Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S11: Difference between revisions
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| title = एकादशोऽध्यायः | | title = एकादशोऽध्यायः | ||
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| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– बद्धो मुक्त इति ह्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः । गुणस्य मायामूलत्वान्न मे बन्धो न मोक्षणम् ॥ १ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– बद्धो मुक्त इति ह्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः । गुणस्य मायामूलत्वान्न मे बन्धो न मोक्षणम् ॥ १ ॥ | ||
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| Line 30: | Line 29: | ||
| verse_line1 = शोकमोहौ सुखं दुःखं देहापत्तिश्च मायया । | | verse_line1 = शोकमोहौ सुखं दुःखं देहापत्तिश्च मायया । | ||
| verse_line2 = स्वप्ने यथाऽऽत्मनः ख्यातिः संसृतिर्नतु वास्तवी ॥ २ ॥ | | verse_line2 = स्वप्ने यथाऽऽत्मनः ख्यातिः संसृतिर्नतु वास्तवी ॥ २ ॥ | ||
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| Line 48: | Line 48: | ||
| verse_line1 = विद्याविद्ये मम तनू विद्ध्युद्धव शरीरिणाम् । | | verse_line1 = विद्याविद्ये मम तनू विद्ध्युद्धव शरीरिणाम् । | ||
| verse_line2 = मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 66: | Line 67: | ||
| verse_line1 = एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैवं महामते । | | verse_line1 = एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैवं महामते । | ||
| verse_line2 = बन्धोऽस्याविद्ययाऽनादिर्विद्यया च तथेतरः ॥ ४ ॥ | | verse_line2 = बन्धोऽस्याविद्ययाऽनादिर्विद्यया च तथेतरः ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 84: | Line 86: | ||
| verse_line1 = अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते । | | verse_line1 = अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते । | ||
| verse_line2 = विरुद्धधर्मिणोस्तात स्थितयोरेकधर्मिणि ॥ ५ ॥ | | verse_line2 = विरुद्धधर्मिणोस्तात स्थितयोरेकधर्मिणि ॥ ५ ॥ | ||
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| verse_line1 = सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ यदृच्छया कृतनीडौ च वृक्षे । एकस्तयोः खादति पिप्पलान्न- मन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = सुपर्णावेतौ सदृशौ सखायौ यदृच्छया कृतनीडौ च वृक्षे । एकस्तयोः खादति पिप्पलान्न- मन्यो निरन्नोऽपि बलेन भूयान् ॥ ६ ॥ | ||
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| Line 118: | Line 122: | ||
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| verse_line1 = आत्मानमन्यं च स वेद विद्वा- नपिप्पलादो न तु पिप्पलादः । योऽविद्ययाऽन्धः स तु नित्यबद्धो विद्यामयो यः स तु नित्यमुक्तः ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = आत्मानमन्यं च स वेद विद्वा- नपिप्पलादो न तु पिप्पलादः । योऽविद्ययाऽन्धः स तु नित्यबद्धो विद्यामयो यः स तु नित्यमुक्तः ॥ ७ ॥ | ||
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| Line 136: | Line 141: | ||
| verse_line1 = देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद् यथोत्थितः । | | verse_line1 = देहस्थोऽपि न देहस्थो विद्वान् स्वप्नाद् यथोत्थितः । | ||
| verse_line2 = ओहस्थोऽपि देहस्थः कुमतिः स्वप्नदृग् यथा ॥ ८ ॥ | | verse_line2 = ओहस्थोऽपि देहस्थः कुमतिः स्वप्नदृग् यथा ॥ ८ ॥ | ||
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| Line 154: | Line 160: | ||
| verse_line1 = इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु गुणैरपि गुणेषु च । | | verse_line1 = इन्द्रियैरिन्द्रियार्थेषु गुणैरपि गुणेषु च । | ||
| verse_line2 = गृह्यमाणेष्वहंकुर्यान्न विद्वान् यस्त्वविक्रियः ॥ ९ ॥ | | verse_line2 = गृह्यमाणेष्वहंकुर्यान्न विद्वान् यस्त्वविक्रियः ॥ ९ ॥ | ||
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| Line 172: | Line 179: | ||
| verse_line1 = दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा । | | verse_line1 = दैवाधीने शरीरेऽस्मिन् गुणभाव्येन कर्मणा । | ||
| verse_line2 = वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्ताऽस्मीति निबध्यते ॥ १० ॥ | | verse_line2 = वर्तमानोऽबुधस्तत्र कर्ताऽस्मीति निबध्यते ॥ १० ॥ | ||
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| Line 199: | Line 207: | ||
| verse_line1 = न तथा बध्यते विद्वान् तत्र तत्राददन् गुणान् । | | verse_line1 = न तथा बध्यते विद्वान् तत्र तत्राददन् गुणान् । | ||
| verse_line2 = प्रकृतिस्थोऽप्यसंसक्तो यथा खं सविताऽनिलः ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = प्रकृतिस्थोऽप्यसंसक्तो यथा खं सविताऽनिलः ॥ १२ ॥ | ||
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| Line 217: | Line 226: | ||
| verse_line1 = वैशारद्येक्षयाऽसङ्गशितया च्छिन्नसंशयः । | | verse_line1 = वैशारद्येक्षयाऽसङ्गशितया च्छिन्नसंशयः । | ||
| verse_line2 = प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्नानात्वाद् विनिवर्तते ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्नानात्वाद् विनिवर्तते ॥ १३ ॥ | ||
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| Line 243: | Line 253: | ||
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| verse_line1 = न कुर्यान्न वदेत् किञ्चिन्न ध्यायेत् साध्वसाधु वा । आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = न कुर्यान्न वदेत् किञ्चिन्न ध्यायेत् साध्वसाधु वा । आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 261: | Line 272: | ||
| verse_line1 = शब्दब््राह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि । | | verse_line1 = शब्दब््राह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि । | ||
| verse_line2 = श्रमस्तत्र भ््रामफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = श्रमस्तत्र भ््रामफलो ह्यधेनुमिव रक्षतः ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 286: | Line 298: | ||
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| verse_line1 = यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवत्राणनिरोधमस्य । लीलावतारेहितकर्म वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ॥ २० ॥ | | verse_line1 = यस्यां न मे पावनमङ्ग कर्म स्थित्युद्भवत्राणनिरोधमस्य । लीलावतारेहितकर्म वा स्याद् वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ॥ २० ॥ | ||
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| Line 304: | Line 317: | ||
| verse_line1 = एवं जिज्ञासयाऽपोह्य नानात्वभ््राममात्मनि । | | verse_line1 = एवं जिज्ञासयाऽपोह्य नानात्वभ््राममात्मनि । | ||
| verse_line2 = उपारमेत विरजं मनो मय्यर्प्य सर्वगे ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = उपारमेत विरजं मनो मय्यर्प्य सर्वगे ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 322: | Line 336: | ||
| verse_line1 = त्वं ब््राह्म परमं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः । | | verse_line1 = त्वं ब््राह्म परमं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः । | ||
| verse_line2 = अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः ॥ २८ ॥ | | verse_line2 = अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः ॥ २८ ॥ | ||
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| Line 340: | Line 355: | ||
| verse_line1 = ज्ञात्वा ज्ञात्वाऽथ ये वै मां यावान् यश्चास्मि यादृशः । | | verse_line1 = ज्ञात्वा ज्ञात्वाऽथ ये वै मां यावान् यश्चास्मि यादृशः । | ||
| verse_line2 = भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मताः ॥ ३३ ॥ | | verse_line2 = भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मताः ॥ ३३ ॥ | ||
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| Line 358: | Line 374: | ||
| verse_line1 = वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया । | | verse_line1 = वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया । | ||
| verse_line2 = वायौ मुख्यधिया तोये द्रव्यैस्तोयपुरस्कृतैः ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = वायौ मुख्यधिया तोये द्रव्यैस्तोयपुरस्कृतैः ॥ ४४ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
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| Line 376: | Line 393: | ||
| verse_line1 = स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि । | | verse_line1 = स्थण्डिले मन्त्रहृदयैर्भोगैरात्मानमात्मनि । | ||
| verse_line2 = क्षेत्रज्ञं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम् ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = क्षेत्रज्ञं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम् ॥ ४५ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
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