Bruhadaranyaka/C4/S3: Difference between revisions
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| title = ज्योतिर्ब्राह्मणम् | | title = ज्योतिर्ब्राह्मणम् | ||
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| verse_line1 = जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो याज्ञवल्क्यश्चाग्निहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ । स ह कामप्रश्नमेव वव्रे । तं हास्मै ददौ तंह सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥ १ ॥ | | verse_line1 = जनकं ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो याज्ञवल्क्यश्चाग्निहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ । स ह कामप्रश्नमेव वव्रे । तं हास्मै ददौ तंह सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरयं पुरुष इत्यादित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २ ॥ | | verse_line1 = याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरयं पुरुष इत्यादित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति चंद्रमा एवास्य ज्योतिर्भवतीति चंद्रमसैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्यतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति चंद्रमा एवास्य ज्योतिर्भवतीति चंद्रमसैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्यतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यग्निरेवास्य ज्योतिर्भवतीत्यग्निनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्यतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यग्निरेवास्य ज्योतिर्भवतीत्यग्निनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्यतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति वागेवास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति तस्माद्वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतेऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र न्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किं ज्योतिरेवायं पुरुष इति वागेवास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति तस्माद्वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतेऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र न्येतीत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चंद्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि किं ज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योतिषाऽऽस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स समानः सन्नुभौ लोकावनु सञ्चरति ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स समानः सन्नुभौ लोकावनु सञ्चरति ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = स वाऽयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसम्पद्यमानः पाप्मभिः संसृज्यते स उत्क्रामन् म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = स वाऽयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसम्पद्यमानः पाप्मभिः संसृज्यते स उत्क्रामन् म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च सन्ध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानं तस्मिन् सन्ध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीदं च परलोकस्थानं चाथ यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन् आनन्दांश्च पश्यति स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामुपादाय स्वयं विहृत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वापित्यत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवति ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च सन्ध्यं तृतीयं स्वप्नस्थानं तस्मिन् सन्ध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीदं च परलोकस्थानं चाथ यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन् आनन्दांश्च पश्यति स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामुपादाय स्वयं विहृत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वापित्यत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिर्भवति ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते न तत्राऽऽनन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिण्यः स्रवन्त्यः सृजते स हि कर्ता ॥ १० ॥ | | verse_line1 = न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते न तत्राऽऽनन्दा मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिण्यः स्रवन्त्यः सृजते स हि कर्ता ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा । | | verse_line1 = प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा । | ||
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| verse_line1 = स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि । | | verse_line1 = स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि । | ||
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| verse_line1 = आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चनेति । | | verse_line1 = आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चनेति । | ||
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| verse_line1 = स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति स्वप्नायैव स यत् तत्र किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगो ह्ययं पुरुषः इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति स्वप्नायैव स यत् तत्र किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगो ह्ययं पुरुषः इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_line1 = स वा एष एतस्मिन् स्वप्ने रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति बुद्धान्तायैव स यत् तत्र यत् किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगो ह्ययं पुरुषः इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = स वा एष एतस्मिन् स्वप्ने रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति बुद्धान्तायैव स यत् तत्र यत् किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगो ह्ययं पुरुषः इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १६ ॥ | ||
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| verse_line1 = स वा एष एतस्मिन् बुद्धान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति स्वप्नान्तायैव ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = स वा एष एतस्मिन् बुद्धान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति स्वप्नान्तायैव ॥ १७ ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्यथा महामत्स्य उभे कूले अनुसञ्चरति । पूर्वं चापरं चैवमेवायं पुरुष एतावुभावन्तावनुसञ्चरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = तद्यथा महामत्स्य उभे कूले अनुसञ्चरति । पूर्वं चापरं चैवमेवायं पुरुष एतावुभावन्तावनुसञ्चरति स्वप्नान्तं च बुद्धान्तं च ॥ १८ ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्यथाऽस्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्त संहत्य पक्षौ सल्लयायैव ध्रियते, एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति । यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते । न कञ्चन स्वप्नं पश्यति॥ १९ ॥ | | verse_line1 = तद्यथाऽस्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्त संहत्य पक्षौ सल्लयायैव ध्रियते, एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति । यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते । न कञ्चन स्वप्नं पश्यति॥ १९ ॥ | ||
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| verse_line1 = ता वा अस्यैता हिता नाम नाड्यो यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्तावताऽणिम्ना तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पिंगलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव हस्तीव विच्छाययति गर्तमिव पतति । यदेव जाग्रद्भयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र देव इव राजेवाहमेवेदं सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥ २० ॥ | | verse_line1 = ता वा अस्यैता हिता नाम नाड्यो यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्तावताऽणिम्ना तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पिंगलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा अथ यत्रैनं घ्नन्तीव जिनन्तीव हस्तीव विच्छाययति गर्तमिव पतति । यदेव जाग्रद्भयं पश्यति तदत्राविद्यया मन्यतेऽथ यत्र देव इव राजेवाहमेवेदं सर्वोऽस्मीति मन्यते सोऽस्य परमो लोकः ॥ २० ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माऽभयं रूपं तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरं तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामं रूपं शोकान्तरम् ॥ २१ ॥ | | verse_line1 = तद्वा अस्यैतदतिच्छन्दा अपहतपाप्माऽभयं रूपं तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरमेवमेवायं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद, नान्तरं तद्वा अस्यैतदाप्तकाममात्मकाममकामं रूपं शोकान्तरम् ॥ २१ ॥ | ||
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| verse_line1 = अत्र पिताऽपिता भवति माताऽमाता लोका अलोका देवा ओवा वेदा अवेदा अत्र स्तेनोऽस्तेनो भवति भ्रूणहाऽभ्रूणहा चांडालोऽचांडालः पौल्कसोऽपौल्कसः श्रमणोऽश्रमणस्तापसोऽतापसोऽनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति ॥ २२ ॥ | | verse_line1 = अत्र पिताऽपिता भवति माताऽमाता लोका अलोका देवा ओवा वेदा अवेदा अत्र स्तेनोऽस्तेनो भवति भ्रूणहाऽभ्रूणहा चांडालोऽचांडालः पौल्कसोऽपौल्कसः श्रमणोऽश्रमणस्तापसोऽतापसोऽनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति ॥ २२ ॥ | ||
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| verse_line1 = यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति । न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ॥ २३ ॥ | | verse_line1 = यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति । न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् ॥ २३ ॥ | ||
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| verse_line1 = यद्वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन् वै तन्न जिघ्रति। न हि घ्रातुर्घ्रातेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ।ततोऽन्यद्विभक्तं यज्जिघ्रेत् ॥ २४ ॥ | | verse_line1 = यद्वै तन्न जिघ्रति जिघ्रन् वै तन्न जिघ्रति। न हि घ्रातुर्घ्रातेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ।ततोऽन्यद्विभक्तं यज्जिघ्रेत् ॥ २४ ॥ | ||
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| verse_line1 = यद्वै तन्न रसयते रसयन् वै तन्न रसयते ।न हि रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यद्रसयेत् ॥ २५ ॥ | | verse_line1 = यद्वै तन्न रसयते रसयन् वै तन्न रसयते ।न हि रसयितू रसयतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यद्रसयेत् ॥ २५ ॥ | ||
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| verse_line1 = यद्वै तन्न वदति वदन् वै तं न वदति । न हि वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति। ततोऽन्यद्विभक्तं यद्वदेत् ॥ २६ ॥ | | verse_line1 = यद्वै तन्न वदति वदन् वै तं न वदति । न हि वक्तुर्वक्तेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति। ततोऽन्यद्विभक्तं यद्वदेत् ॥ २६ ॥ | ||
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| verse_line1 = यद्वै तन्न शृणोति शृण्वन् वै तन्न शृणोति । न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यच्छृणुयात् ॥ २७ ॥ | | verse_line1 = यद्वै तन्न शृणोति शृण्वन् वै तन्न शृणोति । न हि श्रोतुः श्रुतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यच्छृणुयात् ॥ २७ ॥ | ||
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| verse_line1 = यद्वै तन्न मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते । न हि मन्तुर्मतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यन्मन्वीत॥ २८ ॥ | | verse_line1 = यद्वै तन्न मनुते मन्वानो वै तन्न मनुते । न हि मन्तुर्मतेर्विपरिलोपो विद्यते । अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति । ततोऽन्यद्विभक्तं यन्मन्वीत॥ २८ ॥ | ||
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| verse_line1 = यद्वै तन्न स्पृशति स्पृशन् वै तन्न स्पृशति न हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्स्पृशेत् ॥ २९ ॥ | | verse_line1 = यद्वै तन्न स्पृशति स्पृशन् वै तन्न स्पृशति न हि स्प्रष्टुः स्पृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्स्पृशेत् ॥ २९ ॥ | ||
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| verse_line1 = यद्वै तन्न विजानाति विजानन् वै तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात् ॥ ३० ॥ | | verse_line1 = यद्वै तन्न विजानाति विजानन् वै तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते ।अविनाशित्वान्न तु तद्द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात् ॥ ३० ॥ | ||
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| verse_line1 = यत्र वा अन्यदिव स्यात् तत्रान्योऽन्यत् पश्येत् अन्योऽन्यज्जिघ्रेत् अन्योऽन्यद्रसयेत् अन्योऽन्यद्वदेत् अन्योऽन्यच्छृणुयात् अन्योऽन्यन्मन्वीतान्योऽन्यत् स्पृशेदन्योऽन्यद्विजानीयात् ॥ ३१ ॥ | | verse_line1 = यत्र वा अन्यदिव स्यात् तत्रान्योऽन्यत् पश्येत् अन्योऽन्यज्जिघ्रेत् अन्योऽन्यद्रसयेत् अन्योऽन्यद्वदेत् अन्योऽन्यच्छृणुयात् अन्योऽन्यन्मन्वीतान्योऽन्यत् स्पृशेदन्योऽन्यद्विजानीयात् ॥ ३१ ॥ | ||
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| verse_line1 = सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य एषाऽस्य परमा गतिरेषाऽस्य परमा सम्पदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्द एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥ ३२ ॥ | | verse_line1 = सलिल एको द्रष्टाऽद्वैतो भवत्येष ब्रह्मलोकः सम्राडिति हैनमनुशशास याज्ञवल्क्य एषाऽस्य परमा गतिरेषाऽस्य परमा सम्पदेषोऽस्य परमो लोक एषोऽस्य परम आनन्द एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति ॥ ३२ ॥ | ||
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| verse_line1 = स यो ह वै मनुष्याणां राद्धः समृद्धो भवत्यन्येषामधिपतिः सर्वैर्मानुष्यकैर्भोगैः सम्पन्नतमः स मनुष्याणां परम आनन्दोऽथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः स एकः पितॄणां जितलोकानामानन्दोऽथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः स एको गन्धर्वलोक आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाः स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसम्पद्यन्तेऽथ ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजानदेवानामानन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतमाजानदेवानामानन्दाः स एकः प्रजापतिलोकः आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतं प्रजापतिलोक आनन्दाः स एको ब्रह्मलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथैष एव परम आनन्द एष ब्रह्मलोकः सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीत्यत्र ह याज्ञवल्क्यो बिभयाञ्चकार मेधावी राजा सर्वेभ्यो माऽन्तेभ्य उदरौत्सीदिति ॥ ३३ ॥ | | verse_line1 = स यो ह वै मनुष्याणां राद्धः समृद्धो भवत्यन्येषामधिपतिः सर्वैर्मानुष्यकैर्भोगैः सम्पन्नतमः स मनुष्याणां परम आनन्दोऽथ ये शतं मनुष्याणामानन्दाः स एकः पितॄणां जितलोकानामानन्दोऽथ ये शतं पितॄणां जितलोकानामानन्दाः स एको गन्धर्वलोक आनन्दोऽथ ये शतं गन्धर्वलोक आनन्दाः स एकः कर्मदेवानामानन्दो ये कर्मणा देवत्वमभिसम्पद्यन्तेऽथ ये शतं कर्मदेवानामानन्दाः स एक आजानदेवानामानन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतमाजानदेवानामानन्दाः स एकः प्रजापतिलोकः आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथ ये शतं प्रजापतिलोक आनन्दाः स एको ब्रह्मलोक आनन्दो यश्च श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतोऽथैष एव परम आनन्द एष ब्रह्मलोकः सम्राडिति होवाच याज्ञवल्क्यः सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीत्यत्र ह याज्ञवल्क्यो बिभयाञ्चकार मेधावी राजा सर्वेभ्यो माऽन्तेभ्य उदरौत्सीदिति ॥ ३३ ॥ | ||
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| verse_line1 = स वा एष एतस्मिन् स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति बुद्धान्तायैव ॥ ३४ ॥ | | verse_line1 = स वा एष एतस्मिन् स्वप्नान्ते रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति बुद्धान्तायैव ॥ ३४ ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्यथानः सुसमाहितमुत्सर्जत् यायादेवमेवायं शरीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढं उत्सर्जद्याति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥३५॥ | | verse_line1 = तद्यथानः सुसमाहितमुत्सर्जत् यायादेवमेवायं शरीर आत्मा प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढं उत्सर्जद्याति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥३५॥ | ||
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| verse_line1 = स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपता वाऽणिमानं निगच्छति तद्यथाऽऽम्रमौदुम्बरं वा पिप्पलं वा बन्धनात् प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति प्राणायैव ॥ ३६ ॥ | | verse_line1 = स यत्रायमणिमानं न्येति जरया वोपतपता वाऽणिमानं निगच्छति तद्यथाऽऽम्रमौदुम्बरं वा पिप्पलं वा बन्धनात् प्रमुच्यत एवमेवायं पुरुष एभ्योऽङ्गेभ्यः सम्प्रमुच्य पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्या द्रवति प्राणायैव ॥ ३६ ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्यथा राजानमायान्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽन्नैः पानैरावसथैः प्रतिकल्पन्तेऽयमायात्ययमागच्छतीत्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतानि प्रतिकल्पन्त इदं ब्रह्मायातीदमागच्छतीति ॥३७॥ | | verse_line1 = तद्यथा राजानमायान्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽन्नैः पानैरावसथैः प्रतिकल्पन्तेऽयमायात्ययमागच्छतीत्येवं हैवंविदं सर्वाणि भूतानि प्रतिकल्पन्त इदं ब्रह्मायातीदमागच्छतीति ॥३७॥ | ||
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| verse_line1 = तद्यथा राजानं प्रयियासन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽभिसमायन्त्येवमेवेममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥ ३८ ॥ | | verse_line1 = तद्यथा राजानं प्रयियासन्तमुग्राः प्रत्येनसः सूतग्रामण्योऽभिसमायन्त्येवमेवेममात्मानमन्तकाले सर्वे प्राणा अभिसमायन्ति यत्रैतदूर्ध्वोच्छ्वासी भवति ॥ ३८ ॥ | ||
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