Bruhadaranyaka/C2/S4: Difference between revisions
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| verse_line1 = मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः । उद्यास्यन् वा ओऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः । उद्यास्यन् वा ओऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = सा होवाच मैत्रेयी । यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् कथं तेनामृता स्यामिति । नेति होवाच । याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्याद् , अमृतत्वस्य नाशाऽस्ति वित्तेनेति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = सा होवाच मैत्रेयी । यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् कथं तेनामृता स्यामिति । नेति होवाच । याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्याद् , अमृतत्वस्य नाशाऽस्ति वित्तेनेति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = सा होवाच । मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां, यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = सा होवाच । मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां, यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = स होवाच याज्ञवल्क्यः । प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्व व्याख्यास्यामि । ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = स होवाच याज्ञवल्क्यः । प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्व व्याख्यास्यामि । ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । | | verse_line1 = स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । | ||
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| verse_line1 = ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर् योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद देवाः तं परादुः । | | verse_line1 = ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर् योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद देवाः तं परादुः । | ||
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| verse_line1 = स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा ओऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेदद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निःश्वसितानि ॥ १० ॥ | | verse_line1 = स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा ओऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेदद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निःश्वसितानि ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायतनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनमेवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनमेवं सर्वेषां गन्धानां नासिकैकायनमेवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनमेवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनमेवं सर्वेषां सङ्कल्पानां मन एकायनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनमेवं सर्वेषां कर्मणां हस्तावेकायनमेवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवं सर्वेषामध्वानां पादावेकायनमेवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनमेवम् ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायतनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनमेवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनमेवं सर्वेषां गन्धानां नासिकैकायनमेवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनमेवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनमेवं सर्वेषां सङ्कल्पानां मन एकायनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनमेवं सर्वेषां कर्मणां हस्तावेकायनमेवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवं सर्वेषामध्वानां पादावेकायनमेवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनमेवम् ॥ ११ ॥ | ||
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| verse_line1 = स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत न हास्योद्ग्रहणायैव स्याद्यतो यतस्त्वाददीत लवणमेवैवं वा ओ इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत न हास्योद्ग्रहणायैव स्याद्यतो यतस्त्वाददीत लवणमेवैवं वा ओ इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥ | ||
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| verse_line1 = सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीति | | verse_line1 = सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीति | ||
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| verse_line1 = यत्र हि द्वैतमिव भवति । | | verse_line1 = यत्र हि द्वैतमिव भवति । | ||
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