Chandogya/C5: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 1: | Line 1: | ||
{{Adhyaya | {{Adhyaya | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_num = 5 | | chapter_num = 5 | ||
| title = पञ्चमोऽध्यायः | | title = पञ्चमोऽध्यायः | ||
}} | }} | ||
| Line 10: | Line 8: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥ | | verse_line1 = यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च वेद ज्येष्ठश्च ह वै श्रेष्ठश्च भवति प्राणो वाव ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च ॥ १ ॥ | ||
| Line 20: | Line 16: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥ | | verse_line1 = यो ह वै वसिष्ठं वेद वसिष्ठो ह स्वानां भवति वाग्वाव वसिष्ठः ॥ २ ॥ | ||
| Line 30: | Line 24: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = यो ह वै प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठत्यस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च चक्षुर्वाव प्रतिष्ठा ॥ ३ ॥ | ||
| Line 40: | Line 32: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यो ह वै सम्पदं वेद सर्वं हास्मै कामाः सम्पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव सम्पत् ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = यो ह वै सम्पदं वेद सर्वं हास्मै कामाः सम्पद्यन्ते दैवाश्च मानुषाश्च श्रोत्रं वाव सम्पत् ॥ ४ ॥ | ||
| Line 50: | Line 40: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥ | ||
| Line 73: | Line 61: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ ह प्राणा अहं श्रेयसि व्यूदिरेऽहं श्रेयानस्म्यहं श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = अथ ह प्राणा अहं श्रेयसि व्यूदिरेऽहं श्रेयानस्म्यहं श्रेयानस्मीति ॥ ६ ॥ | ||
| Line 83: | Line 69: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = ते ह प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन् को नः श्रेष्ठ इति तान् होवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदं शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = ते ह प्रजापतिं पितरमेत्योचुर्भगवन् को नः श्रेष्ठ इति तान् होवाच यस्मिन् व उत्क्रान्त इदं शरीरं पापिष्ठतरमिव दृश्येत स वः श्रेष्ठ इति ॥ ७ ॥ | ||
| Line 93: | Line 77: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = सा च वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा अकला अवदन्तो प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तः चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = सा च वागुच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा अकला अवदन्तो प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तः चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह वाक् ॥ ८ ॥ | ||
| Line 103: | Line 85: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा अन्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा अन्धा अपश्यन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह चक्षुः ॥ ९ ॥ | ||
| Line 113: | Line 93: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = श्रोत्रं होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिराः अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥ | | verse_line1 = श्रोत्रं होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बधिराः अशृण्वन्तः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा ध्यायन्तो मनसैवमिति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १० ॥ | ||
| Line 123: | Line 101: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = मनो होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्य पर्येत्योवाच कथमशकतर्ते मज्जीवितुमिति यथा बाला अमनसः प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेणैवमिति प्रविवेश ह मनः ॥ ११ ॥ | ||
| Line 133: | Line 109: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ ह प्राणः उच्चिक्रमिषन् स यथा सुहयः पट्वीशशङ्कून् सङ्खिदेदेवमितरान् प्राणान् समाखिदत् तं ह अभिसमेत्योेचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = अथ ह प्राणः उच्चिक्रमिषन् स यथा सुहयः पट्वीशशङ्कून् सङ्खिदेदेवमितरान् प्राणान् समाखिदत् तं ह अभिसमेत्योेचुर्भगवन्नेधि त्वं नः श्रेष्ठोऽसि मोत्क्रमीरिति ॥ १२ ॥ | ||
| Line 143: | Line 117: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठाऽस्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसीति ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि त्वं तद्वसिष्ठोऽसीत्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं प्रतिष्ठाऽस्मि त्वं तत्प्रतिष्ठोऽसीति ॥ १३ ॥ | ||
| Line 153: | Line 125: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ हैनं श्रोत्रमुवाच यदहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीत्यथ हैनं मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = अथ हैनं श्रोत्रमुवाच यदहं सम्पदस्मि त्वं तत्सम्पदसीत्यथ हैनं मन उवाच यदहमायतनमस्मि त्वं तदायतनमसीति ॥ १४ ॥ | ||
| Line 163: | Line 133: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ १ ॥ | | verse_line1 = न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ १ ॥ | ||
| Line 194: | Line 162: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किञ्चिदिदं आश्वभ्य आ शकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किञ्चनानन्नं भवतीति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किञ्चिदिदं आश्वभ्य आ शकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किञ्चनानन्नं भवतीति ॥ १ ॥ | ||
| Line 216: | Line 182: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चादि्भः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चादि्भः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥ | ||
| Line 239: | Line 203: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तद्धैतत् सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = तद्धैतत् सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥ | ||
| Line 261: | Line 223: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ यदि महज्जिगमिषेदमावास्यायां दीक्षित्वा पौर्णमास्यां रात्रौ सर्वौषधस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = अथ यदि महज्जिगमिषेदमावास्यायां दीक्षित्वा पौर्णमास्यां रात्रौ सर्वौषधस्य मन्थं दधिमधुनोरुपमथ्य ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ॥ ४ ॥ | ||
| Line 271: | Line 231: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् सम्पदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यास्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् सम्पदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यास्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ॥ ५ ॥ | ||
| Line 291: | Line 249: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ प्रतिसृप्याजलौ मन्थमाधाय जपत्यमो नामास्यमा हि ते सर्वमिदं स हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाधिपतिः स मा ज्यैष्ठं श्रैष्ठं राज्यमाधिपत्यं गमयत्यहमेवेदं सर्वमसानीति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = अथ प्रतिसृप्याजलौ मन्थमाधाय जपत्यमो नामास्यमा हि ते सर्वमिदं स हि ज्येष्ठः श्रेष्ठो राजाधिपतिः स मा ज्यैष्ठं श्रैष्ठं राज्यमाधिपत्यं गमयत्यहमेवेदं सर्वमसानीति ॥ ६ ॥ | ||
| Line 301: | Line 257: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति तत्सवितुर्वृणीमह इत्याचामति वयं देवस्य भोजनमित्याचामति श्रेष्ठं सर्वधातममित्याचामति तुरं भगस्य धीमहीति सर्वं पिबति निर्णिज्य कंसं चमसं वा पश्चादग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः स यदि स्त्रियं पश्येत् समृद्धं कर्मेति विद्यात् ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = अथ खल्वेतयर्चा पच्छ आचामति तत्सवितुर्वृणीमह इत्याचामति वयं देवस्य भोजनमित्याचामति श्रेष्ठं सर्वधातममित्याचामति तुरं भगस्य धीमहीति सर्वं पिबति निर्णिज्य कंसं चमसं वा पश्चादग्नेः संविशति चर्मणि वा स्थण्डिले वा वाचंयमोऽप्रसाहः स यदि स्त्रियं पश्येत् समृद्धं कर्मेति विद्यात् ॥ ७ ॥ | ||
| Line 311: | Line 265: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तदेष श्लोकः– | | verse_line1 = तदेष श्लोकः– | ||
| Line 321: | Line 273: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति । समृदि्धं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने तस्मिन् स्वप्न निदर्शन इति ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति । समृदि्धं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने तस्मिन् स्वप्न निदर्शन इति ॥ ८ ॥ | ||
| Line 342: | Line 292: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = श्वेतकेतुर्ह आरुणेयः पञ्चालानां समितिमेयाय तं ह प्रवाहणो जैबलिरुवाच कुमारानु त्वाऽशिषत् पितेत्यनु हि भगव इति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = श्वेतकेतुर्ह आरुणेयः पञ्चालानां समितिमेयाय तं ह प्रवाहणो जैबलिरुवाच कुमारानु त्वाऽशिषत् पितेत्यनु हि भगव इति ॥ १ ॥ | ||
| Line 352: | Line 300: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति न भगव इति । वेत्थ यथा पुनरावर्तन्ता३ इति न भगव इति वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति न भगव इति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = वेत्थ यदितोऽधि प्रजाः प्रयन्तीति न भगव इति । वेत्थ यथा पुनरावर्तन्ता३ इति न भगव इति वेत्थ पथोर्देवयानस्य पितृयाणस्य च व्यावर्तना ३ इति न भगव इति ॥ २ ॥ | ||
| Line 362: | Line 308: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = वेत्थ यथाऽसौ लोको न सम्पूर्यता३ इति न भगव इति वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति इति नैव भगव इति ॥३॥ | | verse_line1 = वेत्थ यथाऽसौ लोको न सम्पूर्यता३ इति न भगव इति वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति इति नैव भगव इति ॥३॥ | ||
| Line 372: | Line 316: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ नु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात् कथं सोऽनुशिष्टो ब्रवीतेति स हाऽऽयस्तः पितुरर्धमेयाय तं होवाचाननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाऽशिषमिति ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = अथ नु किमनुशिष्टोऽवोचथा यो हीमानि न विद्यात् कथं सोऽनुशिष्टो ब्रवीतेति स हाऽऽयस्तः पितुरर्धमेयाय तं होवाचाननुशिष्य वाव किल मा भगवानब्रवीदनु त्वाऽशिषमिति ॥ ४ ॥ | ||
| Line 382: | Line 324: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत् तेषां नैकञ्च नाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं ततैतानवदो यथाऽहमेषां नैकञ्च न वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = पञ्च मा राजन्यबन्धुः प्रश्नानप्राक्षीत् तेषां नैकञ्च नाशकं विवक्तुमिति स होवाच यथा मा त्वं ततैतानवदो यथाऽहमेषां नैकञ्च न वेद यद्यहमिमानवेदिष्यं कथं ते नावक्ष्यमिति ॥ ५ ॥ | ||
| Line 392: | Line 332: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हाञ्चकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तं होवाच मानुषस्य भगवान् गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति स होवाच तवैव राजन् मानुषं वित्तं यामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तामेव मे ब्रूहीति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = स ह गौतमो राज्ञोऽर्धमेयाय तस्मै ह प्राप्तायार्हाञ्चकार स ह प्रातः सभाग उदेयाय तं होवाच मानुषस्य भगवान् गौतम वित्तस्य वरं वृणीथा इति स होवाच तवैव राजन् मानुषं वित्तं यामेव कुमारस्यान्ते वाचमभाषथास्तामेव मे ब्रूहीति ॥ ६ ॥ | ||
| Line 402: | Line 340: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स ह कृच्छ्री बभूव तं ह चिरं वसेत्याज्ञापयाञ्चकार तं होवाच यथा मा त्वं गौतमावदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान् गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ॥ ७ ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = स ह कृच्छ्री बभूव तं ह चिरं वसेत्याज्ञापयाञ्चकार तं होवाच यथा मा त्वं गौतमावदो यथेयं न प्राक् त्वत्तः पुरा विद्या ब्राह्मणान् गच्छति तस्मादु सर्वेषु लोकेषु क्षत्रस्यैव प्रशासनमभूदिति तस्मै होवाच ॥ ७ ॥ ३ ॥ | ||
| Line 412: | Line 348: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = असौ वाव लोको गौतमाग्निः तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिः चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | | verse_line1 = असौ वाव लोको गौतमाग्निः तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिः चन्द्रमा अङ्गारा नक्षत्राणि विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | ||
| Line 422: | Line 356: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा सम्भवति ॥ २ ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुतेः सोमो राजा सम्भवति ॥ २ ॥ ४ ॥ | ||
| Line 432: | Line 364: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = पर्जन्यो वा गौतमाग्निः तस्य वायुरेव समिदभं्र धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादुनयो विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | | verse_line1 = पर्जन्यो वा गौतमाग्निः तस्य वायुरेव समिदभं्र धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादुनयो विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | ||
| Line 442: | Line 372: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुतेः वर्षः सम्भवति ॥ २ ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमं राजानं जुह्वति तस्या आहुतेः वर्षः सम्भवति ॥ २ ॥ ५ ॥ | ||
| Line 452: | Line 380: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = पृथिवी वाव गौतमाग्निः तस्य संवत्सर एव समित् आकाशो धूमो रात्रिरर्चिर्दिशो अङ्गारा अवान्तरदिशो विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | | verse_line1 = पृथिवी वाव गौतमाग्निः तस्य संवत्सर एव समित् आकाशो धूमो रात्रिरर्चिर्दिशो अङ्गारा अवान्तरदिशो विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | ||
| Line 462: | Line 388: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्षं जुह्वति तस्या आहुतेः अन्नं सम्भवति ॥ २ ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्षं जुह्वति तस्या आहुतेः अन्नं सम्भवति ॥ २ ॥ ६ ॥ | ||
| Line 472: | Line 396: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = पुरुषो वाव गौतमाग्निः तस्य वागेव समित् प्राणो धूमो जिह्वाऽर्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | | verse_line1 = पुरुषो वाव गौतमाग्निः तस्य वागेव समित् प्राणो धूमो जिह्वाऽर्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | ||
| Line 482: | Line 404: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुतेः रेतः सम्भवति ॥ २ ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुतेः रेतः सम्भवति ॥ २ ॥ ७ ॥ | ||
| Line 492: | Line 412: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = योषा वाव गौतमाग्निः तस्या उपस्थ एव समित् । यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | | verse_line1 = योषा वाव गौतमाग्निः तस्या उपस्थ एव समित् । यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विष्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥ | ||
| Line 502: | Line 420: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुतेः गर्भः सम्भवति ॥ २ ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुह्वति तस्या आहुतेः गर्भः सम्भवति ॥ २ ॥ ८ ॥ | ||
| Line 512: | Line 428: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा मासानन्तः शयित्वा यावद्वाथ जायते ॥ १ ॥ | | verse_line1 = इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्तीति स उल्बावृतो गर्भो दश वा मासानन्तः शयित्वा यावद्वाथ जायते ॥ १ ॥ | ||
| Line 522: | Line 436: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स जातो यावदायुषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः सम्भूतो भवति ॥ २ ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = स जातो यावदायुषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः सम्भूतो भवति ॥ २ ॥ ९ ॥ | ||
| Line 562: | Line 474: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तद्य इत्थं विदुर्ये चेमे अरण्ये श्रद्धा तप इत्युुपासते तेऽर्चिषमभिसम्भवन्ति अर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षात् यान् षडुुदङ्ग् एति मासां स्तान् ॥ १ ॥ | | verse_line1 = तद्य इत्थं विदुर्ये चेमे अरण्ये श्रद्धा तप इत्युुपासते तेऽर्चिषमभिसम्भवन्ति अर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षात् यान् षडुुदङ्ग् एति मासां स्तान् ॥ १ ॥ | ||
| Line 572: | Line 482: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यं आदित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो मानवः स एतान् ब्रह्म गमयति एष देवयानः पन्था इति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यं आदित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो मानवः स एतान् ब्रह्म गमयति एष देवयानः पन्था इति ॥ २ ॥ | ||
| Line 582: | Line 490: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ य इमे ग्रम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसम्भवन्ति धूमात् रात्रिं रात्रे परपक्षपक्षमपरपक्षाद्यान् षड् दक्षिणैति मासां स्तान्नैते संवत्सरमभिप्राप्नुवन्ति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = अथ य इमे ग्रम इष्टापूर्ते दत्तमित्युपासते ते धूममभिसम्भवन्ति धूमात् रात्रिं रात्रे परपक्षपक्षमपरपक्षाद्यान् षड् दक्षिणैति मासां स्तान्नैते संवत्सरमभिप्राप्नुवन्ति ॥ ३ ॥ | ||
| Line 592: | Line 498: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमसमेष सोमो राजा तद्देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमसमेष सोमो राजा तद्देवानामन्नं तं देवा भक्षयन्ति ॥ ४ ॥ | ||
| Line 602: | Line 506: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तस्मिन् यावत् सम्पातमुषित्वाऽथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतमाकाशं आकाशाद्वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = तस्मिन् यावत् सम्पातमुषित्वाऽथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्तन्ते यथेतमाकाशं आकाशाद्वायुर्भूत्वा धूमो भवति धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति ॥ ५ ॥ | ||
| Line 612: | Line 514: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्ते । ततो वै खलु दुर्निष्प्रपतनं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्ते । ततो वै खलु दुर्निष्प्रपतनं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥ | ||
| Line 632: | Line 532: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाऽथ य इह कपूरचरणाः अभ्याशो ह एते कपूयां योनिमापद्येरञ्च्छ्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिययोनिं वा वैश्ययोनिं वाऽथ य इह कपूरचरणाः अभ्याशो ह एते कपूयां योनिमापद्येरञ्च्छ्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चण्डालयोनिं वा ॥ ७ ॥ | ||
| Line 642: | Line 540: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथैतयोः पथोर्नैकतरेण च न तानीमानि क्षुद्रमिश्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत् तृतीयं स्थानं तेनासौ लोको न सम्पूर्यते तस्माज्जुगुप्सेत तदेषश्लोकः ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = अथैतयोः पथोर्नैकतरेण च न तानीमानि क्षुद्रमिश्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत् तृतीयं स्थानं तेनासौ लोको न सम्पूर्यते तस्माज्जुगुप्सेत तदेषश्लोकः ॥ ८ ॥ | ||
| Line 652: | Line 548: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन् ब्रह्महा च । एते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरंस्तु तैरिति ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्च गुरोस्तल्पमावसन् ब्रह्महा च । एते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरंस्तु तैरिति ॥ ९ ॥ | ||
| Line 662: | Line 556: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन् वेद न स ह तैरप्याचरन् पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यश्लोको भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ १० ॥ ३१० ॥ | | verse_line1 = अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन् वेद न स ह तैरप्याचरन् पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यश्लोको भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ १० ॥ ३१० ॥ | ||
| Line 684: | Line 576: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसाञ्चक्रुः को न आत्मा किं तद्ब्रह्मेति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसाञ्चक्रुः को न आत्मा किं तद्ब्रह्मेति ॥ १ ॥ | ||
| Line 704: | Line 594: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = ते ह सम्पादयाञ्चक्रुरुद्दालको वै भगवन्तोऽयमारुणिः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तं हन्ताभ्यागच्छामेति तं हाभ्याजग्मुः ॥ २ ॥ | | verse_line1 = ते ह सम्पादयाञ्चक्रुरुद्दालको वै भगवन्तोऽयमारुणिः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तं हन्ताभ्यागच्छामेति तं हाभ्याजग्मुः ॥ २ ॥ | ||
| Line 714: | Line 602: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स ह सम्पादयाञ्चकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो न सर्वमिव प्रतिपत्स्ये हन्ताहमन्यमभ्यनुशासानीति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = स ह सम्पादयाञ्चकार प्रक्ष्यन्ति मामिमे महाशाला महाश्रोत्रियास्तेभ्यो न सर्वमिव प्रतिपत्स्ये हन्ताहमन्यमभ्यनुशासानीति ॥ ३ ॥ | ||
| Line 724: | Line 610: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तान् होवाचाश्वपतिर्वै भगवन्तोऽयं कैकेयः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तं हन्ताभ्यागच्छामेति तं हाभ्याजग्मुः ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = तान् होवाचाश्वपतिर्वै भगवन्तोऽयं कैकेयः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानरमध्येति तं हन्ताभ्यागच्छामेति तं हाभ्याजग्मुः ॥ ४ ॥ | ||
| Line 734: | Line 618: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयाञ्चकार स ह प्रातः संिजहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपो नानाहिताग्निर्नाविद्वान् न स्वैरी स्वैरिणी कुतो यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद्भगवद्भ्यो दास्यामि वसन्तु भगवन्त इति ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = तेभ्यो ह प्राप्तेभ्यः पृथगर्हाणि कारयाञ्चकार स ह प्रातः संिजहान उवाच न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपो नानाहिताग्निर्नाविद्वान् न स्वैरी स्वैरिणी कुतो यक्ष्यमाणो वै भगवन्तोऽहमस्मि यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद्भगवद्भ्यो दास्यामि वसन्तु भगवन्त इति ॥ ५ ॥ | ||
| Line 744: | Line 626: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत् तंहैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानरं सम्प्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहीति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = ते होचुर्येन हैवार्थेन पुरुषश्चरेत् तंहैव वदेदात्मानमेवेमं वैश्वानरं सम्प्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहीति ॥ ६ ॥ | ||
| Line 754: | Line 634: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तान् होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्तास्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्ने प्रतिचक्रमिरे तान् हानुपनीयैवैतदुवाच ॥ ७ ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = तान् होवाच प्रातर्वः प्रतिवक्तास्मीति ते ह समित्पाणयः पूर्वाह्ने प्रतिचक्रमिरे तान् हानुपनीयैवैतदुवाच ॥ ७ ॥ ११ ॥ | ||
| Line 764: | Line 642: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥ १ ॥ | | verse_line1 = औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्स इति दिवमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै सुतेजा आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् तव सुतं प्रसुतमासुतं कुले दृश्यते ॥ १ ॥ | ||
| Line 774: | Line 650: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १२ ॥ | ||
| Line 794: | Line 668: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुषिं प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ होवाच सत्ययज्ञं पौलुषिं प्राचीनयोग्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यादित्यमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै विश्वरूप आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् तव बहु विश्वरूपं कुले दृश्यते ॥ १ ॥ | ||
| Line 804: | Line 676: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्ट्वेतदात्मन इति होवाचान्धोऽभविष्यो यद्यन्मां नागमिष्यतः इति ॥ २ ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्ट्वेतदात्मन इति होवाचान्धोऽभविष्यो यद्यन्मां नागमिष्यतः इति ॥ २ ॥ १३ ॥ | ||
| Line 825: | Line 695: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै पृथग्वर्त्माऽऽत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वां पृथग्वलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ होवाचेन्द्रद्युम्नं भाल्लवेयं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इति वायुमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै पृथग्वर्त्माऽऽत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वां पृथग्वलय आयन्ति पृथग्रथश्रेणयोऽनुयन्ति ॥ १ ॥ | ||
| Line 835: | Line 703: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १४ ॥ | ||
| Line 856: | Line 722: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ होवाच जनं शार्कराक्ष्यं शार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै बहुलं आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ होवाच जनं शार्कराक्ष्यं शार्कराक्ष्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्याकाशमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै बहुलं आत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं बहुलोऽसि प्रजया च धनेन च ॥ १ ॥ | ||
| Line 866: | Line 730: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते सन्दोहस्त्वेष आत्मन इति होवाच सन्दोहस्त व्यशीर्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते सन्दोहस्त्वेष आत्मन इति होवाच सन्दोहस्त व्यशीर्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १५ ॥ | ||
| Line 886: | Line 748: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं रयिमान् पुष्टिमानसि ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ होवाच बुडिलमाश्वतराश्विं वैयाघ्रपद्य कं त्वमात्मानमुपास्स इत्यप एव भगवो राजन्निति होवाचैष वै रयिरात्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं रयिमान् पुष्टिमानसि ॥ १ ॥ | ||
| Line 896: | Line 756: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेनमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते बस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेनमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते बस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १६ ॥ | ||
| Line 916: | Line 774: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम कं त्वमात्मानमुपास्स इति पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै प्रतिष्ठाऽऽत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ होवाचोद्दालकमारुणिं गौतम कं त्वमात्मानमुपास्स इति पृथिवीमेव भगवो राजन्निति होवाचैष वै प्रतिष्ठाऽऽत्मा वैश्वानरो यं त्वमात्मानमुपास्से तस्मात् त्वं प्रतिष्ठितोऽसि प्रजया च पशुभिश्च ॥ १ ॥ | ||
| Line 926: | Line 782: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १७ ॥ | ||
| Line 948: | Line 802: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तान् होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वांसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = तान् होवाचैते वै खलु यूयं पृथगिवेममात्मानं वैश्वानरं विद्वांसोऽन्नमत्थ यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मस्वन्नमत्ति ॥ १ ॥ | ||
| Line 958: | Line 810: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धेव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्मात्मा सन्दोहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिः हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥ २ ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = तस्य ह वा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धेव सुतेजाश्चक्षुर्विश्वरूपः प्राणः पृथग्वर्मात्मा सन्दोहो बहुलो बस्तिरेव रयिः पृथिव्येव पादावुर एव वेदिर्लोमानि बर्हिः हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यपचन आस्यमाहवनीयः ॥ २ ॥ १८ ॥ | ||
| Line 968: | Line 818: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत् तद्धोमीयं स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात् तां जुहुयात् प्राणाय स्वाहेति प्राणः तृप्यति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = तद्यद्भक्तं प्रथममागच्छेत् तद्धोमीयं स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात् तां जुहुयात् प्राणाय स्वाहेति प्राणः तृप्यति ॥ १ ॥ | ||
| Line 978: | Line 826: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यति आदित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किञ्च द्यौश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यति आदित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किञ्च द्यौश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ १९ ॥ | ||
| Line 998: | Line 844: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ यां द्वितीयां जुहुयात् तां जुहुयाद् व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ यां द्वितीयां जुहुयात् तां जुहुयाद् व्यानाय स्वाहेति व्यानस्तृप्यति ॥ १ ॥ | ||
| Line 1,008: | Line 852: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किञ्च दिशश्चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २० ॥ | | verse_line1 = व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किञ्च दिशश्चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २० ॥ | ||
| Line 1,028: | Line 870: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ यां तृतीयां जुहुयात् तां जुहुयादपानाय स्वाहेति अपानस्तृप्यति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ यां तृतीयां जुहुयात् तां जुहुयादपानाय स्वाहेति अपानस्तृप्यति ॥ १ ॥ | ||
| Line 1,038: | Line 878: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अपाने तृप्यति वाक् तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यां अग्निस्तृप्यति अग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किञ्च पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २१ ॥ | | verse_line1 = अपाने तृप्यति वाक् तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यां अग्निस्तृप्यति अग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किञ्च पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २१ ॥ | ||
| Line 1,058: | Line 896: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ यां चतुर्थीं जुहुयात् तां जुहुयात् समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ यां चतुर्थीं जुहुयात् तां जुहुयात् समानाय स्वाहेति समानस्तृप्यति ॥ १ ॥ | ||
| Line 1,068: | Line 904: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत् तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किञ्च विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतः तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २२ ॥ | | verse_line1 = समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत् तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किञ्च विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतः तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २२ ॥ | ||
| Line 1,088: | Line 922: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ यां पञ्चमीं जुहुयात् तां जुहुयादुदानाय स्वाहेति उदानस्तृप्यति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ यां पञ्चमीं जुहुयात् तां जुहुयादुदानाय स्वाहेति उदानस्तृप्यति ॥ १ ॥ | ||
| Line 1,098: | Line 930: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = उदाने तृप्यति वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यति आकाशस्तृप्यति आकाशे तृप्यति यत्किञ्च वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतः तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २३ ॥ | | verse_line1 = उदाने तृप्यति वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यति आकाशस्तृप्यति आकाशे तृप्यति यत्किञ्च वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतः तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २३ ॥ | ||
| Line 1,129: | Line 959: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति यथाङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात् तादृक् तत् स्यात् ॥ १ ॥ | | verse_line1 = स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति यथाङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात् तादृक् तत् स्यात् ॥ १ ॥ | ||
| Line 1,139: | Line 967: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वात्मसु हुतं भवति ॥ २ ॥ | ||
| Line 1,149: | Line 975: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मनः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मनः प्रदूयन्ते य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति ॥ ३ ॥ | ||
| Line 1,159: | Line 983: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरो हुतं स्यादिति तदेष श्लोकः ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = तस्मादु हैवंविद्यद्यपि चण्डालायोच्छिष्टं प्रयच्छेदात्मनि हैवास्य तद्वैश्वानरो हुतं स्यादिति तदेष श्लोकः ॥ ४ ॥ | ||
| Line 1,169: | Line 991: | ||
| document_id = CHU | | document_id = CHU | ||
| chapter_id = CHU_C05 | | chapter_id = CHU_C05 | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते । एवं सर्वाणि भूतान्याग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत ॥ इति ॥ ५ ॥ ११२४ ॥ ॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमोऽध्यायः ॥ | | verse_line1 = यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते । एवं सर्वाणि भूतान्याग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत ॥ इति ॥ ५ ॥ ११२४ ॥ ॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमोऽध्यायः ॥ | ||