Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S22: Difference between revisions
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| title = द्वाविंशोऽध्यायः | | title = द्वाविंशोऽध्यायः | ||
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| verse_id = BTN_C11_S22_V04 | | verse_id = BTN_C11_S22_V04 | ||
| Line 39: | Line 37: | ||
| verse_line1 = परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ । | | verse_line1 = परस्परानुप्रवेशात् तत्त्वानां पुरुषर्षभ । | ||
| verse_line2 = पौर्वापर्यप्रसङ्ख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम् ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = पौर्वापर्यप्रसङ्ख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम् ॥ ७ ॥ | ||
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| Line 75: | Line 74: | ||
| verse_line1 = अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम् । | | verse_line1 = अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम् । | ||
| verse_line2 = स्वतो न सम्भवेद् यस्मात् ततोऽन्यः पुरुषो भवेत् ॥ १० ॥ | | verse_line2 = स्वतो न सम्भवेद् यस्मात् ततोऽन्यः पुरुषो भवेत् ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = पुरुषेश्वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि । | | verse_line1 = पुरुषेश्वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि । | ||
| verse_line2 = तदन्यकल्पनाऽपार्था ज्ञानं च प्रकृतेर्गुणः ॥ ११ ॥ | | verse_line2 = तदन्यकल्पनाऽपार्था ज्ञानं च प्रकृतेर्गुणः ॥ ११ ॥ | ||
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| Line 111: | Line 112: | ||
| verse_line1 = प्रकृतेर्गुणसाम्ये तु प्रकृतेर्नाऽत्मनो गुणाः । | | verse_line1 = प्रकृतेर्गुणसाम्ये तु प्रकृतेर्नाऽत्मनो गुणाः । | ||
| verse_line2 = सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ॥ १२ ॥ | | verse_line2 = सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ॥ १२ ॥ | ||
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| Line 129: | Line 131: | ||
| verse_line1 = सत्त्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते । | | verse_line1 = सत्त्वं ज्ञानं रजः कर्म तमोऽज्ञानमिहोच्यते । | ||
| verse_line2 = गुणव्यतिकरः कालः स्वभावः सूत्रमेव च ॥ १३ ॥ | | verse_line2 = गुणव्यतिकरः कालः स्वभावः सूत्रमेव च ॥ १३ ॥ | ||
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| Line 179: | Line 182: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया । लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात् ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = व्यक्तादयो विकुर्वाणा धातवः पुरुषेक्षया । लब्धवीर्याः सृजन्त्यण्डं संहताः प्रकृतेर्बलात् ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 197: | Line 201: | ||
| verse_line1 = सप्तैव धातव इति यत्रार्थाः पञ्च खादयः । | | verse_line1 = सप्तैव धातव इति यत्रार्थाः पञ्च खादयः । | ||
| verse_line2 = ज्ञानमात्मोभयाधारस्ततो देहेन्द्रियासवः ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = ज्ञानमात्मोभयाधारस्ततो देहेन्द्रियासवः ॥ १९ ॥ | ||
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| Line 215: | Line 220: | ||
| verse_line1 = चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्नमात्मनः । | | verse_line1 = चत्वार्येवेति तत्रापि तेज आपोऽन्नमात्मनः । | ||
| verse_line2 = जातानि तैरिदं जातं जन्मावयविनः खलु ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = जातानि तैरिदं जातं जन्मावयविनः खलु ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 233: | Line 239: | ||
| verse_line1 = सङ्ख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च । | | verse_line1 = सङ्ख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च । | ||
| verse_line2 = पञ्चपञ्चैकमनसा आत्मा सप्तदशः स्मृतः ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = पञ्चपञ्चैकमनसा आत्मा सप्तदशः स्मृतः ॥ २२ ॥ | ||
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| Line 260: | Line 267: | ||
| verse_line1 = इति नानाप्रसङ्ख्यानं तत्वानामृषिभिः कृतम् । | | verse_line1 = इति नानाप्रसङ्ख्यानं तत्वानामृषिभिः कृतम् । | ||
| verse_line2 = सर्वं न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद् विदुषां किमशोभनम् ॥ २४ ॥ | | verse_line2 = सर्वं न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद् विदुषां किमशोभनम् ॥ २४ ॥ | ||
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| Line 295: | Line 303: | ||
| verse_line1 = त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तनुशक्तितः । | | verse_line1 = त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तनुशक्तितः । | ||
| verse_line2 = त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ नचापरः ॥ २७ ॥ | | verse_line2 = त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ नचापरः ॥ २७ ॥ | ||
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| Line 312: | Line 321: | ||
| verse_type = shloka | | verse_type = shloka | ||
| verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ । एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः ॥ २८ ॥ | | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– प्रकृतिः पुरुषश्चेति विकल्पः पुरुषर्षभ । एष वैकारिकः सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः ॥ २८ ॥ | ||
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| Line 330: | Line 340: | ||
| verse_line1 = ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा विकल्पबुद्धिं च गुणैर्विधत्ते । | | verse_line1 = ममाङ्ग माया गुणमय्यनेकधा विकल्पबुद्धिं च गुणैर्विधत्ते । | ||
| verse_line2 = वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेकमथाधिदैवमधिभूतमन्यत् ॥२९॥ | | verse_line2 = वैकारिकस्त्रिविधोऽध्यात्ममेकमथाधिदैवमधिभूतमन्यत् ॥२९॥ | ||
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| Line 371: | Line 382: | ||
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| verse_line1 = आत्मा परिज्ञानमयो विवादो ह्यस्तीति नास्तीति भिदाऽर्थनिष्ठः । व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात् ॥ ३३ ॥ | | verse_line1 = आत्मा परिज्ञानमयो विवादो ह्यस्तीति नास्तीति भिदाऽर्थनिष्ठः । व्यर्थोऽपि नैवोपरमेत पुंसां मत्तः परावृत्तधियां स्वलोकात् ॥ ३३ ॥ | ||
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| Line 389: | Line 401: | ||
| verse_line1 = विषयाभिनिवेशेन नाऽत्मानं यत् स्मरेन्मनः । | | verse_line1 = विषयाभिनिवेशेन नाऽत्मानं यत् स्मरेन्मनः । | ||
| verse_line2 = जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तविस्मृतिः ॥ ३८ ॥ | | verse_line2 = जन्तोर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युरत्यन्तविस्मृतिः ॥ ३८ ॥ | ||
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| Line 407: | Line 420: | ||
| verse_line1 = ईदृशायास विज्ञाय त्रैविध्यं भाति वस्तुनि । | | verse_line1 = ईदृशायास विज्ञाय त्रैविध्यं भाति वस्तुनि । | ||
| verse_line2 = बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृद् यथा ॥ ४१ ॥ | | verse_line2 = बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनोऽसज्जनकृद् यथा ॥ ४१ ॥ | ||
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| Line 425: | Line 439: | ||
| verse_line1 = सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम् । | | verse_line1 = सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम् । | ||
| verse_line2 = सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्भिर्धीर्मृषायुषाम् ॥ ४४ ॥ | | verse_line2 = सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्भिर्धीर्मृषायुषाम् ॥ ४४ ॥ | ||
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| Line 443: | Line 458: | ||
| verse_line1 = आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ । | | verse_line1 = आत्मनः पितृपुत्राभ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ । | ||
| verse_line2 = भवाप्ययौ हि भूतानामभिज्ञाद्वयलक्षणौ ॥ ४८ ॥ | | verse_line2 = भवाप्ययौ हि भूतानामभिज्ञाद्वयलक्षणौ ॥ ४८ ॥ | ||
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| Line 461: | Line 477: | ||
| verse_line1 = तरोर्बीजविकाराभ्यां यो विद्वान् जन्मसंयमौ । | | verse_line1 = तरोर्बीजविकाराभ्यां यो विद्वान् जन्मसंयमौ । | ||
| verse_line2 = तरोर्विलक्षणो दृष्ट एवं द्रष्टा तनोः पृथक् ॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = तरोर्विलक्षणो दृष्ट एवं द्रष्टा तनोः पृथक् ॥ ४९ ॥ | ||
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| Line 479: | Line 496: | ||
| verse_line1 = नृत्यतो गायतः पश्यन् यथैवानुकरोति तान् । | | verse_line1 = नृत्यतो गायतः पश्यन् यथैवानुकरोति तान् । | ||
| verse_line2 = एवं बुद्धिगुणान् पश्यन्ननीहोऽप्यनुकार्यते ॥ ५२ ॥ | | verse_line2 = एवं बुद्धिगुणान् पश्यन्ननीहोऽप्यनुकार्यते ॥ ५२ ॥ | ||
| commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya | |||
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| Line 497: | Line 515: | ||
| verse_line1 = यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा । | | verse_line1 = यथा मनोरथधियो विषयानुभवो मृषा । | ||
| verse_line2 = स्वप्नदृष्टश्च दाशार्ह तथा संसार आत्मनः ॥ ५४ ॥ | | verse_line2 = स्वप्नदृष्टश्च दाशार्ह तथा संसार आत्मनः ॥ ५४ ॥ | ||
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