Brahmasutra/C2/S4: Difference between revisions

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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V04| text = ‘द्विधा हैवेन्द्रियाणि नित्यानि चानित्यानि च । तत्र नित्यं मनोऽनादित्वान्न ह्यमनाः पुमांस्तिष्ठत्यनित्यान्यन्यानि’ इति गौपवनश्रुतौ मनसोऽनुत्पत्तिः सयुक्तिका श्रूयते । अत आह-}}
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‘द्विधा हैवेन्द्रियाणि नित्यानि चानित्यानि च । तत्र नित्यं मनोऽनादित्वान्न ह्यमनाः पुमांस्तिष्ठत्यनित्यान्यन्यानि’ इति गौपवनश्रुतौ मनसोऽनुत्पत्तिः सयुक्तिका श्रूयते । अत आह-
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{{AuthorNote| text = ॥ इति मनोधिकरणम् (तत्प्रागधिकरणम्)}}
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| verse_line1  = ॐ तत्पूर्वकत्वाद्वाचः ॐ॥ 05-276 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V05| text = ‘नित्ययाऽनित्यया स्तौमि परमात्मानमच्युत्तम्’ इति ।
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               ‘वाग्वाव नित्या न ह्येषोत्पद्यतेऽस्यां हि श्रुतिरवतिष्ठते’  इति सयुक्तिकं पौष्यायणश्रुतौ वाचोऽनुत्पत्तिरुच्यते । अतो ब्रवीति –}}
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‘नित्ययाऽनित्यया स्तौमि परमात्मानमच्युत्तम्’ इति ।
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{{AuthorNote| text = ॥ इति वागधिकरणम् (तत्पूर्वकत्वाधिकरणम्)॥}}
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| verse_line1  = ॐ सप्तगतेर्विशेषितत्वाच्च ॐ ॥ 06-277 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V06| text = ‘सप्तप्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्’ इति श्रुतिः।
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‘सप्तप्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्’ इति श्रुतिः।
               ‘सप्तैव मारुता बाह्ये प्राणाः सप्त तथाऽऽत्मनि । अधिदैवे तथाऽध्यात्मे सङ्ख्यासाम्यं विदो विदुः’ इति च स्कान्दे।
               ‘सप्तैव मारुता बाह्ये प्राणाः सप्त तथाऽऽत्मनि । अधिदैवे तथाऽध्यात्मे सङ्ख्यासाम्यं विदो विदुः’ इति च स्कान्दे।
               ‘द्वादश वा एते प्राणा द्वादश मासा द्वादशादित्या द्वादशराशयो द्वादशग्रहाः’ इति कौण्डिण्यश्रुतौ द्वादशप्राणादृष्यन्ते । अतो वक्ति-}}
               ‘द्वादश वा एते प्राणा द्वादश मासा द्वादशादित्या द्वादशराशयो द्वादशग्रहाः’ इति कौण्डिण्यश्रुतौ द्वादशप्राणादृष्यन्ते । अतो वक्ति-
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{{AuthorNote| text = ॥ इति सप्तगत्यधिकरणम् ॥ 04 ॥}}
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V08| text = ‘दिवीव चक्षुराततम्’ इति व्याप्तिः प्रतीयते ।दूरश्रवणदर्शनादियुक्तिश्च।
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‘दिवीव चक्षुराततम्’ इति व्याप्तिः प्रतीयते ।दूरश्रवणदर्शनादियुक्तिश्च।
               अणुभिः पश्यत्यणुभिः कृणोति प्राणा वा अणवः प्राणैर्ह्येतद्भवति’ इति च कौण्डिन्यश्रुतिः ।
               अणुभिः पश्यत्यणुभिः कृणोति प्राणा वा अणवः प्राणैर्ह्येतद्भवति’ इति च कौण्डिन्यश्रुतिः ।
               अतो वक्ति-}}
               अतो वक्ति-
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{{AuthorNote| text = ॥ इति अण्व(णुत्वा)धिकरणम् ॥ 05 ॥}}
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V09| text = ‘नैष प्राण उदेति नास्तमेत्येकल एव मध्ये स्थाता । अथैनमाहुर्मध्यम इति’ इति मुख्यप्राणस्यानुत्पत्तिः श्रूयते ।
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‘नैष प्राण उदेति नास्तमेत्येकल एव मध्ये स्थाता । अथैनमाहुर्मध्यम इति’ इति मुख्यप्राणस्यानुत्पत्तिः श्रूयते ।
               ‘यत्प्राप्तिर्यत्परित्याग उत्पत्तिर्मरणं तथा । तस्योत्पत्तिर्मृतिश्चैव कथं प्राणस्य युज्यते’ ॥ इति च युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
               ‘यत्प्राप्तिर्यत्परित्याग उत्पत्तिर्मरणं तथा । तस्योत्पत्तिर्मृतिश्चैव कथं प्राणस्य युज्यते’ ॥ इति च युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
               ‘आत्मत एष प्राणो जायते’ इति च ।
               ‘आत्मत एष प्राणो जायते’ इति च ।
               अत आह}}
               अत आह
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| verse_line1  = ॐ न वायुक्रिये पृथुगुपदेशात् ॐ ॥ 10-281 ॥
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{{AuthorNote| text = ॥ इति मुख्यप्राणाधिकरणम् (श्रेष्ठाधिकरणम्)}}
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| verse_line1  = ॐ चक्षुरादिवत् तु तत्सहशिष्ट्यादिभ्यः ॐ ॥ 11-282 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V11| text = ‘प्राणादिदमाविरासीत् प्राणो धत्ते प्राणे लयमभ्युपैति न प्राणः किञ्चिदाश्रितः’ इत्याग्निवेश्यश्रुतौ ।
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               ‘यदाश्रयादस्य चेष्टा सोऽन्यं कथमुपाश्रयेत् । यथा प्राणस्तथा राजा सर्वस्यैकाश्रयो भवेत्’  इति च युक्तिर्भारते।
               ‘यदाश्रयादस्य चेष्टा सोऽन्यं कथमुपाश्रयेत् । यथा प्राणस्तथा राजा सर्वस्यैकाश्रयो भवेत्’  इति च युक्तिर्भारते।
               ‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं प्राणः परवशे स्थितः ।  न परः कञ्चिदाश्रित्य वर्तते परमो यतः’ इति पैङ्गिश्रुतिः ।
               ‘प्राणस्यैतद्वशे सर्वं प्राणः परवशे स्थितः ।  न परः कञ्चिदाश्रित्य वर्तते परमो यतः’ इति पैङ्गिश्रुतिः ।
               अत आह-}}
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{{AuthorNote| text = ॥ इति चक्षुराद्यधिकरणम् ॥ 07 ॥}}
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| verse_line1  = ॐ पञ्चवृत्तिर्मनोवद्व्यपदिश्यते ॐ ॥ 13-284 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V13| text = ‘सर्वे वा एते मुख्यदासाः प्राणोऽपानो व्यान उदानः समान इति । ‘अथ प्राणो वाव सम्राट्’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ।
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               ‘प्राणापानादयः सर्वे मुख्यदासा यतेऽनिशम् ।अतस्तदाज्ञया नित्यं स्वानि कर्माणि कुर्वते’ इति युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
               ‘प्राणापानादयः सर्वे मुख्यदासा यतेऽनिशम् ।अतस्तदाज्ञया नित्यं स्वानि कर्माणि कुर्वते’ इति युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
               ‘मुख्यस्यैव स्वरूपाणि प्राणाध्याः पञ्चवायवः ।स एव प्राणिनां देहे पञ्चधा वर्ततेऽनिशम्’ इति च गौपमश्रुतिः ।
               ‘मुख्यस्यैव स्वरूपाणि प्राणाध्याः पञ्चवायवः ।स एव प्राणिनां देहे पञ्चधा वर्ततेऽनिशम्’ इति च गौपमश्रुतिः ।
               अतो वक्ति-}}
               अतो वक्ति-
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{{AuthorNote| text = ॥ इति पञ्चवृत्त्यधिकरणम् ॥ 08 ॥}}
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V14| text = ‘प्राण एवाधस्तात् प्राण उपरिष्ठात् प्राणो मध्यतः प्राणः सर्वतः प्राण एवेदं सर्वम्’ इति प्राणस्य व्याप्तिः प्रतीयते ।
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               ‘यतः सर्वं जगद्व्याप्य तिष्ठति प्राण एव तु । अतो धृतं जगत् सर्वमन्यथा केन धार्यते’ इति च युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
               ‘यतः सर्वं जगद्व्याप्य तिष्ठति प्राण एव तु । अतो धृतं जगत् सर्वमन्यथा केन धार्यते’ इति च युक्तिर्वायुप्रोक्ते ।
               ‘अणुनैतत्सृज्यतेऽणुनैतद्धार्यते अणौ लयमभ्युपैति प्राणो वा अणुः प्राणो ह्येतद्भवति’ इति च सौत्रायणश्रुतिः ॥
               ‘अणुनैतत्सृज्यतेऽणुनैतद्धार्यते अणौ लयमभ्युपैति प्राणो वा अणुः प्राणो ह्येतद्भवति’ इति च सौत्रायणश्रुतिः ॥
               अत आह –}}
               अत आह –
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{{AuthorNote| text = ॥ इति प्राणाणुत्वाधिकरणम् ॥ 09 ॥}}
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| verse_line1  = ॐ ज्योतिराद्यधिष्ठानं तु तदामननात् ॐ ॥ 15-286 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V15| text = करणत्वं प्राणानामुक्तम् ।
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               ‘जीवस्य करणान्याहुः प्राणानेतांस्तु सर्वशः।यस्मात् तद्वशगा एते दृश्यन्ते सर्वदेहिषु’ इति सौत्रायणश्रुतौ सयुक्तिकं जीवकरणत्वं प्रतीयते।
               ‘जीवस्य करणान्याहुः प्राणानेतांस्तु सर्वशः।यस्मात् तद्वशगा एते दृश्यन्ते सर्वदेहिषु’ इति सौत्रायणश्रुतौ सयुक्तिकं जीवकरणत्वं प्रतीयते।
               ‘ब्रह्मणो वा एतानि करणानि चक्षुः श्रोत्रं मनो वागिति तद्ध्येतैः कारयति’ इति काषायणश्रुतौ । अत आह –}}
               ‘ब्रह्मणो वा एतानि करणानि चक्षुः श्रोत्रं मनो वागिति तद्ध्येतैः कारयति’ इति काषायणश्रुतौ । अत आह –
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V16| text = कथं जीवकरणत्वश्रुतिरित्यतो वक्ति –}}
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| verse_line1  = ॐ तस्य च नित्यत्वात् ॐ ॥ 17-288 ॥
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{{AuthorNote| text = ॥ इति ज्योतिराद्यधिकरणम् ॥ 10 ॥}}
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॥ इति ज्योतिराद्यधिकरणम् ॥ 10 ॥
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| verse_line1  = ॐ त इन्द्रियाण् तद्व्यपदेशादन्यत्र श्रेष्ठात् ॐ ॥ 18-289 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V18| text = ‘अथेन्द्रियाणि प्राणा वा इन्द्रियाणि प्राणा हीदं द्रवन्ति’ इति सयुक्तिकपौत्रायणश्रुतिः सामान्येन प्राणानामिन्द्रियत्वं वक्ति ।
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               ‘द्वादशैवेन्द्रियाण्याहुर्मनोबुद्धी तु द्वादश’ इति च काषायणश्रुतिः ।अतः कस्येन्द्रियत्वं निवार्यत इत्यतो वक्ति-}}
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‘अथेन्द्रियाणि प्राणा वा इन्द्रियाणि प्राणा हीदं द्रवन्ति’ इति सयुक्तिकपौत्रायणश्रुतिः सामान्येन प्राणानामिन्द्रियत्वं वक्ति ।
               ‘द्वादशैवेन्द्रियाण्याहुर्मनोबुद्धी तु द्वादश’ इति च काषायणश्रुतिः ।अतः कस्येन्द्रियत्वं निवार्यत इत्यतो वक्ति-
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| verse_line1  = ॐ भेदश्रुतेः ॐ ॥ 19-290 ॥
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{{AuthorNote| text = ॥ इति इन्द्रियाधिकरणम् ॥ 11 ॥}}
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| verse_line1  = ॐ सङ्ज्ञामूर्तिक्लृप्तिस्तुत्रि वृत्कुर्वत उपदेशात् ॐ॥ 21-292 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V21| text = ‘विरिञ्चो वा इदं सर्वं विरेचयति विदधाति ब्रह्मा वाव विरिञ्च एतस्माद्धीमे रूपनामानी’ इति गौपवनश्रुतिः ॥
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‘विरिञ्चो वा इदं सर्वं विरेचयति विदधाति ब्रह्मा वाव विरिञ्च एतस्माद्धीमे रूपनामानी’ इति गौपवनश्रुतिः ॥
               ‘यस्माद्विरेचयेत् सर्वं विरिञ्चस्तेन भण्यते ।एको हि कर्ता जगतो ब्रह्मैव च चतुर्मुखः’ इति च युक्तिर्ब्राह्मे ।
               ‘यस्माद्विरेचयेत् सर्वं विरिञ्चस्तेन भण्यते ।एको हि कर्ता जगतो ब्रह्मैव च चतुर्मुखः’ इति च युक्तिर्ब्राह्मे ।
               अथ कस्मादुच्यते परम इति परमाद्ध्येते नामरूपे व्याक्रियेते तस्मादेनमाहुः परम इति । अथ कस्मादुच्यते ब्रह्मेति बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च’ इत्याग्निवेश्यश्रुतिः ।
               अथ कस्मादुच्यते परम इति परमाद्ध्येते नामरूपे व्याक्रियेते तस्मादेनमाहुः परम इति । अथ कस्मादुच्यते ब्रह्मेति बृहत्त्वाद् बृंहणत्वाच्च’ इत्याग्निवेश्यश्रुतिः ।
               अत आह-}}
               अत आह-
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{{AuthorNote| text = ॥ इति सङ्ज्ञाधिकरणम् ॥ 12 ॥}}
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॥ इति सङ्ज्ञाधिकरणम् ॥ 12 ॥
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| verse_line1  = ॐ मांसादि भौमं यथाशब्दमितरयोश्च ॐ ॥ 22-293 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V22| text = ‘अद्ब्यो हीदमुत्पद्यते आपो वाव मांसमस्थि च भवन्त्यापः शरीरमाप एवेदं सर्वम्’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ।
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‘अद्ब्यो हीदमुत्पद्यते आपो वाव मांसमस्थि च भवन्त्यापः शरीरमाप एवेदं सर्वम्’ इति कौण्डिन्यश्रुतिः ।
               ‘अम्मयं तु यतो मांसमतस्तृप्तिश्च मांसतः’ इति च भारते ।
               ‘अम्मयं तु यतो मांसमतस्तृप्तिश्च मांसतः’ इति च भारते ।
               ‘पृथिवी शरीरमाकाशमात्मा’ इति च  अतो ब्रवीति –}}
               ‘पृथिवी शरीरमाकाशमात्मा’ इति च  अतो ब्रवीति –
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| verse_line1  = ॐ वैशेष्यात् तु तद्वादस्तद्वादः ॐ ॥ 23-294 ॥
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{{VerseSummary| verse_id = BS_C02_S04_V23| text = कथं तर्हि विशेषवचनमित्यत आह-}}
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कथं तर्हि विशेषवचनमित्यत आह-
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{{AuthorNote| text = इति मांसा(ध्य)धिकरणम् ॥ 13 ॥}}
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इति मांसा(ध्य)धिकरणम् ॥ 13 ॥
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमद्ब्रह्मसूत्रे द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः॥ 02-04 ॥}}
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॥ इति श्रीमद्ब्रह्मसूत्रे द्वितीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः॥ 02-04 ॥
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{{AuthorNote| text = ॥इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायः (अविरोधाध्यायः) ॥ 02 ॥}}
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॥इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये द्वितीयाध्यायः (अविरोधाध्यायः) ॥ 02 ॥
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