Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S4: Difference between revisions
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| title = चतुर्थोऽध्यायः | | title = चतुर्थोऽध्यायः | ||
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| verse_line1 = भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टैः पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन् । | | verse_line1 = भूतैर्यदा पञ्चभिरात्मसृष्टैः पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन् । | ||
| verse_line2 = स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधानमवाप नारायण आदिदेवः ॥३॥ | | verse_line2 = स्वांशेन विष्टः पुरुषाभिधानमवाप नारायण आदिदेवः ॥३॥ | ||
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| verse_line1 = यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि । ज्ञानांशकेन विशतो बलमोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशो यस्येन्द्रियैस्तनुभृतामुभयेन्द्रियाणि । ज्ञानांशकेन विशतो बलमोज ईहा सत्त्वादिभिः स्थितिलयोद्भव आदिकर्ता ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = आदावभूच्छतधृती रजसाऽस्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः । रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = आदावभूच्छतधृती रजसाऽस्य सर्गे विष्णुः स्थितौ क्रतुपतिर्द्विजधर्मसेतुः । रुद्रोऽप्ययाय तमसा पुरुषः स आद्य इत्युद्भवस्थितिलयाः सततं प्रजासु ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार योगं योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनि स्वमूर्त्या नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार योगं योऽद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताङ्घ्रिः ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = इन्द्रोऽपि नाक्यसुखमेष जिघृक्षतीति कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम् । गत्वाऽप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः स्त्रीप््रोक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = इन्द्रोऽपि नाक्यसुखमेष जिघृक्षतीति कामं न्ययुङ्क्त सगणं स बदर्युपाख्यम् । गत्वाऽप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातैः स्त्रीप््रोक्षणेषुभिरविध्यदतन्महिज्ञः ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = त्वां सुन्वतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः कस्तान् विलंघ्य व््राजतात् परमं पदं ते । नान्यस्य बर्हिषि बलिं ददतः स्वभागं धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्धि्न ॥ १० ॥ | | verse_line1 = त्वां सुन्वतां सुरकृता बहवोऽन्तरायाः कस्तान् विलंघ्य व््राजतात् परमं पदं ते । नान्यस्य बर्हिषि बलिं ददतः स्वभागं धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्धि्न ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः । विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्ण- स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगं दत्तः कुमार ऋषभो भगवान् पिता नः । विष्णुः शिवाय जगतां कलयाऽवतीर्ण- स्तेनाहृता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥ १७ ॥ | ||
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| verse_line1 = संस्तुन्वतोऽब्धिपतितांच्छ्रमणान् ऋषींश्च शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम् । देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = संस्तुन्वतोऽब्धिपतितांच्छ्रमणान् ऋषींश्च शक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम् । देवस्त्रियोऽसुरगृहे पिहिता अनाथा जघ्नेऽसुरेन्द्रमभयाय सतां नृसिंहे ॥ १९ ॥ | ||
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| verse_line1 = देवासुरे युधि स दैत्यपतीन् सुरार्थे हत्वाऽन्तरेषु भवनान्यदधात् कलाभिः । भूत्वाऽथ वामन इमामहरद् बलेः क्ष्मां याञ्चाछलेन समदाददितेः सुतेभ्यः ॥ २० ॥ | | verse_line1 = देवासुरे युधि स दैत्यपतीन् सुरार्थे हत्वाऽन्तरेषु भवनान्यदधात् कलाभिः । भूत्वाऽथ वामन इमामहरद् बलेः क्ष्मां याञ्चाछलेन समदाददितेः सुतेभ्यः ॥ २० ॥ | ||
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