात्य स्वां तनुं गताः ।¦तद् दृष्ट्वा बलदेवोऽपि योगेन स्वतनुं जहौ ॥ १७॥ | ||
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| verse_lines = ततः परेशोऽगणितानुभावः स्वसारथिं पाण्डवानां सकाशम् | | verse_lines = ततः परेशोऽगणितानुभावः स्वसारथिं पाण्डवानां सकाशम् ।¦स्वलोकयानप्रतिबोधनाय(स्वलोकयानप्रतिवेदनाय) स्वस्यानु चैषां त्वरयाऽभ्ययातयत् ॥ १८॥ | ||
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| verse_lines = अथाऽसतः पिप्पलमूल ईशितुरूरुस्थितं पादतलं सुताम्रम् | | verse_lines = अथाऽसतः पिप्पलमूल ईशितुरूरुस्थितं पादतलं सुताम्रम् ।¦दृष्ट्वा जरा नाम ससर्ज शल्यं भक्तोऽप्यलं रोहितं शङ्कमानः ॥ १९॥ | ||
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| verse_lines = अच्छेद्याभेद्यदेहस्य शल्ये पादमुपस्थिते | | verse_lines = अच्छेद्याभेद्यदेहस्य शल्ये पादमुपस्थिते ।¦समीपमागतो व्याधो दृष्ट्वा भीतोऽपतद् भुवि ॥ २०॥ | ||
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| verse_lines = विप्रवाक्यं मानयानः कारयित्वाऽमुना हरिः | | verse_lines = विप्रवाक्यं मानयानः कारयित्वाऽमुना हरिः ।¦पापं मां जहि देवेति याचन्तमनयद् दिवम् ॥ २१॥ | ||
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| verse_lines = पादप्रहारदोषेण तं भृगुं व्याधतां गतम् | | verse_lines = पादप्रहारदोषेण तं भृगुं व्याधतां गतम् ।¦पश्चात्तापेन भक्त्या च सुप्रीतस्तच्छरीरिणम् ।¦स्वाज्ञाप्राप्तविमानेन दिवं निन्ये जनार्दनः ॥ २२॥ | ||
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| verse_lines = नीचा योनिर्नीचनीच(नीचां योनिं नीचनीचकर्मा) कर्माऽप्तं नीचकर्मतः | | verse_lines = नीचा योनिर्नीचनीच(नीचां योनिं नीचनीचकर्मा) कर्माऽप्तं नीचकर्मतः ।¦अदुष्टत्वात्तु मनसो भक्तिलोपो नचाप्यभूत् ।¦भृगोरत्राबुद्धिपूर्वं नातिदोषकृदप्यभूत् ॥ २३॥ | ||
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| verse_lines = ततो विरिञ्चेशपुरन्दराद्याः पुनः स्तुवन्तोऽभिययुः प्रणम्य | | verse_lines = ततो विरिञ्चेशपुरन्दराद्याः पुनः स्तुवन्तोऽभिययुः प्रणम्य ।¦कृष्णं स चाऽश्वेव ययौ स्वलोकं स्वतेजसा सर्वमिदं प्रकाशयन् ॥ २४॥ | ||
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| verse_text = गोपालमन्त्रं भजतां फलप्रदस्त्वेकेन रूपेण स भुव्यदृश्यः । | | verse_text = गोपालमन्त्रं भजतां फलप्रदस्त्वेकेन रूपेण स भुव्यदृश्यः । | ||
| verse_lines = गोपालमन्त्रं भजतां फलप्रदस्त्वेकेन रूपेण स भुव्यदृश्यः | | verse_lines = गोपालमन्त्रं भजतां फलप्रदस्त्वेकेन रूपेण स भुव्यदृश्यः ।¦तस्थौ द्वितीयेन च सूर्यमण्डले तृतीयमासीच्छिवपूजितं वपुः ॥ २५॥ | ||
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| verse_lines = सम्पूजितं ब्रह्मलोके चतुर्थं कञ्जोद्भवेनाथ परं स्वधाम | | verse_lines = सम्पूजितं ब्रह्मलोके चतुर्थं कञ्जोद्भवेनाथ परं स्वधाम ।¦समाप्नुवानं वपुरस्य पञ्चमं भक्त्याऽन्वयुर्देववराः स्वशक्त्या ॥ २६॥ | ||
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| verse_lines = तत्तेजसा ते प्रतिमुष्टदृष्टयः पुरुष्टुताद्या अमितोरुदीधितेः | | verse_lines = तत्तेजसा ते प्रतिमुष्टदृष्टयः पुरुष्टुताद्या अमितोरुदीधितेः ।¦यावत् स्वगम्यं त्वनुगम्य तस्थुर्निमीलिताक्षा विहतोर्ध्वचाराः ॥ २७॥ | ||
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| verse_lines = वीन्द्रेशशेषानुगतः स्वयम्भूर्धाम प्रविष्टं तमजं प्रणम्य | | verse_lines = वीन्द्रेशशेषानुगतः स्वयम्भूर्धाम प्रविष्टं तमजं प्रणम्य ।¦वीन्द्रादिकैरप्ययुतः स्वपित्राऽऽश्लिष्टो रहश्चाकथयत् तथाऽस्तौत् ॥ २८॥ | ||
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| verse_lines = स पूर्वरूपेण समाप्य चैक्यं विभज्य चेच्छानुसृतोऽथ रेमे | | verse_lines = स पूर्वरूपेण समाप्य चैक्यं विभज्य चेच्छानुसृतोऽथ रेमे ।¦हरिः श्रिया ब्रह्ममुखैश्च मुक्तैः सम्पूज्यमानोऽमितसद्गुणात्मा ॥ २९॥ | ||
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| verse_lines = ब्रह्माऽपि शर्वादियुतः स्वलोकं प्राप्तः पुनस्तत्र गतं च कृष्णम् | | verse_lines = ब्रह्माऽपि शर्वादियुतः स्वलोकं प्राप्तः पुनस्तत्र गतं च कृष्णम् ।¦रेमेऽभिपश्यन् प्रतिपूजयंस्तं सुराश्च सर्वे रविबिम्बसंस्थम् ॥ ३०॥ | ||
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| verse_lines = यतो न दर्शिता भ्रान्तिः प्रादुर्भावेष्वपि क्वचित् | | verse_lines = यतो न दर्शिता भ्रान्तिः प्रादुर्भावेष्वपि क्वचित् ।¦देहत्यागानुसारेण (देहेत्यागानुकारेण) हरिणा तदिहाच्युतः ॥ ३१॥ | ||
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| verse_lines = मोहयित्वाऽसुरानन्धं तमः प्रापयितुं प्रभुः | | verse_lines = मोहयित्वाऽसुरानन्धं तमः प्रापयितुं प्रभुः ।¦चिदानन्दैकदेहोऽपि त्यक्तं देहमिवापरम् ।¦सृष्ट्वा स्वदेहोपमितं शयानं भुव्यगाद् दिवम् ॥ ३२॥ | ||
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| verse_lines = चिदानन्दैकदेहे हि(चिदानन्दैकदेहेऽपि) द्विरूपे इव ते यतः | | verse_lines = चिदानन्दैकदेहे हि(चिदानन्दैकदेहेऽपि) द्विरूपे इव ते यतः ।¦एकैवातः कृष्णवत् ते दुष्टान् मोहयतस्तथा ॥ ३५॥ | ||
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| verse_text = अन्या महामहिष्यस्तु त्यक्त्वा देहं हुताशने । | | verse_text = अन्या महामहिष्यस्तु त्यक्त्वा देहं हुताशने । | ||
| verse_lines = अन्या महामहिष्यस्तु त्यक्त्वा देहं हुताशने | | verse_lines = अन्या महामहिष्यस्तु त्यक्त्वा देहं हुताशने ।¦काश्चित् काश्चित्तु तपसा(काश्चित् काश्चित् तपस्तप्त्वा) त्यक्तदेहा हरिं ययुः ॥ ३६॥ | ||
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| verse_text = रौहिणेयादिकानां च भार्या वह्निमुखे तनुम् । | | verse_text = रौहिणेयादिकानां च भार्या वह्निमुखे तनुम् । | ||
| verse_lines = रौहिणेयादिकानां च भार्या वह्निमुखे तनुम् | | verse_lines = रौहिणेयादिकानां च भार्या वह्निमुखे तनुम् ।¦त्यक्त्वा स्वभर्तॄनेवाऽपुः सर्वा एव पतिव्रताः ॥ ३७॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = वसुदेवः पार्थमुखाच्छ्रुत्वा तद्योगमास्थितः । | | verse_text = वसुदेवः पार्थमुखाच्छ्रुत्वा तद्योगमास्थितः । | ||
| verse_lines = वसुदेवः पार्थमुखाच्छ्रुत्वा तद्योगमास्थितः | | verse_lines = वसुदेवः पार्थमुखाच्छ्रुत्वा तद्योगमास्थितः ।¦त्यक्त्वा देहं कश्यपत्वं प्राप कृष्णानुरागतः ॥ ३८॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = तस्यार्जुनोऽश्वमेधाग्नावन्त्यकर्माकरोत् तदा । | | verse_text = तस्यार्जुनोऽश्वमेधाग्नावन्त्यकर्माकरोत् तदा । | ||
| verse_lines = तस्यार्जुनोऽश्वमेधाग्नावन्त्यकर्माकरोत् तदा | | verse_lines = तस्यार्जुनोऽश्वमेधाग्नावन्त्यकर्माकरोत् तदा ।¦त्यक्तदेहास्तस्य भार्या वह्नौ प्रापुस्तमेव च ॥ ३९॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = स्त्रियो बालांस्तथाऽऽदाय धनं चैव धनञ्जयः । | | verse_text = स्त्रियो बालांस्तथाऽऽदाय धनं चैव धनञ्जयः । | ||
| verse_lines = स्त्रियो बालांस्तथाऽऽदाय धनं चैव धनञ्जयः | | verse_lines = स्त्रियो बालांस्तथाऽऽदाय धनं चैव धनञ्जयः ।¦विनिर्ययौ द्वारवत्यास्तां जग्रास(जग्राह) च सागरः ॥ ४० ॥ | ||
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| verse_text = स्त्रीबालसहिते पार्थ एकस्मिन् पथि गच्छति । | | verse_text = स्त्रीबालसहिते पार्थ एकस्मिन् पथि गच्छति । | ||
| verse_lines = स्त्रीबालसहिते पार्थ एकस्मिन् पथि गच्छति | | verse_lines = स्त्रीबालसहिते पार्थ एकस्मिन् पथि गच्छति ।¦शापात् सुपापा आभीराः स्त्रीजनान् जह्रुरुद्धताः ॥ ४१॥ | ||
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| verse_text = यास्ताः षोडशसाहस्रवनिताः शतसंयुताः । | | verse_text = यास्ताः षोडशसाहस्रवनिताः शतसंयुताः । | ||
| verse_lines = यास्ताः षोडशसाहस्रवनिताः शतसंयुताः | | verse_lines = यास्ताः षोडशसाहस्रवनिताः शतसंयुताः ।¦कृष्णशापान्म्लेच्छवशं ययुर्दर्पनिमित्ततः ॥ ४२॥ | ||
}} | }} | ||
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| verse_text = ह्रियमाणे धने चैव वनितासु च वासविः । | | verse_text = ह्रियमाणे धने चैव वनितासु च वासविः । | ||
| verse_lines = ह्रियमाणे धने चैव वनितासु च वासविः | | verse_lines = ह्रियमाणे धने चैव वनितासु च वासविः ।¦युयुत्सुर्गाण्डिवं सज्यं(सज्जं) कृच्छ्रेणैव चकार ह ॥ ४३॥ | ||
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| verse_text = क्षीणास्तस्य शरा दैवान्नास्त्राणि स्मृतिमाययुः । | | verse_text = क्षीणास्तस्य शरा दैवान्नास्त्राणि स्मृतिमाययुः । | ||
| verse_lines = क्षीणास्तस्य शरा दैवान्नास्त्राणि स्मृतिमाययुः | | verse_lines = क्षीणास्तस्य शरा दैवान्नास्त्राणि स्मृतिमाययुः ।¦स तद् दैवकृतं ज्ञात्वा संस्मरन् पुरुषोत्तमम् ।¦निघ्नञ्छत्रून् गाण्डिवेन शेषं रक्षन् कुरून् ययौ(कुरूनगात्) ॥ ४४॥ | ||
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| verse_text = तदा कुरुक्षेत्रगतं जगद्गुरुं सुपूर्णविज्ञानबलाब्धिसत्सुखम्(बलर्द्धिसत्सुखम्) । | | verse_text = तदा कुरुक्षेत्रगतं जगद्गुरुं सुपूर्णविज्ञानबलाब्धिसत्सुखम्(बलर्द्धिसत्सुखम्) । | ||
| verse_lines = तदा कुरुक्षेत्रगतं जगद्गुरुं सुपूर्णविज्ञानबलाब्धिसत्सुखम्(बलर्द्धिसत्सुखम्) | | verse_lines = तदा कुरुक्षेत्रगतं जगद्गुरुं सुपूर्णविज्ञानबलाब्धिसत्सुखम्(बलर्द्धिसत्सुखम्) ।¦तमेव वासिष्ठकुलोद्भवं हरिं निरीक्ष्य दुःखेन पपात पादयोः ॥ ४५॥ | ||
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| verse_text = स तेन पुंसां प्रवरेण हेतुभिः सम्बोधितोऽज्ञानतमोंऽशुमालिना । | | verse_text = स तेन पुंसां प्रवरेण हेतुभिः सम्बोधितोऽज्ञानतमोंऽशुमालिना । | ||
| verse_lines = स तेन पुंसां प्रवरेण हेतुभिः सम्बोधितोऽज्ञानतमोंऽशुमालिना | | verse_lines = स तेन पुंसां प्रवरेण हेतुभिः सम्बोधितोऽज्ञानतमोंऽशुमालिना ।¦संस्थाप्य चेतः पुनरेव तस्मिन् जहौ शुचः प्रायश एव धैर्यात् ॥ ४६॥ | ||
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| verse_text = स्त्रियो म्लेच्छहृताः कृष्णप्रेषिताद्(कृष्णप्रेरिताद्) दाल्भ्यतः पुनः । | | verse_text = स्त्रियो म्लेच्छहृताः कृष्णप्रेषिताद्(कृष्णप्रेरिताद्) दाल्भ्यतः पुनः । | ||
| verse_lines = स्त्रियो म्लेच्छहृताः कृष्णप्रेषिताद्(कृष्णप्रेरिताद्) दाल्भ्यतः पुनः | | verse_lines = स्त्रियो म्लेच्छहृताः कृष्णप्रेषिताद्(कृष्णप्रेरिताद्) दाल्भ्यतः पुनः ।¦गोविन्दैकादशीं श्रुत्वा कृत्वा सारस्वते जले ।¦निमज्ज्य वायोर्वचनात् त्यक्तदेहा दिवं ययुः ॥ ४७॥ | ||
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| verse_lines = अर्जुनस्तु कुरुक्षेत्रे हार्दिक्ययुयुधानयोः | | verse_lines = अर्जुनस्तु कुरुक्षेत्रे हार्दिक्ययुयुधानयोः ।¦सुतौ सारस्वते चैव देशे राज्येऽभ्यषेचयत् ॥ ४८॥ | ||
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| verse_text = अनिरुद्धसुतं वज्रं प्रियं कृष्णस्य सद्गुणम् । | | verse_text = अनिरुद्धसुतं वज्रं प्रियं कृष्णस्य सद्गुणम् । | ||
| verse_lines = अनिरुद्धसुतं वज्रं प्रियं कृष्णस्य सद्गुणम् | | verse_lines = अनिरुद्धसुतं वज्रं प्रियं कृष्णस्य सद्गुणम् ।¦सशूरसेनेन्द्रप्रस्थराजानमकरोद् वशी ॥ ४९॥ | ||
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| verse_text = स्त्रीबालांश्च धनं चैव तस्मिन् संस्थाप्य फल्गुनः । | | verse_text = स्त्रीबालांश्च धनं चैव तस्मिन् संस्थाप्य फल्गुनः । | ||
| verse_lines = स्त्रीबालांश्च धनं चैव तस्मिन् संस्थाप्य फल्गुनः | | verse_lines = स्त्रीबालांश्च धनं चैव तस्मिन् संस्थाप्य फल्गुनः ।¦ययौ भ्रातॄनशेषं च वृत्तं तेषामवर्णयत् ॥ ५०॥ | ||
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| verse_text = ते चावियोगसमयं स्मरन्तो मुरवैरिणः(मुरवैरिणा) । | | verse_text = ते चावियोगसमयं स्मरन्तो मुरवैरिणः(मुरवैरिणा) । | ||
| verse_lines = ते चावियोगसमयं स्मरन्तो मुरवैरिणः(मुरवैरिणा) | | verse_lines = ते चावियोगसमयं स्मरन्तो मुरवैरिणः(मुरवैरिणा) ।¦अभ्यषिञ्चन् भागवतं माहाराज्ये परीक्षितम् ॥ ५१॥ | ||
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| verse_text = स्त्रीहारिणां च म्लेच्छानां वधायैनमयोजयन् । | | verse_text = स्त्रीहारिणां च म्लेच्छानां वधायैनमयोजयन् । | ||
| verse_lines = स्त्रीहारिणां च म्लेच्छानां वधायैनमयोजयन् | | verse_lines = स्त्रीहारिणां च म्लेच्छानां वधायैनमयोजयन् ।¦कृतं च तेन तत् कर्म वोढ्रा पैतामहीं(पैतामहं) धुरम् ।¦समयं परिरक्षद्भिर्न पार्थैरेव यत् कृतम् ॥ ५२॥ | ||
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| verse_lines = वासुदेवपदा स्पृष्टभूकण्टकसमुद्धृतिः(समुद्धतिः) | | verse_lines = वासुदेवपदा स्पृष्टभूकण्टकसमुद्धृतिः(समुद्धतिः) ।¦समयः पाण्डवानां हि तस्यैवानुगतिः परम् ॥ ५३॥ | ||
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| verse_lines = अनुव्रजद्भिर्विश्वेशं नास्माभिर्भूस्तदुज्झिता | | verse_lines = अनुव्रजद्भिर्विश्वेशं नास्माभिर्भूस्तदुज्झिता ।¦भोज्या रक्ष्याऽपि वा तेषामित्येव समयः पुरा ॥ ५४॥ | ||
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| verse_lines = तत्र काली भीमभार्या वैष्णवं योगमास्थिता | | verse_lines = तत्र काली भीमभार्या वैष्णवं योगमास्थिता ।¦कृष्णयैकत्वमापन्ना त्यक्त्वा देहं तु मानुषम् ॥ ५५॥ | ||
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| verse_lines = सुभद्राद्यास्तु या भार्याः पार्थानां तु तदाज्ञया | | verse_lines = सुभद्राद्यास्तु या भार्याः पार्थानां तु तदाज्ञया ।¦युयुत्सुश्चात्र शिक्षार्थं पौत्रस्यैवावसत् (पौत्रस्यैवावसन्) पुरे ॥ ५६॥ | ||
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| verse_lines = सन्त्यज्य राजचिह्नानि (राज्यचिह्नानि) वैष्णवं योगमास्थिताः | | verse_lines = सन्त्यज्य राजचिह्नानि (राज्यचिह्नानि) वैष्णवं योगमास्थिताः ।¦वीराध्वानं ययुः सर्वे कृष्णया सह पाण्डवाः ॥ ५७॥ | ||
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| verse_lines = प्रागुदीचीं दिशं पूर्वं ययुस्तत्रार्जुनो धनुः | | verse_lines = प्रागुदीचीं दिशं पूर्वं ययुस्तत्रार्जुनो धनुः ।¦नात्यजल्लोभतस्तं तु(लोभतस्तत्तु) समुद्रमुप पावकः ।¦दृष्ट्वा ययाचे राजानं तदुक्तः प्रास्यदम्बुधौ ॥ ५८॥ | ||
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| verse_lines = प्रातिभाव्यं तु वरुणे निस्तीर्याग्निरदृश्यताम् | | verse_lines = प्रातिभाव्यं तु वरुणे निस्तीर्याग्निरदृश्यताम् ।¦ययौ तेऽपि ययुः क्षिप्रं प्लवन्तः सप्तवारिधीन् ॥ ५९॥ | ||
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| verse_lines = अहोभिः सप्तभिर्योगं समारूढाः प्रदक्षिणम् | | verse_lines = अहोभिः सप्तभिर्योगं समारूढाः प्रदक्षिणम् ।¦कृत्वा क्वचिदसज्जन्त आसेदुर्गन्धमादनम् ।¦अत्र नारायणक्षेत्रे तेषां तन्वोऽपतन् क्रमात् ॥ ६०॥ | ||
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| verse_lines = द्रौपदीसहदेवादिपञ्चानां तत्र मारुतिः | | verse_lines = द्रौपदीसहदेवादिपञ्चानां तत्र मारुतिः ।¦सदेहनाकानिच्छुत्वाद् देहप्रपतनं हि तत् ॥ ६१॥ | ||
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| verse_lines = तेषामिहेति याथार्थ्यं जानन् पप्रच्छ धर्मजम् | | verse_lines = तेषामिहेति याथार्थ्यं जानन् पप्रच्छ धर्मजम् ।¦केनकेनापतद् देहो दोषेण न इति क्रमात् ॥ ६२॥ | ||
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| verse_lines = मृतिकाले हि यो यस्य दोषं वक्त्यृणमोचनम् | | verse_lines = मृतिकाले हि यो यस्य दोषं वक्त्यृणमोचनम् ।¦तस्मात् स्यादुक्तदोषस्येत्याह यच्छ्रुतिरेव तत् ।¦ऋणमोक्षाय सर्वेषां भीमो दोषानवादयत् ॥ ६३॥ | ||
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| verse_lines = सोऽपीच्छापतितान् देहानजानञ्छुद्धकर्मणाम् | | verse_lines = सोऽपीच्छापतितान् देहानजानञ्छुद्धकर्मणाम् ।¦अपश्यन् कारणं प्राह दोषान् स्यादेवमित्यपि ।¦राजा (सम्भावनामात्रान्न (सम्भावनामात्रं) नहि कार्यमकारणम् ॥ ६४॥ | ||
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| verse_lines = स्वच्छन्दमृत्यवो योगाद् देहानुत्सृज्य पाण्डवाः | | verse_lines = स्वच्छन्दमृत्यवो योगाद् देहानुत्सृज्य पाण्डवाः ।¦कृष्णा चाऽपुः परं स्थानं यन्न यान्त्यपि देवताः ।¦इति श्रुतेर्न ते पापाद् देहांस्तत्यजुरूर्जिताः ॥ ६५॥ | ||
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| verse_lines = ऋणान्युन्मुच्य(ऋणात् प्रमुच्य) दोषोक्त्या स्वानां भीमः स्वकां तनुम् | | verse_lines = ऋणान्युन्मुच्य(ऋणात् प्रमुच्य) दोषोक्त्या स्वानां भीमः स्वकां तनुम् ।¦तत्याज परमं ध्यायन्नाप च स्थानमुत्तमम् ।¦इति स्कान्दपुराणोक्तं व्यासवाक्यमृषीन् प्रति ॥ ६६॥ | ||
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| verse_lines = भीमादृते हि चतुर्षु पक्षपातस्तु वासवौ | | verse_lines = भीमादृते हि चतुर्षु पक्षपातस्तु वासवौ ।¦योग्य एवेति कृष्णाया न दोषः स्यात् कथञ्चन ॥ ६७॥ | ||
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| verse_lines = नीतिरूपे वीर्यबले महान्त्येषां यतः क्रमात् | | verse_lines = नीतिरूपे वीर्यबले महान्त्येषां यतः क्रमात् ।¦प्राणत्वाद् भोगशक्तिश्च नहि दोषाय मारुतेः ॥ ६८॥ | ||
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| verse_lines = यथास्वरूपविज्ञानमात्मन्यपि न दोषकृत् | | verse_lines = यथास्वरूपविज्ञानमात्मन्यपि न दोषकृत् ।¦इति व्यासस्मृतेरेषामुक्तदोषोद्भवः कथम् ॥ ६९॥ | ||
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| verse_lines = कदाचिदतिमानोऽपि त्रयाणामेषु जायते | | verse_lines = कदाचिदतिमानोऽपि त्रयाणामेषु जायते ।¦तथाऽपि तत्फलं नैतत् तारतम्यं हि मुक्तिगम्(तारतम्यं विमुक्तिगम्) ।¦गुणदोषाधिकाल्पत्वादत्रस्थमपि हि श्रुतम् ॥ ७०॥ | ||
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| verse_text = प्रारब्धकर्मनाशे (आरब्धकर्मनाशे) हि पतेद् देहोऽप्यपापिनः । | | verse_text = प्रारब्धकर्मनाशे (आरब्धकर्मनाशे) हि पतेद् देहोऽप्यपापिनः । | ||
| verse_lines = प्रारब्धकर्मनाशे (आरब्धकर्मनाशे) हि पतेद् देहोऽप्यपापिनः | | verse_lines = प्रारब्धकर्मनाशे (आरब्धकर्मनाशे) हि पतेद् देहोऽप्यपापिनः ।¦युधिष्ठिरोऽपि हि स्वर्गं बुभुजे नैव तत्तनुः ॥ ७१॥ | ||
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| verse_text = अतिमानादयो दोषाः कुत एव हि मारुतेः । | | verse_text = अतिमानादयो दोषाः कुत एव हि मारुतेः । | ||
| verse_lines = अतिमानादयो दोषाः कुत एव हि मारुतेः | | verse_lines = अतिमानादयो दोषाः कुत एव हि मारुतेः ।¦अनादिकालतः सर्वदोषहीना गुणाधिकाः ॥ ७२॥ | ||
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| verse_text = सर्वजीवगणेभ्यो ये ते हि(समस्तजीवराशिभ्यस्ते हि) वायुत्वमाप्नुयुः । | | verse_text = सर्वजीवगणेभ्यो ये ते हि(समस्तजीवराशिभ्यस्ते हि) वायुत्वमाप्नुयुः । | ||
| verse_lines = सर्वजीवगणेभ्यो ये ते हि(समस्तजीवराशिभ्यस्ते हि) वायुत्वमाप्नुयुः | | verse_lines = सर्वजीवगणेभ्यो ये ते हि(समस्तजीवराशिभ्यस्ते हि) वायुत्वमाप्नुयुः ।¦ऋजवो नाम ये देवा देवानामपि देवताः ॥ ७३॥ | ||
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| verse_text = अभावं ह्यतिमानादेर्भीमस्याऽह च केशवः । | | verse_text = अभावं ह्यतिमानादेर्भीमस्याऽह च केशवः । | ||
| verse_lines = अभावं ह्यतिमानादेर्भीमस्याऽह च केशवः | | verse_lines = अभावं ह्यतिमानादेर्भीमस्याऽह च केशवः ।¦यत्किञ्चाऽत्मनि कल्याणं सम्भावयसि पाण्डव ।¦सहस्रगुणमप्येतत् त्वयि सम्भावयाम्यहम् ॥ ७४॥ | ||
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| verse_text = इति तस्माद् यथा युद्धे धर्महानिममन्यत । | | verse_text = इति तस्माद् यथा युद्धे धर्महानिममन्यत । | ||
| verse_lines = इति तस्माद् यथा युद्धे धर्महानिममन्यत | | verse_lines = इति तस्माद् यथा युद्धे धर्महानिममन्यत ।¦एवमत्राप्यधर्मेण देहपातं नृपोऽब्रवीत् ॥ ७५॥ | ||
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| verse_text = पूज्येभ्यः(पूर्वेभ्यः) पूर्वमेवैषां देहपातमभीप्सताम् । | | verse_text = पूज्येभ्यः(पूर्वेभ्यः) पूर्वमेवैषां देहपातमभीप्सताम् । | ||
| verse_lines = पूज्येभ्यः(पूर्वेभ्यः) पूर्वमेवैषां देहपातमभीप्सताम् | | verse_lines = पूज्येभ्यः(पूर्वेभ्यः) पूर्वमेवैषां देहपातमभीप्सताम् ।¦तत्क्रमाद् (तत्कामाद्) देहपातोऽभून्न पापान्मुच्यतां यथा ॥ ७६॥ | ||
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| verse_text = न हि पापफलं मुक्तौ(पापफलान्मुक्तौ देहपातः कथञ्चन । | | verse_text = न हि पापफलं मुक्तौ(पापफलान्मुक्तौ देहपातः कथञ्चन । | ||
| verse_lines = न हि पापफलं मुक्तौ(पापफलान्मुक्तौ देहपातः कथञ्चन | | verse_lines = न हि पापफलं मुक्तौ(पापफलान्मुक्तौ देहपातः कथञ्चन ।¦किन्तु कर्मक्षयादेव तथा सर्वत्र निश्चितः ॥ ७७॥ | ||
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| verse_text = तेषु स्वलोकान् प्राप्तेषु धर्मजः श्वाऽत्मना सह(स्वात्मना सह) । | | verse_text = तेषु स्वलोकान् प्राप्तेषु धर्मजः श्वाऽत्मना सह(स्वात्मना सह) । | ||
| verse_lines = तेषु स्वलोकान् प्राप्तेषु धर्मजः श्वाऽत्मना सह(स्वात्मना सह) | | verse_lines = तेषु स्वलोकान् प्राप्तेषु धर्मजः श्वाऽत्मना सह(स्वात्मना सह) ।¦ययौ पुरो देवरथस्तदाऽस्यावततार ह ॥ ७८॥ | ||
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| verse_text = रथमारुहेति कथितो रथिना पुरतः शुनः । | | verse_text = रथमारुहेति कथितो रथिना पुरतः शुनः । | ||
| verse_lines = रथमारुहेति कथितो रथिना पुरतः शुनः | | verse_lines = रथमारुहेति कथितो रथिना पुरतः शुनः ।¦आरोहमब्रवीन्नैतद् युक्तमित्याह सोऽपि तम् ॥ ७९॥ | ||
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| verse_text = नाऽरुहेयं विना श्वानमिति तेन स्थिरोदिते । | | verse_text = नाऽरुहेयं विना श्वानमिति तेन स्थिरोदिते । | ||
| verse_lines = नाऽरुहेयं विना श्वानमिति तेन स्थिरोदिते | | verse_lines = नाऽरुहेयं विना श्वानमिति तेन स्थिरोदिते ।¦स्वरूपं दर्शयामास धर्मो ह्याप्तः स्वरूपताम् (श्वरूपताम्) ॥ ८०॥ | ||
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| verse_text = आनृशंस्यपरत्वेन कीर्तिमेवाऽत्मनो वृषः । | | verse_text = आनृशंस्यपरत्वेन कीर्तिमेवाऽत्मनो वृषः । | ||
| verse_lines = आनृशंस्यपरत्वेन कीर्तिमेवाऽत्मनो वृषः | | verse_lines = आनृशंस्यपरत्वेन कीर्तिमेवाऽत्मनो वृषः ।¦ख्यापयामास कौन्तेयरूपिणो धर्मसूक्तिभिः ॥ ८१॥ | ||
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| verse_text = ततः(यतः) स रथमारुह्य लोकानामुत्तरोत्तरम् । | | verse_text = ततः(यतः) स रथमारुह्य लोकानामुत्तरोत्तरम् । | ||
| verse_lines = ततः(यतः) स रथमारुह्य लोकानामुत्तरोत्तरम् | | verse_lines = ततः(यतः) स रथमारुह्य लोकानामुत्तरोत्तरम् ।¦अतिक्रम्याखिलान् राज्ञो जगाम श्रीपतिप्रियः ॥ ८२॥ | ||
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| verse_text = सर्वेषामुत्तरं लोकमैन्द्रं प्राप्येदमेव ते । | | verse_text = सर्वेषामुत्तरं लोकमैन्द्रं प्राप्येदमेव ते । | ||
| verse_lines = सर्वेषामुत्तरं लोकमैन्द्रं प्राप्येदमेव ते | | verse_lines = सर्वेषामुत्तरं लोकमैन्द्रं प्राप्येदमेव ते ।¦स्थानमित्युदितो देवैर्दुर्योधनमवैक्षत ॥ ८३॥ | ||
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| verse_text = सभ्रातृकं ज्वलन्तं च सर्वेषामुपरि स्थितम् । | | verse_text = सभ्रातृकं ज्वलन्तं च सर्वेषामुपरि स्थितम् । | ||
| verse_lines = सभ्रातृकं ज्वलन्तं च सर्वेषामुपरि स्थितम् | | verse_lines = सभ्रातृकं ज्वलन्तं च सर्वेषामुपरि स्थितम् ।¦तं दृष्ट्वा परमक्रुद्धो निमील्य नयने शुभे ॥ ८४॥ | ||
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| verse_text = भ्रातरो मे क्व कृष्णा च सकर्णाः(कर्णाद्याः) क्व च बान्धवाः । | | verse_text = भ्रातरो मे क्व कृष्णा च सकर्णाः(कर्णाद्याः) क्व च बान्धवाः । | ||
| verse_lines = भ्रातरो मे क्व कृष्णा च सकर्णाः(कर्णाद्याः) क्व च बान्धवाः | | verse_lines = भ्रातरो मे क्व कृष्णा च सकर्णाः(कर्णाद्याः) क्व च बान्धवाः ।¦धृष्टद्युम्नादयः पुत्रा हैडिम्बाद्याश्च सर्वशः ॥ ८५॥ | ||
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| verse_text = यादवश्चेति पप्रच्छ देवांस्ते च तमब्रुवन् । | | verse_text = यादवश्चेति पप्रच्छ देवांस्ते च तमब्रुवन् । | ||
| verse_lines = यादवश्चेति पप्रच्छ देवांस्ते च तमब्रुवन् | | verse_lines = यादवश्चेति पप्रच्छ देवांस्ते च तमब्रुवन् ।¦किं ते तैः स्वकृतं कर्म भुज्यतेऽत्र नचापरैः ॥ ८६॥ | ||
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| verse_text = इत्युक्त आह पापोऽयं पृथिवीक्षयकारकः । | | verse_text = इत्युक्त आह पापोऽयं पृथिवीक्षयकारकः । | ||
| verse_lines = इत्युक्त आह पापोऽयं पृथिवीक्षयकारकः | | verse_lines = इत्युक्त आह पापोऽयं पृथिवीक्षयकारकः ।¦सर्वातिशङ्की मित्रध्रुङ् नारायणपराङ्मुखः ॥ ८७॥ | ||
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| verse_lines = नास्तिकोऽतिशठः क्रूरो द्वेष्टा विष्णोश्च तद्भुवाम् | | verse_lines = नास्तिकोऽतिशठः क्रूरो द्वेष्टा विष्णोश्च तद्भुवाम् ।¦कथं दुर्योधनः स्थानं सर्वोत्तममवाप्तवान् ॥ ८८॥ | ||
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| verse_lines = कथं च सर्वधर्मज्ञा नारायणपरायणाः | | verse_lines = कथं च सर्वधर्मज्ञा नारायणपरायणाः ।¦संस्थिताः परमे धर्मे दृश्यन्तेऽत्र न मत्प्रियाः ॥ ८९॥ | ||
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| verse_lines = यत्र सन्तस्तु ते सन्ति तत्र स्थातव्यमेव मे | | verse_lines = यत्र सन्तस्तु ते सन्ति तत्र स्थातव्यमेव मे ।¦निरयेऽपि नचात्रापि नानेन सह पापिना ॥ ९०॥ | ||
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| verse_lines = अस्य वीरतमस्येदं धार्तराष्ट्रस्य युज्यते | | verse_lines = अस्य वीरतमस्येदं धार्तराष्ट्रस्य युज्यते ।¦इत्युक्त्वा देवता दूतं स्वानां सन्दर्शनार्थिनः ।¦राज्ञः सम्प्रेषयामासुस्तत्सन्दर्शितवर्त्मना ॥ ९१॥ | ||
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| verse_lines = दुर्गन्धेन सुकृच्छ्रेण तमसा प्रावृतेन च | | verse_lines = दुर्गन्धेन सुकृच्छ्रेण तमसा प्रावृतेन च ।¦गत्वैव कियतीं भूमिं तद्दुर्गन्धासहो नृपः ।¦इच्छन् निवर्तन तत्र स्वानां वाच इवाशृणोत् ॥ ९२॥ | ||
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| verse_lines = क्षणं तिष्ठ महाराज सन्निधानबलात् तव | | verse_lines = क्षणं तिष्ठ महाराज सन्निधानबलात् तव ।¦वेदना नो न महतीत्येतच्छ्रुत्वा युधिष्ठिरः ॥ ९३॥ | ||
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| verse_lines = के यूयमिति पप्रच्छ दीनध्वनिविशङ्कितः | | verse_lines = के यूयमिति पप्रच्छ दीनध्वनिविशङ्कितः ।¦भीमोऽहमर्जुनः कर्ण इत्याद्युक्तमिवाशृणोत् ॥ ९४॥ | ||
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| verse_lines = श्रुत्वा तत् कृपयाऽऽविष्टः शोकामर्षसमन्वितः | | verse_lines = श्रुत्वा तत् कृपयाऽऽविष्टः शोकामर्षसमन्वितः ।¦आह दूतं यथेष्टं त्वं गच्छ नाहमितो व्रजे ॥ ९५॥ | ||
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| verse_lines = नच स्वर्गेण मे कार्यं त्यक्त्वा स्वजनमीदृशम् | | verse_lines = नच स्वर्गेण मे कार्यं त्यक्त्वा स्वजनमीदृशम् ।¦इत्युक्तः प्रययौ दूतस्तस्थावत्र युधिष्ठिरः ॥ ९६॥ | ||
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| verse_text = ततोऽत्र देवाः पुरुहूतपूर्वकाः समाययुः स्नेहवशाद् युधिष्ठिरे । | | verse_text = ततोऽत्र देवाः पुरुहूतपूर्वकाः समाययुः स्नेहवशाद् युधिष्ठिरे । | ||
| verse_lines = ततोऽत्र देवाः पुरुहूतपूर्वकाः समाययुः स्नेहवशाद् युधिष्ठिरे | | verse_lines = ततोऽत्र देवाः पुरुहूतपूर्वकाः समाययुः स्नेहवशाद् युधिष्ठिरे ।¦तेष्वागतेष्वेव न तत्र वाचो दीना न दुर्गन्धतमोऽप्यपश्यत्(दुर्गन्धतमोऽप्यदृश्यत) ।¦स्वर्गोत्तमं देशमपश्यदेतदभ्रान्तचेताः स युधिष्ठिरस्तदा ॥ ९७॥ | ||
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| verse_text = आहात्र धर्मः पुनरात्मसद्यशः(परमात्मसद्यशः) प्रकाशयन् पाण्डुसुताभिधं स्वम् । | | verse_text = आहात्र धर्मः पुनरात्मसद्यशः(परमात्मसद्यशः) प्रकाशयन् पाण्डुसुताभिधं स्वम् । | ||
| verse_lines = आहात्र धर्मः पुनरात्मसद्यशः(परमात्मसद्यशः) प्रकाशयन् पाण्डुसुताभिधं स्वम् | | verse_lines = आहात्र धर्मः पुनरात्मसद्यशः(परमात्मसद्यशः) प्रकाशयन् पाण्डुसुताभिधं स्वम् ।¦धर्माद् विशिष्टा हि सदाऽनृशंसता दृष्टा च सा त्वय्यधिका त्रिशो मया ॥ ९८॥ | ||
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| verse_text = शक्रोऽप्युवाचैनमिदं मृषा ते प्रदर्शितं द्रोणकृते मृषागिरः । | | verse_text = शक्रोऽप्युवाचैनमिदं मृषा ते प्रदर्शितं द्रोणकृते मृषागिरः । | ||
| verse_lines = शक्रोऽप्युवाचैनमिदं मृषा ते प्रदर्शितं द्रोणकृते मृषागिरः | | verse_lines = शक्रोऽप्युवाचैनमिदं मृषा ते प्रदर्शितं द्रोणकृते मृषागिरः ।¦कृच्छ्रादिदं ते कथितं न चातिविस्रम्भ आसीत् तव कृष्णवाक्ये ।¦नह्याज्ञया वासुदेवस्य किञ्चित् पापं भवेत् सर्वविधर्मिणोऽपि ॥ ९९॥ | ||
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| verse_lines = ब्रह्मापरोक्ष्येऽपि विकर्म सूचकं प्रारब्धपापस्य विषाशनं यथा | | verse_lines = ब्रह्मापरोक्ष्येऽपि विकर्म सूचकं प्रारब्धपापस्य विषाशनं यथा ।¦पश्यात्र भीमप्रमुखान् सुखस्थान् सम्पूज्यमानांस्त्रिदशैः सुरूपान्॥ १००॥ | ||
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| verse_lines = न ते नृपाद्यापि हि मानुषो गतो भावस्ततो द्वेष्टि सुयोधनादीन् | | verse_lines = न ते नृपाद्यापि हि मानुषो गतो भावस्ततो द्वेष्टि सुयोधनादीन् ।¦निमज्ज्य तद् विष्णुपदोदकेऽत्र विसृज्य देहं भज देवभावम् ॥ १०३॥ | ||
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| verse_lines = सुयोधनाद्या(दुर्योधनाद्या) यदिमे सुपापा आरब्धकर्मक्षयमाप्य नित्ये | | verse_lines = सुयोधनाद्या(दुर्योधनाद्या) यदिमे सुपापा आरब्धकर्मक्षयमाप्य नित्ये ।¦निःशेषसौख्योज्झितनित्यदुःखेऽवशाः(नित्यदुःखे वशाः) पतिष्यन्त्यपुनर्निवृत्ताः ॥ १०४॥ | ||
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| verse_lines = देवांशजा ये तु समस्तशस्ते स्वमूलरूपं समवाप्य काले | | verse_lines = देवांशजा ये तु समस्तशस्ते स्वमूलरूपं समवाप्य काले ।¦स्वतारतम्यानुसृतां विमुक्तिं प्राप्स्यन्ति नात्रापि विचार्यमस्ति ॥ १०५॥ | ||
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| verse_lines = इत्युक्त आश्वेव निमज्ज्य गङ्गां धर्मात्मजस्तत्र विसृज्य(धर्मात्मजस्तं प्रविसृज्य) देहम् | | verse_lines = इत्युक्त आश्वेव निमज्ज्य गङ्गां धर्मात्मजस्तत्र विसृज्य(धर्मात्मजस्तं प्रविसृज्य) देहम् ।¦सद्यो बभौ दैवमवाप्य(दैवतमाप्य) कायं विसृष्टरोषादिसमस्तदोषः ॥ १०६॥ | ||
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| verse_text = स तु प्रपश्यन् स्वजनं समस्तं स्वमूलरूपातिसमीपसंस्थम् । | | verse_text = स तु प्रपश्यन् स्वजनं समस्तं स्वमूलरूपातिसमीपसंस्थम् । | ||
| verse_lines = स तु प्रपश्यन् स्वजनं समस्तं स्वमूलरूपातिसमीपसंस्थम् | | verse_lines = स तु प्रपश्यन् स्वजनं समस्तं स्वमूलरूपातिसमीपसंस्थम् ।¦ददर्श भीमं च मरुत्समीपे मध्ये ज्वलन्तं मरुतां गणस्य ॥ १०७॥ | ||
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| verse_text = ददर्श कृष्णामपि तत्समीपे श्रिया ज्वलन्तीं समतीत्य चान्याः । | | verse_text = ददर्श कृष्णामपि तत्समीपे श्रिया ज्वलन्तीं समतीत्य चान्याः । | ||
| verse_lines = ददर्श कृष्णामपि तत्समीपे श्रिया ज्वलन्तीं समतीत्य चान्याः | | verse_lines = ददर्श कृष्णामपि तत्समीपे श्रिया ज्वलन्तीं समतीत्य चान्याः ।¦स्प्रष्टुं च संस्कारवशादियेष निषिध्य तं प्राह सुराधिराजः ॥ १०८॥ | ||
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| verse_text = एषा हि साक्षाज्जगतां प्रियस्य प्राणात्मनो जीववरेश्वरस्य । | | verse_text = एषा हि साक्षाज्जगतां प्रियस्य प्राणात्मनो जीववरेश्वरस्य । | ||
| verse_lines = एषा हि साक्षाज्जगतां प्रियस्य प्राणात्मनो जीववरेश्वरस्य | | verse_lines = एषा हि साक्षाज्जगतां प्रियस्य प्राणात्मनो जीववरेश्वरस्य ।¦प्राणप्रिया श्रीरिति नाम यस्याः शमात्मकेऽस्मिन् रमते सदैषा ॥ १०९॥ | ||
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| verse_text = युष्मच्चतुर्देहगतस्य वायोर्वायुप्रिया भीमतनोस्तथैव । | | verse_text = युष्मच्चतुर्देहगतस्य वायोर्वायुप्रिया भीमतनोस्तथैव । | ||
| verse_lines = युष्मच्चतुर्देहगतस्य वायोर्वायुप्रिया भीमतनोस्तथैव | | verse_lines = युष्मच्चतुर्देहगतस्य वायोर्वायुप्रिया भीमतनोस्तथैव ।¦भोगाय सृष्टा पुरुषोत्तमेन युष्मत्प्रियार्थं भवतां च दारैः ॥ ११०॥ | ||
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| verse_text = प्रीतिस्ततो ह्यभ्यधिका(ह्यत्यधिका) बभूव भीमस्य चास्यास्तदनु स्म पार्थे । | | verse_text = प्रीतिस्ततो ह्यभ्यधिका(ह्यत्यधिका) बभूव भीमस्य चास्यास्तदनु स्म पार्थे । | ||
| verse_lines = प्रीतिस्ततो ह्यभ्यधिका(ह्यत्यधिका) बभूव भीमस्य चास्यास्तदनु स्म पार्थे | | verse_lines = प्रीतिस्ततो ह्यभ्यधिका(ह्यत्यधिका) बभूव भीमस्य चास्यास्तदनु स्म पार्थे ।¦ततो भवत्स्वेव यथाक्रमेण गुणानुसारेण समीरणस्य ॥ १११॥ | ||
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| verse_text = इयं(इदा,एषा) हि सा शुद्धतनुः प्रजाता शच्यादियोगापगताग्र्यदेहा । | | verse_text = इयं(इदा,एषा) हि सा शुद्धतनुः प्रजाता शच्यादियोगापगताग्र्यदेहा । | ||
| verse_lines = इयं(इदा,एषा) हि सा शुद्धतनुः प्रजाता शच्यादियोगापगताग्र्यदेहा | | verse_lines = इयं(इदा,एषा) हि सा शुद्धतनुः प्रजाता शच्यादियोगापगताग्र्यदेहा ।¦यूयं च सर्वे मरुतो विशेषसंयोगहीनाः स्वशरीरसंस्थाः ॥ ११२॥ | ||
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| verse_text = स्पर्शेऽपि नास्याः पवमानपत्न्याः सुपूतताऽलं भवतामिदानीम् । | | verse_text = स्पर्शेऽपि नास्याः पवमानपत्न्याः सुपूतताऽलं भवतामिदानीम् । | ||
| verse_lines = स्पर्शेऽपि नास्याः पवमानपत्न्याः सुपूतताऽलं भवतामिदानीम् | | verse_lines = स्पर्शेऽपि नास्याः पवमानपत्न्याः सुपूतताऽलं भवतामिदानीम् ।¦नचोत्तरत्रापि भवेत् कथञ्चिद् दिवौकसां मानुषदेहिनो(जन्मनो) यथा ॥ ११३॥ | ||
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| verse_text = इतीरितं तं प्रतिसन्निवृत्तं विनाशयन् मानुषवासनां स्वयम् । | | verse_text = इतीरितं तं प्रतिसन्निवृत्तं विनाशयन् मानुषवासनां स्वयम् । | ||
| verse_lines = इतीरितं तं प्रतिसन्निवृत्तं विनाशयन् मानुषवासनां स्वयम् | | verse_lines = इतीरितं तं प्रतिसन्निवृत्तं विनाशयन् मानुषवासनां स्वयम् ।¦समाश्लिषच्छुद्धतनुः स्तनोत्थो धर्मो हरेः सोऽभवदाशु तत्समः ॥ ११४॥ | ||
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| verse_text = ततस्तु पार्था अखिलाः स्वमूलरूपैः सहैवाऽविविशुर्मुदाऽन्विताः । | | verse_text = ततस्तु पार्था अखिलाः स्वमूलरूपैः सहैवाऽविविशुर्मुदाऽन्विताः । | ||
| verse_lines = ततस्तु पार्था अखिलाः स्वमूलरूपैः सहैवाऽविविशुर्मुदाऽन्विताः | | verse_lines = ततस्तु पार्था अखिलाः स्वमूलरूपैः सहैवाऽविविशुर्मुदाऽन्विताः ।¦स्वीयानि धामानि(सद्मानि) ततोऽप्यनूनभोगाः सदारा न्यवसंश्च तत्र ॥ ११५॥ | ||
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| verse_text = तत्रापि कृष्णेन समागमोऽभूत् पुरेव तेषामतितत्पराणाम् । | | verse_text = तत्रापि कृष्णेन समागमोऽभूत् पुरेव तेषामतितत्पराणाम् । | ||
| verse_lines = तत्रापि कृष्णेन समागमोऽभूत् पुरेव तेषामतितत्पराणाम् | | verse_lines = तत्रापि कृष्णेन समागमोऽभूत् पुरेव तेषामतितत्पराणाम् ।¦चिक्रीड एभिः सहितस्तथैव कृष्णोऽपि तद्वत् सरथोऽर्जुनेन ॥ ११६॥ | ||
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| verse_text = अन्ये च(तु) देवांशभवाः समस्ताः स्वमूलरूपैक्यमवापुराशु । | | verse_text = अन्ये च(तु) देवांशभवाः समस्ताः स्वमूलरूपैक्यमवापुराशु । | ||
| verse_lines = अन्ये च(तु) देवांशभवाः समस्ताः स्वमूलरूपैक्यमवापुराशु | | verse_lines = अन्ये च(तु) देवांशभवाः समस्ताः स्वमूलरूपैक्यमवापुराशु ।¦कर्मक्षयादेव सुरेतरास्तु(सुरेतरास्ते) पुण्यक्षयं प्राप्य भुवि प्रजाताः ॥ ११७॥ | ||
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| verse_text = चतुःसहस्रं त्रिशतोत्तरं ते(त्रिशतोत्तरं गते) संवत्सराणामनुभूय दिव्यान् । | | verse_text = चतुःसहस्रं त्रिशतोत्तरं ते(त्रिशतोत्तरं गते) संवत्सराणामनुभूय दिव्यान् । | ||
| verse_lines = चतुःसहस्रं त्रिशतोत्तरं ते(त्रिशतोत्तरं गते) संवत्सराणामनुभूय दिव्यान् | | verse_lines = चतुःसहस्रं त्रिशतोत्तरं ते(त्रिशतोत्तरं गते) संवत्सराणामनुभूय दिव्यान् ।¦भोगान् नरत्वेऽपि सदेश्वरोऽहमसज्जगच्चेति धियाऽऽप्नुवंस्तमः ॥ ११८॥ | ||
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| verse_text = दुःखेऽपि तेषामिह तारतम्यं कलेः परं दुःखमिहाखिलाच्च । | | verse_text = दुःखेऽपि तेषामिह तारतम्यं कलेः परं दुःखमिहाखिलाच्च । | ||
| verse_lines = दुःखेऽपि तेषामिह तारतम्यं कलेः परं दुःखमिहाखिलाच्च | | verse_lines = दुःखेऽपि तेषामिह तारतम्यं कलेः परं दुःखमिहाखिलाच्च ।¦यथा विरिञ्चस्य सुखं परं स्यान्मुक्तौ हरिद्वेषकृतो विशेषः ॥ ११९॥ | ||
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| verse_text = केचित् पिशाचासुरराक्षसत्वमवाप्य विष्णोरपि तत्पराणाम् । | | verse_text = केचित् पिशाचासुरराक्षसत्वमवाप्य विष्णोरपि तत्पराणाम् । | ||
| verse_lines = केचित् पिशाचासुरराक्षसत्वमवाप्य विष्णोरपि तत्पराणाम् | | verse_lines = केचित् पिशाचासुरराक्षसत्वमवाप्य विष्णोरपि तत्पराणाम् ।¦द्वेषात् तमोऽन्धं त्वरया समाप्नुयुर्देवाः स्वकाले निजयोग्यमुक्तिम् ॥ १२०॥ | ||
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| verse_text = चतुःसहस्रे त्रिशतोत्तरे गते संवत्सराणां तु कलौ पृथिव्याम् । | | verse_text = चतुःसहस्रे त्रिशतोत्तरे गते संवत्सराणां तु कलौ पृथिव्याम् । | ||
| verse_lines = चतुःसहस्रे त्रिशतोत्तरे गते संवत्सराणां तु कलौ पृथिव्याम् | | verse_lines = चतुःसहस्रे त्रिशतोत्तरे गते संवत्सराणां तु कलौ पृथिव्याम् ।¦जातः पुनर्विप्रतनुः स भीमो दैत्यैर्निगूढं हरितत्त्वमाह ॥ १२१॥ | ||
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| verse_text = तदैव कृष्णाऽपि भुवि प्रजाता प्रीत्यै हरेरन्धतमस्यपातयत् । | | verse_text = तदैव कृष्णाऽपि भुवि प्रजाता प्रीत्यै हरेरन्धतमस्यपातयत् । | ||
| verse_lines = तदैव कृष्णाऽपि भुवि प्रजाता प्रीत्यै हरेरन्धतमस्यपातयत् | | verse_lines = तदैव कृष्णाऽपि भुवि प्रजाता प्रीत्यै हरेरन्धतमस्यपातयत् ।¦महासुरान् विष्णुपरार्जुनाद्या कृते प्रजाता हरितोषणाय ।¦पुनश्च ते स्थानमवाप्य(पुनश्च तत्स्थानमवाप्य) सर्वे (स्वीयं)स्वीयां परान्ते तु विमुक्तिमाप्नुयुः ॥ १२२॥ | ||
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| verse_lines = वायुत्वमाप्तः स हनूमदंशो ब्राह्मं पदं प्राप्य वृकोदरश्च | | verse_lines = वायुत्वमाप्तः स हनूमदंशो ब्राह्मं पदं प्राप्य वृकोदरश्च ।¦वागीश्वरीत्वं (वागीश्वरत्वं) गतयैव कृष्णया सहैव मुक्तिं गमिताऽखिलोत्तमाम् ॥ १२३॥ | ||
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| verse_lines = भुवि द्युलोके च विरिञ्चतायां मुक्तौ च ताभ्यामधिकं समस्तात् | | verse_lines = भुवि द्युलोके च विरिञ्चतायां मुक्तौ च ताभ्यामधिकं समस्तात् ।¦सन्तोष्यते पूर्णगुणो रमेशः सदैव नित्योर्जिततद्रतिभ्याम्(नित्योदितसद्रतिभ्याम्) ॥ १२४॥ | ||
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| verse_text = ‘भूषन् न योऽधि बभ्रूषु नम्नते’(ऋग्वेद १.१४०.६)(भुषन्न योऽधि बभ्रूषु नम्नते) ‘बळित्था तद्वपुषे धायि दर्शतं’(१.१४१.१) । | | verse_text = ‘भूषन् न योऽधि बभ्रूषु नम्नते’(ऋग्वेद १.१४०.६)(भुषन्न योऽधि बभ्रूषु नम्नते) ‘बळित्था तद्वपुषे धायि दर्शतं’(१.१४१.१) । | ||
| verse_lines = ‘भूषन् न योऽधि बभ्रूषु नम्नते’(ऋग्वेद १.१४०.६)(भुषन्न योऽधि बभ्रूषु नम्नते) ‘बळित्था तद्वपुषे धायि दर्शतं’(१.१४१.१) | | verse_lines = ‘भूषन् न योऽधि बभ्रूषु नम्नते’(ऋग्वेद १.१४०.६)(भुषन्न योऽधि बभ्रूषु नम्नते) ‘बळित्था तद्वपुषे धायि दर्शतं’(१.१४१.१) ।¦‘तां सु ते कीर्तिम् मघवन् महित्वा’(१०.५४.१) इत्यादिसूक्तानि च तत्प्रमाणम् ॥ १२५॥ | ||
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| verse_text = अन्यानि वाक्यानि च वैदिकानि सपञ्चरात्रोक्तिपुराणकानि । | | verse_text = अन्यानि वाक्यानि च वैदिकानि सपञ्चरात्रोक्तिपुराणकानि । | ||
| verse_lines = अन्यानि वाक्यानि च वैदिकानि सपञ्चरात्रोक्तिपुराणकानि | | verse_lines = अन्यानि वाक्यानि च वैदिकानि सपञ्चरात्रोक्तिपुराणकानि ।¦पृष्टश्च भीष्मोऽत्र युधिष्ठिरेणैतन्मोक्षधर्मेष्वपि किञ्चिदाह ॥ १२६॥ | ||
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| verse_text = एवं प्रयातेषु सकेशवेषु स्वानेव लोकान् यदुपाण्डवेषु । | | verse_text = एवं प्रयातेषु सकेशवेषु स्वानेव लोकान् यदुपाण्डवेषु । | ||
| verse_lines = एवं प्रयातेषु सकेशवेषु स्वानेव लोकान् यदुपाण्डवेषु | | verse_lines = एवं प्रयातेषु सकेशवेषु स्वानेव लोकान् यदुपाण्डवेषु ।¦परीक्षिदाद्यास्तु तदन्वयोत्था व्यासानुशिष्टाः पृथिवीमरक्षन् ॥ १२७॥ | ||
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| verse_text = तैः क्षेमकान्तैरिह भारतादिशास्त्राणि शृण्वद्भिरशेषविद्भिः । | | verse_text = तैः क्षेमकान्तैरिह भारतादिशास्त्राणि शृण्वद्भिरशेषविद्भिः । | ||
| verse_lines = तैः क्षेमकान्तैरिह भारतादिशास्त्राणि शृण्वद्भिरशेषविद्भिः | | verse_lines = तैः क्षेमकान्तैरिह भारतादिशास्त्राणि शृण्वद्भिरशेषविद्भिः ।¦व्यासप्रभावाच्च कलौ च धर्मो ज्ञानं च सुत्रातमगान्न(सूत्रार्थमगान्न) नाशम् ॥ १२७॥ | ||
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| verse_text = संवत्सराणां तु सहस्रके गते प्राप्तेषु विद्यामखिलेषु सत्सु । | | verse_text = संवत्सराणां तु सहस्रके गते प्राप्तेषु विद्यामखिलेषु सत्सु । | ||
| verse_lines = संवत्सराणां तु सहस्रके गते प्राप्तेषु विद्यामखिलेषु सत्सु | | verse_lines = संवत्सराणां तु सहस्रके गते प्राप्तेषु विद्यामखिलेषु सत्सु ।¦दग्धा पुरा ये त्रिपुरं घ्नतैव(त्रिपुरघ्नतैव) रुद्रेण जाताः पृथिवीतले ते ॥ १२९॥ | ||
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| verse_text = अदर्शनं सर्वमुनीन्द्रवृन्दैः सहैव सज्ज्ञानमहानिधाने (निदाने) । | | verse_text = अदर्शनं सर्वमुनीन्द्रवृन्दैः सहैव सज्ज्ञानमहानिधाने (निदाने) । | ||
| verse_lines = अदर्शनं सर्वमुनीन्द्रवृन्दैः सहैव सज्ज्ञानमहानिधाने (निदाने) | | verse_lines = अदर्शनं सर्वमुनीन्द्रवृन्दैः सहैव सज्ज्ञानमहानिधाने (निदाने) ।¦व्यासे प्रयातेऽपि सुतत्त्वविद्या तत्सम्प्रदायादपि तैरवाप्ता ॥ १३०॥ | ||
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| verse_text = उत्सादितत्वात्तु दुरागमानां तत्सम्प्रदायस्य च नाशितत्वात् । | | verse_text = उत्सादितत्वात्तु दुरागमानां तत्सम्प्रदायस्य च नाशितत्वात् । | ||
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| verse_text = शुना पुरोडाशमिवावलीढं वेदश्रुतिं चा(वा)ऽन्त्यजनैरवाप्ताम् । | | verse_text = शुना पुरोडाशमिवावलीढं वेदश्रुतिं चा(वा)ऽन्त्यजनैरवाप्ताम् । | ||
| verse_lines = शुना पुरोडाशमिवावलीढं वेदश्रुतिं चा(वा)ऽन्त्यजनैरवाप्ताम् | | verse_lines = शुना पुरोडाशमिवावलीढं वेदश्रुतिं चा(वा)ऽन्त्यजनैरवाप्ताम् ।¦अनन्तदुःखाप्तिसुयोग्यदैत्यैर्विद्यामवाप्तां तु न सेहिरे सुराः ॥ १३२॥ | ||
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| verse_text = नावाग्गतिः क्वापि सुवेदिनां भवेत् प्राप्यं सुखं नित्यमवश्यमेभिः । | | verse_text = नावाग्गतिः क्वापि सुवेदिनां भवेत् प्राप्यं सुखं नित्यमवश्यमेभिः । | ||
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| verse_lines = तेषां तदा वैदिककर्म वीक्ष्य सम्प्राहसत् तद्वपुषैव केशवः | | verse_lines = तेषां तदा वैदिककर्म वीक्ष्य सम्प्राहसत् तद्वपुषैव केशवः ।¦तं जातमात्रं प्रहसन्तमीक्ष्य सुविस्मितैः पृष्ट उवाच विष्णुः ।¦बुद्धोऽहमित्येव सुनित्यबोधाज्जगाद(स नित्यबोधाज्जगाद) चैषामथ बुद्धदर्शनम् ॥ १३७॥ | ||
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| verse_text = तथाऽप्यविश्वासमवेक्ष्य तेषां सस्मार देवानखिलान् जनार्दनः । | | verse_text = तथाऽप्यविश्वासमवेक्ष्य तेषां सस्मार देवानखिलान् जनार्दनः । | ||
| verse_lines = तथाऽप्यविश्वासमवेक्ष्य तेषां सस्मार देवानखिलान् जनार्दनः | | verse_lines = तथाऽप्यविश्वासमवेक्ष्य तेषां सस्मार देवानखिलान् जनार्दनः ।¦विज्ञाय ते तस्य मनोगतं निजान् प्रचिक्षिपुर्हेतिगणानमुष्मिन् ॥ १३८॥ | ||
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| verse_text = स जातमात्रः शिवपूर्वकाणां शूलादिहेतीरखिला निगीर्य । | | verse_text = स जातमात्रः शिवपूर्वकाणां शूलादिहेतीरखिला निगीर्य । | ||
| verse_lines = स जातमात्रः शिवपूर्वकाणां शूलादिहेतीरखिला निगीर्य | | verse_lines = स जातमात्रः शिवपूर्वकाणां शूलादिहेतीरखिला निगीर्य ।¦दैत्यातिमोहाय निजं च चक्रं स्वमुक्तमाश्वेव समग्रहीद्वशी॥ १३९॥ | ||
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| verse_text = तदासनत्वेन विधाय तस्मिन् समास्थितं देवगणाः प्रणम्य । | | verse_text = तदासनत्वेन विधाय तस्मिन् समास्थितं देवगणाः प्रणम्य । | ||
| verse_lines = तदासनत्वेन विधाय तस्मिन् समास्थितं देवगणाः प्रणम्य | | verse_lines = तदासनत्वेन विधाय तस्मिन् समास्थितं देवगणाः प्रणम्य ।¦जग्मुः स्वधामानि वचांसि तस्य (चास्य) स्वीचक्रुराश्वेव जिनादिदैत्याः ॥ १४०॥ | ||
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| verse_text = ते ज्ञानधर्मावपहाय पापा विमोहिता देववरेण(दैववरेण) सर्वे । | | verse_text = ते ज्ञानधर्मावपहाय पापा विमोहिता देववरेण(दैववरेण) सर्वे । | ||
| verse_lines = ते ज्ञानधर्मावपहाय पापा विमोहिता देववरेण(दैववरेण) सर्वे | | verse_lines = ते ज्ञानधर्मावपहाय पापा विमोहिता देववरेण(दैववरेण) सर्वे ।¦जग्मुस्तमोऽन्धं क्षणिकं समस्तं ज्ञानं नसच्चेति दृढं स्मरन्तः ॥ १४१॥ | ||
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| verse_text = नारायणोऽप्याप्य(नारायणः प्राप्य) सुरेन्द्रवृन्दं वृत्तं च तेषामखिलं(तेषां निखिलं) निगद्य । | | verse_text = नारायणोऽप्याप्य(नारायणः प्राप्य) सुरेन्द्रवृन्दं वृत्तं च तेषामखिलं(तेषां निखिलं) निगद्य । | ||
| verse_lines = नारायणोऽप्याप्य(नारायणः प्राप्य) सुरेन्द्रवृन्दं वृत्तं च तेषामखिलं(तेषां निखिलं) निगद्य | | verse_lines = नारायणोऽप्याप्य(नारायणः प्राप्य) सुरेन्द्रवृन्दं वृत्तं च तेषामखिलं(तेषां निखिलं) निगद्य ।¦पृष्टश्च तैराह निजं हृदिस्थं बौद्धागमार्थं सृतिबन्धमोचनम् ॥ १४२॥ | ||
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| verse_text = क्षणादयं क्षणिकास्तद्विशेषा यतः प्रयान्त्येव निसर्गतोऽखिलाः । | | verse_text = क्षणादयं क्षणिकास्तद्विशेषा यतः प्रयान्त्येव निसर्गतोऽखिलाः । | ||
| verse_lines = क्षणादयं क्षणिकास्तद्विशेषा यतः प्रयान्त्येव निसर्गतोऽखिलाः | | verse_lines = क्षणादयं क्षणिकास्तद्विशेषा यतः प्रयान्त्येव निसर्गतोऽखिलाः ।¦ततः स्थिरत्वेऽपि विशेषसंश्रयादुक्तं क्षणस्थायि मया समस्तम् ॥ १४३॥ | ||
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| verse_text = तद्वान् विशेषश्च यतो न भिन्नो सदा स्वनिर्वाहकशक्तियुक्तौ । | | verse_text = तद्वान् विशेषश्च यतो न भिन्नो सदा स्वनिर्वाहकशक्तियुक्तौ । | ||
| verse_lines = तद्वान् विशेषश्च यतो न भिन्नो सदा स्वनिर्वाहकशक्तियुक्तौ | | verse_lines = तद्वान् विशेषश्च यतो न भिन्नो सदा स्वनिर्वाहकशक्तियुक्तौ ।¦अतः क्षणस्थायि समस्तमेतत् स्थिरात्मकं चेति हि नास्ति भेदः ॥ १४४॥ | ||
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| verse_text = ज्ञोऽहं सदैकः परमो मयैतत् सदाऽननीयं हि यतोऽस्वतन्त्रम् । | | verse_text = ज्ञोऽहं सदैकः परमो मयैतत् सदाऽननीयं हि यतोऽस्वतन्त्रम् । | ||
| verse_lines = ज्ञोऽहं सदैकः परमो मयैतत् सदाऽननीयं हि यतोऽस्वतन्त्रम् | | verse_lines = ज्ञोऽहं सदैकः परमो मयैतत् सदाऽननीयं हि यतोऽस्वतन्त्रम् ।¦ज्ञानात्मकं विश्वमतो मयोक्तं जडस्वरूपं च किमु स्म चेतनम् ॥ १४५॥ | ||
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| verse_text = शंशीलकोऽहं यत एव चोच्चः शूनामकस्तद्धि मया निधेयम्(विधेयम्) । | | verse_text = शंशीलकोऽहं यत एव चोच्चः शूनामकस्तद्धि मया निधेयम्(विधेयम्) । | ||
| verse_lines = शंशीलकोऽहं यत एव चोच्चः शूनामकस्तद्धि मया निधेयम्(विधेयम्) | | verse_lines = शंशीलकोऽहं यत एव चोच्चः शूनामकस्तद्धि मया निधेयम्(विधेयम्) ।¦शून्याभिधं दोषविरुद्धरूपो दोषोज्झितोऽन्यस्त्वखिलादनामा ।¦एनैव साद्यं त्वसदेव नामतस्त्वभाव एनैव भवेद् यतस्तत् ॥ १४६॥ | ||
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| verse_text = इत्यादि बोद्धव्यमिदं समस्तं मयोदितं क्वापि न हेयमस्ति । | | verse_text = इत्यादि बोद्धव्यमिदं समस्तं मयोदितं क्वापि न हेयमस्ति । | ||
| verse_lines = इत्यादि बोद्धव्यमिदं समस्तं मयोदितं क्वापि न हेयमस्ति | | verse_lines = इत्यादि बोद्धव्यमिदं समस्तं मयोदितं क्वापि न हेयमस्ति ।¦इत्यादि देवान् प्रतिबोधयंश्च देवैः सहोवास स बुद्धदेवः ।¦गत्वा स्वधामाप्यपरेण रूपेणाऽस्ते पृथक् चैकतनुर्यथेष्टम् ॥ १४७॥ | ||
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| verse_text = ततस्तु बुद्धोदितपक्षसंस्थो जिनोऽपि चक्रे मतमन्यदेव । | | verse_text = ततस्तु बुद्धोदितपक्षसंस्थो जिनोऽपि चक्रे मतमन्यदेव । | ||
| verse_lines = ततस्तु बुद्धोदितपक्षसंस्थो जिनोऽपि चक्रे मतमन्यदेव | | verse_lines = ततस्तु बुद्धोदितपक्षसंस्थो जिनोऽपि चक्रे मतमन्यदेव ।¦बौद्धेन जैनेन मतेन चैव दैत्यांशकाः प्रीतिमगुः समस्ताः ॥ १४८॥ | ||
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| verse_text = प्रशान्तविद्येत्यभिधं तथाऽन्यद् बुद्धोक्तशास्त्रं त्रिदशा अवाप्य । | | verse_text = प्रशान्तविद्येत्यभिधं तथाऽन्यद् बुद्धोक्तशास्त्रं त्रिदशा अवाप्य । | ||
| verse_lines = प्रशान्तविद्येत्यभिधं तथाऽन्यद् बुद्धोक्तशास्त्रं त्रिदशा अवाप्य | | verse_lines = प्रशान्तविद्येत्यभिधं तथाऽन्यद् बुद्धोक्तशास्त्रं त्रिदशा अवाप्य ।¦तोषं ययुर्वेदसमस्तसारं यामाश्रितानामचिरेण मुक्तिः ॥ १४९॥ | ||
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| verse_text = अन्ये मनुष्या अपि भारताद्यं सत्सम्प्रदायं परिगृह्य विष्णुम् । | | verse_text = अन्ये मनुष्या अपि भारताद्यं सत्सम्प्रदायं परिगृह्य विष्णुम् । | ||
| verse_lines = अन्ये मनुष्या अपि भारताद्यं सत्सम्प्रदायं परिगृह्य विष्णुम् | | verse_lines = अन्ये मनुष्या अपि भारताद्यं सत्सम्प्रदायं परिगृह्य विष्णुम् ।¦यजन्त आपुः परमां गतिं तन्न सेहिरे क्रोधवशादिदैत्याः ॥ १५०॥ | ||
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| verse_lines = शैवं तपस्ते विपुलं विधाय जगद्विमोहोर्जितशक्तिमस्मात् | | verse_lines = शैवं तपस्ते विपुलं विधाय जगद्विमोहोर्जितशक्तिमस्मात् ।¦प्राप्य प्रजाता भुवि मोहनं च चक्रुः कुतर्कैरभिदां वदन्तः ॥ १५१॥ | ||
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| verse_lines = तेषां प्रपाताय सतां च मुक्त्यै(विमुक्त्यै) जन्माऽस भीमस्य यदुक्तमत्र | | verse_lines = तेषां प्रपाताय सतां च मुक्त्यै(विमुक्त्यै) जन्माऽस भीमस्य यदुक्तमत्र ।¦दुर्गा पुनर्विप्रकुलेऽवतीर्णा हनिष्यति व्रातमथासुराणाम् ॥ १५२॥ | ||
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| verse_lines = ततः कलेरन्तमवाप्य धर्मज्ञानादिकल्याणगुणप्रहीने | | verse_lines = ततः कलेरन्तमवाप्य धर्मज्ञानादिकल्याणगुणप्रहीने ।¦लोके विरिञ्चत्रिपुरघ्नशक्रपूर्वाः पयोब्धिं त्रिदशाः प्रजग्मुः ॥ १५३॥ | ||
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| verse_lines = नारायणस्तैः स्तुतिपूर्वमर्थितो भवाय लोकस्य स शम्भलाख्ये | | verse_lines = नारायणस्तैः स्तुतिपूर्वमर्थितो भवाय लोकस्य स शम्भलाख्ये ।¦ग्रामे मुनेर्विष्णुयशोऽभिधस्य गृहे बभूवाऽविरचिन्त्यशक्तिः ॥ १५४॥ | ||
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| verse_lines = कलेस्तु कात्कारत(काल्कारत) एव कल्की ज्ञानं कलं कं सुखमेव तद्वान् | | verse_lines = कलेस्तु कात्कारत(काल्कारत) एव कल्की ज्ञानं कलं कं सुखमेव तद्वान् ।¦कल्कीति वा तेन समस्तदस्युविनाशनं तेन दिनाद् व्यधायि ॥ १५५॥ | ||
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| verse_text = अधर्मवृत्तं विमुखं हरेश्च निहत्य निःशेषजनं तुरङ्गी । | | verse_text = अधर्मवृत्तं विमुखं हरेश्च निहत्य निःशेषजनं तुरङ्गी । | ||
| verse_lines = अधर्मवृत्तं विमुखं हरेश्च निहत्य निःशेषजनं तुरङ्गी | | verse_lines = अधर्मवृत्तं विमुखं हरेश्च निहत्य निःशेषजनं तुरङ्गी ।¦संस्थापयामास स धर्मकेतुं(सेतुं) ज्ञानं स्वभक्तिं च निजप्रजासु ॥ १५६॥ | ||
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| verse_lines = इत्याद्यनन्तानि हरेरुदारकर्माणि रूपाणि च सद्गुणाश्च | | verse_lines = इत्याद्यनन्तानि हरेरुदारकर्माणि रूपाणि च सद्गुणाश्च ।¦नित्यव्यपेताखिलदोषकस्य ब्रह्मेत्यनन्तेति च नाम येन ॥ १५७॥ | ||
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| verse_lines = आनन्दतीर्थाख्यमुनिः सुपूर्णप्रज्ञाभिधो ग्रन्थमिमं चकार | | verse_lines = आनन्दतीर्थाख्यमुनिः सुपूर्णप्रज्ञाभिधो ग्रन्थमिमं चकार ।¦नारायणेनाभिहितो बदर्यां तस्यैव शिष्यो जगदेकभर्तुः ॥ १५८॥ | ||
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| verse_lines = यस्तत्प्रसादादखिलांश्च वेदान् सपञ्चरात्रान् सरहस्यसङ्ग्रहान् | | verse_lines = यस्तत्प्रसादादखिलांश्च वेदान् सपञ्चरात्रान् सरहस्यसङ्ग्रहान् ।¦वेदेतिहासांश्च पुराणयुक्तान् यथावदन्या अपि सर्वविद्याः ॥ १५९॥ | ||
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| verse_lines = समस्तशास्त्रार्थविनिर्णयोऽयं विशेषतो भारतवर्त्मचारी(भारतमार्गवर्ती) | | verse_lines = समस्तशास्त्रार्थविनिर्णयोऽयं विशेषतो भारतवर्त्मचारी(भारतमार्गवर्ती) ।¦ग्रन्थः कृतोऽयं जगतां जनित्रं हरिं गुरुं प्रीणयताऽमुनैव ॥ १६०॥ | ||
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| verse_lines = विनिर्णयो नास्त्यमुना विना यद् विप्रस्थितानामिव सर्ववाचाम् | | verse_lines = विनिर्णयो नास्त्यमुना विना यद् विप्रस्थितानामिव सर्ववाचाम् ।¦तद् ब्रह्मसूत्राणि चकार कृष्णो व्याख्या तथैषामयथा (व्याख्याऽथ तेषामयथा)कृताऽन्यैः ॥ १६१ ॥ | ||
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| verse_lines = निगूहितं यत् पुरुषोत्तमत्वं सूत्रोक्तमप्यत्र महासुरेन्द्रैः | | verse_lines = निगूहितं यत् पुरुषोत्तमत्वं सूत्रोक्तमप्यत्र महासुरेन्द्रैः ।¦जीवेश्वरैक्यं प्रवदद्भिरुग्रैर्व्याख्याय सूत्राणि चकार चाऽविः ॥ १६२॥ | ||
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| verse_lines = व्यासाज्ञया भाष्यवरं विधाय पृथक्पृथक् चोपनिषत्सुभाष्यम् | | verse_lines = व्यासाज्ञया भाष्यवरं विधाय पृथक्पृथक् चोपनिषत्सुभाष्यम् ।¦कृत्वाऽखिलान्यं पुरुषोत्तमं च हरिं वदन्तीति समर्थयित्वा ॥ १६३॥ | ||
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| verse_lines = तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः | | verse_lines = तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः ।¦निर्यदीं बुध्नान् महिषस्य वर्पस ईशानासः शवसा क्रन्त सूरयः ।¦यदीमनु प्रदिवो मध्व आधवे गुहासन्तं मातरिश्वा मथायति ॥ १६५॥(ऋ.१.१४१.२-३) | ||
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| verse_lines = इत्यादिवाक्योक्तमिदं समस्तं तथा पुराणेषु च पञ्चरात्रे | | verse_lines = इत्यादिवाक्योक्तमिदं समस्तं तथा पुराणेषु च पञ्चरात्रे ।¦अत्रोदिता याश्च कथाः समस्ता वेदेतिहासादिविनिर्णयोक्ताः(समस्तवेदेतिहासदिविनिर्णयोक्ताः) ॥ १६६॥ | ||
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| verse_lines = तस्मादयं ग्रन्थवरोऽखिलोरुधर्मादिमोक्षान्तपुमर्थहेतुः | | verse_lines = तस्मादयं ग्रन्थवरोऽखिलोरुधर्मादिमोक्षान्तपुमर्थहेतुः ।¦किं चो(वो)दितैरस्य गुणैस्ततोऽन्यैर्नारायणः प्रीतिमुपैत्यतोऽलम्(प्रीतिमुपैत्यतोऽयम्) ॥ १६७॥ | ||
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| verse_lines = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि | | verse_lines = यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं¦बट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।¦वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः¦मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे ॥ १६८॥ | ||
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| verse_lines = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः | | verse_lines = यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः ।¦प्रीयतां प्रीत एवालं विष्णुर्मे परमः सुहृत् ॥ १६९॥ | ||
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Latest revision as of 19:12, 16 June 2026
श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णयः — मूलम्
प्रथमोऽध्यायः
नारायणाय परिपूर्णगुणार्णवाय विश्वोदयस्थितिलयोन्नियति प्रदाय।
आसीदुदारगुणवारिधिरप्रमेयो नारायणः परतमः परमात् स एकः।
तस्योदरस्थजगतः सदमन्दसान्द्रस्वानन्दतुष्टवपुषोऽपि रमारमस्य।
दृष्ट्वा स चेतनगणान् जठरे शयानान् आनन्दमात्रवपुषः सृतिविप्रमुक्तान्।
स्रक्ष्ये हि चेतनगणान् सुखदुःखमध्यसम्प्राप्तये तनुभृतां विहृतिं ममेच्छन्।
इत्थं विचिन्त्य परमः स तु वासुदेवनामा बभूव निजमुक्तिपदप्रदाता।
सङ्कर्षणश्च स बभूव पुनः सुनित्यः संहारकारणवपुस्तदनुज्ञयैव।
स्थित्यै पुनः स भगवाननिरुद्धनामा देवी च शान्तिरभवच्छरदां सहस्रम्।
निर्देहकान् स भगवाननिरुद्धनामा जीवान् स्वकर्मसहितान् उदरे निवेश्य ।
पञ्चात्मकः स भगवान् द्विषडात्मकोऽभूत् पञ्चद्वयी शतसहस्रपरोऽमितश्च।
निर्दोषपूर्णगुणविग्रह आत्मतन्त्रो निश्चेतनात्मकशरीरगुणैश्च हीनः।
कालाच्च देशगुणतोऽस्य न चाऽदिरन्तो वृद्धिक्षयौ न तु परस्य सदातनस्य।
सर्वज्ञ ईश्वरतमः स च सर्वशक्तिः पूर्णाव्ययात्मबलचित्-सुखवीर्यसारः।
आभासकोऽस्य पवनः पवनस्य रुद्रः शेषात्मको गरुड एव च शक्रकामौ।
आभासका त्वथ रमाऽस्य मरुत्स्वरूपाच्छ्रेष्ठाऽप्यजात् तदनु गीः शिवतो वरिष्ठा।
ताभ्यश्च ते शतगुणैर्दशतो वरिष्ठाः पञ्चोत्तरैरपि यथाक्रमतः श्रुतिस्थाः।
तेषां स्वरूपमिदमेव यतोऽथ मुक्तावप्येवमेव सततोच्चविनीचरूपाः।
एवं नरोत्तमपरास्तु विमुक्तियोग्या अन्ये च संसृतिपरा असुरास्तमोगाः।
पूर्तिश्च नैव नियमाद् भविता हि यस्मात् तस्मात् समाप्तिमपि यान्ति न जीवसङ्घाः।
एतैः सुरादिभिरतिप्रतिभादियुक्तैर्युक्तैः सहैव सततं प्रविचिन्तयद्भिः।
साम्यं न चास्य परमस्य च केन चाऽप्यं मुक्तेन च क्वचिदतस्त्वभिदा कुतोऽस्य।
अर्थोऽयमेव निखिलैरपि वेदवाक्यै रामायणैः सहितभारतपञ्चरात्रैः।
नारायणस्य न समः पुरुषोत्तमोऽहं
‘आभास एव’ (ब्र.सू. २.३.५०) पृथगीशत एष जीवो
‘माहात्म्यदेह’ ‘सृतिमुक्तिगते’ ‘शिवश्च
‘आभासकाभासपरावभासरूपाण्यजस्राणि च चेतनानाम् ।
‘यस्मिन् परेऽन्येऽप्यजजीवकोशा’
‘नैवैक एव पुरुषः पुरुषोत्तमोऽसौ
‘सर्वोत्तमो हरिरिदं तु तदाज्ञयैव
‘ऋगादयश्च चत्वारः पञ्चरात्रं च भारतम्।
अविरुद्धं च यत्त्वस्य प्रमाणं तच्च नान्यथा।
वैष्णवानि पुराणानि पञ्चरात्रात्मकत्वतः।
एतेषु विष्णोराधिक्यमुच्यतेऽन्यस्य न क्वचित्।
मोहार्थान्यन्यशास्त्राणि कृतान्येवाऽज्ञया हरेः।
यस्मात् कृतानि तानीह विष्णुनोक्तैः शिवादिभिः।
विष्ण्वाधिक्यविरोधीनि यानि वेदवचांस्यपि।
अवतारेषु यत् किञ्चिद् दर्शयेन्नरवद्धरिः।
अज्ञत्वं पारवश्यं वा (छे)वेधभेदादिकं तथा।
अनीशत्वं च दुःखित्वं साम्यमन्यैश्च हीनताम्।
न तस्य कश्चिद् दोषोऽस्ति पूर्णाखिलगुणो ह्यसौ।
ब्रह्माद्यभेदः साम्यं वा कुतस्तस्य महात्मनः।
निर्णयायैव यत् प्रोक्तं ब्रह्मसूत्रं तु विष्णुना।
यथार्थवचनानां च मोहार्थानां च संशयम्।
तस्मात् सूत्रार्थमागृह्य कर्तव्यः सर्वनिर्णयः।
अभेदः सर्वरूपेषु जीवभेदः सदैव च।
तारतम्यं च मुक्तानां विमुक्तिर्विद्यया तथा।
तस्माद् ‘ये ये गुणा विष्णोर्ग्राह्यास्ते सर्व एव तु’।
‘एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति।
अतत्थ्यानि वितत्थ्यानि दर्शयस्व महाभुज।
इति वाराहवचनं ब्रह्माण्डोक्तं तथाऽपरम् ।
निर्दोषत्वं तारतम्यं मुक्तानामपि चोच्यते ।
स्कान्देऽप्युक्तं शिवेनैव षण्मुखायैव सादरम् ।
‘परमो विष्णुरेवैकस्तज्ज्ञानं मोक्षसाधनम् ।
ज्ञानं विना तु या मुक्तिः साम्यं च मम विष्णुना ।
अभेदश्चास्मदादीनां मुक्तानां हरिणा तथा ।
उक्तं (पा)पद्मपुराणे च शैव एव शिवेन तु ।
‘त्वामाराध्य तथा शम्भो ग्रहीष्यामि वरं सदा ।
स्वाऽगमैः कल्पितैस्त्वं च जनान् मद्विमुखान् कुरु ।
न च वैष्णवशास्त्रेषु वेदेष्वपि हरेः परः ।
निर्दोषत्वाच्च वेदानां वेदोक्तं ग्राह्यमेव हि ।
‘अस्य देवस्य मीळ्हुषो वया विष्णोरेषस्य प्रभृथे हविर्भिः ।
‘स्तुहि श्रुतं गर्तसदं युवानं मृगं न भीममुपहत्नुमुग्रम्’ ।
‘एको नारायण आसीन्न ब्रह्मा न च शङ्करः’ ।
‘यदा पश्यः पश्यते रुग्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् ।
‘यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् ।
‘प्र घा न्वस्य महतो महानि सत्या सत्यस्य करणानि वोचम्’ ।
‘यच्चिकेत सत्यमिइत् तन्न मोघं वसु स्पार्हम् उत जेतोत दाता’ ।
‘सत्या विष्णोर्गुणाः सर्वे सत्या जीवेशयोर्भिदा ।
असत्यः स्वगतो भेदो विष्णोर्नान्यदसत्यकम् ।
जीवेशयोर्भिदा चैव जीवभेदः परस्परम् ।
पञ्चभेदा इमे नित्याः सर्वावस्थासु सर्वशः ।
क्षितिपा मनुष्यगन्धर्वा दैवाश्च पितरश्चिराः ।
रुद्रः सरस्वती वायुर्मुक्ताः शतगुणोत्तराः ।
मुक्तेषु श्रीस्तथा वायोः सहस्रगुणिता गुणैः ।
इत्यादि वेदवाक्यं विष्णोरुत्कर्षमेव वक्त्युच्चैः ।
‘भूम्नो ज्यायस्त्वम्’(‘भूम्नःक्रतुवज्ज्यायस्त्वं तथा च दर्शयति’ ब्र.सू.३.३.५९) इति ह्युक्तं सूत्रेषु निर्णयात् तेन ।
‘नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
‘विष्णुर्हि दाता मोक्षस्य वायुश्च तदनुज्ञया ।
उत्तरेषां प्रसादेन नीचानां नान्यथा भवेत् ।
तारतम्यं ततो ज्ञेयं सर्वोच्चत्वं हरेस्तथा ।
पञ्चभेदांश्च विज्ञाय विष्णोः स्वाभेदमेव च ।
अवतारान् हरेर्ज्ञात्वा नावतारा हरेश्च ये ।
सृष्टिरक्षाऽहृतिज्ञाननियत्यज्ञानबन्धनान् ।
वेदांश्च पञ्चरात्राणि सेतिहासपुराणकान् ।
माहात्म्यज्ञानपूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोऽधिकः ।
त्रिविधा जीवसङ्घास्तु देवमानुषदानवाः ।
मध्यमा मानुषा ये तु सृतियोग्याः सदैव हि ।
मुक्तिर्नित्या तमश्चैव नाऽवृत्तिः पुनरेतयोः ।
नासुराणां तथा मुक्तिः कदाचित् केनचित् क्वचित् ।
असुराणां तमःप्राप्तिस्तदा नियमतो भवेत् ।
तदा मुक्तिश्च देवानां यदा प्रत्यक्षगो हरिः ।
सर्वैर्गुणैर्ब्रह्मणा तु समुपास्यो हरिः सदा ।
यथाक्रमं गुणोद्रेकात् तदन्यैराविरिञ्चतः ।
तैरेवाप्यं पदं तत्तु नैवान्यैः साधनैरपि ।
तस्मादनाद्यनन्तं हि तारतम्यं चिदात्मनाम् ।
अयोग्यमिच्छन् पुरुषः पतत्येव न संशयः ।
अच्छिद्रसेवनाच्चैव निष्कामत्वाच्च योग्यतः ।
नियमोऽयं हरेर्यस्मान्नोल्लङ्घ्यः सर्वचेतनैः ।
दानतीर्थतपोयज्ञपूर्वाः सर्वेऽपि सर्वदा ।
‘शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमायन् अन्यमन्यमतिनेनीयमानः ।
परा पूर्वेषां सख्या वृणक्ति वितर्तुराणो अपरेभिरेति ।
‘तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’(तै. आ. ३.१२.१७, श्वे. उ. ३.८) ।
‘यस्य देवे परा भक्तिर्यथादेवे तथा गुरौ ।
‘भक्त्यर्थान्यखिलान्येव भक्तिर्मोक्षाय केवला ।
ज्ञानपूर्वः परः स्नेहो नित्यो भक्तिरितीर्यते’।
‘निश्शेषधर्मकर्ताऽप्यभक्तस्ते नरके हरे।
‘धर्मो भवत्यधर्मोऽपि कृतो भक्तैस्तवाऽच्युत ।
‘भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
‘अनादिद्वेषिणो दैत्या विष्णौ द्वेषो विवर्धितः ।
पूर्णदुःखात्मको द्वेषः सोऽनन्तो ह्यवतिष्ठते ।
जीवाभेदो निर्गुणत्वं अपूर्णगुणता तथा ।
प्रादुर्भावविपर्यासस्तद्भक्तद्वेष एव च ।
एतैर्विहीना या भक्तिः सा भक्तिरिति निश्चिता ।
अपरोक्षदृशेर्हेतुर्मुक्तिहेतुश्च सा पुनः ।
यथा शौक्ल्यादिकं रूपं गोर्भवत्येव सर्वदा ।
भक्त्यैव तुष्टिमभ्येति विष्णुर्नान्येन केनचित् ।
ब्रह्मादीनां च मुक्तानां तारतम्ये तु कारणम् ।
मानुषेष्वधमाः किञ्चिद् द्वेषयुक्ताः सदा हरौ ।
मध्यमा मिश्रभूतत्वान्नित्यं मिश्रफलाः स्मृताः ।
ब्रह्मणः परमा भक्तिः सर्वेभ्यः परमस्ततः’ ।
‘षण्णवत्यङ्गुलो यस्तु न्यग्रोधपरिमण्डलः ।
तस्माद् ब्रह्मा गुरुर्मुख्यः सर्वेषामेव सर्वदा ।
क्रमाल्लक्षणहीनाश्च लक्षणालक्षणैः समाः ।
सम्यग्लक्षणसम्पन्नो यद् दद्यात् सुप्रसन्नधीः ।
अगम्यत्वाद्धरिस्तस्मिन्नाविष्टो मुक्तिदो भवेत् ।
स्वावराणां गुरुत्वं तु भवेत् कारणतः क्वचित् ।
‘यदा मुक्तिप्रदानाय स्वयोग्यं पश्यति ध्रुवम् ।
यान्ति पूर्वाण्युत्तराणि न श्लेषं यान्ति कानिचित् ।
भविष्यत्पर्ववचनमित्येतत् सूत्रगं तथा ।
‘मुक्तास्तु मानुषा देवान् देवा इन्द्रं स शङ्करम् ।
उत्तरोत्तरवश्याश्च मुक्ता रुद्रपुरस्सराः ।
असुराः कलिपर्यन्ता एवं दुःखोत्तरोत्तराः ।
तथाऽन्येऽप्यसुराः सर्वे गणा योग्यतया सदा ।
मुक्तोऽपि सर्वमुक्तानां आधिपत्ये स्थितः सदा ।
इत्यृग्यजुःसामाथर्वपञ्चरात्रेतिहासतः ।
विष्ण्वाज्ञयैव विदुषा तत्प्रसादबलोन्नतेः ।
तात्पर्यं शास्त्राणां सर्वेषामुत्तमं मया प्रोक्तम् ।
द्वितीयोऽध्यायः
औं ॥ जयति हरिरचिन्त्यः सर्वदेवैकवन्द्यः परमगुरुरभीष्टावाप्तिदः सज्जनानाम् ।
उक्तः पूर्वेऽध्याये शास्त्राणां निर्णयः परो दिव्यः ।
क्वचिद् ग्रन्थान् प्रक्षिपन्ति क्वचिदन्तरितानपि ।
अनुत्सन्ना अपि ग्रन्था व्याकुला इति सर्वशः ।
ग्रन्थोऽप्येवं विलुळितः किम्वर्थो देवदुर्गमः ।
हरिणा निर्णयान् वच्मि विजानंस्तत्प्रसादतः ।
देशे देशे तथा ग्रन्थान् दृष्ट्वा चैव पृथग्विधान् ।
जगाद भारताद्येषु तथा वक्ष्ये तदीक्षया ।
निर्णयः सर्वशास्त्राणां भारतं परिकीर्तितम् ॥९॥
‘भारतं सर्ववेदाश्च तुलामारोपिताः पुरा ।
‘महत्वाद् भारवत्वाच्च महाभारतमुच्यते ।
‘निर्णयः सर्वशास्त्राणां सदृष्टान्तो हि भारते ।
यतः कृष्णवशे सर्वे भीमाद्याः सम्यगीरिताः ।
यस्माद्व्यासात्मना तेषां भारते यश ऊचिवान् ।
ब्रह्माधिकश्च देवेभ्यः शेषाद्रुद्रादपीरितः ।
भूभारहारिणो विष्णोः प्रधानाङ्गं हि मारुतिः ।
यो य एव बलज्येष्ठः क्षत्रियेषु स उत्तमः ।
बलं नैसर्गिकं तच्चेद्वरास्त्रादेस्तदन्यथा ।
देवेषु बलिनामेव भक्तिज्ञाने न चान्यथा ।
तस्माद्यो यो बलज्येष्ठः स गुणज्येष्ठ एव च ।
ज्ञानादयो गुणा यस्माज्ज्ञायन्ते सूक्ष्मदृष्टिभिः ।
देवेष्वेव न चान्येषु वासुदेवप्रतीपतः ।
प्रवृत्तो दुष्टनिधने ज्ञानकार्ये तथैव च ।
कृष्णरामादिरूपेषु बलकार्यो जनार्दनः ।
मत्स्यकूर्मवराहाश्च सिंहवामनभार्गवाः ।
कपिलो दत्त ऋषभौ शिंशुमारो रुचेः सुतः ।
महिदासस्तथा हंसः स्त्रीरूपो हयशीर्षवान् ।
इत्याद्याः केवलो विष्णुर्नैषां भेदः कथञ्चन ।
श्रीब्रह्मरुद्रशेषाश्च वीन्द्रेन्द्रौ काम एव च ।
धर्म एषां तथा भार्या दक्षाद्या मनवस्तथा ।
कश्यपः सनकाद्याश्च वह्न्याद्याश्चैव देवताः ।
गयश्च लक्ष्मणाद्याश्च त्रयो रोहिणिनन्दनः ।
नरः फल्गुन इत्याद्या विशेषावेशिनो हरेः ।
तस्माद्बलप्रवृत्तस्य रामकृष्णात्मनो हरेः ।
ब्रह्मात्मको यतो वायुः पदं ब्राह्ममगात् पुरा ।
यत्र रूपं तत्र गुणाः भक्त्याद्यास्त्रीषु नित्यशः ।
प्रायो वेत्तुं न शक्यन्ते भक्त्याद्यास्त्रीषु यत् ततः ।
तच्च नैसर्गिकं रूपं द्वात्रिंशल्लक्षणैर्युतम् ।
आसुरीणां वरादेस्तु वपुर्मात्रं भविष्यति ।
तस्माद् रूपगुणोदारा जानकी रुग्मिणी तथा ।
ततः पश्चाद् द्रौपदी च सर्वाभ्यो रूपतो वरा ।
हन्ता च वैरहेतुश्च भीमः पापजनस्य तु ।
बलदेवस्ततः पश्चात् ततः पश्चाच्च फल्गुनः ।
रामवज्जाम्बवत्याद्याः षट् ततो रेवती तथा ।
रामकार्यं तु यैः सम्यक् स्वयोग्यं न कृतं पुरा ।
अधिकं यैः कृतं तत्र तैरूनं कृतमत्र तत् ।
प्रादुर्भावद्वये ह्यस्मिन् सर्वेषां निर्णयः कृतः ।
पश्चात्तनत्वात् कृष्णस्य वैशेष्यात् तत्र निर्णयः ।
उक्ता रामकथाऽप्यस्मिन् मार्कण्डेयसमाख्य(स्य)या ।
अत्रोक्तं सर्वशास्त्रेषु नहि सम्यगुदाहृतम्'।
मार्कण्डेयेऽपि कथितं भारतस्य प्रशंसनम् ।
आयुधानां यथा वज्रमोषधीनां यथा यवाः ।
वायुप्रोक्तेऽपि तत् प्रोक्तं भारतस्य प्रशंसनम् ।
एवं हि सर्वशास्त्रेषु पृथक् पृथगुदीरितम् ।
भारतेऽपि यथा प्रोक्तो निर्णयोऽयं क्रमेण तु ।
‘नारायणं सुरगुरुं जगदेकनाथं भक्तप्रियं सकललोकनमस्कृतं च ।
ज्ञानप्रदः स भगवान् कमलाविरिञ्चशर्वादिपूर्वजगतो निखिलाद्वरिष्ठः ।
निर्दोषकः सृतिविहीन उदारपूर्णसंविद्गुणः प्रथमकृत् सकलात्मशक्तिः ।
नम्यत्वमुक्तमुभयत्र यतस्ततोऽस्य मुक्तैरमुक्तिगगणैश्च विनम्यतोक्ता ।
‘कृष्णो यज्ञैरिज्यते सोमपूतैः कृष्णो वीरैरिज्यते विक्रमद्भिः ।
सृष्टा ब्रह्मादयो देवा निहता येन दानवाः ।
स्रष्टृत्वं देवानां मुक्तिस्रष्टृत्वमुच्यते नान्यत् ।
अथ च दैत्यहतिस्तमसि स्थिरा नियतसंस्थितिरेव न चान्यथा ।
तमिममेव सुरासुरसञ्चये हरिकृतं प्रविशेषमुदीक्षितुम् ।
‘नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे ।
वासुदेवस्तु भगवान् कीर्तितोऽत्र सनातनः ।
नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति ।
आद्यन्तयोरित्यवदत् स यस्माद् व्यासात्मको विष्णुरुदारशक्तिः ।
‘सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते ।
‘आलोड्य सर्वशास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।
‘स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित् ।
‘को हि तं वेदितुं शक्तो यो न स्यात् तद्विधोऽपरः(तद्वधः परः) ।
को हि तं वेदितुं शक्तो नारायणमनामयम् ।
अप्रमेयोऽनियोज्यश्च स्वयं कामगमो वशी ।
न प्रमातुं महाबाहुः शक्योऽयं मधुसूदनः ।
वसुदेवसुतो नायं नायं गर्भेऽवसत् प्रभुः ।
जायते नैव कुत्रापि म्रियते कुत एव तु ।
ईशन्नपि हि देवेशः सर्वस्य जगतो हरिः ।
नाऽत्मानं वेद मुग्धोऽयं दुःखी सीतां च मार्गते ।
मुह्यते शस्त्रपातेन भिन्नत्वग्रुधिरस्रवः ।
इत्याद्यसुरमोहाय दर्शयामास नाट्यवत् ।
प्रादुर्भावा हरेः सर्वे नैव प्रकृतिदेहिनः ।
दुष्टानां मोहनार्थाय सतामपि तु(च) कुत्रचित् ।
‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
‘अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रळयस्तथा ।
‘अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्’(भ. गी. ९.११) ।
‘मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
‘महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
‘पिताऽसि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
‘परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
‘ममयोनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ।
‘द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यस्मात् क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
(इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
‘द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च । दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु’(भ. गी. १६.६) ॥९७॥
‘असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्’ ।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोल्पबुद्धयः ।
‘ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ।आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया’(भ. गी. १६.१४-१५) ॥१००॥
‘मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः’(भ. गी. १६.१८)।
‘आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
‘सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
‘सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
‘पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता नारायणः स्वयम् ।
‘ज्ञानेष्वेतेषु राजेन्द्र साङ्ख्यपाशुपतादिषु ।
‘पञ्चरात्रविदो मुख्या यथाक्रमपरा नृप ।
\ (जनमेजय उवाच)
(वैशम्पायन उवाच)‘ नैतदिच्छन्ति पुरुषमेकं कुरुकुलोद्वह ।
‘आह ब्रह्मैतमेवार्थं महादेवाय पृच्छते ।
‘अहं ब्रह्मा चाऽद्य ईशः प्रजानां तस्माज्जातस्त्वं च मत्तः प्रसूतः ।
तथैव भीमवचनं धर्मजं प्रत्युदीरितम् ।
स एष भगवान् कृष्णो नैव केवलमानुषः ।
वचनं चैव कृष्णस्य ज्येष्ठं कुन्तीसुतं प्रति ।
यथाऽऽश्रितानि ज्योतींषि ज्योतिःश्रेष्ठं दिवाकरम् ।
भविष्यत्पर्वगं चापि वचो व्यासस्य सादरम् ।
तदर्थास्तु कथाः सर्वा नान्यार्थं वैष्णवं यशः ।
भाषास्तु त्रिविधास्तत्र मया वै सम्प्रदर्शिताः ।
शैवदर्शनमालम्ब्य क्वचिच्छैवी कथोदिता ।
अविरुद्धं समाधेस्तु दर्शनोक्तं च गृह्यते ।
दर्शनान्तरसिद्धं च गुह्यभाषाऽन्यथा भवेत् ।
तस्याङ्गं प्रथमं वायुः प्रादुर्भावत्रयान्वितः ।
त्रेताद्येषु युगेष्वेष सम्भूतः केशवाज्ञया ।
शंरूपे तु रतेर्वायौ श्रीरित्येव च कीर्त्यते ।
तृतीयाङ्गं हरेः शेषः प्रादुर्भावसमन्वितः ।
रुद्रात्मकत्वाच्छेषस्य शुको द्रौणिश्च तत्तनू ।
प्रद्युम्नाद्यास्ततो विष्णोरङ्गभूताः क्रमेण तु ।
तथा भागवतेऽप्युक्तं हनूमद्वचनं परम् ।
न वै स आत्माऽऽत्मवतामधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान् वासुदेवः ।
यत्पादपङ्कजपरागनिषेवकाणां दुःखानि सर्वाणि लयं प्रयान्ति ।
‘क्वचिच्छिवं क्वचिदृषीन् क्वचिद् देवान् क्वचिन्नरान् ।
लिङ्गं प्रतिष्ठापयति वृणोत्यसुरतो वरान् ।
तस्माद् यो महिमा विष्णोः सर्वशास्त्रोदितः स हि ।
भारतार्थस्त्रिधा प्रोक्तः स्वयं भगवतैव हि ।
‘सकृष्णान् पाण्डवान् गृह्य योऽयमर्थः प्रवर्तते ।
धर्मो भक्त्यादिदशकः श्रुतादिः शीलवैनयौ ।
नारायणस्य नामानि सर्वाणि वचनानि तु ।
भक्तिर्ज्ञानं सवैराग्यं प्रज्ञा मेधा धृतिः स्थितिः ।
एतद्दशात्मको वायुस्तस्माद् भीमस्तदात्मकः ।
अज्ञानादिस्वरूपस्तु कलिर्दुर्योधनः स्मृतः ।
नास्तिक्यं शकुनिर्नाम सर्वदोषात्मकाः परे ।
द्रोणाद्या इन्द्रियाण्येव पापान्यन्ये तु सैनिकाः ।
एवमध्यात्मनिष्ठं हि भारतं सर्वमुच्यते ।
स्वयं व्यासो हि तद् वेद ब्रह्मा वा तत्प्रसादतः ।
इत्यादिव्यासवाक्यैस्तु विष्णूत्कर्षोऽवगम्यते ।
‘वायुर्हि ब्रह्मतामेति तस्माद् ब्रह्मैव स स्मृतः ।
‘ज्ञाने विरागे हरिभक्तिभावे धृतिस्थितिप्राणबलेषु योगे ।
‘बळित्था तद् वपुषे धायि दर्शतं देवस्य भर्गः सहसो यतो जनि ।
पृक्षो वपुः पितुमान् नित्य आ शये द्वितीयमा सप्तशिवासु मातृषु ।
निर्यदीं बुध्नान्महिषस्य वर्पस ईशानासः शवसा क्रन्त सूरयः ।
प्र यत्पितुः परमान्नीयते पर्या पृक्षुधो वीरुधो दंसु रोहति ।
आदिन् मात्रॄराविशद्यास्वा शुचिरहिंस्यमान उर्विया वि वावृधे ।
‘अश्वमेधः क्रतुश्रेष्ठो ज्योतिःश्रेष्ठो दिवाकरः ।
‘बलमिन्द्रस्य गिरिशो गिरिशस्य बलं मरुत् ।
‘वायुर्भीमो भीमनादो महौजाः सर्वेषां च प्राणिनां प्राणभूतः ।
‘तत्त्वज्ञाने विष्णुभक्तौ धैर्ये स्थैर्ये पराक्रमे ।
भीमसेनसमो नास्ति सेनयोरुभयोरपि ।
तथा युधिष्ठिरेणापि भीमं प्रति समीरितम् ।
विराटपर्वगं चापि वचो दुर्योधनस्य हि ।
साम्प्रतं मानुषे लोके सदैत्यनरराक्षसे ।
भीमश्च बलभद्रश्च मद्रराजश्च वीर्यवान् ।
वचनं वासुदेवस्य तथोद्योगगतं परम् ।
यादृशे च कुले जातः सर्वराजाभिपूजिते ।
‘अस्मिन् युद्धे भीमसेन त्वयि भारः समाहितः ।
उक्तं पुराणे ब्रह्माण्डे ब्रह्मणा नारदाय च ।
या मारुताद् गर्भमधत्त पूर्वं शेषं सुपर्णं गिरीशं सुरेन्द्रम् ।
‘यस्याधिको बले नास्ति भीमसेनमृते(भीममेकमृते) क्वचित् ।
‘यस्य न प्रतियोद्धाऽस्ति भीमेमेकमृते क्वचित् ।
तथा युधिष्ठिरेणैव भीमाय समुदीरितम् ।
अन्वेष रौहिणेयं च त्वां च भीमापराजितम् ।
तथैव द्रौपदीवाक्यं वासुदेवं प्रतीरितम् ।
तथैवान्यत्र वचनं कृष्णद्वैपायनेरितम् ।
अक्षयाविषुधी दिव्ये ध्वजो वानरलक्षणः ।
इत्याद्यनन्तवाक्यानि सन्त्येवार्थे विवक्षिते ।
तस्मादुक्तक्रमेणैव पुरुषोत्तमता हरेः ।
पूर्णप्रज्ञकृतेयं सङ्क्षेपादुद्धृतिः सुवाक्यानाम् । श्रीमद्भारतगानां विष्णोः पूर्णत्वनिर्णयायैव ॥१७७॥
स प्रीयतां परतमः परमादनन्तः सन्तारकः सततसंसृतिदुस्तरार्णात् । यत्पादपद्ममकरन्दजुषो हि पार्थाः स्वाराज्यमापुरुभयत्र सदा विनोदात् ॥१७८॥
तृतीयोऽध्यायः
औं ॥ जयत्यजोऽखण्डगुणोरुमण्डलः सदोदितो ज्ञानमरीचिमाली ।
जयत्यजोऽक्षीणसुखात्मबिम्बः स्वैश्वर्यकान्तिप्रततः सदोदितः ।
जयत्यसङ्ख्योरुबलाम्बुपूरो गुणोच्चरत्नाकर आत्मवैभवः ।
‘नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
जयो नामेतिहासोऽयं कृष्णद्वैपायनेरितः ।
नारायणो व्यास इति वाच्यवक्तृस्वरूपकः ।
उपसाधको नरश्चोक्तो देवी भाग्यात्मिका नृणाम् ।
कृष्णौ सत्या भीमपार्थौ कृष्णेत्युक्ता हि भारते ॥ ८॥
सर्वस्य निर्णयसुवाक्यसमुद्धृती तु स्वाध्याययोर्हरिपदस्मरणेन कृत्वा ।
व्यूढश्चतुर्धा भगवान् स एको मायां श्रियं सृष्टिविधित्सयाऽऽर ।
सङ्कर्षणाच्चापि जयातनूजो बभूव साक्षाद्बलसंविदात्मा ।
सूत्रं स वायुः पुरुषो विरिञ्चः प्रद्युम्नतश्चाथ कृतौ स्त्रियौ द्वे ।
श्रद्धा द्वितीयाऽथ तयोश्च योगो बभूव पुंसैव च सूत्रनाम्ना ।
शेषस्तयोरेव हि जीवनामा कालात्मकः सोऽथ सुपर्ण आसीत् ।
काला जयाद्या अपि विष्णुपार्षदा यस्मादण्डात् परतः सम्प्रसूताः ।
व्यूहात्तृतीयात्पुनरेव विष्णोर्देवांश्चतुर्वर्णगतान् समस्तान् ।
ततो महत्तत्त्वतनुर्विरिञ्चः स्थूलात्मनैवाजनि वाक् च देवी ।
बुद्ध्यामुमायां स शिवस्त्रिरूपो मनश्च वैकारिकदेवसङ्घान् ।
पुंसः प्रकृत्यां च पुनर्विरिञ्चाच्छिवोऽथ तस्मादखिलाः सुरेशाः ।
पुनश्च माया त्रिविधा बभूव सत्त्वादिरूपैरथ वासुदेवात् ।
एते हि देवाः पुनरण्डसृष्टावशक्नुवन्तो हरिमेत्य तुष्टुवुः ।
इति स्तुतस्तैः पुरुषोत्तमोऽसौ स विष्णुनामा श्रियमाप सृष्टये ।
तस्मिन् प्रविष्टा हरिणैव सार्द्धं सर्वे सुरास्तस्य बभूव नाभेः ।
तस्मात् पुनः सर्वसुराः प्रसूतास्ते जायमाना अपि निर्णयाय ।
पपात वायोर्गमनाच्छरीरं तस्यैव चावेशत उत्थितं पुनः ।
हरेर्विरिञ्चस्य च मध्यसंस्थितेस्तदन्यदेवाधिपतिः स मारुतः ।
तस्माच्च देवा ऋषयः पुनश्च वैकारिकाद्याः सशिवा बभूवुः ॥ २७ ॥
अग्रे शिवोऽहं भव एव बुद्धेरुमा मनोजौ सह शक्रकामौ ।
चक्षुःश्रुतिभ्यां स्पर्शात्सहैव रविः शशी धर्म इमे प्रसूताः ।
ततोऽसुराद्या ऋषयो मनुष्या जगद्विचित्रं च विरिञ्चतोऽभूत् ॥ ३०॥
उक्तक्रमात् पूर्वभवस्तु यो यः श्रेष्ठः स स ह्यासुरकानृते च ।
लयो भवेद् व्युत्क्रमतो हि तेषां ततो हरिः प्रलये श्रीसहायः ।
अनन्तशीर्षास्यकरोरुपादः सोऽनन्तमूर्तिः स्वगुणाननन्तान् ।
एवं पुनः सृजते सर्वमेतदनाद्यनन्तो हि जगत्प्रवाहः ।
यथा समुद्रात् सरितः प्रजाताः पुनस्तमेव प्रविशन्ति शश्वत् ।
एवं विदुर्ये परमामनन्तामजस्य शक्तिं पुरुषोत्तमस्य ।
देवानिमान् मुक्तसमस्तदोषान् स्वसन्निधाने विनिवेश्य देवः ।
पुनश्च मारीचत एव देवाः जाता आदित्यामसुराश्च दित्याम् ।
ततः स मग्नामलयो लयोदधौ महीं विलोक्याशु हरिर्वराहः ।
अथाब्जनाभप्रतिहारपालौ शापात् त्रिशो भूमितले प्रजातौ ।
(हतो) ततो हिरण्याक्ष उदारविक्रमो दितेः सुतो योऽवरजः सुरार्थे ।
अथो विधातुर्मुखतो विनिःसृतान् वेदान् हयास्यो जगृहेऽसुरेन्द्रः ।
मन्वन्तरप्रलये मत्स्यरूपो विद्यामदान्मनवे देवदेवः ।
अथो दितेर्ज्येष्ठसुतेन शश्वत् प्रपीडिता ब्रह्मवरात् सुरेशाः ।
अभिष्टुतस्तैर्हरिरुग्रवीर्यो नृसिंहरूपेण स आविरासीत् ।
सुरासुराणामुदधिं विमथ्नतां दधार पृष्ठेन गिरिं स मन्दरम् ।
वरादजेयत्वमवाप दैत्यराट् चतुर्मुखस्यैव बलिर्यदा तदा ।
‘स वामनात्माऽसुरभूभृतोऽध्वरं जगाम गां सन्नमयन् पदे पदे ।
पितामहेनास्य पुरा हि (भि) याचितो बलेः कृते केशव आह यद्वचः ।
बभूविरे चन्द्रललामतो वरात् पुरा ह्यजेया असुरा धरातले ।
विरिञ्चसृष्टैर्नितरामवध्यौ वराद् विधातुर्दितिजौ हिरण्यकौ ।
स चासुरान् रुद्रवरादवध्यानिमान् समस्तैरपि देवदेव ।
इत्यादरोक्तस्त्रिदशैरजेयः स शार्ङ्गधन्वाऽथ भृगूद्वहोऽभूत् ।
ततः पुलस्त्यस्य कुले प्रसूतौ तावादिदैत्यौ जगदेकशत्रू ।
सर्वैरजेयः स च कुम्भकर्णः पुरातने जन्मनि धातुरेव ।
तदाऽब्जजं शूलिनमेव चाग्रतो निधाय देवाः पुरुहूतपूर्वकाः ।
त्वमेक ईशः परमः स्वतन्त्रस्त्वमादिरन्तो जगतो नियोक्ता ।
मनुष्यमानात् त्रिशतं सषष्टिकं दिवौकसामेकमुशन्ति वत्सरम् ।
सहस्त्रवृत्तं तदहः स्वयम्भुवो निशा च तन्मानमितं शरच्छतम् ।
त्वया पुरा कर्णपुटाद्विनिर्मितौ महासुरौ तौ मधुकैटभाख्यौ ।
त्वदाज्ञया ब्रह्मवरादवध्यौ चिक्रीडिषासम्भवया (मुखोद्गतान्) मुखोद्गतौ ।
आहृत्य वेदानखिलान् प्रदाय स्वयम्भुवे तौ च जघन्थ दस्यू ।
एवं सुराणां च निसर्गजं बलं तथाऽसुराणां वरदानसम्भवम् ।
इमौ च रक्षोऽधिपती विरोद्धतौ जहि स्ववीर्येण नृषु प्रभूतः ।
स कश्यपस्यादितिगर्भजन्मनो विवस्वतस्तन्तुभवस्य भूभृतः ।
तदाज्ञया देवगणा बभूविरे पुरैव पश्चादपि तस्य भूम्नः ।
स देवतानां प्रथमो गुणाधिको बभूव नाम्ना हनुमान् प्रभञ्जनः ।
सुग्रीव आसीत् परमेष्ठितेजसा युतो रविः स्वात्मत एव जाम्बवान् ।
य एव सूर्यात् पुनरेव संज्ञया नाम्ना यमो दक्षिणदिक्प आसीत् ।
ब्रह्मोद्भवः सोम उतास्य सूनोरत्रेरभूत् सोऽङ्गद एव जातः ।
बृहस्पतिर्ब्रह्मसुतोऽपि पूर्वं सहैव शच्या मनसोऽभिजातः ।
स एव शच्या सह वानरोऽभूत् स्वयम्भुवो देवगुरुर्बृहस्पतिः ।
ब्रह्मोद्भवौ तौ पुनरेव सूर्याद् बभूवतुस्तत्र कनीयसस्तु ।
नीलोऽग्निरासीत् कमलोद्भवोत्थः कामः पुनः श्रीरमणाद् रमायाम् ।
पूर्वं हरेश्चक्रमभूद्धि दुर्गा तमःस्थिता श्रीरिति यां वदन्ति ।
गदा तु वायुर्बलसंविदात्मा शार्ङ्गं च विद्येति रमैव खड्गः ।
एवं स्थितेष्वेव पुरातनेषु वराद् रथाङ्गत्वमवाप कामः ।
तावेव जातौ भरतश्च नाम्ना शत्रुघ्न इत्येष च रामतोऽनु ।
कौसल्यकापुत्र उरुक्रमोऽसावेकस्तथैको भरतस्य मातुः ।
सङ्कर्षणाद्यैस्त्रिभिरेव रूपैराविष्ट आसीत् त्रिषु तेषु विष्णुः ।
येऽन्ये च भूपाः कृतवीर्यजाद्याः बलाधिकाः सन्ति सहस्रशोऽपि ।
स्वयं रमा सीरत एव जाता सीतेति रामार्थमनूपमा या ।
इत्यादिकल्पोत्थित एष सर्गो मया समस्तागमनिर्णयात्मकः ।
पाश्चात्त्यकल्पेष्वपि सर्गभेदाः श्रुतौ पुराणेष्वपि चान्यथोक्ताः ।
चतुर्थोऽध्यायः
औं ॥ अथाभ्यवर्धंश्चतुराः कुमारा नृपस्य गेहे पुरुषोत्तमाद्याः ।
निरीक्ष्य नित्यं चतुरः कुमारान् पिता मुदं सन्ततमाप चोच्चम् ।
तन्मातरः पौरजना अमात्या अन्तःपुरा वैषयिकाश्च सर्वे ।
ततः सुवंशे शशिनः प्रसूतो गाधीति शक्रस्तनुजोऽस्य चाऽसीत् ।
तेनार्थितो यज्ञरिरक्षयैव कृच्छ्रेण पित्राऽस्य भयाद्विसृष्टः ।
अनुग्रहार्थं स ऋषेरवाप सलक्ष्मणोऽस्त्रं मुनितो हि केवलम् ।
अथो जघानाऽऽशु शरेण ताटकां वराद् विधातुस्तदनन्यवध्याम् ।
शरेण मारीचमथार्णवेऽक्षिपद् वचो विरिञ्चस्य तु मानयानः ।
तदा विदेहेन सुतास्वयंवरो विघोषितो दिक्षु विदिक्षु सर्वशः ।
अथो अहल्यां पतिनाऽभिशप्तां प्रधर्षणादिन्द्रकृताच्छिलीकृताम् ।
बलं स्वभक्तेरधिकं प्रकाशयन्ननुग्रहं च त्रिदशेष्वतुल्यम् ।
श्यामावदाते जगदेकसारे स्वनन्तचन्द्राधिककान्तिकान्ते ।
पपुर्नितान्तं सरसाक्षिभृङ्गैर्वराननाब्जं पुरुषोत्तमस्य ।
तथा विदेहः प्रतिलभ्य रामं सहस्रनेत्रावरजं गविष्ठम् ।
मेने च जामातरमात्मकन्यागुणोचितं रूपनवावतारम् ।
स आह चैनं परमं वचस्ते करोमि नात्रास्ति विचारणा मे ।
तपो मया चीर्णमुमापतेः पुरा वरायुधावाप्तिधृतेन चेतसा ।
न देवदैत्योरगदेवगायका अलं धनुश्चालयितुं सवासवाः ।
अधार्यमेतद्धनुराप्य शङ्करादहं नृणां वीर्यपरीक्षणे धृतः ।
इतीरितां मे गिरमभ्यवेत्य दितेः सुता दानवयक्षराक्षसाः ।
संस्विन्नगात्राः परिवृत्तनेत्राः दशाननाद्याः पतिता विमूर्छिताः ।
पुरा हि मेऽदात् प्रभुरब्जजो वरं प्रसादितो मे तपसा कथञ्चन ।
ततस्तु ते नष्टमदा इतो गताः समस्तशो ह्यस्तन एव पार्थिवाः ।
तथेति चोक्ते मुनिना स किङ्करैरनन्तभोगोपममाश्वथाऽनयत् ।
विकृष्यमाणं तदनन्तराधसा परेण निःसीमबलेन लीलया ।
स मध्यतस्तत् प्रविभज्य लीलया यथेक्षुदण्डं शतमन्युकुञ्जरः ।
तमब्जनेत्रं पृथुतुङ्गवक्षसं श्यामावदातं चलकुण्डलोज्ज्वलम् ।
अथो कराभ्यां प्रतिगृह्य मालामम्लानपद्मां जलजायताक्षी ।
ततः प्रमोदो नितरां जनानां विदेहपुर्यामभवत् समन्तात् ।
लक्ष्म्या समेते प्रकटं रमेशे सम्प्रेषयामास तदाऽऽशु पित्रे ।
अथाऽत्मजाभ्यां सहितः सभार्यो ययौ गजस्यन्दनपत्तियुक्तया ।
स मैथिलेनातितरां समर्चितो विवाहयामास सुतं मुदम्भरः ।
तदा विमानावलिभिर्नभस्तलं दिदृक्षतां सङ्कुलमास नाकिनाम् ।
विजानमाना जगतां हि मातरं पुराऽर्थितुं नाऽययुरत्र देवताः ।
यथा पुरा सागरजास्वयंवरे सुमानसानामभवत्समागमः ।
प्रगृह्य पाणिं च नृपात्मजाया रराज राजीवसमाननेत्रः ।
स्वलङ्कृतास्तत्र विचेरुरङ्गना विदेहराजस्य च या हि योषितः ।
प्रियाणि वस्त्राणि रथान् सकुञ्जरान् परार्द्ध्यरत्नान्यखिलस्य चेशितुः ।
महोत्सवं तं त्वनुभूय देवता नराश्च सर्वे प्रययुर्यथाऽऽगतम् ।
तदन्तरे सोऽथ ददर्श भार्गवं सहस्रलक्षामितभानुदीधितिम् ।
अजानतां राघवमादिपूरुषं समागतं ज्ञापयितुं निदर्शनैः ।
न मे सुतं हन्तुमिहार्हसि प्रभो वयोगतस्येत्युदितः स भार्गवः ।
स इत्थमुक्त्वा नृपतिं रघूत्तमं भृगूत्तमः प्राह निजां तनुं हरिः ।
शृणुष्व राम त्वमिहोदितं मया धनुर्द्वयं पूर्वमभून्महाद्भुतम् ।
तदा तु लोकस्य निदर्शनार्थिभिः समर्थितौ तौ हरिशङ्करौ सुरैः ।
ततो हि युद्धाय रमेशशङ्करौ व्यवस्थितौ तौ धनुषी प्रगृह्य ।
शशाक नैवाथ यदाऽभिवीक्षितुं प्रस्पन्दितुं वा कुत एव योद्धुम् ।
यदीरणेनैव विनैष शङ्करः शशाक न प्रश्वसितुं च केवलम् ।
ततः प्रणम्याऽऽशु जनार्दनं हरः प्रसन्नदृष्ट्या हरिणाऽभिवीक्षितः ।
धनुर्यदन्यद्धरिहस्तयोग्यं तत्कार्मुकात् कोटिगुणं पुनश्च ।
यदीदमागृह्य विकर्षसि त्वं तदा हरिर्नात्र विचार्यमस्ति ।
प्रगृह्य तच्चापवरं स राघवश्चकार सज्यं निमिषेण लीलया ।
प्रदर्शिते विष्णुबले समस्ततो हराच्च निःसङ्ख्यतया महाधिके ।
अलं बलं ते जगतोऽखिलाद्वरं परोऽसि नारायण एव नान्यथा ।
पुरोऽतुलो नाम महासुरोऽभवद् वरात् स तु ब्रह्मण आप लोकताम् ।
अतो वधार्थं जगदन्तकस्य सर्वाजितोऽहं जितवद् व्यवस्थितः ।
पुरा वरोऽनेन शिवोपलम्भितो मुमुक्षया विष्णुतनुप्रवेशनम् ।
इतीव रामाय स राघवः शरं विकर्षमाणो विनिहत्य चासुरम् ।
निरन्तरानन्तविबोधसारः स जानमानोऽखिलमादिपूरुषः ।
स चेष्टितं चैव निजाश्रयस्य जनस्य सत्तत्त्वविबोधकारणम् ।
ततः स कारुण्यनिधिर्निजे जने नितान्तमैक्यं स्वगतं प्रकाशयन् ।
समेत्य चैक्यं जगतोऽभिपश्यतः प्रणुद्य शङ्कामखिलां जनस्य ।
ततो नृपोऽत्यर्थमुदाऽभिपूरितः सुतैः समस्तैः स्वपुरीमवाप ह ।
यथा पुरा श्रीरमणः श्रिया तया रतो नितान्तं हि पयोब्धिमध्ये ।
इमानि कर्माणि रघूत्तमस्य हरेर्विचित्राण्यपि नाद्भुतानि ।
पञ्चमोऽध्यायः
औं ॥ इत्थं विश्वेश्वरेऽस्मिन्नखिलजगदवस्थाप्य सीतासहाये भूमिष्ठे सर्वलोकास्तुतुषुरनुदिनं वृद्धभक्त्यानितान्तम् ।
पूर्वं क्षीराब्धिजाता कथमपि तपसैवाप्सरस्त्वं प्रयाता तां नेतुं तत्तमोऽन्धं कमलजनिरुवाचाऽऽशु रामाभिषेकम् ।
तद्वाक्यात् कैकयी सा पतिगवरबलादाजहारैव राज्यं रामस्तद्गौरवेण त्रिदशमुनिकृतेऽरण्यमेवाऽविवेश ।
वृक्षान् पक्षीभकीटान् पितरमथ सखीन् मातृपूर्वान् विसृज्य प्रोत्थां गङ्गांस्वपादाद्धर इव गुहेनार्चितः सोऽथ तीर्त्वा ।
एतस्मिन्नेव काले दशरथनृपतिः स्वर्गतोऽभूद्वियोगाद् रामस्यैवाथ पुत्रौ विधिसुतसहितैर्मन्त्रिभिः केकयेभ्यः ।
धिक्कुर्वन्तौ नितान्तं सकलदुरितगां मन्थरां कैकयीं च प्राप्तौ रामस्य पादौ मुनिगणसहितौ तत्र चोवाच नत्वा ।
इत्युक्तः कर्तुमीशः सकलसुरगणाप्यायनं रामदेवः सत्यां कर्तुं च वाणीमवददतितरां नेति सद्भक्तिनम्रम् ।
श्रुत्वैतद्रामवाक्यं हुतभुजि पतने स प्रतिज्ञां च कृत्वा रामोक्तस्यान्यथात्वे न तु परमभिवेक्ष्येऽहमित्येव तावत् ।
समस्तपौरानुगतेऽनुजे गते स चित्रकूटे भगवानुवास ह ।
स चासुरावेशवशाद्रमास्तने यदा व्यधात्तुण्डमथाभिवीक्षितः ।
स्वयम्भुशर्वेन्द्रमुखान्सुरेश्वरान् जिजीविषुस्ताञ्छरणं गतोऽपि ।
पुनः प्रयातः शरणं रघूत्तमं विसर्जितस्तेन निहत्य चासुरम् ।
स वायसानामसुरोऽखिलानां वरादुमेशस्य बभूव चाक्षिगः ।
ददुर्हि तस्मै विवरं बलार्थिनो यद्वायसास्तेन तदक्षिपातनम् ।
भविष्यतामप्यथ यावदेव द्विनेत्रता काककुलोद्भवानाम् ।
अतः पुनर्भावममुष्य हिन्वन् भविष्यतश्चैकदृशश्चकार ।
रामोऽथ दण्डकवनं मुनिवर्यनीतो लोकाननेकश उदारबलैर्निरस्तान् ।
आसीच्च तत्र शरभङ्ग इति स्म जीर्णो लोकं हरेर्जिगमिषुर्मुनिरुग्रतेजाः ।
धर्मो यतोऽस्य वनगस्य नितान्तशक्तिह्रासे स्वधर्मकरणस्य हुताशनादौ ।
रामोऽपि तत्र ददृशे धनदस्य शापाद् गन्धर्वमुर्वशिरतेरथ यातुधानीम् ।
भङ्क्त्वाऽस्य बाहुयुगलं बिलगं चकार सम्मानयन् वचनमम्बुजजन्मनोऽसौ ।
प्रीतिं विधित्सुरगमद्भवनं निजस्य कुम्भोद्भवस्य परमादरतोऽमुना च ।
आत्मार्थमेव हि पुरा हरिणा प्रदत्तमिन्द्रे तदिन्द्र उत रामकरार्थमेव ।
काले तदैव खरदूषणयोर्बलेन रक्षःस्वसा पतिनिमार्गणतत्पराऽऽसीत् ।
साऽनुज्ञयैव रजनीचरभर्तुरुग्रा भ्रातृद्वयेन सहिता वनमावसन्ती ।
तां तत्र हास्यकथया जनकासुताग्रे गच्छानुजं म इह मेति वचः स उक्त्वा ।
तत्प्रेरितान् सपदि भीमबलान् प्रयातांस्तस्याः खरत्रिशिरदूषणमुख्यबन्धून् ।
दत्तेऽभये रघुवरेण महामुनीनां दत्ते भये च रजनीचरमण्डलस्य ।
श्रुत्वाऽऽशु कार्यमवमृश्य जगाम तीरे क्षेत्रं नदीनदपतेः श्रवणं धरित्र्याः ।
तेनार्थितः सपदि राघववञ्चनार्थे मारीच आह शरवेगममुष्य जानन् ।
इत्युक्तवन्तमथ रावण आह खड्गं निष्कृष्य हन्मि यदि मे न करोषि वाक्यम् ।
सम्प्राप्य हैममृगतां बहुरत्नचित्रः सीतासमीप उरुधा विचचार शीघ्रम् ।
देवेममाशु परिगृह्य च देहि मे त्वं क्रीडामृगं त्विति तयोदित एव रामः ।
तेनाऽहतः शरवरेण भृशं ममार विक्रुश्य लक्ष्मणमुरुव्यथया स पापः ।
यां यां परेश उरुधैव करोति लीलां तां तां करोत्यनु तथैव रमापि देवी ।
क्वाज्ञानमापदपि मन्दकटाक्षमात्रात् सर्गस्थितिप्रलयसंसृतिमोक्षहेतोः ।
देव्याः समीपमथ रावण आससाद साऽदृश्यतामगमदप्यविषह्यशक्तिः ।
तस्यास्तु तां प्रतिकृतिं प्रविवेश शक्रो देव्याश्च सन्निधियुतां व्यवहारसिद्ध्यै ।
मार्गे व्रजन्तमभियाय ततो हनूमान् संवारितो रविसुतेन च जानमानः ।
प्राप्यैव राक्षस उताऽऽत्मपुरीं स तत्र सीताकृतिं प्रतिनिधाय ररक्ष चाथ ।
अन्वेषमाण इव तं च ददर्श गृध्रं सीतां रिरक्षिषुमथो रिपुणा विशस्तम् ।
अन्यत्र चैव विचरन् सहितोऽनुजेन प्राप्तः करौ स सहसाऽथ कबन्धनाम्नः ।
छित्वाऽस्य बाहुयुगलं सहितोऽनुजेन तं पूर्ववत् प्रतिविधाय सुरेन्द्रभृत्यम् ।
दृष्ट्वा तमेव शबरी परमं हरिं च ज्ञात्वा विवेश दहनं पुरतोऽस्य तस्यै ।
शापाद् वराप्सरसमेव हि तां विमुच्य शच्या कृतात् पतिपुरस्त्वतिदर्पहेतोः ।
देहेऽपि यत्र पवनोऽत्र हरिर्यतोऽसौ तत्रैव वायुरिति वेदवचः प्रसिद्धम् ।
एवं स कृष्णतनुरर्जुनमप्यरक्षद् भीमार्थमेव तदरिं रविजं निहत्य ।
एवं सुराश्च पवनस्य वशे यतोऽतः सुग्रीवमत्र तु परत्र च शक्रसूनुम् ।
‘यत्पादपङ्कजरजः शिरसा विभर्ति श्रीरब्जजश्च गिरिशः सह लोकपालैः’ ।
समागते तु राघवे प्लवङ्गमाः ससूर्यजाः ।
संस्थाप्याऽशु हरीन्द्रान् जानन् विष्णोर्गुणाननन्तान् सः ।
षष्ठोऽध्यायः
औं ॥ उत्थाप्य चैनमरविन्ददलायताक्षश्चक्राङ्कितेन वरदेन कराम्बुजेन ।
आरोप्य चांसयुगळं भगवन्तमेनं तस्यानुजं च हनुमान् प्रययौ कपीन्द्रम् ।
श्रुत्वाऽस्य दुःखमथ देववरः प्रतिज्ञां चक्रे स वालिनिधनाय हरीश्वरोऽपि ।
वीक्ष्यैव तां निपतितामथ रामदेवः सोऽङ्गुष्ठमात्रचलनादतिलीलयैव ।
शर्वप्रसादजबलाद्दितिजानवध्यान् सर्वान् निहत्य कुणपेन पुनश्च सख्या ।
एकैकमेषु स विकम्पयितुं समर्थः पत्राणि लोप्तुमपि तूत्सहते न शक्तः ।
जेतुं चतुर्गुणबलो हि पुमान् प्रभुः स्याद्धन्तुं शताधिकबलोऽतिबलं सुशक्तः ।
श्रुत्वाऽस्य वाक्यमवमृश्य दितेः सुतांस्तान् धातुर्वरादखिलपुम्भिरभेद्यरूपान् ।
सन्धाय कार्मुकवरे निशिते तु बाणेऽथाऽकृष्य दक्षिणभुजेन तदा प्रमुक्ते ।
भित्त्वा च तान् सगिरिकुं भगवत्प्रमुक्तः पातालसप्तकमथात्र च ये त्ववध्याः ।
नैतद्विचित्रममितोरुबलस्य विष्णोर्यत्प्रेरणात् सपवनस्य भवेत् प्रवृत्तिः ।
दृष्ट्वा बलं भगवतोऽथ हरीश्वरोऽसावग्रे निधाय तमयात् पुरमग्रजस्य ।
तन्मुष्टिभिः प्रतिहतः प्रययावशक्तः सुग्रीव आशु रघुपोऽपि हि धर्ममीक्षन् ।
सौभ्रात्रमेष यदि वाञ्छति वालिनैव नाहं निरागसमथाग्रजनिं हनिष्ये ।
कोपः सहोदरजने पुनरन्तकाले प्रायो निवृत्तिमुपगच्छति तापकश्च ।
तस्मान्न बन्धुजनगे जनिते विरोधे कार्यो वधस्तदनुबन्धिभिराश्वितीह ।
यः प्रेरकः सकलशेमुषिसन्ततेश्च तस्याज्ञता कुत इहेशवरस्य विष्णोः ।
रामाज्ञयैव लतया रविजे विभक्ते वायोः सुतेन रघुपेण शरे च मुक्ते ।
भक्तो ममैष यदि मामभिपश्यतीह पादौ ध्रुवं मम समेष्यति निर्विचारः ।
कार्यं ह्यभीष्टमपि तत् प्रणतस्य पूर्वं शस्तो वधो न पदयोः प्रणतस्य चैव ।
यः प्रेरकः सकललोकबलस्य नित्यं पूर्णाव्ययोच्चबलवीर्यतनुः स्वतन्त्रः ।
सन्नेऽथ वालिनि जगाम च तस्य पार्श्वं प्राहैनमार्द्रवचसा यदि वाञ्छसि त्वम् ।
कार्याणि तस्य चरमाणि विधाय पुत्रं त्वग्रे निधाय रविजः कपिराज्य आसीत् ।
अथातिसक्ते क्षितिपे कपीनां प्रविस्मृते रामकृतोपकारे ।
न विस्मृतिस्ते रघुवर्यकार्ये कार्या कथञ्चित् स हि नोऽभिपूज्यः ।
स एवमुक्त्वा हरिराजसन्निधौ द्वीपेषु सप्तस्वपि वानरान् प्रति ।
हरीश्वराज्ञाप्रणिधानपूर्वकं हनूमता ते प्रहिता हि वानराः ।
तदैव रामोऽपि हि भोगसक्तं प्रमत्तमालक्ष्य कपीश्वरं प्रभुः ।
यदि प्रमत्तोऽसि मदीयकार्ये नयाम्यहं त्वेन्द्रसुतस्य मार्गम् ।
इतीड्यरामेण समीरिते तदा ययौ सबाणः सधनुः स लक्ष्मणः ।
हनूमतः साधुवचोभिराशु प्रसन्नचेतस्यधिपे कपीनाम् ।
ससम्भ्रमं तं पतितं पदाब्जयोस्त्वरन् समुत्थाप्य समाश्लिषत् प्रभुः ।
समस्तदिक्षु प्रहितेषु तेन प्रभुर्हनूमन्तमिदं बभाषे ।
अतस्त्वमेव प्रतियाहि दक्षिणां दिशं समादाय मदङ्गुलीयकम् ।
समस्तदिक्षु प्रतियापिता हि ते हरीश्वराज्ञामुपधार्य मासतः ।
समस्तदुर्गप्रवरं दुरासदं विमार्गतां विन्ध्यगिरिं महात्मनाम् ।
कृतं मयेनातिविचित्रमुत्तमं समीक्ष्य तत्तार उवाच चाङ्गदम् ।
दुरासदोऽसावतिचण्डशासनो हनिष्यति त्वामपि किं मदादिकान् ।
न चैव रामेण सलक्ष्मणेन प्रयोजनं नो वनचारिणां सदा ।
इतीरितं मातुलवाक्यमाशु स आददे वालिसुतोऽपि सादरम् ।
राज्यार्थिना येन हि घातितोऽग्रजो हृताश्च दाराः सुनृशंसकेन ।
इतीरिते शक्रसुतात्मजेन तथेति होचुः सह जाम्बवन्मुखाः ।
विज्ञातमेतद्धि मयाऽङ्गदस्य राज्याय ताराभिहितं हि वाक्यम् ।
न चाहमाक्रष्टुमुपायतोऽपि शक्यः कथञ्चित् सकलैः समेतैः ।
वचो ममैतद्यदि चाऽऽदरेण ग्राह्यं भवेद्वस्तदतिप्रियं मे ।
इतीरितं तत् पवनात्मजस्य श्रुत्वाऽतिभीता धृतमूकभावाः ।
निरीक्ष्य ते सागरमप्रधृष्यमपारमेयं सहसा विषण्णाः ।
प्रायोपविष्टाश्च कथा वदन्तो रामस्य संसारविमुक्तिदातुः ।
तस्याग्रजोऽसावरुणस्य सूनुः सूर्यस्य बिम्बं सह तेन यातः ।
स दग्धपक्षः सवितृप्रतापाच्छ्रुत्वैव रामस्य कथां सपक्षः ।
स रावणस्याथ गतिं सुतोक्तां निवेद्य दृष्ट्वा जनकात्मजाकृतिम् ।
ततस्तु ते ब्रह्मसुतेन पृष्टा न्यवेदयन्नात्मबलं पृथक् पृथक् ।
सनीलमैन्दद्विविदाः सताराः सर्वेऽप्यशीत्याः परतो न शक्ताः ।
बलेर्यदा विष्णुरवाप लोकांस्त्रिभिः क्रमैर्नन्दिरवं प्रकुर्वता ।
अतो जवो मे न हि पूर्वसम्मितः पुरा त्वहं षण्णवतिप्लवोऽस्मि ।
अपूरिते तैः सकलैः शतस्य गमागमे शत्रुबलं च वीक्ष्य ।
अयं हि गृध्रः शतयोजनं गिरिं त्रिकूटमाहेत उतात्र विघ्नाः ।
उक्त्वा स इत्थं पुनराह सूनुं प्राणस्य निःसीमबलं प्रशंसयन् ।
इतीरितोऽसौ हनुमान् निजेप्सितं तेषामशक्तिं प्रकटां विधाय ।
सप्तमोऽध्यायः
औं ॥ रामाय शाश्वतसुविस्तृतषड्गुणाय सर्वेश्वराय सुखसारमहार्णवाय।
चुक्षोभ वारिधिरनुप्रययौ च शीघ्रं यादोगणैः सह तदीयबलाभिकृष्टः ।
श्यालो हरस्य गिरिपक्षविनाशकाले क्षिप्तोऽर्णवे स मरुतोर्वरितात्मपक्षः ।
नैवात्र विश्रमणमैच्छत निःश्रमोऽसौ निःसीमपौरुषगुणस्य कुतः श्रमोऽस्य ।
जिज्ञासुभिर्निजबलं तव भक्षमेतु यद्यत् त्वमिच्छसि तदित्यमरोदितायाः ।
दृष्ट्वा सुरप्रणयितां बलमस्य चोग्रं देवाः प्रतुष्टुवुरमुं सुमनोभिवृष्ट्या ।
लङ्कावनाय सकलस्य च निग्रहेऽस्याः सामर्थ्यमप्रतिहतं प्रददौ विधाता ।
निस्सीममात्मबलमित्यनुदर्शयानो हत्वैव तामपि विधातृवराभिगुप्ताम् ।
भूत्वा बिडालसमितो निशि तां पुरीं च प्राप्स्यन् ददर्श निजरूपवतीं स लङ्काम् ।
मार्गमाणो बहिश्चान्तः सोऽशोकवनिकातले ।
नरलोकविडम्बस्य जानन् रामस्य हृद्गतम् ।
तादृक्चेष्टासमेताया अङ्गुलीयमदात् ततः ।
भूषणानि द्विधा भूत्वा तान्येवाऽसन् तथैव च ।
यद्यप्येतन्न पश्यन्ति निशाचरगणास्तु ते ।
तेषां विडम्बनायैव दैत्यानां वञ्चनाय च ।
कृत्वा कार्यमिदं सर्वं विशङ्कः पवनात्मजः ।
अथ वनमखिलं तद् रावणस्यावलुम्प्य क्षितिरुहमिममेकं वर्जयित्वाऽऽशु वीरः ।
अथाशृणोद्दशाननः कपीन्द्रचेष्टितं परम् ।
समस्तशो विमृत्यवो वराद्धरस्य किङ्कराः ।
अशीतिकोटियूथपं पुरस्सराष्टकायुतम् ।
समावृतस्तथाऽऽयुधैः स ताडितश्च तैर्भृशम् ।
पुनश्च मन्त्रिपुत्रकान् स रावणप्रचोदितान् ।
बलाग्रगामिनस्तथा स शर्ववाक्सुगर्वितान् ।
अनौपमं हरेर्बलं निशम्य राक्षसाधिपः ।
स सर्वलोकसाक्षिणः सुतं शरैर्ववर्ष ह ।
स मण्डमध्यकासुतं समीक्ष्य रावणोपमम् ।
निधार्य एव रावणः स राघवस्य नान्यथा ।
अतस्तयोः समो मया तृतीय एष हन्यते ।
स चक्रवद् भ्रमातुरं विधाय रावणात्मजम् ।
विचूर्णिते धरातले निजे सुते स रावणः ।
अथेन्द्रजिन्महाशरैर्वरास्त्रसम्प्रयोजितैः ।
अथास्त्रमुत्तमं विधेर्युयोज सर्वदुस्सहम् ।
मया वरा विलङ्घिता ह्यनेकशः स्वयम्भुवः ।
इमे च कुर्युरत्र किं प्रहृष्टरक्षसां गणाः ।
इदं समीक्ष्य बद्धवत् स्थितं कपीन्द्रमाशु ते ।
अथ प्रगृह्य तं कपिं समीपमानयंश्च ते ।
कपे कुतोऽसि कस्य वा किमर्थमीदृशं कृतम् ।
अवैहि दूतमागतं दुरन्तविक्रमस्य माम् ।
न चेत् प्रदास्यसि त्वरन् रघूत्तमप्रियां तदा ।
न रामबाणधारणे क्षमाः सुरेश्वरा अपि ।
प्रकोपितस्य तस्य कः पुरस्थितौ क्षमो भवेत् ।
इतीरिते वधोद्यतं न्यवारयद् विभीषणः ।
अथास्य वस्त्रसञ्चयैः पिधाय पुच्छमग्नये ।
ममर्ष सर्वचेष्टितं स रक्षसां निरामयः ।
ददाह चाखिलं पुरं स्वपुच्छगेन वह्निना ।
सुवर्णरत्नकारितां स राक्षसोत्तमैः सह ।
स रावणं सपुत्रकं तृणोपमं विधाय च ।
विलङ्घ्य चार्णवं पुनः स्वजातिभिः प्रपूजितः ।
रामं सुरेश्वरमगण्यगुणाभिरामं सम्प्राप्य सर्वकपिवीरवरैः समेतः ।
रामोऽपि नान्यदनुदातुममुष्य योग्यमत्यन्तभक्तिभरितस्य विलक्ष्य किञ्चित् ।
अष्टमोऽध्यायः
औं ॥ श्रुत्वा हनूमदुदितं कृतमस्य सर्वं प्रीतः प्रयाणमभिरोचयते स रामः ।
सम्प्राप्य दक्षिणमपान्निधिमत्र देवः शिश्ये जगद्गुरुतमोऽप्यविषह्यशक्तिः (विचिन्त्यशक्तिः) ।
तत्राऽऽजगाम स विभीषणनामधेयो रक्षःपतेरवरजोऽप्यथ रावणेन ।
ब्रह्मात्मजेन रविजेन बलप्रणेत्रा नीलेन मैन्दविविदाङ्गदतारपूर्वैः ।
अत्राऽह रूपमपरं बलदेवताया ग्राह्यः स एष नितरां शरणं प्रपन्नः ।
इत्युक्तवत्यथ हनूमति देवदेवः सङ्गृह्य तद्वचनमाह यथैव पूर्वम् ।
सब्रह्मकाः सुरगणाः सहदैत्यमर्त्याः सर्वे समेत्य च मदङ्गुलिचालनेऽपि ।
इत्युक्तवाक्य उत तं स्वजनं विधाय राज्येऽभ्यषेचयदपारसुसत्त्वराशिः ।
‘कल्पान्तमस्य निशिचारिपतित्वपूर्वमायुः प्रदाय निजलोकगतिं तदन्ते ।
स क्रोधदीप्तनयनान्तहतः परस्य शोषं क्षणादुपगतो दनुजादिसत्त्वैः ।
तं त्वा वयं जडधियो न विदाम भूमन् कूटस्थमादिपुरुषं जगतामधीशम् ।
‘कामं प्रयाहि जहि विश्रवसोऽवमेहं त्रैलोक्यरावणमवाप्नुहि वीर पत्नीम् ।
इत्युक्तवन्तममुमाश्वनुगृह्य बाणं तस्मै धृतं दितिसुतात्मसु चान्त्यजेषु ।(भा\.पु\. ९\.१०\.१३\-१५)
कृत्वेरिणं तदथ मूलफलानि चात्र सम्यग्विधाय भवशत्रुरमोघचेष्टः ।
बध्वोदधौ रघुपतिर्विविधाद्रिकूटैः सेतुं कपीन्द्रकरकम्पितभूरुहाङ्गैः ।
प्राप्तं निशम्य परमं भुवनैकसारं निःसीमपौरुषमनन्तमसौ दशास्यः ।
प्रस्थाप्य वालिसुतमेव च राजनीत्यै रामस्तदुक्तवचनेऽप्यमुनाऽगृहीते ।
द्वारां निरोधसमये स दिदेश पुत्रं वाराम्पतेर्दिशि सुरेश्वरशत्रुमुग्रम् ।
विज्ञाय तत् स भगवान् हनुमन्तमेव देवेन्द्रशत्रुविजयाय दिदेश चाऽऽशु ।
मध्ये हरीश्वरमधिज्य धनुर्नियुज्य यस्यां स राक्षसपतिस्स्वयमेव तां हि ।
विद्रावितो हनुमतेन्द्रजिदाशु हस्तं तस्य प्रपन्न इव वीर्यममुष्य जानन् ।
नीलस्य नैव वशमेति स इत्यमोघशक्त्या विभीषण इमं प्रजहार साकम् ।
सर्वेषु तेषु निहतेषु दिदेश धूम्रनेत्रं स राक्षसपतिः स च पश्चिमेन ।
अकम्पनोऽपि राक्षसो निशाचरेशचोदितः ।
अथास्त्रसम्प्रदीपितैः समस्तशो महोल्मुकैः ।
ततस्तौ निकुम्भोऽथ कुम्भश्च कोपात् प्रदिष्टौ दशास्येन कुम्भश्रुतेर्हि ।
स कुम्भो विधातुः सुतं तारनीलौ नलं चाश्विपुत्रौ जिगायाङ्गदं च ।
ततो निकुम्भोऽद्रिवरप्रदारणं महान्तमुग्रं परिघं प्रगृह्य ।
तं भ्रामयत्याशु भुजेन वीरे भ्रान्ता दिशो द्यौश्च (सचन्द्रसूर्या) सचन्द्रसूर्याः ।
अनन्यसाध्यं तमथो निरीक्ष्य समुत्पपाताऽशु पुरोऽस्य मारुतिः ।
इतीरितस्तेन स राक्षसोत्तमो वरादमोघं प्रजहार वक्षसि ।
विचूर्णिते निजायुधे निकुम्भ एत्य मारुतिम् ।
प्रगृह्य कण्ठमस्य स प्रधानमारुतात्मजः ।
चकार तं रणात्मके मखे रमेशदैवते ।
सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च शकुनिर्देवतापनः ।
रावणप्रेरिताः सर्वान् मथ्नन्तः कपिकुञ्जरान् ।
युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च देवान्तकनरान्तकौ ।
नरान्तको रावणजो हयवर्योपरि स्थितः ।
तं दहन्तमनीकानि युवराजोऽङ्गदो बली ।
तस्योरसि प्रासवरं प्रजहार स राक्षसः ।
अथास्य हयमाश्वेव निजघान मुखे कपिः ।
स खड्गवरमादाय प्रससार रणे कपिम् ।
गन्धर्वकन्यकासूते निहते रावणात्मजे ।
तस्याऽपतत एवाऽशु शरवर्षप्रतापिताः ।
स शरं तरसाऽऽदाय रविपुत्रायुधोपमम् ।
अथ तिग्मांशुतनयः शैलं प्रचलपादपम् ।
तमापतन्तमालक्ष्य दूराच्छरविदारितम् ।
स तमाकर्णमाकृष्य यमदण्डोपमं शरम् ।
बलमप्रतिमं वीक्ष्य सुरशत्रोस्तु मारुतिः ।
तमापतन्तमालोक्य रथं सहयसारथिम् ।
अथ खड्गं समादाय पुर आपततो रिपोः ।
वरदानादवध्यं तं निहत्य पवनात्मजः ।
विद्राविताखिलकपिं वरात् त्रिशिरसं विभोः ।
युद्धोन्मत्तश्च मत्तश्च पार्वतीवरदर्पितौ ।
ततोऽतिकायोऽतिरथो रथेन स्वयम्भुदत्तेन हरीन् (प्रमृद्गन्) प्रमृत्नन्।
बृहत्तनुः कुम्भवदेव कर्णावस्येत्यतो नाम च कुम्भकर्णः ।
तमापतन्तं शरवर्षधारं महाघनाभं स्तनयित्नुघोषम् ।
ववर्षतुस्तावतिमात्रवीर्यौ शरान् सुरेशाशनितुल्यवेगान् ।
शरैः शरानस्य निवार्य वीरः सौमित्रिरस्त्राणि महास्त्रजालैः ।
छिन्नेषु तेषु द्विगुणास्यबाहुः पुनःपुनः सोऽथ बभूव वीरः ।
ब्रह्मास्त्रतोऽन्येन न वध्य एष वराद् विधातुः सुमुखेत्यदृश्यः ।
अथानुजो देवतमस्य सोऽस्त्रं ब्राह्मं तनूजे दशकन्धरस्य ।
हतेषु पुत्रेषु स राक्षसेशः स्वयं प्रयाणं समरार्थमैच्छत् ।
नियुङ्क्ष्व मां मे पितुरन्तकस्य वधाय राजन् सहलक्ष्मणं तम् ।
इतीरिते तेन नियोजितः स जगाम वीरो मकराक्षनामा ।
अचिन्तयन् लक्ष्मणबाणसङ्घानवज्ञया राममथाऽह्वयद् रणे ।
केनाप्युपायेन धनुर्धराणां वरः फलं तस्य ददामि तेऽद्य ।
प्रहस्य रामोऽस्य निवार्य चास्त्रैरस्त्राण्यमेयोऽशनिसन्निभेन ।
विदुद्रुवुस्तस्य तु येऽनुयायिनः कपिप्रवीरैर्निहतावशेषिताः ।
ततः स सज्जीकृतमात्तधन्वा रथं समास्थाय निशाचरेश्वरः ।
बलैस्तु तस्याथ बलं कपीनां नैकप्रकारायुधपूगभग्नम् ।
गजो गवाक्षो गवयो वृषश्च सगन्धमादा धनदेन जाताः ।
शरैस्तु तान् षड्भिरमोघवेगैर्निपातयामास दशाननो द्राक् ।
गिरीन् विदार्याऽशु शरैरथान्याञ्छरान् दशास्योऽमुचदाशु तेषु ।
शिलां समादाय तमापतन्तं विभेद रक्षो हृदये शरेण ।
तद्धस्तगं भूरुहमाशु बाणैर्दशाननः खण्डश एव कृत्वा ।
अथो हनूमानुरगेन्द्रभोगसमं स्वबाहुं भृशमुन्नमय्य ।
स लब्धसञ्ज्ञः प्रशशंस मारुतिं त्वया समो नास्ति पुमान् हि कश्चित् ।
अत्यल्पमेतद् यदुपात्तजीवितः पुनस्त्वमित्युक्त उवाच रावणः ।
किञ्चित् प्रहारेण तु विह्वलाङ्गवत् स्थिते हि तस्मिन्निदमन्तरं मम ।
तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य नीलो धनुर्ध्वजाग्राश्वरथेषु तस्य ।
स क्षिप्रमादाय हुताशनास्त्रं मुमोच नीले रजनीचरेशः ।
ततो ययौ राघवमेव रावणो निवारयामास तमाशु लक्ष्मणः ।
निवारितस्तेन स रावणो (दशाननो) भृशं रुषाऽन्वितो बाणममोघमुग्रम् ।
भृशाहतस्तेन मुमोह लक्ष्मणो रथादवप्लुत्य दशाननोऽपि ।
सम्प्राप्य सञ्ज्ञां स सुविह्वलोऽपि सस्मार रूपं निजमेव लक्ष्मणः ।
बलात् स्वदोर्भिः प्रतिगृह्य चाखिलैर्यदा स वीरं प्रचकर्ष रावणः ।
सहस्रमूर्ध्नोऽस्य बतैकमूर्ध्नि ससप्तपाता(ल)ळगिरीन्द्रसागरा ।
प्रकर्षति त्वेव निशाचरेश्वरे तथैव रामावरजं त्वरान्वितः ।
स मुष्टिमावृत्य (आवर्त्य) च वज्रकल्पं जघान तेनैव च रावणं रुषा ।
निपात्य रक्षोधिपतिं स मारुतिः प्रगृह्य सौमित्रिमुरङ्गशायिनः ।
स रामसंस्पर्शनिवारितक्लमः समुत्थितस्तेन समुद्धृते शरे ।
स शेषभोगाभमथो जनार्दनः प्रगृह्य चापं सशरं पुनश्च ।
रथं समारुह्य पुनः सकार्मुकः समार्गणो रावण आशु रामम् ।
रथस्थितेऽस्मिन् रजनीचरेशे न मे पतिर्भूमितळे(ले) स्थितः स्यात् ।
प्रहस्य रामोऽस्य हयान् निहत्य सूतं च कृत्वा तिलशो ध्वजं रथम् ।
कर्तव्यमूढं तमवेक्ष्य रामः पुनर्जगादाऽशु गृहं प्रयाहि ।
इतीरितोऽवाग्वदनो ययौ गृहं विचार्य कार्यं सह मन्त्रिभिः स्वकैः ।
सशैलशृङ्गासिपरश्वधायुधैर्निशाचराणामयुतैरनेकैः ।
शैलोपमानस्य च मांसराशीन् विधाय (भक्षान्) भक्ष्यानपि शोणितह्रदान् ।
उवाच चैनं रजनीचरेन्द्रः पराजितोऽस्म्यद्य हि जीवति त्वयि ।
इतीरितः कारणमप्यशेषं श्रुत्वा जगर्हाग्रजमेव वीरः ।
प्रशस्यते नो बलिभिर्विरोधः कथञ्चिदेषोऽतिबलो मतो मम ।
चरन्ति राजान उताक्रमं क्वचित् त्वयोपमान् बन्धुजनान् बलाधिकान् ।
प्राकारमुल्लङ्घ्य(मालङ्घ्य) स पञ्चयोजनं यदा ययौ शूलवरायुधो रणम् ।
शतवलिपनसाख्यौ तत्र वस्वंशभूतौ पवनगणवरांशौ श्वेतसम्पातिनौ च ।
रजनिचरवरोऽसौ कुम्भकर्णः प्रतापी कुमुदमपि जयन्तं पाणिना सम्पिपेष ।
अथाङ्गदश्च जाम्बवानिनात्मजश्च वानरैः ।
विचूर्णिताश्च पर्वतास्तनौ निशाचरस्य ते ।
अथापरं महाचलं प्रगृह्य भास्करात्मजः ।
तदा पपात सूर्यजस्तताड चाङ्गदं रुषा ।
अथ प्रगृह्य भास्करिं ययौ स राक्षसो बली ।
यदैनमेष बाधते तदा विमोचयाम्यहम् ।
इति व्रजत्यनु स्म तं मरुत्सुते निशाचरः ।
तुहिनसलिलमाल्यैः सर्वतोऽभिप्रवृष्टे रजनिचरवरेऽस्मिंस्तेन सिक्तः कपीशः ।
कराभ्यामस्य कर्णौ च नासिकां दशनैरपि ।
तळेन चैनं निजघान राक्षसः पिपेष भूमौ पतितं ततोऽपि ।
अमोघशूलं प्रपतन् (प्रपतत्)तमीक्ष्य(तदीक्ष्य) रवेः सुतस्योपरि मारुतात्मजः ।
अथैनमावृत्य जघान मुष्टिना स राक्षसो वायुसुतं स्तनान्तरे ।
तले(ळे)न वक्षस्यभिताडितो रुषा हनूमता मोहमवाप राक्षसः ।
विचिन्तयामास ततो हनूमान् मयैव हन्तुं समरे हि शक्यः ।
अनन्यवध्यं तमिमं निहत्य स्वयं स रामो यश आहरेत ।
मयैव वध्यौ भवतं त्रिजन्मसु प्रवृद्धवीर्याविति केशवेन ।
इति स्म सञ्चिन्त्य कपीशयुक्तो जगाम यत्रैव कपिप्रवीराः ।
ते भक्षितास्तेन कपिप्रवीराः सर्वे विनिर्जग्मुरमुष्य देहात् ।
स तान् विधूयाऽशु यथा महागजो जगाम रामं समरार्थमेकः ।
न्यवारयत् तं शरवर्षधारया स लक्ष्मणो नैनमचिन्तयत् सः ।
अथो समादाय धनुः सुघोरं शरान्सुरेशाशनितुल्यवेगान् ।
यावद्बलेन न्यहनत् खरादिकान् न तावतैव न्यपतत् स राक्षसः ।
द्वाभ्यां स बाहू निचकर्त तस्य पदद्वयं चैव तथा शराभ्याम् ।
अवर्धताब्धिः पतितेऽस्य काये महाचलाभे क्षणदाचरस्य ।
योजनानां त्रिलक्षं हि कुम्भकर्णोऽभ्यवर्धत ।
स तु स्वभावमापन्नो म्रियमाणोऽभ्यवर्धत ।
अथापरे ये रजनीचरास्तदा कपिप्रवीरैर्निहताश्च सर्वशः ।
स दुःखतप्तो निपपात मूर्छितो निराशकश्चाभवदात्मजीविते ।
मया गृहीतस्त्रिदशेश्वरः पुरा विषीदसे किं नरराजपुत्रतः ।
स आत्तधन्वा सशरो रथेन वियत्समारुह्य ययावदर्शनम् ।
पुराऽवताराय यदा स विष्णुर्दिदेश सर्वांस्त्रिदशांस्तदैव ।
तमाह विष्णुर्न भुवि प्रजातिमुपैहि सेवां तव चान्यथाऽहम् ।
वरेण शर्वस्य हि रावणात्मजो यदा निबध्नाति कपीन् सलक्ष्मणान् ।
अहं समर्थोऽपि स लक्ष्मणश्च तथा हनूमान् न विमोचयामः ।
तदेतदुक्तं हि पुराऽऽत्मना यत् ततो हि रामो न मुमोच कञ्चन ।
अथो निबद्ध्याऽशु हरीन् सलक्ष्मणान् जगाम रक्षः स्वपितुः सकाशम् ।
स पक्षिराजोऽथ हरेर्निदेशं स्मरंस्त्वरावानिह चाऽजगाम ।
स राममानम्य परात्मदैवतं ययौ सुमाल्याभरणानुलेपनः ।
श्रुत्वा निनादं प्लवगेश्वराणां पुनः सपुत्रोऽत्रसदत्र रावणः ।
पुनश्च हुत्वा स हुताशमेव रथं समारुह्य ययावदर्शनम् ।
पुनश्च तस्यास्त्रनिपीडितास्ते निपेतुरुर्व्यां कपयः सलक्ष्मणाः ।
विज्ञातुकामः पुरि सम्प्रवृत्तिं विभीषणः पूर्वगतस्तदाऽऽगात् ।
स तं समादाय ययौ विधातृजं विमूर्च्छितं चोदकसेकतस्तम् ।
ऊचे पुनर्जीवति किं हनूमान् जीवाम सर्वेऽपि हि जीवमाने ।
इत्युक्तो जाम्बवानाह हनूमन्तमनन्तरम् ।
मृतसञ्जीवनी मुख्या सन्धानकरणी परा ।
इत्युक्तः स क्षणेनैव प्रापतद् गन्धमादनम् ।
अन्तर्हिताश्चौषधीस्तु तदा विज्ञाय मारुतिः ।
स तं समुत्पाट्य गिरिं करेण प्रतोल(ळ)यित्वा बलदेवसूनुः ।
अवाप चाक्ष्णोः स निमेषमात्रतो निपातिता यत्र कपिप्रवीराः ।
अपूजयन् मारुतिमुग्रपौरुषं रघूत्तमोऽस्यानुजनिस्तथाऽपरे ।
स देवगन्धर्वमहर्षिसत्तमैरभिष्टुतो रामकरोप(करेण)गूहितः ।
स पूर्ववन्मारुतिवेगचोदितो निरन्तरं श्लिष्टतरोऽत्र चाभवत् ।
पुनश्च तान् प्रेक्ष्य समुत्थितान् कपीन् भयं महच्छक्रजितं विवेश ।
वराश्रयेणाजगिरीशयोस्तथा पुनर्महास्त्रैः स बबन्ध तान् कपीन् ।
पितामहास्त्रेण निहन्मि दुर्मतिं तवाऽज्ञया शक्रजितं सबान्धवम् ।
न सोढुमीशोऽसि यदि त्वमेतदस्त्रं तदाऽहं शरमात्रकेण ।
इति स्म वीन्द्रस्य हनूमतश्च बलप्रकाशाय पुरा प्रभुः स्वयम् ।
अनेन दृष्टोऽहमिति स्म दुष्टो विज्ञाय बाह्वोर्बलमस्य चोग्रम् ।
हाहाकृते प्रद्रुत इन्द्रशत्रौ रघूत्तमः शत्रुविभीषणत्वात् ।
निशाचरास्त्रं ह्यगमत् क्षणेन रामास्त्रवीर्याद्धरयो नदन्तः ।
सुरैश्च पुष्पं वर्षद्भिरीडितस्तस्थौ धनुष्पाणिरनन्तवीर्यः ।
विभीषणोऽथाऽह रघूत्तमं प्रभुं नियोजयाद्यैव वधाय दुर्मतेः ।
न वै वधं राम इयेष तस्य पलायितस्याऽत्मसमीक्षणात् पुनः ।
स आदिदेशावरजं जनार्दनो हनूमता चैव विभीषणेन ।
स जुह्वतस्तस्य चकार विघ्नं प्लवङ्गमैः सोऽथ युयुत्सया रथम् ।
उभौ च तावस्त्रविदां वरिष्ठौ शरैः शरीरान्तकरैस्ततक्षतुः ।
अस्त्राणि तस्यास्त्रवरैः स लक्ष्मणो निवार्य शत्रोश्चलकुण्डलोज्ज्वलम् ।
निपातितेऽस्मिन् नितरां निशाचरान् प्लवङ्गमा जघ्नुरनेककोटिशः ।
स तन्निशम्याप्रियमुग्ररूपं भृशं विनिश्वस्य विलप्य दुःखात् ।
मरणाभिमुखः शीघ्रं रावणो रणकर्मणे ।
त्रिंशत् सहस्राणि महौघकानामक्षोहिणीनां (अपि) सह षट्सहस्रम् ।
तदप्रधृष्यं वरतः स्वयम्भुवो युगान्तकालार्णवघूर्णितोपमम् ।
आगच्छमानं तदपारमेयं बलं सुघोरं प्रल(ळ)यार्णवोपमम् ।
वरो हि दत्तोऽस्य पुरा स्वयम्भुवा धरातले(ळे)ऽल्पेऽपि निवासशक्तिः ।
प्रगृह्य रामोऽथ धनुः शरांश्च समन्ततस्तानवधीच्छरौघैः ।
क्षणेन सर्वांश्च निहत्य राघवः प्लवङ्गमानामृषभैः स पूजितः ।
अथाऽययौ सर्वनिशाचरेश्वरो हतावशिष्टेन बलेन संवृतः ।
विरूपनेत्रोऽथच यूपनेत्रस्तथा महापार्श्वमहोदरौ च ।
अथास्य सैन्यानि निजघ्नुरोजसा समन्ततः शैलशिलाभिवृष्टिभिः ।
वीक्ष्यातिकायं तमभिद्रवन्तं स कुम्भकर्णोऽयमिति ब्रुवन्तः ।
वदन् स तिष्ठध्वमिति स्म वीरो विभीषिकामात्रमिदं न यात ।
अथो शरानाशु विमुञ्चमानं शिरः परामृश्य निपात्य भूतळे ।
अथो महापार्श्व उपाजगाम प्रवर्षमाणोऽस्य शराम्बुधाराः ।
निगृह्य केशेषु निपात्य भूतले(ळे) चकर्त वामांसत औदरं परम् ।
अथैनमाजग्मतुरुद्यतायुधौ विरूपनेत्रोऽप्यथ यूपनेत्रः ।
ताभ्यां स बद्धः शरपञ्जरेण विचेष्टितुं नाशकदत्र वीरः ।
उभौ च तौ तेन विचूर्णितौ रणे रवेः सुतस्योरुबलेरितेन ।
ततस्तु सर्वांश्च हरिप्रवीरान् विधूय बाणैर्बलवान् दशाननः ।
तदा दशास्योऽन्तकदण्डकल्पां मयाय दत्तां कमलोद्भवेन ।
तया स वीरः सुविदारितोराः पपात भूमौ सुभृशं विमूर्च्छितः ।
तेनातिगाढं व्यथितो दशाननो मुखैर्वमञ्छोणितपूरमाशु ।
समुद्बबर्हाथ च तां स राघवो दिदेश च प्राणवरात्मजं पुनः ।
तद्गन्धमात्रेण समुत्थितोऽसौ सौमित्रिरात्तोरुबलश्च पूर्ववत् ।
प्राक्षिपत् तं गिरिवरं लङ्कास्थः सन् स मारुतिः ।
तद्बाहुवेगात् संश्लेषं प्राप पूर्ववदेव सः ।
रामाज्ञयैव रक्षांसि हरयोऽब्धाववाक्षिपन् ।
छिन्नप्ररोहिणश्चैव विशल्याः पूर्ववर्णिनः ।
अथाऽससादोत्तमपूरुषं प्रभुं विमानगो रावण आयुधौघान् ।
सम्मानयन् राघवमादिपूरुषं निर्यातयामास रथं पुरन्दरः ।
आरुह्य तं रथवरं जगदेकनाथो लोकाभयाय रजनीचरनाथमाशु ।
आयान्तमीक्ष्य रजनीचरलोकनाथः शस्त्राण्यथास्त्रसहितानि मुमोच रामे ।
कृत्तानि तानि पुनरेव समुत्थितानि दृष्ट्वा वराच्छतधृतेर्हृदयं विभेद ।
तस्मिन् हते त्रिजगतां परमप्रतीपे ब्रह्मा शिवेन सहितः सह लोकपालैः ।
अथैनमस्तौत् पितरं कृताञ्जलिर्गुणाभिरामं जगतः पितामहः ।
त्वमेक ईशोऽस्य नचाऽदिरन्तस्तवेड्य कालेन तथैव देशतः ।
नचोद्भवो नैव तिरस्कृतिस्ते क्वचिद् गुणानां परतः स्वतो वा ।
यथाऽर्चिषोऽग्नेः पवनस्य वेगा मरीचयोऽर्कस्य नदीषु चाऽपः ।
ये ये च मुक्तास्त्वथ ये च बद्धाः सर्वे तवेशेश वशे सदैव ।
किमेष ईदृग्गुणकस्य ते प्रभो रक्षोवधोऽशेषसुरप्रपालनम् ।
इतीरिते त्वब्जभवेन शूली समाह्वयद् राघवमाहवाय ।
इतीरितेऽस्त्वित्यभिधाय राघवो धनुः प्रगृह्याऽशु शरं च सन्दधे ।
अथोत्थितश्चाऽसुरभाववर्जितः क्षमस्व देवेति ननाम पादयोः ।
अथेन्द्रमुख्याश्च तमूचिरे सुरास्त्वयाऽविताः स्मोऽद्य निशाचराद् वयम् ।
सीताकृतिं तामथ तत्र चाऽगतां दिव्यच्छलेन प्रणिधाय पावके ।
जानन् गिरीशालयगां स सीतां समग्रहीत् पावकसम्प्रदत्ताम् ।
अथो गिरेरानयनात् परस्ताद् ये वानरा रावणबाणपीडिताः ।
तदा मृतान् राघव आनिनाय यमक्षयाद् देवगणांश्च सर्वशः ।
विभीषणेनार्पितमारुरोह स पुष्पकं तत्सहितः सवानरः ।
ददर्श चासौ भरतं हुताशनं प्रवेष्टुकामं जगदीश्वरस्य ।
श्रुत्वा प्रमोदोरुभरः स तेन सहैव पौरैः सहितः समातृकः ।
उत्थाप्य तं रघुपतिः सस्वजे प्रणयान्वितः ।
पुरीं प्रविश्य मुनिभिः साम्राज्ये चाभिषेचितः ।
सर्वैर्भवद्भिः सुकृतं विधाय देहं मनोवाक्सहितं मदीयम् ।
मुक्तिप्रदानात् प्रतिकर्तृता मे सर्वस्य चाथो भवतां भवेत (त्)।
मद्भक्तौ ज्ञानपूर्तावनुपधिकबलप्रोन्नतिस्थैर्यधैर्यस्वाभाव्याधिक्यतेजःसुमतिदमशमेष्वस्य तुल्यो न कश्चित् ।
पूर्वं जिगाय भुवनं दशकन्धरोऽसावब्जोद्भवस्य वरतो नतु तं कदाचित् ।
दत्तो वरो न मनुजान् प्रति वानरांश्च धात्राऽस्य तेन विजितो युधि वालिनैषः ।
बलेर्द्वारस्थोऽहं वरमस्मै सम्प्रदाय पूर्वं तु ।
पुनश्च युद्धाय समाह्वयन्तं न्यपातयं रावणमेकमुष्टिना ।
आवां स्वशक्त्या जयिनाविति स्म शिवो वरान्मेऽजयदेनमेवम् ।
अतः स्वभावाज्जयिनावहं च वायुश्च वायुर्हनुमान् स एषः ।
अतो हनूमान् पदमेतु धातुर्मदाज्ञया सृष्ट्यवनादि कर्म ।
भोगाश्च ये यानि च कर्मजातान्यनाद्यनन्तानि ममेह सन्ति ।
एतादृशं मे सहभोजनं ते मया प्रदत्तं हनुमन् सदैव ।
को न्वीश ते पादसरोजभाजां सुदुर्लभोऽर्थेषु चतुर्ष्वपीह ।
त्वमेव साक्षात् परमस्वतन्त्रस्त्वमेव साक्षादखिलोरुशक्तिः ।
समेत्य सर्वेऽपि सदा वदन्तोऽप्यनन्तकालाच्च नवै समाप्नुयुः ।
यस्ते कथासेवक एव सर्वदा सदारतिस्त्वय्यचलैकभक्तिः ।
प्रवर्द्धतां भक्तिरलं क्षणेक्षणे त्वयीश मे ह्रासविवर्जिता सदा ।
इतीरितस्तस्य ददौ स तद्द्वयं पदं विधातुं सकलैश्च शोभनम् ।
नवमोऽध्यायः
औं ॥ अथाऽप्तराज्यो भगवान् स लक्ष्मणं जगाद राजा तरुणो भवाऽशु ।
न मां भवत्पादनिषेवणैकस्पृहं तदन्यत्र नियोक्तुमर्हति ।
इतीरितस्तस्य तदेव दत्त्वा दृढं समाश्लिष्य च राघवः प्रभुः ।
प्रशासतीशे पृथिवी बभूव विरिञ्चलोकस्य समा गुणोन्नतौ ।
गुणैश्च सर्वैरुदिताश्च सर्वे यथायथा योग्यतयोच्चनीचाः ।
सर्वेऽजरा नित्यबलोपपन्ना यथेष्टसिद्ध्या च सदोपपन्नाः ।
सर्वे मनोवाक्तनुभिः सदैव विष्णुं यजन्ते नतु कञ्चिदन्यम् ।
समस्तगन्धाश्च सदाऽतिहृद्या रसा मनोहारिण एव तत्र ।
न कस्यचिद् दुःखमभूत् कथञ्चिन्न वित्तहीनश्च बभूव कस्यचित् (कश्चन) ।
स्त्रियो नचाऽसन् विधवाः कथञ्चिन्न वै पुमांसो विधुरा बभूवुः ।
यथेष्टमाल्याभरणानुलेपना यथेष्टपानाशनवाससोऽखिलाः ।
स ब्रह्मरुद्रमरुदश्विदिवाकरादिमूर्द्धन्यरत्नपरिघट्टितपादपीठः ।
तस्याखिलेशितुरनाद्यनुगैव लक्ष्मीः सीताभिधा त्वरमयत् स्वरतं सुरेशम् ।
रेमे तया स परमः स्वरतोऽपि नित्यं नित्योन्नतप्रमदभारभृतस्वभावः ।
गायन्ति चैनमनुरक्तधियः सुकण्ठा गन्धर्वचारणगणाः सह चाप्सरोभिः ।
एवं त्रयोदशसहस्रमसौ समास्तु पृथ्वीं ररक्ष विजितारिरमोघवीर्यः ।
देव्यां स चाजनयदिन्द्रहुताशनौ द्वौ पुत्रौ यमौ कुशलवौ बलिनौ गुणाढ्यौ ।
कोटित्रयं स निजघान तथाऽसुराणां गन्धर्वजन्म भरतेन सतां च धर्मम् ।
अथ शूद्रतपश्चर्यानिहतं विप्रपुत्रकम् ।
जङ्घनामाऽसुरः पूर्वं गिरिजावरदानतः ।
अनन्यवध्यं तं तस्माज्जघान पुरुषोत्तमः ।
अनन्नयज्ञकृच्छ्वेतो राजा क्षुद्विनिवर्तनम् ।
क्षुदभावमात्रफलदं न साक्षाद् राघवेऽर्पितम् ।
व्यवधानतस्ततो रामे दद्याच्छ्वेत इति प्रभुः ।
तामगस्त्यकरपल्लवार्पितां भक्त एष मम कुम्भसम्भवः ।
अथ केचिदासुरसुराः सुराणका इत्युरुप्रथितपौरुषाः पुरा ।
भूरिपापकृतिनोऽपि निश्चयान्मुक्तिमाप्नुम उदारसद्गुण ।
यावदेव रमया रमेश्वरं नो वियोजयथ सद्गुणार्णवम् ।
इत्युदीरितमवेत्य तेऽसुराः क्षिप्रमोक्षगमनोत्सुकाः क्षितौ ।
ताननादिकृतदोषसञ्चयैर्मोक्षमार्गगतियोग्यतोज्झितान् ।
आज्ञयैव हि हरेस्तु मायया मोहितास्तु दितिजा व्यनिन्दयन् ।
ब्रह्मवाक्यमृतमेव कारयन् पातयंस्तमसि चान्ध आसुरान् ।
तेन चान्धतम ईयुरासुरा यज्ञमाह्वयदसौ च मैथिलीम् ।
गुरुं हि जगतो विष्णुर्ब्रह्माणमसृजत् स्वयम् ।
नासत्स्वप्यनृतं कुर्याद् वचनं पारलौकिकम् ।
निजाधिक्यस्य विज्ञप्त्यै क्वचिद् वायुस्तदाज्ञया ।
नान्यः कश्चित् तद्वराणां शापानामप्यतिक्रमी ।
न विष्णोर्वचनं क्वापि मृषा भवति कस्यचित् ।
प्रविश्य भूमौ सा देवी लोकदृष्ट्यनुसारतः ।
एवं रमालाळितपादपल्लवः पुनः स यज्ञैरयजत्स्वमेव ।
रामस्य दृश्या त्वन्येषामदृश्या जनकात्मजा ।
एवं विधान्यगणितानि जनार्दनस्य रामावतारचरितानि तदन्यपुम्भिः ।
तस्यैवमब्जभवलोकसमामिमां क्ष्मां कृत्वाऽनुशासत उदीक्ष्य गुणान् धरायाः ।
आमन्त्र्य तैः सह विभुर्भगवत्प्रयाणं स्वीयाय सद्मन इयेष दिदेश चाशु ।
एकान्तमेत्य रघुपेण समस्तकालो रुद्रो जगाद वचनं जगतो विधातुः ।
पुत्रस्तवेश कमलप्रभवस्तथाऽहं पौत्रस्तु पौत्रकवचो यदपि ह्ययोग्यम् ।
यत्कार्यसाधनकृते विबुधार्थितस्त्वं प्रादुश्चकर्थ निजरूपमशेषमेव ।
ओम् इत्युवाच भगवांस्तदशेषमेव श्रुत्वा रहस्यथ तनुस्त्वपरा हरस्य ।
सिद्धं न देयमथ साध्यमपीति वाचं श्रुत्वाऽस्य वाक्समयजातमुरु स्वहस्तात् ।
तृप्तो ययौ च सकलान् प्रति कोपयानः कश्चिन्न मेऽर्थितवरं प्रतिदातुमीशः ।
कुन्ती तु तस्य हि मुनेर्वरतोऽजयत् तु रामः स कृष्णतनुवा स्वबलाज्जिगाय ।
एकान्ते तु यदा रामश्चक्रे रुद्रेण संविदम् ।
यद्यत्र प्रविशेत् कश्चिद्धन्मि त्वेति वचो ब्रुवन् ।
दुर्वाससः प्रतिज्ञा तु रामं प्राप्यैव भज्यताम् ।
राघवो घ्नन्नपि तु मां करोत्येव दयां मयि ।
स्वलोकगमनाकाङ्क्षी स्वयमेव तु राघवः ।
अत्यन्तबन्धुनिधनं त्याग एवेति चिन्तयन् ।
इत्युक्तः स ययौ जगद्भवभयध्वान्तच्छिदं राघवं ध्यायन्नाप च तत्पदं दशशतैर्युक्तो मुखाम्भोरुहैः ।
अथ राघवः स्वभवनोपगतौ विदधे मतिं सह जनैरखिलैः ।
श्रुत्वा तु तद् य इह मोक्षपदेच्छवस्ते सर्वे समाययुरथाऽतृणमापिपीलम् ।
संस्थापयामास कुशं स्वराज्ये तैः साकमेव च लवं युवराजमीशः ।
अथाऽह वायुनन्दनं स राघवः समाश्लिषन् ।
त्वया सदा महत् तपः सुकार्यमुत्तमोत्तमम् ।
दशास्यकुम्भकर्णकौ यथा सुशक्तिमानपि ।
पयोब्धिमध्यगं च मे सुसद्म चान्यदेव वा ।
यथेष्टभोगसंयुतः सुरेशगायकादिभिः ।
तवेप्सितं न किञ्चन क्वचित् कदाचिदेव (कुतश्चिदेव) वा ।
इतीरितो मरुत्सुतो जगाद विश्वनायकम् ।
सदा प्रवर्द्धमानया तया रमेऽहमञ्जसा ।
नमो नमो नमो नमो नतोऽस्मि ते सदा पदम् ।
इतीरिते तथेति तं जगाद पुष्करेक्षणः ।
खगा मृगास्तृणादयः पिपीलिकाश्च गर्दभाः ।
सदैव रामभावनात् (रामभावनाः) सदा सुतत्त्ववेदिनः ।
‘स तैः समावृतो विभुर्ययौ दिशं तदोत्तराम् ।
सहस्रसूर्यमण्डलज्वलत्किरीटमूर्द्धजः ।
सुरक्तपद्मलोचनः सुविद्युदाभकुण्डलः ।
दिवाकरौघकौस्तुभप्रभासकोरुकन्धरः ।
सुवृत्तदीर्घपीवरोल्लसद्भुजद्वयाङ्कितः ।
स्वयं स तेन निर्मितो हतौ मधुश्च कैटभः ।
स शत्रुसूदनोऽवधीन्मधोः सुतं रसाह्वयम् ।
समस्तसारसम्भवं शरं दधार तं करे ।
उदारबाहुभूषणः शुभाङ्गदः सकङ्कणः ।
अनर्घ्यरत्नमालया वनाख्यया च मालया ।
स भूतिवत्सभूषणस्तनूदरे वलित्रयी ।
करीन्द्रसत्करोरुयुक् सुवृत्तजानुमण्डलः ।
लसद्धरिन्मणिद्युती रराज राघवोऽधिकम् ।
ज्ञानं नेत्राब्जयुग्मान्मुखवरकमलात् सर्ववेदार्थसारान्स्तन्वा ब्रह्माण्डबाह्यान्तरमधिकरुचा भासयन् भासुरास्यः ।
दघ्रे च्छत्रं हनूमान् स्रवदमृतमयं पूर्णचन्द्रायुताभं सीता सैवाखिलाक्ष्णां विषयमुपगता श्रीरिति ह्रीरथैका ।
साक्षाच्चक्रतनुस्तथैव भरतश्चक्रं दधद् दक्षिणेनाऽयात् सव्यत एव शङ्खवरभृच्छङ्खात्मकः शत्रुहा ।
तस्य सूर्यसुतपूर्ववानरा दक्षिणेन मनुजास्तु सव्यतः ।
गन्धर्वैर्गीयमानो विबुधमुनिगणैरब्जसम्भूतिपूर्वैर्वेदोदारार्थवाग्भिः प्रणिहितसुमनः सर्वदा स्तूयमानः ।
ब्रह्मरुद्रगरुडैः सशेषकैः प्रोच्यमानसुगुणोरुविस्तरः ।
अथ ब्रह्मा हरिं स्तुत्वा जगादेदं वचो विभुम् ।
मातॄणां चापि तल्लोकस्त्वयुताब्दादितोऽग्रतः ।
तथाऽपि सा यदावेशाच्चकार त्वय्यशोभनम् ।
कैकयी तु चलान् लोकान् प्राप्ता नैवाचलान् क्वचित् ।
मन्थरा तु तमस्यन्धे पातिता दुष्टचारिणी ।
प्रायशो राक्षसाश्चैव त्वयि कृष्णत्वमागते ।
अथ ये त्वत्पदाम्भोजमकरन्दैकलिप्सवः ।
अहं भवः सुरेशाद्याः किङ्कराः स्म तवेश्वर ।
इत्युदीरितमाकर्ण्य शतानन्देन राघवः ।
जगद्गुरुत्वमादिष्टं मया ते कमलोद्भव ।
अतस्त्वया प्रदेया हि लोका एषां मदाज्ञया ।
इतीरितो हरेर्भावविज्ञानी कञ्जसम्भवः ।
ते जरामृतिहीनाश्च सर्वदुःखविवर्जिताः ।
ये तु देवा इहोद्भूता नृवानरशरीरिणः ।
असुरावेशतस्तौ तु न राममनुजग्मतुः ।
तयोश्च तपसा तुष्टश्चक्रे तावजरामरौ ।
पीतामृतेषु देवेषु युद्ध्यमानेषु दानवैः ।
अङ्गदः कालतस्त्यक्त्वा देहमाप निजां तनुम् ।
विभीषणश्च धर्मात्मा राघवाज्ञापुरस्कृतः ।
रामाज्ञया जाम्बवांश्च न्यवसत् पृथिवीतले(ळे) ।
अथो रघूणां प्रवरः सुरार्चितः स्वयैकतन्वा न्यवसत् सुरालये ।
तृतीयरूपेण निजं पदं प्रभुं व्रजन्तमुच्चैरनुगम्य देवताः ।
ब्रह्मा मरुन्मारुतसूनुरीशः शेषो गरुत्मान् हरिजः शक्रकाद्याः ।
स्वं स्वं च सर्वे सदनं सुरा ययुः पुरन्दराद्याश्च विरिञ्चपूर्वकाः ।
समस्तशास्त्रोद्भरितं हरेर्वचो मुदा तदा श्रोत्रपुटेन सम्भरन् ।
रामाज्ञया किम्पुरुषेषु राज्यं चकार रूपेण तथाऽपरेण ।
इत्थं स गायञ्छतकोटिविस्तरं रामायणं भारतपञ्चरात्रम् ।
रामोऽपि सार्द्धं पवमानात्मजेन ससीतया लक्ष्मणपूर्वकैश्च ।
कदाचिदीशः सकलावतारानेकं विधायाहिपतौ च शेते ।
इत्यशेषपुराणेभ्यः पञ्चरात्रेभ्य एव च ।
परस्परविरोधस्य हानान्निर्णीय तत्त्वतः ।
बहुकल्पानुसारेण मयेयं सत्कथोदिता ।
क्वचिन्मोहायासुराणां व्यत्यासः प्रतिलोमता ।
एवं च वक्ष्यमाणेषु नैवाऽशङ्क्या विरुद्धता ।
पुंव्यत्यासेन चोक्तिः स्यात् पुराणादिषु कुत्रचित् ।
भीमसेनहतास्ते हि ज्ञायन्ते बहुवाक्यतः ।
विस्तारे कृष्णनिहता बलभद्रहता इति ।
यथा सुयोधनं भीमः प्राहसत् कृष्णसन्निधौ ।
व्यत्यासास्त्वेवमाद्याश्च प्रातिलोम्यादयस्तथा ।
तस्माद् विनिर्णयग्रन्थानाश्रित्यैव च लक्षणम् ।
उक्तं लक्षणशास्त्रे च कृष्णद्वैपायनोदिते ।
व्यत्यासादीन् सप्तभेदान् वेदाद्यर्थं तथा वदेत् ।
‘व्यत्यासः प्रातिलोम्यं च गोमूत्री प्रघसस्तथा ।
इत्यादिलक्षणान्यत्र नोच्यन्तेऽन्यप्रसङ्गतः ।
इतीरिता रामकथा परा मया समस्तशास्त्रानुसृतेर्भवापहा ।
दशमोऽध्यायः
ओं ॥ द्वापरेऽथ युगे प्राप्ते त्वष्टाविंशतिमे पुनः ।
पयोब्धेरुत्तरं तीरमासाद्य विबुधर्षभाः ।
नमोनमोऽगण्यगुणैकधाम्ने समस्तविज्ञानमरीचिमालिने ।
स्वदत्तमालाभुविपातकोपतो दुर्वाससः शापत आशु हि श्रिया ।
त्वदाज्ञया बलिना सन्दधाना वराद् गिरीशस्य परैरचाल्यम् ।
तदा त्वया नित्यबलत्वहेतुतो योऽनन्तनामा गरुडस्तदंसके ।
पुनः परीक्षद्भिरसौ गिरिः सुरैः सहासुरैरुन्नमितस्तदंसतः ।
पुनश्च वामेन करेण वीश्वरे निधाय तं स्कन्धगतस्त्वमस्य ।
कृतश्च कद्रो(द्र्वा)स्तनयोऽत्र वासुकिर्नेत्रं त्वया कश्यपजः स नागराट् ।
नैच्छन्त पुच्छं दितिजा अमङ्गलं(ळं) तदित्यथाग्रं जगृहुर्विषोल्बणम् ।
अथातिभारादविशत् सुकाञ्चनो गिरिः स पाताल(ळ)मथ त्वमेव ।
उपर्यधश्चाऽत्मनि नेत्रगोत्रयोस्त्वया परेणाऽविशता समेधिताः ।
श्रान्तेषु तेष्वेक उरुक्रम त्वं सुधारसाप्त्यै मुदितो ह्यमथ्नाः ।
कलेः स्वरूपं तदतीव दुष्षहं वराद् विधातुः सकलैश्च दुःस्पृशम् ।
स तत् पिबत्(पिबन्) कण्ठगतेन तेन निपातितो मूर्च्छित आशु रुद्रः ।
अथ त्वदाज्ञां पुरतो निधाय निधाय पात्रे तपनीयरूपे ।
अत्यल्पपानाच्च बभूव शूला शिवस्य शीर्ष्ण्यस्य करावशिष्टम् ।
अथ त्वयाऽब्धौ तु विमथ्यमाने सुराऽभवत् तामसुरा अवापुः ।
अन्ये च दिक्पालगजा बभूवुर्वरं तथैवाप्सरसां सहस्रम् ।
तथैव साक्षात् सुरभिर्निशेशो बभूव तत् कौस्तुभं लोकसारम् ।
ततो भवान् दक्षिणबाहुना सुधाकमण्डलुं कलशं चापरेण ।
ततो भवद्धस्तगतं दितेः सुताः सुधाभरं कलशं चापजह्रुः ।
ततो भवाननुपममुत्तमं वपुर्बभूव दिव्यप्रमदात्मकं त्वरन् ।
बृहन्नितम्बं कलशोपमस्तनं सत्पुण्डरीकायतनेत्रमुज्ज्वलम् ।
परस्परं तेऽमृतहेतुतोऽखिला विरुद्ध्यमानाः प्रददुः स्म ते करे ।
धर्मच्छलं पापजनेषु धर्म इति त्वया ज्ञापयितुं तदोक्तम् ।
यथेष्टतोऽहं विभजामि सर्वथा न विश्वसध्वं(अविश्वसध्वं) मयि केनचित् क्वचित् ।
ततश्च संस्थाप्य पृथक् सुरासुरांस्तवातिरूपोच्चलितान् सुरेतरान् ।
निमीलिताक्षेष्वसुरेषु देवता न्यपाययः साध्वमृतं ततः पुमान् ।
तेनामृतार्थं हि सहस्रजन्मसु प्रतप्य भूयस्तप आरितो वरः ।
शिरस्तु तस्य ग्रहतामवाप सुरैः समाविष्टमथो सबाहुः ।
अथासुराः प्रत्यपतन्नुदायुधाः समस्तशस्ते च हतास्त्वया रणे ।
तस्यार्द्धदेहात् समभूदलक्ष्मीस्तत्पुत्रका दोषगणाश्च सर्वशः ।
यथाविभागं च सुरेषु दत्तास्त्वया तथाऽन्येऽपि हि तत्र जाताः ।
भवेद्धि मोक्षो नियतं सुराणां नैवासुराणां स कथञ्चन स्यात् ।
कलिस्त्वयं ब्रह्मवरादिदानीं विबाधतेऽस्मान् सकलान् प्रजाश्च ।
त्वदाज्ञया तस्य वरोऽब्जजेन दत्तः स आविश्य शिवं चकार ।
वेदाश्च सर्वे सहशास्त्रसङ्घा उत्सादितास्तेन न सन्ति तेऽद्य ।
अदृश्यमज्ञेयमतर्क्यरूपं कलिं निलीनं हृदयेऽखिलस्य ।
ऋते भवन्तं नहि तं निहन्ता(तन्निहन्ता) त्वमेक एवाखिलशक्तिपूर्णः ।
इतीरितस्तैरभयं प्रदाय सुरेश्वराणां परमोऽप्रमेयः ।
वसिष्ठनामा कमलोद्भवात्मजः सुतोऽस्य शक्तिस्तनयः पराशरः ।
उवाच चैनं भगवान् सुतोषितो वसोर्मदीयस्य सुताऽस्ति शोभना ।
तच्छ्येनहस्ते प्रददौ स तस्यै दातुं तदन्येन तु युद्ध्यतोऽपतत् ।
तद्गर्भतोऽभून्मिथुनं स्वराज्ञे न्यवेदयन् सोऽपि वसोः समर्पयत् ।
कन्या तु सा दाशराजस्य सद्मन्यवर्द्धतातीव सुरूपयुक्ता ।
इतीरितश्चक्रधरेण तां मुनिर्जगाम मार्ताण्डसुतां समुद्रगाम् ।
विदोषविज्ञानसुखैकरूपोऽप्यजो जनान् मोहयितुं मृषैव ।
यथा नृसिंहाकृतिराविरासीत् स्तम्भात् तथा नित्यतनुत्वतो विभुः ।
स्त्रीपुम्प्रसङ्गात् परतो यतो हरिः प्रादुर्भवत्येष विमोहयन् जनम् ।
द्वीपे भगिन्याः स(तु/च) यमस्य विश्वकृत् प्रकाशते ज्ञानमरीचिमण्डलः ।
अगण्यदिव्योरुगुणार्णवः प्रभुः समस्तविद्याधिपतिर्जगद्गुरुः ।
शुभमरतकवर्णो रक्तपादाब्जनेत्राधरकरनखरसनाग्रश्चक्रशङ्खाब्जरेखः ।
विस्तीर्णवक्षाः कमलायताक्षो बृहद्भुजः कम्बुसमानकण्ठः ।
प्रबोधमुद्राभयदोर्द्वयान्वि(ङ्कि)तो यज्ञोपवीताजिनमेखलोल्लसन् ।
स लोकधर्माभिरिरक्षया पितुर्द्विजत्वमाप्याऽशु पितुर्ददौ निजम् ।
द्वैपायनः सोऽथ जगाम मेरुं चतुर्मुखाद्यैरनुगम्यमानः ।
सर्वाणि शास्त्राणि तथैव कृत्वा विनिर्णयं ब्रह्मसूत्रं चकार ।
समस्तशास्त्रार्थनिदर्शनात्मकं चक्रे महाभारतनामधेयम् ।
अथो गिरीशादिमनोनुशायी कलिर्ममाराऽशु सुवाङ्मयैः शरैः ।
अथो मनुष्येषु तथाऽसुरेषु रूपान्तरैः कलिरेवावशिष्टः ।
ततो नृणां कालबलात् सुमन्दमायुर्मतिं कर्म च वीक्ष्य कृष्णः ।
येये च सन्तस्तमसाऽनुविष्टास्तांस्तान् सुवाक्यैस्तमसो विमुञ्चन् ।
भवस्व राजा कुशरीरमेतत् त्यक्त्वेति नैच्छत् तदसौ ततस्तम् ।
लोभात् स कीटत्वमुपेत्य कृष्णप्रसादतश्चाऽशु बभूव राजा ।
उवाच तं भगवान् मुक्तिमस्मिंस्तव क्षणे दातुमहं समर्थः ।
ज्ञानं च तस्मै विमलं ददौ स महीं च सर्वां बुभुजे तदन्ते ।
एवं बहून् संसृतिबन्धतः स व्यमोचयद् व्यासतनुर्जनार्दनः ।
अथास्य पुत्रत्वमवाप्तुमिच्छंश्चचार रुद्रः सुतपस्तदीयम् ।
विमोहनायासुरसर्गिणां प्रभुः स्वयं करोतीव तपः प्रदर्शयेत् ।
ततस्त्वरण्योस्स बभूव पुत्रकः शिवोऽस्य सोऽभूच्छुकनामधेयः ।
अकामयन् कामुकवत् स भूत्वा तयाऽर्थितस्तं शुकनामधेयम् ।
शुकं तमाशु प्रविवेश वायुर्व्यासस्य सेवार्थमथास्य सर्वम् ।
शेषोऽथ पैलं मुनिमाविशत् तदा वीशः सुमन्तुमपि वारुणिं(वारुणं) मुनिम् ।
कृष्णस्य पादपरिसेवनोत्सुकाः सुरेश्वरा विविशुराशु तान् मुनीन् ।
ऋचां प्रवर्तकं पैलं यजुषां च प्रवर्तकम् ।
चक्रेऽथ जैमिनिं साम्नामथर्वाङ्गिरसामपि ।
नारदं पाठयित्वा च देवलोकप्रवृत्तये ।
तं भारतपुराणानां महारामायणस्य च ।
तमाविशत् कामदेवः कृष्णसेवासमुत्सुकः ।
सनत्कुमारप्रमुखांश्चक्रे योगप्रवर्तकान् ।
जैमिनिं कर्ममीमांसाकर्तारमकरोत् प्रभुः ।
शैवान् (पाशुपतान्) पाशुपताच्चक्रे संशयार्थं सुरद्विषाम् ।
एवं ज्ञानं पुनः प्रापुर्देवाश्च ऋषयस्तथा ।
समस्तविज्ञानगभस्तिचक्रं विताय विज्ञानमहादिवाकरः ।
चतुर्मुखेशानसुरेन्द्रपूर्वकैः सदा सुरैः सेवितपादपल्लवः ।
एकादशोऽध्यायः
औं ॥ शशाङ्कपुत्रादभवत् पुरूरवास्तस्याऽयुरायोर्नहुषो ययातिः ।
यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।
यदोर्वंशे चक्रवर्ती कार्तवीर्यार्जुनोऽभवत् ।
पूरोर्वंशे तु भरतश्चक्रवर्ती हरिप्रियः ।
प्रतीपस्याभवन् पुत्रास्त्रयस्त्रेताग्निवर्चसः ।
त्वग्दोषयुक्तो देवापिर्जगाम तपसे वनम् ।
पुत्रिकापुत्रतां यातो बाह्लीको राजसत्तमः ।
वायुना च समाविष्टो महाबलसमन्वितः ।
भूभारक्षपणे विष्णोरङ्गतामाप्तुमेव सः ।
अजैकपादहिर्बुध्निर्विरूपाक्ष इति त्रयः ।
शिवादिसर्वरुद्राणामावेशाद् वरतस्तथा ।
तदर्थं हि तपश्चीर्णं सोमदत्तेन शम्भवे ।
भविष्यति मयाऽऽविष्टो यज्ञशील इति स्म ह ।
पूर्वोदधेस्तीरगतेऽब्जसम्भवे गङ्गायुतः पर्वणि घूर्णितोऽब्धिः ।
महाभिषङ् नाम नरेश्वरस्त्वं भूत्वा पुनः शन्तनुनामधेयः ।
शान्तो भवत्येव मयोदितस्त्वं तनुत्वमाप्तोऽसि(आप्नोषि) ततश्च शन्तनुः ।
स तत्र भुक्त्वा चिरकालमुर्वीं तनुं विहायाऽप सदो विधातुः ।
अवाङ्मुखेषु द्युसदस्सु रागान्निरीक्षमाणं पुनरात्मसम्भवः ।
इतीरितस्तत्क्षणतः प्रतीपाद् बभूव नाम्ना नृपतिश्च (नृपतिः) स शन्तनुः ।
अथाष्टमो वसुरासीद् द्युनामा वराङ्गिनाम्न्यस्य बभूव भार्या ।
तस्या जरामृतिविध्वंसहेतोर्वसिष्ठधेनुं स्वमृतं क्षरन्तीम् ।
तया द्युनामा स वसुः प्रचोदितो भ्रातृस्नेहात् सप्तभिरन्वितोऽपरैः ।
अधर्मवृत्ताः प्रतियात मानुषीं योनिं द्रुतं यत्कृते सर्व एव ।
प्रचोदयामास च या कुमार्गे पतिं हि साऽम्बेति नरेषु जाता ।
भवत्वसौ ब्रह्मचर्यैकनिष्ठो महान् विरोधश्च तयोर्भवेत ।
मृत्यष्टकोत्थामपि वेदनां सः प्राप्नोतु शस्त्रैर्बहुधा निकृत्तः ।
न मानुषं (मानुषीं) गर्भमवाप्नुमो वयं भवत्वयं सर्ववित् कीर्तिमांश्च ।
इतीरितेऽस्त्वित्युदिताः स्वयम्भुवा वसिष्ठसंस्थेन सुरापगां ययुः ।
इतीरिता सा वरमाशु वव्रे तेभ्योऽप्यपापत्वमथ प्रयत्वम् ।
अविघ्नतस्तान् विनिहन्तुमेव पुरा प्रतीपस्य हि दक्षिणोरुम् ।
तेनैव चोक्ता भव मे सुतस्य भार्या यतो दक्षिणोरुस्थिताऽसि ।
उवाच सा तं नतु मां सुतस्ते काऽसीति पृच्छेन्न तु मां निवारयेत् ।
यदा त्रयाणामपि चैकमेष करोति गच्छेयमहं विसृज्य ।
तथैव पुत्राय च तेन तद्वचो वधूक्तमुक्तं वचनाद् द्युनद्याः ।
ततस्तु सा शन्तनुतोऽष्टपुत्रानवाप्य सप्त न्यहनत् तथाऽष्टमम् ।
अवस्थितिर्नातिसुखाय मानुषे यतः सुराणामत एव गन्तुम् ।
तां पुत्रनिधनोद्युक्तां न्यवारयत शन्तनुः ।
रूपं सुरवरस्त्रीणां तव तेन न पापकम् (पातकम्)।
तत् कारणं वद शुभे यदि मच्छ्रोत्रमर्हति ।
न धर्मो देवतानां हि ज्ञातवासश्चिरं नृषु ।
अदृश्यत्वमसंस्पर्शो ह्यसम्भाषणमेव च ।
अतः सा वरुणं देवं पूर्वभर्तारमप्यमुम् ।
सुतमष्टममादाय भर्तुरेवाप्यनुज्ञया ।
देवव्रतोऽसावनुशासनाय मात्रा दत्तो देवगुरौ शतार्द्धम् ।
ततश्च मात्रा जगतां गरीयस्यनन्तपारेऽखिलसद्गुणार्णवे ।
स पञ्चविंशत् पुनरब्दकानामस्त्राणि चाऽभ्यस्य पतेर्भृगूणाम् ।
स तत्र बद्ध्वा शरपञ्जरेण गङ्गां विजह्रेऽस्य पिता तदैव ।
स मार्गयामास ततोऽस्य हेतुं ज्ञप्त्यै तदा स्वं च ददर्श सूनुम् ।
मीमांसमानं तमवाप गङ्गा सुतं समादाय पतिं जगाद च ।
अस्याग्रजाः स्वां स्थितिमेव याता हरेः पदाम्भोजसुपाविते जले ।
इति प्रदायामुमदृश्यतामगाद् गङ्गा तमादाय ययौ स्वकं गृहम् ।
पुनः स पित्राऽनुमतो बृहस्पतेरवाप वेदान् पुरुषायुषोऽर्द्धतः ।
स सर्ववित्त्वं समवाप्य रामात् समस्तविद्याधिपतेर्गुणार्णवात् ।
यदैव गङ्गा सुषुवेऽष्टमं सुतं तदैव यातो मृगयां स शन्तनुः ।
शरद्वांस्तु तपः कुर्वन् ददर्श सहसोर्वशीम् ।
विष्कम्भो नाम रुद्राणां भूभारहरणेऽङ्गताम् ।
तावुभौ शन्तनुर्दृष्ट्वा कृपाविष्टः स्वकं गृहम् ।
तस्य प्रीतस्तदा विष्णुः सर्वलोकेश्वरेश्वरः ।
पुत्रवच्छन्तनोश्चाऽसीत् स च पुत्रवदेव तत् ।
सर्ववेदानधिजगौ सर्वशास्त्राणि कौशिकात् ।
यदा हि जातः स कृपस्तदैव बृहस्पतेः सूनुरगाच्च गङ्गाम् ।
तद्दर्शनात् स्कन्नमथेन्द्रियं स द्रोणे दधाराऽशु ततोऽभवत् स्वयम् ।
द्रोणेतिनामास्य चकार तातो मुनिर्भरद्वाज उतास्य वेदान् ।
काले च तस्मिन् पृषतोऽनपत्यो वने तु पाञ्चालपतिश्चचार ।
स तद् विलज्जावशतः पदेन समाक्रमत् तस्य बभूव सूनुः ।
स द्रोणतातात् समवाप वेदानस्त्राणि विद्याश्च तथा समस्ताः ।
पदे द्रुतत्वाद् द्रुपदाभिधेयः स राज्यमापाथ निजां कृपीं सः ।
सिलोञ्छवृत्त्यैव हि वर्तयन् स धर्मं महान्तं विरजं जुषाणः ।
तेषां समानो वयसा विराटस्त्वभूद्धहा नाम विधातृगायकः ।
ततः कदाचिन्मृगयां गतः स ददर्श कन्याप्रवरां तु शन्तनुः ।
यस्यै वरं विष्णुरदात् पुराऽहं सुतस्तव स्यामिति या वसोः सुता ।
तद्दर्शनान्नृपतिर्जातहृच्छ्रयो(च्छयः) वव्रे प्रदानाय च दाशराजम् ।
तच्चिन्तया म्लानमुखं(ग्लानमुखं) जनित्रं दृष्ट्वैव देवव्रत आश्वपृच्छत् ।
स तस्य विश्वासकृते प्रतिज्ञां चकार नाहं करवाणि राज्यम् ।
भीमव्रतत्वाद्धि तदाऽस्य नाम कृत्वा देवा भीष्म इति ह्यचीक्लृपन् ।
ज्ञात्वा तु तां राजपुत्रीं गुणाढ्यां सत्यस्य विष्णोर्मातरं नामतस्तत् ।
प्रायः सतां न मनः पापमार्गे गच्छेदिति ह्यात्ममनश्च सक्तम् ।
स्वच्छन्दमृत्युत्ववरं प्रदाय तथाऽप्यजेयत्वमधृष्यतां च ।
लेभे स चित्राङ्गदमत्र पुत्रं तथा द्वितीयं च विचित्रवीर्यम् ।
स्वेच्छया वरुणत्वं स प्राप नानिच्छया तनुः ।
अतिसक्तास्तपोहीनाः कथञ्चिन्मृतिमाप्नुयुः ।
अथौर्ध्वदैहिकं कृत्वा पितुर्भीष्मोऽभ्यषेचयत् ।
चित्राङ्गदेन निहतो नाम स्वं त्वपरित्यजन् ।
अथ काशिसुतास्तिस्रस्तदर्थं भीष्म आहरत् ।
पाणिग्रहणकाले तु ब्रह्मदत्तस्य वीर्यवान् ।
अम्बिकाम्बालिके तत्र संवादं चक्रतुः शुभे ।
शापाद्धिरण्यगर्भस्य साल्वकामाऽहमित्यपि ।
तेनापि सम्परित्यक्ता परामृष्टेति सा पुनः ।
भ्रातुर्विवाहयामास सोऽम्बिकाम्बालिके ततः ।
अनन्तशक्तिरपि स न भीष्मं निजघान ह ।
अनन्तशक्तिः सकलान्तरात्मा यः सर्ववित् सर्ववशी च सर्वजित् ।
भीष्मं स्वभक्तं यशसाऽभिपूरयन् विमोहयन्नासुरांश्चैव रामः ।
‘विद्धवन्मुग्धवच्चैव केशवो वेदनार्तवत् ।
यशो भीष्मस्य दत्वा तु सोऽम्बां च शरणागताम् ।
अनन्तरं शिखण्डित्वात् तदा सा शाङ्करं तपः ।
भीष्मो यथा त्वां गृह्णीयात् तथा कुर्यामितीरितम् ।
रुद्रस्तु तस्यास्तपसा तुष्टः प्रादाद् वरं तदा ।
मालां च य इमां मालां गृह्णीयात् स हनिष्यति ।
तां न भीष्मभयात् केऽपि जगृहुस्तां हि सा ततः ।
एतस्मिन्नेव काले तु सुतार्थं द्रुपदस्तपः ।
भूत्वा भविष्यति पुमानिति साम्बा ततोऽजनि ।
तस्यै पाञ्चालराजः स दशार्णाधिपतेः सुताम् ।
धात्र्यै न्यवेदयत् साऽथ तत्पित्रे सा न्यवेदयत् ।
विश्वस्य वाक्यं रुद्रस्य पुमानेवेति पार्षतः ।
अथ भार्यासमेतं तं पितरं चिन्तयाऽऽकुलम् ।
इति मत्वा वनायैव ययौ तत्र च तुम्बुरुः ।
स तस्या अखिलं श्रुत्वा कृपां चक्रे महामनाः ।
पुंसां स्त्रीत्वं भवेत् क्वापि तथाऽप्यन्ते पुमान् भवेत् ।
अतः शिववरेऽप्येषां जज्ञे योषैव नान्यथा ।
नास्या देहः पुंस्त्वमाप नच पुंसाऽनधिष्ठिते ।
तस्यास्तद्देहसादृश्यं गन्धर्वस्य प्रसादतः ।
श्वो देहि मम देहं मे स्वं च देहं समाविश ।
अप्रत्युत्थायिनं तन्तुलीयमानं विलज्जया ।
यदा युद्धे मृतिं याति सा कन्या पुन्तनुस्थिता ।
तथाऽवसत् स गन्धर्वः कन्या पित्रोरशेषतः ।
परीक्ष्य तामुपायैश्च श्वशुरो लज्जितो ययौ ।
ययौ तेनैव देहेन पुंस्त्वमेव समाश्रिता ।
विचित्रवीर्यः प्रमदाद्वयं तत् सम्प्राप्य रेमेऽब्दगणान् सुसक्तः ।
आविर्बभूवाऽशु जगज्जनित्रो जनार्दनो जन्मजराभयापहः ।
तं भीष्मपूर्वैः परमादरार्चितं स्वभिष्टुतं चावददस्य माता ।
क्षेत्रे ततो भ्रातुरपत्यमुत्तममुत्पादयास्मत्परमादरार्थितः ।
ऋते रमां जातु (ममाङ्गयोगयोग्या)ममाङ्गसङ्गयोग्याऽङ्गना नैव सुरालयेऽपि ।
सा पूतदेहाऽथ च वैष्णवव्रतान्मत्तः समाप्नोतु सुतं वरिष्ठम् ।
सौम्यस्वरूपोऽप्यतिभीषणं मृषा तच्चक्षुषो रूपमहं प्रदर्शये ।
इतीरितेऽस्त्वित्युदितस्तयाऽगमत् कृष्णोऽम्बिकां सा तु भिया न्यमीलयत् ।
स मारुतावेशबलाद् बलाधिको बभूव राजा धृतराष्ट्रनामा ।
ज्ञात्वा तमन्धं पुनरेव कृष्णं माताऽब्रवीज्जनयान्यं गुणाढ्यम् ।
परावहो नाम मरुत् ततोऽभवद् वर्णेन पाण्डुः स हि नामतश्च ।
तस्मै तथा बलवीर्याधिकत्ववरं प्रादात् कृष्ण एवाथ पाण्डुम् ।
उक्त्वेति कृष्णं पुनरेव च स्नुषामाह त्वयाऽक्ष्णोर्हि निमीलनं पुरा ।
इतीरिताऽप्यस्य हि मायया सा भीता भुजिष्यां कुमतिर्न्ययोजयत् ।
तस्यां स देवोऽजनि धर्मराजो माण्डव्यशापाद् य उवाह शूद्रताम् ।
अयोग्यसम्प्राप्तिकृतप्रयत्नदोषात् समारोपितमेव शूले ।
नासत्यता तस्य च तत्र हेतुतः शापं गृहीतुं स तथैव चोक्त्वा ।
विद्यारतेर्विदुरो नाम चायं भविष्यति ज्ञानबलोपपन्नः ।
ज्ञात्वाऽस्य शूद्रत्वमथास्य माता पुनश्च कृष्णं प्रणता ययाचे ।
योग्यानि कर्माणि ततस्तु तेषां चकार भीष्मो मुनिभिर्यथावत् ।
ते सर्वविद्याप्रवरा बभूवुर्विशेषतो विदुरः सर्ववेत्ता ।
गवद्गणादास तथैव सूतात् समस्तगन्धर्वपतिः स तुम्बुरुः ।
विचित्रवीर्यस्य स सूतपुत्रः सखा च तेषामभवत् प्रियश्च ।
गान्धारराजस्य सुतामुवाह गान्धारिनाम्नीं सुबलस्य राजा ।
शूरस्य पुत्री गुणशीलरूपयुक्ता दत्ता सख्युरेव स्वपित्रा ।
कूर्मश्च नाम्ना मरुदेव कुन्तिभोजोऽथैनां वर्द्धयामास सम्यक् ।
तमाह राजा यदि कन्यकायाः क्षमिष्यसे शक्तितः कर्म कर्त्र्याः ।
चकार कर्म सा पृथा मुनेः सुकोपनस्य हि ।
स वत्सरत्रयोदशं तया यथावदर्चितः ।
ऋतौ तु सा समाप्लुता परीक्षणाय तन्मनोः ।
ततो न सा विसर्जितुं शशाक तं विना रतिम् ।
स तत्र जज्ञिवान् स्वयं द्वितीयरूपको विभुः ।
पुरा स वालिमारणप्रभूतदोषकारणात् ।
यथा ग्रहैर्विदूष्यते मतिर्नृणां तथैव हि ।
तथाऽपि रामसेवनाद्धरेश्च सन्निधानयुक् ।
स रत्नपूर्णमञ्जुषागतो विसर्जितो जले ।
नदीप्रवाहतो गतं ददर्श सूतनन्दनः ।
सूतेनाधिरथेन लालिततनुस्तद्भार्यया राधया ।
अथ कुन्ती दत्ता सा पाण्डोः सोऽप्येतया चिरं रेमे ।
अथ चर्तायननामा मद्रेशः शक्रतुल्यपुत्रार्थी ।
प्रह्लादावरजो यः सह्लादो नामतो हरेर्भक्तः ।
स मारुतावेशवशात् पृथिव्यां बलाधिकोऽभूद् वरतश्च धातुः ।
सा पाण्डुभार्यैव च पूर्वजन्मन्यभूत् पुनश्च प्रतिपादिताऽस्मै ।
अथाङ्गनारत्नमवाप्य तद् द्वयं पाण्डुस्तु भोगान् बुभुजे यथेष्टतः ।
भीष्मो हि राष्ट्रे धृतराष्ट्रमेव संस्थाप्य पाण्डुं युवराजमेव ।
भीष्माम्बिकेयोक्तिपरः सदैव पाण्डुः शशासावनिमेकवीरः ।
नैषा विरोधे कुरुपाण्डवानां तिष्ठेदिति व्यास उदीर्णसद्गुणः ।
सुतोक्तमार्गेण विचिन्त्य तं हरिं सुतात्मना ब्रह्मतया च सा ययौ ।
माता च सा विदुरस्याऽप लोकं वैरिञ्चमन्वेव गताऽम्बिकां सती ।
अम्बालिकाऽपि क्रमयोगतोऽगात् परां गतिं नैव तथाऽम्बिका ययौ ।
पाण्डुस्ततो राज्यभरं निधाय ज्येष्ठेऽनुजे चैव वनं जगाम ।
गृहाश्रमेणैव वने निवासं कुर्वन् स भोगान् बभुजे तपश्च ।
स कामतो हरिणत्वं प्रपन्नं दैवादृषिं ग्राम्यकर्मानुषक्तम् ।
न्यसिष्णुरुक्तः पृथया स नेति प्रणामपूर्वं न्यवसत् तथैव ।
तपो नितान्तं स चचार ताभ्यां समन्वितः कृष्णपदाम्बुजाश्रयः ।
एतस्मिन्नेव काले कमलभवशिवाग्रेसराः शक्रपूर्वा ।
ऊचुः परं पुरुषमेनमनन्तशक्तिं सूक्तेन तेऽब्जजमुखा अपि पौरुषेण ।
दुस्सङ्गतिर्भवति भारवदेव देव नित्यं सतामपि हि नः शृणु वाक्यमीश ।
आसीत् पुरा दितिसुतैरमरोत्तमानां सङ्ग्राम उत्तमगजाश्वरथद्विपद्भिः ।
तेषां रथाश्च बहुनल्वपरिप्रमाणा देवासुरप्रवरकार्मुकबाणपूर्णाः ।
जघ्नुर्गिरीन्द्रतलमुष्टिमहास्त्रशस्त्रैश्चक्रुर्नदीश्च रुधिरौघवहा महौघम् ।
अथाऽत्मसेनामवमृद्यमानां वीक्ष्यासुरः शम्बरनामधेयः ।
मायासहस्रेण सुराः समर्दिता(विमर्दिताः) रणे विषेदुः शशिसूर्यमुख्याः ।
समस्तमायापहया तयैव वराद् रमेशस्य सदाऽप्यसह्यया ।
यमेन्दुसूर्यादिसुरास्ततोऽसुरान् निजघ्नुराप्यायितविक्रमास्तदा ।
तस्मिन् हते दानवलोकपाले दितेः सुता दुद्रुवुरिन्द्रभीषिताः ।
वरादजेयेन विधातुरेव सुरोत्तमांस्तेन शरैर्निपातितान् ।
अस्त्राणि तस्यास्त्रवरैर्निवार्य चिक्षेप तस्योरसि काञ्चनीं गदाम् ।
अथाऽससादाऽशु स कालनेमिस्त्वदाज्ञया यस्य वरं ददौ पुरा ।
तमापतन्तं प्रसमीक्ष्य मारुतस्त्वदाज्ञया दत्तवरस्त्वयैव ।
तमस्त्रशस्त्राणि बहूनि बाहुभिः प्रवर्षमाणं भुवनाप्तदेहम् ।
ततोऽसुरास्ते निहता अशेषास्त्वया त्रिभागा निहताश्चतुर्थम् ।
राज्ञां महावंशसुजन्मनां तु तेषामभूद् धर्ममतिर्विपापा ।
त्वद्भक्तिलेशाभियुतः सुकर्मा व्रजेन्न पापां तु गतिं कथञ्चित् ।
धर्मस्य मिथ्यात्वभयाद् वयं त्वामथापिवा दैत्यशुभाप्तिभीषा ।
य उग्रसेनः सुरगायकः स जातो यदुष्वेष तथाऽभिधेयः ।
यस्त्वत्प्रियार्थं न हतो हि वायुना भवत्प्रसादात् परमीशिताऽपि ।
स औग्रसेने जनितोऽसुरेण क्षेत्रे हि तद्रूपधरेण मायया ।
जित्वा जलेशं च हृतानि येन रत्नानि यक्षाश्च जिताः शिवस्य ।
स विप्रचित्तिश्च जरासुतोऽभूद् वराद् विधातुर्गिरिशस्य चैव ।
निवारयामास न कंसमुद्धतं शक्तोऽपि यो यस्य बले न कश्चित् ।
हतौ पुरा यौ मधुकैटभाख्यौ त्वयैव हंसो डिभकश्च जातौ ।
अन्येऽपि भूमावसुराः प्रजातास्त्वया हता ये सुरदैत्यसङ्गरे ।
व्यासावतारे निहतस्त्वयायः कलिः सुशास्त्रोक्तिभिरेव चाद्य ।
रामात्मना(रामावतारे) ये निहताश्च राक्षसा दृष्ट्वा बलं तेऽपि तदा तवाद्य ।
ये केशव त्वद्बहुमानयुक्तास्तथैव वायौ नहि ते तमोऽन्धम् ।
नितान्तमुत्पाद्य भवद्विरोधं तथाच (तथैव) वायौ बहुभिः प्रकारैः ।
हतौ च यौ रावणकुम्भकर्णौ त्वया त्वदीयौ प्रतिहारपालौ ।
यौ तौ तवारी ह तयोः प्रविष्टौ दैत्यौ तु तावन्धतमः प्रवेश्यौ ।
आविश्य यो बलिमञ्जश्चकार प्रतीपमस्मासु तथा त्वयीश ।
मायामयं तेन विमानमग्र्यमभेद्यमाप्तं सकलैर्गिरीशात् ।
नासौ हतः शक्तिमताऽपि तत्र कृष्णावतारे स मयैव वध्यः ।
यदीयमारुह्य विमानमस्य पिताऽभवत् सौभपतिश्च नाम्ना ।
स चाद्य तस्मात् तपसो निवृत्तो जरासुतस्यानुमते स्थितो हि ।
यो बाणमाविश्य महासुरोऽभूत् स्थितः स नाम्ना(सनाम्ना) प्रथितोऽपि बाणः ।
अतस्त्वया भुव्यवतीर्य देवकार्याणि कार्याण्यखिलानि देव ।
त्वमेव नित्योदितपूर्णशक्तिस्त्वमेव नित्योदितपूर्णचिद्धनः ।
इतीरितो देववरैरुदारगुणार्णवोऽक्षोभ्यतमामृताकृतिः ।
स मेरुमाप्याऽह चतुर्मुखं प्रभुर्यत्र त्वयोक्तोऽस्मि हि तत्र सर्वथा ।
ब्रह्मा प्रणम्याऽह तमात्मकारणं प्रादां पुराऽहं वरुणाय गाः शुभाः ।
मात्रा त्वदित्या च तथा सुरभ्या प्रचोदितेनैव हृतासु तासु ।
शूरात् स जातो बहुगोधनाढ्यो भूमौ यमाहुर्वसुदेव इत्यपि ।
तत् त्वं भवस्वाऽशु च देवकीसुतस्तथैव यो द्रोणनामा वसुः सः ।
तस्मै वरः स मया सन्निसृष्टः स चाऽस नन्दाख्य उतास्य भार्या ।
तौ देवकीवसुदेवौ च तेपतुस्तपस्त्वदीयं सुतमिच्छमानौ ।
इतीरिते सोऽब्जभवेन केशवस्तथेति चोक्त्वा पुनराह देवताः ।
अथावतीर्णाः सकलाश्च देवता यथायथैवाऽह हरिस्तथातथा ।
पापेन तेनापहृतो हि हस्ती शिवप्रदत्तः सुप्रतीकाभिधानः ।
महासुरस्यांशयुतः स एव रुद्रावेशाद् बलवानस्त्रवांश्च ।
अभूच्छिनिर्नाम यदुप्रवीरस्तस्याऽत्मजः सत्यक आस तस्मात् ।
यः संवहो नाम मरुत् तदंशश्चक्रस्य विष्णोश्च बभूव तस्मिन् ।
स पाञ्चजन्यांशयुतो मरुत्सु तथाऽंशयुक्तः प्रवहस्य वीरः ।
ये पाण्डवानामभवन् सहाया देवाश्च देवानुचराः समस्ताः ।
लिङ्गं सुराणां हि परैव भक्तिर्विष्णौ तदन्येषु च तत्प्रतीपता ।
द्वादशोऽध्यायः
औं ॥ बभूव गन्धर्वमुनिस्तु देवकः स आस सेवार्थमथाऽहुकाद्धरेः ।
अन्याश्च याः काश्यपस्यैव भार्या ज्येष्ठां तु तामाहुक आत्मपुत्रीम् ।
सैवादितिर्वसुदेवस्य दत्ता तस्या रथं माङ्गलं (मङ्गलं) कंस एव ।
(विनाऽपराधं न) विनापराधाद्धि ततो गरीयसो न मातुलो वध्यतामेति विष्णोः ।
मृत्युस्तवास्या भविताऽष्टमः सुतो मूढेति चोक्तो जगृहे कृपाणाम् ।
षट् कन्यकाश्चावरजा गृहीतास्तेनैव ताभिश्च मुमोद शूरजः ।
राज्ञश्च काशिप्रभवस्य कन्यां स पुत्रिकापुत्रकधर्मतोऽवहत् ।
यो मन्यते विष्णुरेवाहमित्यसौ पापो वेनः पौण्ड्रको वासुदेवः ।
धुन्धुर्हतो यो हरिणा मधोः सुत आसीत् सुतायां करवीरेश्वरस्य ।
ततस्तु तौ वृष्णिशत्रू बभूवतुर्ज्येष्ठौ सुतौ शूरसुतस्य नित्यम् ।
येये हि देवाः पृथिवीं गतास्ते सर्वे शिष्याः सत्यवतीसुतस्य ।
मरीचिजाः षण् मुनयो बभूवुस्ते देवलं प्राहसन् कार्श्यहेतोः ।
धाता प्रादाद् वरमेषां तथैव शशाप तान् क्ष्मातले सम्भवध्वम् ।
दुर्गा तदा तान् भगवत्प्रचोदिता प्रस्वापयित्वा प्रचकर्ष कायात् ।
तदा मुनीन्द्रसंयुतः सदो विधातुरुत्तमम् ।
यधर्थमेव जायते पुमान् हि तस्य सोऽकृतेः ।
प्रधानदेवताजनौ (प्रधानदेवताजने) नियोक्तुमात्मनः प्रियाम् ।
अतोऽन्यथा सुतानृते व्रजन्ति सद्गतिं नराः ।
तदा कलिश्च राक्षसा बभूवुरिन्द्रजिन्मुखाः ।
तदस्य(तदास्य) सोऽनुजोऽशृणोन्मुनीन्द्रदूषितं च तत् ।
य एव मद्गुणाधिकस्ततः सुतं समाप्नुहि ।
तदस्य कृच्छ्रतो वचः पृथाऽग्रहीज्जगाद च ।
न ते सुरानृते समः सुरेषु केचिदेव च ।
वरं समाश्रिता पतिं व्रजेत या ततोऽधमम् ।
कृते पुरा सुरास्तथा सुराङ्गनाश्च केवलम् ।
मनोवचःशरीरतो यतो हि ताः पतिव्रताः ।
स्वभर्तृभिर्विमुक्तिगाः सहैव ता भवन्ति हि ।
अनावृताश्च तास्तथा यथेष्टभर्तृकाः सदा ।
सुरस्त्रियोऽतिकारणैर्यदऽन्यथा स्थितास्तदा ।
अयुक्तमुक्तवांस्ततो भवांस्तथाऽपि ते वचः ।
इतीरितोऽब्रवीन्नृपो न धर्मतो विना भुवः ।
स धर्मजः सुधार्मिको भवेद्धि सूनुरुत्तमः ।
ततश्च सद्य एव सा सुषाव पुत्रमुत्तमम् ।
यमे सुते तु कुन्तितः प्रजात एव सौबली ।
स्वगर्भपातने कृते तया जगाम केशवः ।
शतात्मना विभेदिताः शतं सुयोधनादयः ।
स देवकार्यसिद्धये ररक्ष गर्भमीश्वरः ।
कलिः सुयोधनोऽजनि प्रभूतबाहुवीर्ययुक् ।
पुरा हि मेरुमूर्धनि त्रिविष्टपौकसां वचः ।
ततस्तु ते त्रिलोचनं तपोबलादतोषयन् ।
वरादुमापतेस्ततः कलिः स देवकण्टकः ।
अवध्य एव सर्वतः सुयोधने समुत्थिते ।
स दुःखशासनोऽभवत् ततोऽतिकायसम्भवः ।
स चित्रसेननामकस्तथाऽपरे च राक्षसाः ।
समस्तदोषरूपिणः शरीरिणो हि तेऽभवन् ।
कुहूप्रवेशसंयुता ययाऽऽर्जुनेर्वधाय हि ।
तयोदितो हि सैन्धवो बभूव कारणं वधे ।
तथाऽऽस निर्ऋथाभिधोऽनुजः स निर्ऋतेरभूत् ।
स चाऽम्बिकेयवीर्यजः सुयोधनादनन्तरः ।
युधिष्ठिरे जात उवाच पाण्डुर्बाह्वोर्बलाज्ज्ञानबलाच्च धर्मः ।
यज्ञाधिको ह्यश्वमेधो मनुष्यदृश्येषु तेजस्स्वधिको हि भास्करः ।
विशेषतोऽप्येष पितैव मे प्रभुर्व्यासात्मना विष्णुरनन्तपौरुषः ।
इतीरिते पृथयाऽऽहूतवायुसंस्पर्शमात्रादभवद् बलद्वये ।
स वायुरेवाभवदत्र भीमनामा भृता माः सकला हि यस्मिन् ।
तज्जन्ममात्रेण धरा विदारिता शार्दूलभीताज्जननीकराद् यदा ।
तस्मिन् प्रजाते रुधिरं प्रसुस्रुवुर्महासुरा वाहनसैन्यसंयुताः ।
अवर्द्धतात्रैव वृकोदरो वने मुदं सुराणामभितः प्रवर्द्धयन् ।
स तत्र मासत्रयमुष्य दुर्गयाऽपवाहितो रोहिणीगर्भमाशु ।
स नामतो बलदेवो बलाढ्यो बभूव तस्यानु जनार्दनः प्रभुः ।
यः सत्सुखज्ञानबलैकदेहः समस्तदोषस्पर्शोज्झितः सदा ।
न शुक्लरक्तप्रभवोऽस्य कायस्तथाऽपि तत्पुत्रतयोच्यते मृषा ।
आविश्य पूर्वं वसुदेवमेव विवेश तस्मादृतुकाल एव ।
यथा पुरा स्तम्भत आविरासीदशुक्लरक्तोऽपि नृसिंहरूपः ।
पितृक्रमं मोहनार्थं समेति न तावता शुक्लतो रक्ततश्च ।
अनेकसूर्याभकिरीटयुक्तो विद्युत्प्रभे कुण्डले धारयंश्च ।
स कञ्जयोनिप्रमुखैः सुरैः स्तुतः पित्रा च मात्रा च जगाद शूरजम् ।
तदैव जाता च हरेरनुज्ञया दुर्गाभिधा श्रीरनु नन्दपत्न्याम् ।
संस्थाप्य तं तत्र तथैव कन्यकामादाय तस्मात् स्वगृहं पुनर्ययौ ।
गर्भं देवक्यां सप्तमं मेनिरे हि लोकाः सुतं त्वष्टमं तां ततः सः ।
सा तद्धस्तात् क्षिप्रमुत्पत्य देवी खेऽदृश्यतैवाष्टभुजा समग्रा ।
उवाच चार्या तव मृत्युरत्र क्वचित् प्रजातो हि वृथैव पाप ।
उक्त्वेति कंसं पुनरेव देवकीतल्पेऽशयद् बालरूपैव दुर्गा ।
श्रुत्वा तयोक्तं तु तदैव कंसः पश्चात्तापाद् वसुदेवं सभार्यम् ।
आनीय कंसोऽथ गृहे स्वमन्त्रिणः प्रोवाच कन्यावचनं समस्तम् ।
तथेति तांस्तत्र नियुज्य कंसो गृहं स्वकीयं प्रविवेश पापः ।
अथ प्रभाते शयने शयानमपश्यतामब्जदलायताक्षम् ।
मेनात एतौ निजपुत्रमेनं स्रष्टारमब्जप्रभवस्य चेशम् ।
सुवर्णरत्नाम्बरभूषणानां बहूनि गोजीविगणाधिनाथः ।
गतेषु तत्रैव दिनेषु केषुचिज्जगाम कंसस्य गृहं स नन्दः ।
सहाऽगता तेन तदा यशोदा सुषाव दुर्गामथ तत्र शौरिः ।
निरुष्य तस्मिन् यमुनातटे स मासं ययौ द्रष्टुकामो नरेन्द्रम् ।
याह्युत्पाताः सन्ति तत्रेत्युदीरितो जगाम शीघ्रं यमुनां स नन्दः ।
सा पूतना नाम निजस्वरूपमाच्छाद्य रात्रौ शुभरूपवच्च ।
तीरे भगिन्यास्तु यमस्य वस्त्रगृहे शयानं पुरुषोत्तमं तम् ।
तन्मायया धर्षिता निद्रया च न्यवारयन्नैव हि नन्दजाया ।
मृता स्वरूपेण सुभीषणेन पपात सा व्याप्य वनं समस्तम् ।
सा ताटका चोर्वशिसम्प्रविष्टा कृष्णावध्यानान्निरयं जगाम ।
सा तुम्बुरोः सङ्गत आविवेश रक्षस्तनुं शापतो वित्तपस्य ।
यदाऽऽप देवश्चतुरः स मासांस्तदोपनिष्क्रामणमस्य चाऽसीत् ।
तदा शयानः शकटस्य सोऽधः पदाऽक्षिपत् तं दितिजं निहन्तुम् ।
क्षिप्तोऽनसिस्थः शकटाक्षनामा स विष्णुनेत्वा सहितः पपात ।
ससम्भ्रमात् तं प्रतिगृह्य शङ्क्या कृष्णं यशोदा द्विजवर्यसूक्तिभिः ।
हत्वा तु तं कंसभृत्यं स कृष्णः शिश्ये पुनः शिशुवत् सर्वशास्ता ।
विवर्द्धमाने लोकदृष्ट्यैव कृष्णे पाण्डुः पुनः प्राह पृथामिदं वचः ।
यदैक एवातिबलोपपन्नो भवेत् तदा तेन परावमर्दे ।
शस्त्रास्त्रविद् वीर्यवान् नौ सुतोऽन्यो भवेद् देवं तादृशमाह्वयातः ।
नवै सुपर्णः सुतदो नरेषु प्रजायते वाऽस्य यतस्तथाऽऽज्ञा ।
अतो महेन्द्रो बलवाननन्तरस्तेषां समाह्वानमिहार्हति स्वराट् ।
स चार्जुनो नाम नरांशयुक्तो विष्ण्वावेशी बलवानस्त्रवेत्ता ।
बृहस्पतिः पूर्वमभूद्धरेः पदं संसेवितुं पवनावेशयुक्तः ।
द्रोणात्मकं नातितरां स्वसेवकं कुर्याद्धरिर्मामिति भूय एव ।
बृहस्पतेरेव स सर्वविद्या अवाप मन्त्री निपुणः सर्ववेत्ता ।
मरुत्सु नाम प्रतिभो यदुष्वभूत् स चेकितानो हरिसेवनार्थम् ।
ततोऽब्दतो भूभरसंहृतौ हरेरङ्गत्वमाप्तुं गिरिशोऽजनिष्ट ।
स सर्वविद् बलवानस्त्रवेत्ता कृपस्वसायां द्रोणवीर्योद्भवोऽभूत् ।
यदा स मासद्वितयी बभूव तदा रोहिण्यां बलदेवोऽभिजातः ।
यदा हि पुत्रान् विनिहन्तुमेतौ सहैव बद्धौ गतिशृङ्खलायाम् ।
विनिश्चयार्थं देवकीगर्भजानामन्या भार्या धृतगर्भाः स कंसः ।
हेतोरेतस्माद् रोहिणी नन्दगेहे प्रसूत्यर्थं स्थापिता तेन देवी ।
यदा त्रिमासः स बभूव देवस्तदाऽऽविरासीत् पुरुषोत्तमोऽजः ।
विष्ण्वावेशी बलवान् यो गुणाधिकः स मे सुतः स्यादिति रोहिणी च ।
अवर्द्धतासौ हरिशुक्लकेशसमावेशी गोकुले रौहिणेयः ।
स प्राकृतं शिशुमात्मनमुच्चैर्विजानन्त्या मातुरादर्शनाय ।
साऽण्डं महाभूतमनोऽभिमानमहत्प्रकृत्यावृतमब्जजादिभिः ।
न्यमीलयच्चाक्षिणी भीतभीता जुगूह चाऽत्मानमथो रमेशः ।
कदाचित् तं लालयन्ती यशोदा वोढुं नाशक्नोद् भूरिभाराधिकार्ता ।
तृणावर्तो नामतः कंसभृत्यः सृष्ट्वाऽत्युग्रं चक्रवातं शिशुं तम् ।
पपात कृष्णेन हतः शिलातळे तृणावर्तः पर्वतोदग्रदेहः ।
अक्रुद्ध्यतां केशवोऽनुग्रहाय शुभं स्वयोग्यादधिकं निहन्तुम् ।
यस्मिन्नब्दे भाद्रपदे स मासे सिंहस्थयोर्गुरुरव्योः परेशः ।
जाताः सुतास्ते प्रवराः पृथायामेकाऽनपत्याऽहमतः प्रसादात् ।
इतीरितः प्राह पृथां स माद्र्यै दिशस्व मन्त्रं सुतदं वरिष्ठम् ।
उवाच माद्र्यै सुतदं मनुं च पुनः फलं ते न भविष्यतीति ।
सदाऽवियोगो दिविजेषु दस्रौ नचैतयोर्नामभेदः क्वचिद्धि।
इतीक्षन्त्याऽऽकारितावश्विनौ तौ शीघ्रं प्राप्तौ पुत्रकौ तत्प्रसूतौ ।
पुनर्मनोः फलवत्त्वाय माद्री सम्प्रार्थयामास पतिं तदुक्ता ।
अतो विरोधं च मदात्मजानां कुर्यादेषेत्येव भीतां न मां त्वम् ।
विशेषनाम्नैव समाहुताः सुरा (सुतान्) दद्युः सुरा इत्यविशेषितं ययोः ।
युधिष्ठिराद्येषु चतुर्षु वायुः समाविष्टः फल्गुनेऽथो विशेषात् ।
शृङ्गाररूपं केवलं दर्शयानो विवेश वायुर्यमजौ प्रधानः ।
शृङ्गाररूपो नकुले विशेषात् सुनीतिरूपः सहदेवं विवेश ।
सुपुल्लवाकारतनुर्हि कोमळः प्रायो जनैः प्रोच्यते रूपशाली ।
अप्राकृतानां तु मनोहरं यद् रूपं द्वात्रिंशल्लक्षणोपेतमग्र्यम् ।
अतीतेन्द्रा एव ते विष्णुषष्ठाः पूर्वेन्द्रोऽसौ यज्ञनामा रमेशः ।
युधिष्ठिरोऽसावथ नासत्यदस्रौ क्रमात् तावेतौ माद्रवतीसुतौ च ।
क्रमात् संस्कारान् क्षत्रियाणामवाप्य तेऽवर्द्धन्त स्वतवसो महित्वना ।
त्रयोदशोऽध्यायः
औं ॥ गर्गः शूरसुतोक्त्या व्रजमायात् सात्त्वतां पुरोधास्सः ।
ऊचे नन्द सुतोऽयं तव विष्णोर्नावमो गुणैः सर्वैः ।
इत्युक्तः स मुमोद प्रययौ गर्गोऽपि केशवोऽथाद्यः ।
स कदाचिच्छिशुभावं कुर्वन्त्या मातुरात्मनो भूयः ।
मात्रोपालब्ध ईशो मुखविवृतिमकर्नाम्ब मृद्भक्षिताऽहं ।
इति प्रभुः स लीलया हरिर्जगद् विडम्बयन् ।
कदाचिदीश्वरः स्तनं पिबन् यशोदया पयः ।
(स) प्रमथ्यमानदध्युरुप्रजातमिन्दुसन्निभम् ।
प्रजायते हि यत्कुले यथा युगं यथा वयः ।
इति स्वधर्ममुत्तमं दिवौकसां प्रदर्शयन् ।
नृतिर्यगादिरूपकः स बाल्ययौवनादि यत् ।
स विप्रराजगोपकस्वरूपकस्तदुद्भवाः ।
तथाऽप्यनन्यदेवतासमं निजं बलं प्रभुः ।
अथाऽत्तयष्टिमीक्ष्य तां स्वमातरं जगद्गुरुः ।
पुनः समीक्ष्य तच्छ्रमं जगाम तत्करग्रहम् ।
सदा विमुक्तमीश्वरं निबद्धुमञ्जसाऽऽददे ।
समस्तदामसञ्चयः सुसन्धितोऽप्यपूर्णताम् ।
अबन्धयोग्यतां प्रभुः प्रदर्श्य लीलया पुनः ।
सुतस्य मातृवश्यतां प्रदर्श्य धर्ममीश्वरः ।
पुरा धुनिश्चमुस्तथाऽपि पूतनासमन्वितौ ।
अनन्तरं तृणोद्भृमिस्तपोऽचरद् वरं च तम् ।
धुनिश्चमुश्च तौ तरू समाश्रितौ निषूदितौ ।
पुरा हि नारदान्तिके दिगम्बरौ शशाप सः ।
ततो हि तौ निजां तनुं हरेः प्रसादतः शुभौ ।
नलकूबरमणिग्रीवौ मोचयित्वा तु शापतः ।
वृन्दावनयियासुः स नन्दसूनुर्बृहद्वने ।
अनेककोटिसङ्घैस्तैः पीड्यमाना व्रजालयाः ।
इन्दिरापतिरानन्दपूर्णो वृन्दावने प्रभुः ।
स चन्द्रतो हसत्कान्तवदनेनेन्दुवर्चसा ।
दैत्यं स वत्सतनुमप्रमयः प्रगृह्य कंसानुगं हरवरादपरैरवध्यम् ।
स्कन्दप्रसादकवचः स मुखे चकार गोविन्दमग्निवदमुं प्रदहन्तमुच्चैः ।
तुण्डद्वयं यदुपतिः करपल्लवाभ्यां सङ्गृह्य चाऽशु विददार ह पक्षिदैत्यम् ।
एवं स देववरवन्दितपादपद्मो गोपालकेषु विहरन् भुवि षष्ठमब्दम् ।
ज्येष्ठं विहाय स कदाचिदचिन्त्यशक्तिर्गोगोपगोगणयुतो यमुनातटेषु (जलेषु) ।
(स) तं ब्रह्मणो वरबलादुरगं त्ववध्यं सर्वैरवार्यविषवीर्यमृते सुपर्णात् ।
तद्दृष्टिदिव्यसुधया सहसाऽभिवृष्टाः सर्वेऽपि जीवितमवापुरथोच्छशाखम् ।
‘सार्पह्रदः पुरुषसारनिपातवेगसङ्क्षोभितोरगविषोचच्छ्वसिताम्बुराशिः ।
तं यामुनह्रदविलोलकमाप्य नागः काल्यो निजैः समदशत् सह वासुदेवम्(भा\.पु\. १०\.१६\.६\-७) ।
उत्पातमीक्ष्य तु तदाऽखिलगोपसङ्घस्तत्राऽजगाम हलिना प्रतिबोधितोऽपि ।
तस्योन्नतेषु स फणेषु ननर्त कृष्णो ब्रह्मादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः ।
तच्चित्रताण्डवविरुग्णफणातपत्रं रक्तं वमन्तमुरु सन्नधियं नितान्तम् ।
ताभिः स्तुतः स भगवानमुना च तस्मै दत्त्वाऽभयं यमसहोदरवारितोऽमुम् ।
गोपैर्बलादिभिरुदीर्णतरप्रमोदैः सार्द्धं समेत्य भगवानरविन्दनेत्रः ।
इत्थं सुरासुरगणैरविचिन्त्यदिव्यकर्माणि गोकुलगतेऽगणितोरुशक्तौ ।
तद्गन्धतो नृपशुमुख्यसमस्तभूतान्यापुर्मृतिं बहुलरोगनिपीडितानि ।
सङ्कर्षणेऽपि तदुदारविषानुविष्टे कृष्णो निजस्पर्शतस्तमपेतरोगम् ।
दैत्यांश्च गोवपुष आत्तवरान् विरिञ्चान्मृत्यूज्झितानपि निपात्य ददाह वृक्षान् ।
सप्तोक्षणोऽतिबलवीर्ययुतानदम्यान् सर्वैर्गिरीशवरतो दितिजप्रधानान् ।
या पूर्वजन्मनि तपः प्रथमैव भार्या भूयासमित्यचरदस्य हि सङ्गमो मे ।
अग्रे द्विजत्वत उपावहदेष नीलां गोपाङ्गना अपि पुरा वरमापिरे यत् ।
तत्राथ कृष्णमवदन् सबलं वयस्याः पक्वानि तालसुफलान्यनुभोजयेति ।
विघ्नेशतो वरमवाप्य (स) सुदुष्टदैत्यो दीर्घायुरुत्तमबलः कदनप्रियोऽभूत् ।
तस्मिन् हते खरतरे खररूपदैत्ये सर्वे खराश्च खरतालवनान्तरस्थाः ।
सर्वान् निहत्य खररूपधरान् स दैत्यान् विघ्नेश्वरस्य वरतोऽन्यजनैरवध्यान् ।
पक्षद्वयेन विहरत्स्वथ गोपकेषु दैत्यः प्रलम्ब इति कंसविसृष्ट आगात् ।
भीतेन रोहिणिसुतेन हरिः स्तुतोऽसौ स्वाविष्टतामुपदिदेश बलाभिपूर्त्यै ।
तस्मिन् हते सुरगणा बलदेवनाम रामस्य चक्रुरतितृप्तियुता हरिश्च ।
कृष्णं कदाचिदतिदूरगतं वयस्या ऊचुः क्षुधाऽर्दिततरा वयमित्युदारम् ।
तान् प्राप्य काममनवाप्य पुनश्च गोपाः कृष्णं समापुरथ तानवदत् स देवः ।
ताः षड्विधान्नपरिपूर्णकराः समेताः प्राप्ता विसृज्य पतिपुत्रसमस्तबन्धून् ।
भुक्त्वाऽथ गोपसहितो भगवांस्तदन्नं रेमे च गोकुलमवाप्य समस्तनाथः ।
कृष्णोऽथ वीक्ष्य पुरुहूतमहप्रयत्नं गोपान् न्यवारयदविस्मरणाय तस्य ।
गोपांश्च तान् गिरिमहोऽस्मदुरुस्वधर्म इत्युक्तिसच्छलत आत्ममहेऽवतार्य ।
इन्द्रोऽथ विस्मृतरथाङ्गधरावतारो मेघान् समादिशदुरूदकपूगवृष्ट्यै ।
ताभिर्निपीडितमुदीक्ष्य स कञ्जनाभः सर्वं व्रजं गिरिवरं प्रसभं दधार ।
वृष्ट्वोरुवार्यथ निरन्तरसप्तरात्रं त्रातं समीक्ष्य हरिणा व्रजमश्रमेण ।
तुष्टाव चैनमुरुवेदशिरोगताभिर्गीर्भिः सदाऽगणितपूर्णगुणार्णवं तम् ।
त्वत्तो जगत् सकलमाविरभूदगण्यधाम्नस्त्वमेव परिपासि समस्तमन्ते ।
क्षन्तव्यमेव भवता मम बाल्यमीश त्वत्संश्रयोऽस्मि हि सदेत्यभिवन्दितोऽजः ।
गोविन्दमेनमभिषिच्य स गोगणेशो गोभिर्जगाम गुणपूर्णममुं प्रणम्य ।
कृष्णं ततः प्रभृति गोपगणा व्यजानन् नारायणोऽयमिति गर्गवचश्च नन्दात् ।
स्कन्दादुपात्तवरतो मरणादपेतं दृष्ट्वा च रामनिहतं बलिनं प्रलम्बम् ।
कात्यायनीव्रतपराः स्वपतित्वहेतोः कन्या उवाह भगवानपराश्च गोपीः ।
तास्वत्र तेन जनिता दशलक्षपुत्रा नारायणाह्वययुता बलिनश्च गोपाः ।
तास्तत्र पूर्ववरदानकृते रमेशो रामाद्(रामा) द्विजत्वगमनादपि पूर्वमेव ।
सम्पूर्णचन्द्रकरराजितसद्रजन्यां वृन्दावने कुमुदकुन्दसुगन्धवाते ।
रुद्रप्रसादकृतरक्ष उतास्य सख्युर्भृत्यो बली खलतरोऽपिच शङ्खचूडः ।
नाम्नाऽप्यरिष्ट उरुगायविलोमचेष्टो गोष्ठं जगाम वृषभाकृतिरप्यवध्यः ।
सोऽप्याससाद हरिमुग्रविषाणकोटिमग्रे निधाय जगृहेऽस्य विषाणमीशः ।
केशी (च) तु कंसविहितस्तुरगस्वरूपो गिर्यात्मजावरमवाप्य सदा विमृत्युः ।
तत्खादनाय कुमतिः स कृतप्रयासः शीर्णास्यदन्तदशनच्छदरुद्धवायुः ।
व्योमश्च नाम मयसूनुरजप्रसादाल्लब्धायुतायुरखिलान् विदधे बिले सः ।
कुर्वत्यनन्यविषयाणि दुरन्तशक्तौ कर्माणि गोकुलगतेऽखिललोकनाथे ।
श्रुत्वाऽतिकोपरभसोच्चलितः स कंसो बद्ध्वा सभार्यमथ शूरजमुग्रकर्मा ।
संसेवनाय स हरेरभवत् पुरैव नाम्ना किशोर इति यः सुरगायकोऽभूत् ।
सोऽक्रूर इत्यभवदुत्तमपूज्यकर्मा वृष्णिष्वथाऽस स हि भोजपतेश्च मन्त्री ।
आरुह्य तद्रथवरं भगवत्पदाब्जमब्जोद्भवप्रणतमन्तरमन्तरेण ।
सोऽचेष्टतात्र जगदीशितुरङ्गसङ्गलब्धोच्चयेन निखिलाघविदारणेषु ।
सोऽपश्यताथ जगदेकगुरुं समेतमग्रोद्भवेन भुवि गा अपि दोहयन्तम् ।
उत्थाप्य तं यदुपतिः सबलो गृहं स्वं नीत्वोपचारमखिलं प्रविधाय तस्मिन् ।
श्रुत्वा स कंसहृदि संस्थितमब्जनाभः प्रातस्तु गोपसहितो रथमारुरोह ।
संस्थाप्य तौ रथवरे जगताऽभिवन्द्यौ श्वाफल्किराश्ववततार यमस्वसारम् ।
नित्यं हि शेषमभिपश्यति सिद्धमन्त्रो दानेश्वरः स तु तदा ददृशे हरिं च ।
तत्रापि कृष्णमभिवीक्ष्य पुनर्निमज्य शेषोरुभोगशयनं परमं ददर्श ।
स्तुत्वा वरस्तुतिभिरव्ययमब्जनाभं सोऽन्तर्हिते भगवति स्वकमारुरोह ।
अग्रेऽथ दानपतिमक्षयपौरुषोऽसावीशो विसृज्य सबलः सहितो वयस्यैः ।
आसाद्य कुञ्जरगतं रजकं ययाचे वस्त्राणि कंसदयितं गिरिजावरेण ।
हत्वा तमक्षतबलो भगवान् प्रगृह्य वस्त्राणि चाऽत्मसमितानि बलस्य चादात् ।
ग्राह्याऽपहेयरहितैकचिदात्मसान्द्रस्वानन्दपूर्णवपुरप्ययशोषहीनः ।
मालामवाप्य च सुदामत आत्मतन्त्रस्तावक्षयोऽनुजगृहे निजपार्षदौ हि ।
सर्वेष्टपुष्टिमिह तत्र सरूपतां च कृष्णस्तयोर्वरमदादथ राजमार्गे ।
तेनार्थिता सपदि गन्धमदात् त्रिवक्रा तेनाग्रजेन सहितो भगवान् लिलिम्पे ।
पूर्णेन्दुवृन्दनिवहाधिककान्तिकान्तसूर्यामितोरुपरमद्युतिसौख्यदेहः ।
प्राप्याथ चाऽयुधगृहं धनुरीशदत्तं कृष्णः प्रसह्य जगृहे सकलैरभेद्यम् ।
तस्मिन् सुरासुरगणैरखिलैरभेद्ये भग्ने बभूव जगदण्डविभेदभीमः ।
आदिष्टमप्युरुबलं भगवान् स तेन सर्वं निहत्य सबलः प्रययौ पुनश्च ।
कंसोऽप्यतीव भयकम्पितहृत्सरोजः प्रातर्नरेन्द्रगणमध्यगतोऽधिकोच्चम् ।
संस्थाप्य नागमुरुरङ्गमुखे कुवल्यापीडं गिरीन्द्रसदृशं करिसादियुक्तम् ।
अक्षोहिणी गणितमस्य बलं च विंशदासीदसह्यमुरुवीर्यमनन्यवध्यम् ।
सप्तानुजा अपि हि तस्य पुरातना ये सर्वेऽपि कंसपृतनासहिताः स्म रङ्गे ।
कृष्णोऽपि सूर उदिते सबलो वयस्यैः सार्द्धं जगाम वररङ्गमुखं सुरेशैः ।
आयन् जगद्गुरुतमो बलिनं गजेन्द्रं रुद्रप्रसादपरिरक्षितमाश्वपश्यत् ।
क्षिप्तः स ईश्वरतमेन गिरीशलब्धाद् दृप्तो वराज्जगति सर्वजनैरवध्यः ।
विक्रीड्य तेन करिणा भगवान् स किञ्चिद्धस्ते प्रगृह्य विनिकृष्य निपात्य भूमौ ।
नागं ससादिनमवध्यमसौ निहत्य स्कन्धे विषाणमवसज्य सहाग्रजेन ।
विष्टे जगद्गुरुतमे बलवीर्यमूर्तौ रङ्गं मुमोद च शुशोष जनोऽखिलोऽत्र ।
रङ्गप्रविष्टमभिवीक्ष्य जगाद मल्लः कंसप्रियार्थमभिभाष्य जगन्निवासम् ।
राजैव दैवतमिति प्रवदन्ति विप्रा राज्ञः प्रियं कृतवतः परमा हि सिद्धिः ।
इत्युक्त आह भगवान् (अपहासपूर्वं) परिहासपूर्वमेवं भवत्विति स तेन तदाऽभियातः ।
उत्क्षिप्य तं गगनगं गिरिसन्निकाशमुद्भ्राम्य चाथ शतशः कुलिशक्षताङ्गम् (कुलिशाक्षताङ्गम्) ।
कृष्णं च तुष्टुवुरथो दिवि देवसङ्घा मर्त्या भुवि प्रवरमुत्तमपूरुषाणाम् ।
कूटश्च कोसल उत च्छलनामधेयो द्वौ तत्र कृष्णनिहतावपरो बलेन ।
ताभ्यां हतानभिसमीक्ष्य निजान् समस्तान् कंसो दिदेश बलमक्षयमुग्रवीर्यम् ।
श्रुत्वैव राजवचनं बलमक्षयं तदक्षोहिणीदशकयुग्ममनन्तवीर्यम् ।
जानन्नपीश्वरमनन्तबलं महेन्द्रः कृष्णं रथं निजमयापयदायुधाढ्यम् ।
स्वस्यन्दनं तु भगवान् स महेन्द्रदत्तमारुह्य सूतवरमातलिसङ्गृहीतम् ।
निःशेषतो विनिहते स्वबले स कंसश्चर्मासिपाणिरभियातुमियेष कृष्णम् ।
तं श्येनवेगमभितः प्रतिसञ्चरन्तं निश्छिद्रमाशु जगृहे भगवान् प्रसह्य ।
सञ्चालितेन मुकुटेन विकुण्डलेन कर्णद्वयेन विगताभरणोरसा च ।
उत्कृष्य तं सुरपतिः परमोच्चमञ्चादन्यैरजेयमतिवीर्यबलोपपन्नम् ।
देहे तु योऽभवदमुष्य रमेशबन्धुर्वायुः स कृष्णतनुमाश्रयदन्यपापम् ।
द्वेषात् स सर्वजगदेकगुरोः स्वकीयैः पूर्वप्रमापितजनैः सहितः समस्तैः ।
नित्यातिदुःखमनिवृत्ति सुखव्यपेतमन्धं तमो नियतमेति हरावभक्तः ।
यो वेत्ति निश्चितमतिर्हरिमब्जजेशपूर्वाखिलस्य जगतः सकलेऽपि काले ।
तस्मादनन्तगुणपूर्णममुं रमेशं निश्चित्य दोषरहितं परयैव भक्त्या ।
निहत्य कंसमोजसा विधातृशम्भुपूर्वकैः ।
सदैव मोदरूपिणो मुदोक्तिरस्य लौकिकी ।
अनन्तचित्सुखार्णवः सदोदितैकरूपकः ।
चतुर्दशोऽध्यायः
औं ॥ कृष्णो विमोच्य पितरावभिवन्द्य सर्ववन्द्योऽपि रामसहितः प्रतिपालनाय ।
नन्दोऽपि सान्त्ववचनैरनुनीय मुक्तः कृष्णेन तच्चरणपङ्कजमात्मसंस्थम् ।
कृष्णोऽप्यवन्तिपुरवासिनमेत्य विप्रं सान्दीपनिं सह बलेन ततोऽध्यगीष्ट ।
धर्मो हि सर्वविदुषामपि दैवतानां प्राप्ते नरेषु जनने नरवत् प्रवृत्तिः ।
गुर्वर्थमेष मृतपुत्रमदात् पुनश्च रामेण सार्द्धमगमन्मधुरां रमेशः ।
सर्वेऽपि ते पतिमवाप्य हरिं पुराऽभितप्ता हि भोजपतिना मुमुदुर्नितान्तम् ।
कृष्णाश्रयो वसति यत्र जनोऽपि तत्र वृद्धिर्भवेत् किमु रमाधिपतेर्निवासे ।
येनाधिवासमृषभो जगतां विधत्ते विष्णुस्ततो हि वरता सदने विधातुः ।
रक्षत्यजे त्रिजगतां परिरक्षकेऽस्मिन् सर्वान् यदून् मगधराजसुते स्वभर्तुः ।
श्रुत्वैव तन्मगधराज उरुप्ररूढबाह्वोर्बलेन नजितो युधि सर्वलोकैः ।
क्षुब्धोऽतिकोपवशतः स्वगदाममोघां दत्तां शिवेन जगृहे शिवभक्तवन्द्यः ।
अर्वाक् पपात च गदा मधुराप्रदेशात् सा योजनेन यदिमं प्रजगाद पृष्टः ।
शक्तस्य चापि हि गदाप्रविघातने तु शुश्रूषणं मदुचितं त्विति चिन्तयानः ।
क्षिप्ता तु सा भगवतोऽथ गदा जराख्यां तत्सन्धिनीमसुभिराशु वियोज्य पापाम् ।
राजा स्वमातृत उतो गदया च हीनः क्रोधात् समस्तनृपतीनभिसन्निपात्य ।
सर्वां पुरीं प्रतिनिरुद्ध्य दिदेश विन्दविन्दानुजौ भगवतः कुमतिः स दूतौ ।
लोकेऽप्रतीतबलपौरुषसाररूपस्त्वं ह्येक एष्यभवतो बलवीर्यसारम् ।
सोऽहं हि दुर्बलतमो बलिनां वरिष्ठं कृत्वैव दृष्टिविषयं विगतप्रतापः ।
साक्षेपमीरितमिदं बलदर्पपूर्णमात्मापहाससहितं भगवान् निशम्य ।
द्वारेषु सात्यकिपुरस्सरमात्मसैन्यं त्रिष्वभ्युदीर्य भगवान् स्वयमुत्तरेण ।
तस्येच्छयैव पृथिवीमवतेरुराशु तस्याऽयुधानि सबलस्य सुभास्वराणि ।
आरुह्य भूमयरथं प्रतियुक्तमश्वैर्वेदात्मकैर्धनुरधिज्यमथ प्रगृह्य ।
रामः प्रगृह्य मुसलं स हलं च यानमास्थाय सायकशरासनतूणयुक्तः ।
उद्वीक्ष्य कृष्णमभियान्तमनन्तशक्तिं राजेन्द्रवृन्दसहितो मगधाधिराजः ।
तं वै चुकोपयिषुरग्रत उग्रसेनं कृष्णो निधाय समगात् स्वयमस्य पश्चात् ।
पापापयाहि पुरतो मम राज्यकाम निर्लज्ज पुत्रवधकारण शत्रुपक्ष ।
आक्षिप्त इत्थममुनाऽथ स भोजराजस्तूणात् प्रगृह्य निशितं शरमाशु तेन ।
अन्यच्छरासनवरं प्रतिगृह्य कोपसंरक्तनेत्रमभियान्तमुदीक्ष्य कृष्णः ।
आयान्तमीक्ष्य भगवन्तमनन्तवीर्यं चेदीशपौण्ड्रमुखराजगणैः समेतः ।
शस्त्रास्त्रवृष्टिमभितो भगवान् विवृश्च्य शार्ङ्गोत्थसायकगणैर्विरथाश्वसूतम् ।
नैनं जघान भगवान् सुशकं च भीमे भक्तिं निजां प्रथयितुं यश उच्चधर्मम् ।
ये चापि हंसडिभकद्रुमरुग्मिमुख्या बाह्लीकभौमसुतमैन्दपुरस्सराश्च ।
छिन्नायुधध्वजपताकरथाश्वसूतवर्माण उग्रशरताडितभिन्नगात्राः ।
शोच्यां दशामुपगतेषु नृपेषु (सर्वेष्वस्तायुधेषु) सर्वेष्वात्तायुधेषु हरिणा युधि विद्रवत्सु ।
आधावतोऽस्य मुसलेन रथं बभञ्ज रामो गदामुरुतरोरसि सोऽपि तस्य ।
तौ चक्रतुः पुरु नियुद्धमपि स्म तत्र सञ्चूर्ण्य सर्वगिरिवृक्षशिलासमूहान् ।
श्रुत्वाऽथ शङ्खरवमम्बुजलोचनस्य विद्रावितानपि नृपानभिवीक्ष्य रामः ।
तेनाऽहतः शिरसि सम्मुमुहेऽतिवेलं बार्हद्रथो जगृह एनमथो हली सः ।
भीतेन तेन समरं भगवाननिच्छन् प्रद्युम्नमाश्वसृजदात्मसुतं मनोजम् ।
युद्ध्वा चिरं रणमुखे भगवत्सुतोऽसौ चक्रे निरायुधममुं स्थिरमेकलव्यम् ।
प्रद्युम्नमात्मनि निधाय पुनः स कृष्णः संहृत्य मागधबलं निखिलं शरौघैः ।
व्रीडानताच्छविमुखः सहितो नृपैस्तैर्बार्हद्रथः प्रतिययौ स्वपुरीं स पापः ।
जित्वा तमूर्जितबलं भगवानजेशशक्रादिभिः कुसुमवर्षिभिरीड्यमानः ।
वर्द्धत्सु पाण्डुतनयेषु चतुर्दशं तु जन्मर्क्षमास तनयस्य सहस्रदृष्टेः ।
तत्काल एव नृपतिः सह माद्रवत्या पुंस्कोकिलाकुलितफुल्लवनं ददर्श ।
जग्राह तामथ तया रममाण एव यातो यमस्य सदनं हरिपादसङ्गी ।
तेनैव मानुषमवाप्य रतिस्थ एव पञ्चत्वमाप रतिविघ्नमपुत्रतां च(हि) ।
माद्री पतिं मृतमवेक्ष्य रुराव दूरात् तच्छुश्रुवुश्च पृथया सह पाण्डुपुत्राः ।
पत्युः कलेवरमवेक्ष्य निशम्य माद्र्याः कुन्ती भृशं व्यथितहृत्कमलैव माद्रीम् ।
तेष्वागतेष्वधिक आस विराव एतं सर्वेऽपि शुश्रुवुर्ऋषिप्रवरा अथात्र ।
ते सन्निवार्य तु पृथामथ माद्रवत्या भर्तुः सहानुगमनं बहु चार्थयन्त्याः ।
भर्तुर्गुणैरनधिकौ तनयार्थमेव माद्र्या कृतौ (आकृतौ) सुरवरावधिकौ स्वतोऽपि ।
पाण्डोः सुता मुनिगणैः पितृमेधमत्र चक्रुर्यथावदथ तेन सहैव माद्री ।
पाण्डुश्च पुत्रकगुणैः स्वगुणैश्च साक्षात् कृष्णात्मजः सततमस्य पदैकभक्तः ।
पाण्डोः सुताश्च पृथया सहिता मुनीन्द्रैर्नारायणाश्रमत आशु पुरं स्वकीयम् ।
तूष्णीं स्थिते तु नृपतौ तनुजे द्युनद्याः क्षत्तर्युतात्त उरुमोदमतीव पापाः ।
न क्षेत्रजा अपि मृते पितरि स्वकीयैः सम्यङ् नियोगमनवाप्य भवाय योग्याः ।
एते हि धर्ममरुदिन्द्रभिषग्वरेभ्यो जाताः प्रजीवति पितर्युरुधामसाराः ।
वायोरदृश्यवचनं परिशङ्कमानेष्वाविर्बभूव भगवान् स्वयमब्जनाभः ।
तत्स्वीकृतेषु सकला अपि भीष्ममुख्या वैचित्रवीर्यसहिताः परिपूज्य सर्वान् ।
वैचित्रवीर्यतनयाः कृपतो महास्त्राण्यापुश्च पाण्डुतनयैः सह सर्वराज्ञाम् ।
पक्वोरुभोज्यफलसन्नयनाय वृक्षेष्वारूढराजतनयानभिवीक्ष्य भीमः ।
युद्धे नियुद्ध उत धावन उत्प्लवे च वारिप्लवे च सहितान् निखिलान् कुमारान् ।
सर्वान् प्रगृह्य विनिमज्जति वारिमध्ये श्रान्तान् विसृज्य हसति स्म स विष्णुपद्याम् ।
द्वेषं ह्यृते नहि हरौ तमसि प्रवेशः प्राणे च तेन जगतीमनु तौ प्रपन्नौ ।
दृष्ट्वाऽमितान्यथ करांसि मरुत्सुतेन नित्यं कृतानि तनया निखिलाश्च राज्ञाम् ।
येये हि तत्र नरदेवसुताः सुरांशाः प्रीतिं परां पवनजे निखिला अकुर्वन् ।
अस्मिन् हते विनिहता अखिलाश्च पार्थाः शक्यो बलाच्च न निहन्तुमयं बलाढ्यः ।
एवं कृते निहतकण्टकमस्य राज्यं दुर्योधनस्य हि भवेन्न ततोऽन्यथा स्यात् ।
एवं विचार्य विषमुल्बणमन्तकाभं क्षीरोदधेर्मथनजं तपसा गिरीशात् ।
सम्मन्त्र्य राजतनयैर्धृतराष्ट्रजैस्तद् दत्तं स्वसूदमुखतोऽखिलभक्ष्यभोज्ये ।
जीर्णे विषे कुमतयः परमाभितप्ताः प्रासादमाशु विदधुर्हरिपादतोये ।
दोषान् प्रकाशयितुमेव विचित्रवीर्यपुत्रात्मजेषु नृवरं प्रतिसुप्तमीक्ष्य ।
तत् कोटियोजनगभीरमुदं विगाह्य भीमो विजृम्भणत एव विवृश्च्य पाशान् ।
तं वीक्ष्य दुष्टमनसोऽतिविपन्नचित्ताः सम्मन्त्र्य भूय उरुनागगणानथाष्टौ ।
दुर्योधनेन पृथुमन्त्रबलोपहूतांस्तत्सारथिः फणिगणान् पवनात्मजस्य ।
क्षिप्त्वा सुदूरमुरुनागगणानथाष्टौ तद्वंशजान् स विनिहत्य पिपीलिकावत् ।
तत् तस्य (नैजबलमप्रमेयं) नैजबलमप्रतिमं निरीक्ष्य सर्वे क्षितीशतनया अधिकं विषेदुः ।
दद्भिर्विदश्य न विकारममुष्य कर्तुं शेकुर्भुजङ्गमवरा अपि सुप्रयत्नाः ।
स्वात्मावनार्थमधिकां स्तुतिमेव कृत्वा विष्णोः स दैत्यतनयो हरिणाऽवितोऽभूत् ।
नैसर्गिकं प्रियमिमं प्रवदन्ति विप्रा विष्णोर्नितान्तमपि सत्यमिदं ध्रुवं हि ।
कृष्णः किलैष च हरिर्यदुषु प्रजातः सोऽस्याऽश्रयः कुरुत तस्य बहु प्रतीपम् ।
तैः प्रेरिता नृपतयः पितरश्च तेषां साकं बृहद्रथसुतेन हरेः सकाशम् ।
तेनाऽगृहीतगजवाजिगजा नितान्तं शस्त्रैः परिक्षततनूभिरलं वमन्तः ।
एवं बृहद्रथसुतोऽपि सुशोच्यरूप आर्तो ययौ बहुश एव पुरं स्वकीयम् ।
एवं गतेषु बहुशो नतकन्धरेषु राजस्वजोऽपि मधुरां स्वपुरीं प्रविश्य ।
व्यर्थोद्यमाः पुनरपि स्म सधार्तराष्ट्रा भीमं निहन्तुमुरुयत्नमकुर्वताज्ञाः ।
प्राचीं दिशं प्रथममेव जिगाय पश्चाद् याम्यां जलेशपरिपालितया सहान्याम् ।
पूर्वस्तयोर्हि दमघोषसुतः प्रजातः प्राहुश्च यं नृपतयः शिशुपालनाम्ना ।
जित्वैव तावपि जिगाय च पौण्ड्रकाख्यं शौरैः सुतं सुतमजैदथ भीष्मकस्य ।
भागेत एव तनयस्य स एव वह्नेर्नाम्ना शुचेः स तु पिताऽस्य हि मित्रभागः ।
बन्धोर्निजस्य तु बलं सुपरीक्षमाणः शल्योऽपि तेन युयुधे विजितस्तथैव ।
तद्बाहुवीर्यपरिपालित इन्द्रसूनुः शेषान् नृपांश्च समजैद् बलवानयत्नात् ।
तद्बाहुवीर्यमथ वीक्ष्य मुमोद धर्मसूनुः समातृयमजो विदुरः सभीष्मः ।
कृष्णः सुयोधनमुखाक्रममाम्बिकेयं जानन् स्वपुत्रवशवर्तिनमेव गत्वा ।
सोऽयाद् गजाह्वयममुत्र विचित्रवीर्यपुत्रेण भीष्मसहितैः कुरुभिः समस्तैः ।
ज्ञात्वा स कुन्तिविदुरोक्तित आत्मना च मित्रारिमध्यमजनांस्तनयेषु पाण्डोः ।
पुत्रेषु पाण्डुतनयेषु च साम्यवृत्तिः कीर्तिं च धर्ममुरुमेषि तथाऽर्थकामौ ।
धर्मार्थकामसहितां च विमुक्तिमेषि तत्प्रीतितः सुनियतं विपरीतवृत्तिः ।
इत्थं समस्तकुरुमध्य उपात्तवाक्यो राजाऽपि पुत्रवशगो वचनं जगाद ।
एतन्निशम्य वचनं स तु यादवोऽस्य ज्ञात्वा मनोऽस्य कलुषं तव नैव पुत्राः ।
ज्ञानं तु भागवतमुत्तममात्मयोग्यं भीमार्जुनौ भगवतः समवाप्य कृष्णात् ।
प्रत्युद्यमो भगवताऽपि भवेद् गदायाः शिक्षा यदा भगवता क्रियते नचेमम् ।
रामोऽपि शिक्षितमरीन्द्रधरात् पुरोऽस्य भीमे ददावथ वराणि हरेरवाप ।
कृष्णोऽथ चौपगविमुत्तमनीतियुक्तं सम्प्रेषयन्निदमुवाच ह गोकुलाय ।
मत्तो वियोग इह कस्यचिदस्ति नैव यस्मादहं तनुभृतां निहतोऽन्तरेव ।
पूर्वं यदा ह्यजगरो निजगार नन्दं सर्वे न शेकुरथ तत्प्रविमोक्षणाय(तत्प्रतिमोक्षणाय) ।
पूर्वं स रूपमदतः प्रजहास विप्रान् नित्यं तपःकृशतराङ्गिरसो विरूपान् ।
नायं नरो हरिरयं परमः परेभ्यो विश्वेश्वरः सकलकारण आत्मतन्त्रः ।
नन्दं यदा च जगृहे वरुणस्य दूतस्तत्रापि मां जलपतेर्गृहमाशु यान्तम् ।
सन्दर्शितो ननु मयैव विकुण्ठलोको गोजीविनां स्थितिरपि प्रवरा मदीया ।
श्रुत्वोद्धवो निगदितं परमस्य पुंसो वृन्दावनं प्रति ययौ वचनैश्च तस्य ।
पञ्चदशोऽध्यायः
औं ॥ एवं प्रशासति जगत् पुरुषोत्तमेऽस्मिन् भीमार्जुनौ तु सहदेवयुतावनुज्ञाम् ।
सैरन्ध्रिकोदरभवः स तु नारदस्य शिष्यो वृकोदररथस्य बभूव यन्ता ।
तं पञ्चरात्रविदमाप्य सुसारथिं स भीमो मुमोद पुनराप परात्मविद्याम् ।
सर्वानभागवतशास्त्रपथान् विधूय मार्गं चकार स तु वैष्णवमेव शुभ्रम् ।
नित्यप्रभूतसुशुभप्रतिभोऽपि विष्णोः श्रुत्वा परां पुनरपि प्रतिभामवाप ।
व्यासादवाप परमात्मसतत्त्वविद्यां धर्मात्मजोऽपि सततं भगवत्प्रपन्नाः ।
यदा भरद्वाजसुतस्त्वसञ्चयी प्रतिग्रहोज्झो निजधर्मवर्ती ।
तस्मै माता पिष्टमालोड्य पातुं ददाति पीत्वैति तदेष नित्यम् ।
नृत्यन्तमेनं पाययामासुरेते पयः कदाचिद् रसमस्य सोऽवैत् ।
दृष्ट्वा रुवन्तं(रुदन्तं) सुतमात्मजस्य स्नेहान्नियत्यैव जनार्दनस्य ।
प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तः स रामं ययौ न विष्णोर्हि भवेत् प्रतिग्रहः ।
दृष्ट्वैवैनं जामदग्न्योऽप्यचिन्तयद् द्रोणं कर्तुं क्षितिभारापनोदे ।
तेषां वृद्धिः स्यात् पाण्डवार्थे हतानां मोक्षेऽपि सौख्यस्य न सन्ततिश्च ।
न देवानामाशतं पूरुषा हि सन्तानजाः प्रायशः पापयोग्याः ।
अव्युच्छिन्ने सकलानां सुराणां तन्तौ कलिर्नो भविता कथञ्चित् ।
एवं विचिन्त्याप्रतिमः स भार्गवो बभाष ईषत्स्मितशोचिषा गिरा ।
आत्मा विद्या शस्त्रमेतावदस्ति तेषां मध्ये रुचितं त्वं गृहाण ।
सर्वेशिता सर्वपरः स्वतन्त्रस्त्वमेव कोऽन्यः सदृशस्तवेश ।
सर्वोत्तमस्येश तवोच्चशस्त्रैः कार्यं किमस्माकमनुद्बलानाम् (अतद्बलानाम्)।
इतीरितस्तत्त्वविद्यादिकाः स विद्याः सर्वाः प्रददौ सास्त्रशस्त्राः ।
दानेऽर्द्धराज्यस्य हि तत्प्रतिज्ञां संस्मृत्य पूर्वामुपयातं सखायम् ।
न निर्धनो राजसखो भवेत यथेष्टतो गच्छ विप्रेति दैवात् ।
प्रतिग्रहात् सन्निवृत्तेन सोऽयं मया प्राप्तो मत्पितुः शिष्यकत्वात् ।
सोऽयं पापो मामवज्ञाय मूढो दुष्टं वचोऽश्रावयदस्य दर्पम् ।
प्रतिग्रहाद् विनिवृत्तस्य चार्थः स्याच्छिष्येभ्यः कौरवेभ्यो ममात्र ।
विक्रीडतो धर्मसूनोस्तदैव सहाङ्गुलीयेन च कन्दुकोऽपतत् ।
निष्पत्य चोद्धृत्य समुत्पतिष्ये कूपादमुष्माद् भृशनीचादपि स्म ।
तदा कुमारानवदत् स विप्रो धिगस्त्रबाह्यां भवतां प्रवृत्तिम् ।
इतीरिता अस्त्रविदं कुमारा विज्ञाय विप्रं सुरपूज्यपौत्रम्(सुरपूज्यपौत्रात्) ।
स चाऽश्विषीकाभिरथोत्तरोत्तरं सम्प्रास्य दिव्यास्त्रबलेन कन्दुकम् ।
यथेष्टवित्ताशनपानमस्य धर्मात्मजः प्रतिजज्ञे सुशीघ्रम् ।
पप्रच्छुरेनं सहिताः कुमाराः कोऽसीति सोऽप्याह पितामहो वः ।
न राजगेहं स कदाचिदेति तेनादृष्टः स कुमारैः पुराऽतः ।
श्रुत्वा वृद्धं कृष्णवर्णं द्विजं तं महास्त्रविद्यामपि तां महामतिः ।
द्रोणोऽथ तानवदद् यो मदिष्टं कर्तुं प्रतिज्ञां प्रथमं करोति ।
उन्मादनादीनि स वेद कृष्णादस्त्राण्यनापत्सु न तानि मुञ्चेत् ।
भीष्मादिभिर्भविता सङ्गरो नस्तदा नाहं गुरुभिर्नित्ययोद्धा ।
न बुद्धिपूर्वं वर इन्दिरापतेरन्यत्र मे ग्राह्य इतश्च जिष्णुः ।
तत्प्रेरितेनार्जुनेन प्रतिज्ञा कृता यदा विप्रवरस्ततः परम् ।
स पक्षपातं च चकार तस्मिन् करोति चास्योरुतरां प्रशंसाम् ।
भीमः समस्तं प्रतिभाबलेन जानन् स्नेहं त्वद्वितीयं कनिष्ठे ।
नैवातियत्नेन ददर्श लक्षं शुश्रूषायां पार्थमग्रे करोति ।
तदा समीयुः सकलाः क्षितीशपुत्रा द्रोणात् सकलास्त्राण्यवाप्तुम् ।
अस्त्राणि चित्राणि महान्ति दिव्यान्यन्यैर्नृपैर्मनसाऽप्यस्मृतानि ।
नैतादृशाः पूर्वमासन् नरेन्द्रा अस्त्रे बले सर्वविद्यासु चैव ।
तदा कर्णोऽथैकलव्यश्च दिव्यान्यस्त्राण्याप्तुं द्रोणसमीपमीयतुः ।
कर्णोऽनवाप्य निजमीप्सितमुच्चमानो यस्मादवाप पुरुषोत्तमतोऽस्त्रवृन्दम् ।
स सर्ववेत्तुश्च विभोर्भयेन विप्रोऽहमित्यवददस्त्रवरातिलोभात् ।
अस्त्रज्ञचूळामणिमिन्द्रसूनुं विश्वस्य हन्तुं धृतराष्ट्रपुत्रः ।
ज्ञानं च भागवतमप्यपराश्च विद्या रामादवाप्य विजयं धनुरग्र्ययानम् ।
अङ्के निधाय स कदाचिदमुष्य रामः शिश्ये शिरो विगतनिद्र उदारबोधः ।
तत्राऽस राक्षसवरः स तु हेतिनामा काले महेन्द्रमनुपास्य हि शापतोऽस्य ।
कर्णः स कीटतनुगेन किरीटिनैव ह्यूरोरधस्तनत (ओपरिगात्वचः)औपरिगात्वचश्च ।
किं त्वं न चालयसि मां रुधिरप्रसेके प्राप्तेऽपि पावनविरोधिनि कोऽसि चेति ।
जात्याऽस्मि सूत उत ते तनयोऽस्मि सत्यं तेनास्मि विप्र इति भार्गववंशजोऽहम् ।
इत्युक्तमात्रवचने स तु कीटकोऽस्य रामस्य दृष्टिविषयत्वत एव रूपम् ।
अथाऽह रामस्तमसत्यवाचो न ते सकाशे मम वासयोग्यता ।
अस्पर्धमानं न कथञ्चन त्वां जेता कश्चित् स्पर्धमानस्तु यासि ।
याहीति तेनोक्त उदारकर्मणा कर्णो ययौ तं प्रणम्येशितारम् ।
ततः कदाचिद् धृतराष्ट्रपुत्रैः पाण्डोः सुता मृगयां सम्प्रयाताः ।
श्रुत्वा रावं सारमेयस्य दूराच्छरैर्मुखं शब्दवेधी पुपूरे ।
दृष्ट्वा चित्रं कुरवः पाण्डवाश्च द्रष्टुं कर्तारं मार्गयामासुरत्र ।
पैशाचमेवैष पिशाचकेभ्यः पूर्वं विवेदास्त्रवृन्दं निषादः ।
दृष्ट्वा विशेषं तममुष्य पार्थो द्रोणायोचे त्वद्वरो मे मृषाऽऽसीत् ।
तस्य प्रसादोपचितोरुशिक्षो निषादोऽदाद् दक्षिणाङ्गुष्ठमस्मै ।
पुनः कृपालू रैवतपर्वते तं द्रोणः प्राप्याऽदादस्त्रवराणि तस्मै ।
षोडशोऽध्यायः
औं ॥ काले त्वेतस्मिन् भूय एवाखिलैश्च नृपैर्युक्तो मागधो योद्धुकामः ।
सन्दर्शयन् बलिनामल्पसेनाद्युपस्कराणां बहलोपस्करैश्च ।
सोऽनन्तवीर्यः परमोऽभयोऽपि नीत्यै गच्छन् जामदग्न्यं ददर्श ।
तदा दुग्धाब्धौ संसृतिस्थैः सुराद्यैः पूजां प्राप्तुं स्थानमेषां च योग्यम् ।
तत्रासुरावेशममुष्य विष्णुः सन्दर्शयन् सुप्तिहीनोऽपि नित्यम् ।
देवाश्च तद्भावविदोऽखिलाश्च निमीलिताक्षाः शयनेषु शिश्यरे ।
नारायणे सर्वदेवैः समेते ब्रह्मादिभिर्हासमाने सुपर्णः ।
तत् तस्य शीर्ष्णि प्रतिमुच्य नत्वा खगः स्तुत्वा देवदेवं रमेशम् ।
किरीटं तत् कृष्णमूर्ध्नि प्रविष्टं तत्तुल्यमासीत् तस्य रूपेष्वभेदात् ।
पूर्वं प्राप्तान्येव दिव्यायुधानि पुनर्वैकुण्ठं लोकमितानि भूयः ।
सैवापरं रूपमास्थाय चाऽगाच्छ्रीरित्याख्यं सेन्दिरावेशमग्र्यम् ।
ताभी रामो मुमुदे तत्र तिष्ठञ्छशाङ्कपूगोद्रिक्तकान्तिः सुधामा ।
एवं तयोः क्रीडतोः स्वैरमत्र राजन्यवृन्दानुगतो जरासुतः ।
गिरिस्ताभ्यां पीडितः सन् निमग्नो भूमौ पद्भ्यां योजनैकादशं सः ।
सेनां प्रविष्टौ सर्वराजन्यवृन्दं व्यमथ्नतां देववरौ स्वशस्त्रैः ।
भौमात्मजो दन्तवक्रश्च रुग्मी सौभाधिपो मैन्दमैन्दानुजौ च ।
शस्त्रैरस्त्रैर्द्रुमपूगैः शिलाभिर्भक्ताश्च ये शल्यबाह्लीकमुख्याः ।
सर्वानेताञ्छरवर्षेण कृष्णो विसूतवाजिध्वजशस्त्रवर्मणः ।
हत्वा सेनां विंशदक्षोहिणीं तां त्रिभिर्युक्तां रुग्मिणं नैव कृष्णः ।
जरासुतो रौहिणेयेन युद्धं चिरं कृत्वा तन्मुसलेन पोथितः ।
तेनाऽहतः सुभृशं रौहिणेयः पपात मूर्च्छाभिगतः क्षणेन ।
तथाकृते बलभद्रे तु कृष्णो गदामादाय स्वामगान्मागधेशम् ।
अथोत्तस्थौ रौहिणेयः सहैव समुत्तस्थौ मागधोऽप्यग्र्यवीर्यः ।
अथाब्रवीद् वायुरेनं न राम त्वया हन्तुं शक्यते मागधोऽयम् ।
अन्यो हन्ता बलवानस्य चेति श्रुत्वा ययौ बलभद्रो विमुच्य ।
तेनाऽहतः स्रस्तसमस्तगात्रः पपात मूर्च्छाभिगतः स राजा ।
ययौ शिष्टै राजभिः संयुतश्च पुरं जीवेत्येव कृष्णेन मुक्तः ।
कृष्णो जित्वा मागधं रौहिणेययुक्तो ययौ दमघोषेण सार्द्धम् ।
यामः पुरं करिवीराख्यमेव महालक्ष्म्याः क्षेत्रसन्दर्शनाय ।
गन्धर्वोऽसौ दनुनामा नरोऽभूत् तस्मात् कृष्णे भक्तिमांश्चाऽस राजा ।
सूर्यप्रदत्तं रथमारुह्य दिव्यं वरादवध्यस्तिग्मरुचेः स कृष्णम् ।
द्विधा कृत्वा देहमस्यारिणा च पुत्रं भक्तं तस्य राज्येऽभिषिच्य ।
नीतिं बलिष्ठस्य विहाय सेनां दूराद् युद्धं युद्धं दर्शयित्वैव गुप्त्यै ।
सप्तदशोऽध्यायः
औं ॥ गतेऽथ चेदिपे स्वकं पुरं जनार्दनोऽशृणोत् ।
स रुक्मिनामकोऽग्रजः श्रियो(श्रिया) द्विषन् रमापतिम् ।
प्रघोषिते स्वयंवरेऽथ तेन मागधादयः ।
तदा जगाम केशवो जवेन कुण्डिनं पुरम् ।
पतत्रवायुनाऽस्य ते नरेश्वराः प्रपातिताः ।
किमत्र नः कृतं भवेत् सुखाय हीति तेऽब्रुवन् ।
जिता वयं च सर्वशोऽमुनैकलेन संयुगे ।
अमुष्य चाग्रजः पुरा निहन्तुमुद्यतो हि माम् ।
किमस्य (चोच्यते)तूच्यते बलं वयं तृणोपमाः कृताः ।
किमत्र कुर्वतां सुखं भवेदुदीर्णसङ्कटे ।
अथाऽह चेदिभूपतिः सदन्तवक्रको वचः ।
शृणुष्व राजसत्तम प्रभुं शिवस्वयम्भुवोः ।
तथाऽऽवयोश्च दर्शने भवेत् कदाचिदूर्जिता ।
न कारणं च विद्महे न संशयः परो हरिः ।
इदं हि नः शुभप्रदं नचान्यथा शुभं क्वचित् ।
अथ प्रहस्य सौभराड् वचो जगाद मागधम् ।
न तन्मृषा हरिः स्वयं जनार्दनो वधाय नः ।
स्वधर्म एष नः सदा दृढप्रतीपता हरौ ।
शिवश्च नः परा गतिर्गुरुर्भवानरिर्हरेः ।
तथैव रुक्मिपूर्वकाः करूशचेदिपौ च तौ ।
सदा प्रतीपकारिणौ भवाव कृष्ण इत्यपि ।
पुनश्च ते त्वमन्त्रयन् सहैव पापबुद्धयः ।
अयं त्रिलोकसुन्दरोऽनुरूपिणी च रुक्मिणी ।
समस्तवेदिनां वरं जितारिमग्र्यरूपिणम् ।
वयं च मानसङ्क्षयं नितान्तमाप्नुमस्तदा ।
अतः स्वयंवरे यथा न सङ्गमो हरेर्भवेत् ।
अतो न देयमस्य नः सुभूभुजां समागमे ।
नचाऽस्यति क्षितौ क्वचिद् विमानितः पुरो हि नः ।
स दर्पमानसंयुतः क्रुधा प्रयास्यति ध्रुवम् ।
इति स्म सर्वभूभृतां विनिश्चयं सकैशिकः ।
प्रणम्य पादपद्मयोर्निजं गृहं प्रवेश्य च ।
अथाऽगमच्छतक्रतोर्वचः प्रगृह्य भूभुजः ।
अहं प्रियः शचीपतेः सदाऽस्य चाक्षिगोचरः ।
समस्तराजसत्पतिर्हरिर्न चान्य इत्यपि ।
अतोऽन्यथा शिरस्यहं निपातयामि वोऽशनिम् ।
तदीरितं निशम्य ते पुनः सुतप्तचेतसः ।
पुरा बिभेति नः सदा प्रतिप्रति स्म वासवः ।
अदृश्य एव देवराड् यदि स्म वज्रमुत्सृजेत् ।
पुरा दिविस्थितस्य च प्रमर्दने वयं क्षमाः ।
अतोऽभिषेचनाद् यदीह शार्ङ्गिणः शचीपतिः ।
अतोऽन्यथा दनुर्यथा वरादमृत्युकोऽपि सन् ।
तथैव कृष्णसंश्रयात् स नः शचीपतिर्नयेत् ।
समस्तशो जरासुतादिभिः कृतेऽभिषेचने ।
समाश्रयं च केशवं तदैव जीवनार्थिनः ।
इतीक्ष्य (उदीक्ष्य) पाकशासनोऽवदज्जरासुतादिकान् ।
ततस्तु तान् विनाऽपरेऽधिराजराज इत्यमुम् ।
अतः शचीपतिर्निजं वरासनं हरेरदात् ।
करे प्रगृह्य केशवो न्यवेशयत् सहाऽसने ।
अथाखिला नरेश्वरा मुनीन्द्रसंयुता हरिम् ।
विरिञ्चशर्वपूर्वकैरभिष्टुतः सुरादिभिः ।
अथाऽह भीष्मकं प्रभुः स्वयंवरः किल त्वया ।
इयं रमा तवाऽत्मजा बभूव तां (हरेर्नच) हरेर्न चेत् ।
हिताय चैतदीरितं तवान्यथा न चिन्तय ।
उदीर्य चैवमीश्वरश्चकार हाऽविरात्मनः ।
अनन्ततेज(अनेकतेज) आततं विसङ्ख्यरूपसंयुतम् ।
ज्वलत्सुकौस्तुभप्रभाऽभिभासकं शुभाम्बरम् ।
अनन्तरूपिणीं परां मनुष्यदृष्टितोऽधिकाम् ।
तदद्भुतं समीक्ष्य तु प्रभीत आशु भीष्मकः ।
पुनश्च विश्वरूपतां पिधाय पद्मलोचनः ।
अपाम्पतिश्च मैथिलः स्वयंवरं कृतावपि ।
स्वयंवरः क्षितेर्भुजां स्वधर्म इत्यतो द्वयोः ।
अतो हरौ प्रबोध्य तं गते कृपालुसत्तमे ।
यशश्च धर्ममुत्तमं विधित्सता वृकोदरे ।
वराच्छिवस्य मामयं न हन्तुमीष्ट उत्तमात् ।
मृधे मृधे जितोऽपि सन् दृढाशया पुनः पुनः ।
अतः पुनश्च भूमिपानुवाच बार्हद्रथः ।
अभूपतेर्न चाऽसनं प्रदेयमित्युदाहृतम् ।
अयं नृपोत्तमाङ्कणे महेन्द्रपीठमारुहत् ।
अतः पुनः कथं हरिं वयं जयेम चिन्त्यताम् ।
अयं हि दत्तपुत्रको म औरसाद् विशिष्यते ।
शिवागमेषु शिष्यकाः सरुक्मिसाल्वपौण्ड्रकाः ।
इतीरिते तु सौभराड् जगाद रुक्मिसंविदा ।
नचातिवर्तितुं क्षमः पिताऽस्य चेदिपाय ताम् ।
स्वयं तु कृष्ण एत्य नो विजित्य कन्यकां हरेत् ।
उपाय एष चिन्तितो मयाऽत्र मागधेश्वर ।
यदाऽस्य षण्ढतोदिता मुनेः पुरो हि तस्य च ।
चकार हि प्रतिश्रवं समार्जये सुतं द्रुतम् ।
यतो हि कृष्णसंश्रयाद् बतापहासिता वयम् ।
स चूर्णमायसं त्वदन् ददर्श चाब्दतः शिवम् ।
स विष्णुदैवतोऽपि सन् प्रविष्ट उल्बणासुरैः ।
तमार चाऽसुराप्सरा बलिष्ठपुत्रकाम्यया ।
स यावनेन भूभृता हि गोपिकाभिरर्चितः ।
स चाप्सरस्तनौ सुतं निषिच्य यावनाय च ।
स आश्रमाच्च नैष्ठिकाद् विदूषितः प्रतीपकृत् ।
जगाम चारणं हरिं प्रपाहि मां सुपापिनम् ।
कुतो हि भाग्यमापतेन्मुनेः शिवार्चने सदा ।
सुतोऽस्य कालनामको बभूव कृष्णमर्दितुम् ।
तवैव शिष्य एष चातिभक्तिमान् हि शङ्करे ।
तमेष यामि शासनात् तवोपनीय सत्वरम् ।
ततश्च रुक्मिणीं वयं प्रदापयाम चेदिपे ।
इतीरितो जरासुतो बभूव दुर्मना भृशम् ।
करं करेण पीडयन् निशाम्य चाऽत्मनो भुजौ ।
सुदुर्गकार्यसन्ततिं ह्यगुः स्म मद्भुजाश्रयाः ।
कदाऽप्यचीर्णमद्य तत् कथं करोमि केवलम् ।
इतीरितः स सौभराड् जगाद वाक्यमुत्तमम् ।
स्वशिष्यकैः कृतं तु यत् किमन्यसाधितं भवेत् ।
अपि स्म ते बलाश्रयप्रवृत्तयोऽस्मदादयः ।
कुठारसम्मितो ह्यसौ तवैव यावनेश्वरः ।
वरो हि कृष्णमर्दने वृतोऽस्य केवलः शिवात् ।
तवाखिलैरजेयता शिवप्रसादतोऽस्ति हि ।
इतीरितेऽप्यतृप्तवत् स्थिते तु बार्हद्रथे ।
स कालयावनोऽथ तं जरासुतान्तिकागतम् ।
जरासुतो हि दैवतं समस्तकेशवद्विषाम् ।
तदीरितं निशम्य च द्रुतं त्रिकोटिसङ्ख्यया ।
तदश्वमूत्रविष्ठया बभूव नामतः शकृत् ।
पुनःपुनर्नदीभवं निशाम्य देशसङ्क्षयम् ।
हरिश्च वैनतेययुग् विचार्य रामसंयुतः ।
युयुत्सुरेष यावनः समीपमागतोऽद्य नः ।
स यादवान् हनिष्यति प्रभङ्गतस्तु कोपतः (कोपितः) ।
निराशकोऽद्य यादवानपि स्म पीडयिष्यति ।
उदीर्य चैवमीश्वरोऽस्मरत् सुरेशवर्धकिम् ।
निरम्बुके तु सागरे जनार्दनाज्ञया कृते ।
चकार लावणोदकं जनार्दनोऽमृतोपमम् ।
शतक्रतोः सभां तु तां प्रदाय केशवाय सः ।
समस्तदेवतागणाः स्वकीयमर्पयन् हरौ ।
सम्स्तमाधुरान् प्रभुः कुशस्थलीस्थितान् क्षणात् ।
अनन्तशक्तिरप्यजः सुनीतिदृष्टये नृणाम् ।
अनाद्यनन्तकालकं समस्तलोकमण्डलम् ।
निरायुधं च मामयं वराच्छिवस्य न क्षमः ।
स कृष्णपन्नगं घटे निधाय केशवोऽर्पयत् ।
घटं पिपीलिकागणैः प्रपूर्य यावनोऽस्य च ।
किमत्र सत्यमित्यहं प्रदर्शयिष्य इत्यजः ।
स बाहुनैव केशवो विजित्य यावनं प्रभुः ।
सहास्त्रशस्त्रसञ्चयान् सृजन्तमाशु यावनम् ।
विवाहनं निरायुधं विधाय बाहुना क्षणात् ।
पुरा हि यौवनाश्वजे वरप्रदाः सुरेश्वराः ।
अनर्थको वरोऽमुना वृतोऽपि सार्थको भवेत् ।
तथाऽस्त्विति प्रभाषितं स्ववाक्यमेव केशवः ।
ससञ्ज्ञकोऽथ यावनो धरातलात् समुत्थितः ।
हरिर्गुहां नृपस्य तु प्रविश्य संव्यवस्थितः ।
स तस्य दृष्टिमात्रतो बभूव भस्मसात् क्षणात् ।
वराच्छिवस्य दैवतैरवध्यदानवान् पुरा ।
सुदीर्घसुप्तिमात्मनः प्रसुप्तिभङ्गकृत्क्षयम् ।
अतश्च पुण्यमाप्तवान् सुरप्रसादतोऽक्षयम् ।
ततो हरिं निरीक्ष्य स स्तुतिं विधाय चोत्तमाम् ।
ततो गुहामुखाद्धरिर्विनिस्सृतो जरासुतम् ।
तलेन मुष्टिभिस्तथा महीरुहैश्च चूर्णिताः ।
ससाल्वपौण्ड्रचेदिपान् निपात्य सर्वभूभुजः ।
ससञ्ज्ञकाः समुत्थितास्ततो नृपाः पुनर्ययुः ।
समस्तराजमण्डले विनिश्चयादुपागते ।
समस्तलोकयोषितां वरा विदर्भनन्दना ।
निशम्य तद्वचो हरिः क्षणाद् विदर्भकानगात् ।
समस्तराजमण्डलं प्रयान्तमीक्ष्य केशवम् ।
पुरा प्रदानतः सुरेक्षणच्छलाद् बहिर्गताम् ।
जरासुतादयो रुषा तमभ्ययुः शरोत्तमैः ।
पुनर्गृहीतकार्मुकान् हरिं प्रयातुमुद्यतान् ।
तदा सितः शिरोरुहो हरेर्हलायुधस्थितः ।
स तस्य मागधो रणे गदानिपातचूर्णितः ।
वरोरुवेषसंवृतोऽथ चेदिराट् समभ्ययात् ।
चिरं प्रयुद्ध्य तावुभौ वरास्त्रशस्त्रवर्षिणौ ।
समानभावमक्षमी शिनेः सुतात्मजः शरम् ।
स तेन ताडितोऽपतद् विसञ्ज्ञको नृपात्मजः ।
अथापरे च यादवा विजित्य तद्बलं ययुः ।
सहैकलव्यपूर्वकैः समेत्य भीष्मकात्मजः ।
अक्षोहिणीत्रयं हरिस्तदा निहत्य सायकैः ।
शरं शरीरनाशकं समाददानमीश्वरम् ।
धनुर्भृतां वरे गते रणं विहाय भूभृतः ।
अथाऽससाद केशवं रुषा स भीष्मकात्मजः ।
चकर्त कार्मुकं पुनः स खड्गचर्मभृद्धरेः ।
शरैर्वितस्तिमात्रकैर्विधाय तं निरायुधम् ।
निबद्ध्य पञ्चचूडिनं विधाय तं व्यसर्जयत् ।
सदैकमानसावपि स्वधर्मशासकौ नृणाम् ।
अथाऽससाद सौभराड् हरिं शराम्बुवर्षणः ।
शरेण तेन पीडितः पपात मन्दचेष्टितः ।
समस्तराजसन्निधावयादवीं महीमहम् ।
अथो विवेश केशवः पुरीं कुशस्थलीं विभुः ।
पुरा ततो हलायुधः प्रियां निजां पुराऽपि हि ।
पतिं यथाऽनुरूपिणं तदीयमेव पूर्वकम् ।
स तत्सदो गतो वरात् तदीयतः प्रगीतिकाम् ।
नरानयोग्यगीतिका विमोहयेत् ततो नृपः ।
स मूर्च्छितः प्रबोधितोऽब्जजेन तं त्वपृच्छत ।
स रैवतो बलाय तां प्रदाय गन्धमादनम् ।
बलोऽपि तां पुरातनप्रमाणसम्मितां विभुः ।
तया रतः सुतावुभौ शठोल्मुकाभिधावधात् ।
जनार्दनश्च रुग्मिणीकरं शुभे दिनेऽग्रहीत् ।
चतुर्मुखेशपूर्वकाः सुरा वियत्यवस्थिताः ।
मुनीन्द्रदेवगायनादयोऽपि यादवैः सह ।
सुरांशकाश्च ये नृपाः समाहुता महोत्सवे ।
समस्तलोकसुन्दरौ युतौ रमारमेश्वरौ ।
तया रमन् जनार्दनो वियोगशून्यया सदा ।
चतुस्तनोर्हरेः प्रभोस्तृतीयरूपसंयुतः ।
पुरैव मृत्यवेऽवदत् तमेव शम्बरस्य ह ।
स मायया हरेः सुतं प्रगृह्य सूतिकागृहात् ।
तमग्रसज्जलेचरः स दाशहस्तमागतः ।
विपाट्य मत्स्यकोदरं स शम्बरः कुमारकम् ।
अनङ्गतामुपागते पुरा हरेण साऽङ्गजे ।
पुरा हि पञ्चभर्तृकां निशम्य कञ्जजोदिताम् ।
भवासुरेण दूषितेति सा ततो हि मायया ।
गृहेऽपि साऽऽसुरे स्थिता निजस्वरूपतोऽसुरम् ।
रसायनैः कुमारकं व्यवर्द्धयद् रतिः पतिम् ।
पतिं सुपूर्णयौवनं निरीक्ष्य तां विषज्जतीम् ।
जगाद साऽखिलं पतौ तदस्य(तदास्य) जन्म चाऽगतिम् ।
ददौ च मन्त्रमुत्तमं समस्तमायिनाशकम् ।
ततः स्वदारधर्षकं समाह्वयद् युधेऽङ्गजः ।
स चर्मखड्गधारिणं वरास्त्रशस्त्रपादपैः ।
सहस्रमायमुल्बणं त्वदृश्यमम्बराद् गिरीन् ।
स विद्यया विनाशितोरुमाय आशु शम्बरः ।
निहत्य तं हरेः सुतस्तयैव विद्ययाऽम्बरम् ।
समस्तवेदिनोर्मुनिर्नरान् विडम्बमानयोः ।
स रुग्मिणीजनार्दनादिभिः सरामयादवैः ।
ततः पुरा स्यमन्तकं ह्यवाप सूर्यमण्डले ।
सदाऽस्य विष्णुभाविनोऽप्यतीव लोभमान्तरम् ।
स तं न दत्तवांस्ततोऽनुजो निबद्ध्य तं मणिम् ।
तदा स सत्रजिद्धरिं शशंस सोदरान्तकम् ।
वने स सिंहसूदितं पदैः प्रदर्श्य वृष्णिनाम् ।
ततो निधाय तान् बिलं स जाम्बवत्परिग्रहम् ।
युयोध मन्दमेव स प्रभुः स्वभक्त इत्यजः ।
स मुष्टिपिष्टविग्रहो नितान्तमापदं गतः ।
स्मृतिं गते तु राघवे तदाकृतिं यदूत्तमे ।
ततः क्षमापयन् सुतां प्रदाय रोहिणीं शुभाम् ।
विधाय चक्रदारितं सुजीर्णदेहमस्य सः ।
विधाय भक्तवाञ्छितं प्रियासहाय ईश्वरः ।
गुहाप्रविष्टमीश्वरं बहून्यहान्यनिर्गतम् ।
समस्तवृष्णिसन्निधौ यदूत्तमः स्यमन्तकम् ।
स दुर्यशो रमापतावनूच्य मिथ्यया तपन् ।
मणिं च तं प्रदाय तं ननाम ह क्षमापयन् ।
रमैव सा हि भूरिति द्वितीयमूर्तिरुत्तमा ।
ततो हि सा च रुगक्मिणी प्रिये प्रियासु तेऽधिकम् ।
अथाऽप साम्बनामकं सुतं च रोहिणी हरेः ।
इति प्रशासति प्रभौ जगज्जनार्दनेऽखिलम् ।
जनार्दनः स नामतो रमेशपादसंश्रयः ।
क्षमस्व मे वचः प्रभो ब्रवीम्यतीव (पातकम्)पापकम् ।
न तेऽस्त्यगोचरं क्वचित् तथाऽपि चाऽज्ञया वदे ।
सुतौ हि साल्वभूपतेर्बभूवतुः शिवाश्रयौ ।
अजेयतामवध्यतां (अजेयवध्यतां) च तौ शिवाद् वरं समापतुः ।
महोदरं च कुण्डधारिणं च भूतकावुभौ ।
तयोः सहाय एव तौ वराच्छिवस्य भूतकौ ।
अजेयतामवध्यतामवाप्य तावुभौ शिवात् ।
जरासुतो गुरुत्वतो विरोद्धुमत्र नेच्छति ।
स्वयं हि राजसूयितां जरासुतो न मन्यते ।
इमौ पितुर्यशोऽर्थिनौ पराभवाय ते तथा ।
समुद्रसंश्रयो भवान् बहून् प्रगृह्य लावणान् ।
इतीर्य तं ननाम स प्र चाहसन् स्म यादवाः ।
प्रयाहि सात्यके वचो ब्रवीहि मे नृपाधमौ ।
उपैतमाशु संयुगार्थिनौ च पुष्करं प्रति ।
उपेत्य तौ हरेर्वचो जगाद सात्यकिर्बली ।
ततः पुरैव तावुभौ द्विजं हरस्वरूपिणम् ।
दशत्रिकैः शतैर्वृतो यतीश्वरैः स सर्ववित् ।
वरात् स्वसम्भवादसौ न शापशक्तिमानभूत् ।
स तान् समर्च्य माधवः प्रदाय चोरुमात्रकाः ।
तमत्रिजं हरात्मकं यतो हि वेद मागधः ।
हरौ तु पुष्करं गते मुनीश्वरैः समर्चिते ।
स ब्रह्मदत्तनामकोऽत्र तत्पिताऽप्युपाययौ ।
विचक्रनामकोऽसुरः पुरा विरिञ्चतो वरम् ।
स चाभवत् तयोः सखा सहायकाम्ययाऽगमत् ।
न जीयसे न वध्यसे कुतश्चनेति तोषितात् (तोषणात्)।
अक्षोहिणीदशात्मकं बलं तयोर्बभूव ह ।
द्विरष्टसेनया युतौ सहैकयैव तौ नृपौ ।
अथ द्वयोर्द्वयोरभूद् रणो भयानको महान् ।
तदाऽस्य चानुजं ययौ शिनिप्रवीर आयुधी ।
पुरा स चण्डको गणो हरेर्निवेदिताशनः ।
अक्षोहिणीत्रयान्विताः समस्तयादवास्तदा ।
हरिर्विचक्रमोजसा महास्त्रशस्त्रवर्षिणम् ।
पुनश्च पादपान् गिरीन् प्रमुञ्चतोऽरिणाऽरिहा ।
प्रसूनवर्षिभिः स्तुतश्चतुर्मुखादिभिः प्रभुः ।
समस्तयादवान् रणे विधूय तौ जनार्दनम् ।
स तौ भुजप्रवेगतो विधूय शङ्करालये ।
प्रभक्षयन्तमोजसा हिडिम्बमुद्धतं बलम् ।
तयो रथौ सहायुधौ प्रभक्ष्य राक्षसो बली ।
तदा गदावरायुधः सहैव हंसभूभृता ।
तमागतं समीक्ष्य तौ विहाय राक्षसाधिपः ।
उभौ हि बाहुषालिनावयुद्ध्यतां च मुष्टिभिः ।
अथैनमुद्धृतं बलाद् बलः स दूरमाक्षिपत् ।
विहाय सैनिकांश्च तौ नृपौ ययौ वनाय सः ।
गदस्तु साल्वभूभृता वयोगतेन योधयन् ।
सुतेन तस्य कन्यसा युयोध सात्यकी रथी ।
चिरं प्रयुद्ध्य सात्यकिः स हंसकन्यसा बली ।
स खड्गचर्मभृद् रणेऽभ्ययात् सुतात्मजं शिनेः ।
द्विषोडशप्रभेदकं वरासियुद्धमश्रमौ ।
परस्परान्तरैषिणौ(अन्तरेषिणौ) नचान्तरं व्यपश्यताम् ।
ततः स हंससंयुतो जगाम योद्धुमच्युतम् ।
हतं च सैन्यमेतयोश्चतुर्थभागशेषितम् ।
स पुष्करेक्षणस्तदा सुरैर्नुतोऽथ पुष्करे ।
परे दिने जनार्दनो नृपात्मजौ प्रविद्रुतौ ।
स रौहिणेयसंयुतः समन्वितश्च सेनया ।
निवृत्य तौ स्वसेनया शरोत्तमैर्ववर्षतुः ।
अथाऽससाद हंसको हलायुधं महाधनुः ।
स सात्यकिं निरायुधं विवाहनं विवर्मकम् ।
विधूय सैनिकांश्च स प्रगृह्य चापमाततम् ।
तमाशु केशवोऽरिहा समस्तसाधनोज्झितम् ।
हलायुधो निरायुधं विधाय हंसमोजसा ।
स हंस आशु कार्मुकं पुनः प्रगृह्य तं बलम् ।
शिनेः सुतात्मजोऽप्यसौ विहाय हंसकानुजम् ।
वयोगतः पिता तयोर्युयोध तेन वृष्णिना ।
स सात्यकिर्दृढाहतो जगाम मोहमाशु च ।
स तेन तच्छिरो बली चकर्त शुक्लमूर्द्धजम् ।
नदंश्च सात्यकिर्हरेर्जगाम पार्श्वमुद्धतः ।
हरिस्तु हंसमुल्बणैः शरैः समर्दयन् बलम् ।
स एक एव केशवं महास्त्रमुक् ससार ह ।
स वैष्णवास्त्रमुद्यतं निरीक्ष्य यानतो महीम् ।
वरास्त्रपाणिरीश्वरः पदाऽहनिच्छरस्यमुम् ।
स धार्तराष्ट्रकोदरे यथा तमोऽन्धमेयिवान् ।
ततोऽन्धमेव तत् तमो हरेर्द्विडेति निश्चयात् ।
विहाय रोहिणीसुतं जले निमज्ज्य मार्गयन् ।
विहाय देहमुल्बणं तमोऽवतीर्य चाग्रजम् ।
ततो हरिर्बलैर्युतो बलान्वितो मुनीश्वरैः ।
स्वकीयपादपल्लवाश्रयं जनं प्रहर्षयन् ।
अष्टादशोऽध्यायः
औं ॥ यदा रामादवाप्तानि दिव्यास्त्राणि प्रपेदिरे ।
निजप्रतिभया जानन् सर्वास्त्राणि ततोऽधिकम् ।
न हि भागवतो धर्मो देवताभ्युपयाचनम् ।
नाऽकाङ्क्ष्यं किमुतान्येभ्यो ह्यस्त्रं काम्यफलप्रदम् ।
न काम्यकर्मकृत् तस्मान्नायाचद् देवमानुषान्(दैवमानुषान्) ।
भिक्षामटंश्च हुङ्कारात् करवद् वैश्यतोऽग्रहीत् ।
न प्रतीपं हरेः क्वापि स करोति कथञ्चन ।
(न चौर्ध्वदैहिकानुज्ञां) नैवोर्ध्वदैहिकानुज्ञामवैष्णवकृतेऽकरोत् ।
सख्यं नावैष्णवैश्चक्रे प्रतीपं वैष्णवेन च(तु) ।
प्रतीपकारिणो हन्ति विष्णोर्वैतानजीघनत्(विष्णोर्वै तान्) ।
विद्योपजीवनं नैष चकाराऽपद्यपि क्वचित् ।
आज्ञयैव हरेर्द्रौणेरस्त्राण्यस्त्रैरशामयत् ।
नह्यस्त्रयुद्धे सदृशो द्रौणेरस्त्यर्जुनादृते ।
प्रत्यक्षीभूतदेवेषु बन्धुज्येष्ठेषु वा नतिम् ।
तत्रापि विष्णुमेवासौ नमेन्नान्यं कथञ्चन ।
अन्वेनमेव तद्धर्मे कृष्णैका संस्थिता सदा ।
नाशपद् धार्तराष्ट्रांश्च महापद्यपि सा ततः ।
अन्ये भागवतत्वेऽपि छिन्नधर्माः क्वचित्क्वचित् ।
अवमेनेऽर्जुनः कृष्णं विप्रस्य शिशुरक्षणे ।
हरेरिष्टं सुभद्रायाः फल्गुने दानमञ्जसा ।
कदाचिन्मन्यते पार्थं धर्मजोऽपि नरं हरिम् ।
बन्धनं शङ्कमानो हि कृष्णस्य विदुरोऽपितु ।
नकुलः करदानाय प्रेषयामास केशवे ।
देवकीवसुदेवाद्या मेनिरे मानुषं हरिम् ।
द्रोणकर्णद्रौणिकृपाः कृष्णाभावे मनो दधुः ।
ऋषिमानुषगन्धर्वा वक्तव्याः किमतः परम् (परे)।
तस्मादेको वायुरेव धर्मे भागवते स्थिरः ।
सर्वमेतच्च कथितं तत्रतत्रामितात्मना ।
यदा ते सर्वशस्त्रास्त्रवेदिनो राजपुत्रकाः ।
रक्तचन्दनसत्पुष्पवस्त्रशस्त्रगुडोदनैः ।
ते भीष्मद्रोणविदुरगान्धारीधृतराष्ट्रकान् ।
सर्वैः प्रदर्शितेऽस्त्रे तु द्रोणादात्तमहास्त्रवित् ।
ततोऽप्यतितरां पार्थो दिव्यास्त्राणि व्यदर्शयत् (दिव्यास्त्राण्यप्यदर्शयत्)।
तदैव कर्ण आगत्य रामोपात्तास्त्रसम्पदम् ।
कुन्ती निजं सुतं(निजसुतं) ज्ञात्वा लज्जया नावदच्च तम् ।
रणायाक्षत्रियाह्वानं जानन् धर्मप्रतीपकम् ।
अक्षत्रसंस्कारयुतो जातोऽपि क्षत्रिये कुले ।
निरुत्तरे कृते कर्णे भीमेनैव सुयोधनः ।
अभिषिक्ते तदा कर्णे प्रायादधिरथः पिता ।
भीमदुर्योधनौ तत्र शिक्षासन्दर्शनच्छलात् ।
देवासुरमनुष्यादि जगदेतच्चराचरम् ।
देवा देवानुकूलाश्च भीममेव समाश्रिताः ।
जय भीम महाबाहो जय दुर्योधनेति च ।
दृष्ट्वा जगत् सुसंरब्धं द्रोणोऽथ द्विजसत्तमः ।
स्वकीयायां स्वकीयायां योग्यतायां नतु क्वचित् ।
सुरासुरान् सुसंरब्धान् कालेन द्रक्ष्यथेति च ।
कर्णं हस्ते प्रगृह्यैव धार्तराष्ट्रो गृहं ययौ ।
पार्थेन कर्णो हन्तव्य इत्यासीद् भीमनिश्चयः ।
तथोत्कर्षे फल्गुनस्य यशसो निजयस्य च ।
भीमार्थं केशवोऽन्ये च देवाः फल्गुनपक्षिणः ।
तदर्थमेव भीमस्य ह्यनुजत्वं सुरेश्वरः ।
दुर्योधनार्थं कर्णस्य पक्षिणो दैत्यदानवाः ।
अथ पृष्टो दक्षिणार्थं(दक्षिणायां) द्रोण आह कुमारकान् ।
ते धार्तराष्ट्राः कर्णेन सहिताः पाण्डवा अपि ।
अथाऽह भीमः सामर्थ्यविवेकाभीप्सया गुरुम् ।
निवृत्तेष्वकृतार्थेषु वयं बद्ध्वा रिपुं तव ।
सद्रोणकेषु पार्थेषु स्थितेष्वन्ये ससूतजाः ।
कुमारान् ग्रहणेप्सूंस्तानुपयातानुदीक्ष्य सः ।
ते शरैरभिवर्षन्तः परिवार्य कुमारकान् ।
हर्म्यसंस्थाः स्त्रियो बाला ग्रावभिर्मुसलैरपि ।
द्रुपदस्य वरो ह्यस्ति सूर्यदत्तस्तपोबलात् ।
इति तेन वरेणैव सुखसंवर्द्धिताश्च ते ।
स्त्रीबालवृद्धसहितैः पाञ्चालैरप्यनुद्रुताः ।
तान् प्रभग्नान् समालोक्य भीमः प्रहरतां वरः ।
तमन्वयादिन्द्रसूनुः यमौ तस्यैव चक्रयोः ।
आयान्तमग्रतो दृष्ट्वा भीममात्तशरासनम् ।
द्रुपदस्त्वभ्ययाद् भीमं सपुत्रः सारसेनया ।
धात्रर्यमावेशयुतौ विश्वावसुपरावसू ।
अग्रतस्तु शिखण्ड्यागाद् रथोदारः शरान् क्षिपन् ।
तावुभौ विरथौ कृत्वा विचापौ च विवर्मकौ ।
अथैनं शरवर्षेण युधामन्यूत्तमौजसौ ।
हस्तप्राप्तं च पाञ्चालं नाग्रहीत् स वृकोदरः ।
स शरान् क्षिपतस्तस्य पाञ्चालस्यार्जुनो द्रुतम् ।
अथ प्रकुपितं सैन्यं फल्गुनं पर्यवारयत् ।
अथ सत्यजिदभ्यागात् पार्थं मुञ्चञ्छरान् बहून् ।
घ्नन्तं भीमं पुनः सैन्यमर्जुनः प्राह मा भवान् ।
सम्बन्धयोग्यस्तातस्य सखाऽयं न सुधार्मिकः ।
स्नेहपाशं ततश्चक्रे बीभत्सौ द्रुपदोऽधिकम् ।
मुक्ता कथञ्चिद् भीमास्यात् सा सेना दुद्रुवे भयात् ।
पप्रच्छैनं तदा द्रोणसख्यमस्त्युत नेति वा ।
अथाऽह द्रुपदं द्रोणः सख्यमिच्छेऽक्षयं तव ।
न विप्रधर्मो यद् युद्धमतस्त्वं न मया धृतः ।
अतः सख्यार्थमेवाद्य त्वद्राज्यार्धो हृतो मया ।
इत्युक्त्वोन्मुच्य तं द्रोणो राज्यार्धं गृह्य चामुतः ।
धार्तराष्ट्रैस्तु भीमस्य भयात् पादौ प्रणम्य च ।
द्रुपदस्तु दिवारात्रं तप्यमानः पराभवात् ।
सम्बन्धीत्यर्जुनवचश्चिकीर्षुः सत्यमेव च ।
याजोपयाजावानीयाथार्बुदेन गवां नृपः ।
किमेतयेत्यवज्ञाय तावुभौ विप्रसत्तमौ ।
हुते हविषि मन्त्राभ्यां वैष्णवाभ्यां तदैव हि ।
किरीटी कुण्डली दीप्तौ हेममाली वरासिमान् ।
धृष्टत्वाद् द्योतनत्वाच्च धृष्टद्युम्न इतीरितः ।
अन्वेनं भारती साक्षाद् वेदिमद्ध्यात् समुत्थिता ।
तद्भार्या भारती नाम वेदरूपा सरस्वती ।
आवेशयुक्ता शच्याश्च श्यामलायास्तथोषसः ।
सा कृष्णा नामतश्चाऽसीदुत्कृष्टत्वाद्धि योषिताम् ।
उत्पत्तितश्च सर्वज्ञा सर्वाभरणभूषिता ।
पूर्वं ह्युमा च देव्यस्ताः कदाचिद् भर्तृभिर्युताः ।
शशाप तास्तदा ब्रह्मा मानुषीं योनिमाप्स्यथ ।
विचार्य भारतीमेत्य सर्वमस्यै निवेद्य च ।
देवि नो मानुषं प्राप्यमन्यगात्वं च सर्वथा ।
ब्रह्मणैव च(हि) शप्ताः स्म पूर्वं चान्यत्र लीलया ।
एकदेहा मानुषत्वमाप्स्यथ त्रिश उद्धताः ।
अतस्त्वयैकदेहत्वमिच्छामो देवि जन्मसु ।
चतुर्जन्म भवेद् भूमौ त्वां नान्यो मारुताद् व्रजेत् ।
इतीरिते तथेत्युक्त्वा पार्वत्यादियुतैव सा ।
तद्देहस्था भारती तु रुद्रदेहस्थितं हरिम् ।
तस्यै स रुद्रदेहस्थो हरिः प्रादाद् वरं प्रभुः ।
सर्वेष्वपीति चान्यासां ददौ शङ्कर एव च ।
ततस्तदैव देहं ता विसृज्य नलनन्दिनी ।
तदाऽऽसीन्मुद्गलो नाम मुनिस्तपसि संस्थितः ।
अपाहसत् सोऽब्जयोनिं शशापैनं चतुर्मुखः ।
इतीरितस्तं तपसा तोषयामास मुद्गलः ।
न त्वं यास्यसि ता देवी मारुतस्त्वच्छरीरगः ।
नच पापं ततस्ते स्यादित्युक्ते चैनमाविशत् ।
रेमे च स तया सार्द्धं दीर्घकालं जगत्प्रभुः ।
ततो देशान्तरं गत्वा तपश्चक्रे स मुद्गलः ।
तद्देहगा भारती तु केशवं शङ्करे स्थितम् ।
प्रत्यक्षे च शिवे जाते तद्देहस्थे च केशवे ।
शिवदेहस्थितो विष्णुर्भारत्यै तु ददौ पतिम् ।
देव्यश्चतस्रस्तु तदा दत्तमात्रे वरेऽमुना ।
ताः श्रुत्वा स्वपतिं देवि नचिरात् प्राप्स्यसीति च ।
भविष्यन्तीत्यथैकस्या मेनिरे पञ्चभर्तृताम् ।
अथाभ्यागान्महेन्द्रोऽत्र सोऽब्रवीत् तां वरस्त्रियम् ।
शङ्करं दर्शयित्वैव पञ्चभर्तृत्वमेष मे ।
अजानन् शक्र आहोच्चैः किमेतद् भुवनत्रये ।
इतीरिते शिवः प्राह पत मानुष्यमाप्नुहि ।
पश्यात्र मदवज्ञानात् पतितांस्त्वादृशान् सुरान् ।
उद्बबर्ह गिरिं तं तु ददर्शात्र च तान् सुरान् ।
ततो वरेण्यं वरदं विष्णुं प्राप्य स वासवः ।
मदवज्ञानिमित्तेन पतिता इति तान् सुरान् ।
शशाप मानुषेषु त्वं क्षिप्रं जातः पराभवम् ।
मच्छप्तानां च देवीनामविचार्य मया यतः ।
मानुषेषु ततः पश्चाद् भारतीदेहनिर्गताम् ।
एषा सा द्रौपदी नाम पञ्चदेवीतनुर्भवेत् ।
तासां पतित्वमाप्स्यन्ति भारत्यैव तु पार्वती ।
एते हि मारुताद्यास्ते देवकार्यार्थगौरवात् ।
इत्युक्त्वा प्रययौ ब्रह्मा सोऽश्वत्थामा शिवोऽभवत् ।
वेदेषु सपुराणेषु भारते चावगम्यते ।
मुमुदुः सर्वपाञ्चाला जातयोः सुतयोस्तयोः ।
मनुष्यपुत्रतायाश्च भावो मानुष एतयोः ।
याजोपयाजौ तावेव दयिता द्रुपदस्य सा ।
जातमात्मनिहन्तारं भारद्वाजो निशम्य तम् ।
भीमार्जुनाभ्यां बद्धं तं श्रुत्वा पाञ्चालभूपतिम् ।
सन्मान्य(सम्मान्य) पाण्डवान् सोऽपि शूरानुजसुतासुतः ।
ततः प्रभृति सन्त्यज्य देवपक्षा जरासुतम् ।
विशेषतश्च कृष्णस्य विज्ञाय स्नेहमेषु हि ।
प्रतापाद्ध्येव ते पूर्वं जरासन्धवशं गताः ।
जन्मान्तराभ्यासवशात् स्निग्धाः कृष्णे च पाण्डुषु ।
अपि तं बहुशः कृष्णविजितं नैव तत्यजुः ।
देवा हि कारणादन्यानाश्रयन्तोऽपि नाऽन्तरम् ।
धृतराष्ट्रो बलं दृष्ट्वा (ज्ञात्वा) बहुशो भीमपार्थयोः ।
भीमार्जुनावथो जित्वा सर्वदिक्षु च भूपतीन् ।
तयोः प्रीतोऽभवत् सोऽपि पौरजानपदास्तथा ।
एकोनविंशोऽध्यायः
औं ॥ एवं शुभोच्चगुणवत्सु जनार्दनेन
नाम्ना कणिङ्क इति चासुरको द्विजोऽभूत्
छद्मैव यत्र परमं न सुराश्च पूज्याः
इत्यादि कुत्सिततमां(कल्पिततमाम्) जगृहुः स्म विद्याम्
सम्पूर्णदुर्मतिरथो धृतराष्ट्रसूनुः
ज्येष्ठस्य तेऽपि हि वयं हृदयप्रजाता
राज्यं महच्च समवाप्स्यति धर्मसूनुः
नाऽत्मार्थमस्ति मम दुःखमथातिशुद्ध
एवं स्वपुत्रवचनं स निशम्य राजा
ते हि स्वबाहुबलतोऽखिलभूपभूतिं
एवं ब्रुवत्यपि नृपे पुनराह पाप
एवं निशम्य गदितं सुतहार्दपाशैः आकृष्यताऽशु स नृपोऽरिधरेच्छयैव ।
इत्युक्त आह पितरं(नृपतिम्) शकुनिं निरीक्ष्य
द्रौणेर्हि नास्ति सदृशो बलवान् प्रतापी
एवं हि सैनिकगणा अपि दानमानैः
त्रिंशच्छतं परमकाः सुरदुर्लभाश्च
ते वीर्यदा विजयदा अपि वारिवह्नि
सौहार्दमेषु यदिवाऽतितरां(यदि वा नितराम्) करोषि
एवं स्वपुत्रपरिपालनतो यशस्ते
क्षत्तैक एव सततं परिपोषकोऽलं
ते तेषु(एतेषु) दूरगमितेषु निराश्रयत्वात्
भेदः कुलस्य भविता कुलनाशहेतु
विष्णुर्जयन्त इति शम्भुसहाय आस्ते
अज्ञाप्य मत्पुरुषतां पुरुषैर्मदीयैः
इत्युक्तवत्यथ सुते स तथेत्युवाच
भीमस्तदा ह(तदाऽऽह/तदैव) भविताऽत्र हि भैक्षचार
निष्कालयन्ति यदि नो निजधर्मसंस्थान्
इत्युक्तवाक्यममुमग्रजमन्वगात् स
कीर्त्यर्थमेव निजधर्मपरिप्रहाणे
हन्तव्यतामुपगतेषु सुयोधनादि-
क्षत्ताऽथ चाऽह सुवचोऽन्त्यजभाषयैव
तान् हन्तुमेव च तदा धृतराष्ट्रसूनुः
पूर्वं प्रहस्त इति यस्त्वभवत् सुपापः
दिव्यं गृहं च भवतां हि मयोपनीतं
दृष्ट्वैव जातुषगृहं वसया समेतं
क्षत्ताऽथ नीतिबलतोऽखिललोकवृत्तं
चक्रे स चैवमथ वर्त्म वृतिच्छलेन
तस्याग्रजा च सहिता सुतपञ्चकेन
तं भागिनेयसहितं भगिनीं च तस्य
तप्तं तया ससुतया च तपो नितान्तं
जानन्निदं सकलमेव स(च) भीमसेनो
ज्ञात्वा पुरोचनवधं यदि भीष्ममुख्यैः
भीमोऽभयोऽपि गुरुभिः स्वमुखेन युद्धम्
विश्वासिता विदुरपूर्ववचोभिरेव
हा पाण्डवानदहदेष हि धार्तराष्ट्रो
पौरेभ्य एव निखिलेन च भीष्ममुख्या
भीमोऽप्युदूह्य वनमाप हिडिम्बकस्य
रक्षार्थमेव परिजाग्रति भीमसेने
सा राक्षसीतनुमवाप सुरेन्द्रलोक
तां भीम आह कमनीयतनुं न पूर्वं
सा भारती वरमिमं प्रददावमुष्यै
ज्ञानं च नैजमभिदर्शयितुं पुनश्च
काले तदैव कुपितः प्रययौ हिडिम्बो
सा भीममेव शरणं प्रजगाम तां च
तौ मुष्टिभिस्तरुभिरश्मभिरद्रिभिश्च
तद् भीमबाहुबलताडितमीशवाक्यात्
हत्वैव शर्ववररक्षितराक्षसं तं
ताभ्यामनूक्तमपि यन्न करोति भीमः
दृष्ट्वैव तं परममोदिन आशु पार्था
तान् भक्तिनम्रशिरसः समुदीक्ष्य कृष्णो
एवं ब्रुवत्यगणितोरुगुणे रमेश
सा नन्दनादिषु वनेषु विहृत्य तेन
देवोऽपि राक्षसतनुर्निर्हृतिः पुरा य
जाते सुते समयतो भगवत्कृतात् स
व्यासोऽपि पाण्डुतनयैः सहितो बकस्य
तान् ब्राह्मणस्य च गृहे प्रणिधाय कृष्णः
भिक्षामटत्सु सततं प्रतिहुङ्कृतेन
स्थूलं हि सद्म पृथिवीसहितं त्वरक्ष
धर्मस्य ते सुनियतेर्बलश्च बोधो
इत्युक्त आशु स चकार तथैव भीमः
तत्काल एव रुदितं निजवासहेतोः
जानीहि विप्ररुदितं कुत इत्यतश्च
दातव्य एव हि करोऽद्य च रक्षसस्य
अन्यत्र याम इति पूर्वमुदाहृतं मे
अर्थे तवाद्य तनुसन्त्यजनादहं स्यां
कन्योदिता बत कुलद्वयतारिणीति
एवं रुदत्सु सहितेषु कुमारकोऽस्य
पृष्टस्तयाऽऽह स तु विप्रवरो बकस्य
श्रुत्वा तमुग्रबलमत्युरुवीर्यमेव
एवं बलाढ्यममुमाशु निहत्य भीमः
सन्ति स्म विप्रवर पञ्च सुता ममाद्य
उक्तैवमाह च पृथा तनये मदीये
उक्त्वैवमेत्य निखिलं च जगाद भीम
मातः किमेष मुदितोऽतितरामिति स्म(मुदितो नितराम्)
यद्बाहुवीर्यपरमाश्रयतो हि राज्यम्
इत्युक्तवन्तममुमाह सुधीरबुद्धिः
एष स्वयं हि मरुदेव नरात्मकोऽभूत्
गत्वा त्वरन् बकवनाय सकाशमाशु
तेनैव चान्नसमितौ परिभुज्यमान
पीत्वा पयो त्वरित एनमवेक्षमाण(अवेक्ष्यमाण)
आक्रम्य पादमपि पादतलेन तस्य
हत्वा तमक्षतबलो जगदन्तकं स
द्वार्येव तत् प्रतिनिधाय पुनः स भीमः
दृष्ट्वैव राक्षसशरीरमुरु प्रभीता
अन्नात्मकं करममुष्य च सम्प्रचक्रुः
उत्पत्तिपूर्वककथां द्रुपदात्मजाया
पूर्वं हि पार्षत इमान् जतुगेहदग्धान्
यत्रक्वचित् प्रतिवसन्ति निलीनरूपाः
तत्काल एव वसुदेवसुतोऽपि कृष्णः
स प्राप्य(सम्प्राप्य) हस्तिनपुरं धृतराष्ट्रपुत्रान्
तस्यान्तरे हृदिकसूनुरनन्तरं स्वं
सर्वांश्च नः पुनरसाववमत्य कृष्णा-
इत्युक्त आशु कुमतिः स तु(स हि) पूर्वदेहे
श्रुत्वा तदीयवचनं भगवान् पुरीं स्वाम्
भीमोऽपि रुद्रवररक्षितराक्षसं तं
मङ्गल्यमेतदतुलं प्रतियात शीघ्रं
षण्णां च मध्यगमुदीर्णभुजं विशाल-
रात्रौ दिवा च सततं पथि गच्छमानाः
प्राप्ते तदोल्मुकधरेऽर्जुन एव गङ्गां
हन्ताऽस्मि वो ह्युपगतानुदकान्तमस्या
सर्वं हि फेनवदिदं बहुलं बलं ते
आग्नेयमस्त्रमभिमन्त्र्य तदोल्मुके स
पार्थेन सन्धर्षितः शरणं जगाम
गन्धर्व उल्बणसुरक्ततनुः स भूत्वा
विद्या सुशिक्षिततमा हि सुरेशसूनौ
आधिक्यतः स्वगतसंविद एव साम्ये
पार्थेन सोऽपि बहुलाश्च कथाः कथित्वा
ते धौम्यमाप्य च पुरोधसमुत्तमज्ञं
राजन्यमण्डलमुदीक्ष्य सुपूर्णमत्र
तांश्च प्रदर्श्य सकलान्(निखिलान्) स हुताशनांशः
एतेन कार्मुकवरेण तरूपरिस्थं
इत्यस्य वाक्यमनु सर्वनरेन्द्रपुत्रा
केचिन्निरीक्ष्य धनुरेत्य न मे सुशक्यम्
माषान्तराय स चकर्ष यदैव कोट्या
मद्रेश एत्य चकृषे स्थविरोऽपि वीर्यात्
सन्नेषु भूपतिषु मागध आससाद
जानुन्यमुष्य धरणीं ययतुस्तदैव
प्रायो गतास्तमनु(गतास्तदनु) भूपतयोऽथ कर्णो
तस्मिंश्च तेन विहते(निहते) प्रतिसन्निवृत्ते
विप्राश्च केचिदतियुक्तमिमौ हि वीरौ
तत्रार्जुनः पवनजात् प्रियतोऽप्यनुज्ञाम्(अभ्यनुज्ञाम्)
कृष्णा तदाऽस्य विदधे नवकञ्जमालां
द्रष्टुं हि केवलगतिर्नतु कन्यकाया
भीमस्तु राजसमितिं प्रतिसम्प्रयातां
भीमोऽयमेष पुरुहूतसुतोऽन्य एते
प्रीतेषु सर्वयदुषु प्रपलायितेषु
विप्रेषु दण्डपटदर्भमहाजिनानि
वृक्षं त्वसौ प्रतिनिधाय च मद्रराजं
पार्थोऽपि तेन धनुषा युयुधे स्म कर्णं
त्वं फल्गुनो हरिहयो द्विजसत्तमो(सत्तपो) वा
कार्यं न मे द्विजवरैः प्रतियोधनेने-
अग्रेऽश्विपुत्रसहितः स तु धर्मसूनुः
प्रामादिकं च वचनं न मृषा तयोक्तं
सम्भाष्य तैः स भगवानमितात्मशक्तिः
भिक्षान्नभोजिन उतो भगिनीं निजां च(इमां भगिनीं)
प्रातस्तु तस्य जनितुर्वचसा पुरोधाः
तानागतान् समभिपूज्य निजात्मजां च
चेष्टास्वराकृतिविवक्षितवीर्यशौर्य-
स प्राह मन्दहसितः किमिहाद्य राजन्
एवं ब्रुवाणमथ तं पृथया सहैव
पार्थार्थमेव हि मयैष कृतः प्रयत्नः
नात्र प्रमा मम हृदि प्रतिभात्यथापि
व्यासं तमीक्ष्य (भगवन्तमगम्यपूर्ण)भगवन्तमगण्यपूर्ण-
कृष्णस्तदाऽह नृपतिं प्रति देहि कन्यां
एषां श्रियश्च निखिला अपिचैकदेहाः
दिव्यं हि दर्शनमिदं तव दत्तमद्य
इत्युक्तवाक्यमनु तान् स ददर्श राजा
दत्वाऽभयं स भगवान् द्रुपदस्य कार्ये
पाञ्चालकेषु च महोत्सव आस राजा
उद्बाह्य तत्र निवसत्सु च पाण्डवेषु
दृष्ट्वैव तं मुमुदुराशु कुरुप्रवीरा
देवाङ्गयोग्यशुभकुण्डलहारमौलि-
रत्नानि गोगजतुरङ्गरथान् सुवर्ण-
दासीश्च दाससहिताः शुभरूपवेषाः
मासान् बहूनिह विहृत्य सहैव पार्थैः
वैचित्रवीर्यतनयाः सह सौबलेन
तैरर्दिते स्वपुर आशु स सोमकानां
चित्रे हते समर आशु सचित्रकेतौ
तैस्तेषु पञ्चसु समं प्रतियोधयत्सु
आयान्तमीक्ष्य तरुहस्तमिमं समीर-
ज्ञात्वा समस्तमपि तद् विदुरोऽग्रजं स्वं
पार्था इति स्म विदुरोऽवददाशु सोऽपि
इत्युक्त आह विदुरः स हिडिम्बवध्या-
श्रुत्वाऽथ कृष्णमुपयातमुरु प्रदाय
युद्धाय तेषु पुनरेव रथैः प्रयाते-
भीमार्जुनौ विषहितुं नहि कश्चनास्ति
आनीतये च विनियुज्य सुसान्त्वपूर्वम्
इत्युक्तवत्यनु तथेत्यवदन्नदीजो
तत्काल एव वसुदेवसुतश्च कृष्णो
तेष्वागतेषु सुमहानभवत् प्रहर्षः
कृष्णामपूजयदतीव च सौबली सा
कुन्ति प्रयाहि सहिता स्नुषया गृहं स्वं
ऊषुस्तथैव परिवत्सरपञ्चकं ते
कन्यैव साऽभवदतः प्रतिवासरं च
धर्मात्मजादिषु मरुत् प्रतिविष्ट एषां
नो सुप्तिवत्(सुप्तवत्) त्विदमतोऽन्यवशत्वतो हि
एवं स वायुरनुविष्टयुधिष्ठिरादि-
वासिष्ठयादववृषावपि केशवौ तौ
पूर्वं हि तेषु वनगेषु बभूव काशि-
पूर्वं हि राजगणने मगधाधिराजः
भग्नेषु तेषु पुनरात्तशरासनेषु
एकान्ततो जयमवीक्ष्य च नानुयाति
एकोऽहमेव नृपतीन् प्रतियोधयिष्य
भीष्मादयोऽपि नहि योधयितुं समर्था
इत्युक्त आशु स विमृश्य ययौ पुरं स्वं
सर्वेषु तेषु विजितेष्वभिजग्मिवान् स
सन्धौ यदैव जरया प्रतिसन्धितस्य
एवंविधं सुकुशलं बहुयुद्धशौण्डं
इत्युक्त आशु स तथैव चकार कर्णः
अङ्गाधिराज्यमुपलभ्य जरासुतस्य
उद्वाह्य काशितनयां गिरिजाधिविष्टां(गिरिजाभिविष्टां)
पुत्रो बभूव स तु लक्षणनामधेयः
पूर्वं सुरान्तक इति प्रथितः सुतोऽभूद्
आसीत् स्वयंवर उतात्र कलिङ्गराज-
तत्राथ रुद्रवरतः स जरासुतेन
दुर्योधनेऽनुजजनैः सह तैर्गृहीते
तेऽपि स्म कर्णसहिता मृतकप्रतीका
तत्रार्द्धराज्यमनुभुङ्क्ष्व सहानुजैस्त्वं
त्वं वीर शक्रसम एव ततस्तवैव
तस्याभिषेकमकरोत् प्रथमं हि कृष्णो
इत्येव पार्षतसुतासहितेऽभिषिक्ते
भीमे च पार्षतसुतासहितेऽभिषिक्ते
तस्मिन् महोत्सववरे दिनसप्तकानु-
कोशस्य चार्द्धसहितास्तु यदैव पार्था
भीमप्रतापमवलम्ब्य कलिङ्गबन्धान्
आज्ञापयत्यपि स भेरिरवेण पार्थान्
सद्भिर्हि सङ्गतिरिहैव सुखस्य हेतुः(सुखैकहेतुः)
प्रीतिर्यदि स्म भवतां मयि सानुजेऽस्ति
इत्येव तैः पुरजना निखिलैर्निषिद्धाः
वासिष्ठपेन यदुपेन च पाण्डवानां
देशं च नातिजनसंवृतमन्यदेश-
प्रस्थाप्य दूरमनुजस्य सुतान् स राजा
पार्थाश्च ते मुमुदुरत्र वसिष्ठवृष्णि-
विंशोऽध्यायः
औं ॥ यज्ञोरुदाननरदेववन्द्यताप्रश्नर्षिपूजासु युधिष्ठिरोऽभूत् ।
स्त्रीधर्मसंशासनभृत्यकोशरक्षाव्ययादौ गुणदोषचिन्तने ।
बीभत्सुरासीत् परराष्ट्रमर्दने तेनानियम्यांस्तु जरासुतादीन् ।
राष्ट्रेषु भीमेन विमर्दितेषु जिताश्च युद्धेषु निरुद्यमास्ते ।
आजीविनां वेतनदस्तदाऽऽसीन्माद्रीसुतः प्रथमोऽथ द्वितीयः ।
धृष्टद्युम्नस्तत्र सेनाप्रणेता शक्रप्रस्थे नित्यमास्तेऽतिहार्दात् ।
नावैष्णवो न दरिद्रो बभूव न धर्महानिश्च बभूव कस्यचित् ।
युधिष्ठिरं यान्ति हि दर्शनोत्सुकाः प्रतिग्रहायाप्यथ याजनाय ।
गन्धर्वविद्याधरचारणाश्च सेवन्त एतान्त्सततं समस्ताः ।
तेषां राष्ट्रे कार्तयुगा हि धर्माः प्रवर्तिता एव ततोऽधिकाश्च ।
अथोपयेमे शिशुपालपुत्रीं युधिष्ठिरो देवकीं नाम पूर्वम्(पूर्वाम्) ।
तस्यां सुहोत्रो नामतः पुत्र आसीद् यश्चित्रगुप्तो नाम पूर्वं सुलेखः ।
सा केवला भारती नान्यदेव्यस्तत्राऽविष्टास्तत्कृते(तत्राविष्टा यत्कृते) काशिराजः ।
तेषां मध्ये भीमसेनांस एषा मालामधात् तत्र जरासुताद्याः ।
पूर्वं वाक्यैर्वैदिकैस्तान्स भीमो जिग्ये तर्कैः साधुभिः सम्प्रयुक्तैः ।
वेदाधिक्यं शैवशास्त्राणि चाऽहुर्वेदोज्झितानां बहुलां च निन्दाम् ।
विष्णोराधिक्यं तानि शास्त्राणि चाऽहुः शिवादिभ्यः कुत्रचिन्नैव वेदे ।
लोकायताश्च क्वचिदाहुरग्र्यं विष्णुं गुरुं सर्ववरं बृहस्पतेः ।
तेष्वागमेष्वेव परस्परं च विरुद्धता ह्यन्यपक्षेषु भूपाः ।
पूर्वं हि गङ्गा मम विष्णुपूजाविघ्नार्थमायाद् वामकरेण सा मे ।
स व्याघ्ररूपी कपिलात्मिकामुमां(कपिलात्मकामुमां) परीक्षयन् मां हन्तुमिवाऽद्रवद् द्रुतम् ।
व्याघ्रेश्वरं नाम लिङ्गं पृथिव्यां ख्यातं तदास्ते तद्वदन्यत्र युद्धे ।
एवं प्रत्यक्षे विष्णुपदाश्रयस्य बलाधिक्ये किमु वक्तव्यमत्र ।
मया केदारे विप्ररूपी जितश्च रुद्रोऽविशल्लिङ्गमेवाऽशु भीतः ।
एवं प्रत्यक्षे विष्णुबले प्रतीपं मनो यस्य ह्युत्तरं स ब्रवीतु ।
विद्राप्य(विद्राव्य) तान् बाणसङ्घैः समस्तान् जरासुतं गदया योधयित्वा(पोथयित्वा) ।
स व्रीडितः प्रययौ मागधांश्च भूपैः समेतो भीमसेनो रथं स्वम् ।
तस्यां त्रिलोकाधिकरूपसद्गुणैरासम्मितायां (आसम्मतायां) रममाणः सुतं च ।
कृष्णोऽपि गत्वा द्वारवतीं सरामः सत्यापितुर्वधकर्तारमेव ।
तावब्रूतां (सर्वलोकैकभर्तुः)सर्वलोकैककर्तुर्नाऽवां विरोधं मनसाऽपि कुर्वः ।
अन्वेव तं कृष्णरामौ रथेन यातौ शतं योजनानां दिनेन ।
छित्वा शिरस्तस्य चक्रेण कृष्णो जानन्नक्रूरे मणिमेनेन दत्तम् ।
अविश्वासात् सतु सक्रोध एव ययौ विदेहानवसत् पञ्च चाब्दान् ।
बभूव शिष्योऽस्य तथा गदायामसन्निधानं केशवस्य प्रतीक्षन् ।
ज्येष्ठं ह्येनं केशवो नातिवर्तेदित्येव मेने धार्तराष्ट्रः स तस्मात् ।
रूपेण तस्या मोहितो धार्तराष्ट्रो विशेषतः कृष्णरामौ भगिन्याः ।
जाता देवक्यां सा सुभद्रेति नाम्ना भद्रा रूपेणाऽनकदुन्दुभेस्ताम् ।
सीतायाः प्राङ् नित्यशुश्रूषणात् सा बभूव विष्णोर्भगिनी प्रिया च ।
एतत् कृत्वा धृतराष्ट्रात्मजः स ययौ कुरून् निवसत्यत्र रामे ।
आनीय रामं च समस्तसात्त्वतां यदाऽवादीत् केशवः सन्निधाने ।
अव्याजतामात्मनो दर्शयित्वा हलायुधे केशवस्तस्य जानन् ।
आस्तामक्रूरे मणीरन्यैरधार्यः सदा यज्ञाद् दानपतेः स धार्यः ।
लब्ध्वा रत्नं दानपतिः सदैव सन्दीक्षितोऽभूद् यज्ञकर्मण्यतन्द्रः ।
वसन्नजस्तत्र बहूंश्च मासान् सफल्गुनोऽयान्मृगयां कदाचित् ।
सा सूर्यपुत्री यमुनानुजाता तपश्चरन्ती कृष्णपत्नीत्वकामा ।
ततो गत्वा नग्नजितो गृहं च स्वयंवरे सप्त वृषान्गृह्णात्(अगृह्णत्) ।
ततो नीलां तस्य सुतां च लेभे पूर्वं नीला गोपकन्याऽपि याऽसीत् ।
पितृष्वसुर्मित्रविन्दा सुता च कृष्णे मालामासजद् राजमध्ये ।
जित्वाऽऽवन्त्यौ तौ नृपतींश्चैव सर्वानादाय तां प्रययौ वासुदेवः ।
विश्वेषां देवानामवतारा हि पञ्च ते कैकेया(कैकया) भ्रातरोऽस्या हरेश्च ।
स्वयंवरो लक्षणायास्तथाऽऽसीद् यथा द्रौपद्या लक्ष्यवेधात्मकः(लक्षवेधात्मकः) सः ।
लक्षं च तत् सर्वतश्छन्नमेव द्वारं शरस्याप्युपरि स्म लक्षात् ।
तत्राऽजग्मुर्मागधाद्याश्च सर्वे पार्था अपि द्रष्टुमिहाभ्युपाययुः ।
केचिन्निपेतुर्धनुषैव ताडिता नवै केचिच्चालयितुं च शेकुः ।
धनञ्जयः स्वात्मबलं(धनञ्जयः सु आत्मबलं) प्रकाशयन् सज्जं कृत्वा धनुरैक्षच्च लक्ष्यम् ।
भीमश्चापं लक्षमप्येतदत्र द्रष्टुं च नैवैच्छदरीन्द्रधारिणः ।
कृष्णस्ततश्चापमधिज्यमाशु कृत्वाऽचिन्त्यश्छिन्नबाणेन लक्ष्यम्(लक्षम्) ।
कृष्णे ब्रह्माद्यैः स्तूयमाने नरेन्द्रकन्या मालां केशवांसे निधाय ।
विद्राप्य(विद्राव्य) तान् मागधादीन् स कृष्णो भीमार्जुनाभ्यां सहितः पुरीं स्वाम् ।
भैष्मी सत्या चैकतनुर्द्विधैव जाता भूमौ प्रकृतिर्मूलभूता ।
रामेण तुल्या जाम्बवती प्रियत्वे कृष्णस्यान्याः किञ्चिदूनाश्च तस्याः ।
यदाऽऽवेशो ह्रासमुपैति तत्र प्रद्युम्नतो विंशगुणाधिकाः स्युः ।
एवं कृष्णे द्वारकामध्यसंस्थे गिरिं भूपा रैवतकं समाययुः ।
आत्मानं तान् द्रष्टुमभ्यागतान् स कृष्णो गिरौ रैवतके ददर्श ।
एत्याऽकाशान्नारदः कृष्णमाह सर्वोत्तमस्त्वं त्वादृशो नास्ति कश्चित् ।
दक्षिणाभिः साकमित्येव कृष्णं पप्रच्छुरेतत् किमिति स्म भूपाः ।
कूर्मो दृष्टो विष्णुपद्यां मयोक्तस्त्वमुत्तमो नास्ति समस्तवेति(नास्त्यधिकस्तवेति) ।
या मादृशा देवताः सर्वशस्ता धृतास्तया प्रथितत्वात् पृथिव्या ।
तैरेवाहं मत्समाश्चैव देव्यो ध्रियन्त इत्येव त ऊचिरेऽथ ।
सैका देवी बहुरूपा बभाषे युक्ता यदाऽहं ज्ञेन नारायणेन ।
विष्ण्वाविष्टा यज्ञनाम्नी तदङ्कस्थिता सोचे केशवो ह्युत्तमोऽलम् ।
तयोक्तोऽहं नावतारेषु कश्चिद् विशेष इत्येव यदुप्रवीरम् ।
सदोत्तमः किन्तु यदा तु सा मे वामार्द्धरूपा दक्षिणानामधेया ।
सा दक्षिणामानिनी देवता च सा च स्थिता(साऽवस्थिता) बहुरूपा मदर्द्धा ।
तदाऽप्यस्या उत्तमोऽहं सुपूर्णो न मादृशः कश्चिदस्त्युत्तमो वा ।
ताभिश्चैताभिर्दक्षिणाभिः समेताद् वरिष्ठोऽहं जगतः सर्वदैव ।
उक्तं कृष्णेनाप्रतिमेन भूपा अन्योत्तमत्वं दक्षिणानां च शश्वत् ।
प्रत्यक्षं वो वीर्यमस्यापि कुन्त्या युद्धेऽर्थितः केशवो वीर्यमस्यै ।
व्रतं भीमस्यास्ति नैवाभि कृष्णमियामिति स्माऽज्ञया तस्य विष्णोः ।
एवं क्रीडन्तोऽप्यात्मशक्त्या प्रयत्नं कुर्वन्तस्ते विजिताः केशवेन ।
एवं विधान्यद्भुतानीह कृष्णे दृष्टानि वः शतसाहस्रशश्च ।
वाय्वाज्ञया वायुशिष्यः स सत्यमित्याद्युक्त्वा नारदो रुक्मिणीं च ।
साक्षात् सत्या रुक्मिणीत्येकसंविद् द्विधाभूता नात्र भेदोऽस्ति कश्चित् ।
साकं रुक्मिण्या राजमध्ये प्रवेशात् स्तवादृषेः पुष्पदानाच्च देवीम् ।
दातास्म्यहं पारिजातं तरुं त इत्येव तत्राथाऽगमद् वासवोऽपि ।
तदैवाऽगुर्मुनयस्तेन नुन्ना(तुन्नाः) बदर्यास्ते सर्व एवाऽशु कृष्णम् ।
इन्द्रेण देवैः सहितेन याचितो विप्रैश्च सस्मार विहङ्गराजम् ।
नित्यैव या प्रकृतिः स्वेच्छयैव जगच्छिक्षार्थं द्वादशीं भीमसञ्ज्ञाम् ।
तया युक्तो गरुडस्कन्धसंस्थो दूरानुयातो वज्रभृताऽप्यनुज्ञाम् ।
भौमो ह्यासीद् ब्रह्मवरादवध्यो न शस्त्रभृज्जीयस इत्यमुष्मै ।
भौमेन जेयत्वमपि(जय्यत्वमपि) ह्यमीषां दत्तं भौमाय ब्रह्मणा क्रोडरूपात् ।
आसीद् बाह्ये गिरिदुर्गं तदन्तः पानीयदुर्गं मौरवं पाशदुर्गम् ।
तस्यामात्याः पीठमुरौ निसुम्भहयग्रीवौ पञ्चजनश्च शूराः ।
हन्तुम् कृष्णो नरकं तत्र गत्वा गिरिदुर्गं(गिरिं दुर्गं) गदया निर्बिभेद ।
अथाभिपेतुर्मुरपीठौ निसुम्भहयग्रीवौ पञ्चजनश्च दैत्याः ।
तेषां सुताः सप्तसप्तोरुवीर्या वरादवध्या गिरिशस्याभिपेतुः ।
हत्वा पञ्चत्रिंशतो मन्त्रिपुत्रान् जगाम भौमस्य सकाशमाशु ।
जघ्ने सेनां गरुडः पक्षपातैः पादं शेषां केशवः सायकौघैः ।
अच्छेद्योऽभेद्यो नित्यसंवित्सुखात्मा नित्याव्ययः पूर्णशक्तिः स कृष्णः ।
बहून् वरान् ब्रह्मणोऽन्येष्वमोघान् मोघीकृतान् वीक्ष्य परात्परेशः ।
तदा दृप्तं नरकं वीक्ष्य देवी सत्याऽऽददे कार्मुकं शार्ङ्गसञ्ज्ञम् ।
आलिङ्ग्य कृष्णः सत्यभामां पुनश्च रथान्तरे संस्थितं भौममुग्रम् ।
स मन्त्रिभिर्मन्त्रिपुत्रैः समेतो जगाम कृष्णावज्ञयाऽन्धंतमश्च ।
तदा भूमिः पञ्चभूतावरा या यस्यां जज्ञे नरकः श्रीवराहात् ।
साऽदित्यास्ते कुण्डले पादयोश्च निधाय पौत्रं भगदत्तसञ्ज्ञम् ।
संस्थाप्य तं सर्वकिरातराज्ये भौमाहृतं वैश्रवणाद् बलेन ।
करीन्द्रमेकं तं निधायैव तस्मिन् कृत्वा प्रसादं च वसुन्धरायाः ।
नराधिपान् देवगन्धर्वनागान् जित्वाऽऽनीतं हेमरत्नोच्चराशिम् ।
महावीर्यैर्नैर्ऋतै राक्षसेन्द्रैर्भौमानीतैर्निर्ऋतिं योधयित्वा ।
तत्रापश्यत् कन्यका भूमिपानां भौमानीताः समरे तान् विजित्य ।
काश्चित् तत्राऽसन् देवगन्धर्वकन्यास्तासां प्रधाना त्वष्टृपुत्री कशेरुः ।
भार्यात्वार्थे वासुदेवस्य योषित्तनुं तासामिच्छतीनां समीरः ।
नारायणं तत्र शुश्रूषमाणाः प्राप्याप्सरस्त्वं राजकुलेषु जाताः ।
आजानदेवैः सर्वगुणैः समास्ताः स्वभावतोऽथेन्दिरावेशतोऽतः ।
समन्ततो योजनानां शते द्वे प्रवृद्धमिन्द्रस्य स रत्नपर्वतम् ।
स्वयं च सत्यासहितः समारुहत् स चाश्रमेणैव ययौ त्रिविष्टपम् ।
सम्पूजितः सत्यभामासहायः शक्रेण शच्या सहितेन सादरम् ।
तमासुरावेशवशादजानती सत्यां च सर्वप्रभवौ जगत्प्रभू(जगत्गुरू) ।
अथो सदानन्दचिदात्मदेहः न नन्दनोद्यानमजोऽनुरूपया ।
तयाऽच्युतोऽसौ कनकावदातया सुकुङ्कुमादिग्धपिशङ्गवाससा ।
सर्वर्तुनित्योदितसर्ववैभवे सुरत्नचामीकरवृक्षसद्वने ।
विदोषसंवित्तनुरत्र सत्तरुं ददर्श सत्याऽमृतमन्थनोद्भवम् ।
दृष्ट्वैव तं सुस्मितचन्द्रिकास्फुरन्मुखारविन्दाऽसितलोललोचना ।
तरुर्जगज्जीवद मे गृहाङ्गणे संस्थापनीयोऽयमचिन्त्यपौरुष ।
स तेन वृक्षेण सहैव केशवस्तया च देव्याऽऽरुहदग्र्यपौरुषम् ।
तानासुरावेशयुतान् हरेश्च बलप्रकाशाय समुद्यतान् सुरान् ।
निरायुधं वैश्रवणं चकार चिक्षेप चाब्धौ गरुडो जलेश्वरम्(जलेशम्) ।
विबोध्य शार्ङ्गोत्थरवैः स्वकां तनुमावेशितानामसुरैरगाद्धरिः ।
शिवं च शक्रार्थमुपागतं हरिर्व्यद्रावयच्छार्ङ्गविनिःसृतैः शरैः ।
विद्राविते बाणगणैश्च शौरिणा हरे हरौ वज्रमवासृजद् द्रुतम् ।
अपाहसत् तं जगदेकसुन्दरी हरिप्रियाऽथो जगदेकमातरम् ।
जगाम चाथो शरणं जनार्दनं सुरैर्वृतो देवपतिः क्षमापयन् ।
ययाच एनं परिरक्षणाय शचीपतिः केशवमर्जुनस्य ।
तमर्जुनार्थं वरमाप्य वासवः पुनःपुनश्चक्रधरं प्रणम्य ।
कृष्णोऽप्यनुज्ञाप्य पुरन्दरं पुरीं निजां व्रजन्नभ्यधिकं व्यरोचत ।
विरोचमानस्य सदा जगत्प्रभोर्नवै विशेषः क्वचिदच्युतस्य ।
प्रविश्य चेशः स्वपुरीं स यादवैः सुपूजितोऽन्तःपुरमेत्य चाङ्गणे ।
प्रदाय रत्नानि च सर्वसात्त्वतां यथेष्टतस्ता अपि कन्यकाः प्रभुः ।
पृथक्पृथक् तासु दशैव पुत्रकानधत्त(पुत्रकान् न्यधत्त) कन्यामपि सर्वशः प्रभुः ।
विवस्वतो योऽवरजोऽदितेः सुतः ख्यातश्च नाम्ना सवितेति कृष्णात् ।
स चारुदेष्णोऽपि हि विघ्नराजो येऽन्ये च कृष्णस्य सुताः समस्ताः ।
तस्यां समस्तैरभिपूज्यमाने देवे स्वपुर्यां निवसत्यनन्ते ।
अज्ञानतस्तैरभियोधितः स जिगाय सर्वानपि वासुकिं च ।
तैः पूजितः साम्बसहाय आशु मयं च मायाविनमस्त्रवर्षैः ।
तत्रैव कृष्णेन तु पारिजाते हृते जयन्तं प्रजिगाय चाऽजौ ।
अस्त्राणि तावस्त्रवरैर्निहत्य(तावस्त्रवर्षैर्निहत्य) तयोश्च ताभ्यां प्रतिदग्धयानौ ।
स विद्यया साम्बमुदूह्य रत्या प्रदत्तया रुगक्मि(ग्मि)णिनन्दनः पुरीम् ।
तं द्व्यष्टसाहस्रगृहेषु दृष्ट्वा तावत्स्वरूपैर्विहरन्तमेकम् ।
स आज्ञया ब्रह्मण आह कृष्णां क्रमात् कर्तुं भीम एवैकसंस्थाम् ।
सुन्दोपसुन्दौ भ्रातरौ ब्रह्मवाक्यात् परस्परादन्यतो नैव वध्यौ ।
अतः पृथग् वत्सरतो भवत्सु क्रमात् कृष्णा तिष्ठतां योऽन्ययुक्ताम् ।
ततः कदाचिद् धर्मराजेन युक्तां शस्त्रागारे विप्रगोरक्षणार्थम् ।
युधिष्ठिराद्यैः सौहृदाद् वारितोऽपि ययौ सत्यार्थं स कदाचिद् द्युनद्याम् ।
तस्याः पिता गरुडेनाऽत्तपत्युः पुत्राकाङ्क्षी चोदयामास पार्थम् ।
पुनःपुनर्याच्यमानः स पार्थः पुत्रार्थमस्या भुजगेन तस्याम् ।
गुणाः पितुर्मातृजातिः सुतानां यस्मात् सतां प्रायशस्तेन नागः ।
ततो ययावर्जुनस्तीर्थयात्राक्रमेण पाण्ड्यांस्तनयोऽस्य मात्रा ।
सत्यात्ययान्नैव दोषोऽर्जुनस्य तेजीयसश्चिन्तनीयः कथञ्चित् ।
अतिस्नेहाच्चाग्रजाभ्यां तदस्य क्षान्तं सुता पाण्ड्यराजेन दत्ता ।
स वीरसेनस्त्वष्टुरंशो यमस्याप्यावेशयुक् सा च कन्या शची हि ।
तेनैव हेतोर्नातिसामीप्यमासीत् तस्याः पार्थे पुत्रिकापुत्रधर्मा ।
पुत्रं वीरं जनयित्वाऽर्जुनोऽतो गच्छन् प्रभासं शापतो ग्राहदेहाः ।
एवं हि तासां शापमोक्षः प्रदत्तो यदाऽखिला वो युगपत् सम्प्रकर्षेत् ।
विप्रापहासात् कुत्सितयोनितस्ताः कन्यातीर्थे पाण्डवः सम्प्रमुच्य ।
विचिन्त्य कार्यं यतिरूपं गृहीत्वा कुशस्थलीं प्रययौ तं समीपे ।
सर्वज्ञा(सर्वज्ञाना) सा लीलया हासहेतुमपृच्छत् तं सोऽपि तस्यै बभाषे ।
आक्रीडोऽसौ वृष्णिभोजान्धकानां तत्रापश्यत् केशवः फल्गुनं तम् ।
दृष्ट्वा गिरौ रौहिणेयो यतीन्द्रवेषं पार्थं ज्ञातियुक्तः प्रणम्य ।
सर्वज्ञं तं वाग्मिनं वीक्ष्य रामः कन्यागारे वर्षकाले निवासम् ।
युवा बली दर्शनीयोऽतिवाग्मी नायं योग्यः कन्यकागारवासम् ।
नास्मन्मते रोचते त्वन्मतं तु सर्वेषां नः पूज्यमेवास्तु तेन ।
नित्याप्रमत्ता साधु सन्तोषयेति प्रोक्ता तथा साऽकरोत् सोऽपि तत्र ।
संयाचितः फल्गुनेनाऽह वाक्यं यद् वासुदेवस्तन्न जानाति कश्चित् ।
अस्त्रे शस्त्रे तत्त्वविद्यासु चैव शिष्यः शैनेयो वासुदेवेन्द्रसून्वोः ।
अन्ये सर्वे(अन्येऽपि सर्वे) वासुदेवस्य पार्थान् प्रियान् नित्यं जानमाना अपि स्म ।
दुर्योधने दातुमिच्छन्ति सर्वे रामप्रियार्थं जानमाना हरेस्तत् ।
प्रद्युम्नसाम्बप्रमुखाश्च वञ्चिता ययुस्तीर्थार्थं रामयुक्ताः समग्राः ।
यते तीर्थानाचरन् बान्धवांस्त्वमद्राक्षीर्नः कच्चिदिष्टान् स्म पार्थान् ।
भूयः साऽवादीद् भगवन्निन्द्रसूनुर्गतस्तीर्थार्थं ब्राह्मणेभ्यः श्रुतो मे ।
अत्रैवेति स्मयमानं च पार्थं पुनःपुनः पर्यपृच्छच्छुभाङ्गी ।
ततो हर्षाल्लज्जया चोत्पलाक्षी किञ्चिन्नोचे पार्थ एनामुवाच ।
नातिक्रमो वासुदेवस्य युक्तस्तस्मात् तेन स्वपितृभ्यां च दत्ताम् ।
मातापितृभ्यां सहितोऽथ कृष्णस्तत्रैवाऽयाद् वासवश्चाथ शच्या ।
कृष्णस्ततः पुरुहूतेन साकं तयोर्विवाहं कारायामास सम्यक् ।
ततः कृष्णः स्यन्दनं फल्गुनार्थे निधाय स्वं प्रययौ तद्रजन्याम् ।
सर्वायुधैर्युक्तरथं समास्थिते गृहीतचापे फल्गुने द्वारवत्याम् ।
ततस्तु तं सतनुत्रं महेन्द्रदत्ते दिव्ये कुण्डले वाससी च ।
ततः स आबद्धतलाङ्गुलित्रः सतूणीरश्चापमायम्य(आनम्य) बाणैः ।
चक्रे सारथ्यं केशवेनैतदर्थे(केशवेनैतदर्थं) सुशिक्षिता तस्य सम्यक् सुभद्रा ।
स शिक्षया(स्वशिक्षया, सुशिक्षयाऽत्यद्भुतया) त्वद्भुतया शरौघैर्विद्राप्य तान् भीषयित्वैव सर्वान् ।
प्रियं कुर्वन्निव रामस्य सोऽपि व्याजेन पार्थं सेनयैवाऽवृणोत् तम् ।
एको ह्यसौ मरुतां सौम्यनामा शुश्रूषार्थं वासुदेवस्य जातः ।
निरायुधं विरथं(निरायुधां विरथां) चैव चक्रे पार्थः सेनां तस्य नैवाहनच्च ।
शिक्षां पार्थस्याधिकां मानयान उपेत्य पार्थं च शशंस सर्वाम् (सर्वम्) ।
ततः पराजितवच्छीघ्रमेत्य शशंस सर्वं हलिनेऽथ सोऽपि ।
कृष्णोऽपि सर्वं विपृथोर्निशम्य प्राप्तः सुधर्मां विमना इवाऽसीत् ।
मायाव्रतं तं विनिहत्य शीघ्रं वयं सुभद्रामानयामः क्षणेन ।
ज्ञातव्यमेतस्य मतं पुरस्ताद्धरेर्विरोधे न जयो भवेद् वः ।
अथाब्रवीद् वासुदेवोऽमितौजाः शृण्वन्तु सर्वे वचनं मदीयम् ।
तां मे वाचं नाग्रहीदग्रजोऽयं बहून् दोषान् व्याहरतोऽप्यतो मया ।
अतीतश्चायं कार्ययोगोऽसमक्षं हृता कन्याऽतो नोऽत्र का मानहानिः ।
देया च कन्या नास्ति पार्थेन तुल्यो वरोऽस्माकं कौरवेयश्च पार्थः ।
अर्थ्योऽस्माभिः स्वयमेवाहरत् स शक्रात्मजो नात्र नः कार्यहानिः ।
जित्वा यद्येनं कन्यका चाऽहृता चेत् परामृष्टां नैव कश्चिद्धि लिप्सेत्(कश्चिद् विलिप्सेत्) ।
श्रुत्वा हली कृष्णवाक्यं बभाषे मा यात चित्तं विदितं मयाऽस्य ।
ततोऽर्जुनो यत्र तिष्ठन्(तिष्ठेत्) न कश्चित् पराजयं याति कृष्णाज्ञयैव ।
सम्भावितो भ्रातृभिश्चातितुष्टैरूचेऽथ सर्वं तेषु यच्चाऽत्मवृत्तम्(आत्मवृत्तिम्) ।
सार्द्धं ययौ शकटै रत्नपूर्णैः शक्रप्रस्थं पूजितस्तत्र पार्थैः ।
मासानुषित्वा कतिचिद् रौहिणेयो ययौ पुरीं स्वां केशवोऽत्रावसच्च ।
आसन् कृष्णायाः पञ्च सुता गुणाढ्या विश्वेदेवाः पञ्चगन्धर्वमुख्यैः ।
प्रतिविन्ध्यः सुतसोमः(श्रुतसोमः) श्रुताख्यकीर्तिः शतानीक उत श्रुतक्रियः ।
चन्द्रांशयुक्तोऽतितरां(चन्द्रांशयुक्तो नितरां) बुधोऽसौ जातः सुभद्राजठरेऽर्जुनेन ।
सर्वेऽपि ते वीर्यवन्तः सुरूपा भक्ता विष्णोः सर्वशास्त्रेष्वभिज्ञाः ।
ततः कदाचित् खाण्डवं कृष्णपार्थौ चिक्रीडिषू सत्यभामासुभद्रे ।
स्वैरं तयोस्तत्र विक्रीडतोश्च स्त्रीरत्नाभ्यां मन्दवातानुजुष्टे ।
भूत्वा विप्रस्तौ ययाचेऽन्नमेत्य कुशानुरूचेऽनुमते (कुशानुरूचे च मते) रमेशितुः ।
प्रयाजान् देवाननुयाजांश्च शुल्कं हविर्दाने देवतानामयाचिषम् ।
पुनः पूर्तिः केन मे स्याद् बलस्येत्यब्जोद्भवं पृष्टवानस्मि नत्वा ।
शक्रस्येदं खाण्डवं तेन विघ्नं करोत्यसौ तेन वां प्रार्थयामि ।
नरावेशादन्नदानप्रतिश्रवात् स्वस्यापि शक्रस्य विरोधमैच्छत् ।
नहि स्वदत्तस्य पुनः स वैरं शक्रः कुर्यात् स्वयमिन्द्रो हि पार्थः ।
नचायुक्तः केशवेनैष शक्त इति कृष्णादाप भूयोऽप्यनुज्ञाम् ।
चक्रं गोमन्ते कृष्णमापापि(कृष्णमायाद्धि) पूर्वं भक्त्या वह्निः केशवेऽदात् पुनस्तत् ।
धनुश्च गाण्डीवमथाब्जजस्य करोति येनाखिलसंहृतिं सः ।
तेनैव ते जिग्युरथो जगत्त्रयं प्रसादतस्ते(प्रसादतस्तु) क्रमशोऽब्जयोनेः ।
रथं च शुभ्राश्वयुतं जयावहं तूणौ तथाचाक्षयसायकौ शुभौ ।
विशेषतो ध्वजसंस्थे हनूमत्यजेयता स्याज्जयरूपो यतोऽसौ ।
गाण्डीवमप्यास कृष्णप्रसादाच्छक्यं धर्तुं पाण्डवस्याप्यधार्यम् ।
इन्द्रस्य दत्तश्च वरः स्वयम्भुवा तेनापि पार्थस्य बभूव धार्यम् ।
स योजनद्वादशकाभिविस्तृतं पुरं चकाराऽशु पुरन्दरात्मजः ।
प्रभक्षमाणं(प्रभक्ष्यमाणं) निजकक्षमीक्ष्य सन्धुक्षयामास तदाऽऽशुशुक्षणिम् ।
अस्त्रैस्तु वृष्टिं विनिवार्य कृष्णः पार्थश्च शक्रं सुरपूगयुक्तम् ।
स्नेहं च कृष्णस्य तदर्जुने धृतं विलोक्य पार्थस्य बलं च तादृशम् ।
विष्णुश्च शक्रेण सहेत्य केशवं समाश्लिषन्निर्विशेषोऽप्यनन्तः ।
ब्रह्मा च शर्वश्च समेत्य कृष्णं प्रणम्य पार्थस्य च कृष्णनाम ।
अनुज्ञातास्ते प्रययुः केशवेन क्रीडार्थमिन्द्रो युयुधे हि तत्र ।
दैत्याश्च नागाश्च पिशाचयक्षा हताः सर्वे तद्वनस्था हि ताभ्याम् ।
अयमग्ने जरितेत्यादिमन्त्रैः स्तुत्वा वह्निं पक्षिणो नैव दग्धाः ।
छिन्नेऽर्जुनेनान्तरिक्षे पतन्त्यास्तस्याः शक्रेणावितश्छिन्नपुच्छः ।
मयः कृष्णेनाऽत्तचक्रेण दृष्टो ययौ पार्थं शरणं जीवनार्थी ।
देवारिरित्येव मयि प्रकोपः कृष्णस्य तेनाहमिमं(तेनाहममुं) पुरन्दरम् ।
प्राणोपकृत् प्रत्युपकारमाशु किं ते करोमीति स पार्थमाह ।
कृष्णोऽपि (राज्ञे)राज्ञोऽतिविचित्ररूपसभाकृतावादिशत्(सभाकृतावदिशत्) तां स चक्रे ।
दृष्ट्वा च तौ पाण्डवाः सर्व एव महामुदं प्रापुरेतन्निशम्य ।
एकविंशोऽध्यायः
औं ॥ जनार्दनाज्ञया मयः समस्तकौतुकोत्तराम्(समस्तकौतुकोत्तमाम्) ।
स वायुधारितां गदां हि यौवनाश्वभूभृता ।
पुनश्च वत्सरद्वयं समुष्य केशवो ययौ ।
ततो वसन् स्वपुर्यजः क्वचिद् रविग्रहे हरिः ।
पृथासुताश्च सर्वशः सदारपुत्रमातृकाः ।
तथैव नन्दगोपकः सदारगोपगोपिकः ।
प्रियाश्च ये रमेशितुर्हरिं त्रिरूपमेत्य ते ।
कृतार्थतां च ते ययू रमेशपाददर्शनात् ।
अनुग्रहं विधाय स स्वकेषु केशवस्त्रिवृत् ।
समस्तलोकसंस्थितात्मभक्तिमज्जनस्य सः ।
ततो ययौ स्वकां पुरीं पृथासुतैः सहाच्युतः ।
हयं सभीमफल्गुना हरे रथं समास्थिताः ।
जिताः समस्तभूभृतो जरासुतादयः क्षणात् ।
हयः स कृष्णनिर्मितो दिनेन लक्षयोजनम् ।
पराशरात्मजो हरिर्हरिं यदा त्वदीक्षयत् ।
व्रजन्ति जन्मनोऽनु मे सदा सुता अदृश्यताम् ।
सकृष्णरामकार्ष्णिभिः (न कृष्णरामकार्ष्णिभिः) सुता नु मेऽत्र पालिताः ।
तदा जगाद फल्गुनोऽसुरैर्विदूषितात्मना ।
मया जिता हि खाण्डवे सुरास्तथाऽसुरानहम् ।
उदीर्य चेति केशवं स ऊचिवान् व्रजाम्यहम् ।
विलज्जमानमीक्ष्य तं जगाद केशवोऽरिहा ।
वह्निं प्रवेक्ष्येऽशक्तश्चेदित्युक्त्वा सर्वयादवैः ।
प्रियो हि नितरां रामः कृष्णस्यानु च तं सुतः ।
रतिरेव हि या तस्यां जातोऽसौ कामनन्दनः ।
तस्मात् तांस्त्रीनृते कृष्णः पार्थसाहाय्यकारणात् ।
अस्त्रैश्चकार दिग्बन्धं कुमारोऽथापि तत्क्षणात् ।
वह्निं(अग्निं) विविक्षन्तममुं निवार्य ययौ सविप्रः सहफल्गुनो हरिः ।
ददुश्च मार्गं गिरयोऽब्धयस्तथा विदार्य चक्रेण तमोऽन्धमीशः ।
संस्थाप्य दूरे सरथं सविप्रं पार्थं स्वरूपे द्विचतुष्कबाहौ ।
सहस्रमूर्धन्युरुशेषभोग आसीनरूपेऽमितसूर्यदीधितौ ।
स्थित्वैकरूपेण मुहूर्तमीश्वरो विनिर्ययौ विप्रसुतान् प्रगृह्य ।
दर्पं निहन्तुं हरिरर्जुनस्य समानयद् विप्रसुतान् परेशः ।
अप्राकृतात् सदनाद् वासुदेवो निस्सृत्य सूर्याधिकलक्षदीधितेः ।
लोकशिक्षार्थमेवासौ प्रायश्चित्तं च चालने ।
ब्रह्मादीनागतांश्चैव सदा स्वपरिचारकान् ।
सस्नाववभृथं कृष्णः सदारः ससुहृज्जनः ।
जघान गदया कृष्णस्तं क्षणात् सविडूरथम् ।
हरेः पार्षदः क्षिप्रं हरिमेव समाश्रितः ।
ततः कृष्णः पुरीमेत्य बोधयामास फल्गुनम् ।
अयं द्वीपः सागरश्च लक्षयोजनविस्तृतौ ।
अन्त्याध्यर्द्धस्थलं हैमं बाह्यतो वाज्रलेपिकम्(वज्रलेपितम्,वज्रलेपकम्)) ।
घनोदकं तद्द्विगुणं तदन्ते धाम मामकम् ।
लोकालोकप्रदेशस्तु पञ्चाशल्लक्षविस्तृतः ।
योजनानां पञ्चविंशत्कोटयो मेरुपर्वतात् ।
अबग्नीरनभोहङ्कृन्महत्तत्त्वगुणत्त्रयैः ।
व्याप्तोऽहं (सर्वतः)सर्वगोऽनन्तोऽनन्तरूपो निरन्तरः ।
मद्वशा एव सर्वेऽपि त्वं चान्ये च धनञ्जय ।
‘मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
उषित्वा कतिचिन्मासान् ययुः सर्वेऽपि पाण्डवाः ।
ततः कदाचित् प्रवरे सभातले धर्मात्मजो राजभिर्भ्रातृभिश्च ।
अन्तरिक्षं त्वया प्रोक्तं लक्षयोजनमुच्छ्रितम् ।
भुवः स्वर्गश्च कोट्यैव योजनानां प्रविस्तृतौ(प्रविस्तृते) ।
यावन्त एते मिलितास्तत्प्रमाण उदीरितः ।
ततश्च द्विगुणः प्रोक्तो विष्णुलोकः सनातनः ।
अनन्तजनसम्पूर्णा(अनन्तजनसङ्कीर्णाः) अपि ते हीच्छया हरेः ।
दिव्यरत्नसमाकीर्णं तथा पातालसप्तकम् ।
कामभोगसमायुक्ता बहुवर्षसहस्रिणः ।
एषां च सर्वलोकानां धाता नारायणः परः ।
सेवका ब्रह्मणश्चैव देवा वेदाश्च सर्वशः ।
अखिला अपि राजानः पाण्डुश्चास्मत्पिता मुने ।
उपास्यमानो भगवान् रामो यमसभातले ।
प्रादुर्भावाश्च निखिला ब्रह्मणोपासिताः सदा ।
रुद्रस्योग्राणि भूतानि नृसिंहात्मा शिवेन च ।
तत्र मे संशयो भूयान् हरिश्चन्द्रः कथं नृपः ।
इत्युक्तो नारदः प्राह राजसूयकृतोन्नतिम् ।
करोतु राजसूयं मे पुत्रोऽजेयानुजार्चितः ।
एतच्छ्रुत्वा धर्मसुतो भ्रातृभिः सहितो वशी ।
सुकार्यमेतदित्यलं निशम्य सोदरोदितम् ।
तदैव केशवस्य याः स्त्रियस्तदीयतातकैः ।
प्रणम्य केशवं वचः स आह मागधेन ते ।
नृपायुतद्वयेन सोऽष्टविंशकैः शतैरपि ।
विमोचयस्व तान् प्रभो निहत्य मागधेश्वरम् ।
इतीरितोऽथ सारथिं निशाम्य धर्मजस्य च ।
स पाण्डवैः समर्चितो मखाय धर्मजेन च ।
क्रतुर्यथाविधानतः कृतो हि पारमेष्ठ्यकम् ।
(अयोग्यकम्)अयोग्यकान्महापदे विधातुरेष हि क्रतुः ।
पुरा तु मुक्तितोऽधिकं स्वजातितः करोति च ।
सुरांशकोऽपि ते पिता विना हि राजसूयतः ।
तपश्चरन् समागते शचीपतौ पिता तव ।
व्रजस्व मानुषीं तनुं ततो मृतः पुनर्दिवम् ।
तदाऽधिकस्त्रिशङ्कुजो भविष्यतु त्वदित्यथ ।
अतः सुकार्य एव ते युधिष्ठिर क्रतूत्तमः ।
उदीर्य चैवमीश्वरः क्रतोरमुष्य योग्यता ।
ततः सुपूर्णमस्य तत् फलं विधातुमञ्जसा ।
क्व राजसूयमद्य ते जरासुते तु जीवति ।
विरिञ्चशर्ववाक्यतः समस्तलोकजायिनि ।
इतीरिते(इतिरितो) रथाङ्गिना जगाद धर्मनन्दनः ।
बभूवुरेव(बभूविरे च) भूभृतो नचाऽधिराज्यमापिरे ।
इतीरितेऽमुनाऽवदत् प्रधानमारुतात्मजः ।
निजानुभाववर्जिता हरेरनुग्रहोज्झिताः ।
स्थिरोऽनुभाव एव मे महाननुग्रहो हरेः ।
इतीरितेऽमुना हरिः समुद्यमात् प्रधानतः ।
स एक एव पूरुषो जरासुतोऽद्य वर्तते ।
तथा सतां समाश्रयो यदुद्भवाः सतां गुणाः ।
यदि स्म तेन मागधो निहन्यते सतां जयः ।
स पारमेष्ठ्यसत्पदं प्रयात्यसंशयं युधि ।
निहन्ति मागधेश्वरं य एष वैष्णवं जगत् ।
निहन्ति शैवनायकं य एष(स एव) वैष्णवाग्रणीः ।
युधिष्ठिरे ब्रुवत्यजं मखेन मे त्वलं त्विति ।
इतीरितेऽवदद्धरिर्व्रजामहे वयं त्रयः ।
वृकोदरेण हन्यते यदि स्म मागधाधिपः ।
इतीरिते तु शौरिणा जगाद धर्मनन्दनः ।
भयाद्धि यस्य माधुरं विहाय मण्डलं गताः ।
इमौ हि(इमौ च) भीमफल्गुनौ ममाक्षिणी सदा प्रभो ।
अतो न जीवितात् प्रियानहं रिपोर्बलीयसः ।
इतीरितेऽवदत् पुनर्वृकोदरोऽरिकक्षभुक् ।
वशे च यस्य तद् बलं सुरासुरोरगादिनाम् ।
अधृष्यमस्ति मे बलं हरिः प्रणायकोऽस्य च ।
अजेयता तथाऽर्जुने हरेर्वरोद्भवाऽस्ति हि ।
हनिष्य एव मागधं हरेः पुरो न संशयः ।
वयं त्रयः समेत्य तं प्रयातयाम मृत्यवे ।
भयं न कार्यमेव ते मया हतः स नेति ह ।
स शर्वसंश्रयाग्रणीर्मदाश्रयोत्तमेन तु ।
अतो न शङ्कितं मनः कुरुष्व भूपते(भूपतिं) क्वचित् ।
इतीरितः स विष्णुना विचार्य तद्गुणान् परान् ।
समेत्य मागधांस्तु ते शिवोरुलिङ्गमित्यलम् ।
स्वशीर्षतोऽपि चाऽदृतं जरासुतेन ते गिरिम् ।
अद्वारतस्ते नगरं प्रविश्य माषस्य नालेन कृतास्त्रिभेरीः ।
तथाऽऽपणेभ्यो बहुमाल्यगन्धान् प्रसह्य सङ्गृह्य शुभांश्च दध्रुः ।
तान् विप्रवेषान् स निशाम्य राजा महाभुजान् स्नातकवेषयुक्तान् ।
के ष्ठाथ(स्थात) किंहेतुत आगताश्च कृतश्च मे पर्वतलिङ्गभेदनम् ।
इति ब्रुवाणं भगवानुवाच कार्यं हि शत्रोरखिलं प्रतीपम् ।
इत्युक्तवाक्यं नृपतिं जगाद जनार्दनो नैव हि तादृशा द्विजाः ।
यद् बान्धवान् नः पिशिताशिधर्मतो रौद्रे मखे कल्पयितुं पशुत्वे ।
विमोक्षयामः स्वजनान् यदि त्वं न मोचयस्यद्य निगृह्य च त्वाम् ।
इतीरितोऽसौ मगधाधिपो रुषा जगाद नाहं शिव यागयुक्तान् ।
निरायुधः सायुधो वा युष्मदिष्टायुधेन वा ।
इत्युक्तवन्तमवददजितोरुबलो हरिः ।
येन कामयसे योद्धुं तं न आसादय द्रुतम् ।
घातयित्वा स्वशत्रुं च भीमसेनानुग्रहं परम् ।
तृणीकर्तुं रिपुं चैव निरायुधतयाऽगमन् ।
निरायुधः क्षत्रवेषो नैव योग्यः कथञ्चन ।
मागधस्य ससैन्यस्य स्वगृहे संस्थितस्य च ।
तृतीयमर्जुनं चैव समादाय ययौ रिपुम् ।
वृण्वेकमस्मास्विति स प्रोक्त आह जरासुतः ।
पञ्चपञ्चाशदब्दोऽद्य ह्ययमेवं च बालवत् ।
इत्युक्तोऽप्यर्जुनो नाऽह कुरु तर्हि परीक्षणम् ।
अतो भीमे बलाधिक्यं सुप्रसिद्धमभून्महत् ।
जानन् कृष्णे बलं घोरमविषह्यं स मागधः ।
आह्वयामास भीमं तु स्याद् वा मे जीवनं त्विति ।
अर्जुने तु जिते कृष्णभीमौ मां निहनिष्यतः ।
इति मत्वाऽऽह्वयामास भीमसेनं स मागधः ।
इति स्म(इतीक्ष्य) भीमं प्रतियोधनाय सङ्गृह्य राजा स जरासुतो बली ।
बलं भीमे मन्यमानोऽधिकं तु गदाशिक्षामात्मनि चाधिकां नृपः ।
तदर्थमेवाऽशु गदां प्रगृह्य भीमो ययौ मागधसंयुतो बहिः ।
वाचाऽजयत् तं प्रथमं वृकोदरः शिवाश्रयं विष्णुगुणप्रकाशया ।
तयोर्गदे तेऽशनिसन्निकाशे चूर्णिकृते देहमहादृढिम्ना ।
सञ्चूर्णितगदौ वीरौ जघ्नुतुर्मुष्टिभिर्मिथः ।
चचाल पृथ्वी गिरयश्च चूर्णिताः कुलाचलाश्चेलुरलं विचक्षुभुः ।
सुरास्तु भीमस्य जयाभिकाङ्क्षिणस्तथाऽसुराद्या मगधाधिपस्य ।
मानयित्वा वरं धातुर्दिवसान् दश पञ्च च ।
स प्रणम्य हृषीकेशं हर्षादाश्लिष्य फल्गुनम् ।
पृष्ठेऽस्य जानुमाधाय कूर्मदेशं बभञ्ज ह ।
मर्मण्येव न हन्तव्यो मयाऽयमिति मारुतिः ।
भज्यमाने शरीरेऽस्य ब्रह्माण्डस्फोटसन्निभः ।
निहत्य कृष्णस्य रिपुं स भीमः समर्पयामास तदर्चनं हरेः ।
स्वीकृत्य पूजां च वृकोदरस्य दृढं समाश्लिष्य च तं जनार्दनः ।
जग्मुः सुराश्चातितरां प्रहृष्टा ब्रह्मादयो दीनतराश्च दैत्याः ।
सुतो ययौ शरणं तान् रमेशभीमार्जुनान् सहदेवोऽस्य धीमान् ।
रथो ह्यसौ वसुना वासुदेवाच्छक्रान्तराऽऽप्तो वसुवंशजत्वात् ।
कृष्णोऽस्मरद् गरुडं स ध्वजेऽभूद् रथं कृष्णोऽथाऽरुहत् पाण्डवाभ्याम् ।
नकुलस्याऽदान्मद्रराजो हि पूर्वं स्वीयां कन्यां सा तथैषाऽप्युषा हि ।
जरासुतस्याऽत्मजः केशवादीन् रत्नैः समभ्यर्च्य ययावनुज्ञया ।
सम्भावितास्ते सहदेवेन सम्यक् प्रशस्य(प्रणम्य) कृष्णं भीमसेनं च सर्वे ।
कृष्णश्च पार्थौ च तथैकयानं समास्थिता धर्मजमभ्यगच्छन् ।
द्वैपायनोऽथ भगवानभिगम्य पार्थानाज्ञापयत् सकलसम्भृतिसाधनाय ।
कर्ता हि तस्य परमेष्ठिपदं प्रयाति यद्यन्यसद्गुणवरैः परमेष्ठितुल्यः ।
असाधारणहेतुर्यः कर्मणो यस्य चेतनः ।
हेतवोऽपि हि पापस्य न प्रायः फलभागिनः(फलभोगिनः) ।
असाधारणहेतुश्च भीम एव प्रकीर्तितः ।
जयाच्च कीचाकादीनामन्यैर्जेतुमशक्यतः ।
तस्माद् ब्रह्मपदावाप्त्यै व्यासो भीमस्य तं क्रतुम् ।
अथाब्रवीद् धनञ्जयो धनुर्ध्वजो रथो वरः ।
इतीरितोऽखिलप्रभुर्जगाद सत्यमस्ति ते ।
तथाऽपि कीचकादयो वृकोदरादृते वशम् ।
बलाधिकोऽसि कर्णतस्तथाऽपि नामृतः करम् ।
सवर्मकुण्डलत्वतो न वध्य एष यत् त्वया ।
जीवग्राहभयात् कर्णो ददाति करमञ्जसा ।
अजेयौ शर्ववचनाद् रणे कीचकपौण्ड्रकौ ।
जीवग्राहभयं ह्येषां भीमान्मागधपातनात् ।
प्रयाहि च त्वं धनदप्रपालितां दिशं द्वीपान् सप्त चाशेषदिक्षु ।
रथो हि दिव्योऽम्बरगस्तवास्ति दिव्यानि चास्त्राणि धनुश्च दिव्यम् ।
तथा सुराश्चापि(तथाऽसुराः) समस्तशोऽस्य बलिं प्रयच्छन्ति मदज्ञयेतरे ।
यशश्च धर्मश्च तयोरपि स्यादिति स्यदिति स्म कृष्णेन सुतेन काल्याः ।
वृकोदरोऽजयन्नृपान् विराटमाससाद ह ।
ततः क्रमान्नृपान् जित्वा चेदीनां विषयं गतः ।
मातृष्वसुर्गृहे चोष्य दिवसान् कतिचित् सुखम् ।
क्रमेण सर्वान् निर्जित्य पौण्ड्रकं च महाबलम् ।
हिमवच्छिखरे देवान् जित्वा शक्रपुरोगमान् ।
बाहुयुद्धेन शेषं च गरुडं च महाबलम् ।
पोप्लूयमानः स ततोऽम्बुधौ बली जगाम बाणस्य पुरं हरं च ।
पृष्टश्च गिरिशेनासौ विस्तरं दिग्जयस्य च ।
निशम्य शङ्करोऽखिलं मखस्य च प्रसाधकम् ।
स बाणदैत्यतो महच्छिवेन दत्तमुत्तमम्।
स विप्रयादवेश्वरं द्विधास्थितं जनार्दनम् ।
सोऽभिवाद्याग्रजं(सोऽभिवन्द्याग्रजं) चैव यथावृत्तं न्यवेदयत् ।
यथा जिताः कीचकाद्या एकलव्यसहायवान् ।
यथा सिंहादितनवः शेषवीन्द्रेन्द्रपूर्वकाः ।
सम्भावितश्च कृष्णाभ्यां राज्ञा च सुमहाबलः ।
ऊचे तं भगवान् व्यासो जितं सर्वं त्वयाऽरिहन् ।
विरिञ्चः सर्वजित् पूर्वं द्वितीयस्त्वमिहाभवः ।
तदैवान्ये दिशो जित्वा समीयुस्तस्य येऽनुजाः ।
तत्र रुग्मी(रुक्मी) न युयुधे सहदेवेन वीर्यवान् ।
तपसा तोषितात् कृष्णादन्यानेवामुनाऽखिलान् ।
स्वसुः स्नेहाच्च कृष्णस्य यज्ञकारयितृत्वतः ।
तथा स्मृतं समागतं घटोत्कचं विभीषणे ।
पुरा हि राघवोदितं तदस्य(यदस्य) सोऽखिलं तदा ।
महौघरत्नसञ्चयं स आप्य भीमसेनजः ।
नकुलः पश्चिमाशायां विजिग्येऽखिलभूभृतः ।
अर्जुनः कपिवरोच्छ्रितध्वजं स्यन्दनं समधिरुह्य गाण्डिवी।
त्रैगर्ताः पार्वतेयाश्च सहिताः पाण्डुनन्दनम् ।
तान् विजित्य युगपत् स पाण्डवः सञ्जयन् क्रमश एव तां दिशम् ।
सोऽभियुद्ध्य सगजो दिनाष्टकं श्रान्त आह पुरुहूतनन्दनम् ।
सोऽप्यदात् करममुष्य वासवो मद्गुरुस्तव पितेति सादरम् ।
स्नेहपूर्वं प्रदत्ते तु करे नैवाऽह चोत्तरम् ।
पार्थो जित्वाऽष्टवर्षाणि षड् द्वीपानपरानपि ।
पाताळसप्तकं गत्वा जित्वा दैतेयदानवान् ।
जित्वा च वासुकिं भूरि रत्नमादाय सत्वरः ।
सुवर्णरत्नगिरयश्चतुर्भिस्तैः समार्जिताः ।
चतुःशतं च क्रमश उच्छ्रिता दिग्जयार्जिताः ।
विश्वकर्मकृतत्वात्तु पुरस्याल्पेऽपि च स्थले ।
ततो यज्ञः प्रववृते कृष्णद्वैपायनेरितः ।
ज्येष्ठत्वाद् याजमानं तु प्रणिधाय युधिष्ठिरे ।
ब्रह्माणीपदयोग्यत्वात् कृष्णैका यज्ञपत्न्यभूत् ।
आज्ञयैव जगद्धातुर्व्यासस्यानन्ततेजसः ।
आहूतं दिग्जये पार्थैस्तदा लोकद्विसप्तकम् ।
भीष्मो द्रोणश्च विदुरो धृतराष्ट्रः सहात्मजः ।
तथैव यादवाः सर्वे बलभद्रपुरोगमाः ।
तत्र सर्वजगदेकसङ्गमे तत्त्वनिर्णयकथा बभूविरे ।
तत्त्वनिर्णयकथासु निर्णयो वासुदेवगुणविस्तरोऽभवत् ।
बादरायणभृगूत्थरामयोः शृण्वतोः परमनिर्णये कृते ।
जानमानोऽपि नृपतिः सर्वपूज्यतमं हरिम् ।
नास्ति नारायणसममिति वादेन निर्णये ।
नृपास्तस्मादयं कृष्णो नारायण इति स्म ह ।
ब्रह्मादयः सुरा यस्माद् दृश्यन्ते मर्त्यवन्नृभिः ।
सर्वशास्त्रविदं भीष्मं जानन्त्येते नृपा अपि ।
पितामहाग्र्यपूजार्हः कोऽत्र लोकसमागमे ।
यद्यप्येकस्त्रिधा विष्णुर्वसिष्ठभृगुवृष्णिषु ।
विप्रत्वान्न विरुद्ध्यन्ते तत एव च युक्तताम् ।
अविवादे प्रसिद्धिश्च नैवास्य भविता क्वचित् ।
कृष्णाय दत्ते राजानो विवादं कुर्युरञ्जसा ।
व्यासभार्गवयोः साक्षात् तदैक्यात् तदनन्तरम् ।
अग्र्योपहारमुपयापित एव कृष्णे कोपादनिन्ददमुमाशु च चेदिराजः ।
दूरेऽपि केशवविनिन्दनकारिजिह्वामुच्छेत्स्य इत्युरुतराऽस्य सदा प्रतिज्ञा ।
मयैव वध्याविति तावाह यत् केशवः पुरा ।
जानन्नपि हरेरिष्टं स्वकर्तव्यतयोत्थितः ।
देवसङ्घभविनां महानभूदीक्ष्य(महानभूद् वीक्ष्य) तोष इह केशवेऽधिकाम् ।
आसुरा इह सुयोधनादयस्तत्र ते विमनसो बभूविरे ।
समाह्वयच्च केशवं युधे तमाशु केशवः ।
निकृत्यमानकन्धरः स भक्तिमानभूद्धरौ ।
जयः प्रविश्य केशवं पुनश्च पार्षदोऽभवत् ।
सुवर्णरत्नभारकान् बहून् नृपा उपानयन् ।
अभोजयंस्तथा द्विजान् यथेष्टभक्ष्यभोज्यकैः ।
यदिष्टमास यस्य च प्रदत्तमेव पाण्डवैः ।
नदत्सुरोरुदुन्दुभिप्रगीतदेवगायकाः ।
समस्तराजसंयुता विगाह्य जाह्नवीजले ।
गतेषु सर्वराजसु स्वकां(स्वकं) पुरं स्वकेषु च ।
विचित्ररत्ननिर्मिते रविप्रभे सभातले ।
तथैव (रुग्मिणी)रुक्मिणीमुखाः परिग्रहा रमेशितुः ।
सहैव वायुसूनुना तथैव पार्षतात्मजा ।
यमौ च पार्षतादयो धनञ्जयान्तिकेऽविशन् ।
समासतां तु सा सभा व्यरोचताधिकं तदा ।
विचित्रहेममालिनः शुभाम्बराश्च तेऽधिकम् ।
विशेषतो जनार्दनः सभार्यको जगत्प्रभुः ।
उपासिरे च तान् नृपाः समस्तशः सुहृद्गुणाः ।
द्वारं सभाया हरिनीलरश्मिव्यूढं न जानन् स विहाय भित्तम् ।
प्रवेशयेतां च यमौ तमाशु सभां भुजौ गृह्य नृपोपदिष्टौ ।
तत्रेन्द्रनीलभुवि रत्नमयानि दृष्ट्वा पद्मानि नीरमनसा जगृहे स्ववस्त्रम् ।
तं प्राहसद् भगवता क्षितिभारनाशहेतोः सुसूचित उरुस्वरतोऽत्र भीमः ।
मन्दस्मितेन विलसद्वदनेन्दुबिम्बो नारायणस्तु मुखमीक्ष्य मरुत्सुतस्य ।
कृष्णावृकोदरगतं बहुलं निधाय क्रोधं ययौ सशकुनिर्धृतराष्ट्रपुत्रः ।
यौ मामहसतां कृष्णभीमौ कृष्णस्य सन्निधौ ।
यदि मे शक्तिरत्र स्याद् घातयेयं वृकोदरम् ।
ईदृशं पाण्डवैश्वर्यं दृष्ट्वा को नाम जीवितम् ।
इत्युक्तः शकुनिर्वैरं दृढीकर्तुं वचोऽब्रवीत् ।
अनुजीवस्व तान् वीरान् गुणज्येष्ठान् बलाधिकान् ।
यदि तेषां तदैश्वर्यं न मां गच्छेदशेषतः ।
नच बाहुबलाच्छक्ष्य आदातुं तां श्रियं क्वचित् ।
इतीरितः पापतम आह गान्धारको नृपः ।
यां यां श्रियं प्रदीप्तां त्वं पाण्डवेषु प्रपश्यसि ।
इतीरितः प्रसन्नधीः सुयोधनो बभूव ह ।
धृतराष्ट्रमथोवाच द्वापरांशोऽतिपापकृत् ।
दुर्योधनं तु तच्छ्रुत्वा कुत इत्याह दुर्मनाः ।
श्रुत्वैव तन्नेत्यवदत् स भूपतिर्विरोधि धर्मस्य विनाशकारणम् ।
त्वयाऽपि निर्जित्य दिशो मखाग्र्याः कार्याः स्पृधो मा गुणवत्तमैस्तैः ।
यदि श्रियं पाण्डवानां नाक्षैराहर्तुमिच्छसि(नाक्षैराच्छेत्तुमिच्छसि) ।
यदि मज्जीवितार्थी त्वमानयाऽश्विह पाण्डवान् ।
वेदानुजीविनो विप्राः क्षत्रियाः शस्त्रजीविनः ।
अतः स्वधर्म एवायं तवापि स्यात् फलं महत् ।
एवं ब्रुवन्नपि नृप आविष्टः कलिना स्वयम् ।
आविवेश कलिस्तं हि यदा पुत्रत्वसिद्धये ।
यावत् पुरं परित्यज्य वनमेव विवेश ह ।
न्यवारयत् तं विदुरो महत् ते पापं कुलस्यापि विनाशकोऽयम् ।
इति ब्रुवाणं कलहोऽत्र न स्यान्निवारयामो वयमेव यस्मात् ।
अतः क्षिप्रमुपानेयाः पार्था इति बलोदितः ।
गते हि पार्थसन्निधेः सुयोधने तु नारदः ।
क उद्यमी नृपेष्विति प्रपृष्ट आह नारदः ।
पांसुमुष्टिं सकृद्ग्रासी बहूनब्दांस्तपश्चरन् ।
स श्रुत्वा मागधवधं दिशां विजयमेव च ।
यदून् प्रत्युद्यमं तूर्णं करोतीति निशम्य तत् ।
अस्त्वित्युक्त्वा स गोविन्दः प्रेषयामास यादवान् ।
विदुरस्तु ततो गत्वा धर्मराजमथाऽह्वयत् ।
ज्येष्ठाज्ञयैव विदुर आह्वायन्नपि धर्मजम् ।
इतीह दोषसञ्चयस्तथापि ते पितुर्वचः ।
इतीरितोऽपि पाण्डवो ययौ कलिप्रवेशितः ।
कल्याविशान्नृपतिः प्रतिजज्ञे पूर्वमेव धर्मात्मा ।
तेनाऽयात् (स सुहृद्भिः)स्वसुहृद्भिर्निवार्यमाणोऽपि नागपुरमाशु ।
वैचित्रवीर्यतनयेन तु पाण्डुपुत्राः सम्भावितास्तमुप च न्यवसन् निशायाम् ।
वैचित्रवीर्यनृपतिर्विदुरान्वितोऽस्य गान्धारराजसहितास्तनयाः सकर्णाः ।
सर्वांश्च तत्र कलिराविशदेव भीमपूर्वान् विनैव चतुरः सपृथां च कृष्णाम् ।
भीमादिभिः स विदुरेण च वार्यमाणो द्यूते निधाय पणमप्यखिलं स्ववित्तम् ।
तस्मिन् जितेऽथ सहदेवमथार्जुनं च भीमं च सोमकसुतां स्वमपि क्रमेण ।
सूतो गत्वा तदन्तं समकथयदिमां द्यूतमध्ये जिताऽसि
स पापपूरुषोत्तमः प्रगृह्य केशपक्षके ।
समाहृता रजस्वला जगाद भीष्मपूर्वकान् ।
कथं छलात्मके द्यूते जिते धर्मजयो भवेत् ।
येऽधर्मं(ये धर्मं) न वदन्तीह न ते वृद्धा इतीरिताः ।
कथं द्यूते जिता चाहमजिते स्वपतौ स्थिते ।
सहैव कर्म कर्तव्यं पतौ दासे हि भार्यया ।
इत्युक्ता अपि भीष्माद्याः कल्यावेशेन मोहिताः ।
दुर्योधनप्रतीपं हि न कश्चिदशकत् तदा ।
न तस्य वाचं जग्राह धृतराष्ट्रः सहात्मजः ।
स्वाशक्तिं द्रौपदीं चाऽह जिता नैवासि धर्मतः ।
एवं तु विदुरेणोक्ते विकर्णः पापकोऽपि सन् ।
दृष्ट्वा भीमः क्लिश्यमानां तु कृष्णां धर्मात्ययं धर्मराजे च दृष्ट्वा ।
इमां न्यस्तवतो द्यूते धक्षणीयौ हि ते भुजौ ।
वक्तव्यं नतु कर्तव्यं तस्मान्नहि मया कृतम् ।
अथ कर्णोऽब्रवीत् कृष्णामपतिर्ह्यसि शोभने ।
युधिष्ठिरो दुःखहेतुस्तवैको यद्येनमन्ये न गुरुर्न एषः ।
इत्युक्त ऊचे पवमानसूनुः पूज्योऽस्माकं धर्मजोऽसंशयेन ।
बलज्यैष्ठ्ये यदि वः संशयः स्यादुत्तिष्ठध्वं सर्व एवाद्य वीराः ।
इति ब्रुवन् समुत्थितो नदन् वृकोदरो यदा ।
भीष्मो द्रोणो विदुराद्याः क्षमस्व सर्वं त्वयोक्तं सत्यमित्येव हस्तौ ।
निवारितो धर्मजेन गुरुभिश्चापरैस्तदा ।
न चात्यवर्तत(न चातिवर्तते) ज्येष्ठं धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ।
अथ दुर्योधनः पापो भीमसेनस्य पश्यतः ।
तवोरुमेनं गदयोरुवेगया बिभेत्स्य इत्येव पुनः सुयोधनः ।
अथाब्रवीद् वृकोदरः कृतेऽवमानने हरेः ।
स वध्य एव मे सदा परोक्षतोऽपि यो हरिम् ।
पुनश्च पापवृद्धये तदैव नो जघान तम् ।
प्रयाहि भूभृतो हि नो गृहं न सन्ति पाण्डवाः ।
उभौ च तौ युधिष्ठिरो न्यवारयत् तथाऽपरे ।
दुःशासनैषां वासांसि दासानां नो व्यपाकुरु ।
ते चर्मवसना(अचर्मवसना) भूत्वा तानशिष्टान् प्रकाश्य च ।
पुनर्दुर्योधनेनोक्तः पार्थानामथ पश्यताम् ।
पापेषु पूर्वस्य तथाऽधमस्य वंशे कुरूणामुरुधर्मशीलिनाम् ।
विकृष्यमाणे वसने तु कृष्णा सस्मार कृष्णं सुविशेषतोऽपि ।
पुनःपुनश्चैव विकर्षमाणे दुःशासनेऽन्यानि च तादृशानि ।
वस्त्रोच्चये शैलनिभे प्रजाते दुर्योधनः प्राह सञ्जातकोपः ।
तच्छ्रुत्वा वचनं कृष्णा प्रतिज्ञामकरोत् तदा ।
इत्युक्ते तत् तथेत्याह भीमसेनः सभातले ।
ततः सुयोधनानुजश्चकर्ष पार्षतात्मजाम् ।
अर्जुनार्जुन नैवात्र क्षमा मे तात रोचते ।
इति वेदोदितं वाक्यं न सुतो दारधर्षणे ।
अतोऽद्य सानुबन्धकान् निहन्मि धार्तराष्ट्रकान् ।
ददर्श च महाघोरमादातुं परिघं रुषा ।
तदा शिवा ववाशिरे सुयोधनाग्निगेहतः ।
निमित्तान्यतिघोराणि कुपिते मारुतात्मजे ।
आह तं विदुरो ज्येष्ठं क्षणेऽस्मिंस्तव पुत्रकाः ।
क्रीडसेऽर्भकवत् त्वं हि किं जितं किं जितं त्विति ।
स्त्रीषु द्यूतेषु वा दत्तं मदान्धेन नरेण वा ।
आहार्यं पुनराहुश्च तथाऽपि नतु पाण्डवैः ।
इत्युक्त आहाऽम्बिकेयो निमित्तानां फलं कथम् ।
तोषयस्व वरैश्चैनामन्यथा ते सुतान् मृतान् ।
कृष्णा च पाण्डवाश्चैव तपोवृद्धिमभीप्सवः ।
तथाऽपि यदि कृष्णां त्वं न मोचयसि ते सुतान् ।
इतीरितो विनिर्भर्त्स्य(विनिर्भत्स्य) पुत्रं दुःशासनं नृपः ।
छन्दिता सा वरैस्तेन धर्मे भागवते स्थिता ।
युधिष्ठिरस्य सभ्रातुः सराष्ट्रस्य विमोक्षणम् ।
भर्तुर्विष्णोश्च नान्यस्माद् वरस्वीकार इष्यते ।
अधर्मतो हृतत्वात्तु तद् दानं न वरो भवेत् ।
श्वशुरादैहिकवराः क्षत्रियायास्त्रयो यतः ।
ततो विमुक्ताः प्रययुश्च पार्था गुरून् प्रणम्य स्वपुरं सकृष्णाः ।
समस्तपाण्डवश्रियं समागतामहो पुनः ।
अतः पुनश्च पाण्डवान् समाह्वयस्व(समानयस्व) नः कृते ।
तेनोक्तः स तदा राजा पाण्डवान् पुनराह्वयत् ।
द्वादशाब्दं वने वासमज्ञातत्वेन वत्सरम् ।
कृष्णायाः पाण्डवानां वा दर्शनेऽज्ञातवासिनाम् ।
वत्सराज्ञातवासं च त्यागेऽप्युक्तविधेस्तथा ।
गान्धारेण पुनश्चाक्षहृदयज्ञेन धर्मजः ।
तदा ननर्त पापकृत् सुयोधनानुजो हसन् ।
उवाच च(स) पुनः कृष्णां नृत्यन्नेव सभातले ।
एतेऽखिलाः षण्ढ(ड)तिलास्तमोऽन्धमं प्राप्ता नचैषां पुनरुत्थितिः स्यात् ।
तदाऽकरोद् भीमसेनः प्रतिज्ञां हन्ताऽस्मि वो ह्यखिलान् सङ्गरेऽहम् ।
यत्र द्रोणस्तत्र पुत्रस्तत्र भीष्मः कृपस्तथा ।
अब्रवीद् धार्तराष्ट्रांश्च द्रोणो विप्रोऽपि सन्नहम् ।
रक्षणे भवतां चैव कुर्यां यत्नं स्वशक्तितः ।
ततो ययुः पाण्डवास्ते सभाया वनाय कृष्णासहिताः सुशूराः ।
दृष्ट्वा सभाया अर्द्धनिष्क्रान्तदेहो व्यावृत्य भीमः प्राह संरक्तनेत्रः ।
प्रयाताननु तान् कुन्ती प्रययौ पुत्रगृद्धिनी ।
युधिष्ठिरोऽवाग्वदनो ययौ न क्रोधचक्षुषा ।
उद्धृत्य बाहू प्रययौ बाहुषाली वृकोदरः ।
अबद्धकेशा प्रययौ द्रौपदी सा सभातलात् ।
वर्षन् पांसून् ययौ पार्थ इत्थं शत्रुषु सायकान् ।
यमाववाङ्मुखौ यातौ नावयोः शत्रवो मुखम् ।
प्रेतसंस्कारसूक्तानि पठन् धौम्योऽग्रतो ययौ ।
तानथानुययुः सूता रथैः परिचतुर्दशैः ।
ततस्ते जाह्नवीतीरे वने वटमुपाश्रिताः ।
ततस्तु ते सर्वजगन्निवासं नारायणं नित्यसमस्तसद्गुणम् ।
द्वाविंशोऽध्यायः
औं ॥ आगन्तुकामान् पुरवासिनस्ते संस्थाप्य कृच्छ्रेण कुरुप्रवीराः ।
बकानुजोऽसौ निखिलैरजेयो वराद् गिरीशस्य निहन्तुकामः ।
स सम्प्रहारं सह तेन कृत्वा भीमो निपात्याऽशु(निहत्याऽशु) धरातले तम् ।
निहत्य रक्षो वनमध्यसंस्थास्तदा यतीनामयुतैः समेताः ।
विचिन्त्य तेषां भरणाय धर्मजः सम्पूज्य सूर्यस्थितमच्युतं प्रभुम् ।
बभार तेनैव युधिष्ठिरस्तान् प्रत्येकशस्त्रिंशतदासदासिकान्(त्रिंशतिदासदासिकान्) ।
सत्सङ्गमाकाङ्क्षिण एव तेऽवसन् पार्थैः सहान्ये च मुनीन्द्रवृन्दाः ।
एवं गजानां बहुकोटिवृन्दांस्तथा रथानां च हयांश्च वृन्दशः ।
गवां च लक्षं प्रददाति नित्यशः सुवर्णभारांश्च शतं युधिष्ठिरः ।
पार्थेषु यातेषु किमत्र कार्यमिति स्म पृष्टो विदुरोऽग्रजेन ।
ज्ञानं प्रतीपोऽसि ममाऽत्मजानां न मे त्वया कार्यमिहास्ति किञ्चित् ।
तस्मिन् गते भ्रातृवियोगकर्शितः पपात भूमौ सहसैव राजा ।
इतीरितः सञ्जयः पाण्डवेयान् प्राप्याऽनयद् विदुरं शीघ्रमेव ।
अङ्कं समारोप्य स मूर्ध्नि चैनमाघ्राय लेभे परमां मुदं तदा ।
विज्ञाय तेषां गमनं समस्तलोकान्तरात्मा परमेश्वरेश्वरः ।
अवाप्य पार्थानयमद्य मृत्युं सहानुबन्धो गमिता ह्यसंशयम् ।
मैत्रेय आयास्यति सोऽपि वाचं शिक्षार्थमेतेष्वभिधास्यतीह ।
उक्त्वेति राजानमनन्तशक्तिर्व्यासो ययौ तत्र गतेषु तेषु ।
सर्वाश्च चेष्टा भगवन्नियुक्ताः सदा समस्तस्य चितोऽचितश्च ।
मैत्रेय आगादथ(आयात्) भूपतिश्च पुत्रान् समाहूय सकर्णसौबलान् ।
विशेषतो भीमबलं शशंस किर्मीरनाशादि वदन् मुनीन्द्रः ।
शशाप चैनं मुनिरुग्रतेजास्तवोरुभेदाय भवेत् सुयुद्धम् ।
वने वसन्तोऽथ पृथासुतास्ते वार्तां स्वकीयां(स्वकीयां वार्तां) प्रापयामासुराशु ।
क्रुद्धं कृष्णं धार्तराष्ट्राय पार्थाः क्षमापयामासुरुच्चैर्गृणन्तः ।
अचिन्त्यनित्याव्ययपूर्णसद्गुणार्णवैकदेहाखिलदोषदूर ।
इति ब्रुवन्ती सकलानुभूतं जगाद सर्वेशितुरच्युतस्य ।
श्रुत्वा समस्तं भगवान् प्रतिज्ञां चकार तेषामखिलाश्च योषाः ।
यदीहाहं स्थितो नैवं भविताऽहं त्वयोधयम् ।
सन्निधानेऽथ वा दूरे कालव्यवहितेऽपि वा ।
तथाऽपि नरलोकस्य करोत्यनुकृतिं प्रभुः ।
युधिष्ठिरेऽतिवृद्धं तु राजसूयादिसम्भवम् ।
योग्यताक्रमतो(योग्यताक्रमशो) विष्णुरिच्छयेत्थमचीक्लृपत् ।
स्वयोग्यताया अधिकधर्मज्ञानादिजं फलम् ।
पुनश्च पापवृद्ध्यर्थमजो दुर्योधनादिषु ।
इति दुर्योधनादीनां पापवृद्ध्यर्थमेव सः ।
गुरुत्वाद् भीमसेनस्य क्षमा द्यूतेऽर्जुनादिनाम् ।
द्रौपद्या अप्यतिक्लेशात् क्षमा धर्मो महानभूत् ।
तस्माद् यथायोग्यतया हरिणा धर्मवर्धनम् ।
साल्वं श्रुत्वा समायान्तं (समायातं) रौक्मिणेयादयो मया ।
प्रद्युम्न आशु निरगादथ सर्वसैन्यै-
कृत्वा सुयुद्धममुना मम पुत्रकोऽसौ
नारायणेन हि पुरा मनसाऽभिक्लृप्तं
वध्यस्त्वया नहि ततोऽयमयं च बाणः
श्रुत्वा वचः स पवनस्य शरं त्वमोघं
प्रद्युम्नसाम्बगदसारणचारुदेष्णाः
यस्मिञ्छरे करगते विजयो ध्रुवः स्यात्
तं सागरोपरिगसौभगतं निशाम्य
ताः क्रीडया क्षणमहं समरे निशाम्य
तं स्यन्दनस्थितमथो विभुजं विधाय
तस्मादिदं व्यसनमास हि विप्रकर्षात्
पाण्डवानां च या भार्याः पुत्रा अपि हि(च) सर्वशः ।
धृष्टद्युम्नस्ततः कृष्णां सान्त्वयित्वैव केशवम् ।
धृष्टकेतुश्च भगिनीं काशिराजः सुतामपि ।
पार्वती नकुलस्याऽसीद् भार्या पूर्वं तिलोत्तमा ।
सुभद्रामभिमन्युं च रथमारोप्य केशवः(काञ्चनम्) ।
कञ्चित् कालं द्रौपदेया उष्य पाञ्चालके पुरे ।
ततः परं धर्मराजो निर्विण्णः स्वकृतेन ह ।
ऊषुर्वने च ते पार्था मुनिशेषान्नभोजिनः ।
अलङ्घ्यत्वात् तदाज्ञाया अनुजाः पूर्वभोजिनः ।
एवं सदा विष्णुपरायणानां तत्प्रार्पणान्नैकभुजां(तत्प्रापणान्नैकभुजां) प्रयातः ।
अतिमार्दवयुक्तत्वाद् धर्मराजश्चतुर्दशे ।
क्षमा सर्वत्र धर्मो न पापहेतुश्च दुर्जने ।
हत्वा चतुर्दशे वर्षे धार्तराष्ट्रानराज्यदान् ।
कारयन् सत्यशपथं विवादस्य क्रमेच्छया ।
नैव क्षमा कुजनतासु नृपस्य धर्मः
कर्ता च सर्वजगतः सुखदुःखयोर्हि
इत्युक्तवन्तं नृपमाह पार्षती यदि क्षमा सर्वनरेषु धर्मः ।
सत्यं च विष्णुः सकलप्रवर्तको रमाविरिञ्चेशपुरस्सराश्च ।
तदाज्ञया पुरुषश्चेष्टमानश्चेष्टानुसारेण शुभाशुभस्य ।
वृथा यदि स्यात् पौरुषं कस्य हेतोर्विधिर्निषेधश्च समस्तवेदगः ।
तेनैव लेपश्च भवेदमुष्य पुण्येन पापेन च नैव चासौ ।
इतीरितो धर्मजः कृष्णयैव निरुत्तरत्वं गमितस्त्वभर्त्सयत् ।
छलेन तेन प्रतिभर्त्सिता सा क्षमापयामास नृपं यतः स्त्री ।
राजन् विष्णुः सर्वकर्ता न चान्यस्तत्तन्त्रमेवान्यदसौ स्वतन्त्रः ।
प्रत्यक्षमेतत् पुरुषस्य कर्म तेनानुमेया प्रेरणा केशवस्य ।
तेनैति सम्यग्गतिमस्य विष्णोर्जनोऽशुभो दैवमित्येव मत्वा ।
ज्ञातव्यं चैवास्य विष्णोर्वशत्वं कर्तव्यं चैवाऽत्मनः कार्यकर्म ।
विष्णोर्वशे तन्न हेयं द्वयं च जानन् विद्वान् कुरुते कार्यकर्म ।
पूर्णं प्रमाणं तत्त्रयं चाविरोधेनैकत्रस्थं तत्त्रयं चाविरोधि ।
अज्ञः प्रत्यक्षं त्वपहायैव दैवं मत्वा कर्तृ स्वात्मकर्म प्रजह्यात् ।
स्वभावाख्या योग्यता या हठाख्या याऽनादिसिद्धा सर्वजीवेषु नित्या ।
स कस्यचिन्न वशे वासुदेवः परात् परः परमोऽसौ स्वतन्त्रः ।
विना यत्नं न हठो नापि कर्म फलप्रदौ वासुदेवोऽखिलस्य ।
एतानपेक्ष्यैव फलं ददानीत्यस्यैव सङ्कल्प इति स्वतन्त्रता ।
तस्मात् कार्यं तेन क्लृप्तं स्वकर्म तत्पूजार्थं तेन तत्प्राप्तिरेव ।
बाह्वोर्जातः क्षत्रियस्तेन बाह्वोः कर्मास्य पापप्रतिवारणं हि ।
वैश्यो यस्मादूरुजस्तेन तस्य प्रजावृद्धिस्तज्जकर्मैव धर्मः ।
गतिप्रधानं कर्म शुश्रूषणाख्यं सादृश्यतो हस्तपदोस्तथैव ।
भुजावुरो हृदयं यद् बलस्य ज्ञानस्य च स्थानमतो नृपाणाम् ।
प्राधान्यतो धर्मविशेष एष सामान्यतः सर्व एवाखिलानाम् (सर्वमेवाखिलानाम्) ।
एतैर्धर्मैर्विष्णुना पूर्वक्लृप्तैः सर्वैर्वर्णैर्विष्णुरेवाभिपूज्यः ।
पिता गुरुः परमं दैवतं च विष्णुः सर्वेषां तेन पूज्यः स एव ।
सम्पूजितो वासुदेवः स मुक्तिं दद्यादेवापूजितो दुःखमेव ।
स्वतन्त्रत्वात् सुखसज्ज्ञानशक्तिपूर्वैर्गुणैः पूर्ण एषोऽखिलैश्च ।
दोषास्पृष्टौ गुणपूर्तौ च शक्तिर्निस्सीमत्वाद् विद्यते तस्य यस्मात् ।
हन्याद् दुष्टान् यः क्षत्रियः क्षत्रियांश्च विशेषतो युद्धगतान् स्मरन् हरिम् ।
पापाधिकांश्चैव बलाधिकांश्च हत्वा मुक्तावधिकानन्दवृद्धिः ।
ये त्वक्षधूर्ता ग्रहणं गता वा पापास्तेऽन्यैर्घातनीयाः स्वदोर्भ्याम् ।
राज्ञः पुत्रोऽप्यकृतोद्वाहको यः स घातनीयो न स्वयं वध्य एव ।
अक्षद्यूतं निकृतिः पापमेव कृतं त्वया गर्हितं सौबलेन ।
भीतेन दत्तं द्यूतदत्तं तथैव दत्तं कामिन्यै पुनराहार्यमेव ।
यद्येषां वै भोग्यमल्पं(यद्येतेषां भोग्यमल्पं) तदीयं भोगेन तद्बन्धुभिस्तच्च हार्यम् ।
त्वं धर्मनित्य(धर्मनिष्ठः)श्चाग्रजश्चेति राजन् ऋतेऽनुज्ञां न मया तत् कृतं च ।
सत्यं पापेष्वपि कर्तुं यदीच्छा तथाऽपि मासा द्वादशः नः प्रयाताः ।
मा मित्राणां तापकस्त्वं भवेथास्तथाऽमित्राणां नन्दकश्चैव राजन् ।
स्वतन्त्रत्वं वासुदेवस्य सम्यक् प्रत्यक्षतो दृश्यते ह्यद्य राजन् ।
ब्रह्मादीनां प्रकृतेस्तद्वशत्वं दृष्टं हि नो बहुशो व्यासदेहे ।
तस्माद् राजन्नभिनिर्याहि शत्रून् हन्तुं सर्वान् भोक्तुमेवाधिराज्यम् ।
एवमुक्तोऽब्रवीद् भीमं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
सत्यमेतन्न सन्देहः सत्येनाऽत्मानमालभे ।
तुदसे चातिवाचा मां यद्येवं भीम मां वदेः(भीम मा वद) ।
भीष्मद्रोणादयोऽस्त्रज्ञा निवार्याश्च कथं युधि ।
अस्त्राणि जानन्नपि हि न प्रयोजयसि क्वचित्(प्रयोजसि न क्वचित्) ।
इत्युक्तो भीमसेनस्तु स्नेहभङ्गभयात् ततः ।
अभिप्रायो हि भीमस्य निश्चयेन त्रयोदशे ।
कृतकृत्ये तथा भीमे स्थिते धर्मात्मजो हि सः ।
निवारणं गुरूणां हि भीम इच्छति न क्वचित् ।
आपद्येव हि भीमस्तान् निवारयति नान्यथा ।
सर्वज्ञः सर्वशक्तिश्च कृष्णद्वैपायनोऽगमत् ।
इमं मन्त्रं वदिष्यामि येन जेष्यति फल्गुनः ।
इत्युक्त्वैवावदन्मन्त्रं सर्वदैवतदृष्टिदम् ।
भीष्मद्रोणादिविजय एतावद् वीर्यमेव हि ।
गते व्यासे भगवति सर्वज्ञे सर्वकर्तरि ।
तमाप्य फल्गुनो मन्त्रं ययौ ज्येष्ठौ प्रणम्य च ।
षण्मासेऽतिगतेऽपश्यन्मूकं नामासुरं गिरौ ।
तं ज्ञात्वा फल्गुनो वीरः सज्यं कृत्वा तु गाण्डिवम् ।
किरातरूपस्तमनु सभार्यश्च त्रियम्बकः ।
तेनोक्तोऽसौ मयैवायं वराहोऽनुगतोऽद्य हि ।
इत्युक्तः फल्गुनः प्राह तिष्ठ तिष्ठ न मोक्ष्यसे ।
तत्राखिलानि चास्त्राणि फल्गुनस्याग्रसच्छिवः ।
तदप्यग्रसदेवासौ प्रहसन् गिरिशस्तदा ।
पिण्डीकृत्य ततो रुद्रश्चिक्षेपाथ(ध) धनञ्जयम् ।
पूर्वं सम्प्रार्थयामास शङ्करो गरुडध्वजम् ।
इत्युक्तः प्रददौ विष्णुरुमाधीशाय तं वरम् ।
केवलान् वैष्णवान् मन्त्रान् व्यासः पार्थाय नो ददौ ।
केवलैर्वैष्णवैर्मन्त्रैः स्वदत्तैर्विजयावहैः ।
पार्थः सञ्ज्ञामवाप्याथ जयार्थ्याराधयच्छिवम् ।
आरुहन् स तु तं ज्ञात्वा रुद्र इत्येव फल्गुनः ।
अस्त्रं तद् विष्णुदैवत्यं साधितं शङ्करेण यत् ।
इन्द्रोऽर्जुनं समागम्य प्राह प्रीतोऽस्मि तेऽनघ ।
इत्युक्त्वा प्रययाविन्द्रस्तद्रथेन च मातलिः ।
पूजितो दैवतैः सर्वैरिन्द्रेणैव निवेशितः ।
प्रीत्या समाश्लिष्य कुरुप्रवीरं शक्रो द्वितीयां तनुमात्मनः सः ।
अस्त्राणि तस्मा अदिशत् स वासवो महान्ति दिव्यानि तदोर्वशी तम् ।
षण्ढो भवेत्येव तयाऽभिशप्ते पार्थे शक्रोऽनुग्रहं तस्य चादात् ।
ततोऽवसत् पाण्डवेयो गान्धर्वं वेदमभ्यसन् ।
सुभद्रयाऽभिमन्युना सह स्वकां पुरं गतः ।
मया वरो हि शम्भवे प्रदत्त आस पूर्वतः ।
‘त्वामाराध्य तथा शम्भो ग्रहीष्यामि वरं सदा ।
स्वागमैः कल्पितैस्त्वञ्च जनान् मद्विमुखान् कुरु ।
इति वाक्यमृतं कर्तुमभिप्रायं विजज्ञुषी ।
पुत्रो मे बलवान् देव स्यात् सर्वास्त्रविदुत्तमः।
एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान् मोहयिष्यति ।
अतत्थ्यानि वितत्थ्यानि दर्शयस्व महाभुज ।
अहं त्वां पूजयिष्यामि लोकसम्मोहनोत्सुकः ।
इत्युक्तवचनं पूर्वं केशवेन शिवाय यत् ।
रात्रौ कृष्णे मुनिमध्ये प्रविष्टे घण्टाकर्णः कर्णनामा पिशाचौ ।
तौ दृष्ट्वा मुनिमध्यस्थं केशवं तदबोधतः ।
दृष्ट्वा हृदि स्थितं तं तु कौतूहलसमन्वितौ ।
तयोः प्रसन्नो भगवान् स्पृष्ट्वा गन्धर्वसत्तमौ ।
ताभ्यां पुनर्नृत्तगीतसंस्तवैः पूजितः प्रभुः ।
स्वीयानेव गुणान् विष्णुर्भुञ्जन् (युञ्जन्) नित्येन शोचिषा ।
पूर्वं तेनोदितं यत्तल्लोकान् मोहयताऽञ्जसा ।
तपोऽसुराणां मोहाय सुराः सन्तु गतज्वराः ।
आज्ञया(स्वाज्ञया) चारयामास क्षिप्रं द्वादशराशिषु ।
एकस्मिन्नह्नि भगवान् राशिंराशिं च वत्सरम् ।
मासब्रतं सार्द्धशतश्वासकालैरकल्पयत् ।
तत्रास्य गरुडाद्याश्च परिचर्यां स्वपार्षदाः ।
एवं स्थितं तमरविन्ददलायताक्षं ब्रह्मेन्द्रपूर्वसुरयोगिवरप्रजेशाः ।
शर्वोऽपि सर्वसुरदैवतमात्मदैवम्
अभ्येत्य पादयुगलं जगदेकभर्तुः
कृष्णोऽप्ययोग्यजनमोहनमेव वाञ्छन्
विष्णुः समस्तसुजनैः परमो ह्युपेयः
अव्यक्ततः सकलजीवगणाच्च नित्यम्
उक्तैरन्यैश्च गिरिशवाक्यैस्तत्त्वविनिर्णयैः ।
सर्वदेवोत्तमं तं हि जानन्त्येव सुराः सदा ।
ततः कृष्णः सुतवरं त्वत्त आदास्य इत्यजः ।
पुत्रं देहीति सोऽप्याह पूर्वमेव सुतस्तव ।
पुरा दग्धो मया कामस्तदाऽयाचत मां रतिः ।
उत्पत्स्यते वासुदेवाद् यदा तं(त्वं) पतिमाप्स्यसि ।
दासोऽस्मि तव देवेश पाहि मां शरणागतम् ।
यदर्थमेष आयातः केशवः शृणुतामराः ।
तं हन्तुमेव पुत्रं स्वं प्रद्युम्नमुदरेऽर्प्य च ।
ज्वालामालाकरालेन स्वतेजोवर्द्धितेन च ।
सद्योगर्भं पुनस्तं च रुक्मिण्यां जनयिष्यति ।
दृष्टमेतन्नारदाद्यैर्मुनिभिः सर्वमेव च ।
ततो हरिर्ब्रह्मसुरेन्द्रमुख्यैः सुरैः स्तुतो गरुडस्कन्धसंस्थः ।
कृष्णे प्रयाते निलयं पुरद्विषो रात्रौ पौण्ड्रौ वासुदेवः समागात् ।
पुरीं प्रभञ्जन्तममुं विदित्वा सरामशैनेययदुप्रवीराः ।
तदस्त्रशस्त्रैः सहसा विषण्णा यदुप्रवीरा विहतप्रदीपाः(विगतप्रदीपाः) ।
पुनः समादाय तथोरुदीपिका अग्रे समाधाय च रौहिणेयम् ।
अथाऽससादैकलव्यं रथेन रामः शैनेयः पौण्ड्रकं वासुदेवम् ।
ततो गदायुद्धमभूत् तयोर्द्वयोस्तथा रामश्चैकलव्यश्च वीरौ(हरिवंशे भविष्यत्पर्वणि अ.१०२) ।
तस्मिन् काले केशवो वैनतेयमारुह्याऽयाद् यत्र ते युद्दसंस्थाः ।
उद्यम्य दोर्भ्यां स गदां जवेनैवाभ्यापतद् रौहिणेयो निषादम् ।
विद्रावयन् रौहिणेयोऽन्वयात् तं भीतोऽपतच्चैकलव्योऽम्बुधौ सः ।
सुपापोऽसावेकलव्यः सुभीतो रामं मत्वैवानुयान्तं पुनश्च ।
रामो विजित्यातिबलं रणे रिपुं मुदैव दामोदरमाससाद ।
तं केशवो विरथं व्यायुधं च क्षणेन चक्रे स ययौ निजां पुरीम् ।
मदीयलिङ्गानि विसृज्य चाऽशु समागच्छेथाः शरणं मामनन्तम् ।
कृष्णः प्रहस्याऽह तवाऽयुधानि दास्याम्यहं लिङ्गभूतानि चाऽजौ ।
तं शातकौम्भे गरुडे रथस्थे स्थितं चक्रादीन् कृत्रिमान् सन्दधानम् ।
ततोऽस्त्रशस्त्राण्यभिवर्षमाणं विजित्य तं वासुदेवोऽरिणैव ।
अपातयच्चाऽशु(न्यापातयच्चाशु) शिरः स तेन
साहाय्यकृच्चास्य च काशिराजो यथैव किर्मीरहिडिम्बसाल्वाः ।
निहत्य तौ केशवो रौग्मिणेयं पुनर्वैदर्भ्यां जनयामास सद्यः ।
स शर्वदत्तेन वरेण दृप्तः पुनर्योद्धुं कृष्णमेवाऽससाद ।
एवं यदूनामृषभेण सूदिते पौण्ड्रे तथा काशिनृपे च पापे ।
प्रत्यक्षगं तं शिवं पापबुद्धिः कृष्णाभावं याचते दुष्टचेताः ।
स दक्षिणाग्निश्चासुरावेशयुक्तः सम्पूजितः काशिराजात्मजेन ।
कृष्णस्तस्य प्रतिघातार्थमुग्रं समादिशच्चक्रमनन्तवीर्यः ।
कृत्यात्मको वह्निरसौ प्रधानवह्नेः पुत्रश्चक्रविद्रावितोऽथ ।
दग्ध्वा पुरीं वारणसीं सुदर्शनः पुनः पार्श्वं वासुदेवस्य चाऽगात् ।
कृष्णः क्रीडन् द्वारवत्यां सुपूर्णनित्यानन्दः(सुपूर्णो नित्यानन्दः) क्वचिदाह स्म भैष्मीम् ।
त्वया न कार्यं मम किञ्च भद्रे मयाऽरीणां मानभङ्गार्थमेव ।
स्त्रिया भेतव्यं भर्तुरित्येव धर्मं विज्ञापयन्ती दुःखितेवाऽस देवी ।
एवं क्रीडत्यब्जनाभे रमायां कृष्णादिष्टो गोकुलं रौहिणेयः ।
मासौ तत्र न्यवसद् गोपिकाभी रेमे क्षीबो यमुनामाह्वयच्च ।
पुनस्तया प्रणतः संस्तुतश्च व्यसर्जयत् तामथ नन्दगोपम्(भा.पु.१०.६५.१७) ।
तदैव मैन्दो विविदश्च भौमे हते सखाये (सखायौ) दानवावेशयुक्तौ ।
रामाय सोऽदाद् वरमब्जनाभो वध्यावेतौ भवतां तेऽप्यवध्यौ ।
गत्वा स मैन्दं प्रथमं जघान क्रोधात् युद्धायाऽगतं रैवताग्रे ।
दुर्योधनस्याऽस पुत्री रतिर्या पूर्वं नाम्ना लक्षणा कान्तरूपा ।
बलाद् गृहीतां वीक्ष्य तां कर्णमुख्या दुर्योधनाद्या युयुधुः क्रोधदीप्ताः ।
श्रुत्वैव तद् वृष्णयः सर्व एव समुद्यमं चक्रिरे कौरवेषु ।
पुरस्य बाह्योपवने स्थितः स प्रस्थापयच्चोद्धवं कौरवार्थे ।
आज्ञापयद् वो नृपतिः स्म यन्नः कुमारकः प्रगृहीतो भवद्भिः ।
आज्ञापयामास व उग्रसेन
स लाङ्गलेन तत् पुरं विकृष्य जाह्नवीजले ।
सभार्यमाशु पुत्रकं सुयोधनाभिपूजितम् ।
इत्यादिकर्माणि महान्ति रामस्याऽसञ्छेषस्याच्युतावेशिनोऽलम् ।
क्रीडायुद्धे बहुशो रौहिणेये व्यक्तिं विष्णोर्भीमसेनो विदित्वा ।
तदा जयी प्रभवत्येष रामो नातिव्यक्तस्तत्र(नाभिव्यक्तस्तत्र) यदा जनार्दनः ।
एतादृशेनैव रामेण युक्ते कृष्णे द्वार्वत्यां निवसत्यब्जनाभे ।
तमानयेत्यथ सा चित्रवस्त्रे प्रदर्श्य लोकान् समदर्शयत् तम् ।
अनिरुद्धं गुणोदारमानीतं चित्रलेखया ।
गूढं कन्यागृहे तं तु ज्ञात्वा कन्याभिरक्षिणः ।
आगताननिरुद्धस्तान् परिघेण महाबलः ।
अथ कृष्णः समारुह्य गरुडं रामसंयुतः ।
युद्ध्वैवाङ्गिरसा चैव क्षणाद् विद्राप्य तान् हरिः ।
तेन भस्मप्रहारेण ज्वरितं रोहिणीसुतम् ।
स्वयं विक्रीड्य तेनाथ कञ्चित् कालं जनार्दनः ।
स्वयं जित्वाऽपि गिरिशभृत्यं नालमिति प्रभुः ।
ज्वरेण वैष्णवेनासौ सुभृशं पीडितस्तदा ।
क्रीडार्थमत्यल्पजनेष्वपि प्रभुः कथञ्चिदेव व्यजयद् व्यथां विना ।
यदा ज्वराद्या अखिलाः प्रविद्रुतास्तदा स्वयं प्राप हरिं गिरीशः ।
विजृम्भिते शङ्करे निष्प्रयत्ने स्थाणूपमे संस्थिते कञ्जजातः ।
प्रगृह्य शर्वं च विवेश विष्णोः स तूदरं दर्शयामास तत्र ।
अपेतमोहोऽथ वृषध्वजो हरिं तुष्टाव बाणोऽभिससार केशवम् ।
तदा शिवेन प्रणतो बाणरक्षणकाम्यया ।
एवमग्नीनङ्गिरसं ज्वरं स्कन्दमुमापतिम् ।
येनायत्नेन विजितः सर्वलोकहरो हरः ।
ईदृशानन्तसङ्ख्यानां शिवानां ब्रह्मणामपि ।
नच ज्ञानादयो भावा नचास्तित्वमपि क्वचित् ।
चित्रलेखासमेतोषान्वितपौत्रसमन्वितः ।
एवंविधान्यगणितानि यदूत्तमस्य
एवं वसत्यमितपौरुषवीर्यसारे
पृथ्वीं प्रदक्षिणत एत्य समस्ततीर्थस्नानं यथाक्रमत एव विधाय पार्थाः ।
पार्थैः सम्पूजितस्तत्र कृष्णो यदुगणैः सह ।
तत्र भीमं तपोवेषं दृष्ट्वाऽतिस्नेहकारणात् ।
सर्वे वयं निहत्याद्य सकर्णान् धृतराष्ट्रजान् ।
संवत्सरं समाप्यैव पुरं यास्यन्ति पाण्डवाः ।
एवं वदत्येव शिनिप्रवीरे जनार्दनः पार्थमुखान्युदीक्ष्य ।
स्वबाहुवीर्येण निहत्य शत्रूनाप्स्यन्ति राज्यं त इतीरितेऽमुना ।
क्रमेण पार्था अपि शैशिरं गिरिं समासदंस्तत्र कृष्णां सुदुर्गे ।
उवाह कृष्णां स तु तस्य भृत्या ऊहुः पार्थांस्ते बदर्याश्रमं च ।
अतीत्य शर्वश्वशुरं गिरिं ते सुवर्णकूटं निषधं गिरिं च ।
तस्मिन् मुनीन्द्रैरभिपूज्यमाना नारायणं पूजयन्तः सदैव ।
एवं बदर्यां विहरत्सु तेषु क्वचिद् रहः कृष्णया वायुसूनौ ।
(तत्पक्षपातेन) तत्पक्षवातेन विचालिते तु तस्मिन् गिरौ कमलं हैममग्र्यम् ।
दृष्ट्वाऽतिगन्धं वरहेमकञ्जं कुतूहलाद् द्रौपदी भीमसेनम् ।
तयाऽर्थितः सगदस्तुङ्गमेनं गिरिं वेगादारुहद् वायुसूनुः ।
आसेदिवांस्तत्र हनूमदाख्यं निजं रूपं प्रोद्यदादित्यभासम् ।
धर्मो देवानां परमो मानुषत्वे स्वीये रूपेऽप्यन्यवदेव वृत्तिः ।
सर्वे गुणा आवृता मानुषत्वे युगानुसारान्मूलरूपानुसारात् ।
नैवाव्यक्तिः काचिदस्तीह विष्णोः प्रादुर्भावेष्वतिसुव्यक्तशक्तेः ।
तस्माद् भीमो धर्मवृद्ध्यर्थमेव स्वीये रूपेऽप्यन्यवद् वृत्तिमेव ।
तद्रूपवृद्धिं भीमसेनोऽथ दृष्ट्वा श्रुत्वा हनूमन्मुखतः कथाश्च ।
ध्वजाद् बीभत्सोर्गर्जनेनैव शत्रुपराभवे तेन दत्तेऽर्जुनस्य ।
नरागम्यां नलिनीमेत्य तत्र दृष्ट्वा पद्मान्यद्भुताकारवन्ति ।
ते भीममात्तायुधमुग्ररूपं महाबलं रूपनवावतारम् ।
वराच्छिवस्यैव परैरजेयाः शस्त्रास्त्रवृष्टिं मुमुचुः सुभीमाम्(सुभीमाः) ।
तान् वैष्णवैरेव शास्त्रैः स भीमो विजित्य पूर्वं वाङ्मये सङ्गरे तु ।
वातेन कुन्त्यां बलवान् स जातः शूरस्तपस्वी द्विषतां निहन्ता ।
तत्रापरांश्चैव बहूनसत्यं निरीश्वरं चाप्रतिष्ठं च लोकम् ।
भिन्नं विष्णुमधिकं सर्वतश्च ब्रुवन् प्रवीरान् लक्षमेषां निजघ्ने ।
विक्रम्य तान् गदयाऽसौ निहत्य विद्राप्य सर्वान् नलिनीं प्रविश्य ।
अथो कलहशंसीनि निमित्तानि युधिष्ठिरः ।
सौगन्धिकार्थं यातं तं श्रुत्वा कृष्णामुखान्नृपः ।
ययौ वृकोदरो यत्र दृष्ट्वा चैनमवस्थितम् ।
देवेभ्यो मरणाद् भीता राक्षसा वित्तपाज्ञया ।
वसत्सु तत्र पार्थेषु पुनः कतिपयैर्दिनैः ।
पञ्चवर्णानि पुष्पानि कृष्णा वीक्ष्याऽहृतानि तु ।
अगम्योऽयं गिरिः सर्वैः कुबेरेणाभिपालितः ।
इत्युक्त आशु सगदः सधनुः सबाणो भीमो गिरीन्द्रमजितोरुबलो विगाहे ।
अग्रे निधाय मणिमन्तमजेयमुग्रं शम्भोर्वराद् विविधशस्त्रमहास्त्रवृष्ट्या (महाभिवृष्ट्या) ।
अवध्यांस्तान् क्षणेनैव हत्वा भीमो महाबलः ।
ते हता भीमसेनेन प्रापुरन्धन्धन्तमोऽखिलाः ।
ततो वैश्रवणो राजा महापद्मत्रये हते ।
असुरावेशतस्तस्य भीमे क्रोधो महानभूत् ।
तस्मिन् काले भीमसेनस्य घोषं श्रुत्वा राजाऽपृच्छदाशु स्म कृष्णाम् ।
सभ्रातृके मुनिभिः कृष्णया च गते राजन्यत्र भीमं कुबेरः ।
धृतायुधं भीममीक्ष्यापि किञ्चिद् दैत्यावेशाद् बहु मेने न भीमम् ।
दैत्यावेशादुज्झितः शान्तभावो ददौ निजं स्थानमेषां सुतुष्टः ।
तत्रैव तेषां वसतां महात्मनामानन्दिनामब्दचतुष्टये गते ।
वधं वव्रे स्वशत्रूणामिन्द्रः पार्थात् स्वरूपतः ।
पुनरिन्द्रेणार्थितोऽदाज्जहीमान् नरदेहवान् ।
ऐन्द्रं स्यन्दनमारुह्य पार्थो मातलिसंयुतः ।
शङ्खं ददुस्तस्य देवा देवदत्तः स शङ्खराट् ।
दधानः कुण्डले दिव्ये शक्रदत्ते सुभास्वरे ।
तस्य शङ्खध्वनिं श्रुत्वा गाण्डीवस्य च निस्स्वनम् ।
तिस्रः कोट्यो दानवानां स्वयम्भुवरगर्विताः ।
तेषां स शस्त्राणि किरीटमाली(किरीटमौली) निवार्य गाण्डीवधनुःप्रमुक्तैः(गाण्डीवधनुःप्रयुक्तैः) ।
सर्वे हतास्तेन महारथेन ते दानवाः सोऽपि ययौ तथाऽन्यान् ।
तानस्त्रशस्त्राण्यभिवर्षमाणान् धनञ्जयः पाशुपतास्त्रतो द्राक् ।
ययुरन्धं(प्रापुरन्धं)तमस्तेऽपि सर्वदेवद्विषोऽसुराः ।
आयान्तमीक्ष्य बीभत्सुं मुमुदुर्भ्रातरोऽधिकम् ।
कथाभिर्वासुदेवस्य ध्यानेनाभ्यर्चनेन च ।
नैव शत्रूननुत्साद्य नानादाय महद्यशः ।
तदन्येषां तु वर्णानां क्षमा बाह्येषु शत्रुषु ।
इति भीमवचः श्रुत्वा ससोदर्यो युधिष्ठिरः ।
पादेषु तेषु निवसत्सु हिमाचलस्य
पूर्वं हि वृत्रवधतोऽम्बुजनालतन्तु-
स सर्वसुरविप्रेन्द्रतपश्च बलमक्षयम् ।
स (सुरेन्द्रवचनात्)इन्द्रवचनाच्छच्या महर्षिगणवाहने ।
स शचीप्रतिषेधार्थमगस्त्येन महात्मना ।
तदा भृगुं तस्य जटासु लीनं कदाऽपि तस्याक्षिपथं न यातम्(न यान्तम्) ।
षष्ठे काले यस्त्वयाऽसादितः स्यात्
सर्वदेवमुनीन्द्राणां (सर्वदेवमुनीनां) यत् तपस्त्वामुपाश्रितम् (समुपाश्रितम्) ।
यदा प्रश्नांस्त्वदीयांश्च कश्चित् परिहरिष्यति ।
भृगुदेहगतेनैवं शप्तः कमलयोनिना ।
इन्द्रोऽप्यवाप स्वं स्थानमिष्ट्वा विष्णुं विपापकः ।
नहि लोकावनं पापं त्रैलोक्येशस्य वज्रिणः ।
क्वचित् पापं च पुण्यानां वृद्धये भवति स्फुटम् ।
देवानां वा मुनीनां वा भवेदेवं नवै नृणाम् ।
नान्यस्य पदमाप्स्यन्ति तद् देवानां व्रतं परम् ।
तस्मिन्नेवं निपतिते ब्रह्मणः शापकारणात् ।
यत्तत् सुराणां सर्वेषां मुनीनां च तपः स्थितम् ।
देवानां हि नृजातानामल्पं व्यक्तं भवेद् बलम् ।
नित्यं व्यक्ता गुणा विष्णोरिति शास्त्रस्य निर्णयः ।
देवानां मानुषादौ तु शक्येऽप्यव्यक्तताकृतेः ।
तन्मानुषे बले तस्य वराद् वारितवत्(वरादावृतवत्) स्थिते ।
आत्ममोक्षाय न प्रश्नान् व्याजहार स चाभिभूः ।
किमुत क्षत्रियस्येति जानन्नपि वृकोदरः ।
अयतन्तमपि ह्येनं(ह्येषो) चालनायापि नाशकत् ।
भ्रातृमात्रादिषु(भ्रातृमात्रादिभिः) स्नेहात् क्षिप्रमात्मविमोक्षणम् ।
भ्रात्रादिषु स्नेहवशान्न स्थातव्यमिहेत्यपि ।
स्रस्ताङ्गे पतिते सर्पे यास्यामीति विचिन्तयन् ।
तदैव ब्रह्मवचनात् पूर्वोक्तात् केशवाज्ञया ।
पूरिते नहुषस्थेन तपसा च बलेन च ।
गते भीमे निमित्तानि दृष्ट्वा राजा युधिष्ठिरः ।
यातं मृगार्थं स निशम्य तस्यास्तदूरुवेगात् पतितान् नगेन्द्रान् ।
स कारणं नहुषात् सर्वमेव शुश्राव तत्प्रश्नमशेषतश्च ।
दिव्याम्बरे कुण्डलिनि स्वपूर्वे गते विमानेन स धर्मराजः ।
श्रुत्वा कृष्णा भ्रातरश्चास्य सर्वे सर्वे मुनीन्द्रा भीमसेनेऽतिभक्ताः ।
नैतादृशं साहसं तेऽनुरूपं शक्तोऽपि यत् स्वात्मनो मोक्षणाय(स्वात्मविमोक्षणाय) ।
मैवं पुनः कार्यमिति ब्रुवन्तः समाश्लिषन् सर्व एवैत्य भीमम् ।
ततोऽमितौजा भगवानुपागमन्नारायणः सत्यभामासहायः ।
कृष्णा च सत्या च परस्परं मुदा सम्भाषणं चक्रतुर्योषिदग्र्ये ।
स्त्रीधर्मानखिलांस्तत्र सत्यां निर्दोषसंविदम् ।
क्रीडार्थमेव वचनं ज्ञात्वा सत्यासमीरितम् ।
ततः कतिपयाहानि निरुष्यात्र जनार्दनः ।
ततः कदाचिन्मृगयां गतेषु पार्थेषु राजा सैन्धव आससाद ।
ब्रजन् विवाहार्थमसौ निशाम्य कृष्णां कोटिं प्रेषयित्वैव काश्यम् ।
तया धूतो(धुतो) निपपाताऽशु भूमौ पुनस्ससञ्ज्ञोऽभ्यगमद् विलज्जः(अभ्यपतद्विलज्जः) ।
तदा निमित्तानि निशाम्य पार्थाः समाययुस्त्वरयैवाऽश्रमाय ।
आक्रोशमानं भीमसेनेति धौम्यं दृष्ट्वा तस्याग्रे सैन्धवं चातिपापम् ।
अग्रे कृष्णां योऽवदत् सिन्धुराजं याहीति तं कोटिकाश्यं सुपापम् ।
हत्वा सेनामखिलां सैन्धवस्य भीमार्जुनौ सयमं धर्मराजम् ।
पद्भ्यां धावन्तं भीमसेनो निगृह्य दत्वा प्रहारांश्च भृशं तमार्तम् ।
दासो द्रौपद्या अहमित्येव वाक्ये तेनैवोक्ते भीमसेनोऽप्यमुञ्चत्(भीमसेनो व्यमुञ्चत्) ।
मार्कण्डेयस्तदाऽऽगत्य तेषामकथयत् कथाः ।
लोकदर्शनमाश्रित्य देवाश्च मुनयस्तथा ।
अर्थः समाधिभाषासु ग्राह्यः सर्वोऽप्यसंशयम् ।
ग्राह्यो नार्थो वैदिकं तु दर्शनं ग्राह्यमेव हि ।
जयद्रथस्तु भीमेन तदा(यदा) पञ्चशिखीकृतः ।
वने वसत्स्वेव च पाण्डवेषु चक्रे यज्ञं पौण्डरीकाख्यमेव ।
दुर्योधनस्याऽज्ञया पाण्डवानां दुःशासनः प्रेषयामास तत्र(दूतम्) ।
ततो दिनैः कैश्चन धार्तराष्ट्राः सकर्णगान्धारनृपाः कुमन्त्रतः ।
ते स्यन्दनैः काञ्चनरत्नचित्रैर्महागजैस्तुरगैः पत्तिभिश्च ।
गवां दृष्टिच्छद्मना निर्गतांस्तान् ज्ञात्वा शक्रस्तेजसो भङ्गकामः ।
स षष्टिसाहस्रककोटियूथपैर्गन्धर्वमुख्यैः संवृतोऽगात् सरस्तत् ।
स्नातुं समायास्यति धार्तराष्ट्रो राजेश्वरो निस्सरध्वं तदस्मात् ।
ऊचुर्वयं मानयामस्तदाज्ञां त्रिलोकानां यः पतिः शक्रदेवः ।
इतीरिते कुपितो धार्तराष्ट्रो जघान गन्धर्ववराञ्छरौघैः ।
मुहूर्तमासीत् सममेव युद्धं तेषां तदा धार्तराष्ट्रस्य चैव ।
तेजोभङ्गं तत्र सुयोधनस्य पार्थार्थमत्र प्रविधातुमेव च ।
स चित्रसेनः प्रथमं कर्णमेव युयोध पार्थस्पर्धया तेन युद्ध्यन् ।
स भग्नयानश्च(स भग्नयानोऽथ) विकर्णयानमास्थाय तस्यैव नियम्य वाजिनः ।
मुहूर्तमेनेन समं स युद्ध्यन्नन्यैर्गन्धर्वैर्बहुभिर्माययैव ।
महाबलो धार्तराष्ट्रोऽपि शक्रवराद् विष्णोराज्ञया चाभिवृद्धे ।
तस्यानुजाः शकुनी राजभार्याः सर्वे बद्धाः शक्रदूतैः (शक्रभृत्यैः) प्रणीताः ।
समीपमागत्य पृथासुतानां परिभूतं वः कुलं शक्रभृत्यैः ।
इत्युक्त ऊचे भीमसेनोऽग्रजं स्वं जाने राजन् यादृशोऽयं विमर्दः ।
विज्ञाय तेषां मन्त्रितं वज्रबाहुरेतच्चक्रे नात्र नः कार्यहानिः ।
एकाहयज्ञे दीक्षितेनैव राज्ञा सम्प्रेषितो भीमसेनोऽर्जुनश्च ।
स चित्रसेनो वासवोक्तं च सर्वं कुमन्त्रितं धार्तराष्ट्रस्य चाऽह ।
समाप्य यज्ञं च ततोऽभियान्तं सर्वे प्रापुर्धर्मराजं स चाऽशु ।
स पाण्डवैर्मोचितः सानुजश्च सभार्यकः किञ्चिदतोऽपगम्य ।
स चाऽह दिष्ट्या जयसि राजन्निति सुयोधनम् ।
कर्णदुःशासनाभ्यां च सौबलेन च देविना ।
ततो निशायां प्राप्तायां स्वपक्षे प्रविषीदति ।
शुक्रेणोत्पादिता कृत्या सा प्रसुप्तेषु मन्त्रिषु ।
त्वं दिव्यः पुरुषो वीरः सृष्टोऽस्माभिः प्रतोषितात् ।
इदानीं सर्वदेवानां(इन्द्रादिसर्वदेवानां) वरात् त्वं विजितो रणे ।
कृष्णेन निहतश्चैव नरकः कर्ण आस्थितः ।
भीष्मादींश्च वयं सर्वानाविशाम(प्रविशाम) जयाय ते ।
तस्माद् गत्वा पालयस्व राज्यं राजन्नपेतभीः ।
इत्युक्त्वा कृत्यया भूयः स्वस्थाने स्थापितो नृपः ।
नोवाच कस्यचित् तेषु स्वानुभूतं सुयोधनः ।
भृत्यैस्तवैव पार्थैर्यन्मोचितोऽसि परन्तप ।
या च तेऽर्जुनमाहात्म्ये शङ्का सा व्येतु मे शृणु ।
इत्युक्तोऽवरजैश्चैव सर्वैः शकुनिना तथा ।
सकुण्डलं सकवचमवध्यं सूर्यनन्दनम् ।
तद् विज्ञाय रविः कर्णं स्वप्न उक्त्वा न्यवारयत् ।
ददौ चोत्कृत्य कवचं कुण्डले च शचीपतेः ।
ऋतेऽर्जुनादेकमेव वधिष्यस्यनयेति सः ।
पार्था(पार्थो) विमुच्यैव सुयोधनं तं वने वसन्तो मुदिताः सदैव ।
तस्मिन्नदृश्ये तृषिता एकैकमुदकार्थिनः ।
क्षत्रधर्मस्य रक्षार्थं न तत्प्रश्नान् विदां वराः ।
न विप्राणां च धर्मोऽयं विद्याया उपजीवनम् ।
देवा अपि मनुष्येषु जाताः सुबलिनोऽपि हि ।
अतो भीमार्जुनौ धर्मादत्युत्तमबलावपि ।
मुहूर्तमेव सा माया तयोराच्छादने क्षमा ।
उक्तं पाद्मपुराणे च तदेतत् सर्वमञ्जसा ।
धर्मात्मजोऽथाऽजगामोदकान्तं दृष्ट्वा भ्रातॄंस्तत्र दुःखाभितप्तः ।
अर्थे भ्रातॄणामैच्छदसौ तदीयप्रश्नप्रतिव्याहरणं दयालुः ।
ततस्तुष्टो वरमस्मै ददौ स एकोत्थानं भ्रातृमध्ये स वव्रे ।
इत्युक्त ऊचे माद्रिपुत्रं विहाय कुन्तीपुत्रो न मयोत्थापनीयः ।
यथेष्टरूपप्राप्तिमेषां पुनश्च स्वकामतो निजरूपाप्तिमादात् ।
युधिष्ठिरात्मनस्तस्य यशोधर्मविवृद्धये(युधिष्ठिरात्मनः स्वस्य यशोधर्माभिवृद्धये) ।
ततो राजा भीमसेनार्जुनौ च सार्द्धं यमाभ्यामरणीं प्रदाय ।
त्रयोविंशोऽध्यायः
औं ॥ नारायणानुग्रहतो यथावन्निस्तीर्य तान् द्वादशाब्दान् वने ते ।
गत्वा विराटस्य पुरीं निधाय हेतीः शम्यां छन्नरूपा बभूवुः ।
सर्वे विराटं ययुरत्र देववत् सम्भावितास्तेन शुभोरुलक्षणाः ।
परपाको गृहस्थस्य क्षत्रियस्य विशेषतः ।
वैदिकव्यवहारेषु ज्ञानाधिक्यप्रसिद्धितः ।
स्वीयं वेदविदां सर्वं देवेशानां च किं पुनः ।
शापादेवार्जुनः षण्ढवेषोऽभून्नकुलस्तथा ।
सूतस्यानन्तरत्वात्तु वैश्यजातेस्तथाऽभवत् ।
ततो गोपालतामाप यतिः पूज्योऽखिलैर्यतः
अक्षासक्तोऽभवत् पश्चाद् दर्शयिष्यन् स्वशिष्टताम्
अथाऽजगाम मल्लकः समस्तभूमिमण्डले ।
तमीक्ष्य सर्वमल्लका विराटराजसंश्रयाः ।
य एष सूद आशु तं निहत्य मल्लमोजसा ।
इतीरिते समाहुतो जगाद मारुतिर्वचः ।
समस्तदेववृन्दतो महान् य एव केशवः ।
य एव देवनामधा इति श्रुतिर्जगाद हि ।
युधिष्ठिराभिधश्च यो युधिष्ठिरे स्थितः सदा ।
इति ब्रुवाणो मल्लं तमभियातो वृकोदरः ।
एवं निवसतां तत्र पाण्डवानां महात्मनाम् ।
स द्रौपदीं वीक्ष्य मनोभवार्तः(मनोमदार्तः) सम्प्रार्थयामास तया निरस्तः ।
तया निषिद्धोऽपि पुनःपुनस्तां यदा ययाचेऽथ सा चाह (ययाचेऽथच साऽऽह) कृष्णाम् ।
बलात् तया प्रेषिता तद्गृहाय यदाऽगमत् तेन हस्ते गृहीता ।
अनुद्रुत्यैतां पातयित्वा पदा स सन्ताडयामास तदा रविस्थितः ।
वायुस्तमाविश्य(वायुस्तदाविश्य) तु कीचकं तं न्यपातयत् तां समीक्ष्यैव भीमः ।
कृष्णा रात्रौ भीमसकाशमेत्य हन्तुं पापं कीचकं प्रैरयत् तम् ।
तत्रैनमासाद्य तु भीमसेनो विजित्य तं बाहुयुद्धे निहत्य(निपात्य) ।
अवध्यं तं निहतं वीक्ष्य तस्य पञ्चोत्तरं शतमेवानुजानाम् ।
सा नीयमाना कीचकैः संरुराव श्रुत्वैव तं भीमसेनो महान्तम् ।
एवं यत्नात् तपसा तैरवाप्तो वरः शिवादजयत्वं(शिवादक्षयत्वं) रणेषु ।
गन्धर्व इत्येव निहत्य सर्वान् मुमोद भीमो द्रौपदी चाथ कृष्णाम् ।
अस्त्वित्येनामाह भयात् सुदेष्णा तथाऽवसन् पूर्णमब्दं च तेऽत्र
तेनावदद् द्रौपदीकारणेन दुर्योधनो निहतं कीचकं तम् ।
अग्रे ययौ तत्र योद्धुं सुशर्मा स गा विराटस्य समाजहार ।
विजित्य सङ्ख्ये जगृहे विराटं तदा सुशर्मा तमयाद् वृकोदरः ।
ततोऽपरदिने सर्वे भीष्मद्रोणपुरस्सराः ।
कीचकस्य हिडिम्बस्य बककिर्मीरयोरपि ।
न बाधनाय भीष्माद्या अपि शेकुः कथञ्चन ।
यतिष्ये रक्षितुं भीमाद् धार्तराष्ट्रानिति स्वकाम् ।
यदि युद्धाय निर्यान्ति ज्ञाताः स्युः पाण्डवास्तदा ।
तदोत्तरः सारथित्वे प्रकल्प्य पार्थं ययौ तान् निशाम्यैव भीतः ।
आदाय गाण्डीवमथ ध्वजं च हनूमदङ्कं सदरोऽग्रतो गाः ।
एकीभूतान् पुनरेवानुयातान् सम्मोहनास्त्रेण विमोहयित्वा ।
विधाय भीष्मं विरथं जगाम तदा श्रुत्वा मत्स्यपतिर्जितान् कुरून् ।
तदा क्रुद्धः प्राहरत् तं विराटः सोऽक्षेण तद् भीमधनञ्जयाभ्याम् ।
निजस्वरूपेण समास्थितान् नो यदि स्म नासौ प्रणिपातपूर्वकम्(पूर्वम्) ।
तदा विराटासनमास्थितं नृपं युधिष्ठिरं वीक्ष्य विराट आह ।
ततो विराटो भयकम्पिताङ्गः प्रणम्य पार्थाञ्छरणं जगाम ।
एवं विराटं मोचयित्वैव गाश्च तमस्यन्धे कीचकान् पातयित्वा ।
अयातयन् केशवायाथ दूतान् सहाभिमन्युः सोऽपि रामेण सार्द्धम् ।
आसीन्महानुत्सवस्तत्र तेषां दाशार्हवीरैः सह पाण्डवानाम् ।
दुर्योधनाद्याः सूतपुत्रेण सार्द्धं ससौबलेया युधि पार्थपीडिताः ।
अज्ञातवासे फल्गुनो नोऽद्य दृष्टस्तस्मात् पुनर्यान्तु पार्था वनाय ।
तयोर्वाक्यं ते त्वनादृत्य पापा वनं पार्थाः पुनरेव प्रयान्तु ।
सौरमासानुसारेण धार्तराष्ट्रा अपूर्णताम् ।
दिनानामधिपः सूर्यः पक्षमासाधिपः शशी ।
तदेतदविचार्यैव लोभाच्च धृतराष्ट्रजैः ।
सुवासुदेवा अखिलैश्च यादवैः पाञ्चालमत्स्यैश्च युताः सभार्याः ।
चतुर्विंशोऽध्यायः
औं ॥ ततः सम्मन्त्र्यानुमते(अनुमतेः) कृष्णस्य स्वपुरोहितम् ।
स गत्वा धृतराष्ट्रं तं भीष्मद्रोणादिभिर्युतम् ।
श्रुतास्ते भीमनिहता जरासन्धादयोऽखिलाः ।
तीर्थविघ्नकराः सर्वतीर्थान्याच्छाद्य संस्थिताः ।
भ्रातॄणां ब्राह्मणानां च लोकानां च हितैषिणा ।
यथा जटासुरः पापः शर्वाणीवरसंश्रयात् ।
ज्ञात्वाऽपि भीमसेनेन विप्ररूपस्य नो वधः ।
यमौ युधिष्ठिरं कृष्णां चाऽदायैव पराद्रवत् ।
निपात्य भूमौ पादेन सञ्चूर्णितशिरास्तमः ।
निवातकवचाश्चैव हताः पार्थेन ते श्रुताः ।
तस्मादेतैः पालितस्य धर्मजस्य स्वकं वसु ।
ततः सहैव यदुभिः कृष्णं द्वारवतीं गतम् ।
युगपद् ययतुस्तत्र वेगेनाजयदर्जुनम् ।
दर्पान्नाहं राजराज उपास्ये पादयोरिति ।
असुप्तः सुप्तवच्छिश्ये तत्रातिष्ठद् धनञ्जयः ।
तमैक्षत् प्रथमं देवो जानन्नपि सुयोधनम् ।
तयोरागमने हेतुं श्रुत्वा प्राह जनार्दनः ।
समं करिष्ये युवयोरेकत्राहं निरायुधः ।
इत्युक्ते फल्गुनः कृष्णं वव्रे तद्भक्तिमान् यतः ।
पार्थानामेव साहाय्यं करिष्यन्नपि केशवः ।
ततः पार्थेन सहितः पाण्डवान् केशवो ययौ ।
उपप्लाव्ये सभायां हि तत्पक्षीयं वचो ब्रुवन् ।
ततो दुर्योधनं नायात् स च हार्दिक्यसंयुतः ।
सप्त पाण्डुसुतानां च मत्स्यद्रुपदकेकयैः ।
पुरुजित् कुन्तिभोजश्च चेकितानश्च सात्यकिः ।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ जयत्सेनोऽन्यकैकयाः(अन्यकेकयाः) ।
श्रुतायुरच्युतायुश्च बृहद्बलसुदक्षिणौ ।
अलायुधोऽलम्बलश्च दैत्या दुर्योधनं ययुः ।
सपुत्रपौत्रो बाह्लीको भीष्मद्रोणकृपा अपि ।
पाण्ड्यश्च वीरसेनाख्यः पाण्डवानेव संश्रितः ।
ता युधिष्ठिरक्लृप्ताः स मत्वा शल्योऽब्रवीदिदम् ।
लीनः श्रुत्वा धार्तराष्ट्रः सत्यं कुर्वित्यभाषत ।
स पाण्डवांस्ततो गत्वा तैरनुज्ञात एव च ।
सञ्जयं प्रेषयामास धृतराष्ट्रोऽथ शान्तये ।
हठवादेऽवदद् भीमो यं धर्मं द्रौपदी तथा ।
ततो निरुत्तरः कृष्णं पाण्डवांश्च प्रणम्य सः ।
निन्दितः सञ्जयेनासावाहूय विदुरं निशि ।
ऐहिकस्य सुखस्यापि कारणं तदनिन्दितम् ।
तत्र भावमकृत्वा स ज्ञानादिच्छन्नघक्षयम् ।
स आगत्यावदत् तत्त्वं विष्णोर्मायाविनः शुभा ।
तच्छ्रुत्वा स तु भीतोऽपि पुत्रस्नेहानुगो नृपः ।
यदुक्तवान् सञ्जयाय यदि दित्सतिः नः पिता ।
सोऽप्याहाहं गमिष्यामि सभायामृषिसन्निधौ ।
इत्युक्ते वैरमात्मोत्थं लोकमध्ये प्रहापयन् ।
नास्मन्निमित्तनाशः स्यात् कुलस्यापि वयं कुलम् ।
इच्छताऽप्यखिलान् हन्तुं धार्तराष्ट्रान् दृढात्मना ।
वधं तेषां धर्ममेव लोके ख्यापयितुं हरिः ।
अभिप्रायं केशवस्य जानन् भीमो निजं बलम् ।
शशंस सत्यैः सद्वाक्यै राज्ञां मध्ये प्रकाशयन् ।
नित्यमेकमनस्कौ तावपि केशवमारुती ।
ततः कृष्णोऽर्जुनं चैव कृपालुं सन्धिकामुकम् ।
शौर्यप्रकाशनायैव युद्धं योजयतां भवान् ।
दस्यूनां निग्रहो धर्मः क्षत्रियाणां यतः परः ।
ससात्यकिः स्यन्दनवर्यसंस्थितः पृथातनूजैरखिलैः स भूमिपैः ।
एकोऽपि विष्णुः स तु(च) भार्गवात्मा व्यासात्मकश्चानुगतो मुनीन्द्रैः (व्यासः सशिष्यस्तदनन्यदृश्यः) ।
स वन्द्यमानोऽखिलराष्ट्रवासिभिः प्रसूनवर्षैरभिवर्षितः सुरैः ।
स भीष्ममुख्यैः सरसाभियातः सहैव तै प्रययौ राजमार्गे ।
सभाजितस्तैः(सम्भावितस्तैः) परमादरेण विवेश गेहं नृपतेरनन्तः ।
यथोचितं तेषु विधाय केशवो दौर्योधनं प्राप्य गृहं च पूजितः ।
स भीष्मपूर्वैरभियाचितोऽपि जगाम नैषां गृहमादिदेवः ।
स तेन भक्त्याऽभिगतः प्रसन्नः प्रविश्य चान्तर्गृहमीश्वरोऽजः ।
परे दिनेऽसौ धृतराष्ट्रसूनुना समानीतः संसदि कौरवाणाम् ।
सम्पूजितो भीष्ममुख्यैः समस्तै रराज राजीवसमाननेत्रः ।
वैचित्रवीर्य स्वकुलस्य वृद्ध्यै प्रदेहि राज्यं तव सत्सुताय ।
इतीरितः प्राह ममातिवर्तिनं सुतं स्वयं मे प्रतिबोधयेति ।
येये तदा केशवसंयमाय न्यमन्त्रयंस्ते विबुधप्रतीपाः ।
कर्णः सुराग्र्योऽपि(सुरांशोऽपि) सुयोधनार्थे(सुयोधनार्थं) न्यमन्त्रयद् भावतो नैव दुष्टः ।
ऋषिभिर्जामदग्न्येन व्यासेनाप्यमितौजसा ।
मातापितृभ्यां भीष्माद्यैरनुशिष्टोऽपि दुर्मतिः ।
सात्यकिः कृतवर्मा च तच्छुश्रुवतुरञ्जसा ।
जानन्नप्यखिलं कृष्णस्तच्छ्रुत्वा सात्यकेर्मुखात् ।
अथ तेनाऽहुते पुत्रे सामात्ये पुरुषोत्तमः ।
तत् कालसूर्यामितदीप्ति सर्वजगद्भरं शाश्वतमप्रमेयम् ।
पिधाय रूपं पुनरेव तद्धरिर्वैचित्रवीर्येण समर्थितः पुनः ।
अनन्तशक्तिः पुरुषोत्तमोऽसौ शक्तोऽपि दुर्योधनचित्तनिग्रहे ।
पुनश्च कुन्तीगृहमेत्य कृष्णस्तयोद्योगं धर्मसुतस्य शिष्टम् ।
आयाहि पार्थानिति (पाण्डूनिति) तद्वचः स नैवाकरोन्मानितो धार्तराष्ट्रैः ।
यावत् पितुर्मरणं सोऽपि मैत्रीं वव्रे पार्थैस्तं च विसृज्य कृष्णः ।
सम्प्रार्थितः पृथया चैव कर्णः पार्थैर्योगं याहि सूनुर्ममासि ।
ततो ययुः कौरवाः पाण्डवाश्च कुरुक्षेत्रं योद्धुकामाः सकृष्णाः ।
पञ्चविंशोऽध्यायः
औं ॥ ते सेने समरारम्भे समेते सागरोपमे ।
‘सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत’(भ.गी.१.२१) ।
स्वधर्मो दुष्टदमनं धर्मज्ञानानुपालनम् ।
‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
नच शोकस्त्वया कार्यो बन्धूनां निधनेच्छया (निधनेक्षया) ।
सृष्टिस्थित्यप्ययाज्ञानबन्धमोक्षप्रवृत्तयः ।
न मे कुतश्चित् सर्गाद्याः स्वातन्त्र्याद् गुणपूर्तितः ।
ज्ञात्वैषां निधनाद्यं च जीवादेरस्वतन्त्रताम् ।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
(सम्पूर्णसत्सर्व)सुपूर्णसत्सर्वगुणदेहोऽहं सर्वदा प्रभुः ।
अथ दिव्यदृशं तस्य दत्वा व्याप्तं निजं वपुः ।
तत्प्रार्थितः पुनः कृष्णस्तद्रूपं लोकमानतः ।
ज्ञानं ज्ञेयं प्रकृत्यादि(ज्ञानज्ञेयप्रकृत्यादि) ज्ञापयन् पुरुषोत्तमः ।
अथ व्यूढेष्वनीकेषु नदन् वायुसुतोऽभ्ययात् ।
क्षिप्रं नैव प्रहर्तव्यं ज्ञातिषु प्रहरत्स्वपि ।
अमुचन् धार्तराष्ट्रेषु शस्त्रवृष्टिं दुरासदाम् ।
अपीडयंस्ताञ्छस्त्रौघैर्धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।
तत्र भीमशरैर्नुन्ना धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।
अथ द्वन्द्वानि युद्धानि बभूवुर्विजिगीषताम् ।
दुःशासनेन वीरस्य माद्रेयस्य यवीयसः ।
वृत्ते द्वन्द्वमहायुद्धे तत्र धर्मजपक्षगाः ।
अथ भीष्मद्रोणमुखैर्भगदत्तादिभिस्तथा ।
द्रोणं च भगदत्तं च कृपं दुर्योधनं तथा ।
अथ भीष्ममुदीर्णास्त्रं द्रावयन्तं वरूथिनीम् ।
सौभद्रं तत्र विक्रान्तमतीत्य द्युसरित्सुतः ।
तस्य विक्रममालक्ष्य पार्थं तद्गौरवानुगम् ।
रात्रौ युधिष्ठिरश्चिन्तामाप्य पार्थं व्यगर्हयत् ।
एवं भीष्मो दशाहानि सेनापत्यं चकार ह ।
कर्णोऽर्द्धरथ इत्युक्त्वा तावद् युद्धात् प्रयापितः(प्रहापितः) ।
कर्णेऽयुतरथानां(कर्णोऽयुतरथानां च) स नित्यशो वधमाहवे ।
सुसमर्थावपि वधे तस्य भीमधनञ्जयौ ।
बभूवुस्तत्र युद्धानि चित्राणि सुबहूनि च ।
धृष्टद्युम्नो महेष्वासः प्रतिव्यूह्याऽपगासुतम् ।
तत्रोद्दधार कृष्णोऽपि फल्गुनं मृदुयोधिनम् ।
तेन स्तुतो गृहीतश्च फल्गुनेन प्रणम्य च ।
ततो भीष्मोऽर्जुनश्चैव शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् ।
अयुतानि बहून्याजौ रथानां निजघान च ।
कदाचिदग्रगो भीमो भीष्मद्रोणौ विसारथी ।
पुनः संस्थापितरथौ विजित्यायत्नतो बली ।
भगदत्तद्रौणिकृपशल्यदुर्योधनादयः ।
विरथो व्यायुधश्चैव दृढवेधविमूर्च्छितः ।
ततोऽपहारं सैन्यस्य जिताश्चक्रुश्च कौरवाः ।
उवाच हेतुना केन वयं जीवाम (क्षीयाम, जीयाम) सर्वदा ।
तमाह भीष्मस्तेऽजेया देवास्ते धरणीं गताः ।
मानसोत्तरशैले हि पुरा ब्रह्मपुरस्सराः ।
स्तुत्वा सम्पूज्य भूमेः स भारावतरणाय तम् ।
अयं नारायणो देवः पुर्णानन्तगुणार्णवः ।
एवं तेन समादिष्टा धर्मवाय्वादयोऽखिलाः ।
स च नारायणो देवो देवकीनन्दनोऽभवत् ।
इत्युक्तो डम्भबुद्ध्यैव नत्वा विष्णुं ततो ययौ ।
दिव्यौषधेन भीष्मस्य भूत्वा च निरुजस्ततः ।
तत्राऽसीद् युद्धमतुलं भीमभीष्मानुयायिनाम् ।
धृष्टद्युम्नस्तत्र भीमानुयायी दुर्योधनस्यावरजैः प्रयुद्ध्यन् ।
ततो द्रोणस्तान् समुत्थाप्य सर्वान् विज्ञानास्त्रेणाऽसदत् पार्षतं च ।
अथाऽसदत् कृतवर्मा रथेन धृष्टद्युम्नं सोऽभ्ययात् तावुभौ च ।
तस्मिन् जिते रथवीरे स्वयं तं दुर्योधनः पार्षतमाससाद ।
विमूर्च्छितं तं रुधिरौघमुच्चैर्वमन्तमाशु स्वरथे निधाय ।
अथेन्द्रसूनुः केशवप्रेरितेन रथेन शत्रून् विधमञ्छरौघैः ।
तमन्वगाद् (तमन्वयात्) युयुधानः सुधन्वा विद्रावयन् धार्तराष्ट्रस्य सेनाम् ।
पुत्रान् दशास्याऽशु निहत्य वीरः स सात्यकेः सौमदत्तिः सकाशे ।
अथासिपाणिं युयुधानमाशु महासिहस्तेन च सौमदत्तिना ।
सुयोधनः सौमदत्तिं स्वकीयरथे व्यवस्थाप्य च भीमसेनात् ।
उभौ च तावस्त्रविदां प्रबर्हौ शरैर्महाशीविषसन्निकाशैः ।
स्वबाहुवीर्येण जितः स भीष्मः किरीटिना लोकमहारथेन ।
ततः परेद्युः पुनरेव भीमभीष्मौ पुरस्कृत्य समीयतुस्ते ।
दुर्योधनाद्येषु पराजितेषु भीष्मद्रोणद्रौणिपुरस्सरेषु ।
तेनातिविद्धे भीमसेनेऽस्य पुत्र उद्यच्छमानं पितरं निवार्य ।
स वैष्णवास्त्रं भगदत्तसंस्थं विज्ञाय विष्णोर्वरतो विशेषतः ।
अनुग्रहादभ्यधिकादवध्यं जानन्नपि स्वं वासुदेवस्य नित्यम् ।
स विस्मृतास्त्रस्तु यदा भवेत तदा भीमो भगदत्तं प्रयाति ।
चतुर्गजात्मोपरिगात्मकश्च घटोत्कचः सुप्रतीकं च तं च ।
गजार्तनादं तु निशम्य भीष्ममुखाः समापेतुरमुं च दृष्ट्वा ।
दिने परे चैव पुनः समेताः परस्परं पाण्डवाः कौरवास्ते ।
तैः प्रासहस्तैः क्षतकायोऽतिरूढकोपः स खड्गेन चकर्त तेषाम् ।
दृष्ट्वा तमुग्रं धृतराष्ट्रपुत्रो दिदेश रक्षोऽलम्बुसनामधेयम् ।
तयोरभूद् युद्धमतीव दारुणं मायायुजोर्वीर्यवतोर्महाद्भुतम् ।
हतं निशम्याऽर्जुनिमुग्रपौरुषो ननाद कोपेन वृकोदरात्मजः ।
अलम्बुसस्तं प्रसमीक्ष्य मारुतेः सुतं बलाढ्यं भयतः पराद्रवत् ।
स भीमपुत्रस्य जघान मन्त्रिणो महाबलांश्चतुरोऽन्यांस्तथैव ।
स पीड्यमानो युधि तेन रक्षसा प्रवेशयामास शरं घटोत्कचे ।
चिरं प्रयुद्धौ नृपराक्षसाधिपौ परस्पराजेयतमौ रणाजिरे ।
स द्रोणशल्यौ गुरुपुत्रगौतमौ भूरिश्रवःकृतवर्मादिकांश्च ।
तमेकग्र्यै रथिभिः परिष्कृतं निरीक्ष्य भीमोऽभ्यगमत् समस्तान् ।
द्रौणिं कृपाद्यान् ससुयोधनांश्च चकार भीमो विरथान् क्षणेन ।
तेनाम्बरस्थेन तरुप्रमाणैरभ्यर्दिताः कुरवः सायकौघैः ।
सर्वांश्च ताञ्छिबिरं प्रापयित्वा विना भीष्मं कौरवान् भीमसेनः ।
दुर्योधनोऽथ स्वजनैः समेतः पुनः प्रायाद् रणभूमिं स भीष्मम् ।
प्राग्ज्योतिषं चैव घटोत्कचाय सम्प्रेषयामास सुरापगासुतः ।
तेनाहतः (तेनार्दितः) प्राहिणोच्छूलमस्मै वियत्यवप्लुत्य तदा घटोत्कचः ।
तदा स तस्यैव पदानुगान् नृपो जघान तं मारुतिरभ्ययाद् रणे ।
संस्तम्भिते बाणवरैस्तु नागे भीमस्याश्वान् सायकैरर्दयत्(आर्दयत्) सः ।
स हन्तुकामेन रुषाऽभिपन्नो भीमेन राजा पुरतः पृष्ठतश्च ।
तस्मिन् गते भीमसेनार्जुनाभ्यां विद्राविते राजसङ्घे समस्ते ।
संश्रावितः क्रूरवचः स तेन चक्रे सत्यं मृत्युभयं विहाय ।
तं शक्तितो जुगुपुर्धार्तराष्ट्रास्तेनार्दिताश्चेदिपाञ्चालमुख्याः ।
संस्थाप्य तान् भीष्ममभिप्रयान्तमलम्बुसोऽवारयत् पार्थसूनुम् ।
तद् युद्धमासीन्नृपपार्थपुत्रयोर्विचित्रमत्यद्भुतमुग्ररूपम् ।
अथैनमुग्रैश्च शरैर्ववर्ष सूतं च तस्याऽशु जघान वीरः ।
द्रोणो द्रौणिर्भगदत्तः कृपश्च सचित्रसेना अभ्ययुर्भीमसेनम् ।
तामुद्यतां वीक्ष्य(तामुद्यतामीक्ष्य) पराद्रवंस्ते स चित्रसेनश्च रथादवप्लुतः ।
भीष्मस्तु पाञ्चालकरूशचेदिष्वहन् सहस्राणि चतुर्दशोग्रः ।
विद्राप्य सर्वामपि पाण्डुसेनां विश्राव्य लोकेषु च कीर्तिमात्मनः ।
द्रोणो विराटस्य पुरो निहत्य शङ्खं सुतं तस्य विजित्य तं च ।
भीमार्जुनावपि शत्रून् निहत्य विद्राप्य सर्वांश्च युधि प्रवीरान् ।
युधिष्ठिरो भीष्मपराक्रमेण भीतो भीष्मं स्ववधोपायमेव ।
भीमार्जुनौ शक्नुवन्तावपि स्म नर्तेऽनुज्ञां हन्तुमिमं समैच्छताम् ।
प्राप्यानुज्ञां भीष्मतस्ते वधाय शिखण्डिनं तद्वचसाऽग्रयायिनम् ।
शिखण्डिनो रक्षकः फल्गुनोऽभूद् भीष्मस्य दुःशासन आस चाग्रे ।
भीष्माय यान्तं युयुधानमाजौ न्यवारयद् राक्षसोऽलम्बुसोऽथ ।
अस्त्रेण मायामपनुद्य वीरो व्यद्रावयद् राक्षसं सात्यकिस्तम् ।
द्रोणो द्रौणिर्धार्तराष्ट्रश्च राजा भूरिश्रवा भगदत्तः कृपश्च ।
स तान् मुहुर्विरथीकृत्य वीरः प्राग्ज्योतिषं सगजं द्रावयित्वा ।
युधिष्ठिरं भीष्ममभिप्रयान्तं माद्रीसुताभ्यां सहितं नृवीरम् ।
तान् सादिनोऽश्वांश्च निहत्य सर्वान् विजित्य तं शकुनिं पाण्डवास्ते ।
धृष्टद्युम्नं भीष्ममभिप्रयान्तं न्यवारयत् सैन्धवस्तं स बाणैः ।
गुप्तोऽथ पार्थेन रणे शिखण्डी भीष्मं समासाद्य शरैरताडयत् ।
शिखण्डिनं वारयामास बाणैर्दुर्मर्षणोऽमर्षणविह्वलेक्षणः ।
स लोकवीरोऽपि दुरात्मनाऽमुना रुद्धोऽशकन्नैनमतीत्य यातुम् ।
अमर्षयुक्तौ चिरमेव वीरावयुद्ध्यतामर्जुनधार्तराष्ट्रौ ।
तदा विराटद्रुपदौ कुन्तिभोजं कृष्णासुतान् केकयांश्चेकितानम् ।
जित्वैव तांस्तेऽभिययुश्च भीष्मं (तदा)ततोऽर्जुनोऽतीत्य दुःशासनं च ।
स तैः समस्तैर्बहुभिश्शस्त्रपूगैर्भृशं मर्मस्वर्दितश्चापमुक्तैः ।
स चेदिपाञ्चालकरूशमुख्यान् रथोदारान् पञ्चविंशत्सहस्रान् ।
निरीक्ष्य तं सूर्यमिवाऽतपन्तं सञ्चोदितो वासुदेवेन पार्थः ।
चिच्छेद तच्चैवमष्टौ धनूंषि शक्तिं च चर्मासिवरं पराणि ।
ततः शरैः सूर्यकरप्रकाशैर्विव्याध सर्वे च युधिष्ठिराद्याः ।
निपापितेऽस्मिन् मारुतिर्द्रोणमुख्यान् विद्राप्य तत्राऽगमदाशु तेऽपि ।
प्रणम्य तं तद्वचनात् समीयुस्तस्मिन् दिने शिबिराण्येव सर्वे ।
स पूर्वदिवसे पार्थदत्तबाणोपबर्हणः ।
धार्तराष्ट्रैरविज्ञातं तदभिज्ञाय(तदाभिज्ञाय) वासविः ।
यादृश्यस्त्रज्ञता पार्थे दृष्टाऽत्र कुरुनन्दनाः ।
यादृशं चैव माहात्म्यमनन्तमजरं हरेः ।
उपारमत तद् युद्धं सुखिनः सन्तु भूमिपाः ।
व्यासदत्तोरुविज्ञानात् सञ्जयादखिलं पिता ।
षड्विंशोऽध्यायः
औं ॥ अथाखिलानां पृथिवीपतीनामाचार्यमग्र्यं रथिनां सुविद्यम् ।
कर्णोऽपि भीष्मानुमतो धनुष्मान् युद्धोद्यतोऽभूत् तदसत्कृतः पुरा ।
द्रोणो वृतो धार्तराष्ट्रेण धर्मसुतग्रहे तेन कृते प्रतिश्रवे ।
पतत्रिभिस्तत्र दुधाव शात्रवान् द्रोणो धनुर्मण्डलमन्त्रनिस्सृतैः ।
स तान् विधूयाभ्यपतद् रणेऽग्रणीर्द्रोणं तमन्वार्जुनिरभ्ययात् परान् ।
उभावजेयौ गदिनामनुत्तमावतुल्यवीर्यौ प्रवरौ बलीयसाम् ।
गदाभिघातेन वृकोदरस्य विचेतनः प्रापतदत्र मद्रराट् ।
विचेतनं पतितं मद्रराजं विलोक्य भीमं च तमाह्वयन्तम् ।
विजित्य मद्राधिपमोजसाऽरिहा नदन् रथं प्राप्य निजं स मारुतिः ।
विद्रावयत्याशु कुरून् वृकोदरे विधूय सौभद्रमुखान् ससात्यकीन् ।
स वासुदेवप्रयते रथे स्थितः शरैः शरीरान्तकरैः समन्ततः ।
निहन्यमानासु किरीटिना चमूष्वारक्षिते धर्मसुते तथाऽपदः ।
स धार्तराष्ट्रेण युधिष्ठिराग्रहात् संश्रावितः क्रूरवचो निशायाम् ।
ततः सुशर्मा सहितो महारथैः संशप्तकैर्दूरतरं प्रणेतुम् ।
समाह्वयामासुरथार्जुनं ते प्रातर्हुताशस्य दिशं रणाय ।
निहन्यमानेषु गजेषु (सङ्घशो)सर्वशो विद्राप्यमाणेष्वखिलेषु राजसु ।
विभीषिताः सुप्रतीकेन भीमहया न तस्थुस्तदनु स्म सात्यकिः ।
शैनेयपूर्वेषु रथोज्झितेषु भूमाववप्लुत्य कथञ्चिदेव ।
सङ्क्लेशितो वैष्णवास्त्रं (विमुञ्चेत्) प्रमुञ्चेत् प्राग्ज्योतिषो भीमसेने ततोऽहम् ।
इति स्म सञ्चिन्त्य सहार्जुनेन तत्राऽययावथ पार्थं त्रिगर्ताः ।
तदस्त्रवीर्येण विमोहितास्ते परस्परं कृष्णपार्थाविति स्म ।
विसृज्यं भीमं स च पार्थमेव ययौ गजस्कन्धगतो गजं तम् ।
मनोजवेनैव रथे परेण(वरेण) सम्भ्राम्यमाणे नतु तं गजः सः ।
अस्त्रैश्च शस्त्रैः सुचिरं नृवीरावयुद्ध्यतां तौ बलिनां प्रबर्हौ ।
तस्मिन्नस्त्रे तेन तदा प्रमुक्ते(प्रयुक्ते, प्रदत्ते) दधार तद् वासुदेवोऽमितौजाः ।
दृष्ट्वैव तद् धारितमच्युतेन पार्थः किमर्थं विधृतं त्वयेति ।
न मादृशोऽन्योऽस्ति कुतः परो मत् सोऽहं चतुर्धा जगतो हिताय ।
स एव च क्रोडतनुः पुराऽहं भूमिप्रियार्थं नरकाय चादाम् ।
अस्त्रस्य चान्यो नतु कश्चिदस्ति योऽवध्य एतस्य कुतश्च मत्तः ।
इत्युक्तमाकर्ण्य स केशवेन सम्मन्त्र्य बाणं हृदये मुमोच ।
उभौ च तौ पेततुरद्रिसन्निभौ महेन्द्रवज्राभिहताविवाऽशु ।
अथाचलं वृषकं चैव हत्वा कनीयसौ शकुनेस्तं च बाणैः ।
स नष्टमायः प्राद्रवत् पापकर्मा ततः पार्थः शरपूगैश्चमूं ताम् ।
तदा भीमस्तस्य निहत्य वाहान् व्यद्रावयद् धार्तराष्ट्रीं चमूं च ।
प्राग्ज्योतिषे निहतेऽथाग्रहाच्च युधिष्ठिरस्यातिविषण्णरूपः ।
पार्थे गते श्वो नृपतिं ग्रहीष्ये निहन्मि वा तत्सदृशं तदीयम् ।
पद्मव्यूहं व्यूह्य परैरभेद्यं वराद् विष्णोस्तस्य मन्त्रं ह्यजप्त्वा(जपित्वा) ।
पार्था व्यूहं तु तं प्राप्य नाशकन् भेत्तुमुद्यताः ।
भीमो युधिष्ठिरस्तत्र तज्ज्ञं सौभद्रमब्रवीत् ।
स एवमुक्तो रथिनां प्रबर्हो विवेश भित्त्वा द्विषतां चमूं ताम् ।
वरेण रुद्रस्य निरुद्ध्यमानो जयद्रथेनात्र वृकोदरस्तु ।
जयद्रथस्थेन वृषध्वजेन प्रयुद्ध्यमानेषु वृकोदरादिषु ।
स द्रोणदुर्योधनकर्णशल्यैर्द्रोण्यग्रणीभिः कृतवर्मयुक्तैः ।
स लक्षणं राजसुतं प्रसह्य(प्रगृह्य) पितुः समीपेऽनयदाशु मृत्यवे ।
द्रोणादयस्तं हरिकोपभीताः प्रत्यक्षतो हन्तुमशक्नुवन्तः ।
कर्णो धनुस्तस्य कृपश्च सारथिं द्रोणो हयानाशु विधूय सायकैः ।
भीतेषु कृष्णादथ तद्वधाय तेष्वाससादाऽशु गदायुधं गदी ।
तस्मिन् हते शत्रुरवं निशम्य हर्षोद्भवं मारुतिरुग्रविक्रमः ।
व्यासस्तदा तानमितात्मवैभवो युधिष्ठिरादीन् ग्लपितानबोधयत् ।
निशम्य पुत्रस्य वधं भृशार्तः प्रतिश्रवं सोऽथ चकार वीरः ।
स्वयमेवाखिलजगद्रक्षाद्यमितशक्तिमान् ।
ज्ञापयन् फल्गुनस्यास्त्रगुरुं गिरिशमञ्जसा ।
सान्त्वयित्वा सुभद्रां च गत्वोपप्लाव्यमच्युतः ।
श्रुत्वा प्रतिज्ञां पुरुहूतसूनोर्दुर्योधनेनार्थितः सिन्धुराजम् ।
स दिव्यमग्र्यं शकटाब्जचक्रं कृत्वा स्वयं व्यूहमुखे व्यवस्थितः ।
अथार्जुनो दिव्यरथोपरिस्थितः सुरक्षितः(संरक्षितः) केशवेनाव्ययेन ।
प्रदक्षिणीकृत्य तमाश्वगात् ततः कालात्ययं त्वेव विशङ्कमानः ।
विजित्य हार्दिक्यमथाप्रयत्नः स इन्द्रसूनुः प्रविवेश तद् बलम् ।
स उच्चकाशेऽतिरथो रथोत्तमे सवासुदेवो हरिणा यथेन्द्रः ।
दृढायुमच्युतायुं च हत्वा विन्दानुविन्दकौ ।
सुदक्षिणं च काम्बोजं(काम्भोजं) निहत्याम्बष्ठमेव च ।
स तु तेन शरैस्तीक्ष्णैरर्पितो विरथं क्षणात् ।
गदां चिक्षेप सा तस्य वारुणेः शिर एव तु ।
अयुद्ध्यन्तं स्वगदया यदि ताडयसि स्वयम् ।
इत्यब्रवीत् तं वरुणः पुरा तेन स केशवे ।
हतेषु वीरेषु निजेषु सङ्घशो विद्रावितेष्वालुलिते च सैन्ये ।
इतीरितेऽभेद्यममुष्य वर्म बद्ध्वा महामन्त्रबलात् स विप्रः ।
इतीरितो धार्तराष्ट्रः स चापमादाय सौवर्णरथोपरिस्थः ।
विव्याध पार्थोऽपि तमुग्रवेगैः शरैर्न ते तस्य च वर्मभेदम् (वर्मभेदनम्)।
सन्धीयमानं तु गुरोः सुतस्तच्चिच्छेद पार्थोऽथ सुयोधनाश्वान् ।
स द्रौणिकर्णप्रमुखैर्धनञ्जयो युयोध ते चैनमवारयञ्छरैः ।
पार्थे प्रविष्टे कुरुसैन्यमध्यं द्रोणोऽविशत् पाण्डवसैन्यमाशु ।
स वीरवर्यः स्थविरोऽपि यूनां युवेव मध्ये प्रचचार धन्विनाम् ।
नृपग्रहेच्छुं तमवेत्य सत्यजिन्न्यवारयद् द्रौपदिराशु वीर्यवान् ।
निहत्य तं वीरतमं रणोत्कटं युधिष्ठिरं बाणगणैः समर्दयत् ।
स ऊर्ध्वबाहुर्भुवि संस्थितोऽपि गृहीतुमाजौ गुरुणाऽभिपन्नः ।
द्रोणं ततः शैशुपालिः सपुत्रो जारासन्धिः काशिराजः सशैव्यः ।
स तान् क्रमेणैव निकृत्तकन्धराञ्छरोत्तमैस्तत्र विधाय विप्रः ।
विधूयमाने गुरुणोरुसैन्ये पृथासुतानां पृतनाः परेषाम् ।
अलम्बुसो नाम तदैव राक्षसः समासदन्मारुतिमुग्रपौरुषम् ।
सोऽदृश्यरूपोऽनुचरानपीडयद् भीमस्य तद् वीक्ष्य चुकोप मारुतिः ।
त्वाष्ट्रास्त्रमादत्त स काम्यकर्महीनोऽपि भीमस्तत उत्थिताः शराः ।
तद्धन्यमानं प्रविहाय भीममपाद्रवद् दूरतरं सुभीतम् ।
तदैव कृष्णातनयाः समेता जघ्नुः शलं संयति सौमदत्तिम् ।
घटोत्कचस्तं विरथं विधाय खस्थं ख एवाभियुयोध संस्थितः ।
पदा शिरस्येव स पिष्टमस्तको ममार मध्ये पृथिवीपतीनाम् ।
तदाऽऽसदत् कृतवर्मा रथेन सेनां पाण्डूनां शरवर्षं प्रमुञ्चन् ।
स तेन पाञ्चालगणान् विजिग्ये यमौ च भीमस्य पुरोऽथ तं च ।
विनैव वृष्णीन् विजये वरो यदमुष्य तेनास्य हयान् स सात्यकिः ।
तदा हरिः पाञ्चजन्यं सुघोषमापूरयामास जयेऽभियुद्ध्यति ।
स पाञ्चजन्योऽच्युतवक्त्रवायुना भृशं सुपूर्णोदरनिस्सृतध्वनिः ।
गाण्डीवघोषे च तदाऽभिभूते युधिष्ठिरो भीतभीतस्तदैत्य ।
न श्रूयते गाण्डीवस्याद्य घोषः संश्रूयते पाञ्चजन्यस्य घोषः ।
इतीरितः सात्यकिरत्र विप्रान् सम्पूज्य वित्तैः परमाशिषश्च ।
भीमस्तु सेनामुखमाशु भित्त्वा प्रावेशयद् युयुधानं चमूं ताम् ।
बलं विवृद्धं च तदाऽस्य सात्यकेर्विप्राशीर्भिः कृष्णवरादपि स्म ।
तदा (ततो) विवृद्धोरुबलात् स सात्यकिः संस्थाप्य भीमं प्रययौ रथेन ।
तयोरभूद् युद्धमतीव दारुणं तत्राकरोत् तं विरथं स सात्यकिः ।
निवारयन्तं तमसह्यविक्रमं निहत्य बाणैः समरे स सात्यकिः ।
स पार्वतेयांश्च(स पार्वतीयांश्च) शिलाभिवर्षिणो निहत्य विद्राव्य च सर्वसैनिकान् ।
तयोरभूद् युद्धमतीव घोरं चिरं विचित्रं च महद् विभीषणम् ।
स सौमदत्तिर्भुवि सात्यकिं रणे निपात्य केशेषु च सम्प्रगृह्य ।
तद् वासुदेवस्तु निरीक्ष्य विश्वतश्चक्षुर्जगादाऽशु धनञ्जयं रणे ।
स तेन चोत्कृत्तसखड्गबाहुर्विनिन्द्य पार्थं निषसाद भूमौ ।
गतेऽसुरावेश उतातिभक्त्या ध्यायत्यमुष्मिन् गरुडध्वजं तम् ।
तदा स्वकीयं रथमेतदर्थं क्लृप्तं ददौ सात्यकये ससूतम् ।
तेनैव तीर्थं परमं चकार तथाऽश्वशालामपि बाणरूपाम् ।
युयोज कृष्णस्तुरगान् रथे पुनर्गतश्रमानुद्धृतसायकान् प्रभुः ।
शिनिप्रवीरे तु गते युधिष्ठिरः पुनश्च चिन्ताकुलितो बभूव ह ।
मया नियुक्तश्च गतः स सात्यकिर्भारं च तस्याधिकमेव मन्ये ।
इतीरितः प्राह वृकोदरस्तं न रक्षितं वासुदेवेन पार्थम् ।
अतो भयं नास्ति धनञ्जयस्य न सात्यकेश्चैव हरेः प्रसादात् ।
इतीरितः प्राह युधिष्ठिरस्तं न जीवमाने युधि मां घटोत्कचे ।
यदि प्रियं कर्तुमिहेच्छसि त्वं मम प्रयाह्याशु च पार्थसात्यकी ।
तथा हते चैव जयद्रथे मे कुरुष्व सञ्ज्ञामिति तेन भीमः ।
स चाऽह सेनापतिरत्र भीमं प्रयाहि तौ यत्र च केशवार्जुनौ ।
इति ब्रुवाणं (ब्रुवाणे) प्रणिधाय भीमः पुनः पुनस्तं नृपतिं गदाधरः ।
न्यवारयत् तं शरवर्षधारो द्रोणो वचश्चेदमुवाच भीमम् ।
स्वीया प्रतिज्ञाऽपि हि सैन्धवस्य गुप्तौ मया पार्थकृते विसृष्टा ।
इत्युक्तवाक्यः स गदां समाददे चिक्षेप तां द्रोणरथाय भीमः ।
अमार्दवे पश्य च यादृशं बलं ममेति तस्याऽशु विचूर्णितो रथः ।
द्रोणो गदामापततीं निरीक्ष्य त्ववप्लुतो लाघवतो धरातले ।
शरैस्तदीयैः परमास्त्रमन्त्रितैः प्रवृष्यमाणो जगदीरणात्मजः ।
मनोजवादेव तमाप्य भीमो रथं गृहीत्वाऽम्बर आक्षिपत् क्षणात् ।
सवाजिसूतः स रथः क्षितौ (पतद्विचूर्णितः)पतन् विचूर्णितोऽस्माद् गुरुरप्यवप्लुतः ।
द्रोणोऽपि दुर्योधनदत्तमन्यद् रथं समास्थाय युधिष्ठिरं ययौ ।
विदारितां द्रोणशरैः स्वसेनां संस्थाप्य(संस्थाप्य भीमो) भूयो द्रुपदात्मजः शरैः ।
तयोरभूद् युद्धमतीव रौद्रं जयैषिणोः पाण्डवधार्तराष्ट्रयोः ।
ततः प्रायाद् भीमसेनोऽमितौजा मृत्नञ्छरैः कौरवराजसेनाम् ।
हतेषु तेषु प्रवरेषु धन्विनां सत्यव्रतः पुरमित्रो जयश्च ।
स तैः पृषत्कैरवकीर्यमाणः शितान् विपाठान्(सितान् विपाटान्) युगपत् समाददे ।
स सिंहवत् क्षुद्रमृगान् समन्ततो विद्राप्य शत्रून् हृदिकात्मजं रणे ।
विजित्य हार्दिक्यमथाऽशु भीमो विद्रावयामास वरूथिनीं ताम् ।
दृष्ट्वैव कृष्णविजयौ परमप्रहृष्टस्ताभ्यां निरीक्षित उत प्रतिभाषितश्च ।
भीमस्य नानदत एव महास्वनेन विण्मूत्रशोणितमथो मृतिमापुरेके ।
हत्वा विकर्णमुत तत्र च चित्रसेनं सञ्चूर्णितं प्रविदधे (सञ्चूर्णितं च विदधे) रथमर्कसूनोः ।
आश्वास्य चैव सुचिरं पुनरेव भीमं युद्धाय याति धृतराष्ट्रसुतैस्तथाऽन्यैः ।
विकर्णचित्रसेनाद्या एवं वीरतमाः सुताः ।
निपेतुर्धृतराष्ट्रस्य रथेभ्यः पृथिवीतले ।
एकविंशतिवारं च व्यश्वसूतरथध्वजः ।
प्राणसंशयमापन्नः सर्वलोकस्य पश्यतः ।
द्वाविंशतिमयुद्धे तु रामदत्तं सुभास्वरम् ।
तद्दत्तमेव सङ्गृह्य तूणौ (तूणी) चाक्षयसायकौ ।
सुघोर आसीत् स तयोर्विमर्दो भीमस्य कर्णस्य च दीर्घकालम् ।
ततो भीमो महाबाहुः सहजाभ्यां च संयुतम् ।
इति ज्ञापयितुं तस्य कुण्डले कवचं तथा ।
एवं तान्यपकृष्याहं हन्यां त्वामिति वेदयन् ।
ततस्तु भीमस्य बभूव बुद्धिरस्पर्धिनः सर्वजयो हि दत्तः ।
तथाऽपि मे भगवानत्यनुग्रहाज्जयं ददात्यात्मवचो विहाय (वचोऽपहाय) ।
एवं स्मृत्वा तेन रन्ध्रे प्रदत्ते कर्णोऽस्त्रवीर्येण धनुर्न्यकृन्तत् ।
न मे रथाद्यैर्धनुषाऽपि कार्यमित्येव सञ्ज्ञापयितुं (स ख्यापयितुं) वृकोदरः ।
भीतस्तु(भीमस्तु) कर्णो रथकूबरे तदा व्यलीयताधः (व्यलीयतातः) स वृकोदरो रथात् ।
नैच्छद् गृहीतुं(ग्रहीतुं) विनिहन्तुमेव वा रथं धनुर्वाऽस्य रणेऽपहर्तुम् ।
सत्यां कर्तुं वासवेश्च प्रतिज्ञां सम्मानयन् वैष्णवत्वाच्च कर्णम् ।
ततः कर्णो दूरगतं वृकोदरं सम्मानयन्तं रामवाक्यं विजानन् ।
व्यसून् गजान् प्रक्षिपन्तं समेत्य संस्पृश्य चापेन वचश्च दुष्टम् ।
संश्रावयन्तं वचनानि रूक्षाण्यपाहनद् बाणवरैस्तदाऽर्जुनः(बाणगणैस्तदा) ।
कर्णो भीमे वासवीं नैव शक्तिं विमोक्तुमैच्छन्नैव बीभत्सुतोऽन्यान् ।
नारायणास्त्रं शिरसि प्रपातितं न यस्य लोमाप्यदहच्चिरस्थितम्(लोमाप्यदहरच्छिरःस्थितम्) ।
भीमः कर्णरथं प्राप्तः शक्तिं नाऽदातुमैच्छत ।
दिव्यं रथं धनुश्चैव कृष्णबुद्ध्योऽर्जुनो हरेत् ।
एकं हृतं चेदन्यत् स्यादिति मत्वा भयाकुलः ।
निश्चितो मरणायैव मृतिकाले तु तं रथम् ।
शक्तिं तु तद्रथगतां प्रसमीक्ष्य कृष्णः संस्थाप्य पार्थमपि सात्यकिमेव योद्धुम् ।
शिष्यं त्वशक्तमिह मे प्रतियोधनाय पार्थो ह्यदादिति स सात्यकिमीक्षमाणः ।
न केशवरथे कश्चित् स्थितो याति पराजयम् ।
शस्त्रसङ्ग्रहकाले तु कुमाराणां व्रतं भवेत् ।
तच्छत्रुवधरूपं च पूर्वासिद्धं च गूहितम् ।
अनुपद्रवाय (अनुपद्रवं च) लोकस्येत्यतो भीमो व्रतं त्विदम् ।
अनुपद्रवाय लोकस्य सुव्यञ्जच्श्मश्रुमण्डलः(सुव्यक्तश्मश्रुमण्डलः) ।
अर्जुनस्यापि गाण्डीवं देहीत्युक्तो(देहीत्युक्ते) निहन्म्यहम्(निहन्मितम्) ।
प्रतिज्ञां भीमसेनस्य ब्रुवतः फल्गुने(फाल्गुने) रहः ।
अतूबरोऽपि तेनासौ तस्मात् तूबर इत्यलम् ।
जानासि मत्प्रतिज्ञां त्वं त्वत्प्रतिज्ञामहं तथा ।
प्रतिज्ञातो वधश्चास्य त्वयाऽपि मदनुज्ञया ।
इत्युक्तो वासविः प्राह हन्तव्योऽयं मयैव हि ।
न त्वत्कृतं मत्कृतं स्याद् गुरुर्मम यतो भवान् ।
रूक्षा वाचः श्रावितोऽयं भीमः कृष्णस्य शृण्वतः ।
अतस्त्वां निहनिष्यामि त्वत्पुत्रं च तवाग्रतः ।
द्रौणिकर्णाभिगुप्तं तं नाशकद्धन्तुमर्जुनः ।
नचैनमशकत् तर्तुं यत्नवानपि फल्गुनः ।
तद् दृष्ट्वा भगवान् कृष्णो लोहितायति भास्करे ।
तमोव्याप्ते गगने सूर्यमस्तं गतं मत्वा द्रौणिपूर्वाः समस्ताः ।
तदा हरेराज्ञया शक्रसूनुश्चकर्त बाणेन जयद्रथस्य ।
नैतच्छिरः पातय भूतले त्वमितीरितः पाशुपतास्त्रतेजसा ।
इदं पितुस्तस्य करे निपात्यतां वरोऽस्य दत्तो हि पुराऽमुनाऽयम्(यत्) ।
इति स्म वध्यः स पिताऽपि(वध्योऽस्य पिताऽपि) तेनेत्युदीरिते तस्य सन्ध्याक्रियस्य ।
ततोऽभवत् तस्य शिरः सहस्रधा हरिश्च चक्रे तमसो लयं पुनः ।
भीमस्तदा शल्यसुयोधनादीन् कृपं च जित्वा व्यनदत् सुभैरवम् ।
अपूरयत् पाञ्चजन्यं च कृष्णो मुदा तदा देवदत्तं च पार्थः ।
ततो द्रौणिमुखां(द्रौणिमुखान्) सेनां सर्वां भीमोऽभ्यवर्तत।
शीर्णां सेनां प्रविविशुर्धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।
तत एकीकृताः सर्वे पाण्डवाः सहसोमकाः ।
विद्राप्यमाणं सैन्यं तं दृष्ट्वा दुर्योधनो नृपः ।
स भीमसेनं च धनञ्जयं च युधिष्ठिरं माद्रवतीसुतौ च ।
ते विव्यधुस्तं बहुभिः शिलीमुखैः(शिलीमुखान्) स ताननादृत्य चकर्त बाणैः ।
आदाय चापानि पराणि तेऽपि दुर्योधनं ववृषुः सायकौघैः ।
तं गाहमानं द्विषतां बहूनां मध्ये द्रोणद्रौणिकृपप्रधानाः ।
सुयोधनः कर्णमाह जहि भीममिमं युधि ।
दैवाज्जीवाम्यहं राजन् युध्यंस्तेनातिपीडितः ।
दुर्योधनो द्रोणमाह सैन्धवस्त्वदुपेक्षया ।
प्रतिज्ञा च परित्यक्ता पाण्डवस्नेहतस्त्वया ।
इतः परं नैव रणाद् रात्रावहनि वा क्वचित् ।
मत्पुत्रश्च त्वया वाच्यः पाञ्चालान् नैव शेषय (शेषयेत्, शेषयेः) ।
चमूं परेषामभ्यागाद् धृष्टद्युम्नस्तमाशु च ।
अक्षोहिण्यस्तु सप्तैव सेनयोरुभयोरपि ।
सौभद्रसात्यकिमुखैस्तन्मध्ये षोडशांशकः(षोडशांसकैः) ।
भीष्मद्रोणद्रौणिभिश्च द्वे समं निहते तदा ।
ततो रात्रौ पञ्चभिश्च पार्थाः षड्भिश्च कौरवाः ।
स कर्णपुरतो भीमो दुष्कर्णं कर्णमेव च ।
निरायुधोऽहमिति मां त्वमात्थ पुरुषं वचः ।
इति कर्णस्य तौ भीमः सञ्ज्ञया ज्ञापयन् भुवि ।
मुष्टिना त्वद्वधायाहं समर्थ इति किं वदे ।
केतुमांश्च पिता तस्य शक्रदेवः श्रुतायुधः ।
कर्णानुजान् ध्रुवाद्यांश्च बहून् जघ्ने स वै निशि ।
इति ज्ञापयितुं तां तु ज्ञात्वा भीमः क्षणात् तदा ।
यदि त्वया तदा मुक्ता शक्तिस्त्वां सा हनिष्यति ।
मुक्ता दक्षभुजे सा च(सोऽथ) विदार्य धरणीं तथा(तदा) ।
ततो भीमः पुनः स्वं तु रथमास्थाय चापभृत् ।
तं कर्णो वारयामास शरैः सन्नतपर्वभिः ।
स तद्गदाविघाताय स्थूणाकर्णास्त्रमासृजत् ।
भीमो गदां समादाय कर्णस्य रथमारुहत् ।
एवं त्वच्चूर्णने शक्तो मत्कामात् त्वं हि जीवसि ।
पुनः कर्णपुरः सेनां जघान बहुशो रणे ।
स तु तं विरथीकृत्य धनुः कण्ठेऽवसज्य च ।
न हन्तुमैच्छत् तं कर्णः पृथायै स्वं वचः स्मरन् ।
ततो द्रौणिर्विविधैर्बाणसङ्घैर्जघान पार्थस्य चमूं समन्ततः ।
दृष्ट्वा सेनां द्रौणिबलाभिभूतां तमाह्वयामास घटोत्कचो युधे(युधि) ।
इत्युक्त ऊचे न पिता मम त्वं सखा पितुर्यद्यपि शत्रुसंश्रयात् ।
इत्यूचिवाञ्छक्रधनुःप्रकाशं विष्फार्य चापं प्रकिरञ्छरौघान् ।
स रक्षसां लक्षसमावृतो बली नृभिश्च वीरैर्बहुभिः सुशिक्षितैः ।
स तेन बाणैर्बहुभिः सुपीडितो विभिन्नगात्रः क्षतजाप्लुताङ्गः(क्षतजाभिप्लुताङ्गः) ।
सोऽक्षौहिणीं तां(अक्षौहिणीं तां) क्षणमात्रतः क्षरन् महाशरांस्तानपि राक्षसान् क्षयम् ।
निरीक्ष्य सेनां स्वसुतं च पातितं घटोत्कचो द्रोणसुतं शरेण ।
उत्थाय बाणं यमदण्डकल्पं सन्धाय चापे प्रविकृष्य राक्षसे ।
विमूर्च्छितं सारथिरस्य दूरं निनाय युद्धाज्जगतो विपश्यतः ।
सञ्ज्ञामवाप्याथ घटोत्कचोऽपि क्रुद्धोऽविशत् कौरवसैन्यमाशु ।
तदैव पार्थं प्रति योद्धुमागतं वैकर्तनं वीक्ष्य जगत्पतिर्हरिः ।
स कर्णमाहूय युयोध तेन तस्यानु दुर्योधनपूर्वकाश्च ये ।
ते बाध्यमाना बहुशो बलीयसा कर्णं पुरोधाय तमभ्ययोधयन् ।
निवारयामास गुरोः सुतं तदा भीमस्त्रिगर्ताञ्छतमन्युनन्दनः ।
युद्ध्वा प्रगृह्यैनमथो निपात्य घटोत्कचो भूमितलेऽसिनाऽस्य ।
अलायुधोऽथाऽगमदुग्रवीर्यो नराशनस्तं स घटोत्कचोऽभ्ययात् ।
अथास्य शिर उद्धृत्य क्रोधाद् दुर्योधनोरसि ।
घटोत्कचबलख्यात्यै समर्थेनापि यो रणे ।
सर्वे सञ्चोदयामासुः(सम्बोधयामासुः) कर्णं शक्तिविमोक्षणे ।
एवं सञ्चोद्यमानः(सम्बोध्यमानः) स धार्तराष्ट्रैः पुनः पुनः ।
तामम्बरस्थाय घटोत्कचाय शैलोपमायातुलविक्रमाय ।
निर्भिण्णवक्षाः(निर्भिन्नवक्षाः) स तया पपात व्यचूर्णयञ्छत्रुबलं हतोऽपि ।
तदा ननर्त केशवः समाश्लिषच्च फल्गुनम् ।
तमपृच्छद् गुडाकेशः किमेतदिति दुर्मनाः ।
तमाह भगवान् कृष्णो दिष्ट्या जीवसि फल्गुन ।
ततो युधिष्ठिरो दुःखादमर्षाच्चाभ्यवर्तत ।
ययाऽर्जुनो निहन्तव्यस्तयाऽसौ राक्षसो हतः ।
भीमार्जुनाभ्यामिह हन्यमाने बले कुरूणामितरैश्च पाण्डवैः ।
दृष्ट्वैव तानाह धनञ्जयस्तदा स्वप्स्यन्तु यावच्छशिनः प्रकाशः ।
पुनश्च चन्द्रेऽभ्युदिते युधे ते समाययुः शस्त्रमहास्त्रवर्षाः ।
हतौ च तौ पेततुस्तेन भूमौ बाह्लीक एनं समरे त्वयोधयत् ।
चिच्छेद तं भीमसेनस्त्रिधैव तस्मै(तस्मिञ्छतघ्नीं) शतघ्नीं प्रजहार बाह्लिकः ।
बाह्लीकः प्रार्थयामास पूर्वं स्नेहपुरस्सरम् ।
इत्युक्त आह तं भीमो नितरां व्यथितस्तदा ।
हते बाह्लीके कौरवा भीमसेनमभ्याजग्मुः कर्णदुर्योधनाद्याः(कर्णसुयोधनाद्याः) ।
संशप्तकैरेव पार्थो युयोध तद् युद्धमासीदतिरौद्रमद्भुतम् ।
ततः सूर्यश्चाभ्युदितस्तदाऽतिघोरं द्रोणः कर्म युद्धे चकार ।
विद्रावितास्तेन महारथाश्च नैवाविन्दञ्छर्म बाणान्धकारे ।
रथार्बुदं तेन हतं च तत्र ततः सहस्रं(तथा सहस्रं) गुणितं नराणाम् ।
तथा विराटद्रुपदौ शराभ्यां निनाय लोकं परमाजिमध्ये ।
धृष्टद्युम्नो भीमसेनाभिगुप्तो द्रोणं हन्तुं यत्नमुच्चैश्चकार ।
धृष्टद्युम्नः सत्वरं खड्गचर्मणी आदाय तस्याऽरुरुहे रथोत्तमम् ।
स तैरतिव्यथितस्तद्रथाच्च परावृत्तः स्वं रथं चारुरोह ।
निवार्य शत्रुं स शरैर्ब्रह्मास्त्रमसृजद् द्विजः ।
भीमोऽर्जुनः सात्यकिश्च पर्यायेण गुरोः सुतम् ।
कर्णदुर्योधनादींश्च शल्यं भोजं कृपं तथा ।
तत्र भीमो गजानीकं जयत्सेनं च मागधम् ।
अथ मालवराजस्य त्वश्वत्थामाभिधं गजम् ।
अश्वत्थामवधं श्रुत्वा नाहं योत्स्य इति स्वयम् ।
ब्रूहि सत्यमिति प्राह सत्यमित्येव सोऽब्रवीत् ।
तस्य भीमो रथेषां(रथेषुं) च गृहीत्वा न तवेदृशम् ।
इत्याह खस्था मुनयश्चालमेहीति तं तदा ।
सन्यस्य कर्माणि तदाऽखिलानि योगारूढः परमं वासुदेवम् ।
धृष्टद्युम्नः पाण्डवैर्वार्यमाणोऽप्यगात् खड्गं चर्म चाऽदाय तत्र ।
सञ्छिन्ने द्रोणशिरसि गर्हयामास वासविः ।
धृष्टद्युम्नस्तु तावाह कथं भूरिश्रवा हतः ।
तदा जग्राह शैनेयं भीमः कृष्णप्रचोदितः ।
ते वासुदेवेन तदा सुशिक्षिताः (तदाऽनुशिक्षिताः) स्नेहं पुनः पूर्ववदापुरुत्तमम् ।
आश्रुत्य तातं निहतं प्रतिज्ञां चकार निःशेषरिपुप्रमाथने ।
युधिष्ठिरः प्राह विषण्णचेतनः शैनेयपूर्वाः प्रतियान्तु सर्वे ।
नमध्वमस्त्रस्य ततो विमोक्ष्यथेत्यथ प्रणेमुश्च धनञ्जयादिकाः ।
अदह्यमाने भीमेऽपि वह्नौ वह्निरिव स्थिते ।
न देहे पतितास्त्रस्य बहिर्वेष्टनतः फलम् ।
अमोघत्वं निजास्त्रस्य भीमस्यावध्यतामपि ।
वेष्टितं वारुणास्त्रेण प्रविष्टं बाह्यतस्तदा ।
तदस्त्रं नादहत् ताभ्यां स्वरथादवरोपिते ।
शुद्धक्षत्रियधर्मेषु निरतो यद् वृकोदरः ।
स्वधर्महानौ मित्राणां कर्तव्यं यन्निषेधनम् ।
नमस्कार्यमपि ह्यस्त्रं न नम्यं जीवनेच्छया ।
अस्त्राभिमानी वायुर्हि देवताऽस्य हरिः स्वयम् ।
मनसैवाऽदरं चक्रे भीमोऽस्त्रे च हरौ तदा ।
वासुदेवः स्वकीयास्त्रं भीमं चामोघमेव तु ।
पुनः प्रयोक्तुमस्त्रं तत् (प्रयोक्तमस्त्रं तं) धार्तराष्ट्रोऽभ्यचोदयत्(अभ्ययाचत) ।
आयान्तमीक्ष्यैव गुरोः सुतं तं धृष्टद्युम्नं सात्यकिरन्वयाद् रणे ।
भीमस्याभ्यागतस्याश्वान् द्रौणिर्व्यद्रावयद् रणे ।
ततोऽर्जुनस्तं प्रतियोद्धुमागमद् रुक्षा वाचः श्रावयन् क्रुद्धरूपः ।
अक्षोहिणी निहता चात्र सेना पार्थं सयानं हरिरुज्जहार ।
मा याहि साक्षाद् गिरिशः सुराणां कार्याय भूमौ बलवानजायथाः ।
तथोदितः प्रातरिति ब्रुवाणो ययौ प्रणम्याखिलवेदयोनिम् ।
पार्थाश्च सर्वे मुदिता जनार्दनं परं स्तुवन्तः शिबिराय जग्मुः ।
सप्तविंशोऽध्यायः
ओं ॥ अथानुज्ञामुपादाय द्रौणेर्दुर्योधनो नृपः ।
तत्राभवद् युद्धमतीव दारुणं पाण्डोः सुतानां धृतराष्ट्रजैर्गजे ।
तं कालयन्तं नृपतीन् क्षेमधूर्तिरभ्यागमत् तस्य गजं जघान च ।
निहत्य तं मारुतिरभ्यकृन्तच्छिरांसि यूनां परपक्षपातिनाम् ।
सङ्क्षोभ्यमाणं तदनीकमीक्ष्य द्रौणी रथेन प्रतिजग्मिवांस्तम् ।
दृष्ट्वैव तद् देवगन्धर्वविप्रा ऊचुर्नेदृग् दृष्टपूर्वं सुयुद्धम् ।
नैतादृशी ज्ञानसम्पद् बलं वा द्वयं कुतो वायुमृते शिवं तथा ।
इतीर्यमाणे विबुधैर्नरोत्तमौ दिशः समस्ता गगनं च पत्रिभिः ।
शरासने मारुतिना निराकृतो द्रौणिर्महास्त्राणि मुमोच तस्मिन् ।
पुनः शरैरेव परस्परं तावयुद्ध्यतां चित्रमलं च सुष्ठु ।
भीमश्च विह्वलतनुः स तु किञ्चिदेव पूर्वं गते गुरुसुते प्रययौ क्षणेन ।
तस्मिन् गजान् मर्दयति धार्तराष्ट्रो युधिष्ठिरम् ।
तत्र तं विरथं चक्रे सहसैव युधिष्ठिरः ।
दृष्ट्वा कृपस्तं स्वरथमारोप्यापययौ ततः ।
नकुलं विरथं कृत्वा कर्णोऽथ प्रपलायिनम्(प्रपलायितम्) ।
उक्त्वा च पुरुषा(उवाच परुषा) वाचः कुन्त्या वचनगौरवात् ।
विन्दानुविन्दावथ कैकयौ रणे समासदत् सात्यकिरुग्रविक्रमः ।
ताभ्यां निरुद्धः सहसा जहार तत्रानुविन्दस्य शिरोऽथ विन्दः ।
ततश्च चर्मासिधरौ प्रचेरतुः श्येनौ यथाऽकाशतले कृतश्रमौ ।
तत्रापहस्तेन शिरः सकुण्डलं जहार विन्दस्य मृधे स सात्यकिः ।
कृपमायान्तमीक्ष्यैव तपसां मां प्रपीडयेत् ।
कर्णं समन्तात् प्रतिकालयन्तं वरूथिनीमिन्द्रसुतः समभ्ययात् ।
पराजितः संयति सूर्यसूनुः सुतेन शक्रस्य स धार्तराष्ट्रम् ।
कामं रथो मे धनुरप्यभेद्यं दत्तं भृगूणामधिपेन दिव्यम् ।
इतीरिते सौत्यकृते स शल्यं प्रोवाच स क्रुद्ध इवाभवत् तदा ।
बुद्ध्या बलेन ज्ञानेन धैर्याद्यैरपि योऽधिकः ।
इत्यादिवाक्यैः संशान्त इव शल्योऽस्य सारथिः ।
गच्छन् युद्धाय दर्पेण प्राह यो मेऽर्जुनं पुमान् ।
इति ब्रुवन्तं बहुशः प्राह शल्यः प्रहस्य च ।
काकगोमायुधर्मा त्वं हंससिंहोपमं रणे ।
इत्युक्ते रविजो मद्रान् नितरां पर्यकुत्सयत् ।
कर्णोऽथ शल्यनियतेन रथेन पार्थसेनामवाप्य विदुधाव शरैः समन्तात् ।
तं भीमपार्षतशिनिप्रवराभिगुप्ता सा पाण्डवेयपृतनाऽभिववर्ष बाणैः ।
कृत्वा तमाशु विरथं धनुरस्य कण्ठे सज्यं निधाय परुषा गिर आह चोच्चैः ।
तं प्राणसंशयगतं नृपतिं निरीक्ष्य कर्णं जगाद युधि मद्रपतिः प्रदर्श्य ।
श्रुत्वाऽस्य वाक्यमतिहाय(वाक्यमपहाय) युधिष्ठिरं तं कर्णो ययौ नृपतिरक्षणतत्परोऽलम् ।
राजावनाय शिनिपुङ्गवपार्षतौ च सन्दिश्य कर्णमभिगच्छत आस रूपम् ।
वैकर्तनेन शरसञ्चयताडितः स बाणं च वज्रसदृशं प्रमुमोच तस्मिन् ।
निन्दां हरेस्तु(हरेश्च) विदधाति परोक्षगोऽपि(परोक्षतोऽपि) यस्तं प्रगृह्य करवाणि विजिह्वमेव ।
आयान्तमन्तिकममुं प्रसमीक्ष्य शल्यो नेत्याह हेतुभिरहो न मृषा प्रतिज्ञा ।
इत्युक्त्वा प्रमुखात्(इत्युक्त्वाऽभिमुखात्) तस्य रथेनैव तु मद्रराट् ।
जित्वा सूर्यसुतं भीमः कौरवाणामनीकिनीम् ।
अक्षोहिणीत्रयं तेन तदा विलुलितं क्षणात् ।
विमृद्य सकलां सेनां कृत्वा च विरथं नृपम् ।
तान् भग्नदर्पान् रणतोऽपयातानन्वेव बाणावृतमन्तरिक्षम् ।
क्षत्रियान् परधर्मस्थो मा हिंसीरिति चोदितः ।
संशप्तकैस्तत्र संयुद्ध्यमानं समाह्वयामास सुरेशसूनुम् ।
पार्थः संशप्तकगणैः संसृष्टः समरार्थिभिः ।
उभौ च तावस्त्रविदां प्रधानौ महाबलौ संयति जातदर्पौ ।
द्रौणिस्तदा स्यन्दनवाजिरोमस्वरोमकूपध्वजकार्मुकेभ्यः ।
तस्मिन् निबद्धे हरिरप्रमेयो विबोधयामास सुरेन्द्रसूनुम् ।
निवार्य तान्यस्त्रवरैर्गुरोः सुतश्चिच्छेद च ज्यां युधि गाण्डिवस्य ।
ततः शरेण कुपितः शितेन द्रौणिसारथेः ।
शरान् विसृजता तेन सारथ्यमपि कुर्वता ।
पुनरालिङ्ग्य कृष्णस्तमधाच्छत्रुविघातकम् ।
पुनस्तस्य तुतोद(नुनोद) ज्यां द्रौणिः सन्धाय तां पुनः ।
विरश्मयो हया द्रौणेः पुनः पार्थशराहताः ।
सारथित्वात् केशवस्य ध्वजस्थत्वाद्धनूमतः ।
अवध्यत्वात् तथाऽश्वानामभेद्यत्वाद् रथस्य च ।
एवं स मत्वा प्रविवेश सेनां पाण्डोः सुतानामथ तं समभ्ययात् ।
अष्टावष्टशतान्यूहुः(अष्टावष्टगवान्यूहुः) शकटानि यदायुधम् ।
अथ तं विरथं कृत्वा छित्वा कार्मुकमाहवे ।
अथ विद्रावयामास पृतनां पाण्डवीं शरैः ।
विद्राप्यमाणां पृतनां निरीक्ष्य गुरोः सुतेनाभ्यगमत् त्वरावान् ।
इत्युक्तो दर्शयामास पार्षतः खड्गमुत्तमम् ।
इत्युक्त्वा धनुरादाय ववर्ष च शरान् बहून् ।
स तत्र पार्षतं द्रौणिः क्षणेन विरथायुधम् ।
खड्गेन सोऽस्त्रैशस्त्रैरप्यनिर्भिन्नत्वचं तदा ।
आकृष्यमाणं पार्षतं दृष्ट्वा कृष्णप्रचोदितः ।
स ताभ्यां वज्रसमितैः(वज्रसन्निभैः) शरैरभिहतो भृशम् ।
जगाम च ततोऽन्यत्र पाञ्चाल्योऽपि रथं पुनः ।
तयोरासीत् सुतुमुलं युद्धमद्भुतदर्शनम् ।
अथ दुर्योधनो राजा माद्रेयावभ्ययाद् रथी ।
स्वयं युधिष्ठिरो राजा तदा तं समवारयत् ।
अथाऽगतं सूर्यसुतं पुनश्च जगाम भीमो रभसो(रभसा) रथेन ।
निवार्य कर्णं च शरैरमुष्य सूनोः सुषेणस्य शिरश्चकर्त ।
हतं तमीक्ष्यैव विकर्तनात्मजः क्रोधान्वितो भीमसेनं विहाय ।
न्यवारयेतां शिनिपौत्रपार्षतौ कृष्णासुताः सोमकसङ्घयुक्ताः ।
निहत्य सोऽश्वान् युधि धर्मसूनोर्निरायुधौ तौ च यमौ चकार ।
तदैव मोक्षाय नृपस्य भीमो दुर्योधनं विरथं संविधाय ।
शल्यस्तदा धर्मसुतं विहाय कर्णो ययौ तत्र युधिष्ठिरोऽपि ।
द्रौणिः कृपश्चात्र तदैव जग्मतुस्तदा भीमो द्रौणिकर्णौ जगाम ।
नृपं समादाय कृपेऽपयाते भीमार्दितौ द्रौणिकर्णौ शरौघैः ।
अथात्र राजानमचक्षमाणो धनञ्जयो वासुदेवप्रणुन्नः ।
न्यवारयत् समायान्तं कपिप्रवरकेतनम् ।
उभावतिरथौ तौ तु शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् ।
तत्र दुःशासनेनाऽजौ स्तम्भितो द्रुपदात्मजः ।
तदाऽभवद् युद्धमतीव दारुणं द्रौणेस्तनूजेन तु वज्रपाणेः ।
पार्थोऽथ कृष्णेधितबाहुवीर्यो(कृष्णैधितबाहुवीर्यो) निहत्य सूतं गुरुपुत्रकस्य ।
अतीत्य पुत्रं तु गुरोः समागते पार्थे कर्णो द्रावयामास सेनाम् ।
कर्णमायान्तमालोक्य द्रावयन्तं निजां चमूम् ।
तयोरासीन्महद् युद्धं चिरं सममविश्रमम् ।
निवारितः सात्यकिना रणे दुर्योधनो नृपः ।
तदन्तरैव कर्णोऽपि पार्षताश्वानपातयत्(अश्वानघातयत्) ।
बलं स्वकीयं बहुधा विभिन्नं(विभग्नं) समीक्ष्य भीमो मृगराजकेतुः ।
नादेन बाणैश्च वृकोदरेण भग्नं तदा कौरवसैन्यमाशु ।
दृष्ट्वैव तत् पाण्डवानां च सेना समावृत्ता क्षिप्रमवार्यविक्रमा (समागता क्षिप्रमवार्यवेगा) ।
हन्यमानं दिशो यातं (पाञ्चाल्यैः)पाञ्चालैर्भीमसंश्रयात् ।
सोऽमोघं रामदेवत्यमस्त्रं भार्गवसञ्ज्ञितम् ।
तदस्त्रं वर्जयामास भीमं रामप्रसादतः ।
न ह्यस्त्रं द्रवमाणांस्तद्धन्ति तेन सपार्षताः ।
पलायनेनोर्वरिता अर्जुनोऽप्यस्त्रमुद्यतम् ।
वासुदेवमिदं प्राह वर्जयित्वैव सूतजम् ।
इत्यूचिवांसं पार्थं तं कृष्णोऽप्राप्यैव सूतजम् ।
तत्रार्जुनोऽवदद् भीमं याहि द्रष्टुं युधिष्ठिरम् ।
इत्यूचिवांसं तमुवाच भीमो जानन् स्वबाह्वोर्बलमप्रमेयम् ।
त्यक्त्वा रणं नाहमितो व्रजेयं न मां वदेत् कश्चन युद्धभीतम् ।
ययौ युधिष्ठिरं द्रष्टुं शिबिरं सार्जुनो हरिः ।
अभिवाद्य हनिष्यामीत्युक्तः पार्थेन सा क्रुधा ।
अथवा भीम एवैनं निवृत्ते त्वयि पातयेत् ।
अहं हि सूतपुत्रेण क्लिष्टो मारुतितेजसा ।
तमाह गाण्डिवं दातुं यो वदेत् तद्वधो मया ।
सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् ।
धर्मस्य चरणं(धर्मस्याचरणं) श्रेयो धर्मज्ञानं तु दुष्करम्(सुदुष्करम्) ।
कौशिकाख्यो ब्राह्मणो हि लीनं ग्रामजनं क्वचित् ।
कश्चिद् व्याधो मृगं हत्वा मातापितृनिमित्ततः ।
तस्मात् सद्धारको धर्म इति कृत्वा विनिश्चयम् ।
त्वं नृशंसोऽकृतघ्नश्च निर्वीर्यः पुरुषंवदः ।
भीमो मां गर्हितुं योग्यो यो ह्यस्माकं सदा गतिः ।
इत्याद्युक्त्वाऽऽत्मनाशाय विकोशं चकृवानसिम् ।
मतिपूर्वं देहहानात्(देहनाशात्) पापं महदवाप्यते ।
अतो मा त्यज देहं तु कुरु चाऽत्मप्रशंसनम्(कुरुष्वात्मप्रशंसनम्) ।
गुरुनिन्दाऽऽत्मपूजा च न धर्माय भवेत् क्वचित् ।
तस्य लज्जां समुत्पाद्य नाशयित्वा च तं मदम् ।
इति भावं समुत्पाद्य दोषान् नाशयितुं हरिः ।
तत एवदविज्ञानात् कुपितो नृपतिर्भृशम् ।
तं वासुदेवः प्रतिगृह्य हेतुमुक्त्वा सर्वं शमयामास नेता ।
तौ भ्रातरौ वासुदेवप्रसादान्महापदो मुक्तिमाप्यातिहृष्टौ ।
ततः प्रणम्य बीभत्सुरग्रजं परिरम्भितः ।
तं शङ्कितं कर्णजये स्विन्नगात्रं हरिस्तदा ।
भीमस्तदा शत्रुबलं समस्तं विद्रावयामास जघान चाऽजौ ।
तदाऽऽसदत् तं शकुनिः ससैन्यो दुर्योधनस्यावरजैरुपेतः ।
न जघ्निवांस्तं सहदेवभागं प्रकल्पितं स्वेन तदाऽक्षगोष्ठ्या(तदाऽक्षगोष्ठ्याम्) ।
दुर्योधनस्यावरजा दशात्र प्रदुद्रुवुर्भीमसेनं विहाय ।
पुनश्च निघ्नन्तमरिप्रवीरान् विद्रावयन्तं च निजां वरूथिनीम् ।
तं रूक्षवाचो मुहुरर्पयन्तं विधाय भीमो विरथं क्षणेन ।
आक्रम्य कण्ठं च पदोदरेऽस्य निविश्य पश्यन् मुखमात्तरोषः(मुखमाप्तरोषः) ।
कृत्वाऽस्य वक्षस्युरुसत्तटाकं पपौ निकामं तृषितोऽमृतोपमम् ।
वाक्सायकांश्चास्य पुरा समर्पितान् संस्मारयामास पुनः पुनर्भृशम् ।
तथाऽपि शत्रुप्रतिभीषणाय पपाविवाऽस्वाद्य पुनःपुनर्भृशम् ।
‘यस्ते मन्यो'’ (ऋ.१०.८३.१) इत्यतो नारसिंहं सोमं तस्मै चाऽर्पयच्छोणिताख्यम्(प्रार्पयच्छोणिताख्यम्)।
उवाच वाचं पुरुषप्रवीरः सत्यां प्रतिज्ञां लोकमध्ये विधाय ।
पश्यन्तु चित्रां परमस्य शक्तिं ये वै तिलाः षण्ढतिला बभूवुः ।
इति ब्रुवाणः पुनरेव रक्तं पपौ सुधां देववरो यथा दिवि ।
प्रत्यनृत्यन् येऽस्मान् पुनर्गौरिति गौरिति ।
इति ब्रुवन् नृत्यमानोऽरिमध्य आस्फोटयञ्छत्रुगणानजोहवीत् ।
भयाच्च कर्णस्य पपात कार्मुकं निमीलयामास तदाऽक्षिणी च ।
द्रौणिर्विहायैनमपाजगाम(विहायैतमपाजगाम) दूरं तदा भीमसेनो जगाद ।
इति ब्रुवन् मृतमुत्सृज्य शत्रुं दुर्योधनं चाऽशु रुषाऽभिदुद्रुवे ।
बलद्वयं चापययौ विहाय भयाद् भीमं कृष्णपार्थौ विनैव ।
सङ्कल्प्य शत्रून् गोवदेवाऽजिमध्ये शार्दूलवत् तच्चरितं निशाम्य ।
यदा स रङ्गः पवमानसूनुना शून्यः कृतस्तत्र महूर्तमात्रात् ।
तान् मारुतिर्बाणवरैर्निकृत्तशीर्षान् यमायानयदाशु वीरः ।
कर्माण्यनन्यौपयिकानि(कर्माण्यनन्यौपधिकानि) भीमे कुर्वत्येवं (भीमभीते)भीतभीतेऽरिसङ्घे ।
माद्रीसुतो वृषसेनं शरौघैरवारयत् तं विरथं चकार ।
कर्णात्मजस्तस्य सञ्छिद्य चर्म भीमार्जुनादीनपि बाणसङ्घैः ।
एकेन बाणेन सुते हते स्वे वैकर्तनो वासविमभ्यधावत् ।
पक्षग्रहास्तत्र सुरासुरास्तयोरन्ये च जीवा गगनं समाश्रिताः ।
सुरासुराणां भीमदुर्योधनौ द्वौ समाश्रयौ तत्प्रियौ कर्णपार्थौ ।
इतीरिते वासवः पद्मयोनिं जगाद कृष्णो यत्र जयश्च तत्र ।
इत्यूचिवान् वासवः फल्गुनस्य जयोऽस्तु कर्णस्य वधस्तथेति ।
न कर्णार्जुनयोरर्थे विरोधं कुरुत क्वचित् ।
ववर्षतुस्तौ च महास्त्रशस्त्रैर्भीमो रथस्थोऽवरजं जुगोप ।
दुर्योधनो द्रौणिमुखाश्च कर्णं ररक्षुरावार्य तदाऽऽस युद्धम् ।
तदा नदन् भीमसेनो जगाद गदां समादाय समात्तरोषः ।
समृद्धवीर्यः स तदा धनञ्जयः सुयोधनद्रौणिकृपान् सभोजान् ।
ते किञ्चिद् दूरतस्थुः पश्यन्तो युद्धमुत्तमम् ।
दृष्टं हि भीमस्य बलं त्वयाऽद्य तथैव पार्थस्य यथा जिता वयम् ।
धनञ्जयस्तिष्ठति वारितो मया जनार्दनो नैव विरोधमिच्छति ।
हितार्थमेतत् तव वाक्यमीरितं गृहाण मे नैव भयादुदीरितम् ।
इतीरितः प्राह सुयोधनस्तं दुःशासनस्याद्य पपौ हि शोणितम् ।
इत्युक्तो द्रौणिरासीत् स तूष्णीं कर्णधनञ्जयौ ।
आग्नेयवारुणैन्द्रादीन्येतान्यन्योन्यमृत्यवे ।
क्रमेण वृद्धोरुबलेन तत्र सुरेन्द्रपुत्रेण विरोचनात्मजः ।
तं वासुदेवो रथमानमय्य मोघं चकारार्जुनतः किरीटम् ।
नमिते(नमितं) वासुदेवेन रथे पञ्चाङ्गुलं भुवि ।
भङ्क्त्वा किरीटं वियति गच्छति प्रभुणोदितः ।
ब्रह्मास्त्रस्यातिवेगित्वं प्राप्तं कर्णेन भार्गवात् ॥ १७८॥
पुनश्च पार्थेन महास्त्रयुद्धं प्रकुर्वतः सूर्यसुतस्य चक्रम् ।
उद्धर्तुकामो रथचक्रमेव पार्थं ययाचेऽवसरं प्रदातुम् ।
सत्येन धर्मेण च सन्नियोज्य मुमोच कर्णस्य वधाय बाणम् ।
अपराह्णेऽपराह्णस्य सूतजस्येन्द्रसूनुना ।
तस्मिन् हते दीनमुखः सुयोधनो ययौ समाहृत्य(समागत्य) बलं सशल्यः ।
शशंस कृष्णं च धनञ्जयं च भीमं च येऽन्येऽपि युधि प्रवीराः ।
अष्टाविंशोऽध्यायः
ओं ॥ प्रभातायां तु शर्वर्यां गुरुपुत्रानुमोदितः ।
तमभ्ययुः पाण्डवाश्च हृष्टा युद्धाय दंशिताः (दंसिताः) ।
अग्रे भीमः पाण्डवानां मध्ये राजा युधिष्ठिरः ।
चक्ररक्षौ यमौ राज्ञो धृष्टद्युम्नश्च सात्यकिः ।
मध्ये शल्यः पृष्ठतोऽभूद् भ्रातृभिश्च सुयोधनः ।
तत्रभवन्महद् युद्धं भीमस्य द्रौणिना सह ।
तत्र नातिप्रयत्नेन द्रौणिर्भीमेन सायकैः ।
आससाद तदा शल्यं कपिप्रवरकेतनः ।
रथमन्यं समास्थाय द्रौणिर्भीमं समभ्ययात् ।
तावुभौ शरवर्षेण वारयामास मारुतिः ।
दुर्योधनस्यावरजान् द्रौपदेया युयुत्सुना ।
सहदेवस्तु शकुनिमुलूकं नकुलस्तदा(तथा) ।
शल्यस्तु शरसङ्घातैः पार्थस्यावारयद् दिशः ।
ततः शरं वज्रनिभं मद्रराजः समाददे ।
उपलभ्य पुनः सञ्ज्ञां वासविः शत्रुतापनः ।
सोऽन्यत् कार्मुकमादाय मुमोचास्त्राणि फल्गुने ।
पुनर्न्यकृन्तत् तच्चापमिन्द्रसूनुरमर्षितः ।
प्राप्य सञ्ज्ञां पुनः पार्थः शल्यं विव्याध वक्षसि ।
समाश्वस्तः पुनर्बाणं यमदण्डनिभं(यमदण्डोपमं) रणे ।
तेन विह्वलितः पार्थो ध्वजयष्टिं समाश्रितः ।
तदाऽन्यं रथमास्थाय धर्मराजः शरोत्तमैः ।
शल्योऽन्यं रथमास्थाय सर्वांस्ताञ्छरवृष्टिभिः ।
निहत्याश्वान् सात्यकेश्च धृष्टद्युम्नस्य चाभिभूः ।
ततस्तु शल्यं समुदीर्यमाणं दृष्ट्वा रणे भीमसेनस्तरस्वी(भीमसेनस्तपस्वी) ।
आस्थाय चान्यं रथमापतन्तं पुनश्च शल्यं भृशमेव मर्मसु ।
आत्तान्यात्तान्यायुधान्यस्य भीमः सर्वाणि चिच्छेद बिभेद चास्य ।
तं भीमभिन्नमर्माणं विवर्माणं निरायुधम् ।
आत्मानमभिगच्छन्तं दृष्ट्वाऽन्यं रथमास्थितः ।
दिव्यास्त्रैरपि संयोज्य तां तदा धर्मनन्दनः ।
स भिन्नहृदयो भूमौ पपाताभिमुखो नृपम् ।
मद्रराजे हते वीरे सुशर्माऽर्जुनमभ्ययात् ।
दुर्योधनस्यावरजानवशिष्टान् वृकोदरः ।
उलूकं सहदेवोऽथ शकुनिं चातिपापिनम् ।
बहुशो विरथीकृत्य पीडयित्वा पुनःपुनः ।
शैनेयेन गृहीतोऽथ सञ्जयोऽनन्तशक्तिना ।
तेषामभूत् तस्य च घोररूपं युद्धं स बाणैर्बहुशोऽर्जुनं च ।
तं भीमसेनो विरथं चकार गजं समारुह्य पुनः समभ्ययात् ।
गजे च भीमेन शरैर्निपातिते समारुहद् वाजिवरं सुनिर्भयः ।
मुमोह तेनाभिहतः स सात्यकिर्यमावपि प्रासनिपीडितौ रथे ।
प्रासे निकृत्ते च वृकोदरेण विवाहनः सोऽपि(सोऽप ययौ) ययौ सुयोधनः ।
एवमक्षोहिणीषट्कं भीमेन निहतं रणे ।
अक्षौहिणीचतुष्कं च पार्थानां द्रौणिना हतम् ।
जयं लब्ध्वा तदत्सूच्चैः पाण्डवेषु महात्मसु ।
मन्त्रा दुर्वाससा दत्ता मृतसञ्जीवनप्रदाः ।
इति विद्याबलं तस्य ज्ञात्वा पाण्डुसुतास्ततः ।
तदा जलात् समुन्मज्ज्य त्रिभिर्द्रौणिपुरस्सरैः ।
दुर्योधनोऽविशत् तोयं दृष्ट्वा तं केशवाज्ञया ।
अमर्षितोऽसौ धृतराष्ट्रपुत्रः श्वसंस्तदा दण्डहतो यथाऽहिः ।
तमाह धर्मजो राजा यस्त्वं कृष्णे समागते ।
घातयित्वा सर्वपृथ्वीं भीष्मद्रोणमुखानपि ।
अहत्वा प्रतिगृह्णामि एहि युद्धे स्थिरो भव ।
इत्यादि रूक्षवचनं श्रुत्वा दुर्योधनो रुषा ।
उवाच एक एवाहमकिरीटो विवर्मकः ।
यद्येवमपि मे युद्धं भवद्भिर्मन्यसे समम् ।
इत्युक्त आह धर्मात्मा वर्माद्यं च ददामि ते ।
हत्वैकं त्वं भुङ्क्ष्व राज्यमन्ये याम वयं वनम् ।
इत्युक्त ऊचे नहि दुर्बलैरहं योत्स्ये चतुर्भिर्भवदर्जुनादिभिः ।
श्रुत्वाऽस्य वाक्यं रभसो(रभसा) वृकोदरो गदां तदाऽध्यर्द्धभराधिकां(तदध्यर्धभराधिकां) मुदा ।
अथाऽह नारायण आदिदेवो युधिष्ठिरं कष्टमिदं कृतं त्वया ।
स निश्चयाद् वश्चतुरो निहन्यात् सहार्जुनान् भीमसेनः कथञ्चित् ।
ऊरू भीमेन भेत्तव्यौ प्रतिज्ञां रक्षता रिपोः ।
अधर्म इति तत् कृष्णो लोकनिन्दानिवृत्तये ।
भीमो हन्याद् धार्तराष्ट्रमित्यूचे यद्यपि स्फुटम् ।
आह शिक्षामप्यनूनां यत्नं दुर्योधनेऽधिकम् ।
प्रतिज्ञापालनं धर्मो दुष्टेषु तु विशेषतः ।
नान्यस्ततो लोकनिन्दां व्यपनेतुमुभावपि ।
ततो भीमः सर्वलोकस्य धर्मं प्रकाशयन् वाक्यमिदं जगाद ।
इत्युक्तवन्तं(इति ब्रुवन्तं) प्रससार चाऽजौ दुर्योधनस्तत्र बभूव युद्धम् ।
दर्शयन्तौ गदामार्गं चित्रं तौ प्रविचेरतुः (चित्रं परिविचेरतुः)।
वारितावपि तेनोभौ नैव युद्धं प्रमुञ्चताम्(व्यमुञ्चताम्) ।
ततो(तत्र) भीमं वञ्चयितुं धार्तराष्ट्रः शिरः क्षितौ ।
प्रतिज्ञापालनार्थाय नाभेर्नोपर्यधस्तदा ।
नाधस्तान्मध्य एवासौ निजघ्ने तं वृकोदरः ।
कृष्णं द्यूते निधेहीति यदवादीत्(यदवादि) सुयोधनः ।
तेषां पुण्यानि विद्याश्च समादायैव सर्वशः ।
स्मारयामास कर्माणि यानि तस्य कृतानि च ।
पुनःपुनश्च तद् वीक्ष्य चुक्रोध मुसलायुधः ।
पुनः क्रोधाभिताम्राक्ष(क्रोधातिताम्राक्षः) आदाय मुसलं हलम् ।
अभये संस्थिते भीमे रामं जग्राह केशवः ।
न मण्डलेऽभिसारे वा नापसारे च नाभितः ।
कृता प्रतिज्ञा च वृकोदरेण भेत्स्ये तवोरू इति युक्तिपूर्वम्(पूर्वकम्) ।
वासुदेववचः श्रुत्वा धर्मच्छलमिति ब्रुवन् ।
तस्मिन् गते वासुदेवं समपृच्छद् युधिष्ठिरः ।
न साक्षाद् धर्मतो वध्या ये तु पापतमा नराः ।
भीष्मद्रोणौ च कर्णश्च यदैवोपधिना(यथैवोपाधिना) हताः ।
प्रतिज्ञापालनायापि विभेदोरू वृकोदरः ।
लोकतोऽपि न धर्मस्य हानिरत्र कथञ्चन ।
अवध्यत्वे शिववराद् गदाशिक्षाबलादपि ।
तस्मात् सद्धर्म एवायं भीमचीर्ण इति ब्रुवन् ।
भूभारक्षतिजो धर्मो मच्छुश्रूषात्मकश्च यः ।
स्वेनैव बलभद्राय जनाय च पुनःपुनः ।
मुख्यं धर्मं(मुख्यधर्मं) हि भगवान् बलायाऽह जनाय च ।
पुनःपुनर्धर्मत एव भीमो जघान राजानमिति ब्रुवन्तम् ।
इत्यूचिवांसं प्रजगाद कृष्णो न त्वत्समः पापतमः कदाचित् ।
न पाण्डवेष्वस्ति ततो हि किञ्चित् पापं प्रयत्नाच्च निसर्गतोऽपि ।
निसर्गतः पापतमस्त्वमन्यान् धर्मस्थितान् पापपथे निधाय ।
इति ब्रुवन्तं पुनराह कृष्णं दुर्योधनः पापकृतां प्रधानः ।
इष्टं च यज्ञैश्चरितं च पूर्तैः पदं रिपूणां निहितं च मूर्ध्नि(मूर्धनि) ।
इष्टा भोगा मया भुक्ताः प्राप्ता च परमा गतिः ।
चन्द्रसूर्यनिभैः(चन्द्रार्कसन्निभैः) शूरैर्धार्मिकैः सद्भिरुज्झिता ।
इत्युक्तवत्येव नृपे सुरेशैः प्रसूनवृष्टिर्विहिता पपात ।
सम्भावयत आत्मानं वासुदेवं विनिन्दतः ।
यदैकैकमलं तत्र दुःखाधिक्यं समुच्चयात् ।
नृशंसस्य कृतघ्नस्य गुणवद्द्वेषिणः सदा ।
वदन् पुनःपुनरिदं धर्मतो हत इत्यपि ।
प्रख्यापिते वासुदेवेन धर्मे सतां सर्वेषां हृद्यमासीत् समस्तम् ।
युधिष्ठिरोऽपापदर्शी (अपायदर्शी) सदैव ससंशयोऽभूत् सुमनोऽभिवृष्ट्या ।
ततः कृष्णः पाण्डुपाञ्चालकैस्तैर्भृशं नदद्भिर्हृषितैः समेतः ।
ततः श्रुत्वा सञ्जयाद् दुःखतप्तं सम्बोधयिष्यन् पितरं युयुत्सुः ।
धर्मयुक्तैश्च तत्त्वार्थैर्लोकवृत्तानुदर्शकैः ।
कालानुसारतो दैवांश्चोपसंहर्तुमच्युतः ।
तदैव हार्दिक्यकृपान्वितोऽयात् सुयोधनं द्रौणिरमुं शयानम् ।
स दुःखशोकाभिहतो विनिन्द्य पार्थान् मया भूप किमत्र कार्यम् ।
उच्छिद्य सन्ततिं पाण्डोः कृत्वा स्वक्षेत्रसन्ततिम् ।
स कृष्णभीमपार्थानां भयादेव पुनर्वनम् ।
तस्य चिन्तयतो द्रोणवधं दुर्योधनस्य च ।
हतान् सुबहुसाहस्रानेकेनातिबलेन तु ।
निदर्शनेन ह्येतेन(ह्येनेन) प्रेरितः परमात्मना ।
निवारितोऽपि ताभ्यां स प्राद्रवच्छिबिरं प्रति ।
उग्ररूपधरं रुद्रं स्वकीयां तनुमेव सः ।
दृष्ट्वैव वासुदेवं तमत्रसद् गौतमीसुतः ।
अयुद्ध्यदग्रसच्चाऽशु द्रौणेः सर्वायुधान्यपि ।
अतस्तया प्रेरितेन स्वात्मनैवाखिलेष्वपि ।
यज्ञतुष्टेन(यज्ञे तुष्टेन) हरिणा प्रेरितः शङ्करः स्वयम् ।
उवाच चाहमादिष्टो विष्णुना प्रभविष्णुना ।
तदिच्छयैव निर्दिष्टो दास्ये मार्गं तवाद्य च ।
इत्युदीर्य प्रदायाऽशु सर्वा हेतीर्वृषध्वजः ।
ये निर्यास्यन्ति शिबिराज्जहितं तांस्तु सर्वशः ।
पारावताश्वं स तदा शयानमुपेत्य पद्भ्यां समताडयच्च ।
समुत्थितं मां जहि शस्त्रपाणिं शस्त्रेण वीरोऽसि स वीरधर्मः ।
न सन्ति हि ब्रह्महणां सुलोका विशेषतश्चैव गुरुद्रुहां पुनः ।
अवश्यं भाविनं(अवश्यभाविनं) मृत्युं धृष्टद्युम्नो विचिन्त्य तम् ।
द्रौणिं च कालरात्रिं च द्रोणपातादनन्तरम् ।
समाक्षिपद् द्रोणसुतोऽस्य कण्ठे निबद्ध्य मौर्वीं धनुषोप्युरस्थः ।
ततः शिखण्डिनं हत्वा युधामन्यूत्तमोजसौ ।
तैरुत्थितैरस्यमानः शरैः खड्गेन जघ्निवान् ।
तं तदाऽन्तर्हितः(अन्तर्हितं) शर्वः कैलासमनयत् क्षणात् ।
पुराऽर्थितः स्वदौहित्रस्यामरत्वाय शङ्करः ।
वासुदेवमतं ज्ञात्वा साम्राज्याय परीक्षितः ।
सामान्यतोऽपाण्डवाय द्रौणिनाऽप्यभिसन्धितम् ।
अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैनं न जघानैक्यतस्तयोः ।
स चेदिपाञ्चालकरूशकाशीनन्यांश्च सर्वान् विनिहत्य वीरः ।
जीजीविषूंस्तत्र पलायमानान् द्वारि स्थितौ गौतमः सात्वतश्च ।
खड्गेन प्रहृतं दृष्ट्वा हार्दिक्येन पपात ह ।
तस्या अकथयत् सर्वं सा भीमायाऽह दुःखिता ।
तदन्तरे द्रौणिरपि प्रयातः कृष्णासुतानां मुदितः शिरांसि ।
दृष्ट्वा तदुक्तं च निशम्य पापस्तुष्टोऽत्यजत् साध्विति देहमाशु ।
तत्रैकलं द्रोणसुतं रथेन यान्तं रथी मारुतिरन्वधावत् ।
आद्रवन्तं पुनर्दृष्ट्वा भीमं द्रोणात्मजो रुषा ।
एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो धर्मजेनार्जुनेन च ।
विष्णुनैवोभयं यस्मात् कृतं (क्लृप्तं) भीमोऽस्त्रमेव तत् ।
ऊचे च पार्थयोः कृष्णो यत् कृतं द्रौणिना पुरा ।
पृष्टेनोक्तं त्वया हीनां कृत्वा दुर्योधनाय गाम् ।
तदस्त्रं प्रज्वलद् दृष्ट्वाऽपाण्डवत्वविधित्सया ।
स्वस्त्यस्तु द्रोणपुत्राय भूतेभ्यो मह्यमेव च ।
अनस्त्रज्ञेषु मुक्तं तद्धन्यादस्त्रमुचं यतः ।
तदाऽस्त्रयोस्तु संयोगे भूतानां संहृतिर्भवेत् ।
तथाऽप्यस्त्रद्वयं युक्तं भूतानां नाशकृद् ध्रुवम् ।
संस्थाप्यास्त्रद्वयं दूरे तावाह पुरुषोत्तमः ।
इत्युक्ते फल्गुनः प्राह मया मुक्तं महापदि ।
द्रौणिरप्येवमेवाऽह तौ वेदपतिरब्रवीत् ।
क्षत्रतेजा ब्रह्मचारी कौमारादपि पाण्डवः ।
निवर्तनासमर्थस्त्वं देहि नैसर्गिकं मणिम् ।
इत्युक्तो मूर्धजं रत्नं जरामरणनाशनम् ।
उत्कृत्य भीमाय ददौ मुक्ताः पञ्चैव पाण्डवाः ।
तात मुक्तं द्रौणिनाऽपि त्वमेवास्त्रं निवर्तय ।
यादवेशोऽथ गौतम्याः सुतमाहैकसन्ततेः ।
पक्षपातादिच्छसि त्वं भागिनेयस्य सन्ततिम् ।
वासुदेवः पुनः प्राह यदि हन्तव्य एव ते ।
अभिमन्योर्मृतस्यैव देहे पातय मानद ।
पातये गर्भ एवाहमित्यूचे गौतमीसुतः ।
दुर्मते पश्य मे वीर्यं यत् ते शक्यं कुरुष्व तत् ।
सन्ततिर्वर्षसाहस्रं पाण्डवानां भवेद् भुवि ।
जानामि ते मतिं दुष्टां जिघांसोः पार्थसन्ततिम् ।
मदाज्ञया सा विफला भवित्री वाञ्छा मुमुक्षा विमुखस्य(मुमुक्षोर्विमुखस्य) विष्णोः ।
दुर्गन्धयुक्तो व्रणसञ्चिताङ्गः सदा चरः स्या विपिनेषु मन्दः ।
रूपद्वयेनापि हरेस्तथोक्तो जगाद कालीतनयं स कृष्णम् ।
इत्युक्त ओमिति प्राह भगवान् बादरायणः ।
स्वप्ने हि द्रौपदेयानां वधो दृष्टोऽत्मना निशि ।
निबध्याऽनयनं चैव तेनैव शिबिरं प्रति ।
इत्यादि स्वप्नदृष्टं यत् प्रायः सत्यमभूदिति ।
स कृष्णोक्तमपि प्राप्य बादरायणशिष्यताम् ।
ततः सप्तर्षिर्भूत्वा पाराशर्यप्रसादतः ।
कृपोऽथ पाण्डवान् प्राप्य गौरवात् पूजितश्च तैः ।
बादरायणशिष्यत्वं पुनः प्राप्य भजन्नमुम् ।
कृष्णायै तं मणिं(तन्मणिं) दत्वा भीमस्तां पर्यसान्त्वयत् ।
राजार्हे हि मणौ दत्ते मह्यं भीमेन लौकिकाः ।
मणिं राज्ञे ददौ कृष्णा भर्तृप्रियहिते रता ।
वेदेश्वरेणापि यदूत्तमेन कृष्णेन युक्तास्तत आशु पार्थाः ।
युधिष्ठिरस्यानु विचित्रवीर्यसुतस्य पादावभिवन्दमानम् ।
भीमाकृतिं तां स सुयोधनेन कारापितामभ्यसने गदायाः ।
तमाह कृष्णो न हतोऽद्य भीमो नच त्वयाऽन्यैरपि शक्यतेऽसौ ।
स्वबुद्धिदोषादतिपापशीलपुत्राख्यपापानि विवर्द्धयित्वा ।
इत्युक्ते शान्तबुद्ध्यैव राज्ञाऽऽहूतो वृकोदरः ।
वज्राच्च दृढदेहत्वादविकारे वृकोदरे ।
कुलनाशकरः पापः शापयोग्यस्तव ह्यहम् ।
ददर्श धर्मराजस्य पटान्तेन(पट्टान्तेन) प्रकोपिता ।
वन्दमानं पुनर्भीममाह सा क्रोधविह्वला ।
इत्युक्तेऽस्याः (इत्युक्तोऽस्याः) शमयितुं क्रोधमग्रे वृकोदरः ।
इत्युक्त्वा तां पुनः प्राह प्रतिज्ञाहानिमन्तरा ।
यथाप्रतिज्ञं भ्रातृव्यान् रणे मम निजघ्नुषः ।
‘पापा न शुद्धधर्मेण हन्तव्या’ इति च श्रुतिः ।
निकृत्या निकृतिं हन्यान्निकृत्या नैव धार्मिकान्(धार्मिकम्) ।
इत्युक्ता तं पुनः प्राह कथं ते नरशोणितम् ।
दन्तान्तरं न मे प्राप शोणितं तत् सुतस्य ते ।
भीषणाय च शत्रूणां पीतवच्च प्रदर्शितम् ।
इत्युक्तोवाच नैवान्धद्वयस्यास्य वृकोदर ।
तामाह भीमः पापिष्ठा वधयोग्यापराधिनः ।
सर्वैः समेतैः कृष्णस्य बन्धनाय विनिश्चितम्(विनिश्चतः) ।
वासुदेवं सभासंस्थं ब्रुवाणं धर्मसंहितम्(धर्मसंहिताम्) ।
नैकोऽप्यनपराधी मे स्वयं ताननुशिक्षितुम् ।
इत्युक्ता साऽभवत् तूष्णीं क्रमात् सर्वैश्च पाण्डवैः ।
तस्या याश्च स्नुषाः सर्वास्ताभिः सह पुरस्कृताम् ।
पाण्डवाः प्रधनस्थानं सभार्याः पृथया सह ।
जानन् पाण्डवरक्षार्थं चिकीर्षुस्तत्तपोव्ययम् ।
तेन दृष्ट्वा प्रेतदेहान् सर्वांस्तत्र समाकुला(समाकुलान्) ।
इत्युक्तो भगवान् कृष्णः स्वचिकीर्षितमेव तत् ।
तेन तस्यास्तपो नष्टं हीना साऽतो हि भर्तृतः ।
तत आश्लिष्य भर्तॄणां देहान् प्ररुदतीः स्त्रियः ।
ततो देहान् प्रसिद्धानां पार्थाः समदहन् सताम् ।
स्नेहान्नृपो यमौ च स्वान् नाऽजौ तस्मिन् न्ययोजयन् (ह्ययोजयन्) ।
ततो ददत्सु पानीयं गङ्गायां स्वजनस्य तु ।
ततो हाहेति विलपन् राजा परमदुःखितः ।
हा मातस्तव धृत्यैव वयं सर्वे भृशं हताः ।
एवं वदन्तं कौन्तेयं वासुदेवः सनारदः ।
ततस्ते प्रेतकार्याणि चक्रुः सर्वेऽपि सर्वशः ।
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
ओं ॥ यदैव कृष्णौ सकलाधिराज्ये युधिष्ठिरं यौवराज्ये च भीमम् ।
तदैव चार्वाक इति प्रसिद्धं रक्षस्त्रिदण्डी यतिरेव भूत्वा ।
श्रुत्वैव तद् दुःखितमाशु धर्मजं दृष्ट्वा विप्राः शेपुरमुं भृशार्ताः ।
भस्मीकृतेऽस्मिन् यतिवेषधारिणि युधिष्ठिरं दुःखितं वृष्णिसिंहः ।
रक्षोऽधमोऽयं निहतोऽद्य विप्रैस्तमा शुचः कृतकार्योऽसि राजन् ।
असान्त्वयच्च बान्धवान् स्वपौरसंश्रयादिकान् ।
स भीष्मद्रोणकर्णानां वधाद् दुर्योधनस्य च ।
सोऽनुजैः कृष्णया विप्रैरप्युक्तो धर्मशासनम्(धर्मसाधनम्) ।
तस्मिन् क्रुद्धे नृपं प्राहुर्विप्रास्त्वत्तोऽपि तत्त्ववित् ।
मत्स्नेहादेव सर्वेऽपि धर्मोऽयमिति वादिनः ।
नातिनिश्चितबुद्धिं तं तदाऽपि पुरुषोत्तमौ ।
स ताभ्यां भ्रातृभिश्चैव मुनिभिश्च समन्वितः ।
पृच्छेत्युक्तः स भीष्मेण पप्रच्छाखिलमञ्जसा ।
भीष्मो ह्याह हरिं पार्था बोधनीयास्त्वयैव हि ।
इत्युक्तो भगवानाह त्वत्कीर्त्यै त्वयि संस्थितः ।
राज्ञः प्रथमतो धर्मो भगवद्धर्मपालनम् ।
पूर्णाशेषगुणो विष्णुः स्वतन्त्रश्चैक एव तु ।
देवताक्रमविज्ञानमपूजाऽन्यस्य वै हरेः ।
वृथा कर्माकृतिः क्वापि निराशीस्त्वं सदैव च(सदैव तु) ।
प्रियं विष्णोस्तदीयानामपि सर्वं समाचरेत् ।
साम्ये विरोधे च बहूननुवर्तेत वैष्णवान् ।
तत्त्वविज्ञापनं धर्मो विप्रस्य तु विशेषतः ।
न चार्थदण्डः कर्तव्यो विप्रवैश्यादिभिः क्वचित् ।
यथालब्धेन वर्तेत भिक्षया वा द्विजोत्तमः ।
महापदि विशां धर्मैः क्षत्रियः सुरविप्रयोः ।
विरोधिनः क्षत्रियाच्च प्रसह्यैव हरेद् धनम् ।
कृषिवाणिज्यगोरक्षाकुसीदं वैश्यजीवनम् ।
हरिभक्तावनुच्चस्तु वर्णोच्चो नातिपूज्यते ।
ज्ञापनं क्षत्रियाणां च धर्मो विप्राभ्यनुज्ञया ।
वर्णेष्वज्ञेष्ववर्णस्तु न ज्ञानी स्यात् कथञ्चन ।
ज्ञेयं सर्वं त्रिवर्णस्थः स्त्रीभिर्वेदान् विनाऽखिलम् ।
धर्मो गुणोत्तमानां तु स्मृत्यैवान्धं तमो व्रजेत् ।
वेदा अप्युत्तमस्त्रीभिः कृष्णाद्याभिरिवाखिलाः
उत्तमा इति विज्ञेयास्तच्छूद्रैरप्यवैदिकम् ।
सर्वथाऽन्धं तमो याति वरं सदृशमेव वा(सदृशमेव च) ।
ब्रह्मेशानादिकमपि भेदं यो वा न मन्यते ।
प्राकृतं देहमथवा(देहमथ वा) दुःखाज्ञानश्रमादिकम् ।
मनोवाक्तनुभिर्यो वा तस्मिन्स्तद्भक्त एव वा ।
अन्याधीनत्वविच्चास्य सर्वपूर्त्यविदेव च ।
तत्त्वे संशययुक्ता ये सर्वे ते निरयोपगाः ।
यावद् दोषक्षयश्चोर्ध्वा गतिः(दोषक्षयश्चोर्ध्वगतिः) क्रमश एव तु ।
भक्तिज्ञानोन्नतावेव स्वर्गश्च शुभकर्मणः ।
इत्यादि धर्मसर्वस्वं भीष्मस्थेनैव विष्णुना ।
आह क्षत्ता धर्ममेव सारमर्थं च मध्यमम् ।
सारं स द्विविधो ज्ञेयो दैवो मानुष एव च ।
मध्यमो धर्म एवात्र साध्यं साधनमेव च ।
मानुषोऽर्थोऽपि विद्यायाः कारणं सुप्रयोजितः ।
धर्मार्थतां विनाऽप्यर्थैस्तुष्येयुर्गुरुदेवताः ।
गुरुताऽर्थगतैव स्यात् कामोऽधस्ताद्धि निष्फलः ।
अथाऽह भीमः प्रवरः सुतत्त्वदृशां समस्तानभिभाष्य हर्षात् ।
काम्यं हि कामाभिधमाहुरार्याः काम्याः पुमर्थाः सह साधनैर्यत् ।
विज्ञानभक्त्यादिकमप्यतीव सत्साधनं कामबहिष्कृतं चेत् ।
परात्परोऽप्यादिपुमान् हरिश्च स्वस्येतरेषामपि काम्य एव ।
इच्छैव कामोऽस्तु तथाऽपि नैतामृते हि चित्त्वं घटकुड्यवत् स्यात् ।
न प्रश्नयोग्यः पृथगेव कामस्तेनैष राजन् यदि तारतम्यम् ।
तस्मात् स्वबुद्धिप्रमदाभिरेव(सुबुद्धिप्रमदाभिरेव) कामं रमेथा अनुरूपकामः ।
प्राज्ञः सुहृच्चन्दनसारलिप्तो विचित्रमाल्याभरणैरुपेतः ।
प्रशस्य भीममन्यांश्च राजा मोक्षमथास्तुवत् ।
त्रिंशोऽध्यायः
ओं ॥ अथ कृष्णमनुस्मृत्य भीष्मे स्वां वसुतां गते ।
आश्वासितश्च कृष्णाभ्यां धर्मजो दुःखितः पुनः ।
अपापे पापशङ्कित्वादश्वमेधैर्यजाच्युतम् ।
इत्युक्तः स तथा चक्रे त्यक्त्वा भोगांश्च कृत्स्नशः ।
ददौ देयानि मुख्यानि यथाकाममखण्डितम् ।
प्रष्टा च दाताऽखिलराजनम्यो यष्टा च धर्मात्मज एव तत्र ।
भीमस्तु दौर्योधनमेव सद्म प्रपेदिवानूर्जितवीर्यलब्धम् ।
कृष्णा च पार्थांश्चतुरो विहाय सुव्यक्तसारस्वतशुद्धभावा ।
प्रीत्यैव विज्ञानयुजाऽन्यपार्थैः संवादतः परिहृता गतभाविकाले ।
रराज राजावरजस्तया स द्विरूपया सोमककाशिजातया ।
सर्वोत्तुङ्गो नामतः प्राणवायोरंशो निशायां गुरुपुत्रसूदितः ।
अन्याश्चाऽसुर्वासुदेव्यो दिशो या आपश्च पूर्वं विंशतिरग्र्यरूपाः ।
ररक्ष धर्मानखिलान् हरेः स निधाय विप्राननुशास्य युक्तान् ।
दधार दण्डं तदवर्तिषु स्वयं जग्राह चान्वेव मुदाऽथ तद्गतान् ।
नावैष्णवः कश्चिदभूत् कुतश्चिन्नैवान्यनिष्ठो नच धर्महन्ता ।
वासिष्ठवृष्णिप्रवरौ प्रपश्यतां ताभ्यां च भीमेन मुनीश्वरैश्च ।
शुभं महत् स्वल्पफलं कृते हि विपर्ययेणाशुभमेषु दोषः ।
धनञ्जयः प्रोद्यतदण्ड आसीत् सदाऽन्यचक्रेषु निजाग्रजेरितः ।
सदैव कृष्णस्य मुखारविन्दाद् विनिस्सृतं तत्त्वविनिर्णयामृतम् ।
दुःशासनस्याऽवसथं(अवसथे) सुभद्राचित्राङ्गदासहितोऽध्यावसंश्च ।
समस्तभृत्याश्रितवेतनानां माद्रेय आसीत् प्रथमः प्रदाता ।
सन्धानभेदानुगतप्रवृत्तिस्तिष्ठंश्च दुर्मर्षणशुभ्रसद्मनि ।
सेनापतिः कृप आसीद् युयुत्सुः ससञ्जयो विदुरश्चाऽम्बिकेयम् ।
द्विरूपकृष्णप्रहितेषु पाण्डुषु क्षितिं प्रशासत्सु न कश्चनाऽतुरः ।
शब्दादयश्चाऽसुरतीव हृद्या निकामवर्षी च सुरेश्वरोऽभूत् ।
पृथ्वी च गावः ससरस्वतीका निकामदोहा अभवन् सदैव ।
कृष्णाश्रयात् सर्वमिदं वशे ते विधाय सम्यक् परिपालयन्तः ।
समुज्ज्वला पाण्डवकीर्तिनारी पदं (विधाय)विधायासुरपक्षमूर्धसु(मूर्धनि) ।
पातालपादां पृथिवीनितम्बामाकाशमध्यां करसन्तताशाम् ।
विकुण्ठनाथाभयहस्तमादरान् मूर्ध्ना वहन्तीं(मूर्ध्नाऽऽवहन्तीं) वरभारताख्याम् ।
प्रपालयत्स्वेव धरां सकृष्णेष्वद्धैव पार्थेषु कलिर्बलिश्च ।
नृपेण कृष्णेन च साधु चोदितो भीमस्तदा तौ सगणौ विजित्य ।
पप्रच्छ तं कृष्णपुरो युधिष्ठिर उदारधीः ।
इत्युक्त आह कालोऽयं दुर्योधननिपातनम् ।
तमाह राजा राज्ञां हि बलाद् राज्यं प्रवर्तते ।
कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् ।
तमुवाच कलिः काले मदीये त्वादृशः कुतः ।
वासुदेवसहायेषु तेजो युष्मासु मे नहि ।
मदीयकाले भूपाल विप्रदेव(वेद)विरोधिनि ।
जगाद नृपतिः सत्यं कले वक्ष्यनृतोऽपि सन् ।
सीमाधिर्बहुवाक्यं च तुलामाने च मे करः ।
तमाह भगवान् कृष्णो यावत् पाण्डवसन्ततिः ।
पाण्डवेभ्यः परं यावत् क्षेमकः क्रमवर्द्धिता ।
न द्रष्टव्यं भूतलं ते कुत एव स्पृशेर्भुवम् ।
इत्युक्तो वासुदेवेन मोचितो धर्मजेन च ।
एवं पार्थान् प्रतिष्ठाप्य शक्रप्रस्थे तु सार्जुनः ।
वाणी प्राणो वासुदेव इत्येतैरखिलं ततम् ।
इत्थं हरेर्वशे सर्वं गुणपूर्णश्च(सर्वगुणपूर्णश्च) स प्रभुः ।
स हुताश इति प्रोक्तो(हुताशन इति प्रोक्तो) हुतमत्त्यखिलं यतः ।
एतस्यानादिसद्भक्ता मुक्तियोग्या हि ते स्मृताः ।
मिश्रा मध्या इति ज्ञेयाः संसारपरिवर्तिनः ।
तारतम्यं च विज्ञेयं लिङ्गैर्दैहिकमानसैः ।
विष्णोस्तदनुगानां च प्रीतिकृद् धर्म ईरितः ।
कथञ्चित् तानवस्थाप्य सुदूरानुगतान् प्रभुः ।
समाधिविरतोदङ्कपरिपृष्टः पथि प्रभुः ।
तं शिष्यवधकोपेन शप्तुमात्मानमुद्यतम् ।
मद्भक्तो नितरामेष मदाराधनतत्परः ।
कृपया वासुदेवेन बोधितः शान्तमानसः ।
तस्मै देवोऽभयं दत्त्वा प्रेषयिष्येऽमृतं तव ।
अथाऽदिदेश देवेशं वासुदेवोऽमृतं मुनेः ।
ओमित्युक्तो भगवता तत्स्नेहात् स शचीपतिः ।
मूत्रस्रोतसि सौधञ्च निधाय कलशं वशी ।
स मूत्रमिति मत्वा तं याहीत्येवाऽह भत्सयन् ।
असाधारणमन्नं हि देवानाममृतं सदा ।
आत्मदत्तप्रसादाच्च स्वापराधात् प्रचालिते ।
स्वपुरीं प्राप्य यदुभिः पूजितः शूरसूनवे ।
वधमन्तरितं सूनोः सात्वतेशेन सात्वती ।
ततः सुदुःखिताः शूरपुत्राद्या अभिमन्यवे ।
निवसत्यत्र विश्वेशे धर्मपुत्रः क्रतूत्तमम् ।
हतशेषात् क्षत्रसङ्घात् करं नैच्छद् दयापरः ।
विज्ञाय नित्यविज्ञातनिखिलो बादरायणः ।
मेरुशृङ्गेण यत्रैव विष्णुः स्वात्मानमव्ययम् ।
शङ्कराद्याः सुरा यत्र मरुत्तश्चेजिरे हरिम् ।
तच्छङ्करशरीरस्थं जामदग्न्यं हरिं परम् ।
धनस्य देवता विष्णुर्जामदग्न्योऽखिलेश्वरः ।
तेनैव विष्णुना दत्तमर्जुनायास्त्रमुत्तमम् ।
स ब्रह्मरुद्रशक्रादिपददाताऽखिलप्रदः ।
प्रियोऽस्माकं प्रियास्तस्य सर्वदैव वयं नृप ।
सोऽयं पितामहोऽस्माकं व्यासस्तन्नः प्रदास्यति ।
धनं कृष्णः समादाय(स आदाय) समन्ताच्छतयोजनम् ।
युधिष्ठिरमृते सर्वे भीमसेनपुरोगमाः ।
तदैव वासुदेवोऽपि सभार्यः स सुभद्रया ।
तत्कामवर्षिणो मेघांस्तस्य दत्वोदकार्थिनः ।
आसन्नेष्वेव पार्थेषु व्यासे च पुरुषोत्तमे ।
द्रौण्यस्त्रसूदितं बालं दृष्ट्वा कुन्त्यादिकाः स्त्रियः ।
प्रत्यक्षमात्मना गर्भे रक्षितं प्रसवे हतम् ।
तदैव विविशुः पार्था सकृष्णाः सधनोच्चयाः(सधनोच्छ्रयाः) ।
ददौ दानानि बहुशो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
कुन्तीकृष्णासुभद्राभिर्वैराट्याऽन्याभिरेव च ।
ततः कृष्णाभ्यनुज्ञाता पाराशर्यसदस्यकाः ।
सर्वयज्ञात्मकं तेषामश्वमेधं जगत्पतिः ।
साधनानि तु सर्वाणि शालां चैव हिरण्मयीम् ।
अथानुमन्त्रितोत्सृष्टं पुरोहितपुरस्कृतम् ।
स जित्वा रुन्धतः सर्वान् नृपतीञ्छस्त्रतेजसा ।
युधिष्ठिराज्ञया तेन न कश्चिन्निहतस्तदा ।
मळलूरं (मणलूरं) क्रमात् प्राप्तस्तत्रैनं बभ्रुवाहनः ।
योद्धुकामोऽर्घ्यमादाय त्वयाऽद्याभिगतो ह्यहम् ।
तदाऽपि(तथाऽपि) पितृभक्त्यैनमयुद्ध्यन्तमुलूपिका ।
इत्युक्तो युयुधे पित्रा बलं सर्वं प्रदर्शयन् ।
स तु सर्वायुधक्षेपेऽप्यविकारं धनञ्जयम् ।
मूर्च्छितं तं गुरुं दृष्ट्वा तद्भक्त्या भृशदुःखितः ।
विजगर्ह तदोलूपीं धिग् जगत्त्रयपूजितम् ।
लोकवीरं पतिं हित्वा(हत्वा) न मे कार्यं सुतेन च ।
इत्युक्त्वा मरणायैव तां विनिश्चितमानसाम् ।
नागलोकात् समादाय विशल्यकरणीं क्षणात् ।
प्रहस्योवाच च तदा श्रुतं वाक्यं पुरा मया ।
यद्धतास्तेन दोषेण पार्थस्तेनातिवेदनाम् ।
देवानामेव सङ्कल्पान्मूर्च्छितश्चार्जुनोऽभवत् ।
अन्येन पातितस्त्यास्य यशो नश्येत् त्रिलोकगम् ।
इत्युक्तः प्रीतिमापेदे पुत्रभार्यायुतोऽर्जुनः ।
द्वारकायाः समीपस्थं प्रद्युम्नाद्याः सुता हरेः ।
सुभद्राहरणं मार्ष्टुं नीतेऽश्वे तैर्धनञ्जयः ।
मातुलायाब्रवीदश्वं हृतं पौत्रैरबन्धुवत् ।
मातुलं स प्रणम्याथ यज्ञार्थं तान् निमन्त्र्य च ।
सकृष्णः सहसोदर्यः श्रुत्वाऽसौ प्राप्तमर्जुनम् ।
वासुदेव न पश्यामि दुर्लक्षणमथार्जुने ।
पृष्टस्तं केशवः प्राह भ्राता ते दीर्घपिण्डकः(पिण्डिकः) ।
समस्तलक्षणाभिज्ञाः कृष्णः सत्या वृकोदरः ।
प्रसङ्गात् प्राप्तुमिच्छेत् तां विद्याशीलो युधिष्ठिरः ।
तद्गौरवाद् वासुदेवो नोत्तरं प्रत्यभाषत ।
उदरस्य किञ्चिदाधिक्यं वृषणाधिक्यमेव च ।
नैवोक्तं वासुदेवेन दृश्यमानमपि स्फुटम् ।
समस्तजीवराशौ यद् दुर्लक्षणविवर्जितौ ।
अनादिदुःखहीनत्वे सुखाधिक्ये च लक्षणम् ।
मुख्यं ततोऽपि(ततोऽति) मुख्यं तु स्वान्तन्त्र्यादेरशेषतः ।
साश्वेऽर्जुने यज्ञवाटं प्रविष्टेऽस्य सहोदराः ।
ततः स यज्ञो यदुवीररक्षितो व्यासोपदिष्टो मुनिभिः प्रवर्तितः ।
स कृष्णयुग्मेन च भार्गवेण त्रिधा विभक्तेन परेण पुंसा ।
यथा विरिञ्चस्य पुराऽऽस यज्ञो यथैव शक्रस्य शतक्रतुत्वे ।
न देवगन्धर्वमुनिस्वधर्ममर्त्यादिकेष्वास स योऽत्र नाऽस(सम्भ्रमः) ।
तत्रैव तत्त्वानि ससंशयानि निस्संशयान्यासुरलं विवादे ।
प्रगीतगन्धर्ववरः प्रनृत्तसदप्सराः सन्ततवादिविप्रः ।
समस्तदेव्यः सहवासुदेव्यः स्वलङ्कृताः फुल्लमुखारविन्दाः ।
न वै मुमुक्षुर्न बभूषुरत्र न वै विवित्सुश्च कुतो बुभुक्षुः ।
दिनेदिने तत्र महान्नपर्वताः सभक्षसारा रसवन्त ऊर्जिताः ।
ह्रदा महान्तस्त्रिदशादियोग्याः सुयोगयुक्ता हरिचन्दनादेः ।
यथेष्टपानाशनभोगशिष्टाः सहस्रशो मारुतिना तु कारिताः ।
नैतादृशः कश्चन भूतपूर्वो मखो विना रामविरिञ्चवज्रिणाम् ।
स एवमद्धा हरिदैवतः क्रतुः पञ्चाश्वमेधात्मक उच्चकल्पः ।
यज्ञावसाने निखिलाश्च पाण्डवाः कृष्णा च पृथ्वीमखिलां सवित्ताम् ।
प्रियो विभागो यदमुष्य विष्णोरतो विभागार्थमिवाऽर्पयंस्ते ।
देहेन्द्रियप्राणमनांसि चेतनैः सहैव तस्मा अतिसृज्य नेमुः ।
ततो विभक्ते मुनयोऽवदंस्ते प्रत्यर्पयामो वयमेषु राज्यम् ।
पार्थाः सभार्या द्विजवाक्यमेतन्निशम्य कृष्णाय पुनः प्रणम्य ।
इतीरितः प्राह स बादरायणो मुनीश्वरैरप्यभियाचितः प्रभुः ।
समर्पितं मे फलवच्च तत् स्यात् पुनर्ग्रहो नैव च दोषकारी ।
इतीरितास्ते प्रतिपद्य राज्यं ददुर्हिरण्यं निखिलं च तस्मै ।
सभार्यकाणां वररत्नभूषणान्यशेषतः पुत्रभुवां प्रदाय ।
तद् यज्ञपञ्चकमजस्त्रिगुणां स एभ्यः सद्दक्षिणां क्रतुपतिर्निखिलामवाप्य ।
सकृष्णेष्वथ पार्थेषु सुस्नातावभृथेष्वलम् ।
स्तूयमाने च तद्यज्ञे क्रोधो नकुलतां गतः ।
गर्हयन्नूचिवानित्थं भार्यापुत्रस्नुषायुतः ।
धर्मायातिथये तस्य कलां नार्हति षोडशीम् ।
अतिथेस्तस्य पादोदक्लिन्नः पार्श्वो हिरण्मयः ।
मज्जतोऽवभृथेष्वद्धा यज्ञानामत्र चाऽदरात् ।
कृष्णेन च तमोऽन्धं तं प्रापयद्भिः स्मिते कृते ।
कृष्णस्य पाण्डवानां च मखादेश्च गुणान् बहून् ।
श्राद्धार्थं हि पयः पूर्वं (जामदग्नेः)जमदग्नेरदूषयत् ।
भव त्वं नकुलस्तावद् यावद् धर्मादिकान् सुरान् ।
यद्यप्यल्पधनत्यक्तं वित्तं बहुफलं भवेत् ।
सतां प्रीतिश्च तत्रापि सद्वरो हरिरेव हि ।
सतां च प्रवरो विष्णुः सद्भिर्मुनिवरैर्युतः ।
पठन्ति पैङ्गिनश्चैतान् मन्त्रानन्वर्थकानिह ।
वैष्णवेष्वपि मर्त्यैर्यत् कृतं शतगुणं ततः ।
देवशक्रशिवब्रह्मकृतं तस्मात् क्रमेण च ।
वैष्णवत्वं क्रमात् वृद्धं (क्रमोद्वृद्धं) ब्रह्मान्तं जीवराशिषु ।
इति तेन न पार्थानां कर्मणाऽन्यत् समं क्वचित् ।
अथ पृष्टो वासुदेवः सुरविप्रादिसंसदि ।
ते च श्रुत्वाऽखिलान् धर्मान् भक्त्या परमया युताः ।
एकत्रिंशोऽध्यायः
ओं ॥ यज्ञेश्वरेणाभियुतेषु भक्त्या महीं प्रशासत्सु पृथासुतेषु ।
प्रातर्ददानीति नृपस्य वाक्यं निशम्य विप्रस्त्वरितो मखार्थे ।
अनर्घमग्निप्रतिमं(अनर्घ्यमग्निप्रतिमं) विचित्ररत्नान्वितं(रत्नाञ्चितं) विप्रवरस्तदाप्य ।
अकालजं तं तु निशम्य राजा पप्रच्छ दूतैस्तमुवाच भीमः ।
इतीरितोऽसौ नृपतिस्त्वरेत धर्मार्थमित्यस्य मतं प्रपूजयन् ।
अथाम्बिकेयं विषयेषु सक्तं दुस्सङ्गदुष्टं कृतभूरिदोषम् ।
अकुर्वतस्तीक्ष्णतपः कुतश्चिन्नैवास्य(कुतश्चिन्नैव स्वलोकाप्ति)लोकाप्तिरमुष्य भूयात् ।
आज्ञां परैरस्य निहन्ति सोदरैर्वधूजनैरप्यतिपूजितेऽस्मिन् ।
सर्वे हि पार्थास्तमृते सभार्या वैचित्रवीर्यं परमादरेण ।
स प्रीयमाणो नितरां च तेषु नैवाधिकं प्रीयते भीमसेने ।
तस्यापनेतुं विषयेषु सक्तिं द्वेषं तथैवाऽत्मनि भीमसेनः ।
ताविमौ मे भुजौ वृत्तौ पीनौ चन्दनरूषितौ ।
यमौ तदन्वमोदेतां तत्स्नेहाद् गौरवादपि ।
तच्छ्रुत्वोत्पन्ननिर्वेदं क्षत्ता ज्येष्ठस्य वर्द्धयन् ।
अहो महीयसी(गरीयसी) जन्तोर्जीविताशा यथा(यया) भवान्।
नचापराधो भीमस्य ब्रुवतस्त्वामिदं वचः ।
अलमासज्जतस्तेऽद्य निर्वेदकरमीरितम् ।
विमुच्य द्वेषकामौ त्वं वने तीर्थनिषेवकः ।
इत्युक्तो द्वेषमुत्सृज्य भीमे निर्वेदमागतः ।
अनश्नन्तं चतुर्थेऽह्नि धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः ।
अनुज्ञां वनवासाय त्वत्तः प्राप्यैव सर्वथा ।
शन्तमेन(श्रान्तमेनं) करेणाथ धर्मजस्तं मृदु स्पृशन् ।
पुरस्कृत्य युयुत्सुं त्वं कुरु राज्यमकण्टकम् ।
नेत्याह धृतराष्ट्रस्तं कुलधर्मो हि नो वने ।
तयोर्विवदतोरेवं कृष्णद्वैपायनः प्रभुः ।
तपसाऽशेषदोषाणां क्षयकाममिमं नृपम् ।
काले निर्वेदमापन्नस्तपसा दग्धकिल्बिषः ।
इत्युक्तो धर्मराजस्तमनुजज्ञे स चाशितः ।
अनुज्ञाय गृहं प्राप्ते धर्मजे विदुरं पुनः ।
श्रुत्वा युधिष्ठिरो भीममाह दातव्यमद्य नः ।
तमाह भीमः पापानां विमुखानां मधुद्विषः ।
तज्ज्ञात्वा ददतां दोषो भवेदिति विचिन्तयन् ।
भीष्मादीनां वयं श्राद्धकर्तारस्तेन किं ततः ।
इत्युक्तवन्तं नृपतिरर्जुनश्चोचतुः पुनः ।
इत्युक्तमपि नेत्येव ब्रुवाणं शुद्धधार्मिकम् ।
कोशतो यद् बहिर्वित्तं दानभोगादिकारणम् ।
एवमेवार्जुनोऽप्याह विदुरं पुनरूचतुः ।
इत्युक्तो वित्तमादाय गत्वा क्षत्ताऽग्रजेऽब्रवीत्।
नातिहृष्टस्त्वदाज्ञायां भीमस्तन्मा क्रुधोऽत्र च।
नृपार्जुनौ धर्मरतावपि लोककृपापरौ।
कृत्वा श्राद्धानि सर्वेषां महादानान्यनारतम् ।
सर्वं समर्प्य गोविन्दे पार्थेभ्योऽन्येभ्य एव च ।
धर्मतो रक्षिता यूयमस्मत्पूर्वैर्महात्मभिः ।
इष्टं च यज्ञैः पूर्तैश्च चरितं युष्मदाश्रयात् ।
सौभ्रात्रं येन सन्त्यज्य पाण्डवेषु महात्मसु ।
अप्रियाणि च कृष्णस्य सुबहून्याचरत् कुधीः ।
भ्रातरोऽस्य च सर्वेऽपि तच्छीलमनुवर्तिनः ।
सोऽहं वयोगतश्चैव पुत्राधिभिरभिप्लुतः(पुत्रादिभिरभिप्लुतः) ।
तत्र मामनुजानीध्वं कृपया मित्रवत्सलाः ।
क्रियमाणोऽपि कर्तव्यो भूय एव सदाऽचलः ।
इत्युक्तैः स्वगुणानुच्चैः कीर्तयद्भिः सुदुःखितैः ।
सञ्जयो विदुरश्चैनं सभार्यमनुजग्मतुः ।
वार्यमाणाऽपि तनयैः सभार्यैर्भृशदुःखितैः ।
संन्दर्शितपथो राजा कुन्तीविदुरसञ्जयैः ।
त्रिवत्सरेणास्य (त्रिवत्सरादस्य) निजस्य लोकस्याऽप्तिं सभार्यस्य जगाद तत्र ।
सक्षत्तृगान्धारिपृथे ससञ्जये तपोभिराराधयति प्रभुं हरिम् ।
क्षत्तैकतामत्र युधिष्ठिरेण प्राप्तोऽथ भार्यासहितं ससञ्जयम् ।
प्रादुर्बभूवामितशक्ति(प्रादुर्बभूवामृतशक्ति)तेजोज्ञानाद्भुतैश्वर्यसुखादिरूपः ।
तैः पूजितस्तत्र निषण्ण आह यद्यद् यदिष्टं प्रवदन्तु तत्तत् ।
तेषां प्रदत्तेष्वभिवाञ्छितेषु वैचित्रवीर्यः सह भार्ययैव ।
ततस्तु ते सत्यवतीसुतस्य सर्वेश्वरस्याऽज्ञया सर्व एव ।
ऊषुश्च रात्रिं परमाज्ञयैव सर्वे स्वभार्यासहिता(सर्वेऽपि भार्यासहिता) यथा पुरा ।
अथाऽज्ञयैवास्य परस्य सर्वाः स्त्रियो निजेशैः सहिता ययुः स्वः (स्वम्) ।
तं चाऽनयामास तदैव कृष्णो ह्यचिन्त्यशक्तिः स विकुण्ठलोकात् ।
सम्पूज्य तं कृष्णमपीशवन्द्यं क्षमापयामास परीक्षिदात्मजः ।
पार्थाः पुनः प्राप्य पुरं स्वकीयं धर्मेण पृथ्वीं परिपालयन्तः ।
वर्षत्रयान्ते त्मसमाहिताग्निं (त्यक्त्वाऽग्निभिः)त्यक्ताग्निभिस्तैर्वनमालिहद्भिः ।
वीटामुखं(व्रीळामुखा,व्रीडामुखं, व्रीडामुखान्) ध्यानपरा निशम्य स्वर्यातमात्मीयपितृव्यमाशु ।
ते विष्णुभक्त्या परिपूतकर्मभिर्ज्ञानेन चान्ते तमनुस्मरन्तः ।
(गावल्गणिः)गावद्गणिर्व्याससकाशमेत्य शुश्रूषया तस्य पुनर्निजां गतिम् ।
अष्टादशाब्दाः पृथिवीं समस्तां प्रशासतामेवमगुर्महात्मनाम् ।
द्वात्रिंशोऽध्यायः
OM ॥ ततः कुरुक्षेत्रमवाप्य कृष्णो दीक्षां प्रपेदे द्विषडब्दसत्रे ।
तत्रर्त्विजो दक्षभृगुप्रधानाः पार्था यदूनां प्रवरैः समेताः ।
सर्वे च जीवा वसुधातलस्था येऽन्येऽन्तरिक्षद्युमुखोत्तरेषु ।
सुनिर्णयस्तत्त्वविनिर्णयार्थिनां तत्त्वस्य चाभूदिह वादशीलिनाम् ।
धर्मार्थकामानखिलानवापुस्तदर्थिनो मुक्तिमपीह कृष्णात् ।
क्षेत्रं तदासीद्धरिलोकसम्मितं(तदाऽसीद्धरिलोकसम्मितं) यदीयुरत्राखिलसज्जना युतिम् ।
द्वादशाब्दं महासत्रमेवमेतादृशं हरिः ।
अनुजज्ञे क्रमेणैव वत्सरेण समागतान् ।
उपदिश्य परं ज्ञानमुद्धवायामुमाश्रमम् ।
समारब्धं कलियुगं यदा दुर्योधनोऽपतत् ।
कृतादपि विशेषोऽयं यत् पुण्यस्याधिकं फलम् ।
एवं सुधार्मिके लोके हरिभक्तिपरायणे ।
ब्रह्मरुद्रादयो देवाः स्तुत्वा केशवमव्ययम् ।
प्राचुर्ये सज्जनस्य स्यान्न कलेर्वृद्धिरञ्जसा ।
पुण्यक्षेत्रेऽपि न मृतिः स्वगृहे त्वतिधर्मदा(स्वगृहेऽप्यतिधर्मदा) ।
प्रकाशयितुमेवैनान् प्रभासाय कुशस्थलात् ।
ते ततः शापदोषेण कृष्णेनैव विमोहिताः ।
ततः परेशोऽगणितानुभावः स्वसारथिं पाण्डवानां सकाशम् ।
अथाऽसतः पिप्पलमूल ईशितुरूरुस्थितं पादतलं सुताम्रम् ।
अच्छेद्याभेद्यदेहस्य शल्ये पादमुपस्थिते ।
विप्रवाक्यं मानयानः कारयित्वाऽमुना हरिः ।
पादप्रहारदोषेण तं भृगुं व्याधतां गतम् ।
नीचा योनिर्नीचनीच(नीचां योनिं नीचनीचकर्मा) कर्माऽप्तं नीचकर्मतः ।
ततो विरिञ्चेशपुरन्दराद्याः पुनः स्तुवन्तोऽभिययुः प्रणम्य ।
गोपालमन्त्रं भजतां फलप्रदस्त्वेकेन रूपेण स भुव्यदृश्यः ।
सम्पूजितं ब्रह्मलोके चतुर्थं कञ्जोद्भवेनाथ परं स्वधाम ।
तत्तेजसा ते प्रतिमुष्टदृष्टयः पुरुष्टुताद्या अमितोरुदीधितेः ।
वीन्द्रेशशेषानुगतः स्वयम्भूर्धाम प्रविष्टं तमजं प्रणम्य ।
स पूर्वरूपेण समाप्य चैक्यं विभज्य चेच्छानुसृतोऽथ रेमे ।
ब्रह्माऽपि शर्वादियुतः स्वलोकं प्राप्तः पुनस्तत्र गतं च कृष्णम् ।
यतो न दर्शिता भ्रान्तिः प्रादुर्भावेष्वपि क्वचित् ।
मोहयित्वाऽसुरानन्धं तमः प्रापयितुं प्रभुः ।
दारुकोक्त्या समायातः पार्थस्तमदहत् तदा ।
तथैव जनमोहाय प्राप्य वह्नावदृश्यताम् ।
चिदानन्दैकदेहे हि(चिदानन्दैकदेहेऽपि) द्विरूपे इव ते यतः ।
अन्या महामहिष्यस्तु त्यक्त्वा देहं हुताशने ।
रौहिणेयादिकानां च भार्या वह्निमुखे तनुम् ।
वसुदेवः पार्थमुखाच्छ्रुत्वा तद्योगमास्थितः ।
तस्यार्जुनोऽश्वमेधाग्नावन्त्यकर्माकरोत् तदा ।
स्त्रियो बालांस्तथाऽऽदाय धनं चैव धनञ्जयः ।
स्त्रीबालसहिते पार्थ एकस्मिन् पथि गच्छति ।
यास्ताः षोडशसाहस्रवनिताः शतसंयुताः ।
ह्रियमाणे धने चैव वनितासु च वासविः ।
क्षीणास्तस्य शरा दैवान्नास्त्राणि स्मृतिमाययुः ।
तदा कुरुक्षेत्रगतं जगद्गुरुं सुपूर्णविज्ञानबलाब्धिसत्सुखम्(बलर्द्धिसत्सुखम्) ।
स तेन पुंसां प्रवरेण हेतुभिः सम्बोधितोऽज्ञानतमोंऽशुमालिना ।
स्त्रियो म्लेच्छहृताः कृष्णप्रेषिताद्(कृष्णप्रेरिताद्) दाल्भ्यतः पुनः ।
अर्जुनस्तु कुरुक्षेत्रे हार्दिक्ययुयुधानयोः ।
अनिरुद्धसुतं वज्रं प्रियं कृष्णस्य सद्गुणम् ।
स्त्रीबालांश्च धनं चैव तस्मिन् संस्थाप्य फल्गुनः ।
ते चावियोगसमयं स्मरन्तो मुरवैरिणः(मुरवैरिणा) ।
स्त्रीहारिणां च म्लेच्छानां वधायैनमयोजयन् ।
वासुदेवपदा स्पृष्टभूकण्टकसमुद्धृतिः(समुद्धतिः) ।
अनुव्रजद्भिर्विश्वेशं नास्माभिर्भूस्तदुज्झिता ।
तत्र काली भीमभार्या वैष्णवं योगमास्थिता ।
सुभद्राद्यास्तु या भार्याः पार्थानां तु तदाज्ञया ।
सन्त्यज्य राजचिह्नानि (राज्यचिह्नानि) वैष्णवं योगमास्थिताः ।
प्रागुदीचीं दिशं पूर्वं ययुस्तत्रार्जुनो धनुः ।
प्रातिभाव्यं तु वरुणे निस्तीर्याग्निरदृश्यताम् ।
अहोभिः सप्तभिर्योगं समारूढाः प्रदक्षिणम् ।
द्रौपदीसहदेवादिपञ्चानां तत्र मारुतिः ।
तेषामिहेति याथार्थ्यं जानन् पप्रच्छ धर्मजम् ।
मृतिकाले हि यो यस्य दोषं वक्त्यृणमोचनम् ।
सोऽपीच्छापतितान् देहानजानञ्छुद्धकर्मणाम् ।
स्वच्छन्दमृत्यवो योगाद् देहानुत्सृज्य पाण्डवाः ।
ऋणान्युन्मुच्य(ऋणात् प्रमुच्य) दोषोक्त्या स्वानां भीमः स्वकां तनुम् ।
भीमादृते हि चतुर्षु पक्षपातस्तु वासवौ ।
नीतिरूपे वीर्यबले महान्त्येषां यतः क्रमात् ।
यथास्वरूपविज्ञानमात्मन्यपि न दोषकृत् ।
कदाचिदतिमानोऽपि त्रयाणामेषु जायते ।
प्रारब्धकर्मनाशे (आरब्धकर्मनाशे) हि पतेद् देहोऽप्यपापिनः ।
अतिमानादयो दोषाः कुत एव हि मारुतेः ।
सर्वजीवगणेभ्यो ये ते हि(समस्तजीवराशिभ्यस्ते हि) वायुत्वमाप्नुयुः ।
अभावं ह्यतिमानादेर्भीमस्याऽह च केशवः ।
इति तस्माद् यथा युद्धे धर्महानिममन्यत ।
पूज्येभ्यः(पूर्वेभ्यः) पूर्वमेवैषां देहपातमभीप्सताम् ।
न हि पापफलं मुक्तौ(पापफलान्मुक्तौ देहपातः कथञ्चन ।
तेषु स्वलोकान् प्राप्तेषु धर्मजः श्वाऽत्मना सह(स्वात्मना सह) ।
रथमारुहेति कथितो रथिना पुरतः शुनः ।
नाऽरुहेयं विना श्वानमिति तेन स्थिरोदिते ।
आनृशंस्यपरत्वेन कीर्तिमेवाऽत्मनो वृषः ।
ततः(यतः) स रथमारुह्य लोकानामुत्तरोत्तरम् ।
सर्वेषामुत्तरं लोकमैन्द्रं प्राप्येदमेव ते ।
सभ्रातृकं ज्वलन्तं च सर्वेषामुपरि स्थितम् ।
भ्रातरो मे क्व कृष्णा च सकर्णाः(कर्णाद्याः) क्व च बान्धवाः ।
यादवश्चेति पप्रच्छ देवांस्ते च तमब्रुवन् ।
इत्युक्त आह पापोऽयं पृथिवीक्षयकारकः ।
नास्तिकोऽतिशठः क्रूरो द्वेष्टा विष्णोश्च तद्भुवाम् ।
कथं च सर्वधर्मज्ञा नारायणपरायणाः ।
यत्र सन्तस्तु ते सन्ति तत्र स्थातव्यमेव मे ।
अस्य वीरतमस्येदं धार्तराष्ट्रस्य युज्यते ।
दुर्गन्धेन सुकृच्छ्रेण तमसा प्रावृतेन च ।
क्षणं तिष्ठ महाराज सन्निधानबलात् तव ।
के यूयमिति पप्रच्छ दीनध्वनिविशङ्कितः ।
श्रुत्वा तत् कृपयाऽऽविष्टः शोकामर्षसमन्वितः ।
नच स्वर्गेण मे कार्यं त्यक्त्वा स्वजनमीदृशम् ।
ततोऽत्र देवाः पुरुहूतपूर्वकाः समाययुः स्नेहवशाद् युधिष्ठिरे ।
आहात्र धर्मः पुनरात्मसद्यशः(परमात्मसद्यशः) प्रकाशयन् पाण्डुसुताभिधं स्वम् ।
शक्रोऽप्युवाचैनमिदं मृषा ते प्रदर्शितं द्रोणकृते मृषागिरः ।
ब्रह्मापरोक्ष्येऽपि विकर्म सूचकं प्रारब्धपापस्य विषाशनं यथा ।
कुतः परब्रह्मदृशां सुशुद्धसत्कर्मणां कृष्णपरायणानाम् ।
एते हि देवप्रवराः पृथिव्यां जाता भुवो भारजिहीर्षुमीशम् ।
न ते नृपाद्यापि हि मानुषो गतो भावस्ततो द्वेष्टि सुयोधनादीन् ।
सुयोधनाद्या(दुर्योधनाद्या) यदिमे सुपापा आरब्धकर्मक्षयमाप्य नित्ये ।
देवांशजा ये तु समस्तशस्ते स्वमूलरूपं समवाप्य काले ।
इत्युक्त आश्वेव निमज्ज्य गङ्गां धर्मात्मजस्तत्र विसृज्य(धर्मात्मजस्तं प्रविसृज्य) देहम् ।
स तु प्रपश्यन् स्वजनं समस्तं स्वमूलरूपातिसमीपसंस्थम् ।
ददर्श कृष्णामपि तत्समीपे श्रिया ज्वलन्तीं समतीत्य चान्याः ।
एषा हि साक्षाज्जगतां प्रियस्य प्राणात्मनो जीववरेश्वरस्य ।
युष्मच्चतुर्देहगतस्य वायोर्वायुप्रिया भीमतनोस्तथैव ।
प्रीतिस्ततो ह्यभ्यधिका(ह्यत्यधिका) बभूव भीमस्य चास्यास्तदनु स्म पार्थे ।
इयं(इदा,एषा) हि सा शुद्धतनुः प्रजाता शच्यादियोगापगताग्र्यदेहा ।
स्पर्शेऽपि नास्याः पवमानपत्न्याः सुपूतताऽलं भवतामिदानीम् ।
इतीरितं तं प्रतिसन्निवृत्तं विनाशयन् मानुषवासनां स्वयम् ।
ततस्तु पार्था अखिलाः स्वमूलरूपैः सहैवाऽविविशुर्मुदाऽन्विताः ।
तत्रापि कृष्णेन समागमोऽभूत् पुरेव तेषामतितत्पराणाम् ।
अन्ये च(तु) देवांशभवाः समस्ताः स्वमूलरूपैक्यमवापुराशु ।
चतुःसहस्रं त्रिशतोत्तरं ते(त्रिशतोत्तरं गते) संवत्सराणामनुभूय दिव्यान् ।
दुःखेऽपि तेषामिह तारतम्यं कलेः परं दुःखमिहाखिलाच्च ।
केचित् पिशाचासुरराक्षसत्वमवाप्य विष्णोरपि तत्पराणाम् ।
चतुःसहस्रे त्रिशतोत्तरे गते संवत्सराणां तु कलौ पृथिव्याम् ।
तदैव कृष्णाऽपि भुवि प्रजाता प्रीत्यै हरेरन्धतमस्यपातयत् ।
वायुत्वमाप्तः स हनूमदंशो ब्राह्मं पदं प्राप्य वृकोदरश्च ।
भुवि द्युलोके च विरिञ्चतायां मुक्तौ च ताभ्यामधिकं समस्तात् ।
‘भूषन् न योऽधि बभ्रूषु नम्नते’(ऋग्वेद १.१४०.६)(भुषन्न योऽधि बभ्रूषु नम्नते) ‘बळित्था तद्वपुषे धायि दर्शतं’(१.१४१.१) ।
अन्यानि वाक्यानि च वैदिकानि सपञ्चरात्रोक्तिपुराणकानि ।
एवं प्रयातेषु सकेशवेषु स्वानेव लोकान् यदुपाण्डवेषु ।
तैः क्षेमकान्तैरिह भारतादिशास्त्राणि शृण्वद्भिरशेषविद्भिः ।
संवत्सराणां तु सहस्रके गते प्राप्तेषु विद्यामखिलेषु सत्सु ।
अदर्शनं सर्वमुनीन्द्रवृन्दैः सहैव सज्ज्ञानमहानिधाने (निदाने) ।
उत्सादितत्वात्तु दुरागमानां तत्सम्प्रदायस्य च नाशितत्वात् ।
शुना पुरोडाशमिवावलीढं वेदश्रुतिं चा(वा)ऽन्त्यजनैरवाप्ताम् ।
नावाग्गतिः क्वापि सुवेदिनां भवेत् प्राप्यं सुखं नित्यमवश्यमेभिः ।
ज्ञानप्रदानाय सतां तदन्यज्ञानप्रणाशाय च विष्णुनैते ।
क्षीरोदधेरुत्तरतीरनिष्ठितै(विष्ठितै)रभिष्टुतः सुष्टुतिभिः पुरुष्टुतः ।
यस्त्रैपुराणां प्रथमोऽत्र जातः शुद्धोदनेत्येव जिनेति चोक्तः ।
तेषां तदा वैदिककर्म वीक्ष्य सम्प्राहसत् तद्वपुषैव केशवः ।
तथाऽप्यविश्वासमवेक्ष्य तेषां सस्मार देवानखिलान् जनार्दनः ।
स जातमात्रः शिवपूर्वकाणां शूलादिहेतीरखिला निगीर्य ।
तदासनत्वेन विधाय तस्मिन् समास्थितं देवगणाः प्रणम्य ।
ते ज्ञानधर्मावपहाय पापा विमोहिता देववरेण(दैववरेण) सर्वे ।
नारायणोऽप्याप्य(नारायणः प्राप्य) सुरेन्द्रवृन्दं वृत्तं च तेषामखिलं(तेषां निखिलं) निगद्य ।
क्षणादयं क्षणिकास्तद्विशेषा यतः प्रयान्त्येव निसर्गतोऽखिलाः ।
तद्वान् विशेषश्च यतो न भिन्नो सदा स्वनिर्वाहकशक्तियुक्तौ ।
ज्ञोऽहं सदैकः परमो मयैतत् सदाऽननीयं हि यतोऽस्वतन्त्रम् ।
शंशीलकोऽहं यत एव चोच्चः शूनामकस्तद्धि मया निधेयम्(विधेयम्) ।
इत्यादि बोद्धव्यमिदं समस्तं मयोदितं क्वापि न हेयमस्ति ।
ततस्तु बुद्धोदितपक्षसंस्थो जिनोऽपि चक्रे मतमन्यदेव ।
प्रशान्तविद्येत्यभिधं तथाऽन्यद् बुद्धोक्तशास्त्रं त्रिदशा अवाप्य ।
अन्ये मनुष्या अपि भारताद्यं सत्सम्प्रदायं परिगृह्य विष्णुम् ।
शैवं तपस्ते विपुलं विधाय जगद्विमोहोर्जितशक्तिमस्मात् ।
तेषां प्रपाताय सतां च मुक्त्यै(विमुक्त्यै) जन्माऽस भीमस्य यदुक्तमत्र ।
ततः कलेरन्तमवाप्य धर्मज्ञानादिकल्याणगुणप्रहीने ।
नारायणस्तैः स्तुतिपूर्वमर्थितो भवाय लोकस्य स शम्भलाख्ये ।
कलेस्तु कात्कारत(काल्कारत) एव कल्की ज्ञानं कलं कं सुखमेव तद्वान् ।
अधर्मवृत्तं विमुखं हरेश्च निहत्य निःशेषजनं तुरङ्गी ।
इत्याद्यनन्तानि हरेरुदारकर्माणि रूपाणि च सद्गुणाश्च ।
आनन्दतीर्थाख्यमुनिः सुपूर्णप्रज्ञाभिधो ग्रन्थमिमं चकार ।
यस्तत्प्रसादादखिलांश्च वेदान् सपञ्चरात्रान् सरहस्यसङ्ग्रहान् ।
समस्तशास्त्रार्थविनिर्णयोऽयं विशेषतो भारतवर्त्मचारी(भारतमार्गवर्ती) ।
विनिर्णयो नास्त्यमुना विना यद् विप्रस्थितानामिव सर्ववाचाम् ।
निगूहितं यत् पुरुषोत्तमत्वं सूत्रोक्तमप्यत्र महासुरेन्द्रैः ।
व्यासाज्ञया भाष्यवरं विधाय पृथक्पृथक् चोपनिषत्सुभाष्यम् ।
तनुस्तृतीया पवनस्य सेयं सद्भारतार्थप्रतिदीपनाय ।
तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः ।
इत्यादिवाक्योक्तमिदं समस्तं तथा पुराणेषु च पञ्चरात्रे ।
तस्मादयं ग्रन्थवरोऽखिलोरुधर्मादिमोक्षान्तपुमर्थहेतुः ।
यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं
यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः ।