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| "text": "श्रियः कमितुरानम्य चरणाम्बुरुहद्वयम् ।",
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| "text": "यथाबोधं विधास्यामः कथालक्षणपञ्चिकाम् ॥",
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| },
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "अथ कथां लिलक्षयिषुराचार्यवर्यः प्रारिप्सितप्रकरणपरिसमाप्त्यादि प्रयोजनेष्टदेवताप्रणतिनुतिपुरस्सरं विवक्षितमर्थं दर्शयति ॥",
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| "text": "नृसिंहमखिलाज्ञानतिमिराशिशिरद्युतिम् ।",
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| },
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "सम्प्रणम्य प्रवक्ष्यामि कथालक्षणमञ्जसा ॥ १ ॥",
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| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "इह हि कृतदेवतानतीनामपि या ग्रन्थापरिसमाप्तिस्सा भक्तिश्रद्धाद्यतिशयपूर्वकत्वाभावनिमित्ता न तत्पूर्वकप्रणामस्यप्रारिप्सितपरिसमाप्त्यहेतुतां गमयितुं शक्नोति । न ह्येकदेशव्यभिचारेण सामग्री व्यभिचारिणी स्यात् । अत एव भयाद्यतिशयपूर्वकत्वलक्षणं प्रणामस्य सम्यक्प्रकर्षं शिष्यान् ग्राहयितुं सम्प्रणम्येत्युक्तम् । कृतदेवतानतीनामपि समीहितसिद्धिस्सा कारणान्तरादपि भविष्यति । न ह्येकस्यैकमेव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "कथां विवक्षतस्तत्फलस्य अज्ञाननिवृत्त्युपलक्षिततत्त्वज्ञानस्य निष्पादकत्वेन नृसिंहस्तुतिरवसरोचितेति तथैव विशिनष्टि ",
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| "tag": "em",
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| "attrs": {
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| "type": "prateeka"
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| "text": "अखिलेति ॥",
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| "tail": " अखिलानि च तान्यज्ञानानि च अखिलाज्ञानानि । अखिलाज्ञानानि तिमिराणीव अखिलाज्ञानतिमिराणि । अशिशिरा अशीता द्युतिरस्येति अशिशिरद्युतिरादित्यः अखिलाज्ञानतिमिरनिरसने अशिशिरद्युतिरिव अखिलाज्ञानतिमिराशिशिरद्युतिः तम् । गम्यमानत्वात् निरसनपदाप्रयोगः । यथा अश्वयुक्तो रथोऽश्वरथ इति ।"
| |
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यद्यपि जल्पवितण्डे ख्यात्याद्यर्थे तथापि तत्वज्ञानपरिपन्थिपाषण्डादिनिरसनाङ्गे च भवतः । तत्र प्रधानत्वादुत्तरमेव, प्रयोजनं विवक्षित्वा कथामार्गत्रयस्याप्यज्ञाननिरसनमेव प्रयोजनमभि प्रेत्येदमुदितम् । अथ वा वादफलं अज्ञाननिरसनंप्राधान्यज्ञापनाय स्वशब्देनोपादाय ख्यात्यादिकमितरफलमुपलक्ष्य तस्य निष्पादकत्वेन परदेवता स्तूयते । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अज्ञातज्ञानं संशयविपर्ययादिव्युदासः ज्ञातस्थिरीकरणं च वादफलानि । जल्पवितण्डयोश्च पाषण्डप्रसञ्जितसज्जनसंशयविपर्यासनिरासः । संशयादयोऽपि तत्वज्ञानविरोधित्वेन अज्ञानान्युच्यन्ते । अतः कथात्रयनिरसनीयाज्ञानबाहुल्यमभिपरोत्य ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "em",
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| "attrs": {
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| "type": "prateeka"
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| "text": "अखिले",
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| "tail": "त्युक्तम् । "
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रवक्ष्यामीति प्रशब्देन उद्देशविभागपरीक्षाद्युपयोगि साहित्यलक्षणं लक्ष्यवचनस्य प्रकर्षमपि विवक्षितं द्योतयति । तेन न प्रतिज्ञान्यूनता शङ्कनीया । ",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "न चैवमुद्देशादीनां सर्वेषामपि वक्तव्यत्वेप्राप्ते व्यर्थं लक्षणस्यैव स्वशब्देनोपादनमिति वाच्यम् । कथां खलु सजातीयविजातीयसमस्तवस्तुव्यावृत्ततया व्यवहारयितुमिदमारभ्यते । व्यावृत्तव्यवहारश्च साक्षाल्लक्षणाधीनः । सास्नादिमत्त्वं प्रतीत्य हि गवि गोव्यवहारं कुर्वते । अनुद्दिश्य लक्षणकथनायोगात् लक्षणोक्त्युपयोगित्वमुद्देशस्य । अविभक्तस्य विशेषोद्देशासम्भवात् विभागस्यापि लक्षणाङ्गत्वमेव । लक्षणं च अनुमानतया व्यवहृतिहेतुः । न हि तस्य व्याप्तिपक्षधर्मतालक्षणपरीक्षामन्तरेण तद्भावो निश्चीयत इति परीक्षापि लक्षणाङ्गमेव । तदेवं लक्षणस्यप्राधान्यज्ञापनाय स्वशब्देनोपादानं, इतरस्य तदङ्गताद्योतनाय ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "em",
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| "attrs": {
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| "type": "prateeka"
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| },
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| "text": "प्र ",
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| "tail": "शब्देन सङ्ग्रह इति ।"
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| }
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| "tail": "\n "
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| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "स्यादेतत्, नैयायिकादिभिरेव कथालक्षणस्योक्तत्वात् किमनेन ? अन्यथा शब्दानुशासनादिकमपि कर्तव्यं स्यात् इत्यत उक्तम् ",
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| "tag": "em",
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| "attrs": {
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| "type": "prateeka"
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| "text": "अञ्जसेति ॥",
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| "tail": " स्वकीयवचनाञ्जस्यस्य प्रशब्देनोक्तत्वात् अन्योक्तीनामनेन अनाञ्जस्यमुपलक्षयति । तच्चोत्तरत्र प्रदर्शयिष्यते । विरुद्धयोरन्यतराञ्जस्यमितरानाञ्जस्येन व्याप्तमिति लक्षणाबीजम् । न चास्मदायत्ते वाग्व्यवहारे किमित्यवाचकं प्रयोक्ष्यामह इति वाच्यम् । स्वतन्त्रप्रयोग एव प्रयोजनान्वेषणात् । अयं तु लौकिकः प्रयोगः । दृश्यते हि सुकुमारोक्तिष्वेकप्रशंसनमितरापकर्षद्योतनार्थमिति । ननु किमनया प्रतिज्ञया ? यावता उत्तरग्रन्थ एव स्वकीयकथालक्षणविवक्षां ज्ञापयिष्यति । किं तया ज्ञापितया ? इति । सत्यं, प्रकरणस्य गतार्थताशङ्गानिरासार्थं तावत् अञ्जसा इति वक्तव्यम् । न चैतत् कथालक्षणं प्रवक्ष्यामीत्युक्तिमन्तरेण समर्थं स्यात् । न च मुख्यार्थद्वारमन्तरेण लक्षणा लभ्यते इति अन्यार्थमेवैतत्प्रतिज्ञानम् ।"
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "साधनचतुष्टयसम्पन्नस्याधिकारिणोऽपवर्गाय परमात्मतत्वज्ञानमुत्पादयितुं प्रवृत्तस्य आम्नायस्य इतिकर्तव्यताभूतो हि न्यायो वेदान्ते व्युत्पादितः । स च परार्थः । प्रश्नोपक्रमप्रतियोगिनि एककर्तृके विचारे विविच्य प्रवर्तनीयः । दूषणोपक्रमप्रतियोगिनि अनेककर्तृके कथानामि्न प्रवर्त्य विवेचनीयः । कथां च व्युत्पादयतोऽस्य प्रकरणस्य वेदान्ताङ्गतया तत्प्रयोजनादिनैव प्रयोजनादिमत्ता सिद्धैवेत्यनवद्यम् ॥ १ ॥",
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "अथ कथां विभागेनोद्दिशति",
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| "tag": "prateeka",
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| "tag": "line",
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| "text": "वादो जल्पो वितण्डेति त्रिविधा विदुषां कथा ।",
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| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " तत्वनिर्णयैकप्रयोजनत्वेन अभ्यर्हितत्वात् वादस्य प्रथममुद्देशः । उभयसाधनवत्तया सदधिकारितया च वादसाम्यात् तदनन्तरं जल्पस्य । परिशेषतो जल्पानन्तरं वितण्डायाः । कथकभेदेन कथानन्त्यात् तत्तल्लक्षणोपाधिक्रोडीकृतराशिविवक्षया त्रित्वमिति दर्शयितुं त्रिविधेत्यक्तम् ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु सामान्यलक्षणाभिधानेन विना कथं विभागोद्देशावसरः ? अवच्छेदकैक्येनैक्यमापन्नं हि वस्तु विभज्योद्देष्टव्यम् । अथ कथाशब्दं वाक्यप्रबन्धे व्युत्पादितं सिद्धवक्तृत्य न पृथक् सामान्यलक्षणमुच्यते तर्हि भारतादीनामपि वाक्यप्रबन्धत्वेन कथात्वात् कथं कथात्रैविध्यं ? नहि तानि वादादिष्वन्तर्भवन्तीत्यतो योगरूढिसमाश्रयणेन सामान्यलक्षणं सूचयति ॥ विदुषामिति ॥ जाताविदं बहुवचनं । तेन अनेकविद्वत्कर्तृको विचारगोचरो वाक्यप्रबन्धः कथा । सा वादादिभेदेन त्रिविधेत्युक्तं भवति । वैदुष्यं च कथामहावाक्यस्य निर्वाहकत्वम् । ततः स्वस्थः सर्वजनप्रत्ययावलम्बी सावधानोऽकलहकारश्चेत्यादयः कथका दर्शिताः । पूर्वोत्तरपक्षबलाबलचिन्ता विचारः । अत्रानेककर्तृकत्वोक्त्या एककर्तृकेभ्यो मीमांसावाक्येभ्यो व्युदासः । वैदुष्योक्त्या कलहादिभ्यः । विचारगोचरत्वेन विदुषामन्योन्यसुखव्यवहारेभ्यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "कथा याथात्म्यविदुषां मतेन त्रिविधेति वा । तेन एक एव कथामार्ग इति बाह्याः । वादवितण्डे द्वे एवेति श्रीहर्षः । वादो जल्पो वादवितण्डा जल्पवितण्डा चेति चतस्रः कथा इति गौडनैयायिकाः । ते समस्ता निरस्ता भवन्ति । उपपत्तिं तूत्तरत्र प्रदर्शयिष्यामः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "तत्र यथोद्देशं वादलक्षणमाह",
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| "tail": "\n "
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| },
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| "tag": "prateeka",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "तत्वनिर्णयमुद्दिश्य केवलं गुरुशिष्ययोः ॥ २ ॥",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "कथाऽन्येषामपि सतां वादः..... ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अत्र केवलं तत्वनिर्णयमुद्दिश्य कथा वाद इत्येकं लक्षणम् । तत्र तत्वं प्रमाणसिद्धं वस्तु । तस्य निर्णयः अज्ञातस्य ज्ञानं संशयविपर्ययव्युदासः अभ्यनुज्ञानेन दृढीकरणं चेति त्रिविधः । यदा हि ख्यात्यादि अर्थयमानौ विजिगीषू सद्भ्यामेव साधनदूषणाभ्यां स्वपरपक्षसाधनोपालम्भौ कुर्वाते स जल्पोऽपि भवति तत्वनिर्णयहेतुः । न ह्यसदेव जल्पे वक्तव्यमिति नियमः । प्रतीयमानसदतिक्रमे कारणाभावात् । किन्नाम ? सदपरिस्फूर्तौ ‘ऐकान्तिकपराभवात् वरः पाक्षिकः ’ इति मन्वानोऽसदप्युपादत्ते । न च तत्साधनं तत्वनिर्णयं न करोतीति सम्भवति । व्याघातात् । अतः ‘तत्वनिर्णयहेतुः कथा वादः ’ इत्यभिहिते जल्पविशेषेऽपि गतत्वादुद्दिश्येत्युक्तम् । न हि तत्वनिर्णयहेतुरपि जल्पस्तदुद्देशेन क्रियते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "यदा च स्वयमध्यवसितार्थः कारुणिकतया पाषण्डप्रसञ्जितौ लोकस्य संशयविपर्ययौ पराकर्तुं तज्जिगीषुर्यां वितण्डामारभते साऽपि तत्वनिर्णयमुद्दिश्य कथा भवत्येव । तत्र प्रसङ्गपरिहाराय केवलमित्युक्तम् । भवेत् या वितण्डा लोकसंशयविपर्यासनिरासं ख्यात्यादिकं चोद्दिश्य प्रवर्तते तस्या अनेन व्युदासः । या तु केवलं संशयाद्यपकरणायैव, कथं ततो व्यावृत्तिः ? इति चेन्न । केवलशब्दस्य साक्षादर्थत्वात् । न हि काऽपि वितण्डा साक्षात्तत्वनिर्णयं करोति । किन्तु ? परपराभवद्वारैव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "एतेनैतदपि निरस्तं, केवलं तत्वनिर्णयहेतुरित्येतावतैव सदुपायजल्पव्यवच्छेदसिद्धौ उद्देशग्रहणमतिरिच्यत इति । विवक्षितकेवलार्थस्य तत्रापि गतत्वात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु कथकगततत्वनिर्णयविवक्षया लक्षणे व्याख्याते वितण्डायां प्रसङ्ग एव नास्ति । न हि विनिश्चितार्थः स्वात्मीयतत्वनिर्णयाय तत्र प्रवर्तते,प्राप्तत्वादेव । अभ्यासार्थमिति चेन्न । तथा सति सत्प्रयोगनियमप्रसङ्गात् । नापि पाषण्डिनस्तत्वनिर्णयाय अनुपयोगात् असत्साधनैस्तदयोगाच्च । सोऽपि संसदि पराभूतः तत्वजिज्ञासुर्भविष्यतीति चेन्न ।प्रायो विद्वेषस्यैव सम्भवात् । अतः केवलग्रहणमनर्थकमिति । सत्यम् । यथा नैवं व्याख्यातुं शक्यं तथा वक्ष्याम इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सतां कथा वाद इत्यपरं लक्षणम् । तर्हि जल्पेऽतिव्यापकमित्यतः सन्तो व्याख्याताः गुरुशिष्ययोरन्येषां सखिसब्रह्मचार्यादीनामपीति । अदुष्टमनसस्सन्तः । ते च प्रकृतोक्तिका अविप्रलम्भका यथाकालस्फूर्तिका अनपेक्षकाः प्रमाणसिद्धसम्प्रत्यायिनश्चेत्यादयः । एवम्भूताश्च गुरुशिष्यादय एवप्रायेणेति त एव दर्शिताः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
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| ],
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| "tail": "\n "
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| },
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| "attrs": {
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| "children": [
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "ननु यदा विदिततत्वौ अदुष्टमनसौ परप्रार्थितौ कथां कुरुतः स वादो न वा ? आद्ये अव्यापकमाद्यं लक्षणं, द्वयोरपि तत्वज्ञानितया तदुद्देशिताभावात् । द्वितीयमतिव्यापकम् । सेयमुभयतः पाशा रज्जुः इत्यत आह–",
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| |
| },
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| {
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| "tag": "prateeka",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "वा समितेश्शुभा ।",
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| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "न केवलमियं वादकथा कथकगततत्वनिर्णयार्था विवक्षिता । किन्नाम ? यदा गुरुशिष्यौ तदा शिष्यस्य, यदा सखिप्रभृतयः तदा सर्वेषां, यदा तु विदिततत्वौ तदा कृतप्रार्थनायाः ",
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| "children": [
| |
| {
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| "tag": "em",
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| "attrs": {
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| "type": "prateeka"
| |
| },
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| "text": "समितेः शुभा",
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| "tail": " शुभस्य तत्वनिर्णयस्य हेतुः । सामान्यं चात्र विवक्षितम् । न च सामान्येनोक्तस्य विशेषावलम्बेन दोषावकाश इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "क्रमप्राप्तं जल्पं लक्षयति",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ख्यात्याद्यर्थं स्पर्धया वा सतां जल्प इतीर्यते ॥",
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| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " कथेत्यनुवर्तते । केवलं स्पर्धया स्पर्धानिमित्तपरपराभवोद्देशेन ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
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| "text": " सतामिति ॥",
| |
| "tail": " तत्वज्ञानयोग्यानां । जातौ चेदं बहुवचनम् । ननु ख्यातिलाभपूजापरखिलीकरणानि समस्तानि व्यस्तानि वा उद्देश्यानि जल्पे विवक्ष्यन्ते ? नाद्यः , एकैकोद्देशेन प्रवृत्तौ अव्यापनात् । न द्वितीयः , परस्पराव्याप्तेः । मैवम् । तत्वनिर्णयातिरिक्तफलोद्देशेन सत्कथा जल्प इति लक्षणार्थत्वात् । फलान्तरं च ख्यात्यादिकमिति तद्ग्रहणम् । सत्कथा वादोऽपि भवतीति तद्व्युदासाय ख्यात्याद्युक्तिः । वादविशेषोऽप्यानुषङ्गिकख्यात्यादिहेतुर्भवतीति तद्व्यवच्छेदार्थं उद्देशग्रहणं । वितण्डाव्यवच्छेदाय सतामिति । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
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| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "इतीर्यत",
| |
| "tail": " इत्यनेनागमसम्मतिकथनेन जल्पनिराकरणोपपत्तेराभासतां दर्शयति । आगमश्च ‘वादो जल्पो वितण्डा’ इत्यादिः अन्यत्रोदाहृतः ॥"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
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| "parent": "KL_C01_V04",
| |
| "name": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "vyakhya",
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| "text": "वितण्डालक्षणं दर्शयति",
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| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वितण्डा तु सतामन्यैः ... ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " कथेत्यनुवर्तते ।प्रागिव बहुवचनव्याख्यानम् । ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "em",
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| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
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| "text": "अन्यैः ",
| |
| "tail": " असद्भिस्सह । ‘फलभेदाभावेन न जल्पात् वितण्डा भिध्यते’ इत्येके । तन्निरासाय "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
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| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
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| },
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| "text": "तु",
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| "tail": "शब्देन व्यवच्छिनत्ति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु तत्वज्ञानयोग्यतालक्षणं सत्त्वं यदि कथकाभिमानसिद्धं विवक्षितं तदा वितण्डानवकाशः । द्वयोरपि स्वाभिमानतस्सत्त्वात् । अथ वास्तवं, तथापि न जल्पवितण्डे तदनिश्चयात् । निश्चये वा न वितण्डा स्यात् । न हि विनिश्चितस्वासाधुभावः परसाधुतां विनिश्चित्य वितण्डायै घटितुमर्हति । नैव दोषः । कथाविशेषव्यवस्थाया वादिप्रतिवादिव्यवस्थायाश्चप्राश्निकविधेयत्वात् । ते च शास्त्रोदितलक्षणैः सत्त्वासत्त्वे विनिश्चेष्यन्ति । अत एवप्राश्निकानां वैष्णवत्वनियमो वक्ष्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु कथं जल्पवितण्डयोर्भेदः ? न तावत् फलभेदेन, जल्पवत् वितण्डाया अपि ख्यात्याद्यर्थत्वात् । पाषण्डिपराकरणेन तत्वनिर्णयोऽपि क्वचित् भवतीति चेत् सत्यम्, क्वचिद्भेदाभावापत्तेः । निमित्तैक्याभावेन कथैक्यानुपपत्तेः । नाप्यधिकारिभेदेन निर्निमित्तस्य तस्यैवासम्भवात् । ‘स्वरूपभेदाभावेऽपि वितण्डायां सदसतोरधिकारः ’ इति वचनानुपपत्तेश्च । सदसन्तौ यां कथां कुरुतः सा वितण्डेति चेन्न । तथा सति पुरुषानन्त्येन कथानन्त्यापत्तेरिति । नैष दोषः । प्रवृत्तिप्रकारभेदेन तद्भेदोपपत्तेः । द्वयोरपि स्वपरपक्षसाधनदूषणवान् जल्पः । वितण्डा तु प्रतिवादिनः स्वपक्षसाधनेन विना परपक्षप्रतिक्षेपमात्रेण पर्यवस्यतीति । अधिकारिभेदस्तूपलक्षणत्वेनोक्तः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "नन्वेतदप्यसम्बद्धम् । जल्पे हि वादिसाधनप्रतिक्षेपाय प्रतिवादिनोद्भावितं दूषणं यदि लग्नं तर्हि भग्नं वादिसाधनं जितं प्रतिवादिना । निवृत्ता कथा । यदि न लग्नं तर्हि निरनुयोज्यानुयोगेन भग्नः प्रतिवादी । जितं वादिना । निवृत्ता कथा । तत्र द्वयोरपि क्वास्ति साधनदूषणावकाशः ? एवमेव तत्करणे द्विर्द्विः एकैकेनैव साधनं दूषणं च किं न कर्तव्यम् ? मैवम् । कथकशक्तिपरीक्षणार्थत्वाज्जल्पस्य । न च तत् उभयकरणमन्तरेण सम्भवति । न हि वञ्चितपरप्रहारोऽपि तमप्रहरमाणो युयुत्सुर्विजयते । नापि स्वात्मानमरक्षन् परप्रघाती विजयी । परन्तु श्लाघ्यस्स्यात् । न च द्विरनुष्ठानस्य प्रयोजनमस्ति । प्रत्युत आधिक्येन निग्रहापत्तेः । कथं तर्हि वितण्डायां परप्रतिक्षेपमात्रेण विजय इति चेत् ? सत्यं, मुख्यविजयाभावेऽपि काकोलूकवत्प्राश्निकादिकृतसमयवशेनोपपत्तेः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अथप्राश्निकादयस्तादृशं समयमेव कस्मात्कुर्युः ? इति चेत् तत्राह–",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "prateeka",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "....तत्वमेषु निगूहितम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "कर्तव्यमिति शेषः । यतोऽसत्सु सता तत्वं निगूहितं कर्तव्यं, अन्यथा प्रत्यवेयात् । साधने च प्रकाशनं प्रसज्येत । अतोऽसदुपालम्भेनैवप्राश्निकादयः सतो विजयमनुजानन्ति । जल्पे तु द्वयोरपि सत्त्वेन मुख्यस्यैव विजयोपायस्यानुष्ठानसम्भवेन स्वपरपक्षसाधनोपालम्भाभ्यामेव विजयं नियच्छन्तीति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "लक्षिता वादजल्पवितण्डाः । तत्र जल्पवितण्डयोरिव वादस्यापिप्राश्निकसापेक्षतां केचिदङ्गीकुर्वते । यथाऽऽहुः , ‘स्वपरपक्षसिद्ध्यसिद्ध्यर्थं वचनं वादः । अधिकरणप्रत्यायनं सिद्ध्यसिद्धी । अधिकरणमितिप्राश्निकानां सामयिकी सञ्ज्ञा’ इति । तान्निराचिकीर्षुराह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "prateeka",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वयं वा प्राश्निकैर्वादे चिन्तयेत् ... ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रमेयमिति शेषः । स्वयं, वादी प्रतिवादिना प्रतिवादी च वादिना इति प्रत्येकं सम्बन्धे नैकवचनोपपत्तिः । कुतो वादेप्राश्निकानपेक्षा ? तत्राह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": ".... तत्वनिर्णयम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " उद्दिश्येति शेषः । अयमाशयः ,प्राश्निकानां हि वादस्थानं कथाविशेषव्यवस्थापनं पूर्वोत्तरवादव्यवस्थापनं विवदमानयोर्गुणदोषावधारणं भग्नप्रतिबोधनं लौकिकनिष्पन्नकथाफलप्रतिपादनं चेत्यादीनि कर्माणि । एतानि च यत्र वादिनौ आग्रहगृहीतौ कर्तुमशक्तौ तत्रप्राश्निकानामुपयोगः । वादे तु वादिनावेव तत्वनिर्णयकामौ वीतरागतया कर्तुं शक्ताविति किंप्राश्निकैः ? इति । तत् किं परिवर्जनमेव वादेप्राश्निकानां ? मैवम् । दैवादागतानामुपादानमित्युक्तम् ॥ वाप्राश्निकैरिति ॥ एतच्च संवादेनप्रामादिककथाभासशङ्काऽपनोदाय । न तूक्तकर्मकरणायेति ज्ञातव्यम् । सभापतिस्तु नेष्यत एव । यथाशक्ति यथानियमं मानापमानव्यञ्जनादिकं खलु तस्य कर्म । तत्किञ्चित् वादे नापेक्षितमेव । किञ्चित् स्वयं शक्यते सम्पादयितुमिति । एतेन जल्पवितण्डयोः सभ्यसभापतिप्राश्निकादिनियतिः सूचिता भवति । तत्रोक्तकर्मणां वादिप्रतिवादिभ्यामेव विजिगीषुतया कर्तुमशक्यत्वादिति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V05",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "प्राश्निकानां लक्षणं वक्ति",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "prateeka",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "रागद्वेषविहीनास्तु सर्वविद्याविशारदाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्राश्निका इति विज्ञेयाः .....",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
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| "text": "रागित्वे असन्तमपि पक्षं सन्तम् वदेयुः द्वेषित्वे सन्तमप्यसन्तम् । ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "em",
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| "attrs": {
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| "type": "prateeka"
| |
| },
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| "text": "तु",
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| "tail": " शब्दोऽप्यर्थः । तेन वादिप्रतिवादिनोरन्यतरपरवशत्वादीनां बुद्धिपूर्वं वैपरीत्याचरणहेतूनामसद्भावं समुच्चिनोति । सर्वविद्यापदेन वादिप्रतिवादिदर्शनयोः कथोपयुक्तव्याकरणादीनां च संग्रहः । तदज्ञत्वे अपसिद्धान्ताद्युद्भावने निर्णयो न स्यात् । वैशारद्यग्रहणेन च पुरोक्तग्रहणावधारणानुवादादिपटुताऽपि सङ्गृह्यते । अन्यथा सर्वविद्याज्ञानवैयर्थ्यापत्तेः । तदेवं ज्ञानतोऽज्ञानतो वा वादिप्रतिवादिनोर्वैषम्यमनाचरन्तो यथावस्तुवक्तारः प्राश्निका इति विज्ञेयाः । "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ते च कियन्तः ? इत्यपेक्षायामाह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "prateeka",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "........ विषमा एक एव वा ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "विषमाः",
| |
| "tail": " विषमसङ्ख्याकाः । यथोक्तं–"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": "रागद्वेषविनिर्मुक्तास्सप्त पञ्च त्रयोऽपि वा ।"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "br",
| |
| "tail": " यत्रोपविष्टास्सभ्यास्स्युस्सा यज्ञसदृशी सभा ॥ इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "विषमसङ्ख्याकत्वे हि तेषामेव परस्परविरोधे सति बहूनां संवादेन निर्णयः स्यात् । तथा चोक्तं ‘द्वैधे बहूनां वचनम्’ .... । इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
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| "parent": "KL_C01_V06",
| |
| "name": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "नन्वेवं चेत् एक एव इत्यनुज्ञानं कथम् ? संवादाभावेन तत्कृतकथानिर्णये अनाश्वासादित्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "prateeka",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अशेषसंशयच्छेत्ता निस्संशय उदारधीः । एकश्चेत्प्राश्निको ज्ञेयस्सर्वदोषविवर्जितः ॥ ६ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " अत्र आद्येन विशेषणेन भग्नप्रतिबोधनादौ सामर्थ्यातिशयो दर्शितः । द्वितीयेन विशेषणेन सिद्धान्तद्वयरहस्यवेदित्वाद्यतिशयः , तृतीयेन परोक्तग्रहणादिपाटवातिशयः , चतुर्थेन रागादीनामशेषतोऽभावः । ततश्चप्राश्निकलक्षणातिशयसम्पत्त्या निश्शङ्कमुभाभ्यां निश्चितश्चेदेको वाप्राश्निकोऽङ्गीकार्य एवेत्युक्तं भवति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V07",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
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| "text": "विशेषणान्तरमाह",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एको वा बहवो वा स्युर्विष्णुभक्तिपरास्सदा ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "रागादिराहित्यवत् विष्णुभक्तेः प्राश्निकत्वोपयोगं न पश्याम इत्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विष्णुभक्तिर्हि सर्वेषां सद्गुणानां स्वलक्षणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
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| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "हि",
| |
| "tail": " शब्दो हेतौ । सन्तो गुणा येषां पुसां ते सद्गुणाः । स्वलक्षणं अव्यभिचारिलक्षणम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "इदमुक्तं भवति, यतः प्राश्निकैर्हि कथकयोः सदसद्भावं विविच्य सतोर्जल्पः सदसतोर्वितण्डा दातव्या । तत्रापि असतः स्वपरपक्षसाधनदूषणलक्षणं वादित्वं, सतस्तु परपक्षप्रतिक्षेपलक्षणं प्रतिवादित्वं व्यवस्थापनीयम् । असतो जये सति उदासितव्यम् । सतो जये सति सम्पूर्णसम्माननाय घटनीयम् । अन्यथा पाषण्डिनिरासाभावेन वितण्डावैयर्थ्यप्रसङ्गात् । न चैते कथाविशेषव्यवस्थापनादयो गुणाः तेषां विष्णुभक्तिं विना सम्भवन्ति । अतः प्राश्निकत्वोपयोगिगुणकारणत्वात् तेषां विष्णुभक्तिर्विधीयत इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु वादजल्पयोः को भेदः ? द्वयोरपि सदधिकारित्वात् स्वरूपभेदाभावे अधिकारिभेदस्यातिप्रसञ्जकत्वाच्च । अत एव तत्वबुभुत्सुत्वख्यात्यादिकामत्वरूपोऽधिकारिविशेषोऽपि अनुपयोगितया परास्तः । वादस्तत्वज्ञानं प्रसूते जल्पस्तु ख्यात्यादिकमिति भेद इति चेन्न । स्वरूपभेदाभावेऽस्य फलभेदस्यैव अनिर्वाहात् । न हि कथा कल्पलता येन स्वयमविचित्राऽपि सती पुरुषमनोरथवशेन विचित्रं फलं प्रसुवीत । न च जल्पवितण्डयोरिव प्रवृत्तिप्रकारभेदेन फलभेदः । उभयत्रापि स्वपरपक्षसाधनोपालम्भ सद्भावेन तदभावादिति । मैवम् । प्रमाणतर्काभ्यामेव वादे स्वपरपक्षसाधनोपालम्भौ क्रियेते, जल्पे तु प्रमाणतर्काभ्यां छलादिना च । न चोभयोः प्रमाणतर्कासम्भवः । अभिप्रायनियमस्य विवक्षितत्वात् । तदेवं प्रवृत्तिप्रकारभेदात् युक्तः फलभेदः , कथाभेदश्च सम्भवतीत्याशयवान् वादप्रकारं तावत् दर्शयति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V08",
| |
| "name": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "prateeka",
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| "text": "\n ",
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| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पृष्टेनाऽगम एवादौ वक्तव्यः",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " वादे, प्रतिवादिना वादिनं प्रति विचार्ये प्रमेये प्रमाणं प्रष्टव्यम् । पृष्टेन च वादिना तावदागम एव वक्तव्यः न तु छलादिना प्रश्नखण्डनं कर्तव्यम् । नाप्यनुमानं दुरागमो वा वक्तव्यः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " छलादिना प्रश्नखण्डनमकृत्वा कुतो वादिना प्रमाणमभिधेयम् ? इति तत्राह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "........ साध्यसिद्धये ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " वादी हि तत्वनिर्णयं कामयते । न तु परपराभवम् । प्रमाणमेव च तत्वनिर्णयाय प्रभवति । न तु छलादिना प्रश्नखण्डनम् । आगमः कुतो वक्तव्यः ? इत्यत्राप्येतदेवोत्तरम् । आगमो हि साध्यसिद्धये कल्पत इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अस्त्वागमस्य वक्तव्यता तन्नियमस्तु कुतः ? अनुमानेनापि साध्यसिद्धिसम्भवात् इत्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "नैषा तर्केणापनेया मतिरित्याह हि श्रुतिः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " यस्मात् तत्वमतेरनुमानासाध्यतामाह श्रुतिः तस्मादागमनियमः ॥ वादिना आगमेन स्वपक्षे साधिते प्रतिवादिना किं कर्तव्यम् ? वाद्युपन्यस्तं प्रमाणं दूषणीयम् । प्रतिपक्षे तस्मिञ्जागरूके तत्वनिर्णयायोगात् । उभयत्र प्रमाणोपपत्तौ संशयानतिक्रमात् । उपस्थितसाधनादूषणे स्वपक्षसाधनस्यानवसरात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " आगमस्य च दूषणं कीदृशम् ? इत्यपेक्षायामाह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः प्रतिवादिना ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " द्वेधा हि प्रमाणदूषणं, सर्वथा निर्विषयत्वापादनं पराभिमतार्थप्रच्यावनं च । तत्रागमस्यायथार्थताकथनेन वाद्यभिमतार्थप्रच्यावनमेव प्रतिवादिना कर्तव्यं, न तु सर्वथा अप्रामाण्यं ।कुतो नाप्रामाण्यं वक्तव्यमिति चेत् ? आगमशब्देन हि सदागमा विवक्षिताः । सदागमाश्च श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणलक्षणा एव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V09",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तत्र श्रुतीनामपौरुषेयत्वेन अप्रामाण्यकारणशून्यानामप्रामाण्यं वक्तुं तावन्न शक्यम् । स्मृत्यादीनामप्याप्तप्रणीततया श्रुत्यानुकूल्येन च दोषाभावनिश्चयान्नाप्रामाण्यं वक्तुं शक्यते । अतो विषयान्तरोपदर्शनेन वाद्यभिमतार्थप्रच्यावनमेव न्याय्यमित्याशयवानाह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "prateeka",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ऋग्यजुस्सामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "मूलरामायणं चैव सम्प्रोच्यन्ते सदागमाः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनुकूला य एतेषां ते च प्रोक्तास्सदागमाः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "च",
| |
| "tail": "कारा अन्योन्यसमुच्चये । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "एव",
| |
| "tail": "कारस्त्वेत एव सदागमा इत्यनेन सम्बद्ध्यते । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "सम्प्रोच्यन्ते प्रोक्ता ",
| |
| "tail": " इत्यनेन ऋगाद्या भारतं चैव इत्यागमं सूचयति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V10",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु यदा वादी परिगणितं वेदादिकं वदेत् तदा प्रतिवादिनाऽन्योऽर्थोऽभिधीयताम् । यदा तु उपरिगणितं पाशुपतादिकम भिदधीत, तदा तु अप्रामाण्यं वक्तुं शक्यत एव । अतः कथं अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः इति नियमः ? इत्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्ये दुरागमा नाम तैर्न साध्यं हि साध्यते ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " यतः परिगणितेभ्योऽन्ये दुरागमाः प्रसिद्धाः दुरागमास्तदन्य इत्यादौ । अतो वादिना तत्वबुभुत्सुना ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "तैर्न साध्यं साध्यते ",
| |
| "tail": "। साध्यसाधनाय ते न प्रयोक्तव्या एव । तथा च सर्वथा अप्रामाण्यकथनस्य अप्रसङ्गात् उक्तनियमो युक्त एव ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V11",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " वादिप्रयुक्तागमस्यार्थान्तरकथनेन किं प्रतिवादी चरितार्थः ? नेत्याह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स्वपक्ष आगमश्चैव वक्तव्यः प्रतिवादिना ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "साध्यसिद्धेः प्रमाणैकाधीनत्वादिति एवकारार्थः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "एवं प्रतिवादिना परपक्षप्रतिक्षेपे स्वपक्षसाधने च कृते वादी किं कुर्यात् ? इत्यपेक्षयामाह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तस्याप्यन्यार्थता साध्या वादिना ..... ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "अपिः"
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "'वादिना'",
| |
| "tail": " इत्यनेन सम्बध्यते । अर्थान्तरकथनमात्रस्याप्रयोजकत्वात् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "साध्ये",
| |
| "tail": "त्युक्तं । एवम् अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः इत्येतदपि साध्यः इति व्याख्येयम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "कुतो वादिना प्रतिवाद्युक्तागमस्यार्थान्तरं साध्यं ? तत्राह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "...... स्वार्थसिद्धये ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " न हि प्रतिपक्षप्रमाणे सति स्वप्रमाणमात्रेण वादिनस्तद्दूषणेन विना स्वसाध्यं सिद्ध्यति । सप्रतिपक्षस्य प्रमाणत्व एव सन्देहात् । प्रतिवादिप्रमाणदूषणं चप्रागुक्तन्यायेनार्थान्तरकथनमेव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V12",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "किमेतावता जितं वादिना ? नेत्याह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्यार्थता निराकार्या स्वागमस्य ...... ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "वादिना स्वप्रयुक्तागमस्य या प्रतिवाद्युक्ता ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "अन्यार्थता ",
| |
| "tail": " सा "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "निराकार्या ",
| |
| "tail": " च ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "कुतः ? इत्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "......... विनिश्चयात् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " ल्यब्लोपनिमित्ता पञ्चमी तत्वनिश्चयमुद्दिश्येति । प्रतिवादिना अर्थान्तरकथनेन वाद्यभिमतार्थात् प्रच्यावित आगमः कथं नाम तत्वनिश्चयाय प्रभवेत् ? कथं च प्रतिपक्षदूषणमात्रेण वादिनो निस्साधनस्तत्वनिश्चयस्स्यात् ? इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु वादिप्रयुक्तागमस्य प्रतिवाद्युक्ता अन्यार्थता वादिना कथं निराकर्तुं शक्या ? ‘मदभिमत एवार्थः ’ इत्येवंवादिनि वादिनि ‘न त्वदभिमतः किन्तु ? मदभिमत एव’ इति प्रतिवाद्यपि हि वक्तुं शक्नोत्येव । ततश्च कथं वाद्यागमार्थनिर्णयस्स्यात् ? इत्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "उपपत्त्यवकाशोऽत्र ह्यागमार्थविनिर्णये ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "हि ",
| |
| "tail": " यस्मादागमार्थविनिर्णयार्थमुपपत्तीनामवकाशः तस्मात् वाद्यागमार्थनिर्णयो युक्तः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "एतदुक्तं भवति, आगमो हि न वेदादिमात्रं । तस्यार्थप्रमाजननासामर्थ्यात् । किं नाम ? श्रुतो गृहीतसङ्गतिकोऽनुसंहितोपक्रमाद्युपपत्तिको वेदादिः । तस्य प्रमित्यव्यभिचारात् । तथा च वादिना स्वप्रयुक्तागमस्य स्वाभिमतार्थे उपक्रमाद्युपपत्त्यानुगुण्यं प्रतिवाद्युक्तार्थे तद्वैगुण्यं व्युत्पादनीयमेव । ततश्च कथं नाम तत्वनिर्णयो न स्यात् ? इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V13",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " एवं वादिना स्वागमस्योपपत्तिवशेन स्वाभिमतार्थेप्रामाण्यं साधितवता स्वपक्षे साधिते, परोपन्यस्तागमस्य च अर्थान्तरमुक्तवता परपक्षे दूषिते निवृत्तो वाद इति न मन्तव्यं; किं नाम ? इत्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वाद्यागमार्थे निर्णीत आगमार्थः परस्य तु ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "परस्य ",
| |
| "tail": " इत्येतत् सामर्थ्यात् "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "आगम ",
| |
| "tail": " शब्देन सम्बद्ध्यते । उपपत्त्यानुगुण्येन वाद्यागमस्य तदभिमतार्थपरत्वे निर्णीते, तेन च तस्य च स्वपक्षसाधनसम्पत्तौ सत्यां, पश्चात् परप्रयुक्तागमस्य उपपत्तिवशेनैव प्रतिवाद्यभिमतार्थनिरासपुरस्सरं वाद्यभिमतार्थविषयता समर्थनीया ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "निर्णेयः सहितैः पश्चात् ........................ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "इयांस्तु विशेषः , यथा वाद्यागमार्थनिर्णये वादिभावेन उपपत्तिचिन्ता क्रियते, न तथा प्रतिवाद्यागमार्थनिर्णये । किन्तु ? सहितैः सुहृद्भावेन सङ्गतैः । कुत एतत् ? वादिना स्वपक्षस्य सुदृढतरं साधितत्वात् तत एव प्रतिवादिनः परपक्षप्रतिक्षेपाक्षमत्वात् प्रतिपक्षसाधनस्य चार्थान्तरकल्पनेनप्रामाण्यसन्देहात्, प्रबलदुर्बलयोश्च वादिप्रतिवादिभावायोगादिति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु पुनः प्रतिवाद्यागमार्थमीमांसानुष्ठानं किंनिबन्धनम् ? उक्तरीत्या वादिपक्षप्राबल्यस्य प्रतिवादिपक्षदौर्बल्यस्य च निश्चितत्वात् इत्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "..... ततो निश्शेषनिर्णयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "वादिना उपपत्त्यानुगुण्यवैगुण्याभ्यां स्वागमस्य स्वाभिमतार्थसमर्थन पराभिमतार्थनिरसनानुष्ठानेन स्वपक्षसाधने विहिते, प्रतिवादिप्रयुक्तागमस्यार्थान्तरकल्पनेन तत्पक्षे दूषितेऽपि तत एव प्रतिवादिनः परपक्षोपालम्भस्वपक्षसाधनाक्षमत्वेऽपि प्रतिवाद्यागमस्य वादिप्रतिवाद्युक्तार्थयोरुपपत्त्यानुगुण्यवैगुण्यसमर्थन एव तत्वनिर्णयो भवति नान्यथेति तदनुष्ठेयमेव ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु परस्परविरुद्धयोर्वादिप्रतिवादिपक्षयोः वादिपक्षे प्रबले सति कथं तत्वनिर्णयो न स्यात् ? इति चेन्न । वादिना प्रतिवाद्यागमस्यार्थान्तरे अभिहिते, परमार्थतः को न्वर्थः स्यात् ? इति संशयसद्भावेन वादिपक्षेप्राबल्य एव शङ्काशूकसद्भावात् । न च सति तस्मिन् वादसाध्यस्तत्वनिर्णयः । तदिदमुक्तं ॥ निश्शेषेति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "वाद्यागमस्योपपत्तिवशेन वाद्यभिमतार्थपरत्वे अवधारिते तदानुगुण्येन प्रतिवाद्यागमस्यापि वाद्यभिमतार्थपरत्वनिश्चयेन सन्देह एव कुतः ? सावकाशस्य निरवकाशविरोधेन बाधितत्वादिति चेन्न । वाद्यागमस्य प्रतिवाद्यागमार्थविचारे अव्यापारितत्वात् । व्यापारितत्वे वा को नाम पुनर्युक्त्यनुसरणं विदध्यात् ? इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अनेनैव न्यायेन प्रतिवादिपक्षप्राबल्यमपि व्युत्पादनीयम् । न हि वादिन एव जयोऽपरस्य पराभव इति नियतिरस्ति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V14",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु यदि परश्चक्षुराद्येकप्रमाणके साक्ष्येकविषये वा अर्थे प्रमाणं पृच्छेत् तदा परेण किं तूष्णीमासितव्यम् ? प्रत्यक्षादिकं वा वक्तव्यम् ? आद्ये साध्यासिद्धिः । द्वितीये तु आगम एव वक्तव्यः इति नियमभङ्गः । न च प्रत्यक्षसिद्धेऽर्थे विप्रतिपत्तिरेव न सम्भवति तत्प्रामाण्यासम्प्रतिपत्त्यभिप्रायेण तदुपपत्तेरिति । तत्राह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "प्रत्यक्षसिद्धेष्वर्थेषु प्रश्ने मामक्षजं वदेत् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "प्रत्यक्षसिद्धेषु ",
| |
| "tail": " चक्षुराद्येकविषयेषु । प्रश्ने प्रमाणस्येति शेषः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "मां ",
| |
| "tail": " प्रमाणम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "ज्ञानं वा ज्ञानसिद्धेषु .................... ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " ज्ञानं साक्षिणम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " तर्ह्यागमनियमभङ्ग इति चेन्न । ‘आगम एव’ इति नियमस्य अनुमाननिरासपरत्वेन प्रत्यक्षानिरासादिति भावेनाह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": ".......... नानुमां प्रथमं वदेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "नन्वेतदपि नास्ति ‘उपपत्त्यवकाशोऽत्र’ इत्युक्तत्वात् इत्यत उक्तम् ॥ प्रथममिति ॥ अङ्गतया आनन्तरिकप्रयोगनिषेधोऽनुमानस्य न नियमफलत्वेनाभिप््रोयत इति । ननु केवलानुमानविषये कथम् ? अनुमानं वक्तव्यम् । न चोक्तविरोधः । यत्रागमः प्रत्यक्षं वा सम्भवति तत्र तद्धानेन प्रथममनुमानं न वक्तव्यमित्यस्यार्थस्य नियमफलतया विवक्षितत्वेन अनुमानैकगम्ये तदुपन्यासस्य अनिराकरणात् । तदिदमुक्तं नानुमां प्रथमं वदेदिति । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु यदि ‘नदीतीरे पञ्च फलानि सन्ति’ इत्यादिना लौकिकवाक्येन अवगतेऽर्थे परः प्रमाणं पृच्छेत्, तदा किं वक्तव्यम् ? न तावत्तद्वाक्यं वक्तुं युक्तं, ऋगादिषु अपरिगणितत्वेन अनागमत्वात् । प्रमाणान्तरं तु नास्तीति चेत्, तत् किं वाक्यमुभयोः प्रमाणतया सम्मतम् ? उत असम्मतम् ? असम्मतावपि शक्यप्रामाण्योपपादनम् ? अन्यथा वा ? अन्यथेति पक्षे तूष्णीमासितव्यम् । उपायाभावात् । प्रथमद्वितीययोस्तदेव वक्तव्यंप्रामाण्यं चोपपादनीयम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V15",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " ननु तत् उक्तेषु अपरिगणितत्वात् न आगम इत्युक्तं इत्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "परतुष्टिकरं वाक्यं वदेतां यदि वादिनौ ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "स एवात्रागमो ज्ञेयः .................... ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "वदत इति वादिनौ वादिप्रतिवादिनाविति यावत् । यदिप्रामाण्यसम्मत्या उपपादनेन वा परस्य वादिनः प्रतिवादिनो वा तुष्टिकरं मनस्समाधानकरं लौकिकं वाक्यं वदेतां, तर्हि अत्र तदेकप्रमाणकेऽर्थे स एवागमो ज्ञेयः । तत्र तद्वाक्यमागमत्वेनाङ्गीक्रियत इति यावत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "कथम् ? इत्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "....... परतुष्टिर्हि तत्फलम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ऋगाद्यागमो वक्तव्य इत्यभ्युपगमस्यापि ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "परतुष्टिरेव हि ",
| |
| "tail": " प्रयोजनम् । तत्प्रामाण्यस्य सम्मततत्वात् । सा चेत् परतुष्टिः प्रामाण्यसम्प्रतिपत्या तदुपपादनेन वा यदि लौकिकवाक्येऽपि स्यात्, कथं तस्य नागमत्वम् ? कथं च न वक्तव्यत्वम् ? इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V16",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " नन्वेवंविधस्य वादस्य किं अवसानम् ? तत्राह ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "एवं निर्णयपर्यन्तं वादे सुबहवोऽपि हि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "घटेयुः .......",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "हि ",
| |
| "tail": " शब्दो वादस्य तत्वनिर्णयार्थत्वं हेतुं द्योतयति । एवं प्रमाणतर्काभिमतैरेव स्वपरपक्षसाधनोपालम्भाभ्यां वादे निर्णयपर्यन्तं तत्वनिर्णयाय प्रयतेरन् । न तु वादिप्रतिवादिनोरन्यतरपराजयमात्रेण वादावसानम् । तत्वनिर्णयार्थत्वाद्वादस्य । एकपराजयमात्रेण कथानिवृत्तौ पुनस्तस्यैव साधनान्तरादिस्फुरणे सन्देहावस्कन्दनात् ।यदि साधनान्तरादिस्फुरणेन पुनर्जायमानः पराजितस्यापि संशयो जयिना वारणीयः तर्हि पुरुषान्तरस्य तत्रैव तत्स्फुरणे पुनः सन्देहप्राप्तौ तन्निवारणमपि करणीयं स्यात् समानत्वात् । तथा च एक एव वादी प्रतिवादी चेति न स्यादिति चेत् ? सत्यं, इत्याह सुबहवोऽपि इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " एवं चेत् कथैक्यं किन्निबन्धनम् ? इति चेत् फलैक्यात् इत्यवेहि ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तर्हि वादस्य अपर्यवसानं स्यात् ? इत्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "......चिरकालं च ... ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "च",
| |
| "tail": "शब्दोऽवधारणे । साधनदूषणयोः परिमितत्वेन पुरुषान्तरप्राप्त्यनियमाच्च सर्वशङ्कोद्धारेऽपि विलम्ब एव स्यात्, न तु अपर्यवसानमिति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "एवं वादप्रवृत्तिप्रकारं अभिधाय जल्पप्रवृत्तिप्रकारं सूचयति",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "जल्पे यावत् परो जितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " तावत् घटेतां इति सम्बन्धः । अयं इह जल्पप्रवृत्तिप्रकारः , सभ्यसभापतिप्राश्निकादिसंवरणपुरस्सरं कथानियमबन्धे कृते,प्राक् प्रसक्तेप्राश्निकोपक्षिप्ते प्रतिवादिना च पृष्टे प्रमेये प्रतिवादिपर्यनुयुक्तेन वादिना प्रमाणं अभिधातव्यम् । प्रतिवादिना च अनुक्तोच्यमानग्राह्यनिग्रहाप्राप्तौ आभासबहिरुक्तग्राह्यनिग्रहालाभे च तद्वचनार्थं अवगम्य दूषयित्वा स्वपक्षे प्रमाणं अभिधानीयम् । वादिनादि उक्तोच्यमानाऽभासबहिरुक्तग्राह्यनिग्रहालाभे तद्वचनार्थं अवगम्य दूषयित्वा स्वपक्षसाधनदूषणं उद्धरणीयम् । साधनदूषणे च प्रमाणाभिमतैः , तदलाभे ‘नियतपराभवात् वरः पाक्षिकः ’ इति छलादिना च क्रियते जयैकार्थत्वात् जल्पस्य । अत एव वादिप्रतिवादिनोः अन्यतरो यावत् स्वपरपक्षसाधनोपालम्भयोः अन्यतरावसरेऽपि जीयेत तावदेव उभाभ्यां प्रयतितव्यम् । न तु वाद इव परसाधनपर्यन्तमिति । तदेवं वादजल्पयोः प्रवृत्तिप्रकारभेदात् युक्तो भेद इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V17",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "एवं असङ्करेण कथामार्गत्रयं प्रतिपादितवता कथैक्यादिमतानि अपहस्तितानि विज्ञातव्यानि । अधिकार्यङ्गप्रवृत्तिप्रकारफलभेदे सति किन्निबन्धनं कथैक्यं स्यात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "जल्पस्य न तावत् स्वरूपमेव हातुं शक्यम्, वादादि समानयोगक्षेमत्वात् । अन्यतरान्तर्भावस्तु भेदोपपादनेन परास्तः । वादवितण्डा च यदि तत्वनिर्णयार्था स्वपरपक्षसाधनोपालम्भवती तदा वाद एव । विजिगीषावतोः इति चेत् तर्हि तत्वनिर्णयार्थताव्याघातः । अन्यतरमात्रपर्यवसानेऽपि एवमेव ।\t\t\t\t\tविजयार्थत्वे, जल्पवितण्डायाः अन्यतरत्वापातः । तत्वबुभुत्सावतोः इति व्याहतम् । न च तत्वनिर्णयविजयाभ्यां फलान्तरम् । नापि तदर्थिव्यतिरिक्तोऽधिकारी । न च साधनोपालम्भोभयान्यतरमात्रव्यतिरिक्त प्रवृत्तिप्रकारो, यद्वशात् वादवितण्डा परा कल्पेत इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "आत्यन्तिकपराजयपर्यन्तो वाद इत्युक्तम् । तत्र को वादे पराजयहेतुः ? इत्यपेक्षायाम् आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्वनिर्णयवैलोम्यं वादे साक्षात् पराजयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": " पराजयः ",
| |
| "tail": " पराजयहेतुः । स द्विविधो मुख्यामुख्यभेदात् । तत्र वादिप्रतिवादिभ्यां अभिलषितस्य तत्वनिर्णयस्य यावत् वैलोम्यं विरुद्धं वचनं आचरणं वा तत्सर्वं वादे मुख्यः पराजयहेतुः , कथावसानकारणत्वात् । इतरोऽमुख्यः , कथावसानाहेतुत्वात् । न च तत्वनिर्णयवैलोम्यस्य कथावसितिहेतुत्वेन साक्षात् पराजयहेतुत्वव्याख्यायां "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "उद्भावनीयमेव स्यात् न कथाऽवसितिर्भवेत् । ",
| |
| "tail": " इत्यादिविरोधः । ‘सकृत् एकस्य तत्वनिर्णयवैलोम्यापत्तिमात्रेण न कथावसानं, यथा जल्पे सकृत् निग्रहप्राप्तौ’ इत्येतदर्थपरत्वात् तस्य । अत्रापि तत्वनिर्णयवैलोम्यापत्तौ पुनः तस्य अन्यस्य वा साधनान्तराद्यप्रतीतावेव कथापर्यवसानस्य विवक्षितत्वात् । अन्यथा वादापर्यवसानं स्यात् । न हि तत्वनिर्णयस्य तत्वनिर्णयवैलोम्यापत्तितोऽन्यत् शृङ्गमस्ति । ‘साक्षात्’ इति च अत्र व्यर्थं स्यात् । विरोधादिषु च तत्वनिर्णयवैलोम्येतरविवेकं तु करिष्यामः ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तत्वनिर्णयवैलोम्यं प्राप्तवतः किं कार्यं ? इत्यपेक्षायां आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "संवादे श्लाघ्यतैव स्यात् गुरुत्वमितरस्य च ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " वादिनः प्रतिवादिनो वा तत्वनिर्णयवैलोम्येप्राप्ते तत्र च तेन ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "संवादे ",
| |
| "tail": " कृते तस्य विमलबोद्धृतया स्तुत्यतैव "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "स्यात् ",
| |
| "tail": " न तु पराजितत्वेनापमानः । इतरस्य च तत्वं निर्णीतवतो "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "गुरुत्वं ",
| |
| "tail": " स्यात् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_18",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तत्वनिर्णयवैलोम्यंप्राप्तोऽपि यदि मतिमान्द्यादिना तत्र न संवादं करोति तस्य कर्तव्यम् आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तत्वनिर्णयवैलोम्ये निन्द्यो दण्ड्योऽथ वा भवेत् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "अथ ",
| |
| "tail": " पक्षान्तरे । असंवादे, "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "निन्द्यो भवेत् ",
| |
| "tail": " दोषाधिक्ये दण्ड्यो भवेदिति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "जल्पे च ‘यावत् परो जितः ’ इत्युक्तम् । तत्र जल्पे कः पराजयहेतुः ? इत्यपेक्षायां आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विरोधाऽसङ्गतिन्यूनतूष्णीम्भावादिकैर्जितः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "भवेज्जल्पे ...",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "आदि ",
| |
| "tail": "पदेन संवादाधिक्ययोः ग्रहणम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V19",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "प्रसङ्गात् वितण्डायां निग्रहादिकमतिदिशति",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "...... वितण्डायां न्यायो जल्पवदीरितः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " वितण्डायां च इत्येतावता पूर्णे यत् अधिकमुपादत्ते तेन जल्पे यावत् परो जितः इत्युक्तप्रवृत्तिप्रकारपर्यवसानयोरपि अतिदेशो लभ्यते । अन्यथा प्रकृतत्वात् निग्रहस्थानमात्रातिदेशो विज्ञायेत । ततश्च स्वपक्षस्थापनां विना जल्पवदेव वितण्डा इत्युक्तं भवति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V20",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "विरोधादिप्राप्तवतो जल्पवितण्डयोः कि कार्यं ? इत्यपेक्षायामाह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "संवादे दण्ड्यता न स्यात् वितण्डाजल्पयोरपि ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "पराजितत्वमात्रं स्यात् ............",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "विरोधादिषु प्राप्तनिग्रहस्थानविषये वितण्डायां जल्पे च यदि वादी प्रतिवादी वा संवादं कुरुते तदा नासौ सभापतिना दण्ड्यः । किन्तु ? खण्डिताहङ्कारतया अपमानविषय एव स्यात् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "वादिप्रतिवादिनोः निग्रहस्थानचिन्ताप्रसङ्गात्प्राश्निकापराधं अपोहमुखेन सूचयति ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अनुवादादिराहित्यं नैव जल्पेऽपि दूषणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "एव ",
| |
| "tail": "कारो हेतुसूचनार्थः । एके मन्यन्ते, प्राश्निकैः वाद्युक्तस्य प्रतिवादिनं प्रति, प्रतिवाद्युक्तस्य च वादिनं प्रति अनुवादः करणीयः । अप्रतिबुद्धौ च वादिप्रतिवादिनौ बोधनीयौ । तदकरणे तेषां अपराध इति । तदेतत् जल्पे वितण्डायामपि अनुवादादिराहित्यंप्राश्निकानां न दूषणम्, अनुवादाद्यभावेऽपि वादिप्रतिवादिभ्यां जल्पवितण्डयोः प्रवर्तयितुं शक्यत्वेन तस्य तदकर्मत्वात् । किं नाम ?प्रागुक्तस्वकर्माननुष्ठानमेवप्राश्निकानां अपराध इति मतान्तरनिरासाय अपोह इति ज्ञातव्यम् ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V21",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "वादिप्रतिवादिनोः जल्पारम्भोत्तरकालीनं निग्रहस्थानं उक्तम् । कथातः प्रागपि सम्भवात् आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विद्याहीनत्वलिङ्गेऽपि वादिनोः स्यात् पराजयः ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " सम्भावितसमानविद्ययोरेव जल्पवितण्डाधिकारित्वात् कथातः प्रागेव वादिप्रतिवादिनोः अन्यतरस्य प्रतियोग्यपेक्षया विद्याहीनत्वलिङ्गे पदवाक्यप्रमाणाज्ञत्वदोषेप्राप्ते पराजय एव । दूरे जल्पादि । एतेन ‘कथाबाह्यानां अनिग्रहस्थानत्वं’ इति परास्तम् । ",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
| |
| "parent": "KL_C01_V22",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "ननु विरोधादिव्यतिरिक्तानि हेत्वाभासादीनि निग्रहस्थानानि सन्ति । विजयमात्रप्रयोजनयोश्च जल्पवितण्डयोः पराजयनिमित्तानि सम्भावितानि च । अतः कथं विरोधादिषट्केनैव जल्पादौ पराजयः ? इत्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "तदभावात् नैव षट्कात् अन्यो निग्रह इष्यते ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "अन्तर्भावातदिहान्येषां निग्रहाणाम् ............ ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "अन्येषां विरोधादिपदैः अगृहीततया ततोऽन्यत्वेन शङ्कितानां हेत्वाभासादीनां इह षट्के अन्तर्भावात्, षट्कानन्तर्भूतानां च आश्रयासिद्ध्यदीनां तदभावात् निग्रहस्थानत्वाभावात्जल्पवितण्डयोः षट्कादन्यनिग्रहस्थानानङ्गीकारो न दोषाय इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " कथं हेत्वाभासादीनां एतेष्वन्तर्भावः ? कथं च अनन्तर्भूतानां अनिग्रहस्थानत्वं ? इत्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "...... इति स्म ह ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "उक्तपरामर्श ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "इति ",
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| "tail": " शब्दः । "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "em",
| |
| "attrs": {
| |
| "type": "prateeka"
| |
| },
| |
| "text": "स्म ह ",
| |
| "tail": " इति निपातौ सुप्रसिद्धिं द्योतयतः । हेत्वाभासादीनां विरोधादिषु अन्तर्भावः , अनन्तर्भूतानां च अनिग्रहस्थानत्वं विरोधादीनां हेत्वाभासादीनां च स्वरूपयाथात्म्यज्ञाने सति सुज्ञानमेव इति किं तत्र यत्नेन ? इति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "कथातः पूर्वं विद्याहीनत्वलिङ्गेन पराजय इत्युक्तं, तन्न । कथामन्तरेण विद्याहीनत्वलिङ्गस्य अप्रतीतेः इत्यत आह",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "विद्यापरीक्षापूर्वैव वृत्तिर्जल्पवितण्डयोः ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " जल्पवितण्डाधिकारिणोः खलु विद्याहीनत्वलिङ्गेन कथातः प्राक् पराजय इष्यते । जल्पवितण्डाप्रवृत्तिश्च विद्यापरीक्षापूर्वैव । विद्यापरीक्षा च वादेनैव । वादे च न सम्भावितसमानविद्यत्वापेक्षा । एवं च विद्यापरीक्षया विद्याहीनत्वनिश्चयात् न विरोधः । विद्यासाम्ये तु जल्पवितण्डे इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
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| "attrs": {
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| "parent": "KL_C01_V23",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "विरोधादीनि निग्रहस्थानानि इत्युक्तं । तत्र विशेषं आह–",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "स्खलितत्वादिमात्रेण न तत्रापि पराजयः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तत्र जल्पवितण्डयोरपि स्खलनेन अपस्मारादिवशेन वाप्राप्तैः विरोधादिभिः ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "em",
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| "attrs": {
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| "type": "prateeka"
| |
| },
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| "text": " न पराजयो ",
| |
| "tail": " मन्तव्यः , अपटुकरणत्वादिना सम्भवतः स्खलनादेः प्रतियोग्यपेक्षया अपकर्षस्य अद्योतकत्वात् । किमु वादकथायामिति ।"
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तत्र वादे चतुर्धा निग्रहस्थानगतिः । किञ्चित् असम्भावितमेव, यथा प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञासन्न्यासो निरर्थकं अर्थान्तरं अविज्ञातार्थं अपार्थकं इति षट्कम् । एषां अशक्तिसङ्गूहनप्रकारत्वात् तत्वबुभुत्सुतया च वादे तदभावात् । प्रमादात् सम्भवेऽपि उद्भाव्य त्याजनीयानि । किञ्चित् सम्भवदपि अनुद्भाव्यु मेव, यथा प्रतिज्ञान्तरं हेत्वन्तरम् अज्ञानं अप्रतिभा विक्षेपः मतानुज्ञा पर्यनुयोज्योपेक्षणं इति सप्तकम् । एतदुद्भावनानुद्भावनयोः तत्वनिर्णयानुगुण्यवैगुण्याभावात् । किञ्चित् उद्भाव्यमात्रम्, यथा विरोधः , अप्राप्तकालं, न्यूनं, अधिकं, पुनरुक्तं, अननुभाषणं, अपसिद्धान्तः इति सप्तकम् । किञ्चित् कथावसानिकम्, यथा हेत्वाभासो निरनुयोज्यानुयोग इति द्वयम् ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "तत्वनिर्णयस्य हि साक्षात् विरुद्धा विपरीतप्रतिपत्तिः , सा च हेत्वाभासाद्यनुद्भावने भवति । पारम्पर्यात् विरोधादयः । व्यासङ्गादिना तत्वनिर्णयसामग्रीप्रतिरोधात् प्रतिज्ञाविरोधादीनाम् । आकाङ्क्षासन्निधियोग्यतावत्तया प्रतिसंहितं प्रमाणाप्रतिहतं च वाक्यं खलु तत्वनिर्णयाङ्गम्, न अन्यत् । तत्र प्रतिज्ञाविरोधे योग्यताविरहः । अप्राप्तकाले तु आकाङ्क्षाविरहः । न्यूने तु आकाङ्क्षितासमभिव्याहारेण सन्निधिविरहविशेषः । अधिके तु अनाकाङ्क्षिताभिधानेन आकाङ्क्षाभावः । पुनरुक्तेऽपि एवम् । अननुभाषणे तु उक्ताननुसन्धानेन असन्निधानम् । अपसिद्धान्ते तु सम्मुग्धप्रमाणाबाधोत्क्रान्तिः इति । तदिदं आचार्याणां असम्मतम्, आत्यन्तिकसाधनदूषणनिवृत्तौ एव वादावसानस्य उक्तवात् इति ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "कथालक्षणोपसंहारद्वारेण, न एतत् वाद्यन्तरोक्तवत् असाधु प्रतिपत्तव्यं इत्याह–",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
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| "tag": "prateeka",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "वादजल्पवितण्डानां इति शुद्धं स्वलक्षणम् ॥",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": " यद्यपि कथासामान्यलक्षणं च उक्तम्, तथापि तत् आर्थिकं इति वादादिविशेषोपसंहार एव कृतः । वादादीनामेव व्यवहाराङ्गत्वं न तु कथासामान्यस्य इत्यतो वा । यस्मात् स्वलक्षणं स्वरूपलक्षणं तस्मात् शुद्धं अव्याप्त्यादिशून्यम् । न हि तत्स्वरूपं तत् न व्याप्नोति व्यभिचरति च इति ।",
| |
| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya-descriptor",
| |
| "attrs": {
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| "parent": "KL_C01_V24",
| |
| "name": ""
| |
| },
| |
| "text": "\n ",
| |
| "children": [
| |
| {
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| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "न केवलं एतत् कथालक्षणं उपपत्त्या साधु प्रतिपत्तव्यम् । किं नाम ? परमाप्तोक्तत्वात् आगमान्तरसिद्धत्वाच्च इति दर्शयन् उक्तस्य विनियोगं आह–",
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "prateeka",
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| "text": "\n ",
| |
| "children": [
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| {
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| "tag": "line",
| |
| "text": "आनन्दतीर्थमुनिना ब्रह्मतर्कानुसारतः ।",
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "line",
| |
| "text": "कथालक्षणमित्युक्तं प्रीत्यर्थं शार्ङ्गधन्वनः ॥",
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| |
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| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| }
| |
| ],
| |
| "tail": "\n "
| |
| },
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| {
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| "tag": "vyakhya-descriptor",
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| "attrs": {
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| "parent": "KL_C01_V025",
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| "name": ""
| |
| },
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| "text": "\n ",
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| "children": [
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| {
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| "tag": "vyakhya",
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| "text": "भक्त्यतिशयवशात् भगवान् आचार्यः प्रकरणनिर्माणफलत्वेन परमेश्वरप्रशंसापुरस्सरं तत्प्रसादं आशास्ते",
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| |
| },
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| {
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| "text": "सदोदितामितज्ञानपूरवारितहृत्तमाः ।",
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| |
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| {
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| "tag": "line",
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| "text": "नरसिंहः प्रियतमः प्रीयतां पुरुषोत्तमः ॥",
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| {
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| "text": "इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितेषु दशप्रकरणेषु कथालक्षणं सम्पूर्णम् ॥",
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| }
| |
| ],
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| "tail": "\n "
| |
| },
| |
| {
| |
| "tag": "vyakhya",
| |
| "text": "सदोदितम् अनादित आविर्भूतं प्रलयेऽपि अविलुप्तम् । अमितं आलोचने सर्वविषयम् । सदोदितामितज्ञानपूरेण तं दत्वा इति यावत् । वारितं अस्मदीयं हृत्तमः अज्ञानम् अनेन इति तथोक्तः । तस्मात् परमोपकारित्वात् स्वभावेन परमप्रेमविषयत्वाच्च तत्प्रसादाशंसनमेव युक्तम् इति ।",
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| "text": "श्रीमदानन्दतीर्थार्यहृदयामलमन्दिरा ।",
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| |
| {
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| "text": "इन्दिरार्चितपादाब्जा देवता पातु नः सदा ॥",
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| "tag": "author-note",
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| "text": " इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितकथालक्षणविवरणं जयतीर्थभिक्षुणा विरचितं सम्पूर्णम् ॥",
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "अथ कथां लिलक्षयिषुराचार्यवर्यः प्रारिप्सितप्रकरणपरिसमाप्त्यादि प्रयोजनेष्टदेवताप्रणतिनुतिपुरस्सरं विवक्षितमर्थं दर्शयति ॥\nनृसिंहमखिलाज्ञानतिमिराशिशिरद्युतिम् ।\nसम्प्रणम्य प्रवक्ष्यामि कथालक्षणमञ्जसा ॥ १ ॥\nइह हि कृतदेवतानतीनामपि या ग्रन्थापरिसमाप्तिस्सा भक्तिश्रद्धाद्यतिशयपूर्वकत्वाभावनिमित्ता न तत्पूर्वकप्रणामस्यप्रारिप्सितपरिसमाप्त्यहेतुतां गमयितुं शक्नोति । न ह्येकदेशव्यभिचारेण सामग्री व्यभिचारिणी स्यात् । अत एव भयाद्यतिशयपूर्वकत्वलक्षणं प्रणामस्य सम्यक्प्रकर्षं शिष्यान् ग्राहयितुं सम्प्रणम्येत्युक्तम् । कृतदेवतानतीनामपि समीहितसिद्धिस्सा कारणान्तरादपि भविष्यति । न ह्येकस्यैकमेव ।\nकथां विवक्षतस्तत्फलस्य अज्ञाननिवृत्त्युपलक्षिततत्त्वज्ञानस्य निष्पादकत्वेन नृसिंहस्तुतिरवसरोचितेति तथैव विशिनष्टि \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअखिलेति ॥\u003C/span\u003E अखिलानि च तान्यज्ञानानि च अखिलाज्ञानानि । अखिलाज्ञानानि तिमिराणीव अखिलाज्ञानतिमिराणि । अशिशिरा अशीता द्युतिरस्येति अशिशिरद्युतिरादित्यः अखिलाज्ञानतिमिरनिरसने अशिशिरद्युतिरिव अखिलाज्ञानतिमिराशिशिरद्युतिः तम् । गम्यमानत्वात् निरसनपदाप्रयोगः । यथा अश्वयुक्तो रथोऽश्वरथ इति ।\nयद्यपि जल्पवितण्डे ख्यात्याद्यर्थे तथापि तत्वज्ञानपरिपन्थिपाषण्डादिनिरसनाङ्गे च भवतः । तत्र प्रधानत्वादुत्तरमेव, प्रयोजनं विवक्षित्वा कथामार्गत्रयस्याप्यज्ञाननिरसनमेव प्रयोजनमभि प्रेत्येदमुदितम् । अथ वा वादफलं अज्ञाननिरसनंप्राधान्यज्ञापनाय स्वशब्देनोपादाय ख्यात्यादिकमितरफलमुपलक्ष्य तस्य निष्पादकत्वेन परदेवता स्तूयते ।\nअज्ञातज्ञानं संशयविपर्ययादिव्युदासः ज्ञातस्थिरीकरणं च वादफलानि । जल्पवितण्डयोश्च पाषण्डप्रसञ्जितसज्जनसंशयविपर्यासनिरासः । संशयादयोऽपि तत्वज्ञानविरोधित्वेन अज्ञानान्युच्यन्ते । अतः कथात्रयनिरसनीयाज्ञानबाहुल्यमभिपरोत्य \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअखिले\u003C/span\u003Eत्युक्तम् ।\nप्रवक्ष्यामीति प्रशब्देन उद्देशविभागपरीक्षाद्युपयोगि साहित्यलक्षणं लक्ष्यवचनस्य प्रकर्षमपि विवक्षितं द्योतयति । तेन न प्रतिज्ञान्यूनता शङ्कनीया ।\nन चैवमुद्देशादीनां सर्वेषामपि वक्तव्यत्वेप्राप्ते व्यर्थं लक्षणस्यैव स्वशब्देनोपादनमिति वाच्यम् । कथां खलु सजातीयविजातीयसमस्तवस्तुव्यावृत्ततया व्यवहारयितुमिदमारभ्यते । व्यावृत्तव्यवहारश्च साक्षाल्लक्षणाधीनः । सास्नादिमत्त्वं प्रतीत्य हि गवि गोव्यवहारं कुर्वते । अनुद्दिश्य लक्षणकथनायोगात् लक्षणोक्त्युपयोगित्वमुद्देशस्य । अविभक्तस्य विशेषोद्देशासम्भवात् विभागस्यापि लक्षणाङ्गत्वमेव । लक्षणं च अनुमानतया व्यवहृतिहेतुः । न हि तस्य व्याप्तिपक्षधर्मतालक्षणपरीक्षामन्तरेण तद्भावो निश्चीयत इति परीक्षापि लक्षणाङ्गमेव । तदेवं लक्षणस्यप्राधान्यज्ञापनाय स्वशब्देनोपादानं, इतरस्य तदङ्गताद्योतनाय \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eप्र\u003C/span\u003Eशब्देन सङ्ग्रह इति ।\nस्यादेतत्, नैयायिकादिभिरेव कथालक्षणस्योक्तत्वात् किमनेन ? अन्यथा शब्दानुशासनादिकमपि कर्तव्यं स्यात् इत्यत उक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअञ्जसेति ॥\u003C/span\u003E स्वकीयवचनाञ्जस्यस्य प्रशब्देनोक्तत्वात् अन्योक्तीनामनेन अनाञ्जस्यमुपलक्षयति । तच्चोत्तरत्र प्रदर्शयिष्यते । विरुद्धयोरन्यतराञ्जस्यमितरानाञ्जस्येन व्याप्तमिति लक्षणाबीजम् । न चास्मदायत्ते वाग्व्यवहारे किमित्यवाचकं प्रयोक्ष्यामह इति वाच्यम् । स्वतन्त्रप्रयोग एव प्रयोजनान्वेषणात् । अयं तु लौकिकः प्रयोगः । दृश्यते हि सुकुमारोक्तिष्वेकप्रशंसनमितरापकर्षद्योतनार्थमिति । ननु किमनया प्रतिज्ञया ? यावता उत्तरग्रन्थ एव स्वकीयकथालक्षणविवक्षां ज्ञापयिष्यति । किं तया ज्ञापितया ? इति । सत्यं, प्रकरणस्य गतार्थताशङ्गानिरासार्थं तावत् अञ्जसा इति वक्तव्यम् । न चैतत् कथालक्षणं प्रवक्ष्यामीत्युक्तिमन्तरेण समर्थं स्यात् । न च मुख्यार्थद्वारमन्तरेण लक्षणा लभ्यते इति अन्यार्थमेवैतत्प्रतिज्ञानम् ।\nसाधनचतुष्टयसम्पन्नस्याधिकारिणोऽपवर्गाय परमात्मतत्वज्ञानमुत्पादयितुं प्रवृत्तस्य आम्नायस्य इतिकर्तव्यताभूतो हि न्यायो वेदान्ते व्युत्पादितः । स च परार्थः । प्रश्नोपक्रमप्रतियोगिनि एककर्तृके विचारे विविच्य प्रवर्तनीयः । दूषणोपक्रमप्रतियोगिनि अनेककर्तृके कथानामि्न प्रवर्त्य विवेचनीयः । कथां च व्युत्पादयतोऽस्य प्रकरणस्य वेदान्ताङ्गतया तत्प्रयोजनादिनैव प्रयोजनादिमत्ता सिद्धैवेत्यनवद्यम् ॥ १ ॥" | | "lines": [ |
| | "अथ कथां लिलक्षयिषुराचार्यवर्यः प्रारिप्सितप्रकरणपरिसमाप्त्यादि प्रयोजनेष्टदेवताप्रणतिनुतिपुरस्सरं विवक्षितमर्थं दर्शयति ॥", |
| | "नृसिंहमखिलाज्ञानतिमिराशिशिरद्युतिम् ।", |
| | "सम्प्रणम्य प्रवक्ष्यामि कथालक्षणमञ्जसा ॥ १ ॥", |
| | "इह हि कृतदेवतानतीनामपि या ग्रन्थापरिसमाप्तिस्सा भक्तिश्रद्धाद्यतिशयपूर्वकत्वाभावनिमित्ता न तत्पूर्वकप्रणामस्यप्रारिप्सितपरिसमाप्त्यहेतुतां गमयितुं शक्नोति । न ह्येकदेशव्यभिचारेण सामग्री व्यभिचारिणी स्यात् । अत एव भयाद्यतिशयपूर्वकत्वलक्षणं प्रणामस्य सम्यक्प्रकर्षं शिष्यान् ग्राहयितुं सम्प्रणम्येत्युक्तम् । कृतदेवतानतीनामपि समीहितसिद्धिस्सा कारणान्तरादपि भविष्यति । न ह्येकस्यैकमेव ।", |
| | "कथां विवक्षतस्तत्फलस्य अज्ञाननिवृत्त्युपलक्षिततत्त्वज्ञानस्य निष्पादकत्वेन नृसिंहस्तुतिरवसरोचितेति तथैव विशिनष्टि \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअखिलेति ॥\u003C/span\u003E अखिलानि च तान्यज्ञानानि च अखिलाज्ञानानि । अखिलाज्ञानानि तिमिराणीव अखिलाज्ञानतिमिराणि । अशिशिरा अशीता द्युतिरस्येति अशिशिरद्युतिरादित्यः अखिलाज्ञानतिमिरनिरसने अशिशिरद्युतिरिव अखिलाज्ञानतिमिराशिशिरद्युतिः तम् । गम्यमानत्वात् निरसनपदाप्रयोगः । यथा अश्वयुक्तो रथोऽश्वरथ इति ।", |
| | "यद्यपि जल्पवितण्डे ख्यात्याद्यर्थे तथापि तत्वज्ञानपरिपन्थिपाषण्डादिनिरसनाङ्गे च भवतः । तत्र प्रधानत्वादुत्तरमेव, प्रयोजनं विवक्षित्वा कथामार्गत्रयस्याप्यज्ञाननिरसनमेव प्रयोजनमभि प्रेत्येदमुदितम् । अथ वा वादफलं अज्ञाननिरसनंप्राधान्यज्ञापनाय स्वशब्देनोपादाय ख्यात्यादिकमितरफलमुपलक्ष्य तस्य निष्पादकत्वेन परदेवता स्तूयते ।", |
| | "अज्ञातज्ञानं संशयविपर्ययादिव्युदासः ज्ञातस्थिरीकरणं च वादफलानि । जल्पवितण्डयोश्च पाषण्डप्रसञ्जितसज्जनसंशयविपर्यासनिरासः । संशयादयोऽपि तत्वज्ञानविरोधित्वेन अज्ञानान्युच्यन्ते । अतः कथात्रयनिरसनीयाज्ञानबाहुल्यमभिपरोत्य \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअखिले\u003C/span\u003Eत्युक्तम् ।", |
| | "प्रवक्ष्यामीति प्रशब्देन उद्देशविभागपरीक्षाद्युपयोगि साहित्यलक्षणं लक्ष्यवचनस्य प्रकर्षमपि विवक्षितं द्योतयति । तेन न प्रतिज्ञान्यूनता शङ्कनीया ।", |
| | "न चैवमुद्देशादीनां सर्वेषामपि वक्तव्यत्वेप्राप्ते व्यर्थं लक्षणस्यैव स्वशब्देनोपादनमिति वाच्यम् । कथां खलु सजातीयविजातीयसमस्तवस्तुव्यावृत्ततया व्यवहारयितुमिदमारभ्यते । व्यावृत्तव्यवहारश्च साक्षाल्लक्षणाधीनः । सास्नादिमत्त्वं प्रतीत्य हि गवि गोव्यवहारं कुर्वते । अनुद्दिश्य लक्षणकथनायोगात् लक्षणोक्त्युपयोगित्वमुद्देशस्य । अविभक्तस्य विशेषोद्देशासम्भवात् विभागस्यापि लक्षणाङ्गत्वमेव । लक्षणं च अनुमानतया व्यवहृतिहेतुः । न हि तस्य व्याप्तिपक्षधर्मतालक्षणपरीक्षामन्तरेण तद्भावो निश्चीयत इति परीक्षापि लक्षणाङ्गमेव । तदेवं लक्षणस्यप्राधान्यज्ञापनाय स्वशब्देनोपादानं, इतरस्य तदङ्गताद्योतनाय \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eप्र\u003C/span\u003Eशब्देन सङ्ग्रह इति ।", |
| | "स्यादेतत्, नैयायिकादिभिरेव कथालक्षणस्योक्तत्वात् किमनेन ? अन्यथा शब्दानुशासनादिकमपि कर्तव्यं स्यात् इत्यत उक्तम् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअञ्जसेति ॥\u003C/span\u003E स्वकीयवचनाञ्जस्यस्य प्रशब्देनोक्तत्वात् अन्योक्तीनामनेन अनाञ्जस्यमुपलक्षयति । तच्चोत्तरत्र प्रदर्शयिष्यते । विरुद्धयोरन्यतराञ्जस्यमितरानाञ्जस्येन व्याप्तमिति लक्षणाबीजम् । न चास्मदायत्ते वाग्व्यवहारे किमित्यवाचकं प्रयोक्ष्यामह इति वाच्यम् । स्वतन्त्रप्रयोग एव प्रयोजनान्वेषणात् । अयं तु लौकिकः प्रयोगः । दृश्यते हि सुकुमारोक्तिष्वेकप्रशंसनमितरापकर्षद्योतनार्थमिति । ननु किमनया प्रतिज्ञया ? यावता उत्तरग्रन्थ एव स्वकीयकथालक्षणविवक्षां ज्ञापयिष्यति । किं तया ज्ञापितया ? इति । सत्यं, प्रकरणस्य गतार्थताशङ्गानिरासार्थं तावत् अञ्जसा इति वक्तव्यम् । न चैतत् कथालक्षणं प्रवक्ष्यामीत्युक्तिमन्तरेण समर्थं स्यात् । न च मुख्यार्थद्वारमन्तरेण लक्षणा लभ्यते इति अन्यार्थमेवैतत्प्रतिज्ञानम् ।", |
| | "साधनचतुष्टयसम्पन्नस्याधिकारिणोऽपवर्गाय परमात्मतत्वज्ञानमुत्पादयितुं प्रवृत्तस्य आम्नायस्य इतिकर्तव्यताभूतो हि न्यायो वेदान्ते व्युत्पादितः । स च परार्थः । प्रश्नोपक्रमप्रतियोगिनि एककर्तृके विचारे विविच्य प्रवर्तनीयः । दूषणोपक्रमप्रतियोगिनि अनेककर्तृके कथानामि्न प्रवर्त्य विवेचनीयः । कथां च व्युत्पादयतोऽस्य प्रकरणस्य वेदान्ताङ्गतया तत्प्रयोजनादिनैव प्रयोजनादिमत्ता सिद्धैवेत्यनवद्यम् ॥ १ ॥" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "अथ कथां विभागेनोद्दिशति\nवादो जल्पो वितण्डेति त्रिविधा विदुषां कथा ।\nतत्वनिर्णयैकप्रयोजनत्वेन अभ्यर्हितत्वात् वादस्य प्रथममुद्देशः । उभयसाधनवत्तया सदधिकारितया च वादसाम्यात् तदनन्तरं जल्पस्य । परिशेषतो जल्पानन्तरं वितण्डायाः । कथकभेदेन कथानन्त्यात् तत्तल्लक्षणोपाधिक्रोडीकृतराशिविवक्षया त्रित्वमिति दर्शयितुं त्रिविधेत्यक्तम् ।\nननु सामान्यलक्षणाभिधानेन विना कथं विभागोद्देशावसरः ? अवच्छेदकैक्येनैक्यमापन्नं हि वस्तु विभज्योद्देष्टव्यम् । अथ कथाशब्दं वाक्यप्रबन्धे व्युत्पादितं सिद्धवक्तृत्य न पृथक् सामान्यलक्षणमुच्यते तर्हि भारतादीनामपि वाक्यप्रबन्धत्वेन कथात्वात् कथं कथात्रैविध्यं ? नहि तानि वादादिष्वन्तर्भवन्तीत्यतो योगरूढिसमाश्रयणेन सामान्यलक्षणं सूचयति ॥ विदुषामिति ॥ जाताविदं बहुवचनं । तेन अनेकविद्वत्कर्तृको विचारगोचरो वाक्यप्रबन्धः कथा । सा वादादिभेदेन त्रिविधेत्युक्तं भवति । वैदुष्यं च कथामहावाक्यस्य निर्वाहकत्वम् । ततः स्वस्थः सर्वजनप्रत्ययावलम्बी सावधानोऽकलहकारश्चेत्यादयः कथका दर्शिताः । पूर्वोत्तरपक्षबलाबलचिन्ता विचारः । अत्रानेककर्तृकत्वोक्त्या एककर्तृकेभ्यो मीमांसावाक्येभ्यो व्युदासः । वैदुष्योक्त्या कलहादिभ्यः । विचारगोचरत्वेन विदुषामन्योन्यसुखव्यवहारेभ्यः ।\nकथा याथात्म्यविदुषां मतेन त्रिविधेति वा । तेन एक एव कथामार्ग इति बाह्याः । वादवितण्डे द्वे एवेति श्रीहर्षः । वादो जल्पो वादवितण्डा जल्पवितण्डा चेति चतस्रः कथा इति गौडनैयायिकाः । ते समस्ता निरस्ता भवन्ति । उपपत्तिं तूत्तरत्र प्रदर्शयिष्यामः ।\nतत्र यथोद्देशं वादलक्षणमाह\nतत्वनिर्णयमुद्दिश्य केवलं गुरुशिष्ययोः ॥ २ ॥\nकथाऽन्येषामपि सतां वादः..... ।\nअत्र केवलं तत्वनिर्णयमुद्दिश्य कथा वाद इत्येकं लक्षणम् । तत्र तत्वं प्रमाणसिद्धं वस्तु । तस्य निर्णयः अज्ञातस्य ज्ञानं संशयविपर्ययव्युदासः अभ्यनुज्ञानेन दृढीकरणं चेति त्रिविधः । यदा हि ख्यात्यादि अर्थयमानौ विजिगीषू सद्भ्यामेव साधनदूषणाभ्यां स्वपरपक्षसाधनोपालम्भौ कुर्वाते स जल्पोऽपि भवति तत्वनिर्णयहेतुः । न ह्यसदेव जल्पे वक्तव्यमिति नियमः । प्रतीयमानसदतिक्रमे कारणाभावात् । किन्नाम ? सदपरिस्फूर्तौ ‘ऐकान्तिकपराभवात् वरः पाक्षिकः ’ इति मन्वानोऽसदप्युपादत्ते । न च तत्साधनं तत्वनिर्णयं न करोतीति सम्भवति । व्याघातात् । अतः ‘तत्वनिर्णयहेतुः कथा वादः ’ इत्यभिहिते जल्पविशेषेऽपि गतत्वादुद्दिश्येत्युक्तम् । न हि तत्वनिर्णयहेतुरपि जल्पस्तदुद्देशेन क्रियते ।\nयदा च स्वयमध्यवसितार्थः कारुणिकतया पाषण्डप्रसञ्जितौ लोकस्य संशयविपर्ययौ पराकर्तुं तज्जिगीषुर्यां वितण्डामारभते साऽपि तत्वनिर्णयमुद्दिश्य कथा भवत्येव । तत्र प्रसङ्गपरिहाराय केवलमित्युक्तम् । भवेत् या वितण्डा लोकसंशयविपर्यासनिरासं ख्यात्यादिकं चोद्दिश्य प्रवर्तते तस्या अनेन व्युदासः । या तु केवलं संशयाद्यपकरणायैव, कथं ततो व्यावृत्तिः ? इति चेन्न । केवलशब्दस्य साक्षादर्थत्वात् । न हि काऽपि वितण्डा साक्षात्तत्वनिर्णयं करोति । किन्तु ? परपराभवद्वारैव ।\nएतेनैतदपि निरस्तं, केवलं तत्वनिर्णयहेतुरित्येतावतैव सदुपायजल्पव्यवच्छेदसिद्धौ उद्देशग्रहणमतिरिच्यत इति । विवक्षितकेवलार्थस्य तत्रापि गतत्वात् ।\nननु कथकगततत्वनिर्णयविवक्षया लक्षणे व्याख्याते वितण्डायां प्रसङ्ग एव नास्ति । न हि विनिश्चितार्थः स्वात्मीयतत्वनिर्णयाय तत्र प्रवर्तते,प्राप्तत्वादेव । अभ्यासार्थमिति चेन्न । तथा सति सत्प्रयोगनियमप्रसङ्गात् । नापि पाषण्डिनस्तत्वनिर्णयाय अनुपयोगात् असत्साधनैस्तदयोगाच्च । सोऽपि संसदि पराभूतः तत्वजिज्ञासुर्भविष्यतीति चेन्न ।प्रायो विद्वेषस्यैव सम्भवात् । अतः केवलग्रहणमनर्थकमिति । सत्यम् । यथा नैवं व्याख्यातुं शक्यं तथा वक्ष्याम इति ।\nसतां कथा वाद इत्यपरं लक्षणम् । तर्हि जल्पेऽतिव्यापकमित्यतः सन्तो व्याख्याताः गुरुशिष्ययोरन्येषां सखिसब्रह्मचार्यादीनामपीति । अदुष्टमनसस्सन्तः । ते च प्रकृतोक्तिका अविप्रलम्भका यथाकालस्फूर्तिका अनपेक्षकाः प्रमाणसिद्धसम्प्रत्यायिनश्चेत्यादयः । एवम्भूताश्च गुरुशिष्यादय एवप्रायेणेति त एव दर्शिताः ।" | | "lines": [ |
| | "अथ कथां विभागेनोद्दिशति", |
| | "वादो जल्पो वितण्डेति त्रिविधा विदुषां कथा ।", |
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| | "ननु सामान्यलक्षणाभिधानेन विना कथं विभागोद्देशावसरः ? अवच्छेदकैक्येनैक्यमापन्नं हि वस्तु विभज्योद्देष्टव्यम् । अथ कथाशब्दं वाक्यप्रबन्धे व्युत्पादितं सिद्धवक्तृत्य न पृथक् सामान्यलक्षणमुच्यते तर्हि भारतादीनामपि वाक्यप्रबन्धत्वेन कथात्वात् कथं कथात्रैविध्यं ? नहि तानि वादादिष्वन्तर्भवन्तीत्यतो योगरूढिसमाश्रयणेन सामान्यलक्षणं सूचयति ॥ विदुषामिति ॥ जाताविदं बहुवचनं । तेन अनेकविद्वत्कर्तृको विचारगोचरो वाक्यप्रबन्धः कथा । सा वादादिभेदेन त्रिविधेत्युक्तं भवति । वैदुष्यं च कथामहावाक्यस्य निर्वाहकत्वम् । ततः स्वस्थः सर्वजनप्रत्ययावलम्बी सावधानोऽकलहकारश्चेत्यादयः कथका दर्शिताः । पूर्वोत्तरपक्षबलाबलचिन्ता विचारः । अत्रानेककर्तृकत्वोक्त्या एककर्तृकेभ्यो मीमांसावाक्येभ्यो व्युदासः । वैदुष्योक्त्या कलहादिभ्यः । विचारगोचरत्वेन विदुषामन्योन्यसुखव्यवहारेभ्यः ।", |
| | "कथा याथात्म्यविदुषां मतेन त्रिविधेति वा । तेन एक एव कथामार्ग इति बाह्याः । वादवितण्डे द्वे एवेति श्रीहर्षः । वादो जल्पो वादवितण्डा जल्पवितण्डा चेति चतस्रः कथा इति गौडनैयायिकाः । ते समस्ता निरस्ता भवन्ति । उपपत्तिं तूत्तरत्र प्रदर्शयिष्यामः ।", |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "ननु यदा विदिततत्वौ अदुष्टमनसौ परप्रार्थितौ कथां कुरुतः स वादो न वा ? आद्ये अव्यापकमाद्यं लक्षणं, द्वयोरपि तत्वज्ञानितया तदुद्देशिताभावात् । द्वितीयमतिव्यापकम् । सेयमुभयतः पाशा रज्जुः इत्यत आह–\nवा समितेश्शुभा ।\nन केवलमियं वादकथा कथकगततत्वनिर्णयार्था विवक्षिता । किन्नाम ? यदा गुरुशिष्यौ तदा शिष्यस्य, यदा सखिप्रभृतयः तदा सर्वेषां, यदा तु विदिततत्वौ तदा कृतप्रार्थनायाः \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसमितेः शुभा\u003C/span\u003E शुभस्य तत्वनिर्णयस्य हेतुः । सामान्यं चात्र विवक्षितम् । न च सामान्येनोक्तस्य विशेषावलम्बेन दोषावकाश इति ।\nक्रमप्राप्तं जल्पं लक्षयति\nख्यात्याद्यर्थं स्पर्धया वा सतां जल्प इतीर्यते ॥\nकथेत्यनुवर्तते । केवलं स्पर्धया स्पर्धानिमित्तपरपराभवोद्देशेन \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसतामिति ॥\u003C/span\u003E तत्वज्ञानयोग्यानां । जातौ चेदं बहुवचनम् । ननु ख्यातिलाभपूजापरखिलीकरणानि समस्तानि व्यस्तानि वा उद्देश्यानि जल्पे विवक्ष्यन्ते ? नाद्यः , एकैकोद्देशेन प्रवृत्तौ अव्यापनात् । न द्वितीयः , परस्पराव्याप्तेः । मैवम् । तत्वनिर्णयातिरिक्तफलोद्देशेन सत्कथा जल्प इति लक्षणार्थत्वात् । फलान्तरं च ख्यात्यादिकमिति तद्ग्रहणम् । सत्कथा वादोऽपि भवतीति तद्व्युदासाय ख्यात्याद्युक्तिः । वादविशेषोऽप्यानुषङ्गिकख्यात्यादिहेतुर्भवतीति तद्व्यवच्छेदार्थं उद्देशग्रहणं । वितण्डाव्यवच्छेदाय सतामिति । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eइतीर्यत\u003C/span\u003E इत्यनेनागमसम्मतिकथनेन जल्पनिराकरणोपपत्तेराभासतां दर्शयति । आगमश्च ‘वादो जल्पो वितण्डा’ इत्यादिः अन्यत्रोदाहृतः ॥" | | "lines": [ |
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| "text": "वितण्डालक्षणं दर्शयति\nवितण्डा तु सतामन्यैः ... ।\nकथेत्यनुवर्तते ।प्रागिव बहुवचनव्याख्यानम् । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअन्यैः\u003C/span\u003E असद्भिस्सह । ‘फलभेदाभावेन न जल्पात् वितण्डा भिध्यते’ इत्येके । तन्निरासाय \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतु\u003C/span\u003Eशब्देन व्यवच्छिनत्ति ।\nननु तत्वज्ञानयोग्यतालक्षणं सत्त्वं यदि कथकाभिमानसिद्धं विवक्षितं तदा वितण्डानवकाशः । द्वयोरपि स्वाभिमानतस्सत्त्वात् । अथ वास्तवं, तथापि न जल्पवितण्डे तदनिश्चयात् । निश्चये वा न वितण्डा स्यात् । न हि विनिश्चितस्वासाधुभावः परसाधुतां विनिश्चित्य वितण्डायै घटितुमर्हति । नैव दोषः । कथाविशेषव्यवस्थाया वादिप्रतिवादिव्यवस्थायाश्चप्राश्निकविधेयत्वात् । ते च शास्त्रोदितलक्षणैः सत्त्वासत्त्वे विनिश्चेष्यन्ति । अत एवप्राश्निकानां वैष्णवत्वनियमो वक्ष्यते ।\nननु कथं जल्पवितण्डयोर्भेदः ? न तावत् फलभेदेन, जल्पवत् वितण्डाया अपि ख्यात्याद्यर्थत्वात् । पाषण्डिपराकरणेन तत्वनिर्णयोऽपि क्वचित् भवतीति चेत् सत्यम्, क्वचिद्भेदाभावापत्तेः । निमित्तैक्याभावेन कथैक्यानुपपत्तेः । नाप्यधिकारिभेदेन निर्निमित्तस्य तस्यैवासम्भवात् । ‘स्वरूपभेदाभावेऽपि वितण्डायां सदसतोरधिकारः ’ इति वचनानुपपत्तेश्च । सदसन्तौ यां कथां कुरुतः सा वितण्डेति चेन्न । तथा सति पुरुषानन्त्येन कथानन्त्यापत्तेरिति । नैष दोषः । प्रवृत्तिप्रकारभेदेन तद्भेदोपपत्तेः । द्वयोरपि स्वपरपक्षसाधनदूषणवान् जल्पः । वितण्डा तु प्रतिवादिनः स्वपक्षसाधनेन विना परपक्षप्रतिक्षेपमात्रेण पर्यवस्यतीति । अधिकारिभेदस्तूपलक्षणत्वेनोक्तः ।\nनन्वेतदप्यसम्बद्धम् । जल्पे हि वादिसाधनप्रतिक्षेपाय प्रतिवादिनोद्भावितं दूषणं यदि लग्नं तर्हि भग्नं वादिसाधनं जितं प्रतिवादिना । निवृत्ता कथा । यदि न लग्नं तर्हि निरनुयोज्यानुयोगेन भग्नः प्रतिवादी । जितं वादिना । निवृत्ता कथा । तत्र द्वयोरपि क्वास्ति साधनदूषणावकाशः ? एवमेव तत्करणे द्विर्द्विः एकैकेनैव साधनं दूषणं च किं न कर्तव्यम् ? मैवम् । कथकशक्तिपरीक्षणार्थत्वाज्जल्पस्य । न च तत् उभयकरणमन्तरेण सम्भवति । न हि वञ्चितपरप्रहारोऽपि तमप्रहरमाणो युयुत्सुर्विजयते । नापि स्वात्मानमरक्षन् परप्रघाती विजयी । परन्तु श्लाघ्यस्स्यात् । न च द्विरनुष्ठानस्य प्रयोजनमस्ति । प्रत्युत आधिक्येन निग्रहापत्तेः । कथं तर्हि वितण्डायां परप्रतिक्षेपमात्रेण विजय इति चेत् ? सत्यं, मुख्यविजयाभावेऽपि काकोलूकवत्प्राश्निकादिकृतसमयवशेनोपपत्तेः ।\nअथप्राश्निकादयस्तादृशं समयमेव कस्मात्कुर्युः ? इति चेत् तत्राह–\n....तत्वमेषु निगूहितम् ।\nकर्तव्यमिति शेषः । यतोऽसत्सु सता तत्वं निगूहितं कर्तव्यं, अन्यथा प्रत्यवेयात् । साधने च प्रकाशनं प्रसज्येत । अतोऽसदुपालम्भेनैवप्राश्निकादयः सतो विजयमनुजानन्ति । जल्पे तु द्वयोरपि सत्त्वेन मुख्यस्यैव विजयोपायस्यानुष्ठानसम्भवेन स्वपरपक्षसाधनोपालम्भाभ्यामेव विजयं नियच्छन्तीति ।\nलक्षिता वादजल्पवितण्डाः । तत्र जल्पवितण्डयोरिव वादस्यापिप्राश्निकसापेक्षतां केचिदङ्गीकुर्वते । यथाऽऽहुः , ‘स्वपरपक्षसिद्ध्यसिद्ध्यर्थं वचनं वादः । अधिकरणप्रत्यायनं सिद्ध्यसिद्धी । अधिकरणमितिप्राश्निकानां सामयिकी सञ्ज्ञा’ इति । तान्निराचिकीर्षुराह\nस्वयं वा प्राश्निकैर्वादे चिन्तयेत् ... ॥\nप्रमेयमिति शेषः । स्वयं, वादी प्रतिवादिना प्रतिवादी च वादिना इति प्रत्येकं सम्बन्धे नैकवचनोपपत्तिः । कुतो वादेप्राश्निकानपेक्षा ? तत्राह\n.... तत्वनिर्णयम् ॥\nउद्दिश्येति शेषः । अयमाशयः ,प्राश्निकानां हि वादस्थानं कथाविशेषव्यवस्थापनं पूर्वोत्तरवादव्यवस्थापनं विवदमानयोर्गुणदोषावधारणं भग्नप्रतिबोधनं लौकिकनिष्पन्नकथाफलप्रतिपादनं चेत्यादीनि कर्माणि । एतानि च यत्र वादिनौ आग्रहगृहीतौ कर्तुमशक्तौ तत्रप्राश्निकानामुपयोगः । वादे तु वादिनावेव तत्वनिर्णयकामौ वीतरागतया कर्तुं शक्ताविति किंप्राश्निकैः ? इति । तत् किं परिवर्जनमेव वादेप्राश्निकानां ? मैवम् । दैवादागतानामुपादानमित्युक्तम् ॥ वाप्राश्निकैरिति ॥ एतच्च संवादेनप्रामादिककथाभासशङ्काऽपनोदाय । न तूक्तकर्मकरणायेति ज्ञातव्यम् । सभापतिस्तु नेष्यत एव । यथाशक्ति यथानियमं मानापमानव्यञ्जनादिकं खलु तस्य कर्म । तत्किञ्चित् वादे नापेक्षितमेव । किञ्चित् स्वयं शक्यते सम्पादयितुमिति । एतेन जल्पवितण्डयोः सभ्यसभापतिप्राश्निकादिनियतिः सूचिता भवति । तत्रोक्तकर्मणां वादिप्रतिवादिभ्यामेव विजिगीषुतया कर्तुमशक्यत्वादिति ।" | | "lines": [ |
| | "वितण्डालक्षणं दर्शयति", |
| | "वितण्डा तु सतामन्यैः ... ।", |
| | "कथेत्यनुवर्तते ।प्रागिव बहुवचनव्याख्यानम् । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअन्यैः\u003C/span\u003E असद्भिस्सह । ‘फलभेदाभावेन न जल्पात् वितण्डा भिध्यते’ इत्येके । तन्निरासाय \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतु\u003C/span\u003Eशब्देन व्यवच्छिनत्ति ।", |
| | "ननु तत्वज्ञानयोग्यतालक्षणं सत्त्वं यदि कथकाभिमानसिद्धं विवक्षितं तदा वितण्डानवकाशः । द्वयोरपि स्वाभिमानतस्सत्त्वात् । अथ वास्तवं, तथापि न जल्पवितण्डे तदनिश्चयात् । निश्चये वा न वितण्डा स्यात् । न हि विनिश्चितस्वासाधुभावः परसाधुतां विनिश्चित्य वितण्डायै घटितुमर्हति । नैव दोषः । कथाविशेषव्यवस्थाया वादिप्रतिवादिव्यवस्थायाश्चप्राश्निकविधेयत्वात् । ते च शास्त्रोदितलक्षणैः सत्त्वासत्त्वे विनिश्चेष्यन्ति । अत एवप्राश्निकानां वैष्णवत्वनियमो वक्ष्यते ।", |
| | "ननु कथं जल्पवितण्डयोर्भेदः ? न तावत् फलभेदेन, जल्पवत् वितण्डाया अपि ख्यात्याद्यर्थत्वात् । पाषण्डिपराकरणेन तत्वनिर्णयोऽपि क्वचित् भवतीति चेत् सत्यम्, क्वचिद्भेदाभावापत्तेः । निमित्तैक्याभावेन कथैक्यानुपपत्तेः । नाप्यधिकारिभेदेन निर्निमित्तस्य तस्यैवासम्भवात् । ‘स्वरूपभेदाभावेऽपि वितण्डायां सदसतोरधिकारः ’ इति वचनानुपपत्तेश्च । सदसन्तौ यां कथां कुरुतः सा वितण्डेति चेन्न । तथा सति पुरुषानन्त्येन कथानन्त्यापत्तेरिति । नैष दोषः । प्रवृत्तिप्रकारभेदेन तद्भेदोपपत्तेः । द्वयोरपि स्वपरपक्षसाधनदूषणवान् जल्पः । वितण्डा तु प्रतिवादिनः स्वपक्षसाधनेन विना परपक्षप्रतिक्षेपमात्रेण पर्यवस्यतीति । अधिकारिभेदस्तूपलक्षणत्वेनोक्तः ।", |
| | "नन्वेतदप्यसम्बद्धम् । जल्पे हि वादिसाधनप्रतिक्षेपाय प्रतिवादिनोद्भावितं दूषणं यदि लग्नं तर्हि भग्नं वादिसाधनं जितं प्रतिवादिना । निवृत्ता कथा । यदि न लग्नं तर्हि निरनुयोज्यानुयोगेन भग्नः प्रतिवादी । जितं वादिना । निवृत्ता कथा । तत्र द्वयोरपि क्वास्ति साधनदूषणावकाशः ? एवमेव तत्करणे द्विर्द्विः एकैकेनैव साधनं दूषणं च किं न कर्तव्यम् ? मैवम् । कथकशक्तिपरीक्षणार्थत्वाज्जल्पस्य । न च तत् उभयकरणमन्तरेण सम्भवति । न हि वञ्चितपरप्रहारोऽपि तमप्रहरमाणो युयुत्सुर्विजयते । नापि स्वात्मानमरक्षन् परप्रघाती विजयी । परन्तु श्लाघ्यस्स्यात् । न च द्विरनुष्ठानस्य प्रयोजनमस्ति । प्रत्युत आधिक्येन निग्रहापत्तेः । कथं तर्हि वितण्डायां परप्रतिक्षेपमात्रेण विजय इति चेत् ? सत्यं, मुख्यविजयाभावेऽपि काकोलूकवत्प्राश्निकादिकृतसमयवशेनोपपत्तेः ।", |
| | "अथप्राश्निकादयस्तादृशं समयमेव कस्मात्कुर्युः ? इति चेत् तत्राह–", |
| | "....तत्वमेषु निगूहितम् ।", |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "प्राश्निकानां लक्षणं वक्ति\nरागद्वेषविहीनास्तु सर्वविद्याविशारदाः ।\nप्राश्निका इति विज्ञेयाः .....\nरागित्वे असन्तमपि पक्षं सन्तम् वदेयुः द्वेषित्वे सन्तमप्यसन्तम् । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतु\u003C/span\u003E शब्दोऽप्यर्थः । तेन वादिप्रतिवादिनोरन्यतरपरवशत्वादीनां बुद्धिपूर्वं वैपरीत्याचरणहेतूनामसद्भावं समुच्चिनोति । सर्वविद्यापदेन वादिप्रतिवादिदर्शनयोः कथोपयुक्तव्याकरणादीनां च संग्रहः । तदज्ञत्वे अपसिद्धान्ताद्युद्भावने निर्णयो न स्यात् । वैशारद्यग्रहणेन च पुरोक्तग्रहणावधारणानुवादादिपटुताऽपि सङ्गृह्यते । अन्यथा सर्वविद्याज्ञानवैयर्थ्यापत्तेः । तदेवं ज्ञानतोऽज्ञानतो वा वादिप्रतिवादिनोर्वैषम्यमनाचरन्तो यथावस्तुवक्तारः प्राश्निका इति विज्ञेयाः ।\nते च कियन्तः ? इत्यपेक्षायामाह\n........ विषमा एक एव वा ॥\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eविषमाः\u003C/span\u003E विषमसङ्ख्याकाः । यथोक्तं–\u003Cbr/\u003Eरागद्वेषविनिर्मुक्तास्सप्त पञ्च त्रयोऽपि वा ।\u003Cbr/\u003E यत्रोपविष्टास्सभ्यास्स्युस्सा यज्ञसदृशी सभा ॥ इति ।\nविषमसङ्ख्याकत्वे हि तेषामेव परस्परविरोधे सति बहूनां संवादेन निर्णयः स्यात् । तथा चोक्तं ‘द्वैधे बहूनां वचनम्’ .... । इति ।" | | "lines": [ |
| | "प्राश्निकानां लक्षणं वक्ति", |
| | "रागद्वेषविहीनास्तु सर्वविद्याविशारदाः ।", |
| | "प्राश्निका इति विज्ञेयाः .....", |
| | "रागित्वे असन्तमपि पक्षं सन्तम् वदेयुः द्वेषित्वे सन्तमप्यसन्तम् । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतु\u003C/span\u003E शब्दोऽप्यर्थः । तेन वादिप्रतिवादिनोरन्यतरपरवशत्वादीनां बुद्धिपूर्वं वैपरीत्याचरणहेतूनामसद्भावं समुच्चिनोति । सर्वविद्यापदेन वादिप्रतिवादिदर्शनयोः कथोपयुक्तव्याकरणादीनां च संग्रहः । तदज्ञत्वे अपसिद्धान्ताद्युद्भावने निर्णयो न स्यात् । वैशारद्यग्रहणेन च पुरोक्तग्रहणावधारणानुवादादिपटुताऽपि सङ्गृह्यते । अन्यथा सर्वविद्याज्ञानवैयर्थ्यापत्तेः । तदेवं ज्ञानतोऽज्ञानतो वा वादिप्रतिवादिनोर्वैषम्यमनाचरन्तो यथावस्तुवक्तारः प्राश्निका इति विज्ञेयाः ।", |
| | "ते च कियन्तः ? इत्यपेक्षायामाह", |
| | "........ विषमा एक एव वा ॥", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eविषमाः\u003C/span\u003E विषमसङ्ख्याकाः । यथोक्तं–\u003Cbr/\u003Eरागद्वेषविनिर्मुक्तास्सप्त पञ्च त्रयोऽपि वा ।\u003Cbr/\u003E यत्रोपविष्टास्सभ्यास्स्युस्सा यज्ञसदृशी सभा ॥ इति ।", |
| | "विषमसङ्ख्याकत्वे हि तेषामेव परस्परविरोधे सति बहूनां संवादेन निर्णयः स्यात् । तथा चोक्तं ‘द्वैधे बहूनां वचनम्’ .... । इति ।" |
| | ] |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "नन्वेवं चेत् एक एव इत्यनुज्ञानं कथम् ? संवादाभावेन तत्कृतकथानिर्णये अनाश्वासादित्यत आह\nअशेषसंशयच्छेत्ता निस्संशय उदारधीः । एकश्चेत्प्राश्निको ज्ञेयस्सर्वदोषविवर्जितः ॥ ६ ॥\nअत्र आद्येन विशेषणेन भग्नप्रतिबोधनादौ सामर्थ्यातिशयो दर्शितः । द्वितीयेन विशेषणेन सिद्धान्तद्वयरहस्यवेदित्वाद्यतिशयः , तृतीयेन परोक्तग्रहणादिपाटवातिशयः , चतुर्थेन रागादीनामशेषतोऽभावः । ततश्चप्राश्निकलक्षणातिशयसम्पत्त्या निश्शङ्कमुभाभ्यां निश्चितश्चेदेको वाप्राश्निकोऽङ्गीकार्य एवेत्युक्तं भवति ।" | | "lines": [ |
| | "नन्वेवं चेत् एक एव इत्यनुज्ञानं कथम् ? संवादाभावेन तत्कृतकथानिर्णये अनाश्वासादित्यत आह", |
| | "अशेषसंशयच्छेत्ता निस्संशय उदारधीः । एकश्चेत्प्राश्निको ज्ञेयस्सर्वदोषविवर्जितः ॥ ६ ॥", |
| | "अत्र आद्येन विशेषणेन भग्नप्रतिबोधनादौ सामर्थ्यातिशयो दर्शितः । द्वितीयेन विशेषणेन सिद्धान्तद्वयरहस्यवेदित्वाद्यतिशयः , तृतीयेन परोक्तग्रहणादिपाटवातिशयः , चतुर्थेन रागादीनामशेषतोऽभावः । ततश्चप्राश्निकलक्षणातिशयसम्पत्त्या निश्शङ्कमुभाभ्यां निश्चितश्चेदेको वाप्राश्निकोऽङ्गीकार्य एवेत्युक्तं भवति ।" |
| | ] |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "विशेषणान्तरमाह\nएको वा बहवो वा स्युर्विष्णुभक्तिपरास्सदा ।\nरागादिराहित्यवत् विष्णुभक्तेः प्राश्निकत्वोपयोगं न पश्याम इत्यत आह\nविष्णुभक्तिर्हि सर्वेषां सद्गुणानां स्वलक्षणम् ॥\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eहि\u003C/span\u003E शब्दो हेतौ । सन्तो गुणा येषां पुसां ते सद्गुणाः । स्वलक्षणं अव्यभिचारिलक्षणम् ।\nइदमुक्तं भवति, यतः प्राश्निकैर्हि कथकयोः सदसद्भावं विविच्य सतोर्जल्पः सदसतोर्वितण्डा दातव्या । तत्रापि असतः स्वपरपक्षसाधनदूषणलक्षणं वादित्वं, सतस्तु परपक्षप्रतिक्षेपलक्षणं प्रतिवादित्वं व्यवस्थापनीयम् । असतो जये सति उदासितव्यम् । सतो जये सति सम्पूर्णसम्माननाय घटनीयम् । अन्यथा पाषण्डिनिरासाभावेन वितण्डावैयर्थ्यप्रसङ्गात् । न चैते कथाविशेषव्यवस्थापनादयो गुणाः तेषां विष्णुभक्तिं विना सम्भवन्ति । अतः प्राश्निकत्वोपयोगिगुणकारणत्वात् तेषां विष्णुभक्तिर्विधीयत इति ।\nननु वादजल्पयोः को भेदः ? द्वयोरपि सदधिकारित्वात् स्वरूपभेदाभावे अधिकारिभेदस्यातिप्रसञ्जकत्वाच्च । अत एव तत्वबुभुत्सुत्वख्यात्यादिकामत्वरूपोऽधिकारिविशेषोऽपि अनुपयोगितया परास्तः । वादस्तत्वज्ञानं प्रसूते जल्पस्तु ख्यात्यादिकमिति भेद इति चेन्न । स्वरूपभेदाभावेऽस्य फलभेदस्यैव अनिर्वाहात् । न हि कथा कल्पलता येन स्वयमविचित्राऽपि सती पुरुषमनोरथवशेन विचित्रं फलं प्रसुवीत । न च जल्पवितण्डयोरिव प्रवृत्तिप्रकारभेदेन फलभेदः । उभयत्रापि स्वपरपक्षसाधनोपालम्भ सद्भावेन तदभावादिति । मैवम् । प्रमाणतर्काभ्यामेव वादे स्वपरपक्षसाधनोपालम्भौ क्रियेते, जल्पे तु प्रमाणतर्काभ्यां छलादिना च । न चोभयोः प्रमाणतर्कासम्भवः । अभिप्रायनियमस्य विवक्षितत्वात् । तदेवं प्रवृत्तिप्रकारभेदात् युक्तः फलभेदः , कथाभेदश्च सम्भवतीत्याशयवान् वादप्रकारं तावत् दर्शयति" | | "lines": [ |
| | "विशेषणान्तरमाह", |
| | "एको वा बहवो वा स्युर्विष्णुभक्तिपरास्सदा ।", |
| | "रागादिराहित्यवत् विष्णुभक्तेः प्राश्निकत्वोपयोगं न पश्याम इत्यत आह", |
| | "विष्णुभक्तिर्हि सर्वेषां सद्गुणानां स्वलक्षणम् ॥", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eहि\u003C/span\u003E शब्दो हेतौ । सन्तो गुणा येषां पुसां ते सद्गुणाः । स्वलक्षणं अव्यभिचारिलक्षणम् ।", |
| | "इदमुक्तं भवति, यतः प्राश्निकैर्हि कथकयोः सदसद्भावं विविच्य सतोर्जल्पः सदसतोर्वितण्डा दातव्या । तत्रापि असतः स्वपरपक्षसाधनदूषणलक्षणं वादित्वं, सतस्तु परपक्षप्रतिक्षेपलक्षणं प्रतिवादित्वं व्यवस्थापनीयम् । असतो जये सति उदासितव्यम् । सतो जये सति सम्पूर्णसम्माननाय घटनीयम् । अन्यथा पाषण्डिनिरासाभावेन वितण्डावैयर्थ्यप्रसङ्गात् । न चैते कथाविशेषव्यवस्थापनादयो गुणाः तेषां विष्णुभक्तिं विना सम्भवन्ति । अतः प्राश्निकत्वोपयोगिगुणकारणत्वात् तेषां विष्णुभक्तिर्विधीयत इति ।", |
| | "ननु वादजल्पयोः को भेदः ? द्वयोरपि सदधिकारित्वात् स्वरूपभेदाभावे अधिकारिभेदस्यातिप्रसञ्जकत्वाच्च । अत एव तत्वबुभुत्सुत्वख्यात्यादिकामत्वरूपोऽधिकारिविशेषोऽपि अनुपयोगितया परास्तः । वादस्तत्वज्ञानं प्रसूते जल्पस्तु ख्यात्यादिकमिति भेद इति चेन्न । स्वरूपभेदाभावेऽस्य फलभेदस्यैव अनिर्वाहात् । न हि कथा कल्पलता येन स्वयमविचित्राऽपि सती पुरुषमनोरथवशेन विचित्रं फलं प्रसुवीत । न च जल्पवितण्डयोरिव प्रवृत्तिप्रकारभेदेन फलभेदः । उभयत्रापि स्वपरपक्षसाधनोपालम्भ सद्भावेन तदभावादिति । मैवम् । प्रमाणतर्काभ्यामेव वादे स्वपरपक्षसाधनोपालम्भौ क्रियेते, जल्पे तु प्रमाणतर्काभ्यां छलादिना च । न चोभयोः प्रमाणतर्कासम्भवः । अभिप्रायनियमस्य विवक्षितत्वात् । तदेवं प्रवृत्तिप्रकारभेदात् युक्तः फलभेदः , कथाभेदश्च सम्भवतीत्याशयवान् वादप्रकारं तावत् दर्शयति" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "पृष्टेनाऽगम एवादौ वक्तव्यः\nवादे, प्रतिवादिना वादिनं प्रति विचार्ये प्रमेये प्रमाणं प्रष्टव्यम् । पृष्टेन च वादिना तावदागम एव वक्तव्यः न तु छलादिना प्रश्नखण्डनं कर्तव्यम् । नाप्यनुमानं दुरागमो वा वक्तव्यः ।\nछलादिना प्रश्नखण्डनमकृत्वा कुतो वादिना प्रमाणमभिधेयम् ? इति तत्राह\n........ साध्यसिद्धये ॥\nवादी हि तत्वनिर्णयं कामयते । न तु परपराभवम् । प्रमाणमेव च तत्वनिर्णयाय प्रभवति । न तु छलादिना प्रश्नखण्डनम् । आगमः कुतो वक्तव्यः ? इत्यत्राप्येतदेवोत्तरम् । आगमो हि साध्यसिद्धये कल्पत इति ।\nअस्त्वागमस्य वक्तव्यता तन्नियमस्तु कुतः ? अनुमानेनापि साध्यसिद्धिसम्भवात् इत्यत आह\nनैषा तर्केणापनेया मतिरित्याह हि श्रुतिः ॥\nयस्मात् तत्वमतेरनुमानासाध्यतामाह श्रुतिः तस्मादागमनियमः ॥ वादिना आगमेन स्वपक्षे साधिते प्रतिवादिना किं कर्तव्यम् ? वाद्युपन्यस्तं प्रमाणं दूषणीयम् । प्रतिपक्षे तस्मिञ्जागरूके तत्वनिर्णयायोगात् । उभयत्र प्रमाणोपपत्तौ संशयानतिक्रमात् । उपस्थितसाधनादूषणे स्वपक्षसाधनस्यानवसरात् ।\nआगमस्य च दूषणं कीदृशम् ? इत्यपेक्षायामाह\nअन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः प्रतिवादिना ॥\nद्वेधा हि प्रमाणदूषणं, सर्वथा निर्विषयत्वापादनं पराभिमतार्थप्रच्यावनं च । तत्रागमस्यायथार्थताकथनेन वाद्यभिमतार्थप्रच्यावनमेव प्रतिवादिना कर्तव्यं, न तु सर्वथा अप्रामाण्यं ।कुतो नाप्रामाण्यं वक्तव्यमिति चेत् ? आगमशब्देन हि सदागमा विवक्षिताः । सदागमाश्च श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणलक्षणा एव ।" | | "lines": [ |
| | "पृष्टेनाऽगम एवादौ वक्तव्यः", |
| | "वादे, प्रतिवादिना वादिनं प्रति विचार्ये प्रमेये प्रमाणं प्रष्टव्यम् । पृष्टेन च वादिना तावदागम एव वक्तव्यः न तु छलादिना प्रश्नखण्डनं कर्तव्यम् । नाप्यनुमानं दुरागमो वा वक्तव्यः ।", |
| | "छलादिना प्रश्नखण्डनमकृत्वा कुतो वादिना प्रमाणमभिधेयम् ? इति तत्राह", |
| | "........ साध्यसिद्धये ॥", |
| | "वादी हि तत्वनिर्णयं कामयते । न तु परपराभवम् । प्रमाणमेव च तत्वनिर्णयाय प्रभवति । न तु छलादिना प्रश्नखण्डनम् । आगमः कुतो वक्तव्यः ? इत्यत्राप्येतदेवोत्तरम् । आगमो हि साध्यसिद्धये कल्पत इति ।", |
| | "अस्त्वागमस्य वक्तव्यता तन्नियमस्तु कुतः ? अनुमानेनापि साध्यसिद्धिसम्भवात् इत्यत आह", |
| | "नैषा तर्केणापनेया मतिरित्याह हि श्रुतिः ॥", |
| | "यस्मात् तत्वमतेरनुमानासाध्यतामाह श्रुतिः तस्मादागमनियमः ॥ वादिना आगमेन स्वपक्षे साधिते प्रतिवादिना किं कर्तव्यम् ? वाद्युपन्यस्तं प्रमाणं दूषणीयम् । प्रतिपक्षे तस्मिञ्जागरूके तत्वनिर्णयायोगात् । उभयत्र प्रमाणोपपत्तौ संशयानतिक्रमात् । उपस्थितसाधनादूषणे स्वपक्षसाधनस्यानवसरात् ।", |
| | "आगमस्य च दूषणं कीदृशम् ? इत्यपेक्षायामाह", |
| | "अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः प्रतिवादिना ॥", |
| | "द्वेधा हि प्रमाणदूषणं, सर्वथा निर्विषयत्वापादनं पराभिमतार्थप्रच्यावनं च । तत्रागमस्यायथार्थताकथनेन वाद्यभिमतार्थप्रच्यावनमेव प्रतिवादिना कर्तव्यं, न तु सर्वथा अप्रामाण्यं ।कुतो नाप्रामाण्यं वक्तव्यमिति चेत् ? आगमशब्देन हि सदागमा विवक्षिताः । सदागमाश्च श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणलक्षणा एव ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 2,114: |
Line 164: |
| "parent": "KL_C01_V09", | | "parent": "KL_C01_V09", |
| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "तत्र श्रुतीनामपौरुषेयत्वेन अप्रामाण्यकारणशून्यानामप्रामाण्यं वक्तुं तावन्न शक्यम् । स्मृत्यादीनामप्याप्तप्रणीततया श्रुत्यानुकूल्येन च दोषाभावनिश्चयान्नाप्रामाण्यं वक्तुं शक्यते । अतो विषयान्तरोपदर्शनेन वाद्यभिमतार्थप्रच्यावनमेव न्याय्यमित्याशयवानाह\nऋग्यजुस्सामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम् ॥\nमूलरामायणं चैव सम्प्रोच्यन्ते सदागमाः ।\nअनुकूला य एतेषां ते च प्रोक्तास्सदागमाः ॥\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eच\u003C/span\u003Eकारा अन्योन्यसमुच्चये । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eएव\u003C/span\u003Eकारस्त्वेत एव सदागमा इत्यनेन सम्बद्ध्यते । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसम्प्रोच्यन्ते प्रोक्ता\u003C/span\u003E इत्यनेन ऋगाद्या भारतं चैव इत्यागमं सूचयति ।" | | "lines": [ |
| | "तत्र श्रुतीनामपौरुषेयत्वेन अप्रामाण्यकारणशून्यानामप्रामाण्यं वक्तुं तावन्न शक्यम् । स्मृत्यादीनामप्याप्तप्रणीततया श्रुत्यानुकूल्येन च दोषाभावनिश्चयान्नाप्रामाण्यं वक्तुं शक्यते । अतो विषयान्तरोपदर्शनेन वाद्यभिमतार्थप्रच्यावनमेव न्याय्यमित्याशयवानाह", |
| | "ऋग्यजुस्सामाथर्वाश्च भारतं पञ्चरात्रकम् ॥", |
| | "मूलरामायणं चैव सम्प्रोच्यन्ते सदागमाः ।", |
| | "अनुकूला य एतेषां ते च प्रोक्तास्सदागमाः ॥", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eच\u003C/span\u003Eकारा अन्योन्यसमुच्चये । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eएव\u003C/span\u003Eकारस्त्वेत एव सदागमा इत्यनेन सम्बद्ध्यते । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसम्प्रोच्यन्ते प्रोक्ता\u003C/span\u003E इत्यनेन ऋगाद्या भारतं चैव इत्यागमं सूचयति ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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| "parent": "KL_C01_V10", | | "parent": "KL_C01_V10", |
| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "ननु यदा वादी परिगणितं वेदादिकं वदेत् तदा प्रतिवादिनाऽन्योऽर्थोऽभिधीयताम् । यदा तु उपरिगणितं पाशुपतादिकम भिदधीत, तदा तु अप्रामाण्यं वक्तुं शक्यत एव । अतः कथं अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः इति नियमः ? इत्यत आह\nअन्ये दुरागमा नाम तैर्न साध्यं हि साध्यते ।\nयतः परिगणितेभ्योऽन्ये दुरागमाः प्रसिद्धाः दुरागमास्तदन्य इत्यादौ । अतो वादिना तत्वबुभुत्सुना \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतैर्न साध्यं साध्यते\u003C/span\u003E। साध्यसाधनाय ते न प्रयोक्तव्या एव । तथा च सर्वथा अप्रामाण्यकथनस्य अप्रसङ्गात् उक्तनियमो युक्त एव ।" | | "lines": [ |
| | "ननु यदा वादी परिगणितं वेदादिकं वदेत् तदा प्रतिवादिनाऽन्योऽर्थोऽभिधीयताम् । यदा तु उपरिगणितं पाशुपतादिकम भिदधीत, तदा तु अप्रामाण्यं वक्तुं शक्यत एव । अतः कथं अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः इति नियमः ? इत्यत आह", |
| | "अन्ये दुरागमा नाम तैर्न साध्यं हि साध्यते ।", |
| | "यतः परिगणितेभ्योऽन्ये दुरागमाः प्रसिद्धाः दुरागमास्तदन्य इत्यादौ । अतो वादिना तत्वबुभुत्सुना \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eतैर्न साध्यं साध्यते\u003C/span\u003E। साध्यसाधनाय ते न प्रयोक्तव्या एव । तथा च सर्वथा अप्रामाण्यकथनस्य अप्रसङ्गात् उक्तनियमो युक्त एव ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
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| "parent": "KL_C01_V11", | | "parent": "KL_C01_V11", |
| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "वादिप्रयुक्तागमस्यार्थान्तरकथनेन किं प्रतिवादी चरितार्थः ? नेत्याह\nस्वपक्ष आगमश्चैव वक्तव्यः प्रतिवादिना ॥\nसाध्यसिद्धेः प्रमाणैकाधीनत्वादिति एवकारार्थः ।\nएवं प्रतिवादिना परपक्षप्रतिक्षेपे स्वपक्षसाधने च कृते वादी किं कुर्यात् ? इत्यपेक्षयामाह\nतस्याप्यन्यार्थता साध्या वादिना ..... ।\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअपिः\u003C/span\u003E\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003E'वादिना'\u003C/span\u003E इत्यनेन सम्बध्यते । अर्थान्तरकथनमात्रस्याप्रयोजकत्वात् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसाध्ये\u003C/span\u003Eत्युक्तं । एवम् अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः इत्येतदपि साध्यः इति व्याख्येयम् ।\nकुतो वादिना प्रतिवाद्युक्तागमस्यार्थान्तरं साध्यं ? तत्राह\n...... स्वार्थसिद्धये ।\nन हि प्रतिपक्षप्रमाणे सति स्वप्रमाणमात्रेण वादिनस्तद्दूषणेन विना स्वसाध्यं सिद्ध्यति । सप्रतिपक्षस्य प्रमाणत्व एव सन्देहात् । प्रतिवादिप्रमाणदूषणं चप्रागुक्तन्यायेनार्थान्तरकथनमेव ।" | | "lines": [ |
| | "वादिप्रयुक्तागमस्यार्थान्तरकथनेन किं प्रतिवादी चरितार्थः ? नेत्याह", |
| | "स्वपक्ष आगमश्चैव वक्तव्यः प्रतिवादिना ॥", |
| | "साध्यसिद्धेः प्रमाणैकाधीनत्वादिति एवकारार्थः ।", |
| | "एवं प्रतिवादिना परपक्षप्रतिक्षेपे स्वपक्षसाधने च कृते वादी किं कुर्यात् ? इत्यपेक्षयामाह", |
| | "तस्याप्यन्यार्थता साध्या वादिना ..... ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअपिः\u003C/span\u003E\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003E'वादिना'\u003C/span\u003E इत्यनेन सम्बध्यते । अर्थान्तरकथनमात्रस्याप्रयोजकत्वात् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसाध्ये\u003C/span\u003Eत्युक्तं । एवम् अन्यार्थ एवागमस्य वक्तव्यः इत्येतदपि साध्यः इति व्याख्येयम् ।", |
| | "कुतो वादिना प्रतिवाद्युक्तागमस्यार्थान्तरं साध्यं ? तत्राह", |
| | "...... स्वार्थसिद्धये ।", |
| | "न हि प्रतिपक्षप्रमाणे सति स्वप्रमाणमात्रेण वादिनस्तद्दूषणेन विना स्वसाध्यं सिद्ध्यति । सप्रतिपक्षस्य प्रमाणत्व एव सन्देहात् । प्रतिवादिप्रमाणदूषणं चप्रागुक्तन्यायेनार्थान्तरकथनमेव ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "किमेतावता जितं वादिना ? नेत्याह\nअन्यार्थता निराकार्या स्वागमस्य ...... ।\nवादिना स्वप्रयुक्तागमस्य या प्रतिवाद्युक्ता \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअन्यार्थता\u003C/span\u003E सा \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनिराकार्या\u003C/span\u003E च ।\nकुतः ? इत्यत आह\n......... विनिश्चयात् ॥\nल्यब्लोपनिमित्ता पञ्चमी तत्वनिश्चयमुद्दिश्येति । प्रतिवादिना अर्थान्तरकथनेन वाद्यभिमतार्थात् प्रच्यावित आगमः कथं नाम तत्वनिश्चयाय प्रभवेत् ? कथं च प्रतिपक्षदूषणमात्रेण वादिनो निस्साधनस्तत्वनिश्चयस्स्यात् ? इति ।\nननु वादिप्रयुक्तागमस्य प्रतिवाद्युक्ता अन्यार्थता वादिना कथं निराकर्तुं शक्या ? ‘मदभिमत एवार्थः ’ इत्येवंवादिनि वादिनि ‘न त्वदभिमतः किन्तु ? मदभिमत एव’ इति प्रतिवाद्यपि हि वक्तुं शक्नोत्येव । ततश्च कथं वाद्यागमार्थनिर्णयस्स्यात् ? इत्यत आह\nउपपत्त्यवकाशोऽत्र ह्यागमार्थविनिर्णये ।\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eहि\u003C/span\u003E यस्मादागमार्थविनिर्णयार्थमुपपत्तीनामवकाशः तस्मात् वाद्यागमार्थनिर्णयो युक्तः ।\nएतदुक्तं भवति, आगमो हि न वेदादिमात्रं । तस्यार्थप्रमाजननासामर्थ्यात् । किं नाम ? श्रुतो गृहीतसङ्गतिकोऽनुसंहितोपक्रमाद्युपपत्तिको वेदादिः । तस्य प्रमित्यव्यभिचारात् । तथा च वादिना स्वप्रयुक्तागमस्य स्वाभिमतार्थे उपक्रमाद्युपपत्त्यानुगुण्यं प्रतिवाद्युक्तार्थे तद्वैगुण्यं व्युत्पादनीयमेव । ततश्च कथं नाम तत्वनिर्णयो न स्यात् ? इति ।" | | "lines": [ |
| | "किमेतावता जितं वादिना ? नेत्याह", |
| | "अन्यार्थता निराकार्या स्वागमस्य ...... ।", |
| | "वादिना स्वप्रयुक्तागमस्य या प्रतिवाद्युक्ता \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअन्यार्थता\u003C/span\u003E सा \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनिराकार्या\u003C/span\u003E च ।", |
| | "कुतः ? इत्यत आह", |
| | "......... विनिश्चयात् ॥", |
| | "ल्यब्लोपनिमित्ता पञ्चमी तत्वनिश्चयमुद्दिश्येति । प्रतिवादिना अर्थान्तरकथनेन वाद्यभिमतार्थात् प्रच्यावित आगमः कथं नाम तत्वनिश्चयाय प्रभवेत् ? कथं च प्रतिपक्षदूषणमात्रेण वादिनो निस्साधनस्तत्वनिश्चयस्स्यात् ? इति ।", |
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| | "उपपत्त्यवकाशोऽत्र ह्यागमार्थविनिर्णये ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eहि\u003C/span\u003E यस्मादागमार्थविनिर्णयार्थमुपपत्तीनामवकाशः तस्मात् वाद्यागमार्थनिर्णयो युक्तः ।", |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "एवं वादिना स्वागमस्योपपत्तिवशेन स्वाभिमतार्थेप्रामाण्यं साधितवता स्वपक्षे साधिते, परोपन्यस्तागमस्य च अर्थान्तरमुक्तवता परपक्षे दूषिते निवृत्तो वाद इति न मन्तव्यं; किं नाम ? इत्यत आह\nवाद्यागमार्थे निर्णीत आगमार्थः परस्य तु ॥\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eपरस्य\u003C/span\u003E इत्येतत् सामर्थ्यात् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eआगम\u003C/span\u003E शब्देन सम्बद्ध्यते । उपपत्त्यानुगुण्येन वाद्यागमस्य तदभिमतार्थपरत्वे निर्णीते, तेन च तस्य च स्वपक्षसाधनसम्पत्तौ सत्यां, पश्चात् परप्रयुक्तागमस्य उपपत्तिवशेनैव प्रतिवाद्यभिमतार्थनिरासपुरस्सरं वाद्यभिमतार्थविषयता समर्थनीया ।\nनिर्णेयः सहितैः पश्चात् ........................ ।\nइयांस्तु विशेषः , यथा वाद्यागमार्थनिर्णये वादिभावेन उपपत्तिचिन्ता क्रियते, न तथा प्रतिवाद्यागमार्थनिर्णये । किन्तु ? सहितैः सुहृद्भावेन सङ्गतैः । कुत एतत् ? वादिना स्वपक्षस्य सुदृढतरं साधितत्वात् तत एव प्रतिवादिनः परपक्षप्रतिक्षेपाक्षमत्वात् प्रतिपक्षसाधनस्य चार्थान्तरकल्पनेनप्रामाण्यसन्देहात्, प्रबलदुर्बलयोश्च वादिप्रतिवादिभावायोगादिति ।\nननु पुनः प्रतिवाद्यागमार्थमीमांसानुष्ठानं किंनिबन्धनम् ? उक्तरीत्या वादिपक्षप्राबल्यस्य प्रतिवादिपक्षदौर्बल्यस्य च निश्चितत्वात् इत्यत आह\n..... ततो निश्शेषनिर्णयः ।\nवादिना उपपत्त्यानुगुण्यवैगुण्याभ्यां स्वागमस्य स्वाभिमतार्थसमर्थन पराभिमतार्थनिरसनानुष्ठानेन स्वपक्षसाधने विहिते, प्रतिवादिप्रयुक्तागमस्यार्थान्तरकल्पनेन तत्पक्षे दूषितेऽपि तत एव प्रतिवादिनः परपक्षोपालम्भस्वपक्षसाधनाक्षमत्वेऽपि प्रतिवाद्यागमस्य वादिप्रतिवाद्युक्तार्थयोरुपपत्त्यानुगुण्यवैगुण्यसमर्थन एव तत्वनिर्णयो भवति नान्यथेति तदनुष्ठेयमेव ।\nननु परस्परविरुद्धयोर्वादिप्रतिवादिपक्षयोः वादिपक्षे प्रबले सति कथं तत्वनिर्णयो न स्यात् ? इति चेन्न । वादिना प्रतिवाद्यागमस्यार्थान्तरे अभिहिते, परमार्थतः को न्वर्थः स्यात् ? इति संशयसद्भावेन वादिपक्षेप्राबल्य एव शङ्काशूकसद्भावात् । न च सति तस्मिन् वादसाध्यस्तत्वनिर्णयः । तदिदमुक्तं ॥ निश्शेषेति ॥\nवाद्यागमस्योपपत्तिवशेन वाद्यभिमतार्थपरत्वे अवधारिते तदानुगुण्येन प्रतिवाद्यागमस्यापि वाद्यभिमतार्थपरत्वनिश्चयेन सन्देह एव कुतः ? सावकाशस्य निरवकाशविरोधेन बाधितत्वादिति चेन्न । वाद्यागमस्य प्रतिवाद्यागमार्थविचारे अव्यापारितत्वात् । व्यापारितत्वे वा को नाम पुनर्युक्त्यनुसरणं विदध्यात् ? इति ।\nअनेनैव न्यायेन प्रतिवादिपक्षप्राबल्यमपि व्युत्पादनीयम् । न हि वादिन एव जयोऽपरस्य पराभव इति नियतिरस्ति ।" | | "lines": [ |
| | "एवं वादिना स्वागमस्योपपत्तिवशेन स्वाभिमतार्थेप्रामाण्यं साधितवता स्वपक्षे साधिते, परोपन्यस्तागमस्य च अर्थान्तरमुक्तवता परपक्षे दूषिते निवृत्तो वाद इति न मन्तव्यं; किं नाम ? इत्यत आह", |
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| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eपरस्य\u003C/span\u003E इत्येतत् सामर्थ्यात् \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eआगम\u003C/span\u003E शब्देन सम्बद्ध्यते । उपपत्त्यानुगुण्येन वाद्यागमस्य तदभिमतार्थपरत्वे निर्णीते, तेन च तस्य च स्वपक्षसाधनसम्पत्तौ सत्यां, पश्चात् परप्रयुक्तागमस्य उपपत्तिवशेनैव प्रतिवाद्यभिमतार्थनिरासपुरस्सरं वाद्यभिमतार्थविषयता समर्थनीया ।", |
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| | "वादिना उपपत्त्यानुगुण्यवैगुण्याभ्यां स्वागमस्य स्वाभिमतार्थसमर्थन पराभिमतार्थनिरसनानुष्ठानेन स्वपक्षसाधने विहिते, प्रतिवादिप्रयुक्तागमस्यार्थान्तरकल्पनेन तत्पक्षे दूषितेऽपि तत एव प्रतिवादिनः परपक्षोपालम्भस्वपक्षसाधनाक्षमत्वेऽपि प्रतिवाद्यागमस्य वादिप्रतिवाद्युक्तार्थयोरुपपत्त्यानुगुण्यवैगुण्यसमर्थन एव तत्वनिर्णयो भवति नान्यथेति तदनुष्ठेयमेव ।", |
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| | "अनेनैव न्यायेन प्रतिवादिपक्षप्राबल्यमपि व्युत्पादनीयम् । न हि वादिन एव जयोऽपरस्य पराभव इति नियतिरस्ति ।" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "ननु यदि परश्चक्षुराद्येकप्रमाणके साक्ष्येकविषये वा अर्थे प्रमाणं पृच्छेत् तदा परेण किं तूष्णीमासितव्यम् ? प्रत्यक्षादिकं वा वक्तव्यम् ? आद्ये साध्यासिद्धिः । द्वितीये तु आगम एव वक्तव्यः इति नियमभङ्गः । न च प्रत्यक्षसिद्धेऽर्थे विप्रतिपत्तिरेव न सम्भवति तत्प्रामाण्यासम्प्रतिपत्त्यभिप्रायेण तदुपपत्तेरिति । तत्राह\nप्रत्यक्षसिद्धेष्वर्थेषु प्रश्ने मामक्षजं वदेत् ॥\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eप्रत्यक्षसिद्धेषु\u003C/span\u003E चक्षुराद्येकविषयेषु । प्रश्ने प्रमाणस्येति शेषः । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eमां\u003C/span\u003E प्रमाणम् ।\nज्ञानं वा ज्ञानसिद्धेषु .................... ।\nज्ञानं साक्षिणम् ।\nतर्ह्यागमनियमभङ्ग इति चेन्न । ‘आगम एव’ इति नियमस्य अनुमाननिरासपरत्वेन प्रत्यक्षानिरासादिति भावेनाह\n.......... नानुमां प्रथमं वदेत् ।\nनन्वेतदपि नास्ति ‘उपपत्त्यवकाशोऽत्र’ इत्युक्तत्वात् इत्यत उक्तम् ॥ प्रथममिति ॥ अङ्गतया आनन्तरिकप्रयोगनिषेधोऽनुमानस्य न नियमफलत्वेनाभिप््रोयत इति । ननु केवलानुमानविषये कथम् ? अनुमानं वक्तव्यम् । न चोक्तविरोधः । यत्रागमः प्रत्यक्षं वा सम्भवति तत्र तद्धानेन प्रथममनुमानं न वक्तव्यमित्यस्यार्थस्य नियमफलतया विवक्षितत्वेन अनुमानैकगम्ये तदुपन्यासस्य अनिराकरणात् । तदिदमुक्तं नानुमां प्रथमं वदेदिति ।\nननु यदि ‘नदीतीरे पञ्च फलानि सन्ति’ इत्यादिना लौकिकवाक्येन अवगतेऽर्थे परः प्रमाणं पृच्छेत्, तदा किं वक्तव्यम् ? न तावत्तद्वाक्यं वक्तुं युक्तं, ऋगादिषु अपरिगणितत्वेन अनागमत्वात् । प्रमाणान्तरं तु नास्तीति चेत्, तत् किं वाक्यमुभयोः प्रमाणतया सम्मतम् ? उत असम्मतम् ? असम्मतावपि शक्यप्रामाण्योपपादनम् ? अन्यथा वा ? अन्यथेति पक्षे तूष्णीमासितव्यम् । उपायाभावात् । प्रथमद्वितीययोस्तदेव वक्तव्यंप्रामाण्यं चोपपादनीयम् ।" | | "lines": [ |
| | "ननु यदि परश्चक्षुराद्येकप्रमाणके साक्ष्येकविषये वा अर्थे प्रमाणं पृच्छेत् तदा परेण किं तूष्णीमासितव्यम् ? प्रत्यक्षादिकं वा वक्तव्यम् ? आद्ये साध्यासिद्धिः । द्वितीये तु आगम एव वक्तव्यः इति नियमभङ्गः । न च प्रत्यक्षसिद्धेऽर्थे विप्रतिपत्तिरेव न सम्भवति तत्प्रामाण्यासम्प्रतिपत्त्यभिप्रायेण तदुपपत्तेरिति । तत्राह", |
| | "प्रत्यक्षसिद्धेष्वर्थेषु प्रश्ने मामक्षजं वदेत् ॥", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eप्रत्यक्षसिद्धेषु\u003C/span\u003E चक्षुराद्येकविषयेषु । प्रश्ने प्रमाणस्येति शेषः । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eमां\u003C/span\u003E प्रमाणम् ।", |
| | "ज्ञानं वा ज्ञानसिद्धेषु .................... ।", |
| | "ज्ञानं साक्षिणम् ।", |
| | "तर्ह्यागमनियमभङ्ग इति चेन्न । ‘आगम एव’ इति नियमस्य अनुमाननिरासपरत्वेन प्रत्यक्षानिरासादिति भावेनाह", |
| | ".......... नानुमां प्रथमं वदेत् ।", |
| | "नन्वेतदपि नास्ति ‘उपपत्त्यवकाशोऽत्र’ इत्युक्तत्वात् इत्यत उक्तम् ॥ प्रथममिति ॥ अङ्गतया आनन्तरिकप्रयोगनिषेधोऽनुमानस्य न नियमफलत्वेनाभिप््रोयत इति । ननु केवलानुमानविषये कथम् ? अनुमानं वक्तव्यम् । न चोक्तविरोधः । यत्रागमः प्रत्यक्षं वा सम्भवति तत्र तद्धानेन प्रथममनुमानं न वक्तव्यमित्यस्यार्थस्य नियमफलतया विवक्षितत्वेन अनुमानैकगम्ये तदुपन्यासस्य अनिराकरणात् । तदिदमुक्तं नानुमां प्रथमं वदेदिति ।", |
| | "ननु यदि ‘नदीतीरे पञ्च फलानि सन्ति’ इत्यादिना लौकिकवाक्येन अवगतेऽर्थे परः प्रमाणं पृच्छेत्, तदा किं वक्तव्यम् ? न तावत्तद्वाक्यं वक्तुं युक्तं, ऋगादिषु अपरिगणितत्वेन अनागमत्वात् । प्रमाणान्तरं तु नास्तीति चेत्, तत् किं वाक्यमुभयोः प्रमाणतया सम्मतम् ? उत असम्मतम् ? असम्मतावपि शक्यप्रामाण्योपपादनम् ? अन्यथा वा ? अन्यथेति पक्षे तूष्णीमासितव्यम् । उपायाभावात् । प्रथमद्वितीययोस्तदेव वक्तव्यंप्रामाण्यं चोपपादनीयम् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 2,162: |
Line 265: |
| "parent": "KL_C01_V15", | | "parent": "KL_C01_V15", |
| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "ननु तत् उक्तेषु अपरिगणितत्वात् न आगम इत्युक्तं इत्यत आह\nपरतुष्टिकरं वाक्यं वदेतां यदि वादिनौ ॥\nस एवात्रागमो ज्ञेयः .................... ।\nवदत इति वादिनौ वादिप्रतिवादिनाविति यावत् । यदिप्रामाण्यसम्मत्या उपपादनेन वा परस्य वादिनः प्रतिवादिनो वा तुष्टिकरं मनस्समाधानकरं लौकिकं वाक्यं वदेतां, तर्हि अत्र तदेकप्रमाणकेऽर्थे स एवागमो ज्ञेयः । तत्र तद्वाक्यमागमत्वेनाङ्गीक्रियत इति यावत् ।\nकथम् ? इत्यत आह\n....... परतुष्टिर्हि तत्फलम् ।\nऋगाद्यागमो वक्तव्य इत्यभ्युपगमस्यापि \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eपरतुष्टिरेव हि\u003C/span\u003E प्रयोजनम् । तत्प्रामाण्यस्य सम्मततत्वात् । सा चेत् परतुष्टिः प्रामाण्यसम्प्रतिपत्या तदुपपादनेन वा यदि लौकिकवाक्येऽपि स्यात्, कथं तस्य नागमत्वम् ? कथं च न वक्तव्यत्वम् ? इति ।" | | "lines": [ |
| | "ननु तत् उक्तेषु अपरिगणितत्वात् न आगम इत्युक्तं इत्यत आह", |
| | "परतुष्टिकरं वाक्यं वदेतां यदि वादिनौ ॥", |
| | "स एवात्रागमो ज्ञेयः .................... ।", |
| | "वदत इति वादिनौ वादिप्रतिवादिनाविति यावत् । यदिप्रामाण्यसम्मत्या उपपादनेन वा परस्य वादिनः प्रतिवादिनो वा तुष्टिकरं मनस्समाधानकरं लौकिकं वाक्यं वदेतां, तर्हि अत्र तदेकप्रमाणकेऽर्थे स एवागमो ज्ञेयः । तत्र तद्वाक्यमागमत्वेनाङ्गीक्रियत इति यावत् ।", |
| | "कथम् ? इत्यत आह", |
| | "....... परतुष्टिर्हि तत्फलम् ।", |
| | "ऋगाद्यागमो वक्तव्य इत्यभ्युपगमस्यापि \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eपरतुष्टिरेव हि\u003C/span\u003E प्रयोजनम् । तत्प्रामाण्यस्य सम्मततत्वात् । सा चेत् परतुष्टिः प्रामाण्यसम्प्रतिपत्या तदुपपादनेन वा यदि लौकिकवाक्येऽपि स्यात्, कथं तस्य नागमत्वम् ? कथं च न वक्तव्यत्वम् ? इति ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
| { | | { |
| Line 2,170: |
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| "parent": "KL_C01_V16", | | "parent": "KL_C01_V16", |
| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "नन्वेवंविधस्य वादस्य किं अवसानम् ? तत्राह\nएवं निर्णयपर्यन्तं वादे सुबहवोऽपि हि ॥\nघटेयुः .......\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eहि\u003C/span\u003E शब्दो वादस्य तत्वनिर्णयार्थत्वं हेतुं द्योतयति । एवं प्रमाणतर्काभिमतैरेव स्वपरपक्षसाधनोपालम्भाभ्यां वादे निर्णयपर्यन्तं तत्वनिर्णयाय प्रयतेरन् । न तु वादिप्रतिवादिनोरन्यतरपराजयमात्रेण वादावसानम् । तत्वनिर्णयार्थत्वाद्वादस्य । एकपराजयमात्रेण कथानिवृत्तौ पुनस्तस्यैव साधनान्तरादिस्फुरणे सन्देहावस्कन्दनात् ।यदि साधनान्तरादिस्फुरणेन पुनर्जायमानः पराजितस्यापि संशयो जयिना वारणीयः तर्हि पुरुषान्तरस्य तत्रैव तत्स्फुरणे पुनः सन्देहप्राप्तौ तन्निवारणमपि करणीयं स्यात् समानत्वात् । तथा च एक एव वादी प्रतिवादी चेति न स्यादिति चेत् ? सत्यं, इत्याह सुबहवोऽपि इति ।\nएवं चेत् कथैक्यं किन्निबन्धनम् ? इति चेत् फलैक्यात् इत्यवेहि ।\nतर्हि वादस्य अपर्यवसानं स्यात् ? इत्यत आह\n......चिरकालं च ... ।\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eच\u003C/span\u003Eशब्दोऽवधारणे । साधनदूषणयोः परिमितत्वेन पुरुषान्तरप्राप्त्यनियमाच्च सर्वशङ्कोद्धारेऽपि विलम्ब एव स्यात्, न तु अपर्यवसानमिति ।\nएवं वादप्रवृत्तिप्रकारं अभिधाय जल्पप्रवृत्तिप्रकारं सूचयति\nजल्पे यावत् परो जितः ॥\nतावत् घटेतां इति सम्बन्धः । अयं इह जल्पप्रवृत्तिप्रकारः , सभ्यसभापतिप्राश्निकादिसंवरणपुरस्सरं कथानियमबन्धे कृते,प्राक् प्रसक्तेप्राश्निकोपक्षिप्ते प्रतिवादिना च पृष्टे प्रमेये प्रतिवादिपर्यनुयुक्तेन वादिना प्रमाणं अभिधातव्यम् । प्रतिवादिना च अनुक्तोच्यमानग्राह्यनिग्रहाप्राप्तौ आभासबहिरुक्तग्राह्यनिग्रहालाभे च तद्वचनार्थं अवगम्य दूषयित्वा स्वपक्षे प्रमाणं अभिधानीयम् । वादिनादि उक्तोच्यमानाऽभासबहिरुक्तग्राह्यनिग्रहालाभे तद्वचनार्थं अवगम्य दूषयित्वा स्वपक्षसाधनदूषणं उद्धरणीयम् । साधनदूषणे च प्रमाणाभिमतैः , तदलाभे ‘नियतपराभवात् वरः पाक्षिकः ’ इति छलादिना च क्रियते जयैकार्थत्वात् जल्पस्य । अत एव वादिप्रतिवादिनोः अन्यतरो यावत् स्वपरपक्षसाधनोपालम्भयोः अन्यतरावसरेऽपि जीयेत तावदेव उभाभ्यां प्रयतितव्यम् । न तु वाद इव परसाधनपर्यन्तमिति । तदेवं वादजल्पयोः प्रवृत्तिप्रकारभेदात् युक्तो भेद इति ।" | | "lines": [ |
| | "नन्वेवंविधस्य वादस्य किं अवसानम् ? तत्राह", |
| | "एवं निर्णयपर्यन्तं वादे सुबहवोऽपि हि ॥", |
| | "घटेयुः .......", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eहि\u003C/span\u003E शब्दो वादस्य तत्वनिर्णयार्थत्वं हेतुं द्योतयति । एवं प्रमाणतर्काभिमतैरेव स्वपरपक्षसाधनोपालम्भाभ्यां वादे निर्णयपर्यन्तं तत्वनिर्णयाय प्रयतेरन् । न तु वादिप्रतिवादिनोरन्यतरपराजयमात्रेण वादावसानम् । तत्वनिर्णयार्थत्वाद्वादस्य । एकपराजयमात्रेण कथानिवृत्तौ पुनस्तस्यैव साधनान्तरादिस्फुरणे सन्देहावस्कन्दनात् ।यदि साधनान्तरादिस्फुरणेन पुनर्जायमानः पराजितस्यापि संशयो जयिना वारणीयः तर्हि पुरुषान्तरस्य तत्रैव तत्स्फुरणे पुनः सन्देहप्राप्तौ तन्निवारणमपि करणीयं स्यात् समानत्वात् । तथा च एक एव वादी प्रतिवादी चेति न स्यादिति चेत् ? सत्यं, इत्याह सुबहवोऽपि इति ।", |
| | "एवं चेत् कथैक्यं किन्निबन्धनम् ? इति चेत् फलैक्यात् इत्यवेहि ।", |
| | "तर्हि वादस्य अपर्यवसानं स्यात् ? इत्यत आह", |
| | "......चिरकालं च ... ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eच\u003C/span\u003Eशब्दोऽवधारणे । साधनदूषणयोः परिमितत्वेन पुरुषान्तरप्राप्त्यनियमाच्च सर्वशङ्कोद्धारेऽपि विलम्ब एव स्यात्, न तु अपर्यवसानमिति ।", |
| | "एवं वादप्रवृत्तिप्रकारं अभिधाय जल्पप्रवृत्तिप्रकारं सूचयति", |
| | "जल्पे यावत् परो जितः ॥", |
| | "तावत् घटेतां इति सम्बन्धः । अयं इह जल्पप्रवृत्तिप्रकारः , सभ्यसभापतिप्राश्निकादिसंवरणपुरस्सरं कथानियमबन्धे कृते,प्राक् प्रसक्तेप्राश्निकोपक्षिप्ते प्रतिवादिना च पृष्टे प्रमेये प्रतिवादिपर्यनुयुक्तेन वादिना प्रमाणं अभिधातव्यम् । प्रतिवादिना च अनुक्तोच्यमानग्राह्यनिग्रहाप्राप्तौ आभासबहिरुक्तग्राह्यनिग्रहालाभे च तद्वचनार्थं अवगम्य दूषयित्वा स्वपक्षे प्रमाणं अभिधानीयम् । वादिनादि उक्तोच्यमानाऽभासबहिरुक्तग्राह्यनिग्रहालाभे तद्वचनार्थं अवगम्य दूषयित्वा स्वपक्षसाधनदूषणं उद्धरणीयम् । साधनदूषणे च प्रमाणाभिमतैः , तदलाभे ‘नियतपराभवात् वरः पाक्षिकः ’ इति छलादिना च क्रियते जयैकार्थत्वात् जल्पस्य । अत एव वादिप्रतिवादिनोः अन्यतरो यावत् स्वपरपक्षसाधनोपालम्भयोः अन्यतरावसरेऽपि जीयेत तावदेव उभाभ्यां प्रयतितव्यम् । न तु वाद इव परसाधनपर्यन्तमिति । तदेवं वादजल्पयोः प्रवृत्तिप्रकारभेदात् युक्तो भेद इति ।" |
| | ] |
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| "parent": "KL_C01_V17", | | "parent": "KL_C01_V17", |
| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "एवं असङ्करेण कथामार्गत्रयं प्रतिपादितवता कथैक्यादिमतानि अपहस्तितानि विज्ञातव्यानि । अधिकार्यङ्गप्रवृत्तिप्रकारफलभेदे सति किन्निबन्धनं कथैक्यं स्यात् ।\nजल्पस्य न तावत् स्वरूपमेव हातुं शक्यम्, वादादि समानयोगक्षेमत्वात् । अन्यतरान्तर्भावस्तु भेदोपपादनेन परास्तः । वादवितण्डा च यदि तत्वनिर्णयार्था स्वपरपक्षसाधनोपालम्भवती तदा वाद एव । विजिगीषावतोः इति चेत् तर्हि तत्वनिर्णयार्थताव्याघातः । अन्यतरमात्रपर्यवसानेऽपि एवमेव ।\t\t\t\t\tविजयार्थत्वे, जल्पवितण्डायाः अन्यतरत्वापातः । तत्वबुभुत्सावतोः इति व्याहतम् । न च तत्वनिर्णयविजयाभ्यां फलान्तरम् । नापि तदर्थिव्यतिरिक्तोऽधिकारी । न च साधनोपालम्भोभयान्यतरमात्रव्यतिरिक्त प्रवृत्तिप्रकारो, यद्वशात् वादवितण्डा परा कल्पेत इति ।\nआत्यन्तिकपराजयपर्यन्तो वाद इत्युक्तम् । तत्र को वादे पराजयहेतुः ? इत्यपेक्षायाम् आह\nतत्वनिर्णयवैलोम्यं वादे साक्षात् पराजयः ।\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eपराजयः\u003C/span\u003E पराजयहेतुः । स द्विविधो मुख्यामुख्यभेदात् । तत्र वादिप्रतिवादिभ्यां अभिलषितस्य तत्वनिर्णयस्य यावत् वैलोम्यं विरुद्धं वचनं आचरणं वा तत्सर्वं वादे मुख्यः पराजयहेतुः , कथावसानकारणत्वात् । इतरोऽमुख्यः , कथावसानाहेतुत्वात् । न च तत्वनिर्णयवैलोम्यस्य कथावसितिहेतुत्वेन साक्षात् पराजयहेतुत्वव्याख्यायां \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eउद्भावनीयमेव स्यात् न कथाऽवसितिर्भवेत् ।\u003C/span\u003E इत्यादिविरोधः । ‘सकृत् एकस्य तत्वनिर्णयवैलोम्यापत्तिमात्रेण न कथावसानं, यथा जल्पे सकृत् निग्रहप्राप्तौ’ इत्येतदर्थपरत्वात् तस्य । अत्रापि तत्वनिर्णयवैलोम्यापत्तौ पुनः तस्य अन्यस्य वा साधनान्तराद्यप्रतीतावेव कथापर्यवसानस्य विवक्षितत्वात् । अन्यथा वादापर्यवसानं स्यात् । न हि तत्वनिर्णयस्य तत्वनिर्णयवैलोम्यापत्तितोऽन्यत् शृङ्गमस्ति । ‘साक्षात्’ इति च अत्र व्यर्थं स्यात् । विरोधादिषु च तत्वनिर्णयवैलोम्येतरविवेकं तु करिष्यामः ।\nतत्वनिर्णयवैलोम्यं प्राप्तवतः किं कार्यं ? इत्यपेक्षायां आह\nसंवादे श्लाघ्यतैव स्यात् गुरुत्वमितरस्य च ॥\nवादिनः प्रतिवादिनो वा तत्वनिर्णयवैलोम्येप्राप्ते तत्र च तेन \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसंवादे\u003C/span\u003E कृते तस्य विमलबोद्धृतया स्तुत्यतैव \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्यात्\u003C/span\u003E न तु पराजितत्वेनापमानः । इतरस्य च तत्वं निर्णीतवतो \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eगुरुत्वं\u003C/span\u003E स्यात् ।" | | "lines": [ |
| | "एवं असङ्करेण कथामार्गत्रयं प्रतिपादितवता कथैक्यादिमतानि अपहस्तितानि विज्ञातव्यानि । अधिकार्यङ्गप्रवृत्तिप्रकारफलभेदे सति किन्निबन्धनं कथैक्यं स्यात् ।", |
| | "जल्पस्य न तावत् स्वरूपमेव हातुं शक्यम्, वादादि समानयोगक्षेमत्वात् । अन्यतरान्तर्भावस्तु भेदोपपादनेन परास्तः । वादवितण्डा च यदि तत्वनिर्णयार्था स्वपरपक्षसाधनोपालम्भवती तदा वाद एव । विजिगीषावतोः इति चेत् तर्हि तत्वनिर्णयार्थताव्याघातः । अन्यतरमात्रपर्यवसानेऽपि एवमेव ।\t\t\t\t\tविजयार्थत्वे, जल्पवितण्डायाः अन्यतरत्वापातः । तत्वबुभुत्सावतोः इति व्याहतम् । न च तत्वनिर्णयविजयाभ्यां फलान्तरम् । नापि तदर्थिव्यतिरिक्तोऽधिकारी । न च साधनोपालम्भोभयान्यतरमात्रव्यतिरिक्त प्रवृत्तिप्रकारो, यद्वशात् वादवितण्डा परा कल्पेत इति ।", |
| | "आत्यन्तिकपराजयपर्यन्तो वाद इत्युक्तम् । तत्र को वादे पराजयहेतुः ? इत्यपेक्षायाम् आह", |
| | "तत्वनिर्णयवैलोम्यं वादे साक्षात् पराजयः ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eपराजयः\u003C/span\u003E पराजयहेतुः । स द्विविधो मुख्यामुख्यभेदात् । तत्र वादिप्रतिवादिभ्यां अभिलषितस्य तत्वनिर्णयस्य यावत् वैलोम्यं विरुद्धं वचनं आचरणं वा तत्सर्वं वादे मुख्यः पराजयहेतुः , कथावसानकारणत्वात् । इतरोऽमुख्यः , कथावसानाहेतुत्वात् । न च तत्वनिर्णयवैलोम्यस्य कथावसितिहेतुत्वेन साक्षात् पराजयहेतुत्वव्याख्यायां \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eउद्भावनीयमेव स्यात् न कथाऽवसितिर्भवेत् ।\u003C/span\u003E इत्यादिविरोधः । ‘सकृत् एकस्य तत्वनिर्णयवैलोम्यापत्तिमात्रेण न कथावसानं, यथा जल्पे सकृत् निग्रहप्राप्तौ’ इत्येतदर्थपरत्वात् तस्य । अत्रापि तत्वनिर्णयवैलोम्यापत्तौ पुनः तस्य अन्यस्य वा साधनान्तराद्यप्रतीतावेव कथापर्यवसानस्य विवक्षितत्वात् । अन्यथा वादापर्यवसानं स्यात् । न हि तत्वनिर्णयस्य तत्वनिर्णयवैलोम्यापत्तितोऽन्यत् शृङ्गमस्ति । ‘साक्षात्’ इति च अत्र व्यर्थं स्यात् । विरोधादिषु च तत्वनिर्णयवैलोम्येतरविवेकं तु करिष्यामः ।", |
| | "तत्वनिर्णयवैलोम्यं प्राप्तवतः किं कार्यं ? इत्यपेक्षायां आह", |
| | "संवादे श्लाघ्यतैव स्यात् गुरुत्वमितरस्य च ॥", |
| | "वादिनः प्रतिवादिनो वा तत्वनिर्णयवैलोम्येप्राप्ते तत्र च तेन \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eसंवादे\u003C/span\u003E कृते तस्य विमलबोद्धृतया स्तुत्यतैव \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्यात्\u003C/span\u003E न तु पराजितत्वेनापमानः । इतरस्य च तत्वं निर्णीतवतो \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eगुरुत्वं\u003C/span\u003E स्यात् ।" |
| | ] |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "तत्वनिर्णयवैलोम्यंप्राप्तोऽपि यदि मतिमान्द्यादिना तत्र न संवादं करोति तस्य कर्तव्यम् आह\nतत्वनिर्णयवैलोम्ये निन्द्यो दण्ड्योऽथ वा भवेत् ।\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअथ\u003C/span\u003E पक्षान्तरे । असंवादे, \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनिन्द्यो भवेत्\u003C/span\u003E दोषाधिक्ये दण्ड्यो भवेदिति ।\nजल्पे च ‘यावत् परो जितः ’ इत्युक्तम् । तत्र जल्पे कः पराजयहेतुः ? इत्यपेक्षायां आह\nविरोधाऽसङ्गतिन्यूनतूष्णीम्भावादिकैर्जितः ॥\nभवेज्जल्पे ...\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eआदि\u003C/span\u003Eपदेन संवादाधिक्ययोः ग्रहणम् ।" | | "lines": [ |
| | "तत्वनिर्णयवैलोम्यंप्राप्तोऽपि यदि मतिमान्द्यादिना तत्र न संवादं करोति तस्य कर्तव्यम् आह", |
| | "तत्वनिर्णयवैलोम्ये निन्द्यो दण्ड्योऽथ वा भवेत् ।", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eअथ\u003C/span\u003E पक्षान्तरे । असंवादे, \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eनिन्द्यो भवेत्\u003C/span\u003E दोषाधिक्ये दण्ड्यो भवेदिति ।", |
| | "जल्पे च ‘यावत् परो जितः ’ इत्युक्तम् । तत्र जल्पे कः पराजयहेतुः ? इत्यपेक्षायां आह", |
| | "विरोधाऽसङ्गतिन्यूनतूष्णीम्भावादिकैर्जितः ॥", |
| | "भवेज्जल्पे ...", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eआदि\u003C/span\u003Eपदेन संवादाधिक्ययोः ग्रहणम् ।" |
| | ] |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "प्रसङ्गात् वितण्डायां निग्रहादिकमतिदिशति\n...... वितण्डायां न्यायो जल्पवदीरितः ।\nवितण्डायां च इत्येतावता पूर्णे यत् अधिकमुपादत्ते तेन जल्पे यावत् परो जितः इत्युक्तप्रवृत्तिप्रकारपर्यवसानयोरपि अतिदेशो लभ्यते । अन्यथा प्रकृतत्वात् निग्रहस्थानमात्रातिदेशो विज्ञायेत । ततश्च स्वपक्षस्थापनां विना जल्पवदेव वितण्डा इत्युक्तं भवति ।" | | "lines": [ |
| | "प्रसङ्गात् वितण्डायां निग्रहादिकमतिदिशति", |
| | "...... वितण्डायां न्यायो जल्पवदीरितः ।", |
| | "वितण्डायां च इत्येतावता पूर्णे यत् अधिकमुपादत्ते तेन जल्पे यावत् परो जितः इत्युक्तप्रवृत्तिप्रकारपर्यवसानयोरपि अतिदेशो लभ्यते । अन्यथा प्रकृतत्वात् निग्रहस्थानमात्रातिदेशो विज्ञायेत । ततश्च स्वपक्षस्थापनां विना जल्पवदेव वितण्डा इत्युक्तं भवति ।" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "विरोधादिप्राप्तवतो जल्पवितण्डयोः कि कार्यं ? इत्यपेक्षायामाह\nसंवादे दण्ड्यता न स्यात् वितण्डाजल्पयोरपि ॥\nपराजितत्वमात्रं स्यात् ............\nविरोधादिषु प्राप्तनिग्रहस्थानविषये वितण्डायां जल्पे च यदि वादी प्रतिवादी वा संवादं कुरुते तदा नासौ सभापतिना दण्ड्यः । किन्तु ? खण्डिताहङ्कारतया अपमानविषय एव स्यात् ।\nवादिप्रतिवादिनोः निग्रहस्थानचिन्ताप्रसङ्गात्प्राश्निकापराधं अपोहमुखेन सूचयति\nअनुवादादिराहित्यं नैव जल्पेऽपि दूषणम् ॥\n\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eएव\u003C/span\u003Eकारो हेतुसूचनार्थः । एके मन्यन्ते, प्राश्निकैः वाद्युक्तस्य प्रतिवादिनं प्रति, प्रतिवाद्युक्तस्य च वादिनं प्रति अनुवादः करणीयः । अप्रतिबुद्धौ च वादिप्रतिवादिनौ बोधनीयौ । तदकरणे तेषां अपराध इति । तदेतत् जल्पे वितण्डायामपि अनुवादादिराहित्यंप्राश्निकानां न दूषणम्, अनुवादाद्यभावेऽपि वादिप्रतिवादिभ्यां जल्पवितण्डयोः प्रवर्तयितुं शक्यत्वेन तस्य तदकर्मत्वात् । किं नाम ?प्रागुक्तस्वकर्माननुष्ठानमेवप्राश्निकानां अपराध इति मतान्तरनिरासाय अपोह इति ज्ञातव्यम् ।" | | "lines": [ |
| | "विरोधादिप्राप्तवतो जल्पवितण्डयोः कि कार्यं ? इत्यपेक्षायामाह", |
| | "संवादे दण्ड्यता न स्यात् वितण्डाजल्पयोरपि ॥", |
| | "पराजितत्वमात्रं स्यात् ............", |
| | "विरोधादिषु प्राप्तनिग्रहस्थानविषये वितण्डायां जल्पे च यदि वादी प्रतिवादी वा संवादं कुरुते तदा नासौ सभापतिना दण्ड्यः । किन्तु ? खण्डिताहङ्कारतया अपमानविषय एव स्यात् ।", |
| | "वादिप्रतिवादिनोः निग्रहस्थानचिन्ताप्रसङ्गात्प्राश्निकापराधं अपोहमुखेन सूचयति", |
| | "अनुवादादिराहित्यं नैव जल्पेऽपि दूषणम् ॥", |
| | "\u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eएव\u003C/span\u003Eकारो हेतुसूचनार्थः । एके मन्यन्ते, प्राश्निकैः वाद्युक्तस्य प्रतिवादिनं प्रति, प्रतिवाद्युक्तस्य च वादिनं प्रति अनुवादः करणीयः । अप्रतिबुद्धौ च वादिप्रतिवादिनौ बोधनीयौ । तदकरणे तेषां अपराध इति । तदेतत् जल्पे वितण्डायामपि अनुवादादिराहित्यंप्राश्निकानां न दूषणम्, अनुवादाद्यभावेऽपि वादिप्रतिवादिभ्यां जल्पवितण्डयोः प्रवर्तयितुं शक्यत्वेन तस्य तदकर्मत्वात् । किं नाम ?प्रागुक्तस्वकर्माननुष्ठानमेवप्राश्निकानां अपराध इति मतान्तरनिरासाय अपोह इति ज्ञातव्यम् ।" |
| | ] |
| }, | | }, |
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| Line 2,210: |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "वादिप्रतिवादिनोः जल्पारम्भोत्तरकालीनं निग्रहस्थानं उक्तम् । कथातः प्रागपि सम्भवात् आह\nविद्याहीनत्वलिङ्गेऽपि वादिनोः स्यात् पराजयः ।\nसम्भावितसमानविद्ययोरेव जल्पवितण्डाधिकारित्वात् कथातः प्रागेव वादिप्रतिवादिनोः अन्यतरस्य प्रतियोग्यपेक्षया विद्याहीनत्वलिङ्गे पदवाक्यप्रमाणाज्ञत्वदोषेप्राप्ते पराजय एव । दूरे जल्पादि । एतेन ‘कथाबाह्यानां अनिग्रहस्थानत्वं’ इति परास्तम् ।" | | "lines": [ |
| | "वादिप्रतिवादिनोः जल्पारम्भोत्तरकालीनं निग्रहस्थानं उक्तम् । कथातः प्रागपि सम्भवात् आह", |
| | "विद्याहीनत्वलिङ्गेऽपि वादिनोः स्यात् पराजयः ।", |
| | "सम्भावितसमानविद्ययोरेव जल्पवितण्डाधिकारित्वात् कथातः प्रागेव वादिप्रतिवादिनोः अन्यतरस्य प्रतियोग्यपेक्षया विद्याहीनत्वलिङ्गे पदवाक्यप्रमाणाज्ञत्वदोषेप्राप्ते पराजय एव । दूरे जल्पादि । एतेन ‘कथाबाह्यानां अनिग्रहस्थानत्वं’ इति परास्तम् ।" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "ननु विरोधादिव्यतिरिक्तानि हेत्वाभासादीनि निग्रहस्थानानि सन्ति । विजयमात्रप्रयोजनयोश्च जल्पवितण्डयोः पराजयनिमित्तानि सम्भावितानि च । अतः कथं विरोधादिषट्केनैव जल्पादौ पराजयः ? इत्यत आह\nतदभावात् नैव षट्कात् अन्यो निग्रह इष्यते ॥\nअन्तर्भावातदिहान्येषां निग्रहाणाम् ............ ।\nअन्येषां विरोधादिपदैः अगृहीततया ततोऽन्यत्वेन शङ्कितानां हेत्वाभासादीनां इह षट्के अन्तर्भावात्, षट्कानन्तर्भूतानां च आश्रयासिद्ध्यदीनां तदभावात् निग्रहस्थानत्वाभावात्जल्पवितण्डयोः षट्कादन्यनिग्रहस्थानानङ्गीकारो न दोषाय इति ॥\nकथं हेत्वाभासादीनां एतेष्वन्तर्भावः ? कथं च अनन्तर्भूतानां अनिग्रहस्थानत्वं ? इत्यत आह\n...... इति स्म ह ।\nउक्तपरामर्श \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eइति\u003C/span\u003E शब्दः । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्म ह\u003C/span\u003E इति निपातौ सुप्रसिद्धिं द्योतयतः । हेत्वाभासादीनां विरोधादिषु अन्तर्भावः , अनन्तर्भूतानां च अनिग्रहस्थानत्वं विरोधादीनां हेत्वाभासादीनां च स्वरूपयाथात्म्यज्ञाने सति सुज्ञानमेव इति किं तत्र यत्नेन ? इति ।\nकथातः पूर्वं विद्याहीनत्वलिङ्गेन पराजय इत्युक्तं, तन्न । कथामन्तरेण विद्याहीनत्वलिङ्गस्य अप्रतीतेः इत्यत आह\nविद्यापरीक्षापूर्वैव वृत्तिर्जल्पवितण्डयोः ॥\nजल्पवितण्डाधिकारिणोः खलु विद्याहीनत्वलिङ्गेन कथातः प्राक् पराजय इष्यते । जल्पवितण्डाप्रवृत्तिश्च विद्यापरीक्षापूर्वैव । विद्यापरीक्षा च वादेनैव । वादे च न सम्भावितसमानविद्यत्वापेक्षा । एवं च विद्यापरीक्षया विद्याहीनत्वनिश्चयात् न विरोधः । विद्यासाम्ये तु जल्पवितण्डे इति ।" | | "lines": [ |
| | "ननु विरोधादिव्यतिरिक्तानि हेत्वाभासादीनि निग्रहस्थानानि सन्ति । विजयमात्रप्रयोजनयोश्च जल्पवितण्डयोः पराजयनिमित्तानि सम्भावितानि च । अतः कथं विरोधादिषट्केनैव जल्पादौ पराजयः ? इत्यत आह", |
| | "तदभावात् नैव षट्कात् अन्यो निग्रह इष्यते ॥", |
| | "अन्तर्भावातदिहान्येषां निग्रहाणाम् ............ ।", |
| | "अन्येषां विरोधादिपदैः अगृहीततया ततोऽन्यत्वेन शङ्कितानां हेत्वाभासादीनां इह षट्के अन्तर्भावात्, षट्कानन्तर्भूतानां च आश्रयासिद्ध्यदीनां तदभावात् निग्रहस्थानत्वाभावात्जल्पवितण्डयोः षट्कादन्यनिग्रहस्थानानङ्गीकारो न दोषाय इति ॥", |
| | "कथं हेत्वाभासादीनां एतेष्वन्तर्भावः ? कथं च अनन्तर्भूतानां अनिग्रहस्थानत्वं ? इत्यत आह", |
| | "...... इति स्म ह ।", |
| | "उक्तपरामर्श \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eइति\u003C/span\u003E शब्दः । \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eस्म ह\u003C/span\u003E इति निपातौ सुप्रसिद्धिं द्योतयतः । हेत्वाभासादीनां विरोधादिषु अन्तर्भावः , अनन्तर्भूतानां च अनिग्रहस्थानत्वं विरोधादीनां हेत्वाभासादीनां च स्वरूपयाथात्म्यज्ञाने सति सुज्ञानमेव इति किं तत्र यत्नेन ? इति ।", |
| | "कथातः पूर्वं विद्याहीनत्वलिङ्गेन पराजय इत्युक्तं, तन्न । कथामन्तरेण विद्याहीनत्वलिङ्गस्य अप्रतीतेः इत्यत आह", |
| | "विद्यापरीक्षापूर्वैव वृत्तिर्जल्पवितण्डयोः ॥", |
| | "जल्पवितण्डाधिकारिणोः खलु विद्याहीनत्वलिङ्गेन कथातः प्राक् पराजय इष्यते । जल्पवितण्डाप्रवृत्तिश्च विद्यापरीक्षापूर्वैव । विद्यापरीक्षा च वादेनैव । वादे च न सम्भावितसमानविद्यत्वापेक्षा । एवं च विद्यापरीक्षया विद्याहीनत्वनिश्चयात् न विरोधः । विद्यासाम्ये तु जल्पवितण्डे इति ।" |
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| "chapter": "KL_C01", | | "chapter": "KL_C01", |
| "text": "विरोधादीनि निग्रहस्थानानि इत्युक्तं । तत्र विशेषं आह–\nस्खलितत्वादिमात्रेण न तत्रापि पराजयः ।\nतत्र जल्पवितण्डयोरपि स्खलनेन अपस्मारादिवशेन वाप्राप्तैः विरोधादिभिः \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eन पराजयो\u003C/span\u003E मन्तव्यः , अपटुकरणत्वादिना सम्भवतः स्खलनादेः प्रतियोग्यपेक्षया अपकर्षस्य अद्योतकत्वात् । किमु वादकथायामिति ।\nतत्र वादे चतुर्धा निग्रहस्थानगतिः । किञ्चित् असम्भावितमेव, यथा प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञासन्न्यासो निरर्थकं अर्थान्तरं अविज्ञातार्थं अपार्थकं इति षट्कम् । एषां अशक्तिसङ्गूहनप्रकारत्वात् तत्वबुभुत्सुतया च वादे तदभावात् । प्रमादात् सम्भवेऽपि उद्भाव्य त्याजनीयानि । किञ्चित् सम्भवदपि अनुद्भाव्यु मेव, यथा प्रतिज्ञान्तरं हेत्वन्तरम् अज्ञानं अप्रतिभा विक्षेपः मतानुज्ञा पर्यनुयोज्योपेक्षणं इति सप्तकम् । एतदुद्भावनानुद्भावनयोः तत्वनिर्णयानुगुण्यवैगुण्याभावात् । किञ्चित् उद्भाव्यमात्रम्, यथा विरोधः , अप्राप्तकालं, न्यूनं, अधिकं, पुनरुक्तं, अननुभाषणं, अपसिद्धान्तः इति सप्तकम् । किञ्चित् कथावसानिकम्, यथा हेत्वाभासो निरनुयोज्यानुयोग इति द्वयम् ।\nतत्वनिर्णयस्य हि साक्षात् विरुद्धा विपरीतप्रतिपत्तिः , सा च हेत्वाभासाद्यनुद्भावने भवति । पारम्पर्यात् विरोधादयः । व्यासङ्गादिना तत्वनिर्णयसामग्रीप्रतिरोधात् प्रतिज्ञाविरोधादीनाम् । आकाङ्क्षासन्निधियोग्यतावत्तया प्रतिसंहितं प्रमाणाप्रतिहतं च वाक्यं खलु तत्वनिर्णयाङ्गम्, न अन्यत् । तत्र प्रतिज्ञाविरोधे योग्यताविरहः । अप्राप्तकाले तु आकाङ्क्षाविरहः । न्यूने तु आकाङ्क्षितासमभिव्याहारेण सन्निधिविरहविशेषः । अधिके तु अनाकाङ्क्षिताभिधानेन आकाङ्क्षाभावः । पुनरुक्तेऽपि एवम् । अननुभाषणे तु उक्ताननुसन्धानेन असन्निधानम् । अपसिद्धान्ते तु सम्मुग्धप्रमाणाबाधोत्क्रान्तिः इति । तदिदं आचार्याणां असम्मतम्, आत्यन्तिकसाधनदूषणनिवृत्तौ एव वादावसानस्य उक्तवात् इति ॥\nकथालक्षणोपसंहारद्वारेण, न एतत् वाद्यन्तरोक्तवत् असाधु प्रतिपत्तव्यं इत्याह–\nवादजल्पवितण्डानां इति शुद्धं स्वलक्षणम् ॥\nयद्यपि कथासामान्यलक्षणं च उक्तम्, तथापि तत् आर्थिकं इति वादादिविशेषोपसंहार एव कृतः । वादादीनामेव व्यवहाराङ्गत्वं न तु कथासामान्यस्य इत्यतो वा । यस्मात् स्वलक्षणं स्वरूपलक्षणं तस्मात् शुद्धं अव्याप्त्यादिशून्यम् । न हि तत्स्वरूपं तत् न व्याप्नोति व्यभिचरति च इति ।" | | "lines": [ |
| | "विरोधादीनि निग्रहस्थानानि इत्युक्तं । तत्र विशेषं आह–", |
| | "स्खलितत्वादिमात्रेण न तत्रापि पराजयः ।", |
| | "तत्र जल्पवितण्डयोरपि स्खलनेन अपस्मारादिवशेन वाप्राप्तैः विरोधादिभिः \u003Cspan class=\"gr-prateeka\"\u003Eन पराजयो\u003C/span\u003E मन्तव्यः , अपटुकरणत्वादिना सम्भवतः स्खलनादेः प्रतियोग्यपेक्षया अपकर्षस्य अद्योतकत्वात् । किमु वादकथायामिति ।", |
| | "तत्र वादे चतुर्धा निग्रहस्थानगतिः । किञ्चित् असम्भावितमेव, यथा प्रतिज्ञाहानिः प्रतिज्ञासन्न्यासो निरर्थकं अर्थान्तरं अविज्ञातार्थं अपार्थकं इति षट्कम् । एषां अशक्तिसङ्गूहनप्रकारत्वात् तत्वबुभुत्सुतया च वादे तदभावात् । प्रमादात् सम्भवेऽपि उद्भाव्य त्याजनीयानि । किञ्चित् सम्भवदपि अनुद्भाव्यु मेव, यथा प्रतिज्ञान्तरं हेत्वन्तरम् अज्ञानं अप्रतिभा विक्षेपः मतानुज्ञा पर्यनुयोज्योपेक्षणं इति सप्तकम् । एतदुद्भावनानुद्भावनयोः तत्वनिर्णयानुगुण्यवैगुण्याभावात् । किञ्चित् उद्भाव्यमात्रम्, यथा विरोधः , अप्राप्तकालं, न्यूनं, अधिकं, पुनरुक्तं, अननुभाषणं, अपसिद्धान्तः इति सप्तकम् । किञ्चित् कथावसानिकम्, यथा हेत्वाभासो निरनुयोज्यानुयोग इति द्वयम् ।", |
| | "तत्वनिर्णयस्य हि साक्षात् विरुद्धा विपरीतप्रतिपत्तिः , सा च हेत्वाभासाद्यनुद्भावने भवति । पारम्पर्यात् विरोधादयः । व्यासङ्गादिना तत्वनिर्णयसामग्रीप्रतिरोधात् प्रतिज्ञाविरोधादीनाम् । आकाङ्क्षासन्निधियोग्यतावत्तया प्रतिसंहितं प्रमाणाप्रतिहतं च वाक्यं खलु तत्वनिर्णयाङ्गम्, न अन्यत् । तत्र प्रतिज्ञाविरोधे योग्यताविरहः । अप्राप्तकाले तु आकाङ्क्षाविरहः । न्यूने तु आकाङ्क्षितासमभिव्याहारेण सन्निधिविरहविशेषः । अधिके तु अनाकाङ्क्षिताभिधानेन आकाङ्क्षाभावः । पुनरुक्तेऽपि एवम् । अननुभाषणे तु उक्ताननुसन्धानेन असन्निधानम् । अपसिद्धान्ते तु सम्मुग्धप्रमाणाबाधोत्क्रान्तिः इति । तदिदं आचार्याणां असम्मतम्, आत्यन्तिकसाधनदूषणनिवृत्तौ एव वादावसानस्य उक्तवात् इति ॥", |
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| | "यद्यपि कथासामान्यलक्षणं च उक्तम्, तथापि तत् आर्थिकं इति वादादिविशेषोपसंहार एव कृतः । वादादीनामेव व्यवहाराङ्गत्वं न तु कथासामान्यस्य इत्यतो वा । यस्मात् स्वलक्षणं स्वरूपलक्षणं तस्मात् शुद्धं अव्याप्त्यादिशून्यम् । न हि तत्स्वरूपं तत् न व्याप्नोति व्यभिचरति च इति ।" |
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| "text": "न केवलं एतत् कथालक्षणं उपपत्त्या साधु प्रतिपत्तव्यम् । किं नाम ? परमाप्तोक्तत्वात् आगमान्तरसिद्धत्वाच्च इति दर्शयन् उक्तस्य विनियोगं आह–\nआनन्दतीर्थमुनिना ब्रह्मतर्कानुसारतः ।\nकथालक्षणमित्युक्तं प्रीत्यर्थं शार्ङ्गधन्वनः ॥" | | "lines": [ |
| | "न केवलं एतत् कथालक्षणं उपपत्त्या साधु प्रतिपत्तव्यम् । किं नाम ? परमाप्तोक्तत्वात् आगमान्तरसिद्धत्वाच्च इति दर्शयन् उक्तस्य विनियोगं आह–", |
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| "text": "भक्त्यतिशयवशात् भगवान् आचार्यः प्रकरणनिर्माणफलत्वेन परमेश्वरप्रशंसापुरस्सरं तत्प्रसादं आशास्ते\nसदोदितामितज्ञानपूरवारितहृत्तमाः ।\nनरसिंहः प्रियतमः प्रीयतां पुरुषोत्तमः ॥\nइति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितेषु दशप्रकरणेषु कथालक्षणं सम्पूर्णम् ॥\nसदोदितम् अनादित आविर्भूतं प्रलयेऽपि अविलुप्तम् । अमितं आलोचने सर्वविषयम् । सदोदितामितज्ञानपूरेण तं दत्वा इति यावत् । वारितं अस्मदीयं हृत्तमः अज्ञानम् अनेन इति तथोक्तः । तस्मात् परमोपकारित्वात् स्वभावेन परमप्रेमविषयत्वाच्च तत्प्रसादाशंसनमेव युक्तम् इति ।\nइति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितकथालक्षणविवरणं जयतीर्थभिक्षुणा विरचितं सम्पूर्णम् ॥" | | "lines": [ |
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