Chandogya/C2: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 34: | Line 34: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स य एतदेवंविद्वान् साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥ ४ ॥ १ ॥ | | verse_line1 = स य एतदेवंविद्वान् साधु सामेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो धर्मा आ च गच्छेयुरुप च नमेयुः ॥ ४ ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 71: | Line 72: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वांल्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ३ ॥ २ ॥ | | verse_line1 = कल्पन्ते हास्मै लोका ऊर्ध्वाश्चावृत्ताश्च य एतदेवं विद्वांल्लोकेषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ३ ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 115: | Line 117: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान् वृष्टौ पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = उद्गृह्णाति तन्निधनं वर्षति हास्मै वर्षयति ह य एतदेवं विद्वान् वृष्टौ पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 142: | Line 145: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = न हाप्सु प्रैत्यप्सुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् सर्वास्वप्सु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ४ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 170: | Line 174: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान् भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = कल्पन्ते हास्मा ऋतव ऋतुमान् भवति य एतदेवं विद्वानृतुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ २ ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 194: | Line 199: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = पशुषु पञ्चविधं सामोपासीताजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनं भवन्ति हास्य पशवः पशुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् पशुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = पशुषु पञ्चविधं सामोपासीताजा हिङ्कारोऽवयः प्रस्तावो गाव उद्गीथोऽश्वाः प्रतिहारः पुरुषो निधनं भवन्ति हास्य पशवः पशुमान् भवति य एतदेवंविद्वान् पशुषु पञ्चविधं सामोपास्ते ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 217: | Line 223: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिङ्कारः वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयांसि वैतानि परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकान् जयति य एतदेवं विद्वान् प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपासीत प्राणो हिङ्कारः वाक्प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारो मनो निधनं परोवरीयांसि वैतानि परोवरीयो हास्य भवति परोवरीयसो ह लोकान् जयति य एतदेवं विद्वान् प्राणेषु पञ्चविधं परोवरीयः सामोपास्त इति तु पञ्चविधस्य ॥ ७ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 242: | Line 249: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधं सामोपासीत यत्किञ्च वाचो हुमिति स हिङ्कारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिर्यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतदेवं विद्वान् वाचि सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अथ सप्तविधस्य वाचि सप्तविधं सामोपासीत यत्किञ्च वाचो हुमिति स हिङ्कारो यत्प्रेति स प्रस्तावो यदेति स आदिर्यदुदिति स उद्गीथो यत्प्रतीति स प्रतिहारो यदुपेति स उपद्रवो यन्नीति तन्निधनं दुग्धेऽस्मै वाग्दोहं यो वाचो दोहोऽन्नवानन्नादो भवति य एतदेवं विद्वान् वाचि सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 267: | Line 275: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपासीत सर्वदा समस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ १ ॥ तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात् | | | verse_line1 = अथ खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपासीत सर्वदा समस्तेन साम मां प्रति मां प्रतीति सर्वेण समस्तेन साम ॥ १ ॥ तस्मिन्निमानि सर्वाणि भूतान्यन्वायत्तानीति विद्यात् | | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 336: | Line 345: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात् तान्निदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न एवं खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = अथ यत्प्रथमास्तमिते तन्निधनं तदस्य पितरोऽन्वायत्तास्तस्मात् तान्निदधति निधनभाजिनो ह्येतस्य साम्न एवं खल्वमुमादित्यं सप्तविधं सामोपास्ते ॥ ८ ॥ ९ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 405: | Line 415: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = निधनमिति त्र्यक्षरं तत्सममेव भवति तानि ह वा एतानि द्वाविंशतिरक्षराणि ॥ ४ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 433: | Line 444: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = एकविंशत्याऽऽदित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = एकविंशत्याऽऽदित्यमाप्नोत्येकविंशो वा इतोऽसावादित्यो द्वाविंशेन परमादित्याज्जयति तन्नाकं तद्विशोकम् ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 464: | Line 476: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = आप्नोतीहादित्यस्य जयं परो हास्यादित्यजयाज्जयो भवति य एतदेवं विद्वानात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥ १० ॥ | | verse_line1 = आप्नोतीहादित्यस्य जयं परो हास्यादित्यजयाज्जयो भवति य एतदेवं विद्वानात्मसंमितमतिमृत्यु सप्तविधं सामोपास्ते सामोपास्ते ॥ ६ ॥ १० ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 486: | Line 499: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = मनो हिङ्कारो वाक् प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या महामनाः स्यात् तद् व्रतम् ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = मनो हिङ्कारो वाक् प्रस्तावश्चक्षुरुद्गीथः श्रोत्रं प्रतिहारः प्राणो निधनमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेषु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या महामनाः स्यात् तद् व्रतम् ॥ ११ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 517: | Line 531: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न प्रत्यङ्ग्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = स य एवमेतद्रथन्तरमग्नौ प्रोतं वेद ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न प्रत्यङ्ग्ङग्निमाचामेन्न निष्ठीवेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥ १२ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 544: | Line 559: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनीभवति मिथुनान्मिथुनात् प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥१३॥ | | verse_line1 = स य एवमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोतं वेद मिथुनीभवति मिथुनान्मिथुनात् प्रजायते सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या न काञ्चन परिहरेत् तद् व्रतम् ॥ २ ॥१३॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 627: | Line 643: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति । यस्तद्वेद स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति । सर्वमस्मीत्युपासीत तद् व्रतं तद् व्रतम् ॥ २ ॥ २१ ॥ | | verse_line1 = तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणि त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति । यस्तद्वेद स वेद सर्वं सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति । सर्वमस्मीत्युपासीत तद् व्रतं तद् व्रतम् ॥ २ ॥ २१ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 717: | Line 734: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान् सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥ | | verse_line1 = विनर्दि साम्नो वृणे पशव्यमित्यग्नेरुद्गीथोऽनिरुक्तः प्रजापतेर्निरुक्तः सोमस्य मृदु श्लक्ष्णं वायोः श्लक्ष्णं बलवदिन्द्रस्य क्रौञ्चं बृहस्पतेरपध्वान्तं वरुणस्य तान् सर्वानेवोपसेवेत वारुणं त्वेव वर्जयेत् ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 742: | Line 760: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत् स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २ ॥ | | verse_line1 = अमृतत्वं देवेभ्य आगायानीत्यागायेत् स्वधां पितृभ्य आशां मनुष्येभ्यस्तृणोदकं पशुभ्यः स्वर्गं लोकं यजमानायान्नमात्मन आगायानीत्येतानि मनसा ध्यायन्नप्रमत्तः स्तुवीत ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 786: | Line 805: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्वे ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृत्ता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशेनानभिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥ २२ ॥ | | verse_line1 = सर्वे स्वरा घोषवन्तो बलवन्तो वक्तव्या इन्द्रे बलं ददानीति सर्वे ऊष्माणोऽग्रस्ता अनिरस्ता विवृत्ता वक्तव्याः प्रजापतेरात्मानं परिददानीति सर्वे स्पर्शा लेशेनानभिहिता वक्तव्या मृत्योरात्मानं परिहराणीति ॥ ५ ॥ २२ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 827: | Line 847: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = त्रयो धर्मस्कन्धाः । यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = त्रयो धर्मस्कन्धाः । यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एव द्वितीयो ब्रह्मचार्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन् सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 844: | Line 865: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत् । तामभ्यतपत् तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त । भूर्भुवः स्वरिति । तान्यभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् । तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि सन्तृण्णान्येवमेतेनोङ्कारेण सर्वा वाक्सन्तृण्णोङ्कार एवेदं सर्वमोङ्कार एवेदं सर्वम् ॥ २ ॥ २३ ॥ | | verse_line1 = प्रजापतिर्लोकानभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्त्रयी विद्या सम्प्रास्रवत् । तामभ्यतपत् तस्या अभितप्ताया एतान्यक्षराणि सम्प्रास्रवन्त । भूर्भुवः स्वरिति । तान्यभ्यतपत् तेभ्योऽभितप्तेभ्य ओङ्कारः सम्प्रास्रवत् । तद्यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि सन्तृण्णान्येवमेतेनोङ्कारेण सर्वा वाक्सन्तृण्णोङ्कार एवेदं सर्वमोङ्कार एवेदं सर्वम् ॥ २ ॥ २३ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 911: | Line 933: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यं स वैश्वदेवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं ं स्वारा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यादित्यमथ वैश्वदेवं लो३कद्वारमपा३वा३वार्णू३३ पश्येम त्वा वयं साम्ना ३३३३ हू आ ३म् ३३ ज्या ३यो ३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दतैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनं सम्प्रयच्छन्ति एष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ २६ ॥ | | verse_line1 = पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यं स वैश्वदेवं सामाभिगायति लो३कद्वारमपावा३र्णू३३ पश्येम त्वा वयं ं स्वारा ३३३३३ हु३म् आ३३ज्या३ यो३ आ३२१११ इत्यादित्यमथ वैश्वदेवं लो३कद्वारमपा३वा३वार्णू३३ पश्येम त्वा वयं साम्ना ३३३३ हू आ ३म् ३३ ज्या ३यो ३ आ३२१११ इत्यथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो लोकं मे यजमानाय विन्दतैष वै यजमानस्य लोक एताऽस्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनं सम्प्रयच्छन्ति एष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ २६ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||