Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S19: Difference between revisions
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| title = एकोनविंशोऽध्यायः | | title = एकोनविंशोऽध्यायः | ||
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| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– यो विद्याश्रुतसम्पन्न आत्मवानानुमानिकः । मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि सन्न्यसेत् ॥ १ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– यो विद्याश्रुतसम्पन्न आत्मवानानुमानिकः । मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि सन्न्यसेत् ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = त्वय्युद्धवाऽश्रयति यस्त्रिविधो विकारो मायाऽन्तराऽऽपतति नाद्यपवर्गयोर्यत् । जन्मादयोऽस्य वद मां तव तस्य किं स्यु- राद्यन्तयोर्यदसतोऽस्ति तदेव मध्ये ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = त्वय्युद्धवाऽश्रयति यस्त्रिविधो विकारो मायाऽन्तराऽऽपतति नाद्यपवर्गयोर्यत् । जन्मादयोऽस्य वद मां तव तस्य किं स्यु- राद्यन्तयोर्यदसतोऽस्ति तदेव मध्ये ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = आदावन्ते च मध्ये च यज्ज्ञं सृज्यं यदन्वियात् । | | verse_line1 = आदावन्ते च मध्ये च यज्ज्ञं सृज्यं यदन्वियात् । | ||
| verse_line2 = पुनस्तत्प्रतिसङ्क्रामे यच्छिष्येत तदेव सत् ॥ १६ ॥ | | verse_line2 = पुनस्तत्प्रतिसङ्क्रामे यच्छिष्येत तदेव सत् ॥ १६ ॥ | ||
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| Line 83: | Line 84: | ||
| verse_line1 = श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम् । | | verse_line1 = श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम् । | ||
| verse_line2 = प्रमाणेष्वनवस्थानाद् विकल्पात् स विरज्यते ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = प्रमाणेष्वनवस्थानाद् विकल्पात् स विरज्यते ॥ १७ ॥ | ||
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| verse_line1 = धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम् । | | verse_line1 = धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम् । | ||
| verse_line2 = गुणेष्वसङ्गो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादयः ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = गुणेष्वसङ्गो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादयः ॥ २७ ॥ | ||
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| Line 119: | Line 122: | ||
| verse_line1 = दरिद्रो यस्त्वसंतुष्टः कृपणो योऽजितेन्द्रियः । | | verse_line1 = दरिद्रो यस्त्वसंतुष्टः कृपणो योऽजितेन्द्रियः । | ||
| verse_line2 = गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसङ्गो विपर्ययः ॥ ४५ ॥ | | verse_line2 = गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसङ्गो विपर्ययः ॥ ४५ ॥ | ||
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