Bruhadaranyaka/C3/S1: Difference between revisions
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| verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदमन्तरिक्षमनारम्भणमिव केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चंद्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा तद्यदिदं मनः सोऽसौ चंद्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः साऽतिमुक्तिरित्यतिमोक्षाः ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । यदिदमन्तरिक्षमनारम्भणमिव केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं लोकमाक्रमत इति ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चंद्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा तद्यदिदं मनः सोऽसौ चंद्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः साऽतिमुक्तिरित्यतिमोक्षाः ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ सम्पदः याज्ञवल्क्येति होवाच । कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होता अस्मिन् यज्ञे करिष्यतीति तिसृभिरिति कतमास्तास्तिस्रः इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया किं ताभिर्यजतीति यत्किञ्चेदं प्राणभृदिति ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = अथ सम्पदः याज्ञवल्क्येति होवाच । कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होता अस्मिन् यज्ञे करिष्यतीति तिसृभिरिति कतमास्तास्तिस्रः इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया किं ताभिर्यजतीति यत्किञ्चेदं प्राणभृदिति ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञे आहुतीर्होष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति या हुता उज्जवलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अतिशेरते किं ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्जयति दीप्यत इव हि देवलोको या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । कत्ययमद्याध्वर्युरस्मिन् यज्ञे आहुतीर्होष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति या हुता उज्जवलन्ति या हुता अतिनेदन्ते या हुता अतिशेरते किं ताभिर्जयतीति या हुता उज्ज्वलन्ति देवलोकमेव ताभिर्जयति दीप्यत इव हि देवलोको या हुता अतिनेदन्ते पितृलोकमेव ताभिर्जयत्यतीव हि पितृलोको या हुता अधिशेरते मनुष्यलोकमेव ताभिर्जयत्यध इव हि मनुष्यलोकः ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीत्येकयेति कतमा सैकेति मन एवेत्यनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । कतिभिरयमद्य ब्रह्मा यज्ञं दक्षिणतो देवताभिर्गोपायतीत्येकयेति कतमा सैकेति मन एवेत्यनन्तं वै मनोऽनन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । कत्ययमद्योद्गाताऽस्मिन् यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कतमास्ता या अध्यात्ममिति प्राण एव पुरोनुवाक्या अपानो याज्या व्यानः शस्या किं ताभिर्जयतीति पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्युलोकं शस्यया ततो ह होता आश्वल उपरराम ॥ १० ॥ | | verse_line1 = याज्ञवल्क्येति होवाच । कत्ययमद्योद्गाताऽस्मिन् यज्ञे स्तोत्रियाः स्तोष्यतीति तिस्र इति कतमास्तास्तिस्र इति पुरोनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया कतमास्ता या अध्यात्ममिति प्राण एव पुरोनुवाक्या अपानो याज्या व्यानः शस्या किं ताभिर्जयतीति पृथिवीलोकमेव पुरोनुवाक्यया जयत्यन्तरिक्षलोकं याज्यया द्युलोकं शस्यया ततो ह होता आश्वल उपरराम ॥ १० ॥ | ||
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