Chandogya/C4: Difference between revisions
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| verse_line1 = अथ ह हंसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवं हंसो हंसमभ्युवाद हो होऽयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत्त्वा मा प्रधाक्षीरिति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = अथ ह हंसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवं हंसो हंसमभ्युवाद हो होऽयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत्त्वा मा प्रधाक्षीरिति ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स मयैतदुक्त इति ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स सर्वं मयैतदुक्त इति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्च प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद स सर्वं मयैतदुक्त इति ॥ ६ ॥ | ||
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| verse_line1 = सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तं हाभ्युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यहं ह्यरा३ इति ह प्रति जज्ञे स ह क्षत्ताऽन्विष्याविदमिति प्रत्येयाय ॥ ८ ॥ १ ॥ | | verse_line1 = सोऽधस्ताच्छकटस्य पामानं कषमाणमुपोपविवेश तं हाभ्युवाद त्वं नु भगवः सयुग्वा रैक्व इत्यहं ह्यरा३ इति ह प्रति जज्ञे स ह क्षत्ताऽन्विष्याविदमिति प्रत्येयाय ॥ ८ ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति ते हैते रैक्वपर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास तस्मै होवाच ॥ ५ ॥ २ ॥ | | verse_line1 = तस्या ह मुखमुपोद्गृह्णन्नुवाचाजहारेमाः शूद्रानेनैव मुखेनालापयिष्यथा इति ते हैते रैक्वपर्णा नाम महावृषेषु यत्रास्मा उवास तस्मै होवाच ॥ ५ ॥ २ ॥ | ||
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| verse_line1 = तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = तौ वा एतौ द्वौ संवर्गौ वायुरेव देवेषु प्राणः प्राणेषु ॥ ४ ॥ | ||
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| verse_line1 = तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतं तस्मात् सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दश कृतं सैषा विराडन्नादी तयेदं सर्वं दृष्टं सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतं तस्मात् सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दश कृतं सैषा विराडन्नादी तयेदं सर्वं दृष्टं सर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = तं होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सोम्याऽऽहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशतं गा निराकृत्योवाचेमाः सोम्यानु संव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणावर्तयेति स ह वर्षगणं प्रोवाच ता यदा सहस्रं सम्पेदुः ॥ ५ ॥ ४ ॥ | | verse_line1 = तं होवाच नैतदब्राह्मणो विवक्तुमर्हति समिधं सोम्याऽऽहरोप त्वा नेष्ये न सत्यादगा इति तमुपनीय कृशानामबलानां चतुःशतं गा निराकृत्योवाचेमाः सोम्यानु संव्रजेति ता अभिप्रस्थापयन्नुवाच नासहस्रेणावर्तयेति स ह वर्षगणं प्रोवाच ता यदा सहस्रं सम्पेदुः ॥ ५ ॥ ४ ॥ | ||
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| Line 432: | Line 440: | ||
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| verse_line1 = श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्य आचार्यद्ध्येव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयतीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किञ्चन वीयायेति वीयायेति द्ह्ये ॥ ३ ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेभ्य आचार्यद्ध्येव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापयतीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किञ्चन वीयायेति वीयायेति द्ह्ये ॥ ३ ॥ ९ ॥ | ||
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| verse_line1 = प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामीति ते होचुर्यद्वाव कं तदेव खं यदेवं खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः ॥ ५ ॥ १० ॥ | | verse_line1 = प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति स होवाच विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामीति ते होचुर्यद्वाव कं तदेव खं यदेवं खं तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः ॥ ५ ॥ १० ॥ | ||
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| verse_line1 = स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥१३॥ | | verse_line1 = स य एतमेवं विद्वानुपास्तेऽपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयन्ते उप वयं तं भुञ्जामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च य एतमेवं विद्वानुपास्ते ॥ २ ॥१३॥ | ||
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| Line 604: | Line 615: | ||
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| verse_line1 = भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वानुशशासेति को नु माऽनुशिष्याद्भो इतीहावेव निह्नुत इमे नूनमीदृशा अन्यादृशा इतीहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किल तेऽवोचन्निति ॥ २ ॥ इदमिति ह प्रतिजज्ञे ................ ..................... | | verse_line1 = भगव इति ह प्रतिशुश्राव ब्रह्मविद इव सोम्य ते मुखं भाति को नु त्वानुशशासेति को नु माऽनुशिष्याद्भो इतीहावेव निह्नुत इमे नूनमीदृशा अन्यादृशा इतीहाग्नीनभ्यूदे किं नु सोम्य किल तेऽवोचन्निति ॥ २ ॥ इदमिति ह प्रतिजज्ञे ................ ..................... | ||
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| verse_line1 = य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मैतस्मिन्न किञ्चन श्लिष्यति तद्यदस्मिन् सर्पिवोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = य एषोऽन्तरक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मैतस्मिन्न किञ्चन श्लिष्यति तद्यदस्मिन् सर्पिवोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति ॥ १ ॥ | ||
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| verse_line1 = अथ यदु चैवास्मिञ्च्छव्यं कुर्वन्ति यदु च नार्चिषमेवाभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान् षडुदंङ्गेति मासांस्तान् मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्यात् चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो मानवः स एनान् ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन खलु प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते नावर्तन्ते ॥ ५ ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = अथ यदु चैवास्मिञ्च्छव्यं कुर्वन्ति यदु च नार्चिषमेवाभिसम्भवन्त्यर्चिषोऽहरह्ण आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान् षडुदंङ्गेति मासांस्तान् मासेभ्यः संवत्सरं संवत्सरादादित्यमादित्यात् चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषो मानवः स एनान् ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन खलु प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते नावर्तन्ते ॥ ५ ॥ १५ ॥ | ||
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| verse_line1 = स यथोभयपाद् व्रजन् रथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान् भवति ॥ ५ ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = स यथोभयपाद् व्रजन् रथो वोभाभ्यां चक्राभ्यां वर्तमानः प्रतितिष्ठत्येवमस्य यज्ञः प्रतितिष्ठति यज्ञं प्रतितिष्ठन्तं यजमानोऽनुप्रतितिष्ठति स इष्ट्वा श्रेयान् भवति ॥ ५ ॥ १६ ॥ | ||
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| Line 764: | Line 779: | ||
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| verse_line1 = स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत् तस्यास्तप्यमानाया रसान् प्रावृहद्भूरित्यृग्भ्यो भुव इति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = स एतां त्रयीं विद्यामभ्यतपत् तस्यास्तप्यमानाया रसान् प्रावृहद्भूरित्यृग्भ्यो भुव इति यजुर्भ्यः स्वरिति सामभ्यः ॥ ३ ॥ | ||
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| verse_line1 = मानवो ब्रह्मैवैकर्त्विक् कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥ १० ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = मानवो ब्रह्मैवैकर्त्विक् कुरूनश्वाभिरक्षत्येवंविद्ध वै ब्रह्मा यज्ञं यजमानं सर्वांश्चर्त्विजोऽभिरक्षति तस्मादेवंविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत नानेवंविदं नानेवंविदम् ॥ १० ॥ १७ ॥ | ||
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