Brahmasutra/C1/S2: Difference between revisions
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| verse_line1 = ॐ अनुपपत्तेस्तुन शारीरः ॐ ॥ 03-34 ॥ | | verse_line1 = ॐ अनुपपत्तेस्तुन शारीरः ॐ ॥ 03-34 ॥ | ||
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S02_V03| text = न चादित्यशब्दाच्चक्षुर्मयत्वादेश्च जीव इति वाच्यम् ।}} | |||
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| Line 222: | Line 224: | ||
| verse_line1 = ॐ सम्भोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॐ ॥ 08-39 ॥ | | verse_line1 = ॐ सम्भोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॐ ॥ 08-39 ॥ | ||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति सर्वगतत्वाधिकरणम् ॥ 01 ॥}} | |||
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| Line 253: | Line 257: | ||
| verse_line1 = ॐ अत्ताचराचरग्रहणात् ॐ ॥ 09-40 ॥ | | verse_line1 = ॐ अत्ताचराचरग्रहणात् ॐ ॥ 09-40 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S02_V09| text = ‘जन्माद्यस्य यतः’ इत्युक्तम् । तत्रात्तृत्वं, | |||
‘स यद्यदेवासृजत तत्तदत्तुमध्रियत । सर्वां वा अत्तीति तददितेरदितित्वम्’ इत्यदितेः प्रतीयते । | |||
‘स यद्यदेवासृजत’ इति पुल्लिङ्गम् च ‘कूटस्थोऽक्षर उच्यते’इत्यादिवत् । अत्रोच्यते –}} | |||
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| verse_line1 = ॐ प्रकरणाच्च ॐ ॥ 10-41 ॥ | | verse_line1 = ॐ प्रकरणाच्च ॐ ॥ 10-41 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥ इति अत्तृत्वाधिकरणम् ॥ 02 ॥}} | |||
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| verse_line1 = ॐ गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॐ ॥ 11-42 ॥ | | verse_line1 = ॐ गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॐ ॥ 11-42 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S02_V11| text = सर्वात्रैकः परः उक्तः । | |||
‘ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिनाचिकेताः’ । इति पिबन्तौ प्रतीयेते । तौ काविति । उच्यते ।}} | |||
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| Line 405: | Line 418: | ||
| verse_line1 = ॐ विशेषणाच्च ॐ ॥ 12-43 ॥ | | verse_line1 = ॐ विशेषणाच्च ॐ ॥ 12-43 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥ इति गुहाधिकरणम् ॥ 03 ॥}} | |||
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| Line 502: | Line 517: | ||
| verse_line1 = ॐ अन्तर उपपत्तेः ॐ ॥ 13-44 ॥ | | verse_line1 = ॐ अन्तर उपपत्तेः ॐ ॥ 13-44 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S02_V13| text = आदित्ये विष्णुरित्युक्तम् । | |||
‘य एष आदित्ये पुरुषः सोऽहमस्मि स एवाहमस्मि’ | |||
इत्यादावग्नीनामेवादित्यस्थत्वमुच्यते । अतोऽक्ष्यादित्ययोरैक्याद् | |||
‘य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यत’ इत्यत्राप्यग्निरेवोच्यते । अतः | |||
‘तद्यथा पुष्करफलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविधि पापं कर्म न श्लिष्यते’ इत्यग्निज्ञानादेव सर्वपापश्लेषान्मोक्षोपपत्तिरिति । अतो ब्रवीति –}} | |||
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| Line 633: | Line 654: | ||
| verse_line1 = ॐ अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ॐ ॥ 17-48 ॥ | | verse_line1 = ॐ अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ॐ ॥ 17-48 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥ इत्यन्तराधिकरणम् ॥}} | |||
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| Line 654: | Line 677: | ||
| verse_line1 = ॐ अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॐ ॥ 18-49 ॥ | | verse_line1 = ॐ अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॐ ॥ 18-49 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S02_V18| text = ‘यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः’ इत्याद्यन्तर्याम्युच्यते । | |||
तत्र च ‘एतदमृतम्’ इत्युक्तममृतत्वमुच्यते । स च ‘यस्य पृथिवी शरीरम्’ इत्यादिना सर्वात्मकत्वात् प्रकृतिस्तत्तज्जीवो वा युक्तः । | |||
न हि विष्णोः पृथिव्यादिशरीरत्वमङ्गीक्रियत इत्यत आह –}} | |||
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| Line 702: | Line 729: | ||
| verse_line1 = ॐ शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॐ ॥ 20-51 ॥ | | verse_line1 = ॐ शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॐ ॥ 20-51 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥ इत्यन्तर्याम्यधिकरणम् ॥ 05 ॥}} | |||
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| Line 761: | Line 790: | ||
| verse_line1 = ॐ अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ॐ ॥ 21-52 ॥ | | verse_line1 = ॐ अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ॐ ॥ 21-52 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S02_V21| text = अदृश्यत्वादिगुणा विष्णोरुक्ताः । तत्र – | |||
‘यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः श्रोत्रं तद् पाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः’इत्युक्त्वा, | |||
‘यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति। यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्’ इत्युक्त्वा तस्माच्च ‘अक्षरात्परतः परः’ इति परः प्रतीयत इत्यतोऽब्रवीत्-}} | |||
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| Line 864: | Line 897: | ||
| verse_line1 = ॐ रूपोपन्यासाच्च ॐ ॥ 23 ॥ | | verse_line1 = ॐ रूपोपन्यासाच्च ॐ ॥ 23 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥ इति अदृश्यत्वाधिकरणम् ॥}} | |||
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| Line 903: | Line 938: | ||
| verse_line1 = ॐ वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॐ ॥ 24-55॥ | | verse_line1 = ॐ वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ॐ ॥ 24-55॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S02_V24| text = अदृश्यत्वादिगुणेषु सर्वगतत्वं | |||
‘यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते’ इति वैश्वानरस्योक्तमित्यत आह –}} | |||
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| Line 1,223: | Line 1,261: | ||
| verse_line1 = ॐ आमनन्ति चैनमस्मिन् ॐ ॥ 32-63 ॥ | | verse_line1 = ॐ आमनन्ति चैनमस्मिन् ॐ ॥ 32-63 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥ इति वैश्वानराधिकरणम् ॥ 07 ॥}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ 01-02 ॥}} | |||
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