Bruhadaranyaka/C6/S1: Difference between revisions

Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Line 1: Line 1:
{{Adhyaya
{{Adhyaya
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id  = BR_C06
| chapter_num  = 6
| chapter_num  = 6
| chapter_name = अष्टमोऽध्यायः
| section_id  = BR_C06_S01
| section_num  = 1
| title        = प्रथमब्राह्मणम्
| title        = प्रथमब्राह्मणम्
}}
}}
Line 14: Line 10:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च । ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥
| verse_line1  = यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवति प्राणो वै ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च । ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ १ ॥
Line 24: Line 18:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति वाग्वै वसिष्ठा वसिष्ठः स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ २ ॥
| verse_line1  = यो ह वै वसिष्ठां वेद वसिष्ठः स्वानां भवति वाग्वै वसिष्ठा वसिष्ठः स्वानां भवत्यपि च येषां बुभूषति य एवं वेद ॥ २ ॥
Line 34: Line 26:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति । प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥ ३ ॥
| verse_line1  = यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे चक्षुर्वै प्रतिष्ठा चक्षुषा हि समे च दुर्गे च प्रतितिष्ठति । प्रतितिष्ठति समे प्रतितिष्ठति दुर्गे य एवं वेद ॥ ३ ॥
Line 44: Line 34:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = यो ह वै सम्पदं वेद सर्वं हास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै सम्पच्छ्रोत्रे हीमे सर्वे वेदा अभिसम्पन्ना सं हास्मै पद्यते थं कामं कामयते य एवं वेद ॥ ४ ॥
| verse_line1  = यो ह वै सम्पदं वेद सर्वं हास्मै पद्यते यं कामं कामयते श्रोत्रं वै सम्पच्छ्रोत्रे हीमे सर्वे वेदा अभिसम्पन्ना सं हास्मै पद्यते थं कामं कामयते य एवं वेद ॥ ४ ॥
Line 54: Line 42:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = यो ह वा आयतनं वेदायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥५॥
| verse_line1  = यो ह वा आयतनं वेदायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां मनो वा आयतनमायतनं स्वानां भवत्यायतनं जनानां य एवं वेद ॥५॥
Line 64: Line 50:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = यो ह वै प्रजापतिं वेद प्रजापते ह प्रजया पशुभी रेतो वै प्रजापतिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥
| verse_line1  = यो ह वै प्रजापतिं वेद प्रजापते ह प्रजया पशुभी रेतो वै प्रजापतिः प्रजायते ह प्रजया पशुभिर्य एवं वेद ॥ ६ ॥
Line 74: Line 58:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = ते हेमे प्राणा अहं श्रेयसे विविदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदं शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७ ॥
| verse_line1  = ते हेमे प्राणा अहं श्रेयसे विविदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदं शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७ ॥
Line 84: Line 66:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = वाग्घोच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा अकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तः चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥
| verse_line1  = वाग्घोच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा अकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तः चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥
Line 94: Line 74:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = चक्षुः होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा अन्धा अपश्यन्तश्चक्षुषा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्त श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥
| verse_line1  = चक्षुः होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा अन्धा अपश्यन्तश्चक्षुषा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्त श्रोत्रेण विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥
Line 104: Line 82:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = श्रोत्रं होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा बधिराः अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥
| verse_line1  = श्रोत्रं होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा बधिराः अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वांसो मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥
Line 114: Line 90:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा मुग्धाः अविद्वांसो मनसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥
| verse_line1  = मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा मुग्धाः अविद्वांसो मनसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥
Line 124: Line 98:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = रेतो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच । कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा क्लीबाः अप्रजायमाना रेतसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह रेतः ॥ १२ ॥
| verse_line1  = रेतो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच । कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते होचुर्यथा क्लीबाः अप्रजायमाना रेतसा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वांसो मनसैवमजीविष्मेति प्रविवेश ह रेतः ॥ १२ ॥
Line 134: Line 106:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = अथ ह प्राणः उत्क्रमिष्यन् यथा महासुहयः सैन्धवः पट्वीशशङ्कून् संवृहेदेवं हैवेमान् प्राणान् सम्बबर्ह ते होचुर्मा भगव उत्क्रामीर्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति तस्यो मे बलिं कुरुतेति तथेति ॥१३॥
| verse_line1  = अथ ह प्राणः उत्क्रमिष्यन् यथा महासुहयः सैन्धवः पट्वीशशङ्कून् संवृहेदेवं हैवेमान् प्राणान् सम्बबर्ह ते होचुर्मा भगव उत्क्रामीर्न वै शक्ष्यामस्त्वदृते जीवितुमिति तस्यो मे बलिं कुरुतेति तथेति ॥१३॥
Line 144: Line 114:
| document_id  = BR
| document_id  = BR
| chapter_id    = BR_C06
| chapter_id    = BR_C06
| section_id    = BR_C06_S01
| adhikarana    =
| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = सा ह वागुवाच यद्वा अहं वसिष्ठाऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति यद्वा अहं प्रतिष्ठाऽस्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति चक्षुर्यद्वा अहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीति श्रोत्रं यद्वा अहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति मनो यद्वा अहं प्रजापतिरस्मि त्वं तत्प्रजापतिरसीति रेतः तस्योमे किमन्नं किं वास इति यदिदं किञ्च आ श्वभ्यः आ क्रिमिभ्यः आ कीटपतंगेभ्यः तत्तेऽन्नमापो वास इति न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्नं परिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नं वेद तद्विद्वांसः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वा चाचामन्त्येतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते तस्मादेवं विद्वानशिष्यन्नाचामेदशित्वा चाचामेत् ॥ १४ ॥
| verse_line1  = सा ह वागुवाच यद्वा अहं वसिष्ठाऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीति यद्वा अहं प्रतिष्ठाऽस्मि त्वं तत्प्रतिष्ठासीति चक्षुर्यद्वा अहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीति श्रोत्रं यद्वा अहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति मनो यद्वा अहं प्रजापतिरस्मि त्वं तत्प्रजापतिरसीति रेतः तस्योमे किमन्नं किं वास इति यदिदं किञ्च आ श्वभ्यः आ क्रिमिभ्यः आ कीटपतंगेभ्यः तत्तेऽन्नमापो वास इति न ह वा अस्यानन्नं जग्धं भवति नानन्नं परिगृहीतं य एवमेतदनस्यान्नं वेद तद्विद्वांसः श्रोत्रिया अशिष्यन्त आचामन्त्यशित्वा चाचामन्त्येतमेव तदनमनग्नं कुर्वन्तो मन्यन्ते तस्मादेवं विद्वानशिष्यन्नाचामेदशित्वा चाचामेत् ॥ १४ ॥
}}
}}


{{AuthorNote| text = ॥  इति  बृहदारण्यकोपनिषदि अष्टमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ॥}}
{{Commentary
| verse_id = BR_C06_S01_V14
| id      = BR_C06_S01_V14_author-note
| name    = Bhashyam
| text     =
॥  इति  बृहदारण्यकोपनिषदि अष्टमाध्याये प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
}}


{{AuthorNote| text = ॥  इति बृहद्भाष्ये अष्टमाध्याये प्रथमब्राह्मणम् ॥ १ ॥}}
{{Commentary
| verse_id = BR_C06_S01_V14
| id      = BR_C06_S01_V14_author-note
| name    = Bhashyam
| text     =
॥  इति बृहद्भाष्ये अष्टमाध्याये प्रथमब्राह्मणम् ॥ १ ॥
}}


{{Commentary
{{Commentary