Bhagavatatatparyanirnaya/C5/S6: Difference between revisions
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| title = षष्ठोऽध्यायः | | title = षष्ठोऽध्यायः | ||
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| verse_id = BTN_C05_S06_V01 | | verse_id = BTN_C05_S06_V01 | ||
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| verse_line2 = न नूनं भगवन्नात्मरामाणां योगसमीरितज्ञानावभर्जितकर्मबीजा-नामैश्वर्याणि पुनः क्लेशदानि | | verse_line2 = न नूनं भगवन्नात्मरामाणां योगसमीरितज्ञानावभर्जितकर्मबीजा-नामैश्वर्याणि पुनः क्लेशदानि | ||
| verse_line3 = भवितुमर्हन्ति यदृच्छयोपगतानि॥ १ ॥ | | verse_line3 = भवितुमर्हन्ति यदृच्छयोपगतानि॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = कामो मन्युर्मदो लोभः शोकमोहभयादयः । | | verse_line1 = कामो मन्युर्मदो लोभः शोकमोहभयादयः । | ||
| verse_line2 = कर्मबन्धश्च यन्मूलः स्वीकुर्यात्को नु तद्बुधः ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = कर्मबन्धश्च यन्मूलः स्वीकुर्यात्को नु तद्बुधः ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line2 = साम्परायविधिमनुशिक्ष-यन्स्वकलेवरं | | verse_line2 = साम्परायविधिमनुशिक्ष-यन्स्वकलेवरं | ||
| verse_line3 = जिहासुरात्मन्यात्मानमसंव्यवहितमनर्थान्तरभावे-नान्वीक्षमाण उपरतानुवृत्तिरुपरराम ॥ ६ ॥ | | verse_line3 = जिहासुरात्मन्यात्मानमसंव्यवहितमनर्थान्तरभावे-नान्वीक्षमाण उपरतानुवृत्तिरुपरराम ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमाया-वसानो देह इमां जगतीमभिमानाभासेन चङ्क्रममाणः ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = तस्य ह वा एवं मुक्तलिङ्गस्य भगवत ऋषभस्य योगमाया-वसानो देह इमां जगतीमभिमानाभासेन चङ्क्रममाणः ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = तैरपि ह्यर्वाक्तनया निजलोकयात्रयाऽन्धपरम्परया त एवा-नाश्वस्थास्तमस्यन्धे स्वयमेव प्रपतिष्यन्ति ॥ १२ ॥ | ||
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| Line 156: | Line 159: | ||
| verse_line3 = गायन्ति यत्रत्यजना मुरारेः | | verse_line3 = गायन्ति यत्रत्यजना मुरारेः | ||
| verse_line4 = कर्माणि भद्राण्यवतारवन्ति ॥ १४ ॥ | | verse_line4 = कर्माणि भद्राण्यवतारवन्ति ॥ १४ ॥ | ||
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| Line 176: | Line 180: | ||
| verse_line3 = यद्योगमायां स्पृहयन्त्व्युदस्तां | | verse_line3 = यद्योगमायां स्पृहयन्त्व्युदस्तां | ||
| verse_line4 = महत्तमा येन कृतप्रयत्नाः ॥ १६ ॥ | | verse_line4 = महत्तमा येन कृतप्रयत्नाः ॥ १६ ॥ | ||
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| Line 193: | Line 198: | ||
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| verse_line1 = यस्यामेव कवय आत्मानमविरतविविधवृजिनसंसारपरितापोप-तप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्या ह्यापवर्गिक-मात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नैवाद्रियन्ते भागव-तत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = यस्यामेव कवय आत्मानमविरतविविधवृजिनसंसारपरितापोप-तप्यमानमनुसवनं स्नापयन्तस्तयैव परया निर्वृत्या ह्यापवर्गिक-मात्यन्तिकं परमपुरुषार्थमपि स्वयमासादितं नैवाद्रियन्ते भागव-तत्वेनैव परिसमाप्तसर्वार्थाः ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 213: | Line 219: | ||
| verse_line3 = अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजतां मुकुन्दो | | verse_line3 = अस्त्वेवमङ्ग भगवान् भजतां मुकुन्दो | ||
| verse_line4 = मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम् ॥ १९ ॥ | | verse_line4 = मुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्तियोगम् ॥ १९ ॥ | ||
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