Chandogya/C2: Difference between revisions

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| verse_line1  = ॐ समस्तस्य खलु साम्ना उपासनं साधु यत्खलु साधु तत्सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥ १ ॥
| verse_line1  = ॐ समस्तस्य खलु साम्ना उपासनं साधु यत्खलु साधु तत्सामेत्याचक्षते यदसाधु तदसामेति ॥ १ ॥
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| verse_line1  = तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥
| verse_line1  = तदुताप्याहुः साम्नैनमुपागादिति साधुनैनमुपागादित्येव तदाहुरसाम्नैनमुपागादित्यसाधुनैनमुपागादित्येव तदाहुः ॥ २ ॥
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| verse_line1  = अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥ ३ ॥
| verse_line1  = अथोताप्याहुः साम नो बतेति यत्साधु भवति साधु बतेत्येव तदाहुरसाम नो बतेति यदसाधु भवत्यसाधु बतेत्येव तदाहुः ॥ ३ ॥
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| verse_line1  = स य एतदेवंविद्वान् साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥ ४ ॥ १ ॥
| verse_line1  = स य एतदेवंविद्वान् साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥ ४ ॥ १ ॥
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| verse_line1  = लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत पृथिवी हिङ्कारोऽग्निः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथ आदित्यः प्रतिहारो द्यौर्निधनमित्यूर्ध्वेषु ॥ १ ॥
| verse_line1  = लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत पृथिवी हिङ्कारोऽग्निः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथ आदित्यः प्रतिहारो द्यौर्निधनमित्यूर्ध्वेषु ॥ १ ॥
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| verse_line1  = अथावृत्तेषु द्यौर्हिङ्कार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम् ॥ २ ॥
| verse_line1  = अथावृत्तेषु द्यौर्हिङ्कार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम् ॥ २ ॥
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| verse_line1  = कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वांल्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ३ ॥ २ ॥
| verse_line1  = कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वांल्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ३ ॥ २ ॥
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| verse_line1  = वृष्टौ पञ्चविधं सामोपासीत । पुरो वातो हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः ॥ १ ॥
| verse_line1  = वृष्टौ पञ्चविधं सामोपासीत । पुरो वातो हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः ॥ १ ॥
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| verse_line1  = उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान् वृष्टौ पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ३ ॥
| verse_line1  = उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान् वृष्टौ पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ३ ॥
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| verse_line1  = सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपासीत । मेघो यत्सम्प्लवते स हिङ्कारो यद्वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥ १ ॥
| verse_line1  = सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपासीत । मेघो यत्सम्प्लवते स हिङ्कारो यद्वर्षति स प्रस्तावो याः प्राच्यः स्यन्दन्ते स उद्गीथो याः प्रतीच्यः स प्रतिहारः समुद्रो निधनम् ॥ १ ॥
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| verse_line1  = न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ४ ॥
| verse_line1  = न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ४ ॥
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| verse_line1  = ऋतुषु पञ्चविधं सामोपासीत । वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनम् ॥ १ ॥
| verse_line1  = ऋतुषु पञ्चविधं सामोपासीत । वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनम् ॥ १ ॥
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| verse_line1  = कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान् भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ५ ॥
| verse_line1  = कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान् भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ५ ॥
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| verse_line1  = पशुषु पञ्चविधं सामोपासीताजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनं भवन्ति हास्य पशवः पशुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् पशुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ६ ॥
| verse_line1  = पशुषु पञ्चविधं सामोपासीताजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनं भवन्ति हास्य पशवः पशुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् पशुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ६ ॥
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| verse_line1  = प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिङ्कारः वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयांसि वैतानि परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकान् जयति य एतदेवं विद्वान् प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ ७ ॥
| verse_line1  = प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिङ्कारः वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयांसि वैतानि परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकान् जयति य एतदेवं विद्वान् प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ ७ ॥
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| verse_line1  = अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधं सामोपासीत यत्किञ्च वाचो हुमिति स हिङ्कारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिर्यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतदेवं विद्वान् वाचि सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ १ ॥
| verse_line1  = अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधं सामोपासीत यत्किञ्च वाचो हुमिति स हिङ्कारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिर्यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतदेवं विद्वान् वाचि सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ १ ॥
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| verse_line1  = अथ खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपासीत सर्वदा समस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ १ ॥ तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात् |
| verse_line1  = अथ खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपासीत सर्वदा समस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ १ ॥ तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात् |
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| verse_line1  = तस्य यत्पुरोदयात् स हिङ्कारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात् ते हिङ्कुर्वन्ति हिङ्कारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ २ ॥
| verse_line1  = तस्य यत्पुरोदयात् स हिङ्कारस्तदस्य पशवोऽन्वायत्तास्तस्मात् ते हिङ्कुर्वन्ति हिङ्कारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ २ ॥
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| verse_line1  = अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात् ते प्रस्तुतिकामाः प्रशंसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥३॥
| verse_line1  = अथ यत्प्रथमोदिते स प्रस्तावस्तदस्य मनुष्या अन्वायत्तास्तस्मात् ते प्रस्तुतिकामाः प्रशंसाकामाः प्रस्तावभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥३॥
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| verse_line1  = अथ यत्सङ्गववेलायां स आदिस्तदस्य वयांस्यन्वायत्तानि तस्मात् तान्यन्तरिक्षेऽनारम्भणान्यादायात्मानं परिपतन्त्यादिभाजीनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ४ ॥
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| verse_line1  = अथ यत्सम्प्रति मध्यन्दिने स उद्गीथस्तदस्य देवा अन्वायत्तास्तस्मात् ते सत्तमाः प्राजापत्यानामुद्गीथभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ५ ॥
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| verse_line1  = अथ यदूर्ध्वं मध्यन्दिनात् प्रागपराह्णात् स प्रतिहारस्तदस्य गर्भा अन्वायत्तास्मात् ते प्रतिहृता नावपद्यन्ते प्रतिहारभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ६ ॥
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| verse_line1  = अथ यदूर्ध्वमपराह्णात् प्रागस्तमयात् स उपद्रवस्तदस्यारण्या अन्वायत्तास्तस्मात् ते पुरुषं दृष्ट्वा कक्षं श्वभ्रमित्युपद्रवन्त्युपद्रवभाजिनो ह्येतस्य साम्नः ॥ ७ ॥
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| verse_line1  = अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात् तान्निदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न एवं खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ ९ ॥
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| verse_line1  = अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपासीत हिङ्कार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ १ ॥
| verse_line1  = अथ खल्वात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपासीत हिङ्कार इति त्र्यक्षरं प्रस्ताव इति त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ १ ॥
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| verse_line1  = आदिरिति द्व्यक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत इहैकं तत्समम् ॥ २ ॥
| verse_line1  = आदिरिति द्व्यक्षरं प्रतिहार इति चतुरक्षरं तत इहैकं तत्समम् ॥ २ ॥
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| verse_line1  = उद्गीथ इति त्र्यक्षरमुपद्रव इति चतुरक्षरं त्रिभिस्त्रिभिः समं भवत्यक्षर मतिशिष्यते त्र्यक्षरं तत्समम् ॥ ३ ॥
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| verse_line1  = निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥
| verse_line1  = निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥
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| verse_line1  = एकविंशत्याऽऽदित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥
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| verse_line1  = आप्नोतीहादित्यस्य जयं परो हास्यादित्यजयाज्जयो भवति य एतदेवं विद्वानात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥ १० ॥
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| verse_line1  = मनो हिङ्कारो वाक् प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या महामनाः स्यात् तद् व्रतम् ॥ ११ ॥
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| verse_line1  = अभिमन्थति स हिङ्कारो धूमो जायते स प्रस्तावो ज्वलति स उद्गीथोऽङ्गारा भवन्ति स प्रतिहार उपशाम्यति तन्निधनं संशाम्यति तन्निधनमेतद्रथन्तमग्नौ प्रोतम् ॥ १ ॥
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| verse_line1  = स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न प्रत्यङ्ग्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥ १२ ॥
| verse_line1  = स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न प्रत्यङ्ग्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥ १२ ॥
Line 602: Line 534:
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| verse_line1  = उपमन्त्रयते स हिङ्कारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रतिस्त्री सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥ १ ॥
| verse_line1  = उपमन्त्रयते स हिङ्कारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेते स उद्गीथः प्रतिस्त्री सह शेते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतम् ॥ १ ॥
Line 612: Line 542:
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| verse_line1  = स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनीभवति मिथुनान्मिथुनात् प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥१३॥
| verse_line1  = स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनीभवति मिथुनान्मिथुनात् प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥१३॥
Line 633: Line 561:
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| verse_line1  = उद्यन् हिङ्कारः उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गीथोऽपराह्णः प्रतिहारोऽस्तं यन्निधनमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं स य एवमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या तपन्तं न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १४ ॥
| verse_line1  = उद्यन् हिङ्कारः उदितः प्रस्तावो मध्यन्दिन उद्गीथोऽपराह्णः प्रतिहारोऽस्तं यन्निधनमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं स य एवमेतद्बृहदादित्ये प्रोतं वेद तेजस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या तपन्तं न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १४ ॥
Line 643: Line 569:
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| verse_line1  = अभ्राणि सम्प्लवन्ते स हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपांश्च सुरूपांश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १५ ॥
| verse_line1  = अभ्राणि सम्प्लवन्ते स हिङ्कारो मेघो जायते स प्रस्तावो वर्षति स उद्गीथो विद्योतते स्तनयति स प्रतिहार उद्गृह्णाति तन्निधनमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं स य एवमेतद्वैरूपं पर्जन्ये प्रोतं वेद विरूपांश्च सुरूपांश्च पशूनवरुन्धे सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या वर्षन्तं न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १५ ॥
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| verse_type    = mantra
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| verse_line1  = वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतत् वैराजमृतुषु प्रोतं स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ऋतून् न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १६ ॥
| verse_line1  = वसन्तो हिङ्कारो ग्रीष्मः प्रस्तावो वर्षा उद्गीथः शरत् प्रतिहारो हेमन्तो निधनमेतत् वैराजमृतुषु प्रोतं स य एवमेतद्वैराजमृतुषु प्रोतं वेद विराजति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ऋतून् न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १६ ॥
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| verse_line1  = पृथिवी हिङ्कारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकीभवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या लोकान्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १७ ॥
| verse_line1  = पृथिवी हिङ्कारोऽन्तरिक्षं प्रस्तावो द्यौरुद्गीथो दिशः प्रतिहारः समुद्रो निधनमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोताः स य एवमेताः शक्वर्यो लोकेषु प्रोता वेद लोकीभवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या लोकान्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १७ ॥
Line 673: Line 593:
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| verse_line1  = अजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या पशून्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १८ ॥
| verse_line1  = अजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनमेता रेवत्यः पशुषु प्रोताः स य एवमेता रेवत्यः पशुषु प्रोता वेद पशुमान् भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या पशून्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ १८ ॥
Line 683: Line 601:
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| verse_line1  = लोम हिङ्कारस्त्वक् प्रस्तावो मांसमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनमेतद्यज्ञायज्ञीयेषु प्रोतं स य एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गीभवति नाङ्गेन विमूर्च्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात् तद् व्रतं मज्ज्ञु नाश्नीयादिति वा ॥ १९ ॥
| verse_line1  = लोम हिङ्कारस्त्वक् प्रस्तावो मांसमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जा निधनमेतद्यज्ञायज्ञीयेषु प्रोतं स य एवमेतद्यज्ञायज्ञीयमङ्गेषु प्रोतं वेदाङ्गीभवति नाङ्गेन विमूर्च्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या संवत्सरं मज्ज्ञो नाश्नीयात् तद् व्रतं मज्ज्ञु नाश्नीयादिति वा ॥ १९ ॥
Line 693: Line 609:
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| verse_line1  = अग्निर्हिङ्कारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानां सलोकातां सार्ष्टितां सायुज्यं गच्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ब्राह्मणान्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ २० ॥
| verse_line1  = अग्निर्हिङ्कारो वायुः प्रस्ताव आदित्य उद्गीथो नक्षत्राणि प्रतिहारश्चन्द्रमा निधनमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं स य एवमेतद्राजनं देवतासु प्रोतं वेदैतासामेव देवतानां सलोकातां सार्ष्टितां सायुज्यं गच्छति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या ब्राह्मणान्न निन्देत् तद् व्रतम् ॥ २० ॥
Line 703: Line 617:
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| verse_line1  = त्रयी विद्या हिङ्कारस्त्रय इमे लोकाः स प्रस्तावोऽग्निर्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयांसि मरीचयः स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत् साम सर्वस्मिन् प्रोतं स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन् प्रोतं वेद सर्वं ह भवति ॥ १ ॥
| verse_line1  = त्रयी विद्या हिङ्कारस्त्रय इमे लोकाः स प्रस्तावोऽग्निर्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयांसि मरीचयः स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत् साम सर्वस्मिन् प्रोतं स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन् प्रोतं वेद सर्वं ह भवति ॥ १ ॥
Line 713: Line 625:
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| verse_line1  = तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति । यस्तद्वेद स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति । सर्वमस्मीत्युपासीत तद् व्रतं तद् व्रतम् ॥ २ ॥ २१ ॥
| verse_line1  = तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति । यस्तद्वेद स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति । सर्वमस्मीत्युपासीत तद् व्रतं तद् व्रतम् ॥ २ ॥ २१ ॥
Line 805: Line 715:
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| verse_line1  = विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान् सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥
| verse_line1  = विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान् सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥
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| verse_type    = mantra
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| verse_line1  = अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत् स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २ ॥
| verse_line1  = अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत् स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २ ॥
Line 862: Line 768:
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| verse_line1  = सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मनः सर्व ऊष्मणः प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं यदि स्वरेषूपालभेतेन्द्रं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥
| verse_line1  = सर्वे स्वरा इन्द्रस्यात्मनः सर्व ऊष्मणः प्रजापतेरात्मानः सर्वे स्पर्शा मृत्योरात्मानस्तं यदि स्वरेषूपालभेतेन्द्रं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ३ ॥
Line 872: Line 776:
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| verse_line1  = अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापतिं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिपेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येनं स्पर्शेषूपालभेत मृत्युं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥
| verse_line1  = अथ यद्येनमूष्मसूपालभेत प्रजापतिं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिपेक्ष्यतीत्येनं ब्रूयादथ यद्येनं स्पर्शेषूपालभेत मृत्युं शरणं प्रपन्नोऽभूवं स त्वा प्रतिवक्ष्यतीत्येनं ब्रूयात् ॥ ४ ॥
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| verse_type    = mantra
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| verse_line1  = सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्वे ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृत्ता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशेनानभिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥ २२ ॥
| verse_line1  = सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्वे ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृत्ता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशेनानभिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥ २२ ॥
Line 925: Line 825:
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| verse_line1  = त्रयो धर्मस्कन्धाः । यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥
| verse_line1  = त्रयो धर्मस्कन्धाः । यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥
Line 944: Line 842:
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| verse_type    = mantra
| verse_type    = mantra
| verse_line1  = प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत् । तामभ्यतपत् तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त । भूर्भुवः स्वरिति । तान्यभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् । तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि सन्तृण्णान्येवमेतेनोङ्कारेण सर्वा वाक्सन्तृण्णोङ्कार एवेदं सर्वमोङ्कार एवेदं सर्वम् ॥ २ ॥ २३ ॥
| verse_line1  = प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत् । तामभ्यतपत् तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त । भूर्भुवः स्वरिति । तान्यभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् । तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि सन्तृण्णान्येवमेतेनोङ्कारेण सर्वा वाक्सन्तृण्णोङ्कार एवेदं सर्वमोङ्कार एवेदं सर्वम् ॥ २ ॥ २३ ॥
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| verse_line1  = ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद्वसूनां प्रातःसवनं रुद्राणां माध्यन्दिनं सवनमादित्यानां विश्वेषां देवानां च तृतीयसवनं क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात् कथं कुर्यादथ विद्वान् कुर्यात् ॥ १ ॥
| verse_line1  = ब्रह्मवादिनो वदन्ति यद्वसूनां प्रातःसवनं रुद्राणां माध्यन्दिनं सवनमादित्यानां विश्वेषां देवानां च तृतीयसवनं क्व तर्हि यजमानस्य लोक इति स यस्तं न विद्यात् कथं कुर्यादथ विद्वान् कुर्यात् ॥ १ ॥
Line 999: Line 893:
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| verse_line1  = पुरा प्रातरनुवाकस्योपकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्योदङ्मुख उपविश्य स वासवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं रा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानास्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै वसवः प्रातःसवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ २ ॥ २४ ॥
| verse_line1  = पुरा प्रातरनुवाकस्योपकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्योदङ्मुख उपविश्य स वासवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं रा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानास्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै वसवः प्रातःसवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ २ ॥ २४ ॥
Line 1,009: Line 901:
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| verse_line1  = पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योददङ्मुख उपविश्य स रौद्रं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं विरा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्मत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यन्दिनं सवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ २५ ॥
| verse_line1  = पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योददङ्मुख उपविश्य स रौद्रं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं विरा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्मत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा माध्यन्दिनं सवनं सम्प्रयच्छन्ति ॥ २५ ॥
Line 1,019: Line 909:
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| verse_type    = mantra
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| verse_line1  = पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यं स वैश्वदेवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं ं स्वारा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यादित्यमथ वैश्वदेवं लो३कद्वारमपा३वा३वार्णू३३ पश्येम त्वा वयं साम्ना ३३३३ हू आ ३म् ३३ ज्या ३यो ३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दतैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनं सम्प्रयच्छन्ति एष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ २६ ॥
| verse_line1  = पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यं स वैश्वदेवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं ं स्वारा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यादित्यमथ वैश्वदेवं लो३कद्वारमपा३वा३वार्णू३३ पश्येम त्वा वयं साम्ना ३३३३ हू आ ३म् ३३ ज्या ३यो ३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दतैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनं सम्प्रयच्छन्ति एष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ २६ ॥
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{{AuthorNote| text = ॥  इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयोऽध्यायः ॥}}
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| verse_id = CHU_C02_V54
| id      = CHU_C02_V54_author-note
| name    = Bhashyam
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॥  इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयोऽध्यायः ॥
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