Bhagavatatatparyanirnaya/C11/S24: Difference between revisions
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| title = चतुर्विंशोऽध्यायः | | title = चतुर्विंशोऽध्यायः | ||
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| verse_line1 = आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थश्चैकमेवाविकल्पितम् । | | verse_line1 = आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थश्चैकमेवाविकल्पितम् । | ||
| verse_line2 = यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगे जनाः ॥ २ ॥ | | verse_line2 = यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगे जनाः ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = तन्मया फलरूपेण केवलेन विकल्पितम् । | | verse_line1 = तन्मया फलरूपेण केवलेन विकल्पितम् । | ||
| verse_line2 = वाङ्मनोगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत् ॥ ३ ॥ | | verse_line2 = वाङ्मनोगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत् ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिवृत् । | | verse_line1 = वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिवृत् । | ||
| verse_line2 = तन्मात्रेन्द्रियमनसां कारणं चिदचिन्मयः ॥ ७ ॥ | | verse_line2 = तन्मात्रेन्द्रियमनसां कारणं चिदचिन्मयः ॥ ७ ॥ | ||
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| Line 93: | Line 94: | ||
| verse_line1 = तस्मिन्नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थिते । | | verse_line1 = तस्मिन्नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थिते । | ||
| verse_line2 = मम नाभ्यामभूत् पद्मं विश्वाख्यं तत्र चाऽत्मभूः ॥ १० ॥ | | verse_line2 = मम नाभ्यामभूत् पद्मं विश्वाख्यं तत्र चाऽत्मभूः ॥ १० ॥ | ||
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| Line 111: | Line 113: | ||
| verse_line1 = योगस्य तपसश्चैव ज्ञानस्य गतयोऽमलाः । | | verse_line1 = योगस्य तपसश्चैव ज्ञानस्य गतयोऽमलाः । | ||
| verse_line2 = महर्जनस्तपः सत्यं भक्तियोगस्य मद्गतिः ॥ १४ ॥ | | verse_line2 = महर्जनस्तपः सत्यं भक्तियोगस्य मद्गतिः ॥ १४ ॥ | ||
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| Line 129: | Line 132: | ||
| verse_line1 = मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत् । | | verse_line1 = मया कालात्मना धात्रा कर्मयुक्तमिदं जगत् । | ||
| verse_line2 = गुणप्रवाह एतस्मिन्नुन्मज्जति निमज्जति ॥ १५ ॥ | | verse_line2 = गुणप्रवाह एतस्मिन्नुन्मज्जति निमज्जति ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 147: | Line 151: | ||
| verse_line1 = यस्तु यस्याऽदिरन्तश्च स वै मध्यं च तस्य तत् । | | verse_line1 = यस्तु यस्याऽदिरन्तश्च स वै मध्यं च तस्य तत् । | ||
| verse_line2 = विकारो व्यवहारार्थो यथा तैजसपार्थिवाः ॥ १७ ॥ | | verse_line2 = विकारो व्यवहारार्थो यथा तैजसपार्थिवाः ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 165: | Line 170: | ||
| verse_line1 = यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुते परम् । | | verse_line1 = यदुपादाय पूर्वस्तु भावो विकुरुते परम् । | ||
| verse_line2 = आदिरन्तो यतो यस्मिंस्तत् सत्यमभिधीयते ॥ १८ ॥ | | verse_line2 = आदिरन्तो यतो यस्मिंस्तत् सत्यमभिधीयते ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 183: | Line 189: | ||
| verse_line1 = प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधारः पुरुषः परः । | | verse_line1 = प्रकृतिर्ह्यस्योपादानमाधारः पुरुषः परः । | ||
| verse_line2 = सतोऽभिव्यञ्जकः कालो ब्रह्म तत् त्रितयं त्वहम् ॥ १९ ॥ | | verse_line2 = सतोऽभिव्यञ्जकः कालो ब्रह्म तत् त्रितयं त्वहम् ॥ १९ ॥ | ||
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| Line 201: | Line 208: | ||
| verse_line1 = सर्गः प्रवर्तते तावत् पौर्वापर्येण नित्यशः । | | verse_line1 = सर्गः प्रवर्तते तावत् पौर्वापर्येण नित्यशः । | ||
| verse_line2 = महान् गुणविसर्गोऽर्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम् ॥ २० ॥ | | verse_line2 = महान् गुणविसर्गोऽर्थः स्थित्यन्तो यावदीक्षणम् ॥ २० ॥ | ||
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| Line 219: | Line 227: | ||
| verse_line1 = विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पकः । | | verse_line1 = विराण्मयाऽऽसाद्यमानो लोककल्पविकल्पकः । | ||
| verse_line2 = पञ्चत्वायाविशेषाय कल्पते भुवनैः सह ॥ २१ ॥ | | verse_line2 = पञ्चत्वायाविशेषाय कल्पते भुवनैः सह ॥ २१ ॥ | ||
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| Line 237: | Line 246: | ||
| verse_line1 = अन्ने प्रलीयते मर्त्य अन्नं धानासु लीयते । | | verse_line1 = अन्ने प्रलीयते मर्त्य अन्नं धानासु लीयते । | ||
| verse_line2 = धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते ॥ २२ ॥ | | verse_line2 = धाना भूमौ प्रलीयन्ते भूमिर्गन्धे प्रलीयते ॥ २२ ॥ | ||
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| Line 271: | Line 281: | ||
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| verse_line1 = कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे । आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः ॥ २७ ॥ | | verse_line1 = कालो मायामये जीवे जीव आत्मनि मय्यजे । आत्मा केवल आत्मस्थो विकल्पापायलक्षणः ॥ २७ ॥ | ||
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