Bruhadaranyaka/C3/S8: Difference between revisions
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| verse_line1 = अथ ह वाचक्नव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ताहमिमं द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि तौ चेन्मे वक्ष्यति न वै जातु युष्माकमिमं कश्चित् ब्रह्मोद्यं जेतेति पृच्छ गार्गीति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ ह वाचक्नव्युवाच ब्राह्मणा भगवन्तो हन्ताहमिमं द्वौ प्रश्नौ प्रक्ष्यामि तौ चेन्मे वक्ष्यति न वै जातु युष्माकमिमं कश्चित् ब्रह्मोद्यं जेतेति पृच्छ गार्गीति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = सा होवाचाहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेदेवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थां तौ मे ब्रूहीति पृच्छ गार्गीति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = सा होवाचाहं वै त्वा याज्ञवल्क्य यथा काश्यो वा वैदेहो वोग्रपुत्र उज्ज्यं धनुरधिज्यं कृत्वा द्वौ बाणवन्तौ सपत्नातिव्याधिनौ हस्ते कृत्वोपोत्तिष्ठेदेवमेवाहं त्वा द्वाभ्यां प्रश्नाभ्यामुपोदस्थां तौ मे ब्रूहीति पृच्छ गार्गीति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाशे तदोतं च प्रोतं चेति ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाश तदोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खलु आकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = स होवाच यदूर्ध्वं गार्गि दिवो यदर्वाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद्भूतं च भवच्च भविष्यच्चेत्याचक्षते आकाश तदोतं च प्रोतं चेति कस्मिन्नु खलु आकाश ओतश्च प्रोतश्चेति ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्ति अस्थूलं अनणु अह्रस्वं अदीर्घं अलोहितं ओहं अच्छायं अतमो अवायु अनाकाशं असंगं अरसं अगन्धं अचक्षुष्कं अश्रोत्रं अवाक् अमनो अतेजस्कं अप्राणं अमुखं अमात्रं अगोत्रं अजरं अभयं अमृतं अरजो अशब्दं अविवृतं असंवृतं अपूर्वं अनपरं अनन्तरं अबाह्यं न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = स होवाचैतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्ति अस्थूलं अनणु अह्रस्वं अदीर्घं अलोहितं ओहं अच्छायं अतमो अवायु अनाकाशं असंगं अरसं अगन्धं अचक्षुष्कं अश्रोत्रं अवाक् अमनो अतेजस्कं अप्राणं अमुखं अमात्रं अगोत्रं अजरं अभयं अमृतं अरजो अशब्दं अविवृतं असंवृतं अपूर्वं अनपरं अनन्तरं अबाह्यं न तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति कश्चन ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्यध्वं यदस्मान्नमस्कारेण मुच्यध्वं न वै जातु युष्माकमिमं कश्चित् ब्रह्मोद्यं जेतेति ततो ह वाचक्नव्युपरराम ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = सा होवाच ब्राह्मणा भगवन्तस्तदेव बहु मन्यध्वं यदस्मान्नमस्कारेण मुच्यध्वं न वै जातु युष्माकमिमं कश्चित् ब्रह्मोद्यं जेतेति ततो ह वाचक्नव्युपरराम ॥ १२ ॥ | ||
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