Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S23: Difference between revisions
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| title = त्रयोविंशोऽध्यायः | | title = त्रयोविंशोऽध्यायः | ||
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| verse_line1 = तं दुर्जयं शुत्रुमसह्यवेगमरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित् । | | verse_line1 = तं दुर्जयं शुत्रुमसह्यवेगमरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित् । | ||
| verse_line2 = कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यैर्मित्रैरुदासीनरिपुं विमूढाः ॥ ४९ ॥ | | verse_line2 = कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यैर्मित्रैरुदासीनरिपुं विमूढाः ॥ ४९ ॥ | ||
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| verse_line1 = देहं मनोमात्रमिदं गृहीत्वा ममाहमित्यन्धधियो मनुष्याः । | | verse_line1 = देहं मनोमात्रमिदं गृहीत्वा ममाहमित्यन्धधियो मनुष्याः । | ||
| verse_line2 = एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति ॥५०॥ | | verse_line2 = एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति ॥५०॥ | ||
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| verse_line1 = जनोऽस्य हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनश्चात्र हि भौमयोस्तत् । जिह्वां क्वचित् सन्दशति स्वदद्भि- स्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् ॥ ५१ ॥ | | verse_line1 = जनोऽस्य हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनश्चात्र हि भौमयोस्तत् । जिह्वां क्वचित् सन्दशति स्वदद्भि- स्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् ॥ ५१ ॥ | ||
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| verse_line1 = दुःखस्य हेतुर्यदि देवताऽस्तु किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत् । यदङ्गमङ्गेन विहन्यते क्वचित् क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे ॥ ५२ ॥ | | verse_line1 = दुःखस्य हेतुर्यदि देवताऽस्तु किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत् । यदङ्गमङ्गेन विहन्यते क्वचित् क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे ॥ ५२ ॥ | ||
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| verse_line1 = आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः किमन्यतस्तत्र निजः स्वभावः । न ह्यात्मनोऽन्यद् यदि तन्मृषा स्यात् क्रुध्येत कस्मै न सुखं न दुःखम् ॥ ५३ ॥ | | verse_line1 = आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः किमन्यतस्तत्र निजः स्वभावः । न ह्यात्मनोऽन्यद् यदि तन्मृषा स्यात् क्रुध्येत कस्मै न सुखं न दुःखम् ॥ ५३ ॥ | ||
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| verse_line1 = ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै । ग्रहैर्ग्रहस्यैव भवन्ति पीडाः क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥ ५४ ॥ | | verse_line1 = ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै । ग्रहैर्ग्रहस्यैव भवन्ति पीडाः क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥ ५४ ॥ | ||
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| verse_line1 = कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोर्वै किमात्मनस्तद् हि जडेऽजडत्वे । देहे स्ववित् पुरुषोऽयं सुपर्णः क्रुध्येत कस्मै न हि कर्म मूलम् ॥ ५५ ॥ | | verse_line1 = कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोर्वै किमात्मनस्तद् हि जडेऽजडत्वे । देहे स्ववित् पुरुषोऽयं सुपर्णः क्रुध्येत कस्मै न हि कर्म मूलम् ॥ ५५ ॥ | ||
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| verse_line1 = कालोऽस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तत्र तदात्मनोऽसौ । नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात् क्रुध्येत कस्मै न परस्य बोद्धुः ॥ ५६ ॥ | | verse_line1 = कालोऽस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तत्र तदात्मनोऽसौ । नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात् क्रुध्येत कस्मै न परस्य बोद्धुः ॥ ५६ ॥ | ||
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| verse_line1 = न केनचित् क्वापि कथञ्चनास्य द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य । यथाऽऽत्मनः संसृतिरूपिणः स्यात् एवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः ॥ ५७ ॥ | | verse_line1 = न केनचित् क्वापि कथञ्चनास्य द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य । यथाऽऽत्मनः संसृतिरूपिणः स्यात् एवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः ॥ ५७ ॥ | ||
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