Brahmasutra/C1/S3: Difference between revisions
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| verse_line1 = ॐ द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॐ ॥ 01-64 ॥ | | verse_line1 = ॐ द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॐ ॥ 01-64 ॥ | ||
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V01| text = तत्र चान्यत्र च प्रसिद्धानां शब्दानां विष्णौ समन्वयं प्रायेणास्मिन् पादे दर्शयति । | |||
विष्णोः परविद्याविषयत्वमुक्तम् । तत्र ‘यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्चसर्वैस्तमेवैकं जानथ आत्मानम्’ इत्यत्र, ‘प्राणानां ग्रन्थिरसि रुद्रोऽमाऽऽविशान्तकः’ ‘प्राणेश्वरः कृत्तिवासाः पिनाकी’ इत्यादिना रुद्रस्य प्राणाधारत्वप्रतीतेः । | |||
‘स एषोऽन्तरश्चरते बहुधा जायमानः’ इति जीवलिङ्गाच्च तयोः प्राप्तिरित्यत उच्यते –}} | |||
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| verse_line1 = ॐ स्थित्यदनाभ्यां च ॐ ॥ 07-70 ॥ | | verse_line1 = ॐ स्थित्यदनाभ्यां च ॐ ॥ 07-70 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥ इति द्युभ्वाधिकरणम् ॥ 01 ॥}} | |||
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| verse_line1 = ॐ भूमा सम्प्रसादादध्युपदेशात् ॐ ॥ 08-71 ॥ | | verse_line1 = ॐ भूमा सम्प्रसादादध्युपदेशात् ॐ ॥ 08-71 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V08| text = ‘प्राणो व अशाया भूयान्’ इत्युक्त्वा’ यो वै भूमा तत्सुखम्’ । इत्युक्तेस्यैव भूमत्वप्राप्तिः । ‘उत्क्रान्तप्राणान्’ इत्यादिलिङ्गात् प्राणशब्दश्च वायुवाचीत्यतो वक्ति –}} | |||
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| verse_line1 = ॐ धर्मोपपत्तेश्च ॐ ॥ 09-72 ॥ | | verse_line1 = ॐ धर्मोपपत्तेश्च ॐ ॥ 09-72 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = इति भूमाधिकरणम् ॥ 02 ॥}} | |||
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| Line 367: | Line 377: | ||
| verse_line1 = ॐ अक्षरमम्बरान्तधृतेः ॐ ॥ 10-73 ॥ | | verse_line1 = ॐ अक्षरमम्बरान्तधृतेः ॐ ॥ 10-73 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V10| text = अदृश्यत्वादिगुणा विष्णोरुक्ताः’ अदृष्टं द्रष्ट्रश्रुतं श्रोतृ’ इत्यादिना । ‘अहं सोममाहनसं भिभर्मि’ इत्यादेस्तस्यापि सम्भवान्मध्यमाक्षरस्योक्ता इत्यतो ब्रूते –}} | |||
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| Line 445: | Line 457: | ||
| verse_line1 = ॐ अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॐ ॥ 12-75 ॥ | | verse_line1 = ॐ अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॐ ॥ 12-75 ॥ | ||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति अक्षराधिकरणम् ॥ 03 ॥}} | |||
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| verse_line1 = ॐ ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ॐ ॥ 13-76 ॥ | | verse_line1 = ॐ ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ॐ ॥ 13-76 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V13| text = ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’ इत्यादिना सतः स्रष्टृत्वमुच्यते । तच्चसत्’बहुस्यां प्रजायेय’ इति परिणामप्रतीतेर्न विष्णुः । स हि | |||
‘अविकारः सदा शुद्धो नित्य आत्मा सदा हरिः’ इत्यादिनाऽ तस्यैव हि तल्लक्षणम् । बहुत्वं चाविकारेणैवोक्तं’ अजायमानो बहुधा विजायत’ इति ॥ 13 ॥}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥इति सदधिकरणम् ॥ 04 ॥}} | |||
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| verse_line1 = ॐ दहर उत्तरेभ्यः ॐ ॥ 14-77 ॥ | | verse_line1 = ॐ दहर उत्तरेभ्यः ॐ ॥ 14-77 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V14| text = चन्द्रादित्याद्याधारत्वं विष्णोरुक्तम् । तच्च’अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्म पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तर आकाशः’……’ किं तदत्र विद्यते…..’ | |||
‘उभे अस्मिन् द्यावा पृथिवी अन्तरेव समाहिते । उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ । विद्युन्नक्षत्राणि’इत्यादिनाऽऽकाशस्य प्रतीयते । | |||
स चाकाशो न विष्णुः । तस्यान्ते सुषिरं सूक्ष्मं तस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम्’ इति श्रुतेरित्यत आह- .}} | |||
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| verse_line1 = ॐ अल्पश्रुतेरिति चेत् तदुक्तम् ॐ ॥ 21-84 ॥ | | verse_line1 = ॐ अल्पश्रुतेरिति चेत् तदुक्तम् ॐ ॥ 21-84 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥इति दहराधिकरणम् ॥}} | |||
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| Line 763: | Line 788: | ||
| verse_line1 = ॐ अनुकृतेस्तस्य च ॐ ॥ 22-85 ॥ | | verse_line1 = ॐ अनुकृतेस्तस्य च ॐ ॥ 22-85 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V22| text = अदृश्यत्वादयः परमेश्वरगुणा उक्ताः । ‘तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्’ ‘तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम्’ इत्यादिना ज्ञानिसुखस्याप्यनिर्देश्यत्वमज्ञेयत्वं चोच्यत इत्यतो वक्ति-}} | |||
{{Commentary | {{Commentary | ||
| Line 800: | Line 827: | ||
| verse_line1 = ॐ आपि स्मर्यते ॐ ॥ 23-86 ॥ | | verse_line1 = ॐ आपि स्मर्यते ॐ ॥ 23-86 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥ इति अनुकृत्यधिकरणम् ॥ 06 ॥}} | |||
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| Line 832: | Line 861: | ||
| verse_line1 = ॐ शब्दादेव प्रमितः ॐ ॥ 24-87 ॥ | | verse_line1 = ॐ शब्दादेव प्रमितः ॐ ॥ 24-87 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V24| text = विष्णुरेव जिज्ञास्य इत्युक्तम् । तत्र | |||
‘ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति। मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते’ | |||
इति सर्वदेवोपास्यः कश्चित् प्रतीयते । स च ‘एवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथगेव सन्निधत्ते’ ‘योऽयं मध्यमः प्राणः’’कुविदङ्ग’ इत्यादिना प्राणव्यवस्थापकत्वान्मध्यमत्वात् सर्वदेवोपास्यत्वाच्च वायुरेवेति प्रतीयते । अतोऽब्रवीत् ॥}} | |||
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| Line 869: | Line 902: | ||
| verse_line1 = ॐ हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॐ ॥ 25-88 ॥ | | verse_line1 = ॐ हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॐ ॥ 25-88 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥ इति वामनाधिकरणम् ॥ 07 ॥}} | |||
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| verse_line1 = ॐ तदुपर्यपि बादरायणः सम्भवात् ॐ ॥ 26-89 ॥ | | verse_line1 = ॐ तदुपर्यपि बादरायणः सम्भवात् ॐ ॥ 26-89 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V26| text = मनुष्याणामेव वेदविद्यायामधिकार इत्युक्तम् । तिर्यगाद्यपेक्षयैव मनुष्यत्वविशेषणमुक्तं, न तु देवाद्यपेक्षयेत्याह-}} | |||
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| Line 1,063: | Line 1,100: | ||
| verse_line1 = ॐ भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॐ ॥33-96॥ | | verse_line1 = ॐ भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॐ ॥33-96॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = ॥इति देवताधिकरणम् ॥ 08 ॥}} | |||
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| Line 1,111: | Line 1,150: | ||
| verse_line1 = ॐ शुगस्य तदनादरश्रवणात् तदाऽऽद्रवणात् सूच्यते हि ॐ ॥34-97॥ | | verse_line1 = ॐ शुगस्य तदनादरश्रवणात् तदाऽऽद्रवणात् सूच्यते हि ॐ ॥34-97॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V34| text = मनुष्याधिकारत्वादित्युक्तेऽविशेषाच्छूद्रस्यापि’अह हारे त्वा शूद्र’ इति पौत्रायणोक्तेरधिकार इत्यत आह –}} | |||
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| Line 1,234: | Line 1,275: | ||
| verse_line1 = ॐ श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेश्च ॐ ॥ 38-101 ॥ | | verse_line1 = ॐ श्रवणाध्ययनार्थप्रतिषेधात् स्मृतेश्च ॐ ॥ 38-101 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{AuthorNote| text = इति अपशूद्राधिकरणम् ॥ 09 ॥}} | |||
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| Line 1,273: | Line 1,316: | ||
| verse_line1 = ॐ कम्पनात् ॐ ॥ 39-102 ॥ | | verse_line1 = ॐ कम्पनात् ॐ ॥ 39-102 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V39| text = ‘यदिदं किञ्च जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्बयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति’ इत्युद्यतवज्रज्ञानान्मोक्षः श्रूयत इत्यतोऽब्रवीत् ।}} | |||
{{AuthorNote| text = इति कम्पनाधिकरणं ॥ 10 ॥}} | |||
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| verse_line1 = ॐ ज्योतिर्दर्शनात् ॐ ॥ 40-103 ॥ | | verse_line1 = ॐ ज्योतिर्दर्शनात् ॐ ॥ 40-103 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V40| text = हृदय आहितं ज्योतिः परमात्मेत्युक्तम् । तत्र’योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः’ इत्यत्र’उभौ लोकावनुसञ्चरति’ इति वचनाज्जीव इति प्रतीयत इत्यत उच्यते –}} | |||
{{AuthorNote| text = इति ज्योतिरधिकरणं ॥ 11 ॥}} | |||
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| Line 1,351: | Line 1,402: | ||
| verse_line1 = ॐ आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ॐ ॥ 41-104 ॥ | | verse_line1 = ॐ आकाशोऽर्थान्तरत्वादिव्यपदेशात् ॐ ॥ 41-104 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V41| text = सर्वाधारत्वम् विष्णोरुक्तम् । तच्च’आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता’ इत्यत्राकाशस्य प्रतीयते । वै नामेति प्रसिद्धोपदेशात् । प्रसिद्धाकाशश्चाङ्गीकर्तव्य इत्यत उच्यते –}} | |||
{{AuthorNote| text = इति आकाशाधिकरणम् ॥ 12 ॥}} | |||
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| Line 1,381: | Line 1,436: | ||
| verse_line1 = ॐ सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॐ ॥ 42-105 ॥ | | verse_line1 = ॐ सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॐ ॥ 42-105 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V42| text = असङ्गत्वं परमात्मन उक्तम् । तच्च ‘स यत्तत्र किञ्चित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुषः’ इति स्वप्नादिद्रष्टुः प्रतीयते । स च जीवः प्रसिद्धेरित्यतो वक्ति –}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति सुषुप्त्यधिकरणम् ॥ 13 ॥}} | |||
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| Line 1,403: | Line 1,462: | ||
| verse_line1 = ॐ पत्यादिशब्देभ्यः ॐ ॥ 43-106 ॥ | | verse_line1 = ॐ पत्यादिशब्देभ्यः ॐ ॥ 43-106 ॥ | ||
}} | }} | ||
{{VerseSummary| verse_id = BS_C01_S03_V43| text = ‘एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य’ इति ब्राह्मणस्यापि नित्यमहिमा प्रतीयते । स च ब्राह्मणः ‘स वा एष महानज आत्मा’ इत्यजशब्दाद्विरिञ्च इति प्राप्तम् । देवानां च विद्याकर्मणोः पदप्राप्तिः सूचिता तदुपर्यपीति । अतो ब्रवीति –}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥इति ब्राह्मणाधिकरणम् ॥ 14 ॥}} | |||
{{AuthorNote| text = इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये प्रथमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ 01-03 ॥}} | |||
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