Chandogya/C5: Difference between revisions
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 42: | Line 42: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = यो ह वा आयतनं वेदायतनं ह स्वानां भवति मनो ह वा आयतनम् ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 135: | Line 136: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ १ ॥ | | verse_line1 = न वै वाचो न चक्षूंषि न श्रोत्राणि न मनांसीत्याचक्षते प्राणा इत्येवाचक्षते प्राणो ह्येवैतानि सर्वाणि भवति ॥ १५ ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 164: | Line 166: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किञ्चिदिदं आश्वभ्य आ शकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किञ्चनानन्नं भवतीति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = स होवाच किं मेऽन्नं भविष्यतीति यत्किञ्चिदिदं आश्वभ्य आ शकुनिभ्य इति होचुस्तद्वा एतदनस्यान्नमनो ह वै नाम प्रत्यक्षं न ह वा एवंविदि किञ्चनानन्नं भवतीति ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 184: | Line 187: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चादि्भः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥ | | verse_line1 = स होवाच किं मे वासो भविष्यतीत्याप इति होचुस्तस्माद्वा एतदशिष्यन्तः पुरस्ताच्चोपरिष्टाच्चादि्भः परिदधति लम्भुको ह वासो भवत्यनग्नो ह भवति ॥ २ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 205: | Line 209: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = तद्धैतत् सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥ | | verse_line1 = तद्धैतत् सत्यकामो जाबालो गोश्रुतये वैयाघ्रपद्यायोक्त्वोवाच यद्यप्येतच्छुष्काय स्थाणवे ब्रूयाज्जायेरन्नेवास्मिञ्छाखाः प्ररोहेयुः पलाशानीति ॥ ३ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 233: | Line 238: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् सम्पदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यास्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ॥ ५ ॥ | | verse_line1 = वसिष्ठाय स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् प्रतिष्ठायै स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् सम्पदे स्वाहेत्यग्नावाज्यस्य हुत्वा मन्थे सम्पातमनयेदायतनाय स्वाहेत्यग्नावाज्यास्य हुत्वा मन्थे सम्पातमवनयेत् ॥ ५ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 275: | Line 281: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति । समृदि्धं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने तस्मिन् स्वप्न निदर्शन इति ॥ ८ ॥ | | verse_line1 = यदा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेऽभिपश्यति । समृदि्धं तत्र जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने तस्मिन् स्वप्न निदर्शन इति ॥ ८ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 438: | Line 445: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = स जातो यावदायुषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः सम्भूतो भवति ॥ २ ॥ ९ ॥ | | verse_line1 = स जातो यावदायुषं जीवति तं प्रेतं दिष्टमितोऽग्नय एव हरन्ति यत एवेतो यतः सम्भूतो भवति ॥ २ ॥ ९ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 516: | Line 524: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्ते । ततो वै खलु दुर्निष्प्रपतनं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥ | | verse_line1 = अभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्ते । ततो वै खलु दुर्निष्प्रपतनं यो यो ह्यन्नमत्ति यो रेतः सिञ्चति तद्भूय एव भवति ॥ ६ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 558: | Line 567: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन् वेद न स ह तैरप्याचरन् पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यश्लोको भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ १० ॥ ३१० ॥ | | verse_line1 = अथ ह य एतानेवं पञ्चाग्नीन् वेद न स ह तैरप्याचरन् पाप्मना लिप्यते शुद्धः पूतः पुण्यश्लोको भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ १० ॥ ३१० ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 578: | Line 588: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसाञ्चक्रुः को न आत्मा किं तद्ब्रह्मेति ॥ १ ॥ | | verse_line1 = प्राचीनशाल औपमन्यवः सत्ययज्ञः पौलुषिरिन्द्रद्युम्नो भाल्लवेयो जनः शार्कराक्ष्यो बुडिल आश्वतराश्विस्ते हैते महाशाला महाश्रोत्रियाः समेत्य मीमांसाञ्चक्रुः को न आत्मा किं तद्ब्रह्मेति ॥ १ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 652: | Line 663: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १२ ॥ | | verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते मूर्धा त्वेष आत्मन इति होवाच मूर्धा ते व्यपतिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १२ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 678: | Line 690: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्ट्वेतदात्मन इति होवाचान्धोऽभविष्यो यद्यन्मां नागमिष्यतः इति ॥ २ ॥ १३ ॥ | | verse_line1 = प्रवृत्तोऽश्वतरीरथो दासीनिष्कोऽत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते चक्षुष्ट्वेतदात्मन इति होवाचान्धोऽभविष्यो यद्यन्मां नागमिष्यतः इति ॥ २ ॥ १३ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 705: | Line 718: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १४ ॥ | | verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते प्राणस्त्वेष आत्मन इति होवाच प्राणस्त उदक्रमिष्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १४ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 732: | Line 746: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते सन्दोहस्त्वेष आत्मन इति होवाच सन्दोहस्त व्यशीर्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १५ ॥ | | verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते सन्दोहस्त्वेष आत्मन इति होवाच सन्दोहस्त व्यशीर्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १५ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 758: | Line 773: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेनमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते बस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १६ ॥ | | verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेनमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते बस्तिस्त्वेष आत्मन इति होवाच बस्तिस्ते व्यभेत्स्यद्यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १६ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 784: | Line 800: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १७ ॥ | | verse_line1 = अत्स्यन्नं पश्यसि प्रियमत्यन्नं पश्यति प्रियं भवत्यस्य ब्रह्मवर्चसं कुले य एतमेवमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते पादौ त्वेतावात्मन इति होवाच पादौ ते व्यम्लास्येतां यन्मां नागमिष्य इति ॥ २ ॥ १७ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 828: | Line 845: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यति आदित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किञ्च द्यौश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ १९ ॥ | | verse_line1 = प्राणे तृप्यति चक्षुस्तृप्यति चक्षुषि तृप्यत्यादित्यस्तृप्यति आदित्ये तृप्यति द्यौस्तृप्यति दिवि तृप्यन्त्यां यत्किञ्च द्यौश्चादित्यश्चाधितिष्ठतस्तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ १९ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 854: | Line 872: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किञ्च दिशश्चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २० ॥ | | verse_line1 = व्याने तृप्यति श्रोत्रं तृप्यति श्रोत्रे तृप्यति चन्द्रमास्तृप्यति चन्द्रमसि तृप्यति दिशस्तृप्यन्ति दिक्षु तृप्यन्तीषु यत्किञ्च दिशश्चन्द्रमाश्चाधितिष्ठन्ति तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २० ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 880: | Line 899: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = अपाने तृप्यति वाक् तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यां अग्निस्तृप्यति अग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किञ्च पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २१ ॥ | | verse_line1 = अपाने तृप्यति वाक् तृप्यति वाचि तृप्यन्त्यां अग्निस्तृप्यति अग्नौ तृप्यति पृथिवी तृप्यति पृथिव्यां तृप्यन्त्यां यत्किञ्च पृथिवी चाग्निश्चाधितिष्ठतस्तत्तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २१ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 906: | Line 926: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत् तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किञ्च विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतः तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २२ ॥ | | verse_line1 = समाने तृप्यति मनस्तृप्यति मनसि तृप्यति पर्जन्यस्तृप्यति पर्जन्ये तृप्यति विद्युत् तृप्यति विद्युति तृप्यन्त्यां यत्किञ्च विद्युच्च पर्जन्यश्चाधितिष्ठतः तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २२ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 932: | Line 953: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = उदाने तृप्यति वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यति आकाशस्तृप्यति आकाशे तृप्यति यत्किञ्च वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतः तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २३ ॥ | | verse_line1 = उदाने तृप्यति वायुस्तृप्यति वायौ तृप्यति आकाशस्तृप्यति आकाशे तृप्यति यत्किञ्च वायुश्चाकाशश्चाधितिष्ठतः तत् तृप्यति तस्यानु तृप्तिं तृप्यति प्रजया पशुभिरन्नाद्येन तेजसा ब्रह्मवर्चसेनेति ॥ २ ॥ २३ ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||
| Line 993: | Line 1,015: | ||
| verse_type = mantra | | verse_type = mantra | ||
| verse_line1 = यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते । एवं सर्वाणि भूतान्याग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत ॥ इति ॥ ५ ॥ ११२४ ॥ ॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमोऽध्यायः ॥ | | verse_line1 = यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते । एवं सर्वाणि भूतान्याग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत ॥ इति ॥ ५ ॥ ११२४ ॥ ॥ इति श्रीमच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमोऽध्यायः ॥ | ||
| commentary1 = chandogya | |||
}} | }} | ||