Isha/Data: Difference between revisions
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| verse_text = ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् | | verse_text = ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।¦तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद् धनम् ॥ १ ॥ | ||
| verse_lines = ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।¦तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद् धनम् ॥ १ ॥ | | verse_lines = ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।¦तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः मा गृधः कस्यस्विद् धनम् ॥ १ ॥ | ||
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| verse_text = कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतगꣳ समाः | | verse_text = कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतगꣳ समाः ।¦एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥ | ||
| verse_lines = कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतगꣳ समाः ।¦एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥ | | verse_lines = कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतगꣳ समाः ।¦एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २ ॥ | ||
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| verse_text = असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः | | verse_text = असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।¦ताꣳस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चाऽत्महनो जनाः ॥ ३ ॥ | ||
| verse_lines = असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।¦ताꣳस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चाऽत्महनो जनाः ॥ ३ ॥ | | verse_lines = असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।¦ताꣳस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चाऽत्महनो जनाः ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_text = अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् | | verse_text = अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् ।¦तद् धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥ | ||
| verse_lines = अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् ।¦तद् धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥ | | verse_lines = अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् ।¦तद् धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_text = तदेजति तन्नेजति तद् दूरे तद्वन्तिके | | verse_text = तदेजति तन्नेजति तद् दूरे तद्वन्तिके ।¦तदन्तरस्य सर्वस्य(तदु सर्वस्यास्य) तदु सर्वस्य बाह्यतः ॥ ५ ॥ | ||
| verse_lines = तदेजति तन्नेजति तद् दूरे तद्वन्तिके ।¦तदन्तरस्य सर्वस्य(तदु सर्वस्यास्य) तदु सर्वस्य बाह्यतः ॥ ५ ॥ | | verse_lines = तदेजति तन्नेजति तद् दूरे तद्वन्तिके ।¦तदन्तरस्य सर्वस्य(तदु सर्वस्यास्य) तदु सर्वस्य बाह्यतः ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_text = यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति | | verse_text = यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।¦सर्वभूतेषु चाऽत्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥ | ||
| verse_lines = यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।¦सर्वभूतेषु चाऽत्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥ | | verse_lines = यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति ।¦सर्वभूतेषु चाऽत्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_text = यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः | | verse_text = यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः ।¦तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥ | ||
| verse_lines = यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः ।¦तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥ | | verse_lines = यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः ।¦तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_text = स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम् अस्नाविरꣳ शुद्धमपापविद्धम् | | verse_text = स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम् अस्नाविरꣳ शुद्धमपापविद्धम् ।¦कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥ | ||
| verse_lines = स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम् अस्नाविरꣳ शुद्धमपापविद्धम् ।¦कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥ | | verse_lines = स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम् अस्नाविरꣳ शुद्धमपापविद्धम् ।¦कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_text = अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते | | verse_text = अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।¦ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳ रताः ॥ ९ ॥ | ||
| verse_lines = अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।¦ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳ रताः ॥ ९ ॥ | | verse_lines = अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।¦ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳ रताः ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_text = अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया | | verse_text = अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया ।¦इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे ॥ १० ॥ | ||
| verse_lines = अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया ।¦इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे ॥ १० ॥ | | verse_lines = अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया ।¦इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचक्षिरे ॥ १० ॥ | ||
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| verse_lines = सम्भूतिं च विनाशं यस्तद् वेदोभयꣳ सह ।¦विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४ ॥ | | verse_lines = सम्भूतिं च विनाशं यस्तद् वेदोभयꣳ सह ।¦विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४ ॥ | ||
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| verse_text = हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् | | verse_text = हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।¦तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥ | ||
| verse_lines = हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।¦तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥ | | verse_lines = हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।¦तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_lines = पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।¦समूह तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि ॥ १६ ॥ | | verse_lines = पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् ।¦समूह तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं तत् ते पश्यामि ॥ १६ ॥ | ||
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| verse_lines = योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १७ ॥ | | verse_lines = योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १७ ॥ | ||
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| verse_text = ..वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तꣳ शरीरम् ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_text = ओ३म् क्रतो स्मर कृतꣳ स्मर क्रतो स्मर कृतꣳ स्मर ॥ १९ ॥ | |||
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| verse_text = अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।¦युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥ २० ॥ | |||
| verse_lines = अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।¦युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम ॥ २० ॥ | |||
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| verse_text = नित्यानित्यजगद्धात्रे नित्याय ज्ञानमूर्तये ।¦पूर्णानन्दाय हरये सर्वयज्ञभुजे नमः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = यस्माद् ब्रह्मेन्द्ररुद्रादिदेवतानां श्रियोऽपि च ।¦ज्ञानस्फूर्तिः सदा तस्मै हरये गुरवे नमः ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = यस्माद् ब्रह्मेन्द्ररुद्रादिदेवतानां श्रियोऽपि च ।¦ज्ञानस्फूर्तिः सदा तस्मै हरये गुरवे नमः ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = स्वायम्भुवो मनुरेतैर्मन्त्रैर्भगवन्तमाकूतिसूनुं यज्ञनामानं विष्णुं तुष्टाव ।¦‘स्वायम्भुवः स्वदौहित्रं विष्णुं यज्ञाभिधं मनुः ।¦ईशावास्यादिभिर्मन्त्रैस्तुष्टावावहितात्मना ॥¦रक्षोभिरुग्रैः संप्राप्तः खादितुं मोचितस्तदा ।¦स्तोत्रं श्रुत्वैव यज्ञेन तान् हत्वाऽवध्यतां गतान् ॥¦प्रादाद्धि भगवांस्तेषाम् अवध्यत्वं हरः प्रभुः ।¦तैर्वध्यत्वं तथाऽन्येषामतः कोऽन्यो हरेः प्रभुः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।¦भागवते चायमेवार्थ उक्तः(चायमर्थ एव उक्तः .हृ) ॥ | |||
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| verse_text = ईशस्याऽवासयोग्यम्(ईशस्य वासयोग्यमीशावास्यम्) <span class="gr-moola">इशावास्यम्</span> । <span class="gr-moola">जगत्यां</span> प्रकृतौ । <span class="gr-moola">तेन</span> ईशेन । <span class="gr-moola">त्यक्तेन</span> दत्तेन । <span class="gr-moola">भुञ्जीथाः</span> । स्वतः प्रवृत्यशक्तत्वाद् ईशावास्यमिदं जगत् ।¦‘प्रवृत्तये प्रकृतिगं यस्मात् स प्रकृतीश्वरः ।¦तदधीनप्रवृत्तित्वात् तदीयं सर्वमेव यत् ।¦तद्दत्तेनैव भुञ्जीथाः अतो नान्यं प्रयाचयेत् ॥’ इति ब्रह्माण्डे(ब्राह्मे) ॥ १ ॥ | |||
| verse_lines = ईशस्याऽवासयोग्यम्(ईशस्य वासयोग्यमीशावास्यम्) <span class="gr-moola">इशावास्यम्</span> । <span class="gr-moola">जगत्यां</span> प्रकृतौ । <span class="gr-moola">तेन</span> ईशेन । <span class="gr-moola">त्यक्तेन</span> दत्तेन । <span class="gr-moola">भुञ्जीथाः</span> । स्वतः प्रवृत्यशक्तत्वाद् ईशावास्यमिदं जगत् ।¦‘प्रवृत्तये प्रकृतिगं यस्मात् स प्रकृतीश्वरः ।¦तदधीनप्रवृत्तित्वात् तदीयं सर्वमेव यत् ।¦तद्दत्तेनैव भुञ्जीथाः अतो नान्यं प्रयाचयेत् ॥’ इति ब्रह्माण्डे(ब्राह्मे) ॥ १ ॥ | |||
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| verse_text = अकुर्वतः कर्म न लिप्यत इति नास्ति -¦‘अज्ञस्य कर्म लिप्येत कृष्णोपास्तिमकुर्वतः ।¦ज्ञानिनोऽपि यतो ह्रासः आनन्दस्य भवेद् ध्रुवम् ॥¦अतोऽलेपेऽपि लेपः स्याद् अतः कार्यैव सा सदा ॥’ इति नारदीये ॥ २ ॥ | |||
| verse_lines = अकुर्वतः कर्म न लिप्यत इति नास्ति -¦‘अज्ञस्य कर्म लिप्येत कृष्णोपास्तिमकुर्वतः ।¦ज्ञानिनोऽपि यतो ह्रासः आनन्दस्य भवेद् ध्रुवम् ॥¦अतोऽलेपेऽपि लेपः स्याद् अतः कार्यैव सा सदा ॥’ इति नारदीये ॥ २ ॥ | |||
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| verse_text = सुष्ठु रमणविरुद्धत्वादसुराणां प्राप्यत्वाच्च <span class="gr-moola">असुर्याः</span> । ‘न च(खलु) रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनः’ इत्युक्तत्वात् ।¦‘महादुःखैकहेतुत्वात् प्राप्यत्वाद् असुरैस्तथा ।¦असुर्या नाम ते लोकास्तान् यान्ति विमुखा हरौ ॥’ इति वामने । | |||
| verse_lines = सुष्ठु रमणविरुद्धत्वादसुराणां प्राप्यत्वाच्च <span class="gr-moola">असुर्याः</span> । ‘न च(खलु) रमन्त्यहो असदुपासनयाऽऽत्महनः’ इत्युक्तत्वात् ।¦‘महादुःखैकहेतुत्वात् प्राप्यत्वाद् असुरैस्तथा ।¦असुर्या नाम ते लोकास्तान् यान्ति विमुखा हरौ ॥’ इति वामने । | |||
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| verse_text = ‘अनेजन्निभर्यत्वात् तदेकं प्राधान्यतस्तथा ।¦सम्यग् ज्ञातुमशक्यत्वाद् अगम्यं तत्सुरैरपि ॥¦स्वयं तु सर्वानगमत्(सर्वानुगमात्) पूर्वमेव स्वभावतः ।¦अचिन्त्यशक्तितश्चैव सर्वगत्वाच्च तत्परम् ॥¦द्रवतोऽत्येति सन्तिष्ठत् तस्मिन् कर्माण्यधान्मरुत् ।¦मारुत्येव यतश्चेष्टा सर्वा तां हरयेर्पयेत्॥’ इति ब्रह्माण्डे ।¦‘ऋष= ज्ञाने’ ॥ ४ ॥ | |||
| verse_lines = ‘अनेजन्निभर्यत्वात् तदेकं प्राधान्यतस्तथा ।¦सम्यग् ज्ञातुमशक्यत्वाद् अगम्यं तत्सुरैरपि ॥¦स्वयं तु सर्वानगमत्(सर्वानुगमात्) पूर्वमेव स्वभावतः ।¦अचिन्त्यशक्तितश्चैव सर्वगत्वाच्च तत्परम् ॥¦द्रवतोऽत्येति सन्तिष्ठत् तस्मिन् कर्माण्यधान्मरुत् ।¦मारुत्येव यतश्चेष्टा सर्वा तां हरयेर्पयेत्॥’ इति ब्रह्माण्डे ।¦‘ऋष= ज्ञाने’ ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_lines = <span class="gr-moola">तदेजति(तत एजति)</span> तत एव एजत्यन्यत् ।<span class="gr-moola">तत्</span> स्वयं <span class="gr-moola">नेजति</span> ।¦‘ततो बिभेति सर्वोऽपि न बिभेति हरिः स्वयम् ।¦सर्वगत्वात् स दूरे च बाह्येऽन्तश्च समीपगः॥’ इति तत्त्वसंहितायाम् ॥ ५ ॥ | |||
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| verse_type = bhashya | |||
| verse_text = ‘सर्वगं परमात्मानं सर्वं च परमात्मनि ।¦यः पश्येत् स भयाभावान्नाऽत्मानं गोप्तुमिच्छति॥’ इति सौकरायणश्रुतिः ॥ ६ ॥ | |||
| verse_lines = ‘सर्वगं परमात्मानं सर्वं च परमात्मनि ।¦यः पश्येत् स भयाभावान्नाऽत्मानं गोप्तुमिच्छति॥’ इति सौकरायणश्रुतिः ॥ ६ ॥ | |||
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| verse_text = <span class="gr-moola">यस्मिन्</span> परमात्मनि <span class="gr-moola">सर्वभूतानि</span> स परमा<span class="gr-moola">त्मैव</span> तत्र सर्वभूतेषु <span class="gr-moola">अभूत्</span> । एवं सर्वभूतेष्वेकत्वेन परमात्मानं <span class="gr-moola">विजानतः को मोहः ?</span> | |||
| verse_lines = <span class="gr-moola">यस्मिन्</span> परमात्मनि <span class="gr-moola">सर्वभूतानि</span> स परमा<span class="gr-moola">त्मैव</span> तत्र सर्वभूतेषु <span class="gr-moola">अभूत्</span> । एवं सर्वभूतेष्वेकत्वेन परमात्मानं <span class="gr-moola">विजानतः को मोहः ?</span> | |||
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| verse_text = ‘शुक्रं तच्छोकराहित्याद् अव्रणं नित्यपूर्णतः ।¦पावनत्वात् सदा शुद्धम् अकायं लिङ्गवर्जनात् ॥¦स्थूलदेहस्य राहित्याद् अस्नाविरम् उदाहृतम्।¦एवम्भूतोऽपि सार्वज्ञ्यात् कविरित्येव शब्द्यते ॥¦ब्रह्मादिसर्वमनसां (प्रकृत्या मनसोऽपि) प्रकृतेर्मनसोऽपि च ।¦ईशितृत्वान्मनीषी स परिभूः सर्वतो वरः ॥¦सदाऽनन्याश्रयत्वाच्च स्वयम्भूः परिकीर्तितः ।¦स सत्यं जगदेतादृङ् नित्यमेव प्रवाहतः ॥¦अनाद्यनन्तकालेषु प्रवाहैकप्रकारतः(प्रवाहैकप्रकारकम् .हृ) ।¦नियमेनैव ससृजे भगवान् पुरुषोत्तमः ॥¦सज्ज्ञानानन्दशीर्षोऽसौ सज्ज्ञानानन्दबाहुकः ।¦सज्ज्ञानानन्ददेहश्च सज्ज्ञानानन्दपादवान् ॥¦एवम्भूतो महाविष्णुर्यथार्थं जगदीदृशम् ।¦अनाद्यनन्तकालीनं ससर्जाऽत्मेच्छया प्रभुः ॥’ इति वाराहे ॥८॥ | |||
| verse_lines = ‘शुक्रं तच्छोकराहित्याद् अव्रणं नित्यपूर्णतः ।¦पावनत्वात् सदा शुद्धम् अकायं लिङ्गवर्जनात् ॥¦स्थूलदेहस्य राहित्याद् अस्नाविरम् उदाहृतम्।¦एवम्भूतोऽपि सार्वज्ञ्यात् कविरित्येव शब्द्यते ॥¦ब्रह्मादिसर्वमनसां (प्रकृत्या मनसोऽपि) प्रकृतेर्मनसोऽपि च ।¦ईशितृत्वान्मनीषी स परिभूः सर्वतो वरः ॥¦सदाऽनन्याश्रयत्वाच्च स्वयम्भूः परिकीर्तितः ।¦स सत्यं जगदेतादृङ् नित्यमेव प्रवाहतः ॥¦अनाद्यनन्तकालेषु प्रवाहैकप्रकारतः(प्रवाहैकप्रकारकम् .हृ) ।¦नियमेनैव ससृजे भगवान् पुरुषोत्तमः ॥¦सज्ज्ञानानन्दशीर्षोऽसौ सज्ज्ञानानन्दबाहुकः ।¦सज्ज्ञानानन्ददेहश्च सज्ज्ञानानन्दपादवान् ॥¦एवम्भूतो महाविष्णुर्यथार्थं जगदीदृशम् ।¦अनाद्यनन्तकालीनं ससर्जाऽत्मेच्छया प्रभुः ॥’ इति वाराहे ॥८॥ | |||
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| verse_text = ‘अन्यथोपासका ये तु तमोऽन्धं यान्त्यसंशयम् ।¦ततोऽधिकमिव व्यक्तं यान्ति तेषामनिन्दकाः ॥¦तस्माद् यथास्वरूपं तु नारायणमनामयम् ।¦अयथार्थस्य निन्दां च ये विदुः सह सज्जनाः(ते हि सज्जनाः) ।¦‘ते निन्दयाऽयथार्थस्य दुःखाज्ञानादिरूपिणः ॥¦दुःखाज्ञानादिसन्तीर्णाः सुखज्ञानादिरूपिणः ।¦यथार्थस्य परिज्ञानात् सुखज्ञानादिरूपताम् ॥¦यान्ति(यान्त्येव .हृ) ... ॥ ९-११ ॥ | |||
| verse_lines = ‘अन्यथोपासका ये तु तमोऽन्धं यान्त्यसंशयम् ।¦ततोऽधिकमिव व्यक्तं यान्ति तेषामनिन्दकाः ॥¦तस्माद् यथास्वरूपं तु नारायणमनामयम् ।¦अयथार्थस्य निन्दां च ये विदुः सह सज्जनाः(ते हि सज्जनाः) ।¦‘ते निन्दयाऽयथार्थस्य दुःखाज्ञानादिरूपिणः ॥¦दुःखाज्ञानादिसन्तीर्णाः सुखज्ञानादिरूपिणः ।¦यथार्थस्य परिज्ञानात् सुखज्ञानादिरूपताम् ॥¦यान्ति(यान्त्येव .हृ) ... ॥ ९-११ ॥ | |||
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| verse_text = ‘... एवं सृष्टिकर्तृत्वं नाङ्गीकुर्वन्ति ये हरेः ॥¦तेऽपि यान्ति तमो घोरं तथा संहारकर्तृताम् ।¦नाङ्गीकुर्वन्ति तेऽप्येवं तस्मात् सर्वगुणात्मकम् ।¦सर्वकर्तारमीशेशं सर्वसंहारकारकम् ॥ | |||
| verse_lines = ‘... एवं सृष्टिकर्तृत्वं नाङ्गीकुर्वन्ति ये हरेः ॥¦तेऽपि यान्ति तमो घोरं तथा संहारकर्तृताम् ।¦नाङ्गीकुर्वन्ति तेऽप्येवं तस्मात् सर्वगुणात्मकम् ।¦सर्वकर्तारमीशेशं सर्वसंहारकारकम् ॥ | |||
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| verse_text = ‘यो वेद संहृतिज्ञानाद् देहबन्धाद् विमुच्यते ।¦सुखज्ञानादिकर्तृत्वज्ञानात्(कर्तृृत्वज्ञानम्) तद् व्यक्तिमाव्रजेत् ॥¦सर्वदोषविनिर्मुक्तं गुणरूपं जनार्दनम् ।¦जानीयान्न गुणानां च भागहानिं प्रकल्पयेत् ॥¦न मुक्तानामपि हरेः साम्यं विष्णोरभिन्नताम् ।¦नैव प्रचिन्तयेत् तस्माद् ब्रह्मादेः साम्यमेव वा ॥¦मानुषादिविरिञ्चान्तं तारतम्यं विमुक्तिगम् ।¦ततो विष्णोः परोत्कर्षं सम्यग् ज्ञात्वा विमुच्यते ॥’इति कौर्मे ॥ १४ ॥ | |||
| verse_lines = ‘यो वेद संहृतिज्ञानाद् देहबन्धाद् विमुच्यते ।¦सुखज्ञानादिकर्तृत्वज्ञानात्(कर्तृृत्वज्ञानम्) तद् व्यक्तिमाव्रजेत् ॥¦सर्वदोषविनिर्मुक्तं गुणरूपं जनार्दनम् ।¦जानीयान्न गुणानां च भागहानिं प्रकल्पयेत् ॥¦न मुक्तानामपि हरेः साम्यं विष्णोरभिन्नताम् ।¦नैव प्रचिन्तयेत् तस्माद् ब्रह्मादेः साम्यमेव वा ॥¦मानुषादिविरिञ्चान्तं तारतम्यं विमुक्तिगम् ।¦ततो विष्णोः परोत्कर्षं सम्यग् ज्ञात्वा विमुच्यते ॥’इति कौर्मे ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_text = ‘पात्रं हिरण्मयं सूर्यमण्डलं समुदाहृतम् ।¦विष्णोः सत्यस्य तेनैव सर्वदाऽपिहितं मुखम् ॥¦तत्तु पूर्णत्वतः पूषा विष्णुर्दर्शयति स्वयम् ।¦सत्यधर्माय भक्ताय... ॥ १५ ॥ | |||
| verse_lines = ‘पात्रं हिरण्मयं सूर्यमण्डलं समुदाहृतम् ।¦विष्णोः सत्यस्य तेनैव सर्वदाऽपिहितं मुखम् ॥¦तत्तु पूर्णत्वतः पूषा विष्णुर्दर्शयति स्वयम् ।¦सत्यधर्माय भक्ताय... ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_text = ‘.. ... प्रधानज्ञानरूपतः ।¦विष्णुरेकऋषिर्ज्ञेयो यमो नियमनाद्धरिः ॥¦सूर्यः स सूरिगम्यत्वात् प्राजापत्यः प्रजापतेः ।¦विशेषेणैव गम्यत्वाद् ... ॥ १६ ॥ | |||
| verse_lines = ‘.. ... प्रधानज्ञानरूपतः ।¦विष्णुरेकऋषिर्ज्ञेयो यमो नियमनाद्धरिः ॥¦सूर्यः स सूरिगम्यत्वात् प्राजापत्यः प्रजापतेः ।¦विशेषेणैव गम्यत्वाद् ... ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_text = ‘...अहं चासावहेयतः ।¦अस्मि नित्यास्तितामानात् सर्वजीवेषु संस्थितः ॥¦स्वयं तु सर्वजीवेभ्यो व्यतिरिक्तः परो हरिः ।¦स क्रतुर्ज्ञानरूपत्वादग्निरङ्गप्रणेतृतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।¦सत्यं ब्रह्म हृदये धारयतीति सत्यधर्मा । एकोऽसौशब्दः प्राणे स्थित इति ॥ | |||
| verse_lines = ‘...अहं चासावहेयतः ।¦अस्मि नित्यास्तितामानात् सर्वजीवेषु संस्थितः ॥¦स्वयं तु सर्वजीवेभ्यो व्यतिरिक्तः परो हरिः ।¦स क्रतुर्ज्ञानरूपत्वादग्निरङ्गप्रणेतृतः ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।¦सत्यं ब्रह्म हृदये धारयतीति सत्यधर्मा । एकोऽसौशब्दः प्राणे स्थित इति ॥ | |||
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| verse_text = ‘भक्तानां स्मरणं विष्णोर्नित्यज्ञप्तिस्वरूपतः ।¦अनुग्रहोन्मुखत्वं तु नैवान्यत् क्वचिदिष्यते ॥’इति ब्रह्मतर्के ॥ १७-१९ ॥ | |||
| verse_lines = ‘भक्तानां स्मरणं विष्णोर्नित्यज्ञप्तिस्वरूपतः ।¦अनुग्रहोन्मुखत्वं तु नैवान्यत् क्वचिदिष्यते ॥’इति ब्रह्मतर्के ॥ १७-१९ ॥ | |||
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| verse_text = वयुनं= ज्ञानम् । ‘त्वद्दत्तया(यद्दत्तया) वयुनयेदमचष्ट विश्वम्’ इति वचनात् । जुहुराणं अस्मानल्पीकुर्वत्(अल्पं कुर्वत्) । युयोधि= वियोजय ।¦‘यदस्मान् कुरुतेऽत्यल्पांस्तदेनोऽस्मद् वियोजय ।¦नय नो मोक्षवित्तायेत्यस्तौद् यज्ञं मनुः स्वराड्॥’ इति स्कान्दे ।¦‘युयु= वियोगे’ इति धातुः । भक्तिज्ञानाभ्यां भूयिष्ठां (ते) नम इत्युक्तिं विधेम ॥¦पूर्णशक्तिचिदानन्दश्रीतेजःस्पष्टमूर्तये ।¦ममाभ्यधिकमित्राय(ममात्यधिकमित्राय) नमो नारायणाय ते ॥ | |||
| verse_lines = वयुनं= ज्ञानम् । ‘त्वद्दत्तया(यद्दत्तया) वयुनयेदमचष्ट विश्वम्’ इति वचनात् । जुहुराणं अस्मानल्पीकुर्वत्(अल्पं कुर्वत्) । युयोधि= वियोजय ।¦‘यदस्मान् कुरुतेऽत्यल्पांस्तदेनोऽस्मद् वियोजय ।¦नय नो मोक्षवित्तायेत्यस्तौद् यज्ञं मनुः स्वराड्॥’ इति स्कान्दे ।¦‘युयु= वियोगे’ इति धातुः । भक्तिज्ञानाभ्यां भूयिष्ठां (ते) नम इत्युक्तिं विधेम ॥¦पूर्णशक्तिचिदानन्दश्रीतेजःस्पष्टमूर्तये ।¦ममाभ्यधिकमित्राय(ममात्यधिकमित्राय) नमो नारायणाय ते ॥ | |||
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