Chandogya/C3: Difference between revisions
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| verse_line1 = ॐ असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवंशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥ | | verse_line1 = ॐ असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवंशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य रोहितं रूपम् ॥ ४ ॥ १ ॥ | | verse_line1 = तद्व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य रोहितं रूपम् ॥ ४ ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तदा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्लं रूपम् ॥ ३ ॥ २ ॥ | | verse_line1 = तद्व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तदा एतद्यदेतदादित्यस्य शुक्लं रूपम् ॥ ३ ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णं रूपम् ॥ ३ ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = तद्व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णं रूपम् ॥ ३ ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = तद्व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णं रूपम् ॥ ३ ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = तद्व्यक्षरत् तदादित्यमभितोऽश्रयत् तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य परं कृष्णं रूपम् ॥ ३ ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 217: | Line 222: | ||
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| verse_line1 = ते वा एते रसानांरसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ४ ॥५॥ | | verse_line1 = ते वा एते रसानांरसा वेदा हि रसास्तेषामेते रसास्तानि वा एतान्यमृतानाममृतानि वेदा ह्यमृतास्तेषामेतान्यमृतानि ॥ ४ ॥५॥ | ||
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| verse_line1 = स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता वसूनामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता वसूनामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्विस्तावद्दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ७ ॥ | | verse_line1 = स यावदादित्यः पुरस्तादुदेता पश्चादस्तमेता द्विस्तावद्दक्षिणत उदेतोत्तरतोऽस्तमेता रुद्राणामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ७ ॥ | ||
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| verse_line1 = स यावदादित्यो दक्षिणतः उदेतात्तरतोऽस्तमेता द्विस्तावत् पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेताऽऽदित्यानामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = स यावदादित्यो दक्षिणतः उदेतात्तरतोऽस्तमेता द्विस्तावत् पश्चादुदेता पुरस्तादस्तमेताऽऽदित्यानामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ ८ ॥ | ||
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| verse_line1 = स यावदादित्यः पश्चादुतेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥४।९॥ | | verse_line1 = स यावदादित्यः पश्चादुतेता पुरस्तादस्तमेता द्विस्तावदुत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता मरुतामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥४।९॥ | ||
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| verse_line1 = स यावदादित्यः उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्वं उदेताऽर्वाङ्गस्तमेता साध्यानामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ १० ॥ | | verse_line1 = स यावदादित्यः उत्तरत उदेता दक्षिणतोऽस्तमेता द्विस्तावदूर्ध्वं उदेताऽर्वाङ्गस्तमेता साध्यानामेव तावदाधिपत्यं स्वाराज्यं पर्येता ॥ ४ ॥ १० ॥ | ||
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| Line 540: | Line 551: | ||
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| verse_line1 = न वै तत्र न निम्लोचो नोदियाय कदाचन । देवास्तेनाहं सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणा ॥ इति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = न वै तत्र न निम्लोचो नोदियाय कदाचन । देवास्तेनाहं सत्येन मा विराधिषि ब्रह्मणा ॥ इति ॥ २ ॥ | ||
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| Line 562: | Line 574: | ||
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| verse_line1 = न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति च एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = न ह वा अस्मा उदेति न निम्लोचति सकृद्दिवा हैवास्मै भवति च एतामेवं ब्रह्मोपनिषदं वेद ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 596: | Line 609: | ||
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| verse_line1 = नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामदि्भः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥ ६ ॥ ११ ॥ | | verse_line1 = नान्यस्मै कस्मैचन यद्यप्यस्मा इमामदि्भः परिगृहीतां धनस्य पूर्णां दद्यादेतदेव ततो भूय इत्येतदेव ततो भूय इति ॥ ६ ॥ ११ ॥ | ||
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| Line 620: | Line 634: | ||
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| verse_line1 = गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च वाग्वै गायत्री वाग्वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ १ ॥ | | verse_line1 = गायत्री वा इदं सर्वं भूतं यदिदं किञ्च वाग्वै गायत्री वाग्वा इदं सर्वं भूतं गायति च त्रायते च ॥ १ ॥ | ||
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| Line 646: | Line 661: | ||
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| verse_line1 = या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यस्यां हीदं सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयन्ते ॥ २ ॥ | | verse_line1 = या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यस्यां हीदं सर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयन्ते ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन् पुरुषे शरीरमस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीर्यन्ते ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = या वै सा पृथिवीयं वाव सा यदिदमस्मिन् पुरुषे शरीरमस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीर्यन्ते ॥ ३ ॥ | ||
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| Line 685: | Line 702: | ||
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| verse_line1 = यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे हृदयमस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = यद्वै तत्पुरुषे शरीरमिदं वाव तद्यदिदमस्मिन्नन्तः पुरुषे हृदयमस्मिन् हीमे प्राणाः प्रतिष्ठिता एतदेव नातिशीयन्ते ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 705: | Line 723: | ||
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| verse_line1 = सैषा चतुष्पदा षडि्वधा गायत्री । | | verse_line1 = सैषा चतुष्पदा षडि्वधा गायत्री । | ||
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| Line 730: | Line 749: | ||
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| verse_line1 = तदेतदृचाभ्यनूक्तं– तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = तदेतदृचाभ्यनूक्तं– तावानस्य महिमा ततो ज्यायांश्च पूरुषः । पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति ॥ ६ ॥ | ||
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| Line 771: | Line 791: | ||
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| verse_line1 = अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशो यो वै सोऽन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत् पूर्णमप्रवर्ति पूर्णामप्रवर्तिनीं श्रियं लभेत य एवं वेद ॥ ९ ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = अयं वाव स योऽयमन्तर्हृदय आकाशो यो वै सोऽन्तर्हृदय आकाशस्तदेतत् पूर्णमप्रवर्ति पूर्णामप्रवर्तिनीं श्रियं लभेत य एवं वेद ॥ ९ ॥ १२ ॥ | ||
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| Line 860: | Line 881: | ||
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| verse_line1 = अस्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद । | | verse_line1 = अस्य कुले वीरो जायते प्रतिपद्यते स्वर्गं लोकं य एतानेवं पञ्च ब्रह्मपुरुषान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारपान् वेद । | ||
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| verse_line1 = यत्रैतदस्मिञ्च्छरीरे संस्पर्शेनोष्णिमानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनदमिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = यत्रैतदस्मिञ्च्छरीरे संस्पर्शेनोष्णिमानं विजानाति तस्यैषा श्रुतिर्यत्रैतत्कर्णावपिगृह्य निनदमिव नदथुरिवाग्नेरिव ज्वलत उपशृणोति तदेतद्दृष्टं च श्रुतं चेत्युपासीत चक्षुष्यः श्रुतो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ १३ ॥ | ||
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| Line 942: | Line 965: | ||
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| verse_line1 = मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसङ्कल्पः आकाश आत्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥ २ ॥ | | verse_line1 = मनोमयः प्राणशरीरो भारूपः सत्यसङ्कल्पः आकाश आत्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः एष म आत्मान्तर्हृदय एतद्ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसम्भविताऽस्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्साऽस्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥ ४ ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः एष म आत्मान्तर्हृदय एतद्ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसम्भविताऽस्मीति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्साऽस्तीति ह स्माह शाण्डिल्यः शाण्डिल्यः ॥ ४ ॥ १४ ॥ | ||
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| Line 995: | Line 1,020: | ||
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| verse_line1 = अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलं स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन् विश्वमिदं श्रितम् ॥ १ ॥ | | verse_line1 = अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलं स एष कोशो वसुधानस्तस्मिन् विश्वमिदं श्रितम् ॥ १ ॥ | ||
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| Line 1,017: | Line 1,043: | ||
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| verse_line1 = तस्य प्राची दिक् जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदं रुदम् ॥ २ ॥ | | verse_line1 = तस्य प्राची दिक् जुहूर्नाम सहमाना नाम दक्षिणा राज्ञी नाम प्रतीची सुभूता नामोदीची तासां वायुर्वत्सः स य एतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद न पुत्ररोदं रोदिति सोऽहमेतमेवं वायुं दिशां वत्सं वेद मा पुत्ररोदं रुदम् ॥ २ ॥ | ||
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| Line 1,083: | Line 1,110: | ||
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| verse_line1 = अथ यदवोचं स्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येतदवोचं तदवोचम् ॥ ७ ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = अथ यदवोचं स्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य इत्येतदवोचं तदवोचम् ॥ ७ ॥ १५ ॥ | ||
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| Line 1,162: | Line 1,190: | ||
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| verse_line1 = तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवनमायुरनुसन्तनुतेति माहं प्राणानां आदित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = तं चेदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेत् स ब्रूयात् प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवनमायुरनुसन्तनुतेति माहं प्राणानां आदित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह भवति ॥ ६ ॥ | ||
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| Line 1,187: | Line 1,216: | ||
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| verse_line1 = एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत् प्राह षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७ ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत् प्राह षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद ॥ ७ ॥ १६ ॥ | ||
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| Line 1,263: | Line 1,293: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तद्धैतद्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणशंसितमसीति । | | verse_line1 = तद्धैतद्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणशंसितमसीति । | ||
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| Line 1,312: | Line 1,343: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥ इत्यगन्म ज्योतिरुत्तममिति ॥ ७ ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ॥ इत्यगन्म ज्योतिरुत्तममिति ॥ ७ ॥ १७ ॥ | ||
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| Line 1,377: | Line 1,409: | ||
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| verse_line1 = श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स दिग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद य एवं वेद ॥ ६ ॥ १८ ॥ | | verse_line1 = श्रोत्रमेव ब्रह्मणश्चतुर्थः पादः स दिग्भिर्ज्योतिषा भाति च तपति च भाति च तपति च कीर्त्या यशसा ब्रह्मवर्चसेन य एवं वेद य एवं वेद ॥ ६ ॥ १८ ॥ | ||
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| Line 1,418: | Line 1,451: | ||
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| verse_line1 = स य एतदेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेरन् ॥ ४ ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = स य एतदेवं विद्वानादित्यं ब्रह्मेत्युपास्तेऽभ्याशो ह यदेनं साधवो घोषा आ च गच्छेयुरुप च निम्रेडेरन्निम्रेडेरन् ॥ ४ ॥ १९ ॥ | ||
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